Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Shri Jainkatha Ratnakosh Bhag-8

Pandit, Shriramvijay · 2011/07

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प्रस्तावना बाजेनकथारत्नकोपनामा ग्रथनोथाठमोनाग नापीथमोयें थमारा सर्व साधर्मी सुझनाइयोनी समदमां मूकेलो वे जे नागमां सम्यग्दृष्टि समस्तस अनोने वाचवा योग्य एवो मुनिवर्य पमित श्रीरामविजयजी विरचित शोलमा तीर्थकर जे श्री शातिनाथ नगवान्, तेमनो मात्र एक रास दाखल करेलो वे कारण के जीवने उत्तम पुरुपोना चरित्रो वाचवाथी तथा सांज लवाथी संसारनो निस्तार थाय वे ा रासना जूदा जूदा न खमो ने, तेमा श्रीशातिनाथ जगवानना वारे नवनी सविस्तर कथा आवेली तेमज वली श्री शांतिनाथजीना मुख्यगणधर जे श्री चक्रायुध तेमना पण सर्वनवनी कथा थावेली ने था यथ एवो तो रमणीय ठे, के जेनी प्रत्येक ढालो,सरस एवा नव रसें करी समिलित ने,अने तेमां घणु करीने तो स्थलें स्थलें वैराग्यकारक उपदेशोज थावेला ठे, के जेने ध्यान दइने वाचवाथी वाचकवृदने ससारनु असारपणुं समजाय ने अने तेथी तेमना अत करणना परिणाम सुधरे , थने पढी तेने सजतिनी श्रेणि प्राप्त थाय ने वली या ग्रथमा वीजी पण चित्तचमत्कतिकारक मग सकलश कुमार,तथा सुमित्रानदादिक तथा पुण्यसार वगेरेनीथनेक कथा थावेली ने तेमज वली श्रावकना वार व्रतपरनी वार कथा श्रावेली ,तेनुं थाही अति वर्णन न करतां सर्व नाश्योने हुं एटलीज नलामण करुं बुं, के ते सर्व कथा तेउये पोतेंज पोतानी मेलें वांची तेनुजे याथातथ्यस्वरूप बे, समजवु था रास, मुनिवर्य पमित श्रीरामविजयजीयें पंमितश्रीश्रजित प्रनस रिये सस्कृत पद्यमा वनावेला श्री शांतिनाथचरित्र उपरथी रचेलो होय एम लागे के कारण के ते सस्कृतयथ बने था ग्रथ ज्यारे पापणे मेलवी वाची .ये,त्यारे बदुश वेगु ग्रंथनी श्रदश वात मलतीज थावे डे मात्र'श्रा रासमा सगुने सारी रीते समजी शकाय तेमाटें वैराग्यकारक कथाठमां तथा केटलाएक कविननागमा, यत्किंचित् चरित्रग्रंथगत न बता वधारेल ले तथा एवीज रीतें चैत्यवदन स्तवन पण नवीनज बनावेला ने थारासमां प्रसगोपात पृथक् पृथक्क विकत श्लोको तथा दोहा तथा सिमा तनी गाथा पण लीघेलीयो बे वलीथा ग्रथमां शब्दानुप्रास तो एवा उत्तम T श प्रस्तावना. श्रावेला , के जेना वांचवाथी वांचनारने तथा सांजलनारने अमंद एको थानद उत्पन्न थाय ,ते थानदनुं यथायोग्य वर्णन करवामां श्रमारीफजम, काम करी शकती नथी थने या ग्रंथ सस्कृतपरथी जे रासरूपें रचो ,ते तो कवियें केवल सस्कृतनापाना थविज्ञातजनोनो महोटो उपकार करेजो ने केम के ' जो था रास न करे, तो सस्कृतना थविज्ञातजनोने श्री शांति नाथना चरित्र वाचवानो लान मली शके नहिं हवेथा अथने श्रमोयें ज्यारें डापवानो विचार कस्यो,त्यारे ते बापवाने माटें प्रथम धाग्रथनी प्रत जोश्य तो पनी ते प्रतनो जे जे स्थलें मलवानो सजय हतो,ते ते स्थलें श्रमोयें पत्र हारा तपास कराव्यो,थने वली श्रादि मुंषश्मा पण प्रयासपूर्वक तपास करो,परतु कोइ पण स्थलथी तेनी एक पण प्रत अमोने उपलब्ध थइ नही, मात्र नावनगरथी श्रमारा सुझसाधर्मीलाइ जे शेत कुवरजी थाणवजी तेथे श्रमोने एक प्रत मोकली अने पड़ी एक प्रत थमारा घरना पुस्तको शोधवाथी मली श्रावी तेमां थमारा घरनी प्रत शोध करेली होवाथी घणी शुक्ष दती, परंतु ते प्रतमा प्रथमपी ते चोथा खमनीत्रीजी ढाल पर्यंतनां पत्रोज दतां नदि,त्यारें तो ते नावनग रथी थावेली प्रत उपरथीज थमोयें था ग्रंथ यथामति सशोधन करावीने ते चोथा खमनी त्रीजी ढाल सुधी बाप्यो ,माटें एक प्रतपरथी उपावाथी तेमा केटलीएक नूलो रही गश्दशे तदनतर तो थमोयें था ग्रथने बेतु प्रत साथै मेलावी, तेनु प्रयास पूर्वक यथाबुद्धि सशोधन करावी बाप्यो डे तो पणथा ग्रथमा दृष्टिदोपथी तथा कपोस करनारनी जूलथी तथा अज्ञा नथी जे कांई भूल चूक रही गइ होय,तो तेने सर्वसाधर्मिनाक्ष्योयें, मारी पर सुधारीवांचवारूप कृपा करवी अने वाली हे सुझजनो ससार विटंबणाने वधारनार एवा वीना कार्योमा व्यर्थ व्यय न करतां श्रावा अमारा,ससारो छेदक एवा उत्तम कार्योमा तन, मन धनधी उदार थाश्रय थापवामाश्रमा रापिताना समयमा जेम वक्ष्परिकर रहेता दता, तेम साप्रतसमयमा पण रदेशो एवी थमने पूर्ण थाशा वे कारण के थावा ज्ञानवृद्धिकार्यने उसे जन थापनारा जनोने ज्ञानदान समान पुण्यनी प्राप्ति थाय ते सुमतिजनेषु किं बुद्ध विलेखनेन ॥ शुन नूयात् ॥ ॥श्रावक खीमजी नीमसिह माणक ॥ , ॥ अस्य ग्रथस्यातिसंक्षिप्तानुक्रमणिका ॥ १ श्री शांतिनाथ नगवाननावार नवमाहेला पहेला नवमांश्रीशां तिनाथजी श्रीपेणराजा था उपन्या, तेनु सविस्तर चरित्र श्दश विधधर्माचरण करनारने सुख प्राप्त थाय,तेविपे मगलकलशकुमारक स ३ वीजे नवें श्री शातिनाथजी उत्तरकुरुमा युगलिया देव थइ उपन्या ३० धत्रीजेन- श्रीशातिनाथ नगवान् सौधर्मदेवलोकमा देव थ उपन्या ॥ अथ द्वितीयखमस्यानुक्रमणिका ॥ ५ श्रीशातिनायना चतुर्थनवप्रसगार्थ हरि प्रतिहरिप्रमुखनु चरित्र ३३ ६ चोथेनवे श्रीशांतिनाथनगवान,यमित तेजाविद्याधर थया, तेनुं च०७१ 8 सांतरायधर्म पालनयी सातराय सुखप्राप्त थाय, तेमा मत्स्योदरक० ५५ ७ पांचमे नवें श्रीशातिनाथ प्राणतदेवलोकमा दिव्यचूलनामा देव थ००५ ॥ श्रथ तृतीयखमस्यानुक्रमणिका ॥ ए के नवें श्रीशांतिनाथजी अपराजितनामें वलदेव थया, तेनुं चरित्र ७७ १० अल्पपएकपायसेवनयी जीव रखी थायचे ते पर मित्रानदादिक का ए ११ सयमपालवामांकायरपणुन राखवामा जिनपालने जिनर दित दृ० १२१ १२ त्वग्गत, यस्थिगत ने मलागत एवा धर्ममां नरसिह राजानीक० १३३ १३ श्रीशातिनाथ नगवान् सातमे नवें अच्युतं देव थ उपन्या १४३ ॥ श्रथ चतुर्थखमस्यानुक्रमणिका ॥ १४ बातमे नवें श्रीशातिनाथजीवज्वायुधचक्री या उपन्या,तेनुचरित्र १४ १५ विचारीकार्य करवामाथाम्रनिपात्यादि दृष्टातो,तेमांवीजी कथाजे १५३ १६ वजायुधचक्रीने चक्र उत्पन्न थयुं ते तथा चक्रीपणानीसपदानुवर्णन १७७ १७ पुण्यथी सुखप्राप्ति थाय , तेमा पुण्यसार कुमार कथा १७ चतुर्विध बुद्धिमाहेली थोत्पातिकी बुद्धिमा रोहकनी कथा १ए श्री शांतिनाथनी नवमें नवें नवमग्रवेयके देवता थया ॥ अथ पंचम खमस्यानुक्रमणिका ॥ २० दशमे नवें श्रीशांतिनाथ मेघरथराजा थया,तेनु सविस्तर चरित्र १७ २१ पौपधशालामांपोपध करवा वेला मेघराजाना शरणमा थावेला पारेवाने थापेलाथनयदानविपे सवादरूपेथनेकमनोहर कथा १२६ १GH २०५ - अनुक्रमणिका. २३ धर्मथी थापत्ति दूर थाय ,थने मुखनी प्राप्ति थाय , तेविपे श्रन्यकथायुक्त गतनवमांशूरनामक थयेला वत्सराजनी कथा २४ २३ अग्यारमे नवें श्रीशांतिनाथजी सर्वार्थ सिझविमानमां देव थया २३ ॥अथ षष्ठखमानुक्रमणिका ॥ २४ बारमे नवे पोतेंन श्रीशांतिनाथजी चक्री, तथा श्रीशोलमा तीर्थ कर श्रीशांतिनाथ नगवान् थया तेमनु मनोहर सविस्तर चरित्र २एम २५ विषयत्यागथी सुख प्राप्ति थाय, तेमा गुणधर्मकुमारनी कथा ३१६ २६ कषाय त्यागना उपदेशमा नागदत्तनुं वृत्तांत २० प्रथम प्राणातिपात व्रतना उपदेशमा यमपाशनी कथा २७ दितीय मृषावाद विरमण व्रत उपदेशमा जश्रेष्ठिकथा ३४३ श्ए तृतीय स्थूलथदत्तादानविरमणव्रतपर जिनदत्तकथा ३४ए ३० चतुर्थ मैथुनविरमण व्रत पर करालपिंगल पुरोहित कथा ३१ पचम परिग्रहपरिमाणव्रत उपदेशमा मुलसकथा ३६४ ३२ पष्ठदिशिपरिमाण व्रतपर स्वयंसुदेवकथा ३३ सप्तमनोगोपनोग विरमण व्रतपर नितशत्रुतथा नित्यममिता कथा ३०५ ३५ थष्ठम थनर्थदमविरमण व्रत पर समृधिवत्तकथा ՉԵՆ ३५ नवम सामायिक व्रतोपदेशा सिदश्रावक कथा ३१ ३६ दशम देशावकाशिक व्रतोपदेशमा गगदत्तनी कथा ३४ ३० एकादश पोपध व्रतोपदेशमा जिनच कथानकम्, ३७५ ३० हादश अतिथिसविनाग व्रतोपदेशमा शूरपालकथा ३एन ३५ श्रीशांतिनाथजीनापुत्रचकायुधे दीक्षा लीधीने मुख्यगणधरथया ४१५ 10 मोदराजानु तथा तेना सैन्यनु वर्णन थने जीव,ससारख नोगवे , तेने ज्ञान प्राप्तिथी मुख थाय बे, तेमा रत्नचूडनो दृष्टांत ४१६ ४१ श्रीशांतिनाथचतुस्त्रिंशदतिगवर्णन तथा तत्परिवारसख्या कथन ४५ ४२ श्रीशातिनाथनु मोक्षगमन,ते पठी देवादिकत शोक तथा देवकत निर्दरक्रिया, त्रिंशमोहस्यानविवेचन, कोटिशिलातीर्थमा चका युध मुक्तिगमन, तथा शांतिजिनस्तुति ४३२ ४३ श्रीशातिनाथजीनावार नवनानामनिर्दशथने ग्रथकारनीप्रशस्ति ४३ए ४४ स्वीयोने शिखामणना केटलाएक तूटा लूटा वोलो ४४४ ॥अथ। ॥ पंमित श्रीरामविजयजी विरचित श्री शांतिनाथनगवाननो रासमारन ॥ ॥ तत्र॥ ॥प्रथमखम प्रारज्यते ॥ ॥ दोहा ॥ सकल श्रेयवरदायिनी, मुनिवरवदित जेद ॥ जिनपद लझी नित नमु,थाणी अधिक सनेह ॥ १ ॥ उनय थर्थ वाहन , सदा विराजे जेद ॥ ते श्रीकृपन प्रनू तणां, चरण नमुं गुणगेह ॥ ५ ॥ यत रग रिपुवर्गदल, जिण जित्यु णमांहि ॥ अजित स्वामि पमुदा नमुं, ते जिन धरि उत्साह ॥ ३ ॥महिमा महोटो जेहनो, सकल सुरक दातार ।। जवि मनोवांबित पूरवा, कामकुन अवतार॥ ४ ॥ कुशलव जिवन सींचवा, जे पुष्कर जलधार ॥ विश्वसेनकुल यवतस्या, सकलजतु थाधार ॥ ५ ॥ शांतिनाथ प्रनु शोलमा, गजपुरस्वामी देव ॥ वेदु पदवी धारक थया, सारे सुर नर सेव ॥ ६ ॥ ते श्रीशाति जिपदनो, सरस रसिक सवध ॥ विस्तारें करि वर्णवु, हादश नव अनुवध ॥ ७॥ गुण अनत श्रीजिन तणा, केम करि वर्णव्या जाय ॥ पण ते प्रभुनी नक्तिनु, महोटु मुफ सहाय ॥ ७ ॥ श्री सुमति मुगुरु विद्यानिधे, पदन एह रसाल ॥ ढालबंध श्री शांतिनो, रासप्रवध विशाल ॥ए ॥ नव नव नव चढती कला, शुक्ल पक्ष् जिम चद ॥ जिम कीधा तिम वर्णवु, धरि मनमा थानद ॥ १० ॥ नव पहेले श्रीपेण नृप, विलसी वद् सपत्ति ॥ ते विस्तारें दु कहु ,सुणजो नवि इक चित्त ॥११॥ ॥ ढाल पहेली॥ ॥स्वस्ति श्रीशाला ॥ ए वेशीजवुदीप थनूपम उपे, सकलदीप शृगार ॥ मेरुमहिधर मध्य विराजे,लख योजन विस्तार ॥जेमांहे जाजा शुनथावासा, वासघरा दो चार ॥ तेद तणे श्रतर थन्यतर, सनिवास सुविचार ॥१॥ यसक्तमागमे ॥ नरहं हेमवयति, हरिवासति महाविदेति ॥ रम्म गए रमवयं, एरवयं चेव वासा ॥ १ ॥ तेमादे शुजरत जन बढ सयु D शुन दोहला लाघे अगज वाघे, साघे धर्मविचार ॥ शुनवेला राणी गुणमशि । ए॥श्रीपेण नरिंदा घरे थानदा,थावती पर वार ॥ घदी ठोडावे गुणिजन गावे, घोले जयनयकार ॥ चिरं जीवो नवन थाशीप ॥ १० ॥ देखी दोय पुना गुणसंपत्ता, मना दर्षनरेश, माता इसरावे वति धवरावे, स्तन यहि निज करेण ॥ सुत नामें सुदर गुणमणि मदिर, पेण विमुपेण ॥ चढती वय पामे वडुलन कामे, शोने रूपगणेश जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. त, नरत नाम वरवित्त ।। जिनवर चक्रधरादिक नरवर, चरणवास सुपरि त ॥ रतनूमिनूषण गतदूषण, पत्तन वगुजनवासं ॥ रमपुरं पुरमा एलो पम, पदु मणि रयण निवास ॥ ॥ वापी वप्र विदार विराजे, वारीपन थाराम ॥ सकललोकधनवत विलासी, बहुधाशा विश्राम ॥ ज्ञानी मानी वानी मानी, सजानजन सन्मान ॥ एह नगर अनोपम उपे, पुरीन मान ॥ ३ ॥ वारु नीति शुनरीति महामति, लक्ष्मीपति गुणधारी भी पेणानिय नामें नूपति, जाणे सुर अवतारी ॥ नाम कांत नूपति गुण पाएं, नरवसदो नरसिहो ॥ राजा राज्य करे थतुली बल, तेजें अकल थबीरे ॥ ४ ॥ तेद घर राणी गुणशणी, नाणीती जगाय ॥ रूपें रति दोष पट्टराणी, वादाली जीवित प्राय ॥अनि सिंह धागल नविता जोरे, वते अनिधान ॥ विलसे ते साथें नृप जगनाथे, जोडी जोडीसमान ॥५ विलसता नोगा पुण्यसयोगा, एक दिवसने योग ॥ सुखसेजें सूती पुल पनोती, पदेलीस्तीनीरोग ॥ ऋतुधर्म सनाता तेन दिखाता, चद सूर व ॥ देखे उत्सगे क्रीडा करता, धरता अति धानव ॥ ६ ॥ देत सुपनतर हर्ष निरंतर, दियडे गजगति गेल ॥ थावी पियुपासें मन का मानु मोहनवेलाजय जय मुज स्वामी श्रतरजामी,प्राण नाथ अवधार । मुदणे में दीता लाग्या मीठा, घर सूर्य दोय सार ॥ ॥ तेदनुं फल सामी कहो रतिकामी, प्रबुवे कर जोडी । सानल मृगनयणीथमृत वयणी, फल नाखु मन कोड ॥ होशो सुत सुदर रूप पुरंदर, निजकुलदीपक दोय॥ हरवी ते राणी ने मुणि वाणी, थाची मदिर सोय॥ ७॥ दोय गर्न धरती ते गुणवती, सोदे थग थपार ॥ जाणग उपगारी दोयने धारी, धरणीपरें गुणधार । जग थानदन, कोडाकोडि वरीस ॥ सोदव श्म गावे हर्ष वयावे, देती या ॥ ११ ॥ हवे थष्टम व वडले होय नद । निशालें सूडा , " ३ श्री शांतिनायनो रास खंग पदेलो. जिम ते रुडा, बुझे जेद अमद ॥ रसयथ अनुत्तर कला वहुत्तर, नणि या नारे नेद ॥ देखी दोय जाया हरखी माया, वाध्यो चित्त उमेद ॥१२॥ यौवन वय पाया रूप सुहाया, मानु दोय रतिकंत॥मावित्र मनोरथ करता सारथ, राजलील विलसत ॥ पहेली ए ढालें पुण्य विशालें, दाख्यो राज विलास ॥ श्री सुमति सुगुरुनो शिप्य कहे नवि, सुणो शांतिजिनरास ॥१३॥ ॥ दोहा॥ ॥ इण अवसरें नरतमां, मगधनाम गुन देश ॥ तेमां वदुझमें जयो, अचल नाम सन्निवेश ॥ १॥ वेद विचरण तिहा वसे, वारू वाडव एक ॥ धरणीजट नामें निपुण, सकल शास्त्र सुविवेक ॥ २ ॥ तस घरणी धरणी परें, क्षमावतमां लीद ॥ नाम यशोनश वली, मीठी जेहनी जीह ॥ ३ ॥ पियुसाथै मुख विलसतां, जन्म्या धगज दोय ॥ नदिनूति श्रीनूति वेढु, रूप अनूपम सोय ॥ ४ ॥ ॥ ढाल वीजी॥ ॥श्रेणिक मन थचरिज थयो ॥ ए देशी ॥ ते हिजना घरमा वसे, कपिला नामें दासी रे ॥ यावी यौवनवेशमां, प्रेम कला सुविलासी रे ॥ १॥वि रु विपय विडंबना ॥ ए आंकणी ॥ जो जो जगत विमासीरें ॥ विपयसमी विपमी नहीं, महियल महोटी हांसी रे ॥ वि० ॥ २ ॥ रूप देखी दासी तणु, वाडव थयो विपरीतो रे॥ वेदकला थलगी रही, मोहकलणमां खूतो रे ॥ वि० ॥ ३ ॥ लोकलका नवि लेखवी, मोहतणे वश लीनो रे ॥ शील तजीने कुशीलिनी, थयो दासी थाधीनो रे ॥ वि० ॥ ४ ॥ सुख विलसतर्ता तेदगं, कपिला कुखनो जायो रे ॥ कपिल मुत त्रीजो थयो, जातिविही न गवायो रे ॥ वि० ॥ ५ ॥श्रगज दोयने थादरे, वेदाध्ययन करावे रे ॥ जाति विदीन जाणी करी, कपिल नगीन जणावे रे॥ वि०॥ ६ ॥ मानहीन मति थागतो, थलगो रहि एक चित्तें रे ॥ श्रवण मनन चिंतन करी, शास्त्र जरो शुन रीतें रे ॥ वि० ॥ ॥ सांजलता सघली कला, शीख्यो सकल विचारो रे ॥ वेदकलाकुशली थयो, मानधनी मतिधारो रे ॥ वि० ॥ ७ ॥ जाति थवझाने नये, नगर मूकी नीसरियो रे ॥ यज्ञसूत्र दोय धारतो, मादा मादण जिम वरियो रे ॥ वि०॥ ए ॥ विद्यामा माहा लतो, सघरतो पी रे ॥ श्रनुक्रमें रनपुरें गयो, सुख पाम्यो ते दीठे रे , , जैनकथा रत्नकोष नाग बाग्मो त, नरत नाम वर खित्त ॥ जिनवर चक्रधरादिक नरवर, चरणवास सुपवि त ॥ नरतनूमिनूषणं गतदूषण, पत्तन बहुजनवासं ॥ रमपुरं पुरमा रनो पम, बढ मणि रयण निवास ॥ ५॥ वापी वन विहार विराजे, वाडी वन थाराम'॥ सकललोकधनवत विलासी, बद्धाशा विश्राम ॥ ज्ञानी ध्यानी वानी मानी, सहाननन सन्मान ॥ एहवु नगर थनोपम उपे, पुरी थप मान ॥ ३ ॥ वारु नीति शुनरीति महामति, लक्ष्मीपति गुणधारी ॥ श्री पेणानिध नामें नूपति, जाणे सुर अवतारी ॥ जीम कांत नूपति गुण धारे, नरवसहो नरसिदो ॥ राजा राज्य करे धतुली बल, तेजें थकत थपीहो ॥३॥ तेद घर राणी गुणज्ञाणी, नापीती जगमाय ॥ रूपें रति राणी दोय पट्टराणी, वाहाली जीवित प्राय ॥अनि सिंह धागल नविता जोडे, श्रा वते थनिधान ॥विलसे ते सायें नृप जगनाथे, जोडी जोडी समान ॥ ५ ॥ विलसता जोगा पुस्यसयोगा, एक दिवसने योग ॥ सुखसेजें सूती पुस्य पनोती, पहेली स्त्री नीरोग ॥ ऋतुधर्म सनाता तेज दिखाता, चव सूर दोय श्व ॥ देखे उत्सगे क्रीडा करता, धरता थति थानद ॥ ६ ॥ देखी सुपनतर दर्प निरतर, हियडे गजगति गेल ॥ यावी पियुपासें मन उमा सें,मानुं मोहनवेलाजय जय मुफ स्वामीथतरजामी,प्राण नाथ अवधार ॥ सुहणे में दीता लाग्या मीठा, घर सूर्य दोय सार ॥७॥ तेदनुं फल स्वामी कहो रतिकामी, पूढचे कर जोडी ॥सानल मृगनयपीथमृत वयणी, फल नाखुमन कोड ॥ दोशे सुत सुदर रूप पुरंदर, निजकुलदीपक दोय॥दरखी ते राणी ने सुणि वाणी, थावी मदिर सोय॥ ॥दोय गर्न धरती ते गुणवती, सोहे थग थपार ॥ जाणग नपगारी दोयने धारी, धरणीपरें गुणधार ॥ शुन दोदला लाघे गज वाघे, साधे धर्मविचार॥शुनवेला राणी गुणमणि खाणी, प्रसवे दोय कुमार ॥ ए ॥ श्रीपेण नरिंदा धरे थानदा,थावता दर पार ॥ घदी दोहावे गुणिजन गावे, वोले जयनयकार ॥ चिरं जीवो नदन जग थानदन, कोडाकोडि वरीस ॥ सोहव श्म गावे हर्ष वधावे, देती बद्ध थाशीप ॥ १० ॥ देखी दोय पुत्ता गुणसयुत्ता, मत्ता दर्पनरेण, माता दुलरावे पनि धवरावे, स्तन यहि निज करेण ॥ सुत नामें सुदर गुणमणि मदिर, उपेण विमुपेण ॥ चढती वय पामे बहुजन कामे, शोने रूपगणेण ॥ ११ ॥ हवे थष्टम व बहुप्से ह, पातविया दोय नद ॥ निशालें सूरा . श्री शांतिनाथनो रास खंग पदेलो. य कोरां वस्त्र जो नाली रे ॥ वि० ॥ २५ ॥ जलवाला उद्योतथी, देखी श्रग जलनीनु रे ॥ मनमांहे चिते ए सही, नहिं आचरण कुलीनु रे ॥ वि० ॥ २६ ॥ नग्नपणे थाव्यो हां, धिक् एहन गृहवासो रे ॥ मद रा ग ते ऊपरें,नामा गुण यावासो रे ॥ वि०॥ २७ ॥ वीबू न पडे कवलें, सहू कहेए वातो रे॥राम कहे वीजी ढालमा, जोई लेजो जातो रे ॥ वि० ॥२७॥ ॥ दोहा सोरती ॥ ॥ कपिल तणो हवे वाप, कर्मवों थयो दूवलो ॥प्रगटयां पूरव पाप, वीण थयु धन जेहनु ॥ १ ॥ जोडीजे सो वार, राख्यु एद रहे नहिं ॥ खरचे को गुन गम, जिम वाधे वमणु वली ॥ २ ॥ यमुक्त नैषधे ॥ पूर्वपुण्यविनवव्ययसृष्टा , सपदोविपदएव विमृष्टा ॥ पात्रपाणिकमला पणमासा,तार्स शातिकविधिविधिदृष्ट ॥१॥पूर्वदोहा॥ मूकी मननु मान, पर देशे ते सचस्यो ॥ जाणी कपिल सन्मान, रत्नपुरे याव्यो वही ॥ ३ ॥ थावत दीगो तात, दोडी लाग्यो पाउलेनीयो हियडे जात, हर्प धरी हेजालुवे ॥ ४ ॥ कोई मिप करि सोय, नोजन अवसरें कतने ॥श्रलगो वेठो जोइ, चित्त चमक्यु नामा तणुं ॥ ५ ॥ ॥ ढाल त्रीजी॥ ॥ नमणी खमणी ने मन गमणी ॥ ए देशी ॥ नामा कर जोडी कहे वाच, ससरानी मुफ नाखो साच॥ तुम थंगज एह के अवर, फूल कहो तो हत्या हिजवर ॥ १ ॥ हत्यापातक विहितो तेद, साचु कहे मुण वद्य गुणगेद ॥ ए मुफ दासीनो धगजात, सानली समजी सघती वात ॥ ५ ॥ धन थाप्युं तिहा कपिल प्रवर, धरणीजट चाल्यो निज नगर ॥ सत्य नामा गइ नृपनी पासें, कर जोडीने एणि परेनासे ॥३॥ स्वामी तु पचम लोकपाल, दीन श्रनाथ तणो रखवाल ॥ हूं 5 खणी ने थवला वात, कर कर स्वामी सार सजाल ॥ ४ ॥ यत ॥र्वलानामनाथानां, पासपक्ष तपस्विनाम् ॥ श्रन्यायपरिनूतानां, सर्वेपा पार्थिवोगति ॥ ५ ॥ बप्पय ।। रोपे तरु उतवात, वाल तरुवरने सींचे ॥ कटक काढे दूर, सरल तरु राखे वञ्चे ॥कच नमाहे जाड, जूमि पडता के रस्के ॥ जे छल्यां बढ़ फूल, तास पण स्वाद न चस्के॥ एमथनेक माली तणा, गुण सघता अगें धरे॥ राम कहे ते नूपिति, सकल लोक सपति करे ॥ ३ ॥ पूर्वढाल ॥ जाति येषां तान जैनकथा रत्नकोषनाग आग्मो. वि० ॥ १० ॥ नगर निरीक्षणकारणें, नमतो कपिल कदापि रे ॥स की पाठक तिहां वसे, हिंजवर श्रमल अपापीरे ॥ वी० ॥ ११ ॥ गत्र णावे ते बहु, कपिल गयो तस गेह रे ॥ वेद थर्थ पूजे घणा, अगम गोचर जेद रे ॥ विज्॥१३॥ उत्तर नवि देई शक्यो, मात्र सबल मति तो रे ॥ सत्यकी मन दरख्यो घणु, मतिगुण देखि महतो रे ॥ वि०॥ ३ ॥ विद्याथी श्रादर लहे, विद्या सबल सखायी रे ॥ विद्या वधु विदेशमा, वद्या दैवत सहायी रे ॥ वि०॥ १३ ॥ यमुक्त ॥ दर्जुर्याति न गोचरं किम पश पुमाति सर्वात्मना, ह्यर्थिन्य प्रतिदीयमानमनिश वृद्धि परामृति ॥ कल्पातेष्वपि न प्रयाति निधन विद्यारख्यमतईन, प्रति मानमुपत जना कस्तै सह स्पर्वते ॥ १॥ पूर्वढाल॥योग्य जाणीने सत्यकी, कपिलने नेजपद स्थापे रे ॥ विद्यागुण ए जीवने, बहु सुख पदवी थापे रे ॥ वि० ॥१५॥यक्तं ।। गुणाब्धावादर कार्य , किमाटोपे प्रयोजनम् ॥ विक्रीयते न वंटानि, गाँव क्षीरविवर्जिता शादोदो॥निर्गुण बमेथप्पणा, परपुळे गुण बत॥ सिर धारिलो वण कुसुम,गज मल मत ॥३॥पूर्वदालापातकगृहिणी जबुका, तस पुत्री सत्यनामा रे॥कपिलने जाणी योग्यता, परणावी अनि रामा रे ॥ वि० ॥१६॥ नाम थयुं ते नयरमां, कपिल कपिल सद्ध बोले रे ॥ पुण्यदशा जस पाधरी, ते नरने कुण तोप्ले रे ॥ वि०॥ १७ ॥ सपाध्याय दरख्यो घणु, मुज नाग्य ए मलियो रे ॥ पुत्री पुस्यवती घणु, सबल मनो रथ फलियो रे ॥ वि० ॥१७॥ जगजीवाडण एदवे, वृषा ऋतु तिहां यावे रे ॥ सवल घटा धन मेलवी, जगमांदे जल वरसावे रे ॥ वि० ॥ १ ॥ चिद् दिशें चमके दामिनी, सबल सजल घन गाजे रे ॥ जलधारा वरसे घणु, ताप जगतनो नांजे रे ॥ वि० ॥ २०॥ इण अवसरें रयणी समे, नाटक देखण काजे रे ॥ कपिल गयो ते एकलो, वेदो जने समाजें रे॥ वि०॥ २१ ॥ नाटक जोश्ने वल्यो, विरमी नहिं जलधारो रे ॥ मन चिते हा मनुप्यनो, नहिं कोई सचारो रे ॥ वि० ॥ २२ ॥ कोण थक जीना करे, वस्त्र सकल कतारी रे ॥ थई निरंडक नीसमो, कक्षांतर सवि धारी रे ॥ वि०॥ २३ ॥ थावी निज घर थांगणे, थक पहेरी श्रगें रे ॥ घर पेसता सामुही, सत्यनामा मन रंगे रे ॥ वि० ॥ २४ ॥ थक पियु थागत धस्सा, नूतन कपिल निहाली रे ॥ सुण वनिते मरें करी, श्री शांतिनाथनो रास खम पदेलो ए कोरां वस्त्र जो नाली रे ॥ वि० ॥ २५ ॥ जलवाला उद्योतथी, देखी थंग जलनीनु रे ॥ मनमांहे चिते ए सही, नहिं आचरण कुलीनु रे॥ वि० ॥ २६ ॥ नग्नपणे याव्यो शहा, धिक् एहशु गृहवासो रे ॥ मद रा ग ते ऊपरें, जामा गुण यावासो रे ॥ वि०॥ २७ ॥ बीबू न पडे कवलें, सहू कहेए वातो रे॥राम कहे वीजी ढालमा, जोई लेजो जातो रे ॥ विण ॥२७॥ ॥ दोहा सोरठी ॥ ॥ कपिल तणो हवे वाप, कर्मवों थयो दूवलो ॥प्रगटघा पूरव पाप, वीण थयु धन जेहनु ॥ १ ॥ जोडीजे सो वार, राख्यु एह रहे नहि ॥ खरचे को शुन ताम, निम वाघे वमणु वली ॥२॥ यमुक्त नैपधे ।। पूर्वपुण्यविनवव्ययसृष्टा, सपदोविपटएव विमृष्टा ॥ पात्रपाणिकमला पएमासा,ताठे शातिकविधिर्विधिदृष्ट ॥१॥ पूर्वदोहा।। मूकी मननु मान, पर देशे ते सचस्यो ॥ जाणी कपिल सन्मान, रत्नपुरे श्राव्यो वही ॥ ३ ॥ थावत दीतो तात, दोडी लाग्यो पाठले ॥ नीध्यो हियडे जात, हर्प धरी हेजालुवे ॥ ॥ कोई मिप करि सोय, लोजन अवसर कंतने ॥ यलगो वेतो जोश, चित्त चमक्यु नामा तणु ॥ ५ ॥ ॥ ढाल त्रीजी॥ ॥ नमणी खमणी ने मन गमणी ॥ ए देशी ॥नामा कर जोडी कहे वाच, ससरानी मुफ नारखो साच ॥ तुम अगज एह के अवर, फूठ कहो तो हत्या हिजवर ॥ १ ॥ हत्यापातक विदितो तेद, साचु कहे मुण वदु गुणगेह ॥ ए मुफ दासीनो अगजात, सानली समजी सघली वात ॥ २ ॥ धन थाप्युं तिहां कपिल प्रवर, धरणीजट चाल्यो निज नगर ॥ सत्य नामा गइ नृपनी पासें, कर जोडीने एणि परेनासे ॥३॥ स्वामी तु पंचम लोकपाल, दीन श्रनाथ तणो रखवाल ॥ हुँ 5 खणी में थपला बाल, कर कर स्वामी सार सनाल ॥ ४ ॥ यत ॥र्बलानामनाथानां, वालवृक्ष तपस्विनाम् ॥ श्रन्यायपरिनूतानां, सर्वेपा पार्थिवोगति ॥ २ ॥ उप्पय । रोपे तरु उतवात, वाल तरुवरने सींचे ॥ कटक काढे दूर, सरल तरु राखे व ॥कच नमाडे जाड, नूमि पडतां केश ररके ॥ जे फुल्या बदु फूल, तास पण स्वाद न चरके ॥ एमथनेक माली तणा, गुण सघला यगें धरे। राम कहे ते नूपिति, सकल लोक सपति करे ॥ ३ ॥ पूर्वढाल ॥ जाति - ४ जैनकथा रत्नकोपनाग आठमो. ॥ विध॥१७॥ नगर निरीक्षणकारणें, जमतो कपिल कदापि रे ॥त त्यकी पाठक तिहा वसे, हिनवर अमल श्रपापीरे ॥ वी० ॥ ११ ॥ गत्र जणावे ते बद्द, कपिल गयो तस गेह रे ॥ वेद बर्थ डे घणा, धगम थगोचर जेह रे ॥ वि०॥ १२ ॥ उत्तर नवि देई शक्यो, लगत्र सबल मति मतो रे ॥ सत्यकी मन हरख्यो घणु, मतिगुण देखि महंतो रे ॥ वि०॥ १३॥ विद्याथी श्रादर लहे,विद्या सवल सखायी रे ॥ विद्या वधु विदेशमा, विद्या दैवत सहायी रे ॥ वि०॥ १४ ॥ यमुक्त ॥ हर्जुर्याति न गोचरं किम पिश पुमाति सर्वात्मना, ह्यर्थिन्य प्रतिदीयमानमनिश वृद्धि परामृहति। कल्पातेष्वपि न प्रयाति निधन विद्याख्यमतईन, येषां तान प्रति मानमुक्त जना कस्तै सह स्पईते ॥ १॥ पूर्वढाल ॥ योग्य जाणीने सत्यकी, कपिलने निजपद स्थापे रे॥ विद्यागुण ए जीवने, बहु सुख पदवी थापे रे ॥ वि० ॥१५॥ यमुक्तं ॥ गुणाब्धावादर कार्य , किमाटोपे प्रयोजनम् ॥ विक्रीयंते न घंटानि, गाव क्षीरविवर्जिता ॥शादोहो॥निर्गुण उमेथप्पणा, परपुले गुण वत्त। सिर धारिवण कुसुम,गज मल ढंमत ॥३॥पूर्वढालापाठकहिणी जंबुका, तस पुत्री सत्यनामा रे ॥ कपिलने जाणीयोग्यता, परणावी अनि रामा रे ॥ विण ॥१६॥ नाम ययुं ते नयरमां, कपिल कपिल सद्ध बोले रे ।। पुण्यदशा जस पाधरी, ते नरने कुण तोलें रे॥ वि० ॥ १७ ॥ हपाध्याय दरख्यो घणु, मुफ नाग्ये ए मलियो रे ॥ पुत्री पुण्यवती घणु, सबल मनो रथ फलियो रे ॥ वि० ॥१७॥ जगजीवाडण एदवे, वृषा ऋतु तिहां थावे रे॥ सबल घटा घन मेलवी, जगमाहे जल वरसावे रे ॥ वि० ॥ १५ ॥ चिट्ठ दिशें चमके वामिनी, सबल सजल धन गाजे रे ॥ जलधारा वरसे घणु, ताप जगतनो नाजे रे ॥ वि० ॥ २० ॥ण अवसरे रयणी समे, नाटक देखण काजे रे ॥ कपिल गयो ते एकलो, वेगे जश्ने समाजें रे ॥ वि० ॥ २१ ॥ नाटक जोईने वव्यो, विरमी नहिं जलधारो रे ॥ मन चिते श्दा मनुष्यनो, नहिं कोई सचारो रे ॥ वि०॥ २२ ॥ कोण अमुक जीना करे, वस्त्र सकल कतारी रे ॥ थई निरशुक नीसखो, कक्षांतर सवि धारी रे ॥ वि० ॥ २३ ॥ श्रावी निन घर थांगणे, थक पहेरी थंगें रे ॥ घर पेसता सामुदी, सत्यनामा मन रंगें रे ॥ वि० ॥ २ ॥ यक पियु थागल धया, नूतन कपिल निहाली रे ॥ सुण वनिते मो करी, , , " . श्री शांतिनायनो रास खंम पहेलो. कोरा वस्त्र जो जाली २ ॥ वि०॥ १७ ॥ जलवाजा उद्योत्तथी, थंग तकनी- २॥ मनमा चिने ए तही नहिं-याचरण कुलीनुं वि० ॥ २६ ॥ ननपरो बाचो हां रिश् एहचुं गृहवानो ॥ मं गते ऊपरें जामा गुणवावानो रे ॥ वि०॥ १३ ॥ बीबूं न पडे पंचों, कहेए वातोरेगाराम कहेवीजी टालमा जोलेजोलातो॥ वि॥ n टोहा नोरती॥ ॥ पिल तणे हवे वाप र्मकों घयो दूधजो ॥प्राध्यां पूव ही घयुं धन जेहनु ॥ १ ॥ नाजीनें तो वार रामु एह रहे ना सरचे को गुन तान, जिम वाचे वमाएं वजी॥२॥ यडक नया पूर्वपृस्यविनवव्ययनृष्टा, तंपनविपदएर विटा. ॥ पात्र परामातां तानु शांतिविपिविषिष्ट ॥२॥ पूर्वद्रोहा। मृतीनननुमान देशे ते तंबन्यो ताणी पिल सन्मान, रन्नपुरेंद्यायो वही । घावत दी तात, दोडी लान्यो पानेा जीव्यो हिप तात, हर्ष हेजाजुवे ॥ ४ ॥ कोई नियरि तोय, जोजन ववत्तर कंतने ॥ वेने तो, पिच वमन्यु नाना तणुं ॥ ५ ॥ ॥ वाजत्रीजी॥ ॥ नमसी समणी ने नन सती ॥ ए देनी ॥ जामा कर जोडी वाच, ततराजी मुज नांवो ताच॥ तुम धाज एह के घर, पून तो हत्या शिजवर ॥ ॥ हत्यापातक विहितो तेह ताचं हे सुप गुज्नेह ॥ ए नुज तीनो छाजात, नांनी समजी तवजी वा २ ॥ धनया तिहां कपिज्ञ प्रवर, घरतीज वाख्यो निज नार र जाना गर नृपनी पाने पर जोडीने एजिपरेंजाले ॥ सानी ५ लोकपाल, दीन घनाय तणे रखवाज ॥ हुँ सती ने धवजा व पर कर खानी तार तंजाल ॥ ॥ यतः॥वतानामनापानां, वाज तपस्विनाम् ॥ धन्यायपरिचूनानां. सर्वेषां पार्विवोनि ॥ ॥ ठप्प रोपे तर स्तवात, वाल तत्वरने तीचे ॥ कंटक पाडे दुर. ताल रास्त्रे वाचनमा जाड, जूनि पहतांने रस्के । जे पृश्यां वदु तान पलाट न चले। एनघनेर माती तणा, गुण नरजा भंग य राम कहे ते जूपिनि, तज्ञ लोक तंपति करे ॥ ॥ पूर्वढाल n 1 " ४ जैनकथा रत्नकोपनाग आग्मो ॥ वि० ॥ १० ॥ नगर निरीक्षणकारणे, जमतो कपिल कदापि रेस त्यकी पाठक तिहां वसे, हिजवर अमल थपापीरे ॥ वी० ॥ ११ ॥ गत्र जणावे ते बद्, कपिल गयो तस गेह रे ॥ वेद थर्थ पूठे घणा, अगम अगोचर जेद रे ॥ वि०॥ १२ ॥ उत्तर नवि देई शक्यो, गत्र सबल मति मतो रे ॥ सत्यकी मन हरख्यो घणु, मतिगुण देखि महंतो रे ।। वि०॥ १३ ॥ विद्याथी थादर तहे,विद्या सबल सखायी रे ॥ विद्या वधु विदेशर्मा, विद्या देवत सदायी रे ॥ वि०॥ १४ ॥ यमुक्त ॥ दर्जुर्याति न गोचरं किम पिश पुमाति सर्वारमना, ह्यर्थिन्य प्रतिदीयमानमनिश वृद्धि परामृहति । कल्पांतेष्वपि न प्रयाति निधन विद्यारख्यमत ईन, येपा तान् प्रति मानमुक्त जना कस्तै सह स्पईते ॥ १॥ पूर्वढाल ॥योग्य जाणीने सत्यकी, कपिलने निजपद स्थापे रे॥ विद्यागुण ए जीवने, बहु सुख पदवी थापे रे ॥ वि० ॥१५॥ यमुक्त ॥ गुणाब्धावादर कार्य, किमाटोपे प्रयोजनम् ॥ विक्रीयते न घंटानि, गाँव क्षीरविवर्जिता ॥२॥वोदो॥निर्गुण मेथप्पणा, परपुले गुण वत॥ सिर धारिवण कुसुम,अगज मल मत ॥३॥पूर्वढासापाठकगृहिणी जबुका, तस पुत्री सत्यनामा रे॥कपिलने जाणी योग्यता, परणावी अनि रामा रे ॥ वि० ॥१६॥ नाम थ{ ते नयरमा, कपिल कपिल सद्ध बोले रे ॥ पुस्पदशा जस पाधरी, ते नरने कुण तोलें रे ॥ वि०॥ १७ ॥ सपाध्याय दरख्यो घणं, मुफ जायें ए मलियो रे ॥ पुत्री पुण्यवती घणु, सबल मनो रथ फलियो रे ॥ वि० ॥१७॥ जगजीवाडण एदवे, कृपा कतु तिहां श्रावे रे ॥ सबल घटा घन मेलवी, जगमाहे जल वरसावे रे ॥ वि० ॥ १५ ॥ चिट्ठ विशें चमके दामिनी, सबल सजल धन गाजे रे ॥ जलधारा वरसे घणु, ताप जगतनो नांजे रे ॥ वि० ॥२०॥ण अवसरें रयणी समे, नाटक देखण काजें रे ॥ कपिल गयो ते एकलो, बेगे जश्ने समाजें रे ॥ वि० ॥ २१ ॥ नाटक जोईने वल्यो, विरमी नहिं जलधारो रे ॥ मन चिते हां मनुष्यनो, नहिं कोई सचारो रे ॥ वि० ॥ २५ ॥ कोण थंधक जीना करे, वस्त्र सकल कतारी रे ॥ थई निरंशुक नीसलो, कदातर सवि धारी रे ॥ वि० ॥ २३ ॥ श्रावी निन घर थांगणे, याक पहेरी धगें रे ॥ घर पेसता सामुही, सत्यनामा मन रंगें रे ॥ वि० ॥ ५ ॥थाक पियु थागल घना, नूतन कपिल निहाली रे ॥ सुण वनिते मरें करी, - . Arte - श्री शांतिनाथनो रास खंम पदेलो. यण जावें रेसांनलो॥ए यांकए॥ श्रीजिनवरनी वापी रे॥. दोहिली, मीती थमिय समाणी रे ॥ ज० ॥ ॥ दोप अढारथी . थरिहत प्रज्जु श्राराधो रे ॥ सेवो सुगुरु सुसाधुजी, श्रातमधर्मने ।। रे ॥ न० ॥ ३॥ एक असयम टालीयें, उविध धर्म थादरिये रे ॥ हरियें त्रण दंमने, चित्तमा चार न धरिये रे ॥ न० ॥ ॥ पंच हो पंचने, करि सवला मन सार्थे रे ॥ पचाराधनथी करो,पंचमगति थाशे रे ॥ ज०॥५॥पट उपरें करुणा करो, पट लोनें नवि चलिये काढो पट्क मिथ्यात्वनु, पट् वैरीने दलीय रे ॥ ज० ॥ ६ ॥ सातन नय नवि संपजे, सातने नाणे दिलमां रे ॥ सातमांहे नवि ऊपजे धर्मे शिवमुख पलमा रे ॥ न ॥ ७ ॥ थान नणी उन्मूलियें, कीजें थलगा रे ॥ श्रम पुढवीना सुख लहे, जे ए धर्मशु वलग्या २ ॥ ॥ ७ ॥ नवविध वाडि विशेपथी, धरिये शील सुरगो रे ॥ नव निधि सहेजें रे संपजे, परनव शिवसुखयोगो रे ॥ न० ॥ ॥ ॥ विध धर्म समाचरो, श्राणी मन वैरागो रे॥ मगलकलश तणी परें, धन्य ते मादानागो रे ॥ ज० ॥ १० ॥ तव श्रीपेण नरेश्वरु, वोले वे कर जोडी रे ॥ नगवन् मगलकलशनो, कहो सवध गुण जोडी रे ॥ न ॥ ११ ॥ एकमना नवि सानलो, एह सरस सवध रे ॥ चोथी ढालमा माहामुनि, कहे देशन अनुवधो रे ॥ न० ॥ १५ ॥ उपकारी अणगारजी, नवि जन हितना रागी रे।।कदेशे श्रीपेण धागलें, वात सवल वैरागीरे।न० ॥१३॥ ॥ दोहा॥ ॥ श्रीजिनवरपदकज नमी, धरि मनमा थानट ॥ मगलकलश कुमा रनु, कट्ठ चरित्र सुखकद ॥ १ ॥ नयरी श्रवती थति नली, श्रमरपुरी अवतार ॥ गढ मढ मदिर शोजती, वाथ्य सरोवर सार ॥ २ ॥ वैरसिह नामें नसो, गुणनिप्पन्न जस नाम ॥ राजा राज्य करे तिहा, सुतर शोना धाम ॥ ३ ॥ ते नयरीमाहे वसे, धनें धनद तपमान ॥ नामें धनदत्त शेवजी, सकलकलानो जाण ॥ ॥ जाणे जीव श्रजीवने, सत्य शील सुविनीत ॥ नक्किवत गुरु देवनो, पाले शील सुरीत ॥ ५ ॥ सत्यनामा नामें नली, शीलकुन तृपदेद ॥ नामिनी निज नरिश, राखे अविचल ६ , जैनकयारत्नकोप नाग आठमो. हीन पति मुफ कर चढियो, कोश्क पूरव उप्कृत नडियो ॥ हवे एहएं के दवो रतिराग, मुफ मनमां वसियो वैराग॥ ५॥ ते माटें तुम पासें श्रावी, वात कहो तेने समजावी ॥ निम था जन्म लगे हुँ शील, पालुं जेहपी लहियें लील ॥ ६ ॥ श्रीपेणराय सुपी एम वात, तेव्यो कपिल नणी साक्षात ॥ तुज गृहवासथी विरमी नार, विगतनेह कपर श्यो प्यार ॥ ७ ॥ मूक तुं एहने जनकने गेह, पाले शील सुनिर्मलदेह ॥ वलतुं बोजे कपिल विमासी, महाराज शी मामी हांसी ॥ ७ ॥ प्राणप्रिया ए केम मूकाय, ए विण घडी वरसा सो थाय ॥ राजन जीवननी ए मूली, प्रीति न जाये में उन्मूली॥ ए ॥प्राण कहु तो ए न कहाय, ए विण प्राण घएं सीदाय ॥स्वामी वलि वलि शु बोलावो, प्राणप्रियाने घर वोलावो ॥ १० ॥ कहे जामा वसतु मन मेली, ए साथै नवि करवी केली ॥ जो नदि मेहले किमही एह, अनलशरण करशु था देह ॥ ११॥ राजन कपिल जणी एम नांखे, केम माटीपणे एहने राखे ॥ मन मोती जाग्यां ने जेह, कहो किण परें संधाये तेह ॥ १२ ॥ मुफ मदिरमा रहेशे एह, पुत्रीपरें सानल ससनेह ॥ वात सुणी विलखो थइ वलियो, पण मनमां को कलक लियो ॥ १३ ॥ नामा रहे राणीनी पासे, पाले शील अखम उनासें ॥ राम कहे त्रीजी दाल मकार,धन्य जे राखे निजथाचार ॥१४ ॥स०॥१५॥ ॥ दोहा॥ ॥ विमलबोध इण अवसरें, सूरीश्वर जगवत ॥ बढ्न परिवार परवसा, तूममल विचरंत ॥ १ ॥ पावन करता पाउले, श्रवनीतल मुनिराज ॥जे अगाध जवसिंधुना, तारण तरण जहाज ॥ २ ॥ समितियें समिता साधु जी, साचा जेहना वास ॥ दास कस्यो कंदर्पने, न पच्या याशापास ॥३॥ रत्नपुरीने परिसरें, देवरमण उद्यान ॥ ते मुनि थावि समोसमा, श्रुतज्ञानी नगवान ॥४॥ मुणि बागमन मुनीशनु, लोकमुखें नररान ॥ मुनिवर वदन नीसस्नो, लेई सबलो साज ॥ ५॥ विधियं वदी साधुनें, त्रिविधं थइ उजमाल ॥ निमुणे श्रमृतस्त्राविणी, मुनिदेशन मुरसाल ॥६॥ ॥ ढाल चोथी॥ ॥ चेतन चेतो रे चेतना ॥ ए देशी ॥ मानवनव सवलो लई, मुलदो दश दृष्टातें रे ॥ मूकी रे निज्ञ मोदनी, धर्म करो एकां रे ॥ १॥ नवि , .

श्री शांतिनाथनो रास खंग पदेलो. पूजी जिन मंदिरमा, जाये मननी खातें ॥ प्री० ॥ ११ ॥ ११॥ 'चा त्रण त्रण निसिही, दशत्रिक जाणी उरमां ॥ परमेश्वर थागत परकासे चैत्यवदन जिन घरमां ॥प्री॥१२॥ अथ चैत्यवदन ॥ परमेश्वर रम तमा, पावन परमिछ॥ जय जगगुरु देवाधिदेव, नयरों में दिह॥ अकल थविकार सार, करुणारस सिधु ॥ जगतीजन श्राधार एक, रण वधु ॥ गुण अनत प्रनु ताहरा ए, किमही कट्या न जाय ॥ ॥ . बिना मग्न थाय ॥१॥ निजरूपें शिवस्थानकें, इव्ये । पी, प्रगट जगमाही॥अध्यातमथी जोडिये मान नाव, पामे निरधार ॥ पावन । ते प्रठ पूजा ध्यानथी, राम कहे सुख । 'ढाल ॥ शकस्तव पनणे कर जोडी, 4 रे प्रजुनु लेखवतो, निज थातमनें धन्य । राग सारंग ॥ मन मोयु प्रच गुणवानमा । मोहसुराके पानमा ॥ म ॥१॥ गयो अज्ञानमा॥ दवे कोश्क पुस्योदय ॥ म०॥ २ ॥ अतर नर्म गयो सवि दुरें उ तुम दृष्टि नई मोहि ऊपर, अंतर सरस देख्यो जिनजीको, लम लगी तु पानिधि, उर न देखो जिदानमां ॥ म ।। पारी, परमातम शुचि वानमां ॥ राम पर प्रमाणमा ॥ म० ॥ ५ ॥ इति ।। गुनध्याने जिनगुण धुणतां, सुणता ससुरु नावें, धनदत्त धन गुणखाणी ॥जी॥१॥ वोले ॥थाप्यो सुत वर शेठ विचारे, ॥ १५ ॥ सत्यनामा रयणीय दीतु, मंगल नरशे महारु, वाजणीनु सहि महेणु ॥प्री० व्यो, मुत सुदर सोनागी॥ पंचमी ढालें राम पी॥ प्री० ॥ १७ ॥ सर्व गाथा ॥ १२५ ॥ .

6 - . जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. नेद ॥ ६ ॥ सुख सघला ते थनुनवे, पंच विपय वर जोग ॥ परा नहि काई तेहनें, सवल कर्म सयोग ॥ ७ ॥ ॥ढाल पांचमी॥ ॥ नाना सूडा हो, वात सुणो एक मीठी ॥ ए देशी॥ एक दिवस ते क्षेत्र ना चित्तमा, सुतनी चिता पेनी ॥ कर जोडी कामिनी एम पटे, पीनी पासें वेती ॥१॥प्रीतम प्यारा रे, वात कहो मन मूकी ॥ एकशी। थविनय श्राज लगें पियु तुमचो, नवि कीधो का चूकी ॥ प्री० ॥ ३॥ शेव कहे नाखी नीशासो, कामिनी सुत विण शूनु ॥ रात दिवस ए मनमा,पीलु नहिं कोई मणुं ॥ प्री०॥ ३ ॥ यमुक्त ॥ थपुत्रस्य गृहं शुल्क, दिश शून्या ह्यवांधवा ॥ मूर्खस्य हृदय शून्य, सर्वगुन्य दरिहता ॥१॥ ॥ पूर्वढाल ॥ वलतु विनता कहे सुण कता, शी चितो ए चिता ॥ नावी नाव टले नहिं कोइ, रहियें मन निश्चिंता ॥ प्री० ॥ ४ ॥ यमुक्त ॥ प्रात योनियतिबलाप्रयेन योऽर्थ , सोवश्य नवति नृणा शुनोगुनोवा ॥ नूतानां महति कृतेपि हि प्रयत्ने, नानाव्यं नवति न नाविनोस्ति नाश ॥ ५ ॥ पूर्वढाल ॥ धर्म जगतमा सवि सुखकारी, करे धरी एकतारी ॥ जेहनी बाया सुरतरु सरिखी, वाबित फल दातारी ॥ प्री० ॥ ५॥ यत ॥ धर्म सिधोर्बुवा सिदि, र्युनप्रद्युम्नयोरपि ॥ दुग्धोपलने सुजना, सपत्तिर्दषि सर्पिषो ॥ ३॥ पूर्वढाल ॥ देवगुरुनी नकि करीजें, दान सुपात्रे वीजें ॥ परिगल वित्त पामी थलवेसर, शुनगमें चावीजें ॥प्री० ॥ ६ ॥ यत । व्याजे स्याद्विगुण वित्तं, व्यवसाये चतुर्गुणम् ॥ क्षेत्रे शतगुण प्रोक्त, पात्रेऽनतगुणं नवेत् ॥ ४ ॥ पाकारणोच्यते पापं, त्रकारस्त्राणवाचक ॥ थक्ष्यसंयोगे, पात्रमुक्त मनीषिनि ॥ ५॥ पूर्वढाल ॥ एम करतो जो सुत नवि थाशे, परनव निर्मल दोशे ॥ देवगुरुनी नक्ति जति परें, पाप पंकज सवि धोशे ॥ प्री० ॥ ७ ॥ मुफ मनडे मनमोहन वसियो, धनुनव रस थति मीठो ॥ जेद धनते का प्रीतम, कहिये में नवि वीठो ॥ श्री. ॥ ७ ॥ वात सुणी विनतानी वारु, गई विकलता मनथी ॥ वचन कहे प्रीतम ए साधु, दररव्यो दु हवे तनयी ॥जी॥ ए ॥- मदिर मालीने ते डीने, धन थापीने पोप्यो॥प्रतिदिन परमेश्वर पूजानें, कुसुम नणी सतोष्यो । प्री० ॥ १० ॥ पोतें शेठ जई तस वाडी, लावे फूल प्रजातें ॥ गृहजिन

नि का
.
श्री शांतिनाथनो रास खंम पदेलो.
ए
पूजी जिन मंदिरमा, जाये मननी खांते ॥ प्री० ॥ ११ ॥ पंचालिगमें
त्रण त्रण निसिही, दशत्रिक जाणी उरमां ॥ परमेश्वर धागल परकासे,
चैत्यवदन जिन घरमा॥प्री०॥ १२॥ अथ चेत्यवदन ॥ परमेश्वर परमा
तमा, पावन परमिह ॥ जय जगगुरु देवाधिदेव, नयरों में दिछ॥ अचल
यकल अविकार सार, करुणारस सिंधु । जगतीजन बाधार एक,
रण वधु ॥ गुण अनत प्रनु ताहरा ए, किमही कल्या न जाय ॥ रामप्रनु
जिनध्यानथी, चिदानद मुख थाय ॥१॥ निजरूपें शिवस्थानकें, इव्ये पण
तिमही ॥ नाम स्थापना नेदथी, प्रगट जगमांही ॥ अध्यातमथी जोडिये,
निदेपा चार ॥ तो प्रचुरूप समान नाव, पामे निरधार ॥ पावन बातमने
करे ए, जन्म जरादिक दूर ॥ ते प्रतु पूजा ध्यानथी, राम कहे सुखपूर
॥ २ ॥ इति चैत्यवदन ॥ पूर्वढाल ॥ शकस्तव पनणे कर जोडी, नाव
धरी निज मनमां ॥ स्तवन करे प्रजुनु लेखवतो, निज बातमनें धन्यमां
॥जी॥१३ ॥ अथ स्तवन ॥ राग सारंग॥ मन मोयु प्रनु गुणगानमां ॥
काल अनत न जाण्यो जातो, मोहसुराके पानमां ॥ म ॥ १॥ एके
यि विति चरिंश्यिमा,काल गयो अज्ञानमा॥ दवे कोश्क पुस्योदय प्रग
व्यो, श्राय मिलो प्रनु ध्यानमां ॥ म०॥ २ ॥ थतर नर्म गयो सवि दुरे,
तत्स्व सुधारसपानमा ॥ प्रनु तुम दृष्टि नई मोहि कपर, अंतर थातम
शानमा ॥ म० ॥ ३ ॥ दरस सरस देख्यो जिनजीको, लम लगी तुज
झानमां ॥ केवल कमलाकत कृपानिधि, उर न देखो जिहानमा ॥म ॥
४ ॥ यशरणशरण जगत उपगारी, परमातम गुचि वानमां ॥ राम कहे
तुम थाण नवोनव, धारी नयर प्रमाणमा ॥ म० ॥ ५ ॥ इति साधरण
जिनस्तुति ॥ पूर्वढाल ॥ एम शुनध्याने जिनगुण धुणतां, सुणता सशुरु
वाणी ॥ पात्रे दान दिये जले नावें, धनदत्त धन गुणखाणी ॥जी॥१॥
धर्म प्रनावें शासनदेवी, तुष्ट थई एम वोले ॥थाप्यो सुत वर शेठ विचारे,
नहिं कोई धर्मनें तोले ॥ प्री० ॥ १५॥ सत्यनामा रयणीयें दी, मगल
फलशन मुहणु ॥ मन चिते कतरशे महारु, वांफणीनु सहि महेण ॥प्री०
॥ १६ ॥ सपूरण नव मासे प्रसय्यो, सुत सुदर सोनागी ॥ पंचमी ढालें राम
जिजय कहे, धर्म करो वडनागी॥ प्री० ॥ १७ ॥ सर्व गाथा ॥ १२५ ॥

ច , जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. नेह ॥ ६ ॥ सुख सघलां ते थनुनवे, पंच विपय वर जोग ॥ परम नहिं कां तेदने, सवल कर्म संयोग ॥ ७ ॥ ॥ढाल पांचमी ॥ नानासूहाहो, वात सुणो एक मीठी॥ ए देशी॥ एक दिवस से और ना चित्तमा, मुतनी चिता पेनी ॥ कर जोडी कामिनी एम , पीनी पासें वेती ॥ १ ॥ प्रीतम प्यारा रे, वात कहो मन मूकी ॥ ए श्रांकणी। थविनय श्राज लगें पियु तुमचो, नवि कीधो कांड चूकी ॥ प्री० ॥ ॥ शेव कहे नाखी नीशासो, कामिनी मुत विण शूनु ॥ रात दिवस ए मनमा,बीजु नहिं काई कणु ॥ प्री॥३॥ यक्त ॥थपुत्रस्य गृह दिश शून्या ह्यवांधवा ॥ मूर्खस्य हृदय शुन्य, सर्वशून्य दरिश्ता ॥ ॥ पूर्वढाल ॥ वलतु विनता कहे सुण कता, शी चितो ए चिता । नाच टसे नहिं कोई, रदियें मन निश्चिता ॥ प्री० ॥ ४ ॥ यक्त ।। योनियतिवलाश्रयेन योऽर्थ , सोवश्य नवति नृणा शुनोशुनोवा ॥ नूतानी मदत्ति कतेपि हि प्रयमे, नानाव्यं नवति न नाविनोस्ति नाश ॥ ५ ॥ पूर्वढाल ॥ धर्म जगतमा सवि सुखकारी, करे धरी एकतारी ॥ जेदनी बाया सुरतरु सरिस्ती, वाडित फल दातारी ॥ प्री० ॥ ५॥ यत ॥ धर्म सिधोर्जुवा सिदि, घुम्नप्रद्युम्नयोरपि ॥ उग्धोपलने सुजना, सपतिषि सर्पिपो ॥ ३॥ पूर्वढाल ॥ देवगुरुनी नक्ति करीजें, दान सुपात्रे दीजें । परिगल वित्त पामी थलवेसर, शुनतामें वावीजें ॥ प्री० ॥ ६ ॥ यत ॥ व्याजे स्याट्विगुण वित्त, व्यवसाये चतुर्गणम् ॥ क्षेत्रे शतगुण प्रोक्त, पात्रेऽनतगुरु नवेत् ।। ४ ॥ पाकारेणोच्यते पापं, प्रकारखाणवाचक ॥ थक्षरक्ष्यसंयोगे, पात्रमुक्त मनीषिनि ॥ ५॥ पूर्वढाल ॥ एम करतो जो सुत नवि थाशे, परनव निर्मल दोशे ॥ देवगुरुनी जति जति परें, पाप पंकज सवि धोशे ॥ प्री० ॥ 8 ॥ मुफ मनडे मनमोहन बसियो, अनुनय रस थति मीठो ॥ जेह थनते का प्रीतम, कहिये में नवि दीगे ॥ प्री० ॥ ॥ वात सुणी विनतानी वारु, गई विकलता मनथी । वचन कहे प्रीतम ए साचु, दरख्यो हु हवे तनथी ॥प्री० ॥ ५ ॥- मदिर मालीने ते डीने, धन थापीने पोष्यो॥प्रतिदिन परमेश्वर पूजानें, कुसुम जणी सतोष्यो । प्री० ॥ १० ॥ पोतें शेव जई तस वाटी, लावे फूल प्रनातें ॥ गृह जिन , श्री शांतिनाथनो रास खंम पहेलो. ए जिन मंदिरमां. जाये मननी खांतें ॥ प्री० ॥ ११ ॥ पंचालिगने त्रण नितिही, दशत्रिक जाणी उरमां ॥ परमेश्वर धागज परकाते. स्वदन जिन घरमा ॥जी॥ २२॥ अथ चैत्यवदन ॥ परमेश्वर परमा T, पावन परमिह ॥ जय जगगुरु देवाधिदेव, नयरों में दिह ॥ धवल कल अविकार सार, करुणारस सिधु ॥ जगतीजन धाधार एक निका | बंधु ॥ गुण धनंत प्रतु ताहरा ए, किमही कल्या न जाय ॥ रामप्रच नध्यानधी, चिदानद सुख घाय ॥१॥ निजरूपें शिवस्थान इव्य पण मही ॥ नाम स्थापना नेदधी प्रगट जगमाही॥ अध्यातमधी जोडियें देपा चार ॥ तो प्रचुरूप समान नाव पामे निरधार ॥ पावन यातमने ए जन्म जरादिक दूर ॥ ते प्रच पूजा ध्यानघी, राम कहे सुखपूर २॥ इति चेत्यवदन ॥ पूर्वढाल ॥ शकस्तव पनणे कर जोडी, नाव a निज मनमां ॥ स्तवन करे प्रउनुं लेखवतो निज धातमनें धन्यमां प्री०॥ १३ ॥ अथ स्तवन ॥ राग सारंग॥ मन मोयु प्रच गुणवानमां ॥ ल अनंत न जास्यो जातो, मोहसुराके पानमां ॥ म ॥ १ ॥ ए त्य विति चरिश्यिमां काल गयो अज्ञानमां॥हवे कोक पुस्योदय प्रग यो, थाय मिलो प्रनु ध्यानमा ॥म०॥ २ ॥ अंतर नर्म गयो तवि दुरें त्त्व सुधारतपानमां ॥ प्रनु तुम दृष्टि नई मोहि ऊपर, धंतर बातम गनमां ॥म० ॥ ३ ॥ दरस सरस देख्यो जिनजीको, लम लगी तुज कानमां ॥ केवल कमलाकत कृपानिधि, उर न देखो जिहानमां ॥म० ॥ ॥ घशरणशरण जगत उपगारी, परमातम सुचि वानमां ॥ राम कहे तुम थाण नवोनव धारी नयर प्रमाणमां ॥ म ॥ ५ ॥ इति साधरण जनस्तुति ॥ पूर्वढाल ॥ एम गुनध्याने जिनगुण घुगता. सुणतां ससुरु वाणी ॥ पानें दान दिये जले जावें धनदत्त धन गुणखाणीप्रीर॥ धर्म प्रना शासनदेवी तुष्ट घई एम बोले ॥धाप्यो सुत वर शेत विचारे, नहिं कोई धर्मनें तोजे ॥ प्री० ॥ १५ ॥ सत्यनामा रयणीय दीतुं, मंगल कलशन सुहए॥मन चिते ऊतरशे महारु, वांफणीनु सहि महेणु ॥प्री० ॥ १६ ॥ सपूरण नव मासे प्रतव्यो, सुत सुंदर तोनागी॥ पचमी ढाले राम जिजय कहे, धर्म करो वहनागी॥ प्री० ॥ १७ ॥ सर्व गाथा ॥ ११५ ॥ २ 4 G जैनकथा रत्नकोप नाग आवमो. नेह ॥ ६ ॥ सुख सघतां ते थनुनवे, पंच विपय वर नोग ॥ पण नहिं कांई तेहनें, सवल कर्म सयोग ॥ ४ ॥ ॥ढाल पांचमी॥ ॥ नाना सूडादो, वात सुणो एक मीठी ॥ ए देशी॥ एक दिवस ते शेर ना चिचमा, सुतनी चिता पेठी ॥ कर जोडी कामिनी एम ठे, पीनी पासे वेती ॥ १ ॥ प्रीतम प्यारा रे, वात कहो मन मूकी ॥ ए बांकणी। थविनय थाज लगें पियु तुमचो, नवि कीधो का चूकी ॥त्री१ शेव कहे नाखी नीशासो, कामिनी सुत विण शून ॥ रात दिवस ए मनमां,बीच नहिं कांड कणु ॥ प्री०॥ ३ ॥ यठक्त ॥ यपुत्रस्य राई दिश शून्या बांधवा ॥ मूर्खस्य हृदयं शून्य, सर्वशून्य दरिश्ता ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ वलतुं विनता कहे सुण कता, शी चितो ए चिता ॥ नाव टले नहिं को, रहियें मन निश्चिंता ॥ प्री० ॥ ४ ॥ यमुक्त ॥ प्रास व्योनियतिबलाश्रयेन योऽर्थ , सोवश्यं नवति नृण शुनोगुनोवा ॥ नूतानां महति कृतेपि हि प्रयत्ने, नानाव्यं नवति न नाविनोस्ति नाश ॥ ५ पूर्वदाल ॥ धर्म जगतमा सवि सुखकारी, करे धरी एकतारी ॥ जेहनी बाया सुरतरु सरिखी, वानित फल दातारी ॥प्री॥ ५ ॥ यत ॥ धर्म सिंधोधुवा सिदि, र्युम्नप्रद्युम्नयोरपि ॥ उग्धोपलने सुलना, सपसिर्वपि सर्पिषो ॥ ३ ॥ पूर्वढाल ॥ देवगुरुनी नक्ति करीजें, दान सुपात्रे दीजें ॥ परिगल वित्त पामी थलवेसर, शुनगमें वावीजें ॥ प्री० ॥ ६ ॥ यत ॥ व्याजे स्थाष्विगुण वित्तं, व्यवसाये चतुर्गुणम् ॥ क्षेत्रे शतगुण प्रोक्त, पात्रेऽनतगुणं नवेत् ॥ ४ ॥ पाकारेणोच्यते पापं, कारखाणवाचक ॥ थक्ष्यसंयोगे, पात्रमुक्तं मनीषिनि ॥ ५॥ पूर्वढाल ॥ एम करता जो सुत नवि थाशे, परनव निर्मल दोशे ॥ देवगुरुनी नक्कि नलि परें, पाप पंकज सवि धोशे ॥ प्री० ॥ ॥ मुफ मनडे मनमोहन वसियो, धनुनव रस थति मीठो ॥ जेद थनते कालें प्रीतम, कर्दिये में नवि दीठो ॥ प्री० ॥ ७ ॥ वात सुणी विनतानी वारु, गइ विकलता मनथी ॥ वचन कहे प्रीतम ए साचं, हरख्यो दु दवे तनथी ॥प्री० ॥ ५ ॥- मदिर मालीने ते डीने, धन थापीने पोप्यो। प्रतिदिन परमेश्वर पूजानें, कुसुम नणी सतोष्यो । प्री० ॥ १० ॥ पोतें शेठ जई तस वाडी, जावे फूल प्रनातें ॥ गृहजिन नि का श्री शांतिनाथनो रास खंम पदेलो. जी जिन मंदिरमां, जाये मननी खांतें ॥ प्री० ॥ ११ ॥ पंचालिगमें वण त्रण निसिही, दशत्रिक जाणी उरमां ॥ परमेश्वर धागल परकासे, चैत्यवदन जिन घरमां ॥प्री॥ १२ ॥ अथ चेत्यवदन ॥ परमेश्वर परमा तमा, पावन परमिठ ॥ जय जगगुरु देवाधिदेव, नयरों में दिछ॥ अचल अकल अविकार सार, करुणारस सिंधु ॥ जगतीजन आधार एक, रण बंधु ॥ गुण अनत प्रनु ताहरा ए, किमही कल्या न जाय ॥ रामप्रलु जिनध्यानथी, चिदानद सुख थाय ॥१॥ निजरूपें शिवस्थानकें, इव्ये पण तिमही ॥ नाम स्थापना नेदथी, प्रगट जगमांही ॥ अध्यातमथी जोडियें, निदेपा चार ॥ तो प्रनुरूप समान नाव, पामे निरधार ॥ पावन बातमनें करे ए, जन्म जरादिक दूर ॥ ते प्रनु पूजा ध्यानथी, राम कहे सुखपूर ॥ १ ॥ इति चैत्यवदन ॥ पूर्वढाल ॥ शक्रस्तव पनणे कर जोडी, नाव धरी निज मनमा ॥ स्तवन करे प्रजनुं लेखवतो, निज यातमनें धन्यमां ॥जी॥१३॥ अथ स्तवन ॥राग सारंग॥ मन मोयु प्रनु गुणानमां ॥ काल अनत न जाण्यो जातो, मोहसुराके पानमां ॥ म ॥ १ ॥ एके यि विति चरिंघियमा,काल गयो अज्ञानमांदवे कोश्क पुण्योदय प्रग ट्यो, थाय मिलो प्रनु ध्यानमां ॥ म०॥ २ ॥ अतर नर्म गयो सवि दुरे, तत्त्व सुधारसपानमां ॥ प्रनु तुम दृष्टि नई मोहि ऊपर, अतर बातम शानमां ॥ म ॥३॥ दरस सरस देख्यो जिनजीको, लम लगी तुफ झानमां ॥ केवल कमलाकत कृपानिधि, उर न देखो जिदानमा ॥म० ॥ ४ ॥अशरणशरण जगत उपगारी, परमातम शुचि वानमां ॥ राम कहे तुम थाण नवोनव, धारी नयर प्रमाणमा ॥ म० ॥ ५ ॥ इति साधरण जिनस्तुति ॥ पूर्वढाल ॥ एम गुनध्याने जिनगुण धुणतां, सुणता सशुरु वाणी ॥ पात्रे दान दिये जले जावें, धनदत्त धन गुणखाणी ॥जी॥१४॥ धर्म प्रनावें शासनदेवी, तुष्ट थई एम वोले ॥थाप्यो सुत वर शेठ विचारे, नहिं कोई धर्मनें तोले ॥ प्री० ॥ १५ ॥ सत्यनामा रयणीयें दीतुं, मगल कलशर्नु मुहणु ॥मन चिते कतरशे महारु, वांफणीनु सहि महेणु ॥प्री० ॥ १६ ॥ सपूरण नव मासें प्रसव्यो, सुत सुदर सोनागी॥ पंचमी ढालें राम जिनय कहे, धर्म करो वडनागी॥प्री० ॥ १७ ॥ सर्व गाथा ॥ १२५ ॥ - G जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. नेह ॥ ६ ॥ सुख सघलां ते थनुनवे, पंच विषय वर नांग ॥ . नहिं कां तेदनें, सवल कर्म संयोग ॥ ७ ॥ ॥ढाल पांचमी॥ ॥ नाना सूहा हो, वात सुणो एक मीठी ॥ ए देशी ॥ एक दिवत ना चित्तमा, सुतनी चिता पेनी ॥ कर जोढी कामिनी एम पूने, पीजी पासें वेती ॥ १ ॥ प्रीतम प्यारा रे, वात कहो मन मूकी ॥ एक्सी। थविनय थाज लगें पियु तुमचो, नवि कीयो का चूकी । श्री. शेव कहे नाखी नीशासो, कामिनी सुत विण शूनु ॥ रात दिवस ए मनमां,वीजु नहि का मणु ॥प्री०॥ ३ ॥ यक ॥यपुत्रस्य एई विश शून्या ह्यवाधवा ॥ मूर्खस्य हृदय शुन्यं, सर्वशून्य दरिश्ता ! ॥ पूर्वढाल ॥ वलतु विनता कहे सुण कता, शी चितो ए चिता ॥ नाव टले नहिं को, रहियें मन निश्चिता ॥ प्री० ॥ ४ ॥ यजुक्त ॥ व्योनियतिवलाश्रयेन योऽर्थ , सोवश्यं नवति नृणा शुनोशुनोवा ॥ मदत्ति कृतेपि हि प्रयत्ने, नानाव्यं नवति न नाविनोस्ति नाश ॥ १॥ पूर्वढाल ॥ धर्म जगतमा सवि सुखकारी, करे धरी एकतारी ॥ जेनी बाया सुरतरु सरिखी, वांनित फल दातारी ॥ प्री० ॥ ५ ॥ यत ॥ पर्य सिधोधुवा सिदि, घुम्नप्रद्युम्नयोरपि ॥ उग्धोपलने सुलना, सपतिर्वषि सर्पिषो ॥ ३ ॥ पूर्वढाल ॥ देवगुरुनी जक्ति करीजें, दान सुपात्रे वीजें । परिगल वित्त पामी थलवेसर, शुनगमें वावीजें ॥प्री० ॥ ६ ॥ यत । व्याजे स्याट्विगुण वित्त, व्यवसाये चतुर्गुणम् ॥ क्षेत्रे शतगुण प्रोक्तं, पात्रेऽनतगुणं नवेत् ॥ ४ ॥ पाकारेणोच्यते पापं, कारखाणवाचक ॥ अक्षरक्ष्यसंयोगे, पात्रमुक्तं मनीषिनि ॥ ५ ॥ पूर्वढाल ॥ एम करता जो सुत नवि थाशे, परनव निर्मल होशे ॥ देवगुरुनी नकि जाल परें, पंकज सवि धोशे ॥ प्री० ॥ ७ ॥ मुफ मनडे मनमोहन वसियो, धनुनव रस अति मीठो ॥ जेद बनते कालें प्रीतम, कहिये में नवि दीतो ॥ प्री० ॥ ॥ वात सुणी विनतानी वारु, गई विकलता मनश्री ॥ वचन कहे'. प्रीतम ए साचु, दरख्यो द्र ढवे तनयी ॥प्री० ॥ ५ ॥- मविर मालीने ते डीने, धन श्रापीने पोष्यो। प्रतिदिन परमेश्वर पूजानें, कुसुम नणी सतोष्यो । प्री० ॥ १० ॥ पोतें शेव जई तस वाही, लावे फूल प्रनातें ॥ रहजिन पाप , श्री शांतिनायनो रास खंम पदेलो. ११ हो, एहनो विरहो ॥ मा० ॥ राणी साथे हो, एम निरधारी ॥ मा० ॥ तेज्यो मत्री हो, सुवुद्धि विचारी ॥मा॥५॥ तुक अगजने हो, थापु वेटी ॥ मा ॥ वदु धन साथे हो, गुणनी पेटी ॥ मा० ॥ राजन मूको हो, एह उगाइ ॥ मा० ॥ सरखा सरवी हो, होवे सगाई ।। मा० ॥६॥दु तुफ पायक हो, तुं मुज स्वामी॥ मा०॥ जोडीन जुगति हो, कद्द शिर नामी ॥ मा० ॥ सरिरवा कुलगु हो, सवध कीजें ॥ मा० ॥ यश जगमाहे हो, स वलो लीजें ॥ माण् ॥ ॥ यत ॥ कुल च शील च सुनाथता च, विद्या च वित्तं च वपुर्वयश्च ॥ वरे गुणा सप्त विलोकनीया, स्तत पर नाग्यव शा हि कन्या ॥ ५ ॥ पूर्वढाल ॥ राजन बोले हो, मनहुं राजी ॥ मा ।। तोवलि एहमा हो, गु करे काली ॥मा॥ एह उखाणो हो, साचो जाणी ॥ मा० ॥ वोज न बोलो हो, अम्हा ताणी ॥मा०॥ ७ ॥ पुत्री देवी दो, अवश्य अमारे ॥ मा० ॥ मनमा चिते हो, सचिव तिवारें ॥ मा॥ व्याघ्रतटीनो दो, न्याय ए श्राव्यो ॥ मा० ॥ न रहे राजा हो, में सम काव्यो ॥ मा० ॥ ए ॥ रति रनासी हो, रायनी तनया ॥ मा० ॥ मुफ मुत कुष्ठी हो, सवलो अन्या ॥ मा० ॥ योग वेदुनो हो, कहो किम म लशे ॥ मा० ॥ अथवा जावी हो, कहो केम टलशे ॥ मा० ॥ १० ॥ थवा कुलनी हो, देवी साधी ॥ मा० ॥ करच्छ कारज हो, में मति लाधी ॥ मा० ॥ मानी वातज दो, ते घर वलियो ॥ मा० ॥ नृप राणीनो दो, वादित फलियो ॥ मा० ॥ ११ ॥ मदिर थावी हो, देवी समरी ॥ मा०॥ दरख्यो जाणी हो, श्रावी थमरी ॥ मा० ॥ पूजे कारण हो, किम स नारी ॥ मा० ॥ सुत मदिरमा हो, कोढी नारी ॥ मा० ॥ १२ ॥ शपू वु दो, करो नीरोगी ॥ मा० ॥ बानो राख्यो हो, वह दिन रोगी ॥ मा० ॥ नांखे देवी हो, कर्म जे कीधा ॥ मा० ॥ चीकण रसना हो, न जाये लीधा ॥ मा० ॥ १३ ॥ यत ॥ कृतकर्मयोनास्ति, कल्पको टिशतैरपि ॥ अवश्यमेव जोक्तव्यं, कृतं कर्म शुजालनम् ॥ ३ ॥ थारो हतु गिरिशिखरं, समुश्मुलंध्य यातु पातालम् ॥ विधिलिखिताक्षरमाल, फलति कपालं न नूपाल ॥ ॥ नमस्यामो देवान्ननु हतविधेस्तेपि वशगा, विधिर्वद्य सोपि प्रतिनियतकमैकफलद ॥ फल कर्मायत्तं य दि किममरे किं च विधिना, नमस्तत्कर्मन्यो विधिरपि नयेज्य प्रनवति ।। .

, - १० जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ॥ दोहा॥ ॥ सुतजन्मोत्सव बहु कयो, खरची इव्य पार ॥ सुपन नणी अनि धा ज्वे, मगलकलश कुमार ॥ १ ॥ पचधा पाली जतो, धीज तणो जिम चद ॥ माय ताय मन वनहो, जीवन नयणानद ॥ २ ॥ सुत कुल रावे हर्पन, थापी निज उत्सग ॥ दे श्राशीप एणी परें, माता मनने रंग। ३॥ चिर जीवो मुफ नानडा, वाहालेसर सुकुमार ॥ तुम थला बना वह पडो, खारा समुश्मकार ॥४॥ श्रयो पच वरप तणो,पातवियो नीशाल । मूकी विकथा गुरु कने, शास्त्र नणे उनमाल ॥ ५॥ निज उंचमगति मुगुरु, चिता रहित सुदेह ॥ विनय शास्त्र जणवा तणा, कारण सपना एह ॥ ६ ॥ यत ॥ याचार्य पुस्तक निवास सहाय वासो, वाह्या श्मे पठन पंचगुणा नराणाम् ॥ थारोग्य युधिविनयोद्यमशास्त्ररागा, अन्यतरा पठन पंचगुणा नवति ॥ १ ॥ पूर्वदोहा ॥ नणि प्रवीण पोढो थयो, चार वरसनो नाम ॥ वाही जाता जनकनी, साथै चाल्यो ताम ॥ ॥ साचे ज लाग्यो कुसुम, श्रीजिनराज ॥ प्रतिदिन लावे जइ तिहा, फुन सेवानें काज ॥ ७ ॥ वाहीमा जइ एकलो, लावे कुसुम सुवास ॥ कहेण न माने तातनु,दियडे जिनगुणवास ॥ ५ ॥ एम चिहु दिन'वीत्या पली, एक दिवसनें योग ॥ जेह थ{ ते सांनलो, शुन नावीने नोग॥ १०॥ ॥ ढाल बही॥ ॥केसरवरणो दो,काढ कमुबो ॥ माहारा लाल ॥ए देशी ॥ जबूधी हो, दक्षिण जरतें॥मादारा लालचपा नामें दो, थगें वर्ते ॥मा० ॥ तिहां सुर सुदर दो, राजा राजे ॥ मा० ॥ नामें गुणावली हो, राणी बगजे ॥ मा ॥१॥ पुत्री रूडी हो, तेदनी जाय ॥ मा० ॥ त्रैलोक्यसुवरी दो, विधि निपाई ॥ मा ॥ रूपें सारी दो, रंना दारी ॥ मा०॥ गनगति सारी हो, मोदनगारी ॥ मा० ॥ ३ ॥ तनु सुकुमाली हो, श्रग निहाली ॥ मा० ॥ सुर नर मोहे दो, मुखडं नाली ॥मा० ॥ वेण मुंहाली हो, नागण काली ॥मा० ॥ मदमतिवाली दो, वाणी रसाली ॥मा०॥ ३ ॥ जर यौवना दो, जामा थावी ॥ मा० ॥ राजसनामां हो, राय बुलावी ॥ मा० ॥ पुत्रीनेहें दो, मन बंधाणो म॥ चिती नृपति हो, मन सपराणो ॥ मा० ॥ ४ ॥ श्राप थलगी हो, तो परिसण उलहो ॥ मा० ॥क्षण न स्वमाये , पूज्या .

श्री शातिनाथनो रास खंम पदेलो. १३ कुमर विचारे कर्मनी लीला रे ॥ जोड ज्वलित थनल उतरियो रे, तिण दिशे चाव्यो शीतें गरियो रे ॥ ३ ॥ थवारक नर बहु तापे रे, श्राव्यो कुवर तास समी रे ॥ हांसी करता ते नरने जाणी रे, साकेतिक नर वोल्यो वाणी रे ॥ ४ ॥ थाव्य तु मुफ पासें वत्स वहेलो रे, मदिर माहरे थाइश सोहिलो रे ॥ एम कही थाण्यो मदिर तेह रे,सोप्यो मत्रीने करी नेह रे ॥ ५॥ अशन वसन थाप्या मन गमतां रे, नाव नक्तियें करी जुगते जुगता रे ॥ चिते कुवर कारिज कोई रे, स्वारथ विण चादर नवि होइ रे ॥ ६ ॥ यत ॥ वृदं छोणफल त्यजति विदगा , शुष्क सर सारसा , पुष्पं पर्युपितं त्यजति मधुपा दग्ध वनांतं मृगा ॥ निईव्यं पुरुपं त्यजति गणिका कुष्ठ नृप सेवका, सर्व स्वार्थवशोजनोनिरमते नो कस्य कोवनन ॥१॥ पूर्वढाल ॥ कुवर पूठे कारज दाखो रे, म दिरमां किम बानो राखो रे ॥ मुज साथै काम तुम्हारे रे, मनमां महोटी नाति हमारे रे ॥ ७॥ सचिव कहे ए चपानयरी रे, सुर सुंदर नृप जीत्या वैरी रे ॥ नाम मुबुधि तत प्रधानो रे, हुबु कारज सुण सावधानो रे ॥ ७ ॥ नृपपुत्री मुफ पुत्रने श्रापी रे, परणी थापो रतिरसव्यापी रे ॥ कुमर नरो श्यो पाड चडावो रे, श्रगजने का नवि परणावो रे ॥ ए ॥ तेह कहे मुफ सुत वे कोढी रे, कर्म तणी गति विप मी पोढी रे ॥ कुमर कहे कीधु थविचास्यु रे, पर्यागतनु जल उतास्य रे ॥ १० ॥ कुण एवो मूरख अविचारी रे, परणी थापे परने नारी रे ॥ मत्री मुफ कुल नहि थाचारो रे, का वहु वोली सजा दारो रे ॥ ११ ॥ कूप उतारी वरतने कापे रे, जे परणी अवरने थापे रे ॥ ते माटें न करु ए कामो रे, इण वाटें परनव नदि नामो रे ॥ १२ ॥ यत ॥ मित्र शेही कृतघ्नश्च, स्तेयाँ विश्वासघातक ॥ चत्वार कर्मचामाला, पंचमो जातिसनव ॥ ॥ दस्ते नरकपालं तु मदिरामांसनाणी ॥ नानु प्रष्ठति चांमाली, केनेयं दीयते बटा ॥ ३ ॥ मित्रशेदी कृतघ्नश्च स्तेया विश्वास घा तक ॥ स्वार्थे च तत्परोयोहि, तेनेयं दीयते बटा ॥ ४ ॥ पूर्वढाल ॥ मत्री वोले, जो न करीश एह रे, तो दु मारीश नहिं सदेह रे ॥ कुमर नणे मरवान 5 ख कानु रे, पण ख महोदु मुफ लबननु रे ॥ १३ ॥यत ॥ लोनम्वेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकै , सत्यं चेत्तपसा च किं .

१२ जेनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ॥ ५॥ पूर्वढाल ॥ मत्री बोले दो, केम कुलदेवी ॥मा० ॥ काम नचाले हो, बहु दिन सेवी ॥ मा० ॥ देवी बोले हो, नहिं श्रम जोरो ॥ मा.. सो वहुवेला हो, एह निहोरो॥ मा० ॥ १४ ॥ कहो तो थापु हो, एकमर थाणी ॥ मा० ॥ करशे चितित हो, कारिज जाणी ॥ मा० ॥ सचिव यंपे हो, वात ए वहेली ॥ मा० ॥ देवी तुमने हो, करवी सहेली ॥ मा. ॥१५॥ तव कहे देवी दो, नगरनी बहारें ॥ मा० ॥ तुज अश्वप से हो, लावु तेवारें ॥ मा० ॥ पुरने हारें हो, बाले वेगे ॥मा॥ ते नृपकन्याहो, परणी देशे ॥ मा० ॥ १६ ॥ गइ कुल देवी दो, एहत् नाखी ॥ मा. वात ए चिनमा हो, सचिवें राखी ॥ मा० ॥ वाध्यो उजम हो, ढाल ए बही॥ मा० ॥ रामें दाखी हो, रागें मीठी ॥ मा० ।। १७॥ सर्व गापा १५२ ॥ दोहा ॥ ॥ दवे हर्षे वीवाहना, मामे यति ममाण ॥ राय सचिव महोटे ममें, घुरवेढोल निशाण ॥ १ ॥ सामग्री सरवरी सजी, ममप थतिहि अनुप ॥ थन थन मणि पूतली, सोहे अतिहि सरूप ॥ २ ॥थश्वपाल नर तेरिने बानो निज थावास ॥ वात कही धुरथी सवे, मत्री मन उदास ॥ ३ ॥ जे को थावे तुम कनें, बालक नवले रूप ॥ तेदने तुमें इहा सावजो, जेव न जाणे नूप ॥ ४ ॥ दवे कुलदेवी सचिवनी, नाची जाणी कत ॥ थावी उजेणी पुरी, हियडे दर्ष धरंत ॥ ५ ॥ ज श वाडीथकी, मार्ग वलता ताम॥ श्राफाशें कनी रही, देवी बोले बाम ॥ ६ ॥ फूल ले जाये थळे, जे बालक निजगेद ॥ राजसुता पाणिग्रहण, जाडे करशे तेह ॥ ७॥ वात मुणीने चितवे, जश् कद्ध जनकने थाज ॥ घेर गयो तब वीसनो,वल- म्यो गृहने काज ॥ ७ ॥ बीजे दिन तिमदिज सुपी, चिते जाम कुमार ॥ महेन्यो सपाडी वातुले, चपावनद मकार ॥ ए॥ ॥ ढाल सातमी॥ ॥ सुण मेरी सजनी, रजनी न जावे रे ॥ ए देशी ॥थाप्यो चपा नय री पासें रे, मनमा मगलकलश विमासे रे ॥ कुण ए नगरी कुण ए वाडी रे, केणे थाल्यो मुणने तपाडी रे ॥१॥ नमतां थाक्यो सरोवर दीतु रे, पाणी पीधु टाढू मीतु रे ॥ सरोवर पायें वह एक अलगो रे, तिहां ज वर्ननी दोरें वलगो रे ॥ ॥ अस्तंगत थयो रवि तिण वेला रे,

श्री शांतिनाथनो रास खंम पहेलो. १
थाव्या नृपति गृहनें वागणे जी ॥ हर्प धरी मनमांहे, सासूयें पौरख्य
घरने वारणे जी ॥ ६ ॥ वेग मायरामांहे, त्रैलोक्यसुंदरी मन दररवं
घj जी ॥ वरियो कुमर सुरग, गयें प्राप्यु धन धन नूपशु जी ॥
कर नवि मूके कुमार, रायें पूज्यु शी मन कामना जी ॥ थापे पर
तुरग, चपलगति पाणी पथना जी ॥ ७ ॥ माग्यु थाप्यु राय, हा
दुन विवाह सोहामणो जी ॥ देखी कन्यारूप, कुमर थयो मनमांहे दय
मणो जी ॥॥ कीधु सबल अकाज, कुमरी यमरी सरखी पद्मिणीनी।
केम कोढीने हाथ, देता निर्गमो दिन नामिनी जी ॥ १० ॥ श्म चित
वतो तेह, मदिर श्राव्यो वहु श्रामबरें जी ॥ देखी पियु चलचित्त, कुमर
चमकी हियडा नीतरें जी ॥ ११ ॥ इगित जाणी नाव, केड न मूब
कुमरी तेदनी जी ॥ मनमांहे दिलगीर, रागे रगाणी मीजी जेहनी जी।
१२ ॥ मत्री राय दिये मान, देहचिताने मिप करी नीसयो जी ॥ जल
फारी लेइ नारि, चाली लावे घूघट वीसखो जी ॥ १३ ॥ जेह कत्यु पए
तेद, दीगो शून्यमनें उनो रह्यो जी ॥ सोंपीयो तमने देह, नूख तृपा वै
ठे मुझने कहो नी ॥ १४ ॥ हा ना न कहे रे काइ, मन जाणी मोटव
मगाविया जी॥ कुवर चारखी रे ले, अवसर वचन कहे रस नाविया जी
॥ १५ ॥ दोहो॥ मीठा ए मोदक जला, खाता जांगे नूख ॥ पण नी
उजेणीनु मले, तो सवि थाये सुख ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ चिते राज
कुमार, शु ए जाणे उजेणी नीरने जी ॥ अथवा तिहां कोई दीस, गय
होशे घर मात त्यां वीरने जी ॥ १६ ॥ जलें कीध मुरव शुक्ष, वीर्ख थार
हाथे कथने जी ॥ श्राव्यो मदिर सोय, विनता बोले लही चल चित्तने
जी ॥ १७ ॥ केम पियु थे दिलगीर, वात कहो मनमा होवे जिर्स
जी ॥ उखे उदर मुफ जोर, एम कदी देहचिता उठ्यो धसी जी ।
१७ ॥ विनता रही विश्वास, जल लेने केथी लाग्नं वदी जी ॥ ते पहों
च्यो ततकाल, वस्तु वजेणीपंथें जिहां रदी जी ॥ १५ ॥ रथ थारोपी
वस्तु, चार तुरगम जोडें नोतस्या जी॥ वाथ्यो पूढे रे एक, चाल्या तुरत
तिहाथी पाधरा जी ॥ २०॥ पंथीने पंय, कुमर वेठो रथ निर्नयपणे
जी ॥ थोडा दिवस मकार, कुमर पहोतो नगरे थापणे जी ॥ २१ ॥

, १४ जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. शुचिमनोयद्यस्ति तीर्थन किम् ।। सौजन्यं यदि किं निजे स्वमहिमा यपति किं ममने , सहिया यदि किं धनैरपयशोयद्यस्ति किं मृत्पुना ॥ ५ ॥ पूर्व ढाल ॥ खज उपाडी मारण धायो रे, वचमा पुरुपे मत्री साहो रे ॥ समकाव्यो मान ए वयण रे, नहिं हां कोई तादरो सयण रे ॥ १४ ॥ कुमरें दैवती वाणी सनारी रे, नावि जाण्यु मन निरधारी रे ॥ मन पालें मानी ए वात रे, हरख्यो मत्री साते धात रे ॥ १५ ॥ वजडावे नोगत निशाण रे, वोले वदीजन कल्याण रे ॥ गाये गोरी गीत सुनाए रे, चिर जीवो कुवर कुलनाण रे ॥ १६ ॥ हर्प धरी कुवर न्हवरावे रे, नूपण व ने पहेरावे रे ॥ सदु कहे धन जिण माडीयें जायो रे, बहु दिवस अमें वरिसण पायो रे ॥ १७ ॥ हरव्यो साजन द विशेखी रे, कुमरतj मुखपंकन देखी रे ॥ सातमी ढायें वात वखाणी रे, थाखर वहेशे ढा पाणी रे ॥ १७॥ सर्व गाया ॥ १४ ॥ गाथा तथा श्लोक ॥१॥ ॥ दोहा ।। ॥ कुमर कहे कर जोडीने, मत्रीसरनें बेक ॥ को न करे ते में कम्यु, वात मुणो दवे एक ॥ १ ॥ जे आपे मुमने नृपति, अर्थ गरथ नमार ॥ ते सवि लेणं दु सही, एम कीधो निर्धार ॥ २ ॥ वस्तु उजेणी मारगें, लेई थापजो सर्व ॥ सचिवें सघलु मानियु, मनमा थइ निर्गर्व ॥ ३ ॥ लमदिवस थाप्यो निकट, वाज्यां मगलवर ॥ वरत्या उत्सव बहु परें, सगुमन थानदपूर ॥४॥ ॥ ढाल श्रातमी॥ ॥ देशी सोहेलानी ॥ हवे कुलवती नारी, मकन करावे मगजकलशनें जी ॥ २ र उपर सार, निर्मल जल नरे सोवन कलशने जी ॥१॥ पढ़ेरावे सुकुमाल, अगें थनुपम वस्त्र सोहामणा जी ॥ दीपे सुदर वेष, नूषणनूषित यग रलियामण जी ॥५॥ बेसारी गजखध, फूलतो चाले कोतल थागलें जी ॥ साबेला में पड़, वाघे केसरीये धागें चले जी ॥३॥ टोले मलि मलि थोक, थोके थोके करे एम वातरी जी ॥ प्रेलोक्यसुंदरी धन्य, विधिना ए सरखी जोडी घडी जी ॥४॥ पग पग नाचे पात्र, यात्र करेवा जन बढ़ उलव्या जी ॥ सुचां करि करि गात्र, दरिसण देखण न गणे गजघटा जी ॥ ५ ॥ बडु श्रामबर एम, श्री शातिनाथनो रास खम पदेलो २७ वास वस्यो मनरग हो ॥ सु० ॥ क० ॥ ७॥ वासजुवनथी ससघ्रमें, वाहिर श्रावी तेह हो ॥ सु० ॥ दासी समीप उनी रही, पूढे ते सस्नेह हो ॥ सुं० ॥ कण् ॥ ए ॥ केम स्वामिनी उतावला, मुख न समाये श्वास हो ॥ सु० ॥ प्रीतमथी केम उनगी, नाखो म नि श्वास हो ॥ सु०॥ का ॥ १० ॥ नहि मुफ वल्लन रहां कने, दीसे कोढी कोय हो ॥ सुं० ॥ नाद गयो किहां माहरो, कहे एम सुदती रोय हो ॥ सु ॥ क० ॥ ११ ॥ रात्रि गई रवि कगीयो, गइ पीयर ते वाल हो ॥ सु० ॥ वात मुणावी मातने, सुणि कठी चित्त जाल हो ॥ सुं० ॥ क० ॥ १२ ॥ राजसनामाहे आवियो, मत्री कुबुद्धिनिधान हो ॥ सु० ॥ श्यामवदन नीचे मुखे, वो लाव्यो राजान हो । सु०॥क० ॥ १३ ॥ केम तुमें थामण दूमणा, कहो मत्री मन मेलि दो ॥ सु०॥हर्पने में खेद श्यो, करोयथारुचि केलि हो ॥ सु० ॥ क० ॥ १४ ॥ राजन् अवली कर्मनी, गति दीसे असहाय हो ॥ सु० ॥ विधि प्रतिकूल थयो यदा, सो जग कीजें उपाय हो ॥ सु ॥ क० ॥ १५ ॥ यक्त माघे ॥ प्रतिकूलतामुपगतेहि विधौ, विफलत्वमेति बहु साधनता ॥ थवलंबनाय दिनन रनून्न पतिप्यत करसहस्त्रमपि ॥ ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ कृत उदय थावे सही, विषु कत नावे कोय दो ॥सु० ॥ खेद किश्यो करवो श्हा, कर्म करे सो होय हो ॥ १० ॥ कण् ॥ १६ ॥ यत ॥ उदयति यदि नानु पश्चिमाया दिशाया, प्रचलति यदि मेरु शीतता याति वति ॥ विकसति यदि पद्म पर्वताये शिलायां, तदपि न चलतीर्थ नाविनी कमरेखा ॥२॥ तथाचान्यदप्युक्त ॥ गाथा ॥ रे जीव मुह उहेसु, निमित्तमित्त परं वियाणा ॥ सकयफल मुंजतो, कस्स मुहा कुप्पसि प रस्स ॥३॥ पूर्वढाल ॥ राय कहे मत्री कहो, उखनुं कारण मुज हो ॥ सु० ॥थतर श्यो मुफथागलें, प्रकासो निज गुफ हो ॥ सु० ॥ क० ॥ १७॥प्रीति तिहां पडदो, फिस्यो पडदो तिहांकुणप्रीति दो॥सु॥ हेजें हियर्ल्ड खोलियें, एहिज प्रीतिनी रीति दो ॥ सु॥क० ॥ १७॥यउक्त ॥ ददाति प्रतिगृहाति, गुप्तमारख्याति प्रक्षति ॥ जुक्ते नोनयते चैव, पविध प्रीति लक्षणम् ॥ ४॥ पूर्वढाल ॥ नाखी निसासो ते कहे, राजन् जे करे दैव हो ॥ सु० ॥ तिहा नहिं जोरो केहनो, कृत नोगवीय सदैव हो । मु० ॥ क० ॥ १ए ॥ तुम पुत्रीनी सगतें, मुफ थगन गुणवत हो ॥ सु , ३ २६ जैनकथा रत्नकोपनाग आठमो. पुण्ये सीधु रे कान, थामी ढालें रामविजय कहे जी । पुस करो नदि लोक, श्ह नव परनव जेहथी सुख लहे जी ॥ २२ ॥ सर्व ॥ १०५ ॥ दोहा ।। ॥ मात पिता मगल तणां, जांखर फूरि थयांह ।। सुतनी सुध लापी नहिं, केता दिवस गयाह ॥ १ ॥ मदिर दीगो थावतो, रथ वेदो गुणवत। राजकुमर कोथम घरे, रथ खेडी थावत ॥२॥ वास्तो पण न रह्यो किमे, अरहो थाव्यो जाम ॥ मात पितायें उतरव्यो, निन थगनने ताम ॥ ३ ॥ दीयई हरखे देजमु, उख दोदग टलियांह ॥ मात पिताने पुत्र ए, बडु दिवसें मलीयाद ॥ ४ ॥ थक वेसारी पुत्रनें, रज हे घणे नेह ॥ सुत नवरावे माडली, श्रासूने नीरेह ॥ ५ ॥ वात कही सघली तिणें, पूरि हूती ससनेह ॥ हरव्या मात पिता घणां, पुण्योदय लहि तेह ॥६॥ हवे त्रैलोक्यसुंदरी तणो, नवि निसुणो अवदात ॥ परण्या पूजें जे थयो, कडु सविस्तर वात ॥७॥ ॥ ढाल नवमी॥ ॥ देशी मधुकरनी ॥ राजकुवरी के. गइ, नवि दीगो निज कत हो ।। सुंदर ।। मन विलखाणीमहासती, नयणें नीर करत हो। मु० ॥ १ ॥ कर्म न छूटे श्रापणं ॥ ए थांकए। ॥ दीजे केहने दोप हो ॥ १० ॥ परएयो प्रीतम परदरी, केम गयो विण रोष दो ॥ सुं० ॥ कण् ॥ ५ ॥ पहेरावे निजपुत्रनें, मगलकलशनो वेष दो ॥सुं॥राजकुमरी पासें मोकल्यो, सूवाने सन्निवेश हो।सुं०॥॥॥थाप्यो शय्यासपरें, कुमरीयें दीठो जाम दो ॥ सु० ॥ कुत्सितरूपें कोढीयो, ऊयक उनी यश ताम हो ॥ १॥ क० ॥ ४ ॥ प्राणप्रिये केम वेगलां, जर मनी इण वार हो ॥ सुं० ॥ श्रावो रमो मुखसेजमा, तुं मुफ प्राण थाधार हो ॥ मु० ॥ क ॥ ५ ॥ वलतुं कहे सा सुदरी, मूढ विमासी बोल दो ॥ १० ॥ तुं कोण हुँ कोण एम सही, कहीये न वचन निटोल दो ॥९॥॥६॥ उष्कृत थापा, फल पाम्यो बो तास हो ॥ सु०॥ मूक उम्शीलपणं हां, नर्दितर लदिश विनाश हो ॥१०॥कायत ॥ षढत्वमिश्यिछेद, दो ग्यं च नवे नवे॥ नवेन्नराणां स्त्रीणां ची, न्यकीयासक्तचेतसाम् ॥१॥ पूर्वढाल ।। रहें अलगो मुफथी सही, सो परनारी संग दो ॥ सुं० ॥ मुज पियुनयरी टक्केशिमा,

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श्री शातिनाथनो रास खंग पदेलो. २ए
स्तन पीतां लघु वाल ॥ क० ॥ उदरविल जलें पूरियां रे हां, के पाडयां
मनुथाल ॥ क० ॥२॥ अवगुण थता काढिया रे हां, परने दीधां बाल
॥क०॥ के वली शीलनी खमना रेहां, कीधी कर्मचमाल ॥ क० ॥ ३ ॥
यत ॥कुरम रमत्तण मुनगाई, विलित्त निदू विसकन्नगाइ ॥ जम्मतरे खमि
य सीलनावा, नाचण कुद्या दढसीलनावा ॥ ५ ॥ पूर्वढाल ॥ के पशु
परखी मनुजना रे हां, कीधा वालविठोह ॥ क० ॥ के सुत शोक्यनी ऊपरें
रे हां, विरुन विमास्यो शेह ॥ क० ॥ ४ ॥ के वली दव देवराविया रे
हां, वनमाहे धरि हूंश ॥का के तुच कारिज आपणे रे हां, कीधा देवगुरु
सूस ॥ क० ॥ ५ ॥ इत्यादिक कहो कुण लहे रे हां, शानी विण नवि
वात ॥ क ॥ ते उदयेंज थया इहां रे हां, माहरे माय ने तात ॥
क० ॥ ६ ॥ अथवा पियु उढणमां रे हां, होशे नहि सदेह ॥ क० ॥
मोदक अवसर हितनणी रे हां, नाम कत्यु गुणगेह ॥ कण् ॥ ७ ॥ धीरन
धरे मनमा सती रे हां, चिते चित्त उपाय ॥कामले मुमने जो वालहो रे हां,
तो टलशे ऽरित अपाय ॥ क० ॥ ॥ एक दिन सिह सामतने रे हां, तेडचो
मदिरमाहे ॥ क०॥ वात कही सवि मूलथी रे हां, निसुणी धरी उत्साह
॥७॥ ॥ सिह कहे सुणो स्वामिनी रे दा, म धरो मन जनाल का
वात कहिश जय रायने रे हा, होशे मगलमाल ॥ ॥ १० ॥ लहि
अवसर जइ वीनवे रेहा, सुणोराजन मुफ वाण ॥क० ॥ कष्टें पड़ी तुमची
सुता रे हां, श्रवला वद्ध गुणखाण ॥ क० ॥ ११ ॥थालापन सन्मानता
रे हां, दूर रहो माहाराज ॥ क ॥ वाक्य श्रवणमात्रे प्रनु रे दां, तनुजा
थरज निवान ॥ कण॥ १५ ॥थश्रुजलाविल लोचनें रे हा, नूप कहे मुण
सीह ॥ क० ॥ वांध्यां उदय श्रावे वही रेहा, वीरुई कर्मनी लीह ॥ क० ॥
१३ ॥ प्राणप्रिया ए मुफ सुता रे दां, थ कलकित देह ॥ क० ॥ श्ट
थनिष्ट थई घणु रे दां, कहियें कोने एह ॥ क० ॥ १४ ॥ पण रूठे निज
थातमा रे दा, नवि प्रनवियें लोक ॥क० ॥ थावी कहे शहां कने सुखें रे
हां, मन इलित सो शोक ॥ क० ॥१५॥थनुमति लथावी कहे रे हां,
त्रैलोक्यसुदरी ताम ॥ कण्॥ तात वेष नरनो दीयो रे दा, करु मनचितित
काम ॥ कल ॥ १६ ॥ सिद कहे कारण वशे रे हा, स्त्री ग्रहे नरनो वेप ॥
क॥ राजकुलें ए योग्यता रे हां, राय दीयो श्रादेश ॥ कम् ॥ १७ ॥

१७ जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो. ॥ विणती काया कोढथी, फरसनो दोप महत हो ।। मु०॥क० ॥७॥ कुलखपण ए कुवरी, का ए विधाता दीध हो ॥ सु० ॥ देव कुमर सम कतने, जेणी कोढी कीध हो ॥ सु० ॥ कण् ॥ २१ ॥ वात सुणी व लखो थयो, थाव्यो मत्री थावास हो ॥ सु० ॥ जामाता देखी करी, दु० मनमांहि उदास हो ॥ सु० ॥ क० ॥ २२ ॥ कम ए कोढी थयो, पण पुत्री शिर दोप हो ॥ सु०॥ एह चढयो थति थाकरो, कीजें केहो रोग हो ॥ सु० ॥ क० ॥ २३ ॥ राय कहे मत्री सुणो, कीपू में सवल अकाज हो ॥ सु० ॥ जोरें थापी थगजा, तुझ सुत विणठो थान हो ॥ सु० ॥ क० ॥ २५ ॥ दोप नहि काहि राजनो, नहिं काहिं वहूनो वाक हो । मुं० ॥त्रण वनमांहे वालियो, कम थामो थाक हो ॥ सु० ॥ क० ॥ २५॥ माटें कहु बु स्वामीने, रीप न करशो कोय हो ॥१०॥ पुत्रीनी पेरें पाला, कर्म करे ते दोय हो ॥ सु० ॥ क० ॥ २६ ॥ कर्मवशे सहुने मनें, वात वसी तेणि वार हो ॥ सुं० ॥ वहाली पण वैरण थर, कोइ न ले तस सार हो ॥ सु० ॥ ॥ २७॥ एक बलाश्धे मदिरें, रहे ते अवला बाल दो ॥ सु० ॥ चिते ए मातु मरणथी, मुझ माथे ए थाल दो ॥ सु० ॥ क० ॥ २७ ॥ नवि सुणो नवमी ढालमा, कह कर्मजंजाल हो ॥ सु० ॥ रामविजय कहे कोने, कदिये न दीजें थाल हो ॥ सु० ॥ क० ॥ २५ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ त्रैलोक्यसुदरी चितवे, विरुd कमविलास ॥ मुफ माथे श्रावी पज्यो, बेसी रहे उदास ॥ १ ॥ मुछ्ने मूकीने गयो, वालम नवल सनेह ॥अवगुण को दारख्यो नहिं, साले मुफने तेह ॥ ॥ वली माथे सषलु चढघु, कोढी तणु कलक ॥ थइ सगुने अलखामणी, कर्मवशे दु रंक ॥३॥ यत ॥ कुमुदवनमपनि श्रीमदनोजखम, स्त्यजति मुवमुलक प्रीतिमांचकवाक ॥ सदयमहिमरश्मिर्याति शीतांपुरस्त, दतविधिललि ताना ही विचित्रोविपाक ॥ १ ॥ ॥ ढाल दशमी ॥ ॥ काची कली थनारकी रे दा ॥ ए देशी ॥ पूरवनव में बाधा रे दां, कोइक डरित कठोर ।। कर्म विडंबना ॥ एथाकणी॥तेह उदय थायां हा रे दां, पियु गयो मूकी निगोर ॥ क० ॥ १॥के में दूध विरोहियां रे हां, ,

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श्री शांतिनाथनो रास खंग पदेलो. २ए
स्तन पीतां लघु वाल ॥ क० ॥ उदरविल जलें पूरियां रे हां, के पाडयां
मदुथाल ॥ क॥२॥ अवगुण थरता काढिया रे हा, परने दीधां बाल
॥ क० ॥ के वली शीलनी खंमना रेहा, कीधी कर्मचमाल ॥ क ॥ ३ ॥
यत ॥कुरंग रमत्तण उनगाइ, विलित्त निदू विसकन्नगाइ ॥ जम्मतरे खंमि
य सीलनावा, नाउण कुद्या दढसीलनावा ॥ ५ ॥ पूर्वढाल ॥ के पच्छ
परखी मनुजना रे हा, कीधा वालविठोह ॥ क० ॥ के सुत शोक्यनी ऊपरें
रे हां, विरुन विमास्यो शेह ॥ क० ॥ ४ ॥ के वली दव देवराविया रे
हां, वनमांहे धरि
दूश
॥०॥के तुन्छ कारिज श्रापणे रे हां, कीधा देवगुरु
सूस ॥ कण् ॥ ५ ॥ इत्यादिक कहो कुरा लहे रे हां, ज्ञानी विण नवि
वात ॥ क ॥ ते उदयेंज थया हा रे हा, माहरे माय ने तात ॥
क ॥ ६ ॥ अथवा पियु उणमां रे हां, दोशे नहि सदेह ॥ क० ॥
मोदक थवसर हितनणी रेहां, नाम का गुणगेह ॥ कल ॥ ७ ॥ धीरज
धरे मनमा सती रे दा, चिते चित्त उपाय ॥कामले मुझने जो वालहो रे हां,
तो टलो उरित अपाय ॥ क०॥७॥ एक दिन सिह सामतने रे दा, तेडचो
मदिरमाहे ॥ क० ॥ वात कही सवि मूलथी रे हां, निमुणी धरी उत्साह
॥०॥ ए ॥ सिह कहे सुणो स्वामिनी रे हां,म धरो मन जंजाल ॥क॥
वात कहिश जई रायने रे हा, होशे मगलमाल ॥क० ॥ १७ ॥ सहि
अवसर जश् वीनवे रेहा, मुणोराजन मुफ वाण ॥क० ॥ कटें पडी तुमची
सुता रे दा, धवला बढ़ गुणखाण ॥ क० ॥ ११॥थालापन सन्मानता
रे दां, दूर रहो माहाराज ॥ क ॥ वाक्य श्रवणमात्रे प्रनु रे हां, तनुजा
थरज निवाज ॥ कण॥ १२ ॥अश्रुनलावित लोचनें रे हा, नूप कहे मुण
सीह ॥ क० ॥ वाध्यां उदय श्रावे वही रेहा, वीरुई कर्मनी लीह ॥ क०॥
१३॥ प्राणप्रिया ए मुफ मुता रे हा, थइ कलंकित देह ॥ क० ॥ श्ष्ट
थनिष्ट थई घणु रे हां, कहिये कोने एद ॥ क० ॥१४॥ पण रूने निज
थातमा रे हां, नवि प्रनवियें लोक ॥क० ॥ यावी कहे श्दा कने सुखें रे
दा, मन ठित सो शोक ॥ क० ॥१५॥थनुमति लश्थावी कहे रे हां,
त्रैलोक्यमुदरी ताम ॥ क०॥ तात वेप नरनों दीयो रे हां, करुं मनचितित
काम ॥ क ॥ १६ ॥ सिद कहे कारण वशे रे हा, स्त्री ग्रहे नरनो वेप ॥
क० ॥ राजकुलें ए योग्यता रे हां, राय दीयो आदेश ॥ कम् ॥ १७ ॥

. . २० जैनकथा रत्मकोप नाग आठमो. सोप्यो सिह सामंतने रे हां, तस रक्षाने कान ॥ क० ॥ कुमरी कहे सुणो तातजी रे हां, जाउं उलेणी थान ॥ क०॥ १७ ॥कारण कहील हुंचा वीने रे हां, आगलथी शी वात ॥ क० ॥ दोप न लागे वराने रे हो, तेम करो श्म कहे तात ॥ क० ॥ १५ ॥ सेन्य सहित लेइ सिंहने रे हां, सि हाथी कीध प्रयाण ॥ क० ॥ शोध कारण निज कतनी रे हां, मुंदरी सु गुण सुजाण ॥ क ॥२॥ नावें नवियण सांजलो रे हां, मनोहर दशमी ढाल कण॥राम कहे धन्य जगतमां रे हां, जे रहे मनड वाल ।।क० ॥ ११ ॥ ॥ दोहा ।। ॥ हवे अविहन्न प्रयाणथी, चालतां निक ॥ याव्या केटले एक दिने, नयरी उलोणी नजीक ॥१॥ वैरसिह नृप सांजली, लोक मुखें एम वात ॥ थावे नयर थापणे, चपानृपनो जात॥ २ ॥ दल लेश साहामो चन्मो, वैरसिंह नूपाल ॥ तेडी लाव्यो कुवरने, नयरमाहि उजमाल ॥ ३ ॥ स्वा गत पूजे कुमरने, देई वहु सन्मान ॥ कोण कारण थयु थावतु, नाखो सु गुणनिधान ॥ ॥ तुम नगरी निरखण तणो, हतो बहू मन कोड ॥ तिण कारण अमें थाविया, कुमर कहे मद मोड ॥ ५ ॥राजन कहे जलें. थाविया, श्रम घर पावन कीघ ॥ सप्तनूमि थावासमां, नृप कतारो दीध ॥ ६ ॥ राजसुता तिहा तो रहे, साथ सवल दलपूर ॥ दे थादेश सेवक जणी, प्रद गमते सूर ॥ ७ ॥ ॥ ढाल अग्यारमी॥ ॥ रामचदके बाग, चांपो मोरी रह्यो री ॥ ए देशी ॥ तेडी सेवक तेह, कुमरी एम नणे री ॥ निरखो नीरनुं नाम, जश्ने यन घणे री ॥ १ ॥ पूर्वविशे एक स्वामि, वे जलगम जलू री ॥ बगुजंतु विश्राम, नशिर ति लक मनू री ॥ २ ॥ लदिनृपनो श्रादेश, जलमारग निवसे री ॥ चर्या देख ण काज, कुमरी मन उनसे री॥३॥ जल पीवानें काज, एक दिन ते निरखे री ॥ जाता दयवर पंच, मनसाथे परखेरी ॥ ४ ॥ ए मुफ तातें वीध, दय देखी दरखीरी॥सीधां वांबित काज, चिंते ते निरखीरी॥५॥ सेव कनें कहे थाम, एह स्वामी तणो री ॥ नाम नाम निरधार, मुफ धागें ए नणो री॥ ६ ॥ विनति करी कहे तेह, धनदत्त शेठ तणो री ॥ मगल कलश कुमार, एहज स्वामी सुणो री ॥ ॥ सिंह नणी कहे वात, एह श्री शांतिनाथनो रास खंम पदेलो. कुमर तेडो री ॥जेम दयनो संबंध, सांजलीयें निमोरी ॥ ॥ लेखशाला ये ताम, जातो तेह जाणी री॥अध्यापक सघात, प्रीति करी ताणी री॥ ए । एक दिन नोजन काज, नात्र सहित धावासें ॥ अध्यापक थाणद, तेच्यो मननें वहनासें ॥ १० ॥ साथे निहाली नाथ, हियडे घणु हरखी री ॥ जेम चकोरी च, उलसे चित्त परवी री ॥ ११ ॥ मांझे सोवन थाल, थादरे प्रीति घणी री ॥ प्रीतमने निज पास, वेसारे सुगुणी री ॥ १२ ॥ वीजणे ढोले वाय, नोजन ननां प्रीसे री ॥ देखी प्रिय मुखचद, थतर दील हींसे री॥ १३ ॥ वीजाने सामान्य, गौरव नक्ति करे री ॥ ते देखी सद् वाल, मनमा अणखधरे री ॥ १४॥ एवई एहने मान, का रण को न लहे री॥ पंक्तिनेदनु उख, मनडामांहे दहे री॥१५॥ जमी कन्या वलि तेह, सदुथी अवल शिरें री॥ दौमयुगल पियु कान, थापे हर्ष नरें री ॥ १६ ॥ अध्यापकनें एम, वात कहे सुविचारी ॥ ए तुम सघला मात्र, मांहे माहापण नारी ॥ १७ ॥ जे होय ते मुफ थान, वात कहो एक सारी ॥ ते निसुणी मुफ चित्त, दर्प लहे सनारी ॥ १७ ॥ कोधतणे वश तेह, बोल्या सह एम त्राहीकहेशे मगल एह, नक्ति करी तुमें जाडी ॥ १५ ॥ वोल्या मगल ताम, रहो तुमें सद् थलगा री॥ नक्ति करी ते माटें, शु श्रावो वत्लगा री ॥ २० ॥ नक्ति करे सो वार, जिहां मन मान्युं दुवे री ॥ परने न करे कोय, टग मग साहामुं जुवे री ॥ २१ ॥ सा मन मानी वात, कहोने तेह परी री ॥ सानलिये एक चित्त, प्रीतेरीति खरी री ॥ २२ ॥ एकादशमी ढाल, वात कही रढियाली ॥ दवे मगल मन मेलि, कहेो वात रसाली ॥ २३ ॥सर्व गाथा ॥ २५ ॥ श्लोक २७ ॥ दोहा ॥ ॥ श्रध्यापक थानदीयो, सांजली शिना बोल ॥ मगलनें कहे वत्स तुमें, दाखो वात अमोल ॥ १ ॥ मगल चिते चित्तमा, त्रेलोक्यसु दरी एह ॥ मुफ कारण नरवेप धरि, थावी नहिं सदेह ॥ २ ॥ धन धन एहनी चातुरी, राख्यो जिणें निजधर्म ॥ मुफ जेवो पापी नहिं, कीधु जेणें विकर्म ॥ ३ ॥ कहेवा लाग्यो कुमर ते, कम्पित के थनुभूत ॥ कुमरी कहे अनुनव तणी, वात कहो अनुत ॥॥ धुरहूती मामी सकल, दाख्यो सकल सवध॥यावत मत्री काढीयो,तिदा लगे सवि धनुषधादर्षित दुर , २२ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. सा सुदरी,सांजलीप्रीतम बोल॥रोमरोम तन वनस्युं याजअधिक रंगरोक्ष ॥ ढाल वारमी॥ ॥ मुखने मरकलडे ॥ ए देशी ॥ कृत्रिमकोप करीने जी ॥ कुमरी एम नाखे ॥ ग्रहो ए मिथ्यानापीने जी । सद्कोनी साखें ॥ एहदु जूढं कम बोले जी ॥ कुण् ॥ नहि ए कोई नरनें तोले जी ॥ स ॥ १ ॥ तेने ग्रह वा सेवक धाया जी ॥ कु० ॥ तव वालक सवि उजाया जी ॥ स ॥ ते ग्रही गृहमाहे थाल्यो जी ॥ कु० ॥ ते समज्यो मनमांहि जी ॥ सप ॥ ५॥ उत्तम शासन वेसारी जी ॥ कुछ ॥ कर जोडी रदी सा नारी जी ॥ स० ॥ कहे सिहने ए मुफ कत जी ॥ कु० ॥ए थावी मिल्यो एकांत ॥ स० ॥३॥थान मनोवादित सवे फलियां जी ॥ कु०॥ प्राणजीवन मुजने मलिया जी ॥ स० ॥ थाज जीवित जन्म प्रमाण जी ॥ कु० ॥ मुफ त्रूचा श्री जिननाण जी ॥ स० ॥ ४ ॥ मन सशय सिहज जाणी जी ॥ कु० ॥ ज जुवे श्रवर सहिनाणी जी ॥ स ॥ नाजन मुकता ते दीघा जी ॥ कु० ॥ नामांकित असली सीधा जी ॥ स०॥ ५ ॥ जय जोयो ते सवि दीगो जी ॥ कु० ॥ मन सशय सघलो नाटो जी ॥ स०॥ धनदत्त शेठने कहे जाणीजी॥ ॥ए तुम सुतनीधपीयाणीजी ॥सम् ॥ ६॥सुणी वातने शेठ उजाणो जी ॥॥यावे तिहां श्वास नराणोजी॥ स ॥ घरि रूप रमणी- थारों जी ॥ कुण् ॥थावी श्वसुरने पाये लागे जी॥ स०॥७॥ श्रावे नयर नरेश्वर रंगें जी॥०॥जोवा मलियां बनु उन रंगें जी ॥ स ॥ पंचसाखें राजकुमारी जी ॥ ॥ थर रदी मगज घरनारी जी ॥ स० ॥ ॥ पसरी बढ़ नयरें वात जी॥ कु०॥ धन्य कुमरी एद सुजात जी ॥ स ॥ नरवेष देने चाल्यो जी ॥ कु० ॥ सिंह निज न यरी जणी धाव्यो जी ॥ स० ॥ ए ॥ निजनृपति बागल यावी जी' ॥ कु० ॥ सवि वात कही समजावी ॥ स ॥ धन्य मुफ तनया चतुराई जी ॥ कु० ॥ श्रदो जून सचिव धीच जी ॥ स० ॥ १०॥ प्रीतियें न रहे बानु पाप जी ॥ कु० ॥ नवि दीजे पर उपताप जी ॥ स ॥ पड़ी करन एदने माबो जी ॥ कु० ॥ एक वार जमाश्ने तेडावो जी ॥ स ॥११॥ सिद मूकीने तेहावे जी ॥ कु० ॥ दपती दोय चपा थावे जी ॥ स ॥ नृप सामो थाध्यो थापें जी ॥ ७ ॥ षटु मान जमाइने थापे जी ॥

श्री शांतिनाथनो रास खंग पहेलो. २३ सम् ॥ १२ ॥ गजवरखधे वेसारी जी ॥ कु० ॥ असवाव संघातें जारी जी ॥ स० ॥ पुरमा आवे असवारी जी ॥ कु० ॥ तिहा खलक मल्या नर नारी जी ॥ स० ॥ १३ ॥ सद्ध जपे ए चिरजीवो जी ॥ कु० ॥ कुवर ए कुलनो दीवो जी ॥ स ॥ सघलो ए मत्री वक जी ॥ कु० ॥ दीधु कूडं कोढी कलक जी ॥ स ॥ १४ ॥ नव जात एवं हारी जी ॥ कु० ॥ बोले पुरजन व्यवहारी जी ॥स० ॥ मदिर याव्यो कुलनाण जी ॥०॥ तव वाग्यां ढोल निशाण जी ॥ स ॥ १५॥ नृप सचिवनें कीधो कावो जी ॥ कु० ॥ कस्खो हुकम तलारने मागे जी ॥ स० ॥ कुश चोर तपो रखवाल जी ॥ कु० ॥ बोले एम वाल गोपाल जी ॥ स ॥ १६॥ फल पाम्यो प्रत्यद एह जी ॥ कु० ॥ दीधु थाल सतीने जेह जी ॥सण॥ महोकम माखो तव मूठे जी॥कुण॥ गडदा पाटू पच्या पूर्वे जी ॥स ॥१७॥ तिहा मगलकलश विचारे जी ॥कु०॥सद् निजकतने अनुसार जी स॥ निजथातम दोप विनावे जी ॥ कु० ॥ इहा पर ते निमित्त कहावे जी ॥ स॥१७॥ यमुक्तं ॥ रे जीव सुहहेसु. जीव सुहहेसु० ॥१॥ थप्पा चेव दमेबो, अप्पा दु खलु उद्दमो॥थप्पा दतो सही होइ, अस्सि लोए परमय ॥२॥पूर्वढाल। मुफ वेता जो ए दणाय जी ॥ कु० ॥ अनुकपावत 5 खाय जी ॥ स०॥ सद जीवने जीवित प्यारु जी ॥॥ कही नृपने एने उगारु जी ॥सण॥१॥ यक्त ॥ अमेध्यमध्ये कीटस्य, सुरेंऽस्य सुरालये ॥ समा च जीविताको झा, सम मृत्युनयं यो ॥ ३ ॥ श्रन्यदर्शनेपि ॥ योदद्यान्मेरुवत्स्वर्ण, क स्नां चैव वसुधराम्॥ एकस्य जीवितं दद्या, न च तुल्य युधिष्ठिर ॥ ४ ॥ पूर्व ढाल ॥ कहे नृपने प्रश्नु थवधारो जी ॥ कु० ॥ सचिव नपरें कोप निवारो जी ॥ स० ॥ मुफ नपरें महेर करीजें जी ॥ कु० ॥ मत्रीने जीवित दीजें जी स॥२०॥ धन्य उपगारी तेद जी ॥ कु० ॥ श्रवगुणी उपरें धरे नेद जी ॥ स ॥ कही वारमी ढाल विचारी जी ॥ कु० ॥ गुणवतनी जान व लिहारी जी ॥ स० ॥ १ ॥ सर्वगाथा॥ ३२ ॥ गाथा तथा श्लोक ३२ ॥ दोहा ॥ ॥ नृपजामाता थामहें, तेव्यो मत्री तेह ॥ जा मूक्यो तुम जीवतो, पण ण पुर न रह ॥१॥ निजनगरीथीनीसखो, सचिव तेद मतिदीन ॥ जग सघलु ए जाणजो, मृदयतणे थाधीन ॥ २ ॥ उदय थावे कर्मनें, . २४ जैनकथा रत्नकोप नाग आवमो. महोटा मति मुंफाय ॥ गयो परदेश वापडो, पण कोइन दीये गय ॥३॥ मान रहित मेलो मनें, मेली घरनु राज ॥ करि परघरनी चाकरी, पर नरेवा काज ॥॥ हवे नृप मगलकलगनें, थाप्यो सुतने ग्राम ॥ जुयो। जब गति पुण्यनी, पुण्ये सीके काम ॥५॥ तेडाव्यां तेहना तिहां,मात पिता तेणि वार ॥सद्ध परिवारें परवस्यो, विलसे सुख संसार ॥६॥ एहवे दीपीरा मणी, वनपालक मतिमत। यशोन मुनि उपवनें,समवसस्या गुणवता॥ ॥ ढाल तेरमी॥ ॥ वारी मोरा सादेवा ॥ ए देशी ॥ नृप सुदर सांगली होराज,रीज्यो धर्मने राग ॥ वारी मोरा साधुनी ॥ ए यांकणी ॥ श्रीगुरुवदन नीसमो हो राज, श्राज थजव लह्यो लाग ॥ वा ॥ १ ॥ तारण तरण नवांतुषि हो ॥ जगमा जेम जहाज ॥ वा ॥ पचालिगम ते साचवी हो। वांदे श्री मुनिराज ।। वा० ॥ २ ॥ दल देखी दिल उत्नस्यु हो ॥ दे दिल नर उपदेश ॥ वा ॥ धर्म करो धिगड धसी दो० ॥ यौवन वय सुविशेष ॥ वा ॥ ३ ॥ जर कुट्टी यौवन शशो दो० ॥ काल थाइडी नित ॥वा०॥ धर्मी विना धर्मज नहिं हो ॥ कुशल किहांथी मित्त ॥ वा ॥ ४ ॥ बेड पिशून वझे फूपई दो० ॥ जाइ उजाणो काल ॥ वा० ॥ वहेती वारे शोधायें दो ॥ धर्म था उनमाल ॥ वा ॥ ५ ॥ रखे प्रमादने वश पडो दो ॥ धर्म ते शुद्ध वनाव ॥ वा ॥ अगुम थनादिनी चेतना हो ॥ मोह्यो मोदविनाव ॥ वा० ॥ ॥ दृष्टिविपर्यय थ रह्यो हो। पर सपरें निज नाव ॥ वा ॥ निजवस्तु ए जाणो नहिं हो ॥ देखी रहो चेतननाव ॥ वा० ॥ ७॥ शुं पुजलने वश पच्या दो० ॥ ए कोण कोण तुम रूप ॥ वा ॥ निज घर तजी परघर रमो हो ॥ चतुराई रूप ॥ वा० ॥ ॥ मन मानी गुरुदेशना हो ॥ थायो नववैराग्य ॥ वा० ॥ कहे श्रीगुरु तारो मुने दो॥थाज जह्यो में लाग ॥ वा॥ ५ ॥ कहेगुरु देवाणुप्पिया हो० ॥ करीये नवि परमाद ॥ वा० ॥ नावसधी नमतां सदी हो ॥ चारखो धनुनवस्वाद ॥ वा ॥ १०॥ यावी मगलफलशने हो० ॥ सोंपीने निनराज ॥ वा ॥ राजन संयम पावलो हो । थातम साधन काज ॥ वा०॥ ११ ॥ पंच समिति सूधा मावत थणगार ॥ वा० ॥ शुक्ष निरीद तप थावलो हो ॥ करता सय यति हो॥

श्री शांतिनायनो रास खंम पहेलो. श्य विहार ॥ वा ॥ १२ ॥ गुरु थाणा शिर पाघडी हो ॥धारी राखे सार ॥ वा०॥ विपय न वां पा घडी हो ॥ दु तेहनी वलिहार ॥वा॥१३॥ जे सयम सुख बागलें हो॥सुर सुख पण तिलमात ॥वा॥ नर देव पण नित्य जेहना हो ॥ चरण नमे परमात ॥ वा ॥ १४ ॥ यमुक्तं ॥ तण सथार निवितो, मुणिवरो नग्ग राग गयमोहो ॥ ज पावमुत्तिसुह, कित्तो तय चक्कवट्टीवि ॥ १॥ पूर्वढाल ॥ गुरु चरणाराधनयकी हो ॥ सुरसुदर शपिरान ॥ वा ॥ सुगति सही सिक्षक दशा हो ॥ जिहां सुख मोज समाज ॥ वा ॥ १५ ॥ हवे पाले निजराजने हो ॥ मगलकलश नरेश वाणा राज्ये वणिकने थापीयो हो ॥ निसुण्यं अपर पुरेश ॥ व ॥१६॥ दल ले ते थाविया हो ॥ राज्य सेवाने काज ॥ वा ॥ मगल नृप चढती कला हो ॥ वश कीधा सह राज ॥ वा ॥ १७ ॥ पुण्यदशा जस पाधरी हो ॥ मगलमाला थाय ॥वा॥ पदपद पामे संपदा हो । मन धारे ते उपाय ॥ वा ॥ १७ ॥ ढाल नपी ए ते रमी हो ॥ पुण्यो दयनी वात ॥ वा०॥ धन्य जेहनी धर्मे करी हो ॥ रंगाणी सवि धात ॥ वा ॥ १५ ॥ सर्व गाथा ॥ ३२ ॥ गाथा तथा श्लोक ॥ ३३ ॥ ॥दोहा॥ ॥ सुख जोगवतां अनुक्रमें, त्रैलोक्यसुदरी साथ ॥ सुत जन्म्यो एक सं दरु, उत्सव करे धरनाथ ॥१॥ थानद धरी धगज तणु, यशशेखर अनि धान ॥ सऊन सतोपी घj, थापे ते राजान ॥ २ ॥ जिनममित एथिवी करी, खरची वह धन कोडि ॥ नक्ति करे जिनवर तणी, प्रणमे वे कर जोडि ॥३॥ इव्यक्ति विरचे नती, जावनक्ति अनिलाख ॥ वरसप्रत्ये साहम्मी निमित्त,खरचे धन के लाख ॥ ४ ॥ जिनगुरु जिनमत सघनी, नक्ति नेद ए चार ॥ श्रादरता उज्ज्वल दुवे, समकितनो थाचार ॥ ५ ॥ समरथ सुत थागल थयो, राजधुरधर धीर ॥ प्रजापाल पाले प्रजा, पर ख कायर वीर ॥ ६ ॥ इण अवसर तिहा थाविया, श्री जयसिद मुनीश ॥ श्रवनीपति वदन चल्यो, साथै सवल जगीश ॥ ॥ गुरु वांदी निमुणे नृपति, देशन अमृतवाण ॥ कथा रसिक सवेगनी, निर्वेदनीव खाण ॥ ७ ॥ देशन अतें पूजीयु, नृप पूरव अवदात ॥ गुरु ज्ञानी नाखे प्रगट, पूरव नवनी वात ॥ ए॥

जैनकया रत्नकोप नाग आठमो. ॥ ढाल चौदमी॥ ॥ देशी विदलीनी ॥ क्षेत्र नरत शुन गमें, पुर धरणीप्रतिक्षित नामें हो ॥ राजन सुण वाणी ॥ वीपमी एकर्मकमाणी हो ॥रागामु०॥ निरसे कुलपुत्रक एक, सोमवशनिध सुविवेक हो ॥रा ॥ १ ॥ तस घरे कांता श्री देवी, रूपें श्रमरीना जेहवी हो ॥ रा० ॥ दपती दोय प्रीति पनोता, सुख विलसे सुर सम जोता हो ॥ रा ॥ २ ॥ श्रावक जिनदेव सघातें, तस प्रीति बनी एकातें हो ॥ रा० ॥ नखमांस तणी परें पाले, नेह नि विड चेहू सनाले हो ॥ रा० ॥ ३ ॥ धनहूते पण जिनदेव, परदेश जावा थइ टेव हो ॥ रा० ॥ कहे मित्रने दु थन्य देश, जाइश व्यापार उद्देश हो ॥रा० ॥ ४॥ पण मुज धन राखो पासे,वावरजो क्षेत्र उल्लासें हो ॥रा॥ शुनपात्रं जो वावीजें, परनवसवल पामीजें दो ॥राण॥५॥ ययुक्त ॥ वाजे स्याट्विगुण वित्त, व्यवसाये चतुर्गुणम् ॥ देत्रे शतगुण प्रोक्त, पात्रेऽनतगुण नवेत् ॥ १॥ नैषधेऽपि ॥ दानपात्रमधमर्णमिहैकग्राहि कोटिगुणित दिविदायि ॥ साधुरेति सुकतैर्यदि कर्तु, पारलौकिककुसीदमसीदत् ॥२॥ पाकारेणोज्यते पापं, प्रकारस्त्राणवाचक ॥ अक्षरक्ष्यसयोगे, पापमादुर्म नीषिण ॥ ३ ॥ पूर्वढाल ॥ थापी दशसहस्र दीनार, परदेश चल्यो व्या पारें दो ॥रा ॥ दवे सोमच विचारे, धन्य धन्य एदनो अवतार हो ॥रा ॥ ६ ॥ मुफ हाथे बदु धन दीघो, एवं जन्म कृतारथ कीधो हो ॥रा ॥ तो कांक मुफ उमेरी, खरचु शुनगाम सवेरी हो ॥ रा ॥४॥ पुजल मूर्धा भतारी, प्रशसे तेदनी नारी हो ॥ रा० ॥ वेढ बांधी पुस्पनी राशि, सुख विलसे निज श्रावास दो ॥रा०॥ ७ ॥ एक नशनामें नारी, श्रीदेवीने ते प्यारी दो ॥रा॥ नदशेत सुता गुणखाणी, देवदतनी ते धणी याणी दो ॥रा॥ ए॥ तस पीयुनें अगें रोग, थयो कुष्टनो पूरव जोग हो ॥राणा देखी नश दुई दिलगीर, नयरों फरे यांस नीर हो ॥रा॥ १० ॥ श्रीदेवी साथ साहेली, करे वात बेनु मन मेली हो ॥रा०॥ कोई कर्म तणी गति विपमी, मुफ कथने वेदन न शमी दो ॥रा ॥ ११ ॥ तप हासीमा श्रीदेवी, बोली तुज संगत एदवी दो॥रा॥ तुझ सेव्ये ए व्याधि वलगी, जा उठ मुफथी थलगी हो ॥रा ॥ १२॥ सुणी ना नीचे वयरों, नोई रही करते नयणें दो ॥ रा ॥ मनहुं यां मांहे दूण, सखीयें , .

श्री शांतिनाथनो रास खंग पदेलो. श मुज दी, महेणुं हो ॥ रा० ॥ १३ ॥ मन खेद उपन्यो जाणी, श्रीदेवी वोली वाणी हो ॥रा॥ मत खेद करो मुज वहाली,में हांतीये का तुऊ थाली हो ॥रा ॥ १४ ॥ थइ सुप्रसन्न मनमा तेह, पहोती पोतानें गेह हो ॥ राम ॥ माही पण चाली थामी, हांसीमां वात बिगाडी हो ॥१५॥ हांसी सम नहि कोई पाप, नाखे त्रिवनपत्ति थाप हो । राम् ॥ बंधाये सात ने बात, हासीमां कर्मना गत हो ॥ रा॥ १६॥ यउक्त मागमे॥ जीवेणं नते हस्तमाणे कई कम्म पयडि वधएवा ॥ गोयम सत्तविह वधएवा, अछविह वधएवा ॥ ४ ॥ पूर्वढाल ॥ उत्तमने इसवं वारु, वेदु समयमां एम निरधास्यु हो । यउक्त ॥ यरोसो अइ तोसो, अश्हासो उकयो हि सवासो ॥ अश् उप्नड थावेसो,पच गुरु अपि लदुयंति ॥ ५ ॥ पूर्वढाल ॥ नवि करीये कोनी दासी, जेहथी जग दोवे खासी हो ॥ राण ॥ १७ ॥ एम थाले थाले जीव, वांधे परजव करे रीव दो ॥ रा० ॥ सोमवथने श्रीदेवी, साधुनी सगति सेवी दो ॥रा० ॥ १७ ॥ कह्यु पुण्य ते थाहुं थावे, पहेले मुरलोकें जावे हो ॥ रा ॥ पंच पव्योपमनु श्राय, दोय सुर थयां सुंदरकाय हो ॥ रा० ॥ १५ ॥ सोमवंड चवी तुं तेद, थयो नमिपति गुणगेद हो ॥ रा०॥ त्रैलोक्यसुदरी सारी, पहेली श्री देवी नारी हो ॥ रा० ॥ २०॥ परधने पुण्य कीधु नारी, तिरों परण्यो लाहे नारी हो ॥रा ॥ दासीमा कलंक चढाव्यु, ते था नवें उदय थाव्यु हो ॥ रा० ॥ २१ ॥ निसुणी श्रीगुरुनी वाणी, मन मोहदशा मूकाणी हो ॥राणा एचौदमी ढाल वखाणी, कहे रामविनय धन्य नाणी हो ॥रा॥२॥ ॥ दोहा॥ ॥ वांदी कर जोडी कहे, तारो श्री गुरुराज॥जवजलमांहे मुज मिव्यो, धर्शन तुफ जहाज ॥ १ ॥ पतित नणी पावन करो, यो प्रनु मुफने दी ६॥ मनमा सूधी धारवी, सद्गुरु ताहरी शीख ॥ २ ॥ गुरु कहे देवाणु प्पिया, तेम करियें मन वाम ॥ एथनादि प्रतिबंधमा, नवि पडियें घर काम ॥ ३ ॥ गुरु वदी मदिर चल्यो, विनता सहित नरिंद ॥ राज्य व्यो निन तनुजने, मनमा धरि थानद ॥४॥ ॥ ढाल पन्नरमी॥ ॥ वीर सुणो मोरी विनति ॥ ए देशी ॥ यशशेखर थाणा लही, नृप -

श्त
जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो.
चाल्यो हो संयमने काज॥ वलि जयसिह मुनीशने, कहे यापो हो मुज सं
यमराज ॥१॥ वलिहारी गुणवतनी॥नृप मांझे हो व्रत सायें नेह। कुमति
कुटिल नारी तजी, नजे समता दो सुंदरी गुणगेह ॥ ३० ॥२॥ बीस
अही नवतारिणी, गुरुसाथें हो विचरे मुनिहस ॥ध्यान विमल मोती चूणे,
मतिहसी हो साथै शुन वश ॥ व ॥३॥ समयनलाशयने तरे, जल
ने दो जड चेतननाव ॥ अनुभव चचुस्वनावथी, नय धारण हो पक्ष
ज्ज्वलनाव ॥ व० ॥४॥ शुरू थाहारें मन रमे, निर्दूपण हो नीसितोप॥
गुरुवाणायें चालता, मन वाघे हो वैराग्यनो पोप व ॥ ५ ॥ त्रैलो
क्यमुदरी साधवी, करे किरिया दो गुरुणीनी साथ ॥ व्रत थारा मजला,
मन थाएपुं दो जेणें निज हाथ ॥ ३० ॥ ६ ॥ अतें थसण सादरी,
बेतु पहोता हो पंचम सुर गम ॥ त्रीजे नवें शिवसुख लह्यां, धर्म तारे
हो नवि निसुणो थाम ॥ व ॥ ॥ कीधो कराव्यो ए सही, अनुमोयो
हो थापे शिव धर्म ॥ त्रिकरण योगें थादयो, मनचितित हो पूरे शिव शर्म
॥ ॥ ७॥ श्रीपेण नृप एम सांजली, गुरुदेशने दो बज्यो मनमाहे ॥
समकित शुम थंगीकरी, श्रावक व्रत दो ग्रहे मन उत्साह ॥ ब० ॥ ए॥
मुनि वदी मदिर वल्या, मन सूघे दो पाले श्राचार ॥ जीवदया पाले नली,
देशमाहे दो वरतावी अपार ॥ व० ॥ १० ॥ व्यसन निवारे वेगलां, मन
वारे हो विषये सुविशेष ॥ यातमने उज्ज्वल करे, न लगावे दो कांश का
ली रेख ॥ ब० ॥ ११ ॥ चेतन शुक्लपक्षी थयो, तस संगते हो अनिन
विता नार ॥ धर्म नज्यो नगवतनो, जे साध्यो दो थापे नवपार ॥ ब० ॥
१५॥ नेकनावपण लहे, अनिनदिता दो राणी तृपसंग ॥ उत्तम सगति
गुण करे, पर पण हो तरे तुंष प्रसग ॥ब० ॥ १३ ॥ एहवे कोसबी
धणी, बलिराजा हो बलीयो नूपाल ॥ श्रीमतीकूखें सपनी, श्रीकांता दो
पुत्री सुक्कुमार ॥ ब० ॥ १४ ॥ यौवनवय श्रावी नली, मोदरायने हो
रमवानु ठाम ॥ जोड न थावे तेदनी, जगतीमां दो जोतां कोई गम ॥
ब० ॥ १५ ॥ श्रीपेण सुत श्रुषेणने, योग जाणी हो सबले परिवार ॥
स्वयंवर साहमी मोकली, श्रावी ठतरी दो वनमा तेणी वार ॥१०॥
१६ ॥ पन्नरमी ढाल पूरी थर, नवि मुजो दो नावें उजमाल ॥ रामवि
जय कहे तेदना, नाम लीजें दो जेदने धर्मनी ढाल ॥॥१॥३१॥

श्री शांतिनाथनो रास खंम पदेलो. शए
॥ दोहा॥
॥ रूपवती कुमरी घj, निरखी वेदु कुमार ॥ मनमथने ते वशे पख्या,
वाध्यो विषय विकार ॥१॥ निरखी निरुपम नायका, विपमी कुची जेम ॥
वेती अतर जायगा, नेयु तालक प्रेम ॥ २ ॥ चित्त वेदु वधव तणां, एक
इव्य अनिताप ॥ नेह रहित नीरस थयो, लीली जेहवी लाख ॥ ३ ॥
विपयें विनय तज्यो परो, विपेण कहे एम ॥ म करिश श्राशा एहनी,
जो तु वां देम ॥ ४ ॥
॥ ढाल शोलमी॥
॥ हरिया मन लाग्यं ॥ ए देशी ॥ वे वंधव अमरप .चढचा, देवरमण
उद्यान रे ॥ विपयें मदमाता ॥ तु तुकारें यावीया, बिदु ते यो सुवान रे
॥ वि० ॥ १॥ लाज न थापी कुल तणी, न गल्यो जन अपवाद रे
॥ वि० ॥ एक तरुणीने कारणे, मामयो एम सवाद रे ॥ वि० ॥ २ ॥
लाज तजी अलगी तेणे, नाख्या दथीयारे हाथ रे ॥ वि ॥ चटपटमा
खटपट थर, थाव्या वायो वाथ रे ॥ वि०॥ ३ ॥ योध फुमा धड धडदडे,
कायर कपे प्राण रे ॥ वि० ॥ कोई न बोडावी शके, मलिया राणो राण
रे ॥ वि० ॥ ४ ॥ कामणगारी कामिनी, शु कीधु एवं एह रे ॥ वि० ॥
जोतां वेद बंधवतणो, उमी गयो एम नेह रे ॥ वि० ॥ ५ ॥ वात सुणी
श्रीपेयजी, वारणने असमन रे ॥विण॥ चित्त चिते ए उपन्यो, विपयथकी
अनरठ रे ॥ वि०॥ ६ ॥ धिक् धिक् ए लपटपणु, धिग् धिग् विपय विला
स रे ॥ वि० ॥ युवती रूपें जगतमा, मोहनूपें धनो पास रे ॥ वि० ॥
स॥ तिलमात्र सुख विपयतणु, 5 ख मेरु उपमान रे ॥ वि० ॥ विष
यविलुमा मानवी, थगेंन वले वान रे ॥ वि०॥ ७ ॥ शल्यसमा जिनवर
कह्या, काम थाशीविप तुव्य रे ॥ वि०॥ जे एहथी विरम्या सही, ते नर
रयण थमूल्य रे ॥ वि० ॥ ए॥ माहापण एहनुं क्या गयु, किहा गयो कु
लथाचार रे ॥ वि० ॥ निर्लज ए लाजे नहि, विपय पज्यो धिक्कार रे ॥
वि० ॥ १० ॥ जे पुजल नासे सडे, धर्म सयोग वियोग रे ॥ वि०॥ ते उ
पर मूर्धा श्सी, थदो थना दिनो रोग रे ॥ वि० ॥ ११ ॥ यउक्त ॥ एता
नि तानि धनयौवनगर्वितानि, दाराहारमणिपुरसचितानि ॥ वस्त्रान्न
पानशयनासनलालितानि, नूमौ लुति कृपितानि कलेवराणि ॥ १ ॥

शत
जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो.
चाल्यो हो संयमने काज ॥ वलि जयसिंह मुनीशने, कहे थापो हो मुजतं
यमराज ॥१॥ बलिहारी गुणवतनी॥ नृप मांझे हो व्रत सायें नेह॥हमति
कुटिल नारी तनी, जजे समता दो सुंदरी गुणगेह ॥ ब० ॥ २ ॥ बीस
ग्रही नवतारिणी, गुरुसाथें हो विचरे मुनिहस ॥ध्यान विमल मोती पणे,
मतिहंसी दो साथै शुन वश ॥ १० ॥३॥ समयनलाशयने तरे, जख
ने दो जड चेतननाव ॥ श्रनुनव चचुस्वनावथी, नय धारण हो पहल
ज्ज्वलनाव ॥ ३० ॥४॥ शुरू थाहारें मन रमे, निर्दूपण दो नीरेंसतोष।
गुरुथाणायें चालतां, मन वाघे दो वैराग्यनो पोप ॥व० ॥ ५॥ प्रैलो
क्यमुदरी साधवी, करे किरिया दो गुरुणीनी साथ ॥ व्रत थाराजजलां,
मन थाएपं दो जेणें निज दाथ ॥ ३० ॥ ६ ॥ अतें अणसण श्रादरी,
बेड पहोतां दो पंचम सुर गम ॥त्रीजे नवें शिवसुख लह्यां, धर्म तारे
दो नवि निमुणो थाम ॥ व० ॥ ॥ कीधो कराव्यो ए सही,थनुमोपो
दो श्राप शिव धर्म ॥ त्रिकरण योगें थादस्यो, मनचितित हो रे शिव शर्म
॥ष ॥ ७ ॥ श्रीषेण नृप एम सांजली, गुरुदेशने दो बज्यो मनमाहे ॥
समकित शुरु थगीकरी, श्रावक व्रत दो ग्रहे मन उत्साद ॥ १० ॥५॥
मुनि वदी मदिर वल्या, मन सूघे दो पाले श्राचार ॥ जीवदया पाले नली,
देशमांदे दो वरतावी अपार ॥ व ॥१०॥ व्यसन निवारे वेगलां, मन
वारे दो विषये सुविशेष ॥थातमने उज्ज्वल करे, न लगावे दो कांई का
ली रेख ॥ ब० ॥ ११ ॥ चेतन मुक्तपदी थयो, तस संगतें दो अनिन
दिता नार ॥ धर्म नज्यो नगवतनो, जे साध्यो दो थापे नवपार ॥ ब० ॥
१५ ॥ कनावपणं सहे, थनिनदिता दो राणी नृपसग ॥ उत्तम सगति
गुण करे, पष्ठर पण दो तरे तुंब प्रसग ॥ब॥ १३॥ एदवे कोसंबी
धणी, बलिराजा हो बलीयो नूपाल ॥ श्रीमतीकूखें उपनी, श्रीकांता दो
पुत्री सुक्कुमार ॥ ब० ॥ १४ ॥ यौवनवय श्रावी जली, मोदरायने दो
रमवानुं नाम ॥ जोड न थावे तेदनी, जगतीमा दो जोता कोश ठाम ॥
ब० ॥ १५ ॥ श्रीपेण सुत सुषेणने, योग जाणी हो सषले परिवार ॥
स्वयंवर सादमी मोकली, श्रावी शतरी दो वनमा तेणी वार ॥ब० ॥
१६ ॥ पन्नरमी दाल पूरी यश, नवि सुजो हो नावें राजमाल ॥ रामवि
जय कहे तेदना, नाम लीजें दो जेदने धर्मनी दाल ॥॥१॥३१॥

श्री शांतिनाथनो रास खंम पहेलो. ३१ ए लूटा, वांध्यु धमें निर्लङ ॥ ५ ॥ मल्यो सहू परिवार तव, शोकाकुल ततकाल ॥ स्वामी तें माया तनी, कुण करशे सनाल ॥ ६ ॥ गया विदेशे वादुडे, वाहना कोक वार ॥ पण इण वाटें जे वल्या, ते न मले विजी वार ॥ 8 ॥ प्रेतकार्य कर पितरना,आणी मन श्रदोह ॥ राज दीये गोत्री जणी, मट्यो विपयनो मोह ॥ ॥ एहवे थाव्या सांजली, धर्मरुचि श्रणगार ॥ जे अगाध जवसिधुना, सूधा तारणहार ॥ ए॥ ॥ ढाल सनरमी॥ ॥ सादिवा मोतीडो रे हमारो ॥ ए देशी ॥ याव्या दोय कुमर वदेवा, करे मुनि चरणनी सेवा ॥ साधुजी थमने अव तारो, मोहना मुने पार उतारो ॥ अमें अपराधी पापें नरिया, तुमें निरुपाधिक गुणना दरिया ॥ सा ॥ मो० ॥१॥ अमें शब्दादिक गुण व्यासगी, तुमें तेहना सुपने नहिं सगी ॥ सा ॥ मो० ॥ अमें क्रोधादिक कपायें नडिया, तुमें उत्तम गुणवाणे चढिया ॥ सा ॥मा० ॥ ॥ अमें मदमातंगर्ने वश पडिया, नवि तुमें ते तिलमात्र थानडीया ॥ सा ॥ मो० ॥ अमें थशरण अविनीत अनाण, तुमें जगशरण विनीत सुजाण ॥सा० ॥ मो० ॥ ३ ॥ कीधी कमाई धमें यति खोटी मुनिवरजी तुम पदवी महोटी ॥ सा ॥ मो० ॥ नव थ निनदी अमें बुपावी, तुमें पट कायना नहि परितापी ॥ सा ॥ मो० ॥ ४ ॥ श्रमो ते इडिय विपय राच्या, तुमें थनुनव सुरखमा रह्या माच्या ॥ सा ॥ मो० ॥ कीधी वात श्रमें अति काची, तुम किरिया निक लक ने साची ॥ सा ॥ मो० ॥ ५ ॥ पतित थमें पुरुषारथ दीणा, तुमें पावन गुणज्ञान थहीण ॥ सा ॥ मो० ॥ हवे तुम चरणे थावी व लग्या, एक पलक नवि रहेछ थलगा ॥ सा ॥ मो० ॥ ६ ॥ यो दीक्षा करो पावन काया, तो श्रमें जितनिशाण वजाया ॥ सा ॥मो॥ चार स हस्त्रराजेश्वर साथें, लीधी दीक्षा श्रीगुरुहाथे ॥ स ॥ मो० ॥ ७ ॥ मुनि वर कीधो उय विदार, पाले चार माहाव्रत सार ॥ सा ॥ मो०॥तपत पीयाँ थति उकार गाढा, राखे रुडी चारित्र राढा ॥सा॥ मो० ॥७॥ सहे परिसद तापने टाढ, खडखड हिंमता वाजे दाड ॥सा॥ मो० ॥ चढीया गुणश्रेणी थारोही, मुनिवर थकल श्रवीहथकोही ॥ सा ॥ मो० ॥ए। वाध्या उपशम गुणना जोरा, नाग इष्ट मदादिक चोरा ॥ सा० ॥मो॥

. ३० जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो. श्रन्यदप्युक्तं ॥ विकलयति कलाकुशतं, हसति शुचि पंमित विडंबयति॥अपर यति धीरपुरुष, क्षणेन मकरध्वजोदेव ॥२॥ लीलावतीनां सहजाविलासा, स्तएव मूढस्य हृदि स्फुरति ॥ रागोनजिन्याहि निसर्गसिफ,स्तत्र प्रमत्येव मुधा पडक्षि ॥३॥ पूर्वढाल ॥ कलहथकी विरम्या नदि, लाज्यो मन नपाल रे॥ वि० ॥ एरों कुपुत्रे थादखो, निर्मल वशविटाल रे ॥ वि० ॥१५॥ केम देखाडिश लोकने, मुख दरवारे वेसी रे ॥ वि० ॥ मरण नलु मुकने शहां, घरने खूणे पेसी रे ॥ वि० ॥ १३ ॥ राणी थागल जश् कडु, घरे परमेष्ठी ध्यान रे ॥ वि० ॥ विपमिश्रित ले कमलनें, सूघे मरण निदानरे ॥ वि० ॥ १४ ॥ काल कस्यो श्रीपेणजी, राणी दोय पण तेम रे ॥वि०॥ सत्यनामा चोथी वली, जू अनरथ एम रे ॥वि०॥१५॥ उत्तर कुरुमांच पन्यां, युगलपणे ते चार रे ॥विण॥ एक नृप प्रथम प्रिया तनु, बीजी बीजी विजनार रे ॥ वि०॥ १६ ॥ एहवे चारण मुनिवरु, गगनें श्राव्यो कोय रे ॥ वि ॥ देवरमण वयानमां, निहां जूजे के दोय रे ॥ वि० ॥ १७ ॥ यहो उत्तम कुल उपन्या, चरमशरीरी हो रे ॥ वि० ॥ एम केम लज वाता नथी, करता कुकरम दोइ रे ॥ वि० ॥ १७ ॥ एह कुचेष्टित तुम तणु, देखी पितर परलोक रे ॥ वि०॥ पहोता पण जाण्यु नदि, धीक तुम मादापण फोक रे ॥ वि० ॥ १५ ॥ अनृणपणुं की ज, पया तरुणीना यार रे ॥ वि० ॥ मरणहेतु मावित्रने, थया तुमें मूढ गमार रे ॥ वि० ॥३०॥ शब्द सुणी साधु तणो, चित्त थाव्यु तव गम रे ॥ वि०॥ ६ तजी वेहू जणा, नाखे मुनिने थाम रे ॥ वि०॥ २१ ॥ साचो शो समी ढालमा, विषमो विषय जजाल रे ॥ वि०॥रामविजय कहे ते जला, जेणे टाल्यो ए जंजाल रे ॥वि०॥ २२ ॥ सर्व गाथा ॥ ४०॥श्लोर ॥ दोहा॥ ॥ तु थमने तारक मल्यो, नि कारण जगबंधु॥युद्ध करता तारिया, पडता नवजल थधु ॥१॥ शशरण शरण तुमें थया, वलीघनाथना नाथ ॥ था वीने थम रूपरें, कृपा धरी मुनिनाथ ॥ १॥ वांदीने दोडी चल्या,थाव्या तेछ थागार ॥ पितर देखी धरणी ढल्या, चाली सुधार ॥३॥ रोता हियरे फाटते, करे विलाप अपार ॥ धार न खंचे नयण दो, जेम नाश्व जल धार ॥ ॥ हा हा हा एएं थयु, यमयी सबल थकल ॥ केम कुकर्म श्री शांतिनाथनो रास खम वीजो ३३ ॥ अथ क्षितीयखमस्य प्रारंभोऽयं ॥ ॥ दोहा॥ ॥ धरिहत सिम नमू वली, थाचारिज उवद्याय ॥ साधु सकल प रमेष्ठिपद, नजियें नित सुखदाय ॥ १ ॥ बीजो खम रच हवे, सरस कथा अधिकार ॥ शातिनाथ नववर्णना, करता नव निस्तार ॥ २ ॥ सुर लोकें सुख जोगवे, मनोवांछित वर योग ॥ नाटक व वत्रीशमा, नित नित नवला लोग ॥३॥ वैमानिक सुख जोगवे, ते चारे पुण्यवत ॥ चवी कीहां ते अवतरे, ते दाखं विरतंत ॥ ४ ॥ ॥ ढाल पहेली॥ ॥ देशी चोपानी ॥ जयूछी जरत मकार, वैताढ्य नामें पर्वत सार ॥ पहोलपणे जोयण पञ्चास, उचपणे पचवीश विलास॥१॥राजे रजत तो गिरि तेह, कपर सोहे जिनवर गेह ॥ पुण्यवतने वसवा उगम, उ नरश्रेणें पुर अनिराम ॥ ५ ॥ नामें रथनपुर चक्रवाल, क सोहे जाक जमाल ॥ विद्याधर सुखीया सद् कोय, 5 खीयो नामें न वसे कोय ॥ ३ ॥ साते सुख जिदा वासो वसे, धर्मी सद्ध धर्मे उनसे ॥ साते सुखना गखु नाम, काव्यथकी मुजो मन ठाम ॥ ४ ॥ काव्यं ॥ नीरोगत्व न न वति झण चाऽप्रवासी तथैव, वासोनित्यं वजनसहितोनिर्नयस्थानकेषु ॥ लक्ष्मी कांता तदनुसुनगा सगति श्रेष्ठपुसा, चित्त शुद्ध विमलक पया सप्तधा सौख्यमेतत् ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ तिण नगरी विद्याधर धणी, व्वलनजटी नामें बद्धगुणी ॥ विद्यावत वारू सुविवेक, वायुवेगा तस गृहि पी एक ॥ ५ ॥ लवणिम रूप गुणें उपती, शोल शृगारे ते शोनती॥त द्यथा ॥ श्लोक ॥ श्रादौ मङनचारुनालतिलक नेत्रांजन कुमल, ना सामौक्तिकहारचारुकुसुम जकारवनूपुरम् ॥ थंगे चदनलेपकचुकमणिष्टु ावलीघंटिका, ताबूल करकंकण चतुरता शृगारका पोडश ॥ २ ॥ पूर्वढाल ॥ ए सोले कपर शिरदार, नारीने लहा थाचार ॥ ६ ॥ सजावती ने माहासती, रूपें दासी कीधी रति ॥ थर्कमुपन सूचित सुत जल्यो, थर्ककीर्ति नामें वद्गु नस्यो ॥ 8 ॥ यौवन वय सह मन ना वियुं, युवराज पद शोनावीयु ॥ तदनतर एक पुत्री जणी, चश्लेखा सू .

सोधमै चार, ३२ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. नवपल्लव दुई संयमवाडी, समताजल सींचतां जाडी ॥सा ॥ मो.॥ ॥ १० ॥ वेहु मुनि निजगुणथी वाघे, साधन साधु ग्रहीने साधे ॥ सा. ॥मो॥ अप्रमत्त नूमि निरधारी, मोह कपरें कीधी स्वारी ॥ सा० ॥ मो. ॥ ११ ॥ नाग्यो मोद सबल नहवाह, चेतन जाति चल्यो उत्साहाता. ॥मो॥ वीणमोद गुणगाणे थावी, यंतर्मुहूर्त स्वारी टकावी ॥ सा ॥ मो० ॥ १२ ॥ बेद करे थावरण वेदुनो, चेतन चढी तेरम गुण लीनो ॥ सा ॥ मो० ॥ प्रकट्यो केवलनाण विनास, जासक लोकालोकप्र काश ॥ सा ॥ मो० ॥ १३ ॥ जय जय शब्द करे सुरराजी, देव निशारों रघु थन गाजी ॥ सा ॥ मो० ॥ वेद मुनिवर केवल दिलाधी, यंते सिमवशा तेणें साधी ॥ सा ॥ मो० ॥ १५ ॥ हवे श्रीपेणादिक दोय युगल, त्रण पक्ष्य आयु पालीने विमल ॥ सा० ॥ मो० ॥ तिहांची चवि त्रीजे नवें सुरसुख सह्या सार ॥ सा० ॥ मो०॥१५॥हाल सत्तरमी सुणतां प्यारी, शांति प्रजु गुण गाउ विचारी मो॥ सा ॥ श्री गुरु सुमतिविजयनो शिष्य, राम कहे प्रणमो निश दीस सा॥मो॥१६॥ ॥राग धन्याश्री॥ ॥ धातमा चित्तछं चेत चातुरपणे, धर्म विण को दूजो न जगमां ॥ धर्म ते गुम सहजातमा थापणो, तारशे ते सदी तुज वगमा ॥ था। ॥१॥ निज तपादानथी निमित्त बल पामी, धर्म अविरुष सुविगु-६ लेशी ॥ निमित्त शुन तेह जन संकथा जाणजो, तुरत ते जतने मुक्ति देशी ॥था ॥ ५ ॥ मादरे मन घणी नक्ति धुणवा तणी, शांति प्रल रास रसनाधिकारें ॥ तेदनो खंग पहेलो भयो पुस्मथी, सनिलो नवि यणो निर्विकारें ॥था ॥३॥ श्रागले सरस रस शांतिजिनरासमा, तास रचना रची जलेरी ॥ वात विकथा तजी चित्त समता जजी, सानलो बोडो निदा अनेरी ॥श्रा० ॥४॥ सत्तर पंचाशीए राजनगरें रही, थाविजिन चरण सुपसाय साध्यो ॥ श्री सुमति सुगुरुतणु सानिध्य रामने, थाज थानदनो पोष वाध्यो ॥ था॥ ५॥ सर्वगाथा ॥४३॥ गाथा तथा श्लोक ॥ ३१ ॥ इति पंमित श्री रामविनयविरचित श्री शांति जिनवघेप्राकृतप्रवघे सुरुतसंघे पूर्वनवानुबंधे मगजकलशचरित्रे प्राकतावश जवनिबंधे नवत्रयवर्णननामा प्रथम खम सपूर्ण ॥ १ ॥ 1 श्री शांतिनाथनो रास खंम वीजो. प्रत्ये, पाठवीयो तिण वाय ॥ पोतनपुर पहोतो तुरत, जाइ विन वियो राय ॥४॥ ॥ ढाल वीजी ॥थात टकानो ककणो रे। नणदल॥ थरकी रही मोरी वांह। ककण मोल लीयो ॥ ए देशी॥ दूत कहे कर जोडीने रे॥ साहिवा॥सुण प्रजापति स्वामि ।। वारू वयण सुणो ॥ ज्वलनजटीनो मोकल्यो रे ॥ सा ॥द याव्यो गुन काम ॥ वा ॥ १॥ स्वयप्रना नामें नली रे ॥ सा॥ कुमरी गुणनी खाण ॥ वा ॥ तुम तनुज त्रिप्टठने रे ॥ सा ॥ देवा वा राए ॥ वा० ॥ २ ॥ सरखे सरखी जोडली रे ॥ सा० ॥ हो कोडी कल्याण ॥ वा० ॥ दूत सन्मानी वालीयो रे ॥ सा ॥ मान्यु ए वचन प्रमाण ॥ वा० ॥ ३॥ण अवसरें प्रतिविमुजी रे ॥ सा० ॥ अश्वग्रीव नरिंद ॥ वा ॥ शोल सहस्त्र नूपालनो रे ॥ सा ॥ नायक धरणी इद ॥ वा ॥३॥ चढयो थहमेवें श्राकरो रे ॥ सा ॥ नहिं कोई मुझ समान ॥ वा ॥ सहु किंकर मुफ धागलें रे ॥सा०॥ हूं विट्ठ खम सुलतान ॥वा॥५॥ तनमद धनमद थाकलो रे ।। सा ॥ यौवनमद उन्माद ॥ वा ॥ धींगो थइ धरा जोगवे रे ॥सा॥ वीट्यो नूप गरद्द ॥वा॥६॥ मान चढयु थंस तेहने रे ॥ सा॥ पूढे एकदिन तेह ॥ वा० ॥ मोत होशे कोथी मुने रे ॥ सा ॥ कहे नैमित्तिक एह ॥ वा ॥४॥ वलतुं कहे नैमित्तियो रे ॥ सा ॥ मत श्राणो ममदोप ॥ वा ॥ दण्डो तारा दूतने रे ॥ सा ॥ जे चढियो नर रोप ॥ वा ॥ ७ ॥ शाल विणासे सिहलो रे ॥सा ॥ ताहरी सीम मकार ॥ वा० ॥ दणशे हाथे तेहने रे ॥ सा ॥ ते तुफ मारणदार ॥ वा० ॥ ए ॥ वात सुणी को चढयो रे ॥ सा ॥ फेड तेदनु गम ॥ वाण ॥ सामुं कुण नाली शके रे ॥ सा० ॥ पाद्धं तेहनी माम ॥ वा० ॥ १० ॥ श्ण अवसर कानें मुख्या रे ॥ सा ॥ वलीया वधव वेह ॥ वा ॥ रखे थागल जातां थका रे ॥ सा॥ विदणे मुमने एह ।। वा ॥ ११ ॥ करुं परीक्षा एदनी रे ॥ सा ॥ पहेली वाघु पाल ॥ वा ॥ वैरी व्याधि बेदिये रे ॥ सा ॥कगतां तत्काल ॥वा०॥ १२॥ सहेजें मलवाने मि रे ॥सा॥ मोकलियो एक दूत ॥वा०॥ चमवेगानिध थाकरो रे॥सापोत नपुर तेह पद्धच ॥ वा०॥ १३॥ नाटक जोवाने मली रे॥सा॥चावी राज , ३४ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. चित बहुगुणी ॥ ७ ॥ स्वयंप्रना नामें सा दुइ धिमती योवन वप ली। अनिनदन जगनदन दोय, ननचारी वदे मुनि सोय ॥ ए ॥ निमुखी धर्मतणी देशना, साधी समकितनी वासना ॥पर्वदिनें पोषध अनुसरे, प्रल काल जिनपूजा करे ॥ १० ॥ एक दिन जिनपूना थादरी, नमण तथं जल लेइ कुमरी ॥ जनकसमी थावी चग, वेसारी तेइनें उमरंग ॥११॥ जोई रूप वाथ्यो मन हर्प, पुत्री परणावा उत्कर्प ॥ वठे जइ तप पारण करो, उत्तम कारजने थादरो ॥ १२ ॥ तेव्या मत्रीश्वर गतशोक, पर जोतो पुत्रीने योग्य ॥ श्राप थापणी मति थनुसरी, उत्तर थापे नृपनें फरी ॥ १३ ॥ एक वोज्यो सुरुत थनिधान, मत्रीश्वर वडुबुझिनिधान ।। राजन् जेदनो वारो थाज, तेहने परणावो माहाराज ॥ १४ ॥ रमपुरें महोटो नूपाल, अश्वग्रीव त्रिदु खम रखवाल ॥ प्रतिविमु तेदने दीजीयें, परणावी लाहो लीजिये ॥१५॥ थपर कहे उत्तरश्रेणीय, प्रनकरा नगरी तेणी ॥ मेघधनानिध महोटो सत, मेघमालिनी केरो कत ॥ १६ ॥ विद्युत्प्रन सुत वेटो वली, ज्योतिर्माला में निर्मती ॥ तस मुतने ए पुत्री योग्य,तस पुत्री थापण सुत जोग्य ॥१॥थपर कहे स्वयंवरने करो, पुत्रीमन माने ते वरो॥सुणी विचार विसा तेद, राजनपदोतो थापण गेह ॥१॥ एकदिन नैमित्तिक धावियो, सनिन्नश्रोत्र नृप बोलावियो ॥ कहो मुज पुत्री वरनी वात, जो जाणो ज्योतिष साक्षात ॥१॥ दवे कदेशे ते वात र साल, बीजे खंमें पहेली ढाल ॥रामविजय नारखी मन रली, श्रागल वातज के अति जली ॥ ५० ॥ सर्व गाथा ॥ २ ॥ गाथा तथा श्लोक ॥३॥ ॥ दोदा ॥ ॥ कहे नैमित्तिक रायने, वारू वयण विलास ॥ पोतनपुर नृपति नलो, नाम प्रजापति जास ॥ १॥ तस थगज उत्तम सबल, त्रिप्टष्ट बचत थे वधु ॥ वासुदेव बलन ते, थाशे गुणमणिसिधु ॥ ॥ श्रश्वमीव प्रत्ये सही, दणशे ते मदमत्त ॥ एदवु साधुमुखें सुप्यु, तेतु माने सत्य ॥ ३ ॥ तुमने अधिपति थापशे, विद्याधर शिरदार ॥ तस पटराणी दोयशे, स्वयंप्रना वर नार ॥॥ एवं लमबप्लें लगु, साधु तणे वयणेद ॥ जो शाबासी मुने, जब देखो नयरोह ॥ ५ ॥ नृपति मन सतोपियो, सन्मान्यो दैवज्ञ॥ जतियें करी वोलावियो, नरपति सपल गुण ॥ ६ ॥ इवे दूत मारी घि , ३७ . श्री शांतिनाथनो रास खंम बीजो ॥ ढाल त्रीजी॥ ॥ किसके चेले किसके पूत ॥ ए देशी ॥श्राव्या सनामां वधव जोडी, प्र णमे पितरना पद कर जोडी ॥ वलवत वे ॥ केम दीसो चितातुर थान, नांखो ते थमनें माहाराज ॥ दिल जे हो ॥ १ ॥ कहे जनक मुणो पुत्र सुजाण, कुलदीपक कुल थवर नाण ॥ व ॥ विण वारे तेढुं थयुं याज, तेणें जावु चोकीने काज ॥ दि० ॥ २ ॥ राज विराजो निज धावास, दु कम करो श्रमने नन्नास ॥ व ॥ ए वनचारी पथवतार, ए उपर यु थया असवार ॥ दि० ॥३॥ चाल्या वलीया वयव दो, जगमां देव करे ते होय ॥ व ॥ नाग्य वली तेजें तेजाल, चाले जिम मयगलनी चाल ॥ दि ॥ ४ ॥ शालदेवना कहे रखवाल, अहो तुम न मल्या कोइ नूपाल ॥ व ॥ शु तुम निज जीवित नहि काज, जे एकला या व्या बो याज ॥ दि० ॥ ५ ॥ नदि साह्य ने नहि परिवार, सिह संघातें युद्ध विचार ॥ व ॥ रे रे शोर करे शो गमार, करथी देखाडो वनचार ॥ दि० ॥ ६ ॥ देखायु पर्वतनु घार, मांहे सूतो सिह इशियार ॥ ३० ॥ रथ वेसी थाव्या तेणि वार, कानें सुण्यो रथनो चित्कार ॥ दिन ॥ ॥ कग्यो थालत मोडी धग, पंचानन करवाने नग ॥ ३० ॥ मुख विकाश्यु उपाडी फाल, थाव्यो गुफा वाहिर उजमाल ॥ दि० ॥ ७ ॥ देखी ते पदचारी सिह, रथ मूक्यो थलगो नरसिह ॥ व ॥ देखी नि रायुध ते मृगनाथ, खड्गरत्न मूके नूनाथ ॥ दि० ॥ ए ॥ केसरी चिते श्रचरिज एक, मुफ पासें थावे ए एक ॥ व ॥ वीजु पदचारी मुफ जेम, जीती जाशे कदो ए केम ॥ दि० ॥ १० ॥ त्रीजु मूके थायु६ दूर, ए हना मनमा अमरप नूर ॥ व ॥ मुफ अवगणना करे नि-शक, कादु म रोडी एहनो वक ॥ दि० ॥ ११ ॥ उबली नन हरि दीधी दोट, नावी हरि शिर करवा चोट ॥ ॥ कलें कर क्षेपी मुख वल पोत, दाये साही दरिना होत ॥ दि० ॥१२॥ नाख्यो विदारी जोतां तंत, जीरण शाटक परें पलवत ॥व ॥रो कलेवर थरके तास, सारथि कहे मुण सिह हतास्नु ॥विण॥१३॥मत मास्यो जाणे सामान्य, सिह तु नरसिह यो सुवान ॥३॥ सिहें सिह दस्यो नहिं दोप, मत थाणे मनमाहे रोप ॥ दि० ॥ १४ ॥ सुणी वात न धना यु६ प्राण, मरण लदी नरकें गयो दीन ॥व० ॥ । - ३६ जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. कुली बत्रीश ॥ वा॥ श्णवेलामां राउलो रे थावी, दूत नमाने सील । वा० ॥१॥रायने शंका उपनी रे थाव्यो, प्रतिहरिनो केम दूत ॥वा०॥ नाटक नंग कखो एवं रे थावी, कोप्या दोय नृपपूत वा॥१५॥ ते सन्मानीचा लियो रे पाठो, मद मूजे वल घालि वाणापूवें थावी दो जणा रे बागे, महोकम कूट्यो जाति॥वा ॥१६॥नाटक नगथपराधिया रे धोरी, किहाँ जाइश दवे नाशि ॥ वा० ॥ वात सुणी राय थावियो रे दोडी, मूकामो ए दास ॥ वा ॥ १७ ॥ राय खमावे इतने रे घहेला, ए दोय बाल स नाव ॥ वा० ॥ घर थाणी सतोपियो रे वहेलो, प्रतिहरि नय मन नावि ॥ वा ॥ १७ ॥ श्राव्यो दूत उतावलो रे वनमा, विहितो अमरपनाव ॥ वा० ॥ समय बागल यावीने रे जनमां, नाखे ते सनाव ॥ वा० ॥ १५॥ राय प्रजापति सारिखो रे ॥सा॥ नहिं काहिं तेहनो दोप ॥वा०॥ पण तस धगज कगता रे ॥ सा ॥ विप थकूरा नास ॥ वा० ॥ २० ॥ वात सवे राय सांजली रे चित्तमां, चिते थतरगूढ ॥ वा ॥ मौन धरीने ते रह्यो रे कृत्यमा, मतिमूग्यो दिग्मूढ ॥वा॥१॥ नावीनाव टजे नहि रे नवियां, निसुणो बीजी ढाल वा॥ धन्य मुनि टाल्यो जेणे रे विरुङ, महोटो मदजंजाल ॥ वा ॥ २२ ॥ सर्व गाथा ॥ ५३ ॥ श्लोक ॥ २ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ शालक्षेत्र प्रतिविमुनें, डे बनु निज परिनोग ॥ तास उपव नित्य करे, सिंह सबल बलयोग ॥१॥ तस चोकी चोंपे करे, प्रतिवर्षे राजान ॥ छारें बगुपरिवारयुत, नृप थादेश सुजाण ॥ ५ ॥ तिण वर्षे वारक विना, वाजिग्रीव नृपच॥ दुफम प्रजापतिने करे, मूकी दूत तुरत्त ॥३॥चित्त मां चिता कपनी, दूतयकी थयु काम ॥ कस्यु कुकर्म थविचारिनें, सदयें थाव्यु थाम ॥३॥ यत ॥ सहसा विदधीत न किया, मविवेक परमापदां पदम् ॥ वृषुते हि विमृश्यकारिण, गुणलुब्धा स्वयमेव सपद ॥१॥ कान विचारीने करे, रहे तेनी लाज ॥ अति उत्सुक कतावला, ते विणसाडे काज ॥ ५॥ ययुक्त ॥ मुगुणमपगुण वा कुर्वता कार्यजातं, परिणतिरवधार्या यत्नत पंमितेन ॥ थतिरनतकतानां कर्मणामाविपत्ते, नवति हृदयदाही शल्यतुल्योविपाक ॥ ५ ॥ - - श्री शांतिनाथनो रास खंम वीजो. ३ए ॥ ढाल चोथी॥ ॥ देशी कडखानी ॥ कोप चढे क्रूरलोचन कहे शूरमां, सचिव धसि ऊत यहां जा पहेला ॥ दोय ते उष्टनें ज्वलन त्रीजा नणी, वाधी मुसके शहा ला वहेला ॥ १ ॥ जोयजो विपयथी विपम गति नीपजे, विपय नडिया वढे एम घेटा ।। विपयथी सुरवरा नरवरा खेचरा, नारि यागें रह्या जेम चेटा ॥ जो ॥ २ ॥ दूत आव्यो वही पोतनपुर सही, मद चढयो बोल बोले अटारो॥ मुन्न वल घालतो शत्रु दल पाडतो, वांकडो वाधि के कटारो ॥ जो॥ ३ ॥ रे सुतारत्न मूकी निजस्वामीने, ज्वलन किम रकने हाथे दीधु ॥ रत्ननु गण प्रचुरेव पुहवीतलें, नीचनु वाक्य निसुण्यं न सीधू ॥ जो ॥ ॥यत ॥मणिमेदिनी चदन दिव्यदेति, वर वामनेत्रांगजो वाजिराज ॥ विना नूनुज कोहि नोक्तु समर्यो, गृहे युज्यते नैव चान्य स्य पुंस ॥ ॥ ज्वलन कहे दूत सुण एह साचु कडं, स्वामी जाणी सुता एह दत्ता ॥ वोल तु पाधरे निजधरा ए नहिं, कां सहे अन्यथा चरणलत्ता ॥जो ॥ ५॥ कुमर कहे दूत वाचाल दीसे जलो, ना कनु जीवतो जीव लेई ॥ पारकी नारी थाशा करे ताहरो, स्वामि मरशे श्रखूटेज एही ॥ जो० ॥६॥ जाणु मरवा तणी होंश दीसे घणी, जे अकानें न लाजे न बजे ॥ धावियो फीटणकाल तुम स्वामीनो, तो सही एदवी बुद्धि सूजे ॥ जो ॥ ७॥ दूत थालो थयो तुरत पाबो गयो, स्वामी श्रागें सहू वात गाई । वात मुणि कतीयो सवल शिर चाटको, तुरत गेडी निशाणे दिवाई ॥जो० ॥ ॥ हल हल था हथियार यदि सावदा, सवल विद्याधरो करो सजाई ॥ तुरत पहाच्यो जश्तेद पोतनपुरें, देखतां खेद नाख्यो उमा॥जो॥ए॥थावीया तरवरा सैन्य परिवस्या, नयर पोतनपुरे तेह वेला ॥ सिदनित सामुहो थावी थडियो दवी, दोट दीधी कस्या नेल नेला ॥ जो ॥१०॥ देखी नहवाय नाता सह वापडा, कहि श्राकाश पाबा सिधाव्या ॥ कुमर थाव्या नगरजीत फत्ते करी, सधव मातंगमोती वधाव्या ॥ जो० ॥ ११॥ त्रिप्टष्ठ उरथचल वेद खेचरें परवना, श्राविया श्वसुरगेहें जमाई ॥ कत स्वयंप्रना कुमरीनोश्रावियो, घर घरे वांटे सद्गुए वधाई ॥ जो ॥ १३ ॥ सामुहो थावियो शत्रु निमुणी तदा, थाप हयग्रीव कीधी चढाई ॥ लाख पहेंताली गज हयवरा हिंसता, कोडि नव थश्वशं थामो धाई । जो० ॥ , ३७ जैनकया रत्नकोप नाग आठमो. चर्म लेश दरिनुं गुणवास, मोकलावे प्रतिहरिनी पास ॥ वि० ॥१५॥ कहेवाडे माने मुफ पाड, सिहतणां में पूस्या लाड ॥ ३० ॥ जम्प वेगे हवे कूर ने नात, मुफ सान्निध्य म धरिश प्रतात ॥ दि० ॥१५॥ नि सुणी वैरीना वयण कठोर, मनमांहे उहवाणो जोर ॥ व० ॥ अतर अ नल प्रज्वलियो पूर, चिते दणवा ते घेढ़ शूर ॥ दि० ॥ १७ ॥ पुण्यदशा जस चढती होय, शु करे वैरी साहामु जोय ॥ व० ॥ श्राव्यो पोतनपु रनी हजूर, द वाज्या तव जय नूर ॥ दि० ॥ १७ ॥ दवे नावि सुजो अधिकार, बागल वधशे बहु विस्तार ॥व० ॥बीजे खमें त्रीजी ढाल, विरून क्रोध वडो चामाल ॥ दि० ॥१५॥ सर्वगाथा ॥ 8 ॥ श्लोक ॥ ४ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ वाजिनीव इण अवसरें, स्वयंप्रना सुकुमार ॥ रमणी निरुपम सां जली, वाथ्यो विषयेजजाल ॥ १ ॥ मानिनी ए मोहनसता, मनमानी सुखदाय ॥ ज्वलननणी कहे तुज सुता, मुफ सीताव परणाय ॥ ३ ॥ मुखिणी थाशे तुफ सुता, वली पामिश बढु मान ॥ रस रहेो थापण यधिक, ए वातें म करिश कान ॥३॥ यत्किचित् उत्तर कही, वाल्यो चर राजन ॥पोतन पुर त्रिष्टष्ठने, परणावी प्रजन्न ॥४॥ वात नली थथवा बुरी, षटकर्णे दुइ जेद ॥ पसरे पणिहारीमुखें, ढांकी न रहे तेद ॥ ५ ॥ यत ॥ खंमण पीसण जलवण, बादर नूमि गांद ॥ देवचुवण पप्पड वणण, रसगोती महिलांद ॥ १ ॥ पण वधशे ए वातथी, थागल बढ्नु सताप ॥ अश्वग्रीव मागीदती,पण परणावी नहिं बाप ॥॥सेवक मुख प्रतिहरि मुगी, परणावीसा बालात्रिएष्ठनणीसामीज,कतीथतर जाला विषयथकी वाध्यो घणो, नारीतणे निमित्त ॥ कोप चढयो जाणे नहिं,कोण शत्रु कुण मित्र ॥ ॥ जगमा नारी सम नदि, थवर को जंजाल ॥ विषय विलुका मानवी, पडियां मोदने जाल ॥ए॥ समकाव्यो समफे नदि, मत्रीश्वर वय गेद ॥ वली थाने थावस्यो, नवि निरखे नयणेद ॥ १० ॥ यमुक्त ॥ एक हि चपुरमल सदनोविवेक, स्तछबिरेव सह सवसतिर्हितीयम् ॥ एतड्वयं सुवि न यस्य स तत्त्वतोऽघ, स्तस्यापमार्गचलने खलु कोऽपराध ॥३॥ यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा, शिक्षा तस्य करोति किम् ॥ लोचनान्यां विहीनस्य दर्पण किं करिष्यति ॥२॥ , श्री शांतिनाथनो रास खंम बीजो. ४१ ॥ दोहा ॥ ॥ ज्वलननपी वैताढयनु, विद्याधरस्वामित्त ॥आपे यति कलट धरी, त्रिद खमें अधिपत्त ॥ १ ॥ थर्ककीर्त्तिने आदरें, ज्योतिर्माला नाम ॥ विद्युत्प्रन नगिनी जणी, परणावी तिण नाम ॥ २ ॥ अति थामवरें था विया, निज नयरी नरसिंह ॥ वेहु वाधव सुख जोगवे, पुण्ये अकल अवीह ॥ ३ ॥ यमुक्त ॥ तावञ्चश्वल ततोग्रहवल तारावल नूवलं, तावद्योगनि योगमत्रमहिमा तावत्कृतं पौरुपम्॥तावत्सियति वांछितार्थमखिल तावऊन सहनो, यावत्पुण्यमिद नृणां विजयते पुण्यक्ष्ये दीयते ॥ १॥ शोल सहसमां मूलगी, स्वयंप्रना वर नारि ॥ सुख विलसे ससारनां, प्रियशु रति अनुकार ॥ ४ ॥ हवे पहेला सुरलोकथी, श्रीपेणादिक चार ॥ जिहां धावीने अवतरे, ते दाखं अधिकार ॥ ५ ॥ ॥ ढाल पांचमी॥ ॥ नदी यमुनानुं रे तट रलीयामणु ॥ ए देशी ॥ चवि सुर लोकथकी श्रीपेएजी रे, नव चोथे अवतार ॥अर्ककीर्ति विद्याधर मदिरें रे,ज्योतिर्मालारे नारी ॥ १ ॥सानलजो जव शांतिजिपदनो रे ॥ एश्रांकणी ॥ नवि राखी मन गम ॥ गुण गातां मुणतां गिरुया तणा रे,सीफे वांडित काम सांo ॥ ॥ दीठो तेजें अमित रवि रातमा रे, सुपनें मादामुखकार ॥ नव मसवाहे सुत जनम्यो सही रे, प्राची जेम दिनकार ॥ सां० ॥३॥ तेजें फलामल तनु देखी करी रे, हरख्यां दंपती दोय ॥ नाम ठवे साजन सतोषिने रे, अमिततेजा गुण जोय ॥ सां० ॥ ४ ॥ सुत दुलरावे माडी हर्षयं रे, धरती थधिक जगीश ॥ चिरं जीवो मनमोहन माहरा रे, कोडा कोहि वरीस ॥ सांग ॥ ५ ॥ ज्वलनजटी इण अवसरें यादरे रे, थनिनदन मुनिपास ॥ देशन सुणी व्रत गुणरयणें ना रे, मोडी निविड नवपाश ॥ सां ॥ ६ ॥ वलीया थइ मुनिसाथें नीलस्या रे, दु बलि दारी से तास ॥ लेखवीयो इजाल समोवो रे, जेणें नव पुजलवास ॥ सां० ॥ ४ ॥ सत्यनामा तदनतर उपनी रे, ज्योतिर्मालानी कूख ॥ तारकयुत रयणी सुदण लही रे, जागी सा गत ख ॥ सांग ॥ ॥ शुन वेला राणी रयणीसमे रे, प्रसवी सुता सुकुमार ॥ नाम सुतारा स्थाप्यु तेहनु रे, मोहनवेति रसाल ॥ सां० ॥ए ॥ तरुणपणु पामी सा कुवरी

H0 जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो.
१३ ॥ धडदडे धरणि नीशान तव गडगडे, नूर रणतूर ते सबल बाजे ॥
शब्द कालह तणा श्रतिदि बीहामणा, गुहिर वेताढयना हर गाजे ॥
जो ॥ १४ ॥ सैन्य थपीयें मयां लोद तब उठस्यां, नाटनट कोटि
नट दपट दीनी ॥ लटपटी थाविया चटपटीमांहे ते, रुधिरकईम मही
घोर कीनी ॥ जो ॥ १५ ॥ युद्ध विद्याधरा साथ पाजे सहिं, होश पूरी
वढे सैन्य शूरा ॥स्वामी गयवर चढया शिर वकारे नला, माहरा वीर पेड
परक पूरा ॥ जो० ॥ १६ ॥ बहुत विद्यावचे रूप कीधा घणां, ऊट वेताल
सावि जाणी॥ फोज पानी दती त्रिष्टष्ट थचल तणी, थावि स्वामीसमें
ते उजाणी ॥ जो० ॥ १७ ॥ नागीयु सैन्य निज देखि कोपें चढयो, था
प रथ बेसीने धींग धायो॥पाउल कोटि नट कळले थावता, मानु महेराण
ए पूर थाष्यो ॥ जो ॥ १७॥ पग नणी जोर थाव्यु सवे कायरा, हाक
वीरों तणी ताम वागी ॥ गयण गयण खलदल्यां, देव दानव मल्या, याज
सबली इला थाय लागी ॥जो ॥१॥ रथ चढी थावी साहामो बच्यो
प्रतिहरि, दोय रिपु सामुदा थावि मलिया ॥ दल वेदु पासें देखे तमासो
तिहा, धन्य राणीजाया एह वलीया॥ जो ॥२०॥ विष्य हथियार धास्त्रा
तदा मेघ जिम, प्रतिदरि धनयकी ताम वृती ॥ राय परजापति सुत नवल
लीलथी, शस्त्र बेदी पडी ते थपूर्वी ॥ जो ॥ २१ ॥ चक समयुं तदा
राय दयनीवनी, समर रे समर जे इष्ट तादरे ॥ जय दिखाडे किश्यो
लोहना खमनो, चक मम मूक वलतुं वकारे ॥ जो० ॥ २३ ॥ मूकिपुं
चक तेणें मान मनमा धरी, कोपथी दाथ अपरें नवाडी ॥थावि त्रिष्टष्ट
नी पास ते पुण्यथी, तिहां रा तुंबधी वक्ष ताडी ॥ जो० ॥ १३ ॥
चक्र ले करें कहे दयनीवनें, मान्य मुज थाण जा तुफ मूक्यो ॥ ते कहे
मरण जलु बैरी नमवायकी, नवि नमु प्रतिदरि एम कूको ॥ जो ॥४॥
मूकीयु चक्र शिर बेदी थाव्यु करें, प्रतिदरि नरकनी वाट लीधी ॥ प्रथम
दरि एम उद्घोषणा सुर करे, त्रिप्टष्ठ शिर कुसुमनी वृष्टि कीधी ॥ जो ॥
२५ ॥ साधिया खंम त्रिदु नरत नूमी तणा, सर्व नर असुरनां द सापें ॥
वाम तुज श्रमj कोटि शिल सदरी, पट्ट अनिषेके कीनो सना ॥ जो ॥
२६ ॥ राज्य घरा नोगवे पुस्य बलीया थकी, ढाल चोथी कही खम बीजे॥
रागथाशावरी जाति कडखेसही, राम कहे पुस्यथी कोनसीजे ॥जो ॥२॥

॥ सुख , श्री शांतिनाथनो रास खंम बीजो ४३ ॥ दोहा॥ जोगवतांथनुक्रमें, त्रिप्टष्ठ हरि ते पीत ॥ काल करीने कपन्यो, नर कावास अपश्च ॥ १ ॥ सुख जोगवतां वदु परें, अर्ककीर्ति नूपाल ॥ व्रत सीधु देश राज्य सुत, मूकी मोहनजाल ॥ ॥ अचल वधु नेहें घणो, रुदन करे तजि लाल नायवोट्यांथकी, एम केम सरशे काज ॥३॥ हसी बोलो मुफ वालदा, मूको रीप अलग्ग ॥ निपट निदेजा थायतां, न रहे जेह एकंग ॥ ४ ॥ सस्कार करवा न दे, न मरे मारो वीर ॥ जे कोइ मूठ कहे, तस दवा धाय धीर ॥ ५ ॥ यमुक्तं ॥ तीर्थकरणा सा म्राज्ये, सपत्नीवरमेव च ॥ वासुदेववलस्नेदः, सर्वेन्योप्यतिरिच्यते ॥१॥ पधव ढुं कोण थागलें, कहीश मननी वात ॥ समकाव्यो समफे नहीं, नेहें रंगी धात ॥६॥ नेदो कहाविन किङइथह किला रयण कवल सरिछो॥ यहिएव धोयमाणो, सहावरंगं न बमे ॥ २ ॥ जाण थजाण थई रह्यो, मोहें घेत्यु मन ॥ सहि जाशु वधव मूत्र, ज्यारे विरतु तन्न ॥ ॥ प्रेतकार्य करि यधुनु, मोहवशे पलदेव ॥ उनगु मन निजराज्यथी, शीपु शलनी सेव ॥ ॥ श्रीश्रेयांस जिनवर तणा, स्वर्णकलश थनिधान ॥ थाचारिज मुनि परवस्या, समवस्या उद्यान ॥ ५ ॥ अचल चल्यो वदण नणी, सायें सइ परिवार ॥मुनि वदी देशन सुणे,जेहथीनव निस्तार ॥१०॥ ॥ ढाल बही॥ ॥ राग नट ॥मोद सगते विगरी हेमति जनकी, स्वर्ग मृत्यु पाताल बिई जगतमें, सवल उहाइ फरत उनकी ॥ मो० ॥ ए श्रांकणी ॥ दसणमोद चरण दोय नेदें, स्थिति नारी हे सवल जिनकी ॥ रोकी सनाव विनावमें घेरी, चेतन चाल थना दिनकी ॥ मो० ॥ १॥ दोरत दोरत फिरत पवन ज्यु, हाथ न थावी दशा मनकी ॥ छिनमें राग विराग तजत हे, घातप बाही ज्यु मास सावनकी ॥ मो० ॥२॥ धन रमणीके विषयसें रातो, जेसें मधुमारवी वनकी॥ मदमातो नींतर ज्यों सूतो, खवर परे नहिं रथतनकी ॥ मो॥ ३ ॥ तीन तार गले राग एनाची, तांबेकी लोटी गहिलोजनकी । मच नीच घर श्रगण एणे, टहील मगाइये ज्यु बंजनकी ॥ मो० ॥ ४ ॥ धन्य जिणें मोद महामन जीत्यो, पूरित दशा नाती गणकी ॥ सो शुक्षा तम थातम पदवी, चढियो श्रेणि लही गुणकी ॥ मो० ॥ ५ ॥ मोह छ ४२ जैनकथा रत्नकोप जाग पाठमो. रे, यौवन रूप सुरंग ॥मात पिताने वाहाली जीवथीरे, रमे जस अगेंध नंग ॥ सांग ॥ १० ॥ स्वयंप्रनानी कुखे ठपन्यो रे,अनिनदितानो रे जीव ।। दीठो श्रीधनिपेक ते सुपनमा रे, वाथ्यो हर्प थतीव ॥सां० ॥ ११ ॥ जन्म्यो हरि उत्सव हर्षे करे रे, नाम श्री विजयकुमार ॥ विजपनर नामें बीजो दुत रे, रूपें देवकुमार ॥ सा ॥ १२ ॥ नारायण मंदिर सिदनदिता रे, ज्योति प्रना थनिधान ॥ स्वपमनानी कूखें उपनी रे, पुत्री रूपनिधान ॥ सां० ॥ १३ ॥ श्रनुक्रमें यौवन वय थावी जली रे, ज्योति प्रना रतिरूप ॥ स्वयंवर मांघो तेहने कारणे रे, तेडाया बडु नूप ॥ सां० ॥ १४ ॥ ममप रचीया थति मदोटे मनें रे, अति उंचा थाकाश ॥ ममप स्पंन रची मणिपूतली रे, करती नाटक खास ॥ सां० ॥ १५ ॥ अर्ककीर्ति इण अवसर मोकले रे, सचिव नारायण पास ॥ ते कहे स्वामी सुण मुफ स्वामीनी रे, एक सुंदर अरदास ॥ सांप ॥ १६ ॥ नामें सुतारा मुफ पुत्री नली रे, यावी यौवन वेष ॥ ते यहां थावे स्वयंवर कारणे रे, जो होवे स्वामी श्रादेश ।। सा ॥ १४ ॥ नारा यण कहे श्हां श्रावो सुखें रे, नहिं श्रतर श्रम कोय ॥ वाहाली वेला थावे वालदो रे, तो मन दर्षित होय ॥ सां० ॥ १७ ॥ सचिवें श्रावी वात सर्वे कही रे, अर्ककीर्ति उजमाल ॥ साथै सुतारा ले संवरे रे, सुत साथें तत्काल ॥ सां० ॥ १५ ॥ श्रामो पोतनपुर कतावलो रे, हरि वीयूं बहु मान ॥ मगलशद बंदीजन उच्चरे रे, नाट करे रे कन्माण ॥ सां० ॥ २० ॥ ममप बेग धनु राजेश्वरा रे, विभु बने बलदेव ॥ म मप थावी बे कुमरी नती रे, जिहां बेग नरदेव ॥ सी० ॥१॥ज्योति प्रनायें प्रवनेदथी रे, अमिततेजाने रे कर ॥ वरमाला स्थापी वरियो नलो रे, थाणी मन सस्कन ॥ सां॥ ॥ श्री विजयकुमर तणे कहें तवे रे, कुमरी मुतारा रे माल ॥ उनय सबष थयो एम जाणीने रे, हरख्यो चित्तमां नूपाल ॥ सां० ॥ २२॥ सन्मानी नृप पाडा वालिया रे, निज निज कुमरी विवाद ॥ वेद्य राजवीय कीघो रंगई रे, खरची व्य उत्साह ॥ सा ॥ २४ ॥ कुमरी मूकी वधूनें लेश्ने रे, अर्ककीर्ति निज धाम॥थाव्यो दाल थइ ए पाचमी रे, सुख विलसे शुन नाम ॥ सां०॥२५॥ 1 श्री शांतिनाथनो रास खंम बीजो ४५ ॥ 5 ॥ १० ॥ यौवन रूप रसीली देखी, मुज मन मन्मथ चलीयो रे ॥ चारित्र चूकी धन कारण हु, आव्यो कर्म ए वलियो रे ॥ ९ ॥ ११ ॥ सदु मन मानी वात ए साची, हा हा हवे गु थाशे रे ॥ बुझिये व लीया मत्री बहु मलिया, थाय उपाय विमासे रे ॥ सु० ॥ १२ ॥ एक कहे नृपनें राखीजे, यानारूढ ए जलमा रे ॥ यानपात्र नांगे तो शी गति, तेणें राखीजें स्थलमां रे ॥ सु० ॥ १३ ॥ वीजो कहे वै ताढच गुफामां, पति राखीजें यत्ने रे ॥त्रीजो कहे साचु पण हूँ तुम, नवि श्रनुमोदू मतने रे ॥ सु० ॥ १४ ॥ जे कीजे शुन देतें कारन, ते होये कटन हेतु रे॥हिजसुतनो सवध कदु हां, मुजो तुमें एक चित्तें रे ।। सु० ॥ १५॥ जिसवध कहेशे मत्री, न टले नावी नाव रे ॥ वीजे खमें ढाल ए बही, राम कहे थनिराम रे ॥ सु०॥ १६ ॥ सर्व गाथा ॥१७॥ ॥ दोहा ॥ ॥ जोरावर नवितव्यता, जोर न चाले कोय ॥ वलियो श्हां कणे को नहीं, हृदय विमासी जोय ॥ १ ॥ ॥ ढाल सातमी॥ ॥ कोइ जलो राह बतावे रे ॥ ए देशी ॥ विजयपुरें नयरें एक नि वसे, वाडव सोम नामें दो ॥ ज्वलनशिखा तस घरणी तरुणी, दं पति दोय रति कामें दो ॥ १ ॥ कोई नियति तणी गति न्यारी हो, नि यति करे ते कोई न करे, सुणो नाइ हृदय विचारी हो ॥ ए यांकणी ॥ नूशिख नामें नदन तेहनो, कस्यो महोटो उरी हो ॥ जनक गयो परलोकें तेहवे, कर्मनी रीति बनेरी हो ॥ को० ॥ ॥ तेणें नयरें एक राक्षस थाव्यो, करें मानवसदार हो ॥ नित्यप्रत्ये एक माणस सं कल्पी, कस्यो तेहनो उपचार हो ॥ को० ॥ ३॥ राजद्रुकम तिण राष्ट्र सें मान्यो, सघले वात सुणावी हो ॥ नाम लवी बन गोला नरिया, नि त्यप्रत्ये एक चढावी हो ॥ को० ॥ ४ ॥ एक दिन ते जिमुतने वारे, जननी रोवा लागी दो॥ एक थाधार ए देव न सांस्यो, कोण करम गति जागी हो॥ को० ॥ ५ ॥ श्रासनगृहस्थित नूतने करुणा, थावी कदे निर्धारी दो ॥ रे अशरण श्रवला मत रोवे, लेख थमें कगारी हो । को० ॥ ६ ॥ हिजसुत राजसेवक जइ ढोयो, राक्षस थागल लेई हो ।

- 18 जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. न्माद कींपे सो शूरो, एद वाणी गणधर जिनकी ॥ कहे मुनि थचन पष स गुण ध्यावो, तजि चचलता ए निज मनकी ॥ मो० ॥ ६ ॥ ॥ दोहा । ॥ मोद समो वैरी नहीं, काम समुं नहिं उख ॥ अनल नहिं होई क्रोध सम, ज्ञान समु नहिं सुख ॥ १ ॥ कहो प्रनु ते मुफ पंध, कुण गति लाधी एण ॥ सत्तम पुढवीय उपन्यो, गुरु कहे कर्म वशेण ॥३: विभु वीर तुमसी दुइ, गति एहवी गनीर ॥ थचल विलाप करे पणा, हियई न धरे धीर ॥ ३ ॥ कहे गुरु देवाणुप्पिया, न करो खेद लगार ॥ चरम निणेसर वीर तुफ, दोशे नरत मकार ॥ ४ ॥ निसुणी थान : पन्यो, श्रावी नयर मकार ॥ राज्य देश श्रीवियनने, लीधो सयमनार । ॥ ५ ॥ सूधो सयम श्रादरे, पाले निरतिचार ॥ मोह तजे सवर नजे, चाले शुक्ष थाचार ॥ ६ ॥ दवे श्रीविजय नरेश्वर, पोतनपुरनु राज ॥ पाले थतिरूही परें, करें धर्मनां काज ॥ ॥ गोयमनें जिनवीर पर्यपे ॥ ए देशी ॥ एक दिवसें श्रीविजय नरेसर, वेगे पर्पदा पूरी रे ॥ राजकुली बत्रीशे थागत, ऊना सबल सनूरी रे ॥ १॥ मुण राजेश्वर थरज अमा री॥ ए श्रांकणी ॥ श्राव्यो एक परदेशी रे॥नैमित्तिक तुम मलवा हेतें, कहे प्रतिदार महेशी रे॥सु०॥२॥ दुकम करलो थाव्यो दरबारें, करमा पुस्तक लेई रे॥ जय नृपति नरसिंह सबल दल, वेगे थाशिष देई रे। सु० ॥३॥ कहे नूपति मुज थागत नांखे, वात शुनागुन जाणेरे ॥ कहे नैमितिक सवि जापुं पण, न कहाये ण टाणे रे ॥ सु०॥ ॥ नृप थामहथी ते एम नांखे, बानयी सातमे दिवसें रे ॥ पोतनपुरस्वामीने मस्तकें, सदसा विद्युत् पडशे रे ॥ सु० ॥ ५ ॥ वजाहत एम सकल सना कहे, रे नेमि तिक हीणा रे ॥ नृपशिर विद्युत् तब तुम शिर छ, पडशे कर्मविहीणा रे ॥ मु ॥ ६ ॥ शो मुफ दोष ए हाने नांखी, वात निर्बल राजननी रे ॥ जो कदो बो तो मुज शिर थाशे, वृष्टि तदा सोवननी रे ॥ सु० ॥ 8 ॥रा जन बोले रे नैमित्तिक, एह सबल किदां शीरख्यो रे ॥ ते कहे बलदेव सघातें, श्रीगुरु मुझने दाख्यो रे ॥ मु० ॥७॥ नएयो श्रागम बानाय जली परें, वात सकल तेणें जाए रे ॥ थयो पहिवाई यायो श्हां किण, खसीयु मुफ गुणगाणु रे ॥ सु० ॥ ए ॥ पपिनी खमें जनकस्ससानी पुत्रीशं विवाहो रे ॥ ले दीक्षा मेन्यो तदनतर, बाष्पो शहां उस्ताहो रे श्री शांतिनाथनो रास खंम बीजो. ४ विषु नारी पति विण, जेम जग शोन न पावे रे ॥ तेम मत्रीश्वर धर्म तृपा विण, कोई काम न थावे रे।। क० ॥ ७ ॥ पुनरपि मत्री मलि मन चिते, ए हमां नहिं कांश काचु रे ॥ तेदमाहे एक वोल्यो चातुर, कहु तुमने हूं साधु ॥ क० ॥ ७ ॥ यदपडिमा अनिपेक करीजें, काष्ठमयी एक प्राणी रे । दैवत थनुना नवि पडशे, तिहां विद्युत् एम जाणी रे ॥ क० ॥ ए ॥ जो पडशे तो नविन वनावी, थापी तिण तामें रे ॥ मुरप समान नृपनें राखेवा, ते तिम कीधु काम रे ॥ क० ॥ १० ॥ नृप पौषध धरी श्रीजिनमदिर, वेगे ध्याने लीयो रे ॥ पच परमेश्वर चितन करतां, नहि मन खेद अदीणो रे ॥क० ॥ ११ ॥ सिहासन यद पहिमा स्थापी, सेव करे सद्ध खाते रे ॥ सातमे दिवसें गगनघन उमट्यो, दु तिम चपलापातो रे॥क ॥ १२ ॥ विणती यक्ष्पडिमा नृप कुशलो, रह्यो सहुजन मन हरव्यो रे ॥ जयजयकार थयो ते पुरमां, गणक खरो एम पररव्यो रे ॥ क ॥ १३ ॥ पोपय पारी नृप घर श्राव्यो, नैमित्तिक सत्कायो रे ॥ वृष्टि थ तस शिर सोवननी, वस्वानरणें नास्यो रे ॥क०॥ १४॥ विघन टन्युं नृपनु थति सवलु, सातमी ढाल ए गाई रे ॥ वीजे खमें रामविनय कहे, अवि चल पुण्य सखाई रे ॥ क० ॥ १५ ॥ सर्व गाथा ॥ २० ॥ ॥ दोहा॥ ॥निजपुरमा उत्सव दुवा, घर घर मगलमाल ॥ पूजा रचावे जिनघरे, सत्तर नेवि सुविचार ॥१॥ दिन दोहेला उरे, धन खरचे लख कोहि ॥ पडद थ मारी तणा वती, वजडावे मन कोडें ॥शा नगरमांहे सद्को सुखी, नहिं । खीचें नाम ॥ श्रमिततेज ण अवसरें, श्राव्यो तेणें गम ॥३॥ नगिनीने मलवा नणी, देखी उत्सव एद ॥ पूढे ए कारण कवण, दर्प तणु सस्नेह ॥ ४ ॥ नगिनी मुख सवि सांजली, सनामांहे नूपाल ॥ वेहू राजेश्वर मल्या, फली मनोरथमाल ॥ ५ ॥ श्रमिततेज देवझने, थापे वह धन सार ॥ पंच दिवस रदी थावीया, फरी निज नयर मकार ॥ ६ ॥ ॥ ढाल श्रामी॥ ॥ रामघरणी का श्राणी रे ॥ ए देशी ॥ एक दिवस श्रीविजय नरेसर, वन जोवा नीसरीयो रे।मृगनयणी रमणी सघातें, साथ सपल परवरियो रे ॥ १ ॥ वाहाली मोदतणी ए लीला रे, जाण थजाण थश्ने विलसे, दप , - ४६ जैनकथा रत्नकोप जाग आवमो. थपहरियो सांकेतिक अमरें, गयो निजमातनें देई हो ॥ को. राक्षसनयथी गिरिनी गुफामां, हार शिला देश थाडी दो ॥ मूके मुतने तेह विलुझी, या करीने माही दो ॥ को ॥ ॥ ते हिजसुतने रातें में लियो, जमते अजगरें जारी हो ॥ निसुणो नाई कर्म कमाई, करे नर ने नारी हो ॥ को ॥५॥यक्त ॥ उदयति ॥१॥ प्राप्तव्योनियतिवला श्रयेण योऽर्थ.॥२॥ एउपनय दाख्यो मत्रीश्वर,त्रीजे नियति अनुसारी हो ॥ रामविजय कहे सुणो नवि प्राणी, जुतमें युक्ति विचारी हो ॥ को० ॥ १० ॥ दोदा ॥ चोयो चतुर कहे वली, जे बोलु ते साच ॥ पण पोतनपुरईश्वरें, ए नैमित्तिक वाच ॥ १ ॥ कीजें पोतनपति अवर, तस शिर विद्युत्पात ॥ पडशे स्वामी कगरे, मानी सघले बात ॥ ५ ॥ नैमित्तिक कहे ए निपुण, मत्रीश्वर शिरताज ॥ निजपति राखेवा सबल, वात बतावी थाज ॥ ३ ॥दु पण ए कहेवा नणी, बाष्यो हूँ शण गम ॥ सात दिवस लगें नियमयुत, स्वामी रहो निज धाम ॥ ४ ॥ रदो रहो रे जावव रीति नथी ॥ ए देशी ॥ कहे राजेश्वर मुणो मंत्री श्वर, एद वात केम कीजे रे ॥ परप्राएँ निज प्राण गारे, तेहने अधम कहीजें रे ॥ क० ॥१॥ मर नामें 5ख पामे मानव, किम जाणी तस दणीय रे ॥ तेहथी थाप दणायो वारू, परनवें नय नवि गगी रे ॥ क० ॥ ॥ यक्त वसुदेव हिमे॥ दत्तूण परप्पाणे, थप्पाण जो करे ३ सप्पाण ॥ थप्पाण दिवसाण, कएण णासेश्थप्पाण॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ सफलधर्ममां प्रथम थदिसा, नांखी जिनवरमंथें रे ॥ उहवे ,याप न प रने उहवे, ते मुनि सूधे पंथें रे ॥ क० ॥३॥ तथाचोक्त ॥ हिंसा स्या ज्या नरफपदवी सत्यमानाषणीयं, हेयं स्तेयं सुरतविरति सर्वसंगानि वृचि ॥ जैनोधर्मोयदि न रुचित', पापपंकायनेन्यस्तेन्य सर्वेमटिति निद सि. सर्वदा सर्वथैव ॥ २ ॥ पूर्वढाल ॥ शु ए प्राण सदा स्थिर रहेशे, या खर एक दिन मरवु रे ॥पर दणीयें निज प्राणने माटें, श्या ठपर एक रतुं रे ॥ क० ॥॥ जीव एक सगारी तिण विषु, पडद थमारी वजाव्यो रे ॥ हिंसक जे जगा अवतरिया, तेणें निजवश सजाव्यो रे । क० ॥ ५॥ नेद न दृष्टि विना मुख धन विणु, नारी विषु गृह जेम रे ॥ विप्र वेद विद्या विष्णु नपशम, विष्णु विद्या वली तेम ॥ रे ॥ का ॥ ६ ॥ शूर शस्त्र श्री शांतिनाथनो रास खम वीजो. ४७ विष्णु नारी पति विण, जेम जग शोज न पावे रे ॥ तेम मंत्रीश्वर धर्म तृपा विण, कोई काम न थावे रे॥ क०॥ ७॥ पुनरपि मत्री मलि मन चिते,ए हमां नहिं कांश काचु रे ॥ तेहमांहे एक वोल्यो चातुर,कहूं तुमने हुँ साचु रे ॥ क० ॥ ॥ यदपडिमा अनिपेक करीजें, काष्ठमयी एक प्राणी रे ॥ दैवत अनुनावें नवि पडो, तिहां विद्युत् एम जाणी रे ॥ क० ॥ ए ॥ जो पडशे तो नविन वनावी, थापी तिण तामें रे ॥ सुरप समान नृपर्ने राखेवा, ते तिम कीधु काम रे ॥ क० ॥ १० ॥ नृप पौपध धरी श्रीजिनमदिर, वेतो ध्याने तीणो रे ॥ पंच परमेश्वर चितन करतां, नहि मन खेद थदीणो रे ॥क ॥ ११ ॥ सिंहासन यद पहिमा स्थापी, सेव करे सद्ध खांतें रे ॥ सातमे दिवसें गगनघन उमट्यो, दुन तिम चपलापातो रे ॥ क० ॥ १२ ॥ विणठी यक्पडिमा नृप कुशलो, रह्यो सहुजन मन हरख्यो रे ॥ जयजयकार थयो ते पुरमां, गणक खरो एम परख्यो रे ॥ का ॥ १३ ॥ पोपध पारी नृप घर श्राव्यो, नैमित्तिक सत्कायो रे ॥ वृष्टि थ तस शिर सोवननी, वस्त्रानरों नास्यो रे ॥क० ॥ १४॥ विघन टन्युं नृपनु यति सवलु, सातमी ढाल ए गाई रे ॥ वीजे खमें रामविजय कहे, अवि चल पुण्य सखाई रे ॥क० ॥ १५ ॥ सर्व गाथा ॥ २० ॥ ॥ दोहा॥ ॥निजपुरमा उत्सव हुवा, घर घर मगलमाल ॥ पूजा रचावे जिनघरे, सत्तर नेदि सुविचार ॥ १॥ दिन दोहेला उदरे, धन खरचे लख कोहि ॥ पडद थ मारी तणा वली, वजडावे मन कोडें ॥२॥ नगरमाहे सद्को सुरखी, नहि 5 खीनुं नाम ॥ श्रमिततेज श्ण अवसरें, पायो तेणें नाम ॥३॥ नगिनीने मलवाजणी, देखी उत्सव एह ॥ पूछे ए कारण कवण, दर्प तणु सस्नेद ॥ ४ ॥ नगिनी मुख सवि सनिली, सनामांहे नूपाल ॥ वेहू राजेश्वर मल्या, फली मनोरथमाल ॥ ५ ॥ अमिततेन देवानें, थापे बहु धन सार ॥ पंच दिवस रही थावीया, फरी निज नयर मकार ॥ ६ ॥ ॥ ढाल बातमी॥ ॥ रामघरणी कांइ थाणी रे ॥ ए देशी॥ एक दिवस श्रीविजय नरेसर, वन जोवा नीसरीयो रे। मृगनयपी रमणी सघातें, साथ सवल परवरियो रे ॥१॥ वाहाली मोदतणी ए लीला रे, जाण अजाण थश्ने विलसे, पंप UG जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ती दोय रसीलां रे ॥ वा ॥ ए यांकणी॥ क्रीडा करतां वन संचर, नाइ रमणी यहि हाथे रे ॥ रतिकारक रसमेल बनावे, मन्मप बेहुने ता ऐं रे ॥ वा० ॥ २ ॥ण थवसरें कचनमृग देखी, मनहरणी एम बोले रे ॥ प्राणजीवन मुफ लागे प्यारो, ए मृग श्रमृत तो रे ॥ वा ॥१॥ थाणी थापो मुफने प्रीतम, ए मन रमण कुरगें रे ॥ नेह नसो तृपकेडे उजाणो, रज्यो राणी रगें रे॥ वा० ॥ ४ ॥ जिम जिम नृप के आये, तिम तिम दोडी जाये रे ॥ नृप नारी मूकीने थलगो, पहोतोश्वास जराप रे॥ वा॥५॥प्राणप्रिया कर्कोट थहि मशी, गाढवरें पोकारी रे ॥ प्रास जीवननी वहेला धावो, व्यो मुझने कगारी रे ॥ ६ ॥ स्वामी वाहार करो विनतानी रे ॥ ए श्रांकणी ॥शी वालेसर विलवनी वेला, कां वहेला नथी वलता रे ॥ श्रावो वनाईने अलवेसर, जो बो मनना मलता रे ॥ स्वा॥ ॥ बोथतरजामी आतमना, तो छु घणु कहेवाडो रे ॥ करी रूपा य कमलदल नयणा, मरती मुफ जीवाडो रे ॥ स्वा० ॥ ७ ॥ शब्द मुणी विनतानो थाप्यो, दोही अवला पासे रे ॥ खमा खमा तुमने एम जोसे, राय जराणो श्वासें रे ॥ स्वा० ॥ ए ॥ कण एकमां अवता मूर्खाणी, नृप वत्सगें सीधी रे ॥ नयण निमिल्य रही जब पुवती, तब नृपें हा रा कीधी रे ॥ स्वा० ॥ १० ॥ मूीगत थ धरणे ढलियो, मोद महा रिप बलियो रे ॥ नृप चेतन पाम्यो बहु कष्टे, प्रेम पयोधि उलियो रे ॥ खा ॥ ११ ॥ महारे तो दूजी नहिं वनन, वादाली सुतारा राणी रे ॥ तुफ परण्या पूनें में बीजी, नारी न कोई दिल थाणी रे ॥स्वा ॥ ११ ॥ हे मानिनि एम मान न कीजें, बोल दसीने दीजें रे ॥ विण वांके केम थाडो लीजें, तुफ विरहें तन बीजे रे ॥ स्वा० ॥ १३॥ हे गुणवती इसी बोलती, गुण थपीयाले नयरों रे ।मुफ सामु निरखो घणे हेजें, ऐ नाखु बढ़ वयणे रे ॥ स्वा० ॥ १४ ॥ विरहव्यथा जगमा अति विरुश, प्रीतिनी रीति थटारी रे ॥ वादिर शीतल अतर कनी, प्रीतियमिगति न्यारी रे ॥ स्वा० ॥ १५॥ राय विमासे ए जीव्याथी, मरण नलु ए साईं रे ॥ ए मूके पण दु नवि मूकु, कोल दीयो में हाथे रे ॥ स्वा० ॥ १६ ॥ राय रचावी चिता थति महोटी, तिण अवसर तिहां थाय रे ॥ ननमारग खेचर दोय दोच्या, जिदा पोतन पुरराय रे ॥ स्वा० ॥ १७ ॥ मोहो श्री शांतिनाथनो रास खंग वीजो. U मायाने रूपें, जल मत्री तेणें गंटी रे ॥ थर थर धूजती तिण वेला, माया सुतारा नाती रे ।। स्वा० ॥ १७ ॥ राय कहे ए छ मुफ नांखो, चिर जीवो श्रम स्वामी रे ॥ कर जोडी कहे खेचर वलतुं, निमुणो अतरजामी रे ॥ स्वा० ॥ १५ ॥ यमिततेजनो बौ नैमित्तिक, संनिन्नश्रोत्र उत्कर्षे रे ॥ सुतछं ज्योतिर्वनमा रमवा, चाल्या वेदु अमें हर्षे रे ॥ स्वा० ॥ २० ॥ मारगमांहे सुतारा दीती,थाठमी ढाल एम नारवी रे ॥ वीजे खमें रामवि जय कहे, नृप सुणो धीर मनराखी रे ॥ स्वा० ॥१॥ सर्वगाथा॥३५॥ ॥ दोहा॥ ॥ चमरचचा नयरी तणो, अशनिघोप उनंग ॥ तेणें सुतारा अपहरी, जही जाता अमें दिछ॥१॥ थामा थावो वालहा, वालेसर वलवत ॥ महेलावी मुफने करो, नाथ सनाथ महत ॥ ॥ अमिततेज वधव हु तो, जननीजाया वीर ॥ वादार करो वहेनी तणी, गिरुथा साहस धीर ॥ ३ ॥ इस्यां वयण सुणी तेहनां, लही सेतारा तेह ॥ दोडी जइ रोक्यो अमें, बलियो दूतो जेह ॥ ॥ रे पापी श्रम स्वामिनी, वहेन सुतारा ले ॥ केम जाइश हवे जीवतो, मेल के युद्ध करे ॥ ५ ॥ कयु सुतारायें तदा, थल प्रयासें पंथि ॥ वेताली मोदित पियु, समजावो जइ तेथ ॥ ६ ॥ अमें श्राव्या मतावला, तुम्द राखवा काज ॥ नाती सुतारारूपिणी, वेताली माहाराज ॥ ७ ॥ चिता मत करशो मनें, कर चितित काज ॥ श्रावो श्रम स्वामी नगर, वधशे तुम्हारी लाज ॥ ७ ॥ खबर कहावी मातने, नृप चाल्यो ते साथ ॥ रथनूपुर पुर थावियो, श्री विजयो नरनाथ ॥ ए॥ ॥ ढाल नवमी॥ ॥ बावा किसन पुरी ॥ए वेशी॥थमिततेज कम्यो गुणवत, देखी श्रीवि जयानिध सत ॥१॥ जो जो सजन मल्या, थान मनोरथ सफल फल्या ॥ एथांकणी॥ पूठघु केम चिंतातुर बाज, परकाशो मुझने महाराज ॥जो ॥ २ ॥ नांख्यो तिणे सघलो श्रवदात,थमिततेज कोप्यो मुणि वात ।।जो ॥३॥ जेणे की ए काम कुचेत्र ॥ पाधरोनेत्र करु रणक्षेत्र ॥ जो ॥ ॥ मनमा वाध्यो श्रमरपपूर ॥ थशनिघोप नाखू चकचूर ॥ जो ॥ ५ ॥ मोकलियो शिखवी एक दूत ॥ चमरचचा पहोतो था नूत ॥ ॥

. ५० जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. जो० ॥ ६ ॥ रे की, तें निर्लज थकाज ॥ परनारी लेई प्रायो पान ॥जो० ॥ ॥ परशय्या परदार परान्न, परमदिर परवसन निदान । जो ॥ ॥ मूरख हृदय विमासी जोय, ए पांचे थापण नवि होय । लोक ॥ ए ॥ पररमणी नवि निरखे कच ॥ तो तेदने मुख शोने मूग ॥जो॥१॥ तुज सरिखा जे जगमां शुष्ठ, ते तिर्यंच विण शिग ने पुर। लो० ॥ ११ ॥ परनारी लावतां तूफ, मति सघली तारी गई मूण ॥ मो. ॥१५॥ पण तारो हां नहि वक, मल्यो नयी कोई सबल धिवक जो ॥ १३ ॥ पण जाएं बु सुण नूपाल ॥ थाव्यो तुज फीटण काल ॥ जो० ॥ १४ ॥ पण मुज स्वामी ने वडनाग्य ॥ श्राप सुतारा पाये लाम्य ॥ जो० ॥ १५॥ अशनिघोष कोप्यो अति जोर ॥ दूत प्रत्ये कहे व यण कठोर ॥ जो० ॥ १६ ॥ लाव्यो सुतारा ज बलयोग, रयण नहिं. ए रंकनें नोग्य ॥ जो० ॥ १७ ॥ शय्या वसन थने तांबूल, नारी शस्त्र र यण बढमूल ॥ जो ॥ १७ ॥ जोगवे जगमां वीर जे दोय ॥ मूरख हृदय विमासी जोय ॥ जो ॥ १५ ॥ मुफ पासेंथी नारी बाश ॥ करतो वे दशे थतें विनाश ॥ जो० ॥ २० ॥ रहे बेगे मन राखी गम, कहेजे दूत न घाले हाम ॥ जो० ॥ ३१ ॥ तुमने \ मारुं कंगाल, जेम श्रामो तेम वहेलो चाल ॥ जो ॥ २५॥ वल्यो दूत थइ नैरव रूप, पति श्रागें कहे वात स्वरूप ॥ जो० ॥ २३ ॥ बीजे खमें नवमी ढाल । पूर्व वैर तणो जु ढाल ॥जो० ॥४॥ श्री सुमति मुगुरुनो कहे कवि राम, जगमा वैर न कीजें थाम ॥जो॥२५॥सर्व गाथा॥२६॥ श्लोक तथागथा ॥१२॥ ॥ दोहा ॥ ॥ वचन सुपी वैरी तणां, सबल सजाई कीध ॥ विकट कटक जट मेलिया, गोर नगारे दीध ॥ १ ॥ षडु राजेश्वर सचस्या, घर थरके वल नार ॥ कंत सुतारानो दुन, तरत तिहां श्रस्वार ॥२॥ तुरत जा पहोंचो तुमें, धमरचचा न्यो घेरि॥ सबल विद्याधर सैन्य, करोथरिने फेर ॥३॥ ज्येष्ठ पुत्र साधवा, जाग्ने हिमगिरि थाज॥परविया उल्लेदिनी,माहाज्वाला मादाराज ॥ ४ ॥ शीघ्र थावि मलणं थमो,थने सबल सुत साथ ॥ नादु कनें कहे नावथी, सिम करो नूनाथ ॥५॥ पिता पुत्र हिमगिरि जइ, साधे विद्या सार ॥ हवे श्री विनयनरेंजी, चढिया घट्ट परिवार ॥६॥ - २१ श्री शांतिनाथनो रास खंग बीजो. ॥ ढाल दशमी॥ ॥ चित्रोडा राजा रे ॥ ए देशी ॥ राणीना जाया रे, चढी चपल उजा या रे, दल पूरे सिधाया, श्राया चौपशु रे ॥ १ ॥ गयण गाजे रे, निशाण श्रवाजे रे, घन फोज विराजे, ऊंची उमती रे ॥ २ ॥ नयरी ते घेरी रे, रणनेरी नफेरी रे, सिधूढे स्वर रूडे,जागे गरिमा रे ॥३॥ रिपुवायो जाणी रे, मूके सुत वाणी रे, देई ठोर निसाणे, ते चढिया घणा रे ॥ ४ ॥ वल सूरमा चढिया रे, थावी तिहा थडिया रे, दलपूर सघातें, थायडीया तदा रे ॥ ५॥ अशनिघोप केरा रे, सुत सवल जलेरा रे, एक एक शूरा, थाव्या सामुहा रे ॥ ६ ॥ सुत अमिततेजाना रे, नहिं जगमा बाना रे, थति सवल युवाना, पागल ते हवा ॥ ॥ नररोप जराणा रे, लहि स्वामी थाणा रे, श्रावी साहामा ममाणा, युचने कारणे रे ॥ ७ ॥ रण लाग्यो मातो रे, नट री रातो रे, एक मास उजातो, तिहां जास्यो नहि रे ॥ए॥ नवि कोई दारे रे, वच्चे कोइ न वारे रे, एम दुः सदार, वह सुनटां तणो रे ॥ १० ॥ वैरीसुत नाठा रे,कर देखी काठा रे, थाव्या तेह त्राग, यशनिघोप थागलें रे ॥११॥ दल देखी जाग्यो रे, जगहो वह लाग्यो रे,थाव्यो थापधु थाघो, रण मेदानमां रे ॥१॥ मातु दल नोई रे, नाता सह कोई रे, सुत अमिततेजाना, पाग सख्या रे॥१३॥ श्री विजय सवाई रे, श्राव्यो तव धाई रे, मांहो माहे लागि लडाई, घणी वेडने रे ॥ १४ ॥ लइ खाने धायो रे, श्रीविजय उमाह्यो रे, रिपुशिर दीयो घायो, ते वैरी दोय गुवा रे ॥१५॥ दोय दे विशे रे, तव चारज देखे रे, एम वाधे थलेखे, वैरी वांकडो रे ॥ १६ ॥ नृप चित्त विमासे रे, केम ए जीताशे रे, ए तो सपल तमासे, वात थावी पड़ी रे ॥ १७ ॥ शोचे एम जाम रे, अमित तेन ताम रे, सिम विद्यायेंथाव्यो काम, सवे सख्खु रे ॥ १७ ॥ तस माया निवारी रे, पल देखी नारी रे, न रदी थस्वारी, फनी रिपु तणी रे ॥ १ ॥ रिपुके. उजाणी रे, विद्या सपराणी रे, तुमने देन थाणी,ए पापी जु रे ॥ २० ॥ थइ विद्या के. रे, जाप्यु ठाम ए फेडे रे, न रह्यो तेइ नेहें, उ जाणो घणु रे ॥ १ ॥ पासें जिननुवनें रे, बल केवली चरणे रे, पेठो जइ शरणे,ते सतावलो रे ॥ २२ ॥ देवी वलीथावी रे, कषु ते सम कावी रे, एम बाण मनावी, वेगु वलि ए मल्या रे ॥५३॥ पुण्यें जय पायो .

जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. रे, खम बीजे गायो रे, ढाल दशमी त्रिप्टष्ठनो जायो, तीहां जीतियोरे ॥ दोहा ॥ ॥ अमिततेज मारीचने, कहे एणी परें नास ॥ नगरमांद माळ तुमें, बहेन सुतारा पास ॥१॥ तेडी लावो श्रम कनें, अचलमुमिनी पास ॥ जीतनगारां देश वल्यो, नावुक सहित सनास ॥ ॥ नरीमें वलनश्मुनि, पासें थाव्या नूप ॥ प्रथम गया जिनदेहरे, निरस्ते देव साप ॥३॥ निराकार जिनरूपनी, स्तवना करे थप ॥ जय युगादि मिन वर विनो, जय जय थकल अरूप ॥ ४ ॥ नमी स्तवी जिनराजने, भावे सशुरु संग ॥ मुनि देखी मन कपन्यो, सवल धर्मनो रंग ॥ ५ ॥ गुरु वदे गुरुजक्तिशं, गिस्था ते गुणवत ॥ मुनिवर देखीने थया, तेहना शीतल मन्न ॥ ६ ॥ शील यखमित ते सती, नारी सुतारा गम ॥ पूल बावी पपिनी, निरुपम गुणनुं धाम ॥॥ ते निरखी दर्पित दुधा, पति बांधव बेडू प्रेम ॥ मन विकस्युं तन उनस्पं, जिनगुरुवर्शनें क्षेम ॥ ॥ दिये वे शन मुनिवर हवे, नविक जीव हितकाज ॥ नवदव ताप समाधवा, जिम पुष्कर घनगाज ॥५॥ ॥ ढाल बग्यारमी॥ ॥ विमल केवली एक रे ॥ ए देशी ॥ केवली श्रवल मुणिद, कहे न वियण सुणो ॥ निज श्रातम निर्मल करो ए ॥ १ ॥ काढो मेल अनादि, माहे जे नयो ॥ नव धनत जेलो कयो ए ॥ २ ॥ नमो यावरणी जीव, नव चोगानमां ॥ ब्रांति विविध घमनूलमा ए ॥३॥ जाणे सार असार, थस्थिरने घर कहे ॥ एम विपर्ययमा पच्यो ए॥ ४ ॥पीहे दोय विकल्प, राग ने शेष ए॥थरति वधारण थाकला ए ॥५॥ महोटा ए परमाव,था माहे कह्या ॥ कथला जग एहना घणा ए ॥ ६ ॥ कुण वत जग उख, न हूतो कुण सुखी ॥ जो जग ए नडता नहीं ए ॥ ७ ॥ एक पेटमा दोय, दोय वत्ती थन्यमां ॥ चार थाये वली चोगुणा ए॥ ७ ॥ एहनो पहु वि स्तार, बांधे जव घणो ॥ धन्य बलिया जिणे वश कमा ए॥ ॥ कोटि कटक जट जीते, रणमा एकलो ॥ पण दोय जीते ते जलो ए॥ १० ॥ ए जीत्ये सवि जीत्या, बाजी जीवनी ॥ एम बनतनापी कमु ए ॥ ११ ॥ यशनिघोप नूपाल, सुणी मन समजीयो । घिर में कुल मेलु कमु ए ॥

श्री शांतिनाथनो रास खंग वीजो. ५३ १२॥ न कयुं थातमकाज, गुण गलिया सवे॥ वलीया पण मुजमां किस्यु ए॥ १३ ॥ गुरुसाखे अपराध, रे खामे तेहने ॥ रोप रखे मन राखता ए ॥ १४ ॥ केवललोकालोक, नासक प्रनु कह्यो ॥ राग केम ए कपरें ए ॥१५॥ नहिं मुज पापनी बुद्धि रे,महेली मायिकने॥एदनें में ग्रहियाणीने ए॥१६॥ कहेशे नाणी वात रे, ढाल अग्यारमी वीजे खमें ए हुई ए ॥१७॥ ॥ दोहा॥ ॥ रत्नपुरे पूरव नवें, गुरु कहे ए श्रीपेण ॥ यमिततेज नृपति हतो, वलियो नाग्यवशेण ॥ १ ॥ कपिल नाम हिज तुं दुन, सत्यनामा तुक नारि ॥ नवनोगें हां अवतरी, सती सुतारा सार ॥ २ ॥ कपिल जीव बहु नव नमी, कोक नव धज्ञान ॥ तप करिने शहां अवतस्त्रो, थशनिघोप राजान ॥ ३ ॥ पूरव नव सवधथी, राग विना हरि एह ॥ गतरागी पूरव नवें, तेणें तु मदसनेह ॥ ४ ॥ अमिततेज निज नव चरित, निसुणी कहे मन कोड ॥ धन्य ज्ञानी तुम शाननें, प्रणमुं वे कर जोडि ५॥ के छ नष्य थनव्य बु, नांखो मुफ मुनिराज ॥ नवसायरमां तु मल्यो, तारण तरण जहाज ॥ ६ ॥ ॥ ढाल वारमी॥ ॥ तादारो शहेर नलो योधाणो॥राजा जी॥ ए देशी॥ नांखेथचल में नीश्वर वाण ॥ राजा जी॥नाग्य महोटानोतु धणीजी॥हाथी नव नवमे गुणखाणि ॥रा ॥ दोशो जिनेश्वर बढ़ गुणी जी ॥ १ ॥ नव एके पं चम चक्री ॥रा० ॥ पोडशमो जिनवर वली जी ॥ तिहां श्री विजया निव नूप ॥ रा॥ पहेलो सुत मन रली जी ॥ २॥ करी घाती कर्मनो थत ॥रा ॥ थाशो तुमें तिहां केवली जी ॥ गुण गाशे तुफ धरी रंग ॥ रा० ॥ समवसरण सुर नर मली जी ॥ ३ ॥ एम निसुणी हानीनी पास ॥रा ॥ दिल उनस्यु फलट घणे जी ॥ यहि श्रावक व्रत मन शुद्ध ॥ नाणीनी ॥ जयें तुमारे नामणे जी ॥ ४ ॥ कहे थशनिघोप मुनिराज ॥ ना ॥ तारो हो मुफ करुणा करी जी ॥ दु तो थाक्यो नवमां जोर ॥ ना० ॥ चगतिमा फेरा फरी जी ॥ ५ ॥ तुमो जाणो सघली वात ॥ ना ॥ जे तुम पागल दाखवु जी ॥ तेतो मातनी बागल थावि ॥ ॥ ना० ॥ जेम मोशाल नाखवु जी ॥ ६ ॥ दवे थाव्यो तुमारी पास॥ ।

५२ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. रे, खंमधीजे गायो रे, ढाल दशमी त्रिपठनो जायो, तीहां जीतियो रे ॥४॥ ॥ दोदा ॥ ॥ थमिततेज मारीचने, कहे एपी परें नास ॥ नगरमाहे बाई तुमें, बहेन सुतारा पास ॥१॥ तेडी लावो अम कनें, अपलमुनिनी पास ॥ जीतनगारा देश वन्यो, नावुक सहित उनास ॥ ॥ नगरी में घलन मुनि, पासें थाव्या नूप ॥ प्रथम गया जिनदेहरे, निरस्ते वेव साप ॥३॥ निराकार जिनरूपनी, स्तवना करे थनूप ॥ जय पुगादि जिन वर विनो, जय जय अकल अरूप ॥ ४ ॥ नमी स्तवी जिनराजने, यावे सजुरु संग ॥ मुनि देखी मन कपन्यो, सवल धर्मनो रंग ॥ ५ ॥ सुरु वये गुरुजतिर्थ, गिरुथा ते गुणवत ॥ मुनिवर देखीने यया, तेहनां शीतल मन्न ॥ ६ ॥ शील थखमित ते सती, नारी सुतारा गम ॥ पूल बावी पपिनी, निरुपम गुण-धाम ॥॥ ते निरखी हर्षित दुथा, पति बांधव पेड़ प्रेम ॥ मन विकस्युं तन समस्युं, जिनगुरुदर्शनें केम ॥ ॥ दिये के शन मुनिवर हवे, नविक जीव हितकाज ॥ नववव ताप समाधवा, जिम पुष्कर धनगाज ॥ ५ ॥ ॥ ढाल घग्यारमी॥ ॥ विमल केवली एक रे ॥ ए देशी ॥ केवली श्रवल मुणिद, कहे न वियण सुणो ॥ निज बातम निर्मल करो ए॥१॥ काढो मेल अनादि, माहे जे नयो ।। नव बनत नेलो कल्यो ए ॥ ३ ॥ नमो थावरणी जीव, नव चोगानमां ॥ भ्रांति विविध घमनूलमा ए ॥३॥ जाणे सार असार, शस्थिरने घर कहे ॥ एम विपर्ययमा पच्यो ए॥४॥पीहे दोय विकल्प, राग में ष ए॥थरति वधारण धाकला ए॥५॥ महोटा ए परमाव,यात माहे कह्या ॥ कथला जग एदना घणा ए ॥ ॥ कुण पावत जग स्व, न हुतो कुण सुखी ॥ जो जग ए नडता नहीं ए ॥ ७॥ एक पेटमा वोय, दोय वली श्रन्यमां ॥ चार थाये वली चोगुणा ए॥ ७ ॥ एडनो बहु वि स्तार, बांधे नव घणो ॥ धन्य बलिया जिणे वश का ए॥ ॥ कोटि कटक नट जीते, रणमा एकलो ॥ पण दोय जीते ते नलो ए॥ १० ॥ ए जीत्ये सवि जीत्या, बाजी जीवनी ॥ एम अनतनापी कसं ए ॥ ११ ॥ थशनियोप नूपाल, सुणी मन समजीयो ॥ धिक् में कुल मेलु कमु ए ॥

श्री शांतिनाथनो रास खंम बीजो ५५ ननमारग दोय थाविया जी ॥ जाणीतरीया जिनचैत्य ॥ मु०॥ प्रनु स्तवना करि नाविया जी ॥ ११ ॥ यावी वदे यमिततेजराय ॥ नगीनो ॥ कहे स्वामी देशना दीयो नी॥वीजे वारमी ढालें श्री सुमति कविनो, राम कहे ए रस पियो जी ॥१५॥ सर्वगाथा॥३४॥ श्लोक तथा गाथा ॥१३॥ ॥ दोहा॥ ॥ मुनिवर जाणी योग्यता, परकासे निज धर्म ॥ वस्तु विनावातीत जे, क्लेश रहित बातम ॥ १ ॥ सामग्री लइ दोहिली, मत बांधो थत राय ॥ एह निरतर श्रादरे, चिदानद मुख थाय ॥ २ ॥मन कुविकल्पं जे करे, सांतराय मुख तास ॥ जिम मत्स्योदरनें थयो, थतर सहित विलास ॥३॥ थमिततेज कहे कुण विनो, मत्स्योदर दु तेह ॥ कृपा करीने दाखवो, तस प्रवध गुणगेह ॥ ४ ॥ मुनिवर नांखे तेदनो, सरस सवध रसाल ॥ निमुणो नवि नावें करी,धर्म उपर ए ढाल ॥ ५॥ ॥ ढाल तेरमी॥ ॥ प्रजजी प्रसन्न होजो ॥ ए देशी ॥ क्षेत्र जरत अमरावती सरिखो, नयर कनकपुर निरखो ॥ नांखे सशुरु वाणी, मीठी अमिय समाणी, गरुथा गुणमणि खाणी, निमुणो चित्त हित थाणी ॥ नविका धर्म करे जो ॥ १ ॥ नामें कनकधर तिहां माहाराजा, सबलप्रतापें ताजा हो ॥ घरणी तस गुणरंजा, दीठे होय थचना, कनकश्री गतदना, देवने ते मुलना ॥ रमणी पुण्ये लही जो ॥ ५ ॥ शेठ रतनसार नामें सोनागी, तिहां निवसे वडनागी हो ॥ व्यवहारी गुणवतो, पोढो पुण्यपनोतो, राज ज्वारे समोतो, धर्म उपर दृढचेतो ॥ वारू मुखविलसे जो ॥३॥ रत्नचूला रमणीनो जायो, कुंवर कुलमा सवायो हो ॥ नामें धनद कहायो, कुलदी पक कुल थायो, सट्ठ साजन मन नायो, रूपें मयण हरायो ॥ वारू तनय थडे जो ॥ ॥ सिदलनामें कितव एक महोटो, तिहां निवसे दिल खोटो दो ॥ जूधारी शिरदार, सेवे ते अनाचार, एक दिन हास्यो गमार,थाव्यो देवी श्वार ॥ नांखे रीप धरी जो ॥ ५ ॥ रहूँ तुम देवकुलें हूँ देवी, कां धन नापे तु सेवी दो॥ वहेली प्रगट थइनें, थापे धन मुफ वदीने, नहिं तर गाल देश्ने, नाशु हाथी लेश्ने॥ वलतु देवी कहे जो ॥ ६ ॥ ॐ ताह रे वा मुफ थाल्यु, के छ तें नूश्मांदे घाब्युं हो ॥ श्राव्यो बो हलफल ५४ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. स्वामीजी॥धारा धरी दियडे घणीजी ॥ मुफ तारशो ए विश्वास नाon दायिक समकितना धणी जी ॥ ॥ कहे केवली जेम मन ठाम । ना० ॥ तेम कीजें निश्चल थई जी ॥ सोपी मुतनें निज साम्राज्य नाग थशनिघोषं दीक्षा ग्रही जी ॥ ॥ वलि स्वयंप्रना बढ नारी संपात, चरण ग्रहे केवली कने जी॥पाले पावन पंचाचार ॥मुनिजी ॥चरण करण गुणे एकमनें जी ॥ ॥ दवे वांदी नृप दोय विशे, निज निज नपरें थाविया जी ॥ करे देवपूजा गुरु नक्ति सुवे, सदु जन मनमा लाविया जी ॥ १० ॥ दिये दीन दुखीने दान अलेखे, नक्ति करे जिनमदिरें जी। पाले श्रावकनो श्राचार थशे, सुख विलसे वरमदिरें जी ॥ ११ ॥ एक दिवस अमिततेज राय ॥राजाजी॥ उज्ज्वल एक जिनगृह करे जी॥ माहे स्थाप्या श्रावि लिपद, ते दीचित्तई ठरे जी॥ १२ ॥ नित्य नक्कि करे प्रनात ॥ रा० ॥ अष्टप्रकारी उज्ज्वल मनें जी॥ कहे चैत्यवदन कर जोडी ॥रा ॥ नाव नले उमसित मने जी ॥१३॥अथ चैत्यवदन ॥ उप्पय ॥ जय सामी निज देव, जय अतिशय गुणधारी ॥जय पारंगत परम रूप,थ विचल अविकारी ॥ जय अध्यारम नावधर्म, थकलक श्रमायी॥झानकला पूण धणी, प्रवताई पाई ॥ परमातम प्रेमें नमुंए, प्रह गमते सूर ॥थ मिततेज प्रध्यानथी, दिन दिन चढते वर ॥ १ ॥ सिम निरंजन नाथ नाम,धाता पुरुषोत्तम ॥ बुध थलख शकर सदा, पर ब्रह्मा सप्तम ॥ चिदा नद चेतन कहो, वली थादि अनादि ॥श्रव्यय थक्ष्य ने अरुज, प्रतु पूर्णानदी ॥ एम थनेक नामें करी ए,तुम ध्यातां कल्याण ॥ राम कहे सुर घेनुथी,थधिक तुम्हारीयाण॥॥अथ स्तवन॥रागकेवारो॥धावो मुफ मन धाम जिनजी॥था॥दथी एम रह्या अलगा, केम सरेथम काम ॥जिक ॥श्रा०॥॥१॥ सम थमारा तुमें न मानो, हाथ न नालो दाम ॥ नेद नजरें न कोई निरखो, वीतराग तुम नाम ॥ जि॥था॥ २ ॥ हुँ सरागी राग तोरे, मोदीयो गुणमाम ॥ को हरि दर वन माने, कोई ने मन राम ॥ जि० ॥था ॥३॥ तुंही तुदी तुंही तुही, जाप जपता श्राम ॥ केश शुनरागें तस्या एम, कडु केता स्वामि ॥ नि ॥था॥ ॥ लहे सरागी जावथी, वीतरागता परिणाम॥तेदनें शी खोट जस शिर, तुंही बातमराम ॥नि॥था०॥ ५ ॥ इति सवन ॥ एम स्तवता केते काज ॥ मुनि जी ॥ - ॥धन मुऊ . , श्री शातिनायनो रास खम वीजो ए की उष्टता, देखत उपजत लाज ॥ चांव उठेडे थापणो, परवधनके काज ॥५॥ पूर्वदोहा । क्रोध नराणो शेत, कहे पुत्रने पापीया॥कीधी में ताहारी वेत, हवे जा महोलेंथी परो॥ ६॥शातादायी पूत, पण कुपुत्त रूडो नहिं ॥ शाला शूनी नव्य, पण तस्करपूरी कशी ॥ ४ ॥ ॥ ढाल चौदमी॥ वेला थाज, थचिरानो नदन जिनजी नेटगु जी॥ए देशी ॥ सांजली वचन धनद, मन विलवाणो घरथी नीसखो जी ॥ गाथा अर्थ विचार, धारे रे दिलमा ए मुफ थाशरो जी ॥ १ ॥ शी चिता तुफ जीव, साथे कमाई थावे थापणी नी ॥ रखे मान करतो रे जीव, ताप किस्यो रे परनी तापणी जी ॥ २ ॥ चाल्यो धरि एक तार, नीरसरोवर निरव्यु बागलें जी ॥ नाही पीधु रे नीर, विशामो लीधो जश् वडतरुतलें जी ॥ ३ ॥ धिक् धिक् क्रोध चमाल, सार न कीधी पाठी पुत्रनी जी ॥ रखे मन थाय कगाल, जोय विचारी गाथा सूत्रनी जो ॥ ४ ॥ जिम जिम सानरे जाव, तिम तिम गाहा दिलमाहे धरे जी ॥ थर्थ अमृत रसनाव, ध्यान धारायें पीतां दिल परे जी ॥ ५ ॥ धरि अरिहतनु ध्यान, तरुतलें सूतो करिने सायरो जी ॥ म करो को गुमान, थथिर पदारथ छं मनमा धरो जी ॥६॥रात्रि व्याध अयाण,श्राव्यो रे जाएयु वनचर ने हां जी॥ ताकी नारख्यु रे वाण, वेघ्यु रे पगमा सूतो ने जिहां जी ॥ ॥ थावे जेहवे रे व्याध, तेदवे रे नाग्यो मुखें गाहा जणे जी ॥ धिक् धिक् चिते रे व्याध, पथी में हणीयो सूतो श्रम घणे जी ॥ ७ ॥ पगे लागी थपरा ध, व्याध खमावे में मातु कस्सु जी ॥ वाधे व्रण पटवध, कुमर निवारे मुक एवं सस्यु जी ॥ ए ॥ जा तु ताहरे रे ताम, काम नहिं कोई गाथा मादरे जी ॥ करशे सघला रे काम, वाट जोतां दो घेर ताहरे जी ॥ १० ॥ कुण थापे सुख उख,थाप कमाइए थावे उदे जी॥ लागी तरप ने नूख, वेदन वाधी कहो कोने ववे जी ॥ ११ ॥ यये प्रनातें रे तेह, मृा रे थावी पुहवी तल पख्यो जी ॥ मृत जाणी रे नारंम, चचे महीने थाकाशें ठच्यो नी ॥ १२ ॥पहोतो वारिधि दीप, नारम मूक्यो जश्गुन स्थानकें जी ॥ नक्षण करवाने जाम, चाहे जीवतो जाण्यो अचानकें जी॥ १३ ॥ उडी गयो रे नारम, शीतल वायें तन चेतना वली जी ॥ , ८ . ५६ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. तो,-पालो जा वलवलतो, कोपें ते कलकलतो, पर बालतो देवी एम बोले जो ॥ ॥ मूकि दीयो ए वयणना चटका, न करावो मूर्षि शत कटका हो ॥ देवी जाणो ए माटो, दीसे हियडानो कागे, जोजे मूर्षि पांगे, कांश्क वेश्ने बांटो ॥ देवी नीति लहे नो ॥ ७॥ याप्यो रे ए कागलीयानो कटको, वोल्यो कितव थपिनो नटको हो ॥ रे रे शंकरं रंग, इण पत्रने खंझ, देवी कहे सुण लत, एहथी होशे घमम॥सांनज बात कर जो ॥ ३ ॥ जो गाथा तेहने सार, थापे जे सहस दिनार हो ॥ निसु णी दियडामा दरख्यो, कागल रयण ज्यु परख्यो, थायो घडुटे हकों, कौतुक जोवाने सरिखो॥नाखे गाथा ए लेजो ॥ १० ॥ लोक कहे [ मा थानु मूल, कहे सहस दिनार अमूल हो ॥ सांजली मुह मचकोरे, वलत सादु न जोडे,कुण करे एहनी दोड, धूर्त्तने शिर मोड ॥ कोई मुह न मांगे जो ॥ ११ ॥ नमियो पुरमांदे थाखो दाहाडो, लोक कहे ए पवाडोहो॥ मलिया सांफनी वेला, कुमर धनद थलवेला, ते वेदु थया नेला, पूरे वात सलीला ॥ कारण ए जो ॥१२॥ गाया एहे वांची धन कुमार, करे चित्तमांदे विचार हो ॥ ना साजु ए नारव्यु, न टले विहिये जे लेन्यू, प्रत्यक्ष नजरें में देव्युं, वयण न जाय ग्वेन्यु ॥गाथा साधी ने जो ॥ १३ ॥ गाथा॥नंचिय विहिणा लिहियं तंधिय परिणमे सयल लोयस्त ॥ श्य जाणेवि दुधीरा, विदुरेवि न कायरा दुति ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ वे सह स दीनार ने लीधी, गाथा हो वांचे प्रसिदि दो ॥ ढाल तेरमी नांखी, बीजे खमें दो बाखी, राम कहे चित्त राखी, सुजो सकन साखी ॥ नविका धर्म करेजो ॥१४॥ सर्वगाथा ॥३६॥ श्लोक तथा गाथा ॥१॥ ॥ दोहा सोरठी॥ ॥ चिते धनद कुमार, गाथा बनु मूली मती ॥ लखमूनें पण एह, मुफने मलवी दोहिली ॥१॥ वांचे वारं वार, करमा लेई पत्रिका ॥ घर उपर जिम दार, तिम ते राखी हृदयमां ॥ ॥ एदवे अर्कन कोय, रनसार थागल कहे ॥ तुम सुत मूरख जोय, थागत एवं रावशे ॥ ३ ॥ परघर नजन केश, खल दीसे जगमा घणा ॥ देखे पण न करे, लीजें तेदना जामणा ॥४॥ यठक्त ॥ दोहा॥ एक मास्वी घर पुष्ट नर, देखो इणके ज्ञान ॥थकाज पराये कारणें, हठ करी तजे पराण ॥१॥ठके मन श्री शांतिनाथनो रास खंम बीजो. तिहां आवियो । सुणो नवि ॥ सार्थवाह सुदत्त हो ॥ प्रवहण साये घणा लीया ॥ १० ॥ सोवनदीप पडुन हो ॥ १ ॥ कर्म थनवगत्ति वाध्यु विविध मति, उदय थावे यति थाकरु ॥ सु०॥ कर्म कोणें न कलाय हो ॥ ए आंकणी ॥ वदर थाव्यु जाणीने ॥सु०॥ जल वणनें काज हो । लोक सवे तिहां कतरो ॥ सु ॥ जलसचय करो थाज हो ॥ कप २ ॥ बहु नर साथै यावीयो॥सु०॥सार्थवाह सुजाण हो ॥ नर जल जोवा नीसखा ॥ सु० ॥ मलियो धनद गुणखाण हो ॥ का ॥३॥ जलस्था नक तेरों वावडयु ॥ सु० ॥ मलिया माणस वृद हो ॥ जल जीवन जग मां वह ॥ सु० ॥ जल विण श्यो थानद हो ॥ कण ॥ ४ ॥ यक्त ॥ एथि व्या त्रीणि रत्नानि, जलमन्न सुनापितम् ॥ मूढे पापाणखमेठ, रत्नसज्ञा विधीयते ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ सार्थवाह त्या धावियो ॥ १० ॥ धनदें कस्यो प्रणाम हो ॥ थालिगी वेदू मल्या ॥ सु० ॥ पूब्यु कुशल तेणें ताम हो ॥ क ॥ ॥ ५ ॥ कचन रयण ए कोण तणां ॥ सु० ॥ धनदें कही सवि वात हो । मुऊ नयरें पहोंचाडजो ॥ १० ॥ हरव्यो निमुण! श्रव दात हो ॥ कण् ॥ ६ ॥ रयण सोवननी श्टका ॥ सु० ॥ गणी सों तेणि वार हो ॥ प्रवहणमांहे लेइ धरी । सु० ॥ धन धनरथ करनार हो ॥ कण् ॥ ॥ चित्त चन्यु ते शेउनु ॥ सु॥ धन मेलू जगमाहि हो ॥ एक दणे एह माहरु ॥ सु० ॥ नहिं को वीजो यांहि हो ॥ क ॥ ७ ॥ शान करे सेवक जणी ॥ सु ॥ नाखो ए कूपमकार हो ॥ प्रवदणमा थावो वही ॥ सु ॥ धिक् धिक् लोनविकार दो ॥ कल ॥ ए ॥ लोन स मु 5 ख को नहिं ॥ सु० ॥ लोन वडो जगमूल हो ॥ लोनवशे दुर जी वडो ॥ सु० ॥ नवनवमां मल्यो वृल हो ॥ क० ॥ १० ॥ सेवक धनद नणी कहे ॥ सु॥ तु जल ताणी थाप दो ॥ श्रदोनिश तुझ थन्यास हो ॥ १० ॥ ए श्रमचो उख काप हो ॥ क ॥ ११ n करवाने उप गारडो ॥ सु ॥ धनद थाव्यो तत्काल हो ॥पाप करंतां पापीया ॥सु॥ निर्लज न लाजे चमाल दो ॥ कण्॥१५॥ कूपक- ते थावियो ॥ सु० ॥ थवसर लश् थविनीत दो ॥ मांहे ठेलीने नाखीयो ॥ मु० ॥ जु जुन कर्मनी रीत हो ॥ क० ॥ १३ ॥ विश्वासघाती पापीया ॥ मु० ॥ कर तां काम ए नीच हो ॥ रुले चिढुंगत्ति ससारमा ॥ सु० ॥ लोन कलए - एज जैनकथा रत्नकोप नाग बाग्मो. कोण थाल्यो मुफ बांही, कोण दशा ए हां थावी मली मी ॥४॥ जीव म थाइश नीरू, सहस दिनारे जे गाथा सही जी ॥ धर तेहनो मन नाव, शोच न लावे दिलमाहे सही जी ॥ १५ ॥ कग्यो धरी मन पीर, नीर जोवाने चाल्यो जेटले जी ॥ नहि कोई मनुष्य प्रचार, नयर निहाले उस तेटले जी ॥ १६ ॥ थस्थिर ए घरना रे मोह, मूकीने ना दीसे मानवी जी ॥शु हशे कारण एह, कर्म तणी गति दीसे अनिनवी जी ॥ १७ ॥ जोतां एक जलकूप, निरवीने हरव्यो दिलमांहे घणुं जी। जल थाकर्षी रे पीध, सुखीयु थयु रे तन मन तेह तणु जी ॥१७॥ फल कवलीनां रे थाणि, कीधी कुमार प्राणनी धारणा जी ॥ रहियो नयरथी दूर, रात एकांतें धर्मने धारतो जी ॥ १५ ॥ तिमिर पसगुं अति घोर, शीतनो जोरो पवनथकी थयो जी ॥ उरतो टाढे रे गाढ, निकटगिरि ने उपक- गयो जी ॥ २० ॥ मेली बढुला रे दारु, अग्नि छपाई कीg उतापणु जी ॥ एकलडो वनमांहि, उदय थावे रे कीधु थापणु जी ॥ २१ ॥ प्रात समय थयो एम, नूमि थ थनियें सोवनमयी जी ॥ चिते शेग्नो पूत, सोवनदीप मुल्यो ते में सही नी ॥ २२ ॥ दरख्यो हिया मकार, कचन कीजें दवे दरखें करी जी ॥ कीधो इट सघात, माटी लेश्ने मन कजम धरी जी ॥ २३ ॥ थनि तणे रे संयोग, कचन तेहy जायु नीपज्यु जी ॥ करे फल फूल थाहार, जो जो नबियो फल दवे पुण्यनु जी। २४ ॥ बीजे खेमें रे दाल, चौदमी दाखी अति रलियामणी जी॥ राम कहे रे रसाल, नाव धरीने सांसजो गुणी जी॥२५॥ सर्वगाथा॥३ए॥श्लोक॥१५ ॥ दोहा ॥ ॥ एकदिवस गिरिकुनमां, नमतां जाग्यवशेण ॥ रमसमुच्चय दीठहो, हृदय नख्खु दरखेण ॥१॥याण्यां तिहाथी ते घ,राख्यां सोवन पास ॥ कुवर देखि उल्लसित थयो,मेव्यो बदुधनराशि ॥२॥प्राणवृत्ति तिहां कणे करे, सुदर फल लेथावि ॥ रहे समाचे ते छीपमां, कुंवर सरल खनाव ॥३॥ दवे नवियण तुमें सांजलो, सुख दुख फल अधिकार ॥ नाम्पथकी जे नीपजे, सरसकथा विस्तार ॥ ३ ॥ ॥ ढाल पन्नरमी॥ ॥ हांजा मारु घडी एक करदो फुकाव हो ॥ ए देशी ॥ एवं अवसरें श्री शांतिनाथनो रास खंग वीजो. ६१ ॥ मो० ॥ जो ॥ ३ ॥ कष्ट निवारे पांचमुं, एम कही देवी वाच ॥ ॥ मो० ॥ अदृश्य था चका सुरी, कुवरेंमान्यु साच॥मो॥ जो ॥ ४ ॥ थागल दीठी कुवरें, व्रणसरोदणी एक ॥मो० ॥ लीधी जघा दीने, स्थाप्यां रतन विवेक ॥ मो० ॥ जो ॥ ५ ॥ व्रणसरोहणीये थयो, सानो ते निज धग ॥ मो० ॥ आगल पुर पातालमां, देखी वाध्यो रग ॥ मो जो ॥ ६ ॥ हाट विराजे चहृवटे, मदिर उला उल ॥ मो० ॥ निर्मानुप शूनी पडी, चिद् दरवाजे पोल ॥ मो० ॥ जो ॥ ७ ॥ धैर्य धरीने चाली यो, जोवा पुरमा ख्याल ॥ मो० ॥ देखीने थयो दूमणो, नगर ननु वेहा ल॥ मो॥जो॥७॥यक्त ॥ वसुधानरण पुरुप , पुरुषानरण हि चोत्तमा लक्ष्मी ॥ लक्ष्म्यानरण दान,टानानरण सुपात्र च ॥१॥पूर्वढाल ॥ राजनुवन एक देखियुं, पेगे जोवा तेह ॥ मो० ॥ सातमी नूमिय साहसी, चढीयो कचो गेह ॥ मो० ॥ नो॥ ए ॥ एक पासें पलगमा, वेती यवला वाल ॥ मो० ॥ नवयौवन थावी नली, मोहनरूप रसाल ॥ मो० ॥ जो ॥ १० ॥ थणियाली जस यांखडी, मानु कमलदल दोय ॥ मो० ॥ मुह भ्रमर वासो वसे, मोह्यो रमणी जोय ॥मो॥नो॥११॥ कठीने कनी थई, कामणगारी नारि॥ मो० ॥यासन याप्यु वेसवा, कीधी घणी मनोहार ॥ मो० ॥ जो ॥ १२॥ नयण सखूणे नेहथी, निरखे कुमर स्वरूप ॥ मो० ॥ वोले वाला तुम तणु, कहो यागमन स्वरूप ॥ मो० ॥ जो० ॥ १३ ॥ नातम निधि नाग्यना, शहां थाव्या अजाण ॥ मो० ॥ नय सवलो शहां ले घणो, केम करी राखशो प्राण ॥ मो० ॥ जो ॥ १४ ॥ कुमर कहे जय केहनो, ते दाखो मुफ वात ॥ मो० ॥ शून्य नगर दीसे किस्यु, शो तुमचो थवदात ॥ मो० ॥ जो ॥ १५॥ धैर्य रूप गुणें घणु, रजी चतुरा वाल ॥ मो० ॥ कहे पुरुषोत्तम माहरी, वात सुणो वाचा ल ॥ मो० ॥ जो ॥ १६ ॥ सुणो जरतें नूनामिनी, तिलक तिलकपुर ख्यात ॥ मो० ॥ नाम महें। महामति, नृपति तिहा मुक तात ॥ मो० ॥ जो० ॥ १ ॥ सीमाडिये सघलें मली, परिनवियो मुफ तात ॥ मो० ॥ एदवे कोशएक व्यतरें, श्रावी कही त्या वात ॥ मो० ॥ जो ॥ १७ ॥ राजन पूरवनव तणो, दु तुम मित्र सुजाण ॥ मो० ॥ तु मुफ वहालो जीवथी, कहो कारज गुणखाण । मो० ॥जो ॥ १५ ॥ जय नाजो वैरी , ६० जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो. ए कीच हो । कम् ॥ १५ ॥ पडतां गाथा चित्त धरे ॥ सु० ॥ इहां नहि कोनो दोप हो ॥ कूपमेखल कपर पच्यो ॥ सु० ॥ न धरे जीवमा शोष हो ॥ क० ॥ १५ ॥ दी पावडीयां तिदा ॥ १०॥ कोतुक दीसे कोष दो ॥ नीचो थश्ने मतस्यो ॥ सु० ॥ थागल पहोंच्यो सोय हो ॥ का। १६ ॥ मनमाहे विस्मय पामतो ॥ १० ॥ पन्नरमी वीजे ढाल हो । रामविजय कहे रंगछ ॥ सु० ॥ वारू वात रसाल हो ॥ कण् ॥ १३ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ श्रागल जातां देखीयु, देवल एक विशाल ॥ शोना थति दीसे नली, मोहन काक जमाल ॥ १ ॥ ते माहे दीनी तिहां, चक्रा नामें देवि ॥ जिन शासन रखवालिका, सुर नर सारे सेव ॥२॥चरण नमी चक्री तणां, जनो बेन कर जोडी ॥दर्पगं स्तवना करे, मान रहित मद मोहि ॥३॥ अथ चके श्वरी स्तुति ॥ राग टोडी॥ जय जय तु चक्री अमरी रे, श्रीश्रादीश्वर पद पंकजमें, रसिक वसे तिम ज्युं चमरीरे ॥ज०॥ एथांकणी ॥ गरुडासन बेनी गुणवती, सुर नर कोडि सदा समरी रे॥जे तुज ध्यान धरे एक चित्ते, तस घर फूले तुरंग करी रे ॥ ज० ॥ १ ॥ चक्रायुध विषमु कर लीधु, उष्ट निवा रण साची सुरी रे ॥ बावन वीर रहे तुफ थानें, कर जोडी करे सेव खरी रे॥ ज० ॥ ५ ॥ हुथनाथ तुफ चरणे श्रायो, कर उपगार तु महेर करी रे ॥ विदि नडियो खकूपें पडियो, दवे मुफ वांबित यो उभरी रे ॥ज ॥ ३ ॥ कर जोडी रह्यो दास द्र तोरो, मात मया कीजें सखरी रे ॥ हवे मुफ शरण ए चरणज तोरां, एसी करो ज्यु नासेथरि रे ॥ ज०॥ ॥ इति चक्रेश्वरीस्तुति ॥पूर्वदोहा॥ नक्त वचन एम सानली, वेवी थई प्रसन्न॥ वत्स माग्य जे वर रुचे, बोले इम सुवचन ॥ ४ ॥ तुम दीवे मुफ सवि मल्',फली मनोरथ माल ॥मात नवानी शकरी, तुफ दर्शन देवि रसाल ॥५॥ ॥ ढाल शोलमी॥ ॥कत तमाकू परिहरो ॥ए देशी ॥ पंच रतन थापे खरां, देवीधरी फलट ॥ मोरा लाल ॥ फल दाखे तस रूयहा, धनव मुणे परगट मो॥१॥ जो जो नवि फल पुण्यना॥ए थोकणी ॥ पुण्यं वानित थाय ॥मो॥ पुण्य करो रे प्राणीया, शह परनवे सुखदाय ॥ मो० ॥ जो ॥शप्रथम रयण सौभाग्य दे, वीजे लक्ष्मीराशि ॥ मो० ॥ रोग दरे त्रीजु वली, चोथे विपनो नाश श्री शांतिनाथनो रास खंम बीजो ६३ धरे रे निश्वल था रे ॥रहोण॥ ते चूके नहिं तिल मात ॥मो॥ खड्ग ग्रहो मुफ जनकनु रे ॥रहोण॥ तुमें करजो एहनो घात ॥ मो० ॥ २ ॥ वात करे रे एम वेदु जणां रे ॥ रहो ॥ तेननी नेहें रगाणी धात ॥ मो० ॥ एहवे एक शव लेइने रे ॥ रहो० ॥ ते धाव्यो नीच विख्यात ॥ मो० ॥३॥ दीसे वर्ण वीहामणो रे ॥ रहो ॥ उचो ताडनो त्रीजो नाग ॥ मो० ॥ हड दड हसतो एम कहे रे ॥ रहो ॥ श्राज आगल थाव्यो लाग ॥ मो० ॥ ४ ॥ शव मूक्यु पडतु रे तिहा ॥रहोण॥ ज वेगे जपवा जाप ॥ मो० ॥ बुदि ने वल वेहु शु करे रे ॥ रहो० ॥ जव श्रावी लागे पाप ॥ मो० ॥ ५ ॥ रयण प्रनावें तेदने रे ॥ रहो ॥ नवि जोवे उट निहाल ॥ मो० ॥ खड्ग उपाडी ने थावीयो रे ॥ रहो ॥ रे रे जोजे पुष्ठ सनाल ॥ मो० ॥ ६ ॥ जाएयु हसे ए मुफने रे ॥ रहो ॥ मुफ शु दणशे ए कगाल ॥ मो० ॥ घहेलसफाइमा रह्यो रे ॥ रहो ॥ करवालें लण्यु गलनाल ॥ मो० ॥ ॥ पहोंचाच्यो यममदिरें रे ॥ रहो ॥ एम आवी पहोतुं पाप ॥ मो० ॥ सामग्री विवाह तणी रे ॥ रहो ॥ ते सघली लीधी थाप ॥ मो० ॥ ७ ॥ विघ्न गयुं वेला वली रे ॥ रहो ॥ गुन वेला धनद कुमार ॥ मो० ॥ तिलकसुंदरी परणी तिहां रे ॥ रहो ॥ पुण्य होवे जय जयकार ॥ मो० ॥ ए ॥ दपती दोय दिल नर रमे रे ॥ रग माणो दो राज॥करे दिल खोलीने वात ॥ माहरो गुण मानो हो राज॥ नवल सनेहा साहिवा रे ॥ २० ॥ मुज दाखो तुम अवदात ॥ मा० ॥ १० ॥ कामिनी थागल कंथजी रे ॥ २० ॥ कहो मूलयकी सवध ॥ मा० ॥ वात सुणी विस्मय सही रे ॥ २० ॥ बधाणी प्रेमने वंध ॥ मा॥११॥ दिन केता एक तिहा रही रे॥र ॥ लेरामा रतननी राशि ॥ मा ॥सार वस्तु सीधी घणी रे ॥ २० ॥ ते थावे कूपनी पास ॥ मा ॥ १५ ॥ चरण नमी चक्रातणे रे ॥ सुणो माता दो ॥ करे स्तवना प्रेमने पूर ॥ मा० ॥ तुज दर्शनथी माहरु रे ॥ १॥ वाध्यु घमणु चर ॥ यश् सुख शाता हो ॥ १३ ॥ चरण शरण एक ताहरा रे ॥ सु ॥ मुफ नीडनी नजण दार ॥ थइ० ॥ सान्निध्य करजो श्रवसरें ॥ सु० ॥ तुं निराधार थाधार ।। य० ॥ १४ ॥ थाव्या कूपनी मेखला रे ॥ सुणो प्राणी हो ॥ बीजे खमें सत्तरमी ढाल मनहित थाणी दो ॥ राम कहे रंगेकरी रे ॥सु०॥ धागल - जैनकथा रत्रकोप नाग पाठमो. तो, कीजें मुज सादन ॥ मो० ॥ वैरी थाये पाधरा, पालुं धसमित राज ॥ मो० ॥ जो ॥ २० ॥ व्यतर कहे सुण वालहा, हा नदि मा हरु जोर ॥मो॥ मुहूंती वली ए घणा, शौर्य सेविता चोर ।। मो० ॥ो. ॥ २१ ॥ लोक सहित मुफ तातने, बास्यो एणे गम ॥ मो० ॥ वैरी राख्या वेगला, हां कीधो विश्राम ॥ मो० ॥ जो ॥ २२ ॥ वास्यु नव र पातालमें, कूपमाहे जस मार्ग ॥ मो० ॥ वीज वाहिर पुर का, गुरस्त जोई नूनाग ॥ मो० ॥ जो ॥ २३ ॥ लोक बहु प्रहांकण वस्या, चिटुं विशि जलनिधि पूर ॥ मो० ॥ आवे बहु वादाण जस्खां, अन्न धण इहां चूरि ॥ मो० ॥ जो ॥ २४ ॥ एदवे हांकणे यावीयो, राइस अति विकराल ॥ मो० ॥ कर्म संयोगें कूपमा, पेठगे ते चामाल | मो० ॥ जोग ॥ २५ ॥ सनुजनने नक्षण करी, वाहिर थाव्यो तेद ॥ मो० ॥ वाहाण बेसीने सद, नानां मूको गेद ॥ मो० ॥ जो ॥ २६ ॥ शून्य कमां बेहू तिरों, नगर मादा विपरीत ॥ मो॥ कर्मकथा कहेता थका, पूजे माहरु चिच ॥ मो० ॥ जो॥ २७ ॥ मुफ जर्नागिणी देवतां, थयो बडुनो सहार ॥मो॥राखी मुफने एकली, पापी प्रेम विकार ॥मो॥ जो० ॥२॥ 5 ख म घर रेमानिनी, तुमवरवानीथाश ॥मो०॥ परणीने दिन सातमे, करां जोग विलास ॥ मो॥जो ॥३॥बीजे खमें शोलमी, ढालें कुमरी वात ॥ मो०॥ राम कहे ते नवि चले, जे दी जगतात ॥ मो० ॥ जो० ॥ २० ॥ ॥दोहा॥ ॥श्राज थयो दिन सातमो, कुमरी नांखे तास ॥ दोशे पापी था वतो, मारे माणस वास ॥ १ ॥ तेमाटे तुमने कहूँ, रहेजो मन हुशि यार ॥ नहिंतर मदिर मूकीनें, रहो अलगा श्ण वार ॥ २ ॥ धनद कहे सुनगे सुणो, नहिं मुक एहनी नीति ॥ मुफ दाथे ए पापीयो, तदेशे मरण अनीति ॥ ३ ॥ पाके नूप कुमत्रीथी, कालें फल परिपाक ॥ रोग पचे ल घनथकी, पापी कर्मविपाक ॥४॥ ॥ दाल सचरमी॥ ॥ ताहेरो गुण मान्यो राज ॥ ए देशी ॥ तिजकसुंदरी कहे साहिपारे, ॥रदो बाना हो रान ॥ तस दाखु मृत्यु सपाय मोरे मन मान्या हो राज ॥ विद्यापूजन कारणे रे ॥ रदो० ॥ ते वेसे ले इण गय । मो० ॥ १ ॥धान साथें ॥ श्री शांतिनाथनो रास खंम बीजो. ६५ तुमें हां आव्या, मनोवांनित सुख अमें पाया ॥ तुम दर्शन अधिक सुहाया,जिम चर चकोरान्यायारे॥ना कहे सार्थवाह हरामी,अमें हीप कटाहने पामी ॥ थाव्या जरतयकी गुन कामी, नानु निजनयरें धामें रे ॥न ॥१ ॥ श्रावो तुमें श्रम सघातें, व्यो वस्तु वली सह नखं कीधु ए जगनाथें, तुम साथ मल्यो अम पर्थे रे ॥ ज० ॥ ११ ॥ पहोंचाडो धनद कहे थमने, नाग ठहो देगु तुमने ॥ करचुं तुम सेवा सु मनें, मत मानजो कूड कुमने रे ॥ न ॥ १२ ॥ देवदत्त कहे उत्क पी, थमें माणासना बु परखी ॥ तुम्ह सेवा मेवा सरखी, करछ थमें हियढे हरखी रे ॥ ज० ॥ १३ ॥ वेद वेग वहाण माहि, चाल्यां प्रवहण उत्साहि ॥ नारी देखी मन मांहि, चिते ते धूरत शाह रे ॥ न० ॥ १३ ॥ रमणी ते रूपरसाली नरयौवनमांहे नाली॥ गजगति चाले मतवाली, मृगन यनी तनसुकुमाली रे ॥ज ॥१५॥ मानु मन्मथनी ए घरणी, दणु तेहने जेणें ए परणी ॥ करु ए साथै मुख करणी, रे विपया उर्गतिनी स रणी रे ॥न ॥१६॥ हवे सांजलजो नवि नाई, जुन विषयथकी j, थाइ ॥ विपथी पण थधिक कहावे, विपयामति प्रीति नसावे रे ॥०॥१७॥ खम वीजे अढारमी ढाल, जग महोटो विपयनो जाल ॥ कहे राममुनि नजमाल, जग विपय वडो चमाल रे ॥ न ॥ १७ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ लोने पख्यो कामें नज्यो, देखी धन र नारि ॥ देवदत्त निज चित्तमा, थारत करे अपार ॥ १ ॥ धन रमणी ए एकलो, केम लेश जाशे सुव ॥ नाखु दरियामा खरो, के. वहार न बुव ॥ २ ॥ ए तरुणी ए माल सवि, थाशे मुफ थाधीन ॥ परमेश्वर मुफ पाघरो, करच्छु काज थदीन ॥ ३ ॥ उष्टें धनद कुमार, सट पट मांमी जोर ॥ सरलपणे तिरों नवि लघु, तेदनु हृदय कठोर ॥३॥ सकन जन जाणे नहि, उर्जननी गति नात ॥ चाल्य न जाणे सरगनी, विण जंगनी जाति ॥ ५ ॥ ॥ ढाल उंगणीशमी॥ ॥ कोश्लो पर्वत धुंधलो रे लो। एदेशी ॥धनदत्त खल साथै मल्यो रे लो, वात करे मन मेलि रे॥ मुगुण नर ॥तुम मलियां ख विसरे रेलो,थाज वधी रंग रेल रे ॥सु० ॥१॥ खलसगति नविकीजियें रेलो॥ए थाकणी॥जो ने ६४ जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. संबध रसाल ॥ मम् ॥१५॥ सर्व गाथा ॥४४॥श्लोक तथा गापा ॥ दोहा ॥ ॥ श्राव्या कूपनी मेखला, दिलनर दपती दोय ॥ जे तिण अवसरेंनी पन्मु, ते निसुणो सद्ध कोय ॥ १ ॥ प्रवहण कोई परदेशनु, पाठपुं तेणें छीप ॥ जल इधणने कतस्त्रां, वदर जाणी समीप ॥ २ ॥ याव्या जलने जोवता, कूपकंठ नर के॥जल थाकर्पण दोरिका, मूके दर्ष धरे ॥३॥ धन, दोरि ग्रही तदा, बोल्यो एम वचन ॥ कूपयकी काढो मुने, महोटा तुमें माहाजन ॥ ४ ॥ तिणे जइ निजपतिने कत्यु, देवत्तने श्राम ॥ श्रावो स्वामि उतावला, उपकारनु काम॥ ५ ॥ ते थाव्यो दोडी तिहा, मांची बांधी दोर ॥ धनद कुमरने काढीयो, देवदत्त करि जोर ॥ ६ ॥ सार्थवाह दीगे सरवर, सुदर वेष थवज ॥रेसहन तु कोण ने, निर्मल रूप नवल ॥७॥ केम पडियो ए कूपमां, धनद कहे एक वार ॥ प्राण प्रिया पण माली, कूपमादे निर्धार ॥ ॥थवर वस्तु पण जे घणी, कूपमध्ये महाराज काढीने कहेश पड़ी, वात सकल मुफ थाज ॥ ५ ॥ ॥ ढाल थढारमी॥ ॥ दु दासी राम तुमारी ॥ए देशी ॥ देवदत्त कहे सुविचारी, तुमें काढो परणी प्यारी ॥ सवि वस्तु निकासी सारी, ते दीनी सुदर नारी रे॥१॥जवि का लोन न करजो॥ लोन न कर जोजी॥एथांकणी॥ श्रतें ए ख दाइ, माया विषवेल सहाइ॥ तृमा तरुणीनो लाइ, रघु एदथी जग लपटाइरे॥ना ॥३॥ पूढे सार्थवाद तिवार, कहो तुमचो दवे अधिकार ॥ दोय ना द रमणी निरधार, केम पहियां कूप मकार रे ॥ न०॥३॥ए जरत तणो द्व वासी, दु जातें वणिक विलासी ॥ धन उपराजण उनासी, चन्मोद्दीप कटाद विमासी रे ॥ ॥ ४ ॥ वैवयोगें प्रवहण नांग्यु, एक फलक करें मुफ लाग्यु ॥ दपती दोय पाम्या ताग, लाघ्यु ए बंदर नाग्य रे ॥ ज० ॥ ५ ॥ जल जोता ए कूप दीठो, मनमाहे लाम्यो मीठो ॥ नारी पग तिहां लपट्यो, जोता मनडोकरी धीठो रे ॥ न० ॥ ६ ॥ नारी केरें राजाश्या, पडतु महेन्यु में धाइ ॥ कूपमेखल कपरें जाइ, पडियो लु पुष्प सखाइ रे ॥ ज० ॥ 8 ॥ जलदेवीथ सुप्रसन्न, थाप्या घम वसन रतन ॥ करे प्रव दण वेसी जतन, तुमें जाजो पुरप रतन रे ॥ न० ॥ ॥ अम नाग्य N श्री शांतिनाथनो रास खंम बीजो. ទី១ खास रे ॥ च ॥ ख० ॥ १७ ॥ यमुक्त ॥ छणेन सन्यते यामो, यामेन लन्यते दिनम् ॥ दिनेन सन्यते काल , काल कालोनविष्यति ॥ १ ॥ पूर्व ढाल ॥ मुफ पियु मरवानो नहिं रे लो, रयणतणे प्रसाद रे ॥ च॥ तो उत्तर कहि कारिमो रे लो, करु एहने थाहाद रे ॥ च ॥ ख० ॥ १७ ॥ तट नइ पुरना स्वामिनी रे लो, लहि अनुमति सद् साख रे ॥ च ॥ वयण तुमारूं मानगु रे लो, हरख्यो एम सुपी नाप रे ॥ च०॥ ख० ॥ १५ ॥ निसुणो धनद तणी कथा रे लो, श्रोता वीजे खम रे ॥ च ॥ ढाल कही गणीशमी रे लो, लेहशे सुरकथखम रे॥०॥ ख० ॥२०॥ ॥ दोहा ॥ ॥ पुर जश् नृपनें संतोकच्च, धन देई असमान ॥ चितित कर था पएं, चिते ते थज्ञान ॥ १ ॥ पण जाणे नहि वापडो, परशेहें केम काज ॥ सिह थाये ससारमां, जेहथी प्रनु श्तराज ॥ ५ ॥ दवे धनद जलनिधि पख्यो, पूर्वनम कोई यान ॥ फलक वही थाव्यु करें, श्रदो श्रदो पुण्यनिदान ॥ ३ ॥ ते अवलवी चालियो, कनोलें लोलत ॥ पंचम दिवसें ते धनद, निजपुर निकट पहुत ॥ ४ ॥ तट देखी दरख्यो हिये, जोवे नयणें जाम ॥ मत्स्य महोटे फलके सहित, गल्यो अचितित ताम ॥ ५॥ अहो विपमी गति कर्मनी, कोणें कली नवि जाय ॥ जे जे मनमा चितीयें, ते ते निष्फल थाय ॥ ६ ॥ नरकोपम पडियो तदा, मत्स्य उदर मां तेद ॥ चिते एश नीपन्युं, कर्मवशे मुफ एह ॥७॥ कष्ट हरण मणि स मरणे, ते मत्स्य धीवरें व ॥ उपक- थायो तुरत, धिा विदारण की ॥ ७ ॥ उदरमध्यथी नीसनो, देखी दिव्य कुमार ॥ जलें नवरावी तेहनें, मूक्यो राजज्वार ॥ ए ॥ ॥ ढाल वीशमी॥ ॥ हारे नरवा रे गश्ती नदी यमुनाना नीर जो॥ ए देशी॥ दारे तव पूछे रानाथचरिज वाली वात जो, नाश् मुज नांखोने ए तुमची कथा रे लो। हारे केम रहियो मत्स्य ठवरमां तु सुकुमार जो, केम सहेवाणी सप ली ते व्यथा रे लो ॥ ॥ हारे तव कुमर कहे राजन जननु / जोर जो, वाध्यो रे जकडीने कमै जीवडो रे लो ॥ दारे एकेक प्रदेशे कर्म बनती थात जो, वर्गणाधी वीटाणो रह्यो अनुदिन जडी रे लो ॥ २ ॥ हारे में रे ६६ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. करे वानां लाख रे ॥ सु० ॥ मीठो यथावी मले रे लो, फल किंपाकनी साख रे ॥ सु० ॥ ख० ॥ ॥ एक दिवस रयणी समे रे लो, देहर्षिता त माव रे ॥ चतुर नर ॥ वेगे माची कपरें रेलो, थाव्यो वैरी वाव रे । ॥ ख० ॥ ३ ॥ जोइ अवसर तेणें पापीये रे लो, कापी दोर तुरंत ॥ च० ॥ करता एम बीये नहीं रे लो, पापी काम पुरंत रे ॥१०॥ख. ॥ ॥ लडथडतो पच्यो उबली रे लो, सायरमाहे कुमार रे ॥१०॥ गाथा दिलमांहे सानरी रे लो, जीव दुदशियार रे ॥ च ॥ ख० ॥ ५ ॥ नावी नाव टले नहीं रे लो, हां नहि केहनो वांक रे ॥ च ॥ कर्म वशे सद्गु जीवडो रे लो, कोण राजा कोण रंक रे ॥ च ॥ ख० ॥५॥ सोर करी कनयो सही रे लो, जुवो निहाली कोय रे ॥ च ॥ माणस प डियो सिधुमां रे लो, शब्द सुण्यो म सोय रे ॥च ॥ख०॥ ७ ॥ जयकि सती सा सुदरी रे लो, नवि देखे निन कंत रे ॥च॥ ध्रसक पन्यो तव प्रा सको रे लो, विंडडियो प्राणनाथ रे ॥ च०॥ ख॥ ॥ दाथे हियडे कूट ती रेलो, रोती थबला बाल रे ॥ च ॥5ख जर बाती फाडती रेलो, 3 लटी विरहनी जाल रे ॥ १० ॥ ख० ॥ ॥ ॥ हा वालम मूकी गयो रे लो, केम ख सायरमांहे रे ॥च०॥ सोर मुणी तिहां बावियो रे लो, देवदत सारथवाद रे॥१०॥ख०॥१०॥ कृत्रिम रुदन करी कहे रे लो, ए थयो उतपात रे ॥ च ॥ दा मित्र तुमने केम थयो रे लो, सायर फपापात रे ॥चाख॥११॥ मुखें रोवे दियडे इसे रेलो, पापीमा शिरदार रे ॥ ॥ मुख मीठो धीठो दिये रे लो, ए खलना थाचार रे ॥ च ॥ ख० ॥१॥ प्राणप्रिया नवि रोयें रे लो, रोये तन कुमलाय रे ॥ १०॥ देव प्रते चाले नहिं रे लो, वैव करे ते थाय रे ॥ च ॥ ख० ॥१३॥ वचन सुणी चतुरा चकी रेलो, ए पापीना काम रे ॥ च ॥ हा हा मुछ्ने दवे सही रे लो, ले जाशे निज ठाम रे ॥ च ॥ ख० ॥ १४ ॥शील रतन केम राखछ रे लो, किम रहेशे कुललान रे ॥ च ॥ हा हा देव अटारहो रे लो, ए शु की थकाज रे ॥१०॥ खम् ॥ १५॥ सार्थपति कहे वालही रे लो, तुम पियु गयो पर लोक रे ॥ च ॥ दवे मुफने अंगीकरो रे लो, शीयो मूथानो शोक रे ॥ च ॥ खम् ॥ १६ ॥ विते ए माटीपणे रे लो, करगे शील विनाश ॥ च ॥ काल विलबने कारणे रे लो, उत्तर वालु श्री शांतिनाथनो रास खंम वीजो. ६ए नृपपासें थगिधर कोण ले रे लो ॥ हारे गु एवढं एहने राय तणुं सन्मान जो, के सुस्ती के तेमा काहि नूतनगुण ने रे लो॥१४॥ हारे तिणे मामी दारव्यो सघलो तस थवदात जो, धनद सही मनमाहे तस निश्चे थयो रे लो॥ हारे हवे चिते उष्ट हियामा हलु वात जो, धननो रे अति लोनी नीचमति दुन रे लो ॥ १५॥ हारे नवि वीजे खमें राग श्रख में एह जो, नांखी रे ए वीशमी ढाल सोहामणी रे लो ॥ हारे श्री सुमति सुगुरुनो रामविजय कहे श्राम जो, जगमोहे 5 खटायी लोन दशा घणी रेलो ॥ १६ ॥ सर्व गाथा ५५४ ॥ श्लोक तथा गाथा मली १७॥ ॥ दोहा ॥ ॥ण अवसर राजाननो, गायक गीतरति नाम ॥ श्राव्यो जाणी सार्थपति, तेणें कयो प्रणाम ॥ १ ॥ गीत गाये उचे स्वरें, रीज्यो थापे दान ॥ तेडि एकांतें तेहने, नांखे शेठ अजाण ॥ २ ॥ जो मुफ एक कारज करो, तो थापु बहु धन ॥ ते कहे कर जोडी अमें, करग्यु तुम्ह वचन ॥ ३ ॥ राय थगीधरने जश, बोलावो करि वधु ॥ रूके राजा तेहने, जेम थाये प्रतिवध ॥ ४ ॥ वचन कबूल करी तिहा, पहोतो → पनी पास ॥ धनदूती सवि सपजे, सद्भुये धनना दास ॥ ५ ॥ ॥ ढाल एकवीशमी॥ ॥ कानुडो हवे वेण वजावे रे ॥ ए देशी ॥ गायक जइ दरवारें कना, गावे गीत रसाल ॥मादल ताल नफेरीनेरी, रमझम वीए विशाल ॥ गाय ॥ १ ॥ गुण गावे सहुनें मन नावे, ठची लेई टेक ॥ राजन तुक विण कोइ अवरने, नवि जाचु सुविवेक ॥ गाण ॥ २ ॥ तूगे राजा धन मणि माणिक, आपे दर्प धरीने ॥ ते नवि इच्छे पान थपावो, अमने महेर क रीने ॥ गा० ॥ ३ ॥ कर उचो करी पान थपावे, राजन रग रसालो । स दुको लोक कहे गायकने, राजा सवल वसीलो ॥ गा ॥ ४ ॥ मत्स्योदर थाप्यो जय पासे, रोई वलग्यो कठे ॥ हा पधव तु केम रिसाइ, जाये एम थश्ये लवें ॥गा॥५॥ घर एम केम चाले रीसाणे, मुण्य तुं न ननी जाया ॥ तु मुफ वीजी वाह नगीना, दवे नवि मेलु बाया ॥ गा ॥ ६ ॥ एटला दिन थलगो तु रहियो, हवे में पुण्ये पायो । चिरं जीव तु पधव मोरा, थाज अचित्यो श्रायो ॥ गा॥ ४ ॥ राजा था ६ज जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो अनुनविया सुख उखना बद्दल विपाक जो, ते कहेता नावे रे सिमदी बेहडो रे लो ॥ दारे हवे शु जांखु तुकथागल दु राजान जो, पण तहों सांजल थाणी नेहडो रे लो॥३॥ दारे दु चढियो गर्थनें वर्षे प्रवडर मादि जो, नाग्यु रे जरदरिये वादन वेगलु रे लो॥हारे एक लाध्यु फलक फप लकमाहे थायो पार जो, मस्ये रे उपक महोटे मुफ गल्यो रे लो॥३॥ हारे ते धीवर दणियो दु नगरियो थाम जो, थाणीने तुम थागल मुफले रजू कस्यो रे लो।दारे ते निसुणीनूपति चिते चित्तमांथामजो,नावी रे जोरावर जगमाहे तस्यो रे लो ॥ ५ ॥ हारे हवे सोवननीरें नवरावी नरनाप जो, नेहें रे निज पासे राख्यो तेदने रे लो ॥ हारे तस सन्मानी मत्स्योदर वीधु नाम जो, चाहे रे सद् निम थापाढें मेहने रे लो ॥ ६ ॥ हारे तब राजा बोले त्यो को लायक काम जो, लीधु रे पद तेणें थगिघरk नलु रे लो॥ दारे जस यो राय अपावे पान जो, तेहने एतु थापे कारिज कजलु रे लो ॥७॥ दारे एम दिवस गया केता इक नयर मझार जो, सानलनो दवे मूकी विकथा वातने रे जो ॥ हारे हवे पहेलु प्रवहण जिहां बगु धन राशि जो, थाव्या रे तिण बदर जोरे वायने रे लो ॥७॥ हारे तव बुटी नाल धडो धड थयो थवाज जो, जाप्युं रे पुरमा परदेशी थाविया रे लो ॥ दारे तब दरख्यो मनमा मत्स्योदर गुणवत जो, थावे जो मुफ वैरी तो श्रमें फाविया रे लो ॥ ए ॥ दारे दवे ले उपायन सार्षे सबल परिवार जो, थाव्यो रे दरबारें नृपति नेटवा रे लो ॥ दारे सेवक विनवियो जइ नमियो नरनाथ जो, श्राव्यो रे तुम नयरें उखड़े मेटवा रे लो ॥ १० ॥ हारे थवनीपति थाप्यां बढुलां थादर मान जो, मत्स्यो दर मन साथै निज कुल उतरव्यु रे लो ॥ दारे तिहां देखी धनद सुक्स थयो सशक जो, मुखड्ड रे जवाणु ते कुमरें लख्यु रे लो॥ ११ ॥ दारे तिहा कचा थामण दुमण थक्ने शेठ जो, रायें रे थपायुं बीटुं पाननु रे लो ॥ हारे तिहां कुमर गयो थापेवा हायो दाथ जो, जोड्ने उंगलियु पासु माननु रे लो ॥ १२ ॥ दारे में नारख्यो कूपें 5 खरूपें । जलपूर जो, थायो रे मुफ थागल ए केम एकलो रे लो ॥ हारे ना जो जो नारी कर्म तणो ए नोग जो, दाथे रे नवि हणियो दु थयो ये थकलो रे लो॥ १३ ॥ हारे ते थाप्यो नासी पुरवासीनी पास जो, ५२ रे श्री शांतिनाथनो रास खम बीजो पर एकविशमी ढालें, दररव्यो नृप मनमाय ॥ बीजे खमें रामविजय कहे, जूते सिदिन थाय ॥गा॥२५॥ सर्व गाथा ॥५॥श्लोक तथा गाथा १७ ॥ दोहा ॥ ॥ मातंगगृहथी मगाविया, संघाटक नृप चार ॥धा कराव्या नींतरें, धन दनाम सुविचार ॥१॥ रोपें चढयो राजा कहे, सेवकने तेणि वार ॥ वधनूमें ले जाने, करो वेदने पार ॥२॥ रूपावत कुमर वडो, लागी नृपने पाय ।। बोडाव्या ते जीवता, उत्तम नीच न थाय ॥ ३ ॥ ययुक्त ॥ न भवति नवति च न वर, नवति चिर चेत्फलं विसवदति ॥ कोप सत्पुरुपाणा, तुल्य स्नेहेन नीचानाम् ॥१॥धव न होवे तीवडे, लीन होय श्रव ॥ सजान ते उर्जन नोहे, जो धरती होय थान ॥ ४ ॥ सङान ऐसा कीजिये, जेसा पाणी कोश ॥ पगहूंती जो वेलीये, तोही नाणे रोप ॥ ५ ॥ सलान जाई मनावियें, जो रूसे सो वार ॥ सहननो एक कण नलो, मूरखनो जमवार ॥ ६ ॥ जो रुठे गुणवतने,तोहे जे मुख मोट ॥ एक न देने देव तु, उर्जन साथै गोठ ॥ ७ ॥ सगति कीजे सङनां,जेहथी नांजे नीड ॥ उही सगति नीचकी, नवी कपाई पीड॥७॥ वाह वाह सदुको करे, महोटो ए गुणवत ॥ अवगुण कपर गुण करे, तेहज कहियें सत ॥ ए॥ ॥ ढालवावीशमी॥ ॥ देशी मृगानयणीना गीतनी ॥ ए वणिकने कागे कीधो राज, धन माल कलालीने लीधो राजनवि पुण्य तणा फल जोजो ॥ माल सोप्यो धनदने हाथे राज, मनायो ते नरनाथें राज ॥ न० ॥ १ ॥ पूर्वे दतु घणं मान रान, वली वाध्यु बढ सन्मान राज ॥०॥ जग खाणो कहेवाये राज,गुण के. पूजा थाये रान ॥॥॥ कहे राजन वात प्रकासो राज, मामो मुफलं सोहाशो राज ॥ न ॥ कहे कुमर सुणो नूमीश राज, नांखें मुफ चरित जगीश राज ॥ ज० ॥ ३ ॥ _ तुम नयरनो वासी राज, रस्त सारनो सुत मुविलासी राज ॥ न० ॥ नामें दु धनद कुमार राज, बट्ठ मात पितानो प्यार राज ॥नम् ॥ ॥ एकदिन एक गाथा सीधी राज, दे सदस दीनार में सीधी राज ॥न ।मुफतातें दीधी गाल राज,काढयो घरथी ततकाल राज ॥ न ॥ ५ ॥ तेथी चाल्यो परदेश राज, वींध्यो व्यायें पगदेश राज ॥ न ॥ नारंमें उपाडी मूक्यो रान, सोवन ही जय ० जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. गल सट्ठ मन विस्मय, पामीने एम वोले ॥ फट मूरख तें सपल विटामा, नहिं कोय तारे तोलें ॥ गा० ॥ ७ ॥ रे रे तु साचु ए जांखे, के वली, थवा कूई ॥ मत्स्योदर कहे मुणो माहाराजा, ए सवि नांखेर ॥ गा ॥ एजो जो दवे बुदे करी उत्तर, कदेवो कुवर वाले ॥ बज बुधि कही बलवती, जे उपजे तत्कालें ॥ गा० ॥ १० ॥ राजन एड नव रमा अमचो, जनक पिता मातंग ॥ प्रथागल नित्य गुण गावाने, या वतो मन रंग ॥ गा० ॥ ११ ॥ तेहने घेर दोय दयिता रूडी, ते पेहुना श्रमें जाया ॥श्रण मानीती मुज माता तेणें, मुज वाणी न मुहाया ॥ गा ॥ १२ ॥ एदनी माता हूती वहाली, ए पण वनन गाढो । एक दिन जनकने करुणा यावी, बोल दियो मुज टाढो ॥ गा० ॥ १३ ॥ पंच र यण लेश मुफ जघामां, जनके क्षेप्या जाणी ॥ वत्स विपम वेलायें एहुँ, काठे मन हित थाणी ॥ गा० ॥ १४ ॥राजन सघले अवयव एड्ने, रयण थमूलक क्षेपी ॥ वेढ सुत पासे प्रीति पटतर, कीधो सुमतिने रोपी ॥ गा० ॥१५॥जो नवि मानो तो मुज परगट, जोवो नयण निहाली ॥ जंघा दी पंच रयण ते, देखाच्या सनाली ॥गा ॥ १५ ॥ रायतणे मन वात वसी ए, सेवकनें कहे जालो॥श्रग विदारी रयण लेश्ने, सघलां मुण देखाडो ॥ गा० ॥ १४ ॥ गीतरति जाण्यु गति बिगही, मलियो ए मा थानो ॥ में जास्यु बेतरj एदने, न रह्यो दन ए बानो ॥गा ॥ १७ ॥ धसिया सेवक तस जालेवा, ते कहे मुझने मूको॥धन कारण में कूड का ए, स्वामी सबल दु चूपयो ॥ गा० ॥१५॥ शेव सुदत्त थडे परदेशी, तेणें ए वात करावी ॥ सोवन इट समी मुफनें, लोनें घणु ललचावी ॥गा ॥ २० ॥ राय मत्स्योदर साहामु जोई, पूजे वात ए साची ॥ ते बोसो सुण तु राजेश्वर, ए पण काहिं न काची ॥ गा ॥ १ ॥ अनय वातनो मेल मले किम, कहे मुफथागल साचु ॥ मुफ मननो ए सशय वारो, साचे मारग राचुं ॥ गा० ॥२२॥ सुण राजेश्वर ए वदामा,बष्ट सहस्स प्रमाण ॥ सोवन सघाटक के मादारा, तेहमां नहि विनाण ॥ गा० ॥ २३ ॥ रयण श्रये वली तेहथी दूणा, एक सहस्रं कणां ॥ ते सपा टक मुज नामाकित, ए साचा सवि वयणा ॥गा० ॥ ५५ ॥ वात सुणी , श्री शातिनायनो रास खंम वीजो. ३ नहिं एउने नरक विण तोर राज ॥ न० ॥ २ ॥ सुणि मन सजवाणो राणो राज, वोले वन रोप जराणो राज ॥न ॥ तुज श्राशय लेवा माटें राज, दु वोल्यो वोल ए घाटे राज ॥ न ॥ २१ ॥ कुए ए तुक एहवु जाखे राज, मुफ यागें कहो सङ साखे राज ॥ न ॥ कहे सुंदरी मुणो सदु कोई राज, ए जेहवो नीच न कोई रान ॥ ज० ॥ ॥ नवि एहनु मुख जोजें राज, परशेही दूर करीजे राज ॥ ज० ॥ नरदरिये मुफ पति नाख्यो रान, में जिम तिम थापो राख्यो राज ॥ ज० ॥ २३ ॥ कहे जगमां केम रहेवाय राज, एम ममाणो अन्याय राज ॥ ज० ॥ ते माटे मुफ मूकावो राज, एहने रूडे समजावो राज ॥न ॥ २४ ॥ एम निमुणी रहिया के राज, दश अंगुल मुहमा देई राज ॥ न० ॥ जु साहुकार कहाई राज, करे एहवी कर्मकमाई राज ॥ न ॥ २५ ॥ एम वीजे खमें गाई राज, ढाल वावीशमी सुखदायी राज ॥ ॥ कहें राम करो कोश्वानु राज,पण कीधू न रहे गनु राज नाश६॥स॥१॥ ॥ दोहा ॥ ॥ तिलकसुदरी जूपर्ने, नांखे वे कर जोडि ॥ नृप आदेशे ताहरु, क थन करिश मन कोड ॥ १ ॥ एहतु में नारख्यु हतु, राखण शील रतन्न । ते में महारु जालव्यु, सूधू करी जतन्न ॥ २ ॥ ते माटें करवो दवे, थ नल शरण मुज देह ॥ वालम विण जीववू, शो धन ऊपर नेह ॥ ३ ॥ कहे नृपति मरवा तणु, साहस म कर सुजाण ॥ परस्यो प्रीतम तुज जणी, ठेखाई ण ठाण ॥ ४ ॥ वलतु वोले सा सती, तुमें पथिवी प्रति पाल ॥ लत परें हसतां दुता, नवि शोनो परवाल ॥ ५॥ राजन कहे हसवु किस्युं, तु मुफ वेटी तुल्य ॥ पण देखाहु तुमने, शहां निज कय थमुख्य ॥ ६ ॥ किहांथी ते मुफ वनहो, जे नारख्यो जलधिमकार ॥ अनुमति द्यो मुफ अनसनी, करुं प्रवेश निर्धार ॥ ४ ॥ राजगुकमणी क लियो, वीहां देवा काज ।। सुदरी नजरें निरखजे, ए तहारो नार ॥ ७ ॥ ॥ ढाल त्रेवीशमी॥ ॥ करहलहानी देशी॥ तिलकसुदरी निरखीने, निरखीने मनमाहे एम विमासे ॥ हो राज ॥ ए प्रीतम होवे माहरो, माहरो पण रहा थायो होशे केम तमासे ॥ हो राज ॥ १ ॥ धनद कहे स्वामी एहनो, एहनो श जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो इक्यो राज ॥ न० ॥ ६ ॥ तिहीं कंचन रयण निपायुं राज, तेणें से चित्त ललचायु राज ॥ ॥ नाख्यो मुने कूप मझारी राज, परयो तिहां राजकुमारी राज ॥ ज० ॥ ॥ नाखीने ए वलियो राज, ठेवदत्त श्रावी ने मलियो राज ॥॥ कूपमाहेथी मुफने काढयो राज, जरदरिये परत एवं वाढघो राज ॥ न० ॥ ॥ पडतां महोटे मत्स्यें गलियो राज, हां थाव्यो मनोरथ फलियो राजन॥ तिलकसुंदरी महारी राज, देवदत्ते राखी प्यारी राज ॥ न ॥ ५ ॥ जाग्ययोगें जो हां थावे राज, तो माहरो जोरो फावे राज ॥ ज० ॥ सुण स्वामी गुणमणिखाणी राज, में नांखी कर्म कहाणी राज ॥ न० ॥ १० ॥ सुणी राजा विस्मय पाम्यो राज, सा तो तुज पुण्य सहायो राज ॥ न ॥ रहे नृपगेहें वडनागी राज, हवे पुण्यदशा शुन जागी राज ॥ ज० ॥ ११॥ तिहां देवदत्त सार्थवाहो राज ॥ मलवा श्राव्यो सोत्सादी राज ॥ ज॥ मन्यो नृपने रंगें श्रावी राज ॥ केम टाब्युं टले जे जावी राज ॥ ज० ॥ १२ ॥ लखियो धनव कुमार राज, रह्यो बानो गुप्ताफारें राज ॥ ज० ॥ नृप पूजे कुशल सवाया राज, कुण देशथी शेठजी थाया रान ॥ न ॥ १३ ॥ वली साथें ए कुण नारी राज, किम वेंढारो गुण सारी राज ॥ ॥ कहे शेव कटादयी थाप्यो राज, व्यापार बहु धन पायो राज ॥न ॥ १५ ॥ वलतां जलनिधिमा पाई राज, एकाकी ए चित्त सुदाई राज ॥ ज० ॥ करि वस्त्रानरण विनूषा राज, द लाव्यो श्दा निर्दोषा राज॥न० ॥ १५ ॥ हवे तुम थनुमति अाज राज, होशे मुफ घरणी माहाराज राज ॥ ज० ॥ खे। तुम थाणा कृत्य कीजें राज, तो सगुमां सुयश वरीजें राज ॥ ज० ॥ १६ ॥ निसुणी नृप चित्त विचारे राज, शी वात कही धूतारे राज ॥न ॥ कहे नृप जो तुमनें ए चाहे राज ॥ तो करो कारज उत्सा राज ॥ न ॥ १७ ॥ कहे तिलकसुदरी स्वामी राज, नृपतिने महोटी खामी राज ॥ ज० ॥ पररमणी परने हाथे राज, किम दीजें बनापना नाथें राज ॥ नम् ॥ १७ ॥ ए करणी जगमा मी राज, परनारी नरकनी कूमी राज ॥ ज० ॥ केम थागल रहीने थपावो राज, अंडे तुम नरके जावो राज ॥ ज० ॥ १५ ॥ करे पाप करावे जेहं राज, थनुमोदे त्रीजो तेह राज ॥ ज० ॥ ए त्रणे कह्या गुणचोर राम, जे श्री शांतिनाथनो रास खंम बीजो. जय पामी ॥ दो० ॥ रामविजय कहे पुण्यथी, पुण्यथी सुखमांहे न रहे कां खामी ॥ हो ॥१४॥ सर्व गाथा ॥६३१॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥२०॥ ॥ दोहा॥ ॥ रत्नसारने मंदिरें, श्राव्यो कुमर सुजाण ॥ राज्यमान जाणी करी, शेत दिये बदु मान ॥ १ ॥ मामयु थासन वेसवा,थागत स्वागत कीध ।। तुम थावे था दिवसमां, सवलो लाहो लीध ॥ ५ ॥ धन्य दुहुँ धन्यमां, तुम थावे माहाराज ॥ प्रगट्या पूरव नवतणां, पुण्य अमारां थान ॥३॥ चिते मन कारण किस्यु,थगण थाव्यो एह ॥ केम समाये वाघलो, मुज मोकरनें गेह ॥ ४ ॥ शेव कहे फरमावियें, मुफ लायक काम ॥ कुमर कहे तुम तातजी, केम उर्वल तनु बाम ॥ ५ ॥ नीशासो नाखी कहे, शेव सवल दिलगीर ॥ यगज अमें रिपावियो, गयो विदेशे वीर ॥ ६ ॥ तुम दी ते सांनस्यो, थम जीवित थाधार ॥ एम कहि रुदन करे घj, नयण न खेंचे धार ॥ ॥ कारण मांझीने का, धुरिस्ती समजाय ॥ जाणु तुमें तेहज सही, पण में केम कहेवाय ॥ ७ ॥ ॥ ढाल चोवीशमी॥ ॥ श्रावो श्रावो रे शामलीया कांड चालो ॥ ए देशी ॥ रदो रहो रे पिताजी का रहो, ते दु तुम थंगज जम्यो ॥ तुम शीख न मानी में नि गुणे, एम कहीने पाय पढ्यो सुगुणें ॥१॥श्रावो घावो रे मुतजी नानकडा, ॥ए थांकणी ॥ तुम पाखे सहियां बढ़ उखडां ॥ एम कहीने पुत्र पिता म लीया, वह दिवस तणा विरहा टलिया ॥ था॥ २ ॥ ज जननीने हेजें मलियो, कहे बाज मनोरथ तरु फलियो॥में नयरों दीठी मुफमाडी, मोरी थाख कमल जिम कघाडी ॥ था० ॥ ३ ॥ जननी पगे लाग्यो सोनागी, कहे मा मुज श्राज दशा जागी ॥ घणे दिवसें तुम दर्शन पायो, महारो थान दिवस लेखे थायो ॥ था ॥ ४ ॥ वेसारे खोले सुतने, न्हवरावे थासु जल हेतनें।मायडी मन नेहें घणु जीनु, मुख निरखे फरिफरि सुत जीनु ॥ था ॥ ५ ॥ वत्स वात कहो तुमची सखरी, श्रम 5 खडां दूर गयां विसरी ॥ तिहा सक्षेपें सवि वात कही, सुत सहामु मायडी जोश रही ॥ था० ॥ ६ ॥ करो विनति नृप पासें जा, मुफ सवधूने तेडी लावो ॥ जय राज उवारें थरज करी, सुत तेडी लावे दर्प धरी ॥था ४ जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो. स्वामी दोशे जेह शूने मदिर थाव्यो ॥ हो ॥ निज बीतकनी बात डी, वातहली निज केरी कहिने जस समकाव्यो । हो० ॥ ५ ॥ला वियो एवं जेहनें, जेहनें एवं शान करी मदिरमाहे राख्यो ॥ हो। जेणे बलीये राक्षस नणी, राक्षसने रंजाही हणीने दूरे नाख्यो । हो ॥३॥ परणी जेणे ए पद्मिनी, पद्मिनीने परणीने रगें वातो कीपी ॥ हो ॥ इत्यादिक अतरगनी, सहिनाणी सघती साची दीधी ॥ हो. ॥ ॥ मन विकस्यु तन उनस्यु, उन्नसियां अतरना कूपल देरे ह रखी ॥ हो० ॥ 5 ख दोहग दूर गयां, दूर गयां सवि 5 खडां जोवे निरखी निरखी॥ दो॥ ५ ॥नृप थादेशे कनीरदी, कनी रही जय जोहें प्रेमरा गुणनी खाणी ॥ दो ॥धन धन दपती जोडली, जोडी ए घणु जीवो मुं वर रूप समाणी ॥ हो ॥ ६ ॥ राज ढुकम दुन एडवो, एहवो जेणे की तेदने तुरत खपाहो ॥ हो ॥ उपकारी नर थावियो, श्राव्यो ते छजाई दणता वचमा थाहो ॥ दो० ॥ ॥ धन धन तेहनी मारली, माउलीयें जेरों जायो नरमा रयण समाणो ॥ हो० ॥ अपराधी डोडा वियो, बोडाव्यो जनमाहे सघले सहेर गवाणो ॥ हो ॥ ७ ॥ सहन अतिदि दूदव्यो, दुहव्यो पण नाणे दियडे मश केवारें ॥ दो० ॥ डेपो नेद्यो वशने, वशनो स्वर मीठो बोले वायु जेवारें ॥ हो ॥ ए ॥ अगर थमिमा खेपियो, खेप्यो पण शुनगघे सढुकोने सतोषे॥ दो॥ बदन जो घसीय घणु, घणुये तो पण सहेजें शीतलताने पोषे ॥हो॥१०॥ वस्तु लिये सद्गु थापणी, थापगली केम होवे जे परनी सीध सुधारी॥ हो॥ सदु कहे धर्मे जय दुवे, जय दुवे परयुवती मुख न जोने जाली ॥ हो ॥ ११॥ हु बलिहारी तेदने, तेह तणी परतरुणी परधनथी जे न्यारा ॥ हो ॥ ते सजान मन मादरे, महारा ते मनमाहे लागे अतिहि प्यारा ॥ दो० ॥१२॥ यत ॥ परदारपरष्य, परशेदपराशुख ॥ गगाऽप्यार कदाप्येप, मामहो पावयिष्यति ॥ १ ॥ य परवावे मूक , परनारीवकवीह णेऽप्यंध ॥ पंगु परधनदरणे, स जयति लोके महापुरुष ॥ २ ॥ रहे नृपदत्त श्रावासमा, थावासें दोय रहेता एक दिवस बहु ने ॥ हो ॥ थाण सही नरवर तणी, नरवरना सेवकन्तु थावे जनकने गेहें॥ हो। ॥ १३ ॥ बीजे खमें त्रेवीशमी, वीशमी ए दालें धन रमणी सवि . .

श्री शांतिनाथनो रास खं वीजो JU याव्यो नरवरु, सुख विलसे धरि जेम सुरवरु ॥ आ ॥ २३ ॥ हवे मत्स्योदर विलसे नोगा, निजनारीगु लहि गुन योगा ॥ दोये दीन दुखी ने थनुकपा, गुनरीतें विचरे नि कपा ॥ था ॥ २४ ॥ ढाल वीजे खमें चोवीशमी, कहे रामविजय साकर समी ॥ जुन उदय यदा आवी मले, तव एणी परेंसविचितित फलेपथा॥२५॥सर्वगाथा॥६॥श्लोक ॥२॥ ।। दोहा ।। ॥राजकुमर योवन लयु, सकल कलानो जाण ॥ मत्स्योटरसाथै घणो, राखे नेह सुजाण ॥ १ ॥ जाणे एणे जीवित दियु, उपकारी शिरताज ॥ मत्स्योदर थावे यदा, तब आधु चाले काम ॥ २ ॥ एक दिन रयवाडी चढ्यो, गज वेसी नृपनद ॥ पुरमांहे एक धवल गृह, दीतुं नयनानद ॥३॥ शुरराजनी पुत्रिका, श्रीपेणा इति नाम ॥ कुमरें दीठी क्रीडती, सौ धगवादे ताम ॥४॥ रूपं रति दासी करी, चचल गति सुकुमार ॥ मृगनय णी मनमोहनी, फूली सुरतरु माल ॥ ५॥ गति नूली ग्यो कुमरजी, सुरति रहि न लगार ॥ मन वेध्यु मन्मथ सुनट, नयवाण सविकार ॥ ६ ॥ गौरगी ते गोरडी, कालेजानी कोर ॥ कोरीने पेठी वचें, ज्वलम करे ते जोर ॥ ७ ॥ मन विण जइ पालो बल्यो, वनहूती नृपजात ॥ घर याव्यो पण कोश्नो, न गमे तस सघात ॥॥ कुमरीना मनमा नहिं, ते ऊपर लवलेश ॥ पण ते मूरख एकलो, रागें सहे कलेश ॥ ५ ॥ ॥ ढाल पच्चीशमी ॥ ॥ महेतोजी खणावे वावडी ॥ ए देशी ॥ लहि मित्रमुखे ते वातडी, नृपति मत्री बोलावे रे ॥ शूर समी मोकल्यो, न वात सवे समजावे रे ॥ १ ॥ जगत मोह्यो विपयनी वासना ॥ए यांकणी ॥ सवि जीव विपय ना दासो रे ॥ सुर नर पण करे थहोनिश, मनांहे विपयनी थाशो रे ॥ ज० ॥ ५ ॥ शूर कहे सवे स्वामी, तुमें ए थावी शु दाख्यु रे ॥ राज द्रुकम शिर कपरें,अमें वयण तुमार राख्यु रे ॥४०॥३॥ कहे कुमरी जो तुमें श्रापशो, तो पलकमा प्राणने काढी रे ॥ नारखीश पण दुनहि वरु, ए राज कुमर एम त्राही रे ॥ज॥ ॥ मत्रीने मनमाहे ऊपन्यो, ए वात सुणी ने विपादो रे ॥ कुमरी तो श्छे नहि, जुन राजकुमर उन्मादी रे ॥ न ॥ ५॥ मत्री कहे माहाराजनें, नहिं ते कन्यानो रागो रे ॥ वयण सुप्यु ६ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ॥॥गजवरने खं| वेसारी, नृप साथै कीधी यसवारी ॥ बद्ध लोक सका मलियो जोवा, वलगाडि वत्स न रहे दोवा ॥ था ॥ ॥ कोई कामिनी पिरसती धाई, उमते अबर कजा ॥ परवाल चढावीने केलें, कोई का मिनी जोवाने हीमे ॥ था० ॥ ए ॥ एक थावे फूठे हाथे धसी, कमाता चढण जाय खसी ॥ एक थावे कमती कवरी, मनु मुखकज कपर एच मरी ॥१०॥ एक थलते रजीते करणा, पहेरे साडी उढे चरणा ॥ एक कुकुम बिंदी दे गालें, काजलनो विंध दिये जालें ॥था ॥ ११ ॥ रदि रसपणे पियुनी जोडें, कर कचा करी थालस मोहे ॥ एक सुंदरी सामुं हेज धरी, मत्स्योदरने जोवे फरीय फरी ॥ था ॥ १५ ॥ तिहाँ मलिया बदु माणसदा, वाजे वाजींतर नवनव बदां ॥ शेठ महाजन थागें रंग नरिया, श्रगें पहेस्या वाघा केसरीया ॥ था ॥ १३ ॥ सह बोले मुख जय जय वाणी, धन धनदकुमर ए धणियाणी ॥ धन्य जननी जेणे कुंवर जायो, कुल श्रबर ए दिनमणि थायो ॥ था ॥ १४ ॥ एम श्रामबरें निज घर आया, सद् साजन जन मनमें जाया ॥ बहु नृपति रंग रती, मदिरमांहे बेग सुजन मली ॥ था ॥ १५ ॥ करे सेवा शेठ नरेश्वरनी, मुफ करुणा थइ परमेश्वरनी ॥ मुफ श्रगण जे नृपति बायो, नरि मोती थाल ए वधायो । थाम् ॥ १६ ॥ एहवे श्राव्यो मालाकार, नृप थागल फूल धनां सार ॥ उत्संगें राजकुमर बेठो, लिये फूल करी निज कर देगे ॥था ॥ १७ ॥ जब नाकें वास लिये सारी, तव कुवर कठयो पोकारी ॥ जुन जुन रे सेवक थ६ वहेला, ए फूलमांदे ने शी रे बला ॥ था ॥ १७ ॥ तब जोवे सूक्षम नजरें करी, माहे देखे श्यल थति निखरी ॥ ए राजसर्प सद्गु एम बोले, एदनु विष नहिं कोइने तोलें ॥ श्रा० ॥ १५ ॥णे दासे राजकुमर मश्यो, नृप मनमाहे उख जोरें वस्यो ॥ धा धा रे तेडो गारूडी, एम योज्यो राजा पारडी ॥ था ॥ २० ॥ कदे गारूडी ए थमथी न वले, ए मश्यो कुवर यदि सवले ॥ जोता ततण मूळ थावी, न टले जे टायु कोइ नावी ॥ श्रा ॥ २१ ॥ कहे धनद करो तुमें शी चिता, महाराज रदो पद निर्विता ॥ तिदा गटघु देविदत्त मणि नीर, तब कम्यो कुवर वड वीर ॥ बा० ॥२२॥ राय कीधी दर्प वधामणी, वधी प्रीति मत्स्योदर घणी ॥ निजमदिर सार्षे श्री शातिनाथनो रास खम बीजो पए ते ये काम, रीति माहाकप्टकी ॥ ६ ॥ सकट विपम सम राज, हूती पथ जाणीयें ॥ त्रिक तजवा एक पथ, माहे मन पाणी ॥ पर विनता विधवा निज, गणिका नारिथी ॥ पथ होवे धन्य तेह जे, विरम्या चा रथी ॥ ७ ॥ सात व्यसनमा टोय, कह्यां नारिनां ॥ ग्रथमाहे वली चार, नरकना वारणा ॥ तेमाहे पण वीजू, एह का सही ॥ एम जोतां ए वातनी सघले ना कही ॥ ॥ धनट कहे मुण कुमर, कनकप्रन नूपना ॥ मूकी द्यो हठ एह, घटे नहि रूपना ॥ राम कहे जवि शीख, मुणीय इकमना ॥ मूको विपयनी टेव, जिहां अवगुण घणा ॥ ए॥ इति शीखामणफकडी ॥ पूर्वढाल ॥ कहे राजकुमर उत्तर हवे, सुणो मत्स्योदर मन राखी रे ॥ दोप नहि ए वातमा, जे परणीजे सहु साखी रे ॥ ज० ॥ १५ ॥ वहेला था हवे मुझने, परणावो ए कनी सारी रे ॥ वारं वार शु दाखवु, तुमें महोटा बो उपकारी रे ॥ ज० ॥ १६ ॥ मति थारत जाणी तेहनी, मणिसमरणथी ततकाल रे ॥ चित्त फस्यु कुमरी तणु, वरवाने थइ उजमाल रे ॥ ज० ॥ १७ ॥ तव शूर कहे नृप थागलें, तुम सुत ऊपर रतियातो रे ॥ स्वामी मुता थइ माहरी, सुणि हररयो साते धातो रे ॥ ज० ॥ १७ ॥ लम लेइ कतावला, विवाद कयो मनरगें रे ॥ धन वगुलु रायें तिहा, खरच्यु मन धरिचबरगे रे ॥ ज० ॥ ॥ १ ॥ कहे धनद कुमरने राजवी, तुमें उपकारी शिरताजो रे ॥ जी वित्त थाप्यु पुत्रने, सात्रा थम वालित काजो रे ॥ ज० ॥ २० ॥ वीजे खमें पचवीशमी, ए ढाल कही मुनि रामें रे ॥ सऊन ते जगमा सही, जे अवसर थावे कामें ॥ज ॥१॥ सर्वगाथा ॥१३॥ श्लोक ॥२॥ ॥ दोदा ॥ एक दिवस नृपनें शिरें, शूलव्यथा थति जोर ॥ थश्याची तेणें अति घणो, करे महीपति सोर ॥१॥ रोग निवारण मणिथकी, धनटें कयो करार ॥ नृप मान्यो सुतथी थधिक, नाणी तस उपकार ॥२॥ण थवसर तिए नयर वन, शीलधर अनिधान ॥ मुनिवर थावी समो सस्या, वात मुणी राजान ॥ ३ ॥ वदु परिवार वादवा, थावे धनद स मेत ॥ वादीने वेवा सवे, मुनि कहे सकेत ॥ ४ ॥ .

១០ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. में एहवु, जेहथी उपजे वैरागो रे ॥ ज० ॥ ६ ॥ राय कहे नृपनी कनी, परणावु थपर सुकुमारी रे॥7 नीर्मोही ऊपरें, मोही रह्यो थंग निहाली रे ॥ ज० ॥ ७ ॥ कुमर न माने वातही, कामिनीय कामण कीधु रे माहे पेशी माहरुं, एवं तन मन चोरी लीधु रे ॥ न० ॥ ॥ विण प रणे अन्न न वावरु, पालव साह्या विण पाणी रे ॥ पीवू नहिं पण में कलूँ, नहि कपर बोलो वाणी रे ॥ज॥ ए॥ जु वात सबल वांधे पड़ी, बेतु पासें हनीलां एह रे ॥ पासें रही पीलायें, सुण मत्रीश्वर गुणगेह रे ॥ ज० ॥ १० ॥ कन्या नवि माने वापनु, मुफ कहण न माने पुत्र रे॥ एम द लीघे थाकरे, केम ममाशे घरसूत्र रे ॥ ज० ॥ ११॥ एडवे म स्स्योदर थाचियो, कदे स्वामी सचिता दीसो रे ॥ शे कारण मुफ बागों, प्रकासो ते श्रवनीशो रे ॥ ज०॥ १२॥ समजावो ज तुम मित्रनें, हतीये हठ लीधो गाढो रे ॥ शीखामण देई करी, एदनी खटक हैयेपी काढो रे ॥ ज० ॥ १३ ॥ धनद कहे सुणो मित्रजी, श्यो एकपखो ए नेह रे ॥ ए चचल तरुणी कारणे, काश् सबल दफाडो देह रे ॥ ज० ॥ १५ ॥ ॥ ढाल ॥ नदी यमुनाके तीर, उमे दो पंखीयां ॥ ए देशी ॥ सांजल मित्र कनु, तुज थागल वीनती ॥ रखे मन राखो राग, रमणीनो एक रति ॥ ए रमणी रमणीय, देखाडी नातिनें ॥ चोरीले चित्तमाल, लजावे जा तिनें ॥ १ ॥ नाखे मुख नि श्वास, न थावे निश्डी ॥ उलस वानस थाय, के एक नदि एक घडी ॥ मन्न रहे मलवाने, रात्रि दिवस तरी ॥ उघमाहे तस ध्याने, कठे थारडी ॥ २ ॥ पामे थवस्था कंप, अने श्रम स्वेदनी ॥ मूर्मा ग्लानि बलक्ष्य, लघुता मेदनी ॥ श्रवगुण एम अनेक, देखीता कपजे ॥ ते तरुणीनी संगते, गुण श्यो नीपजे ॥ ३ ॥ जण जण सेती प्रीति, न कीजें प्रेमनी ॥ निखर कसोटी एद के, थातम हेमनी॥हा दशमो नायासुत, वेगे तेहनें ॥ पररमणीनी लालच, लागी जेहने ॥ ४ ॥ नावे तस विश्वास, न ईजत खलकमें ॥ परियागतनु पाणी, सतारे पलकमें ॥ रात्रि दिवस गलियोमा, हीमो हेरतो॥ दियडामां जाननी, माला फेरतो ॥ ५ ॥ राती देखावे रग ज्यु,कण्यरनी कली ॥ विफरी करे । विपरीत, के वाघण ज्युंधली ॥ व्याधि महानिर्नाम के, मदिरा दृष्टिको। तेहबु ,

श्री शांतिनाथनो रास खंम वीजो पए
ते ने काम, रीति माहाकष्टकी ॥ ६ ॥ सकट विपम सम राज, दूती पथ
जाणीयें ॥ त्रिक तजवा एक पथ, मांहे मन थाणीयें ॥ पर विनता
विधवा निज, गणिका नारिथी ॥ पथ होवे धन्य तेह जे, विरम्या चा
रथी ॥ ७ ॥ सात व्यसनमा टोय, कह्यांचे नारिनां ॥ ग्रथमाहे वली
चार, नरकना वारणा ॥ तेमाहे पण वीजू, एह का सही ॥ एम जोतां
ए वातनी सघले ना कही ॥ ॥ धनद कहे सुण कुमर, कनकप्रन
नूपना ॥ मूकी द्यो हन एह, घटे नहिं रूपना ॥ राम कहे नवि शीख,
सुणीय इकमना ॥ मूको विपयनी टेव, जिहां अवगुण घणा ॥ ए॥
इति शीखामणफकडी ॥ पूर्वढाल ॥ कहे राजकुमर उत्तर हवे,
सुणो
मत्स्योदर मन राखी रे ॥ दोप नहि ए वातमा, जे परणीजे सदु साखी रे
॥ ज० ॥ १५ ॥ वहेला था हवे मुझने, परणावो ए कनी सारी रे ॥ वार
वार शु दाखवु, तुमें महोटा बो उपकारी रे ॥ ज० ॥ १६ ॥ मति
थारत जाणी तेहनी, मणिसमरणथी ततकाल रे ॥ चित्त फस्य कुमरी
तणु, वरवाने थइ उजमाल रे ॥ ज० ॥ १७ ॥ तव शूर कहे नृप
थागलें, तुम सुत कपर रतियातो रे ॥ स्वामी सुता थइ माहरी, सुणि
दरख्यो साते धातो रे ॥ ज० ॥ १७ ॥ लग्न ले। कतावला, विवाद कस्यो
मनरंगें रे ॥ धन बगुलु रायें तिहा, खरच्यु मन धरिचबरगे रे ॥ ज० ॥
॥ १५ ॥ कहे धनद कुमरने राजवी, तुमें उपकारी शिरताजो रे ॥ जी
वित श्राप्यु पुत्रने, साया श्रम वालित काजो रे ॥ ज० ॥ २० ॥ वीजे
खमें पचवीशमी, ए ढाल कही मुनि रामें रे ॥ सजान ते जगमा सही,
जे अवसर थावे कामें रे ॥ ज० ॥१॥ सर्वगाथा ॥१३॥ श्लोक ॥२०॥
॥ दोहा॥
एक दिवस नृपनें शिरें, शूलव्यथा थति जोर ॥ थश्थाची तेरों अति
घणो, करे महीपति सोर ॥१॥ रोग निवारण मणिथकी, धनटें कस्यो
करार ॥ नृप मान्यो सुतथी थधिक, जाणी तस उपकार ॥ ३ ॥ण
अवसर तिण नयर वन, शीलधर अनिधान ॥ मुनिवर थावी समो
सखा, वात मुणी राजान ॥ ३ ॥ वट्ठ परिवार वादवा, थावे धनट स
मेत ॥ वांदीने वेठा सवे, मुनि कहे सकेत ॥ ४ ॥

. नदीनो GO जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो. ॥ ढाल नहीशमी॥ ॥थान सखि शामलीयो ॥ए देशी॥ थथवा ॥राग मारु॥कहे मुनि वरजी हितकारी, तुमें धर्म करो नर नारी ॥ एतो प्रवहणनी परें तारे, नवसायर पार उतारे ॥ १ ॥ एहनी वाहे वलग्या जेह, सुख सादि धनत लह्या तेह ॥ जे ए सुखमा रह्या माता, ते नरने वेड नवें साता ॥ ५ ॥ सागार थने थणागार, बिहु ने कह्यो निर्धार ॥ कारण शिव पदना दोय, परं पर अनतर जोय ॥३॥ मन सायें कलक लगाये, तो ख मिश्रित सुख पावे ॥ महणाक परें ते माटें, नि कलक करो मुख साटें ॥ ॥ कहो स्वामी कवण महणाक, तुमें नाखो अनोपम वाक ॥ गुरु कहे नरतें शुन ताम, एक रत्नपुरानिय गाम ॥ ५॥ नि वसे शुनदत्त व्यवहारी, तस नारी वसुंधरा सारी ॥ तस कूख सरोवरें जायो, महणानिध पुत्र मुहायो ॥ ६ ॥ ते थाव्यो यौवन रगें, परस्पो रमणी मुख सगें ॥ रहे नामिनी नित्य नीनो, जाये योवन पूर ॥ ७ ॥ एक दिन रयनी थसवारी, पहोतो उद्यान मकारि ॥ तिहा रंग रसें सद्ध रमिया, ममप वेसीने जमीया॥॥ फरी चाल्या वन जोवानें, मुनि कनो दीगो ध्यानें ॥ रह्यो चपक तरुनी बाया, मुनि कचन वरणी काया ॥ए ॥ प्रचुन एक तान लगाया,नहिं मन ममता ने माया॥मन थानद थधिको पाया, वद्या मुनिवरना पाया ॥१०॥ मुनि ध्यान सपूरण कीधो, उपदेश यथोचित दीधो ॥ शुक्ष देव धर्म गुरु तत्त्व, समकित मा रग ए सत्य ॥ ११ ॥ समकित सुरवृक्ष अमूल, वैमानिक सुख जस फूल ॥ शिवपद फल श्रापे साचो, समकित गुणमा नवि राचो ॥ १२ ॥ नहिं ए उपरात रतन्न, एदना घणा करजो यतन्न ॥ नहिं एदथी वधव दूजो, दरिसण गुणने नवि पूजो ॥१॥ क्ष्योपशम विचार, वेदक दायिक गुण सार । सास्वादन पंचम जाणु, समकितना नेद वखाणु ॥ १४ ॥ मिश्र समकित मिथ्या मोह, थणाचार सवल वलि जोद ॥ एसातना कप उवसमयी, झायिक उपशम लहती ॥ १५ ॥ वेद कह्यो ए चरम प्रदेश, सास्वादन वमते देशे ॥ प्रदेशे वेदन इते, खयोवसम कप जगवतें ॥ १६ ॥ ए सहित योडोही धर्म, थाराध्यो दे शिवशर्म ॥ महणाक सुणी प्रतिबुझो, समकित श्रावक व्रत लीधो ॥ १७ ॥ गुरु वांदी थाव्यो निजपुरमां, जिन श्री शांतिनाथनो रास खंग वीजो. जर धर्म वस्यो निज उरमां ॥ ममाव्यो जिन प्रासाद, खरचे धन मन था हाद ॥ १७ ॥ वदु धननो व्यय थयो जाणी, कर्मे तस मति मूंकाणी॥ जाए{ थोडे थाशे थाबु, खरचतां न जोयुं पा ॥१॥ नांग्यो उ साह रीने, वेठो सतोप करीने ॥ वली लोकाग्रहथी कदापि, प्रतिमा जिननी लेइ स्थापी ॥ २० ॥ स्थापीने प्रतिष्ठा करावी, लीधो लादो धनने वावी ॥ वली एक दिन चिते हीणो, मन ध्यान शुक्ष्मां लीणो ॥ १॥ धन चोथो नाग ए धर्म, करवो एम का शास्तरमें॥ए तो अधिक शहां खर चाणु, फलशे के नहि शु जाणु ॥ २२ ॥ एम हाशय मनमां धरतो, जिन पूजादिक श्रादरतो । एक दिन मुनियुग घर थाव्यु, कठीने तेणें पडि लान्यु ॥ २३ ॥ वलिया वसतु मन नाव्यु, फल दीतु नहि कां फाव्यु ॥ मलें मेलू देखी मील, तेणें कीधी उगहा थवील ॥ ॥ हा हा माह्या पण चूके, कोने कर्म न मूके ॥ वली कीधो पश्चात्ताप, मुफ म होटु लाग्यु पाप ॥ २५ ॥ ए निर्मल श्रग सदाइ, मुफनें माती मति धाई ॥ एम अनुन ने शुन वेदु वांधी, कवि नुवनपतिनी लाधी ॥२६॥ चवीने थयो धनद कुमार, जेम वाध्यु तिम लघु सार ॥ मन कहापोद करत, लघु जातिसमरण तत ॥ २७ ॥ कहे मुनिने जोडी हाथ, जग वही थनाथनो नाथ ॥ मुफ वीतक सघली वात, तुमें परकाशी नली जाति ॥ २७ ॥ तुम शान तणी वलिहारी, नव पडतो राख्यो उपगारी ॥ लेग्नं दीक्षा तुम पासें, माय तायनें पूबी उनासें ॥ ए ॥ मुनि वदी थाव्यो गेह, ढाल बबीशमी कहि एह ॥ रामविजय कही खम वीजे, धन्य जे गुरुवचनें रीजे॥३॥सर्वगाथा॥७॥श्लोक तथागाथामती॥२॥ ॥ दोहा ॥ ॥ मत्स्योदर थावी कहे, पितर नणी कर जोडि ॥ श्रनुमति थापो मुजनें, सयम लगु मन कोहि ॥ १ ॥ मात पिता कहे जातने, जिहा तु तिदा श्रमें साथ ॥ वाट जोवतां थावियो, घणे दिहाडे हाथ ॥ २ ॥ नृपति पण निसुणी कहे, वादाला विण श्यो वास ॥ हे उपगारी ताहरो, दु घडी न महेनु पास ॥३॥ कनकप्रन निज कुमरने, वेसास्यो नृप राज ॥ पोतें सज थइ नीतखो, सयम लेवा कान ॥४॥ धनद धनावद पुत्रने, 11 २ जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. सोपी घरनो नार ॥ मात पिता नारी सहित, वरवा निवृति नार ॥ बहु परिवार परवस्त्रा, थाव्या श्रीगुरु पास ॥ ऊना कर मोरीबदे, दीक्षा यो गुणराशि ॥ ६ ॥ ॥ ढाल सत्त्यावीशमी ।। ॥ झपन देव मोरा हो ॥ ए देशी ॥ थव मोहि तारो हो, दयानिधि पार उतारोहो॥नवनयथी दुकनग्यो, थाव्यो तुम नेरो हो॥थ ॥ दयानि ॥१॥ नाथ मुनि पट्कायना, कीजें मुने चेरो हो ॥ तारक जाणीने सही, मन मान्यो मेरो हो ॥ दण् ॥ ५ ॥ स्वामि अनादिनी मूढता, हूती ई घेलो दो ॥ अव तो विण ए बदीने, कुण राखे थनेरो हो । द० ॥३॥ काज विचारी कीजियें, न पढे ज्यु फेरो हो ॥ कहे गुरु विलब न कीजिये, दोये कर्म निवेरो दो ॥६॥४॥ चिट्ठ जण साथै पचमे, श्री धनद कुमार दो ॥ दीक्षा गुरुपासे यही, रहे उग्र विहारें हो ॥ द ॥ ५ ॥ चारित्र चोखु पालतां, मुनि निरतिचारें हो ॥ सायें साधु तणी किया, प्रमाद निवारे हो । द० ॥ ६ ॥ थिविर मुनि पासें नण्या, बागम याचारें हो ॥ कृषनपरें धोरी थया, धुरा धर्मनी धारे हो ॥ ० ॥ ७ ॥ करि अणसण थाराधना, अनथ्याननी धारें हो ॥ काल करीने कपन्या, सुरलोक मकारें हो ॥ ३० ॥ ७ ॥ सुख वैमानिक देवना, रूडी परें पाले दो ॥ वरस अस रख्प लगें तिहां, वलता अवतारे हो ॥ १० ॥ ॥ तिहाथी विदेहे पंचमे, उत्तमकुलसारें हो ॥ मनुजपणे सयम यही, पहोता शिवतारे हो ॥ व ॥१०॥ ए मत्स्योदरनी कथा, मुनि कही मनोहारें हो ॥ अमिततेजा ये सांजली, मनने सुविचारें हो ॥ ७॥ ११ ॥ तेमाडे तुमने कट्ठ, खेष र अवधार दो॥धर्म निरंतर कीजिये, शिवमुख दातार हो ॥ द० ॥ १२ ॥ गुरु थाणा शिर ऊपरें, राय धारी तेवारें हो ॥ साचे दिल अरिहं तनी, नक्ति सवाई धारे हो ॥ द ॥ १३ ॥ ननममल मुनि चालीया, जिदा जैनविदार दो ॥ अमिततेज श्रीविजयजी, मुख विलसे अपार हो ॥ द० ॥ १४ ॥ ढाल थइ सत्त्यावीशमी, खमबीजे उदार हो ॥ रामविज य कहे ते नला, जे राखे याचार हो ॥ द० ॥१५॥ सर्वगाया ॥श्लोक०॥ ॥ दोहा॥ ॥थमिततेज श्रीविजयजी, ए वेहू राजान ॥ राजनीति रूडी परें, ३ श्रो शांतिनाथनो रास खंम वीजो ले सुगुणनिधान ॥ १ ॥ यात्र करे जिनवर तणी, वेद प्रकारे तेह ॥ दीश्वर वैताढयनी, सीमा नगनी जेह ॥ २ ॥ वरस प्रत्ये महोटी करे, स्य यात्र गुणवत ॥ दोय नटीश्वर हीपनी, एक सामानिक संत ॥३॥ त्रमास उज्ज्वल परखें, तेम वली थासो मास ॥ नदीश्वर उत्सव करे, 3 दिवस वन्नास ॥ ४ ॥ ॥ ढाल अग्यावीशमी॥ ॥ अष्टापद गिरि यात्र करणकु ॥ ए देशी ॥ नदीश्वर वरदीप अनोपम, जहां जिनगृह वावन्न ॥ तेह तणो सवध सपें, कहु सुणो सहु साजन .१ ॥ नविका नाव धरीने सार, जिनवर यात्र करीजें ॥ टालि मिथ्या ति निर्धार, नरजव लाहो लीजें ॥ एयांकणी॥ एकशत कोडीथने वली सत, कोडि चोराशी लाख ॥ योजन नदीश्वर वर पहोलो, ए थागमनी तारख ॥ ज० ॥ ५ ॥ तेह तणे मध्ये थति महोटी, चिद् दिशें चिट्ठ चिटुं वापी ॥ जंबूदीप प्रमाण ए नांखी, उडी नहिय कदापि ॥ न० ॥३॥ एकेकी वापीने थतरें, दधिमुख एक गणीजें ॥ दधिवरणा शोले एक सरिखा, थागममाहे जणीजें ॥ ॥ ४ ॥ एकेकी वापीने अतर, रतिकर दो दो कहा ॥ वर्णे कनकसरीखा सुदर, वत्रीश चिद्ध दिश सहीयें ॥ ॥ ५ ॥ वावोनी वचमां चिट्ठ दिशे एक एक, अजनगिरि एम चार ॥ सहस्र चो राशी योजन कचा, थजन जिम थाकार ॥ न ॥ ६ ॥ एव वावन पर्वत उपरें, बावन जिन प्रासाद ॥ चोवारा ध्वज वापि विराजित, दीनडे होय थाह्लाद ॥ न ॥ ७ ॥ शतयोजन श्रआयाम कहीजें, पचास योजन पहोला ॥ वहोतेर योजन कचां जिनघर, यात्र करे पुण्य वदुला ॥ न ॥ ७॥ चारे चार विराजे सुदर, कचा योजन शोल ॥ मुखममप रंग ममप रूडा, दी होवे रगरोल ॥ ज० ॥ ए॥ पूर्व दिशे षनानन स्वामी, दक्षिणे जिन वर्धमान ॥ पश्चिम दिशे चशनन उत्तर, वारिपेण जग वान ॥ न ॥ १० ॥ चोशनशे ने वलि थडतातीश, प्रतिमा संख्या कहिये ।। पंचशत धनुप प्रमाणे कची, जिनवाणा शिर वहियें ॥'न० ॥ ११ ॥ मूल गनारे एकेक पासें, पडिमा सत्त्यावीश ॥ चैत्यथून चिद्वनी शोज, एम एकसो चोवीश ॥ ज० ॥१५॥ ते वावन्न गुणी तव , c8 जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. थाये, चोशनशे ने थडयाल । सरख्या नांरखी थागममांहे, प्रजी रीन दयास ॥ ज० ॥ १३ ॥ तिदां श्रीविजय ने थमित नरेश्वर, बहुपरिबारे यावे ॥ थान दिवस महोत्सव थाही, पूजा विविध रचावे ॥न. ॥१॥ जक्ति करे जिननी नवरंगी, नव नव थगें पूजी । समकित निर्मल करवा नविने, ए सम करणी न दूनी ॥ न० ॥ १५ ॥ पाढा फरि श्रावी मविरमां, जिनमदिर जूहारे ॥ तत्ता थे ये नाटक करता, पाप पमलने वारे ॥ ज० ॥ १६ ॥ एक दिन मेरुवनें नदनमा, थाव्या जिन नमवाने॥ बेद राजेसर अतिथलवेसर, कर्मनीरज दलवाने ॥॥ १७ ॥ जिणहर चार जगीश विराजे, कचपणे बत्रीश ॥पचवीश योजन पहोलपणे ते,वायत वली पंचास ॥ ज० ॥ १७ ॥ प्रतिमासख्या एक प्रासादें, एकसो वीक्ष गणि राखी ॥ नक्ति करे धावी तिहा राजा, वहु विद्याधर साखी ॥ ज० ॥ १५ ॥ पंचमेरुवन सख्या करतां, विव उन्नुशे कहीयें ॥ ए जिन नित्य उठीने नमता, नवियण शिवसुख लहियें ॥ ज० ॥णानक्ति करीने नदन वनमां, फरता मुनिवर दीना ॥ शमति विपुलमति ण नामें, जोता तान्या मीठा ॥ ज० ॥ २१ ॥ दवे कदेशे मुनिवर उपयोगी, अग्यावीशमी ढाल ॥ बीजे खमें रामविजय कहि, धन्य जस धर्मनो ढाल ॥ न० ॥१२॥ ॥दोहा॥ ॥ अतिशय नाणी मुनि कहे, निमुणो तुमें राजिव ॥ श्रायु अथिर जि नवर कर्पु, श्यो तेहशु प्रतिबघ ॥१॥ वायु श्रमूलक नरतणु, जो धर्मे जो डाय॥ नहिंतर ए नव प्रणा, कोही काम न थाय ॥५॥ ते माटें तुमने अमो, कहियें दे उपदेश ॥ चेताये तेम चेतजो,थायु रघु लवलेश ॥ ३ ॥ ॥ ढाल उंगपत्रीशमी॥ ॥ निश्डी वैरण दुइ रही ॥ ए देशी ॥ निही मोदनी परिहरो, मत कघो हो रहेजो सावधान ॥ कुमति रमणीने दूरे तनो, समतानो दो जजो सग सुजाण ॥ नि०॥ १ ॥ श्रायु दिवस बहीशनु, रघु तुमचू दो निसुणो राजिव ॥ लो अरथी तुमें धर्मना, तिण कारण हो थमें नारव्यु नरिंद ॥ नि ॥२॥ वात सुणी राय चितवे, हे हायो हो एदलें अवतार ॥धर्म कस्यो नदि चोपन्छ, मोदनूपें दो बलिया निरधार ॥ निं॥३॥ मम रह्या अमें मोहमां, श्री शांतिनायनो रास खंग वीजो. GU माना हो या सूधा दास ॥ नीशासो नारखी कहे, मुनिवरजी हो थम कोण हवाल ॥ नि० ॥ ४ ॥ पडता नवजलकूपमा, कोण करशे हो अमची सनाल ॥ रामत रमणीj करी, नवि जोयु हो कां दीर्घ विमास । नि० ॥ ५ ॥ लालच लोनमांहे पड्या, परमारथ हो न लह्यो मुनि राय ॥ हाथ घसी मारखी परें, शु कर हो मुख कहे हवे हाय ॥ नि ॥ ६ ॥ मुनि कहे खेद करो रखे, नथी विणतुं हो तुमचुं हजी काय ॥ साधो सयम थादरें, थाणा शुरू हो जेहथी मुख थाय ॥ नि ॥ ७ ॥ एकदिननो गुचनावथी, आराध्यो हो दे सयम मुख ॥ तो तुमें शी चिता करो, वे बदुटिन हो धरो मनमां सुख ॥ नि० ॥ ७ ॥ मुनि वदी कता वला, राजेश्वर हो थाव्या निजगेह ॥ राज तवी निजपुत्रने, लिये सयम हो वेद नृप ससनेद ॥ नि० ॥ ॥ ॥ अजिनदन मुनिवर कनें, लीई दीदा हो शिक्षा यदि सार । अणसण वेद मुनि श्रादरे, करे 5 कर दो तेहनी वलिदार ॥ नि ॥ १० ॥ लख चोराशी जीवनें, खमावे हो मूकी मन रीप ॥ शरणां चार करे वली, सहे परिसह हो मुनि चढती जगीश ॥ नि ॥ ११ ॥ पादोपगम समाचस्यु, थमिततेजा हो श्रीविजय मुनीश ॥ उक्कर तप साधे जला, सुर किन्नर दो नामे तस शीश ॥ नि ॥ १२ ॥ कर्म वशे श्रीविजयजी, मन सांगरे हो निज जनकनी झदि ॥ मोह पिशाचें बल्यो,तिहां, वांध्यु तिहा कणे हो नीयाणु थम ॥ नि ॥ १३ ॥ मुक्कर तप प्रनावथी, मुफ पितरनी हो सरिखो नूपाल ॥ होजो हु थाव त नवें, एम चित्यु दो धिक् राग चमाल ॥ नि ॥ १४ ॥ श्रयु दयें वेद मुनि चवी, ते उपन्या हो प्राणत सुरलोक ॥ निन्न विमाने सुर थया, कीधा किरिया हो नवि थाये फोक ॥ न॥१५॥ नदिकावर्त विमानमें, थमिततेजा हो सुर दिव्यच्चूल ॥ स्वस्तिकावर्त्तमा रुपन्यो, श्रीविजय जी दो नामें मणिचूल ॥ निं ॥ १६ ॥ प्रीति घणी वेढुनें वनी, सुख विलसे दो मनथी परिवार ॥ नदीश्वरादिक तीर्थनी, करे यात्रा हो राम समकित धारणनि॥१॥ पंचम नवें एम कपन्या, सुर मुदर हो उंगणात्रि शमी ढालावीजे खमें सोहामणी,रामविजयें हो नाखी उजमाल ॥निं०॥॥ ॥ ढाल त्रीशमी॥ ॥ कलश ॥ गिरुथा रे गुण तुम तणा ॥ए देशी ॥ नवियण निर्मल नाव ध GU जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. थाये, चोशनों ने थडयाल ॥ सख्या नाखी थागममाहे, प्रतुजी पीन दयाल ॥०॥ १३ ॥ तिहां श्रीविजय ने अमित नरेश्वर, बदुपरिबारें यावे ॥ श्रात दिवस महोत्सव यादी, पूजा विविध रचावे ॥न. ॥१॥ नक्ति करे जिननी नवरगी, नव नव अगें पूजी ॥ समकित निर्मल करवा जविने, ए सम करणी न दूनी ॥ ज० ॥ १५ ॥ पाना फरि थानी मविरमां, जिनमदिर जुहारे ॥ तत्ता थे। थे नाटक करता, पाप पमलने वारे ॥ न० ॥ १६ ॥ एक दिन मेरुवनें नदनमा, थाव्या जिन नमवाने ॥ बेद राजेसर अतिथलवेसर, कर्मनी रज दलवाने ॥॥ १७ ॥ जिणहर चार जगीश विराजे, कचपणे बत्रीश ॥पचवीश योजन पहोलपणे ते,आयत वली पंचास ॥ ज० ॥ १७ ॥ प्रतिमासख्या एक प्रासादें, एकसो वीश गणि राखी ॥ नक्ति करे थाव। तिहां राजा, बद्ध विद्याधर साखी ॥ज. ॥ १५ ॥ पंचमेरुवन संख्या करता, विव बन्नुशे कहीयें ॥ ए जिन नित्य वतीने नमता, नवियण शिवसुख लहियें ॥ न ॥रानति करीने नवन वनमा, फरता मुनिवर वीता ॥ जुमति विपुलमति इण नामें, जोता लाग्या मीना ॥ न ॥ २१ ॥ हवे कहेशे मुनिवर उपयोगी, श्रग्यावीशमी दाल ॥ बीजे खमें रामविजय कहि, धन्य जस धर्मनो ढाल ॥ न० ॥१२॥ ॥दोहा॥ ॥ अतिशय नाणी मुनि कहे, निसुणो तुमें राजिंद ॥ श्रायु थपिर जि नवर कर्पु, श्यो तेदशं प्रतिबध ॥१॥ थायु अमूलक नरतणु, जो धर्में जो डाय ॥ नतिर ए नव पूरणा, कोडी काम न थाय ॥२॥ ते माटें तुमने अमो, कहिये जे उपदेश ॥ चेताये तेम चेतजो,थायुरघु लवलेश ॥ ३ ॥ ॥ ढाल अंगात्रीशमी ॥ ॥ निश्डी वैरण दुइ रही ॥ ए देशी ॥ निश्ही मोदनी परिहरो, मत यो हो रहेजो सावधान ॥ कुमति रमणीने दुरे तजो, समतानो हो जजो सग मुजाण ॥ नि०॥ १ ॥ थायु दिवस बधीशनु, रघु तुमचूं हो निसुणो राजिंद ॥ नो थरथी तुमें धर्मना, तिण कारण दोयमें नार{ नरिंद ॥ निए ॥२॥ वात सुणी राय चितवे, हे दास्रो हो एहलें अवतार ॥धर्म कमो नहिं चोंपञ्च, मोहनूपें दो बलिया निरधार ॥ नि॥२॥ मम रह्या में मोदमा, , श्री शांतिनायनो रास खंमत्रीजो. GH ॥अथ तृतीयखंमस्य प्रारंनोऽयम्॥ ॥ दोहा ॥ ॥ सिम नमुं कर जोडिनें, धरि मनमा आनंद ॥ यंतर बातम जेहथी, याये पूर्णानद ॥ १ ॥ प्रथम सयोगिपणु जिणें, अनुनवियुं नवमांय ॥ उल्लप्टें नव कोडि लघु, दोय कोडि सख्याय ॥ २ ॥ तस आणायें चालतां, मुनि नव कोडी सहस्स ॥ नमीयें दो कोडी सहस, लघु पद एह रहस्स ॥३॥ सकलगुणे करि जे जया, मद नाख्या जेणें मोडि ॥ सकल गुणीने दु नमु, नित्ये वे कर जोडि॥ ४ ॥ वरदायी वाघेश्वरी, कविजननी थाधार ॥ ते श्रुतदेवीने नमी, त्रीजो खम कहु सार ॥ ५ ॥ नवि निसुणो ना करी, मूको कच पच वात ॥ कुण विमासण मन करे, पीतां दूधनी धात ॥ ६ ॥ कथा रसिक जिनशातिनी, वक्ता रसिक हवत ॥ पण श्रोता रसिया विना, केम धास्वाद लहत ॥ ४ ॥ यमुक्त ॥ बप्पय ॥ विप विनतानें शोक्य, वली विप वयें रमापण ॥ विप दारिडी गोष्टि, वली विप कुलने खपण ॥ विप स्वामी श्रपमान, वली विप चचल गोरी॥ विप गायनने खांसि, वली विप गलियो धोरी ॥ पूत कुप्त कुवास विप, विप विश्वास वैरी जना ॥ प्रीति कहे सुण चतुर नर, विप पंमित वचन थनावना ॥ १ ॥ पूर्वदोहा ॥ सक थश्ने सानलो, मूको विकथा जिन गुणरस श्रवणें सुणो, चिदानद नरपूर ॥ ७ ॥ ॥ ढाल पहेली॥ ॥ माला किहां ले रे ॥ ए देशी ॥ पूर्व विदेहें सुणो नवि नेहें, रमणि विजयमां वारु रे ॥ मुनगा नाम पुरी सुरपुरना, सरखी थति दीदारु रे ॥ १ ॥ रंगें मुणीय रे, जिनगुण वात विनोद, श्रहोनिश नणीये रे ॥ ॥ ए थोकणी ॥ ते नयरीमां नहि वैरीनो, वाचाट तपो न जोरो रे ॥ धर्मे सद्भुनी मीजी नीनी, नवि को दीसे कोरो रे ।। २० ॥ ५ ॥ वधन कुसुम विना नहिं जनमा, नहिं स्नेहनो क्ष्य विण ती रे ॥ चैत्यशिखर विण कम न दीसे, न्यायनिपुण जन दीपे रे ॥ र ॥ ३ ॥ जिहा व्यवहार गुरों करी रूडा, निवसे व्यवहारी महोटा रे ॥ नयमारग चाले चतुराई, नहिं मनमाहे खोटा रे ॥ र ॥ ४ ॥ परपरिवा मूक सरीखा, पर ॥

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जैनकथा रत्नकोप नाग भागमो.
हीने, जिनगुणस्तवना कीजें रे। सांसारिक धंधो ठोडीने, शुद्ध अनुनारत
पीजे रे ॥॥१॥ परमपदारथ सुरुतस्तारथ, पुरुषारथ पामीज रे ॥ बिन
गुण गातां निजगुणनोगी,थतरमल सविठीजे रेनाशगंगाजल उमापन
जग कीर्ति, परनवें सुगति वरीज रे ॥ प्रचुगुण श्रवणें श्रवण करीने, या
तम शुक्ष करीजें रे ॥ ज० ॥ ३ ॥ विक्था वारी गुरु विचारी, एकम
ना चाखीजें रे ॥ जिनगुण मुनिगुण मेवा माग, स्वाद हृदय राखी रे
॥ न ॥ ४ ॥ शांतिप्रनुनी स्तवना माला, गुण गूथी धारतां रे ॥ सुम
ति सुगृहिणी साथें चेतन, क्रीडा करो मतपता रे ॥ न ॥ ५ ॥ र न
वाधे शिवमुख साधे, प्रगुण जे थाराधे रे ॥ शातिप्रजुनें रासें रमतां,
कीर्ति कमला वाघे रे ॥ ज० ॥ ६ ॥ पंचम नव एम प्रजुनी स्तवना,
बीजे खमें कीधी रे ॥ ए माहे जे न्यूनाधिक होवे, ते लेजो कवि शोधी रे
॥ ज०॥ ॥ सवत सत्तर पचाशीया वर्षे, राजनगरमाहे नेट्या रे ॥ त्रिस
सानदन वीर जिनेश्वर, 5 ख दोदग सवि मेटघा रे ॥ ॥ ॥ ते प्र
नुनी सान्निध्ये सपूरण, खम थयोसुप्रमाणो रे ॥ वीजो उज्ज्वल वीज शशी
परें, चढती कला मन थाणो रे ॥ ज० ॥ ए ॥ दाम न घेसे सुणतां
जिनगुण, पावन तन मन थाये रे ॥जवकोटीसचित नवि जननां,
पातक नासी जाये रे ॥ न० ॥ १० ॥ तपगठनायक सूरि सवाई, श्री
लक्ष्मीसागर सूरि राजे रे ॥ श्रीगुरु सुमतिविजय कवि गिरुथा, महिमा
अधिक विराजे रे ॥न ॥ ११ ॥ तस पद पंकज मधुकर सरिखो, राम
विजय कहे रसियो रे ॥ शांतिनिनेश्वर गुण गावानें, मुफ श्रातम मन
सियो रे ॥॥ १२ ॥ सर्व मलीने त्रीशनी संख्यायें, ढाल कही ए खमें
रे । एक मनें सांजलतां जिनगुण, जहियें मुख श्रखंमें रे ॥ ज०॥ १३ ॥
सर्वगाया ॥ २८ ॥ श्लोक तथा गाथा ॥ २० ॥ ढाल ॥ ३० ॥प्रथम
खम गाथा ॥ ४२ ॥ प्रथम खम श्लोक तथा गाथा ॥४१॥ प्रथम
खंम दाल ॥१०॥ उन्नयो खमयोर्मिलित्वा गाथा ॥ १५६५ ॥
चन्नयो खमयोमिलित्वा प्रास्ताविक श्लोक तथा गाथा ॥ ६१ ॥
खमध्यढाल ॥ ४ ॥ इति श्रीशांतिजिनप्रबधे प्राकृतप्रबचे हावशनवनि
वधे सुकृतानुसघे सत्यार्थसधे हरिप्रतिदरिसवधकलितोमत्स्योदरसमधमिलि
तोविद्याधरसुरपदरूपनवध्यवर्णननामा दितीय खम सपूर्ण ॥ ५ ॥

श्रीशांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. नए सकलकला शीखी लघुवयथी, अनुक्रमें यौवन थायो रे ॥ सुख विलमे परणी नृपकन्या, दिन दिन चढत सवायो रे ॥ २० ॥ २२ ॥त्रीजे खमें पहेली ढालें, रामविजय कहे वाणी रे ॥ वेदु वधव सुख विलसे वगुलां, नेह निविड गुण खाणीर॥२३॥ सर्व गाथा॥३॥श्लोक गाथा मलीने ॥१५॥ ॥ दोहा ॥ ॥ इण अवसर तिण नयरीयें, उपशमजलें थगाध ॥ शमदमवता थाविया, नामें स्वयंप्रन साध ॥ १ ॥ समवसस्या वननूमिका, मुनि म हत महनीय ॥ शूरा थर सूधा सहे, जे जे वे सहनीय ॥ २ ॥ एहवे रयवाही चढयो, स्तिमितसागर राजान ॥ वलतां वीशामा जणी, याव्यो तिण उद्यान ॥ ३ ॥ दीठो मुनि कंकलितरु, नीचें निश्चल ध्यान ॥ साधे योगदशा नली, मुनि रहियो एक तान ॥ ३ ॥ वदी कर जोडी कहे, धन्य धन्य गुणपात्र ॥ धन्य धरामां ते नरा, जे करे तुम्हारी यात्र ॥ ५ ॥ तुम पेखे पावन थयां, मुफ लोचन माहाराज ॥ रुपा करी द्यो देशना, गिरुथा गरिव निवान ॥ ६ ॥ कास्सग्गपारी प्रेमगु, वेग उत्तम गम ।। कहे उपदेश सोहामणो, शमरसगुणना धाम ॥ ७ ॥ ढाल वीजी॥ ॥ नणद तीली ॥ ए देशी ॥ सुण सुण रे राजन रढियाला, कडया ए कपायना चाला रे ॥ सुण राजन रढीयाला ॥ ए यांकणी ॥ सुवसन ने वली फूल, माणसने मेलें धूल रे ॥सु०॥ इह नव परनव ३ खदायी, एह साथै अनादि सगाई रे ॥ ९ ॥ १ ॥ दोय नामें जग धधोल्यो, तव स्तिमितसागर नृप वोल्यो रे ॥ सु ॥ प्रनु कहो एहना कति नेद, केम पाम्यो एहथी खेद रे ॥ सु० ॥ २ ॥ कहे मुनिवर दोयथी दुवा चार, वाध्यो एहनो विस्तार रे ॥ सु० ॥ पहेलो क्रोध ने बीजो मान, माया त्री जी ने लोन थमान रे ॥ सु० ॥ ३ ॥ जुन क्रोधथकी शु थावे, यहोनिश बातम श्रवटावे रे ॥ सु० ॥ एह मानथकी मति जावे, थरता पण गुण गवरावे रे॥सु॥ ॥ माया विपवेली समापी, तेगुण ढकण सुपरेंजापी रे ॥ सु० ॥ लोन नवि टकवा दे मननें, जाणे मेलु मेलु बनु धनने रे ॥ सुप ॥ ५ ॥ एकेकना नेद वे चार, कहे मुनि करुणानमार रे ॥ सु ॥ क्रोध पहेलो श्रनतानुवघी, न टले जेहनी के सधि रे ॥ सु० ॥ ६ ॥ करे , १२ . रे ԵԵ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. गुण सेवा शूरा रे ॥ पंगु परनुं धन हरवाने, परमेश्वर्यना पूरा रे ॥२०॥ ॥ ५॥ तिण नगरीमा स्तिमितसागर ण, नामें नृपति गाजे रे । स जान जन रजन उपकारी, उखीयानां 5 ख नांजे रे ॥२०॥ ६ ॥ न्यायें साजो वलथी ताजो, सवलो जेहनो थाजो रे ॥ पट् गुण जाणे सवि सुख माणे, न लदे कोइ तस माजो रे ॥ २० ॥ ७ ॥ शियलगुणें पूरी वलि वड नूरी, रमणी दोय यति रूडी रे ॥ मोदनगारी रमझम करती, दापे सोवन चूडी रे ॥ र ॥ ७ ॥ एक वसुंधरा वीजी अनुधरा, चाले पतिने बढ़े रे ॥ धर्मे लीणी देव गुरुनें, नित्य जीने वदे रे ॥ २० ॥णा हवे प्राण तथी अमिततेजानो, जीव चवीने अवतरियो रे ॥ वसुधरानी कूखे वारु, नाग्यवशे गुण दरियो रे ॥ र ॥ १० ॥ सूतां मध्यरयणीने स मयें, दीपा श्रति श्रीकारो रे ॥ गजवर पद्मसरोवर शशिधर, तृपन वली ए चार रे ॥२०॥ ११ ॥ इलधर जनम तणां ए सूचक, दीठां रमणी रुडां रे ॥ कत कहे तुज उज्ज्वल वणे, सुत होशे नहिं कूड़ा ॥ २० ॥ १२ ॥ प्रसव्यो सुत तेणें पूरणमासे, उत्सव कीधा सवला रे ॥ सुत सोनागी कुसनो दीवो, चिरंजीवो कहे थवला रे ॥२०॥ १३ ॥ वर्ष धरीने "थपराजित” रुडं, नाम तव्यु निज तातें रे ॥ वाधे उज्ज्वल बीज तणो जिम, अहोनिश रयणीकांत रे ॥२०॥ १४ ॥ बीजो ते सुर लोकधी चवियो, मणिचूलामर नामें रे ॥ राणी थनुधरा कूखें थाव्यो, रन ए पूरण कामें रे ॥ २ ॥ १५ ॥ सिह तरणी पूर्णकुन लक्ष्मी, रयणसमुदय दरियो रे ॥ निर्धूम श्रमि ए साते देखे, जब कूखे अवतरियो रे ॥२०॥ १५ ॥ प्रीतमनें परकाशे पमिनी, साच कहो मुफ स्वामी रे ॥ वदालेश्वर रातें में दीठा, सुदणां नहिं कोई खामी रे ॥ रं ॥ १७ ॥ स्तिमितसागर नरवरें बोलाव्या, शास्त्र तणा बढ जाए रे ॥ वासु देव सुत दोशे बलियो, प्रकट्यो पुण्यनिधान रे ॥ २० ॥ १७ ॥ दान वे ने तेहने वोलाव्या, अनुक्रमें सुत सोनागी रे ॥ मध्यनिशा प्रसष्यो पुण्य वतो, नाग्यवशा एम जागी रे ॥ २० ॥१ए ॥ नाम "अनंतवीर्य" तस स्थापे, दियडे हर्प धरीने रे॥वेगु मुतने सत्सगें माता, तेडे लाम करीने रे ॥ २० ॥ २० ॥ पुत्र तमो सदरें थम श्रावी, दर्प घणा उपजाव्या रे ॥ मुतनी तुम मुख देखी थमचा, 5 ख सवि दूर नसाव्यां रे ॥ २० ॥२१॥ " ॥

श्री शांतिनाथनो रास खमत्रीजो. ए बहु मान ॥ ३ ॥ गुणवती गोरी निपुण, चाले गजगति मत्त ॥ मानवती पण कथने, चाले धनुदिन चित्त ॥ ४ ॥ यमुक्त ॥ दोहो ॥ माणिणी तित्तठ माण करे, जीतन कंत सुहाय ॥ जे लाखीपी वाणही, तोहि पहेरीजें पाय॥१॥पूर्व दोहा॥ एम सागर कठपसमी,सुखमां वाहे काल॥पण ते सवली चोरटी, पियुचित्त चोरणहार ॥ ५ ॥ सहि ए चोर ते मानियें, जे हुवे चित्तह चोर ॥ धण कण कचन जे हरे, चोर नहिं ते ढोर ॥ ६ ॥ तेहनी कूखें कपन्यो, पद्मकेसर अनिपान ॥ राजकुमर रलीया मणो, सोहे सुगुणनिधान ॥ ७ ॥ ॥ ढालत्रीजी॥ थवरीयोने दूजे रे नटियाणी राणी वड चूचे ॥ ए देशी ॥ एक दिन योगें हो राजेश्वर राणी महोलमें, वेग रग विलास ॥ केश समारे हो सुकुलिणी निज वालम तणा, धरती हियडे उन्नास ॥१॥ जगमाहे जो जो हो जोरावर याणा मोहनी ॥ ए थाकणी ॥ दिलनर दपती दोय ॥ रंगें रमाहे हो न जगाहे सूता जीवने, नाखे उर्गति सोय ॥ ज० ॥ ५ ॥ पलीयु निहाली हो एक नामा नाखे नूपने, स्वामी दूत निहाल ॥ थाव्यो थलसर हो यानुनो ए उतावलो, जोयु चिट्ठ दिशें नाल ॥ ज० ॥ ३ ॥ दूत को न थावे हो थलवेली एणे मदिरे, चिट्ठ पासें रे जूफार ॥ रहिया ने चोकी हो लाउले माहरा, हाथ ग्रही हथीयार ॥ ज० ॥५॥ दास न कीजें हो रगीली राणी रगमें, उपजावी मुफ ब्रांति ॥ तु जो निहाले हो तो मुफ नजरें केम थावे नहिं, सवली कौतुकवात ॥ जा ॥ ५ ॥ हेजें हरिणाही दो दोशीली हरखीने कहे, पियु शं वोव्याजी बोल ॥ कदिये तुम पागल हो वालमजी में कीधी नहिं, कूडी हांसी निटो लान॥६॥राय विमासे हो तमासे वात किती कहे, तव राणी गुन वेश । सर देखाख्यो दो मननो सशय वारवा, शिरनो उज्ज्वल केश ॥ ज०॥४॥ दूत जरानो हो स्वामीजी ए थाव्यो सही, कहेवा करणनी पास ॥ इशियार रहेजो दो हुँ थावु ई मतावली, मुणि नृप चिते विमासि ॥ ज० ॥ ७ ॥ धिक् धिक् मुफने दो में पूर्वजरीति न थादरी, दुलोनीमाहे लीह ॥ पलीयाथी पहेला दो जे झदि मूकीने नीसया, झं नाखु दवे जीद ॥ ज० ॥ ए ॥ राजाचितयति ॥ दाण सुपने न . ए जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. समकित गुणनो घात, एहथी होय नरकनिपात रे ॥ १० ॥कलो पार रेख समाणो, वर्जे एह ते धन्य जाणोरे ॥ सु० ॥६॥ वीजो कोष अप्रत्या ख्यान, पृथिविरेखा उपमान रे ॥४॥रहे वरस लगें ए नाडो,श्रावक व्रत वेलायें थामो रे ॥ सु० ॥ ॥ तिर्यंचगतिमां पहोंचाडे, प. बहु जब माहे जमाडे रे ॥ सु०॥ प्रत्याख्यानावरणीय एत्रीजो, हणे साधुना गुणनु देजो रे ॥ सु ॥एवेलुनी रेखा सरिखो, थापे मनुज तणी गति निरखो रे ॥१०॥ जलरेखा सम सज्वलणो, चोथो रोध करे ज्यु बलनो रे ॥ सु० ॥ १० ॥ न थावन दे यथारख्यात गुणने, सूधा पण समण माह पने रे ॥ मु० ॥ गति नापे देवनी सारी, म करो ए क्रोधणं यारी रे ॥ सु० ॥११॥ चारेनो एकज ढग, विरुज ए साथै प्रसग रे ।। सु० ॥ जन्म वर्ष श्रने चोमासी, पद स्थिति अनुक्रमें नासी रे ॥ सु ॥ १२ ॥ स्पेन पाषाण अस्थि ने काष्ठ, तृण सम चिट्ठ मान थनिष्ट रे ॥ सु० ॥ वश मूल वली मीढसिग, गोमूत्रा वलेह सुचग रे ॥ सु० ॥ १३ ॥ माया चिट्ठ नेवें जांखी, सुणो लोन उपम चित्त राखी रे ॥ सु० ॥ कमि राग थने वली पंक, अजन दरिानो रंग रे ॥ सु० ॥ १४ ॥ एम थाये भेद ए शोल, एह वरजे बाकमबोल रे ॥ मु॥थति श्रादरथी जे सेवे, तेहने बढुन सुख देवे रे ॥ १०॥ १५॥ ते माटें कषाय न करवा, शिवनारी उपाय ए वरवा रे ॥ सु० ॥ थोडा पण ए सेव्या माग, नजरें जोतां के नाता रे ॥ ९ ॥ १६ ॥ मित्रानदादिक नडिया, कषायतणे वश पडिया रे ॥ सु० ॥ कहे स्तिमितसागर मुनिराया, कुण तेह जे तुमें गाया रे ॥ सुरु ॥ १७॥ कहे मुनि महानुनाव सुणीजें, मुणी झानतणु फल लीजें रे ॥सु ॥ मित्रानदादिक वात, कषाय कपर थवदात रे ॥ सु० ॥१७॥ त्रीजे खमें बीजी ढाल, नांवी एरंगरंसाल रे ॥९॥ कहे रामविनय नवि प्राणी, मुजो सशुरुनी वाणी रे ॥१॥१॥ सर्वगाथा॥५॥श्लोक॥१॥ ॥ दोहा॥ ॥ कहे मुनि इणनरतें नलु, अमरतिलक पुर सार ॥ अमरपुरी सम कपन्यु, जिहा धन धान्य अपार ॥ १ ॥ सुखीया लोक सहू वसे, उखी तणु नदि नाम ॥ मकरध्वज नामें नसो, नूप गुणें थनिराम ॥ २ ॥ मद नसेना तस सुदरी, राणी रूपनिधान ॥ सकलकलायें सोनती, प्रीतमर्नु श्री शांतिनाथनो रास खमत्रीजो. ए३ तु थम 5 खथी, तो ले जाउँजी वाल ॥ सुत ले चाल्यो हो व्यवहारी याव्यो निजपुरे, दर्प धरी उजमाल ॥ ज० ॥ २१ ॥ सुतने न देखे हो पासें मायडी मोहथी, पीडाणी यसमाध ॥ काल करीने हो परलोके ते पहोती तदा, मोहनी महोटी थाधि ॥ ज० ॥ २२ ॥ सुत लेश्यावी सोप्यो शेनें नारीने, नाम अमरदत्त दीध ॥ पुत्री एक तेहनें हो नामें ठे सुरसुदरी, मनह मनोरथ सिह ॥ ज० ॥ २३ ॥ त्रीजे ए खमें हो ढाल थइ त्रीजी नली, रामविजय कहे एम ॥ पूर्व वाध्यां हो जे रसनां कर्म जेणी परें, उदय यावेजी तेमज॥४॥सर्वगाथाश्लोको।।५।। ॥ दोहा ॥ ॥ तेहज नयरीमा वसे, सागरशेतनो पुत्र ॥ मित्रानद नामें नसो, जे राखे घरसूत्र ॥ १ ॥ मात पितानें वजहो, सोनागी सुविनीत ॥ थ मरदत्त साथै घणी, वधाणी तस प्रीत ॥ ॥ गुणवता वेहू नला, अमर ने मित्रानद ॥ धनवत सुत जाणी नमे, सद्को धरि थानद ॥३॥ यत ॥ विगुणमविगुण वा रूवहीण विरम्म, जडमवि ममतं मद सत्त य सूर ॥ अकुलमविकुलीण तं पयपति लोया, नवकमलदलही ज विलोएइ लष्ठी ॥ १ ॥ वर्षाकालें एक दिन, क्रीडा करवा टोय ॥ क्षिप्रा शैवलिनी तटें, रमे थषुलिया सोय ॥ ४ ॥ काली उची तदा, मित्रानने त्याहि ॥ मोई मुहमाहे पडी, वड वाध्युं शब ज्याहि ॥ ५ ॥ ह सतो मित्र वली कहे, महोटु कौतुक एह ॥ श्रचिती ए अमोलिका, शवमुखमाहे पडेद ॥ ६ ॥ कोप्यु शव वलतु जणे, मित्रानंद म फूल ॥ ए वड वधाइश सही, मुफ जेम तु मत नूल ॥ ॥ वचन सुणी वि लखो थयो, जय लाग्यो मनमांहे ॥ हा हा ण ए कयुं, रखे साचु ए थाय ॥ ॥ कहे अमर अपवित्र ए, थइ थमोलिका बाज ॥ व्यो वीजी ए मादरी, रामत रमवा काज ॥ ए ॥ व्यय थयुं मन तेदनु, दोश्थाव्या फरिगेद ॥ मित्रानदने सानरे, क्षण क्षण शव वच तेह ॥ १० ॥ ॥ ढाल चोथी॥ ॥ रसीयानी देशी ॥ रयणीयें सूता हो मित्रानदने, नयणें न थावे रे क्षण एक निंद ॥ यदो थहो में दासी श्रण जाणता, कीधीश बनी रेधरिमन खेद ॥१॥ सुगुण सनेहा रे दासीन कीजियें ॥ए श्रांकणी॥ . , - एक जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. दिन्नं चंगं, तवनियमेण न सोसियमंगं ॥ नवि पुलिाई नवि समझो, हा हा जम्म गउँ अकयधो ॥ ५॥ पूर्वढाल ॥ देखी तिला दो प्रीतमने पूरे पद्मिनी, पियु शु चितो ठो चित्त ॥ मन लाजो गे जराने श्रावीने जाणी, पण तुमें रहोजी निश्चित ॥ ज० ॥ १० ॥ पर वजडान दो पुरमांहे एहवो, तुमने कहेशे गरढानी जेद ॥ तेहने से डावी हो शिखामण सूधी थापणू, मोकला यमगेह ॥ ज० ॥११॥ एम न बोलीजें दो ए वयण विवेकविहीननु, जरा थमने शणमार । यमुक्त ॥ थलकरोति च जरा, राजामात्यनिपग्गुरुन् ॥ विपत्ति पण्यस्त्री, मनगायनसेवकान् ॥ ३ ॥ पूर्वढाल ॥ पण नवि कीधो हो यो वनवयमां धर्म जे, ते मुफ शोच थपार ॥ ज० ॥ १२ ॥ दासु में कीर्छ दो वालमजी सहेजें तुम्ह तणु, मत धरजो मन खेट ॥ रगें रमीजें रो रसीला लीला प्रेमनी, न करो थतर नेद ॥ ज० ॥ १३ ॥ कहे प्रिये थाइश हो हु तापस वनमाहे जइ, नवि करवी दवे वार ॥ कामिनी नि मुणी दो मनमांहे चिते गं करु, हु एकलही निर्धार ॥ ज० ॥ १४ ॥ राज सोपीने हो निज अगजने नृप नीसखो, चाली राणी सघात ॥ बेनु ज लीधी हो दीक्षा तापसनीनली, बोडी थस्थिर सवि थाथ ॥ ज० ॥ १५ ॥ गूढ जे हतो हो राणीने गर्न समो तदा, न लह्यो तेहनोजी नेद ॥ दिन दिन वाध्यो दो चिता वाधी चित्तमां, राय सुणी लह्यो खेद ॥ ज० ॥ १६ ॥ कएं कुलपतिने दो सघलु समजावी सही, कड़े मन करिय बालोच ॥ तापसीपासें दो मूको सचवाये सही, शो करवो हवे शोच ॥ ज० ॥ १७ ॥ श्रनुक्रमें जणीयो दो शुनलक्षण सुत सोहामणो, माने दुश् असमाधि ॥ वनमाहे वाये हो चिव दिशिनो शीतल वायरो, वाधी थेगें दो व्याधि ॥ ज० ॥ १७ ॥ थयां सवि पितातुर हो तापस मनमा चितवे, केम राखी/ ए बाल ॥ मा विण मुतनी हो कहोने पिता कुण लहे, ए थयो महोटो जंजाल ॥ ज० ॥ १५ ॥ यत ॥गाषा ॥ बाल स्तमाय मरण, नहा मरण च जूवणारंने ॥ वृहस्स पुत्त मरण, तिन्निवि गिरुथाइ घरका ॥ ४ ॥ पूर्वढाल ॥ एहवे तिहां पायो हो एजेणी वासी वाणीयो, नामें देवधर शाद ॥ पाय लागीने दो पडे तेहनें प्रेमर्थ, केम तुमें रहित उत्साह ॥ ज० ॥ २० ॥ कुलपति जसे हो जो खीयो श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो एप अणावी पेटिका, माहे स्थापी रे जात ने पाणी ॥ सुत बेसारी मांहे वाहिर, तालक दे रे करि सहिनाणी ॥ सु० ॥ १७ ॥ राजन ए मजूपा माहरी, माहे घरनो रे सार सवे ने ॥ यत्ने राखो नृप कहे गु करु, तुज विणधन ने रे जे मुफ टे ॥ सु० ॥ १७ ॥ मत्री कहे सेवकनो धर्म ए, कटे पडियो पण स्वामी न वचे ॥रायें रहे स्थानक ते धरी, मत्री पहोतो रे जिनगृह सचे ॥ सु० ॥ १५ ॥ करे रे अजहि महोत्सव श्रादरें, सघने पूजे रे दान 5 खीनें ॥ पडह धमारी तणो वजडावीने, प्रयमे प्रेमें रे साधु झपिनें ॥ सु० ॥ २० ॥ चिटुं दिश सुनट रखाव्या सन क री, पोते वेगे रे चैत्यने आगे ॥ दिवस पनरमे रे राय अतेरें, दासी वोली रे एहवे जगे ॥ सु० ॥ २१ ॥ धा धा लोका जुन मंत्रीनो, सुत राणीनी रे वेणी ग्रहीने ॥ वेदीने अलगो नासी गयो, शु दवे कहिये रे इहा कणे रदिने ॥ १० ॥ २२ ॥ राय सुणीने कोप कलकल्यो, एवं मुज थाणा रे पापीय लोपी ॥ रंक रमाई खोलो नरे दगी, राये री रे मति थारोपी ॥ मु॥ २३ ॥ उठी तसार हणो ए सचिवने, सुत थपराधी रे जेदनो प्रेयो ॥ दोच्या सुनट सीपाश् सामटा, तुरत जश्ने मत्री घेखो ॥ सु० ॥ २४ ॥ कहे मत्री मुफने नृप थागल, तुमें ले जा रे तेणें तेम कीधो ॥ नृप उपराठो रोपें थइ रह्यो, कहे मत्रीश्वर में शुं लीधो ॥ सुम ॥ २५ ॥ पेटीगत सवि वस्तु तुमें लीयो, राय कहे मुफ नहि धनकाम ॥ सचिव कहे मुफ प्राण ए तुज वश, हुँ नवि था रे खूण हराम ॥ मु० ॥ २६ ॥ पण एक वार निहालो पेटिका, राय उघाडी रे तालक नजी ॥त्रीजे खमें चोथी ढालमा, राम कहे सुणो साजन रजी ॥ सु० ॥ २४ ॥ सर्वगाथा ॥ १२५ ॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥ ६ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ वेणिदम वामे करें, दक्षिणकरें रूपाण ॥ सुत देखे तिहां सचिवनो, सद्को दुन हेरान ॥ १ ॥ राय कहे मत्री किस्यु, ते कहे न लट्ठ स्वामि ॥ तुम हाथे ए पेटिका, में सोपी गुणधाम ॥ २ ॥ राय सलज थयो घणु, कहे मत्री मुफ वात ॥ ते कदे कोई पथी, व्यंतरनो उत्पात ॥३॥ नहिंतर एम केम नीपजे, राख्यो पेटीमांद ॥ मनसशय नांग्यो परो, पाम्यो परम उत्साह ॥ ४ ॥ षटु सन्मान्यो सचिवने, करे पंचाग . जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. हृदय विमासी रे जोय सुवधो ॥ हांसी करत विस्वाती की निविड कर्मनो रे होवे वधो ॥ सु० ॥ २॥ थरुणोदयें पानी मनो मित्रने, पण मनमांहे उदास ते दीसे ॥ पूछे थमर का दीसो जमाना मित्र न तादारु रे मुखड़े हीसे ॥ १० ॥ ३ ॥ नयण नराइ भाषा थांसुयें, मुख करमाणुं रे कमलनु फूल ॥श्रदो जीवन बधव ए ताहरूं,बाब का एहव रे दीसे शूल ॥ सु० ॥४॥ गोप्य करी रह्यो वयण न घरे, व मर कहे मुफथागल नांखो। तुफ मुजप्रीति वनी नख मस ज्यु, तो एवो केम अतर राखो ॥ सु० ॥५॥ वात कही मित्रानदें मित्रने, नयण करते रे घणं विलगीर ॥ निसुणी अमर कहे शव बोले नहि, पण कोई चा लो रे थमरनो वीर ॥ मु०॥ ६ ॥ मित्र म धर मनमां कायरपणु, साद सथी सवि सपद लहियें ॥ पुरुपपणु पौरुपथी सपजे, मुख ख विज मां रे जाणी रहियें ॥ १० ॥ ॥ उद्यम साहस ने वली धीरता, 4 ल ने बुझिपराक्रम जेहने ॥ पड्गुण जे मानवमाहे वसे, देवने दानव रे ई करे तेहने ॥ मु० ॥ ७ ॥ झानगर्न मत्रीनी पूर्वे, धापद नाठी रे पुरुषा कारें ॥ सनिल कट्ठ तुज धागल ते कथा, धैर्य धरी सुणो मित्रकारे ॥ सु० ॥ ए ॥ एहिज नरतें चपानयरीयें, जितरिपु रायनो मत्री मनोहर ॥ झानगर्न तस नारी गुणावली, सुबुद्धि तनय परनारी सहोदर ॥ ९ ॥ ॥ १७ ॥ एक दिवस राजा बेगे सना, थाव्यो नैमित्तिक एक मुखाकर ॥ पूने राजन् तु लहे, वात कहो मुविवेक गुणाकर ॥ सु०॥११॥ जीवि त मरण ने लानालानने, जाणु गमागम सुख दुख वातो ॥ राजन ए अष्टांग निमित्तनां, गुरु करुणाथी रे कटुं श्रवदातो ॥ मु० ॥ १३ ॥ राज न कहे महारा परिवारमा, पनर दिवसमां रे श्रभुत कोई ॥ जे थानार दोवे ते दाखवो, चित्तमा धारी रे ग्रथने जोई ॥ सु ॥ १२ ॥ मुण नरवर मत्रीश कुटुंब ए, कष्ट सदेशे रे बद्द मरणांत ॥ राजन जन दिल गीर थया सुपी, एम केम जांब्युं रे एणे वृत्तांत ॥ सु ॥ १४ ॥ नमो मंत्रीसाथें निमित्तीयो, तेही पूजे रे तस एकांतें ॥ कोणथी कष्ट कहे ते सुतथकी, एहवु श्राव्यु रे मुफ सिक्षांतें ॥ सु०॥ १५ ॥ कहे मत्री मुत सानल महारु, कहण करे जो तुं एक विचारी॥ तो थापवधी अगरिये सवे, मत कहे नाखो रे मुफ निरधारी ॥सु ॥ १६ ॥ पुरुष प्रमाण .

, श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. ए पालापे मीठडा रे ॥सा॥ सयोगें गुण एम ॥ मो॥ १२ ॥ नावे' हवे जानलो रे॥सा॥त्रीजे पचमी ढाल सुनाति ॥मो॥ रामविजय कहे रग पुरेसा॥ जगमां जो लीजें जाति मो॥१३॥ सर्वगाथा ॥१४॥६॥ ॥ दोहा॥ ॥ करी विचार मनगु खरो, चाल्या वधव दोय ॥ ठाना मातपिता यकी, कर्म करे सो होय ॥ १ ॥ जोतां पुर वन वाटिका, नव नव ख्याल विनोद ॥ अनुक्रमें वेद्गु थाविया, पाटली पुरे प्रमोद ॥ २ ॥ नाही पुष्क रिणीजलें, पावन कीयां अग ॥ पुर पेसता पेखीयो, एक प्रासाद सुचग ॥३॥ दंम कलश ध्वज कोरणी, सुंदर शोना सार ॥ जिनप्रासाद करावियो, धन्य तेहनो अवतार ॥ ४ ॥ धर्मनामें धन वावरे, तो पाम्यु परमाण ॥ पामीनें खरचे नहि, तस जीव्यु अप्रमाण ॥ ५ ॥ जोता शोना तेहनी, यमरदत्ने एक दीव ॥ पाचाली पापाएनी, मनई जाय वश्च ॥ ६ ॥ रूप देखी रामा तणु, चित्रे लखियु तेह ॥ थहो थजव गति मोहनी, मनमा लाग्यो नेद ॥ ७ ॥ ॥ ढाल बही॥ ॥ वैरागी थयो ॥ ए देशी ॥ मन लोनाणु तेह, जोश रह्यो अनि मेप ॥ श्रग अवयव निरखतो, नवि लाज गणतो रेख रे ॥१॥ वधव मा हरा ॥ शु थयो मूढ थजाण रे, देवघर साहरा ॥ शा ढग चतुर सुजाण , रे, दीसे ताहरा ॥ ए थाकणी ॥ पापाण केरी पूतली रे, दीसे ते सुदररू प ॥ एमांहे शु मोहि रह्यो रे, में लत्यु ताहरु रूप रे ॥व०॥ ॥ थाज मोह्यो तुं पूतली रे, काले मोहीश नारि ॥ तो केम पूरु ताहरु रे, में पड़े मित्र विचार रे ॥व०॥३॥ परदेशे पंथें चालवु रे, पग पग सुदर नारी ॥ मित्र नजर न मामीयें रे, ए थापणो श्राचार रे ॥ व ॥ ४ ॥ तु चाल महारा मित्र जी रे, एक वार नगर मकार ॥ तुनें रूप जोवु सांजरे रे, मुने नूख लागी थपार रे ॥ व ॥ ५ ॥ पंथ सम नहिं को जरा रे, दारिद सम नहिं कष्ट ॥ मरण सम जय को नहिं रे, वेयणा नूख थनिष्ट रे ॥वण॥ ६ ॥ कहे अमर सुण मित्रनी रे, में एह नवि मूकाय ॥ शहायकी पग उपाडता रे, महारं मन शकलाय रे ॥ व०॥ 8 ॥ जोइ कमलस रीखु मुखई रे, एहना श्रधर लाल गुलाल॥ एह नम्मर थणियाली नली रे, , १३ ॥ ए६ जैनकया रत्नकोप नाग आठमो. पसाय ॥ हे मंत्रीश्वर ताहाँ, फलियु नाग्य सहाय ॥ ५॥ बात देवझथी, सुतहूती ए कप्ट ॥ राखी पेटीमां तनय, कषु काम में ॥ ६ ॥ श्रीजिनधर्मप्रनावथी, थई विघ्न उपशांति ॥ अयश टम्मु मेला वली, वाधी वमणी कांति ॥॥ थाव्यो एह निमित्तथी, मन वैराग्य आपा र ॥ सुत स्थापी निजपद चिन्हे, लीधो संयमनार ॥॥सुगतें गया वेहू मुनि, साध्यु बातम काज ॥ अमरदत्त कहे मित्र एम, व्यतर थाणो वाज। ॥ ढाल पांचमी॥ ॥ हारे मोरा वालमा ॥ ए देशी ॥ कदे यमरदत्त सुण मित्रानद, कर काम विमास ॥ मोरा वालमा, हारे मोरा वाधवा, दारे मोरा साजना ॥ ए श्रांकणीकलिया वलीया धागले रे नाइ, जाये व्यतर नासी ॥मो॥१॥ तुज उगारण काज थापण, जानु वे परदेश ॥ मो० ॥ तुज मुफ प्रीति धनी अति गाढी, जिहां तु तिदा सहि देश ॥ मो० ॥ ॥ नाइ नेह न देवो तुमने, जिहां लगें घटमां प्राण ॥ मो० ॥ शी चिता चित्तमा धरो रे नाइ, मोजी तु महेराण ॥ मो० ॥३॥ सात मगलानी प्रीतही रे राखे, साजन जीवित सीम ॥ मो० ॥ नेह करी दीये नेहजो रे वालमा, मित्र नहिं ते गनीम ॥ मो० ॥ ॥ मित्रानद सुणी बोलीयो रे ॥ बंधवा ॥ तु सुकुमार शरीर ॥ मो० ॥ सुख मूकी परदेशडे रे ॥ब० ॥ केम सहेवा शे पीह ॥ मो० ॥ ५ ॥ कहे थमर जे प्रीतिना रे ॥ व ॥ बोल्या बहु परे बोल ॥मो॥ मुफ घटमा तुफ नेहलो रे॥०॥ बेगे जेम रंगचोलामो ॥६॥ ए अवसर थावी पडघे रे॥ब० ॥केम रद्ध नेदने नाखि ॥ मो० ॥ तुफ विण सवि शूनु श्हा रे ॥ब० ॥तु तो मोरी थांख ॥ मो० ॥ ७ ॥ एकमना श्रया ते बन्ने रे ॥ ॥ जुन जुन नेहनी वात ॥ मो० ॥ नेह निवेडे ते जला रे ॥ ब० ॥ जननीजाया सुजात ॥ मो० ॥ ७ ॥ काम पडे कूवी चले रे॥वण॥ कलिमां जूवो कुजात मो॥कामवेला थावि मजे रे ॥षणाखाये मारी लात मोजाणामाखण साजन बेनुमा रे ॥०॥ समान श्रति सुक्नुमाल मो० ॥ता माखण वीघरे॥साजनां । प्रतापे ततकाल ॥ मो० ॥ १० ॥ सोनु सुपुरुष धदना रे ॥ सा ॥थापण पीर स्वमत । मो० ॥ कुल कसवटें जाणीये रे ॥ सा ॥ पर एपकार करत ॥ मो॥ ११॥ तुंव कटक वंती नीरसा रे ॥ सा ॥ दारुक शुक तेम ॥मो॥ सर श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो एए सुणो नाविया रे लो, परदेशी तुमें धाविया रे लो ॥ आवो अमारे घेर प्रादुणा रे लो, मत मनमाहे राखो मणा रे लो ॥ ४ ॥ करछु तुम्हारी चाकरी रे लो, जे श्रमथी थागे खरी रे लो ॥ शेनें वात यगी करी रे लो, अमर ने मित्र कहे फरी रे लो ॥ ५ ॥ जो तुमो थापो जी थागना रे लो, तो ज जो बावु अगना रे लो ॥ अमर कहे परदेशडे रे लो, केम मूकाय इण वेशडे रे लो ॥ ६ ॥ तुम 5 ख वातज सांजली रे लो, चूकी जाय मोरी मागली रे लो ॥ मूक तुक असगो परो रे लो, ते उघ वेचीने उजागरो रे लो ॥७॥ तुमथी यलगो दु नवि रदु रे लो, सुख दुख वात कोने कहुँ रे लो ॥ जेम जीवाय तेम जीवन रे लो, श्वास तिहा लगें शीव गु रे लो ॥ ७ ॥ मित्र कहे जांरख्युं खरु रे लो, पण तुज 5 ख टालु खरं रे लो ॥ पण में तुम पासें रही रे लो, भारत न खमाये सही रे लो ॥ ए॥ यावीश द दो मासमां रे लो, मत मन पाडो विमासमा रे लो ॥ तुज पासें मुफ जीवहो रे लो, तु मुझ हृदयनो दीवडो रे लो ॥ १४ ॥ कप्टे समजाव्यो घणु रे लो, हा कही मन करी दुमणु रे लो ॥ श्रमरने सोंपी शेग्ने रे लो, पोतें चल्यो पुर वेगनें रे लो ॥११॥जुन प्रीति ए थाकरी रे लो, परदेशमा एम चाकरी रे लो ॥ प्रीति ए वदर दीवन रे लो, प्रीति परम सुख जीवनु रे लो॥ १२ ॥ पहोतो तेद सोपारकें रे लो, पूडतो फरि घर पारके रे लो ॥ ढुंढता शूरने सांजल्यो रे लो, चिते मनोरथ सहि फल्यो रे लो ॥ १३ ॥ करनी वेची मुड्डी रे लो, वेश थवल शिर पाघडी रे लो ॥ नाव बनायो दीपतो रे लो, देवकुमरने जीपतो रे लो॥१४॥थाव्यो रे फलट थापणे रे लो, शूर सुतारने यांगणे रेलो ॥ उठीने ते कनो थयो रे लो, सात थान पग सादामो गयो रे लो ॥ १५॥ नाग्य जे राज पधारीया रे लो, काज कहो उपगा रीया रे लो ॥ मित्र कहे दवे धादरें रेलो, देवकुल काज ने माहरे रे लो॥ १६ ॥ तुमें कोई ठाम कारिगरी रे लो, करी दोय तो कहो ने खरी रे लो ॥ कहे कारीगर तानमा रे लो, पामलीपुर उद्यानमा रे लो ॥ ॥ १७ ॥ देवल में कम्यं सोदतु रे लो, देव दानव मन मोदतु रे लो॥ दीतु दोशे तुमें कादरें रे लो, कुमर कहे दा सांगरे रे लो ॥ १७ ॥ पण तिहां एक पंचालिका रे लो, सुघड घडी ए कोनी वालिका रेलो ॥

ए जैनकया रत्नकोप नाग आग्मो. यदो जुन एहतुं नाल रे ॥ २० ॥ ७ ॥ तुने नख लागी वाजदारे, नूख नागी जो ॥ क्षण एक एहनो सग न तजू रे,मुझने न कदेशों रे ॥ ५० ॥ ए ॥ दु देखी मोह्यो एहने रे, महारे ए जीवनप्राण मित्र मनमा उख धरे रे, ए दुकवण विन्नाण रे ॥ 4 ॥ १० ॥ चिंता मदारी वीसरी रे, ए थइ सवली पीर॥ एम हृदय नितरस परेरे, फरे ते नयणे नीर रे ॥ व ॥ ११ ॥ वेद गाढस्वरशु रुवे रे, सवि सांजली घरवार ॥ वैरागरंगविना नहि रे, कोइ मोहनो उपचार रे ॥ ३० ॥१५॥ तेद वेलामा श्रावियो रे, प्रासादकारक शेत॥रोइने कांश था इस्लीया रे, कोण करशे तुम वेव रे ॥ व ॥१३॥ हु रत्नसारानिय नलो रे, तुमें गाल वो सुख मुज ॥ वात विण नांखे कुते रे, केम जणाये प्रगुफ रे ॥५०॥ १४ ॥ हवे वात कहेशे चित्तनी रे, सुणो खम त्रीजे ढाल ॥राम कहे पर सुख नजन रे, धन्य धन्य जे उजमाल रे॥व॥१५॥सर्वगाथा १६ए श्लोक ॥ दोहा॥ ॥ मित्र कहे सुण तातजी, ए मुफ मित्र थजाण ॥ शु जाणु एड्ने एं थयु, मोह्यो रूप पहाण ॥ १ ॥ शेठे समजावी का, पण नवि मूके राग ॥ शेठ सचितो चितवे, थाणी मन वैराग ॥ २ ॥ कामणगारी का मिनी, मोह्यो सघलो लोक ॥ सुर नर किन्नर नोलव्या, ए जग महोटो शोक ॥३॥ यमुक्त ॥ तावन्मोनी यतिर्सानी, सुतपस्वी जितेंयि ॥ यावन्न योषितां दृष्ठि, गोचरं याति पुरुष ॥१॥ दोदो सोरठी ॥ तप जप सयम ताम, नर साघे निरता घणा ॥ हिये न लागे जाम, नयणबाण नारी तण ॥४॥ मित्रानद कहे शेठजी, शो करशंज उपाय ॥ कुण रमणीनुं रूप ए, मुफने कहो समजाय ॥ ५ ॥ ॥ ढाल सातमी॥ ॥ नयण सणा नवना रे लो ॥ ए देशी॥शेठ कहे सुणो नाजा रे लो, खरा दीसो बो रे कादिला रे लो ॥ खबर नहिं ए थमने रे लो, कोण रमणी कहु तुमने रे लो ॥ १ ॥ श्रचे कारीगर एहनो रे लो, सोपारक पुर जेदनो रे लो ॥ सूर नामें सूत्रधार के रे लो, ते एदनो करनार ने रे लो॥२॥ मित्रानद कहे एदनी रे लो, सार करो जो रेहनी रे ॥ खबर ले थावु सदी रे लो, गेवजी उत्तर द्यो वही रे लो ॥३॥ शेव कहे . श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. १०१ रे लाल, यागें जगमां कोय ॥म॥ सा ॥ ५॥ रयणी गइ रवि कगीयो रे लाल, शवनो कस्यो संस्कार ॥माजोप रयु नाडु न दे रेलाल, ईश्वर खल शिरदार ॥म॥सा ॥ ६ ॥ मित्रानट कहे जो दशे रे लाल, एवं नगरी कोई राय ॥म॥ तो माहरु रहेशे नही रे लाल, लेन हाक वजाय ॥म ॥ सा ॥७॥ ऊठी चाव्यो चहूवटे रेलाल, सत्यदाता रे सार ॥मा उनट वेश वनावीयो रे लाल,गयो गणिका घर वार ॥ म ॥ सा०॥ ॥ तिलक मजरी उनी थइ रे लाल, दीधू वद् सन्मान ॥मा प्राप्यु थासन वेसवा रेलाल, उनी जोडी पाण मसाणा राज पधास्या बांगणे रे लाल, थाज फली मोरी श्राश ॥मा खीजमत करो ए सुता रे लाल, वसतति सका खास ॥मासा॥१॥ आवो मदिर माहरे रे लाल, साची सुरतरु जेम ॥ म ॥ रगें रमो ण मालिये रे लाल, जेम मन माने तेम म०॥ सा॥ ११ ॥ श्रापे मनमोदें करी रे लाल, चारशे तस दीनार म०॥ धन देखी रीजी घणु रे लाल, धन मोदन ससार ॥ म ॥ १२ ॥ जक्ति युक्ति कीधीनली रे लाल, ढाली सुंदर सेज । म ॥ पुत्री पासें मोकली रे लाल, सांज समय धरि हेज मासा॥१३॥ कनी बागल थावीने रे लाल, सुररमणी अनुहार ॥म॥ मधुरस्वरें वोले इसी रे लाल, मानिनी करे मनो हार ॥ म ॥ सा ॥ १४ ॥ नयणविलासें चालवे रे लाल, सुर नर बसु रना चित्त ॥ म ॥ नल जोलाव्या नामिनी रेलाल,ले दरी तन मन वित्त ॥म ॥सा॥१५॥ जोर करी युवती घणां रे लाल, नाखे नयननां वाण ॥ म ॥ पण कुवर नेदे नहि रे लाल, चिते एम मुजाण ॥ म०॥ सा॥ ॥१६॥ विपयासगें वाहीयां रेलाल, काम न थाये सिम म॥ मन राख्यु हटकी घणु रेलाल, कहे उत्तर धरि बुद्धिम॥ सा ॥ १७ ॥ समरण करतु माहरे रे लाल, लावो थासन एक ॥ म ॥ सोवनपट मामयो तिहा रे लाल, वेतो तिहा मुविवेक ॥ म ॥ सा ॥ १७ ॥ श्रोढण उढी कपरें रे लाल, वेठो जपवा जाप ॥मा नाव देखाहे नामिनी रे लाल, पण नवि मोल्यो थाप ॥ म ॥ सा॥१॥ एम रयणी वोली ग रे लाल, प्रमदा हू निराश ॥ म ॥ धन्य ते जगा साहसी रेलाल, न पडे रमणीपाश ॥ म ॥ सा ॥२०॥ ढाल नणी ए थामी रे लाल, त्रीजे खमें रसाल ॥मारामविजय कदे सांजलो रेलाल,श्रागल था उनमालामासा॥ .

1 . २०० जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. शुर कहे महसेननी रे लो, पुत्र श्रवतीना शिनी रे लो ॥१२॥ मजरी कुवरी नली रे लो, तस अनुसार करी पूतली रे ॥ सुणी को म श्वा घणी रे लो, देवकुल ममावा तणी रे लो॥ २०॥ अवसर ने तेडाव/ रे लो, एम कही चाल्यो स्वनावशु रे लो ॥ दर्ष धरीने बानी यो रे लो, नयरि थवती मन नावियो रेलो ॥ २१ ॥ सांजलो सारस वारता रे लो, जे श्हां नीपनशे कथा रे लो ॥त्रीजे खमें ढाल सातमीरे लो, साजन जन मन सक्रमी रे लो ॥ २२ ॥ सर्वगाथा ॥१ए॥श्लोका ॥दोहा॥ ॥ संध्या समय थावियो, नयरि थवती मझार ॥ पोलतणी रसम लिका, देवीने दरवार ॥ १ ॥ पंथीडा देवल शरण, के सरोवरनी पाल । पंथी को दयामणा, जेम जेम पडे वियाल ॥ २ ॥ मनमाहे घिसे मार रा, बंधवनु जो काम ॥ थाये तो सूधी रहे, माहारी महोटी माम ॥३॥ शण अवसरें तिहां वाजतो, पढदो श्राव्यो एक ॥पले दौवारिक प्रत्ये, पर ह तणो विवेक ॥ ४ ॥ ते कहे सांजल पंथीया, ए नगरीनी वात । मारीपरानव जे घणो, तिणे न रहे शव रात ॥ ५ ॥ ईश्वरोत तो जनक, साफ समे परलोक ॥ पदोतो पोल जही तदा, मनमर्माहे धरि शोक ॥ ६ ॥ शपने राखे रात्रिमा, साहसिक शिरदार ॥ देठ सहस दीनार तस, पडद तणो ए विचार ॥ ॥ मित्रानद मन चितवे, धन विण काज न होय ॥ तिण कारण श्रगी करु, अवसर एडवो जोय ॥७॥ ॥ ढाल थामी॥ ॥ देशी अलबेलानी ॥ मित्रानद कहे मादरे रे लाल, खोले घालो धन ॥ मन मान्या रे ॥ चार पहोर रयणी तणा रे लाल, शबना करे यतन्न ॥ म ॥ १ ॥ साहसपी सवि संपजे रे लाल, साहसगुणन गे द ॥ म ॥ कानें कमल रयणमय रे लाल, थांखे यांजण रेह । म ॥साणाशा बागलथी तस थापीयुं रे लाल, ईश्वरें नाणु श्राप ॥ म॥ धैर्य धरी शष साचवे रे लाल, मित्रानद निरावाध ॥ म ॥ सा ॥ ३ ॥ नूत पिशाच घणा तिहां रे लाल, प्रगव्या रयणमकार ॥ म० ॥ दाकहूती रहे वेगला रे लाल, न चले कोनो चार ॥ म ॥ सा ॥ ४ ॥ कायरने करडे सदरेलाल,न दणे धींगनें कोय म॥ वलिन दीये पलीया तो श्री शांतिनाथनो रास खंत्रीजो. २०३ कुवरने, श्रावी गोंखे सीधी ॥ सो ॥ ११ ॥ वप्रवलय जिहा सात विरा जे, राजमदिर अति रुडं रे ॥ तिहां ए कन्यामदिर सुटर, टीसे मोरनु छ ॥ सो ॥ १२ ॥ तेहने गोख थठे मनमोहन, शहां जो तुमयी जवाये रे॥ तो वदेला लावो मनोवाठित, कारिज सहेजें थाये ॥ सो० ॥ १३ ॥ कुहिनीने वोलावी वलतो, प्लवग परें देश फाल रे ॥ राज सुवनना कोट उलघी, पहोतो नइ ततकाल ॥ सो० ॥ १४ ॥ चिते अक्का कोइ यतुल व ल, पुरुपप्रधान ए दीसे रे ॥ एम चितवती गेहें यावी, धरती हियडे जगीश ॥ सो० ॥ १५ ॥ कन्यामदिर आव्यो कुवर, देवीने विस्मय पामी रे ॥ कोई सवल शूरीनो जायो, नहिं वलमाहे खामी ॥ सो० ॥ १६ ॥ निश कपट करीने सूती, तस चर्याने धारे रे ॥ निशवश देखी नामाकित, ककण करनु उतारे ॥ सो० ॥ १७ ॥ दुरिका ले दक्षिण जयें, त्रण करी तेणें रेख रे ॥ जेमश्राव्यो तेम पाठो वलियो, हियडे दर्प बलेख ॥ सो० ॥ १७ ॥ कुमर ते नहि सामान्य ए, पण में जावा दीधो रे ॥ माही हती पण सवली चूकी, नवि वोलाव्यो सीधो ॥ सो० ॥ १ए ॥ मित्रानद नई देवकुलमां, रातें मुखमा सूतो रे ॥ कुमरी नयणथी निश नाठी, दिल तेमाहे खूतो ॥ सो० ॥ २० ॥ श्रावे उघ करावे सप जी, थये प्रनातें जाग्यो रे ॥ दीसे हर्प धरि हियडामां, पातो पडयो मुह माग्यो । सो० ॥ २१ ॥त्रीजे खमें नवमी ढालें, वात रसिक मुणो साची रे॥रामविजय कहे मित्रता न कही, काम पडे जे काची॥सो॥२॥२५॥ ॥ दोहा॥ चिते मित्रानद ते, अर्धदाम अवशेप ॥ ईश्वर मुज दीधा नहिं, पण लेवा मीन न मेप ॥ १ ॥ जुवो ते ठग मुझने मल्यो, नांग्या जेणें मुज दाम ॥ पण दरवारें नाश्ने, करवु ए में काम ॥ ३ ॥ चिती चल्यो उतावलो, था व्यो राज उवार ॥ रुदन करे महोटे स्वरें, उनो ते दरवार ॥ ३ ॥ राय मुणी तेडावियो, कां एम रहे थपार ॥ न्याय नहि ण नयरीयें, मुफ धूत्यो निर्धार ॥४॥ ॥ ढाल दशमी॥ ॥ कर्म परीक्षा करण कुमर चल्यो रे ॥ ए देशी ॥ कहे राजा सुण पंथी वापडा रे, केम रुवे ने थाम ॥ शु धूतीने लीधु ताहरु रे, कहे मुज तेहनु .

, १०२ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ॥दोहा॥ ॥ मा बागल पुत्री कहे, रात तणो विरतंत ॥ मुफ सामु नाक्यं वर्षि ध्यान धस्युं एकांत ॥१॥ कहे थक्का कलट धरी, पुत्री एह रतन मनन ट मांमी वश करो, एदनां घणां यतन्न ॥ २ ॥ वीजे दिन तिमहिज कj, पण नवि लोज्यो तेह ॥ अक्का रीपाणी कहे, श्यो पारवंम नित्य एह । ३ ॥ राजकुमरने जेहनु, दरिसण देवउलन ॥ ए मुफ तनुजा उतरी, स गयकी मनु रंज ॥ ४ ॥ ते साहामुं निरखो नहि,शी तुम मनमा थाम मन खुरखी वातो करी, किम थ रह्या उदास ॥ ५ ॥ ॥ ढाल नवमी॥ ॥ बाले वेर्षे बाबरी नानी ॥ ए देशी ॥ कुमर कहे सविरुद्धं थाशे,जे सुमें कहेशो ते करणं रे ॥ पण पूड ते वात प्रकासो, वोलथकी नवि फरषु । १॥ सोहागण नांखोने, तुमें नृपकुमरीने जाणो के, ना मुफ दास्वो ने ॥ ए थांकणी ॥ ते साथें एक काम ले माहरे, कागलीयो में देवो रे ॥ कांश क संदेशो नाखीने, पालो पमुत्तर लेवो ॥ सो ॥ ३ ॥ कहे थका मुण पुत्री साथें, तेदने प्रीति ने जाजी रे ॥ कहो ते वात कहीने थावु, ए कामें हूं राजी ॥३॥ कुमरजी नारखोनें ॥थम साथै जीवनजी थान, थंतर मत राखोने ॥ए थांकणी॥ ते थागल जश्ने एम कहेवु, गुण जेह ना सुणि उमसी रे ॥ तें जेहने कागल लखीयो तस, थायो मित्र ने मिलशी ॥ ० ॥ ॥ श्रका राजकुमरीनी पासें, थावे राग धरीने रे ॥ कन्यायें थादर वे बोलावी, बोले प्रीति करीने ॥ कुछ ॥ ५ ॥ तुफ सरनो संदेशो, द कदेवाने थावी रे ॥ विस्मित राजकन्या मन चिते,ए बोले चावी ॥ सो० ॥ ६ ॥ कुण मुफ वनन कुमरी जांखे, तब थक्षा तिहां वोली रे ॥ मित्रानवें कदाव्युं सघल्ल, नांख्यु मनहुँ खोली ॥ सो० ॥ ३ ॥ कुमरी विमासे दुकोण ते कोण, नाम अमरदत्त जेहन रे ॥ पण कांई कूडी रचना दीसे, ठाम न जाणु तेदर्नु ॥ सो० ॥ ॥ पण जेणे दूर रचना कीधी, तेहने नजरें निदालु रे॥एम विमासि थकाने नांखे, वाक वयण रसानु ॥ सो ॥ ए॥ जेणें मुज वन्नन वात प्रकासी, सेहनें तेडी लावो रे ॥ गोंख तणे मागै रगीलो, मादरे तेहग्यं दावो ॥ सो ॥१०॥ सुणी हरखी थका ग गेहें, वात कुमरj कीधी रे ॥ रात समे तेरी वाले - श्री शांतिनायनो रास खंमत्रीजो. २०३ वरने, श्रावी गोंखे सीधी ॥ सो ॥ ११ ॥ वप्रवलय जिहा सात विरा , राजमदिर थति रूढुं रे ॥ तिहां ए कन्यामदिर सुदर, दीसे मोरनुं इस सो० ॥ १२ ॥ तेहने गोंख अवे मनमोहन, शहां जो तुमथी जवाये ॥ तो वहेला जावो मनोवांछित, कारिज सहेजे थाये ॥ सो० ॥ १३ ॥ हिनीने वोलावी वलतो, प्लवग परें देइ फाल रे ॥ राज सुवनना कोट लघी, पहोतो जइ ततकाल ॥ सो० ॥ १४ ॥ चिते अक्का कोइ अतुल व न, पुरुपप्रधान ए दीसे रे ॥ एम चितवती गेहें थावी, धरती हियडे जगीश ॥ सो ॥ १५ ॥ कन्यामदिर थाव्यो कुवर, देखीने विस्मय गमी रे ॥ कोई सवल शूरीनो जायो, नहिं वलमाहे खामी ॥ सो० ॥ १६ ॥ निश कपट करीने सूती, तस चर्याने धारे रे ॥ निवश देखी नामाकित, ककण करनु उतारे ॥ सो० ॥ १७ ॥ बुरिका लेइ दक्षिण ज, त्रण करी तेणें रेख रे ॥ जेमश्राव्यो तेम पाठो वलियो, हियडे हर्प अलेख ॥ सो० ॥ १७ ॥ कुमर ते नहि सामान्य ए, पण में जावा दीधो रे ॥ माही हती पण सवली चूकी, नवि वोलाव्यो सीधो ॥ सो० ॥ १ए ॥ मित्रानद नई देवकुलमां, रातें सुखमां सूतो रे ॥ कुमरी नयणथी निश नाठी, दिल तेमाहे खूतो ॥ सो० ॥ २० ॥ श्रावे उघ करावे सव ली, थये प्रनातें जाग्यो रे ॥ दीसे हर्प धरि हियडामां, पासो पडयो मुह माग्यो । सो ॥ २१ ॥त्रीजे खमें नवमी ढालें, वात रसिक सुणो साची रे॥रामविजय कहे मित्रता न कही, काम पडे जे काची॥सो॥२॥२५॥ ॥ दोहा॥ चिते मित्रानद ते, अर्धदाम अवशेप ॥ ईश्वर मुफ दीधा नहि, पण लेवा मीन न मेप ॥ १ ॥ जुवो ते उग मुझने मल्यो, नांग्या जेणें मुफ वाम ॥ पण दरवारें जाइने, करवु ए में काम ॥ २ ॥ चिती चब्यो उतावलो, था व्यो राज ज्वार ॥ रुदन करे महोटे स्वरें, उनो ते दरवार ॥ ३ ॥ राय सुणी तेडावियो, का एम रहे थपार ॥ न्याय नहिं इण नयरीयें, मुफ धूत्यो निर्धार ॥४॥ ॥ ढाल दशमी॥ ॥ कर्म परीक्षा करण कुमर चल्यो रे ॥ ए देशी ॥ कहे राजा सुण पंथी वापडा रे, केम रुवे ने थाम ॥ शु धूतीने लीधु ताहरु रे, कहे मुज तेदनु २०४ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. नाम ॥ १ ॥ सुण राजेश्वर माहरी विनति रे, कहु तुम धागल वाप। मात पिता नृप देव गुरु थागलें रे, नित्ये नांखवु साच ॥ १० ॥३॥ लोकपाल ताहरी नवि लेखवी रे, थाणा जेणें उतार ॥ देश तो हां ईश्वर वाणीयो रे, ते सवलो धूतार ॥ सु० ॥ ३ ॥ राख्युं रातें तेहना ता तनु रे, महउ में माहाराज ॥ नांग्यु अरघु नाटुं माहरु रे, वैय वेरी दुवे काज ॥ सु० ॥ ४ ॥ दुकम करो थारक्क नर जणी रे, बांधी पासो श्राज ॥ दीयो शिखामण सूधी तेदने रे, जिण लोपी मुझ लाज ॥ मु०॥ ५ ॥ तेदवे निसुप्पं तेणे वाणीये रे, फरीयादी दुळ तेह ॥ ले दीनारने दोडी श्रावीयो रे, साहमो नृपनें गेद ॥ १० ॥ ६ ॥ थाप्या दाथोहाप तेदने रे, कहे नृपने कर जोडि ॥ ते दिवसें कारजनी व्यग्रता रे, नापि शक्यो ए खोड ॥ सु ॥ ॥ दिवस वे त्रण लगें लोकाचारमा रे, वी त्या ए मुफ वांक ॥ लोक सट्ठ कहे साहुकारमा रे, थाडो वाल्यो थांक ॥ सु० ॥ ७ ॥ रायें खुशाल थइ वोलावीयो रे, ते पहोतो निज घेर ॥ नृप पूढे तब मित्रानवने रे, शब राख्यु शी पेर ॥ सु० ॥ ए ॥ कहे स्वामी मुण ते रयणी समे रे, शब रक्षणने हेत ॥ धेगे बुरिका लेई दापमा रे, प्रथम प्रहरसकेत ॥ १० ॥ १० ॥ दारुण फेरी विरव तव सानन्यो रे, जिणे फूटे ब्रह्मांम ॥ प्रगटी पिंगलरोम शियालिणी रे, दु रह्यो धीर श्रखं म ॥ सु० ॥ ११ ॥ बीजे प्रदरें प्रगटी राक्षसी रे कृष्मवर्ण थति घोर ॥ मुज पासें वीटाणां चिट्ठ विशे रे, पण न चल्यो तस शोर ॥ मु० ॥ १२ ॥ त्रीजे प्रहरे थावी शाकिनी रे, रे रे कुण तुं रंक ॥ में दांकी श की ते गई रे, जाणु को त्रिवफ ॥ सु॥ १३ ॥ चोथे यामें वस्त्रवि पिता रे, दिव्यानरण अमूल ॥ बूटे केशे कर काठी ग्रही रे, धीरज मेले धूल ॥ सु ॥ १४ ॥ में मन जाण्यु ए मारी सही रे, जेदनो पुरमा सोर ॥ बुरिका ले छ साहमो धश्यो रे, करणं साही जोर ॥ सु० ॥ १५॥ नासण लागी कर बोहाविने रे, तस ककण मुफ हाथ ॥ श्राव्यो त्रण रेखा जाधे करी रे, बुरिकायें में नाथ ॥ मु०॥ १६ ॥ नानी स रज उग्यो एहवे रे, दुथाव्यो तुम पास ॥ वचन मुणी अघरिजनु राजीयो रे, वोल्यो चित्त विमास ॥ सु० ॥ १७ ॥ वीर पुरुप मुज देखा डो तुमो रे, ककण देवीन मित्त । निजनामांकित देखीने तदा रे, राय सद्मा श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. २०॥ चलचित्त ॥ १० ॥ १७ ॥ { मुफ पुत्री दीसे मारिका रे, तस कक सहि एह ॥ देहचितामि करीने थावियो रे, नृप पुत्रीने गेह ॥ तु० ॥ १५॥ सूती दीनी विण ककण वालिका रे, हा हा प्रगट्यू पाप ॥ तेम तृणस्थानक पाटो देखीने रे, उपन्यो मन सताप ॥ सु ॥ २० ॥ हा हा कुल निर्मल मेलुं कियु रे, इण पापिणीय श्राज ॥ लोक यां हत्यारीयें रे, खोवरावी मुफ लाज ॥ सु० ॥ २१ ॥ तेमाटें वहेली बाहार करु रे, नहितर सघला लोक ॥ मारे ए चमालिणी भाकरी रे, यो हवे एहनो शोक ॥ सु० ॥ ॥ राजसनायें पाठो अवियो रे, वेगे नूप उदास ॥ जोजो नवियण तुमें नावें करी रे, कड्ड कर्मविलास ॥॥२३॥त्रीजे खमें दशमी ढालमा रे,चित्त फरियु नरराजारामविजय कहे धूर्तकलाथकी रे,विहि पण थावे वाज॥सुजोरास॥२॥श्लोक॥७॥ ॥ दोहा ॥ ॥ नृपति ते वेसारियो, मित्रानद नजीक ॥ शु साहस के मत्रवल, जांखो वचन तहकीक ॥ १॥ कुलकमागत माहरे, मत्र अडे वलि एक ॥ पण साहस विण नवि फले, सुण राजन मुविवेक ॥ २ ॥ सना विस र्जावी तदा, वेद वेग एकात ॥ नृप कहे महारी पुत्रिका, मारी सही नदि नाति ॥ ३ ॥ दवे उपकारी तु मल्यो, तेदनो कर निस्तार ॥ कहे कुवर तुम कुल तणी, किम एहवी होय नारि ॥ ४ ॥ नूप नणे सशय किश्यो, जलद कपनी जोय ॥ जलबाला जननें दणे, कहो कुण कारण सोय ॥ ५ ॥ हिम सहेजें शीतल दुवे, पण वाले वनराई ॥ ए अतरनी वारता, कोरों कली न जाय ॥ ६ ॥ जाणु कुलमा कपनी, कम्पवेली उपमान ॥ पण जनमूल उमेदवा, थइ कूहाडी समान ॥॥ मित्र कहे माहाराजजी, म करो फिकर लगार ॥ नजरें देखाडो मुने, करा तस उपचार ॥ ७ ॥ राय कहे जाई जुन, कन्या मदिरमाहे ॥ सूती कती सा जुए, थावतो उत्साह ॥ ५ ॥ जेरों मुफ ककण दस्यु, बुरिप्रहार ए दीध ॥ ते ए नर होवे सही, एम मन निश्चय कीध ॥१॥ राजद्रुकम विण ण समे, था वे नहिं नि शक ॥ श्रासन मामघु वेसवा, मूकी मन नि गक ॥ ११ ॥ ॥ ढाल अग्यारमी॥ ॥ देशी हमीरियानी॥ कुमरी कहे कर जोडिनें, कुण काजें तुमें थाज .

२०४ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. नाम ॥ १ ॥ सुण राजेश्वर मादरी विनति रे, कद तुम पागल बार। मात पिता नृप देव गुरु धागलें रे, नित्ये नांखवु साच ॥5॥१॥ लोकपाल तादरी नवि लेखवी रे, बाणा जेणे उतार ॥ देश तो भी ईश्वर वाणीयो रे, ते सवलो धूतार ॥ सु० ॥ ३ ॥ राख्यु रातें तेहना ता तनु रे, मडठं में माहाराज ॥ नांग्यु घरधू नाईं माहरु रे, वैय वेरी हुने काज ॥ सु० ॥ ४ ॥ दुकम करो थारक्षक नर नणी रे, बांधी वाणो थान ॥ दीयो शिखामण सूधी तेहने रे, जिण लोपी मुफ लाज ॥ ५॥ तेहवे निसुप्यु तेणे वाणीये रे, फरीयादी दु तेह ॥ ले वीनारने वोडी थावीयो रे, साहमो नृपनें गेद ॥ सु० ॥ ॥ थाप्या हाथोहाल तेहने रे, कहे नृपने कर जोडि ॥ ते दिवसें कारजनी व्ययता रे, नापि शक्यो ए खोड ॥ सु० ॥ ७॥ दिवस वेत्रण लगें लोकाचारमा रे, वी त्या ए मुफ वांक ॥ लोक सनु कहे साढुकारमा रे, थाडो वाल्यो आंक ॥ सु॥ ॥ रायें खुशाल थइ बोलावीयो रे, ते पहोतो निज घेर ॥ नृप पूजे तष मित्रानदने रे, शब राख्यु शी पेर ॥ सु०॥ ए ॥ कहे स्वामी सुण ते रयणी समे रे, शब रक्षणने हेत ॥ वेगे बुरिका लेई हाथमा रे, प्रथम प्रदरसंकेत ॥ सु० ॥ १० ॥ दारुण फेरी विरव तव सांजल्यो रे, जिणे फूटे ब्रह्माम ॥ प्रगटी पिंगलरोम शियालिणी रे, तु रह्यो धीर श्रखं म ॥ सु० ॥ ११ ॥ बीजे प्रदरें प्रगटी राक्षसी रे रुमवर्ण अति घोर ॥ मुज पासें वीटाणां चिढं दिशे रे, पण न चल्यो तस शोर ॥ १० ॥ १२ ॥ त्रीजे प्रदरे थावी शाकिनी रे, रे रे कुण तु रंक ॥ में हांकी उश की ते गई रे, जाणु कोइ त्रिवः ॥ ॥ १३ ॥ चोथे या वस्त्रवि नूपित्ता रे, दिव्यानरण श्रमूल ॥ बूटे केशें कर काठी ग्रही रे, धीरज मेले धूल ॥ सु० ॥ १३ ॥ में मन जाण्यु ए मारी सही रे, जेहनो पुरमा सोर ॥ बुरिका ले छ सादमो धश्यो रे, करणं सादी जोर ॥ ९ ॥ १५॥ नासण लागी कर बोडाविने रे, तस ककण मुफ हाथ ॥ थायो त्रण रेखा जाघे करी रे, दुरिकायें में नाथ ॥ मु॥ १६ ॥ नानी व रज उग्यो एदवे रे, दुधाव्यो तुम पास ॥ वचन सुणी अचरिजर्नु राजीयो रे, वोल्यो चित्त विमास ॥ सु० ॥ १७ ॥ वीर पुरुप मुफ देखा डो तुमो रे, ककण देवीनु मित्त ॥ निजनामांकित देखीने तदा रे, राम .

श्री शांतिनाथनो रास खंत्रीजो. १०७ धात ॥ र ॥ वाहाली पण वेरिणी थई, सवली कर्मनी वात ॥ २० ॥ वा० ॥ १७ ॥ वडवा उपर हाथगु, वेसारी ते वाल ॥र० ॥ साथ संप्रे डण चालियो, पोल सुधी नूपाल ॥ र ॥ वा ॥ १ ॥ हवे चाल्यो ले चॉपगु, मित्रानद कुमार ॥ २० ॥ मनमाहे चिते माहरो, सफल थयो अवतार ॥ र ॥ वा० ॥ २० ॥ वडवा चाले उतावली, सा कहे वेसो थावि ॥ कुण् ॥ कुमर कहे सीम संघीने, वेशिश दिल तु नाव ॥ २० ॥ वा० ॥ २१ ॥ण एक पडखी कुवरी, लघी देशनी सीम ॥ र० ॥ फरि कहे वेसो हां हवे, केम लेई रह्या नीम ॥ कु० ॥ वा ॥ २२ ॥ कुमरी कहे कारण जे थठे, प्रकासो हवे तेह ॥ कुछ ॥ अंतर में राख्यो नहिं, तो शियो पटतर एह ॥ कु० ॥ वा ॥ २३ ॥ में तुमनें याण्यां सही, मूकावी कुललाज | जानी जी ॥ मुफ अर्थे मत जाणजो, नाइ अमर दत्त काज ॥ २० ॥ वा ॥ २४ ॥ वात समय कही तिहां, मित्रानंद तदार ॥ ना ॥ मत चिता करजो मने, करगु घणी मनोहार ॥ ना॥ वा० ॥ २५ ॥ तेमाटे एक श्रासने, वेसवु न घटे मुज ॥ ना० ॥ वात मुणी विस्मित थइ, समजी सघ गुद्य ॥ ना० ॥ वा ॥ २६ ॥ मृग नयणी मन चितवे, श्रदो अहो पुरुपरतन्न ॥ देवरजी ॥ नाग्य मल्यो मुफने सही, उत्तम एदनु जतन्न ॥ कुछ ॥ वा ॥ २७ ॥ जे तरुणीने कारणे, मात पिता वली वधु ॥ कु० ॥ वचीने वाले कामने, पुरुप घणा कामध ॥ कु० ॥ वा ॥ २७ ॥ चूक न देखे दिवसमां, रात न देखे का क ॥ कु० ॥ कामी न देखे अहोनितों, चीकणो विपयनो वांक ॥ कु०॥ वा ॥ २५ ॥ मनोहर रूप ए माहरु, नरयौवन ए वेष ॥ कु० ॥ देखें पण मोले नहिं, दु ज पाय पडेश ॥ कु० ॥ वा ॥ ३० ॥ स्वार्थे सद्गु को 5 ख सहे, पण परमारथ कोय ॥ कु०॥ पर खें 5खीया होये, ते जग विरला जोय ॥ ॥ वा०॥ ३१ ॥ यत ॥ विरला जा पति गुणा -॥ १ ॥ धन धन ए जग प्रीतडी, जेहवी दूध ने नीर ॥ ।। कृ ॥ श्राप बतां निज वधुने, उपजावे नहिं पीर ॥ कुछ ॥ वा ॥ ॥ ३२ ॥ यजुक्त ॥ क्षीरेणात्मगतोदकाय हि गुणा दत्ता पुरा तेऽखिला हीरे तापमवेक्ष्य तेन पयसा ह्यात्मा कृशानौ दुत ॥ गतु पावकमुन्म नास्तवनवदृष्ट्वा तु मित्रापद, युक्त तेन जलेन शाम्यति पुनमैत्री सतामी , २०६. जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ॥ कुमरजी ॥ मविर थाव्या माहरे, महेर करी माहाराज ॥ वात कहो मुफमन तणी॥एथांकणी ॥रातेंथाव्या तुमें रंगा, बल श्रावास ॥॥ ककण लीधुं माहरु, काम कीधु ए खास कुणावा मत जाणो उघी दती, द्वं कपटें रदी एम ॥ कु० ॥ पण परमंदिर ने, काम कम्यु ए केम ।। कुछ ॥ वा० ॥ ३ ॥ नई में तुजने दियो, एह कलंक ॥॥दोष सहुए माहरो,तु सूची निकलक ॥ रसीली॥वा०n राजा थापशे तुम नणी, महारे हाथ सुजाण ॥ रसीली ॥ जो तुमने गमतुं होवे, तो ले जावं गण ॥ २० ॥ वा० ॥ ५ ॥ जो न रुचे सो तुफनें, करु निकलक सनूर ॥ र० ॥ कहो मुफ ए वेद वातमा, गमती पुरस्यपमूर ॥ र० ॥ वा ॥ ६ ॥ सानली कन्या चितवे, तशुण रंजी तोर ॥ २० ॥ प्रेम थरुत्रिम एहनो, मुफ कपर थति जोर ॥ र० ॥ वा. ॥ ॥ अंगीकरीयें उखने, पण नवि मूक एह ॥ र ॥ राजलान सोह लो कह्यो, ज्लहो साजन नेह ॥ र ॥ वा ॥ ७ ॥ वलतु बोबे सुदरी, सुनग मुणो थरदास ॥ कु० ॥ प्राण ए श्राधीन ताहरे, जिहां तु तिहां मुफ वास ॥ कु० ॥ वा० ॥ ए॥ सि६ मनोरथ ते कहे, न ए अवधार ॥ २० ॥ तुक शिर जल बाटू यदा, तब मूके फिटकार ॥ २० ॥ वा. ॥ १० ॥ ते पण कुमरीयें थादस्यु, श्रदो यदो मोदनो बध ॥ कुछ ॥ नेह सहे एम Fखहां, जगमा ए महोटो धध ॥ कु ॥ वा० ॥ ११ ॥ रायसमीपें थावीयो, कहे कुमरी मुफ साध्य ॥ राजनजी ॥ कहे नृप दवे कतावला, काढो एह असाध्य ॥ साजनजी ॥ वा ॥ १३ ॥ वादन थाणो एहवु, जाय निशा परदेश ॥ रा॥ जो वचें सूरज कगशे, तो थावशे फरि देश ॥ रा० ॥ वा ॥ १३॥ राजा जय पाम्यो घणो, वायुवेगा ए नाम ॥ राण ॥ जातीली वडवा दिये, असवारीने काम ॥ रा० ॥ वा० ॥ १४ ॥ सध्या समयें नृपमुता, पाणी केशे फालि ॥ रा० ॥ नृपयादेशे सेवकें, सोपी तेदने तत्काल ॥ रा० ॥ वा ॥ १५ ॥ सरशव बाटे तेहने, सामोकरे फिटकार ॥ र ॥जय पाम्यो नरवर तिहां, भ्रूजे थग अपार ॥ र ॥ वा ॥ १६ ॥ गादस्वरें हॉकी तिहां, साथै शांत स्वनाव ॥र ॥ मत्रशक्ति को याकरी, सबलो एहनो अनाव ॥ २० ॥ वा० ॥ १७ ॥ शान करे राजा तिहां, एदन अवली

श्री शांतिनाथनो रास खमत्रीजो. २०ए
तेहा, सदुए एम वारे ॥ पण राख्यो न रहे किमे, कुवर ते तिवारें ॥
य० ॥ ॥ वनमाहे काष्ठचिता रची, वदु नागर साथे ॥ चाल्यो चिता
से थाकरो, काल्यो न रहे वाथे ॥ थ॥ ए ॥ लोक कहे याज अवधि
नो, नेल्लो दिन रहीने ॥ कालें पढी करजो तुमें, जाणो तिम वहीने ॥
य० ॥ १० ॥ मान्यु कहण ए लोकनु, हरख्यो सङ कोई ॥ ते वेहू जण
धावता, रह्या तिण दिरों जो ॥ थ॥ ११ ॥ मित्रानंद उतावलो,
थाव्यो तेनी पासें ॥ लोक कहे कोइ पथीडो, धश्यो आवे उनासें ॥ १०
॥ १२ ॥ अमर सुणी साहमु जुवे, दीठोथलगेथी ॥ चाल दीसे माहरा
मित्रनी, के होशे कोइ पथी ॥ १० ॥ १३ ॥ क्याथी थावे ते वालहो,
जोईतो आज ॥ ऊबक नजिक आव्यो जिस्यो, निरख्यो सवि साज ॥
थम् ॥ १४ ॥ उलरवी सामो थावीयो, वेदु वधव मलीया ॥ घणा दिव
सरा विरहरा, आसू तव गलीयां ॥ थ॥ १५ ॥ अहो बंधव तें धावतें,
मुफ जीवतो राख्यो ॥ तुम दीवे उखपुज ए, सवि अलगो नारख्यो ।
था ॥ १६ ॥ कहे मित्रानद वांधवा, जोवो ए सारी ॥ रत्नमजरी ला
वियो, चित्त चोरणहारी ॥ १० ॥ १७ ॥ अमर कहे ते साचलु, तुक
नाम निपायु ॥ मित्रने थानद जेहथी, मित्रानद गायुं ॥ ५० ॥ १७ ॥
लोक कहे एहना रूपनें, मोह्यो ते न्यायी ॥ मधुकर मालती मोहियो,
नवि पावल जा ॥ १ ॥ १७ ॥ पुण्य उदय थयो वारमी, ढालें मुणो
लोका॥रामविजय कहे सानलो, हवे पुस्यशलोका ॥१०॥ २० ॥३५॥
॥ दोहा ॥
॥ सहने थानद उपन्यो, देखी श्रचरिज वात ॥ मित्र मल्यो विरदो
टल्यो, रोम रोम सुखशात ॥ १॥ तिहां उछाह थया पडी, थमरदत्त
तिण वेल ॥ जाग्य जोगें जे नीपन्यु, ते निसुणो मन मेल ॥ २ ॥ तेह
नयरनो राजीयो, थपुत्रीयो तिण काल ॥ मरण लह्यो मत्र। प्रमुख, करे
राज्यनी जाल ॥ ३ ॥ पंच दिव्य थधिवासीयां, मल्या लोकना वृद ॥
के रूवे केई हसे, महामोदनो फद॥ ४ ॥ त्रिक चतुष्कनें चाचरें, वेता
वगु गुणवत ॥ हस्ती हीमे हर्पा, चिद पासें निरखत ॥ ५ ॥ जब
जोये जे सादमु, तव ते दिशिना लोक ॥ निरखे गज दरखी हिये,
जेम सूरजने कोक ॥ ६ ॥

០ថ្មី जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. दृशी ॥ ॥ पूर्वढाल ॥ वात करें मनमोदछु, धन धन मुज अवतार ॥ कु० ॥ जे तुम मुझ याची मल्या, ते बेग्यो किरतार ॥.. वा० ॥ ३३ ॥ रत्नमजरी साथै हवे, चालतां अनुक्रमें चालतां अनुक्रमें सोय ॥.. पामतीपुर निरख्यु तिहां, नयां दर्पित होय ॥ कुण् ॥ वा० ॥३३॥ त्रीजे खमें श्रग्यारमी, रामविजय कही ढाल ॥ रगीली ॥ श्रमर तणो वर्ष स,सुणो सबंध रसाल ॥रावा॥३५॥सर्व गाथा ॥३५५॥ श्लोकोला ॥ दोहा ॥ ॥ अमरदत्ते इण अवसरे, प्रतिदिन जोई वाट ॥ पण वधव याव्यो नहिं, मनमा सबल उच्चाट ॥ १ ॥ चिते चित्तमां माहरो, मित्र गयो पर देश ॥ कागल को श्राध्यो नहिं, वली नाव्यो सटेश ॥ ५ ॥ हा हा एं दोशे थयु, नाव्यो मित्र थमूल्य ॥ वेग में पेदा कम्यु, पेटनें मशली शूल ॥३॥ ढुं जेहवो मूरख नहि, जगमां को वे शुद्ध ॥ श्रागलबुद्धि कुल उपन्यो, पण थयो पाउलबुदि॥ ॥ जोप तुमें जुट जोपिया, श्रावे किवारे मित्र ॥ थाज काल सद्ध एम कहे, पण न पडे खरि रीत ॥ ५ ॥ मास दोय पूरा ढुवा, रत्नसारने थाम ॥ श्रमर कहे हवे मादरे, जीव्या नु नहिं काम ॥ ६ ॥ शेठ कहे वत्स शुं कदु, तुमने वयण अनिष्ठ ॥ वहेलो मलशे तादरो, मित्रानद अनीष्ट ॥ ७ ॥ ॥ ढाल बारमी॥ ॥ रावल कहे उनी रहो ॥ ए देशी ॥श्रमर कहे सुण तातजी, मुण मित्र न थाल्यो । पूब्धा पंथें पंथीया, पण केणें न बताव्यो ॥ श्रम ॥ ए थोकणी ॥ १ ॥ शुं ते राद नूल्यो हो, किदां नो क्याहिं जाशे ॥ म दिर मारा प्रेमनो, मन घणु थकलाशे ॥॥॥ में सुखकारण मूकीयो, सुख लीधु उदेरी ॥ ते मुफ काजें विदेशमां, देतो हो फेरी ॥५॥३॥ स्वार्थ कीघो वालदो, पण मित्र न कीधो ॥ पण ए देव के पाधरो, प मणो सुख वीधो ॥ था ॥ ४ ॥ नीतयो दु जस 5 खना, वीसारण मा टें॥साहमो पाज्यो ते मित्रने, सवलें नचाटें ॥थ ॥ ५ ॥ हवे वहेली विरचो चिता, काष्ठ नक्षण करवु ॥ मुफ माटें मूठ ते सही, मादरे पण मरतु ॥थ ॥ ६ ॥ शेठे घणी ना ना कही, दीयें हन जीयो । यति याग्रह देखी करी, तव थाकद कीयो । य० ॥ ७॥ लोकमया बहुला ,

श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो १०ए
तिहा, सहुए एम वारे ॥ पण राख्यो न रहे किमे, कुवर ते तिवारें ॥
थ ॥ ॥ वनमांहे काष्ठचिता रची, वदु नागर साथे ॥ चाल्यो चिता
पासे याकरो, काल्यो न रहे वाथे ॥ य॥ ॥ लोक कहे थाज अवधि
नो, वेनो दिन रहीने ॥ कालें पठी करजो तुमें, जाणो तिम बहीने ॥
य० ॥ १० ॥ मान्यु कहण ए लोकनु, हरख्यो सङ कोई ॥ ते वेहू जण
थावता, रह्यां तिण दिन जो ॥ य० ॥ ११ ॥ मित्रानद उतावलो,
थाव्यो तेनी पासें ॥ लोक कहे कोई पथीडो, घश्यो थावे उन्नासें ॥थ
॥ १२ ॥ अमर सुणी साहमुं जुवे, दीवो अलगेयी ॥ चाल दीसे माहरा
मित्रनी, के होठो को पथी ॥ अ॥ १३ ॥ क्याथी यावे ते वालहो,
जोईतो आज ॥ जवक नजिक थाव्यो जिस्यो, निरख्यो सवि साज ॥
थम् ॥ १४ ॥ उसखी सामो थावीयो, वेदु वधव मलीया ॥ घणा दिव
सरा विरदरा, थांसू तव गलीया ॥ ॥ १५ ॥ अहो बंधव ते थावतें,
मुज जीवतो राख्यो ॥ तुज दी 5 खपुज ए, सवि थलगो नाख्यो ।
थम् ॥ १६ ॥ कहे मित्रानद वाधवा, जोवो ए सारी ॥ रत्नमजरी ला
वियो, चित्त चोरणहारी ॥ १० ॥ १४ ॥ श्रमर कहे ते साचलु, तुज
नाम निपायु ॥ मित्रनें थानद जेहथी, मित्रानद गायु ॥ 8 ॥ १७ ॥
लोक कहे एहना रूपनें, मोह्यो ते न्यायी ॥ मधुकर मालती मोहियो,
नवि बावल जाइ॥ य० ॥ १५ ॥ पुण्य उदय थयो वारमी, ढालें सुणो
लोका॥रामविजय कहे सानलो, हवे पुण्यशलोका ॥१०॥ २० ॥३५॥
॥ दोहा ।।
॥ सगुने थानद उपन्यो, देखी श्रचरिज वात ॥ मित्र मव्यो विरहो
टल्यो, रोम रोम सुखशात ॥ १ ॥ तिहां उछाह थया पली, थमरदत्त
तिण वेल ॥ नाग्य जोगें जे नीपन्यु, ते निसुणो मन मेल ॥ २ ॥ तेह
नयरनो राजीयो, पुत्रीयो तिण काल ॥ मरण लह्यो मत्र। प्रमुख, करे
राज्यनी नाल ॥ ३ ॥ पंच दिव्य अधिवासीयां, मल्या लोकनां द ॥
के रूवे केई हसे, महामोहनो फद॥ ४ ॥ त्रिक चतुष्कनें चाचरें, वेग
बद्ध गुणवत ॥ वस्ती ही दर्पशु, चिद पासें निरखत ॥ ५॥ जय
जोये जे सादमु, तब ते दिशिना लोक ॥ निरखे गज हरखी हिये,
जेम सूरजने कोक ॥ ६ ॥

{ ចំ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. दृशी ॥२॥ पूर्वढाल ॥ वात करें मनमोवशु, धन धन मुण अवतार ॥ कु० ॥ जे तुमें मुफ थावी मव्या, ते त्रूट्यो किरतार ॥. वा० ॥ ३३ ॥ रनमजरी साथें हवे, चालतां यनुक्रमें सोय ॥ पामलीपुर निरख्यु तिहां, नयणा हर्पित होय ॥ कुछ ॥ वा० ॥ ३॥ त्रीजे खमें श्रग्यारमी, रामविजय कदी ढाल ॥ रगीली ॥ यमर तणो हो हर्ष सुणो सबध रसाल रावा॥३पासर्व गाथा ॥३२५॥श्लोकाशा ॥ दोहा ॥ ॥ अमरदत्ते इण थवसरें, प्रतिदिन जोई वाट ॥ पण वधव आयो नहिं, मनमा सबल उच्चाट ॥ १ ॥ चिते चित्तमां माहरो, मित्र गयो पर देश ॥ कागल को श्राव्यो नहिं, वली नाव्यो सटेश ॥ २ ॥ हा हा होशे थयु, नाव्यो मित्र यमूल्य ॥ वेग में पेदा कयु, पेटनें मशली शूल ॥ ३ ॥ हूँ जेहवो मूरख नहिं, जगमां को वे शुद्ध ॥थागलबुद्धि कुल सपन्यो, पण थयो पाबलबुद्धि ॥ ॥ जोष तुमें जुन जोपिया, श्रावे किवारे मित्र ॥ श्राज काल सद् एम कहे, पण न पडे खरि रीत ॥ ५ ॥ मास दोय पूरा दुवा, रत्नसारने श्राम ॥ श्रमर कहे हवे माहरे, जीया नुं नहिं काम ॥ ६ ॥ शेत कहे वत्स द्यु कनु, तुफने वयण अनिष्ट ॥ वहेलो मलशे तादरो, मित्रानद थनीष्ट ॥ ७ ॥ ॥ ढाल बारमी॥ ॥ रागल कहे उनी रहो ॥ ए वेशी ॥श्रमर कहे सुण तातजी, मुफ मित्र न थाव्यो ॥ पूबघा पंथें पंथीया, पण केणें न बतायो । श्रम ॥ ए थांकणी ॥ १ ॥ शु ते राह मूल्यो दशे, किहां नो क्याहिं जाशे ॥ म दिर मारा प्रेमनो, मन घणु थकलाशे ॥॥॥ में सुखकारण मूकीयो, मुख लीधु उदेरी ॥ ते मुफ काजें विदेशमां, देतो दशे फेरी ॥०॥३॥ स्वार्थ कीधो वालदो, पण मित्र न कीधो ॥ पण ए देव ने पाघरो, म मणो ख दीधो । थम् ॥ ४ ॥ नीलस्यो दु नस खना, वीसारण मा टें ॥साहमो पाठ्यो ते मित्रने, सवलें तश्चाटें ॥ १० ॥ ५॥ हवे वहेली विरचो चिता, काठ नक्षण करतु ॥ मुझ माटें मूठ ते सही, माहरे पण मरवु ॥ थ ॥ ६ ॥ शेठे घणी ना ना कदी, दीये इन लीयो । यति थाग्रह देखी करी, तव थाकंद कीधो ॥१०॥ ॥ लोकमयां बहुला - श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो २०ए तेहां, सदुए एम वारे ॥ पण राख्यो न रहे किमे, कुवर ते तिवारें ॥ पण ॥ ॥ वनमांहे काष्ठचिता रची, वतु नागर साथे ॥ चाल्यो चिता मे याकरो, काव्यो न रहे वाथें ॥ थाए ॥ लोक कहे थाज अवधि गो, नेल्लो दिन रहीने ॥ कालें पढी करजो तुमें, जाणो तिम वहीने ॥ थ० ॥ १० ॥ मान्यु कहण ए लोकनु, हरख्यो सङ कोई ॥ ते वेहू जण श्रावता, रह्यां तिण दिशे जो ॥ य॥ ११ ॥ मित्रानंद उतावलो, थाव्यो तेनी पासें ॥ लोक कहे कोई पथीडो, धश्यो थावे उनासें ॥ ॥ १२ ॥ अमर मुपी साहमुं जुवे, दीगो अलगेथी ॥ चाल दीसे माहरा मित्रनी, के दोशे को पथी ॥ अ० ॥ १३ ॥ क्याथी आवे ते वालहो, जोईतो बाज ॥ जबक नजिक भाव्यो जिस्यो, निरख्यो सवि साज ॥ थम् ॥ १३ ॥ उलखी सामो थावीयो, घेदु वधव मलीया ॥ घणा दिव सरा विरहरा, यांसू तव गलीयां ॥ अ॥ १५ ॥ यहो बंधव ते धावतें, मुफ जीवतो राख्यो ॥ तुज दीउखपुन ए, सवि थलगो नारख्यो । थम् ॥ १६ ॥ कहे मित्रानद वांधवा, जोवो ए सारी ॥ रत्नमजरी ला वियो, चित्त चोरणहारी ॥ ॥ १७ ॥ श्रमर कहे तें साचलु, तुज नाम निपायु ॥ मित्रनें थानद जेहथी, मित्रानद गायु ॥थ ॥ १७ ॥ लोक कहे एहना रूपनें, मोह्यो ते न्यायी ॥ मधुकर मालती मोहियो, नवि चावल जाइ ॥ थ ॥ १ए ॥ पुण्य उदय थयो वारमी, ढालें मुणो लोका॥ रामविजय कहे सांजलो, दवे पुण्यशलोका ॥थ॥ २० ॥३५॥ ॥ दोहा ।। ॥ सद्भुने थानद उपन्यो, देखी थचरिज वात ॥ मित्र मल्यो विरहो टल्यो, रोम रोम सुखशात ॥ १ ॥ तिहां छाद थया पबी, यमरदत्त तिण वेल ॥ जाग्य जोगें जे नीपन्यु, ते निसुणो मन मेल ॥ २ ॥ तेह नयरनो राजीयो, थपुत्रीयो तिण काल ॥ मरण सह्यो मत्र। प्रमुख, करे राज्यनी जाल ॥ ३ ॥ पंच दिव्य अधिवासीयां, मस्यां लोकनां वृद ॥ के रूवे केई दसे, महामोदनो फद॥ ४ ॥ त्रिक चतुष्कने चाचरें, घेता घ8 गुणवत ॥ हस्ती हीमे हर्पच्छ, चिट्ठ पासें निरखत ॥ ५ ॥ जय जोये जे साहमु, तव ते विशिना लोक ॥ निरखे गज हरखी हिये, जेम सूरजने कोक ॥ ६ ॥ , . १२० जैनकथा रत्नकोष नाग आठमो. ॥ ढाल तेरमी॥ ॥ कहो कुण ए श्रावे ३ ॥ ए देशी ॥ पुरवाहिर गज आवियो, लीबल मलपंतो रे ॥ लोक मल्यां जिहां सामटां, तिहां श्रावे उससंतो ॥१॥थहो अहो पुण्यनी प्रबलता,पुण्यथकी 5 ख नासे रे॥ पुणे सुर सपदा, थावे सघली पासे रे ॥ थ० ॥ ५ ॥ वधव वेहु जोडें रह्या, सीया शिरदारो रे ॥ सिहपरें साहमा थया, गज श्राव्यो तिण गरो रे। ॥थ ॥ ३ ॥ अमर कुमर शिर ऊपरें, ढाल्यो कलश सुचगो रे ॥ करे । लखाट ए हर्षनो, हेषा ताम तुरंगो रे ॥ २० ॥४॥थातपवारण सिर थयुं, चामर तिहां विकाणां रे ॥ वाजां वाजिव रंगनां, धवल मगल मा णां रे ॥थ ॥ ५ ॥ कपाडी निजगढथी, गज भारोपे खर्फे रे ॥ राज सयुं श्रण चितव्यु, मागध गाये प्रबघे रे ॥धon ॥ चिरंजीवो तुमें राजीया, कोडा कोही वर्षो रे ॥ कर जोडी श्रावी नमे, राजकुली बत्रीमो रे ॥ थ० ॥ ४ ॥ बहु थामबरें नृप करे, नयरीमांहे प्रवेशो रे ॥ वपावे गजमोतीयें, सोदव सुंदरवेषो रे ॥ १० ॥ ७ ॥ कोई रमणी कहे मात में, मा ए कुण श्रनिरामो रे ॥ कुण गुणवतीनो नादलो, रूपें जेहवो का मो रे ॥१०॥ ए ॥ मात कहे महोटे स्वरें, रयणमजरीनो कत रे ॥ मि त्रानवनो बंधवो, एद श्रमर चूकतो रे ॥ १० ॥ १७ ॥ धन्य जननी जेणे जनमीयो, ए नर रयण सरीसो रे ॥ चिरं जीवो एह जोडली, एम दीये आशीषो रे ॥ १० ॥ ११ ॥ कोइ कहे धन्य एहनो, बधव मित्रानको रे ॥ जेणें मेली मृगलोचना, नाम्यपरें श्रमदो रे ॥२०॥ १३ ॥ को कहे धन्य शेग्नें, पुत्रपरें जेणे पाल्यो रे ॥ थणजास्या नेदो थाणीने, निजघर माहे घाल्यो रे ॥ श्र० ॥ १३ ॥ एम अवरों सुणतो थको, पुरप्रमवानी वाणी रे ॥प्रीत मनें धन वरसतो, थावे ते गुणखाणी रे ॥थ०॥ १४ ॥ स्तवेरमयी हो छतरी, पेठो ममपमांही रे ॥ करे अत्सव अनिषेकनो, नृप ममल मलि त्यादी रे ॥२॥१५॥ रयणमजरी स्थापी तिहां, पहराणी गुण गेहो रे ॥ मित्रानदने सोंपीयो, सद्यधिकार सनेदो रे ॥१०॥ १६ ॥ स्थाप्यो जनकनें स्थानकें, शेव नणी गुणवतो रे ॥ की, पपोचित एम सङ, पाले राज्य महतो रे ॥ ॥ १७ ॥ मामी वात कही सये, मि त्रानद मनोहारी रे ॥ मुणि राजेश्वर रंजियो, तुफ साइत बलिहारी रे ॥

श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. १११ ॥ १० ॥ १७ ॥ मित्र नणी माने घणो, जाणे जीव समानो रे ॥ राणी पण तेहने सदा, थापे बहु सन्मानो रे ॥ थ० ॥ १५ ॥ वेदु वधव सुख जोगवे, राज्य रमणी रस राता रे ॥ इति गइ निनदेशथी, सदुने वरती शाता रे ॥ १० ॥ २० ॥ ढाल नणी ए तेरमी, त्रीजे खमें विचारी रे ॥ राम कहे तस सद्ध नमे,पुण्यदशा जस सारी रे॥॥२१॥ सर्वगाथा ॥३४॥ ॥ दोहा॥ ॥ श्रमरदत्त सुख जोगवे, निजनारीनी साथ ॥ दोगुदक सुरनी परें, न लहे दिवस ने रात ॥१॥ मन मान्याशु गोठडी, पुण्य विना नवि होय ॥ जे दिन सजन मेलावडो, जग जीवित फल सोय ॥२॥ प्राण अखम वहे सवल, सीमाडा राजान ॥ सप्त अग शोने नलां, दिन दिन चढते वान ॥३॥ मित्रानद तणे मने, शववाणीनी खटक ॥ फ्तक एक नहि वीसरे, यहोनिश एह थटक्क ॥ ४ ॥ अहोनिश रहे उदासमां, न गमे कोई वि लास ॥मरण समो जय को नहीं, जीवित सम नहिं थाश ॥ ५ ॥ कहेय मरने साहिवा, मुझ मन महोटी नीति ॥ रखे थावे व्यतर शहा, उपनावे अप्रीति ॥ ६ ॥ नूमिपति कहे मित्र तु, लय न करे मनमाही ॥ दूर रह्या व्यंतर किस्यु, करशे थावी थाही ॥ ७ ॥ मित्रानद कहे खरु, पण नजीक ए देश ॥ तेमाटे मुफ वधवा, मूको कोई परदेश ॥ ॥ ॥ ढाल चौदमी॥ ॥ सुण बहेनी पियुडो परदेशी ॥ ए देशी ॥ सुण वधव जब तु परदेशी, तव मुफ केम सरेशी रे ॥ क्षण क्षण तोरो विरह दहेशी, केम मुफ बोहि चलेशी रे ॥ १० ॥१॥ नयण फरे थासूनी धारा, मुण सुण मारा प्या रा रे ॥ तु मुफ थातमना आधारा, म म करो एह विचारा रे ॥ ९ ॥ ॥ २ ॥ मित्र कहे गमतुं नयी मुफने, जे मूकी जा तुजने रे ॥ पण श ववयण दहे मुफ तननें, सबल विमासण मनने रे ॥ मु० ॥ ३॥ रयण मजरी कहे थमने वर्जी, किम जाशो देवरजी रे ॥ सुख दुख वात करेगु नेली, मनहाय मन मेली रे ॥सु॥४॥ पण तस मनमा वात नावी, टाक्यु टले किम जावी रे ॥ वात करे जन सहस वनावी, पण कर्म न से वे बचावी रे ॥ सु० ॥ ५ ॥ राय कहे सुण मित्र सोनागी, सेवकां वह नागी रे ॥ वसतपुर जाउँ गुणरागी, तिहा रहेजो धनुरागी रे ॥ सु० ॥ .

. , २२२ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ॥.६ ॥ सेवक मोकलजो मुफ पासे, देवा खबर अनासे रे । जिस नहिं थावो थावासें, तिहां लगें उचे श्वासें रे ॥ सु०॥७॥ पद हूंती न विसरशो, कण कणमां सांनरशो रे ॥ मगलकमलाने तुमो वरतो, काइ फिकर न करशो रे ॥ सु॥ ॥ राय चल्यो सप्रेडण सा, बेडू जण वलग्या दाथे रे ॥ वलतां कहे नृप मलिने वाथें, कां एम कमुख नार्थे रे ॥ सु० ॥ ए ॥ नृप वोलावी पाडगे वलीयो, थाव्यो गृह फलक लीयो रे ॥ मित्रविरद 5 खदधि उहलियो, चाप थई नीकलीयो रे । सु० ॥ १० ॥ न गमे राजविनोदनी लीला, सानरे, मित्रनी पीरा रे। जे साथें करी बहु सुखक्रीडा, केम ते विसरे सखीडां रे ॥ सु० ॥ ११ ॥ मंत्रीश्वर श्रादें सह मलिया, कहे नृपनें तुमें बलीया रे ॥ एम नवि पाई जे प्रतु गलिया, कर्म न जाये कलियां रे ॥ सु० ॥ १२ ॥ कांक शोष निवारी राज्ये, बेता थावी समाजे रे ॥ सुख संपत्ति विलसे सवि साजें, पण 5 ख मनमा दाजे रे ॥ 5 ॥ १३ ॥ दिवस थया बहु घर को ना व्यो, तष बीजो दोडाव्यो रे ॥ ते पण तिहा जइ पालो श्राव्यो, कहे तस खबर न पायो रे ॥ सु० ॥ १३ ॥ एम निमुणी सघ्रांत थइने, कहे रा णीने जश्ने रे ॥ श्राव्यो चर पाबो पण वहीने, खबर न पामी तेहने रे ॥ मु०॥ १५॥ कहे राणी अवधारो कता, ए वातनी महोटी घिसा रे ॥ जो ज्ञानी थावे गुणवता, तो सवि नांजे व्रता रे ॥ १० ॥ १६ ॥ वात करी नृप बाहिर थाष्यो, तब वनपालो जायो रे ॥ नृपति पासें श्वास जरायो,अवल वधामणी लायो रे ॥ सु० ॥ १७ ॥ साहिब -जीयो कोडि वरीसा, दिन दिन चढती जगीशा रे ॥ तुम वन समवसमा मुनि इस्या, श्रीधर्मघोष सूरीशा रे ॥ मु०॥ १७ ॥ अशोकतिलक उद्यानमा किरिया, गुणरयणे करि नरिया रे॥प्रांटक मिश्रावी समोसरिया,अतिक्ष य ज्ञानना दरिया रे ॥ १ ॥ १५ ॥ शम सवेगादिक थादरिया, बडु मुनिशुं परवरिया रे ॥ दूर करया रागादिक थरिया, तामा जिण निज परिया रे ॥ सु॥ २० ॥ समयागमन सुणी चित्त तरियां, नरवर जायें जरिया रे ॥ राणी सघातें तेणें वरिया, गुरुवदन नीसरिया रे ॥ सु० ॥ २१ ॥ साचवी पचानिगम उन्नासें, थाव्यो नृप गुरुपासें रे ॥ दे प्रद क्षिण एणिपरें नासे,तुमें न पख्या नवपाशें रे ।। सु० ॥ २१ ॥श्रीजे खमें - श्री शांतिनाथनो रास खमत्रीजो. २२३ गोदमी जाणो, ढाल ए दिलमां बाणो रे ॥ कहे गुरु नृप निमुणे सपरा गो, करि निज बातम शाणो रे ॥सुगाश्॥ सर्वगाथा ॥४१॥ श्लोकाए ॥ दोहा॥ ॥ धर्मघोप मुनिवर कहे, देशन अमृतरूप ॥ जे निसुणी देखे प्रकट, पटमा सकल स्वरूप ॥१॥ अतिशय नाणी कर्मनो, नाखे सवि विस्तार ॥ बध हेतु दाखे वली, तिम तेहनो निस्तार ॥ २ ॥ ॥ ढाल पन्नरमी॥ ॥राग मनार ॥ चेतन कर्मकी चाल विनावे ॥ नरक निगोद तिरियग्ग तिमें, रमो नदि कवढं सनावें ॥ चे० ॥ १ ॥ धनी अधनी अकुलीन कुलीनो, रूप कुरूप गिणावे ॥ ईश्वर दास सुखी तिम असुखी, नाम श्रने क धरावे ॥ चे० ॥ ॥ श्राव नाम उनके गुन जूदे, सत्वकु थाण मना वे ॥ हे रूपी पण अकल सरूपी, नजरें कोउ न पावे ॥ चे० ॥ ३ ॥ चार चारके योक बने दो, घाति अघाति फिरावे ॥ उनमें मोह सवल मतवालो, जीनकों जोर करावे ॥ चे ॥ ४ ॥ मिथ्या थविरति योग कपा या, चवध हेन कहावे ॥ पंच सुवालस पनर पणवीसा, नेद सत्तावन थावे ॥ चे ॥ ५ ॥ लद्ध दीसे ए बंधनकालें, वगु सुखकों उपजावे ॥ जीवकों रोकि रखी पजरमें, उलटी चाल चलावे ॥ चे ॥ ६ ॥ पाडपो नर्म मर्म न पिठाणे, उनको गायो गावे ॥ जिनकू करि जाणे जीउ मेरो, कही नरक पतावे ॥ चे ॥ ७ ॥ तुं नहिं तेरो नहि ए को, यु मन मांहे नावे ॥ फिरत फरे मतवाला जेसो, कहा सद्गुरु वतलावे ॥ चे ॥ ७ ॥ निजगुण त्यागी मोहके रागी, उनकों शीख सुणावे ॥ देखत ख्या ल ए मोह नटावो, तुमको परसें रे लरावे ॥ चे ॥ ए ॥ निजकु निज जातो तुम चेतन, और गीनो परनावें ॥जात इदीन पर नोहे अपने, बहु री कहा तु कहावे ॥ चे ॥ १० ॥ मुण गुरुकी वानी नवि प्राणी, मोद की बाक मिटावे ॥ रामविजय कहे तेही जगतमें, साचा पुरुप सुहावे ॥ चे ॥ ११ ॥ इतिगुरूपदेशगीतं ॥ दोहा ॥ वचन सुणी गुरुजी तणा, सम ज्या चतुर सुजाण ॥ मोह मटयो मनथी परो, मानी सशुरु थाण ॥ १॥ अशोकदत्त इण श्रवसरें, व्यवहारी कर जोडि ॥ पूछे मुफ पुत्री तनें, केम थावी ए खोड ॥ ॥ सकल श्रग रोगें नरी, नहिं विचिकित्सा , * , १२४ जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. साध्य ॥ कुण कमै मुज दाखवो, विरुई वलगी व्याधि ॥ ३॥ गुरु में जाणीने, नांखे तस श्रवदात ॥ राजादिक सवि सांजले, विस्मय ली वात ॥ ४ ॥ वनसुंदरी, जयसुदरी, श्यामा रे लो ॥ ए देशी बरे सद्गुरु वाणी, सुणो नवि प्राणी, कर्म कहाणी रे लो ॥ नविका मुलीने जीरे लोनूतशाला गामें, नूतदेव नामें, शेत सहु कामे रे लो॥ १ ॥ न नपीयें जीरे लो॥ए आंकणी ॥ क्रूरमति तस नारी, देवमती सारी, वह सुविचारी रे लो ॥०॥ एक दिन मजारी पीयूं धारी, दूध निरधारी रे लो ॥क ॥ ५ ॥ कहे सासू नूमी, उमति कूमी, कोघे उमी रे लो ॥ न । में शाकिनी जाली, जेह विमाली, ते नवि मारी रे लो ॥ क० ॥ ३ ॥ एम कहेतां तत्क्षण, वढू नयनीपण, यही कोई शाकणी रे लो॥ ज० ॥ तस वयरों वलगी, न रहे थलगी, श्राग ज्युं सलगी रे लो ॥ क० ॥ ॥४॥ सासू चितातुर, तेहे थातुर, वैद्य निरंतर रे लो ॥ ज० ॥ पण न थई साजी, कर्मनी बाजी, थावी वाजें रे लोक५ ॥ एक पायो योगी, अग्निनियोगी, तेही मातंगी रे लो ॥ ज० ॥ कहे किदा तु एदने, व लगी वेहनें, मूक सनेहने रे लो ॥ क० ॥ ६ ॥ कहे सासू वाणी, विहिनी जाणी, में महि ताणी रे लो ॥ न ॥ खलजिहा सासू, लोक तमासु, कहे अविमास रे लो ॥ क ॥ ७ ॥ वदुअर नीरोगी, कीधी योगी, थइ सुख रोगी रे लो ॥ ज० ॥ सासू रंजाडी, जित पाडी, स्वरीय नवा ही रे लो ॥ कण् ॥ ॥ सयतिनी पासें, सासु विमासे, प्रत वेवासी रे लो॥न० ॥ चारित्र पालेश, अण्यालोइ, गइ सुरलो रे लो ॥ फ० ॥ए ॥ तिहा देव थइने, वलीय चवीने, इहां थावीने रे लो ॥ ज० ॥ तुज पुत्री रूडी, चवीने कूडी, यश सासूही रे लोक ॥ १० ॥ कडवू जे नारख्यु, मनमा राख्यु, गुरुने न थाल्यु रे लो ॥ ॥ ननदेवी रोपें, पूरव दोपें, एहनें जोशे रे लो ॥ क० ॥ ११ ॥ कन्या इहां लावो, सवि समजावो, पूरवनावो रे लो ॥॥ जातिस्मरण लदेशे, मुस्व सवि कहेशे, थाण वो रेलो ॥ कण॥ १२ ॥ गुरुचरणे याणी, देवी नाणी, न रही शाणी रे लो ॥ न ॥ य सानी कुमरी, निजनव समरी, सूपी समरी रेलो ॥ क ॥ १३ ॥ कहे तन रोमांचू, स्वामी साचं,ज्ञान सुमार रेलो ॥०॥ करि कर्मपरीक्षा, लेगु दीक्षा, सहेगु शिक्षा रे लो ॥क । , - . , , श्री शातिनाथनो रास खंमत्रीजो. १२५ ॥ १४ ॥ कहे गुरुउपगारी,सुण तुं सारी, वात अमारी रे लो ॥ना सुख जोगने कम, रहे तुं घरमे, हमणा शरमें रे लो कण॥ १५ ॥ पठी थाइश अमणी, वात ए गमणी, निसुणी समणी रे लो॥न ॥ वच तहत्त करीने, पाठी फरीने, यावी घरमें रे लो ॥ कण् ॥ १६ ॥ देखीने नृपति, थयो विस्मित, तेवे समये रे लो॥ न ॥ मुज मित्र न थायो, खबर न पायो, किणे नरमायो रे लो ॥ क० ॥ १७ ॥ पन्नरमी पूरी, ढाल सनूरी, वात य धूरी रे लोन॥त्रीजे खमें सूरि, ख सवि चूरी,कहेगे पूरी रे लोक० ॥॥ ॥ दोहा ॥ ॥ कहे गुरु सांनल नृपति, विपम कर्मनी वात ॥ थणचिती यावी नडे, कोणें कली न जात ॥३॥ एह कर्मनी थागलें, जोरावर नहि कोय ॥ मान म करशो मानवी, कर्म करे सो होय ॥ २ ॥ ॥ ढाल शोलमी॥ ॥ बोडी दो प्रिया, बोडी चल्यो वनवास ॥ए देशी॥ साजल हो राजा सनिल ते तुज मित्र, चाल्यो हो राजा चाल्यो शीख मागी करी जी ॥ लघी हो राजा लघी दो जलनो उर्ग, पहोतो हो राजा पहोतो स्थल उरग तरी जी॥१॥ तिहां एक हो राजा तिहा गिरिनटीने प्रपात, रहिया हो राजा रहिया हो नोजन कारणे जी॥धावी हो राजा थावी हो निन्न नी धाड, नाठा हो राजा नाठा सेवक न रह्या रणे जी ॥ २ ॥ ताहरो दो राजा ताहरो वधव तेह, एकण हो राजा एकण दिशि कजाश्यो जी॥ लाज्यो हो राजा लाज्यो हो सेवक तुज, पालो हो राजा पाडो फरी को नावीयो जी ॥ ३ ॥ मित्रे दो राजा मित्रे उजाता एक, दीतु हो राजा दीडं सरोवर जल नघु जी॥पीधु हो राजा पीधु शीतल नीर,वडतलें हो राजा वडतलें शयन तेणें कयुंजी ॥४॥ पडते हो राजा पडते पडतु होय, कोटरें हो राजा कोटरेंथी थहि नीसयो जी॥ मश्यो हो राजा मश्यो तेहने थग, तापस हो राजा तापस एके विप इस्यो जी ॥५॥ पूरे हो राजा पूजे तापस कोण, नारखी हो राजा जांखी यथारय वारता जी ॥ तापस हो राजा ता पस गयो निज ताण, चिते हो राजा चिते हो मित्र थई थारता जी ॥६॥ हतीयो हो राजा हुदतीयो थयो जोर, मान्यु दो राजा मान्यु हो कहण न मित्रनु जी॥थातम दो राजा थातम उपरें थाज, कीधुं हो राजा

२२६ जैनकथा रत्नकोप नाग आम्मो.
कीधुं काम शत्रुनुं जी ॥७॥ जाउं हो राजा जात हो मित्रनी पास,
यो दोराजा सुखीयो थाइश तस संगें जी॥चिती हो राजा चिती हो
कठी, पडियो हो राजा पडियो चोर कुसंगते जी ॥ ॥ जाली हो राम
काली गया निज पाल, जोजो दो राजा जोजो एम नावी नरेजी
नरे हो राजा सांगरे ताहरो प्रेम,मनमां दो राजा मनमा महोटे सरें रहे
जी ॥ ए ॥ वेच्यो हो राजा वेच्यो हो निन्ने तेद, लीधो दो राजा जीयो
एक व्यवहारीये नी॥ थापद हो राजा थापद पडी तस एम, निसुली
दो राजा निमुणी हीये नवि हारी जी ॥ १०॥ कींधां दो राजा की
न बूटे कोय, नाणी दो राजा जाणी कर्म न कीजीयें जी ॥ साचो हो
राजा साचो एक जिनधर्म, जेहथी हो राजा जेहथी शिवमुख लीजीयें
जी ॥ ११ ॥ तिहाथी दो राजा तिहाथी हो पारसकूल, चाल्यो दो राना
चाल्यो वणिक तस लेने जी ॥ वधमां हो राजा वचमाहे थावी उले
ण, रातें दो राजा रातें रह्यो सुख वेनें जी ॥ १५ ॥ बधण दो राजा
बंधण बोडी तुझ, नातो दो राजा नातो दो मित्र नयरी नणीजी॥ स्वायें
दो राजा खालें यश्ने तेद, पेसे हो राजा पेसे होंश घरनी घणी जी
॥ १३ ॥ सुजो हो राजा मुजो हो तेणें प्रस्ताव, नयरमां हो राजा
नयरमा चोरनो जय घणो जी॥ बानो हो सजा बानो फरे कोटवाल, क
रहो, दो राजा करहो दोश्रमल तेह तणो जी ॥ १४ ॥ काल्यो हो राजा
फाल्यो ते ततकाल, जाएयु दो राजा जाएयु दो चोर ए थाकरो जी॥बांयो
दो राजा बांध्यो मयूरने बध, कीधो दो राजा कीधो प्रहार जाजरो जी
॥ १५॥ सोंप्यो हो राजा सोप्यो शेठने ताम, कीधो दो राजा कीधो हु
कम महोटो घणो नी ॥ क्षिप्रा हो राजा विक्षातटें वडरच, बांधी हो
राजा घांधी ए थपराधी हणो जी ॥ १६ ॥ फाल्यो हो राजा फाली चल्या
नर तेद, चिते दो राजा चिते दो मनमा तिण समे जी ॥ साबु हो राजा
साचु वयण थयु तेद, नारन्यु दो राजा नारव्यु श जे पूरवें जी॥ १७ ॥
जाणी हो राजा जागी जिदा तिहां जाउ, नावी हो राजा नावी किहां
नहीं जी ॥ कीजें हो राजा कीजे दो कोहि उपाय, करयां हो राजा
कडवा दो कर्म नहे सही जी ॥ १७ ॥ यमुक्त ॥ बिनयोनिर्धनत्वच,
वधन मरण तथा ॥ येन यत्र यदा लब्ध, तस्य तत्र तवा नवेत् ॥१॥

श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. ११७ याति दूरमसो जीव , पापस्यानाभयक्षुत ॥ तत्रैवानीयते नूयो,ऽनिनव प्रोढकर्मणा ॥ २ ॥ ढाल पूर्वनी ॥ म म कर हो जीव म म कर रोप ल गार, उपरे हो जीव ए अपराधी ऊपरें जी ॥ ए सदु हो जीव ए सद् ता हरो दोप,परनवे हो जीव परनवें सुख तु नविकरे जी ॥१॥ याव्यो हो राजा थाव्यो हो एम गुन नाव, वांव्यो हो राजा वाध्यो वढं विण वांक शु जी ॥ थावे हो राजा थावे हो साहमे पूर, थडियु दो राजा थडियुं यशुन नृप रांकगु जी ॥ २० ॥ एक दिन हो राजा एक दिन रमता हो गोप, मोई हो राजा मोई पडी मुख उठली जी ॥ ताहरा हो राजा ता दरा वधवनी वात, नीपनी हो राजा नीपनी कर्म मादावली जी॥ १ ॥ शोलमी हो नवि शोलमीत्रीजे खम, नांरखी हो राजा नांखी ढाल ए कर्मनी जी ॥ साखी दो राजा साखी होवे एक धर्म, धर्मथी हो राजा ध मैथी प्रापति शर्मनी जी ॥ २२ ॥ सर्वगाथा ॥ ४६ए ॥ श्लोक ॥ ११ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ गुरु मुखथी एम सानली, श्रमरदत्त नूपाल ॥ प्रेमतणे वश वलवले, पख्यो मोहनी नाल ॥१॥ गुण सनारे तेहना, निर्मल गगा नीर ॥ दडकूदण लागी हीये, नयणे चाल्या नीर ॥२॥ पर उपगारी शिरोमणि, हा वधव दा चात॥ वहेला थावो वाहला, करवा मोशु वात ॥३॥ में तुमनें वास्यो घणु, मित्र म जाउ विदेश ॥ पण तें कहण न मानीयु, किहाथी हवे सदेश ॥४॥ सजनीया साले घणु, सनारो सो वार ॥ जे विण घडी न चालतुं, केम चल जमवार ॥५॥ हियडा हवे तु शु रत्यु, गयो ते तुम श्राधार ॥ मित्रानंद मले किदांयकी, जीडनो नजणहार ॥ ६ ॥ एदवा वधव दो हिला, जेदनी शीतल बाय॥ काम पडे विहडे नहीं, वधव बीजी वांहि स ॥ ढाल सत्तरमी॥ ॥ पुण्य प्रशसीयें ॥ ए देशी ॥ रन्नमजरी सुणि एहबु रे, मूीगत थ ताम ॥ हा दा ए शु नीपन्यु रे, थणचित्यु वली थाम रे ॥ १ ॥ देवर मादरा ॥ एम नवि दीजें द रे, गुण बहु ताहरा ॥ ए थाकणी ॥ तुं मुफ में घणो वाइलो रे, थातमनो श्राधार ॥ एम किम उवेखी रह्या रे, यो दर्शन एक वार रे ॥ २ ॥ एम० ॥ ॥ जप मुझने थाणी हां रे,तव कीया के उपाय ॥ थाप विपत्तिवेता सही रे, किहा गइ मति निर्माय रे .

११७
जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो.
॥ दे ॥ ए ॥३॥ तुमें थमने विसारीयां रे, वसिया तुमें बह
अध वच्चे मूकी प्रीतही रे, नहि ए उत्तम रीत रे ॥ ७ ॥ ए.
हा हा देव अटारहो रे, मुखमां उपायुं शूल ॥ हरे एवा गुणवतने रे,पटो.
तेहनें मुख धूल रे ॥ ३० ॥ ए॥ ५॥ एम विलाप करे घणा रे, नव
णे नीर प्रवाह ॥ हियडे धीर धरे नहीं रे, ते केम विसरे दाहो रे ॥
॥ ए ॥ ६ ॥ राय राणी एम उख धरे रे, 5 खीयो सद्ध परिवार ॥गुरु
कहे शोक न कीजीयें रे, ए ससार थसार रे ॥ ७ ॥ सुण सुण प्राणीया,
परिहर मोदविकार रे, गुनगुण वाणीया ॥ ए आंकणी ॥ स्थिर न रह्यो
कोण जगें रे, नागेंड ने चद ॥ परमारथ सद्गु कारि, रे,महोटो ए
मोदनो फद रे ॥ १० ॥ ॥ ७ ॥ मुख निरतर किदांयकी रे, फूल
ते करमाय ॥ जे कगे ते थायमे रे, जे जायुं तेद जाय रे ॥ १० ॥
॥ ए ॥ थनित्यपणे जाण्या दोवें रे, जो पुजल परजाव ॥ शाने रडे एम
जीवडो रे, नित्य एक थाप खनाव रे ॥ सु० ॥ प० ॥ १० ॥ मात
पिता नगिनी सुता रे, कामिनी सुत थवतार ॥ वार धनत ए ताहरे रे,
तुं एदने निर्धार रे ॥ सु० ॥ १० ॥ ११ ॥ जीव जिके षट्कायना रे,
ते थया ताहरा रे बंधु ॥ मायाकल्पित ए सवे रे, जगमाहे सबध रे
॥ सु० ॥पण॥ १५ ॥ को न एवो जगतमा रे, मरण न पाम्यो रे जेद ॥
राज मारग एद जाणीयें रे, केहो शोक सनेहो रे ॥१०॥॥१॥ शोक
दरो उद्यम करो रे, धर्म करो तुमें राय ॥ जिम जनमतर एदबु रे, 5 व
फरी नवि थाय रे ॥ सु० ॥ ५० ॥ १४ ॥ राजा कहे में सग्रह्यो रे, धर्म
करेवो सार॥पण कहो मारा मित्रनो रे, कोण थयो थवतार रे ॥१॥
॥ १५ ॥ कहे गुरु तुझ रमणी तणी रे, कूलं ते सत्पन्न ॥ शुजनावना यो
गथी रे, थाशे पुत्र रतन्न रे ॥ सु०॥०॥ १८ ॥ कमलपत्र लोचन नला
रे, होशे माहायलवत ॥ राजधुरंधर ताहरो रे, थाशे ते गुणवत रे ॥ मु०
॥॥१॥ वात सुपी हरख्यो घणु रे,धन्य प्रलु तुमचु रे ज्ञान ॥ देशना
देश उदयो रे, मुज जेदवो अज्ञानो रे ॥मुणपण॥१॥ वली तुमने पूछ
प्रनो रे, किम देवीने कलक ॥ वधुवियोग ए किम थयो रे, कहो कारण
निकलक रे ॥सुप॥१॥ निरपराध पण वचता रे, किम पाम्यो जेम
चोर ॥ सशय टालो माहरो रे,श्या ए कर्म कठोर रे ॥ सु० ॥५॥ २० ॥

te श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. १२ए त्रीजे सत्तरमी ढालमा रे, कह्यो वधव अधिकार ॥ रामविनय कहे जाणजो रे, महोटो गुरुउपगारो रे ॥१॥पण॥१॥ सर्वगाथा ॥४७॥ श्लोक ॥११ ॥ दोहा॥ ॥ पूरवनव गुरु उपदिसे, योगत्रिके वधाय ॥ कर्मकटुक फलने दिये, एम बोले जिनराय ॥ १ ॥ था जवथी त्रीजे नवें, वांध्यो जिम तुमें वध ॥ या नवें आवी मल्यो, सह सरिखो सवध ॥ २ ॥ ॥ ढाल अढारमी॥ ॥ अरणिक मुनिवर चाल्या गोचरी ॥ ए देशी ॥ पूरव नव कौटुंबिक तु हतो, देमकर इण नामें जी ॥ सत्यश्री घरणी गुण धारिणी, धरणीप्रतिष्ठि त यामें जी ॥ १ ॥ वयण विचारी रे प्राणी उच्चरो ॥ ए बांकणी ॥ जो वांतो सुख सारं जी॥थविचास्यु वोलता जीवडो, फरे चगति ससारो जी ॥ २० ॥ २ ॥ सकल क्रियापटु सेवक तेहनें, चमसेनानिए एको जी॥ कारज सोप्यु रे तेहने देत्रनु, रखवालें सुविवेको जी ॥ व ॥३॥ एक दिन परने रे देवें पथीयो, रीवा ग्रहतो देखी जी ॥ कहे लंवावो रे जाहे एहने, पण तेणें मूक्यो तवेखी जी ॥ व०॥ ४ ॥ तिण वयणे उहवाणो पंथीयो, कर्म करे तिण वेला जी ॥ उष्टवचनथी रे वाध्यु थाकलं, न करो एम अवहेला जी ॥ व ॥ ५ ॥ सत्यश्रीनी रे वद्वथर एकदा, महोटो कव ल उपाडी जी ॥ महोमा मूक्यो रे ते वलग्यो गले, तव सामु एम वाडी जी ॥ व ॥६॥ एम जे रे पापी निशाचरी, लघुकवलें जम्य सोश्जी ॥ जेम नहिं वलगे रे करें ताहरे, वाध्यु कर्म विगोई जी ॥ ३० ॥ 8 ॥ एक दिन हेमकर कहे नृत्यनें, मूके गामें उजाइ जी ॥ जा वहेलो कारज करी थाव्य तु, वे पनी वधाई जी ॥ ३० ॥ ७ ॥ ते कहे वघवने मलवे करी, में न जवाये स्वामी जी ॥ क्षेमकर कहे मत मलश्यो तुने, वजन केवार हरामी जी ॥व०॥ ए ॥ सहेजें एम वधाये वोलतां, कर्म कतिन केई जी ॥ पण रस चिकण वध प्रदेशथी, विणसे विपाकने टेई जी ॥ व ॥ १० ॥ एक दिन याव्या रे मुनिवर विहरता, गोचरीयें गुणगेहो जी ॥ देमकर सूधा सयमी, गुण सपूण देहो जी ॥व०॥११॥ पीयर सूधा रे मुनि पदकायना, धूसर दृष्ठि निहाले जी॥ श्रांगण थावी रे जगम सुरतरु, दंपती दिलनर नाले जी॥ व ॥ १२ ॥ कहे क्षेमकर पहि एम २२७ जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. ॥ दे ॥ ए० ॥ ३ ॥ तुमें थमने विसारीयां रे, वसिया तुमें बम्हसि अध वच्चे मूकी प्रीतडी रे, नहि ए उत्तम रीत रे ॥ दे० ॥ ए. दा हा देव घटारडो रे, सुखमा उपायुं शूल ॥ हरे एवा गुणवतने रे,पढो तेहनें मुख धूल रे ॥ दे ॥ ए. ॥ ५ ॥ एम विलाप करे घणा रे, नव ऐ नीर प्रवाह ॥ हियटुं धीर धरे नहीं रे, ते केम विसरे दाहो रे ॥२० ॥ ए ॥ ६ ॥ राय राणी एम 5 ख धरे रे, 5 खीयो सदु परिवार । गुरु कहे शोक न कीजीयें रे, ए संसार असार रे ॥ ७ ॥ मुण सुण प्राणीया, परिदर मोहविकार रे, गुनगुण गाणीया ॥ ए थांकणी ॥ स्थिर न रहो कोइ ण जगें रे, नागें ने चद ॥ परमारथ सद्ध कारि, रे,महोटो ए मोहनो फद रे ॥ ९ ॥ प० ॥ ७ ॥ सुख निरतर किदाथकी रे, फूल्नु ते करमाय ॥ जे कगे ते थाथमे रे, जे जायुं तेह जाय रे ॥ १० ॥ प० ॥ ए ॥ थनित्यपणे जाण्या होवें रे, जो पुजल परनाव ॥ शाने रडे एम जीवडो रे, नित्य एक थाप स्वनाव रे ॥ १० ॥ ५० ॥ १० ॥ मात पिता नगिनी सुता रे, कामिनी सुत अवतार ॥ वार थनत ए ताहरे रे, तु एदने निर्धार रे ॥ सु० ॥ ५० ॥ ११ ॥ जीव जिके पट्कायना थया ताहरा रे वधु ॥ मायाकल्पित ए सवे रे, नगमाहे सबध रे ॥ सु० ॥०॥ १२ ॥ कोई न एवो जगतमा रे, मरण न पाम्योरें जेद ॥ राज मारग एद नापीयें रे, केहो शोक सनेहो रे ॥॥॥१३॥ शोक दरो सद्यम करो रे, धर्म करो तुमें राय ॥ जिम जनमतर एहवु रे, उख फरी नवि थाय रे ॥ 5 ॥ ७॥ १४ ॥ राजा कहे में सग्रह्यो रे, धर्म करेवो सार ॥ पण कदो मारा मित्रनो रे, कोण थयोथवतार रे ॥१॥ ॥ १५ ॥ कहे गुरु तुज रमणी तणी रे, कूलं ते उत्पन्न ॥ शुजनावना यो गयी रे, थाशे पुत्र रतन्न रे ॥ सु०॥०॥ १ ॥ कमलपत्र लोचन नला रे, दोशे मादाषलवत ॥ राजधुरंधर ताहरो रे, याशे ते गुणवत रे ।। सु ॥॥१॥ वात सुणी दरख्यो घणु रे,धन्य प्रस्तु तुमचु रे ज्ञान ॥ वेशना वे नवरो रे, मुज जेदवो थझानो रे ॥सुप॥१॥ वली तुमने पड़े प्रनो रे, किम देवीने कलक ॥ वधुवियोग ए किम थयो रे, कहो कारण नि कलक रे ॥॥॥१॥ निरपराध पण वचता रे, किम पाम्यो जेम चोर ॥ सशय टालो मादरो रे, श्यां ए कर्म कठोर रे ॥ १० ॥॥ २० ॥ रे, श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. १२ए त्रीजे सत्तरमी ढालमा रे,कह्यो वधव अधिकार ॥ रामविजय कहे जाणजो रे, महोटो गुरुनपगारो रे ॥४॥०॥१॥सर्वगाथा॥धए॥ श्लोक ॥११ ॥ दोहा ॥ ॥ पूरवजव गुरु उपदिसे, योगत्रिके वधाय ॥ कर्मकटुक फलने दिये, एम बोले जिनराय ॥ १॥ या नवथी त्रीजे जवें, वांध्यो निम तुमें बंध ॥ ते या नवें थावी मल्यो, सदु सरिखो सवध ॥ ५ ॥ ॥ ढाल अढारमी॥ ॥ अरणिक मुनिवर चाल्या गोचरी ॥ ए देशी ॥ पूरव नव कौटुंबिक तु हतो, देमकर ण नामें जी ॥ सत्यश्री घरणी गुण धारिणी, धरणीप्रतिष्ठि त ग्रामें नी ॥ १ ॥ वयण विचारी रे प्राणी उच्चरो ॥ ए आंकपी॥ जो वांडो सुख सारं जी॥यविचास्यु बोलता जीवडो, फरे चगति ससारो जी ॥ व० ॥ ५ ॥ सकल क्रियापटु सेवक तेहनें, चमसेनानिय एको जी॥ कारन सोप्यु रे तेहने क्षेत्रनु, रखवालें सुविवेको नी ॥ व० ॥ ३ ॥ एक दिन परने रे देवें पंथीयो, रीवा ग्रहतो देखी जी ॥ कहे संवावो रे जाडे एहने, पण तेणें मूक्यो उवेखी जी ॥ व०॥ ४ ॥ तिण वयणे उहवाणो पंथीयो, कर्म करे तिण वेला जी ॥ उरवचनथी रे वांध्यु थाकलं, न करो एम अवहेला जी ॥ व ॥ ५ ॥ सत्यश्रीनी रे वदुधर एकदा, महोटो कव ल वपाडी नी ॥ महोमा मूक्यो रे ते वलग्यो गले, तव सासु एम वाडी जी ॥ २० ॥६॥ शु एम जे रे पापी निशाचरी, लघुकवलें जम्य सोनी ॥ जेम नहिं वलगे रे कठे ताहरे, वाध्युं कर्म विगोई जी ॥ व ॥ ७ ॥ एक दिन देमकर कहे नृत्यनें, मूके गामें उजाइ जी ॥ जा वढेलो कारज करी थाव्य तु, देच्नु पनी वधाई जी ॥ व ॥ ७ ॥ ते कहे वधवने मलवे करी, में न जवाये स्वामी जी ॥ हेमकर कहे मत मलश्यो तुने, स्वजन केवारें दरामी जी ॥ व ॥ ए॥ सहेजें एम वधाये वोलतां, कर्म कतिन एम केई जी॥ पण रस चिक्कण वध प्रटेशथी, विणसे विपाकने देई जी ॥ व ॥ १०॥ एक दिन श्राव्या रे मुनिवर विहरता, गोचरीयें गुणगेहो जी॥ हेमंकर सुधा सयमी, गुण सपूरण देहो जी ॥वण॥११॥ पीयर सूधा रे मुनि पट्कायना, धूसर दृष्ठि निदाले जी ॥थागण श्रावी रे जगम सुरतरु, दंपती दिलनर नाले जी॥ व ॥ १२ ॥ कहे केमकर पडि , २३० जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. लानो प्रिये, पात्र युगल ए थाव्यु जी ॥ हर्प धरिने रे तेरों पडिलानिया, नृत्ये एम मन जाव्यु जी ॥ व ॥ १३ ॥ धन थहो दंपती दोये वर्ण, दोधु मुनिवर दानो जी ॥ पुण्या विण पात्र किहायकी, एम मखेपनि दानो जी ॥ व० ॥ १५ ॥ वेहु जण जावें रे दीधु साधुने, श्रीजो तिम अनुमोदे जी ॥ त्रिदु जण उपरें तव चपला पडी, हूती जे बनो जी। व० ॥ १५ ॥ पहेले सुरलोकें थया देवता, मित्रपणे ननरंगें जी ॥ मुख विलसे वैमानिकना घणां, लीलालहेर थनंगें जीव० ॥ १६ ॥ रेम कर चवि तु नरवर थयो, सत्यश्री तुक नारी जी॥ सुर त्रीजो पवि श्रावी कपन्यो, मित्रानद मनोहारी जीव०॥ १ ॥ जेणे बांएं रे जेवु पूर, तिम पाम्यु तेणें सीधु जी ॥ राजन थावे रे उदय एणी परें, कडवे वयणे कीधु जी ॥ व ॥१॥ गुरुनी वाणी रे निसुणी ते सवे, मन पाम्यां वैरागो जी ॥ कर्म कमाइ रे के श्रापणी, धारो धर्मधु रामो जी ॥ व ॥ १५ ॥ महापोदविचारें पापणी, पूर्वजात सनारी जी॥ कहे गुरुजीने नृप चरणे नमी, जाउ तुम वलिहारी जी॥ व ॥ २० ॥ मुफ पतितने रे प्रस्तु पावन करो, दे यथोचित धर्मो जी ॥ गुरु कहे चारित्रनी नहिं योग्यता, हनी बदु नोगनु कर्मो जी ॥ व ॥ २१॥ तनय थया पढ़ी सयम थावशे, दमणा गृहिवत वारु जी ॥ तहसि करी ने रे प्रावकव्रत लीये, गुरुपासें गुणकारु जी ॥ व ॥ २२ ॥ पुनरपि पूजे रे वात शयें कही, ते कुण कारण स्वामी जी ॥ सवि ग्रही रे गुरु कहे पंथीयो, नूरिनवें गति पामी जी ॥ व ॥ २३ ॥ वडपासें थयो व्यंतर ते मरी, मित्रानवर्ने देखी जी ॥ वैर सनारी रे पूरनव तणु, थयो ते अपर षी नी ॥ व ॥ ५५ ॥ शबना मुखमांहे तेणें संक्रमी, वात ए णी परें दावी जी ॥ संशय वारण नवजल तारिणी,धर्मकथा मुनि जोखी जी ॥ व० ॥ २५ ॥ प्रतिवण्या केइ निसुणी प्राणीया, मुनिवर कीप वि दारो जी ॥ मुनि वांदीने मदिर थावियो, नृपति समकित धीरो जी ॥ व० ॥ २६ ॥ पाले राज्य जली परे थापण, एद थढारमी ढालो जी ॥ त्रीजे खमें रे रामविनय कहे, धर्मे मुख विशालो नी ॥ ३० ॥ १७ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ गर्न वघे हवे अनुक्रमें, युवती हपे धरंत ॥ जे जे मोहला कपजे, , श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. २२२ ते ते पूरे कंत ॥ १ ॥ शुन वेला शुन दिन घडी, गुन मुहूर्त संयोग ॥ रत्न मंजरीये सुत जल्यो, सुदर तन नीरोग ॥२॥ राय करे उत्सव घणो,खरचे श्व्य अपार ॥ धवलमगल गावे जलां, वेती सोदव नार ॥ ३ ॥ पंच धाव पाली जतो, नाम कमलपत्राद ॥ शेशव वय लघी करी, पाम्यो यौवन दछ ॥ ४ ॥ राज्यनार धोरी थयो, सघली वातें सकङ ॥ दवे राजा मन चितवे, लहुँ सयम तजि रज ॥ ५ ॥ ॥ ढाल उगणीशमी॥ ॥ थारे माथे पचरगी पाघ, सोनारो बनेगलो॥ मारु जी ॥ ए देशी॥ हवे एक दिन तेह मुनीश्वर,थाव्या सांजली ॥ राजाजी ॥ सोंपी पुत्रने राज्यनो नार, चल्यो वनमां रुली ॥ रा० ॥ ग्रहे गुरुजीने दाये दीद, प्रिया साथें वली ॥रा ॥ लीयो शुक्ष्माहाव्रतनार, थया अतुली वती ॥ रा ॥ ॥ १ ॥ तेउने दृढ करवा काज, कहे श्रुत केवली ॥ रा ॥ तुमें चालजो सुधे पथ, मूकी मद थावली ॥राण ॥ लव थंबुधि तारण एह, प्रव्रज्या ने नली ॥रा॥ तेमाडे मूकी राग, ते पालजो साचली ॥रा ॥ २ ॥ ले दीक्षा विषयने वांडे, जे मुनि कायरा ॥ वारुनी ॥ नवि कहीये ते नव जलना, संयम वाहरा ॥ तारु जी ॥ ते विपयें नेह न करे, जी हेजादा ॥ वा ॥ ते मुनि परमार्थ सुखना, दरिया माहरा ॥ वा ॥३॥ जिनरक्षित जिनपालनो, हां नावजो ॥ मुनिवरजी ॥ संवध अनोपम उपनय, मनमा लावजो ॥ सुखकर जी ॥ तव कहे राजर्षि मनमां, हर खी ते कहो ॥ सशुरुजी ॥ नावी ते वात कडु, सघली तुमें सहदो ॥ मु० ॥ ४ ॥ चपानयरीमा माकंदी, नामें मादाधनी ॥मु॥ जशनामें तस नारी, नली सुगुणी वनी ॥ मु० ॥ जिनपातित ने जिनरक्षित, मुत बवि काचनी ॥ मु० ॥ करे वहाणनो रोजगार, वरी लही घणी ॥ मु० ॥ ५ ॥ तेवारे विचार मनोरथ, वाहनो करे ॥ मु० ॥ घणुं वारे तेहने पितर, कर्पु चित्त नवि धरे । मु० ॥ चढिया करियाणु लेइ, जोई वाहाण शिरें ॥ मु० ॥ नरदरिये नांग्यु वाहाण, फलकने श्राशरे ॥ मु० ॥ ६ ॥ त्रिह दिवसें रयणनो छोप, लही ते नीसया ॥ मु ॥ जल पीधु फल ना लियेर, नखीने ते तया ॥ मु० ॥ एहवे ते हीपनी देवी, देखीने थरह स्खा ॥ मु० ॥ कहे मुफ सार्थे तुमें सेवो, विपयमुख कां मया ॥ मुण् ॥ . 1 , २३० जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. सानो प्रिये, पात्र युगल ए थाव्यु जी ॥ दर्प धरिने रे तेणें नृत्ये एम मन नाव्यु जी ॥ २० ॥ १३ ॥ धन थहो दंपती दोपे दोधु मुनिवर दानो नी ॥ पुण्याइ विण पात्र किहांथकी, एम मोपनि दानो जी ॥ व ॥ १४ ॥ वेह नए ना रे दीधु साधुने, श्रीजो M श्रनुमोदे जी ॥ त्रिहु जण उपरें तव चपला पडी, डूंती जे धनों की व ॥ १५ ॥ पहेले सुरलोकें थया देवता, 'मित्रपणे ननरंगें जी॥ विलसे वैमानिकनां घणां, लीलालहेर अनंगें जी ॥ ३० ॥ १६ ॥ ऐन कर चवि तु नरवर थयो, सत्यश्री तुक नारी जी ॥ सुर श्रीजो आवी कपन्यो, मित्रानद मनोहारी जी ॥ व ॥ १७ ॥ जेणें बांस जेवू पूरवें, तिम पाम्यु तेणें सीधु जी ॥ राजन थावे रे उदयें एगी परे, कडवे वयरों कीg जी ॥ ३० ॥ १७ ॥ गुरुनी वाणी रे निमुणी से सवे, मन पाम्या वैरागो जी ॥ कर्म कमाइ रे के. श्रापणी, धारो धर्म रानो जी ॥ व० ॥ १५ ॥ ऊहापोह विचारें श्रापणी, पूर्वलात सनारी जी। कहे गुरुजीने नृप चरणे नमी, जाउ तुम वलिहारी जी॥ व ॥ १० ॥ मुफ पतितने रे प्रच पावन करो, देइ यथोचित धर्मो जी ॥ गुरु कहे चारित्रनी नहिं योग्यता, दनी बढ़ नोगनु कर्मो जी ॥ ३० ॥२१॥ तनय थया पली सयम श्रावशे, हमणा गृहिवत वारु जी ॥ तहत्ति करी ने रे श्रावकवत लीये, गुरुपासें गुणकारु जी ॥ व ॥ २॥ पुनरपि पूजे रे वात शबें कही, ते कुण कारण स्वामी जी ॥ सवि ग्रही रे गुरु कहे पंथीयो, नूरिनवें गति पामी जी ॥ व०॥ २३ ॥ वडपासें थयो व्यतर ते मरी, मित्रानदने देखी जी ॥ वैर सनारी रे पुरनव तणं, पयो ते उपर देषी जी ॥ व ॥ २४ ॥ शबना मुखमांदे तेणे सक्रमी, वात ए णी परें दावी जी ॥ सशय वारण नवजल तारिणी, धर्मकथा मुनि नांखी जी ॥ २० ॥ १५ ॥ प्रतिबण्या के निसुणी प्राणीया, मुनिवर कीप वि दारो जी ॥ मुनि वांदीने मदिर थावियो, नृपति समकित धीरो जी॥ व० ॥ २६ ॥ पाले राज्य नली परें थापा, एद थढारमी ढालो जी। तीजे खमें रे रामविजय कहे, धर्मे मुख विशालो जी ॥ ३० ॥ ५० ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ गर्न वधे हवे अनुक्रमें, युवती हपे धरंत ॥ जे जे मोहला ऊपजे, श्री शांतिनाथनो रास खमत्रीजो २१ ते ते पूरे कंत ॥ १ ॥ गुन वेला गुन दिन घडी, गुन मुहूर्त संयोग ॥ रत्न मंजरीयें सुत जण्यो, सुदर तन नीरोग ॥२॥ राय करे उत्सव घणो,खरचे श्व्य थपार ॥ धवलमगल गावे जलां, बेठी सोहव नार ॥ ३ ॥ पंच धाव पाली जतो, नाम कमलपत्राद ॥ शैशव वय लघी करी, पाम्यो यौवन दछ ॥ ४ ॥ राज्यनार धोरी थयो, सघली वातें सकळ ॥ हवे राजा मन चितवे, लहुँ सयम तजिरज ॥ ५ ॥ ॥ ढाल उगणीशमी॥ ॥ थारे माथे पचरंगी पाघ, सोनारो गलो॥मारु जी ॥ ए देशी॥ दवे एक दिन तेह मुनीश्वर,थाव्या सांजली ॥ राजाजी ॥ सोपी पुत्रने राज्यनी नार, चल्यो वनमा रुली॥ रा० ॥ ग्रहे गुरुजीने हाथे दीद, प्रिया साथें वती ॥रा ॥ लीयो शुभमाहाव्रतनार, थया अतुली वली ॥ रा ॥ ॥ १ ॥ तेने दृढ करवा काज, कहे श्रुत केवली ॥ रा ॥ तुमें चालजो सुधे पथ, मूकी मद श्रावली ॥ रा० ॥ नव अंबुधि तारण एह, प्रव्रज्या ने जली रा॥ तेमाटे मूकी राग, ते पालजो साचली ॥रा ॥ ५ ॥ लेश दीक्षा विषयने वांडे, जे मुनि कायरा ॥ वारुजी ॥ नवि कहीये ते नव जलना, संयम वाहरा ॥ तारु जी ॥ ते विपयें नेह न करे, जी हेजाहरा ॥ वा ॥ ते मुनि परमार्थ सुखना, दरिया माहरा ॥ वा ॥३॥ जिनरक्षित जिनपालनो, हां नावनो ॥ मुनिवरजी ॥ संबंध थनोपम उपनय, मनमां लावजो ॥ सुखकर जी ॥ तव कहे राजर्षि मनमां, हर खी ते कहो ॥ सशुरुजी ॥ नावी ते वात कढु, सघली तुमें सहहो ॥ मु०॥ ४ ॥ चपानयरीमा माकंदी, नामें मादाधनी ॥मु॥ जशनामें तस नारी, नली सुगुणी वनी ॥ मु॥ जिनपालित ने जिनरक्षित, सुत बधि काचनी ॥ १०॥ करे वहाणनो रोजगार, वरी सही घणी ॥ मु॥ ५ ॥ तेवारे विचार मनोरथ, वाहणनो करे ॥ मु० ॥ घणु वारे तेहने पितर, कर्पु चित्त नवि धरे ॥ मु०॥ चढिया करियाणु खेर, जोई वाहाण शिरें ॥ मु० ॥ नरदरिये नांग्पु वाहाण, फलकने थाशरे ॥ मु० ॥ ६ ॥ त्रि8 दिवसें रयणनो हप, लही ते नीसना ॥ मु ॥ जल पीधुं फल ना लियेर, जखीने ते उखा ॥ मु० ॥ एहवे ते दीपनी देवी, देखीने थरद स्या ॥ मु॥ कहे मुफ सार्थे तुमें सेवो, विपयमुख कां मना ॥ मु० ॥ , + २२० जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. लानो प्रिये, पात्र युगल ए श्राव्यु जी ॥ हर्प धरिने रे तेणें नृत्ये एम मन नाव्यु जी ॥ २० ॥ १३ ॥ धन थहो दंपती दोये बर्ज दी। मुनिवर दानो जी ॥ पुण्याइ विण पात्र किहायकी, एम मवेव दानो जी ॥ व ॥ १४ ॥ वेदु जण ना रे दीधु साधुने, श्रीजो सिम अनुमोदे जी ॥ त्रिगु जण उपरें तव चपला पडी, हूती जे यंनो थी । व० ॥ १५॥ पहेले सुरलोकें थया देवता, मित्रपणे ननरंगें जी ॥ सुस विलसे वैमानिकनां घणां, लीलालहेर अनंगें जी ॥ व ॥ १६ ॥ कर चवि तु नरवर थयो, सत्यश्री तुक नारी जी ॥ सुर त्रीजो पनि श्रावी कपन्यो, मित्रानद मनोहारी जी ॥ व ॥ १७ ॥ जेणे बारे जेवु पूरवें, तिम पाम्मु तेणें सीधु जी ॥ राजन थावे रे उदयें एणी परें, कडवे वयरों कीg जी ॥ व ॥ १७ ॥ गुरुनी वाणी रे निसुणी ते सवे, मन पाम्यां वैरागो जी ॥ कर्म कमाइ रे के श्रापणी, धारो धर्म रानो जी ॥ व० ॥ १७ ॥ कदापोह विचार थापणी, पूर्वनात सनारी नी । कहे गुरुजीने नृप चरणे नमी, जाउ तुम वलिहारी जी॥ व ॥२०॥ मुफ पतितने रे प्रनु पावन करो, वेइ यथोचित धर्मो जी ॥ गुरु कहे चारित्रनी नहिं योग्यता, हनी बगु जोगनुं कर्मो जी ॥ व० ॥ ११ ॥ तनय थया पली सयम श्रावशे, दमणा गृहिवत वारु जी ॥ तहसि करी ने रे प्रावकव्रत लीये, गुरुपासें गुणकारु जी ॥ व ॥ २२ ॥ पुनरपि पूढे रे वात शचें कही, ते कुण कारण स्वामी जी ॥ सवि ग्रही रे गुरु कहे पंथीयो, नूरिन गति पामी जी ॥ व ॥ २३ ॥ वडपासे भयो व्यतर ते मरी, मित्रानदने देखी जी ॥ वैर सनारी रे पूरनव तणु, थयो ते उपर क्षेषी नी ॥ व ॥ २४ ॥ शबना मुखमांदे तेणे सक्रमी, वात ए णी परें वाखी जी ॥ सशय वारण नवजल तारिणी, धर्मकथा मुनि नाती जी ॥ व ॥ २५ ॥ प्रतिवण्या के निसुणी प्राणीया, मुनिवर कीष वि हारो जी ॥ मुनि वांदीने मदिर थावियो, नृपति समकित धीरो जी ।। व० ॥ २६ ॥ पाले राज्य नली परें थापणु, एद श्रढारमी ढालो जी ॥ त्रीजे खमें रे रामविनय कहे, धर्मे मुख विशालो जी ॥ व ॥ २७ ॥ ॥ टोदा ॥ ॥ गर्न वघे हवे थनुक्रमें, युवती हपे धरंत ॥ जे जे मोहला अपजे, . - श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. २१ ते ते पूरे कंत ॥ १ ॥ गुन वेला गुन दिन घडी, गुज मुहूर्त संयोग ॥ रत्न मंजरीये सुत जल्यो, सुदर तन नीरोग ॥२॥ राय करे उत्सव घणो,खरचे व्य अपार ॥ धवलमगल गावे जलां, वेती सोहव नार ॥ ३ ॥ पंच धाव पाली जतो, नाम कमलपत्राद ॥ शैशव वय लघी करी, पाम्यो यौवन दक्ष ॥ ४ ॥ राज्यनार धोरी थयो, सघली वातें सकळ ॥ हवे राजा मन चितवे, लद्वं संयम तजिरङ ॥ ५ ॥ ॥ ढाल गणीशमी॥ ॥ थारे माथे पचरगी पाघ, सोनारो बोगलो॥मारु जी ॥ ए देशी॥ हवे एक दिन तेह मुनीश्वर,थाव्यासानली ॥ राजाजी ॥ सोपी पुत्रने राज्यनो नार, चल्यो वनमा रुली ॥ रा० ॥ ग्रहे गुरुजीने हाथे दीद, प्रिया साथें वली ॥ रा॥ लीयो शुक्ष्माहाव्रतनार, थया अतुली बली ॥ रा० ॥ ॥ १ ॥ तेउने दृढ करवा काज, कहे श्रुत केवली ॥ रा ॥ तुमें चालजो सूधे पंथ, मूकी मद थावली ॥ रा ॥ जव अंबुधि तारण एह, प्रव्रज्या ने नली ॥रातेमाटें मूकी राग, ते पालजो साचली ॥ रा० ॥ ॥ दीक्षा विषयने वाले, जे मुनि कायरा ॥ वारुजी ॥ नवि कहीये ते नव जलना, संयम वाहरा ॥ तारु जी ॥ ते विषये नेह न करे, जी हेजादरा ॥ वा ॥ ते मुनि परमार्थ सुखना, दरिया मादरा ॥ वा० ॥३॥ जिनरक्षित जिनपालनो, इहां नावजो ॥ मुनिवरजी ॥ सषध थनोपम उपनय, मनमा लावजो ॥ मुखकर जी ॥ तव कहे राजर्षि मनमां, दर खी ते कहो ॥ सशुरुजी ॥ जावी ते वात कहूं, सघली तुमें सहहो ॥ मु॥४॥ चपानयरीमा माकदी, नामें माहाधनी ॥मु॥ नशनामें तस नारी, नली मुगुणी बनी ॥ मु० ॥ जिनपालित ने जिनरक्षित, सुत बधि काचनी ॥ सु० ॥ करे वहाणनो रोजगार, वरीलही घणी ॥ मु० ॥ ५ ॥ तेवारे विचार मनोरथ, वादणनो करे ॥ मु० ॥ घj वारे तेहने पितर, क{ चित्त नवि धरे ॥ मु० ॥ चढिया करियाणु लेश, जोई वाहाण शिरें ॥ मु० ॥ नरदरिये नांग्यु वाहाण, फलकने श्राशरे ॥ मु० ॥ ६ ॥ बिड दिवसें रयणनो छोप, सही ते नीसस्या ॥ मु० ॥ जल पीधुं फल ना लियेर, नखीने ते तस्या ॥ मु० ॥ एहवे ते दीपनी देवी, देवीने घरद स्खा ॥ मु॥ कहे मुफ सार्थे तुमें सेवो, विपयमुख कां मना ॥ मु० ॥

, २२२ जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो. 8 ॥ तो थाशे प्राणने कुशल, मानो कर्तुं माहरु ॥ मु ॥ नहितर ए रखनें, दिश दु शिर थाहरु ।। मु ॥ जयजीत कहे परमा,कई एम ता हरु ॥ मु० ॥ कहे मत वीहो तुमेंथश, दुदु तुम वाहरु ॥ मु० ॥७॥ सुख विलसंतां ते साथें, गया वह वासरा ॥ मु०॥ एक दिन श्रावी कडे ते, रहेजो तुमें पांशरा ॥ मु॥ तु सुस्थितने थादेश, शोधवा सापरा ॥ मु० ॥ जाउ दु कारण माटें, म थाशो कायरा ॥ मु०॥ ॥ खाजो फल फूल तुमें, रमजो पूरव वनें ॥ मु ॥ न साय तो उत्तर पहिम, जा जो कामनें ।मु०॥ वारुं बु दक्षिण वन, रखे धरता मनें ॥ मु तिहां के दृष्टिविष नाग, देशे 5 ख तुमनें । मु०॥ १० ॥ गइ देवी कुमर बेगु, त्रिट्ठ वनमां रमे ॥ मु॥ फल फूल घणां नली जाते, तिहां पण नवि गमे ॥ मु०॥ चिते मनमाहे न जाये, वासर ए किम ॥ मु० ॥ सांनरे मनमा निज गण, हेरान यया श्रमें ॥ मु० ॥ ११ ॥ वली बली निरखियें दक्षिण, वारिधि नेद ॥मु॥ चिते ज चलो नाइ, तिहां दिल तानस्युं ॥ मु० ॥ दमणां दोडीने तमासो, जोई थावणुं ॥ मु० ॥ विता ए टलशे दूर, थमल चेन पामर्छ ।मु०॥ १२ ॥ गया ते विशें जाम,थ खत्र गध उठली ॥ मु० ॥ वस्त्रे श्राबादी नाक, जो थाघा वली ॥मु०॥ देखी नर त्यां एक रंक, थया मन व्याकुली ॥मु॥ एदवे शूलागत मनुज, वीवो गया छलफली ॥ मु० ॥ १३ ॥ ब्यु तेहनें जइ कुण, कमाइ शी करी ॥ मु० ॥ ते बोल्यो सनिलो मित्र, दशा मदारी फरी ॥मु० ॥ मुफ वादण नांग्यु कर्म, ए लाग्यं नीसरी ॥ मु०॥ रत्ना अनुरागें कांस्क, सेवा वीसरी ॥ मु०॥ १४ ॥ मुफ ३ ख एवं दीधु, मादारु कीषु में लाएं ॥ मु०॥ तेणें नर विणसाड्या कप्टें, पाया हूँ कटु ॥ मु० ॥ कहो वात तुम्हारी मुज्ने, सारी सहनु । मु ॥ धुरिस्ती नांखी काश् न, रा खी ए सक्नु ।मु०॥ १५ ॥ करी करुणा कादि सपाय, कहो जीव्या तो ॥ मु ॥ कहे ते नर शैलक यच, हा सोदामणो ॥ मु०॥ करे अश्चर्नु रूप ए पर्व, दिने बोले घणो ॥ मु० ॥ कहो कुणने रास्तु कुणने, पालुं ते जो ॥ मु० ॥ १६ ॥ तमें जातेदनी पास, करो सेवा नली ॥ मु० ॥ तेथाव्या यक्ष् समीप, सदु थाशा फली ।मु०॥ उगणीशमी ढाल कही, त्रीजे खमें रली ॥मु॥ जे विपयथकी रह्या दूर, तेहनी सुदशा वली १७ श्री शातिनाथनो रास खंमत्रीजो. २२३ ॥ दोहा ॥ ॥ यक्ष्तणी सेवा करे, कुसुमें पूजे पाय ॥ राख राख स्वामी दवे, तुं श्रम माय ने ताय ॥१॥ पर्वदिने बोल्यो यदा, यह तेह उजमाल ॥ वधव कर जोडी कहे, राख राख अम्द पाल ॥ २ ॥ यह कहे ते वेहुने, निस्तार निर्धार ॥ पण निश्चल थ सानलो, महारो एक विचार ॥ ३ ॥ तुम जा तां ते थावशे, पापिणी पूवें सोय ॥ कहेशे तुमने ते घणु, सुननरें साहा मुं जोय ॥ ॥ ते ऊपर धरशो तदा, जो अनुराग लगार ॥ तो उलाली तुमने, नारवीश समुह मकार ॥ ५ ॥ जो रदेशो निरपेक्ष्थी, तो तुमने त तकाल ॥ पहोंचाडीश चपा पुरी, लहेशो सुरक रसाल ॥ ६ ॥ ॥ ढाल वीशमी॥ ॥ मजरो त्यो ने जालम जाटडी ॥ ए देशी ॥ कुमर कहे तस संगर्नु, फल दीतु माहाराज ॥ ए साहामुं निरखं नहिं, सो वानां करे थाज ॥ ॥१॥ दवे श्रम तारोजी सादिवा ॥ ए श्रांकणी ॥ वलग्या तुमारेजी पा य ॥ शरण या एक ताहरु, अवर नदि को उपाय ॥ ह ॥ २॥ खधे चडावीने चालीयो, दरियामां यदाज ॥ वे वांधव दरख्या घj, फलीर्या वांचित काज ॥ द० ॥ ३ ॥ दवे देवीयें निजमदिरें, नवि दीपा दोय पधु ॥ जाण्यं ज्ञाने ते यकजी, जाय चढावीने खध ॥ ६ ॥ ॥ खड्ग लेश्ने केहें यश, क्रोध नराणी जी जोर ॥ थावो वांबोजी जीववु, एम कहे करती जी सोर ॥ ६ ॥ ५ ॥ नहिंतर एणे खतें सही, करो तुम शिरछेद ॥ यद कहे रदो रंगा, अश न करशो जी खेद ॥ ह० ॥ ६ ॥ जाण्यु न मग्या ए चित्तथी, मांमी माया जी नूर ॥ मुफ मूकीने एकाकिनी, केम जाट बोनी दूर ॥ ह॥ ॥ वाहालपणु तुम किहा गयुं, एम नवि दीजें जी बेद ॥ रंगरसें रम्या मदिरें, ते विसामोजी नेह ॥ ६ ॥७॥ चित्त चव्यां नहिं तेदना, खेद लही मनमाहे ॥ कहे जिनरक्षितने घणु, वादालो जीवितप्राण ॥ ६ ॥ ए ॥ ईक्षण मान थालापनी, किया सर खी जी दोय ॥ चित्ताहादक प्रेमनी, गति न्यारी जी कोय ॥ ४ ॥ १७ ॥ तुफ साथें मुफ गोठही, जे थतरनी जी सार ॥ ते जाणे मन माद रु, नहिं तुफ हेज लगार ॥ ६ ॥११॥ श्रावो मलो मुफ वालदा, यो सगमनुजी सुख ॥ नहिंतर प्राण तजिश हु मादरा, दोदिलु विरदनुं , . फूल तुमें, रमनो जैनकथा रनकोप नाग आग्मो. ४॥ तो थाशे प्राणने कुशल, मानो कयुं माहरु ॥ मु० ॥ नाहितर खों, बेदिश हु शिर थादरं ॥ मु० ॥ जयजीत कहे परमाण,मुंव हरु ॥ मु० ॥ कहे मत बीदो तुमें थश, इं तुम वाहरु ॥ मु. सुख विलसतां ते सायें, गया बहु वासरा ॥ मु०॥ एक दिन बाबी ते, रहेजो तुमें पांशरा ॥ मु० ॥ दु सुस्थितने थादेशे, शोधवा सावरान मु० ॥ जाउ कारण माटें, म थाशो कायरा ॥ मु०॥ ए ॥ सानो- पूरव वने ॥ मु॥ न साय तो उत्तर पहिम, का जो कामने ॥मु०॥ वारं बु दक्षिण वन, रखे धरता मनें ॥ मु । तिहां ले दृष्टिविष नाग, देशे 5 ख तुमनें । मु० ॥ १७ ॥ गइ देवी अमर बेगु, बिट्ठ वनमा रमे ॥ मु० ॥ फल फूल घणां जली जाते, तिम पण नवि गमे ॥ मु०॥ चिते मनमाहे न जाये, वासर ए किमे ॥ मु.॥ सांजरे मनमां निज नाण, हेरान थया श्रमें ॥ मु० ॥ ११ ॥ वली बली निरखियें दक्षिण, वारिधि नेदयं ॥मु॥ चिते जश् चलो नाइ, तिहां दिख सनस्यु ॥ मु० ॥ दमणां वोडीने तमासो, जोई श्रावधं ॥ मु० ॥ चिंता ए टलशे दूर, थमल चेन पामयं ॥ मु०॥ १३॥ गया ते दिशें जाम,म खत्र गध उठली ॥ मु० ।। वस्ने थाबादी नाक, जो बाधा वली ।मु०॥ देखी नर त्यां एक रंक, थया मन व्याकुली ॥मु॥ एदवे शूलागत मनुज, दीगो गया फलफली ॥ मु० ॥ १३॥ पूज्यु तेदने जर कुण, कमाइ शी करी ॥ मुण् ॥ ते बोल्यो सानलो मित्र, दशा मदारी फरी ॥ मु० । मुज वाहण नांग्यु कर्म, ए लाग्युं नीसरी ॥ मु०॥ रत्ना अनुरागें कांक, सेवा वीसरी ॥ मुण् ॥ १३ ॥ मुफ 5 ख एवं दीg, माहारु की। में लए ॥ मु० ॥ तेणें नर विणसाच्या कष्टें, पाच्या हूँ | कद्दु ॥ मु०॥ कहो वात तुम्हारी मुफने, सारी सहनु । मु० ॥ घुरिहूंती नाखी कांई न, रा खी ए सद्गु ॥१०॥ १५ ॥ करी करुणा कांहि उपाय, कहो जीव्या तो ॥ मु ॥ कहे ते नर शैलक यद, श्हां सोहामणो ॥ १० ॥ करे अपई रूप ए पर्व, दिने बोले घणो ॥ मु० ॥ कहो कुणने राखु कुणने, पालुं ते नो॥ मु० ॥ १६ ॥ तमें जाउ तेदनी पास, करो सेवा नली ॥ मु०॥ तेथाव्या यह समीप, सदु बाशा फली ॥ मु०॥ गणीशमी ढाल कही, त्रीजे खमें रली ॥मु॥ जे विपयथकी रह्या दूर, तेहनी सुरक्षा वली १० . , .

श्री शांतिनाथनो रास खंत्रीजो. २२३ ॥ दोहा ॥ ॥ यक्ष्तणी सेवा करे, कुसुमें पूजे पाय ॥ राख राख स्वामी हवे, तुं अम माय ने ताय ॥१॥ पर्वदिने वोल्यो यदा, यद तेह उजमाल ॥ वधव कर जोडी कहे, राख राख श्रम्ह पाल ॥ २ ॥ यद कहे ते वेहुने, निस्तार निर्धार ॥ पण निश्चल था साननो, महारो एक विचार ॥ ३ ॥ तुम जा तां ते थावशे, पापिणी पूवें सोय ॥ कहेशे तुमने ते घणु, सुनजरें साहा मुं जोय ॥ ४ ॥ ते कपर धरशो तदा, जो अनुराग लगार ॥ तो उलाली तुमने, नाखीश समुह मकार ॥ ५ ॥ जो रहेशो निरपेक्षयी, तो तुमने त तकाल ॥ पहोंचाहीश चपा पुरी, लहेशो सुरक रसाल ॥ ६ ॥ ॥ ढाल वीशमी॥ ॥ मजरो व्यो ने जालम फाटडी ॥ ए देशी ॥ कुमर कहे तस संगर्नु, फल दीतु माहाराज ॥ ए साहामुं निरखं नहिं, सो वाना करे थान ॥ ॥१॥ दवे थम तारोजी सादिवा ॥ ए आंकणी ॥ वलग्या तुमारेजी पा य ॥ शरण ग्रा एक ताहरु, अवर नहि नहि को उपाय ॥ ह ॥ २ ॥ खधे घडावीने चालीयो, दरियामां यदाज ॥ वे वाधव हरख्या घj, फलीयां ॥ ६ ॥ ३॥ हवे देवीयें निजमदिरे, नवि दीपा दोय वधु ॥ जाएयु झाने ते यदजी, जाय चढावीने खध ॥ द० ॥ ४ ॥ खन खेश्ने के थर, क्रोध नराणी जी जोर ॥ श्रावो वाबोजी जीवनु, एम कहे करती जी सोर ॥ ६ ॥ ५ ॥ नहिंतर एणे खहें सही, करा तुम शिरछेद ॥ यच कहे रहो रगशु, श्रश न करशो नी खेद ॥ १० ॥ ६ ॥ जाण्यु न मग्या ए चित्तथी, मामी माया जी नूर ॥मुक मूकीने एकाकिनी, केम जाबो जी दूर ॥ द॥ ॥ वादालपणु तुम किहा गयुं, एम नवि दीजें जी बेद ॥ रंगरसें रम्या मदिरे, ते विसाखोजी नेद ॥ हा ॥७॥ चित्त चव्यां नहिं तेदनां, खेद लही मनमाहे ॥ कहे जिनरक्षितने घणु, वाहालो जीवितप्राण ॥ दण् ॥ ए ॥ ईक्षण मान बालापनी, क्रिया सर खी जी दोय ॥ चित्ताहालक प्रेमनी, गति न्यारी जी कोय ॥ ह ॥ १० ॥ तुम साथें मुफ गोल्डी, जे थतरनी जी सार ॥ ते जाणे मन माह रु, नदि तुक हेज लगार ॥ द ॥ ११ ॥ थावो मलो मुफ वालदा, यो सगमनूनी मुख ॥ नहितर प्राण तजिश हु माहरां, दोदिलु विरदद्वं वालित काज २३४ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. 5 ख ॥ ६ ॥ १२ ॥ नाथ थनाथ परें मुने, मरती देखीने पता करुणा नथी श्रावती, निरखो नयणे सत ॥ ६ ॥ १३ ॥ कूदो मोर देखाही कामिनी, प्रगट पायोनी पास ॥ जिनरक्षित अवलोकिj, हल उर्गति जिम तास ॥ ६ ॥ १५ ॥ यदें नाख्योन। पूरथी, परतां दींचो त्रिशुल ॥ फल पाम्यो मुफ वचना, खड्ने दणीयोजी मूल ॥ १० ॥१५॥ श्रा के जिनपालने, वोले मीता जी बोल ॥ गति दोशे जेम बंधुनी, गो चित्त दुd मम मोल ॥ ६०॥ १६ ॥ कूड लही तेदनु रह्यो, निमल विष विचार ॥ यक्ष सघातें जी थावियो, चपावन, मकार ॥४०॥ १४॥पान वली गइ व्यंतरी, यक्ष पण वलीयो जी तेद ॥ खम्यो कर जोडी जिनपा लने, थाणी नक्ति सनेह ॥ ६ ॥ १७ ॥ घरे बायो मलीयो निज तातनें, एक दिन वीर जिपद ॥ थाव्या पुत्र पिता गया वांदवा, पया प्रल पासें मुणिव ॥ ह ॥ १५ ॥ जिनपालित मुनिवर नलो, कीपो उम विहार ॥ तप तपीयां श्रति थाकरां, कस्नो थातमनो उधार ॥॥२०॥ कह्यो सबध मुनीश्वरें, श्रमरमुनिने दो काम ॥ कहे उपनय हवे एहनो, ते निसुणो मन ताम ॥ ६ ॥ ३१ ॥ ढाल कही ए वीशमी, श्रीजे संमें रसाल ॥रामविजय कहे धन्य मुनि, बेदी विषयनी जाल ॥हा॥५॥ ॥ दोहा ॥ 'दोय वणिक जिम जीवडा, सवि ससारी जाण ॥रमा देवी जेम वली, थविरति वार वखाण ॥१॥थविरतिथी जे उपन्यो, दुख तो समु वाय ॥ शषलागत नर हां, जाणो मनमा नाय ॥॥ जेम स्वरूप तेणें कर्प, 'निज अनुनूत अशेष ॥ तेम अविरति दुख दावे, गुरुमपगार विशेष ॥३॥ जेम शैलक तारक थयो, तेम संयमगुण सार ॥ दुखीयानां 5 स्ख तहरे, कतारे नवपार ॥ ४ ॥ जेम देवीने वश पज्यो, जिम रक्षित उख दीत ॥ तेम अविरति वश जीवडो, देखे 5 ख थनीठ ॥ ५॥ दूर रह्यो देवीथकी, नवी लोपी यक्ष्याण ॥ कुश० श्राव्यो निजपुरि, ते जिनपाज सुजाण ॥ ६ ॥श्यविरतिथी विरम्यो रहे,न विराधे चारित्र ॥ नि कर्मा पर नीपजे, मुनि शिवसुरक पवित्र ॥ ७ ॥ ते माटें वत्स सांजलो, विरुन विषय विलास ॥ सुमणे मनमा नापजो, जो शिवपुरनी थाश ॥७॥ सूधा सयम धर थया, निसुणी गुरु उपदेश ॥ शुक्ष श्राचारे सघरे, नहिं कपाय लवलेश , , श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. २३५ ॥ ए ॥ रममंजरी साधवी, वेहु जण सुमनोनाव ॥ घातिकर्मक्ष्य उपन्यो, केवलराम स्वनाव ॥ १० ॥ मुगतें गयां ते दो जणां, जिहां धनत सुख राशि ॥ प्रणमुं प्रेमें सिम प्रनु, अनुनव लीलविलास ॥ ११ ॥ ॥ ढाल एकवीशमी॥ ॥ जय सुरपादप जतुना ॥ ए देशी ॥ स्वयप्रन मुनिमुखथी मुणी, सवलती वात वैराग्य॥ स्तिमितसागर नरवर कहे, पाम्यो धर्मनो राग॥१॥वलिहारी तुम ज्ञानने ॥ एयांकणी ॥ तुमें महोटा मुनिराज॥ सवल कपाय वशे कस्या, ती त्रिवनराज ॥वण॥ ॥ राज्य वेसारी रे पुत्रनें, लेई अनुमति तास ॥ तुम पासें नवतारिणी, लेगु दीक्षा उन्नास ॥ व०॥३॥ घरे थावीने हो थापीयो, अनतवीर्यने पाट । अपर कुमारपर्दै ज्वे, मूकी मननो उच्चाट ॥ व० ॥ ४ ॥ चारित्र लीधु रे मुनि कने, पाले पंचाचार ॥ समिति गुप्ति सूधी धरे, मार्ग खांमानी धार ॥ व ॥ ५ ॥ कांइक थते विराधीयो, मन साथै मुनिधर्म ॥ असुर अधिप चमरें जी, ते थया जिहा वढु शर्म ॥व० ॥ ६ ॥ हवे वधव थपराजिता, थनतवीर्य अनिधान ॥ राजलीला सुख जोगवे, दिन दिन चढते रे वान ॥ व ॥ ७ ॥ खेचर को थावी मल्यो, एकदिन पुण्यसहाय ॥ प्रीति वनी तेहछ घणी, उदये थचितित थाय ॥ व ॥ ॥ गगने जवाय दो जेहथी, विद्या दीधी रे सार ॥ विधि सघली रे साधन तणी, तेणें दाखी सुप्रकार ॥ व० ॥ ए ॥ नामें चिलाती ने वर घरी, नाट्यकलानी रे जाण ॥ तेने दोय दासी नली, रूपकला गुण खाण ॥ व ॥ १७ ॥ एकदिन राजसना मत्ती, निरखे नाटक ख्याल ॥ नाचे चिलाती ने वरवरी, योवन रूप रसाल ॥ व ॥ ११ ॥ कोकिल की रे कामिनी, कामकलानी रे धाम ॥ नाव देखाडे हो अति जना, मोह्या महिपति ताम ॥ व ॥ १२ ॥ रंगरसें नीना सवे, नाद तणा जेह जाण ॥ नाद निसुणी जे रीज्यो नहि, ते जगमांहे थजाण ॥ व० ॥ १३ ॥ यमुक्त ॥ सुनापितेन गीतेन, युवतीना च लीलया ॥ मनोननि यते यस्य, स योगी ह्यथवा पशु ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ ब्रह्मचारी कलदागरो, नारदमुनि ननचार ॥थाव्यो पण रहेव्यो नहिं, महोटो मोह विकार ॥३॥ ॥ १४ ॥ नारद मुनि को चढयो, थवगणीयो मुनें थाज ॥ चेटीने ना टके मोहीया, राखी नहिं मुऊ लाज ॥ व ॥ १५॥ ए गुणवती रे , , २२६ जैनकथा रत्नकोष नाग आठमो. गोरडी, जीवनप्राण थाधार ॥ मूंज्या हो एहनां मोहमां, न लदे पाया हार ॥ ब० ॥ १६ ॥ हरण करावु हो एहनु, कोइ बलवतनी पात। जेम एदनो मद कतरे, हुं दो एम विमास ॥ ब० ॥ १ ॥ त्रिसंग केरो दो राजियो, विद्याधरनो रे नाथ ॥ प्रतिदरि दमितारि अने, बलीयो जेदनो रे साथ ॥ व ॥ १७ ॥ तास सनामांहे थावियो, ठठी रेया मान ॥ जलें श्राव्या रे पावन करना, तुम श्रावे वव्यो वान ॥५॥ १ए ॥ कहो कां यमुत वारता, ते कहे सुण रे राजेंड ॥ सुनगा पुरीन रे राजीया, तेजे जाणे दिखद ॥ व ॥ २०॥ थनतवीर्य अपराजिता, तस घर दासी रे दोय ॥ नामें चिलातीने वरवरी, जगमा जोड न कोय । ब० ॥ २१ ॥ नाट्यकलाकुशली घणु, ते नाचती रे थाज ॥ दीनी हो कि स्मय कारिणी, ते विण शु तुज राज ॥ व ॥ २२ ॥ एम कही मुनि उतपत्यो, प्रतिहरि मोह्यो नाम ॥ मोदनगारी रे मानिनी, मोहतणु र धाम ॥ ब० ॥ २३ ॥ नाम मुणी रे थारति करे, दीदी दरिले रे चित्त । स्पर्शी दूती दो बल दरे, सगमें वीरज वित्त ॥ व ॥ २४ ॥ पण जावी न टले किमे, थाव्यो सबंध नजीक ॥ चित्त चव्यु रे लेवा नणी, मूके दूत थनीक ॥ ब० ॥ २५॥ दवे नवियण तुमें सानलो, एह सषध रसाल ॥ त्रीजे खंमें एकवीशमी, रामविजय कही ढाल ॥॥२६॥ ६१३ ॥१॥ ॥ दोहा॥ ॥ दूत चाल्यो दमितारिनो, सुनगा पुरी संपत्त ॥ सादिव बल बलीयो थको, पहोतो सना तुरन ॥ १ ॥ रयण योग्य मुक स्वामिने, नहिं तुम लायक एह ॥ यो चेटी थम ईशनें, वाघे सबल सनेह ॥ ५ ॥ पंधव वलतु कहे, करो काम विमासि ॥ ना सीताप स्वामी कनें, दीयो वपार तास ॥ ३ ॥ दूत बोलावी चितवे, बे बंधव मनमाहे ॥ करे परानव ए सही, नवि मोकलीये त्यांदि ॥ ३ ॥ ते माटें जइ साधीये, विद्या खेचरें दीध ॥ दर्प टले जो एदनो, तो थाये कारिज सिम ॥५॥ पूर्वजन्म सापि त तिसें, यागें कनी थाय ॥ विद्या सिह थई कहे, म करो चिता काम ॥ ६ ॥ कारिज सिम होशे सवे, जे चितवशो चित्त ॥ नक्कि करे विया तणी, गध माल्य सुप वित्त ॥७॥ण अवसरें फरियादीयो, दमितारिनो दूत ॥ को धडहहतो कहे, वढो जाणे यमदूत ॥ ७ ॥ रे चेटी नवि , . 1 श्री शांतिनाथनो रास खमत्रीजो. २२७ मोकली,कां मरवानी हूंश ॥रूपयो स्वामी न मूकशे, जून कदु तो सूस ॥९॥ ॥ ढालवावीशमी॥ करेलडां घड दे रे ॥ ए देशी ॥ कहे वधव दोय ले चलो, दासीरूप निधा न॥ एहनी स्वामी कपरें, प्राण करे कुरवान ॥१॥ वचन श्रम सुण ले रे ॥ ए थाकणी ॥ रूप करी दासी तणु, विद्यावल वलवान ॥ तुरत लई पहोता तिहां, जिहा प्रतिहार राजान ॥ व ॥ २ ॥ कर जोडी कमी रही, मृग नयणी मनोहार ॥ दमितारि देखी कहे, अहो अहो अभुत नारी ॥ व ॥ ३ ॥ नाटक मांझ्यु मानिनी, मोह्यो नर शिरदार ॥ हाव नाव दाखे जला, लटपटा लीयो नारि ॥ ३० ॥ ४ ॥ देखी कलाकुशलीपण, वोल्यो एहवा बोल ॥ रूप मुगुण नारी श्सी, नहि को जगमा थमोल ॥ व ॥ ५॥ कनक सरीखे मदिरें, जाइ रहो मनमोद ॥ राग कला सवि शीखवो, नव नव नांति विनोद ॥ व ॥ ६ ॥ ज्यु पयनाजन जालवे, दर्पित होय विमाल ॥ तेम नृपनी सही थागना, थया मनमाहे खुशाल ॥ व ॥७॥ देखी ते रंना जिसी, रूपवत थनिराम ॥कुमरी गुणनी उरडी, मोही रह्या गुणधाम ॥ व ॥ ७ ॥ गीतकला गुण केलवे, नाटक नव नव जाति ॥ प्रीति बनी पासें रहे, ते दासी दिन रात ॥ ३० ॥ ए ॥ ले वीणा निज हाथमां, तंती चढावी धून ॥ विच विच गाये तानमें, अनतवीर्यके गुन ॥ व ॥ १० ॥ मुख पूनम मानुं शशी, अर्धच सम नाल ॥ लोचन पंकज पांखमी, थधर ते लाल गुलाल ॥ व ॥ ११ ॥ अहो विधिना ए नर घट्यो, दी नांजे रे नूख ॥मानु मदियल ए फल्यो, कल्पतरुको रूख ॥ च ॥ १३ ॥ कहे दासी प्यासी नइ, देखन उन दीदार ॥धनतवीर्यके कपरें, तन मन धन ए ग्वार ॥ २० ॥ १३ ॥ जिणे वनको देख्यो नहिं, मुखपंकजको फूल । सो नारी लेखे नहि, जीवित तिनकु कबूल ॥ व ॥१॥ अपराजित रूपें रही, कहे दासी गुण एम ॥ मुणत नइ ते रागि णी, वाध्यो विपयनो प्रेम ॥ ॥ १५॥त्रीजे खमें वावीशमी, ढाल नली सुरसाल ॥ राम कहे जग को नहिं, प्रेम समो को साल ॥ व ॥ ॥ १६ ॥ राग जैरव ॥ मुने कां न गमे ॥ ए देशी ॥ मुजक थाण मिला वो, मनमोहनतें राजन ॥ मुज० ॥ ए थांकणी ॥ कनकसिरी कहे सहि यर मोरी, मोही रघु मोरं मन ॥ मु० ॥ १ ॥ धनतवीर्य रजपूत रंगी २ज जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. लो, थणीयाला लोचन ॥ मु० ॥ ॥ गुण निसुणी ना नता, तरसे मोरु मन ॥ मु० ॥ ३ ॥ प्राण करु कुरमान ए छपर, ए साजन ॥ मु० ॥ ४ ॥ दिन रयणी दिलथ्यानें लीनो, यावे एव ॥ मु० ॥ ५॥ सागरजल सम तिहां मुफ नेलो, सुरसरिता k ॥ मु० ॥ ६ ॥ कहूँ कर जोही सयानी मोरी, वात मुणो एक ॥ मु० ॥ ७ ॥ स्तिमितसागर कुल शुचि वयरागर, उपन्यु एह रता ॥ मु ॥ ७॥ मुफ 5 स्थितने थापो थाणी, नहिंतर शरण थका ॥ मु० ॥ ॥ नइ प्यासी उनको मुख देखन, चातक चाहे ज्यु पन ॥ मु० ॥ १० ॥ उन विण र सवे मन मेरे, जनक सहोदर सन ॥ मु. ॥ ११ ॥ लगन लगी मोहे उनके गुनकी, कहा रे कगु दु बचन ॥मु' ॥ १२ ॥ में सोंप्यु सवि सहीयर एदने, मादरूं तन मन धन ॥ मु । १३ ॥ जो न मिले मन मोहन मेरो, जागी होय योगन ॥ मु. १३॥ कनक सरिखो पूरण पेखी, प्रगट दुवे परसन ॥ मु०॥ १५ ॥कर जोडी कहे दाजर बदी, अब में तुम थाधीन ॥ मु० ॥ १६ ॥ राग विक लता कारक एसो, नारख्यो श्री लगवन्न ॥ मु० ॥ १७ ॥ वात मुणो अप धागें रसीली, कान धरी सरिजन्न ॥मु॥१॥सर्व०॥६५॥श्लोक॥१२॥ ॥ दोहा ॥ ॥ कहे दरि जो मुफ अपरें, तुफ मन मान्यु एम ॥ चालो जश्ये निम पुरी, बेसी विमाने केम ॥१॥ कनकसिरी वलतु कहे, करे माहरो तात । तुमने परानव श्रति घणो, तेणें मुफ मन शकात ॥ २ ॥ षोल्या ते पेड़ जणा, मत बीहे मनमाहे ॥ थम थागल शो श्राशरो, एकुण गणती माहे ॥ ३ ॥ वचन सुणी विस्मित हुई, पडी प्रेमके पास ॥ रूप शोर्ष गुण मोदिता, साथै चली मनास ॥ ४ ॥ विद्यापलें की। नवं, सुपर एक विमान ॥ संनलावे नृप लोकने, उचा रही असमान ॥ ५ ॥ जो जो सा मतादिको, सबल सेन जूफार ॥ दरी जावं दु नृपसुता, पी. कीजो चाहार ॥६॥ सुणि ततखेव को चढयो, कहे प्रतिदरि दमितारि ॥ रे रे सुजट शीपाश्यो, जान न पावे गमार ॥॥ कनकसिरीको ले चल्यो, तुरत विमान उमा ॥ पूवेसे वाहर चढी, लियो लपेट थप जाइ॥ ७ ॥ .

श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. २२ए ॥ ढाल त्रेवीशमी॥ ॥ कंदर्पना शर रे कांच करे, कटकें मुगुण राण सधीर ॥ ए देशी ॥ वालम देख रे कां चढयो कटकाइ, जनक राण सधीर ॥ मारशे तोकुं था अडियो, सवल मोकू पीर ॥ वालम० ॥ १ ॥ चढयो दल चिटु पासें हूती, मेघ ज्यु गंजीर ॥ गाजे घन नीशान गाजे, तीर वरसत नीर ॥ वा० ॥ २ ॥ कुत चमके अणी जवके, निसुण नणदल वीर ॥ मानु चपला चलत चिटुं दिशि, थाइ पहुचे वीर ॥ वा ॥ ३ ॥ सुनट दूर ठ मीय दश्ने, हाकशे ज्युं हमीर ॥ देखी निजनट हटत पी, श्राव्यो प्रति हरि पीर ॥ वा ॥ ४ ॥ रे रक तु कित जात लेके, सुता रुचिर शरीर ॥ मारके चक चूर करसी, वडे एह थमीर ॥ वा ॥ ५ ॥ध्रुजती तव देखे थर थर, कहे हरि सुण नारी ॥ सिंह के फिकर तनकी, कांड करत वि चार ॥ वा ॥ ६ ॥ठे थाश्वासन एणी परें, सैन्य सजीयुं जोर ॥ दोडी चिद् दिशि वीर धाये, तव मच्यो रणसोर ॥वा॥॥ नट जट्ट तब उठली, दमितारि सेना साथ ॥ देखी निज वल मद चिते, शोचर हरि नाथ ॥ वा० ॥ ॥ प्रगट हुए रत्न ततदण, शंख धनु वनमाल ॥ गदा मणि उर रखड्ग देखत, हुए दोय उजमाल ॥ वा ॥ ॥ शंख लेइ करि पूरीयो तय, जोरसें नरसिह ॥ सैन्य मूर्छित नई रिपुकी, श्राप फोज अवीद ॥ वा ॥ १७ ॥ प्रतिहरि तब था दूक्यो, वैर लेण विचार ॥ रथ चढी रणखेत दोडे, दोय वधु तिवार ॥ वा ॥ ११ ॥ नजरें नजरें मल्या मुशमन, चढयो क्रोध करात ॥ रंगें रणमेदान ऊटपट, लडे दोनुं व्याल ॥ वा ॥ १२ ॥ शस्वनी जलधार वरसे, रोपा दमितारि ॥ शस्त्र तो सब नये नि फल, खलें ज्यु उपकार ॥ वा ॥ १३ ॥ शस्त्र लूटे फरिय पूवें, देखी प्रतिहरि दीन ॥ चक समस्यु श्राय वेतु, करें कहे सुण हीन ॥ वाण ॥ १४ ॥ दे तनुजा पाठ पर थव, काहें मरत थकाल ॥ -मर दिखा वत लोहखमें, घडो तु कगाल ॥ वा ॥ १५॥ कनकसिरि तव कपती यु, धरत मनमा खेद ॥ दा कत प्राणाधार केरो, करेगो शिरछेद ॥ वाण ॥ १६ ॥ म मर मनमां कत घोले, देख तुं क्या दोय ॥ चक बोडधु तेणें दरिकर, थाय वेतु सोय ॥ वा ॥ १७ ॥ कहे दरि दमितारि सुण तुं, म मर नोगष्य राज ॥ कनकसिरि कुतात उनसी, गई कीनी श्राज ॥ १७ २ज जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. लो, थणीयाला लोचन ॥ मु० ॥ ५ ॥ गुण निसुणी ना पास नता, तरसे मोर मन ॥ मु०॥ ३ ॥ प्राण करु कुरबान ए छपर, तातो ए साजन ॥ मु० ॥ ४ ॥ दिन रयणी दिलध्यानें लीनो, थावे एहक ॥ मु ॥ ५ ॥ सागरजल सम तिहां मुफ नेलो, सुरसरिता का ॥ मु० ॥ ६ ॥ कटुं कर जोडी सयानी मोरी, वात सुणो एकता ॥ मु॥७॥ स्तिमितसागर कुल शुचि वयरागर, उपन्यु एड रता ॥ मु० ॥ ॥ मुफ 5 स्थितने थापो वाणी, नहिंतर शरण अना ॥ मु० ॥ ए॥ नइ प्यासी उनको मुख देखन, चातक चाहे ज्यु पन ॥ मु० ॥ १० ॥ तन विण र सवे मन मेरे, जनक सहोदर सन ॥ मु ॥ ११ ॥ लगन लगी मोहे उनके गुनकी, कहा रे कहु हु बचन ॥ मु. ॥ १२ ॥ में सोंप्यु सवि सहीयर एदने, माहरु तन मन धन ॥ मु० ॥ १३ ॥ जो न मिले मन मोहन मेरो, जागी दोय योगन ॥ मु० ॥ १३ ॥ कनक सरिखो पूरण पेखी, प्रगट दुवे परसन ॥ मु०॥ १५ ॥कर जोडी कहे हाजर बदी, अब में तुम थाधीन ॥ मु० ॥ १६ ॥ राग विक लता कारक एसो, नांख्यो श्री नगवन्न ॥ मु ॥ १७ ॥ वात मुणो श्रम बागें रसीली, कान धरी सरि जन्न ॥मु॥१॥सर्व ॥६५॥श्लोक॥१५॥ ॥ दोहा ॥ ॥ कहे दरि जो मुफ सपरें, तुफ मन मान्यु एम ॥ चालो जयें निन पुरी, बेसी विमानें क्षेम ॥१॥ कनकसिरी वलतु कहे, करें माहरो तात तुमने परानव श्रति घणो, तेणें मुझ मन शकात ॥ ॥ बोल्या ते बेडू जणा, मत बीहे मनमाहे ॥ श्रम वागल शो थाशरो, एकुण गणती माहे ॥ ३ ॥ वचन सुणी विस्मित हुई, पडी प्रेमके पास ॥ रूप सौर्य गुण मोहिता, साथें चली समास ॥ ॥ विद्यावलें कीधु न, सुंबर एक विमान ॥ सनलावे नृप लोकने, संचा रही थसमान ॥ ५ ॥ जो नो सा मतादिको, सबल सेन जूफार ॥ हरी जावं दु नृपमुता, पी कीजो वाहार ॥ ६ ॥ सुणि ततखेव को चढयो, कहे प्रतिदरि दमितारि ॥ रे रे सुनट शीपाश्यो, जान न पावे गमार ॥॥ कनकसिरीको ले चल्यो, तुरत विमाम तमा ॥ पूढेसें वाहर चढी, लियो लपेट अव जाइ॥ ॥ , थर थर, श्रीशांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. २२ए ॥ ढाल त्रेवीशमी॥ ॥ कंदर्पना शर रे कांच करे, कटकें मुगुण राण सधीर ॥ ए देशी ॥ वालम देख रे कां चढयो कटकाइ, जनक राण सधीर ॥ मारशे तोकुं थाइ अडियो, सवल मोकू पीर ॥ वालम ॥ १ ॥ चढयो दल चिटुं पासें हूंती, मेघ ज्यु गनीर ॥ गाजे घन नीशान गाजे, तीर वरसत नीर ॥ वा० ॥ २ ॥ कुत चमके थपी जवके, निमुण नणदल वीर ॥ मानु चपला चलत चिटुं दिशि, थाइ पहुंचे वीर ॥ वा० ॥ ३॥ सुनट दूर उ झीय दश्ने, हाकशे ज्यु हमीर ॥ देखी निजनट हटत पी-, श्राव्यो प्रति हरि पीर ॥ वा ॥ ४ ॥ रे रक तु कित जात लेकें, सुता रुचिर शरीर ॥ मारके चक चूर करसी, बहे एह थमीर ॥ वा ॥ ५ ॥ ध्रुजती तव देखे कहे हरि सुण नारी ॥ सिंह थके फिकर तनकी, का करत वि चार ॥ वा ॥ ६ ॥ दे आश्वासन एणी परें, सैन्य सजीयुं जोर ॥ दोडी चिद् दिशि वीर धाये, तव मच्यो रणसोर ॥वा॥॥ नट फट्ट तव उछली, दमितारि सेना साथ ॥ देखी निज बल मद चिते, शोचच्यु हरि नाथ ॥ वा ॥ ॥ प्रगट हुए रत्न ततक्ष्ण, शंख धनु वनमाल ॥ गदा मणि उर खड्ग देखत, दुए दोय उजमाल ॥ वा० ॥ ॥ शंख लेइ करि प्रीयो तव, जोरसें नरसिह ॥ सैन्य मूर्छित नई रिपुकी, श्राप फोज श्रवीद ॥ वा ॥ १७ ॥ प्रतिहार तथ श्राइ दूक्यो, वैर लेण विचार ॥ रथ चढी रणखेत दोडे, दोय वधु तिवार ॥ वा ॥ ११ ॥ नजरें नजरें मख्या शमन, चढयो क्रोध कराल ॥ रंगें रणमेदान ऊटपट, लडे दोनुं व्याल । वा० ॥ १२ ॥ शस्त्रनी जलधार वरसे, रोषा दमितारि ॥ शस्त्र तो सव लये नि फल, खलें ज्यु धपकार ॥ वा० ॥ १३ ॥ शस्त्र बूटे फरिय पूजें, देखी प्रतिहरि दीन ॥ चक्र समघु थाय वेढे, करें कहे सुण हीन ॥ वाण ॥ १४ ॥ देश तनुजा पाठ पर श्रष, काहें मरत थकाल ॥-मर दिखा वत लोहखमें, बडो तुं कगाल ॥ वा ॥ १५ ॥ कनकसिरि तप कंपती यु, धरत मनमा खेद ॥ हा कंत प्राणाधार केरो, करेगो शिरश्छेद ॥ वाण ॥ १६ ॥ म मर मनमा कंत वोले, देख तुं क्या होय ॥ धक बोडघु तेणे हरिकर, थाय घेतु सोय ॥ वा ॥ १४ ॥ कहे हरि दमितारि मुण तुं, म मर नोगव्य राज ॥ कनकसिरि कुतात उनसी, गइ कीनी थाज ॥

. २३० जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. वा० ॥ १७ ॥ मान धरि करवाल ने कर, दोडियो थाकाश ॥चायतो वेखी चक्रसें हरि, बेदियु शिर तास ॥ वा० ॥१॥ दुइ जयजयकार माने, कुसुमको वरसात ॥थनतवीरय स्वामी तेरो, प्रवल पुण्य सघात ॥ वास ॥३०॥ विजयवर्धे वासुदेवो, अपर ए बलदेव ॥ चिरं जीवो कोहि सेरा, करण लागे सेव ॥ वा ॥१॥ जीत दुश् तब थनतवीरय, उदय एकत्र वान ॥ढाल वीशमी त्रीजे खमें, मुणो मुगुण निधान ॥ वा॥२॥१५॥ ॥ दोहा ॥ ॥ कनकसिरी मन चितवे, नागे मुफ याचार ॥ बानी यावी तातथी, में कियो कुलसहार ॥१॥ धिक् धिक् माहापण माहरु, धिक् धिक माहरु रूप ॥ जोतां मुफ धागल इस्यु, कारिज थयु विरुप ॥ ५ ॥ कुल खंपस हु कुंवरी, का श्रवतरी जगमाय ॥ जनक थने वली वधुनो, कसो विना श इण वाय ॥३॥ वे बांधव चाल्या तुरत, घेसी विमान मकार ॥ कनक सिरीकों साथ लर, बगु खेचर परिवार ॥ ४ ॥ निज नगरी नणी चालता, विच कनकादि उदार ॥ श्राव्यो तब खेचर कहे, हा जे जैनविहार ॥५॥ चैत्य जुहारी जिन तणां,वलतां वीतो साध ॥ कीर्तिधर नामें जलो, गुणमणि नखो थगाध ॥ ६ ॥ वरसी तपसी पामियो, उज्ज्वल केवल नाण ॥ दोय नरेश्वर पद नमी, करे मुनि तणा वखाण ॥ ७ ॥ धरा पीठ घेता बिद्ध, कर जोडीने ताम ॥ नविक जीव प्रतिबोधवा, कहे मुनि देशन थाम ॥ ७ ॥ ॥ ढाल चोवीशमी ॥ तुगीया गिरि शिखर सोहे ॥ ए वेशी ॥ कहे मुनिवर वात मीठी, सां जलो नवि धुंद रे ॥ पामियो ए जलद नरनव, करोधर्म श्रमद रे ॥ कर ॥ १॥ प्रथम चुल्लक अने पाशक, धान्य द्यूत विचार रे ॥ रयण सुमिण ते चक्र जाणो, कूर्म युग तिम धार रे ॥ क० ॥ ॥ वशमे परमाणु वस्खा पो, एह दश दृष्टात रे ॥ जाणि उर्लन एद जुगतें, मनुज नवनी वात रे ॥क० ॥२॥ देश थारिज कुल थरोगी, नाव उलह सहाय रे ॥ लही योग ए वध कारण, दूर बगंमघ विनाव रे ॥ क० ॥ ॥ मिथ्याल अविरति अष्ट योगा, तिम कपाय प्रमाद रे ॥ कह्या पंच ए षध हेतु, तजो मन उन्माद रे ॥ क० ॥ ५ ॥ गुरु कुदेव कुधर्म केरा, सगसे मिष्यात L श्री शातिनाथनो रास खमत्रीजो. १३२ रे ॥ पाप विरमण नहि तिल नर, कही अविरति जात रे ॥ क० ॥ ६ ॥ क्रोध मानो माय लोजो, मूल चार कपाय रे ॥ खंति आर्जव मुक्ति मार्दव, ए विपर्यय थाय रे ॥ क० ॥ ७ ॥ कदु मदिरा विपय नि, तिम कपाय निवार रे ॥ पचमी विकथा बाम परही, ए प्रमाद म वधार रे॥ क० ॥ ७॥ योग मन वच काय केरा, जालवो तुमें सार रे ॥ तेरमा गुण गण सूधी, जे रहे निर्धार रे ॥ कण्॥ ए॥ हेतु टूटे गुण प्रगटे, करो तास उपाय रे ॥ कहे केवली धर्मनी मति, करो जिम सुख थाय रे ॥ क ॥ १० ॥ लव स्वरूपं थधकूपें, मोह नूपें पाश रे ॥ विपयनामें मांहे पडि या, होय गति मति नाश रे ॥क० ॥११॥ एक विषय विलासहेते, जे हणे वढु लोक रे ॥ तेहनां फल दोहिला ते, सहे परनव रोक रे ॥ क० ॥ १२ ॥ शैल्य सरिखा कह्या विप सम, कामिनीना नोग रे ॥ सुख माने मूढ न लहे, अनाटिनो रोग रे ॥ क० ॥ १३ ॥ एह सुख मधुविऊ सरिखु, अते कटुक विपाक रे ॥ धन्य एहथी रह्या थलगा,जाणी फल कि पाक रे ॥का॥ कनकसिरि कर जोडी जपे, कहो सत्य अवदात रे ।। विपय चितनथकी 5 ख दे, सेविया शी वात रे ॥ क० ॥ १५ ॥ पण कहो कुण कर्म हूत, पितर वधु वियोग रे ॥ कहे नाणी सुणो प्राणी, कर्म सव लो रोग रे ॥ क ॥१६॥ ढाल चोवीशमी त्रिजे खमें, रगें दाखी एद रे ॥ रामविजय कहे सुणो हवे, पूर्वनव सस्नेह रे ॥ कण् ॥ १४ ॥ ११ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ कहे कीरतिधर केवली, गुरू नाण उपयोग ॥ देवाणुप्पिय सांजलो, प्रवकतनो नोग ॥१॥ ॥ ढाल पच्चीशमी ॥ ॥ प्रथम अहिरावण दीनो॥ ए देशी ॥ पूरव धातकीखमें,शखपुर जरतें थ खमें ॥ उछिन्नवश एक नारी, श्रीदत्ता निरधारी ॥ १ ॥ परघरे करे नित्य काम, श्रवला 5 खनु ए नाम ॥ कर्म कमाइनो योग, न मले वांनि त लोग ॥ २ ॥ एकदिने मुनिवर मलिया, मनद मनोरथ फलिया ॥ कहे स्वामी हित वारखो, मुझने जीवती राखो ॥ ३ ॥ कहे मुनि धर्मचक्र वाल, तप करो या ठजमाल ॥प्रथम थन्म दोय करीयें, साडत्रीश चोथ थादरीयें ॥ ॥ देव गुरु जति थति सारी, पूजा सत्तर प्रकारी ॥ धन २३० जैनकथा रनकोप नाग पाठमो. वा० ॥ १७ ॥ मान धरि करयाल ले कर, दोडियो श्राकाम। देखी चक्रसें हरि, नेवियु शिर तास ॥ वा० ॥१॥ दुउ जपजपाका कुसुमको वरसात ॥थनतवीरय स्वामी तेरो, प्रबल पुण्य सपात । ॥२०॥ विजयथर्धे वासुदेवो, थपर ए बलदेव ॥ चिर जीवो कोहिल्य करण लागे सेव ॥ वा० ॥ २१॥ जीत दुश् तर थनतवीरय, अब एस वान ॥ ढाल वीशमी त्रीजे खमें,सुणो सुगुण निधान ॥वा॥५०॥ ॥ दोहा ।। ॥ कनकसिरी मन चितवे, नाठो मुफ थाचार ॥ठानी श्रावी तातपी, में कियो कुलसहार ॥१॥ धिक् धिक माहापण माहरु, धिक् धिरु मादक रूप ॥ जोतां मुफ थागत इस्युं, कारिज थयु विरुप ॥ २ ॥ कुल खपत छ कुवरी, का अवतरी जगमाय ॥ जनक श्रने वली वधुनो, कसो विना श इण वाय ॥ ३ ॥ वे वांधव चाल्या तुरत, वेसी विमान मकार ॥ कनक सिरीकों साथ लइ, बहु खेचर परिवार ॥ ४ ॥ निज नगरी नणी चालता, विच कनकादि उदार ॥ थाव्यो तव खेचर कहे, हा ने जनविहार ॥५॥ चैत्य जुहारी जिन तणा,वसता दीगो साध ।। कीर्तिधर नामें जलो, गुणमणि नखो अगाध ॥ ६ ॥ वरसी तपसी पामियो, उज्ज्वल केवल नाण ॥ दोय नरेश्वर पद नमी, करे मुनि तणा वखाण ॥ ७ ॥ धरा पीत घेता विद्ध, कर जोडीने ताम ॥ नविक जीव प्रतियोधवा, कहे मुनि देशन थाम ॥ ॥ ॥ ढाल चोवीशमी॥ ॥ तुगीया गिरि शिखर सोहे ॥ ए देशी ॥ कदे मुनिवर वात मीठी, सां जलो नवि वृंद रे ॥ पामियो ए सुलह नरनव, करो धर्म श्रमद रे ॥ का ॥ १॥ प्रथम चुनक बने पाशक, धान्य द्यूत विचार रे ॥ रयण मुमिण ते चक्र जाणो, कूर्म युग तिम धार रे ॥ क० ॥ ॥ दशमे परमाणु वस्खा णो, एद दश दृष्टांत रे ॥ जाणि उर्लन एद जुगते, मनुज नवनी वात रे ॥ क॥२॥ देश थारिज कुल अरोगी, नाव लह सहाव रे ॥ लदी योग ए बध कारण, दूर बांमघ विनाव रे ॥ क० ॥ ४ ॥ मिथ्यात्व थविरति उष्ट योगा, तिम कषाय प्रमाद रे ॥ कह्या पंच ए बघ हेतु, तजो मन उन्माद रे ॥ कण ॥ ५ ॥ गुरु कुदेव क्रुधर्म केरा, सगसें मिप्यात श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. २३३ ॥ दोहा॥ ॥ कहें मुनि उपनय एहवो, नयरी उलेणी नाम ॥ नृप जितरिपु धारिणी तनय, नरसिह मृत अनिराम ॥ १ ॥ सकलकला पूरण शशी, यौवनरूप रसाल ॥ कन्या परणावी पिता, हात्रिंशत सुकुमार ॥ २ ॥ अतुली वल सुख जोगवे, मनोवांछित संयोग ॥ मात पिता मनवल्लहो, विलसे विपयिक लोग ॥३॥ ॥ ढाल ग्वीशमी॥ ॥ मगध देशको राज राजेश्वर ॥ ए देशी ॥ एकदिवस ते पुरने परिसरें, याव्यो दो वननो हाथी ॥ उज्ज्वल वर्णे गज तिम उंचो, नृपर्ने का कोई साथी के ॥ १ ॥ राजन् थरज सुणो एक मोरी ॥दु वलिहारी तोरी ॥ वा लेसर ॥०॥ एयांकणी ॥ गज कोप्यो जन विप्लव करतो, राख हो यमचा स्वामी ॥ अमो श्रनाथ यशरण कोण आगे,कहिये जइ शिर नामी के ॥ रा॥ २ ॥ सुणि राजा सेना दोडावी, सवल राणीना जाया ॥ देखी गज मदमत्त मदोत, दीन थइ फरी याया के ॥रा ॥३॥ थाप थयो असवार नरेश्वर, पहेरी सन्नाह ते शूरो ॥ श्रावी नमे नरसिंह कुम रजी, बोले एम गुणपूरो के ॥ रा ॥ ४ ॥ राज विराजो मदोलें बाजो, हुकम करो थष थमने ॥ फरमावो तेहनें वांधीने, गुजराबु ले स्थाने के ॥राण ॥ ५ ॥ द्रुकम दुवो गज लावो हो जाली, दोव्यो था थसवार ॥ केसरीया रजपुत रढियाला, साथे सबल परिवार ॥रा ॥ ॥ ६ ॥ दीठो गज नव हायनो लांबो, सात उन्नत त्रण पहोलो ॥ दीर्घ दत कर पिंगल नयरों, दरिसण जेहनो न सोहिलो के ॥ रा ॥ ४ ॥ चारशें चालीश लक्षणे पूरो, दीठो गयंद कुमार ॥ सिंधुर राजकुमर जणी घसियो, लोक सर्को वारे ॥ ॥ कुमरजी ए गज काल्यो न जाय । देखि ततखेव ए यमना सरिखो, ए पासें जाय वलाय ॥ कुम ॥ ए॥ कुमर कहे तुमें दूरे रदो सवि, ए गजनें नसाई ॥ तो जितरिपु कुलनो दु जायो, गज थाणु ग्रही चार्ल्ड के ॥रा० ॥ ए॥ चक्रपरें गजने फेरवियो, थकव्यो दो तेहनें गाढो ॥ चरणे खेदाणो श्वासें नराणो, सनो रह्यो थर टाढो के ॥ रा ॥ १० ॥ जई वेगे ऊपर लघु कलश, वलीयो राजकुमार ॥ विस्मय पाम्या थालाने थास्यो, वरत्यो जय जय , १३२ जैनकया रनकोप नाग बाग्मो. होय तो एम कीजें, दान संपत्ति सारु दीजें ॥ ५ ॥ गुरु ली, माने कारिज सीधु ॥ धन्य गुरु मुफ समजावी, सुपी राजमाती ॥ ६ ॥ गुरु बदी घरे श्राची, कहे पाटोशण नावी ॥ तप करे मन थाणी, लोकें उत्तम जाण ॥ ॥ पारणे सर ले सारी, एक विचारी ॥ तप महोटु जिन साध्यु; थातम गुणथी ए वायु .. सात्त्विक राजसी जोय, तामस त्रीचं ए होय ।। दोय तनी एक करी, सहेजें शिवसुख वरीयें ॥ए। तपस्वी घणी थइ नारी,एक दिन नित मजा री ॥ जोता कचन पायो, हियडे हेज न मायो ॥ १० ॥ वाधी तपनी प्रतीति, उजमएं करे रीति ॥ जिनवर पूजा रचावे, सादामी तेरी बिमारे ॥ ११ ॥ तप कजमएं ए की, मणुज जन्म फल तीधु ॥ तप जमता थी वाघे, निन उत्साहें जो साघे ॥ १२ ॥ तपथी होवे व्यवदान, तप ए मुक्ति निदान ॥ तप तपीयु ए नीराशी, प्रगटे निजगुण राशि ॥ १३ ॥ यमुक्त ॥ यहूर यजरा० ॥ १ ॥ मासखमण उपवासी, समगुणनो अन्न राशि ॥ एहवे एक मुनि थाव्यो, श्रीदत्ता मन नाव्यो ॥ १४ ॥ उठी ना तस सामी, पाउ धारो मुज स्वामी ॥ पतितने पावन कीजें, थाहार निरवद्य लीजें ॥ १५॥ पहिलाने मुनि नावें, थशनादिक वहोरावे ॥ कड़े रुतकृत्य हूँ थान, सतोष्या मुनिराज ॥ १६ ॥ धर्म कहो मुज मीठो, फल जस नपणले दीगो ॥ पाली पोरसी श्राइ, सुणजो धर्म सखाइ ॥ १४ ॥ मुनिवरें कीधो थाहार, मास खमण चोविहार ॥ धामो दिवस वीजाथी, सूधो मुक्तिनो साथी ॥ १७ ॥ श्रीदत्ता तिहां थावे, मुनि वर वांधा ते ए नावें ॥ मुनि कहे जिनवर धर्म, निसुणो एदनो मर्म ॥१॥ त्रीजा मित्र समान, थापे शिवसुखदान ॥ एदना तीन प्रकार, सुणजो ते निधार ॥ २० ॥ प्रथम त्वचागत कहीये, दिलमांहे वदीयें ॥ बीजो भ स्थिगत साचो, पण परमारथ काचो ॥ १॥ त्रीजो मकामा दो, न जाये राष्छेद्यो । प्राणांतें नवि मूके, कष्ट पडे नवि चूके ॥ २२ ॥ एड अर्थ एम ध्यावे,परयनर्थ मन लावे॥केम श्रमूरत धर्में, अस्थि मक कहो मम ॥ १३ ॥ श्दो उपनय बतलावे, मुनि हवे एम समजावे ॥ कही पर वीशमी ढाल, त्रीजे खंमें रसाल ॥२॥ सर्वगाथा॥२६श्लोक ॥१॥ .

श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. २३५ ॥ ढाल सत्त्यावीशमी॥ ॥ देशी फकडीनी ॥ सुण योगींदा वे, वात कहुँ अब मेरी ॥ धनके कारण वे, बहुत देश में फेरी ॥ ७ ॥ फेरी दीधी देश विदेशे, बहुत दिव स दूथा मोकुं ॥ नूख्या तरप्या धन मेलणकु, बहुत क्या में कहु तोकु ॥ पण उपगारी कोउन मलिया, जासुटले ए खदंदा ॥थाका धाया देखी तरुनाया, सुख पाया सुण योगीदा ॥ सुण योगींदा वे ॥१॥ धन मन मानु वे, थोर कहा जगमाये ॥ धनसे जात वे, जिहां जावे उहां पावे ॥ ॥ पाश् श्लत दोलत उनियां, धन विण काज न कोईसरे ॥ निर्धन र मृत दोन वरोवर, कवि ग्रथांतर यु उच्चरे । परणीघरणी ते पण ठमे, फरे कुलीन पण थणमान्यु ॥ न गणे कोई प्रतीति ते नरनी, ते माटे धन मन मान्यु ॥ध ॥ २ ॥ अव तु पाया वे, जाग्यदशा मुफ जागी ॥ कर सुपसाया वे, हो मुझ उपर रागी ॥ ॥ रागी होश करो मुफ करुणा, करणी तुमची यति सारी ॥ अवधूत कहावो अलक जगावो, उनियामें तुम गति न्यारी ॥ थालसुथा घर थावी गगा,रग नया मोरे मन जाया ॥ दरिद 5 ख वेदा जोय नमेहा, ताप टले थव तु पाया ॥॥ ३ ॥ कहे ते दरखी वे, कुण कुण देश तें देखे ॥ कहो मुफ यागें वे, वात विचार लं लेखे ॥ ॥ लेखे वात विचारी पंथी, कहे चोराशी फरि थायो।कुण कुण तेह बताव ते मोकु, जांखे कलट मन पायो ॥ मेंनी देखे देश बहुत है, उनकी रीति मिले सरखी ॥ तामें जाणु तरत पिठाण, साची ते कहे ते दरखी ॥ क० ॥ ४ ॥ सोरत देख्यो वे, चतुर जिहां नर नारी ॥ मधुरु घोले वे, मानु सुर श्रवतारी ॥ ॥ सुर थवतारी जिहा दो तीरथ, शत्रु जय गढ गिरनारी॥थादीश्वर थलवेसर स्थाप्या, जाउं उनकी बलिहारी॥ कोडाकोडि थनता सिक्षा, जिदा मुनिवर सो में पेख्या । बडु दिन उदा फरिया पदु नीसरीया, योगीश्वर सोरठ देख्या ॥सो॥ ५ ॥ कुकण देख्या वे, जिहा पग पग पनवाडी ॥ नालीयेर कदली वे, नोजन सुदर शाली ॥ ॥ शाली नोजन चतुरविचक्षण, लोक सस्को नहिं उखीयो॥गयो गुजरान फरन उनदेशें, तोनी में न नयो सुखीयो ॥ कामण दूमण वाले वगुले, सपही मोकं ठवेख्यो॥ कट्ठ श्रवधूता सुण तु मित्ता, ऐसो मे कुकण देख्यो । कु० ॥ ६ ॥ यं यदुतेरे वे, श्रग तैलग कलिंगा ।। लाट

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१३४ जैनकथा रत्नकोप नाग थाठमो.
कार के ॥ रा० ॥ ११ ॥ जनक समीपं श्राव्यो कर जोरी, बिनने
शीश ॥ सद्ध थाशिप दीये चिरं जीवो, कार कोटि वरीत..
१२ ॥ चितये नरवर राजधुरधर, पुत्र सुकुन मुह भाग ॥ पटे
राज्यमा रहेवु, थाव्यु मन वैराग्य के ॥ रा०॥ १३ ॥ यडार
वि पुत्ते, जो नियनार विगु निञ्चतो ॥ न य साहेऽ सकऊ, सो मुत्ततिले
मणि नपिउ ॥ १॥ पूर्वढाल ॥ लहि सम्मति सुत राज्ये थापी, नृप सांग
मुनि पासेंगलोच करी मन शोप हरीने, चारित्र पाले जनामें के ॥ रा..
॥१४॥चपकवरणी काया हो कोमल, कीधो उय विहार ।। पंच समितिमा
गुप्ति सनाले, पाले पचाचार के ॥ रा०॥ १५ ॥ हवे नरसिह नरेसर ने
पाले प्रजाने प्रेमें ॥ न्यायमार्ग नवि चूके कोश, सद्धको व्रतें देम के।
रा० ॥ १६ ॥ थन्य दिवस अतिमायी प्रकटयो, थाकरो चोर प्रचंक।
नगर मुप्यु सघनु तिण धूलें, कोई न देई शके दम के ॥ राम् ॥ १
महाजन लोक मतीने थावे, राजन किम रहेवाये ॥ धोले वहाडे धूते हो
धूरत, रातें वादार न जाय के॥रा॥१॥ दे दिलासो महाजन वास्यो,
धारदक रखवालें ॥ पुनरपि महाजन फरियाद कीधी, का नृपश्रम नदि
पाले के ॥ रा ॥ १५ ॥ नहितर स्थानक थापो अलगु, तिहां अपने
अमें वसीयें ॥ तिहां थारक्षक काठगे कीधो, बोलाव्यो रायें रसीये के।
रा० ॥ २० ॥ कहे महानन राजन इहां एहनो, वाक न कांई दीसे ।
वस्थर बेटी जाय ठटी, धूरत रात नदीसे के ॥ रा॥ २१ ॥ ए कोर
बलीयो ने वली बलियो, को प्रपंचें नीताये ॥ कहे राजा करिश हूं म्हं,
महाजन कीधु विदाय ॥रा॥२२॥ कहे सुव्रत श्रीदत्ता सुण हवे,अस्थि म
कानी घात॥त्रीजे खमें दाल बधीशमी, सानलो मूकी वात के ॥२३॥५॥
॥ दोहा॥
॥ वन वेष धरि नीसमो, रातें ते राजान ॥ सघले शका स्थानकें, प्रम
ण करें धरि शान ॥ १ रात्रिमाहे बाहिर दिने, फरे यहोनिश ते नूप ।
पण किदांये दीतु नहिं, तस्करतएं स्वरूप ॥ ॥ अन्य विवस संध्या
समय, बेगे तरुतो राय ॥ वस्त्र कषाय त्रिदमियो, दीगो मारगाय ॥
३॥ निज समीप श्राव्यो यदा, नम्यो नरेश्वर ताम ॥ कुणतुं किहांपी
श्रावीयो, तिणे पण बघु थाम ॥ ४ ॥

श्री शांतिनाथनो रास खमत्रीजो १३७ धन्यो तिहां जी, जाप्युं लाकड एक ॥ निजस्थानक मूकी करी रे, तरु कोटरें रह्यो धरि टेक रे ॥ चो० ॥ ४ ॥ ग कती जोयु जिस्य जी, सूतो जाणी तास ॥ खड़े हणी कस्या खम वे रे, नृपत्रांते रे अविमास रे ॥ यो ॥५॥ पट परद्द करी जोश्यु जी, श्रदो अदो उगीयो मुफ॥ पश्चात्ताप करे घणो जी, नवि जाण्यु रे में एहनु गुफ रे ॥ चो० ॥ ६ ॥ राजन कहे सुण पापीया जी, थाजे हवे दुशियार ॥ पापनो घट पूरण दु रे, नहि मूकु रे हवे निर्धार रे ॥ चो० ॥ ४ ॥ ननु नलुं कहेता सामुहो जी, थयो जाली तरवार ॥ खड्गाखणे तेहनु रे, युद्ध मातु रे थयु बहु वार रे ॥ चो० ॥ ॥ कल पामीने राजवी जी, चोरने हणीयो मर्म ॥ लडथड तो नोंये पठ्यो रे, एम थाव्यु रे उदय निज कर्म रे ॥ चो० ॥ ५ ॥ विधु र थयो ते घातथी जी, नूपप्रत्ये कहे वात ॥ वीर ठग्यु पुर ताहरु रे, तो पाम्यो रे अचित्यो घात रे ॥ चो ॥ १७ ॥ सुण मरवु सही माहरे जी, ए देवलनी पूर्व ॥ पाताल मदिर डे नलु रे, तुमें जाउ रे सितावी कप रे ॥ घो॥ ११ ॥ वहु नयरनी नारीयां जी, घाली नमि मझार ॥ इव्य अ वलि त्यां घणु रे, तुमें करजो रे हो तेहनी सार रे ॥ चो० ॥ १२ ॥ खड्ग ले जाउ मादरु जी, टेजो दो विवरें साद ॥ तुरत श्रावीने उघाड शे रे, निसुणीने रे तुमारो नाद रे ॥ चो० ॥ १३ ॥ मरण कहेलो मादरं जी, देजो खग निशानि ॥ हार उघाडी तादरी रे, एह सेवा करशे मुजाए रे ॥ चौ ॥ १४ ॥ खड्ग ई नृप चालीयो जी, पहोतो सुवन हार ॥ सवि वृत्तांत सुणी करी रे, पेसास्यो रे नुवन मकार रे ॥ चो० ॥ १५ ॥ श्ण पर्यकें साहिवा जी, वेतो थावी राज ॥ तुम दर्शनथी माहरां रे, सवि सीध्यां रे वांबित काज रे ॥ चो० ॥ १६ ॥ हार देई था हुं तवा जी, प्रवन्न जोतां रे दीठ ॥ सा शकी नृपें उलखी रे, करे कांड रे एह अनीह रे ॥ चो॥१॥निज उपधाननें स्थापीने जी, थाप दीप घन बाय ॥ रदियो यंत्रशिला तदा रे, तेणें मूकी रे तिण ताय ॥ चो० ॥ १७ ॥ शय्या शतखमित थ जी, ताली देती ताम ॥ श्रहो मुफ पध व तणा रे, वेरीनु रे कीg काम रे ॥ चो० ॥ १९ ॥ दोडी राजा थावीने जी, केशे फाली प्रथम ॥ दवे पहोंचाई तुनें रे, निजवधव रे मार्गे रम ॥ चो॥ २० ॥ दीन वचन मुख बोलती जी, जीवती मूकी मांहे ॥ हार १८ , १३६ जैनकथा रनकोप नाग थाम्मो. कुणाला वे, मरुधर गुजर चगा ॥ ॥ चगा देश जिहाँ नबरगद, निर्मल नीर वहे ॥ काशी देश सुवेशा मानव, जिण दी भामर नव जापा नव नव शाखा, दाखी सुण साई मेरे ॥ धन मवि पायो गमायो, देखे देश यु बहुतेरे ॥ ० ॥ ४ ॥ धूरत चिते थे, तारो रख्यु ॥ करशे महारु चे, कारिज पासें राखु ॥ ॥ राम्या पातें विमासे, मत फिकर मनमाहे धरे ॥ मन चाहे सो सम्मी लेना, - कहु सो तु काज तु काज करे ॥ थगीकार कयु तस नारव्यु, जाख्यो चोर एसी चित्तें ॥रात पडी पसयुं तम वहुलु, तब मनमा धूरत चिते ॥५॥ मुण वैदेशी वे, तस्करने जे प्यारी ॥ सन्मुख थावी वे, रयणी एबगारी ॥॥ रात थंधारी थापण प्यारी, ले रूपाण करमें तेरा ॥चाल नपरम ईश्वर घरमा, धन लावे जइ बहुतेरा ॥ सत्त्यावीशमी त्रीजे खंमें, या कही फकडी देशी ॥ श्राव्यु पाप उदय हवे एहनु, राम कहे सुख वैदेशी ॥ क ॥ ए॥ सर्वगाथा ॥ ४५ ॥ श्लोक तथा गाथा मली॥१५ ॥ दोहा ॥ ॥ काढघु खङ्गग पडिहारथी, जवके ज्योति अपार ॥ चिते नृप एइने हणु, वली मन करे विचार ॥ १ ॥ एक वार नोक चरित, दणवो महारे दाय ॥ एम चितीने चालीयो, नृपति तेहनी साथ ॥ २ ॥ धूरत मन शोचे श्स्यु, नहिं खड्ग सामान्य ॥ श्ण खहें जाणु सही, दीसे के राजान ॥३॥ तो उपाय काश्क करी, कूटी मारु राय ॥ वेद धूर्त धूर्तन मम्मा, जोजो शु दवे थाय ॥ ४ ॥ श्राघो ज पालो वल्यो, कहे धूरत पुरलोक ॥ दमणा जागे ने श्दा, सूईजें गतशोक ॥ ५ ॥राजायें दोय कीधला, पत्र वसंस्तर ताम ॥ एकण वीशामो स्वयं, बीजे चोर दराम ॥ ६ ॥ ॥ ढालथग्यावीशमी॥ ॥ मूकी द्यो मति दननी जी ॥ ए देशी ॥ चोर विचारे चित्तमा मी, मुज माथानो एह ॥ मुफ जागतां ए केम मरे, नवि सूवे कपटर्नु गेहरे ॥ १ ॥ चोर कला नवि कीजीयें जी ॥ए थोकणी ॥ घोरी जय नदि थाय ॥ धन मेले धूती घणु रे, पण थाखर जीवथी जाय रे ॥ चो। ॥ २ ॥सांषो सोडो तापीने जी, सूतो घोर तिवार ॥ एम ग्रन ताके पापिया रे, नवि जोवे रे विपाक विचार रे ॥ चो० ॥३॥ नृप इलये , श्री शातिनाथनो रास खंमत्रीजो. १३ए ॥३॥ तप करी काया शोपवी, हालंतां हे वाजे वलि हाड के ॥ सहे परीसह थाकरा, नूख तृपा हे वली ताप ने टाढ के ॥ न॥ ४ ॥ पाती कर्मक्ष्यथा लह्या, नाण पचम हे पचमगति वास के ॥ करुं कर जोडी वदणा, सिपी हे थया लीलविलास के ॥ न० ॥ ५ ॥ कहे सुव्रत जेम योगीने, चूरणे करी हे वासी तस मीज के ॥ तेम धर्मे ए श्रातमा, वा सीजें हे थाणी शुदरीज के ॥ न० ॥ ६ ॥ एम उपदेश मुणी नतो, श्रीदत्ता हे ग्रहे श्रावकधर्म के ॥ मुनि वदी मदिर वली, मनमाहे हे जाण्या व्रतमर्म के ॥ न ॥ ७ ॥ सामायिक पोसह करे, बहश्रध्म हे यांविल उपवास के ॥ नित्ये विगय न वावरे, शुन नावना हे नावे उभा स के ॥ न० ॥ ॥ एक दिन कर्म तणे वशे, मनमाहे हे थाव्युं तस एम के ॥ शुं फल दोशे के नहिं, पालु तु दो सूधो धरी प्रेम के ॥ न ॥ ए ॥ विचिकित्सा एहवी करी, चवि तिहाथी हे जिहां उतपन्न के ॥ कहे कीर्तिधर केवली, ते दाखु हे सुणो राजन के ॥ न० ॥ १० ॥ इण विजयें वैताढयमां, सुरमदिरे हे नगरें गुणवत के ॥ कनकपूज्य राजा नलो, वायुवेगा हे राणीनो कत के ॥ न ॥ ११ ॥ कीर्तिधर सुत जेदनो, नरयौवन हे श्राव्यो नूपाल के ॥ श्रनिलवेगा मुफ कामिनी, गुण वती दे रूपें रतिवाल के ॥ न० ॥ १२ ॥ कुन कृपन गजराजने, स्वप्न त्रयें दो सूचित सुत सार के ॥ प्रसव्यो श्रागल ते थयो, जोरावर दे प्रतिदरि दमितारि के ॥ न ॥ १३ ॥ बहुकन्या परणावियो, में सोंप्यु हो तेदने निजराज्य के ॥ गुरुपासें थणगारता, में लीधी हो लेवा शिवराज के ॥ न० ॥ १४ ॥ ते दमितारिनी वन्नना, म राती दो कूखें सजात के ॥ कनकसिरी पुत्री नली, तु दुइ दे यहां गुण विरव्यात के ॥ न । १५ ॥ करी विचिकिचा पूर्वे, तेमाटें दे थयो बंधुवियोग के ॥ सफल कमाइ थापणी, जग महोटो हे ए कर्मनो रोग के ॥ न० ॥ १६ ॥ निज प्रव नव सानली, मुनि मुखथी हो पामी वैराग्य के ॥ धिक् धिक् विषयी जीवने, विपयाथी दे नावे नवताग के ॥ न ॥ १७ ॥ बेढ वधवने विन वे, जो थनुमति दे थापो मुफ थाज के ॥ तो दीक्षा जिनराजनी, ग्रही सारु दे थातमनां काज के ॥ न० ॥ १७ ॥ अनंतवीर्य थपरा जिता, कहे सुनगे हे मुनगा पुरी जाय के ॥ स्वयंप्रन जिनपासें तुमें, .

रे, १३G जेनकथा रत्नकोप नागारमो. सघाडी बावियो रे, निजमदिर रे नृप उत्साह रे ॥ चो० ॥ थयो रवि कगीयो जी, पुरजन सायें राय ॥ श्रावे तिहां सात- कहे सहुने रे जोवो थाय रे ॥ चो० ॥ २२ ॥ जे जेहर्नु होगते जी, नारी थने धनराशि ॥ ले सहु पुर श्रावीया रे, नृप सुजसविलास रे ॥ चो० ॥२३॥ जे नारी थाणी घरे जी, ते रति लगार ॥ दस्यु उपर मोही रही रे, दोडी नावे रे चोरके वार रे ॥ २४ ॥ जन थावी कहे रायने जी, रायें बोलाव्या वेद्य ॥ का चार ते कीजिये रे, गुटिकादि करे बलि नैवेद्य रे ॥ चो० ॥ २५ कहे कामण चूरणें जी, था परवश ए वाल ॥ निजचूरण आपी करी करु साजी रे दु ततकाल रे ॥ चो० ॥ २६ ॥ राजदुकम वैये करी भी ते सवि मूल खनाव ॥ एक रही कांगड परें नवि गमे रे तेह विमान ॥ चो० ॥ २७ ॥ विस्मय पाम्यो राजीयो जी, पूठे दो कारण तेह । वैद्य कहे सुण सादिवा रे, कदु कारण रे दु सनेह रे ॥ धो ॥ २० ! ढाल नणी अग्यावीशमी जी, त्रीजे खमें विचार ॥ कहेराजा मान् रे, चूर्णनो रे हवे अधिकार रे॥चो॥श्या सर्वगाथा॥१०॥ श्लोक१५॥ ॥ दोहा ॥ ॥ चूर्णथी रे वासी त्वचा, कोइकनी माहारान ॥ मांस रुधिर कोश तणां, वास्यां गरिव निवान ॥ १ ॥ ते में सवि प्रतिचूर्णथी, करी नीरो गी काय ॥ पण एदनी अस्थिमला, वासी ने माहाराज ॥२॥ ते माडे वस्यु तणां, अस्थि घसीने पाय ॥ तो राजन ए कामिनी, सहेजें साजी थाय ॥३॥ ते तिम राय करावियु, निर्विकार थइ ताम ॥ सकल लोक खानद नयो, चिर जीवो ए स्वामि ॥ ४ ॥ ॥ ढालगणत्रीशमी॥ ॥ राजुल बेती मालीये ॥ ए देशी ॥ण अवसरें तिहां श्रावीचा, निजजनकना हे वीक्षा गुरुराज के॥श्रीजयंधरनामें नला, नवजलनिधिही तारना जहाज के ॥१॥ नरसिह नृप वैरागीयो, गुणसागर हे संतने वे रान के ॥ पोते संयम थादसो, गुण गीरुन हे निज भातम काज के ॥ न० ॥ ॥ पंचाचार विचारना, गुण पाबे दो चाजे गुरु पंच के ॥ मारग मुनिवरनो जजो, थाराघे दो नहिं कोई पस्तिमंप के॥ - श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो. १४२ कहे देशना स्वामी वैराग्य केरी, मुणे पर्पदा वार वेठी जलेरी ॥ सुधांनोद धारा समी ताप टाले, बेहु वधवा सानले एक ढालें ॥ ७ ॥ सुरो वाणी वैराग्यनी चित्त चगें, कहे सोवनश्री दियो दीक्ष रगें ॥ दतो जावचारित्र वन्यास पूरो, हवे साधशे योग करि चित्त शूरो ॥ ७ ॥ ग्रही थागना श्री हरि शौरि पासें, वरे उत्सवें साधुधर्म उल्लासें ॥ नमी नाथने तेह निज गेह याव्या, जिनध्यानथी पूर्ण थानद पाव्या ॥ए॥ करे एक चित्रे तपस्या थ माया, शुनध्यानथी कर्मघाती खपाया ॥ चढी श्रेणिमा केवलज्ञान पाया, नमुं सागुणी सोवनश्री सुहाया ॥१॥ लहे मोदनां सौख्य लीला थनंती, वर दायिक ज्ञान नावें लसती ॥ चिदानद चित्ते धरो ध्येय जापी, कहे राम नित्ये जपो जैनवाणी ॥ ११ ॥ इति श्रीनीनस्तुतिसदनित कनकश्री स्तुति ॥ पूर्वदोहा ॥ वल अपराजितने घरे, विरता नामें नारि ॥ गुणवती गुण थागती, गुणमणिनो नमार ॥ ७ ॥ सुमति श्स्ये नामें दुश्, तेहने पुत्री एक ॥ नामें परिणामें समी, नाणे सयल विवेक ॥७॥ सजुरुनी सग ति लहे, तत्त्वाऽतत्त्व विचार ॥ तप करवे शूरी घणु, बालपणाथी सार ॥ ए॥ जैनपथ जाणे जला, सूधी समकितवत ॥ नूपण पंच समाचरे, टाले दूपण तंत ॥ १० ॥ थावश्यक विदु टकना, साचवती शुन चित्त । सामायिक सूधा धरे, जाणे सद्गु जग मित्त ॥ ११ ॥ दूपण टाले तेहनां, वोल्यां जे वत्रीशकामिनी चिते घरतणां, न धरे मनमा रीश ॥१॥ एक दिन चोथनें पारणे, थाव्यो मुनि तस गेह ॥ कतीने कजी थर, थाणी धर्म सनेह ॥ १३ ॥ ॥ ढाल त्रीशमी॥ ॥ देशी चादलीयानी॥ण आंगणीये पाठ धारो, साधूनी मुजसाधारो, नवजलनिधि पार उतारो रे ॥ मुनिवरजी ॥१॥ नरि थाल टपाडीने लावी, मामघो पडघो समनावी, कदे नावें जीनी थावी रे ॥ मु० ॥२॥ मुफ पतितने पावन कीजें, प्रतुजी थाहार ए लीजें, तुम दी दिलाई रीफे रे ॥ मु० ॥ ३ ॥ थाज नाग्यवशा मुफ जागी, तुज दर्शननी था राग। करो पावन वड वैरागी रे ॥ मु० ॥ ४ ॥ दीये छलट नावें दान, करती तपसी गुणगान, दियडे धरे दर्प असमान रे ॥ मु० ॥ ५ ॥ तस दान प्रनावें थाव्या, पंच दिष्य करे सुर नाव्या, श्रदो महोटा मुनि पडिलाच्या २४० जैनकथा रत्नकोप नाग थाम्मो. से दीक्षा हे करजो शुधि काय के ॥ न० ॥ १॥ तेह तमोक्ताने घेदु बधव हे कनकश्री साथ के ॥ घेसी विमाने वालीया, अमना थाव्या नरनाथ के ॥ ना० ॥ २० ॥ लाख बहतालीश गमनसा- वली हे रथ तुरग वखाण के ॥ सोल सहस्र सेवे नना, अतुली हे महोटा राजान के ॥ न॥२१॥ये वाधव धरानोगवे,असुलीबल देगा देव के ॥ वत्रिश सहस्र थतेतरी, हरिने घर हे सुर सारे सेवके। ॥ २२ ॥ हवे कनकसिरीनो सुणो, गुनना है दीक्षा अधिकार है। त्रीजे गणत्रीशमी, ढाल नाखी हेरामविनय उदार के ना२३०३॥ ॥ दोहा॥ ॥ एहवे आवी समोसखा, श्रीस्वयंप्रन जिनराज ॥चविहरे परपला, साथै घढ मुनिराज ॥ १ ॥ पावन करता पाउले, गुण अनत अरिहंत । समवसरण देवें रच्यु, जाममल फलकत ॥ २॥ वेगें दीपि वपामली, वनपालक तेणि वार ॥ लाधो साढावार लाख, सोवणनो अपार ॥३॥ वे बधव वदण चल्या, कनकसिरी सुरंग ॥ सेना त चतुरगिणी, भाषा श्रीजिनसग ॥ ४ ॥ समवसरण दीठ तिहा, वाध्या मनना कोर ॥ बहु वधव श्रावी करी, वदे बिदु कर जोडि ॥ ५॥ जिन देखीने उलस्या, बिम कोकिल मकरद ॥ करे स्तवन जिनराजनु, मनमा धरे थानद ॥ ५ ॥अब श्रीजिनस्तुति ॥जुजगीद॥ जगन्नाथने ते नमे हाथ जोडी,करे वीनति जति शुमान मोही ॥ कृपानाथ ससारकूपार तारु, लघु पुण्यथी श्राज बीमा र तदारु ॥ १ ॥ सोहिलो मिले राजदेवादि नोगो, परं दोहिलो एक तुज भक्तियोगो ॥ घणा कालथी तु लह्यो स्वामी मीठो, प्रनो पारगामी सडू ख नीगे ॥२॥ चिदानदरूपी परब्रह्मलीला, विलासी विनो त्यक्तकामानि कीला ॥ गुणाधार योगीश नेता श्रमायी, जय त्व विनो नूतले सोम दायी ॥ ३ ॥ न वीठी जेणें तादरी योगमुश, पख्या रात दिवसें म. मोद निश ॥ किसी तास दोशे गति छानसिघो, जमतां नवें हे जगजीन बंधो ॥ 8 ॥ सुधास्पंदि ते वर्शन नित्य देखे, गणु सेदनो हु विनो जन्म जेखें ॥ त्वदाज्ञावशे जे रह्या विश्वमांहे, करे कर्मनी हानि हण एक मां हे ॥ ५॥ जिनेशाय नित्यं प्रनाते नमस्ते, नवे ध्यान होमो त्वदीयं सम स्ते ॥ स्तवी देवना देवने हर्ष रे, मुखांनोज नाजे ननी हेम करें ॥ - श्री शांतिनाथनो रास खंमंत्रीजो. २४३ अपराजित तस विरहथी, मनमां घणुं विखिन्न ॥ ४ ॥ शोक धरे मनमां घणो, वधवतणे वियोग ॥ गीत गान न गमे किस्यु, न रुचे रमणीनोग ॥ ५॥ नीतिचतुर मत्री घणो, समकाव्यो सुविवेक ॥ मोहपिशाच बले किस्यु, तुम जेहवाने बेक ॥ ६ ॥ वचन सुणी काइक थयो, गतशोको नूपाल ॥ नाम यशोधर गणधरा, श्राव्या तिहां तिण काल ॥ ४ ॥ ॥ ढाल एकत्रीशमी॥ ॥यांगी अवल बनी ते रे ॥ए देशी ॥ गणधर याव्या ठेजी रे, वनमा वदननें जश्य ॥ यशोधर नामें में जीरे, पावन देखीने थक्ष्ये ॥ ए यांकणी ॥ शोल सहस्र राजेश्वर साथे, गणधरनें वांटेवा रे ॥ धाव्यो तीन प्रदक्षिणा देई, प्रणमी सारे सेवा ॥ ग ॥ १ ॥ देशन निमुणे मुनि वर केरी, करसपुटने मेली रे ॥ अपराजित शोचे मनमांहे, गयो मुफ व धव वेली ॥ ग ॥ २ ॥ योगीश्वर कहे श्ट वियोगें,शोक हुवे जगमाहे रे॥ पण परिव्हरवो माझे पुरुचे, जाणी रूप उत्साहें॥ ग ॥ ३ ॥ प्रगट मेल पिशाच परो ए, नामांतर नीपायो रे ॥ तरुणपणो विपयानो विरुत, जग मा एह गवायो ॥ ग० ॥ ४ ॥ श्ष्टवियोगें रोगें नडिया,कीजें श्रौपच साचूं रे ॥ सुश्रुत नारख्यु किरिया रारब्युं, धर्मथौपध ए साचु ॥ग ॥ ५॥ शोक रोग थावे नदि नेडो, जो मन मुझे करीयें रे॥ जिनवर वैद्य तणी थाणा ये, सहेजें शिवमुख वरीयें ॥ ग० ॥ ६ ॥ मुनिवर वाणी मत्र महातम, शोकपिशाच पणास्यो रे ॥ शुन नावन फलें बढुमूलें, निज श्रातमनें वा स्यो ॥ ग० ॥ ॥ घर थावी सुत राज्य नलावी,व्रत लेवा नीसरीयो रे।। नृपममल सघातें महोटो, सयमव्रत थादरियो रे ॥ ग0 ॥ ७ ॥ खती देता पदुगुणवता, उपशम रसना दरिया रे ॥ जयणायें मुनि मारग पाले, चो खी जेहनी किरिया ॥ग ॥ ए॥ सिहपरें लेई व्रत पहेला, सिहपरें ते पाले रे ॥ समिति गुप्ति सूधी सनाले, व्रतमां दूपण टाले ॥ ग ॥ १० ॥ धन्य मुनि जे ए गुण साधे, थातमवीरज वाघे रे ॥ मनमां नो हे कणो दूणो, बन्न पाणी श्रणलाघे ॥ ग ॥ ११ ॥ तप तपीया उस्तर बढ़तेरा, गुण रयणागर गिरुथा रे ॥ उयंसी तेयंसी जससी, विषय कपायथी नि रुथा ॥ ग ॥ १२ ॥श्रणसण थंतें करीने थच्युत, कल्पें सुरना स्वामी रे ॥ थपराजित मुनिवरजी इवा, पुस्– प्रजुता पामी ॥ ग ॥ १३ ॥ . , T २४२ जेनकथा रमकोप नाग पाठमो. रे ॥ मु० ॥ ६ ॥ निग्रंथ पधावा वनमां, दरखी सुमति नी उलट नवि माये तनमां रे ॥ मु० ॥ ॥ वल केशव मिली बिते धन्य कुमरी जात, जरयोवन यावी वात रे ॥मु०॥म- मत्री सुविचारी, मामयो स्वयंवर गुण धारी, श्राव्या मिपति ॥ मु० ॥ ॥ नामांकित थासन उनी, वेसे नरवरनी टोली, पापा- केशर घोली रे ॥ मु०॥ १०॥ कन्या ले वरमाला, सखीसा बार सुकुमारा, घनमा मनु ए जलनाला रे ॥ मु० ॥ ११ ॥ पूरब जब सार जीव, एहवे थावे तिहा देव, पहेला सचित हेर रे ॥ मु० ॥ १५ सांनसता ते थावी, कहे कुमरीने समजावी, जीव ए विपयानो नानी के ॥ मु० ॥ १३ ॥ जोगवीया वार थनत, तृप्तो न थयो ए जत, विपयामिक जोग उरंत रे ॥ मु० ॥ १४ ॥ हु पहेला नवनी सासू, धाराप्यु संगम पासु, पद पाम्पु वैमानिक खासु रे ॥ मु०॥ १५ ॥ कुमरी निसुणीने साचू, ए सुख सासारिक काचु, हवे तु एदथी नवि राचु रे ॥ मु। १६ ॥ कदे नूपने थाणा थालो, सयम लेता मत वालो, हवे मूकी माक ममालो रे ॥ मु० ॥ १७ ॥ वलन मुरारि विचारी, कहे तनया तुण मति सारी, धन धन तु वालकुमारी रे ॥मु०॥१॥ श्रनुमति थापी निज तातें, पंचशत कुमरी सघातें, ग्रा सयम सुव्रता दाथे रे ॥ मु०॥ १९ ॥ तप तपती ते श्रति सारां, वाधी निर्मल ध्याननी धारा, कीधा तेणें कम विहारा रे ॥ मु० ॥ २० ॥ करी पाती कर्म क्ष्य पामी, केवललीला सुल कामी,अनुक्रमें दुइ शिवगतिगामी रे ॥मु॥१॥ खमत्रीजे त्रीशमी डाल, गुणगाया सतीना रसाल, रामविजय कही उजमाल रे ॥१॥२॥७३॥ ॥ दोहा ॥ ॥ हवे मुरारि झवि जोगवे, खंग विहूनी सार ॥ रणरसमा पापी घां, चिक्कण कर्म अपार ॥ १ ॥ यकमागमे ॥ चत्तारि सूरा पनना जहा, खतिसूरा तवसूरा जुबसूरा दाणसूरा खंतिसूरा अरिहंता जगवता तवसूरायणगारानुषसुरा वासुदेवावाणसूरा वेसमणा॥इति पूर्व वोहा।।प्रीति घणीबेतु बधुने, रमतां रंगे काल ॥घणो गयोजास्यो नहि,मोहवडोअंजाल। २॥ चोराशी सच पूर्वनें, पाली प्रण थाय ॥ ते हरि चषियो अवतो, पदेली नरकें जाय ॥३॥ सहस पहेंतालीश वर्षनु, मध्यम बासु ठप्पन , श्री शांतिनायनो रास खंमंत्रीजो. २४३ अपराजित तस विरहथी, मनमां घणुं विखिन्न ॥ ४ ॥ शोक धरे मनमां घणो, वधवतणे वियोग ॥ गीत गान न गमे किस्यु, न रुचे रमणीनोग ।। ५॥ नीतिचतुर मत्री घणो, समकाव्यो सुविवेक ॥ मोहपिशाच बले किस्यु, तुम जेहवाने वेक ॥ ६ ॥ वचन सुणी कांक थयो, गतशोको नपाल ॥ नाम यशोधर गणधरा, थाव्या तिहां तिण काल ॥ ७ ॥ ॥ ढाल एकत्रीशमी॥ ॥ यांगी अवल वनीले रे ॥ ए देशी ॥ गणधर थाव्या वे जीरे, वनमा वदनने जयें ॥ यशोधर नामें के जीरे, पावन देखीने थइये ॥ ए यांकणी ॥ शोल सहस्र राजेश्वर साथे, गणधरनें वांदेवा रे ॥ थाव्यो तीन प्रदक्षिणा देई, प्रणमी सारे सेवा ॥ ग ॥ १ ॥ देशन निसुरो मुनि वर केरी, करसपुटने मेली रे ॥ अपराजित शोचे मनमांहे, गयो मुफ व धव वेली ॥ ग ॥ २ ॥ योगीश्वर कहे श्ट वियोगें,शोक दुवे जगमाहे रे॥ पण परिहरवो माह्ये पुरु, जाणी रूप उत्साहें॥ ग ॥ ३ ॥ प्रगट मेल पिशाच परो ए, नामांतर नीपायो रे ॥ तरुणपणो विपयानो विरुव, जग मां एह गवायो ॥ ग० ॥ ॥ इष्टवियोगें रोगें नडिया,कीजें श्रौपध सा रे ॥ सुश्रुत नारव्यु किरिया राख्युं, धर्मोपध ए सानु ॥ ग०॥ ५ ॥ शोक रोग थावे नहि नेडो, जो मन मुझे करीयें रे॥ जिनवर वैद्य तणी थाणा ये, सहेजे शिवमुख वरीयें ॥ ग० ॥ ६ ॥ मुनिवर वाणी मत्र महातम, शोकपिशाच पणास्यो रे ॥ गुन नावन फूलें वहुमूलें, निज बातमनें वा स्यो ॥ ग ॥ ॥ घर श्रावी सुत राज्य नलावी,व्रत लेवा नीसरीयो रे ।। नृपममल सघातें महोटो, सयमव्रत थादरियो रे ॥ ग॥ ७ ॥ खती देता पहुगुणवता, उपशम रसना दरिया रे ॥ जयणायें मुनि मारग पाले, चो खी जेदनी किरिया ॥ ग ॥ ॥ सिहपरें लेई व्रत पहेला, सिहपरें ते पाले रे ॥ समिति गुप्ति सूधी सनाले, प्रतमां दूपण टाले ॥ ग ॥ १० ॥ धन्य मुनि जे ए गुण साधे, थातमवीरज वाधे रे ॥ मनमा नो हे कणो दूणो, थन्न पाणी थपलाघे ॥ ग ॥ ११ ॥ तप तपीया अस्तर धद्भुतेरा, गुण रयणागर गिरुथा रे ॥ उसी तेयंसी जससी, विषय कपायथी नि रुथा ॥ ग० ॥ १२ ॥ थपसण अतें करीने श्रच्युत, कल्पें सुरना स्वामी रे ॥'थपराजित मुनिवरजी हूवा, पुण्ये प्रछता पामी ॥ ग० ॥ १३ ॥ N , + १४४ जैनकथा रनकोप नाग थाउमो. त्रीजे खमें रामविजय कहे, सुणो एकत्रीशमी दा रे ॥ पत्र शोक तजीनें,धर्मे मनई वाले ॥गण॥१४॥ सर्वगाथा || . ॥ दोहा ॥ ॥ सुणो घेर् पधव तणो, कहु सयोग संबंध ॥ बीजे कोला सुपो तेह प्रवध ॥ १ ॥ जवूछी जरतमा, नगर वैतादय बहार। श्रेणें दीपतु, गगनवनन पुर सार ॥२॥ मेघवाहन विद्याधरो, नारि ॥ दपती दोय सुख जोगवे, दोगुदक अवतार ॥ ३ ॥ ॥ ढाल बत्रीशमी॥ ॥ वे वे मुनिवर विहरण पांगुस्खा जी ॥ ए देशी ॥बनतवीर्यनो की हवे चवी जी, पहेली नरकहूंती ते ताम रे ॥ याव्यो मेघवाहन मेषमा ने जी, वशे उपन्यो मेघनाद नाम रे ॥१॥ अनंतवीर्यनो जीव हवे चीनी ॥ ए थांकणी ॥ पाम्यो यौवन वय रतीयामणु जी, जेहवो रति रमली नो कैत रे ॥ परणाव्यो कुमरी खेचर तणी जी, पाट पितायें पाप्यो संत रे ॥ १० ॥ ३ ॥ सयम लीधो मेघवाहन नृपें जी, पाले मुनिवर पंग चार रे ॥ करे रे क्रिया ते सूधि साधुनी जी, नित्य नित्य जयें तस पनि हार रे ॥ १० ॥ ३ ॥ श्रेणी वेदुनो स्वामी ते दु जी, महोटो पेपर ते नृप मेघनाद रे ॥ देश देशातर सत्य ने दया जी, मनमांहे धरीने बाहार रे ॥ १ ॥ ५ ॥ एक दिन मेरुवने यात्रा गयो जी, पूजे जिनपरिमा । जनाव रे ॥ तेम वली विद्या प्रज्ञप्ति जणी जी, महोटो जेदनो जग प्रता व रे ॥ १० ॥ ५ ॥ एहवे थाष्या सुर सर्वे कल्पना जी, जिनयात्रा नं न वनमाहे रे ॥ दीनो थच्युत ३३ जिन पूजतो जी, बोलायो धरि मन । स्सा रे ॥ १० ॥ ६ ॥ मनमा विस्मय तेदनें कपन्यो जी, केम पोलावे मुफने एह रे॥का मेघनाद तु मुफ्तें न लखे जी,तुम मुफ पूर्व नवनो नेद रे ॥ ५० ॥ ॥ नांखी पूर्व नवनी वारता जी, निसुणी पाम्यो मन वैरा ग्य रे ॥ ६ गया जिन पूजी स्थानकें जी, बेड मनमा वस्पो अनुरान रे ॥थ ॥ ॥ श्राव्यो अपर वली निजमदिरें जी, मन संजारे बंधव वात रे ॥ मुनि थया जश्ने श्रमर मुनि कने जी, सत्तम तेहनां कुल जात रे॥१०॥ ए ॥ नवनवनमा तप तपे श्राकलं जी, रह्या एक रक्सी पतिमा तेद रे ॥ मेरुशिखर परें न चले चालण्यो जी, नहि निजदेह कप श्री शांतिनाथनो रास खंमत्रीजो १४५ र जस नेह रे ॥२०॥ १० ॥ एहवे असुरकुमार निकायनो जी, अश्व यीवना सुतनो जीव रे ॥ अमर थावीने पूरववैरथी जी, करे उपसर्ग मुनिने यतीव रे ॥थ ॥ ११ ॥ ए ए धीरपणुं मुनिवरतणु जी, न चव्या ध्यानथकी तिलमात्र रे ॥ प्रगटे पुण्य जो पूरव नवतणां जी, तो मले एहवा मुनिनी यात्र रे ॥ ५० ॥ १२ ॥ थये रे प्रनातें प्रतिमा पारि में जी, विचस्या जगतीतल अणगार रे॥ चरण थाराधी साधी ध्याननें जी, आंतें थणसण कीध उन्नास रे ॥ १०॥ १३ ॥ पहोता ते पण थच्युत कल्पमा जी, सुर सामानिक इइ समान रे ॥ विलसे वेहु वधव ते सुख घणां जी, जगमां जोजो पुण्यप्रधान रे ॥ य० ॥ १४ ॥ सुखनर वावीश सागर थाउखु जी, वावीश सहस वरस एकवार रे ॥ ले थानोग निव र्तित ते जलो जी, गुनचितित पुजल थाहार रे ॥ १० ॥ १५ ॥ वदु सुख पाम्या जव एम सातमे जी, मुणतां थातम निर्मल थाय रे॥ए खम त्रीजे ढाल वत्रीशमी जी, रामविजय जिनना गुण गाय रे ॥॥ १६ ॥ ॥ कलश ॥ ॥ तो वो रे मुज साहिव जगमां तो ॥ ए देशी ॥ गावो गावो रे जि नराज तणा गुण गावो॥शाति प्रनु पूरव नव मुणतां, घर घर होवे वधावो रे॥ जि ॥ १ ॥ जिनगुणनी स्तुति मगल नणता, कीर्चिस्थान रोपावो ॥ गु करे दोपी उशमन तेहनें, जस शिर ए प्रनु चावो रे ॥ नि० ॥ ५ ॥ व्य नाव वेहु नेदनी नक्ति, होवे सुजस जमावो ॥ श्रच्युत शिवलीला सुख एहथी, पद उल्लप्टें पावो रे ॥ जि० ॥ ३ ॥ हृदयमाहे प्रचपदने ध्या वो, प्रनुपर्ने हृदय लगावो ॥ जिहां लगें मुक्ति नहिं त्यां लगें ए, मादरे प्रनुशं दावो रे ॥ नि० ॥ ४ ॥ कामित पूरण सकट चूरण,प्रगुण ध्यान सुहावो ॥ एह थतींश्यि सुखनु कारण, यहोनिश दिलमा नावो रे ॥ ॥ जि० ॥ ५ ॥ चिरसचित थप टालणहारी, जैनकथामाहे मावो ॥ एद रसायण पामी प्रमा, का नवहारी जावो रे ॥ जि० ॥ ६ ॥ शांतिप्रनु गुणनास सुणता, मगलमाल उपावो ॥ त्रीजो खम थयो सपूरण, जगी ढोल वनावो रे ॥ जि ॥ ॥ बहे नवें थपराजित स्वामी, सातमे श्य जणाव्यो ॥ व्यनिक्षेप श्रध्यातम नावें, नएता नाव जगावो रे ॥ जि० ॥ ॥ राजनगरमाहे पास चितामणि, प्रतुल तान मिलावो । दुर , १९ - १४४ जैनकथा रनकोप नाग आठमो. श्रीजे खमें रामविजय कहे, सुणो एकत्रीशमी दा रे ॥ पाप प्राची शोक तजीने,धर्मे मनहुं वाले ग॥१॥ सर्वगाथा ॥ ॥ दोहा ।। ॥ सुणो घेर् धंधव तो, कहु सयोग सबध ॥ बीजे जो मेला सुणो तेह प्रबंध ॥ १ ॥ जधी जरतमा, नगर वेताहर बार। श्रेणें दीपतु, गगनवन्नन पुर सार ॥२॥ मेघवाहन विद्याधरो, नारि ।। दंपती दोय सुख नोगवे, दोगुदक अवतार ॥३॥ ॥ ढाल बत्रीशमी ।। ॥ वे वे मुनिवर विदरण पांगुखा जी ॥ ए देशी ॥ श्रनंतवीर्यनो की हवे चवी जी, पहेली नरकहूंती ते ताम रे ॥ श्राव्यो मेघवाहन मेषमात्र ने जी, वशे उपन्यो मेघनाद नाम रे ॥१॥ अनतवीर्यनो जीव हवे चीनी ॥ ए थांकणी ॥ पाम्यो यौवन वय रलीयामणु जी, जेदवो रति रमली नो कंत रे । परणाव्यो कुमरी खेचर तणी जी, पाट पितायें थाप्यो तर रे ॥ १० ॥ ५ ॥ सयम लीधो मेघवाहन नृपें जी, पाले मुनिवर पंचा चार रे ॥ करे रे क्रिया ते सूधि साधुनी नी, नित्य नित्य जयें तस पनि हार रे ॥ था ॥ ३ ॥ श्रेणी वेदुनो स्वामी ते दुनी, महोटो सेपर ते नृप मेघनाद रे ॥ देश देशांतर सत्य ने दया जी, मनमाहे धरीने आहार रे । थ॥ ॥ ४ ॥ एक दिन मेरुवनें यात्रा गयो जी, पूजे जिनपरिमा । ननाव रे ॥ तेम वली विद्या प्राप्ति नपी जी, मदोटो जेहनो जग प्रन व रे । अ० ॥ ५ ॥ एदवे थाष्या सुर सर्वे कल्पना जी, जिनयात्रा ना न वनमाहे रे ॥ दीवो अच्युत ३३ जिन पूजतो जी, बोलायो धरि मन । स्सा३ रे । अ० ॥ ६ ॥ मनमां विस्मय तेदनें कपन्यो जी, केम बोलाये मुझने एद रे॥ कां मेघनाद तुं मुफनें नलखे नी,तुफ मुफ पूर्व नवनो मेह रे ॥ ॥ ७ ॥ नाखी पूर्व नवनी वारता जी, निमुणी पाम्पो मन वेरा म्य रे ॥ ३६ गया जिन पूजी स्थानकें जी, बेडु मनां वस्यो अनुराग रे ॥४०॥ ७ ॥ श्राव्यो अपर वली निजमंदिरें जी, मन सनारे बंधष वात रे ।। मुनि थया जश्ने अमर मुनि कने जी, उत्सम तेदनां कुल आत रे ॥ १० ॥ ए ॥ नवनवनमा तप तपे थाकलं जी, रह्या एक पक्षी पहिमा तेह रे ॥ मेरुशिखर परें न चले थालयो नी, नहिं निजदेह कप , , श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो. २४७ नवि सुणो नव जिन शांतिनो जी ॥ ए थांकणी॥ जिम दुवे तीलविलास ॥ दुरित दरें टले नवतणां जी, संपजे वानित धाश ॥ न ॥ २ ॥ तीर्थ कर थादि नर रयणनो जी, जिहांकणे सचय सार ॥ सूत्र विख्यात नयरी कही जी, रयणसचय गुणधार ॥ ज० ॥ ३ ॥ चोरनु जोर तिल नर नहीं जी, वलि नहि विटतो वास ॥ नयरीयें न्याय वरते घणो जी, धन कण इदि निवास ॥ ज० ॥ ॥ वारे पुर्नीतिने जे सदा जी, सकल प्रजा करे हम ॥ नूप देमकर जिनतणी जी, आण माने सहु प्रेम ॥ नम् ॥ ५॥ म सुई उही त्रण झानना जी, धारक त्रिदु जगमित्त ॥ पण निजकर्मने काढवा जी, रहे गृहवास गुनचित्त ॥ न० ॥ ६ ॥ तास घरे शीलगुण शोनती जी, उपती पुण्यनी राशि ॥ रत्नमाला रलियामणी जी, कामिनी गुण थावास ॥ना॥ जीव अपराजितनो चवी जी, उपन्यो ते हनी कूख ॥ सुपन तेणे चौट दीठा नला जी, तेहिज रातें गत ख ॥ न ॥ ७ ॥ प्रहसमे पियुकनें आवीने जी, नाखियु सयल विरतंत ॥ पुत्र होगे सही ताहरे जी, दीपतो वहु गुणवत ॥नाए॥ कत देमकर मुखयकी जी, सानली थई सुप्रसन्न ॥ सकल होजो पियु तुम कत्यु जी, विकसीयां नयण तन मन्न ॥ न० ॥ १० ॥ गर्न वाघे हवे अनुक्रमें जी, पूरण मासें सुत सार ॥ जन्मीयो दीधी वधामणी जी, दासीय हर्प थपार ॥ न ॥ ११ ॥ थापीयु धन बहु तेहने जी, सात पेढी लगें जेह ॥ खरचतां के मे खूटे नहि जी, राखियो थविदह नेह ॥ न ॥ १५ ॥ जन्म उत्सव करे थति नलो जी, पन्नरमु वजथायुध ॥ स्वप्न दीतु मायें तेणें धस्य जी, नाम "वजापुध” गुड़ ॥ ॥ १३ ॥ शुक्ल पक्ष वीजनो चश्मा जी, दिनप्रत्ये जेम वाधत ॥ सकल जनना मन मोहतो नी, थनिनव मानु रतिकत ॥ ज० ॥ १४ ॥ रंगे रमाडे उत्सगमा जी, मायने मन घणी श्राश ॥ सुतमुख देखी मन हरखती जी, वोलती एणि परें नास्त ।। ज० ॥ १५ ॥ मुत चिरंजीव रहो मादरा जी, ताहरा उशमन दूर ॥ दिन दिन कल्पतरु परें फलो जी, थम मनोवानित पूर ॥ न ॥ १६ ॥ थनु पम श्रगें लक्षण धरे जी, थडहिय सहस उदार ॥ वय थयो वरस ए थानो जी, शीखीयो शास्त्र विचार ॥ ज० ॥ १७ ॥ जाए वहोंत्तेर कला नो थयो जी, सवि लहे जीवना नेद ॥ गुरू नयरी ते व्यवहारनी जी, ,

२४६
जैनकया रनकोप नाग श्राठमो.
तस सान्निध्य त्रीजे खमें, पूरण कलश चढागे रे ॥ जिला
तर पचाशिया वप, कीधो ढालनायो । शाति जिनेश्वररातमें
परिगल वित्त ए पायो रे ॥ जि० ॥ १०॥ श्रीगुरु सुमतिविजयी
निध्य, चितित सघलां गयो । रामविजय कहे शान्ति प्रजी, मुख
दिर थावो रे ॥ जि० ॥ ११ ॥ सर्वगाथा ॥ ३५ ॥ श्लोक तपा
मली ॥ १५ ॥ सर्वढाल ॥ ३२ ॥ खम त्रय गाथा ॥ २०एए ॥ संक
प्रास्ताविक श्लोक तथा गाथा ॥ १६ ॥ खम त्रय ढाल ॥ ५ ॥ति
शांतिनिनप्रवधेपास्तवधेछादशनवनिवघेसत्यार्थसघे रुतसुकतानुसपेमा
रदत्तमित्रानदचरित्रानुविरुपाठसप्तमनववर्णननामा तृतीय खंम समास
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॥अथ चतुर्थखंमस्य प्रारंनोऽयम्॥
॥ दोहा ।।
॥ चउविद चमुह जिन कह्यो, दान शील तप नाव ॥ धर्म ए चार
प्रकारनो, प्रणमु नवजल नाव ॥ १ ॥ ज्ञान थनय थन्न औप, पिई
नेदें दोय दान ॥ ज्ञानवत निर्नय दुवे, सुखी नीरोगी निदान ॥ २ ॥प्रष
म दान प्रजुये कयुं,अर्थ लह्यानु सार ॥ ते जो पात्रे दीजीयें, तो दुवे जव
निस्तार ।। ३ ।। तत्त्व विचार ए बुदिफल, फल व्रतधारण देह ॥ पात्रदान
ए अर्थफल, वचन प्रीतिकर जेद ॥ ४ ॥ शील कुलकम थात्मगत,
त्रि
विध दोय जगमांहि ॥ वेगुथी यश मुख सपजे, त्रीजो मोक्ष उपाय ॥५॥
सात्त्विक राजस तामसी, तप विट्ठ नेदें होय ॥ दोय नेद किचित् हो,
सात्त्विकमा गुण जोय ॥ ६ ॥ नाव तणा बढ़ नेद , शुन अशुन वि
स्तार ॥ सुन श्रादरवा जिन कह्या,श्रगुन तणो परिहार ॥ ॥ चिटुं ने
शुभ धर्मनें, हूँ नित्य करू प्रणाम ॥ खम कहूँ चोथो दवे, सुणो मन
राखी ठाम ॥ ७ ॥ देवलोक सुख नोगवे, श्री अपराजित इव ॥ दवे जिहाँ
श्रावी अवतरे, ते निमुणो नविश्व ॥ ५ ॥
॥ ढाल पहेली॥
॥ राणी पूछे रायने ॥ ए देशी ॥ पूर्व विदेहें जवृतणो जी, सती नवीनी रे
पास ॥ मध्य विजय मगलावती जी, जिहां बहु सुगुणिनिवास ॥ १ ॥

श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो. १४७ नवि सुणो नव जिन शांतिनो जी ॥ ए बांकणी॥ जिम दुवे लीलविलास ॥ उरित दूरें टले नवतणा जी, सपजे वांनित धाश ॥ ज० ॥ ॥ तीर्थ कर थादि नर रयणनो जी, जिहांकणे सचय सार ॥ सूत्रविख्यात नयरी कही जी, रयणसचय गुणधार ॥ ज० ॥३॥ चोरनु जोर तिल जर नहीं जी, वलि नहि विटतणो वास ॥ नयरीये न्याय वरते घणो जी, धन कण कदि निवास ॥ ॥४॥ वारे पुर्नीतिने जे सदा जी, सकल प्रजा करे केम ॥ नूप हेमकर जिनतणी जी, याण माने सद् प्रेम ॥ न० ॥ ५॥ म सुई उही त्रण ज्ञानना जी, धारक त्रिहु जगमित्त ॥ पण निजकर्मनें काढवा जी, रहे गृहवास गुनचित्त ॥ ज० ॥ ६ ॥ तास घरे शीलगुण शोनती जी, नपती पुण्यनी राशि ॥ रत्नमाला रलियामणी जी, कामिनी गुण श्रावास ॥ना जीव अपराजितनो चवी जी, उपन्यो ते हनी कूरख ॥ सुपन तेणे चौद दीठा जला जी, तेहिज रातें गत ख ॥ज ॥ ७ ॥ प्रहसमे पियुकनें श्रावीने जी, नाखियु सयल विरतंत ॥ पुत्र होशे सही तारे जी, दीपतो धदु गुणवत ॥नाए॥ कत देमकर मुखथकी जी, सानली थई सुप्रसन्न ॥ सकल होजो पियु तुम का जी, विकसीयां नयण तन मन ॥ ज० ॥ १० ॥ गर्न वाधे हवे अनुक्रमें जी, पूरण मासे सुत सार ॥ जन्मीयो दीधी वधामणी जी, दासीये हर्प थपार ॥ ज० ॥ ११ ॥ थापीयु धन वगु तेहने जी, सात पेढी लगें जेह ॥ खरचता के मे खूटे नदि जी, राखियो अविदड नेह ॥ न ॥ १२ ॥ जन्म उत्सव करे थति नलो जी, पन्नरमु वज थायुध ॥ स्वप्न दातु मायें तेणें धस्खु जी, वजायुध ६ ॥ न० ॥ १३ ॥ शुक्ल पक्ष वीजनो चश्मा जी, दिनप्रत्ये जेम वाधत ॥ सकल जनना मन मोहतो जी, थनिनव मानु रतिकत ।। न० ॥१४॥ रंगें रमाडे उत्सगमां जी, मायने मन घणी थाश ॥ मुतमुख देखी मन हरखती जी, वोलती एणि परें नास ॥ नम् ॥ १५ ॥ सुत चिरजीव रहो मादरा जी, ताहरा उशमन दूर ॥ दिन दिन कल्पतरु परें फलो जी, थम मनोवाहित पूर ॥ न० ॥ १६ ॥ यनु पम श्रगें लक्षण धरे जी, अडहिय सहस उदार ॥ वय थयो वरस ए श्रानो जी, शीखीयो शास्त्र विचार ॥ ज० ॥ १७॥ जाण वदोंत्तेर कला नो थयो जी, सवि लहे जीवना जेद ॥ शुरू नयरी ते व्यवहारनी जी, नाम २४७ जैनकयारत्नकोप नाग पाठमो. दील वस्यो श्रीजिनवेद ॥ नम्॥ १७ ॥ सात नय सप्तमी झायक जाण निजरूप ॥ नपि नमे एक श्रीजिनवर विना मी, शुम स्वरूप ॥ न० ॥ १५ ॥ श्रनुक्रमें योवन वय लयां जी, नाम वती एक ॥ उत्सव करी परणारियां जी, जोगवे सुख अतिरेक है २० ॥ जीव थनतवीरज तो जी, सुरतनु नोगवी श्राय ॥ सागरें अवतखो जी, कूख लक्ष्मीवती थाय ॥ न० ॥ २१ ॥ जन्मीयो र कुलकेसरी जी, नाम "सहस्रायुध” दीध ॥ पूरव नवतणो नेहलो एह संवध प्रसि-६॥न॥२२॥ ढाल पहेली कही ए सही जी, खम सार ॥थामे नवें चक्रधर दुवा जी, वरत्यो जयजयकार ॥न ॥१३॥ ॥ दोहा॥ ॥ वालपणुं वीत्या पठी, थाव्यु योवन पूर ॥ तरुणी मन मृगपास ते, दिन दिन चढते दर ॥ १ ॥ परणाव्यो प्रीत करी, कनकसिरी मुकुमाल । कुमर सहस्रायुध सदा, विलसे लोग रसाल ॥ २॥ क्षेमकर नृप श्रम्पदा, पुत्र पौत्र परिवार ॥ सिहासन वेगे करे, वदीजन जयकार ॥२॥ बत्र पर्नु शिर कपरें, वेद पद चमर ढलत ॥ युगल मनु कलहसनु, मुख अरधिष मिलत ॥ ४ ॥ वासी कल्प ईशाननो, थमृताशन चित्रचूल ॥ थायो मि थ्यात्वी तिहा, तिण अवसर प्रतिकूल ॥ ५ ॥ नहिं देव गुरु धर्म नहिं, नहीं पाप पर लोक ॥ ए वालक वीदामणा, वीदिना सघला लोक ॥६॥ मत थापे नास्तिक तणो, नहिं श्रास्तिक लगार ॥ पंचनूतथी कपन्यो, चेतनगुण सुविचार ॥ ७ ॥ वज्जायुध वलतो कहे, नहि युक्त ए वात । श्रनुमानें जोतां थका, वली जोता साक्षात ॥ ७ ॥ ॥ ढाल बीजी॥ ॥ कपूर हुवे थति कजलो रे ॥ ए देशी ॥ वज्रायुध वलतु कहे रे, सुण सुर मोरी वाण ॥ ए नास्तिकत्ता नवि घटे रे, युक्ति रहित मन जाण रे ॥ १ ॥ प्राणी धरिये समकित शुद्ध ॥ सत्ता नवि टाली टले रे, जोग विचारी बुद्धि रे ॥प्रा॥०॥ए थाकणी॥थई सुखी थई 5 वी रे, कुस 'जाणे विण जीव ॥ त्रिलु कालें अविजिन्न ने रे, धारा ज्ञान सदैव रे ॥ प्रा०॥२॥ नोक्ता ए नाग्यनो रे, उनने दृष्टात ॥चेतन गुण असा । नहिं रे, चेतन जीव कहत रे ॥ प्रा०॥३॥थमि ज्यु वरणीकाष्ठमा रे, .

श्री शांतिनाथनो रास खंझ चोथो १४॥ फुलमांहे जेम गंध ॥ जेम पयमां घृत तिम मल्यो रे, जीव पुजल सवध रे ॥ प्रा० ॥ ४ ॥ प्रत्यक्ष श्हा कने ताहरो रे, तु दृष्टांत विचार ॥ जो पुण्य न करत पाठले रे, तो किहांथी सुर अवतार रे ॥ प्रा० ॥ ५ ॥ मनुज थयो तु पूरवें रे,या नव ययो सुररूप ॥ जीव विना ए घटे नहि रे, मान तु जीव स्वरूप रे ॥ प्रा० ॥ ६ ॥ भ्रम नांग्यो निज चित्तनो रे, प्रतिवग्यो ते देव ॥ सत्ता मानी जीवनी रे, कहे सुर करतो सेव रे ॥ प्राण ॥ ७ ॥ साधु तुमें राख्यो मुनें रे, नवजल पडतां धाज ॥ ठे थव लवन उइयो रे, सायु प्रातमकाज रे ॥प्राण॥ ॥ देवें समकित थादयु रे, वजायुधनी पास ॥ कहे स्वामी प्रिय गु करु रे, कहो कृत्य उचित विमास रे॥प्रा०॥ ए ॥ नि स्टह जाणीने तेहने रे, दे थानरण थमूल ॥ सुर प्रणमी पागे गयो रे, ईशाने अनुकूल रे ॥ प्रा० ॥ १० ॥ ईशानेश्नी पागलें रे, सुर मामी कहे वात ॥ सुरपति गुण राज्यो कहे रे, सुण एद नो अवदात रे॥ प्राण ॥ ११ ॥ कोडी जिह्वा जो मुख दुवे रे, नव नव गुण वली गाय ॥ थम जेवाना थानखा रे, केई पूरा थाय रे ॥ प्रा० ॥ १२ ॥ ए प्रनु शहाथी पाचमे रे, नवें शोलम जिनराज ॥ शांति जिनेश्वर नामथी रे, गुण गाशे सुरराज रे ॥ प्रा० ॥ १३ ॥ एम गुण गाता तेहना रे, समकित निर्मल कीध ॥ ईशानेबें पूजीया रे,व्यजिन जाणि प्रसिह रे ॥ प्रा० ॥ १४ ॥ सुखकर कामी पुरुपने रे, एहवे मास वसत ॥ कोकिल कल कूजित करे रे, थाय्यो हेजें हसत रे ॥ प्रा॥ १५ ॥ फल फूले ना घणु रे, मोरी सवल वनराइ ॥ गुजे चमर ए कामनी रे, फेरे मानु उहाइ रे ॥ प्रा० ॥ १६ ॥ जोगी पुरुप वनमा घणा रे, जोवे नव नवा रख्याल ॥ श्रवील गुलाल उमाडता रे, गुणियल गाय धमाल रे ॥ प्राण ॥ १४ ॥ एदवे थावी सुदर्शना रे, दासी लेई फूल ॥ नेट करी एम विनवे रे, साहिव सुण तुं अमूल रे ॥प्रा०॥ १७ ॥ प्रीतिमती लक्ष्मीवती रे, रा एणी तुमारी साथ ॥ वाले लील वसतनी रे, उपवन सूरिनिपात रे ॥ प्रा० ॥ १५ ॥ सप्तशती राणी तणी रे, तेहमांहे शिरवार ॥ लक्ष्मीवती राणी तणो रे, पियुन प्रेम अपार रे ॥ प्रा० ॥ २० ॥ चोथे खमें सोदा मणी रे, वोली बीजी ढाल ॥ रामविजय कहे सानलो रे, श्रागल वात रसाल रे ॥ प्रा० ॥ १ ॥ सर्व गाथा ॥ ६१ ॥ , रे 11 २५० जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. ॥ दोहा ॥ ॥ श्रीवजायुध कुवरजी, लालील नार ॥ यतेटर ले। संचलो, वा वनह मकार ॥१॥ ॥ ढालत्रीजी॥ ॥ फागनी देशी ॥ श्रीवजायुध कुमर सुदर रूप तरुण रसाल, हो वनमाहे रमवा मनमोहन उजमाल ॥ साथै सोहागण सारी तन सुकुमाल, मोहनगारी कामिनी चालती गजगति चाल ॥१॥ थो नकवेसर केसर वरणी रे थग, चश्मुखी मृगलोयणी परेरण बीर सुरग॥प्रीतम साथै पनोती पहोती वनहमकार, रंगें रमे मधुमासनी की। थनेक प्रकार ॥२॥ पिककठी कठीरव कटितट लक कुलीन, मोह जीवार ण हारी नारी रमण थाधीन ॥ जा जूई वर चपक मोघर लाल गुलाल, दंपतीना दिल मेलवे मन्मथ माहे दयाल ॥३॥ वाजे चग मृदग धनन तणो रस जोर, रंग रमाडे इसाडे वजाडे ए मोहनो तोर ॥ अलवेसर नरि केसर सगीयें बांटे रे नीर, केलि करे मन मेली रे वाय मुगध समीर ॥ ॥ सूरिनिपात उद्यानमा लील करे वह लोक, फुलि रही वनराई यव कदव अशोक ॥ कोकिल पचमनाद विनोद सुणी ने रे साद, कामी जन मन मोहे रे वाघे विपय उन्माद ॥ ५ ॥ वर तरुणी सघातें रे वजा युध नृपनद, वावमाहे जलक्रीडा रे करवा मन शानद ॥ रस व्यापी जन वापी रे मादे करे जलकेलि, लकाने सतापी हो नाती परी मन मेनि ॥ ६ ॥ एकण पासें दो कतजी बीजे पासें दो नारी, राग निरंतरह दयां बांटे अन्यो अन्य वार ॥ रखे सूकान जाये रे मांहे ए कामना राग, रंगें रसें एम रमतां दो पाम्यां ते जलनो ताग ॥ ४ ॥ण अवसरें दमितारिनो जीव जमी नवमांदे, कोश्क कर्मने योगें दो देव थयो जग माहे ॥ विद्युद्दष्ट्र ए बलीयो रे जलक्रीडापर देख, पूर्ववेरे वजायुध ऊपर श्राव्यो शेष ॥ ७ ॥ मूके ए पर्वत पडतो रे वाव सपर एकत, अध अदि पाशें बांधीयो करवाने तेदनो अत ॥ जोजो रे नवि एम वैर वधाडे करे रे जंजाल, वैर वैश्वानर व्याधि वघे जगमा ततकाल ॥ ए॥ वजायुष चक्रीतणे महा बलीयो दृढकाय, दोय सहस्त्र यक्षसेवित सबलो पुख्य स खाय ॥ अहिबंधन सवि प्रोडियां नारखीयो पर्वत दूर, राणीगणे परवरियो , श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो रएर रे नीसरीयो सुखपूर ॥ १० ॥ अक्षत थग कुमार चिर विचयो वनमादे, फुल से तव पूजे हो नामिनी कतनी वाहे ॥ इण थवसर उरनाथ वि देह नमी जिननाथ, नदीश्वर वर चाट्यो हो ठेवदेवी वगुसाथ ॥ ११ ॥ पास वेदी नग नेदी रे सप्रिय निसस्यो जाण, जो वल तेहनु मनमांहे दुन हेरान ॥ ज्ञान तणे उपयोगे रे नावी हो जाणी निनद, ६ नमे कर जोडी हो धरतो अधिक थानद ॥१२॥ धन्य तुमें सुकुमार स्वअगें महागु गधार, सोलसमा जिनशातिजी थाशो दो जरतमजार ।। पावन दुदु देखी हो लोचन विकस्यां रे आज, जाल नमु कर जोडी हो तुमने व्यजिन राज ॥ १३ ॥ एम स्तवी सुर लोकनो नाथ गयो निज ठाम, श्रीवजायुध कुवर श्राविया थापणे धाम ॥ वात मुणी सवि नयरी वरत्यो जयजय कार, धवल मगल गाय गोरडी वोले ए मगल चार ॥ १४ ॥ हर्प वधाम णा अति घणां थावे ए सोवन कोडी, स्वामी श्रमारा ए जीवजो, वरसनी कोडा कोडी ॥ राजलीला सुख नोगवे नामिनीशु नर्त्तार, हवे हमकर जि नतो मुणो दीक्षा अधिकार ॥ १५ ॥ चोथे खमें रसीली एत्रीजी ढाल रसाल, उत्तमना गुणगावता वाघे मनोरथमाल॥रामविजय कहे रंग धन्य एनना यवतार,पुत्र पिता दोय जिनवर नामयकी जयकार ॥ १६ ॥७॥ ॥ दोहा॥ ॥देमकर नृप एकदा, वेठा सना मकार ॥ मुखधागल थाये जला, नाटक विविध प्रकार ॥ १ ॥ नवस्वरूप नावे तदा, ए धनादिनो खेल ॥ सो पर साथै ताहरे, ए विजातिनो मेल ॥ ५ ॥ जाप्युं श्रासनकपथी, तव लोका तिक देव ॥ जिनकल्प थावी कहे, वृज बृज जिन देव ॥३॥ तारो त्रि सुवन लोकमें, उपगारी असमान ॥धर्मतीर्थ स्थापी करी,थापो शिवसुख दान ॥ ४॥ दीदा थवसर थापणु, जाणी अवधिज्ञान ॥ वरिस लगें वालेसरु, दिये थवारित दान ॥ ५ ॥ श्राठ लाख एक कोडी, वरदवर एणे घोप ॥ प्रतिदिन दे त्रिवन धणी, सद्ध जगन सतोप ॥ ६ ॥ त्रयों कोहि उपर वली, कोडिथग्याशी जाण ॥ लाख एशी कपर थधिक, वरसें दोधू दान ॥७॥ ॥ ढाल चोथी॥ ॥ कलातणीना गीतनी देशी ॥ राय वज्रायुधने उवि हो लाल, सह "

२५३
जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो.
जगमें हितकार ॥ जिलदजी । सुर नर असुर मया तिहां हो जाता
संयम नार ॥ जि० ॥ १ ॥ क्षेमकर जिन बदीये दो लाल nak
सुख थाय ॥ जि० ॥ दोहग उरित दूरे टसे दो० ॥ दर्शन दोजत
॥ जि० ॥ ३० ॥ २ ॥ सर्व सामायिक उच्चरे हो ॥ सिमने करे
॥ जि० ॥ मन पर्यव तिहा उपन्यु हो॥ जाणे मन परिणाम ॥
के०॥ ३ ॥ विचरे जिन पुहवीतले दो० ॥ उपशम रसना सिधु ॥ थिए
चाले र्या शोधता हो ॥ निरुपम जग जनपंधु ॥जि०॥ 2 ॥an
कर्म क्ये कपन्यु हो ॥ उज्ज्वल केवलरुप ॥ जिम् ॥ लोकालोक प्रय
शतु हो ॥ दायिक नाव स्वरूप ॥ जि ॥ २० ॥ ५ ॥ वीश वनपति
यावीया हो ॥ वत्रीश व्यतर ६ ॥ जि ॥ दश वेमानिक ज्योतिषी
हो० ॥ दोय चोश मली इद ॥ जि० ॥ ३० ॥ ६॥ समवसरण
रच्यु दो॥ रचिया त्रए प्राकार ॥जिा रोप्य कनक मणि रमना होगा
जबके तेज अपार ॥ जि० ॥ ० ॥ ॥ पूर्वघारें पेसीने दो० ॥ सिंहा
सन वेसत ॥ जि० ॥ देमकर थरिहतजी हो ॥ देखी नवि उन्नसंत ।
॥ जि० ॥ ॥ ॥ रयणसचय पुरि परिसरें हो ॥ उत्सव अति में
माण ॥ जि० ॥ थाव्या वज्जायुध वादवा हो० ॥ नमे प्रचरण मुमास
॥ जि ॥ के० ॥ ए॥ देमकर जिन देशना हो० ॥ नय उपनय अत
॥ नविक जीव ॥ कर जोडीने सानले दो० ॥ सवि सुर नर पहुन ।
॥ न० ॥ देण ॥ १० ॥ कल्पतरु सुरघेनुथी हो ॥ अधिक महोदय हेतु
॥ ज० ॥ मूकी निश मोहनी दो० ॥ धर्मभं राखो हेत ॥ ज० ॥ २० ॥
॥ ११ ॥ करीयें परीक्षा एदनी हो ॥ चिट्ठ ने श्रुत शील ॥ न ॥ तप
करुणा शुरू सेवतां दो॥ थापे शिवमुख लील ॥ ज०॥ 2 ॥१२॥
जेम थायुर्वेदें कार्यु हो ॥ करवु पय पान ॥ ज०॥ अविचारे अर्कापिस
हो ॥ पीतां होवे गुणहानि ॥ ज० ॥ क्षे० ॥ १३ ॥ बुध विचारे येपर्नु
हो ॥ वायक पीवे तेद ॥ न० ॥ बलपुष्ठिकर धेनुर्नु दो ॥ पय मूकी
सदेद ॥ न ॥ ३० ॥ १४ ॥ तेम थादरिये धर्मने हो ॥ ए वायफ थ
विचार ॥ न ॥ माने निजकुल चालने दो ॥ धर्म करी निर्धार ॥.
॥के० ॥ १५ ॥ धर्म थहिंसा सक्षपणे दो० ॥ बातम गुवस्वजाय ॥न.
परखी लीजें प्रेमथी दो० ॥ सहजगुरों तनाव ॥ ॥ २० ॥ १५ ॥

श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो. २५३ अविचास्यु करतां थकां हो ॥ होवे दोप महंत ॥ ज० ॥ काज विचारी जे करे हो ॥ तेहिज कहिये संत ॥ ७ ॥ १७ ॥ थाम्रनिपाति नृपा दिना दो० ॥ इहां सुणवा दृष्टांत ॥ ज० ॥ तव पर्पद पूरे तिहां हो ॥ ते कुण कहो नगवत ॥ ज० ॥ ३० ॥ १७ ॥ केम थविचारित कामथी हो० ॥ श्यो तेहोनो दुढ दोप ॥ न ॥ पूढे परिपद नावच हो ॥ कहे प्रभुजी गतदोप ॥ ज० ॥ ० ॥ १ए ॥ ढाल ए चोथा खमनी हो ॥ ए सख्यायें जाण ॥ न ॥ रामविजय कहे साललो हो । कहेगे प्रल हित थाण ॥ ॥ ३० ॥ २० ॥ सर्वगाथा ॥१५॥ ॥ दोहा सोरठी ॥ ॥ देमंकर निनराज,नांखे नवियण हित जणी ॥ सुपीयें बातम काज, साघेवा सवि प्राणीया ॥ १ ॥ उत्तम मुखनी वात, उत्तम कारज कपरें । सुणतां दिन ने रात, धर्मतणी दृढता दुवे ॥ २ ॥ परखी करतां धर्म, नर्म रहित ना करी॥लहिये शिव पद शर्म, मर्म लहेवो दोहिलो॥ ३ ॥ जेम सुतने निज तात, यावरयण शखा दीया ॥ जाणि थ६ १६ वात, ह टिपरीक्षा जव दुई॥॥यविमास्यु को काम, करतां पस्तावो घणो॥थाम्र निपाती ताम, यादि तणो उपनय सुणो॥ ५ ॥ ॥ ढाल पाचमी॥ ॥ सांजल सनतकुमार दो ॥ राजेश्वर ॥ ए देशी ॥ देश थवतिमाहे हो ॥ नवि प्राणी ॥ नयरी उजेणी नाम वखापीयें ॥ तिहा जितशत्रुराय हो ॥ ॥ वैरिगज कंठीरव जागीय ॥ १ ॥ तस घर राणी अदंन हो ॥ न० ॥ नामें विजयसिरी सोदामणी ॥ कीधी दासी रज हो ॥ ज० ॥ रूपें मथरगति रलियामणी॥ २ ॥ सुखसागरमा दोय हो ॥०॥ रगें रमे ते कठपनी परें । एक दिन हर्षित दोय हो ॥ ॥ वेठो सनामा नृप थामबरें ॥३॥ दौवारिक तेणि वार हो ॥ राजेश्वर ॥ थर्ज करे थावी नृप बागलें ॥थाव्या राय ज्वार दो ॥ ज० ॥ ॥ कोश्क चार पुरुष रूपें जले ॥ ४ ॥ तुम मलवानी श्राश हो ॥ रा ॥ द्रुकम होवे तो थाये थंदरें। कहे नृप तेडो तास दो ॥ दौवारिक ॥ श्रादर दीजें थाव्या मदिरें ॥ ५ ॥ द्रुकम दुवो नृप जाम हो ॥ रा ॥ चार ते चतुर सनामा थाविया ॥ देखी थारुति ताम दो ॥ रा॥ सकल सनाना मनमा जावीया ॥ ६ ॥ २.

૧૩૪ जेनकथारमकोप नाग आम्मो. जाण्यो उत्तम वश हो ॥ रा ॥ तांबलादिक दे सन्मानिया ।। रहे हस हो ॥ रा० ॥ वगर कह्याथी सद्धये जाणीया ॥४॥ पूछे तास हो ॥ कुंवरजी ॥ कहो कुण कारण किहांधी पारिया। स्वामी थरदास हो ॥रा ॥ देश थवतिप्रनु उपगारिया ॥७॥ तेहमां अनुजात हो ॥ रा० ॥ उत्तरपंथें थति रलीयामणुं ॥ विख्यात हो ॥ रा० ॥ पुर अवनीमा उपे थति घणु ॥ ॥ तिहा राय हो ॥रा ॥ पाले निन प्रजा रगें करी ॥ सबलो वरते हो ॥ रा० ॥ रूपवती तस राणी सुंदरी ॥ १ ॥ दपती दोय रसाल ॥रा ॥ सुख विलसंता सुत सोहामणा ॥ चार थया सुकुमार हो । रा० ॥ राय कीधा वगत वधामणां ॥ ११ ॥ प्रथम दुd देवराज हो । रा० ॥ वत्स ने उर्लन कीर्तिथीवली ॥जोडीजे पद राज हो ॥ रा०॥ एम चिट्ठ सुत देखी थाशा फली ॥ १२ ॥ सकल कला थन्यास हो ॥रात जनकें शीखवीया यत्ने करी ॥ नर यौवनमां नूप हो ॥रा ॥ धारे पर णाव्या नृपदीकरी ॥ १३ ॥ण थवसरें निजतात हो ॥रा॥ अनिवर्तक रोगें पीडियो ॥ राज्य प्रथमसत दाथ दो ॥ रा॥ सोपी ते परनव हिंमियो ॥ १४ ॥ राज्य सही देवरान हो ॥ रा० ॥ पाले मी रीते थापणु ॥ वलीया थम माहाराज दो ॥ रा० ॥ गोत्रीयें जोरो पहाँ घाग्यो घणो ॥ १५॥ पुण्यदशा श्रम हीण हो ॥ रा० ॥ देश दुवा व सद्गु वायादने ॥ नीसरीया थ दीन दो ॥ रा॥ कीधा ऐ हुवे ए वि पादनें ॥१६॥ दिन पतले सवि लोक दो ॥रा ॥ पाणी वला सहुए पारक ॥ केहो कीजें शोक दो ॥रा ॥ धर्म समो नहिं को तारा ॥ १७॥ विदडे सुत ने बंधु दो ॥ रा ॥ विदडे वहाली परणी कामि नी॥ पडिया कर्मने बंध दो ॥रा ॥ एक न विदडे धर्म ए सुरमणि ॥ १७ ॥ ते माटें मुण राज दो ॥ राम् ॥थाव्या तुम पासें मतावला ॥ बधव ए देवराज दो ॥ रा ॥ सेवा कारण वर्ष समाकुला ॥१५॥ सेच्या तुफ गुण दूत हो ॥ रा०॥ बांहे ग्रह्याने तुं तारे सही ॥ मैं उत्तम कुल पुत्त हो ॥ रा० ॥ प्रारथीया साजण पीठे नहिं ॥ २० ॥ यत ॥ पर पक्षणापवन्नं, मा जणि जणेसि एरिस पुत्त ॥मा व्यरेवि धरिकासु, पर एनगो का जेण ॥ १॥ पूर्वढाल ॥ कहे जितशत्रु नरिंद हो ॥ रा० ॥ or श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो. २५५ चिता मत करजो चित्तमांहे तुमें ॥ रहोयम पासें थानद हो ॥रा॥ से वा थाशे ते करा अमें ॥ २१ ॥ तुम जेवा गुणवत हो ।। कुमरजी ।। श्राव्या थांवे ज्यु वायें कोकिला ॥ शरण ए सतने सत हो ॥ कु० ॥ च चल कमला स्थिर न रहे इजा ॥ २२ ॥ मत था दिलगीर हो ॥ कुछ ॥ वीर विराजो सुदर मालीये ॥ अशन वसन वर चीर हो ॥ कु॥ व्यो तुमें सुखमांहे दीदा गालीयें ॥३॥ बहुत करी सुपसाय हो ॥ कु० ॥ सेवक थाप्या चोकी अगनी ॥ वद् सन्मान्या राय दो ॥ कुछ ॥ सुजस वाध्यो वेला उतरगनी ॥२॥ चोथे खमें रसाल दो ॥ नविप्राणी॥ ढाल जपीए रगें पांचमी॥रामकहे उजमाल हो॥न॥धर्म करीजें परखी उद्यमी ॥२५॥ ॥ दोहा सोरठी॥ ॥ रात तणा चिटुं याम, चिट्ठ वधव चोकी करे ॥ श्रनुक्रमें अनुक्रमें काम, राय जलाव्यु थादरें ॥ १ ॥ थाप थापणे याम, तिलनर को कचे नहि ॥ दोदिती सेवा श्राम, देव म देजे तु सही ॥ २ ॥ यत ॥ थाहा रयति न स्वस्थो, विनिशे न प्रबुध्यते ॥ वक्ति न स्वेच्छया किंचित्, सेवक किं नु जीवति ॥ १ ॥ कष्टं नो सेवकानां तु, परदानुवर्त्तिनाम् ॥ स्वयं विक्रीतदेहस्य, सेवकस्य कुत सुखम् ॥२॥ दोहा ॥ जोडक सोनैया दिये, तोहि न कर सेवाकर्म ॥ नरने नारी एम नणे, शु जीवितर्नु शर्म ॥३॥ यत ॥ मौनान्मूक प्रवचनपटुर्वातुलोजल्पकोवा, कात्या नीरू यदि न सहते प्रायशोनानिजात ॥ धृष्ट पाश्रू वसति च यदा दूरतश्चाप्रग ल्न , सेवाधर्म परमगहनोयोगिनामप्यगम्य ॥ ३॥ सोरठी दोदो ॥ मू काव्यु निज राज, वेठ वलगाही पापीयें ॥ उष्ट देवथी थाज, राखे तिम रहीयें सही ॥४॥ ॥ ढाल बही॥ ॥ थारा महोला कपर मेह, जबूके वीजली॥ दो राज ॥5॥ ए देशी ॥ सही नृपनो थादेश, के कोश्क कामने ॥ दो लाल के को॥ गयो एक दिन देवराज, नजीकने गामनें हो॥ न० ॥ करि कारन मध्यान्द, सम य पाबो वयो ॥ दो सा विचमाहे चढीयो जोर, पवन घनशु मल्यो ॥दो० ॥ प॥ १ ॥ वाये वालीया कमे, धूल धोरण चढी ॥ हो । धूळ ॥ कंकर तृण तिम पत्र, दोडी जाय कपड़ी ॥ हो ॥ दो० ॥ चिटुं , - २५६ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. दिशहूती ताम, उठी कादंबिनी ॥ हो० ॥ ३०॥करे कराको जोर, दामिनी ॥ हो ॥ ज० ॥ २ ॥ वरसे वरसलो विड, धरोपरि ॥ हो ॥ ॥णमाहे रहि जाय, रमाडे गोटका ॥ हो॥र.. आवे देश दोट, लपेटे नूमिनें ॥ हो ॥ ल ॥ कां रमे मीपम विसायो तें मुनें ॥ दो० ॥ वि० ॥३॥ वायु शीतल वाय, रा घणी ॥ दो० ॥ ज० ॥ थर थर भ्रूजे थंग, विठूटे कपनी ॥ो. वि० ॥ तव देवराज कुमार, विचारी वडतले ॥ दो० ॥ वि० ॥ कनो उढण, उढी निश्चलें ॥ हो ॥ ३० ॥ ४॥ वड उपरथी बाप, मुण्यु तव तिहाकणे ॥ दो० ॥ सु०॥ मनमाहे चिते एम, हां एकुल जणे ॥ दो० ॥ ३० ॥ निसुएं मामी कान, जोउ शु उचरे ॥ हो जो ॥ सुणे पेशाची वाचें, पिशाच वातो करे ॥ हो० ॥ पि० ॥ ५ ॥ लावी करीने वाह, गाहा एक कहे ॥ हो० ॥ गा० ॥ बीजो मांझी कान, के साची सहदे ।। हो ॥1॥त्रीलो चिते ताम रह्यो हेवल थकी हो. ॥ र० ॥ जोयु थचरिज एद, कहेशे शी वकी॥ हो॥ क०॥ ६ ॥ अत्र चरित्रोक्तं गाथाध्य ॥फो फो जाणसि किंची, सो पनदिनो कहेदि मह किं तं ॥ जपर इमोवि थज, लहीए सो नरिंदोति ॥ ४ ॥ वीएण तर पुझो, केण निमित्तण की वेलाए ॥ सो जप सप्पा, पढमे पदमि लची ए ॥ ५॥ पूर्वढाल ॥ जाणे पिशाची वाणीनो, थर्थ ते श्रापथी॥हो० ॥ थ॥ हा हा मादारो स्वामि, मरशे सापथी ॥दो॥म० ॥ पहेला प्रहर मकार,दैवें शं कीधलु ॥दो० ॥दे॥अथवा नलु लघु एह, में कारिज सी धलु ॥ दो० ॥ में॥ ४ ॥ करीश द्व एह उपाय, साहिब उगारां ॥दो॥ सा० ॥ यज्ञ करीने सर्पनु, विघ्न निवारच ॥ हो ॥ वि० ॥ था नहि गुणचोर के, ढोर परें दवे ॥ हो ॥ढो॥ स्वामी जनक समान, सट्ठ कवि क्ष्म स्तये ॥ दो० ॥ स ॥ ७ ॥ यत ॥ अन्नद प्राणदम्मेव, स्थानदोनय रक्षक ॥ ज्ञानदोजनकम्मेव, सप्तैते पितर स्मृता ॥ ६ ॥ पूर्वढाल ॥ एम चितवतो चित्त, थाष्यो नृप अतिकें ॥ दो ॥ था ॥ वर्षा टाट ठकंट, चढयो शिर चितके ॥ दो० ॥ च॥ सांज समयमा सनानें, विसर्जी राज वी होणावि०॥ वादल घोर घटा घन, रहियो गाजवी ॥ हो ॥र० ॥ ॥५॥ थावी निज श्रावास, नरेश्वर पोढीयो ॥ हो ॥न० ॥ लांबो सो , . .

७ श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो. २५७ डो ताणी, उपर पट उंढीयो ॥ हो ॥ 3 ॥ पासे रही पटराणी, वडी ते सेजमां ॥होवानीडी बिदु नुजवध, ते सूतां हेजमां ॥होते॥ १० ॥ याव्यो पहेले पहोर, चोकीने कारणे ॥होगाचो॥ जोवे ते देव राज, रह्यो गुह्य वारणें ॥होर॥ अध ऊपरें ते वास, वन नीहालतो ॥हो॥नु०॥ वारी जाली गोख, विवर सवि नालतो होपविण॥११॥ खड्ग यही निजहाथ, रह्यो एकण मने होणार ॥ चशेदयने विवरें, थ हि सवित तने हो॥थ ॥ देखी ग्रहियु एक, करें मुख साहसी ॥ हो कण् ॥ वीजे करें दोय खम, कस्या ग्रहीने अति ॥ हो ॥ कल ॥ १२ ॥ गोपविया एक तोर, जर ते खमने ॥ हो॥ ज० ॥ मन चिते थयु कारज, हणीयो लगने दो ॥ ह ॥ निज्ञ विवसन देवी, उर स्थल कपरें ॥हो॥ ॥३०॥ देखी पडिया विंड, रुधिरना ७ ख धरे ॥ हो ॥ रु० ॥१३॥ रखें विपसक्रम होय, इस्यु मन चितवे ॥ हो० ॥३०॥ सूत्रे स्वामीनत, कलाने केलवे ॥ हो ॥क ॥ निशक्यथी ताम, श्रजना उदयथा ॥ दो० ॥ थ ॥ कुच ऊपर कर देखी, गक्यो नृप हृदयची॥ हो ॥ ॥ १४ ॥ कोध धरी मन चिते, मारु एहने ॥हो० ॥मा०॥ अशन वसन सवि पूरूं, नितप्रत्ये जेहने होणानिण॥ कीधुं एवं हराम, सवि ते माहरु ॥ हो॥ स० ॥ कीधु कर्म कठोर, थाने वाहरु ॥ हो ॥ थ० ॥ १५ ॥ दु एहने विश्वास, रई रयणी समे ॥ हो ॥ र ॥ करे ए एहवु काम, हवे मुख नवि गमे ॥ दो० ॥ ६ ॥ प्रीति तणु जिहा ठाम, तिहा त्रण टालीयें ॥ दो ॥ ति॥ अर्थसवध विवाद, रमणी न निदालीयें ॥ हो ॥ र० ॥१६॥यत ॥ यदी विपुला प्रीतिं, त्रीणि तत्र निवारयेत् ॥ विवाद चार्थ सवध,परोके दारदर्शनम्॥॥ पूर्वढाल ॥ब्रह्महत्या ने प्रनास, (प्रनासशब्देन साधारण व्यं) दरिधन देवकु॥हो॥६॥ गुरुपत्नी वली तेम,ए पातकका रा॥होणाएानविपामे ते स्वर्ग,नरकथधिकारिया॥होणानणालो जाणो , कृतगुण, जेरों विसारिया॥हो॥जे०॥१॥ वली नृप चिते एद, जोरावर बे घणु ॥ हो ॥जो॥ कोण जाणे दणे एह, के दु एदने दणु हो॥ के ॥ माटें कोश सपाय, करीने मार ॥ दो० ॥ क० ॥ वैरीने विपवेल, नणी न वधारशु ॥ हो॥ न ॥ १७ ॥ जोजो गुणनो दोप, घने नीप न्यो ॥दोगाथ०॥ जलनालेरकपूर, यकी विप कपन्यो ॥ दो० ॥ थ० ॥ " रएन जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. स्तो फरीने राय, के निशामिप करी ॥ हो॥०॥ पहेलो पदोर पूरी थइ चाकरी ॥ हो ॥ पू० ॥१॥ थाव्यो तव वत्सराम, करे तुमें ॥ दो० ॥ ३० ॥ राज पधारो गेह, हवे रहेगु थमें हो। निजमंदिरे देवराज, पहोंच्यो जई तिहां होगापणा नृप पूने पहोरामद कोण थठे शहां होगाको॥२०॥ कहे स्वामी वत्सराज, ई सेवक ॥ दो० ॥ ढुं० ॥ कनो तु सेवामांहे, के पूरो साजनो ॥दोके की चोथे ढाल, सीराहे ए चढी॥ हो ॥ स ॥ राम कहे कोधांध, न राजे प्रीतडी॥ हो ॥न॥२१॥ सर्व गाथा ॥१६॥ श्लोक तथा गापा ॥ दोहा सोरठी॥ ॥ कहे नरवर एक काम, वत्स करीश तु मादरु ॥ कहे शिर जोरे सा मि, वचन न लोपु तुम्ह तणा ॥१॥ यो थादेश सुजाण, शीशका मुक थी करो ॥ प्रतु तुम वचन प्रमाण, शेप परें शिरें धरु ॥ ॥ प्रेषण नृत्य परीक्ष, व्यसने वधव परखीयें ॥ थापत्तिकाल सरीख, विनवश्य वलि जारजा ॥ ३ ॥ कहे राजा जो एम, तुम मनमा थावे अजे ॥ कर कारज तजी प्रेम, हण वधव देवराजने ॥ ४ ॥ ॥ ढाल सातमी॥ ॥ नदी यमुनाके तीर, ठमे दोय पंखीयां के ॥ ठमे ॥ ए देशी। तहत्ति करी नृप थाण, सुजाण ते नीसयो के ॥ सु०॥ मविरथी वरस राज, हृदयथी थरहस्यो के ॥ हृ ॥ चिते कोप्यो जोर, राजन ठेवराजनें के ॥ रा० ॥ विरु करे निर्धार, ए वयणे बाजने के ॥ ए॥१॥ तनु दारा धन शेही, रुपरें एडवो के ॥ ॥ कोप होय जगमाहे, ए दीसे तेहवो के ॥ ए ॥ पण मुफ वधवमांहे, न को अवगुण थडे के ॥न ॥ जे उत्तम होय तास, थकारिन नवि रुचे के ॥१०॥५॥ सऊन जन थपवाद, थकी रहे बीदता के ॥ थम् ॥ जेह जितेंश्यि तेह, थकान न हिता के ॥थ ॥ मरण करे उकारें, न थाले तप के ॥ न ॥ लजावत सुशील, सुलक्षण संकथे के ॥ सु० ॥३॥ यतः ॥ मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णा, त्रिभुवनमुपकारश्रेणिनि प्रीयंतः॥ परगुणपरमागून पर्वतीकृत्य नित्यं, निजहदि विकसंत संतिसत कियतः ॥ १ ॥ विपदि धैर्यमथान्युदये क्षमा, सदसि वाकपटुता पुधि विक्रम । .

श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो २५ए यशसि चानिरतिर्व्यसन श्रुती, प्रतिसिझमिदं हि महात्मनाम् ॥ २ ॥ वंढाल ॥ मुफ बांधव देवराज, ए सऊन जातिनो के ॥ ए॥ न मले ए हमा कोइ, विचार कुजातिनो के ॥ वि० ॥ केम कोप्यो नरराज, निवाजने स्थानकें के ॥ नि ॥ सवल विमासण कपनी, थाज अचानकें के ॥ था ॥ ४ ॥ पण कुपरीक्षक राय, थझाने थावस्यो के ॥ थ० ॥ विण परमारथ जाणे, हुकम एणे कस्यो के ॥ दु ॥ पण हा काल विलय, करु शुन कारणे के ॥ क ॥ नांख्यो प्रथमां एहज, यशुन निवारण के ॥ ५० ॥ ॥ ५॥ चितवी राय समीप, वही थाव्यो वली के ॥ व ॥ कां रे न लाव्यो तस शिर, गु तुज मति गली के ॥ ७ ॥ कहे वत्सराज नरेश्वर, ते जागे सही के ॥ ते ॥ जागतां देवराज, ह पाये नहि सही के ॥ ह ॥ ६ ॥ मारीश दुनिशनर, ते थाशे यदा के ॥ते॥ नृपतियें पण वात, हृदय धारी मुदा के ॥ ह ॥ स्वामी विनिए कहो कोइ, वात सोदामणी के ॥वाण॥ वत्स कहे थहवा, निसुणो महारी नणी के ॥ ९ ॥ ॥ ४ ॥ वात विनोद विना ए, न जाये यामिनी ॥ न ॥ राय कहे तुं दाख, कथा मुफ कामनी के ॥ क० ॥ मुण नृपवर बद्ध नरवर, पाटली पुरमां के ॥ पा० ॥ पृथ्वीराज नरेश्वर, चावो शत्रुमां के ॥ चा ॥ ॥ सुनगा सुनगा नामें, राणी तस वालही के ॥ त० ॥ रतिरमणी अनुहार के, रूप गुणें सही के ॥ 5 ॥ शेठ तिहा रत्न सार, वसे एक गुणनिलो के ॥ व ॥ सद् व्यवहारीमांहे के, सोहे शिर तिलो के ॥ सो॥ ए ॥ तस घर नारी सलका, नामें रझुका के ॥ ॥ ना० ॥ गौरंगी रतियथ, विचारनी पनिका के ॥ वि०॥ धनदत्त नामें एक, तनय तस कूखनो के ॥ त० ॥ मात पितानो नक्त, न रागी दोपनो के ॥ न० ॥ १० ॥ एकदिन कृतशृंगार, सुमित्रा परवस्यो के ॥ सु० ॥ श्राव्यो चगुटामांहे, ते धनमदछु नखो के ॥ ते ॥ कोई प्रशसे धन्य ए, जोगी प्राणीया के ॥ नो ॥ विलसे लठि विलास, सोनागी जाणीया के ॥ सो॥ ११॥ तव वीजो कहे एह, नणी न वखाणीये के ॥ नम् ॥थाप तणी उपराजि न, थाय ए वाणीये के ॥था॥ वाप तरो परसाद, करे ने सादिवी के ॥ कल ॥ वेतो करे ये तान,वनी तननी बबी के ॥ २० ॥ १२ ॥ वात सुपी मनमांदे, शोचे ते इस्युं के ॥ शो० ॥

२६० जैनकया रत्नकोप नाग आठमो. विण जुजबल उपराजण, मुज जीव्युं किस्यु के ॥मु०॥ धन करुधर्म, सुगमें वावरूं के ॥ सु० ॥ जइ परदेगे कलंक ए, जता के ॥ ए ॥ १३ ॥ कमल उदधि हरिउरमा, वसे ए वारता । पण व्यवसाय उदधिमाहे, दीसे शाश्वता के ॥दी ॥ ते माटे करी श्री जोडणुं के ॥ क० ॥ एह तएं सवि कहेण, एणी परें मोत के ॥ ए० ॥ १५ ॥ यत ॥ या श्री सरोरुहांनोधि, विभोर्वज्ञप्ति पर श्रुति ॥ या पुनर्व्यवसायाब्धी, लक्ष्मी साध्यक्ष्मीदते ॥३॥ व्यापार कर ते लक्ष्मी , किंचित् किंचिञ्चकपणे ॥ यस्ति नास्तीव सेवाया, निलयां नैव संनव ॥ ॥ पूर्वढाल ॥ तेणें कह्यो निज थाशय, मित्रनी धागो के ॥ मि ॥ ते पण कहे सुण साच, लख्यु एम कागलें के ॥ ल० ॥ नि जगुणयी विख्यात, कह्या उत्तम गुणी के ॥ ॥ वापगुणे विस्मात, कीर्ति मध्यम तणी के ॥ की ॥ १५ ॥ यत ॥ उत्तमा स्वगुणे स्माता, मध्यमाघ पितुर्राणै ॥ अधमामातुले ख्याता , श्वसुरेश्वाऽधमाऽधमा ॥ ५ पूर्वढाल ॥ घरे यावी निजतातनें, वात सर्वे कही के ॥ वा ॥ जासह परदेश, रजा मुफ द्यो वही के ॥ र ॥ जनक हिये धरे उख, कहे वत्स यं कर्यु के ॥ क० ॥ व्यो ए धन श्रधार, में ताहरु मन लघु के ॥ में ॥ १६ ॥ विलसो वानित नोग, रमो रग मालीये के ॥र ॥ चितईती परवेशनी,चिता टालीयें के॥चि॥ढाल कही ए चोथे,खमें सातमी के॥०॥ कहे वत्स वात सुणो नृप, बागल मन गमी के॥था॥१७॥११॥ १३ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ धनव कहे सुणो तातजी, तुमें उपराजी लाल ॥ न घटे जोगववी प्रतु, जेम विणसे सवि साच ॥१॥ इण वचने जाण्यु पिता, न रहें राख्यो एह ॥ शीख समी पुत्रनें, सि६ करो गुणगेद ॥२॥ त्यागी रूपण थजो तुमें, निर्वय वली दयाल ॥ परदेशे होजो सही, शूर थने उजमाल ॥ ३ ॥ शिक्षा दीधी पुत्रनें, चान्यो सबले साथ ॥ करियाणु लीषु बहु, चिस समरी जिननाथ ॥३॥ ॥ ढाल घाउमी॥ ॥ वेशी लुहारीनी ॥ हवे साथ सघातें हो, कुंवर वर्ष परी ॥ परपेशे चाल्यो दो, मालें शकट नरी ॥ केतेएक दिवसें हो, श्रीपुर नपर जही।

. , श्रीशांतिनाथनो रास खंम चोथों. २६१ परिसर मतरीया हो, सरोवर पास सही ॥ १ ॥ सारथपति वसिया हो, के उज्ज्वल वसन कुटी ॥ ध्वजनी सहिनाणी हो, के सोहे श्वेतपटी ॥ तिण वेला कोश्क हो, के धूजतो धायो । नये चचल लोचन हो, के शरणा गत थायो ॥२॥ मुज राखो राखो हो, के करुणा स्वामी करो ॥ दु नागे थाव्यो हो, के शरणे महेर धरो ॥ मत वीहे वोले हो, के सारथवाह श्स्यो ॥ मुफ पागल नांखो हो, के वे अपराध किस्यो ॥३॥ एहq जव पूढे हो, के तावत तुरत धस्या ॥ हणो दणो वोलता हो, के थाव्या सु जट कस्या ॥ धनदत्तने नाखे हो, के मूको एह नणी ॥ अपराधी नृपनो हो, के महोटो वे अगुणी ॥ ४ ॥ दास ए घरनो हो, के नृप बाजरण हरी ॥ जूवटनें कानें दो, के रामत नहि सखरी ॥ ए व्यसनज नूहुँ हो, के सातेमां राजा ॥ एहने सेवता हो, के अगें नहिं साजा ॥५॥ नृप वात ए जाणी हो, के जथारी तेडी॥ ली, तिण वेला हो, के कान करी जेडी। हणो स्वामी शेही हो, के व्यसनी दास नणी ॥ मूको मत एहने दो, के रायनें रीप घणी ॥ ६ ॥ करुणा मन थाणी हो, के कहे मत्री स्वामी ।। कारामांहे राखो हो, के कहूँ तुम शिर नामी ॥ मत्रीश्वर वयणें दो, के तालामादे जड्यो।मूक्यो चर चोकी हो,के बो रह्यो मांहे पज्यो॥॥ नांजी कारागृह हो, के सेवकने निहणी॥ नागे तुम पासें हो, के थाव्यो वात नणी॥ तेमाटे काढी हो, के थापो चोर जलो ॥ नहिंतर इण माटें हो, के थाशे सहिय कलो ॥ ॥ कहे सारथवाहो हो, के वात खरी तुमची ॥ शरणागत थापु हो के शान नहिं अमची ॥ कहे सेवक नृपना हो, के अमें श्रादेशकरा ॥ जो लोपु थाणा दो, के कोपे श्रमपरि ॥ ए॥ धनदत्त उपगारी हो, के कहे नूपति पासें ॥ चालो दु थावु हो, के नृपति थावासें ॥धावी नृप थागें दो, के छनो कर जोडी ॥ नेटें एक मूकी हो, के रत्नावलि रूडी ॥ १० ॥ कोण देशथी थाव्या हो, के निरु पम व्यवहारी ॥ कहो काइ थपूरव हो, के वात सबल सारी ॥ धुर दूती मामी हो, के निज वृत्तांत कह्यो ॥ राजेश्वर रूडो हो, के मानव तेह सह्यो ॥ ११ ॥ सुण सादिव मोरा दो, के तोरा चरण ग्रह ॥ करु सहस नीहोरा दो, के चोरने मान लट्ठ ॥ थानरण तुमारुं दो, के तुम हाथे था व्यु, शरणागत स्वामी हो, के चोरने दुपाठ ॥ १२ ॥ कहे राजा मूकण .

२६२ जैनकथा रनकोप नाग आग्मो. दो, के जोगो एह नहि ॥ पण केम लोपाये हो, के तेजेस में जा ए मूक्यो हो, के तुम वहीस कस्यो । मुणि धनात पोचे हियडे हेन ननो ॥१३॥ महोटो ए मुफने हो, के तुमें मुफ्तार एम कही लरथाव्यो हो, के स्थानक तेह वस्यो ॥ सतोप्पो तेहा के नोजन वे नलो । चोरने शीखामण दो, के श्रापे मुगुण नि १४॥ राग याशावरी ॥ क्या करु मदिर क्या करु दमरा ॥ ए रेशी. सन विचार सुणो मेरे नाइ, इह नव परनव हे 5 खदायी ॥ दोय र नाव हे उनके, पार न पावे रे को गुनके ॥ व्य० ॥ १ ॥ पूत मदिरा र वेस्या, करत बाहेडो फिरत वनदेसा ॥ चोरी परनारीसें इव्यसें सातो विसन कदे नारी ॥ व्य० ॥२॥ द्यूत बडो कुलखंपल सनसें जिात कवतु न सहीयें ॥ हे सवहूमें ए सिरदारा, सोइ लम इनसें न्यारा ॥ व्य० ॥२॥ करे जीववध र मांसको चाहे, सो फरि की चिट्ठ गति अवगाहे ॥ जो मद्यपाने रहे मतवालो, वनकु लम्यो मर्नु त तर चालो ॥ व्य ॥ ४ ॥ सब जग धूते जो गणिका निगुरी, उनसे मिले तिनकी गति बिगरी ॥ जो मृगजीव दनत वन पेठो, टनको माटीपनो जाउ हेतो ॥ व्य० ॥ ५ ॥ परके वादिर प्रानकों लेवे, अपने अंतरपान को देवे ॥ कह्यो उट्ठ लोक विराधक उनको, चोरी करे सोही पिछ पिर जनकों ॥ वि०॥ ६ ॥ देखत परनारी रहे फिरते, जानत नाही फहेरसें मरते ॥ परनिजनारी देखे 5 ख पावे, तो काहेक तु परघर जावे ॥मा ॥ ७ ॥ ए सातोसें जे रहे थलगे, तुरत जइ सुरपदसों , वलगे ॥ वो उनकों नावें करी बझे, तो सहनानद सुखशु ममे ॥ व्य० ॥ ॥ सोगठ सोल कषाय निवारो, राग शेष दोउ पासा मारो ॥ बारत भान चोपार सपारो, थपने थानद महोल सिधारो ॥ व्य० ॥ए॥ परपरिवाद ए कपड़ न कीजें, कोपू पीठमांस नखीजें ॥ धन रमणी पर प्रेम न पारो, मोहमदिरा दिलमें न संचारो ॥ व्य० ॥ १० ॥ कुमति बड़ी धूतारी रे धेस्या, उनको मत कोठ करदो वेसासा ॥ जिण कीया सोइ बहु उस पाये, बद्ध रिनद न्युं कचे न थाये ॥ म ॥१॥ मनमें थाइट रे थादेडो, नकों निवारे में उनको चेरो ॥ चराविद अदत्त निवारो चोरी, पर थाशा परचचल गोरी ॥ व्य० ॥ १३॥ ए सातों कहे नाव विचारी, " . श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो. २६३ जो वर्ने तिनकी वलिहारी ॥ रामविजय कहे एसे जगतमें, तुरत चढी वेसे ध्यानतखतमें ॥ व्य॥ १३ ॥ इति सप्तव्यसनोपरि अध्यात्म गीत ॥ पूर्वढाल ॥ कहे धनदत्त प्यारा हो, के वारुं तु तुमने ॥ चोरी मत करजे दो, के लान दियो मुफनें ॥ पगे लागी पयंपे हो, के धन तु उप गारी, तें गुण मुफ कीधो हो, के तीधो कगारी ॥ १५ ॥ जग दोय विशा मा हो, के ससारें नारी ॥ थर्थीने वीजो हो, के सत्संगति सारी॥ धायां तुम वयणां दो, के रयण करी मनमां ॥ न धरुं वकाश हो, के श्रा जथकी तनमां ॥ १६ ॥ यत ॥ तृथिव्यां त्रीणि रत्नानि, जलमन्न सुनापि तम् ॥ मूढे पापाणखमेपु, रत्नसंझा विधीयते ॥१॥ पूर्वढाल ॥ हवे तु मुज स्वामी हो, के दास अबु तोरो ॥ कहु कर जोडीने दो, के वचन करो मोरो ॥ ले एक मुफ पासें हो, के मत्र सबल काजू ॥ करे नूत पराजय दो, के शु नांखु जाजू ॥१॥ तस थाग्रह जाणी हो, के मत्र लियो कुमरें॥ तस्कर निज स्थानक हो, के पहोतो तस समरे ॥ ढाल चोथे खमें दो, के थामी एह कही ॥ जे व्यसन न सेवे हो, तेणें नवनिधि लही॥ १७ ॥ ॥ दोहा॥ ॥सार्थवाह त्यांथी चल्यो, जातां अनुक्रमें एक ॥ अटवी लही कादंबरी, मतरीयो सुविवेक ॥ १ ॥ जल स्थानक जोई नलु, करे रसोई तेह ॥ एह वे याव्यो पारधी, रुमवर्ण जस देह ॥ २ ॥ धनुप वाण हाथे ग्रयां, सा रमेय दश पाच ॥ रुदन करे 5 खीयो घणु, धनवान कहे एम वाच ॥ ३ ॥ केम दीसे एम दूमणो, कदे मुफ पागल थाज ॥ ते कदे मुफ खा मी दुखे, रोनु बुं माहाराज ॥ ४ ॥ शामाटे तव ते कहे, गिरिकुमगिका पालि ॥ तिहा पानीपति शूर , सवल शत्रु कगाल ॥ ५ ॥ सिदचम ना में जलो, सिदवती तस नारी ॥ जीवित थति वालही, रमपी गुणनंमा र ॥६॥ नूतदोप तेहनें नही, तस विरहेंथम नाथ ॥ मरशे तस उखड़ खी यो, दु रुदन करु बु नाथ ॥ ॥ सार्थवाद कहे तेदने, एक वार मुज दृष्टि ॥थाणो तेदने सज करूं, मत्र सवल मन इष्ट ॥ ७ ॥ तेपणे पनी पतिने कम्यु, थाणी तेह तुरत्त ॥ मत्रपलें सानी करी, थहो उपगार वि चित्र ॥ ए ॥ जीवित दान मुफने दियो, वली जीवाडी एह ॥ चरण नमीने थावीयो, पहनीपति निजगेह ॥ १० ॥ धनदत्त तिहांथी चालीयो, २६४ जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो. गुणगिर गनीर ॥ वेलाकुल गत पामीयो, पाटण पुर गंजीर । ॥ ढाल नवमी॥ ॥ धणरा ढोला ॥ ए देशी ॥ साथ निवेश करी तिहारे, पंच रात ॥ धनरा रागी ॥ वस्तु लीये वेचे वह रे, पुरमाहे हुए ध०॥१॥ जूठ जून रे सुजाण ॥ वडनागी ॥ नहि धन जेहतुं प्रिय सह धनरागी॥एयांकणी ॥ तिहां मन मान्यो नवि थयो रे, व्यापार लान ॥७॥ तृमा थनती जिन कही रे, जेम जगमाहे श्रान प ॥ २ ॥ यज्क्तमागमे ॥ सुवरम रुप्पस्स उपचया नवे, सयाड कैलास असंखया ॥ नरस्त लुपस्स न तेहि किचि,श्वाद थागास समा असता ॥१॥ दोहो ॥ तनकी तृमा सही लहे, सवागेरके शेर ॥ मनकी तमा नवि मटे, जो थाणे घर मेर ॥ ५ ॥ पूर्वढाल ॥ पष्ठिम रयणीय nि वे रे, करु दवे जलनिधियात्र ॥ध ॥ इव्य घणु लावु रली रे, हर्षे पी यानपात्र ॥ १० ॥ जूण् ॥ ३ ॥ यये प्रनातें धावियो रे, नोवा जलनिति वेल ॥ ध० ॥ जल कझोल जिहा घणा रे, उबलता करे केल ॥ ३० ॥जू' ॥॥ सार्थपति सरितापति रे, देखी लह्यो थानद ॥ध०॥ चिते ए सुप्रस न दुई रे, दूर टले 5 खदद ॥ ध०॥॥ ५ ॥ गुणगणनो थाधार जे रे, धीवर सेवित जेद ॥ ध० ॥ ससाराबुधि तारकू रे,नैगमयुत गुणगेद ॥ ॥जू ॥६॥ देव थधिष्ठित सितपटें रे, स्फीत स्यु एक यान ॥०॥ जैनवा क्य परें संग्रघु रे, धन देई थसमान ॥ ध॥॥॥ नाम सवे नरियु ति हां रे, जे देशातर योग्य ॥ध ॥ वहाण चढी चाल्यो सुखें रे, सबल पवन श्रनुकूल ॥ ३० ॥ ॥७॥ सदधि घणो उनघीयो रे, सढ पूसा पवणेण ॥धावहाण चाले वेगा रे, जोयण जाय कोण॥ध जू॥ए॥ मार्गव एक सूयहो रे, मुख यदि अबफल सार ॥ ४०॥ उडतो श्रषर लडथडे रे, थाक्यो तेह अपार ॥ध० ॥ जू०॥ १० ॥ धनदत्त धीवरनें कही रे, सेह अणाव्यो पास ॥ध॥ पंख उपर कर फेरियो रे, क्षण एक करि श्राश्वास ॥॥॥११॥ फल हेतु मूकी कहे रे,मनुन परें शुक वाणि ॥धाई अशिगण ताहरो रे, किमही न थालं सुजाण ॥॥॥ १५ ॥ तुमें जी वित मुफने दीयु रे, कीधो वढ्नु उपगार ॥ध॥ मुफ जीवे दोय जीवियां रे, वृक्ष पितर निर्धार ॥धाजू॥ १३ ॥ तेमाटे काश्क करुं रे, तुमने दुप्र

श्री शांतिनाथनो रास खंम चोथो.
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त्पुपकार ॥ ध० ॥ गुण कीधो जाणे नहि रे, ते सही मूढ गमार ॥ध
॥जू॥१॥ नेट करु फल ए ग्रहो रे, साहिब चतुर सुजाण ॥ ध० ॥ शृं
अमें कीजें एहने रे, नक्ष्य ए तुज गुणखाण ॥॥॥१५॥ लीयो अवर
तुफ जे रुचे रे, तव कहे गुक सुण स्वामि ॥ ध० ॥ वहु गुणकारक एह
ने रे, एहनु अमृतफल नाम ॥ ध० ॥जू॥ १६ ॥ सुण कारण एहनु कहूँ
रे, विध्य महीधर पास ॥ धo ॥ विध्या अटवी जुम वसे रे, कीरमिथुन
एक खास ॥ ध० ॥०॥ १७ ॥ सुत हू हु तेहने रे, नेड मूक दुयां तेद
॥ ध० ॥ वृक्षपणाथी थाणीने रे,जय थापु सस्नेह ॥धाजू॥ १७ ॥
थन्य दिवस एक श्रावियु रे, अटवीय मुनियुग मीठ ॥ ध० ॥ थाम्रतरु
तलें श्राविने रे, वेतु में नयणें दीठ ॥ध ॥१॥ देखि विजन मुनिजन
कहे रे, थाम्र उपर एक वात ॥ध ॥ पादशैल दरिया विचें रे, तिहा एक
तरु विख्यात ॥धः ॥ २०॥ ते सहकार सदा फजे रे, तस फल खाये जे
एक ॥धण॥ रोग पणासे अगना रे, जाय जरा पण टेक ॥ध०॥॥१॥
तेज रूप सौलाग्यना रे, गुण वाधे अति जोर ॥१०॥ निमुणी दु दर्पित
दुवो रे,ज्यु चकवा दुवे जोर ॥ध ॥०॥ १२ ॥ मुनिवचन न होवे मृपा
रे, फल थाणीयु तेद ॥ध ॥ दिव्य लोचन होवे माहरा रे, तरुण पितर
गुणगेद ॥१०॥जू॥२३॥ फल सेवा कारण गयो रे, श्रावता विचमां था
ज ॥ध ॥ तें राख्यो मुफ जीवतो रे, जीव तु गरिवनिवाज ॥ ध० ॥जू०
॥२४॥दु वीजु फल थाणीने रे, देश मुक मावित्र ॥ध ॥ फल राखो
अनुग्रह करी रे, करो मुफ जन्म पवित्र ॥ ५० ॥जू॥ २५ ॥ फल देश्ने
कमियो रे, कौर विचारे शेव ॥ध ॥ धन्य पक्षी पण एदवो रे, गुणवत
दीतो ॥ध ॥ जु ॥ २६ ॥ सार्थपति गोपव्यु रे, वनु नपगारीने
हेत ॥ध ॥ देव कोइएक नृपने रे, धारी मन सकेत ॥॥॥ २ ॥
अनुक्रमें जातां पामीयो रे, दिन केते परकूल ॥ धम् ॥ लेइ नेटण जइ मि
व्यो रे, ते पुरनृप थनुकूल ॥ध०॥जू॥ २७ ॥ फल थाप्यु तस गुण कह्यो
रे, रायें मूक्यु वाण ॥ध ॥ महाप्रसाद कही थावियो रे, सार्थपति निज
वगण ॥ ५० ॥ जू॥ श्ए ॥ लान अधिक तिहां कणे लह्यो रे, नवमी
ढाल रसाल ॥ध ॥ राम कहे नर ते जला रे, जस उपगारनो ढाल
॥ ध० ॥ ॥ ३० ॥ सर्व गाथा ॥२५॥ श्लोक तथा गाथा ॥१६॥

१६६ जैनकथा रत्नकोप नाग थाम्मो. ॥ दोहा ।। ॥ वेची क्रियाणक वली थवर, ग्रही तेह धनदन ॥ पागेसी दिने, पुर गंजीर पद्धत्त ॥ १ ॥ साथ लेइ तिहाथी चल्यो, निमपुर माल ॥ विच थटवी कादवरी, थावी ते विकराल ॥ २ ॥ रात रमा को तिहां, सुनट वह परिवार ॥ रह्या चिहुदिशि मोरचे, ग्रही विविध थियार ॥ ३ ॥ पाउले पहोरे रयणीने, हत हत करती धार ॥ पाई पडी मतावली, थटवी जिहां कजाड ॥ ४ ॥ धनदत्त सजी साहा थयो, साहसिक शिरदार ॥ वदी कहे जय जय चिर, श्रीधनवन इमार ॥ ५ ॥ धाड स्वामी पनिपतें, धनदत्त निसुण्यु नाम ॥ रखे होई माता रीयो, जेणें सास्यु मुफ काम ॥ ६ ॥ शस्त्र रहित नट वारिने, साहामो पहनीनाथ ॥ याव्यो तव वेद उलखी, मलिया घाली वाय ॥॥ रे तर प्रेमें करी, कुशल देम विरतत ॥ अहो वहु दिवसें वालहा, मलिपा तुमें महंत ॥ ७ ॥ तुमशु अझाने शहां, कीधी घणी थयुक्त ॥ खमो अपराध ए माहरो, घणी करी प्रणपत्य ॥ ए ॥ तेडी लाव्या मदिरे, कीधी नकि जुगत्त ॥ जोजन वस्त्राविक तणी, करि मनुहार विचित्र ॥ १७ ॥ तस थाणा ले चालियो, निजपुर थाव्यो हेम ॥ मात पिता परिवार, म लियो बढुले प्रेम ॥ ११ ॥ ॥ ढाल दशमी॥ ॥ राग केदारो ॥ सुखदायी रे सुखदायी रे ॥ ए देशी ॥ पुर श्रावी रे पुर थावी रे, बदुयश कीर्ति उपजावी रे ॥ परिगल घरे संपद लागी रे, धन वावे सुक्षेत्रे हो जावी रे ॥ पु० ॥ १ ॥ जिनप्नुवन ते नविन करावे रे, बहु जीरणने समरावे रे ॥ जिनपडिमा अनेक जरावे रे, एम पापे श्रचन क्ष्य जावे रे ॥ पु० ॥ २ ॥ करे ज्ञाननी नक्ति विशाला रे, होवे दूर थज्ञानतमजाला रे ॥ विरचे मुनिनक्ति रसाला रे, प्रगटे गुणमं गलमाला रे ॥ पुण् ॥ ३ ॥ वली थकवगुण सनाली रे, परिलाचे थशन शुम लाली रे ॥ सादामी साहमिणी सतोषे रे, क्षेत्र साते सूधा पोषे रे ॥ पु० ॥ ४ ॥ क्षीण दीन प्रत्ये नबारे रे, दुखीयानास सवि बारे रे ॥ जिन वयण हियामां धारे रे, जे सहेजें नवजल तारे रे ॥ पुण् ॥ ५ ॥ नृप दीधी नगरशेठाई रे, थइ प्रगट सबल पुस्याई रे ॥

श्रीशांतिनाथनोरास खंम चोयो. २६० एक दिन पुर उपवन आइ रे, मुनि समवसस्या सुखदायी रे ॥ पु० ॥ ६ ॥ मुनि वादीने देशन निसुणी रे, वधी वात वैराग्यनी वमणी रे ॥ तनी कचन कोडी ने रमणी रे, मुनि दु माहातम मुगुणी रे ॥ पु० ॥७॥ धनदत्त मुनि चारित्र पाली रे, कर्म कोडी सवे परजाली रे ॥ घनघाति कर्म त गाली रे, शिवरमणी वरी लटकाली रे ॥ पु० ॥ ॥ कहे राम विजय कर जोडी रे,तेहना पाय नमु मद मोडी रे॥जेणें कचन कामिनी बोडी रे, तस शिवमुख हाथ करोडी रे॥॥॥ इति सप्तदेवनाम स्तुति ॥ ढाल ॥ काहाननी मेहलोने कावली रे ॥ए देशी॥ हवे ते फल ले राजवी रे, चिते हो एम विचार॥ए फल खाधे रे शु होवे रे, कीजें हो पर उपगार ॥ १ ॥ राजन सांनलो वातडी रे॥ए थांकणी ॥ कहे वत्सराज कुमार ॥ काज विचारिने जे करे रे, ते नर लहे सुख सार ॥रा ॥ २ ॥ फल उपजावु वद् एहथी रे,थावे वहुने रे जोग ॥ तो महोटो गुण निपजे रे, स नारे वठ्ठ लोग ॥ रा० ॥ ३ ॥ सेवक तेडीने एम नरो रे, ए फल वावो मुगम ॥ चोकी करो नित्य एहनी रे, एह तुमारडु काम ॥रा० ॥ ४ ॥ वाव्यु उत्तम वाडीयें रे, जतन करतां रे तास ॥ दिन केतेश्क निपन्यो रे, सुदर थावो रे खास ॥ राम् ॥ ५ ॥ वात मुणी फल फूलनी रे, रीज्यो राय थपार ॥ दान दीये रखवालने रे, रहेलो तुमें दुशियार ॥ रा० ॥६॥ रात दिवस रहे पोपता रे, केड न मूके लगार ॥ देववों रे एक रातमा रे, नूमि पड्यु फल सार ॥ रा ॥ ७ ॥ दीतु प्रजाते ते सेवकें रे, फल परिपक्क रसाल ॥ नजरें कस्यु जइ रायने रे, नूपें लीयु ततकाल ॥रा ॥ ७ ॥ तेडी पुरोहितने दीयुं रे, यो मनमाहे खुशाल ॥ घर जश् तेणे ते वावस्यु रे, ते पहोतो तव काल ॥ राम् ॥ ए ॥ वात सुणी विलखो थयो रे, रायें धयो मन शोच ॥ दा हा थकार्य केम थयुं रे, करे मनमांदे बालोच ॥ राम् ॥ १० ॥ ए विपवृक्षज ने सही रे, कोई वैरी मुफ कान ॥ मूक्यु प्रपंच करी इदा रे, राखेवु नहिं थाज ॥ राण ॥ ११ ॥ वो रे तुरत उतावला रे, काढो एदनो कंद ॥ कोपीयो राय दुकम करे रे, दुवो सवलो मतिमद ॥ रा ॥ १५ ॥ सेवक लेइ कुठारने रे, धाया हो तेणें रे स्थान॥मूल तछेदी पाडीयो रे, दा दा कीधु थकाम ॥ रा० ॥ १३ ॥ण समे रोगी कोढी नरा रे, जीवितथी निर्विम ॥ विप ग २६६ जैनकथा रत्नकोप नाग थाम्मो. ॥दोहा॥ ॥ वेची क्रियाक वली यवर, ग्रही तेह धनदत ॥ पागे परी दिने, पुर गंजीर पद्त्त ॥ १ ॥ साथ सेइ तिहाथी चल्यो, निमपुरते माल ॥ विच थटवी कादवरी, याची ते विकराल ॥ २ ॥रात रमा को तिहां, सुनट बनु परिवार ॥ रह्या चिनुदिशि मोरचे, ग्रही विविध थियार ॥३॥ पाबले पहोरे रयणीने, हत हत करती धार ॥ पडी ऊतावली, थटवी जिहां ऊजाड ॥ ४ ॥ धनदत्त सजी सादाचे थयो, साहसिक शिरदार ॥ वदी कहे जय जय चिर, श्रीधनवत्त मार ॥ ५ ॥ धाड स्वामी पनिपतें, धनदत्त निसुण्यु नाम ॥ रखे होई मा रीयो, जेणें सास्यु मुफ काम ॥ ६ ॥ शस्त्र रहित नट वारिने, साहामो पश्मीनाथ ॥ श्राव्यो तव वेद उत्तरखी, मलिया घाली वाथ ॥७॥ पूढे त प्रेमें करी, कुशल देम विरतंत ॥ अहो वहु दिवसें वालहा, मलिया मदत ॥ ॥ तुम अझाने श्हां, कीधी घणी थयुक्त ॥ खमो अपराग ए माहरो, घणी करी प्रणपत्य ॥ ए ॥ तेही लाव्या मदिरें, कीधी नकि लगत्त ॥ नोजन वस्वादिक तणी, करि मनुहार विचित्र ॥ १० ॥ तत थाणा ले चालियो, निजपुर आव्यो देम ॥ मात पिता परिवार, म लियो बगुले प्रेम ॥ ११ ॥ ॥ ढाल दशमी॥ ॥ राग केदारो ॥ सुखदायी रे सुखदायी रे ॥ ए देशी ॥ पुर थावी रे पुर थावी रे, बढुयश कीर्ति उपजावी रे ॥ परिगल घरे संपद लापी रे, धन वावे सुत्रे हो जावी रे ॥ पु० ॥ १॥ जिनन्नुवन ते नविन करावे रे, बद जीरणने समरावे रे ॥ जिनपडिमा अनेक जरावे रे, एम पापे श्रवन क्ष्य जावे रे ॥ पु० ॥ ॥ करे ज्ञाननी नक्ति विशाला रे, होवे दूर थझानतमजाला रे ॥ विरचे मुनिजति रसाला रे, प्रगटे गुणमं गलमाला रे ॥ पु० ॥ ३ ॥ वली थलवगुण सजाली रे, पडिलाने अशन शुद्ध नाली रे ॥ साहामी साहमिणी सतोषे रे, क्षेत्र साते सूर्धा पोषे रे ॥ पु० ॥ ४ ॥ क्षीण दीन प्रत्ये सहारे रे, उखीयानां जमा सवि वारे रे ॥ जिन वयण हियामां धारे रे, जे सहेजें नवजन तारे रे ॥ पु० ॥ ५ ॥ नृप दीधी नगरशेताई रे, या प्रगट सबल पुस्साई रे ॥ स श्री शांतिनाथनो रास खम चोयो २६ए अति नर्बु, लोक वसे धनवत रे ॥ १ ॥ वा ॥ वात विचारी कीजीयें, जेम लहीये यशोवाद रे ॥ वा० ॥ अविचास्य कारज करे, जनमां लहे थ पवाद रे ॥ २ ॥ वा ॥वाण॥शत्रुदमन नामे जलो, नरपति अति विकराल रे ॥वा॥ रत्नमाला रलियामणी, राणीथति सुकुमार रे ॥३॥वा०॥वा॥ एक दिवस वेगे सना, राजकुली बत्रीश रे॥वा॥ एक बटुक थाव्यो तिहां, कनो टे याशीप रे ॥४॥वाणवाणाव्यग्रपणे नाव्यो नहिं, सना विसर्जी ताम रे ॥ वा० ॥ श्रमहर स्नान कस्यु नृपें, गयो देवसेवा काम रे ॥५॥ वा० ॥ वा० ॥ फूल आणी मुह थागलें, वटुकें कस्खा तिहा नेट रे ॥वा॥ देवसेवाने कारणे, रायें निहाल्यो मीट रे ॥६॥ वा ॥ वा ॥ पूढे नश्क तुकोण बो, ते कहे सुण अवनीश रे ॥वा॥ नामें शुनकर विप्र बुं, यज्ञ दत्त सुत ईश रे ॥३॥ वा ॥ वा ॥ वासी अरिष्ट पुरनो सही,नव नव देश विनोद रे ॥ वा० ॥ जोतो हा आव्यो प्रनु, देखी पाम्यो प्रमोद रे ॥॥ वा०॥वा०॥ देखि विनीत सोहामणो, दिलमाहे रीज्यो राय रे ॥वा० ॥ निज पासे ते राखीयो, गुपथी थादर थाय रे ॥ ए ॥ वा ॥ यत ॥ शूरस्त्यागीविनीतश्चा, कृतघ्नोदृढसौहद ॥ वितानी स्वामिजक्तच, सर्वत्र लनते यश ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ वाण ॥ गुण देखी गौरव कस्यो, यतेउर थादेश रे ॥ वा ॥ विश्वासी जागी करी, अतर नहिं लवलेश रे ॥ १० ॥ वा ॥ ॥ वा ॥ एक दिवस पुर उपवनें, थाव्यो एक मृगराज रे ॥ वा ॥ व्याध कहेणथी नीसयो, नृप चतुरग ले साज रे ॥११॥ वा० ॥ वा ॥ फोज चढी चिट्ठ दिशि खडी, चढी कुजर नरसिह रे॥वावेतो शुनकर थागलें, थक्कुश ले श्रवीह रे॥१२॥वा०॥वा॥थाय्यो उद्यान उतावलो,नरपति मृगपति पास रे॥वाणानृप पर हरि थावियो, उहजतोथाकाश रे॥१३॥ वा०॥वाणा ताम शुनकर चितवे, रखे करे स्वामिविनाश रे ॥वा॥ थक्कश मुखमां केपीनें, कीधो सिहनो नाश रे ॥१॥ वा ॥वा०॥ नृप करने कहे, रूई न कीधु एद रे ॥ वा० ॥ मुफ चितित ए सिंदने, वचमा दणि यो जेद रे ॥ १५॥ वा०॥ वा० ॥ ए हणतां तें मादरो, सद्गु नृपमा यश वाद रे ॥ वा ॥ कीधो कमी तो एम सही, बटुक कहे तज विखवाद रे ॥१६॥वा०॥वा०॥ राजयनने कारणें, में निहस्यो हरि एह रे ॥वा ॥ निज़ उत्कर्ष न चितव्यो, सुण साहिव गुणगेह रे ॥१॥वा ॥ वा ॥ तुम . । २६७ जैनकया रत्नकोप नाग आग्मो फल जाणीने थावीया रे, मृत्युने काजे थासन्न ॥रा० ॥१७॥ थपक्क ते वावरे रे, के फल फूल ने पान ॥ मजर के लक्षण करे रे, गयो वढ्यो वान ॥ रा० ॥ १५ ॥ थभुतरूप धारी थया रे, वेखीने हो नूप ॥ थहो विपरीत सहकारनु रे, दीसे ए कांइ स्वरूप n NA १६ ॥ जन सामान्यने गुण थयो रे, वेदनो जाण विपन्न ॥ एम चर तेडीयो रे, पूछे हो तेह राजन्न ॥ रा०॥ १७ ॥ शु फल चूंटपुंए थथी रे, के पडीयु स्वयमेव ॥ स्वामी पडयु अमें सावीया रे, साच का नरदेव ॥ रा ॥ १७ ॥ वात सुणी राय चितवे रे, नू पडे विषनाव । कोश्क जीव तणो थयो रे, तेणे धिक्जाति यनाव ॥रा० ॥ १५ ॥ हा में अविचारिने रे, कीधु थकारिज एह ॥ रोपे अमृततरु बेदीयो मूर्खमांहे छ रेह ॥ रा० ॥ २० ॥ यत ॥ मुगुणमपगुण वा कुर्वता का जातं ॥ शोच घणो मनमां धरे रे, जेम जेम सानरे वात ॥ विण परी हैं क्रिया करे रे, तेहनें एह दृष्टांत ॥ रा ॥ २१॥ दाल नणी दशमी सही रे, चोथे खमें रे एह ॥ राम कहे नर ते जला रे, काज विचारी करे जेद ॥ रा ॥ २२ ॥ सर्व गाथा ॥एए।। श्लोक तथा गाया ॥१॥ ॥ दोहा ॥ ॥ जेम थपरीक्षित काजथी, शोच लह्यो तिण राय ॥ तेम अपरें कर नहिं,कहे वत्स सुण नरराय ॥१॥ कथा कहेतां ए क्ली, बीजो पहोर यती त ॥ वत्स वन्यो श्राव्यो तदा, उर्मनराज विनीत ॥ २॥ चिंते राजा विच मां, वस्स कही मुझ वात ॥ पण इणें कारिज नवि कम्यु, थाष्यो एहनो चात ॥ ३ ॥ तेदने पण तिमदिन का, हा कही कयो ताम ॥ श्रापो न पालो वन्यो, नृपर्ने करे सलाम ॥ ॥ कां रे कारन नवि कडं, ते कहे पधव दोय ॥ जागे जे माहाराज मुफ, फिदायी चितित वोय ॥ ५ ॥ ते माटे'कांश कहो, वेला निर्गम थाय ॥ नहिंतर सांजल साहिवा, का कथा सुखदाय ॥ ६ ॥ राज हुकम हू जलो, कहो कथा मुविवेक ॥ जन अवसर जाणि तब, कहे कथा धरि टेक ॥ ७॥ ॥ ढाल थम्यारमी॥ ॥सदीयो मोरी रामलियो नीम वधाइले ॥ ए देशी ॥ वाहाला स्वामी ॥ क्षेत्र नरतमा उपतु, राजपुर नयर महंत रे ॥ वा०॥ पर्वत उपरें श्री शांतिनाथनो रास खंग चोथो. २७२ शुं थविचाखु नझरो जी ॥ ७ ॥ उत्तमवश उत्पन्न, तुमें महोटा राजन्न । मोजी लाल ॥ साजो नहिं केम ए कहे जी ॥ ॥ उत्तम थाप वखाण, न करे हो चतुर सुजाण ॥धी लाल ॥ मांझी प्रशंसा न कीजीयें जी॥ ॥ए॥ दणीयो शुनकर सिंह, तुमें जूनामांहे लीह ॥ प्रीतम लाल ॥ फोगट फूले शु दुवे जी ॥ १० ॥ अवला हो बागल वात, कूडी न नीडो ख्या त ॥ फीके लाल ॥ एह वचन मुफ नवि गमे जी ॥ ११ ॥ राय सुणी चढ्यो रोप, हो- पडे तव शोप ॥ चिते लाल ॥ वात शुनंकरें ए कही जी ॥ १२ ॥ कोइ धागल ए गुफ, नहि परका तुम ॥ जांरव्यु लाल ॥ पण वचनें ए नवि रह्यो जी ॥ १३ ॥ जापक मर्मनो एह, पहोंचाटुं यम गेह ॥बाने लाल ॥काज करेवु में सही जी ॥१४॥ थावी हो नृप एकात, सेडीया रक्षक तंत ॥ था० ॥ एह सुनकरने दणो जी ॥ १५ ॥ बल जोई ततकाल, कीधु ए कर्म चांमाल ॥ धिक् धिक् लाल ॥ जे हण्यो एम गुणवतने जी ॥ १६ ॥ अन्य दिवस पट्टराणी, कहे साहिव गुणखाणि ॥ प्यारे लाल ॥ वटुक गुनकर किहा गयो जी ॥ १७ ॥ कहे राजा तस नाम, लीजें नहि ए दराम ॥ पूढे लाल ॥राणी हो कुण कारण कहो जी ॥ १७ ॥ अतर केम करो थान, मुफ धागल माहाराज ॥ लाखो लाल ॥ जो जाणो बो तो वारता जी॥१॥रायें कपु सवि रूप,राणी कहे ए विरूप॥ नीके लाल ॥ एवं मुज थागल नवि कप जी ॥ २० ॥ सातमी नूमि था वास, ठची चढी तन्नास ॥ नीके लाल ॥ एसवि जोयुं में सही जी ॥१॥ नहिं तस दोप लगार, ए तुम नक्त उदार ॥ प्यारे लाल ॥ ते जीवे ने के नहिं जी ॥ २२ ॥ शोकातुर थइ राय,वात कही समजाय ॥हा हा लाल॥ सबल थकारज में कयुं जी ॥ २३ ॥ शोक करे ते दोय,जेम जेमसानरे सोय ॥ प्यारे लाल ॥ एम थविचास्यु सुख होये जी ॥ २४ ॥ एणि परे ते नर नारि, 5 ख लघु मनमाय ॥ नीके लाल ॥ एम कोई करता रखे जी ॥ २५ ॥ चोथे खमें ढाल, पारमी सुणो जमाल ॥ प्यारे साल ॥ काज विचारिनें कीजीये नी ॥ २६ ॥ यत ॥ सहसा विदधीत न क्रिया ॥ १ ॥ सर्व गाथा ॥ ३५ए ॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥१॥ ॥ दोहा॥ ॥वात कही विरम्यो जिस्ये, पीजो उर्लनराज ॥ त्रीजो प्रहर व्यतीत , - २०० जैनकथारनकोप नाग थाम्मो. प्रनाव ए जाणवो, जे अकुशे दरिघात रे ॥ वा० ॥ कहे हो गलें, नृपें टाल्यो उत्पात रे ॥१७॥ वा०॥वा०॥ कोप मकर ऐ, नहि श्रीजो हां कोय रे ॥वाणा चटकन्नी ए वात, घेरन नहोय रे ॥१णावा॥ यत ॥ पदकोंनियते मत्र, धतु कर्णोन किर्णस्य च मंत्रस्य, ब्रह्माप्यंत न गष्ठति ॥ २॥ पूर्वदाल ॥ वार। कहे जो मत्र ए, नेवाशे जनमाय रे ॥ वा० ॥ तो मुक मुखकलंक प, स्तरशे इण नाय रे ॥२०॥वा॥वा ॥ कहे शुनकर साहिबा, सोप्युं गुफ रे ॥ वा० ॥ वाहिर नेद लहे नहि,प्राण जते पण मुफ रे ॥ ॥ वा० ॥ वा० ॥ वात मुणी राय हर्पयो, यही हरिशव तेणि वार रे। वा० ॥ सैन्य समी थावियो, वरत्यो जय जयकार रे ॥शावावा। ढाल जणी थग्यारमी, चोथे खमें उदार रे ॥ वा० ॥ जे निज गुण नहि, धन्य तेदनो थवतार रे ॥२३॥वाणासर्वगाया॥३५॥श्लोक॥१७॥ ॥ दोहा ॥ ॥ कहे शुनकर सुनटने, प्रजुनो प्रबल प्रताप ॥ परगट पंचानन दणी, टामो सबल सताप ॥ १ ॥ वात मुणी चित्त चमकिया, मामलीक सामत ॥ हो थहो जुजबल स्वामीनु, सद वखाणे सत ॥ ॥ नृप श्राव्या म विर नणी, वाजंते वाजिन ॥ पुरमांहे यश विस्तयो, नूप तणो सुपवित्र ॥३॥ नगरमांदे सस्तव दुन, चोके चोक ए वात ॥ सिंह सबल नरपति हस्यो, रहेको जग यख्यात ॥ ४ ॥ ॥ ढाल बारमी॥ ॥ देशी बाले लालनी ॥ सना विसर्जी हो, राय, श्राव्यो अतेवरमाय ।। थाने लाल ॥ पटराणी पायें पडे जी ॥१॥श्रावो जी प्राण धापार, सादिष नर शिरदार ॥ श्रा० ॥ वात्त कहो हेजें इसी जी ॥१॥ श्यो उत्सव माहाराज, नगरमांहे बहु थाज ॥ प्यारे लाल ॥ सनिलया आज जो घणो जी ॥ ३ ॥ कहे वालम मुण नार, साधु कई निधार ॥ मीठे लाल ॥ श्राज में दरि इणियो सही जी ॥ ॥ वृक्षपणामें एह, करे सस्नेह ॥ नीके लाल ॥ को न करे ते में कमु जी ॥ ५ ॥ मुक जेर वो बलवत, कोइ नहिं दृढचित्त ॥ प्यारे लाल ॥ पंचानन साये अन्यो जी॥ ६ ॥'तष रीसाणी हो नारि, दे उत्तर तेणी वार॥सामी लाल । . लोक जीवो, श्री शांतिनायनो रास खंम चोयो. २७३ पाम्यो रे ॥ नृप नमतो तरप्यो घणु, वह हेल ज वीशाम्यो रे ॥ १०॥ १७ ॥ मनमां श्छे नीरने, वडशाखाहूंती हेठे रे॥ करता जल विउ लहु, मनमा एम चित्यु वेठे रे ॥ सु० ॥ ११ ॥ शाखाविच जाविल वर्या ऋतुनु जल एह रे ॥ नाजन करीय पलाशनु, नरी पान करु सस्नेह रे ॥ ॥ मु॥ १२ ॥ तिम करी जल पीवा जिस्ये, थयो नृपति उजमाल रे ॥ वट पखी एक श्रावीने, करथी ढोल्यु ततकाल रे ॥ मु०॥ १३ ॥ था वि लखो नरराजीयो, फरि जरीयु ते जलपात्र रे ॥ तेम वली ढोल्यु पंखीयें, नृप चिते एद कुपात्र रे ॥१०॥१४॥ कोप्यो राय कशा ग्रही, मन चिते त्रीजी वार रे ॥ थावे तो मारु सही, न करु हवे ढोल लगार रे ॥ सु०॥ १५ ॥ जल अर्थ नाजन धखू, कर एकें पंखी विमासे रे ॥ कोप्यो राय ए मारो, नवि मूके विशवावीशे रे ॥सु॥ १६ ॥ पण मुफ मरण नलु हां, नहि मरण नलु नूपालो रे ॥ ए जीव्ये वह मुफ जेवा के कगालो रे ॥सु०॥ १७॥ धन्य धरा जिहा एदवा, पखी पण वे उपकारी रे ॥ प्राण गारे पारका, ते जीव तणी वलिहारी रे ॥सु०॥ १७ ॥ पत्रनाजन नरी जव पीये, तव थावते नारव्यु उमाडी रे॥ परखी कशाघातें हणी, नृप रीज्यो हेतो पाडी रे ॥ सु० ॥ १७ ॥ फरी पलाशनो पुट धस्यो, जलविंड तिहां थी धागे रे ॥ पडतां देखी चितवे, ए कौतुक सरिखु लागे रे ॥ सु० ॥ २० ॥ वटशाखा जोउ चढी, तरुकोटर थजगर मागे रे ॥ सूतो गरल मु खथी गले, ते जो तिहाथी नागे रे ॥ १० ॥५१॥ए में पीधु होत जो, तो मरत सही इण नामो रे ॥ जूर्व पखी उपगारीये, थहो शु कीधु ए कामो रे ॥ सु० ॥ २२ ॥ प्राण कख्या थलखामणा, पण मुजने एवं उगायो रे ॥ शान करी थावी घणी, पण मूढ दु न रह्यो वायो रे ॥ सु ॥ २३ ॥ हा हा महोटु पाप ए, मुफ पापीने श्रावी लाग्यु रे ॥ एह हवे केम बूट, क्रोघे मुफ मन थयु काय रे ॥ सु ॥ २ ॥ एम मन शोक करे घणो, तस पूल सेना भावी रे ॥ दर्पित था पति देखीने, सवि वात कदी समजावी रे ॥ मु० ॥ २५॥ स्वस्थ थइ नरवर चल्यो, पंखीशव साथे लेई रे ॥ पुर उद्याने चंदने, तस तनसंस्कार करेई रे ॥ मु० ॥ २६ ॥ दे जलांजलि थावियो, नृप मदिर श्रति दिलगीरो रे ।। नृप कहे विसरशे नहिं, ए नि कारण मुज वीरो रे ॥ १ ॥ २७ ॥ प्राण - २७३ जैनकया रनकोप नाग थाम्मो. तब, न थयुं नृपर्नु कान ॥ १ ॥ निजमंदिर नणी चालीवो, राज ॥ कर जोडी थागत रह्यो, तव वोले नरराज ॥२॥ माहरु, होशे तुझथी काम ॥ ते कहे इ सेवक किस्यो, जो न तुज स्वामि ॥ ३ ॥ ले थाव्य कतावलो, देवराजनु शीश ॥ दुम्म वी शिर चल्यो, दीये नृपति थाशीप ॥ ४ ॥ कालविलय करी पत्रे, व्यो नरपति पास ॥कर जोडी कनो रही, एम करे थरदास ॥ ५॥ बधव जागे थडे, त्रले समरथ धीर ।। केम दणाये माहरो, देवराज वीर ॥ ६ ॥ तिणे प्रस्तावें कीजशु, ए तुमचो थादेश ॥ पण हमा ने कहो, कोइ सवध उपदेश ॥ ४ ॥ नृपति कहे कोक तुमें, करो वात ॥ कीर्तिराज कहे सानलो, स्वामिन् एक श्रवदात ॥ ७ ॥ ॥ ढाल तेरमी॥ ॥ काया कामिनी वीनवे ॥ ए देशी।कीर्तिराज कहे सुणो, जरतें माय पुर नाम रे ॥ शत्रुजयानिध राजीयो, राणीनाम प्रियगु थनिराम रे ॥१॥ सुगुण सनेहा एक वातही॥ए श्रांकणी ॥थवधारो अतर्यामी रे ॥ साब करीने जाणजो, मोरा सादिव कदु शिर नामी रे ॥ १० ॥ २ ॥ एक . न ते नृपनी सना, देशातरथी नर थाव्यो रे ॥ अश्वरयण बागल पमो, देखी रायतणे मन नाष्यो रे ॥ सु ॥ ३॥ चिंते नृप सोनागियो, ६ वारु तुरंगम दीसे रे ॥ रूप जिसी गति जो दुवे, तो मदारु मनई हीसे रे ॥ सु० ॥ ४ ॥ यत ॥ जवोदि सप्से परम विभूषण, त्रपागनाया कक्षता तपस्विन ॥ द्विजस्य विद्यैव सुनेरपि क्षमा, पराक्रम शस्त्रबलोपजीपि नाम् ॥ १॥ पूर्वदाल ।। राय तुरंगम सज करी, पलाण उपर ममावी रे । गति विज्ञाननें जोयवा, गयो बादिर ते दोडावी रे ॥ सु० ॥ ५ ॥ सैन्य सद पूरल रघु, नृप थदृश्य थयो क्षणमाय रे ॥ सामत पितातुर पया, कहे ते नर थाची त्याय रे ॥ सुप ॥ ६ ॥ वक्रशिक्षित ए अश्व , मुणों कहे वीसरीपु रे ॥ जय जलादिक ले करी, नृपतवें सैन्य नीसरीई रे ॥ सु०॥ ॥ वेग जोड्ने वालवा, वलगा खेंची नरनार्थे रे ॥ तव पवन परें दोडीयो, राख्यो न रहे जोर सार्थे रे ॥ ९ ॥ ॥ पी पडु नूमि का, नृप थाक्यो वलगा महेली रे॥यश्व उनो रह्यो ततहणे, पयो शांत स्वनावें वेली रे ।। सु०॥ ए.॥ नृपें पलाण तारीयुं, हम अोर नही सुति

श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो २७५
राजन सर्पना खम ठे दोय, जो नवि मानो तो नजरेंजी जोय ॥ हो
॥ ४ ॥ पाणी देखाव्या रे यहि दोय नाग, रायना मनमां रे कपन्यो
राग ॥ हो ॥ राजन विपसक्रम जय जाणी, तन फरस्यु रे मुफ मात
ए राणी ॥ हो ॥ ५ ॥ टलीया थतर चमतमजाला, विकस्यां रे हृदय
कमल ततकाला ॥ दो० ॥ तूने राय विचारे मनशु, एह उत्तम नर
राखु यतनगु ॥ हो० ॥ ६ ॥ अहो उपकारी उपर थयो रोपी, मुफ जे
वो जग कोइ न दोपी ॥ हो ॥ अहो एहना वांधव गुणवता, कहेवा
कह्या मुमने दृष्टांता ॥ दो० ॥ ७ ॥ एद न मास्यो ते थयु घणु सारु,
राज दे व्रत ले सधारु ॥ हो ॥ कहे परिवारने चार ए बंधु, गुणमणि
रयण थगाध ए सिधु ॥ हो ॥ ७ ॥ कुलदेवी एह थगन दीधा,
मुझ थपुत्रियानां वालित सीधां ॥ हो ॥ राज्य स्थापी रे देवराज
कुमार, सूधो दु लेश सयमनार ॥ दो० ॥ ॥ ॥ कहे परिवार पडखो पं
च रात, चारित्र दोहिल्लु वय कोमल जात ॥ हो ॥ कहे राजा मुफ
पूर्वज पहेला, पलित यया विण निसस्या वहेला ॥ हो ॥ १० ॥ पाम्या
हो शिवपद दु मदनागी, कटुकविपय कपर रह्यो रागी ॥ हो० ॥ हवे
निमें मुक सयम लेवो, राज्य कुवर देवराजनें देवो ॥ दो० ॥११॥ तद
नतर गुन दिन निरधारी, राज्य उव्यो देवराज विचारी ॥ हो ॥ पद युव
राज वत्सराजने दीधु, पुण्ये वालित कारज सीधु ॥ हो० ॥ १२ ॥ एहवे
थवसरें नदन वनमां, श्रीदत्त सूरि थाव्या वाहाला रे मनमां ॥ हो ।
वनपालक जय राय वधाव्यो, मन मानी ते वधामणी पायो हो॥१२॥
जेइ परिवारने वदण चाल्यो, मुनि नमवानी वेला मनमांहे माल्यो हो॥
धन्य दिवस मुफ थाननी वेला, प्र तुम दर्शनथी सहि लीला ॥ दो
॥ १४ ॥ गुरु वदी वेठो मन खातें, मुनिदेसण निमुणे रे एकांतें ॥ दो ।
चोथे दो खमें ढाल चौदमी सारी, रामविजय कहे सुणो नर नारी ।।
॥ दो० ॥ १५ ॥ सर्व गाथा ॥ ४० ॥ श्लोक तथा गाथा ॥ २० ॥
॥ दोहा॥
॥ योग्य जाणी ते पर्पदा, दीये गुरुजी सपदेश ॥ नविक जीव हरखे
हिये, जांजे सकल कलेश ॥१॥

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१०४ जैनकया रस्त्रकोप नाग आठमो.
पोताना थवगुणी, मुज जीवित वहातु कीधु रे ॥ ते वहाजो मनि
मुज चित्तडं चोरी लीधु रे ॥ सु०॥ ॥ एहवा उपकारी नणी,में
थकी चूकाव्यो रे ॥ एम वल वलतां रायने, मत्रीश्वर मलि
॥ सु० ॥ २५ ॥ शोच किशो गतवस्तुनो, एम यथातर प्रकाइयु रे।
त्त विपाद मटे नदि, पंखी गुण मनह वास्यु रे ।। सु० ॥ ३० ॥ एम
विमास्याथी घणो, ते नूप पख्यो पस्तावे रे ॥ तेम यवर पण
कारजथी सहि उख पावे रे ॥5॥३१॥ चोथे खमें तेरमी,
रामविनये परकाशी रे ॥ सुयश महोदय ते लहे, जग जे करे काम
मासी रे ॥ सु० ॥ ३२ ॥ सर्व गाथा ॥३एए॥ श्लोक तथा गापा ॥३॥
॥ दोहा॥
॥ कीर्तिराज जब कहि रह्यो, तव प्रनातनां तुर ॥ वाज्यां श्रति भान
द नर, प्रद कगमते सूर ॥१॥ बदीजन जय जय कहे, मगल पाठ
जपत ॥ चिरंजीव तु सादिया, महोटा मदिपति सत ॥ २॥ कीर्तिराज
मदिर गयो, मन चिते माहाराज ॥ एकचित्त चारे सदी, चितित न
राज ॥ ३ ॥ जल लेइ वासी तवा, थावी दातण काज ॥ पावन करि
शुनवेष धरि, वेतो थावी समाज ॥ ॥ मो थागल थावी कहे, कर जो
ही वेवराज ॥ दुकम होय तो हूँ कनु, वात थपूरव श्राज ॥ ५ ॥
नयो राजा तदा, कीधी मुखनी शान ॥ नृप कोप्यो दीसे थडे, समस्या
सट्ठ थनुमान ॥ ६ ॥
॥ ढाल चौदमी ॥
॥ ढुंगाकी लकरी हो रसीया गांव गठीली ॥ ए देशी ॥ दो रहीयाला
राजन रीष न कीजें ॥ रीष न कीजें लालन रीक धरीजें ॥ हो रढी० ॥
ए बांकणी ॥ गुण बोडी अवगुण नवि लीजें, वात सुणीने शापाशी
दो दीजें ॥ हो ॥१॥ बांदे ग्रह्यानी प्रनुजी लाज घरीजें, अवगुण
दोय तो एकांत कहीजें ॥ दो० ॥ साहिवळ रे दम दास न बीजे, सेवा
दो करतां दिलमा कां न नीजे ॥ दो० ॥ २॥ नेद न तोटो साहित
वात न ताजी, मो पर दीसे इतनी क्यु इतराजी ॥ दो॥ गुनह न कोई
कीयो में तुमचो, चारों बांधवांहे दोप न श्रमयो ॥ हो० ॥२॥ वात
कही रे सवि मामी ममाणे, वात पिशायनी निसुणी राणे ॥२॥

श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो. १७७ नमां, करवा तुमने पीर रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ ६ ॥ मारु ए प्रवकंतने, परहरी पापीयें एवं रे ॥ सू०॥ वैर ने क्षण जूनां नो है, मत वाघो ए ते ण रे ॥ सू० ॥ वै ॥ ७ ॥ एहवे तुफ कुलदेवीयें, करीय पिशाचनु रूप रे ॥ सू० ॥ तुज कल्याणने कारणें, जणाव्यु ए स्वरूप रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ G॥ वात सुणी देवराजजी, टाल्यो तुम अपाय रे ॥ सू० ॥ नाती हो देवी तेजथी, सवलो पुण्य सखाय रे ॥ सू० ॥ वै ॥ ए ॥ वात मुणी नर राजीयो, कहे मुनिने कर जोडि रे ।। सू० ॥ कष्ट गयु मुझ नाग्यथी, हवे सयमनो कोड रे ॥ सू० ॥ वे ॥ १० ॥ कहे मुनि देवापुप्पिया, क्षण लाखेणो जाय रे ॥ सू० ॥ गयो पाडो आवे नहि, धर्मे ढील न खटाय रे ॥ सू० ॥ वै॥ ११ ॥ यत ॥ श्रज कल्न पर परारि, पुरिसा चितीय थल सपत्ति ॥थजलिगय व तोय, गलतमा न पिठति ॥ १ ॥ मामुथ अह जम् ॥ २ ॥ लोच कीधो वेहु जेदथी, ग्रहे सयम व्रतनार रे ॥ सू० ॥ धन्य धन्य सद्गु मुख उच्चरे, ए महोटो अणगार रे ॥ सू० ॥ वै० ॥१२॥ गुरुशिक्षा दिये तेहने, सघ चतुर्विध साख रे ॥ सू० ॥ व्रत लीधां विस्तार जो, अनुनव रस मन राख रे ॥ सू० ॥ वै ॥ १३ ॥ जावि कथानक तेहने, जांखे गुरु हितकार रे॥ सू ॥ मगधे राजगृही वसे, शेत धनाव ह सार रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ १४ ॥ धारिणी तस घरणी तणा, कुवर चार सुजाण रे ॥ सू० ॥ धनपाल धनदेव धनपति, धनरक्षित तेम जाण रे ॥ सू० ॥ वै ॥ १५ ॥ ते चिट्ठने परणाविया, चारे वह सुविचार रे ॥ सू० ॥ शेत विचारे चित्तमा, कुण ग्रहेशे गृहनार रे ॥ सू०॥ वै०॥१६॥ तास परीक्षा कारणे, स्वजन जमाडी सच रे ॥ सू० ॥ सहु साखें चिद्गुनें दीया, शालि तणा कण पंच रे ॥ सू० ॥ वै०॥ १७ ॥ मागु तेवार थाप जो, वडीये विचास्यु ताम रे ॥ सू० ॥ ससरोजी घेला यया, छं राख्यानुं ए काम रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ १७ ॥ उबाली नाखी दिया, वीजीयें खाधा तेह रे ॥ सू० ॥ त्रीजीयें यत्ने गोपव्या, चोथीयें पधवगेह रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ १५ ॥ वाव्याची वाध्या घणा, पंचम वर्षे शेठ रे ॥ सू० ॥ पुन रपि ते कण मागीया, विलखी वस्बर जेठ रे ॥ सू० ॥ वै ॥ २० ॥ ना ख्याथी नाखण तणु, काम नलाव्यु तास रे ॥ सू० ॥ खाधा तिए रांधण थ, काम करे सनास रे ॥सू०॥॥१॥ यत्ने हो राख्या तेहने, सोंप्यो , २१ न . २७६ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ॥ ढाल पन्नरमी॥ ॥ रंग डेजी रंग वे जी रंग के ली राज ॥ ए देशी ॥ रदो रली रंगरली रे, धर्मध्यानमांहे रग रली रग रली रे ॥ एयांकणी। ए नर जव तुमें पायो, हास्यो किहा लदेशो वली रे ॥ लहेशो वली रे ॥ १ ॥ पुगतनाव विनाय ए टालो, साधो ए सहज दशा नती रे । ॥र०॥ २ ॥ क्लेशे दो वासित मनहु रे वाली, करो किरिया गुण मी रे॥ गु० ॥ र ॥ ३ ॥ एक दिवस सयम गुण साधे, श्रशुन कर्म गाये टली रे ॥ जा ॥ २० ॥ ४ ॥ ते परिणाम थगुमने त्यागें, पाबमा ल महापली रे ॥म ॥ र० ॥ ५॥ साधनयोगें ए साध्यनें लदेवा, पुण्ययोगें पाम्यो रली रे ॥ पा० ॥ २० ॥ ६ ॥ था साधक दवे वारक मूकी, पांच प्रमाद ए निर्दली रे ॥ श्रव नि० ॥ २० ॥ ॥ कुमति जना री सग निवारी, सुमतिवधू वरो निर्मली रे ॥ व ॥ र ॥ ७ ॥ होवो षटकायना पीयर सूधा, काश् नव खोवो बो अली रे ॥ खो० ॥रon श्रीदत्त मुनि वाणी सुणी रीज्यो, मुनिपद कमल नमे लली रे ॥ नए र ॥ १० ॥ कहे नृप दीक्षा दीयो थप मुझने, योगदशा सूधी कली रे॥ ॥ र ॥ ११॥ रामविजय कहे धन्य ते मानव, मोह न जाये जेहले बली रे ॥ जे ॥ र० ॥ १२ ॥ दोहो ॥ कर जोडी मुनिने कहे, शत्रु नूपाल ॥ न थयु वचन पिशाचर्नु, कारण कोण कपाल ॥ ॥ ढाल ॥ सालुडामा मोतीडो बन रहीयो ॥ ए देशी ॥ कहे मुनिवर जप रे ॥ सूरिजन ॥ वैर न कीजे कोश्यं ॥ वेश्यने वशे उपनी, रूपवती कुमाल रे ॥ सू॥ धै० ॥ १ ॥ गोरी तुझ घरणी दुइ, यौवन रूप रे ॥ सू०॥ तुज मन मानेती घणु, सद्गुमांहे शिरदार रे ।। सु ॥ देखाई करे, पण ताहरो बढ़ प्यार रे ॥ सू० ॥ वै ॥ ५ ॥ हारे कोर कर्मना दोषथी, यश दोनागण तेह रे ॥ सू० ॥ दीठी हो न गमे तुर मूक्यो तेद नेद रे ॥ सू० ॥ वै ॥ ३ ॥ मनमाहे वित मानिनी, मूकी नरतार रे ॥ सू० ॥ श्रवर सहूने बादरे, धिक माहरो अवता ॥सू ॥ Non ॥ मन वैराग्य वाली, जई निजपापने गेहरे तप थझानपणे करी, मरी था व्यंतरी तेह रे ॥ सू० ॥ वै० ॥५ नवसनारी थापणो,सक्रमी सर्प शरीर रे ॥ सू० ॥ पेठी हो तहारा - , २७६ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ॥ ढाल पन्नरमी॥ ॥ रंग जीरंग ने जी रंग में जी राज ॥ ए देशी॥ रली रंगरतीरे, धर्मध्यानमाहे रग रली रग रली रे ॥ एयांकणी। ए नर जव तुमें पायो, हास्यो किदा लहेशो वली रे ॥ लहेशो वली रे ॥ १ ॥ पुनलनाव विनाव ए टालो, साधो ए सहज दशा नती रे । ॥र०॥ २ ॥ क्वेशे हो वासित मनडुं रे वाली, करो किरिया गुण ॥ गु० ॥ २० ॥ ३ ॥ एक दिवस सयम गुण साघे, अन कर्म माये टली रे ॥ जा ॥ र० ॥ ४ ॥ ते परिणाम यगुमने त्यागें, था उसमा ल महाबली रे ॥म ॥ र ॥ ५॥ साधनयोगें ए साध्यनें लदेवा, पुण्ययोगें पाम्यो रती रे ॥ पा० ॥ र ॥ ६ ॥ था साधक दवे पापक मूकी, पांच प्रमाद ए निर्दली रे ॥थव नि० ॥ र ॥ ७ ॥ कुमति कुना रो सग निवारी, सुमतिवधू वरो निर्मली रे ॥ व ॥ र ॥ ॥ होवो षटकायना पीयर सूधा, काई नव खोवो जो थली रे ॥ खो० ॥२०॥॥ श्रीवत्त मुनि वाणी सुणी रीज्यो, मुनिपद कमल नमे जली रे ॥ न ॥र ॥ १० ॥ कहे नृप दीक्षा दीयो थव मुफने, योगदशा सूधी कली रे॥ ॥ र ॥ ११ ॥ रामविजय कहे धन्य ते मानव, मोह न जाये जेहने बली रे ॥ जे ॥ र ॥ १५ ॥ दोहो ॥ कर जोडी मुनिने कहे, जित शत्रु नूपाल ॥ न थयु वचन पिशाचनु, कारण कोण कृपाल ॥१॥ ॥ ढाल ॥ साखुडामा मोतीडो बन रहीयो ॥ ए देशी ॥ कहे मुनिवर मुण जप रे ॥ सरिजन ॥ वैर न कीजे कोश्यं ॥ वैश्यने वशे उपनी, रूपवती । कुमाल रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ १ ॥ गोरी तुझ घरणी दुइ, यौवन रूप रसाल रे ॥ सू०॥ तुज मन मानेती घणु, सद्धमादे शिरदार रे ।। सु० ॥अवरब देखाई करे, पण ताहरो बट्ठ प्यार रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ ॥ हारे फोक कर्मना दोषथी, थ दोनागण तेह रे ॥ सू०॥ दीदी दो न गमे तुमने, मूक्यो तेहगं नेह रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ ३ ॥ मनमांहे चिते मानिनी, मुज मूकी जरतार रे ॥ सू० ॥ श्रवर सहूने थादरे, धिक माहरो अवतार रे । ॥ सू० ॥ वै ॥ ४ ॥ मन वैराग्य वालीयु, जइ निजबापने गेह रे ।' तप श्रज्ञानपणे करी, मरी था व्यतरी तेह रे ॥सू० ॥ वे ॥ ५ ॥ नवसनारी थापणो,सक्रमी सर्प शरीर रे ॥ सू० ॥ पेठी हो तहारास श्री शांतिनाथनो रास खंम चोथो. २७ नमा, करवा तुमने पीर रे ॥ सु० ॥ वे ॥ ६॥ माझं ए पूरवकंतने, परहरी पापीयें एवं रे ॥ सू०॥ वेर ने ज्ञण जूना नो है, मत बांधो ए ते ण रे ॥ सू० ॥ वै ॥ ७ ॥ एहवे तुज कुलदेवीयें, करीय पिशाचनु रूप रे ॥ सू० ॥ तुज कल्याणने कारणे, जपाव्यु ए स्वरूप रे ॥ सू०॥ वै॥ G॥ वात सुणी देवराजजी, टाल्यो तुफ थपाय रे ॥ सू० ॥ नानी हो देवी तेजथी, सवलो पुण्य सखाय रे ॥ सू० ॥ वै ॥ ॥ वात सुणी नर राजीयो, कहे मुनिनें कर जोडि रे ॥ सू० ॥ कट गयु मुझ जाग्ययी, हवे सयमनो कोड रे ॥ सू० ॥ वे ॥ १० ॥ कहे मुनि देवापुप्पिया, क्षण लाखेणो जाय रे ॥ सू० ॥ गयो पाबो यावे नहि, धर्मे ढोल न खटाय रे ॥ सू० ॥ वै०॥११॥ यत ॥ थक कल्न परं परारि, पुरिसा चितीय श्रम सपत्तिं ॥ धजलिगय व तोय, गलतमान न पिठति ॥ १ ॥ मासुथ यह ज० ॥ ॥ लोच कीधो वेहु नेदथी, ग्रहे सयम व्रतनार रे ॥ सू० ॥ धन्य धन्य सह मुख बच्चरे, ए महोटो थपगार रे ॥ सू० ॥ वै० ॥१२॥ गुरुशिक्षा दिये तेहने, सघ चतुर्विध साख रे ॥ सू० ॥ व्रत लीधां विस्तार जो, अनुनव रस मन राख रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ १३ ॥ नावि कथानक तेदने, नाखे गुरु हितकार रे ॥ सू० ॥ मगधे राजगृही वसे, शेव धनाव ह सार रे ॥ सू० ॥ वै ॥ १ ॥ धारिणी तस घरणी तणा, कुवर चार सुजाण रे ॥ सू० ॥ धनपाल धनदेव धनपति, धनरक्षित तेम जाण रे ॥ सू० ॥ वै ० ॥ १५ ॥ ते चिढुने परणाविया, चारे वहू सुविचार रे ॥ सू० ॥ शेत विचारे चित्तमा, कुण ग्रहशे गृहनार रे ॥ सू०॥ वै० ॥१६॥ तास परीक्षा कारणे, वजन जमाडी सच रे ॥ सू० ॥ सट्ठ साखे चिहुनें दीया, शालि तणा कण पंच रे ॥ सू० ॥ वै०॥ १७ ॥ मागु तेवार थाप जो, वडीये विचास्यु ताम रे ॥ सू० ॥ ससरोजी घेला थया, शु राख्यानुं ए काम रे ॥ सू०॥ वै॥१७॥ उजाली नाखी दिया, वीजीयें खाधा तेद रे ॥ सू० ॥ त्रीजीयें यत्ने गोपव्या, चोथीय वधवगेद रे ॥ सु० ॥ वै० ॥ १५ ॥ वाध्याथी वाध्या घणा, पंचम वर्षे शेठ रे ॥ सू० ॥ पुन रपि ते कण मागीया, विलखी वदूधर जेठ रे ॥ सू० ॥ वै ॥ २० ॥ ना ख्याथी नाखण तणु, काम नलाव्यु तास रे ॥ सू॥ खाधा तिण रांधण थइ, काम करे नन्नास रे ॥ सू०॥वै ॥२१॥ यत्ने हो राख्या तेदने, सोंप्यो २३ २१७ जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. हो सघलो माल रे ॥सू०॥ वृद्धि करी तेणे सद्ध शिरें, पाचोची रे ।। सू० ॥ वै० ॥ २२ ॥ उनिया नोगिया रस्किया, चोपी रोहिणी रे ॥ सू० ॥ एह उपनय मुनि कपरें, गुरुजीयें दीधो ताम रे ॥२०॥ २३ ॥ शेठ सुगुरु दीक्षित वढू, कण पचक व्रत जाण रे ॥ सू० ॥ संघ न मिलावडो, 'नाख्या ते 5 खखाण रे ॥ सू०॥ वै० ॥ २४ ॥ के थाजीविका, व्रत उछे थविनीत रे ॥ सू० ॥ के व्रत पाले जजला, प्रति बोधी न शकत रे ॥ सू० ॥ वे ॥ २५ ॥ ज्या वहुने बूजवे, सम मतिमत रे ॥ सू० ॥ तेह परें विस्तारजो, व्रत गिरुथा गुणवत ॥सू॥ वै ॥२६॥ श्रीजिन वीरतणे समे, दोशे एह सबध रे ॥०॥ मन झानी परकाशीयो, सुणी थया सद्ध दृढ सध रे ॥सू०॥वै० ॥२७॥ शील लेइ देवराजनी, मुनि विचरे उजमाल रे ॥ सू० ॥ सयम साधि अति नतो, कर्म कियां विसराल रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ २७ ॥ अनुक्रमें केवल पामीने, नृप साध्युथरिहत रे॥सू॥ सिम थया जिहां सहजना, शाश्वत सुस्क धनत रे ॥ सू ॥ वै० ॥ २५ ॥ श्री हेमकर जिनवरें, जाख्यो ए अववात रे ॥ सू० ॥ परखी लीजें हो प्राणीया, धर्मरयण एकात रे ॥ सू० ॥ वै. ॥ ३० ॥ प्रथम थहिंसा तिम मृषा, स्तेय विषयनो त्याग ग्रह विरमण जाणीने, जे करे ते मादालाग रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ ३१॥ जिनवाणी निसुणी घणा, प्रतिवण्या विद रे ॥ सू० ॥ सयम देशविर ति धरे, नइक गुण थानव रे ॥ सू० ॥ वै०॥ ३२ ॥ वजायुध जिन वां दीने, धर्म तणो लेश लान रे ॥ सू० ॥ निज नयरी थाविया, पाले रा ज्य थदन रे ॥ सू० ॥ वे ॥ ३३ ॥ चोथे खमें पन्नरमी, ढाल कही जि नवाणी रे ॥ सू० ॥ रामविजय कहे सांगली, करो श्रातमदित जाणी रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ ३५ ॥ सर्व गाथा ॥ ॥ श्लोक तथा गाथा ॥११॥ ॥ दोहा ॥ ॥ सघ चतुर्विध स्थापियो, बनु साधु परिवार ॥ क्षेमकर थरिहंतजी, पुदवी करे विहार ॥१॥ हवे वज्जायुध रानियो, न्यायरीतें चालत । वेरी वश कीधा सवे, गुणमणि रोहण सत ॥ २॥ बन्यदिन बापुषक्षा लामा, चक्र जपन्यु सार॥थाही उत्सव करी,साध्या पट् खेम सार ॥३॥ विजय नलु मगलावती, वरती सघले थाण ॥ लाख चोराशी गम तुरी रे ॥सू॥ परि श्री शातिनाथनो रास खंम चोयो पए लख चोराशी निशाण ॥ ३ ॥ चोसठ सहत यतेउरी, रूपें रन समा न ॥ जनपद सहस वत्रीश पति, वत्रीश सहस राजान ॥ ५॥ श्री वजायुध चक्रधर, वेठा सजाममार ॥ तिण थवसर जे नीपन्यु, ते निसुणो अधिकार ॥ ६ ॥ ॥ ढाल शोलमी॥ ॥ वृदावनमां रे नाथ पधारीया जी ॥ ए देशी ॥ण अवसर रे तिदा एक यावीयो जी, खेचर धूजते श्रग ॥ सुण मगलावती विजयना सादिवा जी, शरण ग्रयु तुम चग ॥ १ ॥ प्रजजी मुफ थनाथने उ परो जी, कहे ननचर कर जोडि ॥ मरण समो जय जगमां को नहिं जी, हवे मुफ वधन बोड ॥ प्र० ॥ २ ॥ एहवे थावी रे पवें खेचरी जी, खड्ग ग्रही करमांहे ॥ वली तस प्ठे विद्याधर परवडो जी, श्राव्यो गदा करें साहि ॥ प्र० ॥ ३ ॥ कहे विद्याधर चक्रायुध सुणो जी, ए पापीनी वात ॥ सुका विजयमा वैताढये वसे जी, शुक्ला पुरी शुन ख्यात ॥ प्र० ॥ ॥ ४ ॥ दत्त नरेश्वर विद्याधर तिहा जी, तेदनो सुत वायुवेग ॥ मुज सुकांता कूखनी ऊपनी जी,शातिमती गुणदेग ॥ प्र० ॥ ५ ॥ एक दिवस में विद्या दिधली जी, प्रज्ञप्तिण नाम ॥ गइ मणिसागर पर्वत साधवा जी, साधे करि मन ठाम ॥ प्र० ॥ ॥ ६ ॥ विद्यासाधन करता यावीयो जी, ए विद्याधर ताम ॥ रूपें मोह्यो पुत्री मुफ हरी जी, जो जो उष्टनां काम ॥ प्र० ॥ ७ ॥ पुत्रीनक्तिये रीजी देवता जी, तुष्ट थइ तेणि वार ॥ नावो रे तिहाथी एकतावलो जी, थाव्यो श्हां निर्धार ॥ ॥ ७ ॥ तिहां नवि दीनी में पुत्री तदा जी, के. धायो दु थाज ॥ राजन् मूको अपराधी नणी जी, नहिं मूक माहाराज ॥ प्र० ।। ए॥ थनिलापी पुत्रीशिलनंगनो जी, करवो एदनो में थत ॥ थवधि निदाले रे वजायुध विन्तु जी, पुरवनव विरतंत ॥प्र ॥॥ १० ॥ कहे प्रतियो धने कारण तुमें सुणो जी, तुफ पुत्री हरी जेद ॥ पूरवनवनो नेह न व्यो हा जी, सानलो सदुजन एद ॥प्र० ॥ ११ ॥ निज प्रतु -ज्ञानी जाणी दरखीया जी, थया सुणवा सावधान ॥ देश उपयोगने वजायुध कहे जी, सुणो तुमें मामीने कान ॥ प्र० ॥१२॥ चोथे खंमें रे ढाल थ , २४७ जैनकथा रत्नकोप जाग आठमो हो सघलो माल रे ॥सू०॥ वृद्धि करी तेणे सह शिरें, पाचोची रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ २२ ॥ उप्निया जोगिया रस्किया, चोपी रोहिती रे ॥ सू० ॥ एह उपनय मुनि ऊपरें, गुरुजीयें दीधो ताम रे ॥९॥ २३ ॥ शेठ सुगुरु दीदित वढू, कण पंचक व्रत जाए रे ॥ सू० ॥ न मिलावडो, 'नाख्या ते 5 खखाण रे ॥ सू० ॥ वे० ॥ १४ ॥ थाजीविका, व्रत उलें थविनीत रे ॥ सू० ॥ के व्रत पाले मजला, बोधी न शकत रे ॥ सू० ॥ वे ॥ २५ ॥ ज्या बद्ने बुजवे, रोहिणी सम मतिमत रे ॥ सू० ॥ तेह परें विस्तारजो, व्रत गिरथा गुणवत में ॥सू॥ वै० ॥२६॥ श्रीजिन वीरतणे समे, होशे एह सबध रे ॥सूापन झानी परकाशीयो, सुणी थया सद् दृढ सध रे ॥सू०॥वै ॥२४॥ शील ले। देवराजनी, मुनि विचरे उजमाल रे ॥ सू० ॥ सयम साधि अति नजो, कर्म किया विसराल रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ २७ ॥ अनुक्रमें केवल पामीने, नृप साध्युथरिहंत रे॥सू॥ सिह थया जिदा सहजना, शाश्वत सुस्क बनत रे ॥ सू० ॥ वै ॥ ५५ ॥ श्री हेमकर जिनवरें, जाख्यो ए श्रवदात रे ॥ सू० ॥ परखी लीजें दो प्राणीया, धर्मरयण एकात रे ॥ सू० ॥ वै ॥ ३० ॥ प्रथम थहिंसा तिम मृषा, स्तेय विषयनो त्याग ग्रह विरमण जाणीने, जे करे ते मादानाग रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ ३१॥ जिनवाणी निसुणी घणा, प्रतिवण्यां विद रे ॥ सू० ॥ सयम देशविर ति धरे, नक गुण थानव रे ॥ सू० ॥ वै॥ ३२ ॥ वजायुध जिन यां दीने, धर्म तणो से लान रे ॥ सू० ॥ निज नयरी थाविया, पाले रा ज्य थदंन रे ॥ सू० ॥ वै० ॥ ३३ ॥ चोथे खमें पन्नरमी, ढाल कही जि नवाणी रे ॥ सू० ॥ रामविनय कहे सांजली, करो श्रातमहित जाणी रे ॥ सू० ॥०॥ ३४ ॥ सर्व गाथा ॥ १७ ॥ श्लोक तथा गाथा ॥११॥ ॥ दोहा॥ ॥ सघ चतुर्विध स्थापियो, बद्ध साधु परिवार ॥ क्षेमकर अरिहंतजी, पुहवी करे विहार ॥ १ ॥ हवे वजायुध राजियो, न्यायरीसे चालत ॥ वैरी वश कीधा सवे, गुणमणि रोहण सत ॥ २ ॥ बन्यदिन श्रायुधमा लामा, चक कपन्यु सार॥थनदी उत्सव करी, साध्या षट् खम सार ॥३ विजय नलु मगलावती, वरती सघले थाण ॥ लाख चोराशी गम तुरी रें ॥सूण परि ते श्री शातिनाथनो रास खंम चोयो. २४ए लख चोराशी निशाण ॥४॥ चोसठ सहस अतेरी, रूपें रन समा न ॥ जनपद सहस वत्रीश पति, वत्रीश सहस राजान ॥ ५॥ श्री वजायुध चक्रधर, वेठा सजामजार ॥ तिण अवसर जे नीपन्यु, निसुणो थधिकार ॥ ६ ॥ ॥ ढाल शोलमी॥ ॥ वृदावनमां रे नाथ पधारीया जी ॥ ए देशी ॥ इण अवसर रे तिहा एक यावीयो जी, खेचर धूजते अग ॥ सुण मगलावती विजयना सादिवा जी, शरण प्रत्यु तुम चग ॥ १ ॥ प्रचुजी मुफ यनाथने छ रो जी, कहे ननचर कर जोडि ॥ मरण समो नय जगमा को नहिं जी, मुक वधन बोड ॥प्र० ॥ ५ ॥ एहवे यावी रे पूढे खेचरी जी, खड्ग यही करमाहे ॥ वली तस पूवें विद्याधर परवडो जी, श्राव्यो गदा करें साहि ॥ प्र॥ ३ ॥ कहे विद्याधर चक्रायुध सुणो जी, ए पापीनी वात ॥ सुकह विजयमां वैताढचे वसे जी, शुक्ला पुरी गुन ख्यात ॥ प्र० ॥ ॥ ४ ॥ दत्त नरेश्वर विद्याधर तिदा जी, तेहनो दु सुत वायुवेग ॥ मुक सुकांता कूखनी कपनी जी, शातिमती गुणदेग ॥ प्र० ॥ ५ ॥ एक दिवस में विद्या विधली जी, प्रज्ञप्तिण नाम ॥ गइ मणिसागर पर्वत साधवा जी, साधे करि मन ठाम ॥ प्र०॥॥ ६ ॥ विद्यासाधन करता यावीयो जी, ए विद्याधर ताम ॥ रूपें मोह्यो पुत्री मुफ हरी जी, जो जो उष्टनां काम ॥प्र० ॥ ॥ पुत्रीनक्तिये रीजी देवता जी, तुष्ट थइ तेणि वार ॥ नागे रे तिहाथी ए कतावलो जी, थाव्यो हां निर्धार ॥प्र० ॥ ७ ॥ तिहां नवि दीठी में पुत्री तदा जी, के. धायो दु थाज ॥ राजन् मूको अपराधी नणी जी, नहिं मूक माहाराज ॥ प्र० ॥ ए॥ अनितापी पुत्री शिलनगनो जी, करवो एहनो में अंत ॥ थवधि निहाले रे वजायुध विठ जी, पूरवनव विरतंत ॥प्र० ॥ ॥ १० ॥ कहे प्रतियो धने कारण तुमें सुणो जी, तुफ पुत्री ही जेद ॥ पूरवनवनो नेह न ड्यो श्हां जी, सांजलो सट्ठजन एह ॥प्र० ॥ ११ ॥ निज प्र -झानी जाणी दरखीया जी, थया मुणवा सावधान ॥ देइ उपयोगने वजायुध कहे जी, सुणो तुमें मामीने कान ॥ प्र० ॥१२॥ चोथे खमें रे ढाल था . १७० जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. शोलमी जी, नवि सुणो वात रसाल ॥ रामविजय कहे धन्य जी, वजायुध रे नूपाल ॥प्र०॥ १३ ॥ सर्वगाथा ॥ ४०॥ १ ॥ ढाल सत्तरमी॥ ॥ मरु रे सुदावा नयण्डे ॥ ए देशी ॥ वात मुणो वेरागनी, युध नरदेव ॥ वाहाला ॥ पूरवनव सवधथी, होवे राग वेरागनी टेव ॥ १ ॥ वात मुणो वैरागनी ॥ए याकणी ॥ ऐरवतें जवुदीपमा, एक पुर नामें गाम ॥वा॥ वध्यदत्त राजा नलो,करे धर्म तणां उनकामा ॥वा॥२॥राणी सुलक्षणा कूरखनो,एक तनय नलिनकेतु सार वा माथि त्रने वदालो घणु, जरयौवन कांति थपार ॥वावाशा तेहज नवर मांहे वसे, एक धनमित्र सारथवाद ॥ वा० ॥ श्रीदत्ता नारी जली, एप सुत जनम्यो उत्साह ॥ वा ॥वा॥ ५ ॥ यौवन वय परणावियो, तेव मनोहर रूप निधान ॥ वा ॥ कन्या नामें प्रनकरा, सवली अति सुंदर वान ॥ वा ॥ वा ॥ ५ ॥ जर यौवन नामिनी थइ, मन्मथ वसवार्नु धाम ॥ वा० ॥ प्रीतमसाथै प्रेमनी, करे कीडा थति थनिराम ॥ वा ॥ वा० ॥ ६ ॥ एक दिन मास वसतमा, लेइ नारी प्रनकरा साथ ॥ वा ॥ दत्त ते वनमाहे यावीयो, करे कीडा जलसघात ॥ वा ॥ वा० ॥ ॥ देवकुवर देवांगना, मानु उतरियां थाकाश ॥ वा० ॥ दपती दोय दिलाई मल्या, विरु एद विषयनो पास ॥ वा ॥ वा ॥ ॥ तष राजकुंवर तिहां थावियो, तेद नलिनकेतु तिण वाय ॥ वा०॥ देखी प्रनकरा मोहि यो, मन थटकि रघु तिदां जाय ॥वावा॥॥ मृगनयनी मनमोहनी, मनमांदे वसी ते थाय ॥वा०॥ शुक्षि बुद्धि सविनूली गयो, रह्यो कुमर त्या लगन लगाय ॥वा॥वा॥१०॥ कामातुर सबलो थयो, तेणें जला मूकी दूर ॥वा॥ विकल करे माणास नणी, ए प्रेमपयोनिधि पू ॥वा०॥वा० ॥ ११ ॥ यक्त ॥ विकलयति कलाकुशल, दसति शुचि पंमित विउपयति ॥ थधरयति धीरपुरुष, क्ष्णेन मकरध्वजोदेव ॥१॥ कृश काण ॥२॥ पूर्वढाल ॥ यौवनगर्वित राजगु, कुल शील न कीध. विचार ॥ वा० ॥ ते ६ प्रनकरा थपहरी, थाव्यो गृह राजकुमार ॥ वा० ॥ वा० ॥ ११ ॥ पियु तस टलवलतोरह्यो,थदोथहो जुनजोरनी वात ॥वा॥ धींगो परपम जोगवे, संत खाये देश लात ॥वावा॥१३॥ जुलम इस्पो नाणी करी, , श्री शातिनाथनो रास खंम चोयो. २१ बढ़ लोक थया दिलगीर ॥ वा ॥ जोर न चाले रायशु, तस विरहें कत यधीर ॥ वा ॥ वा ॥ १४ ॥ हा हा प्रनकरा कामिनी, तें थप टतुं कीधु केम ॥ वाहाली ॥ विरहव्यथामां नारखीयो, विसायो नवरस प्रेम ॥ वा० ॥ वा० ॥ १५ ॥ एक दिन दत्त उद्यानमां, मुनि केवलज्ञान दिखद ॥ वाहाला ॥ वांदीने निसुणी देशना, मन पाम्यो परमानद । वा ॥ वा० ॥ १६ ॥ देशन सुणी घरे थावियो, करि दानादिक गुनधर्म ॥ वा० ॥ थायु क्ये चवि कपन्यो, कह विजयमाहे निज कर्म ॥ वा ॥ वा० ॥ १७ ॥ महेशविक्रम वैताढघमां खेचर नूपति वलवत ॥ वा० ॥ तास तणे कुनै उपन्यो, नामें अजितसेन गुणवत ॥ वा० ॥ वा ॥ १७ ॥ कमला हो तस कामिनी थर हवे नलिनकेतु कुमार ॥वा०॥ पितरनु राज्य सही करी, करे क्रीडा अनेक प्रकार ॥ वा० ॥ वा० ॥ १५ ॥ प्रनकरायं रगलं, सुख माणे रात ने दीप्त ॥वा॥ वेग सातमीनूमिका, एक दिन मन धरिय जगीश ॥ वा वा॥२०॥ पंच वरण वादल थया, सोहे वावती रग वनाव ॥वा॥ नजरें निहाले दोय जणा, थयो कौतुक ख्याल जमाव ॥ वा० ॥ वा ॥ २१ ॥ थया विसराल ते ततक्षणे, पवनें वल नाख्यां दूर ॥ वा० ॥ स्वप्नोपम एम देखिने, मनें याव्यु वैराग्यनु पूर ॥वा० ॥ ॥ वा ॥ २२ ॥ धन यौवन सवि कारिमु, जेवु वादलनु स्वरूप ॥वा०॥ यहो जुन एदने कारणे, श्या श्या करे प्राणी विरूप ॥ वा० ॥ वा० ॥ २३ ॥ पुजल ए सवि कारिमा, सवि अस्थिर ए तन धन जोग । वा०॥ साचा करीने सहह्या, ढुं नीनो नामिनी नोग ॥ वा ॥ वा ॥ २४ ॥ में मलिन कस्यो निज थातमा, परतरुणी केरे राग ॥ वा० ॥ क्षणिक ए सुखने कारणें, बहु पाप कस्यु नि ग्य ॥ वा० ॥ वा० ॥ २५ ॥ पतित घणो मुफ जेदवो, कुण तारे विण जिन माग ॥ वा ॥ दवे सयम तप थादरुं, तरवा लवसिधु थताग ॥ वा० ॥ वा० ॥ २६ ॥ निज सुत राज्य ववी करी, क्षेमकर प्रजुने हाय ॥ वा० ॥ नलिनकेतु व्रत थादसो, विच सो महि था मुनिनाथ ॥ वा ॥ वा० ॥ २७ ॥ शम दमवतो साधुजी, गिरुन गुणमणि नमार ॥ वा० ॥ दोप रहित थाहार ले, मुनि पाले पं चाचार ॥ वा० ॥ वा० ॥ २७ ॥ नदि ममता निज देहनी, पट्काय त णा गोवाल ॥ वा ॥ घाती करम क्य केवली, यश् मुक्तियें गया तत - । र २२ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. काल ॥ वा० ॥ वा ॥ ए ॥ नलिनीकेतु सिमने नमुं, ईर जाल ॥ वा० ॥ कर्मनो कचरो काढीयो, धरिये तस ध्यान ॥ वाण॥३०॥ चोथे दो खमें सत्तरमी, कही रामविजयें एहस बलिहारी गुणवतनी, जे राखे हो मनटुं वालि ॥वावा॥ ॥दोहा॥ ॥ वली वजायुध नृप कहे, प्रनकरा जे नारि ॥ सुव्रता चांशयण तप सार ॥ १ ॥ शुननावें तप थादरी, मरण लही ते शांतिमती दुर तादरी, पुत्री गुण नमार ॥ २ ॥ पूरवनव जरतार , जितसेन ननचार ॥ दीनी विद्या साधती, प्रगट्यो मोह विकार । तिण कारण इण अपहरी, पवनवेग सुण साच ॥ कोप म कर ए रें, साचे मारग राच ॥ ॥ शातिमती तु पण निसुणी, मूक्म कोप ए काज ॥ वैर नेद जीरण नहि, एम वोले मुनिराज ॥ ५ ॥ ॥ ढाल थढारमी॥ ॥ म्हाने दीपो थाइ जी थादेश के, द वही रामतमें रम्यां दो राज ए देशी॥निसुणी निसुणी वायुधनी वात के, विदु विद्याधर चितवे हो राम। धन धन एदनुज्ञान थपूव नाति के, कर जोडीने वीनवे दो राज ॥१॥ मलिया मलिया थें थमने महाराज के, दिन वलीया दवे माहरा हो राज टलिया टलिया नरम गरीबनिवाज के,में सेवक बां थाहरा दो राज ॥ जांखे नांखे शांतिमती तनि रीप के, पूरव नवना नायने हो राज ॥स्वमजो खमजो गुनदो मुझ नूमीश के, जे मूक्यो तुम साथने हो राज ॥३॥ कीयो कीधो बिद्ध राजवीयें मेल के, श्री वजापुध वागलें दो राज ॥ सीधा, सी धां मन कीधा नेलसेल के, साजन न रहे थामले दो रान ॥ ४ ॥ बोबे बोले श्री वजायुध राय के, सना सद्गु उद्देशीने दो राज ॥ एतो एहनो पर वनव कह्यो नाय के, दवे सुणो थागल वेसिने दो राज ॥ ५ ॥ नेशे बेशे शातिमती ए दीख के, बिद्धं विद्याधरशुं मती दो राज ॥ करशे करशे वर गुणने उदेखि के, निर्मल तप रत्नावली दो राज ॥ ६॥ पाली पाली सण साथक दोय के, सागर थाम ईशानमा दो राज॥दोशे होशे व परो मुरलोक के, गुण गाशे सुर तानमा दो राज ॥ ७॥ तेणें अवसरें वायुकेचा मुषिद के, थजितसेन मुनिने वली दो राज ॥ परगट होशे केवल ना श्री शांतिनाथनो रास खंग चोथो. २३ दिपद के, थावशे ए मन रली हो राज ॥ ७ ॥ करशे करशे उत्सव विविध प्रकार के, ईशानेजी ललि लाली दो राज ॥ई लेई लान अपा र के, सुरलोकें जाशे वली दो राज ॥ ए ॥ २ तिहाथी उत्तम कुल यव तार के, लहीने दीदा साधशे हो राज ॥ करतां करतां कय विहार के, शुन गुणगाणे वाधशे दो राज ॥१०॥ शोधी शोधी कर्मतणो करि थत के, शिवलीलाने पामशे हो राज ॥ वरशे धरो एदनु ध्यान सुचित के,ते सवि उखने वामशे हो राज ॥ ११ ॥ दारव्यु दाख्यु पट खम केरे नाथ के,थ वरिझाने वालहे हो राज ॥ सानली सानली सयलडो साथ के, हर्प हियडले बढुलो सहे हो राज ॥ १२ ॥ साचु साचु तुम्ह तणु झान के,का सत्रय दीपक जिस्यु हो राज ॥ कीजे कीजें तास गुणज्ञान के, थवर कोश्नु नहि इस्यु हो राज ॥ १३ ॥ शातिमती ने वायुवेग महीश के, थजितसेन त्रीजो सही हो राज ॥ प्रणमी प्रणमी पाय चक्रीश के, निजस्थानक पहोता वही हो राज ॥ १४ ॥ रूडे रूडे राज्य हवे नरदेव के, पाले नित्य चढती कला हो राज ॥ कुवर रूडा सहस्रायुध करे सेव के, विनय गुणें करी थागला हो राज ॥ १५ ॥ सदस्रायुध घरे नाम जयतीनारी के, तेनी कूखें कपन्यो हो राज ॥ रूडो रूडो कनकशक्ति कु मार के, नरयोवन वय नीपन्यो दो राज ॥ १६ ॥ परणावी तस कामि नी दोय रसाल के, कनक वसत जोडिये दो राज ॥ माला सेना पद सुकुमार के, रना न थावे होडियें हो राज ॥१॥ मुख विलसतां रात ने दीस के, काल गयो केतो वही हो राज ॥ ढाल अढारमी चोथे खमें जगीश के, रामविजय जांखी सही दो राज ॥ १७ ॥ सर्वगाथा ॥ ५४१ ॥२५॥ ॥ दोहा सोरठी॥ ॥ कनकशक्ति कुमार, स्त्रीसघातें एकदा ॥ पहोतो गहन ममार, क्रीडा करतो थनिनवी ॥ १ ॥ पतनोत्पतन करत, कोई नर दीठो कुवरें ॥ तिहां जश्ने बत, कहो मुफ ए कारण किस्यु ॥ २ ॥ तेह कहे वैताढय, वासी दु ननचारीयो ॥ पण मुण गुणरयणाढ्य, विद्यापद एक जलियो ॥ ३ ॥ मही न शकु थाकाश, उंचेथी नीचो पड़े ॥ कुमर कहे परकाश, पद पूरु तुफ परवद्धं ॥ ४ ॥ पद लब्धि थनुसार, पूयं प्रेम लह्यो घणो ॥ तिण खेचर तिण वार, विद्या दीधि कुमारने ॥ ५ ॥ तेण प्रकाशी रीति, विद्या , . * २२ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. काल ॥ वा ॥ वा० ॥ २५ ॥ नलिनीकेतु सिमने नमुं,हुंकार जाल ॥ वा० ॥ कर्मनो कचरो काढीयो, धरिये तस ध्यान ॥वा॥३०॥ चोथे दो खमें सत्तरमी, कही रामविजयें एहान बलिहारी गुणवतनी, जे राखे दो मनडु वालि वाणावा॥१ ॥ दोहा ॥ ॥ वत्ती वजायुध नृप कहे, प्रनकरा जे नारि ॥ सुव्रता चांशयण तप सार ॥ १ ॥ गुजनावें तप थादरी, मरण लही ते नारि शांतिमती दुइ तादरी, पुत्री गुण नमार ॥२॥ पूरवनव जरतार ए, जितसेन ननचार ॥ दीनी विद्या साधती, प्रगट्यो मोह विकार । तिण कारण इण थपदरी, पवनवेग सुण साच ॥ कोप म कर ए रें, साचे मारग राच ॥ ॥ शातिमती तु पण निसुणी, मूक्य कोप ण काज ॥ वैर नेद जीरण नहि, एम बोले मुनिराज ॥ ५ ॥ ॥ ढाल बढारमी॥ ॥ म्हाने दीधो थाइ जी थादेश के, वडी रामतमें रम्यां दो राज ए वेशीनिसुणी निसुणी वजापुधनी वात के, बिलु विद्याधर चितवे हो राजम धन धन एदनुज्ञान थपूरव जाति के, कर जोडीने वीनवे दो राज ॥१॥ मलिया मलिया थें थमने महाराज के, दिन वलीया दवे माहरा हो राज टलिया टलिया नरम गरीबनिवाज के,में सेवक बां थादरा दो राज ॥२॥ नांखे नाखे शांतिमती तजिरीप के, पूरव नवना नायने हो राज॥ खमओ खमजो गुनदो मुफ नूमीश के, जे मुक्यो तुम सायने हो राज ॥२॥ कीधो कीधो बिद्व राजवीयें मेज के, श्री बजायुध पागलें हो राज ॥ सीधा सी धां मन कीधां नेलसेल के, साजन न रहे थामले दो राज ॥ ४ ॥ बोले बोले श्री वज्जायुध राय के, सना सढ उद्देशीने दो राज ॥ एतो एहनो पूर वनव कह्यो नाय के, दवे सुणो धागल बेसिने दो राज ॥ ५ ॥ शे जेरो शांतिमती ए दीख के, बिनु विद्याधरशु मली दो राज ॥ करशे करशे अब गुणने वेखि के, निर्मज तप रत्नावती दो राज ॥ ६॥ पाली पाली अण सण साथक दोय के, सागर थाम ईशानमा दो राज॥ होशे होशे १६ बरसे सुरलोक के, गुण गाशे सुर तानमा दो राज ॥ ॥ तेणे अवसरें वायुवेग मुषिद के, थजितसेन मुनिने वली दो राज ॥ परगट होशे केवज नाव , -- , श्री शातिनाथनो रास खंम चोथो. ՀԱԱ प्रीतम वदु नेह, सुरूप सोहागणी रे के ॥ सु० ॥ गुण सघता सतान, नहि एक तेहने रे के ॥ न० ॥ एहिज महोटी खोट, चाहे जग जेहने रे के ॥ चा० ॥ ५ ॥ पुत्र तणी वदु धाश, स्वजन प्रेरे घणु रे के ॥ स्व० ॥ नवी परणे रखे थाय, प्रिया दिल दुमणु रे के ॥ प्रि० ॥ कुनदेवी थाग ल जइ, वेदु एम उच्चरे रे के ॥ वे ॥ स्वामिनि सुतनी चिता, क्षण ६ ण सांगरे रे के ॥ १० ॥ ३ ॥ कोण करो तुक नक्ति, विमासण ठे घणी रे के ॥ वि० ॥ जूवो झान प्रयुजी, मया करो यम नणी रे के ॥ म० ॥ देवी कहे सुण शेठ, होशे सुत सुदरु रे के ॥ हो ॥ पुण्य करतां गुणमणि, रोहण धरु रे के ॥ रो० ॥ ४॥ हर्पित हू शेठ, घणु मनमा रली रे के ॥ १० ॥ चिते माहरी थाजयी, नाग्यदशा वली रे के ॥ना॥ पुण्य तणा करे काज, दयागुण थादरे रे के ॥ द० ॥ दीन दुखी जे लोक, तेजने नहरे रे के ॥ ते ॥ ५ ॥ पुण्यसिरी कुलदेवी, सनारी हेज मा रे के ॥ स ॥ एक दिन रयणीमकार के, सूती सेजमा रेके ॥ सू० ॥ दीगो शोलकला, सपूण चदलो रे के ॥ पूण् ॥ विनावियो जइ शेठ के, सुपन लयो जलो रे ॥ सु ॥ ६ ॥ होशे पुत्ररतन, मनोरथ पूरशे रे के ॥ म ॥ शेव कहे सुत याव्यो, सकट चूरशे रे के ॥ स० ॥ हर्प लही मनमाहि, गर्न प्रतिपालना रे के ॥ ग ॥ कालें जनम्यो पुत्र, करे वह लालना रे के ॥ कण् ॥ ७ ॥ उत्सव कीध थपार, अनेक वधामणा रे के ॥ य० ॥ नाम धस्नु पुण्यसार, मली साजन घणां रे के ॥ म ॥ फलि या मनोरथ सार के, मात पिता तणा रे के ॥ मा० ॥ देखी सुतमुख चद के, दर्पनी नहि मणा रे के ॥ ह ॥ ७ ॥ पच धाव सुत के., वीटा ईरहे रे के ॥ वीं ॥ चिर जीवो मुत एम, सद्व मुखथी कहे रे के ॥ स० ॥ पंच वरस थया ताम, निशा पाठव्यो रे के ॥ नि०॥ सकल कला थन्यास, करे नित्य थनिनवो रे के ॥ क० ॥५॥ रत्नसार एक शेत, तणी तिहा दीकरी रे के ॥त॥ रत्नसुदरी इण नाम, जरो तिहा गुणनरी रे के ॥ ज० ॥ ते विट्ठ जोडे दोडा, दोडें नणे जला रे के ॥ दो० ॥ मादो माहे विवाद, करे ते गुणनिलां रे के ॥ कण् ॥ १० ॥ चपलपणाथी जोर के, वोले थाकुली रे के ॥ बो० ॥ पुण्यसार सघातें, ऊगडे व्याकु ली रे के ॥ ज० ॥ शास्त्र तणो रे विवाद, करे थमरप चढी रे के क॥

X २४ जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. साधी कुवरें ॥ वेद स्त्रीशुं शुनचित्त, मन मानी मोजें फरे ।। हिमगिरि गम, गयो कुमर ते यन्यदा ॥ दीठ विपुलमति नाम, द्याधर वशना ॥ ७ ॥ तास चरण प्रणमेवि, प्रिया सहित बहु वेसे कर जोडेवि, कनकशक्ति वद विनय ॥ ७ ॥ धर्मतणो उपरेश, वरजी जांखे नलो ॥ दूरे दोय किलेश, शिवसुखनो दायक सही । ॥ ढालगणीशमी॥ ॥ रे जीउ जगत सुपनो जाण ॥ ए देशी ॥ कहे मुनिवर प्राणी, कारिमो ससार ॥ ए रूप यौवन पर जलनु, विणता वार ॥ मनमांहे श्राशा बदत धरतो, फरत देश विदेश ॥ धन काज दिवस धावे, धर्म नहि लवलेश ॥ १ ॥रे जीव चेत चतुर सुजाण ॥ श्रांकणी ॥ थाण माने मोद केरी, जिण कीयो हेरान ॥ प्रपंच पुत्रल न लहे, ए अनादि पुराण ॥ सयोग एद वियोग साथै, नित्य माने भ्रम जाल पडियो प्राणीया, मुंही गयो नव खोय ॥ रे जी० ॥ १ ॥ शुम चेतन रूप तेरो, थनतगुण पर्याय ॥ इदि घटमें प्रगट दीसे, करे सोई उपाय ॥ निरावरण समाधि जोगी, योगसें चित्त लाय ॥ थानवपन उपगार तेरो, तुहि एक सदाय ॥ रे जी० ॥३॥ करि धर्मवस्तु सजाय जाणी, मोदमिथ्या दूर ॥ ध्येय ध्याता ध्यान एकी,नावथी सुखपूर ॥ चूर प्रगटे विषय विघटे, नेद जाये नासी ॥ यू शुक्षधर्मे साध्य साधन, सहज लील विलास ॥ रे जी० ॥ ४ ॥ परनाव पुल कच कुलमां, रुप लही विलास ॥ वर कामिनीके नोग सुदर, बद्री वासी दास ॥ उकुरा चितित काम होवे, सबदि माने थाण ॥ धर्मसाधन करत ए फल, बाद षंगिक जाण ॥ रे जी० ॥ ५ ॥ ज्यु पुण्यसार कुमार पायो, सर्व चितित जोग ॥ वर दिलाधी कीर्ति वाधी, कामिनी सयोग ॥ कहे कनक ' शक्ति कुमार मुनिकों, कहो उनकी बात ॥ कहे ज्ञानी सुन हो पानी, पुस से सुखशात ॥ रे जी॥॥ ढाल ॥ त्रिनुवन तारण तीरथ पास चिंतामणि रे॥ए देशी॥ गोपालक पुर क्षेत्र,जरतमा दे दीपतु रे के॥नरतमाहे वीपतुं ॥ सुदर शोना सार,सवि पुर जीपतु रे के ॥ स ॥ तिहां धर्माशिरवार, पुरंदर नामथी रे के ॥ पु० ॥ शेठ वसे गुणवत, प्रतिको नामथी रे के। प्र० ॥ १ ॥ तस घर पुण्यसिरी ण, नामें पमिनी रे के॥ नामें। . .

श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो. २७ में विवाह, मेलो हमणा जरे के ॥ मे ॥ पढ़ें तुम साथे नौजन, कर सु हुं वही रे के ॥ क ॥ कहे पुरदर ऊत, जमीनें दा कही रे के ॥ ज० ॥ १ ॥ चोथे खमें ढाल, कही गयीशमी रे के ॥ क ॥ वालप णानी वात, कही साकर समीरे के ॥ क० ॥ बुध श्रीमुमतिविजय कवि, सेवक विनवे रे के ॥ से० ॥ रामविजय कहे धन्य, विचारी जे लवे रे के ॥ वि० ॥२२॥ सर्वगाथा ॥५४॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥२॥ ॥ दोहा॥ ॥ जोजन करि कन्या पड़ी, लइ साथै परिवार ॥ शेव पुरवर थावीयो, रत्नसार घरवार ॥ १ ॥थादर मान दिये घणा, मामे आसन सार । स्वामी पधाया थागणे, धन्य अमचो अवतार ॥ २ ॥ कदो स्वा मी कारण किश्यु, कहे पुरदर वात ॥ रनसुदरी तुम मुता, पुण्यसार अम जात ॥ ३ ॥ जोडी जली जुगती थने, मेलीजें विवाह ॥ण का रण थाव्या थडु, मनमां धरि उत्साह ॥ ४ ॥ रत्नसार कहे शेवजी, ए तो महारु काज ॥ तुमें कस्यु करुणा करि, सीधा वानित राज ॥ ५ ॥ देवी तुम सुतने सुता, रत्नसुदरी सार ॥ पुण्य विना किहांथी मजे, पुण्यसार जरतार ॥६॥ ॥ ढाल वीशमी॥ ॥ लेडो नांजी ।। ए देशी । तात समीपे वेठी कन्या, पर चावी ॥ ना ना नहिं परणु दु एदने, वात ए मुफ न सुहावी ॥१॥ नाय कदोजी ॥ दा रेतुमें शीदने समजावो, अलगा रदो जी ॥ए आंकणीजे जाणो तेथवर कोश्ने, तातजी मुफ परणावो॥ वरकुवारी रहिश ते वारु, पण पुण्यसार न गावो ॥ नाय ॥ २ ॥ शेत पुरदर चिते मनमा, जुळे वोले शु वाला ॥ मुफ सुत थाशा करे परणवा, पण खोटा एहना चाला ॥ ना० ॥ ३ ॥ वालपणे ए एह बोले, यौवनमद मतवाली ॥थागल मुज सुतने ए साथें, न मले सुखनी ताली ॥ ना० ॥ ४ ॥ रत्नसार कहे मुग्धा वाला, ए शु बोली जाणे ॥ पीत बाल विटनु जे योग्यु, ते कुण मनमा थाणे ॥ ना० ॥ ५ ॥ एदने द्व समजावीश सूधी, तुम सुतने परणेशे ॥ ए कुलवती कन्या मदारी, साहामो जबाप न देशे ॥ना॥६॥ वचन सुणीने पालो बलीयो, परिजन घरे थाष्यो ॥ सुत पुण्यसार उत्स बोले इण - . - १७६ जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. तिल नवि साखे बोल के, वोले चडवडी रे के ॥ यो ॥११॥ पुण्यसार, कुमार कहे इस्यु रे के ॥ कु० ॥ रे मुग्धा मुफ साप, करे किस्यु रे के ॥ वि० ॥ यद्यपि तु गुणवत, कलावत परवरी रे क० ॥ थाखर परण्या पूठे, पुरुप पग मोजडी रे के ॥ पु॥१२॥ पनोता सार, कह्या ससारमा रे के ॥ क० ॥ दासीपरें घरकाज, परिवारमा रे के ॥क० ॥ त्रटकी वोले वोल, चढावी रीपने रे के कोक जाग्यविशालने, वरिश द ईशने रे के ॥ व० ॥ १३ ॥ तुज जेवा कगाल, घणा जगमा फरे रे के ॥ ५० ॥ मुज जेवी गुणवती, किमही में श्रादरे रे के ॥ कि ॥ वोल्यो ताम कुमार, वरु जो तुमने रे के ॥ व ॥ जो करु किकरी तुक तो, माने मुफने रे के ॥ मा ॥ १४ ॥ बोली पर की चम रे, मूरख छ लवे रे के ॥ मू० ॥ जोरें अनन्यप्रीति, दपती केम सनवे रे के ॥ दण् ॥ श्रयो वढु वार विवाद, दैयाना रोपा रे के ॥ है। कुंवर चिते रीष ए, अवसरें पोपा रे के ॥4॥१५॥जो जो बोले पोल, किदांनी किहां थई रे के ॥ कि० ॥ विद्यावादनी वातें, वात हा गइ रे के ॥ वा० ॥ ते पुण्यसार कुमार, थाप्यो निज घर जणी.रे के ॥श्रा० । मुखपंकज थयुं म्लान, थारति मनमा घणी रे के ॥ था० ॥१५॥ सूतो त्रूटी खाट, जई एकण विशे रे के ॥ ज० ॥ शेठ पुरंदर जोजन, कान याच्या तिस्य रे के ॥ का ॥ देखी पुत्रने सूतो, ठेकाणे शून्यमा रे के ॥ ४० ॥ पूरे कारण कोण, शु चितो मन्नमां रे के ॥ ॥ १४ ॥ वात कहे वत्स थाज, विचार जे तादरे रे के ॥ वि० ॥ जीवन प्राणा धार, तु एकज मादरे रे के ॥ तु० ॥ पूजघु थामह जोरें, तदा कहे तात जीरे के ॥ तम् ॥ रत्नसुदरी परणावो, मुफ ए वातजी रे के ॥ मु. १७ ॥ रमसार व्यवहारी, नी ए यगजा रे के ॥ नी० ॥ ए परणावे पुष्ट, होशे मदारी मजा रे के ॥दो॥ तात कहे सुण पुत्र, दजी तु मानने रे के ॥ ६ ॥ तो दमणां शी वात, नस्यानो काल ले रे के। १५ ॥ यौवन समये तास, करेशु विवाहलो रे के ॥ क० ॥ परणामा नो अम्द, घणो ने उमाइलो रे के ॥ ५० ॥ परणवा माटें थाम, चाचे का कादलो रे के ॥ था० ॥ लाग्यवती ते नारी, यश जस नाहलो रे ) था ॥ २० ॥ पुण्यसार कहे वात, न मानु ए सही रे के ॥न॥ ते सा , श्री शातिनाथनो रास खंम चोयो. ចទ ये विवाह, मेलो हमणां जरे के ॥ मे ॥ पवें तुम सायें नौजन, कर यु ढुं वही रे के ॥ क० ॥ कहे पुरदर ऊत, जमीनें हा क्ही रे के । ज० ॥ २१ ॥ चोये खमें ढाल, कही जंगणीशमी रे के ॥ कल ॥ वालप गानी वात, कही ताकर समीरे के॥ कण् ॥ बुध श्रीनुमतिविजय कवि, सेवक विनवे रे के ॥ से० ॥ रामविजय कहे धन्य, विचारी जे सवे रे के ॥ वि० ॥२॥ तवंगाथा ॥५७॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥२॥ ॥ दोहा ॥ ॥ भोजन करि कन्या पनी, लश्तायें परिवार । शेठ पुरदर यावीयो, रत्नतार घरवार ॥ १ ॥ यादर मान दिये घणा, मामे वातन तार ॥ खामी पधाया थागणे, धन्य थमचो थवतार ॥ २ ॥ कहो वा मी कारण किश्युं, कहे पुरदर वात ॥ रत्नसुंदरी तुम जुता, पुरवत्तार थम जात ॥ ३ ॥ जोडी नली जुगती थडे, मेनीले विवाह ॥ण का रण थाया थर्बु, मनमा परि उत्साह ॥ ॥ रत्नसार कहे शेवजी, ए तो महारु काज ॥ तुमें कयुं करुणा करि, सीधा वाठित राज ॥ ५ ॥ देवी तुम उतने उता, रत्नसुंदरी तार ॥ पुण्य विना किहांथी मले, पुण्यतार जरतार ॥६॥ ॥ढाल वीशमी॥ ॥ वेडो नांजी ॥ ए देशी ॥ तात तमी वेवी कन्या, बोले इण परें चावी ॥ ना ना नहिं परणु हूँ एहने, वात ए मुफ न तुहावी ॥१॥ नाय क्होजी ॥ हां रे तुमें शीदने समजावो, घलगा रहो नी ॥ एयांकणी॥जे जाणोतेथवर कोक्ने, तातजी मुफ परणावो॥ वरकुवारी रहिश तेवार, पण पुखतार न गावो ॥ नाय ॥ २ ॥ त पुरदर चिंते मनमां, जु बोले शु वाला ॥ मुफ त थाशा करे परणवा, पण खोटा एहना चाला ॥ ना० ॥ ३ ॥ बालपणे ए एहबु बोले, यौवनमद मतवाली ॥ धागन मुफ सुतने ए ताचें, न मले सुखनी ताली ॥ ना० ॥ ४ ॥ रनतार कहे मुग्धा वाजा, ए शुं बोली जाणे ॥ पीत वाज विटनु जे बोल्युं, ते कुण मनमा थाणे ॥ ना ॥ ५॥ एहने ढुं समजावीश सुधी, तुम नुतने परणे ॥ ए कुलवती कन्या महारी, ताहामो जवाप न देशे ॥ना॥॥ वचन तुणीने पाठो वलीयो, परिजना घरेयायो ॥ सुत पुस्खतार उत्स , २०६ जैनकथा रनकोप नाग श्राठमो. तिल नवि साखे बोल के, बोले चडवही रे के ॥ बो० ॥११॥ पुण्यसार, कुमार कहे इस्यु रे के ॥ कु० ॥ रे मुग्धा मुज साप, करे किस्यु रे के ॥ वि०॥ यद्यपि तु गुणवत, कलावत परवरी रे क० ॥ थाखर परण्या पूढे, पुरुप पग मोजडी रे के ॥ पु० ॥१५॥ पनोता सार, कह्या ससारमा रे के ॥ क० ॥ दासीपरें घरकाज, परिवारमा रे केक ॥ त्रटकी वोले वोल, चढावी रीपने रे के कोक लाग्यविशालने, वरिश हु ईशने रे के ॥ व ॥ १३ ॥ तुज कगाल, घणा जगमा फरे रे के ॥ ५० ॥ मुफ जेवी गुणवती, किमही थादरे रे के ॥ कि ॥ वोव्यो ताम कुमार, वरु जो तुमने रे के ॥ जो करु किंकरी तुफ तो, माने मुझने रे के ॥ मा ॥ १४ ॥ बोली की चम रे, मूरख शं लवे रे के ॥ मू० ॥ जोरें अनन्यप्रीति, दंपती नेम संनवे रे के ॥ दण् ॥ श्रयो बहु वार विवाद, हैयाना रोप रे के ॥ है।" कुवर चिंते रीष ए, श्रवसरें पोपशु रे के ॥॥१५॥जो जो बोले पोल, किहांनी किदा थइ रे के ॥ कि० ॥ विद्यावादनी वातें, वात दामें गइ रे के ॥ वा० ॥ ते पुण्यसार कुमार, थाव्यो निज घर जणी रे के ॥धा मुखपंकज थयुं म्लान, थारति मनमा घणी रे के ॥ श्रा० ॥१६॥ सूतो त्रूटी खाट, जर एकण दिशे रे के ॥ ज० ॥ शेठ पुरंदर जोजन, काल थाव्या तिस्ये रे के ॥ का० ॥ देखी पुत्रने सूतो, ठेकाणे शून्यमा रे के ॥ ४ ॥ पूठे कारण कोण, शु चितो मन्नमां रे के ॥ ॥ १७ ॥ वात कहे वत्स थाज, विचार जे ताहरे रे के ॥ वि० ॥ जीवन प्राणा धार, तु एकज माहरे रे के ॥ तु० ॥ पूज्यु थामद जोरें, तदा कहे तात जी रे के ॥ त० ॥ रमसुदरी परणावो, मुफ ए वातजी रे के ॥ मु° १७ ॥ रमसार व्यवहारी, नी ए थगजा रे के ॥ नी० ॥ ए परणावे पुट, दोशे महारी महा रे के ॥हो ॥ तात कहे सुण पुत्र, दजी तु माल रे के ॥ द० ॥ तो हमणां शी वात, नण्यानो काल के रे के॥॥ १५ ॥ यौवन समये तास, करेविवादलो रे के ॥क ॥ परणामा नो थम्द, घणो ने उमादलो रे के ॥ १० ॥ परणवा माटें धाम, का काहलो रे के ॥ था | लाग्यवती ते नारी, यश जस नादलो रे ) थ० ॥ २० ॥ पुण्यसार कहे वात, न मानु ए सही रे के ॥न०॥ ते सा H में पाय - श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो ចS थें विवाद, मेलो हमणा जरे के ॥ मे ॥ प. तुम साथें नौजन, कर शु ढुं वही रे के । कम् ॥ कहे पुरदर कत, जमीनें दा कही रे के ।। ज० ॥ १ ॥ चोथे खमें ढाल, कही गयीशमी रे के ॥ क ॥ वालप णानी वात, कही साकर समी रे के ॥ का ॥ बुध श्रीमुमतिविजय कवि, सेवक विनवे रे के ॥ से ॥ रामविजय कहे धन्य, विचारी जे लवे रे के ॥ वि० ॥२॥ सर्वगाया ॥५॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥२॥ ॥ दोहा॥ ॥ जोजन करि कन्या पनी, लइ सायें परिवार ॥ शेठ पुरदर थावीयो, रत्नसार घरवार ॥ १ ॥ थादर मान दिये घणा, मां थासन सार ॥ स्वामी पधाखा थांगणे, धन्य अमचो अवतार ॥ २ ॥ कदो स्वा मी कारण किश्यु, कहे पुरदर वात ॥ रत्नसुवरी तुम मुत्ता, पुण्यसार थम जात ॥ ३ ॥ जोडी जली जुगती थडे, मेलीजें विवाद ॥ण का रण थाव्या अनु, मनमा धरि उत्साह ॥ ४ ॥ रत्नसार कहे शेवजी, ए तो महारु काज ॥ तुमें कयु करुणा करि, सीधां वालित राज ॥ ५ ॥ देवी तुम सुतने सुता, रत्नसुदरी सार ॥ पुण्य विना किहाथी मले, पुण्यसार जरतार ॥६॥ ॥ ढाल वीशमी॥ ॥ बेहो नाजी ॥ ए देशी ॥ तात समी वेवी कन्या, वोले इण परें चावी ॥ ना ना नदि परणु हु एदने, वात ए मुफ न सुहावी ॥१॥ नाय कदोजी ॥ दा रे तुमें शीदने समजावो,अलगा रहो जी ॥ एथांकणी॥जे जाणो तेथवर कोश्ने, तातजी मुफ परणावो॥ वरकुवारी रदिश ते वारु, पण पुण्यसार न गावो ॥ नाय ॥ २ ॥शेठ पुरदर चिते मनमा, जुट वोले झं वाला ॥ मुफ मुत थाशा करे परणवा, पण खोटा एदना चाला ॥ ना ॥३॥ वालपणे ए एह बोले, यौवनमद मतवाली ॥थागल मुज सुतने ए साथै, न मले मुखनी ताली ॥ ना० ॥ ४ ॥ रत्नसार कहे मुग्धा वाला, ए झुं चोली जाणे ।। पीत बाल विटनु जे वोल्युं, ते कुण मनमां थाणे । ना० ॥ ५ ॥ एहने हु समजावीश सूधी, तुम मुतने परणेशे ॥ ए कुलवती कन्या महारी, सादामो जवाप न केशे ॥ना॥६॥ वचन सुणीने पालो वलीयो, परिजनशु घरे थाव्यो ॥ सुत पुण्यसार उस्स - न पुण्यसार पनोतो, वर दीयो रतन जैनकथा रनकोष नाग आठमो गें तेडी, नेद सहू समजाव्यो ॥ ना० ॥ ॥ वत्स तुमने ए कन्या, वालपणे वाचाली ॥ थागत थापे ए शिर बाणां, एएपी जाली ॥ ना ॥ ७ ॥ यमुक्तं ॥ कुदेदा विगतस्नेहां, ताम् ॥ यतिप्रचमां उस्तुमा, गृहिणीं परिवर्जयेत् ॥ १ ॥ पूर्वढाल । सार पुनरपि एम वोले, तात कत्यु ए साचु ॥ पण परख्या विण पिताजी,वचन थाय ने काचु ॥ना॥॥ बुद्धिमत मनमाहे विचारे,वांक हिं पितानो ॥ अवर उपाय करी परणेशु,एम चिती रह्यो बानो ॥ ना. १० ॥ एक दिन जनकवयणथी जाणी, सचोवाइ कुलदेवी ॥ कुसुम नैवेद्य करीने, बहु यादरच्छ सेवी ॥ ना ॥ ११ ॥ कर जोरी आज मद मोडी, कजो तन सकोडी ॥ मा दु ते तें कोडि ॥ ना ॥१॥माटे मुफ तरुणीनु वाबित, जब रेशो माता। तब मुठीश दु यहांथी अलगो, थाशे मुफ सुखशाता ॥ ना ॥ १२ ॥ करी प्रतिज्ञा अन्न जल त्यागें, वेठो धरि एकतारी ॥ कहे देवी रजवे तुक होशे, कारजसिदि विचारी ॥ ना ॥१४॥ चिता म म कर मनमा कुंवर, कर पारण पुण्यसार ॥ नोजन करि ले तात थनुझा, गयो निशा लें तिवार ॥ ना० ॥ १५ ॥ थइ निश्चित करे अवशेषित, सकलकला श्रन्यास ॥ बालपण वीत्युं तब योवन, पाम्यो लील विलास ॥ ना० ॥ १६ ॥ चोथे खेमें वाशमी ढालें, रामविजय कहे वाणी ॥ जे सबंध होवे ते नटले,सानलोश्रोता प्राणीना॥१॥सर्वगाया॥११॥श्लोक॥२२॥ ॥ दोदा ॥ ॥ पुण्यसार कृवर नलो, सकल कलानो जाण ॥ दैवयोग वांछित हु, यूतव्यसन सदिनाण ॥ १ ॥ लाग्यो रंग कुसगनो, जिम उज्वल पट नील ॥ वासित श्रातम इष्यने, विणसतां नहि ढील ॥ ५ ॥ पुर्जन सग न कीजियें, जो लहिये लरक दीनार ॥ कीर्ति जाये कुल तणी, होय थवतार ॥ ३ ॥ वायु मात पिता तणु, न करे तेद लगार ॥ मसन विलुको ते घणु, धिक् धिक् कर्मविकार ॥ ४ ॥ लव मूपर्नु एकदा, नूर थानरण थमूल्य ॥ निजगृहथी लेइ निसनो, पुस्पसार प्रतिकूल ॥५॥ द्यूतकारनु लाख धन, माथे चढीयु तास ॥ तेमाहे गइ सोपिडं, या मेलो श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो एनए नूपण उनास ॥ ६ ॥ एम धन विणसाड्यु घणु, न गणे कोश्नी लाज ॥ धूत समु नहि जगतमा, व्यसन को शिरताज ॥ ७ ॥ ॥ ढाल एकवीशमी॥ ॥ नानो नादलो रे ॥ ए देशी ॥ मात पिता घणुए कहे रे, पण वाखो न रहे सोय ॥ धिक् धिक् कर्मने रे ॥ उलना यावे घणा रे, अहोनिश फूरे दोय ॥ घि० ॥१॥जीवहूती वादालोघणो रे, पण थयो वैरी समान ॥ धि० ॥ साजन वोलावे नहि रे, न लहे थादर मान ॥ धि०॥॥ एकदिवस नृपें मागीयु रे, नूपण शेवनी पास ॥ धि० ॥ ज जोयु यावासमा रे, न लघु चिते विमासि ॥ धि० ॥ ३ ॥ पुण्यसार प्रत्यु ए सही रे, नदि बीजो लेवणहार ॥विण॥ गूढ वली अन्यवस्तुनो रे, एह विनाशणहार ॥धि॥४॥ ए राखण योगो नदि रे, पुत्ररूपें रिपु एह ॥धि॥ घरहूती हवे काढवो रे,श्यो एद साथै नेद ॥धि॥५॥ यत ॥ यदर्थ खिद्यते लोकेयत्नश्च क्रियते महान् । तेपि सतापदा एव, 5 पुत्रा हा नवत्यहो ॥१॥ पूर्वढाल ॥ हाटे पुरदर थावीयो रे, तिदा आव्यो पुण्यसार ॥धि॥ पूर्वी खवर थलकारनी जिम तिम लव्यो तेणी वार ॥ वि० ॥ ६ ॥ कोप्यो शेठ कहे इस्यु रे, जा जा उष्ट गमार ॥ धि० ॥ ते नूपण लाव्या विना रे, नाविश मुफ घर वार ॥ धिम् ॥ ॥ वचनें तरज्यो ते घणु रे, निर्दय काली कठ ॥ धिo ॥ वाहालो पण वैरी थयो रे, काढयो ते नन्नत ॥ धि० ॥ ॥ तातवचन सुणि नीसख्यो रे, पुरवाहिर तेणि वार ॥ धि० ॥ साफ पड़ी दिन थाथ म्यो रे, करे मनमाहे विचार ॥ धिम् ॥ ए ॥ दवे किहा जाउ एकलो रे, न लट्ठ मार्गनी शुदि ॥ वि० ॥ अहो कुकर्म में शु कस्खु रे, किदा गइ महारी बुदि॥ धि० ॥ १० ॥ एहवे एक वड देखीयो रे, कोटर बद् विस्तार ॥ धिम् ॥ निर्नय जागी जायगा रे, पेठो तेह मकार ॥ धि० ॥ ११ ॥ शेठ पुरंदर थावियो रे, साफ समे घरवार ॥ धि ॥ नामिनी पूरे कयने रे, किदा पुण्यसार कुमार ॥ धि० ॥ १५ ॥ राजनूपणनी वार ता रे, सवि नाखी थामूल ॥ धि० ॥ में शिक्षाने कारणे रे, काढयो ते प्रतिकूल ॥ धि ॥ १३ ॥ वात मुणी विलखी थइ रे, थाव्यु हृदय नराय ॥ धि० ॥ शु मुख देखाडो मुने रे, सुत काढी सध्याय ॥ धि० ॥ १४ ॥ तन सुकुमार ए बालुडो रे, शी गति दोशे तास ।।

. रएक जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो धि० ॥ वमन केम लाजो नहि रे, ते मुतने निष्कासि ॥नि जो तुम्हें काढयो पुत्रने रे, तो तुम्हें के. जावो ॥ धि० ॥ ते रा रे, मविरमांहे थावो ॥ धि० ॥ १६ ॥ एम निब्यो नारी पुत्र सनारी चित्त ॥ धिम् ॥ पुरमां जोवा नीसखो रे, विरुण रीति ॥ धि० ॥ १७ ॥ पियु थगन घर को नहि रे, एकली नारि ॥ धि ॥ मदिर गुनु देखीने रे, चाली थासुनी धार ॥: ॥ १७॥ दा घरहूती नादलो रे, काढयो में रीसाल ॥ पि० ॥ कोप करी घणो रे, काढयो वाल वियाल ॥ धि० ॥ १५ ॥ एम चित्युं यं ययु रे, चितातुर चित्तमांहि ॥ धि० ॥ कनी उबर थावीने जोर थावतो नाद ॥ धि ॥ २० ॥ चोथे खमें एकवीशमी रे, राम विजय कदि ढाल ॥ धि० ॥ दवे सवध पुण्यसारनो रे, सांगलो नदि उजमाज ॥धि०॥२१॥सर्व गाथा ६५ए॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥१३॥ ॥दोहा॥ ॥ पुण्यसार तिए रातमां, वह उपरें दोय सार ॥ देवी कीती अति जली, तेज तणो नहिं पार ॥ १ ॥ मांदोमांदे वातो करे, निमुणे मांझी कान ॥ सादसिका शिरतिलो, पुस्यसार बलवान ॥ २ ॥ एक बीजीप्रत्ये, मुण बहेनी गुणवत ॥ रातें एह रमवा तणी, वेजा ने एकांत ॥ ३ ॥ बीजी बोले शं हुवे, व्यर्थ नमे नूमाहि ॥ कौतुक देखीजें किहां, तो जश्ये उत्सादि ॥ ॥ ते बोली सांजल बहेनी, वानि पुर परधान ॥ तिहां निवसे व्यवहारियो, धनप्रवर थनिधान ॥ ५॥ धन वती तेहनी जारजा, तस पुत्री ने सात ॥ धर्मसुदरी नयसुदरी, काम सुदरी विख्यात ॥६॥ मुक्तिसुदरी मनमां वसी, नाग्यसुवरी जाण ॥ सोना ग्यमुदरी सातमी, गुणसुदरी खुणखाण ॥ ॥ कन्या वरने कारणे, धन शेवें बगु मान ॥ नवोदर थाराधियो, देई मोदकदान ॥ ७ ॥ प्रत्यार थइ बोल्यो निपुण, थाजयी सप्तम दीस ॥ लग्नवेलायें रातमा, परतो अधिक जगीश ॥ ए ॥ वेढ्नु स्त्रीपू थावशे, शेत तणो एक नर ॥ ते परणेशे तादरी, कन्या धरि थानद ॥ १० ॥धान दिवस सहि सातमो, जय जोवा काज ॥ कौतुक होशे यति ननु, महेनी तिहा कणे धाम। करे , 1 , श्री शातिनाथनो रास खंम चोयो रए ११ ॥ ए तरु उपर वेसीने, चालीजें थाकाश ॥ जीव्या जोयु नलु, प्रीजें मन थाश ॥ १५॥ ॥ ढालवावीशमी॥ ॥ जोली जावजजी नावज महारी नात रधाव्य, सेले मारुजी हो नात मगावीयो जी ॥ ए देशी ॥ मुणि वाणी जी वाणी सुणि ते पुण्य सार, मनडानी मांहे हो अति हर्पित दुउँ जी ॥ गुणखाणी जी गुण खाणी ए देवी रे दोय, नाग्य मली मुफने यचरिज जु जी ॥ १ ॥ हवे जोन जी जोन रे दवे कौतुक वात, तेह जोउ वनजीपुर केहवो जी ॥ जोर शे ठने जी शेत किस्यो धनवत, कुमरें विचार कस्यो मन एहवो जी ॥ २ ॥ दोय देवी जी देवी कीव दुकार, तेह वडपादप चाल्यो थवरें जी॥ वड कोटर जी वडकोटर पुण्यसार, रह्यो रे प्रनुजीनु समरण करे जी ॥ ३ ॥ जो इहाथी जी जो हाथी पडु रे निर्धार, तो रे चेतन तादरी गति शी दुवे जी ॥ शी चिता जी रे शी रे चिता एद योग, मले तस जव प्रचजी सदामु जुवे जी ॥ ४ ॥णमाहे जी रे दणमाहे ततकाल, ते वघ्ननी वन वड श्रावीयो जी ॥ दोय उतरी जी रे दोय उतरी देवी सुरंग, नवल निरुपम वेप वनावीयो जी ॥ ५ ॥ दोय चाली जी रे चाली हो रमझम रात, वात करती हो दसि हसि प्रेमनी जी॥ तस पूवें जी रे तस पूठे पुण्य सार, चाल्यो हो बानो थजवतनु बवी वनी जी॥६॥ लवोदर जीरे लबोदर गृहकार, वेदिका उपर ममप तिदा रच्यो जी ॥ सहु मलिया जी रे मलिया दो साजनवृद, नव नव रंगें दो रस सवलो मच्यो जी ॥७॥ तिहां कुमरी हो जी तिदा कुमरी हो सोहे रे सात,मनु सुरलोकथी यमरी कतरी जी॥तिहा सोहव हो जी सोदव गाये सोदलारां गीत,हर्ष न दियेवढुलो धरी जी ॥ ७॥ मम्पनी दोजी मम्पनी रे पास, ते नारी जाती देखी रे दिनहुं ननस्यु जी ॥ तस पूठे रे पूवें दीगे तेह कुमार, निरखे दो रढ लागे मनहे तिस्यो जी ॥ ए॥ तुम्हें थावो जी रे यावो रे महारे थागणे थान, अरज करा तुमने कर जोडीने जी ॥ दसि वोलो जी रे हसि वोलो थम साथ, वात करो कुवर मद मोडीने जी ॥ १० ॥ वेसारी जी दो वेसारी बदु मान,शेठ करे एम कुंवरने विनति जी ॥ लवोदरजी हो लबोदरें तुम्द दीध, परणो सुता माहरी रूपें रति जी ॥ ११ ॥ एम कदिने हो जी एम . रएश जैनकया रत्नकोप नाग आग्मो कदिने शुन चीर, वसनयुगल तेदने पहेरावियां जी ॥ लखमूमने लखमूल्यने अलकार, सोहे कुवर सदुने मन जाविया जी ॥ १५॥ वेला जी दो गुन वेला रे ममाण, धवल मगल गाये सुंदर गोरडी की करमेलो दोजी करमेलो तिहां कीध, परण्यो कन्या साते गुण जी ॥ १३ ॥ मुफ तातें जी दो मुफ तातें नलु कीध, रीष करी मुफ उपर अति घणी जी ॥ नहितर मुज जी दो नहितर मुफ एड जाम होत किहांथी अचित्यो सुखणी जी ॥ १४ ॥ करि विवादजी होकार विवाह मनरंग, वधूसहित ते शेवने मदिरें जी ॥ बहु उत्सव हो की बगु उत्सव करे इन्य, प्रेमलं पधराव्या सौंध ऊपरें जी ॥ १५ ॥ सिहास न हो जी सिदासन निज कथ, रदि मुख थागल कनी कामिनी जी। कदो वालम हो जी कहो वालम थम थाज, सकल कला शीखी जेर स्वामिनी जी ॥ १६ ॥ मुणो नोली हो जी जोली मुणो मोरी वात, एद कला मुफ मनडे नवि गमे जी ॥ यमुक्त ॥ थत्यतविरुपा नैव, सुखं मूर्ख नृणां न हि ॥ थर्जनीया कलावनि ,सर्वथा मध्यमा कला ॥१॥पूर्वहाल ॥ एद पद्यनो दो जी पद्यनो थरथ विचार, करवा दो लागी कामिनी तिण समे जी ॥ १७ ॥ मन चिते दो जी मन चिते पुण्यसार, वृक्ष रखे जाये गगनें वही जी ॥ जो थाशे हो जी थाशे जी कालविलब, तो ते देवी समी जाशे सही जी ॥ १७ ॥ करे कुवर दो जी कुवर दिशि अवलोक, गुणवती बोली गुणसुदरी जी ॥ शु स्वामी दो जी देदचिता मुत्पन, जे एम जूवो बो चिट्ठ विशि फरी फरी जी ॥१॥ कहे एमदीज हो जी एम हीज मुफ मनमाहि, वात सुणी कहे ते निजस्वामीने जी॥दुश्रावु होजी प्रीतमजी तुम्ह साथ,प्रेमj पारधारीजें दो कामने जी ॥२०॥ श्रधनमिये दोनी रहि थपला एक पास, मनमां करे पुण्यसार विचारणा जी ॥ बेइ खटिका दो जी एक लखीयो तिहा श्लोक, जारवटें करी सूधी धारणा जी ॥१॥ यत ॥ दोदो ॥ किदां गोवालो किदां वनही, किहां लंबोदर देव ॥श्राव्यो वेटो विदिवसीण, गयो सच य परणेवि ॥१॥ पूर्वढाल ॥ नामि नीने दोजी कुमर कहे रहो दूर,देवचिता जिम मुफ सुखथी दुवे जी॥ गुण सुंदरी होजीउनीरही तिण गाय, वाट तिदा वालमनी घणी जोवे जी॥श्शाचोचे खमेंदो जीएवावीशमीदाल,रामविजय कहे नवि नावें सुणो नी । पुखन , H श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो. २५३ रे हो जीए संवध रसाल,थागल वात तणोरस ने घणोजी॥२॥६६५॥२५॥ ॥ दोहा ॥ पुण्यसार कतावतो, याव्यो वटतरु पास ॥ कोटरमा पेठो जई, पाम्यो चित्त उल्लास ॥१॥ एहवे ते पण देवता, थावी जाग्यवशेण ॥ वड कप र उची चही, वेठी रग रसेण ॥ २ ॥ देवशक्तिये ते कमियो, वड थंवर यनिराम ॥ तुरत क्षेत्र जई कतखो, पुर गोवाल वन नाम ॥ ३ ॥ एहवे शहेर नमी घणु,तेहपुरंदर शेत॥थये प्रनाथावीने, विशाम्यो वड हेठ ॥४॥ ॥ ढाल त्रेवीशमी॥ ॥धाज रहो रगमहोलमें केसरीया ॥ ए देशी ॥ रयणी विहाणी रवि कगीयो । दुवारी ॥ पुहवीय थयो प्रकाश रे ॥ दु वारी लाल ॥ वोल ण लाग्या पखीयां ॥ हु० ॥ गयो थधकार सवि नाश रे ॥ ढुं वा० ॥१॥ वटकोटरथी नीसखो ॥ दु० ॥ तव पुण्यसार कुमार रे ॥ दु ॥ वस्त्रानर ए विराजतो ॥ हु॥ देवकुमर थवतार रे ॥ दु० ॥॥ सुत देखी दिल समस्यं ॥ ढुं० ॥ वत्स वत्स कहेतो तात रे ॥ हु० ॥ दोडीने थावी म व्यो । दु ॥ हरखी साते धात रे ॥ द्रु० ॥ ३ ॥ वत्स तुफ विण ए यामिनी ॥ दु० ॥ वैरिणी गश् विकराल रे ॥ दु० ॥ खरज परें तुने देखीने ॥ दु० ॥ मुफ मनकज उजमाल रे ॥ दु० ॥ ४ ॥ वत्स थाव्यो तु वालदो ॥ दु ॥ फलिया वाबित थाज रे ॥ दु० ॥ में तुफ रीप करी घणी ॥ दु० ॥ तुज शाखामण काज रे ॥ दु० ॥५॥ पड़ी मन पस्ताणो घणु ॥ द्रु ॥ सुत विना शून्य ससार रे ॥ दु ॥ तुम युधि लेवा नी सस्नो ॥ दु० ॥ नमतां प्रहर गया चार रे ॥ ढुं० ॥ ६ ॥ सुत कर जोडी वीनवे ॥ हूँ ॥ सवल ए महारो वाक रे॥ दु० ॥थपराधीमादे में सही ॥ द्रु ॥ थाडो वाल्यो थाक रे ॥ दु० ॥ ॥ गुनो खमोजी दवे माह रो॥ दु० ॥ सुतवत्सल तुमें सत रे ॥ दु० ॥ पुत्र कुपुत्र जगमा दुवे ॥ दु० ॥ मावित्र नवि विहडत रे ॥ दु० ॥ ॥ पुत्र पिता घेदु थाविया ॥ दु ॥ हियडे दर्ष न माय रे ॥ हु० ॥ जननीने सुत जर मिल्यो । हुँ । थाव्यां थासु नराय रे ॥ दु० ॥ ए ॥ सुत खोले वेसारीने ॥ दु० ॥ नेहें घेली माय रे ॥ दु ॥ सुत शोना तुम्ह एहवी ॥ दु ॥ किदा हा कहो समजाय रे ॥ दु० ॥ १०॥ मात पिता वे? सानले ॥ दु० ॥ कहे एन जैनकथा रत्नकोप जाग आठमो. मांमी सवि वात रे ॥ दु० ॥ विस्मय मनमा कपम्यो ।' थहो सुत शवदात रे ॥ दु० ॥ ११ ॥ नाग्य जुन सुतर्नु पहुं । एहवी हि विशाल रे ॥ दु० ॥ रातमांहे थावी मती ॥९॥ पुण्य रसाल रे ॥ दु० ॥ १२ ॥ कहे पुण्यसार तुम्ह शीखी । कल्पतरुनी वेल रे ॥ दु ॥ वांबितदायक ए दुइ ॥ ढुं० ॥ सूरी व्यसननी डेल रे ॥ Pण् ॥ १३ ॥ थानूपण सद मूपर्नु । तनहूती कतार रे ॥ ढुं० ॥ देश यूतकारने लावियो । दु० ॥ नृपना तेणिवार रे ॥ हु ॥ १५ ॥ स नृपने ते सोंपियं ॥ दु०॥ शेष पुरंदरें ताम रे ॥ दु० ॥ हवे पुण्यसार समाचरे ॥ दु० ॥ गृहीनां ज्चम - काम रे ॥ गु० ॥ १५ ॥ व्यसन निवास्यां वेगला ॥ दु० ॥ थयो सूची शाहुकार रे॥ दु० ॥ पितर हैये दरख्यां घणु ॥ दु० ॥ सोप्यो सपि व्यापार रे ॥ ढुं० ॥ १६ ॥ चोथे खमें त्रेवीशमी ॥ द्व॥ ढाल कही नित्यमेव रे ॥ P० ॥ राम कहे नर ते जला ॥ दु० ॥ वारे असननी टेव रे ॥ दु॥ १७ ॥ सर्वगाथा ॥ ६०६ ॥ श्लोक तथा गापा ॥२५॥ ॥ दोदा ॥ ॥ दवे निसुणो नारी तणो, पूल जे थधिकार ॥ गुणसुंदरी पानी वली, थावी कहे विचार ॥ १॥ गयो मूकीने नादलो, धूरत जिम धूतेवि ॥ खोटारे खोटु कस्तूं, नूमी एहनी टेव ॥ ५ ॥ ॥ ढाल चोवीशमी॥ ॥ राम सीताने धीज करावे ॥ ए देशी ॥ मुणी वात सर विलवाणी रे, टोलें मनी श्वास नराणी ॥ फट जूझी ए कीधो रे, कंथने ते जागा दीधो ॥ १ ॥ केड कामणगारानी मूकी रे, श्ण बातें सबली चूकी ॥ तुं तो दती घणु मादी रे, केम गइ एम एवं वाही ॥२॥ कहे बहेनर टुं सो जोली रे, में जाएयो रंग ले चोली ॥ नवि जाशे वादालो नवेखी रे, ई तो रही सामु देखी ॥३॥थदो थापणी शी गति थाशे रे, कंथ विण केन दीदा जाशे ॥ विरहातुर रोवे गाढी रे, ते नवपरिणीता साडी ॥४॥ थयो सोर ते महोल मकारें रे,माय ताय थायांतिण वारें ॥ कही बात घणु दिलगीर रे, मूकी गयो नणदल वीर ॥ ५ ॥ तेस नाखती पण थासु रे, वोले पुण्यसारनी सासू ॥ में गुणवत जाएगी थापी रे, परणीने श्री शांतिनाथनो रास खंग चोयो. रएप ते सतापी॥६॥रामत रसमांरगीलो रे, पियुश मेव्यो तुम्हें मेलो। तुमें कांन का कर जाली रे,कथ जा उत्तर थाली ॥३॥ लवोदर देवें दीधो रे, पण लक्षण ए नहि सीधो ॥ व्यसनी दीसे ए मानो रे, थानूपण जेई नागे ॥ ७ ॥ कोण बागल वात ए कहियें रे,प्रजु जेम राखे तेम रहियें ॥ कहे जनक सुणो तुम्हें वेटी रे, सवली चूकी गुणपेटी ॥ ए ॥ पण वात करता मीती रे, सदिनाणी का तस दीठी ॥ नाम नाम तुमें कादि जाणो रे, मुफ थागल तेद वखाणो ॥ १० ॥ कहे गुणसुंदरी गुण जाची रे,तात वात सुणो मुजसाची॥ण दीप तणे परकारों रे,लख्यु जारवटे उल्लासें ॥ ११ ॥ परना वाचन जोई रे, नावी होवे ते होई ॥ ल खियो ते लेख न चुके रे, अणचित्यां थाणी मूके ॥ १२ ॥ नवि जाये वैरिणी रात रे, वणी यश्वेतीसात ॥ जुवो मुखमा शूल उपायु रे, कयु थापणु उदय थाव्यु ॥ १३ ॥ प्रनात समय थये वाची रे, कहे ते गुण सुवरी राची ॥ गोपालय पुरथी थावी रे, परणी गयो ते फरि नावी ॥१॥ ॥ सुणो तात ए देवने योग रे, श्रावी मलीयो ए नोग ॥ वेप नरनो मुफने थापो रे, वनु साथ सघातें थापो ॥ १५ ॥ ते नगर जणी दु जावु रे, पियुडाने खोली लावू ॥ पटमासमाहे करूं काम रे, नहितर मुज व जिनुं ठाम ॥ १६ ॥ सुणी वात पिता मन नावी रे, कन्या नरवेप व नावी ॥ वोलावी सवले साथ रे, हियडे समरी जगनाथ ॥ १७ ॥ गुण सुदर सारयवाद रे, एम नाम धराव्यु उत्साह ॥ गोपालय पुरने मार्ग रे, चाल्या दियडे धरी राग ॥ १७ ॥ कतेक दिवसे श्रावी रे, न तस्मा मेरा देवरावी ॥ लइ जेटणु थति बद्ध माल रे, नेट्यो पुरनो नूपाल ॥ १५ ॥ राय राज्यो दे बदु मान रे, थपावे वीडां पान ॥ जलें थाव्या तुमें व्यवदारी रे, दीसो बो माणास नारी ॥ २० ॥ रदो श्रम नगरीमा थाही रे, व्यापार करो उत्साही ॥ न करें तुम को तुकार रे, तुम्ह साथै वन्यो श्रम प्यार ॥ २१ ॥ एक वार शहा थावेवु रे, जे काज होये ते कहेतु ॥ रहे ते नगरीमा रगें रे, व्यापार करे उबरंगें ॥ २२ ॥ पुण्यसार सुणी गुणवत रे, थायो मलवाने सत ॥ गुणसुदर ने पुण्यसार रे, मलिया विहु दर्ष थपार ॥ १३ ॥ अइ माहोमाहे मित्राई रे, प्रगटी पू रव पुण्याई॥ वाला मनमांहे हरखी रे, प्रीतम जेहवु मुख निरखी ॥

। २९६ जैनकथा रनकोष नाग आठमो. २४ ॥ चोवीशमी चोथे खमें रे,ढाल पूरण राग अखंमें ॥ कहि सुविचारी रे,धन्य ए गुणसुदरी नारी ॥२५॥सर्व गाथा ॥ १३॥ श्लोक ॥ दोहा ॥ ॥ रात्रि दिवस नेला रहे, प्रीति परस्पर जोर ॥ मुख हरसे नजरें, जेणि परें चइ चकोर ॥ १ ॥ थम नयरें जलें थावीया, मो मुजाण ॥ तुम कपर रीफे घणु, अहो अमारां प्राण ॥ ३ ॥ र तुमें सही, नाम धराव्यु नित्य ॥ पण अमचित्त चोरी लियु, चोर तुमें मित्त ॥ ३ ॥ मित्र तुमें यहां कणे रहो, मत जाशो निज धाम ॥ पर मावो थम चाकरी, जे तुम होये काम ॥ ४ ॥ ॥ ढाल पञ्चीशमी॥ ॥ राजें मुने वहाला लागो॥ ए देशी ॥ एवं अवसरें दवे सांगतो रे, रत्नसुदरीनी वात ॥ यौवन थावी अति नली ॥ योवन श्रावी यति नली ॥ एतो कामरमणी साक्षात ॥ १ ॥ पिताजी हो वात सुणो मुज सार॥ए तो गुणसुदर जरतार ॥ पिता ॥ मदारे अवर नहिं निरधार ॥ पि० ॥ महारं नलु रे कीधु किरतार ॥ पि०॥ मुने न गमे ए पुल्पसार । पि० ॥ घणु शं कहूँ वारंवार ॥पिा एदनी थाइश विजमतगार॥वि०॥ मुफ नफरे एह विचार॥ािवा॥एयांकणी॥नाव लदी तनयातणो रे, गुणसंदरनी पास ॥ रत्नसार श्राव्यो वही॥२०॥ एतो धरी मनमा बास ॥पि०॥॥ झती थासन थापीयु रे,पन्धु कहो मुफ काज ॥ केम करुणा कीधी शहां ॥ के० ॥श्रम पर एवडी थाज ॥ पिता ॥२॥ रमसार कहे शेतजी रे, तुम दो तनया रे मुफ ॥ परणवा श्छे अजे रे ॥ ५० ॥ एतो करवा वातनुं गुफ ॥ पिता ॥ ४ ॥ गुणसुदर चित्त चितवे रे, खोटी हो एदनी रे थाश ॥ बिदु नारी विवाहथी रे ॥ बि० ॥ एतो कम चाले घरवास ॥ पि० ॥ ५ ॥ यत्किंचित् उत्तर के रे, वारं हो एदने विमास ॥ नहिंतर जे गति माहरी रे ॥ न ॥ एतो होशे ते गति तास ॥ पि० ॥ ६ ॥ एम चिती कहे शेग्ने रे, जे तुमें कह्यो रे विचार : विण पूजे मावित्रने रे ॥ वि०॥ ए तो न दोय कुल श्राचार ॥ पि. ॥ ४॥ वासी हुँ देशांतरी रे, नवि जाण्यु मुज ठाम ॥ तो गुणवंती नदिनी रे ॥तो॥ एतो केम काढी यो याम ॥ पि ॥७॥ यत ॥माम סשן श्री शांतिनाथनो रास खंम चोथो. वातिदूरस्थ, सूरमोहानिला पिणाम् ॥ त्रिगुणाधिकवाणां, नैव देया सुक न्यका ॥१॥पूर्वढाल ॥ रत्नसार कहे तु सही रे,पुत्रीय वायोचित्त॥यवरनु नाम नसानले रे ॥थ ॥ एतो मानो वात एं मित्त ॥ पि० ॥ ए ॥ यत ॥श त्रुनिर्वधुरूपे सा, प्रदिप्ता 5 खसागरे ॥ या दत्ता हृदयानिष्ट,रमणस्य कुलागना ॥२॥ पूर्वढाल ॥ आग्रहथी तेणें मानीयु रे, सवल नावीनो योग॥ माह्या रे माहापण करे रे ॥ मा० ॥ एतो यावी मले ते योग -॥ पि ॥ १० ॥ उत्सव कीधो अति घणो रे, रत्नसारे तेणि वार ॥ परणावी निज पुत्रिका रे ॥ १० ॥ ए तो गुणसुदरने सार ॥ ११ ॥ सुणो नवि, नियति वडी ससार ॥ मत करजो को यहकार ॥ सु० ॥ तमें बोलो बोल विचारि ॥ सु० ॥ हा न चले हो कोई उपचार ॥ 5 ॥ एहना अवर सखाइ चार ॥सुनि०॥एथाकणी ॥ पुण्यसार तेजाणीने रे,गयो कुलदेवी पास ॥ मात जुए झुं थयु रे ॥ मा० ॥ मुफ महोटी दती तुम थाश ॥ सु ॥ १५ ॥ दवे महारे नहि जीवनु रे, शिर डेदी दीयु तुझ ॥ वोल गयो हवे शु रत्यु रे ॥ वो० ॥ मुने कांश पडे नहिं सुज ॥ सु० ॥१३॥ देवी कहे को थाकलो रे,तु वत्स थाये एम ॥ रत्नसुदरी ते कहे रे ॥ रत्न ॥ मुफ चितित न दुन प्रेम ॥ सु० ॥१॥ देवी कहे दीधी जिका रे, तेदमा नहिं सदेह ॥ सहि ए नावी ताही रे ॥ स॥ मम कर मन साहस एद ॥ सु० ॥१५॥ पुण्यसार कहे नवि घटे रे, सग्रहवी परनारि ॥ परणी ए गुणसुंदर रे ॥ १० ॥ नहिं शहा को विचार ॥ सु ॥ १६ ॥ देवी कहे वली एहबु रे, ग्रं समजे नहीं शान ॥ ए सही तहारी वन्नना रे ॥ ए० ॥ मुफ साख दीये एम ज्ञान ॥ सु० ॥ १७ ॥ माथे चढावीने दे वीनु रे, कहण कन्यो उजमाल ॥ मन चिते पुण्यसारजी रे । म ॥ मुफ फलशे मनोरथ सार ॥ सु० ॥ १७ ॥ चोथे खमें पंचवीशमी रे, ढाल सुणो एक चित्त ॥ राम कहे पीयु नारीनी रे ॥ रा० ॥ दवे परगट दोशे प्रीति ॥ सु० ॥१॥ सर्वगाथा ॥७३६॥ श्लोक तथा गाथा ॥२॥ ॥ दोहा॥ ॥ गुणसुंदरी चित्त चितवे, परगट न लह्यो नाथ ॥ 5 ख न खमाये विरदनु, में दवे रघु न जात ॥ १ ॥ पूर्णावधि खट मासनी, सपूण पर पंच ॥ काष्ठचिता महोटी रची, मेल्यो सघतो सच ॥ २ ॥ पुर वाहिर एज जैनकथा रत्नकोष नाग आठमो. चायो तदा, वहिप्रवेश निमित्त ॥ वात सकल पुर वितरी, जिम जत्त ॥ ३ ॥ सुदर वाला वेशमा, गुणसुदर मुसफूल वैराग्ये नध्यो, मरण करे ने कबूल ॥ ४ ॥ जनमुखथी तुप शेठ पुरंदर लेइ ॥ रत्नसार पुण्यसार, थाव्या तिदा दोडे ॥५. मल्या लाखो गमे, कहे राजा सुण वत्स ॥ याण किरों तुण जाखो करि मन स्वस्थ ॥ ६ ॥ म मर म मर वालुवा, को करे कण काठ ॥ तु माह्यो हूतो घणो, शो ए ताहारो तात ॥ ४ ॥ कहे मादरी, तनुजा थति सुकुमार ॥ का सतापो तेहने, विरुई जाल ॥ ७ ॥ जो अपराध तिरों कियो, तो दाखो मुफ कान रोष निवारो वालदा, थापो मुझने मान ॥ ए ॥ थाण न लोपी माइस नवि कोश्नो अपराध ॥ पण मुज इष्ट वियोगनु, मनमा मुख अनार ॥१०॥ एम कहेतो मुख बाहिरे, नाखतो निश्वास ॥ कतावला वीयो, कुमर चितानी पास ॥ ११ ॥ ॥ ढाल बचीशमी॥ ॥ सखणी योगिणी रुडी बे ॥ए देशी॥राय विचास्युं सहिए मरशे, जामो न रहे जोर ॥वालेसर कोई एदवो ने, एम कहे करतो सोर ॥१॥सितापीमें कोइ राखो बे,अरे दा वालेसर ते मुफ दाखो बे ॥ एयांकणी ॥ जेह करे ते काज करुं दु, कां मरे मुफ हजुर ॥ वाट जोतां दशे एदना, मावित्र रह्या ते दूर ॥ सि ॥ २ ॥ अहो एहनु मुखफूल सजूण, अहो एहनी तनुकांति ॥ विण कारण ए का मरे एदनी, कल न पडे गति नाप्ति । सि ॥३॥ नागर कहे पुण्यसार ने एदनो, साचो अतर मित्त ॥ वास माने ए एदनी, साहिब निसुणो सुपवित्त ॥ सि ॥ ४ ॥ राय कहे पुरुष सार जश्ने, समझावो थविलव ॥ मित्रनुं 5 ख एम देखीने, शामाटे करो बो विलव ॥ सि० ॥ ५ ॥ पुस्यसार पासें जश्तेदनी,एम करे घरदास । था सुखजीला मूकीने, मरवानी का करे थाश ॥ सि ॥ ६ ॥ सरुप पणे तुम रूप थनोपम, बो सपद थावास ॥ मन मूकी मुफ थागो, उखनु कारण प्रकाश ॥ सि ॥ ७ ॥ सा कहे एडवो कोई न कहिये, जस थागत खवात ॥ हृवयथी कठे याविने, पानी फरी हृदयें जात ॥सि ॥ ॥ कहे पुण्यसार ए ताहरी चेष्टा, दास्य तपी करनार ॥ , श्री शांतिनाथनोरास खम चोयो एए मुफ यागल पडदो किस्यो कहो, जिम लहु सुरक थपार ॥ सि० ॥ ए॥ कहे प्रीतमने पुण्यपनोती, ते सनलावी शलोक ॥ तुमें सख्यो किंवा नहिं,साचु कहो मूकी शोक ॥सि॥१॥ कहे पुण्यसार सही में लखीयो, सा कहे ते ढुं नारी ॥ गुणसुंदरी नामें तुमें जे, मूकी तोरण घार ॥ सि ॥ ११ ॥ कत तुमारे कारण सघलो, ए में कीघ प्रयास ॥ वालेसर मूकी मने, जला याव्या तुमें शहा नासि ॥ सि ॥ १२ ॥ करि प्रसाद मगावी बापो, मुफने हवे स्त्रीवेप ॥ कुवर वात मुणी इसी, मनमा समज्यो मुविशेप ॥ सि ॥१॥ वेप मगाव्यो हो घरथी वारु, विनतानो तेणि वार ॥ तन पहेयो शोने नली, मानु रन तणो अवतार ॥ सि ॥ १४ ॥ रम ऊम नूपुर पाय मनोहर, कर चूडी उर दार ॥ तिलक बन्यु शिर शोजतु, गोरी गुणनो नमार ॥ सि० ॥ १५॥ कहे पुण्यसार नरपति बागल, वह वदे तुम नेह ॥ देखी सद् विस्मय लत्यु, थहो कौतुक महोटु एद ॥ सि ॥ १६ ॥ ए कोण रूपवती थति रूडी, रामा रमा थनुदार ॥ सारथवाह केम थइ, रही ए नयर मकार ॥ सि० ॥१७॥ वात सह पुण्यसार प्रकासी, धुरहूंती थामूल ॥सांजली सदुने उपन्योथानद, ए वात अमूल्य ॥ ति ॥ १७ ॥ पाय लागी सासु ससराने, दीये एम ते थाशीप ॥ ए वर वहूनी जोडली, चिर जीवो कोडि वरीस ॥ सि ॥ १ ॥ कुलवती तुफ पाखे कदो कोण, शोधी लीये जरतार ॥ ए चतुराई ताह री, नवि दीठी श्रमें ससार ॥ सि० ॥२०॥ रत्नसार विलखो थइ मनमा, वीन वियो पुर नूप ॥ मुफ पुत्री परणी एणे, तेदनु हवे कवण स्वरूप ।। सि ॥ २१ ॥ राय कहे हा छ पूवु, ते पण एहनी नारि ॥ जे माटें एहनी प्रिया, परणी एवं प्रेम थपार ॥ ति ॥ २२ ॥ पुण्यदशा जूवो एम जागी, नांगी जावत तंत ॥ रत्नसुदरी थइ नारजा, पुण्यसार थयो तस कत ॥ सि ॥१३॥ सद्व हर्षे थाव्या निज मदिर,वरत्यो जय जय कार ॥ मात पिता हरख्यां घणु, वडवखती एह कुमार ॥ सि० ॥ २५ ॥ चोथे खमें बधीशमी ढालें, श्री सुमतिविजय गुरु शिष्य ॥ रामविजय कहे एम पुण्यथी,पहोंचे मन सयल जगीश ॥ सि० ॥ २५॥७७॥२॥ ॥ दोहा॥ ॥ वात गइ वलनीपुरें, प्रगट थयो निज कत ॥ नापीने पट बगना, - . . जात ॥ रएन जैनकथा रत्नकोष नाग आठमो. चाल्यो तदा, वहिप्रवेश निमित्त ॥ वात सकल पुर वितरी, जिम जत्त ॥ ३ ॥ सुदर वाला वेशमा, गुणसुदर मुखश्न । वैराग्ये नच्यो, मरण करे ने कबूल ॥ ४ ॥ जनमुखथी नृप शेठ पुरदर ले ॥ रत्नसार पुण्यसार, थाव्या तिहा दोडे ॥ ५ ॥ मख्यां लाखो गमे, कहे राजा सुण वत्स ॥ थाण किणे तुफ जांखो करि मन स्वस्थ ॥ ६ ॥ म मर म मर बालुथा, को करे - क्षण काठ ॥ तु माह्यो इतो घणो, शो ए ताहारो गठ ॥ ॥ कहे मादरी, तनुजा थति सुकुमार ॥ का सतापो तेहने, विरुई ७ ॥ जो थपराध तिणें कियो, तो दाखो मुज को न । रोष निवारो वालदा, थापो मुझने मान ॥ ए॥ बाण न लोपी माहस, नवि कोनो थपराध ॥ पण मुफ इष्ट वियोगनु, मनमा उख अमाप ॥ १० ॥ एम कदेतो मुख बाहिरें, नाखतो निश्वास ॥ कतावला वीयो, कुमर चितानी पास ॥ ११ ॥ ॥ ढाल बधीशमी॥ ॥ सजुणी योगिणी रूडी वे ॥ ए देशी ॥राय विचाखुसदिए मरशे, जामो न रहे जोर ॥वालेसर कोई एडवो डे, एम कहे करतो सोर ॥१॥सितापी कोइ राखो बे,अरे दा वालेसर ते मुफ दाखो बे ॥ एषांकणी ॥ जेह करे ते काज करु दु, का मरे मुफ दजूर ॥ वाट जोतां दशे एदना, मावित्र रह्यां ते दूर ॥ सि ॥ २ ॥ श्रदो एहनु मुखफूल सखूणु, अहो एहनी तनुकांति ॥ विण कारण ए कां मरे एदनी, कल न पडे गति प्राप्ति । सि ॥३॥ नागर कहे पुण्यसार जे एदनो, साचो अतर मित्त ॥ वात माने ए एदनी, सादिव निसुणो सुपवित्त ॥ सि ॥ ४ ॥ राय कहे पुष्प सार जश्ने, समजावो थविलव ॥ मित्रनुं इख एम देखीने, शामाटे करो बो विलव ॥ सि० ॥ ५ ॥ पुस्यसार पासें जश्तेदनी,एम करे बरदास " था सुखलीला मूकीने, मरवानी का करे थाश ॥ सि ॥ ६ ॥ तरुण पणे तुम रूप अनोपम, बो सपद थावास ॥ मन मूकी मुफ भागों, उखनु कारण प्रकाश ॥ सि ॥ ॥ सा कहे एदवो कोई न कहिये, जस थागल 5 खवात ॥ हृदयथी कठे थाविने, पानी फरी हृदयें बात ॥ सि ॥ ७ ॥ कहे पुण्यसार ए ताहरी चेटा, हास्य तणी करनार 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श्री शातिनाथनो रास खंम चोयो. ३०१ यो रे, धर्म न विहडे जाचो ॥ साची धर्मतणी ए सगाइ, हि नव परनव बहु सुखदायी ॥ मित्र जुहार समो ए कहियें, रात्रि दिवस ए ध्यानमां रहिये ॥जी वा॥६॥ ते वेद नेदें नाखीयो रे, श्रावक ने यणगार ॥ पहेलो परपर हेतु ने रे, वीजो अनतर सार ॥ वीजो अनतर कारण कहिये, थतर मुहूरतमा शिव लहियें ॥ तत्क करे नव सात थात, एवो श्रीजिन बागमपात ॥ जी वा० ॥ ॥ धर्म धर्म सदुको कहे रे, पण न लहे तस मर्म ॥ थातमधर्मने श्रादरे रे, नवि वधाये कर्म ॥ नवि वधाये कर्म ए नामें, स्थापनाव्ये सहु जग कामें ॥ नावनिक्षेपा नामें राचो, ते मुनि मारगमांहे साचो ॥ जी वा ॥ ७ ॥ पूले सुणि गुरुदेशना रे, शेव पुरदर साचु ॥ कहो पुण्यसारे सु कस्यु रे, प्रवनव पुस्य जाच ॥ प्रवनवनु पुण्य प्रकासो, कहे मुनिवर मत राखो सासो ॥ नीतिपुरें कोई कुलपूत, पहेले नवें हुतो गतसुत ॥ जी वा ॥ ए ॥ खेद लह्यो ससारथी रे, चरण ग्रयु गुरु पासें ॥ लइ दीक्षा शिक्षा सहे रे, सयमपंथ धन्यासें ॥ सयमपंथें सूधो चाले, पच समिति त्रण गुप्तिने पाले ॥ कायद्यप्ति दृढता नहिं तेहवी, मुनिमारगमा दावी जेहवी ॥ जी वा ॥ १० ॥ मश मशादि परिसदें रे, कायोत्सर्ग मकार ॥ स्थिरता न रहे वेदनी रे,वति वलि वहेलो पारे॥पारे वली वली वहेलो जेवारे,नाखे सशुरु शीख तेवारें ॥ यावश्यक खमन नवि कीजें, प्राण जते पण नवि चूकीजें ॥ जी वा० ॥ ११ ॥ यत ॥ वरमग्गिम्मि पवेसो, वर विसुदेण कम्मणा मरण ॥ मा गहिय बयनगो, माजीयं खलिय सीलस्स ॥ १ ॥ पूर्वदाल ।। फरि फरि मारग दोहितो रे, दास्यो न थावे दाथे ॥ शाता गारवमां पख्यो रे, लहे जरख कयुं जिननाथें ॥ कषु सानु जिननु सहहिये, जिम लीधु ते तिम निर्वदिये ॥ व्रत पालता नीरु न थश्ये, तो सहेजें शिव पुरमा जश्ये ॥ जी वा ॥ १५ ॥ पापनीरु जय पामियो रे, हूतो थसह पणे पाले ॥ निर्वहे त्रणे गुप्तिनें रे, वेयावश्च सनाले ॥ वेयावच्च करे गुरुजीनी, धर्मे थतर मीजी जीनी ॥ मरण लही थयो सुर सोधर्मे, तिहाथी चवी तुझ सुत थयो कम ॥ जी वा ॥ १३ ॥ प्रवचन माता सातने रे, पाली सुखें तिण देतें ॥ सात प्रिया परणी सुखें रे, पूरव पुण्य सकेतें ॥ पूरवें पाली एक तेणें कटें, थाठमी नारी लही पण सृष्टे । ते २६ --- . २०० जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. थावी तिहां गुणवत ॥ १ ॥ सासु ससराने नमी, बेकर बोरी मदिर थावी कंतनें, पाय पडे ततकाल ॥२॥ मोहनमारा बांमी श्रम निर्धार ॥ कोण नरोंसे मूकीने, शहां थाव्या भापार जाणी प्रीति तुमारडी, नर कोइना नवि थाय ॥ थमें घडेली रदियें एम श्रवटाय ॥ ४ ॥ पण पीयु साथै रूपगुं, कीघे केही शं महापण तुम थागलें, थमें थवला निधि ॥ ५॥ दोहा पियु तुम साथै मान, थमने करवु नवि घटे ॥ पग पहेरीजें निरान, खेणी पण पानही ॥ ६ ॥ रत्नसुंदरी मनमाहे, चिते णे सामु पुरुष वडा जगमांदि,गर्व कस्यो घेली थ॥ महोटा बोल म बोल, पडे ए कर्मनी ॥ माणस फूटा ढोल, ताणी वात करे जिके ॥ ७ ॥ ॥ ढाल सत्त्यावीशमी॥ ॥ वेशी चशवतानी ॥ पुण्यसार माने घणु रे, थावे नारी प्रीतम साथै प्रेमनी रे, वात करे मुख जोती ॥ ॥ वात करे जोती रे श्यामा, देज घणुं देये धरती वामा ॥ दोगुदकपरे ते सुख कम्यो थाथम्यो दीद न जाणे ॥ १ ॥जी वालेसरजी रे ॥ ए कणी ॥ कबदी रमे रग महोलमें रे, कषही वाही जाय ॥ कबदी करे रे, नामिनी मन लाय॥नामिनी मन लाइ रे नाइ,देखो प्रवली कमाइ ॥ यावी तेवारें श्रचिती थाइ, कृणमा दोलत उनियां पाई ॥ ॥ ३ ॥ पुरमा नामीचो थयो रे, पुण्ययकी पुण्यसार ।। दोरा तणो रे, वाध्यो बदु विस्तार ॥ वाध्यो बहु विस्तार करता कंचन कोहि मपाई ॥ सहेर तणी पामी शेवाई, सीधी हात जलाई ॥ जी वा ॥ ३ ॥ण अवसरें नूममलें रे, बमवता नवि जीव नवसायरमा बूडतां रे, जेद थसदीन दीव ॥ जेद थसदीन सरिखा, सूधी जीवाजीव परीक्षा ॥ ज्ञानसागर मुनि वनमा आवे, दिक सनु वादण जावे-॥ ॥ जी मुनीश्वरजी रे ॥ ए यांफणी॥ पुरदर यावीयो रे, साथें ले पुण्यसार ॥ गुरु वांदी मुणे देशना थाणी नाव थपार ॥ थाणी लाव थपार रे प्राणी, ए ससारने जाणी॥कूडी काया कूडीमाया,थाडो थावे ए धर्म सहाया ॥जीरे मुनी ५॥ विदडे सुत तन कपन्यो रे, विहडे बधव साचो ॥ विहरे अर्थ ए स । Pr श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो २०३ ॥ ढाल अग्यावीशमी॥ ॥ गुण गिस्था गुण गिरुया गोडी पास दो ॥ ए देशी ॥ गुण नरिया गुण नरिया दरीयानी परें, मुनिजनने मुनिजनने वढु परिवार हो ॥ जय वता जयवता हो जिनवर थाविया जी ॥ घणु प्यारा घणु प्यारा सदमन नाविया जी ॥१॥ नव कमलें नव कमलें कनकने पद धरे, वर अतिशय वर अतिशय गुणनमार हो ॥ जग वहाला जग वहाला जिपद पधारीया जी॥ २ ॥ तिण नयरी तिण नयरीयें तिण उद्यानमा, तिण वेला तिण वेता त्रिजुवन नाण हो ॥ जगनायक जगनायक यावि समोसखा जी॥ ३॥ सुर मलिया सुर मलिया चार निकायना, वर उहि वर उहि गयण घुरंत दो ॥ जगवदाला जग वहाला जिपद पधारिया जी ॥ ४ ॥ देम कर मिकर जिननी वधामणी, वनपालक वनपालक दीधी तिवार हो । मनमोहन जगसोदन श्रीजिन यावीया जी ॥५॥ धन थापी धन यापी वगु वनपालने,नृप चाल्योनृप चाव्यो वदन काज हो।मन मोहन जगसोहन श्रीजिन थावीया जी ॥ ६ ॥ प्रदक्षिणा परदक्षिणा त्रण देई करी, पर मेश्वर परमेश्वरने परणाम हो ॥ कर जोडी कर जोडी एम स्तवना-करे जी॥७॥ त्रिगुणातम त्रिगुणातम त्रिगुण व्यतीत बो, त्रिवनना त्रिजुवनना नायक त्रिनु काल हो॥त्रिकरण त्रिकरण हो में दिलमें धस्सा जी ॥७॥ थाज पावन याज पावन थइ मुफ देहडी, नलें नेट्या जलें नेट्या श्रीजिन चद दो ॥ मुफ दोहग मुफ दोहग सवि नाशी गया जी ॥ ए ॥ श्राज जाणु थाज जाणु फल्यो मुफ थागणे, सुरपादप सुरपादप तुफ दीदार हो ॥ गुजयोगें शनयोगें दो तु प्रचु जेटीयो जी ॥ १० ॥ स्तवि जिनने स्तवि जिनने दो वेता थागलें, वजायुध वजायुधजी कर जोडि हो ॥ प्रनु नांखे प्रजुनाखे दोमुललित देशना जी ॥११॥ जवकूपें नवकूपें दो मोदनूपं धयो, नवि जाणे नवि जाणे विपयनो पास हो ॥ घणु राता घणु राता दो मोहमा प्राणीया जी ॥१॥ थवलवे थवलवे दो विपय शिला जिस्या, नवजलमा नवजलमा बूडता जीव हो ॥ धर्मवाहण धर्मवादण दूर नवे खीने जी ॥ १३ ॥ शुं कहियें शु कदिये दो इण केई नख्या, सुर किन्नर मुर किन्नर नरवर कोडि दो ॥ जग एहनो जग एहनो दो जोरो सवल कह्यो जी ॥१॥ कह्या तेरे कह्या तेरे हो धर्मना काठीया, तेदमा ए - २०२ जैनकथा रनकोप नाग आठमो माटें परमाद निवारी, सपूरण पालो सुविचारी ॥ जी वा ॥१॥ पुरंदर सांगली रे, मन पाम्यो वैराग्य ॥ ग्रहे दीक्षा गुरुजीकने रे, धनुनव राग ॥ थनुनव वात दैयामां राखी, पुण्यसार श्रावक साखी ॥ वदी जनक मुनि घर बाया, रात दिवस तेदना गुण माया जी वा ॥ १५ ॥ श्रावक व्रत थाराधतो रे, पाले शुभ याचार ॥ सुपा दे जला रे, पुण्य करे पुण्यसार ॥ पुण्यसार करे पुण्य कमाई, थात रमणी सार्थे उत्साही ॥ श्रनुक्रमें पुत्रने सोंपी नार, सशुरु पारे थया अणगार ॥ जी वा ॥ १६ ॥ चारित्र पाली रूयर्ल्ड रे, जाव पस उजमाल ॥ मुक्त गयो मुनिराजीयो रे, बदू छत्रण काल ॥ व वात मुनीश्वरें नांखी, कनकशक्ति पागल दित राखी॥चोथे सत्त्यावीशमी गल, रामें मुनि गुण गायारसालाजी वा॥१॥इति पुण्यसारसबध ॥७॥३० ॥ दोहा ॥ ॥ निसुणी श्री गुरुदेशना, कनकशक्ति नृपनद ॥ सयम सूधु थापरे, मनमा धरि थानद ॥ १ ॥ विपुलमति मुनि तेदने, हितशिक्षा सार । संयम मारग दोदिलो, जेहवी खमाधार ॥ ॥ निरतिचारपणे तुमो, पालेजो निर्धार ॥ व्रत लेई पाले खरा, धन्य तेदनो अवतार ॥ ३ ॥ वतिनी विमलमति कने, दोय नारी लिये दिरक ॥ तजि ससार विराग नजी, चाले रूही शीख ॥ ४ ॥ कनकशक्ति मुनि विचरतो, सिक्षपर्वतें थाय ॥ एक रात पडिमा रह्यो, शिला उपर गुन गाय ॥ मत्सरी, हेमचूलानिध देव ॥ करे उपसर्ग तिहां घणा, वैरनावनी टेव ॥५॥ मुनि निश्चल ध्यान रह्यो, जाणे सुरगिरि टूक ॥ विद्याधर मलि वारियो, देव गयो मुनि मूक ॥ ७ ॥ प्रहसमे प्रतिमा पारिने, विचरंतो नूपीत । रत्नसचया अवियो, गिरुन मुगुण गिरिछ ॥ ॥ सूरिनिपात ज्या नमा, काउस्सग्ग रहियो सोय ॥ मुनिध्यानें लीनो सबल, घातिकर्म मन धोय ॥ ए ॥ उज्ज्वल केवल कपन्यु, फलदल जाणे दिणद । सुर नर विया धर मती, उत्सव करे श्रमद ॥ १० ॥ वजायुध करि नक्ति बहु धन धन तुम्हो मुषिद ॥ कर्मकटक जीट्युं सपल, निर्मल झान दिपक ॥ ११ ॥ देशन सुणि घेर थाविया, वजायुध नरदेव ॥ अहोनिस सारे मेहनी, सोल सहस यह सेव ॥ १२ ॥ ॥ प्रव नवनो श्री शांतिनाथनो रास खंम चोथो. २०३ ॥ ढालयग्यावीशमी॥ ॥ गुण गिरुथा गुण गिरुथा गोडी पास हो ॥ ए देशी ॥ गुण जरिया गुण नरिया दरीयानी परें, मुनिजनने मुनिजनने वह परिवार हो ॥ जय वता जयवता हो जिनवर याविया जी ॥ घणु प्यारा घणु प्यारा सहु मन नाविया जी ॥१॥ नव कमलें नव कमलें कनकने पद धरे, वर अतिशय वर थतिशय गुणनमार हो ॥ जग वहाला जग वहाला जिपद पधारीया जी॥ २ ॥ तिण नयरीयें तिण नयरीयें तिण नद्यानमा, तिण वेला तिण वेला त्रिवन नाण दो ॥ जगनायक जगनायक थावि समोसना जी॥ ३ ॥ सुर मलिया सुर मलिया चार निकायना, वर उडहि वर उहि गयण घुरत हो ॥ जगवहाला जग वहाला जिपद पधारिया जी ॥ ४ ॥ देम कर देमकर जिननी वधामणी, वनपालक वनपालक दीवी तिवार हो । मनमोहन जगसोहन श्रीजिन यावीया जी ॥५॥ धन थापी धन थापी वगु वनपालने,नृपचाल्योनृप चाल्यो वदन काज हो।मन मोहन जग सोदन श्रीजिन थावीया जी ॥ ६ ॥ प्रदक्षिणा परदक्षिणा त्रण देई करी, पर मेश्वर परमेश्वरने परणाम हो ॥ कर जोडी कर जोडी एम स्तवना-करे जी॥॥ त्रिगुणातम त्रिगुणातम त्रिगुण व्यतीत बो,त्रिजुवनना त्रिवनना नायक बिदु काल हो।त्रिकरण त्रिकरण हो में दिलमें धस्खा जी ॥॥ थाज पावन थाज पावन थमुफ देवडी, नलें नेट्या जलें नेव्या श्रीजिन चद हो ॥ मुफ दोहग मुफ दोदग सवि नाशी गया जी ॥ ५ ॥ श्राज जाणु थाज जाणु फल्यो मुज थागणे, सुरपादप सुरपादप तुज दीदार हो ॥ शुनयोगें गुजयोगें हो तु प्रतु नेटीयो जी ॥ १० ॥ स्तवि जिनने स्तवि जिनने दो वेता थागलें, वज्जायुध वजायुधजी कर जोडि दो ॥ प्रतु नाखे प्रचनाखे दोसुललित देशना जी॥११॥जवजवकूपें हो मोहनूपें धल्यो, नवि जाणे नवि जाणे विषयनो पास दो ॥ घणु राता घणु राता हो मोदमा प्राणीया जी ॥१॥ अवलवे श्रवलये दो विपय शिला जिस्या, नवजलमा नवजजमा खुडता जीव हो ॥ धर्मवाहण धर्मवाहण दूर उवे खीने जी ॥ १३ ॥ शु कहियें शु कहिये हो इण के नज्या, सुर किन्नर सुर किन्नर नरवर कोहि हो । जग एहनो जग एदनो हो जोरो सवल कह्यो जी ॥१॥ कह्या तेरे कह्या तेरे दो धर्मना काठीया, तेहमा ए २०४ जैनकथा रत्नकोप नाग आम्मो. तेहमांए थतिहि अवघ्न हो ॥ मोहराजा मोहराजाए रागरूपें रह्यो १५ ॥ कह्यो पहेलो कह्यो पहेलो हो थालस नामथी, मोह बीजे बीजे दो त्रीजे अवर्ण दो ॥ दंन चोयो दन चोथो दो क्रोध ए मो जी ॥ १६ ॥ बांमीजें बांमीजें प्रमाद हो सही, वली सचम सत्तम कृपणनो नाव हो ॥ जय थष्टम जय थष्टम शोक नवम जी ॥ १७ ॥ वलि दशमु वलि दशमुं श्रझानपणु कयु, अम्यारमो ग्यारमो कह्यो व्याक्षेप हो ॥ हादशमो हादशमो कुतूहल वारीयें जी। १७ ॥ सगुथी ए सदुथी ए बलीयो कह्यो तेरमो, विषयानो विषपामो सघले वाक दो ॥ काम नोगें काम जोगें ए दोय शबद नजे ली। १॥ यक्तमागमे ॥ जीवाण नते कामी जोगी गो जीवा कामीवि जोशी वि से केणघण नते एव वुच जीवा कामीवि जोगीवि सोतिदिय पस्किंदिया ६ पहचकामी जिनिंदिय घाणिदिय फासिदियाई पञ्च जोगी नेरझ्याण ते कामी जोगी गो नेरश्या कामीवि जोगीवि एव थमुरकुमाराण जीव पस य कुमाराण पुढवीकाश्याण नते कामी जोगी गो नोकामी जोगी नेर श्या एव जाव तेऽदियाण चरिंदियाण कामीवि जोगीवि एव जीव वे माणियाण इत्यादि।पूर्वढालाकदि देशन कहिवेशन क्षेमकर विठजी, विषपाने विषयाने निवारो दूर हो।तो शिवमुख तो शिवसुख पामी शाश्वा जी ॥१०॥ प्रजीयें प्रजुजीयें प्रकाशी देशना,थडवीशमी थडवीशमी चोथे खम हो । ढाल निसुणी ढाल निसुणी हो हृदयमा राखजो जी ॥ २१ ॥३०॥३५ ॥ दोहा॥ ॥ श्ण अवसर पूछे तिहां, सहस्रायुध नृपनव ॥ कर जोडी धरणे नमी, नाखो नयनानद ॥ १॥ जगवत् तातें केम लही, पूर्व थपर जवषा त ॥ वायुवेगादि खेचर तणी, ते नांखो थवदात ॥ ५ ॥ ॥ ढालगणत्रीशमी॥ थाज दजारी ढोलो थावशे ॥ ए देशी ॥ कहे एम क्षेमकर जगपणी, सानल सहस्रायुध नूप ॥ सुगुण प्राणीजी ॥ ज्ञानरयण जगमा वहुं। तुझ तातें हो यवधिहानथी, नारख्यु ए नवनु स्वरूप ॥ १ ॥ सुगु । ॥ झा ० ॥ ए थाकणी ॥ प्रनु कहो केता नेद ने तेदना, कार करुणा जगदाधार ॥ जिपद राय जी, वलिहारी प्रचनामनी ॥ कदे है श्री शांतिनायनो रास खंम चोथो. ३०५ यो पंच एहना, मति श्रुत ने अवधि मन धार ॥ सु० ॥ झा० ॥ २॥ तिम मन पर्यव चोथु सही, पचम केवल निकलक ॥ सु ॥ दोय नेदें परोक्ष ए जाणीये,प्रत्यक्ष त्रिदु नेर्दे निःशक॥ सु० ॥ज्ञा०॥३॥ दोय विक टप एक सकल्पथी,प्रत्यक्षमाहे विदु नेद ॥ सु० ॥ नेद यावीश प्रथमना, श्रुत चउदस जाणो थखेद ॥ सुझा॥४॥पट नेद थवधि मन थाणी ये, मन पर्यव दोय विकल्प ॥ १० ॥ क्षायिक झान ते पाचमु, तेहमा नहि कोय सकल्प ॥ सु० ॥झा॥५॥ एम नेद एकावन झानना, मतिना तेहमा बहु होय ।। सु० ॥ मतिपर्याय घणा थडे, बुद्धि स्मृति प्रज्ञा जो य ॥ मु० ॥झा॥६॥ मति कहीये हो नावी कालनी, बुद्धि सप्रतिकालनी जाण ॥ सु० ॥ स्मृति लहीये काल थतीतनी, प्रज्ञा त्रिदु काल वरखाण ॥ सु० ॥हा॥७॥वलीए चिद् ने जाणीयें,थोत्पातिकी पहेली बुद्धि ॥सु॥ वैनयिकी बीजी वली, कार्मणकी त्रीजी विगु ॥ सु० ॥झा॥॥ चोथी कही पारिणामिकी, बुद्धि ए चिट्ठ नेद विचार ॥ सु० ॥ अणदीतुं अण सानल्यु, उपजे ते पहेली सार ॥सुझााा ए उपर रोहा तणो, प्रनु प्रकासे सवध ॥ सु० ॥ निमुणे सघली ए पर्पदा, मति उपर ए प्रवध ॥ सु० ॥झा॥१०॥ थथ रोहकसवध ॥नयरि थवतीमाहे वसे, अरिकेशरी नामें नरेश ॥ सु० ॥ ते नयरीनी समीप ने, एक महोटी शिला सुविशेष ।। मु० ॥ज्ञा॥११॥ तास समीप हो नट तणु, एक गाम थवे शक्वित ॥ सु ॥ नट रंगशूर वसे तिहा,सबल गुणी कलावत ॥ १० ॥झा०॥१२॥ तस घर पुत्र सोदामणो, रोदक नामें एक वाल ॥ सु ॥ लघुवयमा माता मुश्मन कपन्यु ७ ख थसराल ॥ सु० ॥झा॥१३॥ रुक्मिणी नामें वीजी वरी, तस जनकें दो तरुणी सार ।। सु० ॥ यौवन मद उन्मन दुश्, न गणे रोहकने लगार ॥सु०॥हा॥१॥ शोक्य यने वली शोक्यना,जगमा कुवादला होय ॥ सु ॥ वालपणे माता मरे, जग ए सम दुख न कोय ॥ सु० ॥हा॥१५॥ रोदक चिते हो माहरी, जो माय मुईण गर ॥ सु०॥ ए रुक्मिणी गणती नथी,मुफ मानवी मात्र लगार ॥९॥झा॥१६॥ रोहक कोप्यो एम कहे, न करे तु मुफ सनाल ॥ मु० ॥ पण पागल रुडु नहीं, जोजे दवे रूहे निदाल ॥ सु० ॥हा॥१०॥ सा त्रटकी वोली तिहा, थरे शु शिशु तुफथी थाय ॥ सु० ॥ तुज रूठे तू किस्यु, तुज हि ३०४ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. तेहमा ए श्रतिदि थवम हो ॥ मोदराजा मोदराजा ए रागरूपें रह्यो जी १५ ॥ कह्यो पहेलो कह्यो पहेलो हो थालस नामथी, मोह बीजे मोह बीजे दो तीजे थवर्ण दो ॥ दन चोथो दन चोयो हो क्रोध ए पर मो जी ॥ १६ ॥ बांमीजें बांमीजें प्रमाद हो सही, वली सत्तम वसी सत्तम कपणनो नाव दो ॥ जय अष्टम जय अष्टम शोक नवम कहो जी ॥ १७ ॥ वलि वशमुं वलि दशमुं अज्ञानपणु का, अम्यारमो । ग्यारमो कह्यो व्यापि दो ॥ हादशमो हादशमो कुतूहल वारीयें जी । १७ ॥ सद्गुथी ए सद्थी ए बलीयो कह्यो तेरमो, विषयानो विषयानो सघले वांक दो ॥ काम नोगें काम जोगें ए दोय शबद नजे जी ॥ १॥ यमुक्तमागमे ॥ जीवाण ते कामीनोगी गोम्जीवा कामीविनोमी वि से केणघण नते एव वुश्वजीवा कामीवि नोगीवि सोतिदिय पस्किंदिया ३ पड्डञ्चकामी जिनिंदिय घाणिदिय फासिदियाइ पमुञ्च जोगी नेरश्याण ते कामी जोगी गो नेरश्या कामीवि जोगीवि एव थमुरकुमाराण जीव पण य कुमाराण पुढवीकाश्याण नते कामी जोगी गो नोकामी जोगी नेर श्या एव जाव ते दियाण चरिंदियाण कामीवि जोगीवि एव जीव वे माणियाण इत्यादि।पूर्वढालाकदि देशन कदिदेशन क्षेमकर विजी,विषपाने विषयाने निवारो दूर हो।तो शिवमुख तो शिवसुख पामी शाश्वतां जी ॥२०॥ प्रज्जीयें प्रबुजी प्रकाशी देशना,थडवीशमीथडवीशमी चोथे खम हो । ढाल निसुणी ढाल निसुणी हो हृदयमा राखजो जी ॥ १ ॥३०॥ ॥ दोहा॥ ॥ण श्रवसर पूढे तिहां, सहस्रायुध नृपनद ॥ कर जोडी चरणे नमी, नारखो नयनानद ॥ १ ॥ जगवद तातें केम लही, पूर्व अपर नववा त ॥ वायुवेगादि खेचर तणी, ते नाखो थवदात ॥ ५ ॥ ॥ ढालगण्त्रीशमी॥ थाज हजारी ढोलो थावशे ॥ ए वेशी ॥ कहे एम क्षेमकर जगपणी, सानल सहस्त्रायुध नूप ॥ मुगुण प्राणीजी ॥ ज्ञानरयण जगमा वहुं॥ तुझ तातें दो थवधिज्ञानथी, नारव्यु ए नवनु स्वरूप ॥ १ ॥ सुगु० ॥ ॥ झा ० ॥ ए थाकणी ॥ प्रनु कहो केता नेद ले तेहना, कर करुणा जगदाधार ॥ जिपद राय जी, वलिहारी प्रहानामनी ॥ कडे घेर .

श्री शातिनायनो रास खम चोयो २०७ वीशे ॥ ए थाकणी ॥ एम मनमान्यागु सदा जी, करती होशे केलि ॥ तो हवे ए साये किसी जी,प्रीति ए विपनी वेल के ॥ २० ॥ २ ॥ कुल लजा लोपी णे जी, न गणी परनव जाति ॥ नारी वेद कुशीलिणी जी, एह थी शु विपरीत के ॥ रम० ॥ ३ ॥ यत ॥ अनूसो सोहा बनयारी, थकिंचपो सोदश दिरकपारी । लताज्जुथा सोहा एकपत्ती, बुद्धी सो हरायमती ॥१॥पूर्वढाला जोवो वातनी वातमा जी,चित्त फरियु ततकाला॥ ते सामु जोवे नहि जी, ब्रांति बडी चमाल के ॥ र० ॥ ४ ॥ नजर न माझे नाहलो जी, केम दीसे दिल रोप ॥ हसी न बोले हेजशु जी, किण कारण ए शोप के ॥ र ॥ ५ ॥ थाण न लोपी एहनी जी, चालतां एक चित्त ॥ रसमाहि केम रूपए जी, पडीयु थावि थचित के ॥ २० ॥ ६ ॥ परनर साथे नवि रमी जी, तु सूधी निकलक ॥ काली कीकी किम थानी, कत तणी विण वक के ॥ २० ॥ 8 ॥ दिवस वे चार थया जिस्ये जी, न शम्यो रोप लगार ॥ अलगी शय्या लेइ रह्यो जी, मन उचे नर तार के ॥र० ॥ ७ ॥ यत ॥ आझानगोनरेशणा, गुरूणा मान मर्दनम्॥ष्टयक् शय्या च नारीणा,मशस्त्रवध उच्यते॥॥ पूर्वढाल ॥एम जूरे वेगी घणु जी, गलहतो वेइ गाल ॥ एहवे रमतो थावीयो जी, नादानो रोहक वाल के ॥ र ॥॥॥श्रावीने कनो रह्यो जी, कां रोवे एम मात॥ ते कहे मुफ नपर घणु जी, रीसाणो तुम तात के ॥ २० ॥ १० ॥ वत्त काइ जाएयुं होवे जी, तो कहे मुफने साच ॥ ताहरी गति तुहिन लदे जी, कहे उघडतो वाच के ॥ र० ॥ ११ ॥ चमकी चिते चित्तमा जी,दीसे एह वलाय ॥ कर जोडी एम वीनवे जी, वत्स दु ताहरी माय के । र ॥१२॥ थान प्रसन्न तुफ उपर जी, नदि लोपु तुज थाण ॥ करि थनुकूल पिता दवे जी, दन महेल्यो में जाण के ॥ र० ॥ १३ ॥ रोहो कहे म करो तुमें जी, चिता किसी मनमाहि ॥ पुनरपि पुत्र पिता बने जी, वेग रयणीये त्यादि के ॥ र० ॥ १५ ॥ चटकी चिट्ठ दिशि चादनी जी, बात करे ते दोय ॥ वोली उपचो थाकलो जी, जाये ए नर कोय के ॥ २० ॥ १५ ॥ जनक कहे किहा मुफने जी, देखाडो ते लग ॥ निज करयुं तनुवादडी जी, वतलावे ते नम के ॥ २० ॥ १६ ॥ वाया नर ए तो सही जी, किहा ठे ते नर धीत ॥ रोहो कहे में पूरवें जी, एडवो २०६ जैनकथारनकोष नाग आठमो. जेवो हो नावे दाय ॥सुझा॥१॥ वचन सुणी अनिमानन,मन चिंते रोदक बाल ॥ मु० ॥ विण मान सतारे हो एहनु, मुफ जन्म जीवित ; बाल ॥सुझा॥रए॥ यत ॥अवध्यकोपस्य निदतुरापदां, नवति वश्या' स्वयमेव सपद ॥ अमर्षशून्येन जनस्य जतुना, न जातहान नवि विधा दर ॥१॥ ज्वलितं न हिरण्यरेतस, चयमास्कवति जस्मनां जन ॥ थनिनूतनयादसूनत , मुखमुङति न धाममानिन ॥२॥ पूर्वदाल॥ अपराप वेश्ने एह शिरें, मुफ जनकने करु अनिष्ट । मु० ॥ एह मान उतारु हो एदनु, तो मुफ चितित होवे इष्ट ॥ सु० ॥झा ॥२०॥ नवि सुणो दवे बुद्धि औत्पातिकी, करे रोदक ते अधिकार ।सु॥ चोथे गणत्रीशमी ढालमा, मतिज्ञान तणो विस्तार॥॥झा॥१॥ सर्व गाथा ॥५॥श्लोक ॥३१॥ ॥ दोहा ॥ ॥ एक दिन घरने वागणे, सूता जनक ने जात ॥ यामिनिमा सहसा कहे, थहो अदो नर को जात ॥१॥ घरमाथी कोई नीलस्यो, कहे पिता देखाहते कहे ते कमी गयो, पाख्यो पिता ब्रममांम ॥२॥ रंगशुर मन चितवे, थदो मुफ कुलटा नारि ॥ वृक्षपणे परण्यो सही, मुफने पच्यो धिक्कार ॥३॥ यत ॥ मूर्खस्य काव्यकरण, गीतमकंठस्य द्यूतमधनस्य ॥ वृक्षस्य विषयवांबा, परिदासपदानि चत्वारि ॥ १॥ एकोगोत्रे स नवति पुमान् य, कुटुब विनति, सर्वस्य हे सुमतिकुमती सपदापन्निमित्ते ॥ स्त्री पुवञ्च प्रनवतितरा तस्य गेहं विनष्ट, वो यूना सह परिचयात्त्यज्यते कामिनीनि ॥२॥ उप्पय ॥ एकांकरे अवाज,लाज एकाच मम॥एकांसोंपे देह, नेह एकागुबमे एकांकरे सकेत,एक नाली समजावे ॥ तन मनयतर और, एक शिरवाय ढोलावे ॥ कामिनी जाति अवगुण घणा,मीठे वोलनधीजीयें ॥- इसी निर्लज नफट नारिश, कयू नेद न कीजीयें ॥१॥ कवित॥करिकोकट ॥ रविचरियं ॥ जलमये ॥ श्स्यु विचारी नारिगु, थयो विरक्त मन तेह ॥ लाख कया गुण एदने, पण नहि मुज्छ नेद ॥४॥ ॥ ढाल त्रीशमी॥ ॥ उदयापुररी राजरना, म्हें दीना एक अचना ॥ ए देशी ॥ रगार मन चितवे जी, जुनी नारी जात ॥ मुह मीठी वातो करे जी, जहेर गजे पुनि वात के ॥१॥ रमणी रूडी राज दीसे, पण ए खोटी विशया .

श्री शांतिनायनो रास खंम चोयो. श्णए खूशी थई नृपति एम वें, यहो केहनो ए जायो ॥ सेवक कहे रगर नटावो, तस सुत रोहक गायो ॥ ६ ॥ वाले वेशे बहु बुद्धिमतो, सकल कलानो ज्ञाता ॥ वात सुणी नरपति मनमाहे, पाम्यो सवली शाता ॥ ॥ घेर थावी नरपति एम चिते, वुदिपरीक्षा कीजे ॥ जो मन माने तो रोहकने, मत्रीश्वरपद दीजें ॥ ॥ कहेवाडयुं एक नर सघातें, तिण गामें राजाय ॥ वद्ध व्ये तुम एक इव्य केरो, करो प्रासाद उत्साहें ॥५॥ गाम लोक मलिया सद्ध नेला, वात विचार ए उमो ॥ जो नवि कहेवा डीशु उत्तर, मानशे नृपति जूमो ॥ १७ ॥ पण कोइने मति एह न सजे, चितातुर थइ रहिया ॥ रोतो रोहक कहे जनकने, नूख न जाये सही या ॥ ११॥ कहे रगशूर पडख वत्स हमणा, विपमो नृप यादेश ॥ याव्यो वे तस चिता महोटी, कहे रोहक कहो लेश ॥ १५ ॥ वात कही सदु ए तब वोल्यो, एहमारे शु गूढा ॥ कठो जानोजन काजें, वेना शु दिल्यूढा ॥ १३ ॥ पठे कहीश दु उत्तर एहनो, सद् जोजन कर थाव्या ॥ रोहापासे तिणे नृपनरने, सद् साखे समजाव्या ॥ १३ ॥ जा कहेजे तुफ नरपति यागल, महोटी शिला हा एक ॥ तेणे नृपयोग्य मदिर निपजशे, इव्य मूको सुविवेक ॥ १५ ॥ सुणि हरख्यां सद्ये नृप बागल, जइ तिण सेवक नारख्यो ॥ कहे राजेश्वर एह प्रत्युत्तर, तुमने केरों याख्यो ॥ १६॥ दीधो उत्तर वालक रोहें, वात मुणी नृप हरख्यो ॥ जेहवो दीगो तेदवोहीज में, इण वातें ए परख्यो ॥ १७ ॥ एक दिवस नृप एक वस्तने, मेहलीने सजलावे ॥ साचवजो ए चारे ने पाणी, मत मत्त कुर्बल यावे ॥ १७ ॥ रोदकने वली पूठे सघला, कहे वृकपास ए वाधो ॥ अधिक नजीके न कणे दुरे, जतन करी ए साधो ॥ १ए ॥ ते थादेश प्रमाण कयाथी, राय घणु रीजाणो ॥ एक दिन एक कुकूटने मुकी, कहे नृपति सपराणो ॥ २० ॥ एकला एहने यु६ करावो, कहे रोहक सद्गु पदेलो ॥ एहना मुख थागल थाणीने, मूको दर्पण वहेलो ॥ ११ ॥ तेम कीधु प्रतिक्विने निरखी, कुर्कुट जूऊण लागो ॥ नृप थादेश प्रमाण कस्यो श्म, सदुनो सशय नाग्यो ॥ २२ ॥ तदनतर तिल शकट नरीने, मोकलियुं नृप गामें ॥ निण माने तिल तेहिज माने, तेल वेबु थम कामें ॥ २३ ॥ कहे रोदक थारीसापू, तिल लीजें ए तोली ॥ सम

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जैनकथा रत्नकोष नाग आठमो.
इज नर दीव के ॥ र० ॥ १४ ॥ रंगशूर मन चितवे जी, हा हा
बुद्धि ॥ विण वांके विनता तजी जी, सबल थयो निर्बुदि के ॥ १॥
१७ ॥ रोपशम्योमन माहिलो जी,थयो रमणी थनुकूल ॥ चूक्यो
अजाणते जी, में कीधु प्रतिकूल के ॥ र ॥ १ ॥ क्षणमा जापा
रूपणां जी, नामिनी ने नरतार ॥ सुख विलसे ससारनां जी,
गणे अवतार के ॥ २० ॥ २० ॥ रुक्मिणी रहे कर जोडीने जी,
करे नरपूर ॥तु वत्स मारे वालदो जी, तुम थला वला रहो दूर के ॥र
॥ १ ॥ पण न करे वेसासडोजी, माय तणी जे शोक्य ॥ जो धीई
एहने जी, तो फल पामु रोक के ॥ र० ॥ २२ ॥ जोजन करवाने समे
जी, बेसे जनकनी साथ ॥ पण मरती ते थहोनिशे जी, राखे मुतने
दाय के ॥ २० ॥२३॥ चोथे खमें त्रीशमी जी, ढाल कदी मन रंग ॥ हवे
श्रोता निमुणो तुम्हें जी, बागल वलु उबरंग के ॥ र ॥२॥७॥३५
॥ दोहा॥
॥ रोहक साथै एकदा, रगशुर निज काम ॥ गयो उहोगी नयरीयें,
जोवा सरिख वाम ॥ १ ॥ चोरासी चढुटा नला, दीपे थति ममाण ॥
देवानुवन रलियामणा, निरखे तेह सुजाण ॥ २ ॥ क्षिप्रातट बेसारीने,
रोहक ने रंगशूर ॥ काज निमित्तें नयरमां, पदोता थानवापूर ॥ ३ ॥ बुद्धि
मत रोदो तदा, नगरी तणु स्वरूप ॥ थालेखे निज थकलयी, क्षिप्रातटें
अनुप ॥ ४ ॥ तस पोछे थइ पोलीयो, कनो रदियो थाप ॥ रेणुमयी
नगरी जोश, मनमां नहिं सताप ॥ ५ ॥
॥ ढाल एकत्रीशमी॥
॥ थारल्याननी देशी ॥ तिण अवसर नयरीनो नरपति, पायो
अल्प परिवारें ॥ थश्व उपर चढियो थलवेसर, जोतो ख्याल तेवारें
॥ १ ॥ नयरी श्रवती जिहां थालेखी, तिहां दोडीने थावे ॥ तष रोहो
थावीने थाहो, नरपतिने समजावे ॥ ५॥ दा दा किदां जाय बे ध
सीयो, कां नगरीने नांजे ॥ वाल तुरंगम वहेलो पाठो, गश् करु बु लाजें
॥३॥ चित्त चमक्यो नरपति श्म वोले, वाग तुरंगम केरी ॥ जो सारे
तो निरस्त्री जोग, नयरि उणि नलेरी ॥ ४ ॥ ते कहे टुं नहिं ताहरो
चाफर,ना चाव्यो श्ण वाटें ॥ एतु जे खाजें जगमा, ते मीगई माटें ॥५॥

शातिनायनो रास खंम चोयो. श्णए खूशी थई नृपति एम पूठे, यहो केहनो ए जायो ॥ सेवक कहे रगगर नटावो, तस सुत रोहक गायो ॥ ६ ॥ वाले वेशे वढु बुद्धिमतो, सकल कलानो झाता ॥ वात सुणी नरपति मनमाहे, पाम्यो सवली शाता ॥ ॥ धेर थावी नरपति एम चिते, बुदिपरीक्षा कीजे ॥ जो मन माने तो रोहकने, मत्रीश्वरपद दीजे ॥ ७ ॥ कहेवाडयु एक नर सघातें, तिण गामें राजाय ॥ बदु व्ये तुम एक इव्य केरो, करो प्रासाद उत्साहे ॥५॥ गाम लोक मलिया सद्ध नेला, वात विचार ए उमो ॥ जो नवि कहेवा डीशु उत्तर, मानशे नृपति मो ॥ १० ॥ पण कोश्ने मति एह न खजे, चितातुर या रहियां ॥ रोतो रोहक कहे जनकने, नूख न जाये सही या ॥ ११॥ कहे रगशूर पडख वत्स हमणा, विपमो नृप यादेश ॥ थाव्यो वे तस चिता महोटी, कहे रोहक कहो लेश ॥ १२ ॥ वात कही सदु ए तब वोल्यो, एहमारे गु गूढा ॥ कठो जाउ नोजन काजें, वेना शु दिङ्मूढा ॥ १३ ॥ पठे कहीश दु उत्तर एहनो, सदु जोजन करि याव्या ॥ रोहापासे तिणे नृपनरने, सनु साखे समजाव्या ॥ १४ ॥ जा कहेजे तुझ नरपति यागल, महोटी शिला इहां एक ॥ तेणें नृपयोग्य मदिर निपजशे, इव्य मूको सुविवेक ॥ १५ ॥ सुणि हरख्या सद्गुये नृप थागल, जइ तिण सेवक नाख्यो ॥ कहे राजेश्वर एह प्रत्युत्तर, तुमने केणे थाल्यो॥ १६ ॥ दीधो उत्तर वालक रोहें, वात सुणी नृप दरख्यो । जेदवो दीगो तेहवोहीज में, इण वातें ए पररख्यो ॥ १७ ॥ एक दिवस नृप एक वस्तने, मेहलीने सनलावे ॥ साचवजो ए चारे ने पाणी, मत मत्त उर्बल थावे ॥ १७ ॥ रोहकने वली पूढे सघला, कहे वृकपास ए बाधो ॥ यधिक नजीकें न कणे दुरे, जतन करी ए साधो ॥ १५ ॥ ते थादेश प्रमाण कस्याथी, राय घणु रीजाणो ॥ एक दिन एक कुर्कुटने मूकी, कहे नृपति सपराणो ॥ २० ॥ एकला एदने युछ करावो, कहे रोहक सद् पहेलो ॥ एहना मुख बागल थाणीने, मूको दर्पण वहेलो ॥ २१ ॥ तेम की प्रतिबिंधने निरखी, कुर्कुट जूमण लागो ॥ नृप थादेश प्रमाण कयो श्म, सदुनो सशय नांग्यो ॥ २२ ॥ तदनतर तिल शकट नरीने, मोकलियु नृप गामें ॥ जिण माने तिल तेहिन माने, तेल देवु थम कामें ॥ २३ ॥ कहे रोहक वारीसा पू, तिल लीजें ए तोली ॥ सम २७ n . २२० जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. थारीसे तेल समर्यो, सांजलि सदुयें तोली ॥ २४ ॥ ते तिम कारिज सीधु, राय तणुं दिल बन्नस्युं ॥ वली मगावे वाट वेलुनी, घधन करा ॥ २५ ॥ रोहें कहाव्यु राजनु कारिज, करतु अमें पण प्रमाण जोवा एक जीरण, मोकलो कटको कोर ॥५॥ प्रत्युत्तर दीधो पुनरपि, जीरण गज मोकलियो ॥ कहेवाडघु यत्ने वजो, ए हाथी उर्वलीयो ॥ २४ ॥ एहनी हकीगत मुज सोपी, पण मून नवि कहेवो ॥ पालता मू तव चिते, लोक शो उत्तर ॥ २७ ॥ रोहें कदायु ए तुम हस्ती, न लिये जल ने चारो ॥ नपरों न जोवे नृप कहे शु मृत, जन कहे तुम श्रवधारो ॥२॥ नृप कहेवायुंश मोकजजो, ग्राम तणो एक मीठो ॥ रोहो कहे पुर कूपने मूको, एए मारग नवि दीवो ॥ ३० ॥ नृप कयु थनि विना मुफ पायस, रांधीने तुमें श्रापो ॥ चूर्णक ऊपर पायस पाचवी, दीधु टल्यो सतापो ॥ २१ चोथे खमें एकत्रीशमी ढालें, बुद्धि परीक्षा कीधी ॥ मति उपर क्षेमकर जिन जी, एदवी देशना दीधी ॥३॥ सर्व गाथा ॥१॥ श्लोक तथा गाथा ॥३५॥ ॥ दोहा॥ । बुद्धिमत जाणी जलो, नृप तेडायो पास ॥ विरुद अवस्थायें थावजे, सद्रुको सुणे ठन्नास ॥१॥ नान करी मत थावजे,महेलो पण नावेश ॥ यान चढी नवि थावईं, पालो पण न चलेश ॥ ॥ रुघाडे मत थावजे, नव शिर ढांक्यु जोय ॥ नवि रात नवि दिवसमा, बिटु पस्के एक न दोय ॥ ३ ॥ नवि बाया नवि थात, नविखाली नवि नेट ॥ जो तु बुषिती थडे, एम मुझ थावी नेट ॥ ४ ॥ गामर कपर ते चटपो, जूतल धरतो पाय ॥ नादी चदन लेपयुत, सध्या काल उत्साह ॥५॥दि पडवे दिन चालणी, शिर परि धरी सुरंग ॥ माटी लेई दायमा, थाल्यो परि बरग ॥ ६ ॥ नृपपर्षद ते थावीने, करे नृपने परणाम ॥ नेटण एगलें, माटीमय थनिराम ॥ ७ ॥ ॥ ढाल वत्रीशमी। रुपने जी ॥ ए देशी ॥ नृप पूछे रोहाप्रत्यें जी, तें कहे जगमा तावडी जी, ए माटी गुणगेह ॥ १ ॥ चाफ्नो ए काम, बुद्धि जग माने पशु भी, बुद्धियकी महे , - त श्रीशांतिनाथनो रास खंम चोथो ११ दाम ॥ सुणो ॥ ए यांकणी ॥ खागत पूठी नृप घj जी, दीधु वदु सन्मान ॥ पर्पदमाहे प्रशसीयो जी,सबलो बुद्धिनिदान ॥ सु० ॥ २ ॥ वह रत्ना वसुधा कही जी, तेहमा नहि सदेह ॥ नीतिशास्त्रमा एदवु जी, वचन का धरि नेह ॥ सु० ॥३॥ यत ॥ दाने तपसि शौर्य च, वि झाने विनये नये ॥ विस्मयोनैव कर्त्तव्यो, वदुरत्ना वसुंधरा ॥ १ ॥ वाजिवारणलोहाना, काठपापाणवाससाम् ॥ नारीपुरुपतोयाना, मतर मह इतरम् ॥ ५ ॥ पूर्वढाल ॥ श्रगरक्क करी थापियो जी, रोहाने तिण रात ॥ नृप कपटें सूतो तदा जी, ते सूतो सादात ॥ सु० ॥ ४ ॥ पहेले पहोरे जगाडीयो जी, रोहा मघे रे केम ॥ चितु तु कहो कुण करे जी, वकरी लीमी एम ।। सुणो ॥ ५ ॥ कहे रोहा मुफ यागलें जी, जो जाणी होय वात ॥ कहे राजन इम जाणियें जी, एहने कोठे वात ॥ सु० ॥ ॥ ६ ॥ वीजे पीपल पाननोजी, आदि थंत गुरुनाव ॥ नृप पूजे निर्णय कयो जी, ए वेदु सरखे नाव ॥ सु० ॥ ७ ॥ तिमहीज त्रीजा याममा जी, खिन्नही सदेह ॥ श्वेत श्याम तनु पुबनो जी, सम पण कहे गुण गेह ॥ सु ॥ ७ ॥ चोथे प्रहरे कटकें जी, वींध्यो बोले रे ताम ॥ पूर्बु कहो मुझ केटला जी,जनक तुम्हारा खामि ॥ सु० ॥ ५ ॥रे पापी छं वो लीयो जी, केता जनक दवत ॥ सत्य कहु बु ताहरे जी, पंच जनक सत ॥१०॥१॥ ते केहा कहे रानवी जी, धनद रजक अलि होय ॥ कई मातंग पांचमो जी, एहमा जूठ न कोय ॥ सु० ॥ ११ ॥ कहे नृप केम जाणीया जी, तुज गुण्थी राजिद ॥ ते गुण केहा तब कहे जी, रोदो धरि थानद ॥ १० ॥ १२ ॥ परजा पाले नृप सही जी, वनद घणे धनदान ॥ रजक रुष्ट धनने हरेजी,कटक थलिनु निदान ॥१॥१३॥ गाढ कोप करवाथकी जी, कढुचमाल नरेश ॥ निश्चय करवा मायने जी, थावी पुढे मदीश ॥ सु०॥ १४ ॥ माय कहे नाह्या पली जी, सम कालें दोय दीन ॥ रजक थलि मुणि समजीयो जी, ए बुद्धिमत गरिछ । सु ॥ १५ ॥ रायें सन्मान्यो घणु जी, शतमत्रीमाई मुख्य ॥ तेहने कीधो बुदिधी जी, पाम्यो परें सुरक ॥ मु० ॥ १६ ॥ बुद्धि पहेली कपर कह्यो जी, रोहकनो दृष्टांत ॥ चोथे खमें वत्रीशमी जी, ढाल सुणो सद् सत ॥ सु० ॥ १७ ॥४३॥सर्व गाथा ॥ श्लोक तथा गाथा ॥३०॥ 10 । ने २२० १ जैनकथा रत्नकोप जाग आठमो. थारीसे तेल समर्यो, सांजलि सद्धयें तोली ॥ २४ ॥ ते तिम कारिज सीधु, राय तएं दिल उन्नस्युं ॥ वली मगावे वाट वेलुनी, षधन कर ॥ २५ ॥ रोहें कहाव्यु राजनुं कारिज, करवु श्रमें पण प्रमाण जोवा एक जीरण, मोकलो कटको कोर ॥६॥ प्रत्युत्तर दीधो पुनरपि, जीरण गज मोकलियो ॥ कहेवाडघु यत्ने वजो, ए हाथी उर्वलीयो ॥ २७ ॥ एहनी हकीगत मुझ सोपी पण मूळ नवि कहेवो ॥ पालता मू तव चिते, लोक शो उत्तर ॥ २७ ॥ रोहे कदायु ए तुम इस्ती, न लिये जल ने चारो ॥ नयरों ने जोवे नृप कहे / मृत, जन कहे तुम थवधारो ॥२॥ नृप कहेवायुं श मोकलजो, ग्राम तणो एक मीठो ॥ रोहो कहे पुर कूपने मूको, एवं मारग नवि दीगे ॥ ३० ॥ नृप कत्यु थमि विना मुफ पायस, राधीने तुमें श्रापो ॥ चूर्णक कपर पायस पाचवी, दीधु टल्यो सतापो ॥४॥ चोथे खमें एकत्रीशमी ढालें, बुद्धि परीक्षा कीधी ॥ मति उपर क्षेमकर जिन जी, एदवी देशना दीधी ॥३॥सर्व गाथा ॥१॥श्लोक तथा गाथा ॥२५॥ ॥ दोहा॥ ॥ बुद्धिमत जाणी जलो, नृप तेडाय्यो पास ॥ विरुक्ष व्यवस्थायें थावजे, सडको मुणे बनास ॥१॥ स्नान करीमत थावजे,महेलो पण नाघेश ॥ यान चढी नवि थाव, पालो पण न चलेश ॥ २ ॥ रुघाडे मत थावजे, नव शिर ढाक्यु जोय ॥ नवि रात नवि दिवसमा, बिटु पस्के एक न होय ॥ ३ ॥ नवि बाया नवि थात, नविखाली नवि नेट ॥ जो तु बुदिषली थडे, एम मुफ थावी जेट ॥ ४ ॥ गामर ऊपर ते चढपो, जूतल धरतो पाय ॥ नादी चवन लेपयुत, सध्या काल उत्साद ॥५॥ शुदि पडवे दिन चालणी, शिर परि धरी सुरंग ॥ माटी जेई दायमा, चाल्यो परि उबरंग ॥ ६ ॥ नृपपर्षद ते थावीने, करे नृपने परणाम ।। नेटण एगलें, माटीमय थनिराम ॥ ७ ॥ ॥ ढाल वत्रीशमी॥ रुपने जी ॥ ए देशी ॥ नृप पूजे रोहाप्रत्ये जी, तें कहे जगमां तावही जी, ए माटी गुणगेद ॥ १ ॥ चाफ्तो ही ए काम, बुद्धि जग माने पशु जी, बुद्धिपकी लहे , . , तवं भू.

श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो. २२३ याव्या वनह मकार रे, देव करे जयकार रे ॥ स ॥३॥ प्रनुचरणे कर जोडिने, कहे वजायुध नूप रे ॥ तारो त्रिभुवन तातजी, तहारु थकल खरूप रे ॥ पडिया नवजल कूप रे, तु अवलवनरूप रे ॥ केवलज्ञानश्चनुप रे, टाल्यो मोह विरूप रे ॥ स ॥ ॥ ले दीक्षा प्रजुजी कने, बजायुध नरदेव रे ॥ राज्य तजी समता नजी, थया ततहण धर्मदेव रे॥ सारे सुर नर सेव रे, नवि राखे यहमेव रे, साची जेहनी टेव रे, अहो निश चरणनी हेव रे ॥ स ॥ ५ ॥ शम दमवता रे साधु जी, विचरे मही ततकाल रे ॥ कय विहारने श्रादरी, पाले मुनि नजमाल रे ॥ पट कायना प्रतिपाल रे, विपययकी मन वाल रे, मदने मीण ज्युं गाल रे, वयण न नाखे थाल रे ॥ स० ॥ ६ ॥ एक दिन मुनिवर थावीया, वजायुध शपिराय रे ॥ सिगिरिनी दो कपरें, रहिया कास्सग्ग नाय रे ॥ वज्ज परें दृढकाय रे, टाव्या हरित थपाय रे, एकाकी थसहाय रे, व्यान धर्म चित्त लाय रे ॥ स ॥ ४ ॥ एक वरस पडिमा तणो, थनिग्रह मनमाहे धार रे ।। मेरु शिखर जेम स्थिर रह्या, ववमुनि गुणधार रे ॥ सुधा श्रीथ रागार रे,बदू द वारो वार रे,धन्य तेहनो जमवार रे,गुणमणिरयण नमार ॥सा एहवे हयग्रीव सुत दुता,मणिकुन मणिध्वज नाम रे॥बहु नव नसता रे ते दुवा, सुर थनुपम तनु धाम रे ॥ तिण दीठो मुनि ताम रे, रह्यो निश्चल एक वाम रे, जाग्यु वैर निकाम रे, करे उपसर्ग उदाम रे ॥ स० ॥ ए ॥ तीखी दाढे फाडता, मुख जोपण विकराल रे ॥ एक सिह दूजो रे वाघलो, यथाव्या ततकाल रे ॥ पडिया मुनिने ख्याल रे, दतें तखेडे खाल रे, मुनि चिते उजमाल रे, रखे जीव थाये सुकुमाल रे ॥ ॥ स० ॥ १० ॥ मुनिवर धारा हो ध्याननी, तिम तिम वाधे रे जोर रे ॥ हाथी थइ वली थाविया, साथै विद्ध करे सोर रे ॥ गुदे दंतनी कोर रे, जीव तु थाजे कगेर रे, दुख सह्या नरकें घोर रे, कीधा कर्म ए दोर ॥ स० ॥ ११ ॥ थया वली साप ने सापिणी,फण मामी थाउ रे ॥ आवी समीपें दोसाधुने,पग वींटे जिम जाड रे ॥ कड कड नाजे हो हाड रे, मुनि रह्या ध्यान माम रे, नाखे कर्म उपाड रे, पूरे मनहम्हाड ॥ स० ॥ १२ ॥ धन्य वायुध साधुजी, नहिं मन रागनो थश दूर कस्यो तिम कोधने, दीपायो निजवश रे ॥ सकल मुनि श्रव रे . रे रे है १२ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ॥ दोहा॥ ॥ वीजी वैनयिकी कही, गुरुविनये जे द्रुत ॥ थोडी पण वीसे गुरु उपकार महत ॥ ॥ यत ॥ शुचिर्नुपय० ॥ विनय वडे कारण कायु, विद्याने अधिकार ॥ शोने विनयथकी नएयु, शास्त्रमाहे ए सार ॥२॥ यत ॥ पुस्तक प्रत्ययाधीत, नाधीतं गुरुसन्निधो ॥ सनामध्ये शोनते, जारगर्ना श्व स्त्रिय ॥ १ ॥ यमुक्तमागमे ॥ विण्या नागरि नाणादसण दसणाचरण॥चरणेहितोमोरको,मोरके सुरकथणापाई ॥१॥ करिणीपदगायक तणा, बात्र तणो उपदेश ॥ ए बुद्धि कपर जाणजो, शास्त्रथकी सुविशेप ॥३॥ घट चित्रादि किया नली, शिल्पी तणु विनाश । कर्मयकी जे ऊपजे, सा कार्मिकी वखाण ॥ ४ ॥ सर्ववस्तुकत नि वया, जे परिणाम वशेण ॥ बुद्धि दोय पारिणामिकी, वयरस्वामी परें जेण ॥ ५ ॥ सघली बुद्धि कपर कह्या, थागममा सबध ॥ अथ तणं गौरव · दुवे, न कह्या तस परवंध ॥ ६ ॥ मति थाव्ये सहचारियुं, प्रगटे श्रुत घटमाहि ॥ वस्तु त्रैकालिक जे नणे, वेदीजें जगादि ॥७॥ काल थसख्य तणा लहे,थतीत अनागत नाव ॥ अवधि सहित चिई दिशि दुवे,थवधिनाण समाव ॥ ॥ नाव मनोगत नापीयें, सज्ञी तणा यशेष ॥ जिने मन पर्यव ते कयुं, चोथु ज्ञानविशेष ॥ ॥ नासक लोकालोकनु, निरावरण निरुपाधि ॥ प्रगटे केवल पांचमु, विलसे सहज समाधि ॥ १० ॥ ॥ ढाल तेत्रीशमी॥ ॥ राम नणे दरि कठीयें ॥ ए देशी ॥ हेमकर जिनजी कहे, सुण सहस्त्रायुध सार रे ॥ ज्ञान थवधियी रे जाणिया, वजायुधे अवतार रे ॥ तहत्ति करी तेणिवार रे, चरण नमे सुखकार रे, वजायुध हिनकार रे, नवजल पार ठतार रे ॥ १ ॥ सहज मुहालो रे राजवी ॥ ए थांकणी ॥ प्रष्नु वांदी घरे थावीयो, वज्जायुध नरराय रे ॥ षट् खम केरो रे राजियो, नवे सुतने निज ताय रे ॥ सहस्रायुध सुखदाय रे, पोतें थयो निर्माय रे, समता साथें सहाय रे, सयम लेवा उत्साद रे ॥ सहज ॥२॥ चार स इस राणी नली, राजन चार दजार रे ॥ साथै शूरा रे नीसना, धम्प तेदना यवतार रे ॥ जव ए जाण्यो यसार रे, सातशे पुत्र परिवार रे, " श्री शांतिनाथनो रास खंम चोयो. २१३ आव्या वनह मकार रे, देव करे जयकार रे ॥ स० ॥३॥ अनुचरणे कर जोडिने, कहे वायुध नूप रे ॥ तारो त्रिवन तातजी, तदारु थकल स्वरूप रे ॥ पडिया जवजल कूप रे, तु यवलबनरूप रे ॥ केवलज्ञान थनूप रे, टाल्यो मोह विरूप रे ॥ स० ॥ ४॥ ले दीक्षा प्रचुजी कने, वजायुध नरदेव रे ॥ राज्य तजी समता जजी, यया ततहण धर्मदेव रे॥ सारे सुर नर सेव रे, नवि राखे यहमेव रे, साची जेहनी टेव रे, यहोनिश चरणनी हेव रे ॥ स ॥ ५ ॥ शम दमवता रे साधु जी, विचरे मही ततकाल रे ॥ जय विहारने यादरी, पाले मुनि उजमाल रे ॥ पट कायना प्रतिपाल रे, विपययकी मन वाल रे, मदने मीण ज्यु गाल रे, वयण न जाखे थाल रे ॥ स० ॥ ६ ॥ एक दिन मुनिवर धावीया, वज्जायुध कपिराय रे ॥ सिमगिरिनी हो ऊपरे, रहिया काउस्सग्ग नाय रे ॥ वज पर दृढकाय रे, टाच्या सुरित थपाय रे, एकाकी यसहाय रे, ध्यान धर्म चित्त लाय रे ॥ स० ॥ ४ ॥ एक वरस पडिमा तणो, यनिग्रह मनमांहे धार रे ॥ मेरु शिखर जेम स्थिर रह्या, वजमुनि गुणधार रे ॥ सुधा श्रीय पगार रे,बदू तु वारो वार रे,धन्य तेहनो जमवार रे,गुणमणिरयण नंमार ॥स०॥॥ एहवे हयग्रीव सुत दुता,मणिकुन मणिध्वज नाम रे॥ वढु नव नमता रे ते दुवा, सुर थनुपम तनु वाम रे ॥ तिण दीगो मुनि ताम रे, रह्यो निश्चल एक गम रे, जाग्यु वैर निकाम रे, करे उपसर्ग उद्दाम रे ॥ स० ॥ ए ॥ तीखी दाढे फाडता, मुख जीपण विकराल रे ॥ एक सिद दूजो रे वाचलो, याव्या ततकाल रे ॥ पडिया मुनिने ख्याल रे, दतें उखेडे खाल रे, मुनि चिते उजमाल रे, रखे जीव थाये सुकुमाल रे ॥ ॥ स० ॥ १० ॥ मुनिवर धारा हो ध्याननी, तिम तिम वाधे रे जोर रे ॥ हाथी या वली थाविया, साथै विद्व करे सोर रे ॥ गुदे दतनी कोर रे, जीव तु थाजे ,कठोर रे, सुख सह्या नरकें घोर रे, कीधां कर्म ए दोर रे ॥ स० ॥ ११ ॥ थया वली साप ने सापिणी,फण मामी फूफवाह रे ॥ धावी समीपें दो साधुने,पग वींटे जिम जाड रे ॥ कड कड नाजे दो हाड र, मुनि रह्या ध्यानगु माम रे, नाखे कर्म उपाड रे, पूरे मनहरूहाड ॥ स० ॥ १२ ॥ धन्य वजायुध साधुजी, नहिं मन रागनो यश ॥ दूर कयो तिम कोधने, दीपायो निजवश रे ॥ सकल मुनि थव रे . रे , न , - २१२ जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. ॥ दोहा॥ ॥ वीजी वैनयिकी कही, गुरुविनये जे द्रुत ॥ थोडी पण दीसे गुरु उपकार मदत ॥१॥ यत ॥ गुचिपय० ॥ विनय वई कायु, विद्याने अधिकार ॥ शोने विनयथकी नएयु, शास्त्रमाहे ए ॥ २ ॥ यत ॥ पुस्तक प्रत्ययाधीतं, नाधीतं गुरुसन्निधो ॥ सनामध्ये शोनते, जारगर्ना श्व स्त्रिय ॥१॥ यउक्तमागमे ॥ विषयाउ नाण नाणादसण दसणाचरण॥चरणेहितोमोरको,मोरके सुरकथणाबाई ॥२॥ करिणीपदगायक तणा, बात्र तणो उपदेश ॥ ए बुद्धि कपर जायखो, शास्वयकी सुविशेप ॥३॥ घट चित्रादि किया नली, शिल्पी तणु विनाण। कर्मयकी जे ऊपजे, सा कार्मिकी वखाण ॥ ४ ॥ सर्ववस्तुकत नि अया, जे परिणाम वशेण ॥ वुद्धि होय पारिणामिकी, वयरस्वामी परें जेण ॥ ५ ॥ सघली बुद्धि ऊपर कह्या, थागममा सवध ॥ अथ तj गौरव · दुवे, न कह्या तस परवध ॥ ६ ॥ मति याव्ये सहचारियं, प्रगटे श्रुत घटमांहि ॥ वस्तु त्रैकालिक जे जणे, वेदीजें जगमाहि ॥७॥ काल असख्य तणा लहे,यतीत अनागत नाव ॥ अवधि सहित चिई दिशि दुवे,यवधिनाण सनाव ॥ ७ ॥ नाव मनोगत जापीयें, सझी तणा यशेष ॥ जिने मन पर्यव ते कत्यु, चोथु ज्ञानविशेष ॥ ए॥ नासक लोकालोकनु, निरावरण निरुपाधि ॥ प्रगटे केवल पांचमु, विलसे सहज समाधि ॥ १० ॥ ॥ ढाल तेत्रीशमी ॥ ॥ राम नणे दरि कठीयें ॥ ए देशी ॥ क्षेमकर जिनजी कहे, सुण सहस्त्रायुध सार रे ॥ ज्ञान थवधियी रे जाणिया, वजायुधे अवतार रे ॥ तहत्ति करी तेणिवार रे, चरण नमे मुखकार रे, वजायुध हिनकार रे, नवजल पार उतार रे ॥ १ ॥ सदन मुहालो रे राजवी ॥ ए यांकणी॥ प्रनु वादी घरे थावीयो, वज्जायुध नरराय रे ॥ षट् खम केरो रे राजियो, ग्वे सुतने निज नाय रे ॥ सदस्रायुध सुखवाय रे, पोतें थयो निर्माय रे, समता साथें सहाय रे, सयम लेवा उत्साह रे ॥ सहज ॥२॥ चार स इस राणी नली, राजन चार हजार रे ॥ साथै शूरा रे नीसमा, थम्य तेदना अवतार रे ॥ जव ए जाप्यो थसार रे, सातशे पुत्र परिवार रे, T श्री शातिनाथनो रास खंम चोयो ३२५ पी, एम थनेक जस नाम ॥ग्रह गठी नित्य समरतां, सीके वांगित काम ॥३॥ पिहिताश्रव नामे जला, ते प्रजुना गणधार ॥ एकदिन यावि समोसखा, चरण करण गुणवार ॥ ४ ॥ ॥ ढाल चोत्रीशमी॥ ॥ याज दु तो थलज रे वहेनी ॥ ए देशी ॥ श्रीसहस्रायुध रे स्वामी, तुम्हने यरज करु शिर नामी ॥ श्री स० ॥ ए थाकपी ॥ वनपा लक उजाणे थावी, दीधी हर्प वधामणी लावी ॥ श्री स० ॥ १ ॥ थाज मुज वनमा रे थाव्या, श्रीपिहिताव गणधर जाव्या ॥ श्री० ॥२॥ उपशम रसना रे दरिया, मुनि पट्काय तणा पीयरीया ॥ श्री० ॥ ३ ॥ जोता मुझ मन रे वसीया, सानति नूरमणीना रसीया ॥ श्री ॥ ४ ॥ राज्य सद्ध वे रे साझ, पण ए मुनिनु दरिसण प्यारु ॥ श्री० ॥ ५ ॥ वात सुणी सहस्त्रायुध राया, करवा निर्मल थापणी काया ॥ श्री० ॥६॥ वगु जन साये रे थाया, वांदण श्री गणधरना पाया ॥ श्री० ॥ ७ ॥ तीन प्रक्षिण रे देवे, वाटी वेसे मुनिपद सेवे ॥ श्री० ॥ ॥ कहे गण घर गुण धरीये थगें, परदरीयें परमाद असगें ॥ श्री० ॥ए ॥ पच ने थावनी सख्यायें कहीय, क्षेमकर जिनवाणी सहहीयें ॥श्री॥१॥ एदने सेव्ये वह ययाउ खीया, जिणे ए मूक्या ते सद् सुखीया ॥ श्री० ॥ ११ ॥ यत ॥ प्राणीनामतरस्थायी, नहालस्य समोरिपु ॥ नास्त्युद्यमसम मित्र,य कृत्वानावसीदति ॥१॥ पूर्वढाल ॥ रहे अनादिनो विपयनी वगमा,ते इनु कारण कामिनी जगमा ॥ श्री० ॥ १२ ॥ यमुक्त ॥ स्मितेन नावे न च लक्जया निया, परामुखैरर्धकटादवोदित ॥ वचोनिरीव्कल हेन लीलया, समस्तनावै खलु वधन स्त्रिय ॥ २ ॥ सत्य जना वच्मि न पक्षपाता, झोकेषु सर्वेष्वपि तथ्यमेतत् ॥ नान्यन्मनोहारि नितं विनी न्यो, उ खैकहेतुर्न च कश्चिदन्य ॥३॥ पूर्वढाल ॥ इणपरें निसुणी गणधर वाणी, सहस्रायुध कहे जोडी पाणी ॥ श्री० ॥ १३ ॥ तु मुफ तारक रे मलियो, थाजयी महारो दादाडो वलियो । श्री० ॥ १४ ॥ प्रष्ठ मुझने कीजे हवे चेलो, वाधे माहरो पुस्यनो वेलो ॥ श्री० ॥ १५ ॥ थनुक्रमें तात साधुने मलीया, मनना सयल मनोरथ फलीया ॥ श्री 7 रे । R- रे १४ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. तंस रे, गुण उज्ज्वल जिम हस रे, नहि प्रमादनो थश रे, करे सड प्रशस रे ॥ स० ॥ १३ ॥ राक्षस ने वली राक्षसी, रूप करी अति रे ॥ पासें यावी हो साधुने, वीवरावे परचम रे ॥ रोप बढया दोप रे, साधु चिते घमम रे, निमित्त मल्यु उद्दम रे, कर्म कषु शत खम ॥स ॥ १४ ॥ एहवे यावी तिलोत्तमा, रना दोय रसाल तणी रे इशणीयो, रूपे काकजमाल रे ॥ वजायुष मुनि नाल रे, जोडी निज़ नाल रे, वदन काज विशाल रे, थावी ते ततकाल रे ॥ स. ॥ १५॥ बीदिना देवी रे देखीने, नासण लाग्या रे ताम रे ॥ तरम्या:- देवीयें श्रति घणा, का रे उष्ट अलाम रे ॥ कीधु तुमें कांश काम रे, सोई निज नव माम रे, जाशो उर्गति गमरे, देठा जा तुम नाम रे ॥ स । ॥ १६ ॥ वांदी मुनिवर पाग्ला, कनी जोडीने हाथ ॥ जय वज्वायुष मुनीश्वरा, शमतानारी नाथ रे॥ क्रोध कस्यो जिण मात रे, साचा शिवपुर साथ रे, मद कीधो तुमें हाय रे, तरिया जवजल पाथ रे ॥ स० ॥ १७ ॥ मुनिगुण गाये रे मानिनी, नाटक करे बढ़ रग रे, वीणा वश ने वासली, वाये बट्ट उबरंग रे ॥ वालीने निज थग रे, मुनि मुख जोती सुचग रे, वज्रायुधजी नि सग रे, रहिया ध्यान थनंग रे॥ स० ॥ १७ ॥ मुनि स्तवना करि वदीने,समकित निर्मल कीध रे ॥ ते देवी निजस्थानकें, पदोती कारज सिम रे ॥ वजायुध सुप्रसिह रे, जितु नुवनें यश लीध रे, थनुनवरस बढ़ पीध रे, दान अनय जग दीध रे ॥ स० ॥ १५ ॥ एक वरस पडिमा रही, पारी विचरे मुनीश रे ॥ श्रीवजायुध साधु जी, नाहि जेदने मन रीश रे ॥ दिन दिन चढती जगीश रे, सेवे सुर नर ईश रे, साधु तणा योनिश रे,गुण धारे सत्तवीश रे ॥स ॥२०॥ चोये स्वमें ते त्रीशमी, ढाल कदी श्रनिराम रे॥धन्य मुनि जे एदवा, तेदना सिमशे काम २॥ नित्य चठी लीजें नाम रे, करो प्रनातें प्रणाम रे, शांतिप्रल गुणगान रे, हर्षे करे मुनि राम रे ॥ स० ॥२१॥ सर्व गाथा ॥ए॥ श्लोक ॥ ३५ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ श्री क्षेमकर जिनवरु, लद चोराशी मेल ॥ पूष पाली थायऱ्या, सिम थया गुणकेलि ॥ १ ॥ सिझ बुझ परमातमा, पारंगत परमिह ॥ परमज्योति पावन पुरुप, प्रठ प्रणमु ते ३० ॥१॥ चिदानद चेतनप श्री शातिनाथनो रास खंम पांचमो. ३१७ ॥अथ पंचमखंमस्य प्रारंनोऽयम्॥ ॥ दोहा॥ ॥ विहरमान जिन वदिये, सीमधर जगवत ॥ युगधर वीजा नमुं, थतुली वल यरिहत ॥ १ ॥त्रीजा वादु जिपदने, हु नित्य करुं प्रणाम ॥ श्री सुजात स्वयमन वली, पनानन गुणधाम ॥ २ ॥ यनतवीर्य सुरि प्रनो, श्री विशाल जिनराज ॥ वज्रधर चानन नमो, चश्वाहु शिवकाज ॥ ३ ॥ श्री जुजग ईश्वर विजु, नेमिप्रन वीरसेन ॥ महानइ देवजस जयो, अजितवीर्य गुनसेण ॥४॥ ए वीशे वदी विच, रचगु पचम खम ॥ कान दे श्रोता सुणो, ए सवध थखम ॥ ५॥ नव दशमो श्री शातिनो, सुणता मगलमाल ॥ निभा विकथा परदरी, निसुणो थइ उजमाल ॥६॥ जिनगुण सानलता यका, जन्म होय सुपवित्र ॥ बोधिवीज निर्मल करे, मुनिजन कहे महत ॥ ७ ॥ ॥ ढाल पहेली॥ ॥ माली केरे वागमा, दोय नारिंग पक्के लो ॥ दो ॥ ए देशी ॥ जवुपूर्व विदेहमा, पुष्कलावई विजया लो॥ यदो पुष्कलावविजया लो ॥ नयरी तिहां पुमरिगिणी, दीपे यति विजया लो ॥थहो ॥दी॥१॥ लान बसे वासो जिहां, मुख सपत्ति सघली लो॥यामु॥ चोराशी बाजारनी, दीपे कृति सबली लो॥थदी॥२॥ तिहा राजे राजेश्वरु, घनरथजी नामें लो ॥था॥ अरिहंत पदवीयें उपन्या,सुर नर शिर नामे लो ॥थ॥॥ ॥३॥थडहिय सहस लक्षण धरे, थगे थति वारु लोपथपथा थतर लक्षण थति घणा, दीपे दीदारु रे लो यादी तस गृहिणी दोय सुदरी, प्रीतिमती पदेली लो ॥थ ॥प्री० ॥ वीजी मनोहरी मानिनी, पियु नेहें घडेली लो॥थापि०॥५॥ दवे वजायुधजी चवी, प्रीतिमती नी कूखें लो॥थ ॥प्री० ॥ मेघ सुपनसूचित सही, अवतरिया ससूखे लो ॥थाथ॥६॥ रथसुपनें सूचित जलो, सहस्त्रायुध थायो लोगया स॥ मनोदरी उयरमा उपन्यो, पुण्यवत मुहायो लो ॥थ॥ पुण् ॥७॥ पूरण का पुत्र दो, दोय राणीयें जाया लो थ॥दो॥ उत्तम लक्षणे पता, कचनवर्णकाया लो ॥अ॥क० ॥७॥ मायतणा मन मोहता, २०

१६ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो.
॥ १६ ॥ शतवल मुतने राज्य नसावी,सहस्रायुध सयम नावीनी.
॥ १७ ॥ थइ गीतारथ विचरे वसुधा, मुखथी वोले वाणी न मुधा । श्री.
॥ १७ ॥ श्रीवजायुध साथै विचरे, सवेगरगमां हैयडे पसरे ॥ श्री.
॥ १५ ॥ करता विविध तपस्या सारी, प्रतिवोधता बहु नर नारी।
श्री० ॥ २० ॥ याव्या नगर पित्यागनार ॥ मुनिवर करता दोय विदार
॥ श्री० ॥१॥ चोथे खमें चोत्रीशमी ढालें, राम कहे धन्य जे एम पाजे.
॥ श्री० ॥ २२ ॥ सर्वगाथा ॥१०॥ श्लोक तथा गाथा मलीने ॥४R
॥ अथ कप्तश ॥
॥ राग धन्याश्री ॥ धन धन ए मुनिवर वह जागी॥ श्रीवजायुध ने
सदस्रायुध, शुरू किरिया गुणरागी ॥ध ॥ १॥ चोरासी लख योनि स
मावी, सुमति दशा मति जागी॥ष्कृत पाप थालोई सघलां, चारण
करे त्यागी ॥ध ॥ २ ॥थणसण पादपोपगम थाराधे, मुनिवर दोष
वैरागी॥थष्टम नव एम योग विलासी,कीर्तिजश् जग वागी॥ध॥३॥ काल
करी नवमे ग्रेवेयकें, झदिबढुली कर लागी ॥ एकत्रीश सागर थायु रुपना,
वेगु थया सोनागी ॥ध॥॥ मुख विलसे थति सुदर वांनित, नव नवमे
धनुषगी ॥ इव्य जिनेश्वरके गुण गावो, दरिसण गुणके प्रसगी ॥ १०
॥ ५ ॥ ते प्रचुके गुणराशिकी रचना, रास कीयो में उमगी ॥ घोपो
खंम सपूरण कीनो, मुजो सड एकरगी ॥ध ॥ ६ ॥ मगलमाला
काकजमाला, सुणतां होवे सुचगी ॥ श्री सुमतिविजयगुरु चरण प
सायें, कीर्ति कमला थनगी ॥ ध० ॥ ७॥ सर्वगाथा ॥१००७॥ श्लोक
तथा गाथा ।। ५२ ॥ प्रथम खम गाथा ॥ ४३ ॥ दितीय खमगाथा
॥ २७ ॥ तृतीयखम गाथा ॥ २४ ॥ चतुर्थखम गाथा ॥ १००४ ॥
चारे खमनी गाथा ॥३१०६॥ चारे खेमनाप्रास्ताविक श्लोक तथा गाथा
॥ ११ ॥ खेम चारनी ढाल ॥ ११३ ॥ इति श्रीशांतिनाथप्रषधे रासब
छादशनवनिवघे थाम्रनिपात्यायनेकाविमृश्यकारिनृपचरित्रानुविधपुरपसा
राधिकारसयधोऽष्टमनवमनववर्णननामा चतुर्थ खम संपूर्णः ॥ ४ ॥

श्री शांतिनाथनो रास खम पांचमो. ए पुरनो धणी, निहतारि नरिंदनी लो॥य निण॥ प्रिय मित्रा ने मनोरमा, मेघरय वस्या सुकनी लो ॥यामे॥२६॥ तेहज नृपनी लघु कनी, दृढर थने यापी लो ॥य॥०॥ सुमतिनामें सुखदायिनी, रतिरसनी वापी लो ॥थ॥र ॥२७॥ मुख विलसत ससारनां, मेघरथजीनी जाया लो॥ यामे॥ सुत नदिपेण मेघसेन , प्रसव्या सुखदाया लो ॥याप्र॥ २०॥ दृढरथने एक सुत थयो, रथसेन विचारी लो ॥ १० ॥ २० ॥ ते त्रणे जणे एकता, बुद्धि सदुनी सारी लोय॥॥२॥ सुख सपत्ति वि लसे घणी, थहो पुण्यनी लीला लो यापु०॥ नेह घणो बदु वधवने, रहे यहोनिश नेला लो यार॥३०॥ पहेली हो पंचम खमनी, ढाल रूडी वखाणी लो ॥य॥ ढा ॥ श्री सुमतिसुगुरु सेवक कहे, धन्य एह कमाणी लो ॥ य॥ध ॥ ३१ ॥ सर्वगाथा ॥ ३० ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ धनरथ राजा एकदा, पुत्र पौत्र परिवार ॥ तखतें वेता थावीने, सुदर शोना सार ॥ १ ॥ मेघरथ जांखे तिए समे, निज पुत्रोने थाम ॥ वत्स कला मुफ आगलें, परकासो गुणधाम ॥ २ ॥ प्रश्नोत्तर पूजो तुमो, कहो तस उत्तर सार ॥ जनकवचन मुणी वोलियो, लघु वधव तेणि वार ॥२॥ तद्यथा॥श्लोक ॥ कथ सवोध्यते ब्रह्मा,दानार्थे धातुरत्र क ॥कः पर्यायश्च वाक्याना,कोवाऽलकरण सताम् ॥१॥ ज्येष्ठ कहे सुण वाधवा,एहनो कलान्यास" इति वली, कहे लघु वधव उनास ॥४॥ श्लोक ॥हितीय प्रश्न ॥ दमनीति कथ पूर्वे,महाखेदे क बच्यते ॥ कोऽवलाना गतिर्लोक, पालक पचमोमत ॥२॥ ज्येष्ठ कहे एशुन कल्यु, “महिपति" एवु नाम ॥ दवे ट्ठ पूल ते कहो, मेघसेन थनिराम ॥५॥ तद्यथा तृतीयप्रश्न ॥ श्लोक। किमाशीर्वचन राशा,का शनोस्तनुममन ॥ क कर्त्ता सुख उखाना, पात्राच मुरुतस्य किम् ॥३॥ ए उत्तर देवा नणी, थणजाण्या सह कोय ।। मेघरथजी तव कहे, "जीवरक्षाविधि" जोय ॥ ६ ॥ पुनरपि मेघरथेनोक्तः॥ श्लोक॥ सुखदा का शशाकस्य, मध्ये च जुवनस्य क ॥ निपेधवाचक कोवा, का ससारविनाशिनी ॥ ४ ॥ कदे धनरथ जी "नावना", पद चिट्ठ प्रश्नं थाय ।। उत्तर एवो सांजली,सदु हरख्या मनमांदि ॥॥ क्षण विनोद एदवो कस्यो, प्रमोत्तरनो सार ॥ण अवसर जेनीपन्यं, ते निमुणो नर नारि ॥७॥ उत्तर खास ॥

, २७ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. रूपें रगीला लो ॥यरू०॥ मुख पूरण शारदशशी, रतिकांत बबीता तो ॥थारपानामधरे उत्सव करी, "मेघरथ" "दृढरथजी"लोचनामे सजान सढुने वालदा, टाले यनरथ जी लोयाटा॥१०॥ गिरि पंपक परें वाधता, पच धावें पालीता लोपथप०॥योग्य कला अन्यासने, सुस मां लालिता लो ॥यासु॥११॥ यध्यापक पासें वन्ने, जणवाने मूस्या लोयान॥ सफल कला शीखे तिदा, कोई वात न चूक्या लो ॥ध. को ॥ १२ ॥ पुरुप तपी वहातेर कला, रूडी थन्यासें लो॥॥॥ लिखित गणित बालेख्पनी, नाटय गीत सरासे लो।थाना॥१३॥ वालि त स्वर तिम यूत ए, थन्न पान विधि जाणो लो॥थाथाशयन धानू षणविधि नली, थार्या गाथा वखाणो लो ॥याया॥१४॥ गीति प्रहे लिका श्लोक ए, गधयुक्तिने कहीये लो ॥थागण॥ तरुणीप्रसाधन ल क्षों, नर स्त्री दय लदिये लो॥थान ॥१५॥ गजलक्षण बावीशमी, गोलक्षण रूहां लो ॥ ॥गो॥ ताम्रचूड लक्षण नला, मीढना नहिं कूडा लो ॥॥ मी॥१६॥ चक्र बत्र मणि दमना, काकिनी थसि केरा लो ॥थ ॥ का ॥ चर्मलक्षण ए ग्रथमा, दाख्या ले जलेरा लो ॥थ दा॥ १७ ॥ चइ सूरज ग्रह राहुना, लहे चरित्र विचारा लो ॥ १० ॥ ल॥ सूपकार विद्याकार वे, मतगत निर्धारा लो॥थाम॥१॥ रगत व्यूद प्रतिव्यूदने, लदे चार प्रतिचारा लो ॥थला परिमाण स्कंधा घोर, पुर वास्तु स्कंधावारा लोपथपु०॥१॥ निवेश वली ए त्रयना, दय गजनी शिक्षा लो ॥थ॥ द०॥ तत्त्ववाद नयशास्त्रमा,धनुर्वेद दक्षा लो॥॥धारणा तेम मणि सोवननी कला, धातुर्वादें माह्या लो॥थ धारा ॥ बागुदंम दृष्टि मुष्टिने, युः जाये न वाह्या लो ॥१०॥ यु ॥३१॥ नियुक वली वाग्युबमां, बेड बांधव कुशला लो॥थ ॥ ॥ सर्प वहि जल स्यंजन, थतर केणें न कल्या लो॥थ॥॥२॥ पप्रछेद वैदक तणी, कपि वाणिज्यकर्मनी लो॥थाक॥ वली पलितनाशनकरी, कला कारक शर्मनी लोपथका॥ २३ ॥ श्रथवा पक्षीरुत तणी, बहोतेरमी कदियें लो ॥१०॥वण॥ कला बहोत्तेर नर तणी, बागमथी ए जहीये लो ॥थाथा॥२४॥ जाण थया एदना घणु, यौवन वय पाया लो॥यम् यो॥ मनमोदन मनवालदा, सहने मन नाया लो॥यास ॥२५॥ सुमदिर श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो. २२ ताम्रकलश अनिधान ॥ राण ॥ वीजो वेढ निज युचना, यया स्वामी बलवान ॥ रा॥ वा० ॥ १६ ॥ हो ॥ एक दिवस तटिनीतटें, घटता दोय थमन ॥ रा ॥ पडिया युधनी लाल, नडिया ते जेम मन ॥ राण ॥ वा ॥ १७ ॥ हो ॥ पुरववैरे प्रेरिया, रोप चढया मदवत ॥ रा० ॥ वींधाणा दतोशलें, वेद ते पाम्या यत ॥ रा० ॥ वा० ॥ १७ ॥ हो० ॥ नयरी अयोध्या कपन्या, दोय सैरन नइम ॥ रा० ॥ नांदीमित्रने मदिरे, शिगाला परचम ॥रा ॥ वा ॥ १७ ॥ हो ॥ राजकुमरे ते सग्रह्या, वेदु लडाव्या ताम ॥राण॥ मरण लघु रोपे जया, जोजो वैरनां का म ॥ रा० ॥ वा ॥ २० ॥ हो ॥ तेहिज नयरमा कपन्या, दोय घेटा दृढकाय ॥ रा० ॥ नडता ते शृगायशु, निधन लह्या तिण नाय ॥ रा०॥ वा ॥२१॥ हो ॥ कुर्कुट ए वेहू थया, पूरव नवने वैर ॥ रा ॥ रोपा रुण नयणां करी, युद्ध करे एणि पेर ॥ रा० ॥ वा० ॥ २२ ॥ हो । तेमाटे वेढुमाहीथी, को न जीत्या जाय ॥रा ॥ वैर वधावां जव नवें, थावी थामां थाय ॥ रा॥ वा ॥ २३ ॥ यत ॥ वैर विश्वानरो व्याधि, विपया व्यसनानि च ॥ महानाय जायते, वकारा पच वर्धिता ॥ ५॥ हो ॥ पंचम खमें सोहामणी, वीजी ढाल विचार ॥ राम् ॥ वैर न कीजें कोन, समजानो ए सार ॥ रा० ॥ वा ॥ २५ ॥ ७० ॥ ५ ॥ ॥ दोहो सोरती॥ ॥ कहे मेघरथजी कुमार, धनरथजीने थादरें ॥ तात का ते सार, वीजु पण कारण इहां ॥१॥ दोहो ॥ केवल वैर नहिं श्दा, बे वीजु पण हेत ॥ कदु पिताजी सांजलो, ते तुम्हने सकेत ॥ ५ ॥ ॥ ढाल त्रीजी॥ ॥ मोरा सादिव दो, श्री शीतल नाथ के ॥ ए देशी ॥ इह नरतें हो वरतें वैताढय के, नयर सुवर्णनान नामथी ॥ श्रेणि उत्तरें हो खेचर शिरदार के, गरुडवेग जे गुनमति ॥ ॥ तस थगज हो चद सूरथी । दोय के, तिलक पदें सोह्यामणा ॥ जिनपडिमा हो सुरगिरिने हक के, नमवा चाल्या दोजणा ॥ २ ॥ मुनि दीठा दो तिहां सागरचद के, चारण श्रमण गुरों नया ॥ प्रणमीने हो वेग जश् पास के, सकल कलायें थल २ - २० जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. ॥ ढाल वीजी॥ ॥ चूडले जोवन जल रह्यो॥ ए देशी ॥दो राजन॥गणिका एक तिहा, कुर्कुट लेई एक॥राजन ॥ हारे न महारो कूकडो, कोई धागल वेक ॥ राजन ॥ १ ॥ वात सुणो वारू परें, न करो कोई गुमान ॥रा. जो कोई गर्व करे मनें, तो याणो कूकड इण वाण ॥ रा० ॥ वा० ॥ दो राजन ॥ जो हारे मुफ कूकडो, तो थापु वन लद ॥ रा॥ जो हारे थवरनो, तो लद लतु प्रत्यक्ष ॥ रा० वा० ॥ ३ ॥ दो० ॥ घणो करती तदा, निसुणी मनोरमा नारी ॥ रा ॥ नृप हुकमची मोर व्यो, निज कुर्कुट तेणि वार ॥ रा ॥ वा ॥ ॥ हो ॥ जूऊण लो ग्या कूकडा, नृप धागल दरवार ॥रा०॥ उलट पालट थाये वने,चच चरण प्रहार ॥ रा ॥वा॥५॥हो॥ यरुण नयण ततहण थया, श्रापरिया जेम योध ॥ रा० ॥ वास्ना पण न रहे केमें, वैरथकी कुर्बोध ॥ रा०॥ वा ॥६॥ हो ॥ त्रिगु झाने शोनित प्रनु, श्रीधनरथ राजान ॥ रा ॥ कहे मेघरथ कुवर नणी, सुण वत्स सुगुण निधान ॥रा ॥ वा ॥७ दो० ॥ ए वे पंखीमांहिलो, नहि हारे कोई एक ॥ रा० ॥ कहे मेघरप कारण किस्युं, कहे नृप वैर एक ॥ रा ॥ वा ॥ ७ ॥ दो० ॥ ऐ रवतानिध क्षेत्रमा, रत्नपुरे दोय सार ॥ रा ॥ धनद सुदत्त नामें वसे, वणिक करे व्यापार ॥ रा ॥ वा ॥ ५ ॥ दो० ॥ मित्राई बेहुने बनी, पण घरनामसकीन ॥ राम् ॥ गत्रीय जोडी बलवने, जाय पर गामें दीन ॥रा ॥ वा० ॥१०॥ हो ॥ जार जरे अतिही घणो, नूख तृषा वली तेम ॥ रा० ॥ बलद बिचारा शुं करे, सहे निज कृतने एम ॥ रा० ॥ वा० ॥११॥ हो ॥ मिथ्यात्वें मोह्या घणु, कूड तोला ने मान ॥ रा० ॥ करे थन्याय उपायु, धन मेव्यु ए निदान ॥ रा ॥ वा ॥ १२ ॥ दो० ॥ एक दिवस धन कारणे, वढीया ते वे? जोर ॥रा ॥ श्रन्योन्ये एकेकने, वीध प्रहार कठोर ॥ रा ॥ वा ॥ १३ ॥ दो० ॥ थारतध्याने ते मुथा, धन थनरथ करनार ॥ रा ॥ नेह सोडावे पलक में, दुवे प्रत्यद सहार ॥ रा॥ वा ॥ १४ ॥ हो० ॥ नरनव हारी ते दुवा, स्वर्णकुलाने कूल ॥रा ॥ दोय दस्ती सोहामणा, लोन परो प्रतिकूल ॥ रा० ॥ वा ॥ १५ ॥ दो० ॥ कंचनकजा पहेलो पचो, , श्री शांतिनाथनो रास खमपाचमो. २२३ यां ॥ १५ ॥ नमी नेहें हो पहोता निज गेह के, गुरुपासें व्रत थादरी ॥ तप पुष्कर हो करे किरिया सार के, चरण नृपतिनी चाकरी ॥ २० ॥ घनघाती हो क्ष्य कीधा चार के, उज्ज्वल केवलसिरि वस्या ॥ मुख पाम्या हो शिवपदना सार के, पलकमाहे नवजल तया ॥ २१ ॥ च रणायुध दो हवे ते निजवात के, पूरव नवनी साजली ॥ मनमांहें हो कीधा निज पाप के, निदे दोय वत्ती वली ॥ १२ ॥ प्रणमीने हो धन रथ प्रनु पायके, थरज करे निज वाणी ॥ थपराधी हो स्वामी यम्हें जोर के, पाप प्रचुर कस्वां प्राणीयें ॥ २३ ॥ धनरथजी हो कहे समकित शुक्ष के, धर्म अहिता लक्षणे ॥ नावपूर्वक हो सहहिने दोय के, काल करे तिहा ततहणे ॥ २४ ॥ नूताटवी हो मांहे ताम्रचूल के, स्वर्णचूल नामें जला ॥ देवयोनिमा दो यया ते नूतदेव के, यत्रुत रूपें मजला ॥ २५ ॥ उपयोगी हो शाने ते जोय के, वेसि विमाने थाविया ॥ प्रण मीने हो धनरथना पाय के, कर जोडी कहे नाविया ॥ २६ ॥ धन्य खामी हो तु जगदाधार के, थम्द अनाथने उहया ॥ तुम्हें कीधो दो महोटो उपकार के, ध्येयपणे हवे थादस्या ॥२॥लहि थाणा हो पहोता निज गाय के, पाचमे त्रीजी ढालमा ॥शुजसगति हो करता निश दीस के, फल लहीयें ततकालमा ॥२॥सर्व गाथा ॥१०॥ श्लोक तया गाथा ५ ॥दोहा॥ ॥ हवे घनरथजी राज्यने, पालता एक दीस ॥ नव थसारता मन वसी, चिते एमजगदीश ॥१॥ विपय थनता कालना,वलम्या ए जीव केड ॥ चेत चेत चेतन चतुर, टेव विपयनी फेड ॥२॥ लोकांतिक सुर थावीया, ण थवसर उजमाल ॥ चूम चूज त्रिभुवनधणी, विपयथकी मन वाल ॥३॥ती रथ स्थापी नविकने, करो हम कल्याण ॥ जय जय प्रनु चिरनद तु, कहे सुर जोडी पाणि ॥४॥ दान दे सवत्सरी, थापी मेघरय पाट ॥ धनरथजी सयम लीये,मूकी सवि उच्चाट ॥५॥ केते काले पामियु, उज्ज्वल केवल ना ए॥नव्य जीव प्रतिवोधता, विचरे श्रीजिनजाण ॥ ६ ॥ मेघरथजी सुख नोग वे,नयरी पुमरिगिणीराज ॥ दृढरथ नाश्शु नला, करे धर्मना काज ॥ ७ ॥ ॥ ढाल चोथी॥ ॥ वाडी फूली थति नली ॥ मन जमरा रे ॥ ए देशी ॥ एक दिन नृप श्श्श जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो कस्सा ॥३॥ कर जोडी हो निसुणे मुनि वाणी के, प्रवनव पूरे हिस्से कहे नाणी दो सुणो धातकी खम के, ऐरवतें वजपुर श्स्यो॥४॥निर्व थनयथी दो घोपानिध राय के, हेमतिलकानो नाहलो ॥ दोय अमर हो जय विजयनो तात के, सोनागी महिमानिलो ॥ ५ ॥ शखनूपति दो पुर एहवे सुवर्ण, के तस पृथिवीराणी जणी ॥ एक तनया होने कचनवर्ण के, पृथ्वीसेना वट्ठ गुणी ॥ ६ ॥ यावी साहमी हो सर्पवर थइ तेह के, परणी थनयघोप कथने ॥ मृगनयणी हो मनोहर मह मार के, मन मानी घणु सतने ॥ ७॥ वनमाहे दो अन्य दिवस वसंत के, नृप चाल्यो रमवा नणी ॥ शतराणी दो साथै उद्यान के, वनशोज जोवे घणी ॥ ७॥ तिहा जोती हो वनतरुवरराजि के, पृथ्वीसेना पदमि णी ॥ मुनि देखे हो दात मदन मदत के, धन्य घडी मुफ थाजनी ॥ मुणी देशन दो पामी प्रतिबोध के,थाण सही जरतारनी॥ग्रहे दीक्षा दो शिल धरे श्रग के, समनावें नवतारिणी ॥ १० ॥थनुमोदी दो वलीयो नूपाल के, निजपुरमाहे थावीयो ॥ पहिलाने दो एकदिन श्री अनत के, जिन बग्रस्थनो नावियो ॥ ११॥ नृप थागण दो प्रगट्या पंच दिव्य के, जय जय सुर मुख चम्चरे ॥ लघु केवल दो जगवत बनत के, अनुक्रमें सुर सेवा करे ॥ १२ ॥ तस पासें दो बेदु तनय सघात के, दीख अजय घोष थादरे ॥ वीश स्थानक हो सेवे मुनिराय के, जिनपद नीकाचित करे ॥१३ ॥ सुत मुनि दो अच्युत सुरलोक के, थनयघोष सुरवर थया ॥ तिहाथी चवी दो श्री थजयघोषजीव के, राजा घनरथजी दुवा ॥१४॥ जयविजयना दो चवीया दोय जीव के, तुम्हें बधव बेद्व यवतमा ॥ एम नांब्यु दो सागरचद साधु के, पूरवनव मुणी चित्त तस्यां ॥ १५ ॥ कहे मेघरथ दो ते खेचर दोय के, पूरवनव नेहें करी ॥ तुम नमवा दो मल वाने काज के, थाव्या हा चित्त हित ध। ॥ १६ ॥ चरणायुध हो जू जता देखि के, बेगुजण बेद यदिच्या निज बातम हो गोपवीने यादि के, विद्यावतच पश्चीया ॥१॥सुणी एहवु दो मेघरथजीर्नु वयण के,ते से चर परगट थइ ॥ कर जोडी दो घनरथजीना पाय के, प्रणमे हियरे गह गही ॥ १७ ॥ थम्द प्रव दो नवचा तुम्हें तात के, जाग्यनले प्रष्ट ने टीया ॥ थयां लोचन दो सफला जगनाथ के, दुख पोडग सवि मेटी . .

श्री शांतिनायनो रास खम पाचमो. २२३ यां ॥ १५ ॥ नमी नेहें दो पहोता निज गेह के, गुरुपासें व्रत आदरी ॥ तप उष्कर हो करे किरिया सार के, चरण नृपतिनी चाकरी ॥ २० ॥ घनघाती हो क्ष्य कीधा चार के, उज्ज्वल केवलसिरि वस्खा ॥ सुख पाम्या हो शिवपदनां सार के, पलकमाहे जवजल तस्खा ॥ २१ ॥ च रणायुध हो हवे ते निजवात के, पूरव नवनी साजली ॥ मनमाहें हो कीयां निज पाप के, निदे दोय वत्ती वली ॥ १२ ॥ प्रणमीने दो धन रथ प्रनु पायके, घरज करे निज वाणीयें ॥ थपराधी हो स्वामी यम्हें जोर के, पाप प्रचुर कस्वां प्राणी ॥ २३ ॥ धनरथजी हो कहे समकित शुद्ध के, धर्म यहिसा लदणें ॥ नावपूर्वक हो सहहिने दोय के, काल करे तिहा ततहणे ॥ २४ ॥ नूताटवी हो माहे ताम्रचूल के, स्वर्णचूल नामें नला ॥ देवयोनिमा हो थया ते नूतदेव के, थभुत रूपें मजला ॥ २५ ॥ उपयोगी हो झाने ते जोय के, वेसि विमान थाविया ॥ प्रण मीने हो धनरथना पाय के, कर जोड़ी कहे जाविया ॥ २६ ॥ धन्य स्वामी दो तु जगदाधार के, थम्द अनाथने उना ॥ तुम्हें कीधो दो महोटो नपकार के, ध्येयपणे हवे थावस्या ॥२॥लहि थाणा हो पहोता निन गय के, पाचमे त्रीजी ढालमा ॥गुनसगति दो करता निश दीस के, फल लहीयें ततकालमा ॥२॥सर्व गाथा ॥१०॥ श्लोक तथा गाया ५ ॥ दोहा॥ ॥ दवे धनरथजी राज्यने, पालता एक दीस ॥ नव थसारता मन वसी, चिते एमजगदीश ॥१॥ विपय थनता कालना,वलग्या ए जीव केड ॥ चेत चेत चेतन चतुर, टेव विपयनी फेड ॥२॥ लोकातिक सुर थावीया, इण थवसर उजमाल ॥ वृज बुज त्रिवनधणी, विपयथकी मन वाल ॥३॥ ती रथ स्थापी नविकने, करो केम कल्याण ॥ जय जय प्रञ्च चिरनद तु, कहे सुर जोडी पाणि ॥धा दान देइ सवत्सरी, थापी मेघरथ पाट ॥ धनरथजी सयम लीये,मूकी सवि तबाट ॥५॥ केते काले पामियु, उज्ज्वल केवल ना एण॥नव्य जीव प्रतिवोधता, विचरे श्रीजिनलाण ॥ ६ ॥ मेघरथजी मुख जोग वे, नयरी पुमरिगिणीराज ॥ दृढरथ नाश्यं नलां, करे धर्मना काज ॥ ७ ॥ ॥ ढाल चोथी॥ ॥ वाही ली थति नली ॥ मन जमरा रे ॥ ए देशी ॥ एक दिन नृप . २२ जैनकथा रनकोप नाग आठमो. कस्या ॥३॥ कर जोडी दो निसुणे मुनि वाणी के, प्रवनव ने कियो। कहे नाणी दो मुणो धातकी खम के, ऐरवतें वजपुर श्स्यो॥ ॥निर्व अजयथी दो घोपानिध राय के, हेमतितकानो नाहलो ॥ दोष अमर दो जय विजयनो तात के, सोनागी महिमानिलो ॥ ५॥ शखनूपत्ति दो पुर एहवे सुवर्ण, के तस पृथिवीराणी जणी ॥ एक तनया हो। कचनवर्ण के, पृथ्वीसेना वह गुणी ॥ ६॥ यावी साहमी हो सपवर यश्तेद के, परणी अनयघोप कथने ॥ मृगनयणी हो मनोहर मुड मार के, मन मानी घणु सतने ॥ ४ ॥ वनमाहे दो थन्य दिवस वसंत के, नृप चाल्यो रमवा जणी ॥ शतराणी हो साथै उद्यान के, वनशोना जोवे घणी ॥ ॥ तिदा जोती हो वनतरुवरराजि के, पृथ्वीसेना परमि गी॥ मुनि देखे दो दात मदन महत के, धन्य घडी मुफ बाजनी ॥२॥ मुणी देशन दो पामी प्रतिबोध के,याण लही जरतारनी।ग्रहे दीक्षा हो शिक्षा धरे श्रग के, समनावें नवतारिणी ॥ १० ॥ श्रनुमोदी दो वलीयो नूपाल के, निजपुरमाहे थावीयो ॥ पडिलाने हो एकदिन श्री अनत के, जिन नग्रस्थनो जावियो ॥ ११॥ नृप थांगण दो प्रगठ्या पंच दिव्य के, जय जय सुर मुख सचरे ॥ लमु केवल दो जगवत श्रनत के, अनुक्रमें सुर सेवा करे ॥ १२ ॥ तस पासें हो बेदु तनय सघात के, दीख अजय घोष थावरे ॥ वीश स्थानक हो सेवे मुनिराय के, जिनपद नीकाचित करे ॥१३ ॥ मुत मुनि दो अच्युत मुरलोक के, थनयघोष सुरवर थया ॥ तिहाथी चवी दो श्री शनयघोषजीव के, राजा घनरथजी दुवा ॥१३॥ जय विजयना हो चवीया दोय जीव के, तुम्हें बधव बेद्व चवता ॥ एम जारव्यु दो सागरचद साधु के, पुरवनव मुणी चित उमां ॥ १५ ॥ कहे मेघरथ दो ते खेचर दोय के, प्रवनव नेहें करी ॥ तुम नमवा दो मल वाने काज के, थाव्या हा चित्त हित धरी ॥ १६ ॥ धरणायुध हो चू जता देखि के, बेद्वजण बेद थदिच्या निज थातम दो गोपवीने यदि के, विद्यावलच पश्टीया ॥१॥सुणी एद दो मेघरथजीने वयण के,ने से चर परगट थइ ॥ कर जोडी हो घनरथजीना पाय के, प्रणमे हियरे गह गही ॥ १७ ॥ थम्ह पूव दो नवचा तुम्हें तात के, नाम्पनले प्रष्ट ने टीया ॥ थया लोचन हो सफलां जगनाथ के, 5 व पोदग सवि मेटी .

श्री शातिनाथनो रास खंग पाचमो
श्श्य
या०॥ पारणे एक दिन साध ॥ ध० ॥ प्रानक यन्न ने पाणी ॥था॥
पडिलान्यो निरावाध ॥ध ॥ १६ ॥ कालें ग्रहे थणगारता ॥ था ।
नारी ने ते नाह ॥ ५० ॥ राजगुप्त गुरुथी सुणे ॥ था ॥ तप अधिकार
उत्साह ॥ ध० ॥१७॥ तप कह्या विविध प्रकारना ॥ था ॥ वोल्या शक्ति
विशेप ॥ ध० ॥ पण थाविल वर्धमाननो ॥ या ॥ महिमा अधिको रेप
॥५०॥ १७ ॥ एकेक वधते याविलें ॥ श्राप ॥ शतसख्या लगें सार
॥ ५० ॥ उत्तीने वेदडे करे ॥ था ॥ पारणु निरतिचार ॥ध॥ १५॥
जी उलीने व्हडे ॥ या ॥ एकेक कह्यो उपवास ॥ ० ॥ मन चढते
थतर विना ॥ या॥ नहितर पारण खास ॥ध ॥ २०॥ सहस पंच
थाबिल कहां ॥ था ॥ तेम उपरें पचास ॥ध० ॥ शत उपवास उत्ती
तणा ॥था ॥ ए तप कीजें नन्नास ॥ध० ॥ १ ॥ चौद वरस त्रस्य
मासनी ॥था ॥ उपरें दिन वलि वीश ॥ १०॥मान कत्यु ए तप तणु
॥ था ॥ सूत्रमाहे जगदीश ॥ध ॥ २२ ॥ राजगुप्त झपि थादरे
॥ था ॥ ए तप थानद पूर ॥ ध० ॥ शमतारसमा जोलतो ॥ था० ॥
दिन दिन चढते नूर ॥ ५० ॥२३॥ काल करी सुर कपन्यो ॥ था ॥ ते
पचम सुरलोक ॥ध ॥ तिहाथी चवी सिहरय थयो ॥ था ।। ण
नवें ए गतशोक ॥ध ॥ २४ ॥ दाखिका पण तिहा अवतरी ॥ था।
वेगवती थइ नारि ॥ ५० ॥ सिहरथने वजन घणु ॥ या० ॥ पूरवनेद
विचार ॥ध ॥ २५ ॥ मेघरथना मुखथी मुणी ॥ था० ॥ निज पुरव
यवदात ॥ध० ॥ प्रतिबज्यो सिहरथ तदा ॥ था ॥ धन धन उत्तम
जाति ॥ध ॥ २६ ॥ मेघरथने वदी वस्यो ॥ था० ॥ सिदरथ निजघर
थावि ॥ध ॥ तनयने राज्य वेसारिने ॥ था ॥ ग्रहे सयम समनाव
॥ध ॥ २०॥ श्रीधनरथ जिनवरकनें ॥ था०॥ तप तपियां थसराज
॥ध० ॥ कर्म खपी केवल लही । था॥ मुक्ति गया ततकाल ॥ १० ॥
२७ ॥ दवे मेघरय नृप थाविया ॥ था ॥ वनहूती निज धाम ॥ ५०
॥ जीवदया पाले नली ॥था ॥ करे गुन धर्मना काम ॥ ध० ॥ २ ॥
ढाल-चोथी खम पंचमे ॥ था ॥ नव दशमोथधिकार ॥ध० ॥ रामवि
जय कहे सानलो ॥था॥ पागल वद्ध विस्तार ॥ ध०॥ ३० ॥१३॥५॥

जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. मेघरथजी ॥ याणदा रे ॥ वधु रमणी परिवार ॥ घणुं सुखका देवरमण उद्यानमा ॥ थाण ॥ याव्यो थवनि याधार ॥ घ. शोकें रहित थशोकने ॥ था॥ नीचे वेगे राय ॥ ५० ॥ तारक जेम चश्मा ॥ य० ॥ तिम शोने समुदाय ॥ ध० ॥ २ ॥ एडवे नों यावीने ॥ श्रा० ॥ मांझयु नाटक सार ॥ ० ॥ चर्म वसन थायुष पा ॥ था ॥ नाचे विस्मयकार ॥ध ॥३॥ ते नाचतां थावीमुं ॥धा॥ एक विमान उत्तग ॥ध ॥ सुदर एक नरनारीनु ॥ था ॥ तेमाहि युगल सुचग ॥ध ॥ ४ ॥ नारी पूढे पियु कोण ए॥ था ॥ कहे मेघ रथ मनरंग ॥ध० ॥ सुण वैताढयथी उतरे ॥ या ॥ नयरी अलका पुरी चग ॥ध० ॥ ५ ॥ विद्युतरथ कुल उपन्यो ॥ था ॥ ए खेचर सिंह रथ ॥ध ॥ वेगवती एदनी नारजा ॥ या ॥ धर्म करण समरह ॥ध० ॥ ६ ॥ धातकी खमें जिन वांदवा ॥ था ॥ गया ए दपती दोष ॥ ५० ॥ वादी पाबा वलता इदा ॥ श्रा० ॥ गति प्रतिघातने जोय ॥ धम् ॥ ७॥ सहसा ए केम नीपन्यु ॥था ॥ दीठो मुफने एण ॥ घ०॥ सामान्य ए नरपति नहीं ॥ था ॥ चिते एम दर्षेण ॥ध० ॥ G॥ विमान तणी खलना दुश्॥ था ॥ एदने प्रना बाज ॥ ध० ॥ नूत रूप कीधा घणां ॥ या ॥ नाटक करवा काज ॥ध ॥ ए ॥ पूछे राणी श्ण पूरवें ॥ था ॥ गुं की, पियु पुण्य ॥ध ॥ जे एहवी कमि पामीयो ॥था ॥ कदो गुणरयण श्रगण्य ॥ध॥१॥ तृप कहे सिंहपुरें पुरी ॥था० ॥ कुलपुत्रक राजगुप्त ॥ ध० ॥ शखिका नारी तेहनी ॥ था ॥ निर्धनतायें विलुप्त ॥ध० ॥ ११ ॥ करे परघरनी चाकरी ॥था ॥ एक दिन काटने कान ॥ध ॥ गया वनमां 5 स्खीयां पन्हे, ॥था ॥ तिहां दीतो मुनिराज ॥ध ॥ १५ ॥ नमि बेतां कृषि थागलें ॥था ॥ कहे मुनिवरजी धर्म ॥ ध ॥ बाराध्यो सुरतरू था ॥ दे मनोवाहित शर्म ॥ ध० ॥ १३ ॥ कहे दपती कर जोडिने ॥ था ॥ प्रनु कदो का उपाय ॥ ध ॥ जिम सुखीया थाश्ये अमें ॥ था ॥ करो करुणा सुपसाय ॥ धम् ॥ १४ ॥ जवसचित अपनाशनो ॥ था ॥ तप वत्रीश कल्याण ॥ध ॥ चोथ वत्रीशे कीजियें ॥ था। थम दोय गुणखाणि ॥ध ॥ १५॥ गुरुदत्त तप ए आदरे ॥ परें ।

श्री शांतिनाथनो रास खंम पाचमो.
२२५
पा० ॥ पारणे एक दिन साध ॥ ध० ॥ प्रानुक थन्न ने पाणीय ॥या॥
पहिलान्यो निरावाध ॥ध० ॥ १६ ॥ कालें ग्रहे यणगारता ॥ या० ॥
नारी ने ते नाह ॥ध ॥ राजगुप्त गुरुथी सुणे ॥ था० ॥ तप अधिकार
उत्साह ॥ १० ॥१॥ तप कह्या विविध प्रकारनां ॥ या० ॥ वोल्यां शक्ति
विशेप ॥ ध० ॥ पण थाविल वर्धमाननो ॥ था ॥ महिमा अधिको रेप
॥ 4 ॥ १७ ॥ एकेक वधते थाविलें ॥या ॥ शतसख्या लगें सार
॥ ५० ॥ उत्तीने वेहडे करे ॥ या० ॥ पारणु निरतिचार ॥ व०॥ १॥
जी उलीने वेहडे ॥ या ॥ एकेक कह्यो उपवास ॥ध० ॥ मन चढते
थतर विना ॥ था॥ नहितर पारण खास ॥ ध० ॥ २० ॥ सहस पंच
थाविल कह्या ॥ था ॥ तेम उपरें पचास ॥ध० ॥ शत उपवास उनी
तणा ॥था ॥ ए तप कीजें वन्नास ॥ध० ॥ २१ ॥ चौद वरस त्रण्य
मासनी ॥ था० ॥ उपरे दिन वलि वीश ॥ध०॥मान कत्यु ए तप तणु
॥ था० ॥ सूत्रमाहे जगदीश ॥ध ॥ २५ ॥ राजगुप्त ज्ञपि थादरे
॥ था ॥ ए तप थानद पूर ॥ ध० ॥ शमतारसमा जोलतो ॥ था० ॥
दिन दिन चढते नूर ॥ध ॥३॥ काल करी सुर ऊपन्यो ॥ था ॥ ते
पंचम सुरलोक ॥ध ॥ तिहाथी चवी सिहरथ थयो ॥ था० ॥ शण
नवें ए गतशोक ॥ध ॥ २४ ॥ शखिका पण तिहा थवतरी ॥ था॥
वेगवती थइ नारि ॥ ५० ॥ सिदरथने वजन घए ॥ था ॥ पूरवनेद
विचार ॥ध ॥ २५ ॥ मेघरथना मुखथी मुणी ॥ था ॥ निज पुरव
थवदात ॥ध ॥ प्रतिबज्यो सिहरथ तदा ॥ था ॥ धन धन उचम
जाति ॥ध ॥ २६ ॥ मेघरथने वदी वल्यो ॥था ॥ सिहरथ निजघर
थावि ॥ ध० ॥ तनयने राज्य सारिने ॥ था० ॥ ग्रहे सयम समनाव
॥ ध०॥ २७ ॥ श्रीघनरथ जिनवरकनें ॥था ॥ तप तपियां यसराज
॥ध ॥ कर्म खपी केवल लदी ॥ था०॥ मुक्ति गया ततकाल ॥ १० ॥
२७ ॥ इवे मेघरय नृप थाविया ॥ था० ॥ वनस्ती निज धाम ॥ धo
॥ जीवदया पाले नली ॥था ॥ करे गुन धर्मना काम ॥ध० ॥ श्ए॥
ढाल-चोथी खम पंचमे ॥ था ॥ नव दशमोथधिकार ॥ 4 ॥ रामवि
जय कहे सालो ॥था थागल वलु विस्तार ॥ध० ॥ ३० ॥१३॥५॥

- २२० जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. मेघरथजी ॥ श्राणदा रे ॥ वधु रमणी परिवार ॥ घणुं सुखवंदा रे देवरमण उद्यानमां ॥ थाण ॥ याव्यो थवनि थाधार ॥ घणु । शोके रहित यशोकने ॥ था ॥ नीचे वेगे राय ॥ ५० ॥ तारण जेम चश्मा ॥थ ॥ तिम शोने समुदाय ॥ ३० ॥ २ ॥ एहवे थावीने ॥ श्रा० ॥ मांमयु नाटक सार ॥ ध० ॥ चर्म वसन यापुष भयो ॥था ॥ नाचे विस्मयकार ॥ध ॥३॥ ते नाचतां यावी ॥धागा एक विमान उत्तग ॥ध० ॥ सुंदर एक नरनारीनुं ॥था ॥ तेमादि युगल सुचग ॥ ध० ॥ ॥ नारी पूढे पियु कोण ए॥ था ॥ कहे मेव रथ मनरंग ॥ध ॥ सुण वैताढयथी उतरे ॥ था ॥ नयरी अलका पुरी चग ॥ ध० ॥ ५ ॥ विद्युतरथ कुल उपन्यो ॥ था ॥ ए खेचर सिंह रथ ॥ध ॥ वेगवती एदनी नारजा ॥ था ॥ धर्म करण समरस ॥ध ॥ ६ ॥ धातकी खमें जिन वांदवा ॥ श्रा॥ गया ए दंपती दोय ॥ ध० ॥ वादी पार्ज वला हा ॥ था ॥ गति प्रतिघातने जोप ॥ध ॥ ७ ॥ सहसा ए केम नीपन्यु ॥ था ॥ दीठो मुझने एण ॥ घ० ॥ सामान्य ए नरपति नहीं ॥ था ॥ चिते एम दर्पण ॥ध ।। G॥ विमान तणी खलना दुश् ॥ था० ॥ एहने प्रनावें थाज ॥ १० ॥ नूत रूप कीधां घणां ॥ था ॥ नाटक करवा काज ॥ ध० ॥ ए ॥ पूछे राणी इण पूवें ॥ था ॥ कीधुं पियु पुण्य ॥ ध० ॥ जे एहवी कमि पामीयो ॥ था ॥ कहो गुणरयण श्रगण्य ॥ध०॥१॥ नृप कहे सिहपुरें पुरी ॥ था ॥ कुलपुत्रक राजगुप्त ॥ ध० ॥ शखिका नारी तेदनी ॥ या ॥ निर्धनतायें विलुप्त ॥ध ॥ ११॥ करे परघरनी चाकरी ॥ था ॥ एक दिन काटने काज ॥ध० ॥ गयां वनमां स्वीयां पन्हे, ॥ था० ॥ तिहां दीठो मुनिराज ॥ध ॥ १२ ॥ नमि बेता शषि धागलें ॥ था ॥ कहे मुनिवरजी धर्म ॥ ध ॥ थाराध्यो सुरतरु परें ॥ था ॥ दे मनोवांबित शर्म ॥ध ॥ १३ ॥ कहे दंपती कर जोडिने ॥ था ॥ प्रच कहो का उपाय ॥ ध ॥ जिम सुखीयां थायें अमें ॥ था० ॥ करो करुणा सुपसाय ॥ध ॥ १४ ॥ नवसंचित अपनाशनो ॥था ॥ तप बत्रीश कल्याण ॥ध ॥ चोथ वत्रीशे कीजियें ॥ था। थम दोय गुणखाणि ॥ध० ॥ १५ ॥ गुरुदन तप ए पारे ।

श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो. བབས་ ॥ यमुक्तमागमे ॥ कहम नंते नेरक्या उयत्ताए कम्म पकरति गो० चनदि कारणेहि नेरयिया उयत्ताए कम्म पकरति त महारजयाए महापरिग्गहि याए पंचिदिय वहेण कुणपाहारेण ॥२॥इति नगवत्या ॥ पूर्वढाल ॥ हिसा थकी निसुणो सही रे, नरकें गयो रे निपाद ॥ जीवदयाथी वानरी रे, स्वरग गई रे थाह्लाद ॥ राम् ॥ ११ ॥ कहो स्वामी ते कोण दुधा रे, तव मेघरथ नूपाल ॥ इयेनपखी प्रतिवोधवा रे, कहे उपदेश रसाल ॥ रा० ॥१२॥ हरिकाता नामें नली रे, नयरी निरुपम नाम ॥ त्या हरिपालानिध जलो रे, राजेश्वर गुणधाम ॥ रा० ॥ १३ ॥ तिण न यरी परिसर घणां रे, शाखामृगना रे वृद ॥ वनमाहे क्रीडा करे रे, फल फूल खाइ थानद ॥रा ॥ १४ ॥ निर्दयने कृतघ्नी घणो रे, यम किंकर उपमान ॥ घातक नाम निपाद रे, ते नयरीमा अजाण ॥ रा० ॥ १५ ॥ व्यसन थाहेडानु घणु रे, लाग्यु पूर्वनु पाप ॥ नित्यप्रतें जीव दणे वढ रे, उपजावे परिताप ॥राण॥ १६ ॥ श्यो मृगयामा दोप ले रे, ते वोले एम याल ॥ निज थातमने पोपवा रे, उष्ट घj नजमाल ॥ रा ॥ १७ ॥ यमुक्त मृगयानिलापुकै ॥ थवलस्वकुलाशिनोऊपान, निजनीडमपीडिन खगान् ॥ थनवद्यतृणार्दिनोमृगान्मृगयानूनहि नून तानताम् ॥३॥ पूर्वढाल॥तेहमादरिप्रिया नामथी रे,वानरी नश्क एक ॥ मांसविरत मादी घणु रे, मनमाहे वस्यो रे विवेक ॥ रा ॥ १७ ॥ हवे ते निपाद एकण समे रे, शस्त्र ग्रही निज पाणि ॥ वनमाहे मृगया था वीयो रे, करवा जीवनी दानि ॥रा ॥ १ए ॥थागल जातां देखीयो रे, वाघ सवत विकराल ॥ जय पामी वृन्हें चढयो रे, ते घातक ततकाल ॥ रा ॥ ५० ॥ पादप ऊपर पूरवें रे, रहि कपिविनता तेह ॥ वाघनये मुख फाडिने रे, थर थर भ्रूजे देह ।। रा० ॥२१॥ ते देखी वीदिनो वली रे, तव वानरी निज रूप ॥ था तस पासें थावियो रे, तेद निषाद वि रूप ॥रा ॥ २२ ॥ विश्वासें तस वानरी रे, जोवे शिरना केश ॥ मस्तक मूकी उत्सगमा रे, सूतो विटप सन्निवेश ॥रा ॥ २३ ॥ वाघ जो नीचो रह्यो रे, निजामांहे निपाद ॥ वानरीने नाखे इस्यु रे, मुण मुग्धा गतसाद ॥रा ॥ २४ ॥ छ उपकार कस्य एवडो रे, नहीं कोई तस जाण ॥ जे उपकारने उलखे रे, चाकरी तास प्रमाण ॥ रा० ॥२५॥ वली , ते २२६ जैनकथा रत्नकोप नाग आवमो. ॥ दोहा सोरठी ॥ ॥ दवे एक दिन मेघरथ, पोपध व्रत सेवा जणी ॥ नूपण मूकि मरव, यावे पौषधशालमा ॥१॥ वेतो थासन योग, योगीश्वर जिम मन रमी। मूकी इश्यि जोग, पौषध व्रत लेई करी ॥ २ ॥ धर्म कहे एकचित्त, राजे श्वर थागें तदा ॥ एदिन डे जगमित्र, थवर न को कगारशे ॥३॥ जोतां ए ससार, लाग्यु जेवु पलेवटुं ॥ कोश् न तारणहार, जीवापा विण जीवने ॥ ४ ॥ मानी सीधु सुख, मुफ मनमां माने नहिं ॥ जस थतें दोय 5 ख, ते सुख केदा कामनु ॥५॥ सुख सदजें जे होय, जे उपाधि सुख नहीं ॥ ए गति न्यारी कोय, मुख उख पुजलथी लघु ॥ ६ ॥ ॥ ढाल पाचमी॥ ॥ जगतगुरु दीरजी रे ॥ ए देशी॥ एणे अवसर एक पंखियो रे, पर थर धूजते श्रग ॥ पारावत थावी पख्यो रे, नृप मेघरयने सत्संग॥ १ ॥ राजेश्वर राखीये रे ॥ तु शरणागत साधार, घणु शुं नांखीये रे ॥ ए थांकणी ॥ मनुज वाणी एम बोलतो रे, तरल नयन नयनीत ॥ मत बीदे तु बापडा रे, नृप सतोषे दित रीत ॥रा ॥ २ ॥ एम नरपति बोलावियो रे, खेचर थयो निर्नीक ॥ तावत् त्यां एक थावियो रे, पंखी सिचाणो नजीक ॥ रा० ॥ ३ ॥ सुण राजन तुज कोडमा रे, पंखी मुण नक ॥ मूक मूक पारेवडो रे, ढुं नमो बु घण वद ॥रा॥४॥ कहे मेघरय ए मादरे रे, शरणागत थयो जेद ॥ युक्त न काढी थापतां रे, जीवतां ए वेह ॥ रा० ॥ ५ ॥ तहूती राखे तेरों रे, क्षत्र का जगमादि । ते पद जो हूँ न जालवु रे, तो नामें j थाय ॥ राम् ॥ ॥ यत ॥ दोहो ॥ केशरीकेश भुजंगमणि, शरणां ए सुदडाद ॥ सती पयोहर कृपण धन, चढशे दाथ मुवाद ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ परमाणे निजप्रा गनु रे, पोषण न घटे तुफ ॥ नरक कारण हिंसा कही रे, कारज म कम थबूज ॥ रा॥७॥ एक पिष्ठ बेदे तादरे रे,अगें दोय असमाधि ॥ तेम बीजाने पण सही रे, दिसा ए महोटो व्याधि ॥रा० ॥ ७ ॥ पल नखां एदनुं रे, तृप्ति दोशे तिलमात्र ॥ पण पंखीना प्राणनी रे, शी गति होशे नात ॥रा ॥ ए ॥ वध पंचेंशियनो करे रे, महापरि ग्रद थारंन ॥ मास तणा थाहारथी रे, नरकासुनो प्रारंन ।। रा०॥ १० .

थयो। वे . तेदवे वाघने पण, श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो. श्शए जीरण कूपें जलहकाजे, पज्यो तृलातुर उगीयो कूपकमांहे तरुवर, शाखा यवलवी रह्यो॥॥ एहवे तरप्या वे लाल,यदिमुख यावीया॥ जल पीवाने वेलाल,कूप लवावीया॥०॥ लवाविया सम 5 ख माटे,वैर बांमीने रद्या॥नगारीया तें सुगुण यावी,एह वीतक सविकयां ॥५॥ मुण उपकारी लाल, मथुरा यावतु ॥ यहोनिश तुम्हचु वे लाल, समरण नाववु ॥ ॥ याववु यमचे नयर हिजवर, नक्ति कर तुम तणी ॥ श्म कही चाल्यो तेह सोवन, कार नयरी थापणी ॥ ६ ॥ तीरथ करतां वे लाल, ते हिज यनुक्रमें ॥ केते दिवसे वे लाल, मथुरा सक्रमे ॥ ॥ सक्रमे मथुरावनमाहि, यावीयो तब उत्तख्यो ॥ वानरो हरख्यो हृदय माहे, तेह थनुमाने लख्यो ॥ ७ ॥ चरणे नमियो वे लाल, फल धागल धना ॥ कहे उपशमियो वे लाल, तुम गुण सानना ॥ ॥ सानया करे नक्तिनावें नखो ॥ यशानथी वनराजसुतने, हणी नूपण ढग कखो ॥॥ जून तिर्यचें वे लाल,गुण नविउलव्यो ॥ वाचा पाली लाल, विक् नरनो लव्यो ॥ ० ॥ जुन नरनो लव्यो दवे तुम्हें, देश या शिप पुर गयो । करी तीरथयात्र पूत्रे, किहा नाडिंधम रह्यो । ए ॥ खो ती काढयो वे लाल, तेह कलादने ॥ नयणे निरखी वे लाल, लह्यो था हादने ॥ ॥ थाहाद लहियो हिजे पण तिणे, निरखी नीचु जाली यु ॥ मनमाहि चितें रखे मागे, हेज सघलु गालीयु ॥ १० ॥ वाजण वो व्यो वे लाल, नाहिंधम गुणी ॥ शु नवि जाणो वे लाल, माया अवगुणी ॥ ॥ थवगुणी माया दवे नाया, अटवी तुम नूली गइ ॥ सुणी कम्यो तुरत प्रणमे, सुरत मुमने नवि रही ॥ ११ ॥ कहे कर जोडी ये लाल, परकासो मुने ॥ कारज वहालु वे लाल, जे होये तुने ॥ ॥ ते कहे मुफने एह पण, किणही दीधु दक्षिणा ॥ एहनु मुफ मूल्य थापो, मुणि कलाद विचक्षणा ॥ १२ ॥ तेदने सोंपी वे लाल, गयो तटिनीन में ॥ स्नान करेवा वे लाल, तन मेलो मलें ॥ ॥ मलें मेलो स्नान करवा, गयो दवे ण थवसरें ॥ वाजतो पडदो देखी पासें, कान ते उचा धरे ॥ १३ ॥ किणहिक मानो वे लाल, नृपथगज नलो॥ नपण काजें वे लाल, ए कुल चादलो ॥ ॥ चदलासम ते होय दीठो, जेणें ते सवि दाखजो ॥ वध्य नर दोशे नहीं तर, हियामां मत राखजो ॥ १४ ॥ वे

श्व
जैनकथा रत्नकोप जाग श्राठमो.
विशेपे मानवी रे, जगमा हे गुणचोर ।। सांजल दुकई मुक्ने रे,
सथी नला ढोर ॥ रा० ॥ २६ ॥ पचमखमें पाचमी रे, हाल ही
रग ॥ वातज कहेशे वाघलो रे, माणस कपर चग ॥रा॥२॥१०॥
॥ दोहा ॥
॥ वाघ कहे सुण वानरी, एकए ग्राम मकार ॥ शिवसामी ना
वसे, वाडव वेदविचार ॥ १ ॥ एक दिवस ते नीसस्रो, करवा तीरप मात्र
॥ जमतां थटपीमा पढ्यो, सूधो दुवो तृपार्न ॥ २ ॥ जल खोलतां र्गि
दिशे, जीरण दीनो कूप ॥ जल कारण, थाव्यो तिहा, वाडव थातुरका
॥ ३ ॥ रङ्गु करी तृण्मय तदा, करपत्रक तिहा वाधि ॥ जल कारण
माहे धरसो, ब्राह्मण रूडी सधि ॥ ४ ॥ तिण दोरें वलगी तवा, कूपपकी
कपि एक ॥ वाहिर याव्यो ते तदा, चिते हिजवर ठेक ॥ ५ ॥ सफल
थयो थायास मुज, ययु एहने याशान ॥ कूप पज्यो में उसो, महोटु
जीवितदान ॥ ६ ॥ वीजी वारें नीसना, वाघ शुजग सघ्रात ॥ वोरी
ब्राह्मण पग पख्या, हरख्या मन थत्यंत ॥७॥ उपगारी जाणी नमे,ते त्रिर्ड
मां कपि ताम ॥ जातिस्मृति थर लखी, जिने जणवे थाम ॥ ७ ॥
यदो मथुरा नगरी वसु, थलु तुम्हारे वश॥एक वार तिहा थावदु, करो
जक्ति थवश्य ॥ ए ॥ वली तमने एक वीनवु, एहमा थडे मनुष्य ॥
ते मत काढो तुम्ह नणी, करो थहित प्रत्यक्ष ॥ १० ॥
॥ ढाल बही॥
॥काया कामिनी वे लाल ॥ ए देशी ॥ ते एम नांखी ये लाल, निज स्था
नक गया॥ हिज एम चिंतेवेलात,ए उत्तम या॥त्रूटक ॥ ए दुया उत्तम
मनुज सत्तम, सकल जीवमांहे शिरें ॥ मुफ पास इतां एह मानव, कहो
ने ते केम मरे ॥ १ ॥ कीजें सद्भुने वे लाल, शक्तियें उपकारहो ॥,मानो
बढुने वे लाल, जीवित प्यारडो ॥ ॥ प्यारडो जीवित जगत जनने,
तिहां नहिं सवेद ए॥ते मात्रै एहने करु सपकति,सफल दोवे एह ए ॥२॥
काढपो तेदने बे लाल, दोरी मूकी करी ॥ पासें थाव्यो बे लाल, प्रमे
हित धरी ॥ ॥ दित धरी प्रणमे चरण तेहनां, पूठियं तु कोण जे ॥
ते कहे मधुरा नयरिवासी, स्वर्णकार थबु रुचे ॥३॥ काज सद्देशी बे
लाल, थायो हां कणे ॥ बु परदेशी वे लाल, कूपें जीरणे ॥ ३ ॥

वे
श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो.
ए
जीरण कूपें जलहकाजे, पज्यो तृभातुर थयो । उगीयो कूपकमांहे तरुवर,
शाखा अवलवी रह्यो॥॥ एहवे तरप्या वे लाल, यहिमुख श्रावीया॥ जल
पीवाने वे लाल,कूप लंबावीया॥०॥ लवाविया सम 5 ख माटें,वैर बांझीने
रह्याउगारीया तें मुगुण थावी,एह वीतक सवि कह्या ॥५॥ सुण उपकारी
लाल, मथुरा थावतु ॥ यहोनिश तुम्हचु वे लाल, समरण नाववु
॥ ॥ यावत् यमचे नयर हिजवर, नक्ति करा तुम तणी ॥ इम
कही चाख्यो तेह सोवन, कार नयरी थापणी ॥ ६ ॥ तीरथ करतां वे
लाल, ते हिज यनुक्रमें ॥ केते दिवसें वे लाल, मथुरा सक्रमे ॥ ७ ॥
सक्रमे मथुरावनमाहि,
यावीयो तव उत्तरख्यो ॥ वानरो हरख्यो हृदय
माहे, तेह अनुमाने लरख्यो ॥ ७ ॥ चरणे नमियो वे लाल, फल यागल
धना ॥ कहे नपशमियो वे लाल, तुम गुण सानया ॥ ० ॥ सांलखा
तेहवे वाघने पण, करे नक्तिनावें नयो ॥ थझानथी वनराजमुतने, दणी
नूपण ढग कस्यो ॥॥ जूठ तिर्यंचें वे लाल,गुण नविलव्यो ॥ वाचा पाली
थे लाल, विक् नरनो तव्यो ॥ ० ॥ जुन नरनो लव्यो हवे तुम्हें, वे था
शिप पुर गयो ॥ करी तीरथयात्र पूछे, किहा नाडिंधम रह्यो ॥ ए ॥ खो
ली काढयो वे लाल, तेह कलादने ॥ नयणे निरखी वे लाल, जह्यो था
ह्रादने ॥ ॥ याहाद लहियो हिजे पण तिणे, निरखी नीचु जाली
युं ॥ मनमादि चितें रखे मागे, हेज सघलु गालीयु ॥ १० ॥ वांनए वो
व्यो वे लाल, नाहिंधम गुणी ॥ नवि जाणो वे लाल, माया अवगुणी
॥ ॥ अवगुणी माया दवे नाया, थटवी तुम नूली गइ ॥ सुणी तयो
तुरत प्रणमे, सुरत मुझने नवि रदी ॥ ११ ॥ कहे कर जोडी थे
लाल, परकासो मुने ॥ कारज वदालु वे लाल, जे दोये तुने ॥ ॥ ते
कहे मुफने एह नूपण, किणही दीधु दक्षिणा ॥ एदनु मुफ मूल्य थापो,
मुणि कलाद विचक्षणा ॥ १२ ॥ तेहने सोंपी वे लाल, गयो तटिनीज
में ॥ स्नान करेवा वे लाल, तन मेलो मलें ॥ ॥ मलें मेलो स्नान
करवा, गयो हवे श्ण थवसरें ॥ वाजतो पडहो देखी पासें, कान ते उंचा
धरे ॥ १३ ॥ किणहिक मायो वे लाल, नृपथगज नलो ॥ नूपण काजें
वे लाल, ए कुल चादलो ॥ ॥ चदलासम ते होय दीठो, जेणें ते
सवि दाखजो ॥ वध्य नर दोशे नहीं तर, हियामा मत राखजो ॥ १४ ॥

1 २३० जैनकया रत्नकोप जाग आग्मो सोनी चिते वे लाल, ए महारु घड्यु ॥ कर्म सोंगे ये लाल, रमाला चढ्यु ॥०॥ थावी चढघु मुफ तेह महारो,नहि गोत्री नहि सनो निय कारण का करु थनरथ, एम थयो मन कनगो ॥ १५ ॥ गुण वीसारी लाल, जई पडदो तव्यो ॥ नूपण देश ने लाल, नृप थार्ग सयो । .. लव्यो ब्राह्मण वात दारखी, नृपे वाधी मगावीयो ॥ पूढीया पोरासिक घणा, श्यो दम श्ण शिर थावियो ॥ १६ ॥ ते कहे स्वामी के लाल, ज्ञाता वेदनो ॥ करता महोटो वे लाल, वश उठेदनो ॥ ॥ वशनो घोष करता, दण्या नदि कोइ दोप ए ॥ रासनारोहण कखो ततक्षण, नुप चढयो घण रोप ए ॥ १७ ॥ राजादेश वे लाल, वाहिर काडीपो । चवन लेपी वे लाल, वाध्यो गाढीयो ॥ ॥ गाढीयो बांध्यो मि, ले जाता चितवे ॥ मुझ कस्या पूरव उदय थाव्या, रोये होने हवे ॥ १७ ॥ मुझने मलियो वे लाल, रुतघ्न ए वडो । वानर वाघे ये लाल,कह्यो मुफ परवडो ॥ ॥ परवडु कत्यु मे न कीधु,अधिती वापर नडी ॥ कहे हिजवर श्लोक दोय तिहा, सुणे खलक तिहां खरी ॥ १५ ॥ तद्यथा ।। व्याघ्रवानरसाणा यन्मया न कत वच ॥ तेनाई अर्विनीतेन, कलादेन विनाशित ॥ १॥ वेश्याऽदाराजचौराच, नीरमार्जार मर्कटा ॥ जातवेदा कलादश्च, नविश्वास्या मे क्वचित् ॥२॥ पूर्वढाल ॥ दोप पद्य नणता वे लाल,श्रवणेंसानल्या ॥ वाड विचालें वे लाल, जगें घट कल्या ॥ ॥ थटकल्या जुजगें एह हिजवर, जिणें थमने सहस्सा ॥ हा दा ते गुणवत महोटा, थाज एम करें नया॥२०॥ उक्त च ॥ठपकारिसि विश्रब्धे, साधुजने य समाचरेत्पापम् ॥ तं जनमसत्यसघ, नगवति वसुधे कथ वदसि ॥३॥ थशनमात्रकृतज्ञतया गुरोर्न पिश्चनोपि मुनो जनते तुलाम् ॥ थपिबहूपकते सविता खले, न खलु खेजति खेलतिका यषा ॥४॥ रूपवत गुणहीन ॥ पूर्वढाल ॥ यहि मन चितवे बे लाल, बहुगुण जेहनो ॥ कांक थाउ वे लाल, करण एदनो ॥ ॥ थाट हरण मन विमासी, गयो वाही कीडती ॥ तिहां राजकन्या मसी ततक्षण, पटी धब देश दोडती ॥ २१॥ दासीमुखथी बे लाल,नृप ए सजिम्युं ॥ हा हा जाखे बे लाल, मन थ{ व्याकुलुं ॥ ३० ॥ व्याकुलु मन करि विच विते, इख समकालें नडघु ॥ हनी एकनो मुण पार नायो पीच एम - -- २३१ चे श्री शांतिनाथनो रास खम पांचमो बावी पडयुं ॥२२॥ नृपे बहु तेड्या वे लाल, तिहां कणे मांत्रिका ॥ जाण ने जोपी वे लाल, वडला तात्रिका ॥ ० ॥ तात्रिका कोश्थी पार नाव्यो, कहे एम मत्रवादीयो ॥ मुज य निर्मल झान सूधु, नहिं दु उन्मा दीयो ॥ २३ ॥ जेहने निहणे वे लाल, ते निकलंक ॥णे कातारें लाल, उमरिया यठे ॥ ० ॥ नमस्या एवं व्याल वानर, वाघ नाडिं धम वली ॥ ते शहा याव्यो पूजियो फल, फलशु कपि मन रली ॥ २४ ॥ तेम वली वाघे वे लाल, एहनी नक्तिने ॥ तुम सुत हणियो वे लाल, वलीये शक्तिने ॥०॥शक्ति वलीये एह नूपण, यापीयु ले एहने ॥ते मात्रै राजन कहु तुमने,म मारिश गुणगेदने ॥२५॥ण विज नोले वे लाल,मौष्टि कने का ॥ ते कृतघनयी वे लाल, तें सघनु ला ॥ त्रू ॥ लयु स घलु उष्ट जाणी, हुकम मारणनो कीयो ॥ विचमाहि जाता तेह जुजगें, एह हिज थवलोकियो ॥ २६ ॥ मूकावणने वे लाल, तुज पुत्री मसी ॥ जो ए मूको वे लाल, तो जीवे इसी ॥ ७ ॥ हसी जीवे राय पूढे, कोण प्रत्यय ए सही ॥ अवतारीयो जिण मत्रवादीयें, ते जगम तिदा वसी ॥२७॥ तिणे सवि मान्यु वे लाल, हिज नृपे मेलीयो । सर्प चूशी वे लाल, विप पाडो लियो ॥ ॥ लीयो विप सा दूइ निर्विप, हर्ष सनु कोई लह्या ॥ कहे मत्रवादी निसुणि वाडव, धन्य यदि जातें कह्या ॥ २७ ॥ पचम खमें वे लाल,बही ढासमां ॥ प्रत्युपकारी वे लाल, एहवी चालमा ॥ ॥ चाल एहवी जेह राखे,गुण कस्खो न विसारे ए॥ मुनि रामवाणी मुणो प्राणी, जश्य तस बलिहार ए ॥ २ ॥२०॥ ॥१२॥ ॥ दोहा ॥ ॥ क्रूर जीव रुतगुण लहे,न लहे मनुष्य कृतघ्न ॥ मगायो थहियें एने, कयुं कलाद विपन्न ॥१॥ वात सकल मामी कही, नृप थागल हिजराज ।। तुष्टचित्त राजा थइ, दी। देशनु राज ॥ ५ ॥ शिवस्वामी हिज देश निज, पू जा नागविधान ॥ नागपंचमी पर्वनु, वरताव्युं ममाण ॥३॥ एद कथा वाचें कही, वानरी थागे सार ॥ माणस जेहवो को नहिं, कृतघ्न वडो गमार ॥ ॥ जेम 5ख दीधु सोनीय, ब्राह्मणने निर्धार ॥ तेम तुक उ ख देशे सही, एह निपाद विचार ॥ ५॥ नद महेल ए माहरु, लं कट्ठ वारो वार ॥ हरिप्रिया हर्षे करी, निज जीवित उगार ॥ ६ ॥ कपि .

२३२ जेनकथा रत्नकोप नाग आम्मो. नारी सारी घj, मूके नहीं निपाद ॥ विश्वासें रह्यो मादरे, थाहाद ॥४॥ जो नाखु दु एहने,तो लागे मुऊ पाप ॥ पिती रही, नहि मनमा सताप ॥ ७ ॥ ॥ ढाल सातमी॥ ॥ वीरमाता प्रीतिकारिणी ॥ ए देशी ॥ वाघ येसी रमो मन एम विमासे॥धन्य तियेच पण एहवी,धरे प्रीति उल्लास ॥१॥ पनका तेह जग प्राणीया, मल्या वेह जे नापे । उर्जन उट नूमा सही, प्रीत थधविच कापे ॥ ५० ॥ २ ॥ तेह निपाद जर जागीयो, तब बानरी सूती ॥ देश उत्सग शिर तेहनें, सुवे पुण्य पनोती ॥ ध०॥३॥बार थावी समीपं कहे, सुण व्याध तु वात ॥ म कर विश्वास वानरी तो, सहि लहिश उपघात ॥ ध० ॥ ४ ॥ तु सुखे जीव दीये मुझने, एह गान री वाला ॥ सप्तदिन कुधित यानीविका, शमे थनिनी ज्वाला ॥१०॥ ५ ॥ नहि दीये तो तुमने सही, थशे 5 खनु हेतु ॥ वानर जाति कोश्नी नो दे, जिम नूत ने प्रेत ॥ध०॥ ६ ॥ निसुण न सुण्यु पुररायने, हल्पो वानरे मूढें ॥ कहे रे निपाद मुफ यागलें, कहो वात ए रुडे ॥ १० ॥ ते कहे नागपुर नयरमा, नृप पावक नामें ॥ एकदा वक्रतुरगे चढी, गयो केलि थारामें ॥ ध० ॥ ७ ॥ अश्व दोडावता थपहरी, गयो रायने जेई । नमतां वनमा तृपातुर थयो,उदयें थघुन थावे ॥०॥॥ एक वानर मम्मो तेहने, फल उत्तम दीधा ॥ वारिसर तास देखाडीयु, नृप कारज सीमां। ध ॥ १० ॥ वारिपान फलनक्षण करी, तरु शीतल बगही ॥ राप बेगे तवा पूरथी, सनु थावीयु पाई ॥ध ॥ ११ ॥ सैन्य साथै नृप पुर । व्यो, ग्रही वानर साथें ॥ जाणि उपकार थापे नजा, फलमोदक हापे ॥ ध० ॥ १२ ॥ पासें रास्यो नृपें तेदने, अगसेवना काज ॥ मास वसं तमा एकदा, गयो वनतर राज ॥ धम् ॥ १३ ॥ केलिघर पुष्पकीरा करी, नृप शांत थ सोवे ॥ थगरक्षक कपि पासें ते, रह्यो चिद् दिशि जोवे ॥ धम् ॥ १४ ॥ भ्रमर गुजित थाप्यो तदा, नृप श्रगपर बेठो ॥ स्वङ्गमारी तदा वानरें, निज नयणजे वीवो ॥ध ॥ १५ ॥ स्वामिनी नक्ति करते थके, कपि बुद्धि उठेदी ॥ भ्रमर मारण मि– रायनी, मूठे कंधरा नेवी । ध० ॥१६॥ जे इतो अति हितकारीयो, थयो यतिहि उसकारी ॥ जाति श्री शातिनाथनो रास खम पाचमो. २३३ ए मूढ वानर तणी, किसी एहशु यारी ॥ध० ॥ १७ ॥ वात निसुणी निपावें करी, तदा वानरी नारखी ॥ वाघ यागल पडी वापडी, धिक् एह वा साखी ॥ध ॥ १७ ॥ वाघ कहे खेद नवि कीजिये, कखो जेहवो सग ॥ तेहवु फल तुमने दूवु, नहि नीचथी रग ॥ध ॥ १५ ॥ यमुक्त ॥ चोपा ॥ नीच तणो नव कीजे सग, जो कीजें तो होवे नग॥ दाथ यगारो ग्रहे जेकोय, का दाफे का कालो दोय ॥ १ ॥ दोहो ॥ सगति की जेंसाधुकी, हरे उरकी व्याधि ॥ उठी सगति नीचकी, याठे पहोर उपाधि ॥२॥श्लोक। गुणिन समीपवर्ती,पूज्योलोकेपु गुणविहीनोपि ॥ विमलेक्षण प्रसगा,दजनमानोति काणादि ॥ ३ ॥ पूर्वढाल ॥ तव उत्पन्नमति वानरी, जणावे निज शानें ॥ हित कट्ठ प्राण ने माहरा, एह पुछने नाणे ॥ध ॥२॥ धागलथी ग्रहो एहने,पले अग तुझ हाथे ॥ तेम कस्यु तेणे देश पुग्नने, चढी वृदने माथे ॥ध ॥ २१ ॥ वाघ विलखो थक्ने वव्यो, थयो यदृश्य तिण वेला ॥ उतस्या वृक्ष्यी ततहणे, नर वानरी नेलां ॥ ध० ॥१२॥ निजलतावास लेई गई, अवगुण न सनाखो ॥ धन्य जगत जिहां एदवा, करे पशु नपकारो ॥ध ॥५३॥ निज शिक्नु पास मूकी करी, गइ फल फल लेवा ॥ उष्ट नूखे जख्या वाल ते, जून नीचना हेवा ॥ ध० ॥ २४ ॥ यक्त ॥ गाथा ॥ अलमेव विबुधाण, मुहमेव थहीण तदय मदस्त ॥ दिहि विय पिसुणाण, सच सबस्त जयजयं ॥ ४ ॥ खमीकवि पत्कालीनवि चुमीकनवि चुम्म व ॥ जीहाफलाइनवि दु, जणे दाद श्रदो पिसुणो ॥ ५ ॥ दोहो ॥ जट्टा नूप नुयगमद, ए मुह उहिला इति॥रीवींजीवाणीयो,पू दाद दियंत ॥६॥पूर्वढाल। फल ले थावी ते वानरी, सूतो ते नर देखि ॥पासें निजवाल दीठा नदी, पडी घ्राति सुवि शेप ॥ध ॥ २५ ॥ तोहि उठाडी तेहने दीया, फल थति घण मीना ॥ वाल जोवा नणी नीकली, तिण साथे नवि दीनां ॥१॥६॥ वृक्षशाखाहूती पूरवें,जून पापीयें पाडी । वाल नक्षण कस्या पणतदा, न वोली किस्यु थाडी ॥ 4 ॥५॥ जुवो गुणवत तिर्यचमा, कह्या सातमी ढालें॥धन्य जेह कष्टथावी पडे,एम निज मन वाले॥॥॥४५॥१॥ ॥ दोहा सोरठी॥ ॥ चिते इष्ट विचार, मनमा खेदाकुलयको ॥ थदो महारो आपार, २३४ जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. बाज सकल निष्फल थयो ।। १ ।। खाली केम जाउ गेर, पीयो मलियो नहीं ॥ एम चिती इणि तेद,वानरी संघ चमोशाबारे नणी जाम, प्रकट थई कहे वापलो । नीव कसुकाम, विजय हणी वानरी ॥३॥ पुत्र तणी पर जेण, पापी तुजने पाजियोर पता केम करेण, तुज दियडु चाल्यु दहा ॥ ४ ॥रे पापीया जमाल मुह लेने जा परो ॥ कृतनी तुझ समान, यवर को वीटो नहिं ।। ॥ एम निनूनी वाघ, विटने मूकीने गयो । कुकर्मजलधि अताम, थाव्यो ते पापीयो ॥ ६ ॥ ॥ ढाल थामी॥ ॥ घरे थावोजीथावो मोरीयो॥ ए देशी ॥ वात सुणी जनमुखपकी, पुरनाथ कोप्यो ततकाल ॥ जग कडवा कर्म न कीजियें ॥ए बांकसी। हु वानर प्रतिपालना, करु ए थयो वानरकाल ॥ ज०॥ १ ॥बार लोपी एवं माहरी, ग्रही लावो बाधी मुफ पास ॥ ज० ॥ काम कमुं एवं थाकरु, नवि जोयु रे काही विमाति ॥ ज० ॥ २ ॥ यक्त ॥ श्राम नगो० ॥ राजसेवके जइ थाणीयो, माखो मदोकम तेणी वार । ज० ॥ दुकम कस्यो मारवा तणो, खे चाव्या ते निरधार ॥ ज० ॥३॥ वाघ मल्यो मारग कहे, एदनु मारण नहीं युक्त ॥ ज० ॥सेवकें जा नृपने कयु, थाव्यो कौतुकयी सुणि उक्ति ॥ ज० ॥ ४ ॥ वाघ कहे पापी घणु, मत मारो एदने राय ॥ ज० ॥ पापी पापें दो थापणे, जेवाये रे एम कहेवाय ॥ ज० ॥ ५ ॥ विस्मय लदी राजा कहे, तुम्हें पण रूपी नरवाणी ॥ ज० ॥ मुज मन ए कौतुक घणु, परकासो तुम्हें गुण खाणी ॥ ज० ॥ ६ ॥ कहे वाघ उद्यानमा थावीया, मुनि नखिशे मा दरी वात ज०॥ एम कही गयो वाघजो,दरख्यो नृप सुणी अववात ॥ज. ॥ ७॥ देशयकी कादयो परो, नरपतियें तेद निषाद ॥ ज० ॥बहु लोक निर्गुब्यो थति घणु, गयो धरि मनमा विखवाद ॥ ज० ॥७॥ थागमन मुणि गुरुराजन, नृप थाव्यो वदन काज ॥ ज० ॥ यावी ने वागलें, गुरु देशन वे घनगाज ॥ ज० ॥ ए ॥ गुरू कहे शेद ना कीजि यें, कोइ कपर सुण नरचद ॥ ज ॥ वली विश्वासीनो शेर जे, सड़ पातकमांडे इद ॥ ज० ॥ १० ॥ नृपयजलि जोडीकडे, प्रचनाखो निर्म

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श्री शांतिनाथनो रास खंम पाचमो ३३५
स झान ॥ ज० ॥ कपिनारी मरी किहां गइ, मुज दाखो मायु मान ॥
ज० ॥ ११ ॥ कहे गुरु सुण सावधान, मरी तेह गई सुरलोक ॥ ज० ॥
यउक्तमागमे ॥ गाथा॥ तव सजम दाण जु,पगईए नहठ किवाखून ॥ गुरुव
यण र निचं, मरीन देवे सुरो जाई ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ कहे पुनरपि नृप
गुरु नणी, नाखो मुझने गतशोक ॥ ज० ॥ १२ ॥ विदु ने नीच निपाव
ते, कुण गति सहेो नगवत ॥ ज० ॥ कहे मुनि नरक विना नहि, एह
ने
अन्य स्थानक सत ॥ ज० ॥ १३ ॥ पचाश्रवने सेवतो, विपयें विव
शीकृत जेह॥जा कृतघ्न निर्दय पापीयो, परोहकारीमा रेद ॥ज॥१४॥
उर्ध्यानी फराशयी, नर नरक तणो थधिकारी ॥ ज० ॥ कहे मुनिवर प्र
स्तावथी, वीजी दोय गति विस्तार ॥ ज० ॥ १५ ॥ माया नियडीने सेव
तो, शठतारत होय सदाय ॥ ज ॥ थार्तध्यानमांहे मरी, जीव तिर्य
चगतिमां जाय ॥ज॥१६॥ मार्दव यार्जव गुणनखो,गतदोप ने थल्पकपा
य ॥ ज० ॥ न्यायी गुण्याही जीवडो, मरिने ते मानव थाय ॥ ज० ॥
१४ ॥ कहे नृप मुनिवरने वती, केम वाघ वोल्यो नरवोल ॥ ज० ॥
सुण नूप कारण एहनु, पहेले सुरलोकें थमोल ॥ ज० ॥ १७ ॥ सामा
निक सुरनी प्रिया, चवी थावी मनुज मकार ॥ ज० ॥ देवी रखवाल
सुरें मली, पूडधु देवी जरतार ॥ ज० ॥१॥ स्वामिन एह विमानमां, कुण
देवी दोशे श्ण ठार ॥ज०॥ कहे ते वननी एक वानरी,लेहेशे श्रावी अवतार ॥
॥ ज० ॥ २० ॥ तेमांदेलो एक देवता, श्राव्यो करी वाघन रूप ॥ ज०
॥ तास परीक्षा कारणे, बोल्यो नरवाणीथनूप ॥ ज० ॥ २१ ॥ निपाद
थने वली वानरी, तेह साथै वदुत विवाद ॥ ज० ॥ कयो वली दृष्टांत
कह्यां घणं, मनमाहे धरि थाहाद ॥ ज० ॥ २२ ॥ वाघ स्वरूप गुरुयें
का, नृप निमुणि लह्यो वैराग्य ॥ज॥ निजसुतने राज्य नलाविने,नृप च
रण प्रदे वडनाग्य ॥ ज० ॥ २३ ॥ राजज्ञपि दरिपालजी, पाली सयम
व्रत सार ॥ ज० ॥ सौधर्म सुर लोकमां, पाम्यो सुरनो अवतार ॥ ज० ॥
२४ ॥ पंचमे थामी ढालमा, कही ए मेघरथजी वात ॥ ज० ॥ राम
विजय कहे सांजलो, दवे श्येनतणो श्रवदात ॥ ज० ॥ २५ ॥ इति निपाद
वानरीकथा समाप्ता ॥ सर्वगाथा ॥२६॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥१॥

पण २३६ जैनकथा रनकोप जाग याम्मो. ॥ दोहा ॥ ॥जीव हिसाथी जिम लह्यो, नरक तणो यवतार ॥ ते निसार पंखीया, का जाये नर हारि ॥१॥ पाप करमयी पामियो, पसीना माहि ॥ वली कुकर्म करवायकी, दीसे नरकनी चाहि ॥२॥ तव सिता वोलीयो, तु सुखीयो राजन ॥ धर्माधर्म विचारमा, वरते तहारु मात्र मुज नदें तुज शरणु ग्रयु, हवे शी मुऊ पेर ॥ दुधा राहती ग्रह्यो, जाउ कोने घेर ॥ ४ ॥ सुए पनि शाह पुरूप तु, वांठे नहिं विक ५ ॥ राख्यो नूरव्यो मुझने, सघले सत स्वरूप ॥ ५ ॥ नूरच्याने सूने ना, हत्यारूत्यविचार ॥ सानन गु जाणे नहि, नीतिशास्त्र यधिकार ॥ यमुक्तं ॥ विवेकोहीर्दयाधनों, विद्यास्नेहश्च सोम्यता ॥ सत्त्व च जागते नैव, कुधार्नस्य शरीरिण ॥१॥ प्रतिपन्नमति प्रायो, लुप्यते दुन्निपीरिते। इत्यथ नीतिशास्त्रोक्तो, दृष्टात श्रूयता प्रनो ॥ २ ॥ ॥ ढाल नवमी॥ ॥ वारे यमने रेंटीयडे ममाप्या ॥ ए देशी ॥ सुण मेघरथ राजे श्वर वाढला,जीवदयाना रागीरे। नूख उपर एक नीतिशास्त्रनी, वात कहूं वैरागी रे ॥ १ ॥ रायजी मुझने नूखडली सतापे रे ॥ नूखडली निठुरता नु कारण रे, नूखडली नेहनु निवारण रे ॥ रा ॥ ए थाकणी ॥ निर्मल मरुममलमा कूड, प्रियदर्शन थहि निवसे रे ॥ नीर समीपें बिलमा रहे तां, अदोनिश दिलमा मनसे रे ॥ रा० ॥ २ ॥ कादिक बदु जीवनुं न क्षण, करतो तिदा सुखे रहेतो रे ॥ एक गगदत्त दर सघातें, प्रीति घणी ते वदेतो रे ॥ रा ॥ ३ ॥ कूपमध्यवासी वली तिहाकणे, एक चित्र लेखा नामें रे ॥ सारिका मुगुणा साथै थदिजी, वहालपणु घणु कामे रे ॥ राम् ॥ ४ ॥ एम करतां को कालें हादश, वार्षिक दुई अनावृष्टि रे ॥ जल नीतुं कूपकनु जलचर, जीव तणी नहिं सृष्टि रे ॥ रा० ॥ ५ ॥ वृत्ति छेद यदिनो तब हु, गगदत्त पंक खाई रे॥ वेता निर्गम करे एक दिन ते, खुजग कहे सुण नाई रे ॥रा ॥ ६ ॥ मित्र घणी पीडा ले मुझने, ते कहे थे मुफ नांखो रे ॥ वदालेसर मन मलियु तिदा कण, बगना बानी म राखो रे ॥ रा० ॥ ७ ॥ दुधावेदना गाढी मुफने, मित्र वमे ने जाणो रे॥मरण समान नहिं जय महोटो, परनव दलित समाणो रे ॥राण ॥ - , श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो २३७ पंथ समान जरा नहिं जगमां, नूख समी नहिं वेयण रे ॥ ते माटें वालेश्वर तिम करि, जिम थिर रहे मुज चेयण रे ॥ रा॥ ए ॥ गगदत्त चिते ण कूपक, सघला जीव विणास्या रे ॥ ए उठातमनी मुफ कपर, दणवा दीसे अाशा रे ॥ रा० ॥ १० ॥ करि उपाय ए उटातमथी, बाप जणी कगारु रे ॥ स्वारथ साधीजे थापणनो, नीतिवचन सनारु रे ॥ रा० ॥ ११ ॥ यत ॥ स्वार्थ च साधयेधिमान्, स्वार्थत्रशोहि मू र्खता॥नास्त्युपाय स कोऽप्पत्र,येन सर्वोपि रज्यते ॥ ३ ॥पूर्वढालाकहे प्रिय दर्शनने ते गगदत्त,सुण स्वामी तुफ काजरे॥ महानदीहना ललचावी,जल चर लावु थाज रे॥रा॥१२॥ पण तिहा जावा शक्ति नहि मुज, चचुपुटें चित्रलेखा रे ॥ जो ऊपाडी तिहा पहोचाडे,करु उपगार विशेपा रे ॥ राम ॥ १३ ॥ यः प्रसन्न जग थादेशे, चित्रलेखा ले उमी रे ॥ कोइक महोटा प्रहमा महेली, वाट जोवे तट रूडी रे ॥रा ॥ १४ ॥ कहे सा रिका निमुणो गगदत्त, कहो वेला केम कीजें रे ॥ स्वामी प्रियदर्शन नूरख्या ठे, काज करी यावीजे रे ॥ राम् ॥ १५ ॥ गगदत्त कहे सुण चित्रलेखा, वात विचारी करीये रे ॥ नूरख्या प्रियदर्शननी सगति, दवे केमही नादरीयें रे ॥रा॥१६॥सारिका प्रति गगदत्त कथयति ॥श्लोक। वुनुदित कि न करोति पापं, दीणा नरा नि करुणा नवति ॥ था रव्याहि नई प्रियदर्शनस्य, न गगदत्त पुनरेति कूपम् ॥ ४ ॥ पूर्वढाल । ते माटे तुऊने दु वारु, म करिश तगति एहनी रे ॥ नूख थने वली माकण वेगु, जगमा नोहे केदनी रे ॥ रा० ॥ १७ ॥ एम समजी ते मन मा थाली, पानी फरि गइ ठाणे रे ॥ श्येन कहे मेघरथजी नूख्यो, कृत्या कृत्य न जाणे रे ॥रा ॥ १७ ॥ तेमाटे मुझने सतोपो, कहे मेघरथ सुण नाई रे ॥ शामाटे तूं रहे डे नूरव्यो, देव थाहार मगाई रे ॥ राण ॥ १५ ॥ कहे पखी थामिप विण मुझने, थन्य थाहार न जावे रे ॥ कहे नृप ते मगावी थापु, एम कां थाकुल थावे रे ॥रा ॥२०॥ मुफ नजरें प्राणी तन दी, जोतु थापे ताजू रे ॥ तो मुफ थातम सतोपाये, नमले तुक मुफवाजू रे।रा॥१॥पंचम खमेंनवमी ढालें,थावीमलियुटाणु रे॥ हवे मेघरथजीसत्य राखशे, थागल तेह वखाए रे ॥रा॥२॥३०॥३॥ - २३७ जैनकथा रनकोप नाग बाग्मो. ॥ दोहा । ॥ मेघरथजी मन चितवे, परने नव उहवाय ॥ निज सनु दी जिम एसतोपाय ॥१॥ कहे नृप साजन श्येन तु, ए पसीजारोबार मुफ तनुमास तुला धरी, थापु करि थाधार ॥ २ ॥ वात पंखी निव पडिवली, तुला मगावी ताम ॥ पारावत एकण दिसे, मूक्यो मनिराज ॥३॥ तीखी बुरिकायें ठेदीने, निज तनु मासना सम ॥ मूके बीचे प्राजुवे, धीरज धरी यखम ॥ ४ ॥ देवमाया को थाकरी, न हुने सरि खो तोल ॥ मास खम तिम तिम धरे, मनसा करी थमोल ॥ ५॥ पण सम याये नहि, तव राजन निज थग ।। सकल्पी वेगे तुला, भो दयागुण चग ॥ ६ ॥ ॥ ढाल दशमी॥ ॥ रंगीला राणा, रहो रदो सनतकुमार ॥ ए देशी ॥ यतेटर सफ्लो मन्यो जी, मलीयो रे सवि परिवार ॥ श्रदो स्वामी शु मामीयो जी, जी वित त्याग विचार ॥ १॥ रगीला राणा, रहो रदो मेघरथ राय ॥ बी जा स्वामी, कहो थम थवगुण काय ॥ हठीला स्वामी, एम केम दी काय ॥ ए थांकणी ॥ एक पखीने कारणे जी, का करो साहस एम । तमें थमने घणु वालहा जी,थविदड तुमा प्रेम ॥ रगीला ॥२॥ हा हा हा सद्धये करे जी,नयण न खेंचे रे धार ॥ वाजेसर केम अवगणो जी, म्हें श्रम प्राण आधार ॥ रगी० ॥ ३ ॥ ए दीसे का कारिमो जी,देवतणो रे प्रकार ॥ नहितर एद कपोतमां जी, केम होवे एवडो नार ॥२०॥ ५ ॥ ज्ञानवत पण नवि जहे जी, पर उपकार रसेण ॥ सरलपणे वेयु न हिं जी, चितवे करुणा वशेण ॥ २० ॥ ५ ॥ धन जगतीमा जे करे जी, धगीकृत निर्वाद ॥ ए पुजल परकामने जी, थावे ए लान अपार ॥ २० ॥६॥ दान सार ने वित्तनो जी,सत्य वचननो सार ॥ श्रायुसार ए कीर्ति के जी, देहनो सार सपकार ॥ २ ॥ ॥ स्वारथीयुं सहुये मन्' नी, वारे जे मुफ थान ॥ पण ए प्राण नवोनवें जी, वार अनती ए राज ॥ २० ॥ ॥ मन देखी दृढ रायन जी, चलत कुमलपुति होय ॥ सूषण थंगें विराजता जी, श्रावी नम्यो सुर कोय ॥ २०॥ नो राजेश्वर धन्य तुं जी, धन धन तोरी रे माय ॥ धन तुम अन्वय जजलो जी, , श्री शातिनाथनो रास खम पांचमो. २३ए धन्य धन्य धनरथ ताय ॥ २० ॥ १० ॥ वीर शिरोमणि तु वडो जी, जी वित जन्म प्रमाण ॥ ईशाने तुम तणां जी, प्रजु थाज कीध वखाण ॥ रं ॥ ११ ॥ थणसहेतो ते वर्णना जी, थाव्यो परीक्षा काज ॥ वढता पूरव मत्सरें जी, दीना कपोत ने वाऊ ॥ र ॥ १२ ॥ ते वेदुने में यात्र यी जी, थाण्या तुम्हारी रे पास ॥ तुम परख्या हरख्यो मनें जी, हवे तु म चरणनो वास ॥ २० ॥ १३ ॥ हवे नृप पूढे एहने जी, वैर दु केम देव ॥ सुर कहे यनरथ कारिणी जी, माती ए लोजनी टेव ॥ राजेश्वर महोटा, सुण सुण वैरनी वात ॥ १४ ॥ ए पाकणी ॥ एदिन नयरी मां दुवो जी, सागरदत्त अनिधान ॥ वणिक विजयसेना नली जी, घरणी ए सुगुण निधान ॥रा॥१५॥ युगल पणे तस उपन्या जी,धन नदन सुत दोय ॥ यौवन वय धन कारणे जी, गया परदेशे रे दोय ॥ रा ॥ १६ ॥ नागपुर नगरें गया जी, करताजी वणिक व्यापार ॥ वहुमूलु उपराजि{ जी, रयण तिहा एक सार ॥ रा० ॥ १७ ॥ ते वेदु वधव रयणने जी, लोनें पच्या रे निर्लक ॥ माहोमाहे एकेकनो जी, चितवे घात थकड़ ॥ रा० ॥ १७ ॥ एक दिन नदीये नाहता जी, माख्यो तिहा रे विवाद। धिक् धरतीमा को नहि जी, लोन समो उन्माद ॥ रा० ॥ १५ ॥ एक कहे उपराजियु जी, रयण ए में बदुमूल्य ॥ वीजो कदे मदारी कला जी, नणियु सवे तुज धूल ॥ रा० ॥ २० ॥ रोप चढयो बिद्धने मनें जी, थरु ए नयण थयां ताम ॥ जल अगाधमा जूफ़ता जी, पडीया ते दोय थ काम ॥ रा० ॥ २१ ॥ श्राध्याने ते मूवा जी, थया पंखी वनमांहि ॥ पूरवनव वैरें मल्या जी, युद्ध करे माहोमांहि ॥रा॥२॥ एम कदी सुर लोकें गयो नी,सुर करतो गुणग्राम ॥ सज धग नृप देखिने जी,दरखलद्यो सद्गु ताम ॥ रा० ॥ २३ ॥ पंचमे खमें सानलो जी, दशमी ढाल सुरंग ॥ राम कहे धन्य जेदने जी, थविदह धर्मनो रंग ॥ रा ॥२॥३३॥२३॥ ॥ दोहा॥ ॥ कहो स्वामी ए कोण हतो, निरपराध जे थाय ॥ एम तुमने सकट वियु, नाखो सब्द समजाय ॥१॥ कहे मेघरय कीधा करम, प्रव वैर निवध ॥ नव नमता थावे उदे, वलीयो थहो सबध ॥ २॥ था नवथी जव पांचमे, नव हरि ने वलदेव ॥ बनतवीर्य थपराजिता, दुता कत २४० जैनकथा रनकोप नाग श्राठमो. सुरदेव ॥ ३ ॥ तिण नव यम्हचो रिपु दतो, दमितारि पण नाम तनया थम्हें थपहरी, की नालु काम || ४ ॥ ते नमी नगातार नरताप्टापद पास ॥ तापस सुत तपि बालतप, थयो ईशान मुर खास ॥५॥ प्रशसा साजली, थणसदहतो ताम ॥ शहा थावीने जे गर्नु, नहि थजाएयु काम ॥ ६ ॥ ॥ ढाल थग्यारमी॥ मोजा मारे रे साजूडावाली ॥ ए देशी ॥ मेघरथजीना मुखची निमुखी, सना सहुजन वाणी ॥ धन धन एराजेश्वर गिरुथा, मलीया थमने नाही रे ॥१॥ ए सुत रुडो रे घनरथजी वालो ॥ प्राण दे पोताना परगट,पारेरो कसो वहालो रे ॥ ए सुत० ॥ ए थाकणी ॥ जीवदया कीधी जेणें वहा ली, धन जननीनो जायो ॥ यतेनर पुरजन सङ मलि मनि, मेघरपजीने गायो रे ॥ ए० ॥२॥ वात सुणी निजनव सुरनवनी,पखी वेदु समजाणा ॥ जाति समरण पामी ततक्ष्ण, क्रोध तजी दुया शाणा रे ॥ ए० ॥ ३ ॥ कहे स्वामी थम्द सवेग थाव्यो, तुम्ह करुणाथी साचो ॥ हवे प्रकासो यातमने हित, जाण्यो नव करि काचो रे ॥ ए० ॥ ४ ॥ कहे मेघरथ मदथी मन वालो, समकित सूधु पालो ॥ पाप नाशन बास ण सनालो, निज थातम यजुवालो रे ॥ ए० ॥ ५ ॥ वेड पंखी करे थसण किरिया, उपशमरसना दरीया ॥ सनारे मन पंचम किरिया, सुरजुवनें थवतरीया रे ॥ ए ॥ ६ ॥ पोपध पारीने कीधु पारण, रा ज्यतीला सुख विलसे ॥ पण जाणे प्रनाव पोतानो, नावमादि दिल सनसे ॥ ए० ॥ ७ ॥ परिसद उपसर्गे नवि बीदे, सवेगवासी श्रवीणो ॥ एक दिन थम्म करि पहिमायें, मुनि जेम ध्याने लीणो रे ॥ ए० ॥ ७ ॥ अडविस लाख विमाननो स्वामी, अड इणीनो कामी ॥ एसी सहस सामानिक केरो, कहे थधिपति शिर नामी रे ॥ ए० ॥ए ॥ निज माहा स्म्यनिर्जित सद्ध जग,गतकल्मष जितकामो॥नावी जिन तुमने कर जोडी, एह करु परणामो रे ॥ ए० ॥ १० ॥ पासें रदी निसुणी कहे देवी, कुण गुणवत निदाली ॥ स्वामी तुमें प्रणाम ए कीघो, कहो अम उत्तर वाली रे ॥ ए० ॥ ११ ॥ ६ कहेसुण त्रैलोक्यमुवरी, नयरी पुमरिगिणीवामी ॥ मेघरथ थन्म तप रह्यो ध्याने, तास नम्यो शिर नामी रे ॥ ए० ॥

श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो. ४२ १२ ॥ ध्यानमां लीन रह्यो जेम योगी, कोश् चलावी न शके ॥ इंशदिक बहु देव मले पण, अंश न ध्यानथी चसके रे ॥ए॥१३॥ निसुणी मुरूपा ने अतिरूपा, इश्तणी शिणी ॥ यावी चलावा मेघरथजीने, पासें ते कजाणी रे ॥ ए॥ १४ ॥ रूप करी रमणीनु वारू, कामणगारी कांते ॥ शोल शृगार करीने सुदरी, थावी उनी एकां रे ॥ ए० ॥१५॥ तन सुकुमारी रूप रसाली, नमुह वनी थणियाली ॥ मेघरथजीने जोवे नाली, कामिनी घणु लटकाली रे ॥ ए ॥ १६ ॥ तन अंक परतु करि कामिनी, कनी थगने मोडे ॥ मेघरथनीने निरखें सदामी, पण ते न यण न जोडे रे ॥ ए० ॥ १७ ॥ थम्हें थमरी तुम पर मोदन, थावी रूपनी मोही ॥ पूरो अम्हारो मनोरथ वहाला, एक वार साहामुं जोई रे ॥ ए० ॥ १७ ॥ तुज दरिसणनी तरशी प्रीतम, मजाणी थन्हें थावी ॥ मूकी सुरपति जेवो स्वामी, तुम मुज्ञ अम नावी रे ॥ ए० ॥ १५ ॥ नयण वयणना चाला करती, वलि वलि जोवे फरती ॥ मेघरथजीनी ध्यानदशा तव, नहि तिलमात्र सरती रे ॥ ए० ॥ २० ॥ जथालि गन देती पासें, भावी कहे नहिं कूद्धं ॥ कहे मुखचुंबन करती प्रीतम, ए मुखपंकज रूड रे ॥ ए० ॥ २१ ॥ दाव ने नाव विलास ने विघ्रम, करि करिने ते थाकी॥कीधा अनेक उपाय चलाववा,कांहिं न राख्यं वाकी रे ॥ ए० ॥ २२ ॥ एम थनुकूल कया वहुतेरा, थाखी रयण विदाणी ॥ थयो प्रनात मग्या नदि ध्याने, तेह घणु जंखाणी रे ॥ ए. ॥ २३ ॥ शात थई निज रूप देखाडी,स्तुति करवाने लागी ॥ धन्य धन्य मेघरथजी तुम जीवित, रागदशा नवि जागी रे ॥ ए० ॥ २४ ॥ श्रम चेटायें लोह मयी पण, पुरुप गलीने जा ॥ पण लवलेश चम्युं नहिं तुमचु, चित्त ए थधिक वडाई रे ॥ ए. ॥ २५॥ धन्य तुम्दो कृतपुण्य तुम्दो बो, ३ व खाण्या तेदवा ॥ ममलथाखमलमुगुणा,कोइ नहिं तुमजेदवा रे ॥ए॥ २६ ॥ खमो थपराध न करगं एहतु, पुनरपि काम कदापि ॥ मेघरथजी थमो घणु पस्ताणी, तुमने शहां सतापी रे ॥ ए० ॥ २७ ॥ ते थमरी प होती निज स्थानक,मेघरथ पडिमा पारी ॥ करे पारण विधि वढ साथें, देव गुरुने सनारी रे ॥ ए ॥ ॥ धन मनना बलीया दृढधर्मी, श्वर जैनकथा रनकोप नाग श्राठमो. मेघरथजीने वदो ॥ पंचम खमें ढाल अग्यारमी, राम कहे तिने रे ॥ ए० ॥ २५ ॥ सर्वगाथा ॥३६ए ॥ श्लोक तथा गापा मली ॥ दोहा॥ ॥ एक दिन राजसना जोडी, वेठा मेघरथ राय ॥ वनपालापाची करी, थरज करे सुखदाय ॥ १ ॥ स्वामिन् तुम मनवमहा, बनना बह परिवार ॥ समवसस्वा धनरय प्रज, जगतीजन थाधार ॥३॥ पारितोपिक घणु, धन हिरएयनी राशि ॥ मेघरथजी परिवारई, 4 चव्या उन्लास ॥ ३ ॥ जिनवर वादी जावा, वेग मनने कोर ॥ दीये देशन प्रजु नवि जना, निमुणे वे कर जोडि ॥ ४ ॥ ॥ ढाल वारमी॥ ॥ देशी वणजारानी ॥ सुणो प्राणीजी॥ कहे धनरथजी नगवान्,थान धरो मन धर्मनो ॥ सुणोप्राणीजी ॥ सु० ॥ सद्ध थाथ ए अपिर निरान, फलपाक ए शुन रुतकर्मनो ॥ सु० ॥१॥ सु० ॥ मेली थनती वार, पुन राशि ए प्राणीये ॥ सु० ॥ सु० ॥ फरि फरि चाहे तास, शीमति तास वखाणी ॥ सु० ॥ ५ ॥ सु० ॥ नहिं कोश्नु जग कोय, स्वारपर्नु सहुये सगु ॥ सु० ॥ १० ॥ जेदने मलीयें थापणो जाणि, ते जाणे एदने उl ॥ सु० ॥ ३ ॥ सु० ॥ नवि जाणे गातो थाप, माया विलुको जीवहरो ॥ मु० ॥ सु० ॥ एतो ज्ञाननयणे करी अध, शु करे सशुरु दीवडो ॥ सु० ॥ ५ ॥ सु० ॥ उत्सदां जे चन थग, तेदमा मूल तुम्हें लहो । मु० ॥ १० ॥ दास्यु न थावे दाय, प. केदेशो जे नवि कह्यो ॥१॥५॥ सु॥ साथै न थावे कोय,धन रमणी नवि तादरी ॥ सु० ॥ सु० ॥ जाणे तु मूढ सनाव,में मेली एमादरी ॥ सु० ॥॥॥ मान चढयो मद जोर, छ करता ए नावनो ॥ सु० ॥ सु० ॥ ए व्यवदारनी चाज, निमय श्राप स्वनावनो ॥ सु० ॥॥ १० ॥गे सुखनां रे सरीख,तो जास्व कारण को वदो ॥ सु० ॥ सु० ॥ ते सुखनु एक हेतु,सार धर्म ते सहहो ॥ १० ॥ ॥ सु० ॥ परदरिने परमाद, धर्म करे जे सम्मह्या ॥ सु० ॥ १० ॥ आपद पण दोय सुख, शूर तणी परें सुख लह्यां ॥ १० ॥ए ॥ सु० ॥ श्य श्रवसर गणधार, पूढे शूर कवण दुळ ॥ सु० ॥ १० ॥कहे धनरपक्षी थरिदंत, धर्म तणुं माहातम जू ॥१० ॥१०॥ सु०॥ अवधीप मजार, श्री शातिनाथनो रास खम पांचमो २४३ मध्य खममा जारतें ॥ सु० ॥ सु० ॥ धरणीप्रतिष्ठित नाम, पुर गुणसमु दायांचितें ॥ सु० ॥ ११॥ सु०॥ तिहा प्रजाप्रतिपाल, वीरसेन नामें जयो ॥ सु० ॥ मु० ॥ न्यायवतमां लोह,धर्म करणने अलजयो ॥ सु० ॥ १२ ॥ १० ॥ धारिणी नामें देवि, मनु देवी धरणी गता ॥ सु० ॥ सु०॥ रायने वजन जोर, महियलमा मोहनलता ॥ मु० ॥ १३ ॥ सु० ॥ एक दिन सूती सेज, सुपनु लहे सुरराजनु ॥ सु० ॥ सु० ॥ कहे पियुनें धरि नेद,धन्य विहाणु मुफयाजनु ॥ मुणो स्वामीजी ॥१४॥ मुणो स्वामी जी॥में जातो दीठो इश, मुह थागत फल न हो ॥ सुणो स्वामीजी ॥ सुणो राणीजी ॥ तुम सुत होशे वलवत, नाव चलाचल पामशे ॥ सु० ॥ १५ ॥ सु० ॥ राणी रे थावी धाम, नव मसवाडे मुत जल्यो ॥ सु० ॥ १० ॥ देवराज" इति नाम, दीध महोत्सव अति घणो ॥ 5 ॥१६॥ १० ॥ ते वधते वली एक, रयणसमे तुप जलो ॥ सु० ॥ सु० ॥ दीगे निज नत्सग,क्रीडा करतो अति जलो ॥ सु० ॥१७॥ सुणो राणी जी ॥ निमुणी कहे नरश्द, तुज सुत दोशे सुदरु ॥ सु० ॥ १० ॥ सुपन परें वसवत, दोशे राजधुरंधरु ॥ सु० ॥१७॥ सुणो प्राणी जी ॥ ययो जन्मसमय सुख वत्सराज" थनिधा उवी ॥ सु० ॥ सु० ॥ वरत्यो जयजयकार, नाग्यदशा जागी नवी ॥ सु० ॥ १ए ॥ सु० ॥ वरस थया जव थाट, तव नीशालें मूकीयो ॥ सु० ॥ मु०॥ सकल कला तिण सार, शीखी किहा नवि चूकीयो ॥ मु० ॥२०॥ मु० ॥ पुण्य तणी ए वात, पुत्र मुगुण एवा मले ॥ सु० ॥ सु० ॥ पंचमे खमें वारमी ढाल, पुण्यथकी वालित फले ॥ सु० ॥१॥ सु०॥ सर्वगाथा ॥३४॥ श्लोक तथा गाथा॥२३॥ ॥ दोहा॥ ॥ वीरसेन नृप एकदा, दाघज्वरने रोग ॥थति थातुर थगें थयो, वल कर्मनो नोग ॥ १ ॥ दृथिवीपति पीडित थयो, तस उखे परिवार । खीयो सवि एकत्र मलि, एणी परें करे विचार ॥ ॥ वयें वडो गुणें नानहो,देवराज नृपनद ॥ पण गुण महोटो वय लघु वत्सराज मुख कद ॥३॥ जगमा गुण दीसे वडा, गुण विण वडो न कोय ॥ वडो करता दीपने, जुवो घर कहेवु होय ॥ ॥ वत्सराज दोय तो जलो, नरपति सवल सकळ ॥ देवरान वयथी वहो, योग्य नहि ए रज ॥५॥ देव कार, स . २४४ जैनकथा रत्नकोप नाग आम्मो. राज एम सांजव्यो, लोक तणो बालोच ॥ रखे राजा बत्तराव मनमा धरे सकोच ॥ ६॥ मत्रीश्वर दाये कस्रो, देई बहु सम्मान । गजादिक वश करी, थाप ययो राजान ॥ ७ ॥ ॥ ढाल तेरमी॥ ॥ पंचसयां धण परहरी ॥ ए देशी ॥ नृप वीरसेनजी सोनकर पति दुर देवराजो रे ॥ थाधि ने व्याधि निपीडियो, कहे ए कोई काजो रे ॥१॥ धिक् धिक्रराजनी मोहनी ॥ ए थाकणी ॥ न गणे बंपर लाजो रे । नेद न राखे रे वापन, एम कहे नरराजो रे ॥ घि०॥ गुणवतो ए वेसी रह्यो, थगुणी थागल कीधो रे ॥ पण मुज कारचे नहिं, चितित काज न सीधो रे ॥ धि० ॥३॥ राज लही देवराजीयो, थयो वलियो सपराणो रे ॥ सह सामतने वश करी, देशमाहे गवराणो रे ॥धि॥॥ जन धनुराग न को धरे,सहु वत्सराज वखाणे रे ॥ एक माता नारे उदरना, पण थतर बहु जाणे रे ॥ धि ॥५॥ राजसनामा रे नित्य प्रतें, थावे वत्सराज कुमारो रे ॥ विनयी वडा वधव तणो, विनय न चूके लगारो रे ॥ घि० ॥६॥ कुण थांजे नयन मृगागना, कोण चीतरे मोरना पिडो रे ॥ उत्पलदल सधि कुण रचे, एम उत्तम विनयने प्रोटो रे ॥ धि० ॥ ॥ सहज विनयगुण देखिने, सकल प्रजा धरे रागो रे ॥ अहो वत्सराज समोवडे, नहि नृपसुत वडनागो रे ॥ धि० ॥ ॥ पुर हवयनो रे चितवे, मत्री देवराजो रे ॥ गुणे वधतो जन वालहो, वेरी ए. वत्सराजो रे ॥ धि० ॥ ए ॥ राज्य दरशे रे थापण, बांधव एड म जाणो रे ॥ शत्रु वथ्यो गुण नवि करे, नीतिनु वचन प्रमाणो रे ॥ वि०॥ १० ॥ बेड मन्या बुंदिया, वायु थनल जेम हो रे ॥ करे कुविकल्प नी कल्पना, कीजें उपाय ए कोई रे ॥ धि० ॥ ११ ॥ कहे मत्री सुण सादिया, जो हो रहे वत्सराजो रे ॥ तो नहिं हित तुजने सही, एम जाणो महाराजो रे ॥ धि० ॥ १५ ॥ काढो बाहिर एदने, पुरहूती इण वारो रे ॥ करशे अनिष्ट कनिष्ट ए, पाम्युं राज म दारो रे ॥ धि० ॥ १३॥ नृप मनमा वसी वातही, निर्जज या निठोरो रे ॥ पंधव तेरने अवगुपी, बोले वयण कठोरो रे ॥ घि० ॥ १४ ॥ तेडी कहे वत्सराजनें, जा मुफ नयरने मूकी रे ॥ कुलनी जला रे लोपिने, बोल्यो नीतिने पू .

श्री शातिनाथनो रास खम पांचमो. ए४५ की रे ॥ धि ॥ १५ ॥ कहे वत्सराज विचारिने, वाधव था| प्रमाणो रे॥थाव्यो मदिर मातने, नमवा सत सुनाणो रे ॥ धि० ॥ १६ ॥ चर ण नमी बागल रह्यो, वोले सुण गुणवाडी रे ॥ सगे रे सहोदरें काढी यो, देशहूती मुने माडी रे ॥ धि० ॥ १७ ॥ वात सुणी उखणी थई, नयण करे वह नीरो रे ॥ हृदय जरा रे यावीयु, चूहे यांसुडां चीरो रे ॥ धि० ॥ १७ ॥ सुण वत्स तुज विण माहरा, प्राण घणु थकलाये रे ॥ जीवन जाया रे तुज विना, घडी वरसा सो थाये रे ॥ धि० ॥ १५ ॥ तुफ विण मदिर मालीया, ए मुफ खावा धायो रे ॥ तुज विण रयणी वैरण थर, मुजने केमही न जायो रे ॥ धि० ॥ २० ॥ माटें वत्स सुण माहरा, श्राविश तहारी दु साथै रे ॥ सुख उख सहेछ रे एकतां, मात ग्रही रही हाथे रे ॥ धि ॥ २१ ॥ वत्स कहे मुण मावडी, थति विपमो परदेशो रे ॥ तुम्हें ण मदिरमा रहो, यो मुझने यादेशो रे ॥ धि० ॥ २२॥ मात कहे सुण वालुडा, शी ए वात प्रकाशो रे ॥ हा रदेवु मुफ नवि गमे, तुज श्वासें मुफ श्वासो रे ॥ थि० ॥ २३ ॥ थरथ नदि देवरा जन,जे तुमने थपकारी रे ॥ बहेन सघातें रे थावद्यु, तुझ साथें निर्धारी रे॥ धि ॥ २४ ॥ सुत माडी मासी वली, कीध विचार विमासी रे ॥ राम कहे खम पंचमे,तेरमी ढाल ए नासी रे ॥ धिo ॥२५॥ सर्वगाथा॥४२॥ ॥ दोहा॥ ॥ रोपें चढयो तब राजियो, देवराज तेणि वार ॥ वाहन सवि खोंची लियां, माय तणा निर्धार ॥१॥ वत्सराज वहालो कियो, ण मूक्यो मुज याज ॥ श्यानी ए मुफ मावडी, थश न राखु लाज ॥२॥ जे को जाशे एहोनी, साथै सेवक थान ॥ तेदने में दण्वो सही, एम वोले देवराज ॥३॥ नहिं थानूपण तेहा, नहिं वसन शुनपास ॥ उदाली लीधां सवे, थहो थहो कर्म विलास ॥ ४ ॥ ॥ ढाल चौदमी॥ ॥ 5 खनीमारी हे, सूतीथी सरोवरियारी पाल दे, कागदियो न थायो महाराराज, विण परदेशरी ॥ ए देशी ॥ उखनी मारी दे, मायडी नयण करते नीर दे, सुतने रे लेइने वदेनी साथ, वादेर नीसरी ॥ पुरना वा सी हे,निसुणीने वात मल्या नरवृत हे, हा हा ए दुवो कवण प्रकार, मुघ . २४६ जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. बुध वीसरी ॥ १ ॥ धिक् धिक सुतने दे, नेहहलो प्रेमीने पीक ह दे,नफट निदेजो महारा राज,राजा ए दुवो। काहि नचाने हे,मोराबर थापण कीधा कर्म है, उदय एम थावे महारा राज, प्रत्यक्ष ए. ॥५॥ कोई न करशो है, कोई न करशो गर्व गुमान है, साय ने कमर महारा राज,थावे थाहरी ॥सहु स्वारथना दे,स्वारथना सदए वे जगमा मिय हे,पडतीरेवेलामा महारा राज,नको पाहरी ॥३॥ रोयण लाम्या हे,पुरवा सी साजनना वृद दे, फट फट रेयन्यायी महारा राज, देव ते कई वत्स सारीसा है, वत्सने सारीसा कुमर सुजाण दे,वनमा रे काढता पार राज, काज किस्यु सख्खु ॥धासाजन महारा है,में ठग थाहारा पगनी रजने तोल दे,प्रजा पोकारे उनी राज,जीवनजी रहो ॥ सादिव महारा हे,एड. कवण विचार है, उना रे रहीने महारा राज, वातडली कहो ॥५॥ कुवर वोले दे,सगुने ने महारो जुहार हे,गुनह खमेजो महारा राज,जे कीधो दोप यादरो॥कुवर बोले हे,वदेला मिलस्यां थावी कहेस्या वात हे,हमणा रेनट काये महारा राज,वीरो कोप्यो माहरो॥६॥पुरन चाल्या हे,साथै माता ने मासी दोय दे,थागत चालता वाटें राज,सवल वेना पडी ॥ कुवर नानो दे, साथे घरडी मोकरडी दोय नारी दे,मारगमाहे नूला महारा राज, एम यापद नही ॥७॥कोने कहीये हे,कोने कहियें सुख खडानी वात दे,एवो रे नहिं कोइ महारा राज,कान देई सुणे ॥ त्रिनु जण चाले हे,त्रिदु जण किहां श्क सरोवरीयारी पाल दे, बना रे न राखे महारा राज, कोई घर थांगणे ॥७॥ मोशी मदारी दे,दीसोबो सबल सुदाली जाति हे,कहोने किण कार ण महारा राज,सुत लेइ नीसवां ॥ सुखनी मारी दे, धारिणी राणी कदे ताम दे,थमें दोय मोशीमदारा राज, मरमेश्वरनां विसस्यां ॥॥ खनी मारी हे, कथ विहूणी सुत खेर साथ दे, चाज्या रे वर्तवा महारा राज, थमें परदेशमा ॥ सत्तर देवे दे,उत्तर देवे जोक नणी ते थाम हे,कोई नयी रे महारा राज,एवा वेशमा ॥१॥ अनुक्रमें थाया हे, देश अवतीमांदे नय रि उलेणी हे, वाडीमा वढबाया महारा राज, वीशामो लियो ॥ धारिणी चिते दे,फट फट रे तें वैव कीशं ए कीघ हे, मुने वीरसेनवधुने कष्ट सपल दीयो ॥११॥ नविका सुराजो हे, कहे घनरथजी अरिहंत हे, कीधी रेक , श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो. २४७ माइ महारा राज, एम यावे उदे ॥ पचम खमें हे, राग थखमें चौदमी ढाल है, कविण न कीजे महारा राज रामविजय वदे ॥१२॥४४॥३॥ ॥ दोहा ॥ ॥ विमलाने कहे धारिणी, जान नयर मकार ॥ जोइ थावो को या शरो, वहेनी प्राणाधार ॥ १ ॥ तु मुफ जीवननी जडी, थ 5 खनी सा रीख ॥ साची तु मानी लणी, नली कबूली नाख ॥ ५ ॥ विमला थावी नयरमा, श्त उत जोवे ठाम ॥ पण को वोलावे नहिं, वाई श्रावो श्राम ॥ ३॥ एक लक्ष्मी बाई विना, धाइ न दे कोई मान ॥ जया शहेरमा नामिनी, फिरे विहूणी शान ॥ ४ ॥ सोमदत्तने मदिरे, ना मिनी नमती नूर ॥पहोतीप्रेमें पारखी, दोसे कोई सत्र ॥५॥ तात विदेशी बु थमो, मुफ नगिनी नाणेज ॥ वसवानी को जायगा, वतलायो धरि हेज ॥ ६ ॥ कहे शेठ था उरडी, वसवानी ने खास ॥ पण नाटुं देशो किस्यु, थागलया परकाश ॥ ७ ॥ विमला कहे शु थापीयें, नाटक नहि कां पास ॥ पण स्वामी घर ताहरे, थई रहेछ दास ॥ ॥ नो जन थमने थापजो, शेत तमे शिरदार ॥ कुजर मुखथी कण गिरे, कोडीने थाधार ॥ ए ॥ वात कबूल करी तेणें, यावी वहेनी पास ॥ तेडी लावी धारिणी, थगज सहित उनास ॥ १० ॥ ॥ ढाल पन्नरमी॥ ॥ एण मुगरीये मन मोदियु॥ ए देशी ॥ धारिणी विमला वत्सराजशु, तिहां श्रावी रही गुन तामो ॥ करे सोमदत्त शेनी चाकरी, जुन कर्म तणा ए कामो ॥ १ ॥ जग कीधा दो कर्म न बूटियें ॥ ए थाकणी ॥ एम नांखे दो त्रिवन नाथ ॥ सुर थसुर नरादिक सानले, सद् सांजले मुनिवर साथें ॥ ज० ॥ ॥ जीदो उदरभरण थति दोहिल, करे परघर केरु काजो ॥ वत्सराज चिते चित्तमा घणु, दा दा किहां गयु महारूं राजो॥॥॥ जीदो मुफ माडी मासी वडी, करता जेदनी बढ़ सेवो ॥ ते पाणी जरे परघर रही, श्रदो थदो ए शु कयु ठेवो ॥ ज० ॥ ४ ॥ वत्सराज चरावे दो वारु,जेमतेम चाले गुजरानो॥ वनमा जमता एकण दिनें, वीशमियो शुन तरुवाणो ॥ ज० ॥ ५ ॥ राजकुवरना राब्द सुण्या तिहा,करे शस्त्र तणो थन्यास ॥धेनु चरती हो मूकीने वत्सजी,तिहां पहो

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ចុមច
जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो.
तो धरि वनासो ॥ ज० ॥ ६ ॥ तेहमांहे जइ कनो रह्यो,
लक्ष्नो वेध सुजाणो ॥ यदि चूके समीपग नर तदा, तब पाये बन
मलाणो ॥ज॥॥ जेद विध्य न न हो तेहने, प्रशसे पश्ने सुशालो।
तेह देखी कलाचार्य चिते, कोइ दीसे कोविद वालो ॥ज०॥॥ तव पूर्व
कलाचारज तिहा, वत्स तु कोण किहाथी रे थाव्यो ॥ वत्सराज करे।
तातजी, देशांतरी एम समजाव्यो ॥ ज० ॥ए कहे थाचारज ह करी,
वत्स लेइ करे धनु तीरो ॥ देखाड कलाकुशल पणु, यम बागल ता
दस धीरो ॥ ज० ॥ १०॥ यवसर जाणीने कला तणो, अतिशय
कासे वीरो ॥ जो कुवर सद्ध चित्त चमकिया, थदो गुणजलनिधि गंजीरों
॥ ज० ॥ ११ ॥ जीरे जोजन थाव्या हो जावता, राजकुधरने का
रसालो ॥ गुणी जाणीने पासें वेसारीयो, जमाख्यो नाग्य विशालो ॥ ज.
॥ १२॥ यत ॥ कला कलौ कामगवी समाना, सर्वार्थससाधनसाव
धाना ॥ कला विदेशे परम हि मित्र, कलासम नास्त्यमृत पवित्रम् ॥१॥
पूर्वढाल ॥ जीरे सगति सरखानी मली, मन पाम्यो हो प्रीति अपारो ॥
गुणीने दो गुणीशु गोठडी, सदु जाणे रे एह विचारो ॥ ज० ॥ १३ ॥
यत ॥ मृगा मृगै सगमनुव्रजति, गावश्वगोनिस्तुरगास्तुरंगे ॥ मूर्खाम
मूर्खे सुधिय सुधीनि समानशीलव्यसनेषु सख्यम् ॥॥पूर्वढाल ॥ दिन बधो
वदि गयो वातमा,रखवाल विना वत्स तेदो॥समकावलि तेद थावियो,
पुरमा सोमदत्तने गेहो ॥ ज० ॥ १४ ॥ कहे शेठजी विमलाने तिहां,
थाज वहेलां केम वत्स रूपो ॥ रखवाज एहनो क्या गयो, वत्सरान ए
कवण सरूपो ॥ ज० ॥ १५ ॥ बाल नावे ए साथें रुई नहीं, एम वात
करता तेहो ॥ वत्सराज थाव्यो संध्यासमे, मल्यो मायने अधिक सनेहो
॥ज॥१६॥ वस्स वेला केम थएवडी,कदे कल्पित वात विचारी ॥ मुफ
सघ थावी वनमा घणी,रह्यो सूक्षतिदा निर्धारी ज॥१॥ कोक धावीने
जगाडीयो, दमणा दु श्राव्यो माडी ॥ वस्त एम वसुर न कीजियें, कहे
विमला हो प्रीति जाडी ॥ज॥१॥ तिम वली बीजे दिन एम रह्यो,
त्रीजे दिन एमन कीg ॥ शेनें उजनो दीधो घणो, एडची मुफ कान न
सीधु ॥ ज० ॥ १५॥ कहे रीष नराणी मावडरी, परदेश बायो इण
वामो ॥ परमदिरवास ए कष्टथी, जोजन पर दाथ ए कामो ॥ज॥२०॥

श्री शांतिनाथनो रास खम पांचमो. श्मए जीरे कर्मकरीनुं याकरु, मुफ माथे कलंक असारो ॥ वली लंना ए ताहरा,न खमाये वत्सकुमारो ॥ज॥१॥ जीरे वयण सुणी माडी तणा, वोल्यो वत्सराज कुमारो ॥ माय वाठरुया चारिश नहीं, नहि महारो वश गमारो ॥ ज० ॥ २२ ॥ ढाल ॥ नहि चारु रे नव लख धेनु ॥ ए देशी ॥ नहि चारु रे मोरी माय, ना रे मा नहि चारु ॥ महारे के. कोण उजाय ॥ना॥ हारे ए तो दोडीने थलगां जाय ॥ना॥हारे ए तो थटवु उपवनमाय ॥ ना० ॥ ए थाकणी ॥ श्री वीरसेन नरेश्वर महारो, सवल पिता गुणधार रे ।। धारिणी माता तहारो जायो, न करु ए काम गमार ॥ ना० ॥ १ ॥ कड वाधी ला लाकडी दाये, थाखो दिन केड करवी रे ॥ वर नूख्यो रहिश पण माडी, ए सेवा नादरवी ॥ ना० ॥ २॥ कला बहुतेरी महारी शीखी, सबली नूली जवाय रे ॥ सुणो माडी मासी वलि महारी, ए मुमने न सोहाय ॥ ना० ॥ ३ ॥ कहेवु ए सोमदत्तने अमचो, सुत वारुया न चारे रे ॥ मन माने तेदने ए सोंपो, उजनो न देशो लगारे ॥ ना० ॥ ४ ॥ घणु करो तव घर राखेशे,जेम सो तेम पच्चास रे॥माडी मनमां चिता न करशो,शी करवी परथाश ॥ ना ॥ ५ ॥ कहे माडी सुण वत्स वालुडा, नोजन कि हाथी करशो रे। जो एदना मुख सामु जोशो,तो कोई दिन उदरने नरशो ॥ ना० ॥ ६ ॥ वत्स कहे द थाजयी भोजन, मन माने त्या करयु रे ॥ पण एहनी उशीयाल न राखु, जेम तेम करि निर्वदा ॥ ना ॥ ७ ॥ नित्य प्रत्ये राजकुमरनी पासे, नोजन करवा जाय रे ॥ वत्स अवेलो का एम थावे, घर तु का नवि खाय ॥ ना० ॥ ॥ वत्स एम किम रीसाणे सरशे, के थथवा जमे क्याही रे ॥ वात कही माडीने मांमी, हर्प लही मनमादि ॥ना॥॥ ढाल विचालें मात ने मुतनी,वस्त चरावण वात रे ॥ जांखी रे निसुणो नवियण नावें, धन धन एहनी जाति ॥ ना ॥१०॥ ढाल पूर्वनी ॥ जीरे एक दिन थाव्यो दोधागणे, देखे माय घणु दिलगीर ॥ तव पूढे दो शी तुम एवडी,दिलमांहे दीसे ने पीर ॥ ज० ॥ २३ ॥ वत्स तु घरचिता नवि करे, नहिं तुफ विण को थाधार ॥ रघु थन्य सर्वे थलगु श्दा, नदि घरमाहे घणनार ॥॥॥ जीरे शहे रनो वास ए साकडो, सवि वात तणी तंगास ॥ जीरे जल श्यण वली ३२ 4 . ३५० जैनकया रनकोप नाग आग्मो. दोहिला, दोहिलानी न गेयाश ॥ ज०॥२५॥ जीरे कहे वत्स सारतिय शिरे, जइ लावु धण जार ॥ मुफ एक थपावो कुगरिका, कावा मति तिम सुविचार ॥ ज० ॥ २६ ॥ प्रनात थये सवि तेम सुं पहरी ए पन्नरमी ढाल ॥ सम पचमे रामविजय कहे, हवे धागे संब रसाल ॥ ज० ॥ २४ ॥ सर्व गाथा ॥ नए ॥ श्लोक ॥ १५ ॥ ॥ दोहा॥ ॥ खांधे कुहाडी सेइ चल्यो, वनह नणी वत्सराज ॥ नाना धुम जोतो थको, वन गदर तरुराज ॥ १ ॥ जो देखु को सरल तरु, तो दी तस खम ॥ कावा नरीने पूरु हु, मनोरथ माय थखम ॥ २॥ तिहां एक दीतु वेवकुल, माहे विराजे यह ॥ नक्ति करे नागर जना, महिमा जास प्रत्यद ॥३॥ तस थागल एक सरल , चदनतरु सुगम ।। कुवर विचारे वावना, चदननो ए गध ॥ ४॥ तस अनुसारें तिदा गयो, साहसथी थदिराज ॥ नासीने दूर गया, कुमरना सीध्यां काज ॥ ५ ॥ यदनु कानन जाणीने, किणे नवि वेद्यो पूर्व ॥ ते तरु देवीने लिया, काटना खम थपूर्व ॥ ६ ॥ कावा जरीने चालीयो, निज घर ते चजमात ॥ पुरपोखे थाव्यो तदा, पोल जही ततकाल ॥ ७ ॥ ते नगरी मांद थडे, शाकिनीनु जय जोर ॥ पुर कपाट नवि कपडे, रवि प्रगव्या विण कोर ॥॥ रात पडी पागे वन्यो, थाव्यो यक्षने नाम ॥ कावा तरु थवजविने, माहे पेठो ताम ॥ ए ॥ दे कपाट थामां तदा, मूकी कुहारी पास ॥ एकदेशे सूतो जई, वत्सराज सुविलास ॥ १० ॥ ॥ ढाल शोलमी॥ ॥ थावे रे नगाणा तहारी कांकणीने फुषे ॥ ए देशी ॥ इण अव सर वैताढयथा रे, मध्यरात्रि मनोहार रे सोहे ॥ थायो रे तिहां खेच रीनो वृद मन मोहे ॥ १ ॥ रम्य विमानथी कतरी रे,यावी मम्पमाहि रे नामा ॥ यौवनना पुरमाहे शोनती ते श्यामा ॥२॥ करि शृंगार टोनें मली रे, करे विनोदनी वात रे बबीली ॥ सहीयो रे बाजनी ए यामिनी रंगीली ॥३॥ रस नरी रमियें रातमा रे, मनमा धरी थापद रे टोनी ॥ नृत्य कीजें अग वाली थाज नावनोली ॥ ४ ॥ घम घम घमके घूघरी रे, उम उम ववती पाय रे बाला ॥ दाथे विणा ताल बेइ किन्नरी रता श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो. ३५२ ला ॥ ५ ॥ र कंचुक कसिया जला रे, उढण नवरग चीर रे रूडी ॥ कर दीपे ककणा ने सोवननी चूडी ॥ ६ ॥ ये थे करती नाचती रे, लीये घूमणली घेर रे माती ॥ विच विच जीणे स्वरें वासलीने वाती ॥७॥ कुचिका विवरें देखतो रे, मन हरखे वत्सराज रे वारु ॥ जलु थयु श्राज दीतो नाच में दीदारु ॥ ७ ॥ रमि रमि रग जरी रातमा रे, स्वेदें जीनां चीर रे धामी ॥ कण एक कामिनी ते नूतलें विशामी ॥ ए ॥ नूतन पहेरी वस्त्रने रे,मूकी नीना चीर रे दोडी ॥ रात थोडी जाणिने उजाणी जेम घोडी ॥ १० ॥ रजसपणे रयणे जथ्यो रे, पडीयो कचुक एक रे दीपे ॥ नूमितल शोनतो ए डिविव कीपे ॥११॥ वार उघाडी उतावलो रे, दोडी लोधो तेणे रे रगें ॥ मांहे पेठो हार देश यदने प्रसगें ॥ १२ ॥ घागल जाता सानन्यु रे, माहे प्रनावती ताम रे वोली ॥ सहीयरो वारवाण माहरो दु नूली ॥ १३ ॥ ते कहे जा उतावली रे, वेगवती लेइ साथ रे चावी ॥ वहेनी तुं चाल वेगें मीलि ले थावी ॥ १४ ॥ थावी तिहां जोवे घणु रे, नव दीनो तिण ठाण रे चिते ॥ किहां गयो नहिं कोई मानवी एकातें ॥ १५ ॥ शु थयु केणें लीधो हो रे, तेह थमूलक माल रे तहारो ॥ प्राणजीवन महारो ए कंचु घणु प्यारो ॥१६॥ कोण तीये एटली वारमा रे, लागी वेला नहिं कां रे थाली॥ प्राणप्रिय देशे मुने थाज घणी गाली ॥ १४ ॥ कहे सखी थातुर छं दुवे रे, नहिं हा मादक कोई रे धास्यो ॥ ते पण सदि इहां कचुत विसायो ॥ १७ ॥ खोली दमणां काढशु रे, उमयो वायुथीदूर रे दीसे ॥ धर मन धीरज विशवा विशे ॥ १५ ॥ जोती ताम बिदुजणी रे, देखी विदगिका एक तरुमा ॥ नर हां गूढ को देवलें निदाले ॥२०॥ हार देखी दृढ गर्ननां रे, बोली थवला दोय रे त्राडी॥थाप थम कचु तु हारने उघाडी ॥२१॥ मूरख का मरवा तणी रे, होंश थई तुफ थाज रे पापी ॥ किदा दवे जाश थमने तु सतापी ॥ २५ ॥ वयण सुणीपण एड्वां रे, न चल्यो चित्त लगार रे वीरो ॥ वीरसेन वशजात साहसिक धीरो॥२३॥ यह तणो जय थापीने रे,नवि उघाडे हार रे वे ॥ थावी नुवन बाहार ते मत्रण करे ॥२॥ चालो नयरमा जोइये रे,एदनो सगो को होय रे मीतो ॥ तेदनोवोलाव्यो ए वो सही धीमो ॥२॥ चितीने ३५० जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. दोहिला, दोहिलानी न पूगेथाश ॥ ज० ॥२५॥ जीरे कहे वत्त साहसिक शिरे, जय लावु धण नार ॥ मुफ एक थपावो कुगारिका, काया तिम सुविचार ॥ ज० ॥ २६ ॥ प्रनात थये सवि तेम कई पी ए पन्नरमी ढाल ॥ खम पचमे रामविजय कहे, हवे धागे सर रसाल ॥ ज० ॥ २७ ॥ सर्व गाथा ॥ धनए ॥ श्लोक ॥ १५ ॥ दोहा॥ ॥ खांधे कुहाडी ले चल्यो, वनह नणी वत्सराज ।। नाना कुम जोतो थको, वन गहर तरुराज ॥ १ ॥ जो देखु कोइ सरल तरु, तो बेदी तस खम ॥ कावा नरीने पूरु दु, मनोरथ माय यखम ॥ २॥ तिहां एक दीतु देवकुल, माहे विराजे यद ॥ जक्ति करे नागर जना, महिमा जास प्रत्यक्ष ॥ ३ ॥ तस थागत एक सरस ठे, चदनतरु सुगप । कुवर विचारे वावना, चदननो ए गध ॥ ४ ॥ तस अनुसारें तिहां गयो, साहसथी थदिराज ॥ नासीने दूर गया, कुमरना सीध्यां काज ॥ ५॥ यक्षनु कानन जाणीने, किणे नवि वेद्यो पूर्व ॥ ते तरु गरीने लिया, काष्ठना खम थपूर्व ॥ ६ ॥ कावा जरीने चालीयो, निज घर ते बजमाल ॥ पुरपोलें थाव्यो तदा, पोल जडी ततकाल ॥ ॥ ते नगरी मांहे थडे, शाकिनीनु जय जोर ॥ पुर कपाट नवि कपडे, रवि प्रगव्या विण कोर ॥॥ रात पड़ी पाबो वढ्यो, थाव्यो यदने ताम ॥ कावा तरु श्रवत्तविने, माहे पेठो ताम ॥ ए ॥ दे कपाट थामा तदा, मूकी कुहाडी पास ॥ एकदेशे सूतो जई, वत्सराज सुविलास ॥ १० ॥ ॥ ढाल शोलमी॥ ॥ श्रावे रे उलगाणा तहारी काकणीने फुवे ॥ ए देशी ॥ श्ण अष सर वैताढयथी रे, मध्यरात्रि मनोहार रे सोहे ॥ थाप्यो रे तिहां खेष रीनो द मन मोहे ॥ १ ॥ रम्य विमानथी कतरी रे,यावी मम्पमाहि रे नामा ॥ यौवनना पुरमाहे शोजती ते श्यामा ॥॥ करिशृगार टोलें मली रे, करे विनोदनी वात रे बबीती ॥ सहीयो रे थाननी ए यामिनी रंगीली ॥३॥ रस जरी रमियें रातमा रे, मनमां धरी थापद रे टोली ॥ नृत्य कीजें श्रग वाली श्राज नावनोली ॥ ४ ॥ घम घम घमके घूघरी रे, उम उम उवती पाय रे बाला ॥ दाये विणा ताल बेइ किन्नरी रसा श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो. श्य३ नाथ ॥३॥ दे प्रतोलीपालने, काष्ठखम ततकाल ॥ नयरमांहे ते सचयो, मलपतो गजचाल ॥ ४ ॥ जाता परिमल ऊठल्यो, दिशि अव लोके लोक ॥ गध किहाथी एहवो, एम चिते गतशोक ॥ ५॥ ए कोई थएवाहक, जाये एम यवहील ॥ को तस वोलावे नहीं, ते पण चाल्यो सलील ॥ ६ ॥ निजमदिर याव्यो वही, हरख्यां मासी मात ॥ वत्स जोवरावी वाटडी, एम केम मोरा जात ॥ वात कही कचुक विना, नारो मूकी घरमांहि ॥ खम एफ मासीकरे, दीधो तिण उत्साहि ॥ ७ ॥ तस यनुमतथी वेचीयो, गाधीयापण तेह ।। इव्य थाणीने थापीयु, वत्स हाय ससनेद ॥ ए॥ ॥ ढाल सत्तरमी॥ ॥ मुरली सानलवा जश्ये ॥ ए देशी ॥ वत्स कहे मुणो माडली, ए धन व्यो तुमें सार ॥ न कीजें चाकरी ॥ ए नीठे वली अवरना, करजो वाम विचार ॥ न कीजें चाकरी ॥१॥ नाडु थापजो शेग्ने,मत रहेजो था धीन ॥न की॥ हु तो स्वेचायें कीडगु,नयरमां श्राखो दिन्न ॥न॥२॥ घेर थाविश सूवा कारणे, म करशो फिकर लगार ॥ सलूणी मातजी ॥ शी चिता तुमने दवे, याव्यो यापद पार ॥ स ॥३॥ एम कहीने आवीयो, राजकुवरनी पास ॥ सखूणा साहिवा ॥ ते कदे काले कहो किश्यु, नाव्या थम यावास ॥ ससूणा साहिवा ॥ ॥ ते कहे मुळ शरीरमा, काश्क हूती श्राधि ॥ स ॥ तेणें तुम पासें नावीयो, याज टली थसमाधि ॥ स ॥ ५ ॥ कहे पातक वत्स ताहरु, कुण स्थानक मुने दाख ॥ स ॥ कवण जनक माता दुवा, मुफ नेद म राख ॥ स० ॥ ६ ॥ कुवर कहे सुणो तातजी, हमणा म पूढशो वात ॥ स ॥ प्रस्तावें सवि मादरो, नाखीश दु अवदात ॥ स० ॥ ॥ नाव जाणीने तेदनो, ताणी न बघु तास ॥ स ॥ कुवर ते थापे तेहने, वसन ने नोजन खास ॥ स ॥ ७ ॥ पुण्यदशा जागी नली, मान लहे सवि वाम ॥ स० ॥ पर पण पोताना थया, थहो थदो पुण्यनां काम ॥ सप ॥ ५ ॥ एक दिवस पाठकवरु, लेइ सवि बात्र सघात ॥ स० ॥ वत्सरा जा थावीयो, नूप समीप विख्यात ॥ स० ॥ १० ॥ करी प्रणिपात यथो चितें, वेगे तेह कुमार ॥ स० ॥ वत्सराज दीठो तदा, देवकुमर अवता + श्य जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. चाली खेचरी रे, नयरमा सुणवा साद रे उजाणी ॥ कर्मयोगें जिहां धारिणी चे राणी ॥ २६ ॥ सुत विरहे रोवे घणु रे, पारिती विमला दोय रे राणी ॥ निश्डी हराम दुर 5 खडे नराणी ॥ १४ वीरसेन नृपवशना रे,साहसिया शिरदार रे जाया॥कोण कष्ट पर्यु हुने मेखि केम माया ॥ २७ ॥ राज्य तजीने नीसखा रे, देशातर परगेह रे वासें । एह सवे थावस्या थमें तादरेजरोंसे ॥२५॥ वत्स इधणने मोकल्यो रे,बरें पापीणीय थान रे जोरे ॥ मन धस्यु 5 ख थमें नेहो रे तोरे ।। ३० ॥ नाम सुणी वत्सराजनु रे, खेचरी यावी दोय रे पानी॥ देव कुलें मातरूपें एम बोले थाठी ॥ ३१ ॥ दा वत्स जोता तु मल्यो रे, खोल्युं सारं शहेर रे नाई॥मुखड देखाड थावी थम्हने उजाई ॥ ३ ॥ वत्स विमासे चित्तमारे,न घटे थापी वेल रे माडी ॥ किम थावे वेडमांही थावही उजाडी ॥ ३३ ॥ मुफ माडी मासी नोहे रे, ए सदी मायारूप रे जाण ॥ वोलता में एदनी रे विक्रिया पिणी ॥ ३४ ॥ धैर्य धरी बोले नहीं रे, गु करे एद कगाल रे पाडी ॥वाज थावी श्राफ रडी जायशे रे त्राडी ॥ ३५ ॥ थाण न लोपाई यदनी रे, बोली बोलीने ताम रे थाकी ॥ कथन रघु नहि कदेण्नु रे वाकी ॥ ३६ ॥ रवि कग्यो रजनी गई रे, खेचरी गइ निज नाम रे रो ॥ जुन एम नाश्यो कर्म गति को ॥ ३७ ॥ एम सबध थावी मले रे, शुननो उदय होवे जाम रे जोतें ॥ सादसिक नर वरे लाल एम पोतें ॥ ३ ॥ यत ॥ दोहो । सादसिया सही मिले, नदु कायर पुरिसेद ॥ कानें कुमल रयणमय, थांखे श्रजनरेद ॥ १ ॥ श्लोक ॥ उद्यम सादस धैर्य, बलबुद्धिपरा क्रमम् ॥ पढेते यस्य विद्यते, तस्माद्देवोपि शकते ॥२॥ पूर्वढाल ॥ पंचम खमें शोलमी रे, ढाल कही सुखकार रे राची ॥ वात कदे श्री जिन धनर थजी साची ॥ ३५ ॥ सर्वगाथा ॥ ५२७ ॥ श्लोक तथा गाथा ॥ २७ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ ययुं प्रनात रवि प्रगटियो, विवर कुचिकामध्य ॥ सूर्य रुचि नेदी तवा, कुमर लदी तब सधि ॥१॥ देवमदिरथी नीससो, ते कूसिक ले ॥ श्रीखम तरुकोटर विचें, मूके या करे ॥ २॥ कावड लइ धरी, काष्ठ स्वम लेइ दाथ ॥ निजपुरजणी मतावलो, चामो जिम मृग ने श्री शातिनायनो रास खंम पांचमो. श्यप सदु कहे, यहो थहो जु माहाराज ॥ स ॥ १५ ॥ राजमहोल उपर रही, कमलश्री सुणी ताम ॥ स ॥ मासी वत्स कुमारनी, चांति पड़ी कहे याम ॥ स ॥ २७ ॥ हे वत्स विमला धारिणी, शहा थाव्या साच ॥ स० ॥ स्वामिनी थावी रह्या इहां, कहे मुणि कतने वाच ॥ स० ॥ २१ ॥ वालेसर महारी वडी, दोय बहेन गुणवत ॥ स ॥ मलवा जाउ तेहने,हुकम करो मुझ कत ॥ स० ॥ २२ ॥ हर्पच्छ हुकम कियो नृपें,तेने जर तेडी लावो ॥ सलूणी सुदरी ॥ बहेन सगी मानी जणी,नाग्य मिल्यो ए वनाव ॥ स० ॥ २३ ॥ वालेसर ण शहेरमा, दोहिला एटला दीह ॥ स० ॥ बाना रह्या जाण्या नहीं, कहेवाये किम 5 ख जीह ॥ स० ॥ २४ ॥ राणी चढी वर हायणी, सायें वड परिवार ॥ स०॥ थावी उत्र धरावती,शेत तणे दरवार ॥स॥२५॥ सघ्रममा पध्यो शेतजी, करे उपचार थनेक || स० ॥ पचम खमें सतरमी, ढाल सुणे मुवि वेक ॥ स ॥ २६ ॥ सर्वगाथा ॥५४॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥२॥ ॥ दोहा ।। ॥ हल फल मामे शेवजी,नक्तियुक्त बदु नाव ॥ राणी थाव्या मुक घरे, सवलो नाग्य वनाव ॥ १ ॥ वत्सराज थागल जप, तुरत वधाई दीध ॥ मासी थाव्या बापण घरे,वानित कारज सीध ॥२॥ ए नयरीनो राजीयो, वहनेवी तुम तास ॥ राणी तुम वहेनी मिलण, थाव्या ए वनास ॥ ३ ॥ जाणु बु वत्स ए सही, लाजें एता दीस ॥ निज यातम गोपवी रह्या, एहनी सवल जगीश ॥ ४ ॥ मदिरहूती नीसरी, महेला चीवर थग ॥ थनुसारें तस उलखी, पालटियो तस रग ॥ ५ ॥ ॥ ढाल थढारमी॥ ॥ सरोवरीयानी पाल, जडाको लाग्यो नयां ॥ ए देशी ॥ दाथणी इती उतरी रे,कठे वलगी धाय ॥ कमलश्री रोती कहे रे, कांश ए मु मोरी माय ॥ १ ॥ सुणो सुणो बहेनी रे वयणा ॥ का वोले गदगद कन, नराइ थाव्या रे नयणा ॥ काई मलीया नाग्य सयोग, थावीने थमने रे सयणां ॥ ए थाकणी ॥ वदेनी वही तुम हो मादरी रे, निजमाताने ताम ॥ एम थवस्था केम दुई, कांई कोण कर्मनां काम ॥ सु० ॥२॥ थथवा उ ख न कीजीयें रे, सद्ध बोले एम न्याय ॥ थापद होवे सतने रे, २५४ जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. र ॥स०॥११॥ मन रीज्यो राजा घणु,देखी तास दीवार सबसे तक कुरा वाल ए, रूप कसा नमार ॥ स० ॥ १२ ॥ राजन नदि मुफ वशविज्ञान ॥ स० ॥ पण विज्ञाने एहनु, नूमि नहिं उपमान स० ॥ १३ ॥ धन जननी जेणे उर धखो, धन्य पिता कुन्त वश || स... सकल कलाकुशली घणु, नरमांहे श्रवतस ॥ सा ॥ १४ ॥ शान बरे राजा तिहा, कहो निज ज्ञान विचार ॥ स० ॥ कुवर कसाना सागरु, व्या मति थनुसार ॥ स० ॥१५॥ यत ॥ एकेन पृष्ठ ॥ दोहो ॥ कामिनी दो यदरतणी, कामणगारी जाण ॥ जेदयकी सवि उलखे, अश नेद विन्नाण ॥१॥ वत्सेनोक्त ॥ कीकी ॥ यपरेण पृष्ठ ॥ कुण मुखममण नारीनु, कुण जग जीवाडत ॥ कुण शोलम शृगारमा, एकण श हुत ॥ ॥ वत्सेनोक्त ॥ तिलक ॥ अन्येन एट ॥ उप्पय ॥ त्रिदुथदरनु नाम, पढम थक्षर सुनिपेधे ॥ बीजो खे- जोय, वर्ण त्रीजो त्रिदु मध्ये ॥ पर विगु थकर पूर्व, सवल नारीखम कहिये, वीजु पद दोय वर्ण, तास गुण पार न लदियें ॥ एम बिलु पद त्रिनु थकरें, मती नाम जे नीपजे ॥ ते ते पुदवीतलें, तो सकल मनोरथ सपजे ॥ ३ ॥ वत्सेनोक्त ॥ महीश ।। थपरेण पृष्ठ॥ दोहो॥ निज वोले पहेलो शब्द,बीजोवोले नाश ॥ए बिटु समें नीपजे,ते राखीजें पास ॥ ॥ वत्सनोक्त ॥ स्वन ॥ वत्सेन पृष्ठ ॥ चोपाई ।। पढमरकर विष्णु कामिनी वदालो, मध्यमाक्षर विषु राख निहालो । अत्यावर विषु सरिखं नाम, त्रिद थकने करु प्रणाम ॥५॥ नृपेणोक्त ॥ नूपतिरिति ॥ पूर्वढान ॥ श्रवर विशेषे नरकला, देखाडे नृपनद ॥ स ॥ वत्स सवाई तेहथी,नूप सह्यो थानद स॥१॥ हर्षित थ राजा कहे, वत्स कहो तुफ वश ॥स०॥ दाया मोती नवि सहे, अर्थ वली परशस ॥स॥१७॥ वस्स विचारे चित्तमा,अवसर मलियो थाजसथवसर जो इने जे कहे, तेदनी वाघे लाज ॥ स० ॥१॥ यत ॥ बप्पय ॥ गइ नमि सपजे,गइ संपचि फिर श्रावे॥जड शूकी पनवे,थवधि फरि फरि फल पावे॥ विसरी विद्या विकट, सोय पढकें फिर लीजें ॥ जो कलु कीयो अधर्म, सो फिरके धर्म कीजें ॥ जीव मरी फरि अवतरे, जीवे जिहां जस गा ये ॥ कवि गग कहे रे गुणियलो, पण अवसर कबहू न पायें ॥ ६ ॥ वात कही निज मूलथी, मामीने वत्सराज ॥ स ॥ कर्मकथा मुणी " , ठे, श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो २५७ चार ॥रामविजय कहे वत्सना रे,कांशपुण्यतणो नहिं पार॥सु॥१॥६०५॥ ॥ दोहा ॥ विनयवत ऊनो रह्यो, सेवकपरें वत्सराज ॥ मध्यरात्रि वोली जिस्य, तव जाग्यो नरराज ॥ १ ॥ श्रवणे निमुण्यु 5 खनु, कामिनीरुदन अपार ॥ मन चिते महाराजजी, दोशे कवण प्रकार ॥ २॥ वोलाव्या यामिक नणी, नरपति कचे साद ॥ पण कोई वोल्या नहि, ऊघ्या निद प्रमाद ॥ ॥३॥ वत्सराज वोल्यो तदा, यो कारिज यादेश ॥ नृप कहे हजी वेगे केम न गयो गृहदेश ॥ ४॥ विण दुकमें जाक नहि, नृप कहे जा निजधाम ॥ प्रेप्यपणु न घटे तुने, कहिश ए थवरने काम ॥ ५ ॥ वत्स कहे महाराजजी, फरमावो मुफ थाज ॥ शिर जोरे करच्छ सही, नहीं हां मुफ लाज ॥ ६ ॥ ॥ ढाल जंगणीशमी॥ ॥ कहे सखि पीयुडे गु कस्यु ॥ सहि मोरी रे ॥ ए देशी ॥ कहे नृप सुण वत्स माहरा ॥ गुण धोरी रे ॥ पलकमाहे मुफ थाज ॥ लीधु चित्त चोरी रे ॥ तुम विण कुण रयणी समे ॥ गुण धोरी रे ॥ पडिवले पुष्कर कान ॥ लीधु० ॥१॥ वत्स जा कतावला ॥ गुण ॥ कोण रोवे ए नारि ॥ ली ॥ दुकम प्रमाण करी चल्यो ॥ गुण ॥ साहसिक शिरदार ॥ ली॥ २ ॥ शदतणा अनुसारथी ॥ गु० ॥ करी उनघन वप्र ॥ जी० ॥ गयो स्मशाननी नूमिका ॥ गु० ॥ सत्त्व सघातें क्षिप्र ॥ ली ॥ ॥३॥ एक प्रदेशे सीमतिनी ॥ गु० ॥ वसनानरण विशेष ॥ ली० ॥ शोने ते सुकुमारिका ॥ गु०॥ दीती सुदर वेश ॥ ली ॥ ४ ॥ पण रोती अतिदी घणु ॥ गु० ॥ पूजे जश्ने कुमार ॥ ली० ॥ बहेन रोवे किण कारणें ॥ गु० ॥ कहे मुफ बुख विचार ॥ ली ॥ ५ ॥ चाव्यो जा परदे शीया ॥ गु० ॥ यं तु पठण काज ॥ ली. ॥ शक्ति विना उपकारने ॥ गु० ॥ श्छे मूर्खशिरताज ॥जी॥ ६ ॥ वत्स कहे तु 5 खिणी ॥3॥ में मूकी न जाय ॥ ली ॥ परसु खें दुखीया कह्या ॥ गुण ॥ सऊन जन जगमाय ॥ ली ॥ ॥ सा कथयति ॥ यस्य कस्याप्यो उख न कथ्यते ॥ यक्त ॥ जो नवि उरक पत्तो, जो नवि उरकस्स निग्गह सम गे॥ जो नवि उहिए उदित, ता किस कहिल्कए उस्क ॥ १ ॥ वत्स २५६ जैनकथा रनकोप नाग पाठमो. कांश सपद वली तेम थाय ॥ सु० ॥३॥ पण यावी तुमेन रहिया गोपवी थाप ॥ ते जेम जेम मुझनें सांगरे रे, कोइ तेमतेम होवे सताप ॥ सु० ॥ ४ ॥ थावे व्यसन एह देवथा रे, नहिं हो तो लाज ॥ न लह्या नयरीमा रह्या रे, काश् ए में की थकाज ॥ सु.. ५ ॥ हा परघरनी चाकरी रे, तुमें कीधी निधार ॥ गाल सबल सिर माहरे रे, काश् वेवी ए जमवार ॥ सु० ॥६॥ जेम जेम तुम्ह 5 स्व सामो रे, तेम तेम हृदय नराय ॥ पण सद् ए वश कर्मने रे,काश् थापणु कोई न थाय ॥ सु० ॥ ७ ॥ किं वदुना हवे हायणी रे, वहेनी बेसो आदि । फर जोडी करे विनति रे,काश् शेव सोमदत सनाव ॥॥॥ में अविनय कीधो घणो रे, दीन कराव्यु काम ॥ ते खमजो मुफ स्वामिनी रे, ई तुमारे नाम ॥ सु० ॥ ए ॥ ते कहे वाक नहि किस्यो रे, तुमचो इहाकणे शेव ॥ केडे लाग्युं पापीयु रे, काश् पेट करावे वेत ॥ सु० ॥१०॥ सहेरमा फरतां यम्ह नणी रे, दीधो तुमें थाश्रम ॥ दोहिला दिन वोलावीया रे, काश् दियु अमें याशिप तुम ॥सु॥११॥ थहित थयु होय थम्हषी रे, ते खमजो अपराध ॥ तुम्हें गिरुथा गुणवत हो रे,काश् तपगारी वली साप ॥ सु०॥ १२ ॥ खमी खमावी एणी परें रे, थावे नृप थावास ॥ बिडु बनी वत्सराजा रे, कां थानद थधिक उल्लास ॥ १० ॥ १२ ॥ नृप उतरवा थापीयु रे, मदिर सुदर एक ॥ सामग्री सयुत करी रे, कार राख्यो सबल विवेक ॥ सु० ॥ १४ ॥ सुखें रदेतां वत्सने रे, कहे नृप शी तुफ चाद ॥ जे मागे ते तुऊने रे,कांश थापु धरि उत्साह ॥सु॥१५॥ ते कदे मुफने तादरी रे, सेवानो डे कोड ॥ रात दिवस तुम रे, कोई रहेश वे कर जोडि ॥ सु० ॥१६॥ सध्यासमय मुझने रे,मोकलजो मुफ गेह ॥ एम कदीने करे चाकरी रे,कांश दियडे धरि बढ़ नेह ॥ सु० ॥ १७॥ मान घणु महिपति तणु रे, माने सघनां लोक ॥ कमलश्री पण नित्यप्रतें रे,कांद खबर लीये तजी शोक ॥ सु० ॥ १७॥ एक दिवस मदिपाल जी रे, विण मोकले वत्सराज ॥ सूतो वासघरे जा रे, कांइ सुस्वमा नर शिरताज ॥ सु० ॥ १५ ॥ यामिक बिहु विशें बाविने रे, रहिया तिहां दुशीयार ॥ खड्ग ग्रही वत्सराजजी रे, पण रहियो घरने बार ॥ सु ॥ ५० ॥ पंचम खमें अढारमी रे, ढाल पक्ष सुवि बागखें , , श्री शातिनाथनो रास खंम पांचमो श्य चार॥रामविजय कहे वत्सना रे, कांइपुण्यतणो नहि पार॥सु॥२१॥६०५॥ ॥ दोहा॥ विनयवत कनो रह्यो, सेवकपरें वत्सराज ॥ मध्यरात्रि वोली जिस्य, तब जाग्यो नरराज ॥ १ ॥ श्रवणें निमुप्यु उखनु, कामिनीरुदन थपार ॥ मन चिते महाराजजी, होशे कवण प्रकार ॥ ॥ बोलाव्या यामिक नएी, नरपति कचे साद ॥ पण कोई वोल्या नहि, घ्या निद प्रमाद ॥ ॥ ३ ॥ वत्सराज वोल्यो तदा, द्यो कारिज यादेश ॥ नृप कहे हजी वेगे थडे, केम न गयो गृहदेश ॥४॥ विण दुकमें जाऊं नहिं, नृप कहे जा निजधाम ॥ प्रेप्यपणु न घटे तुने, कहिश ए थवरने काम ॥ ५ ॥ वत्स कहे महाराजजी, फरमावो मुफ थाज ॥ शिर जोरें कर सही, नहीं रहा मुफ लाज ॥ ६ ॥ ॥ ढाल गणीशमी॥ ॥ कहे सखि पीयुडे शु कयुं ॥ सहि मोरी रे ॥ ए देशी ॥ कहे नृप सुण वत्स मादरा ॥ गुण धोरी रे ॥ पलकमांहे मुफ थाज ॥ लीधुं चित्त चोरी रे ॥ तुफ विणकुण रयणी समे ॥ गुण धोरी रे ॥ पडिव पुष्कर कान ॥ लीधु० ॥ १ ॥ वत्स जा मतावला ॥ गुण ॥ कोण रोवे ए नारि ॥ ली ॥ दुकम प्रमाण करी चल्यो ॥ गुण ॥ साहतिक शिरदार ॥ ली० ॥२॥ शब्दतणा अनुसारथी ॥ गु० ॥ करी उन्नघन वप्र ॥ ली० ॥ गयो स्मशाननी नूमिका ॥ गु० ॥ सत्त्व संघातें दिन ॥ ली० ॥ ॥३॥ एक प्रदेशे सीमतिनी ॥ गु० ॥ वसनाचरण विशेप ॥ ली ॥ शोने ते सुकुमारिका ॥ गु० ॥ दीठी सुदर वेश ॥ ली ॥ ४ ॥ पण रोती थतिही घणु ॥ गु० ॥ पूजे जश्ने कुमार ॥ ली॥ बहेन रोवे किण कारणें ॥ गु० ॥ कहे मुफ बुख विचार ॥ ली ॥ ५ ॥ चाल्यो जा परदे शीया ॥ गु० ॥ शु तुफ पूजण काज ॥ ली० ॥ शक्ति विना उपकारने ॥ गु० ॥ श्छे मूर्ख शिरताज ॥जी॥ ६ ॥ वत्स कहे तु 5 खिणी ॥गु॥ में मूकी न जवाय ।। ली० ॥ पर खें 5 खीया कह्या ॥ गु० ॥ सऊन जन जगमाय ॥जी॥ ॥ सा कथयति ॥ यस्य कस्याप्यये दुख न कथ्यते ॥ यमुक्तं ॥ जो नवि उरक पत्तो, जो नवि सुरकस्स निग्गद सम हो ॥ जो नवि मुहिए उहि, ता किस कदिलाए उरकं ॥ ॥ वत्स . श्यन जैनकथा रनकोप नाग आग्मो. राजेनोक्त ॥ नरेशृणु ॥ अदमवि 5 रक पत्तो, अहमविकारत समो॥थहमवि उहिए उहि, तायम्ह कहिए उस्क ॥२॥ सा कहे सऊन ते जुवा ॥ गु० ॥ तु कोण गणतीमाहे ॥ ली। सुगध घणो दुवे ॥ गु० ॥ पण तेलने शो गुण थाय ॥ ली ॥ मुफ तु नवि लेखवे ॥गु०॥ श्यो थवगुण तें दीठ ॥ली॥ते कहेपाल वेशमां गुण॥ गु तुमथी होवे च ॥जी॥ ए ॥ कहे वत्स शुं न रणेना ॥ गु० ॥ तम कंगतो सूर ॥जी॥ नहानो पण दरिनो शिव ॥ .. नाजे मातंगपूर ॥ली० ॥ १०॥ गु चितामणि नानहो । गुरु करे दारिद दूर ॥ ली ॥ दीपक दीसे वासु ॥ गु० ॥ पण करे तन चकचूर ॥ली० ॥ ११ ॥ एम नहानामा गुण घणा ॥ गु० तेम मुझने पण जाण ॥ ली० ॥ बोली हसीने नामिनी ॥ गु०॥ सांजस चतुर सुजाण ॥ ली० ॥ १५॥ ए नयरीमाहे वसे ॥ गु० ॥ मुज पितु पुरुप रतन ॥ ली० ॥ विण थपराधे नरेश्वर ॥ गु० ॥ शूलीये विर्यु ए तन्न ॥ ली० ॥ १३ ॥ से थावी घृतपूरने ॥ गु० ॥ पियुमूख क्षेपत कान ॥ ली० ॥ दाथ न पदोंचे माहरो ॥ गु०॥ रो तिण कारण बाव ॥ जी० ॥ १४ ॥ कदे वत्स सतशिरोमणि ॥ गु०॥ चढ मुज कपर खध ॥ जी० ॥ पूर समिदित ताहरु ॥ गु० ॥ मुफ उपकारनी सधि ॥ ॥ली० ॥ १५॥ वाली कठोटो कपरें ॥ गु० ॥ उंची चढी विकराल ॥ती० ॥ दे थामिषपिंमने ॥ गु० ॥ दाथ लई ते पाति ॥ली० ॥ ॥ १६ ॥ कवं विलोके वत्सजी ॥ गु०॥ दीतु कुचेष्टित तास ॥ ली० ॥ खड्ग खेंची कहे रंभिके ॥ गु० ॥ किदां जाइश दवे नाशि ॥ ली॥ १७ ॥ ज्ची उमंतां जेदना ॥ गुण ॥ परिधान चीवर हाथ ॥ ती० ॥ रहिर्या ते नाशी गइ ॥ गु०॥ पापिणी जेम थनाथ ॥ ली०॥ १७ ॥ घनरथ जिनने एदवे ॥ गु० ॥ पूजे प्राणी कोय ॥जी॥ जगवत कुण ए कामिनी ॥3॥ कर्म करे गुण खोय ॥जी० ॥ १ए ॥ कहे प्रष्ट देवी उष्ट ते ॥ गु०॥ नर बलवाने थधर्म ॥ ती० ॥ करे थहोनिश शके नहि ॥ गु०॥ कर ती एदवां कर्म ॥ली ॥ २० ॥ कहे प्रतु नक्षण नवि करे ॥ गु० ॥ मांस एद सुर जात ॥जी॥ पण क्रीडा ए तेहोनी ॥ गु०॥ जाणे नर सादात ॥ ली० ॥ ३१ ॥ वत्सराज ले वस्त्र ते ॥०॥ भाष्यो श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो. श्एए निज श्रावास ॥ली० ॥ शयन कस्युं सुखियो थयो ॥ गु० ॥ थानंद लील विलास ली ॥ २ ॥ पचम खमें उंगणीशमी ॥ गु० ॥ ढाल कही ससनेह ॥ ली ॥ रामविजय कहे रग ॥ गुण ॥ वत्स जयो गुणगेद ॥ ली ॥ २३ ॥ सर्वगाथा ॥६३५॥ श्लोक तथा गाथा ॥२॥ ॥ दोहा ॥ ॥ वस्त्र लेई ते थावीयो, नृपपासें परमात ॥ करि प्रणाम कनो रह्यो, कुवर कुलविख्यात ॥१॥ नृप आगल सवि रातनो, नांख्यो तेणे विरतंत ॥ वात मुणी विस्मय लह्यो, मासो ते चूकत ॥ ५ ॥ वसन तेह देवीतj, थाप्युं नरपति हाथ ॥ रयणजडित देखी करी, हरख्यो ते नूनाथ ॥ ३ ॥ राणीने ते सोंपीयु, हरखी मन थत्यत ॥ पहेषु पण कचुक विना, शोना ते न लहत ॥ ४ ॥ राणी कहे प्रीतम नणी, ए सरिखो कूर्पास ॥ थाणी थापो मुझने, प्राणेश्वर सुविलास ॥ ५ ॥ राय कहे वत्सराजने, पहेरण वस्त्र समान ॥ जो कचुक थाणी दीये, तो दुवे दर्प थमान ॥ ६ ॥ वचन प्रमाण कयु तदा, जर वन चदनवृद्ध ॥ कोटरथी खेचरी तणु, थाणी थापे वद ॥ ४ ॥ पहेरी सा परसन थर, मासी दें थाशीप ॥ वत्सराज चिरजीव तु, पूरी मनह जगीश ॥ ७ ॥ ॥ ढाल वीशमी॥ ॥ नमो रे नमो श्री शत्रुजय गिरिवर ॥ ए देशी ॥ लानें लोन घणे रो वाघे, तृमा नवि बोलाय रे ॥ जेम जेम पूरणने धन सींचे, तेम तेम बहुली थाय रे ॥ १ ॥ लानें ॥ ए थांकणी ॥ ते वेद चीवरने थप सरिखु, निज उत्तरीय निहालि रे ॥ कमलश्री करे मन हे थारति, कर देई निज लाल रे ॥ ला० ॥ २ ॥ श्रारति धरती नृपत्ति निहाली, पूर्दा थावी ताम रे ॥ श्याममुखी केम दीसे कामिनी, श्यो तुम मनमाहे काम रे ॥ ला ॥ ३ ॥ सुणो वालम कहेता हूँ लाजु, कहे नृप शी मुफ लाज रे ॥ सुण सुदरी ते लाज न कीजें, जेदथी विणसे काज रे ॥ला ॥ ४ ॥ राणी कहे उत्तरीय मले जो,ए सरिखु अवनीश रे ॥ तो मुफ मन सतोप लहे एम, कहे नामी निज शीश रे ॥ ला ॥ ५ ॥ नूपति चिते लोन तणो ए, योन न दीसे कोय रे ॥ कामिनी जातें थवगुण प्राये, जगमा बगुलो दोय रे ॥ सा ॥६॥ यत ॥ थऋतं साहस माया, जैनकथा रत्नकोप नाग थाठमो. मूर्खलमतिलोनता ॥ यशोच निर्दयत्व च, स्त्रीणा दोषा सनावमा पूर्वढाल ॥ कहे राजन तुम सम नहि कोइ, यविवेकीय अविचारी। व्यर्थ मनोरथ वस्तु यसत्ता, ए मति नहि तुज सारी रे ॥ ला.. कहे राणी प्रीतम ए साचु, पण मुज थाणी थापो रे ॥ प्राचीन मनोवहित पूरण, तुम ऊपर थम दापो रे ॥ साv || G॥ जोबन लेई रही राणी, नृप मन चिता महोटी रे ॥ कोपमदिरमा पेठी कामिनी, लोननी जाति ए खोटी रे ॥ ला ॥ ए ॥ मूरख वाल बने पनितानो, दन सवलो जग होवे रे ॥ घरनी चिता चित्त न थाणे, निज सुख साहा मु जोवे रे ॥ ला० ॥ १० ॥ कहे राजा वत्सराजने तेडी, साहसिया, रदार रे ॥ दिव्य वसन थापीने मुझने, थनरथ कीध विचार रे ॥ता. ॥ ११ ॥ ए तुझ मासी लोनें प्यासी, नदि सतोप लगार रे ॥ उढणी का न लियो इन सवलो, नहिं को पूरणहार रे ॥ ला ॥ १५ ॥ कहेण न माने मानिनी माहरु, लोनयी लक्षण नागा रे ॥ सात न पूराये ए नीति ना, वयण न दीसे माग रे ॥ ला० ॥ १३॥ यत ॥ निर्विप्रोपमो राजा, समुह उदर गृहम् ॥ सप्तैतानि न पूर्यते, याचति च दिने दिने ॥५॥ ॥ पूर्वढाल ॥ वत्स विचारी कहे सुणो खामी, पूरवी मासी आशा रे ॥ पटमासान्यतर जो न पूरु, तो करु थमि प्रवेशा रेला ॥ १४ ॥ कहे राजन वत्स एम न कीजें, याकरी एद प्रतिज्ञा रे ॥ न कलाये विधि विविध कलाइ, नियति न बोले विज्ञा रे ॥ ला० ॥ १५ ॥ ते कहे तुम प्रसादें रुई, राजन् सघलु थाशे रे ॥ पण मुफने तुमें थापो थाणा, नावीनाव जणाशे रे ॥ ला० ॥ १६ ॥ ले नृपयाणा मदिर मांडे, जननी नमेवा याव्यो रे ॥ कर जोडी रहि थागाल छनो, सयल विचार मुपायो रे ॥ सा ॥ १७ ॥ मोहवशे माडी कहे तें वस्त, पुष्कर अगी कीयो रे ॥ वत्स कहे दवे वात ए न फरे, वयणे बोल जे दीपो रे ॥ ला० ॥ १७ ॥ कहे माही मासी मुण धगज, तु अम्द प्राणाधार रे ॥ केम परवेशनणी मूकाये, मारग विषम थपार रे ॥ ला ॥ १५ ॥ कहे वत्स सघलु रुडं था, यो धाशीप पसाय रे ॥ चिंता मत फरशो कोई मदारी, साथे पुण्य सस्वाय रे ॥ला ॥ २० ॥धीर वीर जाणी कहे जननी, दोजो तुम कल्याण रे ॥ वहेला काज करी वत्स वलजो, मुख श्री शातिनाथनो रास खंम पांचमो. २६१ अम जीवन प्राण रे ॥ ला० ॥ २१ ॥ मायडी तिलक कयुं कुकुमर्नु, दीधु श्रीफल सार रे ॥ दधिनोजन करिने सिदि कीधी, श्री वत्सराज कुमार रे ॥ ला ॥ २२ ॥ काश्क सवल लेई साथे, पग पालो ते चा व्यो रे ॥ खड्ग खेटक सयुत दक्षिण दिशि, हीमे दर्प माल्यो रे ॥ ला ॥ २३ ॥ नव नव नाति विनोदने जोतो, फरतो वह पुर ग्रामें रे ॥थाग ल एक घटवी तिहा यावी, नहिं मानवनु नाम रे ॥ ला ॥ २४ ॥ तिहां जाता प्राकारविराजित, लघुपत्तन एक दातु रे ॥ देखी विजन वत्सराज विमासे, ए का कौतुक मीतु रे ॥ ला ॥ २५ ॥ पंचम खमें ढाल वीशमी, राममुनि एम जाखे रे ॥ धन्य एहवे गमें जे तिलनर, जय मनमां नवि राखे रे ॥ ला ॥२६॥ सर्वगाथा ॥६६॥ श्लोक ३१ ॥ दोहा॥ ॥ नूत प्रेत राक्स तणु, दीसे पुर को एह॥अथवा ए चिता किसी, जइ जोन ससनेह ॥ १ ॥ नयरमांहिं जोवे जश, महोटु मदिर एक ॥ लघु वीजां तस पाखती, निरखे ते सुविवेक ॥ २॥ सनामांहि वेठो तिहां, दी गे पुरुप प्रधान ॥ तस परिवारने पूजीयुं, ए कोण मुगुण निधान ॥३॥ कुण नामें दीसे नगर, कुण स्वामी ए पास ॥ नर बोले ए नहिं नगर, नहि नरपतिनो वास ॥ ॥ पण हाथी नहिं ठुकढुं,नहिं वेगलु सार ॥ नूति सकानिध पुर थने, नूरमणी उर हार ॥ ५ ॥ वैरसिह नामें जलो, वैरी गज पचास्य ॥ रूपवती राणी तणो, प्रीतम लील विलास ॥ ६ ॥ तिण पुरमा रगें रहे, दत्त नामें एक शेठ ॥ दोलतने दोरें करी, सद्वये जेदथी हेन ॥ ७ ॥ श्रीदेवी नामें निपुण, नारी निरुपम रूप ॥ रति दासी कीधी जेणे, मोदन वेली थनूप ॥ ७ ॥ तेदनी कूखे उपनी, तनया थति सुवि नीत ॥ श्रीवचा नामें जली, मात पिताने चित ॥ ए ॥ ॥ ढाल एकवीशमी॥ ॥ महाविदेद क्षेत्र सोदामणु ॥ ए देशी ॥ जर यौवन थावी नली, वाला तन सुकुमाल लाल रे॥रूप कला गुण शोनती,चाले गजगति चाल ॥ लाल ॥१॥ जुवो विपम गति कर्मनी ॥ ए थांकणी ॥ कोणें कली न जाय ॥ ला ॥ कर्मवशे सदु जीवडा, लदे सुख उख समुदाय ॥ ला० ॥ जुवो० ॥ ३ ॥ श्रीदत्ता दुर कर्मथी, दोपाकात शरीर ॥ ला ॥

जैनकथा रनकोप जाग धाग्मो. जनक उपाय करे घणा, पण न टली तस पीर ॥ ला॥ मात पिता उखीया थयां, चिते मनमाहे एम ॥ ला ॥ दीर ए रयणनो, कहो हवे कीजे ए केम ॥ ला० ॥ ॥४॥पत ॥ी लाउनता हिम हिमगिरी कार जल सागरे, रुक्षाश्वदनपादपा विपपरेरको रुहं कटके ॥ स्त्रीरनेषु जरा कुचेषु पतन विउत्सु दारिता, सर्व रमन श्वेण सहितं उर्वेधसा निर्मितम् ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ मूके नरने पार, कुमरी सेवा काज ॥ ला ॥ रातमाहे सही ते मरे, महोटुं एह थकान ॥ ला० ॥ ॥ ५ ॥ जो न रहे कोइ पाहरु, ते कन्यानी पास ला॥ तो ते रयणीमा दुवे, सात पुरुपनो नाश ॥ ला० । जु० ॥ ६ ॥ वात सुणी नरराजीये, तेडाव्यो ते दत्त ॥ ला ॥ तुझ कन्या कुसवपिणी, वात सुणी में मित्त ॥ ला० ॥ जु० ॥ ४ ॥ जा मूकी मुफ नपरने, कोइक थटवी मकार ॥ ता० ॥ तुज कन्यादोपे रखे, थाये बहुजन सहार ॥ ला० ॥ ॥ ७ ॥ थइ दिलगीर ते नीसखो, लेई निज परिवार ॥ ला ॥ थावी थटवीमा रह्यो, घर करी सप्राकार ॥ ला ॥ नु० ॥ ए ॥ सेवक राख्या यति घणा, देई बगुला दाम ॥ ला ॥ नाम लखी गोला नसा, करे चिही वधकाम ॥ ला ॥ ॥ १० ॥ ना, यावे जेदन, ते रहे चौकीदार ॥ ला ॥ करे कन्यानी चाकरी, पाये तस सहार ॥ ला ॥॥ ११ ॥ पण लोनें सडको पडे, सहने वहाला दाम ॥ ला ॥ दामयकी जगमां सही, पुष्कर पण करे काम ॥ ला० ॥ जु०॥ १२ ॥ यमुक्त ॥ यदुर्गामटवीमटति विकटं कामति देशांतर, गाईते गदन समुश्मतुलं क्लेशा कृषीं कुर्वते ॥ सेवते कृपण पति गजघटासंघ स्सचरं, सर्पति प्रधन धनांधितधियस्तरोनविस्फूर्जितम् ॥ २ ॥ पूर्वढाल ॥ ते नरमांदेथी सही, एकेको मरे नित्य ॥ ला॥ अवर कोइन रहे इहां, सबली वरते इति ॥ ला ॥ जु० ॥ १३ ॥ ते माटे वारुं तुने, पंथी म जा ण नाम ॥ला ॥ जिण' स्थानक नय उपजे, तिहां जश्ये शो ॥ला ॥ जु०॥ १४ ॥ वात सुणी वस्तराजजी, टपगारी शिरदार ॥ला ॥ धेर्य धरीने थावीयो, दत्त समी वार ॥ ला० ॥ नु० ॥ १५ ॥ मुत्तम नर जाणी करी, खेसासो थासन्न ॥ला० ॥ पान बीडां थागत धना, शेत थई सुप्रसन्न । ला॥ जु० ॥१६॥ मुख देखी काम

श्री शांतिनाथनो रास खंग पांचमो. २६३
रीज्यो घj, पूर्वीयुं कुण तुमें सत ॥ ला० ॥ परकासो थम थागलें, तुमें
महोटा माहत ॥ ला० ॥ जु० ॥ १४ ॥ वासी हुँ उणिनो, थाव्यो
कारण माट ॥ ला ॥ तुम दी थाजमाहरे, दूर गया उच्चाट ॥ला
॥जु ॥ १७ ॥ वात करे दत्त थागले, जेहवे ताम पुमान ॥ला एक
थाव्यो रतियामणो, सुंदररूप जुवान ला॥जु॥१॥ आवी उनो रह्यो
श्रागलें,मनमां घणु विवाय ॥लाणा शेठ नणी पूढे तदा, केम ए नर कुम
लाय ला॥जु॥२०॥ नाखी निशासो तव कहे, सुण शा पुरुप विचार
॥ ला ॥ कर्म कतिन थाव्या उदे, धिक् महारो जमवार ॥ ला ॥
जु० ॥ २१ ॥ गोपनीय पण तादरी, थागल कहूँ अवदात ॥ ला ॥
मुक तनयानी याकरी, कर्मकथानी वात ॥ ला ॥ जु० ॥ २२ ॥ रय
णीय यामिक जे रहे, थाकरो कोश्क दोप ॥ला ॥ रात समयमा ते
मरे, थान तणो ए पोप ॥ ला० ॥ जु० ॥ २३ ॥ थाज के वारक ए
हनो, तेणें जरवाणी काय ॥ला ॥ मरण समो नय को नहिं,
नाखे जिनराय ॥ ला ॥ ० ॥ २४ ॥ वात मुणी वत्सराज वोलियो,
पर उपकारने काज ॥ ला ॥ मुजहूती ए नगरे, तो लहु त्रिजुवनराज
॥ला ॥ ॥ २५ ॥ कहे वत्स मत वीहे मने, ताहरे साटे दु जा
॥ ला ॥ करिश कन्यानी सेवना, तु रहे थानंदमां ॥ ला ॥ go
॥ २६ ।। शेन कहे तु प्रादुणो, करवु घटे सन्मान ॥ ला ॥ तुमने देवा
ये नहिं, मरणतणु थपमान ॥ला ॥ ॥ २७ ॥ यत ॥ गुरुरमि
विजातीनां, वर्णानां ब्राह्मणोठरु ॥ पतिरेव गुरु स्त्रीणां, सर्वस्यान्यागतो
गुरु ॥३॥ पूर्वढाल ॥ वत्स कहे तात ए में सही, कीधु अंगीकार ॥
ला ॥ परउपगारी नरें सही,एम कयुं शास्त्र मकार ॥ला० ॥४
यत ॥कतोपचार सर्वोपि,करोस्युपरुतिं जन ।। विनोपचारं यस्त्राता,विपद
सोऽत्र सङ्कन ॥॥धन्यास्ते पशवोचून,मुपकुर्वति ये बचा ॥ परोपकारहीन
स्य,धिमनुष्यस्य जीवितम् ॥५॥ क्षेत्र रकृति चचा, गृह गतकोष्ठीस्थितान
कणान रक्षा॥ देतातण प्राणा,नरेण किं निरुपकारेण ॥॥ किं तेन सुत
जातेन, येनारमा उर्जर सदा ॥ समर्थोनोपकाराय,मातुर्जा तेन तेन किम्
॥ ॥पूर्वढाल ॥ पंचम खम एकवीशमी, धन एहवा गुणवत ॥ ला ॥
रामविजय कहे तेहने,नित्यती नमो सत ॥ला ॥ ॥२॥४०॥

। २६४ जैनकथा रत्नकोप नाग थाम्मो. ॥ दोहा ॥ ॥ हवे दत्त थाणा लही, उपर चूमि वरसराज ॥ कम्पा पासें पानी यो, साहसिक शिरताज ॥१॥ वत्स देखि चित्त चितवे, अहो रूपमा ए कोइक राजा तणो, दीसे कुवर पहुत्त ॥ २ ॥ ॥ ढालवावीशमी॥ ॥ चतुर चोमासु ण मुगरीये न जश्ये रे ॥ए वेशी॥ देवी कुंवर मन चिते सा वाली रे ॥ नारी नहि पण मारी दु नाली रे ॥ धिक् घिद रेत जने चामाली,मुज माथे महोटी ए गाली ॥ चतुर विचारी एहवा पातको न करीयें रे, पातकडां न करीयें,वहाला मनडां माहे मरीये रे ॥वि०॥१॥ ए नररयण तणी हत्यारी रे, का मुमने इण कुलें थवतारी रे ॥ पि. ॥ ॥ शा कलां कर्म कतिन में नूमा रे, के कसा कोश्यं वैर में कमा रे ॥ धि० ॥३॥ शाने धरी मुफ कुखें तें माडी रे, एदवी पर में तुमने लजाडी रे ॥ धिo ॥ ४ ॥ थर मावित्रने दु खदापी रे, शे काम थावी मुफ चतुराई रे ॥ धि० ॥ ५॥ पाम्यो मानव नव लेते न थायो रे, कमें ए मदोटो दोप लगायो रे ॥ धि० ॥ ६ ॥ हा हवे केम लूटीश ए पापो रे, राखो रे मुफने कोई माय वापो रे ॥ पि० ॥ ॥ ॥ एम चितवती हो थवला ते फुरे रे, नयरों वहे यासुराने में रे ॥ धिम् ॥ ७ ॥ याव्यो कुवर तव वेतो बीजी शय्या रे, कुमरी बोलावे तब मूकीने लला रे ॥ धि० ॥ ए ॥ दु थाव्यो थाज तुफ रखवालो रे, कुंवरी श्रीदत्ता मुफने उत्तर वालो रे ॥ धि० ॥ १० ॥ वात करे मनडामाद रीजी रे, वेढुनी नेदाणी काहिं देडानी मीजी रे ॥ धि० ॥ ११ ॥रीजाणी चिंते एम घाटें रे, एहने अगारुं मदारा जीवित साटें रे ॥ धि० ॥ १२ ॥ एम चितवतां दो ततण थावी रे,निदरडी वैरण जेम कुवरी घेरावी रे ॥ धिम् ॥ १३ ॥ उघी जाणीने वरत अधोनमि जाई रे, काष्ठ जेइ थाष्यो एफ बुद्धि सवाई रे ॥ धिम् ॥ १४ ॥ काष्ठ सुवालु पुरु प जेम दीसे रे, यही तरवार रह्यो एकण दिशे रे ॥ धिम् ॥ १५॥ दीप तणी बाया रह्यो बलीयो रे, धारिणीजायो नवि जाये कोनो बलियो रे ॥धि ॥ १६ ॥ एणे थवसरे वातायन विवरें, रे, मुख एक पेसंतु दी तब कुमरें रे ॥ धि० ॥ १७ ॥ था सचेतो कुमर तब रहीयो रे, वजतणी श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो २६५ परें कानो करी देयो रे ॥ धि॥ १७ ॥ तेणें मुखें वासघरने निहाली रे, पेतो पर्नु तिहां कर ततकाली रे ॥ वि० ॥ १५ ॥ मुश अलकत थलि मोहे रे, थोपधिवल्लीये ममित घणु सोहे रे ॥ वि० ॥ २० ॥ कथकी धूम पसलो थटारो रे, वासचुवनमाहे व्याप्यो थधारो रे ॥ धि० ॥ ॥ २१ ॥ कर फरसे जड़ यामिक सेजे रे, तव कुवरें दण्यो खङ्गे सुतेजें रे ॥धि ॥ २२ ॥ देवप्रनावें तस कर नवि पडियो रे, थोपधियुग पड्यो कुवरने जडियो रे ॥ धि ॥ २३ ॥ एक धूमोपधि तेहमांहे ताजी रे, वीजी व्रणसरोदणी साजी रे ॥ वि० ॥ २४ ॥ थ वेदना हाथ लीयो खची रे, देवी बोली हा हा मुझने वची रे ॥ धि० ॥ २५ ॥ कहे कुवर देवीने सुण दासी रे, हवे मुफ थानें किहां जाइश नासी रे ॥ धि० ॥ २६ ॥ खज उपाडीने कडे उजाणो रे, नाती देवी तस ताप न खमाणो रे ॥ वि० ॥ २७ ॥ पुण्यवलीया थागल कोण ममे रे, पुण्य प्रवल वैरी दल खमे रे ॥ धि ॥ २७ ॥ पालो वली याव्यो वत्सराजो रे,पुण्य पसा ये सवि सीधला काजो रे ॥ धिणा ए ॥ यावी वेठा जव कुवर सवाया रे,रयणी विदाणी तव वाहणला वायां रे ॥ धि ॥३०॥ पचम खवावी शमी ढा रे, नग्यो सूरज वत्स मुखड़े निहाले रे॥धि॥३१॥७३॥३॥ ॥ दोहा।। ॥ण थवसर ते कन्यका, जागी जूवे जाम ॥ थक्तांग दीगे कुवर, देहे दरखी ताम ॥ १ ॥ चितववा लागी चित्रे, ए कोई पुरुपरतन्न ॥स वल प्रनाव एदनो सहि, कुष्ठयकी न विपन्न ॥५॥अथवा जाग्यु नाग्य मुऊ, मलियो पुरुप प्रधान ॥ जो परण तो एहने, नहि तो विषयपच्चरका ण ॥ ३ ॥ एम चिती कहे सुदरी, व्यसनथकी केम थाज ॥ मूकाणा ते मुफ कहो, गिरुथा गरिवनिवाज ॥ ४ ॥ सयल वात मामी कही, नि सुणी हरखी वाल ॥ रोम रोम तन उनम्यु, मन विकस्सु ततकाल ॥ ५ ॥ ॥ ढाल त्रेवीशमी॥ ॥ लाबलदे मात मल्हार ॥ ए देशी ॥ वात करे वेड तेद, हर्ष धरी स सनेद ॥थाज हो ॥थावी रे जल लेश दासी कनी कने जी॥१॥ देखी थक्षत थग,पुरुप थयो मन रंग ॥था॥ दोडी रे श्रावी दत्तशेतनीयाग लें जी ॥ २ ॥ जय स्वामी मुफ थाज, थरज सुणो महाराज ॥ था० ॥

जैनकथा रनकोप नाग आठमो. लावी रे वधामणी नर कुशला तपी जी ॥३॥ हर्ष हैये न समाय, उग्यो शेव तव धाय या॥ थाव्यो रे ते पास नयणे निरखतो जी॥ श्रीदत्ता गुणवाणि, कनी जोडी पाणि ॥ था० ॥ थाप्पु रे गुन या सन जनकने वेसवा जी ॥ ५ ॥ कहे दत्त साहसधीर, सुण पुरुषोतम वीर ॥ या ॥ रातें रे व्यसनाधि कहो केम निस्तखो जी ॥ ६ ॥ सत्त तणो थाधार, मामी कहे सुविचार ॥याणा दरख्यो रे निसुणीने तेहनी वातडी जी ॥ ७ ॥ कहे दत्न सुण नरसिह, महिमावत श्रबीह ॥ श्रा। दीधी रे में पुत्री तुमने माहरी जी ॥ ७ ॥ नहि मुज पाड सुजाण, तुज गुणकीता जाण ॥ था ॥ तो पण रे व्यवहार ए मुफ कहेवा तो जी॥ ए॥ कुवर करे सुणो स्वामि, न लदो मुफ कुल ग्राम ॥ था। दीजें रे केम बणजाएयाने दीकरी जी ॥१०॥ दत्त जणे कुल जात, लक्षणथी लहि वात ॥ था ॥ कलिमा रे कुण कुल कलहस तणु कहे जी ॥ ११ ॥ बानो न रहे सूर, तेज प्रताप पर ॥ श्रा० ॥ पायो रे तुं पुरुषशिरोमणि पुएयथी जी ॥ १५ ॥ यत ॥ थारुतिर्गुणसमृदिशसिनी, नम्रता कुलविधिसूचिका ॥ वाक्क्रम कथितशास्त्रसक्रम , सप्तमस्य नवतोविबोधक ॥१॥ पूर्वढाल ॥ दीधु कन्यादान, समान ॥ था ॥ थापु रे शु अधिक तुमने एदथी जी ॥ १३ ॥ करो करुणा वरो एद, नहिं थम मन सवेद ॥ था॥ जाणु रे तुमें श्रम कर चितामणि चढघा जी ॥ १४ ॥ कुवर कहे कयुं साच, पण निसुणो मुज वाच ॥ था ॥ जावु रे मुज गिरुवे कारज वेगलु जी ॥ १५ ॥ वलतो आवीश थाम, करणं जे कदेशो काम ॥ था ॥ बोले रे दत्त वात कहो ते नवि मजे जी ॥ १५ ॥ एक वार परणी एद, पमन माने तेह ॥था॥ करजो रे कारिज ए श्रमची वीनति जी॥१७॥ की अं गीकार, द जाणी निर्धार ॥था ॥ परणी रे श्रीवसा तिण दिन प मिनी जी ॥ १७ ॥ हरख्यां साजनवंद, उत्सव थति थानव ॥ श्रा० ॥ रदीया रे एक रात्रि तिहा थावासमा जी ॥ १५ ॥ दंपती दिल जर प्रेम, दोगुजक सुर जेम ॥या ॥ रमतां रे रंगें, वोली रातरी जी ॥ २० ॥ नर यौवन वय पूर, दपती चढते घर ॥ ॥ परिगल रे पूण्याइ ए जोडी मली जी ॥ ५१ ॥ बीजे दिन वत्सराज, कहे नामिनी जे मुज जीव श्री शांतिनायनो रास खम पांचमो. २६ सुण थाज ॥धा॥ महारे रे तुज थाणा सिह करवी सही जी ॥२२॥ कहे श्रीदत्ता नारी, वहालेसर अवधार ॥ था ॥ तुमचो रे न खमाये विरहो वालहा जी ॥२३॥ विरहो मास वसत,नवल नेह गुणवत॥था॥ नूतन वय पंचम शर ए पाचे मल्या जी ॥ २४ ॥ पंचम अनि महत, केम सहेवाये कत ॥था ॥ रमीय रे रगीले रस जर मालीये जी॥ ॥ २५॥ विलसो जोग विलास, पूरो वानित थाश ॥ था ॥ चिता रे शी मनमा तुमने ते कहो जी ॥ २६ ॥ पचम खमें ढाल, त्रेवीशमी सुर साल ॥था०॥ होवे रे साहसथी सपद सहेलमा जी ॥२७॥१॥३०॥ ॥ दोहा ॥ ॥ कहे वत्स वनिताप्रत्ये, जावु न गमे मुफ ॥ पण सांजल तुज या गलें, कदु माहरु गुफ ॥ १ ॥ जो न जाउ देशातरें, तो दुवे श्रमिप्र वेश ॥ इहांकणे कांई सशय नहि, माटे द्यो आदेश ॥ २ ॥ ॥ ढाल चोवीशमी॥ ॥देशी जत्तीनी॥जत्नी॥ कहे कामिनी जोडीपाणि,निसुणोप्रीतम गुणखा गी। तुम विण मुफ मन थकलाय,कण वरस वरोवर थाय ॥१॥दोहो॥ सजान तुमें सिधावशो, वगुगुणवता नाह ॥ पण मदारी गति शी होशे, उ चो शोच थथाह ॥ ५ ॥ यत्ती ॥ शोच म करे रे कामिनि काहिं, तुमचं मुफ थतर नाही ॥ में प्राण दीया तुफ हाये, तु रात दिवस मुफ साथें ॥३॥ दोहो ॥ साथ तुमारो वन्नहा, में करवो निरधार ॥अवला कवेखी जशो, शो तुम नेद विचार ॥ ५ ॥ यत्ती ॥ नेह नवल निवाहो वहाला, दोहिला मुफ विरहनां नाला ॥ कत करुणा करो रस नीना, मुफ साथ ब्यो वीर नणदीना ॥ ५ ॥ दोहो ॥ साजल ससनेही प्रिया, वहेलो वल तो थावि ॥ रमनु रामत रंगजरी, नवरस नेह वनावि॥ ६ ॥ यत्ती ॥ वनशे तुम प्रीति जाजी, दे थाणा मुफ थश्ने राजी॥रहेता विणतशे मुफ काज, तुमशु शी करवी लाज ॥ ॥ दोहो ॥ लझा लोपीने कहे, नयण करते नीर ॥ वहालेसर थाव्या विना, नवल न पहेरु चीर ॥ ७ ॥ यत्ती ॥ चिर कुकुम काजल रेहा,न लेन तुम विण घण नेहा ॥ वलि कुसुमानरण वो ला, तुम थाव्ये होशे रंगरोला ॥ ए॥ दोहो ॥ रगीला वालम सदी, ए मुफ वेणीवध ॥तुम थावेदिन लूटशे, एह ग्रही में सधि ॥ १० ॥ यत्ती ॥

२६७
जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो.
सधा समरेजो स्वामी, विनवु दु थतरजामी ॥ रहेयं तनाएं इसको
पण हृदय पियु जिण देशे ॥ ११ ॥ दोहो ॥ जिण देशं पिषु संपरो,
तिण देशे होजो देम ॥ थवसरे मुझसनारजो, मत वीतारो प्रेम ॥१५
॥ यत्ती ॥ प्रेम मत विसारो पनोता, सही नव नवी नारीता ॥ रोज
वलजो हितवता, कर जोडी कहे श्रीदत्ता ॥ १३ ॥ दोहो॥ श्रीदवाने
साहिवा, वहेलाही वलजोह ॥ सुगरजीवी जीवजो, कबर ज्पुं फलोद।
॥ १४ ॥ यत्ती ॥ फलजो तुम कदु शिर नामी, नवि वोली जाणु रति
कामी ॥ जाउ एम कहेता कातु, मत जाउ वयण ए मातु ॥ १५ ॥दोहो
कातु वयण न बोलीयें, पीयु सीधावण वार ॥ जेम जाणो तेम सुं करे,
नेह कवण जरतार ॥१६॥ यत्ती ॥ नेहें थावु सघातें ए वाणी, न पढे ए
पियुजी प्रमाणी ॥ माटें करी चितित काज, वहेलु दरिसण देजो राज
॥ १७ ॥ दोहो ॥ राज्यो निसुणी नारीना, वयण थमीरस तोल ॥ वीत
रशे नहिं वालही, ए तहरा मुझ वोल ॥ १७ ॥ जत्ती ॥ बोल देखेर
शेत वाणा, कुमरें तव कीध प्रयाणा ॥ जाता एक थागल थावी, अ
टवी थति जीपण चावी ॥ १ए ॥ दोदो ॥ चावा नील घणा जिहां, पर्व
त थति उत्तग ॥ फास जाड कग्या घणां, नहि जिदा सऊन सग ॥१०
॥ यत्ती ॥ एहवी थटवीमाहे एक नाम, दीनी एक नयरी अनिराम ॥ पर
यलिद जिदा दीसे, जोता मानव मन दीसे ॥ २१ ॥ दोदो ॥ बाहिर
सरोवर पेखीयु, थति शीतल जल चग ॥ चरणानन पावन करी, बेगे पाखें
मनरंग ॥ २२ ॥ यत्ती ॥ मनरगें वेगे जइ पालें, चिट्ठ दिशे निरखीने नि
हाले ॥ जल बहेती वीनी बहु नारी, पूब्यु एकने जइ मति सारी ॥ २३
॥ दोदो ॥ मतिसारी पूजे तिहा, कुण नयरी कुण चूप ॥ दु तुम एलु प्रेम,
नाखो सकल स्वरूप ॥२४ायत्ती॥ नाखो सकल स्वरूप विचारी,कदेशे हवे
ते पनिहारी॥ पंचमे चोवीशमी ढाल, कहे राम मुणो उजमात ॥२५॥ए
॥ दोहा ॥
॥ व्यंतर देवी वासियु,ते कदे ए पुर सार ॥ क्रीडा करवा कारों, सां
जल चतुर कुमार ॥ १ ॥ थन्य नहिं राजा श्दा, नहिं कोनो अधिकार।
ने देवी थम स्वामिनी, थमें तेदनो परिवार ॥२॥ कुमर कहे साचुं कसे,
जल वदो केणें काज॥ते कहे सांजल सापुरुष, वयण माहरूंथाम ॥२॥

श्री शांतिनाथनो रास खम पांचमो शहए ॥ ढाल पच्चीशमी॥ ॥ शारद बुधिदायी ॥ ए देशी ॥ कहे ते देवनारी, सांजल साहस धीर ॥ जननीना जाया, गिरथा गुण गनीर ॥ पावन पुरुपोत्नम, थतु लीवल वड वीर ॥ थम्ह स्वामीनी वेदन,दजीय न थाव्यो तीर ॥ चूटक ॥ तीर न थाव्यो एकण देशे, थम्ह स्वामिनी गइ हुती ॥ तिहां को पुरु खड्ग प्रहार, तेहने घणु विगुती ॥ वाद तणी पीडा बद्दुतेरी, केमें करार न थाय ॥ पीडा तेह निवारण काजें, नित्य जलथी सींचाय ॥ १ ॥ तिण कारण जलने, वहियें ए सुदर जाण ॥ हजी वेदन न शमी,सवलु ए कर्म विन्नाण ॥ वत्सराज विमासी, वोले एणिपरें वाणी ॥ केम निज पीडाने, निवारण तेह थजाण ॥ ॥ तेह अजाण थर केम वेठी, कहे देवी सुण साचु ॥ ते प्रहार दायक यगरदक, देवतणु वल जाचु ॥ तस प्रनावें ए वेदन न समे, मत मानेजो काचु ॥ देवमनावथ की पण यधिको, मानव महिमा राचु ॥ २ ॥ वली थोपधि युगल, हुतु एहने कर एक ॥ सप्रनाव मनोहर, दो थन्हें सुविवेक ॥ व्यतरपति दीधु, तुष्ट थईने चेक ॥ फल देवी आगल, नारख्यु तेणे अतिरेक ॥ ॥ थतिरेके एकै जग मोहे, वीजी वगु गुणकारी ॥ परधातोभव पीड निवा रण, ए विदु थोपधि सार। ॥ तेह पडी खड़े जिदा ताडी, श्रम स्वामि नी 5ख पा ॥ थोपधि पाडी लाज गमाडी, कीधी कर्म कमाई ॥३॥ वत्सराज पपपे, दु बु मानुष्य वैद्य ॥ टालु तस वेदन, एक साहित्यमाहे सद्य ॥ पण शु मुफ देशे, बोले देवी वचन्न ॥ मन चितित पामीश, सां जल पुरुप रतन ॥०॥ पुरुपरतन्न सुणो मुफ वाणी, हूँ जाउ उजाणी॥ मुज स्वामिनी पूबी श्रावु, श्हा रहेजो गुणखाणी ॥ थावी वात कदे स्वामिनीने, ते कहे तेडी लावो ॥ दासी श्रावी कहे सुण मानव, तुमें मुक साथें थावो ॥ ४ ॥ मारगमां नाखें, स्वामिनी श्रग करार ॥ यये ते नशे, तुझ कपर निरधार ॥ तप मागजे थापो, मुफ कन्यायुग सार ॥ प्रासाद ऊपरें, जे वे तुमचे थाधार ॥०॥ तुम थाधीन थके दय रूपें, यक्ष एक सपराणो ॥ चितित वामें जे पहोंचाडे, ततक्ष्णमां उजा गो ॥ वली तुम पासें थवे जे वारु, कामितदायक सार ॥ एक पल्यंक मनोहर मुफ ए, थापो वानां चार ॥ ५ ॥ एम शीखवी साथे, ले थापु॥ वानित , ༢༠༠ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. चाली तिण नाम ॥थाव्यो देवीनी, पासे गुण थनिराम ॥ वाक सन, वेसे धरि मन रग ॥ कहे देवी जाणे, जो तु वेदक चंग ॥ पूको वेदक जाणे तो मदारी, हस पीडा थ वहेलो ॥ वत्सराज बाबर न रण, योले वेदक पहेलो ॥धूम्रोपधियें धूम्र करीने, अन्यथकी हरे पीता। वेदना सर्व शमी तस जनी, करवा लागी क्रीडा ॥ ६॥ तावत् ते बोली, नइ तेदिज तु होये ॥ मुज पातनो दायक, वीजो नदि हा कोष ॥ करे हा ते साचु, दुश् दर्पित सुणी वाणी ॥ वत्स थ द सुप्रसन्न, तुक सार स गुण खाणी ॥ ॥ गुणखाणी मागो मन्न मान्यु, जेह कहो ते पूरु दारिश चूरु, 5 ख सघलु तुज कापु ॥ पूर्वोदित माम्बु तेणें सघलु, ते कबूल सवि कीधो ॥ देवी चिते गृहनेद महारो, किणहिक एहने दीधो ॥ ४ ॥ सुण सुण तुं सुपुरुप, जा कन्यायुग दीध ॥ पस कनु तस उत्पत्ति, सांजल तु सुप्रसि६ ॥ मुफ पासें ए बद्ध, दिन राखी में एद ॥ पुण्यवत ए ताहरे, नोग्य दशे ससनेद ॥४०॥ ससनेहा सांनल तुज थागत, वात कदु यति मीठी ॥ पूर्ववैर तणी जगमाहे, कह ३ करणी दीवी ।। पंचम खमें हुई पंचवीशमी, ढाल सुणो नर नारी ॥ साहसिक नर सपति पामे, वत्सपरें मुविचारी ॥॥ सर्वगाथा ॥ ७० ॥ ॥ दोहा॥ ॥ कदे व्यंतरी ज्ञानथी, निजकन्या अवदात ॥ वत्सराज हरखें सुणे, थचरिजवाली वात ॥१॥ ॥ ढाल बच्चीशमी॥ ॥ कर्म न छूटे रे प्राणीया ॥ ए देशी ॥ गिरि वैताढपनी अपरें, घमर चचा पुरी सार ॥ गधवादगति नामें राजीयो, विद्याधर शिरवार ॥ १ ॥ कर्म न बूटे रे जीवडा, जे जे बध विचार ॥ नवि खूटे विण जोगष्यां, कीधा एद ससार ॥ क० ॥ ३॥ नाम सुवेगा रे कामिनी, बीजी मदन वेगा जोय ॥ प्रीतम बदें रे चालती, रमणी रतिसम दोय ॥ क. ॥३॥ पहेली कूखें रे कपनी, रयणचूला वर नाम ॥ बीजी सोवनचूक्तिका, जा गुणमणिधाम ॥ कल ॥॥ यौवन थावी रे अति नली, मोहन गुण मणिगेह ॥ मात पिता मनमां धरे, वरचिता अतिरेद ॥ क० ॥ ५॥ ।।। यत. ॥ जम्मतीए सोगो, वहतीए य वहए पिता ॥ परणीयाए .

श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो श्र दमो, जुवा पिया ऽरिकन निच ॥ १ ॥ निय घरसोसा परगे, हममणी कु लकलक कलिवण ।। जेहि न जाया धूया, ते सुहिया जीवलोगम्मि । ॥ २ ॥ पूर्वढाल ॥ एक दिन एक मुनि थाविया, विद्याधर गुणवत ॥ प्रणमी पूजे रे नावच्छ, मुफ नाखो नगवत ॥ क० ॥ ६ ॥ मुफ पुत्री वर कोण दशे, कहे ज्ञानी थणगार ॥ दोशे ना रे वेदुनो, श्रीवत्सराज कु मार ॥०॥ ॥जूचर वरशे रे एहने, पण नहिं तहारी रे पास ॥ नर पति कहे कोण एदनु, कारण स्वामी प्रकाश ॥ क० ॥ ७ ॥ मुनि कहे सुण नृप ताहरु, वे एक मासनु याय ॥ फरि पूछे रे विवाहनो,हवे कहो कोण उपाय ॥०॥ ए ॥ मुनि कदे नगिनी रे ताहरी, नूचर शूर नरिंद। परणी प्रेमें रे तेहगु, यधिकी प्रीति अमद ॥ क० ॥ १० ॥ अन्य वली दुश्तेदने, रमणी रूपनिधान ॥ चित्त हरी लीयु रायनु, तुज नगिनी थपमान ॥क ॥ ११ ॥ रगें रमे राय तेहच्नु,यहोनिश मदिरमाय ॥ तूट पडी तुफ बहेनछ, आव्यु उदे थतराय ॥ क ॥ १२ ॥ दिलमें शो क्य साले घणु, शोक्य समु नहीं सुख ॥ अहोनिश रहे बल ताकती, नावे निद ने सूख ॥कण॥ १३ ॥ यारति मनमां रे यति घणी, मुफ उपर नहीं मान ॥ तप नवि कीधु रे पूरवें, तो पामी थपमान ॥ क० ॥१४॥ हवे तप करु कांइ थावते, नवें पामु का सुख ॥ एम जागी तप थाद स्नु, काइक शोक्यने उख ॥ कण् ॥ १५ ॥ यत ॥ था देवान्नमस्यंति, तप कुवैति रोगिण ॥ निर्धना विनय यांति, रक्षा नारी पतिव्रता ॥ ३ ॥ पूर्वढाल ॥ तप करी काल कखो तेरों, व्यंतरी जातिनी देव ॥ थटवीमाहे रे कपनी, करे वन देवी रे सेव ॥०॥१६॥ यूर नरिंदनी गेदिनी, तेदनी शोक्य सुजाण ॥ दानादिक गुण थादरी, दत्त घरे गुणखाणि ॥क ॥ ॥ १७ ॥ था श्रीदत्ता रे नामथी, कन्या गुणह नमार ॥ पूरव वैरथी व्यत री, वे तस सुख थपार ॥ कण् ॥ १७ ॥ यामिक नरने रे नित्य हणे, थद्यापि ए रीति ॥ देवीपासें ए मूकजो, कन्या धरि मन प्रीति ॥ क ॥ ॥ १५ ॥ रहेता पासें रे तेहने, श्रावो वत्सराज ॥ नरदय करती रे वा रो, वलशे सूधी रे लाज ॥ क० ॥ २४ ॥ श्रीदत्ताने रे परणशे, तिहाथी निसरी तेद ॥ देवीस्थानकें श्रावशे, थाशे कारज एह ॥ क ॥ २१ ॥ एम कही मुनि उत्पत्या, खेचरनाथें रे चग ॥ कन्या थाणी मूकी हां, , དབུག जैनकथा रत्नकोप नाग आम्मो. मुफ पासें मन रग ॥ क० ॥ २२ ॥ विद्याधर तप श्रादरी,मासमादे। खकार ॥ मरि थयो व्यतर थधिपति, पाम्यो सुख श्रीकार ॥ क झाने जाणी रे मुझने,हयरूपं यद एक ॥ किकर मुफने रेयापियो, गार करिय विवेक ॥ क० ॥ २४ ॥ थोपधियुगल पल्पक ए, कामित दावा दीघ ॥ ते में सघनु रे तुज दीयु, वाठित कारज सि ॥०॥ १५॥4 चम खमें बबीशमी, ढाल कही ए उदार ॥ रामविजय कहे पिनां, फल कडवा निर्धार ॥॥२६॥ सर्वगाथा ॥३८॥ श्लोक तथा गाथा ॥३॥ ॥ दोहा ॥ ॥ वात कही वत्सराजने, देवीय मामी सर्व ।। परणावी दोय कन्यका, मूकी मननो गर्व ॥१॥ पुण्यपसायें सवि मिती, सपद नारी सार॥ सुख विजसे ससारना, श्रीवत्सराज कुमार ॥२॥ एक दिन रगविलासा, रमतां नारी साथ ॥ प्रेम सहित पूरे प्रिया, कहो थमने प्राणनाथ ॥३॥ किम श्दा कणे ययु याववु, तव कुमरें निन वात ॥करी प्रतिज्ञानी तिहां, सुणि हरखी ते धात ॥ ४ ॥ नारी कसुं देवीने, जाणि प्रतिज्ञा तास ॥ शीख दीधी वत्सराजने, थावण निज थावास ॥५॥ ॥ढाल सत्त्यावीशमी। ॥ जीदो जाप्यु अवधि प्रयुंजीने ॥ ए देशी ॥ जीदो विरदो असद ती थकी, जीदो पण दियो देवी थावेश ॥ जीदो प्रियासहित वत्सरा जने, जोहो थावजो वली श्ण देश ॥ १ ॥ सुगुण नर, तुमयं प्रीति थपार ॥ सुगुण नर, तुम्हें कीधो उपकार ॥ सु० ॥ मत मेलो विसार ॥सु०॥ धन्य जीव्युं तुम्द सार ॥ ए थाकणी॥ जीढो बेसी पल्यंकने चालियां, जीदो नन मारग पुण्यवत ॥ जीदो चाले विमान तणी परें, जीदो बायां तेह तुरंत ॥ सु० ॥ ५ ॥ जीदो श्रीदत्ताने मविरें, जोहो थायां वही थाकाश, जीदो कती प्रनातसमे तिस्यें ॥ जीदो श्रीदत्ता सुविलास ॥ सु० ॥ ३ ॥ जीदो देखी तुरंग पम्यंकने, जीहो अति विस्मित या बाल ॥ जीदो केणे थाल्यो पर्यक ए, जीदो दय पते केम ए ढाल ॥ सु० ॥ ४ ॥ जीदो जोवे नजरें निदालीने, जोहो दीतो तब निज कत ॥ जीदो दोय नारी कीडतो, जीदो शय्या गत गुणवत ॥ सु० ॥ ५ ॥ जीहो जश की जनकनी धागजें, जीहो

श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो. २७३
पति ऊपर थावास ॥ जीहो थाव्यो ने हां माहरो,जीहो उपन्यो सनम
तास ॥ सु० ॥ ६ ॥ शय्या तुरग तणी कही, जीहो वात सकल समजा
३॥ जोहो हर्प धरीने यावियो, जीहो सप्तम नूमीय धाइ ॥ मु०॥ ७ ॥
जीहो थाव्यो जाणी शेग्ने, जीदो नग्यो ताम कुमार ॥ जीदो थादरमा
न देई घणु, जोहो नांख्यो निज यधिकार ॥ सु० ॥ ॥ जीहो चरित्र
सुणी विस्मित थयो, जीहो नक्ति करे वहु नाव ॥ जीहो तेदिन राख्या
मदिरे, जीहो उत्तम जास स्वनाव ॥सु॥णाजीहो वीजे दिन से थाझा,
जीहो त्रिदु नारी सघात ॥ जीहो शय्या उपर वेसीने, जीदो चाव्या थये
प्रनात ॥ सुण॥ १० ॥ जीहो ततणमा ते थाविया, जीहो निज नयरें
ननचार ॥ जीदो मदिर श्राव्या बापणे, जीहो उतरीयां ततकाल ॥ सुप
॥ ११ ॥ जीदो चिट्ठ जण सूता सेजमा,जीहो थावी घर एकांत ॥ जीदो
धारिणी विमला देखीने, जीहो चिते कुण ए सत ॥ मु०॥ १५ ॥ जीदो
ए शय्या नहिं थापणी, जीहो काइक ए विन्नाण ॥ जीहो चिंती पट
परहो करो, जीदो दीठो कुमर सुजाण ॥ सु० ॥ १३ ॥ जीहो त्रण त
रुणी साथै तिहा, जोहो निज कुवर निरखत ॥ जीहो रोम रोम तन उ
सस्युं, जीहो हैड्ड देजें दसत ॥ सु०॥ १४ ॥ जोहो लजाती पानी वली,
जीहो हलुवे हलुवे ताम ॥ जीहो इण थवसरें ते जागीयो, जीहो कुवर
गुणनु नाम ॥ सु० ॥ १५॥ जीहो माय मासीने पाउले, जीहो दोही
करे प्रणाम ॥ जीहो पू. विमला धारिणी, जीहो कुण कुण कीयां
काम ॥ सु० ॥ १६ ॥ जीहो वात करे माय भागलें, जीहो मामी वत्स
कुमार ॥ जीदो जूवो पुण्याई पुत्रनी, जीदो पामी हर्प अपार ॥ सु० ॥
॥ १७ ॥ जीदो कामितदायी पक्ष्यकथी, जीहो उत्तरीय श्रमूल्य ॥
जीदो नरपति पासें श्रावीयो, जीहो वत्सकमर थनुकूल ॥ ९ ॥
॥ १७ ॥ जीदो राजेश्वर पूछे तदा, जीदो क्षेम कुशलनी वात ॥ जीहो
वत्स जलें तु थावियो, जीदो पाम्या अमें सुख शात ॥ १० ॥ १५ ॥
जोहो जइ मासी चरणे नमी, जीदो करे उत्तरीयनी नेट ॥ जीदो कमल
श्री कहे तुझ विना, जीदो वत्स कोण दीये मुफ नेट ॥ मु० ॥ २० ॥
जीदो चिरं जीव तु वालुया, जीदो मुफ कामित दातार ॥ जीदो मा
सीयें सन्मान्यो घणु, जीदो राजाय पण तेणि वार ॥ मु०॥ १॥

" . २०४ जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. जीहो रायें पुग्घु वत्सने, जोहो वत्स किहां लाध्यु एह ॥ जीहो पात चीतक तणी, जीहो पर्यक दय विण तेह ॥ सु० ॥ २२ ॥ जीहो देवी दीधु वस्त्र ए, जीदो सुणी हरव्या राजान ॥ जी० ॥ जोहो धन्य धन्य सद को कहे, जोहो बलीयो सुगुण निधान ।। सु० ॥ ५३ ।। जीहो मुत माधे रहे तिदा, जीदो विलसे नव नव जोग ॥ जीहो निजनारी रंगमा, जीहो सरिखो मल्यो सयोग ॥ सु०॥ २४ ॥ जीदो पंचम खमें सतवी शमी, जीदो ढाल कही मनरग ॥ जीदो रामविजय कहे पुण्यथी, जोहो लदिये सुरक यनग ॥ सु॥ २५॥ सर्व गाथा ॥ १६ ॥ श्लोक ॥४॥ ॥ दोहा॥ ॥ एक दिन कमलश्री तणे, थगें उपन्यो व्याधि ॥ राय उपाय कसा घणा, पण न टली यसमाधि ॥ १ ॥ राणीखे दुखीयो, राय करे थ ति शोर ॥ नयपथकी थासु फरे, सवलु मोहन जोर ॥ ५ ॥ कला पणी नृप केलवी, लेखे न थावी काय ॥ राणी परलोकें गइ, विरुश कर्म बलाय ॥ ३ ॥ यत ॥ सा नन्धि कला तं न, सिसह तं न किंपि विन्नाण ॥ जे सा धरित काया,खकति कालसप्पेण ॥ १ ॥ पूर्वदोहा ॥ तास वियोगें राजवी, पख्यो शोकने पर ॥ वत्सराज यावी कहे, शोक निवारो दूर ॥ ४ ॥ इण जग चिर नवि को रह्यो, सह थनित्य ससार ॥ तन धन यौवन कारिमो, रमणी शदि परिवार ॥ ५ ॥ यत ॥ कुसग्गे जह उस बिजए, योव चि लबमाणए ॥ एव मपुयाण जीवियं, समय गोयम मा पमायए ॥ ५ ॥ ॥ढाल थम्पावीशमी। ॥ बही नावन मन धरो ॥ ए देशी ॥ वत्स कहे नृप सांनतो, एड थनित्यपशु ससारे रे ॥ शुधारे रे, अस्थिरने स्थिर करी चित्तमा ए ॥ १ ॥ नाव थनित्य ससारना, जलबिष्ट विद्युत् सम जाणो रे ॥ माणो रे, वर्ण गध रस फरसमां ए ॥ ५ ॥ उत्पाद व्यय ने ध्रुव तणी, सवि श्व्ये त्रिनगी नोखी रे॥ए राखी रे, न रहे स्थिति ससारनी ए॥२॥ जिनवर चक्री जे हुवा, ते पण शहां स्थिर नवि रदिया रे ॥ में मोहि या रे, पूरे तु परनावने ए॥ ४ ॥ वार बनत मल्यो सही,ते सबंधाएं राचे रे ॥ वत्ती नाचे रे, तेदने बदें नट परें ए॥ ५॥ पचल ए लही , श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो. श्य थानखु, जे धर्ममांहे सीदाय रे ॥ न कहाय रे, ते शापुरुप शिरो मणि ए॥ ६ ॥ जिन यगदकारें का, शोक रोग निवारणहारु रे ॥ सारु रे, धर्मोपध करवु वुधे ए ॥ ॥ यत ॥ मिति पमिता कुर्यु , यश्रुपात च मध्यमा ॥ धमाश्च शिरोधातं, शोके धर्मविवेकिन ॥ ३ ॥ पूर्वढाल । इत्यादिक वचनामृतें, वत्सराजे नृप समजाव्यो रे ॥ ए जाव्यो रे, मन उपदेश सोहामणो ए॥ ७ ॥ नारीशोक निवारियो, वत्सराज वचनथी वलीयो रे ॥ वलीयो रे, निज यातम तेणे कखो ए ॥ ए॥ मुखमां वाहे कालने, वत्सराज सवल सोनागी रे ॥ रागी रे, त्यागी जोगी थति घणो ए॥ १० ॥ एक दिवस वत्स नारीगु, मदिरमाहि एम विमासे रे ॥ नासे रे, मुणो सुदरी सोहामणी ए ॥ ११ ॥ नोजनने नृप तेडीयें,ए प्रीतिनु लक्षण लहीये रे ॥ कहीयें रे, नीतिशास्त्रमाहे एहवु ए ॥ १२ ॥ यमुक्त ॥ ददाति प्रतिगृह्णाति, गुह्यमाख्याति प्रचति ॥ जुक्ते जोजयते चैव, पविध प्रीतिलक्षणम् ॥ ४ ॥ पूर्वढाल ॥ नृप थापण अनुरागीयें, तेडी जे ए वडनागी रे ॥ जागी रे, नाग्यदशा ए थापणी ए॥ १३ ॥ नारी कहे सुण नाहला, ए वात विचारी कीजें रे ॥ न लीजें रे, नृपने निज थावासमा ए ॥ १३ ॥ श्राश श्हारी कीजियें, पण नृप थासग न क रीय रे ॥ तो वरिय रे, सहेजें सुख ससारमा ए॥ १५ ॥ विप दाढे दोय सापने, विप खतनी जीनें लहीये रे ॥ कहियें रे, तेम दृष्टि विप रायने ए ॥ १६ ॥ यत ॥ वैरिनारीनरेंशणा, नागनीचनियोगिनाम् ॥ नखीनां च न विश्वास , कर्त्तव्य शुनकाक्षिणा ॥ ५॥ पूर्वढाल ॥ ते माटें तुमने कद्गु, नृपघर नोजन मूकीजें रे ॥ चूकीजें रे, नवि एणि वातें कथजी ए ॥ १४ ॥ वत्स कहे सुणो वालही, एणी वातें गौरव न वघे रे ॥ थवघे रे, तेव्या विण चाले नहीं ए ॥ १७ ॥ थाग्रह जाणी कतनो, वलती ते बोली नारी रे ॥ सारी रे, वात सुणो तुम्हें वालदा ए ॥१॥ थमने मत देखाडजो, पनी जेम जाणो तेम करजो रे ॥ वरजो रे, स्वामी थमारा ला सीने ए ॥ २० ॥ पंचम खम थडविशमी, सुणो ढाल कही थति सारी रे ॥ हितकारी रे,वयण देयामा राखियें ए॥१॥ सर्वगाथा॥७ए॥४॥ ॥ दोहा ॥ ॥ कामिनीयें वासो घणु, पण न रह्यो वत्सराज ॥ जोजनने नृप नो -- २६ जैनकथा रत्नकोप नाग थाठमो. तखो, वारू वयण समाज ॥ १ ॥ स्वामी पधारो थांगणे, करो मुज गेह ॥ थरज थमारी चिन धरो, जो मुफ ऊपर नेह ॥१॥ राजन तुम सदा, नहि थतर वत्सराज ॥ माटे नोजननो किस्यो, सर घर थाज ॥३॥ वत्सराज कहे साहिवा, ते गुन अवसर जाति । जिण दिन राज पधारशो, मुफ थागणे गुणखाणि ॥ ४ ॥ कृपा करीने दा नणो, मुफ मन दर्पित होय ॥ दन्हूती नृप मानीयु, निमुखी दरख्यो सोय ॥ ५॥ ॥ ढालगणत्रीशमी॥ ॥ गेंडानी देशी ॥ घरे थावी सवी वात प्रकाशी, मनमा धरी त्साह ॥ थलवेलो रंगीलो नाद, अलवेलो दीलो नाह,थलवेलो उबीलो नाद ॥ थलवेलो० ॥ ए थाकणी ॥१॥ वास्तु थमारु न करे वहालो, मन मा सुखरी चाह ॥ थलवेलो०॥ ५ ॥ जामिनीनु वनोपरिनूमें, लाग्यो कीडामाहि ॥ थल ॥ ३ ॥ रमणी सार्थे रसनी वाते, तिदा वेला बडु वही जाय ॥ थल ॥ ४ ॥ राजन चिते हजी शु न थाव्यो, तेडण ए वत्स एण ताय ॥ थल ॥ ५ ॥ नृप चिते चित्तमा एदने घर, शी साम मी थाय ॥ ॥ ६ ॥ जोवा कारण चर एक मूक्यो, पोतानो तेणें राम ॥थ ॥ ७ ॥ चर जोवे जइ घेर निहाली, नवि देखे रसवती कां॥ थल ॥ ७ ॥ परकाशे नुपतिनी थागें, सेवक पालो था ॥ १० ॥ ए॥ पुनरपि बीजो नर तिहां यावी, जुवे सलाइ तास ॥थ ॥१०॥ कहे नृपने घर धूम न दीसे, शी नोजननी थाश ॥ थ० ॥ ११ ॥ चिंते नृप जुन कीध उगाइ, मनमांदि एम उदास ॥ थ० ॥ १२ ॥ तव ते नो जन अवसर जाणी, वत्स थाव्यो सुविलास ॥ ॥ १३ ॥ कहे राजेश्व रने कर जोडी, पाउधारो मुफ थावास ॥ थ॥ १४ ॥ थाय हवे असर भोजनने, उठोजी लील विलास ॥थ ॥ १५॥ नृप कहे शी दासी मुफ साथें, मामी मुगुण निवास ॥ थम् ॥ १६ ॥ विण सामग्री तेरेथ मने, ए तुमने साबाश ॥ १० ॥ १७ ॥ कोई न मन्यु बीज दासीने, नांग्यो तुज विश्वास ॥ थ० ॥ १७ ॥ कहे वत्स तु मुफ सादिष तहारो, दुबु चरणनो दास ॥थ ॥ १५ ॥ तुम हांसी करतां हां महारी, कुललका जाय नासि ॥ थ० ॥२०॥ शु तुम रसवती के कारण, श्री शांतिनायनो रास खम पाचमो एण श्रावो घरे उन्नास ॥ य० ॥ २१ ॥ नृप कठ्यो नत्साह धरीने, जे दुता निज पास ॥ य० ॥ २२ ॥ याव्या सवि वत्सराजने मदिर, जोवे नयरों तपास ॥ थ० ॥ २३ ॥ देखी ममप थति रलीयालो, देहे करेय विमास थ॥२॥ नहि ए मानव माया दीसे,देवतणी सुप्रकाश ॥थार५॥ पंचमे उगणत्रीशमी ढालें,विरुङ मोहविलास ॥य॥२६॥स०॥२३॥७॥ ॥ दोहा॥ ॥ यथायोग्य मामयां घणा, यासन उलान्त ॥ नृप हरव्यो मन मां घणु, देखी कम बोल ॥ १ ॥ किम एणे एती वारमा, सवि कीयो सामान ॥ ए का जोवा सारिख, मन चिते राजान ॥ ५ ॥ नृप यावी वेग सहू, माझ्या सोवन थाल ॥ पीरसे बढ़ प्रेमें करी, जल पक्कान्न रसाल ॥ ३ ॥ सखर सवा सालणा, खाटा खारा सार ॥ रायता कोले नया, मरचाला मनोहार ॥ ४ ॥ चारखी चाखी स्वादने, पाम्या परमानद ॥ थहो थपूरव रसवती, करे प्रशस नरिंद ॥ ५ ॥ ॥ ढाल त्रीशमी॥ ॥ नाग कुमर कहे रायजी ॥ ए देशी ॥ वत्स विचारे चित्तमां, उत्सव थति नारी ॥ विषु वनिता शोने नही, ए रसवती सारी ॥ १ ॥ मोदन गारी मानिनी, विषु तेह अलूणु ॥ जोजन ए शोने नहिं, वीसे वे कणु ॥ ५ ॥ चितवी मदिर कपरें, चढीयो चोवारी ॥ थावतो देखी नादने, ऊनीय नारी ॥ ३ ॥ प्राणजीवन पान धारीयें,धरा पावन कीजें ॥ नयण सतूणा नाहला, काश् हुकम करीजें ॥ ४ ॥ वहाली हो वेगें थावीने, नृप गौरव सारो ॥ तुम विण ए शोने नहिं, घर श्रांगण महारो ॥ ५ ॥ ते कुलवती चितवे, स्त्रीने गुरु स्वामी ॥ वयण कहे जे कतजी, करवु शिर नामी ॥ ६ ॥ यक्त ॥ गुरुर मिर्दिजातीनां, वर्णानां ब्राह्मणोगुरु ॥ पति रेव गुरु स्त्रीणा, सर्वस्याच्यागतो गुरु ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ निजपियु थाग्रह जाणीने, उठी थलवेली ॥ थाणा हो थापणा नाथनी, नवि जाये तेली ॥ ४ ॥ पण परिणामें रुड्डु नहि, गु कीजें हो वहेनी ॥थापणने नि रखी करी, दृष्टि चलशे दो एहनी ॥ ७ ॥ मन पाखे ते मानिनी, शृगार बनावे ॥ श्रनुपम रूप धनी रमा, जस उपमा नावे ॥ ए ॥ रम जम कर ती रंग, पीरसणने हो थावी ॥ जामिनी देखी नृपनी, गति नाति ១០ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. सुलावी ॥ १० ॥ थहो थहो रूपनी उरडी, जर योवन माती। तुर थयो देखीने, रमणी रग राती ॥ ११ ॥ धन्य जीवित विलसे ए साथै ॥ मुफ घरे एहवी एके नहि, गु कषु जगनायें ॥१॥ जोजन जहेर समु थयु,तरुणीरग लाग्यो । उतायो नवि कतरे, ए माघो ॥ १३ ॥ कामराग सरिखो नहि, जग कोई थटारो ॥ पेसतां से नहि, ए राग कटारो ॥ १४ ॥ नोजन करी नृप कठीयो, वत्सें पड़ सत्कास्त्रो ॥ काम वध्यो मन जेहने,ते न रहे वास्यो ॥१५॥ मदिर थायो। नूपति, महिला मन ध्यातो ॥ थाहट दोहटमा पच्यो, न गमे का वातो ॥ १६ ॥ मत्रीश्वर बोलावीने, वात मननी हो दाखी ॥ तुम्हें मुज करमी राजमां, सुख उखना सरिखी ॥ १७ ॥ मत्रीश्वर पण तेहवा, नृप सरि खा दो विरुथा ॥ वाहिर मीठा नीतर, कडुथा विपतरुथा ॥ १७ ॥ मत्री थालोची मनमा, माती मति रीफे ॥ राजन ए वत्स जीवां, तुम काम न सीफे ॥१॥ माटें कोई उपायथी, वत्सराजने दणी ॥ कारिज साधन कारणे, पुण्य पाप न गपीयें ॥ २० ॥ दा दा एम करतां थकां, जग नीच न लाजे ॥ प्राण हणे खल पारका, पोताने काजें ॥ १ ॥ वहेला था ए वत्सने, करी कोई उपाय ॥ पहोंचाहो यममदिरें, जेम मने सुख थाय ॥ २२ ॥ रायें दुकम एडवो कस्यो, विपयारस वाद्ये ॥ काम कुमाणसर्नु कम्यु, नरपति ए माघे ॥ ३ ॥ शो थनरथ नवि निप जे,विषयाथी दो वांको ॥ मति मूळावे दो नर तणी,कृण राय ने रांको॥ २४॥ पंचम खमें त्रीशमी,ढाल रामें दोनाखी ॥ विषययकी जय नविलहे, सुणो साजन साखी ॥२५॥ सर्व गाथा ॥५३॥ श्लोक तथा गाथा ॥४॥ ॥ दोहा ॥ ॥ मत्री मती विचारी, सिहनामा सामत ॥ जोरावर थाजने, समये अति बलवत ॥ १ ॥ तस थानक वेसारीयें,सनामाहे वत्सराज ॥ रुग्यो दणशे एहने, सिह सरेशे काज ॥ २ ॥ सना जुडावी चोपणं, बेगे नृप ततकाल ॥ वत्सराज थाव्यो तदा, नृप नमवा उजमाल ॥ ३ ॥ सायो सिहस्थानकें, मत्री मती मदत ॥ वत्सराज निर्नय थको, बेगे धीरजवत ॥४॥ सिद तवा थायो तिहां,वेगे वस्सने देखि ॥ हैयरे को कलकल्यो, जो रह्यो थनिमेष ॥ ५ ॥ सनामांहि बोल्मो नहीं, वाणी - .

श्री शांतिनाथनो रास खंम पाचमो. ए नृप थाशंक ॥ नूप सना सरिखा सवे, कुण राजा कुण रंक ॥ ६ ॥ सना विसर्जी ततहणे, नृप मनमाहि चूक ॥ वत्सराजने मारवो, जाणे याज थचूक ॥७॥ वत्सराज मदिर जणी, चाल्यो निर्नय कठी ॥ मत्री मनी वकारियो, सिह तणी तस पूर्व ॥ ॥ सिह नाम तुमचु सही, पण माटी पण शीयाल ॥ स्थानक वेठो तुम तणे, वत्सराज ए वाल ॥ ॥ जीवता मृत सारिखा, तुम जेहवा बलवत ॥ स्थानक खोवे थापणु,ते कलि शुजीवत ॥ ॥ १० ॥ यमुक्त ॥ मा जीयाद्य परा वझा, खदग्धोपि जीवति ॥ तस्याजननीरेवास्तु, जननीक्लेशकारिण ॥ १ ॥ नाकनो लोन करेह, सीस सलोनो रस्किन ॥ तिण माणस जीवेह, कलिमा काहु कीजसी ॥ २ ॥ पादाहत यज्वाय, मूनिमधिमोहति ॥ स्वस्या देवापमानेपि, देहिनस्तर रज ॥ ३ ॥ ॥ ढाल एकत्रीशमी॥ ॥ वासुपूज्य जिन वारमा जी ॥ ए देशी ॥ वात सुणी क्रोधे चढयो जी, सिह सवल विकराल ॥ निज मेलापक ले। तदा, मलीयो वत्सने ततकाल ॥ १ ॥ होजी था सन्मुख शीयालीयाजी ॥ नहिं महेलु तुम थाज ॥ यासन वेसी माहरे, तें उतारी मुफ लाज ॥ दो० ॥ २ ॥ केम रूग्यो निज जीवनें जी,गुं न सुण्यु मुक नाम ॥ एम थवदेला तें करी, को न करे ते कीधु काम ॥ हो ॥ ३ ॥ वल पागे वल ताहरु जी, जोश्ये रणमेदान ॥ वत्स वल्यो वीरसेननो जायो, सुणी योध युवान ॥ दो ॥an नीम परें वेहू नव्या जी, यवसर लही वत्सराज ॥ नाख्यो उडाली सिदने,मृगपति परे करतो थवाज ॥ दो० ॥ ५ ॥ पहोंचाख्यो यममदिरें जी, जोतामा तेणि वार ॥ मुनट सवे नासी गया, छैन सिदतो सहार ॥ दो० ॥ ६ ॥ परनें चितवीयें जिस्यु जी, तेदवु थावे थाप ॥ परउल ताके पापीया ते, पामे एम सताप ॥ हो ॥ ४ ॥ सिहसेना नाती तदा जी, न खमाणो तस ताप ॥ जय पामी मुखे उच्चरे, को राखो माय ने वाप ॥ दो० ॥ ७ ॥ नृपने शरणे यावीयो जी, राखो तुमें नूनाथ ॥ थम थशरणने ठहरो, नाखे एम सिदनो साथ ॥ दो ॥॥ वत्स थाप्यो निजमदिरें जी, वात कही मन मेली ॥ फल पाम्यो एद ति हलो,जो कीधी मुफ अवहेल दो॥१०॥ कहे विद्याधर वशनी जी,नारी श० जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. मुगुण निधान ॥ थम विद्या परनावथी, तुम्हे उतायु तस मान । ११ ॥ तुमें खोटु कस्यु साहिना जी, यमने देखाडी दृष्टि ॥ कामयों राजियो, करशे तुमने ए यनिष्ट ॥ दो० ॥ १२ ॥ पण स्वामी मत रजो जी, किसिय न करशो चित ॥ यहि वश करवो सोहिलो, पण रात न होवे मित्त ॥ दो० ॥ १३ ॥ यमुक्त ॥ काके शोच यूतकारेषु सत्य,सो झांति स्त्रीपु कामोपशांति ॥ क्लीवे धैर्य मद्यपे तत्त्वचिता, राजा मित्र केन दृष्ट श्रुतं वा ॥ ४ ॥ पूर्वढाल ॥ हवे एक दिन ते मत्री जी, राब करे थालोच ॥ काज न सीज्यु थापणु, सामो उपजाव्यो शोच ॥ दो ॥ १४ ॥ सिह गयो मुफ काजनो जी, रह्यो वैरी वत्सराज ॥ कहो मत्री ए शु थयु, न थयु काश् चितित काज ॥ दो० ॥ १५ ॥ पण तुं मित्र जो मादरे जी, नहिं मुफ उर्लन काय ॥ जेदने मित्र महोदधि, सुल ना तस लहेरी थाय ॥ दो० ॥ १६ ॥ सचिव कहे वाघण तणु जी, दूध मगावो स्वामि ॥ मानधनी ए मानशे, सहेजें सरशे ए काम ॥ हो ॥ १७ ॥ दरवारे वत्स थावीयो जी, कृत्य कर॑ नृप एह ॥ करी प्रणाम पालो वढ्यो, श्राव्यो चितातुर गेद ॥ दो० ॥ १७ ॥ नारी कहे तुमने वीयो जी, वाघण उग्धादेश ॥ चित्तमा एदनी शोचना, शी शोचो बगे प्राणे श ॥ हो ॥ १५ ॥ कुमर कहे तमें केम लदी जी, घर वे एह वात ॥ स्वामी श्रमें अतरिक थर, नित्य थावु तुमारी सघात ॥ हो । २०॥ स्वामी श्रम्हें जाप्यु दत्त जी, करशे ए तुमच्नु कूड ॥ पण नि वय पियु जाणजो, पडशे एदने मुख धूड ॥ हो ॥ २१॥ कहेण सुणो थमच तुमें जी, देवत तुरगारुढ ॥ अटवीमा जाउ तुमें, ने एक देवी तिहां गूढ ॥ दो० ॥ २५॥ माता श्रमारी देवता जी, तेहनी सखी ते देवी ॥ तुरगयी उलखशे सही, करशे तुमची बहु सेव ॥ हो । २३ ॥ कहेजो कारिज तेदने जी, थाशे वाघण रूप ॥ तुम साथै सही थावशे, देवीनां यकल स्वरूप ॥ दो० ॥ २४ ॥ यापी रायने सोपजो जी, वधशे तुमारी लाज ॥ चढी तुरंगें चाल्यो वही, रमणी वयरों वत्स राज ॥ दो ॥ २५ ॥ थटवीमाहे मूकीयो जी, निहां देवीनुं गम ॥ दय थदिनाणे उलवी, की तस चितित काम ॥ दो ॥ २६ ॥ था घण या साथें चली जी, थावी नयरीमकार ॥ कान साहीने लावीयो

श्री शांतिनाथनो रास खंम पाचमो. श्र
जी, तेहने वत्स नृपदरवार ॥ हो ॥ २७ ॥ व्यंतरी वाघण नबली जी,
दे दोट तेवार ॥ कुमतिदायक मत्री तणो, कीधो ततण सहार ॥
हो ॥ २७ ॥ नृप विहीनो मनमां घणुं जी, हां हां हां वत्सराज ॥ कां
मुझने मारे शहा, नहि महारे दूधनु काज ॥ हो ॥ श्ए ॥ दीन वयण
सुणी रायनां जी, वाघण कानें साहि ॥ निजघर लाव्यो तेहनी, करे
कामिनी नक्ति उत्साहि ॥ हो ॥ ३० ॥ हर्पित थइ निजस्थानकें जी,
व्यतरी गइ ततकाल ॥ पंचम खम एकत्रीशमी, कहि काम उपर ए ढाल
॥ दो० ॥ ३१ ॥ सर्वगाथा ॥ एए। ॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥५॥
॥ दोहा॥
॥ नरपति मनमा चितवे, नय सबलो गयो नांजि ॥ साहसथी सवि
सपजे, पण नावीजे वाज ॥ १ ॥ पुनरपि मत्रीशु मसी, नरपति करे वि
चार ॥ तेडी कहे वत्सराजने, जल्पतु लावो वारि ॥ ५॥ अगरोग महा
रो टले, वधे तेजनु पूर ॥ तुफ विण कुण थाणे अवर, एक तुफ मुख पर
नूर ॥३॥ कदे ते पाणी किहा थडे, वध्याटवीमकार ॥ वेट्ठ पर्वत
विच कूप एक, तिहां जम्पतु वारि ॥ ४ ॥ करे सर्वदा ते गिरि, सगम
थपगम जाव ॥ मीलन उन्मीलनपणे, जिम ते नयण स्वजाव ॥ ५ ॥
वच्चें तक जो पेसवु, शीघ्र थाणवु वारि ॥ सुष्कर पण थगीकस्यु कुम
रें काम उदार ॥ ६ ॥ घर थावी नारी प्रत्ये, वात कही चित्त लाय ॥ ते
कहे वात ए सहेल , चिता म करो काय ॥ ७ ॥
॥ ढाल वत्रीशमी॥
॥ प्राणी गिरिवर मन सावो ॥ ए देशी ॥ थश्व थारोदी तिहां
पीयु जान, शकुनिकारू सारी ॥ एक देवी बहेन थमारी, वाजितनी
दातारी रे ॥ १ ॥ विरुई, विषयवशा जग दीठी ॥ करे थकारिज ए घट
प्रकटी, काम थनि थगीती रे ॥ विरुई० ॥ ए थांकपी॥थश्व चढी प
होतो तिण गमें, श्री वत्सराज कुमार ॥ शकुनिका जापी सखीनो व
मन, पूजे मुख समाचार रे ॥ विरुई० ॥ २॥ कुमर कह्याथी तुव न
रीने, दीधु ढील न कीधी ॥ पालो वलियो जल लेने, वाबित कारिज
सिदि रे ॥ वि० ॥ ३॥ निनपुर थावी नृपने थाप्यु, देवतणे परना
वें ॥ सद्भु सानलता बोलवा लाग्यु, तुवांहे सनावें रे ॥ विण ॥ ४ ॥

शश जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. कहे राजन तुमनें तुज मत्री, कुमति तणो दातार ॥ बेहुमाहे कडे लक्षण, करूं एम बोले वारि रे ॥ वि० ॥ ५ ॥ नीरवचन निसुणी पर्षद, विस्मय पामी चिते ॥ पाणी ए केम बोले रे नाई, ए तोगी विपरीत रे ॥ वि० ॥ ६ ॥ म्लान थयो राजा एम चिते, काज सिम्युं महारु ॥ काश्क वदन विकासी जपे, धन्य वत्स धीरज तहार । ॥ वि० ॥ ॥ घेर विसर्जि वत्सने विमासे, मत्री साय मलीने । थहो थसाध्य नदि का एहने, सुवनमा नाग्यवतीने रे ॥ वि.. ॥ ॥ मत्री चार मल्या नृप जेहवा, परघर जाजण लीणा ॥ कूड कपल बल बन्ने दो नरिया, धिक् मानव जगदीणा रे ॥ वि० ॥ ए॥ कहे राम न मन शु रह्या मूळी, लवो थमची बुद्धि केही ॥ एक यो ए केरेन कोइ, रमणी तुमची एही रे ॥ वि० ॥ १०॥ देवी श्रीकन्या विवाहनो, मिप करीने एक कीजें ॥ दक्षिण दिशि एक यमघर महोदु, तिहां वत्स पेसारीजें रे ॥ वि ॥ ११ ॥ यम निमत्रण करवा काजें, रायें वात र खाणी ॥ तुमें सवला मुम चिताना कारक, सेवक गुणमणिखाणि ॥ वि. ॥ १२॥ रायें एक गर्ता निपजावी, दक्षिण दिशे थविचारी ॥ कामें थंध श्यो धध न मामे, काम कुगतिदातारी रे ॥ वि० ॥ १३ ॥ अभि प्रजाली तिदां नृप श्राव्यो, मुनट सह तेडाव्या ॥ वत्सनणी बोलायो ते पण, चोंप धरीने थाव्या रे ॥ वि०॥ १४ ॥ नाम ले सुनटोने जाखे, तुमें कदमी मुझ खासा ॥ काम कयुं जोइयें एक हाकण, जो करो अमची थाशा रे ॥ वि० ॥ १५ ॥ फरमावो सट्ठ कदे कर जोडी, यम तेहणने जावु ॥ श्रीदेवी विवादनी उपरें, नृप कहे सुनटने चातुं रे ॥ वि० ॥ १६ ॥ श्रमिपूरित ए गामार्गे, थ यममविर जाय ॥ यम ने निमत्रण जे करि थावे, ते मुफ साचो सखाय रे ॥ वि० ॥ १७ ॥ वात को सघला कदे स्वामी, ए थमथी नवि सीफे ॥ जाणो तेरडे पुष्कर बीज, कारिज थमने वीजे रे ॥ वि०॥ १७ ॥ नृपें वरतराजनी सहामु नाट्यु, स्वामी हुकम मुफ कीजें ॥ तुम थाणा फुलमालतणी परें, शिर ऊपर धारीजें रे ॥ वि० ॥ १५ ॥ जई यमने तुमें नोतरी यायो, कीधु थगीकार ॥ घर थावीने कामिनी बागल,मामी कह्यो ए विचार रे॥ विणार०॥ पंचम खंमें दाल पत्रीशमी,धिक धिक विषय विकार ॥ राम कडे यत श्री शांतिनाथनो रास खम पांचमो. ३ जे विषयमांराता,ते नर मूढ गमार रे ॥वि०॥१॥ सर्वगाथा॥१०२२॥५॥ ॥ दोहा॥ ॥ कामिनी कहे तब कंतने, लीधु ए काम ॥ ए नृप तुम के थयो, मारणने सुणो स्वामि ॥ १ ॥ उगसाथे उग थाइये,धूतारे धूतार ॥ श्यो ख लने उपकार ए, सुगुणा कत विचार ॥२॥ कहे वत्सराज खरु कहो, पण की थगीकार ॥ मिय्या में थाये नहि, श्यो दवे एह विचार ॥ ३ ॥ ॥ जिढकेवसतामुने ॥ अन्यच्च ॥ वयणे जणिय खग्ग, कग्ग क ऊण सधिय वाण ॥ सुंदरि मुन का, मूया ते वयण चुक्कश्या ॥ १ ॥ अलसाय ते पवि स, ऊरोण जे अरकरा समुन्नविया ॥ ते पसरटंक किरि,य व नदु धनहा दुति ॥ २ ॥ पूर्वदोहा ॥ ते माटें यगीकयुं, पा लेबु में सार ॥ वचनचूक जीव्या तणो, स्वाद किस्यो ससार ॥ ४ ॥ कहे कामिनी थाधार एम, चिर जीवो महाराज ॥ एवं विराजो मालिये, उपकारी शिरताज ॥ ५ ॥ ॥ ढाल तेत्रीशमी॥ ।। लाघ्या तोडा तोड रे राज, लाघी नदी रे वनास ॥ ए देशी ॥ कदे कामिनी विद्याधरी राज, थलवेसर थम कत ॥ सुख विलसो ससारना राज, शी मनमा धरो चित ॥१॥ सादिवो रे महारो, उपगारी शिरतान ॥ साहिवो रे महारो, गिरु गरीवनिवाज ॥ सादिवो रे महारो, मोजी वडो महाराज ॥ साहिवारे जोवो,धणरो तमासो थाज ॥ ए थांकणी ॥ किंक ररूपें यक्ष्ने राज, कहे तेही एम वाणी ॥ कतरूप धरी कारिमुं राज, जा नृपपासें सुजाण ॥ सा ॥ २ ॥ जे कहे ते करजो तुम्हे राज, मत कहेजो नाकार ॥ सादिवरो पाणी रहे राज, वरतवु तेम निर्धार ॥ सा० ॥ ३ ॥ रूप धरी वत्सराजनुं राज, थाव्यो नरपति पास ॥ दुक म करो थे राजवी राज, म्हाने सुगुण थावास ॥ सा ॥ ४ ॥ जावो थे मदारी वती राज, यमने करि मनोदार ॥ मासमांहे शहां लावजो राज, का कहा वारं वार ॥ सा ॥ ५ ॥ लोक सहूको देखतां राज,थमिमाहे प्रवेश ॥ कीधो सह हा दा करे राज, धिक् धिक् राय थादेश ॥सा॥६॥ गुणरयणें गाढो नखो राज, वत्स सरीसो कुमार ॥ नृप निंदय दुवो घणो राज, मानो ए निर्धार ॥ सा० ॥ ॥ण वातें रुड नहि राज, थाव्यो L इन्श जैनकया रत्नकोप नाग आठमो. कहे राजन् तुफर्ने तुझ मत्री, कुमति तणो दातार ॥ पेडुमाहे कडे नक्षण, करु एम वोले वारि रे ॥ वि० ॥ ५ ॥ नीरवचन निसुणी पर्षद, विस्मय पामी चिते ॥ पाणी ए केम बोले रे नाई, ए तो विपरीत रे ॥ वि० ॥६॥ म्लान थयो राजा एम चिते, काज सिम्युं महारु ॥ काइक वदन विकासी जपे, धन्य वत्स धीरज सहारने ॥ वि० ॥ ७ ॥ घेर विसर्जि वत्सने विमासे, मत्री साय मलीने। थदो थसाध्य नहिं कांश एहने, सुवनमा नाग्यवतीने रे ॥ वि.. ॥ ॥ मत्री चार मल्या नृप जेदवा, परघर नाजण लीणा ॥ कूड कपर बल बन्ने दो नरिया, धिक मानव जगदीणा रे ॥ वि० ॥ ५॥ कहे राज न मन यं रह्या मूळी, वो थमची बुद्धि केही ॥ एक थडे ए केरेन कोइ, रमणी तुमची एही रे ॥ वि० ॥ १॥ देवी श्रीकन्या विवाहनो, मिप करीने एक कीजें ॥ दक्षिण दिशि एक यमघर महोदु, तिहां वत्स पेसारीले रे ॥ वि० ॥ ११॥ यम निमत्रण करवा काजें, रायें वात व खाणी ॥ तुमें सवला मुफ चिताना कारक, सेवक गुणमणिखाणि ॥ वि. ॥ १२॥ रायें एक गर्ता निपजावी, दक्षिण दिशें अविचारी ॥ कामें थध श्यो धध न मामे, काम कुगतिदातारी रे ॥ वि ॥ १३ ॥ अभि प्रजाली तिहां नृप श्राव्यो, सुनट सह तेडाव्या ॥ वत्सनणी बोलायो ते पण, चोप धरीने थाव्या रे ॥ वि०॥ १४ ॥ नाम ले सुनटोने नांखे, तुमें कदमी मुफ खासा ॥ काम कस्युं जोश्ये एक इहांकण, जो करो थमची श्राशा रे ॥ वि० ॥ १५ ॥ फरमावो सदु कहे कर जोरी, यम तेढणने जावु ॥ श्रीदेवी विवादनी उपरें, नृप कहे सुनटने थातुं रे ॥ वि० ॥ १६ ॥थमिपूरित ए गामार्गे, थ यममदिर जाय ॥ यम ने निमत्रण जे करि थावे, ते मुफ साचो सखाय रे ॥ वि० ॥१७॥ वात को सघला कहे स्वामी, ए यमयी नवि सीफे ॥ जाणो सेबई पुष्कर वीज, कारिज थमने वीजें रे ॥ वि०॥ १७ ॥ नृपें वत्सराजनी सहामु नाल्युं, स्वामी ढुकम मुफ कीजें ॥ तुम थाणा फुलमालतली परें, शिर कपर धारीजें रे ॥ वि०॥ १५ ॥ ज यमने तुमें नोतरी थारो, कीधु थंगीकार ॥ घर थावीने कामिनी बागल,मामी कह्यो ए विचार है। विण॥२०॥ पंचम खंमें दाल पत्रीशमी,धिक् धिक विषय विचार ॥ राम कडे , श्री शांतिनायनो रास खंम पांचमो न्य व उपर आज ॥ तेडण मुफने मोकल्यो राज, पाउधारो महाराज ॥ सा० ॥ २३ ॥ थ दर्पित मुफने तेणे राज, यग थानूपण दीध ॥ कहेवाडघु तुमने यमें राज, काज नलु ए कीध ॥ सा ॥ २४ ॥ तेडाव्या थमने तुमें राज, पण अमथी न अवाय ॥ ३६ दुकमथी माहरे राज, फुरसद पनी न थाय ॥ सा ॥ २५ ॥ ते माटे तुमें थावतु राज, एक वार मिलणने काज ॥ मुफ साथै ए मोकटयो राज, निज दौवारिक बाज ॥ सा ॥ २६ ॥ देखी थनिमेप नयणने राज, रायें मान्युं सवि साच ॥ व्यंतरपति तब वोलीयो राज, रायप्रत्य एम वाच ॥सा ॥ १७ ॥ दंमधरें फरमावियु राज, तुम सेवक मुज पास॥ खासा होवे ते मूकजो राज,खवर देवाने नन्नास॥सा॥२॥करांतेहनी चाकरी राज, श्रमथी यशे ते सार ॥ एम सुणी सेवक सद् राज,जावा यया दुशीयार ॥ सा ॥ श्ए ॥ कहे प्रति दार ते मोकलो राज, खासा जे होय तुम यार ॥ यमगृहपासें थावी या रान, राजन सद्गु परिपार ॥ सा ॥ ३० ॥ पंचमखमें तेत्रीशमी राज, ढाल जणी सुविचार ॥ पाप तणां फल पामशे राज, दवे ते जो जो चार ॥सा॥३१॥ सर्व गाथा ॥१५॥ श्लोक तथा गाथा मनी ॥५॥ ॥ दोहा॥ ॥ वेत्री कहे राजन सुणो,विपमोथमचो स्वामि ॥ रीतें तिहाकण जायें, तो सीफे सवि काम ॥ १॥ मानीताने मोकलो, पहेला महारी साथ ॥ प. राजा के. प्रजा, एम सह्र श्रावो साथ ॥ ५ ॥ चार सचिव तब चितवे, पहेलां गमने इष्ट ॥ फल दोवे चितित सही, नोजन सदियें मिष्ट ॥३॥ यत ॥ दाने याने शयने,व्याख्याने नोजने सजास्थाने ॥ क्रय विक्रयेऽतिथित्वे, राजकुले पूर्णफल श्राय ॥ १ ॥ शून्येऽरण्ये नवने, ग्रामे तोये नये च संग्रामे॥थारोहेप्यवरोहे, पुरस्सरेन्न पथि रात्रौ च ॥२॥ वोहा ॥ वेत्री पेतो थागमा,सगुलोकनी साख ॥ पू-पडीया चार ते, कदि नरपतिने नांख ॥ ॥ पडतखेव दुवा नस्ममय, निज थनिलाप समे त ॥ परलोकें गया पापीया, पापतणे सकेत ॥ ५ ॥ ॥ ढाल चोत्रीशमी ॥ ॥ दोरे लाल ॥ सरोवर पाणी चीखलो रे लाल ॥ ए देशी ॥ दोरे लाल ॥ राजा पण रंगे कल्यो रे लाल, पतंगललित करे जाम ॥ हो० ॥

ចម जैनकथा रत्नकोप नागम्मो. दो रायनो थंत ॥ काम कियो चांमालनो हो राज, न करे इस्मो कोर प्रात ॥ सा ॥ ७ ॥ शोच करे सहुको जना राज, नृप इर्पित ताम ॥ कहे मत्रीने थापरो दो राज, चढियो सिराडे काम ॥ सा. ए ॥ थाणो हवे ते सुदरी राज, म करो विलव लगार ॥ तष मंत्रीम जोडीने राज, कहे नरपति थवधार ॥ सा ॥ १० ॥ सकल प्रजा तुब उपरें राज, रागरहित ने स्वामि ॥ जो तेडावशो ए कामिनी राज, तो कि एसशे काम ॥ सा ॥ ११ ॥ सपद राग प्रजातणे राज, विण सपर श्यो राज ॥ राज विना रमणी किसी राज, सुण सुण गरिवनिवाज ॥ सा॥ १५ ॥ यत ॥ विनयेन नवति गुणवान, गुणवति लोकोऽनुरज्यते निस्य म् ॥ अनुरक्तस्य सहाया , ससहायो युज्यते लक्ष्म्या ॥ ३ ॥ पूर्वढाल ।। ते माटें तुमने कहा राज, पडखो तुमें एक मास ॥ अति उत्सुक हुवे द्रुते राज, दोवेजी काज विनाश ॥ सा ॥ १३ ॥ यत ॥ काज विचारी जे करे॥ मत्रीयें वायो नृप रह्यो रान,मास लगें जेमतेम ॥ वोने मासे कामयी राज, थध लुकम करे एम ॥ सा ॥ १४ ॥ तेडी चार प्रपा नने रान, हुकम करे नृप जाम ॥जाये लेवा नारीने राज, चतुर विचारी ताम ॥ सा॥ १५ ॥ यक मूकी पातलथी राज, पूरव नवनोजी बाप ॥ व्यंतरपति तेडावियो राज, ते पण थाव्योजी थाप ॥ सा० ॥ १६ ॥ तस थानरणे शोनावीने राज, दय बेसारीने देज ॥ मोकन्यो कंतने नृप कने राज, व्यंतरपति शुं सतेज ॥ सा ॥ १७ ॥ चद्भुटामारे संचमो राज, लोक मव्यां लख कोहि ॥ श्रदो पुण्याइ एदनी राज, पूम्याजी वांबित कोड ॥ सा ॥ १७ ॥ दरबारें नृप बागनें राज, कनोजी जोडी दाथ ॥ देखी विस्मय पामीयो राज, मन चिते जूनाथ ॥ सा ॥ १५॥ वीर एवं की, वृथा राज, एक मुनापित सार ॥ दिन रयणी श्रावे गर्ने राज, नावे मुबीजी वार ॥ सा ॥ २०॥ यत ॥ पुनर्विवा पुनारात्रि , पुन सूर्य पुन शशी ॥ पुन सजायते सर्व, न कोप्येति पुनर्सत ॥३॥ पूर्वढाल ॥ पूजे नृप वत्सराजने राज, कुशली यमदेव ॥ महिमा जेहनो थाकरो राज, करे बढ़ सुर जस सेव ॥ सा ॥ ११ ॥ पून मुमने तुम सखा राज, केम बदु दिवसें थाज ॥ तुझ स्वामी सनारीयो राज, मित्र दु ते वत्सराज ॥ सा० ॥ ॥ कयु तष में मुण सादिया राज, उत्त

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श्री शातिनाथनो रास खंम पांचमो.
एन्छ
मंदिर गयो महाराज ॥ हो० ॥ का ॥ १२ ॥ हो ॥ लोक गयां सद्ध
स्थानके रे लाल, धरतां विस्मय नूरि ॥ दो० ॥ एह निमित्तथी रायने रे
जाल, वाध्यु वैरागनु पूर ॥ दो० ॥ का० ॥ १३ ॥ हो॥ चिते पाप घj
कस्यु रे लाल, परदारानी थाश ॥ हो ॥ आतमलघुता में करी रे
लाल, वाथ्यो पापनो राशि ॥ हो ॥ का ॥ १४ ॥ हो ॥ एम चित्ती
निजवालिका रे लाल, परणावे नूपाल ॥ दो० ॥ राज्य दीयु करमोचनें रे
लाल, महेली मन ढक चाल ॥ हो ॥ काम् ॥ १५ ॥ दो० ॥ नृप
शदि मूकी निसखो रे लाल, थयो तापस वनमाय ॥ हो ॥ करे
तप वर थानथी रे लाल, नवि सनाले कांय ॥ हो ॥ का॥ १६ ॥
॥ दो० ॥ राजा ययो वत्सराजजी रे लाल, वीरसेन नृपनो नद ॥
॥ दो० ॥ सकल गुणें करी शोनतो रे लाल, दिन दिन थधिक थानद
॥ दो० ॥ का ॥१॥होण॥ देश घणा साध्या तेणें रे लाल, वरती चिट्ठ
खम थाण ॥ दो० ॥ नूप सवे थावी नम्या रे लाल, हुकम करे परमाण
दो० ॥ का ॥ १७ ॥ दो० ॥ चिट्ठ राणीशु जोगवे रे लाल, शझ्यिसुख
सुविलास ॥ हो ॥ इति निवारी वेगली रे लाल, पूगी मनडानी थारा
॥ हो ॥ का ॥ १ए दो॥ कीर्ति पसरी चिट्ठ विशे रे लाल, ढाकी ते
न रहंत ॥ हो० ॥ वात विद्या कस्तूरिका रे लाल, थापेंदी प्रगटत ॥ हो
॥ का ॥ २० ॥ यमुक्तं ॥ वार्ता च कौतुकवती विशवा च विद्या, लोको
तर परिमलश्च कुरगनाने ॥तेलस्य वितरिव वारिणि, उर्निवार एतचयं प्रसर
तीति किमत्र चित्रम् ॥ ७ ॥ दो ॥ पंचमखमें ए कही रे लाल, ढाल चो
त्रीशमी रंग ॥ दो० ॥ रामविजय कहे देज रे लाल, कीजें पुण्य प्र
सग ॥ हो ॥का॥१॥ सर्वगाथा ॥१७॥ श्लोक तथा गाथा ॥२॥
॥ दोहा ॥
॥ण थवसर निज नयरीयें, पसरी वात पर ॥ वत्सराज राजा
थयो, उहयिनी वड नूर ॥१॥ लख्यो लेख परजा मली, नृप वत्सराज
ने थाम ॥ वहेला वलजो साहिवा, श्रम प्रतिपालन काम ॥ २ ॥ दूत
लेख लेई चल्यो, थाव्यो नयरी रहेण ॥ नृप वत्सराजने सोपियो,
थावी दर्प नरेण ॥ ३ ॥

में शब्द जैनकथा रलकोप जाग आठमो. थमि जसंतमां थाकरो रेलाल, ग्रह्यो वत्सराज ताम ॥१॥ साल ॥ काज विचारी कीजीये रे लाल ॥ सुण प्रथिवीपति हो ॥ नीरखी परखीने जे करे रे लाल, न दुवे तस जंजाल ॥ हो काज वि० ॥ २ ॥ हो । मत जाणो ए मनमा रे लाल, मुन कोय ॥दो॥ ए पटु नाटक में सही रे लाल,तुमने देखाडघु जोय ॥ोर ॥ कान ॥३॥हो॥ ए सवि मत्री कुबुदिया रे लाल, कूर तणाका नार ॥ दो ॥ मुफने प्राणात कठमें रे लाल, नाख्यो मति षटु वार । दो ॥ का० ॥ ४ ॥ दो० ॥ देवतणा परनावथी रे लाल, पूगाच्या एह ॥ दो० ॥ अमिमाहि होमावीया रे लाल, रह्यो हु थखमित देह दो० ॥ का० ॥ ५ ॥ यत ॥ कृते प्रतिकृतं कुर्यात्, लुचिते प्रतिनुचितम् । त्वया सुचापिता पक्षा, मया मुमावित शिर ॥ ३ ॥ दोहो ॥ धुत्तह कीजें धूतिया, थालद दिले थाल ॥ मित्तद किङ मित्तडी, एम गमि काल nan पूर्वढाल ॥ दो० ॥ म म जीवो जे जला था रे लाल,दिये परने दि॥ हो ॥ परोहें परधन नारीने रे लाल, चाहे ते जुर्बु७ि ॥ हो । का॥ ६ ॥ दो० ॥ नृप श्रारिज कदो शुं करे रे लाल, जिहां मंत्री होये कुलात ॥ हो ॥ नृप नूमो पण झुं करे रे लाल, जिदा मत्रीश सुजात ॥दोण॥ का० ॥ ॥दो॥ तु स्वामी ने माहरो रे लाल, नाख्यो में नवि जाय ॥ दो० ॥ स्वामिशेदनु मोटक रे लाल, जगमा पाप कहाय ॥ दो० ॥ का ॥ ७ ॥ दो० ॥ जूमो पण शेद अन्यनो रे लाल, दिये खनो सदोद ॥ दो० ॥ स्वामी मित्र गुरुतणो रे लाल, अति माठो कमो शोद ॥ दो० ॥ का० ॥ ए ॥ हो ॥ वात मुणी नरराजीयो रे लाल, चित्तमा लाज्यो जोर ॥ दो॥ मुफ चेष्टित एवं लघु रे लाल,में कहुं कर्म कठोर ॥ दो० ॥ का० ॥ १० ॥ दो० ॥ एवविध अपराधने रे लाल,सक्ति बतें सह्या जेण ॥ हो ॥ राज्य न लीधु न बालीयो रे लाल,पर उपकारी गुणेण ॥ दो० ॥ का ॥ ११ ॥यत ॥ स्वयमक्षम समम, छमते समया न जाति चान्यर्दिम् ॥ ननव तत् क्षमताया,मिद दिलोकोत्तर चरितम् ॥५R थस्योत्तमस्य परमा,प्रकृति प्राणांतगस्य न हि विपमा ॥ तस्यापमाघमोऽई, कथमनृणीनावमाप्तोस्मि ॥ ६ ॥ पूर्वढाल ॥ दो० ॥ इत्यादिक निम दतो रे लाज,प्रशसतो वत्सराज ॥ हो ॥ नवनिर्विस ताशी परें रे माला, , श्री शांतिनाथनो रास खंम पांचमो. एनए शुज संयोग ॥ राज्य साते थंग शोजित, यग तेम नीरोग ॥ वाधीयो यशोवाद जगमां, दु धर्मने योग ॥ व० ॥ १० ॥ एहवे एक दिवस याव्या, वनहमां गणधार ॥ धर्मरुचि मुनिराज रूडा, करे किरिया सार ॥ कर्म जीपण काज पाले, शुद्ध पचाचार ॥ चारझानी ध्यानी, समो सस्या थपगार ॥ २० ॥ ११ ॥ यावी वनपालक वधामणी, दीधी तेपी वार ॥ चिरंजीवो स्वामि मोरा,प्रजाना थाधार ॥थावीया उद्यानमाहे,मुनि यह परिवार ॥ निमुखी तेदने दान थापे, दरखि चार हजार ॥ व० ॥ १२॥ लेइ सवि परिवार थावे, वांदवा उजमाल ॥ वत्सराज नरिंद महोटो, शदि काक ऊमाल ॥ थावी गुरुनां चरण वदे, खम पंचमे ढाल ॥ पांत्री शमी कदी रामविजयें, धन्य एनूपाल ॥व०॥ १३ ॥ सर्वगाथा॥११०॥ ॥ दोहा॥ ॥ पंचानिगम प्रणाम करि, वेतो राम नूनाग ॥ कहे मुनिवर हवे देश ना, आणी अनुनव राग ॥ १ ॥ सुकतें रत नरपति प्रणत, उद्देशी गुरुरा ज ॥ चाहें जवि धर्म करो तुमें, जेम लहो शिवपदराज ॥ २ ॥ तेह धर्म दोय नेव , सागार ने अणागार ॥ जीवदया तस मूल ने, एदनो थवर विस्तार ॥ ३ ॥ सर्वविरति निर्वादने, मुनि श्राराधे तेह ॥ ते विण बाराधन नोदे, तेहनु सुण गुणगेह ॥ ४ ॥ यतिधर्मे समरथ नहिं, ते शुगृहीनो धर्म ॥ पडिवळतो परंपर लहे, सिम स्वरूप थकर्म ॥५॥ छादश व्रत रूपं नसो, ते नांख्यो जगवत ॥ श्रादरीयें थादर करी, जिम हवे सुस्क थनत ॥ ॥ केश्क जोजन लालची, वनु नर नारीरत्त ॥ माव्य विजेपन जोगीया, दीसे घणा जगत्त ॥ ॥ गीत तणा थर्थी घणा, यूत कथा रसलीग ॥ केशक वाहन गज वपन, रसिया दीसे दीए ॥ ॥ पण जे व्यसनी धर्मना, तेहना नमीय पाय ॥ धन्य तेह धरणी तलें, पावन तेदनी काय ॥ ए ॥ ॥ ढाल बत्रीशमी ॥ ॥ दर्पनर हम पोलजो जी ॥ए देशी ॥ देशन सुणी गुरु वदीने रे, कहे वत्सराज नरेश ॥ तारक नवमा तु मव्यो रे, साचो तुम ठप देश ॥ १ ॥ सुगुरु मुफ, तारक मलियोथाज ॥ मुगुरु मुज, सारो वांछित काज ॥ सुगुरु तुम, पालव वलम्यो थान ॥ मुगुरु मुफ, साचो जगी जहा , .

ܝܢ 7 E , जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ॥ ढाल पांत्रीशमी॥ ॥ राग सिधूडो॥ तथा॥प्रवलकाल तणो पयोनिधि,गामतो गंनीर । देशी ॥ लेख लीधो हाथ तताप, दीध वाचक हाथ ॥ उखेलीने ते वांचे, सांगले नूनाथ ॥ स्वस्ति उहायिनी पुरी जिहा,नृप वसे वत्सराम। क्षितिप्रतिष्ठित नगरहूती, लखे लेख समाज ॥१॥ वहेलाथावजो रे, बारम लावजो रे, राजेश्वर नावजो रे, जग जस पावजो रे॥ए बाकणी॥मीण अर्दित मेघ चाहे, शीतपीडित थाग ॥ जेम सनारे सहूनो, तेम तुम राग ॥ शीघ्र आवो था थमचा, स्वामी तुम वडनाग ॥ अन्यथा अमने शहाकणे, नहिं रह्यानो लाग ॥ वहेला० ॥ ॥ देवरान ए 5 खदायी, करे सवल थन्याय ॥ सुख नहीं ए नयरमाहे, जिदा एदवो राय ॥ शु घणु तुम दाखीये मत, ढील करजो काय ॥ वत्स सघली वात निसुणी, मेलियो समुदाय ॥ वहेला ॥ ३ ॥ तिहां सुनट नट कोटि मलिया, वाजते निशाण ॥ सैन्यनार ए धरा न खमे, चढयो नृप वनराण ॥ पर धानने निज राज्य सोंपी, साथै सवत ममाण ॥ क्षितिप्रतिष्ठित नयर ध नुक्रमें, थावियो दुइ जाण ॥७॥॥ मोकल्यो देवराजने एक, दूत वस्से ताम ॥ जाणियुं वत्सराज थाष्यो, करणने सग्राम ॥ दु लडवा काज तस्पर, देवराज थनाम ॥ सैन्य जइ बाहेर थाव्यो, वडो तेद दराम ॥ ॥ व० ॥ ५ ॥ सामत सघता नहिं रागी, वत्स पर प्रेम ॥ कोई तन देवे ही तिहां, देवराजने तेम ॥ वदन फीके चित्तमांदि, तेह चिते एम। फस्यु सेना सद्गु लश्कर, रवं जीतीये केम ॥ 4 ॥६॥ रात खेई तेद नाटो, देवराज नरिंद ॥ वस्स सदामो चढी थाव्यो, वीरसेन फरजंद ॥ हाथ जोडी पाय लागी, सचिव नृत्य थमद ॥ चिर जीवो स्वामि यमचा, सद कहे थानद ॥ २० ॥ ७ ॥ लोक दर्षित ढुवा सघला, महोत्सव बहु थाय ॥ वाजते नीशाण पुरमा, करे परवेश राय ॥ बोले बदीजन जयारव, हैठे दर्ष न माय ॥ थाव्यो प्रजापाल नृपति, टल्या दूर अन्याय ॥ व० ॥ ॥ ॥ तखत कपर थावी बेता, वखत वलीयो सार ॥ सड हाथ जोरी पाय लाम्या, दुर जय जयकार ॥ राज्य बेहू नलां पाजे, व्यसन सात निवार ॥ पुहवी वत्स नरेश थाणा, वधी बहु विस्तार ॥ १० ॥ ॥ ना रि चिट्ठ सघात विलसे, देवनी परें जोग ॥ पुष्यधीसवि मावि मलीया, तर श्रीशांतिनाथनो रास खंम पांचमो श्नए शुज संयोग ॥ राज्य साते थग शोजित, अग तेम नीरोग ॥ वाधीयो यशोवाद जगमां, दु धर्मने योग ॥ व०॥ १०॥ एहवे एक दिवस थाव्या, वनहमां गणधार ॥ धर्मरुचि मुनिराज रूडा, करे किरिया सार ॥ कर्म जीपण काज पाले, शुद्ध पंचाचार ॥ चारज्ञानी गुरुध्यानी, समो सस्या थपगार ॥ ३० ॥ ११ ॥ थावी वनपालक वधामणी, दीधी तेणी वार ॥ चिर जीवो स्वामि मोरा,प्रजाना आधार॥यावीया नद्यानमांदे,मुनि पट्ठ परिवार ॥ निसुणी तेहने दान थापे, दरखि वार हजार ॥ ७ ॥ १२॥ ले सवि परिवार यावे, वांदवा उजमाल ॥ वत्सराज नरिंद महोटो, शदि काक ऊमाल ॥ थावी गुरुनां चरण वदे, खम पंचमे ढाल ॥ पांत्री शमी कही रामविजयें, धन्य एनूपाल ॥व०॥ १३ ॥ सर्वगाथा॥११॥ ॥ दोहा ॥ ॥ पंचानिगम प्रणाम करि, वेगे शुम जूनाग ॥ कहे मुनिवर हवे देश ना, थाणी थनुनव राग ॥ १ ॥ सुरुतें रत नरपति प्रणत, उद्देशी गुरुरा ज॥ चाहें नवि धर्म करो तुमें, जेम लहो शिवपदराज ॥२॥ तेह धर्म दोय नेद , सागार ने थणागार ॥ जीवदया तस मूल , एहनो यवर विस्तार ॥३॥ सर्वविरति निर्वाहने, मुनि थाराघे तेह ॥ ते विण बाराधन नोहे, तेनु सुण गुणगेद ॥ ४॥ यतिध समरथ नहिं, ते शुगृहीनो धर्म ॥ पडिवजातो परंपर सहे, सिम स्वरूप अकर्म ॥ ५ ॥ हादश व्रत रूपें नलो, ते नाख्यो नगवत ॥ श्रादरीयें थादर करी, जिम दुवे सुरक बनत ॥ ६ ॥ केशक नोजन लालची, वह नर नारीरत्त ॥ माव्य विलेपन नोगीया, दीसे घणा जगत्त ॥ ॥ गीत तणा थर्थी घणा, यूत कथा रसलीण ॥ केशक वादन गज पन, रतिया दीसे दी ॥ ७॥ पण जे व्यसनी धर्मना, तेदना नमीय पाय ॥ धन्य तेद धरणी तलें, पावन तेदनी काय ॥ ए॥ ॥ ढाल बत्रीशमी॥ ॥ दर्पनर हम वोलजो जी ॥ ए देशी ॥ देशन सुणी गुरु वदीने रे, कहे वत्सरान नरेश ॥ तारक नवमां तु मल्यो रे, साचो तुम ठप देश ॥ १ ॥ सुगुरु मुफ, तारक मलियो थाल । मुगुरु मुफ, सारो वांछित काज ॥ मुगुरु तुम, पालव वलम्यो थाज ॥ मुंगुरु मुफ, साचो जंगी जहा श जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ज॥ए श्रांकणी ॥ चरणधर्म प्रच दोहिलो रे, मुमहूती न सपाय : भारत व्रत बच्चरावीयें रे, मुफने करि सुपसाय ॥ सु०॥ ॥ गुरु कहे देवाछु प्पिया रे, उमाये तेम ठाम ॥ थारन के. थनादिनो रे, लागी रह्यो बीच मामि ॥ मु० ॥३॥ व्रत वारे गुरुजी मुखे रे, सञ्चरियां वत्सराज। थइ कतारथ थावीयो रे, निजमदिर महाराज ॥ सु० ॥ ४ ॥ मात कल्प करीने तिहा रे, गुरु विचवा यन्य देश ॥ श्रावकव्रत थाराषतो तृप पाले निजदेश ॥ 8 ॥ ५ ॥ चैत्य करावे जिन तणां रे, विंब जरावे सार ॥ वान सुपात्रं दे नजां रे, करे सफलो अवतार ॥ मु० ॥ ६ ॥ ली तेदन मुनि याविया रे, विचरंता तेणें ठाम ॥ वत्सरान वदण चमो रे, जइ वद्या गुणधाम ॥ सु० ॥ ॥ देशन सुणी पूढे प्रल रे,कदो प्रव श्रवदात ॥ थापद टली सपद दुई रे, कोण कर्मनी वात ॥ १० ॥७॥ गुरु कहे सांजल राजिया रे, जब नरतमकार ॥ पुर वसतपुरमा वसे रे, शूर नृपति सुखकार ॥ सु० ॥ ए ॥ सरलातम सोदामणो रे, दाक्षिण गुण संयुक्त ॥ निर्लोनी सहेजें जलो रे, देव गुरुनो नक ॥ सु॥१०॥ वान खीने थापतो रे, निज सपद भूपाल ॥ पाले प्रजा रूडी परें रे, न्यायरीतें उजमाल ॥ सु० ॥ ११ ॥ इत्यादिक गुणें शोनतो रे, पण शीलालंकार ॥ शोजित दानगुणे करी रे, पसयो यशविस्तार ॥ १० ॥ १२ ॥ तस थतेउरमां शिरें रे, शूरवेगा वर नारी ॥ विद्याधरकुल नप नी रे, चाले पति याचार ॥ १० ॥ १३ ॥ ते कपर बीजी वरी रे, रति चूला नृपजात ॥ तस रूपें रीज्यो घणु रे, न जहे विद ने रात ॥ मु०॥ १४ ॥रायें थवरने परहरी रे, वात जे ए सपरांत ॥ देवीये तुफ धागत कसं रे, सघल्लु तस वृत्तांत ॥ सु० ॥ १५॥ गधवादनगतिनी सुता रे, परणावी जेणें वोय ॥ ते देवीना कदेणथी रे, तुमें जाणो सट्ट कोय ॥ मु० ॥ १६ ॥ सूर नृपति चवि तु थयो रे नृपनवन वस्सराज ॥ दाना दिक शुन कृत्यथी रे, पाम्यो अतुलपल राज ॥ सु० ॥ १७ ॥ कयुं पूर्वे ईश्वरपणे रे, कोश्क थतरायनु कर्म ॥ राज्यनृशादिक तें जK रे, पूर्व वयमा थशर्म ॥ सु० ॥ १७ ॥ गुरु वयणां एम सांजली रे, जातिस्म रण सार ॥ जेम नारख्यु तेम सानण्ट रे, सह्यो वैराग्य अपार ॥९॥१९॥ धन्य झानी तुम ज्ञाननें रे, कही साची ए वाणी ॥ तुम विण कुण एम , श्री शांतिनायनो रास खम पाचमो. एएए उपदिसे रे, गिरुथा गुणनी खाणि ॥ सु० ॥ २० ॥ स्थापी राज्ये तनयने रे, थाश दु तुम शिष्य ॥ वादीने घरे थावियो रे, नरपति सवल जगीश ॥सु० ॥ २१ ॥ श्रीशेखर निजपुत्रने रे, सोपी राज्यनो नार ॥ चिटुं नारी राजीयो रे, थयो सूधो थपगार ॥ १० ॥ १२ ॥ वत्सराज शपिराजियो रे, चाले कय विहार ॥ चोखु चारित्र पालीने रे, पाम्या सुरपद सार ॥ मु० ॥ २३ ॥ देवलोकहूती चवी रे, करशे नरनव एक ॥ कर्म खपी केवल सही रे, सहेशे मुक्ति सुविवेक ॥ सु० ॥ २४ ॥ धनरथ प्रचुजीयें कह्यो रे,शर तणो सबंध ॥ यापद टली सपद थई रे, पुण्य तणो अनुवध ॥ सु० ॥ २५ ॥ इति वत्सराजसवध ॥ पंचम खमें बत्रीशमी रे, ढाल कही मुणो सत ॥ रामविजय कहे सानलो रे, जिनगुण एकण चित्त ॥सु॥ २६ ॥ सर्वगाथा॥ ११३५॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥३॥ ॥ दोहा ॥ ॥ देशन सुणी जिनराजनी, श्री मेघरथ नूपाल ॥ चारित्रने उत्सुक थयो, तनी मोह जजाल ॥ १ ॥ घर यावी दृढरथ नणी, कहे वधव ल्यो राज ॥ प्रजुपासें दुव्रत ग्रही, सारिश थातम काज ॥ २॥ कहे दृढरथ सुण वधवा, ए नरकांतज राज ॥ एहने कारण काज हु, नवि विसाडं थाज ॥३॥ तेणें निज थगज स्थापियो, मेघसेन थनिधान ॥ रथ सेन दृढरथसुत जणी, युवराजा पद ताण ॥ ४ ॥ ॥ ढाल साडनीशमी॥ ॥ तुमने नलें थाव्या कहियें जी, यूलिन नलें थाव्या ॥ ए देशी ॥ मेघरथ घनरथ जिन वांदे जी ॥प्रजुनी सोनागी ॥ मुफ थापो चरण थान जी ॥ वारू वह नागी ॥ १ ॥ मुफ मनना मनोरथ फलिया जी ॥अनु०॥ थाज देवाधिदेव मुज मलिया जी ॥ वारू०॥ २ ॥ मुफ चारित्र थापो चोखं जी ॥ प्र० ॥ निज थातमगुणने पोखं जी ॥ वा० ॥ ३ ॥ मुज नवजलहूती तारो जी ॥ ॥ घनरथ जिन मुफ उगारों जी ।। वा०॥ ४ ॥ नृप चार सहस सघातें जी ॥ प्र० ॥ सुत मुदर सातशे साये जी ॥ वा० ॥ ५ ॥ वधव दृढरथनी जोडी जी ॥प्र० ॥ लिये चारित्र मदने मोडी जी ॥वा॥६॥ ग्रही श्रीजिनदाथे दीक्षा जी ॥प्रा थाराधे जिननी शिक्षा जी ॥वा०॥७॥ पंच समिति गुप्ति रखवाले जी॥प्र०॥

शएश जैनकथा रत्नकोष नाग आग्मो. षट्काय नणी प्रतिपाले जी॥ वा० ॥ ॥ दोप रहित जीये बाहर ॥॥ मुनि पाले पंचाचार जी ॥ वा० ॥ ॥ कटु मुनिनी किर्षि देती जी॥ ॥ व्रत पाले नावनसेंती जी॥ वा० ॥१०॥ श्रीधनरपचिन उपकारी जी॥ प्र० ॥ प्रतिवोध्यां वद् नर नारी जी ॥ वा० ॥११॥ नव. मज उवे प्रनु पाया जी॥०॥ सुर थसुर मती गुण गाया जीवा। १२॥ मल धोई थघाती केरो जी॥प्र० ॥ जिन लो शिव ठाम नमेरो जी ॥ वा ॥ १३ ॥ हवे मेघरय मुनि निर्मायी जी॥प्र० ॥करे सभी साधुकमाई जी ॥ वा ॥ १४ ॥ थाराघे स्थानक वीश जी ॥प्र। बांधे जिननाम जगीश जी ॥ वा० ॥ १५ ॥ थरिदत सिप्रवचन नाम जी ॥ ॥ गुरु थिविर साधु गुणग्राम जी ॥ वा० ॥ १५ ॥ वा त्सव्य एदोनां करवां जी ॥ ॥ वद्वश्चत तपस्वी चित्त धरवा जी ॥वा ॥ १७ ॥ शुद्ध झानतो उपयोग जी ॥ ॥ दर्शन गुण विनयनो योग जी ॥ वा ॥ १७ ॥ थावश्यक शीलवत लेखे जी ॥ ॥ रहे निरति चार विशेष जी ॥ वा० ॥ १५ ॥ क्षण लव तप त्याग विचारो जी ॥ ॥ ॥ वैयावचे समाधि गुण धारो जी ॥वा ॥२०॥ ग्रहे ज्ञान अपूरव होंशे जी ॥ प्र० ॥ श्रुतनक्ति करे सुविशेष जी ॥ वा ॥ १ ॥ प्रवचन प्रजावना सारी जी ॥५०॥ विशमे बोले निर्धारी जी॥वा॥१२॥ करे सिंदनिकीडित साचु जी ॥ ॥ तप जेदवु कचन जाचु जी ॥ वा. ॥ २२ ॥ करे किरिया मुनिवर साची जी ॥ ॥ जिनपद बांष्णु नि काची जी ॥ वा ॥ २४॥ लाख वरस चरण थाराधी जी। प्र० ॥ चढती गुणश्रेणी वाधी जी ॥ वा ॥ २५ ॥ निजकाय थथाम ए जाणी जी॥ प्र० ॥ दृढरय मुनि मुगुण खाणी जी ॥ वा ॥ २६ ॥ तिलका चल उपरें बेदी जी ॥ ॥ शुद्ध नूमितल पहिलेदी जी ॥ वा० ॥ २७ ॥ लख चोराशीने खमावी जी॥ ॥ मन वेराम्य नावना जावी जी॥ वा०॥ २७ ॥ शरणां चार सदार जी॥प्र॥ करे अणसण गुण मार जी ॥वा०॥ २५ ॥ वोसिरावी तेणें निज काया जी ॥प्रनहिं मन ममता ने माया जी ॥ वा० ॥ ३० ॥ मनमांहे समाधिने साधी जी ॥ प्र०॥ सारथ सिदिशदिलाधी जी ॥ वा ॥३१॥ तेत्रीस सहस । प जाय जी ॥ प्र० ॥ तव नूखनी वा थाय जी ॥ ॥३१॥ ते श्री शातिनाथनोरास खमपाचमो. एए३ त्रीश पखवाडे ननास जी ॥ प्र० ॥ एक वार ले श्वासोवास जी ॥ वा ॥ ३३ ॥ चशेदय रुचि उद्योत जी ॥ प्र० ॥ तिहा चोसह मणनु मोती जी ॥ वा ॥ ३४ ॥ चिहु पासें चार ते सोहे जी ॥ प्र० ॥ वत्रीश म णना मन मोहे जी ॥ वा० ॥ ३५ ॥ यात शोल मणां कह्या वारु जी॥ प्र० ॥ तस पापतीयां मनोहारु जी ॥ वा० ॥ ३६॥ शोल याउ म णानी उलें जी ॥ प्र० ॥ श्रागममांहि प्रन्नु एम वोले जी ॥ पागतर ॥ ते दीपे तेज अमोलें जी ॥वा॥३॥ चिट्ठ मणनां मोती वत्रीश जी ॥॥ चोसत दोय मणीया जगीश जी ॥ वा ॥३॥ एक शो घडवीस वखाणो जी॥०॥ एक मणीया मोती जाणो जी॥ वा० ॥ ३॥ एम दो यशे त्रेपन होय जी ॥ प्र० ॥ मुक्ताफलसख्या जोय जी ॥ वा० ॥ ४० ॥ समकितदृष्टि मति सारी जी ॥प्र० ॥ सहुये जिहां एकाव तारी जी ॥ वा ॥४१॥ लवसत्तमिया एवं नामें जी ॥ प्र० ॥ देव सर्वा रथसिम गमें जी ॥ वा ॥ ४२ ॥ प्रनु तिहां जलीये थवतार जी ॥प्र॥ यगियारमे नव थधिकार जी ॥ वा ॥ ४३ ॥ दृढरथ मुनि पण तिहां जाय जी ॥ ॥ लही सुरपदवी सुखदाय जी ॥ वा० ॥ ४४ ॥ खम पाचमे साडत्रीशमी ढाल जी ॥ ॥ कहे रामविजय उज माल जी॥ वा० ॥ ५ ॥ ॥ ढाल ॥ चोपाई ॥ खम खम चतुराई घणी, शांति प्रचुरासें में सुणी॥ तेह तणो ए पचम खम, पूरण हून राग थखम ॥ १ ॥ सवत सत्तर पं चाशिये सदी, राजनगर चोमासूं रही ॥ श्री सनवजिनने सुपसाय, पंचम रच्यो सुखदाय ॥२॥ सागरगड उदयाचलनाण, श्रीलक्ष्मीसागर सूरि सुगुणनिधान ॥ तेह तणे राज्ये थतिचग, रात रच्यो में धरि मन रंग ॥३॥ श्रीगुरु सुमतिविजय कविराज, उपकारीमांदे शिरताज॥ तास शिष्य एम द नणे, शातिप्रजुने जान नामणे ॥॥ सर्वगाथा ॥११॥ श्लोक तथा गाथा मली॥६॥खम पांचेनी गाथा ॥ए॥ खंम पाचेना प्रास्ता विक श्लोक तथा गाथा ॥ ११॥पाचे खमनी ढाल ॥१५०॥ इति श्री शातिनिनप्रवघे रासवधे सुरूतानुसधे हादशनवनिवधे देवराजवत्सराजसव घोपवृहितदशमैकादशनववर्णननामा पचम खम समाप्तिमगमत् ॥ ५ ॥ खम प्रनु, शए४ जैनकया रत्नकोप नाग आग्मो ॥अथ पष्ठखंमस्य प्रारनोऽयम्॥ ॥ दोहा॥ ॥ सुखकर सादिव सेवियें, त्रेवीशम जिन पास ॥ श्रीराखेश्वर प्रमट नामें लीलविलास ॥ १ ॥ वासवपूजित चरणकज,वदू दीनदयाल । परगट परतो पूरवा, चितामणि सुरसाल ॥ २ ॥ ही यह पासनी, मूलमत्रनो जाप । थापद सवि दूरे टले, मटे मोह सताप ॥ ३॥ अष सेनकुलदिनमणि, वामामात महार ॥ ते जिन प्रणमीने कई, उभे खंम मुखकार ॥ ४॥ जिनगुण केरी सकथा, करता नासे पाप ॥ष सिता चित्त विषु पीये, तोहि नासे सवि ताप ॥ ५ ॥ शातिनाथ शोलम विलु, कहेतां तास चरित्र ॥ जवकोटिक पातक टले, थाये जन्म पवित्र ॥ ६ ॥ सर्वारथ मुख जोगवी, तेत्रिश सागर थाय ॥ चवि तिहाथी जिहां श्रवतरे, ते निमुणे चित्त लाय ॥ ४ ॥ ॥ ढाल पहेली॥ ॥ चितामणि स्वामी, सच्चा साहिब मेरा ॥ ए देशी ॥ जंबुद्धीपमा दहि ण जरतें, आदि जिपद सुखकारी ॥ तेदनी सततिमा हुन रे, कुरुनामें न पति सुविचारी ॥ १ ॥ शांतीश्वर जिनकी, सुणो कीर्ति सारी ॥ ए बांक ए॥ तिण नामें कुरुदेश थनोपम, दुल सपद गुणधारी ॥ तास तनय हस्ती तेणें नामें, दस्तिनापुर थवतारी ॥ शांतीश्वर० ॥ ॥ ते दक्षिणा उर सुरपुरसुदर, शोना समुदयनारी ॥ चोराशी बाजार विराजित, दीपे थति मनोहारी॥ शां० ॥ ३ ॥ एक नूमि वोयनमि प्रिनूमिक,पत पंच नमि प्रकारी ॥ सुर थावास जिस्यां जिहां मविर, निवसे सुखी नर नारी ॥ शां ॥ ४ ॥ सद्ध जिनधर्मी जिनेश्वर गुणने, गाये नित्य अगारी ॥ वान दया धर्म जिहां थति दीपे, सह कोई शुन श्राचारी ॥शां० ॥ ५ ॥ श्क्ष्वाकुवशी तिहां विश्वसेना, निध नरपति रतिकारी ॥ न्यायें राज्य प्र जापत्ति पाले, दूरे इति निवारी ॥ शां० ॥ ६ ॥ स्वामी थमात्य मुहद वल शोनित, कीर्ति कामणगारी ॥ चिट्ठ दिशिमाहे वध्यो जस महिमा, रेख नदि कांश कारी ॥ शां० ॥ ॥ तस घर रमणी रूप बजकत, रति रना पण दारी ॥ थचिरा नामें सती सत्यवती, वान अनपदातारी

श्री शांतिनाथनो रास खंम छो ए
॥ शां० ॥ ७ ॥ एकदा नाइपदें वदि पदे, सप्तमी तिथि अधियारी ॥ नर
णीगत चई मेघरथजीनो, जीव ते रयणी मझारी ॥ शां० ॥ ए ॥ सरवा
रथ सिबहूती चवियो,थचिरा उयरें सुविचारी ॥ गुनवेला यावी कपन्यो,
पुत्रपणे अवतारी ॥शां॥१०॥ काश्क सूती कांक जागती,सुपन लहे दश
चारे ॥ पहेला हो गजवर वृपन ए वीजे, चितित कान सुधारी ॥ शां० ॥
११ ॥ त्रीजे सिहप लक्ष्मी चोथे, सहु सुखनी करनारी ॥ पंचमे माला हो
बहे निशाकर, दीनो हो थारति टाली ॥ शा० ॥१५॥ सातमे सूरज या
उमे ध्वजवर, कीर्ति काति वधारी ॥ नवमे कलश सरोवर दशमे, पेखे हो
हर्प थपारी ॥ शाम् ॥ १३ ॥ सिधु थग्यारमे वारमे अमरनु, मदिर दी
उदारी ॥ रत्ननो राशि ए तेरमे चनदमे, निघूम थमि विचारी ॥ शा० ॥
१४ ॥ दर्पनरें जागी सा सुदरी, सुपन देखि उखवारी ॥ यावी हो कंत
समीपें जगाडे, पीयुने हो थचिरा प्यारी ॥ शां० ॥ १५ ॥ विश्वसेन जा
ग्या तप देखे, श्रागें मोहनगारी ॥ श्रासन थाप्यु हो वेसण काजे,
वेग हो अचिरा नारी ॥ शा० ॥ १६ ॥ वालमजी मध्यरात्रिनी वेला,
जाहिरमाणी करारी ॥ दीठां दो चउदे सुपन मनोहर, फल कहो श्रुत
थनुसारी ॥ शां ॥ १७ ॥ राय मुणी दरख्यो मनमाहे, सुपन सवल
सुखकारी ॥ मतिपूर्वक निज बुद्धि विन्नाणे, थर्य कहे तिण वारी ॥ शां०
॥ १७ ॥ सुत दोशे कुलदीपक रूडो, सह जगने उपकारी ॥ कहे राणी
तुम वचन ए मुफने, सफल होजो हितकारी ॥ शां० ॥ १५ ॥ लेश या
णा निजसेजें थावी, थचिरा दो मथरचारी ॥ कहे मुफ सुपन रखे ए ह
गाये, थानें दो एम निर्धारी ॥ शां० ॥ २० ॥ देव गुरु सवध कथायें,
करे जागरण सनारी ॥ थयो प्रनात दुवो जय जय रव, वदीजन जयका
री॥ शां० ॥ २१ ॥ बछे हो खमें पहेली ढालें, करे जिनगुण यारी ॥
राममुनि कहे ते धन जगमां, जाउ उनकी बलिहारी ॥ शा ॥२२॥श्ए।
॥ दोहा ।।
॥ विश्वसेन राजा सना, वेगे थावि उमग ॥ सुपनशास्त्रना जाणने,
तेडावे मन रंग ॥१॥ था नणा तब थाविया,निमित्त थग यह जाण ॥
वे थाशिप वेता सवे, यासन यति ममाण ॥ २ ॥ नू सन्मान्या घशु,
पूढे सुपनविचार ॥ कहे सुपनपातक तदा, शास्त्र तणा थधिकार ॥३॥

६ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. मुपन कह्यां वायाल सवि, त्रीश मोटकां तेम ॥ राजन सुणो बन्द मा, बजे वहोंत्तेर एम ॥ ४ ॥ ॥ ढाल वीजी ॥ वीर जिनवर रे, गोयम गणहरने कहे ॥ ए देशी ॥ सुणि रामन रे त्रीशमाहे चठदश शिरें ॥ दीपा राणीय रे, मध्यरयपीने श्राशरे। दोशे सुपनथी रे,सुत सोनागी सुंदरू ॥ जगपालक रे,नमशे धावि पुरक । ॥ त्रूटक ॥ पुरंदरा सवि थावि नमशे, चक्री जिनवर दोयशे ॥ तुप नाग्य महोदु मुण नरेश्वर, उख सघलु खोयशे ॥ दुवे पद सुपने चक्र जिनवर, सातथी हरिपद धणी ॥ चार वलन एक मंमलिक, वात ए शास्त्रे जणी ॥१॥ ते माटें रे, राजन थचिरा राणी ॥ शुन सुहा रे, दी मन सुख श्राणी ॥ मुणि राजन रे, दान दीये घणुं तेहने । सन्मानी रे, पहोंचाच्या निज गदने ॥ ॥ निज गेह पहोता सुपन पाठक, राय राणीने कहे ॥ वात सघली सुपन केरी, निमुणी सा थाना लहे ॥ निजगेह थावे थई हर्षित, गर्ननी प्रतिपालना ॥ करे राणीशा सवाणी, चित्त बाणी वासना ॥ २ ॥ यति स्नेहल रे, अति मधुरु नवि वावरे । यति खारु रे, थति तीखु तेम परिदरे ॥थति कस्बु रे, नवि खेवे सा गुण जरी ॥ मुखहूंती रे, थोडं बोले सा मुदरी ॥३०॥ सुदरी अचिरा थति न बोले, यति न गाये तिम वली ॥ नवि सुवे अगासें जरीय श्वासे, नवी वोडे मन रली ॥ खाट हिंमोला चढीने, घुमणी न लिये तथा ॥ यति क्रोध न करे गर्नपालन,करे ग्रंथमांहे यथा ॥३॥ तिदा पूर्व रे, अशिव घणो पुरमा दतो ॥ मांद्यदोषे रे, लोक घणो प्रल गतो॥ अवतारें रे, जिण दिनथी प्रनु थावियो ॥ तिण दिनषी रे, थशिव सहू ते नसावीयो ॥ ॥ नसावीयो सवि अशिव एणे, यदो महिमा सुत तणो ॥ मनमाहे माता पिता चिते, नाम्य सपनो थापणो ॥ गर्नमांहिज रह्या सुतनो, जुन अतिशय एवडो ॥ पण किस्प अचरिज गर्नदिनथी, प्रणत सुत ३ वडो ॥ ॥ एद प्रणमी रे, श्राप ने पण प्रणमिया ॥ थावी रे, सुख दोहग सवि वामीयां ॥ एर जन्में रे, दर्प घणो थाशे सही ॥ एह दर्षनी रे, वात न जाये मुल कदी ॥ ॥ मुख कही वात न जाय अतर, हर्षे है गहगहे ॥

श्री शांतिनाथनो रास खम हो शए एम गर्न वाधे सुरूत साधे, मात गुन दोहाला लहे ॥ वरदान दीजे लान लीजें, धर्म कीजें मन धसी ॥ मन जेह बा कपजे ते, राय पूरे उनसी ॥ ५ ॥ एम अनुक्रमें रे, मास थया नव निर्मता ॥ साढा दिन रे, सात थया उपरें नला ॥ जेठ मासनी रे, रूम त्रयोदशीने दिनें ॥ जरणी नमु रे,याव्यो निशाकर गुन मनें ॥०॥ शुन मनें सघला लोक मुखीयां,नहीं जगमा को 5 खी ॥ ग्रह यया गोचर ऊच सघला,नीपनी सघली रुपी ॥ शुन समवेला जले मुहूरत, वाय थनुकूल वायते ॥ मध्यरात्रिसमये वर्ण सोवन, कातिपुज विराजते ॥ ६ ॥ आरोगा रे, थचिरा माडीयें जाईयो । सुत नीरोग रे, त्रण जग दर्प उपाश्यो॥थयो उद्योत रे, नारकीने पण सुख थयु ॥ सचराचर रे, सतु जतुनु 5 ख गयु ॥ ॥ 5 ख गयु सघलु दर्प प्रगट्यो, थवधिज्ञाने जाणीयो ॥ जिनजन्म केरो उपन कुमरी, हर्प है. थाणियो ॥ थातथध गजदत मिरिनी, कदराथी थावि ए॥ वली थान नं दन कूटहूती, थावे धरि मन नाव ए ॥ ४ ॥ प्रत्येकें रे, रुचकगिरि निवा सिनी । थावे यात श्राउ रे, दिशहूती ते सुवासिनी ॥ तेम चारे रे,रुचक विदिशिनी जाणीयें ॥ दीप मध्यम रे, रुचकनी चार वखाणियें ॥०॥ वखाणीय बप्पन्न मलिने, दूइ सघली ते सुरी ॥ नव निर्मित एकयो जन, मित विमानें सचरी ॥ चार साथें मदतरिका, चार सहस सामा निका ॥ पोड सहसा अगरदक, साथ लेई सेनिका ॥ ॥ तिहा थावी रे, जिनजननीने पाये नमी ॥ करे वैक्रिय रे, वात सवर्तक मन रमी ॥ वरसावे रे, जलद वली थावे वली ॥ धरे दर्पण रे, थाd जणी क जट घणी ॥ ० ॥ घणे कलट धरी कलशा, रहे जिननी सामुही ॥ कर बात लेई तालवृत्ता, जोवे जिनमुखा रही ॥ था चामर धरे चतुरा, चार तेम दीवीधरा ॥ रक्षा विधानादिक करे वती, चार देवी नामुरा ॥ ए॥ एम सद्गु मली रे, सूतीकर्म करे जिन तणो ॥ मनमाहे रे, सगुने थानद थति घणो ॥ धन्य धन्य धन्य रे, थाज तणी ए यामिनी ॥ लहि सेवा रे, शोलम जिनवर स्वामीनी ॥०॥ स्वामीनी सेवा नाग्य पामी, थान बहेनड थति नली ॥ त्रिदु जगत केरो नाय नेटघो, दशा सम कित निर्मली ॥ खम बछे दाल वीजी, कदी रामविजय इसी ॥ एम बप्पन्न कुमरी स्तवी जिनने, गई निजस्थानक इसी ॥ १०॥ सर्वगाथा ॥ ४२ ॥ २० श६ जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. सुपन कह्यां वायाल सवि, त्रीश मोटकां तेम ॥ राजन सुणो अहम मां, अजे वदोत्तेर एम ॥ ४ ॥ ॥ ढाल वीजी॥ ॥ वीर जिनवर रे, गोयम गणहरने कहे ॥ ए देशी ॥ सुणि रानन त्रीशमाहे चन्दश शिरें ॥ दीग राणी रे, मध्यरयणीने भाक्षरे । दोशे सुपनथी रे,सुत सोनागी सुंदरू ॥ जगपालक रे,नमशे थावि पुरंदर ॥ त्रूटक ॥ पुरदरा सवि थावि नमशे, चकी जिनवर दोयशे ॥ तुण नाम्य महोटु सुण नरेश्वर, .ख सघलु खोयशे । दुवे चद सुपर्ने चक जिनवर, सातथी हरिपद धणी ॥ चार वलन एक ममलिक, वात ए शास्त्रे नणी ॥१॥ ते माटें रे, राजन अचिरा राणी ॥ शुभ मुहणारे, दीगं मन सुख थापीयें ॥ सुणि राजन रे, दान दीये घj तेड्ने । सन्मानी रे, पहोंचाच्या निज गहने ॥ ॥ निज गेद पहोता सुपन पाठक, राय राणीने कहे ॥ वात सघली सुपन केरी, निसुणी सा थाना जदे ॥ निजगेह थावे थई दर्षित, गर्ननी प्रतिपालना ॥ करे राणीशा स्त्रवाणी, चित्त थाणी वासना ॥ ५॥ अति स्नेहल रे, यति मधुरु नदि वावरे ॥थति स्वारुं रे, अति तीस्तु तेम परिदरे ॥ यति कर रे, नवि मेवे सा गुण नरी ॥ मुखडूंती रे, थोडं बोले सा सुवरी ॥ मुदरी अचिरा अति न बोले, थति न गाये तिम वली ॥ नवि सुवे अगासें नरीय श्वासें, नवी दोडे मन रली ॥ खाट हिंमोला चढीने, घूमणी न लिये तथा ॥ थति क्रोध न करे गर्नपालन,करें प्रथमांहे यथा ॥३॥ तिहां पूर्व रे, थशिव घणो पुरमा दतो ॥ मांद्यदो रे, लोक घणे प्रलय गतो ॥ अवतारें रे, जिण दिनथी प्रल श्रावियो ॥ तिण दिनपी रे, अशिव सहू ते नसावीयो ॥ ॥ नसावीयो सवि अशिव एरों, थहो महिमा सुत तणो ॥ मनमाहे माता पिता चिते, नाम्य सबलो थापणो ॥ गर्नमांदिज रह्या सुतनो, छ अतिशय एवडो ॥ पण किस अचरिज गर्नदिनथी, प्रणत सुत ३ वहो ॥ ४ ॥ एह प्रणमी रे, श्राप णने पण प्रणमिया ॥ ३ थावी रे, ख दोदग सवि वामीयां ॥ एर जन्में रे, दर्प घणो थाशे सही ॥ एह दर्षनी रे, वास न जाये मुल कही ॥ ॥ मुख कही वात न जाय अतर, हर्षे हेई गहनः ।। ॥

श्री शांतिनायनो रास खंम हो. शपए करि पच रूप सुरेश्वर चाले, प्रनुकु एकरूपे काले रे ॥ जि ॥ २२ ॥ दोय रूप हरि चामर ढाले, एक बत्र धरे उजमाले रे ॥ जि ॥ २३ ॥ वज सेई प्रनु थागल दोहे, एक रूपे दरि मन कोडें रे ॥ जि ॥ २४ ॥ मेरुशिखर ले थाव्या रगें, मलिया चोसन मन रगें रे ॥ जि०॥ २५ ॥ वीश वनपति स्वामी कहीजें, वत्रीश व्यंतर विलु लीजें रे ॥ जिणाश्॥ दोय रवि शशी ज्योतिपके श्दा, दश वैमानिक आनदा रे ॥ जि॥ २ ॥ सौधर्मे लिये नत्सगें, प्रनु स्नात्र करणकु तमगे रे ॥ जि० ॥ २७ ॥ सोवनरूप मणि माटीना, कलशा वलि कीधा नवीना रे ॥ जि० ॥ २५ ॥ एक सदस कपर तेम थात, एक जातिना थड जाति वा रे ॥ जि० ॥ ३० ॥ होय एक कोडी थने साठ लाख, कलशा ए शास्त्रनी साख रे ॥ ॥ जि० ॥ ३१ ॥ पणवीश योजन कलशा उचा, वार योजन पदोला प्रीबघा रे ॥ जि० ॥ ३२ ॥ नाखूवा एक योजननां रे जाव्या, कलशानीरें जरी लाव्या रे ॥ जि० ॥ ३३ ॥ श्रच्युत थादि नवे सुरस्वामी, प्रनु न्हवण करे शिर नामी रे ॥ नि ॥ ३४ ॥ स्थापी ईशान शनी गोदें, करे शक नमण मन मो- रे ॥ जि० ॥ ३५ ॥ वस्त्रे दो खूबी प्रजुनूं थग, शुचि चदनें लेपे सुचग रे ॥ जि० ॥ ३६ ॥ नव नव नक्ति करे तिदा देवा, प्रतु गुण गाई करे सेवा रे ॥ जि० ॥ ३० ॥ थारति मगल दीप उतारे, प्रच तो विण कुण हम तारे रे ॥ जि ॥३॥ बठे हो त्रीजी ढाल ए बोली, कहे राम दिल खोली रे ॥जि०॥३ए। जिनगुण नएता पावन जीहा, सफला होय रात ने दीदा रे ॥ जि० ॥ ४० ॥सर्वगाथा ॥७॥ श्लोक ॥ ॥ दोहा॥ ॥ ६ करे जिनवर तणी, स्तुति जोडी दोश् हाथ ॥ नवसमुश्मा बुडता, मल्यो जहाज तु नाथ ॥१॥ जय थचिरा राणी कयरें, सरोवर इंस समान ॥ जव्यक्कुमुदवनचश्मा, थतुलीपज नगवान ॥२॥ जय थ नादि थजन रहित, निराकार निरुपाधि ॥ ज्योतिरूप जगदीश तु, प्रगटी सहज समाधि ॥ ३॥ करवा पावन पतितने, तें लीधो अवतार ॥5 स्तर नवसायरथका, तार तार प्रनु तार ॥४॥ धन्य दुत कृतपुण्य इ, दीतु वरिसण थान ॥ ए मरुस्थल ससारमा, तु सुरतरु जिनराज ॥ ५॥ इत्यादिक वचनें करी, नमी स्तवी सुरराय ॥ मेरुशिखरथी था 7 शएन जैनकथा रनकोप नाग आग्मो. ॥ दोहा॥ ॥ण अवसर सौधर्मपति, निज बासन चल जाणि ॥ज्ञान परि उपयोगथी, लघु जन्म कल्याण ॥ १ ॥ मन विकस्यं तन उहास्युं, पायो रम करार ॥ तेडी हरिणगमेपीने, द्रुकम करे तेणि वार ॥ ५ ॥ ॥ ढाल त्रीजी॥ ॥ शुन नव थमृतवेलीकदो ॥ ए देशी ॥ ६ कहे हरिणगमेपीने, सुख लहियें प्रठ देखीने रे।। जिन जायो नगीनो । जगको सुख दूरे कीनो रे ॥ प्रनु जायो नगीनो ॥ ए थांकणी ॥१॥ वा सुघोषा घंट ताजी, रहे सोहम सुरलोक गाजी रे ॥ जिन० ॥ ॥ पांचशे सुर मली घंटा वाइ, सघली घटा रणफण थाई रे ॥ नि० ॥३॥ खबर दुई सोप मैके वासी, मलिया ए तुरत वासी रे ॥ जि० ॥ ४॥ कहे हरि जिन जन्मोत्सव काजें, जा क्षेत्र नरतें गुजसाजें रे ॥ जि० ॥ ५ ॥ अविरा राणीको नदन नीको, जिन शोलम त्रिवनटीको रे ॥ जि० ॥ ६ ॥ करि जन्मोत्सव बढ़ सुख पागं, श्रमो लान अनत सपा रे ॥ जि. ॥ ४ ॥ पालक योजन लाख विमान, तेणें से श मुज्ञान रे ॥ जि ॥ ॥ साथे सहस चोराशी सामान्य, थगरक्षक घठ गुण मान जि ॥ ए ॥ थममहिषी थावे गुणवती, पियु सा चली पुण्यवती रे ॥ जि० ॥ १० ॥ बत्रीश लाख विमानके स्वामी, सनु थाइ मिले शिर नामी रे ॥ जि० ॥ ११ ॥ कोई धागे को पूसें थावे, मारग विच जिन गुण गावे रे ॥ जि० ॥ १५ ॥ पडखे नदि कोइ सेवक स्वामी, जिननक्ति मांदे नाहिं खामी रे ॥ जि० ॥ १३ ॥ वर्ष नयो प्रनुको मुख जोवा, निज पातक मेलने धोवा रे ॥ जि ॥१४॥थाइ उजाय नदीश्वरही, वहां थावि विमान सक्थे रे ॥ जि० ॥ १५ ॥ श्रावे जरत गजपुर । जाणा, प्रजु देखण हर्ष नराणा रे ॥ जि० ॥ १६ ॥ श्रावी नमे जिन जिनजननीकों, कहे तें सुत जायो नीको रे ॥ जि॥ १७ ॥ वर्ष कियो बिद्ध लोकके माई, दम वाटी स्वर्गे वधाई रे ॥ नि ॥ १७ ॥ मार्ग तेरे सुतकु ले जायु, सुरगिरि शिखरें नवरायं रे ॥ जि० ॥ १५ ॥ करणं समकित निर्मल साचु, प्रष्ट देखि देखि थमें राजु रे ॥ जि॥ २० ॥ जिन प्रतिरूप मेहले मायपासे, श्रवखापिनी दे सहबासें रे ॥ जि० ॥ ११ ॥ 7 ॥

श्री शांतिनाथनो रास खंम छो. ३०१ रवि शशीनु स्वामीने ॥ बही जागरणे सद्ध जाग्या, गायो शिवगामीने रे ॥द० ॥१२॥ काढी थचि कर्ममदिरथी, नीपाइ पक्वान्न ॥ सङ न कुदुव सहुने पोपे, रगेंगु राजान रे ॥ ६ ॥ १३ ॥ शाति एवं वरता वी जगमा, “ शाति कुमर " घणुं जीवो ॥ नाम ठवे सदु कोश्नी साखें, कुवर ए जगदीवो रे ॥ ६ ॥ १४ ॥ अमृत यगूठे हरि वियो, तेहथी होय थाहार ॥ स्तनपान न करे मातानु, शुचितानो नहिं पार रे ॥ द. ॥ १५ ॥ यक्त ॥ ददृशेऽशनमवयार्पित, नहि नीहार विधिश्च जन्मत ॥ गु चिता जुवनेप्यनुत्तरा, यददो स्तन्यमपीश नापिव ॥१॥ पूर्वढाल ॥ अनुपम रूप मनोहर वाधे, प्रनु मनमोहन नीको ॥ सहस अगेत्तर लक्षण शो नित, तीन जुवनको टीको रे ॥ द ॥ १६॥ स्नेदल मुख मुकुरोपम दीपे, पद कूर्मोन्नत धारो ॥ एणीजघ सरीखी जघा, उरु करिकर श्राका रो ॥ द० ॥ १३ ॥ विस्तीरण प्रजुजीनु कटितट, दो मनल्डं मोहे ॥ दक्षिण थावतै गनीरा; नानि थग अति सोहे रे ॥ ह ॥ १७ ॥ वज सरीखु मध्य विराजे, पुरकपाट परें पदोलु ॥ वद स्थल पुरथर्गल कप म, प्रचुनु वाढुज्जुथल रे ॥ ६ ॥ १ ॥ ग्रीवा कबुसरीखी सुदर, थधर होठ गुलाला ॥ कुदतणा कुस्मल परें उज्ज्वल, दीसे दतनी माला रे ॥ द० ॥ २० ॥ उत्तुग सरलो नासावशो, सजनवृत्त ज्यु नालो ॥ पनपत्र सरिखा दोय लोचन, अष्टमिशशिसम नालो रे ॥ ६ ॥ २१ ॥ दोला कार अवणयुग प्रचना, मस्तक बत्राकारं ॥ स्निग्धा थलिकुल श्यामल कुतल, राजे रूप उदारं रे ॥ ६ ॥ २२ ॥ पद्मगध सरिखो प्रजुश्वासो, कनकवर्णी जस काया ॥ थप्सर शिणी दुलरावे, सवली प्रमुटु माया रे ॥ द० ॥ २३ ॥ त्रिक ज्ञाने सयुत त्रिदु जगना, नाथने नयणें निरखे ॥ थानद धरी इशणी पोते, रन ज्यु फरि फरि परखे रे ॥ द० ॥ २५ ॥ एक सदियर लेइ प्रउ खघोले, वीजीने एम वोले ॥ कनकलता तु जो रे प्रचुनें, वदन पूनमविधु तोले रे ॥ दण् ॥ १५ ॥ कोइ कहे सुणो सही यर मोरी, प्रनु उपर घणु मोदी ॥ घरधधो मुझने विसरीयो, रहि प्रल मुखलु जोई रे ॥ ६ ॥ २६ ॥ सहिय समाणी वाली जोली, वात करे वाचाली ॥ प्रविण निरखे जे नित्य जमशे, ते नदि थापणी थाली रे ॥ ह० ॥ २७ ॥ एक करथीवीजे कर लेवे, नूइ नपर पग न धरे ॥ घरना -- ३०॥ जैनकथा रनकोप नाग आठमो. पीने, प्रल सोंपे निजमाय ॥ ६ ॥ निज्ञ पानी सहरी, जाम्या अमित माय ॥ सुत सुरपूजित देखिने, देहे दर्प न माय ॥ ॥ छ कहे को खरें, सद्ध सांजलता वाणि ॥ जिन जिनजननी कपरें, जे चितवशेजार ॥ ॥ तस मस्तक तेम फूटशे, जेम कनाले जाण ॥ एरमफल घटे ती श्म कहे ३५ सुजाण ॥ ए ॥ वृष्टि करी तिदा रयणनी, वंगण कोडि। त्रीश ॥ सौधर्माधिप चालियो, प्रजुने नामी शीश ॥ १० ॥ नदीया ही लई, "यात्र करे सह श्द ॥ निज निज स्थानक सट्ठ गया, परता सन यानद ॥ ११ ॥ ॥ ढाल चोथी॥ ! ॥ दमचडीनी वेशी ॥ सुत सोनागी सुरवरपूजित, निज नयणे नि हाली । अचिरानी दासी उजाणी, वात कहण जमाली रे ॥१॥ दमचडी ॥ए थांकणी ॥ जय जय स्वामी कद्दु शिर नामी, सुण सुण अतरजामी ॥ यचिरा राणी धगज प्रसव्यो, इट सुणो यशकामी रे । दम॥.५ ॥ बप्पन्न विशिकुमरी प्रनु थावी, जिनजन्मोत्सव करवा ॥ सूती कर्म कस्यु जिनजीनु, सुकतनमारने नरवा रे ॥ द० ॥ ३ ॥ई पण थनिषेक करीने, मेरु शिखरें फल लीधु ॥ एदवो सुत अचिरायें जन्म्पो, पुण्ये वादित सीधु रे ॥ ६ ॥ ॥ सुत सहेजें संसारें वहाला, न हाना महोटा कुलना ॥ पण चोसन सुरपतिपूजित सुत, पार नहीं पुस्यवलना ॥ द ॥ ५ ॥ वात सुणी विश्वसेन नरेश्वर, दरख्यो अति मनमाहे ॥धाराहत जेम नीपकुसुम तेम, रोमांचित थयो काय रे ॥ ह० ॥ ६ ॥ थगत थानूषण सघल, मुकुट विना तस थाप्यं ॥ सतति सात लगें नवि खूटे, धन वे दारिद काप्युं रे ॥ ६ ॥ ॥ बत्र तो तेदने नवरावी, दासीबिरुद उतास्यु ॥ त्रिवनपति सुत दर्ष वाई, दायक मान वधायु रे ॥ ६ ॥ ॥ राय कहे पुरमांहे महोत्सव, सुत जन्म्यानी के. ॥ कारागार सकल शोधावी, दीन 5 खी 5 ख फेरे रे ॥ ह॥ ए ॥ मान थने तन्मान वधास्या, थकर यनट परवेश ॥ गजपुर न गर हुठ सवि सुखीयु, नहिं को वैर किलेश रे ॥ द० ॥ १० ॥ माणिक माट बधाई थावे, लाख सदसने लेखे ॥ तेम वलि तेडने पापे नरपति, चितित दान थोखेरे ॥ ६० ॥३१॥त्रीजे दिवस कराव्यु दरिसण, - रे

श्री शांतिनाथनो रास खंम हो ३०३
न कहावे ॥ देखो जगशुरु ज्ञानके दरीया, मुदसें न बोले गंजीरिम जरि
या ॥ १२ ॥ वद्भुत थामवर होवे हो जिनको, मत जाणो परमारथ उन
को ॥ नहिं सोवन ध्वनि तेहवी वजावे, जेहवी हो कास्यके पात्रमें थावे
॥१३॥ काल त्रिहूको ज्ञाता हो स्वामी, नहि जिनकी प्रजुतामाहे खामी॥
यविनय एह दुवे जिनवरको, थाव्यो वेश लश् हिजवरको ॥ १४ ॥ प्रजुक
वेतावे सिहासन सोई, देखी सवे मन थचरिज हो ॥ पाठक थागल रह्यो
कर जोडी, प्रश्न करे मद मत्सर मोडी ॥ १५ ॥ मन सदेह टव्यो तव
साचो, पाठक जाएयु ए पमित थाडो ॥ पाउ पडे मन मान निवारी, तुम
हो वडे जगगुरु उपकारी ॥ १६ ॥ २ नमी निजस्थानक जावे, प्रजुजी
फरि निजमदिर थावे ॥ देखो जाण गनीर ए केसे, दीनदयाल होवे
जग ऐसे ॥ १७ ॥ अनुक्रमें यौवन पाम्या हो साइ, रूपकला अधिकी
चतुराई ॥ वरस पंचवीश सहत वय थाये, तव प्रच्कु लेइ राज्य वेताये
॥ १७ ॥ परावे प्रचुकु वद्रुतेरी, नृपकन्या गुणरूप नलेरी ॥ सकल थ
तेवरमा रतिकारी, नामें यशोमती राणी सारी ॥ १५ ॥ प्रच विलसे
तिण साथै जोगा, सद्ध मतिया मनोवाबित योगा ॥ चाले पग्निनी पतिने
दो दें, घर घर वरते दो यति थानवे ॥२०॥ बछे खमें दो पंचमी ढाल,
राम कवि कहे यति उजमाल ॥थागल सानलजो दवे लोका, वाधशे ज
गमाहे पुण्यशलोका ॥१॥ सर्वगाथा ॥१०॥ श्लोक तथा गाथा ॥१॥
॥ दोहा सोरठी॥
॥ दवे दृढरथनो जीव, सरवारथ सिमथी चवी ॥ पूरण थायु थ
तीव, थावीने तिहां कपजे ॥ १ ॥ यशोमतीनी कूख, शुनवेलायें थव
तस्मो ॥ पूर्ण समय गत ख, चक्र सुपन सूचित जएयो ॥ ॥ कयो
महोत्सव सार, नयरमाहे बदु हर्षशु ॥ "चक्रायुध" गणधार, नाम व्यु
नरपति सही ॥३॥ सुत वाघे श्रीकार, रूप कला गुण शोजतो ॥ ज
गम सुरतरु सार, नरनारी मन मोहतो ॥ ४ ॥ शीखण कला विचार,
नीशालें ते पाठयो ॥ वत्रीश लक्षण धार, सकलशास्त्र सहेजें नएयो ॥
॥ ५ ॥ यौवनवये कुमार, नृपकन्या परणावीयो ॥ रूपें गुणें जितमार,
सुख विलमे ससारना ॥ ६ ॥

३०२ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. सवि वधा विसारी, नित्य प्रजुगुणने समरे रे ॥ ह ॥ २७ ॥ हे संमें ढाल ए चोथी, प्रनु जायो जगस्वामी ॥ रामविजय कहे ए प्रखनीने,' प्रणमु शिर नामी रे ॥ ४० ॥ २ए ॥ सर्वगाथा ॥१२४ ॥ श्लोक ॥ दोहा॥ ॥ गिरिकदरचपक परें, वीज तणो जिम चद ॥ प्रनु वाघे मन मोर तो, सद्भुजन नयनानद ॥ १ ॥ हर्षे दुलरावे रगच्नु, थचिरा प्रेम पर । रोम रोम तन उन्नस्यु, निरखी सुत मुखनूर ॥ २ ॥ ॥ ढाल पाचमी ॥ ॥ माय कहे मेरी बगनां मगना ॥ ए देशी ॥ कहे सुतने हो एम . चिरा माता, तुफ थावे मुफ थ सुखशाता॥मुख दी गया पातक धूनी, तुज पूजे दु पण सुरें पूजी ॥ १ ॥ तु मुफ प्राणतणो थाधार, तुजे उपर वारी वार हजार॥सुण मुफ लाहकहा सुत मीठा, पूरव पुण्ये तुज मुख दी ॥ ५ ॥ लाम समावे हो थपणी रे माडी, नवपल्लव दुश् मुतगुण वारी । हाथे जहाव सोवननी दो कमली,अगें बनी फरवाफ थगडली ॥२॥ पहे राव्यां कानें शुचि मोती,तृप्ति न पामे दो मुखलु जोती॥मणि माणक मोती की दो टोपी, दर्षयं ले सुतशिर थारोपी॥॥ कठे दो तावित सोवन केरा, पहेरावे अचिराजी नबेरा ॥ कामणगारो ने वलि शणगायो, ठमक तमा चाले लागे हो प्यारो ॥ ५॥ मुख मधुरी बोले सुत वाणी, चिरंजीवो कहे थचिराजी राणी ॥ सुर बालकरूपें यथावे, रागें दो शांति कुमर छ खेलावे ॥ ६ ॥ एणीपरें वाधे दो प्रच सोनागी, सट्ठ कोश्ने जोवा रढ लागी ॥ थावे सनामांहे बापके धागें, सगुकोइ कठीके पार लागे ॥ ॥ श्रावो पधारो हमारे दो स्वामी, दो प्रिढुजगके अतर्यामी । तुम दो जगहत्सल उपकारी, तुम सूरत लागत हम प्यारी ॥ ॥ पाठ वरस प्रचुकु नये जाणी, तष बोले मावित्र मुं वाणी ॥ सुत निशान वीजें दो सारो, शास्त्र नणावण मोदनगारो ॥ ए॥ नरपति उत्सव मामे हो जारी, धवल मगल गाये सोदव नारी ॥ तनु जूषण नूपिस बबी सारी, प्रजु कीनी गजकी सवारी ॥ १० ॥ वढु श्रामबर सा हो भाये, पाठक मनमाहे थानव पावे ॥ए अवसरें चब्यां थासन श्वा, खबर दुई देख्यो ज्ञानदिदा ॥११॥ प्रचुकुनी निशाल पगवे, मोह महापनमा + , - श्री शांतिनाथनो रास खम हो ३०३ न कहावे ॥ देखो जगशुरु ज्ञानके दरीया, मुहसें न बोले गनीरिम जरि या ॥ १२ ॥ बहुत थामवर होवे हो जिनको, मत जाणो परमारथ उन को ॥ नहि सोवन ध्वनि तेहवी वजावे, जेहवी हो कास्यके पात्रमें थावे ॥१३॥ काल त्रिहूको ज्ञाता हो स्वामी, नहि जिनकी प्रचुतामाहे खामी॥ थविनय एह दुवे जिनवरको, थाव्यो वेश लइ हिजवरको ॥ १४ ॥ प्रञ्चक वेगावे सिहासन सोई, देखी सवे मन अचरिज हो ॥ पाठक यागल रह्यो कर जोडी, प्रश्न करे मद मत्सर मोडी ॥ १५ ॥ मन सदेह टल्यो तब साचो, पातक जाएयु ए पंमित धागे ॥ पाउ पडे मन मान निवारी, तुम हो बडे जगगुरु नपकारी ॥ १६ ॥ २ नमी निजस्थानक जावे, प्रचुजी फरि निजमदिर थावे ॥ देखो जाण गनीर ए केसे, दीनदयाल होवे जग ऐसे ॥ १७ ॥ अनुक्रमें यौवन पाम्या दो साइ, रूपकला अविकी चतुराई ॥ वरस पंचवीश सहस वय याये, तव प्रनुकु लेइ राज्य वेगये ॥ १७ ॥ परणावे प्रचुकु बढ़तेरी, नृपकन्या गुणरूप जलेरी ॥ सकल थ तेवरमा रतिकारी, नामें यशोमती राणी सारी ॥ १५ ॥ प्रनु विलसे तिण साथै नोगा, सद्ध मलिया मनोवानित योगा ॥ चाले पद्मिनी पतिने हो बदें, घर घर वरते दो थति थानदे ॥२॥ ॥ बछे खमें दो पचमी ढाल, राम कवि कहे अति उजमाल ॥ थागल सांजलजो दवे लोका, वाधशे ज गाहे पुण्यशलोका ॥२१॥ सर्वगाथा ॥ १४॥ श्लोक तथा गाथा ॥१॥ ॥ दोहा सोरठी॥ ॥ हवे दृढरथनो जीव, सरवारथ सिक्ष्थी चवी ॥ पूरण वायु अ तीव, थावीने तिहा कपजे ॥ १ ॥ यशोमतीनी कूरख, सुनवेलायें यव तम्रो ॥ पूर्ण समय गत ख, चक्र सुपन सूचित जएयो ॥ ॥ कस्यो नयरमाहे वट्ठ दर्पगु ॥ चक्रायुध” गएधार, नरपति सही ॥ ३ ॥ सुत वाघे श्रीकार, रूप कला गुण शोनतो ॥ जे गम मुरतरु सार, नरनारी मन मोहतो ॥ ४ ॥ शीखण कला विचार, नीशालें ते पाचव्यो ॥ वत्रीश लक्षण पार, सकलशास्त्र सहेजें नएयो । ॥ ५ ॥ यौवनवयें कुमार, नृपकन्या परणावीयो ॥ रूपें गुणें जितमार, सुख विनमे सतारनां ॥ ६ ॥ महोत्सव सार, नाम व्यु , . ३०४ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ॥ ढाल नही॥ ॥ पांच सोपारी ले हाथ ॥ ए देशी ॥ हवे एक दिवसने योन, युधशालामां ऊपन्युं ॥ चक रतन उत्पन्न, बार सहने हो सोना । १॥ उपन्यो हर्ष थपार, सेवक दीघ वधामणी ॥ आयुधशालामा पर उपन्यु जयजय जगधणी ॥ २ ॥ प्रतु निमुणी दिये दान, धान दिवस उत्सव करे, चक तणो गुणखाणि, जयकमला कारण शिरें ॥३॥ का असि बत्र दम, थायुधशालमा उपजे ॥ मणि कांगिणी ने हो चर्म, निषि सिरि गेहें नीपजे ॥ ४ ॥ पुरोहित वार्षिकी जाण, सेनापति गाघापति । निज नगरें ए चार, रयण तणी कही उत्पत्ति ॥५॥ राजकुलें स्त्रीरम, गिरि वैताढघे दो गज तुरी ॥ रयण ए जस दश चार, केम टके तेदना थरि । ६ ॥ श्रायुधधरथी हो चक्र,चाव्यु वही पथ थवरें। के. दो शांति दयाल, रयण कटक ले सचरे ॥७॥ यक्ष सहस्त्र समेत,चाव्यु प्रथम प्रव विशे॥ मागधतीर्थ थासन्न, वेलाकुलें सेना वसे ॥॥ वाईिकी करे तत्काल, पुर झादश योजन तणु ॥ सैन्यने रहेवा दो कान, यतिसुदर शोना घणु ॥॥ शुन थासन चक्रधार, बेसे दो मागध सन्मुखें ॥ त्रिदु जगनो रे थाधार, जस नामें सद्गु जग सुखी ॥ १० ॥ ते प्रजुने यनुनाव, जलमाहे हादस योजनें ॥ मागध सुरनु हो ताम, थासन चलियु चिंते मनें ॥ ११ ॥ जाण्यु थवधि उपयोग, जिनचक्री वा थाविया ॥ साधन जरतना खंम, जे सुरपति मन नाविया ॥ १२ ॥ नाग्य सबल मुफ बाज, जे जिनराज पधारिया ॥ थाराधनने दो कान, जाउ थान निवारीया ॥ १३ ॥ बेश थारण थमूल्य, वव वली सुरनां जला ॥ थावे हो बद्ध परिवार, प्रनु नक्ति नखां हैयडलां ॥ १४ ॥ कर जोडी कहे देव, नाथ मुणो त्रिवन तणा ॥ दु तुम किंकर स्वामी, मुफमा अवगुण घणा ॥ १५ ॥ करणं तु मारी दो सेव,वास थक रहेछ रहा ॥तुम थाणा परमाण, रहे दो राखेको जिहां ॥ १६ ॥ प्रलु सन्मानी दो तास, नकवत्सल नगवत जी ॥ मोक लियो निज नाम, पहोतो प्रनु समरंत जी॥ १७ ॥ तेम दक्षिण विक्षि चक्र, चाप्यु हो वाटें थाकाशनी ॥थाव्या दक्षिण दधि तीर, तीरथ वर दाम थासनी ॥ १७ ॥ तेम याव्यो सुर तेह, कर जोडी श्रागल रह्यो । तु साहिव गुणगेद, तुम दरिसण नाग्य सह्यो ॥ १५ ॥ तेदने स्थापी श्री शांतिनाथनो रास खंम हो. ३०५ तेणें नाम, वारुणीदिशें प्रनु चालिया ॥ साधण देव प्रनास, दलनारें नग हालिया ॥ २० ॥ तेह नम्यो ततकाल, यावी जगतगुरु पाउले ॥ उत्तर पथ निहालि, चाव्यु हो चक नमाहले ॥ २१॥ याव्या नदीतट सिंधु, नवसिधु तारक विजु जी, सिधुदेवी ततकाल, यावी कहे जय जय प्र भुजी ॥ २२ ॥ स्नाननु पीठ सुचग, कलश कनकमयरूपने ॥ स्नानसा मयी हो जेद, नेट करे जगनूपने ॥ २३ ॥ कहे स्वामी कर जोडि, उलग करी हो ताहरी ॥ करुणानजरें महाराज, नाग्यदशा जागी माहरी ॥ २४ ॥ मुफ लायक खिजमत, प्रनु फरमावियें हित धरी॥ लही थाणा निजधाम, सिधु गई दर्प नरी ॥ २५ ॥ तेडी सेनानी ताम, हुकम करे चक्री इस्यो । सिधुनो पश्चिम खम, साधि थावो सुणि उन्नस्यो । २६ ॥ चर्मरत्न धरि सेन, सिधु तरी परतट गयो । खलनव्या तिहांना नूप, तस सहामो कोइ नवि थयो ॥ २७ ॥ थावि नम्या सद् पाय, साथ लेश्ने दो थाविया ॥ जेट हुई जिनराय, चरण नमे नृप ना विया ॥ २७ ॥ सवलु पुण्यनु जोर, सहसगमे नृप सेवता ॥ थावि नमें कर जोडि,कोडि गमे जस देवता ॥२॥ बडे खमें हो ढाल,बही कही रलि यामणी ॥ सुणो नवि थइ उजमाल,शाति प्रतु कीर्ति घण॥३०॥१३॥१॥ ॥ दोहा ॥ ॥ चक्र चल्यु ननममलें, पूढें शाति नरिंद ॥ श्रनुक्रमें जातां पामि यो, चि वैताढय गिरिंद ॥ १ ॥ थावी नम्यो प्रचुपुण्यथी, वैताढयादि कुमार ॥ वशवर्ती थइ एम कहे, जय करुणानमार ॥ ॥ गुफा तमि सानु तदा, स्वयमुद्घाटी हार ॥ वैताढचपाल सुर चरण नमी, कहे जय जगदाधार ॥३॥ ॥ ढाल सातमी ॥ ॥ मन मोदना लाल ॥ ए देशी ॥ यसवारी गजराजकी ॥ मनमोहना साल ॥ कीनी शाति दयाल दो ॥ जन रंजना लाल ॥ बत्र फरे शिर कपरें ॥ म ॥ तीन जुवन रखवाल हो ॥ ज० ॥१॥ मणि रयण गजराज के ॥ म ॥ कुनस्थल धस्नु सार दो ॥ ज० ॥ वार जोयण लगें ते स दी रे ॥ म ॥ दूर करे अधकार हो ॥ ज० ॥ ५ ॥ कागिणी लेई दाथ मा रे ॥ म ॥ करे ममल तमहार हो ॥ ज० ॥ उगएपचास थालि .

C ३०४ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ॥ ढाल ही ॥ पांच सोपारी से हाथ ॥ ए देशी ॥ दवे एक दिवसने पोष, युधशालामा कंपन्यु ॥ चक रतन उत्पन्न, थार सहले हो सोनई १॥ उपन्यो हर्प थपार, सेवक दीध वधामणी ॥ थायुधशालामा उपन्युं जयजय जगधणी ॥ २ ॥ प्रनु निमुणी दिये दान, घाउ उत्सव करे, चक्र तो गुणखाणि, जयकमला कारण शिरें ॥३॥ थति बत्र दंम, थायुधशालमा ऊपजे ॥ मणि कागिणी ने हो चर्म, निति सिरि गेहें नीपजे ॥ ४ ॥ पुरोहित वार्षिकी जाण, सेनापति गापापति । निज नगरें ए चार, रयण तणी कही उत्पत्ति ॥५॥ राजकुलें स्वीरम, मिरि वैताढघे दो गज तुरी ॥ रयण ए जस दश चार, केम टके तेहना थR | ६॥ श्रायुधधरथी दो चक्र,चाव्यु वही पथ थवरें॥केनें दो शांति दयाल, रयण कटक लेश सचरे ॥७॥ यद सहस्र समेत,चाल्पु प्रथम प्रव रिशे मागधतीर्थ थासन्न, वेलाकुलें सेना वसे ॥॥ वार्दिकी करे तत्काल, पुर हावश योजन तणु ॥ सैन्यने रहेवा हो कान, थतिसुदर शोना घणु ॥९॥ शुन थासन चक्रधार, वेसे दो मागध सन्मुखे ॥ त्रिलु जगनो रे श्राधार, जस नामें सट्ठ जग सुखी ॥ १० ॥ ते प्रजुने अनुनाव, जसमाहे हादश योजनें ॥ मागध सुरनु हो ताम, यासन चलियु चिते मनें ॥ ११ ॥ जाण्यु अवधि उपयोग, जिनचकी हा थाविया ॥ साधन जरतना खेम, जे सुरपति मन लाविया ॥ १२ ॥ जाग्य सवल मुफ थाज, जे जिनराज पधारिया ॥ श्राराधनने दो कान, जाउ श्रशुन निवारीया ॥ १३ ॥ खेर यानरण अमूल्य, वस्त्र वली सुरनां नलां ॥ थावे हो बदु परिवार, प्रनु नक्ति नस्यां हैयडलां ॥ १४ ॥ कर जोडी कहे देव, नाथ सुणो त्रिवन तणा ॥ दु तुम किंकर स्वामी, मुजमा थवगुण घणा ॥ १५ ॥ करई तु मारी हो सेव,दास थ रहेश श्दा ॥ तुम थाणा परमाण, रहेj हो राखेशो जिहां ॥ १६ ॥ प्रनु सन्मानी हो तास, नक्तवत्सल नगवत जी ॥ मोक लियो निज ठाम, पहोतो प्रनु समरंत जी ॥ १७ ॥ तेम दक्षिण विशि चक्र, चाफ्यु हो वाटें थाकाशनी ॥ थाव्या दक्षिण दधि तीर, तीरथ वर वाम थासनी ॥ १७ ॥ तेम थायो सुर तेह, कर जोडी भागल रह्यो । तु सादिव गुणगेद, तुम दरिसण नाग्य ललो ॥ १५ ॥ तेहने स्पापी ३०७ श्री शांतिनाथनो रास खंमबहो. सात दिवस थया वरसतां रे ॥ म ॥ करे चक्रोश विचार हो ॥ ज० ॥ ॥ १७ ॥ शोल सहस यद स्वामीके रे ॥म० ॥ थंग उलग करनार हो । ज० ॥ ग्रही हथीयारने धाश्या रे ॥ म० ॥ जिहा जलद कुमार हो ।। ज० ॥ १५ ॥ रे पापी तमें शु करो रे ॥ म ॥ विण खूटे मरणाश हो ॥ ज० ॥ विरमो नहिंतर पामशो रे ॥ म ॥ तुमें धम्हहूती विनाश हो ॥ ज० ॥ २०॥ जय पामीने उसख्या रे ॥म० ॥ जइ नमीया प्रमुपाय हो ॥ ज० ॥ अमें थपराधी थाकरा रे ॥ म० ॥ तुम्द गिरु था जिनराय हो ॥ ज० ॥ २१ ॥ तृण सेई मुखमा सवे रे ॥ म० ॥ म्लेष्ठ करे अरदास हो ॥ ज० ॥ गुनह खमो ए थम तणो रे ॥ म० ॥ तुम साहिब हम दास दो ॥ ज० ॥ १२॥ नतवत्सल जगवत जी॥ म ॥ गुनह करे वकसीस हो ॥ ज० ॥ हय गजवर मणि नेटणां रे ॥ म० ॥ मूकी नामें शीश हो ॥ ज० ॥ २३ ॥ सेनानीने मूकियो रे ॥ म ॥ वीजो निष्कूट सिधु हो ॥ ज० ॥ साधीने यावो वही रे ॥ म०॥ हुकम करे जगवधु दो ॥ ज० ॥ २४ ॥ जइ सेनानी साधिया रे ॥ म ॥ तिदाना देश थनेक हो ॥ ज० ॥ ते सघता थावी नम्या रे ।। ज ॥ मनमा धरिय विवेक दो ॥ ज० ॥ २५ ॥ जइ झपनकूट शांति जी रे ॥ म०॥ लखे पोतानु नाम हो ॥ ज० ॥ शातिप्रजुकी सादिवी रे ॥म ॥ सीध्यां वाबित काम हो ॥ ज०॥ २६ ॥ गंगोत्तर निष्कूट तिहां ॥ म० ॥ साघे सेनानी जाय दो ॥ ज० ॥ खमप्रपात गुहा थाविया रे ॥ म ॥ कृतमाल मुर थधिष्ठाय हो ॥ ज०॥ २७ ॥ साधीने प्रज्जु नि सस्या रे ॥ म ॥ गगातट यदिगण हो ॥ ज० ॥ गगा श्रावीने कहे रे ॥ म ॥ जय जय श्री जिनजाण दो ॥ ज० ॥ २७ ॥बके खमें सातमी रे ॥ म० ॥ ढाल नणी सुखकार दो ॥ ज ॥रामविजय कहे पुण्ययी रे ॥ म० ॥ लदिये जय जयकार हो ॥ज॥२९॥ सर्व गाथा ॥१५॥ श्लोक ॥ दोदो सोरठी ॥ ॥ गगातटें निवास, स्वामी करे सेनातणो ॥ दवे जुन पुण्यविलास, जे प्रकटे प्रमुजी तणो ॥१॥ ॥ ढाल श्रातमी॥ ॥ जरताधिप राय, साधे देश सद्गु ॥ ए देशी ॥ हादश योजनने थायाम,

३०६
जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो.
खे रे ॥ म० ॥ सेन काजे चक्रधार हो ॥ ज० ॥३॥पचे उम्मया
नगा रे ॥म ॥ निर्ममा तेम जाण हो ॥ज॥ वार्षिकी पान करे नि
रे ॥म० ॥ पामी प्रनुनी थाण हो ॥ ज०॥४॥ सैन्य
सड तिहां
रे ॥ म ॥ जुन जुन पुण्य प्राग्नार हो ॥ ज० ॥ तमित्रगुहाची नीता
रे ॥ म ॥ वाहिर जगदाधार हो ॥ ज० ॥ ५ ॥ तत्रापातचिलातमारे
॥ म ॥ म्लेच तणा मलि नूप हो ॥ ज० ॥ चिते एकुण प्रावियो रे
॥ म ॥ वैरी सैन्य विरूप दो ॥ ज०॥ ६ ॥ युछ तेहो सापें बाणिपुं रे ।
नीडे सुनटनी कोड ॥ ज०॥ देखी म्लेचने थाकरा रे ॥ म० ॥ सैन्य रई
मचकोड हो ॥ ज०॥ ॥ सेनानी सुणी थावियो रे ।। म ॥ व तुरन
थस्वार हो ॥ ज० ॥ दमरत्न ग्रही दाथमा रे ॥ म || धायो यम था
कार हो ॥ ज० ॥ ॥जट कोटी तव कबले रे ॥मः ॥ स्वामियो
बलवान् हो ॥ ज० ॥ नागि पडी म्लेहां तणी रे ॥ म ॥ नाग ते मत
शान दो ॥जाए॥ केश पच्या के थाखच्या रे॥म०॥ केश दुवा सहार
दो ॥ ज० ॥ सहामु कोइ नाले नहिं रे ॥ म० ॥ दुइ म्लेशांनी दार हो
॥ ज० ॥ १० ॥ नासी सिधुतटें गया रे ॥ म ॥ तजि थाहार स्वयमेव
हो ॥ ज० ॥ वारिद नामें कामने रे ॥ म॥ तेह धाराधे देव दो ॥ जा
॥ ११ ॥ तुष्ट थ कहे म्लेडने रे ॥म ॥ श्रमें कुणमात्र अनाथ हो
॥ ज० ॥ णा श्रम चाले नहिं रे ॥ म ॥ ए त्रिदु जगको नाथ हो
॥ ज० ॥ १२ ॥ म्लेष्ठ कीयो थायद घणो रे ॥ मः ॥ वरसावे जलधार
दो॥ न० ॥ किमही तेद न सरे रे ॥ म० ॥ वरसे मूशनधार हो ।
ज० ॥ १३ ॥ जिनचक्रीसेना वहे रे ॥ म ॥ वाध्यु पाणीपूर हो ॥
ज ॥ कहे प्रधान सुण सादिया रे ॥म॥ राख राख वडार हो ॥ ज०
॥ १४॥ चर्मरत्न प्रजुजी धस्यु रे ॥म॥ बार जोयण विस्तार दो ॥ज०॥
जल मती तरी रे ॥ म ॥ सेना जगदाधार दो ॥ ज० ॥ १५ ॥
मरम अपरें तव्यु रे ॥ म ॥ उत्ररत्न सुखकार हो ॥ ज० ॥
कोश घडतातीश उपरे रे ॥म ॥ बत्र तणो विस्तार हो ॥ ज० ॥
॥ १६ ॥ करे प्रकाश मणि रयण रे ॥म ॥ जाणे लग्यो सूर हो
ज ॥ कण नीपावे कर्षणी रे ॥म॥ व वारि करे दूर हो ॥ ज० ॥
१७ ॥ एम निजसेना ठ-दरी रे ॥मा जल नवि खेंचे पार हो ॥ ॥

- श्री शांतिनाथनो रास खंम हो ३०ए मोजी महिराण ॥ शा० ॥ वाजे लाख चोराशी निशाण, जित दुई त्रिनु वन सुलतान ॥ शा० ॥ १५ ॥ कोडि बढार साथै अस्वार, उन्नू कोडी पायक दल सार ॥शां॥ चनद रयण नवनिधि सघात, बहु थामवर य चिरानो जात ॥ शा॥ १६ ॥ गुज दिन गजपुर करे प्रवेश, दूर टल्या जनना सक्लेश ॥ शा० ॥ वदीजन वोले जयवाणि,यागल नाट करे कल्या ण ॥ शा० ॥ १७ ॥ सोहव जारि जरि मोती याल, प्रचकों वधावे थइ उन माल ॥ शा॥ निजमदिर थाये नूपाल, सुखीयो सगु तिहां वाल गोपाल ॥ शां० ॥ १७ ॥ हे खमें दो थामी ढाल, थाये जगत्प्रच दीनदयाल ॥ शा ॥ रामविजय कहे पुण्यसयोग, आइ मिले सवि वादित योग ॥शां॥१॥ सर्वगाथा ॥३५॥ श्लोक तथा गाथा मली। ॥दोहा॥ ॥ वासी भारत वर्षना, मलीया देवी देव ॥ वत्रीश सहस नरेश्वरा, सारे प्रजुनी सेव ॥ १ ॥ करे थनिपेक चक्रीतणो, वार वरस ममाण ॥ विद्याधर नूचर मली, सर्व समयना जाण ॥ २ ॥ करे उत्सव थनिपे कनो, नित्य एक एक राजान ॥ परणावे दोय पुत्रिका, रूपें रन समान ॥ ३ ॥ चोसन सहस यतेवरी, एणी पेरें दूर उदार ॥ दो दो तस वारा गना, एक लक्ष बाणु हजार ॥ ४ ॥ ॥ ढाल नवमी॥ ॥ दरणी जव चरे ललना॥ए देशी॥ प्रवल पुण्याश् शांतिकी ललनां ॥ जला हो कहेता नावे पार ॥ सादिव सेवी ललनां ॥ १ ॥ ए थाकणी॥ फिरत दूहा देशमां ॥ ल ॥ लला हो सहस वत्रीशने मेल ॥ सा० ॥ वत्रीश सहस नरिंदा ॥ ल० ॥ लला दो करे थहोनिश प्रच्छ केलि ॥सा ॥ २ ॥ सहस वहांतर पुरवरा ॥ ल० ॥ल ॥ सोहे दि जमाल ॥ सा० ॥ पाटण सख्या दो सांजली ॥ लम् ॥ल॥ वारु सहस थडियाल ॥सा॥ ३ ॥ कोडि बन्नु वर गामना ॥ ल०॥ लम् ॥ जोगवे लोग रसाल ॥ सा ॥ शोल सहस यह थागलें ॥ल लगा रहे कर जोडी नाल ॥ सा ॥ ॥ दोय सदस अंगरक्षका ॥ ल ल ॥ सेव करे दिल साच ॥ सा ॥ चोसठ ६ दाजर रहे ॥ ॥ल ॥ कोई न लोपे वाच ॥ सा ॥ ५ ॥ दश कोडि थत्तवध्वजाघरा ॥ लम् ॥॥

३०७ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. विस्तर नव योजन हितकाम ॥ शातीश्वर राय, साध्या देल सह यांकणी ॥ थाठ योजन उचा निरधार, नवनिधि मजूषा शां० ॥ १ ॥ वैसूर्य मणिमय जटित कपाट, प्रगट्या निषि तेहनो घाट ॥ शा० ॥ नैसर्पक पहेलो चित्त धार, पाक वीजो निषि ॥ शां० ॥ २ ॥ पिगल त्रीजु सर्वरतन, चोयु महापन पंचम मन। शां० ॥ काल महाकाल मानव शख, चार एव नवनिहि गुख संख। शा० ॥ ३ ॥ स्कधावार ने नगरनिवेश, पहेला निधिमा सयल नित ॥ शां० ॥ धान्य वीजनी सवि सपत्ति, वीजे दुवे एहनी उत्पषि ॥ शां० ॥ ४ ॥ नर महिला हय दाथीना जाण, थापणविधि त्रीने वखाण ॥ शां० ॥ चवद रत्न दुवे चोथे निधान, पाचमु वस्त्र विविधनी खाण ॥ शां० ॥ ५ ॥ बछे कालत्रयनु झान, महाकाले निमुणो मति मान् ॥ शां० ॥ सुवन रूप्प मणि लोद प्रवाल, एनो सनव सातमे नाल ॥ शां० ॥ ६ ॥ युआनीति सघला हथियार, योधतणा यष्टम थप धार ॥ शां० ॥ चनविध काव्य ने तुर्यना धग, नाट्य नाटक विधि नवमे रंग ॥ शां० ॥ ॥ पल्योपम जीवित सुरवास, ए नवनिधिसंबंध मास ॥ शां० ॥ नवसहस निधि सुर कहे थाय, जय जय चकी निष्ठ वनराय ॥ शां० ॥ ७॥ मन माने तेम विलतो स्वामि, निधि असूट तुम्हारे नाम ॥ शां० ॥ प्रगव्यां पूरव पुण्य प्रमाण, वरती तुम्हारी षट खम थाण ॥ शां० ॥ए ॥ निधि उत्सव कीधो तेणी वार, प्रजुना पुल्प तणो नहिं पार ॥०॥ गगा पूरव निष्कूट नाग,थाप वशे कीधो वरनाग ॥ शां०॥ १० ॥ साधी षट् खेम नारत वास, प्रनु बलियो जस सुर नर दास ॥ शां० ॥ नहिं प्रजुने मन मोदविकार, सदय महाबलवान विचार ॥ शां० ॥ ११ ॥ विष्णु उदयें नवि नोगयां जाय, विषु जोगवियां मोर न थाय ॥ शो० ॥ यावशें वरसें साधी दो देश, प्रज्जु श्रावे निज न यर उद्देश ॥ शां० ॥ १५ ॥ दुश् दधिणाठर घर घर वात, थायो सा हिब जग विख्यात ॥ शां० ॥ बांध्यां तरियां तोरण बार, मुख बोले सड मगल चार ॥ शां० ॥ १३ ॥ करि दिग्विजय वरी जयप्रेणि, थावे प्रत गजपुर बगुसेन ॥ शां० ॥ लाख चोराशी गजके दो घाट, आगें चलेक रता गललाट ॥शां ॥१॥ हय रथ सख्या तेती हो नाण, प्रबुजी बडो श्रीशांतिनाथनो रास खंम ठहो. ३११ पति थाविया ॥ल ॥ला देव देवी परिवार ॥सा॥ प्रनु प्रणमी करे हर्पशु ॥ ल ॥ ल० ॥ दीदा महोत्सव सार ॥ सा० ॥ २० ॥ सरवार थ नामें नलीस ॥ल ॥ शिविका रची तेणि चार ॥ सा० ॥ वेता जगगुरु कपरें ।लाल ॥ जगजनके थाधार ॥ सा ॥१॥ चामर वीजे सुरपति ॥ ल ल बत्र धषु शिरदार ॥सा॥ प्रथम उपाडे मा नवी ॥ ॥ स । नरनो प्रथम अधिकार ॥ सा० ॥ २२ ॥ सुर थ सुरेंड वहे पनी ॥ ॥ ल. ॥ गरुल बने नागें ॥ सा० ॥ शिक्षिका उपाहे जिनतणी ॥ लम् ॥ ॥ धरता मन थानंद ॥ सा ॥२३॥ के गाये वाये रगशु ॥ ल ॥ ल० ॥ केश नाटक करे सार ॥ सा० ॥ जाट परें विरुदावली लाल॥ सद्ध कहे जय जयकार ॥ सा ॥२४॥ नुवनोत्तर गुणवर्णना ॥ लम् ॥ ल० ॥ करे सुरपति ससनेह ॥ सा० ॥ रासदायक नर थागलें ॥ लम् ॥ ल॥ नृत्य करे गुणगेह ॥ सा ॥ २५ ॥ जना नेरी मृदगनां ॥ ॥ ल ॥ वाजे वाजिन सार ॥ सा० ॥ ननममल गाजी रघु ॥ लम् ॥ ल० ॥ उनिध्वनि मनोदार ॥ सा ॥ २६ ॥ दादा दूदू वर गायना ॥ ॥ लम् ॥ नाटकवध सगीत ॥ सा ॥ रना तिलोत्तमा कर्वशी ॥ लम् ॥ ॥ नाचती यनुनव रीत ॥ स० ॥ २७ ॥ उत्सवछं प्रनु थाविया ॥ लम् ॥ ॥ गनपुर नगर उद्यान सा॥ सहस्राव वनमाहेबावीने ॥लल॥ मतरिया नगवान ॥ सा ॥ २७ ॥ थानूपण मतारियां ॥ ल० ॥ ल० ॥ मूक्यो परिग्रह नार ॥ सा ॥ पंच मुष्टि करे केशनो॥ ॥ ल० ॥ लोच सहस परि वार ॥ सा ॥ २॥ ॥ वस्त्राचल ३ लीया ॥ ॥ ल ॥ दीरजलधि मांदे केश ॥ सा ॥ वदेवाच्या रखे एहनी ॥ ल ॥ लम् ॥ थाशात न होय लेश ॥ सा० ॥ ३० ॥ तुमुल निवारे दो सुरवितु ॥ ल० ॥ ल० ॥ वरे प्रनुविरति सुनारि ॥ सा ॥ ज्येष्ठ शित चठवशी दिने । ल० ॥ ल० ॥ नरणीगत विधुचार ॥ सा० ॥ ३१ ॥ मुखे “नमोति दाणनणी ॥ ल ल ॥ प्रचलिये सयमनार || सा ॥ पाठ सा मायिक वचरे लाला उचलत चोविदार ||सा॥३॥ मन पर्यव नामें ननु ॥ ल० ॥ ल ॥ सझिमनोगत जाव ॥ सा ॥ जाणे दो जेदथी निर्मला ॥ ल० ॥ ल ॥ प्रगटयु तिण प्रस्ताव ॥ सा ॥ ३३ ॥ चवना

३१० जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो.
दीवीधरा पांच लाख ॥ सा ॥ साठ सदस दरबारमा ॥ ॥न
पंमित पूरे साख ॥ सा ॥ ६ ॥ साठ सहस बिरुदावली ॥लाला
प्रतिदिन बोले जाट ॥ सा० ॥त्रण लाख मत्रीश्वर कह्या ॥ल..
लम् ॥ यश नहि उच्चाट ॥ सा ॥ ७ ॥ वत्रिश सहस नाटक नला ।
लण् ॥ ल० ॥ नव नव लील विलास ॥ सा०॥ वीश सहस थागर तणो
॥ल ॥ ल॥ चाल्यो थावे धनराशि ॥ सा ॥ ७ ॥ थक्य खजीनो
जेहनो ॥ ल॥ लम् ॥ किमही न खूटे सो ॥ सा० ॥ प्रमुदित सवि
परजा जर ॥ लम् ॥ ॥ शातिप्रमुख जोइ ॥ सा ॥ ए॥ चोसठ
सहस करे ना ॥ तल ॥ नित्यप्रत्ये रूप दयाल ॥सा० ॥ वर
तरुणीके विलासमा ॥ ल ल ॥ जातो न जाणे काल ॥ सा० ॥
॥ १० ॥ विश्वसेन कुल दिनमणि ॥ल ॥ ल० ॥ थचिरामात महार
॥ सा० ॥ कचनवर्ण तनु जेदन ॥ल ॥ ॥ निरखत दर्ष अपार
॥ सा ॥ ११ ॥ सात इति विरमी सही ॥ल ॥ ज० ॥ सह मुखीयो
ससार ॥ सा० ॥ शाति प्रचुके राजमा ॥ ॥ ला ॥ वरत्यो जय जय
कार ॥ सा ॥ १२ ॥ वरस सहस पचवीश थया ॥ल ॥ ॥ च
क्रीपद पाजत ॥ सा० ॥थतिशय झानें दो थापणो ॥ ज० ॥ ॥नव
देखे जगवत ॥ सा॥१३॥ निर्मोही थश्ने रह्या ॥ल ॥ला ॥ जोग
उपर थरिदंत ॥ सा० ॥ नव लोकांतिक देवनां ॥ ल ल ॥ चलियां
थासन त ॥ सा ॥ १३ ॥ थावे तिहां उतावला ॥ल ॥ला ॥
जिदां प्रनु शांति जिपद ॥ सा० ॥ बफ बृज नगवत जी । ललि
परिदर मोहनो फद ॥ सा ॥ १५ ॥ स्थापो तीरथ त्रिवनपति ॥
लण् ॥ लम् ॥ लोक सहू हितकार ॥ सा ॥ चौदराजके चोकमें ॥
लम् ॥ ॥ उर न तारणहार ॥ सा ॥ १६ ॥ एम सुर विन वियो
वितु ॥ज॥त ॥ थापे वरसीदान ॥ सा ॥ मरण कीध वसुघरा
॥लम् ॥ ॥ करे सुर नर गुण गान ॥ सा॥ १७ ॥ चकायुध अगन
नपी॥ लम् ॥ ॥ स्थापे राज्य दयाल ॥ सा ॥ थाप यया चलवे
श्वर ॥ल ल॥ दीक्षाने राजमाल ॥ सा ॥ १० ॥ भासन चलियां
शनां ॥ ज० ॥ ॥ जाण्यु अवधिज्ञान ॥ सा ॥ संयमसिरि वरवा
जणी ॥ल ल॥ यया उत्सुक नगवान ।। सा० ॥ १५ ॥ चोसन सुर

श्री शांतिनाथनो रास खंग छो. ३१२ पति थाविया ॥ ॥ल०॥ देव देवी परिवार सा॥ प्रचु प्रणमी करे दर्पछ । ल ल ॥ दीक्षा महोत्सव सार ॥ सा ॥ २० ॥ सरवार थ नामें जलील ॥ल ॥ शिविका रची तेणि वार ॥ सा ॥ वेता जगगुरु कपरें लालम् ॥ जगजनके थाधार ॥ सा ॥१॥ चामर वींजे सुरपति ॥ ल ल०॥ त्र धस्यु शिरदार ॥सा॥ प्रथम उपाडे मा नवी ॥ ल ल ॥ नरनो प्रथम थधिकार ॥ सा ॥ २२ ॥ मर थ सुरें। वहे पनी ॥ल ॥ल ॥ गरुल अने नागें ॥ सा ॥ शिविका उपाडे जिनतणी ॥ ल० ॥ ॥ धरता मन थानद ॥ सा ॥ २३ ॥ के गाये वाये रगशु । लम् ॥ लम् ॥ केश नाटक करे सार । सा० ॥ नाट परें विरुदावली ॥लाल॥ सदु कहे जय जयकार ॥ सा ॥२॥ नुवनोत्तर गुणवर्णना ॥ ल ॥ ल ॥ करे सुरपति ससनेद ॥ सा ॥ रासदायक नर यागलें ॥ ल ॥ ल० ॥ नृत्य करे गुणगेह ॥ सा० ॥ २५ ॥ नना मेरी मृदगनां ॥ ॥ लम् ॥ वाजे वाजिन सार ॥ सा ॥ ननममल गाजी रयु ॥ लम् ॥ ल० ॥ उनिध्वनि मनोहार ॥ सा० ॥ २६ ॥ हाहा हूहू वर गायना ॥ल ॥ ॥ नाटकवध सगीत ॥ सा ॥ रना तिलोत्तमा ऊर्वशी ॥ लम् ॥ल ॥ नाचती थनुनव रीत ॥ स० ॥ २७ ॥ उत्सव प्रचु थाविया ॥ ल ल ॥ गजपुर नगर उद्यान सा॥ सहस्राव वनमाहेबावीने ॥लल॥ तरिया जगवान ॥ सा ॥ २७ ॥ थानूपण कृतारिया ॥ ल ॥ ल ॥ मूक्यो परिप्रद नार ॥ सा ॥ पंच मुष्टि करे केशनो ॥ल ॥ल ॥ लोच सहस परि वार ॥ सा ॥ २ ॥ वस्त्राचल ३ लीया ॥ ल० ॥ लम् ॥ धीरजलाधि माहे केश ॥ सा ॥ वहेवाख्या रखे एहनी ॥ ॥ लम् ॥ थाशात न होय लेश ॥ सा० ॥ ३० ॥ तुमुल निवारे दो मुरवितु ॥ ॥ ल ॥ वरे प्रविरति मुनारि ॥ सा ॥ ज्येष्ठ शित चदशी दिने । ल ल | नरणीगत विधुचार ॥ सा० ॥ ३१॥ मुखे नमोसि वाण" जणी ॥ लाल ॥ प्रज्जु लिये सयमनार ॥ सा० ॥ पात सा मायिक चचरे लाल॥ वह नत्त चोविदार ॥सा॥३२॥ मन पर्यव नामें ननु । ल० ॥ लम् ॥ सझिमनोगत जाव ॥ सा० ॥ जाणे दो जेदयी निर्मला ॥ लम् ॥ ल० ॥ प्रगटघु तिण प्रस्ताव | सा० ॥ ३३ ॥ चपना ३२० जैनकथा रत्नकोप जाग आठमो. दीवीधरा पांच लाख ॥ सा ॥ साठ सहस दरबारमा ॥ ॥ल. पंमित पूरे साख ॥ सा० ॥ ६ ॥ साठ सहस बिरुदावली ॥ लाला॥ प्रतिदिन बोले जाट ॥सा ॥त्रण लाख मत्रीश्वर कहा ॥ला। ल० ॥ यश नहिं वच्चाट ॥ सा ॥ ॥ वत्रिश सहस नाटक जलां । लण् ॥ ॥ नव नव लील विलास ॥ सा ॥ वीश सदस घागर सणो ॥ल० ॥ ल ॥ चाल्यो थावे धनराशि ॥ सा ॥ ७ ॥ थक्ष्य खजीनो जेदनो ॥ ज० ॥ ल ॥ किमही न खूटे सोई॥ सा ॥ प्रमुदित सवि परजा नइ ॥ ॥ ल० ॥ शातिप्रमुख जोइ ॥ सा ॥ ए ॥ चोसन सहस करे नवां ॥ ल ल ॥ नित्यप्रत्ये रूप दयाल ॥ सा० ॥ वर तरुणीके विलासमां ॥ लम् ॥ ल० ॥ जातो न जाणे काल ॥ सा ॥ ॥ १० ॥ विश्वसेन कुल दिनमणि ॥ लम् ॥ लम् ॥ थचिरामात महार ॥ सा ॥ कंचनवर्ण तनु जेदनु ॥ल ॥ ल० ॥ निरखत वर्ष अपार ॥ सा ॥ ११ ॥ सात इति विरमी सही ॥ लम् ॥ ल ॥ सद्ध मुखीयो ससार ॥ सा० ॥ शाति प्रचुके राजमां ॥ लाल ॥ वरत्यो जय जय कार ॥ सा ॥ १२ ॥ वरस सहस पचवीश थयां ॥ लम् ॥ लम् ॥ च क्रीपद पालत ॥ सा० ॥ अतिशय झानें दो थापणो ॥ ल ॥ ॥नव देखे जगवत ॥ सा॥१३॥ निर्मोदी थक्ने रह्या ॥ लाल ॥ जोग सपर थरिहंत ॥ सा० ॥ नव लोकांतिक देवनां ॥ लम् ॥ ॥ चलियां आसन तेत ॥ सा ॥ १४ ॥ थावे तिहां उतावला ॥ ॥ज ॥ जिहां प्रच शांति जिव ॥ सा ॥ बूम बूम जगवत जी ॥ लालम्॥ परिदर मोदनो फद ॥ सा ॥ १५॥ स्थापो तीरथ त्रिप्नुवनपति ॥ ला ॥ ज॥ लोक सहू हितकार ॥ सा ॥ चौवराजके चोकमें ॥ ज० ॥ लम् ॥र न तारणहार ॥ सा ॥ १६ ॥ एम सुर विन वियो वितु ॥ ज०॥ ल० ॥ थापे वरसीवान ॥ सा ॥करण की वसुंधरा ॥लल ॥ करे सुर नर गुण गान ॥ सा॥ १७ ॥ चक्रायुध अंगज जणी ॥ लण् ॥ ज० ॥ स्थापे राज्य क्यात ।। सा० ॥ श्राप थया अलवे श्वर ॥ लम् ॥ल०॥ दीक्षाने राजमाल ॥ सा ॥ १७ ॥धासन पजियां प्रश्नां ॥ ॥ ॥ जाए{ अवधिज्ञान ॥ सा ॥ सयमसिरि वरवा जणी ॥ल ल॥ यया सस्सुक नगवान ॥ सा ॥ १ ॥ योसठ सुर श्री शांतिनाथनो रास खम छो. ३२३ मटी, मिथ्यात्वने काम ॥ वास्या वैरी थनादिना, क्षायिकगुणधाम ॥ १२ ॥ थाबादन अझाननु, उमाडी नास्यु ॥ निश नाती वापडी, थनुनव सुख चारव्यु ॥ १३ ॥ यविरति नवि कनी रही, थलगांथी काखी ॥ राग हेप वेठा तरी, दथियारने नाखी ॥ १४ ॥ दोप अढारथी वेगलो, प्रनु शांति जिपदो ॥ तिण वेला यनुनावथी, चलियांसन दो ॥ १५ ॥ सुर मलिया चार निकायना, ततण तिहां थावे ॥ वायुकु मारा नूमिनो, योजन समरावे ॥ १६ ।। मेघसुरा गधोदकें, रजनूमि समारे ॥ मणिमय पीठ रचे तिहां,यति हर्प पमाडे ॥ १७ ॥ वनपति ने ज्योतिपी, वैमानिक देवा ॥ रूप कनक मणि रयणना, विरचे गढ देवा ॥ १७ ॥ चिद् दिशि घार विराजती, तोरणनी माला ॥ सुर नर मन मोदी रहे, यति काक ऊमाला ॥ १५ ॥ पावडिया शोने जला, वीश सहसनी सख्या ॥ नूख तरप लागे नहीं, ते नयणे देख्या ॥ २० ॥ हादश गुण प्रन्नु थगयी, तेह मध्य थशोक ॥ जे नजरें दी थके, नासे सवि शोक ॥ २१ ॥ चिद् दिशि सिहासन चला, बत्रत्रय वारु ॥ चामर सुर व्यं तर सवे, विरचे दीदारु ॥ २५ ॥ अचिरानदन शांति जी, पूरव दिशि छारें ॥ पेसे तीर्थ नमस्करी, सुर सेवा सारे ॥ २३ ॥ पूर्वदिशे सिंहासने, वेसे जिनदेवा ॥ प्रनु प्रतिरूप करी ज्वे, त्रिगु दिशि तिहां देवा ॥ २४ ।। नाममल पूढें धस्यु, करे कुसुमनी वृष्टि ॥ जानुप्रमाण निरतरें, थइ मन सतुष्टि ॥ २५ ॥ यवर वाजे उनि, नो नो नवि लोका ॥ जाण करे थावी नमो, ज्यु था अशोका ॥ २६ ॥ बारे परिषद तिदा मले, जिन वाणी सुणेवा ॥ कर जोडी नावें रही, जवनय अवगणवा ॥ २७ ॥ सुर वनिता मुनि साधवी, त्रिनु थमि निकोणे॥व्यंतर सुवन ने ज्योतिषी, त्रय नेकत जाणे ॥ २७ ॥ ते सुर वायव्य कूणमां, वैमानिक त्रिदशा ॥ नर नारी ईशाना, त्रिनु पर्षद सुयशा ॥ २ ॥ एहवी वारे पर्पदा, मूल गढमा वेसे ॥ वीजा गढमांहे सवे, तिर्यंच शुचिदेशे ॥ ३० ॥ रौप्य तणा गढमा रहे, वादन सवि जननां ॥ प्रदरिसणथी नवि रहे, म त्सर निज मनना ॥ ३१ ॥ यउक्तं ॥ सारगी सिदशाव स्टशति सुतधिया नदिनी व्याघ्रपोतं, मार्जारी ईसवाल प्रणयपरिवशात्केकिकांता जुर्ज गम् ॥१॥ वैराण्याजन्मजातान्यपि गलितमदा जंतवोऽन्ये त्यजति, श्रित्वा ४.

३१२ जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. णी प्रतु विचरिया ॥ल ॥ ज० ॥ नहि मन मोह विकार ॥सा॥ प्र निर्मोदी वदीने ॥ लम् ॥ ल०॥ पाडो वक्ष्यो परिवार ॥ सा ॥२०॥ शिदिक सद्ध देवता ॥ ला ॥ ज । नदीश्वर करे यात्र ॥सा० ॥ गणतां सुरसुख तृण समु ॥ लम् ॥ल ॥ पावन कीधा गात्र ॥ सा ॥२५॥ खम बहे नवमी नली ॥ ल ॥ ॥ ढाल दीदा थधिकार ॥ सा ॥ राम कहेसुणता सही ॥लाल॥ लहियें नवनिस्तार ॥सा॥३५॥४५॥ ॥ दोहा ॥ ॥ बीजे दिन जिन शांतिजी,कोइ सनिवेश मजार॥ परमानें करे पारणं, सुमित्रतणे घरवार ॥१॥पच दिव्य परगट दुवा, साढी वारद कोहि ॥ वृष्ठि थई सोवन तणी, पहोता वाबित कोड ॥ २ ॥ यमुक्त ॥ यमसेरस कोडी, उक्कोसा तच दोई वसुधारा ॥ थत्तेरस लरका, जहनिया हो वसुधारा ॥ १ ॥ पूर्वदोदा ॥ ग्रामाकर पुर विचरतां, शांतीश्वर जिन चद ।। थप्रतिबध पट् कायना, पालक महामुणिद ॥३॥ ॥ ढाल दशमी॥ ॥ थाज सखी शखेश्वरो ॥ ए देशी ।। चउनाणी चोखे चितें, जूम मलमांहे ॥ सम तृण मणि नावे वितु, विचरे उत्साहें ॥ १ ॥ कल्पाती तपय नजे, कुविकल्प निवारी ॥ योगस्वरूपी योगना, धारक ब्रह्मचारी ॥ २ ॥ वरते शुद मुनि नावमां, विरता दमवता ॥ साधक शिवपदपं यना, सूधा गुणवता ॥ ३ ॥ श्रमल श्रमायी थंतरें, खतीगुण पूरा ॥ पडिमा थनिग्रह धारता, मोनी प्रनु शूरा ॥॥थान मास अस्थमा, विचरी प्रज्नु थाव्या ॥ गजपुर नयरें तिण वनें, जगतीजन जाव्या ॥ ५ ॥ पत्र फल फलें नवतो, नदी तरु सोहे ॥ तिहां प्रजी पाठ धारीया, नविजन मन मोहे ॥ ६ ॥ शक्तध्यानमा वर्चता, तप बह चोविदार ॥ पोष नवमी तिथि कजली, निर्मल गुणधार ॥ ७ ॥ चरणी असु शशी थावियो, शुज वेला स्वामी॥ निर्मल ध्यानदशा वधी, चढते परिणामी ॥ ७ ॥ घाती कर्म क्य घातिया, थविनाशी जावें ॥ उज्ज्वल केवज नपन्यु, निरुपाधि स्वनायें ॥॥ नासक लोकालोकनु, तिण वेला प्रगटघु ॥ दोप बढारनु तिण समे, पल सघलु विघटयु ॥ १० ॥ थतराय थलगा थया, खदायी माता ॥ दास्य थरति रति वेगली, जय सघलां घानं ॥११॥शोक गंगा सा , श्री शांतिनाथनो रास खंम छो. ३२३ मटी, मिथ्यात्वने काम ॥ वास्या वैरी अनादिना, दायिकगुणधाम ॥ १२ ॥ थानादन याननु, उमाडी नारव्यु ॥ निश नाठी वापडी, अनुनव सुख चारव्यु ॥ १३ ॥ अविरति नवि कनी रही, थलगांथी फाखी ॥ राग हेप वेठा तरी, हथियारने नाखी ॥ १४ ॥ दोप बढारथी वेगलो, प्रनु शांति जिपदो ॥ तिण वेला यनुनावथी, चलियांसन दो ॥१५॥ सुर मलिया चार निकायना, ततक्ष्ण तिहां थावे ॥ वायुकु मारा नूमिनो, योजन समरावे ॥ १६ ॥ मेघसुरा गधोदकें, रजनूमि समारे ॥ मणिमय पीठ रचे तिहा, यति दर्प पमाडे ॥ १७ ॥ नुवनपति ने ज्योतिपी, वैमानिक देवा ॥ रूप कनक मणि रयणना, विरचे गढ देवा ॥ १७ ॥ चिट्ठ दिशि घार विराजती, तोरणनीमाला ॥ सुर नर मन मोही रहे, थति फाक जमाला ॥ १५ ॥ पावडिया शोने नलां, वीश सहसनी सख्या ॥ नूख तरप लागे नहीं, ते नयणे देख्या ॥ २० ॥ हादश गुण प्रनु थगयी, तेद मध्य यशोक ॥ जे नजरें दी थके, नासे सवि शोक ॥ २१ ॥ चिट्ठ दिशि सिहासन नला, त्रत्रय वारु ॥ चामर सुर व्यं तर सवे, विरचे दीदारु ॥ २२॥ थचिरानदन शाति जी, पूरव दिशि छारें ॥ पेसे तीर्थ नमस्करी, सुर सेवा सारे ॥ १३ ॥ पूर्वदिशे सिंहासने, वेसे जिनदेवा ॥ प्रनु प्रतिरूप करी ज्वे, विट्ठ दिशि तिहा देवा ॥ २४ ॥ नाममल पूवें धस्यु, करे कुछमनी वृष्ठि ॥ जानुप्रमाण निरंतरें, थ मन सतुष्टि ॥ २५ ॥ थघर वाजे उनि, जो जो नवि लोका ॥ जाण करे थावी नमो, ज्यु था अशोका ॥ २६ ॥ वारे परिषद तिदा मले, जिन वाणी सुणेवा ॥ कर जोडी नावें रदी, नवनय थवगणवा ॥ २७ ॥ सुर वनिता मुनि साधवी, त्रिदु थमि निकोणे॥व्यंतर जुवन ने ज्योतिषी, त्रय नैझत जाणे ॥ २ ॥ ते सुर वायव्य कूणमा, वैमानिक त्रिदशा ॥ नर नारी ईशानमा, बिट्ठ पर्षद सुयशा ॥ २ ॥ एदवी वारे पर्पदा, मूल गढमा वेसे ॥ वीजा गढमाहे सवे, तिर्यंच शुचिदेशे ॥ ३० ॥ रौप्य तणा गढमा रहे, वादन सवि जननां ॥ प्रनु दरिसपथी नवि रहे, म त्सर निज मनना ॥ ३१ ॥ यउक्त ॥ सारंगी सिहशाव स्टशति सुतधिया नदिनी व्याघ्रपोतं, मार्जारी हसवाल प्रणयपरिवशास्केकिकांता सुज गम् ॥१॥ वैराण्याजन्मजातान्यपि गलितमदा जतवोऽन्ये त्यति, श्रित्वा , -- . - ३१४ जैनकथा रनकोप नाग आठमो. साम्यैकरूढप्रशमितकलुप योगिन क्षीणमोहम् ॥ २॥ पूर्वढाल ॥ सा रंगी दरिबालने, सुतनी परें फरसे ॥ वाघ शिशुने नदिनी, चाटे अति हर्षे ॥ ३२ ॥ मांजारी दसवाल, रमे हर्षे नेली ॥ मोरवधू अदिई करे, कीडा मन मेली ॥ ३३ ॥ वैर टले थाजन्मनां, प्रजुने महिमायें ॥ रेव श्रवर कोई एहवो, नवि दीठो महिमाये ॥ ३४ ॥ यमुक्त ।। तीर्थकराणां साम्राज्यं० ॥ समवसरणस्थिति तेदवी, लवलेशथी दाखी ॥ इवे नि सुणो नवि वेशना, जिनजी जे नाखी ॥ ३५ ॥ दशमी बघ खमनी, कही ढाल सुरंगी ॥ रामविनय कहे सानलो, प्रल देशना रंगी ॥३६॥३१॥४॥ ॥ दोदा ॥ ॥ नामधेय कल्याण एक, थावी पुरुषरतन्न ॥ चक्रायुध बागल कहे, वात करी स्थिर मन्न ॥ १ ॥ समवसस्या थावी हां, श्रीशातिजिपद दयाल ॥ प्रनु ए वर्ष वधामणी, दु लायो पाल ॥ २ ॥ वात मुणी दर्षित थयो, देश यथोचित दान ॥ प्रवदनने निसस्यो, चकायुध राजान ॥३॥ पांचे थनिगम साचवी, प्रल वांदे नूपाल ॥ कर जोडी उनो रही, स्तवना करे रसाल ॥ ४ ॥ जय स्वामिन् जगदीश्वर, जय त्रिवनजन बंधु ॥ नव थगाधतारक विजु, जय गुणमणिना सिंधु ॥ ५॥ नवजल पडतां जीवने, तारक तुम्हो जहाज ॥ पूरण पुण्ये मुझने, मलिया श्री जिनराज ॥ ६ ॥ ध्येय धनतर सांबरो, ध्यायकने निजनाव ॥ दायक मुफ कपर करो, प्रतुजी करुणानाव ॥ ७ ॥डे थनत गुण ताहरा, तेह मां एक गुण मुफ ॥ देतां सेवक 5 ख टले, दाम न बेसे तुज ॥ ७ ॥ दी नोधरण धुरंधरा, हे थनाथना नाथ ॥ देखी हु तुम मुखकमल, जगा दुवो सनाथ ॥ ५ ॥ नमी स्तवी जिनराजने, नातिदूर नवि पास || बेसी निमुणे वेशना, चकायुध समास ॥ १० ॥ ॥ ढाल श्रग्यारमी॥ ॥ दस्तीनागपुर वर जलु ॥ ए वेशी ॥ वर पांत्रीश वाणीगुणे,संयुत थ तिशयमार रे॥प्रतु वरसे तिहां देशना, जेम जग पुष्कर जजधार रे॥टक। जेम जगपुष्कर जलधार श्सी, जिनदेशना सुखकार रे ॥ सुखकार मुणोथ विकार, निरामयकारिणी सुविचार रे ॥नि॥१॥ एथांकणी ॥राजन बाह्य ए शत्रुनु, सबलु तें टास्यु जोर रे ॥ पण ययापि न वस कमा, निज , श्री शांतिनाथनो रास खंम हो ३२५ देहमा इडिय चोर रे ॥॥ निजदेहमा इञिय चोर करे, अनरथ घणो गुण काजें रे।गुणकाज अनादिनो जीव फिरे,जग वाग्लो गतसाज रे ॥ज॥॥ शब्द रूप रसगधना, वाह्या वली फरस ने फद रे॥जाण यजाण थई रह्या, एह सेवे ते सहि मद रे ॥ ॥ एह सेवे ते सही मद कह्या, जिनयागमें गुणदीन रे ॥ गुणहीन ए दीन थश्ने फरे, रोप रागमें लयलीन रे ॥ रो ॥३॥ व्याधि लहे ते व्याधना, जेम निसुणी गीत सराग रे ॥ मरण तहे ते हरिणलो, तेम रागी सुणो वडनाग रे ॥०॥ तेम रागी सुणो वडजाग वैराग्यने, थादरो गुणवत रे ॥ गुणवत न कीजें कत शब्द, सुणी थावरो मतिमत रे ॥ सु० ॥ ४॥ लोचन इश्यि चपलता,चलता मननी बहु थाय रे ॥ मनचचलताये जीवहो, फरि फरि चिढ़ गतिमा जाय रे ॥०॥ फरि फरि चिट्ठ गतिमा जाय नयण रस, राचियां जग नूब रे ॥ जग नूब लहे ते मृत्यु पतंग, ज्यु वचिया नहि उच रे ॥ ज्यु० ॥ ५ ॥ स्वादेंजे शुन रस तणी, रसनावरावर्ती जीव रे॥ कटुक विपाक लहे घणा, परनव नरकें करे रीव रे ॥॥ परनवें नरकें करे रीव सदेव, ते मुखीया जगमांही रे॥ जगमा मरे मीन तणीपरें, ते सही 5 खिया गतबाय रे ॥ ते ॥६॥ गध शुनागुन कारणें, बढ़ जीव तणो करे नाश रे॥पोपे दो यि नातिका,नवि जोवे मूढ विमास रे ॥॥ नवि जोवे मूढ विमाती, वाघे राशि पापनी जेम नृग रे ॥ जेम नृग लह्यो 5 ख तेम गर्थे, गति थापणी मति नग रे ॥गा॥ फरस थामाहे जिके, सलचाणा लालचपूर रे॥बगु थारंन करे सदा, तेदने सद्गति रही दूर रे ॥॥ तेदने सजति रही दूर सही जेम, हाथी पर हाथ रे॥ परदाय सही जेम वेयण तिम, नृप जीवडो ए थनाथ रे॥9॥७॥ जे गुणगण ते मूल , जे मूल ते वलि गुणगण रे ॥ देतु हेतुमनावधी, बीजांकूरन्याय सुजाण रे ॥ ॥ वीजांकूरन्याय सुजाण, थजाण ए थादरे निरुपाय रे ॥ निरुपाय करे जिनधर्म ते, सदी सुरखने वरे शिवाय रे ॥ स ॥ए ॥ थाखर ए सदी विणसशे, बेद देई जाशे एद रे ॥ त्यारे तु फरीश श्रति घणो, माटें म कर विषय सनेह रे ॥ ॥ माटें म म कर विषय सनेह चक्रायुध, राजीया गुणगेद रे ॥ गुणगेद थ वेदने नेहें, रमो रस रंजीया शुचिदेह रे ॥ र ॥ १० ॥ एदवा जाणीने जेणें तज्या, तेदना जग सरिया कान रे ॥ जेम गुणधर्म कुमार जी, तनी ३१६ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो विपय ला शिवराज रे ॥ ॥ तजि विषय लघु शिवराज कहे, एम शर्मा तिनी नगवान रे ॥ तब चक्रायुध कर जोडी कहे, कहो तातजी उपमान ॥०॥ ११ ॥ कुण गुणधर्म किहा थयो केम, विपय तज्या तेणें सामी रे॥तास कथा मुझने कदो, केम थाप्यो शुनपरिणाम रे॥॥केम धामो गुजपरिणाम कहे, तब केवलीनगवत रे॥नगवत थनत गुणाकर,कहे मननी रली सुणो सत रे ॥ क॥ १२ ॥ जरतें सोरीपुर नयरमां, दृढधर्म दूत रा जान रे ॥ तस घरणी शीलशालिनी निज, पीयुनु लहे बदु मान रे ॥ निज पियुनुं लहे वट्ठ मान श्रमान, गुणें नरी वर नारी रे ॥ वर नारी ल कालु विनीत, गुणाकर सुदरी मुखकार रे ॥ गुण ॥ १३ ॥ मुख जोगवतां कतरां, मुत जायो एक रतन्न रे ॥ नामें जलो गुणधर्मजी, मायडी करे तास जतन्न रे ॥०॥ मायही करे तास जतन्न, कला सघली नएसो गुण वत रे ॥ गुणवत महंत दु सत्यवत, सोदामणो वलवत रे ॥सो॥१॥ यौवन वयमां थावीयो, तेद सकल कलानो जाण रे ॥ मात पिता मन वालदो, गुणधर्म कुंवर कुलनाए रे ॥ ॥ गुणधर्म कुवर कुलनाण, सुनग सरलाशयी प्रियवाण रे ॥ प्रियवाण दिताहित जाण, सऊन जन बाश्रमी गुणखाण रे ॥सण॥१५॥ नयर वसतपुरे वसे, इण समे नृप ईशा नच रे ॥ कनकवती कनी तेहनी, तस स्वयंवर मामयो नरिंद रे॥ 5 ॥ तस सयंवर काजें दूत समाजें, थावीयो उनमाल रे॥उजमालसुणी गुणधर्म, कुमार जी चालीयो ततकाल रे॥कुण॥१॥धाव्यो वसतपुरें तदा,रहे ते नृप दस थावास रे ॥ एकदिन स्वयंवर देखवा,गुणधर्म गयो समास रे ॥३०॥ गुणधर्म गयो तिहां पण तेद थावी, नृपनी कनी तेणी वार रे ॥ तेणी वार जोतो तुरंत,लागी दृष्टि रागनी निर्धार रे ॥ ला॥ १७ ॥ नयरों था ने प्रीतडी, पेठी ते इयडामांय रे ॥ चित्तमादि लागी चटपटी, तेन निज निज मदिर जाय रे॥॥ तेद निज निज मदिर जाय के नेद, नयणतणे जण दोय रे॥जण दोय चितारे चित, एकेकने यतिघणे मन मोह रे॥ए॥ ॥१॥ अगीयारमी ढालमां,कहे शांतिजिपद दयाल रे॥काम महाग्रह जेदने, तस न मटे कल्पनाजाल रे ॥॥ तस न मटे कम्पनाजाल, विषम विरुन सदि इखदाय रे ॥ सुखदाय कह्यो जिनराय ए, बात जूती नही जगमाय रे ॥वा॥१॥ सर्वगाथा ॥३४॥ श्लोक तपा मापा मनी ॥

पाप ॥ श्री शांतिनाथनो रास खंम छो. ३१७ ॥ दोहा ॥ ॥ कनकवती चित्तमां वस्यो, श्री गुणधर्म कुमार ॥ रात दिवस तस रूपमा, मोही मोहविकार ॥ १ ॥ प्रेमसमो पावक नहि, प्रेम समुं नहि वडू परवशपयु, ए सम नहिं सताप ॥ २ ॥ प्रेम तपो "प्रे" लेइने, यमनो इ " मे "कार, "प्रेम" शब्द एम निपन्यो, जिणथी 5 ख दातार ॥ ३ ॥ कनकवती मन समरतो, श्रीगुणधर्म कुमार ॥ निज उता रे यावीयो, पण जक नदि लगार ॥ ४ ॥ रातें मूकी कुमरीयें, दासी तेह नी पास ॥ एक पाटी चित्रामनी, कर दीधी तस खास ॥५॥ कुमरें दीठी पट्टिका, तिहा कलहसी रूप ॥श्लोक एक तेहने तलें, वांचे कुमर स्वरूप ॥ ६ ॥ तद्यथा ॥ यादो दृष्टप्रिया सानु, रागाऽसौ कलहसिका ॥ पुनस्तद शन शीघ, वाहत्येव वराक्यहो ॥१॥ पूर्वदोहा ॥ नावाशय लही तेहने, राज्यो कुमर अपार ॥ रूप लवी कलहसनु, श्लोक लखे तेणि वार ॥७॥ तद्यथा॥ कलहसोऽप्यसो सुच्च, क्षण दृष्ट्वानुरागवान् ॥ पुनरेव प्रिया दृष्टु, महो वांछत्यनारतम् ॥ २ ॥ पूर्वदोहा ॥ कनकवती कुमरी वली, सरस सुगधां छत ॥ दासी साय मोकले, विलेपन तावूल ॥ ॥ पुष्प ले शिर पर यस्खा, मुख चावे तांबूल । थगविलेपन चोपडा, कुवर गुणें अमूल्य ॥ ए ॥ दान दिये सतोपनु, उज्ज्वल मोतीहार ॥ ते कहे सुण कन्या तपो, एक सदेशो सार ॥ १०॥ ॥ ढाल वारमी॥ ॥ कालानां गीतनी देशी ॥ कहे कर जोडी राजने ॥ वाहालेश्वर ॥ मुफ स्वामिनी थरदास ॥ पियु तुम प्रेमपयोधिमां ॥ वा० ॥ मन जर मुविलास ॥ १ ॥ रात दिवस मुफ हृदयमां ॥ वा ॥ मोरने ज्यु जलधा र॥ लागी मुफ तुज मोदनी ॥वा०॥ न गमे दो अवर विचार ॥ ॥ में तुम कठे स्थापवी ॥ वा०॥ परमातें वरमाला कोई दिन विषयने पडखवो ॥ वा० ॥ थावु न थति उजमाल ॥ ३ ॥ कुमरें हो मानी वातडी। वा० ॥ दासी थावी फरी गेद ॥ कनकवतीने मांगीने ॥ वा ॥ वात कही ससनेद ॥ ३ ॥ हरिणाही दरखी हैये ॥ वा ॥ प्रगट हूउ पर जात ॥ स्वयंवर श्रावी रंग ॥ वा ॥ वस्यो गुणधर्म सुजात ॥ ५ ॥ साजन जन सद्गु हर खिया । वा० ॥ बरख्या दो माय ने तात ॥ सरखी ३१७ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. मली ए जोडली ॥ वा० ॥ उलट श्रग न मात ॥ ६ ॥ करे उत्सव विवा दना ॥ वा ॥ ईशानच नूपाल ॥ परणावी निजपुत्रिका ॥ वा० ॥ वरती हो मगलमाल ॥ ४ ॥ ससरे वढुधन थापीयु ॥ वा ॥ मणिमय नूषण सार ॥ हय गय रथ दीधा घणा ॥ वाण ॥ कहे सह जय जयकार ॥ ॥ वोलावे निज कुवरी ॥ वा० ॥ शुनदिन जोइ विशेष ॥ शिखाम ण देई घणी ॥ वा ॥ मात पिता हित लेख ॥ एनक्ति करेजो कंत नी॥ वा ॥ थाण वदेनो श्रखम ॥ सगति मत करजो कदा ॥ वा ॥ जे दोवे उर्जन लव ॥ १० ॥ सासु ससरानी तो ॥ वा ॥ विनय म चूकीश सार ॥ नोजन तु करजे पडें ॥ वा० ॥ जमी रहे सवि परिवार ॥ ११ ॥ तुकारो नवि दीजियें ॥ वा ॥ कहिये न मर्म निटोल ॥ वैर बधाये थाकरां ॥ वा ॥ बोलतां कलुवा रे बोल ॥ १२ ॥ सजान ज ननी सेवना ॥ वा ॥ कीजें दो दर्षे रे धाय ॥ नीच निखर व्यसनी तणी ॥ वा० ॥ उना न रहीये रे बाय ॥ १३ ॥ शील थखमित पालजे ॥ वा० ॥ कुलवधू नाम धराय ॥ शोना सबल पराजजे ॥ वा० ॥ वहे ली हो मलजे रे थाय ॥ १४ ॥ सूजे पियु सूता पड़ी ॥ वा ॥ जागजे पहेली प्रनात ॥ शोक्य सहूमांहे सदी ॥ वाण ॥ नाम धरावे सुजात ॥ १५॥ शुं तुमने कदीयें घणु ॥ वा ॥ सहजगुणें तु सुशील ॥ दान देवाने अवसरें ॥ वा ॥ बाइ म थाजे पखील ॥ १६ ॥ गुण सवि धारे अगमवाणावगुण थलगा निवार ॥ देव गुरुना विनयमां ॥वा॥ खा मी न करशो लगार ॥ १४ ॥ नणद जेठाणी नमी ॥ वा० ॥ चालजे ए थम शीख ॥ विनय वडानो जालवे ॥ वा ॥ कोनी मनांजीशनीव ॥ १७॥ शिव धरी शिर कपरें ॥ वा० ॥ चाली दो कतनी साथ ॥ सटु शुं जुहार करी चल्या ॥ वा० ॥ दंपती दोय सनाथ ॥ १५ ॥ अनुक्रमें याव्या निनपुरें ॥ वा ॥ नामिनी ने जरतार ॥ नृप परिजन थानदी या ॥ वा० ॥ वाध्यो दो प्रेम थपार ॥ २० ॥ यतारी एक मदिरें । वा० ॥ कनकवती नृपनद ॥ प्रेमविलुको हो प्राणीयो ॥ वा० ॥ महोटो ए मोदनो फद ॥२१॥ मनमा वसी ते मानिनी ॥ वा०॥ पण मुखथी न कहाय ॥ एक दिन देखी कतनें ॥ वा० ॥ कामिनी ठनी रे थाय ॥२॥ मांमघु यासन वेसवा ॥ वा० ॥ कनी हो जोडी हाथ ॥ चित्त पचल श्री शांतिनाथनो रास खंम छो. ३२ए देखी तदा ॥ वा ॥ विनवे सुणो प्राणनाथ ॥ २३ ॥ कहो एक को प्रहेलिका ॥ वा ॥ यनिनव थर्थ वनाय ॥ तुम साथे पियु गोष्ठिनो ॥ वा० ॥ मुफ मन हर्प न माय ॥ २४ ॥ तदा गुणधर्मेणोक्त ॥ दोहो ॥ स्थल जाता जल उपरें, चाले जल न नराय ॥ जे नित्य लोक प्रतारिणी, नारी कोण कहाय ॥ १ ॥ उत्तर ॥ होडी ॥ प्रश्न ॥ मुख अनेक अवगुण यहे, पडतो महेले सार ॥ नाटक करे कर पाय विषु, नारी कोण विचार ॥२॥ उत्तर ॥ चालणी ॥प्रश्न ॥ नार पयोधर थाक्रमी, नरखधे चढि जेह ॥ तन्वगी गुणसयुता, कामिनि कहो कुण तेह॥ ३ ॥ उत्तर ॥ कावारूति ॥ पुनस्तयोक्त ॥ चातक शब्द किस्यो कहे, जग सदु माथे जेह ॥ दोय पद नेला मुफने,क्षण नवि विसरे तेह ॥४॥ उत्तर ॥ पियुनाम ॥पूर्वढाल ॥ एम विलासनी वातही ॥ वा ॥ करि गुणधर्म कुमार ॥ याव्यो निजमदिर नणी ॥ वा ॥ धरतो दर्प अपार ॥ २५ ॥ बछे दो वारमी ढालमां ॥ वा० ॥ सवल ए मोह विकार ॥ लालच विपयनी पाडुई वा विठ्ठलव उखनी देनार ॥ २६ ॥ सर्वगाथा ॥३३॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥६॥ ॥ दोहा ॥ ॥ वेठो ते थास्थानमा, वन सेवक परिवार ॥ परिव्राजक एक था वियो, कहे श्रावी प्रतिहार ॥ १ ॥ तेडाव्यो नृपनदने, थाप्यं श्रासन सार ॥ कुशलागम पूरे तदा, श्री गुणधर्म कुमार ॥ ५ ॥ बु नैरवाचार्यनो, शिष्य मोकव्यो तेण ॥ तुम थाकारण कारणें, न लट्ठ कारण केण ॥ ॥ ३ ॥ किहा नैरवाचार्य , ते कहे थमुक स्थान ॥ पुर बादिर मुफ साथ तुम, थावो सुगुणनिधान ॥ ४ ॥ सध्यासमय लदी तदा, कहे कुमार सुण स्वामि ॥ सही प्रनातें श्रावन, तिहांकणे दु हितकाम ॥ ५॥ वोलाव्यो उत्तर कही, नृपनदन निजधाम ॥ सुखनिज्ञमां यामिनी, वीती जाग्यो ताम ॥ ६ ॥ कृत्य करी परनातनां, लेई निज परिवार ॥ नेरवपासें थावीयो, नृपनदन तेणि वार ॥ ७ ॥ ॥ ढाल तेरमी॥ ॥ गगाधरने करी जुहार ॥ ए वेशी ॥ व्याघ्रचर्म उपर थासन, दीगे योगी ध्यानें लीन ॥ शिर नामीने लागे पाय, कर जोडी उनो तिण गय ॥ १ ॥ देखी कुमर ससनम दोय, देखाडे निज थासन सोय ॥ योगी ३० जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो हैये दर्ष बद्दु धरी, बोलाव्यो ते थादर करी ॥ ५॥ कहे विनीत मुख धर्मकुमार, नगवन् न घटे ए याचार ॥ गुरु सम धासन से मेर पुर्विनीत नर कहिये तेह ॥ ३ ॥ तमें मदोटा योगीश्वर जाण, अमने मानेवी तुम थाण ॥ तुम वढे थापद सवि टले, मनोवांबित यावीने मले ॥ ४॥ निज पदाति वस्त्रोपरि तेह, वेगे कुमर धरी मन नेह। मुफ नगरी पाठ धारो बाज, सवल वधारो मदारी लाज ॥ ५ ॥ करे योगी सुण राजकुमार, तु मुफ मान्य सही निर्धार ॥ पण निकिंचन महाराज, शी तुम नक्ति करु दु थाज ॥ ६ ॥ कहे कुमर तुमची वाशीष, ए थम जन कोटी बकशीस ॥ कहे योगी ते साचु कपु, पण लौकिका एवु लमु ॥ ७ ॥ यत ॥ नक्ति प्रेम प्रियालाप, सन्मान विनयस्तथा । दानेन हि विना लोके, सर्वमेतन्न शोनते ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ कहे कुमर पुन रपि एम वाणी, सुनजरें जुवो तमें गुणखाण ॥करो थाझा अमने जे संत, ए तुम कहिये दान महंत ॥ ॥ कहे योगी सुण न कुमार, जे मुज पासें मंत्र सदार ॥ थान वरस थयां करता जाप, अम कीधो में बदुलो थाप ॥ ए॥ तास विधन प्रतिघातक थाय, जो तु एकरयण ण गय ॥ तो प्रयास सफलो होवे सही, एद वात नैरव मुख कही ॥१०॥ कहे कुमर कर जोडी ताम, दु नु स्वामि तुमारे नाम ॥ कहो तेरों दिन थानु तुम पास, साधो मत्र तमें उनास ॥ ११ ॥ कहे योगी कालीचर दशी, प्रेतवने थावेवु निशि ॥, छ पण बिट्ठ शिष्यनी सघात, श्रावीच तिहां निसुणी एम वात ॥ १२॥ कुवर प्रणाम करी घेर गयो, योगी मने थति दार्षित थयो ॥ घर जश् चदश दिवस सुजाण, भाष्यो मसा रो कुवर थसिपाण ॥ १३ ॥ शिष्य सघातें योगी ताम, थाष्यो कुंवर करे परणाम ॥ कहे योगी थाजे हुशियार, मुफ राखणने साहस धार ॥ १४ ॥ कहे कुमर चिता मत धरो, सुखें तमें मप्रसाधन करो ॥ कुण तुम सादामु नाली राके, खड्ग काली सनो नवि चके ॥ १५ ॥ ममल कर। एक शव स्थापियो, थनि प्रजाली होमविधि कियो ॥ ण यसरें प्रकव्यो निर्घात, विश्व बधिर करतो साक्षात ॥ १६ ॥ पर विधा धरती तिण वार, नीसरियो जीपण श्राकार ॥ काल कराल वो यमदूत, प्रकट थयो तिदा एक थचत ॥ १७ ॥ शु ते नवि जामो मेघनाद, क्षेत्रपाल वलवत, , श्री शातिनाथनो रास खंम हो ३३२ कहे महोटे साद ॥ मुफ पूजा विण कीधे एम, मत्रसिदि तु चाहे केम ॥ १७ ॥ ए पण राजतनय थझान, तें नोलवियो मति विज्ञान ॥ एम -कही तेणे कियो सिहनाद, क्षेत्रपालें मांमयो उन्माद ॥ १ए ॥ ते त्रण शिष्य योगीना जेद, पडिया उठलीने नूयें तेह ॥ वोल्यो कुवर मन सा इस धरी, फोकट शु गाजे मति फरी ॥ २० ॥ जो देवपाल तु यति तो यु६ कर मुज साथें महत ॥ तेहने निरायुध देखी कुमार, मूके खड्ग दूरे तेणी वार ॥ २१ ॥ वेदु सन्मुख थावीने थझ्या, नुज दमें माहोमाहे नव्या ॥ वेदु वतीया कोइ नवि लडथडे, पगपडदें धर धडहडे ॥ २२ ॥ वज्जसार निजनुज जीडियो, कुमरें क्षेत्रपाल पीडियो ॥ तस साहस देखी थयो तुष्ठ, वोल्यो माग माग वत्स श्ट ॥ २३ ॥ कहे कुमर मूकी जो देव, थया सुप्रसन्न मुज उपरें हेव ॥ तो मुझ ऊपर करुणा धरो, योगीनु मनोवाबित करो ॥ २४ ॥ कहे क्षेत्रपाल एहनो सिझ मत्र, थयो तुझ महातम गुणवत ॥ सकल समीहितने पूरशे, चिता सवि मननी चूरशे ॥ २५ ॥ पण तु मनोवाबित मुफ पास, माग माग वत्स मुगुणनिवास ॥ महानाग्य दरिसण देवनु, निष्फल नवि थाये नीपन्यु ॥ २६ ॥ कहे कुमर तो तेम करो स्वामि, कनकवती होवे माहरे नाम ॥ परणी पण वा नवि नोग, कर्म तणो ए महोटो रोग ॥ २७ ॥ कहे ज्ञानें जोई क्षेत्रपाल, वश थाशे तदारे नूपाल ॥ मुज प्रनाव कामितरूप दशे, तेहथी काज सकल सीमो ॥ २७ ॥ वर देइ पहोत्यो निज नाम, योगी प्रशसे कुमरने ताम ॥ साहसिक तुमयी मुफ काम, सीध्यु राखी तें मुफ माम ॥ श्ए ॥श्रवसर मुझने सनारजो, काम काज वलि फरमावजो॥ एम कदीने योगी चालियो, कुवर निजमदिर हालियो ॥ ३० ॥ निज थावास कुवर थावियो, साजन जन मनमा ना वीयो । ढाल बठे खमें तेरमी, सांजलतां श्रोता मन गमी ॥३१॥२१॥७॥ ॥ दोहा ॥ ॥ थग पखाली थापण, धरतो हर्ष थत्यंत ॥ वीर वेप मूकी शयन, कीधु या निर्मित ॥१॥ दवे वीजे दिन यामिनी, पहोर एक गइ जाम ।। थदृश्य रूप ले रमणी, मदिर पहोतो ताम' ॥ २ ॥ कनकवती दीती तिहा, दोय दासी वेनु पास ॥ वात करे ते रगनी, निसुणे कुमर चनास॥३॥ - ४१ . ३२ जैनकथा रनकोप नाग श्राठमो. ॥ दाल चौदमी॥ ॥वीर जिणेसर चरणकमल ॥ ए देशी ॥ कनकवती राणी तरा, चित्त चचल जाणी॥ कारण कांक ए सही, कुमरे पहिचाणी ॥१॥ चरित्र जोउ नारीतणा, किहां जाये एह ॥ विषय न वांडे मुमो, चचल तेद ॥ २ ॥ पासें आवी उनो रह्यो, पण सा नवि देखे ॥ कनक वती वासी नणी, पुढे सुविशेपं ॥ ३ ॥ रात गले केटली, कहे स्वामिनि वेला ॥ तिहाकणे जावानी थइ, दवे को सलीला ॥ ४ ॥ तुरत छठी उतावली, नाही मन रगें ॥ थग विलेपन अति जला, दीपे शुचि श्रमें: ॥५॥ वस्त्र जलां पदेया वली, थानरण थमूल ॥ हार हैये सोहे नवलखो, नाके नयछल ॥ ६ ॥ घम घम घमके घूघरी, नूपुर पाय सोहे ॥ शोल शृगार कस्वा नला, रूपें मन मोहे ॥ ७ ॥ देवकुवरी सम उपती, रूप वती रामा ॥ जर यौवनमाहे नामिनी, शोने घणु श्यामा ॥ ७ ॥ देवा वास समान एक, रचीयुं ए विमान ॥ कुंवर जोश्ने थयो, मनमा हे रान ॥॥ थावी असे कामिनी, वासी सघातें ॥ कुवर चिते चित्तमा, मनो एकांतें ॥ १० ॥ एता दिन दु जाणतो, ए दीसे सुहाली ॥ पण जोरावर ए घणु, नजरें में नाली ॥ ११ ॥ कामिनी न होय केहनी, वाना सो कीजें ॥ पण एदना थतरगनी, नवि वात सहीजें ॥ १२ ॥ यत ॥ रवि चरिय० ॥ जनमत ॥ मुख वोले मीठी घणु, मनमाहे धीठी ॥ लारी सरीखी कामिनी, सृष्टियें थवली न दीती ॥१३॥ यत ॥ यावर्त सशया नां० ॥ नर नोलाने जोलवे,मानिनी मतवाली ॥ विफरी वाघणनी परें, वि रुई विकराली॥ १३ ॥ पण जोउ एक वार दु, जाये जिहां चावी ॥ केट न मूर्छ एहनी, थाशे जे नावी ॥ १५ ॥ एम विमासी विमानमां, खेळ एक वेशे ॥ वात करे त्रणे मली, चाली थाकाशें ॥ १६ ॥ रह्यो सवि सानले, गुणधर्म सोनागी ॥ नारीचरित्र जोवा सणी, मनर्मा रट लागी ॥ १७ ॥ उत्तर दिशें उतावलु, ते चाल्यु विमान ॥ कुवर मन मांहे धरे, नगवतनु ध्यान ॥ १७ ॥ दूर जश्ने उतघु, अाकाशथी हेतु ॥ वन अशोकने थांतरे, एक सरोवर दीतु ॥ १९ ॥ स्थानक ते रलिया मणु, शोना थति सारी ॥ देखीने ते उतरी, दासी नारी ॥ २० ॥ एक विद्याधर तिहां अवे, यावी तस पासें ॥ कनकवती कर जोडीने, प्रमे

श्री शांतिनाथनो रास खंम हो.
३२३
सनासें ॥ २१ ॥ पासें वेती कामिनी, कुवर पण वेगे ॥ चिते कौतुक
एहवो, किहांये नवि दीगो ॥ ॥ २२ ॥ अन्य वली यावी तिहा, रामा
त्रण रूडी ॥ ते विद्याधरने नमी, वेठी नहीं कूडी ॥ १३ ॥ थन्य वली
थाव्या तिहां, खेचर वन वलिया ॥ ते विद्याधरा सवे, थावीने
मलीया ॥ २४ ॥ ते वनमा एक देहरु, थादीश्वर केरु ॥ दम कलश
ध्वजें शोनतु, दीपे ते जलेरु ॥ २५ ॥ ते सद्ये तिहां यावीया, जिन
नतिने काजें ॥ नाटक वारक केहनो, पूघु खेचरराजें ॥ २६ ॥ कनक
वती उठी तिहा, परिधान समारी ॥ मामे ते मनमोदशु, नाटकविधि सारी
॥ २७ ॥ हाव नाव दाखे जला, नाचे तन वाली ॥ येई ये पाठ मुखे
नणे,थगें सुकुमाली ॥२॥त्रणे सही जोडें रही, एके वीणा वा॥वीजी
वेणु वजाडती, जिनना गुण गाइ ॥ २ए ॥ त्रीजी ताल देई करी,
गाये तस जोडें ॥ गुणवती चारे मली, नाचे मन कोडें ॥ ३० ॥ पास
रह्यो देखे सद्भु, गुणधर्म कुमार ॥ विस्मय पाम्यो चित्तमां, जोइ नाटक
सार ॥ ३१ ॥ नाच करंतां नारीनी, पड़ी किकणी माला ॥ लघुकलर कु
वरें यही, करच तेणी वेला ॥३२॥ नाटक यतें जोश्यु, नवि दीठी तेणें ॥
मनमाहे चिता उपनी, एद लीधी केणें ॥ ३३ ॥ निज निज स्थानक
सह गया, नारी सघातें ॥ कुवर निजपुर थावीयो, तेह पाउली रातें
॥ ३४ ॥ निज घर थावी विमानथी, उतरी ते वेला ॥ हर्षे सूतो जर,
कुवर निजशाला ॥ ३५ ॥ बछे खमें चौदमी, ढालें सुणो साचु ॥ राम
कहे विपया समु, काम कोई न काचु ॥ ३६ ॥ सर्वगाथा ॥ ४६० ॥ ७ ॥
॥ दोहा॥
॥ परनातें तेडी कुमर, मत्रीसुत निज मित्र ॥ थापी किंकणीमा
लिका, समजावी सवि सूत्र ॥ १ ॥ तुम पासें ए राखजो, वधव सुणो
विचार ॥ श्रवसर जोई थापजो, कनकवतीने सार ॥ ॥ एम शिक्षा
देश करी, मित्रसाथै गुणधर्म ॥ नारीमदिर थावीयो, करवा चितित कर्म
॥३॥ठतीने उनी थई, प्रमदा गुणनी खाए ॥ थाप्यु थासन वेसवा,
थागल रही सुजाण ॥ ॥ कुमर कहे मामो तमें, रामत पासा सार ।
रमवा वेता विट्ठ जणा, थाणी दर्प थपार ॥ ५ ॥

३२४ जैनकथा रनकोप नाग वमो ॥ ढाल पन्नरमी॥ ॥ रूडी रुडी रामतडीने रसें परवश थयो रे लाल ॥ ए देशी॥ रंग जरी रूडी रे वेदु रामत रमे रे लाल, खेले खेले कनकवती ने कत ॥ रंग रगीला रे पासा सोगा रे लाल, इसी इसी नाखे दाव छलसत ॥१॥ रगनरी ॥ बेल बीला रे वेड जोडें रह्या रे लाल, नोली जोली न लहे मनहानी वात ॥करि करि चतुराइ दावने चालवे रे लाल, जो जोइ पावें कीयो पियु मात ॥ रग ॥ २॥ हेजें हरिणाक्षी रे कहे निज कंतने रे लाल, पियु एक ग्रहणक मुफने सार ॥ मित्रनी सहामुं रे तेणें अवलो कीयु रे लाल, श्रापी थापी मित्र दो माला तेवार ॥ रग ॥३॥ देखीने वोली रे किंकणीमालिका रे लाल, थावी थावी किदाथी तुमारे दाय॥ कहे प्रीतम तुमें ए पाही किदां रे लाल,न लट्ठ न ल किहा पाडी प्राणनाथ ॥ रंग ॥ ४ ॥ वालम मुफने दाखो ए किदाथकी रे लाल, लाधी साधी थाज तुम्हें अवनीश ॥ कुमर कहे मुफ मित्र लहे सद्गु रे लाल, कहेशे कहेशे तुमने धरीय जगीश ॥ रग ॥ ५ ॥ ले नैमित्तिक माहरो मित्रजी रे लाल, जाणे जाणे एद सयल थवदात ॥ ते कहे कनकवतीने दु सही रे लाल, धारी धारी कालें कदीश थवदात ॥ रंग ॥ ६ ॥ ते बेड थाव्या रे थापण मदिरें रे लाल, कनकवती कहे रे एम ॥ सदीयर बानी रे वात ए थापणी रे लाल, वहेली वहेली कतजीयें सही केम ॥ रंग ॥ ॥ ७ ॥ जाणी दोशे गं मादरी वातडी रे लाल, बोले बोले कनकवती एम बोल ॥ दीसे थजब गति एदनी थनिनवी रे लाल, नहिं नहिं को जग एदनी तोल ॥ रंग ॥ ॥ रात पडी तेरों चैत्ये तेम गयो रे लाल, रंगें रंगे कनकवतीनी साथ ॥ वीणा वातां रे तास चरणतणु रे लाल, थाव्यु थाव्यं एक नूपुर तस दाथ ॥ २०॥ ॥ घणु वली खोल्यु रे तेम लाध्यु नहीं रे लाल, यथइमनमांद दिलगीर॥मविर थावी रे कुवर घरे गयो रे लाल, सूतो सूतो धरी दीलडामां हे धीर ॥२०॥ १०॥ यये प्रनातें रे मित्रषु यावीयो रे लाल, वेतो वेठो श्रीगुणधर्म कुमार ॥ गोष्टि करीने रे पियुशु प्रेमनी रे लाल, पूरे पुढे मित्र नणी तेणी वार ॥ २० ॥ ११ ॥ ते पण वोले रे निमित्त तणे व रे लाल, जाण्यु जाएयु गपुं नूषण वली थाज॥ मन शकाणी रे वात सुणी करी रे लाल, कहे कहे फोगट ए श्यो थ रे रे श्री शांतिनाथनो रास खंग हो ३श्य वाज ॥र०॥ १२ ॥ वातडली जो जाणी रे होय तो कहो गु गयु रे रे लाल, मानु मानु वात तुमारी साच ॥ यापण वीती रे वात न कम लहे रे लाल, नाखे नाखे कुमर एणी परें वाच ॥र॥१३॥ माया गाली रे बोले मानिनी रे लाल, सुण मुण साहिव चतुर सुजाण ॥ में नवि जाण्यु रे पियुडा माहरु रे लाल, खोयु खोयु ए नूपुर किण गण ॥ २०॥ १४ ॥ मर्म ने मोसा रे पीयुजी न वोलीये रे लाल ॥ नहि नहि दु का तेदवी नार ॥ रान दुकमथी रे इण मदिर रह लाल, महेन्युं महेल्यु में नवि घरनु वार ॥२०॥१५॥ आण न लोपी रे पीयुडा तादरी रे लाल, साचु सानु कुमर कहे कहो एह ॥ कोश्के थावी रे मुझने एम का रे लाल, टालो टालो मुझ मनडानो सदेह ॥ र० ॥ १६ ॥ सुण मुण गुणधर्म कुमारजी ताहरी रे लाल, वारू वारू कनकवती वर नारि ॥ दूर जातीनु नूपुर पगतणु रे लाल, पडघु पड्यु नीकलीने तेणी वार ॥ २० ॥ १७ ॥ जेणे जेणें ए लीधु रे तेहने जाणु सही रे लाल, लीधु लीधु फुटावी तस पास ॥ वात कहीने रे अण्वोल्यो रह्यो रे लाल, चिते चिते कनकवती ते उदास ॥र० ॥ १७ ॥ सही मुफ साथें रे थाव्यो नाहलो रे लाल, करी करी को प्रयोगविशेप ॥ मुफ जरतारें रे सघलो माहरो रे लाल, दीठो रात तयो सवि दोप ॥२०॥ १५ ॥ यत ॥ दूरनई कला चाड़ी, चोरिकाक्रीडितानि च ॥ प्रकटानि तृतीयेऽन्दि, सुचिन्द सुकतानि च ॥ ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ चितीने कनकवती कहे माहरु रे लाल, थापो थापो नूपुर मुफ नाथ ॥ कुमर कह्याथी रे मतिसागर तदा रे लाल, सोंप्यु सोप्यु कनकवतीने रे दाथ ॥ र० ॥ २० ॥ पुनरपि वोली रे कनकवती तदा रे लाल, साचु साचु कहो मुझने तुमें कथ ॥ किहांथी जडघु रे ए नूपुर मादरं रे लाल, नाखो लाखो तेह तणु विरतंत ॥ २०॥ २१ ॥ बहे खंमें रे ढाल ए पन्नरमी रे लाल, दाखी दाखी रामविजय सुरसाल ॥ जगमादि महोटी रे माया नारीनी रे लाल, धन्य धन्य जेणें वरजी ए जाल ॥ २० ॥ २२ ॥ सर्वगाया ॥ १७ ॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥॥ ॥ दोदा ॥ ॥ कनकवती कहे जिहा कणे,पडियु नूपुर स्वामि ॥ ते स्थानक दी तुमें, के निमुप्पु तस नाम ॥ १ ॥ कनकवती कहे कतजी, ए दीतुं तमें ते 1 जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. रीज ॥ पण थन् जो कयु होवे, तो करु श्रमिनी धीज ॥३॥ एम कही चितातुर थइ, वे गलदो गाल ॥ गतउत्साहा कामिनी, नीरवी निदाल ॥ ३ ॥ चिताजलनिधिमा पडी, नयण फरे वहु नीर ॥ देखीने कायर थयो, कुवर घणो दिलगीर ॥ ४ ॥ मोहनगारी मानिनी, मोझो सघलो लोक ॥ सादमा शियाला करे, जव लेवेसे शोक ॥ ५ ॥ या त करे कुवर दसी, नयण सलूणे ताम ॥ रोप न कीजे वालही, प्रेम त णे ए वाम ॥ ६ ॥ दोप नहि तुफमा किस्यो, दु जाणु निर्धार ॥ वात सुणी हर्षित था, कनकवती तेणि वार ॥ ४ ॥ ॥ ढाल शोलमी ॥ नयर रतनपुर जाणीयें ॥ ए देशी ॥ कुवर निजमदिर गयो, मित्र सहित दर्षित थयो, नवि नयो, रोप किश्यो लववेशथी ए॥१॥ रातें वती गुणधर्म ए, श्राव्यो नारीघरमें ए, शमैं ए, एकांतें उनो रह्यो ए ॥२॥ वात करे ते दासी ए, सुण स्वामिनि उनासी ए, जासी ए, तिहा क्यारें वेला दुई ए॥३॥ वेलातिकम थाशे ए, तो विद्याधर रीसाशे ए, गाशे ए, तुफ विण तिहां कुण गीतने ए॥॥ निसासो तब नाखे ए, कनकवती एम जांखे ए, राखे ए, लाज हां प्रजु मादरी ए ॥५॥ मदनाम्य धणीयाणी ए, कतिन ए कर्म कमाणी ए, जाणी ए, कीधी थावे थापणी ए॥॥जनक घरे विद्याधरें, एवं मुफने अति थादरें, खेचरें, पूर्वे शपथ करावियो ए ॥ ॥॥ मुफ थादेश थया विना, कांत म सेवे एकमना, रीजना, बोल म बोलिश कता ए ॥॥ रातें बेसी विमानमा,थावेषु मुफ शानमा,ताना, मम रहेतु मानिनी ए॥ ए ॥ एह कह्या तपरें वली, ए दी थ व्याकुली, मन रुनी, परण्यो ए राजकुमारने ए ॥ १० ॥ ए पियु मुफ वमन घणं, एदनी उपमा शी ना, मन तणु, चितित माहरु मन सहे ए ॥११॥ पण तिहा जाती एरों सदी, जाणी वात सकल जदी, वली कदी, वात एणे वातडी ए ॥ १२ ॥ विद्याधर दीगो तिहां, नित प्रति जावं दुं जिहां, कहो किहां, वात लही ए मादरी ए ॥ १३ ॥ कुण जाणे मुफ पीपु नणी, विद्याधर दणे निर्गुणी, थवगुणी, के अथवा मुझने दणे ए ॥ १४ ॥ था शफा मुज मोटी ए, वदेनी चित्तमा खोटी ए, चोटी ए, बीधी खेचर हाथमा ए ॥१५॥ यौवन काल नवीन ए, बहुल उपाय अधीन ए,थीम , ३२ श्री शातिनाथनो रास खंम छो ए, उत्तम कुल ए माहरु ए॥ १६ ॥ लोक विपम ए वांको ए, जेमतेम लवय नि:शको ए,याको ए, को नहि मुफ कर्मनो ए॥ १७ ॥ तथा च श्लोकक्ष्य ॥ नवीनोयोवनारनो, वदपाय प्रवर्त्तते ॥ उत्तमे च समा ख्याते, पितृश्वसुरयो कुले ॥१॥ यत्यतविपमोलोको, यहा तथा प्रज ल्पति ॥ कार्याणा गदनत्वेना, कुलीनतास्मि सर्वथा ॥ २ ॥ पूर्वढाल ॥ वात सुपी दासी कहे,स्वामिनी याज तु यहां रहे, मत वीहे, थाज तु दु जाइश एकली ए ॥ १७ ॥ कहिश दु मादरी ते सखी, कांक मीलें ले 5 खी, मन रखे, रोप दैयामा लावता ए ॥ १ए ॥ कनकवती कहे तुज विना, कुण पूरे मुफ कामना, नामना, ताहरी माहरे मन वसी ए ॥ ५० ॥ रचिय विमान ते सोपीयु, जे जोश्ये ते यापीयु, स्थापियु, प्रेम घणे ते उपरें ए ॥ २१ ॥ कुमर विचारे एहनो, राग ए सवल सनेह नो, मेहनो, दरिसण जेम चातक मनें ए ॥ २२ ॥ दासीसायें बाज ए, जा करु निज काज ए, लाज ए, हवे एहनी राखु नहि ए ॥ २३ ॥ स्त्री नाटक जोवा तणी, हॉप हैये एहने घणी, नवि गणी, लाज एणे निज कुल तपी ए ॥ २४ ॥ परनारीने पाप ए,लहियें वह सताप ए, श्राप ए, जगगुरु एम नाखे सुणो ए ॥ २५ ॥ यत ॥ पढत्वमिश्यिछेद, दो ग्य च नवे नवे ॥ नवेन्नराणा स्वीणा चा, न्यकांतासक्तचेतसाम् ॥ ३ ॥ पूर्व ढाल ॥ काढु कूटी वाक ए, ए मुफ थागल वाक ए, लाक ए, जौन एद नी केडनो ए ॥ २६ ॥ वेठो तेह विमानमा, उमीचाल्यु थसमानमां, ता नमा, तुरत जा पहोच्यु तिहा ए ॥ २७ ॥ चेटी विमानथी उतरी, खेचर ने प्रणिपत करी, थादरें, उनी जिनालय थावीने ए ॥ २७ ॥ खेचर पूछे एवडी, का रे तुज वेला चढी, परवडी, तुझ स्वामिनी दीसे नहिए ॥२५॥ कहे काश्क तन कादेलो,मर्म कह्यो में माहिलो, वाहलो, सुणी वैरी थर वोलीयो ए ॥ ३० ॥ मात्र करो तुमें खेचरा, ए पापिणी दासी वरा, सा दरा, करु चिकित्सा एहनी ए ॥ ३१ ॥ एम कदीने केशे ग्रही, दासी वि चारी जोइ रही, को नहीं, जे डोडावे तेहने ए ॥ ३५ ॥ खड्ग नगामीने रह्यो, नवि माने कोनो कह्यो, नवि लह्यो, परमारथ पर मन तणो ए॥ ३३ ॥ स्त्रीहत्या महोटी कही, क्रोध चढयो जारो नहिं, जग सही, क्रोध थमि ए थाकरो ए॥ ३४ ॥ समर समर जे ताहरे, दासी कहे एक मा - . ३श्न जैनकथा रत्नकोष नाग आग्मो. हरे, वादारे, श्री गुणधर्म कुमारजी ए ॥ ३५ ॥ त्रिनुवनपूज्य ए जिनबरु, मदारे एह परमेश्वरु, मुखकरु, था नव परनव ए सही ए ॥ ३९ ॥ ते समयो जिन चित्तथी, हवे न चूक ध्यानथी, कोदि नथी, मुज पिता मर वा तणी ए ॥ ३ ॥ नदि को मात ने बात ए, मदारो सगो मुनात ए, वात ए, एक गुणधर्मनी मादरे ए ॥ ३० ॥ खड्ग उपाडे जाम ए, कुम रें दाक्यो ताम ए, काम ए, नीच तणु मांमधु किस्यु ए ॥ ३ ॥ प्रकट थश्ने एम कहे, नारीवध नव नव दहे, सबहे, सहन गुरुनी शीखडी ए॥ ४० ॥ यमुक्त ॥ विश्वस्ते व्याकुले लोके, वालवृक्षाऽवलाजने ॥ प्रह रंति च ये पापा, ध्रुव ते याति उर्गतिम् ॥ ४ ॥ पूर्वढाल ॥ स्त्रीदत्या पात क तणा, कारक सनिल निर्गुणा, तुफ तणा, अवगुण हूँ केता कई ए ॥ ४१॥ प्रायश्चित्तनो दाता ए, मलियो छ विख्याता ए, झाता ए, जेम जग माहे गुरु कह्यो ए ॥ ४२ ॥ विद्याधर तव बोलीयो, अतरपट सवि खोलीयो, मलीयो, मनोवांबित सवि माहरो ए ॥ ५३॥ जेहनो घात में ध्याश्यो, ते मुफ सदामो यावीयो, पाश्यो, तु कीधु दवे ताहरु ए ॥ ४ ॥ सहामा वेगु यावी थव्या, बलीया बढ़ रोपें चव्या, ते लख्या, एक कामिनीने कारणे ए ॥ ४५ ॥ श्रवसर सही कुमार ए, कीधो तेदने प्रहार ए, सार ए, शिर डेयु खेचर तणु ए ॥ १६ ॥ सेवक सहु तस ना ग ए, कर दीठा घणु काग ए, मागं ए, कर्म करया थावे लदे ए ॥ ४४॥ सद्भुने दीध दिलासो ए, शा माटें तुमें नासो ए, सांसो ए, मत क रशो कोई रागनो ए॥ ७ ॥त्रण बाला थावी नमी, थमें परवशता बटु खमी,सवि शमी,थापद थान थमारही ए॥४॥ बहे खमें शोलमी, ढाल सङान मन सक्रमी, नवि गमी,राग दशा परनारीनी ए॥५०॥५४॥१॥ ॥ दोहा ॥ ॥ थमने मूकावी तम्हें, विद्याधरथी थाज ॥ बोडावे जीव पापथी, जे म गुरु गरीब निवाज ॥ १ ॥ कहे गुणधर्म कुमार जी, कुण तुमयो थव दात ॥ एक चतुरा वोली तिहां, सुण स्वामी मुज वात ॥ २ ॥ शंखपुरा निध नयरनो, राजा उसनराज ॥ पुत्री कमलवती थङ, तेहनी हु महा राज ॥ ३ ॥ नय एहने में वनदो, वांग्यो नहि लगार ॥ कुमर कहे नय नेहथी, किंवा कोप विकार ॥ ४ ॥ कुमरी कहे ए अपरें, नहिं नेह तिल , , , , श्री शातिनाथनो रास खम ठहो ३२ए मात ॥ रमती मुफने अपहरी, कुहिमयकी कुजात ॥५॥ निजरसना छेदन जणी, दु तव थइ उजमाल॥ तव खेचर मुझने कहे, म मर म मर मुण वाल ॥ ६ ॥ रमण कह्या विण माहरे,पडिवजवो नहि प्रेम ॥ मुझ समी प नित्य थावतु, रजनीमाहे देम ॥ ७ ॥ तुज सुशीलने होयशे, मुफ यनुनाव विमान ॥ शीखवगु नाटककला, करे मुफ यागत गान ॥ ७ ॥ एम जो थाणा मादरी, माने तु निर्धार ॥ तो मूकु तुज जीवती, में मा न्युं तेणि वार ॥ ए ॥ एम वीजी त्रीजी तया, वश कीया एवं स्वामि ॥ तुमें एहने हणता थका, सास्यु यमारु काम ॥ १० ॥ ॥ ढाल सत्तरमी॥ ॥ पथीडा रे सदेशडो ॥ ए देशी ॥ कुमर मुणी एम वातडी, कहे तेह नेजी थाम ॥ जा तुमें निजमदिरें, करो उत्तम काम ॥ १ ॥ नाग्य बलें वालम वडो, मट्यो पुण्यनें योग ॥ चेटी मन हरखी घj, मुझ स्वा मिनी योग ॥ जाग्य ॥ ५ ॥ दासी सघातें दो थावीयो, कुवर निज धाम ॥ कनकवती दासी नणी, पूढे एम ताम ॥ नाग्य० ॥ ३ ॥ मु ऊ कंतें मारियो, ते खेचर ष्ट ॥ वात कही सवि मामिने, थइ सांजली तुष्ट ॥ ना० ॥ ॥ निज पियु पौरुप सानली, जुजवल परशस ॥ करती हो कतने पय नमे,दरख्यो निज दस ॥ ना० ॥ ५ ॥ वात करे रसरंगनी, नामिनी जरतार ॥ मूकी दो मननो थातरो, गणे धन्य थवतार ॥ ना॥ ६ ॥ गोष्टि करे मन मेलिने, देडे धरी हेज ॥ रात समे तेणे मदिरे, पो ब्यां सुख सेज ॥ ना ॥ ॥ सूता दो थावी निड्डी, रमतां तेणें रात ॥ ण असर जे नीपनी, निमुणो ते वात ॥ ना० ॥ ॥ हतवि याधर वधवो, श्रनुजात ते वार ॥ निजवधव मास्यो सुणी, चढयो क्रोध थपार ।। ना० ॥ ए ॥ थाप्यो हो री दोडीने, जिहां सूतां दो दोय ॥ जूदा हो वेगुने समुश्मा, नाखे खेचर सोय ॥ ना ॥ १० ॥ जुवो दो विषयनी वारता, थनरथ एम थाय ॥ विपय विलुदा मानवी, फरे चिट्ठ गतिमाय ॥ ना० ॥ ११ ॥ नाम्यसयोगें हो पामीयो, गुणधर्म कुमार ॥ फजक को वादण तयु, जलमा तेणी वार ॥ ना० ॥ १२ ॥ वेलें तणा तो दो चालियो,अति उ खीयो हो दीन ॥ नूख्यो तरप्यो दो थति घणो, सट्ठ कर्म थाधीन ॥ ना० ॥ १३ ॥ सातमे दिवसें दो कुमरजी, जलनि ३ज जैनकथा रत्नकोष नाग आठमो. हरे, वादारे, श्री गुणधर्म कुमारजी ए ॥ ३५ ॥ त्रिवनपूज्य ए जिनबरु, मदारे एद परमेश्वरु, सुखकरु, था नव परजव ए सही ए ॥ ३९ ॥ ते समस्यो जिन चित्तथी, हवे न चूकु ध्यानथी, कोहि नथी, मुफ पिता मर वा तणी ए ॥ ३७ ॥ नहिं को मात ने घ्रात ए, महारो सगो सुनात ए, वात ए, एक गुणधर्मनी मादरे ए ॥ ३० ॥ खड्न उपाडे जाम ए, कुम रें दोक्यो ताम ए, काम ए, नीच तणु मांमधु किस्यु ए ॥ ३५ ॥ प्रकट थश्ने एम कहे, नारीवध नव नव दहे, सदहे, सऊन गुरुनी शीखती ए॥ ४० ॥ यमुक्त ॥ विश्वस्ते व्याकुले लोके, वालवृक्षाऽवलाजने ॥प्रह रति च ये पापा, ध्रुव ते यांति उर्गतिम् ॥ ४ ॥ पूर्वढाल ॥ स्त्रीदत्या पात क तणा, कारक सांजल निर्गुणा, तुम तणा, थवगुण हुँ केता कहूँ ए॥ ४१॥ प्रायश्चित्तनो दाता ए, मलियो दु विख्याता ए, झाता ए, जेम जग माहे गुरु कह्यो ए ॥ ४२ ॥ विद्याधर तव बोलीयो, थतरपट सवि खोलीयो, मलीयो, मनोवांबित सवि माहरो ए ॥ ४३ ॥ जेदनो घात में ध्याश्यो, ते मुफ सहामो यावीयो, पाइयो, तु कीधु हवे तादरं ए॥ ४४ ॥ सहामा बेदु थावी थख्या, बलीया बठ्ठ रोघे ते लख्या, एक कामिनीने कारणे ए ॥ ४५ ॥ श्रवसर जही कुमार ए, कीधो तेदने प्रहार ए, सार ए, शिर द्यु खेचर तणु ए ॥ १६ ॥ सेवक सद् तस ना ग ए, कर दीठा घणु काठा ए, मा ए, कर्म कश्यां थावे उदे ए ॥ ॥ सहने दीध दिलासो ए, शा माटें तुमें नासो ए, सांसो ए, मत क रशो कोई रागनो ए ॥ ४ ॥त्रण बाला थावी नमी, अमें परवशता बडु खमी,सवि शमी,थापद थाज यमारडी ए ए॥ ब खमें शोलमी, ढाल सक्कन मन संकमी, नवि गमी,राग दशा परनारीनी ए ॥५०॥५॥१२॥ ॥ दोहा ॥ ॥ थमने मूकावी तम्हें, विद्याधरथी थाज ॥ बोडावे जीव पापथी,जे म गुरु गरीय निवाज ॥ १॥ कहे गुणधर्म कुमार जी, कुण तुमचो थव दात ॥ एक चतुरा वोली तिहां, सुण स्वामी मुफ वात ॥ ५ ॥ शंखपुरा निध नयरनो, राजा उसनराज ॥ पुत्री कमलवती थबु, तेदनी हु महा राज ॥ ३ ॥ जय एहने में वनहो, वाग्यो नदि लगार ॥ कुमर कहे नय नेहथी, किंवा कोप विकार ॥ ॥ कुमरी कहे ए अपरें, नहिं नेह सिल चच्या, श्री शांतिनाथनो रास खंम हो. ३३२ सदामो थयो, जोरावरकाय ॥ विद्याधरने हो जितीयो, तेणे लीलामांय ॥ जा ॥ ३२ ॥ जीवतो महेव्यो हो तेहने, नम्यो कुमरने पाय ॥ याप थखम रह्यो तिहा, निरुपक्रम थाय ॥ ना० ॥ ३३ ॥ बहे हो खमें स त्तरमी, नाखी ए ढाल ॥ राम कदे धन्य ते जेणे, तजी विषयनी जाल ॥ जा० ॥ ३४ ॥ सर्वगाथा ॥ ५० ॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥१४॥ ॥ दोहा ॥ ॥ स याणा कुलपति तणी, श्रीगुणधर्म कुमार ॥ प्रिया सहित को पुर नणी, चाल्यो दर्प यपार ॥ १ ॥ जातां पुर वनमां मव्या, गुणरत्नो दधि साध ॥ शांतमूर्ति सोहे नला, वरते सहज समाधि ॥ २ ॥ प्रिया सहित प्रणमे नई, ते मुनिवरना पाय ॥ धन्य गणे निज थातमा, थयो रोमाचित काय ॥ ३ ॥ योग्य जीव जाणी करी, मुनिवर थाणी नाव ।। धर्म कहे जिनवर तणो, विपय रहित समनाव ॥ ४ ॥ ॥ ढाल थढारमी॥ ॥ रंगीले यातमा ॥ ए देशी ॥ कहे मुनिवरजी देशना, देशनासानलो नवि चित्त लाय॥ वैरागीश्रातमा॥चौद राजके चोकमें, चोकमें नव नव वेश वनाय ॥१॥वैरागीथातमालाख चोराशी योनिमा, योनिमा रहीयो काल थनत ॥ वै ॥ दृथिवी पाणी तेलमा, तेनमा वायु कह्यो जगवत ॥ वै० ॥ ५ ॥ सात सात लक्ष एदोनी, एदोनी योनि कही जिनराज ॥ वै० ॥ वण प्रत्येकमां जीवनी, जीवनी दश लक्ष योनि समाज ।। वै० ॥ ३॥ साधारणमा जाणीयें, जाणियें चौदश लाख विचार ॥ वै ॥ विति चठ इयि जीवनी, जीवनी दो दो कदि निरधार ॥ वै० ॥ ४ ॥ देव श्रने वली नारकी, नारकी योनि कही चल चार ।। वै० ॥ पंचेंड्यि तिर्यंचमा,तिर्यंचमां चन तद योनि सनार ॥ वै० ॥ ५ ॥ चठदश सकले मनुजनी, मनुजनी तेम जाणो गुणवत ॥ वै । फिरता लक्ष् चोराशीमें, चोराशीमें वीत्यो काल थनत ॥ वै० ॥ ६ ॥ जाति ने योनि रही नहिं, रही नदि जिहां नवि थायो ए जीव ॥ वै० ॥ जन्म मरण कीधा घणा,कीयां घणां 5 खीयो एह थतीव ॥ वै० ॥॥ यत । न सा जाइन सा जोणी,न तं गण न तं कुल ॥ न जाया न मुथा जम, सचे जीवा थपतसो ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ क्यु सोवे तु करारमें, करारमें . ३३० जैनकथा रत्नकोप जाग आग्मो धितट दीठ ॥ पार लदी जमतां थका, तापस एक दीन ॥ना ॥१॥ प्रणिपत्य करी वेठो तिहां, थावी 5 खिणी हो ताम ॥ कनकवती निव वमना, मन चिते हो थाम ॥ ना ॥ १५ ॥ मु ए कनकवती होवे, या वी दशे केम ॥ कुमरनो सशय वारवा, कुलपति कहे एम ॥ जा ॥ १६ ॥ बाजथकी त्रीजे दिने, पहेलां सुण थांहि ॥ वनमाहे धावी ए कामिनी, धरती 5 ख थथाह ॥ जा० ॥ १७ ॥ तरुशाखायें निजथातमा, बांधीने हो तेद ॥ मरवाने उद्यत थई, तुज विरहें दो एद ॥ ना ॥१॥ पाश बेदी में जीवती, राखी ए वाल ॥ थाश्रम पाणी दो माहरे, साजे प्रेमनु साल ॥ ना ॥१॥ जाणी थागमन निमित्तथी,ताहरु इण तार । राखी दिलासो में वेश्ने,तादरी ए नारि ॥ ना ॥ २० ॥ वात सुणी हर्षि त थयो, मियां दपती दोय॥विरह टल्यो शाता था, करे कर्म तो होय ।। ना० ॥ ११ ॥ कदली थादिक तरुफलें, करी प्राणनी वृत्ति ॥ रातें हो सूता लतारहें, बेगु थइ निश्चित ॥ ना ॥ २२ ॥ सात दिवस जलमा गया, सात वरस समान ॥ वहाली हो ताहरा विरदन, थ{ 5 ख थसमान ॥ ना ॥५३॥ थाज वियोगनु 5 ख टप्यु, थयुं शीतल अग ॥ पुस्यसयोगें दो तादरो, मल्यो मुफने दो सग ॥ ना० ॥ २४ ॥ सुख निशमाहे पोढियां, जूवो कर्म विलास ॥ खेचर थाव्यो हो तिहांकणे, विरुई विषयनी श्राश ॥ ना ॥ १५ ॥ पुनरपि हुने तपाठीने, नाल्यां समुश्मकार ॥ वैर वघे जेदथी घणां, मो विषय विकार ॥ ना० ॥३॥ था जोरावर वेद्वनु,तरी फलकें हो नीर॥बेहु मन्यां वली एकता,पामीज लनिधि तीर ॥ ना ॥ २४ ॥ कुमर कहे सुण कामिनी, विधिविलासित एद ॥ विषयासक्त ए जीवने, शो विपत्ति सदेव ॥ना॥२॥ यत ॥अनेनेव विरागेण, त्यक्ताशेषपरिमदा ॥ निर्ममत्वान्मदासत्त्वा, स्तप कुर्वति साधव ॥१॥पूर्वढासा। कनकवती कहे कतने, श्यो खेद ए नाथ ॥ पौरुषहूते विषा द कां, करो जेम थनाथ ॥ ना ॥२॥ यत ॥ दीनोधारोन विधे, नैक छात्रा कता मही ॥ विपया नोपचुक्ताश्च, प्रकाम खिद्यसेंग किम् ॥२॥पूर्व ढाल॥वात रमणीनी दो सानली,गुणधर्म कुमार॥ नारिसंघातें दो रातमा, रहे ते दुशीयार ॥ना॥३०॥ के. विद्याधर धावियो, वैर लेवा काज ॥ जा इश किदा वलि पापीया, नर्दि महेलुं थाज ॥ नाम्॥३१॥ सास धरी -- श्री शांतिनाथनो रास खंम को. ३३३ तंत नही ए वय तणो, वय तणो धर्म विपे मन जाव ॥ वै० ॥ १ ॥ कनकवती कहे पूबीने, पूठीने घायु तणुं अवसान ॥ वै० ॥ आदरजो तमें दिरकने, दिरकने यो एतु मुझ मान ॥ वै ॥ २० ॥ मन विषु मानी वातने, वातने वादी गुरुना पाय ॥ वै० ॥ नगर जणी चाल्यो तदा, चाल्यो तदा जोजन पान उपाय ॥ वे ॥ २१ ॥ काननमा मूकी करी, मूकी करी कनकवती तरु ॥वै॥ राजकुमर तिहा यावीयो, थावियो गुणच सा दीव ॥ वै० ॥ २२ ॥ राग लह्यो देखी करी, देखी करी मा निनी मोहनगार ॥ वै० ॥ पूढे हो यावी तेदने, तेहने तु केनी घरनारि ॥ वे ॥ २३ ॥ किण कारण यहां एकली, एकली यौवनरूप रसाल ॥ ॥ वै० ॥ तुज जरतार किहां थडे, किदा असे कहो मुझने इण काल ॥ ॥ वै० ॥ २४ ॥ राग सही ते कुमरनो, कुमरनो निज जरतार वैराग्य ॥ ॥ वै ॥ निज वृत्तात का सवि, का सवि मोही रदी तस राग ॥ वै० ॥ २५ ॥ लागी नयनी थाशकी, थाशकी जोइ रह्या थनिमेप ॥वै०॥ नयण कमलदल पाखडी, पाखडी मोह्यो कुवर ते देखि ॥ वै० ॥ २६ ॥ यत ॥ दोहो ॥ नयण पदारथ नयणरस, नयणें नयण मिलत॥थयजा एया प्रीतडी, पहेला नयण करत ॥ ६ ॥ पूर्वढाल ॥ जोग तणी करेप्रा थना, प्रार्थना करे गुणच कुमार ॥ वै॥ यावो हो मानिनी मुज घरे, मुमघरे सफल करो थवतार ॥ वै० ॥ २७ ॥ प्राणप्रिया करि राखनु, राखन देश नदि क्षण बेद ॥ वै ॥ थवर नणी नवि थादरु, थादरु तुक कपर मुफ नेह ॥ वै० ॥ २७ ॥ कनकवती मन चितवे, चितवे श्यो पीयुगु दवे नेद ॥ वै ॥ उघडशे नहिं माहरु, माहरु थाखर ए नि स्नेह ॥ वै० ॥ श्ए॥ जान ए राजकुवर घरे, कुवर घरे जोगबु लीलवि लास ॥ वै० ॥ कहे वची जरतारने, जरतारने याविश ढुं तुम पास ॥ ॥ वै० ॥ ३० ॥ राजकुवर गयो मदिरे, मदिरे मोह्यो तेहने रूप ॥ वै॥ जगमाहे विषय समो नदि, समो नदि महोटो कोई विरूप ॥ वै॥३१॥ बछे हो खमें थढारमी, थढारमी ढाल विचारो एह ॥वै॥ राम कहे जग कारिमो, कारिमो धिक् धिक् नारीनेह ॥वै॥३२॥ सर्वगाथा ॥६॥२०॥ ॥ दोहा सोरठी॥ ॥ दवे गुणधर्म कुमार, पुरमा जश् उनो रह्यो ॥ को न दिये थावकार,

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३३२ जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो.
त्रिगु जण लाग्या केड ॥ वै० ॥ चेतन चेतो हो चित्तमा, विचमा ए
शमनकु फेड ॥ वै ॥ ७ ॥ खावद माल थनंतके, अनतके म्यु रहे
होय दिलगीर ॥ वै ॥ श्राप दशा परगट करो, परगट करो ज्युं जाने
नवनीर ॥ वै ॥ ए ॥ सादिव दास ज्यु दुइ रह्यो, दुइ रह्यो इश्मिके
थाधीन ॥ वै० ॥ पान करी मदमोद को, मदमोहको क्यु वेठो मिल
कीन ॥ वै० ॥ १० ॥ यत ॥ थात्मनूपतिरयं चिरतन , पीतमोहमदि
राविमोहित ॥ किंकरस्य मनसोपि किंकर, रिंडियैरहह किंकरीकत ॥२॥
पूर्वढाल ॥ चेतन तेरे राजमें, राजमें विपय करे क्युं जोर ॥ वै ॥ मित्र
दुश्था मिले, थाइ मिले ए पांचोंदी चोर ।। वै० ॥ ११ ॥ क्षण सुख
तोकू चखायकें, चखायके नाखेंगे ले दूर ॥ वै० ॥ ए ससार धनाविको,
अनादिको वहे विषयाके पूर ॥ वै० ॥ १२ ॥ यक्तमागमे ॥ क्षणमिच
सुरका बहुकाल उरका ॥ निद निवारो दो मोहकी, मोहकी बालस
थलगु नाखि ॥ वै० ॥ घटमें शानदीपक करो, दीपक करो सुमति
उघाडो थांख ॥ वै० ॥ १३ ॥ देशन सुणी गुरुराजकी, गुरुराजकी श्री
गुणधर्म कुमार ॥ वै० ॥ मोह मव्यो ममता घटी, ममता घटी नागे
विषय विकार ॥ वै० ॥ १४ ॥ कनकवती निज नारीने, नारीने करे
लीजें थष दीख ॥ वै ॥ संयम मारग थादरी, थावरी चलियें सशुरु
शीख ॥ ॥ १५ ॥ सा कदे विषयनिवारणी, निवारणी नवयौवन
वय एद ॥ वै० ॥मुख विलसो ससारनां, ससारनां दोदिलो ए नवल सने
वे
॥ १६ ॥ वृक्षपणामां वालदा, वालदा कीजें योग अभ्यास ॥
वै० ॥ योगवशा थावे नहीं, श्रावे नहीं जिदा लगें विषयपिपास ॥ वै०
॥ १७ ॥ यमुक्त ॥ शेशवेऽज्यस्त विद्यानां, यौवने विषयैषिणाम् ॥ वार्षके
मुनिवृत्तीना, योगेनांते तनुत्यजाम् ॥ ३ ॥ पूर्वढाल | कहे गुणधर्म ए
धर्मनो, धर्मनो वृक्षपणे नहिं लाग ॥ वै० ॥ जर्जर वय तनु बल घटे,
बल घटे वाघे तृष्णा थताग ॥ वे ॥ १७ ॥ यमुक्त ॥ बार्गलस्याशु न
पापबुदि, गत वयो नो विपयाचिलाप ॥ यत्नम नैषज्यविधौ न धर्मे,
स्वामिन्नदो मोहविडवना मे ॥ ४ ॥ श्रग गलित पलित मुम, वसनविहीन
जात तुमम् ॥ तृशोयाति गृहीत्वा दम, तदपि न मुरत्याशापिंगम् ॥ ५ ॥
पूर्वढाल ॥ यौवनमा पण कोश्ने, कोश्ने थावे वेराम्पनो नाव ॥०॥

श्री शातिनाथनो रास खंम हो ३३५ नारी तस घर जाती दीनी रे ॥ ना० ॥ १०॥ ते गइ एम उत्तर दीधो रे ॥ ना० ॥ ते चाल्यो नगर जणी सीधो रे ॥ ना०॥ मनमाहे करे ए वि चार रे ॥ ना ॥ कनो गुणधर्म कुमार रे ॥ ना० ॥ ११ ॥ तद्यथा ॥ वध्यो च नोपकारेण, नाजसा हत योपित ॥ गृह्यते न कुल शील, मर्यादा गणयति च ॥ १ ॥ रदोन जायते यावत्, स्यार्थयिता न च ॥ सतित्व तावदेतासा, नारीणा नारदोऽवदत् ॥ ५ ॥ पूर्वढाल ॥ एम चिती कुमर तिहा यावी रे ॥ ना ॥ तेहने एम तेणे समजावी रे ॥ ना० ॥ कहे तो तुम मोशाल मूकू रे ॥ ना ॥ ढुं जवनावग्यी चूकू रे ॥ ना ॥ १२ ॥ तिहां पासे नगरमां थावी रे ॥ ना० ॥ तेहने मातुलघरे वो सावी रे ॥ ना० ॥ जइ तेह मुनिनी पासें रे ॥ ना० ॥ ग्रहे चारित्र दिल उनासें रे ॥ ना ॥ १३ ॥ करे किरिया तप तपे काता रे ॥ ना॥ घणा कर्म खपाच्या मागा रे ॥ ना० ॥ थयो तेह मादाव्रत धोरी रे ॥ ना ॥ चढती परिणामनी दोरी रे ॥ ना ॥ १४ ॥ करि थपसण सुरपद लीवु रे ॥ ना० ॥ तेहनु वानित कारज सीधु रे ॥ ना ॥ तिहाथी चवि नर नव पामी रे ॥ ना० ॥ ते थाशे शिवगतिगामी रे ॥ ना० ॥ १५ ॥ दवे कनकवतीनी कहाणी रे ॥ ना० ॥ निसुणो तुमें सट्ठये प्राणी रे ॥ ना० ॥ थावी मातुलघरथी रीसाणी रे ॥ ना० ॥ थइ गुणचनी धणि याणी रे ॥ना ॥ १६॥ राजकुमरने ते घणु प्यारी रे ॥ ना० ॥ तेणे मूकी थवर विसारी रे ॥ ना ॥ तव चिते दो पहेली राणी रे ॥ ना० ॥ एवं नारी कुजात ए थाणी रे ॥ ना० ॥ १७ ॥ एवं कामण मोदन कीयो रे ॥ ना० ॥ महारो पियुडो वश करि लीधो रे ॥ ना० ॥ जगमांदि खार ए मदोटो रे ॥ ना ॥ परनवड खदायी खोटो रे ॥ ना० ॥ १७ ॥ तेणें नोजनमा विप दीधु रे ॥ ना० ॥ मारी कनक वतीने वैर लीधु रे ॥ ना० ॥ ध्यान रोड्माहे ते मूई रे ॥ ना ॥ चोयी नरकें नारकपणे हूई रे ॥ ना० ॥ १ए ॥ जुवो उत्तम कुलनी जाई रे ॥ ना ॥ शी कीधी कर्मकमाई रे ॥ ना० ॥ सुखमांहे काल निर्गमशे रे ॥ ना० ॥ तिहाथी नव वदुला नमशे रे ॥ ना० ॥ २० ॥ कहे प्रतुजी शाति जिलदा रे ॥ ना ॥ विरुथा ए विपयना फदा रे ॥ ना० ।। खदायी ए विपयप्रमादो रे ॥ ना० ॥ मदोटो जग ए उन्मा ३३४ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. थाथ विना थावर किस्यो ॥ १ ॥ मनमा चिते नारि, सूखी होशे मा हरी ॥ करु शहां कवण प्रकार, धन विण जोजन किहांपकी ॥३॥ यत ॥ पुत्ताय सीसाय॥ मगाये नहीं नीख, नख्यां रहेवाये नहीं। न रही मनमा शीख, रमवा वेगे जूवटे ॥३॥ कांक धन उपारजि, सुरत करावी रसवती ॥ लेई ममक साज, उद्याने थावे वही ॥ ४ ॥ ॥ ढाल उंगणीशमी॥ ॥ किण वाटें गया वनमाली रे॥बाइ मदारी बहेनडीयां ॥ ए देशी ॥ वन मांदे श्राव्यो उजाई रे ॥ नारी मोरे मन वतीयां ॥ कहे जोजन लायो ट्ठ धाई रे ॥ नारी नवि उन्नसिया ॥ कहे कुमर मुणो सुकुमाली रे ॥ नारी मो० ॥ तुने नूखें घणु परजाली रे ॥ ना॥ १ ॥ यावी कुवर बेठो जो रे ॥ नारी ॥ थापण कीजें जोजन कोडे रे ॥ ना० ॥ मन विण जोजन बेठी रे ॥ ना ॥ पण मनमांदे चिता पेठी रे॥ ना० ॥२॥ नवि बोले रसीली वातो रे ॥ना॥ प्रिय चिते एदनी फरि धातो रे ॥ना॥ बोले नेदविहूणी वाणी रे ॥ ना० ॥ कुवरें तस वात पिठाणी रे ॥ ना ॥३॥ एणे मुमणं मोद उतायो ॥ना०॥ बीजो कोक विलमांहे धानो रे ॥ ना० ॥ धिक् धिक् धिक् नारीनेहा रे ॥ ना० ॥ क्षणमादि देखाडे बेहा रे ॥ ना० ॥ ४ ॥ द्व जाणतो हतो प्यारी रे ॥ ना० ॥ पण एह सपल धूतारी रे ॥ ना० ॥ में पाप कडे इण माटे रे ॥ ना ॥ मुर्गति परपी ए साटें रे ॥ना॥ ५॥ करी एहने में साव सोनानी रे ॥ना॥ पण न रही जाति ए बानी रे ॥ ना ॥ मुफ सम नदि कोइ थझानी रे ॥ ना ॥ समजाव्यो दतो मुफ कानी रे ॥ना०॥६॥ वनमां को मिप करी चान्यो रे ॥ ना ॥ थागल एक पुरुष निदायो रे ॥ ना० ॥ तेणें पूजा कुमरने थाई रे ॥ ना० ॥ ॥ गयो राजकुवर शुनाई रे ॥ ना ॥ ॥ कहे राज कुवर कोण थायो रे ॥ ना ॥ श्दा जे तुमें मुझने बतायो रे ॥ ना॥ कहे ते नर मुण विदेशी रे ॥ ना ॥ शहां थाव्यो कुमर अम देशी रे ॥ ना० ॥ ७॥ नृपनवन गुणच नामें रे ॥ ना ॥ याप्यो वन जो वा कामें रे ॥ नाते साथें नारी एक वोली रे ॥ना ॥ करी वात ते मन खोली रे ॥ ना ॥ ५ ॥ तस थाणायें थलगो जाई रे ॥ ना० ॥ थाव्यो हा कणे नाई रे ॥ ना० ॥ ते माटें पूड वात मीठी रे ॥ ना० ॥

श्री शातिनाथनो रास खम हो ३३५ नारी तस घर जाती दीनी रे ॥ ना० ॥ १० ॥ ते गइ एम उत्तर दीधो रे ॥ ना० ॥ ते चाल्यो नगर नणी सीधो रे ॥ ना०॥ मनमांहे करे ए वि चार रे ॥ ना० ॥ कनो गुणधर्म कुमार रे ॥ ना० ॥ ११ ॥ तद्यथा ॥ दध्यो च नोपकारेण, नाजसा हत योपित ॥ गृह्यते न कुल शीत, मर्यादां गणयति च ॥ १ ॥ रदोन जायते यावत्, कणस्यार्थयिता न च ॥ सतित्व तावदेतासा, नारीणा नारदोऽवदत् ॥ २ ॥ पूर्वढाल ॥ एम चिती कुमर तिहां आवी रे ॥ ना ॥ तेहने एम तेणे समजावी रे ॥ ना० ॥ कहे तो तुज मोशाल मूकू रे ॥ ना ॥ हु जवनावग्थी चूकू रे ॥ ना० ॥ १२ ॥ तिहा पासे नगरमां यावी रे ॥ ना ॥ तेहने मातुलघरे वो लावी रे ॥ ना ॥ जइ तेह मुनिनी पासें रे । ना० ॥ ग्रहे चारित्र दिल उल्लासे रे ॥ ना ॥ १३॥ करे किरिया तप तपे काठग रे ॥ ना॥ घणा कर्म खपाच्या माठा रे ॥ ना ॥ थयो तेद मादाव्रत धोरी रे ॥ ना ॥ चढती परिणामनी दोरी रे ॥ ना० ॥ १४ ॥ करि यसण सुरपद लीवु रे॥ ना० ॥ तेदनु वानित कारज सीधु रे ॥ ना० ॥ तिहाथी चवि नर जव पामी रे ॥ ना० ॥ ते थाशे शिवगतिगामी रे ॥ ना० ॥ १५ ॥ दवे कनकवतीनी कहाणी रे ॥ ना ॥ निसुणो तुमें सट्ठये प्राणी रे ॥ ना ॥ थावी मातुलधरथी रीसाणी रे ॥ ना० ॥ य गुणचश्नी धणि याणी रे ॥ ना० ॥ १६ ॥ राजकुमरने ते घणु प्यारी रे ॥ ना ॥ तेणे मूकी थवर विसारी रे ॥ ना ॥ तव चिते दो पहेली राणी रे ॥ ना० ॥ एवं नारी कुजात ए थाणी रे ॥ ना ॥ १७ ॥ एवं कामण मोहन कीधो रे ॥ ना० ॥ महारो पियुडो वश करि लीधो रे ॥ ना ॥ जगमाहि खार ए महोटो रे ॥ ना ॥ परनवड खदायी खोटो रे ॥ ना ॥ १७ ॥ तेणें नोजनमा विप दीधु रे ॥ ना० ॥ मारी कनक वतीने वैर लीधुं रे ॥ ना० ॥ ध्यान रोड्मादे ते मूई रे ॥ ना० ॥ चोथी नरकें नारकपणे हूई रे ॥ ना ॥ १५ ॥ जुवो उत्तम कुलनी जाई रे ॥ ना ॥ शी कीधी कर्मकमाई रे ॥ ना० ॥ उखमांहे काल निर्गमशे रे ॥ ना ॥ तिहाथी नव वठ्ठला नमशे रे ॥ ना० ॥ २० ॥ कहे प्रबुजी शांति जिपदा रे ॥ ना० ॥ विरुथा ए विपयना फदा रे ॥ ना० ॥ 5 खदायी ए विषयप्रमादो रे ॥ ना० ॥ महोटो जग ए सन्मा ३३६ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो दो रे ॥ ना ॥ २१ ॥ ए वर्जे ते सुख पावे रे ॥ ना ॥ सुर नर मशी तस गुण गावे रे ॥ ना० ॥ ए विपय उपर वीतरागें रे ॥ ना०॥ बही वात सवल वैरागें रे ॥ ना० ॥ २२॥ बछे खमें उगणीशमी वाली रे ॥ ना ॥ ए वात देयामा राखी रे ॥ ना० ॥ कहे राम जे करशे करणी रे ॥ ना० ॥ वरशे शिवलीला गृहिणी रे ।। ना० ॥ २३ ॥ इति विषये गुणधर्मकनकवतीसवध ॥१॥ सर्वगाथा ॥६५१॥ श्लोक तथागाथा ॥१२॥ ॥ दोहा ॥ ॥ कहे प्रतु चक्रायुध निसुण, एद विपय अधिकार ॥ दवे कषायज पर कनु, नागदत्त विस्तार ॥१॥ वर्षमान जिनवर तणे, वारे होशे तेद ॥ यागामिक हमणा कनु, वात सुणो ससनेह ॥ २ ॥ नहिं कषाय विषु विषय को, तस नाशें नवनाश ॥ नवनाशें शिव सपजे, सहजाना विलास ॥ ३ ॥ करे चक्रायुध स्वामीने, कर जोडी अरदास ॥ नागदप सबध मुफ, जगगुरु परकाश ॥ ४ ॥॥ ॥ ढाल वीशमी॥ ॥म म करो माया काया कारमी॥ए देशी ॥ वसंतपुर नरत अबू तणे, समृम वसुदत्त दोय नद रे ॥ सरलमन शांतगुण शोनता, मधुर मुख वाणी सुखकद रे ॥१॥ शांति जिनराज एम उपदिशे ॥ ए थाकणी॥सवि सुणो पर्षदा बार रे ॥ कटुक फल एद कषायना, जाणी वजों सुविचार रे ॥ शांति ॥ २॥ व्यवदरे तेह मैत्रीपणे, मन कह्यो निश्चय एम रे॥ एक जे कारिज थादरे, श्रवर पण थाचरे तेम रे ॥ शा० ॥ ॥ ३ ॥ दोय उद्यानमा थावीया, एक दिन मुनिवर दीठ रे ॥ वजगुप्तानिय गुण निलो, दरिसण थति घणु मीठ रे ॥ शा० ॥ ४ ॥ करिय प्रणिपत्य मुनि वरप्रत्ये, दोय कहे कदो दित शीख रे ॥ देशना दीध नवतारिणी, नि मुणी लीधी दोय दिरक रे ॥ शां० ॥ ५ ॥ वधन बोडी संसारना, दोय दुवा श्रमण गुणधार रे ॥ थते यनशन करी उपन्या, दोय सुरलोक म फार रे ॥ शा० ॥ ॥ पण कस्युं दोय देवें तिहां, जे चवे पडेल इण गम रे॥ तेणें बीजो प्रतिवोधवो, धर्मसकेतने काम रे ॥ शा० ॥ ॥ ससुम दच जीव तिहाथी चव्यो, जरतमा थवतम्रो आय रे ॥ सागरदत्तने मदि रें, धरणिनिवास पुर वाय रे ॥ शां० ॥ ॥ धनवचा नारी वरकूस्खा, श्रीशांतिनाथनो रास खंम हो ३३७ नागसुरदत्त वर योग रे ॥सुत थयो नागदत्तानिधो, पूर्व मुकतनो जोग रे ॥ शां० ॥ ए॥ सकल शीख्यो कला नर तणी, जाण गांधर्वनो जोर रे ॥ चतुर पण सकल पुरजन तणा, चित्तनो ते थयो चोर रे ॥शां० ॥ १० ॥ नाम गांधर्व पूर्वक थयु, नागदत्त तेहनु ताम रे ॥ कुशल वीणा कलामां घणो, गारुडीमा शिरें नाम रे ॥ शां० ॥ ११ ॥ एक दिन तेह न द्यानमा, मित्र सघातें नागदत्त रे ॥ कीड करवा जणी चालीयो, मन धरी हर्प अत्यंत रे ॥ शां० ॥ १२॥ वसुदत्त सुरें प्रतिवोषियो, वधवा बुज तुं बूम रे ॥ मेल कपायने वेगला, विपयरसमा मत मूफ रे ॥ शा॥ १३ ॥ पण मनमादि यावे नहि, इश्यि जनित सुख दास रे ॥ धर्म थ तीक्ष्यि नवि जजे, यहो थहो विपय सुखपाश रे ॥ शां०॥ १४ ॥ जिहां लगें कष्ट दीतु नदि, तिहा लगें नवि करे धर्म रे ॥ चिति एम रूप मुनिनु करे, जुन जुन मित्रनो मर्म रे ॥ शाम् ॥१५॥ सर्पकरमक कर ग्रह्यो, नहिं रजोहरण मुखवस्त्र रे॥ नागदत्त पासे ते थावियो, मुनिवररूप नहिं शस्त्र रे ॥ शा० ॥ १६ ॥ पूबीयु एद करंममा, गु थ तव कहे तेह रे ॥ नाग कीडा तणा एहमां,सांनल ने गुणगेह रे ।। शा० ॥ १७ ॥ वोलियो नाग दत्त माहरा, नाग कोडाव तुं श्राज रे॥ ताहरा नाग खेलावन्छ, होशथी हुँ मुनिराज रे ॥ शां० ॥ १७ ॥ कहे ज्ञपि वात म करिश इसी, माहरा ना ग उईत रे ॥ क्रीडव्या जाय कोणे नहिं, एह विपधर बलवत रे ॥शा ॥ १९ ॥ देव पण ए ग्रही नवि शके, तो शहा तु कोणमात्र रे ॥ मत्र यो पध विना ताहरे, वश न हूवे थहिजात रे ॥ शां० ॥ २० ॥ नाग वोल्यो थनिमानगु, मूक जो थदि ग्रह केम रे॥के वली तुं ग्रहे माहरा, सुर कहे मुक तुं क्षेम रे ॥शा ॥ २१॥ नागदत्त मूकिया पन्नगा, वलगीया सुरतणे थग रे ॥ वेदना यश नवि करि शके, दिव्य प्रनाव ए चगरे ॥शा॥२॥ नागवत्त कोपीयो एम नणे, मूक हवे ताहरा नाग रे ॥ जो केहवा थडे जालमी, नहिं हां विलंबनो लाग रे ॥ शा॥ २३ ॥ मेल शहां स्वजन सवि ताहरां, कर इदा पंचनी साख रे। गारुहिक सुरवच सांजली, मेलि यां स्वजन हित दाखि रे ॥ शां० ॥ २४ ॥ कहे सुर कंचस्वरथी तदा, नागदत्त मुफ थदि साथ रे ॥ क्रीडवा चित्त चाहे घणु, पण नहि यहि मुक दाय रे ॥ शां० ॥ २५ ॥ दोप देवो नहि मुझने, जो मसे एहने था

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३३७
जैनकथा रत्नकोप जाग आठमो.
ज रे ॥ वजन जन सद्ध मल्या वारवा, म म कर एह अकाज रे.
॥२६॥ वारियो पण नवि विरमीयो, मूकीया नाग विरूप रे ॥ सोमबार
वाहक एम कदे, सुणो मुफ जग स्वरूप रे ॥ शां० ॥२७॥ रकयो
चन विप पूरितो, क्रूर दोय जीन विकराल रे ॥ क्रोध यनिधान पूरवल
शे, प्रथम एह जग सनाल रे ॥ शां० ॥ २७ ॥ पाठ फणाटोप जीव
ण घणो, स्तब्धतनु याम्यदिशि जाण रे ॥ यम समानो महोरग करो,
जेहनु मान अनिधान रे ॥ शा० ॥ २५॥ वचनाकुशल जे अति घसो,
पश्चिमें वक्रगति धार रे ॥ एह माया जुजगी वडी, धरिय नवि जाय नि
र्धार रे ॥ शा० ॥ ३० ॥ उत्तरदिशे वडो जालमी, लोननामें श्रहि
राज रे ॥ एह मशिया नरा जगतमा, पूर्ण थाये निधन राज रे ॥ शां॥
३१ ॥ जेहने चार ए थहिमसे, तस पख्यान किस्यु चित्त रे ॥ रहित श्रा
लबनें जे नरा, ते लहे 5 ख विचित्र रे ॥शा ॥ ३२ ॥ नागदत तेहने
तब कहे, श्यो करे वातविस्तार रे ॥मूक मुफ उपरें शीघ्र तु, म कर मुफ
फिकर लगार रे ॥ शा० ॥ ३३ ॥ मूकीया तेणें उतावला, मत्र औषर्षे
नहिं साध्य रे ॥ तनु मस्यु शेतना सूततणु, नूमि पथ्यो थने असाध्य
रे॥ शा० ॥३॥ मित्र उपचार बगुला किया, नवि वली चेतना तास रे॥
एह जीवाहो एम सद्धमली, वीनवे करि अरदास रे ॥ शा० ॥ ३५ ॥ तेह
थदिवादक बोलीयो, तो रहे जीवतो रे ॥ जे
कट्ठ
ते किरिया करे,
पुष्कर घणो ससनेद रे ॥ शा० ॥ ३६ ॥ हूँ पण पूवें श्ण मस्यो, तास
विष वारवा हेत रे ॥ कष्ट किरिया करु एदवी, सोनलो तास सकेत रे
॥ शा० ॥३७ ॥ केश ढुंचावु निज शिरतणा,जीरण श्वेत मित मान रे ॥
वस्त्र शोना विना वावरु, तप कर मुझ श्रनिदान रे ॥ शां० ॥ ३० ॥
थम उपवासने, पारणे सूक्त थाहार रे ॥ नवि तीन जक थाकंतता,षट
रस विगय निवार रे ॥शां०॥ ३५ ॥ जो एम नवि करु दु कदा, तेह विष
उदय फरी थाय रे ॥ कोइ समे वन गृह शुन्यमा, नमु नदि मुज एक
गय रे ॥ शा० ॥ ४० ॥ एम किरिया करता थका, मुफ नो हे एह विष
जार रे ॥ स्तोक निज्ञ करु वली थमो, लीजियें स्तोक बाहार रे ॥ शां
॥४१॥ वोलीयें स्वल्प मितधर्मनु, वाक्य मनमांदे विचार रे ॥ एम
करे उट ए यहिता, नवि चले नोर तिलनार रे ॥०॥४१॥

श्री शातिनाथनो रास खम ठहो. ३३ए एहवी जो क्रिया ए करे, तो सही जीवे एम जाणो रे ॥ नहितर ए मरशे श्स्यु, साजन सद् मन थाणो रे ॥ शां० ॥ ४३ ॥ कहे जन एम करो किया, तुमें करो एदने सङ रे ॥ प्रौढममल तिहां थालखी, उच्चरे पाठ शुज कड़ा रे ॥ शा० ॥ ४ ॥ सिम सहुने प्रणमी करी, करे मुखे एम उच्चार रे ॥ सर्वथा प्राणातिपातने, सर्वथी यलिय तिम धार रे ॥ शां० ॥ ४५ ॥ सर्वथा अदत्त मैथुन वली, सर्व परिग्रह तेम जाण रे ॥ जावजीव नागदत्त कुमर ए, एदनां करे पञ्चरकाण रे ॥ शां० ॥ ४६ ॥ वार त्रण दमक एम जणी, यतें स्वाहा पद पाठ रे ।। शेवसुत तेह साजो कस्यो, सुर तेणें करिय एम नाव रे ॥ शा० ॥ ४ ॥ जा गियो स्वजन हरख्या सवे, दाखवी तस सवे वात रे ॥ सहाही नवि तेणें तत्दणे, सवल थवली तस धात रे ॥ शा० ॥ ४ ॥ घर नणी नीसखो तष वली, नूमि पडियो ततकाल रे ॥ पुनरपि सयणना कहेगयी, तेह जीवाडियो वाल रे ॥ शा० ॥ ४॥ ॥ वार त्रीजी वली एम सही, निश्चय कीधलो जाम रे ॥ नागदत्तें वात मानी तदा, देवचितित थयु काम रे ॥ शां० ॥ ५० ॥ देव वनमाहि तस थाणिने, निज कही पूर्वनव वात रे ॥ सुणि तेणें जातिसमरण लघु, प्रत्येक बुध मुनि जात रे ॥ शां० ॥ ५१ ॥ देव तस चरण वदी करी, गयो निज ठाम धरि दर्प रे ॥ नाग दस्त मुनि मही विचरतो, पाले थाचार उत्कर्ष रे ॥ शा० ॥ ५५ ॥ देहकरमथी वाहिरें, नीसरवा न दे जेद रे ॥ चार कपाय थहिने सदा, एहवो मुनि गुणगेह रे ॥ शा० ॥ ५३ ॥ नागदत्त मुनि श्रनुक्रमें द्रुवा, सयमश्रेणि गुण धार रे ॥ घातिकर्मक्ष्य उपन्यु, केवलज्ञान उदार रे ॥ शां ॥ ५५ ॥ श्रनुक्रमें मुक्तिनारी वना, एम कहे शाति जिनचद रे ॥ ए कपायातमा वश करे, प्रगट होय सहज थानद रे ॥ शा० ॥ ५५ ॥ ढाल बछे मुणो वीशमी, रामविजयें कही एह रे ॥ शांति प्रजु देशना सानली, समजजो नवि गुणगेद रे ॥ शां० ॥ ५६ ॥ इति क पायप्रमादोपरि नागदत्तसवध ॥२॥ सर्वगाया ॥१५॥ श्लोक ॥२२॥ ॥थय प्रथम प्राणातिपातविरमगव्रतसवध ॥ ॥ दोहा॥ ।। सुण राजन् ए श्रादि दे, पंच प्रकार प्रमाद ॥ परिहरवो सुविवे

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३३७
जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो.
जरे ॥ स्वजन जन सद्ध मव्या वारवा, म म कर एह थकाज रे ॥.
॥२६॥ वारियो पण नवि विरमीयो, मूकीया नाग विरूप रे ॥ सोग परि
वादक एम कहे, सुणो मुफ जुजग स्वरूप रे ॥ शां० ॥ २७ ॥ रकम
चन विप पूरितो, क्रूर दोय जीन विकराल रे ॥ क्रोध अनिपान प्रब
शे, प्रथम एह चुजग सनाल रे ॥ शा० ॥ २७ ॥ अाठ फणाटोपनीय
ण घणो, स्तब्धतनु याम्यदिशि जाण रे ॥ यम समानो मदोरग करो,
जेहानु मान थनिधान रे ॥ शा० ॥ २५ ॥ वचनाकुशल जे यति घणो,
पश्चिमें वक्रगति धार रे ॥ एद माया जुजगी वडी, धरिय नवि जाय नि
र्धार रे ॥ शा० ॥ ३०॥ उत्तर दिशे वडो जालमी, लोजनामें अहि
राज रे ॥ एद मशिया नरा जगतमा, पूर्ण थाये निधन राज रे ॥ शां०॥
३१ ॥ जेहने चार ए थदि मसे, तस पच्यानु किस्युं चित्त रे ॥ रहित था
लबनें जे नरा, ते लदे उख विचित्र रे ॥ शा० ॥ ३२ ॥ नागदत्त तेहने
तब कहे, श्यो करे वातविस्तार रे ॥मूक मुफ उपरें शीघ्र तु, म कर मुफ
फिकर लगार रे ॥ शां० ॥ ३३ ॥ मूकीया तेणें उतावला, मत्र घोष
नहिं साध्य रे ॥ तनु मस्यं शेतना सूततणु, नूमि पयो थश्ने असाथ
रे॥ शां० ॥३॥ मित्र उपचार बडुला किया, नवि वली चेतना तास रे॥
एह जीवाडो एम सदुमली,वीनवे करि अरदास रे ॥ शा० ॥ ३५॥ तेर
अदिवादक बोलीयो, तो रहे जीवतो एद रे ॥ जे कदु ते किरिया करे,
पुष्कर घणो ससनेद रे ॥ शा० ॥ ३६ ॥ तु पण प्रवें श्ण मस्यो, तास
विष वारवा हेत रे ॥ कष्ट किरिया करु एदवी, सांजलो तास सकेत रे
॥ शां० ॥ ३० ॥ केश खंचावु निज शिरतणा,जीरण श्वेत मित मान रे ॥
वत्र शोना विना वावरु, तप करु शुद्ध श्रनिदान रे ॥ शा० ॥ ३ ॥
थम उपवासने, पारणे खूद थाहार रे ॥ नवि लीव नक्त याकंठता,षट
रस विगय निवार रे ॥०॥ ३ए । जो एम नवि करु दु कदा, तेह विष
उदय फरी थाय रे ॥ कोइ समे वन गृह शून्यमा, जमु नहिं मुक एक
वाय रे ॥शां० ॥ ४० ॥ एम किरिया करता थकां, मुज नो दे एक विष
जार रे ॥ स्तोक निशा करु वली श्रमो, लीजियें स्तोक बाहार रे ॥ शां०
॥४१॥ वोलीय स्वल्प मितधर्मनु, वाक्य मनमाहे विचार रे ॥ एम
करे 5ष्ट ए थहिता, नवि चले जोर तिलनार रे ॥ ॥१॥

श्री शांतिनाथनो रास खंम छो. ३४२ वन तात ॥ शा॥ २ ॥ प्राणीवध बदु नेद , दोयशे ताल ॥ नव त्रि कगु गुणता थकां, सत्त्यावीशज नाल ॥ शा॥३॥ करण करावण थनु मतें, एक्याशी विचार॥लेखवतां त्रिदुकालथी, सख्या थवधार ॥शां॥४॥ यत ॥ न जल जलपानिल वण, वि ति चन पंचिदिएहि नव जीवा ।। मण वय काय गुणिया,हवति ते सत्तवीसत्ति॥३॥श्वासी श्ता करण,कारणा पुम ताडिया हो ॥ सञ्चिय तिकाल गुणिया, उन्निसया इति तेयाला ॥ ४ ॥ पूर्वढाल ॥ ए सवि हिंसानेदथी, विरम्या थणगार ॥ वीश वसा तेने कही, दया सयम सार ॥ शा० ॥ ५ ॥ थूल उगारे दश रह्या, था रमें दो पंच ॥ सापराध सापेक्ष्यी, यई यईनो सच ॥ शां० ॥ ६ ॥ यत ॥ थूल सुगुमा जीवा, सकप्पारन य ते विदा ॥ सावराह निर वराहा, सावरका चेव निरवरका ॥५॥ पूर्वढाल ॥ एम सागारी सवा वसो, करुणा पालत ॥ श्रच्युत सुर लगि थायुख, बांधे गुणवत ॥ शां० ॥७॥ पंच थतिचार एदना, वह वधना विवेद ॥थतिनारारोपण वली, नात पाणी विशेद ॥ शा० ॥ ७॥ ए मुख्य व्रतने पालवा, वीजा वाड समान ॥ जीवदया व्रत मूलगु,नाखे नगवान ॥ शां० ॥ ए ॥ यउक्त ॥ देवपूजा गुरू पास्ति, दानमध्ययन तप ॥ सर्वमप्येतदऽफल, हिंसा चेन्न परित्यजेत् ॥ ॥ ६ ॥ ज थारुग्गः ॥ योदद्यात् ॥ निरतिचार ए पालता, लदे लील विलास ॥ व नव परनव सुख घणां, जेम ते यमपाश ॥ शां० ॥ ॥ १० ॥ चकायुध पूछे जिन कहे, वरते सुखवास ॥ नयरी वाणारसीथ तिनली, नदि दरिद निवास ॥ शा० ॥ ११ ॥ धर्मर्षण राजा तिहां, न्या यी गुणवत ॥ राणी कमलश्री जली, शीलें शोनत ॥ शां० ॥ १२ ॥नामें सुमजरी थाकरो, तिण नयरी तलार ॥ यमपाश जाति चामाल , नहि कम जगार ॥ शा० ॥ १३ ॥ एक नलदामा वागीयो,निवसे तिदा सत॥ नाम सुमित्रा गेदिनी, दपती एक चित्त ॥ शा ॥ १४ ॥ तस घर मम्म ण सुत थडे, लह्यो यौवनपूर ॥ सुख विलसे ससारना, चढतु जस चूर ॥ शां० ॥ १५ ॥ एक दिन एक हय कपरें, थयो नृप यसवार ॥ वैरी सुरे ते श्राश्रयो, हयने तेणी वार ॥ शा० ॥ १६ ॥ उत्पतियो वेगें तदा, गगने दय तेद ॥ दूरे जइ नमि पडघो, नृप को वनडेद ॥ शा०॥ १७ ॥ दय पदोतो परलोकमा, नृप थायुने योग । वच्यो ते वनमा जमे, नावी . .

. " ३४० जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. कीयें, मूकी मन विपवाद ॥ १ ॥ धर्म करेवो धसमसी, जेद चार मत सार ॥ दान शील तप नावना, मोक्ष तणा ए हार ॥ ५ ॥द दोप ते धर्मना, सागार ने थणगार ॥ दशविध कह्यो थणगारनो, धर्म मुक्ति दातार ॥३॥ वीश वसा जिहां पाजवी, जीवदया जली नाति ॥ ते मुनि धर्म थाराधता, करे कर्मनो घात ॥ ४ ॥ तेदथी कतरतो कह्यो, कायरने सागार ॥ बार नेद ने तेहना, समकित मूल उदार ॥ ५ ॥ वर्शन मोह कर्मोपशम, धादियकी उत्पन्न ॥ जीवादिक श्रदान शुरू, समकित वर रतन्न ॥ ६ ॥ यक्त ॥ जिय थजिथ पुण्य पावा, सव सवर बध मुस्क निकरणा॥जेण सहद तयं,सम्म खश्गा वहु नेथा ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ तत्त्वत्रयनो जे सदा, थध्यवसाय विवेक ॥ ते समकित कहीयें वली, तेदना नेद अनेक ॥ ॥ उक्त च ॥ थरिदं देवो गुरुणो ॥ सम कित अरिहंत धर्मनु, मूलभूत निर्धार ॥ प्रथमाहे एहनो घणो, जास्पो ने विस्तार ॥ ॥ इविध इविध इत्यादिकें, हादश व्रत थाचार ॥ सम कित उत्तर गुण सहित, नग एहना धार ॥ ए ॥ कोडि तेरशें उपरें, तेम चोराशी कोहि ॥ बार लाख तस परें,सहस सत्त्यावीश जोडि ॥ १० ॥ वोय शत दोय कह्या वली, नंग एटला जाण ॥ ए सर्वेमाही शिरे, समकित प्रथम वरखाण ॥११॥ ए विण एके नगनो, सनव नो हे तेम ॥ ते माटे प्रबुजी को, बागममांहे एम ॥ १२ ॥थतएवोक्तं ॥ मूज दार पश्नण, थाहारो नायण निदि ॥ उसकस्सावि धम्मस्त, स म्मच परिकित्तियं ॥ २ ॥ पूर्वदाल ॥ कारक रोचक दीपकें, समकित त्रिलु प्रकार ॥ चारित्री थविरति तथा, मिथ्यादृष्टि विचार ॥ १३ ॥ पंच दोष एदना कह्या, शंका कख विगिध ॥ तेम पसस संथव कह्यो, वर्जे समकित सच ॥ १४ ॥ मूल एद साजू करे, बागल दोय विस्तार ॥ समकित मूल व्रत बार जे, एह धर्म सागार ॥१५॥ दवे प्रथम व्रत अपरें, नांखे प्रश्रवदात ॥ ते नवियण तुमें सांजलो, मूकी विकथा वात ॥ १६ ॥ ॥ ढाल एकवीशमी॥ ॥ घरे थावी जननी नमे ॥ ए देशी ॥ शाति जिनेश्वर एम कहे, नि सुणो तुमें सार ॥ नरजव हास्यो नवि मले, एह वीजी वार शां०॥१॥ व्रत पदेलु सागारनु, स्थूलप्राणातिपात॥ विरमण करीये तेह, कहे निष्ठ श्री शांतिनाथनो रास खंम हो ३४३ अवसरें मृत माहरो, नामें अतिमुक्त ।। बहु रोगे ते पीडियो, न लहे ते उक्त ॥ शा०॥३५॥ तेह गयो समशानमा, दीग मुनिराज ॥ कर जोडी पाये नम्यो, कहे सीध्या काज ॥ शा० ॥ ४० ॥ यवर नहीं कोई तुज विना, मुफ राखणदार ॥ तु प्रनु नयणे निरखीयो, करुणा नमार ॥ शा ॥ ३१ ॥ मुनि परनावें ते थयो, थगें नीरोग ॥ वात थावी घरे मुफ कही, गयो माहरो रोग ॥ शा० ॥ ४२ ॥ कुटुव सहित रोगें दम्यो, नम्यो दु मुनिपाय ॥ ते मुनिचरणप्रनावथी, थया नीरोगी काय ॥ शा॥ ४३ ॥ ते मुनिवर मुफ देशना, कहे करुणाखाणि ॥ जीवदया तुम्हें पालजो, बातम हित जाणि ॥ शा० ॥ ४ ॥ रोग सोग नावे कदा, दोहिल उखराशि ॥ धर्म थदिसा सेवतां, होवे शिवपुरवास ॥ शां० ॥ ॥ ४५ ॥ आवक धर्म में यादयो, करि हिसा त्याग ॥ मन वच कायें नादरु, निमुणो वडनाग ॥ शा० ॥ ६ ॥ कृत्रिम कोप करी कहे, राजा तव एह ॥ कारिज कर नहि तो तुने, मूकीश यमगेह ॥ शां० ॥ ५४ ॥ ते कहे मरवु एकदा, नहि वीजी वार ॥ पण निज व्रत नांग्या तणा, 5 खनो नहिं पार ॥ शा० ॥ ७ ॥ यमुक्त ॥ वरमग्गिम्मि प वेसो, वरं विसुदेण कम्मणा मरण ॥ मा गहिय वयनगो, मा जीयं ख लिय सीलस्त ॥ ॥ पूर्वढाल ॥ राय सुणी दररव्यो घणु, मूक्यो यम पाश ॥ सन्मानी वोलावियो, परशस्यो तास ॥ शा० ॥ ४ ॥ मात गनो स्वामी कस्यो, करे उत्तम काम ॥ श्रायु पूरे यमपाश ते, पहोतो सुर वाम ॥ शा० ॥ ५० ॥ थपर थत्यज नृप दुकमथी, कखो मम्मण नाश ॥ फल कडथा दिसा तणा, लह्यां नरक निवास ॥ शां० ॥ ५१ ॥ एम जे ए व्रत साचवे, तस लील विलास ॥ मुख पामे जेम ते यमपाश ॥ शां० ॥ ५२ ॥ बछे खमें एकवीशमी, प्रतु नांखे दयाल ॥ पहेलु व्रत एम पालता, लहे सुख रसाल ॥शा॥५३॥ सर्वगाथा ॥४॥ इति प्राणातिपात प्रथमव्रतसवघे यमपाशकथानकम् ॥१॥ ॥अथ द्वितीय मृपावाद विरमगनतसवध ॥ ॥ दोहा॥ ॥ हवे वीजा याव्रत तणो, कहे जगगुरु थधिकार ॥ चकायुध नृप थागलें, ते निमुणो अधिकार ॥ १॥ क्रोध मान माया वली, लोन . . मुर शिव तणा, . . ३४२ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. कर्मने जोग ॥ शा॥ १७ ॥ नूख तृपा लागी घणी, नृप चिते दो एम पाणीविना प्राण माहरां, इदा रहेशे हो केम ॥ शां० ॥ १५ ॥ एवं एक मृग थावीयो, नूपतिनी पास ॥ पूरव नव तस सांजसो, नृप रेल ठन्नास ॥ शा० ॥ २० ॥ थर लखी शिला परें, जणाये हो तेर देवलनामें हो ताहरो, सेवक गुणगेह ॥ शा० ॥ २१ ॥ धान्यानमार मरी, थयो मृग वनमाहिं ॥ तुफ दी मुझ सांजस्यो,पूरव नव थोहि ॥ ॥ २२ ॥ नीर देखाडघु नृप जणी, जल पीधु तेवार ॥ स्वस्थ पयो मन चितवे, मृगनो उपकार ॥ शां० ॥ २३ ॥ सेना पूठे सचरी, करी नरपति केड ॥ वन वन जोता नृप नणी,थावी तेण वेड ॥ शा० ॥ २४ ॥ सैम्प सघातें हो थावीयो, मृग लेई साथ ॥ दान थनय वा मूकीयो, पुरमा नाथ ॥ शा॥ २५ ॥ फिरता दो एक दिन थावीयो, मृग मम्मण दाट। पूरव मत्सरनावथी, उदयो जे सानि ॥ शा॥ २६ ॥ तातने कहे थप राधीयो, मृग मारीश थाज ॥ जनक कहे नवि कीजियें, एह सबल व काज ॥ शा० ॥ २७ ॥ जीव कोइ दणीयें नहीं, वली एह विशेष ॥ नृप तिने मन मानियो, उपकारी रेख ॥शा॥॥ जनकनो वासो नविरह्यो, रोषे दणे सोय ॥ मम्मण थयो विलखो घणु, चास्यु कहण न कोय ॥शां० ॥२॥ यमदमें तेण थवसरे,वीनवीयो राय ॥ कर्म कयं ण मम्मों, नि दय मन थाय ॥शा॥३०॥ राय कहे कुण साखीयो, कहे ते तस बाप ॥ नृप पूढे साचु कहे, श्रावी ते थाप ॥ शां०॥३१॥ रीयो राय मनें घणु, सत्यवादी जाण ॥ मान सहित बोलावीयो, घर ते गुणवाणि ॥ शां० ॥ ३२ ॥ कहे तेडी यमपाशने, मम्मणने दो मार ॥ कहेतो हिंसा नवि करु,नरपति थवधार ॥ शा०॥ २३ ॥ तुं हिंसा न करे किस्यु, जातें चांमाल ॥ ते कहे राजन् माहरे, नहिं हिंसा ढाल ॥ शां० ॥ ॥ २५ ॥ कारण सुण तेहूं कद्गु, सादिष उजमाल ॥ हस्तिशीर्ष पुर ने नलु, सोहे सुविशाल ॥ शा॥ ३५ ॥ दमदत नामें वाणीयो, सुणि वाणी थनत ॥ जिनवर पासें श्रादयो, सयम गुणवत ॥ शां० ॥३६॥ तप प्रनावथी उपनी, तस लब्धि अनेक ॥ ते विचरंतो भावीयो, वनमा सुविवेक ॥ शां० ॥ ३४ ॥ रह्यो काउस्सग्ग स्मशाना, तपीयो अण गार ॥ जिए दीठे पावन होये, मानव अवतार ॥ शो० ॥ ३० ॥श्य .

रे . हित नयरमा, श्री शातिनाथनो रास खंम हो. ३४५ लेखे व्रत को ॥ धूरत श्रावकसुतनो, मृपा उपरे रे हां उपनय होय ॥४०॥ ६ ॥ ने पारदारिक दस्युनी,प्रतिकिरिया रे जे वोले थलीक ॥ तस प्रतिकार न को मिले, ए चारजो रे मनमा तहकीक ॥ ध० ॥ ॥ चार थाश्रवनु एकण दिशे, दिशि एकण रे मृपावादनु पाप ॥ नारे यस त्यनु त्राजवु, एम बोले रे श्रीजगगुरु थाप ॥ध ॥ ७ ॥ वायसपद जेम एकलु, सामुहिक रे लणना लद ॥ अप्रमाण करे तेम श्हा, जूत नाखदु गुणगण प्रत्यद ॥ध ॥ ए ॥ यत ॥ सुग्गधो पूश्मुहो, यणिध्वयणो यफरुस वयणो थ ॥ जल एल मूथ मम्मण, थलिय वयण जपणे दोसा ॥ १ ॥ इह लोए चिय जीवा, जीहाद वह च वध वा ॥ ययस धणनास वा, पावति य यलिय वयणा ॥ ५॥ पूर्व ढाल ॥ कूडनाखी उपरें कह्यो, नशेठनो रे प्रनुजी दृष्टांत ॥ निसुणे वारे पर्पदा, गुण यर्थी रे मन धरि एकात ॥ध ॥ १० ॥ धरणीप्रति धनवर्जित दोय वणिक वसत ॥ उष्टवुदि सुबुद्धि नलो, धन कारण रे परदेश नमत ॥ध ॥ ११ ॥ कोइक पुरमाहे गया, लानहेतें रे रह्या केता दीद ॥ देवचिता टालण नणी, एक दिन गयो तेह सवुद्धि थवीह ॥ध ॥ १२ ॥ खमित घरमाहे खोदता, नाग्य योगें रे जड्यु तास निधान ॥ वेदु मली जोवे यदा, एक सदसज दीनारनु मान ॥धo १३ ॥ कृतकृत्य यश् निजपुर वल्या, थावी उप वनें रे करे एम विचार ॥ नयरमेलें जाता थका, ए वातनो रे वधशे विस्तार ॥ध० ॥ १४ ॥ उटवुदि कहे ए सवि, धन दाटिये रे नमिमां इण गम ॥ शत एकेकने थाशरे, वे जश्ये रे थापण निजधाम ॥ धo ॥ १५॥ सरलपणे वीजे सवे, वात मानी रे कीधु ते काम ॥ वट पासें धन दाटीने, परजातं रे थाव्या ते निज वाम ॥ध ॥ १६ ॥ शत दीनार ते मुटनी, दिन केते रे नाठी तत्काल ॥ पुण्य विना स्थिर नवि रहे, एद सपद रे सुणो नवि उजमाल ॥ धि० ॥ १७ ॥ यत ॥ न निमित्तहिपां केम, नायुर्वेद्यकविहिपाम् ॥ न श्रीर्नीतिहिपामेक, मपि धर्महिपां न हि ॥ ३ ॥ पूर्वढाल ॥ पुनरपि वेदु मती एका, जर लाव्या रे शत शत दीनार ॥ थन्य दिवस र्बुदि ते, मनमाहे रे करे एम विचार ॥ध ॥ १७ ॥ वची सुबुधिने एकलो, जइ लावु रे सघलो रे - . ३४४ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. त्रिविध तेम राग ॥ क्षेप हास्य जय वीडथी, कीडा विकया लाम ॥ रति धरति दाक्षिण्य तेम, मुखरपणुं इत्यादि ॥ एह कारणपी संको जगमा मिरपावाद ॥३॥ पीडाकारक जगतमा, सत्यवाद पण तेम मृपावाद तेदने कह्यो, नदि परिणामें देम ॥४॥ यत ॥अति नन सियच, अधिद्ध सब वि जं न वत्तव ॥ सञ्चपि जन सचं, ज परपीट करं वयण ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ ते उविध जिनवर कह्यो, स्थूल सूक्ष्म अर धार ॥ परिदासादिकथी मुद्धम, तस यतना सागार ॥ ५॥ स्पूल तीः सक्लेषथी, ते परिहरवो नित्य ॥ थवगुण जेहमांथति घणा, एदन वर अकृत्य ॥ ६ ॥ यदावश्यकचूंकित् ॥ जेण नासियेण थप्पणो परस्स वा थतीव वाघातो वा थतिसकिलेसो थ जायते थहाए अणहाएवारा वपत्ति ॥ २ ॥ पूर्वदोहा ॥ कन्या गो नूमीतणु, नव्य थलिक निवार । थापण उलवियें नहीं, कूडी साख मधार ॥ ७ ॥ तथा च लोकिक वचः ॥ कूटसाक्षी सुहृोदी,कतनोदीर्घरोपिवान् ॥ चत्वार कर्मचामाला , पंचमो जातिसनव ॥३॥ तथा ॥ दस्ते नरकपाल ॥ चौमाली प्राह ॥ मित्र शेही ॥ कूटसाही मृषावादी, पक्षपाती जगषये ॥ कदाचिञ्चलितो मार्गे, ते ॥ ४ ॥ पूर्वदोदा ।। सत्यमूल जे जस तणु, तेम विश्वास निदा न ॥ सत्य स्वर्गर्नु बारण,सत्य सिदिसोपान ॥ ॥ मत्रयोग सत्यें फजे, धर्म थर्थ ने काम ॥ सत्यवत 5 ख नवि जहे, पडियां विषमे गम ॥५॥ ॥ ढाल बावीशमी॥ ॥ नोकरवाली वदीयें ॥ए वेशी॥ शांतिजिणेसर एम कहे, सवि सारे रे नवियण जिनवाणी ॥ व्रत बीज तुमें थावरो, मृषावावर्नु रे कीजे पत्र रकाण ॥१॥ धन्य जिनवाणी जे सुणे ॥ए थांकणी॥ नवि बोले रे कूई लवलेश ॥ ते सुखीया सोनागीया, नवि पामे रे परनव सक्नेश ॥ ५० ॥ ॥ २ ॥ पंच थतिचार एदना, वर्जीजें रे सदसान्याख्यान ॥ अणधालो ची कोइने, नवि दीजें रे अबता थपमान ॥ध० ॥३॥ वात एकांत नी कोने, नवि कहीये रे रहथव्याख्यान ।। जेद वदारामंत्रनो, नवि क रिये रे जेहथी दोय दाण ॥ध ॥ ॥ मोसुवएस दीजें नहीं, बिडु वढतां रे काहिं कूडि बुधि ॥ कूड लेख लखवो नहिं, मन थाणिये रे धरि समतासुक्षि ॥ध ॥ ५ ॥ ए व्रत बावरिया विना, नवि यावे रे श्री शांतिनायनो रास खंम हो ३४७ कूड घणां कमजात रे ॥ सा ॥ ४ ॥ कहे उर्बुदि श्हा साखीयो, वे वट विटप माहाराज रे ॥ सा ॥ ते जो साख नरे इहां, तो देजो सावाश रे ॥ सा ॥ ५ ॥ लीधु सुवुझिये वित्त ए, एम जो कहे ए वड वाणी रे ॥ सा ॥ तो मुझ साचो जाणजो, घणु शु कनु तुमने ताणी रे ॥ सा ॥ ६ ॥ कहे नृपति जो एम हो, तो पामिश बढ़ सन्मान रे ॥ सा ॥ जो जूनो याइश इहा, तो 5 ख लहिश यसमान रे ॥ सा० ॥ ४ ॥ 5 बुद्धि कहे रायने, करगु प्रना ए काज रे ॥ सा ॥ नरवर कहे ते वेढुने, जान दे जमान घर याज रे ॥ सा ॥ ७॥ ते विहु निजम दिर गया, मनमाहे विमासे सुबुद्धि रे ॥ सा० ॥ उर्घट काम एवं पडि वज्ज्यु, कल शी केलवशे पुर्बुदि रे ॥सा॥ ए ॥ अथवा जय होवे धर्मथी, नही खोटुं श्हा तिलमात रे ॥ सा ॥ श्यो नय मनमांहे थाणवो, जिदा कूड त्या धूड कहात रे ॥ सा ॥ १० ॥ उर्बुदि जइ निजघरे, कहे तातप्रत्ये समजाय रे ॥ सा ॥ लाव्यो निधान दु रातमा, ऊगडो ममाणो थाय रे ॥ सा ॥ ११ ॥ नशेत वलतुं कहे, हवे करवो कोण उपाय रे ॥ सा ॥ धन वाहालु एकए दिश, एकदिशि इकत कहे वाय रे ॥ सा ॥ १२ ॥ पुत्र कदे निर्धन तणी, जात श्ये आवे काम रे ॥ सा ॥ धनदूती रजात घणी, वली वाधे जगमाहे माम रे ॥ सा० ॥ १३ ॥ माटें वटकोटर वचें, पेशी रहो रातें तात रे ॥ सा ॥ प्रनातें कहेजो तुम्हें, धन लीधु सुवु एम वात रे ॥ सा ॥ १४ ॥ सुत उपरोघे मानीयु, तेणें दुष्कर पण काम रे ॥ सा ॥ थतिलोजी नर जे दुवे, तेदनी न रहे जगमा माम रे ॥ सा ॥ १५ ॥ रातें रह्यो वट कोटरें, प्रनातें मल्या जनवृद रे ॥ सा० ॥ महीपति पण तिदा था वियो, जुवो कपटीनो हवे फद रे ॥ सा ॥ १६ ॥ पुरजन नृप सह दे खता, वटतरु पूजे उजमाल रे ॥ सा ॥ उष्टवुदि एम उन्चरे, कहो इय्यनी थमने नाल रे ॥ सा ॥ १७॥ वैश्रमणालय सानलो, तुम उपर एह विवाद रे ॥ सा ॥ सघले मतीने ठेरावियो, कह्यो जेम होय थम थाहाद रे ॥ सा ॥ १७॥ वटकोटरमाहे रह्यो, सद्ध सानलता नझोउ रे ॥ सा ॥ कदे निमुणो सट्ठ को तुम्हें, ए काम सुवुक्नुि रे ॥ सा ॥ १५ ॥ राय कहे ते सुवुद्धिने, निधि लीधो मुफ देखा -- ३४६ जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो ते माल ॥ शु न करे धन लालची, धन सम नहि रे जगमां कोइ साल ॥ ध० ॥ १५ ॥ रातें जइ सवि सामदु, धन लायो रे कपटी ते, जात ॥ बल करी सरलने तरी, धनलोनी रे वचे निजतात ॥ ॥ २० ॥ साथै तेडी जइ तेहने, पठे नोयु रे तेणे धनगण ॥ माद कांहिं दीसे नहीं, कपटीना रे जुन एद विन्नाण ॥ध० ॥ २१ ॥ हा हा पुर्बुदि कहे, मुफ वची रे को धूरत एह ॥ माल ले गयो माहरो, देयु कूटे रे दाथेच्नु तेह ॥ ५० ॥ २२ ॥ चिते सुबुद्धि चित्तमा, एह धूरत रे एहना सवि काम ॥ धुत्ता होय सुलक्षणा, जगमांहे रे कहेवाये थाम ॥ ५० ॥ २३ ॥श्रम बिलु विण को नवि लहे, एह स्थानक रे त्रीजो जन मात्र ।। सही लीधु थावी एणे, एह जेहवो रे जग नहि कमजात ॥ ध० ॥४॥ खम बरे वावीशमी, ढाल नाखी रे निसुणो गुणवत ॥ इथ्य समो नहि को रिपु, जेणें मेहल्यु रे धन तेह सत्यवत ॥ध ॥ २५॥ १७ ॥३९ ॥ दोहा ॥ ॥ कहे सुबुधिने पापीयो, तें सही लीधु एद ॥ वीज कोइ जाणे नहीं, तु थयो सदि नि नेद ॥ १ ॥ कहे सुबुद्धि बुदि मुण, मुक मन एदवु दूत ॥ तो एकातें ए लसुं, शाने तुक सोपत ॥ २॥ पण वयक तुहिज सही, ठगमाहे शिरवार ॥ तुज विण दूनो को नहीं, ए निधान लेनार ॥ ३ ॥ प्रीति रही नहि तेने, कलदो लाग्यो जोर ॥ माहोमादि धन कारणे, वोले वयण कठोर ॥ ४ ॥ ऊगडता बेन थाविया, नरपतिने दरबार ॥थरज करे मचे खरे, पुष्टबुद्धि तेणि वार ॥ ५ ॥ ॥ ढाल वीशमी॥ ॥ देरापी जेगणीना गोखला ॥ ए देशी ॥ राजन् थम वेद पामीया, निधि कोश्क ठाम उदार रे ॥ सादिष सुणो विनति ॥ ए थांकणी ॥ तुऊ नयथी थमें वडतलें, लेइ सताडघु निर्धार रे ॥ सा ॥ १ ॥ मुण वची एवं लियु, नहिं नूमिमांहे ते निधान रे ॥ सा ॥ सुफ विण कुण मुज सांजले, फरियाद ए मुगुणनिधान रे ॥ सा ॥ २ ॥ तुम बेन ए नयरमा, वरते जो एइदो अन्याय रे ॥ सा ॥ तो थम जेहवा बना थनी, कहोने हवेशी गति थाय रे ॥ सा० ॥ ३ ॥ कहे राजन सारखी डे कोइ के कल्पितवात रे । सा० ॥ धन कारण बहु केलवे, एम श्दा, - श्री शांतिनाथनो रास खंम हो ३४ाए ॥ अथ तृतीयस्यूल थदत्तादानविरमण व्रतसवध ॥ ॥ दोहा॥ ॥ स्यूल थदत्त परित्यागनु, व्रत त्रीजु कहे स्वामि ॥ चक्रायुध नृप या गलें, सवि नविजन हितकाम ॥१॥ स्वामी जीव गुरु तीर्थकर, थदत्त कत्यु चन भेद ॥ चम्जेदें ए साधुने, तजवु तजि मन खेद ॥ ५ ॥ कनकादिक स्वामी श्रदत्त, नवि लीजे कोइ वार ॥सचित्त फलादिक नेदता, जीवादत्त वि चार ॥ ३ ॥ तेह फलादिक जीवडे, नवि दीधां निज प्राण ॥ तेह जणी लेवु नहि, सचित्त फलादिक जाण ॥ ॥ गृही दीधु पण साधुने, बाधा कर्मी जेद ॥ तीर्थकर थाणा नदि, श्रदत्त तीर्थकर तेह ॥ ५ ॥ आवकने प्राच्छक वली, थनद ने काय थनत ॥ वावरतां तीर्थकरें, यदत्त कत्यु नगवत ॥ ६ ॥ सर्वदोप निर्मुक्त पण, अनिमत्री गुरु सार ॥ जे सुजीजें ते कह्यो, गुरु यदत्त सुविचार ॥७॥ स्वामि यदत्तनो हा कणे, स्थूलबतें थधिकार ॥ यत्न करीने जासवो, ए व्रत निरतिचार ॥ ७॥ चौरानीत न लीजियें, चौरप्रयोग निवार ॥ सरस नीरस वेड नेलीने, नवि कीजें व्यापार ॥ ए ॥ राज्यविरुद न कीजियें, कूटतुला ने मान ॥ पंच दोप ए टालता, १६ व्रत का निदान ॥ १० ॥यउता। चौरश्चौरार्पको मंत्री, नेद छ काकायी ॥ अन्नद स्थानदश्वेति, चौर सप्तविध स्मृत ॥१॥ ॥ ढाल चोवीशमी॥ ॥ थादि ए थादि जिणेसर, नानिनरिंद महार ॥ ए देशी ॥ शांति जिनेश्वर एम कहे, सांजलो सवि नर नारी ॥ एद थतिचार टालवा, चौरप्रसूति निवार ॥ जलq ए कुशलनु पूब्वु, सझाकरण सुविचार ॥ राजनोग्य धननिहव, श्रवलोकन तेम धार ॥ १ ॥ बहुं थमार्गनुं वर्शन, शय्यासमर्पण जाणे ॥ पदनग जाणीयें थामो, विश्राम नवम वखाणो ॥ पादपतन थासन तिम, गोपन मन नवि थाणो, खम खा दन मादाराजिक, वर्जे ए मुगुण सुजाणे ॥२॥ पद हितकारक पद्य, उसण जल तैल न दीजें ॥ पाकने कारण थनिनु, दान कदापि न कीजें॥पानने थथै शीतल जल, दीधे ए लान न लीजें ॥ पशुवधनने ए रहुनु, दान देता गुण बीजे ॥३॥ चौरप्रसूति थढार ए, जाणी करे जेह त्याग ॥ सुजस महोदय ते लहे, दिन दिन थधिक सोनाग ।

३४७ जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो. ड रे ॥ सा ॥ चिते सुबुद्धि तरु नवि कहे, उर्बुद रज्युं सवि बाल रे॥ सा ॥ २० ॥ वटकोटरथी नीसरी, वाणी नरनी ए बाज रे । सा ॥ सांकेतिक सही हाकणे, कोइ नरथी थयु ए काज रे ॥ सा ॥ २१ ॥ कर जोडी कहे नूपने, में देवु धन उल्लास रे ॥ सा ॥ पण जो दुकम होय राउलो, तो ढुं करु एक यरदास रे ॥ सा ॥ २२ ॥ कहे राजा सुखें विनवो, कहे में लीधु धन तेह रे ॥ सा० ॥ पण ए तरुको टर विचें, मूकीने गयो निजगेह रे ॥ सा ॥ १३ ॥ एक दिन सेवा श्रा थावियो, तव दीतो हां यदि एक रे ॥ सा ॥ फण मांझी कपर रह्यो, नयंकर दीसे थति बेक रे ॥ सा ॥ २३ ॥ मुफ धन थधिष्ठायक थई, रह्यो जो कहो तो दणु देव रे ॥सा ॥ राय थनुज्ञा तब दुई, करो कारिज वहेला देव रे ॥ सा ॥ २५ ॥ शर्पण गण लेई घणा, तरुकोटर पूरे सुबुद्धि रे ॥ सा ॥ थनिथी धूम थयो घणो, गइ नइ तणी गुम बुद्धि रे ॥ सा ॥ ३६ ॥ लोचन थकुलाणां घणु, पख्यो उबलीने नूपीव रे ॥ सा० ॥ पुरपति पुरजन सट्ठ मल्या, नझोउने प्रत्यक्ष दीप रे ॥ सा ॥ २७ ॥ पूजे सकौतुक सद् तिहां, कहे सुत कुठे मुफ लाज रे ॥ सा ॥ खोवरावी सद्गु शहेरमां, एवं कीनीच थकाज रे ॥ सा ॥ १७ ॥ कूडी साख जरावीने, नव कितनो कस्यो नाश रे ॥ सा ॥ मुफ जेवो जड को नदि, पज्यो मोहतणे दु पाश रे ॥ सा ॥ २५ ॥ वाक्य थ लिक मुफने फल्यु, एहिज नवमां नरदेव रे ॥ सा ॥ एम जाणीने सदु तुम्हें, मत राखो थलिकनी टेव रे ॥ सा ॥ ३० ॥ जश्नपी राय मू कियो, तस सुत तेही पाल रे ॥ सा ॥ धन सघ ले करी, पुर वा हिर कयो तत्काल रे ॥ सा ॥ ३१ ॥ सुबुद्धि जणी सन्मानियो, दे वस्त्रानरण अमूल्य रे ॥ सा ॥ नृप जन सद्ध घर थावीयां, जग एदबु थसत्यनु शूल रे ॥ सा० ॥ ३२ ॥ इह परनव 5 खदायकु, जाणीने थसत्य तजो दूर रे ॥ सा ॥ सुण चक्रायुध राजीया, सत्यथी होय सुख नरपूर रे ॥ सा ॥ ३३ ॥ व्रत वीजा उपरें कह्यो, प्रभुजीयें संबध रसाल रे ॥ सा ॥ ब खमें त्रैवीशमी,कदी रामविजयें ए ढाल रे ॥सा॥३॥ इति मृपावाद विरमणहितीयव्रतेनधिकथानक॥शासर्वगाथा॥५॥३६ श्री शांतिनाथनो रास खंम ठहो. ३५१ कर, परमातम थरिहत नमो ॥ पारगत परमेष्ठि अधीश्वर, नयनजन जगवत नमो ॥ मु०॥ २ ॥ शनु स्वयजु जगत्प्रनु यनयद, वीतराग गुण सिधु नमो ॥ वोधिदायक त्रिदु कालके झायक, यशरण शरण सुवधु नमो ॥ मु० ॥ ३ ॥ केवलकमलाकत महोदय, सिम वुद्ध सर्वज्ञ नमो ॥ तीर्थकर तीर्थेश्वर ईश्वर, पुरुपोत्तम परमज्ञ नमो ॥ मु० ॥ ४ ॥ याप्त थनत यचित्य गुणाकर, निर्मोही अविकार नमो ॥ पूर्णानद स्वयम सादिव, योगीश्वर जितमार नमो ॥ मु० ॥ ५ ॥ लोकालोक प्रकाशक नासक, थानदघन अविनाश नमो ॥ देवाधिदेव शरण एक तेरो, दायिक नावविलास नमो ॥ मु० ॥ ६ ॥ इत्यादिक गुन नामके धारक, करूं प्रणिपत्य त्रिदु काल नमो ॥ राम कहे करो सेवक कपर, करुणादीन दयाल नमो ॥ मु॥ ७ ॥ इति श्रीजिनस्तुति ॥ पूर्वढाल ॥ एहवे तिहां एक थावी ए, नावी कनी मन रगें ॥ यौवन रूप रसाली, मनोहर वाणी सुचगे ॥ निज उत्तरीय करी मुख, कोश धरी मन नाव ॥ जिनमुख ममन करती, मनोहर रग बनाव ॥ ए ॥ थगे ए थागी थनोपम, उपती कांति थपार ॥ केसर घन घनसार, विरचे ए विविध प्रकार ॥ पत्रवनी रचना वली, नवली कपोलें ए सारी॥ करती श्री जिनर्विवने, कुमरे निहाली ए नारी ॥ १०॥ जिनदत्त कहे निजमित्रने, कोण कनी ए सारी ॥ जक्ति करें जगवतनी, मित्र कहे सुविचारी ॥ प्रियमित्र सारथवाहनी, नदनी जिनमती नामें ॥ शुनलक्ष्ण सपूरण, सृष्टं घडी एद कामें ॥ ११ ॥ रूपें ए सरिखी रे ताहरे, जोडी मिले गृहवास ॥ तो सफलो होय विधि तो, ए निर्माणप्रयास ॥ जिनदत्त कहे जिनन्नुवनमा, दास्य न कीजें ए नाई ॥ थाशातन दोय जिनतणी, विपयकया 5 खदायी ॥१२॥ जघन्य तोपि जिनगृहे वश थाशातना वर्जनीया ॥ तद्यथा ॥ तंवोल पाए नोयण, वाणह मेहूण सत्रण निछुवण ॥ मुत्तुञ्चार जूचं, वले जिणनाह जगईए ॥६॥ उत्कटतचतुरशीतिसख्यया थाशातना वर्जनीया ॥ तद्यथा ॥ खेल र केलि श् कलि ३ कला धकुललय ५ तवोल ६ मुग्गालय , गाली - कगुली या ए सरीरधवण १0 केसे ११ नहे १२ लोदियं १३ ॥ नत्तो १४ सत्तय १५ पित्त १६ वति १० दसणा १७ विस्तामण १ए दामण २०, दत २१ जी २२ नह २३ गन्न २४ नासिय २५ सिरो २६ मुत्त २७ वीण २७ , .

. ३५० . जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ॥ थय चौरप्रसूतिकास्वरूप गाथानिर्लिख्यते ॥ जलन कुशलं तो, राम जागोवलोकनम् ॥ यमार्गदर्शन शय्या, पदनगस्तथैव च ॥ १॥ विश्राम पादपतन, चासन गोपन तथा ॥ खमस्य खादन चैव, तथान्यन्मासा राजिकम् ॥ २॥ पद्यायुदकरना, प्रदान झानपूर्वकम् ॥ एताः प्रसूतयोझेया, अष्टादश मनीपिनि ॥३॥ पूर्वढाल ॥ एह यदत्त निया रीने, साधे जे मुक्तिनो माग ॥ ते गृही उत्तमगति लहे, धागल शिव गति लाग ॥ ॥ यमुक्त ॥ खिते खले यरन्ने, दियायराठ व सर धाए वा ॥ यो से न विणस्सइ, थचोरियाए फल एय ॥ ४ ॥ गामागर नगराण, दोण मुद ममव पट्टणाण च ॥ सुर दवति सामी, अयोरिया ए फल एयं ॥ ५ ॥ पूर्वढाल ॥ ए व्रत पालवु यत्नथी, जिनदत्त परें सुखकार ॥ चक्रायुध नृप थागलें, कहे प्रल तस अधिकार ॥ नयर वसतपुरे वसे, जिनदास आवक सार ॥ जीवाजीवादिक तत्त्वना, जाणे ए अर्थ विचार ॥ ६ ॥ जिनदत्त नामें ए नदन, जन थानदन जाचो । जिनवर धर्म समाचरे, जाणे ए मारग साचो ॥ कुल कन्या विवाहनी, वातमाहे दवे राचो ॥ मात पिताने जिनदत्त, कहे ससार ए काचो ॥ ४ ॥ मित्रममला परवस्त्रो, एकदिन उपवन जाय ॥ देखि उत्तग मनोहर, जिनगृह दर्षित थाय ॥ मित्र सघातें ए थावे रे, नाव धरी मनमांदि ॥ पूजा करी जिनराजनी, चैत्यवदन करे त्यांहि ॥ ७ ॥ अथ चैत्यवदन ॥ जय जय तुं जिनराज थाज, मलियो मुफ स्वामी ।। थविनाशी थकलक, रूप जग थतर्यामी ॥ रूपारूपी धर्म, वेव बातम थारामी ॥ चिदानद चेतन थचित्य, शिवलीला पामी ॥ सिदि बुद्धि तुम वदता ए, सकल सिदि वर बुद्धि ॥ राम प्रच्छ ध्याने करी, प्रगटे थातम ऋदि ॥१॥ काल पगु स्थावर घरे, नमीयो जवमादि ॥ विकलेंड्रिय माहि वस्यो, स्थिरता नहीं क्यादी ॥ तिरि पंचेंक्ष्यि मादि देव, कमै द थायो । करि कुकर्म नरकें गयो, दरिसन नवि पायो । एम बनत का करी ए, पाम्यो नर अवतार ॥ दवे जगतारण तुं मिल्यो, जवजल पार मतार ॥ ५ ॥ इति चैत्यवदन ॥ थथ स्तवन ॥ श्री राग ॥ मुनि ध्येय नमोसुर गेय नमो, पतितपावन शुचि नाम नमो ॥ चितित सकल मनोरथ प्रण, कल्पतरु परिणाम नमो ॥ मु० ॥ १ ॥ जिनमुनिनाप जिनेश्वर श - श्री शातिनाथनो रास खंम छो. ३५३ यो ॥३॥ कीधी वात प्रमाण, जिनदत्तने जनकें तिहां ॥ याव्यो घरे सुजाण, मुह माग्या पासा ढल्या ॥ ४ ॥ जिनदत्त मदिरमांहि, थाव्यो वात कही सवे ॥ पण सयमनी चाह, नवि इवे विवादने ॥ ५ ॥ जिनमदिरनी वात, मामीने सपती कही ॥ पण ते निसुणी जात, मौन धरी मनमा रह्यो ॥६॥ ॥ ढाल पच्चीशमी ॥ ॥ चादलीयोने लग्यो रे हरणी थायमी रे ॥ ए देशी ॥ जिनमती वोले रे सहीयर माहरी रे, मन हरी जिनदत्तें लीध ॥ रयणी न जाये रे वैरिणी थइ रही रे, का मुफ कामण कीध ॥ जि० ॥ १ ॥ चदनशीतल चश्नी चड्किा रे, मुक तन दहे रे थपार ॥रात दिवस मुने वनन सांगरे रे, भ्वासमांहे सो वार ॥ जि ॥ ॥ वैर वसाव्यु रे एहने निरखता रे, नवि सही प्रीतिनी रीत ॥ वाहेर दीसे रे शीतल ए सही रे, पण ने ए थ मिनी मित्त ॥ जि ॥३॥ माया लगाडी रे जिनघरे थावीने रे, पण न हिं मुजरा रे राग ॥ दु तस कारण यहोनिश टलवलु रे, पण मिलवु होवे नाग्य ॥ जि० ॥ ४ ॥ निमुण्यो वैरागी रे में तेहने सही रे, एक पखी रे एह प्रीत ॥ केम जोडाशे रे सहीयर माहरी रे, सवल विमासण चित्त ॥ जि० ॥ ५ ॥ सहीयर वोले रे धर धीरज मनें रे, मिलशे दो वालिम तेह ॥ तुफथी विवादनी वातने सांगली रे, मौन धरी रह्यो तेह ॥ जिन ॥ ६ ॥ एम थनुरागें रे दिवस घणा गया रे, एक दिन घरथी रे तेह ॥ निसरती नीरवी रे पुररक्षक रे, वमुदत्तें ससनेह ॥ जि० ॥ ॥ मोहन गारी रे निरखी मानिनी रे, मनमाहे मोह्यो अत्यंत ॥ जनकने नांखे रे परणावो मुने रे, जिनमती एह एकांत ॥ जि ॥७॥ प्रियमित्र बोले रे ए जिनदत्तने रे, दीधी थम्हें सुणो सत ॥ माटें कयु हवे ए शा काम नु रे, सुणि तेद क्षेप धरंत ॥ जि०॥ ए ॥ उष्ट रीसाणो रे जिनदत्त ऊपरें रे, विषय ए अनरथ मूल ॥ विपय विलुका रे जगमाहे मानवी रे, गति मति मिले सवि धूल ॥ जि० ॥ १० ॥ एक कनक रे दूजी कामिनी रे, दोय घाटी विकराल ॥ वदु लेवाणा रे एदमाहे बापडा रे, तस नदि सार मनाल ॥ जि० ॥ ११ ॥ थारक बल ताके श्रदोनिशे रे, जिनदत्त दणवाने काज ॥ मनमांहि चिते रे ए मारे थके रे, सही मुफ सरशे . ३५२ जैनकथा रत्नकोप नाग बाग्मो. मल ॥ ७ ॥ मत ए मीलण ३० लिरिकयं १ विनजण कार ३३ उपसण, ३४ बाणी ३५ कप्पड २६ दालि ३७ पप्पर २० बरी ३॥ विस्तारण नासप ध ॥ थक्कदं ४१ विकह ५२ सरधरणं " तेरितसगवण, ४ थग्गीसेवण ४५ रंधण ४६ परिवण ४३ निस्सी हियानजण ४७ ॥ ७ ॥ उत्तधए वादाण ५० सम ५१ चामर ५५ मणे रोगत ५३ मनिंगण, ५४ सञ्चित्ताण ५५ मचायचायमजिए ५६ विहीर नोथजली ५७ ॥ साडेगत्तरसगनग ५७ मउड, ५ए मोलि १० सिरे सेदरं ६१ गुमा ६२ जिद १३ गिीथारमण ६५ जोदार ६५ र किय ६६ ॥ ए॥ रिकारं ६७ धरण ६७ रण ६ए विवरणवालाण . पहनडिथ ७१, पाक ७२ पायपसारण ७३ पुडपुडी ७४ पंक ७५ र ६ मेगुण स॥ जूध ७ जेमण पए जुड़ 50 विक १ वणिज सिहं ०३ जले मङ्गण, ७४ एमाई थमवङ कल मुख वक्ते जिणदालए ॥१०॥ इति चतुरशीति थाशातनाविचार ॥१०॥ पूर्वढाल ॥ जाणो ए थाशय माहरो, दक्ष तमे गुणवता॥चारित्र ले। ए नर नव, तु करणं फलवता ॥ जिनमुख ममन चातुरी, नाव लही पूलघु एद ॥ नहिं लवलेशथी माहरे, एह उपर काइ नेद ॥ १३ ॥ कीजें ए केम जिनमदिर, नारिकथा मुणो नाइ ॥ एम कदीने रह्यो जिनदत्त, जिनमुख दृष्टि लगा ॥ जिनदत्त कुमर निदालता, थयो मनमां थनुराग ॥ शुन थाकार ए जो वरु, तो मदारु वड जाग्य ॥१॥ जाण्यं सखीजन स्वामिनी, जिनदत्त उपरें मोही। मेल मले किम वातनो, कुवर ए निर्मोही॥जिनमती पण घरे थावी रे, पितरने कहे सखी वात ॥ ते निमुणी मन रीक्रिया, थरु सुखिणी सवि धात ॥१५॥ जिनदत्त पण घरे थावीयो, करे वारू व्यवहार ॥ न्याय मारग नवि लोपे ए, पाजे थखम थाचार ॥ खम ब ए चोवीशमी, ढाल कही मनरागें ॥ राम कहे दवे एदनी, वात मुणो नवि थागें ॥ १६ ॥ सर्वगाथा ॥११॥४४॥ ॥ दोदा सोरठी॥ ॥ प्रिय मित्र सारथ वाद, गयो जिनदासने मविरें ॥ मेलणने विवाह, हर्ष धरी हेजालु ॥ १ ॥ तेढ्ने दीधो ताम, जिनदासें यावर पणो ॥ पर्नु कहो कुण काम, पाचवाया थम थांगणे ॥ २॥ ते कहे कन्यादान, देवाने द्यावीयो ॥ तुम सुत सुगुणनिधान, यम मना घणु नावि .

श्री शातिनाथनो रास खंम छो. ३५५ ॥ जि० ॥ २७ ॥ एहवा पुरुपरयणने मारतां रे,केम वहे नीचना हाथ ॥ केम एहवी गुणवतने आपदा रे, शे दीधी जगनाथ ॥ जि० ॥ २७ ॥ चोक महेल गोंखे रही मानिनी रे, जोवे जिनदत्तरूप ॥ गति एहनी नारी नी शी हो रे, थयु ए यकाज विरूप ॥ जि० ॥ श्ए ॥ याम्यो प्रिय मित्र सारथवाहने रे, मदिर हेर्नु रे तास ॥ सुणी कोलाहल थावी गो खमा रे, जिनमती मुदती उन्नास ॥ जि० ॥ ३० ॥ दीठो रे जेहवे ते जिनदत्तने रे, रुदन करे तेणि वार ॥ हा मुफ वालेसर जिनदत्तने रे, कां रूतो किरतार ॥ जि० ॥ ३१ ॥ हैयहूं जरा रे थाव्यु हेजयी रे, नयण वहे जलधार ॥ शोकपयोनिधि वेल वधी घणु रे, यहो अहो मोह प्रकार ॥ जि० ॥ ३२ ॥ कां मुफ उपरें देवज कोपीयो रे,जे मुफ जीवन प्राण ॥ ए जिनदत्तने जो तें एम कस्यु रे, हवे जीव्यु थप्रमाण ॥ जि० ॥ ३३ ॥ एम विलपती दीनी ते सती रे, मन चिते जिनदत्त ॥ पार नहीं कांड ए दनी प्रीतिनो रे, मुफ कपर एक चित्त ॥ जि० ॥ ३४ ॥ मुफ 5 ख देखी रे 5खणी ए घणु रे,थदो ए नेह यह ॥ जो मुफ यावे रे 5 खनो ठे दलो रे, तो करु एहथी सनेह ॥ जि० ॥ ३५ ॥ नहिंतर मुफने सागारी हनो रे, थणसण परनव सार ॥ एम चितवता रे बाण्यो तेहने रे, वध स्थानक तेणी वार ॥ जि० ॥ ३६ ॥ प्रियमित्र सारथवाहनी पुत्रिका रे, जर ग्रहे चैत्यमकार । जइ जिनवर बागल प्रणमी करी रे, करे एम म न विचार ॥ जि० ॥ ३ ॥ में मुफ वालेसर जिनदत्तनु रे, कष्ट टले निर्धार ॥ एह कानस्सग्ग तो पारेवो सही रे,रही उनी तिण तार ॥ जिप ॥ ३७॥ चित्त चिती शासनदेवता रे, करजो मुमने सहाय ॥ जो बु साची दु जिनशासने रे, तो मुफ राखजो लाज ॥ जि० ॥ ३५ ॥ तुष्ट थइ तस शीलप्रनावथी रे, शासनदेवी ते वार । थावे तिहा शूली नाजी पड़ी रे, तृणपरें तेणें त्रण वार ॥ जि० ॥ ४० ॥ तरु वांध्यो त्रूटी तव दोरि का रे, करे तव खड्गप्रहार ॥ कुसुमतणी माला जेम ते थयो रे, सवलो शील थाधार ॥ जि ॥ १ ॥ जथारक्षक नरें नृप विनव्यो रे, जयवि स्मय मन धारि॥ थाल्यो तिहा दोडी उतावलो रे, जय जय तु गुणधार ॥ जि० ॥ ४२ ॥ गज वेसारी थाल्यो शहरमा रे,सद्ध कहे जयजयकार ।। नरपति पूतये धुरहूती कह्यो रे, वसुदत्तनो थधिकार ॥ जि० ॥ ४३ ॥ न कोटवाल ॥ कुमल ३५४ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. रे काज ॥ जि० ॥ १२ ॥ एम निष्कारण जगमांहे पापीया रे, बांधे हो कर्मनो राशि ॥ सरल स्वनावी रे जिनदत्तने मने रे, वरते हो नाव मात ॥ जि० ॥१३॥ एक दिवस नृप रहवाडी चढयो रे, गयो ज्यान मार । वसतां विचाले रे कुंमल काननु रे, पडीयु रे कोशक तार ॥ जि० ॥१०॥ घरे थावीने रे राये जाणीयुं रे, कीधो हुकम जोवारे तुरत ते चालीयो रे, वसुदत्त थ जमाल ॥ जि० ॥१५॥ कर्म संवो में रे कोश्क कारणे रे, तिण वाटें जिनदत्त ॥ थागल चाल्यो रे बाहिर तिण समे रे, जो जो नावानिमित्त ॥ जि० ॥ १६ ॥ कुमल दातुं रे तेणें मारग पडघु रे, तजि मारग तेणी वार ॥ दूर थश्ने रे अलगो नीसमो रे, सामु न जोयं लगार ॥ जि० ॥ १७ ॥ यत ॥ श्रात्मवत्सर्वभूतानि, पर व्याणि लोष्ठवत् ॥ मातृवत्परदारांच, य पश्यति स पश्यति ॥१॥ य प रवादे० ॥ पूर्वढाल ॥ वमुदत्त थाव्यो रे फिरतो तिहां कने रे, पीयु छ मल देखि ॥ तुरत लेने नृपने सोंपीयु रे, नृप सह्यो वर्ष विशेष ॥ निक ॥ १७ ॥ नरपति पूछे रे किहां ए पामीयु रे, ते कहे जिनदत्त दान । जिनदत्त शाक रे परधन नवि दरे रे, एम बोले पुस्नाथ ॥ जि० ॥१५॥ कहे वसुदत्त ए सरिखो को नहिं रे, चोर श्रवर रे ससार ॥ धर्मी नाम धरावी धीरवे रे, पश्यतोदर ए धूतार ॥ जि० ॥ २० ॥ नाम न लीजें रे साहेब एदनु रे, एदवो नीच न कोय ॥ उर्जन थाव्या रे वावने चाल वे रे, रूग्यो तृप सुणी सोय ॥ जि ॥ २१ ॥ वध थादेश को कोटवा लने रे, कानें काचा दो राय ॥ जो जो विषययकी विष निपन्यु रे, कीर्धा कर्म न जाय ॥ जि ॥ २२ ॥ क्रोधवशे वसुदतें बांधीयो रे, जिनदतने ततकाल ॥ पुरमा सद्गु कोय हा दा रव करे रे, ए / थयु रे यकाल ॥ जि० ॥ २३ ॥ जिनदत्त जेदवो धर्मी को नहिं रे, न करे एम अन्याय ॥ पण उर्जन वसुदत्त भनेरीयो रे, शान विद्वो ए राय ॥ जि० ॥ १४ ॥ कहेण न माने रे राजा कोनु रे,वसुदत्त रोप थपार ॥ रक्तचदनें जेपी तनु तेदनु रे, कस्यो कणवीर सिगार ॥ जि० ॥ २५ ॥ रासन सपरें ते पा वीयो रे, ले चाल्यो वसुदत्त ॥ जु जिनदत्त अवस्था शी सही रे, कर्मठ दय वलवत ॥ जि ॥२६॥ विरस वजाडे रे मिमिम धागो रे, परे बहु वासे हो मार ॥ ॥ नागर जन परिजन रोवे घए रे, एका किरतार श्री शांतिनायनो रास खंम हो. ३५७ रतां होय पहेलो, नाखे त्रिजुवननाण जी ॥ म ॥३॥ इत्वर नाटी देश वश कीथी, किणदिक गणिका नारी जी ॥ स्वल्पकाल साधारण बु, गमनें वीजो अतिचार जी ॥म ॥ ४ ॥ अनग तणी क्रीडा नवि करवी, पर नारी सघात जी॥ अधरदशन कुचमर्दन चुवन, तजी थालिगन वात जी ॥ म ॥ ५ ॥ परनारीनां थग मनोहर, नवि निरखे सविकार जी। शीलवत श्रावकने नांव्यु, एम कहे जगदाधार जी ॥ म०॥ ६ ॥ यत ॥ पड बन्नग वसणेय, गोमुत्त ग्गहण कुसुमिणे चेव ॥ जयणा सबध करे, इविय थवलोयणे थ तदा ॥१॥ पूर्वढाल ॥ ढाक्यां श्रग नारीनां जोतां, उलटे राग अताग जी ॥ फरसे तेम वली वाधे वमणो, वरजे तेह महा जाग जी ॥ म० ॥ ४ ॥ नजरें यावे रूप कदाचित्, न धरे राग ने क्षेप जो ॥ गोमूत्रादिक ग्रहता न करे, मर्दन योनिविशेष जी ॥ म०॥ ॥ शयन करता पहेलु चिते, शल्य विपोपम काम जी ॥ खिणमित्त सुख बडु काल लगें 5 ख, मन चितवीय याम जी ॥ म ॥ ए ॥ एम नावन वे राग्य सूता, कुसुमिण नावे रात जी ॥ मोह उदयथी कदाचित् थावे, तो निमुणो तस वात जी ॥ म ॥ १० ॥ कती इरियावही पडिक्कमी, निद तजी ततकाल जी ॥ कास्सग्ग कीजे चत लोगस्सनो, जावें यजमा ल जी ॥ म ॥ ११ ॥ इश्यि अवलोकननी जयणा, दृष्टिनिवर्तन रूप जी॥ यमुक्त ॥ गुद्योरुवयणकरको,रु यतरे तद थपतरे दिहुँ ॥सा हरश्ता दिहिं, नय वध विहिए विहिं ॥ ५ ॥ पूर्वढाल ॥ थनगकीड उपर ए वि स्तर, नाखे श्रीजिननूप जी ॥ म ॥ १२ ॥ अथवा निजनारी थातुर, नावविपय यसमान जी ॥ चोराशी थासन थासेवन, न करे प्रक्षावान जी ॥ म ॥ १३ ॥ पुरुप नपुसक सेवन तिम वली, दस्तकर्म परिदार जी ॥ काट चर्म फल माटी घटित जे, कामोपगरण धार जी ॥ म० ॥ ॥ १४ ॥ एहथकी जे कीडा करवी,ते पण त्रीजो जाण जी ॥ हवे विवा इतणो कट्ठ चोयो, ते निसुणो गुणखाण जी ॥म० ॥ १५ ॥ कन्या फल लिप्सायें परना, वालकनो विवाह जी ॥ निजदारा सतोपी न करे, मुणो तस मर्म उत्साह जी ॥ म० ॥ १६ ॥ निज द्वारा सतोपी निज विण, न धरे थवर विचार जी ॥ परदारा वर्जी निज वेश्या, विषु नही विषयविकार जी॥म० ॥ १७ ॥ श्रवरथी मनवचकायें न करु, न क ३५६ जेनकथा रनकोप नाग आग्मो. रपति कोप्यो वसुदन उपर रे, मूकाव्यो जिनदत्त ॥ सकन जिनकालन याराधतां रे, सहु उपरे सम चिन ॥ जि० ॥ ४४ ॥ जिनरत्तनी परशंसा बहु वधी रे,धन्य धन्य ए जिनधर्म ॥ राजदुकमथी मदिर बावियो रे, तनु साजन लह्या शर्म ॥ जि० ॥ ४५ ॥ वात सुणीने कायस्सम्ग पारियो रे, जिनमती दर्प न माय ॥ धन्य जिनशासननी रखवालिका रे, शासनदेसी तु माय ॥ जि० ॥ ४६॥ वात सुणी प्रिय मित्रना मुखपकी रे, हरलो मनमाहि तेह ॥ परणी गुन मुहूरत सा सुदरी रे, वाध्यो सपल समेह ॥ जि० ॥ ४ ॥ नोग्य विषयसुख नोगवीया घणा रे, जिनमती मन रंग ॥ एक दिवस मुनि मुस्थितनी कने रे, ल्ये सयम मन उबरंग ॥ जि. ॥ ७ ॥ चारित्र चोखु पाली चित्त चोखे वन्हे रे, थया मुरवर सुरलोक ॥ शांतिप्रनु त्रीजा व्रत उपरें रे, कह्यो उपनय गतशोक ॥ जि० ॥ ४ ॥ के खमें रे ढाल पचवीशमी रे, रामविजय कही सार ॥ परधन परनारी थी वेगला रे, तेदना धन्य थवतार ॥ जि० ॥ ५० ॥ इति परश्यापहार विरमणे तृतीयजिनदत्तकयानक ॥३॥ सर्वगाथा ॥४॥ श्लो ॥७॥ ॥थथ चतुर्थ मेथुनविरमणव्रत सघध ॥ ॥ दोहा॥ ॥ शांतिनाथ जिनवर कहे, सुण चक्रायुध नूप ॥ थालत असर पर हरी, हवे श्रब्रह्म सरूप ॥ १ ॥ स्थूल सूक्ष्म ने का, मैथुन दोय प्र कार ॥ सूक्ष्म पित् कामथी, इश्यिजनित विकार ॥॥ोदारिक वेकि य तथा, स्त्रीसाथै सनोग ॥ स्थूल कह्यो ते जिनवरें, मन वच काया योग ॥३॥ मैथुन विरमणरूप ते, ब्रह्मचर्य दोय नेव ॥ सर्वदेशथी बागमें, नारख्युं प्रज्नु गतवेद ॥ ४ ॥ सर्वनारी परिदार जे, सर्वथकी ते ब्रह्म ॥श्त रदेशथी जाणीयें, ए सागारी धर्म ॥ ५ ॥ ॥ ढाल बधीशमी॥ ॥ थादर जीव क्षमागुण थावर ॥ ए देशी ॥ शांतिप्रनु जिनराज पय पे, ए व्रत निरतिचार जी ॥ पाजता शिवपद पामीजें; सुणो दवे तास वि चार जी ॥ १ ॥ म कर विषयविष थाश ए विरुश्, कहे थचिरानो नव जी॥ कर जोडी वर्षद सवि नावें, निमुणे धरि थानद जी ॥ म० ॥५॥ थपरगृहीता विधवा कन्या, दिक पर नहीं एम जाण जी ॥ तास गमन क . , . श्री शांतिनाथनो रास खंम छो. ३५० रता होय पहेलो, नाखे त्रिभुवननाण जी॥ म० ॥३॥ त्वर नाटी दे वश कीधी, किणहिक गणिका नारी जी ॥ स्वल्पकाल साधारण बु,गमनें वीजो अतिचार जी ॥म० ॥४॥ अनग तणी क्रीडा नवि करवी, पर नारी सघात जी ॥ श्रधरदशन कुचमर्दन चुवन, तजी थालिंगन वात जी ॥ म ॥ ५ ॥ परनारीनां थग मनोहर, नवि निरखे सविकार जी॥ शीलवत श्रावकने जांरख्यु, एम कहे जगदाधार जी ॥म०॥ ६ ॥ यत ॥ पह बन्नग सणेथ, गोमुत्त ग्गहण कुसुमिणे चेव ॥ जयणा सवछ करे, इविध अवलोयणे अ तहा ॥१॥ पूर्वढाल ॥ ढाक्यां श्रग नारीनां जोतां, उलटे राग थताग जी ॥ फरसे तेम वली वाधे बमणो, वरजे तेह महा नाग जी ॥म० ॥ ॥ नजरे आवे रूप कदाचित्, न धरे राग ने क्षेप ज। ॥ गोमूत्रादिक ग्रहता न करे, मर्दन योनिविशेष जी ॥ म ॥ ७ ॥ शयन करता पहेलु चिते, शल्य विपोपम काम जी ॥ खिणमित्त सुख बहु काल लगे उख, मन चितवीयें थाम जी ॥ म ॥ ए ॥ एम नावन वै राग्य सूता, कुसुमिण नावे रात जी ॥ मोह उदयथी कदाचित् थावे, तो निमुणो तस वात जी ॥ म० ॥ १० ॥ कती इरियावही पडिक्कमी, निद तजी ततकाल जी ॥ काउस्सग्ग कीजें चर लोगस्तनो, जावें थइ उजमा सनी ॥ म ॥ ११ ॥ इघिय थवलोकननी जयणा, दृष्टिनिवर्तन रूप नी ॥ यजक्त ॥ गुयोरुवयणकरको,रु थतरे तह थपतरे दिहु ॥सा हरत विहिं, नय वध विहिए दिहिं ॥ २॥ पूर्वढाल ॥ थनगकीड वपर ए वि स्तर, नाखे श्रीजिननूप जी ॥ म ॥ १२ ॥ अथवा निजनारी थातुर, नावविपय यसमान जी ॥ चोराशी थासन यासेवन, न करे दावान जी ॥ म० ॥ १३ ॥ पुरुष नपुसक सेवन तिम वली, हस्तकर्म परिहार जी ॥ काट चर्म फल माटी घटित जे, कामोपगरण धार जी ॥म० ॥ ॥ १४ ॥ एहथकी जे क्रीडा करवी,ते पण त्रीजो जाण जी॥ हवे विवा इतणो कहूँ चोथो, ते निमुणो गुणखाण जी ॥ म० ॥ १५ ॥ , कन्या फल लिप्सायें परना, वालकनो विवाह जी ॥ निजदारा सतोपी न करे, मुणो तस मर्म नत्साह जी ॥ म० ॥ १६ ॥ निज वारा सतोपी निज विण, न धरे थवर विचार जी ॥ परदारा वर्जी निज वेश्या, विषु नही विपयविकार जी ॥ म ॥ १७ ॥थवरथी मनवचकायें न करु, न क .

३५ जैनकथा रनकोप नाग बाग्मो. रावु ए प्रसग जी ॥ जो जोडे विवाह ते परना, मैमुन कारण * जी ॥म० ॥ १७ ॥ हु विवाद कारक नही मेथुन, कारक एवं भार जी ॥ नत सापेक्ष थनग विचारी, नगानग विनाव जी ॥ म.॥१॥ निज थपत्य उछादनी चिता, पण न करे मुश्राम जी । जो चिता कारक होवे को, ते जग विरला लाध जी ॥ म० ॥ २०॥ यथवा सह निव नारी दंते, परणे वीजी जेह जी ॥ परविवाह करे ते थोपो, अतिचार सुणो नेह जी ॥ म० ॥ २१ ॥ तीवकाम उपर नवि कीज, बध्यवसाय थत्यत जी ॥ मुखकदोपस्थादि न सेवे, चिरकाल एक चित्त जी॥ म ॥ २२ ॥ केशाकर्पण दत नखदत, करिन नगाडे काम जी ॥ कामकृति कारी गुटिकादिक, केरु नलीये नाम जी ॥ म० ॥ २३ ॥ वेदोदय यसहि प्पुपणाथी, निजनारी यागार जी ॥ मैथुनमात्रे वेदोपशमन, नहि अवर विस्तार जी ॥ म ॥ २४ ॥ थपिक कुचेटाथी गुण न दुवे, साहमु बल क्ष्य थाय जी॥परदारा वर्जी पच वरजे,थवरने त्रय कहाय जी म॥२५ ॥ उक्त च ॥ परदारवङियो प,च दुति तिनिउ सदार सतुठे॥छी तिन्नि पचव, नगविगप्पे हि नायबा ॥ ३ ॥ वदारसतोपिए स्तुत्रय एवा त्या ॥ थायौ तु जगावेवेति ॥ पूर्वढाल ॥ एम नारीने पण वर्जेवा,थतिचार उन्मा द जी ॥ परपुरुप निजपति ब्रह्मचारी, थनिसरता होय थाद जी ॥ म० ॥ २६ ॥ परिगृहीत वारक दिन शोक्ये, निज पियुगु तेण दास जी॥ शो क्य तो वारक लोपते, वीजो होय जगीश जी ॥म ॥ २७ ॥ एम पचे जाणेवा जुगतें, नारीने अतिचार जी ॥ निजदारा सतोपीने पण, पंच ने थवर प्रकार जी ॥ म ॥ २७ ॥ पोते नाटक दे ग्रहीने, गणि का सही निजनारी जी ॥ गमन करतां बीजो होवे, तेदने पण अतिचार जी ॥ म ॥ ए ॥ थनानोग थतिकम थादिकथी, पहेलो पण को वार जी ॥ त्रण पूर्व दाख्या में तेदिज, एम कह्या पंच यतिचार जी ॥म ॥ ३० ॥तया च सूत्र ॥ सदार सतोसिस्स इमे पंच अश्यारा जा पियवा न समायरियवेति ॥ एतद्रतफलमाद॥ पूर्वढाल ॥ कनक चैत्य निप जावे कोश, थापे कनकनी कोडी जी ॥ तेनु पण फल शीलवतनी, न करे जगमा दोड जी ॥ म० ॥ ३१ ॥ यत ॥ जो देशकणय कोडी, थदवा कारे कणयजिण नुवण ॥ तस्स न तत्तिय पुस, जसिथ बनाए भा श्री शातिनाथनो रास खंम को. ३५ए धरिए ॥ ४॥ परसमयेपि ॥ एकराज्युपितस्यापि, या गतिब्रह्मचारिण ॥ न सा ऋतुसहस्त्रेण, वक्तु शक्या युधिष्ठिर ॥ ५ ॥ एकतश्चतुरोवेदा, ब्रह्मच तु एकत ॥ एकत सर्वपापानि, मयं मांस तु एकत ॥ ६ ॥ पूर्वढाल चिन्नेश्यि दो नाग नगदर, कुरूव नपुसक रमजी ॥ वध्या निदू विपकन्या तिम, होये कुशीत जगनम जी ॥ म ॥ ३२ ॥ देवव्यने नक्षण कर वे, परनारीने पापे जी ॥ सात वार सत्तमीयें पहोंचे, एम कहे जिनवर थाप जी ॥ म० ॥ ३३ ॥ परेप्पाहु ॥ तस्माधर्मार्थिनिस्त्याज्य, परदारो पसेवनम् ॥ नयति परदारस्तु नरकानेकविशतिं ॥७॥ पूर्वढाल ॥ निजदारा सतोपीने पण, पर्वदिवस मुविशेप जी ॥ विपय तणो परिहार करेवो, पर मतमां पण देख जी ॥ म ॥ ३५ ॥ यउक्त ॥ विमुपुराणे ॥ चतुर्दश्य एमी चेवा, मावास्या चेव पूर्णिमा ॥ पर्वाण्येतानि राजे,रविसकातिरेव च ॥ ७ ॥ तैलस्त्रीमाससजोगी, पर्वस्वेतेपु वै पुमान् ॥ विएमूत्रनोजन नाम, प्रयाति नरक मृत ॥ ए ॥ पूर्वढाल ॥ वत्रीस उपम कही ए व्रत नी, साजल तस थधिकार जी ॥ नवियण दशमा थंग ममार, चोये सवर हार जी ॥ म० ॥ ३५ ॥ ठहे खमें ढाल उद्वीशमी, चोथा व्रत थधिकार जी ॥ राम कहे ए व्रत पालता, होवे जयजयकार जी ॥ म० ॥ ३६ ॥ ॥ ढाल ॥ सारो सोरत देश देखाउ रसीया॥ ए देशी ॥ शीलवत मुगुण मोरे मन वसीया ॥ वत्रीश कपम गुणयुत धारी, नाम जपे रे जाये पाप नसीया रे ॥ शील ॥१॥ मुकुट ने दौम वसन फूल थश्चन्न, चदनमा गोसीस रसिया रे ॥ शी० ॥ २ ॥ चर लवण रयणायर रूडो, मणि वैमूर्य ननसीयां रे ॥ शी॥३॥थोपधिय करी हेमगिरि महोटो, सिधुमा सी तोदा सिरिया रे ॥ शी० ॥ ४ ॥ दशमे सयनू रमण जलनिधिमा, वर्नुल नगमा रुचक गिरिया रे ॥ शी० ॥ ५ ॥ गजमाहि ऐरावत हरि मृगमा, थसुरमा वेणुदेव वरिया रे ॥ शी० ॥ ६ ॥ पनरमी उपम सुवनपतिमां, धरणीधर जेम गुण नरिया रे ॥ शी०॥ ४ ॥ सद् सदमाहे जेम सौधर्मी, ब्रह्म सुर लोकमा सुख करियां रे ॥ शी० ॥ ७॥ स्थिति महोटी सवस नम सुरनी, दानमा दान थनय गरीयां रे ॥ शी० ॥ ए॥ वीशमी उपम रंगमाहि किर्मजी, कवही न जाये उतरीयां रे ॥ शी० ॥ १० ॥ वज इ पजनाराच सघयणे, सहाणमादि समचठरसीया रे ॥ शी० ॥ ११ ॥ - ३५७ जैनकथा रत्नकोप जाग आठमो. रावु ए प्रसग जी ॥ जो जोहे विवाह ते परना, मेथुन कारण न जी ॥म० ॥ १७ ॥ दु विवाह कारक नही मेथुन, कारक एवं नार जी ॥ नत सापेक्ष थनग विचारी, नगानग विनाव जी॥ म॥१९॥ निज थपत्य उछाहनी चिता, पण न करे सुश्रा जी ॥ जो चिता कारक होवे को, ते जग विरला लाध जी ॥ म० ॥ २०॥ अथवा सक निव नारी दुते, परणे वीजी जेह जी ॥ परविवाह करे ते चोथो, यतिवार सुणो नेद जी ॥ म ॥ २१ ॥ तीवकाम उपर नवि कीजे, अभ्यवसाय थत्यत जी ॥ मुखकछोपस्थादि न सेवे, चिरकाल एक चित्त जी॥ म०॥ ॥ २२ ॥ केशाकपेण दत नखरत, करि न जगाडे काम जी ॥ कामति कारी गुटिकादिक, केरु नलीये नाम जी ॥ म० ॥ २३ ॥ वेदोदय यसदि प्णुपणाथी, निजनारी थागार जी ॥ मैथुनमात्रे वेदोपशमन, नहि अवर विस्तार जी ॥ म० ॥ २४ ॥ थधिक कुचेटाथी गुण न दुवे, साहमु मल क्ष्य थाय जी॥परदारा वर्जी पच वरजे,यवरने त्रय कहाय जी म॥२५ ॥ उक्त च ॥ परदारवङियो प,च दुति तिन्नित सदार सतु॥ठी तिन्नि पंचव, जगविगप्पेहि नायवा ॥ ३ ॥ सदारसतोपिण स्तुत्रय एवा त्या ॥ वाद्यो तु नगावेवेति ॥ पूर्वढाल ॥ एम नारीने पण वर्जेवा,यतिचार उन्मा द जी ॥ परपुरुप निजपति ब्रह्मचारी, थनिसरता होय थाद जी ॥ मा ॥ २६ ॥ परिगृहीत वारक दिन शोक्य, निज पियुन तेण दीस जी॥ शो क्य तणो वारक लोपंते, वीजो दोय जगीश जी ॥म ॥ १७ ॥ एम पचे जाणेवा जुगतें, नारीने अतिचार जी ॥ निजदारा सतोपीने पण, पंच ने थवर प्रकार जी ॥ म ॥ २७ ॥ पोते नाटक वे ग्रहीने, गणि का लही निजनारी जी ॥ गमन करतां बीजो होवे, तेदने पण अतिचार जी ॥ म ॥ २५ ॥ श्रनाजोग थतिकम थादिकथी, पहेलो पण को वार जी ॥ त्रण पूर्वं वाख्या के तेहिज, एम कह्या पंच अतिचार जी ॥म ॥ ३० ॥तथा च सूत्र ॥ सदार सतोसिस्स इमे पंच यश्यारा जा पियवा न समायरियवेति ॥ एतद्तफलमाद॥ पूर्वढाल ॥ कनक चैत्य निप जावे कोश, थापे कनकनी कोही जी ॥ तेदनु पण फल शीलवतनी, न करे जगमा होड जी ॥ म ॥ ३१ ॥ यत ॥ जो देश कणय कोडी, थदवा कारे करायजिण वण ॥ तस्स न तत्तिम पुर्ण, जनिय बनधए .

श्री शांतिनाथनो रास खंम हो. मनसे रे लो ॥ सु० ॥ न० ॥ तेहने पुरोहित साथे, प्रीति अछे घणी रे लो ॥ क० ॥ न० ॥ रात दिवस रहे नेला, होश हैया तणी रे लो ॥१० ॥३॥ न ॥ ते व्यवहारी घरे, नारी सारी थडे रे लो ॥ क० ॥ ज० ॥ रूपवती गुणवती, पति मनमा रुचे रे लो ॥ सु० ॥ ज० ॥ नामें ते प्रद्यु म्न, सिरी रति सारसी रे लोकन ॥ देखी ते पुरोहितना,मनमाहे वसी रे लो ॥ सु० ॥ ४ ॥ ज० ॥ थयो विपया थनितापी, नारखी लाज ने रे लो ॥ क० ॥ ज० ॥ रात दिवस ते दोडे,नरवर काजने रे लो ॥ सुप ॥ना एक दिवस ते उपर,नृपरीज्यो अति रे लो ॥ क० ॥ ॥ मागो मनोवांनित कहे, हप॑ नूपति रे लो ॥ सु० ॥ ५ ॥ न ॥ विपयानो उमाह्यो, वाह्यो ते धसी रे लो ॥ का ॥ राजन् मनोवांनित वर थापो, श्वा ने इसी रे लो ॥ सु० ॥ राजन पुरमा मन मानीती, नारीशु रमु रे लो॥ क० ॥ राजन् मन मान्या सुखमांहि, काल दुनिर्गमुं रे लो ॥ १०॥ ६ ॥ ग ॥ मन शरमाणो वोलें, वधाणो कहे रे लो॥ क॥ सानत वात पुरोहित तुफ, साथे दिल जे वहे रे लो। मु० ॥ कहे नृप ते साथें तुफ रमवु, श्रवर न इचवी रे लो॥ क० ॥ धरजे वात पुरोहित एह, कही जे प्रीछवी रेलो ॥ सु० ॥ ७ ॥ कदे नृप एहथी जो विपरीत तु;चालीश एकदा रे लो॥ क० ॥ कहे नृप करच्छ तुक शिर दम, अन्यायी परें तदा रे लो ॥ सु० ॥ मानी नृपनी वाणी निर्गल,ते पुरमा थयो रे लो ॥ क ॥ थागत कचो उट वली ते, उकरडे गयो रे जो ॥ मु० ॥ ७ ॥ नमतो पुरमा ते दिन रात के, माता साढ ज्यु रे लो॥ क ॥ करतो परनारीशु केलि, कुलागत सवि तज्यु रे लो ॥ सु० ॥ एकदिन मोह्यो ते पुष्पदेवनी, नारी ऊपरें लो ॥ क० ॥ रागें थध थयो ते चिते, चित्तने थतरें रेलो ॥ मु॥ ए॥ केम ए नारी सारी प्यारी, महारे वश थशे रे लोक ॥ देखी एदना मुखनु फूल के, मुज दिल उनसे रे लो ॥ सु० ॥ न० ॥ एम चिती तस खासी, दासी मली रे लो ॥ क॥ दाखी तेहनी धागल सघती, वात ए मन रली रे लो ।। सु० ॥ १० ॥ नई तेम कर जेम तुम स्वामिनी, मुझने थादरे रे लो । कम् ॥ मुफने क्षण क्षण तस दीदार, हियामा सानरे रे लो ॥ सु० ॥ मानिश तादरो पाड निरतर, जीविश जिदा लगें रे लो ॥ क० ॥ करजे ३६० जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. ध्यानमा ध्यान शुक्ल मन मान्यं, ज्ञानमां केवल धारतीयां रे ॥सी.. ॥ १२ ॥ पचवीशमी उपम क्षेश्यामा, शुकलपी कर्म कठिन सतियां रे ॥ शी० ॥ १३ ॥ मुनिमा जेम तीर्थकर स्वामी, सुर नर थावी नमे पती या रे ॥ शी० ॥ १३ ॥ देव विदेह ज्पु क्षेत्रमें महोटु, मेरु महिपरमा लसीया रे ॥ शी० ॥ १५ ॥ वनमाहि नदनवन जेम महोटु, तरुमा अंबू उकसिया रे ॥ शी० ॥ १६ ॥ जेम हय गज नर सैन्यमा महोटो, जग कीश्वर गुन वसिया रे ॥ शी०॥ १० ॥ जेम रथमा हरिनो रथ महोटो, तेम व्रतमाहि शील कसिया रे ॥ शी० ॥ १७॥ वत्रीश उपम चोपाव तनी, जाणी पालो व्रत धसमसीया रे ॥ शी० ॥ १ ॥१००० ॥ ५७ ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ ए व्रत उष्कर पालता, पहोचे सयल जगीश ॥ परदारा लपट तिके, दुख पामे निशदीस ॥१॥ यत ॥ मेरू गरिको जह पदयाण, एराव्रणो सार वलो गयाण ॥ सिहो वलिको जद सावयाण, तहेव शील पवरं वयाण ॥ १॥ थन्यञ्चोक्त ॥ नपुसकत्व तिर्यक्त्व, दो ग्यं च नवे नवे ॥ नवेन्न राणा स्त्रीणाचा, न्यकातासक्तचेतसाम् ॥ ५ ॥ पूर्वदोहा ॥ परनारीलोलुप यके, करालपिग 5ख दी ॥ कहे चक्रायुध स्वामीने, कवण दुत कहो २७ ॥३॥ प्रातु सवध कहे तेहनो, करालपिग जस नाम ॥ पर्षद स्थिर चित्त सानले, फरीय प्रजुने प्रणाम ॥ ४ ॥ ॥ ढाल सत्त्यावीशमी॥ ॥ देशी रसियानी ॥ कुथु जिणेसर केंसर जीनी वेदही रे लो॥ ए देशी ॥ नवियण, विषय न सेवो विरुध खदायी घणु रे लो॥ कहे जिनशांतिनी रे जोन०॥ क्षेत्र नरतमा नलपुर पुर सोदामणु रे लो ॥ सुणो मन खाते जा रे लो ॥ न०॥ तिहां नलपुत्र नरेश्वर राज्य करे गुपी रे लो॥क० ॥ ॥ न ॥ उज्वल जेदनी कीर्ति चिद् विशिमा मुणी रे लो॥मुणो मन ॥ १॥ न० ॥ तेदने पापाजीष्ट पुरोहित ने नलो रे लो ॥ क० ॥०॥ नाम करालथी पिंग यळे तस निर्मलो रे लो ॥ सु०॥ ज० ॥ शांति कर म मांदे माह्यो यति रलियामणो रे लोक ॥॥ रायतणे मन मान्यो लोक नमे घणो रे जो ॥१०॥५॥०॥ तिय पुरमा एक न्यतनय वासो वसे रे लो ॥क० ॥ ॥ नामें ते पुष्पदेव पने-करी श्री शातिनाथनो रास खंमग्छो ३६३ तुम आदेश प्रमाण, जइ लावु अमें रे लो ॥ सु० ॥ ज० ॥ घेर थावी एक जूमि, गृह सत्वर कखो रे लो ॥ क ॥ ज० ॥ ते उपर एक पत्र पल्यंक लेईधस्यो रे लो ॥सु॥२॥ न० ॥शीखवियु सेवकने, जव थावे रही रे लो ॥ क० ॥ ज० ॥ यत्रशय्या वेसारी,नाखेजो महि रे लो ॥ सुप ॥ न० ॥ ते ठानो मुफ पासें, पुरोहित लावजो रे लो ॥ क० ॥ ज० ॥ काम करीने जिदा दु,तिहा तुमें थावजो रे लो ॥१०॥१॥न॥ चालणने मिप जइते,वनमां कतस्यो रे लो ॥ क० ॥ ज० ॥ ततण तेह पुरोहित, दर्प हैये नखो रे लो ॥ सु० ॥ ज० ॥ पुष्पदेवने मदिर, ते थाव्यो वही रे लो ॥ क० ॥ न ॥ कूडतणी रचना तेणे, मूर्ख नवि लही रे लो। सु०॥ १२ ॥ न० ॥ पद्मसिरीयें यत्र, पल्यकें वेसारीयो रे लो ॥ का ॥ न ॥ ततण ते उठलीने, नोंय सिधावियो रे लो ॥ सु० ॥ ॥ नां ग्यु तेहनु थग, थयु सवि जाजरु रे तो ॥क ॥ ज० ॥ वकाणी सवि सधि ज्यु,जूनु खाजरु रे लो ॥ सु० ॥३॥ न ॥ वांधी मयूरने वघे,शेव ने थापीयो रे लो कान॥ उपाडी कठ पंजरमां, तस स्थापियो रे लो ॥ १० ॥ ज० ॥ चाव्या कोश देशांतर, खटमासी रह्या रे लो ॥ क० ॥ न ॥ काज करीने वलीया, नवि कोणे लह्या रे लो॥ मु ॥ २४ ॥ न ॥ निजपुर थावी मीणें, लेप कस्खो तनें रे लो ॥ कण् ॥ ज० ॥ चहो ज्यां पंचवरणनां, पिंब थति वने रे लो ॥ सु० ॥ ज० ॥ ज दरवारें नेट,कस्यो ते नूपने रे लो ॥ कण ॥ न० ॥ रीज्यो राजा जोर, देखी तस रूपने रे लो ॥ मु० ॥ २५ ॥ राजन वदुः ग्रहियां पण मारग, माहे मरी गया रे लो ॥ क० ॥रा ॥ श्राव्यो ए हां कणे एक ए, विज वगुदिन थया रे लो ॥ सु० ॥ राजन कहे ए पंखी माणस, सरिखो केम थठे रे लोक ॥रा कहे वोलावो एहने, मुज मनमा रुचे रे लो ॥ सु० ॥ २६ ॥ न ॥ जइ करमां ते प्राजन, थार दीये घणु रे लो ॥ क ॥ न० ॥ बोल तु पंखी नृप था,गल बगु गु नए रे लो ॥ सु० ॥ न ॥ ते कहे किंजम्पामी, तस वाणी सुगी रे लो ॥ क० ॥ राजन हिज उलखीयो जाखे, वजतु तेजणी रे लो ॥ मु० ॥ २४ ॥ रा० ॥ कहे पुष्पदेव ए मुझ, पुरोदित सारिसो रे लो॥ क. राजन दाथ तणे थारीसे, करककण किस्यो रेलो ॥ सु० ॥ राजन ॥

३६२ जैनकथा रनकोप नाग आठमो. मुफ उपर अनुकूल, मनावी उलगे रे लो ॥ सु० ॥ ११॥पामीर सर तेणी दासीय, वात सवे कही रे लो ॥ क० ॥ निसुणी शीलवती ए वात, निखर मानी नहीं रे लो॥ सु० ॥ रे रे धिक् मी एं बोली, बोल तु एदवा रे लो॥ क० ॥ नुमा पुरमाहे वह विटल, वसे ए जेडवा रे ॥ सु० ॥ १२ ॥ दूवे मुख एहवानु जोश, पापी थातमा रे लोक.. वहेनी चिरजीवो मुझ वालम, थवरनी नही तमा रे लो ॥ सु० ॥फरीने दासी कहे तुझ वात,न माने ए किमे रे लोक॥ कहेण न चाले हा मुफ, कांश करो तुमें जे गमे रे लो॥ सु० ॥ १३ ॥ पामी अवसर एक दिवस ते, थावीने कहे रे लो ॥क० ॥ वहेली करो करुणा मुफ पर, विरहें तन दहे रे लो ॥ सु०॥ कहेवा लागी ते एम न घटे, तुमने वोलवु रे लो ॥ क० ॥ जो जाणे तुम मित्र तो थाये,हा कां यनिनबु रेलो ॥ सु० ॥ १५ ॥ न० ॥ निसुणी वाणी पुरोहित, थयो मनमा खुशी रे लो ॥ क० ॥ ज० ॥ जाणी ते थनुकूल, कहे फरीने हसी रे लो। मु० ॥ न० ॥ कहे तेहने एम करवु, जेम तुम नाहलो रे लो ॥ क० ॥ सुवरि तो पुराये थापण,चिन उमादलो रेजो ॥ सु० ॥१५॥ न० ॥ कही एकातें तेणें निज, कतने वातडी रे लो॥क० ॥ ज० ॥ निमुणी मनमा सूधी,तस ईर्ष्या चढी रे लो सुगन॥॥ मन नाग्यु दिलमांहे, रीज रही नहिं रे लो॥ कण ॥॥ जगमाएह शिर,नूमी करणी सही रेलो ॥ सु० ॥ १६ ॥ ज० ॥ हवे तेरों कीधी नृप शिर,वेदन याकरी रे लोकमान॥ मत्रवने करे पासें,पुरोदित चाकरी रे जो ॥१॥न॥ कहे राजन पुरोहित, टालो वेदनी रे ॥ क० न०॥ करो उपकार ए मुफ तो, विलसु मेदिनी रे लो॥सु॥१॥॥ मत्रथकी तेणी वारे,वेदन ततक्षणे रे लो कान॥ तुष्ट थयो राजेश्वर, वर मागो नणे रे लो॥ १०॥ न ॥ विप्र कहे सुण राजन, माहरी विनति रे लो ॥ कण ॥ साहेब मुफने एह मगावी, बापो करु विनति रे लो ॥ सु०॥ १७ ॥ राजन ने किंजम्पछी, मुस्वर पंखीयां रे लो ॥ क ॥ रा० ॥ नामथकी किंजल्प, बडु में परखियां रे लो ॥ सु० ॥ रा० ॥ ए पुष्पदेवने मूको, जश्ने लावशे रे लो ॥ का ॥ रा० ॥ चोप करी करि कारज, वहेलो श्रावशे रेलो ॥ सु० ॥ १५ ॥ रा० ॥ कहे तेडी पुष्पदेवने, काज करो तुम्हें रे लोक ॥ रा॥

१ श्री शातिनाथनो रास खम छो. ३६५ पापाण एवज १७मणि ११मौक्तिका, १२प्रवाल १३शंख तिम गलि ॥ ए॥१५तिणि सागरु १६चदण वत्ती,१७वस्त्र पतन तेम १ एकाष्ठ ॥ २०चर्म २१दत श्वाल २३गप तिम, २५व्यौपध ए काठ ॥ १० ॥ स्थावर त्रिद नेदें कपु, नूमी घर तरु जाणि ॥ विपद दोय चकारवध, मा पुस तेम वखाण ॥ ११ ॥ चकारवधो गव्यादि ॥ मानुष्य दासादीति ॥ चोपद दश ने कह्या,गो महिपी तिम नट्ट॥अज एलग यास घासतरग, दय रासन ने करदृ ॥ १२ ॥ नानाविध उपगरणना,नेद अनेक विचार ॥ कुप्प कह्यो चोसहिमो,परिग्रह नेद उदार ॥१३॥ लोन अल्प जेम जेम हो ये, जेम जेम अल्पारन ॥ तेम तेम सुख वाधे घणु, धर्मसिद्धि प्रारन ॥ १३ ॥ नरजव सार थारोग्यता, धर्म एह सत्य सार ॥ सुख ए सतोप सार ठे, विद्यानिश्चय सार ॥ १५ ॥ यत ॥ ब्रह्मज्ञान विवेकनिर्मलधिय कुवैत्यदो पुष्कर, यन्मुचत्युपनोगनाज्यपि धनान्येकांततोनि स्टहा ॥ न प्रप्तानि पुरा न सप्रति न च प्राप्तौ दृढप्रत्ययो, वाबामात्रपरिग्रहाण्यपि वयं त्यक्त न तानि कमा ॥ १ ॥ पूर्वदोदा ॥ परियहथी विरम्या नहि, ते लहे 5 ख समुदाय ॥ श्रावक मुलस तणी परें, कहे एणी परें जिनराय ॥ १६ ॥ कहे चक्रायुध स्वामिने, सुलत कहो कुण तेह ॥ पंचम व्रत उपर प्रनु, परकाशो तुमें जेह ॥ १७ ॥ ॥ ढाल थम्चावीशमी ॥ ॥ नरत नृप नावचं ए ॥ ए देशी ॥ शांति जिणेसर एम कहे ए, मुण चक्रायुध राय॥परिग्रह 5 ख दीये ए॥ नयर श्रमरपुर नरतमा ए,सवि शो ना समुदाय ॥ परि० ॥१॥ श्रमरसेन तिहां राजीयो ए, शेठ रुपनद त्त सार ॥ ५० ॥ श्रावक समकित धारकू ए, जिनगुरु पूजणहार ॥ ५० ॥३॥ जिनदेवी तस जारजा ए, रूपें रंजसमान ॥ प० । मुलस नामें सुत थति नलो ए,सोहे मुगुण निधान ॥ ५० ॥ ३ ॥ यौवनवय परणावी यो ए, जिनदास तनया सार ॥ ५० ॥ पतिबदे चाले नली ए, नामें सुना नारि ॥ पण ॥ ४ ॥ जनक कहेणथी एकदा ए, गुरुपासें ते सुजा ए ॥ ५० ॥ श्रादरे श्रावक व्रत विना ए, एक परिग्रह परिमाण ॥ प० ॥ ५ ॥ रसिक कलानो श्रति घणो ए, विपयन वेसे चित्त ॥ ५० ॥ मात विचारे मन्नमां ए, मृत ए शुनो जीत ॥ ५० ॥ ६ ॥ नवि बोले निज - ३६४ जैनकथा रत्नकोप नाग श्राग्मो. जूवो निरखी जेम, सदेह टले परो रे लो ।। क० ॥रा. परतीने निरखता,ते जाण्यो खरो रे लो ॥ सु० ॥ २७ ॥ रा० ॥ पूजे ए ऐ कारण, मुक दाखो तुमें रे लो॥ क० ॥ रा० ॥ कहे पुष्पदेव कइंता, लाई यो रे लो ॥ सु० ॥ रा० ॥ वात सुणीने मनमा, नृप कोप्यो पलो लो ॥ क० ॥रा० ॥ कहे थारदक नरने, जर एहनें हो रे लो॥ मु. ॥ २५ ॥ न० ॥ करीय कवर्थना पुर, शेरीमा फेरीयो रे लोक ॥० ॥ जश्वधनमें नृप, सुनटे ते मारीयो लो ॥ सु० ॥ ज०॥ मयो नरकावनि ताजी, जिहा ययपूतली रे लो ॥ क० ॥ ज० ॥ थालिंगावे थसुर, पचारे वली वली रे लो ॥ सु० ॥३०॥ ज० ॥ नमशे ते पहुकाल, लगें ससारमा रे लोक ॥ ज० ॥ रहे एम विपय नव्यानव, कारा गारमा रे लो ॥ सु० ॥ न० ॥ के खमें ढाल, कही सत्तवीशमी रे लो ॥ का ॥ न॥ शातिप्रजनी देशन, मुणो साकर समी रे लो ॥ सु० ॥ ३१॥ इति चतुर्थव्रतोपरि करालपिगलपुरोहित कथानकम् ॥ ५ ॥ सर्व गाथा ॥ १०४३ ॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥ ५५ ॥ ॥ अथ पंचम परिग्रहपरिमाणवत सवध ॥ ॥ दोहा॥ ॥ दवे पंचम व्रत जिन कहे, परियदनु परिमाण ॥ तेम चापरिमाण वली, नांखे श्री जिननाए ॥ १ ॥ सचित्त थचित्त मिश्र जाणीयें, परि अदना त्रण नेद ॥ नव जेदें दोय तिम वली, एम जाखें गतवेद ॥ २ ॥ क्षेत्र वासु धन धान्य तेम, रुप्य कूप्य ने हेम ॥ पिद चतुष्पदनो सदा, मन राखीजें प्रेम ॥३॥ परिग्रह वाथ्यो ए घणु, होय बहु खदातार ॥ सिक्षांत एहना थडे,वली थनेक प्रकार ॥ ४ ॥ धान्य रम स्थावर विपद, चठपद कुप्पविचार ॥ सामान्य पट् नेद एम, उत्तर योसह चार ॥ ५ ॥ धान्यनेद चोवीश ,जवश्गहू ने वली शाति ॥ विहि एप्सहीयपकुर वा, पथपुथा कंगू एराल ॥ ६ ॥ १०तिल ११मुग १श्मासा १श्थल सि तिम, दरिमथ १५त्रिपुट १ पनिपाव ॥ १ मा १७चोला १एयरटी नली, मसुर रतुंबरि तिम नाव ॥ ॥ १श्कुलही श्वनय २४वृत्त चनक, धान्य भेद प्योवीश ॥ रम जाति वजी तेटली, एम नांले जगदीश ॥ ॥ सोवन स्त्रपु ३त्रांबू घरजत, पलोह पसीस सुहिरम ।

श्री शांतिनाथनो रास खंम हो ३६० णी यापण सही ए,पडीया थापण मांहि ॥ प० ॥ नीसासा नाखें घणा ए,पण चित्यु नवि थाय ॥ ५० ॥ २३ ॥ सोल वरस लगें तिहां रह्यो ए, मात पिता थया कीण ॥ ५० ॥धारतध्यानमां वेदु जणां ए, गयां पर लोकें दीण ॥ ५० ॥ २४ ॥ गुणवती तस नारजा ए, तेम धन महेले तास ॥ ५० ॥ जेह न थापे कतने ए, यहो थहो मोह विलास ॥ प० ॥ २५ ॥ धन नीतुं तब तेणिये ए,निज थानूपण सार ॥ १० ॥ दासी स घातें मोकट्या ए, यकायें चित्यु तिवार ॥ ५० ॥ २६ ॥ धन नीतुं एहना घर तणु ए, मोकटयो निज शणगार ॥ ५० ॥ ए मुफ राखवु नवि घटे ए, फरी मोकल्यु सुविचार ॥ ५० ॥ २७ ॥ हवे अक्का मन चितवे ए, श्यो निर्धनग्नु नेह ॥ १० ॥ कहे पुत्रीने एहन्छ ए, हवे श्यो करवो सनेह ॥ प० ॥ २७ ॥ ढाल कही थडवीशमी ए, बहा खम मकार ।। १० । राम विजय कहे धन वर्ल्ड ए, स्वारथी ए ससार ॥ प० ॥ ५ ॥१७॥१॥ ॥ दोहा ॥ कहे पुत्री माताप्रतें, वह धननो दातार ॥ सोल वरस लगें जेह गु, विलस्या जोग उदार ॥ १ ॥ केम बमाये वालहो, प्राणथी य धिको एद ॥ सोंप्या में हाथे करी,जेहने धन मन वेद ॥ २ ॥ कहे थक्का पुत्री सुणो, तुम कुल ए याचार ॥ निर्धनिया नर परिहरे, धनवत व्यव हार ॥ ३ ॥ तस मन जाणी पंच दिन, थक्का पडखी जेद ।। इकु मगावे एक दिन, दिये कूचा धरि नेह ॥४॥ मा ए / दु ढोर लु, नि पीडित इक्छु दम ॥ जे ले मुफ थागें धस्खा, थक्का कहे कुरंग ॥ ५ ॥ जो ए चाव्ये रस होवे, तो सेवे सुलस कुमार ॥ सानो चूसी रस लीयो, बोता बोड गमार ॥ ६ ॥ पुत्री कहे कूचा घणे, कामें थावे माय ॥ घेर घालाथी नूख एहथी जाय ॥ ४ ॥ रस लेई पोथी तणो, नीरस थापे हाथ ॥ रीसाणी पाबी दीये, शु मुफ दीठ थनाथ ॥ ७ ॥ मा कहे नी रस पोथी ए,जिमन रंगाये पाय ॥ तेम ए निर्धन सुलसथी,कोडी काम न थाय ॥ ए ॥ कहे पुत्री पोथी नीरस, पण दसा दीप होय ॥ तेम ए निर्धन सुलसमा, गुण केता एक जोय ॥ १० ॥ राग सही पुत्री तणो, बानी रदी तेवार ॥ विण पूडघे ए काढवो, मनमा कस्तो विचार ॥ ११ ॥ ढोरनी, ३६६ जैनकथा रनकोप नाग थाउमो. नारिगु ए, न जुए दृष्टि सराग ॥ ५० ॥ न करे उपम वणिजनो ए, रहे शे ए. निर्जाग्य ॥ १० ॥ ७ ॥ जिनदेवी कहे कतने ए, नि स्टह सरीसो पूत ॥ १० ॥ विपय न वा चित्तशु ए, केम चनशे पर सूत ॥.. G॥ तेम करो जेम ए विपयने ए, वा वालम नद ॥ १० ॥ शेठ नारी नपणी ए, बोल मा एम मतिमद ॥ ५० ॥ ॥ के काल बना दिना ए, लाग्या रिपु य जेह ॥ १० ॥ ते रिपुर्ने सुत सोपता ए, स्यो मावित्र सनेद ॥ ५० ॥ १० ॥ यत ॥ नोगा न नुक्तावयमेवनुक्ता, स्तपो न तप्त वयमेव तप्ता ॥ कालोन यातोवयमेव याता, स्तृपणा न जीर्ण वयमेव जीर्णा ॥ २॥ पूर्वढाल ॥विण शीखवीया थावडे ए,बाहार विषय विकार ॥ ५० ॥ पण यनाविनो दोहिलो ए, धर्मतणो व्यापार ॥ १० ॥ ११ ॥ दन नवि मूके कामिनी ए,लीधी शेवनी केड ।। ५० ॥ पाच्या पण मुगर पड़े ए, नावी न जाये फेडि ॥ १० ॥ १२ ॥ शेने नट विट तेरी या ए,जुथारी कमजात ॥ ५० ॥ चतुराई शीखण जणी ए, सोप्यो तेहने जात ॥ ५० ॥१३॥ सदी कुसगति तेहनी ए,वीसारी सवि वात ॥ १० ॥ नणतर तेणें विसारीयु ए,शक्ष्यि मुखनी धात ॥ १७ ॥१४॥ कौतुक हास्य विनोदनी ए,मुणता वात रसाल ॥ ५० ॥ मन विंधाणु तेदनु ए, पडीयो विषयनी जाल ॥ ५० ॥ १५॥ निर्वल सगतिथी निपन्यो ए, वेश्या सयोग ॥पणा दाव नाव करी जोलव्यो ए,विलसे विपयिक जोग ॥ १० ॥ ॥ १६ ॥ मात पिता धन मोकले ए, मोकले मन धरी नेह ॥ ५० ॥ सु त वेगे वितसे तिदा ए, मोद तणी गति एह ॥ १० ॥ १७ ॥ घरहूती नवि नीसरे ए, जाग्यो गणिका रंग ॥ ५० ॥ विषय अमिमा जीवा ए, पडीया जेम पतंग ॥ १० ॥ १७ ॥ यत ॥ लोलेक्षणावकनिरीक्षणेन ॥ मात पिता बबु मोफले ए, जन तेडाने फाज ।। प० ॥ पण गणिका जावा न दे ए, नवि लोपे तस लाज ॥ ५० ॥ १५ ॥ लालच नमी विषयनी ए, संगीथतिहि अगाध ॥ १० ॥ ससारी एदमा पन्या ए, लदे मुख निराबाध ॥ ५० ॥ ५० ॥ मात पिता फूरे घणु ए, सुतने संना री जोर ॥ ५० ॥था नव कीधा था नवें ए, थायां कर्म कठोर ॥ प० ॥ २१ ॥ वाफ नहिं हां कोश्नो ए, सहामो चढावी पार ॥ ५५ ॥ विटल पुरुषने सोंपीयोए, की ए मुतने लार ॥ ५० ॥ १२ ॥ वाम ख . श्री शातिनाथनो रास खम हो ३६ए वन एह ॥ धि० ॥ १६ ॥ हवे थाजयी दु समजियो, परदेश नइ करी काज ॥ याविश वहेलो हुँ सहि, तुं राखजे रे रूडी मुफ घरलाज ॥ वि० ॥ १७ ॥ सखी लेख करमा धयो, देवानुयोगें तत्र ॥ निजनारी वासी तिहां कणे, थावी तेहने रे सोप्यो तेणें पत्र ॥ धिo ॥ १७ ॥ श्ष्ट समरी चालीयो, ते सुलस कोइएक देश ॥ परिधान जूना चीवरा, नहिं पासे रे धन कांश लव लेश ॥ वि० ॥१९॥ याथने थरथे जमे, परदेशमा उजमाल ॥ एक नगर जीर्णोद्यानमा, जा पहोच्यो रे थाक्यो असराल ॥ धि ॥ २० ॥ तिहा ब्रह्मतरु थकुर नीरखी, चितवे चित्तमांहि ॥ ए विनव विषु होवे नहिं, ज जोउ रे मन धरिय सम्माह ॥ धि० ॥२१॥ ज खो दीयु ते ठाण ततहण, सहप्त एक दिनार ॥ नीलस्यो निधि तिहा दर्प पाम्यो, मन चिते रे त्यो किरतार ॥धि॥२२॥ सगोप्य करी पुरमाहि थाव्यो, सुलस धरी थानद ॥ ढाल गणत्रीशमी, खम बढे रे सुणोसाज नद धिणा३॥ सर्वगाथा ॥११२३॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥१॥ ॥ दोहा ॥ ॥ पुरमाहे एक वणिकने, वेतो थावी हाट ॥ वीसामो लेवा जणी, मूकी मन उच्चाट ॥ १ ॥ ग्राहक बगुला यावीया, देखी व्याकुल तास ॥ सुलस करे साहाय्य तस,माह्यो मन उन्नास ॥२॥ तस महापणने देखीने, रीज्यो शेठ थपार ॥ पूढे किहाथी थावीया, नश्क यहो कुमार ॥३॥ तुम थाव्ये थाज माहरे, लान ययो अणचित ॥ कहो मुझ यागल मामीने, सघलो तुम वृत्तात ॥ ४ ॥ वासी श्रमरपुरी तणो, प्राघूर्णक गुणधाम ॥ ते कहे मदिर तुम तणे, थाव्यो दुदु स्वामि ॥ ५ ॥ शेजें म दिर तेडीने, न्दवराव्यो नालि नात ॥ जीमाच्यो नोजन सरस, वे मारी मन खात ॥ ६ ॥ ॥ ढाल त्रीशमी॥ ॥ देशी जमारुलीनी ॥ शेठ कहे कुण कारण थाव्या ॥ नमारुती ॥ सुलस कहे निज काज ॥ तातजी दुइहा थावीयो तो ॥ न० ॥ धन उपराजण थाज ॥ १ ॥ नहीं हा कोइ माहरो सगो तो ॥ ज० ॥ तुम्हें बो पिताने रे नाम ॥ करो करुणा मुज उपरें तो ॥ न ॥ कोइ थपावो सुधाम ॥ २॥ हाट थपाव्यु नाटकें तो॥ न ॥ करे तिहा वणिज ३६७ जैनकथा रत्नकोप नाग थाम्मो. ॥ ढालगणत्रीशमी। पुरखें सुरूत न में कीयो ॥ ए देशी ॥ यका करे उतावली, बारि सुलसनी पास ॥ तुमें नूमि देता कतरो, वे कारिज रे पर बाबा ॥१॥ धिक् धिक् उर्जन प्रीतडी रे ॥ जे थापेरे उटकी है। रग कुसुन तणो जिस्यो, जेम न टके रे जग गरनो त्रेह ॥ पि० ।। मनमादि कुवर चितवे, गु दो एदने काज ॥ सोल वरसमाहि एण्ड नधि सुपीयु रे सनलाव्यु ते थाज ॥ धि० ॥३॥ दासी कहे श्रावीने, गु रह्यो मूढ विमासि ॥ निर्लज थाने केम रह्यो, नहीं तारे रे कोडी एक पास ॥ घि० ॥ ४ ॥ थाथ विना थादर नहिं, मनमा विचारी जोय ॥ ए वेश्या मदिर नवि शूना, प्रीति चूखी रे यहां कर नवि होय ॥धि ॥ ५ ॥ सुलस निज मदिर नणी, निसलो न लरे माग ॥ मन खेद पामे यति घणणे, एह देखी रे उपजे वेराम्य ॥ पि० । ६ ॥ अणुसार मारग समरतो, थाव्यो निजगृह पास ॥ चिटु पासें परी यु जीर्ण ते, गृह देखी रे थयो मन उदास ॥ धि० ॥ ७ ॥ बगेद सवि वरवडी गइ, नलिया तणी नही शुद्धि ॥ नागे कपाटे उस जिस्यो, तेह देखी रे नूनी गयो बुद्धि ॥ धि० ॥ ॥ पूर्वीयु पाडोशी नणी, घर स्वामीनु नाम ॥ ते कहे ताहरे थडे, ए नामनु रे पूडयानु काम ॥ धि ॥ ए ॥ ते कहे सहेजें बीयु, ए रुपनदचनु गेद ॥ श्राम अ वस्था का थइ,जीवे डे के वली मूठ तेह ॥ धि ॥ १० ॥ ते कहे शेठ ने तस प्रिया, वेगु पद्भुतला परलोक ॥ घर पडघु सनाच्या विना, एम निसु णी रे मनमा धरे शोक ॥ धि० ॥ ११ ॥ धिक् व्यसन मुफ वेश्यातए, ई थयो मूढ गमार ॥ मृत पितर में नवि जाणिया, नवि गणीयो रे अपयश थपकार ॥ धि० ॥ १५ ॥ धन धूलमाहे मेली, सेविया सात व्यसन्न ॥ काम में रूई कस्यु,देखाई रे दवे केम वदन्न ॥धि०॥१३॥ घर जोड्ने पागे वन्यो, थावीयो जीर्णोद्यान ॥ खर ताट पत्रे जुरीकया, तेणें लवीया रे थकर धरि शान ॥ धि० ॥ १४ ॥ मुलस श्रीबिनवर नमी, लखे नामिनीने लेख ॥ श्राब्दाव सहित यतावलो, तु वांचे सृगन यणी विशेष ॥ धि० ॥ १५ ॥दु बाज गणिकाघरपकी, नीसरी थाव्यो गेद ॥ मृत पितर निमुणी जाजियो, तुफ न मल्यो रे आयो श्री शांतिनाथनो रास खंम छो. ३७२ पण ए नि स्वामिक थडे तो ॥ न ॥ ग्रहु नवि लहे कोई गुव ॥ १७ ॥ चैत्य करावीश अनिनवां तो ॥ ज० ॥ करस्युं ए जीर्ण उदार ॥ पुण्य ए एहना स्वामीने तो ॥ ज० ॥ होशे नहिं जस पार ॥ १५ ॥ एम चिती लीधा तेणें तो ॥ ज० ॥ कोडीना मूल्यना पच ॥ ताणी गावे वांधीयां तो ॥ ॥ सुलसें करि रूडो सच ॥ २० ॥ वेलाकुल पुर थावीयो तो ॥न० ॥ जलनिधि तट सुखकार ॥ श्रीसार शेग्ने मदिरें तो ॥ ज०॥ थाव्यो ते मुलस कुमार ॥२१॥थागत स्वागत बद करी तो ॥ ॥ शेठ दीये सन्मान ॥ बहु कोडें दोय वेचियां तो ॥ न० ॥ रयण दो तेज थ मान ॥ २२ ॥ नाम यही बहु तेदना तो ॥ ज० ॥ निजपुर चालण प्रेम । साथ सघातें चालीयो तो ॥ ज० ॥ मनमाहे चिते रे एम ॥ २३॥ मला जइ घर नारी तो ॥ न ॥ कर ए लील विलास ॥ स्वजन सद्ध साथे मले तो ॥ ज० ॥ पूरञ्नु मदिरवास ॥ २४ ॥ एक महोटी य टवी तिहां तो ॥ ज० ॥ जातां ए थावि विचाल ॥ एक प्रदेशे तेहने तो ॥ ज० ॥ उतस्यो साथ विशाल ॥ २५ ॥ धान्यपाक सट्ठको करे तो ॥०॥थावि कजाती ए धाड ॥ थइ सन्नर सहामो थयो । न० ॥ पूरवा वैरीना लाड ॥२६॥रणमाहे नासी गया तो पन॥ मुलसना सुनट अनेक ॥ रह्यो तिहा करो एकलो तो ॥ना मुलस धरीमन टेक ॥२७॥ वांध्यो पालावाद्यें तो ॥ न ॥ लूटी लीयो सवि माल ॥ कर्म दशा नव पालटी तो ॥ ज० ॥ नर दोय जेम कगाल ॥ २७ ॥ ते लेइ चाल्या सुख सने तो ॥ ज०॥ वेच्यो ए वणिकने हाथ ॥ तेणें जश् पारसकूलमां तो ॥न० ॥ थाप्यो ए मुलस थनाथ ॥ २ए ॥ रुधिर तणे काजें लीयो तो ॥न ॥ जुन जुन पूरवपाप ॥ बंधातां मालिम नहि तो ॥ ज० ॥ तदयें लहे रे सताप ॥ ३० ॥ थाकर्षी नर तनुथकी तो ॥ ज० ॥ रुधिर नरे कुम के ॥ तेमाहे तिहां उपजे तो ॥ न० ॥ जीव घणा लघुवेदि ॥ ३१ ॥ कमीराग तेहनो नीपजे तो ॥ ज० ॥ वसन रगाये रे तेण ॥ रंग न । तेदनो उतरे तो ॥ ज० ॥ दाघे ए पण जलरोण ॥ ३५ ॥ मुलस सहे 5 ख तेहवा तो ॥ ज० ॥ रुधिर खरख्या रे थग ॥ पज्यो थचेत नूमि तले तो ॥ न० ॥ विरुन ए कर्मप्रसग ।। ३३ ॥ नारम एक तिहां था वियो तो ॥ न ॥ चचुमां ग्रही तल सार ॥ ले उख्यो अवरतलें तो - ३७० जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो. व्यापार ॥ लालच मनमा श्रति घणी तो ॥ ॥ जेमतेम धन में सार ॥३॥ पट महिना त्या अतिक्रम्या तो॥०॥ बमा पारे दिनार ॥ लाने लोन वध्यो घणो तो ॥ न० ॥ मनमाहि करे रे विचार ॥ ॥ लेइ करियाणु सामटु तो ॥ ज० ॥ सुलस चल्यो लेइ साप । ॥ तिलकपुर ते थावियो तो ॥ न० ॥ रलवाने वडुली रे बाप ॥ ५ मन चितित नवि पामीयो तो॥ना लान तिहा पण तेह ॥ वाहन माल नरी चढयो तो ॥ ज० ॥ रमझोपे गुण गेह ॥ ६ ॥ नेट र नृपने मन्यो तो ॥ ॥ दाण थर्ध मेव्यु राय ॥ यादर मान वीर्छ घणु तो ॥ ज० ॥ काध महा सुपसाय ॥ ७॥ लान घणो तिहांकणे थयो तो ॥०॥ फली मनोरथमाल ॥ निजपुरने जावा नणी तो ॥न० ॥ सुलस थयो उजमाल ॥ ॥ ले लक्ष्मीने चालीयो तो ॥ ॥ वादण वेसी कुमार ॥ जर दरीये नाग्यु तदा तो ॥ न० ॥ यहो यहो कर्म विकार ॥ ए ॥ मन चिते बद्ध जीवडो तो ॥नम् ॥ सवय वडो बलवान ॥ कोडी उपाय करे कोई तो ॥ ज० ॥फले कतकर्म निदान ॥ १० ॥थायु जोरावर सुससनु तो॥ज ॥ चढीयु रे फलक दाय ॥ पंचम दिवसें पामीयो तो ॥ न ॥ किदांएक तीर थनाथ ॥११॥ वन देखी कदली तणा तो ॥ ॥ कसो तस फलथी थाहार ॥ वि शाम्यो जइ तरुतलें तो ॥०॥ मनमांदि धरे रे विचार ॥ १२ ॥ कष्ट स ह्यां में अति घणा तो ॥ न० ॥ मेली कदि अपार ॥ पण मुफ दाथ रही नही तो ॥ ॥ कर्म कतिन निर्धार ॥१३॥अथवा देव वनधीने तो ॥ न० ॥ कीजें क्रिया जग जेद ॥ न फले सरजल चातकें तो॥०॥ मझुं गले नीसरे तेद ॥ १५ ॥ यतं ॥ देवमुलंध्य यत्कार्य, क्रियते फल वन्न तत्॥सरोंजवातकेनात, गलरभ्रेण निर्गतम् ॥१॥पूर्वढाला तो पण में नवि बोमवु तो ॥ ज० ॥ साहस सुखनु रे देत ॥ वाहला बंधवनी परें तो ॥ ज० ॥ कविय ए बेह न देत ॥ १५ ॥ सुजस विचारी चित्तमा तो ॥ न ॥ श्रागल चाल्यो ए जाम॥पंखी समूडें चूथीयुं तो ॥ ना ॥ शष एक वीतु रे ताम ॥ १६ ॥ ते नर शबवसनाचलें तो ॥ ज०॥ बांधी रे दीनी गांठ ॥ ते सुलसें बोडी न तो ॥ न ॥ लीधा पण रयण छ कित ॥ १७ ॥ अणवीधु ले नहिं तो ॥ न ॥ एह प्रतिज्ञा रे मुज ॥

श्री शातिनाथनो रास खंम छो. ३७१ पण ए नि स्वामिक बजे तो ॥ ज० ॥ ग्रहु नवि लहे कोई गुव ॥ १७ ॥ चैत्य करावीश अनिनवां तो ॥ ज० ॥ करश्यु ए जीर्ण उधार ॥ पुण्य ए एहना स्वामीने तो ॥ ज० ॥ दोशे नहिं जस पार ॥ १५ ॥ एम चिती लीधा तेणें तो ॥ ज० ॥ कोडीना मूल्यनां पंच ॥ तापी गांठे बांधीयां तो ॥ न० ॥ सुलसें करि रूडो सच ॥ २० ॥ वेलाकुल पुर थावीयो तो ॥न० ॥ जलनिधि तट सुखकार ॥ श्रीसार शेठने मदिरें तो ॥न ॥ थाव्यो ते सुलस कुमार ॥२१॥ थागत स्वागत वद् करी तो ॥०॥ शेव दीये सन्मान ॥ बहु कोडें दोय वेचिया तो ॥ न० ॥ रयण दो तेज थ मान ॥ १२ ॥ नाम ग्रही बहु तेदना तो ॥ ज० ॥ निजपुर चालण प्रेम ॥ साथ सघातें चालीयो तो ॥ ज० ॥ मनमाहे चिते रे एम ॥२३॥ मला जश् घर नारी तो ॥ न ॥ कर ए लील विलास ॥ स्वजन सद् साथे मले तो ॥ ज० ॥ पूरच्छ मदिरवास ॥ २४ ॥ एक महोटी थ टवी तिहां तो ॥ ज० ॥ जातां ए थावि विचाल ॥ एक प्रदेशे तेदने तो ॥ ज० ॥ तस्यो साथ विशाल ॥ २५ ॥ धान्यपाक सहुको करे तो ॥ न० ॥थावि कजाती ए धाड ॥ थइ सन्नः सदामो थयो ॥ ज० ॥ पूरवा वैरीना लाह ॥२६॥रणमांहे नासी गया तो ॥ज०॥ सुलसना सुनट थनेक ॥ रह्यो तिहा करो एकलो तो ॥ना मुलस धरीमन टेक ॥२॥ वाध्यो पाला वादुयें तो ॥ ज० ॥ लूटी लीयो सवि माल ॥ कर्म दशा जव पालटी तो ॥ ज० ॥ नर होय जेम कगाल ॥ २७ ॥ ते ले चाल्या मुल सने तो ॥ ज० ॥ वेच्यो ए वणिकने दाथ ॥ तेणें जश् पारसकूलमां तो ॥ ज० ॥ थाप्यो ए मुलस थनाथ ॥ २ए ॥ रुधिर तणे काजें लीयो तो ॥ ज० ॥ जुन जुन पूरवपाप ॥ बंधाता मालिम नदि तो ॥ न० ॥ सदयें लहे रे सताप ॥ ३० ॥ थाकर्षी नर तनुथकी तो ॥ ज० ॥ रुधिर नरे कुम केश ॥ तेमांहे तिदा उपजे तो ॥ न ॥ जीव घणा लघुदेहि ॥ १ ॥ कमीराग तेहनो नीपजे तो ॥ न ॥ वसन रगाये रे तेण ॥ रंग न तेदनो उतरे तो ॥ न० ॥ दाघे ए पण जलरोण ॥ ३२ ॥ सुलस सहे छ ख तेदवां तो ॥ न० ॥ रुधिर खरख्या रे थग ॥ पख्यो थचेत जमि तले तो ॥ ॥ विरुन ए कर्मप्रसग ॥ ३३ ॥ नारंग एक तिहा था वियो तो ॥ ज० ॥ चचुमां यदी तस सार ॥ लेख्यो थपरतलें तो ३७२ जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. ॥ न० ॥ नहीं कोई राखणहार ॥ ३४ ॥ रोहणगिरि ना उसको जो ॥ न० ॥ मूकी शीला तल जाम ॥ लक्षणने उग्रत पपोतो. नारंम वीजो रे ताम ॥ ३५ ॥ थाव्यु नदय देखी करी तो ॥ तेणे पण दीधी रे दोट ॥ माहोमाहे वलग्या वन्हे तो ॥नमे एक एकने चोट ॥ ३६ ॥ थदो ससारविडवना तो ॥ ज० ॥ मत्स्यकता गल एद ॥ कोइ केहनु वहालु नदि तो ॥ ज० ॥ स्वारप साप सनेर ॥ ३ ॥ कलह करता देखिने तो ॥ न० ॥ लघुकला ततकाल । तेर सुलस नासी करी तो ॥ ज० ॥ पेठो गिरिविवर विचाल ॥२७॥ते बेडु पंखी जब गया तो ॥ न० ॥ निसखो सुलस कुमार ॥ गिरिनिर्णन निर्मल करे तो ॥ न० ॥ निजतनु लेने वारि ॥ ३५ ॥ अणसरोहि पीने रसें तो॥न ॥ व्रण कसा साजा तेण ॥ गिरि उपरपी छतको तो ॥ न० ॥ मुलस ते नाग्यवशेण ॥ ४० ॥ नूमितलें जब धावीमो तो ॥ज ॥ गर्ता रेगुत्कर दीत ॥ नर वह खणता देखीया तो ॥ ज० ॥ मन चिते कौतुक मी ॥४१॥ बछे खमें त्रीशमी तो ॥नवि सुणो। परिग्रह एम उखदाय ॥ राम कहे परिग्रहथकी तो ॥ नवि सुणो ॥ विरमे महासुख थाय ॥ ३२ ॥ सर्व गाथा ॥१११॥ श्लोक तथा गाया॥६॥ ॥ दोहा॥ ॥ सुलत देखि तिदा पंचकुल, दरख्यो चित्त अपार ॥ पूजे हवे जर ते हने, कवण देश थाचार ॥१॥ ले खनित्र करमा खणे,किण कारण ए सधि ॥ कुण पर्वत ए दाखवो, मुफने सवि सवध ॥ २ ॥ ते नर कहे मुण पंथिया, जे देशांतर जाय ॥ ते माह्या सघलु लदे, तु एम घेलो काय ॥३॥ श्राकाशयकी पच्यो, जे न लदे का वात ॥ मुलस कहे ते पण खरु, निमुणो मुफ शवदात ॥ ॥ एक विद्याधर माहरे, सूषो जीवन प्राण ॥ मेरु गिरि देखाडवा, मुफ ले चल्यो सुजाण ॥ ५॥ देव योग वचमां मन्यो,रिपु विद्याधर एक ॥ यु८ अ ते वेगुने, ड पडीयो तप बेक ॥६॥ नाम्य योगें रह्यो जीवतो, जे तुम्हें कन्यु ते साच ॥ माटें तुम प्रबु थडु, कहो मुज साची वाच ॥ ४ ॥ ते कहे रोहणनामथी, पर्वतने ए देश ॥ वजसार नरराजीयो,तेद तणे वादेश ॥ ७॥ ए नर नूमि स्वणी घणी,काढेरयण यबार ॥ कर देई राजा प्रतें,लेजाये घर मार ॥ए। सास - , श्री शातिनाथनो रास खम ठहो ३७३ वचन सांजली सुलस,मनमां थयो खुशाल ॥ धन उपराजण ए जलो,लह्यो उपाय सुविशाल ॥ १० ॥ रत्नपुज पुरमा रहि, १६ वणिकने गेह ॥ नर साथै गर्ता जइ, मेले रयण सनेह ॥ ११ ॥ एक बहुमूलु पामीयो, रयण गोपवी थग ॥ वीजारयणनो नाग देश, चाल्यो परि मन रग ॥ १२ ॥ ॥ ढाल एकत्रीशमी ॥ ॥ कानें मुश शिर जटा ॥ ए देशी ॥ सुलस तिहाथी चालीयो ॥ सुणो नवि नावें लाल ॥ लोन महाउ खदायकु ॥ जज जगवतक वे ॥ मायानो वाध्यो प्राणीयो ॥ सु० ॥ पग पग पामे अपायकु ॥ ज॥ १ ॥ श्रीमतपुरमाहे याय के ॥ सु० ॥ वेची रयण कस्या दाम के ॥ न ॥ करीयाणु बहु तेइ चल्यो ॥ सु० ॥ चिते थयु मुफ काम के ॥ न. ॥२॥ मारगमाहि थावता ॥९॥ अटवी थावी विकराल के आन०॥ दव लाग्यो तिहां जोरञ्च ॥ सु० ॥ पवनें हो पसरी जाल के ॥ ज० ॥ ३ ॥ करियाणु दाधु सवे ।। सु० ॥ कर्म सवल प्रतिकूल के ॥ न ॥ जीव तेइ नाठो तिदा ॥ मु० ॥ लोन ए 5 खनु मूल के ॥ ज० ॥ ४ ॥ कोइक गामने परिसरें ॥ मु० ॥ नमता हो तापस दीन के ॥ न ॥ कर जो डी तेदने नम्यो ॥१०॥ पासें जइ उपविज के ॥ज॥५॥तापस कहे तव सुलसा ॥ सु० ॥ कोन मूलकसें थाया श्हा ॥ ज० ॥ फिकर करे क्यु चित्नमां ॥ १० ॥ वत्स ते जावेगा किदा ॥ न ॥ ६ ॥ मुलस कहे सां ३ मुणो ॥ थवे उपकारी लाल ॥ धन कारण जगती जम्यो ॥ ज०॥ पार न थायो दलिको ॥ अवे ॥ काल बदु यु निर्गम्यो ॥ न० ॥ ॥ थव साई मुफकों मीले ॥१॥ नाग्य फल्या मेरा सही न॥ तुम जेसे मोकु मिले ॥य॥ उरकुथव जाचु नदि ॥०॥॥ काहे पूकारतव्यकु ॥ थवे मुण वाचू लाल ॥ धन हम धूल समा गिने ॥ ज० ॥ ए मायाके खेल हे ॥ श्रवण ॥ सो योगी वर्जे जिणे ॥ न ॥ ए ॥ दोलत मुनियां कारि मी ॥२०॥ विणसतां नदि वार के ॥ ज० ॥ मस्त रहो प्रध्यानमा ॥ थः ॥ धरो एक योगसे प्यार के ॥ न० ॥ १०॥ मुलस कहे तुम सच कहा ॥ थवे सुण सा लाल ॥ मार्ग योगान्यासका ॥ ॥ पण जग मुनियादारकू ॥ थ ॥ वधन थाशापाशका ॥ ज० ॥ ११ ॥धन विष्णु जगत चले नदि ॥ थवे ॥ धन मूल ए ससार के ॥ न ॥ करो ३०४ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. करुणा मो उपरे ॥ थ० ॥ तुम हो वडे सिरदार के ॥नः ॥ १५ ॥बरे परिव्राजक काहे ॥ थ० ॥ शोच करत दिल जीतरे ॥ ॥पन पर तेरा हे शहा ॥ य० ॥ छिनमें दारिश दूर करे ॥ ॥ १३ ॥ सुजात कहे मोकु कहो ॥ थ० ॥ धन मिले कोन उपायसे ॥ न० ॥ रसकसी रस जो मिले ॥थ ॥ कचन होवे थायसे । न० ॥ १४ ॥ सुप्लस फुरमावीये ॥ थ० ॥ मुफ लायक होवे काज के ॥ ॥ महिषीपुरा को थाणि के ॥था तेलमें देपो थाज के नि०१५॥ मृत महिपीपुर इधयु ॥ थ० ॥ तेलमाहे पट्मास के न०॥ सुलसको किणहीके घरे । थ०॥ जिमाडे सो नन्नास के ॥ ॥१६॥ पटमासें दोय नीसरे ॥ था ॥ पुस्तक पुल ले। हाथ के ॥॥ दोय तुवी दोरी ग्रही ॥१०॥ मचिका लीधी साथ के न॥ १७ ॥ गिरिविवरें दोय यावीया ॥सु०॥ यद पडिमा पूजी करी ॥ न० ॥ वलि देवे नूतदेवको ॥ १० ॥धागें च ले दोनु फिरी ॥ ज० ॥१॥ दीप कीयो उन पुष्ठको ॥ सु० ॥ दोक जन थागे गये ॥ न० ॥ चोरस रसकूप देखि के ॥थ ॥ दो दोलमें हर्षित नये ॥ ज० ॥ १५ ॥ वलि देई कहे मुलसकों ॥ सु०॥ इस माची पर वे के ॥ न ॥ तुव लेई दोन हाथमें ॥ थव० ॥ जा रस लेणको तेल के ॥ ज० ॥ २० ॥ सुलस गयो रसकूपमें ॥ सु० ॥ मुख समरे नवकार के ॥ ज० ॥ रस सेवा उद्यत थयो ॥ सु० ॥ शद मुल्यो तेणी वार के ॥ न० ॥ २१ ॥ ए रस कोटी हे बुरो ॥ सु॥ मत करसें फरसो तुमें ॥ न० ॥ तु साधर्मिक माहरो ॥ सु ॥ उनसें वारत हे यन्हें ॥ ज० ॥२॥ तनु रस लागेसें होवे ॥ सु० ॥ दिनमें प्रानको नाश के ॥ ज० ॥ थाराधक जिनधर्मको ॥ सु० ॥ तुं थायो धनधाश के ॥ न० ॥ १३ ॥ जावो तुषक रस जरी देव ॥९॥ करु तुमकु सादाज के ॥ ज० ॥ मुलस कहे तुम वदन ॥थबे धर्म बांधव लाल ॥ वात कदो तुम थाज के ॥ज॥५॥ बखमें एकत्रीशमी॥थाढाल कदीधनपरें॥नाधन निज संकट श्रव गुणी॥०॥ जे एकज उपक्रति करे ॥ ज० ॥२५॥ सर्व० ॥ १२०७ ॥ ॥ दोदा ॥ ॥ कहे धर्म बांधव मुणो, लोन वडो जगमादि ॥ लोनवशे ए जीवहो, पामे उख यथाद ॥१॥ नयरी विशालामा वसुं, जिनशेखर बनिधान।।

श्री शातिनाथनो रास खंम हो ३५ समुश् चढयो धनकारणे, नाज्यु थधविच यान ॥ २ ॥ उदधि तखो फल हक लही, जमता बटवीमांहि ॥ परिव्राजक मुझने मव्यो, नारख्यो कूपक मांदि ॥ ३ ॥ तुवक नरी को गयो, ले तुवक तेणें नीच ॥ दोर वेदी नाख्यो मुनें, पडीयो रस थध वीच ॥ ४ ॥ जाणुं तुमने पण तेणे, वेत रीयो सहि थाज ॥ जो सुश्रावक मत करो, तस विश्वास गुन काज ॥ ५ ॥ मुलसें पण सवध निज, दाख्यो तेणे रस तुंव ॥ दोय नरी दीधां तिहा, न कस्यो कांश विलव ॥ ६ ॥ मांची तल वांधी निविड, सुलसें दला वी दोर ॥ कूपकत लगें तापीयो, योगीय करी जोर ॥ ७ ॥ दे तुवक मुझने प्रथम, ते कहे वांध्यां ताणी ॥ मांचि तले बूटे नहि, यापीश प में सुजाण ॥ ७ ॥ तेणे जाण्यु नेदू मल्यो, न उगाये हवे एह ॥ तुव स हित तेणें मुलसने,नाख्यो कूप नि स्नेह ॥ ए ॥ कूप मूकी योगी गयो, नि तुर नीच कुपात्र ॥ सुलस कूप मेखल पध्यो,थक्षत रहियु गात्र ॥१०॥ सुलस गाढ स्वर उच्चरे, पचपरमेष्ठिजाप ॥ कहे चेतन ए ताहरा, उदय याव्या पाप ॥ ११ ॥ जो परिग्रह थागलयकी, मूलथी मेल्यो होत ॥ तो एवड श्याने शहा, 5 ख दूं नजरें जोत ॥१५॥ यधुना पण प्राणी हां, ले चारित्र उदार ॥ करि अणसण थाराधना, जिम दुवे तुझ तक्षार ॥१३॥ जिनशेखर तव सानली,कहे म म चितव एम ॥ कदु निस्सरण उ पाय दु, साजल धरि मन प्रेम ॥ १४ ॥ एक गोधा थावे थने, रस पी वाने यत्र ॥ तस पुष्ठ वलगी तु जजे, ते जिहां जाये तत्र ॥ १५ ॥ कहे जिनशेखर माहरु, थल्प थायु थवशेप ॥ कर उपकार तु मुमने, देई धर्म उपदेश ॥ १६ ॥ ॥ ढाल वत्रीशमी॥ ॥ महाविरजीनी देशना ॥ ए देशी ॥ सुलत कहे हवे तेहने ए, जिन शेखर अवधार तो ॥ चिट्ठ गतिमा लाइ जीवडो ए, जमता न थाव्यो पार तो ॥१॥ श्रीजिनवरनी देशना ए॥एयांकणी ॥ पाचे ए याव रो लवे ए, पहेले ए प्राणातिपात तो ॥ बीजो मृपावाद परिदरो ए, थवत्त करे गुणघात तो ॥श्रीजि॥॥ मैथुन परिग्रदमा घणु ए,लपटाई रह्योजी व तो ॥ नोगवे नरक निगोदमा ए,करतो वेवनें ए रीव तो ॥श्रीजि॥२॥ एक समरे श्ररिहतने ए, सिम नजे गुणवत तो ॥ थाचारिज उवधायने .

३६ जैनकथा रत्नकोप नाग बाग्मो. ए, समरे महामुनि सत तो ॥ श्रीजि० ॥ ४ ॥ ए पंच ममल मूली ध्याता हो नवनिस्तार तो ॥ शरण नहि कोई ए विना ए, नवाद । खणहार तो ॥श्रीजि०॥५॥ शरण हजो वली तुज नणी ए,अरिहंत तिब सुसाध तो ॥ केवतिनापित धर्मनु ए, राखजो दिलमा समाष तो. श्रीजि० ॥ ६ ॥ तु कोनो नहि ताहरु ए, कोइ नहि जगमाहे तो। एक जिनधर्म ठे ताहरो ए, वलगजे एहिनी वाहे तो ॥ श्रीजि० ॥७॥ लख चोराशी खामजे ए, म धरिश कोश्ठ वेर तो ॥ स्वारथीयु सडको म व्यु ए, वादला हो वहेती सेर तो ॥ श्री० ॥ ॥ सगपण ए ससारना ए, हूवा यनती वार तो ॥ वहालो वैरी थश्यवतरे ए, वैरी वहालोस सार तो ॥श्रीया मिथ्या रुत दीजीय ए, सेव्या ए पाप अढार तो था जव परजव सेवीया ए, दोप थनेक प्रकार तो ॥ श्री० ॥१५॥ जे तें कला वली कारव्या ए, पनर ए कर्मादान तो ॥ त्रिविध विविध वोसिरावजे ए, उर्गतिना ए निदान तो ॥ श्री० ॥ ११॥ साजल था दारीपणु ए, लाग्यु थनादिनु केड तो ॥ क्याहि रह्यो नहिं ए विना ए, दवे तस मूळ फेड तो ॥ श्री० ॥१२॥ चार प्रकार थाहारना ए,तु वोप्ति रावजे थाज तो ॥ अरथ सरे जेम ताहरो ए, वत्तीयो था कर काज तो ॥ श्री० ॥ १३ ॥ सूर यजे तु ण समे ए, म करीश कायर जाय तो ॥ थमुरमुरादिक स्थिर नहि ए,ए ससार स्वनाव तो ॥ श्री० ॥१४॥ जिनशेखर मनक्षिए, सदहिया सवि वोल तो ॥ ध्यान धरे नवका रनु ए, रह्यो मने थइ थमोल तो ॥ श्री० ॥ १५ ॥ पट्कायना जीव कपरें ए, राग ने क्षेष निवार तो ॥ थायु पूरुं करी अवतस्रो ए, अष्टम कम्पमकार तो ॥ श्री० ॥ १६ ॥ न दीये जुकारो यदा ए, जाण्यु गयो परलोक तो ॥ मुलस रुवे कठ मूकीने ए, धर्म बाधवने शोक तो ॥ श्री. ॥ १७ ॥ हा जिनशेखर बांधवा ए, साधर्मिक गुणधार तो ॥ मुफ मूकीने किहां गयो ए, यो उत्तर एणी वार तो ॥ श्री० ॥ १७ ॥ धर्माराधनरकु थी ए, मूकीने उखकूप तो ॥ सुरपदवी सदि पामीया ए, जाणु एमति थि स्वरूप तो ॥ श्री० ॥ १५ ॥ एणे थवसरें श्रावी गोधिका रे, रस पीवा तिण नाय तो ॥ पान करी पाली वली ए, पुढे हो बलम्पो जाय तो ॥श्री॥२०॥ किदा सूवे से किदा ए, किदाम्लो एण मेल तो।

श्री शांतिनाथनो रास खंम हो ३० कष्टथी वादेर नीससो ए, जूठ जून कर्मना खेल तो ॥ श्री० ॥ २१ ॥ रवि पर्वत देखी करी ए, मूकी हो तेनु पुत्र तो॥ एकदिशि लेश्ने चालियो ए, मुलस धरी मति उच तो ॥ श्री० ॥ १२ ॥ यागें जाता एक हाथीयो ए, साहामो धायो विकराल तो ॥ सुलस विचारे हो चित्तमा ए, मूके नदि ए व्याल तो ॥ श्री० ॥ २३ ॥ अत नायो एक उखनो ए, बाजु थायु सन्मुख तो ॥ में वहु पाप समाचघु ए, पूव नव कोइ तिरक तो ॥ श्री० ॥ २४ ॥ नातो ते गज जयथकी ए, करी थाव्यो तत्काल तो ॥ करें काली नहालीयो ए, चितित थयु विसराल तो ॥ श्री० ॥ २५ ॥ पडतां दो नाग्यवशे तिहां ए,तरु उपर पड्यो थाय तो ॥ मास्या मरे नहीं ते सही ए, जस निरुपक्रम थायु तो ॥ श्री० ॥२६॥ शाखा हो अवलवी रह्यो ए, दृढचित्त सुलस कुमार तो ॥ गज तरु धधोले रह्यो ए, थर थर भ्रूजे थपार तो ॥ श्री० ॥ २७ ॥ सिह तिहा कणे यावीयो ए, गज दणीयो एमांय तो ॥ यामिप तस नक्षण करे ए, मत्स्य ज्यु ए नव न्याय तो ॥ श्री० ॥२७॥ वाघ जोरावर तिहा वली ए, याव्यो हो मास नद्देश तो ॥ एक इव्य कारण विट्ठ जणा ए, वढीया ते सुविशेप तो ॥श्री ॥ २५ ॥ यु६ करता वेढुनें ए, रात पडी तिण ठार तो ॥ सुलस विचारे चित्तमां ए, नाव्यो ए कर्मनो पार तो ॥ श्री० ॥ ३० ॥ तरु शाखायें ए कण दिशें ए, दीठो उद्योत थत्यंत तो ॥ मुलस विचारे ए शु दशे ए, जोउ जइ टले नाति तो ॥ श्री० ॥ ३१ ॥ जोता हो एक माला विचे ए, दीठो मणि तिदा एक तो ॥ पासें जगस्थानक वली ए, देखी चिते सुविवेक तो ॥ श्री० ॥ ३२ ॥ विपथपदर ए मुजगर्नु ए, शिरमणि र यण ए होय तो ॥ ले। करतल ते उतस्यो ए, हर्षे ते मणि जोय तो ॥ श्री० ॥ ३३ ॥ वाघ दरि दोय नासीया ए, ते मणिने उद्योत तो॥ रात गइ रवि उगीयो ए, प्रगटी पूर्वदिशें ज्योति तो ॥ श्री० ॥ ३४ ॥ बसे खमें पत्रीशमी ए, ढाल जणी मनरंग तो॥ख जग जीव सहे घणा ए, परियदने परसग तो ॥ श्री० ॥३५॥ सर्वगाथा ॥१२५।। श्लोक ॥६॥ ॥ दोहा ।। ॥ थये प्रनाते मणिरयण ते, गांठे वाधी सार ॥ चाल्यो थति उता वलो, सुलस अरण्य मझार ॥ १॥ नूरख्यो तरप्यो श्रति घणो, सहेतो ४८ ३७G जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. 5ख थपार ॥ साते दिवसे पामीयो, ते अटनीनो पार ॥२॥ समय दिन एक पर्वते, दीगो थनि प्रकाश ॥ तस अनुसार तिहाँ गयो, मनमा मुलस विमासि ॥ ३ ॥ धातुदी व मिव्या, करे धातुरस योग । मुलत तिहा कनो जइ, पूर्व कर्मने नोग ॥ ४ ॥ श्रादर देई स्पापीयो, तेहने निज पास ॥ भोजन थापे जावता, सुलस सह्यो विश्वास ॥५॥ सूता एक दिन तेहनी, गाउँ देखी गरछ । ठगनो ठोडीने लियो, अपहरे थनर ॥ ६ ॥ तस में वांध्यो थवर, तत्प्रमाण पापाए ॥ बल कारक एम बल करी, परधन हरे थजाण ॥ ७ ॥ ॥ दाल तेत्रीशमी॥ ॥ सामि सोहकर, श्रीशेरीश ए॥ ए देशी ॥ पाठली रयणी रे, सुलस ते जागीयो ॥ धातु धमता दु रह्यो निर्जागीयो ॥ त्रूटक ॥ निनांगीयो इहां अर्थ केरी, थाश महारी नवि फली ॥ बहु दिवस थया मुज धातु धमता, इव्य कोडी नवि मिती ॥ ए इव्य अर्थी करे व्यर्थी, अनिकिरिया अति घणी ॥ बहु पाप कर्मी नहिं धर्मी, थाश एदोनी सवि दणी ॥ १॥ यत ॥ धातु धमे विषु जा धणथाशा, सिर मुझे विषु जा रुवासा ॥ वेश धरे विणु जा घरयाशा, एतिनिवि याशा दूइ निराशा ॥ १ ॥ पूर्व ढाल ॥ प्रह उतीने रे, सुलस ते चालीयो ॥ मारगमाहे रे, बहु उस सालीयो ॥ ॥ सालीयो बहु उख तास मनमां, अर्थ विषु बडु वन नमे ॥ पूरवें खोया थरथ केरी, चित सघली चित्त दमे ॥ मनमाहे आशा अर्थ केरी, करु उपराजण नवी ॥ थावीयो थटवी शीर्षपुरमा, सबल शोना थनिनवी ॥ ॥ मणि वेचणने रे, बोडे गठी ए॥ पाषाण देखी रे, पज्यो नूपीठ ए ॥ ॥ पीठ पडियो करे हाहा, मुस्यो मुफने अति घणणे ॥ ते धातुवादीयें तगी थनुपम, रयण लीयो मुफ तणो ॥ अथवा नहीं तस का दूपण, दोष सवि मुज कर्मनो ॥ मन चिंतव्यं तस दोय क्याथी, लेश नदि जस धर्मनो ॥३॥ प्रव नव में रे, कर्म कीधां घणां ॥ केइ रण नाज्यां रे, होशे जन तां ॥ 5 ॥ जनतां नांज्यां तेम रण वली, वेवाव्य साधारणा ॥ में नल्यां होशे ते विगोशे, काल बद्दु नव प्रणा ॥ अथवा दरिड़ी नारी विधवा, श्व्य होशे वावना ॥ ते कर्म मुफने उदयें था नव, धावियां महारां कां ॥३॥ . श - १ श्री शातिनाथनो रास खंम हो. ३७ मन एम चिते रे, शुण जीवितें ॥ 5 खीयो कीधो रे, मुफने देव तें ॥ गादेव तें जोकीध उ खीयो,प्राण तजवां में हवे ॥ कृष्ण चनदिशि रयण पितृवन, जई गाढस्वरें चवे॥वैताल नूत पिशाच निमुणो, मांस वहेंचु मुज तणु ॥ तुमें जेम जाणो तेम थावी, करो नदण तनु तणु ॥५॥ कर ले काती रे, वह थाव्या तीहा ॥ वैतालादि रे, सुलस थवे जीहा ॥ ७ ॥ जिहा सुलस ले ते तिहाकणे, यावी एणिपरें उच्चरे ॥ वैराग्यथा जो मांस विक्रय, करे ठे तुं श्रादरें ॥ तो नियत हाकणे चूमि उपरें, पज्यो ते निर्नय थ ॥ सदु पासें विटा वव्या हवे, वात सुणो तिदा जे दुइ ॥ ६ ॥ एहवे थवसर रे, जिनशेखर जयो ॥ अवधि झानें रे, जो थल जीयो ॥ ॥ अलजीयो जो तुरत सोइ, सुलस पासें थावीयो ॥ ते नूत नाग दता मावा, तास जश्वोलावीयो ॥ जो सुलस श्रावक यह तुम प्रति, नमु बु कर जोडीने, ते मुफ याराधन मुहावी, बूजीयो मद बोडीने ॥ ४ ॥ थयो सुरलोकें रे, यष्टमे हु सदी ॥ सामानिकनी, ऋदि में लही ॥ ३० ॥ में लही झदि ए तुज प्रसादें, धर्मगुरु मुफ तु थयो ॥ तप कार तादरो थठे सवलो, ते न जाये में कह्यो ॥ एम निमुणी ते पण सु लस करो, जाणी जिनशेखर सुरो ॥ कहे धर्मवाधव तुमने पण, दु नमु लु सादरो ॥ ७ ॥ देव तव चोले रे, गु तुफ प्रिय करु ॥ सुलस कहे तुम रे, दो दिल वयु ॥०॥ दिल त तो पण कहो मुझने, कर्म हवे केतु रघु ॥ निविड ए थतराय केरु, ज्ञानथी जे तुम्हें लघु ॥ कहे देव ए तुम कीण सरिखु, कर्म रसु लवलेशथी ॥ पण नोगकर्म थडे घणु तेणें,चरण द मणा तुज नथी॥ए। माणिक्य सोवन रे, धनराशि घणी ॥ सुर बद्द ढो रे, तेदना गुण नणी ॥ ॥ गुण नणी ढो साथ साथें, नयर तस पदों चाहियो ॥ मुर शीख मागी गयो स्थानक, शुनें थच्चन नसाडियो ॥ पुर मांहे सघले वात पसरी, नयरपति साहमो जय ॥ बढ़ करी उत्सव न यरमांहे, लाविया दर्पित थ ॥ १०॥ निजघरे थाव्या रे, साथ व जन घणा ॥ सदु जन बोले रे, दर्प वधामां ॥ ॥ वधामणा लीये नामणा तेम,प्रथम नारी पीयु तणावद दिवस वदालेसर पधास्या, थाज उलट थति घणा ॥ कत कामिनी दोय मलिया, दिवस वलीया सु खना ॥ थतराय माग सवे घाग, दिवस नाता खना ॥ ११ ॥ कामप ते ३७ जैनकथा रनकोप नाग आठमो. 5ख थपार ॥ साते दिवसे पामीयो, ते बटवीनो पार ॥ २ ॥ समय दिन एक पर्वतें, दीगे थमि प्रकाश ॥ तस अनुसार तिहाँ गयो, मनर्मा सुलस विमासि ॥ ३ ॥ धातुर्वादी बहु मिल्या, करे धातुरस योग । रासस तिदा कनो जइ, पूर्व कर्मने नोग ॥ ॥ यादर देई स्थापीयो, तेहने निज पास ॥ जोजन थापे नावता, सुलप्स जो विश्वास ॥५॥ सूता एक दिन तेहनी, गाउँ देखी गरछ ॥ गनो ठोडीने लियो, अर्पबरे थनर ॥ ६ ॥ तस गमें वाध्यो थवर, तत्प्रमाण पापाण || बल कारक एम उल करी, परधन हरे थजाण ॥ ७ ॥ ॥ ढाल तेत्रीशमी॥ ॥ सामि सोहकर, श्रीशेरीश ए॥ ए देशी ॥ पाठली रयणी रे, सुलस ते जागीयो ॥ धातु धमता दु रह्यो निर्नागीयो ॥ त्रूटक ॥ निनांगीयो यहाँ अर्थ केरी, थाश महारी नवि फली ॥ वद्दु दिवस थया मुझ धातु धमतां, इव्य कोडी नवि मिली ॥ ए इव्य थर्थी करे व्यर्थी, यनिकिरिया अति घणी ॥ बहु पाप कर्मी नहि धर्मी, याश एदोनी सवि दणी ॥ १॥ यत ॥ धातु धमे विषु जा धण्याशा, सिर मुझे विषु जा रुवासा ॥ वेश धरे विणु जा घरथाशा, एतिन्निवि श्राशा दूर निराशा ॥ १ ॥ पूर्व ढाल ॥ प्रद उतीने रे, सुलस ते चालीयो ॥ मारगमाहे रे, बहु 5 स्व सालीयो ॥ ॥ सालीयो बद 5 ख तास मनमा, अर्थ विषु बडु वन नमे ॥ पूरवें खोया थरथ केरी, चित सघली चित्त दमे ॥ मनमाह श्राशा यर्थ केरी, करु उपराजण नवी ॥ यावीयो थटवी शीर्षपुरमा, सबल शोना अनिनवी ॥ ॥ मणि वेचणने रे, बोडे गठी ए॥ पाषाण देखी रे, पच्यो नूपीठ ए॥ ॥ नूपीठ पडियो करे हाहा, मुस्यो मुफने श्रति घणणे ॥ ते धातुवादीयें उगी अनुपम, रयण लीयो मुफ तणो ॥ अथवा नहीं तस कार दूषण, दोष सवि मुफ कर्मनो ॥ मन चिंतव्यु तस दोय क्याथी, लेश नहिं जस धर्मनो ॥३॥ प्रव जव में रे, कर्म कीधा घणां ॥ केश रण नाज्यां रे, दोशे जन तणां ॥०॥ जनतणां नांज्यां तेम रण वली, देवव्य साधारणा ॥ में जरख्यां दोशे ते विगोशे, काल बनु नव पूरणा ॥ अथवा परिछी नारी विधवा, इव्य होशे वावस्यां ॥ ते कर्म मुफने ठदये था नव, थावियां महारां कलां ॥४॥ २ श्री शातिनाथनो रास खंम छो. ३२ का सुलसने, कीधो तास पसाय ॥ १ ॥ सुलसे जइ रायने कत्यु, राय घणे परिवार ॥ गुरुवदणने यावीयो, तिण उद्यान मकार ॥ २ ॥ पाचे अनिगम साचवी, करि पंचांग प्रणाम ॥ गुरु वादी वेग सवे, तिहां यथोचित स्थान ॥३॥ ॥ ढाल चोत्रीशमी॥ ॥ मोरी मातजी रे,थनुमति यो व्रत थादरु रे ॥ ए देशी ॥ गुरु नांखे तिदा देशना रे, मीती थमीय समाणी रे ॥ ए नरनव दोहिलो लह्यो रे, कां ३ हारो गुणखाणी रे ॥ १ ॥ मोरा प्राणीया रे, एद धर्म नित्य थादरो रे ॥ शुनगुण वाणीया रे, मत प्रमाद समाचरो रे ॥ ए थाकणी ॥ घूणा दर न्यायें करी रे, ए सामग्री लाधी रे ॥ ते हवे तुमें सफली करो रे, जैनक्रियाने साधी रे ॥ मोरा० ॥ ॥ वायु उजाणु जाय बे रे, न लीये लगार विसामो रे ॥ काल कुलालना चक्र ज्यु रे, एह फिरे थ विरामो रे ॥ मो॥३॥ पंच प्रमादमाहे पख्या रे, थाप सवारथ मा ह्या रे ॥ काल उजातो नवि लहे रे, मोहपिशाचे वाह्या रे ॥ मो० ॥ ॥ ४ ॥ सूर्यगतागत थाउखु रे, प्रतिदिन ए य पामे रे ॥ जन्म जरा दिक देखीने रे, क्षण निर्वेद न कामे रे ॥ मो० ॥ ५॥ मोहमद्यपाने करी रे, जग मतवालु दीसे रे ॥थात्मतत्त्व न उलखे रे, साचु ए विश वा वीशे रे ॥ मो० ॥ ६ ॥ गुरुवाणी निसुणी सवे रे,जीव नविक मन द रख्या रे ॥ देव धर्म गुरुतत्त्वने रे, सूघे लक्षण परख्या रे । मो० ॥ ७॥ थवसरें पूजे तिहा रे, मुनिने सुलस शिर नामी रे ॥ केम न रही प्रठ मादरे रे, सपद कटें पामी रे ॥ मो० ॥ ॥ देश ज्ञान उपयोगने रे, नांखे एम चननाणी रे ॥ सपद थावीने गई रे, मुण हेतु तस गुणखा णी रे ।। मो० ॥ ए ॥ ताम्राकर गामें हतो रे, तारचइ थनिधानो रे ॥ कौटुषिक कुलमां वडो रे, अक्षावान ते दानो रे ॥ मो० ॥ १० ॥ याचक श्रमणाविक जणी रे, दान थवारित थापे रे ॥ श्रावक दुतो थहोनिशे रे, मन शुनकरणीमा स्थापे रे॥ मो० ॥ ११ ॥ एक दिन थानना योगथी. रे, तस मनमा एम थाव्यु रे ॥ दा दीधु में श्रति घणु रे, पण तस फल नवि पाव्यु रे ॥मो॥१२॥ / दीधे गुण नीपन्यो रे, थाज पढी नवि वेतु रे । गुणकीर्चि वोले नहीं रे, पातु कां न लेबु रे ॥मो॥१३॥ दानादिक २० जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. ताका रे, पण थनुरागिणी ॥ वेणीवघे, मितांचकनागिणी ॥ पूज गिणी देखी तेदने पण, करी राखी मेहिनी ॥ दोय नारीसाचे नोबी लसे, विमल कीर्ति जेहनी ॥ एक दिवस चिते चित्तमांडे, जीव परिषद मिति विना॥ते 5 ख बहुला सह्या परिग्रह, व्रत लीघा एकमना ॥ १५॥ इव्य यनेरु रे, धर्मव्यय करे ॥ साते क्षेत्रे रे, परिगल वावरे ॥३०॥ वावरे साते क्षेत्रं वदुलु, वित्त तेम विलसे वली ॥ एक दिवस थाना उदयथी तस, इव्य खूटयु थति मली ॥ दिलमाहे विलखो पयो सुलत ते, इव्य चाहे जेटले ॥ थाउमा सुरलोकथी सुर, आवी पूरे तेटले ॥ १३ ॥ कहे मुफ वेग रे, तुम चिता किसी ॥ जे तुम जोश्ये, ते लेजो उनसी ॥ ॥ वलसी लेजो सृष्टि करीने, कहे सोवन राशिनी । तेणें निजपरियह विरति माफक, लीयु नहि मति थाशनी ॥ सुर करे मुलसने एद रुडं, कस्यु थातमदित नणी ॥ ए श्व्य विण परिमाण कीधे, दीये वेदन यति घणी ॥ १४ ॥ यत ॥ यथा यया योलोन' स्या, दम्पारंपरिग्रह ॥ तथा तथा मुख नृणां, धर्मास्तिमि प्रजा यते ॥ २ ॥ पूर्वढाल ॥ वाबित धन देश, मुलसने ते गयो ॥ हर्ष हि यामा रे, तस बमणो थयो ॥ ॥ थयो बमणो सुलस एक दिन, गयो वाठी मन रुती ॥ तिदा कर्मयोगें निधान देखी, चित्तमा चिते वली ॥ ए व्य न घटे मुफ लेवु, व्रतनग ते थादरो ॥ मन एम चिती निरखी नजरें, सुलस पागे उसयो ॥ १५ ॥ दीतु रायने रे, सुनटें तिहां कणे ॥ पुरमा जश्ने रे,नृप थागें जणे ॥ ॥ श्रागें जणे तुमें रही बाना, सुल सनी परीक्षा करो ॥ तेणें सात दिवसा लगी परस्यो, जाणीयो गुण मणि नल्यो। नृप तेडि पूढे कदो अंडे,केम निधि लीधो नहीं ॥ कहे मुलस मादरे नियम उपर, लीये व्रत नांजे सदी ॥ १६ ॥ गुणवत जाणी रे, निज मारनी ॥ कूची सोपी रे, नृप दरबारनी ॥ ॥ दरबारनी सवि वात नृपति, सुजसने पूबी करे ॥ पुरमांहे सघ सुनस पसनो, सन मुख उच्चरे ॥ ढाल ब खंग तेत्री, शमी सपूण थई ॥ एम नियम पाले धन्य ते नर, नमो तेहने पर्ने जश् ॥ १७ ॥ सर्वगाथा॥११॥४॥ ॥दोहा॥ ॥ण अवसर तिदा थाविया, अमरचश् मुनिराम ॥ यावी नर , कीर्चि , श्री शातिनाथनो रास खंगो ३७३ ॥अथ पाठदिशिपरिमाण व्रतसवंध ॥ ॥दोहा॥ ॥ पच अणुव्रत श्म कह्यां, हवे त्रण गुणव्रत तंत ॥ चक्रायुध नरवर सुणे, कहे शांति जगवत ॥ १ ॥ दिशिपरिमाण कत्यु प्रथम, जोगोपनोगनु मान ॥ अनर्थदंमविरमण वली, एत्रण गुणवत जाण ॥२॥ कर्ध्व अधो तीम दिशे, यधिकगमन थनाजोग ॥ यतिचार त्रण ए कह्या, मुगु वीजा दोय योग ॥ ३ ॥ देत्र वृद्धि चोयो कह्यो, स्मृतिनु थतान ॥ थतिचार ए टालीने, पालो दिशिपरिमाण ॥ ॥ लोगोदधि सके लीयो, जेणे ग्रा ए व्रत सार ॥ त्रस थावर वह जीवने, ते थनय तणो दातार ॥ ५ ॥ तप्तलोह गोलक समु, थविरतिपाप ए जीव ॥ सकल जीवप्रत्ये दहे, तेणें यारंन अतीव ॥ ६ ॥ यद्यपि सघले गमननी, शक्ति नथी श्णे देह ॥ तो पण अवर निवध तस, दोवे नहीं सदेह ॥ ॥ दिशिपरिमाण कस्या विना, पामे वढु सुखराशि ॥ जेम स्वयंनू देवनी, नवि पदोती मन श्राश ॥ ७ ॥ चक्रायुध कहे स्वामीने, कोण व यंजू देव ॥ किहा थयो किणि परें 5 ख लघु, ते नाखो जिनदेव ॥ ए ॥ ॥ ढाल पांत्रीशमी॥ ॥ उठ कलालण जर घडो हे ॥ ए देशी ॥ शांतिप्रचु कहे जलो हे, गगातट इरों नाम॥गाम सुदत सोदामणु है, राजा तिहा थनिराम ॥१॥ नवियण नावे सांनलो हे ॥ दिशिपरिमाण विचार ॥ पालता सुख पा मीयें है, लहियें नव निस्तार ॥ न० ॥ ३ ॥ नाम स्वपनदेव ने हे, तिहां कौटुविक एक ॥ करे कपि कर्मारननु हे, नही सतोप विवेक ॥ ज० ॥ ॥३॥ निज्ञ विरामे एकदा हे, ते चिते एम रात ॥ मनोवांडित न हुन कदा हे, लान ए कर्मनी वात ॥ न० ॥ ४ ॥ गमन करु देशांतरें दे, लावु बहु धन कोडि ॥ जेम पूराये माहरा हे, सघला वाबित कोड ॥ ॥ ५॥ करी सामग्री चालीयो दे, उत्तर पंथ थपार ॥ लक्ष्नीशी पकपुर गयो दे, करवा वणिज व्यापार ॥ ॥ ६ ॥ तेद नयरमादे वसी हे, करे व्यवसाय उपाय ॥ लान दुन निज कर्मने दे, थनुसार तिण वाय ॥ ॥ ३ ॥ पण तृप्तो नहिं जीवडो है, देखी बढ धन वत ॥ परदेशी पूढे घण दे, कुण कुण वेश महंत ॥ ॥ ७॥ वात ३२ जैनकया रत्नकोप नाग थाउमो. तस दीजीयें रे, जे मुख कीर्ति वोले रे॥j दोघे होये साधुने रे,जे गाते ख्याति न खोले रे ॥ मो० ॥ १४ ॥ एम विध विच पायो तेरों रे, कर्म कविन अतरायो रे ॥ वली देखी मुनि अन्यदा रे, दान देवा मति पायो रे ॥मो॥१५॥ एम थनेक वारे तेणें रे,दीधु खमधु दानो रे ॥ ते समावि मरी ययो रे, सुर सोधर्म विमानो रे ॥मो॥१॥ तिहाथी चविने तुंगो रे, इन्य नदन गुणवतो रे ॥ जेम दीधु तेम पामीयो रे, वात करी मुनि तो रे॥मो० ॥१७॥ ते माटे मनगुड़िया रे, देवु दान विवेकें रे॥पांचे दूपल माहिले रे, सानित न करीये एके रे ॥ मो० ॥ १७ ॥ दान शील तप ए जलां रे, मन शु दोय लेखे रे ॥ जो थादरीये नावथी रे, तो फल थापे विशे रे ॥ मो० ॥ १५ ॥ सुप्लस सुणी प्रतिबूजीयो रे, राप कहे यो शीखो रे ॥ नवजलनिधिनी तारिणी रे, लेश दु हवें दीखो रे ॥मो० ॥ २० ॥ राय कहे तु पण सही रे, लेश व्रत तुऊ साय रे ॥ जोड मि ली जुगतें नली रे, नलु कस्यु जगनाथें रे ॥ मो० ॥ २१॥ गुरु वांदी घरे यावीयो रे, पुत्रने सोंपी राजो रे ॥ वेदुजणे सयम थावस्तु रे, साखां थातमकाजो रे ॥ मो० ॥ २२ ॥ सवेग रसमा जीलता रे, तप तपता थ ति गाढा रे ॥ शुज नावनमा वर्चता रे, सफल करे रात दहाडा रे ॥ मो० ॥५३॥ व्रतनावन नावे जली रे, समतावत सतोपी रे ॥ मुनिमारग अव गाहतो रे, थातमगुणनो पोपी रे ॥ मो० ॥ २३ ॥ सुजस मुनि केवल लघु रे, घातिकर्म क्षय घाती रे ॥ 5 खदायी एथनादिनो रे, जाण्यो परिग्रह साथी रे ॥ मो० ॥ १५ ॥ कहे नविकजन बाग रे, एह परि यह मूको रे ॥ धनमूर्धा उतारीने रे, जैनधर्ममा ढुको रे ॥ मो० ॥ ॥ २६ ॥ मुलस मुनि मुकें गया रे, धनत चतुष्टयधारी रे ॥ सादि अनत नागें रह्या रे, तेह नमो सुविचारी रे । मो० ॥ २७ ॥ ए पंचम व्रत उपरें रे, सुण चक्रायुध राजा रे ॥ शांति प्रचुली एम कहे रे, व्रत पाले शिवराजा रे ॥ मो० ॥ २७ ॥ बरे खफ योत्रीशमी, रे, ढाले मुलस अव दात रे ॥ राम कहे व्रत पालतारे,वाघे जग यास्याति रे ॥ मो० ॥२॥ इति पंचमपरिग्रहपरिमाणवतोपरि मुलसकथानकं समाप्तम् ॥ इति पंच अणुव्रतकथानकानि, ॥५॥ सर्वगाथा ॥१३१५॥ श्लोक तपा गापा ॥१४॥ - , श्री शांतिनाथनो रास खम हो. ३०३ ॥ यथ पष्ठदिशिपरिमाण तसबंध ॥ ॥ दोहा॥ ॥ पंच यषुवत इम कह्यां, दवे त्रण गुणव्रत तत ॥ चक्रायुध नरवर मुणे, कहे शांति नगवत ॥ १ ॥ दिशिपरिमाण का प्रथम, जोगोपनोगनु मान ॥ अनर्थदमविरमण वली, ए त्रण गुणव्रत जाण ॥ ॥ मर्ध्व अधो तीर्जी दिश, थधिकगमन अनानोग ॥ अतिचार त्रण ए कह्या, मुगु वीजा दोय योग ॥ ३ ॥ क्षेत्र वृद्धि चोयो कह्यो, स्मृतिनु थतान ॥ थतिचार ए टालीने, पालो दिशिपरिमाण ॥४॥ लोनोदधि सके लीयो, जेणें ग्रत्यु ए बत सार ॥ त्रस थावर वद् जीवने, ते यनय तणो दातार ॥ ५ ॥ तप्तलोह गोलक समु, अविरतिपाप ए जीव ॥ सकल जीवप्रत्ये दहे, तेणें यारंज अतीव ॥ ६ ॥ यद्यपि सघले गमननी, शक्ति नथी इणे देह ॥ तो पण अवर निबध तस, होवे नहीं सदेह ॥ ॥ दिशिपरिमाण कस्खा विना, पामे वह 5 खराशि ॥ जेम स्वपनू देवनी, नवि पहोती मन थाश ॥ ७ ॥ चक्रायुध कहे स्वामीने, कोण व यंनू देव ॥ किहा थयो किणि परें 5 ख लघु, ते नाखो जिनदेव ॥ ए ॥ ॥ ढाल पांत्रीशमी॥ ॥ नत कलालण नर घडो हे ॥ ए देशी ॥ शांतिप्रनु कहे जलो हे, गगातट श्रों नाम॥गाम सुदत सोहामणु दे, राजा तिहा थनिराम ॥१॥ नवियण नावे सानलो हे ॥ दिशिपरिमाण विचार ॥ पालतां सुख पा मीये हे, लहियें नव निस्तार ॥ न० ॥ २ ॥ नाम स्वपनूदेव ने हे, तिहा कौटुविक एक ॥ करे रुपि कारननु है, नही सतोप विवेक । न० ॥ ॥ ३ ॥ निशविरामे एकदा हे, ते चिते एम रात ॥ मनोवाबित न दु कदा हे, लान ए कर्मनी वात ॥ ज० ॥ ॥ गमन करु देशांतरें है, लावु पदु धन कोहि ॥ जेम प्राये मादरा , सघला वालित कोड ॥न० ॥ ५ ॥ करी सामग्री चालीयो हे, उत्तर पंथ चपार ॥ लक्ष्नीशी पंकपुर गयो दे, करवा वणिज व्यापार ॥ न० ॥ ६ ॥ तेद नयरमाहे वसी हे, करे व्यवसाय उपाय ॥ लान दु निज कर्मने दे, घनुसारें तिण ताय ॥ ॥ ॥ पण तृप्तो नदि जीवडो हे, देखी बदु धन वत ॥ परदेशी पूढे घणा दे, कुण कुण देश महत ॥ ज० ॥ ॥ वात ७ ३४ जैनकथा रखकोप नाग आग्मो. सुणी तेहोने मुखे दे, नव नवी होश परंत ॥ प्रायें नव नव सनो रे लोनीने लोन दवत ॥ ज० ॥ ५ ॥ यक्त ॥ श्रूयमाणा पुनारेशा, रा जान सेवितास्तथा ॥ सर्व दूरस्थितं वस्तु, स्यात्यायोविस्मयावहम् ॥ पूर्वढाल ॥ कोक नगरे थावीने दे, वणिकनी पास ॥ किडांपी तुमें पर लावीया दे, ते परकाशो उन्नास ॥ ॥ १०॥ ते करे देश विक्षात माहे, बहु मेलीने थाज ॥ थमो थाव्या ह शहा हे, सीमां बांगित काज ॥ ज० ॥ ११ ॥ काश्क सवल लेने हे चाल्यो चिलातनी वाट । साथ सहित थइ सावदो दे, जुनवि लोननो गठ ॥ ॥ १५ ॥ तप्तवालुका नामनी , विचि उन्नधी रे पथ ॥ हिम शीतल मारन चढयो दे, जिदा वहु उत्पथ ॥ ज० ॥ १३ ॥ तिहाथी गिरिमानें गयो है, अटवी विपम थपार ॥ लोनवशे शु नवि करे दे, प्राणी गीकार ॥ ज० ॥ १४ ॥ एणी परें नमतो एकदा हे, पदोतो देश विला त ॥ राजविरोध तिदा घणो दे, म्लेडने अन्य सघात ॥ ज० ॥ १५ ॥ साथ चिलातनो जाणीने दे, खूटी लीयो सवि सार ॥ साथने पागे वा लीयो हे, निज मदिर तिणवार ॥ ॥१६॥ नजर वचीने तेहोनी हे, नाठो स्वयं देव ॥ मन चिते महोकम थयो है, करन वाबित देव ॥ ज० ॥ १७ ॥ करम सयोगें जा पडयो दे, अबरशिगुने रे पास ॥ कर चरणें तेणे बांधियो हे, रुधिर विलव्यो रे तास ॥ न ॥ १७ ॥ नासम्मो जय थटवी वच्चे दे, ऊकही करी श्रग जोर ॥ मृत जाणी गृध्र पंखीयां हे, बाया करे बदु सोर ॥ ज० ॥ १५ ॥ चचुपदारें चूटिने दे, तस जहण करे तेद ॥ मन चित्यु मनमा रघु हे, यति लोनें गति एह ॥ न० ॥ ॥ २०॥ गृध्रने बाध्या जाणीने हे, यलगाथी निझबाल ॥ बाणे ते पंखी दणे दे, जुन जुन कर्म चमाज ॥ न० ॥ २१ ॥ सांझ परपे ते स्वयंजुने दे, तेडी लावे रे गेह ॥ बध बोडी बेसारिने हे, जीमारे ससनेह ज०॥ २२ ॥ रात राखी स्वयंचने हे, मविरमांदे प्रनात ॥ वनमा नाखे बाधीने हे, जुन जुन कर्मनी वात ॥ न० ॥ १२ ॥ एम मुख सहेता एक दिने दे, वनमा वाघण एक ॥ थावी नूखी अति पण हे, ४॥ वाघण ले स्वयंने दे, चाली गीयो दे,नूस्या जाणीने बाल ॥ ज० का नाग सबर शिशु बेक ॥ ना वन विकराल॥

श्री शातिनाथनो रास खंम हो. ३न्य ॥ ५५ ॥ वधन बोडी तेदनां है, मूकी ते मृतप्राय ॥ निज वालकने खोलवा दे, वाघण चाली वनमाय ॥ न० ॥ २६ ॥ पूठे अवसर पामीने है, नाठो स्वयष्ठ रे कत ॥ नाही नदीमा जइ मिव्यो हे, केशक सायनी पूत ॥ न० ॥ २७ ॥ अनुक्रमें मदिर यावियो हे, श्म चितवतो रे चित्त ॥ धनलोनें बदु धरा नम्यो दे, न गइ दारिप इति ॥ ज० ॥ २७ ॥ थतिलोनी यति उख लहे हे, तेहमां नहि सदेह ॥ जेहवो गयो तेवो धावियो हे, जीव फरी तु गेह ॥ ज० ॥ ५५ ॥ धिक् तुमने ससारमा हे, रहेतां कवण सवाद ॥ नित्य नती निजवधुमां हे, तुज अवगुण थप वाद ॥ ॥ ३० ॥ जाग्यसयोगें मुनि मल्या हे, सीधो सयमनार ॥ मुनिवर मारग पालतो हे, लोन न राखें लगार ॥ ज० ॥ ३१ ॥ स मता सूधी मन धरे हे, पाले शुमाचार ॥ साधु स्वयं पामिया हे, सुरपदवी अवतार ॥ ज० ॥ ३२ ॥ विशिविरमणे जीवडो हे, लहे एणी परे वगु 5 ख ॥ एम जाण ए व्रत धरो हे, जेम लहो अविचल मुख ॥०॥ ३३ ॥ बके खमें पात्रीशमी हे, ढाल बछे व्रत जाण ॥ राम कहे गुणवतना दे,करो नित्य उठी वखाण ॥न॥३॥इति पष्ठ विशिविरमरावते स्वपञ्चदेवकथानकम् ॥६॥सर्वगाथा ॥१३५७॥श्लोक तथा गाथा मली॥६५॥ ॥अथ सप्तम नोगोपनोगविरमाव्रत सवध ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ वारमाहे व्रत सातमु, गुणव्रत वीजु सार ॥ कहे प्रचु चक्रायुध प्रत्ये, नविक जीव उपकार ॥ १ ॥ जोजन ने वली कर्मथी,विड ने कत्यु तेह ॥ जोग भने उपभोगनु, मान करो गुणगेद ॥ २ ॥ थनतकाय वली थनक्ष्यनु, नोजन वर्जे जाणि ॥ तेह तणो लवलेशथी, मुण विस्तार सुजाण ॥ ३ ॥ अनक्ष्य तजे सघj तज्युं, तेहनां वावीश नाम ॥ एपंच परि एचठ विगश्तेम, १०दिम वरजो गुणधाम ॥ ४ ॥ ११ विष १श्करगा सवि १३मृत्तिका, १४रयणीनोजन जाण ॥ १५वदुबीजा मत वावरो, तेम १पथनत १ सधाण ॥ ५ ॥ १घोलवडा १ एवायंगणां, ण्याजाण्या फल फल ॥ ११तुफल वलि २श्चलितरस, वर्जे होय सवि शुल ॥ ६ ॥ उत्तम गृही न वावरे, ए वावीश थनक्ष्य ॥ एकावश गुण पूरो सही, कहिये तेद सुदक्ष ॥ ७ ॥ काय थनत न वावरे, जिहा थनतजीव ३७४ जैनकथा रनकोप जाग आम्मो. सुणी तेदोने मुखे दे, नव नवी होश धरंत ॥ प्रार्य नव नव रेसनो लोनीने लोन दवत ॥०॥ ए ॥ यमुक्तं ॥ श्रूयमाणा गुलादेशा, रा जान सेवितास्तथा ॥ सर्व दूर स्थित वस्तु, स्यात्यायोविस्मयावहम् ॥१॥ पूर्वढाल ॥ कोश्क नगरे थावीने दे. पूढे वणिकनी पास॥ किहांपी तुमें पर लावीया दे, ते परकाशो उन्नास ॥न ॥ १०॥ ते कर देश चिलात मांदे, बहु मेलीने थाज ॥ थमो थाव्या ह हा दे, सीपी गांजित काज ॥ ज० ॥ ११ ॥ काश्क सरल सेक्ने दे, चाल्यो चिलातनी वाट. साथ सहित थ सावदो है, जु नवि लोननो गठ ॥ ॥ १५ ॥ तप्तवालुका नामनी हे, विचि उल्लघी रे पंथ ॥ हिम शीतल मारन चढयो दे, जिहा बहु के उत्पथ ॥ ज० ॥ १३ ॥ तिहाथी गिरिमार्ने गयो , थटवी विपम अपार ॥ लोनवशे गु नवि करे दे, प्राणी गीकार ॥ ज० ॥ १४ ॥ एणी परें जमतो एकदा हे, पहोतो देश चिला त ॥राजविरोध तिदा घणो दे, म्लेष्ठने अन्य सघात ॥ ज० ॥ १५ ॥ साथ चिलातनो जाणीने दे, लूटी लीयो सवि सार ॥ साथने पाडो वा लीयो दे, निज मदिर तिणवार ॥ ॥ १६ ॥ नजर वधीने तेहोनी हे, नाठो स्वयंठ देव ॥ मन चिते मदोकम थयो हे, करण वानित देव ॥०॥ १७ ॥ करम सयोगें जा पडयो दे, शबरशिशुने रे पास ॥ कर चरणें तेणे बांधियो हे, रुधिर वितव्यो रे तास ॥ न ॥ १७ ॥ नास्मो जई थटवी वचे हे, फकडी करी थग जोर ॥ मृत जाणी गृध्र पंखीयां दे, थाया करे बहु सोर ॥ ज० ॥ १५ ॥ चचुप्रहारें चूटिने हे, तस लक्षण करे तेद ॥ मन चित्रं मनमां रघु दे, यति लोनें गति एद ॥ ज० ॥ ॥ २० ॥ गृध्रने श्राध्या जाणीने दे, अलगाधी निक्षबाल ॥ पारो ते पंखी दणे दे, जुन जुन कर्म चमाल ॥ ॥ २१ ॥ सांज पडघे ते स्वयंछने दे, तेडी लावे रे गेह ॥ बध बोडी बेसारिने हे, जीमाडे ससनेह ॥०॥ २५ ॥ रात राखी स्वयंचने हे, मविरमांदे प्रनात ॥ वनमा नाखे बाधीने दे, जुन जुन कर्मनी वात ॥ न०॥१३॥ एम व सदेता एक दिने हे, वनमा वाघण एक ॥ श्रावी नूस्वी अति घणु है, नाग शबरशिशु डेक ॥ न० ॥ २४ ॥ वाघण लेइ स्वपंजुने दे, चाली वन विकराल ॥ निजस्थानक ते पाणीयो देनूस्यां आणीने बाल न.

श्री शांतिनाथनो रास खंम हो. ३७ ॥२॥ गाल कर्म वार।यें ने, वन्न गंमो दूर ॥ शकट नाटी स्फोट महेलो, सुख दोवे पूर ॥ क० ॥३॥ करम पंच बामिये, पांच वणिज वार । वांतनो व्यापार नूंमो, नाख दूरे मार ॥ क० ॥ ४ ॥ रस केश विप केरो, वणिज निखरी गम ॥ पापनो परिहार कीजे, धर्म साथे मांग ॥ क० ॥ ५॥ यंत्रपीलण ने निबन, पापकारण जाण ॥ दाव थनि दान देतां, दोय गुणनी हाणि ॥ क० ॥ ६ ॥ शोपवे जल जाणjथी, नीचमा शिरदार ॥ असतीपोपण वारीयें तो, पामी गति सार ॥ क० ॥ ७ ॥ एह पन्नर पंच नोगें, वीश थतिचार ॥ एहनो व्यासग मदेलो, कहिये वारं वार ॥ क ॥ ७ ॥ जोग उपरें नावीयें, जितशत्रुनो दृष्टांत ॥ दा खीये नित्यमंमिता, उपनोग कपर वात ॥ कम् ॥ ए ॥ कहे प्र छ ए नरतमां, वसंतपत्तन नाम ॥ राजवी जितशत्रु रूडो, नामने परि णाम ॥ क० ॥ १० ॥ नाम सुवुदि मत्री साथें, अश्व जोवा काम ॥ चा लीयो जितशत्रु राजा, अश्व खेल्यो ताम ॥ का ॥ ११ ॥ वाग खेचे पवननी परें,दोडीया हय दोय ॥ राजा ने मत्रीश दोनु,नाखे जगत सोय ॥क० ॥ १२ ॥ तीन दिवस वनमांहे, न मन्यु तेहने नीर ॥ केडेथी सवि सैन्य श्राव्यु, पुरमा थाएया वीर ॥ क० ॥ १३ ॥ जोजन कीयां ना वतां, थाकंठ नूख्ये जोर ॥ माय नहीं उडकार मांदे, एदवो जिम्यो घोर ॥क० ॥१५॥ रातमा थाहार वाहिर, वमनमार्गे जाय ॥ पेटमांदे चूक उठी, बालस विजस श्राय ॥कण्॥१५॥ राय ते परलोकमांडे, गयो तेणी वार ॥थार्तध्याने ते मरीने, थयो व्यंतर सार ॥॥१॥ जोगना परिमाण पाखे, एहवी गति दोय ॥ गति मति खोइ वेसे,दसे सङ कोय ॥ क० ॥ १७ ॥ सांजलो परिजोग ठपरें, कहे श्रीजिनशांति ॥ नित्य ममिता नारि केरी, वात सुणो खाति ॥ क० ॥ १७ ॥ एदिज नगरमांदे हू, थमिदेव विप्र ॥ वेदनो ते जाण सूधो, करम करे विष का ॥ १५ ॥ तेदने घरे ले सुनदा, नामथी वर नारि ॥ कंतने थतिवालही, प्राणनो थाधार ॥ क० ॥ २० ॥ तेह यांनण लोकपूजित, वित्त पाम्यो नूरि ॥ थगनूपण नारीने एणे,कीधां थानदपूर ॥ क० ॥ २१ ॥थगथी क्षण मात्र थलगा,न उतारे तेद ॥ कतजी तो नित्य वारे, पहेरमा तु एद ॥ क० ॥ २२॥ कोइ पर्व पदेरीयें ए, चोरनु इदा जोर ॥ केतने कहे , ३६ जैनकथा रनकोप जाग धाममो. घात ॥ सिस्थकी पण बनत गुण, जेहमा जीवसंपात पतः। नृन्योनैरयिकाः सुराश्च निखिला. पंचाक्षतिर्यग्गणोपक्षापावलनोपयोग ममी संख्यातिगा नापिता ॥ तेन्योनूजलवायव समधिका', प्रोतापमान क्रम, सर्वेच्य शिवगा यनतगुणितास्तेन्योप्पनतांशगा॥१॥पूर्वमत । नाम कह्या बत्रोश तस, यारिजवेश प्रसि ॥ गुणवतधीजे पारीने, परिद रिये मति ६ ॥ ए ॥ १सूरणकद निवारी, श्वजकद तेम पार । श्याईहरिश परिहो, मृगवेर विनिवार ॥ १० ॥ पवाईकपूर पता वली, विरातिका दोय वेलि ॥ तिम कुवार एयोदर १ गलो, ११सान कदने मेल ॥ ११ ॥ १श्वशकरेल १३गकर वली, जे वली १४सामी थाय ॥ ते लवणकने वरजियें, एम वोले जिनराय ॥१शा लोडकर पपषि निकद तेम, १६गिरिकर्णिका विचार ॥ १किसलय पत्र १सरिंगुका, १एथेगकंद अवधार ॥ १३ ॥ २० थाईमोथ ए वीशमी, प्रमर वृक्ष्नी बगल ॥ लोकप्रसिक्षा खिल्लहड, श्श्यमृतवेलीने टाल ॥१३॥ श्वमूलकद निवारी, चोवीशमो ए वोल ॥ जाणी जेनक्षण करे, ते नर सही निटोल ॥ १५ ॥ २५नूमिकदा बत्रक कह्यां, वर्षाका. होय । नूमिफोट सदु को कहे, धोले वर्णे जोय ॥ १६ ॥ धान्य विदल जे बाड रित, ते विसदा कदेवाय ॥ शाक जाति पटक वाधुलो, खातां अवगुण थाय ॥१॥ श्मशुक्रवनि पत्यक तेम, शाक नेद अवधार ॥ कोमल तिम वलीण्यापली,थबद अस्थि निर्धार ॥१॥ ३१वालुक शर्पिमा लुक कह्या, कदनेद तेम जाण ॥ ए बत्रीशे परिहरे, श्रावक तेह सुजाण ॥१ए॥ सचित्त श्यचित्तमिश्रजाणीयें,तेम ३पक ध्यपक ॥ पतुशेषधि नक्षण तथा,न करे मतिपरिपक्क ॥२०॥ अतिचार ए वारता,ए होय निरप्ति चार ॥ कर्मथकी दवे सांजलो, ए व्रतनो विस्तार ॥ ११ ॥ ॥ ढाल बत्रीशमी॥ कूडा काननी रे, महारी लोबडी तु जाव ॥ ए देशी॥ कर्मयकी स्वर कर्म सघलां, दूर मे जाण ॥ तास अतिचार पन्नर, जांले श्रीनिन जाण ॥१॥ कहे जिनशांतिजी रे ॥ नविजन नावपी पार ॥ धरो मन खांते जी रे, कविन कर्म दूरे मार ॥ ए यांकणी ॥ पनर काशन वारो, कर्मनु यावान ॥ थातमाने एम तारो, नजो श्रीनगवान ॥कडे J 1 श्री शातिनाथनो रास खम हो ३नए जोडे यादि ॥॥ यक्त ॥ कार्य शुनेऽगुनेवापि प्रवृत्ति कृतादित ॥ ॥ नेद्यास्ते तस्य कर्तार , पश्चादप्युपचारत ॥ ३ ॥ पूर्वढाल ॥ उपजोग परिजोग वस्तुने, अधिक न मेले जाण ॥ अधिक माग्यु थापता, होय अनर्थ गुणहाणि ॥ ए ॥ एह अतिचार पाचमो, वजो निरतीचार ॥ ए थष्टम व्रत पालता, लहिये जवनो पार ॥१०॥ एह उपर प्रभुजी कहे, समृद्धिदत्त सवर ॥ चक्रायुध नृप सानले, जाव नक्ति यनुवध ॥ ११ ॥ ॥ ढाल साडत्रीशमी॥ ॥ जीरे जी॥ ए देशी ॥ जीरे धातकी खम मकार, देव नरत रैपुर जलु ॥ जीरे जी ॥ जीरे तिदा रिपुर्मदन राय,यश जगतमां मज़दूं ॥ जीरे जी ॥१॥ जीरे समृदिदत्त सुविचार,कोदुविक तिण पुर वसे ॥जि॥ जीरे कुटुवतणो स्वामि, दर्प दियामा बन्नसे ॥जी॥२॥ जीरे एक दिन सूतो सेज,मनमांदे एम चितवे ॥जी॥जीरे जो हु थान नूप, जरत खम साधु सवे ॥जी॥३॥ जीरे साधतो जान वैताढय,दे विद्या ननचर नली॥जी॥जीरे विद्यावल थाकाश, तव का हु मन रली ॥जी॥॥ जीरे एम चितवतो ताम,सेजयी उचो उठल्यो ॥ जी ॥ जीरे पडतो ते नूपीठ, पडियो गृहमान कल्यो ॥ नी० ॥ ५ ॥ जीरे पीडाणो तन जोर, करे पाकद यति घणो ॥जी॥ जीरे स्वजन मिव्या तव वाइ, शु थयु तुम थमने जो ॥ जी० ॥ ६ ॥ जीरे रहिया मुफ मनमाहे, मनद मनोरथ मादरा ॥ जी० ॥ जीरे उन ली मूढ गमार, पग लाज्या ते ताहरा ॥ जी० ॥७॥ जीरे घणु निर्देबयो तास, केतेक दिने साजो थयो ॥ जी० ॥ जीरे पाले ते निजगेद, दिय डामा दर्पित हुन ॥जी० ॥ ७ ॥ जीरे एक दिन सीधु तेण, खड्ग थमू लक उपतु ॥जी॥ जीरे जे खगनु तेज,थवर नहि को जीपतु ॥जी॥ ए ॥ जीरे पुरमा पसरी वात, खड्ग तणी थतिही घणी ॥ जी० ॥ जीरे एक दिन पुरने नूप, सनामा वेठे मुणी ॥ जी० ॥ १० ॥ जीरे एक दिन खड्गरतन्न, प्रमादयकी तस विसयु ॥जी॥ जीरे गृहयगण ते मूकि, माहे शयन जई कस्यु ॥जी॥११॥ जीरे सांजा तस मध्यराति, पण प्रमान थाणियो ॥ जी० ॥ जीरे चिते कुण ले जाय, रह्यो निश्चितो प्राणीयो॥ जी ॥ १५ ॥ जीरे चोरें दस्यु तेणी राति, खड्ग लेख्ने ते चल्यो । जी० ॥ जीरे शेग्नो सुत ग्रही वदि, जाता नृप सेवक मिल्या ॥ जी० ॥ - ३तन जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. नदि सतारु,श्यो करो वो सोर ॥ क० ॥२३॥ राग पाणी तेह तापी, की न बोल्यो बोल ॥ कामिनीनो प्रेम गाढो, रंग रातो चोल क... एक दिवस धाड थावी, वोलती मुख मार ॥ कर्मना सयोगहूती, किन ने घरवार ॥ क० ॥ २५ ॥ कतरे नहीं नारी केरा, नपण सेशी पार । बेदिया तस थग सुदर, खड्ग तीखी धार ॥ क० ॥ २६ ॥ बलवले ते नारी कनी, फरे लोदीधार ॥चरण दे नूमि पर,पडी ते निरधार ॥३॥ २॥ याचमा एम थावे उदय, नदि को राखणदार ॥ राखो राखो मुझे नाखे, नित्यममिता नारि ॥ क० ॥ २७ ॥ कथ तेहनो नासी पेठगे, कोई नाव्यु पास ॥ रोझ्ध्याने ते मरिने, गई नरकावास ॥ क० ॥ २५ ॥ एम जे परिनोग उपरें, राखे माया नरि । तेहनी एह गति होवे, बामो माया दूर ॥ क० ॥३०॥ बछे खमें ए रात्रीशमी,ढाल नाखी सार ॥ शातिप्रानी देशनाथी, पामियें नवपार ॥ क० ॥ ३१ ॥ इति सप्तमनोगोपनोमो परि जितशत्रुनित्यममिताकथानके ॥ ३२ ॥सर्व॥१४१० ॥श्लो॥१६॥ ॥ श्रथाटम यनर्थदमविरमणत सवध ॥ ॥दोहा॥ ॥ दवे त्रीजु गुणव्रत प्रलु, कहे शांति जिनराज ॥थनर्थदम विरमण करो, निम सिजे थातमकाज ॥ १ ॥ थपध्यान पदेलु वली, पाप तणो उपदेश ॥ हिंस्रप्रदान त्रीच का, उखदायी सुविशेप ॥ २ ॥ तेम पाच रण प्रमावर्नु, चोथो नेद वस्वाण ॥ चार नेद एम नीपजे, श्रोता मुणो स जाण ॥३॥ पंच थतिचार एदना, प्रथम कह्यो कदर्प ॥ रागें दास्या दिक वचन, बोले जे धरी दर्प ॥४॥ कौकुचपणु निवारीयें, मुख चू नेत्र विकार ॥ दास्य जनक विटनी परें, ते बीजो अवधार ॥ ५॥ ए प्रमा वयी नीपजे, मुखरपणु तेम टाल ॥थसबभनाषी घणो, जेम तेम बोले थाल ॥६॥ महाथनर्यन हेतु ए, पहेलो पाप उपदेश ॥ ए वर्जे जे मानवी,न लहे तेह किलेश ॥ ७ ॥ यजक्तं ॥ बहूनां समवाये हि, सिके कार्ये सम फलम् ॥ यदि कार्य विपत्ति स्या, न्मुखरस्तत्र बाध्यते ॥ १ ॥ अन्यच्च ॥ थविधाणिय पष्ठाव, परचित्तमलरिककण जं नणियं ॥ किंपावयरतत्तोवि, द्रुत थन्नपि लोथमि ॥ ३ ॥ पूर्वढाज ॥ वजी चतुर्ष श्रधिकरणनो, दल कुगर शकटादि ॥ सङ करी मेहजे नाहिं, सेम नवि .

श्री शातिनाथनो रास खंम हो. ३' ताणियो ॥ जी० ॥ ३० ॥ जीरे मार पब्यो तस जोर, मुखहूती सुर एम कहे ॥ जी० ॥ जीरे का दीधो उपदेश, जीनयकी जीव सुख लहे ॥ जी० ॥ ३१ ॥ जीरे चरण नमीने तेह, निज अपराध खमावतो ॥जी॥ जीरे टलवलतो ते देखी, सुरें मूक्यो तेने जीवतो ॥ जी० ॥ ३५ ॥ जीरे समृध्दित्त मनमाहे, चिते में मातुं कस्यु ॥ जी० ॥ जीरे अनर्थदम एके क, कीधाथी वह सुख वयु ॥ जी० ॥ ३३ ॥ जीरे मन याव्यो वैराग्य, नावें तेणें सयम ग्रह्यो ॥जी॥ जीरे पाले निरतिचार, सुर वैमानिक सुख लघु ॥ जी ॥३॥ जीरे पामी नर अवतार, समृद्धिदत्त सयम ग्रही ॥ जी० ॥ जीरे यागामिक नव सार, शिवलीला लहेशे सही ॥ जी० ॥ ३५ ॥ जीरे शांतिप्रतुयें ए वात, थष्ठम व्रत उपर कही ॥ जी० ॥ जीरे व्रतपालण जमाल, नवियण तुम्हें थाजो वही ॥ जी ॥३६॥ जीरे बके खेमें एद, ढाल कही साडत्रीशमी ॥जी॥ जीरे रामप्रतुनी वाणी, नवियण मन साकरसमी ॥जी॥३७॥श्त्यष्टमानर्थदंमविरमणव्रतोपरिसर वित्तकथानकम् ॥ ॥ इति त्रीणि गुणव्रतकथानकानि ॥स॥१४५॥६॥ ॥अथ नवम सामायिकव्रत सबंध ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ हवे शिक्षाबत जिन कहे,चउ सरस्यायें सार ॥ सामायिक व्रत प्रथम तिहां, कहे प्रक्षु जगदाधार ॥ १ ॥ साम थने सम तिम वली, सम्यर एक विचार ॥ सामायिक एक थर्थ ए, नांरख्यो सूत्र मफार ॥२॥ नाम स्थापना व्यथी, नाव निक्षेपा चार ॥ प्रजी नांखे तेदनो, थर्थ अनोपम सार ॥३॥ यत ॥ मदुरपरिणाम साम,सम तुला सम्म खीर खम जुई। दोरे दारस्सतिग,धम्मे था तु दवमि ॥१॥थावमा परऊरक मकरणं राग दोस मकच ॥ नाणातिग तसाइ, पोसण जावसामाई ॥ २ ॥ पूर्ववोदा ॥ मन वच काया योगनो, उष्टप्रयोग निवार ॥ श्रनव स्थान चोथो वली,स्मृतिविदीन तेम धार ॥॥थतिचार पंच एहना,तेम पली दोष वत्रीय ॥ सामायिकमा टालिये,तो लदियें सयस जगीश ॥ ५ ॥ ॥ ढाल थाउत्रीशमी ॥ ॥ सामायिक झात्रिशहोपस्वरूपं कथ्यते ॥ चोपाई ॥ थार्न रौतणो परि हार,थतिथि सीम सयमथाचार ॥ थाणो समतानो परिणाम, सामायिक ३० जैनकथा रनकोष नाग श्राठमो. १३ ॥ जीरे जोर कसु नृप लोक, निधन पमाग्यो चोरने बी. जीरे चोरें मरतां तेद, माखो शेठ किशोरने ॥जी० ॥ १५ ॥ बीरे सा ग्रही प्रनात, नेट कगुं जय रायने ॥जी॥ जीरे समृश्विनने कोष, जाने नृप वोलाइने ॥जी॥१५॥ जीरे केम कीधो ते अन्याय, खड्ड एह तारक सही ॥ जी० ॥ जीरे वात कही समझाय, पण नृप कहे मेलु मदि ॥ जी० ॥ १६ ॥ जीरे रायें दमयो तास, केम प्रमाद तें धारयो। जी० ॥ जीरे निर्धन करि घर वार, मूक्यो ते शोकें नमो ॥ मी ॥ १७ ॥ जीरे एक दिन तेण भयाण, विप वेचातु कोश्ने ॥जी॥ जीरे दीधुं धनने लोन, नृपवैरीने जोश्ने ॥ जी० ॥ १७ ॥ जीरे बेइते चमाल, सरवरमा विप घातियु । जी० ॥ जीरे ते पीधे के लोक, पुरमा हे मृत्यु पामियं ॥ जी० ॥ १५ ॥ जीरे नृप जाणी ते वात, जल पीपे बदु नर मूया॥जी॥जीरे रायें कढावी गुदि, कहो एकुण कारण दुर्गा ॥जी॥२०॥ जीरे कोकथी लही वात, विपप्रयोगनी माहिली ॥ जी०॥ जीरे रायें तेज्यो तेद, तुरत न कीधी काहेली ॥जी॥१॥ जीरे पूढे नर तेहावि,को पासें तें विप लियुं ॥जी॥ जीरे शं दवे जूठे थाय,समृक्षिय सु फने दियु ॥जी॥ २२ ॥ जीरे रायें जाणी श्रनीति, समृद्धिदत्तने दमियो ॥जी॥ जीरे पुरमा तस अप्रीति, सद्गुको जाणे ललियो ॥जी॥१२॥ जीरे वली एक दिनने योग, कौटुबिक कोई धावियो ॥जी॥ जीरे नूतन वत्स युग एक,ते सघातें लावीयो ॥जी॥२॥ जीरे समृधिवत्त सेणि वार, तेदने प्रेम ॥जी॥ जीरे ए वत्स दमवा योग्य, दमता नथी कारण कि रघु ॥ जी ॥ २५ ॥ जीरे धार कशा ने घात, निर्वयपरिणामें करी ॥ जी० ॥ जीरे वत्स दमो सुविशेष, लघुवयमा नलट धरी ॥जी० ॥१६॥ जीरे वात सुणी वृष दोय,नी उपर कोप्या घj ॥ जी० ॥ जीरे नाम थकी पण एद, प्राणीने 5 ख बलखामणु ॥ जी० ॥ २७ ॥ जीरे ते ऐ जर ते वत्स दोय, दमवा मांझपा निर्वयी ॥जी० ॥ जीरे से मुहमार शरीर, वेदन सहे वाणी नहिं ॥ जी ॥ २७ ॥ जीरे तनु अर्पज पर तेह, एक दिन काल को बने ॥ जी० ॥ जीरे अफामनिरायोग, धमा व्यतर सुर एक मनें ॥ जी० ॥ ॥ जीरे ज्ञान तणे उपयोग, अहित कारक तस जाणीयो ॥ जी॥ जीरे धावी तिहां सुर दोष, सबलो तेहने है , श्री शांतिनाथनो रास खंम वो. ३३ दोप॥नक्ति हीण ए दशमोसही,श्रावक ए थादरवा नहि ॥१॥इतिसामा यिकझात्रिशदोपस्वरूप॥काव्य॥वत्तीस दोसेहि विमुहिमेथ,करिङ सामाश्य मप्प मत्तो ॥ निच्च नरोजो निस दीस काल,वरित तं मुत्तिरमा कमेण ॥१॥ ॥ दोहो ॥ ए व्रत कपर जिन कहे, सिहश्रावक श्रवदात ॥ न विक जीव सदु सानले, करि निजमन एकांत ॥ १ ॥ ढाल ॥ स वाइ गुरु वाहणनी परें तारे ॥ ए देशी ॥ जरते रमणीय इण नाम,पुर सुदर शोना गम, वद्द जतुनो विश्राम ॥ १ ॥ निणदराय देशना देई तारे, नव जलनिधि पार उतारे ॥ जि ॥ए बाकणी ॥ तिहा हेमांगद अनि धान, राजा बहु बुद्धिनिधान, मुदर तन शोने वान ॥ जि० ॥ २ ॥ मश्री तेहने राणी, रूपें जीती इशाणी, वली लावण्यगुणमणि खाणी ॥ जि ॥३॥ श्रावक जिनदेव विचारी, जिनदासी तस घर नारी, शी लादि गुणे करि सारी ॥ जि० ॥ ॥ सिह नामें हो थगज सोहे, रूपें साजन मन मोदे, कदिये ते न रहे कोहें ॥ जि० ॥ ५ ॥ जीवाऽजीवा दिक जाण, समजु सवलो गुणखाण, मावित्रने जीवनप्राण ॥ जिन ॥ ६ ॥ विट्ठ टक थावश्यककारी, सूधो सामायिकधारी, रूडो आवक थाचारी ॥ जि० ॥ ॥ इक दिन सारथ सघातें,चाल्यो व्यापारने हेतें, सिह लइ करियाणु खतें ॥ जि० ॥ ॥ साथ उतनो थटवीमांहे, तटिनीतट जोइ उत्साह, लीधु सामायिक सिह शाहें ॥ नि ॥ ५ ॥ सघलो श्रारंन निवारी, मुनिनी परें समताधारी, करि मन वच तन एक तारी ॥ जि॥ १० ॥ तटिनी जल शीतल वासें, वहु कडे मशकनी राशे, कस्खो धूम वहु तव त्रासें ॥ जि० ॥ ११ ॥ रह्यो सिद अचल गुण । गेह, सहे मशकपरीसह देह, न चले मेरु निम तेह ॥ जि ॥ १२ ॥ वद् मशक समूहें विटाणो, श्रावी मलियो तव टाणो, ध्यान दीपक नवि उलवाणो॥ जि ॥१॥ त्वच नेदीने मुख माहे घाली,पीये रुधिर ते मश कनी थाली, सिहें काया न सनाली ॥ जि ॥ १४ ॥ जाणे ए पुजल सार, व्रत पालीजें निर्धार, ए विषु जम्यो यद्गु ससार ॥ जि० ॥ १५ ॥ कोनो नहिं तु तुफ कोइ, मत रहे तन उपर मोही, रखे जातो ए व्रत खोइ ॥ जि ॥ १६ ॥ निश्चल परिणामें रदियो, परिसह उत्कट तेणें सदियो, एहवो सिदो लन कहियो ॥ जि ॥ १७ ॥ थाव्यो दक्षिण , , ३एर जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. करवो थनिराम ॥१॥ तेह तणा जे दोप वत्रीश, ते पनणिर्छ मन परीष जगीश ॥ ते साजली श्रावक खप करे, लीलें जिम नवसायर तरे से वस्त्रे वाहे वाली पाली,प्रथम दोप ए जुगतो नथी । आधु पादु बासन थाय वीजु ए दूपण कहेवाय ॥२॥ दृष्टि न राखे एके दिश,जोवे वपलपणे चिट्ठ दिशें ॥ त्रीजो दोप सामायिक जाण, ततधर परिहर हियरे बाए ॥३॥ यल्प वदुल लागे सावक,चोथे दोप निवारो कल ॥ पूढें नींत पाटी ने थन,पचम दोपजे से थवष्टन॥५॥थति सकोडे थग नवग,बजे दोष करे व्रतनग ॥ थालस मोडे ए सातमो, नाजे करडक ए बाग्मो ॥ ६ ॥ नवमो मल उतारे जेह, मोलतणो व्रत दूपे तेद ॥ वण खणे ए दशमो जाण, टालता व्रत कहे प्रमाण ॥ ॥थगे विश्रामण कारवे, दोप थम्यारमे व्रत दारवे ॥ वारम दोप जे निज्ञ करे, बार दोप कायना परिदरे ॥ ॥ वचन तणा दश दोप पिठाण, परिहर चतुरपणु वित थाण ॥ बोले कुवचन पहेलो दोप, लाग्यो जाण म धर सतोप ॥ए। बीजो म जणीश सहसात्कार, थार्नस्वर दुवे त्रीजे वार ॥ थापण ब- जे बोलीयें, चोथो दोष विपे तो लीये ॥ १० ॥ जणता सूत्र म कर सोप, पंचम दोष तणो निक्षेप ॥ कलह म ममिश जा व्रत सार, बम दोष तणो परिहार ॥ ११ ॥ विकथा सप्तम दोप निवार, पर उपहास बाग्मो विचार ॥ सपद पद विषु उतावलो, म नयो नवम दोषथी टलो ॥१॥ जाव थाव एम कहियें नहिं, दशम दोष परदरिये सही ॥ वचन तणा ए जाणी दोष, टाली करो सामायिक पोप ॥ १३ ॥ मनना दोष दवे सां नली, परिदर नवियण दूर रली ॥ प्रथम दोष मन नदिय विवेक, नहु जाणो मणो अतिरेक ॥ १४ ॥ जस कीर्ति वाले थति घणी, करे सामा यिक जे तेद नणी ॥ बीजो दोष ए थागम कह्यो, नवियण जाणीने नवि ग्रह्यो ॥ १५ ॥ दियडे वाडे धननो लाद, श्रीजो दोष घणो गुण दाद ॥ चोथो दोष जे करे गर्व, एदथी निर्गमियु फल सर्व ॥१६॥ करे सा मायिक जे बिदतो, वारे दोष सुगुण हतो ॥ पुत्र धनाविक तशु नि दान, करता हो दोष निदान ॥१॥ सामायिक फल विधि जे कदी, से जाणु दोशे वा नहिं ॥ एम सशय दियडे याणिये, सप्तम दोषने श्रुति जागीय ॥ १७ ॥ थष्ठम करे मन थाणी रोष, अविनय करतां नवमो , १ , श्री शांतिनाथनो रास खम हो. ३एय ॥ ढाल लंगणचालीशमी॥ ॥ रहो रहो रे यादव दो घडीया ॥ ए देशी ॥ सुणो सुपो रे प्राणी शीखडीयां ॥१०॥ थक्ष्य निधि जिनधर्म ए पामी,काहेक मागत नीखडियां ॥ सु० ॥ १ ॥ ए थाकणी ॥ शखपुरें गगदत्त व्यवहारी, वास वसे गुन चोपडीयां ॥ सु० ॥ २ ॥ जिनवर धर्म करे मन शुद्दे, जाणे ए चि तामणि जडिया ॥ १०॥ ३ ॥ देशावकाशिक एक दिन घरनु, लीधु न निसरु शेरडीयां ॥ सु० ॥ ४ ॥ साथ बहु थाव्यो नाणीने, मित्र थावी कहे थारडिया ॥सुण॥५॥ साथै चलो बहु लान होवेगो,कहे गगदत्त मुफ थाखडियां ॥ सु० ॥ ६ ॥ मित्र कहे व्रत काले करेजो, लाज वहु थाज सांपडियां ॥ १० ॥ ७ ॥ कहे गगदत्त ए लान न लेखे, व्रत नवि बोडं पा घडियां ॥ सु० ॥ ७ ॥ धन पुजल यदु वेर मिलेगो, धर्म करो दिन रातडिया ॥सु०॥॥ थाज थ व्रत देशावकाशिक,मूको विकथा वातडियां ॥सु॥१०॥ मित्र लही तस निश्चय निज घर,थावे उत्साह विषु घडवाडि यां ॥ सु॥११॥ दु प्रजातं निश्चय पूरो,करि थावश्यक पडवडियां ॥ सुप ॥ १२ ॥ साथमें थावे वणिज करणकु, करियाणा वढु ढग पडिया ॥ सु० ॥ १३ ॥ लिये लाखोके माल मुलावी, उनमें लान वहुत जडिया ॥ सु० ॥ १३ ॥ चिते सवि ए धर्म महातम, दरिक्ष उडी जाये ज्यु चिडिया ॥ सु० ॥ १५ ॥ लानके वनसें चैत्यनक्ति उर, सादामीवत्स लसे जुडिया ॥ सु० ॥ १५ ॥ बहु दिन श्रावक व्रत थाराधी, चाखत थनुनव सेलडिया ॥ सु० ॥ १७ ॥ यतें श्रणसण करि सुरलोकें, विलसे अप्सर गोरहिया ॥ मु० ॥ १७ ॥ ॥ एक अवतार करी लहि केवल, च डशे शिवपुर पावडियां ॥१॥१॥ दशमा व्रत उपर ए जिनवर,कह्यो सबंध रसवेडिलां॥सु॥२०॥ उंगणचालीशमी खम बळे,ढाल सिराडे ए चड़ियां ॥सु॥२१॥ राम कहे प्रतपालक नरकु, नवनिधि थावी रहे खडिया॥९० ॥२॥ इति दशम देशावकाशिकवते गगदत्तकथानकम् ॥१॥१५३॥ ॥ अकादश पौपधव्रतसवध ॥ ॥ दोहा ॥ ॥त्री शिक्षाव्रत दवे, कहे जिनत्रिभुवन नाण ॥ व्रतमांहे थग्यारमुं, पोपधव्रत मन थाण ॥१॥ पुष्ट करे जे धर्मने, थावरिय तिथि पर्व ।

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३०४ जैनकथा रत्नकोष नाग आठमो.
दिशि वात, कमी गयो मशकनो नात, सूणी याव्या तस गात nir.
॥ १७ ॥ उपसर्ग टल्यो थ शाता, पारे सामायिक गुणवता, एम काम
पडे रह्यो तत ॥ जि० ॥ १५ ॥ यनुक्रमें देशातरें जाय, बहु लागलो
सान उपाय, घर याव्यो सिह कमाय ॥ जि० ॥२०॥ साते क्षेत्रे वित्तने
वावे, लखमी सुरुतारथ थावे, देशमां वदुलो यश पावे ॥ जि० ॥१॥
गृहिधर्म रूडी परें पाली, यते यणसण सनाली, गयो सुरलोकें रुचि
शाली ॥ जि० ॥ २२ ॥ लहेशे एक नर थवतार, थादरशे संयमनार,
होशे सिविधू जरतार ॥ जि० ॥२३॥ एम ए व्रत पाल्यु सार,बापे नव
जलनो पार,जब क्षण तव ए गुण धार ॥ जि० ॥ २४ ॥ बयाउनीशमी
ढाल,कहे रामविजय उजमाल,व्रतवतने नमो त्रण काल ॥ जिम् ॥ १५ ॥
इति नवमसामायिकत्रते सिहश्रावक कथानकम् ॥ ए ॥ १५०० ॥ ॥
॥ अथ दशम देशावकाशिकवतसवध ॥
॥ दोहा॥
॥ वीजु शिक्षाव्रत दवे, व्रत दशमु तेम जाण ॥ शाति प्रजुजी एम
कहे, नवियणनें दित थाण ॥ १ ॥ जावजीव दिशिविरतिनु, जे व्रत बहु
सार ॥ तेमांहे प्रतिदिन धारवो, सहेपें सुविचार ॥ २ ॥ सर्व प्रत सके
पथी,थथवा ए व्रत जाण ॥ मुट्ठन दिवस वती पक्षता,ए व्रतनु परिमाण
॥ ३ ॥ यमुक्त ॥ एग मुद्वत्त दिवस, राई पंचादमेव परके वा ॥ वयमिह
धारेद दढ, जावई यं उन्हहे काल ॥ १ ॥ पूर्वदोहा ॥ एवं सघला व्रत
नियमनो, प्रतिदिन करे सक्षेप ॥ चन्द नियम सनारतां, सक्षेपतां
निर्लेप ॥ ॥ श्रतएव ॥ सञ्चित्त दध विगई, वाहण तंबोल व कुसु
मेसु ॥ वाणह सयण विजेवण, बन दिसि न्हाण नत्तेसु ॥ ३ ॥ पूर्वढाल
॥ पंच थतिचार एदना, प्रथमानयन प्रयोग ॥ प्रेष्यप्रयोग बीजो वली,
शब्दानुपाती तिम योग ॥ ५॥ रूपानुपाती चोयो कह्यो, पंचम पुजल
क्षेप ॥ वशमा व्रतमाहे कहे, श्री जिनवर गतक्षेप ॥ ॥ गगदत्त श्रा
वकपरें, पालीजें निर्धार ॥ परंपरायें ए व्रत सही, शिवसुखनु वातार
॥ ४ ॥ कहे चक्रायुध कुरा विनो, गगदत्त गुणवत ॥ पर्षद पारे श्रागों,
जांखे श्री जगवत ॥ ७ ॥

श्री शांतिनाथनो रास खम रहो. ३एय ॥ ढाल उगाचालीशमी॥ ॥ रहो रहो रे यादव दो घडीयां ॥ ए देशी ॥ सुणो सुपो रे प्राणी शीखडीयां ॥सु॥ थक्ष्य निधि जिनधर्म ए पामी,काहेक मागत नीखडिया ॥ सु०॥१॥ ए याकणी ॥ शखपुरे गगदत्त व्यवहारी, वास वसे गुन चोघडीया ॥ सु० ॥ २ ॥ जिनवर धर्म करे मन शुदें, जाणे ए चि तामणि जडिया ॥ सु० ॥ ३ ॥ देशावकाशिक एक दिन घरनु, लीधु न निसरु शेरडीयां ॥ मु०॥ ४ ॥ साथ बहु थाव्यो जाणीने, मित्र थावी कहे थारडियां ॥४॥५॥ साथें चलो वढु लान होवेगो,कहे गगदत्त मुफ थाखडियां ॥ सु० ॥ ६ ॥ मित्र कहे व्रत काले करेजो, लान वदु थाज सांपडियां ॥ १० ॥ ७ ॥ कहे गगदत्त ए लान न लेखे, व्रत नवि बोडं पा घडियां ॥ सु० ॥ ॥ धन पुजल बहु वेर मिलेगो, धर्म करो दिन रातडियां ॥मु०॥॥ श्राज यो व्रत देशावकाशिक,मूको विकथा वातडियां ॥सु॥१॥ मित्र लही तस निश्चय निज घर,थावे उत्साह विष्णु घडवडि यां ॥९॥११॥ दु प्रजातें निश्चय पूरो,करि यावश्यक पडवडियां ॥ सु० ॥ १२ ॥ साथमें थावे वणिज करणकु, करियाणा वढु ढग पडिया ॥ सु० ॥ १३ ॥ लिये लाखोके माल मुलावी, उनमें लान बहुत जडियां ॥ सु० ॥ १४ ॥ चिते सवि ए धर्म महातम, दरिक्ष उडी जाये ज्यु चिडिया ॥ सु० ॥ १५ ॥ लानके वनसे चैत्यनक्ति तर, सादामीवत्स लसें जुडिया ॥ सु० ॥ १५ ॥ बहु दिन श्रावक व्रत थाराधी, चाखत धनुनव सेलडिया ॥ सु० ॥ १७ ॥ तें थणसण करि सुरलोकें, विलसे अप्सर गोरडिया ॥ मु ॥ १७ ॥ ॥ एक अवतार करी लहि केवल, च डशे शिवपुर पावडियां ॥सु॥१॥ दशमा व्रत उपर ए जिनवर,कह्यो सर्वध रसवे डिलयांमुणा॥ गणचालीशमी खम बछे,ढाल सिराहे एचडिया ॥मु०॥१॥ राम कहे व्रतपालक नरकु, नवनिधि थावी रहे खडियां॥सुप ॥ २२ ॥ इति दशम देशावकाशिकवते गगदत्तकथानकम् ॥१०॥१५३॥ ॥ श्रथैकादश पौपधव्रतसवध ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ त्रीजु शिवाव्रत दवे, कहे जिनत्रिवन जाण ॥ व्रतमाहे थग्यारमु, पोपधवत मन थाण ॥१॥ पुष्ट करे जे धर्मने, थादरिये तिथि पर्व ॥

- ३६ जैनकथा रनकोप नाग बाग्मो. ते पोपधयाराधता, लहियें वांडित सर्व ॥२॥ प्रथम पोपध बाहारनो, सर्व दोय नेद।चोविहार निवी प्रमुख,तपची कह्यो गतवेद ॥३॥वीबो रेर सत्कारनो, सर्वदेशथी जोय ॥ ब्रह्मचर्य पौफ्ध तिमज, अमापार तिम होय ॥ ४ ॥ पंच अतिचार एहना, वर्जी चतुर मुजाण ॥ नाम कहे प्रा तेदना,शातिनाथ नगवान ॥ ५ ॥ यत्सूत्र ॥ अप्पडिसेहिय उप्परिजेदिय सिजा सथारए ॥१॥ अप्पमङिय सुप्पमकिय सिङा सपारए । '२॥ थप्पहिलेदिय उप्पडिहिय वचारपासवणनूमी ॥ ३ ॥ थप्पमजिय सुप्पमलिय उच्चारपासवणनूमी ॥ ४ ॥ पोसदोववासस्स सम्म अणषु पालण्या ॥ ५ ॥ पूर्वदोहा ॥ ए व्रत पालता जलां, सफल होय पिन रात ॥ श्रावक साधु जेहवो, निर्मल गुण अवदात ॥ ६ ॥ यमुक्त ॥ सामा यिय पोसहस, वियस्त जीवस्स जाइ जो कालो ॥ सो सफलो बोपनो, सेतो. ससारफलहेक ॥ १ ॥ ए व्रत उपरें जिन कहे, जिनधश्नो दृष्टांत ॥ चक्रायुध नृप सानले, नाव धरी एकात ॥ ७ ॥ ॥ ढाल चालीशमी॥ ॥ मेरे जीउमें लागी थाशकी ॥ ए देशी ॥ सुप्रतिष्ठपुरमा दुवो, नृप थनतवीर्य बलवान रे ॥ रूपवती राणी मनमोहन, कमनीय कंत सुजाए रे ॥ १ ॥ नवि जीवमें व्रत गुण धारियें ॥ जेम सफल फले सवि पाश रे ॥ एकमनां ए व्रत पालतां, दोय थानद लीज विलास रे ॥ जम् ॥ ५ ॥ श्रावक जिनच नामथी, तिहां निवसे निचलधर्म रे ॥ सुदर थारूति सुवरी नामें, करे गेदिनी शुभ कर्म रे ॥ ज० ॥२॥ जिनमत शुक्ष जाणे जतो, जीवाऽजीवादिक तत्त्व रे ॥ समकित मूल श्रावक व्रत पाले, टाले मिथ्यामति तत रे ॥न ॥॥ एक दिन पोषध लेश येतो, पौषधशालामफार रे ॥ सावधयोग पञ्चरकाण करीने, एकमने निरतिचार रे ॥ न० ॥५॥ण अवसर पहेले सुरलोकें, हरि निरखे जिन चप रे ॥ यदो बहो धन धन एद महामति, एम प्रशसे व रे ॥ नम् ॥ ८ ॥ पूछे तब सुर सेवक स्वामी,श्यो गुण दीठो तास रे ॥ कहे पोसह बत एदनो, थविचन लीलविलास रे ॥ ज० ॥७॥ एक सुर मिप्यावचन मिथ्यात्वी, करवा थायो ताम रे ॥ श्रावक जिनपपासें यावी, बहेन थइ कहे थाम रे ॥ ज०॥ ७ ॥ सूरज उदय अकानें कीपो, सुण पांवर - श्री शातिनाथनों रास खंम हो. ३एड गुणवत रे ॥ जोजन दु लावी तुम कारण, पारण करो सत्यवत रे ॥ रे ॥ ज० ॥ ए ॥ वचन सुणी मनमाहे विचारी, केम एम दुवो प्रजात रे ॥ धर्म ध्यानादिक करणीने, थनुसारें हजी रात रे ॥ ज० ॥ १० ॥ कारण काक ए सनवीये,कौतुकवाली वात रे ॥ कोइक देवतणी ए लीला, रखे चलतो तिल मात रे ॥ ज० ॥ ११ ॥ मौन लदी रहियो मनमांदे, धरि थरिहतनु ध्यान रे ॥ जीव रखे व्रत कर तु काचु, एम नारख्युं श्री जगवान रे ॥ न० ॥ १२ ॥ मित्र थइ कर लेइ विलेपन, वली मुगधां फूल रे ॥ श्रावी कनो जिनच धागें, ग्रहो ए मित्र अमूल रे ॥ न० ॥ १३ ॥ ॥ तु मुफ जीवन दु तुऊ वदालो, लाव्यो नक्तिने काज रे ॥ थं गीकार करो मुज वाधव, जेम था मुखीया थाज रे ॥ न ॥ १४ ॥ जिनचइ चित्तमा एम विमासे, न घटे ए मुफ फास रे ॥ गध विलेपन कु सुम ए लेता, होय पोपध व्रतनाश रे ॥ ज० ॥ १५ ॥ रही थणवोल्यो ध्याने विचारे, रखे धरे पुजलथाश रे ॥ मायाजालें म पड मनपखी, का थाय तृष्णादास रे ॥ न० ॥ १६ ॥ देवें जाएयु चित्त नवि चलीयु, करी तव पुरुपनु रूप रे ॥ तस कामिनी लइ जातो देखे, जिनच एद स्वरूप रे ॥ ॥ १७ ॥ निजनारीनी विडवन देखे, मूकावो प्राणनाथ रे ॥ पण ते ध्यानथकी नवि चूके,समरे एक जगनाथ रे ॥ज॥१॥ एम अनुकूलयकी नवि चलियो, तव सुर करे विकराल रे ॥ सिह पिशा चादिक यति विरुथां, रूप घणा ततकाल रे ॥॥ ज० ॥ १५ ॥ ते तिल मात्र न छोयो मनमा,देखी जयकर रूप रे ॥ ठेहनो नेद न राखे हृदयें, स्मरे एक शुद्ध स्वरूप रे ॥ ज० ॥ २० ॥ निश्चल जाणी प्रगट थइ ते,सुर नामे निज शीश रे ॥ जय जय तुं पदेले सुरलोकें, स्तवियो थमारे ईश रे ॥ ॥ २१ ॥ धन्य तुम्दो कृतपुण्य तुम्हारु, जीवित जन्म प्रमाण रे ॥ कहो मुफ लायक काश्क कारज, शिर वटुं तुमची थाण रे ॥ ॥ २२ ॥ कहे जिनच निरीद मुमतिघर, नहि मुफ लालच कोय रे ॥ जो कहो बो तो तिम करो जिम, शासन उन्नति होय रे ॥ न० ॥ २३ ॥ थगीकार करीने सुरवर, थान दिवस लगी सार रे ॥ थाश्महो त्सव जिनमदिर, मांमे नक्ति नदार रे ॥ ज० ॥ २४ ॥ धूप कुसुम वर गध विलेपन, करे जिननक्ति रसाल रे ॥ पूना सत्तर प्रकारनी विरची, नाटक ३एन जैनकथा रतकोप जाग श्राठमो. जक्ति विशाल रे॥०॥२५॥ प्रनु थागल नाचे ते सुरवर, पेसदस रे ॥ तार तार करुणारससागर, जगतवस्सल जयवत रे ॥१॥ तुहिज तत्त्व परम हितकारी,परमनक्तप्रतिपाल रे ॥ देव निररंजन निका धिक गुण, जय जय देव दयाल रे ॥ न० ॥२०॥ लोक सहू देखी पिण दरख्या, धन जिनशासन एद रे ॥ जिहां एहवा प्रजुने दरमारे, नाचे व सनेह रे ॥न॥२॥ देव कहे चितामणि सुलहो,कल्पजुम सुरकुंन रे॥पण ए जैनधर्म अति उत्सदो, सही सेवो निर्दन रे ।। ज० ॥ २५ ॥ ये ए सुर शिवपद सुख शाश्वत, सुणि एमके नविद रे॥ज्या धर्म नजी जिनव रनो,याणी मन यानद रे ॥०॥ ३० ॥ करी प्रनावना शासन केरी, मुर पदोतो निज नम रे ॥ ने कहे जे तुमो परकाश्यो, ते नर गुणमसि धाम रे ॥०॥३१॥णी परें पोपध व्रत थाराधो, नवि चालीजें चित्तरे तो सुर शिवपद सुख पामीजें, कहे जगगुरु सुपवित्त रे ॥॥३॥ बछे खमें चालीशमी ढालें, पोपधव्रत थधिकार रे ॥ रामविजय कहे एम व्रत निर्मल,पालतां नवनिस्तार रे ॥न॥३३॥ इति एकादश पोपवते जिनपद कथानकम् ॥११॥ सर्वगाथा ॥१५॥ श्लोक तथागाथा मली ॥ १६ ॥ ॥ श्रथ हादश थतितिसविनागवत सबध ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ दवे अतिथि सविनागनु, घावश व्रत थनिराम ॥ शिवाव्रत धोएं सही,कहे शांति नगवान ॥१॥ लोकिक तिथि पर्वा दिनो, जिरों वरज्यो व्यव दार ॥ नांजन कालें यावियो, थतिथि कहियें सार ॥२॥ सक्त च ॥ तिषि पर्वोत्सवा सर्वे,त्यक्तायेन महात्मना ॥थतिथि तं विजानीयाशेषमन्यागत विठ ॥१॥ पूर्वदोदा ॥ साधुथतिथि कह्यो श्राइने,तस निरवद्य थादार ॥ सविनाग कीजै नलो,श्ण व्रतें लहे नवपार ॥२॥ प्रथम यतिने थापीने, पढ़ें वावरे श्राप ॥ मुनि न मले तो पण करे, दिशालोक गतपाप ॥ ४ ॥ यक्तं ॥ पढम जईण दाण, थप्पणा पणमिवण पारेई ॥ असा असु विदिशाण,नुजेश्य कय दिसालो ॥ २ ॥ अन्यत्राप्युक्त । अईदल्य प्रप म निवेद्य सकलं सत्साधुवर्गाय च, प्राप्ताय प्रविनागत अचिपिया बता यथाशकित ॥ वेशायातसधर्मचारिनिरल, साई च काजे सर्य, मुंजीतेसि सुनाजन गृहवतां पुण्यं जिने पितम् ॥ ३ ॥पूर्वदोदा ॥ पंच अतिचार श्री शांतिनायनो रास खंग हो. एहना, सचित्त उपरें निदेप ॥ सचित्तें तिम ढाके वली, वीजो कहे गत लेप ॥५॥ निजने यणदेवाजणी, वुझे कहे परकीय ॥ मत्सर चोयो जिन कहे, कालातिकम होय ॥ ६ ॥ शूरपाल परें पालिये, ए व्रत निरतिचार ।। पूढे चक्रायुध तदा,कहे जिन जगदाधार ॥ ४ ॥ ॥ ढाल एकतालीशमी॥ ॥ घरज थरज सुणोने रूडा राजीया होजी॥ ए देशी ॥ कहे जिन कहे जिन एदिन नरतमा दोजी, नयर कचनपुर नाम ॥ तिहा नृप तिहा नृप जितरिपु नामथी होजी, गिरुन गुण थनिराम ॥ १ ॥ सुगुण सु गुण सनेहा सुणो वातही होजी, कहे प्रनु शाति दयाल ॥ देता देतां हो दान सुपात्रने दोजी, सवि सुख लहिये रसाल ॥ सु० ॥ २ ॥ ए थाक णी ॥ तस घर तस घर राणी सुलोचना होजी, रमणी रूपनमार ॥ तिहां एक तिहां एक महिपाल नामथी होजी, क्षत्रिय निवसे उदार ॥ सु॥३॥ करे नित्य करे नित्य कर्पण कर्मने दोजी, तस घर धारिणी नार ॥ तेहनी तेहनी हो कुरखना उपन्या होजी, थगज वे तस चार ॥ सु० ॥ ४ ॥ पहेलो हो पहेलो दो धीरपाल नामथी होनी, पृथ्वी पाल सुजाण ॥ देवपाल देवपाल त्रीजो हो जाणीये दोजी, गुरपाल चोथो वखाण ॥सु॥५॥ थगज थंगज ए सोहामणा होजी,चारे चतुर वि नीत ॥ रूपें रूप हो यति रलियामणा हो जी, शैशवनाव व्यतीत ॥ मु०॥ ६ ॥ यौवन यौवन वय परणाविया होजी, चारेने वर नारी ॥ पहे ली पहेलीहो चश्मती सती होजी,कीर्तिमती सुविचार ॥१॥॥ त्रीजी श्रीजी हो शातिमती जणी होजी, शीलमती गुणगेह ॥ निजघर निजघर काम करे जला होजी, धरती थविदड नेह ॥ सु ॥ ७ ॥ एकदिन एकदिन वकालमा दोजी, चारे महिपाल नद ॥ पाबली पाबती रय पीयें सतीने हो जी, क्षेत्रे गया सुखकद ॥ सु ॥ ए ॥ पूल पूरलथी तस कामिनी दोजी, नात लेश्ने दो चार ॥ चाली चाली हो चतुरा चमकती दोजी, क्षेत्र जणी सुविचार || मु॥ १०॥ मारग मारगमाहे उन्नयो दोजी, चिटुं दिशिथी जलधार ॥ गडगड गडगड घन गाजे घणु होजी, वरसे थखमित धार ॥ सु ॥ ११ ॥ पवन पवन फकोले थति घणो दोजी, ऊडी मामी रे थासार ॥ कचुक कचुक चीर नीना घणु दो -- YO0 जैनकथा रनकोप नाग आम्मो. जी, तब ते चतुरा दो चार ॥ सु० ॥ १२ ॥ वडतलें वरतले भावीनी रही होजी, घरी जेहनी हो बाय ॥ टप टप जल पिंड चूवे रोजी, वाये शीतल वाय ॥ सु०॥ १३ ॥ वात करे वात करे धनीपकी होगी, मानिनी हसि हसि तेह ॥ एहवे एहवे हो महिपाल पूर्वधी दोजी,बायो तिहां ससनेह ॥ सु०॥ १३ ॥ जाता जाता दो क्षेत्रनणी तिहां होजी, मार्गे जलदने जोर ॥ ते पण ते पण वडतरुने त होजी, गनो रह्यो एक गोर ॥ सु० ॥ १५ ॥ उथे उथें रहीने सांगले होजी, ते वहूध रनी रे वात ॥ विजन विजन लहीने निराकुली दोजी, पहेली बोले निर्मित ॥ सु० ॥ १६ ॥ अवसर अवसर थाज मल्यो जलो होजी, कहो मन जे दुवे श्ट ॥ माही माही मापण केलवी दोजी, वहूर बोले कनिष्ट ॥ सु० ॥ १७ ॥ सुणिय सुणियें दो एहबु ससारमा होजी, वाडीने पण ढुवे कान ॥ न घटे न घटे वनावनु नाखवु दोजी,मुऊ मनमांहे ए शान ॥ सु० ॥ १७ ॥ यत ॥ दिवा निरीक्ष्य वक्तव्य, रात्रौ नैव च नैव च ॥ संचरति महाधूत , वटे वररुचिर्यथा ॥ ४ ॥ पूर्वदाज ॥ बोले बोजे हो चश्वती तिहा दोजी, नदि हा कोश्नो प्रचार ॥ गोष्टि गोष्टि करीजें दिल खोलीने दोजी, मुझने वर्ष थपारः ॥ सु० ॥ १५ ॥ कहे तब कहे तब शीलवती सती दोजी, कहो अनुक्रमें तुमें एह ॥ वारक वारक था वे मादरे दोजी, यात कदिश ससनेह ॥ सु० ॥ २० ॥ पहेली पहेली कहे मन मादरे दोजी, घृत ताव्यु ततकाल ॥ जो नले जो नले दिन चट कष्एमां दोजी, तो जमु था उनमाल ॥ सु० ॥१॥ वली तेम वली तेम शिराववी नली दोजी, सुदर दहिंने सयोग । मलती मलती दो थानकचूरिशु होजी, जोजन ए देवयोग ॥ सु ॥ २२ ॥ बीजी बीजी हो कीर्तिमती कहे होजी, सुणो मुफ मननी रे श्राश ॥ घदेनी बहेनी हो होश दियडे रहे दोजी,कहियें कोने ए नास ॥सु॥१२॥ साव साव दूध खीर खामा दोजी, मामा सुंदर जोडि ॥ सरहा सरदां घृत शाल दाला दोजी,मुफ जीमणनो रे कोड ॥ सु० ॥ २४ ॥ त्रीजी त्रीजी हो शांतिमती कहे दोजी, मुफ मोवकनी रे श्राश ॥ अवर अवर वली सुखनक्षिका दो जी, मुज मन जावे मिगश ॥ सु० ॥ ५५ ॥ बलतुं वल तु हो शीलवती वदे दोजी, नदि मुफ नोजन प्रेम ॥ खाई खाधु हो श्री शातिनाथनो रास खंम हो. ४०१ वेसी र नहि दोजी, सुणो मुझ मनमांदे एम ॥ सु० ॥ २६ ॥ नाही नाही दो निर्मल नीर दोजी, चदन चर्चित थग ॥ पदेरी पहेरी हो वसन सोहामणा दोजी, नूपण नूपित चग ॥ सु० ॥ २४ ॥ मांझ्या मां मया हो थाल सोहामणा होजी, कनक कचोलां रे माहे ॥ पिरम पिरसु सुसर जेत कतने दोजी, जोजन मनने उत्साह ॥ सु० ॥ २७ ॥ पोपी पोपी हो गृहजन सर्वने दोजी, दे दीनादिक दान ॥ केडे के. दो निकुत्सित जे रघु होजी, श्रशन अने वली पान ॥ श्ए ॥ जमता ज मतां ते नोजन मुज मनें होजी, होवे दर्प थपार ॥ नांख्यो नाख्यो हो थनिप्राय आपणो दोजी, शीलवती तिण वार ॥९॥३०॥ निमुणी निसु णीदो कानमांमी करी दोजी,सुसरे सघली रे वात ॥ त्रिट्ठ जणी विट्ठ जणी फरि बोले तिहा दोजी, नवली तादरी रे धात ॥ सु० ॥ ३१ ॥ थापण थापण कौटुबिक घरे दोजी,अशनादिक रे उलन ॥ वसन वसनथानूपण वातही दोजी, करवी एह थचन ॥ सु० ॥ ३२ ॥ करिये करिये मनोरथ एहवो दोजी, जेदवुथापणु नाग्य ॥ करलु करवु दो कर्पण कर्मनु दोजी, किदाथी एद मिले लाग ॥ सु० ॥ ३३ ॥ चिते चिते मदिपाल मनमा होजी, मुझ घर नारी कुहाड ॥ नोजन नोजन वहूने थापे नदि दोजी, न सरे मननी रुहाहि ॥ सु० ॥ ३४ ॥ घर जई घर जश्ने निज नारीने होजी,समजाविश सुविचार॥पूरिश पूरिश ए बिलु वहूतणा होजी,मन चि तित रे थाहार ॥ १० ॥ ३५ ॥ बोले वोले थसमजस वोलडा होजी, चोथी वढू कम जात ॥ केवल केवल एदने प्रवु दोजी, कुत्सित उदन नात ॥ सु० ॥ ३८ ॥ विरमी विरमी हो दृष्ठि गई क्षेत्रमा दोजी, वहू थर ते गुणवत॥थावीथावी महिपाल नारीने दोजी,वात कही सवि तंत ॥सु ॥ ३४ ॥ कदिने कदिनें गयो निज क्षेत्रमा दोजी, जुवो नावीस वध ॥ न टले न टले हो टाल्यो कोनो दो जी, जो करे कोटि प्रबंध ॥ सु॥३॥ खम खम ब ढाल ए जणी दोजी, एकतालीशमी सार ॥राम राम कहे जग दोहिला दोजी,गुणना जाणणहार ॥९॥३॥१६॥७॥ ॥ दोहा॥ ॥ वहूथर जब वेला थई, तब थावी निन घेर ॥ सासुयें पहेलाथी करी, ते नोजननी पेर ॥१॥ जमवा बेसारी सवे, उला जलें सन्र ।।

४०३ जैनकथा रनकोप नाग बाग्मो. नोजन पिरसे लावता, थाणी थानदपूर ॥५॥त्रणे जपी मन तवे, मन चितित थाहार ॥ केम मलियो थपषितव्यो, ए पोर वण प्रकार ॥ ३ ॥ शीलवतीने सासुये, पिरस्यु बाणी कदन्न । पछि नेद जाणी करी,विलखु थयु वदन्न ॥४॥ में काही विणसाइघु नहि,नजदी कारणदि ॥त्रणे जणी पण चितवे, खोटी सासु बुधि ॥ ५ ॥ जमी ठी चारे जणी, पण मन विस्मय नारि ॥ पुनरपि कारनने वशे, पानी क्षेत्र मफार ॥ ६ ॥ ॥ ढाल वहेंतालीशमी॥ ॥ सुग्रीव नयर सोदामणु जी ॥ ए देशी ॥ मारगमाहे चिढ़ जणी जी, करती एम विचार ॥ मन गमतो थावी मल्यो जी, थापणने बारार रे ॥१॥ बहेनी,ए थयो कवण प्रकार ॥ चितित फलियु सार रे ॥ १० ॥ ए० ॥ ए थाकणी ॥ शीलवतीने सर्वे कहे जी, चितित सरिखु रे पाय ॥ तें कदशन जो चितव्यु जी, तेवु मलियु थाय रे ॥ ॥ ५ ॥ कीजें मनोरथ महोटको जी, तुझ न धरिये रे चित्त ॥ शीलवती कहे सनिलो जी, शी ए वात विचित्र रे ॥ ३० ॥३॥ नोजन सार असार नो जी, उदरें एकज नाव ॥ शु फूलो नोजन लदी जी, शो ए सुम्ह स नाव रे ॥ ब० ॥ ४ ॥ मन गमतुं जब मादरे जी, थाशे कारिज तेह ।। लेखे जनम तब थावशे जी, म म धरजो सदेह रे ॥ ५० ॥ ५॥ नि त्यप्रत्ये नोजन नावता जी, पीरसे सासु रे तास ॥ तब त्रिलु जणीने जीमतां जी, मनमा दुइ विमास रे ॥ब० ॥ ६ ॥ पूजे सासूने किस्यो जी, शीलवतीनो रे दोष ॥ नोजन थतर एवडो जी, नवि कीजें धरि शो परे ॥ ब० ॥ ४ ॥ कदि सासूयें मूलथी जी, वडनीचें करी जेद ॥ वा त सुणीने सा दुई जी, म्लानमुखी गुणगेह रे ॥॥॥ नित्य प्रत्यें रहे ते फूरती जी,न वले तननो रे वान ॥ मुख करमाणु फूल स्रं जी,पामी ते अपमान रे ॥१०॥ए॥ यत ॥ चितान्योऽप्यधिका चितां, लोके जानामि निश्चित्तम् ॥ चिता ददति निर्जीव,पिता दहति सजीवकम् ॥१॥ पूर्वढाल ॥ एक दिन का पूढीयुं जी, कां तु उर्वज काय ॥ शी तुज चिता उपनी जी, मुफ मन थारति थाय रे ॥ वहाली, ए थयो कवण प्रकार ॥१०॥ ढलक ढलक थासू ढले जी, कां एवडी दिलगीर ॥ नीसासो नाखी दे श्री शांतिनाथनो रास खंम हो. ४०३ जी, यांसु सूही चीर रे ॥ व ॥ ११ ॥ वात सवे मामी कही जी, धुर हूंती थामूल ॥ शूरपाल मनमा थयो जी, वात सुणी प्रतिकूल रे ॥ व० ॥ १२ ॥ थहो गुणवती कपरें जी, एहवो अनादर नाव ॥ निर्गुण मुझ माता पिता जी, जे विपरीत स्वनाव रे ॥ व० ॥ १३ ॥ एह मनो रथ अति नलो जी, आगल ए अनुसार ॥ थाशे सहु नारीशिर जी, ए महारी घरनार रे ॥ व ॥ १५ ॥ ते माटे देशांतरें जी, जई मेलु धन कोडि ॥ थोडे दिवसें नारीना जी, पूरुं वांछित कोड रे ॥ व ॥ १५ ॥ एम चिती कहे नारीने जी, जाइश हूँ परदेश ॥ तुझ मनोरथ पूवा जी, मत 5ख धरे लवलेश रे ॥ १६ ॥ स्वामी, तुम विषु घडी रेड मास ॥ ए याकणी ॥ शीलवती कहे साहिबा जी, वहालेसर अवधार ॥ तुमें चाले देशातरें जी, मुफने कोण थाधार रे ॥ स्वामी० ॥ १७ ॥ सा त ननु पण सासरु जी, पीयर तेम मोशाल ॥ पण प्रीतम विना नारी नी जी, न लिये कोई सजाल रे ॥ स्वा० ॥ १७ ॥ यौवन नर मुफ देह डी जी, दोपी लोक अनेक ॥ वालम परदेशे चले जी, करि पग पग मुज वेक रे ॥ स्वा० ॥१९॥ थलगीन रढुंबध घडी जी,श्रावीश तुम संघात ॥ बाया थनगी नवि रहे जी, देहथकी तिल मात रे ॥ स्वा० ॥ २० ॥ कहे प्रीतम सुण कामिनी जी, तुक पासें मुफ प्राण ॥ थतर नहि तुज मुफ विचें जी, सुदरी सुगुणनिधान रे ॥ वहा ॥ २१ ॥ पगवधन परदेशमा जी, केम सचवाये नारी ॥ ते माटें मदिर रदो जी, यो थादेश विचार रे ॥वहा॥२२॥ ना कहेतां रुडुं नहिं जी,जाकदेतां नि स्नेह ॥ जाम जा एम कदु जी, उदासीन पक्ष एह रे ॥ स्वा० ॥ २३ ॥ नयरों जल चा व्यां वही जी, हियडुं न धरे रे धीर ॥ शी गति दोशे माहरी जी, सुण नणदलरा वीर रे ॥ स्वा० ॥ २४ ॥ तुमें गुणवता नाइला जी, जिहां जा शो तिहा कधि ॥ रखे मुझने वीसारता जी, पियु पामी नव निधि रे ॥ स्वा० ॥ २५ ॥ सुण सुदरी नवि विसरे जी, तुऊ गुण वसिया रे चित्त ।। चित्त गयदा मावतां जी, उतरे नहि कल्पात रे ॥ स्वा० ॥ २६ ॥ तुम थावे ए बोडवो जी, कचुक वेणीषध ॥ एम प्रतिज्ञा थादरी जी, महोटो मोह प्रतिवध रे ॥ स्वा० ॥ २७ ॥ मुगुण सनेहा साहिबा जी, वहेलाही वलजोद ॥ सुगरजीवी जीवजो जी, उबर ज्यु फलजोद रे ॥ स्वा० ॥ , Yog जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. २७ ॥ नारी मनावी निसखो जी, मदिरची शूरपाल ॥ सा एकर दिशें जी, हवे जुवो नाग्यविशाल रे ॥ स्वा० ॥ ॥ बहेंताप्तीकली ढालमा जी, नर नारीने रे राग ॥ परदेशे एम नीसलो जी, बामन फलो नाग्य रे॥वाणा३॥सर्वगाथा॥१६६॥ श्लोक तथा गाथा मली ॥१॥ ॥ दोहा॥ ॥ शीलवती मन 5 ख धरे, पियु चाल्यो परदेश ॥ हडकूदण लागी हिये, रति न लदे लवलेश ॥ १ ॥ स्वोचित गृहकारज करे, पण मन चिंता वत ॥ कण कण दियडे सांगरे, शूरपाल निज कत ॥ २ ॥ मात पिता ये पूनियु, किहा गयो सुत शूरपाल ॥ सहन सहु को एम कहे, नहिं ते हनी कोई नाल ॥ ३ ॥ शोध करी तेदनी घणी, मात पिता तेणी वार॥ पण किदाय लाध्यो नदि, धरे मन खेद अपार ॥ ४ ॥ करे मांहोमहि मत्रगुं, केणे उहवियो तेद ॥ जे एम रीसावी गयो, कोश्क कारण एह ॥ ५ ॥ थापण उहवियो नहिं, ते कनिष्ठ गुणगेह ॥ सहुने वाहालो जीव जेम, केम तेणें दीधो लेह ॥ ६ ॥ पूजे शीलवती नणी, नरे तुण स घात ॥ शु रीसाणो वनहो, ते दाखो श्रम वात ॥ ७ ॥ बाण न लोपी कतनी, में काई तिलमात्र ॥ पण मुफ वेणी ए वमहे, दाथे गूंथी रात्र ॥ ॥ कयुं मुफने थाव्या विना, नवि बोडेवी वेण ॥ बीच काय जाणु नदि, कापु मुज कारण केण ॥ ए॥ ॥ ढाल तालीशमी॥ ॥ नारी रे निरुपम नागिला ॥ ए देशी ॥ वात सुणी रे करे मत्रए, बाधव मली माय ताय रे ॥ थापण किएँ उहव्यो नहिं, केम गयो एम रीसाय रे ॥१॥ दा शूरपाल तु किदां गयो,मोहें कहे एम माय रे ॥ तेम महिपाल पण वलवले, दियडलाथाव्यां जराय रे ॥ दा० ॥ ॥ बांधव त्रिट्ठ एम चितवे, नारी केरु थपमान रे ॥णे न सहेवाणु रे बांध, ग यो मन धरि थनिमान रे । दाम् ॥ ३ ॥ जननी जनक धन बधुने, त जे पलकमाहे सोय रे ॥ न सदे तूंकार कोनो वली, मानधन जे ज ग होय रे ॥ हा ॥ ४ ॥ ए परानव सहि तेदने, जे कसो में तस ना री रे ॥ मानधन पुरुप साखे नहिं,नारी अपमान निर्धार रे ॥ दा० ॥५॥ विरहातुर घणु 5 ख नखां, नवि लदि वांधवशोध रे ॥ जेम यति बेशची श्री शांतिनाथनो रास खंम छो. ४०५ नवि लहे, प्रथमगुणवाणीया वोधि रे ॥ दा० ॥ ६ ॥ हवे शूरपाल ते चालीयो, जोवतो गिरि वन ठाम रे ॥ श्रनुक्रमे नयर एक धावियुं, महा शाल जेदनु नाम रे ॥ हा ॥ ७ ॥ जवुतरु हेग्ल विश्रम्यो, वसन ना खी धरापीठ रे ॥ शयन कीधु अमातुर नणी, उघ थावी यति मीठ रे ॥ हा ॥ ७ ॥ तास प्रजाव तरुबायडी, तेम रही दिवस मध्याह्न रे ॥ थहो थहो पुण्य प्रगट द्वयुं, ते सुणो सहु सावधान रे ॥ हा ॥ ॥ ते द नगरी तणो राजियो, काल पहोतो ततकाल रे ॥ पचदिव्य मत्री थ धिवासियां, पुरमाहे फरे उजमाल रे ॥ हा ॥ १० ॥ नाग्यने योगें ति हां थावीया, पोढीयो जिहां शूरपाल रे ॥ हाथीय कलशलो ढालियो, जागीयो नाग्यविशाल रे ॥ दा० ॥ ११ ॥ दरखी हेपारव हय करे, चा मर बत्र धरत रे ॥ गजवरें खचे वेसारियो, वदीजन विरुद नजरत रे ॥ हा ॥१२॥ सर्व सामत थावी नम्या, देखीयो लक्षणवत रे ॥ स्वामी थ म नाग्य वल ए कस्खु, मलीयो तु गुणवत रे ॥ हा०॥ १३ ॥ थाविया वद् त थावरे, वाजते हर्पनिशाण रे ॥ स्वामी यमचा घणु जीवजो, वरस कोडाकोडि मान रे ॥ हा ॥ १४ ॥ एम थाशीप दिये गोरडी, धवल गा ती सुकुमार रे ॥ करिय यनिपेक वेसारियो, तरस्त ऊपर ततकाल रे ॥ हा० ॥ १५॥ वखत फलियो बलें वाधीयो,सीमना सवि नम्या राय रे ॥ सवल धरा धिग थइ जोगवे,प्रवल जस पुण्य सखाय रे ॥ हा ॥ १६ ॥ एक दिन नारी तस साजरी, निसस्यो जेहने काज रे ॥ स्वजन सडको वली साजयां, चितवे एम नरराज रे ॥ हा ॥ १७ ॥ मादरी थाथ श्या कामनी, जोगवु एकलो थाम रे ॥ पूरवु जो नदि नारीना, सकल मनोवाठित काम रे ॥ दा ॥ १७ ॥ यत ॥ किं तया क्रियते लदम्या, विटेशागतया ननु ॥ थरयो या न पश्यंति, वधुनिर्या न जुज्यते ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ एम चिती नृपें दायशु, लख्यो निजनारीने लेख रे ॥ राज्य पाम्यो पण तारुं, पामीश सुख मुख देखि रे ॥ दा० ॥ १॥ लेख थापी नृपें मोकल्या, सेवको तेडवा काज रे ॥ तुरत कचनपुरे ते गया, खोलता थाविया वाज रे ॥ दा० ॥ २०॥ पण महिपाल लाधो नहिं, का एक नयरने लोक रे ॥ काल उर्निकमा ते गयो, श्दाथकी धरि मन शोक रे ॥ दा० ॥ १ ॥ तेह सह कुटुव किदा गयो, खबर नहि , , - ४०६ जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. हां कोइ तास रे ॥ एम सुणि तेह वलिया सवे, याविया नृपतिपाल रे ॥ हा० ॥ २५ ॥ वात सुणी राय विलखो थयो, चितवे चित्तमा एम रे ॥ थहो थहो माहरा सयण ते, वरततां दशे कहो केम रे ॥ २३ ॥ राज्य पाम्यो पण रति नहि,सानली सयनु खरे ॥ एह येवल रहेथति घणी,जुन जुन कर्म यति तिरक रे ॥हा॥२॥ खम बढे काही क मनी, अनवगति ढाल ताल रे ॥ राम कहे सांनलो दवे कडु, जे लएं ते महिपाल रे॥हा॥२५॥ सर्व गाथा॥१६॥ श्लोक तथा गाथा मलीशा ॥ दोहा॥ ॥ जिण वरसें तेनीसमो,गेहयकी शुरपाल ॥ तेहथकी बीजे वरस,कागे पच्यो सुष्काल ॥ १ ॥ मूलयकी वूगे नहीं, पख्यो काल विकराल । जरि लोक क्ष्य नीपन्यो, वदेचे नूखें बाल ॥ २ ॥ मारग 5 सचर हुवा, फरे तस्करनां वृद ॥ नूख्या नर जहण करे, मानवप्रत्ये यबह ॥३॥ कष्टयकी पामे तिहा, मुनिवर पण थाहार ॥ रक मली लिये फूटीने, एदवो हाहाकार ॥४॥ परणी पण तरुणी तजे,नि स्नेहीजरतार. ॥ नेहरहे नहिं कोनो, न पले निज थाचार ॥ ५ ॥ गति मति सवि जाये गली, एहवो जाणी काल ॥ निजकुटुब लेश नीसयो, मविरथी महिपाल ॥ ६ ॥ ॥ ढाल चुम्मालीशमी॥ ॥ दो सायर सुत सोहामणा ॥ ए वेशी ॥ दो महिपाल परिवार , प रिवार रे दो नीसरियो परदेश ॥ दो सबल नहि एक दिवसनो,एक विव सनो रे दो नहिं समाधि लवलेश ॥१॥ निजकत्य श्रागें रे कोई बलीयो नहीं रे॥एथांकणी ॥ दो गाम नयरपुरमा नमे, पुरमा जमेरे दो कोण दिये थावकार ॥लोक कहे परदेशीया, परदेशीया रे हो कना न रहो इण ठार नि॥शादो शून्य मदिर थावी रहे,थावी रहे हो नयां नजाये रात ॥ हो निद न थावे नयणले,नयणले रे हो उठी चले प्रनात निः॥३॥हो पंथें पग चाले नहीं, चाले नहिं रेहोसानले कुवचन तास ॥ करे गुजरान फल मुलगं,फल फूल रे दो चिते चित्त उदास ॥ नि० ॥ ४ ॥ हो केम कुटुंब जीवाइयं, जीवाहशुं रे दो नहिं कोडी पेदास ॥ सूरज ग्ये गतीने, उठीने रे दो करवी परनी थाश नि॥५॥ दो जेम तेम करता थनुक्रमें, यनुक्रमें रे दो थाव्या पुर महाशाल ॥ लोक वसे सुखीयां घणा, मुखीयाँ , श्री शातिनाथनो रास खंग हो. ४00 घणां रे हो देवी थयां उजमाल ॥ नि० ॥ ६ ॥ दो करे पुरमां थाजी विका, बाजीविका रे दो चाले सुखें गुजरान ॥ शीलवती कारन करे, कारज करे रे दो पति विषु न लहे मान ॥ नि० ॥ ॥ हो एक दिन सासू एम कहे, एम कहे रे हो जीरण कचुक कतार ॥ वेणी बोडाव तुं शिर तणी, शिर तणी रे हो कहेण न माने लगार ॥ नि० ॥ ॥ दो सासू ससरो थाक्या कही, थाक्या कही रे हो पण ते दीली जाण ॥ दो थइ सद्धने थलखामणी, अलखामणी रे हो कर्म करे ते प्रमाण ॥ नि० ॥ ए ॥ हो पतिविरहें था दूवली, दूवली रे हो वीज चांदनीया रेद ॥ दो क्षण क्षण प्रीतम सानरे, सानरे रे हो साले नवल सनेह ॥ नि० ॥ १० ॥ दो मुखहूती वोले नहि, वोले नहि रे हो करे सविशेषु काम ॥ हो कुललझा राखे जली, राखे जली रे दो शीलवती निज माम ॥ नि ॥ ११ ॥ हो हवे मुणो ते पुरराजीयो, राजीयो रे दो शूर पाल थनिधान ॥ लोक सहू हितकारणें, कारणे रे दो सरोवर मांमधु सुजाण ॥ नि० ॥ १२ ॥ हो निर्धन जन थावे घां, थावे घणां रे हो तिहां कणे करवा काम ॥ 5 स्थित लोक मजूरियां, मजूरीयां रे दो पामे खासा दाम ॥ नि० ॥१३॥ दो वात नगरमा विस्तरी, विस्तरी रे हो थयो जाणी रोजगार ॥ हो महिपाल पण थावीयो, थावीयो रे हो लेइ साथै परिवार ॥ नि ॥ १४ ॥ हो करे रोजगार मजूरनो, मजूरनो रे हो तदरनरण सुखें थाय ॥ दो वान वस्यो वेला वली, वेला वली रे हो दिवस सुखें तस जाय ॥ नि ॥ १५॥ दो एक दिन गज चढी रा जीयो, राजीयो रे दो सरोवर जोवा काज ॥ हो तेजी तुरिय पलापिया, पलापिया रे हो साथै सवलो साज ॥ नि ॥ १६ ॥ दो नवरंग नेजा फरदरे, फरहरे रे दो नोषत घुरे रे निशाण ॥ दो यश् थस्वार ते था वीयो, श्रावीयो रे हो नाला फलदल जाण ॥ नि०॥ १७ ॥ हो गज खर्चे चढयो राजवी, रानवी रे दो कनी सुनटनी कोडि ॥ दो करे रे म जूरी मजूरीया, मजुरीया रे दो चोप धरी मन कोड ॥ नि० ॥१७॥ दो निरखे नजरें निदालीने, निहालीने रे दो तय दीठो महिपाल ॥ दो शीलवती "दीती प्रिया, दीती प्रिया रे हो उपली विरहनी जाल ॥ नि० ॥१४ा दो परनरने निरखे नहिं, निरखे नहिं रे दो शीलवती सुकुमार ॥ न ४०६ जैनकथा रत्नकोप नाग बाग्मो. यहां कोई तास रे ॥ एम सुणि तेह वलिया सवे, याविया पतिपात रे ॥ दा० ॥ २२ ॥ वात सुणी राय विलखो थयो, चितवे चित्तमा एम रे ॥ थहो यहो माहरा सयण ते, वरतता हो कहो केमरे ॥रा. २३ ॥ राज्य पाम्यो पण रति नहि,सानली सयनु खरे ॥ एह इस रहे यति घणी, जुकर्म यति तिरक रे ॥हा॥२४॥ खम बडे काही क मनी, थनवगति ढाल ताल रे ॥ राम कहे सांजलो दवे कडु, जे लए ते महिपाल रे॥हा॥२५॥ सर्व गाथा॥१६॥श्लोक तथा गाथा मलीन ॥ दोहा॥ ॥ निण वरसे ते नीसखो,गेहथकी शुरपाल ॥ तेहथकी वीजे वरस,कागे पड्यो मुष्काल ॥ १ ॥ मूलयकी वूगे नहीं, पख्यो काल विकराल ॥ नरि लोक क्य नीपन्यो, वदेचे नूखें वाल ॥ २ ॥ मारग 5 सबर हुवा, फरे तस्करना वृद ॥ नूरख्या नर नदण करे, मानवप्रत्ये घबद ॥३॥ कष्टथकी पामे तिहा, मुनिवर पण थाहार ॥ रक मली लिये फूटीने, एहवो हाहाकार ॥४॥ परणी पण तरुणी तजे,नि स्नेहीजरतार ॥ नेह रहे नहिं कोश्नो, न पले निज थाचार ॥ ५ ॥ गति मति सवि जाये गली, एहवो जाणी काल ॥ निजकुटुंव ले नीसखो, मदिरथी महिपाल ॥ ६ ॥ ॥ ढाल चुम्मालीशमी॥ ॥ हो सायर सुत सोहामणा ॥ ए वेशी ॥ दो महिपाल परिवार, प रिवारशु रे हो नीसरियो परदेश ॥ दो सपल नहिं एक दिवसनो,एक दिव सनो रे दो नहिं समाधि सवलेश ॥१॥ निजकत्य थागें रे कोई बलीयो नहीं रे॥एश्रांकणी॥दो गाम नयरपुरमा नमे, पुरमा जमे रे हो कोण दिये थावकार ॥ लोक कहे परदेशीया, परदेशीया रे दो कना न रहो इए गरनि॥॥ दो शून्य मदिर थावी रहे,थावी रहे हो जूरव्या न जाये रात ॥ दो निद न थावे नयणले,नयणले रे दो नती चले प्रनात ॥ नि०॥३॥हो पंथे पगचाले नहीं, चाले नहिं रे हो सानले कुवचन तास ॥ करे गुजरान फल फूल,फल फूला रे हो चिते चित्त सदास ॥ नि० ॥ ४ ॥ हो केम कुटुंब जीवाडगु, जीवाडा रे दो नहि कोडी पेदास ॥ सूरज उग्ये ठतीने, उतीने रे दो करवी परनी थाश ॥निया हो जेमतेम करतो धनुक्रमें, अनुक्रमें रे दो थाव्या पुर महाशाल ॥ लोक वसे सुखीयां घां, सुखीयां ते श्री शातिनाथनो रास खंगको ४ए रे हो थापणो ए राजान॥दो एह कर्मकर उपरें, उपरें रे हो एवर्ल्ड केम स न्मान ॥नि ॥ ३४ ॥ हो चुम्मालीशमी ढालमा, ढालमा रे हो प्र कट्यो पुण्यविलास ॥ हो रामविजय कहे सानलो, सानलो रे हो मन माहे धरि उल्लास ॥ नि ॥ ३५ ॥ सर्व गाथा ॥ १७३५ ॥श्लोक॥३॥ ॥ दोहा॥ ॥ घर थावी सुसरो कहे, शीलवतीने एम ॥ जीरण कचुक परहरी, पहेर नवो धरि प्रेम ॥ १ ॥ जाता नृप थावासमा, पोसाये निर्धार ॥ एक नूर कह्यो यादमी, कपडूं नूर हजार ॥ ५ ॥ पण नवि माने कहण, सूता सुखमाहे राति ॥ स लेवाने मोकली, ते कग्ये परनात ॥ ३ ॥ राजवन ऊनी रही,नूतन जाणी तास ॥ प्रतिहारिणी तब जइ, नृपने करे अरदास ॥ ४ ॥ नृप थावी कहे तेहने, का तुज एहवो वेश ॥ जीरण कचुक केम धरे, लाजे नहि सुविशेप ॥ ५ ॥ लाजें नीच जोवती, नवि वोले ते लगार ॥ कतें सूधी उलखी, सती शीरोमणि सार ॥ ६ ॥ राजाय देवरावीयु, गोरस बगुलु तास ॥ यावी मदिर लेइने, धरती थग नन्नास ॥ ७ ॥ वीजे दिन तेम हिज गइ, शीलवती नृपगेह ॥ नृप कहे मुफ अर्पित ग्रहो, वारवाण धरि नेद ॥ ७ ॥ ते न लिये तव रो पथी, वोल्यो राजा एम ॥ कहेण न मानिश माहरु, तोनहि तुमने हम ॥ ए ॥ सा वोली सुदर थहव, होय असुदर देव ॥ पण निधे खा नहिं, जीवजाव नित्यमेव ॥ १० ॥ यत ॥ थायातु यातु लक्ष्मीर्वा, यत्ता वदता हुन ॥ जीनितं मरण वाऽस्तु, सता धर्मान्न विध्युति ॥॥ १ ॥ ॥ ढाल पिस्तालीशमी॥ ॥ माना दरजएनी लंकानो राजा ॥ए देशी॥ कर्बिम कोप करी कहे रे,सेवकने तव नूप ॥ थाण न मानेमाहरी,ए नारीनु थकल स्वरूप रे ॥१॥ दियडानी वातो,नृप रीज्यो रे ए निरखी धातो, मन मानी रे मनमानी ए नारी सुजातो, रे हियडानी वातो ॥ ए थांकणी ॥ केपो ए कारागारमा रे, थजर न करवो थाज ॥ नृप थाणा निमुणी धस्या, ले चाल्या क रत विवाज रे ॥ हि ॥ २ ॥ पण न चली निज चित्तथी रे, शीलवती गुणवत ॥ तुष्ट थइ पानी तिदा,तेडावे ते निज कत रे ॥ हि ॥३॥ पूज्यु कुण कारण प्रिये रे, नवि मूके वारवाण ॥ वैरूप्यकारक एहशु, केम Hor जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. जर न मांमे कोश्यं, कोश्यु रे हो काम करे राजमात ॥ नि० ॥१०॥दो वांधव माता तेम वली,तेम वली रे हो करतां देखी काम । पद विजनीर मन चितवे,चितवे रे दो मुज कुटुव थयु थाम ॥ नि० ॥ २१॥ हो कर्म कमाइ नोगवे, जोगवे रे हो नहि श्हा कोइनो चार ॥ हो गर्व म करतो मानवी, मानवी रे हो खोटो थथिर ससार ॥ नि० ॥ २२ ॥ हो राय कहे पंचकुलप्रत्ये, कुलप्रत्ये रे हो छु लहे कर्म करे एह ॥ रूपक एक दिन दिन प्रत्ये,दिन दिन प्रत्ये रे हो पामे एम कहे तेह ॥ नि० ॥१२॥ दो साहिव तुमची थाणथी,थाणथी रे हो मध्यम लहे रे याहार ॥ कहे नृप कुटुब उदेशिने,उद्देशिने रे हो पचकुलने तेणिवार ॥निणारा हो ए माणस घणां कामना,कामना रे हो करे मजूरी खास ॥ दो वमणु वधतुं एदोने, एदोने रे दो द्यो जेम वधे तन्नास ॥ नि० ॥२५॥ यत ॥ साध्य साधुजने स्वामी, निर्विशेषो यदा नवेत् ॥ तदा साधुगुणोत्साह, साघो रपि न वर्षते ॥१॥ पूर्वढाल ॥दो नात उत्तम वेवु वली,देवु वली रे हो प्रड श्रादेश प्रमाण ॥हो कहे तेडी महिपालने,महिपालने रे हो कहे अम तूग्यो राण ॥नि॥२६॥ दो करि सलाम मुखें नमस्खो,सच्चस्रो रे दो महाप्रसाद महाराज ॥ ते पण तेमदिज मुखें कहे, मुखें कहे रे दो सीध्यां वांनित काज नि॥२॥ दो पहिपालने नृप कहे,नृप कहे रे हो केता तुम अग जात॥होते कहेसाहिब मादरी,मादरी रे दो सानजसघली वातनाश्ता हो चार तनय प्रमादरे,माहरे रे हो वदूधर तेहनी ए चार ॥ एक गयो परदेशमा, परदेशमा रे दो रीसावी निर्धार ॥ नि॥ २९ ॥ दो ते थमने वदालो घणु,वहालो वए रे दो हूतो जीवन प्राण ॥ दो ते परदेश गया पड़ी, गया पड़ी रे दो दुवां थमे घणु देरान ॥ नि० ॥ ३० ॥ हो कोण नगरथी थाविया, थावीया रे दो कंचनपुर अमवास ॥ हो तुफ गया थावी रह्या, थावी रह्या रे दो मुण साहिब अरदास ॥ नि ॥३१॥ दो कहे नरपति महिपालने, महिपालने रे हो ए लघु वहू थम गेद ॥ तक लेवाने मूकजो, मूकजो रे दो मत करजो संदेह ॥ नि० ॥ ३२ ॥ दो नृप निजमदिर थावियो, थावीयो रे दो एम कही तस थादेश ॥ लोक सहू विस्मय सह्यां, विस्मय लहां रे हो अच रिज एद विशेष ॥ नि॥ ३३॥ हो कोइ साथै मोले नहीं, मोजे नहीं श्री शांतिनाथनो रास खंम छो. ४११ शोने घणुं रे, रूपवती रति रन ॥ नूपण नवि शोने घणी, दीठे होय न रने अचन रे ॥ हि ॥ २० ॥ रमझम करती कामिनी रे, यावी तृ पति पास ॥ नृप थादर थापे घणो, दीधु अर्शसन तास रे ॥ हि ॥ २१॥ सामत मत्रीश्वर सवे रे, नती करे प्रणाम ॥ तिण दिन शांति मती हती, साथै वली गई निजधाम रे ॥ हि० ॥ ॥ गुप्तदेप वेला तदा रे, नासी गइ निजगेह ॥ निज कुटुवनी थागलें, वात यावी कही सवि तेह रे ॥ हि ॥ २३ ॥ निज दयी हरिणी सही रे, वेठी हो का रागार ॥ सनु कहे जुगतुएहने,कीधु एणे किरतार रे ॥ हि ॥२॥ जे दव वादी घणु दोवे रे, ते पामे 5ख एम ॥ वृक्ष का जे मानशे, ते पग पग लेहशे देम रे ॥हि॥२५॥ नो थाती ए पाधरी रे, शु बोडाव्यानु काम ॥ एद हीलीनु दवे, मत लेजो कोई नाम रे ॥ हि ॥ २६ ॥ एक दिन ते महिपालने रे, नृपें तेच्यो सकुटुव ॥ भोजन कारण थाविया, निज जनक ने वधव थव रे ॥ हि ॥ २७ ॥ स्नान कराव्या तेहोने रे, व सन नला अति चग ॥ थानूपण पहेराविया, राजायें धरी मन रग रे ॥ हि ॥ २ ॥ मनमा महिपालादिका रे, वारु विमासे विचार ॥ थापणने ए राजियो, केम एम करे उपचार रे ॥ हि ॥ २५ ॥ जेने जे हथी रे लहेणु होवे रे, निर्गुण पण तस पास ॥ पामे लान थचितव्यो, नहिं श्हा को थवर विमास रे ॥ दि० ॥ ३० ॥ श्रासन रम्य वेसा रिया रे, नोजन काज ते वार ॥ थाल विचित्र ममावीने, नृप पण वेठो गुणधार रे ॥ दि० ॥ ३१ ॥ नृप थादेश थावे तिहा रे, शीलवती वर नारी ॥पूर मनोरथ थापणा, प्रिये चिरसचित इण वार रे ॥ हि ॥ ३२ ॥ पिरसे जोजन प्रेमा रे, अहो थहो जक्ति थपार ॥ चिते मदि पाल चित्ता, सही हा कणे को विचार रे ॥ हि० ॥ ३३ ॥ भोजन करि नया सवे रे, वेसावां थासन्न ॥ सूरपाल महिपालने रे, चरणे नमे थइ प्रसन्न रे ॥ हि ॥ ३४ ॥ तात ते दु तुम थगजो रे, नामें जे सूरपाल ॥ मात पिता तुम्हें मादरा, मलिया मुफ जाग्य विशाल रे ॥ दि० ॥ ३५ ॥ राज्य थचितित में लघु रे, ए सवि तुम्द प्रसाद ॥ हूँ से वक दु राउलो, मनमा म धरो विपाद रे ॥ दि० ॥३६ ॥ जाणीने पण तुमकने रे,नीच कराव्यु काम ॥ ते गुनहो सवि मादरो,खमनो तमें कट्ठ । ..

४२० जैनकथा रनकोप नाग थाम्मो. रीकी रही तु थजाण रे ॥ हि० ॥४॥ शीलवती कडे माहरे रे, मानवी निज हाथ ॥ वेणी रची ए प्रेमा, पहेराव्यो कनुक नाप रे ॥.. ५॥ पियुहाथे ए उतरे रे,शाने कहो का वात ॥ कत विना हुँ कोनार, मानु कहेण तिलमात रे ॥ हि० ॥ ६ ॥ राय कहे हु ताहरो रे, मा नामिनी तु जरतार ।। शीलवती कहे स्वामीने, न घटे कहेवो एल चार रे ॥ हि ॥ ७॥ सकल प्रजा रक्षक तुम्हे रे,पंचम ठगे लोकपाल । करता ए थन्यायने, पृथिवी जाय रसाताल रे ॥ हि० ॥ ॥जे शील परानवी रे, सतीयोनो थाधार ॥ ते जो शील खंमन करे तो, नहि कोई राखणहार रे ॥ हि ॥ ए॥ जेहनी रक्षा तेहपी रे, नव उपजे जगाहे ॥ वाड नखे जो चीनडा तो, कुण करे एहनो न्याय रे । दि० ॥१०॥ यउक्त ॥ गोत्र विगोपितं तेन, पोरुप चरित तथा ॥त्रा मितोमेदिनीपीते, ऽयश पटहकोऽखिले ॥ २ ॥ महाय॑मपि तेन स्व विहित रजसा सम ॥ परस्त्रीसेवन येन, निर्लोन रुतं खलु ॥ ३ ॥ युग्म ।। ढाल ॥ पासें वाणी तव कहे रे, सुण नई उजमाल ॥ सद्ध वाले जे हने त्रिया,तुज वाठे ते नूपाल रे ॥ हि ॥११॥ शीलवती कहे मुजतन्नने रे, कत थने के यगन्न ॥ ते विणु को थमे नहीं,साचु मानजोमन रे ॥ दि॥१२॥ यत ॥ दोहो । केसरि केश यंग मणि, सरणा मुहहांड ॥ सती पयोधर रुपण धन, चढशे दाथ मुयाद ॥॥ पूर्वढाल ॥ राय कहे सकेतना रे, वचन प्रतीतिने काज ॥ सादामु जो निहाल तु,खोटु कहेतां मुफ लाज रे ॥ हि ॥ १३ ॥ थाव्यो हा दु एकलो रे, सूरपाल अनि धान ॥ राय थपुत्रियो शहां मूर,थ वेगे दु राजान रे ॥ दि० ॥ १४ ॥ प्रत्यय सहित मुणी करी रे, वयण विमासे नारि ॥ कत सदी ए माहरो, जाणे इगित थाकार रे ॥ दि० ॥ १५ ॥ तब सन्मुख निरस्युं तेणें रे, उत्तखियो निज कत ॥ मन विकम्युं तन उमस्यु,नागी मनहानी घ्राति रे ॥ हि ॥ १६ ॥ सा दर्षित मनमा दुई रे, थयु रोमांचित श्रग ॥ जेम घनदर्शन मोरडी, तेम वाथ्यो अंतररंग रे ॥ दि० ॥ १३ ॥दासीने फरमावीयु रे,खासी करो एदनी सेव ॥ ए गुणवती स्वामिनी, सेवो एहने जेम देव रे ॥ हि ॥१॥ स्नान कराव्युं तेदने रे,चदन तनु चरचाय ॥ पटांशुक पहेरावियां,वर भाषण शोनाय रे ॥ दि० ॥ १५ ॥ श्यामा ते श्री शांतिनाथनो रास खंग रहो. ४११ शोने घणु रे, रूपवती रति रज ॥ जूपण बवि शोने घणी, दीठे होय न रने वचन रे ॥ हि ॥ २० ॥ रमझम करती कामिनी रे, यावी नृ पति पास ॥ नृप थादर थापे घणो, दीधु असिन तास रे ॥ हि० ॥ २१ ॥सामत मत्रीश्वर सवे रे, उठी करे प्रणाम ॥ तिण दिन शांति मती दती, साथे वली गइ निजधाम रे ॥ हि ॥ २२ ॥ गुप्तदेप वेला तदा रे, नासी गई निजगेह ॥ निज कुटुवनी थागलें, वात यावी कदी सवि तेह रे ॥ हि ॥ २३ ॥ निज दतथी हतिणी सही रे, वेठी हो का रागार ॥सद्ध कहे जुगतुएहने,कीधु एवं किरतार रे ॥ हि ॥२॥ जे वादी घणु होवे रे, ते पामे सुख एम ॥ वृक्ष का जे मानशे, ते पग पग बेहशे देम रे ॥हि॥२५॥ बो थाती ए पाधरी रे, शु जोडाव्यानु काम ॥ एह दतीतीनु दवे, मत लेजो कोई नाम रे ॥ हि ॥ २६ ॥ एक दिन ते महिपालने रे, नृपें तेब्यो सकुटुव ॥ नोजन कारण थावियां, निज जनक ने वधव थव रे ॥ हि ॥ २७ ॥ स्नान कराव्या तेहोने रे, व सन नलां यति चग ॥ बानूपण पहेरा विया, राजायें धरी मन रग रे ॥ हि ॥ २७ ॥ मनमा महिपालादिका रे, वारु विमासे विचार ॥ थापणने ए राजियो, केम एम करे उपचार रे ॥ हि ॥ ए ॥ जेने जे हथी रे लहेणु होवे रे, निर्गुण पण तस पास ॥ पामे लान थचितथ्यो, नहिं हा को अवर विमास रे ॥ हि ॥ ३० ॥ थासन रम्य वेसा रिया रे, नोजन काज ते वार ॥ थाल विचित्र ममावीने, नृप पण वेठो गुणधार रे ॥ हि ॥ ३१ ॥ नृप थादेश थावे तिहां रे, शीलवती वर नारी ॥पूर मनोरथ थापणा, प्रिये चिरसचित इण वार रे ॥ हि ॥ ३२ ॥ पिरसे नोजन प्रेमशु रे, थहो थहो नक्ति थपार ॥ चिते महि पाल चिना, सही हा कणे कोई विचार रे ॥ हि ॥ ३३ ॥ भोजन करि उतयां सवे रे, वेसावां थासन्न ॥ सूरपाल महिपालने रे, चरणे थइ प्रसन्न रे ॥ हि ॥ ३४ ॥ तात ते हूँ तुम थगजो रे, नामें जे यूरपाल ॥ मात पिता तुम्हें मादरा, मलिया मुफ नाग्य विशाल रे ॥ हि ॥ ३५ ॥ राज्य थचितित में लघु रे, ए सवि तुम्द प्रसाद ॥ दु से वक बु राउलो, मनमा म धरो विपाद रे ॥ दि ॥३६ ॥ जाणीने पण तुमकने रे,नीच कराव्यु काम ॥ ते गुनहो सवि माहरो,खमजो तमें कट्ठ . नमे ४२२ जैनकथा रनकोप जाग आठमो. शिर नामि रे ॥ हि० ॥ ३० ॥ शीलवती कर जोडीने रे, नासे। नामी शीश ॥ खमजो मुझ थपराध ए, तुमने ने बढावी रीप रे ॥R ॥३०॥ तुम वचनें नवि मूफियो रे,में कमुक तेण गाय ॥ ते मुण बारे कतनो, कुलवती केम लोपाय रे ॥ हि ॥३पा महिपाल पण हरसिक रे, उत्तखियो निज नद ॥ नाग्य वड्ड वत्स ताहरू, दीठे पयो थाना रे हि० ॥ ४० ॥ तुझ देखी मुफ मने रे, वाध्या हर्पकमोल ॥ सिधु पर शीतांशुने, जेम पसरे जग कलोल रे ॥ हि० ॥४१॥ कर जोडी जान रह्यो रे, जनक थागल गुणवत ॥ जनक उपाडी शुरने, सिहासन के उवत रे ॥ हि० ॥ ४२ ॥ सुसरो शीलवती नणी रे, कहे पुत्री तु धप धन्य ॥ जीवलोकमा तुज समी,नवि दीठी में कोश्यन्य रे ॥ हि ॥४॥ जेह मनोरथ ताहरा रे, होता घणु थसनाव्य ॥ तुज नाग्य अण तव्या, थया सपूर्ण सनाव रे ॥ हि ॥ ४ ॥ राख्यु शील तें वापर रेनवि लोपी पियु याण ॥ तो सविनारीमा शिरे तु,वेटी थइ गुणखाण रे ॥ हि ॥३५॥ पग पग तुमने दुहवी रे,ते खमजे थपमान ॥ शीलवती कहे तातनी,तेदथी मुफ वाध्यो वान रे ॥ हि ॥४६॥ मात पिता सुसरा तणी रे, शीख कल्पतरु बाय ॥ मुफने मानेवी घटे,जेहथी वाडित मुख थाय रे ॥हि॥७॥ सङ परिवार मल्यो तिहा रे, थानद अगन माय ॥ पिस्तातीशमी ढालमा, एम प्रगट्यो पुण्य पसाय रे ॥ हि ॥॥१७॥ ॥ दोहा॥ ॥ शूरपाल नृपति दवे, तेड्या सवि सामत ॥ कहे महिपाल ए मुफ जनक,ए मुफ वांधव गुणवत ॥१॥ ए माताजी मादरी, ए नोजाई सार । कर जोडी प्रणमो तुम्हें,एमादरो परिवार ॥२॥ एम कह्याथी सवि नम्पा, स्वामी थाण प्रमाण ॥नयरमांहे उत्सव दुवो, वाज्यां ढोल निशान ॥२॥ निजबांधवने मानशु, नूरि देश राज्य ॥ थापीने दर्षित करमा, सीयां वांबित काज ॥ ४ ॥ पुस्य पसायें जोगवे, मनोवांडित वर जोग ॥ शीलवती प्रीति बद्ध, सरिखो मल्यो संयोग ॥ ५ ॥ ॥ ढाल तालीशमी॥ ॥ दोजी लुंबा पूबा वरसीलो मेह, बाजूनो दहाडो रे पणरी श्रीजनो हो लाल ॥ ए देशी ॥ दोजी जोगवे ते सुख नोग,म्यामधर्म वरते घणो ॥

श्री शांतिनाथनो रास खंम हो ४२३ हो लाल ॥ होजी पुण्य तणे संयोग,तेज सवल ते नृप तणो ॥ दो लाल ॥ १ ॥ दोजी वैरी नम्या सवि पाय, यावी करे सक्नु चाकरी ॥ हो० ॥ होजी एके थारे दोय, पाणी पिये वाघ वाकरी॥ हो ॥ २ ॥ होजी वलीयो शूरपाल राय,माय तायनी करे सेवना ॥ दो० ॥ दोजी साते व्य सन निवार, पद प्रणमे जिनदेवना ॥ दो० ॥३॥ होजी एक दिवस उद्यान, श्रुतसागर मुनि थाविया ॥ दो० ॥ होजी पट्कायना रखवाल, स? कपर सम नाविया ॥ हो ॥ ४ ॥ होजी वदन काज नरें, तात प्रिया साथें चल्या ॥ दो० ॥ होजी यावी वनह मकार, गुरु वदे हेजें ह व्या ॥ हो ॥ ५ ॥ होजी गुरु दिये देशन सार, ए ससार अशाश्वतो ॥ हो० ॥ होजी एक जिनधर्म ए सार, करो दिल राखी दिसतो ॥ दो० ॥ ६॥ होजी तन धन योवन एह,जाय नदीना पूर ज्यु ॥ दो ॥ होजी का रिमो सयण सनेह, उमी जाये अर्कतूल ज्यु ॥ हो ॥ ७ ॥ दोजी कू डो ए राज्य वितास, आश किसी करो एहन। ॥ दो० ॥ होजी जसमां जेम पतास, तेम पुजलबवि वेदनी ॥ दो० ॥ ॥ होजी ग्रहे श्रावकनो धर्म, निसुणी गुरुनी देशना ॥ दो० ॥ होजी पूढे कहो मुफ मर्म,कर्म क स्या श्या क्लेशनां ॥ हो ॥ ए ॥ दोजी केम सुखने वली मुख, पाम्यो प्रन्नु परकाशियो ॥ दो० ॥ होजी गुरु कहे सुण राजें, दानगुणें चित्त वासियो ॥ दो० ॥ १० ॥ दोजी को तें अतिथिसविनाग, प्रवनव ते सांनलो ॥ दो० ॥ होजी कहे मुनिवर वडनाग, सुणे नृप मूकी थामलो ॥ दो० ॥ ११ ॥ दोजी नरतें जूमिप्रतिष्ठ, नयरें वीरदेव नामथी दो॥ होजी निवसे श्रावक एक, जस मनमां शका नथी । हो ॥ १२ ॥ हो जी तस घरे सुव्रता नारी, चित्त चोखी ६ श्राविका ॥ हो ॥ दोजी मा ने निजगुरु थाण, समजू सूची जाविका ॥ हो ॥ १३ ॥ होनी थष्टमी दिन एक वार, वीरदेव पोपध थादस्यो ॥ दो० ॥ होजी पारण दिन उज माल, चिते एम हर्षे नखो ॥ हो ॥ १४ ॥ होजी जगमा ते नर धन्य, पोपधव्रतने पारणे ॥ दो० ॥ दोजी पडिलाने गुरू थन्न, मुनिवरने हित कारणे ॥ दो० ॥ १५॥ होजी कती दिशि अवलोक, करवा लाग्यो चिट्ठ दिशें ॥ दो० ॥ दोजी थावतु मुनियुग दीठ, देखी दिलडे उनसे ॥ दो० ॥ १६ ॥ दोजी सहामो जश् वीरदेव, पडिलाने मुनि नाव ॥ दो ॥ हो ४१४ जैनकथा रमकोप नागथाम्मो. जी यनुमोदे तस नारी, दान मुनिनु मन वस्यु ॥ दो० ॥१७॥दोबी थया सुरुतारथ दोय, मुनियर वोरीने वव्या ॥ दो० ॥ होजी पतीमा म णि वार,मनह मनोरथ सवि फव्या ॥दो॥१॥दोजी पास्यु तेरों बहुमन, आवकवत नावें करी ॥ हो० ॥ होजी करि यसण यतकाल, गर्वा साने ते मरी ॥ हो० ॥ १७ ॥ हजी तिहाथी चवी नरदेव, शूरपात पयो ? सही ॥ हो० ॥ होजी नारीनो ते जीव, शीलमती हाकणे पहा हो. ॥२०॥दोजी पूरवनव दन दान,तास प्रनावें पामिया॥दोहोजी तितित धन सन्मान, तुम्दे लह्या सवि सुख कामिया ॥ दो० ॥२१॥ होजी एम सानली ततकाल, जातिसमरण उपन्यु ॥ दो ॥ दोजी दीठु सवि पर पाल, पुरवनवरुत थापणु ॥ हो० ॥ २२ ॥ होजी चपाल मुतने राज्य, सोंपी जनक नारी सही ॥ हो० ॥ दोजी विदु जणे लीधी दीख, कोष कपाय धरे नहि ॥ दो० ॥ २३ ॥ होजी पाली विगुरू चारित्र, पाती करम क्य घातिया ॥ दो० ॥ दोनी बिदु जण लदी वर नाण, मुक्ति गया नव जीतिया ॥ दो० ॥ २४ ॥ होजी कहे एम शाति नगवान, तिथिसविनाग व्रत ऊपरें ॥ हो ॥ दोजी निसुणे पर्पद वार, जिनपर वा पी ए यादरें ॥ दो० ॥ २५ ॥ दोजी ठके कही ए ढाल,हर्षे उतालाशमी ॥दो० ॥ दोजी राम कहे उजमाल,नवि सुण्जो साकर समीदो॥१६॥ इति छादश यतिथिसविनागव्रते शूरपालकथानकम् ॥ १२ ॥ १०५० । ॥ दोहा ॥ ॥ एम व्रत वारे जिन कह्या,श्रावकनां यतिसार ॥ चक्रायुध नृप धाम में, नविजनने उपगार ॥ १ ॥ धर्म गृहीनो साधता, करे निज बातम गुधि॥ चढते परिणामें चढी, सयम ग्रहे विबुध ॥ २ ॥ श्रथवा एकादश वली,पडिमा वहे सुजाण ॥थते श्रणसण श्रादरे,श्रावक तेह सुजाण ३॥ त्रिधा चतुर्धाथादरे,श्रणसण ने सागार ॥ वर्धमान परिणामथी, निरतिचार ॥ ॥ श्व लोकाशसा प्रथम, तिम परलोफाशस ॥ जी वितधारासा कही, तेम वली मरणाशस ॥ ५ ॥ काम लोग याने नदि, पंच दोष ए टाल ॥ थाराघे सलेखना, श्रावक थर जमाल ॥१॥ जघन्य थायु सौधर्मनु,यच्युत सुर उत्कृष्ठ ॥ सुरलोकें सुख जोगयी, शिवपर लदेथनीष्ट ॥७॥ धर्म एद श्रावकतो,बीजो मुनिवर पर्म ॥ पंच समिति व ,पाजे , श्री शांतिनाथनो रास खंम हो. ४र त्रण गुप्तिा,साध्यो दे शिवशर्म ॥॥ एह थनतर हेतु ,शिवपदनो मुनिधर्म ॥ निश्चय समकिता धखो, हणमें दे शिवशर्म ॥णायत ॥ एग दिवसपि जीवो। ॥ ढाल सडतालीशमी॥ ॥ नलराजारे देश, दोजी पुगलहूती पल्हाणीया ॥ए देशी ॥ निसुणि श्री जिनवाण,दोजी कहे चक्रायुध पति ॥ तारो हो त्रिवन स्वामि,हो जी द्यो मुफ दीक्षा जिनपति ॥ १ ॥ नमियो नवमा जोर, होजी चोर कर्म थाते थया ॥ कडया कतिन कपाय, दोजी काल थनादिना रहे नया ॥ ५॥ नाजो ए उशमन जोर, होजी कगारो थरिदत जी ॥ करूं प्रनु तुमने निहोर, होजी नकवत्सल जगवत जी ॥ ३ ॥ जन्मजरा मरणादि, होजी आंगने दीपित थति घणु ॥ नवग्रहथी निस्तार, दोजी प्रजुजी तुम थति ना ॥ ५ ॥ प्रनु कहे करुणावत, दोजी धर्मे विलब न कीजीयें ॥ जो मनहूँ दोय नाम,होजी तो शुचि सयम लीजियें॥५॥ सु त स्थापी निज पाट, दोजी पांत्रीश नृपञ्च परवस्त्रो ॥ चक्रायुध जिन हाथ, होजी नावें सयम थादस्यो ॥ ६ ॥ दीधी जिनजीयें दीख, होजी शीख यहे जिनवर कने ॥ कर जोडी प्रनु पास, होजी पूढे तत्त्व कहो मुने । ७॥ तत्त्व कदे उतपत्ति, दोजी ना एकांतें चितवे । समय समय ए जीव, नारकीथादिक सनवे ॥॥ एम उपजता तेद,नुवनत्रय माये नहिं । एम धरी सशय चित्त, दोजी प्रनु पासें पूजे जय ॥ ५ ॥ प्रप्नु प्रकाशो तत्त्व, होजी विगम कहे त्रिजुवन धणी ॥ पुनरपि जर एकात, होजी विगम विचारे वद् गुणी ॥ १० ॥ सर्व विगम जो दोय, दो शून्यपणु तो जग नजे ॥ न रहे जगमा कोइ, दोजी वस्तु विगमने उपजे ॥ ११ ॥ पुनरपि पूछे तत्त्व, दोजी स्थिति नांखे शासनपति ॥ समज्या सकल स्वरूप, होजी सशय न रह्यो एक रति ॥ १२ ॥ त्रिपदीने थनुसार, होजी थग उवालस ते रचे ॥ एम सघलाएक रीति, दो हादशांग विरचे रुचें ॥१३॥ थावे पडे प्रपास, दोजीथासनथी जिन उठीया ॥ श थावे जरि थाल, होजी वासें मन सतुहिया ॥ १३ ॥ वास लेई प्रनु हाथ, दोजी थापे सघने मन रुली ॥ दीये प्रदक्षिणा तीन, दोजी प्रप्नु पूढे ते लली लली ॥ १५ ॥ तस शिर स्थापे वास, दोजी सघ सहित जिनवर मुदा ॥ गण धरपद थधिवास, दोजी एम सहनो कीधो मुदा ॥ १६ ॥ थवर वली -

४२६
जैनकथा रत्नकोप नाग थाठमो.
नर नार, होजी प्रभुजीये बहु दीक्षित कसा ॥ महिया संपमनार, दोबी
सहेजे नव सायर तया ॥ १७ ॥ चरण सहस नर नारि, होजी ते दुग
श्रावक श्राविका ॥ गुरू समकित व्रतधार, होजी ते सहुये मन नाविका
॥ १७ ॥ एम चतुर्विध सघ, दोजी शातिजिणेसर स्पापियो । समकित
रयण थमूल, होजी प्रनुजीय सहुने थापीयो ॥ १ ॥ पोरिति अंतें
जिननाण,होजी देववदक माहे थाविया ॥वीजा वन मकार,होजी जगगुरु
सद्ध मन नावीया ॥२०॥ जिनवरने पाद पीठ,वेसे प्रथम तिहां गणपत ॥
वीजी पोरसीमादे, दोजी करे व्याख्यान मनोहरु ॥२१॥ सघनी बागल
म, होजी कहे कया अघहारिणी ॥ यतरग वात विनोद, होजी धर्म
नी स्थिरता कारिणी ॥ २२ ॥ सडतालीशमी ढाल, दोजी बछेखमें सोहा
मणीरामविजय कहे एम,होजी साजनो थातम हितनश्श१०५६॥
॥ दोहो ॥
॥ मोदराजके राजमा, धर्मराजकी याण ॥ वर्तावे चेतन तदा, जी
वित जन्म प्रमाण ॥ १ ॥
॥ ढाल थडतातीशमी ॥
॥ दो प्रतु मदेर कर महाराज ॥ ए देशी ॥ क्षेत्र मानव लोकमांडे,
देह नयर ममाण ॥ मोहनामा वडो नरपति, जगत सदु जस बाण
॥ १ ॥रे जीव समज सुगुण सुजाण ॥ तुतो म धर मोदनी थाण, हारे
जेम लहे कोडि कल्याण ॥ रे जीव० ॥ ए थांकणी ॥ मोह घरणी रंगें
परणी माया नामें नारि ॥ तेह वेद्थी उपन्यो मुत,सबल मदन कुमार ॥
रे जी॥ २ ॥ लोन नामें महामत्री,क्रोध उर्वर पास ॥राग क्षेष महारथी
दो, मिथ्यात्व जास खवास ॥ रेजी० ॥३॥ मान नामें वडो गजवर,मोह
वादन जोर ॥ चड्यो यिथश्व उपर,करत सबलो शोर ॥ रेजी० ॥४॥
विषय त्रेवीश मोद बागल,खडे रहत चोवदार ॥ एक एक उमराव पोडे,
चढत पाप बढार ॥ रेजी० ॥५॥ श्राव बांधव राज विलसे, रूप शत श्र
डवन्न ॥ एक पूठे धनत वर्गण, सेन चढत गरम ॥रे जी० ॥ ६ ॥
प्राण वाणिज वसे उनमें, चित्त पुर थारक्ष ॥ राज सबलो मोद केरो,
साचवे थइ दक्ष ॥ रे जी० ॥ ७ ॥ निसुणी गुरु उपदेश नींतर, फिरे म
न थारक्ष ॥ वेदपुरमा धर्म नृपति, लहे प्रवेश प्रत्यक्ष ॥ रे जी० ॥ ॥

जिनके, हे जूजार ॥ श्री शांतिनाथनो रास खंम छो. ४२० वृत्ति थार्जवनामे राणी, तेहेनी मनोहारि ॥ धर्म नृपति कत साथें, रहे थनेद विचार ॥ रे जी ॥ ए ॥ सचिव महोटो सवल गुणवत, नामथी सतोप ॥ यहोनिशे निज स्वामीसेती, वाध्यो प्रेमनो पोप ॥ रे जी० ॥ १०॥ ममलेश्वर बजे श्रागें, नाम समकित धीर ॥ सामत व्रत गुण मूल केरा, रदत पास अनीरु ॥ रे जी० ॥ ११ ॥ याव्रतादिक पत्ति व ठ्ठला, रहत जास समीप ॥ मातंग मार्दव नाम गर्जत, वडो ए श्रवनीप ॥रे जी० ॥ १२ ॥ योध उपशम थादि वहुत चारित्ररथ चढी चलत यागें, श्रुत सेनानी सार ॥ रे जी० ॥ १३ ॥ करी मानस हाय अपने, सवल धर्मनरिंद ॥ देहपुरमा थाय थ पनी, वसति करे थदमिद ॥रे जी० ॥ १४ ॥ निर्धाटियो तब मोह नृपकों, वरती थपनी बाण ॥ मोहको अवकाश कोश, देहु मत गुण खाणि ॥ रे जी० ॥ १५ ॥ बहुत दिनकी याण उनकी, करत हूवे हे रान ॥ विश्वास ए अन्याय नृपको, म कर चतुर सुजाण ॥ रे जी० ॥ १६ ॥ जो कदाचित् मोहके वश, होत ए थझान ॥ कर्मपरिणति फेरि जनकों, लेइ स्थापे ताण ॥रे जी० ॥ १५ ॥ जेम थनीतिपुरे विप चिमा, वणिकसुत बुद्धि दान ॥ रत्नचूडने उहयो यम, घट गणिका जाण ॥ रे जी० ॥ १७ ॥ कुण दु ते कवण गामें, कहे सघ कर जोडि ॥ कहे गणधर प्रथम तेदनी, कथा मनने कोड ॥ रे जी० ॥१॥ खम बहे एद नारखी, ढाल ए थडयाल ॥ रत्नचूड तणु हवे जवि, सुणो चरित उजमाल ॥ रे जी० ॥ २० ॥ सर्व गाथा ॥१७४७ ॥ श्लोक ॥७॥ ॥ दोहा ॥ ॥ नरतक्षेत्रमा थति नली, बद् न्यनो वास ॥ तामलित्ती नगरी घण, दीवे होय मनास ॥ १ ॥ गढ मढ मदिर मालीयां, चोराशी वा जार ॥ थमरपुरी मनु अवतरी, मानव लोकमकार ॥२॥ सदाचार वासे वसे, रत्नाकर तिहा शेव ॥ दोलतने दोरें करी, वीजा सट्ठ ए हेठ ॥३॥ तस घरणी पुण्यातमा, सावण्यरुप निधान ॥ सरस्वती नामें नली, प्रीतमनु बद्दु मान ॥ ४॥ निजकरगत महारत्न शिख, उद्योतित निजधाम ॥ निशा शेप देखी सुपन, कहे पियुने थनिराम ॥ ५॥ प्रिये तनय होशे नलो, हरखी निमुणी वाणि ॥ सुत जन्म्यो समय तिणे, ५३ ४२७ जेनकथा रत्नकोप नाग श्रापमो. चनचूड थनिधान ॥ ६ ॥ वालपणे गीखी कला, सकल करी ते चूप ॥ योवन वय मन मोहतो, मानिनी तण यनूप ॥ ७ ॥ ॥ ढाल गणपश्चासमी॥ ॥ मन मोहना लाल | ए वेशी ॥ एक दिवस दट शहरमा र ॥ मन मोहना लाल ॥ चाल्यो रत्नचूड ताम हो ॥ जनरजना लाज ॥ मारना सामी मली रे ॥ म० ॥ सोनाग्यमजरी नाम हो । जन०॥ १॥ तृप मन मानीती घणु रे ॥ म० ॥ गणिका ते मदवत हो ॥ ज० ॥ खधे तेणें दुहवी रे ॥ म० ॥ बोले ते एम तंत हो ॥ ज० ॥ २ ॥ पालव सारी तेदनो रे ॥ म० ॥ बोली करी उपहास्य हो ॥ ज० ॥ नदन सुण तु शेवनारे ॥म ॥ पमित जननी जास हो ॥ ज० ॥ ३ ॥ धनें अनेर मूकापणु रे ॥म० ॥ पश्यतने पण दोय हो ॥ ज०॥ जे तु माल दिवसमा रे ॥म ॥ न चले सदामु जोय दो ॥ ज० ॥ ४ ॥ देखे नहिं मुफ थावती रे ॥ म० ॥ धनमद न घटे ए तुक हो ॥ ज० ॥ ते माटें कहे नीतिना रे ॥ म ॥ जाण वचन ए गुड हो ॥ ज० ॥ ५ ॥ जनक उपार्जित वित्ता रे ॥ म० ॥ न करे कोण विलास दो ॥ ज० ॥ निजघुज थर्जित सपदा रे ॥ म ॥ विलसे तस साबाश हो ॥ ज० ॥ ॥ ६ ॥ एम कही स्थानक गई रे ॥ म ॥ गणिका गुणनु पात्र हो ॥ ज० ॥ रत्नचूड मन चितवे रे । म ॥ करु हवे परदेशयात्र हो । जा ॥ ॥ सत्यवचन करवु सही रे॥ म० ॥ एदनु में धनहेत दो ॥ ज० ॥ धन थाणी परदेशथी रे ॥ म ॥ करु पूर्ण सकेत दो ॥ ज० ॥ ७ ॥ घर थायो रत्नचूडनी रे ॥म ॥ मन धरतो विषवाद हो ॥ ज० ॥ पूळे पिता थावी तदा रे ॥ म ॥ धरतो मन थाल्हाद हो ॥ ज० ॥ ए ॥ श्याम ववन केम तादरु रे ॥ म०॥ दीसे का दिलगीर दो ॥ ज० ॥ किसी अनुरति तादरे रे ॥ म || तु मुफ मनहानो दीर हो ॥ ज॥ ॥ १०॥ तात जश्श परदेशमां रे ॥ म ॥ धन उपराजण काज हो ॥ ज० ॥ यौवनवय निज जनकनी रे ॥ म०॥ इति जोगवतां लाज हो ॥ ज० ॥ ११ ॥ कहे रत्नाकर वत्स तु रे ॥ म ॥ नानडियो सुख मार हो ॥ ज०॥ केम परदेशे एकलो रे ॥ म०॥ में मोकलाये बाज दो ॥ ज० ॥ १२ ॥ वत्स विलसो मुख मविरें रे ॥ म० ॥ नित्य नवला ।

श्रीशांतिनाथनो रास खंम हो
४
ए नोग हो ॥ ज० ॥ वेग तुफ केम उपन्यो रे ॥म ॥ परदेशे ज
चानो रोग हो ॥ ज० ॥ १३ ॥ विपमपथ परदेशनो रे ॥ म ॥ इडिय
वश होय जास हो ॥ज०॥ नारी लाल नवि पडे रे ॥म॥ वोले वचन
विमास हो ॥ ज० ॥ १४ ॥ ते परदेशे सचरे रे ॥ म० ॥ वत्स ए 3
ष्कर वात हो ॥ ज० ॥ रत्नचूड कहे माहो रे ॥ म० ॥ न चले नि
श्रय तात दो ॥ ज० ॥ १५ ॥ व्य लद लेश तातनु रे ॥ म ॥ उधारे
परदेश हो ॥ ज० ॥ चाले करियाणु ग्रही रे ॥ म ॥ कोक वाहण
बेसि हो ॥ ज० ॥ १६ ॥ शेव शीखामण दे घणी रे ॥म०॥ वत्स रहेजो
गुशियार हो ॥ज०॥ पुर अनीति मत जायजो रे ॥मा ज्या नहि न्याय
विचार दो ॥ ज ॥ १७ ॥ तिहां नृपति श्रन्याय ने रे ॥ म० ॥ अवि
चारित प्रधान हो ॥ ज० ॥ सर्वग्राह्य धारदको रे ॥ म ॥ सहे नृ
पनु बहुमान हो ॥ ज० ॥ १७ ॥ नाम थशाति पुरोहितो रे ॥म ॥
गृहितनदक शेठ हो ॥ ज० ॥ मूल नाश सुत तेहनो रे ॥ म० ॥ नय
रमाहे वह वेत हो ॥ ज ॥ १ए ॥ रणघटा गणिका तिहा रे ॥ म० ॥
यमघटा तस माय हो ॥ ज० ॥ द्यूतकार चोरादिका रे ॥ म० ॥ बहु
निवसे सुखदाय हो ॥ ज० ॥ २० ॥ लोक वसे तिहा अति घणा रे
॥ म ॥ उचा जस थावास दो ॥ ज० ॥ जे थजाण जाये तिहा रे
॥ म० ॥ पाडे तेदने पास हो ॥ जण ॥ २१॥ एतु अनीतिपुर मूकीने
रे ॥ म ॥ करजो मुखें व्यवसाय हो ॥ ज० ॥ जनक शीखामण चित्त
धरी रे ॥म०॥ चाल्यो ते सुसहाय हो ॥ ज० ॥ २२ ॥ शकुन नला यया
तेहने रे ॥ म ॥ वेग प्रवहण तेह हो ॥ ज० ॥ चाल्या जलनिधिमा
सुखें रे ॥ म ॥ धरता दर्प श्रह दो ॥ ज० ॥ २३ ॥ धीवर इनित
होपने रे । म० ॥ चलव्या पण ते वाय दो ॥ ज० ॥ जोरावर नवित
व्यता रे ॥ म० ॥ याव्या शनीतिपुर ठाय हो ॥ ज० ॥ २४॥ पोत
देखी ते
थावतु रे ॥ म ॥ दरख्या सघला लोक हो । ज० ॥ हेरि कोट
कची करी रे ॥ म० ॥ रविदरिसण जेम कोक दो ॥ ज० ॥२५॥ दवे न
वियण तुम्हें सानलो रे ॥ म ॥ ए सवध रसाल हो ॥ ज० ॥ बछेउंग
एपञ्चास रे॥म॥राम कहे उजमाल हो ॥ज॥ २६ ॥ ११ ॥८॥

४३० जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. ॥दोहा॥ ॥ बदरका नाग, वाहण तेणी वार | कोक नरने पूरी, दीप नयर थाचार ॥ १॥ चित्रकूट ए दीप ठे, पूर्वावित अनिभान न गरादिकनु दाखव्यु, चमक्यो सुगी सुजाण ॥ ॥ अहो अगालो थाज हु, थाव्यो एणे ठाम ॥ जिहा जनकें वायो हतो, न ययु चितित काम ॥ ३ ॥ पण मुफ एक थाधार , रे शकुनपवन यनुकूज ॥ मन उत्साह तेम माहरो, गु करशे प्रतिकूल ॥ ४ ॥ शोच किस्मो करयो हवे, थाशे सघलु श्ट ॥ पुण्यदशा जब पाधरी, दूर टले अनिष्ट ॥ ५ ॥ एम धीरज मनमा धरी, उतरिया तेणी वार ॥ रनचूड वेलातटे, करे निवास नदार ॥ ६ ॥ नाम नतासा यानथी,दिये गुल्क धन तास ॥ राज पंचकुलने तिहा, रत्नचूड सुविलास ॥ ७ ॥ ॥ ढाल पञ्चासमी॥ ॥ जोरावर हाडाना गीतनी देशी ॥ तिण थवसर तेणि गाय रे, पुरमांषी थाया,धन काज उमाह्या, चारे समनाया, निगुणा खदाया,थावीने उना रे चारे वाणीया रे ॥ १॥ पूठे कुशल देम वात रे, नाइ नलें थाव्या, देखी सुख पाव्या, साजनजी सोहाव्या, कहोने गु लाव्या, लावो रे करियाणु ते लेा थन्हें रे ॥ ५ ॥ निसुपी एदवी वात रे, दरख्यो मनमाहे, विते रे उत्साह, दीसे ए शाहें, कूडी नदि प्राहें, मुश रे दोसे ने शाहुकारनी रे ॥ ३ ॥ कहे धूर्त ते चार रे, वादाजेसर मोरा, करीयें ये निहोरा, मुण साजन बोरा, करियाणां तोरां, लेधु रे रंगेंj सघजादी थम्हें रे ॥४॥ वे{ एहनु मूल रे, जेवु तमने गमशे, दारिश निगमशे, थारति सवि सम शे, वानित सवि सरशे, वे रे नरी वादण जे कदेशो तेणें रे ॥ ५ ॥ थाप्यो सघलो माल रे, लेने ते चाल्या, मनमाहे माल्या, रंगेश रेख्या, याव्या पुर वेल्या, माल वदेंची ने घेरे सा गया रे ॥ ६ ॥ दवे रमचूड मार रे, मन धरी थानदा, देखे नरवृदा, मुख पूनमचवा, साजन मुख कंवा, थावे रे नयरीनो नरपति नेटवा रे ॥ ७ ॥ विचमाहे कारुक एक रे, सदामो तस थायो, धींगड मल्ल धायो, प्रणमी कहे पायो, कुवरजी लायो, श्रवज तुमारे काजें पाठका रे ॥ ॥ देवरावी संबोज रे, कहे कुवर रंगें, मनने उबरंगें, निसुणो एकगें, जाणो ए अनंगें, करीश खुशाल श्री शांतिनाथनो रास खंम हो. ४२ दु जातां तुफने रे ॥ ए ॥ यागल चाल्यो कुमार रे, कोई सहामो थाव्यो, धूरतमां चावो, काणे कसो दावो, मुफ लोचन लावो, सहसमाटें रे सोप्यु तहारा बापने रे ॥ १० ॥ एम कही था'यु धन तास रे, हियडामा चिते, कुवर एकातें, वोले ए सतें, गिरुन गुणवते, जाखे रे यावासें लेवा श्रावजो रे ॥ ११ ॥ आगल जाता चार रे, व्यस्तक वति मलिया, वोले फन फलिया, माहोमाहे जलिया, कुवर सांजलिया, वात करे रे वाद तणी तिहा रे ॥ १२ ॥ एक कदे समुश्नु नीर रे, गगाना कणीया, ए ने अणगणिया, बुद्धिमत बहु नणिया, तेणें न जाये गणिया, पण न गणीजे रे वनिताहृदयने रे ॥ १३ ॥ वीजो बोले उक्ति रे, एहवी ए नारखी, हियडामा राखी, सुणजो सदु सारखी, कामित थाकारखी, ग्रथने नारी हृदय न को लहे रे ॥ १४ ॥ त्रीजो वोले ताम रे, कपटी सिरदार, वयणा निर्धार, खोटां न लगार, जाणे ए सार, शुक्र गुरुनी सरिखो बुजे दुवे रे ॥ १५ ॥ चोथो बोले बेक रे, परदेशथी थायो, मोरे मन नायो, वालक ए कहायो, सूधो डे माह्यो, जाणे रे सघली ए सुजा पित वारता रे ॥ १६ ॥ वोटयो अन्य तव दूरे रे, ए गगा दीसे, मनटुं केम दीसे, साचु कदीसें, माह्यो जाणीसे, मान करावो रे सायर जल तणु रे ॥ १७ ॥ एम कस्यो तेणें हनवाद रे, उजम उपायो, न रह्यो मन साह्यो, थमर्प मन थायो, ना एम न कदायो, कुवर तेरों रे वात अगी करी रे ॥ १७ ॥ सायर जलतणु मान रे, थमने करि बापो, तुमें वोल ए थापों, सशयने कापो, थम धन तुम दापो, नहितर लेगु रे ताहरी सपदा रे ॥ १५ ॥ एम कही लीये तस बोल रे,ताली त्रण दीधी, प्रतिज्ञा कीधी, कारिज या सिदि, जुवो ठग र्बुदि, चाल्यो ते तिहाथी कुवर धागलें रे ॥ २० ॥ चिते मनमा एम रे, सट्ठ ए ठग दीग, हियडाना मीठा, मु हडाना मीठा, लागे ए अनीता, मादरे रे जनके ए कहिया तेहवा रे ॥ २१ ॥ ए कारिज निर्वाद रे, कदोने केम करा, कोने जइ कहेश, न त्तर श्यो देश, यश केम हा लहेश, चिते रे चित्तमाहे रत्नचूड एहवु ॥ २२ ॥ चिते एक उपाय रे, गणिका घरे जाउ, बुद्धि कोई उपान, जेम सुखीयो थाउ, माणसमा थाउ, इस्यु विमासी गयो गणिकाघरे रे ॥५३॥ बठे पञ्चासमी ढाल रे,नवियण साजलजो,कूड मत लवजो,ग बुद्धि , रे ४३० जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. ॥ दोहा॥ ॥ वदरका नागयु, वाहण तेणी वार ॥ कोक नरने पूी, दीप नयर थाचार ॥ १ ॥ चित्रकूट ए दीप ठे, पूर्वोदित अनिधान । न गरादिकनु दाखव्यु, चमक्यो सुणी सुजाण ॥ २ ॥ अहो अमालो थाज हु, श्राव्यो एणे ठगम ॥ जिहा जनके वास्यो हतो, न पयु वितित काम ॥३॥ पण मुफ एक थाधार ठे, रे शकुनपवन अनुकूल ॥ मन उत्साह तेम मादरो, गु करशे प्रतिकूल ॥४॥ शोच किस्यो करतो हवे, थाशे सघलु श्ट ॥ पुण्यदशा जब पाधरी, दुरे टले अनिष्ट ॥ ५॥ एम धीरज मनमा धरी, उतरिया तेणी वार ॥ रत्नचूड वेलातटें, करे निवास नदार ॥ ६ ॥ जाम उतावा यानथी,दिये शुल्क धन तास ॥ राज पंचकुलने तिहा, रत्नचूड सुविलास ॥ ७ ॥ ॥ ढाल पच्चासमी॥ ॥ जोरावर हाडाना गीतनी देशी ॥ तिण थवसर तेणि गाय रे, पुरमाषी वाया,धन काज उमाह्या, चारे सम नाया, निगुणा खदाया,यावीने मना रे चारे वाणीया रे ॥ १॥ पूरे कुशल देम वात रे, नाइ नलें थाव्या, देखी सुख पाव्या, साजनजी सोदाव्या, कहोने गु लाव्या, लावो रे करियाणु ते लेश अम्हें रे ॥ ५ ॥ निसुणी एहवी वात रे, दरख्यो मनमाहे, चिते रे उत्साहें, दीसे ए शाहें, कूडी. नहि प्राहें, मुश रे दोसे ने शाहुकारनी रे ॥ ३ ॥ कहे धूर्त ते चार रे, वाहालेसर मोरा, करीयें .ये निहोरा, मुण साजन बोरा, करियाणा तोरा, लेगु रे रंगें सघलाही थम्हें रे ॥५॥ देयं एदनुं मूल रे, जेवु तमने गमशे, दारि निगमशे, धारति सवि सम शे, वानित सवि सरशे, देश रे जरी वादण जे कहेशो तेरों रे ॥ ५ ॥ थाप्यो सघलो माल रे, खेश्ने ते चाब्या, मनमांहे माल्या, रंगेयं रेख्या, थाव्या पुर तेल्या, माल वदेंची ने घेरे लई गया रे ॥ ६ ॥ दवे रमचूटक मार रे, मन धरी थानदा, देखे नरदा, मुख पूनमचदा, साजन मुख कदा,थावे रे नयरीनो नरपति नेटवा रे ॥ ॥ विचमाहे कारुक एक सहामो तस थायो, धींगड महम धायो, प्रणमी कहे पायो, कुवरजी लायो, थवल तुमारे काजें पाउका रे ॥ ॥ देवरावी संघोल रे, कहे कुवर रंगें, मनने टबरगें, निसुणो एकगें, जाणो ए अनंगें, करीश खुशाल रे , श्री शातिनाथनो रास खंग रहो. ४२३ णी वार ॥ मो० ॥ तेडी लावी एहने रे माता, ए ने मुज थाधार ॥ मो० ॥ ५ ॥ एहवे वणिक ते यावियो रे जोजो, प्रणमे यक्का पाय । मो० ॥ वात कही रत्नचूडनी रे जोजो, धुरिस्ती समजाय ॥ मो० ॥ । ६ ॥ ग्रा करियाक एहनु रे जोजो, थम्हें करी कूड उपाय ॥ नो० ॥ कहे थक्का तुम अम्हमा रे जोजो, कोडी लान न थाय ॥ । मो० ॥ ४ ॥ ते कहे केम अमने कहो रे जोजो, सा कहे नारख्यु श्राम ॥ मो० ॥ तुम चितित करियाण रे जोजो, प्रश्न यान निकाम ॥ मो० ॥॥ वा यनेक प्रकारनी रे जोजो,कहेो मशकने हाड ॥मोगा पूरो ए प्रवहण माहरु रे जोजो, तो केम पूरशो लाड ॥ मो० ॥ए। चार वणिक तव वोलीया रे तेहने, एवडी किहांथी बुद्धि ॥ मो० ॥ कहे थक्का मत जाणजो रे नाइ, वाल माटे निर्बुदि ॥ मो० ॥ १० ॥ ए धूरत पुर थावियो रे दोशे, तेह धूरत शिरदार शिरदार ॥ मो० ॥ कोश्क माथानो मिले रे नो हे, सघला एक प्रकार ॥ मो० ॥ ११ ॥ लान थायजो तुम्द ने रे नाई, तो होय मुफने लाद ॥ मो० ॥ पण मनमामम राखशो रे नाई, मनडामाद चाद ॥ मो० ॥१२॥ तेह गया निज मदिरें रे थाव्यो, कारुक दोडी ताम ॥ मो० ॥ विकसित मुख बोले दसी रे थक्का, थाज थयु मुफ काम ॥ मो० ॥ १३ ॥ थाज व्यवहारी थावियो रे कोर, नेट नपानद कीध ॥मो॥ करिश खुशाल दु तुमने रे तेणें, एहवु वचन मुज दीध ॥ मो० ॥ १४ ॥ तस सर्वस्व लीघे सही रे थाशु, दु खुशाल दिल माहे ॥ मो० ॥ ए कदेवाने थावियो रे पासें, तुमचे धरि उत्साद ॥ मो० ॥ १५ ॥ कदे थक्का मुण कारुथा रे कीजें, मनोरथ थाप समान ॥ मो० ॥ श्रजुगत एदवु मागतां रे माथे, पडशे तादरे उपान ॥ मो ॥ १६ ॥ कहेशे ए नरिंदने रे तूने, मदिरमा सुत थाज ॥ मो० ॥ तु खु शाल किंवा नहीं रे त्यारे, श्राफरडो थावीश वाज ॥ मो० ॥१७॥ ते पण सुणि विलखो थइ रे पाडो, थाव्यो निज घरवार ॥ मो० ॥ ध्रु रत एकग थावियो रे करतो, थापणो गुण विस्तार ॥ मो० ॥१७॥ यमघटा बोली इसी रे कूडी, ताहरी शी ए बुद्धि ॥ मो० ॥ थागलथ) धन थापीयु रे मातुं,कीधु किदां गई मुदि ॥मो ॥ १५ ॥ कहे तस धन लेवा तणो रे ए में, कीधो सत्यकार ॥ मो०॥ कहे थकाण वातथी रे व ४२२ जैनकथा रत्नकोप नाग बाग्मो. म धरजो, हियडामा मरजो, दुबलिहारी रे जाउ तेहनी रे ॥२॥११॥ ॥ दोहा ॥ ॥ रत्नचूड गणिका घरे, थावी कनो जाम ॥ रणघंटा जनी पर था दर दीधो ताम ॥ १ ॥ गौरव सहित जमाडियो, वे बहु सन्मान | गात करे ते प्रेमनी, प्रमदा गुणनी खाण ॥ २ ॥ सध्या काल थयो तबा, सखर बिठावी सेज ॥ सार शृगार जला कीया, गणिकायें धरि देव ॥३॥ मन खोलीने प्रेमनी, करवा लागी वात ॥ मन पाखे उत्तर दीये, रत्नसार अगजात ॥ ४ ॥ चिताये न गमे किसी, मीठी पण कोइ वात । जेम तावीला पुरुपने,लागे कटुक निवात ॥ ५ ॥ शेत सुणो एणिपरें नणे, पूछ तमने एक ॥ ए विवादनी उपरें, कहो उत्तर मुफ टेक ॥ ६ ॥ ए निर्वाह यया विना, न गमे रगविलास ॥ प्रेम धरी मुझने तुम्हें, बुद्धि कहो मुविलास ॥ ७ ॥ तब वोले गणिका तिहा, साजल चतुर सुना ण ॥ दैवयोग इण वंदरें, श्रावे कोइ थजाण ॥ ७॥ सर्व मली ए तेद ना, से वचीने दाम ॥ एक यश ते इव्यनो, पदोचाडे नृपधाम ॥ए । वीजो नाग प्रधाननो, शेतनोत्रीजो थश ॥ चोथो थारक्षक तणो, अपि कारी निस्त्रिंश ॥ १० ॥ लीये पुरोहित पाचमो, वो महारी माय ॥ मति पूरण ते बागलें, सद् थावे चित्त लाय ॥ ११ ॥ ते माटे तुमने तिहां, तेडी जान थाज ॥ सांजलजो तुमें चित्त धरी, सहेजें सरशे काज ॥१२॥ ॥ ढाल एकावनमी॥ ॥ उचु देहरु थादिनाथनु रे जोजो ॥ ए देशी ॥ रघटा कहे ते दने रे थावो, करी नारीनु रूप ॥ मोरा साहेवा रे॥ काम सबल ए बुदिन रे जोजो ॥ ए थाकणी ॥ थ नारी गयो तेहने रे जोजो, के. ते न वल स्वरूप ॥ मोरा सादेवा रे ॥ का० ॥१॥ करी प्रणाम अका जणी रे जोजो, पासें वेठी तेह ॥ मो० ॥ पूढे तेदने तादरी रे केलें, कोण ए रूपनुं गेद ॥ मो० ॥ २ ॥ ते कहे श्रीदत्तशेनी रे माता, रूपवती कन। एह ॥ मो० ॥ एह सही डे मादरी रे माता, एदा निविड सनेह ।। मो० ॥ ३ ॥ एक वार एदने मल्या विना रे माता, कल न पडे मुज काय ॥ मो० ॥ ए पण वेठी मविरें रे माता, अहोनिश मुफ गुण गाप ॥ मो० ॥ ४ ॥ दमणां ए मिष करी मुफमे रे माता, मलवा यावी श्री शातिनाथनो रास खंम हो ४२५ लाम॥ ए ॥ लान थयो बहु तेहने, नरि करियाणे यान ॥ रत्नचूड निज पुर नगी, चाल्यो सुगुणनिधान ॥ १० ॥ थोडे दिवसें थावियो, रत्नचूड निजगेह ॥ रत्नाकर दरख्यो घएं,सुत इति देखि यह ॥ ११॥ प्रणमे चरण पिता तणां, माताना वली पाय ॥ सुत जीवो युग कोडि लगें, ये थाशीप पसाय ॥ १२ ॥ मामीने सघलु कयु, निजवृत्तांत थशेप ॥ रत्नाकरना हृदयमां, हर्प थयो सुविशेप ॥ १३ ॥ ईपत् तस गुणवर्णना, पिता करे तेणि वार ॥ पुत्रप्रशसा नवि करे, गुरुजन एम व्यवहार ॥ १४ ॥ यत ॥ प्रत्यके गुरुव स्तुत्या , परोदे मित्रवांधवा ॥ कर्माते दासनृत्याश्च, पुत्रा नैव मृता स्त्रिय ॥ १ ॥ पूर्वढाल ॥ थाव्यां घणा वधा मणा, साजन दर्प अपार ॥ पुत्र पिता वेद मल्या, वरत्यो जय जयकार ॥ १५ ॥ थावी सौनाग्यमजरी, तस देखणने काज ॥ रत्नचूड यासन ववी, वद्रुत वधारी लाज ॥ १६ ॥ नई तुफ उपदेशथी, उपराजी बद्ध शाहि ॥ जय परदेश कमाश्यो, थ मुफ कारिज सिदि॥ १७ ॥ ॥ ढाल वावनमी॥ ॥ कंसार ते सूधो केलव्यो ॥ ए देशी ॥ सौनाग्यमजरी कहे एहवु, तुम नाग्य हतु थयु तेदवु ॥ तुम शोना थावी अति नली, तुम कीर्ति वाधी कजली ॥ १ ॥ तुम पर मोदी द्रु घणु, तुम गुणसमुदाय केता नए ॥ प्राण जीवन तुम एक माहरे, गृहिणी थाइश घर तादरे ॥२॥ ले नेव्यो उपायन नूपति, घणु रीज्यो देखि तेदनी रति ॥ हर्षित नृ पनी थाणा वरी, घर राखी सौलाग्यमजरी ॥३॥ धन थाप्यु,पितानु मूलएं, कर जोडी था रह्यो उलगुं ॥ त्रुज उपराज्यु इव्य वावरे, बद्गु त्याग ने नोग समाचरे ॥ ४ ॥ अन्य पण परणी तेणें कामिनी, गुणवती जे गज गामिनी ॥ करे पुण्यना काम ते थति घणा, जिनचैत्य करावे सोदा मणा ॥ ५॥ विलसे रूडी नोगसपदा, मुदणामांहे नहिं थापदा ॥ सुखमाहे काल गयो घणो, यश चावो चिट्ठ विशि तेद तणो ॥ ६ ॥ एक दिवस मुनीश्वर थाविया, शम दमवता समनाविया ॥ रत्नचूहें जई मुनि वदिया, गुरुवेशना सुणी थानदिया ॥ ७ ॥ लीये सयम मुनि वरजी कने, पाले निरतिचार रूहे मनें ॥ करे किरिया मुनिवर निर्मली, शुधनाव सहित मननी रली ॥ ७ ॥ थतें ते थणसण थादरी, सुर ४३४ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. हेलो, थाइश सही तु खुवार ॥ मो० ॥ २० ॥ अन्य लोचन अपवा किती रे तेदवी, वस्तु देखाडशे तुज ॥ मो० ॥ तु मति केलविने तदा रे तेदने, कदिश नहि ए मुफ ॥ मो० ॥ २१ ॥ कदेशे ते तोलन पत्रपीरे खेड, तुम लोचन तोलि । मो० ॥ सरिखु थाय तो ताहरु रे खेजो, श्यो तब उत्तर वोल ॥ मो० ॥ १२ ॥ कहे कितव तुम एदवु रे सूफे, नहिं तस वोलण थाय ॥ मो० ॥ तेमाटे धन एदनु रे माहरे, हाये थाम्माप्राव ॥ मो० ॥ २३ ॥ ते पण उतीने गयो रे थाव्या, व्यसक ते वली चार ॥ मो० ॥ कहेवा लाग्या थापणी रे थावी, वात सकल विस्तार ॥ मोग ॥ २३ ॥ कदे थका तुम वातमा रे कार, देखु नहीं सकार ॥ मो० ॥ ते बुद्धिमतनी याग रे काइ, नहि तुम जोर लगार मो॥२५कहेशे सा यर नीरनु रे माहरे, करवु सहि परिमाण । मो० ॥ पण नदीयोना नीरने रे नाइ, करो थलगु तुमें जाण ॥ मो० ॥ २६ ॥ ते नहि थाये तुम्हथी रे त्यारे, खोशो घरनी थाथ ॥ मो० ॥ खोटो विचार न कीजिये रे जेहपी, न रहे शरम निजहाथ ॥ मो० ॥ २७ ॥ ते पण उगीने गया रे ह रख्यो, शेग्नदन गुणवत ॥ मो० ॥ हे एकावनमी जणी रे जोजो, बुद्धिवलियो बलवत ॥ मो० ॥२७॥ सर्व गाथा ॥१एन१॥ श्लोक ॥४॥ ॥ दोहा॥ ॥ रणघटा वतीयो, शेव नदन गुणखाणि ॥ तस मदिरमा धावियो, करतो तास वखाण ॥ १ ॥ ले अनुमति तेहनी, थाव्यो निजयावास ॥ थक्का कथित उपायथी, कारिज कर उमास ॥ ५॥ नामयादी वणिजो थकी, लीधु धन चल लक्ष् ॥ वारिधि जल मितकारथी, तावत् वली प्रत्य क्ष ॥ ३ ॥ तिण व्यतिकरथी ते दुर, पुरमाहे परसि६ ॥ अम्पदिवस ले नेटणु, गयो नरपतिने सविध ॥ ४ ॥ करि प्रणाम जनो रह्यो, पूरे नृप वृत्तांत ॥ रत्नचूम मामी कह्यो, सघलो ते श्रवदात ॥ ५ ॥ नरपति मन चिते इस्यु, थभुत एदनु नाग्य ॥ उग थम नगरी लोकने, जेणें । गिया ए काग ॥ ६ ॥ माग माग राजा कहे, थयो तुण सपर सुष्ट ॥ बु दिमत तुज देखिने, या मुफ मनसुखः पुष्टि ॥ ॥ रणघंटा मुफने दियो, प्राणवलना थाय ॥ राजद्गुकमयी गेदिनी, थइ गणिका सुखदाय ॥6॥ वस्त्रानरण दीधां घणां,पूरी मननी रुदार ॥ रणघटानां रंगम,पूमा सघलां

श्री शातिनाथनो रास खंम हो. वश
मी थया, केशक तजी विकर्म ॥ ४ ॥ तम नाटुं सवि जगतनु, कग्यो जि
नवर जाण ॥ कोशिक जिम एक धनव्यने, न थयु कांश कल्याए ॥ ५ ॥
थनिये पण सीके नहि, जे करडू कण होय ॥ तेम यनव्यने तारवा, सम
रथ नहि जिन कोय ॥ ६॥ उपर नूमि न नीपजे, जेम जगमा का
धान्य ।। वोधि न दोय थनव्यने, तेम जिनदेशन वाणि ॥ ॥ यति
शयवत माहामुनि, महागोप यनिधान ॥ गुण अनंत जिनवरतणा,
कुए कही शके सुजाण ॥ ७ ॥
॥ ढाल त्रेपनमी॥
॥ त्रिपदीनी देशी ॥ चोत्रीश यतिशयवत मुणिंद, महीममल विचरे
जिनचद, नवियण मन थानद तो॥१॥जयो जयो नवियण मन थाणंद
॥ एथाकणी॥ स्वेद मल रोग रहित प्रनु अग,श्वास पद्मगध होय सुचग,
मास रुधिर सितरग तो ॥ जयो० ॥ ॥ नवि देखे थाहार नीहार,थति
शय जन्म तथा ए चार, होवे थग मकार तो ॥ ज० ॥ ३ ॥ योजन नमि
सुर नर तिरि कोड, वेसे निराकुल मननें कोड, कुण करे एहनी दोड तो
॥ ज० ॥ ॥ सदु समजे योजन लगें वाणी, जलके नाममल नीशाणी,
श्रीजिनगुपनी खाणि तो ॥ ज० ॥ ५ ॥ पंचशत कोश लगें उर्निद, रोग
वैर इति मारी प्रत्यक, अति वर्पण ने थवर्ष तो ॥ज० ॥ ६॥ स्वपर चक्र
जय बोल ए थान॥न दुवे ए आगमनो पाठ, एम थग्यारनो नाव तो ॥ज.
॥७॥घातिकर्मक्ष्यथी एथग्यार,दवे देवकत उंगणीश विचार, सुणिये नवि
निर्धार तो ॥ ज० ॥ ॥ धर्मचक्र प्रनु थागल सोहे, चामरयुग नविजन
मन मोहे, मणि सिहासन जोय तो ॥ ज०॥ ए ॥ बत्रत्रय ध्वज प्रवर,
देमकमल विरचे तिदा सुरवर, त्रिदु गढ अतिहि मनोहर तो ॥ ज०
॥१०॥चनमुह रचना धर्म प्रकास, चेश्यतरु दी तन्नास,थयो होय कटक
थास्य तो ॥ ज० ॥११॥ तरु नमन उनि ध्वनि सारी, दृष्टानुपाती पव
न निर्धारी, अतिशय गुण वलिदारी तो ॥ ज० ॥ १२ ॥ पंखी पण प्र
दक्षिणा दिती, गध जलवृष्टि तिदा कणे द्रुती, कुसुमष्टि विरचती तो ॥
ज०॥ १३ ॥ व्रत सीधे नवि वाघे केश, जघन्ययकी सुरकोटि प्रवेश, झ
तु अनुकूल थशेप तो ॥ ज० ॥ १४ ॥ ए गणीश अतिशय सुर कीधा,
एम चोत्रीश थया परसिक्षा, सघला कारिज सिक्षा तो ॥ ज० ॥ १५ ॥

४२६ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो लोकनी लीला तेणे वरी ॥ पद पाम्या माहानद अनुक्रमें, पायतेने एदवा मुनि नमे ॥ ए ॥ हवे निसुणो उपनय ए सही, अन्तरनी वातो कही ॥ कुल उत्तम मानव जव लह्यो, नविजीव वणिकनो मुत कह्यो ॥ १० ॥ हितकारक श्रीगुरु जाणीय, ते तेदनो तात वखाणी । अदादि जनित प्रोत्साहना, ते वेश्यावचन निदानना ॥ ११॥ पुस लक्ष्मी उपचयकारिणी, थागल पण नवजल तारिणी ॥ मूलव्य चा रित्र गुरुये दियु, ते राखे ठेकाणे सहजीयु ॥ १२ ॥ पुर वाटुं अनीति जे तवा, गुरु सारण वारण दे मुदा ॥ सयम प्रवहण ऊपम सही, नव सायर तरवो ने सही ॥ १३ ॥ कर्णधारक तुल्य विमलमना, सार्मिक साथ तपोधना ॥ नवितव्य नियोगान जागीये, प्रमाद जे हयमा था पीयें ॥ १४ ॥ पुर पाम्यु थनीतिना नामनु, कुप्रवृत्तितणु जे प्रवर्तनु । मोदनूपति नाम थन्यायीयो, पुरमा सघले जे गाश्यो॥ १५ ॥ नामयाति वणिक सम नाखिया, चार फुट कपाय ते राखिया ॥ दरे व्यविवेक ते पापीया, एवं लोक घणा सतापीया ॥ १६ ॥ विपयाशा दो वेश्या सम कदी, तेदने जाय मले जीवडो सही ॥ कर्मपरिणति थका अति नली, शुनमतिदायक रूत पूर्वती ॥ १७ ॥ उनघी अन सवि ते हथी, प्राणी मलियो निजगेदयी ॥ धर्ममारगमा फरि धावियो, जन्म नूमिपरें मुख पामियो ॥ १७ ॥ एह उपनय दिलमाहे धारीयें, गुण थादरी अवगुण वारिये ॥ कीजे धर्मनु कारिज धसमसी, धन्य वात ए जेदने मन वसी ॥ १५ ॥ चक्रायुध गणधर उपदिस्यो, श्रीसघतणा दिलमां वस्यो ॥ए उपनय दिलमा राखनो, नवि थनुनव स्वादने चाखजो ॥२०॥ बावनमी ढाल बड़े सुणी, थतर उपनय दाख्यो मुनि ॥ कहे राम विजय सद् सनिलो,नवि धर्म करो तजि थामलो ॥ २१ ॥२०१॥ ॥ दोहा ॥ ॥ दीधी गणधर देशना, सामाचारी सार ॥ साधुने सवि दाखवी, जेदी नवनिस्तार ॥ १ ॥ थिविरकल्प प्रकाशियो, श्रुत केवली नग वान ॥ श्रीचकायुध गणधरु, नविकज सूर समान ॥ २ ॥ प्रनु विचरे पु दवीतजे, पद धरता कज हेम ॥ सुर नर कोडे परिवमा, वरस्युं जगा क्ष्म ॥३॥ केश्क दीक्षा यादरे, के ग्रहे श्रावकधर्म ॥ नकपरिणा श्री शातिनाथनो रास खंग छो. शए स श्रुत केवली, पटकायना त्राता रे ॥ ज० ॥ १० ॥ नव सख्यात मनु प्यना, रूपी व्यने देखे रे ॥ अवधिज्ञानी मुनिवरा, त्रण सहसने लेखे रे ॥ ॥ ११ ॥ समय क्षेत्रमाहे सझिता, मननावने जाणे रे ॥ मन प र्यवनाणी मुनि, सहस चार वखाणे रे ॥ न ॥ १५ ॥ केवलझाने जाणता, सद्ध लोक थलोक रे ॥ चार सहस त्रणशे वली, वदो गतशोकें रे ॥०॥ १३ ॥ वैकियलब्धिधरा नला, पट्सहस मुणिद रे ॥ चार शें दोय सहस नमो, वादी थापद रे ॥ न० ॥ १४ ॥ए परिवार निणं दनो, कर जोडी नाले रे ॥ मुक्तिमार्ग साधे नलो, वदो त्रिदु कालें रे॥ न० ॥१५॥ वैयावृत्य करे नलु, सद् विघ्न निवारे रे ॥ यक्ष् गरुड नामें न लो, प्रचसेवा सारे रे ॥ ज० ॥ १६ ॥ नक्क तणी सान्निध्य करे, निर्वाणी नामें रे ॥ शांति प्रशासन सुरी, समरो शुभकामें रे ॥नम् ॥ १ ॥ मुरव्य सद्भुमाहे शिरें, चक्रायुध जात रे॥ कोणाचल नृप स्वामीनी, करे सेव सुजात रे ॥ न० ॥ १७ ॥ चालिश धनुपनी देहडी, मृगलांबन स्वामी रे॥ कांचनवर्ण तनु शोजतु, प्रणमो शिर नामी रे ॥ न० ॥ १५ ॥ श्रप्रति रूप निणदनु, वपु सुदर दीपे रे ॥ एक मनें अवलोकतां, सवि पातक बीपे रे ॥ ० ॥ २० ॥ वनत्रय प्रजुता तणा, सूचक उत्किहां रे ॥ थात थशोकादिक तणां, प्रातिहारज दीग रे ॥ न ॥ १ ॥ यत ॥ थशोकवृक्ष सुरपुष्पवृष्टि,दिव्यध्वनिश्यामरमासन च ॥ नाममल 53 निरातपच, सत्प्रातिदार्याणि जिनेश्वराणाम् ॥ १॥ पूर्वढाल ॥ एम प्रजु प्रलता जोगवे, त्रिदु जगत प्रतिपाल रे ॥ सहजसमाधिनी लीलमा, विचरा घट्द काल रे ॥०॥ २२ ॥ सौख्य थतींश्यिना धणी, वर ते समजावें रे ॥ साधक बाधकता मटी, सहजातम नावें रे ॥ ज० ॥ २३ ॥ घट घट व्यापक जे विच्च, थविकल थविनाशी रे ॥ परमातम प्रग टी कला, गुन ज्योतिविलासी रे ॥ज॥२॥ चोपनमी ए ढाला, खम के मुणीजें रे॥ शातिप्रनु पद सेवता,जन्म सफल गपीजे रे ॥॥२५॥ ॥ दोहा ॥ । वरिस पंचविशति सहस, कुमरपणे जगदीश ॥ मात पिता था गल रह्या, दिन दिन अधिक जगीश ॥ १ ॥ सामानिक राजापणु, वरिस तेटलां जाण ॥ सुखलीला प्रश्ठ नोगवी, यतिशय गुणमणि - प्रश्न जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. गुण यनत जिनजीना दीसे, जोता नवियपना मन हिंसे, दिन दिन चढती जगीश तो ॥ ज० ॥ १६ ॥ अतिशय गुण जिनजीना जेह, जिन विण वीजो न सहे तेह,महिमा यतुल अह तो ॥ ज० ॥ १७ ॥ विष रे महि यचिरानो जायो, चोसन इ मली गुण गायो, त्रिवननन म न नायो तो ॥ ज० ॥ १७ ॥ चक्रायुध गणधर अनुसाथ, सेवे प्रलने जोडी हाथ, जय शिवपुरना साथ तो ॥ ज० ॥ १ए । जाणत पण पूरे कर जोडी, गणधर प्रजुजीने मद मोडी, पहोंचे नवियण कोरितो ॥ ज० ॥ २० ॥ बछे खमें त्रेपनमी दाल,शातिप्रजु थतिशय गुणमाल, नवि यण सुणो उजमाल तो ॥ ज० ॥ २१ ॥ सर्वगाथा ॥ २०४७ || G ॥ ॥ दोहा॥ ॥ विश्वसेन कुलचदलो, थचिरा मात मल्हार ॥ सोलम जिन प्रियन धणी, नोधारा थाधार ॥ १ ॥ नक्तवत्सल नावट हरण, सेवकजन सा धार ॥ करुणारस सायर प्रल, कद्दु तेदनो परिवार ॥ २ ॥ ॥ ढाल चोपनमी॥ ॥ केवलीने मुख सानली ॥ए देशी ॥ नवियण वदो रे नावचं, प्रनो परिवारो रे ॥ गुणवतजीना गुण स्तव्ये,लहियें नवजल पारो रे॥नवियण वदो रे नावj ॥ एथांकणी॥ १ ॥ गुण सत्याविश शोनता, समरस नं मारो रे ॥ प्रजुनीना मुनिवर नमु, वासठ हजारो रे ॥॥२॥ एकस सदस गुणें नरी, पट्शत अधिकरी रे॥हस्तदीक्षित नमु साधवी, गुणशील जलेरी रे॥ ज० ॥ ३ ॥ शुभ समकित गुणधारका, बारे व्रत पाले रे ॥ न चले चलाव्या धर्मथी, व्रत दूषण टाले रे ॥ न० ॥ ४ ॥ रागें रगाणा ष मैंने, जिनधर्म ए जाणे रे ॥ सार ए थवर असार , न मगे कोई टारो रे ॥ न ॥ ५ ॥ चनदश थामने दिने, करे पोसह नावें रे ॥ शुभ अश नादिक साधुने, हर्षे पडिलाने रे ॥ न ॥ ६ ॥ शांतिप्रवाणी सुणी, सूधा प्रतिबुझा रे ॥ साधुनी सगत मूकीने,न रहे ते जूदा रे ॥ ज० ॥७॥ दोय लाख अपर वली,नेवु सहस सुगीजें रे ॥ एहवा प्रावक जिन तणा, नित्य प्रत्ये समरीजें रे ॥नम् ॥ ॥ गुणवती दुश् प्राविका, प्रण्य ला व उदार रे ॥ त्राएं सहस उपर वली, प्रणमो नर नारी रे ॥न ॥ ए ॥ जिन नहिं पण जिन सारिखा, बिटु कालना ज्ञाता रे ॥ बात सह श्री शांतिनाथनो रास खंम हो. ४३१ पाख तणी परें, तनु यतें ते दीसे ॥ नांखे शातिप्रनु निसुणीने, नविय णनां मन हीसे ॥ से० ॥ १३ ॥ जे ऊपर योजन चोवीसम, नागें सिह विराजे॥ ज्योति ज्योति मली परमातम, लील अनती बाजे ॥से॥१॥ सिझ यनत चतुष्टय प्रगट्यु, विरम्यो सकल उपाधि ॥ एक नेद पन्नर उपचारें, सिम नमो सुसमाधि ॥ से ॥ १५ ॥ नहि जिहा जन्म जरा दिक 5 खडां, घनत थतीश्यि सुखडां ॥ निराकार निर्दल विलासी, सिम जपे चिमुखडा ॥से ॥ १६ ॥ मुग्ध लोक अनुमाने एहनी, उपमा जग कहेवाय ॥ पण परमारथ सोख्य यतीश्यि, केम पुजल जोडाय ॥ से ॥ १७ ॥ जिम साकेतपुरपति रिपुमर्दन, बायो पुलिंदने पुरमां ॥ उपकारी जाणीने दर्प, राथ्यो ते निज घरमा ॥ से० ॥ १७ ॥ उत्तम थशुक तस पहेराव्या, यानूपण थति वारू ॥ मेवा मीगई वरनोजन, करतां थयो दीदारु ॥ से० ॥ १५ ॥ एक दिन वर्पाकालें विरहे, थयो कामातुर गाढो ॥ वनमाहे रमतो कीडा करतो, सानल्यो निज थापाढो ॥ से ॥ २० ॥ यामिकने वचीने निशिमां,नग्न थई नीसरियो ॥ वनमांहे थाव्यो निज परिकरने, मलियो 5 ख विसरियो ॥ से० ॥ २१ ॥ वर्ण फिरे नवि ते उलखाणो, कोण तु किहाथी श्राव्यो ॥ ते कहे दु तुमची सवधी,नेद सकल वतलाव्यो । से० ॥ १२ ॥ ते पूढे कहेवा सुख दीना, श्यो कीयो थाहार ॥ ते कहे कहेणीमाहे न थावे, विण उपमा निर्धार ॥ से ॥ २३ ॥ तस प्रतीति ऊपमयी कहेवा, मांमी सुरखनी वात ॥ फल सुखाद कदादिक जेहवी, मीठी मोदकजाति ॥से ॥ २४ ॥ शाल्याविक नीवार सरीखा, में तिहा नक्षण कीयां ॥ गुंदी पत्रोपम थति सुदर, पत्र यशन प्रसिक्षा ॥ से ॥ २५ ॥ शाल्मलिकदोपम पूगी फल, वसन ए वल्कल सरिसा ॥ पहेखा कुसुम तणी जेम माला, तेम आनूपण सरतां ॥ से० ॥२६॥ गिरिकवरसम वर आवासें, वसियो हूँ वदु वेला ॥ तेम थसार सुखशुं तेणी उपमा, दीदी तेणी वेला ॥से ॥२७॥ एम सांसारिक लोकनीथागल,थमें शिवसुख वर्णवियें ॥ लोक तणे अनुमानें पण ए, नवि कहेवाये न मवियें ॥से॥२॥ काम जोग सवधी जे मुख, तेदयी दिव्य सुख महो? ॥ सि६ प्रजुने थनतगणु सुख, एद वयण नवि खोटु ॥ से० ॥ ५॥ ॥ ए मुखलीला थागत नवना, सुख सघलाही ४३० जेनकथा रत्मकोप नाग पाठमो. खाण ॥ ५ ॥ सहस पंचविंशति वत्ती, चकवानिपद लोग ॥ बरस पंचोतेर सहस एम, रहिया प्रनु गृहयोग ॥ ३ ॥ पणवीस तास र सज लगें, चारित्र पाल्यु सार ॥ वरस न्यून तेता वरस, केवातीपणे । दार ॥ ४ ॥ वर्ष तक एम था, जोगवियु जिनराज ॥ सवे कई बषि कार ते, जेम पाम्या शिवराज ॥ ५ ॥ ॥ दास पंचावनमी॥ ॥ थापो श्रापोने राज, मोघा मूला मोती ॥ ए देशी ॥ सेवो सेवोने राज, शांतिजिनेश्वर स्वामी ॥ सोसम जिनवर सोलम सोवन, वरणे लिय गतिगामी ॥ सेवो सेवोने राज ॥ शा० ॥ ए थाकणी ॥ जगगुरु जगलो चन जगदीपक, जगतारण हितकारी ॥ जगजीवन जगबधव जिनवर, वदो सवि नर नारी ॥ सेवो० ॥ ॥ निज निर्वाणसमय प्रन्नु जाणी, घ8 साधु परिवारें ॥ समेतशिखरें पधाया प्रजुजी, थाप तरे पर तारे । सेवो ॥२॥ मनु शिव चढवानी नीसरणी, समेतशिखर गिरिंदा । थारोहे थलवेसर जिनवर, थघिरा राणीनदा ॥ सेवो० ॥३॥ पपासन पुरी परमेश्वर, वेता ध्यान समाधि ॥ सुरवर समवसरण तिहा विरचे, हेनरों दियढे वाघे ॥ से० ॥ ४ ॥ तिहा वेसी उपदेश दिये प्रच, निमुणे थसुर सुरिंदा ॥ नाव थनित्य सकल जवमाहे, दीसे ए सवि फदा ॥ से ॥ ५ ॥ म म करशो ममता मनमादे, सद् सवर्षे मलियु ॥ राखो नवमांहे रोकीने, कर्मकटक ए वलियु ॥ सेवो ॥ ६ ॥ तु कुण घरनो चेतन तहारी, समता सुदरी नारी ॥ शु लाग्यो ममता गणिका, दोप रह्यो नीखारी ॥से० ॥ ॥ चेतन सग तजो ममतानो, करो सम ताछ यारी ॥ जातें जाति मिले होय युगतु, थसरिस सग निवारी॥ से० ॥ ॥ काम करो कोइ एवं धारी, बंधनो देतु निवारी ॥ जेम जव स्थिति बांझी थति नारी, वरीये मुक्ति सुनारी ॥ से ॥ ॥ तब गणधर गिरुन गुणवतो, चक्रायुध मद मोडी ॥ सिवस्वरूप कदो प्रज्जु मुफने, पूजे बेढ कर जोडी ॥ से ॥ १०॥ कहे प्रल क्षेत्रथकी नोवतां, लद पणया लिस मानें ॥ सिक्षशिला पुढवी उपर, सज्ज्वल कचन वान ॥ से ॥ ११ ॥ उत्तान बत्र तो याकारें, समयक्षेत्र परिमाणें ॥ मध्यपि था योजन जेदनो, शानी विण कुण जाणे ॥ से ॥ १५ ॥ मास्त्री केरी श्री शातिनायनो रास खंम छो. ४३३ ले हवे सेवक केरी, रह्यो थापणने मोह घेरी रे ॥ प्र० ॥ ॥ कुण करशे श्रम सार सनाल, प्रजु तुम विपुं दीनदयाल रे ॥ प्र० ॥ नक्त वत्सल प्रनु नाम धरावी, उपगार करो प्रचु यावी रे ॥ प्र० ॥३॥ शु कहेवु वीतरागने एह, जेदना मनमा नहि नेह रे ॥प्र०॥ चार निकाय तणा सुर मलिया, जिननक्ति करण जल फलिया रे ॥प्र० ॥ ४ ॥ दीरोदधिनां दो नीर मगावी, पहेला प्रजुने नवरावी रे ॥प्र० ॥ गो शीर्ष चंदन घसि रगें, सुर लेप करे जिन यंगें रे ॥प्र० ॥ ५ ॥ मुख म हेली करि सुवास, पढेरावे देवप्य वास रे ॥ ॥ अगरु उखेवे नक्ति महमूर, पसरे तस परिमल पूर रे ॥ प्र ॥ ६ ॥ मदार पारिजा तकसतान, फुलें पूजे नगवान रे ॥प्र० ॥ शिविका रयण तणी विर चावे, प्रजुजी तनु तिहा पधरावे रे ॥ प्र० ॥ ७ ॥ शदिक शिविका क पाडे, नैऋत कूणे पहोंचाडे रे ॥ प्र० ॥ चदनदारुचिता तिहा विरची, प्रख्यग धयुं तिहा अर्ची रे ॥प्र ॥ ७ ॥ अपर चिता अणगारने हेते, सुरें कीधी मननी प्रीते रे ॥ प्र० ॥ थमिकुमार सुर तिहा यावी, मुखे अग्नि तिदा सलगावी रे ॥ प्र० ॥ ए॥ वायुकुमार विकूळ वाय, प्रजाली प्रजुनी काय रे ॥ ॥ दाधां शोणित मांसने जाणी, मेघ सुर वरसावे पाणी ॥प्र० ॥ १० ॥ चिताथनल शमियो तिण वेला, सह ३५ थया तिदा नेला रे ॥ प्र० ॥ दक्षिण अर्ध्वदाढ सुचगा, महे पति सौधर्म सुरगा रे ॥प्र० ॥ ११ ॥ चमर थपर ग्रहे दक्षिण केरी, दाढा धरी जक्ति पणेरी रे ॥ ॥ वाम दाढा यध उपर दोई, ईशान वती ले सोइ रे ॥ प्र॥ १२ ॥ शेप थग्यावीश दत सुरिंदा, लिये धरि मनमा थानदा रे ॥प्र० ॥ शेप अस्यि अनिमेप विचारी, लिये ना वशु करि एक तारी रे ॥ प्र० ॥ १३ ॥ विद्याधर नर कना जोडे, चिता जस्म ग्रहे मन को रे ॥ प्र० ॥ सकल उपश्व टालणदारी, प्रचन क्तिनी जान वलिहारी रे ॥प्र० ॥ १४ ॥ एम सस्कार करी प्रन्नु थगें, करे धूप तिहा मनरंगे रे ॥ ॥ सोवन रयणनु काम विराजे, दी नवनावत नाजे रे ॥ प्र० ॥ १५ ॥ ते ऊपर जिनपडिमा स्थापे, दरि साथी उरितने कापे रे ॥ प्र० ॥ केसर मुखडा जे पूजे सवि, अच्चन कर्म तस धूजे रे ॥प्र० ॥ १६ ॥ नक्ति करे जिनपडिमानी सारी, ज ४३२ जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. फीका ॥ जात्यमणि थागल नवि शोने, तुष्ठ यसार श्रकीका ॥ से.. ॥३०॥ व पचावनमी ढालें, देशना दीधी जिलद ॥ रामविजय कदे थहोनिश दिलमा, धरिये मन थान ॥ से० ॥ ३१ ॥ २१११ ॥ ७० ॥ ॥ दोहा ॥ ॥ देई एणी परें देशना, कठया त्रिजुवननाण ॥ शिखर चढ्या शिवरी तणे, जाणी निजनिर्वाण ॥ १ ॥ केवलझानी साधुजी, नवशे साप मुखिद ॥ थणसण किमु थरिहतजी, एकमासिक सुखकद ॥ २ ॥ सपरि वार सुरपति सवे, जगत प्रधुनी पास ॥ परम प्रीति सपन्न ते, करे सेवना खास ॥ ३ ॥ ज्येष्ठ श्याम तेरश दिने, जरणी मु विधुयोग ॥ शक्ल चरम नेद ध्यावता, लहे गुणगाण ययोगि ॥४॥ चरिम समय श्रयोगीने, करी वहोत्तरनो नाश ॥ चरम समय ते खेपवी, पदोता शिवपुरवास ॥५॥ समय पएसतर वली,थण फरसीने ताम ॥ गति परिणामे पंचमी, गति सही त्रि जुवनस्वामि ॥ ॥ श्रनुक्रमें साधु सवि तिहा, पाम्या परमानद॥सिझपशु पाम्या मुनि, मोही नवनयफद ॥ ४ ॥ नाथ थयो शिवनारीनो, जाणीने जगनाथ ॥ थश्रुजलाविल लोचनें, रुदन करे सुरनाथ ॥ ॥ गुण सनारे स्वामीना, श्राव्या हृदय नराय ॥ दा प्रनु तुम विरहो पन्यो, कहो हवे केम खमाय ॥ ए॥ सशयतिमिर विनाशवा, दा! दिनकर उपमान ॥ थमने मूकी थनाथपरें, किहा गया हे जगवान' ॥ १० ॥ सद्ध नाषा सवादिनी, गाजत जेम घनमेह ॥ तुम विण कुण व देशना, दरशे श्रम सवेद ॥ ११ ॥ उनिहादिक थशिव सवि, पीडाकर जग मांद ॥ तस उपशम करशे कवण, तुम विशु तिवणनाद ॥ १२ ॥ काज तजी देवलोकना, मदियल यावी वाम ॥ कर{ कोनी चाकरी,सुम विपु प्रस्च गुणधाम ॥ १२ ॥ धरता एम मन खेदने, ६ सवे सेणि वार ॥ करे उत्सव निर्वाणनो, दवे निसुणो थधिकार ॥ १४ ॥ ॥ ढाल बप्पनमी॥ ॥ महारी सही रे समाणी ॥ ए देशी ॥ जिनवर मुकें पधाना जाणी, मन खेद धरे नविप्राणी रे ॥ प्रश्नु मुक्ति पधाया ॥ प्रन्नु जगजीवन ज शिव वरिया, थया निरुपाधिक सुखदरिया रे ॥ प्र० ॥१॥ पतित पावन परमातम नामें, थ बेगे अविचल धामें रे ॥ प्र० ॥ सार न ॥

श्री शांतिनाथनो रास खंमग्छो ४३५ ॥ ढाल सत्तावनमी॥ ॥ उसहो मानवनव लाधो ॥ ए देशी ॥ कदे चकायुध केवल नाणी, मनिलो सदु नवि प्राणी॥नव अनादि सयोग ए दीसे,गु देखि देखी हीसे -॥१॥ नविका, धर्म करो मद मूकी॥ नहिंतर जाशो नव चूकी रे ॥न॥ थांकणी ॥ मनमांहे चिते मात पिता मुफ, नाई ने नोजाई ॥ पण को काम पड़े नवि थावे, साथै थाप कमाई रे ॥ ॥ २ ॥ लोन घणो म माहे राखे, मेले धन के लाख ॥ पाप परिग्रह नेलो कीधो, पण प्रतें सहु राख रे । न॥ ३ ॥ मनमाहे जाणे मान तणे वश,पूरुं दु सदु तु पालु ॥ शीख देयता नागे थवतो, बोले वायक थाई रे ॥ ॥ ४ ॥ बेगु प्रकारे वालपणु निज, पोपे वद्दु थारनी ॥ निष्कारण जगमांहे वांधे, कर्म कठिन सारनी रे ॥ न० ॥ ५ ॥ पुजलनी मूर्नामांहे पडियो, पाप कर्म करे के ॥ करे धन्याय रहे वलि अलगो, परने माथे देई रे ॥न ॥६॥ त्रीश महामोहस्थानक वारो, निज थातम साधारो ॥ कहे चक्रा युध गणधर गिरुन, ते नवि हृदयमा धारो रे ॥०॥७॥ जलमांहे पेसी जे दणे त्रसने, मत्स्यादिकने जलशस्त्रे ॥ पादादिक थाक्रमण करीने, प्रथम स्थानक कयु शास्त्रे रे ॥०॥७॥ वाघ्र लीले त्रस जीवने वींटी,जे दरो ते 5 ख लहेशे ॥ हाथे मुख रूंधी हणे त्रसने, कहो तस शी गति दोशे रे ॥ ज० ॥ ॥ ममप वाडादिकाहे क्षेपी, धूमाकूल करि मारे ॥ महा मोदस्थानक सेवतो, रुले चिद्गति ससार रे ॥ न० ॥ १० ॥ उष्ट मनें यसि मुभर शस्त्रे, उत्तम श्रग विदारे ॥ निर्दय परिणामी त्रस कपर, करतो ए कर्म वधारे रे ॥ज० ॥ ११ ॥ मायायें वेश बेई वणिजादिक, पंथ चलीने सायें ॥ वचमांदे गलकर्त्तन करे पापी, नूमा कह्या जगनायें रे॥न॥ १२ ॥ गूढाचार निगृहे नूमो, मायायें परमाया ॥थामादे जिम शकुन विघातक,बद ढाके निज काया रे ॥ ज० ॥ १२ ॥ ए बहुं स्थानक मत सेवो, दवे सप्तम मुणो प्राणी ॥थसत्यवादी सूत्रारथनिहव, कह्यो जिन थवगुण खाणी रे ॥ ज० ॥ १४ ॥ अष्टाचरण रहितने थतें, थाप करे थपराधे ॥ बायाघ्रश करे ते पापी, थातमगुणथी न वाधे रे ॥ ॥ न० ॥ १५ ॥ नवमे जाण हूँ तो पर्पदमां,साचा जूता जे वोले ॥ फल दयकी श्रणविरम्यो मानव, नावे कोही मूलें रे ॥ ज० ॥ १६ ॥ नाय

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जैनकथा रखकोप नाग थाम्मो,
मां धन्य ते नर नारी रे ॥प्र० ॥ करी निर्वाणमहोत्सव महामा,
नदीश्वर यात्रायें चाव्या रे ॥३०॥ ॥ १७ ॥ करि जिनक्ति लिहानो
नावे, कर जोडी जिनगुण गावे रे ॥०॥ पावन पाता जिनरावा,
पूजी करे निर्मल काया रे ॥०॥ १७ ॥ प्रमुगुणज्ञानमा तान ।
नावी, घणी वार त्या नावना जावी रे ॥ ३० ॥ निज निज स्थानक ते
सुर जावे, दिलमा प्रचुके गुण ध्यावे रे ॥५०॥ १५ ॥ समकितपत
तणी ए करणी, नवसायरपार उतरणी रे ॥ ३० ॥ कुगति हरी रिये मुक्ति
सहेली, अनुपूजायें दरिसण जेली रे ॥३०॥ २० ॥ ढाल उप्पनमी
खमें बहे, प्रत पूजो चित्त थकुठे रे ॥प्र० ॥ रामविजय कहे उत्तम
तेद, जेदने प्रनु साथै सनेह रे ॥ प्र०॥ २१ ॥ सर्वगाथा ॥ २१४६
॥ दोहा॥
॥ जिनवर मुक्ति पधारिया, चकायुध गणधार ॥ प्रमुगुण समरंता
मनें, महियल करे विहार ॥ १ ॥ साधु सघातें परिवस्या, सूघा समता
वत ॥ नविकजीव प्रतिबोधता, सुरनरसेवित सत ॥२॥ गुण सस्पा
वीश साधुना, श्रगें घरे थणगार ॥ समतारसमाहे फीलता, नहिं
ममता थहकार ॥३॥ यरति निवारी चित्तथी, रतिपत्ति न लहे लाग॥
चक्रायुध गणधर तणु, जग प्रसस्यु सौनाम्य ॥४॥ आतम गुण वाही
नली, सींचे उपशम नीर ॥ वानर इयि चपलता, कादी मूके धीर ।
॥ ५ ॥ कटुक जाड काढयां परा, क्रोधादिक जस नाम ॥ वारी नली वे
राम्यनी, चोपस्के श्रनिराम ॥ ६ ॥ शांतिनाथ जिनराजनी, शिरपर धारे
थाण ॥ स्याहाद मत उपदिसे, नय गम नग प्रमाण ॥ ॥ व्ये गुण
पर्यायनु, चितन करे सुधर्म ॥ अप्रमत्तता नूमिमां, निबिड खपाच्या कर्म
॥ ॥ नर्म मव्यो मोदरायनो, चेतन कीधी केहि ॥ करणशस्त्र करमा
प्रदी, नाख्यो मोह उखेहि ॥ ए ॥ श्रेणि चढी गुणगणमा, वरतावे
निज थाण ॥ वीतरागना नावथी, पाम्यो केवलनाण ॥ १० ॥ मुरम
सुरादिक सवि मिल्या, उत्सव करे थपार ॥ गगनें गाजे इंशनि, वरस्यो
जय जयकार ॥ ११ ॥ नवस्वरूप नाटक समु, दीतुं नजरें ताम ॥ जय
जीवनी श्रागलें, दिये वेशना थाम ॥ १३ ॥

, श्री शांतिनाथनो रास खंम हो ४३० थग्यावीशमु मोदनु स्थानक, ए दाख्यु जिननाहें रे ॥ न० ॥ ३४ ॥ देव तणी युति झदि ने वीरज, वल यश वर्णविशेप ॥ तास अवर्ण जे वालम ति कहे, नहिं तेहमा गुणरेख रे ॥ न० ॥ ३५॥ नवि देखे ने कहे दु देखें, देव थने वली यद ॥ यज्ञानी जन पूजा अर्थी, वांधे मोद प्र त्यद रे॥ न० ॥ ३६ ॥ ए त्रीशे स्थानक सेवतो, महामोदनो थधि कारी ॥ जाणीने तुमें विरमो एहथी, कहे गणधर उपकारी रे ॥ न ॥ ३७ ॥ ढाल सत्तावनमी खम बढे, गणधर देशना दीधी॥ समकितदृष्टि जे नर नारी, श्रवणपुटें करी पीधी रे ॥ न० ॥३॥ सर्वगाथा ॥२१ए॥ ॥ दोहा॥ ॥ श्रीचक्रायुध केवली, देशन अमृतसार ॥ नविक जीव के व ऊवी, कताना नवपार ॥ १ ॥ श्रायु जाणी थवशेप निज, थोडं गण धर देव ॥ वह साधुन परिवस्या, सारे सुर नर सेव ॥ २ ॥ जरत क्षेत्र मध्य खममा, पावन तीरथ सार ॥ कोटिशिलानिध जे नलु, नामें नव निस्तार ॥ ३ ॥ श्री चक्रायुध केवली, विचरता मुनि साथ ॥ कोटिशिलायें थाविया, जगतारण जगनाथ ॥ ४ ॥ अणसण की तिहां कणे, वद्ध केवतिपरिवार ॥ श्री चक्रायुध गणधरु, पाम्या शिवपद सार ॥ ५ ॥ कालें कोटिशिलाविपे, सिदा मुनिवर कोडि ॥ चक्रायुध सिका पड़ी, वदू वे कर जोडि ॥ ६॥ ॥ ढाल थावनमी॥ ॥ झपन जिपदा रुपन जिपदा॥ ए देशी ॥ तीरथ वदो ए तीरथ वदो, कोटिशिलानिध जेम चिर नदो ॥ कोडि गमे गया जिहां मुनि मुक्तं, ते तीर्थ प्रणमो नवि नक्तं ॥ ती० ॥ १ ॥ श्री चक्रायुध गणधर सिक्षा, शांतिप्रसुवारें परतिक्षा ॥ ते पू- मुनि सख्यात कोडि, मुक्तं गया प्रणमु कर जोडी ॥ ती० ॥ ५ ॥ कुथु जिद दुथा जगवता, सत्तरमा जिन गिरुथा गुणवता ॥ सख्यात कोडी तस तीरथ सिक्षा, मुनि वदो गुण रयण समिक्षा ॥ ती ॥३॥ श्रीथरनाथें तीरथ तरिया, द्वादश कोटि मुनि शिवपद वरिया ॥ एक शिला उपरें 5 ख वारी, सिम थया जान बलिहारी ॥ ती० ॥ ४ ॥ मनि जिणेसर त्रिवन स्वामी, सुर नर थावी नमे शिर नामी ॥ ए प्रस्ठ तीरथें मुनि पटू कोडी, शिव पाम्या प्रणमो ४३६ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. क रहित सचिव नरपतिनो,राज कलत्र विधसी ॥ अर्यावगम पाप जणी तेम, ध्वसे ते पूरो मशी रे ॥ ज०॥ १७ ॥ सामतादिक परिकर दे, तस थधिकार पडावी ॥ धिग या हरे जोगने परना, गुलमति मूके माषी रे ॥ ज० ॥ १७ ॥ नदि कुमार कहे वालकुमारो, ब्रह्मचारी लोक यागें ॥ स्त्री वरावर्ती थग्यारमु स्थानक, सेवतो जाणशे थागे रे ॥ ज० ॥ १९ ॥ न हि ब्रह्मचारी कहे ब्रह्मचारी, वारमु स्यानक मातु ॥ जस निष्ठा विचरे ते हनु धन, ताके ते पातक कातु रे ॥ ज० ॥ २० ॥ यईश्वर ईश्वर जेणें कीधो, परिगल वित्त घर पामी ॥ या क्षेप धरे स्वामीर, तेहमा महोटी खामी रे ॥ ज० ॥ २१ ॥ जेम सापिण थमकपुट निदणे, तेम पोपकने मारे । सेनापति शास्तार प्रत्ये ते, रूडो नदि याचार रे ॥ न० ॥२॥ देश तणो नायक जे दीसे, निगम तणो थधिकारी ॥ शेठ वदुयशने जे मा रे, शोलमुं ए गण नारी रे ॥ न ॥ १३ ॥ वढुजनना नेता प्राणीने,त्रा ए जे हीप समान ॥ प्रावचनी नरने जे निदणे, सत्तरमु का ताण रे ॥ नम् ॥ २४ ॥ सयतविरति उपस्थित तपसी, धर्मथकी चूकावे ॥ महा मोदनो वध करे ते, मुफ मनमा न मुहावे रे ॥ न० ॥ २५ ॥ जिन थ नत नाणी वरदशी, तेहनो थपयश वोले ॥ एकोनविशतितम ए स्थान क, सेवतो कहो कुण तो रे ॥ ज० ॥ २६ ॥ नैयायिक मारग अपका री, बगु जनने भनेरे ॥ नावयतिनिदी ए महेजो, फरशे चिट्ठ गति फेरे रे ॥ ॥ २४ ॥ थाचारिज उवफायें जणाव्यो, सबल थयो श्रुतपाठी ॥ बाल करे खिंसा वली तेदोनी, मति तेदनी घणु माठी रे ॥ न० ॥२०॥ याचारिज उवमायने न करे, सम्यग् जे उपगार ॥ थप्रतिपूजक तेदनोजे नर, तास थकज अवतार रे॥०॥५॥त्रेवीशमु स्थानक थषद्रुश्रुत, । बहुश्रुत नाम धरावे॥चोवीशमे थत्तवस्ती तपीयो, हु एम कीर्ति गवावे रे ते ॥ न० ॥ ३० ॥ ग्लानतणु वेयावञ्च न करे, समरथ हूंतो जेद ॥ एवं न कमु नवि करशे ए माहरे, महामोह बांधे तेह रे ॥ ज० ॥ ३१ ॥ जे द कथा थधिकरण प्रयुंजे, तीरथ नेद करतो ॥ उधीशमु महामोहनु स्था नक, बोधि न पामे मरतो रे ॥ ज० ॥ ३२ ॥ जे आधर्मिक योग प्रयुंजे, निमित्त वशीकरणावि ॥ श्लाघा मित्र तणे वली देतें, मदामोदनो । न्माद रे ॥ ॥ ३३ ॥ जे मानुष्यक जोग यतृप्तो, पारलौकिकने चाहे ॥ . . - श्री शांतिनाथनो रास खंग छो. ४३ए जपे नाम चित्तें ॥ शां ॥ ७ ॥ शांतिजिन सानलो एक मुज वीनति, ढुं नति वद करी एम दाखु ॥ नेक नजरें करी निरखों मुफ सामुई, तुम विना अवर दिलमा न राखं ॥ शाम् ॥ ७ ॥ हु सयोगी अयोगी प्रच्छतु जयो, दुसरागो तुमें वीतरागो ॥ दु सदाशी नीराशी तुमें साहिवा, मेलव्यो मेल तुफ नक्तिरागो ॥ शां० ॥ ए॥ मुज सम सेवका स्वामी ताहरे घणा, तुज सम थवर नहि कोई मदारे ॥ शरण दु थावियो सेव करवा नणी, नक्तवत्सलतणु बिरुद तहारे ॥ शां० ॥ १०॥ प्रलु तुम गुण तणो रास रगें रच्यो, हपेश हुँ मच्यो एह गातां ॥ वोधिप्राप्ति महो दय घणी सपदा, पलक नहि वार तुम चरण ध्यातां ॥ शां० ॥११॥ सतर सवत जयो वरस पचाशियो, राजनगरें रह्या थधिक हेजें ॥ यादिजिन शांतिजिन पार्श्वजिन वीरजिन, चार प्रलु दीपता सहज तेजें ॥ शां० ॥ १२ ॥ तेह प्रञ्च सान्निध्ये रास रचना करी, अतिहि था नद मनमाहे धारी ॥ श्री सुमतिविजय मुगुरुचरणसुपसायथी, रामप्रच शांतिजिन सौख्यकारी ॥ शा० ॥१३॥ इति शातिजिनस्तुति ॥ २२२६ ॥ ॥ ढाल॥ ॥ शांतिप्रनु नामणे जावं ॥ ए देशी ॥ नवियण जाव धरीने थावो ॥ शांति प्रतु गुण गा रे ॥ मोती थाल नरीने लावो, प्रमुगुणरास वधावो रे ॥ न ॥ १॥ जगमाहे अधिक थडे मीगइ, जाति विविध मन जाई रे ॥ तेहथी एदमा थधिक सरसाइ, स्वाद ए शिवसुखदायी रे ॥ ज० ॥ २ ॥ पहेले नव श्रीपेण नरिंदा,बीजे युगल सुखकदा रे ॥त्रीजे सुरसौधर्म मुरिंदा, सुख विलसे थानदा रे ॥ ॥ ॥ ३ ॥ चोथे विद्याधरकुलें आया, थमिततेज गुण गाया रे ॥ पाचमे प्राणत सुरपद पाया, बो राम कहाया रे ॥ न ॥४॥ सातमे थ व्युत ३६ कहीजें, थाउमे चक्री सुणीजे रे ॥ नवमे मेवेयक निसुणीजें, नवमे नाम जपीजे रे ॥न ॥५॥ दशमे मेघरथ राय थदीनो, वान थनय जिणें दीनो रे ॥ करे प्रशसा स्वामी शचिनो, जस गुण रसमा जीनो रे ॥ ॥ ६ ॥ सारथसिम मुर शवतारे, सुख पाम्या श्री कार रे ॥ नव थग्यारमे वारमे जरतें,थयो जिन जगदाधार रे ॥ना शांति प्रजुना गुणनी माला, गातां रग रसाला रे॥ मनोवांडित लहे लही ४३७ जैनकथा रत्नकोप नाग श्राठमो. मन कोहि ॥ ती० ॥ ५॥ श्रीमुनिसुव्रत वारे ए कहिये, कोटिशिला देखी गहगहिये, त्रण कोडि मुनिवर मुक्ति पधास्त्रा, ते वदीने जब इस वाया ॥ ती० ॥ ६ ॥ नमि जिन तीरथमा गुण जरिया, एक कोहि मुनि पट्काय पीहरिया॥एद शिला उपर थालोटी,पाम्या हो शिव पदवी महोटी ॥ती० ॥ ४ ॥ एम थवर पण मुनिवर तिक्षा, पण ते हा गणनायें न लीधा ॥ कोटि अन्यूना जेहने वारे, सिमा तेहनो हा यधिकार ॥ती. ॥॥ कोटिशिला तिण माटें कहिये, ए तीरथ सेव्ये सुख लहियें ॥ चारण अमण मुनि शहां थावे, सुर नर किन्नर मति गुण गावे ॥ ती० ॥ ५ ॥ जिहा एक मुनिनु होय निर्वाण, ते तीरथ नमे कोडि कल्याण ॥ जिहां मुनि मुक्ति गया के कोडि, ते तीरथ प्रणमो कर जोडी ॥ ती० ॥ ॥१०॥ कोटिशिलानिध तीरथ दीसे, जोता नवि जननां मन दीसे ॥ तीरष वदो ए नरतमा वारु,राम कहे सुणो सुगुण श्रोतारु ॥ती॥११॥२१॥ ॥ ढाल ॥ ॥ राग धन्याश्री ॥ शांति जिन शांति जिन शाति जिन राजीया, पुंस्यथी थाज तुफ सेव पामी ॥ गायता स्वामिगुण रासलीला घणी, याजथी शुभ दशा सरस जामी ॥ शां० ॥१॥ मात थचिरातणो तनय सोदामणो, तुम तो जामणा नित्य लीजें ॥ राय विश्वसेसना कुमर कुलचदला, तादरे नाम शुनकाज सीफे ॥ शां० ॥ २ ॥ धन्य तु धन्य तुं धन्य दु धन्य हु, जाग्यथी सरस तुम दरिस दीगे ॥ शोलमा जिन वरा खदरा शकरा, बाजथी माहरो पाप नीगे ॥ शां० ॥३॥ विष्य कचनवने थजष शोना बनी, धनुष चालीश तनुमान सामी॥ देवना देव तुज सेवना मन वसी, माहरा सुकृतमां नहींय खामी ॥ शां०॥ ॥ दिव्य अनुपम घणु रूप रलीयामणु,तुम तणु नयण जोतां निहाली ॥ हरित दूरे टले लठि बगुली मले, मुजस वेला वले अति र साजी ॥ शां० ॥५॥ ताहरु नाम वरमंत्र मन जेदने, तेहने रिपु परा नव न लागे ॥ सिदि नव निधि वर बुद्धि विजसे तिहां, नविजना जे रहे तुज रागें ॥ शां० ॥ ६ ॥ गाजती गजघटा तास घर बांगणे, नृपति सेवे थई दास नित्य ॥ विमल कमला वरे कीर्ति जग विस्तरे, जे जना तुम श्री शांतिनाथनो रास खंग हो. ४३ए जपे नाम चित्तें ॥ शां ॥ ॥ शांतिजिन साजलो एक मुफ वीनति, हुँ नति वह करी एम दाखु ॥ नेक नजरें करी निरखो मुझ सामुहूं, तुम विना अवर दिलमां न रा ॥ शा० ॥ ॥ दु सयोगी अयोगी प्रज्जु तु जयो, दु सरागो तुमें वीतरागो ॥ हुँ सदाशी नीराशी तुमें साहिवा, मेलव्यो मेल तुक नतिरागो ॥ शां० ॥ ए॥ मुफ सम सेवका स्वामी ताहरे घणा, तुम सम थवर नहि कोई मदारे ॥ शरण द् थावियो सेव करवा नणी, नक्तवत्सलतणु विरुद तहारे ॥ शां० ॥ १० ॥ प्रलु तुम गुण तणो रास रगे रच्यो, हर्पछ हुँ मच्यो एह गातां ॥ वोधिप्राप्ति महो दय धणी सपदा, पलक नहि वार तुम चरण ध्यातां ॥ शां० ॥ ११ ॥ सतर सवत जयो वरस पचाशियो, राजनगरें रह्या थधिक हेजें ॥ शादिजिन शांतिजिन पार्श्वजिन वीरजिन, चार प्रनु दीपता सहज तेजें ॥ शां० ॥ १२ ॥ तेह प्रनु सान्निध्ये रास रचना करी, अतिहि था नद मनमाहे धारी ॥ श्री सुमतिविजय मुगुरुचरणमुपसायथी, रामप्रच शांतिजिन सौख्यकारी ॥ शा॥१३॥ इति शातिजिनस्तुतिः ॥ २२६ ॥ ॥ ढाल ॥ ॥ शांतिप्रनु जामणे जा ॥ ए देशी ॥ नवियण जाव धरीने श्रावो ॥ शांति प्रल गुण गा रे ॥ मोती थाल नरीने लावो, प्रगुणरास वधावो रे ॥ ॥१॥ जगमाहे थधिक थडे मीठाइ, जाति विविध मन जाई रे ॥ तेदथी एदमा अधिक सरसाइ, स्वाद ए शिवसुखदायी रे ॥न० ॥ २ ॥ पहेले नव श्रीपेण नरिंदा,वीजे युगल सुखकदा रे ॥त्रीजे सुरसौधर्म सुरिंदा, सुख विलसे थानदा रे ॥ न० ॥ ॥ ३ ॥ चोथे विद्याधरकुलें थाया, थमिततेज गुण गाया रे ॥ पाचमे प्राणत सुरपद पाया, बहे राम कदाया रे ॥ ज० ॥४॥ सातमे थ च्युत ३६ कहीजें, थामे चक्री मुणीजें रे ॥ नवमे ग्रेवेयक निसुणीजें, नवमे नाम जपीजें रे ॥ ज० ॥ ५॥ दशमे मेघरथ राय थवीनो, दान थनय जिणें दीनो रे ॥ करे प्रशसा स्वामी शचिनो, जस गुण रसमा जीनो रे ॥ ॥ ६ ॥ सर्वारथसिम सुर शवतारें, मुख पाम्या श्री कार रे ॥जव थग्यारमे घारमे जरतें,थयो जिन जगदाधार रे ॥जा॥ शांति प्रजुना गुपनी माला, गातां रग रसाला रे॥ मनोवादित लहे लची दूर पला - ४४० जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो. विशाला, मंदिर जाक ऊमाला रे ॥॥ ॥ 5ख दोहग सवि ये, जे ए प्रगुण गाये रे ॥ दोपी पुश्मन नाशी जाये, जन्म कतारण थाये रे ॥ न०॥ए । जिनगुण गणता नावें नएतां, श्रवणें तेम साचल तां रे ॥ थलवे यलगा होय थपमिलतां, यावि मले सवि चलता रे॥ न० ॥ १० ॥ मूकी विकथा वात यनेरी, जिनगुण वात जलेरी रे ॥ करता कुगति न जूवे हेरी, लहिये मुक्तिनी शेरी रे ॥ ज० ॥ ११ ॥ तपगहना यक सुगुरु मुणिदा, श्रीहीरविजय सूरिंदा रे ॥ वमव्यो अकबर शाह नरिं दा, मोदनवनीकदा रे ॥ ज० ॥ १२ ॥ पडह थमारी तणा वजराया, जजिया कर बोडाया रे ॥ मावर सरोवर जाल मुकाया, महियल मुजस गवाया रे ॥ ज० ॥ १३ ॥ साह कुयरकुल साहस धीरा, नाथीकूखे ही रा रे ।। प्रगव्या पूरव पुण्य थकूरा, धर्म करण थया शूरा रे ॥ ज० ॥ १४॥थकवर शाह को जेणें सीधो, वीरुद जगशुरु दीयो रे ॥ महिम लमांहे सवलो यश लीधो, चितित कारिज कीधो रे ॥ ज० ॥ १५ ॥ श्री विजयदान गुरु पाट पटोधर,उदयोथधिक सवाई रे ॥ पंच विषय परिहार कयो जेणे, तप तपिया सुखदायी रे ॥न ॥ १६ ॥ दोय सदस थांषि ल जस कीधां, तिम नीवी तिम जाणो रे ॥त्रण सदस पट् शत वली सपरें, तप उपवास वखायो रे ॥ ॥ १७॥ चार कोडि सख्यायें कीयो, श्रीसदगुरु सहायो रे ॥ अष्टोत्तरशत मुनि जिवं दीरच्या, ए गुरु पुण्ये पायो रे ॥ न० ॥ १७ ॥ पंच शत संख्या जस उपदेशे, वेदरासर प्रासादो रे ॥ नविजन नाव धरीने मामघा, दीठे दुवे थानदो रे ॥ जण ॥ १५ ॥ बिंबप्रतिष्ठा कीधी गुरुजीयें, पचास वार उदारो रे ॥ पाटण प्र मुख नयर बनु मस्सव, वरत्यो जय जयकारो रे ॥ ज० ॥ २० ॥ यात्रा दोय सिमाचल केरी, दोय गिरनीरें कीधी रे ॥ लाख बिष जुदासां जि ननां, महियल स्कत लीधी रे ॥ ज० ॥ २१ ॥ मान तनी कृषि मेघजी नामें, सूका मतनो स्वामी रे ॥ जिनप्रतिमा श्राराधक दूठ, दीर गुरुने पा मी रे ॥ न० ॥ २२ ॥ मागझिर गुदि नवमी दिन सुंदर, साहकुंयर कुल थायो रे ॥ पन्नर ध्यासीयें पालणपुरमा, नाथायें कुंवर जायो रे ॥ न० ॥ २३ ॥ पन्नर बन्नुयें कार्तिक वदिमां, बीजें दीक्षा लीधी रे ॥ सवत शोल साते नागोरे, पमित पदवी दीधी रे ॥नम् ॥ ॥ संवत शोल .

रे श्री शांतिनाथनो रास खंम हो ४४२ था वाचकपद, माहागुदि पचमी दीधु रे ॥ विजयदान सूरीश्वर उत्तम, चितित कारिज कीधु रे ॥ न० ॥ २५ ॥ सोल दाहोत्तरें शीरोहीमां, था चारिज पद पायु रे ॥ सोनागी महिमानिधि महोटा, जिनशासन दीपायु ॥ ॥ २६ ॥ समिति गुप्ति सूधी गुरु धारे, समतारस नमारो रे ॥ जेणें ए गुरुजी नयणे निरख्या, धन्य तेहनो अवतारो रे ॥ न० ॥ २७ ॥ श्रीहारविजयगुरु पाट पटोधर, साह कमा कुलचदो रे॥मात कोमा कुखे उप्पन्ना, श्रीविजयसेनसूरि वदो रे ॥ न० ॥ २७ ॥ शाह मनामांहे वाद करीने, जिनमत स्थिरता स्थापी रे ॥ विरुद सवाई जगजुरु पायो, कीर्ति लता थारोपी रे ॥ ॥ ए ॥ तास पाट नदयाचल उदयो, शुक्ष्प्ररू पणकारी रे ॥ श्री राजसागरसूरि जग जयवता, नवियएने उपकारी रे ॥०॥ ३० ॥ देवीदास शंवर कुलदिनमणि, मात कोडिमदे जायो रे ॥ मनमोहन सोनागी सद्गुरु, महिमानिधि मुनिरायो रे ॥ न० ॥३१॥ सवत सोल वाशीया वरसे, थाचारिज पद पायो रे ॥ श्रीराजसागरसूरि नाम जयकर, सागर गव दीपायो रे ॥ ज० ॥ ३२ ॥ शाह शिरोमणि सहसकिरणसुत, शांतिदास मुजाणे रे ॥ जस उपदेशे बहु धन खरच्यु, लख थग्यार प्रमाणे रे ॥ ज० ॥ ३३ ॥ कीर्त्तिकमला श्रीगुरुजीनी, जग माहे घणु पसरी रे ॥ नवियण मनमाहे यति हर्षे, जस गुणमाला समरी रे ॥ ज० ॥ ३४ ॥ तेह गुरुपाट पटोधर प्रगट्या, श्रीवृद्धिसागर सरिंदा रे ॥ पंचाचार विचारे चतुरा,मोहनवमीकदा रे ॥ न ॥ ३५ ॥ रूप थनोपम थगें विराजे, चुन लक्षण थति रूडा रे ॥ वद् नर नारी जेणें प्रतिवोव्या, वयण न नांखे कूडा रे ॥ ज० ॥ ३८ ॥ गुणनिधि तेद ने पाट विराजे, श्रीलक्ष्मीसागरसूरि बाजे रे॥ कीर्ति जेहनी जगमाहे गाजे, नवि मन सशय नाजे रे ॥०॥३॥ सप्रतिमानविनय ते गुरुजी,सोनागी शिरदारा रे ॥ वैरागी वदाला नविजनने, शमतारस नमारा रे ॥न० ॥ २७ ॥ तेह तणें राज्ये ए रचियो, शातिप्रानुनो रासो रे ॥ नवियण नाव धरिने निमुणो,लदिये मुरक विलासो रे ॥ न० ॥ ३५ ॥ २२७५ ॥ ॥ ढाल। ॥ राग धन्याश्री ॥ श्रीगुरु हीरसूरीश्वर शिप्या ॥ ए थाकणी ॥ कल्या णविजय ववद्याय पुरंदर, दिन दिन चढत जगीशा ॥ श्रीगु० ॥ १ ॥ , ।४२ जैनकथा रत्नकोप नाग आग्मो. T दरवानदन सोनागी, साचो वड वैरागी ॥ सम्मति अविचारी सरु, चो शुजमति रागी ॥ श्री० ॥ २ ॥ मात पुजीवा कूखे जायो, नामें विनिधि थाइ॥ वाचक धर्मविजय वर तेदना, दीपे यधिक सवाई 10 ॥ ३ ॥ तस अतेवासी गुणनरिया, वोल न बोले विरुवा । जीजयविजय विवुध श्रुतदरिया, पाले सूधी किरिया ॥ श्री० ॥ ४ ॥ तस दिपंकज घूमर सरीखा, श्रीगुनविजय कवीशा ॥ गुणगनीरिम मेरुगिरीक्षा, नुतजलसिधु मुनीशा ॥ श्री० ॥ ५ ॥ तस चरणावुज सेवक सुपर, पुनकिरियागुणशूरा ।। साधे योगाभ्यास थखमित, नहि गुणरयणे अधूरा । श्री०॥ ६ ॥ महिमावत मदत मुनीश्वर,चरण नमे थवनीशा ॥ श्रीगुरु सुमतिविजय उपगारी, प्रतपो कोडि वरीसा ॥ श्री० ॥ ७ ॥ ते श्रीगुरु नहिमानिधि सानिध्य, रास रसिक में निपायो ॥ शाति प्रमुगुणराशि नपता, नवनिधि थानद पायो ॥ श्री० ॥ ७ ॥ पूर्व चरित्र तणे अनु तारें, ए सवध बनाया ॥ लाज अनत सह्यो ए रचता, दिन दिन सुजस सवाया ॥ श्री० ॥ ए ॥ सकल सघने मगलकारी, शाति जिपद सुखदाया ॥ रामविजय कहे ए जिनवरके, दर्प धरी गुण गाया ॥ श्री ॥ १० ॥ सवत सत्तर पंचाशीया वर्षे, वैशाख मास कदाया ॥ अदि तप्तमी गुरु पुष्य सयोगें, पूरण कलश चढाया ॥ श्री० ॥ ११ ॥थधिक न्यून जे कांश एणीमें, थण उपयोगें लिखाया ॥ ते सुकवि सवि शोधी लेजो, करि सुनजर सुपसाया ॥ श्री० ॥१५॥ श्रीराजनगरनो संघ सोलागी,तेदने प्रथम सुणाया ॥ इति वृद्धि प्रगटी थधिकरी, थानद अधि क उपाया ॥ श्री० ॥ १३ ॥ इति श्रीशातिजिनप्रबंधे रासवधे सुकतानुसघे प्रनोरवतारजन्म जन्ममहोत्सव नामस्थापन लेखकशालामहोत्सव योवन वय प्रापण राज्यस्थापन राजकनीपाणिग्रहण चकरमोत्पत्ति षट्खमसा धन चक्रवर्तिराज्यानिषकोत्सव षट्समपालन नवाऽसारतानासन, वार्षि कवानसमर्पण चारित्रग्रहण केवलोत्पत्ति चतु षष्ठिसुरेंमिलन समवसरण निर्मापण तधर्णन देशनादान तन्मध्ये पंचेंश्यिविषयवर्णन, तपरि गुणप मकुमारसवधकथन,तवनतर कषायोपरि नागवलसबधकथन तदनतर विस्त सम्यकमूलाधादशव्रतकथन तन्मध्ये प्रथमनतोपरि यमपाश संवध तदनतर वितीयत्रतोपरि नश्श्रेष्ठिसवधकथन तदनतर तृतीयनतो १ श्री शांतिनाथनो रास खंम हो. ४४३ परि जिनदत्तकथानक चतुर्थव्रतोपरि करालपिंगलपुरोहितसवंध पचमन तोपरि सुलससवध पष्ठन्नते स्वयजुदेवसवध सप्तमव्रतोपरि जितशत्रुनृपनि त्यममितानारीदृष्टांतनिरूपण थप्टमव्रते समृध्दत्तसवधोपदेश नवमव्रते सिहश्रावकावदातवर्णन दशमदेशावकाशिकव्रते गगदत्तसवधवर्णन, एकादश पोपवतोपरि जिनदत्तसवध हादशव्रतोपरि शूरपालनृपसवधवर्णन इति श्रावतसवधकथनानतर शुक्ष्यतिधर्मस्वरूपश्रवणत प्रतिवुनचक्रायुधन पचारित्रग्रहण गणधरपदस्थापन हादशांगिरचन पाश्चात्यपौरुपसघस्याये गणधरदेशनासमर्पण तन्मध्ये यंतरगस्वरूपकथन, तउपरि रत्नचूडसवंधनि रूपण तपनयमेलन तदनतर प्रविहारावसरे चतुस्त्रिशदतिशयवर्णन प्रनुपरिवारसख्याकथन अष्टमहाप्रातिहार्यवर्णन थायुधसवधमिलन निजा युरवशेपवदुपरिवारेण सम्मेतगिरिगमन तत्र चतु पष्ठिसुरेंइमिलन प्रल देशनाप्रवण तन्मध्ये सिवस्वरूपवर्णनावसरे सिवसुखप्टप्ठया वनचरसवं धकथन तदनतर नवशतकेवलज्ञानिसाधुनिरनशनविधान निर्वाणपदप्रा पण निर्वाणकव्यापिकोत्सवकरण तदनतर चक्रायुध गणधरकेवलोप्तनिव र्णन देशनाया त्रिशन्महामोहस्थापननिरूपण थनेकनव्यजीवप्रतिवोधन कोटिशिलातीर्थगमन तत्र मुक्तिपदप्रापण कोटिशिलातीर्थस्तवन शांति जिनराजस्तुतिमाहात्म्यवर्णनाद्यनेकसवधोपवृदित पष्ठ खम समाप्तिम गमत् ॥ तत्समप्तौ च समाप्तोऽय शातिजिनरास ॥ गुन नवतु श्री श्रमणसं घस्य ॥गुन स्तानेखकपाकयो ॥सर्वगाथा ॥ २२ए ॥ प्रस्ताविक श्लोक तथा गाथा ॥ ॥ प्रथम खमे ढाल ॥१॥हितीयखमे ढाल ॥३०॥ तृतीयखमे ढाल ॥३३॥ चतुर्थखमे ढाल ॥३४॥ पचमखमे ढाल ॥३॥पष्ठ खमे ढाल ॥२॥सर्वस्मिन् नृत्वा ढाल ॥१३॥ प्रथमखमे गाथा ॥३॥ हितीयखम गाथा ॥२॥ तृतीयखमे गाथा ॥ ३४ ॥ चतुर्थखमे गाया ॥१००४॥ पचमखमे गाथा ॥ ११७७ ॥ पष्ठखमें गाथा ॥ २५॥ सर्व स्मिन् नूत्वा गाथासख्या॥६५॥प्रथम खमेप्रस्ताविक श्लोकगाथा॥१॥ हितीयख प्रस्ताविक श्लोक गाथा ॥ २० ॥ तृतीयखमे प्रस्ताविक श्लोक गाथा ॥ ६ ॥ तुर्यखमे प्रस्ताविक श्लोक गाथा ॥ ४२ ॥ पंचमखमे प्रस्ताविक श्लोक गाथा ॥ १३ ॥ पष्ठखमे प्रस्ताविक श्लोक गाथा ।।

. ४४२ जैनकथा रत्नकोप नाग आठमो. शा हरवानंदन सोनागी,साचो वड वैरागी ॥ सम्मति अविचारी लाल, साचो शुनमति रागी ॥ श्री० ॥ २ ॥ मात पुजीवाइ कूखे जायो, नामें नवनिधि था। ॥ वाचक धर्मविजय वर तेदना, दीपे यधिक सवार श्री० ॥ ३ ॥ तस थतेवासी गुणनरिया, वोल न बोले विरुवा । श्रीजयविजय विवुध श्रुतदरिया, पाले सूची किरिया ॥ श्री० ॥ ४ ॥ तस पदपंकज भ्रमर सरीखा, श्रीशुनविजय कवीशा ॥ गुणगनीरिम मेरुगिरीक्षा, श्रुतजलसिधु मुनीशा ॥ श्री० ॥ ५ ॥ तस चरणावुज सेवक सुंदर, गुजकिरियागुणशूरा ॥ साधे योगान्यास थखमित, नहि गुणरयणे श्रधा ॥ श्री०॥ ६ ॥ महिमावत महत मुनीश्वर, चरण नमे थवनीशा ॥ श्रीगुरु मुमतिविजय उपगारी, प्रतपो कोडि वरीसा ॥ श्री० ॥ ॥ ते श्रीगुरु महिमानिधि सानिध्य, रास रसिक में निपायो । शान्ति प्रगुणराशि नपता, नवनिधि थानद पायो ॥ श्री० ॥ ७ ॥ पूर्व चरित्र तणे अनु सारें, ए सवध वनाया ॥ लान थनत लह्यो ए रचतां, दिन दिन सुजस सवाया ॥ श्री० ॥ ए ॥ सकल सघने मगलकारी, शाति जिलद सुखदाया ॥ रामविजय कहे ए जिनवरके, दर्प धरी गुण गाया ॥ श्री. ॥ १० ॥ सवत सत्तर पंचाशीया वर्षे, वैशाख मास कदाया ॥ शुदि सप्तमी गुरु पुष्य सयोगें, पूरण कलश चढाया ॥ श्री० ॥ ११ ॥ अधिक न्यून जे कांश एणीमें, पण उपयोगें लिखाया ॥ ते सुकवि सवि शोधी खेजो, करि सुनजर सुपसाया ॥ श्री० ॥ १२ ॥ श्रीराजनगरनो सघ सोनागी,तेदने प्रथम सुणाया॥ इति वृद्धि प्रगटी थधिकरी,श्रानद अधि क उपाया ॥ श्री० ॥ १३ ॥ इति श्रीशांतिजिनप्रबघेरासबंधे सुकृतानुसघे प्रनोरवतारजन्म जन्ममहोत्सव नामस्थापन लेखकशालामहोत्सव यौवन' वय प्रापण राज्यस्थापन राजकनीपाणिग्रहण चकरमोत्पत्ति षद्वमसा धन चक्रवर्तिराज्याभिषेकोत्सव पखमपालन नवाऽसारतानासन, वार्षि कदानसमर्पण चारित्रग्रहण केवलोत्पत्ति चतु षष्ठिमुरे मिलन समवसरण निर्मापण तर्णन देशनादान तन्मध्ये पंचेंश्यिविषयवर्णन, तपरि गुणप; मकुमारसषधकथन,तवनतर कषायोपरि नागदचसंबधकथन तकनतर विस्त सम्यकमूलाधादशव्रतकथन तन्मध्ये प्रथमवतोपरि यमपाश सबंध तदनतर वित्तीय व्रतोपरि नवेष्ठिसषधकथन तदनतर तृतीयव्रतो १ रत

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४४ जैनकथा रत्नकोप नाग पाठमो. ॥ ७ ॥ सर्वस्मिन् नूत्वा प्रस्ताविक श्लोक तथा गापा ॥ ३३० ॥ इति पमित श्रीरामविजयविरचित शांतिनाथनगवाननो रास समाप्त ॥ ॥ थथ स्त्रीने शीलपालवाना यत्किचित् बोलो लखीये ये ।। १ पिता वाधव प्रमुख कोइपण पुरुपनी कोटे वलगी मलवु नहिं कोई परपुरुपने न्हवराववो नहि ३ कोई परपुरुपनु उवटणादिकथी गमर्दन करवु नहि ४ कोई परपुरुप साथै पत्रादिकथा खेलवु नहि ५ कोई पर पुरुपनो वेडो पकडी वात करवी नहिं ६ कोई परपुरुपसाथै हसीने हाप ताली लेवी नदि कोई परपुरुपनी वेणी गुथवी नहि कोई परपुरुषनां थग चांपवा नहि ए कोई परपुरुपना दायनी पाननी वीडी लेवी नहिं १० को परपुरुपसाय एक शय्याय वेसवु थने सुवु नदि ११ वाटे शेरीयें पुरुषना सघमा जावु नहि १२ घोडा वगेरे थाम्श विनाना वादनपर वेसवुनहिं १३ ज्येष्ठ, ससरो, सासु तथा सासरामा कोइ मोटेंरानी सायं उच वाजी करवी नहिं १५ कोई परपुरुप साथै एकातमा रहेवु नदि १५ परपुरुषथी दृष्टि मेलावी सरागथी जोवु नहि १६ कोई परपुरुषसाथै सांकेतिक नापाथी वोलवु नहि १७ योगी, नरडा, निक्षाचर, तेनी साथै नाषण करवु नहि १७ कोई पुरुप देखे तेम वहीनीति लघुनीति करवी नहिं १ए ज्या पुरुष सुता होय, त्यां अनर्गल था फरवु नहि २० पुरुष देखता थाजस मरडवु नहिं २१ तेम शरीरना अवयव उघाडा करी बता ववा नहिं २२ थत्यंत मिष्ट पदार्थ खावापर प्रीति राखवी नही २३ नोज न थल्प करवु २४ महोटे स्वरथी इसवु नहिं २५ थजाणे घेर जावु नहि २६ पीयर जाज्जु रहेवु नहिं २७ घरनी वात कोने कहेवी नही सासरा मुंडव्य कपटथी पियरीयाने थापवूनही एधीरा तथा नीचा स्वरथी बोलबु ३०थंग सर्व ममित राखq ३१पोताना स्वामीनु थपमान थाय त्यांजवु नहि , ॥ इति श्री जैनकथारनकोषस्याष्ठमो ॥ नाग समाप्तिमगमत् ॥

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Shri Jainkatha Ratnakosh Bhag-8

Author
Pandit, Shriramvijay
Title
Shri Jainkatha Ratnakosh Bhag-8
File name
Shri Jainkatha Ratnakosh Bhag-8
Text
OCR done
Citation
1893
Published
2011/07
Publisher
Mohmyya, Nirnyasagar Mudralaye
Language
Sanskrit
Pages
535
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314000
Barcode
99999990312158.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
EDTqu4GsfHk
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