Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Surya Siddhant
Front matter
अज्ञानान्धकार में समाउछन्न था,जिस समय ज्ञान एवं सभ्यता का क्षीणालोक भी यरूपं आदि महादेश में शनैः २ पादधिक्षेप द्वारा प्रस्त नहीं हुषा था । उस समय भारत विद्या, युद्धि, ज्ञान और सभ्यता के पूर्ण झालोक से जगत को जालोकित कर अविनश्वर गौरव महिमा में सविशेष गौरवान्वित हुधा था । या धर्म, क्या शान, क्या दर्शनशास्त्र, क्या गणित, या ज्योतिष, क्या भैषज्य तत्व, क्या काव्य, क्या इतिहास, क्या शिल्प, क्या वाणिज्य, क्या भापा, या साहित्य सर्वविध विषय ही में भारत जगत् के शीर्षस्थानीय था । जो आर्यजाति अतुल साहस, विक्रम, तेजस्थिता और मनखिता प्र- भाय से भूमहल में अक्षयकीर्ति लाभ कर गई है, जो आर्य जाति एक. समय पृथिवी में सब विषयों में सर्वश्रेष्ठ जाति कहकर परिगणित हुई थी, जो आर्यजाति ज्ञान और सभ्यता के विमल आठोफ में जगत् को उद्भासित का जगत् फा शिक्षा गुरु यहुसम्मामाहं वरणीय पद पर मधिरूढ़ थी, जिस आर्य जाति के गौरव के प्रभाव से भारतवर्ष जगत् के इतिहास के शीर्षस्थाम में विराजमान होरहा है, जिस आर्य जाति के वंशधर कहकर हम परपद. दलित होकर भी अब तक सभ्यसमाज में ससम्मान से परिग्रहीत होते हैं। उसी जगद्गुरुआर्यजाति को अपूर्व विद्या ज्योतिषशास्त्र आज अदृष्ट चक के आवर्तन से कीर्तिविलोपकारी कराल काल की विस्मृति कवठ में निहित है। इस समय आर्यप्रतिमा पर कुछ फहूंगा । अधिकांश सम्यजन पद में जो. संख्या लिखने की प्रणाली चल रही है, भारतवर्ष-ही उसकी उत्पत्ति का स्थान है । एक से < संख्या एवं शून्य, एवं संख्या आदि.मार्य ही लोगों ने पहिले सष्ट की थी॥ पाटीगणित की दशगुणोत्तर संस्था लिखने की प्रणाली आयों की सृष्टि है। अरषवासीगण ने भारतीय आर्यों के निकट से यह.सीख कर पुरोप में प्रचार किया। अरबयासियों ने स्पष्टतः इस विषय में अपने को आय शिष्य कहकर स्वीकार किया है। यूरोपीय लोग इस मत का अनुमोदन करते हैं। जो निम्नलिखित प्रमाणों से सिद्ध है। (2.) “The Ilindoos are distinguished in Arithmetie by the acknowledge Fed invention of the decimal motation.".........P. 142, rlphinstone's History of India, "The Hindous idycotc.) the decimal notation, Arabiang took hints From them, nhtuce the Luropeans came to hnow tlic figures," 5. VY. JONCS, in his son-dic.Courses. - - (r.) "Hakandir, an Arabisu, zscribes the ini ention of the numeral figures in the decimal scale to the Indians. As the proof commonly gisen of the Indians being thic inventors of these is only an extract from the preface of a book of Arabic poems, it ruay be as well as to incntion that all the Arabic an! Per. siaa books of Arithmetic ascribe the invention to the Indians. P. 181. Vol. XII Asiatic researcher. बीजगणित भी भारतवासी की सुष्टि । युरोपीय लोगों ने घीजगणित को मुसलमानों से पापा पागधीजगणित का Algebra नाम ' आलभिघर । शब्द से समुत्पन्न । स्रोष्टीय प्रयोदश शताब्दी के प्रारम्भ में लिठनाई ने मुस- लमानों के निकट यो नगणित सोसफर, इस का यूरुप में प्रचार किया। मुम. लमानों ने आलजियरा नीस देश में दिमागहरा को सिखलाया, किन्तु मुख- मान लोगों ने इस विषम में भाभट यराहमिहिर नलगुप्त प्रभृति ग्रन्पों से शिक्षा की ७५३ सोहाब्द में पलीफा आलमनमूर के राजत्यकाल में पहिले अरयो भाषा में भारतवर्षीय गणितशास्त्र अनुवादित हुया। बहुत से लोगों को सम्मति यह है कि " ग्रीकदेशीय गणितवित दिवफारडम ३६० मोटाउद में प्रादुर्भूत हुया । यह प्रार्य से पहिले हुवे किन्तु फराष्ट्रम पपिछत के पहिले पराथर, गर्ग प्रति भारतीय गणितविद्गण ने उन्म ग्रहण किया था । १५८८ स्त्रीष्टाव्द में घन्वेठी ने बीजगणित प्रकाशित किया यही दिउसापडम का अनुवाद । यन्धेली ने स्पष्ट बीकार किया है जो आरय आदि के पहिले भारतीय लग बोजगणित मानते थे। फलतः भारय लोगों के निकट परोपीय लोग अनेक विषयों में पी एवं ये आरय लोग हम आर्यों के निकट पद २ में ऋणी हैं। इस विषय में यूरोपीय परिहत का जो लेख है उमे प्रकाशित करता हूं। "Lioannis of Pra istralucel Algelm into finoms; ke luared it at Bergin, in Basshary, where his fatlier aserihe in th- Curtaim lr.ce apuruntmirent from list Nis is dated A. D. 1:01. Choral's paie w pjestone's History of India P. 115. "Molsanmel Ben Most is regnizcü among the Arabians as tio firs: who made Algebra known to them. He is the same shi abirged, for the gratification of Almainam, an astronomical sterk telen írom ledas ersteun in the preckling age, under Almaasur. lle franel talles ika-rise, gread on those of the lindous, which he professed to ime Ad! te stalel -od crnonicaled to his cuatro men the Indian medias ieci esamtalien." Colebrool's dissertim niet to bistrzostáni fra Gaestril algebra. "!'Rarily see their dreidint ia &rced Gisks & 1 Hintensyvias;
any pretensions on the part of the Arabians who, in fact, horeser, prefet none inventors of Algebra. They rere avored borrorers in science and by their own un'arried acknowledgement from the Tiadoos, they learnt the science of numbers. That they also receiial the Hiodoo Algebra, is much more probable than that the same Jathemetician who studied the Indian Arithmetic and taught it tf his Arabian brethren, should have bit upon Algebra unaided by any hint or suggestion of the Indir analysis." Cole-brook's dessertions, " The first Arabian Mathematician translated a Hindoo book in the reiga of the Khalif Almansur, A D. 77३." Carrell's note to Elphinstone's History of Iodis P.145. "The Arabs became acquainted with the Indian Astronomy and numeral science, before they had any knowledge of the writings of Greciau astronomer and Mathematicians, and it was not until after more than more century, and nearls tiro, that they haš the benefit of an interpretation of · Diophantas, whether Tcision o1 paraphrase, executed by Mahammed Abul Waphs Al Duggade" Cole-brook's Dissertion P. XXI. "We knor of no Greek writer on Algebra, but Diophantus ; neither he nor any known another of any age or of any country, has spoken directly or indirectly of any other Greek tenter on Algebra has vrith a term to designate the science." P 163,Vol. XII Asiatic researches" "In 1579 Bombulli published a treatise of Algebra, in wbich le rass that he and a lecturer at Rome whom he names, hnd translated part of Diophantus adding that they had found that in the said work the Indian authors are often cited, by which they learnt that science trae loown among tbe Indians before the Arabians had it" P. 161, Vol. II. Asiatic researches. धेकनसाहब कहते हैं कि स्त्रीप्ट के ४००० वर्ष पूर्व भारतवर्ष में गणित पी. सिप की अत्युपति थी। येलीमामक जनेक फरासी पण्डित ने लिखा है कि हिन्दुस्तान में ५२ वर्ष पहिले ज्योतिषशास्त्र उत्तम अवस्था में पाया जाता था। ऐसे भारतीय प्राचीन ज्योतिषशास्त्ररूपी अमूल्य ररन के अन्वेषण में निश्चेष्ट, निष्क्रिय, परपदानत भारतवासी आर्यसन्तान की प्रवृत्ति और उ. साह नहीं उत्पन्न होते॥ लिस प्रकत ज्योतिषशास्त्र के न जामने से भारतवासी घेद आदिसम्छालों के गूढार्थ भर्म समझने में असमर्प होकर घेद, ब्राह्मण, पुराल मादि मतिपा दत ज्योतिष मूलक भालङ्कारिक लेसों का उछटा निन्दित माशय समझकर 1 , - हमारे ऋषियों को गुरुतल्पगामी, फिसी को चोर, किसी को इन्द्रिय पर. घश होकर नन्दन धन में रम्सादि अप्सरा लेकर क्रीड़ा की, कोई अभिमानी, कोई स्वार्थपर, किसी को लोभी, सब ही महापापी, सब ही दुर्घल, प्रला ने अपनी बाकी के साथ लोग किया। श्री कृष्ण ने प्रजाजनाओ के साथ शाखविरुद्ध मैघुनादि फर्म किया,यमयमी संवाद, गौतम अहल्या फया इत्यादि। चन्द्रमा ने अपनी ३३ स्त्रियों में से विशेषतः रोहिणी के साथ प्रीति की। पथिषी का पुत्र महल, चन्द्रमा का पुत्र बुध, देवताओं का गुरु यहस्पति आदि ।। आज हम उसी वेद के छ. अङ्गों में से सर्वप्रधान सिद्धान्त ज्योतिष के अनुवाद करने को प्रवृत्त हुए हैं। आशा है कि हमारे भारतवासी इस अमूल्प भारतरत्र माधीन वेदाङ्ग ज्योतिषशास्त्र (सूर्यसिद्धान्त) के भाषानुवाद को पढ़कर वेद एवं अन्यान्य वैदिक एव लौकिक ग्रन्थों का प्ररुत अर्थ समझ कर खा सठावेंगे हम प्रथम ज्योतिष विषयक शटा समाधान प्रमाण एवं युक्ति पूरित 'सहभूमिका लिखेंगे सदनन्तर सूर्यसिद्धान्त का अनुवाद आरम्म करेंगे । इस समय धनाभाव से इस के साथ चित्र (नशा) नहीं छपवा सके । कारण अनुमानतः चित्रों के छपने में ३००) रुपये उगेंगे,परन्तु मदि हमारे प्रापि सन्तान ने इम आत्ति से भूयंसिद्धान्त को हाथों हाथ लेकर हमारे परिश्रम को सफल किया तो आशा है कि अगली आवृत्ति में अवश्य मषित्र सोदाहरण मू० सि० पायेंगे। स्थान मधुरापुर आप का शुभचिन्तक- हाफ-घिदूपुर जिला मुजफ्फरपुर उदयनारायणसिंह (आर्य) १८11६.
सूर्यसिद्धान्त-भूमिकास्थ विषयानुक्रमणिका सूचीपत्रम् विषय पृष्ठ संस्सा शिपय पृष्ठ संख्या ज्योतिष शास्त्र का उक्षण १/ सूर्य एक ही है ज्यातिषशास्त्र को वेदाङ्गत्व १ / सूर्य में कलङ्क सिद्धान्तज्योतिष के २२ ग्रन्यो के नाम३ शुक्र ग्रह की सस्या मर्यसिद्धान्त की रचना आदि ४/ शुक्र का विन{ lenas ) माम यो ज्योतिपके सहिता स्कन्ध कायिपार ८ शुक्र को फाणा क्यो कहते है। ज्योतिष के मुहूतं ग्रन्थो का पिचार दशेत अश्विनी २५ मुहर्त के ग्रन्थो के रचना फालादि । बुधग्रह की सस्था २७ ज्योतिष के होरा (जातक ताजक) युध चन्द्रमा का पुत्र क्यों? २६ शकुन केरल ग्रयो फा विचार १०. चन्द्रमा उपग्रह है २६ अन्य तालिका ११/ चन्द्रमा का भगुणकाल चनारस के सुप्रसिद्ध महामहोपाध्याय चन्द्रमा की सस्या २८ प० बापूदेव शास्त्री रुत फलित ज्यो. चन्द्रमा सूर्य से प्रकाशित होता है २८ तिष विधार १२ / चन्द्रमा जलमय है नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह के लक्षण १८ गहलपहकोसस्था एष भगण फाउ ३० १८ मङ्गल भूमि का पुत्र क्यो ? ३१ सामयिक नक्षत्र १९ महल का लोहिताङ्ग क्यो नाम पठार पविकारी नक्षत्र १९ सहस्पति ग्रह की सस्था २० एहस्पति के देवपुरोहित देवगुरु आकाश गङ्गा २पयो माम? ३१ गगममण्डल विभाग २० आङ्गिरस क्यो। ग्रहो के विक्षम करने के नियम एव पृहस्पनि ग्रह का रस दिफ प्रमाण २१ शनैश्चर ग्रह काभगए संस्थामादि, भक्ष गण एक २ लोफ विशेष है २२ शनैश्वर, सौरि भादि नाम क्यो?" भूर्य पह नही है किन्तु ग्रहपनि है २३ | रोहिणी फा शकटभेद और पद्म- भूर्य के सात घोडे आदि २३ | पुराण की कथा ३५ पायु का कारण सूर्य २४ | प्रजापति (युरेमस ) पद की सपा तु का कारण मूर्य २४ | आदि यमलमक्षय (७) पृष्ठ संख्या "विषय विषय यूट सध्या वरुण नेपचुन)ग्रह को सस्था आदि ३५ / नक्षत्रो की देवता ५५ उत्तर खराड के नक्षत्रों का वर्णन ३८ देवता ज्ञापक चक दित्यवान, नीकापुख.] गति के लक्षण ५८ ३० यम, अगस्त्य, त्रिश चकावतया यसाक्षास सप्तर्षि तारे और पा- केन्द्राभिकपणी शति ल्मीकीय रामायण ४ केन्द्रापसारणी शक्ति की त्रिशा की कथा पृथियी का गोलत्य, सूर्य देवयान ४२ का उदयास्त पियान ४२ एथिवी का आधार आकार शर्मिष्ठा, देवयानी आदि पधिधी के श्रमण में युलियां नक्षत्र पुल ४३ पृथिवी आदि लोको के म. मग मे भारतवर्षीय अन्धों मध्य खगह के नक्षत्रो का वर्णन ४३ का प्रमाण বায়িষ্ক ত্বত ই ७१ ४३ पुषिधी भ्रमण में आधुनिक सूर्योदय से सप्तम लग्न राशि ग्रन्पकारों की विरुद्ध सम्मति ७५ में अस्त क्यों होता है? धनारस राजकीय सस्कृव फा. राशिचक्र का बेद में उल्लेख छेज सुप्रसिद्ध ज्योतिष के अपर्ष वेदसे २८ नक्षत्रों का घर्जन gs आचार्य महामहोपाध्य फालीदास कृत ज्योतिर्विदा. ५० यापूदेवशाखी कृत भरण से प्रत्येक नक्षत्रों पृथिवी भ्रमण मीमांसा की आकृति मादि राशिधक का चिन ५२. कलि, द्वापर, श्रेता, कृतयुग चन्द्रमा की स्त्री रोहिणी क्यों १४ मन्वन्तर ३३ कन्याओं की अपेक्षा रो- प्रलय हिणी में अधिक स्नेह क्यों? ५५ स्तु १ कार्तिक स्वामी की कपा ५५ / दिनरात्रि A । काठ विषय पृष्ठ सख्या विषय पृष्ठ संख्या दिनमान यारपति, होरापति, भासा पिप आदि यारमत्ति माम अधिमास ६७ एं १५ तिषिया चन्द्रकला हासवृद्धि सिधिग अमावास्या पौर्णमामी . शुकृपक्ष रुष्णपक्ष क्षयतिषि ऋग्वेद में सूर्यग्रहण का उल्लेख ११० सूपंग्रहण कहीं न कहीं प्रतिदिन होता है शंतपयवाह्मण आदिक वैदिकप्रन्यों का प्रमाण ग्रहणसमय देशदेशान्तरों की १०० पोपलीला १०१ | पञ्चाङ्गविचार १९७ १९(सपर शक आदि २३ प्रकार के १०२ सवत् का सक्षिप्त इतिहास ११८ धूमकेतु १२३ १०३ उल्कापिण्ड १२५ ज्वार एवं भाटा' १०३ वेध या पर्यवेक्षणिका १२९ भारतवर्ष में कहीं २धेधशालाची १३९ १०४ भूगोल वर्णन ९३९ वेदादि से भुयन संस्था काममरण ११२ १०६ [भूगोल एव खगोष्ठरेसा विषयक १०२ आर्ष ग्रन्थों का प्रमाण ४४ १०९ ज्योतिष शास्त्रोक्तकठिन शब्दोका शाचार्य 44 পিয়খ सर्व शाखसम्मत सायम पक्ष ठीक है ग्रहण चन्द्रग्रहण के नियम मूर्यग्रहण के नियम - १४७ है ओ३म् अथ सूर्यसिद्धान्तस्थ विषयानुक्रमणिका सूचीपन्नम् और घर पानात ५ १९ २१ पिपय पृष्ठ-शोक विषय पृष्ठ-लोक मालाचरण, १ ग्रहस्पहाधिकार स्पोविपशान लिये यहाँ फा ज्यासंस्कार १५ मयासुर का तप वर्णन २ ग्रहों का मन्दकेन्द्र संस्कार ग्रहों का शीघ्र केन्द्र संस्कार सूर्याश पुरुष फी सत्य ग्रहों का नतिसाधन ति पूर्वक मय के साथ दिनमान रात्रिमान शाम संघाद वर्णन फाऊ भेद निरूपण ग्रहों का नक्षनानयन ६५ १० योगों का छाना ६५ युगमान सन्धि और सन्ध्यांशमान १५ तिथियों का लाना मन्वन्तर माग १६ कल्पमान करण का खाना पराई फालमान इति स्पशधिकार.२ ग्रहादि स्पष्ट करने के लिये पर्षगणानयन ২২/ স্নিগ্ধাঙ্কিায় ग्रहों की गतिनिरूपण भगण स्वरूप २७ छायाज्ञान आहर्गणसाधन ४५ अक्षजान भगणादि महानयन ५३ अक्ष से पलता का खाना १६ संवत्सर का खाना ५५ भुगमापन રર मध्य ग्रह का खाना ५६ स्वदेशोदयादि जान ६२| काल साधन ४ पार मयक्ति फाडतान ६६.इति त्रिमन्नाधिकारः ३ ग्रहों का तास्फाटिफ फरना इशि मध्यमाधिकारः चन्द्रग्रहण पूर्ण चन्द्र विम्बस्फुटीकरण १ - २५/ दिगजान १ रेगा देश -- २ . :. (१०) घिपय ४-झोक विषय पृष्ठ-झोक दोनों ग्रहण की संभूतिजाम ६/उदयास्ताधिकार पास साधन पांच ताराओं का पश्चिमास विम्य प्रयोजन और पूर्वोदय ग्रास फाखाना १०. चन्द्रमा, बुध, शुक्र का मध्यग्रहण स्पर्शमोक्ष कालजान १६ पूर्वास्त और पविमोदय निमीलनोल्मोलन कालमान १७ इष्ट कालांश का लाना सूर्यग्रहण में विशेषता रहस्पति आदि का काठांश ग्रास लाने के अनेक भेद २० कालांशमान द्वारा अस्तोदय) बिम्बों की अगुली बनाना २४ का गतैष्यत्व शान इति चन्द्रग्रहणाधिकारः४ नक्षत्रों का अस्तोट्य ज्ञान इति नवमाधिकारः चन्द्रग्रहण से सूर्यग्रहण ---**-- माधने में विशेषता चन्द्रमा का अस्तोदय हो- नति साधन १०मति निर्णय इति पञ्चमोध्यायः ५ चन्द्र टङ्गोनति परिलेख मूर्य और चन्द्रग्रहण का परि- इति पाताध्यायः १०. लेखाधिकार कान्ति की समता लामा, इतिच्छेदकाधिकारः६ स्पष्ट पातकाल जाम युति भेद निरूपण १ पञ्चाङ्गस्य व्यतिपात जाम दृकर्म निरूपण गयडान्त स्वरूपादिक २१ विम्ब काल का ठाना १३ | अकाँश पुरुष वाक्योपसंहार मुद्ध समागम निरुपण इति पाताधिकारः११. भति ग्रहयुत्यधिकारः भूगोल जामा मयासुर रुत मन १ नक्षन्न धुवक और शरज्ञान . सूर्याश पुरुषोक्ति योग तारा सान. १६ | जगदुत्पतिक्रम इनि नक्षत्र ग्रहयुत्पधिकारः २९ मूर्य ही सर्वाला महाभूनोत्पत्ति o " or १३ १ २ विषय पृष्ठ-झोक विषय पृष्ठ-लोक पञ्चतारोत्पत्ति २४/ ज्योतियोपनिषशिरुपया १. शशि नक्षत्रोत्पत्ति २५, गोलबन्धन विधि रचित पदार्थों की संस्था २१ अनेक प्रकार के मन्त्रों के साधन १६ ब्रह्माण्ड गोल २८. उपनिषद् फल श्रुति ३५ ग्रह भूगोलादिक का ३०. इति त्रयोदशोध्यायः १३ गानाध्याय १ आकाश में परिवमय सात पाताल मेरु स्थिति .३४ बार्हस्पत्यमान भूगोल में समुद्र का अवस्थाम , ..३६ सौर माम २ भूगोल में पमालय चान्द्रमान ३ कोटि लङ्का से एक १८/पितृमान ४ नाक्षमान ५ देवासुर के दिन रात का निश्चय ६५ सावनमान १८ गोलस्थिति का वर्णन २० कक्षानिरूपण ७५ प्राजापत्यमान आकाश कक्षा प्रलापडा. न्तर्गत नल्लायड कक्षा का नामान्तर सहझूमि मान ग्रन्थ की समाप्ति कर) सूचफ फलश्रुति कहना | पति मूगोलाध्यायः १२ इति चतुर्दशोध्यायः १४ ૧૨ १४ कुरु देश का वर्णन ६३ दिपमान .
सूर्यसिद्धान्तस्य भूमिकायाः शुद्धिपत्रम् भशुद्ध पृष्ठ-पशि रुपवेद उपवेद, ६ शास्त्रादास्मात् शालादस्मात् वेदपक्षः वेदचक्षुः २३ त्यतिष ज्योतिष क्रवेदल्योतिष शाग्वेदज्योतिष दत्वा दरवा विद्वान्त सिद्धान्त ६ २ . ३ २९ ५ ४ १ V जातफ जातकया पवून यवन १२१ २० ३ विद्वानों से बदानी कारणम नक्षत्रे चित्रविचित्र रुत्ति विद्वानो ने इदानीन्तम कारण नक्षते चित्रविचित्र के रुत्तिका २२ २२ शुक्र सख्या गाद ३० २४ चलने वाला ग्रह चलने वाला) खोर २ परियन्ति परिष्यन्ति सानुवाद सूर्यसिद्धान्तस्य शुद्धाऽशुद्ध पत्रम् संख्या पृष्ठ पति ४ ५ ६ ८ C २६ समय को उत्तर नियमी के ४३००० Circumfirence धाले Signa विकला भरका इस प्रकार इस प्रकार वर्तमान वर्तमान केन्द्रफारक शवर्ग मर्य संख्या विपद्ध ग्रहण मास के उत्तर निवासी ४३२००० Circumferance वाले Sign कुटिला भक्त्वा इसमकार वर्तमान केन्द्र करके गुकुषर्ग सूर्य संस्था धिमाई १ ३२ '४३ . ११४ ४३ ४१ .१४ ४८ २२ २५ ६० २५ ६१ ८ २० ६ ११ ७६ . पूर्वत शलका स्पटाः तदन्तर राश्पादि होगा पूर्ववत् । शडाका स्फुटाः सदमन्तर राश्यादि १९ शुक्र २२ २ ओ३म् ज्योतिष शास्त्र ज्योतिष शब्द का सामान्य अर्थ तारा आदिक प्रकाशमान वस्तु और शास्त्र का अर्थ बतलाने वाला "ज्योतिषशास्त्र अर्थात् जिस के द्वारा सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्यान्य नक्षत्रादिकों की गति विधि प्रभृति का ज्ञान हो- जिसका लक्षण नी भास्कराचार्य ने अपनी सिद्धान्तशिरोमणि में यों लिखा है:- त्रुट्यादिप्रलयान्तकालकलनामानप्रभेदः क्रमाच्चारश्च मुसदां द्विधा च गणितं प्रश्नास्तथा सोत्तराः। भूधि- रण्यग्रहसंस्थितेश्च कथनं यन्त्रादि यत्रोच्यते सिद्धा- न्तः स उदाहृतोऽत्र गणितस्कन्धप्रवन्थे बुधैः ॥ ६ ॥ भावार्थ:-काल के सब से छोटे भाग को "त्रुटि" कहते हैं। त्रुटि से कल्प पर्यन्त काल की गणना, सौर, सावन, नाक्षत्रादि काठमान, एवं प्रत्यनु- कला से प्रगण पर्यन्त क्षेत्रपरिमाण, ग्रह एवं नक्षत्रादिकों की गति, व्यास तथा अव्यक्त गणित (Mathemothes). प्रश्नोत्तर सहित एक पृथ्वी आदि ग्रहों की संस्थिति और यन्त्रादिकों का वर्णन इत्यादि जिसमें हों उस को पण्ठित लोग "सिद्धान्त क्योतिप" कहते हैं ॥ ६ ॥ कतिपय पण्डित लोग ज्योतिषशास्त्र के दो भाग मानते हैं एक पूर्वोक्त सिद्धान्त ज्योतिष एवं दूसरा फलित ज्योतिष । फलित का लक्षण "फलित विचार में लिखा गया है, वही देखें ॥ ज्योतिप शास्त्र को वेदाङ्गत्र प्राचीन इतिहासों से यह बात सर्वथा मिद्ध है कि दुनिया भर में वेद से प्राधीन धर्मपुस्तफ दूमरा कोई नहीं है । इस अपौरुषेय वेद को ( किसी व्यक्ति ने इसकी रचना नहीं की) अनादिकाल से हम मनुष्यों के हितार्थ ईशर ऋषियों द्वारा प्रत्येक सष्टि की आदि में प्रकाशित करता है । वेद सय विद्याओं का भण्डार है। इस वेद के चार भाग हैं:-१ अग्वेद, २ यजुर्वेद, ३ मामधेद, ४ अपर्धवेद, एवं इनकी ११२३ शाखायें हैं । इन वेदों को समझने व पढ़ने पढ़ाने के लिये हमारे महर्षियों ने ४ or २ - - मूर्य सिद्धान्त उपवेद, ६ अङ्ग, और ६ उपाग बनाये हैं । उपवेद-१ आयुर्वेद (वैद्यकशास) २ धनुर्वेद ( युद्धशास्त्र ) ३ गान्धर्यवेद गानविद्या और ४ अर्थवेद ( शिल्प- शास्त्र) हैं । अङ्ग-1 शिक्षा, २ फन्प, ३ व्याकरण, ४ निरुक्त, ५ ज्योतिष और ६ छन्दः शास्त्र है । और उपाग-१ पैशेषिकशास्त्र, २ न्यायशास्त्र, २ योगशास्त्र, ४ सांख्यशास्त्र, ५ पूर्वमीमांसा, ६ उत्तरमीमांसा वा वेदान्त हैं । जब तक इन उपवेद अङ्ग और उपाङ्गों को प्रथम नहीं पढ़ ले तब तक वेदों का यथार्थ तत्त्व मनुथ नहीं जान सकता । हमें इन छः अङ्गों में मे यहां ज्योतिष शाख के विषय में यक्ष्य है। भास्कराचार्य ने लिखा है कि- वेदास्तावदाज्ञकर्मप्रवृत्ता यज्ञाः प्रोक्तास्ते तु कालाश्रयेण। शास्त्रादऽरमात् कालबोधोयतः स्याद्वेदाङ्गत्वं ज्योतिपस्यो- क्तमस्मात् ॥ ६॥ सिद्धान्तशिरोमणौ ॥ भावार्थ:-जिस कारण वेदों में यहुधा यश का विधान है और यश करने में समय निर्दिष्ट किया जाता है कि अमुक समय या करना चाहिये,पायेदी इतनी लम्बी चौड़ी होनी चाहिये, याकुण्ड अष्टकोण, चतुष्कोण आदि आकार का होना चाहिये, और यज्ञशाला इस प्रकार होनी चाहिये इत्यादि ज्ञान विना ज्योतिष शास्त्र के नहीं हो सकता-इस लिये ज्योतिषशास्त को "वेदाङ्गत्य है। अय रूपकालङ्कार से वेद को अङ्गी एवं निरुतादि छः शाखों को इराके अजयन करते हैं:- "शब्दशाखं मुखं ज्योतिपं चक्षपी,योनमुक्तं निरुक्तञ्च कल्पः करौ। या तु शिक्षास्य वेदस्य सा नासिका,पाद- पवाद्वयं छन्द आदौर्बुधः ॥१०॥ "वेदचक्षुः किलेदं स्मृतं ज्योतिष,मुख्यता चाङ्गमध्येऽस्य तेनोच्यते । संयुतोऽपीतरैः कर्णनासादिभिश्चक्षुपाङ्गेन हीनो न किञ्चित्करः ॥११॥ सिद्धान्तशिरोमणा ॥ भावार्थ:---घेद (शरीर) के व्याकरण तो मुरा, ज्योतिषशास्त्र नेत्र, शिक्षा नासिका,और छन्दः शास्त्र पैर हैं।वेद के नेत्ररूपी ज्योतिषशास होने से उ अङ्गों में सब मे श्रेष्ठ ज्य तिषशास्त्र है क्योंकि नेत्रहीन व्यक्ति अन्यान्यमय अङ्ग रहने पर . ५ भूमिका ३ भी अन्यान्य अङ्गों से नेत्र का काम नहीं ले सकता। इस लिये किसी कार्य के फरने में अममर्थ होता है। इसी प्रकार विना ज्योतिष शास्त्र पड़े घेद के यसादिक कार्य तथा गृहनिर्माणादि कार्य नहीं हो सकते। पहां ज्योतिषगान से "सिद्धान्त ज्योतिष” समझना चाहिये, फलित नहीं। फलित वस्तुतः ज्योतिपशास्त्र नहीं है और न उस का घेदोश यशादिफ कार्य से सम्बन्ध है, क्योंकि घेद मा दस की शाखा में विधिशप हैं कि "पुत्रेष्टि" मादि यात अमुक वयं, गारा, पातु, पक्ष, तिथि, नक्षत्र में करमा चाहिये और यस कुरा समचतुष्कोण आदि होना चाहिये, तथा यज्ञशाला आदि इतनी लम्बी चौड़ी होनी चाहिये। अब इस के अनुसार ज्योतिष शास्त्र से वर्ष, मास आदि यथोचित निर्धारित होता है, फलित ज्योतिष से नहीं । इस में सन्देह नहीं कि फलित ज्योतिष से स्वार्थसिन्धु लोगों को टका फनाने का और भारत को गारत कर आरत बनाने का अच्छा सुविधा मि. लता है । डीफना, मैंघुन करना, धोती पहनना, पढ़ना, लिखना, बेघना, खरीदना, विवाह करना, चोरी करना, परदेश जाना आदि जितने सांसारिक कार्य वा अकार्य , सब ही के लिये जैसी फीम दाखिल करें,वैसा मुहूर्त लीजिये। Tagtra vnfern ( Astronomy ) काल के सय से छोटे भाग को " त्रुटि " कहते हैं, त्रुटि से लेकर फल्प पर्यन्त काल की गणना, सीरमास, नक्षत्रादि कालमान, एवं विकला से भगण पर्यन्त क्षेत्रपरिमाण तथा नक्षत्रादिकों की गति, व्याक एव अन्य गणित (fathematics) प्रश्नोत्तर सहित एय पृथियी आदि ग्रहों की सस्थिति और यन्त्रादिकों का वर्णन इत्यादि विषय जिस में ही उस फो पशिष्त गण "सिद्धान्त ज्योतिष" कहते हैं। इस के निम्नलिखित प्रामाणिक ग्रन्थ हैं गर्ग सिद्धान्त /११ अन्दर सिद्धान्त २ सूर्य सिद्धान्त १६ तत्वविवेक ३ सोम सिद्धान्त १० पराशर १७ सार्य शीग - . एव्यास " " U . ११ भोज ४रोमक ५ वसिष्ठ ६ पौलस्त्य १८ लघु माध्य १९ शहद भार्य " 20 . १२ वराह १३ ब्रह्मगुप्त १४ सिद्धान्तशिरोमणि, & रहस्पति " २० ऋग्वेद ज्योतिष २१ यजुर्वेद ज्योतिष २२ अपर्य ज्योतिष 1 : मूर्यसिद्धान्त सूर्य सिद्धान्त रचना काल आधुनिक सूर्य सिद्धान्त में १४ अधिकार और ५२० अनुष्टुप्छन्द के लोक हैं। इस के आरम्भ के श्लोक में लिखा है फि सत्ययुग के अन्त में सूर्य की आज्ञा से मूीश पुरुप ने मय नामक असुर को ज्योतिष का उपदेश किया जिस को वने आज शाके १८२५ तक २१६५२०४ सौर वर्ष हुए । परन्तु आधुनिक सूर्यसिद्धान्त रुत युगान्तकालिक नहीं है, इस विषय में महामहोपाध्याय श्री पण्डित मुधाकर द्विवेदी प्रोफेसर संस्कृत कालिज धनारस ने पञ्चसिद्धान्तिका की भूमिका में लिखा है, जिस का मैंने उपयोगी समझ कर यहां उल्लेख किया है:- "सूर्यसिद्धान्तरचनाकालस्तु नित्यानन्देन सिद्धान्तराज- कृता कलेः पत्रिंशच्छतमितेऽब्दगणे व्यतीते निगदाते। स कालस्तु आर्यभहकृतसिद्धान्तस्य समकालिकएव सि- ध्यति विभाति च तथ्यं नित्यानन्दन प्रतिपादितमार्यभ- टीयसिद्धान्ते न कुत्रापि सूर्यसिद्धान्तमतप्रतिपादनात्। साम्प्रतं प्रचलितसूर्यसिद्धान्तः कृतयुगान्तकालिकस्तु केनचिदन्येन प्रकल्पितो नवोन इति स्फुटमेव सूक्ष्मवि- चारप्रवृत्तानां गणकानाम् । भारतवर्षे ऋऋपिप्रणीतानां सिद्धान्तानामेव प्रमाणं नान्येपांतेन भारतवर्षीयाश्चिरं- तना आचार्याः कमपि मुनिप्रणीतसिद्धान्तं स्वीकृत्य तत्र बीजादिकं दत्वा स्वस्वं सिद्धान्तं चक्रुर्यथा ब्रह्मगु- तिन ब्रह्मसिद्धान्तं स्वीकृत्यात्मसिद्धान्तो विरचितः ॥ नमो ग्रहगणितं महता कालेन यसखिलीभूतम् । अभिधीयते स्फुटं वज्जिष्णुमतम्रल गुप्तेन ॥ भास्कराचार्यणापि स एव ब्रह्मसिद्धान्तः स्वीकृतएव नन्येऽपि सूर्यसिद्धान्तादीन् स्वीकुर्वन्तितेन तत्तदाचार्य रचितसिद्धान्तान् तत्तत्स्वीकृतमुनिसिद्धान्त नाम्ना व्य. f - ५ भूमिका यहरन्ति तत्तदुत्तरकालीना विद्वांसोऽतएव वदति वराह- मिहिराचार्यः " पञ्चभ्यो द्वावादशी व्याख्यातौ लाठदेवेन अर्थात् लाटाचार्यण द्वौ पौलिशरोमकसिद्धान्तौ व्याख्या तौ तयोर्भगणादिपु वीजं दत्वा विस्तारितौ स्वकृतसिद्धान्त अत्रेदमुक्तं भवति - लाटाचार्येण पौलिश रोमक सिं- द्वान्तौ खीकृत्य तत्र बीजादिविशेपं विधाय रचितोऽन्यः सिद्धान्तः । अत एव यथा मदीयं करणं सर्वजनस्वीकृतंभवे. दिति बुझा पञ्चानां सिद्धान्तानां मतानि स्वीकृत्य रचिता चाचार्यणेयं पञ्चसिद्धान्तिका । एवमेव विष्णुचन्द्रादयो वसिष्ठसिद्धान्तादीन् स्वीकृत्य स्वान् सिद्धान्तान् रचया- मासुःन ते साक्षादवसिष्ठादिसिद्धान्तक र इति मन्मतम्॥ भावार्थः-सिद्धान्तराज ग्रन्थकार नित्यानन्द कहते हैं कि सूर्य सिद्धान्त कलियुग के ३६०० वर्ष बीतने पर यना । यह समय आयं अह कत आर्य सि- द्वान्त के समफा प्रसिद्ध ही है और सत्य ही प्रतीत होता है। क्योंकि आर्य सिद्धान्त में सूर्य सिद्धान्त का कहीं भी उल्लेख नहीं है । आधुनिक मूर्प सिद्धान्त को सत्ययुगान्तकालिक मानना केवल लोगों की कल्पनामात्र है ।। भारतवर्ष में ऋषिकत सिद्धान्त अन्यों ही का प्रमाण माना जाता- औरों का नहीं,इस लिये भारतवर्षीय चिरन्तन आचार्यों ने किसी मुनि प्र. णीत सिद्धान्त को मान कर उसमें वीजादिक दे अपने २ सिद्धान्त को बनाया- जैसे ब्रह्मगुप्त ने ग्रह्मसिद्धान्त मान कर अपना सिद्धान्त रचा। ब्रह्मल ग्रहगणित बहुत काल होने से जो नएमाय हो गया उसी को जिष्णुपुत्र ब्रह्मगुप्त स्पष्ट करते है । भास्कराचार्य ने भी उसी ग्रह्मसिद्धान्त को माना इसी प्रकार और लोग भी सूर्यसिद्धान्तादिक को मानते हैं । इस कारण उन २ आचार्यरचित सिद्धान्तों को उन २ के माने हुए मुनिकतसिद्धान्तों के नाम से तदुत्तर- कालीन विद्वान् लोग व्यवहार करते हैं। इस लिये घराह मिहिराचार्य कहते कि पांच सिद्धान्तों में से प्रथम दो की व्याख्या लाट देव ने की है अर्थात् लाटाचार्य ने पौलिश और रोमक सिद्धान्त की व्याख्या की है। इन के A । H ।
६ " भूपंसिद्धान्त भगणादि मे बीज मिनाय विस्तारित कर अपना सिद्धान्त बनाया । यही यह कहा जाता है कि लाटाचार्य ने पोलिश और रोमक सिद्धान्त को मान कर उन में वीजादि विशेष देकर अन्य सिद्धान्त रचा। अत एव मेरा धनाया फरण (अन्य ) राय लोगों से माना जावे इस बुद्धि से पांचों सिद्धान्तो के मत को मानकर आपास्यं ने इस मञ्चमिडान्ति का नामक ग्रन्थ को रचा। इसी प्रकार विष्णु चन्द्रादिक ने वसिष्ठसिद्धान्तादि को मानकर अपने सिद्धान्त को बनाया। धसिष्ठ आदि मुनियों ने स्वय नहीं बनाया -यह मेरा मत है । और आय्यं सह ने शाके ३९८ में जन्म लेकर २३ वर्षको अवस्था में मार्य हिदान्त यमाया जिस का प्रमाण उसी ग्रन्थ से मिलता है- "कालः पष्टयदानां पष्टिर्यदा व्यतीतात्रयश्च युगपादाः । ज्यधिका विंशतिरब्दास्तदेह मम जन्मनोऽतीताः ( आर्यसिद्धान्ते कालक्रियापादे) अर्यात शाके ४२१ में यह ग्रन्थ धमा-इस में मूर्यसिद्धान्त फा कहीं भी उलए नहीं है। एव वराहमिहिराचार्य ने जिम का देहान्त शाफे ५० में हुआ अपनी पञ्चसिद्धान्तिका ग्रन्थ में जिस सूर्य सिद्धान्त का उल्लेख किया है उस से और आधुनिक सूर्यसिद्धान्त से अन्तर पठता है-इस से अनुमान होता है कि जो सू० मि० घराहमिहिर के समय में था यह प्रचरित सू० सि० से भिन्न दूसरा था। पाठको के अवलोकनार्थ थोड़ा सा दोनों सू०सि० का विषय नीचे लिखते हैं:- महायुगीय भगण संख्या- घराहमिहिर उम्मिलित सूर्यसिद्धान्त आधुनिक भूप्य सिद्धान्त ग्रहगण बुध १७९३७००० १७८३७०६० शुक्र ७२२३०० ०२२३७६ २२८६८३४ २२९६८३४ शहस्पति মলয় १४६५६५ वराहमिहिर के देहान्त होने का (शाफे ५०६ में) प्रमाण- नवाधिक पञ्चशतसंख्यशाके वराहमिहिराचार्यों दिवं गतः ॥ भगण गण -- १२ मूर्यसिद्धान्त फलित ज्योतिष का विचार A Lecture on astrology by Pandit Bapu Dera Sli stry, Pro- Hessor of Astronomy, Benares Sanskrit College, Honorary Member of the Royal A sosiation Society London de the Asiatic Society Bengal, Fellow of the Calcutta Univeraty फलित उस को कहते हैं जिस में इष्ट फाल के ग्रहों की स्थिति पर से भूत भविष्यत् और वर्तमान इन तीनों फाल के शुभ और अशुभ फल जानने को प्रकार रहते हैं । यह दो प्रकार का है, एक सहिता और एक होरा ॥ सहिता उसे कहते हैं जिस में उस २ काल के ग्रहों की स्थिति पर शिक्ष, दुर्भिक्ष, सुष्टि, अतिवृष्टि, अग्नि भय, वा राजकीय उपद्रव इत्यादि सर्वसाधारण शुभ वा अशुभ फल जानने के प्रकार हैं और जिस में किसी काम का आरम्भ करने के लिये ऐसा काल ठहराने के प्रकार रहते हैं, कि जिस काल में उस कार्य का आरमा करने से वह काम सफल होजाये। ऐसे (ठह- राये हुये ) काल को संस्कृत ( फलित ग्रन्थ ) में “ मुहूर्त " और भाषा में सासत " कहते है। होरा अथया जातक उसे कहते हैं जिस में हर एक प्राणी के जन्म पाल के ग्रहों की स्थिति पर से उस के समग्र जीवन का वृत्तान्त ममझने की विधि रहती हैं । इस होरा शास्त्र का और भी एफ भेद है जिस को ताजिक फहते हैं। इस में प्राणी के जन्म काल से हर एक वर्ष मास आदि के आरम्म फोल के ग्रहों की स्थिति पर थे उस २ वर्ष, मास आदि का वृत्तान्त समझने के प्र. कार रहते हैं। यह फलित शास्त्र का इस देश में जिस समय सस्कृत विद्या का सूर्य अस्तप्राय होता था जिस को लग भग "वर्ष हुये कि प्रचार होने लगा। इस में जातक के ग्रन्धों में तो कितने एक शब्द केवल यमन अर्थात् ग्रीक भाषा के । इस से स्पष्ट जान पड़ता है फिजातक शास्त्र के कुछ विषय यहां के ध्यो- के ग्रन्थकारों ने ग्रीक लोगों से लिये हैं और ताजिक" के तो सप विषय बालों से लये हैं क्योंकि उस के सथ सांकेतिक शब्द अरबी भाषा के हैं। अधिकांश आयं लोग इस फलितज्योतिष को ममझते हैं और मायः इस में जो लिखा है उसके अनुसार आचरण करते हैं । मुहूर्त के विषय में तो फिसी फाम फा आरम्भ अच्छी साइत देखे बिना नहीं करते । जो किसी को कुछ N . -- , भूपमिद्वान ब्राह्मणों को दान देता है और उन से जप होम इत्यादि करवाता है। यही घास हिन्दू संगो मे है। माल जानने के लिये गणित फा जान अवश्य घाहिये, यही गणित या "सिद्धान्त ज्योतिष शास्त्र का नुरुप उपयोग अधिकाश आर्य (हिन्दू) लोग समभाते हैं। सिद्वान्त में भो यो लिखा है कि:- ज्योतिःशात्रफलं पुराणगणकैरादेश इत्युच्यते, नूनं लग्नबलाश्रितः पुनरयं तत् स्पष्टखेटाश्रयम् । ते गोलायिणोऽन्तरेण गणितं गोलोपि न ज्ञायते, तस्मादझीगणितं न वेत्ति स कथं गोलादिकं ज्ञास्यति । अर्थात्-पुराने ज्योतिषी लोग कहते हैं कि आदेश अर्थात भूत भधि- ध्यत् घर्तमान इन तीनो काल के शुभ वा अशुभ फा जो कहना है, सो ज्यो- तिष शास्त्र का प्रयोजन है । फिर आदेश लग्म के बलं के आश्रय से है और यह लग्न स्पष्ट ग्रह से और स्पष्ट ग्रह "गोल से ज्ञात होता है और विमा गणित के गोल समझ में नहीं आता, इस लिये जो गणित नही जानता सो गोल आदि कैसे जानेगा । इस लिये वराहमिहिर ने अपनी सहिता में लिखा है कि.- तन्त्रे सुपरिज्ञाते छायाम्बुयन्त्रसंविदिते । होरार्थे च सुरूढे नादेष्टुर्भारती वन्ध्या ॥ अर्थात् जो गणित और सिद्धान्त को उत्तम प्रकार से जानता हो और शङ्ख की छाया और घही यन्त्र से लग्न जानता हो और जातफ शाख का सम्म अर्थ ठीक किया हुआ हो उस का कहा हुमा फल कभी व्यर्थ नहीं होगा। इसी लिये यहां के बहुम लोग यो मापते हैं कि ये अग्रेज़ लोग जो गणित और सिद्धान्त में यहुम प्रयीण होते हैं और जो बहे २ सन्त्रों से सूक्ष्म पेष फरफे ग्रहों की स्थिति उत्तम प्रकार से जानते हैं, वे फलित में अपर पहुत अच्छे होगे और इस लिये वे अच्छी साइत पर युद्ध करते होगे तभी उन का सर्वत्र जप होता है। और जो कोई उस से कहे कि अपेज़ लोग फलित नहीं मानते तो यह कहना झूट समझते हैं और जो किसी को इस कहने पर विवाद ही जाये तो उस को बाहीमाचर्य होता है,गी अंग्रेज़ लोग लिनहीं मानते ܝܫܙ भूमिका तो गणित में ग्रहों की स्थिति जानने में इतना व्यर्थ परिश्रम क्यों करते हैं । परन्तु पहिले विलायत में भी सिद्धान्त विद्या का फलित ही के लिये था। अनुमान १५ वर्ष पहिले जर्मनी देश में केप्लर नामक एक बड़ा ज्योतिषी हुआ। उस ने एक ग्रन्थ में यों लिखा है कि सिद्धान्त विद्यारप विदुषी माता की फलित विद्यारूप एक मूर्ख बेटी है और माता का जीवन केवल उसी मूर्स से है। परन्तु आश्चर्य का विषय है कि हिन्दुस्तान में फलित विद्या का प्रचार है और सिद्धान्त विद्या जो फलिन को महुत आवश्यक है सो बहुत क्षीण हुई है, उस का पोटा सा अंश प्रसिद्ध है। यहां जिम को ज्योतिषी होने की इच्छा होती है वह केवल "पत्रा" (पञ्चाङ्ग+जन्त्री) बनाने की एक सा. रफी (Table) ग्रन्थ पढ़के और दो घार फलित के ग्रन्थ पढ़ लेता है। इतना पढ़ के ज्योतिषी बन के लोगों की जन्मपत्री और वयं फल लिस के अपना निर्वाह करता है और जो जन्मपत्री या वर्षफल में फल निसा रहता है, कही मिलता और कही नहीं मिलता । वह फल न मिलने का दीप अपने ऊपर न आवे इस. किये ज्योसिपी लोग जन्मपत्री की आदि में मायः यह मोफ गिरते हैं:- जनुपः समये धृतं न यन्त्र न मया च निवेशिता च नाडी। अपरैरुपदिष्टजन्मकाला- ज्ननिपत्रीह विलिख्यते मयैपा। अपात्-(जन्मपत्री लिखने या ज्योतिषी कहता है कि ) मैंने जन्म. फान ठीक जानने के लिये उस समय कोई तुरीय आदि यन्त्र लगाया नहीं पा, न कोई पड़ी भी यहां स्थापित की पी । दूसरे ने जो जन्मकामा कक्षा उस पर से में यह जन्मपत्री लिखता हूं। इस लिये विश्वगुणादर्श नामक पु' स्तक में ज्योतिषी का एक्त लिखा है कि:- विलिखति सदसट्ठा जन्मपत्रं जनानां फलति यदि तदानीं दर्शयत्यात्मदाक्ष्यम् । न फलति यदि लग्नं द्रष्ट्रवाह मोहं हरति धनमिहेवं हन्त दैवज्ञपाशः ॥ अर्यात न्योतिषी अच्छा वा धुरा किमी प्रकार का एक जन्मपत्र लोगों - १६ मूर्यसिद्धान्त को लिख देता है। जो उस में लिखा हुआ फल मिल जावे तो सक्षों को अपना सामथ्र्य दिसलाता है और जो न मिले तो कहता है कि जन्मकाल देखने हारा चूका है। सेद फी यात है कि इस प्रकार से कुत्सिग ज्योतिषी लोगों से द्रव्याहरण करता है। यो हिन्दुओं में फलित की ओर ज्योतिपी की अवस्था है । मुसलमान लोग को कहते हैं कि फलित विद्या सच्ची है । वन में शीआलोग तो हिन्दुओं की नाई उस को मानते हैं । लसनी में कितने कितने एक ब्राह्मणों ने फ. लित विद्या पर मुसलमानों से लाखों रुपये पाये हैं। मुन्नी लोग विद्या को सनी समझते है परन्तु प्रायः अपनी जन्मपत्री और वर्षफल यनवाफे शुमा. शुभ फल नहीं देखते। अब पहिले लिखा है कि फल कहीं मिलता है और कहीं नहीं मिलता तिसपर फलित के आचार्य कहते हैं कि जो फल नहीं मिलता सो फलित शास्त्र का दोष नहीं है, परन्तु वह फल लिसने हारे ज्योतिषी का अज्ञान है। उस ने जो ग्रहो कर गणित किया होगा सो चूका होगा वा फलित के पि. चार में कहीं भूला होगा इस में कुछ संशय नहीं है। यों ज्योतिषी की मूल से फलित शास्त्र झूठ नहीं हो सकता । क्योकि इस शास्त्र के यनाने हारे जो आचार्प होगये हैं उन लोगों ने उस २ फाल के ग्रहों की स्थिति पर से बहर फल निश्चय से होता है, यो पारम्यार परीक्षा फर के फलित के सिद्धान्त लिखे है सो झूठ क्योंकर होगे? जैसे अमुक रोग पर अमुक औषध देने से वह रोग दूर होता है, यो वैद्यक के ग्रन्थकारो ने चार २परीक्षा से ठहरा के वह औषध उस रोग का नाशक है, यो अन्ध में लिख दिया है, फिर बैद्य लोगरोगियों को औषध देते हैं उस में कितने एक रोगियो का रोग दूर होता है और कि. तने एक फा नही होता । उस में वैद्यकशाख का दोष नहीं यह वैद्य फा दीप है। उस रोग के दूर न होने में कारण यही है कि सस वैद्य को रोग की परीक्षा अच्छी भांति न हुई होगी वा औषध की वृत्ति अच्छी म घनी होगी परन्तु इस से वैद्यकशास्त्र झूठ नहीं हो सकता। इसी प्रकार से क. लित भी झूठ नहीं है ।जो कोई यों कहे कि आकाश में यह और नक्षत्र पृथिवी पर से उस २ स्थान में दृष्ट हो तो वह २ फल होता है। यह जो समग्र फलित में लिखा है इस में परस्पर दूरस्थित जो ग्रह और नक्षत्र हैं, इन में क्या सम्बन्ध हैं ? और उन से वह फल क्योंकर होगा, इस में कोई युक्ति ही देख नहीं पष्टती । इस लिये यह फलित शास्त्र युक्तिशून्य है, यह सत्य नहीं हो सकता। इस पर फलित जामने हारे यह उत्तर देते हैं कि यद्यपि भूमिका आकाश में परस्पर दूर स्थित प्रह और नक्षत्रों के उस स्थान पर आने में और पंथिवी पर उस २ फल के होने में पा सम्बन्ध है ? और फल होने में क्या पारण है, यह हमारे ध्यान में नहीं आता । तथापि उस २ यह स्थिति को अनुसार यह २ फल स्पष्ट देख पड़ता है, तब उस की झूठ नही कह स- फसे । जैसे अमावास्या,पूर्णिमा और अष्टमी इन चार तिथियो में सूर्य और चन्द्र आकाश में नियत अन्तर पर रहते हैं और जो बहुत रोगी होते हैं उन का रोग इम तिथियों में बढ़ता है और जो रोग मरणासन्न हो तो मायः उन के उगभग फाल में मर जाता है और जो कदाचित् ये तिथि बीत जायें तो रोग शान्त होता है। यह यार २ परीक्षा करके देखा है। यों सूर्य और चन्द्र के दृष्ट अन्तर में भूमि पर रोग की पद्धि और हास होता है । इस का कारण यद्यपि प्यान में नहीं आता, तथापि फर स्पष्ट देख पड़ता है, वह झूठ नहीं हो सकता। इसी प्रकार से और भी ग्रह आकाश में उस उस स्थान में देस पड़ने से पह २ फल होता है, यह परीक्षा फरको फलगन्ध यमाये है। इन में जो फल को उपलब्धि होती है वो ही युक्ति है, दूसरी नहीं है। यों ज्योतिषी लोग स्पष्ट कहते हैं और भी कहते हैं कि जैसे हल्दी पीली होती और धूना शुभ्र होता है पर जो ये दोनों पानी में एकटे किये जायें तो उस मिन द्व्य का रा लाल होता है । यह रश होने में क्या कारण है। मद्यपि मन में नहीं आता ती भी लाल रङ्ग को झूठ नहीं कह सकते। इसी प्रकार से ग्रहो की स्थिति के अनुसार भो फल होता है उसे नहीं कहसस्ते इस पर फलित फो न नामने वाले कहते हैं कि फलिती लोग ऐसी ३ चाहे वतनी फलित की उपपत्ति दिसलायें परनु फलितशाख किसी प्रकार से काम में लाने के योग्य नहीं है । यह शात सब परस्परविरुद्ध उलियों से भरा होजैसा फि भायसाधन अनेक प्रकार का छिला है उससे साधी पटना भिक २ प्रकार की शात होगी, उस में कौनसी सत्य कहनी चाहिये । उनी प्रकार से मायुर्दाय फा गणित अनेक प्रकार का है दब झौन गणित पर से मनुष्य के मायुष्य का निधय होगाायो ही मन्सो में ग्रहों की दशा बहुत प्रकार फी लिरी है तय यह ग्रह की दशा का पाठ किसी प्रकार से नहीं ठहराया जासकता,ऐमी अनेक विरुह उक्तिजस में हैं तो कल का निरीय क्योंकर होगा. और भी पुषिधी पर एक ही समय में अनेक मनुष बन्नते हैं पर उन गयो की यत्ति एकसी कभी नहीं होती। और इन का रपट उदाहरण यह है कि जो दो युगल जन्मते हैं टन के इन्म लग्न में तो सार नकाश . सूर्य सिद्धान्त में भी प्रायः भेद नहीं होता। इसलिये उन को जन्मपत्री एकही सो बम है पर जो उन की जीवन की वृत्ति देखो तो दोनों की भिन्न २ प्रकार होती है सो उस जन्मकुण्डली से किसी प्रकार से ज्ञात नहीं हो सकता तब फलितशास्त्र किस काम का होगा? और भी फलित को न मानने वाले कहते हैं कि यह मावी फली ਬਲਬਲੇ ही कहना केवल व्यर्थ है, इतना ही नहीं है, यह प्रायः बाधक भी होता है । जैसा कोई मनुष्य किमी ज्योतिषी से पूछे कि जो मै व्यापार करता हूं उस में लाभ होगा वा हानि होगी। तब जो ज्योतिषी कहदेवे कि इस तुम को हानि होगी तो यह सुनते ही वह मनुष्य खिन्न होके उस व्यापार के काम में ढीला हो जावेगा और जो उस को उस व्यापार में लाभ भी होने घाला हो तो भी उस की दीलाई से हानि ही होगी। इस लिये यहं भावी फल फा कयन उद्योगी मनुष्य को दोला कर देता हैं। इस लिये फल के न मानने वाले स्पष्ट कहते हैं कि फलितशाख का भरोसा न करके केवल ईश्वर के भरोसे पर सब काम प्रयत्न से करो,इसी में सम्र सिद्धि और वृद्धि है। इस फलित विचार को श्रीयुत प० वापुदेव शास्त्री ने जो ज्योतिष शास्त्र के आचार्य पे, सन १८५२ ई० में संस्कृत कालिज यनारस में भारतेन्दु श्रीयुक्त या हरिश्चन्द्र जी आदि महाशयों के अनुरोध से वामृतासाप से कहा था, जो श्रीयुत धा० हरिश्चन्द्र जी की आप से सर्वसाधारण के लाभार्थ बनारस मेडिकलहालप्रेस में छाप कर प्रकाशित किया गया । नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह अन्धकार रात्रिसमय गगनमण्डल में जो असष्य नक्षत्र दीरते हैं वे देखने में यद्यपि छोटे २ जाम पड़ते हैं, परन्तु वस्तुत थे छोटे नहीं हैं । ये नक्षत्र पृपिधी से अत्यन्त दूर पर अवस्थित है। इस कारण पृथियो से कई गुणा बड़े होने पर भी छोटे २ दीरते हैं । इन क्षत्रों की दिनरात्र एक ही दशा रहती है, परन्तु दिन में सूर्य की किरणो की प्रसरता से हम लोग उन को नहीं देख सकते और रात्रि में देखते हैं । ये नक्षत्र सब एक प्रकार के नहीं हैं,जिन सय नक्षत्रों की दूरी परस्पर एक ही सी रहती है एव नित्य अपने ही स्थान में दीख पड़ते हैं अर्थात् फिन्हीं लोकलोकान्तर की परिक्रमा नहीं करते, केवल अपनी ही धुरी पर घूमते हैं, उन्ही को नक्षत्र कहते हैं। ये नक्षत्र दो प्रकार के हैं। एक अचल नक्षत्र, दूसरा घल नक्षत्र । अचल नक्षत्रों की संख्या - - - भूमिका अद्यावधि आधुनिक विद्वानों से ५००००,१०२00 के लगभग देखे हैं । अचल नक्षत्र का वर्णन ऊपर हो चुका है। चल नक्षत्र वा ग्रह बहुत से नक्षत्र कमी गगनमण्डल के एक स्थान में कसी अन्य स्थान में रवस्थिति करते हैं। एवं कभी अचल अयस्था में रहते हैं, इन्हीं सब नक्षत्रों से धिक प्रकाश होता है । इस लिये इन को ग्रह कहते हैं। ये ग्रह सब सूर्य प्रकाशित होते हैं अर्थात् इन में स्वकीय तेज नहीं । परन्तु पूर्वोक्त अचल नक्षत्र स्वयं प्रकाशमान हैं। उन में सूर्य का प्रकाश नहीं है ।। आफाश में जो सब नक्षत्र दीरते है उनमें से जो हम लोगों को दिन में सबसे अतिप्रमायुक्त दीखता है वहीं सूर्य है । पूर्वोक्त नियमानुसार सूर्य ग्रह नहीं है, श्योंकि यह किसी की परिक्रमा न करके अपनी ही धुरी पर धूमता है और स्वयं प्रकाशित होता है । भारतवर्षीय बहुतसे भवीन ग्रन्धों. में सूर्य को ग्रह माना है, परन्तु घेदादि सच्छास्त्रों में इस को ग्रहपति मामा है अर्थात् ग्रहों के केन्द्र स्वरूप। घेद का प्रमाण आगे ग्रह प्रकरण में दिया जायगा । अमरकोप वाले ने सूर्य के नामों में एक नाम "विभावसु ग्रहपतिः लिखा है । इदानी विद्वानों ने दूरयीक्षण यन्त्र द्वारा अनेक दूरस्थित नक्षत्रों को देख कर निश्चय किया है कि ये एफ २ सूर्य हैं अर्थात् हमारे सूर्य की नाई ग्रह, उपग्रह आदि के मध्य स्थित हो सब को प्रकाशित करते हुये अपनी धुरी पर घूमते हैं । इनके तीन भेद हैं । एक सामयिक नक्षत्र, दूसरा अन्तर्हित एवं तीसरा यमल था मिथुनमाला नक्षत्र हैं। सामयिक नक्षत्र जो सब नक्षत्र किसी २ समप अतिउज्ज्वल,किसी समय अत्यन्त निष्प्रभ एवं फसी २ अदृश्य होते हैं उन को सामयिक वा नध्यतारा कहते हैं। अन्तर्हित वा रूपविकारी नक्षत्र बहुतमे नक्षत्र पहिले अत्यन्त दीप्तिमान् होकर प्रकाशित होते हैं और कुछ दिन पीछे उन फी ज्योतिः क्रमशः न्यून होने लगती है एवं कुछ दिनों पीछे आकाश में अदृश्य होजाते हैं। ऐसे नक्षत्रों को अन्तर्हित नक्षत्र कहते हैं। बहुत दिनों के पीछे जो दृश्य होते हैं इस से अनुमान होता है कि वे अपनी गति से अपनी कक्षा में बहुत दूर तक भ्रमण करते हैं इसी कारण कुछ काल तफ अदृश्य होजाते हैं।
. -- मूर्यसिद्धान्त याले हैं, परन्तु उनके प्रकाश का क्षत्र (इन्द्र)=(सूर्य) ने और लेलिया अर्थात् तम नक्षत्रो की दूरता प्रयुक्त और सूर्य के प्रखर किरणों से हमलोग उन्हें एक २ तारे की नाई (छोटे २) देखते हैं । इस कारण न इन्हें नक्षत्र (न-नहीं, क्षत्र-भूर्य की नाई प्रकाश ) कहते हैं। आशय यह है कि प्राचीन समय में जिन नक्षत्रों का प्रकाश हम लोगो के निकट दूरता के कारण अत्यन्त न्यून पहुंचता एवं बहुत थोड़ी गति वाले हैं उन्हें नक्षत्र कहते थे और नक्षत्रों में जो देखने में कुछ बड़े जानपड़ते हैं उन्हें कहीं २ "ऋक्ष कहते घे ॥ सलिलं वाइदमन्तरासीत् ॥ यदतरन् । तत्तारकाणां ता- रकत्वम् ॥ योवा इह यजते ॥ अमुंसलोकं नक्षत्रे ॥ तन्न- क्षत्राणांनक्षत्रत्वम् ॥ देवगृहा वैनक्षत्राणि ॥ यएवं वेद। गृह्येव भवति यानि वाइमानि एथिव्याश्चित्राणि ॥ ता- नि नक्षत्राणि ॥ तस्मादश्लीलनामंचित्रे ॥ नावस्येन्न यजेत ॥ तै० ब्रा० १।५।२॥ अर्थात्-वर्तमान सृष्टि की आदि में जल था । उस से जो सुष्टि होती हुई-सस्थ पदार्थों में सब से निकद, एवं अधिक गति वाले हैं,वे ही तारे हैं, एवं जिस प्रकार यज्ञ करने वाले अघी गति को पाते हैं। इसी प्रकार जो अपेक्षाकृत ऊपर के नक्षत्र हैं उन्हें "नक्षत्र कहते हैं । सौर जगत् में एक २ नक्षत्र मामो ग्रहादिक अन्यान्य विशेष गतिमान सस्य पदार्थों के घर हैं। जिस प्रकार इस पृथिवी पर चित्रविचित्र घर हैं, इसी प्रकार आफाश में भी नक्षत्र पुल की मारुति भिक्ष २ प्रकार की है। प्रत्येक नक्षत्रादि एक २ लोक विशेष है। इस का प्रमाण वेदो में है:- एतस्माद्वाओदनात्त्रयस्त्रिंशतं लोकान्निरमिमीत प्रजापतिः। ( अपर्ध ११ १२ । ४ । ५२) तेपा प्रज्ञानाय यज्ञमसृजत ॥ ३ ॥ अर-अला ने ३३ लोक { २७ अश्विनी से रेवती पर्यन्त और ६ कत्ति नक्षत्र की योगतारा नक्षत्र ये३३ नक्षत्र) रचे हैं। जिन के जानने के लिये यह का विधान है अर्थात् या फरने से सात्विक युद्धि होने पर शीघ्र विद्याद्वारा रन डोकों का ज्ञान हो जाये। यह उपलक्षण मात्र कहा गया। इसी प्रकार जितने आकाशस्य नक्षत्रादिक हैं वे सब एक २ लोकविशेष हैं। " DAN - भूमिका सूर्य सौर जगत् में सूर्य ही सय ज्योतिष्क पदार्थों में यहत् एवं उत्ताप और आलोक का आफर है। सूर्य २५ दिन : होरा २२॥ फल में अपनी कक्षा पर पश्चिम से पूर्व को एक बार घूम आता है। सूर्य सौर जगत् में केन्द्र स्वरूप होने से ग्रहों में इस की गणना नहीं, वेदादि सच्छास्त्रों में भी इस को ग्रह नहीं माना है। एवं सूर्य को बीच में और उस की चारों ओर अन्यान्य ग्रहों की संख्या लिखी है । अब हम उन प्रमाणों का उल्लेस करते हैं, जिन से पूरा २ निश्चय हो जायगा कि भारतवर्षीय लोग अनादि काम्न से सूर्यादि ज्योतिष्क पदार्थों की वास्तविक गति विधि आदि जानते थे । उदानधमित्रमह आरोहन्नुत्तरां दिवम् । हृद्रोगं मम सूर्य हरिमाणं च नाशय ॥ ऋग्वेद१।५०।११॥ अर्थात्-हे ईश्वर ! जिस प्रकार सूर्य का उदय होने से अन्धकार दूर होता है, इसी प्रकार मेरे हृदय के अमानान्धकाररूपी रोग का नाश करो ।। सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमको अश्वोवहति सप्तनामात्रिनाभि चक्रमजरमन यत्रेमा विश्वा भुवनाधितस्थुः॥ ऋ०११६४॥२॥ सप्त त्वा हरितो रथे वहन्ति देव सूर्य । शोचिकेशं विचक्षण ।। सामवेद प्र०६ । अ०प्र०३द०१४।१४ अपांत हे सूर्य ! तुम्हारे मण्डल में सात प्रकार की किरणें हैं । सप्तयुञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वोवहति सप्तनामा । त्रिनाभिचक्रमजरमन यत्रेमाभुवनाधितस्थुः ॥ अ०९।।।२ अवदिवस्तारयन्ति सप्त सूर्यस्य रश्मयः ॥ अ०१७॥१०॥१७॥१॥ अर्थात्-सूर्य की सातों फिरणे दिन में प्रकाशित होती हैं। पुराणों में सूर्य के ७ पोहे अरुण नामक सारयो और रथ आदि की जो कथा लिखी है, यह वस्तुतः कुछ नहीं है। सूर्य के न कोई रघ, न घोडे, न सारथी आदि हैं। यह आलङ्कारिक वर्णनसे कहा गया है कि एक ही किरण (रश्मि) सात नागों ( मास प्रकार के रण ) मे-भूर्यमहल ( धक्र ) में प्राप्त होता है । इस २४ नूर्य मिद्धान्त अक्षय और प्रतिवन्ध पक में तीन नाभि हैं ( उत्तरायण, दक्षिणायम और विषयत् ) इसी सूर्यमण्डल (सौरजगत् ) में सब लोक ठहर रहे हैं और (अम) विस सूर्य के रथ में घोड़ा नहीं है। हमारे पौराणिक पण्डित ठोग सूर्य को ग्रहों में गिमते हैं, परन्तु यह उन फी भूठ है क्योंकि प्राचीन प्रमाणों के अतिरिक्त अमरकोष में भी सूर्य को “ग्रहपति" लिखा है, यह नहीं है । विभावसुर्ग्रहपतिस्त्विपांपतिरहर्पतिः ॥ ३० ॥ ( अमरकोप फाय१ कालवर्ग) वायु के कारण सूर्य सवितारं यजति यत्सवितारं यजति तस्मादुत्तरतः प- श्चादयं भूयिष्ठं पवमानः पवते सविटप्रसूतो ह्येप एत. त्पवते । ऐ० ब्रा०२।७॥ यह वायु सूर्य की सेवा करता है । जिस लिये सूर्य की सेवा करता है, इस कारण सूर्य की उत्तर पशिम आदि नाम से वारंवार घायु चलता है। आशय यह है कि सूर्य से उत्पन्न होकर वायु धहता है। ऋतु के कारण सूर्य पूर्वानु प्रदिशं पार्थिवानामृतून् प्रशाद्विदधावनुष्टु ॥ (ऋ० सं०१३) हे सूर्य ! तुम्हारे द्वारा पृथिवी पर पूर्षादि दिशा की व्ययस्या होती है और तुओं को उत्पन्न करते हो । सौरजगत् में एक ही सूर्य है एक एवाग्निर्वहुधा समिद्ध एकः सूर्याविश्वमनुप्रभूतः । एकैवोपा सूर्यमिदं विभाति । ऋ० ८।८।२॥ एक ही अग्नि घहुत प्रकार से जलाया जाता है और एक ही सूर्य सब लोकों को प्रकाश करने में समर्प है और एक ही उपा (भूयोदय से पूर्व ला. लिमा से भी पूर्वकाल ) सम्पूर्ण जगत् को सुशोभित करती है। अनश्वो जातो अनभोशुरर्वा कनिक्रदत्पतयदूर्ध्वसानुः । ( ० सं०१।१५२ । ५) भूमिका घोडारहित ही सूर्य उत्पन्न हुवा परन्तु विना घोड़े के यहा तेज एवं कपर को अपनी परिधि में चलता है * ॥ अंग्रेजों ने जो दूरवीक्षणं यन्त्रद्वारा सूर्यमण्डल में फल देखा है और उत्तर दक्षिण किश्चित् दया हुया निश्चय किया है यह विषय कई सहल वर्ष पूर्व ही से हमारे शास्त्रों में लिखा है:- हस्खोरूक्षोऽप्रशस्तश्च परिवेपस्तु लोहितः । आदित्ये विमले नीलं लक्ष्म लक्ष्मण दृश्यते ॥ (वाल्मीकीय रा० युः सर्ग २४ ) श्रीरामचन्द्र जी कहते हैं कि हे लक्ष्मण ! सूर्यमण्डल सन्ध्या के कारण लाल है, एवं इस का अङ्ग कुछ रुथ ( दया ) है और नील रा का फल (चिन्ह ) दीखता है॥ शुक्र युध के अनन्तर शुक्र की संस्था है । यह ग्रह अन्यान्य ग्रहों की अपेक्षा अतिशय सुन्दर और यहा है। सूर्य के उदय और अस्तमन से पहिले अर्थात् सन्ध्याकाल में एपं अरुणोदय के पहिले मातःकाल में यह ग्रह दृश्य होता है, इसी कारण सर्वसाधारण इस को प्रभाततारा या सन्ध्यातारा कहते ६ ॥ युध और शुक्र फो जो हम लोग सम्पूर्ण रूप से नहीं देख सकते, इस का फारण यह है कि ये दोनों ग्रह पपियी के गमनीय पथ और सूर्य के मध्यस्पान हो फर गमन करते हैं । चन्द्रमा की नाई शुक्र की कला को भी पति और हास होते हैं। इसी कारण कमी २ यह इतना सूक्ष्म हो जाता है, जो हम लोगों को ठीक २ दृष्टिगोचर नहीं होता। इसी कारण भारतय में शकको या दैत्याचायं शुक्र एकाक्ष है, ऐसा कहते हैं। यह सो सदरलतम विद्वानों ने अनुसय किया है। वेद में इसी प्रकार एवं दस में पिरोप ठिा है । अंग्रेजी में शुक्र फा माम वीनस (Venus) है । इस से अनुमान होता है कि हमारे वेदों में जो "धेनम शुक्र का माग है, उसी को लेटीन, चीफ आदि भाषा में भी लिखा है। वेदों के प्रमाण दिये जाते है:- * किन्हीं लोगों को जो यह धारणा है कि गूयं पृषियी की परिक्रमा करता है पह एकमात्र भमूलक है पोंकि येदादि मत्यशास्त्रों में इस का प्र. माण नहीं पाया जाता है। देको पथिवीभ्रमण विचार ।। फाणा ४ मूर्यसिद्धान्त अयं वेनश्चोदयति पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायरजसो विमाने। इममपां सङ्गमे सूर्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभीरिहन्ति । (ऋ० सं०१० । १२३ । १) भयं-या घेनस (शुक्र) और मति (बुध) सूर्य के पास शिशु (बालक) की माई प्रतिदिन बढते हैं, अर्थात् पन्द्रमा की कला की हानि वृद्धि की सी इन की कला भी घटती बढती हैं, परन्तु यिम ( सहस्पति) पह के लिये यह नियम नहीं है। ककुभं रूपं धूपभस्य रोचते यहच्छुक्रः शुक्रस्य पुरोगाः । सोमः सोमस्य पुरोगाः ॥ यजु० अ०८ ॥ १६ ॥ अर्थ-इस पूर्ण कलायुक्त शुक्र का सुन्दर रूप देखने में सुहावन है और इस की सख्या चन्द्रमा के पहिले एष इस के भागे ( सामने ) चन्द्रमा है। अयं वेनः । चित्रं देवानाम् । यजु० अ० ३३ ॥ ३३ अर्थ-यह धेमस् (शुक्र) सस्थ दिव्य यही में सब से सुन्दर है। चक्षुपी ह वा अस्य शुक्रामन्थिनी । तद्वा एप एव शुक्रो य एप तपति तदादेप एतत्तपति तेनैप शुक्रश्चन्द्रमा एव मन्थी ॥१॥ इमामुहैके शुक्रस्य पुरोरुचं कुर्वन्ति । अयं वेनश्चोदयत्पश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमान इति तदेतस्य रूपं कुर्मो य एप तपतीति यदाह ज्योति- जरायुरिति ॥८॥ शत० प्रा०४।२।१॥ भाशय -सूर्य के दो नेयस्वरूप युध और शुक्र हैं, शुक्र मका. शित होता है, यह जो शुक्र तपता है, चन्द्रमा है (चन्द्र तुल्य है ) इसको कोई चन्द्रमा का पुरोघर्ती कहते हैं । (चन्द्रमा के पहिले शुक्र की सस्था है) इस लिये शुक्र को प्रकाश का गभ ( जरायु) कहते हैं । वख्यसि रुद्रास्यदितिरस्यादित्यासि शुक्रासि गृहस्पतिस्त्वा सुम्ने ररावतु । तै० सं०११२॥५॥ भाशम -तू पश्यी है, रुद्रा है, अदिति है, शुक्रा है, पन्द्रा है, और यह स्पति ग्रह के तुल्य तुम्हारे मुसमद मदेश है ( श्रेत है)। या यह " उप.फाल भूमिका इस मन्त्र में जो शुक्र के विशेषण स्त्रीलिङ्ग शब्दो में हैं। इस का कारण यह है कि शुक्र की सुन्दरता के वर्णन में है। इस लिये पुलिङ्ग वाचकशब्द नही हैं एवं बुधग्रह के वर्णम में शुक्रफा एफा होना आदि लिखा गया है वहीं देखना चाहिये । प्रायः चारों वेदों में पृष्ठस्पति और शुक को " अश्यिमी " भासत्या, दसा, स्त्रयद्य के बहुत से मन्त्र है उस का कारण यह है कि मातः. फाल अर्थात् आधीरात के पीछे और सूर्य के अरुणोदय से पूर्व एव सन्ध्या- काल में सूर्य के पीछे ईश्वरोपासना का समय है जिस का नाम और प्रासमुहूत है । इस समय हमारे अधिगण प्रायः सांसारिक कार्यों को छोड़कर नियमपूर्वक स्मामादि मित्यक्रिया कर ईश्वरोपासना, होम, वेदपाठ आदि ईश्वरोपासनासम्बन्धि कार्य में व्यस्त रहते थे । सो ये दोनों ग्रह शुक्र और शुहस्पति जिन को हमारे देश के आयाल बद्ध स्त्री पुरुष जानते हैं "शुक्र तारा एव"एहस्पति तारा"माया मत्येक वर्ष के आधे महीनों में उदित होते हैं । इसी कारण उषःकाल एवं सन्ध्याकाल के वर्णन में मनुष्यों को ईश्व. रोपासना विशेषतः फरनी चाहिये ।शुक्र और एहस्पति तारा देखने से मियत. फाल का निश्चय होता है। यध यह पह अन्याय ग्रहों की अपेक्षा अत्यन्त छोटा एव सूर्य के अत्यन्त मि. कटवर्ती है. इस का धर्म शुभ्र(वेत) सूर्य के उदप अस्त के किश्चित् पहिले दृष्टिः गोचर होता है । बुध ग्रह २७ दिन २३ होरा १५ मिनिट ४६ सेकेपट में सूर्य की एक पार प्रदक्षिणा कर लेता है और अपनी कक्षा पर २४ होरा ५ मिनट में एक यार भ्रमण करता है। इस ग्रह की संस्था सूर्य के पथात् है (पाचात्य मतानुसार)। इसी प्रकार येद में भी इस फी सस्था लिखी है प्रायः धारो वेदों में उप फाउ (सूर्योदय के लालिमा से पूर्व का काल) के ईश्वरोपासना विषयक मन्त्रों में आउदारिक वर्णन द्वारा सूर्य के दो नेत्र स्वरूप बुध और शुरु को माना है। प्रायः देखने में ये दोनों ग्रह इसी प्रकार जान पड़ते हैं। दोनों और शुरु और धीच में सूर्य रहता है। सूर्यस्य चक्षूरजसैत्यावृतं तस्मिनातस्युर्भुवनानि विश्वा॥१४ालियः सतीता उमे पुंसआहुः पश्यदक्ष- एवान्न वि चेदन्धः। कविर्यः पुत्रः ईमा 'चिकेत यस्ता विज्ञानात् सपितुःपितासता अथर्वसंकाश।१५ और बुध २९ . सूर्यसिद्धान्त आशय:-शुक्र ग्रह का नाम अंग्रेजी में वीनस (Venus) है जिस का अर्थ अत्यन्त सुन्दर है (Goddess of buts) जिसे संस्कृत में "श्री" कहते हैं। एवं शुक ग्रह फो फाणा वा एकाक्ष भी संस्कृत के ग्रन्थों में लिखा है वह इस कारण से कि दूरवीन यन्त्र द्वारा देखने से कसी र शुक्र ग्रह इतना मूक्ष्म प्रतीत होता है जो उस का वास्तविक झप नहीं दीखता (चन्द्रमा की नाई इस की कला यढ़ती घटती है ) इस से इस को "काणा" भी कहते हैं । इस का मूल ऊपर के मन्त्र में पाया जाता है। मन्त्रापः-सूर्य के दो नेत्र स्वरूप बुध और शुक्र ग्रह हैं ( अत्यन्त नि. फट हैं। जिन में अनेक लोक यसते हैं। इन दो में एक तो पुरुष (बुध) और एक स्त्री (शुक्र) एव नेप्र वाला (बुध) और एक नेत्रहीन (शुक्र) है। इन को जो विद्वान् जाने वह विद्वानों में श्रेष्ठ है ।। इसी प्रकार बुध के नाम सौम्य, एवं रोहिग्य क्यों हैं इस का कारण मीचे व्या किया जाता है। कभी २ बुध और शुक्र को चन्द्रमा पिधान (ढक लेता है) करलेता है और प्रायः तारा और ग्रहों का भी पिधान होता है। अनेक दिन हुए फि रोहिणी और चन्द्रमा के पिधान में युध ग्रह आगया -धा पुनः युध चन्द्रविन्द्र से बाहर निकल गया था इसी कारण रोहिणी को तो मान कर और पन्द्रमा को पुरुप एव रुपकाललार से इन दोनों के समागम बुध उत्पन्न होकर रौहिणेय और सौम्य कहलाया। इसको लेकर पुराणों में एफ और कथा है कि चन्द्रमा ने गुरुपदी तारा को हरलिया पा उसी से बुध का जन्म हुमा इत्यादि परन्तु यह भी कल्पनामात्र है। वास्तविक पि- धान ही होता और ग्रहों का भी इसी प्रकार विधान होता है परन्तु औरों की कथा इस प्रकार प्रसिद्ध नहीं हुई । मङ्गल और शुक्र का क्रम से आपा- दामू और मघासू नाम पिधान ही के कारण प्रसिद्ध हैं। चन्द्रमा यशपि चन्द्रमा ग्रहों में परिगणित नहीं परन्तु वेदरें में इस की संस्थाका कम जिस प्रकार लिसा है उसी प्रकार शुक्र की संस्था के अनन्तर पृपियो के उपग्रह रूप से इस की संस्था है। पृथिवी जिस प्रकार सूर्य का परिभ्रमण करती है उसी प्रकार चन्द्रमा भी पृषियी को प्रदक्षिणा करता है ७ दिन अहोरा ४३ मिनट ११.५ सेकेण्ड में चन्द्रमा पृपियी का एक पार परिषमप फर लेता है । चन्द्रमा का ग रुष्ण, काल,गौर भोर श्वेत है। चन्द्रमा स्वयं , - भूमिका तेजस्वी नहीं, परन्तु पाचात्य पण्डितों ने यह भी निश्चय किया है कि घन्द्रमा एकमात्र निष्प्रत नहीं है किन्तु उस में मन्दमना है जो सूर्य की किरणों से विशेष रूप से प्रकाशित होता है । लाईनरमाहब कहते हैं कि यहुत परी- क्षा द्वारा जाना गया है कि चन्द्रमा की किरणों में ताप नहीं और हम्बोलट साहब इसके विरुद्ध कहते हैं कि चन्द्रमा की फिरणों में साप है । चन्द्रमा में पर्वत, समुद्र, भूमि आदि हैं एवं फोई भाग अंघा कोई नीचा है । अब हम क्रम से वेदादि सध्यास्त्रों द्वारा उपरोक्त विषष को सिद्ध करते हैं:- ककुभं रूपं वृषभस्य रोचते यहच्छुक्र: शुक्रस्य पुरोगाः। सोमः सोमस्य पुरोगा।यजु०अ०८ म०४६ इस का अर्थ शुक्र के यसम में किया गया है। परन्तु यहां चन्द्रमा की संस्था दिसलाने को लिखा गया है। शुक्र ग्रह के सामने (आगे) चन्द्रमा और चन्द्रमा के मागे शुक्र । अव चन्द्रमा में जो श्याम रस एवं अंधा नीषा आदि है, उस का प्रमाण:- यानि नक्षत्राणि दिव्यन्तरिक्ष अप्सुभूमौ यानि नगेपु दिक्षु। प्रकल्पयंश्चन्द्रमा यान्यतिअथर्व०११ अर्थ-जो नक्षत्र द्युलोक में (जहां सूर्य की संस्था है ) और जो अन्त. रिक्ष में (जहां चन्द्रलोक है ) जहां के चन्द्रमोधिष्ठित पहाड, जल, एपियो और पक्षादि हें उम२ प्रदेश में जो नक्षत्र हैं। हे ईश्वर । मन से हम को सरा पहुंचे। इस से सिद्ध हुआ कि चन्द्रमा में पहाड भूमि आदि सय हैं और इसी फारण चन्द्रमा में जो भाग नीचा है वहां मूर्य का प्रकाश ठीक नहीं पहुंभत्ता जिस से श्याम रह प्रतीत होता है। चन्द्रमा अप्स्वान्तरा सुपर्णो धावते दिवि ॥ सामवेद प्र० ५। अर्ध प्र० १। द०४। मंद। जलात्मक पन्द्रमा (रुष्णपक्ष और सतपक्ष होने से पक्षी) पतिस्वरूप भाकाश में चल रहा है। चन्द्रमा में अपना भी प्रकाश है, तो लिया है उम फा भी प्रमाण हमारे वेदों में है:- उदेनं भगो अग्रभीदुदेनं सोमो अंशुमान् ॥ अधर्व०८।११२ माय ने अपने कार्य सिद्धान्त के गोलपाद में मिला है कि- ar- ३० मूप्यंसिद्धान्त चन्द्रो जलमर्कोऽग्निः मृदभूमिश्छायापि तमस्तद्धि । आर्या ३७ अर्थात-चन्द्रमा जल स्वरूप, मूर्य अग्निमय, एवं पृथिवी मुयमय जिस की छाया चन्द्रमा को ढक लेती है तो ग्रहण होता है। कालीदास जो श्री महाराजे विक्रम के नवरत्रो में से पे, अपमे शकु न्सला पन्ध में लिखते हैं किः- मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मी तनोति । किमिव हिमधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ॥ शकुन्तला १-१ । १८॥ हमारे शास्त्रो में जो चन्द्रमा के अमृत की प्रसिद्धि है यह वास्तविक सत्य है क्योंकि चन्द्रमा में ईश्वर ने कुछ ऐसा विलक्षण गुण दिया है जिस की किरणों से हमारे चैद्यकशाखोलओषधिया सब उत्पन्न होकर नाना प्रकार के गुण देसी हैं। नाना प्रकार चूंटियां पाहाहो में होती है जिन का वर्णन घरफमुश्रुत एवं अन्यान्य वैद्यकशास्त्रों में है। इन्हीं ओषधियों के मूल कारण चन्द्रमा के होने से इस का नाम"ओयधीश है और ओषधियो के विलक्षण गुणों के कारण उस के किरण का नाम अमृत हुआ है ॥ सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वः। तै० सं०३।४।७।१ अर्थात्-चन्द्रमा सूर्य की किरणों से प्रकाशित होता है। चन्द्रमा पर आधा भाग हम लोग सदैव देखते हैं परन्तु इस फा शेप दूसरा आधामही दृश्यहोता। इस को हमारे पूर्वज प्राषियों ने पहिले से लिख रपणाह.- यथा हिमवतः पावष्टं चन्द्रमसो यथा । न दृष्टपूर्व मनुजः० ॥ महा० शान्ति पर्व अ० १०० । मङ्गल पुध के अनन्तर पृपियी की सस्था,सदभन्तर मङ्गल की संस्था है । यह गाड़ अत्यन्तगाढ़ वायु में अनयरत अवस्थित है इसी कारण अन्यान्य ग्रहों की - पेक्षा इम का रङ्ग अतिशप का मङ्गल का गमनीय पप पिषी की कक्षा के बहिर्दश में है। इस ग्रह की दूरी सूर्य से १४६०००००० माईल है एवं १ वर्ष ३१ दिन १७ होरा ३० मिनट ४१ सेकेदह में सूर्य की परिक्रमा एकधार कर लेता है।
- भूमिका ३१ हमारे भारतवर्षीय संस्कृत ग्रन्गों में मङ्गल ग्रह के नाम 'लोहिता' 'अङ्गारका लाल होने के कारगा रफो गये हैं। जिस लालवर्ण को जानकर फलित ज्योतिषियों ने इस ग्रह की क्रूर ग्रहों में गणना की है। कभी २ एथियी के एफ और सूर्य, दूसरी ओर मङ्गल आजाता है। एवं इस की कक्षा पृथियीकक्षा के मनन्तर है। मङ्गल और पृथियों के अनेक अंशों में सादृश्य है । इन का. रणों से हमारे माघीम ग्रन्थों में इस के नाम 'महीसुत' 'फुज' 'भीम' हैं। घेद में इम ग्रह का नाम और रङ्ग भी लिखा है:- असौ यस्ताम्री अरुण उत बभ्रुः सुमङ्गलः । ये चैनं रुद्रा अभितो दिक्षुश्रिता: सहशोऽवैपांहेड ईमहे ।। य०अ०१६म०६ माशया-यह जो तामे के रस की नाई अथवा पिङ्गलवर्ण सुमङ्गल धा असिमुन्दर है, जिस के चारों ओर मुन्दर प्रकाश है। गृहस्पति पहों में एहस्पति सय से बड़ा है । इस का व्यासपरिमाण ८९३०३ मेल और सूर्य से ८८५५८६००० मैल दूरायस्थित है। एष इस की कक्षामङ्गल फेपश्चात् है। सूक्ष्मगणना द्वारा माना गया है कि यह ग्रह ११ घर्ष ३१४ दिन २० होरा २ मिनट ७ सेफेयर में एक धार सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण कर आता है। जो स्थूल गणना से हमारे ज्योतिष ग्रन्थों में १२ यर्प लिसे हैं और इस ग्रह के चार उपग्रह हैं, इस ग्रह का नाम संस्कृत में गुरु, वृहस्पति, देवपुरोहित माङ्गिरस आदि हैं। अन्यान्य ग्रहों से इस में गुरुत्य अधिक होने से गुरु और बहिर्वी ग्रहों में शुक्र की भाई प्रमायुरू होने से "पुरोहित (पुर:-आगे+ हितम्रपणा है)एवं तिष्य नक्षत्र से पिपान होने से 'अङ्गिरम"तिष्य सम्भव माम है। यहस्पति की उत्पत्ति तिष्यमामक नक्षत्र से मानी जाती है उस का कारण यह है कि इस ग्रह का परमशर १ मंच ३० कला होता है, इस से २७ नक्षत्रों में से जिम के साप निकटयुति होनी सम्भव है वह केवल पुष्प,मघा, विशाखा, अनुराधा, शतभिषा और रेवती नक्षत्र हैं। इस कारण गुरु और तिप्प ममत्र की युति होने पर, मिकटता प्रगुरु दोनों नक्षत्र और एकसा म. तीत होने से युतिकाल के पोले जब गुरु बाहर होगया हो तो लिष्य नक्षम से पम की धपत्ति मानी गई ( रुपकाखबार से ) ममाण:- 1 मूर्य सिद्धान्त वृहस्पतिः प्रथमं जायमानः तिप्यं नक्षत्रमभिसंबभूव ॥१॥ (ले० प्रा०३।१।१) वृहस्पतिः प्रथमं जायमानो महो ज्योतिपः परमे व्योमन् ॥२॥ (१०४।५०।४) वृहस्पतिः प्रथमं जायमानो महोज्योतिषः परमे व्योमन्॥३॥ ( अपयं० २० । ८।४) ईन्यिदपुपेवपुश्चक्रं "पर्यन्या नाहुपा युगा मन्हा रजांसि दीयथः ॥४॥ (ऋ० स०५१ ७३ । ३) वृहस्पति एफवार सूर्य के परिभ्रमण में ममुष्य के १२ सौरवर्ष होते है अर्थात १२ वर्ष में अपना चक्र पूरा करता है ॥४॥ शहस्पति की सस्था दिव्य अन्यान्य शुक्रादि महो से ऊपर को है- बृहस्पतिर्मा विश्वैर्देवैरायादिशः पातु ॥ अथ० २२१७११० जिस समय आधीरात का आकाश में यहस्पति तदित होता है पासूर्यो दय समय जब यह ग्रह अस्तमित होता है एव भूर्यास्त काल में जब इस का उदय होता है । उस समय यह शुक्र की नाई पृथिवी के अत्यन्त निकटवर्ती होकर हम लोगो को शुक्र यह की नाई अति उज्जवल भाम होता है। इसी कारण वेदो में "अश्विनी नाम से प्रात कालीन एव सन्ध्याकालीम कर्तव्य विधायक मन्त्रों में इन का वर्णन बहुत स्थलो मे भापा है ।। और भी इस ग्रह के विषय में दो के प्रमाण आवेधसं नीलरष्टं रहन्तं रहस्पतिं सदने सा- दयध्वम् । सादझोनिं दम आ दीदिवांसं हिरण्य वर्णमरुपं सपेम ॥ ऋग्वेद सं० ५। १३ । १२ ॥ इस मन्त्र से छहस्पति का बहा होमा, नीला, लाल, रमणीय, श्वेतवर्ष अपात माना रङ्ग का होना एक देदीप्यमान होमा सिद्ध होता है। शहदवयो वृहते तुभ्यमग्ने धिया जुरोमिथुनासः सचन्त ॥ ऋग्वेद सं०५।४३ । १५ ॥
भूमिका जिस प्रकार यशवेदी के दो और दो २ स्त्री पुरुष अर्थात् ४ मनुष्य मिल के यज्ञ करते हैं, इस प्रकार है यहस्पते । चार पारिपार्श्विक ग्रहों से सुशो. भित हो रहे हो। रहस्पति का नाम आङ्गिरस क्यो है सो इस मन्त्र से सिद्ध होता है.- यजिष्ठत्वा यजमाना हुवेम ज्येष्ठमङ्गिरसां विप्र मन्मभि- विप्रेभिः शुक्र मन्मभिः ॥ ऋग्वेद सं० ११ १२७ ॥ २॥ इस मन्त्र के भाप्य में सायण ने निरुता और ऐ० प्रा० का प्रमाण दिया है- अङ्गाराणां मध्ये ज्येष्ठं ज्वालायुक्तत्वात् । अगिरा अङ्गारा इति यास्क : ॥ नि०३ ॥ १७ ॥ ये अगारा आसंस्तेगिरसोभवन् । ऐ० ब्रा ३।३८ । अर्थात्-पृहस्पति ग्रह सय ग्रहो मे यहा होने और प्रकाशयुरू होने से आङ्गिरस नामक है। মানৱৰ इस ग्रह की सस्या-वृहस्पति के अनन्तर है. यह मृर्य मे अत्यन्त दूर एय यहा है। प्राप. ८७२३००० माईल दूरी पर अवस्थित है। यह २ यस्सर १६६ दिन २३ होरा १६ मिनट ३२ मेकेण्ड में सूर्य की एक बार परिक्रमा कर लेता है । अत्यन्त दूर होने के कारण एम की किरणे पृषियों पर अतिमाग भाव से प्रकाशित होती हैं। इसी मे इस की मारूति स्पूलदृष्टि में गायों की नाई छोटी जान पहती है परन्तु वास्तयिक दृरवीनद्वारा गाया गया कि इस में इतनीउप्णता है जो ग्रहों मे एम की तप्ता की उपगागही हो गफसी प्रत्युत द्वितीय भूर्य ही है अर्थात् मूर्य हो मे एम फी मपमा घोगपती ।। मूर्यसदृश उष्ण होने से दरा का नाम “ मृर्य का पुग्न" संस्था प्राधी में लिया है एव अत्यन्त मन्द गति होने में “मेपर " ( शाम्भीर । घर-घलने वाला इम की भारुति विसाण भाय गे दृष्टिगो पर हुईद अर्थात तीन पक वा अहुरीय के बीच में स्थित है। इन पत्र में दो Tract और एक दीप्तिहीन । एव पत्रय शनि मे बहुत अयरिथरा भीर परस्पर सलग्न नहीं हैं। इन तीन अहुरीप के बाहर आठ उपग्रह लोग को गिाय परिममण करते हैं। जैसे हमारी पूपियी को रात्रि में चन्नूगा प्रमाणित परमा है इसी प्रकार शनि आठ चन्द्रद्वारा रात्रि में भालोपित घोसा । मेयर पंसिद्धान्त का र नीला,पीला,पाएहुर तामे का रङ्गअनेक प्रकार के प्रतीत होते हैं। अब हम ठीक इसी प्रकार लक्षणयुल पर्यटन का प्रमाण वेद में दिखाते हैं- आधर्णसिहडिवो रराणो विश्वेभिर्गन्त्वोमभिर्ह पानः । मा वसान ओषधीरमृध्रखिधातु ऋङ्गो वृपभो वयोधाः ॥ ( ० सं०५ । ४३ । १३) अर्यात-यह सूर्य की माई प्रकाशमान याहुत ऊपर तीन रज के बड़े ३ चिन्हों में वर्णित और अत्यन्त ज्यालायुक्त है । सज्ज राणस्तरुभिः सुते गृभं वयाकिनं चित्तगासु सुस्वरुः। धारवाकेप्यजुगाथ शोभसे वर्धस्व पत्नीरभिजीवोअध्वरे ॥ (प्रा० सं०५४४५) अपोत-हेमन्दगामिन ! अनेक छोटे २ ग्रहों (उपग्रहों) के बीच अवस्थित अर्थात् शनिग्रह तुम छोटे काय वाले ग्रहों के बीच में कैसे शामते हो,जिस प्रकार ताराओं में चन्द्रमा। इस से शनि के उपग्रह सिद्ध होते हैं। ज्यायांसमस्य यतुनस्य केतुन ऋपिस्वरंचरति यासु नाम ते ॥ (०५ । ४५ ।) हे मोरे ! जिस प्रकार सप्तर्षि तारे हैं, ऐसे तुम जान पड़ते हो, परन्तु बड़े तेजस्वी और तुम्हारे अधिकांश गुण सूर्य की नाई हैं अर्थात् प्रकाश उष्णता, गति और रोहिणी नक्षत्र का शफटभेद (देखो सूर्य सिद्धान्त अ०८) प्रायः शनि, मङ्गल और चन्द्रमा करते हैं अर्थात रोहिणी नक्षत्र का आकार गाड़ी की माई है,जो इन शनि आदि के भ्रमण मार्ग में पड़ने से हम लोगों को मेष की नाई भाच्छादित हो जाने से छिन्न भिन्न दृष्टिगोचर होता है। इस शफटभेद को फलित ज्योतिषी लोग अशुभ मानते हैं। यह शकटभेद बहुत 'कम होता है । गणितद्वारा जाना गया है कि आज से ५०० वर्ष पूर्वरोहिणी का शकटोद शनि ने किया था। वस्तुतः इस से कुछ शुभाशुभ फल हम लोगों को नहीं होता, म किसी सधन्ध मैं इस का उल्लेख है, परन्तु पौराणिक भाइयों को फिर मौका मिडा भर के पद्मपुराणान्तर्गत काशीगण्ड में लिए मारा फि श्री महाराज दशरप जी के समय में शनि ने रोहिणी का शकट दकिया था, जिस से उन के राज्य में १२ वर्ष तक अनावृष्टि हुई तो श्री दशरथ जी ने आकाशमहल में जाकर शनि से युद्ध किया तो शनि ने पराजित होफर राजा को वर दिया कि तुम्हारे राज्य में अध में पोहा न दूंगा । बम इसी मिपा का को लेकर भूमिका पौराणिक जी ने शनि की स्तुति रघ लो ! ! ! क्या आश्चर्य की बात है ? कि वेदादि समन्पों में सूर्यादिक आफाशस्थ पदार्थों को तो जड़ माना है,परन्तु महाराज दशरथ जी ने उन से लड़ाई को !!! प्रजापति ( यरेनस) इस ग्रह का वर्णन घेद छोड़ फर किसी ज्योतिष के सूर्यसिद्धान्तादि ग्रन्थों में नहीं पाया जाता। एम की संस्था शनि के याद है सन् १७८९ में हथल साहय ने गगनमण्डल को देख कर इस का निथय किया पy इस ग्रह की सूर्य से प्रायः १८२२००:०० मैल दूरता है। एवं पास परिमाण इस का मामः ३४५०० मेष्ठ है। हमारे ८४ वर्ष ५ दिन १८ होरा १ मिनिट ३६ सेकेपर में इस का ९ वर्ष वा सूर्य को परिभ्रमण करता है । इस का रग शुभ्र और कुछ मीठा सा है और इस के ८ उपग्रह हैं । जिस प्रकार हमारे प्राचीन ग्रन्पों में ग्रहों की आरुति आदि के अनुसार उन के नाम हैं उसी का अनुकरण ग्रीक और रोमम लोग भी करते हैं। उन में भी रहस्पति को "जुपिटर (पितर) और शनि का सटर्न देष नाम रक्खा है। वे लोग शनि को एहस्पति से यहा आकार पाठा समझ कर सहस्पति का पिता शमि को मानते हैं और सहस्पति का पितामह (दादा) युरेनस को मानते हैं। इसी प्रकार यद्यपि हमारे সাফি ভবিষ সুখী # স্ব স্ব ফা ধ প ব্যয় না, ব हा लक्षणों के मिलाने से हमारे वेद में प्रजापति नामक यह से अधिक सा. दृश्य होता है । इसके अनेक उल्लेख वेद की संहिसाओं में पाये जाते हैं, परन्तु मेरे पास सायण न होने के कारण मन्त्रों का प्रमाण नहीं दे सका। सूर्यसिद्धान्तादि प्रचरित ज्योतिष के पुस्तकों में इस का कुछ भी वर्णन नहीं है। वरुण (नेप्चुन) प्रजापति (पुरोगा) के मनन्सर यरुण की कक्षा है। इस का भी वर्णन ज्योतिष के सूपंरिहात और आर्यभटीयादि ग्रन्यों में नहीं पाया जाता है। परन्तु माधुनिक माविका लक्षणों के मिलाने से घेद में इस ग्रह का वर्णन पापा जाता है। निस के अनेक प्रमाण दिये जाते हैं, परन्तु प्रथम इस का वम जैसा कि महरेजी अन्धों में लिखा है, लिख कर पुनः वैदिक ममाणों से तुलमा की जायेगी। पेरिमनगर निवासी ज्योतिर्विद् डावेरीयर * प्रकृति कतिपय व्यक्ति इस प्रकार विधार कर फि सुरेनस ग्रह के भनम्तर अवश्य ही कोई. दुसरा पह है, एवं उम अशात ग्रह के माकर्षणद्वारा युरेनस की कक्षा - मृर्यमिद्धान्त इस प्रकार विचलित होती है, इत्यादि प्रकार अनुभव करने लगे, एब कुछ फाल के पीछे निधय किया, परन्तु उन के पास दूरयीक्षण यन्त्र नही था। इस कारण ये इम के स्थान को मफट नहीं कर सके। बर्लिन नगर के ज्यो. तिर्विद् डाक्टर गालसाहय को स्यीय ग्रहगणना विवरण सम्यलित इस प्रकार एक पत्र लिखा कि वास्तविक यदि किमी अज्ञात ग्रह की आकर्षण शक्ति से युरेनस ग्रह की कक्षा विधलित होती है तो यह ग्रह इस समय गगनमयडल में अमुक स्थान में अवश्य रहेगा। आप इस स्थान को अनुमन्धानकर अवश्य देखेंगे। उक्त डाक्टर सन् १८४६ ई. ता०२३ सेप्टम्बर को पत्र पाकर उसी रात्रि में आकाशगल में तल्लिखित वस्रुष्ट दूरवीक्षण यन्त्रद्वारा निरीक्षण करने लगे और इसी रात्रि में इस अनाविष्कृत ग्रह को उसी स्थान में पाया जहा उक्त माहय ने पत्र में लिया था। अब हम उसी नियम के अनुसार जो व्यास एव दूरी भादि का निश्चय हुआ है, लिखते हैं - सूर्य से इस की दूरी २८५२०३0000 मेल है, एष हमारे वर्ष परिमाण से प्राय १६४ वर्ष २२. दिन में यह सूर्य को एक बार परिश्रमण कर लेता है। अब तक इस के दो उपग्रह जाने गये हैं। इस का व्यास ३६१८३ मेल है।हमारी पृथिवी पर जितनी सूर्य की किरणो की उष्णता होती है, उस के १००० वा भाग गर्मी इस ग्रह में पहुंचती है। इसी से "जल की देवता अगरेजो ने इसका नाम अन्यर्थ ही रक्षा है । अय चैदिक प्रमाण दिये जाते हैं - ऋग्वेदादि सहिताओं में इस ग्रह का यणन पाया जाता है, परन्तु पास सायणमाप्य न होने से मन्त्री का प्रमाण नही दे सफा और प्रधरित सूर्यसिद्धान्तादि ग्रन्थों में इस का कुछ भी वर्णन नही है ।। 10 उत्तर खण्ड पाश्चात्य पगिहतो एव एतद्देशीय नवशिक्षित लोगो का ऐसा निश्चय है कि भारतवर्षीय ज्योतिषग्रन्थो में इस सरह के नक्षत्रो का उल्लेख नही है और न इस देश के पूर्वज लोग जानतेध इत्यादि । यह कहना उन का एक मात्र अविश्वसनीय है। हम प्रमाण के साथ सिद्ध करते हैं कि जब घेदी में सब खण्डो के नक्षत्रादिको का उल्लेख है तो अयश्य घेद की शाखा एवं आप ( ज्योतिष ) अन्यो में होगा।
भूमिफा ३० विश्वकर्मा सप्तऋषिभिरुदीच्यादिशः पातु । अथर्वरा१५७ अमी य ऋक्षा निहितास उच्चा नक्तं ददृशे कुहचिद्दिवेयुः ॥ ( ऋ० सं०१ । २४ । १०) सप्तीनु ह स्म वै पुरा इत्याचक्षते ॥ श० ब्रा०२ ॥ १।२।४. अथर्ववेद की मचा में स्पष्टतया सप्तर्षि तारा की संस्था उत्तर दिशा में लिखी है और ऋग्वेद की ऋधा में "ऋक्ष शब्द से सप्तर्पि का उपदेश है।अ- र्थात् ये जो रात्रि में बड़े २ नक्षत्र उत्तर ओर हैं । इस समय (दिन में) कहां हैं। शतपथ ब्राह्मण में "क्ष"शब्द से और सामान्यतः सय नक्षत्र सप्तर्षि तारा अर्थ लेने के लिये पुष्ट प्रमाण है। यों ऋक्ष का अर्घ भालु है और अंग्रेजी में भी सप्तर्षि तारों को ग्रेटयीअर अर्थात् बहा मालुक लिखा है,जो उत्तर दिशा में हैं। विराट् परमेष्ठी प्रजापतिरनिर्वैश्वानरः सह पङ्क्त्याश्रितः॥ ( अधर्य० सं० १३ । ३ । ३ । ५) अर्थात् 'हंस' नामक मक्षत्र, ( विराट् ) प्रल छदय, ( परमेष्ठी ) प्रजा. पति, अग्नि ये चारों नक्षत्र राशिधक (वैश्वानर ) की पंक्ति से उत्तर में हैं। आगरेजों ने भी दूरयीन द्वारा देखकर ठीक ऐसा ही लिखा है ॥ सउदतिष्ठत उदीचों दिशमनुव्यचलत् । तं श्यैतं च नौधसं च सप्तर्षयश्च सोमश्च राजानुव्यचलत् ॥ अपर्व ० १५।१।२ । २२ उत्तर दिशा में जाकर ध्रुष नामक नक्षत्र ( श्यैत) भीर घुयमत्स्य (नीध स) एवं रातर्षि नक्षत्रों को देखे । इन्हीं दो नक्षत्रपुञ्जों को (जिन में ७ सात नक्षत्र हैं) अगरेजी में पोठ स्टार Pole Stars कहते हैं। सप्तपीन् वा इदं ब्रूमोऽपोदेवीः प्रजापतिम् ॥ ( अपर्य० सं० १९ । ४।६) अपस्पुत्रासो संविशध्वमिमं जीवधन्याः समेत्य ॥ (अपयं० १२ । ३।३।४) जात-आपनामक मक्ष एवं मजापति और अपांवत्स नामक नक्षत्र राशिचक्र के पास हैं। इस सपाट में सप्तर्षि नक्षत्रों के पास एक अरुन्धति नामक नक्षत्रपुल है। ।
३६ यह मूर्य सिद्धान्त जिस को अंग्रेजों ने फेदशिपिमा राजमहिषी नामक नक्षत्र लिखा है। सप्त नक्षत्रों के नाम अत्रि १,भङ्गिरा ,वसिष्ठ, ३,मरीचि ४,पुष्ह ५,पुलस्त्य और ऋतु ये नाम वेद में नहीं। इन नामों से नक्षत्रों का दूसरा प्रयोजन नहीं। ये केवल उन २ ऋषियों द्वारा वेदोत्तरकालीन समय में जानेगये हैं और दूसरा प्रकार यह भी है। जैसे महर्षिगण अपने २ तातम कर्गद्वारा मोक्षपद को लान कर अचल सुख में निमग्न हुये इसी प्रकार ये ( अतितेजस्वी) एवं स्थिर धिराजते हैं। • ध्रुवमरुन्धती सप्तीनिति दृष्ट्वा वाचं विसृजेत ॥ 'आश्वलायन गृह्य सू० १॥ ७॥ २२ अर्थात् धुष, अरुन्धती, सप्तर्षिनक्षत्रगण इन को देख कर बोले । भाशय है कि जिस प्रकार ये नक्षत्र उज्ज्वल एवं अचल हैं इसी प्रकार जो बात कहे वह दृढ़ अविचल एवं उत्तम हो । सप्तन्पृिष्ठतः कृत्वा युध्येयुरचला इव ॥ १६ ॥ महाभारत शां० रा ० अ० १०० अपात जिस प्रकार सप्तर्षि नक्षत्र अधल हैं (अतिगतिवाले ) इस प्रकार अपने को अजर अमर वीर समझ कर युद्ध किया । इस खण्ड में भी असंख्य मात्र हैं जिन का उल्लेग वेदों में प्रायः कर स्थानों में है। विस्तरसय से यहां नहीं लिखते ॥ . . गन्धर्वा एनमन्वायत् त्रयस्त्रिंशत् त्रिशताः । पद सहस्राः सर्वान्स देवांस्तपसा पिपर्ति ॥ अथर्व० ११ । ३।५।२॥ ३३ गन्धर्व अर्थात् राशिचक्रान्तर्गत नक्षत्रपुन मध्य खण्ड में एवं उत्तर राह में ६३०० नक्षत्र हैं। जिस प्रकार बड़े तपस्थीगण अपने पुण्यकर्म द्वारा दिप लोक मोक्ष मुख को पाते हैं, इस प्रकार प्रकाशित हैं। नक्षत्रों को ग. सर्व संतांस का प्रमाण- वातो वा मनो वा गन्धर्वाः सप्तविंशतिः ॥ यजु०अ०६। योत नक्षत्रों को पर्य संज्ञा है। दक्षिण खण्ड- इस सस्त में अंग्रेजों ने बहुतभी वारामों की गति आदि जान कर नियम भूमिका किया है और वे लोग तथा भारतवर्षीय नवशिक्षित आप ग्रन्थों से अन. शित लोग कहते हैं कि आर्यावर्त के ज्योतिष यन्धों में मध्य सरह की कड़ कर उत्तर, दक्षिण खगड के नक्षत्रों के विषय में कुछ उल्लेख नहीं है और तम के पूर्वज लोग नहीं जानते थे इत्यादि। पह कहना उन फा कदापि मानने योग्य नहीं। यद्यपि हमारे सूर्य सिद्धान्तादि ग्रन्थों में इस खण्ड के नक्षत्रों का उल्लेख नहीं पाया जाता, परन्तु वेद ब्राह्मण वाल्मीकीय आदि आग्रन्थों में इस का उल्लेख है । हमें जितने नक्षत्रों का पता लगा है उन को लिखते हैं:- पचातिनक्षत्रपुञ्ज, मिरा नक्षत्रपुञ्ज और नौकापुञ्ज, ये रूपविकारी (पूर्वोक्त) हैं और अपपा, शर्मिष्ठा और देवयानी ये नीन नक्षत्रपुञ्ज नव्पतारा है और सारथिनामक पुरु भो । एवं त्रिशङ्खनामक नक्षत्रपुल,मिथुनमाला तारा है । आकाशगङ्गा, यमुना, अगस्त्य, यम, दिव्यश्वान, कालकञ्ज, व्याध, उच्चैः प्रवाः और दक्षिणसं ये नक्षत्र सघ राशिचक्र के दक्षिण में हैं। १शुनो दिव्यस्य यन्महतस्तेन ते हविपा विधेम ॥ १ ॥ २ये त्रयः कालका दिवि देवा इवश्रिताः ॥ २ ॥ (अपर्व० सं०।६८०) ३यो ते श्वानी यम रक्षितारौ चतुरक्षौ पथिरक्षी नृचक्षसी॥३॥ (ऋग्वेद सं०१०।१४।१९) ४ दैवी नावं स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीरुमाहेमास्वस्तये॥१॥ (ऋ० सं० १० । ६३ । १०) ५ हिरण्ययी नौरचरद्धिरण्यबन्धना दिवि । तत्रामृतस्य पुप्यं देवाः कुष्ठमवन्वत ॥ अ०सं०११।४ अर्थात् राशिचक्र के दक्षिणपण्ड को यमलोकसंज्ञा है, क्योंकि वहां एक यमनामक नक्षत्र है । इस नक्षत्र के पास दो कुत्ते की आकृति वाले दो नक्षत्र हैं। जिन को यम के पास होने से "ममदूत (सरमा,देषशुनी) प्रसिद्ध है दृश्यतमोल के दक्षि पराम के अन्तिम भाग में जिस प्रकार उत्तर ध्रुव के पास समर्पि आदि नक्षत्र है । उसी प्रकार विशड्ड ( अयः कालकाः) नक्षत्र पुल हैं ॥२॥ दो "दिव्य वाम मामक मतपुर दक्षिणपप में ॥३॥ एवं "नीकापुन नामक नक्षत्र जिस को अंग्रेजी में मैवीस (Nairs) कहते हैं। अं. प्रेमी ने वक "मौका पक्ष को पुष्प नक्षत्र के पास देशा है । वेद में मी "पुष्पं ३ ।
मूर्य सिद्धान्त देवाः से पुष्य नक्षत्र से सम्बन्ध दिखलाया है (अर्थात् 'पुप्य के पास है) ॥५॥ को अग्रेजी में केनीसमेजर ( Canis major ) नक्षत्र है यह हमारे यहां ठयाध नक्षत्र है । देखो सूर्यसिद्धान्त ०८ और अग्रेज़ी में जिस. को केनीस माइनर Manis minor) लिखा है वही हमारे दोनों "दिव्य श्यान" हैं। अगस्त्य नक्षत्र का वर्णन सूर्य० सि. अ० ८ में किया गया है, वहीं देखो। अब त्रिशङ्ख . नक्षत्र के विषय में वाल्मीकीयरामायण में सपकालङ्कार से लिखा है उसको हम यहां लिखते हैं:- सृजन्दक्षिणमार्गस्थान्सप्तपीनपरान्पुनः । नक्षत्रवंशम- परमसृजस्क्रोधमूर्छितः ॥ २९ ॥ दक्षिणां दिशमास्थाय ऋपिमध्ये महायशाः । सृष्ट्वा नक्षत्रवंशं च क्रोधेन क- लुपीकृतः ॥२२॥ अन्यमिन्द्रं करिप्यामि लोको वा स्याद- निन्द्रकः । दैवतान्यपि स क्रोधात्स्रष्टुं समुपचक्रम॥२३॥ तत: परमसंभ्रान्ताः सर्पिसंघाः सुरासुराः। विन्ध्यामित्रं महात्मानमूचुः सानुनयं वचः ॥२॥ अयं राजा महा- भाग! गुरुशापपरिक्षतः । सशरीरो दिवं यातुं नाहत्येव तपोधन !॥ २५ ॥ तेषां तद्वचनं श्रुत्वा देवानां मुनिपु- इवः । अब्रवीत्सुमहद्वाक्यं कौशिकः सर्वदेवताः ॥२६॥स- शरीरस्य भद्रं वस्तिशडोरस्य भूपतेः। आरोहणं प्रतिज्ञातं नानृतं कर्तुंमुत्सहे॥२७॥ स्वर्गास्तु सशरीरस्य त्रिशङ्कोरस्य शाश्वततानक्षत्राणि च सर्वाणि मामकानिध्रुषाण्यथ॥२८॥ यावल्लोकाः परिप्यन्ति तिष्ठन्त्येतानि सर्वशः । मत्कृ तानि सुराःसर्वे तदनुज्ञातुमर्हथ ॥ २६ ॥ एवमुक्ता: सुराः सर्वे प्रत्यूचर्मुनिपुगवम्। एवं भवतु भदन्ते तिष्ठन्त्येता- नि सर्वशः ॥ ३० ॥ गगने तान्यनेकानि वैश्वानरथाद बहिः । नक्षत्राणि मुनिश्रेष्ठ ! तेषु ज्योतिःपु जाज्वलन् । . A भूमिका ४१ ॥३१॥ अवाक्शिरात्रिशङ्कुश्च तिष्ठत्वमरसंनिभः । अनु- यास्यन्ति चैतानिज्योतीपि नृपसत्तमम् ॥ ३२ ॥ बालकाण्डे ६० सर्गः चकारान्यं च लोकं वै क्रुद्धो नक्षत्रसम्पदा । प्रतिश्रवणपूर्वाणि नक्षत्राणि चकार यः ॥ ३४ ॥ ( महाभारत आदिपवं अ०१) ब्रह्मराशिर्विशुद्धश्च शुद्धाश्च परमर्पयः । अर्चिप्मन्तः प्रकाशन्ते ध्रुवं सबै प्रदक्षिणम् ॥ (वाल्मीकीय यु० स०४ । ४८ ) त्रिशङ्कुर्विमलो भाति राजर्पिः सपुरोहितः । पितामहः पुरोस्माकमिक्ष्वाकूणां महात्मनाम् ॥ वाल्मी० रा० यु. का०४ 1 YE भावार्थ:-राजा त्रिशङ्क के ऊपर विश्वामिन की कृपा एवं विश्वामित्र के राजर्पित्य के साथ वसिष्ठ ऋषि के ब्रह्मर्पित्य की तुलना दिखलाने के लिये त्रेतायुगीय वाल्मीकीयरामायण के कर्ता आदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने आकाश के दक्षिणसण्ड के नक्षत्रों का आलङ्कारिफ रीति पर वर्णन किया है । राशिचक्र के उत्तरीय ध्रुव के पास सात विशेष तेज वाले नक्षत्र हैं जिन फो सप्तर्षि कहते हैं। उन सात नक्षों में एक वसिष्ठनागफ नक्षत्र है। इसी प्रकार राशिचक के दक्षिण भाग में दक्षिणीय ध्रुव के पास सात नक्षत्र हैं, उन्हें भी सप्तर्षि नक्षत्र कहते हैं,एवं इन्हीं के पास त्रिशनामक नक्षत्र,दक्षि- णक्षं और अगस्त्य आदि हैं। ये सय नक्षत्र अनादिकाल से हैं। जिस मकार सूर्य, चन्द्रमा, एवं अन्यान्य नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह आदि हैं। विवामित्र ने कुछ होकर दक्षिणभागस्य सप्तर्पिनामक नक्षत्र,एवं अन्यान्य नक्षत्र की रचना करते हुवे कहा कि मैं "दूसरा इन्द्र (त्रिशष्ट) रचूगो या इन्द्र ही को लोक से निकाल बालूंगा, इस प्रकार नक्षत्रों की रचना करते देख मह. गिण और देषलोग विश्वामित्र के पास आकर बोले कि हे तपोधन ! यह राजा ( विशड । गुरु (वसिष्ठ) के शाप से पापी हो रहा है। इस लिये शरीर सहित स्वर्ग की जाने योग्य नहीं है। इन की बात सुन विश्वामित्र योले कि "त्रिशकु शरीरसहित स्वर्ग को जाये " इत्यादि मकार में प्रतिज्ञा करचुफा हूं, यह मिश्या नहीं हो सकती। ६ - + 44 - भूप सिद्धान्त इस लिये सशरीर त्रिशड्डु राजा के वास्ते शाश्वत वर्ग हो और ध्रुव नक्षम्र एवं अन्यान्य नक्षत्र जब तक सधिवर्तमान रहे,राजा के साथ रहें । इस प्रकार देयतों ने उम की बातें सुन कहा कि ऐसा ही हो। सो आकाश में वैवानर पप ( अमादि राशिधक) के बाहर दक्षिणस्थ सब नक्षत्र बडे प्रकाश बालों के बीच नीचे की ओर शिर किये त्रिशल देवतों की नाई ठहरे उस के साथ अन्यान्य सब नक्षत्र भी जायें। हमी प्रकार महाभारत के श्लोक का भी आशय है और श्री रामचन्द्र जी ने युटुकापड में कहा कि देखो किस प्रकार त्रिशहु नक्षत्र मकाशित होरहा है। एक सप्तर्यि और अलराशि ( अभिजित ) नक्षत्र ध्रुव नक्षत्र के पास प्रका• शित हो रहे हैं। उत्तर गोलार्ध की देवलोक " या " देवपान " ( पप) और दक्षिण गोलार्ध की पिहलोक या यमलोक वा"पितृयान सज्ञा है। इस का प्रमाण- वसन्तो ग्रीष्मोवाः । ते देवा ऋतवः शरद्धेमन्तः शिशिरस्ते पितरः स ( सूर्यः ) यत्रोदगावर्त्तते । देवेषु तर्हि भवति ... यत्र दक्षिणो वर्त्तते पिपु तर्हि भवति ॥ शतपथ ब्रा०२।१॥३॥ अर्थात् जय सूर्य उत्तरायण में होता है , वसन्त, ग्रीडम, वर्षा ऋतुओं में सो देवभाग में दिन एवं शरद्, हेमन्त, शिशिर ऋतुओं में जब सूर्य दक्षिणा. पन होताह तय पितृलोकस्य (दक्षिण गोलाई के) माणियों का दिन होता है। इस प्रमाण से सिद्ध हुया कि उत्तर गोलार्ध, देयलोक एष दक्षिण गोलार्ध पितृलोक है। अब हम नक्षत्रों की सख्या कहां तफ लिखें अनेक स्पल में वेदों में उपलक्षण मात्र से फहीं लाख, कहीं सहस्र कहीं कोटिपर्यन्त नक्षत्रों का वर्णन है। यासल्फ्यस्मृति में लिसा है कि- पिढयानोऽजवीथ्याश्च यदगस्त्यस्य चान्तरम्। तेनाग्नि होत्रिणो यान्ति स्वर्गकामा दिवं प्रति ॥ १८ ॥ तत्राष्टाशीलिसाहनामुनयो गृहमेधिनः । सप्तर्पिनागवी- पन्ते देवलोकं समाश्रिताः ॥१८७॥ प्रायश्चित्ताऽध्याय रूपफालद्वार से आकाश में नक्षत्रों को पर, एष अल्पपुल बाले समु. दाय को ग्राम, इमी प्रकार मगर, एवं नगर के अन्तर्गत वीथी ( मुहल्ला, वा पनि) का यान वेद एवं अन्यान्य शास्त्री में किया है। उरार गोलार्ध में "भाग" .
- भूमिका ४३ के आकार की वीथी है जहां सप्तर्षि नक्षत्र हैं एवं अगस्त्य नक्षत्र के पास दक्षिणगोडार्भ में "अज बकरी की नाई वीथी (नक्षत्रपुल) है। इस दक्षिण. खपड में प्रायः ८०० मुनितुल्प स्थिर नक्षत्र हैं-एय अग्निहोम आदि उत्तम कर्म करने वाले इन्हीं दो मागों से अर्थात् देवयान और पित्याग से जाते हैं- देखो उपनिषद् । वस्तुतः पुराणों में जो 22000 मुनियों की कया है यह इन्हीं नक्षत्रों को लेकर कल्पना कर ली गई है। शर्मिष्ठा, देवयामी, आदि नक्षत्रपुञ्ज जिन का प्रमाण संस्कृत ग्रन्थों का नहीं दिया गया है उमका उल्ठेस हत्महिता घराहमिहिरात ग्रन्थ में है विस्तार से यहां नहीं लिसा गया ॥ अगस्त्य नामक नक्षत्र का उदय प्रायः ययातु की समाप्ति पीर शरद् पतु के आरम्भ में होता है। और एस के पास ही इस से न्यून दीप्तिवाला"लो. पामुद्रा मामफ नक्षत्र है। ये दोनों राशिचक्र के दक्षिण दिशा में है। इसका पशेन वेद में भी पाया जाता है। जैसे:- पूर्वीरहं शरदः शश्रमाणा दोपावस्तोरुपसा जरयन्तीः ।। लोपामुद्रा वृषणं नीरिणाति धीरमधीरा धयत्तिश्वसन्तम्"। (प्र० स०१। १७०) अर्थ:-हम मन्त्र से ईश्वर उपदेश करता है कि हे मनुष्यो ! जिस प्रकार लोपामुद्रा नामफ मक्ष अगस्प नामक नक्षत्र के पास अनेक शरऋतु दिन रात से स्त्री पुरुष की मा विराजती है। इसी प्रकार तुम अपनी खो के साए अटल नीति करो। "प्रससादोदयादम्भः कुम्भयोनेहीजसः" । (कालिदास) अर्थ:-पड़े को माईआकारयाले अगस्त्य नामक बड़े प्रकाशमान नक्षत्र के उदय होते ही जल चला जाता है। आशय यह है कि जिस कारण अगस्त्य नक्षत्र के उदय होने से वर्षा की समाप्ति होती है इसी से लोगों में दस की कहावत प्रमिद्ध है कि "अगस्त्य ऋपि ने अगूठे में समुद्र को रख कर सीख लिया "इत्यादि। राशिचक्न। सूर्य को ज्येष्ठ और आपाट मास में पृथ्वी के वंश में और पौष मास में दक्षिणांश में जाते देखते हैं, यसको देख कर ऐसा समझमा अपित नहीं कि मूर्य एकवार उत्तर और एकवार दक्षिण इस प्रकार जाया माया सूर्यसिद्धान्त फरता है । वस्तुतः पृथ्वी की गति के अनुरोध से जिस समय उस का उत्तरमेरु सन्निहित प्रदेश सूर्य के सामने होता है उस समय हमको योष होता है कि सूर्य ही कुछ उत्तर की भोर जाता है, उसी समय का हम लोग "उत्तरायण" कहते हैं । अनन्तर जब पृथ्वी कादक्षिणमेरु सनिहित प्रदेश मूर्य के सामने होता है, तब सूर्य को पृथ्वी के कुछ दक्षिण ओर जाते देखते हैं। उस समय को सब लोग दक्षिणायन कहते हैं। प्रतिवर्ष मूर्य को इम प्रकार उत्तरायण और दक्षिणायन जाते देखते हैं-इस सीमा को चिन्हित करने के लिये विद्वानों ने भूपृष्ठ के ऊपर के भाग में दो रेसा कल्पना की हैं--उसकी उत्तररेखा को नाम उत्तरकान्ति वा 'अयनान्तवृत्त' । दक्षिणरेखा का नाम दक्षिणक्रान्ति वा दक्षिण अयनान्तवृत्त कहते हैं। ये दोनों क्रान्तिरेखा विपुवरेखा से उत्तर दक्षिण को ओर २३. २८ अन्तर में है । ( संस्कृत के ग्रन्थों में २४. लिखा है बहुत दिन होने से इतना अन्तर है ) इन्हीं दो रेखाओं के बीच में पृथ्वी के मार्ग का जो अश पड़ता है-मेषादि १२ राशि उसके अन्तर्गत होती हैं इसी कारण गगनमरहल के दम अंश को 'राशिचक्र' कहते हैं । राशिषक को परिधि प्रायः नौ सौ अठासी अर्पद माईल, एवं उसका व्यास प्रायः उन्नीस पृन्द माइंछ, इसी चक्र के भीतर मृर्य अवस्थिति करता है। पृथ्वी सूर्य से नौ फोटि पचास लाख अन्तर में रह कर प्रति वत्सर एकवार सूर्य की प्रदक्षिणा करती है। पृथ्वी सूर्य की प्रदक्षिणा करती है,पर बोध होता है कि मूर्य ही १२ राशियों में क्रम २ से गमन करता है । आपाततः बोध होता है कि मूर्य प्रत्येक राशि को २८ दिन से न्यून एवं ३१ दिन अनधिक काल पर्यन्त भोग फर ३६५ दिन ६ होरा र मिनट १० सेकराए में धार्षिकगति समाप्त करता है। वस्तुतः सूर्य पृथ्वी को परिभ्रमण नहीं करता। पृथ्वी अपनी कक्षा में पू. मती २ उस की धारों ओर घमण करती है। इसी से जब पृथ्वी राशिचक्र के उत्तरांश में मेप, पप, मिथुन प्रभृति राशियों में जाती है तो उस समय भूर्य को राशिषक के दक्षिणांश में तुला, वृश्चिक, धन, आदि राशि में अवस्थित देखते हैं अर्थात् पृथिवी को गति ठीक विपरीत दिशा में मूर्य की गति जनुमान होती है । जिस समय पध्वी कन्या राशि में रहती है,तम समय मूर्य मेष राशि में, जिस समय पृथ्वी वृश्चिक राशि में, उस समय सूर्य कृप राशि में है, ऐमा लोग समझते हैं। इसी कारण जिस समय पृथ्वी दक्षिणअपन उस समय मूर्य उत्तर अयन हुआ योष होता है । पृथ्वी के उत्तरअयन - र्थात् पृथ्वी के मेष राशि में प्रवेश करने पर मूर्य तुला राशिस्य जान पड़ता भूमिका ४५ । है। मेष राशि के परे पृथ्वी जय वप राशि में आती है, सूर्य को वृश्चिक राशि में, एवं पृथ्वी जब मिथुन राशि में आती है तब सूर्य धनराशि में उपस्थित होता दीखता है । एतद्देशीय आधुनिक ज्योतिष में यह बात स्पष्ट नहीं, उस में केवल इतना ही लिखा है कि जिस राशि में जिस ग्रह का उदय होता उसके सप्तमराशि में उसका अस्त होता है । अपात् पृथ्वी जिस राशि में रहती है, उस से सप्तम राशि में सूर्य अवस्थित दीखता है। सूर्य का इस प्रकार विपरीत दिशा में जाते दीखने का कारण यह है कि चल पदार्थ में अवस्थित होकर अचल वस्तु को देखने पर जिस प्रकार भ. पनी गति अनुभूत नहीं होती। एवं स्थिर पदार्थ ही की गति काभ्रम होता है। इसी प्रकार पृथिवी राशिचक्र में घूमती है, परन्तु हम लोगों को, भय होता है कि सूर्यपर्याय क्रम से एक २ राशि भोग करता है।" राशिचक्र ज्ञापक चित्र ३.० १ my मीन . मिथुन कुम्भ 290 A La कर्कट 6. श RAJ obs 6 मूर्यमिद्धान्त " उपरोक्त चित्र में सू० सूर्य, प ५ प्रषियी का कक्षा प्रदेश । पृथिवी से कोई दर्शक सूर्य को पूपियो के गमनपथ के विपरीत दिशा में दर्शन कामे , " पर पृषियी जिम प्रकार ए स्थान से पू और पकी ओर आयेगी तो बोध " . होगा कि सू मूर्य स स्थान से स और स स्थल में माता है । इस प्रकार राशि- चक्र के जिस स्थान में पृथिवी घूम भावेगी उस अंश मे मूर्य राशिचक्र के सहम अंश में आता सा जान पड़ेगा। नक्षत्रगण के बीष होकर जो बड़े वृत्ताकार पप में सूर्य की सांवत्सरिक गति सम्पादित होती है, अनुमय होता है, उस को रविमार्ग कहते हैं । वस्तुतः यही एधियी का वार्षिक भ्रमणमार्ग है,जिस को पषियी की कक्षा कहते है। यह एत निरक्ष इत्त को घाव से छेद करता है। एक छेद कोण २३ - परिमित रविमार्ग और राशिचक्र ९२ समानभाग में विभक्त हैं। इस प्रत्येक भाग को राशि कहते है । प्रत्येक राशि ३० आयत । सूर्य प्रतिदिन राशिचक्र के माय एक अश फरफ गमन करता है। राशि चक्र पहिले कहा जाचुका है कि आफाश के मध्यसरह में १२ राशि(पुलधार) भौर उस के भीतर लगभग १०१६ नक्षत्र हैं । इस मयखण्ड में जो सब नक्षत्र हैं वे अघल हैं। प्राचीन ज्योतिर्विद पण्डितों ने इन नक्षत्रों की एक २ मारुति कल्पना कर १२ राशियों में विभात किया है। इसी को राशिक कहते हैं। १२ राशियों के नाम ये हैं.-मेष ( मेदासा आकार) पृष (बैलसा आफार ) मिथुम (स्त्री, पुरुष-जोड़ा ) फकंट ( फेकहा ) सिंह (शेर) कन्या ( कन्या की माई ) तुला (तराजू ) धूश्चिक ( विठू) धनु (बाण ) मकर (घड़ियाल ) कुम्म ( पड़े की माई ) मीन ( मछली की नाई) है । इस की संस्था सब से ऊपर है अर्थात् इसी में सब ग्रहादिकों का भ्रमण होता है। वेदों में राशियों के नाम स्पष्टतया नहीं पाये जाते परन्तु १२ विभाग और मक्षत्रों की मारुति का वर्णन है । एवं राशिचक्र को वेद में अपठ लिखा है, परन्तु वेदोत्तरफालीन ज्योतिष के ग्रन्थों में मार्य भह को छोड़ सबों ने राशिचक को बल और पपिषी को अषष्ठ माना है। अब प्रथम राशिक - भाग भूमिका का नाम तथा इस का अचलस्य घेदादि सध्छाखों से दिसला फरपुनः राशिचक्र में सूर्य द्वारा क्योंकर दिन रात होते हैं लिखेंगे:- वैश्वानरस्य प्रतिमोपरिददौर्यावद्विववाधे अग्निः । ततः पष्ठामुतो यन्ति स्तोमा उदितो यन्त्यभिपष्ठमन्हः॥ (अथर्घ८।५।९।६) अर्थात-राशियक ( वैश्वानर ) के ऊपर जो स्थान है उस से छः सूर्य एक ओर दृश्य होता है, एवं उः भाग दूसरी ओर दृश्य होता है। जिस से एक भाग में एक बार दिन होता है (छः माम तक एष दूसरे भाग में रात और दूसरे भाग में जय दिन तब पहिले भाग में रात होती है ) धैश्वानर शब्द से जो राशिचक अर्थ ग्रहण हुआ उस का प्रमाणः- गगने तान्यनेकानि " वैश्वानर " पधायाहिः । नक्षत्राणि मुनिश्रेष्ठ ! तेपु ज्योति:पु जाज्वलन् ॥३१॥ (पाल्मीकीय रा०या० सर्ग ६०) इस पर राम नामक टीकाकार ने लिखा है कि "अनादिन्योतिप चक मार्ग से बाहर में नक्षत्र सय प्रकाशित हैं" यह निशफु तारा के वर्णन में है, देसी त्रिशद वर्णन ॥ विश्वेदेवा द्वादशारेण जगतीमुदजयंस्तामुज्जेपम् ॥ ( यजु०पू० अ०९।३३) भार-जितने नक्षत्र प्रह तारादि हैं सय ही राशिचक्र (हादशारण) में अपस्थित होकर उदय और अस्त सम्पादन करते हैं। भपञ्जरः स्थिरोभूरेवावृत्त्यावृत्य प्रातिदेवत्तिको उदयास्तमयो सम्पादयति नक्षत्रग्रहाणाम् ॥ (पदस्थामिकता नवचनम् ) आर्यभिटामत मामक ज्योतिपयन्प का वचन है । अपांत् रागिपक स्थिर है और इस में पृपिवी के भ्रमण के कारण गगन माइलस्य नतत्रादिकों का दैनिक उदयास्त प्रतीत होता है।रम का विशेष प्रमाण पपियों के समय में देखो। अब इस राशिधा में २७ मत हैं (सर्वसाधारण ज्ञानते हैं) पानु वेद में बER, एवं इस समय अद्विनी नक्षत्र में भारम्भ होकर रेवती पर ४५ . भूपंसिद्धान्त समाप्त करते हैं, परन्तु घेद मे कत्तिका से आरम्भ होकर रेवती पर समाप्त हुआ है। प्रमाण- चित्राणि साकं दिवि रोचनानि सरीसृपाणि भुवने जवानि ॥ १॥ सुहवमग्ने कृत्तिका रोहिणी चास्तु भद्रं मृगशिरः शमाः ॥ पुनर्वसू सून्ता चारु पुष्यो भानु- राश्लेपा अयनं मघा मे ॥२॥ पुण्यं पूर्वाफाल्गुन्यौचात्र हस्तश्चित्रा शिवा स्वातिः सुखो में अस्त ॥राधे विशाखे सुहवानुराधा ज्येष्ठा सुनक्षत्रमरिष्टमूलम् ॥३॥ अन्नं पूर्वा रासतों में अपाढा ऊर्ज देव्युत्तरा आवहन्तु । अभि जिन्मे रासतां पुण्यमेव श्रवणः श्रविष्ठाः कुर्वतां सु- पुष्टिम् ॥४॥आ मे महच्छतभिपग्वरीय आमे द्वया प्रोप्ठ- पदा सुशर्म । आरेवती चान्वयुजौ भगं म आमेराये भरण्य आवहन्तु ॥५॥ अष्टाविंशानि शिवानि शम्मानि सहयोगं भवन्तु मे ॥ अथर्व वे० सं०१९ । १। सू०७।८। इन नक्षत्रो के नाम ही से इन के आकार का भी बोध होता है सो महा फयि कालिदासरुत ज्योतिर्विदाभरण नामक ग्रन्थ में नक्षत्रो फी आकति वि. धायक शोकलिसकर तय इन मन्त्रोको अर्थात् इकट्ठाएकाधकं द्वारा लिखेंगे - तारका त्रयमिते शराकृतौ केशवे गगनमध्यवर्तिनि । मत्तवारणगतेऽजलग्नतो निर्ययुर्गजमहीध्रलिप्तिका:॥१॥ मस्तकोपरि समागते धने मर्दलाकृतिनिपञ्चतारके । यान्ति कान्तिमति मेपलग्नतः सारसाक्षि रसधात्रलि- प्तिकाः ॥२॥ मण्डलाभशततारकाकुले मध्यभाजिनभसः प्रचेतसि ॥ वाणशैलधरणीमिताः कलाः शारदेन्दुमु- सिताघुरेर्ययुः ॥ ३॥ मारमूर्तिभृत्तिकोपरिस्थिते पूर्व- भूमिका भाद्रपदभे द्वितारके । लिप्तिकाः करिकराक्षि सम्मिता निःसरन्ति वृपभोदयात् प्रिये॥2॥ उत्तरे सुमुखि भारमूर्ति भृत्युत्तमाङ्गमिलिते द्वितारके। नीलचामरकचे नृयुग्मतो लोचनाचलकलाः पलायिता: ॥५॥ दन्तसंख्यभगणे झपा- कृतावस्त्यभे लसदनन्तमध्यगे । कोमलागि जिमुमोद- यात्तदा कालखानलकलाः प्रियेऽचलन् ॥६॥ तन्वि घोटक- मुखाकृति त्रिते मस्तकोर्ध्व भाजि वाजिनि।चारु चन्द्र- मुखि कर्कठोदयान् निर्गता गगननन्दलिप्तिकाः ॥ ७ ॥ तारकात्रययते त्रिकोणके मध्यगे दिविपदध्वनो यमे । पङ्कजाक्षि मिलिताः कुलीरतः शायकाक्षि भुज. लिप्ति- काः ॥८॥ हव्यवाहनशिखाकृती स्थिते मस्तकोपरि पक्षकऽनले । सिन्धुसिन्धुरमिता: कला गताःकुन्त- दन्ति मृगनायकोदयात् ॥ ६॥ कम्बुकण्ठि शकटाकृती नभोमध्यमागतवति प्रजापतौ। पञ्चभे गजकुपक्षलि- प्तिका निःसृताः सुमुखि सिंहलग्नतः ॥१०॥ मूपिकाशन- पदाकृतौ विधौ व्योममध्यमिलिते त्रितारके । शार- देन्दुमुखि कन्यकोदयादीक्षणानलकला:कलावति ॥११॥ उज्ज्वलैकशतपत्रसुन्दरे शूलिनि त्रिदशवर्ममध्यगे । निर्गता: खचरसलिप्तिका: पूर्णचन्द्रमुखि कन्यल- ग्नतः ॥ १२ ॥ मध्यवर्तिनि शरासनाकृतिन्यम्बरस्य सुरमा गताः। लिप्तिकाः सुमुसि पचतारके पक्षपा- वकमिता.घटोदयात् ॥ १३ ॥ रासपीठकठिनीरजाप्रभे मध्यमृच्छति विहायसो गुरौ । तौलिनःपतमार- 9 ३० सूर्यसिद्धान्त लोचने लोचनाद्रिकुमितागताः कलाः ॥ १४ ॥ मौलिगे भुजगभे श्वपुच्छवदभङ्गुराकृतिनि पञ्चतारके।मारकेलि. रसिके तुलोदयादत्ययुर्जलधियाक्षि लिप्तिकाः ॥ १५ ॥ लाइलाकृतिनि पञ्चतारके चारुकशि पितृभे शिरोगते । नीलनीरजविनिद्रलोचने वृश्चिकाद्विगलितं कलाशतम् ॥१६॥ दक्षिणोत्तरगते द्वितारके योनिभे मिलति मस्त- कोपरि। कीटतः स्फुटसरोरुहानने निःसृता गजरसाक्षि लिप्तिकाः॥ १७ ॥ अर्यमण्यमरवममध्यगे सौम्ययाम्य- मिलिते द्वितारके । चापतश्चपललोचनाञ्चले कालपा- वकमिताः कला गताः ॥१८॥ मस्तकोपरि कराकृती करे तिष्ठतीन्दुमुखि वाणतारके । लिप्तिकाःशरकुपक्षसंख्य- काःशायकासनविलग्नतो गताः ॥१॥ एकमौक्तिकसमु- ज्ज्वलप्रभे त्वष्टरीन्दुवदने खमध्यगे। आदितो मृगवि- लग्नमादिशत्युल्लसन्मदनवाणलोचने ॥२०॥ कुड्कुमारु- णतरैकतारके वायुभे सुदतिमध्यमागते । शायकाम्यरच. राधरा: कलाश्चञ्चलाक्षि विययुर्मूगोदयात्॥२१॥ तोरणा कृत्तिनिपञ्चतारके तारकेशवदने विशाखभौतन्वि यान्ति वियुधाध्यमध्यगे कुम्भतो रसभुजाः कलाःप्रिये ॥ २२ ॥ पन्नगाकृतिनि सप्ततारके मित्रभे सुदति मध्यगे दिवि । वन्हिबाहुएथिवीमिताः कला निर्गता घटकुचे घटो. दयात् ॥ २३ ॥ तन्धिकोलरवदनाकृतौ त्रिभे वासवे वसति मस्तकोपरि । कालवाणवसुधा कलाश्च ख. अनाक्षि कलशोदयादायुः ॥ २४ ॥ मौलिभाजि नवतार- ५१ भूमिका काङ्किते मूलभे सुदति शङ्खमूर्तिनि । लिप्तिकाप्टकमराल- कुन्तले निजंगाम पृथुलोमलग्नतः ॥ २५ ॥ सूर्यमूर्तिनि शिरोगते चतुस्तारके करिकरोरुतोयभे । अन्त्यभाद- मृतवाणि निर्गताः खेचराम्बरशशाङ्कलिप्तिकाः ॥ २६ ॥ शीर्पभाजि भचतुष्टयाङ्कितें विश्वभे तरुणि सूर्पका- सूतौ । भूतिरस्कृतमनोजकार्मुके यान्ति कालशरचन्द्र- लिप्तिकाः ॥ २७ ॥ ( ज्योतिर्विदाभरणे ).॥ रात्रिसमय जो मक्ष जिस समय ठीक माथे पर दीखेंगा तदनुसार निस राशि के जितने दपच पलादि योसँग उन का भी ज्ञान इसी पत्राद्वारा होगा। ३६० अंगों का एक चक्र होता है और प्रत्येक राशि ३० तीम तीमअंथों की एवं एक एक राशि में मघा दो दो नक्षत्र एवं प्रत्येक नक्षत्र १३ २० में अवस्थित है। वेदमन्त्रों में नक्षत्रों के नामों के माप योग तारा का भी उल्लेरा है । परन्तु प्रत्येक पोगसारा की संरपा नहीं है, किन्तु फालिदास ने तारों की संख्या दी है । समग्रमोग का प्रमाण घेद में- शिक्षा विभिन्दो अस्मै चत्वार्ययुता ददत् । अष्टपरःसहस्रा ० सं०८।२१४१ अपांर ४००विकला जिस में ६० मे भाग करने पर कशा होती हैं। देखो भूमि० अ० ११६५ . . .
५२ पूर्योक श्लोक और अधर्ववेदीय मन्त्रों का अर्थ घक द्वारा किया गया है। राशिचक्र क्षेत्र योगतारा मख्या नक्षत्रों के नाम नक्षत्रो की आरुति मुरुया अशकला उदय लग्न राशियो के क्षेष का भुक जिस राशि के फाल यीते हैं नाम अश कर्कट मेष १३० | १३० ४५ २३० . मिह भमिफा " मिथुन ३ ३० कन्या अश्विनी भरणी कृत्तिका रोहिणी भृगशीर्ष आद्र पुनर्वस पुप्य आश्लेषा १० मघा ११ / पूर्वाफाल्गुनी १२ उत्तराफाल्गुनी १ १ ५ धनुष १३ २० घोडा १३ | २० | त्रिकोण १३ २० अग्निशिखा २० / गाही ( शकट) १३ | २० | विहालपद २० २० २०] माणिक्प वर्ण १३ २० | कुत्ते का पुच्छ २० हल की नाई २० | दक्षिण उत्तर दिशा २० हाथ की नाई (पल्ले की नाई) फकंट४ | ३० ०३२ | तुला ५२ " वृश्चिक ५ २ २ ५ मिह ५३० १४० २८ कन्या ६३० " " * राशिक उदयलग्न राशियों के क्षेत्रमा भुक्त जिस राशि के काल बीते हैं दण्ड पल हम वर्ण तुला ७ " क्षेत्र संख्या नक्षत्रों के नाम योगनारा नक्षत्रों की आरुति संरुपा अंशकला चित्रा २० मुलाकी नदि उज्ज्वल स्वाती ३ দ্বিারা २० तोरण अनुराधा शूर्प ज्येष्ठा १३ २० २० पूर्यापाठा २१ १३ अभिजिर कुम्भ वृश्चिक ३० " omorror .. . मीन सूर्यसिद्धान्त " मकर १०३० " यहपूर्यापाढाके भी- तर है इसलियेही नक्षत्र अब गिनते हैं। २० वाण मर्दल(मानरयाजा) प्रवणा धनिष्ठा शतभिषक पूर्वभाद्रपदा उत्तरभाद्रपदा रेवती २० २] ५५ " वृष २६ २७ १०० २ २ मार की नाई २० २० दो मस्तक मउठी मोन १२ १/१२/ मिथुन १३ ५ - भूमिका उल्लिखिन नक्षत्रों के अतिरिक और भी मक्ष इस मध्यस्या में हैं। गिन का वर्णन वेदो में है परन्तु विस्तराप से हम यहा नहीं लिखते । अप्रेजो ने जो इस सयड में केवल ११६ नाराओं का निश्चय किया है। उस से भी अधिक ताराओ का उल्लेख घेदों में पाया जाता है। एक नक्षत्र जिम को अग्रेजी में ओरायन (orron) (इस से मिलता हुआ सस्रुत शब्द अग्रहायण है) कहते हैं इस का वर्णन मालणग्रन्थ में है । जिस प्रकार महरेजो ने इस को अनुसन्धान से यथावत् जाना है, उसी प्रकार वर्णन है । और घेद में भी ठीक ऐमा ही शब्द नक्षत्र वर्णम प्रसङ्ग में आया है - आग्रयणश्च मे वैश्वदेवश्च मे वैश्वानरश्च में । यजुर्यद० पू०भ० ९८ । २० अर्थात् ओरापम या आग्रहायण (मृगशी) राशिचक्र के पास के भय मक्षत्र एष राशिचक॥ तमभ्यायत्याविद्धत्स विटु ऊर्ध्वउद प्रपेत तमेतं मृग इत्या- चक्षतेपर उ एव मृगव्याधःस उ एव सयो रीहित् सारोहिणी यो एवेपुखिकाण्डासो एवंपुत्रिकाण्डा तवा इदं प्रजापते रेतरिसक्तमधावत् तत्सरोभवत् ॥ ऐ० ग्रा०१३ ॥ ६ ॥ अर्थात् रोहिणी उपर को हुई इस कारण रोहिणी नाम, एष मृगशीर्ष मक्ष रोहिणो से विद्ध होकर रहा इसलिये मृगशीर्ष हुआ एव जा दोनों के घाण से विद्ध हुआ बह-उपाध वा लुब्धक हुआ। आशय यह है कि प्राय. घेद और प्रामण ग्रन्यो में सपकालकार से गगममण्डलस्य दिव्य पदापों का वर्णन है। रोहिणी और मृगशीर्ष नक्षत्र जो व्याध के उपर है उन की आकृति वाण की माई है इस से या प्रकार वर्णन है। रोहिणी मक्ष के विषय मे एक मनोहर रूपकार मे पासण सय में वर्णन है कि भला ने अपनी ३३ कन्यायें चन्द्रमा को दी परन्तु चन्द्रमा का अधिक स्नेह रोहिणी नामक कन्या से देखकर अवशिष्ट कन्यागण ब्रह्मा के पास जाकर कहने लगी कि भगवन् ! चन्द्रमा हम लोगो से अधिक स्नेह रोहिणी में करता है। इस पर ब्रह्मा ने चन्द्रमा और कन्यागणों को परस्पर शपथ देकर कहा कि सम में समान प्रीति रखो, सब ने स्वीकार किया। अनन्तर चन्द्रमा फिर भी रोहिणी मे अधिक स्नेह करने उगा। यह देख प्रजापति ने पन्द्रको सूर्यसिद्धान्त शाप दिया। मुस से चन्द्रमा को यक्ष्मा रोग हुआ, पुनः चन्द्रमा शापमर्पण फा प्रा हुआ और प्रहला ने कहा कि सूर्य को धरु दोसो शाप से मुक्त होगे, इत्यादि । ऐतरेय ब्राहक्षण १३ । ६।१,१,10॥ अब उ आरपायिका का सारांश यह है फि कत्तिफा, रोहिणी, पुप्प, मघा, चित्रा, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा,शतभिषा, रेवती इन १२ नक्षत्रों के साथ कमी २ घन्द्रमा का विधान (इक लेता है ) होता है। इन १२ नक्षत्रों में जो अत्यन्त सूक्ष्म है, उसी का चन्द्रमा अधिक पिपाम फरसा है । इस प्रकार के नक्षत्र केवल मघा, ज्येष्ठा, चित्रा, रोहिणी इन में भी उत्तरोत्तर तेजस्वी हैं । अर्थात् मघा से ज्येहा अधिक प्रकाश याला, ज्येष्ठा से चित्रा, एवं चित्रा से भी अधिक रोहिणी तेजस्वी है। चन्द्रमा का पिधान ती प्रायः तक्त मब नक्षत्रों के साथ होता है, परन्तु सब से तेजस्वी तारा रोहिणी का पिधान अतिमनोहर होता है । इमी सुन्दरता के कारण केवल रोहिणी का पिधान अधिक प्रसिद्ध है। इसी के वर्णन में उार माध्यापिका है। यहां अश्विनी आदि २७ नक्षत्र और कृत्तिका की योग- तारा मिल कर ३३ कन्या हुई। चन्द्रमा को शाप क्या उम में जो फाला सा घिष्ट्र दीखता है, उसी का वर्णन है । मूर्य को अरु कसा देना भूपंद्वारा प्रकाशित होता है,सो रुष्णपक्ष में सूर्य अपना तेज ले लेता है और शुक्र में देता है। इसी का उस प्रकार वर्णन है । इसी कथा को मूल रूप से लेकर पुराणों में चन्द्रमा और रोहिणी विषयक अनेक कटपटाङ्ग कथा रची गई हैं। अब रुतिका नक्षत्र से पौराणिक माया फैली है । उसको लिखते हैं:- फतिका नक्षत्र फो छ. योगतरायें हैं और यह नक्षत्र फार्तिक माम में अवश्य प्रातःकाल उदित होता है। इस को कात्तिक स्वामी नामक देवता मान फर फार्तिक स्नान) पूजादि का विधान पुराणों में लिया है। कार्तिक स्वामी फा नाम पायमातुर, शकिधर,शरजन्मा आदि । सः योगतारा मानों उस की माता है । इसलिये पायमातुर नाम जान कर आडम्बर रघे हैं। वास्तविक पह पोपलीला मात्र है । अविद्या के प्रस्ताव से यह सय जाल फैला है ।। - - - नक्षत्रों की देवता तैत्तिरीय ब्राह्मण एवं यजुर्वेद ज्योतिष में अश्विनी भादि २७ नक्षत्रों की शिम २ देवता डिसी हैं, परन्तु सर्पमिद्वान्तादि ज्योतिष ग्रन्थों में इस 4 - भूमिका का कुछ भी वर्णन नहीं है। देखने से महाभारत,मिताक्षरा एवं बाल्मीकीय. रामायण आदि ग्रन्थ और मिलाने से सगोल के नशे को अनुमान होता है कि एक सौर जगत् ( जिस में हम लोग हैं ) में बुध, शुक्र, भाष, हस्पति आदि अनेक लोक हैं और एक २ लोक में अनेक छोटे विभाग हैं। हमारे शास्त्रों में ऐसे विभागों के अनेक उल्लेस पाये जाते हैं और ये विभाग नक्षत्रों फो आकृति नक्षत्र पुल और दिशा आदि के अनुसार हैं । जैसे प्रत्येक अश्विनी आदि नक्षत्रों का नाम घोड़ा आदि मारुति के अनुसार है और पुन: प्रत्येक सया दो दो नक्षत्र की एक एक राशि (पुज। रूप १२ विभाग हैं (जिन की मेष मादि आरुति है। इसी प्रकार प्राचीन रीति से कृत्तिका नक्षत्र की देवता "अग्नि है । सो वास्तविक दूरयीन से देखने से इस की आरुति अग्नि की माई मालूम होती है। इसी प्रकार अन्यान्य कई नक्षत्रों की देवता हैं। यह तो आरुतिपरक देवता हुई। अब खगोल के विभाग के अनुमार देषयान आदि सज्ञा । खगोल के उत्तरीय भाग की देव वा देवयान सज्ञा है और दक्षिण प्रदेश की पितृयान और यम सजा हैं। और अगस्त्य नक्षत्र के प्रदेश की वीथी" संज्ञा है । फिसी की सर्प सजा है । इसी विभाग के अनुसार जिस २ विभाग में जो २ नक्षत्र पड़ा है, उस २ की वह २ देवता (जाफाशस्य समस्त चमकीले पदार्थ की देव ) सजा है । इस विभाग के विषय में प्राचीन प्रमाण है:- पियानोऽजवीथ्याश्य यदगस्त्यस्य चान्तरम् । तेना- ग्निहोत्रिणो यान्ति स्वर्गकामा दिवं प्रति ॥ १८४ ॥ तत्राष्टाशीतिसाहस्रं मुनयोगृहमेधिनः । सप्तर्पिना- गवीथ्यन्ते देवलोकं समाश्रिताः ॥ १८७ ॥ (पासवल्क्यस्मृती) आशय-जिस प्रकार एक भारतवर्ष के भीतर अनेक सूर्य (यमालादि) हैं । प्रत्येक सूबों में अनेक कमिश्नरी या जिला कसको हैं। एक साल में अनेक घड़े २ मुहल्ले हैं। एक २ मुहल्ले में अनेक बड़ी एव छोटी गलियां हैं । इसी प्रकार खगोल में सौर जगत् के विभाग हैं। पित्यान,अजवीथी,देवयान, नाग. वीपी आदि । और भी प्रमाणु:- स (सूर्य:) यत्रोदगावर्त्तते देवेषु तर्हि भवति यत्र दक्षिणा वर्त्तते तर्हि पितृपु भवति ॥ शत० ब्राह्मणे २ । १।३॥
५७ भूमिका अर्थ-याह सूर्य जम उत्तरायण होने पर उत्तर की ओर जाता दीखता है तो देवयाम प्रदेश में होता है। एय जय दक्षिणायन होता है तो पित्यान प्रदेश मे होता है। इसी प्रकार सूर्य को जो १२ नाम हैं घे भी आकाश के विभाग के अनु. मार गित २ मास में आकाश के जिम जिस प्रदेश में सूर्य दीराता है, उस २ विभाग के अनुमार सूर्य के १२ नाम है । इम का वर्खन महामारत के जादि. पर्व में है, हम यहा विस्तारलय से उगसोको का उल्लेख नहीं करते हैं। इसी के अनुसार नक्षत्रो की देवता लिसी है । प्रमाण - कृत्तिका नक्षत्रमम्बग्निदेवताग्नेरुचस्थ प्रजापतेर्धातुः सोमस्यचे त्या रचे त्वा झुते त्वा भासे त्वा ज्योतिपे त्वा रोहिणी नक्षत्रं प्रजापतिर्देवता मृगशीर्ष नक्षत्रं सोमो देवता नक्षत्रं रुद्रो देवता पुनर्वसू नक्षत्रमदितिर्दै- वता तिप्पो नक्षत्रं यहस्पतिर्देवताऽऽश्लेषा नक्षत्रं सर्पा देवता मघा नक्षत्रं पितरो देवता फल्गनी नक्षत्रमर्य- मा देवता फल्गुनी नक्षत्रं भगो देवता हस्तो नक्षत्रं सविता देवता चित्रा नक्षत्रमिन्द्रो देवता स्वाती नक्षत्र वायुर्दवता विज्ञासे नक्षत्रमिन्द्राग्नी देवताऽनुराधा नक्षत्रं मित्रो देवता रोहिणी नक्षत्रमिन्द्रो देवता विधृतौ नक्षत्रं पितरो देवतापाढानक्षत्रमापो देवतापाढा नक्षत्रं विश्वे देवा देवता नवणा नक्षत्रं विष्णुदैवता नविष्ठा नक्षत्रंवसवो देवता शतभिपड़ नक्षत्रमिन्द्रो देवता प्रो. छपदा नक्षत्रमज एकपाद्देवता गोष्ठपदा नक्षत्रमहिq. ध्रयो देवता रेवती नक्षत्रं पूपा देवताऽश्वयुजी नक्षत्र- मश्विनौ देवता भरणोर्नक्षत्रं यमो देवता पूर्णापश्चा- प्यन्ते देवा अदधुः । तैत्तिरीय ब्राह्मणे ४ । ४ । १० इन मन्त्री का अर्थ चकद्वारा किया गया है - मसिहाम्त नक्षत्रों की देवता ज्ञापक चक्र रुत्तिकादि नक्षत्र देवता कृत्तिकादि नक्षत्र देवता १६/ ज्येष्ठा यह पति २१/प्रविष्ठा २५/ रेवती १२/ चित्रा १३ स्वाती १४ विशारा २७/ भरणी अग्नि १रुत्तिका मित्र १५) अनुरोधा २. रोहिणी प्रजापति ३ मृगशीर्ष सोम- |१७/ मूठ निति ४ आर्द्रा १८ पूर्वापाढ़ आपः ५ पुनर्वसू अदिति १९ उत्तराषाढ़ विश्वेदेष ६ पुष्प २ श्रवण विष्णु आश्लेषा सर्प घन ८मघा पितर २२ शतभिषा घरुण पूर्व फल्गुनी भग |२३| पूर्व भाद्रपदा अजएकपात् १० उत्तर फल्गुनी अर्यमा २४| उत्तरभाद्रपदा अहिर्युन्य सविता पूषा त्यष्टा ८अश्वयुज अश्विनी वायु यम इन्द्राग्नी गति एफ स्थान से दूमरे स्थान में लाने फानाम गति है। जड़ पदार्थ निश्चेष्ट स्वयं एक स्थान से दूसरे स्थान में नहीं जा मकता । परन्तु इस में भी एक मकार की गति है। चला देने से घलना है। यही नियम संसार में अत्यन्त अद्भुत है,फिभी जड़ वस्तु का चलना और रुक जामा तीन कारणों से होता है। १-अपेक्षाकृत गुरुतर वस्तु के आकर्षण, वायुद्वारा अवरोध, एवं दूसरे घस्तु के माध घर्षण। गुरुतर वस्तु का धर्म यह है जो अपने से छोटे वस्तु को आकर्षणद्वारा अपनी ओर ले आता है। जिस के द्वारा कोई वस्तु चालित होता है. उन को शक्ति कहते हैं। विना शक्ति के गति नहीं होती। कोई वस्तु फिती निर्दिष्ट फाल में जितनी दूर जाता है. उस को उम वस्तु फा वेग कहते हैं। माह पदार्थ की गति का नाम "कार्य है और जिरा शक्ति से गति होती. है, उस को "फारण कहते हैं। "चक्रावत" वा "वृत्ताभास" जिस समय किसी वस्तु को पक्राफार पा तदनुरूप पथ में चलते देखते
भूमिका
है तो उस समय अवश्य विचारना होगा कि इस वस्तु में दो शक्ति दी गई
हैं। एक शहिद्वारा नियत निक्षित एवं अपरशक्ति से गियत आकृष्ट होताहै।
इस में पहिली शशि अर्थात् जिम से केन्द्राभिमुख गति होती है, उस को
केन्द्राभिकपणशक्ति और दूसरी शक्ति अर्थात् जिस से केन्द्र छोड़ कर उस को
जाना पड़ता है उस को केन्द्रमसारणी शक्ति कहते हैं ।
केन्द्राभिकपणी शक्ति वा मध्याकर्षण शक्ति
मूर्य की गुरुता के कारण प्रथिवी उम के द्वारा आलष्ट होकर सूर्य की ओर
जाती है। दूसरी आरनहीं जा सकती, इसी को केन्द्राभिकर्षणी शक्ति कहते हैं ।
केन्द्रप्रसारणी शक्ति
जिस धर्म (स्वभाव)के प्रभाव में कोई पदार्थ स्वयचालित नहीं चल सकता,
एवं अन्य कर्तृक घालित होने पर अपने आप स्थिर नहीं हो सकता सस का
नाम "जड़त्व हे पृथियो जा पदार्थ है, उतरा इस में घटितमय ईश्वर ने तो
प्राणुगमन शक्ति दी है. उसी के प्रभाव से यह सीधी चलती, परन्तु वह शक्ति
सूर्य के आकर्षण से प्रतिहत होकर यगति या वृत्तानास पथ में चलती है।
एपियों के प्राजु गमनार्थ शक्ति पर कही गई है वही केन्द्रप्रसारणी शक्ति है।
पृथिवी का गोलचक्र
पपिवी का आकार गोल है जो अनेक युक्तियो और प्रमाणों से सिद्ध है,
परन्तु फिन्हीं आधुनिक ग्रन्थकारों ने पारी को समतल और चतुष्कोण लिसा
है जो प्राचीन शास्त्रों एघ युति से विरुद्ध होने से मानने योग्य नहीं । गोल होने
में जो युशियां दी जाती हैं वे प्राय स्कूल एव छोटी २ पाठशालाओं के पाट्य
पुस्तकों में भी दी हुई हैं। दम लिये मैं फेवल यहां प्रमाणों का उल्लेग करताहूं।
चक्राणासः परीणहं पृथिव्या हिरण्येन मणिना शुम्भ-
मानाः । नहिन्यानासस्तितिरुस्त इन्द्र परिपसो अद-
धात्सूर्य ऋग्वेदे ११३३ १८॥
आशयः-पथियी गोलाकार है, एवं इस का आधा भाग अर्थात् व्यास
गोल होने के कारण सूर्य से प्रकाशित रहता, एवं आधा भाग अन्धकारावत
रहता है और सूर्य के अफर्पण पर यह भूगोल ठहरा है । पुन:-
आ प्रारजांसि दिव्यानि पार्थिवा श्लोक देवः कृणुते
स्वाय धर्मणे । प्रबाहू असा सविता सवीमनि नि-
वेशयन्प्रसुवनक्तुभिर्जगत् ॥ ऋग्वेदे ४१ ५३ ॥ ३ ॥
मूर्यसिद्धान्त आशयः-सूर्य धुलोक एवं भूलोफ आदि लोकों को अपने २ नियमों में रसता हुआ और दिग रात करता हुआ अपनी कोट पर अवस्थित है। युग:- स वा एप न कदाचनास्तमेति नोदोति तं बदस्तमेतीति मन्यन्तेह एव तदन्तमित्वाथात्मानं विपर्यस्यते रात्री मेवावस्तात् कुरुतेहः परस्तादथ यदेनं प्रातरुदेतीतिम- न्यन्ते रात्रेरेव तदन्तमित्वाथात्मानं विपर्यस्यतेऽहरेवाव- स्तात् कुरुते रात्री परस्तात् स वा एप न कदाचन नि- म्लोचति । ऐतरेय ब्राह्मणे १४॥६॥ इसी प्रकार गोपथ ब्राह्मण में भी लिखा है:- सवा एप न कदाचनास्तमे यति । नोदयति । तदादेनं पश्चादरतमयतीति मन्यन्ते । अह एव तदन्तं गत्वा थात्मानं विपर्यस्यतेऽहरेवाधस्तात् कृणुते रात्री पर- स्तात् । स वा एप न कदाचनास्तमयति नौदयति। तदा- देनं पुरुस्तादुदयतीति मन्यन्ते । रात्रेरेव तदन्तं गत्वा- त्मानं विपर्यस्यते रात्रिमेवाधस्तात् कृणुतेऽहः पर- स्तात् । सवा एप न कदाचनास्तमयति न चन निम्लोचति । गोपथ ब्राह्मणे । १० ॥ अर्थ-मूर्य न कभी छिपता (अस्त) और न निकलता ( उदय ) है । जो लोग सूर्य का अस्त होना मानते हैं वे दिन के अन्त होने पर अर्थात् रात्रिमें पषियी के घूमने से पश्चिम से पुनः पूर्व में सूर्य को देखते हैं और सूर्य पृथिवी के इस भाग में दिन और दूसरे भाग में रात्रि को करता है । तब लोग सूर्य का उदय मानते हैं। इसी प्रकार जय दिन के अन्त को प्राप्त होकर मूर्य पश्चिम में दिखाई देता है और भूमि के इस भाग में रात्रि और दूसरे भाग में दिन करता है तो उोग सूर्य का अस्त मानते हैं। इन्हीं उपरोक्त दोनों प्रमायसे पृषिधी का गोलत्व,निराधारत्य एवं दिन रात का होना मिद्ध होता है । पुगः- वृत्तभपञ्जरमध्ये कक्षापरिवेष्टितःखमध्यगतः। मृज्जल- शिखिवायुमयो भूगोल: वर्तते सर्वतोवृत्तः ॥ ६ ॥ वैकदा.
भूमिका कुसुमैरतद्वद्धि सर्वसत्वर्जलजः स्थलजश्न भूगोल: । आर्य सिद्धान्ते गोलपादे ॥ ७ ॥ अर्थ-नक्षत्र धक के भीतर कक्षा से घिरा हुआ आकाश पञ्चभूतात्मक ( मृत्तिका, अग्नि, वायु, जल, आकाश ) भूगोल अवस्थित है ॥ ६ ॥ एव इस की सब ओर जिस प्रकार फदम्ब के फूल के सब और पंखड़ी होती है, उसी प्रफार पूधिों के सय भाग में जल और स्थल में उत्पन्न होने वाले प्राणी रहते हैं ॥ ॥ इसी प्रकार वराहमिहिर ने लिखा है- पञ्चमहाभूतमयरतारागणपञ्जरे महीगोलः । खेऽयस्कान्तान्तःस्थो लोह इबावस्थितवृत्तः ॥१॥ - तरुनगनगगरामसरित्समुद्गादिभिश्चितः सर्वः ॥ (पञ्चसिद्धान्तिका १०१३) अर्थ-मृत्तिका, यायु, जल,आकाश और पानी यह पञ्चतत्वात्मक भूगोल राशिचक्र के भीतर आकाश में गोलाकार अवस्थित है। जिस प्रकार चुम्बक के भीतर लोहे का गोला रहता है । इस भूगोल के चारों ओर पठभाग वृक्ष, पर्षत, नगर, धादिका, नदी और समुद्रादिकों से आच्छादित है। भास्करा. चार्य ने भी डिसा है.- सर्वतः पर्वतारामग्रामचैत्त्यचयश्चितः । कदम्बकुसुमग्रन्थि केसरप्रसरैरिव ॥ (सिद्धान्तशिरोमणि भुवन कोपे) अर्थ-पृथियो की सय ओर पर्वत पाऔर ग्रामादि हैं जिस प्रकार कदम्य के फल फी सब मोर पंसष्ठी होती हैं। पुन:- समो यतः स्यात्परिधेःशतांशः । पृथ्वी च पृथ्व्या नितरां तनीयान् ॥ नरस्य तत्पष्ठग- तस्य कृत्स्ना समेव तस्य प्रतिभात्यतःसा ॥ मिटान्तशिरोमणी) अर्थ-परिधि का शतांश (१२ वां हिस्सा) जिस प्रकार पृथियोस्थ पुरुष को समतल दीख पड़ता है । इस का कारण यह है कि पृथियो मनुष्य की सूर्य सिद्धान्त अपेक्षा बहुत बही है। पुराणों में जो पथिवी को चपदी लिखा है। उस का सपान भास्कराचार्य ने लिया है- यदि समा मुकुरोदरसन्निभा भगवती धरणी तरणिः क्षितेः । उपरि दूरगतोऽपि परिभ्रमन् किमु नरैरमरैरिव नेक्ष्यते॥ यदि निशाजनकः कनकाचलः किमु तदन्तरगः स न दृश्यते । उदगयन्ननु मेरुरधांशुमान्कथमुदेति च दक्षिणभागके ॥ ११ ॥ अर्घ-यदि पथिधी दर्पणोदर धरातल के तुल्य घपटी है तो मनुष्यों को ऊपर को भ्रमण करता हुवा मूर्य (सायङ्काल के पीछे) क्यों नहीं दीखता? यदि भूर्य मेरु की ओट में आजाता है तो मेरु क्यों नहीं दिखाई देता ? और यदि मेरु फी आड़ से निकल कर सूर्य उदय होता है तो पूर्व उत्तर दिशा ही से सूर्योदय होना चाहिये क्योंकि मेरु उत्तर की ओर है। फिर (शीतकाल में) दक्षिणभाग से सूर्य का उदय क्यों होता है? इस से यह मानना पड़ेगा कि पृथियो हो की आष्ट में सूर्य आजाता है। अर्थात् पृषिधी का जितना भाग सूर्य के सामने होता है उतने में दिम और जो ओट में आता है उतने में रात्रि होती है । इसी आशप का मन्त्र ऋग्वेद में आया है जिस पर सायणाचार्य ने भी उपोतिषशास्त्र के अनुफूल ही भाप्य किया है- प्रत्यङ् देवानां विशः प्रत्यङ्देपि मानुपान् । प्रत्यङ् विश्वं स्वर्दू शे॥ऋ० सं० मं१। सू०५०मं ५ भाष्यम्-हे सूर्य त्वं देवानां विशःमरुन्नामकान्देवान्मरुतो वै देवानां विश इति श्रुत्यन्तरात् । तान्मरुत्संज्ञकान्प्रत्यङ्देपि प्रति गच्छन्नुदयं प्राप्नोपि तेपामभिमुखं यथा भवति तथेत्यर्थः । तथा मानुपान प्रत्यङदेपि तेऽपि यथा अस्मदभिमुख एव सूर्य उदेतीति मन्यन्ते तथा विश्वव्याप्तं स्वः स्खलौकं दृशे द्रष्टुं प्रत्यङ्- देपि यथा स्वर्लोकवासिनो जनाः स्वस्वाभिमुख्येन पश्यन्ति, भूमिका तथा उदेपीत्यर्थः । एतदुक्तं भवति लोकत्रयवर्तिनो जनाः सर्वे. ऽपि स्वस्वाभिमुख्यन सूर्यं पश्यन्तीति तथा चाम्नायते-तस्मा. सर्व एव मन्यते मां प्रत्युद्गादिति (तै० ब्रा० ६ । ५। १) भाशयः-पृथियीस्प समस्त लोग जानते हैं कि सूर्य मेरे प्रति उदित हुया अगर पृथिवी गोल न होती एवं सूर्य अपनी ही धुरी पर न घूमता तो एंसी घटना कदापि न होती कि उत्तर मेरुनियासी ( देवता ) लोग दक्षिण भेरू निवासी एवं अन्यान्यप्रदेशस्य व्यक्तिगण को प्रतीत होता कि सूर्य का उदय मेरे सम्मुख होता है। ललाचार्य ने लिखा है कि:- समता यदि वियते भुवस्तरवस्तालनिभा बहूच्छ्याः कथमेव न दृष्टिगोचरं नुरहो यान्ति सुदूरसंस्थिताः ॥ अर्थ-यदि पषियी चपटी होती तो बहुत दूर स्थित ताष्ट्र के समान ऊचे कंधे पेड़ पूरे दृष्टिगोचर क्यों नहीं होते ? अर्थात् दूरस्थित वृक्षों के केवल आर्य भाग दृष्टि पड़ने का फारण यही है कि उन का नीचे का भाग पृथियी फी गोलाई फी ओट में आजाता है । पृथिवी का आधार पृथिवी किस के आधार पर ठहरी है इस में अनेक मत हैं-कोई कहता है कि एभिधी शेषनाग के ऊपर है कोई खेल पर यतलाता है। एवं कोई फूर्म के पीठ पर कहता है इत्यादि । परन्तु वेदादि सत्य शाखों में एवं माधुनिक विद्वानों ने निश्चय किया है कि सूर्य के आकर्षण से अपनी कक्षामें आकाश में अवस्थित है । प्रमाणः- सत्येनोत्तभिता भूमिः । अथर्ववेदे कां० १४ ।।। १। अर्थ-परमेश्यर ने भूमि को धारण किया है। पुन:- स दाधार पृथिवीम् । यजुर्वेद अर्थ:-उसी परमेश्वर ने पृथियो को धारण किया है। "उक्षा दाधार पृथिवीमुत याम् । ऋग्वेदे भूर्य (तक्षा ) की आकर्षणशक्ति पर पृथिवी आकाश में है । इमी का अर्थ म समझ फर फिदी लोगों ने लिखदिया कि पथिवी बैल को माँग पर है 1 । ।
आशय:- - आशयः- ६४ मूर्य गिद्धान्त "स नेमिचक्रमजरं विवावृत उत्तानायां दश युक्ता वहन्ति। सूर्यस्य चक्षुरजसत्यावृतं तस्मिन्नर्पिता भुवनानि विश्वा ॥ ऋग्वेदे १ । १६४ । १४ -सूर्य को केन्द्र (मध्य) करते हुये जितने लोक एवं पृधियी दशों दिशा युक्त भ्रमण करती हुई अवस्थित है। इसी प्रकार सूर्य के अत्यन्त निकट घुध और शुक्र भी परिक्रमा करते हैं । मित्रो जनान्यातयति प्रजानन्मित्रो दाधार पृथिवीमत साम् । तैत्तरीय ब्रा० ३।४।११ यः-सूर्य सब लोकों को सौर जगत् )अपनी आकर्षण शक्तिसे नियम में रखता हुवा एवं पृथिवी और द्युलोक को धारण करता है ॥ पुन:- मूर्तो धर्त्ता चेटुरित्र्यास्ततोऽन्यस्तस्याप्यन्योऽस्य- वमन्त्रानवस्था। अन्त्ये कल्प्या चेत्स्वशक्तिः कि- मादो किन्नोभूमेः साष्टमूतैश्च मूर्तिः । (सिद्वान्त शिरोमणि भुवन कोपे) अर्थ:-यदि पृथियों का कोई (जैसा कि पौराणिक लोग शेषनाग,मुसलगान लोगबैल पर मानते हैं)भूतिगान्धर्तामाना जावे तो उस धर्ता का कोई अन्य धर्ता मानना पड़ेगा और फिर उस का कोई दूसरा भी प्रकार इस का कहीं अन्त न मिल पावेगा अर्थात् इस में अनवस्या दोष लगेगा एवं अन्त में यही मानमा पढेगा कि पृथिवी अपनी ही शक्ति से स्थित है। आवृष्टिशक्तिश्च मही तया यत्स्वस्थं गुरु स्वाभिमुखं स्वशत्या । आकृप्यते तत्पततीव भाति समे समन्तात् क्वपतत्वियं खे ॥ (सिद्धान्तशिरोमणि भुवनकोपे.) अर्थात्-धियी अपनी माफर्षण शक्ति से भूतल के सब पदायों को अपनी और सींचती है इस सिये ये पदार्थ पृथिवी पर गिरते हुये दिसलाई देते हैं। जय पृथियो के समीप के सय पदार्थ उम की अपेक्षा बहुत छंटे होने के फा- रण उस की आकर्षण शक्ति से पूधियी पर गिरते हैं तं पृथियो कहां को गिर जावे १ पस लिये यह शङ्का फि पृथिवी पिना आधार के कैसे रह सकती है? प्रधा निर्मूल है। न - - भूमिका पृथिवी का भ्रमण पृथिवी की गति दो प्रकार की है-आनिहफ और वार्षिक । रथचक्र जिस प्रकार मेरु दगड के ऊपर नियत घूमता है, उम की इस गति का नाम दैनिक गति है । एक वह इस प्रकार प्रतिदिनअपनी धुरी पर पुमती २ सूर्यके चारों ओर एक वर्ष में पुनः जहां से चली थी वहीं आज्ञाय इस को उन की वार्षिक गति कहते हैं। वहीं दो प्रकार की गतियों से दिवा,रानि,कातु परिवर्तनादि नाना प्रकार के नैसर्गिक व्यापार सम्पन्न होते हैं। पृथिवी का ना भाग जिस समय सूर्य के सम्मुख होता है उसी भाग में दिन होता है एवं उसके विपरीत भागमें रात्रि होती है । वह प्रतिदिन पश्चिम से पूर्व को अपनी धुरी पर होता है, परन्तु लोग कहते हैं कि गगनस्थ सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रादि पूर्व दिशा में उदित होते हैं एष पश्चिम दिशा में अस्तमित होते देखे जाते है वस्तुतः सूर्यचन्द्रादि नक्षत्रों को जिस प्रकार उदित एवं अस्तमित होते देखते हैं, उन का उस प्रकार उद- पास्त नहीं होता। कंघल पृथिवी की गति के कारण ऐसा बोध होता है। किन्तु पृथिवी की यह गति हमारे दर्शन, श्रवण, स्पर्शन आदि किसी इन्द्रिय द्वारा अगुभूत नहीं होती। कोई उस को आस से पूमता नहीं देखता,कान से भी कोई तय की गति के शब्द को नहीं सुनता, एव उस की गति फो की फोई स्पर्शेन्द्रिय द्वारा स्पर्श नही करता । इसी कारण कितने ही अगभिश लोग पहिले इस की गति को स्वीकार नहीं करते थे, एवं उस समय भी बहुत से लोग नहीं मानते। जो लोग किसी भी इन्द्रियद्वारा पृथिवी की गति का बोध नहीं करते वे पृथिवी की गति से दिया, रानि, मास नातु आदि न मान कर. सूर्यादि आकाशस्थ अगरय पदार्थ की प्रात्यहिक गति स्वीकार कर उन्हीं को पर्या- क्रम से दिधा, रात्री, ऋतुपरिवर्तनादि मानते हैं। जिस कारण इन दो मतों के भिन्न दूसरा कुछ नहीं फहा जा सकता। अग्र विचारना चाहिये कि प्रधियी की गति से दिन रात्रि आदि स्वाभाविक घटना होती हैं या सूर्य एव नक्ष. त्रादि आफाशस्य पदार्थ प्रतिदिन पृथिवी को प्रदक्षिणा करते, इस से दिन रात आदि होते हैं किन्तु इन दोनों मतों को देखना चाहिये कि फोनमा मत असल (प्राकृत)है एव कौनसा अप्राकृतहै । एव बहुस से ज्योतिर्विदोने प्रत्यक्षादि प्रमाण द्वारा इस की मीमांसा करके सत्यसस्थापन करने के लिये पदार्थ विद्या द्वारा जिन प्रमाणों का आश्रय लिया है उन में से कतिपय प्रमाण निखित किये जाते हैं।
। मूर्य सिद्धान्त (९) यदि पृथिवी को स्थिर मान के सूर्यादि पदार्थ की प्रात्यहिक गति स्वीकार की जाये तो प्रत्येक नक्षत्र, ग्रह, उपग्रहादि की भिन्न प्रकार की गति न मानने से दिन रात का पर्याक्रग मे होना सम्पन्न न हो सकेगा। भूयर्यादि जो गगनस्य पदार्य २४ होरा में पृथिवी की प्रदक्षिणा करते जान पड़ते हैं वे पृथिवी के समान स्थित नहीं हैं। सुतरां तय सय समानगति से एक ही समय में पृथिवी की प्रदक्षिणा नहीं कर सकते । ग्रहगण व नक्षत्रगण पृथिवी से जो जितनी दूरी पर हैं उन की परस्पर को गति तत्तत्परिमाण सत्वर वेग से सम्पन्न होती है। एक समय में आकाशस्थ सफल नक्षत्रादि पृथिवी की प्रदक्षिणा कर सकते हैं । फिन्तु भिन्न भिन्न नक्षत्रादि की इस प्रकार भिन्न भिन्न गति सिद्ध होने से कैमा असङ्गत घ कहां तक असम्भव है, इस की जोर ध्यान देने से पृथिवी को अवश्य भ्राम्पमाण ही मानना पड़ेगा। नक्ष. त्रादि परिधी से इतनी दूर पर हैं जो उन की गति मन में विचारना व संख्या द्वारा निर्देश करना कठिन है।फिन्हीं ज्योतिर्विद पण्डितों ने गणित द्वारा देशाहो फि को ये सब दूरस्थित नक्षत्र जितने वेग से गमन करके पृथिवी को प्रदक्षि. मा एक दिन में कर सकेंगे। उस से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड घूर्ण होकर परमाणुरूप होजाये । अति दूरस्थित नक्षत्रादि की बात अलग रहे, निकटस्थ सम्पूर्ण न. सत्र सूर्यादि प्रतिदिन पृथिवी को प्रदक्षिण करें, इस में जितने धेग की आवश्यकता है उस को मन में विचारना कठिन है। एचं सृष्टि की प्रणाली के विरुद्ध है। ज्योतिर्विद्या द्वारा निश्चित हुवा है कि पृथिवी सूर्य से प्रायः ९५०२७०८० मैल दूर स्थित है। एवं अति निकटस्थ नक्षत्र प्रापः ३0000000000000 मैल दूरस्थित हैं । अत एव यदि सूर्य २४ घण्टे में पृथिवी को एक बार परि- भ्रमण करे तो एक मिनट में उस को चार लाख मैल भ्रमण करना पड़ेगा। एवं अति निकटस्य नक्षत्र को एक मिनट में १६०२01000000 मैल पथ पर्यटन म करने से किसी प्रकार सम्भव नहीं जो प्रथिवी को एक धार परिभ्रमण कर मफे। इसी प्रकार जी नक्षत्र शितनी दूर पर है यह यदि उतने घेग से न चले तो यह नक्षत्र किसी प्रकार पृधियी को एक दिन में परिभ्रमण नही कर सकता। परन्तु वस्तुतः यदि नक्षत्रादि उस प्रकार महावेग से प्रतिदिन पूपियो को प्राक्षिण करता तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उसी तेज से चूर्ण २ होजाता । किन्तु इस प्रकार अमूलक कल्पना जो सर्वशक्तिमान् जगदीश्यर की सुटसल सष्टि प्रणाणी के साथ फितना असङ्गत एष फहां तक असम्भव है सो फहना अ- युक्ति होगी । जो उपक्ति इस नियम सष्टिप्रणाली के मति एक यार किंधित - - भूमिका ६७ दृष्टिपात करके देखें तो वे पुनः कती उफार अमुलक कल्पना महीं कर सकते। जिस असीम ज्ञानवान् अनन्त शक्मिय पुरुष ने अनिर्वचनीय सुष्ट- खल सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की है यह क्या इस क्षुद्र पृथिवी की क्रिया सम्पादन के लिये उलटानिया करेगा ? यह किसी प्रकार विद्यास योग्य नहीं। जब केवल एक पृथिवी की आन्हिक गतिद्वारा अनायाम दिन रात मास ऋतु आदि सब घटना संघटित हो सकती हैं तो उसके लिये नमोमण्डलस्प असरुप भयानक प्रकाण्ड नक्षत्रादि की भयङ्कर गति कल्पना करे यह आश्चर्य है। जो कार्य अनायास सिद्ध हो सकता है कोई उस की सिद्धि के लिये आठ- म्यर नहीं पाता । एत एव जो सामान्य थुद्धि वाले पुरुष के लिये नितान्त अकर्तव्य व असङ्गत कह कर बोध होता है उस को किस प्रकार सर्वशक्तिमान, ज्ञानाफर, आदि पुरुष, विश्वकर्मा, जगन्निर्मायक, में असम्भव दीप आरोपण करके अपराधी होने का साहस करेगा ।। (२) सूर्य यदि पृथिवी को प्रतिदिन परिभ्रमण करता तो यह प्रति निपत भूमण्डल के मध्यभाग अर्थात् निरक्ष प्रदेश को चेष्टनपूर्वक भ्रमण फरसा । पदार्थ विद्या द्वारा विशारद पण्डितगण ने परीक्षापूर्वक निश्चय किया है कि जब तक एक जड पदार्थ अन्य जड पदार्थ को परिभ्रण फरसा है उस समय दोनों पदार्थ समतालस्थिन अर्थात् परस्पर इस प्रकार सस्थित रहते हैं जो मूत्र पात करने से दोनों एक ही रेखा में पतित होते हैं, एव वेष्टनकारी भा. म्पमाण पदार्थ मध्य स्थित स्थिर पदार्थ को नियत एक निर्दिष्ट स्थान में होकर परिभ्रमण करता है। अत एव सूर्य यदि पृथिवी को प्रतिदिन परिभ्रमण करता तो उम की कक्षा अवश्य ही भूमण्डल के ठीक मध्यस्थान के ऊपर होकर जानी एवं उसको प्रतिदिन पृथिवी के ठीक पूर्व और उदित होता और पश्चिममें अस्त होता देखा जाता । परन्तु वस्तुतः प्रतिदिन ऐसी घटना नहीं होती। एक वत्सर में केवल दोही दिन सूर्य को सूमण्डल के ठीक गध्यभाग से उदित होकर ठीक मध्यभाग में अस्तमित होते देखते है । तभिन्न तस को छः महीना पृथियी के दक्षिण पश्चिमांशमें अस्तमित होते देखते, एव अपर अर्धाश में पृथिवीके पूर्व उत्तरमें उदित एव पश्चिम उत्तरमें अस्तमित होते देखते हैं। मूर्य को प्रात्यहिक गति मानने से कभी उस का एदयास्त उक्त प्रकार से सिद्ध नहीं किया जा सकता । एवं तशिन विस्तर ध्रुव नक्षत्र काभी सूर्य की तरह उत्तरायण व दक्षिणायन देखा जाता है। अत एव यह सम्पूर्ण ध्रुव नक्ष- गगाके उत्तर दक्षिणायनद्वारा भी पृथिवी की प्रात्यहिक गति सिद्ध होती है ।
सूर्यमिद्वान्स (३) यहत् वस्तु क्षुद्र वस्तु को कभी परिभ्रमण नहीं करता। जड पदार्थ की गति का ऐसा नियम है । बड़ा पदार्थ छोटे पदार्थ को पमों नहीं परि भ्रमण करमकता, पदार्थ विद्यावित् परिडतों ने धावत्तं गति प्रसङ्ग में विधि पूर्वक भिटु किया है कि पृधिधी की अपेक्षा मृर्य मण्डल तेरह लाए गुण में भी अधिक बड़ा है। अत एव मूर्य को पृथियी का परिभ्रण करना किसी प्रकार सिद्ध नहीं होता, म.युत्त एधियी की ही गति अनापाम सिद्ध होजाती है । एवं पृथिवी की गति खीकार न करने से दिन रानि आदि घटना सूर्य को पृषियी की परिकमा रोमिद्ध नहीं होती। पृथियो वृत्तानाम पथ में वर्ष में एक चार भ्रमण करती है। दमी लिये तुपरिवर्तन होता है । पृथिवी की कक्षा यदि मण्डलाकार होती तो वर्ष में भिन्न २ प्रकार त्रातु की घटना न होती। मूर्य को चारों तरफ परिश्रमणकाल में पृथिवी मूर्य सम्बन्ध में भिन्न २ स्थान अवस्थित होने से भी भिन्न २ प्रकार ऋतु की घटना होती॥ (४) पण्डित लोगो ने साधारण गति के नियमों को समझा कर पृथिवी की आन्हिक गति का एक प्रत्यक्ष प्रमाण दिखलाया है कि जब कोई पदार्थ घूमता है तो उस का वेग अपने केन्द्र प्रदेश (धीच) की अपेक्षा दूरतर प्रदेश में अधिक होता है। इसी कारण जब किमी पर्वत पर मे कोई वस्तु नीधे को गिराई जाये तो वह कुछ दूर पूर्वाश में गिरेगी । इम से स्पष्ट सिद्ध होता है कि यदि पृथिवी पश्चिम से पूर्व को भ्रमण न करती हो तो उच्चस्यान से द्रव्या. दि फेंकने मे वह ठीक नीचे न पड़कर क्यों कुछ पूर्व ओर गिरता है ॥ (५) बुध ग्रह सूर्य से कार अंश मे अधिक दूर नहीं जाता। एव शुन ग्रह फनी ४ अश से अधिक दूर नहीं जाता है किन्तु यद्यपि वे पृथिवी को मध्य में रखकर परिभ्रमण करते तो भी कभी २ सूर्य से १५०० पर्यन्त दूर में जाते किन्तु भी घटना या पहिले यया अब कमी किमी ले नहीं देखी। (६), यहागा कभी पूंमं ओर फभी. पश्चिम कोर चाले दोसते हैं और उन के गगनीय मार्ग में किमी किसी अश में वे शिम प्रकार स्थिर हो जाते है, ऐसा बोध होता है किन्तु उग की गति की इस प्रकार विचित्रता या यथा ही होती है सो नहीं। पृथिवी युध शुक्रफे गमग आग के यहिभांग में रह कर मृर्य को परिचमण करते हैं। इस लिये ऐसा बोध होता है। पृथिवी की गति हमारे इन्द्रियगोचर नहीं होती । ऐसा समझ कर इस को अपला -- ६ भूमिका समझ लेना किसी प्रकार युक्तियुरू नहीं । यदि कोई क्षुद्र जीव किमी बड़े पस्तु पर सवार होतो बड़े पदार्थ के घूनगे या चलने से चढ़ा हुषा क्षुद्र जीव अपने आप किसी प्रकार उस फी गति अनुभव नहीं कर सकता। जब कोई जहाज पर चढ़ा हुवा पुरुष जहाज़ में येठा है और जब जहाज़ मगुद्गमन करताह तो उस समय नौकास्थ पुरुप उस की गति को नहीं जान सकता । समुद्रतीरस्थ अपर किसी स्थिर पदार्थ को लक्ष्य न करके आरोही कभी अपने जाहाज की गलि नहीं जान सकता है। इस लिये हम लोग पृथिवी की दैनिक गति अनुभव नहीं कर सकते, इस से उस को स्थिरमानना किमी प्रकार मिह नहीं हो सकता। पृथिवी की आन्हिक गति के कारण जो मयं चन्द्रमा ग्रह नक्षत्रादि प्रति दिन पूर्व दिशा में उदित होकर पश्चिम में अस्तमित देखे जाते हैं इस के अनेक प्रमाण हैं। जब कोई तरणी वा शकटादि यान हुन बेग से गगन करते हैं तो तन्- मध्यस्थिन आरोही तीरस्थ वा पाश्वग किसी वृक्षादि स्थिर पदार्थ के प्रति दृष्टिपात काने से वह अवश्य ही उन स्थिर वृक्षादि को अपनी विपरीत : दिशा में जाते देखते हैं, इस में सन्देह नहीं । और सचल पदार्थ गति द्वारा जो अचल पदार्थ की गति का भ्रम होता है,इस में सन्देह नहीं ॥ कोई २ कहते हैं कि यदि पृषियी प्रतिदिन घूमती होती तो भूमण्डलस्य जितने पदार्थ जीवजन्तु आदि हैं सब उस की गति से उलट पड़ते। यह शङ्का व्यर्थ है । गृहत् वस्तु सदैव छोटे वस्तु को आकर्षित करता है । पृथिवीस्य जितने पदार्थ हैं उन की अपेक्षा पृथिवी बड़ी है एय मब वस्तु पृथिवी में आरुष्ट होकर रहते हैं । पृयियी घूमते समय चाहे जिस अवस्था में रहे उस के ऊपर अवस्थित जीव जन्तु व अन्यान्य पदार्थ नियत उस में मारुष्ट होकर रहेगा। प्रविधी पूमती चाहे जिम दिशा में जावे हम लोग सदा अपने पैरों के नीचे पृथिवी व मस्तकोपरि आकाश को देखते रहेंगे। सुतरों पृधिधी की आन्हिक गति द्वारा किसी प्रकार हमारा अवस्शान्तर अनुभूत या घटने की सम्भावना नहीं। कोई २ यह कहते है कि "पृथिवी की गति होने से एक बड़ा भयानक शब्द होता यह शङ्का एक मात्र अमूलक है। हम लोग जो किमी वस्तु की गति का शब्द सुनते हैं उस का कारण यह है कि उस वस्तु का वायु के साथ वर्षण व अभिघात होने से यह शब्द उत्पन्न होता है । वह शब्द उसी वायु के सहकार से हमारे कानों में सुन - मृर्पमिद्धान्त पड़ता है। पृथिवी शून्य के ऊपर अवस्थित है, वहां वायु या अन्य कोई पदार्थ नहीं । सुतरां उस का किसी के साथ घर्षण वा अभिघात की सम्भावना नहीं एवं घर्षण वा अभिघात होने से भी वायु फा प्रभाव होने मे तज्मनित शब्द हमारे कर्ण गोयर नहीं होता। शून्य में याधफता शक्ति नहीं । यदि यह शक्ति रहती तो शून्य में पृथिवी न ठहर सकती । जय पृथिवी के अवस्यान मेंशन्य प्रति वाधकता नहीं उत्पन्न होती है । वह उस गति का प्रतिवादी नहीं हो सकता । एय गाड़ी, घोडा, नौका प्रभृति सवारी द्वारा गमन काल में जो प्रयठ घायु का शब्द सुन पड़ता है। ऐसा समझ कर यह कहना कि पृथिवी की गति से भी शब्द होना चाहिये, यह असम्भय है। कारण यह है कि यायु की प्रचण्ड गति ममय पर्वत, अट्टालिका, वृक्षादि जितने वस्तु हैं, अपनी २ अवस्थानुसार वायु की गति का अवरोधक ( रोकने वाले ) होते हैं तो उम से अवश्य ही परस्पर द्रव्यों के संस्पर्शजनित शब्द उत्पन्न होते हैं। उस का प्रमाण यह है जोजिम स्थान में अधिक वृक्षादि रहते हैं, वहां वृक्ष के साथ वायु के अभिघात से अधिक शब्द होता है। जहां क्षादि घोड़े होते है, वहां शब्द भी कम होते हैं। पुनः लोग कहते हैं कि “यदि पृथिवी में गति होती तो पृथिवी के गति मार्ग के विपरीत ओर वायु की गति का अतिशय पराक्रम होता" यह शङ्का भी अग्राह्य है । यदि भूयायु स्थिर रहता और पृथिवी उस के बोध होकर या उस भूयायु की स्वतन्त्रगति एवं पृथिवी को स्वतन्त्रगति होती किंवा भूवायु पृथिवी के आकर्षण के आधीन न होता तो पृथिवी की गति मार्ग के वि. परीत धायु का वेगवान् प्रवाह होना सम्भव होता । पृथिवी की मध्याकर्षण शक्ति में अन्यान्य वस्तु उस में जिस प्रकार आरुष्ट होती हैं उसी प्रकार वायु भी आरुष्ट होता है। पृथिवी के आकर्षणाधीन होने से पृथिवी की गति जिस प्रकार हो जाती है वायु को भी गति उसी प्रकार नित्य होने पर भी क्षिति की गति के विपरीत दिशा में वायु गति नहीं होती। जय कोई पैदल या गाड़ी आदि पर चढ़ कर जाता है, उस समय जो गाठीआदि को गति प्रतिकूल वा अनुकूल में वायु की गति है अनुभव होती हे उमफा कारण यह है कि गाही आदि की एवं वायु की भिन्न गतिय परस्पर में एक दृहरे के आधीन नहीं।
भूमिका २ कोई २ यह कहता है कि "यदि पृथिवी प्रति सेके गक्ष एवं प्रति मिनट बहुत मैल पथ पर्यटन करती तो पृथिवीस्य बड़े र मन्दिर तथा मकानादि या स्तम्भादि एवं किमी उच स्थान से कोई पदार्थ फेंकने से वह उग के जड़ में नह गिरता । पृथियी की गति वशात् अपश्य ही यह उच्च स्थान से बहुत दूर अलग गिरता । एवं पक्षी प्रति उड़ने वाले सेपर जीव सर जिम प्रदेश होकर उड़ते हैं, पृथियो द्रुत ग्रेग के अनुरोध से वे वहां से बहुत दूर पोले पट जाते, जिस कारण वह फेंका हुया पदार्थ उद्दष्टीपमान सेघर जीवगण एषियी के साथ समान धेगमें किसी प्रकार नहीं चल सकते। किन्तु यस्तुतः कसो ऐमी घटना दृष्टिगोचर नहीं होतीस्तम्नादि उच्च स्थानसे कोई पदार्थ गिरने या किसी पदार्थ के फेंकने से वह उम को जड़ में गिरता है । एव पक्षी प्रभृति रोचर माणी सब आकाश मार्ग में उड़कर अनायास पृथिवीके साथ २ बठेजाते हैं।" यह अमूलक आपत्ति फिसी फाम की नहीं। जय दो पदार्थ एकम रहते हैं, तय एक फी गति से दूसरे की गति सिद्ध होती है । पोष्टे के गमन से अश्यारुढ़ का गमन सिद्ध होता है । जहाग के गमन से जहाज पर चढ़े व्यकि फा गमन मिद्ध होता है। एवं शरुट की गति से गाड़ी पर मयार का गगन सिद्ध होता है । घोठा रथ नौका आदि से यदि कोई पदार्थ भूतल में या जल में गिर पड़े तो जन तक यह भूतल या जल में नहीं गिरता तय तफ अश्य रवादि के साथ २ समान गति से चला जाता है, इसी कारण स्थिर रचय यस नौका से कोई पदार्थ फेंकने से जैसे यह इस रथ चनौका के ठीक नीधे गिरता है। इसी प्रकार सघल नौका य गमनशील रप से कोई वस्तु गिरने या फेंकने में भी यह ठीफ उस के नीचे पहता है । इस लिये पृषिधी प्रसिहोरा पश्चिम से जितनी दूर पूर्व की ओर जाती है, पथियोस्य सम्पूर्ण पदार्थ के प्रति होरा उतना ही दूर गमन सिद्ध होता है,स्तम्भ से गिरी हुई एंट उस के मूल में गिरती है एवं आकाशस्य सेवर रेय जन्तु पर नहीं पाते . पृधिव्यादि लोकों का भ्रमण एपियों के भ्रमण में युक्तियांलिसी जा चुकी हैं,अय प्रमाण लिखे जाते हैं- विसामना मिपिरामिन्द्रभूमि महीमपारां सदने ससस्थ । अस्तभ्नादां वृपभोअन्तरिक्षमपन्त्वा परुचयेऽप्रसूताः । (प्राग्येदे ३ । ३० १९) . भूमिका ७३ ग्रीप्मस्ते भूमे वर्षाणि शरद्वेमन्तः शिशिरोवसन्तः। ऋ- तवस्ते विहिता हायनीरहोरात्रे पृथिवि नो दुहाताम्॥ (अथर्ववेदे १२ । १८ । ३६) आशय-हे भूमे ! तुम्हारी वार्षिक गति के कारण ग्रीष्म, वर्षा, शरत, हेमन्त, शिशिर और वसन्त ऋतु होते हैं । और भी:- आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः । पितरं च प्रयन्त्त्वः ॥ यजुर्वेदे अ०३। मं० ६ ॥ भाशय-यह पृथिवी जल को प्राप्त होकर अर्थात् जल के सहित अन्तरिक्ष में आक्रमण करती है, अर्थात् अपनी धुरी पर घूमती है और सूर्य के भी चारों ओर घूमती है । पुनः- या गोर्वर्त्तनि पर्येति निष्कृतं पयोदुहाना व्रतनीर- वारतः । सा प्रब्रुवाणा वरुणाय दाशुपे देवेभ्यो दाशङ्क- विपा विवस्वते ॥ ऋग्वेदे अ०८।२। व० १० मं०१ ॥ आशय-जो प्रधियी धदा अनन्त रस फल फूलादि पदार्थों से प्राणिमों को फरती तथा अपने नियम का पालन करती, परमेश्वर की महिमा का उपदेश करती, दानी और अच्छे लोगों को और विद्वानों को नाना प्रकार के सुरा दती, अपनी कक्षा में सूर्य को चारों ओर घूमती है । पृथिवी के अन्यान्य नामों में "गो" भी नाम है । जिस की निरुक्तिनिरुत में की गई है- गौरिति एथिव्या नामधेयं यह दूरं गता भवतीति ॥ (निरुत २ । २५) भाशय-गी" प्रथधी का नाम है. जो दूर तक चलाई जाती है (सूर्य के आकर्षण से ) । इसी प्रकार माकण्डेय पुराण में लिखा है कि- भ्रमतां सर्वजगतां नाभिभूतेन भास्वता । समुद्रादिवनो- पेता सा रुरोह मही नमः ।। गगनं चाखिलं ब्रह्मन् स- चन्द्रग्रहतारकम् । अधोगतं महामाग बभूवाक्षिप्तमा. कुलम् ॥ मा० पु० अध्याय १०६ श्लोक ४२ - सूर्य सिद्धान्त अर्थ-भूपं इस समस्त विवरणशील ज्योसिक गणो के नाभि (केन्द्र) स्थान में है और वह जय अपने केन्द्र पर भ्रमण करता है, तय अन्यान्य ज्यो. विष्कगण इस की आकर्षण शक्ति से आकृष्ट हो,अपने २ हिसाव पर घूमते हैं। अतएव समुद्र पर्वत और वनादि समेत यह समस्त प्रषियी घूम के आकाश में घट जाती है और चन्द्र ग्रह तारागण विशिष्ट गगममहल आक्षिप्त और आकुल होके नीचे के भाग में चला जाता है। इसी प्रकार आर्यसह ने तो अन्यान्य ग्रहो के भगण वर्णन मे पृथिवी का श्री गण लिखा है - युगरविभगणा रयुघृशशिचयगियिडुशुछ्लू कुडिशि बुरालरन्टप्रांक ॥ (आर्यसिद्धान्ते देशगीतिकायाम्) अर्थ-एक महायुग मे पृथिवी के १५८५२० भगण पूर्व से पश्चिम चलने मे होते है । यदि पृथिवी न भ्रमण करती होती तो मार्यम इस के अगण को लिखते । इस प्राचीन ज्योतिष गास्त्र के विरुद्ध अन्यान्य आधुनिक ज्योतिष के अन्धो में उक्त पृथियो के भगण को "पू भगण के स्थान में " गण (न क्षत्रगण ) लिखे हैं अर्थात् पृथियो को अबला एवं राशिचक्र वा वक्र को सघल सिद्ध करने के लिये ॥ इसी प्रकार आगे चलकर भायंस फिर लिखते हैं कि- प्राणेनैति कलांभूः । आर्यसि० देशगी० आर्या ॥ अर्थ-पृथिवी की गति कलामिका (Hinnte) होती है अर्थात् फला२ करके चलती है । इस पाठ को भाधुनिक ज्योतिष के ग्रन्धकारो ने बदल कर अपना पक्ष सिद्ध करने के लिये ऐसा पाठ कर दिया है-"माणेनैति फला अर्थात् राशिचक्र ( राशिचक्र ) फला २ करके चलता है। यह पाठ ब्रह्मगुप्त के समय तक ठीक था, क्योकि ब्रह्मगुप्त ने अपने ब्रह्म सिद्धान्त में पृथिवी के भ्रमण का खण्डन किया है, उस में लिखा है कि- प्राणेनैति कलां भूर्यदि कुतो व्रजेत् कमध्यानम् । आवर्तनमुाश्चेन पतन्ति समुच्छ्रयाः कस्मात् ॥ ब्रह्मसिद्धान्त अध्याप ११) अर्थात्-यदि पृथिवी कला २ करके चलती है तो किस रास्ते से कहा जाती है. यदि पृषिधी चलती है तो कोठे आदि सच स्थान क्यों नहीं गिर जाते ॥ पुन आर्यभट लिखते है कि- भूमिका. अनुलोमगतिर्नेस्थिः पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत् । अचलानि भानि तद्वत् सपश्चिमगानि लड्कायाम् ॥ (मासिक गोलपाद) अर्ध-जिस प्रकार नौका में बैठा हुआ मनुष्य किनारे की स्थिर चीजो को दूसरी ओर को चलते हुवे देखता है। ऐसे ही मनुष्यो को मूर्यादि नक्षत्र जो स्थिर हैं, पश्चिम की ओर चलते हुए दीराते है और प्रथिवी स्थिर मा लूम होती है, परन्तु वास्तव में भूमि ही चलती है।युन आर्यभट्ट लिखते हैं- भपञ्जर: स्थिरोभरेवावृत्यावृत्य प्रतिटवसिको उदयास्तमयौ सम्पादयति ग्रहनक्षत्राणाम् । ( आर्यसिद्धान्त गोलपाद ) अर्थ-भूर्यादि सब नक्षत्र स्थिर है, पथियो ही बार २ अपनी धुरी पर घूम कर प्रति दिवस इन के उदय और अस्त का सम्पादन करती है और अमरकोप में (अङ्गारक कुगो भीमो लोहिताडो महीसुत ) मङ्गल ग्रह के नामो में "महीपुत्र या “महीज" नाम लिसा है, इस का फारणा यही जान पडता है कि पृथिवी की कक्षा (धमण भाग) के बाद महल की कक्षा है । इस लिये मही से उत्पन्न महल को लिखा है, यदि पृथिवी न चलती होती तो उस के भ्रमणमार्ग की व्यवस्था ऐमी क्यो लिखी जाती ।। पृथिवी भ्रमण में अर्वाचीन ग्रन्थकारो की सम्मति घरामिहिर ने लिखा है - भ्रमति भ्रमस्थिते क्षितिरित्यपरे वदन्ति नोडुगणाः । यदोवं श्याना न खात्पुनः स्वनिलयमुपेयुः ॥६॥ अन्यच्च- भवेदभूमेरहाममरंहसाध्वजादीनाम् । नित्यं पश्चात् प्रेरणं यथाल्पगा स्यात् कथं भ्रमति ॥७॥ पञ्चसि०अ०१३॥ अर्थ-जिस प्रकार लोहार के भ्रमयन्त्र स्थित लोहे का गोला घूमता उसी प्रकार भ्रमपन्त्र में ठहरी हुई सी पृथिवी घूमती है, नक्षत्रगण नही । इस प्रकार यहुत से आचार्यों का मत है, (खण्डन) परन्तु यदि पृथिवी भ्रमण करती है तो आकाशगामी पक्षिगण अपने २ घामले को नहीं पाते अर्थात् १६ मयसिद्धान्त पृथिवी को घूमती मानते तो पक्षियो के घोमठे (पृथिवी के भ्रमण से) अपनी पहिली जगह को छोह फर दूसरी जगह मे होजायें, इस लिये पक्षिगण अपने घोमले पो नहीं पा सकते और यदि एक ही दिन मे पृथिवी का भ्रमण हो तो भ्रमण वेग से कोठे मन्दिरादि की पताकादिका नित्य पश्चिमाभिमुख गमन हो। यदि कहो कि पृथिवी की मन्द गति के कारण ऐसा होता है तो एक ही दिनमे मन्द गति से पूरा भ्रमण फ्यो कर होता है। इस के टीकाकार भो महामहापाध्याय परिष्ठत मुधाकर द्विवेदी मोके. सर ( ज्योतिष के ) मस्कृत कालिज बनारस लिखते हैं कि- एतेन वराहमिहिरेण भूवायुसहितायाः पृथिव्याः प्रागममणं न बुद्धमिति ज्ञायते ॥ पुन- ध्वजादीनां पश्चिमाभिमुख सञ्चलनमिदमपि खण्डनं भूवायु सहितायाभूमेः प्रागभ्रमणेन व्यर्थमेवास्तीति शेयमिति ॥ अर्धात्-इस से मालूम होता है कि यराहमिहर को पृथिवी का भूयायु के सहित भ्रमण करना समझ में नहीं आया। और यह जो पताका का पश्चिमाभिमुख सचलन रूप खण्डन किया है यह श्री पृथिवी भूयायुतहत घूमने के खण्डन में व्यर्थ की है ऐसा जानमा इत्यादि। इस से पाठकगण भली भाति ममझ जायेंगे कि उन महामहोपाध्याय की भी पृथिवी का भ्रमण युक्ति और प्रमाण युक्त ममझते हैं एव अस के पक्ष- पाती हैं और यह प्राचीन सिद्धान्त है ॥ जयति स जगदीशो यस्य नानाविधानामचरचरच- यानां निर्मिती क्वापि नाभूत् । कथमपि लघु साध्यं क- हिचिट् गौरवेण विरचितमिह नूनं चेतनं वा जडंवा । अथ प्राचीन ज्योतिःशास्त्राचार्याशयवर्णनम् इह सलु ग्रहभ्रमणविषयेट्वे मते तावत् सुप्रसिद्ध । एक भूः स्थिरा ताममितश्च सूर्यादयोग्रहा भ्रमन्तीति । अन्यच्च- ७७ भूमिका रविरचलस्तं परितः सभूमय: सर्वग्रहाः पर्ययं कुर्वन्ति ॥ तत्रादरमतवादिनः प्रत्येक ग्रहः पूर्वदिशं चरन् यावता कालेन भुवमभित एक भगणं पूरयेत् तस्मात् कालादनुपा- तेन ग्रहस्यकदिनसम्बन्धिनी समानां गतिं निश्चित्य ताम- ध्यमामभिदधानास्तस्याः सकाशादभीष्टकाले खेटस्य भच- केवगतं स्थानं मध्यमग्रहशवदेन व्यवहरन्ति । एतन्मते रवि. ज्ञशुक्राणां वसुमत्याः समन्तादेकेनैव हायनेनैकं भ्रमणं भव- तीतितेपांमध्यमा गतिस्तुल्यैवजायते।तथैव मध्यमस्थानमपि अन्त्यमतवादिनस्तु प्रत्येक खेटस्य सूर्यमभितः परि भमणकालमवगम्य तत्र मते बुधशुक्रयोर्मध्यमे गती स्थाने चादामतीयाभ्यां गतिभ्यां स्थानाभ्यामन्योन्यं च भिदोते । सूर्यमभितो भगणपूर्तिकालस्य भेदात् । सूर्यभूम्योरन्तरे कदाचिदप्यसंचरतां कुजजीवरविजानां तु मध्यमगतयः स्थानानि चासमतीयाभ्योगतिभ्यः स्थानेभ्यश्च न भिदान्ते यतस्ते प्रत्येकं तरणिं धरणिं च तुल्येनैव कालेन परिभ्रमन्ति। तत्र भारतवर्षीयाः सकलमूलग्रन्थकाराः सर्वैग्रहास्तरणि परितोममन्तीत्यभिप्रेत्य ग्रहपातगणान् निरणायिपतेत्येत- दुपपादनार्थमुच्यते ॥ द्वयोरपि मतयोर्वादिभिर्विक्षेपकेन्द्रार्थ मन्दस्पष्टे ग्रहे पातस्य योजनमङ्गीक्रियते । ग्रहाणां विक्षेपकेन्द्रमप्युभयत्र समानम् । तत्र ये मध्यमा ग्रहा उभयमतेऽपि समाना अत एनस्वस्वमन्दफलसंस्कृताअपि- भापार्थ- प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के आचार्यों का आशय वर्णन - १. मृमंमिहान्त इस भारतवर्ष में यहो के भ्रमण विषय में दो मत हैं । एक पथिवी अचला और इम की चारो और मूर्य एव अन्यान्य ग्रह भ्रमण करते हैं। दृमरा मूर्य अचन और उस की चारो ओर भय ग्रह भ्रमण करते हैं । इन में प्रथम वादिगण प्रत्येक ग्रह पूर्व दिशा को चलते हुवे जितने काल में भूमि को चारो ओर एक भगण पूरा करते हैं, उस काल से अनुपातद्वारा ग्रह के एक दिन सम्बन्धि समानगति का निश्चय कर, उस की "मध्यमगति" सज्ञा रक्ख एव उस से इष्ट काल में ग्रह का राशिचक्र में स्थान निश्चय करते हैं। जिस को "मध्यग्रह" करते हैं । इस मत के अनुमार मूर्य युध,शुक्र, क,पथिवी का एक ही वर्ष में पूरा धमण होता है । उन की मध्यमगति तुल्य ही योध होती है। इसी प्रकार मध्यम स्थान भी ॥ और अन्त्य मतवादिगण तो प्रत्येक ग्रह का सूर्य की चारो ओर काल को जान कर इस मन में बुध, शुक्र के मध्य मगति और स्थान प्रथम वादिगण के गति और स्थान में एक दूसरे से भेद पहता है । सूर्य को चारो ओर भग पूर्ति काल के भेद के कारण से सूर्य और भूमि के अन्तर कमी भी बिना घले मङ्गल, यहस्पति और शनि के मध्यमगति और स्थान यम वादिगण के गति और स्थान से नही भेद पडता। जिस कारण प्रत्येक ग्रह सूर्य और पुषिधी इन दोनो की चारो ओर परिभ्रमण समान ही काल में करते हैं। सन में से भारतवर्षीय सब मूल ग्रन्थकारो का यह मरा है कि सब ग्रह सूर्य को चारो आर परिभ्रमण करते हैं। इसी अभिप्राय से ग्रह पात भगणो का निर्णय करने के विचार से इस की उपपत्ति कही जाती है। दोनो मत वा. दिगण विक्षेप केन्द्र के लिये मन्द स्पष्ट ग्रह में पात का योग करना स्वीकार करते हैं। ग्रहो के विक्षेप केन्द्र भी दोनो मतो में समान हैं । उन में जो मध्यम ग्रह हैं, वे दोनो मत में तुल्य हैं । अतएव अपने २ मन्द फल सस्कृत ग्रह भी- साम्यं न जहति तेषां पाता मतद्वये तुल्या एव स्युः । 'विक्षेपकेन्द्रस्योभयत्र तुल्यत्वात् । यथा कुज गुरु शनी- नाम् । अत एव तेषां पठिताः पातभगणा अप्युभयत्र समानाः। मध्यमौ बुधशुक्रौ त्वाददमते मध्यमसूर्य- तुल्यौ । अन्त्यमते च मूलग्रन्थोक्तशीघ्रोच्चसमानौ यत भूमिका se एतन्मते बुधस्य किंचिदूनाष्टाशीति सावनदिनैरेकं भ- गणं पूरयतः प्रत्यहं स्वकक्षायांद्वात्रिंशद्विकलाधिकप- ञ्चचत्वारिंशदुत्तरशतद्वयमितकलारूपा गतिः शुक्रस्य चेपन्न्यूनः पादोनतत्त्वदसैः कुदिनैरेक पर्ययं कुर्व तोऽनुदिनंनिजमार्ग विकलाष्टकाधिकपण्णवति कला- त्मिका मूलग्रन्थेषु तत्तच्छीघ्रोच्चगतित्वेनोपन्यस्तेति तयो: पातौ नोभयमते तुल्यौ । विक्षेपकेन्द्रस्य तुल्यत्वे- ऽपि मध्यमस्य भेदात्। अतएव तयोः पातभगणाभ्यां मध्येनोभयत्र तुल्याभ्यां भाव्यम् ।तावेतो पातावस्म- न्मूलग्रन्थकारैर्मन्दस्पष्टयोर्बुधशुक्रयो प्रक्षिप्येते। अ- पितु मन्दफलसंस्कृते तत्तच्छीघ्रोच्च इत्यतः स्फुटमे- तदवगम्यते यत् पठितेभ्यः सूर्यकेन्द्रकभ्रमणभगणावि- रुद्धेभ्यो भगणेभ्य उत्पन्नेपु मध्यमेष कुजजीवरविजेपु प्रक्षेपयोग्यंतद्विरुद्धेभ्य उत्पन्नयोश्च बुधभार्गवयोःप्रक्षे- पायोग्यं तत्तच्छीघ्रोच्चे च प्रक्षेपयोग्यं पातं साधयन्तः पठिता ग्रहपातभगणा भूलोक्तवुधशुक्रशीघ्रोच्चरूपम- ध्यमवुधशुक्रसम्पादकतरणिकेन्द्रकभ्रमणवादिमतीया इति । कथमन्यथा मध्यमबुधशुक्रप्रक्षेपयोग्यापात- सम्पादकाः शीघ्रकेन्द्रभगणाधिकाः पातभगणा न प. ठोरन् । अतएव भौमादीनां पञ्चानामपि ग्रहाणां सूर्य- केन्द्रकं भ्रमणं भूलकाराणामभिमतमित्यवसीयते।अ. न्यथा तन्मतीयपातभगणपठनानौचित्यात् । ननु ज्ञशुक्रयोः सूर्यकेन्द्रकंभ्रमणमस्तु मूलकाराणा- A मूम्पमिद्धान्त मभिमतम् । आदामतविरुद्धानां तयोः पातभगणानां पठनात्। कुजजीवरविजानां तु भूमिकेन्द्रकमेव स्यान्न सूर्यकेन्द्रकम्। तत्पातमगणानामादरमताविरुद्धत्वादि- ति चेन । रविकेन्द्रकभ्रमणास्त्रीकारे सूर्यस्यभौमादि- शीघ्रोच्चत्वानुपपत्या रविकेन्द्रकभ्रमणस्यैत्र मूलका- राभिप्रेतत्त्वात् ॥ भापार्थ: -तुल्यता नहीं छोड़ते उन के पात दोनों मतों में तुल्य ही हैं । विक्षेप केन्द्र दोनों मतों में तुल्य होने के कारण। जिस प्रकार मङ्गल, गुरु, एवं शनि का । अतएव उन के फहे हुवे पात प्रगण भी दोनों मतो में तुल्य हैं। मध्यम युध और शुक्र तो आद्य मत में मध्यम सूर्य के तुल्य हैं और अ. न्त्यमत में तो मूल ग्रन्धोक्त शीशोच के समान हैं। जिस कारण इस मत में धुध का कुछ न्यून ८० सावन दिन में एक गण पूरा होता है। प्रतिदिन अपनी फक्षा में २४५ फला २२ घिफला चलता है और शुक्र तो कुछ न्यून २४२ सावन दिन में एक बार घूम आता है और प्रतिदिन अपने मार्ग में ६ फला ८१ विकला चलता है ( अपनी धुरी पर ) मूल पन्धों में उस को शीघ्र ध गति कहकर लिसा है उन के पास दोनों नतों में तुल्य नहीं है । विक्षेप केन्द्र के तुल्यत्य में भी मध्यम के भेद के कारण । अतएव दीनो के पात एवं भगणद्वारा भी दोनों मतो से दोनों तुल्य नहीं होना चाहिये। ये दोनों पात हमारेभूल पन्थकारों द्वारा मन्द और स्पष्ट के धुध और शुक्र के प्रक्षिप्त नहीं किये जाते है, अर्थात् इन फा विक्षेप नहीं होता। प्रत्युत मन्दफल सस्कृत में उस २ शीघ्रोच में साफ २ जान पड़ता है जो कहे हुवे सूर्यकेन्द्रक भमण भगण अधिरुह भगण से उत्पन्न मध्यम मङ्गल रह- स्पति, मूर्य में प्रक्षेप योग करना और उम के विरुद्ध उत्पन्न बुध और शुक्र के मलेप को नहीं जोडना और उसके शीघ्रोच्च में प्रक्षेप योग करना पात को स्थिर फरता हुवा कहे हुवे ग्रहपात भगण मूलक युध, शुक शीघ्रोच रूप मध्यम बुध, शुक्र सम्पादक सूर्यकेन्द्रकभ्रमणवादिगण के मतानुसार हैं। नहीं तो क्यों नहीं मध्यम बुध, शुक्र प्रक्षेप योगपात सम्पादक शीघ्रोच्च फेन्द्र भगण -- 7 भूमिका "८१ अधिक पात, भगण कहने घाहिये। इस लिये भौमादि ५ ग्रहों के सूर्यकेन्द्रक श्रमण मूलमन्धकारों का अनिमय था। नहीं तो उन के मतानुसार पात. भगण लिसना अनुचित था। मान लो कि रहस्पति शुक्र का सूर्य केन्द्रक भ्रमण मूडग्रन्थों का अभिप्राय हो। आमत के विरुद्ध उन के पातभरण पाट से'। महल सहस्पति एव शनि.का तो भूमिकेन्द्रक ही हो, सूर्य केन्द्रक नहीं, यदि उस पातागण के आद्यमत के अविरुद्ध हो सो नहीं । सूर्यकेन्द्रक भ्रमण न भागने से सूर्य का भौमादि शीघ्रोचत्व को अनुपपत्ति द्वारा सूर्यकेन्द्रक भ्रमण फा ॥ तथाहि- भूमेरतिदूरोग्रहकक्षायाः प्रदेशो ग्रहस्य शीघ्रोच्चम्। " उच्चस्थितो व्योमचरः सुदूरे नीचस्थितः स्यानिकट धरियाः" इत्युक्तत्वात् कक्षान्तर्गताया भूमेनिर्गतया केन्द्रस्पृशन्त्या रेखया स्टष्टः कक्षामदेश एव च भूमे रतरः स च रवेः केन्द्रगतत्वाभावे रविसम्मुख एव किमिति स्यात्केन्द्राति- रिक्तस्थलस्थस्य रवेः केन्द्रसमानगतिकस्य मूरदभिप्रेतत्व- कल्पनमपेक्ष्य तु रवेरेव केन्द्रत्वकल्पनाया लघीयस्या मूलक- दभिप्रेतत्वकल्पनमुचितम् ॥ न च सूर्यमभितो ग्रहभ्रमणमभिमयतामाझाचार्याणां भूमि परितो समणप्रदर्शनमसंगतनिति वाच्यम् । लोक- प्रतीत्यनुसृतये लाघवेन गोलपियवगतये च सूर्यधर्माणां धरण्यामारोपणस्य तैरडीकरण: तदेवमारोपरसिका नाचार्या योधलाघवं लोकमतीति चानुसरन्त एव कल्पनालाघवेन सिद्धोऽपि तरणिसहितस्य भपज्जरस्य धरण्याश्चाचतत्ववलले अन्योन्यमिला- रोप्येव तरणिं भचक्रं च चलं धरणिं चाचता पर्षयां- सूर्यसिद्धान्त चरित्यपि प्रतीयते । भवति हि लाघवमयं रविः प्रातस्त- त्रस्थ इदानीमत्रास्तीति बोधयितुम्। जानन्तिचैवमेव लो. काः । एवं रवेराश्यन्तरसंचारमपि । कल्पनायां तु भवत्येव तरणधरणिं परितो भ्रमणस्याङ्गीकरणे तरणिं परिभ्रमतां व्योमचारिणामपि भुवमभिभ्रमणमनायत्या स्वीकृतमिति गौरवम् । मतान्तरे च धरणेरेकस्या एवेति लाघवम् ॥ तदेवं भूमेर्मूलोक्तस्य भचक्रभ्रमणस्य सजातीयं स्वाक्षं परितो भ्रमणं रविभ्रमणस्य सजातीयं क्रान्तिवृत्ते भ्रमणं च मूलकाराणामभिप्रेतमिति सिद्धम् ॥ स एप विपयोऽर्वाचीनैर्ग्रन्थकारैर्न व्यज्ञायि । यतस्तेषु केचन कुजगुरुरविजेपु पातं संयोज्य साधिताद विक्षेपके- न्द्राच्छरस्यानयनमुपलब्ध्यतिरिक्ता- भाषा,-मूलग्रन्धकारो के अभिप्राय से उसी प्रकार, भूमि से अतिदूर ग्रहकक्षा का प्रदेश ग्रहो का शीघ्रोच्च होता है। "उच्चस्थित आकाशगामी अत्यन्त दूर मे एव जोधस्थित होने पर पृथियो के निकट"ऐसा करने पर कक्षान्तर्गत भूमि से निकला केन्द्र को छूती हुई रेखा से स्पर्श करता हुवा कक्षाप्रदेश में भी भूमि अधिकतर दूर और यह मूर्य के केन्द्र गतत्व के अन्ताय से मूर्य सम्मुस ही क्या हो । केन्द्रातिरिक्तस्य स्थल का सूर्य के केन्द्र समानगतिक का मूलग्रन्धकार के अभप्राय की कल्पना की अपेक्षा करके सूर्य ही केन्द्रत्य थोड़ी कल्पना करके मूलग्रन्धकार का अभिप्राय कल्पना उचित था और न गूर्य को चारों ओर ग्रहश्रमण प्रदर्शन असंगत है, ऐसा कहमा चाहिये । लोक की प्रतीति का अनुसरण करने के लिये एवं थोहे उपाय से गोठस्थिति समझने के लिये भूर्यधर्म (अचल होना) पृथिवी में भारोपण करके उनके मानने से। इस प्रकार आरोपण करने वाले आचार्य योपलाघव और लोकप्रतीति को अनुसरण करते हुवे लघुकल्पनामात्र से सिद्धहुधे यूर्यसहित सशिक्षक और एथिवी के अवलय और चलत्व में एक ३ भूमिका दूसरे में आरोपण कर सूर्य एव राशिचक्र को सचल और पृथिवी फो अघला वर्णन किया है ऐमा जान पड़ता है । यह लाघव भी है कि प्रातःकाल सूर्य यहां है, अय यहां है इत्यादि । इस प्रकार समझना सहज है । लोकभी ऐसा ही जानते हैं। इसी प्रकार एक राशि से दूसरी राशि में जाना (लोक में व्यवहार है कि इस माम में सूर्य मेष राशि में है पुनः वपमें जावेगा इत्यादि) कल्पना की जाती है ( वस्तुतः नहीं ) कल्पना करलेने से कि एशियी के "धारों और सूर्य भ्रमण करता और सूर्य के चारों और ग्रहादिक भ्रमण करने वाले एथिवी के चारों ओर भ्रमण करते हैं। इस प्रकार अङ्गीकार करने में " गौरव " ( समझना कठिन) है। किसी के मत में एधिवी ही का भ्रमण लाघय है । सो इस प्रकार भूमि का मूलग्रन्यो भचक्र भ्रम फा भजातीय अपने अक्ष पर परिभ्रमण करना और सजातीय क्रांति मृत्त में भ्रमण करना मुलग्रन्थकार का अभिमाय सिद्ध है। मो इस विषय को नबीन ग्रन्थकारों ने नहीं समझा जिस कारण उन में कोई २ मङ्गल, गुरु, शनि में पात की जोड़ कर साधित विक्षेप केन्द्र से शर का लाना-- उपपत्तिसहितं मन्यमाना बुधशुक्रयोः शीघ्रोच्चे पात- प्रक्षेपेण शरानयनमुपलब्ध्यतिरिक्तोपपत्तिरहितमवगम्य बुधशुक्रयोः शीघ्रोच्चस्थाने यावान् विक्षेपस्तावानेव यत्र कुत्र स्थितयोरपि तयोर्भवतीत्यत्रोपलब्धिरेव वासनेत्याहुः। अन्ये च बुधशुक्रयोलग्रन्थेषु पठितान्वास्तवानपि पात- भगणानवस्तुभूतान्त्वल्पतया सुखमानार्थकांश्चाहुः । देव- गत्यार्यभटस्य बुद्धिपथमारुढम्- “अनुलोमगतिस्थिः पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत् । अचलानि भानि तद्वत्समपश्चिमगानि लङ्कायाम् " इत्यादिना प्रकाशितमपि भचक्रस्याचलत्वं क्षीण्यान स्वाक्षं परितो भ्रमणम् ब्रह्मगुप्त: आवर्तनमुश्चेिन्न पतन्ति समुच्छ्याः कस्मात् इत्यनेनं भ्रमणप्रारम्भोत्तरकाले संयुक्तानां पृथ्व्याप्टानां मूर्यसिद्धान्त वस्तूनां पतनाभावमजानन् प्रारम्भकालिकत्रमणस्वभावमे- वावगच्छन्नपालपत् । लल्लश्च- "यदि च भ्रमति क्षमा तदा स्वकुलायं कथमाप्नुयुःखगाः । इपवोऽपि नभः समुजिता निपतन्तः स्युरपांपतेर्दिशि ॥ पूर्वाभिमुखे भ्रमे भुवो वरुणाशाभिमुखो व्रजेटुघनः । अथ मन्दगमात्तथा भवेत्कथमेकेन दिवा परिभमः ॥ इत्यनेन भूवायुसहितायाःक्षितभ्रमणमजानन्त्रीपतिश्च- “यदोवमम्बरचरा विहगाः स्वनीडमासादयन्ति न खलु भ्रमणे धरित्र्याः । किजाम्बुदा अपि न भूरि पयोमुचः स्युर्दै- शस्य पूर्वगमनेन चिराय हन्त ॥ भूगोलवेगजनितेन समो- रणेन केत्वादयोऽप्यपरदिग्गतयः सदा स्युः । प्रासादभूधर- शिरांस्यपि संपतन्ति तस्माद्धमत्युडुगणस्त्वचलाऽचलैव"॥ इत्यनेनोभयमप्यजानन् । मापार्थः-उपलब्धि को छोड़कर उपपत्ति सहित मानने वाले बुध शुक्र के शीघ्रोच्च में पात प्रक्षेपवाग शर का लाना उपलब्धि को छोड़ कर उपपत्ति. रहित जान कर बुध शुक्र के शांघोच्च स्थान में जितने विक्षेप हैं उतना ही विक्षेप जिस किमी स्थान का हो उन दोनों का होता ही है । इस में उप. उब्धि ही उपपत्ति है। यहुत से लोग युध शुक्र को मूलगन्ध में पढ़े हुवे वास्तविक पातागणों को न्यूनतया मुन्न पूर्वक समझने के लिये कहा है । देवगति से आर्यमा युद्धिपए पर आरूढ लिखते हैं- "जिस प्रकार नौका में बैठे हुवे मनुष्य को पर्वतादि किनारे की अचल (उहरी हुई ) वस्तुए उलटी और को चलती हुई दिखलाई देती हैं। ऐसे ही पूर्व की ओर को चलती हुई एषियो पर रहने वाले मनुष्पो को अचल (स्थिर ) तारे भी पश्चिम को जाते हुवे दिसलाई देते हैं । इत्यादि द्वारा पृषिषी का भ्रमण एवं राशिचक्र का अपलत्व प्रकाशित फरने पर पी व्रामगुप्त ने समझफर नही लिखा है कि- भूमिका "यदि पधिवी भ्रमण करती तो कोठे आदिक कंघी वस्तु क्यों नहीं गिरती" इस से घमण प्रारम्भोत्तर काल में पृथिवी के आकर्षणशक्ति से इस के ऊपर की वस्तु नहीं गिरती,इस बात को न समझकर प्रारम्भकालिक भ्रमण स्वभाव ही को केवल मुनकर लल्ल ने लिया है फि- "यदि पृथिवी भ्रमण करती है तो पक्षिगण अपने घोंमले को क्योंकर पहुं. चसे हैं ? आकाश में छोड़े हुवे वाण पश्चिम दिशा में क्यों गिरते हैं । पूर्व की और पृथिवी का भ्रमण होता है तो पश्चिम में वाण गिरते हैं। यदि कहो कि पृथिवी की मन्दगति से ऐसी घटना होती है तो एक ही दिवस में अपने मक्ष पर क्योंकर भ्रमण करती है? इत्यादि ट्वारा भूवायुसहित पृथिवी के भ्रमण को न समझकर श्रीपति ने लिखा है कि.-- ननु तरणिमभितो धरणे: क्रान्तिकृत्ते भ्रमण स्वीकृते रवेरिव नक्षत्राणामपिस्थिराणामुदग्दक्षिणायनंध्रुवतारोन- तिभेदरचोपलभ्येत । न चापरिमेयां भचक्रदरतामपेक्ष्य धर- णिभ्रमणमार्गस्यात्यन्तमणुतयान तथोपलब्धिरिति वाच्यम्। भकक्षादूरतायाः पष्टिगुणरविकक्षादूरत्वतुल्याया एव । "भवेदभकक्षा तीक्षणांशोभ्रमणं पष्टिताडितम्" । इत्या- दमागमाभिहितत्वादिति चेन्न । छेदके कक्षावृत्ते प्रतिवत्ते चैकस्यामेव दिशि मेपादिस्थितिमादयाचार्याणामपरिमेय- स्यैव भचक्रटूरत्वस्याभिमततया तद्विरुद्धमुपपत्तिशून्यं दूर- त्वं बोधयतस्तस्य वचनरयानभिज्ञप्रक्षिप्ततायाः स्फुटमेव, प्रतीयमानत्वादिति शम् ।। प्राचीनज्योतिषाचार्यवर्याणामेवमाशयः । वापुदेवाभिधानेन यथावुद्धिप्रदर्शितः ॥ इदमाशयवर्णनं मया गजनागाद्रिकुसम्मिते शके । रचितंसुहृदांमहीभ्रमभ्रमिणांगोलविदांविदांमुदो।इति सूर्यसिद्धान्त 'भापार्थः-सूर्य की चारों ओर पथिवी का कान्तिपत्त में भ्रमण मानने से सूर्य की नाई स्थिर नक्षत्रों का भी उत्तरायण एवंदक्षिणायन एवं ध्रुवतारा की उन्नतिभेद प्रतीत होवे। और न पचक्र की अपरिमेय दूरता की अपेक्षा पृ. पियी का भ्रमण मागं की तुलना अणुमात्र है इम लिये उस प्रकार प्रतीत नहीं होता ऐसा कहना चाहिये। राशिचक की कक्षा की दूरता से ६० गुणा मूर्यकक्षा की दृरता की तुलना है। सूर्य की कक्षा भ्रमण ६० गुण भचक्र की कक्षा से होता है" इत्यादि शास्त्रोक्त होने से। यदि कहो सो नहीं । प्रवृत्त छेद्यक कक्षावृत्त में एक ही दिशा में मेषादि स्थिति आद्य आचार्यो का अपरिमेय भचक्र को दूरता के अभिप्राय- उन के विरुद्ध उपपत्तिशून्य दूरत्व समझाने के लिये यह वचन साफ २ मक्षिप्त है। यदि पृथिवी चलती है तो सेघर पक्षिगण अपने २ घोंसले को क्योंकर पहुंचते हैं। और मेघ वार २ नहीं वर्षता। देश के पूर्व गमन से भूगोल के वेगसे वायुद्वारा पताका भी दूसरी दिशा में होजाती और कोठे पहाड़ की चोटियां टूटकर गिरजाती इस लिये नक्षत्रगण भ्रमण करते हैं, पृथिवी अचला ही है। इस से दोनों ने न ही ममझकर। प्राचीन ज्योतिष शास्त्र के आचार्यवों ही के आशय वर्णन में (वापूदेव शास्त्री) ने अपनी युद्धि अनुमार दिसलापा और यह आशय वर्णन मैंने शाके १७७८ में गोलविद्यावित् मज्जनों के लार के लिये जिन्हें महीभ्रमणा में भ्रम होता है लिसा॥ १ युग+कल्प काल यद्यपि बहुत लोग यह भी कह सकते हैं कि काल ही धर्म की हानि और वृद्धि का कारण है। जैसा कि अनेक संस्कृत के ग्रन्धों में लिखा है कि "कलि फाल में सनातन भार्यधर्म नष्ट होके विविध पासण्ड मत प्रवृत्त होगे इसी प्रकार इन दिनों देख भी रहे हैं कि आर्यधर्म उच्छिन्न होता जाता है तो पहिये क्या अय आर्यधर्म की उन्नति हो सकती है ? इत्यादि कह कर कितने परिहत धमन्निति से उपेक्षा करते हैं, परन्तु यह एकमात्र उन को आलस्य- परायणता ही है और अपने आलसी चित्त को तक वचनों का झूठा सहारा हम पूछते हैं कि शास्त्र की किस बात को लेके फलिकाल में धर्म की हानि पुकार रहे हैं ? या केयल काल ही धर्महानि का कारण है या और ६ कुपय में गेरना है।
८७ भूमिका भी कुछ ? यदि काल ही है तो यह साधारणरूप से धर्म का हास करता है, अथवा कलित्य धर्म के संयुक्त होने से ? प्रथम ती काल कुछ एक स्वतन्त्र वस्तु ही नहीं है, जो उम की किसी कार्य के प्रति फारणता या अकारणता मानी जाय,क्योंकि अधिक पाठ और न्यून काल" इत्यादि व्यवहार पृथिवो के भ्रमण यशात् मूर्य द्वारा परिप्पद किया ही की अधिकता वा न्यूनता हो जायगी। जो पृथिवी की चलनक्रिया अपेक्षाकृत कुछ अधिक हो गई है. यही अधिक काल एव जब वह न्यून है, वही न्यून काल कहा जायगा । मुतरां और २ उपवहार भी सा इसी प्रकार सम्पमा हो जायगे, फिर कहिये फाल क्या कुछ यस्तु शेष रहा ? मुतरां पृथियो की चलनक्रिया समूह का नाम काल रहा और परिप्पन्द क्रिया तो सत्ययुग से आज तफ सदा एफ ही रूप से चली आती है, पुनः उस समय धर्महानि नहीं हुई और अब ही हुई. इस फा विशेष कारण कुछ काल हो को नहीं कह सकते । हां, जिम प्रकार सभी पदार्थ जो अगत् में उत्पन्न होते हैं, उन के प्रति दिशा प्रागमाय एवं ईश्वरादि (वैशेषिकशास्त्रोक) कारण होते हैं । इस प्रकार काठ भी एक साधारण कारण है । यह ईश्वरीय नियम अनादिकाग से एक प्रकार से चला आता है । या सत्ययुग, त्रेता, द्वापर, कलि या मन्वन्तर और कल्प सब समयों में जिस प्रकार ईश्वरीय नियम से स्वभावतः जल में शीतलता, अग्नि में उष्णता आदि गुण हैं, इसी प्रकार जितने पदार्थ हैं ममी के लिये उम के अविचल नियम हैं। हम इम का प्रमाण देते हैं:- कलिः शयानोभवति संजिहानस्तु द्वापरः। उत्तिष्ठरत्रे- ता भवति कृतं सम्पदसते चरन् । ऐ० प्रा०३३ । १५ ॥ अर्थात्-धर्म के फागों में मनुष्य जय तक (शयान.) आलस्य किये पड़ा रहता है तब तक उस मनप्य की कलि सज्ञा है। जब भालस्य को त्याग देता है तब यह द्वापर कहलाता है। जब कमर बांध के धर्म के कामों में सहा होता है तब वह वेता कहलाता है और जय धर्म को यथावत् रीति से सेवन फरता है तो वह सत्ययुग कहलाता है ।। पाठक'। देखिये यहां उक्त प्रमाण से कलिस्य आदि धर्म स्पष्ट २ मनुष्य ही में प्रतिपादन किये गये हैं कुछ काल में नहीं,तथा मनुष्यों ही के कारण उक धर्म काल में भी फहे जा सकते हैं । अतएव काल ही केवल धर्म था मृप्यसिद्धान्त फार्य की हानि वृद्धि में मुख्य कारण होता नही है,वरन मनुष्यो की शिथि- लता आलस्य वा उद्याग का अभाय ही हानि का कारण होता है। अनेक लोगो का कथन है कि मन के स्वाभा व गुण ऋतु में अवश्य ही होते हैं, किसी के टाले नही टलते । इस लिये मत्ययुग आदि में जो धर्म- वृद्धि और हास आदि गुण हैं वे अवश्य ही होगे। हम कहते हैं कि कहने वाले फा अपने आप न शोचना चाहिये कि ऋतुओ के परिवर्तन मे भी मूर्य की गति एव तत्तद्देश विशेष आदि अन्यान्य कारण हैं जिन की काय कारणता से ऋतुओ में तत्तद्गुण प्राप्त हो सकते हैं । माईवीरिया द्वीप में क्यो घसन्त मतु नहीं आता? अथवा इङ्गलेण्ड देश में यहा की नाई प्रेमिक अन्न क्यो नही उत्पन्न होते ? अतएव सिद्ध हुआ कि कालरुत कार्यो में हानि या एद्धि नही होती। जिस प्रकार दिन रात महीना वर्ष आदि काल की सजा है इसी प्रकार सत्प, त्रेता, द्वापर, कलि आदि काल की सजा है।प्राण, नाष्टी दण्ड आदि का वर्णन पूर्ण रीति से मृ०अ०१मे किया गया है। इस लिये यहा उम के परिमाण का वर्णन नह होगा, परन्तु वेदो के प्रमाण मात्र दिये जावेगे याओपधीः पूर्वाजाता देवेभ्यस्त्रियुगंपुरा ॥ ऋ० १०॥९७१ मग्वेद में अनेक स्थानो मे (१.१८ १ । १५८ । ६ १।१४।३. ३.२६ । ३, ३ । ३३ ८आदि) युग शब्द भाया है, परन्तु कत, बता द्वापर,कलि ( सपरिमाण ) के विभाग प्रम मे नही आया सामान्यत क लवाची हैं । जो ओषधिया पूव तीनों युगो में विद्वानो द्वारा जानी गई हैं । अर्थात् वेद मे युग का नाम तो नहीं आया है,परन्तु युगो के वर्ष सरया परिमाण दिये है- शतं ते अयुतं हायनान्वे युगे त्रीणि चत्वारि कृएमः ॥ ( अथर्व ८ । २।२१) अर्थात् १२००० दिव्य वर्षरूप युग के दशये भाग को चार तीम दो एक से गुणा करने पर कम से सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग की दिध्यवर्ष सरुया होगी । (देखो मूर्य सिद्धान्त अ०१ मनुस्मृति में भी युग काल विशेप का नाम माना है जैमा कलिः प्रसुप्तो भवति सजाग्रत् द्वापर युगम् कर्मस्वभ्युदातस्त्रेदा विचरंस्तु कृतं युगम् ॥ मनुस्मति । ३०१-३०२ अर्थ- -इस का अर्थ उसी प्रकार है,जैसा फि ऐ०या०३३।१५ का किया गया है । - B भूमिका अक्षराजाय कितवं कृतायादिनवदर्थ त्रेतायै कल्पि- नं द्वापरायार्धकल्पिनमास्कन्दाय सभास्थाणुम् ॥ ( यजुर्वेद उ० अ० ३२ ॥ १८) . कृताय सभाविनं। त्रेताया आदिनमदर्श । द्वापराय बहिस्सदं । कलये सभास्थाणुं ॥ तै० ब्रा०४।३।१॥ भापार्थः-एसी प्रकार ऐतरेय ब्राह्मण में भी चार युगों का उल्लेरा है, परन्तु तकीहार्य पाशाका भिन्न २ अयस्थान मात्र है। एव तैत्तिरीय प्रा०३।४। १ । १६ में भी चारों युगों का नाम द्यूत क्रीडा पाशा के नाम में आया है। छान्दोग्योपनिषद् ४ । ११४ में केवल कृतयुग का उल्लेख है ।सामवेदीय पष्ट विश माह्मण में लिखा है कि चन्द्रकला से युग चतुष्टय फहे ये प्राचीन माम प्रचरित हुये हैं। १००२ सहस्र चतुर्युग का जो एक कल्प होता है उस का प्रमाणे:- एक यदङ्गमकृणोत्सहस्रधा कियता स्कम्भः प्रविवेश तन्त्र । ( अथर्व १० । २१७) एक कालरूपी अङ्ग १००० हिस्सों में विभक्त किया है। पुनः फल्प के याद सष्टि होती है उस का प्रमाण-~ सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ॥ (ऋग्वेद १० । १९) अर्थात जिस प्रकार पूर्व ( गत ) कल्प में भूर्य चन्द्रमा आदि की रचना ईश्वर ने की थी उसी प्रकार इस वर्तमान कल्प में भी की है। रूपकालङ्कार से-सृष्टि काल के परिमाण के वर्णन में ज्योतिष में लिसा है कि १४ गनु और १ सन्धि सहित १५ नन्वन्तर एक कल्प वा बालदिन और इतने ही की रात्रि अर्थात् ३० मन्वन्तरों का एक बाल अहोरात्र होता है अर्थात् जिस प्रकार हमारे सौर मान से १५ मुहूर्त का दिन एवं १५ मुहूर्त की रात्रि होती है उसी प्रकार एकरमन्यन्तर का एक २ माल मुहूर्त होता है और जिस प्रकार हमारी आयु २०० वर्ष की है इसी नियम से वान अहो. रात्र के परिमाण से १०० बाल यर्य सृष्टि की आयु होती है अर्थात् महामटम होता है। प्रत्येक मन्वन्तर में जो सन्ध्या और सन्ध्यांश हैं, वह इस प्रकार समझना चाहिये कि जिस प्रकार ६० घड़ी का मानुषी दिनरात होता है इस का उठा भाग १० घड़ी हुवा जिस में ५ घड़ी प्रातःकाल सन्ध्यांश और साय. १२ है परन्तु भूर्यसिद्धान्त ङ्काल ५ पट्टी सन्ध्या कहलाती है इसी प्रकार सत्ययुग आदि प्रत्येक युग में उस २ दिव्य वा मानुपवर्ष संस्पा का छठा भाग सन्ध्या सन्ध्यांश कहाता है। प्रलय सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय के अनेरु क्रम हैं, अर्थात् महाप्रलय के बीच में जितने २ प्रलय अवान्तर प्रलय होते हैं, उन सब का क्रम पृथक् २ जैसा एक महाप्रलय के अवान्तर मलय का क्रम होता है धैसा ही प्रत्येक महाप्रलय में उन उन अवान्तर प्रलय का कम रहता है। प्रत्येक मन्वन्तर की समाप्ति में जय जल से अवान्तर प्रलय होने पर आता है तब वर्षों तक घरायर मूसलाधार वृष्टि होती है जिस में पर्वतादि भी जलमय होजाते हैं । द्वितीय मन्वन्तर का फिर आरम्भ होता है तब फिर जल से पृथिषी, पृथिवी से ओपधियां, उन से अन, अन्न से धीर्य और वोर्य से शरीरों फी उत्पत्ति होती है अर्थात् यह प्रत्येक मन्वन्तर के आदि अन्त का प्रलय जल से होता है इस में पृथिवी और पार्थिव शरीर मात्र का प्रलय होजाता है । जल, अग्नि, वायु और आकाश बने रहते हैं । १७२८००० वयं में आधा समय पहिले मन्वन्तर की समाप्ति में सन्ध्या और आधा समय आगामी मन्वन्तर का सम्ध्यांश (प्रातः काल ) समझा जाता है। इतने समय तक पृथियो सर्वथा जलमय होजाती है। आशय यह है कि मन्वन्तरों की आरम्म समाप्ति में अषान्तर प्रलय जल से और मन्वन्तर के आरम में जल से ही सृष्टि का आरम्भ होता है और ब्राह्मकल्प में अग्नि से प्रलय होता है। अग्नि से ही सुष्टि का फिर आ. रम्भ होता है और महाप्रलय में वायु तथा आफाश से प्रलय होता है और महाफल्प के पश्चात् फिर वायु तथा आकाश से सष्टि का आरम्भ होता है। आस्मा से आकाश और आकाश से वायु की उत्पत्ति जो शास्त्रों में दिखाई है उस का अभिप्राय परमेश्यर से सृष्टिक्रम दिखाने का है। वस्तुतः आफाश भी एक तत्त्व अग्नि, वायु आदि के समान ही उत्पन्न वा नए धोने घाला है। केवल भेद इतना ही है कि जैसे अग्नि की अपेक्षा यायु मूक्ष्म होने से देखने में नहीं भाता वैसे यायु से भी अधिक मूक्ष्म आफाश सस्व है । इम कारण यह स्पर्शन इन्द्रिय से शेय नहीं। आकाश का गुण शब्द है घाह शब्द सिम में रहता तथा जहां से प्रकट होता वही आकाश द्व्य है । यद्यपिकिन्हीं लोगों का यह सिद्धान्त है कि आकाश कोई द्रव्य नहीं, उम के उत्पत्ति नाश भी नहीं होते, इस पक्ष में वायु सक का ही मलय माना जायगा तथापि वायु मादि के तुल्य आकाश को द्रव्य वा तत्व मानकर उस के उत्पत्ति नाश - - - भूमिका भानने का यक्ष टोक मालूम होता है और वायु की गति का कारण मायःअग्नि है । वायु में हलकापन आजाता है इसी से ग्रीष्मकाल में घायु की गति :- धिक और शीतकाल में भारीपन रहने से वायु की गति धेसी तेज नहीं होती है। हलका ही पदार्थ अधिक बलायमान होता और सारी पदार्थ अधिकांश में स्थिर होता है। जैसे भारी गम्भीर मनुष्य की बुद्धि स्थिर और हलके की चपल बुद्धि होती है। कृण उह जाते और पत्थर नहीं उड़ता है। तात्पर्य यह है कि यदि अन्य तत्त्वों का संघर्षण न हो और अग्नि वायु को हलका न करे तो वायु फा घलना ही न हो तथा यायु सर्वत्र व्यापक है कभी पंसा हिलाने से घलने लगता है। जैसे जल सर्वत्र भरा हो और एक स्थल से जल लिया जावे तो उस स्थल में इधर उधर से जल गिरेगा ऐसे ही सर्वत्र परे वायु को जहां २ अग्नि दलका करता है वहाँ २ अन्यत्र से वायु गिरता है इस लिये उस में गति होती है। जय अग्नितत्व का प्रलय होजाये तब वायु की गति होना भी दुस्तर है अर्थात् अग्नि के प्रलय में वायु अपने कारण आकाश में स्वयमेव लीन हो जाता है। इस लिये जल, अग्नि, वायु, आकाश इन ही तत्वों से तीन ही प्रकार का प्रलय होता है। जब २ जिस २ तत्व से मलय होता है, तब २ उसी तस्म से फिर सृष्टि का आरम्भ होता है । पृथिवी के परिभ्रमण काल में उस के मेरुदण्ड वा कल्पित ध्यास सम्यक सम्यमान रह कर कुछ तिर्यक्प से स्थिति करता है, इसी कारण समय पा पृषिधी पर सूर्य के तेज का न्यूनाधिक्य होता रहता है । अतएव ऋतु- परिवर्तन हुआ करता है। पृथिवी स्वभावतःफिञ्चित् वक्रताव से नित्य ही भ्रमण करती है। किसी समप भी इस भाव अर्थात् वक्रता को नहीं छोड़ती। सुतरां सूर्य को चारों मोर भ्रमण करती २ किती २ समय सूर्य सम्बन्ध में इस का मेरु देश एक घार उम्नत्त और एक धार अवनत होजाता है । कोई पदार्थ तिर्यरूप से एक भाव से निरबलम्ब होकर घनाकार वा वृत्ताधाम पथ में परिभ्रमण करने से वह पक या वृत्ताभास के केन्द्र सम्बन्ध में उस का शिरोभाग और अधोभाग अवश्य ही एक बार उन्नत एवं अवनत होता है, ऐमी प्रतीति होती है। पृथिवी अपनी फक्षा पर कुल तिर्यमाव से नित्य भ्रमण करती २ इस का मेरु प्रदेश एफवार मूर्य के सम्मुस एवं एक्वार मूर्य के परोक्षमें उपस्थित होजाता है इस से सिद्ध होता है जो पृथिवी से ईपत् तिर्थक्झाव से अव. स्थिति करने एवं इस की वार्षिक गति द्वारा ऋतु मव वारर प्रत्यागमन करते. और परिवर्तित होते हैं।
सूर्यमितान्त यदि पृथिवी सूर्य को परिभ्रमण नहीं करती तो हम लोग ऋतुओं का वार २ आना, एव इस के परिवर्तन की फसी नहीं देख पाते । पृथिवी यदि लम्बसाय से अवस्थित हो कर ठीक चक्राकार पथ में परिभ्रमण करती तो सूर्य का आलोक पात कमी तिर्यभाव से कभी सरलभाव से अथवा दिवा माग में सूर्य के आकाशमण्डल कमी दीर्घकाल फनी अल्पकाल अवस्थिति इस प्रकार कभी नहीं पड़ता। मुतरा पृथिवी में उत्ताप का कभी तारतम्य न होकर वह सय समय सर्वत्र समनाय से अनुभूत होता ।। मूर्यकिरण सरल रेखा की नाई एक ही ओर विकीर्ण होता है । एवं . पृथिवी के साथ सम मूत्रपात काल में जो स्थान ठीक मूर्य के सम्मुखवर्ती होता है, वही स्थान अधिक उपण होता है । इसी कारण दोनो अयनान्त. वृत्त के मध्यवर्ती देशो में ग्रीष्म ऋतु का प्रादुर्भाव होता है यघोफि उस उस देश को छोड कर फिसी अंश में सूर्य किरण लम्बसाव से पतित नहीं होता। उत्तर अयनान्तयत्त के जितने उत्तर होगा या दक्षिण अपनान्तयत्त के जितने दक्षिण होगा उतना ही शीत फा आधिक्य होता है। पीप्म काल की उत्पत्ति सामान्यतः दो कारणो से होती है। प्रथमतः इस समय मूर्यरश्मि पृथिवी में लम्यभाव से पड़ती है । द्वितीय गगनम- यडल में मूर्य अधिक काल स्थिति करता है और जिस समय इन दो अय. स्थाओ में वैपरीत्य होता है, उस समय हेमन्त काल का उदय होता है । ज्येष्ठ और आपाढ मास में दो महर के समय गगनमण्डल में दृष्टिपात करने से सूर्य को हम लोग अपने मस्तकोपरि देखते है, किन्तु पौष और माघ मास में इस प्रकार मूर्य के प्रति अवलोकन करने से उस को बहुत दक्षिणांश में अर्थात् आकाश के बहुन नीचे देखते हैं । अधिकन्तु ज्येष्ठ और भाषाढ मास के दिन मे मूर्य आकाशपथ में दीर्घकाल रहता है, किन्तु पौष और माघ माम में स्वल्प क्षण अवस्थिति करता है। इसी कारण ज्येष्ठ और आपाढ मास में ग्रीष्म फा एवं पौष और माघ मास में शीत का प्रादुर्भाव होता है । इस प्रकार शीत और ग्रीष्म के तारतम्यानुसार भिन्न २ देश में भिन्न २ जातीय उद्भिज्ज और जन्तु मय उत्पन्न होते हैं,ये सब इस प्रकार ऋतु परि- यतन न होने से जीवित नहीं रह सकते। विश्यकर्ता ने पृथिवी को जीव के यौम्प और जीय को प्रथिधी के योग्य यना कर अपनी अपारमहिमा प्रकट की है। - भूमिका वेदों में ऋतुओं का उल्लेख मधुश्च माधवश्च वासन्तिकावृतू शुक्रश्च शुचिश्च ग्रेप्मा- वृतू नभश्च नभस्यश्च वार्षिकावतू इपश्चार्जश्च शारदा- वृतू सहश्च सहस्यश्च हैमन्तिकातू तपश्रतपस्यश्वशैशि- रावृतू ॥ यजुर्वेद पू० अ० १३ ॥५॥६॥१५॥ १६ । २५।२७१५७ भापार्थ--मधु,माधव,१ वसन्त ऋतु शुक्र,शुचि,२ ग्रीष्मऋतु,नमस, नभस्य ३ वर्षाऋतु, इप, ऊर्ज,४ शरझतु,सहः,सहस्य ५ हेमन्तऋतु और तपस्,तपस्य ६ शिशिर ऋतु हैं अर्थात् मधु आदि दो र महीनों के वसन्तादि छः पातु होते हैं। सामवेद में भी छः ही ऋतुओं का उल्लेख है- वसन्तइन्नुरन्त्यो ग्रीष्म इन्नुरन्त्यः वाण्यन शरदो हेमन्त: शिशिर इनुरन्त्यः ।। (सामवेद प्र०६ । अ०३।६ । १३ । ३) सब नतुओं में वसन्त ऋतु को मुख्य मानते हैं। प्रमाणः- मुखं वा एततूनां यदवसन्तः । (तैत्तिरीय ब्राहणे ११ । २।६।७) वेद या ब्राह्मण ग्रन्थों में १२ महीनों के माम नक्षत्रों के नामानुसार क्षेत्रादि नहीं, घरन मधु माधवादि हैं । चैत्रादि नाम होने का नियम यह है कि जिस महीने की पौर्णमासी को जो नक्षन्न पड़ता है, उस नतन के नामानुसार उस फा नाम होता है। जैसे चित्रा नक्षत्र में जिस महीने को पोणं- मासी हुई उस महीने का नाम क्षेत्र, इसी मकार विशाखा नक्षत्र वाले का वैशास,इसी प्रकार और भी जानो। परन्तु यह नियम अब नहीं रहा । अयती चाहो उस २ महीने की पौर्णमासी को वह २ नतत्र न पड़े, परंतु चैत्रादि नाग रूढ़ से हो रहे हैं। इसी कारण वेदों में इन अविचल नियम मे १२ महीनों के नाम हैं। जो फनी उस का परिवर्तन नहीं हो सकता। जैमाकि चाहं जय वसन्त ऋतु हो, उस के प्रथम और द्वितीय माम को कम से मधु, माघध, चाहे जव ग्रीष्म ऋतु हो उस के प्रपन और द्वितीय नाम को कम शुक्र, शुचि, चाहे जब वर्षा ऋतु हो उन के प्रपन लौर द्वितीय मान कोम से नामम् ननस्य, चाहे जब शरद ऋतु हो, इस के प्रश्न और द्वितीय मान । ।
भूपेंसिद्धान्त को कम से इषः, कर्ज, हेमन्त ऋतु धाहे जय हो उस के प्रथम एवं द्वितीय माम को क्रम से सहः, सहस्य और शिशिर ऋतु चाहे जय हो उस के प्रथम और द्वितीय मास फो क्रम से तपस् एवं तपस्य कहते हैं । अधुना जो लोग मधु आदि १२ महीनों को धैत्रादि के वाचक समझते है। यह मेरी समभा में उन की मूल प्रतीत होती है क्योंकि चैत्रादि नाम न. क्षत्रों के अनुसार और मधु आदि ऋतु के लक्षणानुसार हैं। अर्थात् सूर्य के कारण वातु परिवर्तित होते हैं जो धैत्र, वैशासादि इस समय वसन्तादि प्रातुओं में होते हैं, वे इस के कई महत वर्ष पहिले ग्रीष्म यो शरदादि में हुवे हैं । इस फा नियम यह है कि लग भग २३०२० वर्ष में (अयन गति के कारण)प्रत्येक दो दो महीनों को भय पातु कम से होते गये हैं। अथात् चैत्र में एक वार वमन्त ऋतु ४ सवा चार हजार वर्ष में। ग्रीम पातु ८॥ साढ़े आठ हजार वर्ष में । वर्षा ऋतु १७ हजार वर्ष में । शरद् ऋतु २१ हज़ार वर्ष में । इसी प्रकार हेमन्त और शिशिर हुए हैं। दिन और रात्रि जिस प्रकार किसी प्रकाशमान यस्तु के सामने कोई निस्तेज पस्तु रहने से उम निस्तेज वस्तु का केवल मामने का भाधा भाग प्रकाशित होता और उस का दूसरा आधा भाग अन्धकार में रहता है। इसी प्रकार प्रकाशमान सूर्य के किरणों से निस्तेज भूगोठ का आधा भाग ( सामने का) मात्र प्रका• शित होता एवं अपराई माग अन्धकार में रहता है । पृथिवी की यह अय. स्था सतत इसी प्रकार रहती है अर्थात् एकाटुं प्रकाशित एवं अपराई अन्य फारापत रहता है,फिन्तु इम की दैनिकगति के कारण से इम के राय स्थानों में क्रम २ से आठोक और अन्धकार का आविर्भाय होता एव तद्द्वारा दिन रात होते हैं ( जहां प्रकाश यहां दिन एवं जहां अन्धकार वहां रात्रि) पृथिवी के निपत आयतन (Rotation) से क्रमशः भिन्न २ ममय में प्रत्येक स्थान ही सूर्य के सामने होता है,भिम समय जो स्थान सूर्य के सामने होता उस भगय वहां के लोगों को बोध होता है कि सूर्योदय हुया। पीछे वही स्थान फ्रम से पूर्व की ओर अग्रसर होने से उन लोगों को मूर्य ठीक अपने मस्तको- परि ( मध्याहू ) दृश्य होता है । निदान जय पृथिवी के आवग द्वारा सूर्य भएठल अदृश्य होता उस समय उन लोगों फो बोध होता है कि सूर्यास्त - व्यवहार करते भूमिका हुधा । इसी प्रकार जब एक स्थान मे दिन होता है तो दूसरे स्थान में साय- काल, एवं एक देश में जय मध्याहू तब दूसरे देश ( पाताल ) मे आधीरात होती है। फलतः सूर्य का उदयास्त वास्तविक नहीं होता फिन्तु पृथिवी की दैनिकगति से दिन, रात, मध्याहू, सन्ध्या आदि होते हैं, पृथिवी के सब स्थानों में दिन रात एफ परिमाण से नहीं होते,फहीं ३० मुहर्त का दिन रात कहीं ६० का, फहीं हमारी अपेक्षा एक सप्ताह, एग्र छः महीने का दिन इ. त्यादि होते हैं । अय हम वेदादि शास्त्रों के प्रमाण देते हैं। जिन से यह घात सिद्ध होगी कि दिनाधिपति, होराधिपति, नासपति, वर्षपति आदि पालितज्योतिप की कल्पनामात्र है,वस्तुतःमिहान्त ज्योतिष से इस का सम्बन्ध नहीं। येदोत्तरकालीन अमाप संस्कृत ग्रन्थों में एव इस समय की शिक्षित अशि- क्षित दोनों मण्डली प्रायः"दिन शब्द के स्थान में "वार" (लिखते, पढ़ते ) हैं। इसी प्रकार रविवार, सोमवार आदि लिगते पढ़ते योलते हैं। परन्तु इस प्रकार का व्यवहार हमें घेद,ब्राह्मण, गृह्यसूत्र, ट्याक- रण, महाभारत और वाल्मीकीय आदि ग्रन्थों में नहीं मिलता, यहां तक कि अमरकोप जो बहुत थोड़े दिन का बना हुवा ग्रन्थ है उस में भी नहीं पाया जाता"घस्त्री दिनाहनी वा तु तीये दिवसवासरी"अर्थात् घस्त्र, दिन, बहन, दियस, यासर, ये दिन के नाम हैं । ऐसा अमरकोप के कालवर्ग में लिखा है। परन्तु “बार शब्द दिन के अर्थ में नहीं आया । आदित्मनस्य रेतसो ज्योतिपश्यन्ति वातरम् । परो यदिध्यते दिवा ॥ ऋ० सं०८।। अर्थात् सूर्य का प्रकाश दिनभर रहता है । देवों के दिन एकं वा एतद्देवानामहः यत्संवत्सर । तैना सर हमारे एक वर्ष की बराबर उत्तरमेन्विादियों ( देवता ) का एक दिन होता है। दिन के पांच विभाग:- तस्मा उदान्त्सूर्यो हि कृणोतिसिंगवः प्रस्तौति मध्यन्दिनम्। उद्गायत्य 'पराह्नः' प्रति हरत्यस्तं चनिधनम्। (अपर्व ) मृर्य सिद्धान्त दिन के पांच भाग होते हैं-सूर्योदय, संगय, ( मध्याहू के पहिले और सूर्योदय के पीछे) मध्याहू, अपराह्न और सूर्यास्त या सायशाल । इसी प्रकार शतपथब्राह्मण में भी लिखा है:- आदित्यस्त्वेव सर्वऋतवः। यदैवोदेत्यथ वसन्तो यदा संगवोथ ग्रीप्मो यदा मध्यंदिनोऽथ वर्मा यदापराहोऽथ शरद यदैवास्तमेत्यथ हेमन्तः ।। (शत० वा०२।२।३।) अर्थ-सूर्य ही सघ ऋतुओं का कारण है और प्रतिदिन सय ऋतुयें बीतती हैं अर्थात् जय सूर्योदय होता है तो वसन्त त्रातु संगव' काठ में, ग्रीष्म, मध्याहू में वर्षा, अपराल में शरद् और सूर्यास्त समय हेमन्त ॥ दिनमान अर्थात् दिन का घटना बढ़ना- सोम राजन् प्रणआयूंपि तारीरहानीव सूर्योवासराणि ॥ (भग्वेदे ८।४।७) भापार्थ:-हे सोम राजन् ! वासर ( जगदासक ) इस को जिस प्रकार सूर्य बढ़ाता है इसी प्रकार तू मेरी आयु को बढ़ा। युगणाद्दिनवारवाप्तिर्युगणोऽपि हि देशकालसम्ब- न्धात् । लाटाचार्येणोक्तो यवनपुरेऽस्तिगे सूर्य ॥१८॥ रव्युदये लङ्कायां सिंहाचार्येण दिनगणोऽभिहितः । यवनानां निशि दशभिर्गतैर्मुहूर्तश्च तद्गुरुणा॥१॥लङ्का- र्धरात्रसमये दिनप्रवृत्तिं जगाद चार्यभटः । भूयः स एव सूर्योदयात् प्रभृत्याहलङ्कायाम्॥२०॥देशान्तरसंशुद्धिंकृत्वा चेन्न घटते तथा तस्मिन् । कालस्यास्मिन्साम्यं तैरेवोक्तं यथाशाखम् ॥२१॥ मध्यान्हं भद्राश्वेप्वस्तमयं कुरुपु केतु- मालानाम् । कुरुतेऽर्द्धरानमुदान्भारतवर्षे युगपदकः ।२२॥
- भूमिफा उदयो यो लङ्कायां सोऽस्तमय: सवितुरेव सिद्धपुरे । मध्याहो यमकोटयां रोमकविपयेऽर्द्धरात्रः सः ॥ २३ ॥ अधिमासकोनरात्रग्रहदिनतिथिदिवसमपचन्द्रार्कः । अयनासंगतिनिशाः समं प्रवृत्ता युगस्यादौ ॥ २४ ॥ अन्यद्रोमकविषयाद्देशान्तरमन्यदेव यवनपुरातालङ्काई- रात्रसमयादन्यत्सूर्योदयाच्चैवारशासूर्यस्याद्धास्तमयात्म- तिदिवसं यदि दिनाधिपं ब्रूमः । तत्रापि भाप्तवाक्यं न च युक्तिः काचिदन्यारित ॥ २६ ॥ क्वचिन्निशादिवसप- ते: "क्वचित्कचित् ।स्वल्पे स्वल्पेस्थाने व्याकुलमेचं दिन- पतित्वम् ॥ २७ ॥ होरावार्ताप्येवं यस्मादोरा दिनाधिप- स्यादा । तस्याऽपरिनिष्ठाने होराधिपतिः कथं भवति ॥ २८ ॥ अविचार्य प्रायो दिनवारे जनपदः प्रवृत्ती- ऽयम् । स्फुटतिथिविच्छेदसमं युक्तमिदं प्राहुराचार्याः ॥ २६ ॥ अ० १५ पञ्चसिद्धान्तिकायाम् ॥ वराहमिहिर ने उपरोस श्लोक लिखे हैं । एवं इस पर वासनानामक टीफा श्री महामहोपाध्याय पं० सुधाकर द्विवेदी प्रोफेसर संस्कृत कालिज बनारस ने की है। पाठकों के अबलोकनार्थ भाषा में अर्थ किया गया है। भापा:-जिस कारण अहर्गणसे वारप्राप्ति होती है और महर्गण भी देशकाल के सम्बन्ध से सिद्ध होता है। जैसे:-लाटाचार्य ने यवनपुर (जौनपुर) में सूर्यो. हस्ति समय में, सिंहाचार्य में उड्डा में, सूर्योदय काल में मुमउमानों के गुरु यवनाचार्य ने रात्रि में १० मुहूत्तं बीतने पर अहगंण कहा है और आर्यम ने सो एकत्र उड्डा में अर्द्धरात्रि समय दिन प्रवृत्ति कही है । पुन. उन्हीं आर्य- भE ने दूसरे स्थान में लिखा है कि लङ्का में सूर्योदय से वार प्रवृत्ति होती है ॥१०॥९॥ उस देश में देशान्तर की शुद्धि भी की जावेती भी उस प्रकार फार की समता नहीं होती तो फाछ साधना उन्हीं आचायों द्वारा शास्त्र- सम्मत कहा गया है, उसी प्रकार इस विषय में काट को गगता किस प्रकार की है यह समता आगे कही जाती है:- - सूर्यसिद्धान्त भारतवर्ष में जब मूर्य उदित होता है उस समय मद्राय वर्ष में मध्याहू, कुरुयर्ष में सूर्यास्त, केतुमाल वयं में आधीरात एव लका में जब मूर्य उदय तय सिद्धपुर में सूर्यास्त, यमकोटि में मध्याहू, रोमक नगर में आधीरात। इस प्रकार गणक लोग देश की स्थिति जानकर अपने २ अमीष्ट देश भनीप्टकाल में आहर्गण साधते हैं और तदनुसार ग्रहों को सर्वत्र अपने २ ममप में यास्त. विक ही देखते हैं। दिन के आरम्भ भेद से इस में कोई हानि नहीं। ऐसा आ. चार्य का अभिप्राय है ।। २९ ॥ २२ ॥ १३ ॥ युग के आदि में अधिमास क्षय तिपि, ग्रह, सावनदिन, तिथि, मेपराशि,चन्द्रमा,सूर्य, अयन, ऋतु,नाक्षप्रगति, रानि ये सब बराबर एक ही समय में प्रवृत्त हुये अर्थात् सूर्यास्त समय में म. घिमासादि सब एक साथ प्रवृत्त हुवे परन्तु किस स्थान में? सी आचार्य नहीं फहते परन्तु प्रायः सघ सिद्धान्तों के अनुमार लङ्का ही में युगादि हुई । रोमक देश से जो देशान्तर लिया जाता है वह दूसरा है । एव जौनपुर से जो देशान्तर लिया जाता है वह और ही है ॥२५॥ लक्षा में आधीरात से बार- प्रवृत्ति हुई यह किसी का मत है और यहीं सूर्योदय समय धार प्रवृत्ति हुई यह औरों का मत है । अब यदि प्रतिदिन सूर्य के आधे अस्त समय ही से हम लोग दिनाधिप अर्थात् चारप्रवृत्ति को फहें, उस में भी कोई आप्तवाक्य प्रमाण नहीं और न कोई युक्ति ही है। सूर्य से किसी स्थान में सन्ध्या,किसी स्थान में दिन, किसी स्थान में रात्रि होती है इस प्रकार छोटे छोटे स्थानों में भी पार प्रवृत्ति की असङ्गति होती है ॥ २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥ जैसे पहिले वारप्रवृत्ति की बात कही गई उसी प्रकार " होराधिपति की वार्ता भी जागनी चाहिये। जिस कारण दिन से पहिले होराधिपति होता है। इस कारण वारप्रवृत्ति के अनिश्चय होने पर होराधिपति का निश्चय नहीं हो सकता ॥ २८ ॥ और यह देश मापः विना विचार ही जिस दिन जो धार सुनता है उस दिन उस यार की प्रवृत्ति मामता है। अर्थात् आज कौन दिन है, यह परम्परा ही से जाना जाता है, इस में कोई गणित की युक्ति नहीं है जिस से वार जात किया जाये। अब जो आचार्यों ने जो यह गणित स्फुट तिपि भादि विधार के तुल्य हो वही गणितयुक्त समीचीन कहा है। अर्थात् जिम गणित से ग्रहगण तुल्यता को प्राप्त हों वही गणित समोचीन जानना, दिनपति चाहे जो हो इस में हम को आग्रह नहीं । . क्षमारे व्यवहार में अपात् शाखों में एवं लोक में चान्द्रमास से व्यवहार शूमिका होता है ( विशष देखना हो तो सूर्यसिद्धान्त अ० १४ देखो ) घान्द्रमास दो प्रकार का होता है । एक अमावास्या से दूसगी अमावास्या तक गुफ । इस को "अमान्त मास" कहते, एवं एक पौर्णमासी से दूसरी पौर्णमासी तक दूसरा । इस को "पूर्णिमान्त" मास कहते हैं । व्यवहार दोनों ही प्रकार के महीनों से होता है, परन्तु मुख्य फर " अमान्त मास से होता है । चन्द्रमा जो पृथिवी को एक बार पूरा परिधमण कर लेता है, इस में २७ दिन होरा ४३ मिनट १९.५ सेकेण्डसमय लगता है। यही पूर्णिमान्त मास होता है,एवं एक अमावास्या से दूमरी अमावास्या तक में सामान्यतः ९ दिन १२ होरा ९४ मिनट २.८७ सेकेण्ड समय होता है । इसी को अमान्त एव मुख्य घान्द्रमास कहते हैं ॥ अमान्त और पूर्णिमान्त मास कय से आरम्भ होता है। वह नीचे लिखा जाता है। पूर्णिमास्त शुक्लपक्ष} चैत्र रुष्णपक्ष वैशाख वैशाख शुक्रपक्ष) ज्येष्ठ समान्त एवं पूर्णिमान्त मास होने का प्रमाणः- अमावास्यया मासान् सम्पादनाहरुत्सृजन्ति । अमावा. स्यया हि मासान्संपश्यन्ति पौर्णमास्या मासान् सम्पा. दाहरुत्सृजन्ति पौर्णमास्यया हि मासान् संपश्यन्ति ॥ (तेव्रा० ।५।६।१) स्पष्ट है । भाषा में अर्थ करने की आवश्यकता नहीं । - अमान्त कृष्णपक्ष अधिक मास युग के आरम्भ से अमावास्या के अन्त तक एक चान्द्रमास शेष रहता है । इस घान्द्रमास के शेर्ष होने से उस का ५४ दगड २८ पठ ३१ विपस ५२ अनुपल ३० प्रत्यनुपाठ के अनन्तर मूर्य पराशि में प्रवेश करता है अर्थात् एप की सकान्ति में एक सौरमास शेष रहता है। इस लिये सौर मास और चान्द्रमास इन दोनों के अन्तर ५४ दण्ड, २७ पल, ३१ विपल, ५२ अनुपड. मत्यनुपल हो जाता है, उस के अनन्तर मिपुन की सक्रान्ति समय वेध - मूर्य सिद्धान्त द्विगुण अर्थात् १ दिन ४६ दण्ड, २५ प०, ३ वि०, ४३ ० प बढ़ता है । एवं फकंट सक्रान्ति में तीन गुण और सिह की सक्रान्ति में धार गुण, इसी प्रकार शमशः बढ़ते २ मीन सक्रान्ति में अर्थात् १ वर्ष में दोनों का अन्तर १० दिन ५३ द, ३० ३०, २२ यिपल, ३० म०प० होता है। इसी प्रकार प्रत्येक सौर और घान्द्रमास में एक दिन का तारताम्य होता है। एवं १ वर्ष में प्राय ११ दिन अधिक होते हैं । अतएव ये दिन सब जब क्रमशः ३० दिन पूरे हो जाते हैं ती अधिक मास होता है, इसी को अधिमास कहते हैं। वेदों में भी अधि. मास का उल्लेख है ॥ वेद मासो धृतव्रतो द्वादश प्रजावतः । वेदाय उपजायते ॥ (ऋ० सं०१ । २५१८) अर्थात् यह जो काल के विभाग १२ महीने हैं। इन में माणिमात्र उत्पन होते हैं । एव इन बारह से अधिक महीना होता है। यानी अधिमास (उपजायते)। अहोरात्रैर्विमितं त्रिंशदझं त्रयोदशं मासं यो निर्मिमीते । ( अथर्व०१३।३।८) अर्थात् जिस परमात्मा ने दिन रात ३० दिन का महीना, १३ महीने (अधिमास गिन कर ) रचे हैं। . १५ तिथियों का वर्णन वेदों में अग्नेः पक्षति ( परिवा)योर्निपक्षति (द्वितीया) रिन्द्रस्य तृतीया सोमस्य चतुर्थ्यदित्यै पञ्चमीन्द्राण्यै पष्ठी मरुतां सप्तमी गृहस्पतेरष्टम्यर्यम्णो नवमी धातुर्द- शमीन्द्रस्यैकादशी वरुणस्य द्वादशी यमस्य त्रयोदशी। ( यजुर्वेद २० २५ । ४) भावार्थ-पक्षति ( परिवा ) निपक्षति (द्वितीया) तृतीया, धतुर्थी,पञ्चमी, पष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी,एकादशीद्वादशी, त्रयोदशी इन फी क्रम से अग्नि, वायु, इन्द्र, सोम, अदिति, इन्द्राणी,मरुत् सहस्पति, अर्यमा, धाता, इन्द्र, वरुण, पम सजा हैं।
भूमिका
वेद तथा बाह्मण ग्रन्थों में अटका, उदए, ध्यप्टका तिथियों का भी वर्णन है।
तस्य व्रात्यस्य । योस्य द्वितीयोऽपानः साठका ॥
{ अधर्व सं० १५ । १६ १२)
पौर्णमास्यां पूर्वमहर्भवति । व्यष्टकामुत्तरम् अमावा-
स्यायां पूर्वमहर्भवति । उदष्ट उत्तरम् ॥ तैवा०।८।१०।२॥
अर्थात् कृष्ण प्रतिपदा से आठवीं तिथि को "aयटका" और शुक्ल की
परिवा से आठवीं तिथि को "उदष्ट" कहते हैं ।
चन्द्रमा की कत्ता की लास वृद्धि
यत्स्वा देव प्रपिबन्ति तत आप्यायसे पुनः । वायुः सो-
मस्य रक्षिता समाना मास आकृतिः॥ऋ०सं १८॥
यमादित्याअंशुमाप्यायन्ति यमक्षितमक्षितयःपियन्ति ।
(है. ब्रा०२।४।१४)
हे चन्द्र ! तुझे सूर्य की किरणे (कृष्ण पक्ष में) शोष जाती है । एवं पुनः
कला २ कर बढ़ाती हैं ( शुक्ल पक्ष में )।
नवो नवो भवति जायमानोऽहांके तुरुपसामेत्यग्रे। भागं
देवेभ्यो विदधात्यायन् प्र चन्द्रमास्तिरति दीर्घमायुः ॥
( सं०१०। ८५११९)
अर्थात-जिस प्रकार मूर्य किरणों से चन्द्रमा की फला प्रतिदिन २ यढती
घढ़ती पूर्णमासी को पूरी होजाती हैं। इसी प्रकार मेरे ऐश्वर्या को मेरी
आयुभर घहि करो॥
तिथि
6905
,
.
चन्द्रमा प्रतिदिन राशिचक्र में पश्चिम से पूर्व ओर १३ । १०। ५५ जाता
है और सूर्य ५८ 1 ८ चलता है। इसी कारण चन्द्रमा प्रतिदिन सूर्य से १२
अंश, ११ कला, ४३ विफला फरके पूर्व की ओर आगे जाता है । चन्द्रमा की
-
चन्द्रमा वै मूर्यसिद्धान्त इस प्रात्यहिक अग्रगति से एक २ तिथि घनती है । चन्द्रमा की फठा (म. काश का १६ वां भाग) का वृद्धि का नाम शुरूपक्ष और हास का नाम कृष्ण- पक्ष । चन्द्रमा का आकाश के पक्षी भी कहते हैं। इसी कारण इस के दो पक्ष (छैने) लिखे हैं । चन्द्रमा जब सूर्य से १८० अशया छः राशि अन्तर में होता है तो पूर्णमासी तिथि कहते हैं । एव पूर्वोक्त रीति से चन्द्रमा जय १८० अंग से १२, १९, ४७ पूर्व से पश्चिम गमन पूर्वक अश पहुंचने पर कृष्णाष्टमी तिपि छोती है । एघ क्रमश. मूर्य के मिफट होने से (एक स्थान में)अमावास्यातिथि होती है । पुनः क्रम २ से चन्द्रमा सूर्य से जैसे २ दूर होता जावेगा वैसे २ चन्द्रकला बढ़ती जावेगी, एवं बढ़ते २ जय १८० अश पर आजावेगा तो पूर्ण- मासी होगी। अब इस के प्रमाण दिये जाते हैं:- यां पर्यस्तमियादभ्युदियादिति सा तिधिः ॥ऐ० प्रा० ३२॥१०॥ चन्द्रमा के एक उदय से दूसरे पर्यन्त काल की तिथि संशा है। पञ्चदशः। एप हि पञ्चदश्यामपक्षीयते ॥ पञ्चदश्यामापूर्यते ॥ (तै ब्रा० १।५ । १०) आशय यस्तुतः चन्द्रमा एक ही है, पर लोक में व्यवहार होता है कि परिवा का चन्द्र द्वितीयाका चन्द्र आदि। यही एक चन्द्रमा कृष्णपक्ष में क्रमशः १५दिन घटता है । एय पुनः शुक्लपक्ष में १५ दिम कम २ से बढ़ता है । तिथि भाग ७२० द्वादशारं नहि तज्जराय वर्वर्त्ति चक्रं परि दामृतस्य । आपुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानि विंशतिश्च तस्थुः ॥ ऋ० सं०१ । १६४ ॥ ११ ॥ भावार्थ-एक धन ( सयत्सर वा राशिचक्र) में १२ महीने वा राशि अविचल समातन हैं और जिस में सूर्य के पुत्र (सूर्य से उत्पन्न) स्वरूप ३६० जोड़े ( अहोरात्र ) अर्थात् ७२० तिथि भोग हैं। अमावास्या और पौर्णमासी तस्य व्रात्यस्य । यदादित्यमभिसंविशन्त्यमावास्यां चैव तत्पौर्णमासी च ॥ तस्य व्रात्यस्य ॥१॥ यदस्य दक्षिणम- क्ष्यसौ स आदित्यो यदस्य सव्यमक्ष्यसौ स चन्द्रमाः ।। ( अपर्य० १५ । १७।। १०) 1
भूमिका
९०३
भावार्थ:-उस प्रात्य के अङ्गस्वरूप सूर्य और चन्द्रमा जय एक स्थान में
होते है तय अमावास्या होती है ॥ १॥ उस प्रात्य की दहिनी आंख स्वरूप
और थाई आंसस्वरुप चन्द्रमा है । पुमः-
चन्द्रमा अमावास्यायामादित्यमनुप्रविशति ।
आदित्यादै चन्द्रमा जायते ॥ ऐतरेयब्राह्मणे १०५
भावार्थ:-चन्द्रमा अमावास्या को मूर्य के साथ (समसूत्रस्य ) होता है
और पुनः उस से अलग होता है । पुन.-
एप वै सोमो राजा देवानामन्नं यच्चन्द्रमा स यत्रैप एतां
रात्रिंन पुरस्तान्न पश्चादृशे तदिमं लोकमागच्छति स
इहैवापश्चीपधीश्च प्रविशति सवै देवानां वस्वन्नं ह्येपां
तदोपां रात्रिमिहामावासति तस्मादमावास्या नाम ।
(शतपथ ब्राह्मणे १।६।४।५)
सयार्थः यह चन्द्रमा जो देयों के मान(मोपधि)आदि करने वाला है सो
जिस रात्रि में कुछ भी नहीं दीस पहता है उस रात्रि की अमावास्या संता है।
पौर्णमासी
सोमावास्यायां रात्रिमेतया पोडश्या कलया सर्वमिदं
प्राणभृदनुप्रविश्य ततः प्रातर्जायते ॥ गृहदारण्यके ।
भावार्थ:-यह घन्द्रमा जिस रात्रि में १६ फलामो से प्रकाशित होता है
तो सब प्राणियों को मुरामद होता है अर्थात् पौर्णमासी को।
शुक्र या पूर्वपक्ष और कृष्ण वा अपरपक्ष ।
पूर्वपक्षं वै देवान्वज्यन्त । अपरपक्षमन्वसुराः ।
ततोदेवा अभवन् । परा सुराः। ते० प्रा० २।३.१
अर्षास-जिस समय उत्तरमेहनियासियों को शुक्लपक्ष होता उस समय
उस के विरुद्ध दक्षिणमेरूनिवासियों को प्रापक्ष होता है ।
आश्रित्य ताममावास्यां पश्यतः सुसमागती।
अन्योन्यं चन्द्रसूर्यौ तौ यदा तद्दर्श उच्यते ।
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सूर्य सिद्धान्त
जिस तिथि में चन्द्रमा और सूर्य समसूत्रस्य होता है उम को अमावास्या
या "दर्थ कहते हैं।
चतुर्दश्यष्ठमी चैव अमावास्या च पूर्णिमा ।
पर्वाण्येतानि राजेन्द्र ! रविसंक्रान्तिरेव च ॥
चतुर्दशी,अष्टमी,अमावास्या,पूर्णिमा,सूर्य की संक्रांति इन का नाम"पर्व है ।।
या पूर्वा पौर्णमासी सानुमतिर्योत्तरा सा राका ।
या पूर्वामावास्या सा सिनीवाली योत्तरा सा कुहूः ॥
(ऐ० प्रा० ३२ । १०)
अर्थ-चतुर्दशीयुक्त पौर्णमासी को " अनुमति " एवं परिवायुक्त पौर्णमा.
सी को “राका " कहते हैं। इसी प्रकार चतुर्दशीयुक्त अमावास्या को "सिनी
वाली एवं परियायुक्त अमावास्या को "कुहू" कहते हैं । इसी प्रकार गोपथ
ब्रामण में भी लिखा है।६।१०॥
क्षयतिथि
फल्प या युग के आरम्भ में भौम और चान्द्रदिन एक ही समय आरम्भ
होता है किन्तु सायनदिन से घान्द्रदिन न्यून होने से सायनदिन के शेष होने
के पहिले वह शेष होजाता है अर्थात् उस के परदिवस में सूर्योदय से भागे
शेष होजाता है, यही घान्द्र दिन के शेष एव पर दिवस में सूर्योदय के शेष.
इन्हीं दोनों के बीच के समय को "अवम" या क्षयतिथि यातिथि कीहानि
आदि कहते हैं । यही अवशिष्ट प्रतिदिन बढ़ते २ जब ६० दरष्ठ पूरा होता
है तब पूरी एक तिथि की हानि वा क्षयतिथि होती है। इस का भी वेद
में उल्लेख है.-
द्वौच ते विंशतिश्चते राध्येकादशावमाः॥अथर्व २१।६।१७५
अर्थात् १ घर्ष में १९"अयम एवं दो वर्ष में २२ इसी प्रकार और जानो।
यहां स्पष्ट 'अवमा शब्द तिथि का याचक है । जैसा भास्कराचार्य ने अपने
सिद्धान्तशिरोमणि नामक ज्योतिपग्रन्थ में लिखा है।
सायन और निरयण
ग्रहगण , निरन्तर राशिचक्र
भ्रमण फरते हैं । इस राशिचक्र के
भूगिका किमी स्थान को आरम्भ नहीं कह सकते, तब सूर्य मार्ग के जो दो स्थानों में सूर्य के आगमन समय दिन रात का परिमाण बराबर होता है और जिन दो स्थानों में अपन शेष होगा, उन्हीं चारों स्थानों में से किसी स्थान से आरम्भ कहा जासकता है। किन्तु विपुवरेखा के जिस स्थान में सूर्य के आने से दिनमान वृद्धि और वृक्ष लता शादि का नूतन पल्लवादि उद्गम होते दृश्य हो, उसी स्थान को राशिचक्र का आरम्भ कह सकते हैं । इसी स्थान से मूर्यमार्ग को ३६० अंशों में विभाग कर उस के प्रथम ३२ अंश मेष, उसके बाद ३० अंश वृष इत्यादि क्रम १२ राशि कल्पना कर जो लग्न स्फुट और यह स्फुट गणना की जावे उस का नाम "सायन" है ।। ज्योतिष गणना के प्रथम ( आरम्भ काल में । आकाशमण्डल के चिह्नित मेष राशि स्थित अश्विनी नक्षत्र के प्रारम्भ में दिन और रानि मान समान स्थिर हुआ था। पीछे कम २ से नक्षत्रगण धसकता जाता है । विषुवरेसा से प्रतिवत्सर अश्विनी नक्षत्र जितनी दूर धसक जावेगा, उसी अश्विनी नक्षत्र में सूर्य के आगमन ( समय ) उसी दिन को वल्सर का पहिला दिन कल्पना फर लग्नस्फुट ग्रहस्फुट द्वारा उसी स्थान की राशि चक्र का आरम्भ कह कर जो गणना की जावे, उस को "निरयण" कहते हैं। हमारे ज्योतिषशास्त्र के अनुसार राशिचक्र वा अयन प्रतिवर्ष ५४ विकला प्रतिमास ४ विकला ३० अनुकला और प्रतिदिन ९ अनुकला धसकता है । एवं ६६ वर्ष ८ मास में राशिचक्र विषुवरेसा से एक अंश करके चला है और इसी मकार राशिचक्र विषुवरेसा से चल २ कर समय २पर उस विपुवरेसा के स्थान में मिल जाता है । सम्प्रति सूक्ष्मगणनानुमार लगभग २६००० वर्ष में राशिचक फा विपुवरेखा पर पूरा एक फेरा होता है और प्रति वत्सर इस की गति ५०.३ विकला है। वेद में भी "अयन का उल्लेख है:- भानुराश्लेपा अयनं मघा में ॥ अथर्व १६ ॥ ७ ॥२॥ अर्थात्-आश्लेषा नक्षत्र के अन्त एवं मघा की आदि में "अयन है। भारतवर्ष में यद्यपि प्रमाण एवं युक्ति से सायन मत ठीक है, परन्तु अद्यावधि ज्योतिष के विद्वानों ने इस को स्थिर नहीं किया है और अधि- फांश निरयण मत से "पञ्चाङ्ग बनाते हैं । जिस लिये सायन और निरया दो पक्ष चल रहे हैं, इस लिये दोनों में कौन सा प्रकृत शास्त्रसम्मत है, इस को हम प्रमाणों से सिद्ध करते हैं:-. - भूम्यसिद्धान्त यस्मिन्दिने निरंशःस्यात्संस्कृतोर्कोऽयनांशकैः। तद्दिनं च महापुण्यं रहस्यं मुनिभिःस्मृतम् ॥ (ज्योतिर्निवन्धे वसिष्ठः) अयनांशसंस्कृतो भानुर्गाले चरति सर्वदा । अमुख्याराशिसंक्रान्तिस्तुल्यः कालविधिस्तयोः ॥ स्नानदानजपथाव्रतहोमादिकर्मभिः । सुकृतं चलसंक्रान्तावक्षयं पुरुषोऽश्नुते ॥ पुलस्त्यस्मृतौ ॥ चलसंस्कृततिग्मांशोः संक्रमो य: स संक्रमः । अजागलस्तनइव राशिसंक्रान्तिरुच्यते ।। पुण्यदां राशिसंक्रान्ति केचिदाहुर्मनीपिणः । नैतन्मम मतं यस्मान्नस्पृशेत् संक्रान्तिकक्षया ॥ वसिष्ठः॥ संस्कृतायनभागार्कः संक्रान्तिस्त्वयनं किल । स्नानदानादिपुश्रेष्ठामध्यमःस्थानसंक्रमः॥ सोमसिद्धान्तः॥ अयनांशसंस्कृतार्कस्य मुख्या संस्कृतिरुच्यते । अमुख्या राशिसंक्रान्तिस्तुल्यः कालावधिस्तयोः ॥ १७ ॥ (रोमशसिद्धान्त स्पष्टाधिकार) चलसंस्कृततिग्मांशोः संक्रमो यः स संक्रमः। नान्योन्यत्र च तत्क्षेत्रं नैति तत्क्रान्तिकक्षया ॥६२॥ शाकल्यसं- हिताहितीयाध्याय सूसि०अ० १४ श्लोक ८१०देखो- उपरोक्त शमशनों का यही आशय है कि जितने वैदिक शास्त्रीय यज्ञादिक सस्कार हैं, सायन गणनानुसार ही होना उत्तम है, निरयण से नही। शास्त्रमादनं तदेवेदं यत्पूर्व प्राह भास्करः । युगानां परि- वर्तन कालभेदोऽत्र केवलम् ॥ सू० सि० अ० १६॥ इस पर रङ्गनाथ की दीका इस प्रकार है - कालवशेन ग्रहचारे किंचिद्वैलक्षण्यं भवतीति तत्तदन्तरं
भूमिका
१०७
ग्रहचारे प्रसाध्य तत्तत्कालस्थितलोकव्यवहारार्थं शा-
खान्तरमिव कृपालुरुक्तवान् ।
आशयः-कालयशात् ग्रहोंकी गति में भेद पड़ता है । इस लिये समय २
पर ग्रहों को वेधकर बीज देवे और लोक व्यवहारार्थ तिश्यादि का निश्चय करे।
अत्र गणितस्कन्धे उपपत्तिमानेवागमः प्रमाणम् ॥
(भास्कराचार्य, गोलसन्धाधिकारः)
अर्थ- इस गणित स्कन्ध में "उपपत्तिमान ही शास्त्र प्रमाण है ॥
यस्मिन्देशे यत्र काले येन दृगणितैक्यकम् ।
दृश्यते तेन पक्षेण कुर्यात् तिथ्यादिनिर्णयम् ॥
अर्थ-जिस देश में जिस काल में जिस प्रकार टूरगणितैक्य दीखे, उसी
पक्षद्वारा तिघ्यादि का निश्चय करे ।
"महाराज द्विजराज श्रीमहीश्वरीप्रसाद नारायणसिंह
घहादुराख्येन श्रीकाशीनरेशेन"आदिष्टः पञ्चाङ्गकरणे
प्रवृत्तोऽहम्।भवति यदाप्यत्र सायनगणनैव मुख्या तथा-
प्यस्मिन्भारतवर्षे सर्वत्र निरयणगणनाया एव प्रचारात्
सामान्यजनप्रमोदायेदं तिथिपत्रं निरयणगणनयैव
व्यरचयम्"
आशयः-महाराज द्विजराज श्री ५ महीश्वरीप्रसाद नारायणसिह बहादुर
नामक काशी नरेश की आज्ञा से मैं पञ्चाङ्ग बनाने के लिये प्रयत्त हुवा हूँ।
पद्यपि शासप्रमाण से सायन गणना ही मुख्य है. तथापि इस भारतवर्ष में
सर्वत्र निरयणगणना के प्रचार से एवं सामान्पलोगों के प्रसव करने के लिये
इम तिथिपन को निरयण गणना द्वारा मैंने रचा ॥
देशी भूमिका पातुवर्णन यजुर्वेद का प्रमाण सायनगणनानुसार ऋतुओं
और माम का होना।
मधुश्व माधवश्व वासन्तिकावृतू ॥ ०१।४।११
आश्वयुजामाश्वयुजीकर्म ॥॥ आहिताग्नेराग्रा-
यणस्थालीपाक:आश्वलायन गृणसू०अ०रखं०२
- १६ भूपंसिद्धान्त मार्गशीप्यों प्रत्यवरोहणं चतुर्दश्याम् ॥१॥ पौर्णमास्यां वा॥२॥ हेमन्तं मनसा ध्यायेत् ॥५॥ आश्व० गृ० सू०२।३ अथातोध्यायोपाकरणम् ॥१॥ ओपधीनां प्रादुर्भावे श्र- वणेन श्रावणस्य ॥२॥ आश्वलायन गृ० सू० ३ । ५ धन वचनो का भी यही आशय है कि सायनगणना भुरय है । इमी में वैदिक एव स्मात्तं कर्म होने चाहिये । ग्रहण चन्द्रमा अमावास्या को सूर्य और पृथिवी के मध्य स्थान में प्रवेश करता है और पृथिवी पूर्णिमा को चन्द्रमा और भूय के मध्ययत्तिनी होती है । पृथिवी स्वय निस्तेज एव गोलाकार है, इस हेतु इस का जो भाग मूर्यरश्मि से प्रका- शित होता है उम के विपरीत भाग (परली तरफ) में मूच्याकार ( सूई दी नोक की सी आकृत) इम भूछाया मे जब चन्द्रमा प्रवेश करता है तब वह क्रमश मलिन होने लगता है । इसी को चन्द्रग्रहण कहते हैं । ऐसी घटना केवल पूर्णमासी ही को होती है इस कारण पूणमासी ही को चन्द्रग्रहण हो सकता है। चन्द्रमण्डल मूर्य और एथिवी से मध्यवर्ती होने से मूर्यरश्मि अवरुद्ध होती है तमी को "मूर्यग्रहण कहते हैं। सूर्य और चन्द्रमा के सगम- काल में अर्थात् अमावास्या को जब सूय ग्रहण होने की सम्भावना होती है। यदि चन्द्रकक्षा और भूकक्षा समतल स्थित होती तो मति पूर्णमासी को चन्द्रग्रहण एघ प्रति अमावास्या को सूर्यग्रहण होता। क्योकि उस २ काल मे मूर्य चन्द्रमा और पृथिवी समसूत्र मे रहने से चन्द्रद्वारा गूर्यरश्मि आच्छन्न वा भूच्छायाद्वारा चन्द्रविम्ब दीप्तिहीन होता। किन्तु चन्द्रकक्षा और प थिवी कक्षा समतलस्य नही है। इन दो कक्षाओ के दा विन्दुमात्र में नियंग भाव मे मन्धि होती है। जिन ( राहु, केतु ) फो चन्द्रपात कहते हैं, इसी पातस्थान मे चन्द्रमा जब आता है, चन्द्रमा मूर्य और पृषिधी समतलस्थ होती है। अतएव पूर्णमासी वा अमावास्या को चन्द्रमा अपने पातस्य या निकटस्थ न होने से धन्द्र या मूर्यग्रहया नही होता। चन्द्रग्रहण के नियम 1-पृथिवी की छाया के केन्द्र से चन्द्रविम्ब के केन्द्र तफ जो अन्तर है, यह भूछाया और चन्द्रमाके यामाईके योगसे न्यून न होनेसे ग्रहण नहीं हो सका। - - भूमिका २-चन्द्रमा के केन्द्र से छायाकेन्द्र पर्यन्त जो अन्तर है,वह छाया और चन्द्रगा के व्यासाई वियोग फल की अपेक्षा न्यून अथवा दोनों समान न होने पर पूर्ण ग्रहण नहीं हो सकता ॥ ३-पृथिवी से चन्द्रमा जितनी दूर, भूच्छाया उस के प्रायः साढ़ेतीन गुण अ. धिक विस्तृत एष इस छाया के जिस प्रदेश में चन्द्रमा प्रवेश फरमा है उस के परिमर च द्रव्यास के प्राय. तीन गुण । चन्द्रविम्ब जब सम्पन् रूप मे छाया में प्रविष्ट होता है, उम ममय "पूर्णग्रहण" होता है। और जिम समय उस का एक अशमात्र छाया में आच्छन्न होता है उस समय "आंशिक ग्रहण" होता है। ४-एक वर्ष में दो वार भी चन्द्रग्रहण हो सकता है और चन्द्रग्रहण एकवार न हो यह भी सम्भव है । एक वर्ष में पाच मूर्य ग्रहण और दो चन्द्रग्रहण का होना सम्भव है। - . . - ५-चन्द्रमा अमावास्या को १७ । २१ पातस्यान में निकटवर्ती होने पर सूर्य- ग्रहण, एवं पूर्णमासी को १९ । ३५ निकट होने पर चन्द्रग्रहण हो सकता है। ६-चन्द्रपात यदि स्थिर रहता तो प्रतिवत्सर एक ही समय ग्रहण होता किन्तु यह पात पूर्व से पश्चिम को सूर्य को प्रायः १८ वर्ष २२८ दिन और होरा में एक बार प्रदक्षिण फरता है।इसी कारण इतने समय के अन्त में चन्द्रपात अपने स्थान में प्रत्यागत होता है । सुतरां प्रति १८ वर्ष २२८ दिन छः होरा में चन्द्रग्रहण और मूर्यग्रहण मायः समानरुप से ह ते हैं ।। हमारे बहुत से फलितज्योतिषी और पौराणिकों का यह निश्चय है कि जय २ पृथियो पर अधिक पाप होता है तब २ ग्रहण अधिक होता है। यह उन की भान्तिमात्र है। सूर्यग्रहण के नियम चन्द्रमा द्वारा मूर्य की किरणे अवरुद्ध होने मे मूर्यग्रहण होता है। चन्द्रमा यद्यपि यस्तुतः सूर्य की अपेक्षा छोटा है,परनु दूरता में वह सूर्य की अपेक्षा पृथिवी के निकटस्य होने से उस का भी विम्ब के सनान देख पड़ता है। मौरग्रहण तीन प्रकार के हैं:-आंशिक, माध्य, एवं मर्वप्रास ॥ 1-भूपे और चन्द्रमा का दृश्यमान व्यामाद योगफल यदि मृर्प के केन्द्र से चन्द्रमा के केन्द्र की अपेक्षा न्यून होता है तो ग्रहण सम्भाव होगा ।
११० मूर्पमिद्धान्त २-मृर्य के दृश्यमान व्यासाई से चन्द्रमा का दृश्यमान व्यापाई अन्तर पारने पर यदि वह मूर्यको केन्द्र मे दूरता अपेक्षा न्यून हो तो "माध्ययाम होगा। ३-मूर्य का दृश्यमान व्यामार्बु चन्दमा के दृश्यमान मासाद्धं मे अन्तर करने पर यदि वह सूर्य के केन्द्र से दूरता अपेक्षा न्यून हा ता"सर्वग्रास ग्रहण होगा। ४-मूयग्रहण कहीं न कहीं प्रतिदिन होता है,परन्तु स्यान विशेष से वह ग्रहण कहों दीसता है कहीं नहीं दीसता । इस का प्रमाण आगे दिया जावेगा । ग्रहणविषयक वैदिक प्रमाण- यत्वा सूर्य स्वर्भानुरतमसा विध्यदासुरः । अक्षेत्रविक्ष- था मुग्धो भुवनान्यदीधयुः ॥५॥ स्वर्भानोरध यदिन्द्र मा. याऽवोदिवा वर्तमाना अवाहन्। गूढं सूर्य तमसापव्रतेन तुरीयेण ब्रह्मणाऽविन्ददत्रिः ॥ ६॥ मा मामिमं तव सं. तमत्र इरस्या दूग्धो भियसा निगारीत्। त्वं मित्रोअसि सत्यराधास्ती मेहावतं वरुणश्च राजा ॥ ७॥ ग्राव्णो ब्रह्मा युयुजानः सपर्यन् कीरिणा देवानमसोपशिक्षन् । अत्रिः सूर्य-य दिवि चक्षुराधात्स्वर्भानोरपमाया अधु- क्षत् ॥८॥ यं वै सूर्य स्वर्भानुस्तमसा विध्यदासुरः । अत्र यस्तमन्वविन्दन्नह्यऽन्ये अशक्नुवन् ॥ ६॥ (ऋग्वेदे ५। १० । ५-६॥) : उच्चापतन्तमरुणं सुपर्ण मध्ये दिवस्तरणिं भ्राजमानम् । पश्याम त्या सवितारं यमाहुरजसज्योतिर्यदविन्ददत्रिः॥ (अथर्ववेदे १३ । २।२ । ३६ ) पुनः- स्वर्भानुर्ह वाऽआसुरः । सूर्य तमसा विव्याध स तमसा विडो न व्यरोचत-तस्य सीमरुद्रावेवैतत्तमोऽपाहतां स एपोऽपहतपाप्मा तपति ॥ शतपथब्राह्मणे ५। ३।२ १२ भूमिका पुनः- स्वर्भानुर्वाआसुरः सूर्य तमसा विध्यत्तदनिरपनुनोद तदनिरन्वपश्यत् ॥ गोपथब्राह्मणे उ०३ । १९ पुनः- स्वर्भानुर्वा आसुरः आदित्यन्तमसाऽविध्यत्तं देवाः स्वर- सामाना भवन्त्यादित्यस्य स्टत्यैः।ताण्यब्राह्मणे ४।५।२ स्वर्भानुर्वाआसुर आदित्यन्तमसा विध्यत्तं देवा न व्यजानस्तेऽत्रिमुपाधावंस्तस्यात्रिर्भासेन तमाऽपाहन्यत्। * प्रथममपाहन सा कृष्णाविरभवादुद्वितीयं सा रजता यत्तृतीयं सालोहिती यया वर्णमभ्यतणत्सा शुक्लासीत् ॥ (ताएयग्राह्मण ६।६।८) पुनः-- स्वर्भानुर्वा आसुर आदित्यं तमसा विध्यत् स न व्यरो- चत्तस्यात्रिर्भासेन तमोऽपाहन्स व्यरोचत यदेतदभा अभ- वत्तदासस्य भासत्वम् ॥ ताण्ड्यब्राह्मणे १४ । ११ । १४ ॥ यं वै सूर्य स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः । अत्रयस्तमन्व- विन्दन्नान्ये अशक्नुवन् । आश्वलायन शाखा अष्टक ? पूर्वोक्त ऋग्वेद, अथर्ववेद एवं ग्रामग्रन्थों के ग्रहणविषयक मन्त्र और व्याख्यान का एक ही आशय है । इस लिये प्रत्येक प्रमाण का भिन्न २ अर्थ न फरक एकत्र आशयमात्र लिखा गया है:- आशयः-हे सूर्य, चन्द्रमा ने जो तुझे अन्धकार से घेर लिया है इस से सय लोग अपने २ स्थान न जानकर मुग्ध हो रहे हैं ॥५॥ द्युलोक में तेरा प्रकाश है उस को चन्द्रमा ने आच्छादक होकर अन्धकार मे तेरे रूप को एक विवरण-इस में ग्रहण के रह का वर्णन है । कृष्ण,चांदी का रङ्ग,लाल वर्ण और शुक्ल ये धार प्रकार के होते हैं । देखो स० सि० ग्रहणाध्याय ॥
. । भूप मिट्ठान्न मात्र छिपा दिया है। इस बात को पूर्ण विच र करने पर जान द्वारा जाना आता है॥६॥ हे सूर्य । तेरा नाम मित्र एव वरूगा अनेक स्यानो में लिखागया है । ऐसे अनेक विशेषण होने पर भ. ईश्वरीय नियम के बद हो तुझेअन्धकार निगल गया ( सर्वग्रासग्रहण का उपलक्षण है)॥ 9 ॥ मानो ब्रह्मा ने मेघ की नाई तुम्हारे लिये चन्द्रमा का आच्छादक अपण किया है। उन्मीलनकाल में धुलोक में पुन प्रकाश होने लगा ॥८॥ जिम मूर्य को चन्द्रमा ( स्यानु) ने आच्छादित कर लिया था, उस को केवल ज्ञानी लोग (ज्योतिषविद्यावित्) जानते, दूसरे नहीं जान सकते ॥ ८ ॥ ग्रावण-मेघ । अनि मात । स्थानुचन्द्रमा। आमर-अन्धकार । अन्वविन्दजाना॥ वेदादि मत्यशास्त्रो में ग्रहण का कारण न तो राहु नामक दैत्य लिखा है और न उस ममप स्नान दान एव श्राद्धादि कुछ कर्तव्य ही लिखा है । जो उपरोक प्रमाणो से सिद्ध है । सूर्येन्दुभगणधात्री संस्थानविदोऽधिकृत्य कथयामि । ग्रहण सदैव भानो. स्थानविशेषात् क्वचिदृश्यम् ॥१॥ अविदितसस्थानानां बोधोऽपि हि जायते यथाधान्यम् । क्षीरं शड्खोपहितं दशनविनाशक्षम भवति ॥२॥ संक्षेपसूत्रवशत. शशिना ध्रियते दिवाकरो येपाम् । तेपां सूर्यग्रहणं स च देशं प्रतिदिनं क्वापि ॥३॥ भापार्थ -सूर्य चन्द्रमा नक्षत्रगण एव पृथिवी की सस्था जानने वाले के मत के अवलम्धन से मै कुछ ग्रहण की विशेषता कहता हू । सूर्यग्रहण सदैव कहीं न फही प्रतिदिन होता है, परन्तु स्थान विशेष से वह ग्रहण कहीं २ दीख पडता, कहो नही दीखता। अर्थात् सर्वत्र नही दीखता । यह यात गणित द्वारा जागी जाती है। जिस प्रकार भात, दूध को शर में रख कर खाने से दातो का नाश होता है यह ओषधि यल में जाना जाता है । उमी प्रकार गणितद्वारा अविदित रास्थान का ज्ञान होता है । जिस देश में दृष्टिरेसा के यश से चन्द्रमा द्वारा मूर्य आच्छन्न होता है उस २ देश में सूयग्रहण होता है। यह घटना प्रतिदिन कहो न फही अवश्य होती है । १:२।३॥ इसी प्रकार जिस समय पृथिवी पर सूर्यग्रहण होता है , उस समय चन्द्रलोक में पृथिवीग्रहण हो जाता है। क्योकि जिस प्रकार मूर्यरश्मि द्वारा 1
.
। भूमिका
चन्द्रमगइल दीप्तिमान होता है , इसी प्रकार एपिधी भी सूर्य के आलोक में
आलोकमम हो जाती है, इस कारण जय चन्द्रमा पृथिवी और सूर्य के मध्य
स्थान में पूर्वोक्त प्रकार समावेशित होता है , उस समय चन्द्रमण्डल द्वारा सूर्य
किरण अपवारित हो भूमण्डल अन्धकारमय होकर पन्द्रलोक में अदृश्य होता
है, उसी को पृथिधीग्रहण कहते हैं।
पुन वराहमिहिराचार्य ने लिखा है कि-
नीचस्थोऽस्माकमंशुमान्भवति । चन्द्रः परमोच्चयोघ-
नवद्भानोर्भवति हेतुः ॥७॥ अस्माकमुदयसमये येपा-
मल्पास्तगोदिवसनायः । मध्याहो वा येपां तेपामपि
न युगपद्ग्रहणम् ॥ ८॥ तदतीतमुदयगानां क्षणवये नै-
प्रयटस्तकेशानाम् ।मध्यादेशगानामनवरतं वर्तमानेन
॥ ६ ॥ उक्तश्व संहितायां मया प्रपञ्चोऽस्य राहुचारादौ ।
ग्रहणस्य यन्निमित्तं विनैव राहुं रविहिमांश्वीः ।। १० ।।
मापार्ध-हमारे उदयकाल या अस्तकाल में अर्थात् सम्पूर्ण दिन में भूपं
दूरस्थ और चन्द्रमा निकटस्प रहता है। इसी कारण सूर्यग्रहण में चन्द्रमा मेघ
की नाएं सूर्य को ढक लेता है। जिस से हम उस को उतने मगप तक नहीं
देखते । हमारे उदय ममय में जिन देशो में सूर्य अस्तपाप होता, तमो समय
जिन देशो मे मध्याहू होता है उन देशो में एक ही काल में ग्रहण दृश्य नही
होता । लम्बन और अवनति मेद में सूर्य के अदृश्य होने के कारण ॥
जिस कारण वर्तमान एक ही दिन में कमी उदय देशो मे मनुष्यो को
ग्रहण व्यतीत होवे उस के अनन्तर दो क्षण में निरन्तर अस्त देशो में ग्रहण
भावी हावे और मध्याह्न देशों में दो क्षण निरन्तर ग्रहण रहना चाहिये।
सूर्यग्रहण और घान्द्रग्रहण में राहु और जो अन्यान्य वासनिक
कारण है, उन्हें मैंने स्वरचित सहिता में कहा है."
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नित्यमधस्थस्यन्दो भिर्भानोः सितं भवत्यर्द्धम् ।
स्वच्छाययान्यदसितं कुम्भस्येवातपस्यस्य ॥१॥
भाषार्थ- ११५ भूप्यसिद्धान्त । सलिलमये शशिनि रवेधितयो मूर्छितारतमो नैशम् । क्षपयन्ति दर्पणोदरविहिता इव मन्दिरस्यान्तः ॥२॥ (वृहत्संहितायाम् ) में रक्खे हुए घट के तुल्य चन्द्रमा का आधा भाग सूर्य की किरणों से प्रकाशित हो जाता है और दूसरा आपा अपनी छाया से अन्य कार में रहता है । सूर्य की किरणे चन्द्रमा पर पड़कर प्रतिविम्बित होकर लौट आती हैं और रात्रि के अन्धकार का नाश करती हैं। जैसे রে हुवे दर्पण पर सूर्य की किरणें पड़ कर मन्दिर के भीतर चली जाती है।पुनः- भूच्छायां स्वग्रहणे भास्करमर्कग्रह प्रविशतीन्दुः। प्रग्रहणमतः पश्चान्नेन्दो नोश्च पूर्वार्धात् ॥ (दृहत्संहितायाम् अ०५) भाषार्थ-चन्द्रमा अपने ग्रहण में भूमि की छाया में और सूर्यग्रहण में सूर्य और पृथियो के मध्य में आजाता है,इस कारण ग्रहण होता है। पुनः- एवमुपरागकारणमुक्तमिदं दिव्यदृम्भिराचार्यैः । राहुरकारणमस्मिन्नित्युक्तः शास्त्रसदभावः ।। (यहत्सहितायाम् अ०५) भावार्थ-यह दिव्यदर्शी आचार्यों ने सत्यशास्त्रों के अनुकूल पहण का फारण फहा है। इस में राहु कारण नहीं है। पुनः आर्यभट्ट ने लिखा है कि- चन्द्रो जलमर्कोऽग्निर्मुदभूच्छायापि या तमस्तद्धि । छादयति शशी सूर्यं शशिनं च महती भूच्छाया ॥ (आर्यसिद्धान्ते गोलपादे ३७ ) {--जठमय चन्द्रमा अग्निस्वरूप सूर्य को ग्रहणकाल में ढक लेता है और मृत्तिकामय पृषिधी जिस की बड़ी छाया चन्द्रग्रहण काल में चन्द्रमा को ढक लेती है,राहु नहीं । इसी प्रकार भास्कराचार्य ने भी लिखा है कि:- पूर्वाभिमुखो गच्छन् कुच्छायान्तर्यतः शशी विशति । तेन प्राकमग्रहणं पश्चान्मोक्षोऽस्य निस्सरतः ॥ (सिद्धान्तशिरोमणी) - धूनिका भाषार्थ-जब चन्द्रमा पूर्व की ओर को जाता हुआ भूमि की छाया में चला जाता है। तब ग्रहण पड़ता है और जब छाया से निकलता है,लय मोक्ष था उग्रहण होता है । ग्रहलाप्रधकार ने भी यही कारण लिया है:- छादयत्यर्कमिन्दुर्विधु भूमिमाः ॥ भापार्य-चन्द्रग्रहण में भूमि की छाया चन्द्रमा को और सूर्यग्रहण में पन्द्रमा सूर्य को ढक लेता है। इसी प्रकार भादि कधिवाल्मीकि ने भी लिया है:- अभ्यधावत काकुत्स्थं स्वर्मानुरिव भास्करम् ॥ ( पाल्मीकोपरामायण युद्धकाण्ड सर्ग १०२ । ३) मापार्थ-जिस प्रकार चन्द्रमा (स्वर्भानु ) ग्रहणकाल में सूर्य को आ. छादन कर लेता है, उसी प्रकार रावण श्री रामचन्द्र जी महाराज की ओर धावा करता है। । युक्ति एवं वेदादि सत्यशास्त्रों के विरुद्ध ग्रहण में हेतु कल्पना १-पुराणों में प्रहण का विलक्षण कारण लिया है। जिस समय विष्णु जी मोहनी फा रूप पर अमृत बांट रहे थे, राष्ट्र नामक एक राक्षस देव घेय बनाकर सन फी पक्ति में आ बैठा । जय विष्णु गयान् ने उस को अमत दिया, वह उस को उसी समय पी गया। परन्तु सूर्य और चन्द्रमा ने उस की चुगली सा दी कि यह देवता नहीं है, राक्षम है। इस पर विष्णु ने क्रोध कर चक्र से राहु का शिरफाट डाला, परन्तु यह अमृत पी धुफा पा, इस लिये न मा। इस कारण से घाह सूर्य एवं चन्द्रमा को जहां पाता है वहीं ग्रस लेता है। परन्तु वह उस को गरदन के छेद में होकर निकल जाता है । यद्यपि यह लेख महाभारतादि में भी समुद्रमपम प्रसङ्ग में आया है और उसी के अनुसार भालङ्कारिफ वर्णन से इस का आशय भी ज्योतिषशास्त्र के अनुकूल परन्तु इप्त आलङ्कारिक ठेस को न समझ कर लोक में ऐतिहासिक घटना मान कर अन्धपरम्परा चल रही है । हम इस विषय को "पुराण मीमांमा. नामक पुस्तक में लिखेंगे। इस अन्धपरम्परा का कारण फउितत्योतिष एवं पुराण (वस्तुतः नवीन) ग्रम्प है। इसी के अनुसार माधुनिफ धर्मशाखों में भी लिखा है कि यही बामाल राणु गगनगामी चन्द्रमा और सूर्य को स्पर्श करता है, इस कारण । 7- मूर्य सिद्धान्त पूषिधीस्य मनुष्यों को भी अशोध होता है। ग्रामारम्भ फाल में मरने का प्रशोध एवं मोक्ष काल में जन्माशीच फरना चाहिये।इस लिये स्नान व्यतिरिक शुद्धि नहीं होती। उस के अतिरिक्त ग्रहण काल में राहु के यणं अनुसार भूमण्डल में अनेक प्रकार की शुभाशुभ घटना होती हैं । देखो मत्स्य पुराण अ० ६७ ।। भारतवर्ष को छोड़ अन्यान्य देशों में ग्रहणकाल में पोपलीला ग्रहण की उत्पत्ति विषय में अनेक अप्ररुत और भ्रममूलक मत हैं उस के प्रभाव में अनेक लोगों के चित्त में ग्रहण घटित नाना प्रकार की आशङ्कायें होती. हैं । फिसी अमाधारण कारण द्वारा इस को घटना होती है। एवं इस के द्वारा चन्द्रमा या सूर्य या पृथिवी को अमङ्गल होता है । अनेक जातियों में इस प्रकार विश्वास पहिले था और कहीं २ अय भी है। २-पूर्वकाल में रोम नगर में लोग चन्द्रग्रहण काल में चन्द्रमा को यातना. ग्रस्त समझ कर उम के क्लेशशान्त्यर्थ पित्तल पन्त्र बजाया करते थे। एवं जये स्थर से कोलाहल किया करते थे। उन मे बहुतों को ऐसा विश्वास था कि फुहक जीवी लोग चन्द्रमा को आकाश से गिरा फर “दूर्वाक्षेत्र में चराया,या एव उन्हीं लोगों के कुहक द्वारा चन्द्रग्रहण होता है। इस देश में ऐसा नियम पा कि कोई व्यक्ति ग्रहण के वास्तविक कारण को प्रकाश रूप से आलोचनान करे। ३-चीन देश में चीनियों को ऐसा विश्वास है कि भयङ्कर सर्प सब चन्द्रमा और मूर्य को ग्रास करते हैं, इसी कारण उन का ग्रहण होता है । ग्रहण समय में ग्रासकारी सर्प को ताड़ना के लिये चीनी लोग इएका बजाया करते हैं.॥ ४-अमेरिका खरष्ठ के अन्त.पाती मेक्सीको देशीय लोग ग्रहणकाल में 'उपयास (खाते नहीं) करते हैं। उन का यह विश्वाम है कि चन्द्रमा एवं सूर्य में आपस में विवाद हुआ है और चन्द्रमा को मूर्य ने मारा है। इसी निमित्त वे लोग विशेषतः उन की त्रियां आपस में एक दूसरे को कटुवचन आदि व्यवहार कर एवं याहू और अन्यान्य अङ्ग प्रहार द्वारा शरीर में रुधिर बाहर करती हैं, इस विचार से कि जिस प्रकार चन्द्रमा और सूर्य संग्राम में लड़फर आपम में एक दूसरे को फ्लेशित करता है, हम लोगों को भी उन के दुःख में सहानुभूति प्रकट करनी चाहिये । ५-पूमप सरह में विद्या के मभाव से इस समय पूर्वो प्रकार के अनेक + - भूमिका भ्रममूलक सस्कार लुप्तप्राय हो गये और अन्यान्य स्थानो में भी प्रकृत (अ. सली ) ज्योतिष सम्यग रूप से प्रचरित हुआ। हे जगदीश्वर ! हमारे देश से यह सायन फलित विद्या कय जायेगी। भगवन् ! सिद्धान्त ज्योतिपम्प सूर्य प्रकाशित कर फलितरुपी तिमिर का शीघ्र नाश करी ।। पञ्चाङ्ग किसी ज्योतिषी का वचन है कि जिस प्रकार हाथी, घोटा, रथ, पैदल इन चार प्रकार की सेना (बल) से राजा पृथिवी को जीतकर अपने वश में कर लेता है। इसी प्रकार मैं भी पञ्चाङ्गरूपी बस से आकाश को यश मे फरलेता हूँ। । चतुरङ्गबली राजा जगती वशमानयेत् । अहं पञ्चाङ्गवलवानाकाशं वशमानये ॥ अर्थात १ तिथि, २ वार, ३ नक्षत्र, ५ योग, ५ करगा ये पाच अग। प्राचीन समय मे 'धार' और 'योग' पञ्चाङ्ग के अङ्ग नहीं थे और ऐसा भी 'न था कि इस में पांचो अङ्ग हो । तिथि, करण और माधनदिग (वार) एफ ही अङ्ग में | और योग का तो एकमात्र प्रचार ही नही था, क्योकि सिद्धान्तज्योतिष मे (आर्यभट्ट और वराहमिहिर ने भी इम का गणित प्रकार नहीं लिया है) इम का गणित प्रकार लिखा है और न प्राचीन ग्रन्धो मे धार, योग,करण शब्द से किसी यज्ञादि का विधान पाया जाता है। भारतवर्ष में माय 'सब ही श्रीत एव स्मात फर्म करने में प्रतिदिन आर्य मात्र को पञ्चाङ्ग व तिषि पन्न की आवश्यकता पडती है। तदनुसार प्राचीनकाल से इस तिथिपत्र वा पञ्चाङ्ग का प्रचार चला आता है,परन्तु पहिले वेदोत्तरकालीनपञ्चाङ्ग भारतवर्ष भिर के लिये एक ही बनता था और याच वर्ष का पञ्चाङ्ग एकवारयनता था और उसी का प्रचार आर्यो मे था।आपस मे खेंचातानी नहीं थी,जैसी कि अन है। ......पाच सवत्सरो के नाम एवं प्रमाण - संवत्सरोसि परिवत्सरोसि इदावत्सरोसि इद्वत्सरोसि (तोत्तरीयमालण ३ । १०१.४) अपात १ सवत्सर, २ परिवासर, ३ इदायत्सर ४ वत्सर, ५ इवत्सर ये पाच वासर है । और महाभारत में भीष्मजी ने दुर्योधन से कहा है - तेपां कालातिरेकेण ज्योतिषां च व्यतिक्रमात् । पञ्चमे पञ्चमे वर्षे द्वौ मासात्रुपजायतः ।। ३॥.. 1 मूर्षसिद्धान्त एपाभ्यधिका मासाः पञ्च च द्वादशक्षपाः । त्रयोदशानां वाणामिति में वर्त्तते मतिः॥ ॥ ( महाभारते विराटपर्वणि १० ५२ श्लोक) अर्थात् राजा विराट् के गोहरण के पीछे कौरव पाण्डवों की युद्ध तैयारी के समय प्रथम इस यात का निश्चय किया गया कि पापडवों के १२ वर्ष वनवास के पूरे हुधे या नहीं ? ग्रहों की गति से प्रत्येक पांच वर्ष पर दो दी महीने अधिक होते हैं । इस हिसाब से वनवास के १२ घर्ष,५ महीने,१२ दिन हुधे । अर्थात् मेरी समझ में १३ वां वर्ष बीत रहा है। इस लिये पायडवों के प्रकट होने में (मध्छन्न थे) कोई सन्देह नहीं है। अब तो पांच वर्ष के पञ्चाङ्ग का प्रधार एकमात्र उठगया और भारतवर्ष के मित्र र प्रदेशो में मिष प्रकार पञ्चाङ्ग एक दूसरे से विरुद्ध बनने लगे। केवल घटी,पल,स्पष्टग्रह आदि काभेद हो सो नहीं, दिन,लग्न,तिथि,एवं पञ्चाङ्ग बनाने के यम्प श्री झिकर फल्पित फरलिये। एय सापनपञ्चाङ्ग जो शास्त्रानुसार था, उस के स्थान में निरयणपञ्चाङ्ग धनने लगा। इस समय वीन पक्ष के ग्रन्थ एवं इन्हीं तीनों पक्षों के अनुसार पञ्चाङ्ग भी बनते हैं:-१ सौर, २ ब्राह्म, ३ मार्य हैं। सौर वा सूर्यसिद्धान्त के अनुसार मकरन्द विवरण तत्वविवेक मादि । ब्रह्मसिद्धान्त के अनुसार करणप्रकाशादि और आईसिद्धान्तानुसार ग्रहला. पव और करणकुतूहलादि हैं। इन्हीं सीनो पक्षो के पन्ध आपस में बैंचा- सानी एवं तिथि आदि के निश्चय में झगड़ा हालते हैं और एक २ प्रमादि दो दो दिन किये जाते हैं। ये सब झगड़े फलितज्योतिष के प्रचार से होरहे। संवत् शक आदि भारतवर्ष में प्रत्येक श्रोत एष सात कर्म के सकल्प में और पचास या लौकिकव्यवहार में सरसवत् का व्यवहार होता था, जिस का वर्णन सूर्यसि० अ०१ महर्गणानयन में किया गया है । अघ इस का प्रचार उठगया और निम्नलिखित सवस् का प्रचार भिन्न २प्रदेशो में भिक रीति से होता है:-- १-कठिकाउ-वैधादि और मेषादि दोनों ही का प्रचार है। पञ्चाङ्ग में कही गत कल्यब्द कहीं वर्तमान कल्यब्द लिखते हैं। शक वर्ष में ३१३८ मिलाने से गत कलिवर्ष होते.
- . • भूमिका २-सप्तर्षिकाल -इस को लौकिककाल जी कहते हैं । अर्थात् सप्तपिनक्षत्र १० वर्ष में राशिचक्र के एक नक्षत्र से चलकर दूसरे नक्षत्र में जाते हैं और २७ नक्षत्रों को २७०० वर्ष में एकवार भ्रमण करते हैं। परन्तु प्रचार केवल प्रत्येक वर्ष में एक २ वर्ष बताते जाने का है। एव १८० वर्ष पूरा होने पर पहिला, दूसरा,तीमरा,इस क्रम से बढाते जाने का है। ज्योतिषशास्त्रानु. सार वर्तमान कलियर्ष २७ चैत्रयुक्त १ दिवस सप्तपिंकाल का भारम्भ हुवा। वर्ष चैत्रादि और वर्तमान है । एवं महीना पूर्णिमाप्त होता है ॥ ३-विक्रमकाल-वर्ष चैत्रादि और कार्तिकादि और महीना अमान्त और पूर्णिमान्त दोनों होते हैं । शकवर्ष में १३४ मिलाने से फात्र्तिकादिषि- क्रम वर्ष और १३५ मिलाने से चैत्रादि विक्रम सवत् होगा । ४ ईसवी सन, त्रिस्तीसन,अग्रेजीराज्य समय से इस देश में इस का प्रचार है। वर्य सायन और सौर होता है और १ जनवरी से वर्ष आरम्भ होता है। इस समय जनवरी का आरम्भ अमान्त पौप या माध में होता है। शक वर्ष में 96 9 मिलाने से ईसवी सन् होता है ।। ५-शककाल-ज्यातिष के करण ग्रन्थों में इस वर्ष से अधिक काम देते हैं। इस का वर्ष धान्द्र और मौर होता है। धान्द्रवर्ष चैत्रादि और सौरव मेषादि होता है और महीना अमान्त, एवं पूर्णिमान्त होता है। ६-चेदिकाल, या फउचुरियाकाल-इस फा इन दिनो प्रचार नहीं। विक्रम चैत्रादि सवत् ३०५, शक १००, ईसवी सन् २४८, २४६ माधिन शुक्ल प्रतिपदा इस चेदिकाल का आरम्भ होता है । इस का वर्ष आश्विनादि और महीना पूर्णिमान्त एवं अमान्त होता है । इस में १६९ । ।१७२ मिलाने से शकवर्ष और २४७ । २४८ मिलाने से ईसवी सन् होगा। 4-गुरुकाल-एम का इस समय प्रचार नहीं । वर्ष दैत्रादि और मास पूर्णि- मान्त होता है । शकवर्ष २४२ चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को इस वर्ष का आर- महुवा । इस में २४र मिलाने से शकवर्ष होगा और ३१६ १०मिलाने से ईसवी सन् होगा। -हिजरी सन का मूल स्थान अरब देश है । मुसलमानों को अमलदारी से इस देश में इस का प्रचार हुवा हिलरा'मुसलमानों का पैग़म्बर मुहम्मद, इसवी सन् ६२२ ता० १५ जुलाई शक ५४४ श्रावण शुक्ल गुरुवार की रातिको (मुसलमानों की शुक्रवार की रात्रि) मका होकर मदीना गये थे। इस से इस सन् का नाम 'हिजरी, हुवा । इस का महीना भोदरंम इत्यादि शान्द्र - - भूर्य सिद्धान्त है और अधिकमास इस में नही जोहा जाता। इस लिये वर्ष केवल ३५४ या ३५५ दिन का होता है और इस के अनुसार ३२ या ३३ सौर वर्ष में इस मन् के वर्ष का एक मा सौर वर्ष की अपेक्षा यढजाता है। शुक्ला प्रति- पदा या द्वितीया तिपि से घन्ट्रमा को देखने पर इस का महीना आरम्स होता है । महीना का एक दिन, दृमरा दिन आदि कहने को पहिला चन्द्र, दूमरा चन्द्र इस प्रकार है { घान्द्रदिन या तारीग)। महीना में २९ या ३० दिन होते हैं । यार और तारीख का आरम्भ मूर्यास्त समय से होता है । इस कारण हमारे गुरुवार की रात्रि भुमलमानो को शुक्रवार फी रात्रि होती है। -यशाली सन्-इस का प्रचार बनाठ प्रान्त में है। इस फा वर्ष सौर एय मेप की सक्रान्ति से आरम्भ होता है। महीना का नाम चैत्र, वैशास आदि घान्द्र होता है। मेय सक्रान्ति से महीने का आरम्भ होता है, जिस को वै. शाख फहते, उस को तामीर प्रान्तवाले चैत्र कहते हैं । यगाली सन् १.३०शक वर्ष १८१५ ६० सन् १८८३-८४ बगाली सन् में ५१५ मिलाने से शकष निक लता है । ५६३, ५८४ मिलाने से ईसवी सन् होता है ॥ १०-विलायती सन् बङ्गाल के किसी भाग में मुख्यत ओरियाप्रान्त में प्रध. रित है । इस का वर्ष सौर परन्तु महीना घान्द्र होता है । यर्ष का आरम्भ फन्यासक्रान्ति के दिन से होता और महीने का आरम्भ यङ्गालियो में सक्रान्ति के दूसरे या तीसरे दिन से होता । परन्तु विलायती सन् के म होने का आरम्भ सक्रान्ति के दिन से होता है । विलायती वर्ष में ११४ । १५ मिलाने से शकवर्ष होता और ५९२ । ३ मिलाने से ईसवी मन् होगा। १९-अमली मन्-* ओरिया" प्रान्त के राजा इन्द्रद्युम्न की जन्मतिथि अर्थात भाद्रपद शुरू १२ से यह वर्ष आरFH होता है और सक्रमणकालीन महीना आरम्भ होता है । इस का महीना सीर, परन्तु यर्ष घान्द्र मौर होता है। कन्यासक्रान्ति भाद्रपद महीने में द्वादशी के पहिले या पीछे भारम्भ हुआ है। १२-फमलीमन् को अकयर यादशाह ने चलाया था। प्रथम हिजरी सन् का वर्षाडू इस की बरायर चलता था, परन्तु हिजरी वर्ष केवल घान्द्र (३५४ दिन का) होता है और फसली सौर होता है। इसी से इस वर्ष से एक वर्ष का अन्तर पाता है। दक्षिण में जिस फसली सन् का प्रचार है, उस में - - . - भूमिका १२ । ११३ मिलाने से शक वर्ष होगा और प०-११ मिलाने से ईसवी सन् होगा । और वङ्गालियों के फसली सन् में १४-५१५ मिलाने से शफ वर्ष होता है एवं १२ । ६३ मिलाने से ईसवी सन् होता है। १३-मूर सन् या शाहुर सन्-इम की कमी २" अरयी सन् ॥ भी कहते हैं, ; ईसयी सन् १३४५ हिजरी ७४३ में यह वर्ष ( मूर सन् ) आरम्भ हुआ। सूर सन् के वर्ष में ५२१ । २२ मिलाने से शक वर्ष होगा और ९ । ६० मिलाने से ईसवी सन् होगा। १४-हर्ष फाल-फनोजदेश के राजा हर्षवर्द्धन ने इस कार को चलाया था। बेरुपी के समय से मथुरा और कन्नौज-इन प्रान्तों से आरम्भ हुआ था परन्तु अब इस का प्रचार नहीं । इस वर्ष में ५२- मिलाने से शक वर्ष होगा और ६०६ । ६०१ मिलाने से-ईसवी सन् होगा ।। १५-मगी सन्-चटगांव प्रान्त में चलता है-इस में और बङ्गाली.सन् में ४५ वर्ष फा अन्तर है शेष सय अंशों में बराबर है । १६-कोलम काल-परशुराम काल' यह फाल मलवार मान्त में 'मंगलोर से कुमारी पर्यन्त और तीने घेल्ली से आरम्भ हुआ। इस फा वर्ष सौर और इस के महीनों के नाम मेप, वप इत्यादि राशियों के नाम के अपधंश है-१२०० यों का इस फा एफ चक्र होता है। और इस समय इस फा पीपा चक्र है परन्तु अब इस फी वर्ष गणना १००० से भी अधिक होने लगी है। इस वर्ष में 9४६।४३ मिलाने से शकवर्ष और २४ । २५ मिलाने से ईसवी सन् होगा। १७-नेवार फाल-नेपाल में यह फाल शक १६९० से आरम्भ हुआ। इस का वर्ष कात्तिंकादि और मास अमान्त होता है । ताम्रपट पर या संस्कृत माधों में इस को नेपाल काल " कहते हैं । ८८0 1 ८०१ वर्ष मिलाने से शकयपं और ८७८ 1 मिलाने से ईसघी सन् और ३५ मिलाने से फार्तिकादि विक्रम संवत् होगा। १८-चालुक्यकाल-चालुक्य राजा विक्रमादित्य ने इस को शाके में आरम्भ किया था। विजलकलचुरिया ने जय शाके १०८४ में इस को पराजय किया तब से यह संवत् यन्द होगया। इस वर्ष में दर मिलाने से शकय और १०३५ । ७६ मिलाने से ईसवी सन् होता है । - इस वर्ष में मूर्यमिदान १६-सिंहसंयत्-फाठियावाड़ और गुजरात मान्तों से प्रचरित हुमा । महीना इस का अमान्त, यर्प चान्द्र सौर होता है । इम में १०३५ । ३६ मिलाने हे शकवर्ष और १११३ । १४ मिलाने से ईसवी सन होता है और १९७२ लामे से आषाढादि विक्रम संवत् होता है। २०-लक्ष्मण सेमनकाल-यह काल तिरहुत प्रान्त में विक्रम फाठ या शकफाल की यरायर प्रचरित है। इस का वर्ष कार्तिकादि, महीना अमान्त है। १०४० ४१ मिलाने से शकवर्ष और १११ IT मिलाने से ईसवी सन् और ११७५ मिलाने से कार्तिकादि विक्रम संवत् होगा । २१-इलाहीसन्-इम को अकबर बादशाह ने आरम्भ किया था। इम से इस 'को “अकबरी मनु" भी कहते हैं। इस में १४७६ 1 99 मिलाने से शफवर्ष और १५५५ । ५६ मिलाने से ईसवी सन् होगा। २९-राज शक या राज्याभिषेक शक-मराठी राज्य के संस्थापक शिवा जी ने इम काल को चलाया। शिवा जी के राज्याभिषेक के समय ज्येष्ठ शुक्ला १३ शाके १५९६ में आनन्द सवत्सर घला । दक्षिण में घान्द्र सौर अमान्त शकघर्ष अनुसार होता है । इस में १५९। ६ मिलाने से शफययं और १६७३ । १४ मिलाने से इंसधी सन् होगा।
भूमिका संवत् प्रदर्शकच अर्थात् जिस संयत् फा जिस समय से भारम्भ हुआ है,इस चक्र से छास होगा। फलि विक्रम सप्तर्षि ईसपी (चैत्र, नेप) (चैत्र ) चैत्र | (आपाढ़) (फार्तिक) ( जनवरी) (चैत्र, मेष) शक गत ४ वर्तमान १९३५ १९३४ १८१८ १०० ४८८ . दि गुप्तधालनी गुप्त हिजरी फसली फसली आद्रकृष्ण दक्षिणी घशाली १मतिपदा कार्तिक (चत्र) मोहर्रम) (सग. जुलाई) (भाद्र कृष्णा १) १६३० ९५५९ १५५९ १२९५ १२८७ १२५ विलायती असली यहाली अ/] भगी कोलम ( फन्या ) भाद्रशुक्लार (मेप) सूर (मृग) (मेष) (सिंह, कन्या) २२८५ १२५ १२५० २०५३ नेपाल (धार) (फार्तिक) घालुका सिह लक्ष्मण इलाही शिवाजी (अकबरी) राजशक- (आपाइ (कार्तिक) (सायन मेप) ( ज्येष्ठ शुमा १३ ) CCE ८०२ ७५८ ७६४ ३२३ २४ धूम केतु ( Comet) ग्रह, उपग्रह और नक्षत्रों के अतिरिक्त एक प्रकार का ज्योतिष्क की रात्रि को आकाश में दृष्टिगोचर होता है। यह गोलाकार और पुच्छ के साथ होता है। इस के पुच्छ हो'मैं दीसि रहती है और गृहमार्जनी (झाडू ) की नाई देख पड़ती है। इस ज्योतिष्क को " धूम केतु " कहते हैं । धूम केतु के शरीर + १२४ सूर्यसिद्धान्त ( आफार ) में दो भाग होते हैं। एक मस्तक और दूसरा पुन्छ । इस का मस्तफ भाग कुछ उज्वल एय उस का मध्यसाग तारा फी नाई अपेक्षाकृत दीप्तिमान होता है। यही मध्यस्थल धूम फेतु फी अष्टि प्रतीत होती है । पुच्छभाग कुछ उज्ज्वल होता है और फनी २ फिश्चित् पक्राय से क्रमशः प्रशस्त होकर बहुत दूर तक यढ़ जाता है। पुच्छ फा मध्यभाग अपेक्षाकृत कृष्ण वर्ण होता है । एव एक रेसा में रहने के कारण उस के दो अठग २ भाग दीखते हैं । धूमकेतु फा केतु बहुत कालपर्यन्त मूर्य के विपरीत दिशा में रहता है । सव समप धूमकेतु फा केतु हम लोगों को दृष्टिगोचर नहीं होता, फक्षी २ फेतुहीन धूमकेतु एव फनो २ छः केतुयुक्त धूमकेतुयुक्त धूमकेतु दीखने उगता है। धूमकेतु प्रति स्वयं प्रकाशमान नहीं किन्तु अन्यान्य ग्रहों की नाई यह भी सूर्य की किरणों से प्रकाशित होता है । जब यह मूर्य के निकट होता है तो दीखने लगता है। अन्यथा दूर होने पर अदृश्य होता है । और ग्रहों की नाई यह भी सूर्य की परिक्रमा किया फरता है । अर्थात् पश्चिम से पूर्व और कभी २ पूर्व से पश्चिम जाता है । अद्यावधि यूरोपियन विद्वानो ने लग भग 9२२ धूमकेतुओं की गति विधि आदि फा निवप किया है । एव जिन २ पुरुषों ने जिन धूमकेतुभों का पता लगाया है उन २ के नाम से घे २धूमकेतु प्रसिद्ध किये गये हैं। हमारे बहुत से नवशि. क्षित भारतवर्षीय पुरुषों को ऐमी धारणा है फि हिन्दू लोगों के यहां इस का कुछ उल्लेख नहीं है। यह उन को एक मात्र भूल है । क्योकि प्रथम तो हमारे वेद ही में इस का मूल पाया जाता है । एवं अन्यान्य कतिपय ज्योतिष के संहिता ग्रन्थों में १००० के लगभग धूमकेतुओं का ठेस है:- शन्नोमृत्युधूमकेतुः शं रुद्रास्तिग्मतेजसः ॥ (अथर्ष ३० कां० १९।६। मं० १०) फसो २धूमकेतु भूयं के अतिनिकट होने के कारण उसे बड़ी उपणताहोती है। पैतामहलकेतुः पञ्चवर्पशतं प्रोप्य उदितः । अथोद्दा- लकश्वेतकेतुर्दशीत्तर वर्षशतं प्रोप्य दृश्यः शूलाग्राकारी शिखां दर्शयन् ब्राह्मनक्षत्रमुपसृत्य मनागध्रुवं ब्रह्म- -राशिं सप्तपीन् संस्पृश्य कश्यपःश्वेतकेतुःपञ्चदशं वर्षशतं प्रोप्यनां पनकेतोश्चारान्ते..."। नभस्त्रिभागमाक्रम्याप- - भूमिका सव्यं निवृत्या१प्रदक्षिणजठाकारशिखः । अथरश्मि- केतुर्विभावसुजः प्रोप्य शतमावर्त्तकेतोरुदित्तश्चारान्ते कृत्तिकासु धूमशिखः॥ एहस्संहिता ग्रन्थ के टीकाफार पं० भट्टोत्पल ने पराशरहिता नामक ग्रन्थ के वधन फा उम्मेख फिया है ।। He-पैतामहकेतु ५०० वर्ष प्रयास कर अर्थात् एफ यार दृश्प होकर ५०० घर्ष के पीछे दृष्टिगोचर हुमा । उदाष्ठफश्वेतकेतु ११० वर्ष के पीछे दृष्टिगोचर हुमा । शूलायशिखाधारी फाश्मपकेतु १५२० वर्ष के पीछे, पद्मकेतु छदप । होकर पूर्व से होता हुभा मालराशि ( अभिजित ) नक्षत्र स्पर्श करता हुआ ध्रुवनक्षत्र ग्रह्मनक्षत्र और महर्पि नक्षत्रों को स्पर्श करता हुआ आफाश के तीसरे भाग को अई प्रदक्षिणाफार फर जटाधारी फी नाई जयस्थित है। एव विभावसज रशिमकेतु सोरयपं के पीछे दृश्य हुआ और पायाफेतु कृत्ति. फा नक्षत्र में प्रकाशित है। इन प्रत्येक घूमकेतुभों के साथ जो पतिविशेष के नाम ठगे हैं वह इस कारण से फि जिन २ महापुरुषों ने जिन २ धूमफेतुओं फं। देख कर उन फा सम्लेस किया था तम २ के नाम से वे २ प्रसिद्ध हैं। उल्कापिण्ड रात्रिकाल में जो गगनमयदल से नक्षत्र गिरते दीख पड़ते हैं यह नक्षत्र- पात नहीं किन्तु उल्कापिण्डपात होता है। उल्कापिया किस प्रकार फहां से गिरता है वस पात पर आधुनिफ यूरो. पिपन विद्वानों ने अनेक यादानुपादपूर्वक यह निश्चय किया है कि जिस प्रकार यह, धूमकेतु आदि निर्दिष्ट नियमानुसार सूर्य की परिक्रमा करते हैं उसी प्रकार ठल्कापिण्ड भी भूयं की चारों और भ्रमण करता है। उल्कापिण्ड और पृधियी के भ्रमण मार्ग का सम्पात ( संयोग स्थान ) है। जब एथियो और उल्कापिण्डगण भ्रमण करते २ सम्पातस्थान में पहुंच जाते हैं, उस समय उल्कापिण्ड सब पृथिवी में गिरते हैं या उसी समय न गिर कर भूवापु राशि में मिलाते हैं। एवं पीले क्रमशः पृथिवी के आकर्षण के प्रभाव भूतल में गिरते हैं । तल्कापिण्ड की संस्था १६ माईल मे २०० माईल प. यन्त पविधी से ऊपर को है और इस की गति प्रतिविपलमाईल से४ माईल पर्यन्त होती है । प्रतिवर्ष में पृधिग्री में कितने उल्कापिएस गिरते हैं, इस की संख्या करनी दुःसाध्य है । प्रतिदिन डासों उल्कापिण्ड पषिवी के भिवर सूर्यसिद्धान्त प्रदेशो में गिरते हैं । उल्कापिण्ड में परीक्षा से देखने पर निश्चित हुआ है कि इस में लोहा, टीन आदि अनेक पृथिवी की अपेक्षा विलक्षण धातु रहते हैं। हमारे भारतीय ज्योतिपशास्त्रो में अशनि और पायाण द्रव्य मिश्रित इस के पिरष्ठ में लिखा है। एव वेद मे इस का भी उल्लेख है.- शन्नो भूमिपमाना शमुल्का निहतं च यत् ॥ (अथर्व । कां० १९ । । म०७) आधुनिक सिद्धान्त फैसा मिठता है कि पृथिवी के गमन से उल्का टकर सा फर गिरता है। जैसा ऊपर कहा गया है। और श्री प० श्रीपति ने भी एक ज्योतिष ग्रन्थ में उल्कापिएर का उल्लेख किया है। ज्वार और भाटा प्रतिदिन नियमपूर्वक जो समुद्र के जल फा हाम एव वृद्धि होती है उस को ज्वारभाटा कहते हैं, अर्थात् समुद्र का फल जो सहसा बढ़ जाता है, उस को ज्वार (सस्कृतभाषा में “घेला") कहते हैं और यही ज्यार का जल जब क्रमश घट जाता है, तब उस को भाटा कहते हैं। सूर्य और चन्द्रमा की आफर्षण शक्ति से यह घटना होती है । ज्योतिर्वित् परिडतो ने यह निश्चय किया है कि चन्द्रमा पृषियी के आकर्षण से आरुष्ट होकर अपनी कक्षा में घूमता है । पृथिवी जिस प्रकार प. न्द्रमा को आकृष्ट करती है , चन्द्रमा भी उसी प्रकार पृथियो का आकर्षण करता है। इसी कारण पृषिवी का जो भाग जिस समय चन्द्रमा के टीका नीचे आता है । उस समय उस भाग की जलराशि बड़ जाती है और यही ज्यार होता है । पृथिवी का जल भाग जिस प्रकार चन्द्रमा के आकर्षण के आधीन है,स्थलमाग भी उसी प्रकार चन्द्रमा का व्याप्प है,तो जल तरलपदार्थ है इसी कारण वह अनायास चालित और स्फीत हो जाता है। यह व्यापार सय को दृष्टिगोधर होता है, स्थलकठिन होता है । इस लिये स्फीत और महोध सहन से नहीं होता और यह इन्द्रियगोचर भी नही होता। पृथियों का जोश चन्द्रमा के निम्न माग में आजाता है उस समय उस भाग में ज्वार होने की सम्भावना होती है। किन्तु रात दिन में कोई स्थान एक धार से अधिक चन्द्रमा के ठीक निम्नस्थ नही होता तय जो इस समय एक स्थानमें दो बार धार होता है,उस के कारण नीचे दिखलाये जाते हैं.- पृथिवी का जो स्थान जिस समय चन्द्रमा के ठीक निम्नमाग में अवस्थित होता है, उस समय यह स्थान अन्यान्य अश की अपेक्षा उस के निकटवर्ती - भूमिका होता है, इस कारण सम स्थान का जल चन्द्रफत्तक अधिक आफष्ट होकर चन्द्रमा के सम्मुखस्कोत हो जाता है। उस स्थान का जाल इस प्रकार बढ़ता है। ततके पादयिपक्ष(पाताल)स्थान चन्द्रमासे अधिक दूर होने के कारण यहां चन्द्रमा का आकर्षण न्यून होता है । कारण यह है कि लो वस्तु आफर्षक पदार्थ के निकट रहता है वही अधिक तेज से आरुष्ट होता है और निकट से जैसे २ दूर जाता है ,आकर्षण प्रभाव भी उसी दूरस्य के अनुसार वास होता जाता है। मतरां इस स्थान का जल नत हो जाता है और अपर स्फीत अर्णत् उन्नत और स्थानद्वय पृथियो के केन्द्र से बहुत दूर अपस्त हो जाता है। सुतरां दोनों स्थानों के ऊपर पृथिवी की पोन्द्राभिकर्षणी शक्ति अनुसार सर्वता होती है । इस कारण उस २ स्थान की जलराशि तरलता स्वाभाविक तरलता की अपेक्षा अधिक होती है। इस प्रकार मध्यार्पण के विरल प्रभाव से दोनों ओर का जल तरल होता है और एक जोर चन्द्रमा के अव्यवहित आकर्षण से उस जल स्फीत (बढ़ता है। होता है, दूसरी ओर केन्द्रप्रसारणी शमि का प्रादुर्भाव के नियन्धन से यह नत हो जाता है। इससे दोनों जगह ज्वार होता है । जिम स्थान की जलराशि स्फीत होती है, उस के पावस्य जलराशि अवश्य ही सङ्कुचित होती है। इसी सोच का नाम 'पाटा है। चन्द्रमा जिस प्रकार जल आकर्षण करता है सूर्य भी उसी प्रकार जल आकर्षण करता है। एवं फोई बाधा न होने से सूर्पकर्तृक एफ पृथक प्यार होने की सम्भावना थी किन्तु सूर्य की अपेक्षा चन्द्रमा पृधियी से बहुत निकटवर्ती है । इस कारण उत्त फी आकर्षण शक्ति अधिक होती है। एवं उसी शक्ति द्वारा सूर्यकृत ज्वार निराकृत होता है। परीक्षा द्वारा निश्चय किया गया है कि पृषिधी के जल के ऊपर सौर आकर्षण की अपेक्षा चन्द्राक. पण अधिक होता है । सुतरां, चन्द्रमा और सूर्य दोनों जल आकर्षण करने से चन्द्राकर्षण सौराकर्षण को रोक देगा और दोनों यदि समसूत्र में रहें और जाकर्षण फरें तो अधिक शक्ति होगी। वस्तुतः इसी प्रकार होता भी है । अमावास्या समय चन्द्रमा और सूर्य समसूत्रस्य होते हैं जयांत उस समय चन्द्रमण्डल सूर्यमण्डल के नीचे भाग में अवस्थिति करता है। इस कारण दोनों मिल कर जल आकर्षण फरते हैं, इस कारण अन्यान्य दिन की अपेक्षा इस दिन ज्वार अत्यन्त प्रबल होता है और पूर्णमासी को सूर्य और चन्द्रमा परस्पर आकाशमण्डल के विपरीत भाग में उदय होते हैं । चन्द्रमा जय पूर्व भाग में तो सूर्य पश्चिम भाग में रहता है । एवं चन्द्रमा जब पश्चिम भाग १२ सूर्य सिद्धान्त में तो सूर्य पूर्व भाग में रहता है । चन्द्रमा के एफ उदय से दूसरे उदय पर्यन्त २४ होरा ४८ मिनिट उगता है । एवं इतने समय में पूर्योरीति से दो बार ज्यार हो जाता है सुतरां इस ज्वार की प्रतिदिन निरूपित एक समय होने की सम्भावना नहीं । प्रातःकाल में १० बजे ज्वार होने से दूसरे दिन १० बजके २४ मिनिट में ज्वार आरम्भ होगा और प्रतिदिन ४८ मिनट करके अग्रसर होता है अर्थात् एकादशी के दिन ६ यजके ५६ मिनट पर ज्वार होने से द्वादशी दिन ७ या फर ४४ मिनट पर होगा । ज्वार के आरम्भ से भाटा की समामिपर्यन्त १२ होरा २४ मिनिट होता है। इस काल को द्विगुण करने पर एक तिथि होगी। पवार आरम्भ होने पर प्रायः ठःहोरा पर्यन्त दक्षिण ओर से उत्तराभिमुख वेगवान् होता है । उम के बाद प्रायः १२ मिनट पर्यन्तस्थगित रहता है। उस के याद भाटा होता है। भाटा के आरम्भ होने पर यह घेग पुनर्यार दक्षिणाभिमुख छः होरा पर्यन्त अपसरण करके ४ मिनट तक स्थिर होता है । अनन्तर उस के पूर्वोक्त रीति से पुनर्वार ज्यार होता है और पुनर्वार भाटा होता है। पूर्णमासी और अमावास्या के दो एक दिन पीछे ज्यार की अत्यन्त पद्धि होती है और चान्द्रमाम के द्वितीय और चतुर्थ पाद के प्रथम दो तीन दिन ज्वार अत्यन्त खर्य हो जाता है। कारण अमावास्या और पौर्णमासी के समय चन्द्रमा और सूर्य मिलकर अधिक परिमाण जल आकर्पण करने से जल की गतिफा वेग अत्यन्त प्रयल हो जाता है। अमावास्या और पौर्णमासी के पीछे चन्द्रमा और सूर्य आकर्षण नहीं करते। इस से आकर्षण ममाव हास हो जाता है, किन्तु जल की गति का वेग दो एक दिन न बीतने पर हास नहीं होता । क्योंकि जहपदार्थ एक यार किसी शक्ति के प्रभाव से घालित होने से उस की गति शीघ्र स्थिर महीं होती। इसी प्रकार चन्द्रमा की कला की पति और हास कम मे उधार भाटा होता है। जैसा कि ऊपर कहा गया । हम विस्तारभय से यहां अधिक उल्लेख नहीं करते । पाश्चात्य पण्डित और भारमयर्षीय नवशिक्षित लोगों की धारणा है कि भारतवर्ष में उस घटनाविषयक नियमनहीं जानते हैं। परन्तु यह कहना उन का एकमात्र युक्तिशून्य है। हमारे शाखों में चन्द्रमा को समुद्र का पुत्र, एवं चन्द्रमा की कला को वृद्धि और हास ऋमसे समुद्र में वेला ( ज्वार ) घा जलोळ्यास और पुनः जल का ह्रास (पाटा) होता है, स्पष्टतया लिखा है। जैसे:- - भूमिका १२९ वेलान्दोलानिलवलक्षोभोट्वेग समुच्छ्रितम् । वीचीह- स्तैः प्रचलितैर्नत्यन्तमिव सर्वतः ॥ १० ॥ चन्द्रवृद्धिक्ष- यवशादुवृत्तोर्मिसमाकुलम् ॥ महाभारते आदिपर्वणि २१ अध्याय अर्थात्-यह जो समुद्र में ज्यार और भाटा से लहरें कपर को उठ २ कर पुनः गिरती हैं । इस का कारण वायु और चन्द्रमा की फटा फी वृद्धि और हास होता है । वेध या प-वेक्षण (Observation ) थलाका या यष्टि या दूसरे किसी पदार्थ के सहारे से जो आकाशस्य नक्षत्रादिकों को देखते हैं, उस क्रिया का नाम सस्रुत में “ वेध" है। एच यन्त्रादि द्वारा देखने से "यन्त्रवेध" कहते हैं । अाधुनिक पाश्चात्य विद्वानों, एवं हमारे कतिपय नवशिक्षित भारतवर्षीय लोगों की ऐसी धारणा है कि भारतवर्ष में वेध की परम्परा एवं वेधविषयक ग्रन्थ तथा यन्त्रादिक नहीं थे और न कहीं वेधशाला शी इत्यादि। पष्ट धारणा उन की एकमात्र युनिशून्य और अविश्वासनीय है क्योंकि जिम सूर्य, पृथिवी, नक्षत्र, धूमकेतु आदि की गति आदि को यथायत् जामने के लिये अगरेज़ अरयों रूपपे व्यय करके एक पन्त्र निर्माणपूर्वक २०० वर्ष के उगग में ग्रहादिकों की गति विधि आदि से अभिा हुए है, इन विषयों को हमारे पूर्वज करोड़ों वर्ष पूर्व ही से निश्चय कर हमारे ज्योतिष शास्त्र में उन का उम्लेस कर गये हैं। राशिचक १२ भाग, एवं एक एक भाग में तीसर अंध एव ३६० अश का राशिचक्र, धूमकेतु, सप्तर्षि तारे, ग्रहण आदि विषय, एहस्पति का गुरुत्य अधिक जान कर गुरु नाम रखना, मगल को लोहिताङ्ग ( अंग्रेजों ने साम्मे की नाई रङ्ग निश्चय किया है ) इत्यादि यिना यन्त्रों ही कर गये हैं। अब हम यहां पाठकों के अवलोकनार्थ कतिपय वेध यन्त्रों का नाम लिखते हैं। ५-गोलपन्न (Globe ) काठ फा वगा-खगोल और भूगोल के विषयों को चित्रद्वारा भलीभान्ति ज्ञान के लिये । देखो मृ० मि० अ० १२ एवं सिद्धान्त शिरोमणि भुवनकोछ ।
३-चाप मूर्यसिद्धान्त धातुमय या काष्ठमय-इस यन्त्र से ग्रहों का अक्ष, भोग, शर २-धक यन्त्र | आदि जाना जाता है (अङ्करेजी में "घेहोलाईट कम्पास" कहते हैं) इस से पृथिवी को भी माप फर क्षेत्र फल जान लेते हैं। ४-तुयं गोल | अरेली सरकार के सरये विभाग एवं इजीनियरिङ्ग विभाग में इस में काम लिया जाता है। ५-नाही वलय-इस यन्त्र से स्वदेशीय उदय आदि काठ ज्ञान होता है । ६-घटिका यन्त्र-प्रसिद्ध ही है। ७-शष्ट्कु-हाथीदान्त या किसी घन पदार्थ फा १२ अङ्गुल लम्या यना कर उस की छाया से कालज्ञान, दिशा आदि जानते हैं। -फलक यन्त्र-इस से काल ज्ञान होता है। ह-यष्टियन्त्र (Compass ) क्षेत्र फल निकालने के लिये एवं ज्या, ज्याई, अग्रा, त्रिज्या इत्यादि प्रयोजन के लिये होता है । १०-स्वयवह यन्त्र-काल ज्ञान के लिये ॥ यहा हम ने दिडमात्र यन्त्रों का नाम लिखा है। यन्त्रों के बनाने के लिये हमारे भारतवर्ष में शिल्पिगण ज्योतिषियों में भिन्न घे, के भिन्न २ थे, क्योंकि जहां यन्त्र का उल्लेख ज्योतिष में आया है । प्रायः यह लिखा रहता है कि अच्छे गोलविद्या जानने वाले शिल्पी से अमुक यन्त्र बनवावें । वाल्मीकीय रामायण के यालकारह में जहां महाराजा दशरथ 'जी ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया है, लिखा है कि रामशाला और यावेदी आदि बनाने के लिये गणक, शिल्पी, सनक, तक्षा ( बढ़ई ) आदि को बुलाना घाहिये । इस से शिल्प शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र भिम्न २ होने के कारण ज्योतिष शास्त्र में यन्त्र निर्माण का पूरा उल्लेख नहीं किया गया है । शिल्प शास्त्र के ग्रन्ध अधुमा नहीं मिलते । परन्तु यन्त्रविधायफ थोड़े से मयीन ग्रन्थों का नाम लिखते हैं जो आपंगाधों के अनुकूल ही हैं। १-सर्वतोभद्र यन्त्र-भास्कराचार्य रुत सिद्धान्त शिरोमणि पुस्तक में इस का उल्लेस है, परन्तु यह ग्रन्थ नहीं मिलता है। २-यन्त्रराज महेन्द्रमूरिरुत एवं इस पर महामहोपाध्याय प. सुधाकर द्विवेदी ने टीका फी है । १८२ लोक हैं । शाके १२९२ का बना है । ३-भुषभ्रमयन्त्र-पद्मनाभरुस ३१ श्लोक हैं । इस पर टीका ग्रन्धकारने अपने आप की है । शाके १३२० में बमा ॥ अन्य भी १३१ भूमिका ४-यन्त्र चिन्तामणि-धघरकत शाके १९०० में बना । २६ शोक में अन्य समाप्त हुवा है। ५-प्रतोदयन्त्र-गणेशकत । १३ श्लोक ॥ ६-गोलानन्द-चिन्तामणि ने १२३ लोकात्मक ग्रन्थ बनाया || वेधशाला ( Observatery) वेधशाला उस को कहते हैं जहां ज्योतिषशास्त्र सम्बन्धि यन्त्र ( वेधो. पयोगी ) रक्खे रहते हैं और समय २ पर यन्त्रद्वारा ग्रहादिकों को घेध फर गणित द्वारा गति आदि का निश्चय करते हैं । यह कार्य बाहुन धनमाध्य होता है। इसी कारण प्रत्येक राज्यशासन समय यह राजाधित रहा । इस समय थोड़े काठ से जय से भारत की राज्यनी समुद्र यान पर चढ़ कर द्वीपान्तर फो गई, उस के साथ भारत की विद्या भी गई । एष वेधशाला आदि का क्रम टूट गया। पाठकों के अवलोकनार्थ थोड़े से स्थानों का नाम लिखते हैं कि जहां र वेधशाला थीं-और कहीं २ अब भी मृत्युकल्प होरही हैं । -सितारा ३-वीर ४-इंदरायाद ५-दिल्ली ६-मपुरा श्री महाराजा जयसिंह कारित सवत् १७५० । उस ममय इन 9-जयपुर की सभा में प० केशव एवं गणेश ये दो गणक बड़े मधीण पे॥ -उज्जयिनी ९-काशी-श्री राजा मानसिंह कारित-मान मन्दिर नाम से प्रसिद्ध है । इस का जीर्णोद्वार तक इस समय नहीं हो सका । इस विषय पर पं० वायूदेव शास्त्री जी ने सन् १९६८ ईस्वी में एक लेख प्रकाशित किया था और बहुत शोक प्रकाशित किया था। भूगोल वर्णन यद्यपि खगोल विधायक पुस्तक के माय भूगोल का सम्बन्ध उतना नहीं है परन्तु मू० सि० अ० १२ में इस का विषय गौणमाव से भाया है और काठ.
. सूर्यसिद्धान्त भय भूगोल और खगोठ की रचना का प्रकार लिखा है । इस कारण अब हम उस गोल का वर्णन करते हैं। रुनिम गोल एक धातु के तार के आधार से रहता है । यह तार उस गोठ के बीच में से केन्द्र हो जाता है इस के दो अन्त एफ पीतल के घल. पृक्त में दो छेद होते हैं, उन में लगे रहते हैं । यह पीतल का घडत आधारवृत्त कहावे और तार पृषियी का *अक्ष" कहावे । एषियी का अक्ष अर्थात् उम के केन्द्र पर से जाने हारी एक फाल्पनिक रेखा है जिस पर उस का भ्रमण माना है और जिस की धारों भोर समस्त खस्य पदार्थों का धमा प्रतिदिन देख पड़ता है। उस अक्ष के दोनों अन्तों को पृथियी के ध्रुव कहते हैं उन में एक को ध्रुव " और दूसरे को “ दक्षिण ध्रुव " कहते हैं । जो वृत्त दोनों ध्रुव होके जाते हैं उन को पाम्योत्तर वत (एफ को दक्षिण एत्त और दूसरे को उत्तर वृत्त) या "मध्याहू वृत्त " कहते हैं । भूगोल के पूर्व की ओर से पश्चिम की ओर घूमने से पृषियी का केन्द्र और सूर्य इन के ठीक यीच में जय कोई मध्याह्न वृत्त आता है तय उम मध्याहू वृत्त पर मूर्य के सम्मुख जितने देश रहते हैं । वन में मध्याहू होता है। कृत्रिम वृत्त पर केवल१२ मध्याहू वृत्त लिसे रहते हैं और अयशिष्ट स्थान में आधार वृत्त को मध्याहूयत्त कर सकते हैं । पृथिवी के दोनों भुवों से जो समान अन्तर पर एक वृत्त रहता है और जो गोल के समान दो भाग करता है उस को"निरक्ष देश कहते हैं। और गोल के उत्तरार्द्ध को “उत्तर गोल और दक्षिणार्ट को “दक्षिण गोल" कहते हैं । अट पथिवी के पृष्ठ पर जो स्थान हैं उन पर पूर्वोक्त अनेक फाल्पनिक वृत मान के उन स्थानों का परस्पर स्थितिसम्यन्ध फिस प्रकार से ठहराते हैं इस का विचार करते हैं:- प्रत्येक रत्त के ३६० ममानभाग मान लिये हैं उन प्रत्येक को अंश कहते हैं । इस लिये अदं यत्त में १८० अंश वृत्त के चतुर्थांश में८० अश होते हैं। जैसे दोनों ध्रुव परस्पर १८२ अश दूर में हैं और मिरक्षदेश से प्रत्येक भुध र अंश पर है। निरक्ष देश से फिमी स्थान के अंशात्मक अन्तर को "अक्षांश कहते हैं जो वह स्थान मिरत देश के उत्तर में हो तो उत्तर अक्षांश - भूमिका एवं दक्षिण में हो तो दक्षिण अक्षांश " कहलाते हैं। परन्तु संस्कृत में स्थान की जिस दिशा में निरस देश हो सम दिशा के अक्षांश कहलाते हैं। अर्थात निरक्ष की उत्तर में स्थान हो तो दक्षिण अक्षांश और दक्षिण में स्थान हो तो उत्तर अक्षांश होता है । इस लिये यह परिभाषा या परिभाषा से उलटी है जैसा उत्तरध्रुव और निरक्षदेश इन के ठीक मध्य में ४५ उत्तर- अक्षांश हैं परन्तु संस्कृत में वे दक्षिण अक्षांश कहलाते हैं । निरमदेश से जो २ स्थान अधिक दूर रहते हैं, यहां अक्षांश अधिक होते हैं। कृत्रिम गोल पर किसी निर्दिष्ट स्थान के अक्षांश जाननेकेलिये नियम-आधार वृत्ति की जो अलङ्ग निरक्ष से ध्रुव तक अंशसस्था में अङ्कित रहती है उम अल के नीचे निर्दिष्ट स्थान को ले आना तय सस स्थान के रूपर जिस अंग सख्या का चिह हो उतने अक्षांश जानना ॥ किस स्थान पर सय से अधिक अक्षांश हैं, और कितने होते हैं । पहिले कहा है कि हर एक एत्त में ३६० अंश मान लिये हैं। उन को अंश कहते हैं इस लिये एक अंश की लम्बाई मृत के महत्य के अनुसार होती है । गोल पर जो वृत्त गोल के समान दो भाग करते हैं उन को महावृत्त कहते हैं। जैसे निरक्षदेश मध्यान्हवृत्त ये भय महारत हैं। महादत्त के एक अश की लम्बाई अनुमान ३० कोश होती है। अब हिन्दुस्तान के उत्तर मे ले दक्षिण तक और वैसे ही सिहल आफ्रिका अमेरिका और आष्ट्रीलिया इन के स्थलमान से लम्बाई गिनी ॥ किसी निर्दिष्ट स्थान में जितने अक्षांश हो उतने ही अक्षांश जितने स्थानों में होवे उन सब स्थानों को जानने के लिये नियम-आधार वृत्त की जो अलङ्ग निरक्ष से भुव तक अश संख्या से अहित रहती है उस अलग के नीचे उस निर्दिष्ट स्थान को ले आना पुनः उस के ऊपर जिस अश संरुपा का चिह्न हो उस संख्या को मन में घर गोल को घुमाने से जो २ स्थान उस चिहू के नीचे आयें वे अभीष्ट स्थान हैं। इस से स्पष्ट प्रतीत होता है कि निरक्षदेश से ९० अंश के अन्तर पर जो दो ध्रुवस्थान हैं उन्हें छोड और किसी स्थान का निश्चय केल अक्षांश पर से नहीं होसकता। जितने स्थान पर समान अक्षांश ई वे सब अवश्य निरक्षदेश स्पष्ट परिधि - शुध - भूर्यसिद्धान्त एक समान्तर पत्त में रहते हैं। उस समान्तर वृत्त को कहते हैं । अब कृत्रिम गोल पर यद्यपि केवल १६ स्पष्ट परिधि लिसे रहते हैं तो भी गोल पर हर एक स्थान पर से एक स्पष्ट परिधि की कल्पना हो सकती है । गोल पर के १६ स्पष्ट परिधियों में हर एक गोलाई में आठ २ लिख रहते हैं और हरएक गोलाई में निरत और ध्रुव इन के बीच में 6 अश होने के कारण वे स्पष्ट परिधि सय मध्याहू पत्तों को दश २ अशों से दि. भक्त करते हैं। और हरएक विभाग का मध्य देश भी अक्षांश जानने के लिये आधारयत से विभक हो सकता है। यह स्पष्ट है कि पृथिवी के स्वतः निश्चित हैं। उन पर से निरत देश का निश्चय होता है। निरक्ष देश पर से स्पष्टं परिधि टहराये जाते हैं। परन्तु यहां से पूर्वापर देश मापते है। उस के ठहराने का इस में कोई प्रकार नहीं है। हम लिये धैमा "याम्योत्तर" वा 'मध्याहू वृत्त । जिस से पूर्वापर देश नापते हैं और जिस को मुरुप रेखा कहते हैं, उस का ठहराना स्वतन्त्रता से होता है ।। जैमा भारतीय ज्योतिष ग्रन्थों में उज्जपिनी आदि पर से सो मध्यान्ह वृत्त जाता है उस को मुख्य रेखा मानते हैं । और अगरेज लोग लण्डन पर से जो मध्यान्ह वृत्त जाता है उम को मुरुप रेखा मानते हैं और मुख्य रेसा छोड़ कर और जो स्थान हैं वे उस के पूर्व में या पश्चिम में गिने जाते हैं । जिस प्रकार किसी स्थान का निरक्ष रेखा से जो अन्तर होता है उसे अक्षांश कहते हैं। उसी प्रकार उस स्थान का जो मुरुप रेखा से अन्तर निरक्ष पर नापा जाता है उस को "देशान्तर" कहते हैं। देशान्तर निकालने का नियम-आधारपत्त के नीचे निर्दिएस्थान को ले मामा । तब मुख्य रेसा से आधार वृत्ततक निरक्षदेश में जितने अश होगे सो निर्दिष्ट स्थान का देशान्तर होगा। जो निर्दिष्टस्थान मुरुपस्थान के दाहिनी ओर होघे तो पूर्य देशान्तर और जो याई ओर होवे तो पश्चिम देशान्तर जानना । निर्दिष्ट स्थान में जो देशान्तर है, उस देशान्तर के जितने और स्थान होवें उन के जानने के लिये, नियम-आधारपत्त के एक अलग के नीचे निर्दिष्ट स्थान को ले आना तब एक ध्रुव से ले दूसरे ध्रुध तक उस भलङ्ग के नीचे जितने स्थान होघे थे सब समान देशान्तर के स्थान हैं।
भूमिका किसी स्थान के अक्षांश और देशान्तर निकालने का नियम आधार वृत्त की जो अलङ्ग निरक्ष से.ध्रुव तक अंशों से अङ्कित रहती है, उस अलंड के नीचे वह निदिष्ट स्थान ले आना । तब उस स्थान के ऊपर आधारवृत्त में जितनी अंश सख्या काशित होगा उतने यहां अक्षांश जानना, और आधार यत्त की वह अङ्कित अलङ्ग जहां निरक्ष में लगा हो वहां जितने अंश का चिन्ह होगा, उतना देशान्तर जानना ॥ नियम ६ जिस स्थान के अक्षांश और देशान्तर सात हैं उस स्थान को गोल पर ठहराने के नियम ॥ निरक्ष देश पर निर्दिष्ट स्थान का देशान्तर का अंश चिन्ह जानके उसे आधारवृत्त की अदिन अलग के नीचे ले आना तब आधारधुत्त पर जहां निर्दिष्ट अक्षांश का चिन्ह हो उस के नीचे अभीष्ट स्थान होगा । यह पांचवें नियम के उलटा है निर्दिष्ट स्थान कृत्रिम गोल पर फिप्त दांव में है । यह ठहराने की जब इच्छा है तब एथिवी पर उस स्थान के वास्तविक अक्षाश और देशान्तर जान के तदनुमार उस स्थान का कृत्रिम गाल पर चिन्ह करना ॥ उदाहरण- एक शुन गोल बनाके तस पर किसी एक ठांय में उत्तर ध्रुव का एक चिहू करके उस के सामने ही गोल पर दूसरा एक दक्षिण ध्रुव का चिह करना । फिर उन दोनों ध्रुवों से समान अन्तर पर एक निरक्षदेश अङ्कित फरके सोलह स्पष्ट परिधि और १२ मध्याह रेखा अङ्कित करना और वन मध्याहू रेखाओं में किसी एक को मुख्य रेखा अर्थात् लाइन की मध्याहू रेखा दहराना । फिर कृत्रिम गाल पर इस मुख्य रेखा के किसी विन्दु पर लपहन का चिहू किया जावे सो ठहराना चाहिये । जो पृथिवी के पृष्ठ पर लण्डन से उत्तर ध्रुव तक अन्तर माप सकते तो उस विन्दु को ठहरा सकते । परन्तु आज तक फोई ध्रुव तक जा नहीं सका। इस लिये उस विन्दु को ठहराने के लिये जी आकाश से सम्बन्ध रक्से ऐसा कोई दूसरा प्रकार यहां अवश्य लगाना चाहिये। आकाश की ओर देखने से यह स्पष्ट दिखाई देता है कि पृथिवी के चारों और और सब आकाशस्य पदार्थ भ्रमण करते हैं । अथवा पृथिवी अपने अक्ष पर म्रमण करती है और इसी से सब सस्य पदार्थ हमारी दृष्टि के सा- मने जाते है। इन दोनों कल्पनाओं में पृथिवी के भ्रमण विशेष में लापव है और वैदिक प्रमाण से भी पूधियी ही का भ्रमण सिद्ध होता है। अब ऐसी । मूर्य सिद्धान्त फरपना करो कि पृथिवी अपने अक्ष पर नित्य एक वार घमण करती है। तब पृथिवी के केन्द्र से उस का ध्रुव स्थान होके जाने हारी रेसा में को फोई नक्षत्र होता तो और सय धूमते हुये नक्षत्रों में वही एफ स्थिर देख पड़ता। एक चमकीली तारा तम स्थिर स्थान के अति निकट में है इसी लिये उम को ध्रुव तारा कहते हैं। जो देखने वाला पृथ्वी के ध्रुय स्थान पर रहता - है उम को यह ध्रुव तारा ठीक शिर पर दिई देता है । और जो निरक्ष. देश पर रहता है उस को यह पृथ्वी जहां चारों ओर आफाश में लगी हुई दिखाई देती है जिस को सस्कृत में * क्षितिज " कहते हैं उममें ध्रुवतारा देख पड़ता है। इमी प्रकार भास्कराचार्य ने "सिद्धान्तशिरोमणि" मामक ग्रन्थ में लिखा है:- निरक्षदेशे क्षितिमण्डलोपगौ ध्रुवौ नरः पश्यति दक्षिणोत्तराविति ॥ पृथिवी पर निरतदेश और ध्रुव इन के बीच में जो देश अधिक ध्रुध के पास होगा। वहां ध्रुव तारा अधिक ऊंचा देख पड़ेगा। यह मथं आचार्य ने श्री सि. शि. में लिखा है कि:- उदग्दिशं याति यथा यथा नरस्तथा तथा खालतमृक्ष मण्डलम् । उदग् ध्रुवं पश्यति चोन्नतं क्षितरिति । अब यह ध्रुव तारों की ऊंचाई एक एत्त में हर एक क्षेत्रज्ञ नाप सकता है और इस ऊघाई में जितने अंश होते हैं वे ही निरक्ष से भूमि पर अंश हैं। अर्थात् "अक्षांश" हैं। यों लपवन में अक्षांश ठहरा के कृत्रिम गोल पर मुख्य रेखा में निरक्ष से उत्तर की ओर “अक्षांशान्तर" पर ठरहन का चिहू. करना । इस प्रकार से अपया इस के सजातीय और किसी प्रकार से और सब स्थानों के वास्तविक “ अक्षांश " ज्ञात होते हैं । परन्तु केवल अक्षांशों से प्रत्येक स्थान का निश्चय नहीं होता इस लिये पृधियी के पृष्ठ पर जो स्थान हैं उन के देशान्तर जानने की रीति का अवश्य विधार करना चाहिये । पृथिवी अपने अक्ष पर ६० पड़ी में एक बार घूमती है और ६० पड़ी का ३६० वां भाग १० पल होते हैं। इस लिये इस से यह जान पहता है कि जो स्थान मुख्य रेखा से पूर्व में एक अंश पर हैं वे सब मुरुप रेखा के मध्याहू दश पल पहिले सूर्य के नीचे आते हैं अर्थात् यहां तय मध्या होता है और जो स्पान मुख्य रेसा से पश्चिम एक अंश पर है, यहां मुख्य रेखा के मध्याहू काल से दश पाठ पीले मध्याहू होता है । इसी प्रकार से जो स्थाम पूर्व में दो अंश के अन्तर पर हैं, वहां २० पल पहिले मध्याहू होता है। - - - . . भूमिका यो ही आगे भी। त्रिम गोल पर १२ मध्याहू वृत्त लिखे रहते हैं। इसीलिये दो २ पत्तों के बीच में पन्द्रह २ अंश रहते हैं और १० पलों को जब पन्द्रह मे गुणते हैं तब १५० पान अर्थात् अढाई घड़ी होती है। अढ़ाई घडी फी एफ होरा होती है । इस लिये उन मध्याहू वृत्तों को "होरा वृत्तभी कहते हैं। अब जिस स्थान फा देशान्तर ठहराना हो उस का मध्याहु काल वेध मे बूझ पड़ता है। और उसी क्षण में जो मुख्य रेखा का भी काल ज्ञात हो तो एक- सला गणित से इष्ट स्थान का देशान्तर यूझ पडेगा । अब एतना हो करना चाहिये कि इष्ट स्थान का मध्याहु काल और लण्डन का मध्याहू काल इन दानों का अन्तर जानके दश २ पलों का एक २ अश गिनना और वे पूर्व या पश्चिम जैसे हावै वैसा देशान्तर फहना जैसा कि निर्दिष्ट " पुर" के मध्या फाल में लाइन में ११ बजे हों तो निर्दिष्ट पुर में १५ पूर्व देशान्तर जानना और तो लण्डन में एक यजा हो तो निर्दिष्ट पुर में १५ पश्चिम देशान्तर जानना । लगन का काल जानने के अनेक प्रकार है। उन में एक सुखा प्रकार यह है कि शुद्ध अर्थात् दोपरहित एक कालमापक यन्त्र पास रसके उसे लगान में दृष्ट काल पर लगाके उस को वहां से पृथिवी के इतरभाग में ले जाना तय जय तक कि वह यन्त्र शुद्ध प्रकार से चलता है तब तक उस पर से लगहन फा फाल ज्ञात होगा । इस प्रकार घड़ी आदि यन्त्र बनाने की यिधि हमारे शिल्प शास्त्र में है, परन्तु इस के यह ग्रन्य नहीं मिलते हैं बड़ी माघ जहाल) जो समुद्र में चलती हैं, उन पर देशान्तर जानने के लिये एक कालमापक मन्त्र रहता है । उन्नतांश बूझने के लिये एक यष्ठांश नामक यन्त्र रहता है। हम से अक्षांश जानने के लिये ध्रुवतारा था और किसी सस्यपदार्थ के तन्नतांश नापते हैं। तब नौकाध्यक्ष को रुनिम गोल पर से यह सब जान पड़ता है कि हम समुद्र के पृष्ठ पर किम ठांव में हैं और हम को इष्ट घाट पर पहुंचने के लिये किस दिशा में चलना चाहिये । ऐसी कल्पना करो कि मुख्य रेखा नहीं निरक्ष में लगी है यहां नौका है । तब यहां दृष्ट हुआ मध्याहू और फारामापक यन्न से ज्ञात हुआ लयवन का मध्याहू ये दोनों अवश्य एक ही काल में होगे अब वह नाव निरक्ष देश पर पश्चिम की ओर उतनी दूर तक गई जहां दृष्ट मध्याहू काल लएष्ठन के मध्याहू काल के पीछे १० पठ पर होवे । तब यहां अंश पश्चिम देशान्तर होगा और उस नाव का गमन पश्चिम की भोर अनुमान ३० कोश होगा । परन्तु जो नाव ४५२ मतांशों के स्पष्ट परिधि पर अर्थात् मूर्य सिद्धान्त निरत और भुय इन के मध्य मार्ग पर चले ती काल में दश पल अन्तर होने से जो एक देशान्तरांश होता है, वह ३० कोश से न्यून ही कोश चलने से होगा । इसी प्रकार से और उत्तर की भोर देशान्तरांश की लम्बाई और लोटी रहती है। यह मय पृथिवी की गोलत्य कल्पना पर जैसी घटना होनी चाहिये तदनुसार ही होती है । पृथिवी गोल है । यह कल्पना नाय चलाने की जितनी रोतियां हैं उन सयों का मूल है और इन रीतियों से नाविक को कोई यही भूल फभी नहीं होती। इस लिये नाविक लोग जो पृषिधीका आकारमानते हैं उस से और शांति का उस का आकार होना असम्भवनीय है । विधि किसी निर्दिष्ट स्पष्ट परिधि पर एक देशान्तरांश में कितने कोश होते हैं यह जानने के लिये नियम निर्दिष्ट स्पष्ट परिधि पर दो होरा वृत्तों के बीच में जितना अन्तरहोगा सतना निरक्ष पर नापके उस में कितने अंश अन्तर्गत होते हैं, सो देख लेना। फिर उस अश सख्या को दो से गुण देना । वतने फोश निर्दिष्ट स्पष्ट परिधि पर एक देशान्तरांश की लम्बाई होती है। सूर्य जो पपोय से फिर उसी मध्याहू वृत्तपर आता है. इसी से प्रायः "काल गति की गिनती होती है। इस से किसी मनुष्य का पृथिवी के पृष्ठ पर मध्यात बदलने में कुछ चमत्कारिक घटना होती हैं । उदाहरण-ऐसी कल्पना करो कि कोई एक मनुष्य पृथिवी को ६० घड़ी में एक प्रदक्षिण कर सकता है और पृथियो के अपने अक्ष पर घूमने से साठ घी में उस की चारों ओर में सूर्य का भ्रमण देख पड़ता है इस लिये वह मनुष्य अपनी गति से किसी स्थान को मध्याहू काल में छोड़ पश्चिम की ओर चलना हुआ सर्वदा सूर्य के नीचे रह सकेगा । अपांत् इस फो साठों घड़ी मध्याहू ही बना रहेगा और यह मनुष्य जिस स्थान से चला यहां के रहने हारे मनुष्य को उतने काल में दो मध्याहू होंगे अर्थात् वह एक दिन गिनेगा और ये दो मनुष्य जब फिर मिलेंगे तब उन दोनों की गिनती में एक दिन का अन्तर होगा। यहां एक पुरुष को साठ घड़ी में पृषिषी को प्रदक्षिण करने का सामथ्र्य मानके दोनों की गिनती में एक दिन का भेद दिखलाया। परन्तु उस प्रद क्षिण करने हारे मनुष्य को साठ ही घही में एक प्रदक्षिण करना आवश्यक मही है । वह चाहे जाना चीरे बले और उसके चलने में चाहे उतमा विराम . भूमिका हो तो भी यह मनुष्य प्रदक्षिण करके जय फिर अपने स्थान पर आयेगा तब उस को गिनती में एक दिन न्यून होगा । उदाहरण- ऐसी कल्पना करो कि कोई मनुष्य अपने स्थान में पश्चिम की ओर एक देशान्तरांश पर गया, तब उस के छोड़े हुवे स्थान में जिस काल पर जितने मध्याह होंगे, उस काल के दश पल पीछे उस मनु प्य को यहां २ उतने म. ध्याहू होंगे, यह स्पष्ट हैं । इस गणित से जब वह मनुष्य अपने स्थान से अंश पर पश्चिम में जा रहेगा. तय उस को अपने स्थान के मध्याहों से पन्द्रह घड़ीपीछे उसने मध्याहूहोंगे। यों ही जघ यह १८० अंश पर जावेगा तब उसके ३० घडी पीछे उत्तने मध्याह होंगे । जब यह २९० अंश पर जा रहेगा, तब सम फो ४५ घड़ा पीछे उतने मध्याह होंगे और सब ३६० अंश पर जायेगा, मर्थात् फिर अपने स्थान पर आ पहुंचेगा,तब उस को साठ घड़ी पीछे उसने मध्याह होगे । इसी लिये यहां उस की गिनती में एक दिन न्यून होगा फिर वह चाहे उसना धीरे चला हो और उम के चलने में चाहे उतना वि. राम हुंभा हो । यों ही जो कोई मनुष्य फिसो स्थान से पूर्व की ओर चले तो उस को मध्याह उत्तरोत्तर पहिले ही होंगे। तब जाय उस की एक प्रद- क्षिणा होगी तब उस की गिनती में एक दिन बढ़ जायगा । पृथिवी को प्रदक्षिण करके आये हुधे लोगों से जो लोग मिले हैं उन फा उन आये हुवे लोगों के साथ दिन बार के विषय में प्रायः विवाद हुआ है। कृत्रिम गोल को उष्ण में रखने के लिये यों कि जिस से वह पृथिवी की वास्तविक स्थिति दिखलावे नियम-पहिले खुले स्थान में समान भूमि पर ककांटक ( कम्पास ) से एप PE TAIT R IF के फ्रेन्द्र स्थान में एक मच्याकार शुद्ध रखनालका सम शङ्ख के अग्र की छाया मध्याहू के पहिले और पीछे उम इत्त के परिधि में जहाँ लगे वहां दो चिहू करना । फिर उन निहों पर से एक सरल रेखा करके उस रेखा के किमी स्थान पर उस भूमि में एक लम्बा रेषा करनी । वह लम्बा रेखा उस स्थान को याम्योत्तर ( दक्षिण उत्तर ) रेसा कहावे । तब उस भूमि पर रुत्रिम गोल को यों रखना कि जिस में उस का आधार मृत्त ठीक उम याम्योत्तर रेखा पर रहे। फिर अपने रहने के स्थान का जो चिहू गोल पर होगा,उसे आधार वृत्त के नीचे ले आके भुयस्थान को अक्षांधी, मूर्यमिद्धान्त . - ध्रुधस्थान के चारों ओर २३ । २१ अन्तर पर जो वृत्त होते हैं उन को क्रम से "उत्तर कदम्यवृत्त" और दक्षिण कदम्यक्त " कहते हैं। दो अयनवृत्त और दो काम्बवृत्त इन चार वृत्तों मे भूगोल के पांच विभाग होते हैं। उन को भूगोल के खण्ड कहते हैं । जो रागड दो अपनवृत्तों के बीच में है उसे उपण. खपा कहने हैं क्योंकि पृथ्वी के और प्रदेशों की अपेक्षा से यहां उष्णता विशेष रहती है । ध्रुवस्थान के चारों ओर कदम्बकृत्तो के भीतर जो देश है उन को शीतखण्ड कहते हैं क्योंकि यहां शीत बहुत रहता है। और उष्ण खएह और शीत सण्ड इन के बीच में जो खण्ड है उन को क्रम से उत्तर और दक्षिण समशीतोष्णखएड कहते हैं। भुवन संस्था आधुनिक सिद्धान्तानुसार जिम पृषिधी पर हम लोग रहते हैं यह आकाश में सूर्य के भाकर्षण पर ठहरी है । इस के ऊपर अन्तरिक्ष जिम में मेघ, वायु, चन्द्रमा और तम के ऊपर मङ्गलादि ग्रह एवं सूर्य और सब से ऊपर नक्षत्र मण्डलहै । अब हम वेद के प्रमाण देते हैं:- योस्य प्रथमः प्राणः ऊो नामासौ स अग्निः ॥३॥ योस्य द्वितीयः प्राणः प्रौढो नामासौ स आदित्यः ॥४॥ योस्य तृतीय: प्राणोऽभ्यूढो नामासी स चन्द्रमाः ॥५॥ योस्य चतुर्थः प्राणो विभु माथ स पवमानः ॥६॥ योस्य पञ्चमः प्राणो योनि म ता इमा “आपः ॥७॥ योस्य पष्टः प्राणः प्रियो नाम त इमे पशवः ॥८॥ योस्य सप्तमः प्राणोऽपरिमितो नाम ता इमाः प्रजाः ॥ योस्य प्रथमो व्यानः सेयं भूमिः ॥ १॥ योस्य द्वितीयो व्यानस्तदन्तरिक्षम् ॥२॥ योस्य तृतीयो व्यानः सा दयौः ॥३॥ योस्य चतुर्थो व्यानस्तानि नक्षत्राणि (अथर्व सं० काण्ड १५ । १५ । १७) 'भूमिका इन मन्त्रों से ईश्वर प्रात्य नामधारीने घिरास्वरूप में भुवनसस्या का उपदेश फिया है-अर्थात् १-नक्षत्रमगडलं या राशिचक्र-सब से ऊपर । इस के नीचे २-द्यौः लोक-जहां मूर्य एवं अन्यान्य मङ्गलादि यह हैं । इस के नीचे ३-अन्तरिक्ष लोक-जहां चन्द्रमा है। एवं इसी अन्तरिक्ष में चन्द्रमा के नीचे ४-वायुमण्डल, जल, मेघ, इन्द्रधनुष आदि का स्थान है-और सब से नीचे ५-प्रजा घा भूमि है । आधुनिक विद्वानों ने निश्चय किया है कि ४५ मील १० पर्यन्त कपर को वायुमण्डल है जिस में मेघ विजुली भादि हैं। सभी प्रकार हमारे भास्कराचार्य आदि ने भी लिखा है:- भूमहिादश योजनानि। भूवायुरनाम्बुविादादशम् ॥२॥ (सि०शि० मध्यगति वासना) दोनों आर्य NE, लक्ष ने भी ऐमा लिखा है अर्थात् भूमि से ऊपर १२ योजन या ६० माइल पर वायुमण्डल है इसी में निर्घात, उल्का, मेघ, इन्द्र. धनुप, वीज, गन्धर्व नगर । निर्घातोल्का धनसुरधनुर्वियुदन्तः कुवायोः । संदृश्यन्ते खनगरपरीवेपपूर्व०॥. पृपिषी के उपर जो घायु हैं यह सास प्रकार के हैं। भावह,मयद,उद्यह, यह, सुबह, परिवह और परायह । इन्हीं सात यायुओं को सात, पाताल या जो द्वीप हैं उन से गुणन करने से होते हैं। वस्तुतः एफ हो है परन्तु स्थान भेद से भिन्न २ सख्या की गई है। इसी को पुराण वाठों ने करोड़ यापु डिसा है"फोटि" का अर्थ प्रकार है ट कोटि अर्थात् ४६ प्रकार के इसी *फोटि को फरोह संख्या अर्थ समझ कर पौराणिक महात्माने लिस मारा है। आवहः प्रवह उद्वहस्तथा संवहः सुपरिपूर्वको वही । सप्तमस्तु पवनः परावहः कीर्त्तितः कुमरुदावहोपरैः ॥ १॥ (धीवृद्धिद तन्त्र ग्रहभ्रमसंस्था ) ॥ सप्तार्द्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णुस्तिष्टन्ति प्रदिशा विधर्मणि । ऋ० सं०१।१६४ । ३५ मूर्यमिद्धान्त . भ्रयस्थान के चारों ओर ३ । २१ अन्तर पर जो वृत्त होते हैं उन को क्रम से "उत्सर कदम्यकृत और दक्षिण कदम्यवृत्त कहते हैं। दो अयनवृत्त और दो करम्यवृत्त इन चार वृत्तों से भूगोल के पांध विभाग होते हैं। उन को भूगोल के खण्ड कहते हैं । जो रागड दो अपनवृत्तों के बीच में है उसे उष्ण. खयह कहते हैं क्योंकि पृथ्वी के और प्रदेशों की अपेक्षा से वहां उष्णता विशेष रहती है । ध्रुवस्थान के चारों ओर कदम्बपत्तों के भीतर जो देश हैं सन को शीतखण्ड कहते हैं क्योंकि वहां शीत बहुत रहता है। और उष्ण सबह और शीत सगड इन के बीच में जो खयह हैं उन को कम से उत्तर और दक्षिण समशीतोष्णसए कहते हैं। भुवन संस्था आधुनिक सिद्धान्तानुसार जिम पषिधी पर हम लोग रहते हैं यह आकाश में सूर्य के भाकर्षण पर ठहरी है । इस के ऊपर अन्तरिक्ष जिम में मेघ, वायु, चन्द्रमा और तम के ऊपर मङ्गलादि ग्रह एवं मूर्य और सब से ऊपर नक्षत्र भपहलहै । अब हम वेद के प्रमाण देते हैं:- योस्य प्रथमः प्राणः ऊों नामासौ स अग्निः ॥३॥ योस्य द्वितीयः प्राणः प्रौढो नामासौ स आदित्यः ॥४॥ योस्य तृतीय: प्राणोऽभ्यूढो नामासी स चन्द्रमाः ॥५॥ योस्य चतुर्थः प्राणो विजुर्नामाथ स पवमानः ॥६॥ योस्य पञ्चमः प्राणो योनि म ता इमा "आपः ॥७॥ योस्य पष्ठः प्राणः प्रियो नाम त इमे पशवः ॥८॥ योस्य सप्तमः प्राणोऽपरिमितो नाम ता इमाः प्रजाः ॥ योस्य प्रथमो व्यानः सेयं भूमिः ॥ १॥ योस्य द्वितीयो व्यानस्तदन्तरिक्षम् ॥ २॥ योस्य तृतीयो व्यानः सा दयौः ॥३॥ योस्य चतुर्थो व्यानस्तानि नक्षत्राणि ॥ ४ ॥ (अथर्व सं० काण्ड १५ । १५ । १७) - मूमिका इन मन्त्रों से ईश्वर प्रात्य नामधारीने विराट्खरूप में भुवनसंस्था का उपदेश किया है-अर्थात् १-नक्षत्रमगडल वा राशिचक्र-सब से ऊपर । एस के नीचे २-द्यौः लोक-जहां सूर्य एवं अन्यान्य मङ्गलादि ग्रह हैं। इस के नीचे ३- अन्तरिक्ष लोक-जहां चन्द्रमा है। एवं इसी अन्तरिक्ष में चन्द्रमा के नीचे ४-वायुमण्डल, जल, मेघ, इन्द्रधनुष आदि का स्थान है-और सब से नीचे ५-प्रना वा भूमि है । आधुनिक विद्वानों ने निश्चय किया है कि ४५ मील से १०० पर्यन्त जपर को वायुमण्डल है जिस में मेघ घिगुली आदि हैं। इसी प्रकार हमारे भास्कराचार्य आदि ने भी लिखा है:- भूमेर्वहिादश योजनानि। भूवायुरत्राम्बुविसुदादाम् ॥२॥ (सि० शि० मध्यगति वासना) दोनों आर्य सह, लल्ल ने भी ऐसा लिखा है अर्थात् भूमि से ऊपर १२ योजन या ६० माइल पर वायुमण्डल है इसी में निर्घात, उल्का, मेप, इन्द्र. धनुष, वीज, गन्धर्व नगर ॥ निर्घातोल्का घनसुरधनुर्विद्युदन्तः कुवायोः । संदृश्यन्ते खनगरपरीवेपपूर्व०॥ पृथिवी के ऊपर जो घायु हैं वह सात प्रकार के हैं। आवह,प्रवाह,उद्याह, संवह, सुबह, परियह और परावह । इन्हीं सात वायुओं को सात, पाताल या जो द्वीप हैं उन से गुणन करने से ४८ होते हैं। वस्तुतः एक ही है परन्तु स्थान भेद से भिन्न २ सख्या की गई है । इसी को पुराण वालों ने ४० करोड यायु लिखा है फोदि का अर्थ प्रकार है ४ काटि अर्थात् ४ प्रकार के इसी "कोटि को करोह संख्या अर्थ समझ कर पौराणिक महात्माने लिख मारा है। आवहः प्रवह उद्वहस्तथा संवहः सुपरिपूर्वको वहौ ॥ सप्तमस्तु पवनः परावहः कीर्त्तितः कुमरुदावहोपरैः ॥ १॥ (धीवृद्धिद तन्त्र ग्रहभ्रमसंस्था)। सप्ताईगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णुस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि । ऋ० सं० १ । १६४ । ३५. - .
१४४ मृमिद्वान भाय धं -चन्द्रमा और ग्रादिको को कक्षा क्रान्ति कृत के आम माम है, यह फसो क्रान्ति के उता या दक्षिण क्रान्तिया को काट कर जाता है जिन को विक्षेप " कहते है। यह विशेष ॥ अंश उत्तर या दक्षिण में रहता है । यह क्रान्ति प्रदेश १५ अश चौड़ा है। भूगोलरेसा वर्णन वैदिक प्रमाणों से खगोल एवं भूगोल की रेखादि का वर्णन यदस्य दक्षिणमक्ष्यसौ स आदित्यो यदस्य सव्य- मक्ष्यसौ स चन्द्रमाः॥२॥ अथर्ववेदे। काण्डे १५ अर्यात व त्य नामधारी ईवा के दक्षिण आंख मानो मूर्य है बाई आंख चन्द्रमा, दिन रात नासिफा, दिति और अदिति ( आफाश के दो सरह पूर्व और पश्चिम ) दोनो कपाल और संवत्सर शिर है। इस उपदेश से हम को मूर्या द की सस्था, दिन रात का होना, आकाश के विभाग एवं नशे का धनाना आदि का ज्ञान होता है। प्रपिट्याणं पन्यां जानाति प्रदेवयानम् । (अथर्ववेदे १५ । १२ । ५) मर्यात्-मूर्य जब उत्तरायण एय दक्षिणायन होता है उस को क्रम से उत्तरायण को " देवयान " एव दक्षिणायन फो "पितृपान " कहते हैं । वसन्तो ग्रीमो वः । ते देवा ऋतवः । शरद्धेमन्तः शिशिरस्ते पित्तरः स (सूर्यः)। यत्रोदगावर्त्तते देवेषु तर्हि भवति । यत्र दक्षिणावर्त्तते तर्हि पिटपु भवति ॥ (शतपथब्राह्मणे २।१।३) भावार्थ:-यमन्त, ग्रीष्म, थर्या इन ऋतुओ में सूर्य उत्तरायण होने के कारण देवभाग ( उत्तर मेरु ) में होता है और शरद् हेमन्त, शिशिर इन श्रातुओ में पिरलोक ( दक्षिण मेरु) में होता है अर्थात दक्षिणायन ।
प्रकार पुरुप भूमिका यथा वै पुरुप एवं विपुवांस्तस्य यथा दक्षिणोई एवं पूर्वा विपुवतो यथोत्तराई एवमुत्तरा? विपुवतस्तस्मादुत्तर इत्याचक्षते प्रवाहुक् सत्त: शिर एव विपुवान् ॥ ऐतरेय ब्राह्मणे १८.१ २२ । भावार्थ -जिस प्रकार पुरुष होता मी प्रकार विषयान् सूर्य होता है। जिस के शरीर या शिर के पूर्वाद्धं और दक्षिणाद्धं होते इसी प्रकार प. श्चिमाई एवं उत्तरार्द्ध होते हैं अर्थात् समान दो २ भाग होते हैं। इसी कारण (जब सूर्य मेप एवं कन्या राशिस्य दीखता है तो उस समय अहोरात्र परा- सर होता है। ये ते पन्थाः सवितः पूर्यासोऽरेणवः सुकृता अन्तरिक्षे ॥ ( यजुर्वेद अ० ३४ । २७) भावार्थ:-पृथिवी के भ्रमण मार्ग को रविमार्ग वा क्रान्तियत्त कहते है, जिस पर सूर्य प्रत्येक राशि में जाते दीखता है ।। पडाहुःशीतान् पडु मास उष्णान्टतम् ॥ ( अथर्ववेद १८ । ५। १० । १७) भावार्थः-छः महीने मूर्य के उत्तरायण होने के कारण गर्मी रहती है। एवं छ• मास के दक्षिणायन होने से शीत होता है। तस्मादादित्यः परमासो दक्षिणेनैति पडत्तरेण । ( तैत्तिरीय ग्राहणे ६।५।३) भावार्थ:-चिघुवती रेखा से छ' मारपर्यन्त सूर्य दक्षिणा जाले दीरता है, एवं छ, मासपर्यन्त उत्तरायण में उत्तर की और जाते दीखता है। द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत । तस्मिन्साकं त्रिशता न शङ्कवोर्पिता: पष्टिर्न चलाचलासः ॥ (नस १६४ । ४८) मायाम:- :-३६० अंश का एक चक्र ( सवत्सर वा क्षेत्र) होता है, जिस में तीन गाभि (गर्मी, शर्दी, वर्षा ऋतु वा भूत, भविष्यत् , वर्तमान ) हैं । उस ३६० अंश मनातन और अविष्ल है। .
मृघसिद्धान्त पष्टिं सहस्राश्व्यस्यायुतासनमुष्ट्रीणां विंशति शर्ता । दश श्यावीनां शता दश व्यरुपीणां दश गवां सहस्रा॥ (ऋ० स० ८.४६ । २२) भावाधं और प्रत्येक ३६० में साढ २ फलायें (चा दगड )होती हैं। अर्थात् ३६०४६०-१२६८) कला ॥ 216००कल्ला त्वमेताजनराज्ञो द्विर्दशाबन्धुना सुश्रवसोपजग्मुपः । पष्टिं सहस्रा नवतिं नव श्रुतो नि चक्रेण रथ्या टुप्प- दावृणक ॥ ऋ० सं १ । १३ । ६॥ भाव थं - और प्रत्येक कला मे साठ २ विकला ( या पल ) होती है। अर्थात् २१६००४६०-१२९:००० विफला ॥ योऽश्वेभिर्वहतेवस्त उसाखिः सप्त सप्ततीनाम् ॥२६॥ अधप्रियमिपिराय पष्टि सहस्रासन्द्रम् ॥ २६ ॥ (अथर्व स० ८।४६ । २९) भायाधं -और प्रत्येक विकला में साठ २ अनुफला ( विपरल) होती है अर्थात् १२९६००००X40-=999६०००० अनुकला ।। चतुर्भिः साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीरवीविपत् ॥ ऋ० सं० १ । ११५ १६ भावार्थ -३६० अश का एफ चक्र होता है और इप्त में चार पाद होते है। प्रत्येक पाद में नम्वे २ (0) अंश होते है, जिम फो वृत्तपाद-कहते हैं । अनवरात्रिंशतं योजनान्येकैका क्रतुं परियन्ति सदाः । (ऋ० स० १ । १३ । ) भावार्य -जहा पर ठीक सूर्योदय होता है उस स्थान से (पशिम) परे ३. योजन पर उप प्रकाश होता है ( अरुणोदय से पहिले जो प्रकाश होता है) इम मन्त्र से ईश्वर देशान्तर लाने और सूर्य एक ही समय में भयंत्र उदित या अस्तमित नहीं होता, इभ का उपदेश करता है। में ( १४१) ज्योतिष के ग्रन्थों में बहुत से साङ्केतिक दुग्ह शब्दों से संख्यायें निर्देश की गई हैं, उन प्रत्येक का अर्थ- साङ्केतिक शब्द झापा साङ्केतिक शब्द भाषा . सूर्य १२ १७ १ ४ ५ ईक्षण शून्य, ईला २ अत्यष्टि अज अनल अच अक्षि अक्ष अर्कि अम्बर अर्थ अम्युधि श उरग ११ sur E শ नक्षत्र . प्रक्ष sur १२ ४ , १२ कर काल ६ ३ 9 १ ཐཱ ཉྙོ ཡཱ ཤྩ – ཝཱ ལཾ ཀྵ ཀྵ ཝཾ ཀྐཱ ཀྐཱ པཨ ༔ ཤཱ ཀྐཱ ཡྻ # # ཤྩ ཧྥ་ལྷོ་ཏྟཱ་ महल 9 अवधि अग्नि अद्रि अग अरुण अश्वि अचल अष्टि সায় आब्ध आकर थाहत . बग Noun कृति कृत रा C जोड़ा हुवा रोट ग्रह गुणित हस्पति त 40 घन १७ C घान गुणन ज्योतिप के ग्रन्थों में बहुत से साङ्केतिक दुरुह शब्दों से संख्यायें निर्देश की गई हैं, उन प्रत्येक का अर्थ-- माङ्केतिक शब्द भापा, साङ्केतिक शब्द मापार्थ छिद्र बुध ४ १ ४ १४ ३ नन्द नभर नयन निशाकर निगम पक्ष पर्वत पयोधि पाक पृथिवी प्रभाकर घाण याहु 9 जलधि जिग जिष्णु ज्यटन नक्ष तव नान तिथि त्रि शरङ्ग दन्त प्शन uy ४ ३ १ ge ३ ५ २ नक्षत्र २ भुजङ्ग ८ १ दस्त्र दिव दिन शून्य भूधर २ om 9 द्विप धुचर हि देव भरणी नरख नग ग्रह २ ३३ महल ४९ 9 भूमिधर भीम मरुत् महीधर महीज मार्गण मुनि पम १ 3 नव २ (१४९) ज्योतिष के ग्रन्थों में बहुत से साङ्केतिक दुरूह शब्दों से संख्यायें निर्देश को गई हैं, उन प्रत्येक का अर्थ- , साङ्केतिक शब्द भाषार्थ माले तक शब्द भाषा यमल २ २ युग ३ ५ विसरू 9 ६ शिव शिसी शिलीमुरा शेपित शैल घट् सर्प सागर सायक सिताच् सिद्ध सितस्विट रवि १२ C ar ४ ११ ५ २४ लोषम घन्दि वसु যন্ত্রখা विपत् ব্যক্তি or सूर्य सीरि शन्य. ४ अन्तर মুনি আখি विधर हिमांशु हसी हुतमुक विश्व विधु . वीतिहोत्र . ३ . हीम पटाना .जन्य ५ or ध्योम शर যায় शशाङ्क, श्रुति शूली COM ओ३म् सूर्यसिद्धान्त भाषानुवादः अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने । समस्तज- गदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः ॥ १॥ अल्पावशिष्टे तु कृते मयनामा महासुरः । रहस्यं परमं पुण्यं जिज्ञा- सुर्ज्ञानमुत्तमम् ॥२॥ वेदानमरयमखिलं ज्योतिपां गति- कारणम् । आराधयन्धिवस्वन्तं तपस्तेपे सुदुश्वरम् ॥३॥ तोपितस्तपसा तेन प्रीतस्तस्मै बरार्थिने। ग्रहाणां चरितं मादान्मयाय सविता स्वयम् ॥४॥ विदितस्ते मयाभाव- स्तोपितस्तपसा ह्यहम्। दमां कालानयं ज्ञानं ग्रहाणां चरितं महत् ॥ ५॥ न मे तेजासहः कश्चिदाख्यातुं ना- स्ति में क्षणः । मदंशः पुरुपोऽयं ते निःशेपं कथयिष्यति ॥६॥ इत्युक्तवान्तर्दधे देवः समादिश्यांशमात्मनः ।स पुमान्मयमाहेदं प्रणतं प्राञ्जलिस्थितम् ॥ ७ ॥ शृणुप्चैक- मनाः पूर्व यदुक्तंज्ञानमुत्तमम् । युगे युगे महीणां स्त्र- यमेव विवस्वता ॥ ८॥ शास्त्रमादा तदेवेदं यत्पूर्व माह भास्करः । युगानां परिवर्तन कालभेदोऽत्र केवलम् ॥६॥ भयानुवाद-उस ब्रहरको जिस का रूप ध्यान में नहीं आसफता और न फिसी इन्द्रिय से प्रत्यक्ष हो मुझता है, जिस में सस्य रज तम आदि प्रति गुण नही हैं और नित्य धान मुसादि गुण वर्तमान हैं और जो असिल जगत् को धारण करता है,नमस्कार है ॥ ९ ॥ सत्ययुग के अन्त से थोड़े समय पहिले भयनामक महा असुर ने यह मूट पुरयजनक सब से श्रेष्ठ और उत्तम के २ मूर्यसिद्धान्तभावानुवाद समान ॥२॥ जो सब वेदाङ्गों ( वेद के छः अङ्ग है, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्दः शास्त्र और ज्योतिष ) में अग्रणी है और ग्रह नक्षत्रो की गति का कारण है, जानने की इच्छा से नारायण की आराधना करके अतिकठोर परिश्रम वा तप किया ॥३॥ उस के तप से प्रसन्न होकर वर चाहने वाले मय को ग्रहों का सम्पूर्ण भान सूर्य मे दिया॥४॥ सूर्य ने कहा-हे मय। मैने तेरा प्रयोजन जाना और मैं तेरे तप से प्रसन्न हुवा, मैं तुम को फाठ के आ. अय जो ज्योतिप शास्त्र का ज्ञान है यह दूंगा ॥ ५॥ मेरा तेज कोई नहीं सम्हाल सकता और मुझे उपदेश करने का अवकाश भी नहीं इस लिये यह पुरुष जो मेरा अंश है तुझ से सम्पूर्ण शाख कहेगा ॥६॥ यह कह कर भूर्य अपने अंश पुरुप को आज्ञा देकर अन्तर्धान होगया और उस पुरुप ने नय मे जो हाथ जोड़े और मय हुवा सड़ा था, यह कहा ॥७॥ हे मय । जो उत्तम साम स्वयं सूर्य ने पूर्व युग में महर्षियों को उपदेश फिया था उस को एकाग्र हो श्रवण करो॥८॥ यह बहुत प्राचीन शान है जो पूर्वकाल में सूर्य ने वर्णन किया है और प्राचीन और आधुनिक शास्त्रों में युगों के बदलने का फारण केवल फाल का भेद है। अर्थात ग्रहादिकों की गति विधि मादिनिरू- पण के नियम एकसे रहते हैं परन्तु समय २पर वेध ( Obserration) द्वारा ग्रहों को देखने से कुछ बीज (Correction) देना पड़ता है, इस कारण कुछ २ फाल में भेद पड़ता है ॥en विवरण-लोक २-७ असुर जाति के भय ने सगोलस्य पदार्थों के सम्यक् शान के लिये "सावित्र विद्या" (ज्योतिष शाख ) में फठिन परि. श्रम (Study) किया जिस से प्रथम उस ने सूर्य ( जो सारे जगत् में सब से बड़ा पदार्थ एवं केन्द्र स्वरूप है) का निश्चय किया (उस का आकार, गति, वर्ण, भगण आदि) और उसी को मूल मानकर सौर जगत्स्य अन्यान्य ग्रह, उप- ग्रह एवं नक्षत्रादि समस्त आकाशस्थ पदार्थों का ज्ञान प्राप्त किया। इसी को आलङ्कारिक वर्णन मे ( सूर्य की तपस्यादि ) माचीन शैली से लिसाहै। ज्योतिष शास्त्र को प्राचीन समय में सावित्रविद्या कहते थे इस में प्रमाणः- 'अहीनायस्भ्यः । सावित्रं विदाञ्चकार ॥ १० ॥ स ह हंसो भूत्वा । स्वर्गलोकमिपाय । देवनागो ह ौतर्पः । सावित्रं विदाञ्चकार ॥१॥शूषो हयाणेयः । आदित्येन समाजगामा ते० प्रा०।३।१०।१" अर्थात् अथत्थाले पप समीर ने सावित्रविद्या को जाना और स्वर्ग । . A मधमााध्याय. को प्राप्त हुवा और पौतर्ष देवभाग ने सावित्रविद्या को जाना और बाणेय शूध ने सावित्रविद्या को जाना और सूर्य के तुल्य ( विद्यामें) प्रकाशमान हुवा। शोक ६।७।८ के विषय में पाठ भेद है। पूना के आनन्द आश्रम नामक पुस्तकालय में एक टीका रहिल पुस्तक है जिस के नं० २८०० में इस प्रकार पाठ है फिन मे तेजःसहः कश्चिदात्यातुं नास्ति मे क्षणः । भदंशः पुरुषोश्यं ते निम्शेपं कथयिष्यति ॥ ६॥ तस्मात् त्वं स्वां पुरी गच्छ तत्र भाम ददामि ते । रोमके नगरे ब्रह्मशायान्म्लेच्छावतारधृक् ॥ ७ ॥ इत्यु. परवान्तर्दधे देयः अर्थः-हे मय । मेरा तेज कोई सह नहीं सकता और मुझे कहने का समय नहीं। यह मेरा अंश पुरुष तुझ से सब कहेगा। इस लिये तू अपनी नगरी को जा, वहां रोमकनगर में मलशाप से मैं म्लेच्छायतार लेने वाला हूं तो घहीं तुझे ज्योतिषशास्त्र का उपदेश फरूंगा । यह पाठ सटीक एक पुस्तक में ६ लोक नहीं है, एवं दूसरी में दोनो हैं । इस पर मिस्टर २० घर्जेस (अंग्रेज़ी अनुयादफ) की सम्मति है कि तकनीक ६ । ७।८ असहस हैं किसी ने मिलाये जान पड़ते हैं। इस का पूरा वर्णम भूमिका में किया गया है, यहां देखिये। लोकानामन्तकृरकालः कालोऽन्यः कलनात्मकः ॥ स द्विधा स्थूलसूक्ष्मत्वान्मूर्त्तश्चामूर्त उच्यते ॥१०॥ माणादिः कथितो मूर्त्तखुट्याक्षोऽमूर्तसंज्ञकः ॥ पभिः प्राणैर्वि- नाडी स्यात्तत्पप्या नाडिका स्मृता ॥ ११ ॥ नाडीप- श्या तु नाक्षत्रमहोरात्रं प्रकीर्तितम् ॥ तत्त्रिंशता भ- घेन्मासः सावमोऽर्कोदयस्तथा ॥ १२॥ ऐन्दवस्तिधि- भिस्तद्वत्संक्रान्त्या सौर उच्यते ॥ मासैदशमिर्व दि- व्यं तदहरुच्यते ॥ १३ ॥ सुरासुराणामन्योऽन्यमहोरात्रं विपर्ययात् ॥ सत्पष्टिः पड्गुणा दिव्यं वर्षमासुरमेव च ॥१४॥ तद्द्वादशसहस्राणि चतुर्युगमुदाहृतम् ॥ सूर्याब्द- संख्यया द्वित्रिसागररयुताहतैः ॥ १५॥ सन्ध्यासन्ध्यांश- ४ मूर्य मिद्वान्तभावामुयाद सहितं विज्ञेयंतच्चतुर्युगम् ॥ कृतादीनां व्यवस्थेयं धर्म- पादव्यवस्थया॥१६॥युगस्य दशमोभागश्चतुखिद्वकपड् गुणः । क्रमाकृतयुगादीनां पष्ठांशः सन्ध्ययोःस्वकः॥१७॥ भापाउनुवाद-फाल दो प्रकार का है,एफ वह जोजगत् की उत्पत्ति स्थिति और नाश का कारण होने से अनन्त है। दूसरा जो ज्ञानगम्य है अर्थात गणित द्वारा जानने योग्य है । ज्ञानगम्य काल दो प्रकार का है। एक भूर्त या स्थूल है, दूसरा मूत्म ( जिस का परिमाण नहीं हो सकता ) है ॥ १० ॥ प्राण से लेकर वल्पादि पर्यन्त काल को मूर्त काल कहते हैं।एवं त्रुटि आदि ( अति सूक्ष्म काल जो व्यवहार में नहीं आता ) को अमूर्त काल कहते हैं। छः प्राण की १ विनाही ( पल) एवं ६० विनाही फी १ नाड़ी ( घड़ी,दण्ड) होती है ॥ ११ ॥ ६० नाही फा १ नाक्षत्रिक अहोरात्र ( दिन + रात्रि) और ३० नाक्षत्रिफ अहोरात्र का १ नाक्षत्रिक महीना होता है । एक सूर्य के उदय से लेकर दूसरे सूर्य के उदय पर्यन्त काल को "सावन" (Civil day & night) वा "पार्षिक अहोरात्र कहते हैं और ३० मायन अहोरात्र का १ सावन समय होता है ॥ १२ ॥३० तिथियों का १ चान्द्रमास होता है। संक्रान्ति में संक्रान्ति तक काल का १ सौर मास होता है और प्रत्येक पूर्वक १२ नाक्षत्र मास का १ नाक्षत्र वर्ष, १२ सावनमास का १ सावनवर्ष, १२ घान्द्रमास का १ चान्द्र वर्ष और १२ सौरमास का १ सौर वर्ष होता है। एवं १२ सौर मास का दिव्य अहोरात्र होता है (देवता और असुर का)॥३॥ देव और असुरों फा अहोरात्र विपर्यय ( बरअक्स ) से होता है अर्थात् जय देवताओं का दिन होता है, तब अमरों की रात्रि होती है । एवं जय अमरों का दिन होता है तय देयताओं की रात्रि होती है। ऐसे दिव्य ३० अहोरात्र का१दिष्पमास और १२ दिव्य महीनों का१दिव्य वर्ष होता है ॥ १४ ॥पूर्वोक्त १२००० दिव्य वर्षों की १ चतुर्युगी ( चौकड़ी-युग) होती है । जिस के सौर वर्ष ४३२००० होते हैं ॥ १५ ॥ उक्त चतुर्युगी का परिमाण सन्ध्या और सन्ध्यांश मिलाकर है । चतुर्युगी में जो सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और फलि कम से ४, ३. २ और १(संख्या से लो भागे गुणन होगा) हैं यह धर्म के ४ चरण की नाई हैं ॥१६॥ युग (पूर्योक १ महायुग वा चतुर्युगी) के वर्ष के दशम भाग को ४, ३, २ और १ से गुणा करने से क्रम से रुत, ग्रेता, द्वापर और कलियुग के वर्षों - , प्रथमाभ्याय, का परिमाण होगा और इन प्रत्येक युगों के वर्ष परिमाण का छठा भाग अपना २ सन्ध्या और सन्ध्यांश वर्य होता है जो उसी में मिला है अर्थात् प्रत्येक युगमान वर्ष के छठा भाग फे वर्ष दो भाग में से एक भाग आदि सन्धि का वर्ष और दूसरा भाग अन्त सन्धि का वर्ष होता है ॥ १७ ॥ १९--वियरण-सेकयाह के ३१५० भाग को ध्रुटि कहते हैं ।। १२-एक दिन जिस समय माध्यान्हिक रेरा के ऊपर कोई स्थिर सारा दीख पड़ती है उस समय से उस के दूसरे दिन उसी रेखा पर-जिस समय तक तारा दीख पड़े, उतने समय को नाक्षनिक अहोरात्र कहते हैं । १३-एक दिन के मध्यान्ह फाल से उसके दूसरे दिनके मध्यान्हकाल पर्यन्त समय को प्रात सौर दिन कहते है। १४-पथियों को उत्तरमेरु के निवासी देव और दक्षिण मेरु के निवासी असर कहाते हैं । पृथिवी की दैनिक गति से जघ छः मास में उस का उत्तर. मेरुप्रदेश सूर्य के सम्मुख होता है तब देवताओं का छः मास तक दिन और उस समय अमरों की रात्रि और जय पृथिवी का दक्षिणप्रदेश सूर्य के सामने होता है तब अमरों का छः महीने का दिन और उस समय देवों की रात्रि होती है । इस प्रकार प्रषियी की यार्षिक गति में वर्ष फा-देवता और अ. सुरों का १ अहोरात्र होता है। युगानां सप्ततिः सैका मन्वन्तरमिहोच्यते ॥ कृताब्दस- ख्यातस्यान्ते सन्धिः प्रोक्तो जलप्लवः ॥१८॥ ससन्धयस्ते मनवः कल्पे ज्ञेयाश्चतुर्दश ॥ कृतप्रमाणः कल्पादौ स- न्धिः पञ्चदशः स्मृतः ॥ १६ ॥ इत्थं युगसहस्रेण भूतसं- हारकारकः ॥ कल्पोब्राह्ममहः प्रोक्तं शर्वरी तस्य तावती ॥ २० ॥ परमायुः शतं तस्य तयाहोरात्रसंख्यया ॥ आयुपोऽर्द्धमितं तस्य शेपकल्पोऽयमादिमः॥२१॥कल्पा- दस्माच्च मनवः पड्व्यतीता: ससन्धयः ॥ वैवस्वतस्य च मनोर्युगानां निधनो गतः ॥ २२ ॥ अष्टाविंशाागाद- *- ६ मूप्पमिद्वामानापानुवाद स्माददातमेतत्कृतं युगम्॥ अतः कालं प्रसंख्याय संख्या- मेकत्र पिण्डयेत् ॥ २३ ॥ भापामः-पूर्वोहरू ११ महायुगों ( चतुर्युगी) फी १ मन्वन्तर संज्ञा है और मन्वन्तर के अन्त में सत्ययुग के वर्ष परिमाण ( सौर वर्ष १७२८००० जिस के दिव्य वर्ष ४० होते हैं) के परावर सन्धि का परिमाण है । इस सन्धि समय सारी पृथिवी जग से भर जाती है अर्थात् जलमय हो जाती है ॥१॥ पूर्वोक्त १४ मन्यन्तर फा१कल्प होता है । इस में १४ अन्त की सन्धिपां होती हैं और एक आदि सन्धि सत्ययुग के यर्प परिमाण के बराबर होती है अर्थात १ कल्पमें १४ मन्यन्तर और १५ सन्धिया होती हैं ॥१॥ पूर्वोक्त रीति से १००० चतुर्युगी का १ फल्प होता है जिस के अन्त मे सब प्राणियो का नाश हो जाता है। १फल्प फा १ ब्राह्म दिन होता है और इसी परिमाण की रात्रि अर्थात् पू. वोक्त २ कल्प का ९ ब्राह्म अहोरात्र होता है ॥ २० ॥ ब्रह्मा की आयु (सृष्टि वर्तमान रहेगी । ब्राह्ममान से १०० वर्ष की है अर्थात् पूर्वोक्त ३० ग्राम अहो. रात्र का १ ब्राह्ममास, एवं १२ बाल मारा कर १ वालवर्ष होता है। ऐसे १०० वर्ष की प्रला की आयु है । इस आयु का आधा भाग बीत गया और अव- शिष्ट ( याफ़ी ) आयु के फल्पो में से यह वर्तमान पहिला कल्प है अर्थात् १० वर्ष में से ५२ यर्प पूरे बीत गये । एघे ५१ वा वर्ष अपशिष्ट आयु काधीत ॥२॥ इस वर्तमान कल्प (मानदिन) में से ६ मन्यन्तर सन्धियो सहित यीत गये हैं और इस वर्तमान वैवस्वत नामक सप्तम मन्वन्तर के २१ महायुगो में से पूरे २७ चतुर्युग बीत गये हैं ॥ २२ ॥ और २८ थीं धतुर्युगी में सतयुग पूरा बीत गया है । अब काल की संख्या करने के लिये इस ३८ यी चतुर्युगी के रुत युग तक के बीते हुवे वर्षों को एक स्थान में योग फ॥२३॥ विधरण-झोक १८ से २३ तक १४ मन्यन्तरों के नाम ये हैं-१ स्यायम्भुव, २ स्यारोचिष, ३ औतमि, ४ तामस, ५ रैवत. ६ पाशुप, धेषस्वत, ८ सावर्णि, दक्षसावर्णि, १० ब्रह्म सावर्णि, १९ धर्मसापणि, १२ रुद्रपुत्र, १३ रोप और १४ भौत्यक । ये १४ मन्यन्ता और १५ सन्धि मिलाफर १०० महायुग होते हैं। महायुग का दशम भाग ४३०२० सी० ब० कलियुग का परिमाण, इस के द्विगुणित द्वापर, तीन गुणा श्रेता और चार गुणा सत्ययुग और प्रत्येक युग के वर्षों का छठा माग आदि भीर रुठा साग अन्त सन्धि के वर्ष होते हैं। .
युगवर्पज्ञापक चक्र कलियुग चतुर्युग वा महा युग द्वापर युग रुत युग वेता युग सौर दिव्य सौर दिव्य सौर सौर दिव्य सन्धि सौर दिव्य सन्धि और वर्ष य युगमा सन्धि और मुगमान सन्धि और युगमरन सन्धि और युगमान वर्ष वर्ष वर्ष वर्ष घर्ष वर्ष वर्ष मषमाध्याय आदि| १४४८०/400) आदि १८८000 | ३०० आदि ७२०००/ २०० आदि | ३६००० | २०० आदि ३६००००/ १००० सन्धि सन्धि सन्धि 10000३००० युगमान १२००००/ २००० युगमान ३६०००० / १२०० युगमान३६० रुस पुग:M4000|| युगमान अन्ता १४४०००800/अन्त १०८000] ३०० अन्त | ७२०८० २०० अन्त ३६००० अन्त ३६०००० १००० सन्धि मन्धि सन्धि सन्धि सन्धि ९०२८०००/४०० सन्धि २२८६००० ३६०० सन्धि ६४० २४०० सन्धि ४३२०२० / १२०० सन्धि सहित सहित सहित सहित युगगाना युगमाना युगमान युगमान युगमान १ गन्यन्तर-१ महायुग १ पाहायुग-सीरयर्प ४३२०००० x 91-३०६०२०००० सौर वर्ष, (१ मन्वन्तर के घर्ष) इन को १४ [मन्यन्तर से गुणा किया तो ४२४८०००० सौर यप हुये (१४ मन्यन्तर के वर्ष ) १५ सन्धि १ सन्धि में १७२८०२० सौरवर्प । इन को १५से २००
-
P
D
मूर्य सिद्धान्त भाषानुवाद
गुणा किया तो २५००० मौर वर्ष हुये। इस संख्या को १४ मन्वन्तर की वर्ष संख्या
में योग किया तो ४३२०००००० सौर वर्ष हुवे। यही १ फ्ल्प वा बाल दिन का
परिमाण हुआ। इसी प्रकार इतने ही वर्ष की प्राल्ल रात्रि शेती है । इस
वर्तमान फल्प के ६ मन्यन्तर बीत गये।
६ x ३२६७२०००० ( मन्वन्तर परिमाण ) = १८४०३२०००० सौर वर्ष
मन्वन्तर फी पीती हुई सन्धि १७२८:00सन्धि परिमाण वर्ष)=१२००६
बीते हुबे धतुर्युग २७ ४ ४३२०००० ( १ चतुर्युग वर्ष )-१९६६४०००
गत रुत युग १७२८०००
कल्प के आरम्भ से सतयुग के अन्त पर्यन्त १८७२७८४००० सौर वर्ष हुवे ।।
ग्रहह्मदेवदैत्यादि सृजतोऽस्य चराचरम् । कृताद्विवेदा
दिव्याब्दाः शतघ्ना वेधसोगताः॥२४॥ पश्चादुव्रजन्तोऽति
जवानक्षत्रैः सततं ग्रहाः । जीयमानास्तु लम्बन्ते तु-
ल्यमेव स्वमार्गगाः॥२५॥ प्राग्गतित्वमतस्तपां भगणः
प्रत्यहं गतिः । परिणाहवशाद्विन्ना तद्वशादानि भुञ्जते
॥२६॥ शीघ्रगस्तान्यथाल्पेन कालेन महताल्पगः । तपां
तु परिवर्तन पौष्णान्ते भगणः स्मृतः॥ २७ ॥
भापानु०-कल्प के आरम्भ से जगनिर्माता ईश्वर को ग्रह, नक्षत्र, देव,
अमर, मनुष्य, भूमि, पर्वतादिकों (घराघर-जङ्गम, स्यावर ) की सृष्टि करते
हुवे ४०४०० दिव्य वर्ष बीत गये ॥ २४ ॥ ग्रह सब अपने २ मार्ग पर नक्षत्रों के
साथ अति शीघ्र गति से पूर्व से पश्चिम की ओर जाते हैं परन्तु नक्षत्रो से
चलने में पीछे रहजाते हैं । यह गति सब ग्रहों की तुल्प वेग से जनित
है ॥२५॥ इस कारण ग्रहों की गति पश्चिम से पूर्व की ओर है और उस गति
का ज्ञान ग्रहों के भगणों के नाम से होता है। ग्रहों की कक्षाओं ( Orbit ) के
परिधि (Circumfirence ) भिन्न २ होने के कारण यद्यपि न की तुल्य बेग
से जनित है तथापि भिन्न २ है ॥६॥ शीप चलने वाले ग्रह घोड़े समय में
राशि धरु का धमण पूरा फरलेते हैं और मन्द २ चलने वाले पह अधिक
समय में एक भगण पूरा करते हैं। राशिधक में रेवती के योग तारा से चल-
कर पुनः वहीं लौट कर आजाने को प्रत्येक ग्रहों का अपना२"भगण कहते
हैं ॥२७॥
प्रघमारध्याय विवरण-२४ श्लोक ४१४ दिव्य वर्ष x ३६०=१७०६४००० सौर वर्ष को १८५०७८४००० (पूर्वोक्त सौर वर्ष ) वर्ष से घटाने पर शेष १८५३७२०००० सौर वर्ष फल्प के आरम्भ से कृतयुग के अन्ततक व्यतीत हुए हैं। अब इस प्रकार सम- झना चाहिये कि- रुतयुग के अन्त तक १८५३७२००२० गत त्रेता युग १२९६००० गत द्वापर ८६४००० गत फलि (मिति चैत्र कृष्णपक्ष संवत् १९५८ तक) ५०२ योग १९५८८५००२ वर्तमान सृष्टि संवत् यही है और चैत्र शुक्ल १ संवत् १९५८ को १८५८०५००३ का प्रारम्भ होगा। २६॥ ग्रहों की कक्षा बड़ी और छोटी होने के कारण प्रत्येक की गति एकसी नहीं होती है । अर्थात जिन ग्रहों की कक्षा बड़ी है । जैसे शनि, सहस्पति) उन को अपनी कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करने में अन्यान्य छोटी कक्षा वाले ग्रहों की अपेक्षा अधिक समय लगता है। और जिन की छोटी कक्षा ( जैसे -चन्द्रमा, बुध, शुक्र ) है उन की गति अधिक होती है । विकलानां कला पप्ट्या तत्पष्टया भाग उच्यते । तत् त्रिंशता भवेद्राशि गणो द्वादशैव ते॥२८॥ युगे सूर्यज्ञ- शुक्राणां खचतुष्करदार्णवाः । कुजार्किगुरुशीघ्राणां भगणाः पूर्वयायिनाम् ॥ २६ ॥ इन्दोरसाग्नित्रिनीषु सप्तभूधरमार्गणाः । दसत्र्यष्टरसाङ्काक्षि लोचनानि कु- जस्य तु ॥३॥ बुधशीघ्रस्य शून्यर्तुखाद्रियङ्कनगेन्दवः । गृहस्पतेः खदस्राक्षि वेदपड्वयस्तथा ॥ ३१ ॥ भापानुवाद-६० विकलाओं की (Second ) १फला (Umute ) और६० फलाओं का १ अंश (Degrec ), ३० अंश की एक राशि ( Signr ) और १२ राशियों का १ अर्गण (Rerolution) होता है ॥ २८ ॥ एक चतुर्युगी में गूर्य, থ और शुक पूर्व की ओर चलने में ४३२००० गण पूरा करते हैं। मगल, २ ॥ मूर्यसिद्धानामावानुवाद शनि और पृहस्पति के शीघ्रोध के गण गी ४३२८००० ही होते हैं ॥ २ ॥ एक महायुग में चन्द्रमा के ५७७५३३३६ और बगल के स६८३२ भरण होते हैं ॥३॥ एक महायुग में युध के शीघ्रोच्च के १७३०६० और सहस्पति के ३६४२२० अगण होते हैं ॥३१॥ विवरण- सोक-मूर्य और चन्द्रमाफी कक्षा का वह स्थान जो एथिवी से अत्यन्त दूर हो,उन का मन्दोघ कहलाता है (सूर्य और चन्द्रमा फा), मङ्गलादि ५ ग्रहों ( मगल, बुध, रहस्पति, शुक्र, शनैश्चर ) का वह स्थान जो भूयं से अत्यन्त दूर हो उन का मन्दोच्च कहलाता है और यह स्थान जो पथिवी मे अत्यन्त दूर हो उन का शीघ्रोच्च कहलाता सितशीघ्रस्यपट्सप्तत्रियमाश्विखधराः । शने - जगपट्पञ्चरसवेदनिशाकराः ॥ ३२ ॥ चन्द्रोच्चस्याग्नि- 'शून्याश्विवसुसार्णवायुगे । वाम पांतस्य वस्वग्नि- यमाधिशिखिदखकाः ॥३३॥ भानामप्टाक्षिवस्खनित्रि- द्विद्वयष्टशरेन्दवाभोदया भगणः स्वः स्वैरूनाः स्वस्यो- दयायुगे॥३४॥भवन्ति शशिनोमासाःसूर्येन्दुभगणान्त- रम् । रविमासोनितास्ते तु शेपा:स्यरधिमासकाः॥३॥ भापानुषाद-एक नहायुग में शुक्र के शीनोच्च के 9०२२३१६ और शनि के १४६५६८ भगण होते हैं ॥ ३२ ॥ एक महायुग में चन्द्रमा के मन्दोच के ४८८२०३ और चन्द्रमा के वामपात वा राहु (Scending nod or north nod ) २३२२३८ भगण होते हैं ॥ ३३ ॥ एफ महायुग में नक्षत्रों के १५८२२३७८२८ भगण होते हैं । इस नक्षत्र भगण संख्या मे से ग्रहों के भगण घटाने पर महायुग प्रत्येक ग्रहों की अपनी २ उदयसरुया निफल आवेगी ॥३४ ॥ सूर्य के जगणों में से चन्द्रमा के भगणो को घटाने पर शेष ( याको) अङ्क महायुग घान्द्रमास की संख्या होगी और इस पान्द्रमास से सौरमास घटाने पर जो यचे यही महायुग में अधिमाम की संख्या होगी ॥ ३५ ॥ बियरण-३२ लोक-मङ्गल, सहस्पति और शनि के भगण और घुप के तीनोच्च और शुक्र के शीघ्रोच्च को भगण एक युग में सूर्य के चारों और परि- “कमा की भगया है। के
मधमाध्याय
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विवरण--३३ नोक-कान्तिवृत्त जो सूर्य का मार्ग है, ग्रहों की फसाये
उस के सम क्षेत्र में नहीं हैं, परन्तु उस के साथ कोण बनाती हैं और कभी
'उस को काट कर कपर चढती हैं, कभी नुस को काट कर नीचे आती है।
जिम स्थान में कांतिवृत्त को ग्रहों की कक्षा काटकर ऊपर चढ़ती हैं उस की
"पान" (राहु या केतु ) कहते हैं । यह पात स्थान बदलता रहता है और
इस की धम गति है अर्थात् पूर्व से पश्चिम की ओर है।
विव०-३४ लोक-किसी नक्षत्र का निरक्ष देश में जहा दिन रात बराबर होता
है, एक स्थान पर उदयं होकर फिर उसी स्थान पर उदय होना नक्षत्रागण
कहलाता है और जो समय इस में लगता है उसका नाम नाक्षत्र दिवस है,इस
लिमे युग में १५८२२३७२१८ नाक्षत्रिक दिन हुवे। इस में से जिस ग्रह के अगण
संख्या को घदादें, युग में उस ग्रह की उदयसंख्या (दिन ) होगी। जैसे सूर्य
के भगण ५३२२००० को उक्त संख्या से पटाने पर शेष १५५७८९७८२८ संख्या होगी।
यही एक युग में सूर्योदय की संख्या है (सापन दिन हुवे),इसी प्रकार अन्मान्य
ग्रहों का भी जानना ॥
यि०३३ नोक-एक महायुग में चन्द्रमा के भगण ५७१५३३३६ । सूर्य के भगण
४३२०००० घटाने से शेष अन्तर ५३४४३३३६ युग में चान्द्रमास हैं । सूर्य के भगण
को १२ (मास) से गुणा करने पर ५१८४०००० युग में सूर्य मास पदाने पर शेष
अन्तर १५९६३३६ युग में अधिगाम ।।
सावनाहानि चान्द्रेभ्यो दुभ्यः प्रोझय तिथिक्षया: । उ-
दयादुदयं भानोभूमिसावनवासराः ॥ ३६ ॥ वसुद्वयष्टा-
द्विरूपाङ्कसप्तादितिथयो युगोचान्द्राःखाटखखव्योमखा-
ग्निखर्तुनिशाकराः ॥ ३७ ॥ पड्वहित्रिहुताशाङ्कतिथय-
श्वाधिमासकाः । तिथिक्षयायमार्थाधिद्वयष्टव्योमशरा.
श्विनः ॥ ३८ ॥ खचतुष्कसमुद्राष्टकुपञ्चरविमासकाः ।
भवन्ति भोदया भानुभगणरूनिताः क्वहा॥ ३९ ॥अधि-
मासो नरायचान्द्रसावनवासराः। एते सहस्रगणिताः
कल्पे स्युर्भगणादयः ॥2॥
१२ मूर्यमिद्वान्स भापानुवाद भाषानुपाद-एक महायुग में चान्द्रदिनों (तिषि) की संख्या से सावन दिन घटानेपर शेष संख्या महायुग में "तिथिक्षय" संख्या होगी । मुफ सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक के फाल फो " सावनदिन कहते हैं ॥३६॥ एक महायुग में १५७१९१५:२८ मावन दिन और १६०३०:0065 घान्द्रदिन(तिथि) होते हैं ॥३॥ एक महायुग में १५६३३३६ अधिमास और २५०८२२५२ तिथितय होते हैं ॥ ३८ ॥ एक महायुग में ११८५२०० सौर मास होते हैं और नाक्षत्रदिन की संख्या में से सूर्य के भगणो को घटाने से जो शेष सख्या रहेगी यही युग में पार्थिव या सावन दिन फी संख्पा होगी ॥ ३८ ॥ पूर्वो भगण, अधिमास, तिथिक्षय, नाक्षदिन, घान्द्रदिन और सावन दिन इन प्रत्येक को भिन्न भिन्न १०० मे गुणा करने में फल्प में इन प्रत्येक की संख्या होगी ॥ ४० ॥ विवरण ३० श्लोक-युग में सावन दिनों की संख्या जानकर ग्रहों की दैनिक गति (भुक्ति) जान सकते हैं और पृथियी या मूर्य की चारों ओर ग्रहादिकोंका अगण काल ( भगण ) भी जान सकते हैं । जिस ग्रह की दैनिक गति जाननी हो तो उस ग्रह के युग के गणों को युग के सावन दिन संख्या से भाग देने पर भागफल दैनिक गति होगी । इस के लिये राशिक की क्रिया करे । १ युग को सावनदिन : युग के भगण : तो दैनिक भगण या दैनिक भुक्ति मा होगी। जिम कारण देनिकगति फलाओं में निकाली जाती है । इस लिये प्रत्येकग्रहों के युगभगण संख्याओ फो भिन्न २ थारह से गुणा कर गुणन फल राशि सख्या होगी । उस को ३० से गुणा करने पर अंश होगे, (अंश संख्या होगी) एवं अंश को ६० से गुणा करने पर कला होगी। उदाहरण के लिये प्रथम सूर्य की मध्यदैनिकगति निकालकर दिखलाता हूं:- १ युग में सूर्य के भगण ४३२०००x१२४३०xe= ऊपर वाली संख्या जो गुणा १ युग मे सावनदिन सख्या १५१७९१७२८ फरने पर कला संस्था होगी। इसमें नीचे घासी सख्या से परम देने पर कल फला ५६ । यिक्ला । अनुकला १० । यही सूर्य की मध्यदैनिफगति हुई (यहा 'कला के अन्तर विकला और अनुकला, ६० में गुणा करने पर होगी। कला । में भाग न होसका तो विकला ६० से गुणा कर बनावे, एवं विकला करे। शेपा को ६० से गुणा करनेपर अनुकला होगी) अब उपरोमनियम से प्रत्येक माहुलादि ग्रहों की भी दैनिक भुक्ति निकल भायेगी। इस लिये प्रत्येक की क्रिया भिख २ नहीं लिखी गई ।
. प्रथमाध्याय ग्रहगण कला अनुकला मत्यनुफला १० । . चन्द्रमा १० . ८ . . २८ . १ --- . ८ . C . ६ १२ যক্ষ ३१ एहस्पति बुधशीनोच्च शुक्रंशीघ्रोच्च ३६ मङ्गलशीघ्रोच १० सृष्टस्पतिथीप्रोच्च १० शनिशीप्रोच १० चन्द्रमा का मन्दोच्च ४१ ग्रहो के मन्दोच्चो को गति अत्यन्त थोडी है अर्थात् प्रति कला के . भाग से भी न्यून है। इस लिये गणित में शून्य ही लिया जाता है। ग्रहो की दैनिक गति कही गई । अव ग्रहो के भगण काल लाने का नियम लिखा जाता है। जिन ग्रहो का भगण काल(१२ राशियो में वार भ्रमण का फाल) जानना है, त्रैराशिक द्वारा इस प्रकार लाना चाहिये कि एक युग के भगण में तो इतने (युग) सावन दिन होते हैं तो १ भगण में क्या होगा। इस लिये युग के सावन दिनो मे युग के भगण संख्या से भाग देवे, भागफल, इष्ट ग्रह का भगण काल होगा । उदाहरण के लिये, सूर्य का अगण काल निकाला जाता है । जैसे युगीय सावन दिन १५७१९१७८२८ में युगीय सौरभगण ४३२0000 फा भाग दिया तो दिम घडी पल वि० हुमा । यही सूर्य का सावन ३१ दिनो में ९ भगण काल हुआ। इसी प्रकार पधिवी के धारो ओर चन्द्रमा के परिक्रमा करने का काल २० दिन १९ घडी १८ पल है। इतने समय में चन्द्रमा राशिचक्र के एक स्थान से चल कर पुनः उसी स्थान परआजाता है। चान्द्र मास उस पुरा होता है जय चन्द्रमा पुनः मूर्य की राशि में आजाये। चान्द्रमास दिन निकालने के लिये पुगीय धान्द्र मास से युगीय सावन दिन में भाग दो तो दिन २पठी ३१ पान ५० यही अमान्त मान्द्र माम होगा।
. मूर्य मिद्धान्तभाषानुवाद अब प्रत्येक ग्रहो के भगण फाल जो पूर्वोक्त क्रिया से स्थिर हुवे हैं,लिखे जाते हैं। मङ्गल का ६८६ दिन ३६ घड़ी, वृहस्पति का ४३३२ दिन यही,शनि का१७६५ दिन ४६ घडी, बुध फा ८७ दिन ५८ घड़ी, शुक्र का २२४ दिन ४२ पट्टी। बुध आदि के शीघ्रोच्चो के भगण के लिये देखो झोक ३२ का विवरण ।। प्राग्गतेः सूर्यभन्दस्य कल्पे सप्ताष्टवहयः । कोजस्य वेदखयमा चौधस्याष्टर्तुवन्हयः॥४१॥ खखरन्ध्राणि जैव- स्य शौक्रस्यार्थगुणेपवः । गोऽग्नयः शनिमन्दस्य पाता- नामथ वामतः ॥४२॥ मनुदस्रास्तु कोजस्य बौधस्याप्टाष्ट- सागराः । कृताद्रिचन्द्ररजैवस्य त्रिखावाश्च भूगोस्तथा ॥४३॥ शनिपातस्य भगणाः कल्पे यमरसर्तवः । भगणाः पूर्वमेवात्र प्रोक्ताश्चन्द्रोच्चपातयोः ॥ ४४ ॥ पण्मनूनां तु. सम्पीय कालं तत्सन्धिभिःसह । कल्पादिसन्धिना साई वैवस्वतमनोस्तथा ॥ ४५ ॥ युगानां त्रिघनं यातं तथा कृतयुगं त्विदम् । प्रोझय सृष्टस्ततःकालं पूर्वोक्तं दिव्यसंख्यया॥ १६ ॥ सूर्याव्दसंख्यया या कृतस्यान्ते गताअमी। खचतुप्कयमाद्यग्निशररन्ध्रनिशाकराः ॥४॥ भाषानुवाद-एक कल्प मे सूर्य के मन्दोस के (जो पूर्व की ओर चलता है) ३८७ भगण होते हैं । मङ्गल के मन्दोच्च फे २०४ और बुध के मन्दोच के ३६८ भगण होते हैं ॥४१॥ एक कल्प में एहस्पति के मन्दोच के ८०, शुक्र के मन्दोच्च फे५३५ और शनि के मन्दोच के ३९ भगण होते हैं। अब पातो के भगण की सख्या कहते हैं, जो पूर्व से पश्चिम की ओर चलते हैं ॥ ४२ ॥ एक कल्प में मगल के पात के २१४, युध के पात के ४८,सहस्पति के पात के १७१, शुक्र के पात के 9: भगण होते हैं ॥ ४३ ॥ और शनि के पात के ६६२ भगण होते हैं, चान्द्रमा फे पात और मन्दोध के भगण पहिले कहे गये । ॥ ४ ॥ छ मन्यन्तरों के फाल को ६ सन्धियो सहित और काल की की सन्धि स. हित काल को एक स्थान में जोड़ फर रक्सो और सप्तम वैवस्वत मन्वन्तर - प्रथमाध्याय केस पीते हुवे चतुर्युगियों को एवं ८ वी चतुर्युगी के गत सतयुग के काल को एकत्र कर पूर्वोक्त छः मन्यन्तरों के काल में जोड़ने से जो संख्या लब्ध हो उस में से सष्टि रचना का फालं जो दिव्य वर्षों में ( २४ वां शोकोह ४७४०) दिया है । सौर वर्ष बनाको घटाने से ८वी चतुर्युगी के अन्त तक१५३१२००३० सौर वर्ष सृष्टि के गत वर्ष होगे ॥ ४५ ॥ ४६ । ४७ ॥ विवरण ४७ शोक-अव अहर्गण बनाने के नियम लिखे जाते हैं। वर्तमान सृष्टि की आदि से प्रष्टकाल ( जिस सवत् मास दिन तक चाहे ) तक सावन दिनों की संख्या का नाम है । अथ उदाहरण के लिये श्रावण कृष्णा २ संवत् १९४६ तफ का साया जावेगा । गत सौर वर्ष सृष्टि की आदि से सवत् १९५८ के अन्त तक १९५५८८५००२ में १२ वर्ष घटाओ तो शेष संवत् १८४५ के अन्त तक १९५५८८ होगा। अंत ऊर्ध्वममी युक्ता गतकालाब्दसंख्यया । मासी- कृता युता मासैर्मधुशुक्लादिभिर्गतः ॥ ४ ॥ पृथकस्या- स्तऽधिमासघ्नाः सूर्यमासविभाजिताः। लब्धाधिमासके- युक्ता दिनीकृत्य दिनान्त्रिता:॥४॥ द्विष्ठास्तिथिक्षयाभ्य- स्ताश्चान्द्रबासरभाजिताः । लब्धोनरात्रिरहिता लङ्काया- मार्द्धरात्रिकः ॥ ५० ॥ सावनो झुगण: सूर्यादिनमासा- व्दंपास्ततः । सप्तभिः क्षयितः शेपः सूर्यादीवासरेश्वरः. ॥५१॥ मासाब्ददिनसंख्याप्तं द्वित्रिनं रुपसंयुतम् । सप्तोट्ट- • तावशेपौ तु विज्ञेयो मासवर्षपौ।। ५२॥ मायानुवाद-उका रुतयुग के अन्त तक के वर्षों की संख्या में इष्ट (जिस संघर, शाके या समय तक चाहो ) काल के गतवर्ष को जोड़ो । पुनः जोएने से जो संख्या हो उस को १२ से गुणा करने से मास की संख्या होगी। पुनः इस मास संख्या में चैत्रमास के शुक्ल पक्ष की परिवों से जितने मास बीते हों जोड़ो तो इष्ट कालतक की मास संख्या होगी ॥ ४ ॥ इन को मिन र स्थान पर रक्सी । एक स्थान के भट्टों को युग के अधिमासों से गुणा करो और युगे के भीरमाम की संख्या से भाग दो। इस से अधिमास की संख्या निकल आ मूर्य सिद्धान्तमाधानुवाद येगी। इस अधिमाससंख्या को दूसरे स्थान में रखे हुए अटों के साथ जोर कर उस को ३० से गुणा कर दिन यनावे । एव इष्ट काल से जितने चान्द्र दिन बीते हों उस को जोड़े ॥ ४ ॥ उस जोड़े हुए अटों को भिन्न २ दो स्थानों में रक्ये। उन में से एक को एक महायुग के तिथिक्षयाङ्क द्वारा गुणा करे और पूर्वोक्त एक महायुग के चान्द्रदिनो पर भाग करे और नागावशिष्ट छोड़ कर भागफल गतक्षयतिथिसख्या होगी। इस तिधिक्षम सरुपा को दू. सरे स्थान में रखे हुवे अटो में से घटाने पर जो सरुपा लम्ध होगी वही लङ्का में आधीरात तक जितने सावन दिन बीते हैं, साधनदिन को सख्या होगी॥५॥ उक्त आई हुई सावनदिनसख्या से दिन, मास और वर्ष फा अधिपति जाना जावेगा।वार आदित्य यार से गिन कर निकल आते हैं । सर अहगंण को से भाग करके शेषाङ्क को आदित्ययार से गिने तो उस तिथि का घार निकल आयेगा अर्थात् ७ भाग फरने पर १ बचे तो रविवार । २ २ वर्षे तो सोमवार,३ बर्चे तो मङ्गलवार,४वघे तीवुधवार५ वर्षे तो गृहस्पतिवार, ६ यर्षे तो शुक्रवार और यदि कुछ न बचे तो शनिवार जानना ॥५१॥ उक्तअहर्गण को दो स्थानो में अलग २ रखकर एक को ३० से और दूसरे को ३६० से भाग दो। जो फल हो उस को क्रस से २ और ३ से गुणन फरो और दोनों गुणनफल में १ जोड़दो, पुन. से भाग दो तो भागफल कम से भास और वर्ष के अधिपति होगे ॥ ५२ ॥ विवरण-अब उन सरयाङ्क सौर वर्ष को १२ से गुणा कर मास बनाओ एष गुणनफल में गतमास चैत्र शुक्त की आदि से आपाढ़ शुक्त की आदि तक ३ मास हुवे । इन को जोड़ो तो इष्टकाल तफ मास संख्या होगी। १८५५-HECORR+३-२३४७०६१९८८३ मास हुये ॥४॥ उक्त संख्या आपाद शुक्लसे आगे आने वाली संक्रांति तक सौर मासों की सरुया है। इम को पैराशिक दल चान्द्रमास यनाये । अर्थात इस सख्या को युग के अधिमास से गुणाकर गुणनफल में युगीय सौर मास सख्या से भाग दे। भागफल गत अधिमास संख्या होगी । जैसे-सौरमास २३४७०६१८८८३४१५४३३३६ (युगीय अधिमास ) ३३९६५८३६०२८६६८८+५१८५८००० (युगीय सौर मास )=७२१३८४७१४ गत अधि भास हुए और भाग देने से शेपा १९६० हुवा । उतमधिमास को शेषा., को के सहित गत सौर मामों में जोड़ने से योगफल आपाढ शुक्ल के आये, - प्रथमाध्याय - आने वाली सक्रान्ति तक चान्द्रमास की सरुयाहोगी और यदि उक्त शेपाडू को छोहदें तो आपाढ शुक्ल के अन्त तक गत चान्द्रमास की सख्या होगी। आपाढ शुक्ला के अन्त तक गत सौरमास ३४३०६१९८८३+७२१३८४०१४ ( गत अधिमास )=२४२००७ (गत चान्द्रमास) x30-3२५७६०१६७६१० (दिनहुवे) +१६ ( गतदिन आपाढ शुक्ल के अन्त से श्रावण कृष्णा २ के आदि तक )- 9२५७६०९३७९२६ ( सृष्टि की आदि मे इष्टकाल तक गत चान्द्रदिन बा तिथि ) अय हम चान्द्रदिन से सावनदिन बनाने के लिये त्रैराशिक की क्रिया करें अर्थात् गत चान्द्रदिन को युगीय तिथिक्षय से गुणा कर गुणन फल में युगीय घान्द्रदिन का भाग दे, भाग फल सख्या गत तिषिक्षय सख्या होगी । गत चान्द्रदिन ७२५७६२१३१८५६४२५०८२२५२ (युगीय तिथिक्षय )-१८२०३६९८६७१०३८ २११:०४-१६०३०००८ ( युगीय घान्द्रदिन )-११३५६०१८५६६ यही गत तिधिक्षय सख्या हुई और शेष अङ्क जो भाग देने से रहगया १३.३..... । यह तिधि- क्षय शेय अहसहित गत चान्द्र दिनी से निकालदे तो गत तिथि के अन्त तक सावन दिनो की सरया होगी, परन्तु अहगण इष्टतिथि की अर्द्ध रात्रि पर्यन्त चाहिये । इस लिये शेष अङ्क लोडदेना चाहिये । यह शेप गत तिथि के अन्त से वर्तमान तिथि के अद्ध रात्रि तक का काल है। इस कारण श्रावण कृष्णा २ सवत् १८४६ को लङ्का की आधीरात तफ निम्नलिखित अहगंण हुवे । गत घान्द्रदिन ३२५५६०२३७९२६ गततिधिक्षय १९३५१०९८५६६ और गत सावन दिन १४४-५ १९३६० ॥ ४ ॥ ५० ॥ वक्तअहर्गण में का साग देने से शेप १ मिला, इस लिये प्रावण कृष्णा २ को रविवार था ॥५१॥ पुन उस अहर्गण में ३० का भाग दिया तो २३८२३४७०२४५ ( और शेप अङ्क को छोहदिया )x२-४७६३६४- १२८०+१-४१५२६८४१२९१-१ से भाग दिया तो शेष अङ्क ६ मिला तो श्रावण रु. २ को मास का अधिपगि शुक्र था । पुन वर्षाधिपति जानने के लियो १६०४१९ ३६०-३६०-१९८४५५८८५ ( शेष अङ्क को छोहदिमा )x३=५९५३३६७६५१५१-५५३. ३६५६१२-तोशेष अङ्क४ रहा इस लिये सवात् १९४६ का वर्षाधिपति बुध था ॥५॥ यथास्वभगणाभ्यस्तो दिनराशिः कुवासरैः । विभाजितो मध्यगत्या भगणादिर्ग्रहो भवेत् ॥ ५३ ॥ एवं स्वशीघ्रम- न्दोच्चा ये मोक्ताः पूर्वयायिनः । विलोमगतयः पातास्त- द्वञ्चनाद्विशोधिताः॥ ५ ॥द्वादशना गुरोर्याता भगणा- ३ मूर्यसिद्धान्त भाषानुवाद वर्त्तमानकैः । राशिभिः सहिताः शुद्धा: पष्टया स्युर्विज- यादयः ॥५५॥ विस्तरेणैतदुदितं संक्षेपायावहारिकम् । मध्यमानयनं कार्यं ग्रहाणामिष्टतो युगात् ॥५६॥ अस्मि- न्कृतयुगस्यान्ते सर्व मध्यगता ग्रहाः। विना तुपातमन्दो- चान्मेपादौ तुल्यतामिताः ॥ ५७ ॥ भापानुवाद-वक अहर्गण को ग्रहों के एक कल्प के भगणों की संख्या से गुणा करो और कल्प के सावनदिन सख्या से भाग दो तो ग्रहों का भग. णादि मध्य अर्थात् राशि, अंश, कला आदि निकल आपेंगे। इस प्रकार ग्रहों की मध्यगति से स्थान शात होजावेगा । १६ । इसी प्रकार शीघोच मन्दोच्चों के मध्यस्थान जिन के अगण पहिले कहे जा चुके हैं और पातों के मध्यस्थाम, जाने जासकते हैं,परन्तु पातों के स्थान १२ राशि में से घटाफर गणित करे क्योंकि इन की राशि क्रन से विलोम अर्थात् उलटी होती है ॥ ५५ ॥ रहस्पति के गत भगण को १२ से गुणा कर गुणनफल में गत राशियों का योग कर यो. गाङ्क को ६० कााग देने पर भागफल विजपादि सवत्सर होगा ॥५५॥ ऊपर अर्थात् ४५ नोक से५४ तक ग्रहों के मध्यानयन प्रक्रिया विस्तारपूर्वक फही गयी। उपयहार में त्रेतायुग के आरम्न से ग्रहों का मध्य स्थान निश्चय करना चाहिये ॥५६॥ जिस कारण इस सत्ययुगके अन्त में पात और भन्दोच को छोड़कर सब ग्रहों के मध्यस्थान मेष राशि के आरम्भ में घे ॥ ५ ॥ विवरण-कल्प के आरम्भ में सब ग्रहों का एक ही स्थान था, सब ग्रह रेवती नक्षत्र के योगतारा से चले, इस लिये इष्ट समय पर उन का मध्यम स्थान निफालने के लिये राशिक फी क्रिया करनी चाहिये अर्थात् उह अह- गंण को कल्प के सगणों मे गुणा कर गुणनफल में कल्प के सावनदिनों का भाग देखें तो ग्रहों का मध्यस्थान निफलेगा। जैसे- ११४४-४११८३:० (अहर्गण) x४३२०000000=३०८६२२५७८५६३५२०२८00000२१५७७४११८२८००० ( फल्प के सायन दिन )-२८५५-७४010 अगण शेष अङ्क ३८६५८२00४१२-४१५११७९३C0000 कल्प के सायनदिन मे भाग दिया तो २ राशि हुई और शेष अङ्क २५४२५८०- ६०२०-३२-३६२७३६२८०००० अंश हुये, इस में T कल्प के सायनदिन का भाग दिया तो फल अंश शून्य हुआ। और जो उक्त अंश को ६० में गुणा प्रथमाध्याय अंगण 91 २४ । ५२ । 9. २। । ४७। किया तो ४५७६६५७६८००००० कला संख्या हुई । इस में उक्त कल्प के सावन दिन का साग दिया तो २९ कला निलों। शेष अङ्क ६५८७EEDLEx६०-४१७५- ८७२८०००० इस में उक्त सायनदिन का भाग दिया तो फल शून्य विकला हुई। इस लिये श्रावण २२ संवत् १६४६ को सूर्य का मध्यस्थान १९५५८८४८६० भगण, ३ राशि, अंश, २८ कला, शुन्य विकला । इसी मकार चन्द्रमा के भगण से उस अहर्रपा को गुणन शेष क्रिया पूर्ववत् किया तो चन्द्रमा का मध्यस्थान भगण २१६४७८८८५-रा० । अं० २१ । क ५२ । वि० ३७॥ शेष ग्रहों के निम्नलिपित भगणादि हैं- राशि अंश फला विफला मङ्गल २०३९८०३३४१ । १९५५८५८४EEN शुक्र १९५५८eo दहस्पति १६४९०१०२५॥ २२१६६। शमेश्वर ६६३५८८३१ । ॥५२॥ ५३॥ धुध के शीप्रोच भगण को अहर्गण में गुणा करने और कल्प के सावन- दिनोंपर भाग करने मे ८१२९०२४६३५ भगणा राशि ३अंश।८ कला और ४५ वि- फला निकलेंगी। इसी प्रकार शुक्र के शीघ्रोच्च का स्थान ३१७९३८८८४५ भगण, १० राशि, २५ अंश, ६ कला और १९ विकला निकलते हैं। मङ्गल, सहस्पति और शनि के शीघ्रोच्च का वही स्थान होगा जो सूर्य मध्य का है पयोंफि उन के भगण तुल्य हैं ॥ जय मन्दोचों को लिखते हैं- प्रथम चन्द्र का मन्दोच्च अहर्गण को ४८८२०३००० गुणा और १५७७८१७८२८०२० पर भाग करने से २२१०३५४७२ भगण २ राशि ११ अंश १८ फला और २२ विफला निकलेंगी, पही चन्द्र भन्दोच्च का मध्यस्थान हुवा ।। अब चन्द्रपात लिखते हैं। अहर्गण को २३२, २३८,००० में गुणा करके १, ५१७,९१७, ८२८,००० पर भाग करो तो १०५. १४६, ०२२ गण राशि अंश कला और १७ विकला निकलेंगी। इन राशि आदि को १२ राशि में शोधने से २ । २२ । ५ । ३ चन्द्रपात का मध्यस्यान हुआ । सूर्य का मन्दोच्च निकालने के लिये अहगंण को ३८७ में गुणाकरके ९५७७, मूर्य सिद्धान्तभावानुवाद ९,८२८,००० पर भाग करो तो ११५ भगण २ राशि १५ अंश १७ कलासविकला निकलेंगी। मद्गल के मन्दोच्च निकालने के लिये प्रहगंण को २०४ में गुणा औरर, 199, ९१७, ८२८, ८० पर भाग करो। लब्ध भगणादि ६२ । ४ । १० ॥२॥४१ इसी तरह गृहस्पति के मन्दोच के जगणादि ४०५ १ ५।२१ २२ २१ बुध के भन्दोस के १६६ । ७ । १० । ३८ । २३ शुक्र के मन्दोच्च के २४२ । २ । १८ । १२ । और शनि के मन्दोच के १५१७।२६।३१।३४ भगण,राशि, १०अंश,फला और विकला निकलेंगे । महल का पात निकालने के लिये अहर्गणको २१४ में गुणा करके १० ५११, ११, १२२८, 000 पर भाग करो तो र६।१०। १९५६०५६ यह लब्ध हुघे ॥ राशि आदि को १२ राशि में से शोधो तो १ राशि अंश ३ क्ला और ४ विकला । यह मङ्गल के पात का स्थान हुआ धुध पात निकालने के लिये अहगंण को ४८८ में गुणाकरके १, ५७७, १७, ८२८, ००० पर भाग करो तो २२॥ १९ । । । १८ । २२ लब्ध भगणादि हुये । १२ राशि में शोधने से० । २०१४० । ३८ युध पात का स्थान हुआ।हस्पति के पानके भगण ह राशि १० अंश ए फला ५६ विकला निकलेगी।राशि आदि को चक्र में शोधने से २१ १९०४ यह गृहस्पति के पात का स्थान हुआ।शुक्र के पात के ४०८।१०।२।४४ भगणादि निकलेंगे । चक्र में शोधने से १ ॥२९ । ३९ ॥९६ राश्यादिशुक्र पात का स्यान हुभा शनि पात के २८ । ८ । १९ । ३९ । १९ भगणादि हुए। चक्र में शोधने से ३। १०। २० । ४१ । यह शनि के पात का स्थान हुआ। चन्द्र का पात पहिले निकाल चुके हैं,सूर्य का पात नहीं होता । अब ग्रहों का स्थान एक जगह लिराते हैं:- मूर्य का मध्य स्थान ३ 1 0 10 10 बुध मन्दोच ७।१०।२८।२३ मथ्र्य भन्दोच्च २ । १७ । १७ । २७ बुध शीघ्रोय १३.४५ ।९।५२ । ३० बुध पात .० । २० । ४० । ३६ पन्द्रमन्दोध २ । १९ । १८॥ २२ | गृहस्पति मध्य चन्द्र पात २ । २२ । ५२ । ३) वृहस्पति मन्दोछ, ५१२१ । २२ १६७ मङ्गल मध्य २७ । २४ । ५२ ) रहस्पति शीघ्रोध, ३.01. मङ्गल मन्दोच ४ । १०१२। ४१ हस्पति पात २।१९।४।४ माल शीघ्रोध ३।।२९।० माल पात १।१०।३।४ शुक्र मन्दोध .२ । १९ । ५२ । २१ बुधफामध्यस्थान, शुक्र शीघ्रोच्च " - M " शुक्र मध्य ३ " प्रथमाध्याय । C " " " " " " " " " ४१/ शनि " चन्द्र पात 4 " शुक्रपात १।६९ । ३९ । १६ मङ्गल शीघ्रोच्च शनि मध्य "३। २० । ५५ । ४७ | बुध शनि मन्दोच्च ७। २६ । ३७ । ३४ युथ मन्दोच्च 'अत्यन्त अल्प 'शनि शीघ्रोच्च बुध शीघ्रोच २४५ । ३२ शनि पात ,३। १०१२ । ४२ बहस्पति ४।५ सय ग्रहों की भुक्ति या मध्यदैनिक यहस्पति मन्दोच्च अत्यन्तअल्प गति भी नीचे लिखते हैं:- रहस्पति शीघ्रोच्च सूर्य की गति फलादि ५९ । शुक्र सूप्यं मन्दोच अत्यन्त अल्प शुक्र मन्दोच अत्यन्तअल्प चन्द्रमा की गति 30 | ३५/ शुक्र शीघ्रोष चन्द्रमा मन्दोच्च ३. ११ शनिमन्दोच अत्यन्त अल्प ३१) २६ शनि शीघ्रोच्च महल मन्दोच अत्यन्त अल्प मङ्गलादि ग्रहों के पातों की गति अत्यन्त अल्प -अतः नहीं लिसी। गणित में शून्यही लेते हैं। ५५ विवरण-वृहस्पति के एक राशि से दूसरी राशि में जाने का काम एक प्रकार का सवस्मर माना जाता है। ऐसे ६० संवत्मर हैं जिन के नाम विजय से आरम्भ होते हैं। फल्प के आदि में विजय संवत्सर था तो इस समय फोन संवत्सर होगा। यह जानने के लिये जितनी राशि कल्प की आदि से छहस्पति ने भोगी हैं उन को १० पर भाग करो-जो शेष रहे तो उस को विमय से गिन कर संवत्सर का नाम निकाल लो। उदाहरण -श्रावण यदि सं० १८४६तक पृहस्पति के १६४, ८०१, ०२५ भगण और ८ राशि होती हैं । इस की १,८८, ८१२,३००राशि हुई ६०पर भाग करने से शेप रहे-इस लिये विजयसेवां संवत्सर अर्थात् शर्वर संवत्सर हुआ। ५६ यियरण-त्रेतायुग की आदि से सं० १४६ श्रावण वदि २ को अर्ध- रात्रि का महर्गण See, ७८१, ६४७ निकलेगा, इस से मूर्यादि ग्रहों के मध्य निकालने से घही निकलेंगे जो कपर लिख आए हैं। यार निकालने के लिये बुधवार से गिनना चाहिये क्योंकि छत के अन्त में मङ्गलवार था । --
मृपंमिदान्त भापानुवाद
१ याहस्पत्य संवत्मर हमारे १२ सौर वर्ष के समान होता है । अर्थात्
पृहस्पति ग्रह को मृर्य की एक परिक्रमा करने में हमारे १२ वर्ष की बराबर
समय लगता है और वैदिक समय में ५ वर्ष फी १ युग संज्ञा घी और ५ वर्ष
का एक ही बार "पञ्चाङ्ग" यनता था। इस कारण सहस्पति का १ युग
अर्थात ५ वर्ष हमारे ६० वर्ष के तुल्य होता है। इस कारण पञ्चाङ्ग बनाने के
साथ ६० वर्ष तक की गणना कर लिसते थे और ६० वर्षों का कल्पित नाम
रखते थे। यह नाम रखना अपनी इच्छा पर है, इसी कारण भिन्न २ ग्रन्थों में
भिन्न २ प्रकार से ६० घों के नाम पाये जाते हैं। वस्तुतः इस से फोई वि.
शेष प्रयोजन नहीं । परन्तु फलित वालो इन ६० वर्षो से भी भिन्न भिन्न
प्रकार के शुभाशुभ फल की कल्पना फरली है ॥
वृहस्पति के ६० वर्षों के नाम ये हैं-१ विजप २ जय ३ मन्मध ४ दुर्मुख
५ हेमलम्ब ६ विलम्ब विकारी ८ शर्वरी लव १० शुझाकृति ११ शोभन
१२कोधी १३ विश्वावसु १४ पराभव १५प्लव १६ कालिक १७ सौम्य १८ साधारण
१९ विरोधारुति २० परिधावी २१ प्रमादी २२ आनन्द २३ राक्षस २४ अनल
१५ पिङ्गल २६ कालमुक्त २१ सिद्धार्थी २८ रोट्र २९ दुर्मति ३० दुन्दुभि ३९ रुधि-
रोद्गारी ३२ रनाक्ष ३३ कोधन ३४क्षय ३५ पराभव ३६ यिभव ३७ शुक्ल ३८ प्रमोद
३ प्रजापति ४० अङ्गिरा ४१ श्रीमुख ४२ भय ४३ भुवन ४४ पाता ४५ ईश्वर ४६ बहु-
धान्य ४७ प्रमाथी ४८ विक्रम ४ वृषा ५२ चित्रभानु ५१ स्वर्मानु ५२ दारूण ५३
पार्थिव ५४ व्यय५५सर्वजित् ५६ सर्वधारी विरोधी ५ विकृत ५९ सर ६० नन्दन ।।
मकरादौ शशाङ्कोच्चं तत्पातस्तु तुलादिगः । निरंशत्वं
गताश्चान्ये नोक्तास्ते मन्दचारिणः ॥ ५८ ॥ योजनानि
शतान्यष्टौ भूक? द्विगुणानि तु । तद्वर्गतोदशगुणात्पदं
'भूपरिधिर्भवेत् ॥५६॥ लम्बज्याप्नस्त्रिजीवाप्तः स्फुटोभूप-'
रिधिःस्वकः । तेन देशान्तराभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विभाजिता
॥६०॥ कलादि तत्फलं प्राच्यां ग्रहेभ्यः परिशोधयेत् ।
रेखाप्रतीचीसंस्थाने प्रक्षिपेत्स्युःस्वदेशजाः ॥ ६१ ॥ रा-
क्षसालयदेवीकःशैलयोर्मध्यसूत्रगाः। रोहीतकमवन्ती च
यथा सन्निहितं सरः ॥६२॥
मथमाध्याय भाषानुयाद-उस समय केवल चन्द्रमा का मन्दोच्च मकर की आदि अर्थात् रा, शून्य अश में और चन्द्रमा का पात तुला के आरम्भ में अर्थात ६ राशि शून्य अंश मे था । एवं अन्यान्य ग्रहो के गन्दोच्च और पात,ये सब भी अंशरहित नये ॥५॥ ८० योजन को द्विगुण करने से १६०० योजन पृथिवी के व्यासका परिमाण होगा। इस को १० मे गुणा कर,पुनः इस का वर्गमूल निकालने से पृथिवी की परिधि होगीता एथिवी की परिधि को असीए देश के लम्बज्या से गुणा करो।गुणन फल में त्रिज्या का भाग देने पर भागफल उस अभीष्ट स्थान को स्शुट परिपि होगी । देशान्तर को ग्रह की भुक्ति ( गति) से गुणा कर गुणन फल में इस स्फुट परिधि द्वारा भाग दे ॥६॥ भागफल से कलादि निकलें उन को ग्रह के मध्य स्थान से घटाओ, यदि अमीष्ट देश मध्य रेखासे पूर्व दिशा में हो।परन्तु यदि इष्ट देश मध्य रेखा से पश्चिम दिशा में हो तो भागफल कलादिको को जोड़ो तो योगफल स्वदेशीय ग्रहो के मध्यस्थान होगे ॥ ६९ ॥ लङ्का और सुमेरु पर्वत के मध्य सूत्र पर जो रेखा कल्पित हुई है उस का नाम मध्य रेखा है । इस मध्य रेसा पर रोहीतक मगर उज्जयिनी एवं कुरुक्षेत्रादि देश अवस्थित हैं ॥२॥ विवरण ५। ५८ -ऊपर लिखीरीति से रुत के अन्त तक अहगंण लेफर ग्रहो का स्थान निकालने से नोक ५७ और ५८ के कथन का प्रमाण निश्चय हो सकता है। कृतान्त फा अहर्गण १३,३३७,६१३,७१३ निकलेगा । पस मे सय ग्रहों के मध्य ।। । 0 निकलते हैं । चन्द्रोच १०। ।। और चन्द्रपात 51 0 1 0 1 0 निकलता है, अहर्गण को ७ पर भाग फरने से ३ शेष रहते हैं। इस लिये रुत के अन्त में मङ्गलवार निकलता है। वि० ५६ इस से निरक्ष देश पर परिधि ५०५८ योजन निकलती है। वि०६०-प्रथम चित्र में निपमेरिर वृत्त पृथिवी का गोल है, म उस फा मध्य है, निरक्ष वृत्त वह यहा वृत्त है जहा दिन रात्रि सदैव यरायर होते है। निर निरक्ष वृत्त का तथा पृथिवी का व्यास है, रि कोई नगर है, जैसे रिवाडी, ममे अर्ध व्यास है,इम को त्रिज्या भी कहते हैं. ररिधनु रिवाही का अक्ष है। रिमे रिवाडी की मेरुसे दूरी है, इस दूरीको लम्य कहते हैं, परिधि रियाष्टी की स्फुट परिधि है । परि स्फुट परिधि का व्यास है, जारि मेरि धनु की ज्या है, अब स्फुट परिधि निकालने के लिये यह त्रैरागिक करो। भर या ममे(भदं व्यास)पर : भू परिधि : जरि पर: स्फुट परधि क्या होगी - .
मूर्यसिद्धान्त भावानुवाद अर्थात् लम्घज्या जरि फो भूपरिधि में गुणा करके त्रिज्या पर भाग करो। उदाहरण-रिवाड़ी का लम्य अर्थात् मेरु से फासला ६१ अंश ५१ कला है। ज्या और त्रिपा निकालने की रीति दूमरी अध्याय के शोक १५,१६ में लिखेंगे ६१ । ३१ की ज्या ३-३१ है और त्रिज्या ३४३८ होती है। ५५८ को गुणा और ३४३८ पर भाग किया तो ४४५९ स्फुट परिधि हुई । लङ्का और उज्जैन से मेरू के बीच होकर जो पत्त कल्पित किया जावे उस को मध्य रेखा कहते हैं । जैसे ग्रीनिव अंगरेज़ों का है। इस रेखा से इष्ट स्थान की दूरी को जो उस की स्फुट परिधि पर मापी जाती है, देशान्तर कहते हैं।ग्रह की भुक्ति किसी स्थानपर उस के स्फुट परिधि के एक परिवर्तन के काल में पूरी होती है। उज्जैन वा लङ्का में जिप्त राशि आदि में ग्रह होगा उस के पश्चिम की ओर जितने देश हैं उन में उस का भोग कुछ अधिक होगा, क्योंकि ग्रह की गति पश्चिम से पूर्व की ओर है, पश्चिम देशों में ग्रह पहिले दृष्टि पड़ेगा और उस के मध्य रेखा तक पहुंचने तक पशिम देश में उस का कुछ विशेष लोग हो जायगा। इसी तरह उज्जैन या लट्ठा से पूर्व में जो देश हैं यहां ग्रह की राशि आदि न्यून होंगी। इस ग्रह का भोग कितना न्यून वा अधिक होगा, सो जानने के लिये यह त्रैराशिक करो । इष्ट देश की स्फुट परिधि परः उक्त ग्रह की भुक्ति देशा- न्तर : ग्रह की विशेष गति क्या होगी। इस लिये भुक्ति को देशान्तर में गुणा करके स्फुट परिधि में भाग करने से ग्रह की विशेष गति निकल आवेगी जिस को मध्य रेखा पर ग्रह के स्थान में जोड़ने या घटाने से इष्ट देश में ग्रह का मध्य स्थान निकल आवेगा । उदाहरण-रिवाड़ी का देशान्तर ११ योजन पूर्व की ओर है. इस लिये ग्रह की मध्य भुक्ति को १९ में गुणा करके ४४५८ पर भाग करने से जो गति न्यूना- धिक फरनी है यह निकल आवेगी ॥ यि०६१-सूर्य की भुक्ति ५६ । है, उस को ११ योजन में गुणा फरके ४४५८ पर भाग करें, तो विकला आती हैं। चूफि रिवाड़ी मध्य रेखा से पूर्व की ओर है इस लिये सूर्य के स्थान से विकला पटाओ, तो रिवाड़ी में सूर्य का स्थान ३।।रू । ५१ यह हुआ। चन्द्रमा की भुक्ति ७२ । ३५ है इस को ११ में गुणा और ४४५८ में भाग करने से १ १ ५७ कलादि लग्थहुई 'इन फो चन्द्रमा के स्थान से घटाने से ।२१। ५२ । ४० यह रिवाड़ी में प्रथमाध्याय . - चन्द्रमा का मध्यस्थान हुआ। इसी तरह मङ्गल का विफला, बुध के शीमोच फा ३६ विकला, हस्पति का १ विकला, शुक के शीघ्रोच्च का १४ विकला, शनि का विकला, चन्द्रमन्दोच्च का विकला और चन्द्रपात का विकला देशान्तर फल निकलेगा। इन को ग्रहों के स्थान में से पटाने निम्न लिखित यह हो जायेंगे। सूर्य ३ । । २८ ॥ १॥ पन्द्रमा २१॥ ५० ॥ ४० ॥ मङ्गल २१७१ २४॥ ४७ बुध शीघोच्च ०।३।८। सहस्पतिः । २२ ॥ २६॥ ४२ शुक्र शीघ्रोच्च १०॥ २५। ६ । ५ शनि ३ । २० । ५५ । ४३ चन्द्र मन्दोच्च २ । ११ । १८ । २९ चन्द्रपात २१ २२ ॥ ५० ॥३॥ वियरण ६२-यहां लडा से वर्तमान लङ्का देश नहीं समझना चाहिये क्योंकि यह तो निरक्ष से ऊपर है और उज्जैन की मध्य रेखा से बहुत पूर्व है। लका कोई टापू या नगर निरक्ष पर वर्तमान लला देश के दक्षिण पश्चिम कोण में पा, भय यहां समुद्र है। कोई नगर पा टापू नहीं है। जो वहा धृत पषिधी के उत्तर दक्षिण मेरु तथा रोहीतक उज्जैन तथा लङ्का के बीच में होकर कल्पित किया जाये उस को मध्य रेणा कहते हैं। अतीत्योन्मीलनादिन्दोः पश्यात्तद्गणितागतात् । यदा भवेत्तदा प्राच्यां स्वस्थानं मध्यतो भवेत् ॥६॥ अप्राप्य च भवेत् पश्चादेवं वापि निमीलनात् । तयोरन्तरना- डीभिर्हन्याटु भूपरिधिस्फुटम्॥४॥ पष्टया विभज्य लब्धै- स्तु योजनःमागधापरः। स्वदेशपरिधिज्ञेयः कुर्यादेशा- न्तरं हि तैः ॥६वारप्रवृत्तिःमाग्देशे क्षपा?ऽभ्यधिके भवेत् । तद्देशान्तरनाडीभिः पश्चादूने विनिर्दिशेत् ॥६६॥ भापानुयाद-घट स्थान पर यदि चन्द्रमा पो सर्वग्रास ग्रहण फा भारम्भ मां अन्त गणित से आये हुये काठ से पीछे हो तो इष्ट स्थान उक्त मध्यरेता से पूर्व दिशा में है, जानना ॥ ६३ ॥ (उन्मीलन से मोक्ष) परन्तु यदि चन्द्रमा के सर्वप्रास ग्रहण का प्रारम्स या अन्त गणित से आये हुये फाठ से पहिले हो तो इष्ट स्थान मप्परेसा को पश्चिम दिशा में जानना(निमीलन से स्पर्श)गणि- तागत काठ और ग्रहणदर्शनकार दोनों काल फाअन्तरदण्ड,पलादि निकाल -- भूपेंसिद्धान भावानुवाद वियोगफल जो दश पलादि होंगे, उन को स्फुट परिधि से गुणा करो ॥६४॥ डात गुणन फल को ६० से भाग फरके जो भाग फल हो वह इष्ट स्थान को दूरी ( देशान्तर) मध्य रेखा से पूर्व या पश्चिम फितनी होगी उस की संख्या योजन में निकाल आवेगी। पूर्वोत ६०-६१ सोफ लिखित नियमानुसार पस देशान्तर योजन फो कला वनाय ग्रह मध्य में जोड़े या घटाये । इससे ग्रहों के मध्यस्थान फा निश्चय होगा ॥ ६ ॥ मध्यरेखा से जिस देश के दपठ, पलादि नितने होंगे मध्य रेसा में सूर्योदय के पहिले या पीछे उतने ही दडपलादि में धार का आरम्भ होगा अर्थात् मध्य रेसा के पूर्व देशो में पहिले एवं मध्य रेखा से पश्चिम के देशो में पीछे पार का आरम्भ जानना ॥ विवरण-गणित द्वारा लाया हुआ काल मध्य रेखा पर उन्मीलन का समर होता है । ६३ । दिन रात ६० घड़ी की होती है । देशान्तर निकालने के लिये राशिफ की क्रिया करनी चाहिये अर्थात् देशान्तर घटिकाओं को स्फुट परिधि में गुणा कर गुणन फल में ६० फा भाग देवे । भाग फल देशान्तरकी योजन सख्या होगी । उदाहरण-रेवाड़ी ( लिया है) में गणितागत और प्रत्यक्ष सर्व पास का मोक्ष फाल का अन्तर - पल ५२ विपल है और स्फुट परिधि ४५८ मोजम है। दोनो को गुणा फरके ६० पड़ीxex६०२१६००० विपाल से भाग दिया तो ११ योजम रिवाड़ी का देशान्तर मिला ॥६॥रि. वाही मध्यरेखा के पूर्व है इस लिये वहां सायण रुष्णा २ सं० १९४६ कोमल ५२ विपल उपरान्त सोमवार होगा ॥६६॥ इष्टनाडीगुणा भुक्तिः पष्टचाभक्ता कलादिकम्।गते शोध्यं युतं गम्ये कृत्वा तात्कालिको भवेत् ॥ ६७ ॥ भचक्रलि- ताशीत्यंशपरमं दक्षिणोत्तरम् । विक्षिप्यते स्वपातेन स्वक्रान्त्यन्तादनुप्णगुः ॥ ६८॥ तन्नवांशं द्विगुणितं जीव- विगुणितं कुजः। बुधशुक्रार्कजाःपातैर्विक्षिप्यन्ते चतुर्गु- णम् ॥६६ ॥ एवं त्रिघनरन्ध्रार्करसार्कार्कादशाहताः । चन्द्रादीनां क्रमादुक्ता मध्यविक्षेपलिप्तिकाः ॥ ७० ॥ इलि प्रथमोऽध्यायः ॥
प्रथमाध्याय भाषानुषाद-ग्रहका स्थान आधी रात से पहिले या पीछे जानमा हो तो ग्रह की दैनिक भुक्ति (गति) को इष्ट (जिस समय मध्यस्थान स्थित करना हो) पड़ियों से गुणा कर गुणन फल में ६० का भाग दे, भागफल जो फलादि होंगे उन को ग्रह के स्थान से पटावे । यदिइएकाल आधी रात से पहिले हो तो, एवं यदि इष्ट काल आधी रात से पीछे होतो जोड़ देवे। इस प्रकार करने से ग्रह का तात्कालिक मध्यस्थान निरूपित होगा ॥६॥ रवि मार्ग के जिस स्थान में चन्द्रमा को क्रान्ति का शेष मिला है उस स्थान से २१६०० कला के ० भाग का एक भाग (३-331) उत्तर या दक्षिण में पाप्त द्वारा चन्द्रमा चलायमान हो जाता है अर्थात् चन्द्रमा उक्त परिमाण से अपने स्थान से उत्तर या दक्षिण की ओर चला जाता है। इस को चन्द्रमा का विक्षेप कहते हैं उक्त ३-307 पन्द्रमा का परम विक्षेप है ॥ ६८ ॥ चन्द्रमा का जो परम विक्षेप हो,उस को से भाग करके,साग फल को दो भाग में जितना होगा वही एहस्पति का परम विक्षेप । इसी प्रकार माल का परम विक्षेप एवं पन्द्रमा के परम विक्षेप फाधुध, शुक्र और शनि का होगा ॥६॥ चन्द्रमा का मध्य परम विक्षेप २१० फला,मङ्गल का ० कला,युध का १२० फला, एहस्पति का ६० कला, शुक्र का १२० कला, एवं शनि का १२० कला ॥ २० ॥ विवरण-ग्रहों के मध्यस्थाम जो श्लोक ६१ के अर्थ में लिखे हैं वह रिवाड़ी फे अर्धरानिक हैं। यदि आधी रात के ७ घडी ३० पठ उपरान्त समय के प्रह पनाने हों तो घडी ३० पठ को ग्रहों को भुक्ति में गुणा कर गुणन फल में १० का भाग देवे और भाग फल को ग्रहों के स्थान में जोहदेवे तो तात्कालिक ग्रह हो जायेंगे। गणित फरने से सूर्य के ७ कला र विकठा,चन्द्रमा फेटका ४. वि., मङ्गठ के ३ कला १६ धिफला, युध शीघ्रोच्च के ३० फला ४२ विसर. स्पति के फला शून्य वि० ३१, शुक्रशो० के १२ कर १ वि०, शनि के कSTO वि०१५,चन्द्रमा के मन्दोचके फला० वि०५२ और चन्द्रपात के बा० विकडा २४ इन को ग्रहों के अपने २ स्थान में जोड़ने से प्राधण रुष्णा की आधी रात से घही ३० पल पीतने पर होंगे। पात में से कलाओं को घटाना पाधिये । सूर्य ३ 1 0 । ३८ ॥ १५, चन्द्रमा रु १२, महन२१६१ २८ ॥ ४३, बुध शीमोध 1३1३ 1 ५१रहस्पति १२ । २७ । १६, शुक्रग्री- प्रोष।।६, शनि ३। २० ।५६१२, चन्द्रमा के मन्दोछ । और चन्द्रपात २१२२ । ४।६॥ ६ ॥ १1८1 ९९.
Naman सूप्यंसिद्वान्त भाषानुवाद ग्रह की कक्षा का पत जिस विन्दुमक्रान्ति पत्तको काट कर उसके उत्तर की भोर घढ़ता है उस विन्दु को “ पात " कहते हैं। जब ग्रहपात से दूर होता है तो क्रान्ति कृत्त से उस की दूरी को जो दक्षिण या उत्तर में होती है विक्षेप कहते हैं । जय ग्रह पात से ३ राशि आगे वा पीछे होता है तब यह कान्ति वृत्त से अत्यन्त दूर हो जाता है । इस अत्यन्त दूरी का नाम “परम वि. क्षेप है। ३ राशि और भोग कर ग्रह का कक्षा वृत्त पुन क्रान्ति कृतको फाट के उस से दक्षिण में जाता है यह दूसरा पात है परन्तु गणित में पहिला ही पात लिया जाता है। चन्द्रमा का परम विक्षेप राशिचक्र की कलाओं का है अर्थात राशि धन २२६०० कक्षा में २७२ चन्द्रमा का परम विक्षेप हा प्रति भाषानुवादे प्रपमोरयाय ओ३म् अथ द्वितीयोऽध्यायः अदृश्यरूपाःकालस्य मूर्तयो भगणाश्रिताः । शीघ्रम- न्दोच्चपाताख्या ग्रहाणां गतिहेतवः ॥ १॥ तद्वातरश्मि- भिर्ववास्तैः सव्येतरपाणिभिः । प्राक्पश्चादपकृष्यन्ते यथासन्नं स्वदिङ्मुखम् ॥ २॥ प्रवहाख्यो मरुत् तास्तु स्वोच्चाभिमुखमीरयेत्। पूर्वापरापकृष्टास्ते गतिं यान्ति पृथविधाम् ॥३॥.ग्रहात् प्राग्भगणार्धस्थः प्राङ्मुखं कर्पति ग्रहम् । उच्चसंज्ञोऽपरार्धस्थस्तद्वत्पश्चान्मुखंग्रहम् ॥४॥ स्वोच्चापकृष्टा भगणः प्राङ्मुखं यान्ति यद्ग्रहाः । तव तेषु धनमित्युक्तमृणं पश्चान्मुखेपु तु ॥५॥ दक्षिणी- त्तरतोप्येवं पातोराहुः स्वरंहसा । विक्षिपत्येप विक्षेप- श्चन्द्रादीनामपक्रमात् ॥६॥ भाषानुयाद-अदृश्यमाप, शीघ्रोध, भन्दोच, एवं पात फाय को मूर्ति है और भगणों के आश्रित हैं।ही के कारण ग्रहों की ( स्पष्ट ) गति होती है॥१॥ वह शीघ्रोध, मन्दोन एवं पात अपने वायुरूप रस्सियों से सय ग्रहों फो थान्य फर अपनी ओर खींचते हैं। यह ही मन्दोधादि अपने दहिने और धार्ये रस को पफड फर पूर्व और पश्चिम की ओर आकर्षण करते हैं। जो मह इम के धामभाग में हैं उन को बायें हाप से एवं जो इन के दहिने और है, उन को दहिने हाप से अपनी ओर सचते हैं ॥ २॥ प्रयह नामक वायु भी सय ग्रहों को अपने उच्चकी ओर सेंघता है । इस लिये ग्रहगण पूर्व और पधिम की मोर प्राकर्षित होते हैं और इसी कारण ग्रहों की अनेक मृप्यसिद्धान्त भाषानुवाद प्रकार की गति होती है ॥३॥ ये उच्चादि यदि ग्रहस्थान से पूर्व छः राशि अर्थात् मेपादि छः राशियों में होने से ग्रहों को पूर्व फी भोर एवं दूसरे आधे में अयात् तुलादि छः राशियों में रहने से पश्चिम की ओर आकर्षण करते हैं ॥ ४ ॥ ग्रहगण अपने उच्च मे माफर्पित होकर जितने अंशादिक पूर्व की ओर जाते हैं उतने अशादिं उन के मध्यस्थान में जोड़ना पड़ता है और इसी म. फार जितना अशादि पश्चिम में आफर्षित होते हैं उतने अशादि ग्रहमन्य. स्थान से घटाना चाहिये ॥ ५॥ इसी प्रकार पाप्त ( राहु) अपनी शीघ्रता से चन्द्रादि ग्रह को रविमार्ग में चन्द्रमा के शेष क्रान्ति स्थान से उत्तर या दक्षिण की ओर ले जाता है। इस प्रकार जिस ग्रह को जितना विक्षेप करता है उस ग्रह का उतमा उत्तर या दक्षिण विक्षेप होता है॥६॥ विवरण-चन्द्रमा की कक्षा जिस स्थान में क्रान्ति यत्त को फाट फर ऊपर चढ़ती है, उस को राहु कहते हैं और ६ राशि लोग फर दूसरे स्थानमें पुनः क्रान्ति यत्त को काट कर दक्षिण की ओर जाती है,उस को केतु कहते हैं ॥६॥ वि० सी०१-६ ग्रहों की जो उच्च, पात आदि की गणना का वर्णन है यह केवल गणित की सुगमता के लिये है, वस्तुतः ग्रहों से भिन्न पातादि कोई जीव वा पह की नाई अपर ग्रह नहीं हैं, जैसा कि भास्कराचार्य ने लिखा है:- ग्रहः पूर्वगत्या प्रतिमण्डलेनैव भ्रमति। यदेत- नीचोच्चवृत्तं तव्याज्ञैर्गणकैः फला) कल्पितम् । (सि० शिरोमणि गोलाध्याय छेदाकाधिकार ) अपात्-वस्तुतः यहगण पूर्व गति से प्रति कृत्त में धमण करते हैं। ये जो मीच एवं उच्च वृत्त हैं, केवल गणकों ने गणित को सुगमता के लिये कल्पना किये हैं। इसी प्रकार ब्रह्मगुप्त ने भी अपने ब्रह्मसिद्वान्त में लिखा है फि:- प्रतिपादनार्थमुञ्चाः प्रकल्पिताः। ग्रहगतेस्तथा पाताः ॥ २६ ॥ गोलाध्याये। अर्थात्-ग्रहों को स्पष्ट गति ( True motion ) प्रतिपादन के लिये"ठ और "पात की फल्पना की गई है। • उत्तराभिमुखं पातोविक्षिपत्यपरार्धग:। ग्रहं प्राग्भगणा- र्धस्यो याम्यायामपकर्षति ॥युधभार्गवयोः' शीघ्रा- 4
द्वितीयायाय
त्तद्वत्पातो यदा स्थितः। तच्छीघ्राकर्षणात्तीतु विक्षि-
प्येते यथोक्तवत् ॥८॥ महत्वान्मण्डलस्यार्कः खल्प-'
मेवापकृष्यते । मण्डलाल्पतया चन्द्रस्ततो बहुपकृप्यते
॥ ॥ भीमादयोऽल्पमूर्तित्वाच्छीघ्रमन्दोच्चसंज्ञकः ।.
देवतैरपकृप्यन्ते सुदूरमतिवेगिताः ॥ १० ॥ अतोधनर्ण
सुमहत् तेषां गतिवशावेत् । आकृप्यमाणातैरेवं व्यो-
ग्नि यान्त्यनिलाहताः ॥ ११॥
भाषानुवाद-पही पात यदि पश्चिम विभागस्प अर्थात् तुलादि छ राशि
के अन्तर्गत होता है तो ग्रहों को उत्तर की ओर विलेप करता है। एवं
यह पात यदि ग्रहों के पूर्व भागस्थ अर्थात् मेपादिए राशि के मध्यवर्ती
होता है तो ग्रहादिकों को दक्षिण की ओर विक्षेप करता है ॥ ७॥ परन्तु
जय धुध और शुक्र के पात तन के शीघ्रोच्च से समान गति और समान
अन्तर होता है उस समय उन के शीशोध के आकर्षण द्वारा पूर्वोक्त रीति
से विक्षेप फो प्राप्त होते हैं ॥ ८॥ सूप्यं का भण्डल को गुरुता के कारण
उस के उच्च का आकर्षण बहुत थोड़ा होता है । एव चन्द्रमा के भण्डल लघु
होने के कारण सूर्य की अपेक्षा इस को उच्च बहुत आकर्षण फरता है। मङ्गल,बुध,
हस्पति, शुक्र, शनि इन पांच ग्रहों के मण्डल छोटे होने से इन को शीघ्रोध
और मन्दोच्च बहुत धेग से आकर्षण करते हैं ॥ १० ॥ पूर्वोक्त कारण से ग्रहों
के भन्दोच्च के आकर्षण में जो गति होती है उस का योगफल या पियोगफल
अधिक होता है । इस प्रकार ग्रहगण शीघ्रोच और मन्दोच्च से आर्पित हो
कर और मवह वायु से तापमान होकर आकाश मार्ग में घमण करते हैं ॥१९॥
वक्रानुवमा कुठिला मन्दा मन्दतरा समा। तथा शी-
'प्रतरा शीघ्रा ग्रहाणामष्टधा गतिः ॥ १२॥ तत्रातिशीघ्रा
शीघ्राख्या मन्दा मन्दतरा समा। ऋज्वीति पजधाज्ञेया
या वक्रा सानुवक्रगा ॥ १३॥ तत्तद्गतिवशान्नित्यं यथा .
द्वक्तुल्यता ग्रहाः । मयान्ति तत्प्रवक्ष्यामि स्फुटीकरणमा-
दरात् ॥ १४॥
३२ मूर्यसिद्धान्त भाषानुवाद भापानुवाद-ग्रहो की गति : प्रकार की है,वका १,अति वक्रा ,विकला ३, मन्दा ४, मन्दतरा ५, समा ६, शीघ्रतरा 9 और शीघ्रा ८॥१२॥ पूर्वोक्त प्रकार की गतियो में से अतिशीना, शीघ्रा, मन्दा, मन्दतरा और समा ये५ सरला (सीधी) गति हैं और यझा, अतिषका और फुटिला,ये ३ वक्रगति हैं ॥१३॥ ग्रहगण प्रतिदिन गमन करते हैं। उन की गति फिसी दिन शीन, कभी अति शीघ्र होती है । सुतरां उन की गति अनेक प्रकार की होजाया करती है। इस समय यही ग्रहगणों की गति स्थिति निरूपण के लिये स्फुट प्रकरण फहूंगा इस स्फुट करने से जो निश्चय होगा, यही देखने पर भी जाना जायेगा ॥१४॥ राशिलिप्ताष्टमो भागः प्रथमं ज्याप्रमुच्यते । तत्तट्वि- भक्तलब्धोनमिश्चितं तद्वितीयकम् ॥ १५ ॥ आदानव क्रमात्पिण्डान् भत्रका लब्धोनसंयुताः । खण्डकाः स्यु. श्चतुर्विशज्यापिण्डाः क्रमादमी ॥ १६ ॥ तत्त्वाश्वि- नोऽङ्काब्धिकृता रूपभूमिधरतवः । खाकाष्टौ पञ्चशून्येश वाणरूपगुणेन्दवः ॥ १७ ॥ शून्यलोचनपञ्चकाश्छिद्ररूप- मुनीन्दवः । वियच्चन्द्रातिश्तयो गुणारन्ध्राम्बराश्विनः ॥ १८ ॥ मुनिषड्यमनेत्राणि चन्द्राग्निकृतदत्रकाः। प- ञ्चाष्टविपयाक्षीणि कुञ्जराश्विनगाश्विनः ॥ १९॥ रन्ध्र- पञ्चाष्टकयमा वस्वादयमास्तथा । कृताप्टशून्यज्वलना नगाद्रिशशिवतयः ॥ २० ॥ पट्पञ्जुलोचनगुणाश्चन्द्रने- त्राग्निवह्नयः । यमाद्रिवन्हिज्वलनारन्ध्रशून्यार्णवाग्नयः ॥ २१ ॥ रूपाग्निसागरगुणावस्वग्निकृतवन्हयः। प्रोज- भयोक्रमेण व्यासार्हादुक्रमज्यापिण्डकाः ॥ २२ ॥ झापानु०-एक राशिमें १८०० कला होती हैं, उस के अष्टमभाग में २२५ कला, इसी फो इस राशि का प्रथम श्याई कहते हैं। इस प्रथम ज्यादं २५ कोसपसे भाग करने पर जो भाग फल होता है इस १ को मपम इयाई २५ से ज्या ४५० 4 ४४|१४ या ६७१/१५ यां ८९ ०१६ यां ९०० 2 द्वितीयाध्याय घटाने पर शेष २४ होगा। इस २२ को प्रथम न्याई २२५ के साथ जोड़ देने से योगफल ४४होगा । यही द्वितीय ज्याई है ॥१५॥ उक्त द्वितीय ज्याई xxe को प्रथम ज्याई से भाग करके भागफल २लेफर यह र इस के साथ पूर्वद्वितीय ज्याई निष्कासन भाग फल से जो मिला है, जोड़ने से ३ होगा। इस ३ को उन भाजक २२५ से घटाने पर २२२ बचेगा,इसी २२२ को द्वितीय न्याई ४४० के साथ जोड़ने से ६५ होगा, यही तृतीय ज्याई है । इसी प्रकार कमशः २४ ज्याई गणना करनी होगी॥१६॥ किसी वृत्त के चतुर्थाश जिस का व्यासाई ३४३८ उस के ३४ अंश की ज्याई निमलिखित होंगी। अंश या कला अंश वा कला ज्या प्रथम कोण २२५/१३ वां कोण ४८।। २५७५ २२६७ द्वितीय २७०० २४३१ तृतीय ६१५ २०२५ २५८२ चतुर्थ ३१५० २७२८ पञ्चम ११२५ १९०५ /१७ वां ६३॥ ३३७५ २८५० १३५० १३१५ १८वां ३६०० २०५८ सप्तम १५७५ १५२० ए वां ७२४ ३८२५ ३०४ अष्टम १८०० १७१९ २० वां २०२५ १९१५/२१ यां दशम २२५० २०९३ | २२ यां ४९५२ ३४ २४७५ २२६७/२३ वां ५१७५ ३४३९ द्वादश २७०० २४३१ | २४ वां पूर्योत ज्याटुं परिमाण सम को उलटे प्रकार से ३४३८ व्यासाई से पृथप पथक् घटाने पर जो अपटाने से बचेंगे उन को उत्क्रमज्या कहते हैं। प्रति २४ अंश में इस प्रकार उत्क्रमज्या हो जाती हैं । १६-२२ झोक तफ ॥ मुनयोरन्ध्रयमला रसपटकामुनीश्वराः । द्वयष्टैकारूप- पड्दताः सागरार्धहुताशनाः ॥२३॥ खर्तुवेदा नवाद्यर्था दिङ्नगास्स्यर्थकुञ्जराः। नगाम्बरवियञ्चन्द्रारूपभूधरश- ॥ १ M A ७५ ४०५० ३१७७ ४७२५ ३३७२ नयम 211 2 " एकादश - " एक ५४०० ३४३८ 23 सख्या उत्क्रमज्या अपक्रमज्या सपा उतक्रमज्या 9 १ २ १५२८ ३४ मूर्यसिद्धान्त भापानुवाद इराः ॥ २४ ॥ शरार्णवहुताशैका भुजङ्गाक्षिशरेन्दवः । नवरुपमहीधैका गजैकाङ्कनिशाकराः॥ २५ ॥ गुणाश्वि- रूपनेत्राणि पावकाग्निगुणाश्विनः । वस्वर्णवार्थयम- लास्तुरङ्ग नगाश्विनः ॥ २६ ॥ नवाप्टनवनेत्राणि पाव- कैकयमाग्नयः । गजाग्निसागरगुणा उत्क्रमज्यापि- एडकाः॥ २७ ॥ भापानुवाद- -अब कम से १ से २४ तक को उत्कमज्या और अपक्रमग्या नीचे लिखी जाती है। अपक्रमज्या ११ १३ ११५१ १०५० १८२ १४ १३४५ ९१०७ २७३ १९९२ १७१६ १२१० १८२ १५ १९१८ १५३ ५३५ १६ २१२३ ३५४ ६१८ १६ २३३३ १३२३ १३४९. ७७६ २७६७ १३३२ १० ११० २९६ १३८८ ९१ २३ २००७ ३४३८ परमापक्रमज्या तु सप्तरन्ध्रगुणेन्दवः । तद्गुणा ज्या त्रिजीवाप्ता सच्चापं क्रान्तिरुच्यते॥२८॥ ग्रहं संशोध्य मन्दोच्चात् तथा शीघ्राद्विशोध्य चशेपं केन्द्रपदं तस्माद भुजज्या कोटिरेव च ॥ २६ ॥गताद भुजज्या विपमे गम्यात् कोटिः पदे भवेत्। युग्मे तु गम्याद बाहुज्या को- ४ ५ ६ . २५४८ ५७ २१ २२ १२ एस २४ * H द्वितीयाध्याय ठिज्या तु गताद् भवेत् ॥ ३०॥ लिप्तास्तत्वयमभक्ता लब्धं ज्यापिण्डकं गतम् ।गतगम्यान्तराभ्यस्तं विभजेत् तत्त्वलोचनैः ॥ ३१ ॥ तदवातफलं योज्यं ज्यापिण्डेगत- संज्ञके। स्यात् क्रमज्याविधिरयमुत्क्रमज्यास्वपिस्मृतः॥३२॥ भापानुवाद-ग्रहों की परम कान्तिज्या १३८७ । अब ग्रहों की मध्यक्रान्ति लानी हो तो अजीटच्या को परम क्रान्तिज्या १३८७ से गुणा फर-गुणन फल को व्यासाई ३४३८ से भागदेये । जो भाग फल हो यह पूर्णाक जो ज्याईसंख्या के साथ समान, इस ज्यादि में धनु होगी वही धनु ग्रह की मध्य क्रान्ति होगी ॥२८॥ ग्रह के भन्दोच्च से उसी ग्रह का मध्य पटाने से जो शेष रहे उस को मन्दकेन्द्र कहते हैं । एवं मन्द केन्द्र और मध्य को शीघ्रोच्च से घटाने पर जो बचे उस को शीघ्र केन्द्र कहते है। इसी शीघ्र केन्द्र और मन्द केन्द्र से भुजज्या और फोदिन्या निरूपित होंगी । १२ राशि के वृत्त में किसी धसु. थोश में यह केन्द्र होता है उस को (केन्द्र) जान कर इस केन्द्र की भु- जज्या और कोटिज्या स्थिर फरे ॥ २८ ॥ १२ राशि के वृत्त के विषम पपस में (अर्थात् मेप,यप,मिथुन प्रथम-एवं तुला, वृश्चिक, धनु तृतीय-इन की विषम पद संज्ञा है ) अर्थात् राशि चक्र के प्रथम और तृतीय भाग में धनु का जितना भाग यीत गया है उस को भुगज्या और गम्य अर्थात् इस खया के पूरा होने को जितना भाग अवशिष्ट ( बाकी ) है उस को फोटिज्या कहते हैं । 'और सम मण्डल ( अर्थात् कर्स, सिंह, कन्या द्वितीय-एवं मकर, कुम्भ, मीन पतुर्थ भाग-इन की युग्म या सम पद संज्ञा है ) अर्धात द्वितीय, चतुर्थ भाग मे । धनु फा गम्य अर्थात् इस सपड के पूरा होने में जितने भाग अवषिष्ट हैं उस को भुजाया, एवं इस धनु के जितना भाग पूरा हुआ है उस को कोटि- ज्या कहते है ॥ ३० ॥ अशीट अश को कला बनाकर २२५ से भाग दे । इम भागफल सख्या में पूर्व फथित जो ज्या के साथ ममान होगा, उस का नाम गतज्या । इस गत ज्या के पीछे जो मा लिखी है, उस फो गम्यउपा कहते हैं । इस गत और गभ्यज्पा को घटाने से जो ययेगा,उस के द्वारा पूर्व भाग के अयशिष्टाङ्क से गुणा कर गुणनफल मैं २२५ का भाग देये । इस भागफल को उक्त गतज्या के साथ जोह देवा योगफल अभीष्टया होगी इसी नियमसे अभीष्ट अश की कमश्या निकालनी चाहिये। एव इसी प्रक्रिया से अवशिष्ट सूर्य सिद्धान्त भाषानुवाद अंश की व्युत्क्रमज्या श्री निरूपित होगी ॥ ३१ ॥ ३२॥ ज्यां प्रोज्य शेपं तत्त्वाश्वितं तद्विवरोधृतम् । सं- ख्या तत्त्वाश्विसंवर्ग संयोज्य धनुरुच्यते ॥ ३३ ॥ रवे- मन्दपरिध्यंशा मनवःशीतगोरदाः । युग्मान्ते विपमान्ते च नखलिप्तोनितास्तयोः ॥३४॥ युग्मान्तार्थाद्रयः खा- ग्नी सुराःसूर्या नवार्णवाः । ओजे द्वयगा वसुयमा रुद्रा रुद्रागजाब्धयः ॥३५॥ कुजादीनामतः शैघ्रघा युग्मान्तेऽ- र्धाग्निदत्रकाः। गुणाग्निचन्द्राः खनगा द्विरसाक्षीणि गोग्नयः॥३६॥ओजान्ते द्वित्रियमला द्विविश्वे यमपर्वताः। खदिखा वियवेदाः शीघ्रकर्मणि कीर्तिताः ॥ ३० ॥ भापानुवाद -जिस ज्या पिया का धनु स्थिर करना हो उस ज्या से पूर्व वर्ती अशुद्ध ज्या को घटावे । जो शेष रहे, उस को २२५ से गुणन करे । पुनः उस गुणन फल को शुद्ध और अशुद्ध दोनों ज्याओं के अन्तर ( घटाने से यो हो) से झाग देवे । पुन जितनी ज्या अभीष्ट हो उतनी संख्या और २६५ इन्हीं दोनों के गुणनफल में पूर्वोक भागफल जोड़ने से जो हो वही अभीष्ट • ज्या पिण्ड को धनु होगी ॥ ३३ ॥ युग्म रागष्ट में सूर्य की मन्द परिधि १४ अश और चन्द्रमा की मन्द परिधि ३२ अश। फिन्तु विषमसयड में पूर्वोक्त दोनो नन्द परिधि घीस २ कला न्यून होगी । अर्थात् विषमखण्ड में सूर्य की मन्द परिधि १३ अंश ४. कठा और चन्द्रमा की मन्द परिधि३१ अंश४० कला॥३४॥ युग्म सएह मे मङ्गल की मन्द परिधि ५अश,युध कीम०प० ३० अंश,टहस्पति की म. प. ३३ अंश, शुक्र की म०प०१२ अश और शनि की म०प० अंश भीर विषम राण्ड में मगल की मन्द परिधि ७२ अंश, बुध की म०प०२८ अंश, सहस्पति की मा प० ३२ अश, शुक्र की म०प०११ अश, एवं शनि की म०प०४८ अश ॥३॥ अय इस समय मङ्गलादिग्रहों को शीघ्रपरिधि का परि. माण फहा जाता है । युग्म राण्ड में मङ्गल को शीघ्रपरिधि २३५ अंश, बुध की शी० प०१३ अंश,सहस्पति को शी० ० ० अंश,शुक्र की शीघ्रपरिधिकार मंग, एवं शनि की शीघ्रपरिधि ३६ अंश ॥३६॥ विषम बहड़ में द्वितीयाध्याय शीघ्रपरिधि २३२ अंश, घुध फी शीघ्रपरिधि १३२ अंश, एहस्पति को शी० प० १२ अंश, शुक्र को शी० १०२६० अंश, एवं शनि फी शी० ५० ४० अंश ॥ ३ ॥ ओजयुग्मान्तरगुणा भुजज्या त्रिज्ययोद्धता। युग्मे वृत्ते धनर्ण स्यादोजादूनाधिके स्फुटम् ॥३८॥ तद्गुणे भुजकोटिज्ये भगणांशविभाजिते । झुजज्याफलधनुर्मान्दं लिप्तादिकं फलम् ॥३॥ सापानुवाद-जिस ग्रह की शुद्ध परिधि लागी होघे-उस ग्रह के पूर्वोत युग्मसएड और विषम की दोनों मन्दपरिधि को आपस में घटाफर तम अन्तर पल को अभीष्ट केन्द्र को भुजन्या के गुणन करे, एवं गुणन फस में उमाई से भाग देवे, अनन्तर इस भाग फल को पूर्वोक्स युग्मसयड के मन्दपरिधि से यदि न्यून हो तो उस फो जोड़े, एवं यदि अधिक हो तो घटाये । यही योग था यियोग फल उस ग्रह की शुद्ध परिधि होगी ॥३॥ मान्ध और शीघ्र केन्द्र की भुजन्या और फोटिग्या फो अपने२ स्फुट परिधि से अलगर गुणन फरको गुणन फल को ३६० से भाग देये, दोनों भागफल, मुजपरिधिफल और फोटि फल होगा । पुनः यह देखना चाहिये फि जो व्या इस मुमफल के समान है उसी ज्या की धनु में जितनी कला हैं, यही भन्दफल है ॥३॥ शैघ्यं कोटिफलं केन्द्रे मकरादौ धनं स्मृतम् । संशोध्यं तु त्रिजीवायां कर्कादौ कोटिजं फलम्॥४०॥ तद्वाहुफल- वर्गक्यांमूलंकर्णश्वलाभिधः । त्रिज्याभ्यस्तं भुजफलं चल- कर्णविभाजितम् ॥४१॥ लव्धस्य चापंलिप्तादिफलंशघ्रय- मिदं स्मृतम्। एतदादो कुजादीनां चतुर्थे चैव कर्मणि॥२॥ मान्दा कमैकमन्दोभीमादीनामयोच्यते । शैघ्रघमान्दा पुनर्मान्वं शैघ्रयञ्चत्वार्यनुक्रमात् ।। ४३ ॥ मध्येशीघ्रफ- लस्याद मान्दामर्धफलं तथा । मध्ययहे मन्दफलं सकर शघ्रयमेव च ॥४॥ भाषामुपाद-पूर्वोस मकियामुगारशीम केन्द्र से शीघ्र कोटि पल स्थिर करमे ३६ - मृर्यमिदान्त भाषानुवाद से जो अङ्क होगा यह केन्द्र यदि ३ राशि से न्यून और 6 राशि मे अधिक हो तो ठयासाई (३४३८) के साथ यह फोटिफल योग करे और यदि केन्द्र ३ राशि से अधिक किंया राशि से न्यून हो तो यह कोटिफल व्यासाई से घटाये तो स्फुट कोटि निकल आयेगी) ॥४॥ इस योग या वियोग फल करे वर्ग की द्वितीय भुजफल के वर्ग के साथ जोड़े, पुनः इस योगफल का वर्ग मूल निकाले। वर्ग मूल संख्याही शीघ्र फर्ग होगी। तदनन्तर द्वितीय भुज फल के अङ्क फो(लोक ३९ में कहा गया है)व्यासाई से गुणन फर गुणन फलमें उक्त शीघ्र कर्ण की संख्याका भाग देवे॥४॥इस शीघ्र कर्णमे भाग कर जो भाग फल हो, उस ज्या के अनुसार धनु स्थिर करनेपर जोहो यही ग्रहोंका कलादिशैघ्र फल होगा। आदि ५ ग्रहोंके स्फुट साधन समयप्रथम संस्कार में और चतुर्थ संस्कार में इम शीघ्र फल की आवश्यकता होती है ॥४२॥ सूर्य और चन्द्रमा का केवल एक ही वार मान्द्य फल संस्कार करने से इन का स्फुट स्थिर होगा, किन्तु मङ्गलादि पांच ग्रहों का यथाक्रम से शीघ्र फल पीछे मान्द्य फल अनन्तर पुनर मान्द्य फल एवं पुनर शीघ्र फल संस्कार करने से उन का स्फुट होगा॥४३॥ पहिले ग्रहों के मध्य में शीघ्र फल का अटुंाश संस्कार करना, संस्कार करने पर जो फल मिले उस के साथ मान्द्य फल का अद्धीश संस्कार करना चाहिये अर्थात् जो मान्द्य फल उल्लिखित शीघ्र फलाई संस्कृत मध्य से स्थिर हुआ है, यही संस्कार करना होगा, उस के पश्चात् पुनः ग्रहों के मध्य में मान्य फल फा समस्त भाग (जो शीघ्र फलार्द्ध और मान्द्य फसाई संस्कृत मध्य द्वारा जाना गया है) संस्कार किया जायेगा। इसी का नाम मन्द स्पष्ट है, पुनः इस मन्द स्पष्ट द्वारा जो शीघ्र फल स्थिर होगा वही शीघ्र फल का सम्पूर्ण भाग मन्द स्पष्ट में संस्कार करना चाहिये । इस प्रकार संस्कार करने से ग्रहों का स्फुट स्थिर होगा ॥४४॥ अजादिकेन्द्र सर्वपां शैघ्रये मान्दो च कर्मणि । धनं ग्र- हाणां लिप्तादि तुलादावृणमेव च ॥ १५॥ अर्कबाहुफ- लाभ्यस्ता: ग्रहभुक्तिर्विभाजिता। भचनकलिकाभिस्तु लिप्ता कार्या ग्रहर्कवत् ॥ ४६॥ स्वमन्दभुक्तिसंशुद्धा मध्यभुक्तिर्निशापतेः।दोान्तरादिकं कृत्वा भुक्ताण- द्वितीयाध्याय गधनं भवेत् ॥ ४० ॥ ग्रहभुक्तेः फलं कार्य ग्रहवन्मन्द- कर्मणि। दोन्तिरगुणा भुक्तिस्तत्त्वनेत्रोदधृता पुन:४८ भाषानुयाद-सम ही ग्रहो के शीघ्र केन्द्र वा मन्द केन्द्र मेपादि उ राशि के अन्तर्वर्ती होने से उन की कलादि शीघ्र फलाङ्क वा मन्द फलाडू धन अर्थात् जोहना होगा और तुलादि छ राशि के अन्तर्वर्ती होने से ये ही फलादि फल सकल ऋण अर्थात् घटाना पडेगा ॥४५॥ * भुजान्तर सस्कार ग्रह के दैनिक स्फुट गति सरुपा को सूर्य के मन्द फल के कलाङ्क से गुणा कर गुणनफलके अङ्क को राशि चक्र के २१६०० कला द्वारा भाग करने से जो भाग फल मिले उस के कलादि को अङ्क सख्या जिस प्रकार सूर्य का मन्द फल जोहा या घटाया जाता है उसी प्रकार ग्रह के स्फुट में जोएना या घटाना पटेगा । इस प्रकार लड्का के मध्य रात्रि का स्फुट निर्णीत होगा । ग्रहस्यान में जो जोष्टने वा घटाने का उल्लेख हुआ है उस को लङ्का के मध्य रात्रि के महगंण से ग्रह का जो मध्य निरूपित होता है उस से जानना चाहिये । चन्द्रमा फी दैनिकगति के अङ्क ते चन्द्रमा के मन्दोच के दैनिकगति के अङ्क को घटाने से जो अङ्क अवशिष्ट रहे ( वही बघा हुवा द्वारा चन्द्रमा के मन्दोच से गति का परिमाण जाना जायेगा) इस अवशिष्ट अद्वारा पश्चात् -लिपित निपमानुसार चन्द्रमा का मन्दफल निरूपण करके चन्द्रमा के दैनिक गति के अङ्क साथ घटाने या जोहने से चन्द्रमा की यथार्थ गति निरूपित होगी ॥ ४ ॥ मन्द फल सस्कार में जिसप्रणाली से ग्रह का मन्दफल निर्णीत होता है, उसीप्रकार ग्रह को दैनिकगति से ग्रह का मन्दगति फल साधन करना चाहिये। ग्रह के मन्दकेन्द्र की ज्या निरूपण करने के समय नो “गत" और “गम्य ज्या निर्णीत हुआ है, वही दोनों ज्या से परस्पर घटाने से जो बचे तस के द्वारा ग्रह की दैनिक भुक्ति के अङ्क को गुणाकर गुणनफल को २२५ से भाग फरे, पुन भाग फल को अपने दमदपरिधि द्वारा गुणन फरे॥४८॥ खमन्दंपरिधिक्षुण्णा भगणांगोइष्टताः कलाः कर्कादौतु * टिप्पणी-बशा में यथार्थ मध्यरात्रि मुट गणना के लिये अहर्गण निक- पन पूर्वक वो ग्रहस्फुट स्थिर किया जाता है उसी ग्रहस्फुट में यह मुशान्तर मस्कार करना पड़ता है।
गूर्यसिद्धान्त भाषानुवाद धनं तत्र मकरादावणंस्मृतम् ॥४६॥ मन्दस्फुटीकृतां भुक्तिं प्रोजझ्य शीघ्रोच्चभुक्तितः । तच्छेपं विवरेणाथ हन्यात् त्रिज्यान्त्यकर्णयोः ॥५०॥ चलकर्णहृतं भक्तो कर्ण त्रिज्याधिके धनम् । ऋणमूनेऽधिके प्रोजभय शेपं वक्र- गतिर्भवेत् ॥५१॥ दूरस्थितः स्वशीघ्रोच्चाटु ग्रहः शिथिल- रश्मिभिः। सव्येतराकृष्टतनुर्भवेद्वक्रगतिस्तदा ॥५२॥ कृत- तुचन्द्रैदेन्द्रः शून्यत्र्येकैर्गणाष्टभिः । शररुद्रेश्चतुर्थेषु केन्द्रांश सुतादयः ॥३॥ भाषानुयाद-पूर्वोक्त गुणनफल फो३६० से भाग देवे, भागफल जो फलादि मिले (उसी को मन्दगति फल कहते हैं) उस को ग्रह की दैनिक मध्यगति के अङ्क के साथ जोड़े या पटावे । यदि मन्द केन्द्र कर्कादि छः राशि के अन्त. यी हो तो जोड़े, एव मफरादि छः राशि के अन्तर्वर्ती हो तो घटाये तो सूर्य और चन्द्रमा की दैनिकगति और मङ्गलादि अन्यान्य ग्रह की मन्द स्पष्ट गति साधित होगी॥ ४ ॥ पूर्वोक्त मन्द स्पष्ट गति के अङ्कको दैनिक शीनोध गति के भर से घटाकर बचे हुवे अङ्क को ध्यासाई और द्वितीय शीघ्र कर्ण. इन दोनो के अन्तराल (पटा कर जो बचे ) से गुणा फर गुणन फल को इसी शीघ्र कर्ण फी भर सण्या से भाग फरे। पदि कर्ण व्यासाई की अपेक्षा अधिक होवे तो वा भाग फल को मन्द स्पष्ट गति के अङ्क के साथ जोड़े। एवं फर्ण ष्यासाई की अपेक्षा न्यून होने से घटावे, किन्तु यदि भाग फल मन्द स्पष्ट गति की अपेक्षा अधिक हो अर्थात् घट न सके तो भाग फल से मन्द स्पष्ट गतिके अङ्क फोघटाये, पटाने से जोशेष हो ससी फो ग्रह फी धक गति कहते हैं In जिस समय कोई ग्रह अपने शीघ्रोध से दूर में अर्थात् ३ राशि अपेक्षा अधिक दूर में हो रहता है, उस समय उस की रश्मि शिथिल हो जाने से उच्च बाई या दहनी और उस को आकर्षण करता है अर्थात् ग्रह उस के घाई ओर होने से दक्षिण और को, एवं दहिनी ओर होने से उस को पाई और संधता है। इसी कारण ग्रहों की वक्रगति होती है ॥५२॥ ग्रहस्फुट गणमा समय चतुर्थ संकार का केन्द्रांश १६४ होने से माल वक्र गमन भारम्भ द्वितीयाध्याय हो जाता है इसी प्रकार १४४ अंश होने से बुध, १३० अंश होने से शहरपति, १६३ अंश होने से शुक्र, एवं ११५ अंश होने से शनि का, वागमन आरम्भ होता है ॥ ३ ॥ भवन्ति वक्रिणस्तैस्तु स्वैः स्वैश्वनाधिशोधितः । अव- शिष्टांशतुल्यैः स्वैः केन्द्ररुज्झन्ति वक्रताम् ॥ ५५ ॥ म. हत्त्वाच्छीघ्रपरिधेः सप्तमे भृगुभूसुतौ । अष्टमे जीवश- शिजौ नवमे तु शनैश्वरः ॥५५॥ कुजार्किगुरुपातानां ग्रह- वच्छीघ्र फलम् । वामं तृतीयकं मान्दं बुधभार्गवयोः फलम् ॥ ५६ ॥ स्वपातोनादग्रहाज्जीवाशीघ्राद्भगुजसौ- म्ययोःविक्षेपनान्त्यकर्णाप्ता विक्षपत्रिज्ययाविधी:५७॥ भाषामवाद-उल्लिलित सब अंशों को अलग अलग 380 अंश सेपटाने से H - सूर्यसिद्धान्त भापानुषाद वियोग करे, पटाने से जो शेष रहे उस की भुजण्या को उक्त ग्रहों के परम विक्षेप भङ्क से (जो अ० १ श्लोक ७० में कहा गया है) गुणा कर गुणनफल को चतुर्थ शीप्रकरण के अङ्क से भाग देये। जो भागफल मिले वही मङ्गल, सह- स्पति, शनि, बुध और शुक्र का विदेय है, किन्तु चन्द्रमा के विक्षेप साधन काल में चतुर्थ शोधकर्ण स्थल में व्यासाई से भाग करना होता है । वही भागफल चन्द्रमा का विक्षेप होगा ॥५७ विक्षेपापक्रमैकत्वे क्रान्तिर्विक्षेपसंयुता । दिग्भेदे वियु- तास्पष्टा भास्करस्य यथा गता ॥ ५८ ॥ ग्रहोदयप्राण- हता खखाप्टकोदता गतिः। चक्रासवो लब्धयुताःस्था- होरात्रासवःस्मृतः ॥५६॥ क्रान्तःक्रमोत्क्रमज्ये वे कृत्वा तत्रोत्क्रमज्यया । हीना त्रिज्या दिनव्यासदलं तदृक्षि- णोत्तरम् ॥६॥ क्रान्तिज्याविषपदभानी क्षितिज्या द्वाद- शोधता। त्रिज्यागुणाहोरात्रार्ध कर्णाप्ताचरजासवः॥६१॥ भापानुबाद-फिसी ग्रह की स्पष्ट क्रान्ति स्थिर फरनी हो तो ( मेप से कन्या तक ६ राशि उत्तर और तुला से मीन तक ६ राशि दक्षिण ) उस ग्रह के विक्षेप और अपक्रम (कान्ति) यदि रपिमार्ग के एक दिशा में अवस्थित हो तो उस फी माय झान्ति के साथ विक्षेपात को जोटे और एक दिशा में अवस्थित्त न हो तो मध्य क्रान्ति से विक्षेपात घटाये । इसी प्रकार योग या वियोग करके जो फल मिले यही उस ग्रह की स्पष्ट कान्ति है। परन्तु सूर्यको मध्य क्रान्ति ही उस फी स्पष्ट क्रान्ति है ।। ५८ ॥ सायन ग्रह जिस राशि में अयस्थित हो उस राशि के लग्नमान के माणसे उस ग्रह फी दैनिक फलादि गति के गुणन फल को १८०० से भाग देवे, भागफल को १२ राशि के लग्नमान के प्राणाङ्क के साथ जोहने से जो समष्टि होगी, वही उस ग्रह के अहोरात्र का परिमाण होगा॥६॥ पूर्वोक्त अनुसार ग्रह की क्रान्ति का क्रमग्या और उत्क्रमज्या साधन पूर्वक उत्क्रमज्या फो व्यासाई से घटा फर जो बचे वही महाधिपुर रेसा के दक्षिण या उत्तर दैनिक वृत्त का ध्या. साई होगा। इसी को द्युन्या कहते हैं। एब अमग्या को ही क्रान्तिउपा कहते हैं ॥ १० ॥ उपरोक सान्तिज्या फो विषुध दिन को पलमा से गुणा फर.गुणन फाल में १२ का भाग दे । भागफल फुश्या होगी। कुज्या को ध्यासाई से गुणा महको गुणन करके -- द्वितीयाध्याय ४३ फर गुणनफल को पूर्व कथित धुज्या से भाग देवे । भागफल घरज्या होगी। इस चरण्या की कला आदि धनु ही घराई का प्राण होगा ॥१॥ तत्कार्मुकमुदक्क्रान्ती धनहानी पृथक स्थिते । स्वाहो- रात्रचतुभांग दिनरात्रिदले स्मृते॥६॥ याम्यक्रान्तौ विप- यस्ते द्विगुणे तु दिनक्षपे । विक्षेपयुक्तोनितया क्रान्त्या. भानामपि स्वके ॥ ६॥भभोगोऽष्टशतीलिप्ताः साश्विशै- लास्तथातियः । ग्रहलिप्ता भभोगोप्ता भानि भुक्तया दि- नादिकम् ॥ ६ ॥ रवीन्दुयोगलिप्ताभ्यो योगाभभोगभा- जिताः।गतागम्यान पष्टिनर भुक्तियोगाप्तनाडिकाः ॥६॥ भापानुवाद-यदि क्रान्ति उत्तरदिग्यतिनी हो तो अहोरात्र के परिमाण के चतुर्थाश को दो भिन्न स्थानो में रराफर एक स्यामस्य उक्त घराध जोडे और अन्य स्थानस्य अङ्क से घटाये तो यथाक्रम दिनार्द्धमान और रायमान निमपित होगा और यदि यह कान्ति दक्षिणदिग्वर्तिनी हो तो उक्त घराई को यथाक्रम घटावे और जो इस प्रकार--इस प्रकार करने से पूर्वयत् दिनाईमाग और गत्यर्द्धमान स्थिर होवेगारदिनार्द्धमान और राज्यर्द्धमान को द्विगुण करने से दिनमान और रात्रिमान होगा। इस प्रकार नापत्रिक दिन के परिमाण को जानने ही से यथाक्रम उन २ को क्रान्ति के अङ्क के साथ उन २ के विले. पार को जोहे या पदावे ।। ६२ । ६॥ सभोग अर्थात् नक्षत्र के परिमाण र फला और तिथि घान्द्रदिन का परिगाण ७२० कला अनीष्ट समय के ग्रह स्फुट की राश्यादि की कला बनाकर पूर्वोक्त मनोग ( ८०० ) से भाग करने . .
पात, सूर्यसिद्धान्त भाषामुवाद हुवे अङ्क को ८०० से घटाधे, पटाने से जो मिले उस का नाम “गम्य है।इन दोनों अङ्कों को भिन्न भिन्न ६० से गुणा कर गुणनफल को सूर्य और चन्द्रमा की स्फुट गति की समष्टि से भाग करने से, जो फल हो वह यथाक्रम धत्त. मान योग के गत एवं गम्य दण्डादि होंगे ॥ ६ ॥ विवरण-विष्फुम्म, प्रीति, आयुष्मान्, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, मुकर्मा, धृति, शूल, गण्ड, यति, ध्रुव, व्यापात, हर्षण, वज, सिद्धि, व्यति. वरीयान्, परिप, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्मा, इन्द्र, वैधृति, ये ही २७ योग एक आदि क्रम से अधिनी आदि नक्षत्रों के योगका नाम है। अर्कोनचन्द्रलिप्ताभ्यरितथयो भोगभाजिताः । गता ग- म्याश्च पष्टिना नाझोभुक्त्यन्तरोधृताः॥६६॥ ध्रुवानि शकुनि गं तृतीयं तु चतुष्पदम्। किंस्तुम्नं तु चतुर्दश्याः कृष्णायाश्वापरार्धतः ॥ ६७ ॥ ववादीनि ततः सप्त चरा- ख्यकरणानि च । मासेऽष्टकृत्व एकैकं करणानां प्रवर्तते ॥६॥ तिथ्यर्द्धभोगं सर्वपां करणानां प्रकल्पयेत् । एपा स्फुटगतिः प्रोक्ता सूर्यादीनां खचारिणाम् ॥६६॥ इति द्वितीयोऽध्यायः॥ मापानुबाद-अभीष्ट समय में चन्द्रमा के स्फुट से सूर्य स्फुट घटाने पर जो राश्यादि वर्षे उन की फला बना कर तिथि सोग १२० से भाग देवे, जो भागफल हो वह गत तिथि वा धान्द्र दिन और जो अवशिष्ट रहे, यह पर्तमान तिथि के गत (वीता) अंश, एवं इस अपशिष्ट अङ्क फो ७२० से घटाने पर जो पवे वही गम्य बीतने घाला । इस गत और गम्य इन दो अड़ों को प्रथम प्रधा६० से गुणन फर गुणन फल को भिन्न रदो स्थानों में रक्से तदत्तन्तर चन्द्रमा की दैनिक स्पट गति से सूर्य की दैनिक स्फुट गति घटा कर जो घचे अस में पूर्व स्थापित दोनों अकों को यथाकम से भाग देवे, भागफल यधाम से वर्तमान तिथि का गत औरगम्य दण्डादि मयगत हो सकता है। ॥६६॥ रुग्णपक्ष की चतुर्दशी के पराई से आरम्भ होकर शुक्लपक्ष की परिवा दो पूर्वार्द्ध तक कमशः शकुनि, नाग, चतुष्पद भीर किंस्तुम, ये पार स्थिर फरण होते हैं ॥६॥ और पवादि घर नामक फरण शुक्लपक्ष की परिवार पराई से सपाक्रम से होते हैं। ये फरण प्रत्येक मास में बार बार परिवर्तित द्वितीयाध्याप होते हैं ॥६॥ तिधिमान का अदभाग ही प्रत्येक करण का भोग काल है। सूर्यादि की दर्शनोपयोगी गति आदि का वर्णन किया गया ! वियरण-किस तिथि के पूर्वाद और परार्द्ध में कौन करण होगा, वह नीचे लिखित चक्र द्वारा भली भाति ज्ञात होगा। चक्र की प्रथम पति में से ३० तिथि अर्थात् शुभपक्ष की परिवासे अमावस्या तक लिखा है, द्वितीय और पञ्चम पटित में इस २ तिथि के पूर्वार्द्ध में जो २ करण होंगे उस २ का अङ्क रक्खा गया है। और तृतीय और ६ठी पक्ति में इस तिथि के पराई में जोर करण होगे उसर का अङ्क रक्खा गया है। जैसे-प्रथम पांति के एक के अङ्क में शुक्ल पक्ष की परिवा है । इस तिथि के पूर्वार्द्ध होने से द्वितीय पांति के प्रथम में "मि० " द्वारा किंस्तुन्न फरण, एवं पराई होने से तृतीय पात्ति के १ अङ्क में घर करण होगा। इस प्रकार क्रमशः गणना करनी होगी। इन सम्पूर्ण फरणों का नाम-क्य, चतुष्पद्, नाग और किंस्तुम्न है। ये ही चार फरण मिल फर १९ करण होगे । निम्नलिखित चक्र मे विष्टि के बदले में (०) शून्य और शकुनि के बदले में (श), चतुष्पद के बदले में (१०), नाग के बदले में (ना), किंस्तुन के बदले में (कि०), ये सब लिखे हैं ।। फरणों के नाम-शकुनि, धतुष्पद, नाग, किंस्तुन, ये धार ध्रुव फरण हैं और यव, बालय, फौलय, तैतिल, गर, यणिज् विष्टि; येसात घर करण है। तिथियों के अनुसार करण ज्ञापकचक्र ॥ तिथियो के अझ ११२३४५६७८५१११११२१३१४/१५ रुष्णपक्ष तिषियों के पूर्वार्द्ध में जो करण होते हैं कि २४६३५० तिथियों के पराई में जो फरण होते है 11३५०४ तिषियो के अङ्क १६१५१८१२२२१२२५३४५६२१/३० शुक्लपक्ष तिथियों के पूर्या में जो म होते हैं तिषियों के परार्द्ध में जो करण होते हैं ४६३५०२४६० २ १३ ५ D२४६/ २४ १३५०,४६५. मा०
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मृयमिद्धान्त भाषानुवाद
करण के जो भिन्न नाम हैं वह फलित ज्योतिष का विषय है और
"करण संज्ञा भी मानीन अन्धो में अर्यात् गृह्यमूत्र और महाभारत आदि
मैं नहीं पाई जाती परन्तु इस समय “पचाके ५ अङ्गो में से करण एक
अग माना जाता है और फलित जी महाराज इस से भी नाना प्रकार के
शुभाशुभ फल की कल्पना करते हैं । देशी भूमिका ॥
इति भापानुवादे द्वितीयोध्यायः ॥२॥
ओ३म् अथ तृतीयोऽध्यायः निप्रश्नाधिकारः शिलातलेऽम्बुसंशुढे वज्जलेपेऽपि वा समे। तत्र शङवा - लैरिष्टैः समं मण्डलमालिखेत् ॥ १॥ तन्मध्ये स्थापये- च्छकुं कल्पनाद्वादशाकुलम् । तच्छायानं स्पृशेदात्र वृत्ते पूर्वापरार्धयोः ।। २॥ तत्र विन्दू विधायोभौ वृत्ते पूर्वापराभिधी । तन्मध्ये तिमिना रेखा कर्तव्या दक्षि- णोत्तरा ॥३॥ याम्योत्तरदिशोर्मध्ये तिमिना पूर्वपश्चिमा। दिङ्मध्यमत्स्यैः संसाध्या विदिशस्तद्वदेव हि ॥४॥ भापानुवाद -जल की नाई यरायर पत्थर पर या फठिन समक्षेत्र में इष्ट अङ्गुली के परिमाण कासमपत्त रचना करोउसमें१२अगुल का शकु(काठ का दण्ड उत्तम पना हुया)स्थापन कर उरा के आगे वृत्त को पूर्यान्ह या अपरान्ह में जिस जगह छुए यहां दो पूर्वापर(पूर्वान्तिक और अपरान्हिक)विन्दु (चिन्ह)लिखें । तिमि रेसा (दो त के छेद में उत्पन्न मछली की नाई स्थान का नाम "तिमि" है ) द्वारा उन दोनों विन्दु के बीच दक्षिणोत्तर रेसा रौंचे, दक्षिणोत्तर के दो विन्दुओं को केन्द्रकारक (मान फर) ठयासाई परिमाण से वृत्त सेवे, यही तिमि होगी, उस से पूर्व और पश्चिम रेसा बनती है, दिशा के मध्य उक्त तिमि द्वारा ईशानादि (ईशान, अग्नैिर्ऋत्य, वायव्य, इन पार विदिशाओं का निश्चय करें) विदिशा फी रेसा होगी ॥३२॥३॥ ३॥ चतुरसं बहिःकुर्यात्सूत्रैर्मध्याद्विनिर्गतः । भुजसूत्राहुलै- स्तत्र दत्तरिष्टममा स्मृता ॥५॥ मारपश्चिमाश्रिता रेखा मोच्यते सममण्डलम् । उन्मण्डलञ्च विषुवन्मण्डलं परि मूर्य सिद्धान्त भाषानुघाद कीर्त्यते ॥६॥ रेखा प्राच्यपरा साध्या विपुवदाग्रगा तथा । इष्टच्छायाविपुवतोर्मध्यमग्राभिधीयते ॥ ७ ॥ शङ्कुच्छाया कृतियुतेर्मूलं कर्णोऽस्य वर्गतः । प्रोज्झय शकुकृतिं मूलं छायाशङ्कुर्विपर्ययात् ॥८॥ भायानुवाद-अभीष्ट स्थान से दिक् सम्पावरूप रेखा से निकली हुई आदों दिशाओं की रेखा द्वारा जो केन्द्र के एत्त से बाहर है, छाया के परि. भाण से वृत्त सैंधकर पूर्व पश्चिम की रेखा से वृत्त के बाहर एक सम चतुष्कोण क्षेत्र रोंघे, वृत्त में छाया के अनुसार भुज ( शङ्ख के आगे की छाया को दूरता के परिमाण को भुज कहते हैं) पूर्व में या पश्चिम में उत्तर में या दक्षिण में खंचकर भुजान के साथ जहां केन्द्र का संयोग हुआ है, वहां इष्ट छाया दिशा ज्ञात हो जावेगी॥ ५॥ पूर्वापर रेखा का नाम सममएठल रेखा घिपुवन्मएडल रेखा और उन्मएडल रेखा, ये तीनों नाम है ॥ ६ ॥ उक्त सम चतुष्कोण में विषुव छाया के परिमाण पूर्वापर रेणा से दूर उत्तर भाग में एक सम रेखा साधन फरे। विषुध रेखा से इष्ट छाया रेसा के अन्तरको "अया कहते हैं। शङ्ख छापाका वर्ग फरे और इस शङ्कवर्ग में शवर्ग को जोड़े। पुनः उस योगफल का वर्गमूल निकालने से छाया करण होता है । छापा फणे का वर्ग करे, इस फो शङ्ख वर्ग से घटाये । पुमः शेष अङ्क फा वर्ग मूल निकालने से छाया होगी। और उस के विपरीत करने से अर्थात् छाया कणं के वर्ग से छाया वर्ग घटाने से शेष फल धर्ग होगा ॥८॥ *त्रिंशत्कृत्यो युगेभानां चक्रं प्राक्परिलम्बते । तद्गुणाद् भूदिनर्भक्तायुगणादादवाप्यते ॥ ६॥ तद्दोखिनाद- शाप्तांशा विज्ञया अयनाभिधाः। तत्संस्कृतादग्रहाना- न्तिच्छायाचरदलादिकम् ॥ स्फुटं दृक्तुल्यतां गच्छेदयने विपुषद्वये ॥ १० ॥ प्राक्चक्रं चलितं होने छायाात्क- रणागते अन्तरांशैरथावृत्य पथ्याच्छेपैस्तथाधिक॥११॥ इस के टीकाकार पं. रशनाथ ने लिखा है कि यह पाठ (त्रिंशत् इत्यादि) मामादिक है । सोमसिद्धान्त अन्य में ऐसा पाठ हैकि-"युगे षट्शत फरवो हिना मागविलम्बते । .
वतीयाध्याय एवं विषुवती छाया स्वदेशे या दिनार्धजा । दक्षिणो- तररखायां सा तत्र विपुवत्प्रभा ॥ १२ ॥ • भाषानुवाद-एक महायुग में भचक्र ( राशिचक ) पूर्व और पश्चिम दिशा में ६० यार चलता है अर्थात् राशियक विषुच रेसा से पश्चिम ओर २३ अंश घठ कर पुनः अपनी विषुव रेखा पर (अपने स्थान पर) फिर आता है और उस स्थान से पूर्व की ओर इसी प्रकार २७ अंश जाकर पुनः अपनी विषुवरेखा पर वापिस आजाता है । इस प्रकार एक महायुग में ६०० यार जाता और आता है, इस लिये एक कल्प में ६००००० वार जाता और आता है। प्रसी को "अयन कहते हैं। एवं इसी के अंश को अयमांश कहते हैं । इस६०० को महगंणसे गुणा कर गुणनफलको युगके साधनदिनसे माग देघे । भागफल भगणादि ( भगण, राशि, कला, विकला ) होगे। इस भागमल में से भगण को छोड़ देवे और राशि, फला, यिफला जो हो उस का भुण बनाये (पूर्वोक्त रीति से ) उस भुजांश फो तीन से गुणा फर गुणनफल में १० से भाग देवे । भागफल अयनांश होगा। ग्रहों का शयन संस्कार करने से ग्रहों की क्रान्ति, ज्या, चर आदि स्थिर होते हैं। दोनों विषुव दिन में (दोनों उत्तरायण और दक्षिणायन फी सन्धि ) उ नियमों का अनायास निधय होता है। १०॥ या द्वारा जाना हुआ सूर्य से गणित द्वारा लाया हुआ स्पष्ट सूर्य पदि न्यून हो तो चक्र (क्रान्तिकृत्त ) पूर्वधारी है और छायागत सूर्य से गणितागत स्पष्ट सूर्य अधिक हो तो चक (क्रान्तिकृत्त) पशिमगामी होगा। अन्तरांश द्वारा कान्तिकृत्त चलता है ॥११॥ अपने अभीष्ट देश में इस प्रकार से विषुव दिन के मध्यान्ह की छाया दक्षिणोतर रेखा में दिखाई देती है यही यहां की विषय पाया है ॥ १२ ॥ शङ्कुच्छायाहते त्रिज्ये विषुवत्कर्णभाजिते । लम्वाक्षज्ये तयोश्चापे लम्याक्षौ दक्षिणौ सदा ॥ १३॥ मध्यच्छाया- भुजस्तेन गुणिता त्रिभमौर्विका। स्वकर्णाप्ता धनुर्लिप्ता नंतास्ता दक्षिण भुजे॥ १४ ॥उत्तराश्चोत्तरे याम्यास्ताः सूर्यक्रान्तिलिप्तिकाः । दिग्भेदे मिश्रिताः साम्ये विश्लि- ३० मूर्यसिद्धान्त भाषानुवाद टाश्चाक्षलिप्तिकाः ॥१२ताभ्योऽक्षज्या च तद्वर्ग प्रोज्भय त्रिज्या कृते पदम् । लम्बज्यार्कगुणाक्षज्या विषुवनाथ लम्बया ॥१६॥ स्वाक्षार्कनतभागानां दिक्साम्येऽन्तरम- न्यथा।दिग्भेदेऽपक्रमः शेपस्तस्य ज्या त्रिज्यया हता॥१०॥ भाषानुवाद-दो स्थानों में रक्सी हुई त्रिज्या को अलग २ शफु अर्थात् १२ से गुणा कर गुणनफल को विषुवच्छाया कर्ण से भाग देये, भागफल पहिले स्थान में रक्खी हुई त्रिज्या की लम्यज्या होगी और दूसरे स्थान में रक्सी हुई त्रिज्या की अक्षज्या होगी और उम्यज्या का धनु बनाने से लम्भ होगा और अक्षज्या का धनु बनाने से अक्ष होगा ॥ १३ ॥ इष्टदिन के मध्यान्ह की छाया का नाम "भुज है, उस को त्रिज्या से गुणा फार गुणनफल को मध्यान्ह छायाफर्ण से भाग देवे, भागफल का धनु बनाये, वही "गति होगी, यह मतकला मध्यान्ह छाया (भुज ) यदि पूर्वापर रेखा से दक्षिण में हो तो उत्तर नत कता होगी और यदि पूर्यापर रेणा से उक्तभुज उत्तर में हो तो दक्षिण मतफला होगी । उक्त नत कला और सूर्य क्रान्ति यदि एक दिशा में हों तो दोनों को एकत्र जोड़े और यदि दोनों भिन्न दिशा में हों तो एफ में से दूसरे को घटाये तो योगफल या यियोगफल स्वीय अक्ष होगा ॥ १४ १५ ॥ उस अक्ष कलाओं से अक्षज्या होती है, अक्षज्या का वर्ग फरे, एवं इस को त्रिज्या वर्ग से पटाये, शेष अङ्क का मूल निकाले, वही लम्बज्या होगी। अक्षज्या को १२ से गुणा कर गुणनफल में उम्यज्या का भाग देवे, भागफल विषुवघ्छाया होगी॥ १६ ॥ स्वदेश के अक्ष और इष्ट दिन के मध्यान्ह सूर्यन तांश एफ दिशा में हों तो दोनों के अन्तर (पटाने से) करने से शेष फल सूर्य फ्रान्ति होगी, एवं यदि दोनों भिन दिशा में हों तो दोनों को योग करने से योगफल भूर्य कान्ति होगी। इस सूर्य कान्तिश्या को निष्पा से गुणम करे ॥१३॥ परमापक्रमज्याप्ता चापं मेपादिगोरविः । कर्कादौ प्रो- जय चक्रार्धात् तुलादो भार्धसंयुतात् ॥ १८ ॥ भृगादौ मोघ भगणान्मध्यान्हेऽर्कः स्फुटोभवेत् । तन्मान्दम- सकृदयामं फलं मध्योदिवाकरः ॥ १६ ॥ स्वाक्षार्काप- तृतीयाध्याय क्रमयुतिदिक्साम्येऽन्तरमन्यथा । शेष नतांशा: सूर्यस्य तट्वाहुज्या च कोटिर्जा ॥ २० ॥ शड्डुमानानुलाभ्यस्ते भुजत्रिज्ये यथाक्रमम् । कोटिज्यया विभज्याप्ते छाया कर्णावहर्दले ॥२१॥ कान्तिज्या विपुवत्कर्णगुणाप्ता शङ- जीवया । अर्काग्रा स्वष्टकर्णनी मध्यकर्णोद्धृता स्वका ॥ २२॥ विषुवदभायुत्तार्काग्रा याम्ये स्यादुत्तरो भुजः विषुवत्यां विशोध्योदग्गोले स्यावाहुरुत्तरः ॥ २३ ॥ भावानुवाद-उा गुणनफल में परम भान्विज्या ( ९३६७ ) का भाग देवे, भागफल फी ज्या धनाये तो मेपादि ( मेष, वृष, मिथुन ) राशियोंसे सायन रपि स्पष्ट होगा और उस भागफल ज्या फर्फटादि ( कर्फ सिह कन्या ) राशियो में चकाई से (६ राशि से ) घटाने पर शैप फल मध्यान्ह काल मे स्फुट सूर्य होगा और तुलादि ( तुला, वृश्चिक, धनु राशियों में छः राशि योग करने से सायन रवि स्पट होगा और मकरादि ( मफर, फुम्भ, मीन ) राशि में १२ राशि से वियोग करने पर सायन रषि स्पष्ट होगा। सूर्य स्पष्ट से मान्यफल निर्णय करके उलटी रीति से अनेक यार संस्कार करने से सूर्य मध्य होगा अर्थात् सूर्य स्पष्ट को सूर्य मध्य को नाई गणित कर मन्दोधादि संस्कार द्वारा मान्द्यफल लाभ होकर उलटी रीति से संस्कार करने से स्पृष्ठ सूर्य होगा । उस को मध्य जान कर मान्यफल पुन. उत रीति से सूर्य स्पष्ट मेत आय से संस्कार को 10CE THE Wr sir और ५२ सूर्यसिद्वान्त भाषानुवाद फर्ण से गुणा कर गुणनफल में त्रिज्या का भाग देवे, भागफल खकर की अग्रा होगी ॥ २२ ॥ दक्षिण गोल में विघुवच्छाया से सूर्य के अभीष्ट कालिक फर्ण फी अग्रा को जोड़े तो उत्तरभुज होगा और उत्तरगोन में विषुवछाया से सूर्य के अभीष्ट फालिक कर फी अग्रा को घटावेतो शेष फल उत्तरभुज होगm२३॥ विपर्ययाद जो याम्योभवेत् प्राच्यपरान्तरे । माध्या- :- न्हिकोभुजोनित्यं छायामाध्यान्हिकी स्मृता।।२४ालम्बा- क्षजीवे विपुवच्छायाद्वादशसंगुणे । क्रान्तिज्याप्ते तु तौ की सममण्डलगे रवी ॥२॥ सौम्याक्षोना यदाक्रा- न्तिः स्यात्तदा यु दलनवः । विपुवच्छाययाभ्यस्तः कर्णो मध्याग्रयोदधृतः ॥ २६ ॥ स्वक्रान्तिज्या त्रिजीवानी ल- म्यज्याप्ताग्रामौर्विका । स्वेष्टकर्णहता भक्ता त्रिज्ययाग्रा- हुलादिका ॥२७॥ भाषानुपाद-यदि सूर्य से अनीप्ट फालिफ फर्ण फो अया विषुषच्छाया म घट सके तो यिपुर छाया को अभीष्ट कालिक सूर्य के कर्ण की अग्रा. को घटाधे, शेयफल दक्षिण भुज होगा। पूर्वापर रेखा के मध्य में दक्षिण , जीर उत्तरभुज होता है और मध्यान्ह फालिफ लाया का नाम भुज है ॥ २४ ॥ ल. प्रज्या को विषय छाया से गुणा कर गुणनफल में क्रान्तिज्या का भाग देवे, भागफल पदि राम गपडलस्य सूर्य हो तो "छाया होगी । पुनः अक्षज्या को १२ से गुणा कर गुणनफल में कान्तिज्या का भाग देवे । भागफल यदि सम इसस्य सूर्य हो तो छाया कणं होगा ॥२५॥ यदि सत्तर क्रान्ति अक्ष,से न्यून हा ती समवृत्तस्य सूर्य की साधित क्रान्ति मध्याहू फर्ण फो विषुवछाया से गुणा फर गुणनफल में फर्ण की अशा का पाय देणे, सरगफल सम मण्डलस्य ग्रह का छापा फर्ण होगा ॥२६॥ इष्ट कालिक कान्तिज्या को त्रि- प्रया से गुणा फर गुणमफल को लम्बग्या से भाग देवे, भागफल अग्रा होगी, उस को अपने प्रष्ट फर्ण से गुणा कर गुणनफल में प्रिज्या से भाग देवे, भाग. फल अासादिक होंगे ॥ २ ॥ त्रिज्यावर्धितोऽग्रज्या वर्गोनाह द्वादशाहतात् । पुना- मध्याह वतीयाध्याय ५६ दशनिघ्नाच लभ्यते यत् फलं युधैः ॥२८॥ शङ्कवर्गाईसं- युक्तविपुषवर्गभाजितात्। तदेव करणी नाम तां पृथक् स्थापयेहबुधः ॥२६॥ अर्कघ्नी विपुच्छायाग्नज्यया गुणि- ता तथा। भक्ता फलाख्यतवर्गसंयुक्तकरणीपदम् ॥३॥ फलेनहीनसंयुक्तं दक्षिणोत्तरगोलयोः। याम्ययोर्विदिशोः शरेवं याम्योत्तरे रवौ ॥३१॥ परिभ्रमति शङ्कोस्तु शङ्क- रुत्तरयोस्तु सः। तत्रिज्यावर्गविश्लेपान्मूलं दृगज्याभि- धीयते ॥३२॥ स्वशङना विभज्याप्ते दृकृत्रिज्ये द्वादशाहते। छायाकी तु कोणेषु यथास्वं देशकालयोः ॥३३॥ भापानुयाद्-त्रिच्या धर्ग के आधे से (५९९२) पूर्व प्रकार लाया हुआ तात्कालिक अयज्या घर्ग को घटाकर वियोगफल को १४४ से गुणा कर गुणन फल को विषयखाया में ७२ मिठा कर वर्ग फरे, इस वर्ग से उक्त गुणमफल में माग देधे,भागफल "फरणी होगी। इस फो अलग एक स्थान में रस छोडे ॥२॥९॥ विषुवछाया को १२ से गुया करे गुणनफल को अग्रन्या से गुणा फर गुणनफल को ७२ मिला कर विषुवछाया के यर्ग से माग देवे, भागफल "फल" होगा । इस फल के वर्ग और करणी को एकत्र जोड़े, पुन' इस का वर्गमूट मिकाले, इस वर्गमूल को दक्षिण गोड में “फल" से घटाये और तर गोल में "फट में जोड़े तो योग या पियोग फल कोण शुद्ध होगा। 'सूर्य दक्षिण में हो तो फोणशङ्ख दक्षिणदिशा के दो कोणों में (आग्नेय, मैनत्य-विदिशा) और सूर्य तार गोल में हो तो कोण शकु उत्तर के दो कोणों (ईशान, पायल्प-विदिशा) में ॥३२ । ३१ ॥ उस का वर्ग और त्रिज्या वर्ग का अन्तर (पाको घटाने पर ) का यर्गमूल निकालने में दृग्ग्या होगी। टूरश्या को१२ से गुणा फर गुणनफल को और त्रिज्या पो १२ से गुणा कर गुणनफल को कम से कोण कटारफ से भाग देगे से भागफल इष्ट स्थान में इष्ट स्थान की छाया (पहिला फम्न ) होगी और फर्ण होणा(दूसरे का पठ) ॥३२॥ उत्तर दिशा में भूर्य होने पर निग्या से घरख्या को योग को योगफल “अन्या होगी। दक्षिणगोठ में सूर्य हो तो निगा से परश्या को घटाये। मेष कर , मूर्यसिद्धान्त भापानुवाद अन्त्या" होगी। नध्यान्ह से इष्ट फाल घटाने पर वियोग फल का अधादि (अश, फला) यााने से "नत” होगा, नत को अनुसार उत्कमस्या अन्त्य शे पटाफर वियोगफल को अपने अहोरामा ध्यास से गुणा करे ॥ ३३ ॥ त्रिज्योदक्चरजायुक्ता याम्यायां तद्विवर्जिना । अन्त्या नतोत्क्रमज्योना स्वाहोरानार्धसंगुणात्रिज्याभक्ता- भवेच्छेदो लम्बज्यानोऽथभाजितः।त्रिभज्ययाभवेच्छाहु- स्तवर्ग परिशोधयेत् ॥ ३५॥ त्रिज्यावर्गात्पदं दृग्ज्या छायाको तु पूर्ववत् । अभीष्टच्छाययाभ्यस्ता त्रिज्या तत्कर्णभाजिता ॥ ३६ ॥ दृग्ज्या तदुर्गसंशुद्धात् त्रिज्या वर्गाच्च यत्पदम् । शह.सत्रिमजीवानः स्वलम्बज्यावि- भाजिताः ॥ ३७ ॥ छेद. सत्रिज्ययाभ्यस्तः स्ताहोरा- त्रार्दुभाजितः । उन्नतज्या तया हीना स्वान्त्या शेपस्य कार्मुकम् ॥ ३८॥ भावानुवाद-उक्त गुणनफल को त्रिग्या ( ३४३ ) से भाग देवे, नागफल छेद होगा। छेद को लम्यज्या से गुणा फर, गुणन फल को त्रिज्या से भाग देवे, भागफल इप्ट फाय फा शफु होगा । त्रिज्या वर्ग (१९८९९८४४) से उस शकु वर्ग ( १४४ ) को घटाने से शेष फल का वर्गमूल निकाले तो दृग्ज्या होती है । इस से छाया और फर्ण पूर्वोक्त रीति से स्थिर होता है ॥३३॥ ३४ ॥ ३५ ॥ अमीष्ट फालिक छाया को त्रिज्या से गुणा कर, गुणनफल को छापा कर्ण से भाग देवे, भागफल दृग्ग्या होगी । इस के वर्ग को विज्पा वर्ग से घटावे और शेष अङ्क का धर्ग भूल निकालने से शड्फु होगा। उस शकु को त्रिज्या से गुणा कर गुणनफल को अपनी लम्यज्या से भाग फरे, भागफल • छेद" होगा। उस छेद को त्रिज्या से गुणाकर गुणनफल को स्वाहोरात्राई से भाग करे, भागफल को स्वीय “अन्त्य से घटाने पर शेष सम्मतन्याहोगी, उस फा धनु करे ॥ ६ ॥ ३ ॥ उपक्रमज्याभिरेवं स्युः प्राक्पश्चार्धनतासवः ॥३८॥ इष्टा- ग्रानी तु लम्यज्या स्वकर्णागलभाजिता। क्रान्तिज्या सा तृतीयाध्याय त्रिजीवानी परमापक्रमोदधता । तच्चापं भादिकं क्षेत्रं पदैस्तत्र भवोरवि: ॥३६॥ इप्टेहि मध्ये प्राक् पश्चादधृते बाहुनयान्तरे। मत्स्यद्वयान्तरयुते खिस्टकसूत्रेण भा- भ्रमः ॥४०॥ त्रिभ कर्णार्धगुणाः स्वाहोरात्रार्धभाजिताः। क्रमादेकद्वित्रिभज्यास्तच्चापानि पृथक पृथक् । स्वा- धोधः परिशोध्याध मेपालकोदयासवः ॥४१॥खागाष्टयो- ऽर्थगोऽगैका: शरत्र्यङ्कहिमांशवः ।। भाषानुवाद-उन्नत ज्या के परिमाण से धनु बनाने पर पूर्वाई और अपराद्ध नति प्राण स्थिर होगा ॥ ३८ ॥ इष्ट अग्ना से सम्बज्या फो गुणा कर गुणनफल को अपनी कर्णागुल संख्या से भाग देवे,भागफल सूर्य की क्रान्ति- ज्या होगी, उस को त्रिज्या से गुणा कर गुणन फल में परमापर्कमया से भाग करे, भागफल ज्या का धनु ( राश्यादि ) करने से ( यदि यह धात मालूम हो कि धक के विषनपद या समपद में) सायन सूर्य स्फुट होगा॥३८॥ अभीष्ट दिन को पूर्वापर सूत्र के मध्यस्थान से ३ चिन्ह करके मस्स्सद्वय गत रेसा के संयोग स्थान से तीन चिन्ह को स्पर्श करता हुआ तीन वृत्तखेंधने से छाया शेय का भ्रमण मार्ग निर्णीत होगा ॥४॥ एक दो और तीन राशि फी ज्या को क्रमशः तीन राशि के युज्या ( १३८७ ) द्वारा गुणा करके स्वर राशि के अहोरात्राई ज्या द्वारा भागकर धनु निद्यय करे । प्रथम द्विराशि के प्रथम वियोग और त्रिराशि पाल से द्विराशि फल घटाकर कला मेपादि का लड्योदय प्राण होगा। प्राण संख्या मेष १६७०, थप १७६४,मिथुन १३५ ॥४॥ स्वदेशचरखण्डोना भवन्तीष्टोदयासवः ॥ १२ ।। व्यस्ता व्यस्तैर्युताः स्वैः स्वैः कर्कटादास्ततस्त्रयः ॥४३॥ उत्क्रमण पडे वैते भवन्तीष्ठा तुलादयः ॥ ॥ गतभोग्यासवः का- Uभास्करादिष्टकालिकात् । स्वोदयासुहता भुक्तभो- ग्याभक्ताः स्ववहिभिः ॥४५॥ अभीष्टघटिकासुभ्यो भो- .
मूमिहान्त भाषानुवाद
ग्यासून्प्रविशोधयेत् । तद्वत्तदेण्यलग्नासूनेवं यातांस्त-
थोत्नमात् ॥ ४६॥ शेषंचेत्रिंशताभ्यस्तमशुद्धन विभा-
जितम्।भागहीनं च युक्तं च तल्लग्नं क्षितिजे तदा॥४॥
भापानुवाद-उस से स्वदेश परस्पष्हाधियोग करने से इस देश का उदय
माण होगा ॥४२॥ पश्चिम से क्रम से लडोदय प्राण के साथ पश्चिम से घर खण्डा
योग करने से कर्कादि उदय प्राण होगा ॥ ४३ ॥ मेपादि छः राशि के उदय
माण पश्चिम से तुलादि के उदयमाण होंगे ॥ ४४ ॥ उदय भान द्वारा तात्का.
लिक (सायन) रविस्पष्ट के गत और भोग्य प्राण होगे ॥४॥ स्वाभीष्ट घटिफा
के प्राण से भोग्य पदावे । फिर क्रम २ से पिछली पिछली राशियों के प्राण
जय तक घट म सके इसी प्रकार करता जावे ॥४६॥ शेष को ३० से गुणा कर.
गुणन फल में शोध्य राशि की माणसंख्या से भाग देने से जो अंशादि हो
उसको गत राशिकी संख्या में जोड़ने से ( सायन ) लग्न स्पष्ट होगा ॥४॥
प्राक्पश्चान्नतनाडीभिस्तस्माल्लकोदयासुभिःभानौ क्षय-
धने कृत्वा मध्यलग्नं तदा भवेत्॥४८॥भोग्यासूनूनकस्याथ
भुक्तासूनधिकस्य च । संपिण्ड्यान्तरलग्नासूनेवं स्यात्
कालसाधनम् ॥४६॥ सूर्यादूने निशाशेपे लग्नेऽर्कादधिके
दिवा। भचक्रार्धयुताद्वानोरधिकेस्तमयात्परम् ॥५०॥
इति दृतीयोऽध्यायः ॥३॥
जापानुवाद-उक्त प्रकार से पयात् नत प्राण लहोदय प्राण खपहा लेकर
रविस्फुट में प्राण और योग करने से मध्य वा दशम उग्न स्थिर होगा ॥xcn
उग्म और रवि स्पष्ट के मध्य में न्यून का भोग्म फोर अन्य का भुक्त एवं इन दोनों
के मध स्थित राशि गण के प्राण सख्या को एकत्र करने से जो प्राण संख्या
होगी,उस से फाठ साधित होगा ॥ ४॥ लग्नस्पष्ट सूर्यस्फुट से न्यून होने से
मिशा शेष और अधिक होने से दिन में और छःराशियुक्त सूर्य से लग्न अधिक
हो तो सन्ध्या के पीछे होगा ॥५॥
इति भापानुवादे तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
ओ३म् अथ चतुर्थोऽध्यायः अप चन्द्रग्रह्णाधिकारः सार्धानि पट्सहस्राणि योजनानि विवस्वतः । विक- म्भो मण्डलस्येन्दोः सहाशीत्या चतुःशतम् ॥१॥ स्फुट- स्वभुक्त्या गुणिती मध्यभुक्तोदघृतौ स्फुटौ.। रवः स्व- भगणाभ्यस्तः शशाङभगणोद्धृतः ॥२॥ शशाङ्ककक्षा- गुणितो भाजितो वार्ककक्षया । विष्कम्भश्चन्द्रकक्षायां तिथ्याप्तामानुलिप्तिकाः ॥ ३॥ स्फुटन्दुभुक्ति व्यासगु- णिता मध्ययोदधृता। लब्धं सूचीमहीव्यासस्फुटार्कनव- णान्तरम् ॥४॥ मध्येन्दुव्यासगुणितं मध्यार्कव्यासमाजि- तम् । विशोध्य लब्धं सूच्या तु तमोलिप्तास्तु पूर्ववत् ॥५॥ भाषानुवाद-भूर्यमण्डल अर्थात् मूर्य के विम्य व्यास को परिमाण ६५०० योजन और चन्द्रमा के धिम्य ठयास का परिमाण ४८० योजन है, इन को 'कम से मूर्य के धिम्म व्यास को सूर्य की स्पष्ट गति से गुणा कर, गुणनफल में सूर्य की मध्य गति से भागदे, भागफल सूर्य के स्फुट विम्य ध्यान का परि- माण होगा। इसी प्रकार चन्द्रमा के यिन्त्र व्यास को चन्द्रमा की स्पष्टगति मे गुणा कर गुणनफाल में चन्द्रमा की मध्य गति फा भाग दे, भागेंफल चन्द्रमा में स्फुट ध्यास का परिमाण होगा ।। सूर्य के स्पष्ट व्यास को अपने भगण (मृ.) थे गुणा कर, गुणनफल में चन्द्रमा के भगण का भाग दे. या चन्द्रमा की कक्षा योजन संख्या से गुणा कर, गुणनफल में सूर्य की कक्षायोजन संध्या का भाग दे, भागफल चन्द्रमा की कता मैं अर्थात् चन्द्राधिष्ठित आकाश गोल मैं मर्य स्पष्ट टपास का परिमाण होगा। प्रम के पश्चात् मृपं स्पाट बिय घ्याम की योजन माया को १५ मे भाग दे, भागफल मूर्य के निम्न व्याम को क्लाहोंगी ५ मूर्य सिद्धान्त भावानुवाद उस चन्द्रमा के स्पष्ट बिम्ब व्यास योजन संख्या को १५ से भाग दे,भागफल चन्द्रमा के स्पष्ट बिम्ब व्यास की कला होगी॥ २ ॥ ३॥ चन्द्रमा की स्पष्ट गति को पृथिवी के व्यास (१६००) से गुणा कर गुणनफल में चन्द्रमा की मध्य गति का भाग दे, भागफल "सूची" होगी। पथिवी के स्पष्ट व्यास को सूर्य के स्पष्ट बिम्ब व्यास से घटावे, जो अवशिष्ट हो, उस को चन्द्रमा के मध्य व्यास ( १८० ) से गुणा फर, गुणनफल में सूर्य के मध्य ध्यास योजन संख्या फा भाग दे, भागफल को उक्त "मूची” से घटाने पर शेष अङ्क " तमव्यास" सख्या होगी। इस को पहिले की नाई १५ से भाग दे, भागफल तम व्यास की कला होगी।४।५॥ भानोभार्धे महीच्छाया तत्तुल्येऽर्कसमेऽपि वा। शशाङ्क- पाते ग्रहणं कियभागाधिकोनके ॥६॥ तुल्यौ राश्यादि- भिः स्याताममावास्यान्तकालिकौ । सूर्यन्दू पौर्णमास्यन्तें भार्धे भागादिको समौ ॥७॥ गौप्यपर्वनाडीनां स्वफ- लेनोनसंयुतौ । समलिप्तौ भवेतां तौ पातस्तास्कालिको ऽन्यथा ॥ ॥ छादको भास्करस्येन्दुरधःस्थोधनवभ- वेत् । भूच्छायां प्रामुखश्चन्द्रो विशत्यस्य भवेदसौ ॥ तात्कालिकेन्दुविक्षेपं छादाच्छादकमानयोः । योगार्धात् प्रोझय यच्छेपं तावच्छन्नं तदुच्यते ॥ १० ॥ भाषानुवाद-सूर्य में ६ राशि दूर अर्थात् १८० अंश पर पृथिवी की छाया स्थित है । चन्द्रपात या छाया (भूगाया) मूर्य के यरायर राशि अश में यदि अपस्थित हो तो ग्रहण का सम्भय होगा। उक्त परिमाण से न्यूम या अधिक होने पर भी ग्रहण होगा॥६॥ अमावस्या के अन्त काल में सूर्य और च. न्द्रमा की राशि अशफलादि बराबर होती हैं और पूर्णमासी के अन्त में सूर्य और चन्द्रमा में १८२ अथ ( ६ राशि) का अन्तर ( फरक ) हो जाता है अर्थात अमावास्या को मूर्य के अधोभाग में चन्द्रमा आमाता है और पूर्णमासीको चन्द्रमा और पुधिषी की छाया समसूत्रस्प हो जाती है और सूर्य १८० अंश रप रहता हैn ॥ मध्य रात्रिक स्पष्ट (अ० १ । ६७ कोक) राश्यादि (राशि, . - उखमान" सूर्य सिद्धान्त भाषानुवाद तद्ग्राह्यमधिके तस्मिन्सकलं न्यूनमन्यथा।योगाधादधि- के न स्याद्विक्षेपे ग्राससम्भवः ॥११॥ ग्राह्यग्राहकसंयोग- वियोगौ दलितो पृथक् । विक्षेपवर्गहीनाभ्यां तवर्गाभ्या- मुभेपदे ॥ १२ ॥ पष्टया संगुण्य सूर्यन्द्वोर्भुक्त्यन्तरविभा- जिते । स्यातां स्थितिविमर्दा नाडिकादिफले तयोः ॥ १३ ॥ स्थित्यर्धनाडिकाभ्यस्ता गतयः पष्टिभाजिताः । लिप्तादिप्रग्रहे शोध्यं मोक्षे देयं पुनःपुनः ॥१४॥ तद्विक्षेपैः स्थितिदलं विमर्श तथा सकृत् । संसाध्यमन्यथा पाते तल्लिप्तादिफलं स्वकम् ॥१५॥ भाषानुवाद-जी ग्राह्यमान ग्रहविम्ब से अधिक हो तो खग्रास" वा सम्पूर्ण ग्रहण होगा (सर्वग्रास) और ग्राध मान से "उनमान" न्यून हो तो, न्यून ग्रहण किया जायेगा । और ग्राह्य और ग्राहकमान को जोड़ कर, आधा करने पर यदि यह आधा विक्षेप से न्यून हो तो, ग्रहण नहीं होगा। ग्रहण दो प्रकार का है एक मर्यग्रास या सम्पूर्ण ग्रहण, और दूसरा आशिक वा राग महण होता है ॥ ११ ॥ पाहमान और ग्राहकमान को एफन जोड़े, पुनः उस जोड़े हुए अङ्क को आधा कर एक स्थान में रक्खे और ग्राह्यमान से ग्राहकमान को घटावे, जो शेष अङ्क हो उस फो दूसरे स्थान में रक्खें । एवं पहिले रक्से हुवे योगाई फा वर्ग करे, इसी प्रकार दूसरे स्थान में रकरों हुए वियोगार्दु का वर्ग फरे, और योगाई वर्ग से विक्षेप वर्ग को घटाये, इसी प्रकार वियोगाई वर्ग से विक्षेप वर्ग को घटाये, और दोनों घटा हुए घर्ग का भित्र घर्ष मूल निकासे, युनः उन दो वर्ग मूखों को मिनार ६० से गुणा करे, गुणनफल में सूर्य की स्पष्टगति से चन्द्रमा की स्पष्टगति को पटावे, घटाने से जो फल हो, उस के दोनो भिन्न २ स्थापित गुणनफल में भाग दे, भागफल क्रम से योगाई फा फल रुधूलस्थित्यई दण्डादि और वि. योगाई फा फल स्थूल वियदर्ध दण्डादि होगे ॥ १२॥ १३ ॥ सूर्य चन्द्रमा और पात (राहु) की गति को स्थित्यई दण्ड से गुणा कर, गुणनफल में ६० का भाग देवे, भागफल फलादि स्पर्श में सूर्य और चन्द्रमा के पटावे और मोक्ष re धतुर्थाऽध्याय में सूर्य और चन्द्रमा में जोड़े, और पात में इस के विपरीत करे अर्थात् मोक्ष में पात से घटावे और स्पर्श में पात में जोड़े उस से अर्थात तात्कालिक चन्द्रमा और उस के पात द्वारा लाई हुई शर कला से स्थित्यई निर्णय करे जयतक निश्चय न हो बारम्बार इसी मजार फरता जावे ॥१५॥१५॥ स्फुटतिथ्यवसाने तु मध्यग्रहणमादिशेत् । स्थित्यर्धना- डिकाहीने ग्रासोमोक्षस्तु संयुते ॥१६॥ तवदेव विमर्धि- नाडिकाहीनसंयुते । निमीलनोन्मीलनाख्येभवेतां सकल- ग्रहणे ।। १७ ॥ इप्टनाडीविहीनेन स्थित्यर्धनार्कचन्द्रयोः । भुक्त्यन्तरं समाहन्यात् पट्याप्ताः कोठिलिप्तिकाः ॥१८॥ भानोहे कोटिलिप्ता मध्यस्थित्यर्धसङ्गुणाास्फुटस्थित्यर्ध सम्भक्ताः स्फुटा: कोटिकलाःस्मृताः ॥ १८ ॥ क्षेपोभुज- स्तयोर्वर्गयुतेर्मूलं श्रवस्तु तत् । मानयोगार्धतःप्रोज्झय ग्रासस्तात्कालिको भवेत् ॥ २० । भाषानुयाद-स्पष्ट तिथि के अन्त में मध्य ग्रहण होता है। उस से सूक्ष्म स्थित्यई दगड घटाने पर स्पर्श ( ग्रास ) काल होता है और स्पष्ट तिथि के अन्त में सूक्ष्म स्थित्पर्द्ध दयह जोड़ने से मोक्ष फाल होता है ६ इसी प्रकार सम्पूर्ण ग्रहण में (१६ श्लोक में जैसा काद) सूक्ष्म विमदांध घटिका मध्यग्रहण समय से घटाये तो निमोउन फाल होगा और मध्यग्रहण समय में मूक्ष्म पिमहाद्ध घरह जोड़े तो उन्मीलन काठ होगा। सम्पूर्ण ग्रहण में "स्पर्श" को निमीटन और " मोत " को "उन्मीलन" कहते हैं ॥१॥ सूर्य और चन्द्रमा की गति के (परस्पर पटा फर) अन्तर कला से ग्रहणारम्भ से इष्ट दगडादि घटापर शेष अङ्कको स्थित्यहं से गुणा करे,गुणन फल में ६० का भाग माग फल कोटि फला होगी। मूर्य ग्रहण में पूर्वोक्त प्रकार से छाई हुई कोटि कलाको स्थित्य के गुणा फरे, गुणन काल में स्फुट स्पित्यई का भाग देवे, भागफल स्फुट कोटि फडा होगी। विक्षेप के वर्ग मोर कोटि फल के वर्ग को एकत्र कोहे, पुनः इस का वर्गमूल निकाले, वही मृष्ठ कारण होगा। चन्द्रमा और सूर्य के भाग सूर्यसिद्धान्त भाषानुवाद को एकत्र जोह कर इस का आधा करे । इस आधे से फण को घटावे । शेष अङ्क तात्कालिक होगा ॥ २०॥ मध्यग्रहणतश्वोर्ध्वमिष्टनाडोर्विशोधयेत् । स्थित्यर्धान्मौ- क्षिकाच्छेपं प्राग्वच्छेपं तु मौक्षिके ॥२१॥ ग्राह्यग्राहकयो- गार्धाच्छोध्याः स्वच्छन्नलिप्तिका: । तद्वर्गात् प्रोज्भय तत्कालविक्षेपस्य कृतिम्पदम् ॥ २२ ॥ कोटिलिप्तारवेः स्पष्टस्थित्यर्धनाहताहृताः।मध्येन लिप्तस्तन्नाड्यः स्थिति- वग्रासनांडिकाः ॥२३॥ नतज्याक्षज्ययाभ्यस्ता त्रिज्याप्ता तस्य कार्मुकम् । वलनांशाःसौम्ययाम्याः पूर्वापरकपा- लयोः ॥२४॥ राशित्रययुताद् ग्राह्यात् क्रान्त्यशैदिक्समै- र्युताः । भेदेऽन्तराज्जयावलनासप्तत्यङ्गुलभाजिता ॥२५॥ सोनतं दिनमध्यर्ध दिनार्धाप्तं फलेन तु । छिन्दवाद्विक्षेप- मानानि तान्येपामहुलानि तु ॥२६॥ इति चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥ जापानुयाद-मध्य ग्रहण के अनन्तर भौतिक स्थित्यर्ट से इष्ट नाही पदा कर फोटि स्थिर करे और शेष क्रिया पूर्वोक (श्लोक १ में जैसा कहा है) रीति से करे ॥ २९ ॥ पाय और ग्राहक के मान को एकन जोडे और योग फल को आधा फरे । उस आधे से अभीष्ट ग्रास की कला को घटाये, शेष अङ्क को वर्ग करे । घर्ग फल से अभीष्ट ग्रास कालिफ विक्षेप के वर्ग को पटावे, शेष अङ्क का घर्गमूल निकाले यही कोटि कला होगी ॥ २२ ॥ परन्तु सूर्यग्रहण में कोटि कला स्पष्ट स्वित्पर्द्ध से गुणा कर गुणन फल में मध्य स्थित्यढे से भाग फरे, भाग फल कोटि कला होगी। उस से जिस मकार" स्थिति का साधन किया जाता है, अर्थात् जिन नियमो से स्थिति का निश्चय करते है, उसी प्रकार ग्रास नाही को स्थिर करना चाहिये ॥३॥ जिस काल का घलन स्थिर करना हो उस फाल के नत का निर्णय करे । चन्द्रग्रहण में चन्द्रमा का एव मूर्य ग्रहण में सूर्य का नत स्थिर करे । खदिमावान्तर्गत W
धनुर्पाग्याय
दरह पूर्व मत दण्ड एवं स्वदिनाई से न्यून दण्ड पश्चिम नत दण्ड होता है।
उस नत को ० से गुणा कर गुणन फस में स्वदिनाई से भाग दे, भाग फल
नतांश होगा, उस की ज्या, नत ज्या होती है, उस को अभीष्ट अक्षच्या से
गुणा कर, गुणन फल में त्रिज्या से भाग दे, भाग फल ज्या को धनु घनाघे याह.
चलनांश होगा, उम को ६० मे भाग देवे, भागफल क्रम से पूर्वापर कपाल के
पूर्वापर नत का पूर्व का उत्तर वलनांश एवं पश्चिम का उत्तर यलनांश होगा
॥२४॥ जिम्फाल का यलनांश लाना हो उस काल के ३ राशियुक्त
बाघ से ग्रह स्फुट की क्रान्ति निर्देश करे। वलमांश और यदि एक दिशा में
हो तो योग करे, और यदि भिन्न दिशा में हो तो घटाये तो स्फुट अलन
होगा। स्फुट पलन ज्या को अगुल से भाग दे, मागफल अमुलादिक घलन
अस्त ग्रह का होगा । दिनमान में स्वीय अर्द्ध और अभीष्ट फाल की उन्नत
पटिका के साथ योग करे, योगफल को दिनार्दु से भाग दे, जो भाग फल हो
उस से फलात्मक विक्षेप गाय और ग्राहक सिम्यमान प्रति को भाग करने
से भाग फल, अङ्गुलादि होंगे ॥ २६ ॥
इति भाषानुवादे चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
ओ३म्
अथ पञ्चमोऽध्यायः
अप सूर्यग्रहणाधिकारः
मध्यलग्नसमे भानौ हरिजस्य न सम्भवः । अक्षोदड्म-
ध्यमक्रान्तिसाम्येनावनतेरपि ॥१॥ देशकालविशेपेण
यथा नतिसम्भवः । लम्बनस्यापि पूर्वान्यदिग्वशाच्च
तथोच्यते ॥२॥ लग्नं पर्वान्तनाडीनां कुर्यात्स्वरुदयासु-
भिः । तज्ज्यान्त्यापनमज्यानी लम्बज्याप्तोदयाभिधा॥३॥
तदा लड्डोदयैर्लग्नं मध्यसंज्ञं यथोदितम् । तत्क्रान्त्यक्षा-
शसंयोगो दिवसाम्येऽन्तरमन्यथा ॥४॥ शेपं नतांशस्त-
न्मौर्विमध्यज्या साभिधीयते ।
भाषानुवाद-अमावास्या के अन्त काल में यदि सूर्य स्फुट और मध्य
छान ( ०३।४८) तुल्य हो तो लम्बन फा सम्भव नहीं होता है अर्थात्
उस समय लम्बन नहीं होता। उत्तर अक्षांश और दशम लग्न फी क्रान्ति समान
हो तो अवनति (नति ) फी भी सम्भावना नहीं होती, अर्थात् उस समय
नति नहीं होती है ॥१॥ देश और काल की विशेपता से जो गोल स्थित
द्वारा जिस प्रकार नति की सम्भावना धा उत्पत्ति होती है और मध्य रेखाके
पूर्व या पश्चिम में होने के कारण जो लम्बन होता है मो इस समय कहा
जाता है ॥ २॥ स्यदेशीप उदय माण से पन्त (अगावास्या या पूर्णमासी)
काठ की ( सायन) स्थिर करे। उस की भुणस्या को परमापनमज्या (१९८७)
से गुणा कर, गुणनफल में स्वदेशीय सम्बडया का भाग दे, भागफल को -
"उदय" फहते हैं ॥ ३ ॥ पर्वान्त काल में उड्डा के उदय माण से ( मायन)
मध्य लग्न साधन करे । मध्यलग्न की क्रान्ति और अक्षांश एक दिशा मे हों
ती योग करें और यदि भिन्न दिशा में हो तो घटावे,शेष अट नतांश होता
है। उस की या करने से मध्यज्या होती है ॥४॥
पञ्चमाध्याये मध्योदयज्ययाभ्यस्ता त्रिज्याप्ता वर्गितं फलम् ॥५॥ मध्यज्या वर्गविश्लिप्टं दृषक्षेपः शेषतः पदम् । तत्रि- ज्यावर्गविश्लेपान्मूलं शङ्कः स दृग्गतिः ॥ ६॥ नतांश- वाहुकोटिज्ये स्फुटे द्ववक्षेपदृग्गती । एकज्यावर्गतश्छे- दो लब्धं दुग्गतिजीवया ॥७॥ मध्यलग्नार्कविश्लेपज्या छेदेन विभाजिता । रवीन्द्वोर्लम्बनं ज्ञेयं प्राक्पश्चाद घटिकादिकम् ॥८॥ मध्यलग्नाधिके भानौ तिथ्यन्तात् प्रविशोधयेत् । धनमूने सकृत्कर्म यावत्सर्वं स्थिरीभ- वेत् ॥ ६ ॥ दृक्क्षेपः शीततिग्मांशोर्मध्यभुक्त्यन्तराहतः। तिथिन्नत्रिज्यया भक्तो लब्धं सावनतिर्भवेत् ॥१०॥ दृक्- क्षेपात् सप्ततिहृताट्वेद्वावनतिः फलम् । अथवा त्रि- ज्यया भक्तात्सप्तसप्तकसङ्गुणात् ॥ ११ ॥ भापानुवाद-पूर्वोक्त मध्यज्या को पूर्वानीत उदयज्या से गुणा करे,गुणन फल को त्रिज्या में भाग दे, भागफल को वर्ग करे । बर्गफल को मध्यज्या के वर्ग से घटाघे शेप अङ्क का वर्ग मूल निफाले, वही मूल दृश्क्षेप होगा । इस टूक्क्षेप वर्ग से त्रिज्या वर्ग घटाफर शेष अङ्क का मूल निकाले, यही मूल दृग्- गति होगी ॥५॥६॥ स्थूल पक्ष में दशम लग्न के नताश की भुजज्या फो द्रुक्क्षेप कहते हैं और कोटिज्या को दूरगति कहते हैं ।.७ ॥ एक राशि के ज्या के वर्ग को द्रगति (पूर्वोत ज्या) से भाग करे, भागफल “छेद होगा । मध्यलग्न से उस काल के सूर्य को घटाकर उस की ज्या यनाये, इस ज्या में छेद फा भाग दे, नागफल दण्डादि मध्यलग्न से पूर्व और पश्चिम निश्चय कर सूर्य से चन्द्रमा के लम्बन दाहादि स्थिर होगे॥८॥ मध्यालगन से सूर्य अधिक हो तो सिम्पन्त से काल उम्बन घटाये और यदि न्यूम हो तो जोड़े। पुनः लम्बन साधन फरफे तिश्यन्त में संस्कार करे। जब तक स्थिर न हो तब तक ऐसा ही करता लाये In दूक्क्षेप (पूर्वानीत) को सूर्य को गति से चन्द्रमा की भुक्ति घटाकर,शेष अङ्क से गुणा कर गुणनफल में १५ गुणित त्रिज्या से (त्रिज्या भो३म् अथ षष्ठोऽध्यायः परिलेखाधिकारः॥ न छेदाकमृते यस्मादभेदा ग्रहणयोः स्फुटाः । ज्ञायन्ते तत्प्रवक्ष्यामि छेदकज्ञानमुत्तमम् ॥१॥ सुसाधिताया- मवनौ विन्दु कृत्वा ततो लिखेत् । सप्तवर्गाद्गुलेनादौ मण्डलं बलनाश्रितम् ॥२॥ ग्राह्यग्राहकयोगार्धसम्मि- तेन द्वितीयकम् । मण्डलं तत्समासाख्यं ग्राह्यार्धेन तृती- यकम् ॥३॥ याम्योत्तराप्राच्यपरासाधनं पूर्ववदिशाम्। प्रागिन्दोर्ग्रहणं पश्चान्मोक्षोऽर्कस्य विपर्ययात् पायधा- दिशं प्राग्ग्रहणं बलनं हिमदीधितः। मौक्षिक त विप- यस्तं विपरीतमिदं रवेः॥५॥ भाषानुवाद-छेद्यक (गोल स्थिति को दिखलाने के लिये कल्पित प्रकार) के पिना सूर्यग्रहण और उस की स्पर्श और मोक्ष दिशा और परिमाण का स्पष्ट धान नहीं होता अर्थात् सूर्य और चन्द्रग्रहण में विम्ध मण्डल के किस ओर से ग्रहण आरम्भ हो कर किस ओर समाप्त होगा और कितना भाग मपाल का आच्छादित (ग्रहण) होगा, यह विषय विना छेधक के ली भाति नहीं जात होगा इस लिये उत्तम शानसाधफ छेद्यक को कहता हूं ॥१॥ जल की नाई घरायर की हुई भूमि (अभीष्ट स्थान) में एत मध्य विन्दु अर्थात् केन्द्र सापक चिाह (point) करे, पुनः उस विन्दु से ४ अङ्गुल परि- मित व्यासाई भे, "बलन देने के लिये एक वृत्त लिसे ॥२॥ ग्राह्य और ग्राहक फे यिम्पमान फी अङ्गुलियों के आधे परिमित, व्यासाई से दूसरात लिखे। इस का नाम समास वृत्त गोगा। और ग्राह्य के विम्बमान के भगुलियों के अर्ध परिमित व्यासाई से तीसरा पत्त लिखे ॥३॥ पूर्ववत् (१०३ । सो०१४ पष्टाध्याय वास) आठ दिशाओ में से पाम्योत्तर एवं पूर्वापर रेखा अर्थात् दक्षिण उत्तर रेखा एवं पूर्व और पश्चिम को गई रेखा को साधन करे। चन्द्रग्रहण मे चन्द्रमा के बिम्बमण्डल की पूर्व ओर स्पर्श (ग्रहण आरम्भ) एवं पश्चिम ओर मोक्ष (ग्रहण समाप्त) होता है और सूर्यग्रहण में इसके विपरीत होता है अर्थात् सूर्यमण्डल के पश्चिम भाग में स्पर्श एवं पूर्व भाग में मोक्ष होता है ॥४॥ विवरण-शीघ्रगामी चन्द्रमा सूर्यसे छः राशि (१८० अश) अन्तर में पूर्व की और घलतारपृथिवी की छाया में आजाता है इस कारण चन्द्रग्रहण में पहिले पूर्व दिशासे (मण्डल के) म्लान होता है। एवं पश्चिम दिशामें मोक्ष होता है। और सूर्यग्रहण में चन्द्रमा सूर्य को पीछे आकर ढक लेता है इस लिये सूर्य के पश्चिम दिशा मे स्पर्श और पूर्वभाग में मोक्ष होता है ॥४॥ चन्द्रमा के ग्राह्य स्पार्शिक घलन को पूर्व चिन्ह से दक्षिण हो तो दक्षिण में, उत्तर हो तो उत्तराभिमुख देवे। पूर्व और पश्चिम सूत्र (रेसा) अर्द्धज्या फी नाई बलनानित वृत्त में बलम देवे, (इस लिये उस वृत्त की अलनाश्रित वृत्त संक्षा है) चन्द्रमा के मोत कालिक वलन को विपरीत भाव से पशिम चिन्ह से पूर्वापर सूत्र से अई ज्या की नाई दक्षिण हो तो उत्तराभिमुरा, उत्तर हो तो दक्षिणाभिमुख यलन देवे । सूर्यग्रहण में चन्द्रग्रहण की अपेक्षा उलटे मकार से बलनदान होगा। मोक्ष फालिक बलन पूर्व चिन्ह से पूर्वापर सूत्र से अर्द्ध ज्या की नाई दक्षिण हो तो दक्षिणाभिमुख, उत्तर हो तो उत्तराभिमुरा देना। स्पर्श फाठिक पलन, पश्चिम चिन्ह से पूर्यापर सूत्र (रेखा } आई ज्या की नाई दक्षिण हो तो उत्तराभिमुख, उत्तर हो तो दक्षिणाभिमुख देना ॥५॥ वलनागावयेन्मध्यं सूत्रं यदात्र संस्टशेत् । तत्समासे ततो देयौ विक्षेपौ ग्रासमौक्षिकौ ॥६॥ वियाग्रात् पुनःसूत्रं मध्यविन्दु प्रवेशयेत् । तद्ग्राह्यविन्दुसंस्प- दिग्रासमोक्षी विनिर्दिशेत् ॥५॥ नित्यशोऽर्कस्य विक्ष- पाः परिलेखे यथादिशम् । विपरीताः शशाङ्कस्य तद्व- शादथ मध्यमम् ॥८॥ बलनं माड्मुख देयं तद्विक्षेपै- कता यदि भेदे पश्चान्मुखं देयमिन्दो नोर्विपर्ययात् सूर्यसिद्धान्त भाषानुवाद ॥ ६॥ बलनाग्रात्पुनःसूत्रं मध्यविन्दु प्रवेशयेत् । मध्य सूत्रेण विक्षेपं चलनाभिमुखं नयेत् ॥ १० ॥ भापानुवाद-बठनाग्र (प्रथम एत्त में जहां स्पार्शिक पलनान और जहा मौक्षिक यलनाय जाना गया है) से मध्यविन्दु (केन्द्ररूप) तक सूत्र (रेखा) रचना करे । इस रेखा को समास नामक द्वितीय यत्त में जिस प्रदेश में स्पर्श (छुए) फरे, उस रेखा से समास वृत्त में अई ज्या की नाई, स्पर्श और मोक्ष का विलेप यथायोग्य देना ॥६॥ समास वृत्त में विक्षेपाय से जिस स्थान में पायपत्त को स्पर्श किया है, यहां से रेखा को द्वितीय धार यलमान से रेखा में मध्य केन्द्र तक उसी प्रकार विक्षेपाय से मध्य विन्दु तफ रेखा प्रवेश करे। उस रेखा से पाय यिम्य फे वृत्त और परिधि के सयोग स्थान से ग्रास और मोक्ष दिखलाये, स्पार्शिक शरापरेसा को ग्राह्यत्त में जहां पर मिला हुआ है वहां स्पर्श और मौक्षिक शरापरेखा को प्राय यत्त में पाहां संयोग हुआ है, यहां मोक्ष कहे ॥७॥ सूर्यग्रहण के परिलेख (ग्रहण को दिखलाने के लिये फल्पित प्रकार) में नित्य ही चन्द्रमा के विक्षेप अपनी ठीक दिशा में होते हैं। और चन्द्रग्रहण में चन्द्र विक्षेप यदि विपरीत दिशा में हो तो अर्थात् दक्षिण में हों तो उत्तर और उत्तर में हो तो दक्षिण विक्षेप होते है। इसी के अनुसार स्पार्शिक और मौक्षिक विक्षेप देवे, (यह उदाहरण विपरीत दिशा फा दिया गया है ) तत्पश्चात् मध्य ग्रहण कालिक दिशा के साप भूर्यग्रहण में मध्य ग्रहण कालिक स्पष्ट विक्षेप दिक्ष चिन्ह से और चन्द्रग्रहण में मध्य कालिक विपरीत दिक् चिन्ह से, यदि उस विक्षेप को एकता हो तो बालन विक्षेप मध्यग्रहण कालिक षिक्षेप है । आशय यह है कि इन दोनों की एफ दिशा होमी। (यहां चन्द्र विक्षेप दिशा का यथा दिक् स्थित होना ही विपरीत दिशा जानना) विक्षेपानाल्लिखेटुवृत्तं ग्राहकार्धनतेन यत् । ग्राह्यवृत्तं समाकान्तं तद् ग्रस्तं तमसा भवेत् ॥ ११ ॥ छेदशकं लि- खता भूमौ फलके वा विपश्चिता। विपर्ययो दिशां कार्यः पूर्वापरकपालयोः ॥ १२॥ स्वच्छत्वाद् द्वादशांशोऽपि 'ग्रस्तश्चन्द्रस्यदृश्यते।लिप्तात्रयमपि ग्रस्तं तीक्ष्णत्वानवि- WM बष्टाध्याय ७१ वखतः ॥१३॥ स्वसंज्ञितात्रयः कार्या विक्षेपाग्रेषु बिन्दवः। तत्र प्राङ्मध्ययोर्मध्ये तथा मौक्षिकमध्ययोः ॥ १४ ॥ भाषानुवाद-मध्यकालिक बटनाव से मध्यविन्दु तक रेखा रचना फरे । इस रेखा पर मध्यविन्दु से पुनः बछनाशिमुख विक्षेप का चिन्ह करे। ग्राहक को भान को आधा फरे । उस आधे परिमाण को व्यासाई के साथ विक्षेपाय के चारों मोर पत्त कल्पना करने से जो यत्त होगा यह वृत्त प्राय यत्त में जितना व्यास हो यही तमसायत अर्थात् उतना भाग मपटल का ग्राहक से आच्छादित होकर अन्धकार से घिर जायेगा ॥१०॥ १९ ॥ समतल भूमि में या फलक ( काठ की पट्टी ) पर छेद्यक लिस फर पूर्वापर कपाल लोट पोट करे अर्थात् पूर्व कपाल में वाई और से पश्चिम लिखना और पश्चिम कपाल में याई ओर से पूर्व लिखना, यह तो ठीक कर से हुआ। परन्तु इस को घदल फर करना कि पूर्व के स्यान में पश्चिम और पश्चिम के स्थान में पूर्व लिपना ॥ १२॥ चन्द्रमा की स्वच्छता के कारण चन्द्रमण्डल के १२ अंश ग्रहण होने पर भी हम लोग देखते हैं । परन्तु मूर्य की किरणों की प्रखरता से ३ फला का सूर्य ग्रहण भी हम लागों को नहीं दिखाई देता ॥ १३ ॥ विक्षेपा. प्रों में स्पार्शिक विक्षेप मौक्षिक विक्षेप एवं माध्य विक्षेपों का पहिले अपने अपने स्थान में स्पर्श मोक्ष और मध्यग्रहण जानने के लिये अग्निम माग में अपने २ नाम का साङ्केतिक ३ विन्दु लिगे। जैसे-रूपर्श शर के अग्रभाग में स्पर्श पिन्हाङ्कित बिन्दु, मोक्ष शर के आगे मो० चि० विन्दु, एवं मध्यरार के मागे म० पि० मिन्दु लिसे। इस प्रकार तीनों बिन्दुओं को स्थापन करे ॥४॥ लिखेन्मत्स्यौ तयोर्मध्यान्मुखपुर पुच्छविनिः सृतम् । प्रसार्य सूत्रद्वितयं तयोर्यत्र युतिर्भवेत् ॥ १५॥ तत्र सूत्रेण विलि- खेञ्चापं विन्दुत्रयस्पशाास पन्था ग्राहकस्योक्तो येनासौ सम्प्रयास्यति ॥ १६ ॥ ग्राह्यग्राहकयोगार्धात् प्रोज्झयेष्ट ग्रासमागतम् । अवशिष्टाङ्गुलसमां शलकां मध्यविन्दुतः ॥१७॥ तयोर्मार्गोन्मुखोंदवादग्रासतः प्राग्ग्रहाश्रिताम् । विमुञ्चतो मोक्षदिशि ग्राहकाध्वानमेव सा ॥१८॥ स्पशे- १३२ . मूर्यसिद्धान्त भाषानुवाद दात्र ततोवृत्तं ग्राहकार्धन संलिखेत् । तेन ग्राह्यादादा. क्रान्तं तत्तमोग्रस्तमादिशेत् ॥१६॥ भाषामुयाद-स्पर्श और मध्यविन्दु के द्वारा (अ. ३ नोक २ ॥३) और मोक्ष एवं मध्यविन्दु द्वारा दो मत्स्य अतित करे और दोनों मत्स्य रेखाओं के बीच से उन के मुख और पुच्छ से निकलती हुई दो रेखा सैंचे। जहां इन दो रेशाओं का संयोग होउम को केन्द्र मान कर उक्त तीन बिन्दुओं को छूता हुआ एक धनुषु अनावे । वह धनुष ही ग्राहक का मार्ग होगा । अर्थात् जिस मार्ग से ग्राहक ग्रास्य बिम्ब को आच्छादन के लिये जावेगा ॥१५॥ १६ ॥ ग्राह्य और ग्राहक मान को एकत्र जोड़े, पुनः इस के आधे से इट ग्रास घटा कर जो बचे, उस परिमाण से मध्यविन्दु से रेखा उसी मार्ग की ओर बँचे । मध्य. ग्रहण के पूर्व होने पर स्पर्श दिशा में और मध्यग्रहण के पश्चिम दिशा में होने पर मोक्षाभिमुख एक रेखा लावे। रेखान्त यिन्दु को केन्द्र मान कर ग्रा- हक मान के आधे परिमाण से सम्यकपा एक वृत्त रचना करे, यह पत्त और गाय पत्त दोनोंके अधिकृत अंश ही तत्कालीन आच्छादित अंश हैं ॥१९॥ मानान्तरार्धन मितां शलाका ग्रासदिङ्मुखीम् ।निमी- लनाख्या ददात् सा तन्मार्ग यत्र संस्पृशेत् ॥२०॥ ततो- ग्राहकखण्डेन ग्राम्वन्मण्डलमालिखेत् । तद्ग्राह्यम- ण्डलयुतिर्यत्र तत्र निमीलनम् ॥ २१ ॥ एवमुन्मीलने मोक्षदिनमुखी सम्प्रसारयेत् । विलिखेन्मण्डलं प्राग्व- दुन्मीलनमथोक्तवत् ॥२२॥ अर्धादूने सधूमं स्यात्कृष्ण- मर्धाधिकं भवेत् । विमुञ्चतः कृष्णतामं कपिलं सकलग्रह ॥ २३॥ रहस्यमेतद्देवानां न देयं यस्य कस्य चित् । सुपरीक्षितशिष्याय देयं वत्सरवासिने ॥ २४ ॥ इति पष्ठोऽध्यायः ॥६॥ भाषानुवाद-ग्राप मान से पाहकमान को पटाये, शेष फल के आधे परिमाण की एक शलाका ग्रास दिशा में उस मार्ग पर स्थापन करे और सम MARA यहाध्याय . के अप भाग को केन्द्र कर ग्राहकमान के परिमाण का वृत्त खेंचे । उस वृत्त में जहा पर वह मण्डल को छुये उसी दिशा में निमीलन आरम्भ होगा। २१॥ इस प्रकार से मोक्ष दिशा की ओर उक्त शलाका को स्थापन करके पूर्व- यत् अर्थात् जहां पर मपहल स्पर्श करे "पही उन्मीलन" दिशा होगी ॥२॥ चन्द्रग्रहण में ग्रास आधे से न्यून होने पर धूम्रवर्ण,आधे से अधिक होने पर काटा रङ्ग, जव मण्डल फा तीन हिस्सातो काला और लाल मिला हुवा रजा और संपूर्ण पास होने पर मण्डल कपिलवर्ण ( जई रम) होगा। एवं मोक्ष फाल में लाल काला मिला हुआ रह होता है।॥ २३ ॥ विवरण-भूमि की छाया में कोई प्रकाश नहीं, इस कारण की आच्छादिका होने पर चन्द्रग्रहण में अनेक प्रकार के रङ्ग दीखते हैं और घ- न्द्रमा जलस्वरूप सूर्य का भाच्छादक होता है । इस कारण सूर्यग्रहणा में सदा फाला रा होता है, दूसरा रा नहीं होता। इस कारण यहां सूर्य ग्रहणका जनहीं कहा गया ॥ २३ ॥ यह छेद्यक ज्ञान का तत्व विद्वानो के लिये रहस्य है, इस लिये जिस फिसी अपरीक्षित ( जिस की भलीभांति ज्योतिष विद्या में तीक्ष्ण बुद्धिन पाई जाये) सर्वसाधारण व्यक्ति को इस का उपदेश न करना चाहिये । किन्तु एक वर्ष तक जिस विद्यार्थी की परीक्षा ले ली है, उसी शिष्य को इरा का उपदेश करना चाहिये ॥२४॥ इति भाषानुवादे पष्ठोऽध्यायः ॥ ६॥ - सोइम् अथ सप्तमोऽध्यायः तारा ग्रहाणामन्योन्यं स्यातां युद्धसमागमौ । समागमः शशाङ्केन सूर्यणास्तमनं सह ॥१॥ शीघ्र मन्दाधिकेतीतः संयोगोभवितान्यथा । द्वयोः प्राग्यायिनोरेवं वक्रिणो- स्तुविपर्ययात् ॥२॥ प्राग्यायिन्यधिकेऽतीतोवक्रिएयेप्यः समागमः । ग्रहान्तरकला:स्वस्वभुक्तिलिप्ता समाहताः ॥३॥ भक्तधुत्तरेण विभजेदनुलोमविलोमयोः । द्वयो- र्वक्रिण्यधैकस्मिन् भक्तियोगेन भाजयेत् ॥ १ ॥ लब्धं लिप्तादिकं शोध्यं गते देयं भविष्यति । विपर्ययादवक्र- गत्योरेकस्मिंस्तु धनव्ययौ ॥५॥ सापानुवाद-सारा और पाच ग्रहो अर्थात् मङ्गल, बुध सहस्पति, शुक्र, और शनि के परस्पर योग ( एफ के साथ दूसरे का मिलना ) का नाम "युद्ध" और समागम कहते हैं। चन्द्रमा के साथ उक्त पाचो ग्रहो में से किसी एक ग्रह के योग का नाम "समागम और सूर्य के साथ उक्त पांचों ग्रहो में से किसी एक ग्रह के योग का नाम अस्तमन है ॥१॥ जिन दो ग्रहो का "योग जानना हो उन में से यदि शीघ्रगामी ग्रह मन्दगामी ग्रह की अपेक्षा अधिक हो तो "योग' यत (हो गया अमीष्ट फाल से पहिले) और मन्दगामी ग्रह शीघ्रगामी ग्रह की अपेक्षा अधिक होतो"योग माया (हट फाल के पीछे होगा ) जानना । यह नियम दो पूर्वगामी ग्रहो के लिये है और धक्रगामी अहो का तो उस के उलटा होता है,अर्थात् धकी मन्दगामी ग्रह की अपेक्षा । यकी शीघ्रगामी ग्रह अधिक हो तो योग भावी और यकीशीघ्रगामीग्रह की अपेक्षा वक्रीमन्दगामी यह अधिक हो तो योग गत जानना और दोनों पाहो में से एक वक्री, एष दूसरा पूर्वगामी यह हो तो धक्रीग्रह से पूर्वगामी मप्तमाध्याय " प्रह अधिक हो तो "योग गत और पूर्व गामीग्रह से मन्दगामी ग्रह अधिक हो तो "योगावी जानना ॥ ३ ॥ दो (जिन का योग) इप्टकालिक ग्रहों की अन्तर कला को (एक की कला को दूसरे की कला से घटा कर) अलग अलग अपनी २ गति कला द्वारा गुणा कर, गुणनफल में दोनों सरगामी या वक्रगामी हों उन की स्फुटगति के अन्तर कला ( घटाकर ) का भाग देवे। अब इस में विशेषता यह है कि यदि दोनों ग्रहों में से एक धक्री हो तो दोनों के गति कला के योग से भाग देवे और अपने २ भागफल कला- दिक को योग गत हो तो सरलगामी ग्रहों से घटावे और योग भावी हो तो दोनों में योग करे और दोनों धक्रगामी ग्रहों के अपने २ भागफल फलादिको योग गत हो तो जोड़े और भावी हो ती घटावे। दोनों ग्रह में से एक ग्रह घकी हो तो दोनों सरलगामी एवं वक्रगामी ग्रहों के अपने २ कलात्मक फ- लाङ्क फो योग और वियोग करे, अर्थात् योग गत होने पर सरलगामी ग्रह से फल को घटावे और वक्रीग्रह में फल को जोड़े और यदि योग भावी हो तो वक्री ग्रह से फल को घटावे, एव सरलगामी ग्रह में जोड़े ॥३४॥५॥ समलिप्ती भवेतां तौ ग्रही भगणसंस्थिती । विवरं तद्व- दुदधृत्य दिनादि फलमिण्यते ॥६॥ कृत्वा दिनक्षपामानं तथा विक्षेपलिप्तिकाः । नतोन्नतं साधयित्वा स्वकाल्ल- ग्नवशात्तयोः ॥ ७ ॥ विपुवच्छाययाभ्यस्ता द्विक्षेपाद् द्वादशोधृतात् । फलं स्वनतनाडीघ्नं स्वदिनाविभा' जितम् ॥ ८॥ लब्धं प्राच्यामृणं सौम्याद्विक्षेपात्पश्चिमे धनम् । दक्षिणे प्राक्कपाले स्वं पश्चिम तु तथा क्षयः॥६॥ सत्रिभग्रहजक्रान्तिभागन्नाः क्षेपलिप्तिकाः । विकलां.. स्वमृणं क्रान्तिक्षेपयोभिन्नतुल्ययोः ॥ १० ॥ सायानुवाद-उक्त क्रिया पर दोनों ग्रहों की राशि चक में संहिदि काम) अर्थात् राशि, अंश, कला समान होंगी। "योग काइरो सी दोनों ग्रहों की अन्तर कला को पूर्वोक्त हारक द्वारा जार करने पर
मूर्य सिद्धान्त भाषानुवाद
फल जो दिनादि होगा वह समफष्ठा काठ से इष्ट काल के अन्तर दिनादि
होगा ॥६॥ दोनो समकालाफालीन ग्रहो का दिनमान, रात्रिमान और विक्षेप
फला का निधय करके,ग्रहस्थानगत उग्न से नत और तसत का निश्चय करो।
विवरण-अ०३ । झोक ४८ के अनुसार ग्रहो के दिनगत,रात्रिगत का निश्चय
क्षरे। दिन में जो भाग बीत गया,तथायीतने वाला है उसके अर्थात् गत और
गम्प के अल्प भाग का नाम वत्रत और दिन और रात्रि से न्यून अर्थात दिन
के आधे या रात्रि के आधे की ग्रह का "नत होता है । जिस अश में यह
स्थित है उस के उदय (लग्न) का समय स्थिर फरके उस से ग्रह का मध्योदय
फाल ग्रह का दिनार्द्धमान योग करने से निकल आता है। मध्योदय काल
नियत हो जाने पर पटदगड को एपक्ता से मतोलत अनायास ज्ञात हो
फाते हैं ॥७॥
विक्षेप को विपुषष्छाया से गुणा कर,गुणनफल को१२ से भाग फरे, भाग
फरड को अपने नतदएड से गुणा कर, गुणनफल में दिनाई (रात्रि में राज्य
से) का भाग देवे,भागफल अक्षद्वग् ग्रह होगा। इस फल को उत्तर विक्षेप होने
से पूर्व कपाल में अक्षदृग् ग्रह स्पष्ट से पदाये और पश्चिम फपाल में जोड़े और
यदि दक्षिण विक्षेप हो तो उत्तर भागफल,फो पूर्व कपाल में योग और पश्चिम
फपाल में घटावे ॥८॥ तीन राशि मिले हुवे ग्रह स्पष्ट के अनुसार
छाये
हुवे क्रान्ति के अंश से विक्षेप फला को गुणा फरे । गुणनफल विफला (आ.
यन दृक्षर्म की) होगी। पूर्वोक्त क्रान्ति और विक्षेप यदि भिन्न २ दिशा में हो
तो ग्रह में योग फरे और यदि दोनो एक दिशा में हो तो पह में पदावे ॥१०॥
नक्षत्रग्रहयोगेपु ग्रहास्तोदयसाधने। शृङ्गोन्नतीतु चन्द्र-
स्य दृक्कादाविदं स्मृतम् ॥११॥ तात्कालिको पुनः कार्या
विक्षेपौ च तयोस्ततः। दिक्तुल्ये त्वन्तरं भेदे योग शिष्टं
ग्रहान्तरम् ॥ १२ ॥ कुजार्किज्ञामरेज्यानां त्रिंशदर्धार्ध-
वर्धिताः । विष्कम्भाश्चन्द्रकक्षागं भृगो:पष्टिरुदाहृताः
॥ १३ ॥ त्रिचतुष्कर्णयुक्तचाप्तास्ते द्विघ्नास्त्रिज्यया हताः ।
स्फटाः स्वकास्तिथ्याप्ता भवेयुर्मानलिप्तिकाः ॥ ११ ॥
समाग्याथ
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भाषानुवाद-मक्षर और ग्रह के योग जानने के लिये ग्रहों के उदयास्त
के निमित्त चन्द्रमा को श्रोन्नति के निमित्त नक्षत्रों के उदयास्त निमित्त पूर्व-
यत् पहिले आक्षक् एवं आयन दृष्कर्म करे। (यहां नक्षत्रों का आयन कर्म
ह। घुफा दे । इस लिये नक्षत्रों का आयन इक्कर्म न करे ) ॥१९॥ पुनः उसी
मकार (लोक ३।३।६) मध्य और स्पष्टादि क्रिया द्वारा दोनों को ता.
कालिक फरे, धन के विक्षेप को भी तारकालिक करे, यदि इस से भी दोनों
यह समकलाकालीन न हो तो अनेक बार इसी प्रकार करता जाये, जब
स्थिर हो जाये तो यदि विक्षेप एक दिशा में हो तो वियोग करें और मिन
दिशा में हो तो योग करने पर ग्रहान्तर अयोस् दोनों ग्रहों के विम्ब और
केन्द्र का उत्तर, एवं दक्षिण सिद्ध होगा ॥१२॥ चन्द्रमा की कक्षा में मङ्गल का
बिम्ब पास ३०,शनि का विम्य ध्यास ३०.युधका पिम्य ध्यास ४५, रहस्पति
फा बिम्ब व्यास १२३, शुक्र फा ६० विम्य व्यास है। इन विम्य व्यासों को
द्विगुणित विज्या से गुणा फर गुणनफल में त्रिज्या और चतुर्थ फर्म में शीघ्र
कर्ण में जो कर योगफल से भाग देधे,भागफल स्वस्पष्ट विम्ब व्यास होगा।
इस स्पष्ट ध्यास फो १५ मे भाग करे, भागफल फलादिमान होगा॥१३॥१४॥
छायाभूमौ विपर्यस्ते स्वच्छायाने तु दर्शयेत् । ग्रहः
स्वदर्पणान्तस्यः शवने सम्प्रदृश्यते ॥ १५ ॥ पञ्चहस्तो-
च्छितौ शकू यथादिग्भ्रमसंस्थितौ । ग्रहान्तरेण वि-
क्षिप्तावधोहस्तनिखातगौ ॥ १६ ॥ छायाको ततो द.
दाच्छायाग्राच्छडमूर्धगी । छायाकर्णाग्रसंयोगे संस्थि-
तस्य प्रदर्शयेत् ॥ १७ ॥ त्वशङ्खमूर्धगौ व्योम्नि ग्रहो दुक-
तुल्यतामितौ। उल्लेखं तारकास्पेर्गादेदे भेद प्रकीर्त्यते
युटुमशुविमर्दास्यमंशुयोगे परस्परम् ॥ १॥ अंधादू-
नेऽपसव्याख्यं युद्धमेकोऽन्न चेद्वगुणः । समागमोऽशाद-
धिके मवतवेदलान्वितौ ॥ १६ ॥
सूर्यसिद्धान्त भाषानुवाद भाषानुयाद-छाया देने के लिये बराबर कियी हुई भूमि में शकु स्था पन करके यह के दूसरी दिशा में दूग्ज्या से छायान दिसताये। छायान में दर्पण ( आइना ) रखने से दर्पणान्तर स्थित यह और शकु के आगे सम सूत्र में दिखाई देगा ॥ १५॥ पांच २ हाथ की लम्यो ( २४ अङ्गुल का एक हाथ) दो शङ्ख (काष्ठ का सकोमल बनाया हुआ दण्ड) की युति फाल में दोनों यह अपने सस्थान से जिधर को हों उसी और दक्षिण और उत्तर रेखा के यीच एक अङ्गुल अन्तर में भूमि में एक हाप गहरा करके गाढ़ देवे । जिस से दोनों शकु चार हाथ ऊपर को सही रहें। छायान से शङ्कु के अध्याय तक दो लाया निर्णय फरे । छाया और फर्णाय रेखा में स्थित मनुष्य को यह दिसलावे, वह भी शंकु के आगे ग्रह को देखेगा ॥ १६ ॥ १७ ॥ भीमादि (मङ्गल घुध, रहस्पति, शुक्र, शनैश्चर ) पांच ग्रहों के परस्पर योग में ग्रहस्पर्श से विम्यनेमि स्पर्शमात्र का नाम "उल्लेख" युद्ध है। दोनों ग्रहों के मान के एक सबह के नुल्य दक्षिण और उत्तर में मण्डल भेद होने से “भेद नामक युद्ध होता है । परस्पर दोनों की किरणें यदि मिलजायें तो अंगुयिमई मामक युद्ध होता है। दोनों के दक्षिण उत्तर अंश से ६० कलात्मक से एक अंश भी न्यून पार्थक्य होने पर * अपसव्य " नामक युद्ध होता है। इस अपसव्य युद्ध में दोनों ताराओं में से यदि एक तारा छोटी है तो प्रकाशयुद्ध होता है और दोनों यदि समान हों तो अमफाश युद्ध होता है। दक्षिण और उत्तर अन्तर में ६० भाग में से एक भाग अधिक होने पर होता है, परन्तु यदि दोनों ग्रह बलयान ( स्थूल मण्डल तथा स्थूल बिम्ब वाले) हों तो समागम प्रकाश होगा और यदि ऐसा न हो तो समागम अप्रफाश होगा। १ । १८॥ अपसव्ये जितो युद्धे पिहितोऽणुरदीप्तिमान् । रुक्षोवि- वो विध्वस्तो विजितो दक्षिणाश्रितः ॥२॥ उद- यस्थोदीप्तिमान्स्थूलो जयोयाम्येऽपि योयली ॥२१॥ आ- सन्नावप्युभौ दीप्ती भवतश्चेत्समागमः । स्वल्पौ द्वा- घपि विध्वस्तो भवेतां कूटविग्रहौ ॥२२॥ उदक्स्थो दक्षि- णस्यो वा भार्गवः प्रायशोजयी । शशाड्डेनवमेतेपां . समागम .
समाध्याय
कुर्यात्संयोगसाधनम् ॥ २३ ॥ भावाभावाय लोकानां
कल्पनेयं प्रदर्शिता। स्वमार्गगाः प्रयान्त्येते दूरमन्यो-
न्यमाविताः ॥ २४ ॥
इति सप्तमोध्यायः ॥ ७ ॥
सापानुवाद-दोनों ग्रहों में से एक दूसरे से विध्वस्त होजावे उस को
पराजित जानना । अपसव्य युद्ध में पोड़ी प्रभावाला ढका हुवा छोटे बिम्ब
धाला ग्रह पराजित होता है । यह ग्रह रूखा,विवर्ण,प्रभारहित और दक्षिणस्थ
होता है ॥ २२ ॥ अन्य ग्रह की अपेक्षा उत्तर दिकस्य ग्रह प्रकाशयुक्त स्थूल-
बिम्ब और जयी होता है। दक्षिण दिशा मे बलवान् होने पर ग्रह गयी
होता है ॥२१॥ दोनों ग्रह दीप्तिमान होकर निकट एक भाग में आजायं ती
"समागम युद्ध होता है । जो दोनों ही थोड़ी दीप्ति वाले और विध्यस्त-
बिस्य हों तो "फूटधिग्रह" ( फूट और विग्रह) नामफ युद्ध होता है ॥ २२ ॥
उत्तर दिशा मे या दक्षिण दिशा में हो, शुक्र प्रायः इतर यहों की अपेक्षा दोनों
ही दिशाओं में जयी होता है । मङ्गलादि पांच ग्रहों का चन्द्रमा के साथ
संयोग काल पूर्वोत रीति से साधन करे ॥ २३ ॥ ग्रहण परस्पर 'दूरस्थित
अपनी २ कक्षा में चलते हैं। वे कमी २ इकडे चलते दीखपड़ते हैं। इस
फारण मनुष्यों के ज्ञान के लिये उन ग्रहो के युतिविषयक नियन दिखलाये
गये ॥२४॥
इति भाषानुवादे सप्तमोध्यायः ॥ ७ ॥
च भो३म् अथाष्टमोऽध्यायः प्रोच्यन्ते लिप्तिकाभानां स्वभोगोथ दशाहतः । भवन्त्य- तीतधिष्ण्यानां भोगलिप्तियुता ध्रुवाः ॥ १॥ अष्टार्णवाः शून्यकृताः पञ्चपष्टिर्नगेपवः । आष्टा अब्धयोऽष्टागा अङ्गागा मनवस्तथा ॥२॥ कृतेपवो युगरसाः शून्यवाणा वियदसाः । सवेदाः सागरनगागजागाः सागरर्तवः ॥३॥ मनवोऽध रसा वेदा वैश्वमाप्याभोगगम्।आप्यस्यैवा- भिजित्प्रान्ते वैश्वान्ते श्रवणस्थितिः ॥४॥ त्रिचतुःपादयोः संघौ नविष्ठा श्रवणस्य तुस्विभोगतो वियनागाः प- तिर्यमलाश्विनः॥शारन्ध्रादयःक्रमादेपांविक्षेपास्यास्पद- क्रमात् । दिङ्मासविषयाः सौम्ये याम्ये पञ्च दिशोनय ॥३॥ सौम्ये रसाःखं याम्ये गाः सौम्ये खास्त्रियोदश । दक्षिणे रुद्रयमलाः सप्तत्रिंशदथोत्तरे॥७॥ याम्येऽध्य- र्धत्रिककृता नवसार्धशरेपवः। उत्तरस्यां तथा पष्टिस्त्रिं- शत्पत्रिंशदेव हि ॥८॥ दक्षिणेत्वर्धभागस्तु चतुर्विंश- तिरुत्तरे । भागापडूविंशतिः खंच दत्रादीनां यथाक्र- मम् ॥६॥ भाषानुवाद-उत्तरापाढा, अभिजित, अयण और धनिष्ठा,इन चार नक्ष. त्रों को छोड़ कर अन्यान्य नक्षत्रों की कठा संख्या कही जाती है। प्रत्येक नक्षत्र के घश्यमाण भोगाङ्क को १० से गुणा कर, गुणनफल में अश्विन्यादि गत नक्षत्रों की भोग कला की समष्टिसंख्या को जोड़े अर्थात् प्रतिनक्षत्र भोग ८०० कला के अनुसार अनीट नक्षत्र (जिस नक्षत्र का ध्रुव जानता हो)प. चन्त जितने नक्षत्र हों उन की समष्टि (योग) जोड़े, पुनः जोहने से जो योग फल हो वही नक्षत्रों का अपमा २६व (द्रापिमा) होगा ॥१॥ भाषानु०-२- झोकतक अपं निलिखित पकद्वारा लिखागया है:- ।
८२ सूपं महान्त भाषानुवाद ध्रुव विक्षेप अनुक्रम संख्या स्वभोग नक्षत्रों का नाम क्ला अश अंश दिशा Btrfar ३६ ० २३ धनिष्ठा २० उत्तर श्रवणा के तृतीय एवं चतुधं पादकी सन्धिमें। २४ शतभिषक् १०० २५ पूर्वाभाद्रपदा ०२६/० २६ उत्तराभाद्रपदा २२ २७ रेवती 8 १९२० ५० ठीक क्रान्ति यत्त रेखा पर है यि० शून्य। नक्षत्र योग तारा फा कदम्याभिनुस भोग | नक्षत्र योग तारा का कदम्याभिमुख शर भोग शर शरदिशा . गक्ष hि अश्विनी २ भरणी कृत्तिका ४ रोहिणी ५ । मृगशीर्ष ६ अरी ७ | पुनर्वसु पुष्य आश्लेषा १९५° उत्तर રરૂષ ३ ४४४ ४६ दक्षिण | ४ ६१/३ | दक्षिण | <be ६५५० / दक्षिण / ८३ ६० उत्तर १०९५८) दक्षिण १२९० ११ उत्सर १५०१०| उत्तर १७४२२ | दक्षिण १०६ दक्षिण | १२ C . . • ११ / पूर्याफल्गुनी १२ | उत्तराफरगुमी १३ चित्रा १५ स्वाति विशाला ११ | अमुराधा (२१३३१ । दक्षिण २४४४ | दक्षिण २२ अष्टमारध्याय शर अनकम मेच्या मक्षत्र असा कला १८ ज्येष्ठा . . भोग शरदिशा 'S १०) दक्षिण |३/ ४-३२दक्षिण 1010 २० (पूर्णपाडा ५३) दक्षिण |५/२८ २१ उत्तराषाढ़ा २६०/२३ / दक्षिण | अभिजित २६० सागर ५५८ २२ श्रवण २२ र ५४ २३ धनिष्ठा और ३५ ३७ शतभिपक ३१०/५०/ दक्षिण .२८ २५ । पूर्वाभाद्रपदा ३३६/२५ उत्तर (२२३०१ २६ उत्तराभाद्रपदा ३५११६ तर २४ २७ रेवती ३५५२ | दक्षिण अशीतिभागैर्याम्यायामगस्त्योमिथुनान्तगः । विशे च मिथुनस्यांशे मृगव्याधी व्यवस्थितः ॥ १०॥ विक्षेपो- दक्षिण भागःखार्णवैःस्वादपक्रपात् । हुतभब्रह्महृदयौ वृपे द्वाविंशभागगी ॥ ११ ॥ अष्टाभिस्त्रिंशता चैव वि- क्षिप्तावुत्तरेण तौ ।गोलंबध्वा परीक्षेत विक्षेपंध्रुवसं- स्फुटम् ॥ १२ ॥ वृपे सप्तदशे भागे यस्य याम्योऽशक- द्वयात् । विक्षेपोऽभ्यधिकोजिन्दवाद्रोहिण्याः शकटं तु सः ॥ १३ ॥ ग्रहवदानिशेभानां कुर्यादट्टकर्म पूर्ववत् । ग्रहमेलकवच्छेपं ग्रहभुक्तचा दिनानि च ॥ १४ ॥ भापा-सोक १० । ११ सफ फा- ध्रुय दिशा राशि अंश कला राशि अंश कला १ अगस्त्य दक्षिण २१मृगव्याध दक्षिण विक्षेप . to २ . . ३ अग्नि .
- सर्पमिद्वान्त भाषानुवाद पक्ष्यमाण गोठ घांस आदि की शलाफा से बाध कर अर्थात् एक गोल यन्त्र तैयार कर भलीभांति नक्षत्रों के ध्रुघ तथा विक्षेप की परीक्षा करने से भव विषय स्पष्टतया ज्ञात हो जावेगा ॥ १२ ॥ रोहिणी नक्षत्र का आकार शकट फी नाई है। जो ग्रह वृष राशि के १७ अंश में अवस्थित, एवं जिस का दक्षिण विक्षेप २ अश से अधिक होगा, यह ग्रह रोहिणी के शक्टाकार संनिवेश में प्रवेश करेगा, अर्थात् शकटारुति को फाट देगा । भेदक ग्रह का विक्षेप रोहिणी के विक्षेप से न्यून होना चाहिये, क्योकि दक्षिण विक्षेप रो. हिणी के विक्षेप से अधिक होने से शटभेद नहीं होगा। यह रा०२ । अंक १० वि० द० वेध द्वारा देख कर सिद्ध किया है ॥१३॥ नक्षत्र के साथ ग्रह योग जागने के लिये अध्याय १।२ लिखित नियमानुसार नाक्षत्रिक अहोरात्र का परिमाण ठीफ कर नक्षत्र की द्राधिमा में आक्ष दृकर्म (सस्मार) करे, तदन्तर पहिले जो ग्रहो के विषय में जिस प्रकार कहा गया है, उसी प्रकार यहां भी करना चाहिये । अनन्तर अभीष्ट फाल मे ग्रहों की दैनिक भुक्ति (गति ) से पूर्व रीत्यनुसार "गत" और "गम्य दिन निश्चय करे ॥ १४ ॥ एप्यो हीने ग्रह योगो ध्रुवकादधिके गतः । विर्प- र्ययाद्वक्रगते ग्रहे ज्ञेयः समागमः ॥ १५ ॥ फल्गुन्योर्भाद्र- पदयोस्तथैवापाढयोर्द्वयोः । विशाखाश्विनिसौम्यानां भोगतारोत्तरा स्मृता ॥ १६॥ पश्चिमोत्तरताराया द्वितीया पश्निमे स्थिता । हस्तस्य योगतारा सा प्रविष्ठायाश्व पश्रिमा ॥ १७ ॥ ज्येष्ठाश्रवणमैत्राणां वार्हस्पत्यस्य म- ध्यमा।भरण्याग्नेयपित्र्याणां रेवत्याश्चैव दक्षिणा ॥१८॥ रोहिण्यादित्यमूलानां प्राची सार्पस्य चैव हि । यथा प्रत्यव शेपाणां स्थूला स्यादोगतारका ॥ १९ ॥ भापार्थ-आक्षदृफर्म सस्कृत नक्षत्र ध्रुष से आयनदृकर्मसंस्कृत ग्रह का ध्रुव न्यून होने मे नक्षत्र और ग्रह का योग अभीष्ट कार से पीछे होगा और अधिक हो तो नक्षत्रयोग गत (होगपा) जानना । परन्तु पक्रगति यह का उत नियम से विपरीत होता है, अर्थात् यह का धुव न्यून हो तो नक्षत्रयोग - ओ३म् अथ नवमोध्यायः अथोदयास्तमययोः परिज्ञानं प्रकीर्त्यते। दिवाकरकरा- कान्तमूर्तीनामल्पतेजसाम् ॥ १ ॥ सूर्यादभ्यधिकाः पवादस्तं जीवकुजार्कजाः। ऊना: प्रागुदयं यान्ति शु- क्रज्ञौ वक्रिणी तथा ॥ २॥ ऊना विवस्वतः प्राच्यामस्तं चन्द्रज्ञभार्गवाः ।व्रजन्त्यभ्यधिकाः पश्चादुदयंशीघ्रया- यिनः ॥३॥ सूर्यास्तकालिकौ पश्चात् प्राच्यामुदय- कालिको। दिवा चार्कग्रहौ कुर्याद दृकर्माथ ग्रहस्य तु ॥४॥ ततोलग्नान्तरमाणाः कालांशाः पष्टिभाजिताः । प्रतीच्यां पड्भयुतयोरतवल्लग्नान्तरासवः ॥ ५॥ भापानुवाद-भय उदय (थोड़े तेजवाले ग्रह,उपग्रह नक्षत्रादिक सूर्य से अलग होने पर जितने समय में पहिली घार दीखप ) और अस्त ( सूर्य से 'दूर होने पर जितने फाठ में जो ग्रह पहिली बार दीपड़े) फा परिज्ञाम (सूक्ष्म रोति से) कहा जाता है । पहिले कहा जा चुका है कि जितने सस्थ पदार्थ अर्थात् ग्रह, उपग्रह, दिफ हैं प्रायः सूर्य के किरणों से प्रकाशित होते हैं। उन में बहुतसे पाहे तेजपाले और कतिपय एफ की अपेक्षा अधिक तेज घाले हैं। यहां चन्द्रमा, मङ्गल, बुध, पृहस्पति, शुक्र, शनि और नक्षत्रों का उदयास्त कहा जावेगा ॥१॥ सूर्य स्पष्ट की राश्यादि से ( राशि, अंश, क- लादि ) रहस्पति, मङ्गल, शनि ए८ पकी धुध और शुक्र इन पांच ग्रहो की स्पष्ट राश्यादि अधिफ होने से इन फा अस्त पश्चिम दिशा में होता है। और सूर्य स्पष्ट की राश्यादि से जाम पांघों ग्रहों फी स्पष्ट राश्यादि न्यून होने से इन का उदय पूर्व दिशा में होता है ॥ २ ॥ शीघ्र घलने वाले चन्द्र, बुध और शुक्र को स्पष्ट राश्पादि सूर्य की रपए राश्पादि से न्यून होने से, इन का अस्त पूर्वदिशा में होता है और शत ग्रहों की स्पष्ट राभ्यादि सूर्य की स्पर नवमाध्याय ८५ - . राश्यादि से अधिक होने से इन का उदय पशिम दिशा में होता है ॥३॥ यदि पश्चिम दिशा में ग्रहों का अस्तोदय ज्ञान करना हो तो अभीष्ट दिन थे सूर्य और ग्रह का अस्तकालिक अर्थात् उस समय सूर्य तथा ग्रह किस राशि, अश कलादि फो भोग करते है, गणित द्वारा निश्चय करे । एवं यदि पूर्व दिशा में ग्रहो का अस्तोदय शान करना हो तो उसी प्रकार सूर्य तथा ग्रह को अभीष्ट दिन के उदयकालिक करके पीछे आक्षक कर्म करे ।। ४ । तब पूर्व कपाल में भूप और दृग् ग्रह ( वेध से देखा हुआ ग्रह) के स्फुट से घटाने पर जो लग्ग प्राण हो उस को ६० से भागदेवे, भागफल कालांश होगे और पश्चिम फपास में ६ राशि जा कर मूर्य और गग्रह के स्पष्ट लग्नान्तर प्राण स्थिर करे ॥५॥ एकादशामरेज्यस्य तिथिसंख्यार्कजस्य च। अस्तांशा- भूमिपुत्रस्य दशसप्ताधिकरततः ॥ ६ ॥ पश्चादत्तम- योष्टाभिरुदयः प्राइमहत्तया।प्रागस्तमुदयः पश्चादल्प- त्वाद्दशभिर्भूगोः ॥ ७ ॥ एवं बुधो द्वादशभिश्चतुर्दशमि- रंशकः । वक्रोशीघ्रगतिश्चार्काकरोत्यस्तमयोदयौ ॥८॥ एभ्योऽधिकैःकालभागैदृश्यान्यूनरदर्शनाः भवन्ति लोके खचरा भानुभाग्रस्तमूर्तयः ॥६॥ तत्कालांशान्तरकला भुक्त्यन्तरविभाजिताः। दिनादि तत्फलं लब्धं भुक्तियो- गेन वक्रिणः ॥ १०॥ यामुबाद-मूर्य के स्पष्ट राश्यादि से गृहस्पति का स्फुट १ अश से अधिक या न्यून होने से उन दिशा मे ( देसो श्लोक ३) सहस्पति का अस्त पा उदय निधय करना चाहिये । १५ अंश अधिक या न्यून होने मे शनि फा, एय १७ अंश अधिक वा न्यून होने से उक अस्तोदय के निरूपित दिशा मे मगल का अस्त वा उदय होगा । सूर्य के स्पष्ट से चन्द्रमा कास्पष्ट १२ अश अधिक होने से पश्चिमदिशा में चन्द्रमा दिसखाई देगा । सूर्य के स्पष्ट से हर अंश न्यून होने से पन्द्रमा पूर्वदिशा में असमित होगा ( नहीं दीखेगा) । पदि यकी शुक्र फा स्पष्ट सूर्य के स्पष्ट से ८ अंश अशिकहो तो गुरु पक्षिम मूर्यमिद्धान्त भाषानुवाद दिशा में अस्तमित, ६ एवं ८ अंश न्यून होने से पूर्व दिशा में उदित होगा और वक्रतारहित शुक्र जय शीघ्रगामी होगा तब यदि मूर्य के स्पष्ट से शुक्र का स्पष्ट १० अंश न्यून हो तो पूर्वदिशा में अस्तमित होगा, एवं १० अश अधिक होने में उल शुक्र पश्चिम दिशा में उदित होगा। इसी प्रकार यदि यक्री बुध का समुद्र सूर्य के स्पाट से १२ अंश अधिक हो तो पश्चिम दिशा में अस्त, एवं १२ अंश न्यून होन से पूर्वदिशा में उदित होगा । वक्रगति रहित युध फा स्फुट राश्यादि सूर्य के स्फुट राश्यादि से १४ अंश न्यून होने से पूर्व दिशा में बुध का अस्त, एवं १४ अंश अधिक होने से पश्चिम दिशा में बुध का उदय होगा।६।७।८॥ पूर्वोक्त (६ । । ८ श्लोकोत) कालांश से अधिक होने पर इष्टकाल में ग्रह दृश्य होते हैं । एवं न्यून ह'ने से सूर्य के . मिकट होने के कारण सूर्य की प्रसर किरणों से ग्रहों के विम्ब घिर कर लोगों फा नहीं दीयते ॥ ८ ॥ ग्रहों के पूर्वोक्त अपने २ कालांश से इष्टकालांश घer. फर फला धनावे पुनः उस को सूर्य और ग्रह की दैनिकभुति की जो घटाई हुई कला उम से भाग दे. भागफल दिनादि होगा, परन्तु पक्रो ग्रह की मुक्ति जोह कर भागदेने से भागफल दिनादि होगा ॥१०॥ विवरण-मूल सू० सि० के अनुमार चन्द्रमा १२ अंश, भङ्गल १७ अंश, बुध १३ अंश, एहस्पति १९ अंश शुक्र र अंश और शनि १५ अंश में । आर्यभट्ट ने भी ऐसा ही लिया है । एवं आधुनिक पाश्चात्य पण्डितों ने भी ऐसा ही अनुभय किया है । केयल शुक्र का अंग्रेजों ने ८ अंग लिसा है घाफी सब एक मे हैं । श्लोक ६-८॥ तल्लग्नासुहते झुत्तीअष्टादशशतोदधते । स्यातां कालग- ती ताभ्यां दिनादिगतगम्ययोः॥ ११ ॥ स्वात्यगस्त्यमृग- व्याधचित्राज्येष्ठाःपुनर्वसुः । अभिजिदंब्रह्महृदयं त्रयो; दशभिरंशकैः ॥ १२ ॥ हस्तश्श्रवणफल्गुन्य: नविष्ठा- रोहिणीमघाः । चतुर्दशांशकैदृश्याविशाखाग्विनिदेव- तम् ॥ १३ ॥ कृत्तिकामैत्रमूलानि सार्प रौद्रर्तमेव च । दृश्यन्ते पञ्चदशभिरापाढाद्वितयं तथा ॥ १४ ॥ भरणी तिप्यसौम्यानिसौक्ष्म्यात्रिःसप्तकांशकैः। शेपाणि सप्त- - ।
नवमाध्याय . दशभिर्दृश्यादृश्यानि भानि तु ॥ १५ ॥ भापानुवाद-सूर्य और ग्रहमुक्ति को उस लग्न प्राण से गुणन कर गुणन फल में १८०० का भाग देवे भागफल सूर्य और ग्रह के कालांश के तुल्य फाल गति होगी, उन दोनों गतियों से गत और गम्यादि पूर्वप्रक्रियानुसार निश्चय फरे॥११॥ स्वाति, अगस्त्य, मृगव्याध, चित्रा, ज्येष्ठा, पुनर्वसु, अभिजित ब्रम- हदय, धन नक्षत्रों का कालांश १३ अंश है अर्थात ये नक्षत्र १३ अंश में दृश्य होते हैं। इस से न्यून होने से अदृश्य होते हैं ॥१२॥ हस्त, श्रवण, उत्तराफल्गुनी, पूर्यापाल्गुनी, धनिष्ठा,रोहिणी,नघा, विशाखा, पश्विनी, इन फा फालांश अंश है अर्थात् ये नक्षत्र १४ अंश में दीस पड़ते हैं इस से न्यन होने से अदृश्य होते हैं॥१३॥कृत्तिका,अनुराधा,मल, आश्लेपा,आर्द्रा, पूर्वापाढाऔर उत्तरापाढा इन के १५ कालांश में अर्थात् ये नक्षत्र १५ अंश में दृश्य होते हैं इस से न्यून होने से अदृश्य होजाते हैं ॥ १४ ॥ भरणी, पुप्य और मृगशिरा ये अत्यन्त छोटे हैं अर्थात् इन के बिम्ब यहुत छोटे हैं इस कारण २१ अंश दीस पड़ते हैं न्यून होने से अदृश्य होते हैं और शेष नक्षत्र शतभिष, पूर्वा भाद्रपदा, उत्तरा भाद. पदा, रेवती, अग्नि,प्रजापति,अपांवत्स और आप,इन का कालांश १७ अंश है,ये नक्षन्न १७ अंश दौरा पड़ते हैं, इस से न्यून होने से अदृश्य होते हैं ॥ ९५ ।। अष्टादशशताभ्यस्ता दृश्यांशाः स्वोदयासुभिः । विभज्य लब्धाः क्षेत्रांशास्तैश्यादृश्यताथवा ॥१६॥ मागेपामु- दयः पश्चादस्तो दृक्कर्म पूर्ववत् । गतप्यदिवसमाप्ति- र्भानुभुक्त्या सदैव हि ॥१॥ अभिजिब्रह्महृदयं स्वाति- वैष्णववासवाः ॥ अहिर्बुध्न्यमुदस्थत्वान्न लुप्यन्तेऽर्क- रश्मिभिः ॥ १८ ॥ इति नवमोऽध्यायः ॥ ६॥ सापानुबाद-कालांश को १८०० मे गुणन कर गुणनफल को लग्न प्राण 4 १२
सूर्यसिद्धान्त भाषानुवाद
से भाग ट्रेवे, भागफल क्रान्तियत्तस्य अंश होगा अर्थात् उसी अंश से दृश्य
और अदृश्य होता है ॥ १६ ॥ इन नक्षत्रो का उदय पूर्व दिशा में एघ अन
पश्चिम दिशा में होता है। और इन फा आतट्टक् कर्म पूर्ववत् करना चा-
हिये एष सर्वदा सूर्य की गति से ( १० श्लोकोस नियम ) दिन आदि मिर्षय
करे ॥१७अभिजित, ब्रह्महदय, स्वाति, अयण, धनिष्ठा, उत्तराभाद्रपदा, हम
नक्षत्रों का उत्तर विक्षेप अधिक होता है इस कारण गूर्य की किरणों से कभी
शुप्त नहीं होते अर्थात् इन का कमी अस्त नही होता ॥१॥
इति भापानुवादे नवमोऽध्यायः ॥ ६॥
مشهد ओ३म् अथ दशमोध्यायः उदयास्तविधिः प्राग्वत् कर्तव्यः शीतगोरपि ।भागा- दशभिः पश्चादृश्यः प्राग्यात्यदृश्यताम् ॥१॥ रवीन्द्रोः पड्भयुतयोःप्राग्वल्लग्नान्तरासवः । एकराशौ रवीन्द्रो- श्व कार्या विवरलिप्तिकाः ॥ २॥ तन्नाडिकाहते भुक्ती रवीन्द्वोःपष्टिभाजिते । तत्फलान्वितयोर्भूयः कर्तव्या विवरासवः॥३॥ एवं यावस्थिरीभूता रवीन्द्वोरन्तरास- वः । तैः प्राणैरस्तमेतीन्दुः शुक्नेऽस्तिमयात्परम् ॥ ४ ॥ भगणाई रवेर्दत्त्वा कार्यास्तद्विवरासवः । तैः प्राणः कृ- ग्णपक्षे तु शीतांशुरुदयं व्रजेत् ॥ ५ ॥ झापानुवाद-पूर्वोक प्रकार से (पूर्वाधिकारोक) यन्द्रमा का भी उदयास्त शाधन करे। १२ अंश दूर होने पर घन्ट्रमा पश्चिम दिशा में दिखाई देता और पूर्व दिशा में १२ अंश दूर होने पर अदृश्य होता है ॥१॥ शुक्लपक्ष के समीट दिन के सापाल में सूर्य और चन्द्रमा का आपन दृष्कर्म और आतदृकर्म करे, पुनः हकर्म संस्कृतसूर्य और चन्द्रमामें छःराशियोग फरे। पूर्योक रीति मे(मोन्ड) उग्नरन्तर प्राणनिश्चय करे और ः राशि मिलाने पर यदि सूर्य और च. न्द्रमा एक राशि में हों तो.छः राशियुक्त मूर्य और चन्द्रमा की अन्तर कला करे । एवं माण और कला की पटिफा से प्राण को ३६० से भाग देवे, भाग- फड घटिका कला उदय प्राण से गुणन कर गुणनफल माप में पुनः एकराशि की कला से आग देने पर माण हो उस को ५६ हे भाग देवेशागल घटिका होगी। उस से सूर्य और चन्द्रमा की दैनिकमालक गति से गुशन कर गुणन फल में ६० का भाग.देवे गफल को भामेर स राशियुक्त सूर्य और चन्द्र- भा में जोड़कर पुनः पूर्ववत् अन्तर मार एवं उस घटिका से सूर्यास्त कालिस राशिल संस्कत सूर्य और चन्द्रमा को पार लवक.अन्तर मूर्यसिद्धान्त भाषानुवाद माण स्थिर न हो इसी प्रकार फरता जावे । सूर्यास्त के पीछे उक्त प्राणमस्या काल के वीतने पर चन्द्रमा फा अस्त होगा ॥२॥३४॥ कृष्णपक्ष में सूर्य स्पष्ट में छ राशि मिलाकर चन्द्रमा मे अन्तर प्राण का निश्चय करे उन्ही माण सख्याकाल के पीछे कृष्णपक्ष में चन्द्रोदय का फाल है ॥५॥ अर्कन्धोः क्रान्तिविश्लेपोदिक्साम्ये युतिरन्यथा । त- ज्ज्येन्दुरादाबासी विज्ञेया दक्षिणोत्तरा॥६॥ मध्या- हेन्दुप्रभाकर्ण सद्गुणा यदि सोत्तरा । तदानाक्षजीवायं शोध्या योज्या च दक्षिणा ॥ ७ ॥शेपं लम्बज्यया भक्तं लब्धो याहुः स्वदिड्मुखः । कोटिशहुस्तयोर्वर्गयुतेर्मूलं श्रुतिर्भवेत् ॥८॥ सूर्योनशीतगोर्लिप्ताः शुल्क नवशतो- धृताः। चन्द्रयिम्बाङलाभ्यस्तहृतंद्वादशभिः स्फुटम्॥॥ भाषानुवाद-यदि सूर्य और चन्द्रमा की झान्तिन्या एफ दिशा में हो तो इन फा मन्तर फरे (घदाकर) और यदि दोनो भिन्न दिशा में हो तो योग करे । सूर्य से चन्द्रमा की संस्थिति ( रहना ) दक्षिण या उत्तर हों उसी के अनुसार कान्तिज्या भी (दक्षिणा या उत्तरा) होगी॥ ६ ॥ उस काल की स्व. मध्य रेखागत चन्द्रमा की छाया कर्ण को ऊपर कहे हुवे फल से गुणन करे गुणनफल यदि दक्षिणा होतो १२ रो गुणन फियी हुई अक्षज्या में योग, यदि गुगनपाल उत्तरा हो तो वियोग करना चाहिये ॥७॥ यह शेष लम्ध लन्ध- ज्या मे भाग करे, भागफल स्वदिक् सूचक बाहु होगा । चन्द्रमा के शङ्कु फो ( १२ अङ्गुल की कोदि ) कोटि जानकर भुज और कोटि के वर्ग का योग करे, वर्गकल मूल निकालने से कर्ण होगा। चन्द्रमा से सूर्यघटाकर कला फरे, इस कला में ८० फा भाग देवे,सागफल शुल्काशहोगा। चन्द्रमा के वि. म्बागुल से ( चन्द्रग्रहणाधिकारो रीति से ) गुणा करे, गुणनफल'को भाग देवे, भागफल स्फुट गुल्फ होगा ॥६॥ दत्त्वार्कसज्ञितं विन्दु ततो बाहुं स्वादिड्मुखम् । ततः “पश्चान्मुसी कोटिं कर्ण कोटाग्रमध्यगम्॥ १० ॥ कोटि- - दशगाध्याय कर्णयुताद्विन्दोर्बिम्बं तात्कालिकं लिखेत् । कर्णसूत्रेण दिसिद्धि प्रथमपरिकल्पयेत् ॥ ११ ॥ शुल्क कर्णेन त- द्विम्बयोगादन्तर्मुखं नयेत् । शुल्काग्रयाम्योत्तरयो- मध्ये मत्स्यौ प्रसाधयेत् ॥ १२ ॥ तन्मध्यसूत्रसंयोगा- द्विन्दुनिस्एग्लिखेद्धनुः। प्राविम्यागेवस्यात्तादृक्तत्र दिने शशी ॥ १३॥ कोट्या दिसाधनात् तिर्यक्सूत्रान्ते ङ्गमुन्नतम् । दर्शयेदुन्नतां कोटिं कृत्वा चन्द्रस्य साकृ- तिः ॥११॥ कृष्णे पड्भयुतं सूर्य विशोध्येन्दोस्तथा सि- तम् । दनाद्वामं भुजं तत्र पश्चिम मण्डलं विधोः ॥१॥ इति दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ भापानुवाद-वरायर की हुई भूमि में ( अभीष्ट स्थान में ) दिक्साधन फरफ पूर्वपश्चिम रेषा और दक्षिण उत्तर रेखा सेचे । उक संघे हुए रेखास्थान में असंज्ञक बिन्दु (चिन्ह । लिसे! उस विन्दु से अपनी दिशा के अनुसार (दक्षिण या उत्तर ) भुज अङ्गुल गिनफर ( पूर्वसाधित ) उत्त के अनुसार रेखा सेंचे। उस भुज रेसा के अग्रभाग से पश्चिममुखगामी कोटि (१२ अ- गुरु) के परिमाण से रेसा सेंचे । कोटि के आगे से मध्यविन्दु तफ की रेखा ही फर्ण होगी। कोटि और कर्ण रेखा के संयोगस्थान में मध्यविन्दु लिसफर तात्कालिक साधित चन्द्रमण्डल रोचे । इस विम्यगरहल में पहिले फर्ण रेखा द्वारा दिपिसद्धि ( साधन ) दिरालाघे । चन्द्रमपहर में जहां फर्ण रेखा लगी है वही चन्द्रकृत में पूर्वदिशा, फर्णरेखा को अपने मार्ग से चन्द्रपुत्त परिधि में आगे निकाल कर जहांपर फर्ण रेखा परभाग में लगी है यही पश्चिम दिशा, उन दोनों मत्स्पद्वारा चन्द्रयात में जहां दक्षिण उत्तर रेसा उगी है घही दक्षिण उतर दिशा हैं। शुल्क (पूर्य सापित) को कर्ण मार्ग द्वारा फर्ण रेखा और चन्द्रमण्डल की परिधि के संयोग स्थान से धृत्त के केन्द्र की और रेखा संचे । चन्द्रपत्त के भीतर कर्ण रेण पर पदिम से शुल्क गिन कर चिन्ह करें और इन्द्रपसमें जहां शस्कान का चिन्ह है औरचन्द्र জী অতি
मूम्बसिहान्त भाषानुवाद
छुप्त परिधि में जहां दक्षिण उत्तर का चिन्ह है इन दोनों के बीच से दो
मछली को भारुतिफोरेसायनावे । शुल्कान और दक्षिण चिन्हद्वारा एक मछ-
ली.एवं शुल्कान और उत्तर चिन्हद्वारा दूसरी मछली बनाये । इन दोनों म.
छलियों के मुख और पूंछ से निकली हुई रेखा के संयोग (चन्द्रमसालो
भीतर या बाहर के शुल्काग्र पश्चिम होतो पूर्व में "संयोग औरशुल्काम पूर्व
में हो तो पश्चिम में "संयोग मे अपने २ मार्ग से फैली हुई रेखा के सम्पात
स्थान से ) स्थान को केन्द्र करके त्रिविन्दुस्पक् (शुल्काम विन्दु, दक्षिण
विन्दु उत्तर विन्दु, इन तीन विन्दु को छूता हुआ) धनु रेखा बँचे । पूर्वकाल
में लिखित चन्द्रबिम्ब जिस प्रकार होगा एवं लिखित धनु द्वारा जैसा पश्चिम
काल में होगा उसी प्रकार उस दिन ( शृङ्गोमति के गणित के लिये अभीष्ट
दिन सध्यासमय ) भी चन्द्रमा आकाश में दिखाई देगा ॥१०॥ १९ । १२ ।
१३ ॥ कोटि रेखा द्वारा धन्द्ररत्त में कर्ण रेणा के समान दिवसाधन से परि.
लेस में शुल्क धनु के कोटि अग्रभागामफ अषा देख कर दक्षिण उत्तर रेखा
के अन्त में उपन्टङ्ग दिखलावे, वही आरुति ( परिलेस सिद्ध) आकाशस्थ
चन्द्रमा का आकार होगी ॥१५॥ कृष्णपक्ष में चन्द्रमा के स्पष्ट से छः राशि
यह सूर्य पटावे और शुल्क फो नाई (पूर्वोकप्रकार) असित (कालापन) नि-
र्णय करे और कृष्ण परिलेस में पूर्वोक भुज को विपरीत दिखलाये अर्थात्
सूर्य चिन्ह से उत्तरभुज को दक्षिण से दिखलाये एष सूर्यचिन्ह से दक्षिणभुज
को उत्तर से दिसलाधे और चन्द्रमण्डल को पक्षिम भोर असित दिखलाय॥१५॥
इति भापानुवादे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
ओ३म् अथैकादशोऽध्यायः एकायनगतौ स्याता सूर्याचन्द्रमसौ यदा । तदातौ म- ण्डलेक्रान्त्योस्तुल्यत्वे वैधृताभिध: ॥ १ ॥ विपरीता- यनगती चन्द्राको क्रान्तिलिप्तिकाः। समारतद्वा व्यतीपा- तो भगणार्धे तयोर्युतौ ॥२॥ तुल्यांशुजालसंपर्कात्त- योस्तु प्रवहावृतः । तट्टक्क्रोधभवो वहिलीकामावाय जायते ॥३॥ विनाशयति पातोऽस्मिंल्लोकानामसकृयतः। व्यतीपातःप्रसिद्धोऽयं संज्ञाभेदेन वैधृतिः॥४॥ सकृष्णो दारुणवपीहितालोमहोदरः । सर्वानिष्ठकरोरौद्रो भू- योभूयः प्रजायते ॥ ५॥ भापानुवाद-सूर्य और चन्द्रमा जय एक अयन (चाहे दक्षिणायन या उत्त- रायण) में होते हैं और जय दोनो की स्पष्ट राश्यादिक जोहने से १२ राशि के परिमाण की होती हैं, एवं दोनो की क्रान्ति समान होती हैं, तय ". सि मामफ पात होता है॥१॥ परन्तु जय सूर्य और चन्द्रमा भिन्न २ अपन में रहते, एक वन की क्रान्ति फल मान होती हैं और दोनो की स्पष्ट रा- स्मादि जोड़ने से राशि के बराबर हो तो "ध्यतीपात" नामक पात होता है ॥२॥ सूर्य और चन्द्रमा के फिरणो का परस्पर मिलने से दूररूप क्रोध से उत्पन्न अग्नि प्रवाह वायु से प्रज्वलित होता हुआ लोगो को अशुभ फल देने वाला होता है ॥३॥ पूर्वो पात रूप अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति समान होने पर अनेकवार होता है और लोगो का नाश करता है, इस लिये इस को "पतीपात" और "वैधृति कहते हैं ॥४॥ * सूर्य और * शोक ३।४।५ का विशेष विवरण देखो, इसी अध्याय की अन्तिम व्याया।
सूर्यसिद्धान्त भाषानुवाद चन्द्रमा की क्रान्ति समान होने पर जो उक्त दोनों नाम का पात होता है, उस फा यर्ण(रंग)काला,कठिन शरीर,लाल नेत्र, महोदर (यहा पेट) सब लोगों को हानि पहुंचाने वाला, एव नाशकारक वारंवार होता है ॥५॥ भास्करेन्द्रीचक्रान्तश्चक्रावधिसंस्थयोः । दृक्तुल्य- साधितांशादियुक्तयोः रवावपक्रमौ ॥६॥ अथौजपदग- स्येन्दोः कान्तिर्विक्षेपसंस्कृता । यदि स्यादधिकाभानोः क्रान्तः पातोगतस्तदा ॥७॥ ऊना चेत्स्यात्तदाभावी वाम युग्मपदस्य च । पदान्यत्वं विधोः क्रान्तिर्विक्षेपाच्चेद्वि- शुध्यति ॥८॥ क्रान्त्यो] त्रिज्यया भिन्ने परक्रान्तिज्य- योदधृते । तच्चापान्तरमधं वा योज्यंभाविनि शीतगौडा शोध्यं चन्द्रादुगते पाते तत्सूर्यगतिताडितम् । चन्द्रभु- क्या हृतं भानौ लिप्तादि शशिवरफलम् ॥ १० ॥ भापानुवाद-पूर्योक रीति से ( अ० १० श्लोफ १९) दृक्तुल्य साधित अं- शादि युता सस्कृत चन्द्रमा और सूर्य की स्पष्ट राश्यादि को जोड़ने से जय १२ राशिमैं या पशि के निकट हो तो उस समय के सूर्य की क्रान्ति एक चन्द्रमा की विक्षेपसंस्कृत क्रान्ति निक्षय करे ॥६॥ ओजपद (देखें। अ० २ श्लोक ३४) में स्थित चन्द्रमा फी विक्षेप सस्रुत स्पष्ट क्रान्ति सूर्य की क्रान्ति से अधिक हो तो "पात" गत (साधित शान्ति काल से पहिले हो गया) जाने और यदि चन्द्रमा की स्पष्ट कान्ति सूर्य को क्रान्ति से न्यून हो तो"पात भावी (साधित क्रान्ति फाल से पीछे होगा ) जागे और युग्म पदस्थ ( देखो अ० २। सोफ ३४) चन्द्रमा के होने से उक्त रीति से विपरीत होता है, अर्थात् जब "पात" गत फहा गया है, उस समय “पात भावी और जय "पात"भावी कहा गया है, उस समय “पात गत जानना जब चन्द्रमा से विक्षेप कान्ति घटाना होती (चन्द्रमा की स्पष्ट क्रान्ति लाने में) चन्द्रमा अन्य पदस्थ हो जाता है (विषम पदस्य हो युग्म पदस्थ हो जायेगा ) ॥ ॥ ८॥ सूर्य और चन्द्रमा की साधित क्रान्तिज्या फो त्रिज्या से गुणा कर गुणनफल में परम कान्तिज्या का दोनों में भाग दे, भागफल ज्या को अलग २ धनु ममावे। उस धनु का अन्तरवा एकादशाऽध्याय अन्तरार्ध (जन अन्तर थोडा हो तो "अन्तर" और जय अन्तर अधिक हो तो उस का आधा करे) जय पात आधी हो तो चन्द्रमा को राश्यादि में जोड़े और जब पात गत हो तो चन्द्रमा को राश्यादि से घटावे । Tn धाद्रमा के साधन में जो संस्कार किया गया है उस फल को सूर्य को स्पष्ट गति से गुपा कर गुणनफल में चन्द्रमा की स्पष्ट गति से भाग देवे, भागफल चन्द्रमा की नाई कलादि होगा । पुनः इस को (चन्द्रमा में जैसा योग या वियोग किया गया है ) सूर्य में योग या वियोग फरे, फल स्पष्ट सूर्य होगा ।। ८ । १० ॥ तद्वच्छशाङ्कपातस्य फलं देयं विपर्ययात् । कमैतदसत- त्तावदावत्क्रान्ती समे तयोः ॥१९॥ क्रान्त्योः समत्वे पा- तोऽथ प्रक्षिप्तांशोनिते विधौ । हीनेऽर्धरात्रिकादातो भावी तात्कालिकेऽधिके ।। १२॥ स्थिरीकृतार्धरात्रेन्वोर्द्ध- योर्विवरलिप्तिकाः। पष्टिनाश्चन्द्रभुक्तचाप्ताः पातकालस्य नाडिकाः ॥ १३ ॥ रवीन्दुमानयोगार्ध पष्टया सगुण्य भाजयेत्। तयोर्भुक्तयन्तरेणाप्तं स्थित्यर्थ नाडिकादि तत् ॥ १४ ॥पातकालः स्फुटोमध्यः सोऽपिस्थित्यर्धवर्जितः । तस्य सम्भवकालः स्यात्तत्संयुक्तोऽन्त्यसंज्ञितः ॥ १५ ॥ भापानुवाद-चन्द्रमा के फल फलादि को उक्त प्रकार चन्द्रफल को पात की गति से गुणा कर,गुणनफल में चन्द्रमा की स्पष्ट गति से भाग देवे, भागफल को जिस प्रकार घन्ट्रमा में योग या वियोग (पहिले कहा जा चुका है) किया गया है उसके उलटे प्रकार से अर्थात् जहां चन्द्रमा में योग कहा गया है घहां पात में वियोग और जहा चन्द्रमा में घियोग कहा गया है, यहा पात में योग करना ॥ १ ॥ सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति जब समान हो तो स्पष्ट पात होता है। प्रतितांश संस्कृत पाद्रमा मध्यरात्रिक चन्द्रमा से घटाने पर मध्यरात्रि में पात गत और तात्कालिक चाइमा अधिक हो तो पात भायी होता है ॥१२॥ कान्तिसाम्पगत चन्द्रमा और मध्यरात्रिक चन्द्रमा की अन्तर कला को ६० मे गुणा कर गुणनफल में भईरात्रिक चन्द्रना की स्पष्ट कलात्मक गति से नाग देवे, भागफल पात काल के स्पष्ट की अन्तर नाही सूर्यसिद्धान्त सापानुवाद होगी॥ १३ ॥ सूर्य और चन्द्रमा के मान को एकत्र जोडेपुन इस पा आधा करे, इस आधे को ६० से गुणा फर गुणनफल में सूर्य की स्पष्ट गति से चन्द्रमा की स्पष्ट गति को घटाकर शेप अङ्क से भाग देवे, भागफल स्पित्यई दराड होगा ॥१४॥ १३ सोकदारा लाया हुआ पातका मध्य काल है। उस से स्थित्यई वियोग करने पर फल पात का "सम्भव" (भारम्भ) काल है । एष स्थित्यह योग करने पर फल पात फा "अन्त्यकाल" है ॥ १५ ॥ आदन्तकालयोर्मध्य: कालोज्ञेयोऽतिदारुणः । प्रज्वल- ज्ज्वलनाकार: सर्वकर्मसु गर्हितः॥१६॥ एकायनगतं या- वदन्द्वोर्मण्डलान्तरम् । सम्भवस्तावदेवास्य सर्वकर्म- विनाशकृत् ॥ १७ ॥ स्नानदानजपथाव्रतहोमादिक- मभिः । प्राप्यते सुमहच्छे यस्तत्कालज्ञानतस्तथा ॥१८॥ रवीन्द्वोस्तुल्यताक्रान्त्योर्विपुवत्सन्निधौ यदा । द्विर्भवेद् द्विस्तदा पातः स्यादभावो विपर्ययात् ॥१६॥ भाषानुषाद-पात के आरम्स और समाप्ति के बीच का काल अत्यन्त फठिन, देदीप्यमान अग्निस्त्ररूप सय शुभ फर्मों में वर्जित है ॥ १६ ॥ * जितने काल तक सूर्य और चन्द्रमा के मण्डल का कोई अश एफस्यान ( एकमार्ग) मे हो तो उस समय पात का आरम्भ मय शुन्त कर्मों का नाशफारी होता है ॥ १७ ॥ पातकाल को जानकर स्नान, दान, जप, श्राद्ध, व्रतादि कार्य फरने में बहा कल्याणकारफ होता है ॥ १८ ॥ जय विषुवत् के निकट चन्द्रमा और सूर्य को क्रान्ति समान होती है तो उस समय कान्ति के अनाव से दो वैधति और व्यतीपात नामक पात. होते हैं और यति मूर्य और चन्द्रमा की शान्ति तुल्य न हो तो दोनो मे से कोई भी पास नही होता ॥ १९ ॥ शशाङ्कार्कयुतर्लिप्ताभभोगेन विभाजिता.लब्ध सप्तद- शान्तोऽन्यो व्यतीपातरवतीयकः ॥२०॥ सापेन्द्रपौष्ण- धिष्ण्यानामन्त्याः पादाभसन्धयः । तदनभेण्यादापादो * लोक १६, १७, १८ के लिये देखो इसी अध्याय को अन्तिम व्याख्या।
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एकादशाध्याय
गण्डान्तं नाम कीर्त्यते ॥ २१॥ व्यतीपातत्रयं घोरं
गण्डान्तत्रितयं तथा । एतद्सन्धित्रितयं सर्वकर्मसु
वर्जयेत् ॥ २२ ॥ इत्येतत्परमं पुण्यं ज्योतिषां चरितं
हितम् । रहस्यं महदाख्यातं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि॥२३॥
* इति पूर्वखण्डम्
इत्येकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
भाषानुवाद-अपनाश संस्कृत चन्द्रमा और भूयं की कला को ओष्टकर
योगफल में 200 का भाग देघे, भागफल अन्त में होने पर ध्यतीपात नाम
तीसरा पात होता है।०॥ आश्लेया, ज्येष्ठा, रेवती, इन नक्षत्रो का चौथा
चरण "असन्धि" होता है । एव अश्विनी, मघा और मूल इन नक्षत्रों का
पहिला चरण"गण्डास्त होता है ॥ २१ ॥ तीन व्यतीपात ( दो कान्तिसाम्य
वाले एवं विषुवत् निकट का) तीन गएष्टान्त, तीन नक्षत्र सन्धि, ये सब शुभ
फर्मों में अतिदूपित होने से त्याज्य हैं ॥ २२ ॥ यह परम पवित्र ग्रह नक्ष-
आदिको की गति आदि का गणितरूप शान परम हितकर रहस्प कहा।
अब आगे क्या सुनने की इच्छा है ॥ २३ ॥
* यह पूर्वखण्ड समाप्त हुवा *
विवरण-पात या योग उस को कहते हैं जय चन्द्रमा और सूर्य की
गति का योग १७-२० होता है उतने काष्ठ मे एक " योग होता है। ये
योग अश्विनी आदि २७ नक्षत्र में २७ योग होते हैं। पारित वालो ने योगों
के भित २ नाम ररा कर उन से शुभाशुभ जल की कल्पना किया है, उसी
फलित ज्योतिष के अनुसार यहां भी ३।४।५।१६ ॥ १७ ॥ १८ और २१
श्लोक किसी ने निलाये हैं। इस विचार से कि " मृयमिद्वान्त * मायीन
अन्य है। इस कारण " योगफष्ठ कहना इस के अनुसार प्रामाणिक होगा।
अय हम आर्यभट्ट एव वराहमिहिररुत मिहान ग्रन्थकाममाण देते हैं जिम
से स्पष्ट सिद्ध होगा कि उपरोक रखोफ अवश्य किमी ने निलाये हैं..
रविशशिमक्षगणा. सम्मियाश्व व्यतीपाताः॥२॥
१०० भूम्यसिद्धान्त मापानुवाद, (मार्यभट फाल.क्रिया पाद) अर्थात् मूर्य और चन्द्रमा के नक्षत्र भाग का योग जब समान हो तो, "ध्यतीपात योग होता है। अने व्यतीपाता युगणे पञ्चाम्बरहुताशेः' ॥ ४ ॥ (पञ्चसिद्धान्तिफा १०१२) अर्थात् जब युगीय गत व्यतीपात योग जानना हो तो अहर्गण को १२ गुणा कर गुणनफल में ३-५ का भाग दे, भागफल युग के आरम्भ से बीते हुवे व्यतीपात की संख्या होगी। इस के अतिरिक्त व्यतीपात जनित शुभाशुभ फट का वर्णन कुछ भी उन दोनों प्राचीन ग्रन्थों में नहीं है। विष्कम्भ, प्रीति, आयुष्माम्, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, भुकर्मा, धृति, भूल, गड, पहि, ध्रुव, व्याघात, हर्पण, यज्ज, सिद्धि, व्यतीपात, वरीयान्, परिच, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्मा, इन्द्र, वैधृति ये २० योग हैं। इति भाषानुवादे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ Pri . ओ३म् अथोत्तरखण्डे द्वादशोध्यायः अथाकशिसमुद्भूतं प्रणिपत्य कृताञ्जलि: । भक्त्या पर- मयाभ्यर्च्य पप्रच्छेदं मयासुरः ॥ १॥ अगवन्किम्प्रमाणा भूः किमाकारा किमानया । किंविभागा कथञ्चान सप्त पातालभूमयः ॥२॥ अहोरात्रव्यवस्थां च विदधाति कथं रविः । कथं पर्येति वसुधां भुवनानि विभावयन् ॥३॥ देवासुराणामन्योन्यमहोरात्रं विपर्ययात् । कि- मधं तत्कथं वा स्याद्वानो गणपूरणात् ॥४॥ पित्र्यंमा- सेन भवति नाडीपष्टया तु मानुपम् । तदेव किल सर्वत्र न भवेत्केन हेतुना ॥५॥ दिनाब्दमासहोराणामधिपा न समाः कुत्तः । कथं पर्यति भगणः सग्रहोयं किमान्नयः ॥६॥ भूमेरुपर्युपy|ः किमुत्सेधाः किमन्तराः । ग्रहक्ष- कक्षाः किम्मात्राः स्थिताः केन क्रमेण ताः ॥७॥ग्रीमे तीव्रकरोभानुर्न हेमन्ते तथाविधः । कियती तत्करप्रा- प्तिर्मानानि कति कितैः॥८॥ भाषानुपाद-तदनन्तर मयनामक असुर ने सूर्य के अंश से उत्पन्न पुरुप को हाथ जोह, परम शक्ति से प्रणाम कर यह पूंछा कि ॥१॥ हे भगवन् ! इस पृषियी फा परिमाण क्या है (कितनी परिधि, या श्यास क्रम) भाकार कैसा है ? (गोल, चिपटी, दर्पणोदराकार इत्यादि) किस के आश्रय से ठहरी है (शेष नाग पर बेल पर इत्यादि) इस के क्या र विभाग हैं: (कितने भागों में घटी है) और किस प्रकार से इस में सातों पाताल की संस्था है ? (७ पाताल किस क्रम से उपर नीचे हैं। ॥२॥ सूर्य किस प्रकार से दिन रात्रि चन्द्रमा की १०२ मूर्यमिद्वाना भाषानुवाद की व्यवस्था करता है और इस पृथिवी तथा अन्यान्य भुवनों को प्रकाश करता हुआ कि प्रकार अपनी धुरी पर भ्रमण करता है ? ॥३॥ उत्तर मेरु नियासी और दक्षिण मेरु निवासियों को दिन रानि विपर्यय से क्यों होता है ? और क्यों उन का अहोरात्र सूर्य के १२ राशियों के भ्रमण के समान है? ॥४॥ चन्द्रलोक निवासी का हमारे एक महीने के बराबर एक अहोरात्र, मनुष्यों का ६० घडी का अहोरात्र होता है। इन प्रत्येक के दिन रात्रि एक से क्यों नहीं होते भिन्न २ क्यों हैं ? ॥ ५॥ दिन, वर्ष, मास और * होरा" इन के अधिपति भिन्न २ क्यों हैं। ग्रहगण फिस के आनय से ठहरे हुवे अपने २ भगणों को पूरा करते हैं ? ॥ ६॥ पृथिवी से ग्रह, नक्षत्र, सूर्य, कक्षायें कितनी दूर ऊपर को हैं ? इन में एक कक्षा से दूसरी कक्षा का अन्तर ( फासला ) क्या है ? परिमाण क्या है ? (परिधि, व्यास आदि) और वे किस प्रकार स्थित हैं ? ( पहिले कौन ग्रह, तदनन्तर कौन इत्यादि क्रम ) ॥७॥ ग्रीष्मऋतु में सूर्य की किरणों की प्रखरता, हेमन्त में फिरणों की मन्दता, ऐसा क्यों होता है, क्यों नहीं सय ऋतुओ में सूर्य की फिरणे समान होती है सूर्य की किरणों की प्रसरता, मन्दता आदि जानने के क्या २ नियम हैं ? और मान (सावन नाक्षत्र आदि अ०१ में जो कहे गये हैं) फितने और थे फोन कौन से हैं, उन प्रत्येक का क्या २ प्रयोजन है ? ॥८॥ एतं मे संशयं छिधि भगवन्भूतभावन । अन्योन त्वामृते छेत्ता विपते सर्वदर्शिवान् ॥६॥ इति भक्त्योदितं श्रुत्वा भयोक्तं वाक्यमस्यहि । रहस्यं परमाध्यायं ततः माह पुनः स तम् ॥१०॥ तृणुष्वैकमनाभूत्वा गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्। प्रवक्ष्याम्यतिभक्तानां नादेयं विदाते मम ॥११॥ वासु- देवः परब्रह्म तन्मूर्तिः पुरुषः परः । अव्यक्तो निर्गुणः शान्तः पञ्चविंशात्परोऽव्ययः ॥ १२ ॥ प्रकृत्यन्तर्गतो देको बहिरन्तश्च सर्वगः । सङ्कर्पणोऽयं सृष्टयादौ तासु वीर्यमवासृजत् ॥,१३ ॥ तदण्डमभवद्वैमं सर्वत्र तमसा वृतम् । तत्रानिरुटुः प्रथमं व्यक्तीभूतः सनातनः ॥१४॥ ।
हादसापाय १०३ भापानुवाद-हे भगवन् ! आप मेरे पूर्वोक सन्देहों को दूर कीजिये । आप ज्योतिष शास्त्र के सम विषयों को जानते हैं और आप को सम विषय उपस्थित ( याद ) है । एस धारण मेरे लिये आप के अतिरिक दूसरा संशय फा दूर करने वाला नहीं है ॥ ॥ इस प्रकार भक्ति भाव से कहे हुये मयासुर के वचनों को सुनकर मूयांश पुरुप पुनः १२ वां अध्याय परम रहस्य फहने लगा ॥ १०॥ अच्छा तो परम रहस्य अध्यात्म ज्ञान कहता हूं एकाग्र चित्त हो सुनो । ऐमा कोई पदार्थ मेरे पास नहीं जो मैं तुम्हारे सदृश अपने अतिभा को न कह सफू वा न देकं ॥ ११ ॥ वासुदेव ( जिस में स- म्पूर्ण घराघर जगत् नियास करता है ) परमल उस ही फा नामान्तर, परम पुरुप, अव्याक, निर्गुण,शान्त, अव्यय और ६५ प्रत्यादि (१ प्रकृति, २ महर, ३ आहार, ४ रूप, ५ रस, ६ गन्ध, ७ स्पर्श, शब्द, वाक्, १० पाणि, ११ पाद, १२ गुदा, १३ उपस्य, १४ नेत्र, १५ गिहा, १६ नाफ, १७ स्यचा, १८ कान, १८ मन, २० पृथियो, २९ जड, २२ तेज, २३ यायु, २४ आकाश, ६५ जीय) से शित है ॥ १२ ॥ जगत के उपादानरूप प्रकृति के बाहर और भीतर अर्थात् सयंत्र व्यापक सहर्षण (ईश्वर) ने सृष्टि की आदि (कल्प की आदि में, क्योंकि सुष्टि तो प्रवाह से अनादि है ) पहिले जस का रचा और उस में अपनी शति विशेष को निक्षेप किया ॥ १३ ॥ यह जल शक्ति विशेष में मिलकर अन्धकार से घिरा हुपा सोने के अण्हे की नाई होगया । उस में प्रथम सु. नावम अनिरुद्ध (विराट् ) प्रकट हुवे ॥ १४ ॥ हिरण्यगर्भाभगवानेपच्छन्दसि पयते । आदित्यो ह्या- दिभूतत्वात्प्रसूत्या सूर्यउच्यते ॥ १५ ॥ परं ज्योतितमः पारे सूर्यायं सवितेति च । पर्येति भुवनान्येप भाव- यन्भूतभावनः ॥१६॥ प्रकाशात्मा तमोहन्ता महानित्यप विश्रुतः । ऋचोऽस्य मण्डलं सामान्युस्रा मूर्तिर्यजूंपि च ॥१७॥ त्रयीमयोऽयं भगवान्कालात्मा कालकृद्विभुः । सर्वात्मा सर्वग: सूक्ष्मः सर्वमस्मिन्प्रतिष्ठितम् ॥ १८ ॥ .
१०४ भूर्य सिद्धान्त भाषानुवाद रथे विश्वमये चक्रं कृत्वा संवत्सरात्मकम् । छन्दांस्यश्वाः सप्त युक्ताः पर्यटत्येप सर्वदा ॥ १६ ॥ भापानुवाद-वेद में उन परमेश्वर के नाम हिरण्यगर्भ, सृष्टि की आदिमें प्रकट होने से आदित्य और सष्टि के निमित्त सूक्ष्म अलस्वरूप से (वि. राटस्वरूप ) होने के कारण सूर्य कहे गये हैं ॥ १५ ॥ उक्तगुणविशिष्ट अनिरुद्ध ही परम ज्योतिष्मान् सविता अर्थात् समस्त सूर्यादि प्रकाशकों का भी प्रकाशक है और अन्धकार को नाश कर (प्रलयावस्यारुपी अन्धकार) भूतभावन ज्यो. तिःस्वरूप परमात्मा सय भुवनों (ब्रह्मागहों ) में व्यापक हो रहे हैं ॥ १६ ॥ प्रकाशस्वरूप तिमिरनाशक महान् इत्यादि नामों से वह जगदीवर प्रसिद्ध है। उस प्रकाशस्त्ररूप ईश्वर का ऋग्वेद मगह लरूप है, सामवेद किरण रूप है और यजुर्वेद मानो उस की मूर्ति है, इस प्रकार वेदत्रयात्मक वह भगवान् काल स्वरूप, काल का फर्ता, अणिमादि गुण युक, सर्वात्मा, सर्वग, और सूक्ष्म होने पर भी इस में सय जगत् अवस्थित है ॥ १७ ॥ १८ ॥ यह फालामा परमेश्वर, ब्रह्माण्डरूपी रथ पर, वर्षरूपी चक्र द्वारा, वेद के ७ छन्द स्वरूप (गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप्, रहती, पति त्रिष्टुप्, जगती, ये सात छन्द हैं ) घोड़ों को बनाकर, निरन्तर व्यापक हो रहा है । मब लोक लोकान्तरों को चला रहा है ) ॥१८॥ त्रिपादममृतं गुह्यं पादोऽयं प्रकटोऽभवत् । सोऽहंकारं जगत्सृष्ट्यै ब्रह्माणमसृजत्पनुः ॥ २०॥ तस्मै वेदान्वरान् दत्त्वा सर्वलोकपितामहम् । प्रतिष्ठाप्याण्डमध्येऽथ स्वयं पर्यंति भावयन् ॥ २१ ॥ अथ सृष्टयां मनश्चक्रे ब्रह्माह- कारमूर्तिभृत् । मनसश्चन्द्रमा जज्ञे सूर्योऽक्ष्णोस्तेजसां निधिः ॥२॥ मनसः खंततोवायुरग्निरापोधरा क्रमात् । गुण कझा पञ्चैव महाभूतानि जज्ञिरे ॥ २३ ॥1 अग्नी- पोमो भानुचन्द्रौ ततस्त्वङ्गारकादयः। तेजोभूखाम्यु- बातेभ्यः क्रमशः पञ्च जज्ञिरे ॥ २४ ॥पुनादशधात्मानं विभजद्राशिसंज्ञकम् । नक्षत्ररूपिणं भूयः सप्तविंशात्मकं द्वादशाध्याय वशी ॥२५॥ ततश्चराचरं विश्वं निर्ममे देवपूर्वकम् । ऊर्ध्वमध्याधरेभ्योऽध स्रोतोभ्यः प्रकृतीः सृजन् ॥२६॥ गुण- कर्मविभागेन सृष्ट्वा प्राग्वदनुक्रमात् । विभागं कल्पया- मास यथास्वं वेददर्शनात् ॥ २७ ॥ भावानुवाद-घेदात्मा परमात्मा के तीन पाद सदैव छिपे रहते है, चतुर्थ पाद में ही यह जगत प्रकट है, उस अनिरुद्ध ने अपना स्थूल स्वरूप, रुटि काने के ममय ब्रह्मा नामधारी होकर वेदानुकूल सृष्टि करने के लिये प्रथम अहङ्कार स्वरूप (ब्रह्मा को) उत्पत्ति की । और स्थूल स्वरूप से थेद के अनु- * फूल सृष्टि करने लगा, और सम्पूर्ण जगत् के रचयिता होने से पितामह नाम से प्रसिद्ध होकर ब्रह्माण्ड में व्यापक हो रहा है ॥ २० ॥ २१ ॥ तब अह- द्वाररूप ब्रह्मा के मन से चन्द्रमा और नेत्र से तेजोनिधि सूर्य को उत्पन्ना फिया ॥ २२ ॥ पुनः मन से आकाश, पुनः वायु, अग्नि, जल और पृथिवी एक एक गुण की द्विारा पांचों महाभूतों को उत्पन्न किया ॥ २३ ॥ प्रकाशात्मा होने से सूर्य अग्नि स्वरूप, चन्द्रमा जलरूप को रच कर पुनः तेज से मङ्गल, पृथिवी से बुध, आकाश से दहस्पति, जल से शुक्र, और यायु से शनि इन पांच ग्रहों को उत्पन्न किया ॥२४॥ पुनः वशी (ब्रह्मा) ने अपनी इच्छा से १२ विभागमक राशि चक्र और २७ नक्षत्रादिक की सुष्टि फियी ॥३५॥ तदनन्तर उप्तम, मध्यम, निकृष्ट त्रिगुणात्मक क्रम से देव, मनुष्य, असुर और घराचर विश्व को निर्माण किया ॥२६॥ पुनः ब्रह्माने गुण ( सत, रज, तम ) और कर्म ( पूर्व जन्मार्जित ) के अनुसार वेदोस रीति से सृष्टि करके विभाग किया व जगत् फा विभाग किया ॥२७॥ ग्रहनक्षत्रताराणां भूमेर्विश्वस्य वा विभुः । देवासुरमनु- प्याणां सिद्धानां च यथाक्रमम् ॥ २८ ॥ ब्रह्माण्डमेत- सुपिरं तत्रेदं भूर्भुवादिकम् ! कटाहद्वित्तयस्येव सम्पुटं गोउकाकृति ॥ २६ ॥ ब्रह्माण्डमध्ये परिधिोमकक्षा- भिधीयते । तन्मध्ये भ्रमणं भानामघोऽधः क्रमशस्तथा मूसिद्धान्त मापानुधाद ॥ ३० भन्दामरेज्यभूपुत्रसूर्यशुक्रेन्दुजन्दवः । परिभ्रम- न्त्यधोऽधस्थाः सिद्धविनाधरा घना:॥३१॥मध्ये समन्ता- दण्डस्य भूगोलोव्योम्नि तिष्ठति । विभ्राणः परमां शक्ति ब्रह्मणोधारणात्मिकाम्॥३२॥ तदन्तरपुटा:सप्तनागासुर समाश्रयाः। दिव्योपधिरसोपेतारम्याः पातालभूमयः ३३ भाषानुवाद-ग्रह, नक्षत्र, तारा, पृथिवी, देव, असुर, मनुप्प, मिद्ध इन के स्थानो का विभाग किया अर्थात् इन प्रत्येक की संस्था को क्रम से विभाग किया ॥ २८ ॥ पूर्योक ब्रह्माण्ड में भूर्भुवादि ( भूलोक, भुवलोक, स्वर्लोक,जन लोक, महलोक, सत्यलोक, तपोलोक) लोक अवस्थित हैं। यह ब्रह्माण्ड दो' कटाह जोडने से जैसा गोलाकार होता है, इस प्रकार का है अर्थात् गो. लाकार है ॥ २९ ॥ ब्रह्मायष्ठ मे परिधि का नाम आकाश फक्षा है। उस में सब से ऊपर राशि चक्र, उस के नीचे शनि, उस के नीचे रहस्पति, उस के नीघे मङ्गल उस के नीचे सूप, उस के नीचे शुक्र, उस के नीधे बुध, उस के नीचे चन्द्रमा भ्रमण करता है। उस के नीचे सिद्ध विद्याधरगण के घूमने फा मार्ग अन्तरिक्ष है और सब से नीचे मेघ मण्डल है ॥ ३० ॥ ३१ ॥ प्रल की धारणास्मिका परमाशक्ति के ऊपर यह भूगोल अण्ड (ब्रह्माण्ड) के बीधा आकाश में भ्रमण करता हुआ अवस्थित है ॥३२॥ उस भूगोल के भीतर नाग और असुर आदि मनुष्य विशेष के निवास को ७ पाताल है ( अतल, वितष्ठ, सुतल, तल, तलातल, रसातल, पाताल) शिन में अनेक प्रकार स्वप्रकाशयुक्त रमणीक ओपधि हैं॥ ३३ ॥ अनेकरत्ननिचयो जाम्बूनदमयोगिरिः । भूगोलमध्यगो मेरुरुभयत्र विनिर्गतः ॥ ३४ ॥ उपरिष्टात्स्थितास्तस्य सेन्द्रा देवा महर्षयः । अधस्तादसुरास्तद्वदद्विपन्तोऽन्यो- न्यमाश्रिताः॥३॥ ततः समन्तात्परिधिः क्रमेणायं महा- णवः । मेखलेव स्थितीधाच्या देवासुरविभागकृत् ॥३६॥ समन्तान्मेरुमध्यात्तुतुल्यभागेषु तोयधेः । द्वीपेषु दिक्षु द्वादशाध्याय १७ पूर्वादिनगर्यो देवनिर्मिताः ॥३७॥ भूवृत्तपादे पूर्वरयां यमकोटीति विशुता । भद्राश्वव नगरी स्वर्णमाकार- तोरणा ॥३८॥ याम्यायांमारते व लङ्कातस्मिन्महापुरी। पश्चिम केतुमालाख्ये रोमकख्या प्रकीर्त्तिता ॥ ३ ॥ सापानुवाद-भूगोल के बीच और दोनों उत्तर दक्षिण से मेरु के बीच स्वर्णमय नाना प्रकार के रत्नों से भरा हुआ भैरु नामक पर्यत है ॥३४॥ उत्तर मेरु के पास इन्द्रादि देवता और महर्पिगण वास करते है, एवं दक्षिण मेस के निकट असुरगण भयस्थित हैं । परस्पर को नीचस्थ समझते हुवे दूसरी दिशा में ठहरे हुये हैं ॥३५॥ उस दण्डाफार मेरु दण्ड की चारों ओर यह नहा समुद्र है, जो कम से भूगोल में मेखला की नाई अल्ला ने देयता और असुरो मे स्थागो विभाग करने वाला पदार्थ रचा है । उक्त समुद्र के उत्तर भूगोल का आधा भाग भारतवर्षरूपी देवभूमि है ( आर्यों के रहने का स्थान ) और उक्त समुद्र के दक्षिण भूगोल के आधे भाग में छः द्वीप और छः समुद्र असुरों के रहने का स्थान हैं ॥३६॥ दरहाकार मेरु के मध्य प्रदेश से घेरा रूप समुद्र की धारो दिशाओं में समविभागास्मक देवनिर्मित धार पुरी है ॥३७॥ भूयत्त ( ५०५८ योजन) चतुपाश परिमाण व्यवधान में पूर्व की भोर भद्राश्य वर्ष है । उस में पमकोटि नामक पुरी है, जो सोने की भीत और सोरणों से घेरी हुई है और भूपत्त के चतुर्थाश योजन परिमाण व्यवधान में दक्षिण में भारतवर्ष है । उम के मध्य में ला नामक महापुरी है और भूयत के घ. तुर्थाश योजन परिमाण व्यवधान में पश्चिम में केतुमाल वर्ष । उस में री. मक नामक नगरी है। SER उदकसिद्धपुरी नाम कुरुवर्षे प्रकीर्त्तिता। तस्यां सिद्धा महात्मानो निवसन्ति गतव्यथाः ॥ ४० ॥ भूवृत्तपादवि- वरास्ताश्चान्योन्यं प्रतिष्ठिताः । ताभ्यश्चोत्तरगो मेरुस्ता- वानेव सुराश्रयः ॥४१॥ तासामुपरिगोयातिविषुवत्स्थो दिवाकर। न तासु विपुवच्छाया नाक्षस्योनतिरिष्यते ॥२॥ मेरोरुभयतो मध्ये ध्रुवतार नभःस्थिते । निरक्ष- . १०८ सूर्यसिद्धान्त भापानुवाद दशसंस्थानामुभये क्षितिजाश्रये ॥४३॥ अतो नाक्षोच्छ्य- स्तासुध्रुवयोः क्षितिजस्थयोः। नवतिर्लम्बकांशास्तु मेरा- वक्षांशकास्तथा ॥४४मेपादौदेवभागस्थे देवानां याति दर्शनम् ।असुराणां तुलादौ तु सूर्यस्तदुभागसञ्चरः ॥४५॥ भापानुयाद-उत्तरमाग में कुरुवर्ष में सिद्ध पुरी नामक नगरी है, यहाँ सिद्ध महात्मा लोग सब कष्टों से रहित होकर मुरापूर्वक वास करते हैं ॥gen पूर्योक नगरी सय परस्पर भूपत्त के चतुर्थ अंश के योगन परिमित अन्तर पर अवस्थित हैं। एवं इन नगरियों के समान अन्तर पर उत्तर मेरु है । जहां के निवासियों को देवसमा है ॥४९॥ पूर्घात नगरियों के ऊपर जब सूर्य दीखता है वही विषुवत् कृत्त है । लय सूर्य विषुववृत्तस्य होता है तो यहां विपुषच्छाया (पलना ) और अक्षोन्नति ( अक्षध्रुव की) नहीं होती ॥ ४२ ॥ दोनों मेरु के मध्य आकाश में भुवतारा अवस्थित हैं। निरतदेशस्य (पूर्यात नगर स्थित ) मनुष्यो फो उत्तर और दक्षिण क्षितिज वृत्त मे दोनो ध्रुव तारा हैं ॥ ४३ ॥ इस लिये दोनों ( ध्रुवतारा ) क्षितिज वृत्त में ध्रुवौच्च्य (उन्नति ) नहीं है । दोनों ध्रुय क्षितिज यत्त में हैं । इस कारण वहां का लम्बकांश और मेरु का अक्षांश १० है ॥४॥ जय सूर्य मेषादि ( मेष, ष, मिथुन,फर्कट, सिंह, कन्या इन छः राशियों की उत्तर गोलार्द्ध संज्ञा है) अर्थात् उत्तरमेरु प्रदेश में दीयता है तो उत्तर मेरुनिवासियो को : मास पर्यन्त दृश्य होता है और जब तुलादि (तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन इन राशियों की दक्षिण गोलार्द्ध संज्ञा है ) राशियो में सूर्य दीराता है तो दक्षिण मेरुवा- सियो को छ. मास तक सूर्य दृश्य होता है ॥ ४५ ॥ विवरण-यद्यपि सिद्धान्त ग्रन्थ में शुगोल का विशेषवर्णन करना प्रकरण विरुद्ध है, तथापि जितने अश से गणित का अम्बन्ध है उतने का वर्णन फ- रना आवश्यक है। हमारे संस्कृत ग्रन्धों में प्रायः " सप्तद्वीपा घसमती" इत्यादि लिया है। अर्थात् सात द्वीप और नव खण्ड । परन्तु द्वीप शब्द से लोग"भाइस्लएर * (Island) समझते हैं,सो ठीक नहीं। क्योकि यदि हमारे ऋषियो को द्वीप शब्द से आइस्लैण्ड अभीष्ट होता तो भारतवर्ष की द्वीप में गणना न करते । हम से द्वीपशब्द से पेमन्सुला ( Penensula ) अर्थात् जिसके द्वादशाध्याय poe - .. ३ हरिवर्ष दो ओर पानी हो । (द्वयोः आपोयस्य) इस से आधुनिक सात विभाग से टीक मिलता है। दो अमेरिका, युरोप, एशिया, आफरिका, ओशिनीआ और आस्ट्रलिया ये सात विभाग हैं। संस्कृत- जम्यूद्वीप, २ यक्षद्वीप, ३.श ल्मलीद्वीप, ५ कुशद्वीप, ५.क्रौञ्च द्वीप, ६ शाकद्वीप, ७ पुष्करदीप । अम जम्बूद्वीप के नव खण्ड हैं । जाभि वर्ष ( भारतवर्ष ) समुद्र के ४ इलावृत्त वर्ष उत्तर और हिमालय के दक्षिण"आ-५ रम्यफ घर्ष र्याय: देश है । जो राजा भरत के ६ हिरण्यक वर्ष समय से भारतवर्ष कहलाया ॥ ७ कुरुवर्ष २ फिम्पुरुष वर्ष भद्राश्यवर्ष ९ केतुमालवर्ष 'अत्यासन्नतया तेन ग्रीप्मे तीनकरा रवेः । देवभागे सु- राणां तु हेमन्ते मन्दतान्यथा॥ ४६॥ देवासुरा विपुवति क्षितिजस्थं दिवाकरम् । पश्यन्त्यन्योन्यमेतेपा वामसव्ये दिनक्षपे ॥ १७ ॥ मेपादावुदितः सूर्यस्त्रीराशीनुद- गुत्तरम् । सङ्घरन्प्रागहमध्यं पूरयेन्मेरुवासिनाम् ॥४८॥.. कर्कादीन्सचरंस्तद्वदलः पश्चार्धमेव सः । तुलादीस्त्रीन्म- गादीश्च तद्वदेव सुरद्विपाम् ॥ १६ ॥ अतोदिनक्षपेतेपा- मन्योन्यं हि विपर्ययात् । अहोरात्रप्रमाणं च भानोर्भ-. गणपूरणात् ॥ ५० ॥ दिनक्षपार्धमेतेपामयनान्ते विप-. र्ययात् । उपर्यात्मानमन्योन्यं कल्पयन्ति सुरासुराः॥५१॥ भापानुवाद-इसी कारण (पूर्वोक्त प्रकार सूर्य के उत्तरायण, दक्षिणायन होने से ) सूर्य जय ग्रीष्मऋतु में देवभाग में निकटतर ( दूसरे की अपेक्षा) होता है तो वहां इस की किरणों की प्रसरता से गरमी अधिक होती और उस समय अमुरंभाग ( दक्षिणमेरु ) में गरमी की न्यूनता और शीत को घृद्धि होती है । एवं हेमन्त ऋतु में सूर्य देवभाग से दूर और असुरमाग के निकटतर x ११३ मूर्य सिद्धान्त भावानुवाद होता है तो उस समय देवनाग में मूर्य की किरणों फी मन्दता और शीत की यद्धि होती है और अमुरमाग में सूर्य की किरणों की प्रखरता और शीत की मन्दता होती है ॥ ४६॥ जिस समय नूयं विपुषत् रे पर होना है उस समय उत्तर मेरु मियासी एय दक्षिण मेरुनियासी सूर्य को क्षितिज्ञ रेसा में देखते हैं । इस प्रकार सूर्य के उत्तरायण दक्षिणायन होने के कारण परस्पर देव और असुरों के दिन रात्रि विपर्यय से ( यर अफ्स ) होते हैं। अर्थात् सूर्य जब उत्तरायण होता है तो देवों का दिन और उस समय असुरो फी रात्रि, एवं मूर्य जय दक्षिणायन होता है तो देवों की रात्रि और असुरों फा दिन होता है ॥ १७ ॥ उत्तर मेरुनिवासियों के भाग में जब सूर्य मेप,यप, मिथुन राशिस्थ होता है तो इन फा पूर्वार्ध दिन (प्रातःकाल से मध्याहू सफ) होता और उस समय असुरो की आधीरात ( सायङ्काल से आधीरात तक) होती और जय कर्क, सिह, कन्या इन तीन राशियों में होता है तो देयभाग में अपराह ( दिन का पिछला आधा ) होता और उस समय असुरमाग में पिछली आधीरात (आधी रात से शोर के पहिले तक) होती है। इसी प्रकार जय सूर्य तुला, वृश्चिक, धनु इन तीन राशियों में होता है तो असुरभाग दिम का पूर्वाद और देवभाग में आधीरात होती है और जय सूर्य मकर, कुम्भ, मीन इन तीन राशियों में होता है तो असुरभाग में अपराहू और देव- भाग में पिछली आधीरात होती है ॥४४॥ पूर्वोक्त कारण से देव और असुरो फा परस्पर अहोरात्र ( दिन रात) विपर्यय से होता है । सूर्य के भगणकाल फा पूरा होना ही इन दोनों का एक अहोरात्र होता है ॥ ५० ॥ सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायम होने के कारण देवता और अमरो का दियाई और राज्य विपर्यय से होता है अर्थात् जय देवों का दिनाई, तब असुरों की आधीरात एय जय असुरों का दिनार्द्ध तब देवो की आधी रात होती है । देव और अनुरगण निज २ स्थान को एक दूसरे की अपेक्षा ऊपर समासे हैं, अर्थात् देवगण अमरों को अपने से नीचस्थ और इसी प्रकार अमरगण देवों को अपने से नीचस्थ समझते हैं ॥ १॥ अन्येऽपि समसूत्रस्था मन्यन्तेऽधः परस्परम् । भद्राश्व- केतुमालस्था लङ्कासिद्धपुराश्रिताः। ५२ ॥ सर्वव मही- गोले स्वस्थानमुपरिस्थितम् । मन्यन्ते खे यतो गोलस्त-.
हादशााध्याय
स्य वोवं कवाप्यधः ॥ ५३॥ अल्पकायतया लोकाः ,
स्वस्थानात्सर्वतोमुखम् । पश्यन्ति वृत्तामप्येतां चक्रा-
कारां वसुन्धराम् ॥ ५४ ॥ सव्यं भमति देवानामपसंव्यं
सुरद्विपाम् । उपरिष्टा गोलोऽयं व्यक्षे पश्चान्मुखः स..
दाशाअतस्तन दिनं त्रिंशन्नाडिकं शर्वरी तथा।हानि-
वृद्धी सदा वामं सुरासुरविभागयोः ॥ ६ ॥ मेपादौ तु
सदा दृद्धिरुदगुत्तरतोऽधिका । देवाशे च क्षपाहानिर्वि-
परीतं तथासुरे ॥ ५७ ॥ तुलादौ युनिशोर्वामं क्षयवृद्धी
तयोरुभे । देशक्रान्तिवशान्नित्यं तद्विज्ञानं परोदितम् ५८
मूर्य सिद्धान्त भापानुवाद पद्धि होती है ।। ५६ ॥ सूर्य जय मेपादि अर्थात् मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या इन छः राशियों में उत्तरायण में होता है तो उत्तर मेरु प्रदेश में दिन की पद्धि और रात्रि की हानि होती है। और उस असुरक्षाग में इस के विपरीत होता है अर्थात् दिन का ह्रास और रात्रि की वृद्धि होती है। इसी प्रकार जब सूर्य तुलादि अर्थात् तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन इन छः रा- शियों में होता है तय असुरभाग में दिन की वृद्धि और रात्रि की हानि होती है और देवभाग में दिन की हानि एवं रात्रि की वृद्धि होती है । क्षय और यद्धि (दिन+रात्रि की) सूर्य की क्रान्ति के कारण होती है जिस के विषय मे अ० २ मे कहा जा चुका है ॥ ५७ । ५८ ॥ भूवृत्तं क्रान्तिभागघ्नं भगणांशविभाजितम् । अवाप्त- योजनैरर्कोव्यक्षादयात्युपरिस्थितः ॥ ५९॥ परमापक्रमा- देवं योजनानि विशोधयेत् । भूवृत्तपादाच्छेपाणि या- नि स्युर्योजनानि तैः ॥६०॥ अयनान्ते विलोमन देवा- सुरविभागयोः। नाडीपष्ट्या सकृदहर्निशाप्यस्मिन्स- त्तथा ॥ ६॥ तदन्तरेऽपि पप्ट्यन्ते क्षयवृद्धी अहर्नि- शोः । परतो विपरीतोऽयं भगोल: परिवर्त्तते ॥२॥ जने भूवृत्तपादे तु द्विज्यापक्रमयोजनैः । धनुर्मूगस्थः सविता देवभागे न दृश्यते ॥६६॥ तथा चाऽसुरभागे तु मिथुने कर्कटे स्थितः। नष्टच्छायामहीवृत्तपादे दर्शनमादिशेद भापानुपाद भूपत्त ( ५५९) को सूर्य की क्रान्ति से गुणा फर गुणनफल को ३० रो भागदे, भागफल योजन संख्या निरक्ष देश से उतने योजन दूर स्थित स्थान में मूर्य मध्याहू के ममय मस्तकोपरि होगा ॥ ५॥ सूर्य की परम कान्ति (२४ अंश परिमित ) के योजन फो भूपत्त (५९) चौथे भागसे घटाने पर शेप योजन सख्या रहती है। निरक्षदेश से उतने दूर दक्षिण और उत्तरप्रदेश में विपरीत भाय से ६० घड़ी का दिन और रात होता है अपात् अपनान्त। जय मकरराशिस्थ सूर्य उत्तरभाग में होता है उस समय देव.
द्वादशाध्याय भाग, ६० घष्ठी की रात एवं असुरमाग में ६० घड़ी का दिन होता है और जय कर्क राशिस्थ सूर्य होता है तब निरक्ष देश से उत्तर उतने योजनान्तरित देश में ६० घड़ी का दिन एवं दक्षिणभाग में ६० पड़ी फी रानि होती है ॥६॥ ६१॥ निरक्ष देश में पूर्वोक्स रीति से जितनी दूर उत्तर और दक्षिण प्रदेश में ६० घड़ी में हानि और वृद्धि कही गयी हैं उस के अनुसार यहां दिन रात होते हैं परन्तु निरक्ष के दक्षिण और उत्तर उ अवधि से आगे के देशों में यह भूगोष्ठ गणित के विरुद्ध भमण करता है इस लिये उस से परे के देशों में दिन रात्रि की हास बद्धि नहीं कही गई । ६२ ।। दो राशि की ज्या के कान्ति के अंश को भूपत्त (५०५९) से पटाये शेष पाल योजन निरक्ष देश से उत्तर उतने दूर प्रदेश में । धनु और मकर राशि का सूर्य देवों कर नहीं दीखता अर्थात् उन की रात्रि रहती और निरसदेश से दक्षिण प्रदेश में उक्त योजन दूर पर मिथुन और कर्क राशि का सूर्य असुरों को नहीं दीराता अर्थात् उन की रात्रि रहती है। जिस स्थान में पृथिवी को लाया नहीं है यहां सूर्य का दर्शन होता अर्थात् दिन होता है और पृथिवी के पत्त के चतुर्थाश में सदैव सूर्य दर्शन कहनाधा- हिये ।। ६३ । ६४ ॥ एकज्यापक्रमानीतैयोजनैः परिवर्जितैः । भूमिकक्षा चतुर्थांश व्यक्षाच्छेपैस्तु योजनैः ॥ ६॥ धनु गालिकु- म्भेषु संस्थितोऽर्को न दृश्यते। देवभागेऽसुराणां तु वृपादो भचतुष्टये ॥६६॥ मेरौ मेपादिचक्रार्धे देवाः पश्यन्ति भास्करम् । सकृदेवोदितं तद्वदऽसुराश्च तुलादिगम् ॥६॥ भूमण्डलारपञ्चदशे भागे देवेऽथवासुरे । उपरिष्ठात् व्रजत्यर्कः सौम्ययाम्यायनान्तगः ॥ ६८ ॥ तदन्तराल- योश्छाया याम्योदक सम्भवत्यपि । मेरोरभिमुख याति परतः स्वविभागयोः ॥६६॥ भद्राश्वोपरिणः कु- र्याद् भारते तूदयं रविः । रायकेतुमाले तु कुरावस्त- मयं तदा ॥४०॥ भारतादिपु वर्षेषु तद्वदेव परिभ्रमन् । मध्योदयार्धरात्र्यस्तकालात्कुर्यात्प्रदक्षिणम् ॥ १ ॥ १५ मूरपंसिद्धान्त भावानुवाद भाषानुवाद-एक राशि की ज्या के कान्ति अंश के योजग से भूवत्त के चतुर्थाश योजन के घटाने पर शेप योजन संरया होगी । उतनी दूर निरक्ष देश के उत्तर भाग में वृश्चिक,धनु:मकर, कुम्न, राशि स्थित सूर्य तत्रत्य लोगों ( देवताओं) को नहीं दीखता । और निरतदेश से दक्षिणभाग में उतने योजन अन्तर में श्य, मिथुन, कर्क, सिंह राशिस्थ सूर्य असुरों को नहीं दीखता । और उत्तर मेरु निवासियों को धूप,मिथुन,कर्कट,सिंह इन राशियों में स्थित सूर्य देवों को दीखता है। एवं पृश्चिक, धनु, गकर, कुम्भ राशि में अवरिधत मूर्य असुरों को दीखता है ॥ ६५ ॥६६॥ उत्तर मेरू निवापियों को मेपादि ( मेष, रूप, मिथुन, फर्फट, सिंह, कन्या ) चक्राधगस सूर्य एक यार उदय हुआ छः महीने तफ दृश्य होता है और दक्षिण मेरु निवासियों को तु. लादि ( तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन ) अपर चक्रार्धगत सूर्य एक चार उदय हुआ छः मास तक दीसता है ॥ ६ ॥ निरक्ष देश से भूपत्त के १५ भाग ( अंश) दूर उत्तर प्रदेश में - (उतने योजना परिमित अन्तर पर) उत्तरायण में देषनाग में सूर्य मस्तकोपरि दीखता है और १५ अंश परि- मित योजन अन्तर पर दक्षिणायनसूर्य असुराग में मस्तक के ऊपर दीयता है ॥ ६८ ॥ निरक्ष देश से १५ अंश योजन परिमित अन्तर उत्तर और दक्षिण प्रदेश की अभीष्ट कालिफ छाया दक्षिण या उत्तर होती है अर्थात् मिरक्षा: देश से १५ अंश योजन परिमित अन्तर में उत्तर देश में मध्याहू नतांश दक्षिण रहने पर छाया उत्तर रहती है। नतांश उत्तर रहने पर छाया दक्षिण होती है। इसी प्रकार निरक्ष देश से १५ अश योजन परिनित अन्तरदेश में सूर्य के पारस्थ होने पर छाया दक्षिण और सूर्य के दक्षिणस्थ होने पर छाया उत्तर होगी और निरक्ष देश से १५ अंश योजम परिमित उत्तर और दक्षिण प्रदेश से भागे उार और दक्षिण मेरु के सम्मुरा छाया पड़ती है ॥ ६ ॥ भारतवर्ष में जय सूर्य मस्तक के ऊपर होता है तो भारतवर्ष में मध्याहु, केतुमाल में मूर्योदय, कुरुयर्ष में आधीरात और भद्राशय वर्षमें सायात होता है । जब केतुमालयप में सूर्य मस्तक के अपर होता है तो केतुमाल में मध्याह, कुरु य में सूर्योदप भद्राश्य वर्ष में आधी रात और भारतय में सायशाल होता है और जब फुरयप में सूर्य मस्तक से ऊपर होता है तो फुरुवर्ष में मध्याहू, भद्राश्यवर्ष में सूर्योदय, भारतवर्ष में आधी गत और केतुमाल यप में सूर्यास्त
मूर्य सिद्धान्त भापानुवाद
और शुक्र मध्य की कक्षा ४३३१५०० योजन है अर्थात् इन तीनो की कक्षा का
परिमाण एक ही है ॥८६॥ मङ्गल की कक्षा ८२४.८०८ योजन,चन्द्रोल की कक्षा
३३.८४ योजन है | गृहस्पति की कक्षा ११३७१५६४ योजन, चन्द्रमा के पात
(राहु) की कता ९८५१८६४ योजन हे ॥८॥ शनि की कक्षा १२७६८२५५ योजन।
भवक्षा ८००१२ योजन है ॥ * ॥ ब्रह्मायण की कक्षा १८५१२०८०८६४00000
योजन है, इन फा मध्य मूर्य की किरणो का विस्तार है ॥ ८ ॥
विवरण-आकाश कक्षा ओ लिखी है यह वास्तविक आकाश कहानहीं,
फिन्तु पहकक्षा जानने के लिये जाकाशकक्षा मान कर एक प्रकार की परुपा
मान ली गई है। भास्कराचार्य ने भी ऐसा ही लिखा है
ब्रह्माण्डमेतन्मितमस्तु नो वा कल्पे ग्रहः कामति योज-
नानि । यावन्ति पूरिह तत्प्रमाणं प्रोक्तं खकक्षाख्य-
मिदं मतं नः ॥३॥ (सि० शि० कक्षाध्याय)
अर्यात्-ब्रह्मायड की इतनी ही फक्षा है, यह ठीक नहीं । परन्तु पूर्या-
चार्यों ने इस सख्या से प्रहादि कक्षा का परिमाण निश्चय किया है। पुन -
"कोटिन्नैर्नखनन्दपटकनखभू भूभृदभुजङ्गेन्दुभिज्योतिः
शास्वविदो वदन्ति नभसः कक्षामिमां योजनः ।
तब्रह्माण्डकटाहसम्पुटतटे केचिज्जगुर्वेष्टनं, केचित्
प्रोचुरदृश्यदृश्यकगिरि पौराणिकाः सूरयः ॥ ६ ॥
अर्थात-ज्योतिषशास्त्रवित परिष्ठतगण कहते हैं कि आकाश को कक्षा
फो योजन सख्या १८७१२०६९२०:000000 1 इस को कोई २ प्रहमाण्ड फटाह
के
सम्पुटस्य घेष्टन समझते हैं । एव किसी २ पौराणिक का अनुमान है कि यह
लोकालोक पर्वत का वेष्टन (घेरा) मात्र है ॥ ६ ॥
इति भाषानुवादे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः अथ गुप्ते शुचौ देशे स्नातः शुचिरलङ्कृतः । सम्पूज्य भास्कर भक्त्या ग्रहान्भान्यथ गुह्यकान् ॥१॥ पारम्प- योपदेशेन यथाज्ञानं गुरोर्मुखात् । आचार्यः शिष्यवी- धार्थं सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् ॥२॥ भूभगोलस्य रचनां कुर्या- दाश्चर्यकारिणीम् । अभीष्टं पृथिवीगोलं कारयित्वा तु दारवम् ॥३॥ दण्ड तन्नध्यगं मेरोरुभयत्र विनिर्ग- तमा आधारकक्षाद्वितयं कक्षा वैपुवती तथा ॥ ॥ भग- णांशाङ्गुलैः कार्यादलितस्तिस एवताः । स्वाहोरात्रार्धक- फैश्च तत्प्रमाणानुमानतः ॥ ५॥ क्रान्तिविक्षेपभागैश्च दलितैर्दक्षिणोत्तरः स्वःस्वैरपक्रमैस्तितो मैपादीनामप क्रमात् ॥६॥ कक्षाःप्रकल्पयेत्ताश्व कादीनां विपर्ययात् । तवत्तिवस्तुलादीनां मृगादीना विलोमतः ॥ ७ ॥ भापानुवाद--एकान्त पवित्र (साफ) स्थान में स्नानादि नित्यक्रिया कर शमन होकर आचार्य (सूर्याशपुरुप) वखादिक पहनकर नूर्य और महाधि. ष्ठित नारायण को प्रणाम कर, शिष्य नियामर) को मुगमतया बोध के लिये प्रत्यक्ष करके जिस प्रकार गुरुमुस से एवं परंपरा से ज्ञान प्राप्त किया था,ज्योतिष के सय विषयों को मय को दिखलाया ॥१॥२॥ शिष्य को भलीभांति भूगोल एवं भगोल विषयक (पूर्वोक्त) ज्ञान हो । गणक को चाहिये कि किसी गोष्ट विद्यायित् शिल्पा ने अभीष्ट काठ का आश्चर्यकारी भूगोल और गोल धन- वावे, उस भूगोल में दोनों ओर ( दक्षिण उत्तर ) निकला हुया मेरु दण्ड आधार फी दो कक्षा और दो विपुषवत को कक्षा बनाये ॥३॥ ४॥ स्वाहो. रात्रा फर्ण परिमाण से ध्यास विशिष्ट तीम पत्तों को रैथे और प्रत्येक गत - १२० सूर्य सिद्धान्त भाषानुवाद में तीनसोसाट २ भाग चिहू फरे, क्रान्ति विक्षेपाश अद्वित दक्षिणोत्तर रेसा मे मेपादि के अपरून के अनुसार अपक्रमाश में उक्त तीनो पत्तो को सयोग करावे, वे ही विपरीत भाव ( यर अक्स ) से फर्कादि की कक्षा होंगी । उसी प्रकार दक्षिण ओर भी तुठादि की तीन कक्षाओ को सयुक्त करे, वे ही विलोम (उलटे क्रम ) में मकरादि की कक्षा होगी।५।६।१।। याम्यगोलाश्रिताः कार्याः कक्षाधाराद्वयोरपि। याम्यो- दग्गोलसंस्थानां भानामभिजितस्तथा ॥८॥ सप्तीणा- मगस्त्यस्य ब्रह्मादीनां च कल्पयेत् ।मध्ये वैपुवती कक्षा सर्वपामेव संस्थिता ॥ ९ ॥ तदाधारयुतेरूद्धमयने वि- पुववयमाविपुवत्स्थानतोभागःस्फुटै गणसञ्चरात्॥१०॥ क्षेत्राण्येवमजादीनां तिर्यग्ज्याभिः प्रकल्पयेत् । अय- नादयनं चैव कक्षा तिर्यक् तथापरा । क्रान्तिसंज्ञात- या सूर्यः सदा पर्यंति भासयन् ॥११॥ चन्द्रामाश्च स्वकैः पातैरपमण्डलमाथितः। ततोऽपकृष्ठादृश्यन्ते विक्षेपा- न्तप्वपक्रमात् ॥१२॥ उदयक्षितिजे लग्नमस्तं गच्छच्च त- द्वशात् । लड्वोदयैर्यथा सिद्धं खमध्योपरि मध्यमम्॥१३॥ भाषानुवाद-उत्तर, दक्षिण गोलस्थित, अभिजित् आदि नक्षत्रगण की फक्षा सय को आधारकक्षा के ऊपर सयुक्त करे। इसी प्रकार सप्तर्षि, अग- स्त्य, ब्रह्महृदपादि की कता होगी। सब के बीच के भाग में विषुवतीकक्षा रहेगी ॥।॥ विपुवती और आधार कक्षा के सयोगस्थान से ऊपर के प्रदेश में दो अपन और दो विषुव का चिहू करे, उस के बाद विपुव रेखा से राशि अन्तर में मेषादि १२ क्षेत्र तिनिरूपण करे। एफ अपन से दूसरा अयन गत ति कक्षा को कान्तिकक्षा कहते हैं। इसी कक्षा में सूर्य भ्रमण फरते दीखता है । चन्द्रादि अपने पाव से आकृष्ट होकर अन्य इत्त मे श्रमण करता है । उसी प्रकार आकृष्ट होकर अपने अपकम से विक्षेपात में दूरम होता है । उदय क्षितिजवृत्त में उन के अश ही उदय उग्न है। एष अस्त में भस्त लग्न है ॥ १०-१३॥ ।
त्रयोदेशाध्याय मध्यक्षितिजयोर्मध्ये या ज्या सान्त्याभिधीयते । ज्ञेया चरदलज्या च विपुवक्षितिजान्तरम् ॥ १४ ॥ कृत्वोपरि स्वक स्थानं मध्ये क्षितिजमण्डलम् ॥ १५ ॥ वस्त्रच्छन्नं बहिश्वापि लोकालोकेन वेष्टितम् । अमृतस्रावयोगेन कालभ्रमणसाँधनम् ॥ १६ ॥ तुंगवीजसमायुक्तं गोलय- न्त्रं प्रसाधयेत्। गोप्यमेतत्प्रकाशोक्तं सर्वगम्यं भवेदिह ॥ १७ ॥तस्मादगुरूपदेशेन रचयेद्गोलमुत्तमम् । युगेयुगे समुच्छिन्ना रचनेयं विवस्वतः ॥ १८ ॥ प्रसादात्कस्यचि- भूयः प्रादुर्भवति कामतः । कालसंसोधनार्थाय तथा यन्त्राणि साधयेत् । एकाकी योजयेद्वीजयन्ने विस्मय- कारिणि ॥ १९ ॥ भापानुवाद-मध्य और क्षितिज के मध्य में जो क्या है वही "अन्त्या" है। विधुवत् और क्षितिज के अन्तर को “ घरदलज्या कहते हैं ॥१४॥ काष्ठ + के बनाये हुवे उस भूगोल में अपने स्थान को सय से ऊपर के मध्य में क्षि- तिज भण्डल स्थिर फेरे ॥ १५ ॥ दृष्टान्त गोल के क्षितिज के बाहर प्रखं से ढक कर वस्त्र के ऊपर पत्तो को अङ्कन फरके जलमवाह से कालसाधन फरे ॥ १६ ॥ गणकं को चाहिये कि पारे के साथ गोलयन्त्र को सिद्ध करे जिस में ६० नाक्षत्रिक पटिकाओ में दृष्टान्त गोल भ्रमण करजावे । यह विषम विषय भली भाति प्रत्यक्षतया दिखलाने और स्पष्टतया फहने से तो सय फो समझ में आवेगा ॥१७॥ इस लिये गुरु के उपदेश से गणक उत्तम गोल बनाये। यह (सावित्रविद्या) युग २ में छुप्तमाय हो जाती है, परन्तु ईधर की रुपा से किन्हीं ऋषिद्वारा प्रकट होती है ॥ १८ ॥ कालसाधन के लिये स्वयं इस यन्त्र के अतिरिक्त अन्यान्य यन्त्र भी अच्छे शिल्पज्ञ द्वारा बनवावे और केवल एक पारा आश्चर्यकारी यन्त्रो में मिठवावे ॥ १६ ॥ शड्डयष्टिधनुश्चक्रश्छायायन्त्रैरनेकधा। गुरूपदेशाविज्ञेयं कालज्ञानमतन्द्रितैः ॥ २० ॥ तोययन्त्रकपालादीमयूर- .
१२२
सूर्य सिद्धान्त भाषानुवाद
नरवानरः। ससूत्ररेणुगर्भश्च सम्यक्कालं प्रसाधयेत्॥२१॥
पारदाराम्बुसूत्राणि शुल्यतैलजलानि चावीजानि पांस-
वस्तेपु प्रयोगास्तेऽपि दुर्लभाः ॥ २२ ॥ तासपात्रमध-
श्छिद्रं न्यस्तं कुन्देऽमलाम्भसि । पष्टिर्मज्जत्यहोराने
स्फुटं यन्त्रं कपालकम् ॥२३॥ नरयन्त्र तथा साधु दिवा
च विमले रवी। छायासंसाधनैः प्रोक्तं कालसाधनमुत्त-
मम् ॥ २४ ॥ ग्रहनक्षत्रचरितं ज्ञात्वा गोलं च तत्वतः ।
ग्रहलोकमवाप्नोति पर्यायेणात्मवानरः ॥ २५ ॥
इति ज्योतिपोपनिपदध्यायस्खयोदशः ॥ १३ ॥
भापानुवाद-निष्कपट तथा भ्रमरहित गुरु के उपदेश से गणक को चा.
हिये कि शङ्ख, यष्टि, धनु, चक्र और अनेक प्रकार के लायायन्त्र द्वारा फाल.
साधन फरे अर्थात् कालज्ञान करे ॥ २० ॥ कपालादि जलयन्त्र, मयूर नामक
स्वयंवह यात्र, शकुनामक नर या छायायन्त्र, या नरनामक स्वयंवह यन्त्र
बनाये और मयूरनामक स्वयंवह यन्त्र में इस प्रकार निपुणता से वालु भरे
जिस में क्रम २से ६० घड़ी मे सय यालु गिरजाये॥ पूर्वोत यन्त्र तथा पारे
से मिलाहुघा जलयन्त्र, मूत्र, शिल्प को निपुणता, तेल मिलाहुवा जल,पारा,
घालू इन सब का प्रयोग करना (सर्वसाधारण के लिये)बहुत कठिन है ॥२२॥
निर्मल जल भरे हुवे माटी के घड़े में एक तामे का बना हुवा कटोरा जिस
के नीचे खेद हो,रक्से, यह कपालकनामफयन्त्र अहोरात्र में साठ वार पाल में
डूबेगा ॥ २३ ॥ दिन मे जय बादलरहित आकाश स्वच्छ हो उस समय सूर्य
के आतप में छापाद्वारा फाल जानने के लिये नरयन्न ( १२ अगुल ) साधन
फरे ॥ २४ ॥ ग्रह नक्षत्रादि चरित (स्थित्यादि। भूगोल और खगोल को भली
मांति जानकर मनुष्य ग्रहादि लोको को यथावत् जानलेता है और आत्म-
ज्ञानी होजाता है ( जिस से मोक्ष होता है ) ॥ २५ ॥
इति भापानुवादे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
ओ३म् अथ चतुर्दशोऽध्यायः ग्राहां दिव्यं तथा पित्र्यं प्राजापत्यं गुरोस्तथा । सौर- ज्ज सावनञ्चान्द्रमाक्षं मानानि वै नव ॥ १॥ चतुर्भिर्व्य- वहारोऽत्र सौरचान्द्रक्षसावनैः । बार्हस्पत्येन पष्टयब्द ज्ञेयं नान्यैस्तु नित्यशः ॥ २॥ सौरेण सुनिशोर्मानं पड- शीतिमुखानि च । अयनं विथुवच्चैव संक्रान्तःपुण्यका- लता ॥ ३॥ तुलादिपडशीत्यहां पडशीतिमुखं कमात् । तञ्चतुष्टयमेव स्याद् द्विस्वभावेपु राशिपु ॥ १ ॥ पड्विंशे धनुपो भागे द्वाविंशे निमिपस्य च । मिथुनाष्टादशे भागे कन्यायास्तु चतुर्दश॥५॥ ततः शेपाणि कन्याया या- न्यहानि तु पोडश । क्रतुभिस्तानि तुल्यानि पिढणां दत्तमक्षयम् ॥६॥ भाषानुवाद कालमान नी प्रकार के हैं-ब्राहल. देव, पित्य. प्राजापत्य, याहस्पत्य, सौर, साधन, घान्द्र और नाक्षत्र भान हैं ॥१॥ उन में से लोक में मायः धार मानों का नित्य प्रयोजन पड़ता है. ये हैं-सौर,चान्द्र, नाक्षत्रिक और भावन । ६० वर्ष के ज्ञान के लिये रहस्पतिमान का प्रयोजन हता है एवं शेष ब्राह्म, देव,पिन्य, प्राजापत्य इन का प्रयोजन नित्य नहीं होता,परन्तु कभी होता है ॥२॥ अहोरात्र का परिमाण, यशोति मुख आदि, (म. क्रान्ति विशेष ) अयन,( उत्तरायण, दक्षिणायन ) विपुवत् और सक्रान्ति की पुण्यकालता ये सय सीरमान से निर्यात होते हैं ॥३॥ तुलादि राशि के भारम्भ से ८६ सौर दिन में पडशीति मुख नाम की संक्रान्ति होती है यह झन से धार द्विस्वभाय यालो राशियों में होती हैं ॥४॥ प्रथम पहशीति मुस धनु राशि के अश में, दूसरा मीनराशि के २२ अंश में, तीसरा मिथुनराशि के १६ अंश में, चीया कन्याराशि के १५ अंश में होता है ॥५॥ फन्याराशि के अपशिष्ट अंश ( अर्थात् १४ अंश तो पडशीतिमुरा शेय ६ अंश) याकार्य के लिये अच्छा है। इस समय पितृगण के लिये दिया हुवा अक्षय होता है विवरण-शा०६ स सुनय के दान की प्रशंसापरक धवन की उपए समझ में नहीं आती कि क्यों ऐसा लिखा है और न यह सिद्धान्त ज्यादि फा विषय है। पञ्चसिद्धान्तिका की टीका में भी महामहोपाध्याय प० सुधाकर .
मृर्यसिद्धान्त भाषानुवाद वेिदी जी इसी विषय पर लिखते है कि तुला आदिर्यस्था सा तुलादि कन्या नस्या पडशीतिमुरोपु ये दिवसा पोहशावशेषाः सन्ति ते पितृदिवसास्तत्र पि- णा दत्तमक्षय स्यादित्यत्र प्राचीनवचनान्येव प्रमाणानीति अर्थात् ताक पित दिवस मे दान देने से भक्षय होता है इस की कोई उत्पत्ति नहीं इस में प्राचीन वधन ही माण हैं। भचक्रनाभौ विपुवद्वितयंसमसूत्रगम् । अयनद्वितयं चैव चलसः प्रथितास्त ताः ॥७॥ तदन्तरेपु संक्रान्तिद्वितयं द्वितयं पुनः । नैरन्तर्यात्तु संक्रान्तेयं विष्णुपदीद्वयम् ॥८॥ भानोर्मकरसंक्रान्तेः पण्मासा उत्तरायणम् । क- र्कादेस्तु तथैव स्यात्पण्मासा दक्षिणायनम् ॥ ६॥ द्वि- राशिनाथाऋतवस्ततोऽपि शिशिरादयः । मेपादयो द्वा- दशैते मासास्तरेव वत्सरः ॥१०॥अर्कमानकला:पष्ट्या गुणिताभुक्तिभाजिताः। तदर्धनाड्यः संक्रान्तेराक्प- ण्यं तथापरे ॥ ११ ॥ अर्काद्विनि:सृतः प्राची यझात्य- हरह शशी । तच्चान्द्रमानमंशैस्तु ज्ञेया द्वादशभिस्तिथिः। भागानुवाद-नक्षत्रचक्र को नाभि ( बोध ) में दो विपुषत् ( मेष और तुला ) विन्दु (चित ! सममूत्रग ( बरावर ) हैं और उसी प्रकार दा अयन ( मकर अयनान्त ककट अयनान्त ) भी हैं। ये चार विन्दु सदा प्रसिद्ध हैं usu पूर्वोक्त दोनो विपुव अयन में निरन्तर दो सक्रान्ति होती हैं और जो चार सक्रान्ति उन के पीछे होती हैं उन को विष्णुपदी कहते हैं ॥८॥ (शेप स. कान्ति का नाम पडशीति है ) सूर्य के मकर ( मफर कुम्भ, मीन, सेप, रूप, मिथुन येउ राशि । सक्रान्ति के पीछे छ सौर मास की उत्तरायण सझा है और फर्कट की समान्ति ( कर्कट सिह कन्या, तुला, पथिक, धन, छ राशि) के पीछे उ मीरमास की. दक्षिणायन सज्ञा है ॥u मकर सक्रान्ति के पीछे सूर्य के दो२ राशि भ ग काल की शिशिरा ऋतुसना होती है और इस प्रकार १२ महीनो का धप होता है ॥ १० ॥ सूयनिम्बमान की फला को ६० मे गुणा फर गुणन फल मे मूर्य की दैनिकभुक्ति से भाग देने भागफल कलादि का आधार परिमित समय सकान्तिकाल में घटाने या जोडने से जो वियोगफल और योगफल रूप मे समय होगे उस का अन्तर (मध्य) अलिपुण्यप्रद होता है ॥ १९ ॥ सूर्य का साप छोड़ कर प्रतिदिन चन्द्रमा पूर्वदिशा में जाता है, उस चतुर्दशाध्याय के लिये सूर्य से १३ अश जाने को जितना समय लगता है उतने समय की एक तिथि सभा है ।। १२॥ तिथिः करणमुद्वाहः क्षौरं सर्वक्रियास्तथा । व्रतोपवा- सयात्राणां क्रिया चान्द्रेण गृह्यते ॥१३॥ त्रिंशता तिथि- भिर्मासश्नान्द्रः पित्र्यमहः स्मृतम् । निशा च मासपक्षा- न्ती तयोर्मध्ये विभागतः ॥१४॥ भचक्रभ्रमणं नित्यं ना- क्षत्रं दिनमुच्यते । नक्षत्रनाम्ना मासास्तु ज्ञेयाः पर्वान्त- योगतः ॥ १५ ॥ कार्त्तिक्यादिपु संयोग कृत्तिकादिद्वयं द्वयम्। अन्त्योपान्ल्यो पञ्चमश्व विधा भासत्रयं स्मृतम् ॥ १६ ॥ वैशाखादिपु कृष्णे च योग: पञ्चदशे तिथौ । कार्त्तिकादीनि वर्षाणि गरोरस्तोदयात्तथा ॥१७॥ उद- यादुदयं भानो सावनं तत्प्रकीर्तितम्। सावनानि स्युरे- तेन यज्ञकालविधिस्तु तैः ॥ १८ ॥ झापानुवाद-विधि, फरण ( अ०२ देखो) वियाह क्षीरादि (चौल कर्म) प्रत, उपवास (किसी यज्ञ या वैदिक सस्कार तिमित्त) यात्रा (कही जाना, उस की तारीख मालूम करना) ये सय चान्द्रमान द्वारा निर्णीत किये जाते हैं ॥१३॥ '३० चान्द्र दिन का एक प्रान्द्रमास होता है। एव इसी को पिश्य अहोरात्र भी कहते हैं । चान्द्रमास दो प्रकार का होता है । एफ अमावास्या मे अ भावास्या तक । दूसरा पूर्णमासी के पूर्णमासी तफा पहिले को अमान्त और दूसरे को पूर्णिमान्त चान्द्रमास कहते हैं। चान्द्रमास से १५ दिन फा पिय दिन और १५ दिन की पिश्य राति होती है ॥ १४ ॥ दैनिक नक्षत्रधक के घमणफाल का नाक्षत्रिक अहोरात्र होता है, और पूर्णमासी के अन्त में जो मक्षन होता है उसी के नाम से महीने का नाम हाता है ॥१॥ कार्तिकादि मास की पूर्णमासी से दो २ नक्षत्रों में एक एक भास होता है,परन्तु भाश्विन, भाद्रपद और फाल्गुन इन तीन मासो में तीन २ नसय होते हैं ॥ १६॥ जिस मफार वैशाणादि मास में पूर्णमासी की तिथि के ततत्र के नामसे नहीने का नाम होता है, उसी प्रकार एहस्पति के अस्त और उद्य समय पपक्ष को अमावास्या तिपि के नक्षत्र के नाम से घर्ष का नाम होता है सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक के मध्ययाती कार को 'सावना दिन कहते है। रसी मायन मान से यशकाल विधि निीत होता है। - भूप्यंसिद्धान्त भाषानुवाद सूतकादिपरिच्छेदो दिनमासाद्दपात्तथा । मध्यमा ग्रहभुक्तिस्तु सावनेनेव गृह्यते॥१९॥ सुरासुराणामन्योन्य- महोरात्रं विपर्ययात् । यत्प्रोक्तं तदभवेदिव्यं भानोर्भ- गणपूरणात् ॥ २० ॥ मन्वन्तरव्यवस्था च प्राजापत्यमु- दाहृतम् । न तत्र सुरा निशोभैदो ब्राझं कल्पः प्रकीति- तम् ।। २१ ॥ एतत्ते परमाख्यातं रहत्यं परमादभुतम् । अझैतत्परमं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २२ ॥ दिव्यं चाक्षं ग्रहाणां च दर्शितं ज्ञानमुत्तमम् । विज्ञायाकादि- लोकेषु स्थान प्राप्नोति शाश्वतम् ॥ २३॥ भाषानुवाद-सूतक (जन्म मरण सम्बन्धी) गादि । वैद्यकशास्त्र द्वारा रोगियों को उपचार कराने की विधि घान्द्रायण व्रत) आशीच, दिन,मास और वर्ष के अधिपति (अ० २ देरा) ग्रहों की दैनिक घा वार्षिक गति इन सब फा गणित मावनमान से होता है ॥१॥ उत्तर मेरु निवासी और दक्षिण मेरु निवासियों का अहोरात्र विपरीतनाव से होता है (देखो अ० १२)और सूर्य के भगण(राशि)पूर्ण फालकाही दिव्यदिनहोताहै॥२०॥मम्धन्तरकोव्यवस्था पहिले कही जा चुकी हे(देखोअ०१)वाही प्रजापत्यमान है इस में अन्यान्यमान की तरह दिनरात्रि का भेद नहीं और कल्प ही बाल नान है॥२१॥ हे मय । यह परम रहस्य ज्योतिष शास्त्र मैने कहा । खगोल विद्या होने से अन्यान्य विद्याओं से यह अद्भुत है । ज्योतिपसम्बन्धी अविद्यारूपी पापों का नाश करने वाला अतिपवित्र है, मानो ब्रह्म ही है। ( राष्टिसम्बन्धी यथावत् ज्ञान होने से ब्रल की प्राप्ति होती है।॥२२॥ ग्रह और नक्षत्रादिफ आकाशस्य पदार्घसम्बन्धी उत्तम शान मैंने तुम से फहा है। उस का यथावत् जानने से अनुत्तम सुख माप्त होता है। एवं ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है॥२३॥ यहाँ २३ में से आगे निम्रलिखित २९ लोक फिसी २ पुस्तक में पाये जाते हैं, जिन को रङ्गनाय टीकाकार ने लिखा है कि ये शोक फिसी पृष्ट ने प्रक्षिप्त किये हैं। हन भी सूखमात्र छापे देते हैं । यथा- “यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा । तहदेदाङ्ग- शास्त्राणां गणितं मर्धनि स्थितम् ॥ १॥ न देयं तत् कृतनाय चतुर्दशशाध्याय वेदविनायकाय च । अर्थलुम्याय मुख्य साहंकाराय पापिने ॥ २ ॥ एवंविधाय पुत्रायाप्य देयं सहजाय च । दत्तन वेदमार्गस्य समुच्छेदः कतो भवेत् ॥ ३ ॥ व्रजतामन्धतामिस्त गुरुशिष्यो तुदारुणम् । ततः शान्ताय शुचये ब्राह्मणायव दापयेत् ॥ ४ ॥ चक्रानुपातजो मध्यो मध्यवृत्तांदाजः स्फुटः । कालेन हक्समो न स्यात् ततो बीजकियोच्यते ॥ ५ ॥ राश्यादिरिन्दरकनी भक्तो नक्षत्र क्षया । शेपं नक्षत्रकलायात्पजेच्छपकयोत्तयोः ॥६॥ यदल्पं तद्भजेदानां कक्षया तिथिनिघ्नया । वीजं भागादिकं तत् स्यात् कारयेत् तदनं चौ ॥७॥ त्रिगुणं शोवयेदिन्दौ निननं भूमिजे क्षिपेत् । दृग्यमनामृणं जोचे खरामन्नं गुरावृणम् ॥ ८॥ ऋणं व्योमनवघ्नं स्यादानवेज्याचलोचके | धनं सप्ताहतं मन्दे परिधीनामयोज्यते ॥ १ ॥ युग्मान्तोक्ताः परिधयो ये ते नित्यं परिस्फुटाः । भोजान्तोक्तास्तु ते ज्ञेयाः परवीजन संस्कृताः ॥१०॥ यस्मि निर्वाजकानोजपदान्ते वृत्तभागकान् । सूर्येन्दोमनवो दन्ता धृतितत्त्वकलोनिताः ॥ ११॥ बाणतो महीजस्य सौम्यस्या. चलायाहवः । चापतेरष्टनेत्राणि व्योमशीतांशवोभृगोः ॥ १२ ॥ शूयर्तवोऽर्कपुत्रस्य बीजमेतेपु कारयेत् । बीनं वाग्न्यद्धृतं शोध्यं परिध्यशेष भास्वतः ॥१३॥ इनाप्तं योजयदिन्दोः कुजस्याइवहतं क्षिपेत् । विदश्चन्द्हेत याज्यं सूररिन्द्रइतं धनम् ॥ ११ ॥ धनं भृगार्भुवा निघ्नं रचिन शाधयेच्छनः। एवं मान्दाः परिध्यशास्फुटाः स्युर्वमि शीघ्रकान ॥ १५ ॥ भौमस्याघ्रगुणाक्षीणि बुधस्याधि- गुणेन्दवः । चाणाक्षा देवपूज्यस्य भार्गवस्पन्दुपड्याः || १६ ॥ शनेश्चन्द्राव्ययः शौघा माजान्ते वीजवर्जिताः । हिनं स्वं कुज- भागेषु बीजं दिनमृणं विदः ॥ १७ ॥ पत्त्यष्टिनं धनं सूरेरिन्दुनं - मूर्य सिद्धान्त भापानुवाद शोधयेत् कवेः। चन्द्रग्नमृणमार्फस्य स्युरेभिट्टक्समा ग्रहाः ॥१८॥ एतहीजं मया ख्यातं प्रीत्या परमया तव । गोपनीयमिदं नियं, नोपदेश्यं यतस्ततः ॥ १९ ॥ परीक्षिताय शिष्याय गुरुभक्तीय साधये । देयं विप्राय नान्यस्मै प्रतिकञ्चककारिणे ॥ २० ॥ वीजं निःशेषसिद्धान्तरहस्यं परमं स्फुटम् । यात्रापाणिग्रहादीनां कार्याणां शुभसिद्धिदम् ॥ २१ ॥ इत्युक्त्वा मयमामन्त्र्य सम्यक् तेनाभिपूजितः । दिवमा- चक्रमेऽकींशःप्रविवेश स्वमण्डलम् ॥२४॥ मयोऽथ दिव्यं तज्ज्ञानं ज्ञात्वा साक्षादविवस्वतः कृतकृत्यमिवात्मानं मेने निर्धूतकल्मपम् ॥ २५ ॥ ज्ञात्वा तमृपयश्चाथ सूर्य- लब्धवरं मयम् । परिवQरुपेत्यांथो ज्ञानं पप्रच्छुराद- रात् ॥२६॥ स तेभ्यः प्रददौ प्रीतो ग्रहाणां चरितं महत् । अत्यद्भुततमं लोके रहस्यं ब्रह्मसम्मितम् ॥ २७ ॥ इति सूर्यसिद्धान्ते मानांध्यायश्चतुर्दशः ॥ १४ ॥ भापानुवाद-इस प्रकार मयासुर को सूर्याश पुरुप अच्छे प्रफार ज्योतिष फा उपदेश कर अपने स्वर्गतुल्य सूर्यमण्डल में प्रवेश कर गया ॥४॥ सूर्यांश पुरुष के अन्तदान होने पर मयासुर ने सूपीश पुरुष से जान पाने पर भी अपने को साक्षात् सूर्य ही से शान पाया जाना। इस विचार से पापरहित और कृतकार्य समझने लगा॥ २५ ॥ मूर्य के वरदान से ज्योतिष का जान मयासुर को प्राप्त हुआ। ऐसी जनश्रृंति मुन कर मुनिगण उस के पास आकर आदर- सहित ज्योतिषसम्बन्धी ज्ञान पूंछने लगे ॥२६॥ और मयासुर ने भी ऋषियों के सत्कार से प्रसन्न होकर उन को ज्योतिष का ज्ञान महादिकों की स्थित्यादि अतिअद्भुत और रहस्य मानो मोक्षशास्त्रस्वरूप का उपदेश किया ॥ २ ॥ इति सूर्यसिद्धान्ते भापानुवादे चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥ समाप्तश्च सूर्यसिद्धान्तः ॥
विशेष ध्यान देने योग्य बात पृष्ठ ३ की २३ वी पति से २४ वे पृष्ठ की प्रथम पक्ति तक जो विवरण लिखा गया है, उस की अब आवश्यकता नही रही, कारण यह है कि ग्रन्थ छपने के पूर्व यह विचार था कि अनुवाद के साथ उदाहरण और चित्र भी दिये पाव अनेफ कारणो से इस भावत्ति मे चित्र नही दिये गये द्वितीय आपत्ति में भावश्यक मित्र और उदाहरण और प्रत्युदाहरण भी दिये जायेंगे।