Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Hindi Kavyalankar
Front matter
No text on this page.
हिन्दी काव्य-प्रबंध-पाला-पुस्तक मरी।
AIRITARIANRAINIKANIAN
॥ श्री 11
हिन्दी-काव्यालङ्कार
म तमन्न अलका के लक्षण पोर उहाग अत्यन्त मुगम
गति से गित मान्याय मोरनिनिमित
अलङ्कार दर्पण भी सम्मिलित है।
MIVIVIMIWILIUNVINICIUNUNNINIUNIINiving
-
'पपिता-
साहित्याचार्य याच जगनायप्रमाद भानु-रवि,
रिटायर्ड ई. ए. सी. रिलासपुर, मध्यप्रदेश ।
-*
जगन्नाध प्रेस बिलासपुर में मुहिन ।
सन १९१८०
NAINAINNAININNRNAY
नाराट
PYINID IS ARDULLA VivacyRA DIG
. 4474VYATI PRI ss" — BIL 43PUR, CP.
111
PuI LISILYD) 13Y Vik B Jada TI Pitasaty
PROPRIITON
ZARIBAR
भूमिका।
हिन्दी काव्य-प्रमन्य-माला की यह दुमरी पुस्तक "हिन्दी-कान्यालकार
अपने प्रिय पाठको की सेवा में हम सादा समर्पण करते है। हिंदी काव्य
का रसास्वादन करने के लिये प्रलकारों का जानना परमारण्यक है। मरे,
पुचित प्रकाव्य प्रभार में भी हमी नविन्तर व्याया है परन्तु
उसका मूल्य अधिक होने के कारण वह सर्वसाधारण को दुप्राय मा है
इसलिये दोटीमी गुम्न मर्मसाधारग के हेतु निमिन की गई है। इसमें
मदेह नहीं कि हिन्दी साहित्य में इस विषय के अनेक र विधान है
परन्तु किमी में लगा और उदाहारा महर छटा में कहे है और कितनी
मलदार वल गरमी कहरत उदाग छटा में रहे हैं जिनके पार
मग्न में विरार्थियों को भायन्न कठिनाई होनी है। भाषा में सारा
गौर माहाग नतिर गति में एक एकही टोह में पाये जाने परन्तु
उनकी माया नहीं मार शिपों को ये मुगम बार नीम
ना में शेषना किलदान और मारपीटने म मरे गये
और उनी के नीचे मार यानीमल fon:
म निति गरमादियों में पलक :
गनिम निगम र दामाद
माना गये । पल APTE मा matी
mfrint की पर
HTTrirani an E
tarako P17 १ . Fri
--
भूमिका।
गगाधर तपा भाषा-अप अलकार प्रकाश, अलकार मजूपा, गमचद्रभ्परा.
जसवतभूषण ओर भाषाभ्पण से बहुत कुछ सहायता ली गई है प्रत हम
इनके लेखकों के प्रति अपनी हादिक कृतज्ञता प्रदर्शित करते है। तम्त के
तो प्राय सभी प्रय उत्तम हैं पर भाषा में ग्रलकार प्रकाश और अलकार
मजूया ऊचे दरजे के ग्रन्थ है । अग्नु दम पुस्तक मे पाटको को कुछ भी
लाभ हुआ तो में अपने को स्तरुत्य समझगा।
जगन्नाथ प्रसाद,
बिलासपुर, मध्यप्रदेश
१९१८
भानु-कवि।
८४VANAGAR
हिन्दी काव्यालङ्कार का सूचीपत्र । अग्यारों काम पृष् अलकारों क शाम पृष्ठ अरपती अधावापाम ८१ अपापति अपारपार अमानितोकि अनाप याय अन गुण अभियांकि সানিধাবি भधि अधिक अधिषनाग ३३ अकारपन .. अर असा มถูก ५८ भनय २० ४ भगमरमर ८२ भनियोकि ९९माधि ३२ अन NT NAI भरमा anitaram.NAL:060 भगमाग ग मालामा mins उमति १२ मरिता उपET "ग 3HIK TIMER: . 1 .. ..
Eee [२] सूचीपत्र। तिस्तर तुरययोगिता २२९ ३४ १४ १०० ८०१ ९० काकतालाय काकुवमाक्ति कारकदीपक कारणमाग कालभेद दोष कायालग काव्याधापत्ति कूपमडूक वृम्मांग तिवापनुति मुतिक कोमला कौडिन्य भम गड्मुरिका प्रकार गणपति गतागत गृडोक्ति गूढोत्तर गोटी घटप्रदीप घुणाक्षर चिद्र चौद्गका चपलातिशयोक्ति चित्रालकार বিস্বান छकानुप्राम छकापहनुति छकोक्ति जलतरग जर तुविका तद्गुण तिरस्कार ६५ दपूपिका दिनदिनपति दापक दृष्टान दृष्टिपटक १०७ देहलीदापक २६ दोप अर्धालकार १०७ दोष शन्दालकार নিয়ে १०७ निरक्ति ६७ निरोष्ठ निपथाभाम नृसिंह “याय न्यूनता-दोष पग्वध परिकर परिकरापुर १०८ परिणाम १०८ परिवृत्ति परिसरया ११० ४७ १०८ ४८ २४ ६८ परुपा . पाचाला ३ ६७ २७ पध्याय पग्यायोक्ति पय्यस्तापानुति पिष्टपपण पिहित पुनरप्रवदामाम पुरुषभेद-दोप ८० ७० 732 [३] ८० .. PRASANNAINAIASAN मूचीपत्र। पूर्णोपमा पापार ८ .. पूधम्प मनापमा गपिपिस ८. प्रमिपमा प्रापथ " पर पनिसान प्रचनाका kola Instane प्रन्दन | पोपमा miociale it . प्रनाल प्रामामार प्रार प्रहप7 REPITH प्रहापाग ॥ गुमाएमा P 03 | Pirit hintale ८. बगनिदा fion गरपुर T " पर im Pariramir iTER JI sixit " HRI ९ ४ .. वेदमा PresebeneraMerites [४] •सूचीपत्र । वासों वृत्तिविरोध १०० वृत्त्यनुमाम समाधि गृह्मकुमारी यापय १११ ममामाति मायय वैपत्य १०८ माधानिशान व्यतिरक मभर व्याघात मभाया व्याजनिंदा व्याजस्तुति माप याति व्याजोक्ति मामान्य शब्दप्रमाण मार मिदावरीका शुखापट्नुति सुदोषनुश्न असनुप्राम ६। मूलीपगार शृम्बना मम्म शप अय स्थालापता रुप-शब्द रमरण समष्टि । साभावोक्ति ५३ ८३ ३ १. मकर ९८ सदह सदह उभयासकार हत्यपहनुनि हटना न्याय क्षारनौर न्याय मदर न्याय । सागर और wwwvitrena
MANAND
हिन्दी-काव्यालङ्कार
( Figure of Speech)
1
.
१. फाव्य जिसमे अलकृत होता है उसे काव्यालङ्कार कहते
है, कान्य दो प्रकार का है (१) गय (उदरहित वाक्य)
(२) पय (उद निवद्ध) जिसमें गप वा पर दोनों हो
उसको चपू कहते हैं, यथा-
छंद निवद्ध मुपद्य कहि, गद्य होत बिन घंट।
चंपू गयऽरुपद्य मय, भानु भनत सानंद ॥
२. फाल्प के दो भेद चारह (१) दृश्य, जो देखने योग्य हो
पया नाटकाटि (२) श्रव्य जो मुनने में पढ़ने के योग्य
हो अर्थात् तिपि पर यथा रामागपादि ।
३. काव्यान्नगन चमत्कार को अलवार कहते हैं। अरक्षार
का धम्म है-काव्य की शोभा बढ़ाना ।
४. अलकार तीन मार के होनेर
१सन्दालार, मां द ग्चना द्वाग नमकार
भामित हो । यमा. रघुनद भानंद मंद वाचन गंद
दराम नंदनम् ।
२ अमावफार, नाम पर पागा नाई। सपा
भनि म मासामग, भामा मोहा।
३ रामपाशर, नही पा से मार पाई
पिरगद के पापा दोनों रे, मा.
1
02K
[२]
हिन्दी काव्यालङ्कार ।
लसत मंजु मुनि मंडली, मध्य सीय रघुनंद ।
ज्ञान सभा जनु तनु धरे, भक्ति सच्चिदानंद ॥
सू०-अलंकार का विषय कही सूक्ष्म और वादग्रस्त है अतएव:
विद्यार्थियों को चाहिये कि यथा संभव परस्पर वादानुवाद
द्वारा इसका अभ्यास सिद्ध करें।
शब्दालङ्कार
( A figure of Speech in words)
शब्दालंकार के आठ भेट है, १ पुनरुक्तवद्राभाम, • अनुप्रास,
३ यमक, ४ वक्रोक्ति, ५ भापासमक, ६ श्लेप, ७ प्रहेलिका
और ८ चित्र ।
१ पुनरुक्तवदाभास (पुन उक्तवत् आभास)
पुनरुती वद भास, शब्द भिन्न एकार्थ जहं ।
अर्थ जुदो परकास, भंग अभंगहिं रूपतें ॥ यथा-
सह सारथि सूत सुलसत, तुरंग आदि पद सैन ।
निकट तुम्हारे रहत नृप, मुमनस विषुध सुबैन ।
यहां प्रथमार्द्ध में सारथि और सूत ये दोनों भिनर होने
पर भी एकार्यवाची हैं परतु पद भग करने से अर्थ जुदा हो
जाता है जैसे हे नृप सहसा (बलपूर्वक) रथि ( योद्धागण मूत
(सारथी) तुरंग (घोडा) और पैदल फौज आदि से आप
शोभायमान है । द्वितीयार्द्ध में अभंग पद सुमनस और विबुध भी
एकार्थवाची है पर अर्थ जुदा है अर्थात् मंत्री और पंडित ।
६७
हिन्दी काव्यालद्वार ।
[३]
A
२ अनुप्रास
(Alliteration )
(वर्ण साम्य मनुमासो, वैपम्येऽपि स्वरस्य यत् )
व्यंजन सम वरु स्वर असम, अनुप्रास लंकार ।
छेक, वृत्ति, श्रुति, लाट अरु, अंत्य पांच विस्तार ॥
जहा व्यंजन की समानता हो, स्वर मिल पा न मिल पटरी
अनुमास । अनुभास में स्वगें की गणना नहीं कीजाती।
१ छेक-अनुमाम
(Singl. Allhttrition)
जहें अनेक व्यंजनन की, आत्ति एक बार ।
सो छेकानुप्राम ज्यों, अमल कमल कर धार ॥
अर्थ ₹-को व्यजन मरम्प सग्रन् मार
मनेकधा । जहां अनेक पननों पी फेवर एक बार क्रमपूर्णक
भावनि हो उसको लानुपास करते हैं। यहां का भार में
की और अपल फमन में 'मन' की एकही धार ममपूर्ण
भारतिर पदि एक स्थान में पल रो और दसरे स्थान
लमहीनो पासपूर्णक नहीं गमगना नागि नंगे 'रम की!
भारपि 'रमन कि 'गर' । पपा-
(१) गा.पापन गनि, चीनी गांकन गुभाग !
दाबी पिम मुग, गुधा गरी मनाप ।
या पर भारी, शriमार fre
'ग' की मुभा चार मामाप में की एक सामान
का
[४] हिन्दी-काव्यालङ्कार ।।
वैसेही दाख दुखी में 'द' और 'ख' की और मिसरी, और
मुरी में 'म' और 'र' की एक एक बार ही आवृत्ति है।
(२) शुभ शोभा सोहै सही, वारी वर चल चाल ।
यहां शकार, भकार, सकार, हकार, वकार, रकार, चकार
और ल कार का एक एक बार ही सादृश्य है ।
(३) बाधे द्वार काकरी चतुर चित काकरी सो उमिर वृथा
करी न राम की कथा करी।
यहाँ वृथा और कथा में 'य' की, चतुर और चिन में 'च
और 'त' की, करी करी में दोनों वर्गों की और काकरी-
काकरी में तीनों वर्गों की श्रावृत्ति एक एक बार ही है ।
(४) भंजेउ चाप दाप बड़ वादा (प और ब)
(५) छप करी कह छेम विसेखी (छेम, छम, क, क)
(६) अति गह गहे बाजने नाजे (ग, ह, ब, ज)
.
-
.
२वृत्ति-अनुमाम
(Harmomous Allhteratom)
व्यजन इक वा अधिक की, आवृत्ति कैयो वार ।
सो वृत्यानुप्रास जो, परै वृत्ति अनुसार ॥
वृत्तिगत अनेक व्यंजनों का अथवा एक व्यजन का कई
देवार सादृश्य हो उसको वृत्यनुमास कहते हैं. इसमें क्रमाक्रम के
विचार की आवश्यक्ता नहीं, यथा-
(१) कहि जय जय जय रघुकुल केतू ।
(२) सत्य सनेह सील सुख सागर ।।
८eAJAPALN:
eve८४MP3BUMBAI
हिन्दी काव्यालधार ।
[५]
वृत्ति के तीन भेद है (१) उपनागरिका (२) कोमला (३) पापा।
१ उपनागरिका-जिसमें मधुर वर्ण तया सानुनामिक की
बाहुल्यता हो, परन्तु ट ठ ड ढ प नहों यथा-रघुनंद
थानंद यद फौशलचद दशरथ नंदनम्। गुण-माधुर्य
अनुकूलरस शृगार, हास्य, करुणा और गात ।
२ कोमला-जिसमें प्रायः उपनागरिका के ही वर्ण हों, परतु
योजना सरल हो, सानुनामिक और संयुक्त वर्ण
कम हो और अल्प ममास वाले वा सपास रहित
से शन डोजो पढ़ते या सुनतेटी समझ में आना
यथा-सत्य सनेह मील सुससागर । गुण प्रमाद
अनुकूळरस-सर रस ।
३ परुगा-जिसमें कठोर वर्ष ट ठ ड ढ प, द्वित्त वर्ण, रेफर
दीर्घ समाम नया संयुन पो फा बाइप रो नसे-१
पक यक फरि पुराल फरि रुट पर यपि गुला।
गुण-सोज । मनातरम-पीर, यीमन्स, भय,
यमुन भार रोदा
पनागरिफा और फीमना फी पनि पो दी, और
पापा की नि को गाड़ी कार, दभी गार गायक पिण,
देको पांगाली गनि करने यदि पापानी में ग्रहना पद पर
मोर साटी शनि फडानी, पया--
बंदी मुंदर सरल, गौड़ी गुंठित गूद।
पांचानी जानी जा रचना गृह नगा।
Encanenina हिन्दी-काव्यालङ्कार। '[८] नाम . , उदाहरण १ सर्वान्त्य-न ललचह, सब तनहु, हरि भजहु यम करहु । २ समान्त्य-) जिहि सुमिरत सिधि होय, गणनायक करिवर बदन। विषमान्त्य करहु अनुग्रह सोय, बुद्धि राशि शुभगुण सदन । ३ समान्त्य-~-सय तो । शरणा । गिरिजा । रमणा। ४ विषपान्त्य-लोभिहिं प्रिय जिमिदाम, कामिहि नारि पियारि जिमि तुलसी के पन राम, ऐसे हो कव लागिहौ । ५ समविषमान्त्य-जगो गुपाला । सुभोर काला । कई यशोदा। लहै प्रमोदा। ६ मिन्नतुकान्त-कुंजों कुजों प्रति दिन जिन्हें, चाव से था चराया जो प्यारी थीं परम ब्रज के लाडिले को सदाही। खिन्ना दीना विकल वन में, आज जो घूमती है। ऊधो कैसे हृदयधन को, हाय ! वे धेनु भूली ।। ३ यमक। (Repetition of words in different manning ) यमक शब्द को पुनि श्रवण, अर्थ जुदो होजाय । शीतल चंदन चंदनहिं, अधिक अग्नि तें ताय ।। यहा चदन शब्द दो बार आया है एक अर्थ चंदन दुसरे शन का सवय नहि' के साथ निपेयवाचक हैं, यमक में ड १और ल, व और च, तथा र ार ल का भेद नहीं माना जाता है। ( यममादा भवे दैश्य, डलो गेलरोस्तथा ) यथा- भजन क्यो तातें भज्यो, भज्यो न एकहुं वार । दर भजन जातें कह्यो, सो तू भज्यो गवार ॥ - ,
[९]
areASINDIAN
हिन्दी-काव्यारवार।
मू०-जहां आदर, भाचर्य, शोक तथा रदतार्य वही शन्द कई
पार आर सो यमक नहीं। यथा-राम राम यहि राम की
राम गम कहि राप, ऐसे मयोग को वीप्सा यहते हैं:
(वीप्साया द्विरुक्ति ) इसमें रिशेप चमत्कार प्रतीत नहीं
होता, अनुमास मलही मान लिया जाय ।
४ वक्रोक्ति।
( Ambnou ullernen)
(वाती भांति की, एक प पुनि काकु)
वाक्य शब्द के सुनतही, अर्थ अनेक लग्वाहि
वहे श्लप वक्रोक्रि है, भंग अभंग लखाहिं ।।
१भग पद कांति
शब्द भंग करि अर्थ जहे, अन्य कछ होजाय ।
प भंग पद ताहि को, कहन सुरुवि समुदाय ।
नाम शानिनी प्यारी मार्ग, मदा तुपीए भो।
(१) गांग गाज्निी (0)गौ: सना + भरिना।
tiनगम भागा मालनी नी भगमा परी
२ अनुपाना , शुशी र अंग।
नाफ माग गरि wोगाम गुपनन मंग।
गांना समुपगम-माना नहीं भून,
पटनार
नाम:
(मरीमा पर भी
।
และ [१०] हिन्दी काव्यालकर २ अभंग पट पक्रोक्ति शब्द भंग कीन्हें बिना, अर्थ विविध विधि होय । तहं वक्रोक्ति श्लेप को, पद अभंग है सोय ।। कोतुम ! हरिप्यारी ! कहा, वानर को पुरकाम । श्याम सलोनी ! श्याम कपि, क्यों न टरै तब वाम ॥ हरि ( कृष्ण और बंदर) श्याम (कृष्ण और काला) , , काकु वक्रोक्ति जह कंठ ध्वनि भिन्न से, आशय जुढो लखाय । सो चकोकी काकु है, कविवर कहैं बुझाय ॥ अलिकुल कोकिल कलिन पह, ललित बसत विहार । कहु मखि ! नहिं अहहै कहा ? प्यारे अपहुं अगार ॥ क्या नहीं आवेंगे? ध्वनि अवश्य आयेंगे । ५ भाषा समक (Mined Lingunge) शब्दन की विधि एक जह, भाषा विविध प्रकार । वाक्य मनोहर होय तह, भापा समक विचार ॥ दृष्टु तत्र विचित्रता सुमनसा, मैं था गया बाग में ! काचित्तत्र कुरंगशाव नयना गुल तोडती थी खडी। उन्नद्धृ धनुपा कटाक्ष विशिखें, घर्घायल किया था मुझे। तत्मीदामि सदैव मोह जलधौ हैदर गुज़ारे शुभ ॥१॥ जादिनते जमुनातट वाहि वजावत बामुरि नेक निहारो। होशमरफ्त न मुदरदस्त भरोग रहै दिनरैन तिहागे। . -
ANLAP
wort
हिन्दी-काव्यालकार। [११]
हाफिज़ फिक्र कुढामनुपायम कोउ उपात्र चल न हमारो ।
है सखि कोउ उपाव चाफिर बारिक देखिय नददुलारो॥
हर नयन हुताश ज्वालया जो जलाया,
रति नयन जलौघे साफ वाकी वाया।
तदपि दहति चित्त माफ क्या मैं करोगी,
मदन सरमि भूयः क्या बला याग लागी ||३||
यदा मुन्नरी कर्कटे या कमाने, यदा चस्मयोग ज़मींचाममाने ।
तटायोतिपी क्या लिखंगा पड़ेगा, हुआ यालका गटशाही करेगा।
मुनर्ग-हम्पति, कटे (कर्क में) फ्माने (धनु में)।
नग्मयोग (शुक्र) जमींसमाने (दशमम्यान में)
६ श्लेप
(Prronomic)
श्लेप शब्द पलटे बिना, औरहु अर्थ सुधार ।
द्रोह करण काकोडर
हु, रक्षा करण उदार
पायाटर (कानाग) की भी रक्षा करनेवान उदार श्रीगणा:
कामोदर (जगत) पी भी गया पनि माल इटार गम ||
१ पीपर पार मार, नामन मना सामना ।
मरदम मानार, पीएम की गुमना ।
२ पपि न न नना
राधमाण गंएग सिप मा।
TREAM-विगविगी
[१] हिन्दी-काव्यालदार ।
७ प्रहेलिका
(Riddle )
प्रश्नहिं में उत्तर कदै, कछू शब्द के फेर ।
सो प्रहेलिका दोय विधि, शब्द अर्थ गत हेर।।
(शब्दगत)
देखी एक अनोखी नारी, गुण उसमें इक सबसे भाग।
पढ़ी नहीं यह अचरज आव, मन्ना जीना तुम्त बतावे।। (नांडी)
हिंदी भाषा में 5 के स्थान मेंर भी हो जाता है । यथा-
अनाड़ी, अनारी।
(अर्थगत)
लक्ष्मीपति के कर वसे पांच चरण के माहिं।
पहिलो अक्षर छांडि के सो देते क्यों नाहि ।। (सुदरशन)
-
८ चित्र
,
-
(Protortal)
चित्र वर्ण विन्यास है, पदमादिक आकार ।
गोरख धंधा समनिरस, त्यागत सुकवि विचारात :
(१) कमलबद्ध
नैन बान हन वैन मन, ध्यान लीन मन कीन ।
चैन हैन दिन रैन तन, छिन छिन उन बिन छीन।
यहा ध्यान देने से विदित होगा कि इस दोहे का प्रत्येक
दूसग
वर्ण नकार है। एक नझार को मध्य में रख कर, उसके,
चारों ओर गोलाकार अन्य वर्ण क्रमपूर्वक रसने मे फमलाकार
चित्र बन जाता है।
ॐADtBC270
२
स
१४:३८.८tert
हिन्दी-काव्यारहार
[१३]
(२१ निरोष्ठ
Nam-ttbinl)
छाडि पवर्गहि के वरण, और वरण सब लेत ।
लगें न अधरा धर पढ़त, सो निरोष्ठ चित चेत॥
सीक नाक PI मसिन में Twen int
साइन का RITI पापोरन सदा मुरा साफा दुपन।
मादाम का दारोमोरसेगारात गमग ति मत है।
परिवार का राना पदोन CATirnet ER
(३) अगत्त
( The Non symtroitc)
विन माना वरणनि रचें, ई ऊ ए कछु नाहि ।
, ताहि अमत्त वखानिये, समुझा निज मन माहि।
जग जगमगत भगत जन रस यस भव भपहर पर करन पर ना
फनफरसन तन अमन अनल बड़ पर दल बमन सजन यरया पर
अनर सपर अन घरद चग्न घर परम धरम गन घरन मरन पर
अपल कपल पर बदन सरन जसरन मदन मद मदन पटनर
(४) अतापिका
(Tlir life 11 s} li )
उत्तर आवे अंत में, प्रश्न ना ही होय ।
सोई अंगापिका, हेतु छट मह जोय ॥
भूषित पीरि भंग. पोरी निघाप ।
पानरोग भनग, पीयन Eि।
१नमा २मान RTI
• nitin नामदेव disti
मारवादETrinil
-
ened
S
ecene
[१४] हिन्द-काव्यालङ्कार ।
फौन चरित सुख देय कहा ते सरजू आई।
छद बद्ध को कियो राम जस भापा गाई ॥
उत्तर-शंभु, प्रसाद, सुमति, हिय हुलमी ।
राम चरित, मानस, कवि तुलसी ॥
(५) वहिल पिका
(The Hidden outside )
बाहर से उत्तर कढ़े, वहिलापिका सोय ।
१ भाप काइ सर्जन को कौन शंभु वाहन है का को सुख होते।
काकी माला शिधारो है।
काह गजे वधन छवी ले ग काके प्रति कौन हर पुत्र सीप
संत को विखारी है।
शोभा को से नाम का है कृष्ण नव धारो कहा सिंधु से
मिलत कौन कोह अनियारो है।
उत्तर के वर्णन में श्रादि अंत छोड़ दीजे मध्य लीजे सोहिये
मनोरथ हमागे है।
उत्तर-यार कृपा करि नेक निहारिय ।
२ को नाम विपरीत कार, जाम भयो प्रसिद्ध ।
सो अनादि सम है गयो, जानि लेहु करि सिद्ध।।
उत्तर-उलटा नाम जपत जग जाना। वालमीक में ब्रह्म समाना।।
१६) दृष्टिकूटक
the Puzzler)
दृष्टि को छलने वाला कूट किटना का बोधक है तथापि,
अन्तलीपिका और वहिलापिका के समान यह चित्रालद्वार का
एक भेद माना जा सकता है। यथा-
१ मयान, घर , ३ सुकृत, ४ कपाल, ५ साकर, ६ परिणी,
७ गनेश, ८ मुगना, ९ पानिय, १० पहाड़, ११ मारता, १२ नयन ।
MPU
vedeos
हिन्दी-फाख्याधार । [१५]
अहि बल्ली रिपु की मुता, ताके पति को हार ।
ता अरि पति की भाषिनी, सदा यसै तुप द्वार ।।
अहि पल्ली नागरेल, नागवल का रिपु हिम (हिमांचल),
दियांचल की कन्या पार्वतीजी, पार्वती पति शिवजी, शिवजी पाई
हार सर्प, सर्प के शट गरुड़जी. गडनी के पति विष्णु भगवान
उनकी भामिनी जो लक्ष्मीजी है सो सदैव भाप के द्वार पर:
निवास करें।
मेप गशित पांच ली, गने क नो नाम ।
ता भवण दादश गये, आये नहिं घनश्याम ।।
मेष रापि से पानवां सिंह, सिंह का पक्षण मास अर्यात
महीना, सो घारह महीने हो गये घनश्याम नहीं भाये, समर्थ
महात्मा मूरदासजी ही ऐसी कविता में बहुत कृत कार्य हुए हैं।
(७) लोमविलोम
( Tlu two food in different epilac)
सीधे उलटे बांचिये, पार और अर्थ ।
एक छंद में सुकविजन, प्रगटहिं दोउ ममथी।
लोम अनुलोमन्यथा क्रम. पिलोमा उलटा नप, गया-
मनन माघर ज्यों सरके सर य मुदेम गुगुमा ।
नमानचिनी नानी माग पर गा निपि पाल पौ।
नैन मुनी जग भीर भरी पी पीर पर्ग नमुपान कर।
मन मनी गुरु नाल पण गुभ मा पन में सामा mimn:
गन पनी में न रमो भान पर नाम गुनी मन में।
सन को गुवर्ग धारिगं मा भी गनी गन।
नादिनि मापी लिपन।
पमान गरेमु सो पग यो समान INS
ta
[१६] हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
(८) गनागत
( The two fiiced conveying the sune sense
--
सूधो उलटो वांचिये, एकहिं अर्थ प्रमान ।
कहत गतागत ताहि कवि, केशवदास सुजाना।
यथा-माल वनी बल केशवदास सदा वश केल वनी बलमा ।
(E) सिंहावलोकन
( Backward glance)
सिंहावलोकन का अर्थ सिंह समान आगे चलते हुए पी
देखते जाना है, अर्थात् मुक्त पद को फिर ग्रहण करना। यथा
नामहिं के सुमिर मुख पायहाँ छाडि यहै न गिनी जग काहिं
कामहिं कोउ न श्रायहें ये सुत मातु मातु पिता प्रिय बंधु औ वामहि
बामहिं हो सिगरे भव के सुख होत नतौ छन बिसरामहि
रामहिं राम रौ रे ररौ सब वेद पुरान को है परिनामहि
हिन्दी काव्यालद्वारा
[७]
अर्थालङ्कार।
(A figure of speech in sense)
व्यंगम रस तें भिन्न जो, हृदय रूप सरसाहिं ।
चमत्कार भूषण सरिस, सोई भूपण आहि ॥
यदपि सुजाति सुलच्छनी, मुचरण सरस सुवित्त ।
भूषण बिन न विराजई, कविता वनिता मित्त ॥
यह बात नहीं कि बिना अलङ्कार के कविता हो ही नदी
'सफनी प्रभिमाय यह है कि कविता फैमीही उगम अच्छे वर्ण
भार रसयुक्त क्यों न हो परन्तु अन्हार दीन होने के कारण
ना कहाती है भतर अलकार का मान परमावश्यफ फाग्य
में जो चमत्कार है उस चपरकार को ही जलकार कहते हैं जैसे
कोई को कि "ह पुरुष या विधान है" तो इस बार में कोई
नमस्कार नहीं, सदि यही यापय इस प्रकार पहा गाय गि
"यह पुगप मग वृहस्पनि " नी इस पपन में चमत्कार
पागगा ! अलार फार फेटय सम्म । यथा--
छंद चरण भूपण हदय, करमुष भानुभाव ।
चय थाई श्रुति संचरी, माहित अंग नुनाव ॥
बादामrairi-रमें भेद यकिनावार,
मा पल पली नानी
।
भीगी पदमोदमाने माता
Aarगरमा मानना REAT
[८]
Pune
हिन्दी-काव्यालद्वार ।
जाकी तुलना कीजिये, सो उपमेय वखान (स्त्री का मुख)
जासों तुलना कीजिये, सो जानो उपमान (चन्द्रमा)।
तुलना वोधक शब्द जो, वाचक कहिये ताहि , (सदृश)
गुण उपमे उपमान को, गहत धर्म स्वइ आहि (उज्ज्वल)
उपमेय वह है जिसकी तुलना किसी दुसरे वस्तु से की
जावे, जैसे मुख, पद, अपर आदि। उपमेय को वर्ण्य, वर्णनीय,
विपय, प्रस्तुत, वा भकृत भी कहते हैं।
उपमान वह है जिससे तुलना की जावे अर्थात् जिसकी
उपमा दीजावे, जैसे चन्द्र, कमल आदि। उपमान को अवण्य,
अवर्णनीय, विषयी, अप्रस्तुत वा अप्रकृत भी कहते हैं।
वाचक वह शब्द है जिससे तुलना का बोध हो जैसे, से,
सो, सरिस, समान, इव इत्यादि । करिजनों के मतं में जहां-इव,
यथा, ज्यों, जैसे, सी, से, सो, लौ इत्यादि उपमावाचक शब्द
कहे गये हों उसको श्रौती वा शाब्दी उपमा कहते हैं और
महा-तुल्य, तूल, सम, समान, सरिस, सदृश, वत् इत्यादि उपमा-
वाचक शब्द कहे गये हों उमको आर्थी उपमा कहते हैं।
धर्म वह है जिसमें उपगेय और उपमान का साधारण धर्म
मगट हो, जैसे उज्ज्वलता, मृदुता, कठोरता इत्यादि ।
१ पूर्णोपमा
(Complete Smule )
पूर्णोपम वाचक धरम, उपमे अरु उपमान ।
ससि सो उज्ज्वल तिय वदन, पल्लबसे मृदु पान॥
1
PANA
हिन्दी काव्यालका
[१९]
पूर्ण+उपमा-पूरी उपमा, उप-समीप, मानापना, समीपता
से विशेष ज्ञान । जिसमें भेट रहते हुए भी समान धर्म कहा
जाय मो उपमा है। पूर्णोपमा में उपमेय, उपमान, वाचक और
धर्म चारों रहते है। ससि सो उज्वल तिय बदन को गश में
इस प्रकार कह सकते हैं स्त्री का मुग्व कैसा उज्ज्वल है जमा
चर सही पल्लव मे मृद पान को इस प्रकार कह सकते है इस्त
कसे कोमल है जैसे पला । यथा-
करि कर सरिस सुभग भुन दंडा।
जहां उपमेय, उपमान, वाचक और धर्म इनमें से एक दो,
वा तीन फा लोप हो उसे सुसोपमा जानो, यथा-
(१) लुप्तोपमा
(Eliptical Sule)
लुप्तोपम है अंग जहें, न्यून चारतें देख ।
विजुरीसी पंकज मुखी, कनकलता तिय लेखा
यहां पिजुरीमी पंफज मुम्बी घर्ष मोपमा और कनकलता
तिय लेख, वारक धर्म लुलोपमा, उपपा के और भी भट।
.
-
.
(0) पामोपमा
(Cixrland of Surah)
मालोपम उपमेय की, उपमा बहुन प्रकार ।
मलि से मानन से. याला तेरे यार।
पार पनिको करने गया--
मंटीग म भ ग | RER पन दोषा
पनि नगन गमाना पर मामला II
पारिगर समिर गुग
[२०] हिन्दी-काव्यालङ्कार।
मुरानीक-देवताओं की फौज जिससे राज्यमद सूचित
होता है । सुरा-मद, शराव । यथा-
बाज ज्यों विहंग पर सिंह ज्यों मतंग पर त्यों विपच्छ बंस पर
शेर सिवराज है।
(३) रशनोपमा
(Girdle of Similes)
रशनोपम उपमेय जह, होत जात उपमान ।
कुलसी मति मति सोजु मन, मनहीं सो गुरुदान॥
रशना कर्धनी वा श्रृंखला । यथा-
काव्यवर जग सोहै कैसो सोहै काव्यवर जैसो मानसर
सोहै सरन को अधिराज । कैसो सोहै मानसर कहौ कवि भानु
योसों जैसो सोहै द्विजराज कैसो सोहै द्विजराज । मदन मुकुर
जैसो मदन मुकुर कैसो प्यारी के बदन पर जैसी रही छबिछाज ।
प्यारी को
वदन
कैसो
सुख
जैसो सुख कैसो
जसो शुभ रामराज।
२ अनन्वय
(Comparison Absolute)
जाकी उपमा ताहि सों, दिये अनन्वय मान ।
तेरे मुख की जोड़ को, तेरो ही मुख जान ।
अन्+अन्वय नहीं है सम्बंध जिसका, यथा-१ इन सम ये
उपमा उर आनी, २ तू सो तुही दशरत्य दुलारे, ३ सुन्दर नंद
किशोर से सुन्दर नद फिगोर ।
SAGeevi
को सदन
को सदन
2210LAS
.
हिन्दी-काव्यारबार । [२१]
३ उपमानोपमेय
(Reciprocal compation)
सो उपमानुपमेय, उपमा लागे परस्पर ।
तुब हग खंजनसेय, खंजन है तुव नैन से॥ यथा-
१ चे तुप मम तुम उन सम स्वागी।
२ राम फया मुनिार्य उखानी, मुनी महेश परम मुग्य मानी ।
३ ऋषि पूडी हरि भगनि मुद्दाई. कही गमु अधिकारी पाई ।
४ आरपुरी अमगतिमी अपरावति प्रापपुगेसी विग।
इमरी उपमेयोपमा भी पाहते है।
४ प्रतीप
Conseran)
(१) सो प्रतीप उपमेय नम, जब कहिये उपमान
लोचन मे अंबुज बने, मुख सो चंट यखान ।
पतीपम्पनिल, उलटा । यहा उपमानही उपमेय सा,
गिना गया-
गरि नाग नामल, नगर ममगाम ।
उपमे को उपमान ते, जादर जोन तिर ।
गई करन मुष को कहा. चंद्राष्ट्रिना जाय।
गाता भनाटा।
मापनाar
पः मतदान।
४७७
[२] हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
(३) जहँ बरणत उपमेय तें, हीनो करि उपमान ।
तीछन नेन कटाक्ष ते, मंद काम के वान ।।
यहां उपपान का अनादर है।
१ सिय मुख समता पाव किमि, चंद्र वापुरो रंक ।
२ कलिशहु चाहि कठोरता, कोमल कुसुमहु चाहि ।
चित खगेस रघुनाथ कर, बूझ पर कहु काहि ॥
३ देखो नॅद नंद सुखकंद ब्रमचंद अाजु राधे मुखचन्द चंद
मंद करि डारो है।
६(2) उपमे की उपमान जब, समता लायक नाहिं
अति उत्तम हग मीन से, कहे कौन विधि जाहिए,
यहां उपमान की योग्यता माननीय नहीं। यथा-
सीय बदन सम हिम कर नाही।
(५) व्यर्थ होय उपमान जव, उपमे को लखि सार ।
दृग आगे मृग कछु न ये, पंच प्रतीप प्रकार ॥
यहा उपमान बिलकुल अयोग्य ठहरा गया । यथा--
कोटि काम उपमा लघु सोज।
५ रूपक
( Met iplor)
रूपक साम्य निषेध विन, जहँ उपमे उपमान ।
मिलि तद्रूप अभेद द्वै, अधिक न्यून सम जान ।।
रूपक-किसी के सदृश रूप का धारण करनेवाला चाहे।
स्वरूप से वा गुण से, मनोहर आकृति और स्वभाव जैसे-
इस्तकमल, मुखकमल, नेत्रकमल, मुखचन्द्र इत्यादि ।
-
191CMs
J
91.2
050
हिन्दी-काव्यारद्वार।
[३]
तप अधिक
१ पुरख शशि या शिते अधिक, उदित ज्योति दिन रात ।
२ विप वारुणी वधु प्रिय जेही, कहिय रमा सम किमि देही ।।
तड्प न्यून
१ सागर ते उपनी न यह, कमला अपर मुहात ।
२ गम मात्र नघुनामदमाग।
३ दुर भुन के हरि रघुरर मुंदर चेस, एक जीभ के लछिमन
मुहर सेम।
तप मम
१ नन कमल ये ऐन है, और कयल फिहि काम।
२ लखन उतर जाति मरिस, भृगुपति कोप कशानु ।
अभेट आधिक
१ गमन करन नीकी लगत, फनकलना यह याम।
२ गुरु पट रन मृदु मंजुल अंजन ।
हरिहर पथा विराजन बेनी. मुनन सफल सुद मंगल देनी।
अभेद न्यून
१९ गधे न उर बसी, परेमानुपी दे।
२भनि पनन पिपीक फागा।
3 सब यो देग्रन गाय पय, गया मित्रमं पार।
पविरान पिन पक्षको, नीर ममी पार ।।
अभा मम
गम क्या मुंदर करनारी, मगर विग मारना।
गु.- समान पाना T TRI गुलना
समान मे करे गीगापतको गोपियो,
मान पाना for TIM तुमना पान
वाट।
-
[२४] हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
६ परिणाम
(Commutation )
उपमे की किरिया कर, उपमा सो परिणाम ।
लोचन कंज विशाल तें, देखत देख्यो वाम ॥
परिणामस्वभाव का बदकना । यथा-
१ कर कमलन धनु सायक फेरत ।
२ मामवलोकय पंकज लोचन ।
३ है घनश्याम पै तेरो पपीढ़ग है 'बजचंद पै तेरो चोर है
७ उल्लेख
(Representation
(१) सो उल्लेख जु एक को,
समझे
बहु
रीति।
जाचक सुरतरु, तिय मदन, अरि को काल प्रतीत।
उद्+लेख-उत्कृष्टलेख, जहां एक को अनेक जन अनेक
प्रकार से सममें।
देखहि भूप महा रणधीरा । मनहुं वीर रस वरे सरीरा ॥
रहे असुर छल जो नृप भेखा । तिन मन प्रगट काल सम देखा।
बहु विधि वहु गुण एक के, वरण द्वितीय उलेख ।
तू रण अर्जुन, तेज रवि, सुर गुरु बचन विशेख ॥'
जहां एक को एक जन अनेक प्रकार से वर्णन कर मा
दुसरा भेद है, जैसे तू रण में अर्जुन, तेज में सूर्य और वचनों में
दृहस्पति है | यथा--
सब गुण भरा ठकुरवा मोर, अपनै पहरू अपने चौर ।
७८
-mwa
हिन्दी-काव्यालद्वार। [२५]
८स्मरण
( Rhetorical Recollection)
सुमिरन लखि सुनि काहु को, सुधि आवे जहें खास ।
सुधि आवत वा बदन की, देखे सुधा निवास ।।
स्मरण सुनने देखने सोचने तथा स्वम से भी हो सकता है।
१ प्राची दिशि शशि उग्यो मुहारा।
सिय मुख सरिस देखि मुख पाया ।।
२ सयन फुज छाया सुरपद, शीतल मंद समीर ।
मन नात भजी वद, वा जमुना के तीर ।।
8 भ्रांति
(Mistsko)
भ्रांति और को औरही, निश्चय जय अनुमान ।
तुब सँग फिरत चकोर है, वदन सुधानिधि जानायथा-
१ फपि फरिदा विचार, टीन मुद्रिका दारि नर ।
जानि अगोफ अंगार, सीय हर्षि उठि कर गहेत।
२ पाप महारर देन पी, नायन यी मार।
फिर फिर जान महाग, पनी मोहन नाय॥
०-उन्माद (पागलपन में पा लिग टिकाने नए) सेमी'
प्रालि दोती है उसमें नमनार ना।
१० संदेह
(Dat)
जालंकार मंदेह में, शिधा यो के मान ।
यदान किया यह शीतकर.लीश परत नजान
१ गर गलन गमि it iजना।
2ीन दे।
eeted
१ [२६] हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
११ शुद्धापनुति
( Concenliment pure)
शुद्धापनुति झूठ लहि, सांची वात दुराहि ।
नेन नहीं ये मीन जुग, छवि सागर के माहि।
शुद्ध-स्वच्छ, अपहनुति-छिपाना ।
१ यह मुख नहीं चद्रमा है ।
२ बंधु न होय मोर यह काला ।
अपह्नति के भेद नीचे लिखे हैं।
कैतबापत् नुति
(Concealment of the decentfal)
कैतव पह्नति एक को, मिस करि वरणत आन ।
तीछन नैन कटाक्ष मिस, बरसत मन्मथ बान ॥
कैतव-छल, न्याज, मिस । इस अलङ्कार का वाचक
"मिस" है।
१ कवी नरेन्स बात सव.माची। तिय मिस मीच सीस पर नाची।
२ पठे पोह मिस खगपति तोही । रघुपति दीन वटाई मोही ।।
हत्वपहनुति
(Concealment with a reason)
वस्तु दुरइये युक्ति सों, हेतु अपह्नुति सोय ।
तीन चंद्र नहिं निशि रवी, बड़वानलही जोय।
चंद्र को देखकर कहती है, तीन है अतएव चद्र नहीं,
गत्रि है अतएव सूर्य नहीं-यह तो बडवानल ही है । यथा-
ममु प्रताप बड़वानल भारी। शोपेउ प्रथम पयोनिधि वारी।।
तर रिशु नारि रुदन जलधागा भरेउ यहोरि भयउ तिहि खारा
८
RE
.
हिन्दी-फाचार
[२७]
पर्यस्तापरनुति
(Conce an ent trurlined)
पर्यस्तापनति धरम, श्रान वस्तु में रोप ।
है न सुधाधर की जु यह, वदन सुधावर अोप।।
पर्यस्त का
हुआ। पया-
१ मुगुट न होहिं भूप गुण चारी।
२है न सुगा यह है मुधा-संगनि माधु मुजान ।
३ फाकूट विप नाहि, विप है फरमरदिरा।
हर जागत छफि चाहि, उहि सँग रि नींद न नमन ।।
भ्रांत्यपहनुति
(Cancerthurnt under n .)
भ्रांति अपहनुति सत कहे, पृच्छक को भ्रम जाय ।
ताप कंप वर हे सरवी!, ना मखि मदन सताय॥
कर सुमि मनि हृदय दगातून प्रशानन के तुन गह।
पे किरीट दशधा करें। भारत पाल मनय के ।
सू०-दमको भ्रांनापानुनि भी करते हैं।
रफापानी
(Content ortional
लेक अपानुनि युनि. कारि, पर सा यात टुगय।
कान अधर उन पिया नहीं. सधरी सीत रातु पायरिया
मानपरिक्षा मान गुमाईबार मना सामना)
गुरनानी |
REAT मापोभान ! मुंबना पा कान।
RELATERAalarhati
।
है [३०]
हिन्दी काव्यालङ्कार ।
फलोत्प्रेक्षा-सिद्धास्पदा
कैकई कटु बोलत मनौ, लौन जरे पर देय ।
यहां पर जले पर निमक छिड़कने की वेदना कटु
बोला
का फल नहीं तथापि तद्वत् फल की कल्पना की गई, कटु बोल
सिद्ध ही है।
फलोत्सेता-असिद्धपदा
तुव पद समता को कमल, इक पादहिं जल सेय।
कमल स्वतः जल में रहता है चरणों की समतारूपी फल
की प्राप्ति के लिये नहीं तथापि फल कल्पित दिया गया। जड़
कमल में जल सेवन करना प्रसिद्ध है अतएव अमिद्धासपदा।
इसी को चेतन धोत्पेक्षा ( Personification ) भी कहते हैं।
मनु जनु नहीं कहा अतएव गम्योत्पेक्षा भी है।
सू०-उत्संक्षा में "यथा" वा "ज्यों" शब्द का कथन दोष है
इसमें "मनु जनु" का प्रयोग समुचित, है यदि पद में
क्रिया किसी हेतु से कही गई हो तो हेतृत्लेचा और उस
से किसी फल की इच्छा प्रगट हो तो फलोत्प्रेक्षा जानो।
उत्प्रेक्षा की समर्थन को अर्थान्तरन्यास का कथन अनु.
चितार्थ दोप है जैसे-इच्छत हिमगिरि तमहिं मनु गुफा,
लीन रवि भीत, शरणागत छोटेहु पर करत बड़े जन,
प्रीत । यहां अचेतन तम को सूर्य से भय होनाही संभव
नही फिर हिमालय द्वाग यह केवल व्यर्थ संभावना है
इम के समर्थन के लिये उचराई में अर्थान्तरन्याम का
फयन व्यर्थ है।
vernNNETEReseamers
--
-
71
-~-
हिन्दी काव्यार कार !
[३१]
१३ अतिशयोक्ति
(Hyperbale )
अतिशयोकि भूपण तहां, जहें केवल उपमान ।
कनकलता पर चंद्रमा, धरे धनुप द्वै वान ॥
जहा केवल उपमानही कथन होता है वहा अनियोक्ति
जानो जमे या कालना से मुदर नो, चंद्रमा मे मुग्य, धनुषा
से भी और घाणों से नयनों का बोध होता है। इसका
रूपकातिशयोक्ति भी कहते है, यथा-
? अरुण पराग जनज भरिनीके, ससिहि भूप महिलाम थोकी
यहां फर नहीं करा जलन कहा, मुम्ब नहीं फहरा शक्षिका
२ पाज किधर चांद निकला.
सापानमातिशयोक्ति
(R-Culn.sa
नापनवपढ्नुति महिन, स्पायोनि बयान ।
अहि शाशमंटल पेलने. जिय पताल जिनजान ।।
यहां
मुद्रमा रमेकी ए भी (मा
जानन मा गरिमा म FREE:
दानाल में उपमानालापानागा-
गुरमतिरम में सभा, लिपि।
२ गार भेद भरमा गर भू Tirt MEE
-
, - - [३४] हिन्दी काव्यालङ्कार । १ कह कपि प्रथम दक्षिणा लेहू । पाछे हमर्हि मंत्र तुम देहू ।। २ पद पखारि जलपान करि, आप सहित परिवार । पितर पार करि प्रभुहिं पुनि, मुदित गयो लै पार ।। १४ तुल्ययोगिता ( Equul Purnig ) (१) तुल्य धर्म वय वरण, वा अवयं इक संग। वैन वैन बांके भये, प्रगटत यौवन अंग जहा अनेक उपमेयों का वा अनेक उपमानों का क्रिया वा गुण कर के एकही धर्म संबंध कथन किया जाय' वहां तुल्य योगिता जानो यहा बन नैन (वये) का एक ही धर्म बांके होना कहा गया, यथा--- वर्य वर्ण्य १ वैन नैन चाके भये, प्रगटत यौवन अंग । २ गुरु रघुपति सव मुनि मन माहीं। मुदित भये पुनि पुनि पुलकाहीं। ३ श्रीदशरथ सों मागिवे हेतु गुनी निगुनी द्वउ द्वार पै डोले । ४ चरण धरत चिंता करत, तनिक न भावै सोर । सुवरण को,ढूंढत फिरत, कवि कामी अरु चोर।। अवर्ण्य अवर्ण्य । १ लग्वि कोमलता अंग तुन, हे कामिनि विन खोर । को न गुलाबरु मालती, कटली गुनत कठोर ।। २ कमल कोक मधु कर खग नाना । हम्पे सकल निसा अवमाना । ३ अरुणोदय सकुचे कुमुद, उडगन ज्योति पलीन । इस आधे दोहे के उदाहरण में हेतु अलंकार का भी आभास है, अनएव उभयालकार है यदि पूरी दोहा कहें (तिमि तुम्हार आगमन सुनि भये नृपति बल हीन ) तो वर्ण्य अवर्य के सबध से दीपमालकार होगा.
हिन्दी काव्याद्वार। [३५]
(२) शत्रु मित्र मैं एक सम, जहां होत व्यवहार ।
१ गुण निधि नाके देत तू , तिय को अरि को द्वारा यथा-
२ को काटी क्रोध फरि, वासींची करि नेह ।
वरत पेड़ घर के, तऊ दुहुन की देर ।।
३ बदी संत समान चित. हित अनहित नहिं कोय ।
अजुलि गत शुम मुमन जिमि, सम मुगंध कर दोय ।।
४ निमिदिन सेवा फर, अब जे कर विरोध ।
तिन्दै परम पद देत हरि, कहाँ कौन यह बोध ।।
५ कीरति भणित भूति भल सोई।
गुरसरि सम सर कर हिन रोई।।
(३) गुणगण बहु के तुल्य करि, एकहि ठार वखान
१ लोकपाल मुस्पति वरुण, गम पुरेर प मान । यथा-
• मभु ममर्थ गिा, माल फला गुण पाग ।
जगमान राज्य निधि, प्रगत पम्प नर नाम !!
तुम पितु मातु बंधु मिय मारे ।
उदागान ३ पदि विधिपूर्वक मयन या गार
गगा।
Tre भरमा र के योग में जाना
नही, पनी या फगुपप गोड
नुनfrmtwri चांगाना,
दारनाtarपशिए पर it:
irituRATE :
-
-- " Beta "มะละลงระ [३६] हिन्दी-काव्यालद्वार । - १५ दीपक (Illuminator) दीपक वर्ण्य अवर्य को, एके धर्म समान । गृह गढ़ गिरि अरुगुणिन को, होय उच्चतामान ॥ दीपक में प्रस्तुत (वर्य) और अप्रस्तुत (भवण्र्य ।। अथात् उभयपक्ष का धर्म एक बारही कथन किया जाता है सो यह अलकार वहीं होगा जहां दीपन का कथन चमत्कारी ही यहां गृह, गढ, गिरि अवर्य, गुणिन वण्र्य, उच्चता पर्म, ५ १ सोहत है मद सों कलम अति प्रताप सो भूप । भूप (वर्ण्य) हांधी (अवर्ण्य ),सोहत (धर्म) २ सोहत भूपति दान सों, फल फूलन पाराम । भूपति (वये ) आरामबाग (अवर्य) सोहन (पर्म) ३ सँग ते जती मुमत्र ते राजा । मान ते ज्ञान पान ते लाजा प्रीति प्रणय दिनु मद तें गुनी। नाश िवगिनीति अस मुनी राजा (वर्य) अन्य (अवण्य) नाहिं धर्म) ४ राम नाम मणि दीप घर, जीह देहरी द्वार। तुलसी भीतर वाहिरहुँ, जो चाहास उजियार ।। जीभ (वये) देहरी (अव) उजियार (धर्म) ५ अगुन मगुन विच नाम मुमाग्वी। उभय प्रबोधक चनुर दुभाखा सगुण (वण्य) अगुण (अवर्य) प्रवोध होना (ब) नीचे दो उदाहरण में देते हैं जिनमें जिमे प्रस्तुत मो पर और शेप अवश्य दें, यथा-- + งานกองละคร . - ६
202t.०५१
NEAAWAIv237
हिन्दी-काव्यालङ्कार। [३]
६ ग अंजन, मुख पान तें, मिहँदी ने कर जान ।
जावक ने तिय चरण की, शोभा अधिक पग्वान ।।
७ लोभी जन धन लाभ अरु, तिय जन मंग सफाम !
साधु सफल श्रीराम के, नाम लहत आराम ।।
मु०-तुन्य योगिता में केवल वय का पये में साथ चा,
अवर्ण्य का अवयं के माय सम्बध है दीपक में उभय,
पक्ष का अर्थात वर्ग में गाय श्रार्य का संबंध है।
तुल्य योगिता में विक्षा की सपेचा १ दीपक
में धर्म पयं मिद है। कोर्टर फरि देहरी दीपक की
अलग अलंकार मानते है अर्थात् ऐसा पद ग्वना जो
दोनों योर लागू हो परंतु प्राचीनों ने उसे दीपक
अलगार केही अनर्गत माना हैदरग दीएफ को भी
प्रय के न्याय मारण देखो।
१६ कारक दीपक
(Thain Tilm a suitor)
फारक दीपक एक में. क्रम में भार अनेकः ।
जानि रितय भारतिसनि. पूरनि पात पित्र॥
बानगी पमपूजन रिपार्टी में भागों का
किया जाय, गणा--
१ मामला गाई।
• पार न पाममान मनमा
NAMANY
[३८] हिन्दी काव्यालाहार ।
१७ आवृत्ति दीपक
( illuminator repeated),
आवृत्ति दीपक तीन विधि, आवृत्ति पद की होय ।
घन वरसों हे री सखी, निसि वरसौं है सोय ॥
आरति कई घार, धन बरसने पर ही है, गनि बरस सी
हो रही है, यथा----
हे विधि मिल करन विपि बाला ।
.
.
अर्थातत्ति
दूजी आकृति अर्थ की, शब्द पृथक इक सार ।
कूजहि कोकिल चाव सों, गूंजहि ग अपार ।।
कूजहि गूंजहि शब्द पृथक् तात्पर्य एक ।
पदार्थावृत्ति
पद अरु अर्थ दुइन की, आत्ति तीजी पाहि ।
मत्त भये है मोर अरु, चातक मत्त सराहि ।।
मत्त मत्त पदात्ति, मत्त भये और मत्ते सराहि-अात्ति
१ भले भलाई पै लहहि, लहहि निचाई नीच ।
मुपा सराहिय अमरता, गरल सराहिय मीच ॥
लहहिं लहहिं सराहिय सराहिय-पदार्थावृत्ति
२ तोयो नृपगण को गरव, तोयो हर को दड।
राम जानकी जीय को, तोयो दुःख अखंड ।।
तो यो तोयो तोयो-पदार्थावृत्ति
awrariawaarmarawasnawwar
॥
ब
-
८८
८RNALAM
हिन्दी काव्यालद्वार।
१८ एकावलि
(Tho Necklace)
एकावलि पद रीति जह, गृहित मुक्त पद जान।
दृग श्रुति लों श्रुति बाहुली, बाहु जंघ लो मान ।।
अवलि पक्ति, गृहीत-ग्रहण किया इमा, मुक्त-त्यागा हुभ
इसमें पूर्व के प्रति उत्तरोत्तर वस्तु का विशंपण भाव से म्यापन
पानिपंध होता, यथा-
१ पिन गुरु हाय कि नान, तान कि रोग रिंगग पिन ।
हमे "पला" भी करते है।
२ सोजर फर्दिय पाह, नहा चार पंकन नती।
'पाज, मो कार, जहा भगर नरबीन।
श्रमन में यह मार, मर मर गुमान जो।
गुजन धिन सार, गान त मन जनन ।
१९ प्रति वस्तृपमा
पतिवन्तपम धर्ममम, जुटे सुटे पद जान ।
मारन भानु प्रताप सौ. नमन मर धनु मान ।
प्रति+म+पमा I उपमान मीर मेगन ना:
रात में मापा पप पर गरदा हान
it. htrn भानु मार गो पा TRAI नाम भी 'url
गाशन मा उमान नाम पर पार TE
मा गमला।
[३८] हिन्दी-काव्यालङ्कार।
७ आवृत्ति दीपक
(Illuminator acpeated),
आवृत्ति दीपक तीन विधि, आवृत्ति पद की होय ।
घन वरसौं है री सखी, निसि वरसों है सोय ॥
आवृत्ति-कई बार, धन बरसने पर ही है, रात्रि वग्स सी
यथा--
हे विधि मिल कवन विपि वाला।
हो रही है,
एक।
अर्थावृत्ति
दूजी आवृति अर्थ की, शब्द पृथक इक सार ।
कूजहिं कोकिल चाव सों, गूंजहिं भंग अपार ॥
कूजहि गूंजहि शब्द पृथक्
तात्पर्य
पदार्थावृत्ति
पद अरु अथ दुन की, आवृत्ति तीजी आदि ।
मत्त भये है मोर अरु, चातक मत्त सराहि ॥
मत्त मत्त पदात्ति, मत्त भये और मत्त सराहि-अर्धापत्ति
१ भले भलाई पै लहहिं, लहहिं निचाई नीच ।
मुपा सराहिय अमरता, गरल सराहिय मीच ।।
लहहिं लहहिं सराहिय सराहिय-पदार्थावृत्ति
• तोन्यो नृपगण को गग्य, तोयो हर को दड ।
राम जानकी जीय को, तोयो दुःख अखंड ।।
तो-यो तोन्यो तोन्यो-पदार्थावृत्ति
40HQ
L
Priymmswwwmnama
wa
wwwr
दिन्दी-काव्यालद्वार। [३९]
१८ एकावलि
(Tho Necklacu )
एकावलि पद रीति जह, गृहित मुक्त पद जान ।
हग श्रुति लो श्रुति बाहुलो, वाहु जंघ लो मान ।
अवनि-पक्ति, गृहीत-ग्रहण किया था, मुक्त-त्यागा हुआ
इसमें पूर्ण पूर्व के प्रति उत्तरोतर यस्तु का विशेषण भाव से म्यापन
पानिपध होता, यथा-
१ पिन गुम होय किसान, ज्ञान कि होय रिगल विन।
इमे "शृंखला" भी कहते है।
२ सो जल कादिय बाद, हा चार पंकज न ।
पंकज मी कार, महा भ्रगर नहीन है।
भ्रान में पा गार, मधुर मधुर गुनम न जो।
गनन पिन सार. जान 7 पन जनन ॥
१९ प्रति वरतृपमा
(
Turn. .
प्रतियन्तृपम धर्ममम, जुन्दे.
जुदे शुढे पद ज्ञान।
सोहन नानु प्रताप नों, जमन र धनु यान ।।
मनि तु+उपमा पमान माउपादन दाना
मारयों में पपी मारा धर्म पर पर दाग न
रो. मग भानु मार गो' या मान भाग और 'मन
माना समान पापी पक, पापम पर
इमाnirana
.
२
sear
१ [४०] , हिन्दी-काव्यालद्वार।
कुवलयानंद के मत से कहीं२ वैधर्म्य से भी दृढ़ीकरणार्थ,
धर्म की साम्यता बताई जाती है। उदाहरण नीचे देखिये-
१ राजत राम अतुल बल जैसे (उपमान वाक्य)
तेज निधान लखन पुनि तैसे (उपमेय वाक्य)
पिशुन वचन सज्जन चितै, सके फोरि ना फारि।
कहा करै लगि तोय में, तुपक तीर तरवारि ॥
'सके फोरि ना फार' और 'कहा करें इन भिन्न पदों का
अशक्तता रूप एक समान ही धर्म कथन किया गया।
३ बुध जनहीं जानै भले, बुध जन श्रम गंभीर ।
वध्या क्यों करि, अनुभव, तन प्रमून की पीर ।
४ गुणी जनन के गुणनि को, आपुहि होत विकास ।
कस्तूरी आमोद नहि, शपथ किये कछु भास ॥
कहीं२ काकु से भी एक समान धर्म कहा जाता है, यथा--
५ सॉम वरणि सकी विधि फेही। डाबर कमठ किमंदिर लेहीं॥2
६ सा यनु राजकुंवर कर देही । बाल मराल कि मदर लेहीं ।।।
सू०-रसगंगापर के कर्ता पडितराज जगन्नाथ के मत में
प्रतिवस्तूपया और हशत में थोडीही विलक्षणना के कारण अतर
नहीं तो ये दोनों एकही अलकार के भेद मात्र हैं। -
२० दृष्टांत
(Ehemplification )
दृष्टांतहु प्रतिबिंब सम, दुहूं वाक्य सम दीख ।।
कृष्ण प्रेम पगि जोग कस, राज्य पाय कस भीख॥
दृष्टांत देखा गया है अंत अर्थात् निश्चय जहा, उदाहरण ।।
दृष्टात में एक से धर्म वालों की साम्यता बताई जाती है इसमें
.
+
--
.
हिन्दी काव्यारद्वार
[४]
अपमान उपमेय और साधारण धर्म का विच प्रतिबिंध भार रहता
है काव्य प्रकाश में दृष्टात का लक्षण यों है। दृष्टानः पुनरेतेपा,
सर्वपा मतिविपनम् । मादित्य दर्पण में इसका लक्षण यों लिया,
है दृष्टांतस्तु समर्मम्प वस्तुन प्रतिक्विनम् । इममें दो चास्य रहते
है जिस वाक्य का निशप फराना हो सो दाटीन, और गिम
वास्य द्वारा निथय कगया जाय सो दृष्टांत है मामान्य का
मपर्यन सामान मे और विशेष का विशेष से होता है, पया-
१ रहे सनेह लघुन पर करहीं । अनि म गिरि तण शिर पाही
२ पी मेम नंदलाल के, हम न भारत जोग ।
मधुप गन पद पाय फे, भीख न पांगत लोग।
3 सरे मायक गपन , कोउ न निकल गदाय ।
पान जगारन भाग को. दीपरिन यशाप ।
४ पानि पिले मन पिलन, सनमिलने न मिन्नाग ।
दूध दही ने गपन , कानी में फट जाय ।
५ का शम्पार जहमति कर गुमान ।
राग भारत जात,मिर पर पान निमान ||
६ निवि कानमाल को, न न ना भान ।
मानविण फोफान, कटु भापति को पार॥
" म मुराई बागु नन, नारी को गनमान |
भनी हिंग, मोटे प्रानादान ।।
८ नगा ननायो मिदिमाता,
मनमो ना
Tiपिन गरापन, मोनिन थीमा
. यापमा पार
-
[ ४२ ] हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
१० मन मलीन तन सुंदर कैसे । विप रस भरा कनक घट जैमे॥
११ अनरस हू रस पाइये, रसिक रसीसी पास !
जेसे सांटे की कठिन, गांठौ भरी मिठास ।।
१२ मधुर वचन तें जात मिट, उत्तम जन अभिमान ।
तनक शीत जल सों मिटै, जैसे दूध उफान ||
१३ रिसकी रसकी रसिक को, तेरी सबै सुहात ।
तातें सीरे नीर ते, जैसे आग सिरात ।।
१४ दोप एक गुण पुंज में, होत निमग्न 'मुरार' ।
जैमे चट मयूग्व मे, अंक कलक निहार ।।
किसीर प्राचीन आचार्य ने उदाहरण नामक एक अलङ्कार
अलग माना है परन्तु अन्य प्राचीन तथा अर्वाचीन आचार्यों ने
उसे दृष्टांतर्गत ही माना है। लाला भगवानदीनजी ने अपने ग्रंथ
अलंकार मंजूपा में इसकी उत्तम और यक्ति सगत विवेचना की
है अर्थात् दृष्टात में ज्यों, जैसे, वाचक नहीं होते, जिनमें ये वाचक
हो सो उदाहरण है दृष्टात में कवि का मुख्य लक्ष्य उपमान
वाक्य (उत्तरार्ध भाग) पर होता है और उदाहरणालंकार
कवि का मुख्य लक्ष्य उपमेय वाक्य (पूर्वार्ध भाग) पर होता है
मालूम होती है और व्यान देने योग्य है परंतु ऐसा
प्रतीत होता है कि अनेक आचार्योंने यह भेद इसलिये छोड
दिया कि जहा पाचक स्पष्ट रूप से नहीं आते वहा ऊपर से
कहने में याते है और कोपकारों ने भी दृष्टांत और उदाहरण,
को एकही चान मानी है। कवि मुरारीदानजी ने दृष्टांत और
उदाहरण दोनों अलकार अलग अलग माने हैं परतु वाचक
रहते हुए भी उदाहरण नंबर १३ को उन्होंने दृष्टांतालंकार
बात ठीक
माना।
wwwra
१
---
हिन्दी-गाचारहार । [४३ ]
२१ निदर्शना
( Illustration)
१(१) निदर्शना आरोपनो, एक अर्थ दुई बंध ।
मीटे बचन उदार के, सोने माहिं सुगंध ॥
निदर्शनाचच दिगाना । जटा दो वाग्यों के अर्थ
समना भानूचा ऐसा भारांप दिया जाय कि दोनों पकन
मान पट चाहे रे असंभा न यो हो सो निदर्शना जलकार इनमे
एक वाक्य दुसरे अपेचिन रहना है इसके पाचरु जी, मेज,
ने, कही स्पष्ट रूप से रहने है भार कहा ऊपर से लगाने में पान
६, यथा--
१ जड़ चेतन गुण टोप मग. पिम्प फोन परतार ।
सनम गुण गा पय, परि रि वारि विमार ॥
२ गुन ग्बगेगरि भतिपिटाई जो मुग्न चाहेमान उपाई ॥
सोमठ मारा सिंधु धिन नग्नी पर पार चाहत जड़ परती ॥
३ दाना मादी गाम्यता. पूर्ण इद् निगा।
१जगजीन ने गातु, नामों पर यार ।
जी गोगनपाल ट ते साय ॥
মা ও গণ অস, লি আশা।
पयों पर फर शिगिगा. सगम वारन गा॥
पारटार धर्म को मार हार भागेप।
पिन या परन अपर मनाईजोपायथा-
१ मा गुन सामननागान भार।
• पावर गिरि ।
गिर पनि नाम पर
[४४] हिन्दी-काव्यालङ्कार।
(३) आप अवस्था तें जहां, औरन को उपदेस ।
धन्यो ताहि नहिं छांडिये, कहत धरणि धर सेस ।
यथा--
संग लाय करिणी करि लेही । मानहुं मोहि सिखापन देही ।।
( यहां मानहुं शब्द उत्प्रेक्षा वाची नहीं केवल शिक्षा का
ग्रारोपक है ) इस तृतीय भेद में जहा सत अर्थ कथन किया
जाय वह सदर्थ निदर्शना और जहां असत अर्थ कहा जाय वहा
असदर्थ निदर्शना जानो, यथा-
(सदर्थ निदर्शना)
१ पयो ताहि नहिं छाडिये, कहत धरणि घर सेस ।
२ भानु उदय निज होतही, कमलहि अर्पत श्रीय ।
सपति को फल अनुग्रह, सुहृदन पर कम नीय ।।
३ पद कर हिय मुख चग्व समताई।
पाय कमल अहमिति नहि लाई॥
कीच वीच वास अस सिखलाये।
नमि जो चले ऊच पद पावै ॥
(असदर्थ निदर्शना)
१ राज विरोधी नसत है, यो जग को दरसात ।
चद्र उदय तें तम निकर, छिन छिन छीजत जात ।
२ सतापित करि दीन, लहत सतत को संपदा ।
अस्ताचल निमि लीन, भानु तपत दिन में जऊ ॥
३ भोग गिलासहि में सदा, जन्म गमायो हाय ।
चितामणि को कांच के, मोलहिं दियो वहाय ।।
२८९
हिन्दी-पाण्यासार! [१५]
४ घट घट में हरि गजहीं, खोजत अनत वृथाहि ।
चिंतामणि गर में बँधी, अन्न दृढ भू माहि ॥
मूक-दृष्टांत में दोनों पाप सिंग प्रतिबिंर भाव से स्वतंत्र रहते
है और लोक प्रसिद्ध पाश्य से ममता दी जाती है,
निदर्शना में एक वाश्य दूसरे के प्राधिन रहना है।
२२ व्यतिरेक
.
(Contrist)
व्यतरिक जहें उपमेय में, कोई बात विशेष ।
मुम्ब है अम्बुज सो सखी, मीठी यात विशेष ॥
নিয়র শিল্পনা, বাণ।
१ नाम गाते नाप रड़, बन्दापर दानि ।
गम चरित गन फोटिमर, लिए महम जिय नानि ।
२ नारि विमानान या नोगामा किक मृगपांग
उदित महापामगहनापिदिन नग नभनिदिन ना?
३ करन मय पंदी दिगे. पर दी गुणान।
निपालिमाटो हिप, प्रगपिन रहन उनला
४ माागनानी माना पिन पर नना।
निम परितापमानाना । परम्प र मुगा पुर्माना।
५ को पद सीट पर मुनि गुपद गति In
६ मHिATRITIमानना nik
७ PETERTR परोप।
अनमी नाम राम गिनन ।
.
.
[४८ ] हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
२७ परिकरांकुर
(Sprout of Insinuator)
परिकर अंकुर नाम, साभिप्राय विशेष्य जहँ । '
नेक न मानत वाम, सूधेहू पिय के कहे ॥
जहा विशेष्य साभिप्राय हो वहां परिपगंकुर जानो जैसे
वाम अर्थात् टेढी ।
१ गुनह लग्वन कर हम पर रोष । (लग्ख न जो न लखे)*
२ वटन मयंक ताप त्रय मोचन ।
३ सुनहु बिनय मम विटप अशोका।
सत्य नाम करु हरु मम शोका।
४ बाल वेलि मूखी सुखद, इह रूखे रुख घाम ।
फेरि डहडही कीजिये, सरस सीचि घनश्याम ॥
,
२८ श्लेष
(Parono nasi)
श्लप अलंकृत अर्थ बहु, एक वाक्य में होत ।'
होये न पूरन नेह विन, ऐसो प्रगट उदोत ॥
श्लेप अनेकार्थवाची पद ! नेह-तेल, प्रेम । यथा--
१ साशु चरित शुभ सरिस कपाम् ।
निरम विशद गुण मय फल जाम् ।।
गुणमय-गुण से भरा हुआ, मूत से भरा हुआ।
२ सगुण सभूपण शुभ सरस, सुवरण सुपद सुराग ।
इपि कविता अरु कामिनी, लहै जु सो बड भाग ।।
की यहा लय न शब्द साभिप्राय मानकर परिकराकुर अलकार है
जहा यह साभिप्राय न माना जाय तो विषम अलकार होगा।
---
४८.८LAL
हिन्दी-साव्यालद्वार । [४९]
३ चरण धरत चिंता करत, तनिक न मात्र सोर।
मुबरण को दृढत फिरत, कनि कापी अरु चोर ।।
उदाहरण नंबर ३ तुल्ययोगिता भी होने से उभपाळकार है।
२९ अप्रस्तुत प्रशंसा
{ Indirect Di-qcription)
अप्रस्तुत परशंम जह, प्रस्तुत अहि होय ।
राजहस दिन को कर, छीर नीर को दोय ॥
-
यमातुन-अनुपन्धित । यहा गनम अप्रस्तुत की मसा
में किसी प्रस्तुत अविवेकी का वर्णन है। म पनि भेट
(यह उदाहरण मारुप्य निधना का)।
१ मारुपनिययना (रुप मिस 47)
कांधे केसर यांधि के, रूप रच्यो मृगराज ।
कृकर क्या कार है कहाँ, करि कृज कंपन गाज ॥
गरपान पा समनकर में
असन्तुन
तिकी मनमा
में फिमी पटिन म्प गर्व का मागमप फापर सामना गमा-
২ । মনমূল মান ঘ্যাঙ্ক বিলনিন বাবা।
२ भपा मारनपति सलिपान, पर मन की बात
महा पहा गट की, न पान पानि ॥
३ मानना पंद पिन, पियन नीर।
"बादी भूगी, मिल पान नारद
गापानी पुगे पूला मारा
~
-
Renuene
[५२] हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
१ भळ न कीन्ह नै निशिचर नाहा। अपमुहिं आन जगायेउ काहा
अहह वंधु तै कीन खुटाई । प्रथम न मोहिं जगायेउ भाई ।
२ सीत वात आतप सहो, राखि तेरियै आस ।
तऊ पपीहा की जलद, तैं न बुझाई प्यास ॥
३ जिन जिन देखे वे कुसुम, गई सुबीत बहार ।
अव अलि रही गुलाव में, अपत कटीली डार ।।
सू०-प्रस्तुताकुर में कहने वाले का मुख्य तात्पर्य उससे
होता है जिसके प्रति वात कही जाय । गूढोक्ति में
किसी दूसरे सुनने वाले से होता है ।
३१ पर्यायोक्ति
(Periphr.913)
(१) प-योनी व्यंग सों, बोलै बचन रसाल ।
चतुर वहै जो तुव गरे, बिन गुनं डारी माल॥
पाय+उक्ति अभीष्ट अर्थ का कथन उसी रूप से न कर
दूसरे प्रकार से घुमा फिरा कर करना, यथा-
तिन कह नाथ कहन किमि चीन्हें । देखिय रवि कि दीप कर लीन्हें
(२) मिस करि कारज साधिये, दूजो भेद विशाल ।
तुम दोऊ बैठो यहां, जात अन्हावन ताल यथा-
१ लखन हृदय लालसा विसेखी । जाय जनकपुर आइय देखी।
२ पूस मास सुनि सखिन सन, साई चलत सवार ।
लेकर वीन प्रवीन तिय, गायो राग मलार ॥
३ सीता हरण तात जनि, कहेउ पिता सन जाय।
जो में राम तो कुल सहित, कहहि दशानन पाय ।।
-
.
evensist
हिन्दी काव्यालङ्कार। [५३
३२ व्याज स्तुति
(Arttul Praise or long )
(१) व्याज स्तुति निदामिसहि, स्तुति निंदा होय ।।
स्वर्ग चढ़ाये पतित लों, गंग कहा कहुं तोय ॥
व्याज-वहाना, मिस । स उदाहरण से उमी फी निदा
में उमी की स्तुनि हुई, यथा-
गम न सकहि नाम गुण गाई।
इराक सर पिलकर ६ भेद है।
(२) उसी की स्तुति में उसी की निंदा ।
समर तू पड़ भाग है, कहा सरायी जाय ।
पली कर फल पास नुहि, निगि दिन सेदि गाया।
१ अदो मुनीश महा भट मानी।
२ नाफामान पिन भगनि निरीउमाफीन तुम धर्मचारी
लाजवन तर महन गुभाज। निज गण निग पुग्य
परसि न फाऊ॥
३ जननी तू जननी भी, रिपि मन कसा बसाय ।
(३) और की निंदा से और की निंदा।
पान निंद निदा मिम, निदा से भरपूर ।
पर नो एंगे परी, नाम धन्यो भएर ॥ गया---
शिपिा न नारिद्रय गति नानी | गमन पर मर भरणगानी ।।
(2) और की स्तुति से और यी स्तुति ।
पानरमा प्राम, फरकीपना कहा।
सानसाद निer. WITRA DANCEm
কানু যে ধন খালাম। গাধ পু? বন না।
--
[५४ ] हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
(५) ओर की निदा से और की स्तुति ।
१ हर से नग्नहि भनहु हरि, कहा लाभ जिय जानि |
२ एक कहत मुहिं सकुच अति, रहा वाल की कांग्व ।।
तिन महे रावण कवन ते, सत्य कहहु तजि माख ।
यहा रावण की निंदा से बाल की स्तुति है।
(६) और की स्तुति से और की निंदा ।
प्रभु प्रताप रवि उदय लखि, नृप शशि ज्योति मलीन ।
३३ आक्षेप
(Hnt)
(१) तीन भांति आक्षप है, इक प्रतिषेध विचार ।
चंद्र दरश दे वा अहै, तिय मुख प्रभा पसार ॥
आक्षेप-दूपण लगाना यथा-
१ प्रभु, प्रसन्न है दीजिये, स्वर्ग धाम को वास ।
अथवा यातें फल कहा, करहु आपनो दास।
२ सानुज पठइय मोहिं वन, कीजिय सवहिं सनाथ ।
नतरु फेग्यि वधु द्वउ, नाथ चलौ मै साथ ॥
निषेधाभास
(Solmng Hint)
(२) दुतिय निषेधाभास है, कोउ कवि जन मत लेख ।।
हो नहिं दूती अग्नि तें, तिय तन ताप विशेख ।।
निषेध+आभास निषेध सा भासना।
दूनी तो थीही तथापि कहती है कि दूती नहीं हूं बरण
नायिका की प्रवल उत्कठा हू।
,
-
vaye033
हिन्दी-काव्यासार।
१ राम करहु सर सयम पाजूजो विधि कुशल निवाई कानू।।
२ मोहितु जानत है कपि है यह में कपि ही नहिं काल
हो तेरो।
विधि निषेध
(Hint Ambiguous)
(३) दुरे निषेध जु विधि वचन, भेद तीसरो आहि ।
जाहु दई मुहिं जन्म दे, चले देस तुम जाहि॥ यथा-
१ राज देन कहि दीन घन, मुहि न सोच ला लय।
तुम पिन भरतहिं, भूपतिहिं, महिमनंड क्लेश ।
२ भरत विनय सादर मुनिय, करिय पिनार पहारि ।
फरव साधु मत लोक मत, नृपनर निगम निचोरि।।
३ जदपि कवित रस एफी नाहीं । राम मताप मगदगतिमाहीं ।
४ पविन होउ नदि चतुर फहमति अनुरूप राम गुग गाऊं।
३४ विरोधाभास
(Confrad (kinn)
वह विरोधा भास, भास जहां विरोध मो।
वामुख चंद्रप्रकास.मुधिभाये नुधि जात है। यथा-
१ संधी नार पनि ग, गरम गा ग रंग।
भारद निरनई गा मंग।।
२ भानु TIPE गुमाः । माग मागिरहना।
३ पनि गितमा ।
४T initiatifal
मामी नाम
मग thritarian
"
CAUR Seekers
[ ५६] हिन्दी-काव्यालङ्कार।
६ भये अलेग्व सोच बस लेखा (लेखा-देवता)
७ भरद्वाज सुनु जाहि जब, होत विधाता वाम ।
धूरि मेरु सम जनक यम, ताहि व्याल सम दाम ॥
८ वदों मुनि पद कंज, रामायण जिन निर्मयो।
सखरस कोमल मंजु, दोष रहित दूपण सहित ।
३५ विभावना
( Peculhar Causation)
(१) विभावना पट हेतु विन, जहें वरणत हैं काज।
विन जावक दीन्हें चरण, अरुण लखे हैं आज॥
विभावना = गई है भावना जिसमें, जावक-महावर,
अरुण-लाल, यथा--
विनु पद चले सुनै विनु काना । कर विनु कर्म करै विधि नाना ।।
आनन रहित सफल रस भोगी। विन वाणी वक्ता बड जोगी।
(२) हेतु अपूरण तें जबै कारज पूरण होय ।
कुसुम वाण कर गहि मदन, सब जग जीत्यो जाय॥
यया---
काम कुनुपनु लायक नीन्हें । सफल भुवन अपने वश कीन्हें।।
(३) प्रति बंधक के होत हू, कारंज पूरण मान ।
निसि दिन श्रुति संगति तऊ, नैन राग की खान।
(श्रुति वेद, कान) यथा---
रखवारे हति विपिन उजारा । देखन तोहि अछन तेहि मारा॥
(2) जवे अकारण वस्तु ते, कारज परगट होत ।
कोकिल की बानीअवे, बोलत सुन्यो कपोतायथा-
१MALAALA
७
हिन्दी काव्यालदार
[५७ ]
१ भयउ नात निशियर मुल भूपण ।
२ पकन ते परुज उपन, सुन्यो न देन्यो नैन।
तिय मुग्ध पंकन में तखे, इदीवर ऐन ।
५)-काह कारण ते जवे, कारज होत विरुद्धः ।
करत मोहि संताप यह, सखी शीत कर शुद्धायथा-
(१) उम्ग स्वास सम निविर समीग।
(२) जेहि तर ग्ही करत सो पारा॥
(६) पुनि कछु कारज ते जये, उपजे कारण रूप ।
नन मीनतें देखियत, सरिता वहत अनूप ॥ यथा-
१ नगन पिता में सुत करि जाना ।
२ शंभु निरचि विष्णु भगवाना। उपनहिं जागु शंसते नाना॥
३ तुप कर कम्पदि ते प्रभू, यम पयोधि उत्पन',
३६ विशेपोक्ति
(Piculter Artion)
विशेपोक्ति जहें हेतु सौं, कारज उपजे नाहिं।
ने घटत नहिं हिय जा. काम टीप चिनमा
पियार, नरम, मेल, गधा--
१. मशिताकि गिा पनुशारी।
उठानमांटि पानि गर ।
: फांदिकरायो,frrita
३ मामु
किन मritial
४मी भयान।
6
[५८] हिन्दी काव्यालङ्कार ।
३७ असंभव
(Improbality)
कहत असंभव ही जहां, होत असंभव काज ।
को जाने थो गोप सुत, गिरि धारैगो आज ॥ यथा-
१ अति सुकुमार युगल ममवारे निशिचर सुभट महा बलभारे ।।
२ ऊधी हम नहिं जानतती, मन मोहन कूवरि हाथ विकै है।
३८ असंगति
( Dis Connection)
(१) होत असंगति हेतु अरु, कारज औरहिं ठौर।
कोयल मद माती भई, झुमत अम्बा मौर ॥
कोयल तो मद से मत्त हुई उसे झूमना था सो वह तो न।
भूमी आम.सै. मौर झूमे, यथा---
१ जिन वीथिन विहरै सब भाई । थकित होहिं सब लोग लुगाई।
२ और करै अपराध कोउ, और पाय फल भोग ।
३ सीता रावण ने हरी, बाँधो गयो समुद्र ।
४ वैल न कूदा कूदी गान ।
(२) और ठौरही होत जह, और ठोर को काम ।
तिलक लगायो हाथ में, तु वैरिन की वामायथा-
१ जो जो भाव सोइ सोर लेही। मणि मुख मेळि डारि कपि देही।
२ ते पितु मात सखी कहु कैसे । जिन पठये वन बालक ऐसे ॥१
(३) औरै काज अरंभिये, और करिये दौर ।
मोह मिटायो नाहिं प्रभु, मोह लगायो पोर॥यथा-
९८५१
हिन्दी-काव्यालङ्कार।
१ मोह मिटावन हेतु प्रभु, तुम लीनो अपनार ।
उलटो मोहन रूप धरि, मोहीं सर वजनार।।
२ राज देन कहि शुभदिन साजा । कहेउ जाउ वन फेहि अपगधा
३६ विपम
(lucongruity )
(१) विषम अलंकृत तीन विधि, अन मिलते जु मिलाया
कह कोमल तन तीय को, कहां काम की लाय ।।
लाय-भनि, यथा-
१ कहँ फुभन कह मिंधु अपारा ।
२ फठिन भूमि कोमल पद गामी ।
३ जिहि विधि तुमहिं रूप अम दीना | तिदि जद पर
चाउर कस फीना।
४ गम मुकीरति मणिन भदेसा। असमंजम मस मोटि अंदमा
५ पर्दै रघुगर के चरित अपारा । कई मनि मोरि निरत ममागा
(२) कारण को योर रेंग, कारज को
नता श्याम असिने प्रगट. कीर्ति सेत नहुँ टो।।
गया-
१ माम नगी पप गिमा प्रति, गुनद पनि पान ।
२ मा गगी पिनी, गनि समीनाराय॥
मान्यों बोम्पामग, मौलाना॥
१३. मोर भनी उगन किये जान युरो फान आप!
मग्निमायाचनमारप, अभिगोनम तापापा:
कछु और
समि ननबारः
हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
१ भले कहत दुख गैरेहु लागा ।
२ मूपक धुस्यो अहार हित, सर्प पिटारी जाय ।
मिल्यो अहार न तिहि कछु, सर्प गयो तिहि खाय।।
३ गुनहु लखन कर हम पर रोपू। कतहुं सुधाइउ ते बड़ दोध ।
४ करत नीक फल अनइस पावा ।
प्राचीनों ने विपन के ३ ही भेद माने हैं परन्तु एक चौथा
भेद भी प्रतीत होता है :-
(१) और बुरो उद्यम किये, भलो होय तत्काल ।
विष देते विषया दई, ऐसे दीन दयाल ॥
विपया एक राजकन्या का नाम, यथा-
कालकूट फल दीन अमीके।
४० सम
(Equal )
(१) समभूषण है तीन विधि, यथायोग्य को संग।
हार कठिन तिय उर वस्यो, जोय कठिन स्वइ अंगा
इस अलमार को विषम का ठीक विरोधी समझो, यथा--
१ जस दूलह तम बनी वराता।
२ चिरजीवी जोरी जुरै, क्यों न सनेह गंभीर ।
को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के धीर ॥
वृषभानुजा-पभान की कन्या, वृषभ अनुजा बैल की
बहिन अर्थात् गाय, इलयर के वीर-पलदा के भाई,
हलधर के वीर हल धारण करनेवाले वेल के भाई-बैल
३ खर मधुर मनोहर दो।
.
20
८७०८
vaala
-
हिन्दी काव्यालदार ।
[१]
(२) कारणही के अंग सब, कारज माहीं चाहि ।
नीच संगअचरज कहा, लछमी जलजा आहियथा
१ जो कुछ काहिय थोर सखि सोई । राम मु अम काहे न होई ।।
२ सीय दुसह दुग्व सहि लिया, मुना भूमि की होय ।
(३) विना विघ्नही काज जह, उद्यम करते होइ।
जाहि ढूंढ़ने में चल्यो, वीचहि मिलिगो सोडायथा-
१ इंदभि अस्पिताल दिखराये । विन प्रयास गुनाय हाये!!
२ छुरतहि हट पिनाक पुराना ।
३ जपदि नाम जन आरत भाग मिटहि कुसंकटारोहिंगुम्बार्ग !!
४ भाव अभार अनम आलग हूं। गम नपन मगन दिमिदमा।।
गूल-जिन पदों में एक से दूसरे की घगरी, मिना, ,
होड इत्यादिक भार प्रदर्शित होंगो समालकार पं.री:
अंतर्गत है परन्तु कोई इसको करितोपना गया,
लक्ष्योपमा नाम से प्रयास सफार माना गया- ?
उस म्याम रटा दम है या बस पानि न मोतिमी
दामिनि कहाँ उन पाप न झा ME
चातक पांउसिन िTR
उन पर पटनगुया पग्मा दिदीन में सं.
११ विचित्र
.
Fनिर उलटो जनन-17 फ
'नगान गाया-
मरामि IEEETTE
.
RBA
[ ६२] हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
सू०-कोई२ इससे मिलता हुआ अनुकूल नामक अलंकार पृथक
मानते हैं परन्तु वह विचित्रालंकार के ही अंतर्गत प्रतीत
होता है, यथा--
प्रतिकूलहिं अनुकूल, करव सोइ अनुकूल है ।
दंड उचित वडि भूल, बांधु मोहि निज भुजनतें ॥जैसे-
जो वधेिही तोप, तौ बांधौ अपन गुणनि ।
४२ अधिक
,
(Exceeding)
अधिक अधार अधेय तें, वा अधेय अधिकाय ।
गोपि हृदय त्रिभुवन पती, कीर्ति न सिंधु समाय॥
आधार जिसमें कोई वस्तु ठहरे, आधेय-वह वस्तु
आधार में ठहरे।
(आधार चडा'श्राधेय छोटा)
१ गोपि हृदय त्रिभुवन पती।
यहां गोपि हृदय आधार वडा ठहरा और त्रिभुवनपति
आधेय छोटा टहरा।
२ व्यापक ब्रह्म निरजनउ, निर्गुण विगत विनोट ।
सो अज प्रेमरु भक्तिवस, कौशल्या की गोद ॥*
यदा कौशल्या की गोद आधार बड़ी ठहरी और
ब्रह्म आपेय छोटा ठहरा ।
(आवार छोटा प्राधेय बडा)
१ कीर्ति न सिंधु समाय ।
यहा सिंधु आधार छोटा ठहरा, कीर्ति आधेय
बढी ठहरी।
* यह उदाहरण विरोधाभास में भी घटित होता है (उभयालकार)।
हिन्दी काव्यालबार ।
२ वहुत उछाह भवन अति धोरा।
भवन आधार छोटा, उडाह आधेय पड़ा।
३ अधिक सनेह सपान न गाता ।
गात आधार छोटा, सनेह आधेय बडा ।
४३ अल्प
(Smallnnes)
रम्य जहां हो अल्पता, सो अल्पालंकार ।
अगुरी की मुंदरी हुती, भुज में करत विहार॥ यथा-
१ रोम रोम मनि राजही, कोटि कोटि ब्रामंड।
२ गज मुख तंदुल कण गिरत, घटत न नेक प्रहार ।
सो पिपीलिकाले चलत, पालत निज परिवार ।।
४४ अन्योन्य
(Recidiroeul)
अन्योनहिं उपकार, जहां परस्पर पाइये।
निशिही सोशशिसार, शशिसोनिशिनीकी लगायथा
१ मृनि रतीर परस्सर नहीं।
२ मृति पितत प्रमोद पाग।
४५ विशेप
(T Ite oririn)
(1) विशेष प्रय भांति को, अनाधार पाय ।
नम ऊपर कंचन ना, कुसुम महाधिनी
पहा कमला मिनी या प्राची पाने मr मुम
मामानीपणा
गगन मिना।
MAHA
भ
[६४] हिन्दी-काव्यालवार ।
(२) थोरेही आरंभ तें, फल पावै जहॅ भूर।
कल्पवृक्ष देख्यो सही, देखि तुमहिं सुखमूर ।।
आप सुखमूरि को हमने देखा तो साक्षात् फल्पक्ष ही
देख लिया अर्थात् थोडे लाभ को अविक मान लेना, यथा-
१ कपि तव दरस सकल दुग्व वीते। मिले आज मुहि राम सप्रीत।।
२ आजुकी या छवि देखि भटू अब देखिवे को न रह्यो कछु बाकी।
(३) वस्तु एक को कीजिये, वर्णन ठौर अनेक ।
अंतर बाहर दिसि विदिसि, व्याप रहो प्रभु एक॥
यथा--
१ निज प्रभु मय देखहिं जगत, कासन करहिं विरोध ।
२ मो में तो में खड्ग खभ में, कहां बताऊ दूर ।
३ सीयराम मय सब जग जानी । करौ मणाम जोरि जुग पानी।
-
४६ व्याघात
( Frustration)
(१) व्याघात जु कछु और सों, कीजे औरहि कार ।
सुख पावत जास जगत, तासों मारत मार ॥
व्याघात-चिन्न, धडा-जिस पदार्थ से जो कार्य होना,
चाहिये उपसे कोई दूसराही कार्य किया जाय जैसे कटाक्षादि से,
जगत प्रानदित होता है उसी से मार (कामदेव) जो है सो
मारने का कार्य करता है, यथा-
१ देखहु तात वसंत मुहावा । प्रियाहीन मुहि डर उपजाया।
२ उरग श्वास सम त्रिविध समीरा ।
-
,
auwork
हिन्दी काव्यालद्वार। [६]
(२) वहुरि विरोधी तें जवे, काज आपनो सार ।
निहिचे जानत वाल तो, करत काह परिहार ।।
जहां कारण को उलटा सिद्ध करकं भी उमसे कार्य सिद्ध
किया जाय, जैसे एक राजा अपने लड़के से कहता ६
"तू नादान बचा है इसलिये युद्ध में नहीं ले जाते "लाका
माता रे फि अगर आप नादान बचा समझते हैं तो मुझं.
न्यागना उचित नहीं, यथा--
१ ऐसे बचन कठोर मुनि, जो न दृढय पिलगान ।
ना पुनि विपम चियोग दुग्य, सहिद पामर मान ।
२ राखिय अवर जु भवधि लग, रहत जानिये मान ।।
४७कारणमाला
(Gurlamni of Coysen )
कारगनाला जान, कारण काज परम्परा ।
नीतहिं धन, धनदान, दानहिं तें पले मुजम॥
नीनि से धन, धन मे टान, शोर दान मे गुपा पन्ना
है, पथा-
१ धर्म नि म मानाजान मोपनाना
पिया नियमिपम |
गगन भग का मरन, पर में पE TR
s frTiminar मा निरन माग
मोदगो नि.TOTTru
इस अलंकार में (उत्कर्प) अधिक से अधिक वा (अपकी
हिन्दी-काव्यालद्वार।
४८ मालादीपक
(The Serial Illummatoi )
माला दीपक पूर्व पद, उत्तर प्रति उपकार ।
रस सों काव्यरु काव्य सों, सोभा वचन अपार॥
दीपक और एकावलि के मेल से यह अलंकार होता
यथा-
१ जग की रुचि ब्रजवास, ब्रज की रुचि ब्रज चंद हरि ।
हरि रुचि वंसी "दास", बंसी रुचि मन वांथियो।
२ श्री हनुमान हिये रघुनाथ वसैं रघुनाथहिं में सब लोक हे
४६ सार
(The Climax)
सार होत है अधिक जव, इकतें एक बखान ।
मधु
सों मधुरी है सुधा,
कविता
मधुर महान॥
न्यून से न्यून दोनों का समावेश होता है, यथा-
१ अधम तें अधम अपम अति नारी । तिन मह में मति
मंद गॅवारी ।।
२ तृणतें लघु है,तूल, तूलहुत लघु मॉर्गनो (? मंगन, भिग्वारी)
३ गिरि ते बडो है सिंधु, सिंधुहू ते नभ पुनि, नभहू
तें ब्रह्म
ब्रह्महूत बडी आशा है।
५० यथासंख्य
( Relative order)
यथासंख्य वर्णन विषय, वस्तु अनुक्रम संग।
कर अरि मित्त विपत्ति को, गंजन रंजन भंग ॥यथा-
।
23 MAMAL aur- F ७४N०७rueA हिन्दी-काव्यारद्वार। [६७ ] १ बंदी राम नाम रघुबर कोतु कृगानु भानु हिम फरको|| यहां राम शब्द के माहात्म्य वर्णन में रगर अकार और पकार का क्रमपूर्वक वर्णन है। २ श्रमी इलाहल मद भरे, संत ज्याम रतनार। जियत भरत झुकि कि परत, जिहि चित्तवत इस यार। जहां क्रम भग हो वह निकृष्ट यथायस्य है, यथा- ३ सचिव वैद्य गुरु तीन जो, प्रिय बोलाहिं भय पाम । राज्य धर्म तन तीन को, होय वेगही नाम || सू०-इसको क्रमालकार भी कहते हैं। ५१ पर्याय (The Stquence) (१) पर्यायहि क्रमते जये, बहु इक प्राश्रय पाय। हुती चपलता चरण में, भई मंदता माय ॥ पर्याय-सम अर्थ को पोष गगनेहाग गन्द। इसमें। अनेकों का माश्रय एक स्पल में होना है नंगे-निग परण में पहिले उपलता भी वहां अय मदता भागई, दोनों शमार एस चरणही ६, था- १ जना उगल मोर दिई। २ हुनी देश में लाई, पनि तानाजोर। शिरपाई माई अनाभन ते नासिर । 1(२) फिर क्रमतें जय एकही, यात माधा पाए । नीर बदन दुति कमल नजि चंद गली माया ममें एरी अनेक पदों में बार-
adven
[६८ ] हिन्दी काव्यालङ्कार ।
१ मणि माणिक मुकता छनि जैसी । अहि गिरि गज शिर
सोहन तैसी ॥
नृप किरीट तरुणी तन पाई । लहैं सकल सोभा अधिकाई ।।
२ सती विधात्री इंदिरा, देखीं अमित अनूप ।
जिहि जिहि वेप अजादि सुर, तिहि तिहि तनु अनुरूप
३ नाम अनंत अनंत गुण, अमित कथा विस्तार ।
४ कामरिवारे अहीर येई ब्रज वीच विराजत कुंजविहारी।
५२ परिवृत्ति
(The Return )
परिवृत्ती न्यूनाधिकौ, कछु
देत लेत।
• लहत संपदा शंभु की, वेल पत्र इक देत. ॥
परिवृत्ति-विनिमय, कुछ लेना कुछ देना, अदल बदल करना
( थोड़ा देकर वहुत केना)
लहत सपदा शंभु की, बेलपत्र इक देत ।
( बहुत देकर थोड़ा लेना)
तारा विकल देखि रघुराया। दीन ज्ञान हरि लीनी माया ।।
५३ परिसंख्या
(The Special Mention)
परिसंख्या इक थल वरजि, दूजे थेल ठहराय ।
नेह हानि हिय में नहीं, भई दीप में जाय ।
परिसंख्या बदले में एक वस्तु को उसी सदृश दूसरे स्थल
में ठहगना, यथा--
.
.
हिन्दी काव्यारद्वार। [ ६९]
१ दइ यतिन कर भेट जहॅ, नर्तक
नृत्य समाज।
दंड अपराधियों को होता है वहा न होकर यतियों के
हाय में देखा गया भेद भाव अमिनों में होता है यहां न
होकर नाचने वाले में देखा गया।
२ केशनही में कुटिलता, सचारिन में गफ ।
लरूपो राम के गज्य में, इक शगि माहिं फलंक ।।
३ पत्राही तिथि पाइये, वा घर के चर पाम ।
नित मनि पूनो ही रहत, मानन प्रोप उनाम ।
४ नृपति राम के राज्य में, है न शूल दुग्न मूल ।
लखियन चिनन में लिखो, शंकर के फर शूल ॥
५४ विकल्प
(The Alternatiro )
हे विकल्प के तो वहे, के यह कह बिहान ।
दूर करेगो विरह दुख,
के काल ॥
विफल्प-नाना विधि फल्पना । इसमें मंपि विग्रह रूप मे।
दो तुल्य विरोधी परिणामों का एक सापटी फयन रोताई।।
१ सन्म कोटि लगि रगर हमारी। नारदीगमारी
२ की तनु प्राण को चल माना पिणि करवर का नार
नजाना।
५५ममुख्य
(TI.Comitram
(१) होत समुच्चय भाव यह उपजें इफ मग माय।
तुर अरि भाजत गिरन फिरभासन मनगर,
के गुपाल
पकिन पिनय पहिचानीni.मी
। अर्थ-मतलब, अतर दूसरा, न्यास-रवना। इसमें सामान्य [७२ ] हिन्दीकाव्यालङ्कार ।। २ सो नर क्यों दशकंध, वालि वध्यो ज्यहि एक शर। ३ श्याम गौर किमि कहाँ बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु वानी ॥ ४ तजि तीरथ हरि राधिका, तने दुति कर अनुराग। जिहि ब्रज केलि निकुंज मग, पग पग होत प्रयाग ।। .५ मेरी,भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय । जातन की झाई परे, श्याम इरित दुनि होय ॥ काव्यलिंग में जो शब्द वा भाव जिस योग्य हो उसी का युक्ति अर्थात् हेतुपूर्वक समर्थन करना है। ६ धर्महीन प्रभु पद विमुग्व, काल विवश दशशीश । आये गुण तजि रावणहि, सुनहु कौशलाधीश ॥ ६० अर्थातरन्यास ( The Tians tion) है अर्थातरन्यास, जहें विशेष सामान्य दृढ़ नृप कर पान पलास, पहुंचत है संग पानके ॥ SERAIAINMns कथन विपेश कथन द्वारा तथा विशेष कथन सामान्य कयन द्वारा उदाहरणवत् पुष्ट होता है अर्थात् एक वाक्य का समर्थन दूसरे वाक्य से होता है। (सामान्य कथन विशेष कथन द्वारा पुष्ट) १ नृप कर पात पलाम पहुंचत है सँग पान के २ बड़े न हूजे गुणन विन, विरद बढ़ाई पाय ( सामान्य कथन कनक धतूरे सों कहै, गहनो गढ़ो न जाय (विशेष कयन) (सामान्य कयन) (विशेष कथन) BVUN
हिनी-काव्यालकार। [३]
३. राम एक तापस तिय तारी (सामान्य कथन)
नाम कोटि खल कुमति सुधारी
(विशेष कथन
४ राम भजन चिनु मिटहि न कामा (सामान्य स्थन
थल विहीन तरु फरहुं कि जामा (विशेप कयन)
(विशेप कथन सामान्य कवन द्वारा पुष्ट)
१ हरि प्रताप गोकुल बच्यो
(विशंप कयन)
कानहिं करदि महान
(सामान्य कयन
२ परशुराम पितु याशा राखी
(पिशेप कथन)
भारी मातु लोक सय सासी (सामान्य पयन)
मु०-इस अलंकार में वाचक नहीं होता।
६१ विकस्वर
(The Expinason)
विकस्वर होत विशेप जव, फिर सामान्य विशेष ।
हरि गिरि धान्यो सत पुरुप, भार सह ज्यों शेष ।
विकस्वर-विस्तृत गायन, यथा---
हरि गिरि धान्यो (शिंप, सत्तरप भार सई (मामान्य)
योगेप (विशेष) यया-
मिरि पयन मुत पारन नाम् । अपने यस फारसगंज राम् ॥
६२ प्रौदोति
(Thy Bold Smt.h)
मोदोक्ती उत्कर्ष को, कर सहेन ।
जमुना तीर तमाल से, तेरे माल रसेत ॥
-
[७४ ]
हिन्दी काव्यालवार ।
प्रौढ़-दृट, उक्ति कथन, उत्कर्ष बडाई-यहां जमुना तीरही
के तमाल अधिक श्यामवा के कारण नहीं, क्योंकि तमाल कहीं
के हो सब एकसे ही काले होते हैं अतएव पौरोक्ति, यथा-
काम कलभ कर भुजवल सीवां
६३ संभावना
ܝ ܕ
,
(The Supposition )
संभावना विचार, यो होवे तो होय यों।
लहतो गुणनि अपार, वक्ता होतो शेष जो ॥ यथा-
१ जो तुम अवत्यो मुनि की नाई। तौ पद रज शिर
धरत गुसाई ।।
२ यह विधि उपजै लच्छि जब, सुंदरता सुख मूल ।
। तदपि सकोच समेत कवि, कहें सीय समतुल ।।।
६४ मिथ्याध्यवसिति
:, (The False Determination)
मिथ्याध्यवसिति झूठ हित, कहै जु झूठी रीति ।
धरै जु माला नभ कुसुम, करै सु पुरतिय प्रीति ॥
मिथ्या-झूठ, अध्यवसिति यह ऐसा ही है ऐमा ठान
लेना, यथा-
१ फर्मठ पीठ नामहि बहु बारा । बंध्यासुने बरु काहू मारा ॥
२ वारि मधे घृत होय बरु, सिकतात बरु तेल ।। ।
-
4 ६५ ललित हिन्दी काव्यालधार। [५] 18 (Artful Indication) ललित को कछु चाहिये, ताही को प्रतिवि । सेतु वांधि करिहाँ कहा, गयो उतरि अय अंव ।। फेवल प्रतिबिंब वाक्य कह फरही अभिप्राय चित करना, यथा- १ सुनिय सुपा देखिय गरल, सर करतूत कराळ। जह तह काक उलूक वक, मानस सकत मराल ।। अमृत केवल सुनने में आता है विप साधात दंग्या जाता है अर्याद राम राज्य केवल मुनने में आया देसने में नहीं। २ लिग्षत सुधाकर लिखिगा राष्ट्र । विधि गति पार सदा सर फार" एभिमाय यह है कि गमजी का राज्याभिषेक नोन दुमा उरटा वनवास गया ३ या पापिनिस्सिम फापरकाय भरन पर पापांक ६६ प्रहर्पण + -- , . (Harpturt) (१) नीन प्रार्पण जतन पिन, पारित फल जोहोपा जाको चित चाहत हुतो. आईदूती सोप। यथा- ? লিন্য ; নিন। সৰ ধৰি মাধ, मापमान मापन में शीनाशनी नानिमदामादार मो Thiruit Rahe
PLAN
40
-
[७६-1 हिन्दी काव्यालङ्कार ।
३ मुनु सिय सत्य असीस हमारी 1.पूनिहि मन कामना तुम्हारी ॥
४ सुफल मनोरथ होये तुम्हारे । राम लखन सुनि भये मुखारे।।
(२) 'वांछित हुतै अधिक फल,श्रम विन लह मनमान।
दीपक को उद्यम कियो, तौलों उदयो भानायथा-
१ वरहुधीर हुइहै सुत चारी । त्रिभुवन विदित भक्त भयहारी ।।
(मांगने गये ये एक मिले चार)
२ सुनत वचन बिसरे सत्र दूखा । तृपावं जिमि पाय पियूषा ।
(३) सोधत जाके जतन को, वस्तु चढ़ कर आन ।
निधि अंजन की औषधी, सोधत लह्यो निदान।।
जमीन में गड़े हुए धन के प्राप्त्यर्थ अंजन की औपनी
हूंढतेही जमीन का गडा हुआ धन मिल गया, यथा-
१ यह विधि मन विचार कर राजा । आय गये कपि
सहित समाजां॥
२ हरि की सुधि को राधिका, चली अली के भौन ।
हॅसत बीचही मिलि गये, वरणि सकै सुख कौन ॥
।
-
६७ विषाद
(Despondency)
सो विषाद चित चाहते, उलटो कछु हो जाय ।
राज्य देन कहिदीन बन, विधि गति जानि न जायायथा
१ केशन तुम ऐसी करी, बैरिउ करिहै नाहि ।
चद वदन मृग लोचनी, बावा कहि कहि जाहि ।।
-OMer
-
paneeeaNaam
दिन्नी काव्यालझार । [७]
२ रिखत सुधाकर लिखिगा राहू ।
यह उदाहरण व्यंग्यार्य में विपाद है "ललित में पति-
पिंप भाव तयावाच्यार्थसे ललितालंकार (उभयालकार)
३ उड्डिी खिलि कमन जब, निशि पीते पर मात ।
यो सोचन अलि कोशगत, करि पिनम्यो जल जात ॥
६८ उल्लास
(Aharilomnant)
गुण औगुण जव और के, और धरे उल्लास ।
तिय के तन पानिप बढ़े, पिय के नेननि प्यास।
(१) गुण से गुण
१ नहाय संत पापन कर, गंग धर यहि मास!
२ जेल पर संपति देखी।
३ भठ मुगादि सत्संगति पाई।
अगर इसके साथ दसग पट "पारम परमि
-मुगाई " लगा नो पा टासकार होगा।
४ मजन फल देखिय तत्काला। फाफोदि पिकवक मरा
-
(२) गुण से दोग
१निय केतन पानिप प, पिय फे नमनि प्यान।
२ जरहि सदा पर मपनि देगी।
(३) दोष मे गुण
१ परामदानिमाम नि।
२ ल पतिminोग।
गुस्सी ही िपर मिली।
है
६९ अनुज्ञा
अवहा अनादर, अवहेलना । इसका एक भेद निरस्कार
[ ७८ ]
हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
(४) दोप से दोष
१ दुखित होहिं पर विपति विशेखी।।
२ कुटिल कूवरी संगते, भये त्रिभंगीलाल।
( Permission)
होत अनुज्ञा चाहते, दोषहि गुण ठहराय ।
लगै कलंक निशंक तौ, मिलौ मोहनै जाय ॥
अनुज्ञा आदेश,
, हुकुम, इजाजत, यथा-
रामहि चितय मुरेश सुजाना । गौतम शाप परम हित माना ।
७० अवज्ञा
( Disregard)
(१) होत अवज्ञा और के, औरहिं नहिं गुण दोष ।
का परम सुधाकर किरण तें, खुलें न पंकज कोष ॥
और है।
।
-
(एक का गुण दूसरा न गहै)
१- लोटा बोरे समुद में, अधिक न जल कछु लेत ।
२ राजत शिव के भाल तऊ, शशि धोयो न फलक।
३ ऊसर बरसे तण नहिं जामा ।
(एक का दोष दूसरा न गहै)
१ चंदन विष लाग नहीं, लपटे रहैं भुजंग ।
२ पत्र न लहै करीर, दोप बसंतहि को कहा।
चातक मुग नहि नीर, दोष मेघ को ना कह ।।
30A
हिम-काव्यालङ्कार।
[१]
तिरस्कार ( The Contempt )
(२) तिरस्कार कछु दोष मों, त्याग बस्तु गुणमान ।
वा सोने को जारिये. जामों हटे कान ।। यथा-
१. सो मुम धर्म कर्म जरि जाऊन न गम पद पंकज भाज।
२ कह पगगन में जो बने धनी मन में न लागे हरि जन
तो थूक ऐसे धन में।
७१ लेश
"
• (Suggestion)
लेश दोप में गुण लखे, गुण में दोप अधीर ।
काक कटुक निधरक फिरन, परत पीजरे कीर॥
(दोप में गुण लख)
१ काफ कडक निधरक फिरत ।
२जो नहिं होत मोट अति मोही। मिपिता लान पर
। शिधि तोही॥
३ कदा कही बाकी दशा, हरि प्राणन म ।
विरहगाल नगियो तो, मरिश भी भगीर
४ पालि परमदित जागु समासामिगोगमगुरु शमन विटा
(गुग में दोपसन)
१ एनपीशी मी मागीय
माहिदीन गुम्म मुनम गुगrathi
मुमा प्रातुन पद विषय, तो मकान।
मन भी. गुप मानन
.
१ मज्जन फळ देखिय तत्कालाकाक होहिं पिकवकहु मराला*
मीलित जो सादृश्य ते, भेद न जकै लखाय ।
* यह उदाहरण उल्लास में भी घटित होता है (गुण से गुण)
wheran
हिन्दी-काव्यालाकार।
'राग' लाल रंग को भी कहते हैं, यथा-
१ चंदन विष व्यापै नहीं, लपटे रहत भुजंग ।
२ पायस पालिय अति अनुरागा । होहिं निरामिष कबहुँ,
कि कागा |
३ राखौ मेलि कपूर में, हींग न होत, सुगंध ।
इस अलंकार में गुण सब्द रूप रम गंधादिवाची माना
जाता है।
७७ अनुगुण
( The Conformity)
अनुगुण संगति ते जचे, पूरण गुस्स सरसाय।
मुक्त माल हिय हास्य ते, अधिक सेत हो जाय॥
अनुबड़ना, दूसरे के संग से अपना पहिले वाला गुण
वढ़े, यथा-
२ मणि माणिक मुक्ता छरि जैसी । अहि गिरिंगज सिर
सोहन तैसी।
नृपकिरीट तरुणी तन पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई ।।
३ चंपक हरवा अंग मिलि अधिक सोहाय ।
७८ मीलित
(The Lost )
अरुण वरण तिय चरण पे, जावक लख्यो न जाया।
मीलित-मिला हुआ, यथा-
अतएव उभयान्तफार ।
I
ram-102TRO
हिन्दी-कान्यालद्वार।
१. वेणु हरिन मणिमय सत्र कीन्हें । मगल सपर्ण पर
नहिं चीन्हें ।
२ पँसुरी लगी गुलाब की गाल न जानी जाय ।
मीलित में नीच गुणगाली वस्तु श्रेष्ठ गुणवाली वस्तु
विलीन हो जाती है।
७६ सामान्य
{The Sunanesa )
सामान्य जु साहरय ते, जानि परेन विशेप।
नाहि फरक श्रुति कमल अरु, तिय लोचन अनिमेप।
जहा भेट रहने हुए भी माश्य से कोई विधानान
दिग्याते हुए जो पाय कहा जाय यह सामान्पालंकार है -
अनिमेष (सुले हुए) निय के नैनों में और कान में सोसे
कमल पुष में कोई अंतर नहीं देख पड़ता, यथा-
१ पासप तुम भ्राता दी।
२ भरत राम पर मनुहाल सहसा सरिन म नर नारी
३ गिग मर्प जल पीरि सप, पहियत मिलन भिन!
८० उन्मीलित
{ lr Urion)
उन्मीलित सादृश्य ते, हेतु भेद कछ मानि ।
फीरनि मागे तुहिन गिरि, छग परन हे जानिए
उन्गौरिगोयामा, मामा, मा.
मोजोमर netf मरे
irregान नहीं पा -
A
งงง ८८८ene [ ८४]" हिन्दी काव्यालङ्कार । १ पदी संत असज्जन चरणा। दुख पद उभय बीच फछु धरणा|| २ सम प्रकाश तम पाख दुई, नाम भेद विधि कीन । शशि पोषक शोषक सम्ममि, जग जस अपजस दीना| ३ चंपक हरवा अंग मिलि, अधिक मुहाय'। जानि परै सिय हियरे, जब कुँभिलाय ॥ ८१ विशेषक (The Un hameness) वह विशेषक जो फुरे, निश्चय समता मांझ।' जाने तिय मुख अरु कमल, शशि दर्शनते सांझा विशेषक-विशेष करके जो परीक्षा में पाया जाय, जैसे- तालाब में तैरती हुई नायिका के मुख और कमल में भेद नहीं जान पड़ता संध्या समय चद्र दर्शन से कमल मुंदने पर जान पड़ता है, यथा- १ सोइ सर्वज्ञ गुणी सोइ ज्ञाता । राम चरण जाको मन राता । २ जानि परत हैं काफ पिक, ऋतु वसंत के माहि ॥ उन्मीलित में हेतु की और विशेपर्क में सपय वा अवसर की अपेक्षा है। ८२ गूढोत्तर (The Socrot Reply) १(१) गृहोत्तर कछु भाव तें, उत्तर दीने होत.। हों मैं दशनन मध्य ज्यों, जीभ विचारी होत ।। इसमें कहीं प्रश्न पूछने पर उत्तर होता है और, कहीं प्रश्न मान लिया जाता है और उत्तर होता है यथा- 4 १ . -
-
हिन्दी-काव्यालझार।
१ मुनहु पवनसुत रहनि हमारी जिमि दशनन गहुँ जीभ विचारी
२.कह दशकट कवन ते बदर । मैं रघुवीर दूत दशरुधर ।।
चित्रोत्तर
(Thic Skilful Reply
१(२) चित्र प्रश्न उत्तर दुहू, एकहि पट में होय ।
को है जारत अगिन पिनु, कोरे नेह न होय ।
मन-विना अग्नि कौन जलाता है, उत्तर कोह-शोध ।
मन्न-स्नेह विहीन पुरुष को क्या कहते हैं, उत्तर कांग।
प्रश्न-का वर्षा जव कृपी मुखाने का-या, काया ।
प्रश्न-तात कहां पाती आई, उत्तरम्नान कराने मात के पास से
(३) के अनेकही प्रश्न को, एकहि उत्तर धार ।
वारि वताय विहारि मृग, सर न नली नार।।
प्रश्न-जल बताओ, मृग की शिकार करो, उचर सर नहीं।
पथी प्यासा जाय, गददा मो उदास गों।
उत्तर दीन ताप, एक वचन 'लोग नहीं।
शब्दालंकार में नो मोतिका है। शन्दांती :
प्रहालका अनिर्गत ये चिनगर शहार फे सन्नर्गन नागना
पाहिये, यथा-
१ पानी में निमि दिन रहे, जाकेदारन माम।
काप फर नम्बार फो, फिर पानी याममा पारोगा
२ शीश महा पापी गई, मन चमन नन मा।
योगी नमन, पारन नादि।
३ पानी पानी नर मार्ग भार!
नई सनाई पानुगनिजाग 171
อนวะงงง
[ ८६ ]
हिन्दी-काव्यालकार।
'४ मिर पर साहै गंग जल, मुडमाल गल माहि ।
पाइन वाको उपभ है, शिव कहिये की नाहिं ॥ (रहट)
('The Subtle)
सूछम पर आशय लखे, करै क्रिया कछु भाय ।
मैं देख्यों उन शीश मणि, केशन लियो छिपाय ॥
सूक्ष्म-इशारा देखकर कुछ क्रिया के इशारे से ही उनर देना
शीश फूल काले बालों में छिपाने से इशारा निकला
कि अभी चादनी है अँधेरे में मिलेंगे, यथा-
१ सुनि केवट के बैन, प्रेम लपेटे अटपटे ।
विहंसे करुणा ऐन, चितै जानकी लग्दन तन ।।
२ सीतहिं सभय देखि रघुराई । कहा अनुज सन सैन वुझाई ॥
८४ पिहित
( The Covering)
पिहित छिपी पर बात को जानि दिखा भाय ।
प्रातहिं आये सेज पिय, हति दावत तिय पाय।।
पिहित आच्छादित, छिपा हुआ व छिपी हुई, यथा-
१ मती कपट जाना सुरस्वामी।
२ जोरि पाणि प्रभु कीन प्रणामू । पिता समेत लीन्ह निज नाम्।।
८५ व्याजोक्ति
( The Dissenbler )
व्याज उक्ति कछु और विधि, कहे दुरै आकार ।
सखि सुक काटेअधर ये, दंतनि जानि अनार ।। यथा-"
हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
[८]"
१ नाम मताप भानु अवनीसा । तासु दूत में सुनहु मुनीसा ।।
२ बहुरि गौरि कर ध्यान करे। भूप किशोर देखि किन लेह ।।
छकापहनुति में निषेध से छिपाना है, व्याजोक्ति में गुप्त भेट
प्रगट होजाने पर किसी बहाने से उमको रिना निर डिपाना है।
८६ गूढोक्ति
(The Stirers)
गृहोक्ती मिस और के, करें और सों बात ।
काल सखी से जाउंगी. शिव पूजन परभात ॥ यथा-
पुनि पाउन यहि विरिया कानी।
अस कहि मन विहसी इक आली॥
इस अलंकार में रहने वाले का तात्पर्य किमी दूसरे।
मुनने गले से होता है जिससे बात कही जाती है उसमे नही है
मस्तनागर में कहने नाले का मुग्य तात्पर्य उसमे होता है
निराकति पात कही जाय।
८७ विवृत्तोक्ति
वितोकि है ऐन. लेप लिपी परगट किये।
कहत जनाये मन, वृष भागा पर मेन में।
पिन-जपान मा अक्रि ययन, गोवा मागयया
मा
भने योग दिया, गगा--
१गि निमनदिर, माभियमान
गुदिन गुमान नट नर, गर॥
•niममा मा, करिय मानि AR
लोहगानि सनि, म १ ॥
wh । - धनु बान॥ [८८] हिन्दी-कामालकार। ८८ युक्ति (Civcrt Sjxeech ) युक्ति यहै कीन्हे क्रिया, मर्म छिपायो जाय । पीय चलत आंसू चले, पोंछत नैन ज॑भाय ॥ युक्ति-चतुगई, हिकमत, यथा- : बहुरि वदन विधु अचल ढांकी। पियतन चितै भौंह करि बाकी खजन मंजु तिरीछे नयननि । निज पिय कहेउ तिनाहि सिय सैननि। २ लिखत रही पिय चित्र तह, आवत लखि सखि आन | चतुर तिया तिहि कर लिखे, फूलन के ३ वेद नाम कहि अँगुरिन खड अकास । पठ्यो सूपनखाहिं लखन के पास ।। वेद-श्रुति, कान | अकास-नाक । ८६ लोकोक्ति (Popular Say ng) लोक उक्ति कह नूति जम, तस प्रसंग के ठांव। राजा करे सो न्याय है, पांसा परै सो दांव ॥ यथा- १चली सग्वी उत जाइये, जहा बसै ब्रजराज । गोरस वेचत हरि मिलें, एक पथ दो काज ॥ २ कप प्रधान विश्व कार राखा जो जस कर सोतस फल चावा? ३. महादेव अवगुण भवन, विष्णु सकल गुणधाम । जिहि कर मन रम जाहि सन, ताहि ताहि सन काम ।। ४ देव कहा हम तुमहिं गुमाई । ईधन पात कि गत मिताई ॥ .
Remeteen
हिन्दी-काव्यालङ्कार।
[८९]
५ आरत कहहिं विचारन काऊ । मूम जुवारिहि आपन दाऊ।।
६ च्या मरहु जनि गाल बजाई ! मन मादक नहि भूव बुताई।।
७ सिय रघुवीर कि कानन योगा कर्म प्रधान सत्य कह लोग।
८ भा विधना भतिकल जौ, तर ऊट चढ़े पर कृफर फाटत ।
- अमंग वर्णन के साथही लोकोनि घटित करने से लोकोनि
अलकार होता है, केवल लोकोग्नि, अलंकार नहीं।
९० छेकोक्ति
(The Skiful Speech)
चेक उक्ति लोकोकि को, साभिप्राय वखान ।
चोरी को गुड़ हे सखी, अति मीठो जिय जान ।।
रोक-चतुर, उक्ति कथन साभिमाय-मनलय के साय, पणा-
१ सत्य सराहि कोड पर देना जानेहु लेइहि मांग पर
२. खगनाने खगही की मापा जाने उमा गुप्त फरि राया
३ जानत एक मुनगही, सखि सुनंग के सोग ।।
९१ वक्रोक्ति
( Tlic Cronard Sjuech)
वक उनि स्वर लेप सौं, अर्थ फेर जय होय ।
गसिक अपूग्य हो पिया, चुरो कहत नहिं कोय॥
वन-टेदा, यथा-
१ मैं गुटपारि नाप बन योग । मस्तिपित नामो र भोग
भरत कि राउर पूा न गी भान मौत रिमादिशा
शालामा जागी। पारादरममा
गानि परी दुई पनी पाल कान दानिश को
.
।
[ ९०]
हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
६२ स्वभावोक्ति
( Description of Nature)
१(१) स्वभावोक्ति तहँ जानिये, जहँ स्वभाव कहि जाय।
फरकत फांदत फिरत फिर, तुव तुरंग रघुराय
१ भोजन करत चपल चित, इत उत अवमर पाय ।
भागि चलत फिल कात मुग्व, दधि ओदन लपटाय।। यथा-
२ कहहु स्वभाव न कुलहिं प्रशसीकालहु टरहिं न रण रघुबंसी।
३ रघुकुल रीति सदा चलि आई। माण जायें वरु बचन न जाई॥
४ सत्य कहहु गिरि भव तनु एहा । इठन छुट छूटे बरु देहा ।।
५ सीस मुकुट कटि काछनी, कर मुरली उर माल ।
यह वानिक मो मन वसौ, सदा बिहारी लाल ॥
(२) उक्तिप्रतिज्ञा बंध जहँ, भेद दूसरो आय ।
अवसि इंद्रजित हतहुँ बरु, शेत शंकरहुँ सहायायथा
१ नोरहुँ छत्रक दंड जिमि, तव प्रताप रघुनाथ ।
जो न करहुँ प्रभु पद शपथ, पुनि न धर्टी धनु हाथ ॥
२ शिव सकल्प कीन यन माटी । यहि तन सती भेंट अब नाही ॥
३ जो शत शंकर करें सहाई । नदपि हौ ग्ण राम दुहाई ।।
६३ भाविक
( Ile V14101 )
भाविक भूत भविष्य को, परतिक कहत बखान ।
ऐसो भयो न होय गो, जेसो यह वलवान ॥
भाविक-भार की रक्षा करने वाला, यथा--
RENEREDEDORERETE.
DEDELE
दिमी-काव्यालद्वार । [९१ ] १ मया न अहइन अर हुनिहारा । भूप भरत जस पिता तुम्हारा ।। (भून प्रत्यक्ष) २ जहँ मुनियन सग वाम करि, चरित कीन अभिगम। चित्रकूट में जानिये, अबहू राजत राम ।। (भूतमत्यक्ष) ३ जिन चलाइये चलन की, चाचा श्याम मुनान । मैं देखति ही वाहि यह, वात सुनत विन माना। (भानीपलक्ष) ६४ उदात्त (The Exnited) उदात्त महिमा कथन, जहें उपलच्छित अन्य। राधा कृष्ण विहार थल, बंसी वट बट धन्य ।। उदात्त श्रेष्ठ, उसमें महिमा और संपति की भठना भन्प को उपलधित करके कही जाती है, पया--- १ जोसंपदा नीच गृह मोटामो विलोकि मुम्नायफ मोहा। २ जेहि तिरहुन तिहि समय निहारी । निहिरा लाग सुनन? देश घारी।। ३ गो पद रटावन जहां, रच्यो गम नंदलाल । मुरली मधुर यजाय फे, मोही मर प्रकार || ६५ अत्युक्ति (Exertion) अति उत्की अतिशय कथन. दान मुजम यन कपा खारफ नेरे दान त. भये का ना भर॥ जल-मानी पदार माना Eent- Minान दान गर शामिन पास सामान टेलिsी, PRE [ ९२] हिन्दी-काव्यालङ्कार । ३ जासु त्रास डर कह डर होई। ४ भूपण भार सॅभारि है, क्यों वह तन सुकुमार । मधे पांय न धरि सकत, महि शोभा के भार || । ५ श्याम गौर किमि कहाँ वखानी । गिग अनयन नयन विनु बानी।।* ६ देव देवि तव,बालक दोऊ । अव न अांख तर आवत कोऊ ७ राम न सकहिं नाम गुण गाई । ६६ निरुक्ति हे वश हुए (Exposition) निरुक्ति नाम के योग तें, अर्थ प्रकल्पन आन । ऊधव कुब्जा बस भये, निर्गुण वहै निदान । निर+उक्तिम्चचन को जोड देना। उधर जो कुबजा के वे निश्चय ही-निर्गुण है यहां निर्गुण का अर्थ सत रज तम रहित नहीं वरन अज्ञान हुआ, यथा- ५ नाम उदार प्रताप दिनेशा। (यहां भानु प्रताप को प्रताप दिनेशा कहा) २ कनक कलित अहिवेलि वनाई । लखि नहिं पर सपने मुहाई (यहा नागवलि को आहिबलि कहा) ३ दोप भरे इमि चरित तुव, तब दोपा कर नाम । (दीपा कर दोप का आकर और रात्रि करनहारा चंद्र ४ था विरस बातें करति, लेति न हरि को नाम । यह न आचग्ज है कछु, रसना तेरो नाम ।। ५ छीनी छवि मृग मीन की, कही कहा की रीति । नामहिं में नहिं नीति का, फरै नयन ये नीति ।। * उभयालकार देखो कायलिंग। . 173A८ -
723243
हिन्दी-काव्यालवार । [ ९३]
६७ प्रतिषेध
( Prohibition)
सो प्रतिषेध प्रसिद्ध जो, अर्थ निषेध्यो जाय।
मोहन कर मुरली नहीं, है कछु बड़ी वलाय ॥
प्रतिपध-रोकना, मना करना, यथा-
१ निपटहिं द्विज करि जानेसि मोही । मै जस विम मुनावी तोही।।
२ कालनेम सम में नहीं, मुनहुँ वीर हनुमान |
३ सिय कंकण को छोरियो, धनुप बोरिवो नाहिं।
६८ विधि
(Fitness)
अधिकाहियत हे सिद्धि जव, अर्थ साधिये फेर।
किल है कोकिल जवे, तु में करिहै टेर ॥ यथा-
१ विश्व भरण पोपण फर जोई। तार नाम भात थम रो।
२ जाके सुमिरन तें रिपु नासा । नाम शान वेट AFTH INS
३ मुग्ली मुरली होति , मोहन के मुख मागि।
४ दीन दयाळ इमारो रो दुस नो गुन दीनानान गरा।
निरकि में मन माना सर्यान्यन या मान पिपि,
गिद्धार्थदी पुन' ही कहा जाता है।
६६ हेतु
(Crur)
हेतु अलंत दोष रिधि. कारोबारत सग।
उदित भयो शशि मानिनी.मान मान गेभंग !!
.
।।
[९४ . हिन्दी काव्यालङ्कर।
१ अरुण उदय अवलोकहु ताता । पकज कोक लोक सुखदाता?
२ रघुकुल कमल सुजन सुखदाता।आये कुशल देव मुनि त्राता।।
३ राम सरूप निहारतही, उर मोद बदयो मिथिलेश लली के।
(२) कारण कारज ये जवै, लहत एकता पाय ।
मेरे वृद्धि समृद्धि है, तुव दाया रघुराय ॥ यथा-
१ करि राख्यो निर धार यह, में लखि नारी ज्ञान ।
वही वैध औषधि वहै, वही जु रोग निदान ।
२ सिया राम मय सब जग जानी। करी प्रणाम जोरि जुग पानी?
३ परम पदारथ चारिहूं, श्री राधा गोविंद ।
४ कोऊ कोरिक संग्रही, कोऊ लाख हजार ।
मो सम्पति यदुपति सदा, विपति विदारनहार ।।
१०० प्रमाण
(The Just)
कहिये वचन प्रमाण अब, वेद शास्त्र युत होय ।
सत्य वचन सब ते भलो, बुरो कहत नहि कोय ॥
इसके ८ भेद है
आठ भेद प्रत्यंच पुनि, अनुमानस उपमान ।
शब्द अर्थीपतिऽनुर्पलवधि, संभव ऐतिहं जाना।
१ मत्यक्ष
मन अरु इंद्रिय विपय जो, सो प्रत्यक्ष बखान ।
ज्ञान हीन कुलहीन जऊ, पूजत सब. धनवान ।।
१ तान जनकतनया यह सोई । धनुप यज्ञ जिहि कारण होई ।
१ समामोक्ति में भी दलो-भयानकार शिप में
बाग्मयालकार।
เvarieษร้ายจะงราะจะลงาน
हिन्दी-कान्यालार। [९]
२ अनुमान
कारण लखि अनुमान ते, कारज लीजे जान ।
धवां देखि सब कोउ करत, आगी को अनुमान ॥
१ नाचि अचानक ही उठे, विन पावस बन मोर ।
जानाति डॉ नंदित करी, यह दिशि नंद किशोर ।।
।। २ मिन लुग्वरी मारी नहीं, कहा मारिई शेर ।
३ उपमान
उपमा की समता लखे, उपमे जानो जाय ।
सागर सो गम्भीर जो, सो समर्थ रघुराय ।।
शान लोक को वचन जो, साई शब्द प्रमान ।
धर्म विना नहिं मुखल है, गुरु विन लहे न ज्ञान ।।
मर मम सरदार मचा कहर टद।
और हठीली नारि भरे पुरुप निलदह ।।
आत्मग मो मरि नाग हाथ ले मदिरा पाये।
पृन नहीं परि नाग दुएल में दाग लगा ।
निपार गनायर नीद पदापर मध्ये।
मनार कर रिम मुनी इनफ मर न गये ।।
५पापम
अर्धापति में को, जोग च्य जान।
हम वरती ना तुमने, नो यस्तो सहु कॉन ।।
पदमीमपातदिन।
1
[९६ ] हिन्दी काव्यालङ्कार ।
६ अनुपलब्धि
जानि परै नहिं वस्तु कछु, अनुपलब्धि सो मान ।
राम तियहुं रावण हरी, है अदृष्ट बलवान ॥
अन-नही, उपलब्धि-माप्ति ।
७ संभव
जह संभव है वस्तु को, संभव सोइ कहाय ।
चार जने मिलि गहि सबै, मेसहिं देत हिलाय ।।
संभव में किसी वस्तु का हो सकना माना जाता
संभावना में शर्त रहती है कि ऐसा हो तो ऐसा हो सकता है।
८ ऐतिह्य
ऐतिह कथा पुराण जो, ताही केर बखान ।
बलि द्वारे ठाढ़े अजहुँ, श्रीहरि ज्यों दरबान ॥
ऐतिह्य-ऐतिहासिक।
।
-
1
3.
รษะระ
हिन्दी-काव्यालद्वार।
[९७
~
उभयालंकार
भूपण इकतें अधिक जह, सो उभयालंकार ।
संसृष्टिरु संकर तहां, उभय भेद निरवार ॥
संसृष्टि
शब्दालकार-गब्दालसार
जुदे जुदे भाले सकल, अपनी अपनी ठाम ।
तिल तंहुल की रीति सौ, है संसृष्टि सुनाम ॥ यथा-
फरकी करकी यर चुरी, धूर मरित देह ।
फत मुरकन परसी परन, मुन्न सो मनी सनेह ।।
यहा यमक और छकानुनासती मटि
अर्यालंकार+मर्यालंकार
लमे, संजन है मनु
अधर नासिका विन्य शुक, मधुर सुधा से येन ॥
उपमा, उत्सेक्षा भार ययास अशादी।
गन्दालंकारागार
टग से हग हैं यादि के मुख मो मृपा पाहि ।
कर में कर काटिली की. उपमा उपजे पा॥
पहा दशानुमागा।
शशि सौ उज्ज्वन मुग्व
Enine
[९६ ]
हिन्दी काव्यालङ्कार।
६ अनुपलब्धि
जानि परै नहिं वस्तु कछु, अनुपलब्धि सो मान
राम तियहुं रावण हरी, है अदृष्ट वलवान
अन-नही, उपलब्धि प्राप्ति ।
७ संभव
जहें संभव है वस्तु को, संभव सोइ कहाय ।
चार जने मिलि गहि सबै, मेरुहिं देत हिलाय
संभव में किसी वस्तु का हो सकना माना जाता
संभावना में शर्त रहती है कि ऐसा होवे नो ऐसा हो सकता
८ ऐतिह्य
ऐतिह कथा पुराण जो,
ताही केर बखान ।'
बलि द्वारे ठाढ़े अजहुँ, श्रीहरि ज्यों दरवान
ऐतिय ऐतिहासिक।
A
Mr.
PRITATEREn
हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
[९७ ]
उभयालंकार
.
भूपण इकतें अधिक जह, सो उभयालंकार ।
संसृष्टिरु संकर तहां, उभय भेद निरधार ॥
संसृष्टि
शब्दालकार शब्दालकार
जुटे जुदे भाते सकल, अपनी अपनी टाम ।
तिल तंडुल की रीति लो, हे संसृष्टि सुनाम ॥ यथा-
करकी फरकी घर चुरी, धृर धूसरित देद ।
फत मरकत परसी परत, मुच मामी सनेह ।।
यहा यमक और कानुनासस ससटि:
अर्याल कार+मर्यालकार
शशि सों उज्ज्वन मुग्व लसे, संजन है मनु नेन
जधर नासिका विन्ध शुक. मधुर सुधा से येन ।।
उपमा, उत्सेक्षा और यथामरय भकासपीगी।
गन्दालंकारागार
इंग से दृग हे याहि के.
मुख
मो माया
कर से फर काटिनी कटी. उपमा उपजे पारी ॥
पहानुभाग are insti
1
ยะลา,ะร
Res
ar
[१०] हिन्दी-काव्यालङ्कार।
दोष कोष...
अलंकारों के मुख्यर दोप लिखे जाते हैं-यथासंभर उनसे
बचना चाहिये।
(शब्दालंकार के दोष)
१ प्रसिद्धाभाव
अपमान कह वात जो, अनुप्रास के हेत ।
दोष प्रसिद्ध अभाव तिहि, भाषे सुमिति निकेत॥यथा-
दरिजात दारिद दिनेस ननया के कहे,
कहत कलिंदी के कन्हैया होत देर विन ॥
२ वैफल्य
चमत्कार तो है नहीं, शब्दाडंवर मात्र ।
सो वैफल्य बखानिये, सुनि राखो सब छात्रा यथान
फा बलमा बलमा वलग, बलमा वलमा बलमा बलमा है ।
३ वृत्तिविरोध
वृत्ति रचे प्रतिकूल जे, नियमनि को नहिं सोध।
रत में अनरस सम तिही, जानिय वृत्ति विरोध ॥यथा-
उपटीकी टीफी प्रभाटीकी बयुटीकी नाभिटीकी धूर्जटी की
श्री कुटीकी सपुटीकी है।
यह शृगार रस है इसमें कठोर वर्ण नहीं चाहिये उन्ही
का यहां बाहुल्य है।
८ene
&mener
No text on this page.
Marairenstar
[१०] हिन्दी काव्यालङ्कार ।
दोप कोष
।
अलंकारों के मुख्यर टोप लिखे जाते हैं-यथासंभव उनसे
बचना चाहिये।
(शब्दालंकार के दोष)
१ प्रसिद्धाभाव
अपमान कह वात जो, अनुप्रास के हेत ।
दोष प्रसिद्ध अभाव तिहि, भायें सुमिति निकेतायथा-
दरि जात दारिद दिनेस तनया के कहे,
कहत कलिंदी के कन्हैया होत देर चिन ।।
२ वैफल्य
चमत्कार तो है नहीं, शब्दाडंबर मात्र ।
सो वेफल्य बखानिये, सुनि राखो सब छात्र। यथा-
का बलमा बलमा वलग, बलमा वनमा बलमा बलमा है।
३ वृत्तिविरोध
वृत्ति रचे प्रतिकूल जे, नियमनि को नहिं सोध।
रस में अनरस समतिही, जानिय वृत्ति विरोध ॥यथा-
उपटीकी टीकी प्रभाटीकी बधुटीकी नाभिटीकी धूर्जटी के
श्री कुटीकी सपुटीकी है।
यह शृंगार रस है इसमें कठोर वर्ण नहीं चाहिये उन्हें
का यहां बाहुल्य है।
tระะะะะะะ
SIR
हिन्दी काव्यारवार।
[१०१ ]
४ अप्रयुक्त
यमक होय इक चरण में, दो में वा पुनि चार ।
अप्रयुक्त हे तीन मे, धरिये ताहि विचार ॥ यथा-
तोपर गारों उर पसी, सुन
गपिके
सुजान।
तू मोहन के उर बसी, है उसी ममान ॥
(अथीलंकार के दोप)
१ न्यूनता
उपमेय से उपमान की (जानिगत)
चतुर मखिन के मृदु वचन, बासरजाय विताय ।
पे निशि मे चंडाल लो मारत यह शशि जाय ।
यहा चद्रमा की तुलना चाडाल से दी है यही जातिगत
न्यूनता है।
उपमेय मे उपमान की (प्रमाणगन)
सोहत अनल पतंग सम. यह रवि रथ नभ थान ।
पहा विग्य की उपमा अग्नि की चिनगारी से है जो अत्यन्त
जी है-यही ममागगन न्यूनता है।
उपमेय मे उपमान की (धर्मगन)
पण अजिन पट ललत मुनि, शुचि माजीयुन गान
नील मेघ के निकट जिमि, नभ दिन मणि पिलसान।
म दौर में जिस प्रकार मुनि उपमेय के माग फाग
PM मा पनि माजी का वर्णन रिया सगी ER
[१०२] हिन्दी-काव्यालङ्कार ।।
सूर्य उपमान के साथ केवल नीलमेघ धर्म का वर्णन किया है
मौंजी के समान दूसरा धर्म विद्युल्लता और कहना था सो नहीं
कहा श्रतएव उपमान के धर्म की न्यूनता है ।
२ अधिकता
उपमेय से उपमान की (जातिगत)
कमलासन आसीन यह, चक्रवाक विलसाहि।
चतुरानन जुग आदि में, प्रजा रचनजिमि आहि
यहां चक्रवाक उपमेय का ब्रह्मारूप उपमान देवजाति के
होने से जातिगत अधिकता है ।
उपमेय से उपमान की (प्रमाणगत)
दशनन वाके दिख परत, बज शिला अनुहार
यहां दांत उपमेय की समता वशिला से की गई यही
भयाणगत अधिकता है।
उपपेय से उपमान की (धर्मगत)
लसत पीत पट चाप कर, मनहर बपु घनश्याम।
तड़ित इंद्र धनु शशि सहित, ज्यों निशि में घनश्यामा
यहाँ उपपेय श्रीकृष्ण का शंख धारण नहीं कहा गया
उपमान नीलमेघ को रात्रि में बिजली इन्द्र धनुष तथा चंद्रमा
सहित कथन किया यही धर्मगत अधिकता है।
३ व ४ उपमेय और उपमान के लिंग
और वचन में भेद
कहे जायें कहु कोन विधि, या नृप के गुन कूल ।
मधुरे वच हे दाख लों, चरित चांदनी तूल ॥
BADHAING:
Bherune
हिन्दी काव्यालकार।
[१०३
उपमेय वचन पुलिंग और बहुपचन, उपमान दाख)
वीलिंग और एकवचन, तथा चरित पुद्धिग बहुवचन, चादनी
स्त्रीलिंग एकवचन, यही लिंग और वचन का दोग।
५ कालभेद
रण में इमि शोभित भये, रामवाण चहुं ओर ।
जिमि निदाघ मध्याह मे, नभ रविकर खर घोर ।।
शोभित भये-भूतकाल, निमि सूर्य फिर, मध्यान में
होती है वर्तमान काल, अतएर अनुचित कालभेद ।
६ पुरुषभेद
राजत हो प्यारी ! रुचिर, पट कुसुंभ तन धारि ।
लाल सुवाल प्रवाल तरु, प्रभवलता अनुहारि ॥
उपमेय पारी (मध्यमपुरुष) उपमानस्ना (अन्य पुरष
यही दोष है।
७ विधिभेद
नृप ! तर कीरति मम सदा, दिनकर फर प्रकार।
मग सही मागमान कोलिपान माना
रीनिधिमंद।
MetaIANS
[१०४] हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
meene
८ अप्रसिद्ध
काव्य चन्द्र रचना करत, अर्थ किरण जुत चारु ।
काव्य को चन्द्र और अर्थ को किरण कहना अप्रसिद्ध
दोष है।
९ असंभव
धनु मंडल तो परतु है, दीपत शर खर धार ।
जिमि रवि के परवेश तें, परत ज्वलित जल धार ॥
यहां धनुप से छूटे हुए दीप्त वाणी को सूर्य मंडल से
हगिरती हुई ज्वलित जलधाराओं की उपमा दी जाने से असंभव है
दोष है क्योंकि मूर्य मंडल से जलती हुई जलधाराओं का पतन
असभव है।
AHAJAGAV
1
BAR
งบ นาง
rala
हिन्दी काव्यालकार। [१५]8
न्याय
काव्य शास्त्र के चोध में, परत न्याय को काम ।
सोधि भानु परगट कियो, लोक उक्ति अभिराम ॥
1 अजापुत्र
जोर चले नहिं सवल सो. अवलहि टीजे त्रास ।
अजापुत्र सो न्याय है, घरणन बुद्धि उजाम ॥ यथा-
(१) 'जा पुर्व रलिं दद्यात्' । इमे यो पदी अना पुनः
न्याय, ऐमेही मघु व्यजनान में सर्वर जानी।
(२) पल सों मन चेतो . कोउ न आइन पाय ।
न्याय सबल परतन्छ, गना की मां न्याय ||
(इमफा सरल न्याय भी कहते
२ अरण्य गदन
जाकी जवे गुहार, रहत यहुत में अनसुनी।
हो उद्योग असार, है अग्गय रोदन स्वई । यथा-
को नगारखाने गुने तूनी सी भागाग।
३ अरुन्धती
सूक्ष्म वस्तु वोधार्थ जहॅ. कमते थूल यतात ।
गुरुजन ताही कहत हैं. न्याय भन्धनि ताताया-
बाम निरूपगार्थ प्रपम देन मार कार पाना मान
सलों कागार मदुपात और मानि मार पोर हो
मनला मुनम पान की मानिक
२८
,
[ १०६ ] हिन्दी-काव्यालङ्कार।
४ अंधकवर्तिकीय
अंधक वर्तक वस्तु जह, अकस्मात मिलि जाय ।
अंधे हाथ वटेर ज्यों, लागी हिय हरपाय ॥
५ अंधगज
जह निज निज अनुमान, वस्तु अदेखी वरणिये।
बरणत सर्व सुजान, अंध गजहि सो न्याय है यथा-
अगों ने हाथी का जो जो अग टटोला हाथी का रूप
--
वैमाही बताया।
६ अंधादर्पण
मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलें विरंचि सम।
बरणत बुद्धि निकेत, अंधा दर्पण न्याय स्वइ ॥
इसी को ऊपरष्टि न्याय कहते है।
७ अंध परम्परा
चाल पुरानी पर चले, मर्म न जाने कोय ।
सोई अंध परम्परा, भाषत हैं कवि लोय ॥
मू०-यदि मर्म जाने तो अधपरम्परा नहीं।
८ कदलीफल
सूधी बातन तें जहां, कारज निकसे नाहि ।
कदली फल सो न्याय है, नीच निसानी आहि ॥
८८५
७८en
हिन्दी-काव्यालङ्कार। [१०५ ]
है काकतालीय
होनी माही निमित कछु, अकस्मात लगि जाय ।
न्याय काकतालीय त्यहि, वरणत कवि समुदाय ।।
ताह क्ष के नीचे से उड़ते हुए कौए पर अकस्मात् तार
फल का टूट गिरना और उममे कौए की मृत्यु होना जसे वह
पुरुप मस्नेही को था अकस्मात फिसी का धका लगने से
निष्माण हो गया।
१० कूपमण्डूक
घर तजि बाहर की खबर, जाहि न रहत कछुक
अल्प ज्ञान के कारणे, न्याय कूप मण्डक ॥
११ कूमांग
जाको जो विस्तार है, ताही माहिं समाय ।
नष्ट नहीं अदृष्ट स्वई, कूम्मांग है न्याय ॥
'१२ कैमुतिक
सिह हन्यो निज वाहु वल, कहा स्यार की बात
जहां होत कह नूति अस, सो कमुतिक कहात ॥
जादि सकन दनि म्याग ती, फहा सिंह की पान ।
नदांडोत फाडनूनि अस, बउ फैमुगिफ कहान ।।
१३ कोण्डिन्य
नीको है यदि होत यह. औरह नीको होत ।
सो कौण्डिन्य न्याय है, वणन सरि कवि गोन।
[ १०६ ] हिन्दी-काव्यालङ्कार।
४ अंधकवर्तिकीय
अंधक वर्तक वस्तु जह, अकस्मात मिलि जाय ।
अंधे हांथ वटेर ज्यों, लागी हिय हरपाय ॥
५ अंधगज
जहें निज निज अनुमान, वस्तु अदेखी बरेणिये।
वरणत सवै सुजान, अंध गजहि सोन्याय है ।यथा-
अंगों ने हाथी का जो जो अग टटोला हाथी का रूप)
वैमाही बताया।
६ अंधादर्पण
मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलैं विरंचि सम।
बरणत बुद्धि निकेत, अंधा दर्पण न्याय स्वइ.।।
इसी को ऊपरदृष्टि न्याय कहते है।
७ अंध परम्परा
चाल पुरानी पर चले, मर्म न जाने कोय ।
सोई अध परम्परा, भाषत हैं कवि लोय ॥
सू०-यदि मर्म जाने तो अधपरम्परा नहीं।
'८ केदलीफलं
सूधी बातन तें जहां, कारज निकसे नाहि ।
कदली फल सो न्याय है, नीच निसानी आहि ॥
"८८८८८
।
हिन्दी-काव्यारा
[1]
है काकतालीय
होनी माही निमित
कछु, अकस्मात लगि जाय ।
न्याय काकतालीय त्यहि, वरणत कवि समुदाय ॥
ताद वृक्ष के नीचे से उड़ते हुए कौए पर अकस्मात् नाद
फल का हट गिरना और उममे फॉग की मृत्यु होना जमे
पुल्प मानेही को था अकस्मात मिसी फा पा लगने से
निप्माण हो गया।
१० कूपमण्डक
घर तजि बाहर की सबर, जाहि न रहन कक्ष ।
अल्प ज्ञान के कारणे, न्याय कूप माइक ॥
११ कुम्मांग
जाको जो विस्तार है, ताही माहि ममाय ।
नष्ट नहीं अदृष्ट स्वई, कृम्मांग है न्याय ॥
'१२ कैमुतिक
हसिंह हन्यो निज बाहु यल, कहा त्यार की यान ।
जहां होत कह नृति अस, मो फेमुनिक फहान ॥
जातिमान गिरना, दिदीक्षा।
नहारोन पाहि भग, मदml
१३ कादिन्य
नी है यदि शोर या air नील
सोमाण्डिन्य गाय.परगमममिति in
,
นอง ระ:ษ
[१०८] हिन्दी-काव्यालङ्कार।
१४ गड्डरिका प्रवाह
एक चले सव चलि परत, नहिं कछु ठीक ठिकान
सो गडरी प्रवाह जिहि, कहियत भेड़ धसान।
१५ गणपति
जह थोड़ीसी युक्ति सों, साधत कार्य महान ।
सोई गणपति न्याय है, बरणत बुद्धि निदान ॥
जैसे गणपतिजी पृथ्वी में राम नाम लिसकर उसकी
प्रदक्षिणा करके प्रथम पूजनीय हुए।
१६ घटप्रदीप
चहै भलाई आपनी, कबहुं न पर उपकार ।
घट प्रदीप सो न्याय है, बरणत बुद्धि उदार ॥
१७ घुणाक्षर
कछु करत कछु योग सों, चित्र कछ् वनि जाय ।
सोई कवि जन के मते, होत घुणाक्षर न्याय ॥
१८ चंद्र
चंद्रिका
जाको गुण जब जाहि सों, कबहुं जुदो नहिं होय ।
भली भांति लखि लीजिये, चंद्र चंद्रिका सोय ॥
इसको दिन-दिन पति न्याय भी कहते है
१६ जल तरंग
जव जाही को रूप कछु, विलग न तासों होय ।
शब्द मात्र की भिन्नता, जल तरग है सोय ॥
1CAMPUR
देहरी दीपक न्याय पर घर जाति रिवार ।
गम नाम मणिदीप धरू. जीरा ॥
आधी सागर, साधी भागीर
मो नमाया पानी
SUNACAD
&
हिन्दी-काव्यारधार ।
[१०९ ]
२० जल तुम्बिका
केतो गोपन कीजिये, तऊ प्रगट हो जाय ।
सोइ न्याय जल तुंबिका, कहन सकल कविराय ।।
२१ तिल तण्डुल
मिले परस्पर ह जहां, वस्तू जुदी लखाय ।
निल तण्डुल सों न्याय है, वरणत बुद्धि निकाय ॥
२२ दंड चक्र
जहां एक बिन एक को, सरत नाहि जब काज ।
टंड चक है न्याय तहे. भापत कति सिरताज॥
२३ दंडपृपिका
नष्ट भये अवलंब के. अवलंधित को नाना
कुत्ता लाटी ले गयो, बॅधी पुरी कर आस ।।
(72ठी, पूपिका-दुर्ग)
२४ देहलीदीपक
२५ नृसिर
enceuter
[ ११०]
हिन्दी-काव्यालद्वार।
२६ पिष्टपेषण
सिद्ध वस्तु की सिद्धि को, वृथा जतन जहँ ठान ।
कहत पिष्ट पेपणत्यही, कवि जन बुद्धि निदान ॥
२७ पंग्वन्ध (पंगु अंध)
जहां निवल द्वै करत हैं, इक
की
एक सहाय।
बुध जन ताही कहत हैं, अन्धा पंगू न्याय ॥
इसे दनक न्याय भी कहते हैं।
२८ बीजांकुर
दो मे पहिलो कोन है, ठीक न जानो जाय ।
इक को कारण एक जहें, सो वीजांकुर न्याय॥
२६ मण्डूकप्लुति
विषय चलत औरै कछू, औरै कछु वतरात ।
मण्डूकप्लुति न्याय सो, कहत सुमति अवदात॥
३० यक्ष वृक्ष
देखी है नहिं काहुने, सुनी एक ते एक ।
यक्ष वृक्ष सो न्याय है, भापत कवि सविवेक ।
जैसे-भाई इस वृक्ष में एक प्रेत है, प्रश्न क्या तुमने
उत्तर देखा तो नहीं हमारे काका कहते थे काका से
तो उन्होंने कहा हमारे बाबा कहते थे, ऐसेही और
-
४.८1८.42CALL
हिन्दी-काव्याला
[११]
।
३१ रात्रिदिवस
जब यह है तो वह नहीं, जहां होत निरधार ।
रात्रि दिवस सो न्याय है, भापत सुकवि विचार ।।
३२ वृद्ध कुमारी वाक्य
जह थोरीसी बात में, मांग लेत
बहु
दान।
वृद्ध कुमारी वाक्य त्यहि, चरणत सबै सुजान ।।
एक प्राची तपस्विनी पद कुपारी पर देव मगन एप
फदा, पकही घरदान मांगो हदा ने कहा काल इतनाही मागती
कि अपने नानो के पता को मोने के टाठी (पाल)
खाते हुए देम् ।
३३ सुन्दोपमुन्दन
प्रयन रिपुन को परस्पर, होन जहां पर नाम ।
मुन्द उपसुन्दन न्याय नहै. यात कपि सहलाम।
३४ मृची फटाह
अल्प अधिक को पूव्ही, जो निपटायो जाय ।
मुनि कटा न्याय ना, भापन कृषि समुदाय ।
भी Trii. भो
परिभ भार कम 1
२६ पिष्टपेषण
देखा तो नहीं हमारे काका कहते थे काका से पूछा गया
[११०] हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
सिद्ध वस्तु की सिद्धि को, वृथा जतन जहँ ठान ।
कहत पिष्ट पेपणत्यही, कवि जन बुद्धि निदान ॥
२७ पंग्वन्ध (पंगु अंध)
जहां निबल द्वे करत हैं, इक की एक सहाय ।
बुध जन ताही कहत हैं, अन्धा पंगू न्याय ॥
इसे हृदनक्र न्याय भी कहते हैं।
२८ बीजांकुर
दो में पहिलो कौन है, ठीक न जानो जाय ।
इक को कारण एक जहॅ, सो वीजांकुर न्याय॥
२६ मण्डूकप्लुति
विषय चलत औरै कछू, औरै कछु वतरात ।
मण्डूकप्लुति न्याय सो, कहत सुमति अवदात॥
३० यक्ष वृक्ष
देखी है नहि काहुने, सुनी एक तें एक ।
यक्ष वृक्ष सो न्याय है, भापत कवि सविवेक ॥
जैसे-भाई इस वृक्ष में एक प्रेत है, प्रश्न क्या तुमने देखा है ?
उत्तर
ऐतो उन्होंने कहा हमार बावा कहते थे, ऐसेही और भी जानो ।
.
VULNA
---
"
हिन्दी काव्याला!
[११११
३१ रात्रिदिवस
जब यह है तो वह नहीं, जहां होत निग्धार ।
गत्रि दिवस सोन्याय है, भापत सुकवि विचार॥
३२ वृद्ध कुमारी वाक्य
जह थोरीसी बात में, मांग लेत बहु दान ।
वृद्ध, कुमारी वाक्य त्यहि, घरणन संच सुजान ॥
एक थधी तपम्बिनी वृद्ध युपारी पर देर प्रमन गुप,
कहा, कही यरटान पांगो मुद्धा न मानम्म नारी पाती
किशाने नानी के पनी को मोने के टाटी (पास) में
गाते हुए देम् ।
३३ सुन्दोपसुन्दन
प्रयल रिपुन को परस्पर, होन अहां पर नाम ।
सुन्द उपमुन्दन न्याय त. यगत कपि सहुलाम ।।
३४ सूची कटाह
अन्य अधिक के पूर्वही, जो निपटापो जाय।
भूचि कटाह न्याय ना, भाषन कपि ममुशाय
एशोः गई, पगा- मो.
पाद राम निपटाने पाद काम पर
।
A
[ ११२ ] हिन्दी-काव्यालङ्कार ।
३५ स्थालीपुलाक
हांडी में को एक कण, लखत होय अनुमान ।
सोई थाल पुलाक है, भाषत सुमति निधान ॥
३६ क्षीर नीर
और वस्तु जव और में, मिलि तन्मय हो जाय ।
पृथक् करण तिन कर सरस, क्षीर नीर है न्याय ॥
-
इति ---
enternmes
ANA-NCAliad
अथ अलङ्कार दर्पण।
.
शब्दालङ्कार
गुरु पद पद्महिं नाय सिर, मुमिरि शारदा माय !
अलंकार दर्पण सजत, 'भानु' भेट विलगाय ||
लक्षण लक्ष्यहि कहउँ सब, थोरेही संकेत ।
गद्य पथ में अति सुगम, शीघ्र धोध के हत ॥
कहत सुनत समुझत ललित, बुद्धि पदावनहार ।
शोभा कर अति काव्य को, अलंकार सुरिचार ॥
यदपि सुजाति मुलच्छनी, सुवरण सरस लुपित्त ।
भूपण विन न विराजई, कविता यनिता मिन ॥
चेक गृत्ति श्रुति लाट में. व्यंजन ही यो नार ।
त्यानुप्रामहि करिय, पररी पंत पिया।
लिEिATERNETr
र Truttiriramirror
RTINENTrera
RATRAPTerrrrror:
-
[ ११४] अलवार दर्पण । 1, सक्षिप्त लक्षण उदाहरण छेकानुप्रास पफ वा अनेक व्यजनों की दास दुखी मिसरी मुरी श्रावृत्ति पकही यार हो, स्थर मिले वा न मिले। वृत्त्यनुप्रास एक वा अनेक व्यजनों की धर्म धुरीण धीर नय- श्रावृत्ति कई धार हो, स्वर नागर । मिले वा न मिले। त्यनुप्रास ताल कठादि व्यजनों की जयति द्वारिफा धीश, समता हो, स्वर मिले वान जय सतन सतापहर । - मिले। यदा मुरतरी कर्कटे पा - लाटानुप्रास पयावृत्ति में केवल तात्पर्य पीय निकट जाके नहीं, का भेद । घाम चांदनी ताहि । पीय निकट जाके नहीं, घाम चांदनी ताहि॥ प्रत्यानुप्रास तुफात । हरि भजा, सब तजहु। यमक वही शब्द फिर हो परन्तु | भये विदेह विदेह अर्थ दूसरा हो। विसेखी। भाषा समक मिधित मापा । कमाने । अर्थातकार घर्णन के पूर्व उपमाओं के कुछ मेद नीचे लिखते हैं मुख जैसा मुखही है अनन्वय (२) मुखसा चन, चदसा मुख उपमानोपमेय (उपमेयोपमा)(३) मुखमा चन्द्रमा है प्रताप (४) मुखही चप्रमा रूपक (५) क्या यह मुख है पाचनमा ? सदेह (१०) मुख नहीं चद्रमा है अपड्नुति (११) मुख मानो चन्द्रमा है उत्प्रेक्षा (१२) मुसशोभायमानहे चद्रभीतीप्रकाशमान प्रतिधस्तूपमा (१६) , अलमारपण। -- अलङ्कार दर्पण (अर्थालङ्कार) पूणोपना समापमा उपमान, उपमेय, पाचकांगनीजाप नियन धर्म उपरोक में एक दो या बिनुनी (धर्म तीन फम ल्मोपना उपमेय की उपमा पनि में काल में मातोपमा उपमेय अपमान होता 'लना जुमा, । मन गुर धनत्यप Amri उपमा उमी में "दा पी साप क उरमानापमेय पर रूपमा ४.प्रतीप उपमेपलीममा उपनामा का जाप उमपी TRITER र पर समान यदी मिपा देश {}EET Fr - . + T irrrr. 44 32 [ ११६ ] अलवार दर्पण। नाम सक्षिप्त रक्षण उदाहरण ११ शुधापनुनि सची वात विपाई जाय यह मुख नहीं कमल है कैनवापनुति किंसी मिस से वात आप के भेजने के मिस से छिपा गम ने मुझे बडाई दी है हेत्वप नुति किसी हेतु से वात यह तीन है अतएव चन छिपावै नहीं, गत्रि है अतण्व रविनहीं पर्यस्ता एक का धर्म दुसरे मे यह चढ़ का प्रकाश नहीं पह्नुति अारोपण करे मुख चद्र का प्रकाश है। प्रतापनुति सत्य कहने मे पूछनेवाले हे सखी क्या कप ज्वर का का भ्रम दूर हो ताप है नहीं सखी मदन सताता है फापट्नुति युक्ति कर दुसरे से घात अर्द्ध निशा वह प्रायो भौन,, छिपाये मुदरता बरण कवि कौन, निरखत ही मन भयो भनद. क्यों सखि मजनी नासखि चद' १२/ उत्प्रेक्षा जो नहीं है उसे मान श्रवन समीप भये सित केसा, लेना १३ अतिशयोक्ति | फेवल उपमाम ही का कनकलता पर चद्रमा, धेरै मनहु जाठ पन अस उपटेसा या रुपफाश- कथन हो योक्ति धनुष द्वै धान सापानवाति- रुपफातियोक्ति छिपी हो, अहि शशि मडल पै लसे,, शयोक्ति जिय पनाल जिन जान मेवफाति इसकी कुछ बात ही और हसियो बोनिबो, और शयोक्ति 'और है याकी बात संघल्धाति अयोग्य को योग्य ठह- वा पुर के मरि क है, शशि शयोक्ति लौ ऊचे लोग प्रसयथाति- योग्य को अयोग्य ठहराना सो न सकहिं कहि कल्प शयोक्ति चपखाति हेतु सुनतेही कार्य हो निमल कया कर कीन मामा, शयोक्ति 1 शत, सहस शारदा सेम मुनत नसाय मोह मद टमा 08 अलवार । भा नाम H यस्तानि हेतु के पूर्वही यार्यही प्राम उपान्यो भाय हार, पाधि पुनि टेन्यो गान १५ तुल्ययागिता २) वगर्य नगर्य का बाक न पांक मल अपर्य भगय का, नाना, rमरान ना एक धर्म . (२) मा मित्र पर एफ यहीन me समवरार (३) भनेको के गुण गामारनशियन तुर फर एपदी, पना गुणमा ठार फडना दीपक यगर्य अप्रगय का धम गा ग गुस्न माग फोरम १६कारक दीपफ पर में प्रम में प्रमेय मा नाम राशि दीपक पर पी भाति * प्रथ की प्राति पर पर कामा?rerar प्रागि १/पशाजि irg पर प्रता जाना WATrmir T.. में Trim ... . . . -- ENNNNNN [ ११८ ] अलवार दर्पण। उदाहरण मक्षिप्त लक्षण सस्या नाम २१ निदर्शना 1 - २२/व्यतिरेक वात विशेष २३ सहोक्ति २४ विनोक्ति २५ समासोक्ति २६/ परिकर (१) दोनो वास्यो में एक मीठे बचन उदार के सोने अर्थ की-प्रारोपणा माहि सुगध (0) ओरटोर के धर्म को मिय मुख शशि मे नयन पोर ठौर ग्रारोप चकोग (३) अपनी अवस्था से धन्यो ताहि नहिं छाडिये, दूसरों को उपदेश कहत धरणिधर शेष उपमासे उपमेय मे कोई मुख हे अम्बुज सो सखी, मीठी वात विशेष सह शब्दार्थ युक्त मनो- नाक पिनाकहि सग सिधाई हर युक्ति विन शब्द युक्त मनोहर वदन सून कविता विना, युक्ति सदन मुवनिता हीन प्रस्तुत वर्णन से अप्र- मूर समर करनी करहि, कहि स्तुत फुर हो न जनावहि आप विशेषण प्राशय सहित हिम कर वदनी नायिका, हो ताप हाति है जोय विशेप्य श्राशयसहित हो वदन मयक ताप नय मोचन एक वाक्य मे अनेक होय न पूरन नेह बिन, ऐनो अर्थ अप्रस्तुत के वर्णन से गज हम बिन को को, छोर प्रस्तुत का गुण प्रगट हो नी को दोय प्रस्तुन में उपालम्म कहा गया अलि फेनको छाडि सुकोमल जाय (१) व्यग मे रसाल चतुर है जो तुब गरे, विन उक्ति गुन टारी माल (०) मिस करि कार्य लखन हृदय लालमा विमेखी साधन जाय जनकपुर भाइय देवी किमी वहाने किसी की स्वर्ग चटार्य पतित लों, स्तुति निंदा गग कहा कह तोय २७ परिकराकुर २८ लेप प्रगट उदोत २६ अप्रस्तुत प्रशसा ३० प्रस्तुताकुर ३१/ पायोक्ति ३२ व्याअस्तुति
हिन्दी-याव्यालार।
[ ११९]
मत्या
कक्षमा
३३१ मार प्रतिषेध-निषेध दपि कविताम की नारी
দ সাম গান্ধী
२४ निरोधामाम विगंध का प्राभान हो या मुग चा प्रसान, मुधि
मापे मुशि मानी
अविनावना
११) हेतु पिनर याम्यही दिन जाम रोने भाग
अग्ग लामा
(मग तु मेरा काम युसुम मा मारण
पर मुस्न प्रान समान
प्रतियध के दात पिन 31,
भी कार्य प्रग हो। देगानाहानमार
{४) अशाग्या या में माना iTr
कार्य प्रगट हो
कारण में
बार मम
} मन
(E) कार्य में भाग में का
.
froपानि रहो पापनही तो
प्राणपर
गति
orgarmat
Fro Trmire
13.
kܝ
r"
[ १२० ] अलकार दर्पण। नाम मरख्या उदाहरण सक्षिप्त रमण (२)कारण का और रंग ज्यों२ दृडे श्याम रंग, त्यो२ कार्य का प्रोर रग उज्ज्वल होय (३) भला उद्यम करते भले कहत दुख गरेहु लागा बुरा फल हो (४) धुरा उद्यम करते कालकूट फल दीन अमी के भला फल हो (१) यथायोग्य का सग जस दूलह तम बनी बगता (२) कारण के अग नीच सग अचरज कहा, कार्य में दिख पडें लछमी जलजा आहि (३) उद्यम करतेही बिना छुवतहि टूट पिनाक पुगना. विघ्न कार्य हो ४० सम ४. विचित्र इच्छा फलार्थ उलटा नमत उच्चता लहन को, जेहे प्रयत्न पुरप सचेत ४२ अधिक ४३ अल्प आधार वा प्राधेय की अधिक सनेह नमात न गाता कमी वरी प्रल्पता रमणीय हो रोम रोम प्रति राजही, कोटि२ ब्रह्मन्ड एक से दूसरे का उपकार निशिहीं सों ससि सार, मों निसि नीकी लगे (१)प्राधेय अनापार नभ ऊपर कचन लता, कुसुम नसि २४. अन्योन्य विशेष महा छवि देय (२) थोडे आरम से कपि-तन दरस सकल दुस विशेष फल, धाडे। बीते का वहुत मानना (३) एक वस्तु का वर्णन निज प्रभु मय देवहि जगत: अनेक टोर करना कामन करहिं विरोध (१) और से पोर ही विझुग्न एक प्राण हरि लेही द६'व्याघात कार्य हो ८७८ emasagarm 1 अलवार दपंग। [११] AL शान . 'पप्यार (क)पिरोधी से अपना गरिरय भजधजु मांग लग कार्य माधना रहत जानिये मान ४७. फारणमारना फागण का परम्परा धर्म रितिपनि माग ८८ मालादीपय दीपक+पकावलि, उत्तग्न सो काव्य पर पानमा प्रति उपकार सोमा पान अपार पफ से पकबरपर मथुनों मधुगे। मुग, ताह मो शुभ मान्य घयन में धस्तु अनुभम पर पति गिनि का नजनमा अनेक पका स्यन पी पपनना नर में, यापक प्रमेय म्यत भई मंना भाव पर जापान १. परिणति निना देना पम कामगंभी, मेन पत्र एप गपन में परमिगरमrafRE, गरेपलमेंटागना गय पामा पदमा पद उमा गंगा - Thr मामा Bey. or marathi fontrr, Karirma 4 .३ परिमाया - mp : . फ । room . .
gะะะะะะะะะะะะะะ भलवार दर्पण। m [ १२० ] सख्या नाम उठाहरमा " सक्षिप्त रक्षण (२)कारण का ओर ग ज्यों२ दूई श्याम रंग, त्यो र कार्य का ओर रग उज्ज्वल होय (३) भला उधम फरते भले कहत दुस गैरेहु लागा बुरा फल हो (४) चुरा उद्यम करते कालकूट फल दीन अमी के भला फल हो (१) यथायोग्य का संग जस दूलह तम बनी बराता (२) कारण के अग नीच सग अचरज कहा, कार्य में दिख पडें लछमी जलजा आहि , (३) उद्यम करतेही विना छुवतहि टूट पिनाक पुगंना विघ्न कार्य हो - १० सम विचित्र जे. इच्छा फलार्थ उलटा नमत उच्चता लहन को, प्रयत्न पुरुष सचेत ४२ अधिक ४३ अल्प उथ अन्योन्य २५ विशेष आधार वा प्राधेय की अधिक सनेह समात न गाता कमी वटी अल्पता रमणीय हो रोम रोम प्रति गजही, कोटिर ब्रह्मन्ड एक से दुसरे का उपकार निशिहीं सों ससि सार, ससि सों निसि नीकी लगै (२) प्राधेय अनाचार नभ ऊपर कचन लता, कुसुम महा छवि देय (२) थोटे आरम से कपि तव दग्स सकल दुख धोडे बीते का वात मानना (३) एक वस्तु का वर्णन | निज प्रभु मय देखहि जगत अनेक टोर करना कासन करहिं विरोध (१) पार से और ही विझुन्त एक प्रारा हरि लेही neerinenew विशेष फल, २६ व्याघात कार्य हो TI अलवार दर्पण। [१३] गया. नगम भक्षिा लक्षा अवधा (१)एक के गुणदीप ऊपर वरम तय नगमा को दुमगन गह (२) तिरस्कार नो मुग धाया गरि जाऊ, जनगम र पानमा टोप में गुण और गुण फार कमा निधन में दापली पान पांगे वीर शप या मोहरे समान भानि न मान मनागा मग मी अर्थ प्रस्तुत अध में प्रम में मिल चामुंग गांगपति, और भी नाम ७२. मुद्रा ७३'रसायलि ७६ नहर पा गुगा लेप प्रयंकप अपना गुण नझिमंगति, बमर मी मा गिनि पर गादपि प (३) मगका गुण लेकर m मोरे धार अपना फिर प्राग पर मुन्म में 7 nu'rreumommunt 40 7 .. . ग भी ५.: .::- :
है। १२२] BRITEReme अलङ्कार दर्पण। Jha नाम उदाहरण मक्षिस लक्षण ५६/काव्यत्लिग युक्ति से अर्थ समर्थन मो नर क्यों दशकध, बालि बध्यो जिहि एक शर ६० अर्थातरन्यास सामान्य विशेष से वा नृप कर पात पलाम, पहुँ- विशेषमामान्य से दही चत है सँग पान के ६१/ विकस्वर विशेप फिर सामान्य हरि गिरि धान्यो सत पुरुप, फिर विशेष कथन से दृढता ३२/प्रौदोनि आहेतु को हेतु मानकर जमुना तीर तमाल मे, तेर उत्कर्प कथन ६३ संभावना यो होवे ता यो होय लहतो गुणनि अपार, वक्ता हो तो शेष जो ६४ मिथ्याध्य- अमत्य कथन असत्य वारि मये घृत होय चरु, वसिति रीति से सिकताते बरु तेल भार सहै ज्यों शेष बाल असेत ६५ ललित ६६ प्रर्पण फल मिले जानि जन दीना प्रस्तुत का प्रतिर्विव सेतु - बाधि करिहो कहा, भाव से कथन उतरि गयो प्रव अबु (१) यक्ष रिना यादित नाथ सफल साधन में हीना कीनी कृपा (२) विना श्रम वाछित वरहु धीर हवेह मुत चारी मे भी अधिक फल प्राप्ति (३) वस्तु के यत को यह विधि मन विचार कार शोधतेही वस्तुप्राप्ति राजा, प्राय गपे कपि सहित समाजा चित चाह से उलटा राज्य देन कहि दीन बन होना पक का गुण अवगुण न्हाय मत पावन कार, धरै यह आन चाह से दोप को गुण गौतम शाप पत्म हत माना ठहराना ६७ विषाद ८. उल्लाम दूसरा धरै ६) अनुश 80...
PR28233-3 अलहार दर्पण। [३] मक्षिा 7 IRLS ७०ध्ययणा ७२ लेश (1) पक के गुणदाप ऊपर वाम तग न मा फोदूनगन गई 10) तिरस्कार मां मुग धर्मपर्म नाम नग पद पप, नाऊ रोप में गुण मार गुण फार पटनिधन में दोर लार पान पारेको धाप यामोहर फेसमान भानि च गाभागा मग मी अधी प्रस्तुत प्रथम प्रम में किस पार नदिपार, रीनाम मरन न सामलि ७८ तहत अपा गुण नजिमगनि यम माना AT , गगुगालेय पार (1) माया गुन लेपारमा fami. मुऔर अपना फिर प्राण कर ७५ पुग्धप tor . ave Sim. १ Try in ": 7 r [ १२४ ] अलकार दर्पण । m ~~ मरया नाम मक्षित क्षम उदाहरण ७६ सामान्य ८० उन्मीलित ५१ विशेषक ८२ गुनोत्तर भेदरहते टुपभीमाश्य एक रूप नुम बाता दोऊ में विशेषता न जान पटे सादृश्य से हेतु भेद कीरति आगे तुहिन गिरि छुए परत है जान जो परीक्षा द्वारा सिद्ध जाने तिय मुख अरु पागल हो शशि दर्शन ते माझ (१) कुछ भाव सहित कह दशमठ कान ते बदर, उत्तर देना मे रघुवीर दूत दशकदर (२) चित्रोत्तर-प्र-नोत्तर का वर्षा जब कृपी मुखाने पकही पद मे (३) अनेक प्रश्न कापक वारि वताय विहानि मा, ही उत्तर सरन नवेली नार अर्थ प्रहेलिका वावी बाकी जल भरी, ऊपर वारी आग। जब बजाई बासुरी, निकल्यो कारो नाग पर प्राशय देख क्रिया सीतहि समय देखि ग्युगई, से भाव जतादे कहा अनुज सन सैन बुझाई छिपी बात को भाव से जोरि पाणि प्रभु कीन प्रणाम जताना पिता समेत लीन निज नाम प्रगट वस्तु का रुफ्ट नखि शुरु काटे प्रधा ये, से गोपन करना दतनि जानि अनार और के मिल में और पुनि आउन यहि विग्यिा से बात करना माली, अस कहि मन विहमी दस पाली छिपा लेप प्रगट करना कहत जताये सेन, प भाग पर सेत ते क्रिया द्वारा मर्म विपाना पीय चलत प्रात् चले, पांला नैन भार ८४ पिहित ५५ व्याजोक्ति ६ गूक्ति २७ विवृतोक्ति ८८ युनि
मलकार दपण।
[१५]8
-
म
कलाकानि
फदावत का प्रमग काम प्रधान का
साथ कहना
नाम ना नफा
६०दिकोनि
--
मामानिमाभिप्राय हागनान II माया
गा। उमा गुम गm
घर पर अधमान कि TETAH
निसले
सम्पमाणि (म्यनाय का
योनि
(-) प्रतिमा का TRET
३jभागिणः
भूत भविष्यकामद- crime
{ पर कहना
भतिशय ममल पा Trform
मयुगि
पाभनिनामा
Mrir
ofrre
८४४
[ १२६ ]
अलङ्कार दर्पण ।
नाम
सक्षिप्त रक्षण
उदाहरण
Rम या
विधि
।
सिद्ध वस्तु का विधि काकिल है कोकिल जये,
पूर्वक विधान
मृतु में काहि टेर
(१) कारण कारय सग अम्गा
उदय अवलोकह
ही कथन हो
ताना, पफज कोक' लोक
मुपदाता
(२) कारण कार्य की कोऊ कोटिक सग्रहो, कोऊ
एकता
मो सम्पति
यदुपति सदा, त्रिपति विता-
ग्ण हार ॥
वेद शास्त्र युक्त कथन
मत्य बचन सत्र 'त. भलो,
बुगे कहन नहि कोय
लाप हजार,
.
...AAI
१०० प्रमागा
शुभम्भूयात्
विज्ञापन ।
भानु-कवि विरचित निम्न लिखित ग्रंथ और
पुस्तकें इस यंत्रालय में मिलती है
(साहित्य परीक्षार्थियों के लिय परमापयोगी)
भाषा मारिय का अनुठा प्रथ'
लक्ष्मी र प्रेम पारा में भी प्राप्य
विगत माटी
दमागलीमप्राय मग्ल भाषा मिगत
४ हिंदी वाव्यालकार
प्रलफार मोगरी
नरामत गमारत' पिणन मी
काव्यप्रभाकर
सौतलामाता मजापति (गगी भाग)
चनुमान (गया गमगर
तुही तात(एमागमा
गरिमानामी
गुगतार (1)
नोट:-पुस्तक विमों को marti:
भागन,
जगन्नाथ प्रसाद
AATrn inar
No text on this page.
No text on this page.