Sanmati Library, Jaipur

Bhaktamar Stotram

Jaini, Gyanchandra · 2009/11

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भूमिका। - यह भक्तामर संस्कृत पाठ श्रीमानतुंगाचार्य रचित हैं और इस का शब्द अर्थ अन्वयार्थ भाषार्थ हमने लिखा है और भाषा पाठ पण्डित हेमराज कृत है कठिन शब्दों का अर्थ हमने लिखा है परन्तु काल दोष से अन्यमति लेखका में भक्तामरे संस्कृत की ६वीं और ४५वीं काव्य और भाषा पाठ के. ३९ और ४४ छन्द में ऐसे शब्द प्रचलित कर दिये थे। जो स्त्री और पुरुषों की विषयेद्रियों के नाम हैं जब कभी स्त्री और मरद या पिता और पुत्र या पुत्री मिल कर यह पाठ पढ़ा करते थे. तो महा लज्जा का स्थान होता बल्कि जब कभी कोई विषया पण्डित कभी किसी स्त्री को यह पाठ पढ़ाता था तो बार बार इन शरमनाक शब्दों का उच्चारण करने से उस स्त्री के शील भंगका कारण होता था तो दैवयोग ले तलाश के बाद शुद्ध पाठ मिल जाने से. हमने संस्कृत का पाठ ठीक कर और संस्कृत के अर्थ के साथ भाषा का मिलान कर सर्व त्रुटियां दूरकर दोनों-पाठ अति शुद्ध कर छापे हैं भाषा छन्द ३२ में रवि नहीं रख पढ़ो छन्द १३ में डाकपत्र नहीं पीन पत्र पंदो। इस स्तोत्र का नाम भकामर कहने का यह कारण है कि इस स्तोत्र के आदिमें भक्तामर पाठ होने से इसे भक्तामर कहते हैं अथवा जो भक्त शुद्ध मन करके इस स्तोत्रको नित प्रति पढ़ें वह अमर कहिये. देवता अथवा अ.कहिये नहीं, मर कहिये मरना यानि नहीं मरने वाले अर्थात सिद्ध होजाते हैं।

मी मो. गैमूषा मक्तामरस्तोत्रम्। बसन्त तिलकछन्दः। भक्तामरप्रपातमौलिमणिप्रभाणा । मुद्योतकं दलितपापतमो वितानम् । सम्यक् प्रणम्य जिनपादयुगयुगादा, वालंबनं भवजले पततां जनानाम १५ ५ शब्दार्थ-भक-नाने घाल। अमर -देवता। प्रणात = प्रणाम करते! मौलि-मस्तक (माट)। मणि परन । प्रना -फांति । उद्योतकं प्रकाश करनेवाला. दलित दूर कर दिया है। पाप पाप कपी । तमः = अंधेरा। वितान समूह । सम्यक-मली प्रकार | प्रणम्य प्रणाम करके। जिनपाद-जिनेन्द्र के चरण युग-यो । युगादी-शुग के भादि मा भालंम्बन -संहारा। भयजल संसाररूपी पानी गात् संसार समुद्र । पतता -गिरते हुये जिन-जीव " गन्ययाधं-मक्ति करनेवाले जो देवता उनके नमें हुए जो माथे उनके मुकुंटों को मणि (रनों की कांतिका भी प्रकाशक, दूर कर दिया है पाप कप अन्धेरे का समूह जिसने और संसार रूपी जल (समुद्र में गिरते जीयों का सहारा ऐसा जो "युगादि में हुप" जिन का पाद युगल उस को भली भांति प्रणाम करके। मांधा-यहां माघार्य काहते हैं कि प्रभो आपके चरणों में इतनी ज्योति है कि जिस समय इन्द्र नमस्कार करते हैं उनके मुरी में जड़े हुए जो रत्न जगमग जगमग करते हैं। वह चमक उन रगों में केवल आपके चरणों को प्रभा पड़ने से ही पैदा होती है माप चरणपाप रूपी अंधेरे के नाशफ, संसार रूपी समुद्र में गिरते हुए प्राणियों को क्षाथ से पकड़ कर बचाने वाले हैं। आदि पुरुष आदीशजिन, आदिसुविधि करतार । "धर्मः धुरन्धर परमगुरु, नमो आदि अवतार॥ ॥ १५ मात्रा चौपाई छन्द ॥ नतेसुर मुकंट रत्न छवि करें। अन्तर पाप तिमिर सब हरें। जिनपद बन्दं मन क्च.काय । भवजल पतित उद्धरणसहाय ।।

४ भक्तामर स्तोत्र। यःसंस्तुतः सकलवाङ्मयतत्वबोधा दुद्भुतबुद्धिपटुभिःसुरलोकनाथैः। स्तोत्रैर्जगत्रितयचित्त हरैरुदारैः, स्तोष्यकिलाहमपितं प्रथमं जिनेट्रम ॥२॥ शब्दार्थ-य-जो । संस्तुता =स्तुति किया गया। सकल - सभी 1 वाडमय (शास्त्र) तत्व = यथार्थसार । बोध ज्ञान । उद्भूत उत्पन्न हुई। बुद्धिमान । पटु-चतुर ।सुरलोक-स्वर्ग । नाथ स्वामी। स्तोत्र-स्तुति जगत - संसार। त्रितय -तीन । अर्थात् स्वर्ग मय (मनुष्यलोक) पाताल । वित्त (दिल)। हर-हरने घाले । उदार अच्छे । स्वाध्य = स्तुति करता हूं। किल-निश्चय से । अहं-मैं। अपि-भी। तं-उसको। प्रथम-पहिले। जिनेन्द्र आदि नाथ ॥ अन्वयार्थ समस्त शास्त्र के तत्वज्ञान से उत्पन्न हुई जो बुद्धि उस करके चतुर जो इन्द्र उन करके तीन लोको के विक्ष,को हरने वाले उज्वल 'स्तोत्रों से जो स्तुति किया गया है उस आदि जिनेन्द्र की मैं भी स्तुति करता हूं। भावार्थ-इस द्वितीय छन्द में कवि (आचार्य) ने स्तोत्र रचने की प्रतिज्ञा करी है और यहां आचार्य कहते हैं कि इन्द्र जैले बुद्धिमान स्तोत्र कर्ता जिस प्रभु की स्तुति करते हैं उस भगवान् की मैं भी स्तुति करने लगा हूं। श्रुतिपारगइंद्रादिकदेव । जाकी स्तुति कीनी कर सेव ॥ शब्द मनोहर अर्थ विशाल । तिसप्रभु की वरणु गण मालं।२। मादि पुरुष -मथम पुरुप । आदिश जिन-प्रथम जिनदेव । आदि सुविध करतार = कर्मभूमिके आदि मैं विधिक कर्ता । धर्मधुरंधर धर्म की धुरा (भार) के धारणाला॥ १-तसुर-तत (नम्र) भक्त जोसुर देवता छघि-शोमा । अन्तर-मीतर, का पाप तिमिर पाप रूपी अन्धेरावच घाणी काय देह । भष-संसार अल-(जलषि) समुद्र । पतित गिरे हुए। उद्धरण-निकाललेना। २- श्रुतिपारग-शास्त्र के पार जाने वाले । मनोहर-सुन्दर । विशाल- बहुत विस्तार वाला मनु स्वामी । गुणमाल-गुणों की माला (गुण समूह)।- - - भक्तामर स्तोत्र। ५ बुद्ध्या विनाऽपि विवधार्चित पादपीठ, स्तोतुसमुद्यतमतिविंगतत्रपोऽहम्। बालं विहाय जलसंस्थितमिंटुबिंब, मन्यःकडूच्छतिजनः सहसाग्रहीतुम् ॥३॥ बुदया-धुद्धि से । बिना-बगैर । भपि = भी। विबुध देवता ।अचिंत पूजित। पादपीठ =छोटी चौकी। स्तोतुं स्तुति करने के लिये । समुद्यत तैयार मति -बुद्धि । विगत = दूर होगई। प्रपालज्ञा(शरम) । अहं - मैं । यालंघच्चे. को। विधाय-छोड़ कर। जल-पानी। संस्थित ठहरा हुभा। इन्दु सचांद । विम्य = मण्डल । अन्य दूसरा । का कौन । इच्छति चाहता है । जना मनुष्य सहला- जलदी प्रस्तुं-पकड़ने को । अन्वयार्थ-देवतायों करके पूजा गया है पादपीट जिसका ऐसे हे स्वामिन् ! दूर होगई है लज्जा जिसकी ऐसा में बुद्धि से बिना ही स्तुति करणे को तैयार हुवा ८, पानी में स्थित धान्द के प्रतिविंय को बिना बालक के दूसरा कौन मनुष्य शीघ्र प्रवण करना चाहता है। भावार्थ-जैसे जल में पड़े हुवे चान्द के प्रतिविम्ब को महा मूढ़ पालक पकड़ना चाहे वैसे मैं भाप की स्तुति करने लगा हुँ अर्थात् यहां भाचार्य कहते हैं कि हे भगवन् जैसे पानी में पड़े बांद के प्रतिविम्य को पकड़ना असंभय है वैसे ही मेरी पद्धि पर आपका स्तोत्र रचना असम्भव है, तो भी मैं शरम छोड कर आपका स्तोत्र रचने को उद्यमी हुआ। विधुधवंद्य प्रभु मैं मतिहीन । होय निलज स्तुति मनसा कीन । जल प्रतिविम्ब बुद्धको गहे । शशिमण्डल बालक ही चहे ॥३॥ ३--विबुध देवता । निलज (निर्लज्जा- बेशरम । जलप्रतिविम्ब = पानी में पड़ा दुवा चान्द का प्रतिविम्व । शशिमण्डल-चाम्द । बुद्ध पण्डिन । गहे पकड़े। बालक म्यच्चा (मूग्) । बहे इच्छे है ॥.

भक्तामर स्तोत्र। tor बक्तुं गुणान् गुणसमुद्र शशांक कांतान, कस्ते क्षमः सुरगुरुप्रतिमोऽपि बुद्ध्या । कल्पातकालपवनोइतनाचक्र, कोवोतरीतुमलमंथुनिधिं भुजाभ्याम् ॥४॥ - वक्तुं-कहने को गुणानं गुणों को | गुणसमुद्र -हेगुणों के सागर। शशांक -चांद । कांत-सुन्दर । का कौन । ते तुम्हारे । क्षमः = समर्थ । सुरगुरु- वृहस्पति । प्रतिमा -समाम। अपि भी बुद्धया - बुद्धिसे । कल्पांतकाल -प्रलयकाल पवन वायु । उद्धत -उछाले । नक - मगरमच्छ । वक्र-समूह । का- कौन । पा भथवा । तरीतुं = तैरने को । गलं समर्थ । अम्वुनिधि समुद्र । भुजाभ्यां - भुजाओं से हाथों से)। अन्वयार्थ हे गुणों के सागर! चान्द के समान मनोहर तेरे गुणों के कहने को बुद्धि से वृहस्पत्ति के तुल्य भो कौन पण्डित समर्थ है। प्रलय काल की वायु से उछल रहे है नाकूधों के समूह जहां ऐसे समुद्र को भुजावों से कौन तैर सकता है। भावार्थ-यहां आचार्य कहते हैं कि हे गुणों के सागर भाप के गुण असंख्य हैं जब वृहस्पति सारखे बुद्धिमान भी आप के गुण वर्णन करने में अशक्त हैं तव मेरी । अल्पबुद्धि कर भापके गुणों का वर्णन करना हाथों ले अगाध समुद्र के तरने के समान है। गुणसमुद्र तुम गुणअविकार । कहत न सुरगुरु पावे पार ॥ प्रलय पवन उद्धत जलजन्ता जलधि तिरे को भुजबलवन्त॥३॥ ४-गुणसमुद्रगुणों का सागर । अविकार -विकार से रहित (शुद्ध)। सुरगुरुम्वृहस्पति । पवन वायु । उद्धत -उछलते । जलजन्त जल के जीव । जलधिसमुद्र भुज-चांह से । बलवन्त बलवाला ॥ --- भक्तामर स्तोत्र। ७. सोऽहं तथापि तव भक्तिवशान्मुनीश, कतुं स्तवं विगतशति रपि प्रवृत्तः । प्रीत्यात्मवीर्यमविचार्यमगी मृगेन्द्र, नाऽभ्येति किनिजशिशोःपरिपालनार्थम् ॥५॥ सोहम् = लो मैं । तथापि-तौ भी । तव = तुम्हारी । भक्तिवशात् = भक्ति के पश से । मुनीश मुनीश्वर । फत् = करणे को स्तव-स्तोत्र । विगत दूर होगई। शक्ति सामथ्र्य । अपि-प्रवृत्त = तत्पर (मशगूल) प्रीत्या प्रेम से । आत्म बीर्यः अपनी ताकत । अविवार्य विना विचारे । मगी-हिरनी। मृगेन्द्र' शेर । नाभ्येति सन्मुख नहीं भाती । किम्फ्धा । निजशिशोः = अपने बच्चे के। परिपालमार्थम् - बचाने के लिये ॥ अन्वयार्थ-तो भी हे मुनीश शक्ति हीन भी मैं तुम्हारी भक्ति के वश से स्तोत्र यनाने के लिये प्रवृत्त हुआ हूं। हिरणी प्रेम से अपनी ताकत को न विचार कर अपने बच्चे के अचानक लिये शेर के सन्मुख पचा नहीं जाती। भवार्थ-जैले हिरणी अपने में शेर के मुकाबले की ताकत न होते हुए भी अपने बच्चे की प्रीति के घश से शेर के सन्मुख जाती है वैसे ही मैं यह जानता भी हुँ कि मेरे में आपके स्तोत्र बनाने को लियाकत नहीं है तो भी मैं हे महन्त भगवन् माप के प्रेम के वशीभूत हुआ आप का स्तोत्र वानने में तत्पर (मशगूल ) हुआ हूं । सो मैं शक्तिहीनस्तुतिकरू । भक्तिमाव वश कुछ नहीं डरूं । ज्यूं मृगी निज सुत पालन हेत । मृगपति सन्मुखजाय अचेत ॥५ ५-शक्तिहीन सामर्थ्य से रहित (कमजोर)। भाव-भावना । मृगी- हिरणी । निज-अपना । सत-पुत्र । हेत=लिये । मृगपति-शेर । अचेत विना समा

भकामर स्तोत्र।
अल्पश्रुतंश्रुतवतां परिहासधाम,
त्वद्भक्तिरेवमुखरीकुरुते बलान्माम्
यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरोति,
तच्चारुचामकलिकानिकरक हेतुः ॥ ६ ॥
भल्पथोड़ा। श्रुत शास्त्र । श्रुतवता - पण्डितों को परिहास -हांसी ।
• धाम पात्र । स्वद्भक्ति-तुम्हारी भक्ति । एच-ही। मुखरीकुरुते वाचाल करती
है। बलात्-जोर से। मां-मुझे । यत्-जैसे (जो) कोकिला कोयल ! किल-
निश्चय से । मधौ बसन्त में। मधुर- मीठा परौति भन्द करता है । तत्वह।
बार मनोहर । मान-माम । कलिकाकाली (मन्जरी वा कोहर)निकर समूह ।
एकहेतु-एक खास लक्ष ।
अन्वयार्थ-हे प्रभो थोड़ा पढे हुचे और विद्वानों की हांसी के स्थान मुझ
को आप की भक्ति जोरावरी से बहुत बोलने वाला करती है जो वसन्त ऋतु
..कोयल मीठागाती है उसमें मनोहर आम को मञ्जरी का समूह ही सबध है ।।
भावार्थ-हे भगवन जैसे घसन्त ऋतु में आम के कोर के प्रभाव से तृप्त
हुई हुई कोयल मीठे मीठे शब्द करती है उसी तरह से मुझ- फम इलम मालमों की
हांसी के स्थान को आप की भक्ति जोर सोर से.धारा प्रवाह अपकी स्तुति करने
को मजबूर करती है.॥
नोट-इस श्रीमानतंगावार्य रचित काव्य में किसी ने आन शब्द दूर कर
उसकी जगह एक ऐसा लज्जा उपजाने वाला शब्द गूंथ दिया था जो स्त्री के उस
पोशीदा अंग का नाम है जिस सें पुत्र पुत्रो जन्मते हैं देखो जैनस्तोत्र संग्रह पृष्ठ
छापा बम्बई सं० १९४७ वि० सो इस समय तक किसीने भी उस दोष के दूर करनेकी
कोशिश नहीं की जय हमने प्रथम यह संस्कृत पाठ छापा तब यह त्रुटी दूरकरी थी।
मैं शाठ बुद्धि हसन को धाम । तुम मुझ भक्ति बुलावे राम ॥
ज्यूंपिक, अम्ब कली परभाव । मधऋतु मधुर करे आराव ॥६॥

९ भक्तामर स्तोत्र त्वत्संस्तवन भवसंततिसन्नि बई, पापंक्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम् । आक्रांतलोकमलिनीलमशेषमाशु, सूर्यांशुभिन्न मिव शावरमंधकारम् ॥ ७ ॥ स्वरसंस्तवेन -तुम्हारे स्तोत्र से। भवसंतति जन्म समूह । सन्निवचं- बन्धे हुये । पाप गुनाह । क्षणात् थोड़े वकत में । क्षयं नाल को । उपैति प्राप्त होते हैं । शारीरभाजां देहधारियों के अक्रांतअलोक दुनिया में छारहा अलिनीलं - भ्रमरके समान नीला । अशेप-कुलआशु - जल्दी । सूर्य रवि । अंशु-किरण । मिन्नं दूर किया । इच-तरह । शार्वर = रात का । अन्धकार अन्धेरा ॥ अन्वयार्थ-हे प्रभो ! जैसे जगत् को माक्रमण करणे वाला भौरे के समान काली रात का तमाम अन्धेरा सूर्य की किरण से फटा हुआ तत्काल नष्ट होजाथ है वैसे ही प्राणियों का जन्म जन्मान्तर से बंधा हुआ पाप कर्म आपके स्त्रोत से क्षण में नाश को प्राप्त होता है। भावार्थ-हे भगवन जैसे जगत में छाया हुमा भी अन्धकार सूर्य के प्रकाश से नष्ट होजाता है। वैसे ही आप का स्तोत्र पढने से अनेक जन्म के पांधे हुए पाप क्षण मात्र में जाते रहते हैं। तुम यश जपत जन छिन माहि । जन्म जन्म के पाप नसाहि । रवि उदय फटे तत्काल | अलिवत् नील निशा तम जाल ॥७॥ " ७-जपत - जपना (उच्चारणा)। नसाहि-नस जाते हैं । रवि-सूर्य । --- उदय-गना॥ '' भलिवतभौरे के समान । नील नीला, काला । निशा रात। तम- जाल-अन्धेरैका समूह ॥

भक्तामर स्तोत्र महवेति नाथ तव संस्तवनंमयेद, मारभ्यते तनुधियाऽपि तव प्रभावात्।" चेतोइरिष्यति सतां नलनीदलेश, मुक्ताफलद्युतिमुपैति नन्दविन्दुः॥८॥ - मत्वा मानकर । इति = यह । नाथ स्वामिन् । तब-तुम्हारा | संस्तवन स्तोत्रमया मेरेले। यह । आरभ्यते -शुरु किया गया है तनुधिया कम पुद्धि ले । मपि - भी। तब-तुम्हारे। प्रभाव:-प्रताप । चेतो-दिलको । हरिष्यति -चुरालेगी। सतासज्जन । नलिनी-कमलिनी। दल-पत्र: मुक्ताफल = मोती। युति-कति । उपैति-पाता है । ननु = निश्चय से । उदबिन्दु - जलकी बून्द । भन्वयार्थ-हे स्वामिन् । यह जान कर तुम्हारे प्रभाव से थोडी बुद्धि करके भी तुम्हारा स्तोत्र मेरे से शुरू किया जाता है तो यह स्तोत्र सज्जनों के वित्त को हरेगा। जल की बून्द कमलनी के पत्ते पर पड़ी हुई मोती की शोभा को धारती है। भाषार्थ- हे भगवन जैसे कमल के पत्र पर पड़ी हुई पानी की बून्द मोती समान भासती है यही मानकर मैंने आपका स्तोत्र बनाना शुरु किया है । लो उमेद करता हूं कि मुझकम इलमसे किया हुआ यह आप का स्तोत्र (गुणानुवाद) सज्जनों के चित्स को हरेगा। तुमप्रभाव ते करूं विचार । होसी यह थुति जनः मन हार ॥ ज्यों जल कमल पत्र पे परे । मुक्ताफल की युति विस्तरे॥८॥ ८-प्रभाव प्रताप । होसी होवेगी। मनहार=मन को हरने वाली। पत्र पचा। परै-गिरे।मुकाफल-मोती द्युति=कान्ति ।।

भकामर स्तोत्र। ११ पास्तां तव स्तवनमस्तसमस्तदोर्षे, त्वत्संकथाऽपि जगतांदुरितानि इंति। दूरे सहस्रकिरणः पञ्चाकरेषु जलजानि विकाशभांजि ॥६॥ कुरुते प्रभैव, मास्ता (दूर) रहो । तव = तुम्हारा । स्तवन स्तोत्र । अस्त-नाश(दूर) होना। समस्त सकल । दोष गुनाह । त्वत्-तुम्हारी । संकया भच्छी कथा । अपि भी जगतां संसार के दुरित-पाय । हन्ति नाश करती है। दूरे दूर, सहस्र किरण -सूरज। कुरुते करता है। प्रभा-तेज। एक ही पद्माकर सरोवर जलज-कमल विकाशमाजि-खिलने वाले। ....,मत्वयार्थ-दूर कर दिये हैं सकल .पाप जिसने एसा आपका स्तोत्र तो दूर रहो आपको तो कथा ही पापों को दूर करती है सूज तो दूर रहो सूरज कांतिही सरोवरों में कमलों को खिलाने वाले कर देती है। भावार्थ-हे भगवन, जैसे सूर्य तो बहुत दूर है सिरफ उसके उगने के पूर्व उसं कर किये हुवे उजाले से प्रात:काल कमल खिल जाते हैं तैसे ही भाप का स्तोत्र तो एक गुत बड़ी बात है केवल तुम्हारे नाम मात्र के उच्चारण से हो जीवों के पाप दूर होजाते हैं। तुम गुण महिमा हत दुःख दोष। : सो तो दूर रहो सुख पोष॥ पाप विनाशक है तुम नाम । कमल विकासे ज्यु रविधाम ॥९॥ - महिमा, माहातम्य, (बडाई)। हन = नाश करनेवाली विकाशे- खिलायें। रविधाम सूरन का तेज ।।

भक्तामर स्तोत्र। नात्यद्भुतं भुवन भूषण भूत नाथ, भूतैर्गुणैर्भुवि भवंतमभिष्टवंतः। तुल्या भवंति भवतीननु तेनकिंवा, भूत्याश्रितंयङ्कहनात्मसमं करोति ॥१०॥ -- न-नहीं । अत्युद्भुतं = बड़ा आश्चर्य । भुवन =संसार भूषण = अलंकार (जेवर)। भूत-प्राणि । नाथ = स्वामी । भून-सुन्दर । गुणगुण । भुवि जमीन पर भवन्त आपको । अभिष्टुवन्तः = स्तुति करते हुए । तुल्या-घरोवर भवन्ति: होते हैं । भवतः तुम्हारे । ननु निश्चय से । तेन -उस करके। किया। घा अथवा । भूति विभूति । श्रितं -दास। या-जो। इह = यहां । न नहीं । आरमसम - अपने लमान । करोति करता है। मन्वयार्थ हे जगत् के भूषण मतों प्राणियों के स्वाभिन पृथ्वी में सच्चे गुणों कर भापको स्तुति करते हुये भक यदि आप के तुल्य होजाते हैं तो इसमें क्या भाश्चर्य है। इस जगत में जो अपने आश्रित को विभूति करके अपने समान नहीं करता उस से क्या। भावार्थ-हे नाथ इस जगत में वही स्वामी श्रेष्ठ हैं जो अपने माश्रित को विभूति कर अपने समान कर देते हैं सो यदि आपको भजते भजते जो भक्त जीव, इस ही दुनिया में आप के समान होजाते हैं तो इस में क्या आश्चर्य है। नहीं अचंभ जो होय तुरन्त। तुम से तुम गुण वरणत सन्त। जो आधीन, कोआप समान। करे न सो निन्दित धनवान् ॥१०॥ १०-भचन अचमा(भाश्चर्या)। तुमसे तुमजैले भाधीन सेवक(भक्त)।

है -- भक्तामर स्तोत्र । १३ ܝ ܦܕ܀ दृष्ट्वा भवंतमनिमेषविलोकनीयं, नाऽन्यत्र तोषमुपयाति जनस्यचक्षुः। पीत्वा पयः शशि करद्युतिदुग्धसिंधोः, .. चारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत्॥११॥ दृष्टवा देख करके । भवन्तं = आपको मिनिमेष बिना आँख के झसकने से बिलोकनीयं देखने योग्य । न नहीं । मन्यत्र और जगह । तोष =आनन्छ । उप-याति -पात्ती है । जनस्य -मनुष्यकी । चक्षा आँख पीत्वा = पी करके । परः = दूध। शशि कर चांद को किरण धुति कांति। दुग्धसिंधुः क्षीरसमुद्र । सात- खारी । जल पानी । जलनिधि ससूद्र । मसितुं-पीने । कोक-कौन् । इच्छेत् चाहे। -अन्वयार्थ-- हे प्रभो न झमकने से देखने योग्य आपको देख कर मनुष्य की आंख मूसरी जगह आनन्द को नहीं पाती । चन्द्रमाकी किरणों की शोभा के समान शोभावाले क्षीर समुद्र के दूध को पीकर दूसरे समुद्र के खारे पानी पीने को कौन चाहता है। भावार्थ- हे भगवन काल के भेदों में आंख झमकने मात्र वकत (एकपलक) थोडासा समय है सो भाप का यह देखने योग्य (दिलकश) स्वरूप नहीं शमकती है आंख जिस की लगातार देखनेवाला) एक पलक तो क्या अगर जरा मो इन्सान की आंख देख लेवे तो फिर यह आपको देखतो हुई पलकमात्र भी दर्शनाभाव नहीं सहती हुई लगातार आप को ही देखने की इच्छक किसी दूसरे को भी देखना पसंद नहीं करती क्योंकि क्षीर समुद्र के उज्जल दुग्ध को पीकर खारे समुद्र का जल कौन पीना चाहता है नोट-भरतकी मांख कभी नहीं झमकतो ओर देखने वालों की भांख भी उन को देख कर यहो चाहती है कि मैं उन के स्वरूप को देखे जाऊ शमकुं नहीं ॥ इकटक जन तुम को अविलोय । और विषे रति करे न सोय ॥ को कर क्षौरजलधि जल पान क्षार नीर पीवे मति मान । । -- --- भक्तामर स्तोत्र यैःशतिरागरुचिभिः परमाणुभिस्त्वं निर्मापितस्चिभुवनैकललामभूत। तावंत एव खलु तेऽप्यणवः पृथिव्यां यत्तसमानमपरं महिरूपमस्ति ॥१२॥ - यै-जिन्हों करके । शांतराग जाता रहा है रागजिनका रवि-इच्छा। परमाणु = पदगलका सबसे छोटा हिस्सा (जरी) स्विं भाप निर्मापित-घनायागया। त्रि-तीन । भुवन जगत् । एक-अकेला। ललामभूत-भुषणरूप । तायन्तः = इतने पव-हो । खलु -निश्चयसे । तेथे। अपि =भी। अणका (परमाण)। पृथिवी = जमीन। यत् जिससे।ते-तुम्हारे । समान तुल्य । अपर - दूसरानहीं नहीं। रूपं रूप। अस्ति है। । अन्वयार्थ-हे भगवन् तीन भुवनों के भूषण रूप तुम, शांत होगये हैं राग (मोह) अथवा (रंग) और रुचि ख्वाहिश जिनके ऐसे जिनपरमाणुचों से आप बनाए गए हो वह परमाणु उतने ही थे जिससे कि तुम्हारे समान दूसरा रूप पृथ्वी में नहीं है । भावार्थ-हे भगवन आप तीनलोक के भूषण हो जिन शांतराग इच्छा रहित “परमाणुवों से आपका शरीर बना है वह जगत् में उतने ही थे यही कारण है कि आप जैसाकप और किसी दूसरे का नहीं है। तुम प्रभु वीतराग गुण लीन । जिन परमाणु देह तुम कीन॥ हैं जितने ही ते परमान। यातें तुम सम रूप न आन ॥१२॥ १२-परमाणु -सबसे छोटा जरी मान =और, दूसरा ।

भकामर स्तोत्र। - वक्चं क्व ते सुरनरोरगनेवहारि, निशेषनिर्जितजगचितयोपमानम्। बिम्बं कलंकमलिनक्व निशाकरस्य, यहासरे भवतिपांडुपलाशकल्पम्॥१३॥ चक्र-मुख क्वि-कहां। ते तुम्हारा ।सुर-देवता। नर-मनुष्य । उरग- सांपा नेत्र-मांखाहारिमनोहर । निशेष-सकल । निर्जित-जीतलिया। जगत्रितय तीन लोक । उपमान-उपमा चिंच-प्रतिबिम्ब । कलंक मलिन-कलंक से मैलाव कहां । निशाकर चांद । यत् =जो। वासर-दिन मवति होता है। पांडु-पीला पलाश-पचा। कल्प-समान॥ अन्वयार्थ-हे भगवन् देवता, मनुष्य, और सौ के नेत्रो को हरणे बाला, भौर जीत लीनी है तीन जगत की उपमायें जिस ने ऐसा आपका मुख कहां और वह कलंक से मैला चांद का प्रनिर्विव कहां जोकि दिन में पीले पत्ते के समान होजाता है। भावार्थ-हे भगवन आपके रूप की सुन्दरता ने जितने देव मनुष्य और सादि तिर्यच है सर्व के नेत्र और मन हर लिये हैं हम कवि लोग सब से बढ़ कर चांद की उपमा मच्छी मानने हैं परंतु यदि हम उस की उपमा भी आपके मुख को दे तो पूर्णमाशि का पूरा चांद भी कलंकित भालता है और दिन में पीले पत्ते की तरह चमक रहित होजाता है आपका मुख निकलंक सदा दैदीप्यनान है सो चांद को भी जीतने वाला है पस तीन लोक में ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जिस की उपमा आपके मुख को देसक इसलिये आपका मुख अनुपम है । नोट-पलाशशब्द का अर्थ ढाकानी है पर भी है सो पांडुपलाश का अर्थ पीतपत्र होना चाहिये सोई हमने ठोक कर दिया है। कहां तुममुख अनुपम अविकार । सुर नर नाग नयन मनहार ॥ कहां चन्द्र मण्डल सकलंक। दिन में पीत पत्र सम रंक ॥ १३ ॥ .

१६ १ भक्तामर स्तोत्रा । संपूर्णमंडलशशांककलाकलाप, शुभ्रागुणास्त्रिभुवनंतवलंघयन्ति। ये संश्रितास्विजगदीश्वरनाथमेकं, कस्तान्निवारयति संचरतो यथेष्टम् ॥१४॥ 7 संपूर्ण पूरा । मण्डल-प्रतिविम्य । शशांक चांद । फला-सोलहमा हिस्सा एकलापसमा , शुम्रा-सफेद । गुण - गुण। त्रिभुवन -त्रिलोकी । तब- तुम्हारे घयन्ति-उल्लंघ जाते हैं । ये-जे । संधिना=आश्रयसे हैं। त्रिजगदीश्वर तीनलोकके नाथ नाथ स्वामी। एक-एकक = कान । तान उनको निवारयनि- विवारता है.(हटाता है)। संवरता -विवार रहे। यथेष्टं - अपनी इच्छा से। 1 अन्वयार्थ है भगवन् ! सम्पूर्ण मण्डल वाले चान्द की किरणों के समूह के समान सफेद आपके गुण त्रिलोको को उल्लंघ जाते हैं। जो गुण तीन जगत् के एक स्वामी को आश्रय करते हैं इच्छा से विवरते हुए उनको कौन निवारण कर सकता है । भावार्थ हे तीन लोक के साथ तीन लोक में जितने गुण हैं सर्व ने अपनी इच्छा से विचरते हुए आपका भाश्रय लिया है अर्थात् वह सर्व आपमें आनिष्ठे हैं सो माप के गुण पूर्ण चन्द्रमा के मंडल की किरणों के समूह के समान उज्जल नीन लोक को भी उहंघ कर सर्व लोकाकाश में व्याप्त हो रहे हैं उनको कोई भी हटा नहीं सकता अर्थात् चन्द्रमा की उज्जलता और गुण तो सिरफ इस ही लोक में फैलते हैं और दिन में सूर्य की किरणों से प्रकाशमान नहीं रहते और थापके गुण तीन लोक को भीउलंघन कर सर्वत्र व्याप्त रहे हैं जिन को कोई भी हटा नहीं सका । पूर्ण चन्द्र ज्योति छविवन्त । तुम गुण तीन जगत् लंघेत ॥ एक नाथ त्रिभुवन आधार । तिन विचरत को सके निवार ।।१४ १४-छवि शोमा लिपंत-पारजाना । नाथ स्वामी माधार आश्रय, निवार हटाना॥

" भक्तामर स्तोत्र। चिकिमत्र यदि ते बिदशांगनाभि, तं मनागपिमनी न विकारमार्गम् । कल्पांतकालमरुता चलिताचलेन, कि मंदरादिशिखरं चलितं कदाचित् ॥१५॥ १ । चित्र- आश्चर्य। किंक्या । अत्र = यहां। यदि जेकर । ते तुम्हारा । त्रिदश-देवता ।अंगना-स्त्री। नीतं -लिजाया गया। मसाक् = थोडासा । अपि - भी। मन:-दिल । न-नही । विकारमार्ग-विकार का रास्ता। कल्पान्तकाल- प्रलयकाल । मरुत्-पवन(हवा) । चलता चल-हिला दिये हैं पहाड़ जिसने । कि- क्या । मन्दरादि-मन्दिराचल पहाड़ (मेरू) । शिखर-चोटी। चलितं हिलता । कदाचित् = कभी भी॥ अन्वयार्थ--हे प्रभो यदि (अगर), अप्सराओं से आपका मन थोड़े से विकार- मार्ग (काम विकार) पर नहीं लाया गया तो इस में आश्चर्य होक्या है। -हिलादिये हैं पहाड़ जिसने ऐसे प्रलय काल की वायु करके क्या कभी मन्दिरांचल (मेक) पहाड़ की चोटी हिल जाती है (कभी नहीं) ॥ भावार्थ-हे स्वामिन जैसे प्रलय की वायु सभी पहाड़ों को हिलाती है परन्तु मेक को नहीं हिला सकती तैसे ही इन्द्रादिकों के भी मन को विकार उपजाने वाली अप्सरा यदि भाप के मनको नहीं हिला सकी तो इस में कोई आश्चर्य नहीं है। क्योंकि भाप का मन निष्कम्प है उसे कोई भी कम्पायमान नही कर सत्ता ।। जो सुरतिय विभ्रम आरम्भ। मन न डिगो तुम सो न अचंभ। अचल चलावे प्रलय समीर। मेरु शिखर डिगमगेन धीर ॥१५ १५-सुरतिय-देवांगना । विभ्रम-विलास (क्रीडा) अचंभ आश्चय्य । अचल- पहाड़ा समीर वायु ॥

भक्तामर स्तोत्र। निघूमवतिरपर्जिततैलपूरः, कृत्स्नं जगत्रयमिदं प्रकटीकरोषि । गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां, दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ जगत्प्रकाशः ॥१६ निधूम-धू से रहित वत्ति = (वसी) अपवर्जित रहित । तैलपूर तेल का प्रवाह । रस्तंसकल (तमाम) । जगत्रय-त्रिलोकी।इद = यह प्रकटीकरोषि = प्रकाश करते हो । गम्या -प्राप्त । न-नहीं। जात-कभी मी मरुत् = हवा चलता.. बलानां =हिलादिये हैं पहाड़ जिन्होंने, दीप-दीवा । अपर दूसरा विं-तुम! असि- हो । नाथ -स्वामिन् । जगत् प्रकाशा-जगत् को प्रकाश ने वाला। मन्वयार्थ हे भगवन् धूप यची तेल इनसे रहित सकल इस त्रिलोकी को प्रकाश (प्रकट) करता हुवा पर्वतों के हिलाने वाली भी वायु से कभी न हिलने वाला जगत् का प्रकाशक तू एक दूसरा दीवा है । भावार्थ हे प्रभो! दीपक अल्प देशका प्रकाशक और आपत्रिलोकी के प्रकाशक दीपक धूवां तेल और बाती वाला अर्थात् तेलवती के आश्रय है और धूवा सहित है और हवादिक से हिलचल या भाभाव को प्राप्त हो जाता है और भाप इन से रहित सदा दैदीप्यमान रहने वाले विलक्षण दीपक हैं । धूम रहित बाती गतिनेह। परकाशक त्रिभुवन घर येहः॥ बात गम्य नाहीं परचण्ड। अपर दीप तुम बले अखण्ड ॥१६॥ ram ११-धूम-धूवा वातीबसी । गति हिलना । नेह नहीं । वात हवा। गप पहुंचनामपर दूसरा दीप दीवा ॥

भक्तामर स्तोत्र। नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुंगम्यः, स्पष्टीकरोषि सहसायुगपज्जगन्ति । नांभीधरों दरनिरुद्धमहाप्रभावः, सूर्याति शायिमहिमासि मुनींद्रलोके ॥१७॥ नम्नहीं । मस्त-बजाना । कदाचित् = कभी भी। उपयासि =जाता है। न-नहीं । राहगम्या-राहु करके पास किया गया। स्पष्टी करोपि-जाहिर करता है। सहसा = शीघ्र ही । युगपत् = एकदम । जगन्ति-तीन लोक । न=नहीं । अम्मोधर-बादल । उदर-पेट (मध्य) । निरुद्ध रुका । महा - बडा। प्रभाव: प्रताप । सूर्य = रवि । अति शायि - जियादा । महिमा -महात्म्य ।असि-हैं। मुनीन्द्र -मुनीश्वर । लोके संसार में। अन्वयार्थ हे प्रभो !तून कभी अस्त होता है न राष्ट्र से पास किया जाता है भौर शीन तीनलोकों को एक दम प्रकाश करता है तथा नहीं रुका बादलों के बीच बड़ा प्रभाव जिसका लो ऐसा तू संसार में सूरज ले भतिशय महिमा युक्त है। भावार्थ-हे भगवन् यदि आपको मैं सूर्य की उपमा दूं तो सूर्य संध्याकाल अस्त होजाय है अमावस के दिन ग्रहण में राष्ट्र से असा भी जाय और जगत् को क्रम से प्रकाशे है तथा बादलो,के बीच भी आजाय सो आप में यह दोष कोई भी नहीं है भाप सर्व दोषरहित निर्विघ्न निरंतर सदा काल तीन लोक को प्रकाशे हैं इसलिये आप निरुपम कहिये उपमा रहित महान् तेजस्वी सूर्य हैं । छिप हो न लिपो राह की छाहिं। जग प्रकाशक हो छिन माहि ।। धन अनवदाह विनिवार । रवितें अधिक धरो गुणसार ॥ १७ ॥ १७-लिपो-ढका जाना ।धन अनवर्त = बादल से न ढका जाना। दाह मगरमी । विनिचार हटामा । रवि-सूर्य ।

อุย भक्तामर स्तोत्र। नित्योदयंदलितमोहमहान्धकार, गम्यं न राहुबदनस्य नं वारिदानाम् । विभाजते तव मुखाजमनल्पकान्ति, विद्योत यज्जगदपूर्वशशाङ्कविम्बम् ॥१८॥ । नित्योदय - सर्वकाल में ऊगा । दलित-दला गया। मोह-मशान | महान्धकार बड़ा भारी अन्धेरा गिम्य-प्राप्त होने योग्य । न- नहीं। राहुवदन- राहु का मुख । न-नही । वारिद-वादल ! विभ्राजते । शोमता है। तव तुम्हारा। मुखाज-मुखरूपकमल । अनल्प-बहुत कांनि शोमा। विद्योत - प्रकाश । जगत् विश्व । अपूर्व नया । शशांकबिम्ब-चन्द्रमण्डल ॥ अन्वयार्थ हे प्रभो! सदा उगा हुमा नाश कर दिया है मोहरूप महान् अन्धकार जिसने राहु के मुख मे न माने वाला, न बादलों से ढका जाने वाला तथा पड़ी शोभा वाला आपका मुख रूप कमल जगत को प्रकाशवा हुमा एक नया चन्द्र मण्डल है। भावार्थ-चांद कृष्ण पक्ष में क्षीण होय तथा शुक्ल में बड़े और पूर्णमासी को राहु से ग्रसा जाय। और आपके मुख में यह कोई भी दोष नही सो आपका मुख एक विलक्षण चन्द्रमा है । अर्थात् किसी काल में भी नहीं मंद होय है ज्योति जिल की ऐसे माप जगत् को प्रकाश करने वाले एक अद्भुत जाति के चन्द्रमा है ॥ सदा उदित विदलित तम मोह। विघटतमेघ राहु अविरोह ॥ तुम मुख कलम अपूर्व चन्द। जगत् विकाशी ज्योति अमन्द ॥१८॥ - - . १८-तम-अंधेरा। मोह = अज्ञान । विघटित मलग । भविरोह-तुका जाना अपर्ध चन्द्र-गया चान्द । विकाशीप्रकाशने वाला । भमंद-म' भक्तामर स्तोत्र। २१ किं शर्वरीषु शशिनाऽह्निविवस्वतावा, युष्मन्मुखेंदुदलितेषुतमस्सुनाथ । निष्पन्नथालिबनशालिनि जीवलोके, कार्यकियज्जलधरैर्जलभारनामः ॥१६॥ किं- क्या । शर्वरी-रात । शशिना-चांद से। भति = दिनमैं । विवस्वाम्, सूर्य । वा = अथवा । युष्मद =आपके। मुखेन्दु =मुखरूप धांद । दलित-दलेगये तमा अन्धेरा । नाथ -स्वामिन् । निष्पन्न = पैदा हुए । शालिवन चावलों के खेत शाली शोभने पाले । जीव लोक- मनुष्यलोक । कार्य= काम । कियत्-कितना जलघर-मेघ । जलमार पानी का भार । नम्रनी हुवे। अन्वयार्थ हे स्वामिन् । मापके मुखरूप चांद से अन्धेरे के नष्ट होजाने पर रात में चांद से और दिन में सूर्य से क्या प्रयोजन है जब जगत् पके हुए धानों के समूहले शोभता है तब जलभार से नीचे हो रहे जो मेघ हैं उमसे क्या फायदा है । भावार्थ-हे भगवन् जैसे चावलों के खेत पक जाने पर सजल मेघ का हुक कर आना अकारथ है वैसे हो जब रात के अन्धेरे को चांद दूर करता है और दिन में सूर्य अन्धेरै को दूर करता है सो यदि दोनों वकों के अंधेरे को तुम्हारे मुखरूपी चंद्रमा ने दूर करदिया तो तय इन की क्या जरूरत है ॥ निश दिन शशि रवि को नहिं 'काम । तुम मुख चन्द हरे तमधाम ॥ जो स्वभाव से उपजे नाज। सजल मेघ तो कौन हु काज ॥ १९॥ १९-तम-भन्धेरा। सजल मेघ - पानी पाया यादी भक्तामर स्तोत्र ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कतावकाश, नैवं तथा हरिहरादिषु नायकेषु। तेजः स्फुरन्मणिषु याति यथा महत्व, नैव तुकाचशकले किरणा कुलेऽपि ॥२०॥ शानं ज्ञान तथा जैसे त्वयि आप में विभाति-शोभता है। कृत- किया गया। अवकाश-जगह । ननहीं । एवं ऐसे। तथा तैले। हरि-विष्णु- हर-शिव । नायक-मालिक | तेज-तेज । स्फुरन् चमकीली। मणिरल। याति-पाता है । यथा- जैसे। महत्त्व घडाई । ननहीं। एवं = पसे । काच- कच्च शकल-टुकड़ा। किरण-किरण । आकुल-व्यास्त । अपि भी। । अन्वयार्थ है जिनेन्द्र कृतावकाश ज्ञान जैसे पाप में प्रकाशता है वैसे हरि हरादिक देवों में नहीं जैसे प्रकाशमान मणियों में तेज महत्व को प्राप्त होता है वैसे किरणों ले व्याप्त काच के खण्ड में नहीं प्राप्त होता । भावार्थ-हे भगवन् जैसे जितनी चमक रत्नों में होती है उतनी कंच के टुकड़ों में नहीं होतो वैसे ही जैसा अखण्डित शान आप में दैदीप्यमान है वैसा हरि हरादिक देवों में नहीं है। जो सुबोध सोहे तुम माहि। हरिहरादिक में सो नाहि ॥ जों युति महारत्न में होय। काच खंड पावे नहिं सोय ॥२०॥ २०-सुबोध साना M २३ भक्तामर स्तोत्र । मन्ये वरं हरिहरादय एव हष्टा, दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति । किं वीचितेन भवता भुवि येन नान्यः, कश्चिन्मनोहरति नाथ अवांतरपि॥२१॥ - मन्ये -मानताई | घरं बहुत अच्छा । हरिहरादया हरिहरादिक । एत्र - ही। हष्टा-देखे गए । दृष्टेषु-देखे हुए । येषु -जिनके । त्वयि -तेरे में। तोष खुशी । एति प्राप्त होती है । किं =क्या । वीक्षितेन-देखे हुवे करके । भवता - आप करके। भुवि-पृथ्वी में । येन जिस से । नन्नहीं । अन्या-दूसरा । कश्चित कोई । मन-दिल । हरति-चुराता है। नाथ -स्वामिन् । भवान्तर -- दूसरा जन्म | अपि भी। अन्वयार्थ हे प्रभो ! बहुत अच्छा हुआ कि हरिहरादिक, मेरे कर देखे गये जिनके देखे जाने पर दिल आप विषे संतोष को प्राप्त हुमा भूमि पर आपके देखने से दूसरा कोई जन्मान्तर में भी मन को हरण नहीं कर सकता ॥ भावार्थ-हे भगवन् ! मेरे वास्ते यह बड़ी खुशी की बात है कि मैंने हरिह- रादिक दूसरे देव भी देख लिये क्योंकि उनके देखने से आपको वीतराग रूप पहिचान मेरा दिल आप विषे ही संतोष को प्राप्त हुआ अब किसी जन्मान्तर में भी मेरे मन को दूसरा कोई हरण नहीं कर सकता। . नाराच छन्द। सरागदेव देख मैं भला विशेष मानिया । स्वरूप जाहि देख वीतराग तू पंछानियो । कछु न तोहि देख के जहाँ तुही विशेषिया । मनोज चित्त चोर और भूल ह न पेखिया ॥२१॥ . 4 २१-लरागराग सहित । विशेषिया-जियादा पेखिया देखा।

भक्तामर स्तोत्र स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्, नान्या सुतं त्वटुपमं जननी प्रसूता। सर्वा दिशो दधति भानि सहस्ररश्मि, प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशुजालम् ॥२२॥ स्त्री औरत । शत-सौ (१००)। शतश: सैंकड़ो। जनयन्ति = पैदा करती हैं। पुत्रान बच्चों को । न नहीं । अन्या-दूसरी । सुत - पुत्र । त्वदुपम तेरे समान । जननी =माता । प्रसूता - पैदा करती । सर्वा =सभी । दिशा =दिशा। धति धारण करती हैं। भानिस्तारावों को । सहबरश्मि = सूर्य । प्राची -पूर्व दिशा । एव =ही । दिक्-दिशा । जनयति = पैदा करती है । स्फरतु -प्रकाशमान अंशु-किरणें । जाल-समूह ॥ अन्वयार्थ हे भगवन् सैंकड़ों स्त्रिये सेंकड़ों पुत्रों को जनती हैं परन्तु दूसरी माता ने तुम्हारे समान पत्र पैदा नहीं किया । सभी दिशाये तारों को धारण करती हैं । लेकिन प्रकाशमान होरही है किरणे जिसकी ऐसे सूर्य को तो पूर्वदिशा ही पैदा करती है। भावार्थ-हे भगवन जैसे तारों को तो हरएक दिशा धारण करती हैं परन्तु सूर्य को तो पूर्व दिशा ही उदय करती है इसी प्रकार अनेक माता अनेक पुष जन्मती हैं परन्तु तुम्हारे समान पुत्र सिवाय आपकी माता के किसी दूसरी माता के उत्पन्न नहीं होता। अनेक पुत्रवन्तनी नितम्बनी सुपूत हैं। न तो समान पुत्र और मात ते प्रसूत हैं। दिशा धरन्ततारका अनेक कोटिको गिने। दिनेश तेजवन्त एक पूर्वही दिशा जने ॥२२॥ २२-नितंबनी-स्त्री। प्रसूत-पैदा करना । धरंत =धरती है । तारका सारे हिले-मर्य।

भक्तामर स्तोत्र। २५ परमं पुमांस, -- त्वामामनंति मुनयः मादित्यवर्णममलं तमसः पुरस्तात्।। स्वामेव सम्मगुपलभ्य जयन्ति मृत्यु, नान्यः शिवः शिवपदस्य मुनीन्द्र पंथा॥२३॥ स्वां तुझे। आमनन्ति-मानते हैं। मुनि-मुनि। परम-प्रकृष्ट शक्ति वाले । पुमान् = पुरुष। आदित्य =सूर्ये । वर्ण =रंम। अमल शुद्ध । तमसः = अन्धेरे से । पुरस्तात =आगे । स्वां-तुझे । एव ही । सम्यक =अच्छी भांति उपलभ्य मालूम करके। जयन्ति जीतते हैं। मृत्यु मौन । न नहीं । अन्या- दूसरा। शिवकल्याण रूप । शिवपद-मुक्ति । मुनीन्द्र - मुनीश्वर । पंथा- रास्ता i अन्धयार्य-हे मुनीन्द्र मुनि तुझे परम पुरुष अन्धेरे के आगेसूर्य के तुल्य 'प्रभाव पाले शुद्ध मानते हैं और मनुष्य आपकी भली प्रकार जानकर मृत्यु को जीतते हैं और मुक्ति जाने के लिये और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। भावार्थ-हे सुनीन्द्र मुनिजन आप को महान् पुरुष कर्म रूपी अंधेरे के 'आंगे सूर्य समान शुद्ध वरण मानते हैं और आपकी मले प्रकार जान कर मृत्यु को औतते हैं अर्थात् सिद्ध पद को प्राप्त होते हैं क्योंकि सिवाय आपक मुक्ति जाने का और कोई दूसरा रास्ता नहीं है ॥ २३ ॥ पुराण हो पुमान हो पुनीत पुण्यवान् हो । ...कहें मुनीश अन्धकार नाश को सुभान हो । महन्त तोहि जान के न होय वंश काल के । ॥ १ . न और मोक्ष मोक्ष पन्थ देव तोहि टालक ॥२३॥ २३--पुराण -पुराणा । पुमान = पुरुष। भामू बसूर्य ।।

२६ भकामर स्तोत्र स्वामव्ययं विभुलचिंत्यमसंख्यमाद्यं, ब्रह्माणमीपवन सनंत अनंग केतुम् । योगीश्वरं विदितयोगलनेकमेकं, ज्ञानस्वरूपमनलं प्रवदंति संतः।२४। -- त्वां-तुझे । अव्यय = अविनाशी। विभु व्यापक । अचिन्त्य-जिस का चिंतन न हो। असंख्य अनगिणन । आधआदिका । ब्रह्मन् ब्रह्मा जी। ईश्वर परमेश्वर। अनन्त-जिस का अन्त नहीं । अनङ्गकेतु -महादेव । योगीश्वर-योगिः राज । बिदितयोग-जाना है योग जिसने । अनेक-अनेक रूप। एक-अद्वितीय । ज्ञानस्वरूप ज्ञान (बोधरूप) । अमल-शुद्ध । प्रवदन्ति = कहते हैं। संत-सन्त (सज्जन)॥ अन्वयार्थ-हे प्रभो संत जन तुझे अविनाशी व्यापक, अचित्य असंख्य आध प्रामा ईश्वर अनन्त विष्णु काम शत्रु (शिव) योगीश्वर योग के जानने वाले अनेक एक शान रूप अमल (शुद्ध) कहते हैं । भावार्थ-हे प्रभो संतजन तुझे अविनाशी सर्व व्यापक अनित्य असंख्य आद्य (पहिला) ब्रह्मा ईश्वर अनंत अनंगकेतु शिव योगीश्वर विदितयोग भनेक शान स्वरूप शुद्ध कहते हैं। अनन्त नित्य चित्तकी अगम्यरम्य आदि हो । असंख्य सर्वव्याप ब्रह्मविष्णु हो अनादि हो॥ महेश काम केतु योग ईशा योग ज्ञान हो । अनेक एक ज्ञान रूप शुद्ध सन्त मान हो ॥२४॥ २४-रस्य मनोहर २७. TAL " भक्तामर स्तोत्र बद्ध स्त्वमेव विबुधार्चित बुद्धिबोधात्, त्वं शंकरोसि भवन त्रयशंकरत्वात। धातासि धीरशिवमार्गविधेविधानात, व्यतीत्वमेवाभगवन परुषोत्तमोऽसिं२५॥ बुद्ध-बुदशानी) । वंतू एवम् हो। विवुध-देवताभर्चित: पजित। बुद्धि बोध-द्धि का बोध (प्रकाश) =तु । शंकरः शिव । असि. है । भुवन : प्रयतीनलोक शंकर मंगलका धाता ब्रह्मा ।धीर:धीरजवाला । शिवमांग की मुक्ति का रास्ता ।-विधि-तरीका। विधान बनाना । ब्यक्तं = साफ विमेव भगवन् ऐश्वर्य बाली । पुरुष में मनुष्य । श्रेष्ठ। पुरषोतम-विष्णु भलि मन्वयार्थ- हे देवतावों से पूजित बुद्धि को बोध करने से तुही एक तीन अपनों को कल्याण करणे से तू शशंकर हैं। हे धीर मोक्षमार्ग की विधि (तरीक) के विधान से तु (ब्रह्मा) है। हे भगवन् तूही स्पष्ट पुरुषोत्तम है। भावार्थ:-हे धीर देवतावों कर पूजित तू-बुद्धि का योधन करने से डरे तीन लोक के मंगल करता होने से तुही शंकर है और मोक्षमार्ग की विधिका करने पाला होने से तुही विधाता है.। और तुही पुरुषोत्तम कहिये.नरों में उत्तम (श्रेष्ठहै ॥ तुहीं जिनेश बुद्ध हो सुबुद्धि के प्रमान से । तुही जिनेश शंकरो जगत्रयीविधान से ॥ तुही विधात है सही सुमोक्षपन्थधार से। नरोत्तमो तुही प्रसिद्ध अर्थ के विचार से ॥२५॥ .. " tra जगत्रयों-तीनजगत्। विधाता-चने वाला २८ भक्तामर स्तोत्र। तुभ्यं नमस्त्रिभुवनातिहरायनाथ, तुभ्यं नमः शितितलामलभूषणाय । तुभ्यं नमस्त्रिजगतः परमेश्वराय, तुभ्यं नमी जिनभवोदधिशोषणाय । २६ । - . तुभ्यं माप के ताईनमः-नमस्कार हो। त्रिभुवन-त्रिलोकी। माति- पीडा । हर-हरणेवाले । नाथ -स्वामिन् । तुभ्यं -तुसे। नमः -प्रणाम हो। क्षिति. तल पृथ्वी वल (भूतल)। अमल शुद्ध । भूषण -जेवर । तुभ्यं मापके ताई। नमः-प्रणाम निजगत् = त्रिलोकी । परमेश्वर स्वामी । तुभ्यं मापको नमः- नमन हो । जिन-जिन । भवोदधि-संसारकप समुद्र । शोषण-सुकाने वाले । 'मन्वयार्थ-हे जिन तीन भवनों के दुःख दूर करने वाले आप को नमस्कार हो। पृथ्वी में शुद्ध भूषण कप भाप को नमस्कार हो। हे तीन जगत् के परमेश्वर भाप को नमस्कार हो। हे संसार समुद्र के सुकाने वाले आप के ताई ममस्कारहो। भावार्थ-इस श्लोक में श्रीमानतुंग भावार्य ने भगवान के मिन्न भिन्न गुण पणन कर बारंबार नमस्कार करी है। नमों कलंजिनेश तोहि आपदा निवार हो। नमों करूं सुभूरि भूमि लोक के सिङ्गार हो । नमों करूं भवाब्धि नीर रास शोष हेत हो। नमो कर महेश तोहि मोक्ष पन्थ देत हो ॥ २६ ॥ F २१-मापदा-दुःख । मुरिम्बहुत भवाब्धि संसार समुद्र । मोर राख -पानी कासमूह । मदेश-शिव ।

भक्तामर स्तोत्र को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशेषैः स्त्वं संश्रितो निरवकाशतथा मुनीशा दोषैरुपात्तविविधाश्रयनातगः, - কলোনলি কালিদীঘিনীভৰি২৩ क - क:- कौन । विस्मय भाश्चर्य अत्र यहां। यदि अगर। नाम-प्रसिद गुणे-गुणोंकर । भशेष-सकल । त्वं-तू । संश्रित: माश्रयकिया। निरवकाशतया -किसी जगह के न मिलने से मुनीश-मुनीन्द्र । दोष-दोष । उपात-पाया। विविध भनेक प्रकार के माश्रयासरावात हुवा गर्व महंकार स्वप्नांतर सुपने में अपि भी। नहीं। कदाचिदपि कभी भी। ईशिता देखा गया। मसि ॥२७॥ मन्वयार्थ हे मनीश यदि समस्त गुणों ने निरवकाश होने से तू भाभव किया है तो इस में क्या भाश्चर्य है। मिल गए हैं अनेक आश्रय जिन को इस लिये उत्पन्न हुवा है महंकार जिनहें ऐसे दोषों से स्वप्न में भी कमी नहीं देखा गया। मावार्थ-हे भगवन जब समस्त गुणों को कोई भौर जगह नहीं मिली तब । उन्होंने मापका आश्रय लियाहै सो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है पानी तो भीवाण की तरफही जागा सो गुण तोगुणी के माश्रय ही ठहरेंगे भौर चंकि दोषों को हर जगह मासरा मिल गया है इस लिये उन्होंने कभी स्वप्नमें भी मापको नहीं देखा मर्यात भाप में सर्व गुण ही गुण हैं, दोष कोई भी नहीं है। ॥ १५मात्रा चौपाई॥ तुम जिनवर पूरण गुण भरे। दोष गर्व कर तुम पर हरे॥ और देवगण आश्रय पाय। सुपन न-देखे तुम फिर आय ॥ २७॥.. २७-ई-अहकार परहर - त्यागना। - भक्तामरस्तोत्र। उच्चैरशोकतरुसंश्रितमुन्मयूख, माभाति रूपममलं भवतो नितांतम् । स्पष्टोल्लसत्किरणमस्ततमोवितानं, ।, विम्व वरिव पयोधरपाश्ववर्तिः। २८ - उन्म: ऊँचा। अशोकनर अशोकवृक्ष । संश्रिन = आश्रयविया । उन्मयूख -ऊंची किरण पाला। आभाति-शोभता हे । रूप-रंग । अमल शुद्ध भवतःआपका । नितांत-बहुत । स्पष्ट साफ । उल्लसत् चमक रही। किरण -किरणें । मस्त- नाशकिया। तमोवितान-अन्धेरा रूप चन्दोवा । विश्व प्रतिविम्ब । र सूर्य का इव-जैसे। पयोधर मेघ । पार्ववर्ती -पास होने वाला॥ मन्वयार्थ हे स्वामिन् जैसे स्पष्ट प्रकाशमान किरणों वाला अन्धकार के समूह को दूर करने वाला और बादल के पास होने वाला सूर्य का प्रतिबिंव (मण्डल) हो वैसे ऊचे अशोक तरुके पास,ऊंची किरणो वला शुद्ध आपका रूपा निरन्तर शोमता है। भावार्थ-बादल भी नीला होय है और अशोक वृक्ष भी नीला होता है। सो जैसे बादलों के पास ऊंचा सूर्य शोभता है वैसे ही हे भगवन आप भी उगमशोक वृक्ष के पास शोभते हो। तरु अशोक तल किरण उदार। तुम तन शोभित है अविकार ॥ मेघ निकट ज्यूं तेज फुरन्त । दिन कर दिपे तिमिर निहन्त ॥२८॥ ॥ २८-त-नींचे । दिनकर-सूर्य । निहंत-माछ।

भक्तामर स्तोत्र
सिंहासने मणिमयूखशिखाविचिके पार
विधाजत तव वपुः कनकावदातम् ॥
बिम्ब वियदिलसदंशुलताविताना
तुङ्गोदयादिशिरसीव सहस्रधर्म रक्षा
'सिंहासन चौकी मणिमयूख मणिमोकी किरणे शिखी ज्वाला।विचित्र
कई रंगका। विभ्राजते - शोभता है। तव तुम्हारा । वपु शरीर कनक सोना
भवदात्त शुद्ध । वि-प्रतिविध वियत् = आकाश । विलसंत - शोभमानी अंशु-
लता किरण रूपोलता वितान-विस्तार । तुंग-ऊंचा। उदयाद्रिदयाचल।
शिरः-चोटी।वम् जैसे सहस्ररश्मिा-सूर्य ।
।
..
।
भन्वयार्थ-ऊंची उदयाचल पहाड़ की चोटी पर आकाश में चमक रहा है
किरण रूप लतावों का समूह जिसका पेसा सूर्य का मण्डल जैसे शोभे है पैसे मणियों
"की किरणों के तेज (ज्वाला) से अनेक वर्ण के सिंहासन पर सोने के समान:शुबतेरा
शरीर शोमता है।
मावार्थ- हे भगवन जैसे उदयाचल पर्वत पर सूर्य शोभताई वसे ही अनेक
प्रकार के रत्नाकर जडितसिंहासन पर आपका स्वर्ण समान पीतवर्ण शरीर शोमता
हैमर्थात् यहां आचार्य ने स्वर्ण के सिहासन पर विष्टते दुई भगवान की उदयाचल
की चोटी पर आरूद सूर्य की उपमा दी है ।।
सिंहासन मणि किरण विचित्र ।
तिस पर, कंचन-वरपा पवित्र ॥
तुम तन शोभित किरण विचार ।
ज्योउिदयाचल रवि तम हार ॥ २९ ॥

३२
भक्तामर स्तोत्र।
"
कुन्दावदातचलचामरचार शोभा :
विचाजते तव वपुः
कलधौतकांतम् ।।
उद्यच्छयांकशुचिनिर्भरवारिधार:-
मुच्चैस्तटंसुरगिरेरिवशातकोभम्, ३०॥
कुन्दकुन्दलफूल । अवदात सफेद । चल-चंचल । पामर-यंवर चान्द
-मनोहर शोम-शोमा।विभ्राजते-शोभता है। -तुम्हारा । वपु: पारीर
फलधौत-सौना । कति सुन्दर । उद्यत्-ऊगा हुआ । शशांक- बांद. शुचि-शुब
निरभरणा । पारि-पानी। धार = घारा । जच्चै ऊंचा. तट-किनारा। सुर-
गिर-सुमेक। व-जैसे । शातकौम्म -सौने का।
भन्यवार्थ-हे भगवन् उदय हो रहे चांद के समान शुद्ध निर्झर (मरणों) की
जलधारों पाला सोने के ऊंचे सुमेरु के तट (किनारे) की तरह कुन्द के फूल के तुल्य
सफैक्ष हिलते चंपरोसे मनोहर शोमानाला सोने के समान सुन्दर मापका शरीर
मत्यन्त शोमित हो रहा है।
भावार्थ-हे भगवन् जैसे मुफैद जलके झरणों कर सहित स्वर्ण मय सुमेर
पर्वत शोने है ऐसे ही कुन्द के पुष्पों के समान सुफ़ैद चंवरौ के दुलन सहित भाप का
पीतवर्ण शरीर शोभे हैं।
कुन्द पहुँप सित चमर ढुलंत
कनक वरणं तुम तन शोभंत॥
ज्यों सुमेरु तट निर्मलं कांति ॥
झरणा झर नीर उमगांति ॥ ३०॥

- . भकामर स्तोत्र। छचवयं तव विभाति शशांक कांत, मुच्चैः स्थितं स्थगितभानु करप्रतापम् मुक्ताफल प्रकरजालविवद्धशोभं। प्रख्यापयल्चिजगतः परमेश्वरत्वम् ।३।। नवयं-तीनछत्र । तब तुम्हारे । विभाति =शोमते हैं । शशांक-चांद। कांत-सुन्दर । उच्चैऊचा। स्थित मौजुद । स्थगित हकदेना। भानु-सूर्य । कर-किरणे। प्रताप -प्रकाश । मुक्ताफर-मोती। प्रकर- समूह । विशुदवढी-1-23 शोम-शोमा। प्रस्थापयत् कहना हुआ। त्रिजगतः त्रिलोकी का । परमेश्वरत्व- परमेश्वरपणा। मन्वयार्थ हे प्रमो चांद के तुल्य कांतिवाले होने से मनोहर अंचे स्थित उकदिया है सूर्य की किरणों का तेज जिन्हों ने और मोतियों की लड़ियों के समूहमे बढी है शोमाजिनकी तथा तीनलोकों की परमेश्वरता (स्वामिता) को प्रकट करते हुए मापके तीन उन शोमते हैं। मावार्थ-एक लोक का जो स्वामी होता है उसके सिर पर एकछत्र शोमताहै। मौर भगवान के सिर पर तीन छत्र होते हैं सो भाचार्य ने यहां यह प्रकट किया है कि यह मोतियों की लड़ियों से जड़े हुए तीन छत्र भगवान् के सिरपर दुलते हुए यह बतळा रहे हैं कि यह तीन लोक के स्वामी हैं। ऊंचे रह सूर दुति लोप । तीन छत्र तुम दीप अगोप॥ तीन लोक की प्रभुता कहें। मोती झालर सो छविलहैं ॥१॥ १५-पूर-साइति पुति)-योमा भगोप-प्रसार ।

३४॥ भक्तामर स्तोत्र। गंभीरताररवपूरितदिग्विभाग, स्त्रैलोक्यलोकशुभसंगमभूतिदक्षः।। सद्धर्मराजनयघोषणघोषकः सन्खें.. दुन्दुभिर्वनति ते यशसः प्रवादी ॥३२॥ .. गम्भीर-गहुगो तार ऊंचा रव-शब्द । रित = पूर्ण करना। डि. विभाग दिशायें । त्रैलोक्य त्रिलोकी । लोक-जन ।शुभ मला । संगम: प्राप्ति भूति विभूति दिक्षा =चतुर । सत् =श्रेष्वा धर्मराज-धर्म का राज । जयघोषण: -जयकारशब्द । घोषका = बजाने वाला । सन् =है। सम्माकाश । दुन्दुमिन बाजा अवनति-बजता है। तेस्तुम्हारे। यश-कीर्ति। प्रयादी कहने वाला। 'अन्वयार्थ लाम्भीर और ऊँचे शब्द से पूर (पूर्ण) दिये हैं दिशामों के विभाग जिसने और निलोकी के रहने वाले जीवों को शुभ ऐश्वर्य देने में चतुर तथा उत्तम धर्म का जो राज्य उसके जयकार शब्द का उच्चारण करने वाला जो आकाश में दुंदुभी (पाजा) बजता है वह आपके यशका कथन करणे त्राला भावार्थ-जिनेन्द्र के जी अष्ट प्रतिहार्य में आकाश में बाजा बजता है,सो आचार्य कहते है कि सो बाजा मानो दश दिशों को व्याप्त होकर यह बताता है कि है जीवो भव तुम को इस लखार के दुखों को दूर करने वाली सुन पविभूति मिलेगी मौर मोक्ष मार्ग के चलाने के लिये धर्म का राज प्रवतेगा। . दुन्दुभि शब्द गहर गम्भीर। चहुं दिश होंय तुम्हारे धीर॥ 'त्रिभुवन जन शिव संगम करें। मानो,जय जय रव उच्चर ॥ ३२

भक्तामर स्तोत्रा
मंदारसुन्दरनमेरुसुपारिजात,
सन्तानकादिकुसुमोत्कर वृष्टि रुता।
गंधोदबिंदुशुभमंदमरुत्प्रपाता,
दिव्या दिवः पततिते वचसा ततिा ॥३३॥
an-
मंदार-एक जाति का कल्पवृक्ष । सुन्दर-मनोहर । नमेक, पारिजात,
और संतानक- ये सभी कल्पवृक्ष हैं । कुसुम फूल । उत्कर समूह । वृष्टिबारस
उद्घा - शुम । गन्धोद गन्धोदक । विन्दु-बूंद । शुम - उत्तम । मन्दम् आहिसता
चलने वाली । मरुत वायु । प्रपाता-पड़ी। दिव्या-आकाश कीदिव, आकाश
पतति:गिरती है। ने तुम्हारी । पचसांघाणीयों की । तति समूह ॥
अन्वयार्थ-हे.प्रभो गन्धोदक की बूंदों से पवित्रं मंदमंद पवन करके गिराई
मन्दार, मनोहर नमेश श्रेष्ठ पारिजात और संनानक आदि कल्पवृक्षों के पुष्प
समूह की जो दिव्यदृष्टि आकाश से गिरती है सो आपके वचनों की पंक्ति खिरती है।
भावार्थ-यहां माचार्य ने भगवान को दिव्य पाणी को दियं पुष्पों की
'उपमा दी है कि हे जिनेश ! माप के कल्याण के समय जो देवता गंधोदक और
पुष्पों की दृष्टि करते हैं सो मानो भापके वचनों की पक्ति ही खिरती है।।
मंद पवन गंधोदक इष्ट ।
विविध कल्पतरु पुहप सवृष्ट
देव कर विकसत दल सार।
मानो द्विज पंकति अवतार ॥.३३ ॥

भक्तामर स्तोत्र । शुम्भत्प्रभावलयभूरिविभाविभोस्त, लोकत्रयद्युतिमतां द्युतिमाक्षिपन्ती। प्रोद्यहिवाकर निरंतर भूरिसंख्या, दीप्त्याजयत्यपिनिशामपिसीमसौम्याम्। । 6 शुंमत् = शोभायमान् । ममा- कांति ! वलय -मण्डल । भूरि-अधिक । विमा' प्रमा। विभु -प्रभु । ते-तेरी। लोकत्रय तीनलोक ! धुतिमत: कांति वाला। घुति-शोभा। भाक्षिपन्ती-तिरस्कार करती हैं। प्रोद्यत-ऊगा हुमा । दिवाकर सूर्य । निरंतर लगातार । भूरि-जियादा । संख्या = गिणती । दीप्त्या काति से। जयति जीतती है अपि भी निशा-रात अपि-भी। सोमवान्द सौग्या-ठंडी। भन्नग्रार्थ: हे भगवन आपकी शोभा वाले कांति के. भामण्डल की अधिक प्रना तीन.लोको के तेजस्वियों के वेज को तिरस्कार करती हुई उदय हुए अनेक सूर्यों के समान तेज वाली भी वांद के समान ठंडी हुई हुई रात को भी कांति से जीत लेती है। भावार्थ:-हे.प्रभो आपके भामंडल की ज्योति का इतना तेज है कि तोनलोक में जितने सूर्यादिक पदार्थ हैं सर्व मंद मासते हैं- इतना तेजस्वी होने पर मी सौम्य- पने में रानी के चन्द्रमा को शोतलता को भी जीतता है । तुम तन भामंडल जिन चन्द । सब दुतिवन्त करत है. मन्द कोटि संख्य रवि.तेज छिपाय। शशिनिर्मल नित करै अछाय ।।३४... ३४-भामण्डल-शोभा का मण्डका भक्तामर स्तोत्र। ३७ स्वर्गापवर्गगममार्गविमार्गणेष्टः, सद्धर्मतत्वकथनैकपटुस्बिलोक्याः। दिव्यध्वनिर्भवति ते विशदार्थसर्व, भाषास्वभावपरिणामगुणैः प्रयोज्यः ॥ ५॥ . स्वर्ण- देवलोक । .अपवर्ग मोक्ष। गम-जाना. मार्ग-रास्ता। विमार्गण: खोजना । इष्ट मित्र । 'सद्धर्म - श्रेष्ठधर्म । तत्वकथन- यथार्थकथन । एक पटु - एक चतुर । त्रिलोकी-तीनलोक । दिव्यध्वनि-दिव्य शब्द । (वाणी) भवति होती है। ते-तुम्हारी । विशद =उज्वल । अर्थ -अर्थ। सर्व-सकल। भाषा: जुधान । स्वभाव-भादत । परिणाम - नतीज गुण-गुण प्रयोज्य प्रयोग किया। अन्वयार्थ हे विभो स्वर्ग और मोक्ष में जाने के लिये जो रास्ता उसके ढूंढने वा बताने में मित्र (सहायक) तीनलोको में सच्चे धर्म के तत्व कहमें में एक पण्डित साफ साफ अर्थ तमाम जुबाने स्वभाव (भादत) परिणाम (नतीजे) और गुणों करके मिली हुई आप की दिव्य ध्वनि खिरती है ।। . भावार्थ हे भगवन तीन लोक में जितने पदार्थ हैं सर्व का स्वभाव (खासि. यत) और स्वर्ग और प्राचीन सत्यधर्म के असली तत्वों को दरशाती हुई सर्व भाषाओं में समझ आने पालो स्वर्ग और मोक्ष में जाने के लिये सच्चा रास्ता बताती हुई जगत के जीवों की हितु आपकी निर्मल दिव्यध्वनि त्रिरती है। स्वर्ग मोक्ष मारग संकेत। परम धर्म उपदेशन हेत॥ दिव्य वचन तुम खिरै अगांध। सब भाषा गर्भित हितसाध ॥३५॥ ३५-मारगरास्ता!

भक्तामर स्तोत्र। उन्निद्रहेमनवपंकनपुज्जकांती, पर्युल्लसन्नखमयूखशिखाभिरामी। पादीपदानि तव यच जिनेंद्र धत्तः, पद्मानि तब विबुधाः परिकल्पयन्ति ॥३६॥ उन्निद्र -खिला । हेम सोना । नव-नया पिंकज-कमलापुज-समूह कांति-शोमा। पर्युल्लसत् -बहुत धमकीला । नख =नाखून । मयूख = किरणें। शिखा-लाट (ज्वाला)। अभिराम मनोहर। पादौ चरण। पदानि-जगह । तब-तेरे । यत्र जहाँ । जिनेन्द्र-जिनेश । घत्ता-धरते हैं । पन कमल । तत्र- वहां विवध देवता परिकल्पयन्ति कल्पना करते हैं । , मन्वयार्थ-हे जिनेन्द्र खिले हुए सोने के नए कमलों के समूह के समान कांति वाले और चमकीले नाखूनों की किरणों की शिखा से मनोहर भापके पांव जहां जहां पग धरते हैं। वहां-वहां देवता कमल रचते हैं। भावार्थ-हे भगवन् घमकती हैं नाखूनों की किरणों की निहायत खूबसूरत शिखा जिनकी ऐसे खिले हुए निर्मल सोने के कमलों के समूह की मानिन्द रोशन आपके घरण जहां जहां कदम धरते हैं वहां वहां देवता कमल रचते हुए चले जाते हैं। दोहा छन्द ॥ विकसित सुवरण कमल द्युति। नखयुति मिल चमकाहि ॥ तुम पद पदवी जहां धरै। तहां सुर कमल रचाहिं ॥३६॥ ३१-धुति-शोमा।

" भक्तामर स्तोत्र इत्थं यथा तब विभुतिरभूज्जिनेन्द्र, धर्मोपदेशनविधी न तथा परस्य । याहक प्रभादिनकृतःमहतान्धकारा, ताहक्कुतीग्रहगणस्य विकासिनोऽपि ॥३७ इत्थं -इस प्रकार । यथा - जैसे। तब-तेरी। विभूति-ऐश्वर्य । भभूतू- हुई । जिनेन्द्र-जिनेश्वर । धर्मोपदेशनविधि-धर्मोपदेशकरने का तरीका।न-नहीं तथा तैसे। परस्य = दूसरेको। याक् = जैसी । प्रभाकांति । दिन कृत्-रवि। प्रहतान्धकारा दूर करदियाहै अन्धेराजिसने । ताइक =वैसी।कुतो = कहाँ। प्रहगण चांद वगैरहं ग्रहों का समूह । विकाशिम:-धमक रहे । भपिम्भी॥ अन्वयार्थ = हे जिनेन्द्र ! इस प्रकार दिव्य ध्वनि वगैरह विमूतियें जैसे आपकी धर्मोपदेश के विधान में हुई वैसी दूसरे उपदेशक की नहीं होती।जैसी अंधेरे के नाश करणे वाली प्रभा सूर्य की है वैसी प्रकाशमान ग्रहों के समह की कहां ॥ भावार्थ-हे प्रभो हे भगवन् शिव मार्ग के पतलाने वाले इस प्रकार दिव्य ध्वनि मादि ऊपर बियान की गई जैसी तेरी विभूतियां धर्मोपदेश करने के समय हुई है वैसी किसी दूसरे भन्य मतावलंधी देवादिक के नहीं हुई क्योंकि जैसी मन्धेरै के दूर करने वाली सूर्य की ज्योति होती है वैसी दूसरे प्रहादिक की नहीं होती। ऐसौ महिमा तुम विषै। और धरै नहिं कोय ॥ सूरज में जो जोत है। नहिं तारांगण सोय ॥ ३७॥ : .. T

.
४०.
भक्तामर स्तोत्र
पूच्योतन्मदाविलविलोलकपोलमूल,
मत्तम्भमदनमरनादविवद्धकीपम् ।
ऐरावताभमिभमुखतमापतंतं,
हष्ट्वा भयं भवतिनो अवदाश्रितानामा३८।
चोवत-गिररहा ) (बह रहा) । मद मद, आविलव्याप्त। विलोल
चंचल । कपोल मूल = गण्डस्थल । मत्त-मस्त विमः धूमते हुए। भ्रमर-भौरे।
नाद-शब्दः । विवृद्ध बढ़ा । कोप - गुस्सा । ऐरावतान = इन्द्र के हाथी के तुल्य ।
एम हार्थी । उत-मस्त । आपतत् = आपडता हुआ । दृष्ट्वा -देखकर । भयं
घरं भवति होता है | नोनहीं । भवत् = आपके। भानित आसरे वाला।
अन्वयार्थ हे प्रभो। बह रहे मद से भीगे हुवे चचले गालों के मूल पर मस्त,
चूम रहे भौरों के शब्द से बढ़ गया है गुस्सा जिसका इन्द्र के हाथी के समान कांति
बाले. उन्मत्त ऐसे आते हुये हाथी को देखकर आपके भक्तों को भय नहीं होता।
भावार्थ-हे प्रभो चाहे कैसा हो भयंकर ऐरावत के तुल्य महामस्त मदोनमस
गजेन्द्र तेरे भक्तों के सन्मुख मारने के लिये आवें परन्तु तेरे नाम का आनय होने से
तेरे भक्त यह नहीं डरते ॥
॥ छप्प छन्द ॥
मद अवलिप्त कपोल, मूल अलिकुलझंकारें ।
तिन सुन शब्द प्रचण्ड, क्रोध उद्धत अतिधारें।
कालवणं विकराल, कालवत सनमुख धांवे ।
ऐरावत सम प्रबल, सकलजन भय उपजावे।
देख गजेन्द्र न भय कर, तुमपद-महिमा लीन ।
विपति रहित संपतिसहित, वरते भक्त अदीन ॥
३८-मद -हाथीका मद । भवलिप्त-लिपा हुवा। कपोल-गाले भलि
भौरा इदत मत (मस्त)
,
-
.

भक्तामर स्तोत्र।
भिन्नेभकुम्भगलदुज्वलशोणितात,
मुक्ताफलप्रकरभूषितभूमिभागः।
बद्धक्रमाक्रमगतंहरिणाधिपोऽपि,
नाकामतिकमयुगाचलसंश्रितं ते ॥३६॥
भिन्न -फूटे। इभ-हाथी । कुम्भ - कपोल। गलत् = बह रहा। उज्वल:
सुन्दर । शोणित = लहू (खून)। भक्त मिला हुआ. मुक्ताफल = मोती । प्रकर-समूह
भूषित = शोभित । भूमि =पृथ्वी । भाग- हिस्सा । बद्ध = बांधा । कमतरोका
क्रमगत-क्रमप्राप्त। हरिणाधिप-शेर । अपि = भी । न = नहीं । आक्रामति =दवा
लेता है । क्रमयुग-चरणयुगल । अचल = पहाड़ संश्रित सहारा लिये। ते-तेरा।
अन्वयार्थ-फाइदिये जो हाथीयों के कुम्भ उनसे गिर रहे उजले. लहू से मांगे
हुए मोतीयों के समूह कर शोभित कर दिया है जमीन का हिस्सा जिसने और बाधा
है कम जिसने ऐसा भी शेर अपने पावमें पड़े हुए परन्तु भापके दो चरण रूप पर्वत
के मासरे होनेवाले को नहीं दवा सकता ॥
भावार्थ हे भगवन् महाभयंकर हाथियोंके मस्तक के छेदने वाला जिसे देखते
ही इन्सान कांप उठे यदि ऐसे शेरके पैर में भी कोई आपका भक्त फंस जावे तो शर उसे
कुछ भी बाधा नहीं कर सकता । जसे गुफा में अंजना सुन्दरी की सहायता हुई थी।
मोट-इस काव्य के भाषा छन्द कवि हेमराज जी कृत में कालदोष से एक
ऐसा शब्द प्रचलित होगया था जो मरद के पुशोदा' अंग का नाम है 'जो स्त्रियों के
सन्मुख कहते हुए लज्जा माती है लो हमने ठीक कर दिया है।
अतिमदमत्तं गयन्द, कुम्भथल नखन विदारै ।
मोतीरक्त समेत, डार भूतल सिंगारैः।
बांकी दाढ़, विशाल, बदन में रसना हाले।
भीम भयङ्कर रूप देख जन थरहर चोले।
ऐसे मृगपति पग तलेजो नर आया होय।
शरण गहै तुम चरणकी; शाधाकर न सोय॥३९॥

भक्तामर स्तोत्र। कल्पान्तकालपवनोदतवहिकल्पं, दावानलं ज्वलितमुज्ज्वलमुत्स्फुलिंगम्। विश्वं जिघत्सुमिव संमुखमापतन्तं, त्वन्नाम कीर्तनजलं शमयत्यशेषम॥४०॥ . कल्पांतकाल - प्रलयकाल | पवन हवा । उद्धत मड़कती। पति- आंग। कल्प-चरोवर । दावानल पनकी आग । ज्वलित चलती। उज्वल-धमंक। उत्स्फूलिंग-जिस से चिंगयाड़े निकल रहे हैं । विश्व - जगत् । जियत्सुः खाने की स्वाहिश वाला ।इव-जैसे संमुखं सामने आपनत् आते हुए विनाम तेरे नाम' कीर्तन -कथन करणा । जल = पानी, शमयति शान्त करता है। अशेष-सकल ॥ : अन्वयार्थ हे भगवन ! प्रलयकाल की पवन कर उड़ाये वा भड़काये माग के समान बल रहे चमकीले ऊंचे विनगायें से शोभित संसार के खाने की इच्छा से. मांनी सांहने आ रही बनकी तमाम भाग को आपका नामोच्चारण रूपंजल शांत कर देता है ।। भावार्थ-यद्यपि अग्नि जल से शांत होय है तो भी प्रलयकाल की पवन कर उभारी हुई आसमान तक जिस के भभकारे जारहे हैं चारों तरफ से बलतो मा रही ऐसी भयानक अग्नि मी भगवान के नाम रूपी जल से शांत हो जाती है । नोट:-जैसे सीता सतीकर उच्चारण किये प्रभु के नाम रूपी जलने अग्निकुण्ड को शांतकर कमलों सहित प्रफुल्लित पानी का सरोवर बना दिया था। प्रलय पवन कर उठी, अग्न जो तास पटतर। वर्मफुलिङ्ग शिखा, उतङ्ग पर जले निरन्तर । जगत् समस्त निगल कर, भस्म करेगी मानों। तड़तडाट दवजले, जोर चहूं दिशा उठानो। सो इक छिन में उपशमें, नाम नीर तुमलेत । होय सरोवर परणमें, विकसित कमल समेत ॥ १० ॥ 4 ,

४३
7
.
भक्तामर स्तोत्र।
रक्तक्षणंसमदकोकिलकंठनीलं,
क्रोधोद्धत फणिनमुत्फणमापतंतम् ।
आक्रामति क्रमयुगेन निरस्तशंक,
स्त्वन्नामनागदमनी हृदि यस्य पुंसः॥४१॥
रक-लाल।क्षिण भास्ने । समदमस्त । कोकिल - कोयला कंठ- गला
मील-नीला । क्रोधोवत-गुस्से से उन्मत्त । फणीलांप । उत्फण ऊंची,फण किये
आपतंतं - मा.रहे । माक्रामति वालेता है । क्रम =पांउ । युग जोड़ा निरस्त
वगैर । शंका-शका त्वत्-तेरा । नाम नाम । नागदमनी-नागदौन बूटी। दि
दिलमै । यस्य: जिस के। पुंसः = नर के ॥
मन्वयार्थ हे स्वामिन् । सुरख आंखें पाले मस्त कोयल के गले के समान नीले, गुस्से
से उद्धत ऊंची करी है फण जिसने ऐसे आते हुये सांप को "यह पुरुष" निर्भय होकर
दोनों पावों से दवा सकता है जिस मनुष्य के दिल में आपके नामरूप नागदौनबेटी है ।।
भावार्थ-नाग दमनी एक जड़ी होती है जिस के लगाने से कैसा भी जहरीलालपिन
काटाहो बाधा नहीं कर सकता अर्थात् जहर उतर जाता है लो यहां भाचार्य कहते हैं
कि हे प्रभो भापके नाममें इतना असर है कि जो पुरुष मापके भक्त हैं आप पर निश्चय
रखते हैं वदि महाकाला सुरख भांखों वाला गुस्से से भराहुआ सांप ऊंचीफणउठाएलोर
से फुकारे मारता हुभा मुखसे मग्निके चिङ्गाड़े निकलतेहुए किसीआपके भक्तकेसन्मुख
भावतो वह उसे देख कर नहीं डरता दोनों पैरों से दवा सकता है यदि वह 'काट भी
खाये तो भापके नाम स्मरण रूपी नागदमन से भापके भक्तों को जहर नहीं चढ़ता।।
नोट-विषापहार में सेठ के पुत्र का जहर उतर गया था।
कोकिल कण्ठ समान, श्यामतन क्रोधजलंता ।
रक्तंनयन फुकार मार विष कणि उगलन्ता।
फण को ऊंचा करे वेगही सन्मुख धाया।
तव जन होय निशंक, देख फणपतिको आया ।
जों के निजविको, व्याप विष न लगार ।
नागदमन तुम नामकी, है जिनको आधार ॥४१॥

भक्तामर स्तोत्र
वल्गत्तुरंगगजगर्जितभीमनाद,
माजी बलं बलवतामपि भूपती नाम् ।
उद्यहिवाकरमयूखशिखा पविद्धं,
त्वत्कीर्तनात्तम इवाशुभिदामुपैति ॥ ४२ ॥
वल्गन नाचत । तुरंग घोड़ा। गज-हाथी ! गर्जित् = गाजता भीम
भयंकर । नाद - शब्द। आजि-युद्ध । बल = फौज । बलवान् =जोरावर | अपि में
भी भूपति राजा । उद्यत् = ऊपरहा। दिवाकर -सूर्य । मयूख-फिरणें । शिखा-
ज्वाला । अपविद्ध-फूंकागया। स्वत् = तेरा। कीर्तन - कथन । तम = अन्धेरा। इव-
जैसे। आशुम्जल्दी । मिद-भेद । उपैति प्राप्त होय है ।।
अन्वयार्थ-हे प्रमो चल रहे नाचते घोड़ो से और हाथियों के गर्जन से भय
कर शब्द वाली बलवान् राजों की फौज युद्ध आपके नामोच्चारण से ऊगते हुए सूर्य
की किरणों की शिखाओं ले वीधे हुए अन्धेरे के समान जल्दी नष्ट हो जाती है ।।.
भावार्थ-यहां भावार्थ कई है कि हे भगवन् यदि कोई गनीम बहुत बड़ी फौज'
का भमघोह लिये हुए घोड़े दौड़ाता हुआ हाथियों को गरजाता हुभा' इस कदर गरद
सुधार उड़ाते हुए कि सूर्य भी नजर न पड़े जिसको देखकर बड़े बड़े,मानी. राजानों के
मान गलजावें यदि आपके भक्त के सन्मुख आवे तो जैसे सूर्य के सम्मुख अन्धेरा
नहीं ठहरता इसी प्रकार आपके आश्रित के मुकाबले से वह भाग जाता है।
जिस रण मोहि भयानक, शब्द कर रहे तुरंगम,
घन से गज गरजाहि, मत्तमानो गिर जंगम ।
अति कोलाहल माहि, बात जहां नाहि सुनीज,
राजन को परचण्ड,देखबल धीरज छीज।
नाथ तुम्हारे नाम से सो छिनमाहिं पलाय,
ज्यूं दिनकर परकाशते, अन्धकार मिटजाय ॥४२॥

भक्तामर स्तोत्र।
४५
कुन्ताग्रभिन्नगजमोंगितबारिवाह,
वेगावतारतरणातुरयोधीमें।
युद्धे जयं विजितदुर्जेयजेय पक्षा,
स्त्वत्पादपंकजवनायिणी लभते ।४३ ।
कुन्त = माला (वरछो)। अन = अग्रभाग। भिन्न - फटा । गजे = हाथीं।
शोणित-खून । पारि-पानी। वाह = प्रवाह । वेग-जल्दी । अवतार में उतरना।
तरणि-तैरना । आतुर - दुखीं । योध-योधा । भीम =भयंकर । युद्ध लड़ाई।
जय-जीत । विजित-जीते गए । दुर्जय-दुखसे जीतने योग्य । जेय जीतने योग्य
पक्ष-तरफ । त्वत्-तेरे । पाद =चरण । पंकजवन - कमल समूहमाश्रयी-
मासरा लेने वाला।लभंते लभते हैं ।
अन्वयार्थ हे प्रभो आपके चरण कमलं रूप बनका आश्रय लेने वाले (भक्त)
परछी के अग्रभाग से मेरे(छेद) गए जो हाथी उनके खून कंप पानी के प्रवाह में जल्दी
से उतरणे तथा पारजाने में दुःखी हो रहे हैं योधा जिस में इस लिये भयंकर युद्ध में
जीत लिये हैं दुःखसे जीतने योग्य शत्रुपक्ष जिन्होंने ऐसे हुए हुए जय को प्राप्त होतेह ।
भावार्थ:-हे भगवन ऐसे बड़े जंगोजदल में कि जहां फोज का घमसान हो
जाने से खून की नदियां बहने लग जाये जिसमें बड़े २ योधा फसे हुए दुखी होकर
पार जाने में असमर्थ हो ऐसे जंग में मुघतला भी आपके भक्त आपके नाम के स्मरण
मात्र से ऐसे अजीत जंग को भी जीतकर फतह पाते हैं।
मारे जहां गजेन्द्र कुम्भ हथियार विदारे।
उमगे रुधिर प्रवाह, वेग-जल से विस्तारे।
होय तिरण असमर्थ,महा योधा बल पूरें।
तिस रण में जिन तोय,भक्त जे हैं नर सूरे।
दुर्जय अरिकुल जीतकर,जय पावें निकलंक।
तुम पद पंकज-मन बसें, तेनर सदा निशंक ॥ ४४ ।।

भक्तामर स्तोत्र। . अंभोनिधौ क्षुभितभोषणनक चक्र, पाठीनपीठभयदोल्वणवाडवाग्नी। रंगत्तरंगशिखरस्थितयानपाचा, स्वासं विहाय भवतः स्मरणादवजन्तिा88 मम्मोनिधी = समुद्र । क्षुभित-क्षोभवाले। भीषण भयं देने वाले। न माक्वा समूह। पाठीन-एक किसम की मछली । पीठ पीदाभयद-उपने पाली । उल्वण-प्रचण्ड । वडवाग्नि-समुद्र की आग । रंगत् = नाचती । तरंग-' लहरें । शिखर-चोटी । स्थित ठहरे हुए। पानपात्र जहाज बास-भय विदाय छोड़ भवतः - तुम्हारे । स्मरण म्याद करणा। ब्रजन्ति -जाते हैं। मन्वयार्थ हे भगवन् क्षोभ को प्राप्त हो रहे हैं भयानक नाकूचों के समूह और मछ नल जीव भोर भय देने वाली है बडवा आग जहाँ ऐसे समुद्र में नाचती दुई लहरों के ऊपर स्थित है जहाज जिनके ऐसे भी आपके स्मरण से (याद करणे से) भय को छोड़ कर चलते हैं। भावार्थ- हे भगवन अति गंभीर समुद्र जिस में नाको भौर बड़े र खेलमच्छ और बड़े २ सांपों के समूह भरे हुए हो जिसकी लहरें मोलो तक उपर उछल रही हो और जहां जल के जलाने वाली घड़वा अग्नि चल रही हो जिल को जहाज और . भग्न बोट भी नहीं अबूर कर सकते जैसे कि सौथपोल (दक्षिणी कुतव) ऐसे मलंय समुद्र में यदि आपके भक्त गिर जावे तो आपके नामरूपी तारण के मामय से उस को तैरकर पार हो जाते हैं। नोट-श्री पालमट आदि अनेकापार हुए हैं। नक चक्र मगरादि, मच्छकर भय उपजावे। जामें बड़वा अग्नि, दाहसे नीर जलाये। पार न पावे जास, थाह नहिं लहिये जाकी। गजें जो गम्भीर, लहर गिनती नहिं ताकी । सुख सो तिरेसमुद्र को जे तुम गुण सुमराहि । चपल तरङ्गान के शिखर पार जान ले जाहि॥४४॥ - भक्तामर स्तोत्र। उदभूतभीषणजलोदरभारभुग्नाः, शोच्या दशामुपगतागतजीविताशाः । त्वत्पादपंकजरजोऽमृतदिग्धदेहा, मां भवंति मकरध्वजतुल्यरूपाः ॥४५॥ । उद्भूत-होगया । भीषण भयंकर । जलोदर पेटका रोगामार भार। भुग्न कुबड़े। शोच्या =शोक के योग्य । दशा म्हालत । उपंगता प्राप्त हुये। गत दूर हो गई। जीवित-जीना। आशा-आस । त्वत्पाद - तेरे पाव। पंकज- कमल । रजो-धूल। भमत अमृत । दिग्ध-लिपा । देह शरीर । मां मनुष्य भवन्ति होय है मकरध्वज कामदेव । तुल्य समान । कंप-शकल ।। अन्वयार्थ हे प्रभो! बढ़ गए भयंकर जलोदर रोग के भार से टेडे होगये भौर दूर होगई है जीवने की आशा.जिनकी इसी लिये शोक की दशा (हालत) को प्राप्त हो गए ऐसे भी मनुष्य भापके घरण कमल की घूल रूप अमृत से लिप गप है शरीर जिनकेलो तो कामदेव के तुल्य रूप पाले होजाते हैं। भावार्थ हे भगवन् मापके चरणों की रज में इतना असर है कि छोटे मोटे रोग का तो क्या जिकर जलोदर सारखे ला इलाज मरज जिनको होजाने से उनकी जिन्दगी की भाशा नहीं रहती भापके चरणों की रजकपी अमन शरीर के लगाने से उनके सर्व रोग दूर हो कामदेव समान कंचन वरण शरीर होजाता है। नोट-भगवान् के प्रतिविम्ब के प्रक्षालन मात्र जल लगाने से कोटीमट प्रापाल का कुष्ट दूर हो सुवर्णसा शरीर हुआ है। महा जलोदर रोग; भार पीड़ित जेनर हैं। वात पित्त कफ कुष्ट, आदि जे रोग गहे हैं। सोचित रहें उदास, नाहि जीवन की आशा। 'अति घिनावन देह, धरें दुर्गन्ध निवासा। तुमपदं पंकज धूलको जेला निज अङ्ग । ते नौरोग शरीर लहि, छिन में होय अनंग ॥ ४५॥ .

१० भक्तामर स्तोत्रा आपादकंठमुरुशृंखलवेष्टितांगाः, गाढंटइन्निगडकोटिनिष्टजंघाः । त्वन्नाममंत्रमनिमनुजाः स्मरंतः, सद्यःस्वयंविगत बंधमया भवंति ॥४६॥ ', आपाद कंठ-पाव से कंठ तक। उस वा शंखलसांकल । वेष्टित लपेटा गया।. अंग-शरीरं ।' गाडे मजबूत । वृहत बडे २ । निगड जंजीर • (सांकल)। कोटि- अनभाग । निधृष्ट घलगई। जंघा टाँगे । वन्नाममन्त्र - तुम्हारा नाम कपी मन्त्र । अनिश दिनरात मनुज-मनुष्य स्मरन्ता यादकरते हुए सद्यः = शीघ्र । वस्त्र अपने आप । विगत:- दूर होगया। बंध-बंधन । म हरभवंति - होजाते हैं। अन्वयार्थ-पांव से गले तक बड़े भारी सांकल से लपेटे हैं शरीर जिनके गादी बड़ी की कोटी से घिस गई है.जंघा जिनकी ऐसे मनुष्य तुम्हारे नामरूप मंत्र.फो. दिनरात जपते हुए जल्दी ही अपने आप टूट गए हैं बंधन जिन के ऐसे हो जाते हैं । ::. . भावार्थ-हे प्रभो भापके नाम मात्र में इतना प्रभाव है कि जब राजा आदि संकलों से जकड़ कर भोयें में डाल ताले टोक देते हैं, तब ऐसी कठिन मोड़ पड़ने पर आपके भक्त आपका नामांसपी मंत्र का स्मरण करते हैं तो अपने बाप तमाम बंधन टूट सर्व भय दूर हो जाते हैं।' पांव कण्ठ से जकर, बान्ध सांकल अति भारी। गाढ़ी बेड़ी पैर माहि, जिलजांघ - विदारी। भख प्यास चिन्ता, शरीर, दुःख जे विललाने । शरण नाहि जिन कोय, भूप के घन्दीखाने । तुम सुसरत स्वयमेव ही, बन्धनः सब खुल जाहिं। छिनमें ते संपति लहें, चिन्ताभय विनसाहि॥ ४६ .

। भक्तामर स्तोत्र ४९. मत्तहिपेंद्रमृगराजदवानलाह, संग्रामवारिधिमहोदरबंधनोत्थम् । तस्याशुनाशमुपयातिभव मियेव यस्तावक स्तवमिममति मानधीते ॥४॥ मस-मस्त द्विपेन्द्र (गजराज) बडे-हाथी! - मृगराज-और। दवानल पनकी आग महिलांपा संग्राम युद्ध (लड़ाई) चारिधिम् समुद्र । महोदर जलोदर के समान पेट का रोग बंधन बांधा जाना । उत्थं उठा । तस्य-उसका। भाशु -जल्दी नाश-नष्ट | उपयोति हो जाता है। भयं खौफ। मियां डर खे।इव-तरह । यः जो; तावक = तुम्हारा स्तव-स्तोत्र । इमं से मंतिमान्य बुद्धमानमधीते पढ़ता है :..: मन्वयार्थ जो बुद्धिमान आपके इस स्तोत्र को पढता है-उस का मस्त हाथी' शेर, धनकी भाग, सांप, युद्ध, समुद्र जलोदर, बंधन, पुनले पैदा होने वाला भय। शीघ्र ही उससे डरता हुआ नष्ट हो जाता है । भावार्थ; यहां आचार्य कहे' हैं कि है. भगन् ऊपरके छन्दों में वर्णन करें जो. मस्त हाथी, शेर, बन की आग साप युद्ध समुद्रं जलोदर रोग बंधन आदि भष्ट प्रकार के महा संकर जो बुद्धिमान आप के भक्त विपदा के लमय आपका यह स्तोत्र पढ़ें उन की हर प्रकार की मुसीबत डर कर एक क्षण मात्र में नष्ट हो जाती हैं अर्थात् उनको कैसी ही विपदा पेश क्यों न आजाधे यदि वह मुसीवेत के चकत औपके इस स्तोत्र का पाठ करें तो उनकी सर्व तकलीफात फौरन दूर हो वह अमन चैन हासिल करते है। TA महामत्त गजराज, और. मृगराज वानल । फणपति रण परचंड नौरनिधि गेगमहाबल । बन्धन ये भयं आठ, डरप कर मानोनाओं सुमरत छिन माहि, अभय थानक परकाशें। इस अपार संसारमें शरण नाहिं प्रभु कोय । याते पद भक्त को भक्ति सहाई होय ॥ १७॥ " ।

५० भक्तामर स्तोत्र । स्तोचस्रजं तव जिनेंद्रगुणैर्नि , भक्त्या मया विविधवर्णविचित्रपुष्पाम् । धत्ते जनो य इहकंठगतामजस्रं, तं मानतुंगमवशा समुपैति लक्ष्मीः ॥४८॥ : स्तोत्रसजस्तोन रूप माला को। तब-तुम्हारी जिनेन्द्र-जिनेश । गुण- माधुर्यादि काव्य गुण, वा, सूत । निवद्ध -गून्धी (रची) मत्या मंक्ति से। मया- मैने । विविध अनेक प्रकार की वर्ण-रंग । विचित्र मकई रंग की पुष्पा - फूल। धते-पहिनता है । जनः-मनुष्य । या-जो। इह-यहां किंठ-गलागता पड़ी हुई। अजन्न-निरंतर (लगातार) । तं उसे । मान इज्जत । तुंग-ऊंचाया "मानतुंग" कवि का नाम है । भवशा=न वश होने वाली । समुपैति मच्छी तरह प्राप्त होय है । लक्ष्मी श्री, शोभा, मुक्ति। अन्वयार्थ हे जिनेश भक्ति करके तुम्हारे गुणों से गून्थी हुई भनेक भक्षर स्प विचित्र हैं फूल जिसमें कंध में प्राप्त इस स्तोमरूप माला को जो पहिन लेता है मान से ऊंचे उस मनुष्य को नी लक्ष्मी (मुक्ति प्राप्त होती है। भावार्थ-स स्तोत्रके पढ़नेका महात्म्य यह है कि इस में वर्णन करे जो जिनेन्द्र के गुण घही भया तागा और इस के शब्द वही नवे रंग बिरंग के फलों की माला जो नर कंठ में पहने अर्थात् इस को कंठ कर नित्य पढ़ें वह इज्जत, लक्ष्मी माला दरजे के बतवे खिलत और स्त्री पुत्रादिक हर किसम के मनोवांछि कायम रहने पाले. फलपाय मुक्ति के भागी होवेंगे। यह गुण माल विशाल नाथ तुम गुणन समारी। विविध वर्ण के पुष्प, गून्थ में भक्ति विद्यारी ॥ जोनर पहिरे कंठ भावना मनमें भावे । मानतुङ्ग वह निज अधीन शिवलक्ष्मी पावे ॥४८ दोहा-भाषा भक्तामर कियो, हेमराजहितहेत। जे नर पढ़ें स्वभाव सों ते पायें शिव खेत॥ - (.. ५१ ) सची पत्र । यह पुस्तके हमारे यहां बिकती हैं हमारी छपवाई हुई पुस्तकों के नाम। . 4 . शुद्ध पंचल्याणक तिथियों के, चार, दर्शन कंथा भाषा छंद वाद चौबीसी पूजन पाठ संग्रह का. महान चार दान कथा "बड़ी. ग्रंथ अर्थात् संस्कृत चौवीसी पूजा पाठ शील. कथा मापा छंद बन्द २. भाषा चौबीसीदूजा पाठ रामचन्द्रकृत 'दो निशि भोजन कथा बड़ी छोटी.) ३ भाषा चौबीसी पूजापाठ वृन्दावनत नित्य नियम पूजा देवशास्त्रं गुरु शुद्ध ४ मापा चौबीसी पूजा पाठ वखतावर | संस्कृत पूजा तथा भाषा पूजा)। कृत यह चारों पाठ एक प्रन्थाकार खुले ६०५ दिगम्बर भाषा जैन अन्यों पत्रों में शुद्ध पंच कल्याणक तिथियों के 'के नाम... छपे हैं । इसमें कमीशन नहीं काटा कुवरदत्त, के १८.नाते जाता क्योंकि इसका पूरा दाम १०) चारह भावना संग्रह im हरवंश पुराण महान ग्रन्थ. ५ )इसमें छह ढला संग्रह धानत, बुधजन, दौलत कमीशन नहीं काटा जाता ..क्योंकि तीनों पाठों को इकट्ठी एक पुस्तक ) इसका परा दामः ६) है। श्री मनाथ का व्याहला प्रश्नीचर श्रीपाल चरित्र भाषा छन्द यन्द.१॥2. बारह मासादि राजल नौ पाठ ...) नई जैनतीर्थ यात्रा बेडी.. यमनसैनचरित्रमुनियमनसैन का वृत्तान्त सुकुमाल चरित्र बड़ा भाषा मुनिवर के अहार की विधि ......) जैन कथा संग्रह स्त्रियों के संतान पैदा तथा जिल्द सहित ६.. 1॥ होने की विधि और इलाज सहित १) तत्वार्थ सूत्र मूल संपूर्ण । जैनवाल गुटका प्रथम भाग बड़ा जैन भूधर जैन शतक अर्थ सहित ) पाठशालाओं में पढ़ाने योग्यः का भक्तामर भाषा कठिन अर्थ सहित ) मिलने का पता हकीम ज्ञानचन्द्र जैनी मालिक दिगम्बर जैनधर्म पुस्तकालय लाहौर।

- . (५२ :) हमारी जडी बूटियों के इलाज से स्त्री को जरूर गर्म रह जाता है यह इलाज हम जंगल को जड़ी बूटियों से करते हैं हमारे इलाज से जकर ग रह जाता है जिसे इलाज करना हो हमसे हमारा इश्तिहार मंगा कर पदे. स्त्रियों के पगर (सुफेद वीर्य गिरने) का इलाज। जिस स्त्री के वीस.वर्ष से भी सफेद वीर्य गिरता हो हमारी जड़ी बूटियो इलाज से बिलकुल बंद हो जाता है जिसके कपडे, बंद हो गये हो हमारी जड़ी बूटिर के इलाज से कपड़े जारी हो कर हरमास बराबर होने लगते हैं । पुरुषों के वीर्य की विमारियों का इलाज । जिस पुरूष का वीर्य पानी समान भी पतला हो गया हो आताफ के जखम हो पुराना सुजाक हो खून गंदा हो गया हो.ना मरद होंगया हो हमारे इलाज से बित कुल नीरोग हो कर काया स्वर्ण समान हो जाती है । पुराने जखमों का इलाज। जिन विमारों को डाक्टर यह कहे कि इसकी टांग या बांह चदून काटे इसके • जखम अच्छे नहीं हो सकते हमारी जड़ी बूटियों के मल्हम से वर्षों के सड़े जखम दूर फरक काया नीरोग हो जाती है । फालिज का कामिल इलाज। जिसे फालिज मार गया हो अघडंग मार गई हो दांग बांह धुड मुड़ने या हो हमारी बूटियों के इलाज ले मनुष्य बिलकुल तंदुरुस्त हो जाता है । हम दवा नहीं बेचते हम दवा नहीं बेचते और न दवा भेज सकते हैं जिले इलाज कराना हो हमें बुलं कर इलाज करवावें हम हकीम है वाय पिच कफ बीमार, के मिजाज माफिक संरक्ष गरमी चतुरमास मौसम के अनुसार सोच समझ कर इलाज करते हैं । हमारी फीस बहुत बड़ी है। हम मामूली फोलपर इलाज करने नहीं जाते हमारो फीस हाथी जैसा,पेट इन्, बदी है कि बड़े धनवान हो देसकते हैं जो हमको बुलाकर इलाज करवावे हमारा मुलाज सहितभानेजानेका किरायां खरब दवा का दाम रोजाना रसोई खरचमीदेना पड़ा। हमारा पता:- "महला अनारकलौनीला गुम्मन लाहोर - - - ,

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Bhaktamar Stotram

Author
Jaini, Gyanchandra
Title
Bhaktamar Stotram
File name
Bhaktamar Stotram
Text
OCR done
Citation
1912
Published
2009/11
Publisher
Lahore, Ekanomical Press
Language
Sanskrit
Pages
52
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain sahitya
DLI number
344259
Barcode
99999990234134.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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