Adarsh Library, Jaipur
The Halo
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हलो
राजकृष्ण मिश्र
साहित्यसहकार
दिल्ली-110051
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एक शहर के पश्चिमी किनारे पर हज्जीटोला वस्ती, तीन तरफ सड़क मे घिरी हुई थी। चौथे किनारे पर रेलवे लाइन थी जो भोजीपुरा स्टेशन मे सीधे पूरब की ओर जाती थी । बस्ती के बाहर और रेलवे लाइन के किनारे- किनारे छोटी-छोटी दुकानें बनी थी। बायो तरफ चबूतरे-छज्जे याले मकानों की लंबी कतारें थी और बीच की गली के साथ दायी तरफ, टूटी फूटी कयह-खाबड़ लखोरी इंटो की बनी हुई, दो हवेलियां । सड़क से लगी हुई लंबी पगडही के एक तरफ पुरानी हवेली से लगी हुई कोठरियां यों और दूसरी तरफ लकड़ी की टाल । यही आटा चक्की के पीछे कच्ची शराब का ठेका था। राव के ठेके से जरा आगे, दाहिनी तरफ जगन्नाप कालिया की हवेली थी, जिसमे दिन के वीस पटे जुआ चलता रहता। शाम का रक्त या। सूरज पेड के पीछे छिपने लगा था। हल्का-हल्ला घुधलका वस्ती के ऊपर गहराने लगा था। हवेली और छज्जे वाले मकानों की कतार के बीच, बस्ती के अदर आने वाली पगडंडी के किनारे म्यूनि- सपिल्टी के नल पर पानी भरने के लिए औरतों की भीड़ लगी थी । दूसरी तरफ बस्ती के बच्चे कंचे, गोलियां, गेंद-तडी और सिकड़ी गेल रहे थे। उस दिन हज्जीटोला में एक उत्सव का माहौल था। पानी के नल पर चूड़ियों की खनक के साथ जहां एक तरफ तकरार और मीठी झडप चल रही थी, वहीं दूसरी तरफ काम से लौटकर आये मदों मंदान में लगी नौटंकी में जाने के लिए हल्ला मचा रखा था। घरो की अंगीठी से उठता हुआ घुआं चारों तरफ फैलने लगा था। गोलाकार जमीन के सामने, यस्ती के अदर आने वाली पगडंडी के किनारे पर, दुमंजिले मकान के निचले हिस्से मे, अपने घर की दहलीज पर ममता बैठी थी । उसका मन उदास था। वह फटी-पटी आपों से सामने खेलते हुए बच्चों को देख रही थी। ममता के मन मे उम समय न तो कोई जजवा था न स्याल, एक अजूबा पालीपन भरता जा रहा था। उमे न तो
नारी सदैव ही पिता-पति, भाई, पुत्र आदि के रूप में
पुरुप संरक्षण में अपने को सुरक्षित अनुभव करती रही है ।
लेकिन पति या पिता के रूप में संरक्षक ही जब विषम
परिस्थियों में भक्षक बन जाए तो परिवार की क्या परिणति
होगी?
माधव एक ऐसा व्यक्ति है जो आर्थिक विसंगतियों के
परिणामस्वरूप असमाजिक तत्त्वों के प्रभाव में आकर निजी
स्वार्थवश अपनी पत्नी ममता एवं पुत्री माया की इज्जत
दाव पर लगा देता है। ममता ने अपनी पुत्री माया के
भविष्य को तबाह होने से बचाने के लिए अपने प्राणों की
बाजी लगाकर क्या-क्या पापड़ वेले और अन्त क्या हुआ
दफ्तर के वाबुओं की घिनौनी संकीर्ण मानसिकता एवं
वर्तमान युवा पीढ़ी का वैचारिक धरातल क्या है ?
माया के दफ्तर का राजी नाम का युवक एक पार्टी
माया द्वारा औपचारिकतावश मात्र 'हलो' कह देने से
गलतफहमी का शिकार हो प्यार का उद्बोधन समझ बैठता
है। प्यार के चर्म उत्कर्ष पर पहुंचने के लिए वह अपने
मूर्खतापूर्ण व्यवहार का क्या परिणाम भुगतता है ?
इन सव प्रश्नों का उत्तर प्रवाहमयी भाषा में बड़े
रोचक ढंग से लेखक ने अपने इस उपन्यास में प्रस्तुत किया
?
नवें दशक के बहुचर्चित ख्याति प्राप्त उपन्यास
दारुलशफा एवं सचिवालय के लेखक राजकृष्ण मिश्र का
यह तीसरा उपन्यास भी पाठकों में अपना विशिष्ट स्थान
बनाएगा-ऐसी आशा है।
-प्रकाशक
हलो:7 उसके हाथ से मिट्टी को गोट छूटकर गिर पड़ी। उसके चेहरे पर फिर यही योफ था, माधव की माल बांगों का पौफ । यह रुकी हुई थी। उसके पर में जमीन के अंदर गड़ते जा रहे थे। यह पोछना चाह रही थी, मां को आवाज देना चाह रही थी, लेकिन उसके गले से मूपी सामी के घट बार-बार नीचे-ऊपर होने लगे थे। एक तो वह घर से बाहर पी, दूसरे अपनी मा ममता के साये से दूर । तेजी के साथ माधव बढ़ता चला आ रहा था। इससे पहले माया बुछ करे, कुछ कहे, उन सहरियो में से एक सहकी ने, जिमे चांस लेने की जल्दी थी, गिरी हुई मिट्टी की गोट उठा ली और 'तुझे नहीं सेलना है तो जा यहां से कहते हुए माया यो ढकेल दिया। उस एक धक ने माया की सोती हुई तदाओ को झकझोर दिया। फिर वह रुकी नहीं । धक्के ने उसे अपनी जगह से आगे बढ़ा दिया था। वह ममता के करीय पहुचने के लिए दौड पही। ममता को जय इत्मीनान होने लगा कि माया अपनी उम्र की लह- कियों के साथ हस रही थी, मेल रही थी, तो वह धोपट में धीरे-धीरे उठ- कर अदर की तरफ जाने लगी। छोटे-से चबूतरे से लगी हुई चौपट थी और चौपट के नीचे दरवाजो के बाद तिकोने साकार का कमरा पा जिसके एक किनारे पर पुराना तरुन पहा था। तस्न से ठीक विपरीत दीवार पर लकड़ी का एक छोटा टांडा या जिसके कार देवी-देवताओं की तस्वीरों पर पूजा का सिंदूर लगा हुआ था। टड़ेि से जरा हटकर लेकिन बाई दीवार के पत्म होने से पहले, एक दरवाजा अंदर के हिस्से में खुलता पा । इसी दर- वाजे के बगल में, कीले से बंधी हुई रस्सी पर, विस्तर और कपडे टंगे थे। अंदरूनी दरवाजे से जुड़ी दीवार के किनारे, सदूक और कनस्तर का ढेर और दूसरे किनारे पर कुछ बोतलें और एक-आध पुराने मोले पोपे। कमरे के बीचोबीच फटी पुरानी दरी पर हाय का पंया रणा हुआ था। ममता के अंदर न जाने कहाँ से, रलाई के सैलाब उमरने लगे थे। उसे लग रहा था, उसका वजूद, उसफी हस्ती जंगे कचरे के पिसी ढेर पर पड़ी थी और उसको बदबू से पैदा होते हुए कोडे, विसपिसाने हए, उसके बदन के रोम-रोम में समाने जा रहे थे। उसका सत्व गस रहा था, उसके अंदर ही अंदर न जाने पितनी संडाय घुलती जा रही थी। उसे हैरत हो - - 8:हलो रही थी, वह सोच रही थी, जिंदगी ने उसे किस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया था। वह थी, उसके सामने उसकी नियति थी और उससे और उसकी नियति से जुड़ा हुआ था माधव । उसे घिन आ रही थी। माधव का ख्याल चिपचिपाते हुए कोड़े की तरह उसके जेहन में, उसके दिमाग में चुभने लगा था। वह सोच रही थी, क्या यह वही माधव था, जिससे उसने च्याह किया था, जिसके बच्चों की वह मां बनी थी? न जाने कितनी आवाजें, न जाने कितने अंधेरों को चीरती हुई एक सर्द ठंडक मरोड़ वन- कर, उसके पेट के अंदर उमड़ने लगी। न जाने कितने दिनों बाद, उसके अंदर का अहसास करवटें बदलने लगा था। ममता को बड़े दिन बाद खुद अपनी याद आने लगी थी, जब वह चौखट से अंदर आकर लालटेन जलाने बैठी थी। "जिंदगी की सुबह की तरह एक साफ खूबसूरत ख्वाब धीरे-धीरे भरकर सामने आ रहा था । दूर, बड़ी दूर से ममता दौड़ती हुई चली आ थी। उसे पकड़ने के लिए, लड़कियां पीछे दौड़ रही थीं। लेकिन कोई पकड़ नहीं पा रहा था । वह सभी के हाथ से निकल जाती । उसकी । की आवाज दूर बड़ी दूर से आते हुए, तेज हो जाती । कितना हंसती वह, कितना बोलती थी वह ! स्कूल से कालेज तक, एक-एक क्षण, एक- एक लमहा जैसे खुशियां बटोर-बटोर कर, उसकी झोली में डाल रहा था। उसकी मां कहा करती थी, "अरे, तू तो नींद में भी हंसती है रे !" तभी एक झटके में, माया, डरी हुई हिरनी की तरह आकर उससे लिपट गई । वह हांफ रही थी। कंपकंपी-सी उठ रही थी उसके वदन में। ममता ने उसकी तरफ देखा, उसके माथे पर हाथ फेरा, उसे प्यार किया। इससे पहले वह माया से कुछ पूछे, उसे अपने सवाल का जवाव खुद-ब-खुद मिल गया था। सामने के दरवाजे से उसने देखा, माधव अपने मुसटंडों के साथ घर की तरफ बढ़ रहा था। माधव जब घर के अंदर पहुंचा, वाहरी कमरे में, एक किनारे पर, लालटेन जल रही थी। माधव सारा सामान, बीच में पड़ी दरी के कपर रखने लगा तभी, झिनक ने दाहिनी तरफ की खिड़की खोल दी और गंजा माधव के तख्त के कपर लेटकर सीटी बजाने लगा। उधर मोटा वड़ी । । - - । - हलो: तत्परता से माधव की मदद करने सेगाना उस दिन दूसरे पकर में था, वह किसी भी तरह माधव की बेटी पिया सेना पाहता पा। उसने आगे का सौदा, तीन हजार में कर रया था । वह एक हजार तक और गर्न कर सकने की स्थिति मेथा। जिनक और मोटे ने अपना जाल विधाना शुरू कर दिया । तन्न के नीचे से अल्मुनियम का गिलाम उठाकर शिन उममे संतरा डालने लगा तो माधव ने बोतल की का मुह मे गोलकर, पीनी शुरू कर दी। तम्त से उतरकर गजा दरी पर आ गया और गयाय का टुकडा लेकर उमने भी बोतल मुह में लगा ली। इनको देव कर मोटा पहा पीछे रहता, वह भी बोतल में पीने लगा। धीरे-धीरे आवाजें बदलने लगी पी."पुटी "धुटी, सटरती हुई, फिमलती हुई आवाजें । महक मारती हुई दारू, सरती सिगरेट के धुए में डूयकर अदर तक पहुंच रही थी। इससे पहले माधव घर के अदर आए, ममता अपनी बेटी माया को लेकर, अंदरूनी दरवाजे से, छोटा-सा बरामदा पार करके, आंगन में चली आई थी। वरामदे में एक तरफ चूल्हा बना था, जिसकी वाई तरफ बर्तन से हुए थे और दायी तरफलकही पी चली और कोयता पा। पीछे की गली से लगा हुआ आगन चौकोर न होकर लयाई में सीधा था। बाहर गली की तरफ खुलने वाले दरवाजे के पास एक तरफ मिट्टी पा र था और दूसरी तरफ वायरूम। छोटे बरामदे मे आंगन के दाहिने हिस्गे की दीवार से सटी हुई एक पत्थर की सिल रखी थी। ममता आंगन तक, करीब-करीब दोड़फर आई थी। पहले तो माया को उसने अपने में चिपटा कर माथे पर हाथ फेरा, उमे प्यार किया और फिर उमे पानी पिलाया। अदानी दरवाजे की तरपा, वरामदे मे गडे हुए पटोले को गिरापर, उगने धीरे-धीरे, माया को लिटा दिया। माया तब भी डरी हुई थी। उमरा चेहग सफेद होता जा रहा था । मापे पर पसीने की यः यो और रह- रहकर वह मांप उठनी । ममता उग माया को देख रही थी जो पद उसका पथी, जिसको उमने अपनी कोख से जन्म दिया था। वह उगवी मां थी । उमका रूप होते हुए भी, अपनी योग से जन्म देने के बाद भी, यह सोच रही यो"यह माग्य को कमी विहंदना पी, एर उसके at 10 : हलो नीचे, सहमी हुई, डरी हुई, उसकी बेटी पड़ी थी और वह कुछ कर सकने के काबिल नहीं थी । वह सोच रही थी 'खुद उसकी हालत, कौन-सी माया से अच्छी थी। उसे मौत क्यों नहीं आ जाती? वह जीकर करेगी भी क्या? तब उसे ख्याल आया माया का और फिर ख्याल आया, उस लमहे का, जब उसने माया को जन्म दिया था और उससे भी पहले जब उसे माधव मिला था। जिंदगी कभी इस तरह धोखा देती, वक्त कहीं इस तरह बदलता । ममता की नजर आंगन की दीवार पर टिक गई, जहां एक केंचुआ नाली की चिकनी तलहटी से उबरकर दीवार पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था। माया को लगा उसकी नियति उस नाली के कीड़े की तरह थी जो खुद फिसलन में ही फिसल-फिसल कर टूट जाएगी 'नष्ट हो जाएगी। तभी कहीं दूर से कोयल के बोलने की आवाज आयी । कोयल की मीठी आवाज का यहां क्या काम था? जब उसके आंचल के नीचे, दहशत और खौफ के अंधेरों में, उसकी बच्ची भटक रही थी, और वह दहशत, खौफ खुद उसके शरावी बाप की देन थी। जव उसकी जिन्दगी तार- तार, टूट चुकी हो, जव माधव उसका सब कुछ छीनकर उसे नंगा बना चुका हो, तव कोयल की आवाज का क्या काम था? कोयल की आवाज उसे कभी नहीं फली । न जाने क्या हो जाता, जव-जव कोयल बोलती थी, उसका कुछ-न-कुछ छिन जाता था। ""वारह साल पहले, उस दिन भी वैसे ही कोयल बोल रही थी। वैसा ही शाम का वक्त था । धुंधलका भासमान से उतरने लगा था। वह अपने सपनों में खोई हुई, शिवा का इंतजार कर रही थी। उसी टीले से लौटकर आयी थी वह जहां शिवा ने सपनों के संसार के ताने-बाने बुने थे। ममता दस-बारह साल की थी जव शिवा का परिवार उसके घर के बगल में आकर रहने लगा था। घर में, मोहल्ले में, स्कूल में, बाजार में, हर जगह तव ममता एक तितली की तरह उड़ती रहती और किसी के हाथ नहीं आती थी। यह तो बड़े दिनों बाद उसे धोरे-धीरे शिवा से लगाव होने लगा था। शिवा रुक नहीं सकता था, ठहराव नाम की चीज उसकी जिन्दगी में नहीं थी। वह बड़ा आदमी बनना चाहता था। ममता और शिवा सड़क से दूर ऊंचे टीले पर चले जाते जहां शिवा टीले की ।
हलो: 11 एक तरफ उठी जमीन पर सपनो के महल बनाया करता और ममता उसमें हंसी के रंग भर दिया करती। शिवा ने जो नक्श उतारा था उसमें ऊंची-ऊची छत वाले कमरों का काफी बड़ा बगला था, एक नही कई मोटरें थी, एयर कंडीशनर ये, कालीन थे, लहराते हुए पर्दै थे, रुतवा था, पोजीशन थी। इन सबके बाद, अपनी जरूरत अपनी रफ्तार की हर चीज जमा कर लेने के बाद, तव कही वह ममता को रखता था। ममता उससे तब कहा करती आलीशान बंगला, मोटर, बैंक बैलेस, पर्दे- कालीन, कही ऐसा न हो, यह सब तो तुम्हे मिल जाए और मैं खो जाऊँ। .."शिवा यह सुनकर बेचैन हो जाता और कहा करता, उन तमाम चीजों का ममता के विना मोल ही क्या है । 'तव ममता वस हंस दिया करती, और उसके साथ शिवा भी हसने लगता । उस दिन सपनो के उसी टोले से उतरकर वह आयी थी। वह सोच रही थी, शिवा वही आएगा। लेकिन शिवा उस दिन नहीं आया और फिर कभी नहीं आया। कई दिन बाद 'पडोस में उसको शादी का कार्ड आया था। उसकी मधु से शादी तय हो गई थी। मधु से शिवा की शादी की खबर सुनकर एक धमाका हुआ था, एक विस्फोट हुआ था। उसे लगा उस ऊंचे टीले पर सपनो के नक्स उतारते वक्त वह शिवा के साथ मन और आत्मा से जुडी थी तो उसके बिना जी पाना मुमकिन नहीं होगा उसके लिए । जुडने और जीने, अलग होने और चले जाने के बीच फैमला करना था उमे। उसी टीले की तरफ चल पड़ी थी वह । घर से टीले तक रास्ता जाना-पहचाना था उसका । कितने पेड, कितने झुरमुट, कितने मोड और किनारो पर उसने शिवा के साथ वक्त गुजारा था, सपने बुने थे। उसे अजीब-सा लग रहा था। वह खुद, अपनी निगाहो मे छोटी हुई जा रही थी। उस दिन वह देख रही थी, उस आकाश को जिसे अपनी बाहों में बांध लेने का विचार किया था उसने, वह देख रही थी दूर-दूर तक फैले विश्व को, ससार को, जिसे शिवा ने नापने का संकल्प किया था। शिवा का सकल्प और उसका विचार एक था तब। दोनों के दोनो के हाथ बंधे थे, एक-दूसरे में । लेकिन शिवा तो विश्व नापने जा चुका था उसे मालूम था मधु का बाप मर चुका था और म' लखपति मां की इकलौती बेटी थी। ओर वह खुद अपना छोटा-सा वज़ मन, - 12 : हलो छोटी-सी हस्ती लेकर उस छोटे-से टीले पर न जाने कब से उस असीम आकाश को नापने का ख्वाब देख रही थी, जिसका एक छोटा-सा टुकड़ा तक उससे छिटककर दूर चला गया था। टीले के उस पार खाई थी और खाई से लगी हुई नदी। इससे पहले ममता उसमें छलांग लगा दे, न जाने कवः पीछे से आकर माधव ने उसे रोक लिया था । माधव हमेशा से ऐसा नहीं था। उसने भी एक अच्छे खानदान में जन्म लिया था। उसके भाई था, वहन थी, उसके वाप एक स्कूल में मास्टर थे। माधव उन दिनों वड़ा हो चला था, एम० ए० का इम्तहान पास कर लिया था उसने, जव उसके ऊपर मुसीवतों का पहाड़ टूट पड़ा। सबसे पहले उसका वाप मर गया और फिर मां ने दीवार पर सर पटक-पटक कर जान दे दी । न जाने कौन-सा पाप माधव के घर को खाए जा रहा था । एक-एक करके सव उससे अलग होते गए। छूटते गए। माधव ने एक वर्ष में चार मौतें देखी थीं। एक अजीव तरह की यातना, एक औचक खालीपन जैसे उसके हिस्से-हिस्से की पैमायश कर रहा था। दु:ख की भी कोई सीमा होती है, लेकिन माधव को उन दिनों लग रहा था जैसे समूचे संसार का दु:ख, सारे विश्व का शोक उसके अंदर समाता जा रहा था। रात के अंधेरे में बड़ी दूर, हवा की सुरसुराहट, पत्तों का खड़कना और झींगुर की आवाज सुनकर माधव को लगता जैसे और कोई दुःख और कोई मौत उसके यहां दस्तक देने आ रही थी। वह सारे दु:ख जो किसी की पूरी जिन्दगी में मिल पाते, माधव को उन दिनों मिल चुके थे। घर के कोने-किनारे से, कभी दम तोड़ते वाप और कभी-कभी दीवार पर सर फोड़ती हुई मां की तस्वीरें उभर आया करती और माधव के अंदर किसी गुमनाम खौफ का हिस्सा वनकर ठहर जाती, रुक जातीं। कभी उसे अपनी प्यारी-प्यारी छोटी बहन की याद आती जो ट्रक से कुचलकर मर गई थी, तो कभी भाई की शक्ल उसकी आंखों के सामने नाचने लगती। पानी में डूबकर मर गया था उसका भाई। माधव वहीं खड़ा था। दुःख के उन दिनों में, दोनों भाई, वस्ती के वाहर बाढ़ देखने गए थे। वहीं माधव का भाई फिसलकर वह गया था। उसके भाई की आखिरी चीख, उसकी छटपटाहट, उसका तड़पना, उसकी वेवसी, बड़े भाई से बचा लेने की मासूम फरियाद, जैसे माधव के प्राणों । । - - हलो : 13 मै आकर ठहर गई थी। नही सह पाया था माधव, विपदा के उस धमाके को और उसे यही लगा था जैसे उसका छोटा भाई सुद उसके हायो से फिमलकर मौत के मुंह में चला गया था। माधव की जिंदगी में न इधर उम्मीद थी न उधर सुशी। उसे तो अपने चारो तरफ एक सन्नाटा ही दिखाई पड़ता था। जाने-अनजाने, न जाने कौन-सी अंधेरी गुफाओ मे, उसका मन भटकने लगता। उस समय माधव को किसी छोटी-सी खुशी को तलाश थी, एक ऐसी खुशी जो उमकी उजडी हुई जिन्दगी में विश्वास की महक डाल सके। वह मन्दिर गया, मस्जिद की अजान सुनी उसने, गिरिजाघर के सामने घंटो खडा रहा, पिक- निक, पिक्चर, सैर-सपाटा, हंसना, बोलना उसने सब कुछ किया, उस छोटी-सी पुगी को पाने के लिए । उसे मालूम था वह छोटी-सी खुशी उसके सारे समूचे जीवन में एक ऐसी हसीन रगत घोल दगी जो किसी गुलजार चमन मे पिले हुए फूलो के बीच उडती हुई रगीन तितलियो को नसीब हुआ करती है। कितने लोगो से मिला वह, कितनी जगह वह गया, लेकिन माधव को वह छोटी-सी सुशी नही मिली, जो उसके अंदर से उस डरावनी छाया को निकाल सके। उस डरावनी छाया के साथ जुड़ा हुआ था वह । वीरान सन्नाटा जिसने अनेक-अनेक परतो मे, बारूद के गोले की तरह, इतने दिनो मै, उसके अन्दर, न जाने कितने विस्फोट कर डाले थे । माधव जिंदगी के उम मुकाम पर पहुच चुका था जिसके आगे उसे मालूम था जाने का रास्ता नही था। दर्द की छटपटाहट उमे सहन नहीं होती और वह जैसे अपने जीवन के कोने-किनारो से उभरते हुए काल्पनिक खतरो के साथ, एक कभी न खतम होने वाली जंग, एक कभी न समाप्त होने वाली लडाई लड़ रहा था । माधव के लिए इस बात का फैसला कर लेना मुमकिन नहीं था, उसे वह छोटी-सी खुशी कब मिलेगी या फिर वह खौफ के अधेरो से कब निकल पाएगा 1 वह टूटने लगा था। एम० ए० के बाद उसने रिसर्च के लिए दाखिला लिया था। उसे मालूम था वहा भी वह कुछ कर नहीं सकेगा। उस दिन चारो तरफ एक भयावह सन्नाटा, आसमान के ऊपर से उतरकर धीरे-धीरे वस्ती के बाहर, उस ऊची पहाडी पर फैलने लगा था, जहां माधव, कई वार बैठकर, अपने आपमे बातें किया करता । दूर - 14 : हलो वादियों से उसे अपनी फुसफुसाहट खुद सुनाई दे जाया करती। कभी-कभी तो वह चुपचाप घंटों वहां बैठा रहता, न सोचता, न बोलता, न वात करता, लेकिन तब भी उसे लगता जैसे आसमान बोल रहा था, वादियां बोल रही थीं। उन वादियों से उसकी गूंज-भरी फुसफुसाहट लोट-लौटकर, उसके अंदर, सब कुछ तोड़ दिया करती, तार-तार कर दिया करती। एक अजूबा खौफ, एक अनजान-सा डर, उसके अंदर, कितने-कितने दिनों पहले, आकर पैठ गया था। उसकी रग-रग में असंख्य सुइयों सरीखी चुभन फट पड़ती। क्या-क्या सोचा था उसने 'रिसर्च पूरी करने के बाद जब वह डाक्टर बन जाएगा तव अपने बाप का वह सुख लौटा देगा, वह सपना साकार कर देगा जिने सीने से लगाए हुए, उसके बाप ने दम तोड़ दिया था। माधव के बाप का सपना स्कूल की मास्टरी से नहीं बल्कि किसी बड़े कालेज की हसीन प्रोफेसरी से जुड़ा था। माधव ने बहुत दिन पहले यह तय कर रखा था, उसे वाप का सपना पूरा करना था । माधव ने उन दिनों तो, सभी के सपने बटोर-वटोर कर, अपनी झोली में डाल लिए थे। उसे तब क्या मालूम था, जिंदगी उसे ऐसा धोखा देगी। उसे ईश्वर उठा लेता वह खुद मर जाता, वह इस दुनिया में नहीं रहता, यह तो उसे मंजूर था, लेकिन बाप के न रहने पर, मां के चले जाने पर, भाई के डूब जाने पर, बहन के कुचल जाने पर वह सोचता"उन सपनों का वह क्या करे जो उसने अनजाने में अपनी शम्सियत से जोड़ लिए थे। उस दिन माधव की खुद अपने सपनों के संग, जंग चल रही थी, तभी उसने देखा, पहाड़ी के दूसरे सिरे पर ममता खड़ी थी। शाम के हलके धुंधलके में वस्ती के बाहर पहाड़ी के दूसरे छोर पर, ममता को देखकर न जाने क्यों माधव की आंखों के सामने एक बार फिर मौत का डरावना साया मंडराने लगा था। उसे लगा, जब वह संभलने वाला था, जब उसने जिंदगी को किसी किनारे लगा सकने की कोशिश शुरू कर दी थी, उस समय वह एक और मौत देखने जा रहा था। पड़ाड़ी के जिस छोर पर ममता खड़ी थी, उसके नीचे एक गहरी खाई थी, जहां गिरने के बाद कोई वच नहीं सकता। ममता ने न कुछ कहा था और न ही कुछ ऐसा किया था, जिससे माधव को यह विश्वास हो जाता, वह खाई के अंदर छलांग लगाने । - हलो : 15 वाली थी। लेकिन माधव का तो मौत के साथ कोई खुफिया संबंध तब तक बन चुका था। वह मौत को खूब पहचान गया था। हवा की मुरसुराहट, जरें-जरें का एक-दूसरे में लिपट-लिपट कर टूट जाना, आसमान से टपकता हुआ कोई अनजान वीराना, जैसे माधव को सब कुछ बता दिया करता। ममता को पहाडी के उस छोर पर खडी देखकर माधव को लग रहा था, एक बार फिर मौत उसके करीव आकर ठहर गयी थी और तभी तो शायद उसने आगे बढकर ममता को रोक लिया था। काफी देर बाद माधव को लगा कमरे की छत, जमीन सब धूम रही थी और वह खुद उनके साथ चक्कर लगा रहा था। उसकी आखें वद होने लगी। वह दरी के ऊपर सेट गया। वह बार-बार उन्हें ढकेल देता, लेकिन कुछ आवाजें तो जैसे उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी। तभी उसे महसूस हुआ, कोई उसे धक्का देकर जगा रहा था। न जाने कितनी मुश्किल से, खुद अपने आपमे जूझते हुए माधव ने देखा, गजा उसे बार-बार ढकेल रहा था। "क्या है वे..." माधव उछलकर बैठने ही फिर लुढक गया। "जब मतलव की बात होती है, तू सो जाता है, साला!" गजे ने कहा । "हू..." माधव संभलकर बैठ गया। शिनकू ने दूसरी बोतल खोलकर उसके हाथ में दे दी। "तेरे को बोल देता हू"तू साला हम्हारा पैसा दे दे ।" मोटे ने कहा। "दे देंगे यार !" माधव नशे में बोला। "तू झूठा है, माधव !" झिनकू ने झिड़की दी। "मुझे झूठा मत कह रे ।" माधव ददं मे कराहा । "तू झूठा है "तू झूठा है !!" "हा-हा तू झूठा है ! !" तीनो ने दाव फेका । 'कै?" माधव ने कहा। "कितनी बार तूने कहा, कभी एक पैसा भी दिया तूने !" गजे ने ललकारा, "हम्हारे पैमे हराम के हैं क्या ।" "हा"हां!" मोटे ने सहमति प्रकट की। "मैं क्या करूं.'यार''इधर कड़की ने मार रक्खा है अपने को!"
- 14 : हलो वादियों से उसे अपनी फुसफुसाहट खुद सुनाई दे जाया करती। कभी-कभी तो वह चुपचाप घंटों वहां बैठा रहता, न सोचता, न बोलता, न वात करता, लेकिन तब भी उसे लगता जैसे आसमान वोल रहा था, वादियां वोल रही थीं । उन वादियों से उसकी गूंज-भरी फुसफुसाहट लौट-लौटकर, उसके अंदर, सब कुछ तोड़ दिया करती, तार-तार कर दिया करती । एक अजूबा खौफ, एक अनजान-सा डर, उसके अंदर, कितने-कितने दिनों पहले, आकर पैठ गया था। उसकी रग-रग में असंख्य सुइयों सरीखी चुभन फट पड़ती। क्या-क्या सोचा था उसने 'रिसर्च पूरी करने के बाद जब वह डाक्टर वन जाएगा तब अपने बाप का वह सुख लौटा देगा, वह सपना साकार कर देगा जिसे सीने से लगाए हुए, उसके वाप ने दम तोड़ दिया था। माधव के वाप का सपना स्कूल की मास्टरी से नहीं बल्कि किसी बड़े कालेज की हसीन प्रोफेसरी से जुड़ा था । माधव ने वहुत दिन पहले यह तय कर रखा था, उसे वाप का सपना पूरा करना था। माधव ने उन दिनों तो, सभी के सपने बटोर-बटोर कर, अपनी झोली में डाल लिए थे। उसे तब क्या मालूमः था, जिंदगी उसे ऐसा धोखा देगी। उसे ईश्वर उठा लेता वह खुद मर जाता, वह इस दुनिया में नहीं रहता, यह तो उसे मंजूर था, लेकिन बाप के न रहने पर, मां के चले जाने पर, भाई के डूब जाने पर, वहन के कुचल जाने पर वह सोचता'""उन सपनों का वह क्या करे जो उसने अनजाने में अपनी शख्सियत से जोड़ लिए थे। उस दिन माधव की खुद अपने सपनों के संग, जंग चल रही थी, तभी उसने देखा, पहाड़ी के दूसरे सिरे पर ममता खड़ी थी। शाम के हलके धुंधलके में बस्ती के बाहर पहाड़ी के दूसरे छोर पर, ममता को देखकर न जाने क्यों माधव की आंखों के सामने एक बार फिर मौत का डरावना साया मंडराने लगा था। उसे लगा, जब वह संभलने वाला था, जब उसने जिंदगी को किसी किनारे लगा सकने की कोशिश शुरू कर दी थी, उस समय वह एक और मौत देखने जा रहा था। पड़ाड़ी के जिस छोर पर ममता खड़ी थी, उसके नीचे एक गहरी खाई थी, जहां गिरने के बाद कोई वच नहीं सकता। ममता ने न कुछ कहा था और न ही कुछ ऐसा किया था, जिससे माधव को यह विश्वास हो जाता, वह खाई के अंदर छलांग लगाने । , - - - हलो: 15 वाली थी। लेकिन माधव का तो मौत के साथ कोई खुफिया संबंध तय तक वन चुका था। वह मौत को खूब पहचान गया था। हवा की मुरसुराहट, जरें-जर का एक-दूसरे में लिपट-लिपट कर टूट जाना, बासमान से टपकता हुआ कोई अनजान वोराना, जैसे माधव को सब कुछ बता दिया करता। ममता को पहाड़ी के उस छोर पर खडी देखकर माधव को लग रहा था, एक बार फिर मौत उसके करीब आकर ठहर गयी थी और तभी तो शायद उसने आगे बढ़कर ममता को रोक लिया था। काफी देर बाद माधव को लगा कमरे की छत, जमीन सब घूम रही थी और वह खुद उनके माथ चक्कर लगा रहा था। उसकी आंखें वद होने लगी। वह दरी के ऊपर लेट गया। वह बार-बार उन्हें ढकेल देता, लेकिन कुछ आवाजें तो जैसे उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी। तभी उसे महसूस हुआ, कोई उसे धक्का देकर जगा रहा था। न जाने कितनी मुश्किल से, खुद अपने आपमे जूझते हुए माधव ने देखा, गजा उने वार-बार टकेल रहा था। "क्या है वे..." माधव उछलकर बैठनं ही फिर लुढक गया। "जब मतलव की बात होती है, तू सो जाता है. साला!" गजे ने कहा । "हू." माधव सभलकर बैठ गया। झिनकू ने दूसरी बोतल खोलकर उसके हाथ में दे दी। "तरे को बोल देता हूं."तू साला हम्हारा पैसा दे दे।" मोटे ने कहा। "दे देंगे यार!" माधव नशे मे वोला। "तू झूठा है, माधव!" शिनकू ने शिडकी दी। "मुझे झूठा मत कह रे !" माधव दर्द मे कराहा। "तू झूटा है!" "तू झूठा है !!" "हां-हाँ तू झूठा है ! ! !" तीनों ने दाव फेका। 'कमे?" माधव ने कहा। "कितनी बार तूने कहा, कभी एक पैसा भी दिया तूने !" गजे ने ललकारा, "हम्हारे पैमे हराम के हैं क्या !" "हां"हां !" मोटे ने सहमति प्रकट की। "मैं क्या करूं."यार''इधर कड़की ने मार रक्खा है अपने को !"
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हला इसीलिए तो यह हजार भिजवाए हैं तेरे लिए । पालेंगे यह, यड़ा करेंगे। लापी की जायदाद को मालिक होगी तेरी बेटी । जा से आ उगे।" गजे का दवाव माधव की पीठ पर बढता जा रहा था। उधर झिनकू और मोटे ने उसे उठाकर गड़ा कर दिया। गजा भी उठकर पड़ा हो गया और उसने माधव के कान में, "ले आ अपनी वेरी यो", वहार हल्का-सा आगे पो हरेल दिया । माधव अंदर की तरफ चल दिया। माधव कव अन्दर आया था, यह ममता उसी तरह नहीं जान पाई जगे यारह साल पहले, उस ऊचे टीले पर गडे होकर, टीले से लगी हुई पाई में छलांग लगाने का इरादा करते यरत नही जान पाई पी।रिन धारह माल पहले के माधव में और आज के माधव में जमीन-आममान था पर्णा गया था। जिंदगी के दौर में वह माधव तोवर या मर पुरा था। यह तो उसकी लाश थी जिसने न जाने कौन हैवान किग याननीयी और यरबादी का साया बनकर समाया हुआ था। परीर वही था, यह कोई और पी। घटकनों के साथ उठती-बैठती न तो वह पचान पी और ना ही वह गर्माहट जिसके अपनत्व में जुड़कर वह वान्ह साल पहले उग टोर से उतरकर माधव के साथ चली बाई थी। ममता शायद जान ही न पाती, अगर एक बार फिर उसकी अनियों मै माया के बदन मी कंपकपी न पटने लगती। माया के कांपी हुए बदन मे धीरे-धीरे उमने अपना चेहरा ऊपर की तरफ उठाया, तब कही जाफर उसकी नजर माधव पर पटीनेकिन इसमे पहले उसकी समझ में कुछ आए, वह कुछ कहे, माधव ने अपनी बेटी को, एक झटके में पटोले मे नीचे उतार लिया। माया चीसकर जमीन पर परार गई। माधव उमका हाप पकड़कर खींचता हुआ बाहरी कमरे में ले गया। बाहरी कमरे तक पहुचते. पहुंचते उसके हाथ से माया फिमल गई। माधव के हाथ से फिसलते ही माया उठकर खड़ी हो गयी। लेकिन माधव ने एक अटके में उसके बाल पकड़बार, सीधे दरी की तरफ ढकेल दिया । माया गजे. शिनक और मोटे के ठीक सामने दरी पर जाकर गिर पड़ी। इतनी देर में ममता बाहर निकल आई। इमी बच्चो के लिए ही तो 18 : हलो । - ममता जिन्दा थी, खूखार गुंडों, शराब की बोतलों और सिगरेट के धुएं के बीच अपनी बेटी को पड़ा हुआ देखकर ममता के दिमाग में खून चढ़ने लगा । माधव की पीठ थी उसकी तरफ । वह हांफ रहा था और लड़खड़ाता हुआ दस-दस के नोट की गड्डी की तरफ बढ़ रहा था । तभी अचानक दाहिनी तरफ से, पूरा जोर लगाकर ममता ने, विफरी हुई शेरनी की तरह, माधव को दीवार की तरफ ढकेल दिया। झपटकर उसने माया को उठा लिया। इससे पहले गंजे, झिनकू और मोटे की समझ में कुछ आए, वह करीव-करीव दौड़ते हुए अन्दर की तरफ चली गई । अन्दर घुसते ही, उसने माया को छोड़ दिया और अन्दरूनी दरवाजे को वन्द करके सांकल लगा दी। ममता ने जब माधव को धक्का दिया, वह हिसाब लगा रहा था। बोतल में शराब बाकी थी और सामने दरी पर हजार रुपये के नोट रखे थे । गंजा वापस तख्त के ऊपर जाकर लेट गया था, मोटा उछलकर पीछे चला गया था और झिनकू ने बाहरी दरवाजे की चौखट पर खड़ा होकर बोतल मुंह में लगा ली थी। माधव और दरी के बीच थोड़ा-सा फासला बचा था । वह करीब-करीव घिसट रहा था। उसकी सांस फूल रही थी। उसके चेहरे से पसीने की धार बह निकली थी। दरी पर रखे हुए नोट, छोटे-बड़े आकार में, कैमरा के जूम की तरह, दूर बड़ी दूर से करीब आते जा रहे थे। एक झनकदार आवाज, ताल, स्वर और गूंज में डूबी हुई एक महीन खूब- सूरत आवाज, उसे सुनाई देने लगी थी । माधव ने उस आवाज से चेहरा भी जोड़ लिया। वह चेहरा था दुलारी का जिसने चन्द दिनों पहले ही उससे पांच सौ रुपये मांगे थे, अपने इलाज के लिए । गाहे-बगाहे माधव, दुलारी के कोठे पर पहुंच जाया करता। वह एक गजरे और मिठा दोने पर माधव को अपना सब कुछ दे दिया करती । माधव को दुस् । - हलो: 19. । बढाया। उमी दक्त दाहिनी तरफ में ममता ने पूरा जोर लगाकर उसे घका दिया था। ममता के धक्के को माधव बर्दाश्त नहीं कर सका । वह मीधा मिटकी मे लगी दीवार के पान जाकर गिरा । उमका मिर, दीवार के निचले हिस्ने में लड़कर भिड़ गया था। एक बार उमने उटने की कोशिश की लेकिन फिर गिर पड़ा। मिनकू निहायत डरपोक किस्म का आदमी या। उमने माधव को गिरते देखा और फिर विफरी हुई गेरनी की तरह ममता को अंदर आते हुए देवा । इमी बीच मोटा भागार नन्त के नीचे छुप गया था। इसमें पहले गना उमे और कुछ करने के लिए उपनार, शिनर दवे पांव बाहर निकलकर वम्नी के अंधेरे में सो गया। अंदर का दरवाजा बन्द होते ही गजा तत्त में टटकर गुहा हो गया। उसने मोटं को तम्न के नीचे घुमते हुए देखा था । लेकिन मोटे मे पहले उसे माघद की प्रवर लेनी थी। माधव गे तरफ बढने वक्त उमने पहले तो वह बोतल लात मारकर उछाल दी जो जल्दी में मोटा तप्त के किनारे छोड गया था और फिर कमरे के दूसरे कोने में पड़े माधव के पाम पहुंच गया। तब तक मोटा भी बाहर निरल वाया था। उनने गजे की तरफ देखा जो माधव के करीव डाकर बैठ गया था। गंजा बमल में माधव को उठाने की कोशिश कर रहा था, नविन माधव भला कहा उरने वाला था। वह तो उम म्यिनि में पहुंच गरा या जहा उमे किसी चीज की सुध बाकी नहीं बची थी। तभी माधव को छोडकर गजा उन छोटे दरवाजे के पास पहुंच गया जिसने होकर ममता अदर गई थी। गंडे को अन्दरूनी दरवाजे को नरफ जाते हुए देवकर मोटा भी बागे वढ आया । दह दरी किनारे तक वा गया था तब उसे दरी के वोचो. वोच बोतल से दये हुए नोट दिखाई दिए ये 1 एक पल में उसने माधव को देवा और दरवाजा पीटते हुए गंजे को देखा और दूमरे ही क्षण झुककर उमने नोट उटा लिए । अभी मोटे ने पूरी तरह नोट उठाए भी नहीं थे कि रमे गजे की तेज बावाज सुनाई दी। गजा चीनकर उसे बुला रहा था,. दरवाजा तोड़ने के लिए। गंजे की यादाज के माय ही कुछ नोट मोटे के हाथ से छूटकर गिर पड़े। तभी पीछे मुड़कर गजे ने मोटे की हरकत देस - *20 : हलो ली और उसकी तरफ दौड़ा । गंजे को अपनी तरफ दौड़ते हुए देखकर मोटा सर पे पैर रखकर बाहर की तरफ भाग गया। गंजे ने पहले तो दरी पर 'विखरे हुए नोट उठाए और फिर मोटे को पकड़ने चल दिया । ममता के पास वक्त नहीं था। माया को गुंडों के बीच से उठाते समय, उसने वह नोट की गड्डी देख ली थी जिसकी तरफ माधव लड़- खड़ाता हुआ बढ़ रहा था । उसे मालूम था, एक और हमले का उसे सामना करना था । वह दरवाजा जिसके पीछे वह थी, जरा-सी हरकत से लात मारकर खोला जा सकता था। ऊपर से तीन गुंडे वहां मौजूद थे, शराब की बोतलें थीं और नोट की गड्डी थी। ममता ने बेचैनी से इधर-उधर देखा । तभी उसे अन्दरूनी दरवाजे के पीटने की आवाजें सुनाई दी । गंजा, मोटे को दरवाजा तोड़ देने को उकसा रहा था। ममता पीछे हटकर आंगन में आ गई। आंगन में पहुंचते ही उसकी नजर उस दरवाजे पर पड़ी जो पिछली गली में खुलता था। उसने तेजी से आंगन का बाकी हिस्सा पार किया और दरवाजा खोलकर गली निकल गई। दो - 'घर के बाहर निकलते ही ममता ने वेतहाशा भागना शुरू कर दिया था । माया भी उसके पीछे दौड़ रही थी। ममता को उस वक्त कहीं भी, किसी भी ऐसी जगह पर पहुंच जाने की जल्दी थी, जहां पर माया को वह कुछ दिनों के लिए छोड़ सके। उसे मालूम था, अपने घर में माया के लिए - कोई ठिकाना नहीं था। माधव वहशियत के उस मुकाम पर पहुंच चुका था, जहां उसके लिए अच्छे और बुरे में फर्क करना तो दूर रहा, खुद अपनी बेटी माया को चन्द पैसों के लिए या शराव की एक बोतल के लिए बेच देना मामूली बात थी। उसके चारों तरफ अंधेरा था -और वह भागती चली जा रही थी। उसे कोई ऐसी जगह नहीं नजर आ रही थी, जहां वह माया को छोड़ सके। काफी दूर निकल आने के बाद, । हलो: 21 जम उसे विश्वास हो गया, कोई उसका पोका नहीं कर रहा था, वह पानी के एक नल के पास एक गई। वहीं जाकर उसे मारा का पाल' आया। घबड़ा कर उसने पीछे मुडकर देखा तो कुछ दूर पर मायरा दोडती हुई आ रही थी। उसके चेहरे पर खौफ या, दहशत यो और नन्हे-नन्हें न जाने कितने सवाल थे। वह दौड़कर मां से लिपट गई। माया कुछ देर तक मां को देखती रही और तभी उसने रोना शुरू कर दिया। उसकी सिम- कियों की आवाज, वातायन के सामीपन मे, दूर-दूर तक खाली हवाओं के झोकों को छूकर लौटने लगी। उम वीरान सड़क पर ममता को समझ मे जब कुछ भी नहीं आया तो वह भी फूट-फूटकर रो पड़ी। मा को रोता हुआ देखकर माया की सिसकिया रकने लगी और वह ममता को चुप कराने लगी। दूर-दूर तक ममता के सामने काली लहराती हुई सड़क यो और था एक घुटा हुआ सन्नाटा । बस्ती से कुछ बाहर निकल आयो यी वह । उस दिन कितने दिनो बाद एक अहसास ममता के अन्दर करवट बदलने लगा था। जहा एक तरफ उसके सामने अनेक मवाल थे. उन सवालो से जुड़ा हुआ, अनन्त विस्तार में फैला हुआ, रेत का गुबार या जिसमे घिरी हुई सी वह, पल-पल के लिए, संघर्ष कर रही थी, वहीं दूसरी तरफ एक कमक थी, वीने हुए दिनों की वह या घी, जिन्होंने उसे जिंदगी के उस मुकाम पर ले जाकर पटक दिया था, जहा जी सकना और मर जाना बेमानी था, उसके लिए। ममता हमेशा से ऐसी नहीं थी, माधव हमेशा से ऐसा नहीं पा। यह तो वक्त था, जो न जाने कहां से एक भयानर. घिनौनी शक्ल में सामने आकर खड़ा हो गया था। छोटी-मी थी वह जब उसके जीवन में शिवा आ गया था। एक सुनहरे स्वाद की तरह, जिदगी के हर लमह में, धड़कन में समापा हुआ, कितना-कितना प्यार वह अपनी सासों में बटोर लिया करती थी। एक दिन उमे पता लगा था शिदा ने दौलत के लिए किसी और से शादी कर ली है । तर कितना सईया ममतार टूटकर विपर गई थी। अपने जिस्म से, अपनी रुहान दुनिया की हेरी से उसे नफरत हो गई थी। वह जान देना चाarches *22 : हलो - ‘लिए मरती वह, यह सवाल था उसके सामने उस समय ! जिस शिवा ने उसे धोखा दिया, उसके लिए वह जिंदगी मिटा दे, खत्म हो जाए, यह कौन-सा भरम था, यह कौन-सी. कुर्वानी थी, माधव ने ही तो उसे बताया था । एक सैलाव की तरह माधव उसकी जिंदगी में आया था और उसकी नफरत, उसकी निराशा, उसके सारे-समूचे अस्तित्व को बहा ले गया था। सब कुछ पीछे छूट गया था। और फिर उस समय दूर-दूर तक, पीछे कहीं कुछ भी रोक सकने वाला नहीं था उसके पास । शिवा ने कुछ भी तो 'नहीं छोड़ा था पकड़ सकने के लिए। माधव की हालत बिगड़ने लगी। एक के बाद एक नौकरी मिली उसे, लेकिन कहीं टिक नहीं सका वह । नाकामियों ने माधव को तोड़ना शुरू कर दिया था। एक बार जब उसका टूटना शुरू हो गया, तव उमे ममता भी रोक नहीं पाई, वह टूटता ही गया । और धीरे-धीरे सब खत्म हो गया। ममता की जिंदगी में बदनसीवी दवे पांव नहीं आई थी, लेकिन उसकी 'समझ में यह कभी नहीं आया था, वह कैसे माधव को बचाए और कैसे । को वचाए । . . इतने दिनों बाद, घर से निकल आने के बाद, सुनसान सड़क के किनारे रात के सन्नाटे में, अपनी रुलाई के बीच, ममता को वह लमहा याद आया, जब शिवा से अलग होने के बाद उसे मौत को गले लगाने का ख्याल आया था, जब वह जान देना चाहती थी, तव माधव ने उसे ऐसा नहीं करने दिया था, क्योंकि जान देने का मकसद शिवा था और शिवा का भरम टूट चुका था। लेकिन उस दिन ममता को लग रहा था, उसने माधव की बात मानकर गलती की थी। कौन किसका होता, तब कुछ तो -आप में जुड़ता-घटता रहता । जव इतना कुछ घट गया था, अगर वह जवरदस्ती जी लेने की जिद न करती तो उसे इतना न गिरना होता। वह मौत कितनी खूबसूरत होती, वह मकसद कितना हसीन होता! उस दिन एक बार फिर ममता के मन में वही ख्याल कुलबुलाने लगा था । लेकिन अगले ही क्षण उसने कुचल दिया उस ख्याल को, जिसे कितने-कितने साल पहले, उसने शिवा के चले जाने के बाद माधव के कहने पर एक वेकार वलिदान समझकर कुचल दिया था। उस वक्त, उस दिन खुद अपने हलो: 23 माया थी उसकी बजह । एक नन्ही, फूल-सी नाजुक बच्ची, जो उनकी बेटी थी, उस वक्त जो खौफ और दहशत के अंधेरों में भटक रही थी और जो उससे लिपटी हुई, अपनी भोली निगाहों से, नन्हें हाथ फैलाकर उमस उस जिंदगी को भीख मांग रही थी जिसका उसे हक था और जो तब तक उसे कभी मिली नहीं थी । धीरे-धीरे ममता की रलाई का दौर कम होने लगा। उसने माया की तरफ देखा । एक पूरी जिंदगी थी उसके सामने । अगर वह किसी तरह माया को वचा ले जाए तो भी शायद उसके जीने का और उसके न मर जाने का कुछ मकसद बच रहेगा। लेकिन मवाल था, वह करे क्या? माया को लेकर जाए तो जाए कहा ? माया को बचाए कैसे? माया के वालों पर, तब हाथ फेरते हुए, अपने करीव चिपटान हुए, ममता ने दूर, बडी दूर धेन निगाहो से देखा, पालीपन में डूबते हुए, उत्तराते हुए । एकाएक उसके सामने शिवा का पहरा धूम गया । पत्थर-मा बोझ था। शीशे की रेत के कण, जमे उमकी रग-रग मे घुलने लगे थे। न जाने कितनी शंका, न जाने कितना सदेह, न चाहते हुए भी, अपनी खुद्दारी, अपने अभिमान को कुचलते हुए भी ममता धीरे-धीरे उठकर पड़ी होने लगी। उमने महेश मेहता के यहा जाने का फैसला कर लिया था। शहर के जाने-माने रईम महेश मेहता ही थे, ममता के शिवा । महेश मेहता उर्फ शिवा ने ही तो ममता को उस मुकाम पर लाकर पटक दिया था, जहां उसके चारों तरफ मजबूरियो, हिकारतो का दलदल था, जिसमे वह धंनती चली जा रही थी। ममता जब तक महेश मेहता के बंगले पर पहुंची, काफी रात गुजर चुकी थी। वहां तक पहुंच जाने के बाद, ममता को लग रहा था, महेश मेहता का सामना कर सकना इतना बामान नहीं था और फिर महेश मेहता पहले जैसे नहीं थे। वह तो एक काफी वही ट्रेवल एजेमी के मालिक थे। ऐसा नही था जो वह इतने दिनों तक उनसे कभी मिली नहीं थी। माधव ने यह घर भी नहीं छोडा या। पुराने प्रेम-पत्र लेकर माधव ने शिवा को ब्लेकमेल किया था। इस सिलसिले का ममता को बड़े दिन बाद पता चला था। महेश मेहता ऊंचे ओहदे पर थे, उनके औलाद नहीं आध बार उन्होंने ममता से मिलने की कोशिश की थी। यह वह .
। - 24 : हलो भी ममता को अजीब-सा लग रहा था । एक क्षण को उसके अंदर वापस लौट चलने का विचार आया था। लेकिन माया को लेकर जायेगी कहाँ, यह सवाल था उसके सामने । लेकिन उससे बड़ा सवाल था, उस आदमी के सामने दामन फैलाने का, जिसने उसकी जिंदगी में वह आग लगायी थी, जिसमें जलते हुए, सुलगते हुए, वह खाक हो चुकी थी। यही था वह आदमी जिसने उसके मासूम सपने तोड़ डाले थे, उसे वरवाद कर डाला था और किसी सस्ते चोर की तरह उस वक्त उसे छोड़कर भाग गया था, जब वह अकेली हो गई थी, बिल्कुल अकेली। महेश मेहता के बंगले के अंदर वाई तरफ एक पतली सड़क थी और दाहिनी तरफ दूसरी सड़क। दोनों सड़कों के बीच तिकोने किस्म का बगीचा था, जिसमें वेंगन-वेलिया, मालती, केना के फूल लगे थे। फूलों की कतार से हटकर, गोलाकार हौदे के अंदर फुहारा था, जिसके चारों तरफ स्पाट लाइट लगी थीं। वायीं ओर दाहिनी सड़क के किनारे पर पन्द्रह- बीस फीट के फासले पर, लम्बे खंभों पर गोल ढक्कन के अन्दर से विजली । के बल्ब की रोशनी आयतन के आकार में निकल रही थी। तिकोने बगीचे के बाद, सामने के फाटक से सीधी चढ़ाई पर फैली हुई इमारत का पोर्टिको था। पोर्टिको के अंदर एक गाड़ी खड़ी थी। पोर्टिको से लगे हुए बरामदे की छत के ऊपरी किनारों पर, दोनों तरफ, गिलास की शक्ल के लैम्प की रोशनी, पिछले हिस्से से अंधेरे को और ज्यादा बढ़ा रही थी। हल्की-हल्की हवा के झोंकों के बीच, झीगुर की आवाज, खड़खड़ाते हुए पत्तों के बीच कभी-कभी किसी जानवर का निकल आना, रोशनी के हिलते हुए साये और माहौल में गमकती हुई फूलों की खुशबु, किसी आने वाले लमहे के इंतजार में जैसे रुकी हुई थी, थमी हुई थी। ममता के लिए फैसला कर पाना बड़ा मुश्किल था। फिर भी न जाने क्यों वह बायीं तरफ वाली सड़क पर, माया का हाथ थामे हुए चल दी। फाटक के अंदर घुसते वक्त तक उसे मालूम नहीं था, वह नहीं जानती थी, उसे महेश मेहता से मिलना भी था या नहीं। वह सोच रही थी, अपने अंदर के जजवात की पकड़ से बाहर निकल पाने की कोशिश कर रही थी। उसके सामने न तो कोई अंजाम था और नहीं कोई असलियत । वह तो वस . - हलो:25 माने आप, चाहे बिना चाहे, चुपचाप, धीरे-धीरे बंगले के अंदर चली आई यी । वह अंदर जाना भी चाहती थी और वापस भी लोट जाना चाहती थी। तभी न जाने कहां से जमीन धूमने लगी थी, फूल-पत्ते, पेड़- पांघों की डालियां हिलने लगी थी। थकन के मारे वेवस होकर पोटिको में जरा-मी दूर पर ममता लड़बड़ा कर गिरने लगी थी, तब माया ने उन पकड़कर सहारा दिया था। जिम वक्त बंगले की वाई महक पर चक्कर खाकर ममता गिरने लगी थी, दाह्निी तरफ ने महेश मेहता का बूढ़ा नौकर आ रहा था। उसने अपने क्वार्टर से पोटिको तक का रास्ता पूरा कर लिया था । वह पोटिको के अंदर घुमकर बरामदे की मीढियों पर चढ़ने वाला था, तभी उसकी निगाह माया पर पडी जो अपनी छोटी-सी बांहा ने सडम्बड़ाती हुई ममता को संभालने की कोशिश कर रही थी। वृटा नौकर वरामद की सीटियो की तरफ से मुटकर सीधे वाई तरफ की सडक की तरफ दौड़ लिया था। उसके हाय मै झोला था, कंधो पर गमझा, कची धोती के ऊपर बडी और झुरियों वाला चहरा, मिचमिचाती बांबो पर मो? फेम वाला चश्मा या। बूढ़ा नौकर ममता तक पहुंचने की कोगिरा कर रहा था। वह लडखडाती हुई ममता को देख रहा पा और देव रहा था, वैवस माया को जो ममता को मंभालने में भी गिरी जा रही थी। ममता के करीब पहुंचकर उसे सहारा दे, इमस पहल दूटा नौकर खुद ठोकर खाकर गिर पडा था । उमका झोला, उसका गमझा, उसका चरमा छिटक कर गिर गया। दुड़े नांकर तो माया ने देखा नहीं था। इसीलिए जब वह सामने आकर गिरा तो माया के मह से तेज चीख निकल गई, वह डर गई थी। तब तक ममता बैठ चुकी थी। माया की चीख ने उसकी तद्रा को एक झटके से जगा दिया था। उसने माथे पर हाथ रखा हुआ या । अपने दाहिने हाय को धीरे-धीरे ऊपर की तरफ ले जाते हुए, वह उठने की कोशिश करने लगी । इस वीच बूढ़ा नौकर अपना गमझा उठाकर धूल झाड़ने लगा था। गमझे में उलझा हुआ उसका चश्मा उने मिल गया था। धूल झाइना छोडकर उसने पहले आंखों पर चश्मा चढ़ा लिया। उस वक्त ममता उठकर खड़ी होने लगी थी। बूढे नौकर की निगाह उसके पैरों से ऊपर की तरह को दौड़ते हुए 26 : हला बढ़ने लगी थी। तभी माया ने ममता से पूछा था, "मां! पानी पियोगी , ना?" - माया के शब्द बूढ़े नौकर के कान में जब पड़े थे, उस वक्त वह सड़क पर बैठा हुआ, ममता के चेहरे को घूर रहा था। एक तेज रफ्तार में सनसनाता हुआ तीर, एक घुमनी, एक चक्कर बूढ़े नौकर के अंदर पैठने लगा था। उसने अपने को संभाला और एक झटके में उठकर खड़ा हो गया । अब वह ममता के ठीक सामने था। उस बंगले का फाटक, बाईं तरफ की सड़क से लगा हुआ वगीचा, फूल-पत्ती; पेड़-पौधे, डाल-डालियां, आसमान, जमीन बूढ़े नौकर को कुछ नहीं दिख रहा था। दिख रही थीं, उस वक्त उसे तो बस ममता की आंखें और आंखों से जुड़ा हुआ ममता का चेहरा । दर्द में छटपटाते हुए, अंतर की गहराइयों से उभरती हुई टीस और कांपते हुए हाथों को उठाकर, बीच की उंगली अलग करके, बूढ़े नौकर ने ममता की तरफ उठाते हुए कांपती हुई आवाज में कहा था, "ममता ! तुम !" ममता को लगा, बड़े दिनों बाद, न जाने कितने-कितने दिनों बाद किसी ने उसका नाम लिया था। कौन था वह, किसने उसका नाम लिया था? उसका कोई नाम भी था, उसे याद नहीं था, फिर भी उसका नाम तो था और किसी ने उसे बुलाया था। यह नाम उसका नाम, उस नाम को कहने वाली आवाज कोई जानी-पहचानी थी। जैसे उसकी जहनियत के विस्तार के किसी टूटे हुए हिस्से से जुड़ी हुई आवाज लौट-लौट कर, न जाने कहाँ से आकर, दस्तक दे रही थी। पोटिको के बगल की छत पर लगी हुई गिलास की शक्ल की बत्ती की रोशनी, सीधे बूढ़े नौकर के चेहरे पर गिर रही थी। बूढ़ा नौकर उस वक्त, दाहिनी सड़क की तरफ मुंह किए खड़ा था, ठीक ममता के सामने । ममता ने पहचानने की कोशिश की। जहां उसकी आंखें बूढ़े नौकर को देख रही थीं, वहीं दूसरी तरफ उसका मन, उसका दिमाग, यादों के दरीचों में टटोल-टटोल कर कुछ खोज रहा था, कुछ पहचान रहा था और तभी; बड़ी कोशिश के बाद, वह याद का टुकड़ा फिसलते-फिसलते, उसकी पकड़ में आ गया था, जिसके साथ एक खुशी-भरी चीख निकली थी उसके कांपते होंठों से, ? . - हलो:27 "रामू काका..." "हा ममता, वेटी." बूढ़ा नौकर अपना सिर हिला रहा था । एक सहारा मिला था । बचपन की यादो से जुडा हुआ किसी नाम का सहारा मिला था। तभी जब बूढे नौकर ने ममता के कंधे थपथपाना शुरू किया था, वह उसके सीने में मुंह ढापकर रोने लगी थी। ममता रो रही थी, बूढ़ा नौकर रो रहा था और माया देख रही थी, कभी बूढे नौकर को और कभी अपनी मां ममता को। "कहां थी तू ममता?.. मैंने तो सबर कर लिया था, कही मर-सप गई होगी तू ।" बूढ़े नौकर ने गमझे से आंसू पोछने हुए कहा था। यूढे नौकर के सोने से अपना सिर उठाते हुए, डबडवाती हुई पलकों को झपकाते हुए ममता ने कुछ कहने की कोशिश की लेकिन प्राब्द गले में ही फस गए थे। "बोल बेटी'कह डाल!" "तुमने ठीक सोचा था, रामू काका! मैं तुम्हे जिंदा दिखती हूं क्या?" "नही बेटी "नहीं, ऐसा न कह''मैं तेरा बाप नही हू, फिर भी क्या बाप से कम प्यार दिया था मैंने?" "काका !" "आओ अदर चलो वेटी..." बूढे नौकर ने झोला उठा लिया था। यह रामू काका का हुक्म था या यूढे वाप की फरियाद, यह ममता की समझ मे नही आया, लेकिन जब बूढे नौकर ने उसके कधो पर अपना एक हाथ रखा तो वह खुद-ब-खुद उसके साथ चलने लगी थी। थोड़ी-सी सडक का फासला पार कर बूढा नौकर, ममता और माया पोटिको से बरामदे के अंदर दाखिल हो गए । आगे बढ़कर बूढे नौकर ने जाली का दरवाजा खोलकर ममता और माया को अदर किया और फिर जाली के दरवाजे मे चिटकनी लगाकर, दूसरा दरवाजा भी वन्द कर दिया। गैलरी के बगल में दाहिनी तरफ महेश मेहता की बैठक थी। बूढा नौकर दोनो को बैठक के अदर ले गया और उन्हे सोफे पर बैठाकर, करीव- करीव भागता हुआ अदर की तरफ गया। ममता ने इस बीच अपनी अस्त- - 28 :हलो व्यस्त धोती को ठीक कर लिया था और माया के सिर पर हाथ फेरने लगी थी। तभी बूढ़ा नौकर अंदर से वापस आ गया। उसके हाथ में दो गिलास पानी के थे । उसने एक गिलास ममता को दिया और दूसरे गिलास से माया को पानी पिलाने लगा। लेकिन माया ने गिलास ले लिया और पानी पीने लगी। बूढ़ा नौकर माया के गिलास लेते ही अंदर चला गया, "अभी बुलाता हूं साहब को" कहते हुए। ममता देख रही थी, महेश मेहता का वैभव । उस आलीशान बंगले की ऊंची छत वाली बैठक में, कीमती कालीन के ऊपर पैर रखते उसे डर लग रहा था । धूल-भरे पैर, मैले-कुचैले कपड़े पहनकर, गद्देदार सोफे पर वैठते वक्त उसकी रूह कांप गई थी। उसे बार-बार अपनी गलती का अहसास हो रहा था, वह सोच रही थी, आखिर वह यहां आई क्यों ? माया के लिए ना? लेकिन अगर महेश मेहता ने माया को रख लेने से मना कर दिया तो? फिर माया उनकी लगती कौन है ? माया को वह रखने वाले ही क्यों थे? उसका कौन-सा हक था, किस रिश्ते से वह यहां आई थी? और फिर इतने दिनों बाद, आज, इस हालत में, जब वह पूरी तरह टूट चुकी थी, क्या उसे यहां इस तरह, रात के वक्त आना चाहिए था? न जाने कितने सवाल उसके अंदर घूम रहे थे, उसे, उस वक्त, खुद अपने आप से घिन आने लगी थी। एक तरह की वितृष्णा, एक खास तरह का डर, उसके अंदर उठकर खड़ा होने लगा था। उसने माया की तरफ देखा था। माया उस वक्त अपना सिर उठाए, वह सब कुछ देख रही थी, जो उसने कभी सपने में भी नहीं देखा था, जाना था। उसके अंदर का मोह, एक बार उसे कमजोर बनाने लगा था। क्या कभी वह खुद ऐसी जगह रह सकती थी? ममता ने माया की जगह स्वयं को रखा और तब उसे माया की नादान निगाहों में एक हसरत, एक सुनहरे ख्वाब की परछाई नजर आई थी। पर दूसरे क्षण उस अनजाने उधार के सुख की चाहत को कुचल डाला था उसने । वह उठकर खड़ी हो गई। उसके उठकर खड़े होते ही माया भी चौंक कर उठ गई थी । ममता ने इतनी देर में वहां से चले जाने का फैसला कर लिया था। वह सोफे के सामने से चलकर माया के करीव आई, उसने माया के सिर पर हाथ फेरा और दरवाजे की तरफ बढ़ने - ~ हलो: 29 लगी, तभी उमे महेश मेहता की आवाज सुनाई दी थी, "क्या देख रहा हूं, ममता · तुम..." एक आश्चर्यजनित खुशी के साय महेश मेहता ने कहा था। अब तो ममता के लिए चला जाना मुमफिल नहीं पा। महेश मेहता के आ जाने के बाद, उनकै शब्दों से प्रलक्तीहुई खुशी ने, काफी हद तक ममता की हिचक दूर कर दी थी। वह दरवाजे से वापस लौट आई और उसी सोफे के पास खड़ी हो गई, जहां से उठकर भी बाहर जाने लगी थी। "हां, शिवा । आज में तुमसे कुछ मांगने आई थी।" ममता को आवाज मे दर्द या। “ममता । तुम मुझसे कुछ मांगोगी कभी, ऐमा मौभाग्य मेरा है क्या? कितना कर्ज है, तुम्हारा मेरे ऊपर!" "कर्ज?" "हा ! पूरी एक जिंदगी का कर्ज, जिसे मात जन्म में भी चुका पाळगा मला?" "वह मैने कब कहा। मैं यहां किसी हक से तो आई नही !" "हक मानो तो है, न मानो तो अच्छा बैठो तो।" "यह माया है, मेरी बेटी," ममता ने मोफे पर बैठते हुए कहा । "जानता नहीं हू क्या ?" माया को दुलराते हुए महेश मेहता ने उसे अपने पास खींच लिया । माया एक पल को झिझकी, फिर ममता की तरफ देखने लगी। ममता के चेहरे पर कोई विरोध न देखकर वह महेश मेहता के पास बैठ गई। "क्या हालत है ममता तुम्हारी? हे भगवान, क्या इस पाप से मैं कमी उवर पाऊंगा?" महेश मेहता ने सांम निकालते हुए कहा । "कौन-सा पाप? किम कर्ज को बार-बार याद दिलाने हो तुम?" ममता ने सोफे पर अपने कपड़े ठीक करते हुए व्यय से कहा। "नाराज हो न"बहुत नाराज हो मुझसे, फिर मुझे कुछ महती क्यों नही...?" "अव उन बातों को कहने से क्या होगा? वह वक्त की मार थी... शायद मेरी ही तपस्या में कुछ कमी होगी।" "नहीं"नहीं..कभी नही" तुम्हारी तपस्या"इस तरह तुम्हारा
30 :हलो
जी लेना यही तो है वह पीड़ा जो मेरे मन को सालती रहती है । तुम्हारा
न होना''मुझे लगता है, जैसे खालीपन 'धुप अंधेरों में जैसे हर वार
मुझसे कुछ-न-कुछ फिसलकर छूट जाता रहा है ।"
"शिवा, मैं जरा जल्दी में हूं।" ममता ने वात काट दी थी।
"वोलो न ममता"
"हमारी हालत तो तुम्हें पता होगी न ?"
"हां !" महेश मेहता ने धीरे से कहा।
"इधर कुछ दिनों से माधव कितना गिर चुका है, इसका भी अन्दाज
होगा तुम्हें ?"
"कुछ-कुछ पता है मुझे।"
"उस घर को, जिसमें मैं रहती हूं, जहां मेरी बच्ची है, माधव ने एक
ऐसी घिनौनी तस्वीर का हिस्सा बना दिया है, जहां अब और जी सकना
मुमकिन नहीं है । माधव एक वहशी जानवर बन गया है । शराबी, जुआरी
तो कई होते हैं लेकिन यह चीजें अब तक उसके जिस्म को नहीं, उसकी रूह
को मार चुकी हैं।"
"मैंने कोशिश की थी, माधव को समझाने की..."
"कोई नहीं समझा सकता है उसे ! अब वह खत्म हो चुका है"
मैं भी खत्म हो चुकी हूं। नशे की परत से उबरते ही उसकी हिंसा शुरू
हो जाती है । घर से जेवर-गहने, कपड़े-लत्ते तो कब के बिक चुके थे और
अव..."
"और अब...?"
"और अब जंगली, खूखार जानवर की तरह मेरी इज्जत ममता
फूट-फूटकर रोने लगी थी।
"मैं एक बार और कोशिश करता हूं।"
"उससे होगा क्या, सबसे कर्ज लिया है उसने ! पैसे-पैसे का मोहताज
है वह । गुंडे, शरावी, वदमाश उसके साथ आते हैं, और घर में बैठकर
कच्ची-पक्की शराब पीते हैं, जुआ खेलते हैं, उसके साथ 'माधव के
साथ, उसकी वीबी का, उसकी बेटी का सौदा करते हैं। कई बार मेरी
-
लो:31
इज्जत लूटने की कोशिश हो चुकी है। कितनी बार मेरे कपड़े उतर चुके
"तुम ममता उसे छोड़ क्यों नहीं देती ?"
"मैं अपने लिए नही आई हूं यहां।"
"फिर भी अगर तुम तलाक लेना चाहो.."
"मेरा सब कुछ चुक गया है, मुझे भुला दो शिवा !"
"नहीं ममता ! मैं "मैं तुम्हें भुला सकता हूं भला! मैं तो कहता हूं,
तलाक लेकर यहां क्यों नहीं था जाती?"
ममता कुछ देर महेश मेहता को घूरती रही, "मैं यह तो न कहूगी
शिवा, तुम एक कमीने इन्सान हो, लेकिन हा, इतना जरूर कहूगी, यह
चेशुमार दौलत, यह रुतबा जो है तुम्हारे पास, इसे पाने के लिए ही तो
तुमने मुझे छोडा या न?"
"लेकिन इसे पाने के वाद..."
"इसे पाने के बाद, उसे छोड़ने के बाद, ऐसा हुआ, वैसा नहीं, यह सब
कायर कहते हैं । तुमने शिवा ! इस दौलत को पाने के लिए, मुझे छोड़ा था
न! और आज जब वह औरत नही रही, जिसकी वजह से तुमने यह दौलत
पाई, तो फिर वही पहुंच जाना चाहते हो, जहा मे तुमने अपना खेल शुरू
किया था !"
"ममता, मुझे समझने की कोशिश करो-वह औरत बदचलन थी,
इसका पता मुझे बड़ी देर बाद लगाया।"
"और अव ! मुझे बदचलन बनाना चाहते हो?"
"मैंने ऐसा तो नहीं कहा
"तुम सब एक जैसे हो, सब कुछ कर डालने के बाद, उस हर चीज का
जवाव है, तुम्हारे पास जो तुमने भोगी है, जिसका तुमने उपभोग किया है।"
"मैंने क्या पाया है और क्या भोगा है" मैं ही जानता हूँ । कभी कहा
तो नहीं तुमसे । आज जब तकदीर ने तुम्हे ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया
था..."
"लेकिन वह मुकाम ऐसा नहीं है, जहां हम मिल सके।"
"क्यो?"
32 : हलो "तुमने मुझे समझ क्या रखा है, शिवा ! इस आलीशान बंगले में, ऐशो-आराम की इस जगह पर, तुम्हारे साथ मैं रहूंगी."उस दौलत को मैं भोगूंगी, जिसने मेरा संसार उजाड़कर रख दिया था "फिर हमारे और क्रिमनल्स के बीच फर्क ही क्या रह जाएगा? "मुझे इसमें न लपेटो शिवा .."थोड़ा-सा सुख जब मेरे भाग्य में नहीं था, तो इतना सुख, इतना आराम भोग पाऊंगी भला !" "ममता ! यू आर रीयली ग्रेट । आई रेसपेक्ट यू !" "ग्रेट क्या हूं, मुझे वह सब कह लेने दो, जिसके लिए मैं यहां आई हूं। आज तो हद हो गई ! यह नन्ही-सी बच्ची, छोटी उम्र से अपने वाप के कार- नामे देखती रही है । माधव के जुल्म, उसका वहशीपन, घर की मनहूसियत, इसके अंदर खौफ की न जाने कितनी अंधेरी ढलाने बना गया है। यह कभी संभल पाएगी, इसका शक है मुझे। थर-थर कांपने लगती है यह माधव को देखकर । घर में गुण्डे-बदमाश जो आते हैं न, इधर कई दिनों से इसकी ताक में थे। आज उन लोगों के हाथ माधव ने इसे, अपनी बच्ची को वेच दिया था। बड़ी मुश्किल से इसकी जान बचाकर भागी हूं।" "ओ गॉड !” महेश मेहता का चेहरा तमतमा गया था। "तभी तो लाई हूं, इसे तुम्हारे पास !" "लेकिन तुम कहां जाओगी ?" "और कहां, उसी नर्क में ।" "तुम मेरी बात मानती क्यों नहीं ?' 'यहां नहीं रुकना चाहती हो न, न रुको, कहीं और तुम्हारे रहने का इंतजाम कर सकता हूं मैं ।" "लोग तुम्हारी रखैल कहें मुझे, यही चाहते हो न ?" "यू आर डिफीकल्ट टू अंडरस्टैंड, बेरी डिफीकल्ट, ममता !" "अब मैं जाऊंगी शिवा ! कहीं माधव यहां आ गया तो..." "यह जिन्दगी, कितनी मुश्किल चीज है न?" "है भी और शायद नहीं भी..." "लेकिन, तुमने इसे और अधिक मुश्किल नहीं बना दिया है क्या?" "मैंने "तुम"तुम शिवा, मुझे दोप दे रहे हो "मैं तुम्हें दोप दूंगा, भला ! मैं तो आज अपनी भूल का पश्चात्ताप - हलो:33 करना चाहता हूं।" "कुछ भूलें ऐसी होती हैं, जिन्हें ठीक नहीं किया जा सकता और फिर जिन्दगी से पूरा-समूचा, विना टूटे हुए निकल आना, कितना कठिन होता है है न शिवा।" "सच में!" "अच्छा तो मैं चलती हू. अब मेरी बच्ची का ख्याल रखना।" ममता का गला रुध गया था। सोफे से उठकर वह माया के पास आकर रुक गई। बैठक के बीच वाली गोल मेज के पास महेश मेहता खडे थे। उन्होंने इसी वीच अपना पाइप सुलगाना शुरू कर दिया था। उधर माया की समझ मे कुछ भी नहीं आ रहा था। इतने बडे घर मे, इस कीमती साज-सामान के बीच, इतने बडे-बड़े लोग, कितनी वडी बातें कर रहे थे। उसका तो मामूम दिल धडक रहा था, उसका नन्हा-सा दिमाग हिसाब लगा रहा था, वस यही सोच रही थी, कहीं उसका भी ऐसा ही घर होता, जहां वह एक राजकुमारी की तरह रहती। यह तो परियों का देश था, किसी खूबसूरत ख्वाब में, उस वक्त वह डूबती जा रही थी, सोती जा रही थी, जब ममता उसके करीब आकर रुक गई थी। मां के करीब आते ही, माया उठकर खड़ी हो गई थी। ममता ने अपने दोनों हाथ फैला दिए थे, जिनमें आकर वह समा गई । खूब प्यार किया था ममता ने उसे । उसके माथे पर, उसके बालो पर हाथ फेरा, उसके गाल चूमे, उसे अपने सीने से चिपरा लिया । माया बेहद उदास हो गई थी। डरी हुई, सहमी हुई, वह मा से लिपटी जा रही थी। उधर किसी अनजाने दर्द को कचोट मे कराहते हुए, ममता ने धीरे-धीरे मामा को उसी तरह अलग किया था जैसे कोई अपने जिस्म का हिस्सा, अपनी जहानियत का टुकड़ा, अपनी रूह का जजया अलग करे । अदर से छटपटाते हुए भी ममता ने अपने आसू रोक लिए थे और माया के कान में फुसफुसाते हुए कहा था, "तुझे बेटी यही रहना है । आज से इन्हे अपना पापा समझना और मुझे भूल जाना।" एक मा के लिए यह बहुत बड़ा फैसला था, लेकिन उसे मालूम था, वह कुर्बानी उसे देनी थी। अफसोस क्या करना था उसे, अफसोस करने से 34 : हलो - - - होना भी क्या था, इसीलिए तो उसने अपने मन को मार लिया था, अपने ऑसू भी कुचल डाले थे । और फिर अफसोस तो तब होता,उसे होता जिसने पहले कुर्बानी न दी हो। आज इस वक्त तो उसे लग रहा था, उसकी जिन्दगी वारूद का एक ढेर थी, जिससे उवलकर वक्त-बेवक्त, एक आग का दरिया, आज से नहीं, हमेशा-हमेशा से, उसके अंदर उसके मन को, उसके शरीर को, उसकी आत्मा को निगलता रहा है । वह जानती थी, खुद को वचा 'पाना उसके लिए नामुमकिन था, लेकिन अगर कहीं माया वच जाय तो शायद, मरने से पहले कोई तो काम वह कर जाएगी। "यहीं रहना और मुझे भूल जाना!" बस इतना ही कह पाई थी ममता "उस वक्त अपनी वेटी से। इसके बाद उससे और कुछ कहा नहीं गया था। उसने शिवा को नहीं देखा, माया को नहीं देखा, उस बैठक को, दीवार को, किसी चीज को नहीं देखा और दरवाजे की तरफ चल दी। लेकिन वह आगे नहीं बढ़ पाई। उसका आंचल माया के हाथ में था । उस आंचल में अपने को लपेटते हुए, वह एक बार फिर माया के पास लौट आई। उसके हाथों से अपना आंचल छुड़ाया, माया का माथा चूमा और भागकर बैठक से बाहर चली गई। ममता जव तक बैठक से लगी हुई गैलरी पार करके पोटिको तक पहुंची, महेश मेहता आ गए थे। “ममता, रुक जाओ ! मैं तुम्हें गाड़ी से छोड़ने चलता हूं।" महेश मेहता ने कहा। इससे पहले कि महेश मेहता अंदर की तरफ गाड़ी की चाभी लेने को 'चलें, ममता ने उन्हें रोक दिया, "क्या हो गया है, शिवा तुम्हें ?" इतनी रात गए तुम मुझे छोड़ने चलोगे !" "नहीं तो क्या अकेली जाओगी?" महेश मेहता ने पीछे घूमकर ममता से पूछा। "मैं रामू काका के साथ चली जाऊंगी। तुम अंदर जाओ शिवा, माया •अकेली है ना।" "तो मैं रामू काका को भेजता हूं।" कहकर महेश मेहता अंदर चले गए। ममता उसी रास्ते से होकर बंगले से बाहर जा रही थी, जिधर से . .
हलो:35 अभी कुछ देर पहले वह आई थी। रामू काका उसके साथ था और दोनों चुपचाप बंगले के बाहर निकल आए थे । वंगले के बाहर निकलकर ममता और रामू काका ने पैदल ही वस्ती की ओर चलना शुरू कर दिया। लेकिन कुछ ही दूर चलना पड़ा था उन्हें जब एक रिक्शा मिल गया था। रिक्शे में पहले ममता बैठी और फिर रामू काका। आधी रात गुजर चुकी थी। सडक पर सन्नाटा था। कुछ दूर निकल आने के बाद ममता ने ही पहल की थी, "रामू काका! मेरी बेटी का ख्याल रखना!" "अरे ममता ! इस यान की तुम जरा भी चिंता न करना । तेरी बेटी को मैं वैसे ही पालूगा, जैसे मेरी अपनी बेटी।" "अब मैं कभी नहीं आऊगी रामू काका !" "क्या कह रही हो तुम अपनी बेटी से नाता तोडकर जा रही हो?" "और क्या काका!" ममता की आंखो से दो आंसू टपककर रामू काका के हाथों पर गिर पड़े थे। रामू काका के हाथ पर टपके हुए बांसू ममता के मन में जागती हुई उस टीस से निकले थे, जो पहली बार अपनी बेटी को छोडकर आते वक्त पैदा हुई थी। एक थरथराहट, एक हनक, हुमकतो हुई उमके अंतस्तल में कंपकंपी की लहर दौडा गई थी। उसके मामने काली रात मे डूबा हुआ आसमान था और दूर-दूर तक फैली हुई मितारों की वह दुनिया थी, जिसमें न जाने कितने-कितने दिनों में वह ढूंढ रही थी, अपनी किस्मत का एक सितारा । इधर कुछ दिनो से उसे लगने लगा था, उसका सितारा वही था जो टूटकर आसमान में गिर जाता था और न जाने कहा वातायन के अंधेरों मे खो जाता । उमने कितनी-कितनी बार उम सितारे को ढूढा था, तलाश किया था। और आज वह फिर देख रही थी उसी भासमान की तरफ, अनगिनत सितारों के बीच, कही से टूटकर कोई मितारा गिरे, एक वार, सिर्फ एक बार, गिरने के बाद वह सितारा उसकी मुट्ठी मे समा जाय और वह फिर कभी ना खोले उस मुट्ठी को। "ममता! याद है तुझे "क्या काका ?" ममता ने आसमान से अपनी नजर
36 : हलो
पलकों से रामू काका की तरफ देखा ।
"आज से बारह बरस पहले, इसी तरह तू मेरे साथ रिक्शे में बैठकर
आई थी।
ममता ने अपनी आंखें दूसरी तरफ फेर ली।
"शिवा उस दिन पहली बार नौकरी पर जा रहा था और तू मेरे साथ
उसे स्टेशन छोड़ने गई थी।"
"हां काका !" ममता ने धीरे से कहा ।
"और इसी तरह, तेरी आंखों से दो आंसू टपककर मेरी हथेली पर
गिरे थे।"
"काका ! मैं वडी अभागिन हूं। उस दिन शिवा को छोड़कर आई तो
फिर शिवा से न मिल सकी और अब अपनी बेटी को..."
"ऐसा ना कह मैं तो हूं न'' और फिर तेरा शिवा पहले जैसा नहीं
"यह बात नहीं है काका !"
"तव?"
"हर मां अपनी बेटी को डोली में बैठाकर विदा करती है और एक
मैं हूं..."
-
"तू मजबूर है...
"हां काका ! माधव के होते हुए भी. "
वस्ती के करीब वाली सड़क पर रिक्शा पहुंच चुका था। ममता ने
रिक्शा रुकवाया और उतर पड़ी।
"काका, अब तुम जाओ..."
"तू अपना घर नहीं दिखाएगी मुझे ?"
ममता ने रामू काका की तरफ देखा । उसकी आंखें गीली होने लगी
थीं । रामू काका की तरफ ज्यादा देर नही देख पाई थी वह । उसने अपनी
आंखें नीचे की तरफ झुका ली और नाखून से जमीन कुरेदने लगी।
"तुम्हें तो याद होगा काका !"
"क्या?"
"क्या-क्या सपने थे घर के !"
हलो:37 "हाँ!" रामू काका के मुंह से ठंडी सांस निकल गई। "तो यह घर अब क्या देखोगे काका !:"मैं चलती हूं।" रामू काका के जवाब का इंतजार नहीं किया ममता ने और पीछे मुड़- कर चली गई। रामू काका दूर तक ममता को जाते हुए देखता रहा और जब ममता उसकी आँखों मे ओझल हो गई तव अपनी पलकें पोंच्ने हुए वह विशे में जाकर बैठ गया। ममता गली की तरफ से ही घर के अंदर माई थी। मांगन में आकर उसने देखा, दरवाजा अभी तक अदर से वद था। वह चुपचाप माकर खटोले के पास खड़ी हो गई। तभी उमे माधव का ख्याल आया । थके मन से उसने कुडी नीचे की तरफ गिराई और दरवाजा खोल कर उसने देखा, बाहरी कमरे में कोई नहीं था। वह बाहरी कमरे में आ गई। उसने बाई तरफ देखा, जहां माधव वेदम, बेहोश-सा पड़ा हुआ था। ममता धीरे-धीरे माधव की तरफ बढने तगी। माधव के करीब जाकर कुछ देर देखती रही। तमो वक्त बसे घर के खुले दरवाजे की याद आई । माधव के पास से हट- कर वह बाहरी चौखट तक आई और उसने दरवाजा बंद कर दिया। दरवाजा बंद करने के बाद वह वापत माधव के पास पहुच गई। एक बार उसने सोचा वह माधव को उठाकर तख्त पर लेटने के लिए कहे, लेकिन दूसरे ही क्षण उमे अहसास हो गया कि इस स्थिति में माधव को उठाना ठीक नहीं होगा। वह वापस तख्त के पास गई और वहां से एक तकिया उठाकर उसने वही मुश्किल के बाद, माधव के सिर के नीचे रख दिया और पद वही बैठ गई। ममता उस वक्त माधव को देख रही थी। माधव बडी गहरी नींद में सो रहा था। उसकी सास तेज चल रही थी और उसकी गर्दन एक तरफ को लुढक आई थी। माधव के पास मे कच्ची शराब के भभके ना रहे थे। एक तो बेटी को छोडकर आई थी वह, ऊपर से शिवा ने उससे माधव को छोड़कर अपने साथ रहने के लिए कहा योर उसने वही सख्ती से शिवा प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। ऊपर से लौटते वक्त रामू काका ने पुरा यादों के जन्म कुरेद दिए थे। ममता का मन एक मजीव-सी तपन में जरत लगा था। शराब को भभक माधव के मुह से बरावर आ रही थी। पूर 38 : हलो । कमरा जैसे शराब की भट्टी-सा जल रहा था। चारों तरफ बोतलें उल्टी- सीधी पड़ी हुई थीं। ममता को याद आया जब पहली बार माधव शराब पीकर आया था । उसके पैरों पर गिर पड़ा था, उससे माफी मांगी थी उसने। उसे लगा वेचारा माधव भी उतना ही बदनसीव था जितनी वह ! जिंदगी ने माधव को कभी संभलने का मौका ही नहीं दिया । उसे लगा जिंदगी और मन, हकीकत और सपना यह दो अलग-अलग चीजें हैं। और जिस वक्त यह एक साथ जुड़ती हैं, वह वक्त वहुत पीछे, बहुत पहले छूट. गया था। कसूर न तो माधव का था और न ही नियति का, कसूर तो था सिर्फ उस भरम का जिसे एक वार टूट जाने के बाद उसने जोड़ने की कोशिश की थी। वह थक गई थी। माधव के कच्ची शराव के भभके जव उससे और बर्दाश्त न हुए तो वह उठकर अंदर चली गई। तीन ममता के चले जाने के बाद महेश मेहता ने माया को बड़े प्यार से घपथपाया और धीरे-धीरे उसे दीवान की तरफ ले गए। दूध का गिलास उसे उठाकर दे दिया। कुछ हिचक के वाद माया ने एक वार में ही दूध पीकर गिलास मेज पर रख दिया। माया के दूध पी लेने के बाद, महेश मेहता ने उसे दीवान पर लिटा दिया और अंदर जाकर एक चादर ले आये । माया के सिर के नीचे कुशन रखने के बाद उन्होंने उसे चादर उढ़ा दी। माया को सुला देने के बाद महेश मेहता को एक सुकून मिला। उनके अकेले मन में कहीं एक अहसास करवट बदलने लगा। यह अहसास उनके अंदर रह-रहकर गुदगुदी मचा रहा था। उन्होंने सारी बत्तियां वन्द कर दीं, सिर्फ बैठक के कोने में रखे हुए लैंप को जला दिया। माया को चादर उढ़ाते वक्त, पहली बार उन्होंने ध्यान से उसे देखा तो देखते रह गए थे। वह विलकुल ममता का प्रतिरूप थी। वही तीखे नाक-नक्श, गोरा रंग, - हलो: 39 बड़ी यांखें । भद्दे कपड़ों में भी, उस वक्त माया वेहद खूबसूरत लग रही थी। बार-बार उसे देखते रहने को जी चाहता था। माया के पास मे बलग हटकर, महेश मेहता एक बाराम कोच पर' अधलटे होकर बैठ गए। उनके मन में, उनके दिमाग में, उस वक्त एक घुध छाई हुई थी। ममता को बाहर तक छोड़कर, बूढे नौकर को ममता के साथ भेजकर लौटने के बाद वार-बार उन्हें ममता की बातें कुरेद रही थी। और मन में माया को देखकर एक नया अहमास करवट बदलने लगा था। इन दोनों के बीच एक फामला था, जिसे पूरा करने के संघर्ष में, उनको शस्मियत जूझ रही थी। उनके अकेले, एकाकी जीवन में ममता ने ऐमी चोट कर डाली थी, जिन सहन कर लेने के बाद भी, मन में कही पर कोई चीज कुरेद रही थी । अपने को कितना छोटा पाया था उन्होंने ! उनके सामने, जहां एक तरफ सब कुछ होते हुए भी जैसे कुछ नहीं था, और दूसरी तरफ पूरी तरह टूट जाने के बाद भी, ममता जैसे एक बडी ऊंची जगह पर खड़ी होकर, किसी पाक रोशनी में नहायी हुई, बार-बार उन अपराधों का हिसाव मांग रही थी, जो उन्होंन विए थे और जिनकी अनुभूति हमेशा-हमेशा से उन्हें तडपाती रही थी। वह आलीशान बंगला, समूचा वैभव, प्रभुत्व और सारा सुख भी उस अनुभूति की यातना में कभी उन्हें मुक्ति नहीं दिला सका था । दूर बड़ी दूर से वजनी हुई शहनाइयां धीरे-धीरे कम होती जा रही थी और महेश मेहता को लग रहा था, वह एक चोर की तरह, जिंदगी के कोने-किनारों में घुसकर ऐशो-आराम के वह टुकड़े बटोरते रह गए जो उनके किमी काम न आ सके। दूसरी तरफ आग का एक गोला था, जिसमे ममता भस्म होती जा रही थी। .''तभी महेश मेहता के चारों तरफ, गोलाकार में, हल लाल रंग की रोशनी होने लगी। वहां सफेद फ्राक पहने हुए दूध मे नहाई-सी, परों मे महावर लगाए हुए, माया आकर खड़ी हो गई। उसके सीने पर हल्की- हल्की गोलाइयां यो "वह धीरे-धीरे थिरक रही थी, अपनी मौज में डूबी हुई, मस्ती में नहाई हुई। वातायन के किनारे-किनारे से तभी न जाने कितने साजों की, तरंगों को हल्की-हल्की धुन फूटने लगी। उस धुन पर , - . .40: हलो माया ने तब नाचना शुरू कर दिया। लेकिन कुछ ही देर बाद, एक झन्नाटे- दार आवाज के साथ, एक डरावना, बदशक्ल, काले चेहरे, बड़े दांत और लंबे बालों वाला इंसान, माया की तरफ बढ़ने लगा। उसे देखते ही माया का थिरकना रुक गया। वह डर गई.."उसने चीखने की कोशिश की, लेकिन चीख गले से निकलकर उसके तालुओं में चिपक गई। उसने भागने की कोशिश की, लेकिन उसके पैर जम गए। उसके चेहरे के मोहक अंदाज और रंग जैसे किसी ने नोचकर अलग फेंक दिए थे और उनकी जगह ले ली थी खौफ और दहशत ने । यह भयानक किस्म का आदमी, वरावर माया की तरफ बढ़ता रहा । तभी उस भादमी ने माया के चारों तरफ हिंसात्मक हाव-भाव और उरावनी हरकतें करनी शुरू कर दी। माया उसके चंगुल से निकलने के लिए तड़पने लगी.'छटपटाने लगी। चारों तरफ तेज किस्म की धुन बज रही थी. 'ध्रम, धुत, डीह"ढी "धा" धी'ढन' 'ढन ! लाल रंग की गोलागार रोशनी कभी धीमी कभी तेज होती, जिसके साथ संगीत की राज बदल जाती और तभी एक धमाका हुआ संगीत का ! लाल, नीली, पीली, बैंगनी रंग की तमाम रोशनी गडमड होती हुई जैसे किसी विस्फोट में मिली हुई, जुड़ी हुई बिखर गई। लाल रंग की गोलाकार रोशनी बन्द गई। संगीत की धुन नहीं थी, तर्ज की गति नहीं थी। बस थी एक खामोशी, एक घुटा हुआ सन्नाटा, जो खुद अपने आप में भिनभिना रहा 'था । लंबी-लंबी सांसें चल रही थी, जैसे कोई दौड़-दौड़कर अंधेरे में टकरा रहा हो, अनगिनत, चलती-फिरती खामोश छाया से... महेश मेहता की आंख खुल गई थी। कमरे में अंधेरा था। वह दोनों हथेलियां रगड़ रहे थे। उनका चेहरा पसीने से लथपथ था। उनके पैर कांप रहे थे। उन्होंने उठकर बैठक की वत्ती जला दी और दीवान के करीब जाकर माया के पास खड़े हो गए । माया खामोश नींद की गहराइयों में डूबी हुई थी। वह कुछ देर यूं ही, उसके पास रुके रहे, तभी उन्हें याद आया वह किस्सा जो ममता ने माया के बारे में बताया था। दोनों हाथों से अपना चेहरा पोंछते हुए, महेश मेहता मैटल पीस की तरफ बढ़े। मैटल पीस के ऊपर से उन्होंने पाऊच और पाइप उठाया।
. हलो:41 पाऊच से पाइप साफ करने वाला चाकू निकाला। चाकू से पाइप साफ करने के बाद, पाइप उन्होंने सेंटर टेबल पर रख दिया। पाऊच से तबाकू की पत्तियां निकालने के बाद, हथेली पर रखकर कुछ देर रगडने रहे। उनकी आंखे झुकी हुई थी, माथे पर पसीने की हल्की बूदें थी और बीच-बीच में, उनका हाथ काप जाता था। तबाकू के छिलके तैयार करने के बाद उन्होंने पाइप भर लिया। होठो के बीच, गाउन की जेब मे लाइटर निकालकर उन्होंने पाइप जलाया और लंबे-लये कश लेने लगे। पाइप से धुआं उनके मुह के अंदर जाकर नाक के नथुने से निकल रहा था। गहरे कश मे खिच- कर धुएं के छल्ने चारो तरफ फैलने लगे। महेश मेहता के दिमाग की धुन घटने लगी। तब कही जाकर उन्हें उस अहसास की गर्माहट का भी पता लगा जो माया के आने में उनके सीने में बार-बार उछाल मार रही थी। 'उन्हे लगा, उनके अदर की वह मुर्दा ठडक धीरे-धीरे निकलकर भागने लगी। अपने बाप के घर से निकल आने के बाद माया के लिए महेश मेहता के घर का माहौल नया था, अजूबा था। इतना सुख, इतना ऐश्वर्य, इतनी दौलत, उसने सपने में भी नहीं देखी थी। ममता के चले जाने के बाद, दिनो तक वह गुमसुम, उदास, पोई-खोई-सी रहा करती थी। अधेरे से उसे डर लगता था। दूर-दूर तक माधव की लाल-लाल आखे, उसका पीछा किया करती। शराब के नशे में धुत, उन तीन शोहदो के बीच, उस दिन जब माधव ने उस पटक दिया था, तब उसन अपनो पाक निगाहो से, उनके वहशी चेहरो को देखा था । डरी हुई हिरनी जैसी किसी खौफनाक मंजर को देखकर भागने लगे और भागते-भागते किसी ऐसी जगह पहुच जाए जहा हवा मे, जहा माहौल मे, जहा हर चीज उसे महफूज लगे, वेसाप्ता, वेलाग, खुली हुई, महकदार ! माया के नन्हे से दिल ने महेश मेहता के घर को अपना घर मान लिया था। कुछ ही दिनो मे वह ममता को भूल गई, माधव को भूल गई, वह गदगी, वह घिनौनापन, सब कुछ भूल गई। ममता तो न मिलनी थी उन्हे और न मिली, हां ममता का प्रतिरूप जो माया की शक्ल में उभरकर आ रहा था, उनके पास जरूर था। पहले तो अपनी उदास जिदगी में, डूबते हुए तिनके की तरह, उन्होंने माया 42 : हलो को गले लगाया था; लेकिन धीरे-धीरे माया एक तेज चढ़ते हुए नशे की तरह उनके ऊपर हाबी होती चली गई। एक खूबसूरत अहम् का, एक खूबसूरत टुकड़ा, जैसे जानी-पहचानी उन की गलियों से, गलिआरों से निकलकर अचानक सामने आ गया था । महेश मेहता के सामने दूर तक एक तराशा हुमा, निखरा हुआ, एक हसीन नजारा था, जिसकी पाक रोशनी वारवार उनके अंदर रोमांच की, अनुभूति की अनगिनत तरंगें उठा दिया करती। चंद दिनों में ही माहौल और कपड़ों की वजह से माया का रूप निखर आया। तब वह, गरीवी- विपदा में पली हुई, खौफ और दहशत के अंधेरों में भटकती हुई, माधव की लाल-लाल आंखों और गुंडों की घिनौनी हरकतों से सहमी हुई माया नहीं थी। तव तो वह स्वच्छंद हिरनी की तरह अठखेलियां करती हुई, खिले हुए, फूल की महक की तरह, महेश मेहता के इर्द-गिर्द छाई जा रही थी, लिपट रही थी। शाम की चाय के वाद से रात के सोने तक, महेश मेहता वत माया के साथ रहते । उसके साथ खेलते, पढ़ते-पढ़ाते, घूमते, खाते-पीते । कितने-कितने दिनों वाद, दर्द से छटपटाती हुई उनकी अंतरात्मा ने कोई ऐसा आधार पाया था, जिसे छू-भर लेने से चारों तरफ महक में डूबी हुई नन्हीं-नन्ही फुलझड़ियां फूटने लगती। माया के उठने से पहले, वह जाग जाया करते । माया का अच्छे स्कूल में दाखिला करवा चुके थे वह । स्कूल जाने के लिए तैयार होने में वह माया की मदद किया करते। नहाना-नहलाना, स्कूल की ड्रेस पहनाना, कितावें-कापी, पेंसिल का पूरा इंतजाम करने के बाद, वह माया के साथ नाश्ता किया करते। माया को स्कूल छोड़ते हुए, समय से पहले, वह दफ्तर पहुंच जाया करते। स्कूल से छुट्टी होने पर महेश मेहता, माया को लेते हुए, घर आ जाते। उसकी ड्रेस वगैरा वदलकर, उसके साथ दोपहर का खाना खाते । कुछ देर आराम करने के बाद माया को सुलाकर वह दफ्तर चले जाते। थोड़ा-सा काम ही करत महेश मेहता दफ्तर में । वहां उनका जी नहीं लगता। वन पांच वजते ही दफ्तर छोड़ देते और सीधे घर आकर माया के साथ चाय पीते। हमेशा से महेश मेहता ऐसे नहीं थे। सवेरे आठ बजे से रात नौ बजे तक दफ्तर के काम में मशगूल रहा करते थे। ममता को छोड़कर जव उन्होंने मधु से , .
हलो:43 . शादी की थी, तब मधु की मां जिंदा थी। शादी के बाद महेश मेहता पर- जमाई बनकर रह गए थे। उनकी पत्नी मधु के कोई भाई-बहन नहीं था। मधु के घर में यह कोई नई बात नहीं थी। मधु के वाप भी करीब-करीब इसी तरह घर के मालिक बने थे। हालाकि महेश मेहता और मधु के बाप मे एक खाम फर्क जहर था। जहां वक्त के साथ न दौड सकने के कारण मधु के वाप गुजर गए थे और मधु की मां मालकिन बन गई थी, वहां मधु के गुजर जाने के बाद, महेश मेहता वैसे ही स्मार्ट, हैंडसम और चुस्त थे। महेश मेहता को पढ़ाई-लिखाई और नौकरी के चक्करो मे काफी दिनों तक बाहर रहना पड़ा था। बडे दिनों बाद उन्हें मधु के चाल-चलन के वारे में पता चला था। क्लब जाना, डास करना, ड्रिंक करना, ताश खेलना मधु की जिंदगी का हिस्सा था । उधर महेश मेहता के पास मधु के लिए वक्त नहीं था और तब तक मधु को भी उनको कोई खास जरूरत नही रह गई थी। महेश मेहता मे काम करने की लग्न थी और मधु के अंदर दूसरे मर्द से दोस्ती करने की भख मधु की मौत के बाद, इतने बड़े बंगले मे महेश मेहता बस अकेले ही मंडराया करते । उन दिनों ममता की याद मे डूबे रहने पर, जब वह अपने वक्त का हिसाय करते तो उन्हें लगता, एक खूबसूरत इमामवाडे मे, कीमती फर्नीचर, कालीन, एअर कडीशनर और फैसी पर्दो के बीच उन्हें जिंदगी ने दफन कर दिया था । जव तक दफ्तर मे रहते, उनका जी लगा रहता, लेकिन घर तो उन्हें काटने को दौडता । जहा एक तरस, मधु को हरकतें, उसके चाल-चलन से दुखी रहते वह, वहां दूसरी तरफ बार-बार उन्हे ममता के प्रति किए गए अपने अन्याय का भी अहसास हुआ करता। इसी- लिए तो उस दिन जब ममता, माया को लेकर उनके पास आई थी, तब सबसे पहले जिस ख्याल ने उनकी जहनियत को छेड़ा था, वह था, अकेले- पन की ऊय से निकला हुआ, वेजार जिंदगी से जन्मा एक अहसास, ममता को फिर से पा लेने का। यही स्वाहिश तो वार-यार उनकी रगों को छेड़ा करती। लेकिन ममता, गरीबी, जुल्म, हिकारत और अपमान अंधेरो में भटकते हुए भी, उस मिट्टी से बनी हुई औरत थी, 44 : हलो मुकाम पर, उस आदमी के पास लौट सकने वाली नहीं थी, जिसने उसे धोखा दिया था। वह यह भी जानती थी, दो मुर्दा जिंदगी, जिंदादिल नहीं बन सकती थीं। उधर महेश मेहता का मन बार-बार ममता के लिए तड़पता । वह ममता को कैसे बताते जो अपनी बेशुमार दौलत और वे- हिसाव प्रभुत्व से न जाने कितनी औरतें खरीद चुके थे। लेकिन हर औरत के साथ सोने पर उन्होंने बस ममता को ही तलाश किया था। ममता भला कहां मिलती उन्हें ! हां, उसकी बेटी माया उनके घर में आ गई थी। माया का हंसना, माया का वोलना, उसके चेहरे की शिकन, उसके अंदाज, उसकी अदाएं ममता की तरह थीं : न जाने उन्हें कितनी बार लगता, उम्र का फासला तोड़कर ममता अपने शुरू के दिनों में लौट आई थी। ऐसे दिनों में, एक दिन महेश मेहता अपनी बैठक में माया के साथ अध- लेटे हुए बैठे थे। माया उनकी जांघ पर सिर रखे हुए थी। वह माया के लहराते हुए बालों से खेल रहे थे। लैंप से धीमी-धीमी रोशनी आ रही थी और ग्रामोफोन पर एक धुन बज रही थी। धीरे-धीरे वालों से खेलते-खेलते महेश मेहता शोख आवाज और अदाओं के साथ, माया के गुलावी गालों पर हल्की-हल्की प्यार की चपत लगाते हुए गुनगुना रहे थे । गुनगुनाते हुए जव उनकी आवाज तेज होने लगी, तब माया भी उठकर बैठ गई और उनके साथ तरन्नुम मिलाकर गाने लगी- वन एण्ड टू, आई लव यू लेट्स प्ले द गेम आफ लव श्री एण्ड फोर एंड वांट यू मोर, लेट्स प्ले द गेम आफ लव फाइव एण्ड सिक्स एण्ड किस मी क्विक सेवन, ऐट एण्ड नाइन टिल द एण्ड आफ टाइम, लेट्स प्ले द गेम आफ लव । गाना खत्म होने के पहले महेश मेहता खड़े हो चुके थे और अपनी उंगली गोल-गोल नचाते हुए वार-बार गाना गा रहे थे। वह बीच-बीच में हलो: 45 घूमते जा रहे थे, चक्कर लगा रहे थे और हंसते जा रहे थे। गाना खत्म होने पर माया दौड़कर उनसे लिपट गई थी। महेश मेहता ने माया को उठाकर ऊपर तक उछाल दिया और फिर हाथ पकडकर उसे गोल चक्करों में घुमाने लगे थे। माया उनके हाथों को मजबूती से पकड़े हुए घूम रही थी, चक्कर लगा रही थी"उसके पैर जमीन से ऊपर थे। महेश मेहता ने जैसे ही उसे जमीन पर रोका, वह उचककर दोनों हाथ उनके गले में डालकर झूल गई। हंसी में खिलखिलाते हुए महेश मेहता के गालों को वह वार-बार चूमने लगी "फाइव एण्ड सिक्स किस मी क्विक गाते हुए। एक नशीला अंदाज, उम्र की कगार को लापकर महेश मेहता के अंदर जागने लगा था। कितने-कितने दिनों बाद, उनके जीवन मे वह घड़ी आई थी, जब वह हंस रहे थे, गा रहे थे, बच्चों की तरह सेल रहे थे। हर दिन महेश मेहता के लिए खुशियों की बहार लेकर आ जाता। उनकी मुर्दा जिंदगी मे माया ने जान डाल दी थी। उसकी मामूमियत, हसीन अदाओं में डूबी हुई ख्वाब की तरह खूबसूरत उसकी शख्मियत, बार-बार हवा के झोको की तरह लहराती हुई उनसे लिपट जाती। माया के माय हसते-खेलते दिन गुजरते चले जा रहे थे, तभी एक दिन महेश मेहता, माया को सुलाकर खुद सोने जा रहे थे तो बूढे नौकर रामू ने माधव के आने की बात कही थी। माधव का नाम, रामू काका के मुह से माधव का नाम, महेश मेहता के दिलो-दिमाग पर बिजली बनकर गिरा था । उन्हे लगा था, पैर के अगूठे से सिर के वालो तक कोई आग की लहर पल भर में उन्हे जला गई थी। ऐसा नहीं था, जो उन्हे माधव के माने की उम्मीद नहीं थी या फिर वह समझते थे, माया के यहा रहने को माधव कभी नहीं जानेगा या फिर जान लेने के बाद, आएगा नहीं। बस इम बात को वह इन दिनो भूले हुए थे। असल में वह खुश थे, संतुष्ट थे, अपने चारो तरफ का माहौल जो माया से जुड़ा हुआ था, उन्हे लग रहा था, उनकी पकड़ में आने लगा था। तभी किसी भयावह स्वाव की तरह एक दिन माधव आकर खडा हो गया था। किसी अनजाने डर को कंप- कंपी उनके दिमाग के कोने-कोने में फैल गई। एक गंदी मरोड़ हुई उनके पेट में, जिसके साथ ही तालुवों से उभरकर एक कसलापन उनके मुह में भर गया। एक पल खामोश रहने के बाद उन्होंने बूढ़े नौकर से माधव को नीचे बैठाने के लिए कह दिया था और खुद ठंडी सांस भरकर गाऊन पहनने के लिए, अंदर की तरफ चले गए थे। महेश मेहता के आने पर माधव उठकर खड़ा नहीं हुआ और न ही उसने कुछ कहने की कोशिश की । बस ड्राइंगरूम की हर चीज को तौलता रहा, जांचता-परखता रहा, जैसे कोई दरिंदा अपने शिकार को तौल रहा था। "कैसे हो माधव, ममता तो ठीक है ना?" महेश मेहता को ही पहल करनी पड़ी। माधव की तंद्रा में विघ्न पड़ा और एक जहरीले नाग की तरह वह उबल पड़ा, "मुझे मालूम था हमें देखकर आपको ममता का ही ख्याल आएगा।" "क्या?" "ममता'ममता''ममता नाम की एक औरत मेरी बीवी है, जिसकी आपसे आशनाई है। उस बेवफा औरत से तो मैं वाद में निपटूंगा, धव हांफ रहा था, "पहले यह वताइए माया कहां है ?" महेश मेहता को इसी चीज का डर था। माधव के नाम से अभी कुछ देर पहले जो कंपकंपी हुई थी, पेट में जो मरोड़ पैदा हुई थी, वह इसी डर से थी। इतने दिनों के भीतर माया उनसे जुड़ चुकी थी, उनके दिल से, उनके दिमाग से, उनके हिस्से-हिस्से से जुड़ चुकी थी। पहले तो उन्हें ख्याल ही नहीं था, लेकिन धीरे-धीरे एक खौफ उनके अंदर घर करता जा रहा था कि अगर किसी दिन माधव सामने आकर खड़ा हो गया और उसने माया को मांगा तो उनके पास क्या जवाब होगा? और आज भूले हुए ख्यालों की तह से उठकर माधव आ ही गया था। उन्हें सामना तो करना ही था, यह सोचकर दूसरे ही क्षण उन्होंने अपने को संभाल लिया, "माया, क्या हुआ माया को ?" "क्या हुआ माया को ?" माधव ने विराते हुए कहा, "मजाक समझ रखा है, किसी की बेटी को छुपाकर रख लेना इतना आसान नहीं है।" "माधव! चले जाओ यहां से "तुम अपने को वाप कहते हो 'हैवान - हलो: 47 हो तुम "इंसानियत के नाम पर कलंक हो तुम !" "हूं तो! आपको मुझसे रिश्ता बनाना है क्या? मैं तो अपनी बेटी लेने आया हूं।" "न दूं तो?" "तो..." माधव गुर्राया, "तो में पुलिस के पास जाऊंगा।" "पुलिस? पुलिस की धमकी और मुझे ? मेरा ओहदा जानत हो?" "जानता हूं."जानता हूं, लेकिन उसका जवाब है मेरे पास अख- वार वालों से कह कर आपके कारनामों का चिट्ठा छाप दूगा तब" तब क्या करेंगे आप?" महेश मेहता की समझ में आने लगा था। वह जरा आगे बढे और उन्होंने माधव के कंधे पर अपना हाथ रख दिया, "माधव | वोलो, कितने पैसे चाहिए तुम्हें !" "पैसे "मुझे पैसे नहीं "अपनी बेटी चाहिए।" "मत लो अपनी जुबान से यह पवित्र नाम ! अगर उसे अपनी बेटी मानते हो, तो यह भी जानते होंगे, किस तरह वह रहेगी यहां।" "हर मोह की कीमत होती है, अगर आपको उससे मोह हो गया है," माधव हंसने लगा, "तो ठीक है, माया यही रहेगी।" "कितने पैसे दूं?" "दस हजार?" "फिर तो नहीं आओगे यहां?" "अभी नहीं! "फिर कब?" "अगर जिन्दा रहा तो..." माधव ने बदमाशी मे मुम्कराने हुए कहा। "लेकिन यहां इस घर में, वादा करो, कभी नहीं आओगे।" "यहां नहीं तो फिर कहा ?" "कहीं नहीं "सिर्फ टेलीफोन वह भी दस महीने बाद ।" "मुझे मंजूर है !" "तो अभी जाओ, कल दफ्तर मे आ जाना!"
48 : हलो "लेकिन कुछ पैसे अभी चाहिए मुझे।" महेश मेहता ने गाऊन की जेब से एक हजार रुपये निकाले जिसे झपटकर माधव ने ले लिया और नोट गिनते हुए, लड़खड़ाता हुआ बाहर चला गया। महेश मेहता का मन बड़ा उदास था। रात-भर वह सो नहीं सके थे। न जाने कितनी दूर तक उनका पीछा करती रही थी वह काली छाया जो इधर कई बार से, उनके अंदर से उभर कर सामने आ जाती। उसे पकड़ कर, उसे छूकर, उसे जानने की तमाम कोशिश कर डाली थी उन्होंने, लेकिन हर बार उनकी पकड़ से छूटकर वस अंधेरे में वह खो जाती। कई वार ऐसा होता जब रात के वक्त माया मुस्कराती हुई, गुड नाइट कहकर वेडरूम में सो जाने के लिए चली जाती तो अपने बंगले के वागीचे, बरामदे से लेकर कमरों तक वह घूमते रहते। कई वार, कई-कई दिनों तक उन्हें नींद नहीं आती। जब कभी आराम कुर्सी पर लेटकर उनकी आंख जरा देर के लिए लग जाती तो वही डरावनी छाया, उनके इर्द-गिर्द मंडराती और कभी उन्हें लगता वह छाया, एक-दो प्रतिरूप में घिरती हुई, छुपती हुई, गोल घेरों में माया की तरफ भद्दे इशारे करते हुए आगे की तरफ बढ़ती रहा करती । माया को स्कूल छोड़कर उस दिन वह घर लौट आए थे। उनकी तवियत कुछ ठीक नही थी। एक घबराहट, एक वेचैनी उनके अंदर घट- घटकर बढ़ रही थी ! गाड़ी खड़ी करने के बाद, वैसे ही वह सीट पर बैठे रहे । फिर थके हाथों से गाड़ी का दरवाजा खोलकर वह बाहर निकले और धीरे-धीरे घर के पिछले हिस्से की तरफ चल दिए। कुछ ही दूर चले होंगे महेश मेहता, तभी रामू दौड़ता हुआ उनके करीब आया। "मालिक !" की आवाज में डर था, वेचैनी थी । बूढ़े नौकर की आवाज जैसे पैनी काट बना गई थी उनके अंदर ! उन्होंने विना कुछ कहे, धीरे-धीरे बूढ़े नौकर की तरफ मुड़कर देखा । "मालिक ! माधव मर गया 'सुना आपने, माधव का खून हो गया।" "क्या?" "हां मालिक ! ममता ने उसका खून कर दिया !" रामू .
। हलो:49 "ममता ने खून कर दिया?" "हां मालिक !" "कब ? कैसे ? कहा?" "कल रात में किसी समय उसने माधव के ऊपर पत्थर की सिल पटक दी थी।" "माधव को तो जाना ही या एक दिन फिर ममता ने यह सब क्यों' किया ?" अपने आपसे कहते हुए महेश मेहता गाड़ी की तरफ बढ़ने लगे। गाडी में बैठकर उन्होंने बूढे नौकर रामू को बुलाकर कहा, "माया से चुछ. ना कहना काका?" "नही मालिक ! कभी नहीं !!" महेश मेहता जव तक ममता के घर पहुंचे, माधव को लाश पोस्ट- मार्टम के लिए जा चुकी थी। ममता को पुलिस ले गई थी। पुलिस स्टेशन मे नामी, रुतबेदार और शोहरतमंद महेश मेहता आए थे, यह एक वडी बात थी। चारों तरफ अदव और हुजूरत का माहौल था तभी तो जब ममता ने महेश मेहता से मिलने से इंकार कर दिया, तो पुलिस स्टेशन के दरोगा, सिपाही, काम्टेवल, मुशी, सब के सब ममता के पीछे लग लिए थे। समझा-बुझाकर उसे महेश मेहता से मिलने के लिए राजी कर लिया था उन्होने। ममता असल मे दवे पाव महेश मेहता से मिलने आई थी। उस समय उसके अदर न तो मौत का सन्नाटा था और न ही जिंदगी की उम्मीद । उस वक्त उसे न तो अपनी नियति से कोई शिकायत थी और न ही महा मेहता से कोई गिला। वह तो, उस वक्त, जिदगी की तमाम तमाम हदो को पार कर किमी ऐसे मुकाम पर पहुंच चुकी थी, जहां उसके लिए" किसी चीज को पा लेना या खो देना, बेमाने या। जैसे कोई हार मान ले, सब कुछ छोड़कर जी सकने या मर जाने की तमन्ना तक से नाता तोड ले, जैसे घटकनी के अदर सालती हुई कोई पीड़ा दूर-दूर तक बंद अधेरो में छटपटाती हुई, वापस लौटकर वही आ जाए जहां से वह उठी थी, जहा उसने करवट बदली थी। ममता का महेश मेहता से न मिलने का फैसला ऐसी ही मनःस्थिति से उपजा था। वह तब किसी से क्या मांगती, जब धीरे-- । ।
48 : हलो "लेकिन कुछ पैसे अभी चाहिए मुझे।" महेश मेहता ने गाऊन की जेब से एक हजार रुपये निकाले जिसे झपटकर माधव ने ले लिया और नोट गिनते हुए, लड़खड़ाता हुआ बाहर चला गया। महेश मेहता का मन बड़ा उदास था। रात-भर वह सो नहीं सके थे। न जाने कितनी दूर तक उनका पीछा करती रही थी वह काली छाया जो इधर कई वार से, उनके अंदर से उभर कर सामने आ जाती। उसे पकड़ कर, उसे छूकर, उसे जानने की तमाम कोशिश कर डाली थी उन्होंने, लेकिन हर बार उनकी पकड़ से छूटकर बस अंधेरे में वह खो जाती। कई बार ऐसा होता जब रात के वक्त माया मुस्कराती हुई, गुड नाइट कहकर वेडरूम में सो जाने के लिए चली जाती तो अपने बंगले के बागीचे, बरामदे से लेकर कमरों तक वह घूमते रहते। कई वार, कई-कई दिनों तक उन्हें नींद नहीं आती। जब कभी आराम कुर्सी पर लेटकर उनकी आंख जरा देर के लिए लग जाती तो वही डरावनी छाया, उनके इर्द-गिर्द मंडराती और कभी उन्हें लगता वह छाया, एक-दो प्रतिरूप में घिरती हुई, छुपती हुई, गोल घेरों में माया की तरफ भद्दे इशारे करते हुए आगे की तरफ बढ़ती रहा करती। माया को स्कूल छोड़कर उस दिन वह घर लौट आए थे। उनकी तवियत कुछ ठीक नहीं थी। एक घबराहट, एक वेचैनी उनके अंदर घट- घटकर बढ़ रही थी ! गाड़ी खड़ी करने के बाद, वैसे ही वह सीट पर बैठे रहे । फिर थके हाथों से गाड़ी का दरवाजा खोलकर वह बाहर निकले और धीरे-धीरे घर के पिछले हिस्से की तरफ चल दिए। कुछ ही दूर चले होंगे महेश मेहता, तभी रामू दौड़ता हुआ उनके करीब आया। "मालिक !" रामू की आवाज में डर था, बेचैनी थी। बूढ़े नौकर की आवाज जैसे पैनी काट बना गई थी उनके अंदर! उन्होंने विना कुछ कहे, धीरे-धीरे बूढ़े नौकर की तरफ मुड़कर देखा। "मालिक ! माधव मर गया 'सुना आपने, माधव का खून हो गया।" "क्या?" "हां मालिक ! ममता ने उसका खून कर दिया !" . !
हलो: 49 "ममता ने खून कर दिया?" "हां मालिक!" "कब ? कै? कहाँ ?" "कल रात में किसी समय उसने माधव के ऊपर पत्थर की सिल पटक दी थी।" "माधव को तो जाना ही था एक दिन फिर ममता ने यह सव क्यों किया ?" अपने आपमे कहते हुए महेश नेहता गाड़ी की तरफ बढ़ने लगे। गाडी मे बैठकर उन्होंने बूढे नौकर रामू को बुलाकर कहा, "माया से कुछ ना कहना काका?" "नहीं मालिक ! कभी नहीं !!" महेश मेहता जब तक ममता के घर पहुंचे, माधव की लाश पोस्ट- मार्टम के लिए जा चुकी थी। ममता को पुलिस ले गई थी। पुलिस स्टेशन मे नामी, रुतवेदार और शोहरतमंद महेश मेहता आए थे, यह एक बड़ी बात थी। चारो तरफ अदव और हुजूरत का माहौल था ! तभी तो जब ममता ने महेश मेहता से मिलने से इकार कर दिया, तो पुलिस स्टेशन के दरोगा, सिपाही, कास्टेबल, मुशी, सब के सब ममता के पीछ लग लिए थे। समझा-बुझाकर उसे महेश मेहता से मिलने के लिए राजी कर लिया था उन्होंने। ममता असल मे दबे पाव महेश मेहता से मिलने आई थी। उस समय उमके अंदर न तो मौत का सन्नाटा था और न ही जिदगी की उम्मीद । उस वक्त उसे न तो अपनी नियनि मे कोई शिकायत थी और न ही महेश मेहता से कोई गिला। वह तो, उस वक्त, जिंदगी की तमाम-तमाम हदी को पार कर किसी ऐसे मुकाम पर पहुच चुकी थी, जहां उसके लिए किसी चीज को पा लेना या खो देना, वेमाने था। जैसे कोई हार मान ले, सब कुछ छोड़कर जी सकने या मर जाने की तमन्ना तक से नाता तोड ले, जैसे धड़कनो के अदर सालती हुई कोई पीड़ा दूर-दूर तक वद अधेरो में घटपटाती हुई, वापस लौटकर वही आ जाए जहा से वह उठी थी, जहा उसने करवट बदली थी। ममता का महेश मेहता से न मिलने का फैसला ऐसी ही मनःस्थिति से उपजा था । वह तब किसी से क्या मांगती, जब धीरे- - - :50: हलो 'धोरे उसने खुद सब कुछ खो दिया था । एक था उसका अतीत, एक था उसका वर्तमान और आने वाले वक्त के ऊपर उसका भरोसा उठ चुका था। - अतीत ने हमेशा उसके जजबातों को पकड़कर तोड़ डाला था। पहले उससे शिवा को छीना, फिर माधव को। वह उस माधव के छिन जाने का अफसोस नहीं कर रही थी जिसको उसने मार डाला था, वह तो रोती रही थी उस माधव के छिन जाने पर जिसने उसे मर जाने से बचाया था, कितने दिनों पहले! लेकिन महेश मेहता से फिर भी वह मिलने चली आई थी महज इस- लिए, वह चाहती थी उसकी वेटी माया यह सब न जाने और यही एक -वात तब उसे कहनी थी महेश मेहता से । कुछ पल के लिए वह दूर चली गई थी, बहुत दूर ! उन जेल की • सलाखों से, महेश मेहता से, उस सारे माहौल से वह दूर चली गई थी। .."उसने पाया था अपने आपको चंद घंटों पहले माधव की लाश के बगल में । वह पत्थर की सिल जो उसने माधव के सिर पर पटक दी थी, लुढ़क- कर थोड़ा नीचे आ गई थी और उसके ऊपर खून की पतली धार बहने दी थी। हाथ में जब तक पत्थर की सिल थी, वह एक ममता थी और ह 4 से निकलकर जव तक वह सिल माधव के सिर के ऊपर आकर गिरी थी, एक दूसरी ममता जैसे पहली ममता की छाया से निकलकर खड़ी हो गई थी। वक्त का वह लमहा, उसे न जाने कितने टुकड़ों में बांट गया था। जितनी तेजी के साथ उसके हाथ से सिल छूटकर गिरी थी, उतनी ही तेजी के साथ उसके बदन के अंदर, जांघों से लेकर माथे तक एक मुर्दा ठंडक व्याप्त हो गई थी। उसका रोम-रोम कांप उठा था। वह मुर्दा ठंडक उस सिल से कहीं ज्यादा वजनदार थी और फिर यह तो आज छूटकर ऊपर चली गई थो, इसने तो आज उसे न जाने कितनी यातना से मुक्ति दिलाई ‘थी ! लेकिन उस मुर्दा ठंडक का आयतन, आकार और वजन कितने- 'कितने दिनों उसके पैरों से चिपटकर, लिपटा हुआ था, वह खुद उसमें समाती जा रही थी। एक विस्फोट हुआ था, एक धमाका हुआ था, जिसने एक ही झटके में उसे मुक्त करा दिया और उसके साथ दिमाग की नसों को सकझोर कर रख दिया था। एक अजीब-सी स्थिति थी। उसके सामने ...
हलो:51 उसका पति, उमकी बच्ची का वाप माधव मरा हुआ पड़ा था जिसको मोत खुद उसके हायों हुई थी। ममता चारपाई के ऊपरी हिस्से से घूमकर पंताने की तरफ आ गई । उसने वेजान, वेवस, वेजार माधव को देखा। पर का हिस्सा उससे देखा नहीं गया। धीरे-धीरे उमकी नजर नीचे की तरफ माधव के पर पर ठहर गई। वह कुछ देर माघव के पर देखती रही और फिर वही जमीन पर बैठ गई। थोडा झुकते ही, उसके दोनो हाय माधव के पैर पर थे और उमका माया पैर के तल्लों पर !... "ममता! यह सब क्या किया तुमने ?" महेश मेहता की फुसफुसाहट में दर्द था। वह शायद यह छह शब्द उनके अंदर की कसक मे डूब-डूब- कर निकले थे। ममता जब आई थी, महेश मेहता दूसरी तरफ देख रहे थे। तभी वह अपनी दुनिया के अंधेरों मे चली गई थी 'खो गई थी । उसका मन उदास हो गया था, उसकी आखें भर आई थी, एक घुनघुनाता हुआ सन्नाटा उसके और महेश मेहता के बीच जगह बना चुका था। तभी तो ममता को देखकर भी महेश मेहता ने पहले कुछ कहा नहीं था। फिर शून्य मे देखती हुई उसकी नजर को पकडकर ही उन्होंने खुद तक को न सुनाई देने वाली आवाज मे ममता से सवाल किया था। "ममता ! यह सब क्यो किया तुमने?" महेश मेहता के यह शब्द ममता को दूर बड़ी दूर से सुनाई दिए थे और इन शब्दों की फुसफुसाहट में वधकर वह अंधी ढलानों से लौटकर वापस आ गई थी। उसने देखा महेश मेहता को, उस माहौल को, जिससे वह इन चद लमहो के लिए दूर चली गई थी, और तभी उसे अपनी गीली आंखो का ख्याल आया था। ममता ने अपनी धोती के किनारे में आंखें पोछ डाली और तव महेश मेहता को देखते हुए उसने कहा था, "यह तुम पूछ रहे हो, शिवा !" "हां, इसलिए कि मैं तो जानता था, वह तुम्हे मार डालेगा लेकिन । तुम' "मैं शायद ऐसा कभी नहीं करती...' "बोलो ममता ! कह डालने से जी हल्का हो जाएगा।" "एक बार फिर ममता महेश मेहता से अलग होने लगी। उसने अपना 52: हलो . चेहरा घुमा लिया और निगाहें दीवार पर गड़ा दी, फिर जैसे अपने आप से कहने लगी थी, "कल शाम माधव जरा जल्दी आ गया था और उसने शराब नहीं पी थी बल्कि बोतल लेकर आया था। काफी और सामान था जिसे उसने मुझे बुलाकर दिया था। कितने सालों के बाद, वह मेरे लिए कपड़े लाया था 'फूलों के गहने लाया था"..'कहते कहते ममता सुवकने लगी और कुछ क्षणों के बाद चुप होकर खुद-ब-खुद कहने लगी, "उसने जबरदस्ती करके मुझे नए कपड़े पहनाए थे, बड़ा मान किया था मेरा, खुद मेरे जूड़े में फूल लगाए थे। मिठाइयां थीं, फल थे, राशन का पूरा सामान उठा लाया था वह । क्या-क्या सामान लाया था वह, जैसे फिर से नई गृहस्थी बना रहा था। चादर. तकिया, तौलिया, गिलाफ, पर्दे, एक दर्जन से ऊपर साड़ी-धोती, व्लाउज, पेटीकोट, पाऊडर, लिपस्टिक, क्रीम वह सब कुछ था जिसे देखने को हम तरस जाते थे । पहले तो मैंने वह सब छूने तक से मना कर दिया था। मैंने उससे कहा था, जुआ खेला होगा उसने और जीत के पैसे से वह सव लाया होगा, लेकिन नहीं माना उसने, मेरी कसम खाई, ईश्वर की कसम खाई, तव भी मैंने विश्वास नहीं किया, लेकिन जव उसने शराब की कसम खाई और हर तरह से मुझे विश्वास दिलाया कि उसने न तो कहीं चोरी की थी और न ही जुआ खेला था, तब मैं मान गई थी। मैंने बड़े मन से शृंगार किया था."उसने मुझसे खाना बनाने को कहा और मेरी इजाजत लेकर शराब पीने लगा । शरावपीने के पहले मिठाई और फल का प्रसाद चढ़ाया था, ठाकुर जी को! उसने खुद मुझे मिठाई खिलाई और मैंने सिर पर आंचल रखकर उसके पैर छुए थे 'सारा वैर भूलकर उसने सच्चे मन से मुझे आशीर्वाद दिया था। एक नया संसार वसा रही थी मैं." सपनों की नई दुनिया में खो जाने लगी थी। हम दोनों ने मिलकर घर सजाया था "वह पर्दे लगा रहा थामैं चादर और तकिया। रेडियो लाया था वह 'रेडियो पर गाना बज रहा था. अगर बत्ती जलाई थी। सब कुछ सजाकर नये कपड़े पहनकर नजर उतारी थी मैंने..." ममता फिर रोने लगी 'फूट-फूटकर रोने लगी। महेश मेहता ने उसे रोका नहीं, उसे रोने दिया । वस चुपचाप देखते रहे । और तभी रोते हुए ममता कहने लगी, "उसने मेरा माथा चूमा था, मेरा लाड़ किया था। मेरे सिर पर हाथ फेरा - - हलो:53 । था, मुझे दिलासा दी थी। मैं दुआ दे रही थी ऊपर वाले को, ईश्वर से, भगवान से मैं कह रही थी जो कितने दिनो बाद मेरे दिन फिरने लगे थे। बड़े-बडे दिनो वाद भले ही तरसा-तरसाकर कही से बहता हुआ वक्त का वह टुकड़ा आ गया था, जो कितना हसीन था, कितना प्यारा था। दूर-दूर तक जलती हुई रेत के बंवडर की घुमनी मे फसे हुए तडपते-तरसते मन को, प्यासे मन को जैसे प्यास बुझाने का मौका मिल जाए। वह चार-पांच घंटे न जाने कब गुजर गए थे और वह खाना पाकर बिस्तर पर लेट गया था। मैं भी सारा काम पाम करके उसी के पाम आ गई थी। मेरी मति मारी गई थी । मुझे लालच होने लगा था। इसी सुख" इतने से गुस के लिए तो मैं हमेशा वैजार रहा करती थी। खुद अकेले इसे भोग पाऊगी भला''यह मैं सोचने लगी थी। मुझे माया की याद आने लगी थी। मुझे लग रहा था, अगर यह सब सच था तो मैं अपनी बेटी को वापस ले आऊंगी।मा का मन मेरा, इस जरा से मुख मे, बेटी को फिर से पा लेने का, अपने पास, अपने करीव रख सकने का अहसास करवट लेने लगा था। मैने उसके सीने पर अपना सिर रखकर माया को वापस ले आने की बात कही थी..." ममता का चेहरा सस्त होता जा रहा था। उसकी आखों की नमी जा चुकी थी और उसकी जगह धीरे-धीरे जैसे एक आग जागने लगी थी। माथे पर बल पड़ रहे थे और हाथ की उगलिया कसने लगी थी, बदन सीधा हो गया था, गर्दन उठाकर वह ऊपर छत की तरफ देखने लगी थी। "शिवा ! उसने तुमसे दस हजार रुपये लिए थे ना?" "हां!" महेश मेहता ने धीरे से कहा। "तो तुमने माया को खरीद लिया था।" "क्या कह रही हो तुम ममता!" "यह बात उसने मुझे कल बताई थी' 'उस वक्त बताई थी जब मैं उसके सीने पर सिर रखकर माया को वापस ले आने के सपने वनाने लगी थी। मेरी बेटी को उस तरह नहीं तो इस तरह बेच डाला था। यही तो चाहता था वह ना ! एक धमाका हुआ था, जैसे अनेक-अनेक छोटे-बड़े वारूद के ढेर मेरे मदर फूटे थे और जिनके साथ एक बार में सब कुछ नष्ट हो गया था। असल में उसने यह सौदा भगर किसी और के साथ 54 : हलो । - होता तो शायद मुझे ऐसा न लगता, मेरे ऊपर खून सवार न होता ! मैं रोई नहीं. "मैंने उससे कुछ नहीं कहा, मुझे धिन आने लगी थी में चुप- चाप उठकर अंदर चली गई थी। मैंने वह कपड़े उतारे 'फूलों का गहना नोचकर फेंक दिया और फिर से पुरानी धोती पहन ली "सारा सामान जो वह लाया था ''मैंने जमा किया और फिर उसके पास पहुंची 'लेकिन तब तक वह सो चुका था। नये कपड़े पहने हुए था वह, उसकी शक्ल, उराका रूप बदला हुआ था, नया बिस्तर था और उस पर आराम से वह सो रहा था । उसके चेहरे पर संतोष था, तुख था, अपनी बेटी का सौदा करने का सुख ! उसका वह सुख और वह सब देखकर मेरे अंदर नफरत का एक सैलाब उठा था और फिर मैंने..." "सच में ममता! तुम्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे पैसे और पाशविकता की इस दुनिया में अभी सब कुछ चुक नहीं गया है। लेकिन फिर भी तुमने जीवन को कितना कठिन नहीं बना डाला है ?" "दुनिया को मैं नहीं जानती शिवा ! मैं खुद तो चुक ही गई हूं। मैंने तो कुछ भी कठिन नहीं बनाया, सब कुछ याठिन बनता गया न?" "लेकिन ममता! तुम घबड़ाना नहीं। मैं तुम्हारी जमानत का इंतजाम फर लूंगा।" "किरालिए?" ममता के चेहरे पर फीकी हंसी थी। "तुम यहीं रहोगी क्या?" "और कहा जाऊंगी मैं?" "अपने घर और कहाँ ?" "कौन-सा घर' गेरा घर कोई है क्या?" "मेरे दरवाजे..." "नहीं शिवा ! अपने पति का खून करने के बाद कोई औरत कहीं और जा सकती है ?" "जा समाती है कहीं भी जा सकती है।" "पाहीं नहीं 'कभी नहीं और तुम भी अब यहां न आना।" "क्यों ?" "माया के लिए और क्यों?"
हलो:55. "हां, माया के लिए, लेकिन..." "उसे कुछ न कहना'"उसे कुछ न बताना" ममता फूट-फूटकर रोने' लगी। चार ममता के चले जाने के बाद अब महेश मेहता के जीवन में कुछ भी नहीं वचा था। टूटने-टूटने उम्मीद का वह आखिरी कतरा जो ममता के साथ जडा था, खत्म हो चुका था। कमा मायावी खेल जिन्दगी उनके साथ खेल रही थी ! महेश मेहता सोचने-सोचने उलझन के दायरो मे घूमने लगते। माया उम्र के सैलाव मे उन्हे बहाकर लिए जा रही थी। उनकी और माया की उम्र में 25 साल का फर्क था। वक्त की दौड मे वह माया का साथ कहां तक दे सकेंगे, इसकी भी चिन्ता थी उन्हे । न जाने क्या होता जा रहा था । माया जब भी उनके करीब आती, उनसे चिपट जाती, तो उनके खून का दौरा नेज हो जाता। ममता के हमेशा-हमेशा के लिए चले जाने के बाद माया उसी रूप मे, उसी उम्र मे, जैसे सिमटकर आ गई थी उनके सामने, उनके पास । लेकिन वह छाया, ममता का वह रूप, वह प्रतिबिम्ब कितना मोहक था, कितना नशीला था ! जहां एक तरफ उन्हे डर लगता, वही दूसरी तरफ उनके अदर यह अहसास करवटें बदलने लगा था कि माया के बिना जिंदा रहना उनके लिए कितना मुश्किल था। उस दिन दफ्तर से लौटने मे जरा देर हो गई थी। माया वही दीवान पर लेटी हुई थी। उसके चेहरे पर एक मस्ती-भरी, लुभावनी मुस्कराहट थी। उसने एक वार करवट बदली और फिर अंगडाई ली, एक ऐसी अगड़ाई जिसने उसके बदन के जोड, कटाव, उभार मोहक बना दिए थे । भरपूर जवानी जैसे उसके कपडो में समा नही पा रही थी और वह बेचन-सी, उनीदी अंगड़ाइयो से फूटकर निकलती हुई अदाओ से उस कमरे के पूरे माहौल में खुमार के हल्के-हल्के बुलबुले जगा रही थी। माया जिस दीवान पर लेटी , :56: हलो - - “थी, यहां से गुछ दूर पर महेश गेहता सड़े थे। वह दीवान से अलग हटकर मैंटलपीरा को पारा मा गए । उन्होंने मैंटलपीस पर अपना पाईप रख दिया और वहीं खड़े होकर माया को देखते रहे। लेकिन उनके अंदर चल रही, राहगी और जिरगानी कशमकश ने उन्हें ज्यादा देर त राजा नहीं रहने दिया और यह गाथा पगार फर यहीं जमीन पर बैठ गए। उन्हें लग रहा था उम्रगी उरा जगर पर, उनके लिए, गाया के साथ, जोगा और मस्ती के रोलाव, तरंगों से बंधे रहना, सवेरे रो रात तक किसी जागरूक पूर्ण रूप से जागरूमा हती का हिस्सेदार बने रहना, फितना मुशिमाल होता जा रहा था। गाया उन्हें एक पल को भी छोड़ने को तैयार नहीं थी। वह तो महेश गेहता गो इर्द-गिर्द एका चैन गी तरह लिपटती चली गई थी। उसके लिए दुनिया के बारे मर्द माधव थे या गाधव के वह लफंगे दोस्त जिनकी भया- नया गा, गाधव गी लाल-लाल मांगों को सौफ गो ऊपर पगार किसी डरा- पो गंजर का हिस्सा बनगार, उराके अंदर पारवटें बदलती रहती। फिर वगत ने फोन उसे ठहरने दिया था । तेरह साल की उम्र में, स्कूल के एक लीने धेरहगी रो, उसके साथ बलात्कार किया था। इसकी गर्मा गुछ ऐसी पली, काफी दिनों तक उराणा स्कूल जाना बंद हो गया। उधर जैसे बदनसीबी उसका इंतजार गार रही थी। पाई गहीनों बाद जब उसने स्फूल जागा शुरू गिया, तभी एगा पिकनिक पार्टी में कालेज के लड़कों ने कोल्ड लिंग में गशीली गोलियां मिलाकर, उरागी छीछालेदर पर डाली थी। जिदगी के ऊपर से जैसे उराका यकीन ही उठ गया था । सारी दुनिया उराके लिए एक उरावना सपना बनकर रह गई थी। अपने चारों तरफ हर मर्द उसे वहशी जानवर की तरह पूरता हुआ, भयानक गेहरे बनाता हुभा, जिय और जबरदस्ती गा गिनीना मुखौटा लगाए नजर आता । माया की दुनिया धीरे-धीरे सिमटती गई और बरा सिगुड़ते हुए महेश मेहता की छाती पर ठहर गई। उधर महेश मेहता की खुद गुछ समझ में नहीं आ रहा था। एक तरफ उनको मौत की अंधी घाटियां नजर आ रही थीं और दूसरी तरफ गागा एगा गोहपा रापने की तरह, उनगी बाहों में सगाई हुई तड़प रही थी। यह सोग रहे थे यह पौसी जिंदगी, यह गौन-सी विडंबना थी जिसमें ईश्वर - हलो:57 ने उन्हें डाल दिया था। कभी तो उनकी रगों मे एक झुनझुनी, सुन्न पड़ती हुई सई ठंडक पठने लगती और दूसरे ही क्षण क्रोध की तपती हुई लहर उठती उनके जहन में, जिसके साथ, एक जलती हुई सांस का झोका निकलता उनके अंदर से । दस साल-काश सिर्फ दस साल वह उम्र को पीछे ढकेस सकने । तब शायद वह सब कुछ मिल जाता उन्हें जिसके लिए वह हमेशा तड़पते रहे थे। एक मासूम बच्चे की तरह वह तलाशते रहे थे, जिंदगी के तमाम अंधेरों के बीच, प्यार का वह रास्ता, गर्माहट को वह रोशनी जो कभी नहीं मिली उन्हें । कभी मा की ममता, कभी ममता का प्यार, कभी मधु को वेवफाई, बम सब कुछ उनका यू ही छिनता गया था। उन्हें लगता जैस जिंदगी, कोई अजीव खेल उनके साथ खेल रही थी। कंधो पर फैले रेशमी वालो को सहलाते हुए, जब माया अपना चेहरा उनको महफूज छाती में छिपा दिया करती तव कई वार उनके अदर जिंदगी में बगावत कर देने का ख्याल जागने लगता । यह तो वक्त ने उन्हें जीते जी मार डाला या। उनके सामने जोश के समदर में लहराती हुई, झूमती हुई जवानी और मस्ती के खुमार में डूबी हुई, वेपनाह हुम्न की मलिका माया थी और उस सबसे जुड़ी हुई थी ममता को वह तमाम मुर्दा यादें जो हमेशा-हमेशा उन्हें छड़ती रहती थी । ममता को तो वह जिंदगी के दौर में कितना पीछे छोड़ पाए थे। फिर भी ममता की याद चिन्दियो की तरह उड़कर वक्त-वक्त गुवार की शक्ल अख्तियार कर लेती। सब कुछ सह लिया करते थे वह ! लेकिन जिम दिन ममता, माया को उनके घर पर, उनकी निगरानी में छोड़ गई थी, उन्हें लगा था, एक दोहरी तलवार थी, जिसके ऊपर चलते-चलते, कभी भी वह गिर सकते थे, खत्म हो सकने थे । वह तमाम ममता की यादें, जो मां की आखिरी हिचकी के साथ जुड़ी हुई थी, एक-एक करके, खूबसूरत नशे की तरह, उनके सामने, उनकी आखो के सामने, दुवारा जन्म ले रही थी, पल रही थी, बड़ी हो रही थीं। महेश मेहता के सामने जिंदगी के दो हिस्से थे, और दोनों स्वरू खड़े थे। महेश मेहता को ममता से वेद प्यार था । उस वक्त की ममता, जैसे एक बार फिर, कितने-कितने सालों के दाद, माया की शक्ल में, उनके ड्राइंग रूम में उस दिन आकर खड़ी हो गई थी। एक बार तो महेश मेहता को विश्वास नहीं हुआ था। लेकिन
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। हलो:59 सोफे के बगल में, कार्पेट पर महेश मेहता की फोटो पड़ी थी, जिसे एक हाय में उठाकर वह देख रही थी। तभी वह उठकर बैठ गई । उमने टेप- रिकार्डर बंद कर दिया और दोनों हाथों से महेश मेहता की फोटो देखने लगी। करीब तीन हफ्ते बाद महेश मेहता अस्पताल मे घर आए थे। ये दिन माया ने एक मामूम खौफ में तडपते हुए गुजारे थे। हर पल उमने ईश्वर मे, महेश मेहता के ठीक हो जाने की दुआ मांगी थी। उसे मालूम था, दुनिया मे वह कितनी अकेली थी और उसका रोम-रोम यस महेश मेहता के लिए धडरता था। उनसे अलग जैसे उसका कोई अस्तित्व ही नहीं था। उम दिन माया का जन्मदिन था। केक काटने के बाद माया के दोस्तों ने, अपने-अपने दोस्त राडको के साथ नाचना शुरू कर दिया था । जैसे-जैसे संगीत तेज होता गया, नाच की गत बढ़ती गई । कुछ लडकियो ने माया को अपने बीच खीच लिया। जीन्स और टलाउज में वह किसी परी की तरह थिरक रही थी। महेश मेहता कमरे के एक कोने में खडे हुए इन लोगो का नाच देख रहे थे। तभी माया ने उन्हें डामफ्लोर पर आने का इशारा किया। उसे असल में किसी का माय पसद नहीं था। महेश मेहता के आने के बाद वह मस्ती-भरी अदाओ के माय नाचने लगी। उधर महेश मेहता संगीत की लहरियो में इठलाती हुई माया के साथ नाच रहे थे । जैम-जैसे नाच की रफ्तार बढने लगी, महेश मेहता अपनी रफ्तार बढाते गए । धीरे- धीरे लड़के और लड़कियों ने 'डासफ्लोर' छोडना शुरू कर दिया। वे सव थककर चूर हो गए थे। लेकिन महेश मेहता नाचते रहे-नाचते रहे । वह सबसे अच्छा, सबसे जोशीला डांस कर रहे थे और माया उन्हें देखकर सम्मोहित हो रही थी। उसे महेश मेहता पर गर्व हो रहा था। सगीत बजाने वाले मार्केस्ट्रा के लोग भी धकने लगे, लेकिन महेश मेहता नाचते रहे । एकाएक उनकी आंखों के सामने अधेरा छा गया और वह डासफ्लोर छोड़कर एक आरामकुर्सी पर बैठ गए । तालियों की गडगडाहट के बीच माया भी डांमफ्लोर छोडकर उनके करीब मा गई । महेश मेहता नाच खत्म होने पर बुरी तरह से हांफ रहे थे। पहली बार अपनी बढती हुई उम्र 1 60 : हला का पता चला था उन्हें । उनको हार्टअटैक हो चुका था-पहला हार्ट अटेक ! फिर शुरू हुए अस्पताल के चक्कर, दवाइयों का सिलसिला और माया अकेली रह गई थी। बड़ी मुश्किल से उसने वह दिन काटे थे। उस दिन भी महेश मेहता अपने कमरे में आराम कर रहे थे जब माया उनकी फोटो को देखकर गुनगुना रही थी। तभी वह बैठक में आ गए। उन्हें देख. कर माया उठकर उनके पास चली आई। "पप्पा''पप्पा, आप वैठ जाइए ना !" "क्यों ?" "मैं आपको देखूगी पप्पा "आपको देखूगी 'वैठिए ना !" "यह भी कोई बात है "मैं आपको देखूगी !" उन्होंने चिढ़ाते हुए कहा। "है ना बस, मैं देखूगी, यह फोटो है ना, इसमें आप जितने अच्छे. लगते हैं, उतने ही अच्छे हैं आप या उससे ज्यादा यह देखना है मुझे !" माया ने महेश मेहता को खींचकर सोफे पर बैठा दिया और खुद कार्पेट पर बैठ गई। उसने उनके घुटनों पर अपनी ठुड्डी की टेक लगा दी और सीने पर एक हाथ रखकर उनके चेहरे की तरफ देखना शुरू कर दिया · काफी देर तक वस देखती रही। "पप्पा"पप्पा !" "हां बेटा!" 4 "कितने अच्छे हैं आप ! कितने स्वीट हैं.. कितने प्यारे हैं आप ! कोई आपकी वरावरी नहीं कर सकता है।" "अच्छा !" महेश मेहता की मांखों में आंसू थे। "हां पप्पा, यू आर नेट, यू आर टू गुड ! आई लव यू पप्पा, आई लव यू वेरी मच !" "रियली?" "हां पप्पा ! मुझे तो हर वक्त चारों तरफ बस आप ही नजर आते हैं । यू आर सो काइन्ड । मैं देखती हूं पप्पा, यह तमाम लड़के, यह ढेर सारे आदमी कितने वेहूदे हैं, कितने क्रुअल हैं । आई हेट देम । मैं उन्हें स्टैण्ड नहीं -
हलो:61
कर सकती।"
"नहीं"सव नहीं।"
"सद पप्पा "आल याफ देम आर मेम ।"
"इतनी कम उम्र में तुझे इतने दुख मिले हैं तो अब तेरा भी क्या दोप
है “यो गाड !"
"मेरी मां नहीं है पप्पा"मेरा दाप नहीं है पप्पा"मेरा कोई नहीं है
पप्पा!"
"मैं तो हूं ना बेटा।"
"हां, बस आप हैं ।" माया फूट-फूटकर रोने लगी।
"नहीं रोते बेटे "नही रोते "वच्छे लोग कभी नही रोते ।" महेश
मेहता खुद भी रो रहे थे, "स्टाप इट नाव, यू नो आई कांट स्टेड टियर्न !"
"नहीं रोऊंगी पप्पा मैं कभी नहीं रोऊंगी। आप हैं तो मेरे पास !
यू आर सो काइंड, यू आर सो ब्यूटीफुल !"
कुछ देर माया को देखते रहने के बाद, जैसे बड़ी हिम्मत बटोरकर
महेश मेहता ने कहा, "मैं सोच रहा था .." आगे न कह सके वह ।
"रक क्यों गए पप्पा, कहिए ना !"
"हां।" माया ने भरे हुए गले में कहा ।
"मैं भला कब तक तेरा साप दे सकूगा। जिंदगी है न, जाने क्व
धोखा दे दे ! सोचता है, अब तेरी शादी कर दू ।"
माया एकदम छिटक कर अलग हो गई। बडी दर्दनाक चीख निकली
उसके मुंह से । जैसे वातायन के खालीपन मे लहराता हुआ, तेज रफ्तार में
कोई बड़ा-सा बोझ उसके माथे पर धम से आकर गिरा था।
"नहीं" "पप्पा "नहीं।"
"क्यों, तेरी शादी तो होगी ना?"
"नेवर पप्पा नेवर"यूनो आई हेट दम आल । दे आर क्रुअल एण्ड
डर्टी।"
"फिर भी शादी तो होनी है ना-आज नही, कभी तो।"
"कमी नही-कभी नहीं ""मेरी ननं मे.. मेरे जेहन की वैवले.
62 : हलो कोई समा सकता है "यू नो यू नो इट वेरी मच..." महेश मेहता चोखती- चिल्लाती, तड़पती हुई माधुरी को कुछ देर देखते रहे, एक गहरी आत्म- सात करती हुई निगाहों से ! उनकी खुद समझ में कुछ नहीं आ रहा था। वह सब मिला भी तो तब, जब किसी काम का नहीं था उनके लिए। न जाने कब से उनका एक हाथ माया के कंधों पर फैले हुए रेशमी बालों को सहला रहा था और न जाने कब माया ने अपना चेहरा उनके सीने पर टिका दिया था। और फिर सब कुछ धीरे-धीरे बदल गया। जिंदगी ने, महेश मेहता को जीते जी मार डाला था। उनके सामने जोश के समन्दर में लहराती हुई, झूमती हुई, मस्ती के खुमार में डूबी हुई माया थी, जिसका वेपनाह हुस्न बार-बार उनके करीब आता और दूर चला जाता । उसे अपने इतना करीव पाकर भी महेश मेहता के मन की गहराइयां अछूती रह जाती । सब कुछ टूट जाता, विखर जाता और तब यूं ही तड़पते हुए खामोश निगाहों से वह उजड़ता हुआ अपना संसार देखते रहते । जीवन ने हमेशा की तरह इस बार भी इतने करीब से उन्हें छला था, जो वह जान ही न पाए। कब सितारे टूटने लगे थे, कब आसमान फट पड़ा था। उनके मन के कोने-किनारे में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गई थीं, जिन्हें भरने के लिए माया का सहारा था। बस ! लेकिन माया उन का फासला तो नहीं भर सकती थी। उस दिन माया के जन्मदिन की पार्टी के दौरान उन्हें पहला हार्ट अटैक हुआ था और तभी से उन्होंने माया की शादी की बात सोचनी शुरू कर दी थी। हर वक्त उन्हें इस बात का डर था, जो कहीं कुछ हो गया उन्हें तो माया का क्या होगा? वह तो अकेली थी, बिल्कुल अकेली, उसका न तो कोई दोस्त था और न ही कोई साथी। दुनिया उसके लिए खौफ का ऐसा मंजर थी, जिसके पास भी वह नहीं जाना चाहती थी, जैसे जल जाएगी, मिट जाएगी। माधव से लेकर हर आदमी को उसने नफरत की निगाहों से देखा था। शायद इसीलिए उसके अंदर उसकी सांसों में, उसकी धड़कनों में वही अंधा विश्वास, वही घुटी हुई आस्था घर कर चुकी थी, जिसमें किसी के लिए कोई जगह नहीं थी। महेश मेहता को एक फैसला करना था बहुत बड़ा फैसला! जहां एक - - जिदगी का हलो: 63 तरफ वह माया को खोना नहीं चाहते थे। वहीं दूसरी तरफ माया, आने वाले वक्त में कैसे जियेगी, इसकी भी चिंता पी उन्हे। उधर माया को शादी के लिए तैयार भी करना था और अगर वह मादी के लिए तैयार भी हो जाए तो किसी ऐसे लडके की तलाश करनी पी जो उनके मानदण्ड पर खरा उतरे। तभी उन्होंने माया को बड़ी मुश्किल से राजी करने के बाद, भोला चौधरी से उसकी शादी कर दी। उन्हें मालूम था, हिसाव इतना आसान नहीं होता। कुछ छूट जाता, कुछ बिखर जाता। उनके लिए तो अब यह सब थैमाने था, उसका कोई मतलब नहीं था। इसीलिए उन्होंने हालातों से समझौता कर लिया और कलेजे पर पत्थर रखकर माया को विदा कर दिया। कहने को तो सब कुछ हो गया था, लेकिन महेश मेहता को इंतजार था सिर्फ यह देखने का जो उनका फैसला सही था और वह खुद कितना और सह सकने के काबिल थे। एक मुर्दा की तरह, लोहे की मशीन के बने हुए पुजों की तरह उन्होंने अपने वक्त को काटना शुरू कर दिया था। उधर कई दिनो से महेश मेहता को माया की धड़ी याद आ रही थी। वह माया से मिलने के लिए सोच रहे थे । मन-ही-मन कितनी-कितनी बार उन्होंने अपने को रोका था, क्योकि उन्हें मालूम था, उनके वहा जाने मे, माया खुद उनके साथ चलने की जिद करने लगेगी। इसीलिए वहां जाने की बात वस हर दूसरे रोज पर टाल दिया करते। लेकिन उस दिन दफ्तर से लौटकर जैसे ही वह घर के अदर आए और अपनी छडी मैंटलपीस के पास रपने को बढे तो माया को वहा देखकर एक हैरतमद खुशी उनके चेहरे पर झलक उठी । "अरे रे । तुम !" "देखा' देखा आपने आज फिर देर कर दी !" "लेकिन मुझे कुछ पता तो हो।" "पता तो-क्या भला?" "यही जो यहा तू आई है। अच्छा बता तो सही, अकेले ही आई है या मोला भी आया है ?" "नहीं !"
64 : हलो - - "तो फिर लड़कर आई है ?" "आप तो जानते हैं पप्पा ! मैं लड़ सकती हूं भला!" वस मेरा जी नहीं लगता वहां 'मैं क्या करूं पप्पा, मेरा जी नहीं लगता "तेरा पति है वह, भोला अच्छा लड़का है !" "मैंने तो पहले ही कह दिया था ना।" "कहा तो था तुमने ''लेकिन अपने मन को समझाओ माया !" "अच्छा आप वैठे तो,” महेश मेहता के टाई की नाट ढीली करते हुए उसने कहा था, "कितने थके से लगते हैं आप, पप्पा, पप्पा, तबियत तो ठीक है ना?" "दो हार्ट अटैक के बाद अब तबियत कैसी होगी।" महेश गेहता के होंठों पर उंगली रखकर माया ने उनके हाथ सहलाना शुरू कर दिया, "सच में पप्पा, आपको मेरी जरूरत है ना?" "भोला की जरूरत ज्यादा है। उससे भी ज्यादा तुझे भोला की जरूरत है।" "मैं आपको छोड़कर नहीं रह सकती । दे आल आर टेरर टु मी आय टोल्ड यु !" महेश मेहता के जवाब का इंतजार किए विना, माया अंदर जाकर उनकी स्लीपर ले आई, जिसे उनके पास डालकर जूते, मोजे, कोट, टाई वगैरह लेकर अंदर चली गई । महेश मेहता उसे अंदर जाते हुए देखते रहे और चुपचाप काफी टेबल से अखवार उठाकर पलटने लगे। तभी उनकी निगाह दरवाजे की तरफ गई, जहां भोला खड़ा हुआ था। "आओ भोला, आओ, वैठो ना।" भोला चुपचाप आकर बैठ गया और कमरे में इधर-उधर देखने लगा। "माया अंदर है, अभी लौटकर आया तो मैंने देखा उसे !" महेश मेहता ने हंसते हुए कहा। "हां, मुझे मालूम है, वहां रह भी कैसे सकती है ? मैं उसे कहूं भी क्या ? जिसकी अपनी आमदनी न हो, जिसका वाप सटोरिया हो, जिस घर में इज्जत न हो' 'वहां'वहां तो, अब मैं भी नहीं रह सकता।" ! , - .
"और तुम हलो:65 "तो यहां आ जाओ ना।" महंश मेहता की आवाज में उम्मीद थी। "नहीं"मैं घरजमाई नहीं बन सकता।" "देखो भोला ! तुम्हारे घर की हालत मुझे पता थी"यह शादी मैंने तुम्हें देखकर की थी।" "लेकिन आपने मेरे सटोरिए वाप का हिसाब लगाया था?" "तभी तो! यहां ना जाओ"वक्त लगेगा लेकिन सब ठीक हो जाएगा।" "नही "कभी नहीं । वस माया रहेगी यहाँ ।" ?" "मैं किसी लाज में रहूंगा और क्या !" "और खर्चा-पानी?" "उसके लिए नौकरी तलाश करूगा ना।" "नौकरी ! वो मेरे यहां मिल सकती है।" "तब तो शायद कुछ दिनों के लिए यही ठीक रहेगा।" "तो कल तुम दफ्तर आ जाना, आई जल फिक्स समथिंग।" माया को आने हुए देखकर महेश मेहता अदर को तरफ चले गए थे। "माया, मैं घर छोड आया हू ।" भोला उठकर खड़ा हो गया। "क्या!" "हां, अब मेरी वहा तो गुजर नहीं होने की। मेरा दिमाग दिन पर दिन घुनता जा रहा है । बाप के सट्टो के नम्बर, खंराती, खुराकी किस्म के नम्बर बार-बार, वडे आकार में, घनत्व में किसी कटखने कोड़े की तरह दिन-रात मुझे काटते रहते हैं।" "फिर !" माया डरी हुई थी। "पापा ने कल बुलाया है, किसी नौकरी के लिए।" "मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता।" "लेकिन मेरी समझ में सब कुछ आ रहा है । एक बार वसव के चक्कर में आ गया। पापा को रकम पर नजर थी उसकी।" "रकम !" "हां रकम, लेकिन मुझमे ऐसा क्या था?"
66 : हलो . "पापा को बस शरीफ और सीधा लड़का चाहिए था ना ?" माया हंस रही थी। "शरीफ ! सीधा!" भोला चौधरी ने ठहाका लगाया, "शरीफ हूं, तभी तो ठोकरें खा रहा हूं, सीधा हूं, तभी तो ठुकराया जाता हूं। दुनिया में जीने के लिए शरीफ और सीधा नहीं-कुक चाहिए, डवल कुक !" "यू मीन क्रुक, यू वान्ट टु बी क्रुक !" "इसमें बुराई क्या है, जी सकता है कोई सीधा बनफर?" "तुम्हें क्रुक बनने की जरूरत क्या है, यहां क्यों नहीं आ जाते ?" "घरजमाई बनकर ?" भोला ने व्यंग्य से कहा। "नाट दैट वे!" "फिर है कोई नया नाम इसके लिए?" माया चुपचाप अपने नाखून कुरेदती रही। "वस में यही नहीं कर सकता । सटोरिया बाप के साथ सीधा बनकर और यहां क बनकर नहीं रह सकता।" "तो?" "मुझे थोड़ा वक्त चाहिए माया! थोड़ा वक्त ! मैं मेहनत करूंगा। यह मेहनत यहां की दौलत, यहां के आराम से ज्यादा कीमती होगी। आय वान्ट ८ वी सेल्फ मेड !" "पापा को मेरी जरूरत है।" "और मुझे?" माया का हाथ पकड़कर भोला ने खींच लिया, "कम आन आज मैं बड़ा लोनली फील कर रहा था।" "छोड़ दो मुझे छोड़ दो !" माया ने हाथ छुड़ा लिया। "क्यों छोड़ दूं, तुम बीवी हो, मेरी व्याहता हो।" "अधिकार जता रहे हो ?" भूल गए अपना वादा?" "याद है सब मुझे "लेकिन क्या छू भी नहीं सकता, लेट मी हैव ए किस प्लीज !" "आय सिम्पली डोन्ट लाइक इट नाय !" "सीधा हूं ना ! अरे कोई और होता, बस चमड़ी उधेड़कर रख देता और तब पूछता, डू यू लाइक इट नाव।" भोला ने चिढ़ाते हुए कहा । - हसो:67 माया उठकर खड़ी हो गई. पीछे की ओर हटने हुए घर पर कांपने हुए उसने कहा, "अभी कह रहे ये ना, यु वाटवी ऋक! इन' फेट, यू हैव विक्रम के !" उसके चेहरे पर परेशानी, हैरत, अविश्वास था, "यू आर क्रुजेल, आर यू क्रुक ! मैं जानती थी, यू आल भार सेम!" माया अंदर जाने के लिए मुड़ने लगी। "नहीं"माया नहीं।" भोला की आवाज मे दर्द था, "नाट दैट वे, आय एम नाट कुवेल"आई लव यू'माय लाइक यू वेरी मच 'लेट मी दाय ""आय शंल मेक इट।" "नही नही मैं तुम्हें ट्रस्ट करूनो भला !" कहकर माया अदर भाग गई। भोला चौधरी को अपनी गलती का अहमास हो चुका था। उसने माया को खुद वादा किया था। उसने महेश मेहता ने भी वादा किया था। लेकिन उस समय न जाने क्या हो गया था, वह कुछ देर बस य ही खड़ा रहा था वैठक के बीचोबीच । जैसे माषा की परछाई से निकलकर कोई गूज बार-बार उसके मन के कोने-किनारों से टकरा रही थी। कुछ दर बाद एक लम्बी सास भरकर, वह बाहर चला गया। एक तरह का समझौता कर लिया था महेश मेहता ने जिंदगी मे। सब कुछ पीछे छूटता जा रहा था, तेज रफ्तार में गुजर चला या । महेश मेहता असल मै मुकद्दर के धनी थे और हमेशा-हमंशा से जद सारे राने वद हो जाया करते, किसी-न-किसी रास्ते से निकलकर वह आगे का सफर तय कर लिया करते । उस दिन जब मावा अपनी ससुराल से वापम लोट आई थी और फिर जब भोला चौधरी ने आकर उनके सामने माया के वहीं, उनके पास रहने का प्रस्ताव किया था, तो शायद यह निर्यात का वही दरवाजा था, जिसे उन्होंने खुद खुला छोड रखा था। जब माना वहां उनके पास रहने लगी, तब उनको पता लगा उम फर्क का जो उनके द्वारा या जाने से पड़ा था। तिल-तिलकर टूटने हुए मन की दवाइयों में झुत घटत हुए अनेक मवालो का उन्हें जैसे जवाब मिलने लगा था। माया के लिए तब अच्छा क्या यऔर बुरा क्या था। जो कुछ था, वह महेश मेहता के पास या । उनके जोर डालने से, अपनी कमम देकर मजबूर •68 : हलो - करने से उसने भोला चौधरी से शादी तो कर ली थी लेकिन वह भोला की होकर रह न सकी। पहली ही रात उसने भोला चौधरी से एक खुफिया समझौता कर लिया था। भोला ने उसे अपने साथ, विस्तर पर लेटने के लिए मजबूर न करने की और महेश मेहता के यहां जाने से न रोकने की सौगन्ध उठा ली थी। एक लखपती बाप की बेटी जो खुद भी लाखों में एक थी, जिसका वेपनाह हुस्न, उसकी आंखों के सामने अनेक रंगों के ताने-बाने बुन रहा था, उससे भला भोला तव और क्या कहता ! भोला चौधरी के लिए सब कुछ नया था, अजूबा था। जैसे तेज रफ्तार मैं दौड़ते हुए घोड़े पर वह दूर-वहुत दूर निकल गया हो और तब भटकते-भटकते वह किसी ऐसी जगह पहुंच गया हो, जहां एक महल हो, एक राजकुमारी हो और साथ में बेशुमार दौलत की मिलने वाली मिल ‘कियत हो। कई दिनों तक उसे विश्वास ही न हुआ। उसे लगता था, यह कोई सपना था । शक्ल-सूरत से वह अच्छा था, रामू काका के पास मिलने के ए आया करता था। पढ़ने-लिखने में अच्छा होने के साथ, उसके चरित्र में | और स्वभाव में सरलता थी। उन्हीं दिनों तो महेश मेहता की नजर सके ऊपर पड़ी थी। वह माया के लिए किसी लड़के की तलाश में थे । पहले तो काफी दिनों तक महेश मेहता उसे सब समझते-तोलते रहे थे। जब एक दिन रामू काका ने माया से उसकी शादी का जिक्र किया तो लगा था जैसे उसे पंख लग गए । दूर-दूर तक उसे सारा संसार कितना हसीन 'दिखाई देने लगा था। जैसे आसमान से उतरकर कितनी रहस्यमय निधियां, कोने-कोने से फूट-फूटकर निकल रही थीं और उनके नन्हें से मासूम मन में, उसकी भोली निगाहों में समा नहीं पा रही थीं । उसे लग रहा था जैसे वह उड़ता चला जा रहा था, अनन्त विस्तार में और उसके चारों तरफ एक खुशहाल जिंदगी थी, इतनी खुशियां थीं, जिनकी कल्पनामात्र से उसे 'रोमांच हो आता था। शादी की पहली रात को जब उसने माया को अपने करीव पाया तब उसे लगा जैसे हुस्न-नूर की एक परी न जाने कहां से आकर वहां बैठ गई थी। वह डर रहा था, माया को छू तक लेने से डर रहा था। उसका मन कर रहा था जो वह वहीं जमीन पर बैठ जाय और अपने आंसुओं से माया के पैर धो डाले, उसकी पूजा करे, उसे अपना सब . । हलो: 69. कुछ दे डाले। इन्ही मनस्थितियों में तो माया ने उससे जो कुछ मांगा,. उसने दे डाला था, और सुहागरात को वम करवट बदलकर सो गया था। फिर उसके सटोरिए बाप ने सारा मजा किरकिरा कर दिया था। उसके बाप की छिछोरी हरकतों ने उसके अंदर महेश मेहता की दौलत के लिए एक हिकारत पैदा कर दी थी। उसके बाप को पैसे का जितना लालच था और जिस तरह की कमीनी हरकतें वह करता था, उसने मोला के अंदर आत्मसम्मान का, खुद्दारी का एक ऐसा जजवा पैदा कर दिया था जिसमे महेश मेहता कापरजमाई वनना उसे स्वीकार नहीं था। न जाने कैसी-कैसी वातें उसके अंदर पैदा होने लगी। वह जीना चाहता था, लेकिन अपनी तरह । अपनी शर्तों पर वह माया को हासिल करना चाहता था। महेश मेहता को माया की और माया को महेश महतो की जरूरत थी । भोला चौधरी अपनी बीवी माया को साथ रख सकने की स्थिति में नहीं था । वह घर छोड चुका था। इसलिए उसे एक छोटी-मोटी नौकरी की तलाश थी और कोई रहने का ठिकाना भी चाहिए था। महेश मेहता ने उसे अपने दफ्तर में नौकरी दिलवा दी और उसके रहने का ठिकाना भी लाज में करवा दिया था। उधर मग मेहता को तब तक इडिया ट्रेवल्स के उत्तराधिकारी की भी तलाश थी। और दिन-पर-दिन माया के बिना रह सकना उनके लिए नामुमकिन होता जा रहा था। उन्होंने माया को इंडिया ट्रेवल्स में काम सिखाना शुरू कर दिया था। हालातो की तहत महेश मेहता, माया और भोला चौधरी में एक प्रकार का समझोता हो चुका था, एक अरैजमेट हो चुका था, जिसमें अपनी-अपनी जरूरत की सीमाओ में बधे हुए यह सब, एक प्रकार से अलग-अलग होते हुए भी, एक-दूसरे से जुड़े रहने की लगातार कोशिश कर रहे थे। भोला चौधरी ने फिलहाल अपने को विरकुल अलग कर लिया था। वह महेश मेहता के घर शायद ही कभी आता। माया से भी वह बहुत कम मिलता। पहले तो महेश मेहता ने उसे पास खीचने की कोशिश की, लेकिन फिर उसकी खुद्दारी को जिद को समझते हुए, उसे अपने हाल पर ही छोड़ दिया था। एक बार फिर माया उनके पास थी और उनके जीवन में एक बार फिर शक्ति का अनत स्रोत उक्लने लगा था, खुशियो में वह चहकने लगे थे।
पांच सब कुछ ठीक-ठीक चल रहा था, तभी इंडिया ट्रेवल्स में राजी खन्ना नाम का एक लड़का नौकरी के लिए आया। बड़े सरकारी ओहदेदार का वेटा था राजी, जिसे महेश मेहता को कारोवारी दस्तूर की वजह से, नौकरी देनी पड़ी थी। राजी असल में, वचपन से जवानी तक, साधारण स्कूल में पढ़ा था । स्कूल में लड़कियों से उसका कोई ताल्लुक नहीं था। 'नवजवान, साफ-सुथरा आकर्पक व्यक्तित्व था राजी का । उसके मन के 'विस्तार के हिस्से-हिस्से में, हसीन ख्याल में, मासूम तसव्वर में अनेक लड़कियां गुदगुदी मचाया करती थी। लड़कियों को देख-देखकर कितनी- 'कितनी हसरत में वह तरसता रहता। उसे सिनेमा देखने और फिल्मी पत्रिकाएं पढ़ने का वेहद शौक था। फिल्मी मोहब्बत, हमेशा-हमेशा से उसके में, न जाने कितनी गडमड तस्वीरें बना देती और वह अकेले में उनकी में में खो जाया करता । गली-बाजार और मोहल्ले की न जाने लड़कियों से उसने सोहबत करने की कोशिश की थी। वस नाकामी ही मिली थी हर बार उसे । उसके पास नाकामियों का एक लम्बा इतिहास था । इश्क में वह नाकाम रहता क्योंकि उसे इश्क करना आता ही नहीं 'था । शुरू के दिनों में, अंग्रेजी स्कूल में पढ़े लड़कों की तरह, उसने कभी 'किसी लड़की के साथ, अकेले में बैठकर बात तक नहीं की थी। किसी लड़की के साथ पिकनिक, डान्स या रेस्ट्रां में चाय तक पीने का उसे अवसर नहीं मिला था। राजी खन्ना बेहद डरपोक था। विस्तर पर लेटकर आंसू 'वहा लेना, लड़की के इश्क में तड़पना, उसका पीछा करना, उसके घर के सामने घंटों छुपकर खड़े होना और उसके महज दीदार के लिए वेचैन रहना, -यह सब तो वह कर सकता था, लेकिन खुद उसके सामने जाकर अपने इश्क का इजहार कर देना, उसके लिए नामुमकिन था। न जाने कितनी बार, इस तरह उसके हाथों असफलता लगी। निराशा की उन घड़ियों में वह नशे की गोलियां ले लिया करता। धीरे-धीरे मैनड्रक्स, वेस्परेक्स वगैरा नशीली गोलियां लगातार खाते रहने की उसकी आदत पड़ चुकी थी।
हनो:71 राजी खन्ना ने जब एजेन्सी में कदम रखा तो वहां दो सरितां यो। एक थी शबनम, दमलर की टाइपिस्ट और दूसरी पी माला चौधरी। माया को देखने ही किसी स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत गई सनसनी देर प्रतिक्रियाएं होने लगी थी उनके अंदर । उबर झवनन की गन्ना को चुपके चुपके चाहने लगी। लेकिन राजी खन्ना ने शबनम की ओर देना सक नहीं। अपनी पुरानी बादत के तहत वह मापा ने वर-वारे इल करने लगा। दस्तर में और बाहर थोड़ाना फानना रखकर वह माग का चुपके-चुपके, चोर निगाहो में पीछा किया करता। दही हरत-नरी निगाहो में, वह माया को देखता, देखता ही रहता। उसरी नशीली आंदों में माया किसी हसीन स्वाद की तरह उनराया करती । मन में, चेहरे पर तडप, खोई-खोई निगाहों में, अनेक-अनेक रूप में मापा, उनके ख्यालो मे, कल्पना के कोने-किनारों से उतरकर उनके पास चली आती। मनडेक्स की गोलियां इन अनुभूतियों को गह्नता को बड़ा देती और कुछ कर गुजरने के लिए वह तडपता रहता। दफ्तर मे धितन बाबू बहुत पुराने आदमी थे। खिचड़ी वाल, अघ- कचरी मूछो मे घिरे उनके चेहरे पर एक फूहड़ मुस्कान हमेगा सेती रहती। स्टील के कमानीदार गोल शीशे वाले चश्मे में, उनकी आखों की पुतलिया जव-तब उलट जाया करतीं। बीस साल से लपर हो गए थे उन्हें एजेंसी में काम करते हुए । एक निहायत घिसे हुए, पिटे हुए, खुर्गट किस्म छित्तन बाबू के जीवन में, घर "बीबी बच्चों के सिवा, कुछ भी नही या । सीधी-सादी जिंदगी से उनका मन कब चुका था। रगीन मिजाज तो वह ये लेकिन समय उनके साथ नहीं था। अपने बारे में उनसे कोई खान गलतफहमी नहीं थी । वस उन्हें ईश्वर से यही शिकायत थी जो उनको उन अघेड़ उम्न तक, सिवाय घरेलू औरत और वेशुमार बच्चों के, उन्हे कुभो नहीं मिला था। सब कुछ होते हुए भी समझ-बूझ के धनी पे हितन मन नंगी-अधनंगी औरतों की तस्वीरें, सिनेमा पोस्टर, कोतस्वीमिजागे और नए फैशन की तितलियों को देखकर, वह हाय-हार करने सल्ले। माया को उन्होंने, बारह साल की उम्र से, महेश महता के पत्रो, जवान होते हुए देखा था। एक तो उम्र का फासला, दूसरे वास को बेटी, मामा .
72. नो
भारे में मारा गरमा राम गुनाह था।
मेलि उस बार उनकी गुदरती आँखों गे राब पुछ देख लिया था।
परार में जिस तरह राजी, गागा उपर, पाइन मार रहा था, छित्तन
मागोमागे में भला गिनी देर लगती। राणी गे माध्यम से, माया
म अपना राम्ग मिठापार, अपनी भड़ारा निगालने या उससे अच्छा
गौका भला उन्नाव और गाह मिलने पाला था।
पाणी पितों रामा किन बानु राजी गो गाया की तरफ, लगातार
परो खरो रातो । राजी की मेज उगगी गेज मे बगल में ही थी।
उरा दिल गागा Eer : मागजात, रेपारंग रोमशन सेनेकर, उनकी गेज
पारा में मिली थी, जिसन मागे राजी को खड़ा था, "पटाखा
राजी राम! पसामा?"
"गगा?" राजी गो छिन बान से ऐसी बात सुनने की उम्मीद न
भी।
HTTE Iो सोनही ''मैंने तो सिर्फ भाग गन की बात कही। मन
माना, जमान गेरीपी।"
"गामीमा मेरे गीगात?"
"तो भी गार" में सपनाली रामलो पोती निभाना जानते
"गयों नहीं ?" राजी को अजीब लग रहा था।
"एगी का नाम है, जरा धीरे से।"
"एम० श्री... एस० पी० साहस गया कह रहे हैं आप?"
"हमरी पुणे राब देखा है, सब जाना है।" आंख की पुतलियां
उस लिन पाने गहा।
रासी मपनी मुसी लोकर किन बाबुरे सामने आकर बैठ गया,
" , विमान?"
"मागा'मागापौधरी""भोला मी बीबी!"
"शोला.."पा शोला !" राजी ने मुंह बनाया ।
"गही."महीं.."रा को सो गुरु' भोला तो बस नाम की खातिर
हलो: 73 "भोला की बीवी है"भला "शादी की हुई ?" "छोड़ो भी यह भी कोई शादी है कुछ चाहिए तो ढकने के लिए ना!" "हकने के लिए?" "अरे हां, एम० डी० को पालो हुई है, अपने हाथों जवान किया है उमे।" छित्तन वावू हाय मल रहे थे। "मतलब?" "यही कोई दस-बारह साल की थी, कहीं मे उठा लाए थे, अकेले घर में जी बलाने के लिए। फिर धीरे-धीरे जवान होती हुई माया नशे की तरह उनके ऊपर छा गई। बचपन मे जवानी को देहरी तक, माया ने सिर्फ एम० डी० को ही जाना था, पहचाना था। उन्होंने उसे कब अपने से अलग होकर, आजाद जिंदगी जीने का मौका दिया ! और गुरु ! उन्होंने ही उमे तमाम खुफिया रिश्तों का अहमाम कराया, जो जवान होने पर हर लड़की कही-न-कही से मोखती है। उसके बाद सब कुछ आसान होता गया।" "क्या कह रहे हैं, छित्तन वायू ! माया तो शादीशुदा है ना?" "हां! उम्र ज्यादा हो चली थी एम० डी० साहब की, इसलिए उन्होंने एक माधारण आदमी से उमकी शादी कर दी। अरे भई ! ढके रखने के लिए भी तो कुछ चाहए ना 1.. और भोला, वह तो नाकारा है, बेचारा जाने क्या बड़े लोगो के खेल | बीवी के खर्च मे बचाए हुए हैं उमे एम० डी० साहब, ऊपर से नौकरी दी है, रहने का ठिकाना कर दिया। ससुरा कहता है मैटल होने तक माया उनके पास रहेगी। अरे इस तरह कोई अपनी बीवी छोड़ता है क्या ! लोगों ने उसका नाम रखा छोड़ा है । सेटलमेंट! "अव छोड़िए भी छित्तन बाबू "मैंने तो छोड ही रखी थी बॉम के डर मे ! अब आप न छोड देना। क्या जोडी रहेगी तुम दोनों को !" राजी बिना जवाब दिए उठकर चला गया, लेकिन ठित्त 74 :हलो वात उसे अच्छी लगी। वह जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया और एक बार माया को उड़ती निगाहों से देखकर फाइल के कागजात उलटने लगा। राजी का दिमाग बड़ी तेजी से घूम रहा था। उसने माया को व्याहता नहीं समझा था। वैसे माया के कंधों तक लहराते हुए रेशमी वाल, गोरा रंग, छरहरे बदन के कटाव और उभार, किसी मदहोश मोहकता में ड्वे हुए थे। उसमें मस्ती भरी अदा थी। कभी जीन्स और शर्ट, कभी सलवार-कमीज, कभी स्कर्ट-ब्लाउज और कभी-कभी साड़ी पहनती थी वह । उसकी चाल में, उठने-बैठने में, बोलने में, देखने में, उसके वजूद, उसके अस्तित्व में एक कमसिन खूबसूरती, एक अछूतापन था । वह जिधर से निकल जाती, माहौल महक उठता, ज-जरे से खुशबू फूटने लगती, अनेक-अनेक रंगों से बनी हुई कितनी ही वृत्तियां उभर आतीं। राजी करता भी क्या माया को देख कर, दिल में कसक उठती और वह उसका दीवाना हो जाता । माया का सबसे बड़ा दोप था, उसकी सुन्दरता, उसका अनूठा रूप । कभी-कभी तो उसे छू तक लेने के ख्याल से डर लगता और कभी जैसे सिर पर जूनून सवार हो जाता। उसके हसीन चेहरे पर दोनों तरफ कुदरती गड्ढे पड़ते, जिनमें धंस जाने पर उभर सकना मुश्किल था। छित्तन वावू ने न जाने कितने सवाल उठा दिए थे। माया, भोला जैसे लीचड़ आदमी की वीवी थी, इसको स्वीकार कर लेना, इसे मान जाना उसके लिए बड़ा मुश्किल होता जा रहा था। और फिर एम० डी० साहब के साथ, उसके खुफिया रिश्ते की बात भी छित्तन बाबू ने उसे वताई थी। सच क्या था और झूठ क्या था, इसका उसे पता नहीं था, लेकिन मन की सीढ़ियों पर चढ़कर उसने माया के साथ अपने को जोड़ लिया था। उसे यह भी अहसास होने लगा था, जो हालातों में फंसी हुई माया को शायद उसकी जरूरत थी । फाइल के कागज देखने में राजी का मन नहीं लगा। वह अपनी कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया । उसने फाइल उठा ली । फाइल लेकर वह एम० डी० साहब के केबिन से जरा दूर पर रखी हुई फाइलिंग कैविनेट के पास खड़ा हो गया। कैविनेट के ड्रामर पर लिखे हुए इन्डेक्सिग कोड को देखता रहा । उसने सबसे ऊपर वाला डामर खोला और वहां से एक के बाद एक फाइल देखकर हलो: 75 "स्पान्सई टु अस' की फाइल निकाल ली। ड्रामर को बन्द करने के बाद, कैबिनेट की टेक लगाकर वही, वह फाइल के कागजात उलटने-पलटने - माया ने माया हाल के दूसरे कोने मे, खरामा-बुरामा, एक फाइल झुलाते हुए चली आ रही थी। उसकी निगाहों में शोयी-भरी मस्ती थी, खुमार था। एक बार जरा देर के लिए वह भवानी बाबू की मेज के पारा रुकी, फिर उसने रावत से वात को। उसे एम० डी० साहब से डेलीगेशन के दौरे की बाबत कई बातें तय करनी थी। दफ्तर में चारों तरफ, किमी जहीन व्यस्तता का माहौल था। बाहरी लोग अपनी बुकिंग के लिए पूछताछ कर रहे थे। रावत मे बात करने के बाद माया एम० डी० साहब के केबिन की तरफ चली। बेबिन की तरफ मुडने से पहले उसकी नजर राजी पन्ना से मिली, जिसके साथ जैसे अपनत्व की, पहचान की लहर उठी और उसके महीन, लाल होटो की दरार से दो शब्द नियने "हलो मुस्कराकर राजी की तरफ देखा और एक पल के लिए ठहर गयो। दूसरे ही क्षण हावड़ाकर राजी ने जवाब दिया था, "हलो" गालो के गड्ढों तक माया के चेहरे पर हल्की-सी हसी की बिजली कौघ गई और वह के दिन के अंदर चली गई। राजो के हाथ से फाइल छूटकर गिर गई । वह फटी-फटो निगाहो से माया की तरफ देख रहा था, देखता ही जा रहा था। केबिन के बन्द होते हुए दरवाजे को घूरता रहा था। चन्द लमही के बाद वह अपनी कुर्सी पर बैठ गया और काफी देर तक बस शून्य में देखता रहा। हलो "हलो, जैसे वही दूर से, किसी ऊचे पहाड़ी टोले पर खड़े होकर कोई कह रहा था, हलो"हलो...! यह वादियों को फुसफुसाहट थी या तनाव की दूरियो को लोपतो हुई कोई महीन-मोहक 'मदहोश बना देने वाली आवाज कितने- कितने दिनों के इंतजार के बाद, कोई दिलो-दिमाग मे सोए हुए उस शब्द को जगा रहा था जिसे सुनने की साध लिए वह एक लम्बी बीमारी के दौर से गुजरता रहा था । उसे तो इसका भी पता नहीं था, यह म्यप्न था या हकीकत ! इस शब्द को सुनने की हसरत के लिए वह कितना तडपा था, यह कितना रोया था। उसका वजूद, इस शब्द का वजूद, उन यादों की - 76: हलो हस्ती कब की ढेर हो चुकी थी। वह तो अनजान, गुमनाम सांसों के लिए धड़कनों के लिए तरसता ही रह गया था। कितने दिनों के बाद एकाएक उसके जहन में यह शब्द, नींद की ढलानों से उठकर बैठ गए। उसे अहसास हुआ जैसे कोई जहर से वुझा तीर, तेज, बड़ी तेज रफ्तार में, हवा के संग, वातायन की दूरियों को लांघता हुआ, उसके मन में चुभ गया था। एक पल को तो लगा, सब कुछ झूठ था, सच तो था बस इस शब्द का जुड़ा होना, उस सारी उम्र से जो वह पार कर यहां तक आया था। लेकिन वह दस्तक,, वह फुसफुसाहट, तनाव की दूरियों को लांघती हुई एक महीन-मोहक- मदहोश आवाज ! राजी का हाथ अपने माथे पर गया, जहां पसीने की बूंदें उभर आयी थीं। उसने एक लंबी सांस छोड़कर जेव से रुमाल निकाला, माथे का पसीना पोंछकर रुमाल जेब में रखा और क्लिप किए कागजों से एक सादा कागज निकाल कर लिखने लगा : "..'माया'हलो'हलो.." हलो 'माया''माया हलो 'हलो''हलो' 'माया'माया'माया ।" इस घटना ने राजी के सारे-समूचे जीवन को झकझोर कर रख दिया था। एक खुशनुमा, जजबाती सैलाव, नशीली परत-दर-परत से उभर कर रिसने लगा था। राजी के लिए एक जवान, खूबसूरत लड़की का अपने आप हलो कह देना एक बहुत बड़ी बात थी। दफ्तर के सब लोग जा चुके थे, वस राजी अकेला वैठा एक पेंसिल से माया का लाइन स्केच बना रहा था। स्केच पूरा करने के बाद उसने तस्वीर को नाम दिया, डियर हलो ! तब कहीं जाकर उसने दफ्तर में चारों तरफ देखा। सब लोग जा चुके थे। कुछ पंखे चल रहे थे, कुछ वत्तियां जल रही थीं। वहां एक सन्नाटा भिनभिना रहा था। राजी उठकर खड़ा हो गया और वहीं से माया की मेज की तरफ देखने लगा। धीरे से अपनी कुर्सी खिसका कर वह माया की मेज के पास तक गया । एकाएक उसकी निगाहों के सामने, वहां रखा हुआ एक लेडीज रुमाल घूम गया । वह तेजी से घूमा और करीब-करीव दौड़ता हुमा, एम० डी० साहब के केविन तक गया। उसने केविन का दरवाजा खोलकर देखा। फिर पूरे दफ्तर का चक्कर लगाकर, बाहर तक देख आया। जव उसे किसी के भी वहां न होने का इतमीनान हो गया, तब वह वापस माया की मेज के करीब पहुंचा और हलो:77 एक झटके से उसने स्माल उठाकर अपनी मुट्ठी में बन्द कर लिया। उसके चदन में अनगिनत चीटियां रेंगने लगी जैसे उसके पोर-पोर में एक झुनझुनी -एक सुनसुनाहट हो रही थी । वह स्माल को बार-बार चूमने लगा। रमाल को मीने मे, मांखों मे लगाकर वह बार-बार फुसफुसाहट की आवाज में कह रहा था : हलो"हलो"हलो माया ! आई लव यू वेरी मच ! एक उपलब्धि, कुछ तो पा सकने का संतोप, एक छोटा-सा सहारा, झूठी- सच्ची आस्था की तरंगो में झूलता हुआ, खामोश कदमो से राजी दफ्तर से बाहर निकल गया। और फिर हमेशा की तरह शुरू हुआ राजी के प्यार का सिलसिला । 'एक हलो के सहारे वह स्वावो के दरीचो मे माया को सजाकर बिठाने लगा। एक गुमनाम मोहब्बत की खुशबू उसकी सासो मे, उसकी धड़कनों में पैठ चुकी थी। उसने माया के रमाल, माया के स्केच, और हलो लफ्ज़ के सहारे अपने चारो तरफ मोहब्बत का बवडर खड़ा कर दिया था। राजी माया के स्माल, माया के स्केच को न जाने कितनी कितनी देर तक हसरत-भरी निगाहो से देखता रहता, कोरे कागज पर हलो लपज को लिखता और चूम लेता। दूर से ही वह प्यार-भरी निगाहो से माया के जिस्म के एक-एक कपडे को उतार डालता और अंधेरी रातों में तमव्वुर के उतार-चढ़ाव मे उससे प्यार करता। उसके सग रोता-हंसता । माया का उमने पीछा करना शुरू कर दिया था। उसके घर के सामने किसी पैड, झुरमुट या झाडी मे छुपकर, घंटो उसकी एक झलक देखने के लिए खड़ा रहता । दफ्तर मे, कितनी बार माया की मंज के चक्कर लगाता और अक्मर योजनाबद्ध तरीके में उसके करीब जाकर हलो कहता, जिसके जबाव मे माया गालो के गड्ढो तक महीन-मोहक मुस्कुराहट फैलाकर निहायत सलोने तरीके से हलो कह दिया करती। तभी राजी ने प्रेमपत्र लिखना शुरू कर दिया था। वह लिखता और फाड देता। लिखे हुए पत्र को फाड़ कर वह फिर लिखता । एक शब्द लिखता और फाड़ देता। मम्बोधन से आगे बढ़ने में उसे कई दिन लगे थे। कई दिनों के बाद, वह प्रेमपत्र का सम्बोधन, मात्र हलो तय कर पाया था फिर एक दिन उसने अपना प्रेमपत्र पूरा कर लिया। अपना प्रेमपत्र माया की 78 : हलो , - - -- मेज पर एक फाइल के अन्दर रखकर वह माया के पत्र पढ़ने का इन्तजार करने लगा। तभी उसने देखा, माया ने वह फाइल, विना देखे ही, वाहर जाने वाले कागज की ट्रे में रख दी। इससे पहले कि चपरासी वह फाइल ले जाकर किसी को दे, राजी खन्ना ने बहाना बनाकर फाइल से अपना प्रेमपत्र निकाल लिया। राजी मोहब्बत की जिस दर किनार गली से गुजर रहा था वह दफ्तर के लोगों की निगाहों से छिपा नहीं था। छित्तन बाबू, और करीब-करीव सभी लोगों को उसकी हरकतों का पता लग चुका था। पहले तो वह सारे काम सावधानी से बचाकर किया करता था, लेकिन धीरे-धीरे एक तरह की लापरवाही उसके अंदर घर कर गयी थी। अपने अन्दर उठते हुए जजबात उसे मजबूर कर दिया करते और उसे इस बात का हिसाब ही नहीं रहता जो कब और कहां किस-किसने उसे क्या करते हुए देख लिया था। छित्तन बाबू का काम था आग लगाना और इन्होंने शवनम के मन में आग लगा दी। "राजी को छोड़ो, मैं कहता हूं शबनम, राजी छोड़ो, छित्तन बाबू के यह अलफाज उसके जहन में तेज धार वाले छुरे की तरह सोख्ता-सोख्ता दफन यादों को काट चले थे। राजी को भूल जाना, उसे छोड़ देना, क्या इतना आसान था? उसके तसव्वुर में, उसके ख्यालों में हर वक्त बस राजी का नाम था। राजी के नाम की हरकत वार-वार, शबनम को गुदगुदाया करती । न जाने क्यों बार-बार उसका मन करता, वह दौड़कर राजी के पास चली जाये, उसके कदमों पर गिर पड़े, अपना जीवन, अपना सब कुछ उसे समर्पित कर दे। राजी उसकी दुनिया का वह हिस्सा बन चुका था जिसे जोड़ा तो जा सकता, लेकिन अलग नहीं किया जा सकता था । मन, शरीर और आत्मा तक समाया हुआ, वक्त के हर लमहे में बसा हुआ राजी, शवनम के लिए एक अजूबा ख्वाब बन चुका था। वह राजी को देखते-देखते, किसी अनजानी दुनिया में खो जाती, किन्हीं तनहाइयों में डूब चलती। राजी का ख्याल, उसकी चाहत जव इतनी प्यारी थी तो राजी कितना प्यारा होगा, इसका अहसास शबनम बन्दर सुरसुरी छोड़ने लगता । उसने राजी के करीब जाने की बड़ी कोशिश की, उसे चाहा, उसे पूजा, लेकिन राजी तो न जाने किस दुनिया में खोया .
हलो: 79 हुआ था। वर्षों की तपस्या के बाद उसे एक लड़की, खुद-ब-युद पाह रही थी, उसके करीब पाने के लिए बड़प रही थी और तकदीर का सेल था जो राजी अनजान अंधेरों में भटक रहा था, उस माया के लिए जो उसकी नहीं बन सकती थी। छित्तन बाबू शवनम के पास से उठकर दफ्तरी, चपरासी, भवानी बाबू और जूनियर रावत की मडली मे पहुच गए। धीमी, चीखती हुई फुस- फुसाहट में, छित्तन बाबू शवनम की ओर, राजी की और और माया की तरफ, झटके देकर, हाथ फैलाकर, फूहड तरीके से, ह्वा बाधने लगे, "कयामत आने वाली है, बच्चू, इस दफ्तर में कयामत आने वाली है ! इश्क का भूत सवार है. सबके ऊपर | शवनम मरती है राजी पर, राजी मारता है माया पर और माया मरतो है, एम० डी० पर!" हो"हो"सी ई ई खो ही ही को आवाजों के बीच, किसी ने मुद्दा उठाया, "भोला" ..'और भोला को छोड गए, गुरु छित्तन बाबू ने उछाल मारी, "अरे भोला ! वह तो मरेगा'"युद मरेगा साला देखना, कितना भी चेहया हो, रह सकेगा इस महोल मै ! भाग जाएगा किसी दिन सब छोडकर।" "क्या बात है, छित्तन बाबू, क्या मुद्दा पकड़ा है " भवानी बाबू ने छित्तन बाबू को उठा दिया। रावत की मडली मे अपना रग जमाकर, अलमस्त अदा में छित्तन बाबू ने सिगरेट सुलगायी और मुट्ठी में दायकर कश लेते हुए, वह अपनी मेज की तरफ पहुचे ही थे, तभी दूसरी तरफ से आता हुआ राजी दिय गया । उन्होने दूर से ही हाथ उठाकर, राजी को रोका और पास आते ही उमललकारा, "अरे राजी साब, क्या हुआ, कहा रह गए थे, भई ?" तभी उनकी निगाह राजी के हाथ मे दबे हुए एक पैकेट पर पड़ी, "अरे, यह क्या छिपाया जा रहा है, हमसे ?" "नही तो, कुछ भी तो नहीं है।" राजी ने बचने की कोशिश की। "हम तो उड़ती चिडिया पहचानने वाले हैं। क्या कुछ वताओ गुरु राजो ने हारकर पकेट छुपाना छोड दिया, "आपने देव तो ले किन कही कहिएगा तो नहीं?" 1"
30 : हलो
"नहीं कभी नहीं, उनके लिए है क्या?"
"हां"उनके लिए स्कार्फ है, छित्तन वावू !" राजी ने धीरे से कहा।
"कोई खास मौका?"
"नहीं तो।"
"फिर भी?"
"आज उनकी बर्थ-डे है ना।"
"वाह'वाह, राजी साव, कितने गहरे हैं आप 'जवाव नहीं
आपका कोई जवाब नहीं।" छित्तन बाबू जैसे झूला झूल रहे थे।
"न जाने क्यों छित्तन बाबू, उनको देखकर बस दीवाना हो जाता
ई.. सव कुछ टूटने लगता है।"
"उनका भी तो यही हाल है।"
"सच !" हल्की-सी चीख निकल गयी राजी के मुंह से ।
"हां 'सच, वस एम० डी० से छुटकारा दिलाना होगा।"
"क्यों?"
"वच्चे हो अभी, अपने तजुर्वे से काम लो!" छित्तन बाबू के स्वर में
हिकारत थी।
"अच्छा !" राजी ने एहमत होते हुए कहा ।
"तुम तो आज आए हो, मैंने तो शुरू से सब देखा है, जाना है।"
"मुझे तो लगता है उसे प्यार चाहिए किसी ने उसे प्यार नहीं
किया, उसे सहानुभूति की, प्यार की जरूरत है।"
"करेक्ट, टोटल करेक्ट !"
तभी एम० डी० साहब का चपरासी आ गया, "साब ने बुलाया है।"
"एम० डी० साव ने !" राजी ने चौंककर पूछा, "क्या बात है ?"
"साहब गर्म हैं। 'बहुत गर्म !"
"गर्म हैं..'मेरे ऊपर !"
"और नहीं तो क्या मेरे ऊपर !" 'चपरासी हंसते हुए चला गया।
"घवड़ाना नहीं राजी साव, हम सब साथ हैं।" छित्तन वाबू ने दिलासा
। छित्तन वावू की बात का जवाब नहीं दिया राजी ने और एम० डी०
साहव के केबिन की तरफ चल दिया।
छह राजी के इश्क की चर्चा, दफ्तर के कोने-कोने में हो रही थी। पित्तन चाबू की लफ्फाजी, स्कैंडल उडाने का अदाज, घुटी-घुटी फुसफुमाहट, 'चीखती हुई आवाजें, बवडर की शक्ल में मंडरा रही थी। हर रोज एक नया किम्मा, किसी न किमी नये अदाज में शुरू हो जाता। ये तमाम वाते दफ्तर तक ही सीमित न रह मकी थी । दफ्तर में आने वाले डारिया, ठेकेदार, टेक्मी के मालिक, ड्राइवर, मिस्त्री, कारीगर और तमाम एजेंसी की सेवाएं हासिल करने वाले लोगों के जरिए, राजी का इक, राजी की मोबत, अनगिनत रास्तो, दीवारो और घरो को पार करती हुई, शहर के कोने कोने में जलती हुई आग की तरह फैल गई । वात मिर्फ राजी के दश्क की नहीं थी, उममे जुडी हुई घो, वे मारी कहानिया, वे सारे रिस्मै जो एजेंमी मे, पिछली तीन पुश्तो में हुए थे। मधु की मौत, मधु के याप के किस्म और माया और महेश मेहता उर्फ एम० डी० माहब के रिश, जने नियति की डोर से रंधे-बधे, एक समूची साजिश बनकर सामने आ गए 'थे । भोला की दयनीय स्थिति, उसके मटोरिए वाप का सौदा, माया के साथ स्कूल के माली का बलात्कार और फिर स्कूली लड़को द्वारा माया के साथ सामूहिक बलात्कार, यह सभी मूत्र किसी-न-किसी तरह एक-दूसरे से जुड़े हुए, गर्म, सुलग हुए अगारों की तरह नयी, येलाग अफवाहो को जन्म दे रहे थे । और तभी शुरू हुआ था पतों का सिलसिला। दिला नागा, रोज दफ्तर मे, माया के नाम एक खत जरूर आता। कभी-कभी तीन-चार चिट्ठिया आ जाती । कोई माया को दिल देता, कोई जिंदगी! किनी को रात मे नीद नहीं आती, और कोई दिन-रात उसकी याद में तड़पता | कोई उमे नदी के मिनारे बुलाता, कोई अधेरी रात में, उसके कमरे में आ जाने की धमकी देता। माया एक नशा वनकर सबके कार छा गई थी। उसका सुरूर, उमका शवाय सभी के दिलो को गुदगुदाया करता। नुमाइश में, जलसे मे, होटल और रेस्टोरेंट में उसके नाम के रिकार्ड वजाये जाने । टेलीफोन पर माया की आवाज सुनार, ठंडी-ठडी सांस भरने के साथ, उसके चाहने दाले उसे अपनी बाहों में बुलाया करते, उसके होंठों को चूमने के लिए फ्लाइस किस दिया करत, सोटिया बजाते ।
82 : हलो धीरे-धीरे खतों की तादाद कम होने लगी, लेकिन फिर भी एक खत, खास तरह का एक खत तो जरूर आता। वह खत, खत नहीं होता बल्कि प्रोनोग्राफी की किताव का पन्ना होता। कभी-कभी उसके साथ नंगी औरतों की तस्वीरें होती तो कभी हाथ से बनाया हुआ स्केच । खत लिखने वाला, अपना नाम वस 'एक चाहने वाला' लिखकर छोड़ देता। हर खत में मिलने की तमन्ना थी, अकेले में लिपट कर प्यार करने की गुजारिश थी। राजी जब केविन का दरवाजा खोलकर, दवे पांव अंदर दाखिल हुआ, उस समय एम० डी० साहब पीछे की तरफ मुंह किए बैठे थे। केविन का दरवाजा आटोमेटिक स्प्रिंग से धीरे-धीरे बंद होने लगा और जैसे दरवाजे के बंद होने की आवाज आई, एम० डी० साहब अपनी रिवाल्विग कुर्सी को तेजी के साथ घुमाकर खड़े हो गए। उन्होंने होंठों के बीच दये हुए पाइप को हाथ में लेकर मेज पर रख दिया । "यह सब क्या है "वाट नानसेंस !" एम० डी० साहब के हाथ में माया के नाम आई हुई ताजी प्रोनोग्राफी . किस्म की चिट्ठी थी! "क्या सर ?" राजी ने हिम्मत करके पूछा। "तुम"राजी गुन्ना तुम ! एक निहायत गिरे हुए, कमीने इंसान हो ! तुम आदमी हो या जानवर इसका भी पता करना होगा। तुम समझते हो "क्या मुझे कुछ मालूम नहीं. मैं सब जानता हूं..आई नो आल... क्या तुम्हें यह बताना होगा माया व्याहता है ''शी इज मैरिड 'तुम्हारी इन बेवकूफियों का मतलब? यह दफ्तर है. 'दफ्तर !" "सर !" राजी की कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। "माया मासूम है, अवोध है । तुम लोग अपनी गंदी, गिरी हुई हरकतों से उसका यहां आना बंद करा दोगे। लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूंगा।" "एम० डी० साहब ने चीखते हुए आगे "आज तुम्हें नोटिस मिल जाएगी"गेट आउट फाम हियर, यू फूल, गेट आउट'आई से गेट आऊट !" वह हांफ रहे थे। एम० डी० साहब के केविन से बाहर निकलते ही, छित्तन वावू सहित दपतर के वायू और चपरासियों ने राजी खन्ना को घेर लिया। उसके चेहरे पर मुर्दनी छाई हुई थी। एकदम, एक झटके से एम० डी० साहब ने उसकी ! कहा, .
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:84 : हलो "चुप थे।" छित्तन बाबू ने झिड़की दी। "लेकिन दिल पर ताले लगा दें.. आंखों में दरवाजे बांध देना।" राजी गुस्से में बोल रहा था। "ऐसा ही है तो घर में रखो ना, छुपा लें सात पर्दो के पीछे, हम ना देखेंगे, ना कहेंगे।” छित्तन बाबू ने दांव फेंका। "भला इसमें एम० डी० को बोलना था.. अगर एतराज करना हो तो भोला करे।" रावत ने फैसला कर दिया। "यह तो दादागीरी' 'धींगामस्ती है सरासर ।" दफ्तर के बाबू ने टांग अड़ाई। "ये राजी साव नादान हैं."भोले हैं. ये तो अभी आए हैं यहां और तुम सब जोकर हो मैं जानता हूं सब कुछ मैं जानता हूं।" छित्तन बाबू ने झूलकर कहा, "माया को किसी से मिलने दिया है उन्होंने ! उसके मासूम मन में नफरत के पलीते लगाए हैं एम० डी० साहब ने, बस अपने इर्द- 'गिर्द वांध कर रख दिया उसे !" "यहां कौन राजी साव ने हमला कर दिया था ।" पहला वावू वोला। "हमला कैसा हमला' 'कहां का हमला !" दूसरे बाबू ने मसखरी - में कहा। दूसरे बाबू की मसखरी पर सभी को हंसी आ गई । छित्तन बाबू ‘पहले तो कुछ क्षणों तक घूरते रहे और फिर उनके ऊपर भी हंसी का दौरा ‘पड़ गया। वह पेट पकड़कर, काफी देर तक हँसते रहे। इतना काफी था, ' राजी को उतावला बना देने के लिए कुर्सी पीछे खिसकाकर, वह उठकर खड़ा हो गया। बाहर निकलकर वह दो-एक कदम ही चला होगा, तभी उसके पैर लड़खड़ा गए और वह मेज की टेक लगाकर रुक गया । उसके तेवर देखकर सभी लोगों की हंसी रुक गई । सबके सब उसे तौलने लगे। "हम एजेन्सी के मुलाजिम तो हैं लेकिन एम० डी० साहब के घरेलू नौकर नहीं।" राजी गरज रहा था, "मुझे नोटिस देने को कहा है उन्होंने, कसूर क्या है मेरा ? मन के अंधेरों में चुपके-चुपके जागती हुई रोशनी को रोक लेंगे वे "हमें गुलाम बनाकर रखेंगे, आओ सब लोग चलते हैं. 'आज फैसला होकर रहेगा।" - हलो: 85 "हां" हां, चलो न ससुरो, स्क क्यों गए ? लडका हिम्मत करेगा, तो हम पीछे रहेगे भला।" छित्तन बाबू ने घोषणा की। "लेकिन हमारा क्या है, हममे तो कुछ कहा नही है न।" पहले बाबू ने सवाल उठाया। "मुझे तो मितली आ रही है।" कहकर रावत घिसकने लगा। उसके पीछे दूसरा बाबू, दफ्तरी और चपरासी भी चल दिए। "भागो कुत्तो"भाग जाओ - तुम सब चकल्लस के लिए ही हो ना "चलो राजी साव, हम चलते हैं आपके साथ ।" छित्तन बाबू आगे बढ़ गए। राजी ने चलने के लिए जैसे ही कदम उठाया, वह फिर लड़खड़ा गया। छित्तन बाबू ने वापस लौटकर उसे गिरने से बचा लिया। तभी उनकी निगाह मैन्ड्रक्स की गोलियो के पत्ते पर पड़ी। "अरे राजी साब, ज्यादा ले ली थी क्या ?" गोलियो के पत्ते की तरफ छित्तन बाबू ने इशारा किया । "नही छित्तन बाबू, ये तो उनकी हरामजदगी पर थी''बड़ा गंदा लग रहा था, मुझे।" अपने को सभालकर एक झटका दिया राजी ने और तेजी से मेहता साब के केविन की तरफ चल दिया। रावत, भवानी बाबू, दफ्तरी और चपरासी का गुट राजी की मेज से खास दफ्तर की तरफ बढ़ा ही था, तभी सामने से, खाकी पेट, दो जेब वाली बुशर्ट और चमड़े का झोला लिए हुए भोला आ गया। "और लो"आ गए, दूल्हा राजा आ गए ! भवानी बाबू ने झटके देकर कहा। "अरे इन्हे क्या, ये तो चिकने हैं !" रावत ने चिपका दी "चिकने नही."चिकने घड़े हैं।" भवानी ने जवाव मारा । "घडे हैं, ""हां जी चिकने धड़े हैं।" रावत के कहते ही, हा, हा, ही, ही, हो, हो करके सब हसने लगे। "आखिर है क्या? कोई बोलेगा?" भोला विषम परिस्थिति में फंस गया था। "देखो""उधर देखो," राजी एम० डी० साह्न के केबिन के अंदर घुस रहा था । उस तरफ इशारा करते हुए रावत ने कहा था।
- :86 : हलो "लेकिन क्या ?" भोला ने हड़बड़ाते हुए पूछा। "अरे भोला, सच में तुम्हें कुछ पता नहीं ? "बिल्कुल गोबर हो क्या .."आखिर कैसे खसम हो"न इधर की खवर''न उधर का पता !" ‘रावत ने मुंह बनाया। "वको मत !" कह कर भोला छित्तन बाबू की तरफ बढ़ गया। छित्तन बाबू, एम० डी० साहब के केविन से लगे हुए खड़े थे, जब उनके पीछे भोला आकर खड़ा हो गया । केविन के अंदर से राजी के चीखने की आवाज आ रही थी। वह चिल्लाकर कह रहा था- "..'आखिर, आपने, एम० डी० साहब, मुझे समझ क्या रखा है, मैं वेहूदा हूं.' 'वत्तमीज हूं."आपने मुझे गाली दी "मुझे बेवकूफ कहा ! नौकरी से अलग करने की धमकी दी, मुझे केविन से बाहर निकाल दिया ! माया पर मैंने कोई हमला तो नहीं किया। लेकिन यह सच है "हां हां ''यह सच है, आई लाइक हर, आई लव हर ! दूसरों पर उंगली उठाने से 'पहले यह तो जान लिया होता, सर ! एक उंगली अपनी ओर भी इशारा ती है । अपने दामन से उठते हुए गन्ध के गुवार तो देख लिए होते। सारा दफ्तर, सारा शहर थू थू करता है आपके ऊपर । न जाने क्या" क्या कहते हैं लोग।" "स्टाप इट ! आई से स्टाप इट !" एम० डी० ० साहब ने दहाड़कर - ! ... कहा। "स्टाप इट," राजी बिरा रहा था, "शुरू तो आपने किया था। अब यह खत्म नहीं होगा "चलेगा, दौड़गा । आप मेरा कर क्या सकते हैं ? नौकरी छीन लेंगे, यही ना? काम करता हूं साव, काम ! भोला चौधरी की तरह खैरात नहीं लेता, देख लूंगा' 'मैं सवको देख दूंगा!" "गेट आउट !" मेहता साव लगातार घंटी बजाते रहे। जैसे ही दौड़- कर चपरासी आया, उन्होंने चीखकर कहा, 'यो हिम आउट !" लेकिन तभी राजी, दरवाजा खोलकर बाहर निकल आया जहां छित्तन बाबू उसका इन्तजार कर रहे थे। राजी को आता हुआ देखकर, भोला, पास में रखी हुई आलमारी के पीछे छुपकर खड़ा हो गया। उसने ।
गया था।
हलो: 87
बब कुछ मुन लिया था। उसका गेहरा मफेद पट गया था। माथे पर पीने
की बूंदें उभर आई पी और उसके हाथ में झोला छूटकर जमीन पर गिर
उघर छित्तन याय, राजी का हाप परदे हम दूसरे हाथ में लगी
पीठ ठोकते हुए, हाल के किनारे फगे गए गे!
"शाबाश ! राजी साब, गावाग ! पापन हाद दाल दिया है, तो
हम पूरी तरह, आपके साथ हैं । हम भी पछि नहीं रेंगे। दर गाय की थी,
जन एम० डी० माहब उमे लाए थे। जयार होत मागेर
देखा क्या है," हाय नचान हप हिनन दा ने रोहा"सान या
उमे। वह वैचारी करती भी क्या, मने यसमा दिया गया
पर डाल दिया और अब देखा नहीं जाता है। बात यह है प्रष्ट
नहीं !"
"मुझे तो यह बूढ़ा बदमान लगता है।" गी ने किमी टार में
और क्या मैं तो दिल ममोगरा जाना था।" गाने पर रदका
मारते हुए, दितन वायू फट गए, "लेकिन यार, मन कर राना पार
तुमने "और गुरु वह डायसा यह भोला चौधरी रात को मना है."
क्या बात है. रात्री मार दिल मेरवानी रायमाग थी। यम मादी
बार दुने ! दिदगी भर याद रा माला, एम० ए० माहब का
दन्छा!
"दादा, दोटक की
नंदिवयाने मोगा नहीं।
यले जहाल में, टमाटोमी गुनगा !"
"मना! मानि की दुम,
माता दुरडायाबिन गरी प्रापार पता
ऐसी कट रमन,
पहने मानवी मनपरी
मी परिरहना
हिटरदार टिका र माटी
गहन्दः पनी का TR: .
88 : हलो ही शैल शवनम भी थी। "छित्तन बाबू, दिस इज नो गुड, लूज जॉब !" शबनम ने तीखे स्वर में कहा। !" राजी चीखा "मैं तो कहती हूं, अभी मौका है, माफी मांग लो।" "माफी ! मैं माफी मांगूंगा'मैं कोई भोला हूं मैडम !" राजी ने चिल्लाकर कहा, "मैं कोई भोला हूं।" "हां जी ! अब माफी क्या मांगना !" भवानी वावू ने और आग लगा "हू केयर्स, माई - दी। "नो'नो' 'माफी तो विल्कुल नहीं। कोई तो साला मर्द दिखा इस दफ्तर में । इधर भोला के आने के बाद सभी जनाने हो चले थे।" "अरे''अरे 'चुप करो, देखो तो भोला सुन रहा है ।" छित्तन वावू ने रहस्यमय मुद्रा में कहा । "भोला''हूं.'सुनकर करेगा क्या बेचारा ?" भवानी बावू के स्वर में दया थी। "यू आर माल स्क्राउडेल !” शवनम पैर पटकती हुई चली गई। "अच्छा चलो, अभी तो सब लोग चलो, अपनी.. अपनी सीट पर।" छित्तन बाबू के इतना कहते ही, सभी अपनी-अपनी सीट की तरफ खुसर- पुसर करते हुए चले गए। राजी दफ्तर से बाहर जा चुका था। छित्तन वावू, मुट्ठी में सिगरेट दवाकर, कश पर कश लगाए जा रहे थे और साथ में भवानी बावू को अपने स्थित विश्लेपण से परिचित करा रहे थे । उधर माया की कुर्सी खाली थी, जिस पर निगाह डालकर छित्तन बाबू ने जैसे ही भवानी वावू से कहा, "लगता है मन्थली कोर्स की वजह से आई नहीं।" तभी न जाने कहां से निकलकर भोला सामने आ गया । भोला के चेहरे पर एक सोख्ता ठंडक, वर्फीली ठंडक थी "बर्फ की मजबूत सिल्ली की तरह, अपने अंदर तार-तार होती हुई नमी को वह सतही तस्ती में छिपाए हुए था। "छित्तन बाबू !" बड़ी लाचारी से भोला ने कहा । "छित्तन बाबू की तो एक बार उसे देखकर जान सूख गई थी, लेकिन हलो: 89 जय उमे उन्होंने अपना नाम लेते मुना, तब जाकर कहीं उनकी जान में जाय आई। "हां, भोला आओ'याओ न !"फिर भोला को भवानी बाबू की तरफ देखते देख उन्होंने कहा, "यच्छा भवानी, अव तुम जाओ, जाकर चलेसिंग कर लो, एम०टी० साहब के पास भेजनी है ना !" "हां"हां, मुझे जाना चाहिए।" भवानी उठकर चला गया। "आओ, भोला, वैटो ना !" छित्तन यावू ने प्यार मे पहा, लेकिन भोला बेटा नहीं । वम जरा और पास आ गया। लेकिन उसने कहा वृछ नहीं, चुपचाप दूर भी तरफ शून्य में देखता रहा, जैसे अपने बंदर उवलठे हुए, अनेक-अनेक सवाली में से कोई एक सवाल निकालकर उठा लेने की कोशिश में लगा था। इस बीच छितन बाबू ने अपनी सिगरेट से दो-एक कम लगाकर मिगरेट को जूते से कुचल दिया। जिम जंगली तरीके से ठित्तन बाबू ने बची हुई मिगरेट जूते से कुचली, उमे भोला देखता रहा या । उसे अपनी नियति कुछ वृचली हुई सिगरेट के टुकडे सरीखी ही लगी थी। "छित्तन वादू יין "हा भोला, कह डालो, मन में कुष्ट न रखो नहीं तो चुभेगा।" "मैं बैंमा नहीं हूं जो साई के बकरे की तरह. मेए ए मेए करूं । जब हलाल होना था, हो गया! सेकिन एक बात सिर्फ एक यात दहकने हुए अंगारे की तरह मुझे जला रही थी। मुझे आपसे कुछ पूना था, बताएगे ना?" "हां" क्यों नहीं !" "विल्कुल सच ?" "हां यार, पूछकर देखो ना!" "बहुत बड़ी बात है, छित्तन दाबू, इसका कोई गलत जवाब न देना।" "दम जूते मार लेना जो झूठ कहू ।" अपने दोनो कान पकडकर हित्तन बाबू ने जिस समय यह कहा उस समय उनके चेहरे पर निहायत कमीनापन था।" "तो यह सब सच है ?" भोला को खुद अपनी सम्त लेकिन धीमी फुस- फुमाहट जैसे बड़ी दूर से आती हुई सुनाई दी। छित्तन बाबू ने जवाब देने 90 : हलो के लिए मुंह खोला ही था, तभी उन्हें रोकते हुए उसने आगे कहा, "मेरी- आपकी कोई दुशानी तो नहीं है ?" "तोबा तोबा भोला ! अब तुमसे भला क्या दुएमनी होगी !" "तो फिर आपको 'आपके बच्चों की कसम' सच बताना'"बिल्कुल राच !" छित्तन वाबू एक पल को अंदर तक कांप उठे, फिर भोला की जलती हुई निगाहों से अपने को बचाते हुए, दूसरी तरफ देखने लगे और तभी अपने को झटका दिया उन्होंने, जिसके साथ वह कंपकंपी, भोला की जलती निगाहों का प्रत्यारोपण छिटककर दूर चला गया, "हां भोला, तेरे साथ धोखा हुआ है " जरो किसी तेज धार वाले औजार की तीखी काट से छटपटाते हुए आंखों में उबलते हुए आंसू रोकते हुए, दूसरे ही क्षण अस्फुट शब्द निकले गोला गोकांपते होंठों से, "धोखा !" और वह चला गया। भोला के चले जाने के बाद, एका पल को छित्तन बाबू स्तब्ध-से, निश्चल बैठे रहे। उन्हें लगा अनजाने में जैसे कोई बड़ा अपराध हो गया हो । लेगिन वह करते भी क्या, उनकी प्रकृति, उनका स्वभाव, स्वयं उनके उपर हावी हो जाता। उस समय अच्छा क्या था, बुरा क्या था, इसका फर्क कर पाने की क्षमता नहीं बची रहती उनके अंदर। ऐसे कुछ खास मोके होते जब उनकी रगों में दौड़ते हुए खून की रफतार तेज हो जाया पारती, उनके दिमाग की जड़ें हिलने लगतीं, उनका रोम-रोम किसी तपती, सुलगती गट्टी की तरह जलने लगता और तब न जाने कौन-सी हिंसा उनके मन में जाग उठती। लाठी, बल्लम, बंदूक चलाना तो उन्हें भाता नहीं, बस बातों की गोलियां दाग दिया करते । उन्हें लगा करता, दुनिया की हर चीज उनके खिलाफ है और अगर उनका वस चलता तो उस हर चीज को वह मिटा देना चाहते, जो उनके चारों तरफ मौजूद हो। आज से नहीं, हमेशा से ही, छित्तन बाबू ऐसे ही किसी मौके की तलाश में रहा कारते, जब वह कहीं कुछ तोड़-फोड़ कर सकें। उनकी कुंठा, उनके अभाव, जीवन में सब कुछ उन्हें घट-घटकर ही मिला था। चाहते हुए भी जब यह कुछ न पा सके तो तरस-तरस कर जीते हुए, उनके अंदर काफी " । हलो :91 दिनों पहले, एक ग्रान तरीके की वहशियत जाग उठी थी। छित्तन बाबू की सड़ाई पुद अपने आप से मी, अपनी नियति से थी। फिर भी उनके अंदर, भोला को लेकर किसी वालीपन का अहसास करवट बदलने लगा, तो अपनी प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष से बचने के लिए, रित्तन वायू ने नई सिगरेट सुलगा ली और अपनी युसर्सी से उठकर, दपार के दूसरे हिस्से की तरफ वह धीरे-धीरे गुनगुनाते हुए "मार कटारी मर जाऊंगी"ओ बलमा, मार कटारी मर जाऊगी" चल दिए । तभी रावत ने उन्हें लसकारा- "वाह गुरु मान गए" लोहा मान गए।" "क्या मान गए रावत के बच्चे !" बटी यामानी से ठित्तन बाद को वह निकामी मिल गई, जिसकी वह तलाश में थे। इसी निवासी के लिए ही तो उन्होंने 'मार कटारी मर जागी' गुनगुनाना शुरू किया था। "एक तीर से तीन शिकार गुर।" रावत न तीन उगलियां दिग्दाई। "तीसरा कोन गुर?" छित्तन यात्रु अब तक हल्के हो चुके थे। "तीसरं हुए एम० डी० माहब ! और कौन !" "वी कैमे" "वो राजी को जब तक नोटिम देंगे, भोला पुद उनको नोटिम दे डालेगा । है ना, गुएर ब्रह्म 'गुरुर विष्णु" "मेरा क्या, मेरा क्या है, जो दे उसका भला, जो न दे, उसका भला, सबका भला।" "और माया का?" "उसका तो सयमे पहले भला, सबसे आखिर में भला !" "आओ गुरु चलते हैं।" "कहां?" "तीन टाकः।" "क्या बात है, आज इतनी मेहरबानी कसे !" "सब वताएं गुरु !" "चोल बेट्टा वाल !" छित्तन वायू ने पुचकारते हुए कहा। "आज लगा मुझे आपसे कुछ सीखना चाहिए। अगर यह लर 92 : हलो बातों का यह अन्दाज कहीं मेरे पास होता, तो मैं कहां से कहां पहुंच गया होता !" - "तो श्रद्धा से पिलाएगा ना !" "हां गुरु !" "तो चल।" रावत का हाथ पकड़कर छित्तन वावू मस्ती में झूमते हुए बाहर निकल आए। दफ्तर से लोग जा चुके थे, बस एक चपरासी, बाहरी दरवाजे के पास, स्टूल पर बैठा हुआ ऊंध रहा था। उधर माया अपनी मेज पर नक्शा फैलाकर, मोटी, लाल, पीली, नीली पेंसिल से कुछ निशान लगाती जा रही थी। कुछ देर वाद माया ने पेन्सिलें रखकर नक्शा समेट लिया और एक फाइल उठाकर पलटने लगी। तभी उसकी निगाह, इतनी देर में, आकर खड़े हो गए राजी पर पड़ी। दोनों की निगाह मिली तो माया के चेहरे पर, पहले हल्की-सी शिकन आई और फिर साधारण बड़ी साधारण-सी मुस्कुरा- हट खेल गई, उसके चेहरे की गहराइयों तक । लेकिन राजी के ऊपर उस मोहक मुस्कुराहट की कोई भी प्रतिक्रिया नहीं हुई। वह तो गहरी चोट खाए हुए, किसी असीम मानसिक यातना से पीड़ित था। उसकी लाल-लाल' आंखें दहक रही थीं, उसके बाल उलझे थे, कपड़े अस्त-व्यस्त और चेहरे पर ऐंठन थी। उसने माया को देखा "उसकी निगाहों के अन्दर तक' गहराई तक पैठकर, कुछ देर देखता रहा । महज माया को देखते रहने तक की देर में, उसके चेहरे की ऐंठन दूर जा चुकी थी और आंखों की जलन दबने लगी थी। सिकुड़ती हुई पलकों का भार जैसे धीरे-धीरे हल्का होने लगा था। कुछ देर चुपचाप देखते रहने के बाद राजी ने बड़े प्यार से कहा, "हलो !" "हलो! आप अभी तक गए नहीं !" माया ने खुश होकर जवाब दिया। "नहीं. 'जानबूझ कर नहीं गया।" "जानबूझ कर?" "हां, मैं तो सबके चले जाने का इंतज़ार कर रहा था।" "सच में !"
हलो :93 "मुझे मौका पाहिए पा"आई वान्टेड ए चान्स ! मिम माया!! "मिसेज" "नेवर माइन्ह ! आई टेक यू एज मिस ओनली !" "या, इतना आसान होता है सब?" "मेरे लिए तो कुछ भी आसान नहीं था, इट इज आलवेज डिपोकल्ट फार भी ! घर, क्या एम० डी० साहव नहीं हैं ?" "क्यो?" "ऐसे ही मुझे कुछ कहता है।" "क्या?" "यही या कही चल सकते हैं हम !" "चल सकते हैं. लेकिन कहाँ ?" "कही भी!" "नहीं, पापा भाएंगे"यहां लेने को मुझे !" "कितनी देर में?" "दस मिनट तो लगेंगे !" माया नै धड़ो देखते हुए कहा, "फोन आया था उनका!" "तो बैठ जाऊं मैं?" "श्योर!" राजी वैठकर माया को प्यार की नजर से देखता रहा । माया शर्मा कर सिर झुका लिया। तभी राजी की आवाज दूर से जैसे बडी सेलाई दी, "कैसे कहूं"लगता है. आप न जाने क्या सोचे 'मुझे वितरको परवाह नही, वट आई केयर फारम्।" माया यस पेन्सिल से कुछ लकीरें यनाती रही। तभी राजी ने उसके हाथ के ऊपर अपना हाय रति- रहा है"यही दूर से आया हूं. न जाने कितनी चराई कि पगडंडियों पर गिरते.. पड़ो यहा तक पहुंच पा र हिम्मत नहीं बच पाई है। उधर नीचे देवता हो कितनी गहरी "भमानक साई नजर आती है।" की तरफ देख रही थी। "यह सब इतना जाता है।
- - 94 : हलो आगे बढ़ाई, "यह तो मुझे पता था, लेकिन लोग इसे इतना मुश्किल बना देंगे''यह मैं नहीं जानता था। अब सवको मालूम हो गया है, तब मैं भी चुप नहीं रह सकता। आई लव यू ! आई लव यू वेरी मच । माया ! मैं तुम्हारे विना जी नहीं सकता !" माया अपने होंठ काटने लगी। उसकी सांस, उसकी धड़कन तेज होने लगी थी। "वैसे तो, इस तरह, शायद मैं कभी कह नहीं पाता'"कभी नहीं। बस चुपके-चुपके 'तुमको ख्वावों के दरीचों में सजाकर चाहता प्यार करता' 'लेकिन अब शायद मुझे यहां से जाना होगा 'चले जाना होगा । और चले जाने से पहले..." राजी चुप हो गया था। माया ने आगे की बात जानने के लिए नादानी से पलकें उठाई, फिर सब कुछ समझकर उसने नजर नीचे झुका ली, जैसे उसका इतना कुछ जान लेना काफी था । "हां 'चले जाने से पहले एक बार सिर्फ एक बार माया को लग रहा था वह बैठी हुई तो थी लेकिन उसके नीचे से जमीन घूमने लगी थी, तभी राजी ने आगे बढ़कर उसे चूम लिया और फिर कहा, "माया, जीवन में पहली बार मैंने सब कुछ अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था।" माया के लिए यह सब इतना अप्रत्याशित था, इतना अचानक था, जो कुछ क्षणों तक वह चुपचाप ठगी-ठगी खड़ी रही, उसके चेहरे पर अनेक रंग वदलते-उतरते रहे और फिर हया के मारे उसने गर्दन झुका ली थी। तभी वह आगे बढ़ने के लिए चली, तो राजी ने उसे रोक लिया--"नहीं माया, इस तरह नहीं, मुझे मेरे सवालों का जवाब चाहिए। फिर एक सवाल होता तो यहीं जवाब मांग लेता, लेकिन मेरे सामने तो अनेक-अनेक सवालों की कतार खड़ी है, और उनके चक्रव्यूह में मैं उलझता जा रहा हूं। माया ! मुझे वक्त चाहिए वक्त' 'चले जाने से पहले बस थोड़ा-सा वक्त, जव मैं अकेले में सब कुछ कह दूं सब कुछ जान लूं."प्लीज माया ! प्लीज !! आई वान्ट टु वी वेडेड मेन्टली एटलीस्ट !" "आई० एम० ऑलरेडी वेडेड!" माया ने धीरे से कहा । "नहीं. 'नहीं. वैसे नहीं ! मुझे मालूम है।" राजी ने छटपटाते हुए कहा, "मैं कैसे बताऊं...! ओ गॉड ! मुझे एक मौका दो, माया सिर्फ एक चार! जितना मैंने चाहा है तुम्हें, जितना प्यार किया है, उतना शायद कोई , - हलो: 95 तुम्हे प्यार नहीं करेगा, माया ! ट्राय टु अन्डरस्टेन्ड भी !" माया मेज के घेरे से बाहर निकल आई, तव राजी भी उठकर खडा हो गया, "क्या अच्छा नहीं लगा तुम्हे !" माया को कोई भी जवाव सूझ नही रहा था। "मेरा मन .."बहा अकेला है, मेरा मन ! जिस पहले दिन मैंने तुम्हे देखा था, बस उसी दिन से, हजार-हजार सुइयो को कसक घुसकर पैठ गई थी और जिस दिन तुमने हलो कहा था, पहली वार, उस दिन मेरे अन्दर दौड़ते हुए खून के कतरे-कतरे में एक अनजाना अपनापन और उससे जुड़ा हुआ अधी दलानों का खालीपन उठकर बैठ गया था। मैं नहीं जानता, अच्छा क्या है, बुरा क्या, लेकिन इतना मैं जानता हूं" तुम व्याहा हो, इसका पता शुरू में मुझे नहीं पा और जब तक मैंने यह जाना बड़ी देर हो चुकी थी, माया ! बड़ी देर हो चुकी थी, बडी दूर आ चुका था मैं..." तभी बाहर कार का हॉनं बजा जिसके साथ माया बाहर जाने के लिए बढी, लेकिन राजी की तडप, उसकी लाचार निगाहो को देखकर वह एक गई। राजी ने आगे बढकर उसका हाथ पकडकर जैसे ही कुछ कहना चाहा, बाहर से चपरासी दौडता हुआ आया। चपरासी के आ जाने में माया ने एकाएक अपना हाथ छुड़ा लिया। चपरासी ने कुछ दूर पर रक्कर मापा से कहा, ''साहब..." चपरासी की बात माया ने काट दी, "तुम चलो, मैं आ रही है।'' उसने मेज के ऊपर रखा हुआ अपना पर्स उठा लिया और. दौडबर, चपरासी के पहुंचने से पहले, बाहर पहुंच गई । राजी लाचार सा'बुझा" वुझा, वस हसरत-भरी निगाहो से उसे चले जाते हुए देवता रहा । कुछ क्षणों तक यही सोया-सोया प्डे रहने के दाद, एक लम्बी सांग निकालकर उसने जेब मे रखा हुआ एक पत्र निकाल लिया। उन पत्र को उसने माया की मेज पर रखी हुई एक पाइल के बीच में रख दिया । पाइन दाद व रपे उसने उसी जगह पर दी, जहां से उठाई थी और उनी गाने से बाहर निकल गया, जहा से माया गई थी।
. . 96: हलो इतमिनान कर लेने के बाद उस फाइल को उन्होंने उठा लिया जिसके अन्दर राजी ने माया के लिए पत्र रखा था। फाइल खोलकर उन्होंने पत्र निकाल लिया और बाहर की तरफ चलने लगे, तभी कुछ याद आने पर, वह मेज पर वापस लौट आए। अव तक वह पत्र उन्होंने जेब में रख लिया था, जिसे निकालकर, वापस फाइल में रख दिया। कुछ अनिश्चितता की स्थिति में छित्तन वाबू सोचते हुए खड़े रहे, जैसे वह हिसाव बैठा रहे थे, गणित निकाल रहे थे। मन के भ्रम को दूर करने में उनको ज्यादा समय नहीं लगा। उनकी निगाहें एक बार फिर दफ्तर के चक्कर लगाने लगीं। जैसे ही उनकी नजर एम० डी० साहब के केविन के ऊपर पहुंची, उन्होंने फैसला कर लिया। अगले क्षण, विना सोचे-समझे, उन्होंने फाइल उठा ली और खामोश कदमों से एम० डी० साहब के केविन के अन्दर चले गए। कुछ देर वाद छित्तन बाबू केविन से बाहर निकले तो उनके हाय में फाइल नहीं थी। एम० डी० साहब को उस दिन शाम की फ्लाइट से दिल्ली जाना था। "उन्होंने जरूरी कागज, फाइल वगैरा ब्रीफकेस में रखने के बाद माया को | माया जैसे ही केबिन में दाखिल हुई, एम० डी० साहब ने कागजों देखना छोड़ दिया । "माया, अच्छा होगा' 'कुछ दिनों के लिए तुम दफ्तर से छुट्टी ले लो!" "क्यों "पप्पा ?" "मुझे दो-चार दिन के लिए दिल्ली जाना पड़ेगा !" "कव पप्पा!" "आज और कब !" "मैं भी चलूंगी।" माया ने मचलकर कहा । "अरे तुम," एम० डी० साव ने हंसते हुए आगे कहा, "वहां तुम क्या करोगी?" "आपके सेक्रेटरी का काम !" "मेरी तो वस दौड़ रहेगी 'इधर-से-उधर''कई मीटिंग लगी हैं आई शैल वी वैरी बिजी! " -
हलो :97
"ओ पप्पा, आप तो "मुझे ले जाना नही चाहते हैं"ना?"
"नहीं"ऐसा नहीं है"लेकिन..."
"तो ठीक है" फिर मुझे छुट्टी लेने को क्यों कहते हैं भला?"
"दफ्तर का माहौल ठीक नहीं है, ना! मेरे लोट माने तक तुम्हारा
यहां आना ठीक होगा"यही सोच रहा था मैं।"
"लेकिन मुझे रिपोर्ट बनानी है"डेलीगेशन का टूर लाइन अप करना
है जो।"
"ओह !" एम० डी० साहब ने समझ कर कहा ।
"डोन्ट वरी पप्पा। मैं तो शबनम के साथ रहूंगी ना।"
तभी टेलीफोन की घंटी बजने लगी, एम० टी० साहब ने फोन उठाकर
कहा, "हलो "हाँ..."
"हां"हां!"
"ओ० के..."मैं अभी आता हूं।" कहकर उन्होंने फोन रख दिया
और माया से बोले, "अभी "मुझे अभी जाना होगा, ऐमा करो, तुम अपने
पेपर्स ले आओ और जब तक दिल्ली से लौटकर न आ जाऊं.. यही मेरे
केविन में बैठकर काम करना। अब शायद तुममे मिल नहीं सकूँगा"
मीटिंग से सीधे एअरपोर्ट जाना होगा।" जल्दी में एम० डी० साहब ने
अपना ग्रीफकेस खोला और उसमें मेज पर रखी जरूरी फाइलें भर ली
और माया से कहा, "टेक केअर आफ योरसेल्फ ! गुड बाय ! एण्ड गुड
सक!"
"गुड लक पापा ! फोन करियेगा!"
"श्योर"वाय !"
"वाय !"
एम० डी० साहब के चले जाने के बाद, माया अपने पेपर्स लेकर वही
केविन में काम करने लगी। तभी शबनम एक टाइप किया हुआ लेटर
लेकर के दिन में आई।
"बरे दीदी ! तुम यहां हो!"
"शवनम तुम "तुम कब याई?"
"अभी तो।"
98 : हलो ।" " . "आओ बैठो ना!" "आप विजी हैं और एम० डी० साहव !" "भरे बैठो भी.. पप्पा तो दिल्ली गए कुर्सी पर बैठते हुए शवनम ने कहा, "राजी आपको पूछ रहे थे।" "अच्छा"लेकिन क्यों।" माया ने चहकते हुए कहा। "पता नहीं, आपकी मेज पर फाइल देख रहे थे, कोई कागज था उसमें।" "फाइल' "कागज?" "कोई लेटर' शायद उनका लिखा हुआ आपके नाम हो या फिर !" शवनम ने मटकते हुए कहा। "लेटर''मेरे नाम' 'लेकिन मुझे तो मिला नहीं। क्या था ''क्या लिखा था उसमें ?" "नो आइडिया..." "अरे शवनम''ये तुम्हारा राजी बड़ा नर्म है''बड़ा सीधा है।" "वाह दीदी 'वाह'''चलो कोई तो मिला, जिससे डर नहीं लगता।" "सच में ! उससे डर नहीं लगता !" "फिर तो ठीक है।" "लेकिन मुझे क्या है ?" "वस दीदी''यही बात आपकी मुझे लग जाती है। आपका यह न्यूट्रल एटीट्यूड' 'जहां कुछ गुड है अच्छा है आप चुप रह जाती हैं और सब जगह तो आपको डर लगता है।" "क्या है, शबनम ! इतनी लम्बी बीमारी के दौर से गुजर चुकी हूं." जो अच्छा-बुरा किसी अहसास तक से डर लगता है। उसे मान लेने की डिजायर तक मुझे लड़ते रहना पड़ता है।" "ऐसा नहीं है जो मैं कोई राय दे सकती हूं, लेकिन फिर भी इतना कहना है मुझे, यू शुड टेक थिग्स ऐज दे आर !" "थिंग्ज आर नाट ऐज दे लुक !" "दे लुक ऐज यू आर !" "चलो ऐसा मान भी लो"तब भी मैं कुछ और सोच सकू'इस , हला: स्थिति में, मैं हूं कहां!" "सोचना कुछ कम करो, दोदी" "पप्पा भी यही तो कहते हैं। अभी कह रहे थे, कहीं बाहर चलने को।" "बाहर चलने को?" "हां, दिल्ली से लौटकर जम्ट फार ए चॅन!" "यहां कुछ मोचा है ?" "मैं तो निमला जाऊंगी या फिर कुल्लू !" "कुल्लू !" शवनम ने हंसोड़ा मुह बनाया। "तू भी चलेगी?" "मैं"मैं भला क्या करूंगी?" "वया परेगी तू," विराने हाए, “मनोरंजन, और क्या !" दोनों मनोरंजन शब्द पर हमने लगी और काफी देर तक हंमती रही। फिर एक-दूसरे को देखकर और जोर से हंसने लगी। तय शवनम ने.." कुल्लू कहा, जिसमे दोनों की हंमी और बढ़ गई। जैसे हंगी का दौरा पड़ गया या उनको। तभी केबिन का दरवाजा पोलकर भोला चौधरी अंदर मा गया। भोला के चेहरे पर एक ननाय था, माथे पर सिकुडन, उलझे बाल, लाल. लाल आयें, गदे कपड़ी में उसका इलिया भवानर लग रहा था। उसके चुपचाप अदर आ जाने से दोनो मे मे किसी ने भी उसे देना नहीं था। भोला चौधरी उन दोनो को हसने हए "लगातार हंमत हुए देयता रहा लेकिन इममे उगके चेहरे का तनाव और खूगार लहजे में बदल गया । तमी शबनम की निगाह भोला के ऊपर पडो और उसकी हंसी गले में अटक गई। माया उम ममय मुह दूमरी तरफ किए हुए हंस रही थी जिमसे शबनम को हसी एक जाने पर उमने एक वार धीरे में कहा, "कुरलू ! अरी रस यी गई दुल्लू !" फिर जदावी हसी का दौर न पाकर उमने आश्चर्य से शवनम की तरफ देवा । फिर उसका खुला हुआ मुंह और उसे दूसरी तरफ देखते हुए देख उसने भी अपनी नजर उपर ही घुमाई जिधर गवनम देख रही थी। और तब उसने भोला को देखा । माया की हंसी का दौर एक चुका था। वह भोला के चेहरे के तनाव को देखकर सामोर हो. पो.
Hum. 1001 हलो जैसे एकदम से रुकी हुई हंसी की रेखाएं उघड़कर गिर पड़ी थीं। "एम० डी० साहब कहां हैं ?" भोला ने सख्त आवाज में पूछा। "कौन पप्पा.."वो...वो तो........। "पप्पा'"पप्पा 'खूब 'वाह'वाह, क्या नाटक करती है, कमाल का ड्रामा है !" भोला का चेहरा घृणा रो सिकुड़ गया । "ड्रामा !" माया ने हैरत में कहा । "हां"हां"ड्रामा।" चीखते हुए.."एक निहायत गिरे हुए कमीने आदमी से और क्या उम्मीद की जाती "लेकिन तुम्हें"तुम्हें तो सोचना था'व्याहता हो, शादीशुदा हो।" माया ने शवनम की ओर देखा। "उधर क्या देखती हो।" मोला चिल्लाया, "देखना है तो मेरी आंखों में शांककर देखो 'आज इतना कुछ जान लेने के बाद भी जिंदा हूं. 'दहकते हुए अंगारों पर लोटते हुए अपने अरमानों की खाक मुट्ठी में बन्द करके • लाया हूं तो सिर्फ यह काहने के लिए' 'तुम फाहशा हो ! जब मैं आता हूं, तो तुम्हें उर लगता है न ! अपने, मेरे साथ हुए खुफिया समझौते का देती हो और उधर खुल्लम-खुल्ला उस छोकरे राजी के साथ इश्क की ग बढ़ाती हो । चाहिए भी क्या तुम्हें माया और चाहिए भी क्या, कितना परा, कितना परफेक्ट अरेन्जमेंट है तुम्हारा ! रात में पप्पा और दिन में राजी। क्यों..'आखिर क्यों, मुझे क्यों फंसाया तुम लोगों ने 'मैने क्या विगाड़ा था किसी का ? अगर एम० डी० साहब के साथ तुम्हारा गंदा, नापाक रिश्ता था, अगर राजी के साथ तुम्हें इएक करना था, तो बीच में मुझे क्यों डाला "बोलो, इस सारी योजना में, मैं कहां आता हूं ?" माया का चेहरा सफेद पड़ता जा रहा था, तभी शबनम उसके पास .आकर पड़ी हो गयी, "स्टाप इट नाव, स्टाप इट, फार गाड सेक स्टाप इट !" शवनम भोला से भीख-सी मांग रही थी "स्टाप इट !" भोला चिढ़ा रहा था, "अव सबको बुरा लग रहा है, ना! बुरा काम किया, तब ! मुझे फांसकर बलि का बकरा बनाया, तव ! मुझे उल्लू बनाया, तब ! मेरी बीवी बनकर मेरे साथ दगा की, तब ! मुझे बीच में डाला, तब ! मुझसे शादी की, तब ! बुरा नहीं लगा था!" “भोला हांफने लगा था। ! - - - हमो: 101 केविन के बाहर भीड़ हो चली थी। छितन वायू दरयाना गोसफर गांक रहे थे । और लोग उनकै पीछे पड़े थे । गभी के चेहरों पर अगोग उगला थी, नये भेद जान लेने को पुशी पी। "हाँ, मेरो जोरत पागा, तुम मांगों को!" जरा देर रककर भोला ने धीमी से किन गजापान फिर कहना शुरू कर दिया- "एम० डी० साहय को और शायद तुमको भी ! पिन मेरे जैसा एक फर्जी याविन्द पड़ा किया जाय, यह याटिया, यह म्कीमिग उनकी थी। अपने यार्मों को छुपाने के लिए ''मेरा जैसा एक गधा चाहिए था! अरे कोई देखने वाला है !" भोला चिल्लाया। "यह मेरी बीवी है. शी इज माय वाइफ और मैंग नहीं सकता.."आई जस्ट कान्ट टच हर!" गधे हुए गले से थकी हुई आवाज में मापा ने कहा, "ले पलो मुग पहा से, किमने रोका है ?" "हां ले घलो महाँ मे !" हाथ मलते हुए, तड़पते हुए, दीवार पर भाषा पटकन हुए भोला सुबकते हुए कहने लगा, "जागती है यह बदनात ! बन्छी तरह जानती है यह, जो मैं संकर नहीं जा सकता. 'दो गौ राय की नौकरी है, रहने के लिए घर कहाँ से लाऊं ! साल के कमरे में, जहाँ रहलाई, मुस्टन्ही का अड्डा रहता है, मप मार्ग दारू पीकर धुन पटे रहत है." एमी जगह, जानती है यह मैं नहीं ले जा सकता "रय नहीं रावसा।" केविन के अदर झांकत हुए लोगों की तरफ घूमार उगने आग बहा, "एम. डी० साहब मुझे गान मो की नौकरी दिलवा सकत पे, रहने के लिए अच्छा पलंट ने मकते थे मेरे लिए, लेकिन नहीं पिया, उन्होंने यह मय नहीं किया, क्योंकि तब चिहिया उन हाय से रह जाती और मेरी बीवी मेरे साथ रहने लगती ना" "मुझे जाने दो"प्नीज "प्लीज" माया को यागे बदल देगर भीड़ हटन सगी। तभी मीना ने मार्ग बदकर मापा के कई पकड़ लिए और टगे मोरते हुए बोला, "नहीं मुना जाता है ना, मुझग भी नही गुना पाया दिन-राठ यही सब तो गुनता रहता है। लेकिन यार तुम यह भी ...
102 : हलो . 'मेरे साथ अब कोई खुफिया समझौता नहीं चलेगा। अव मैं तुम लोगों को ऐसा सवक सिखाऊंगा जिससे आने वाले वक्त में कोई बड़ा आदमी, कोई 'पैसे वाला, किसी लाचार, वेसहारा नौजवान की ओट में अपनी हवस का शिकार नहीं खेलने पाएगा। आई शैल टीच यू ए लेसन 'ए लेसन फार 'लाइफ ! यू चीट' "एण्ड दैट बास्टर्ड आई शैल सी हिम आलसो !" भोला भीड़ को चीर कर बाहर निकल गया, जिसके साथ केविन का दरवाजा बंद करके दफ्तर के लोग भी खिसक गए। भोला के जाने के बाद केविन का दरवाजा बंद हो गया। अंदर थर-थर कांपती हुई माया को बेहोशी का दौरा पड़ने लगा था, जब शवनम ने उसे वहीं बड़े सोफे पर लिटा दिया। एम० डी० साव की मेज से पानी का 'गिलास उठाकर, शवनम माया के पास फिर आ गई। पहले उसने अपने 'पर्स से रूमाल निकाला, फिर उसे पट्टीनुमा बनाकर गीला किया और माया के माथे पर रख दिया। कुछ देर बाद माया ने आंखें खोलीं, तब उसे उठाकर शवनम ने पानी के दो-चार चूंट पिला दिए । तब तक शवनम ने सोफे पर एक कुशन रख दिया था। माया सोफे पर लेट गई । इस बीच वह चुप 'विलकुल चुप जैसे किसी खामोश गुफा में बन्द हो चुकी थी। वह 'फटी-फटी निगाहों से, एकदम सीधी लेटी हुई छत की तरफ देख रही थी। उसके बदन में कोई हरकत नहीं थी। बस कभी कभी धड़कन ''सांस तेज हो जाने पर, उसकी छातियां उठती-गिरती थी। उसके चेहरे पर 'एक दहशत थी, कुछ दवा हुआ जहर में बुझा हुआ एक अनजाना खौफ उसके अंदर तक की सतह में घुस कर बैठ गया था। तभी उसके बदन में कुछ हरकत देखकर, शवनम पास की कुर्सी से उठकर, उसके करीव आ गयी। एक पल को दोनों की निगाहें मिलीं । माया जैसे कोई सहारा ढूंढ़ रही थी। शवनम की आंखों में पहचान थी, जिसकी वजह से उसकी निगाहें शवनम की आंखों पर टिकी रहीं और उनमें आंसू छलक आए... उसकी पलकें गीली हो गई। शवनम भी अपने को रोक नहीं पाई और फिर दोनों रोने लगीं । धीरे-धीरे उठती हुई ठुमक और अंदर ही अंदर टूटती हुई हिचकी को रोके रखने में उसके दोनों हाथों की मुट्ठियां भिंच गई। फिर माया के फफक-फफक कर रोने के साथ, शबनम से भी चुप हलो: 103 नहीं रहा गया और उसने आगे बढ़कर माया को गले मगा लिया। उन दोनों के रोने की आवाज एम० डी० साव के केबिन मे गूंज बनकर उठ्ने सगी । दोनों कुछ देर तक यू ही, एक-दूमरे से चिपटकर रोती रहीं। तभी रहते हुए मांसू पोख्ने हुए माया ने भारी आवाज में कहा, "पप्पा, शबनम, पापा को बुलाओ!" अपने आंसू पोते हुए शवनम ने सवाल किया, "वहां होंग मला!" "टूरिस्ट डिपार्टमेन्ट में, एअरपोर्ट या कही भी, यात हिम टु कम चक! कुछ रुककर वह पुनः बोली-"मुश्किल होगा ना ! फिर भी एक बार देखो ना, आय नीड हिम रिअली !" "यस रियली " कहकर सवनम बाहर चली गई। माया के दिमाग पर धुध की गहरी काली छाया वटी तेज रफ्नार में आती और गुजर जानी। वही अनजाना डर, वही पुराना मोफ जो माधव ने दस साल की उम्र में उनके अदर डाल दिया था, उठकर बैठ गया था। चेहरे नए थे, जगह नई थी, माहौल दूसरा था, लेकिन और सब कुछ वसा ही था। उसे लग रहा था, वह सौफ उसो भयानक शक्ल में बार-बार उसके करीब पाकर उमे डकार जाना चाहता था। जैसे ही उम खौफ के करीव आने का अहसान उमे होता, उमका दम घुटने लगता और जब वह दूर जाने लगता तब उन लमही के लिए उसकी सांस में एक नमी- सी आ जाती, कुछ आराम मिल जाता उमे ! कुछ ही देर बाद शवनम अदर लोट आई। "दीदी ! एम० डी० साब तो मिले नहीं, हां उनके लिए एअरपोर्ट पर मैमेज छोड़ दी है, वो फोन करेंगे । ही इज बुक्ड इन द फ्लाइट "शवनम ! लगता है, पप्पा से अब मुलाकात नहीं होगी।" "ऐसा नहीं कहते, दीदी !" माया चुपचाप शून्य मे देखती रही। "दीदी, चार बजे हैं, सेटहें, है ना! दफ्तर से सब लोग जा चुके हैं, बाप जाएगी घर?" "घर"नहीं," माया के मुह से हल्की-सी चीख निकल गई, "वहां 104 : हलो ! फिर आएगा वह ! कैसे फेस करूंगी मैं ! तू भी चल ना !" "श्योर दीदी ! पर उससे पहले मुझे अस्पताल जाना है। मम्मी एडमिट हैं ना ! गाड़ी तो है नहीं, उधर से दूर पड़ेगा मुझे और फिर. विजिटिंग आवर्स खत्म हो जाएंगे या फिर आप भी चलो मेरे साथ !" "मेरा इस वक्त कहीं जाने का मूड नहीं है 'पप्पा के केविन में 'वड़ा सेफ लग रहा है । फिर पप्पा फोन करेंगे ना !" "ओ० के० फिर मैं हास्पिटल होकर आती हूं! आप यहीं रुकेंगी तो ?" "हां ! कितनी देर लगेगी तेरे को ?" "एक घंटा, टोटल!" "ट्राय टु मेक इट अर्ली ।" "ओ० के० !" शवनम ने पर्स उठाया और केविन के दरवाजे तक जाकर जैसे ही हैन्डल घुमाने के लिए उसने हाथ बढ़ाया उसे माया की थकी हुई आवाज सुनायी दी- "जल्दी आना शवनम ! कहीं देर ना हो जाए !" "डोन्ट वरी, आई शैल वी क्विक एण्ड फास्ट !" केविन खोलकर "शबनम बाहर निकल गई। ७ सात महेश मेहता न जाने कब के मर चुके होते। वह जिंदा थे तो बस इसलिए. कि माया के कातिल को सजा हो जाए । माया की हत्या करने वाला कौन था? उसने माया को क्यों मार डाला? वह कौन-सी कमी थी जिसे वह पूरी नहीं कर सके थे ? कहां से ढूंढ़ कर वह लाते वह रोशन जिन्दगी का उनमान जिसने न जाने कितने पर्त-दर-पर्त ढके अंधेरों को चीरकर उजाले में बदल दिया था ! एक पूरी-समूची जिन्दगी जिसे ढोकर वह खींच रहे थे, माया के साथ जुड़कर इतनी तेज रफ्तार में दौड़ी हसी: 105 थी कि कब उनको टोकर सगी, यह भी वह नहीं जान पाप । भूने- विमरे रास्तों को पलटकर भी नहीं देगा या उन्होंने और किसी आगमानी उदान में वह चले थे वह । चारों तरफ रंगीन मितारों की दुनिया थी, गर्माहट थी और पा कभी न समाप्त होने वाला गुशियों का दौर टूट-टूट कर जीने वारे महेश मेहता एक समूची सम्मियत के मालिक यन थे। उन्हें इस बात का यहमाम होने लगा था कि उनकी जिन्दगी फिमी नाकारा यदशक्ल, वदनुमा दायरे का हिम्मा नहीं बल्कि गुट में एक दौर थी। यह ऊंचाई, वह गहराई, उम धरासन का बार-बार उन्हें अपने पाग पीच सेना जैसे विमी गुदाई करिस्म का हिस्मा पा, जब यही वृष्ट नहीं यथा था तव माया किंगी फरिस की तरह उनकी जिदगी में आई थी। माया ने किसी गृवमूरत ताने-बाने मे उन्हे धुन हाना था, जहां हर धडकन, मचलती हुई महमनी हुई गुभियों की चौग बन गई थी । उग्र की दहलीज, मौन की कगार नाघकर भी वह निरन पाए थे। माया ही तो था वह नाम जिमकी अमीम तारन के महारे अग्पताल और वीमारी से संघर्ष किया था उन्होंन । उन दिनो उन्हें यही लगना या जमे मारी. ममूची दुनिया में उन्हें कोई भी पराजित नहीं कर माता पा, ईयर भी नहीं, मौत भी नहीं। लेकिन कभी पराजित न होने वाले मन महता उम एक बार में अपना मव कुछ हार बैठे थे, सो वैठे थे । वह घरानस तो टूट गया था, जिस पर वह मर , वह उनमान ही वियर गया था, जिमने चनको जिन्दगी में रोगनी फैलायी थी। एकः थके हुए, हारे हुए जुमारी की तरह उनके पाम दांव पर लगाने के लिए कुछ भी नहीं बचा पा । यस्त मापा का दृमा पा, लेकिन उन्हें लगा था, मार वह हाले गए थे। उन दिनों महा मेहार जिन्दा लागी तरह अपने बालीगान बंगले में रात को तन्हाइयो में माया की यादी को मीन मे चिराए हुए भटकने रहत । माया के कपई, उमरा विम्लर, उमरी अनगिनत घीनों को बम मान में सगारे हुए मन-ही-मन मुदा-मुदय पर रोया परने। वही वापर पता लगा पा वर ग्निनी एमगार, स्तिनी गहाग, जिन्दगी का बोझ ढोने चले या रहे थे। अपने को न दान स्तिना" समाने वाले महंगमेहता को इग्न मि इस बात पर पीदि यह माया मक -- 106 : हलो - - को नहीं बचा पाए थे। माया को न बचा सकने के अहसास के साथ जुड़ा था कितनी-कितनी नाकामियों का सिलसिला! उन्हें लग रहा था"एक साथ हकीकत उनके सामने उजागर हो चुकी थी। उनके अन्दर' 'खुद उनके अंदर आत्मविश्वास, अहंकार, बड़ाई के पत्तों के नीचे एक खुदगर्ज किस्म का इंसान छिपा था, जिसने वक्त के टुकड़े-टुकड़े में, अपने लिए सिर्फ अपने लिए सभी से सब कुछ छीन लिया था। ममता, मधु और फिर माया, सभी के साथ, उन्हें लग रहा था, उनका सलूक एक जैसा था। ममता के साथ गांव के ऊंचे टीले पर, खाई के किनारे, जंगल की छांव में महेश मेहता ने अपना खेल शुरू किया था। न जाने कितने सपने, न जाने कितना ऐश्वर्य, न जाने कितनी खुशियों के रंग उन्होंने बटोर लिए थे। अपनेपन की उस पहिचान में उन्होंने दायरों में सिमटना नहीं सीखा, विस्तार में फैलना सीखा था । एक तेज दौड़ में ममता के साथ बुने हुए रंगीन सपनों, खुशियों के रंग और मन के समीकरण को पीछे छोड़कर, ऐश्वर्य की ओर बढ़ चले थे। तब उन्होंने एक पल को भी यह नहीं सोचा था कि ममता का क्या होगा, वह कहां जाएगी, क्या करेगी। सपने, खुशियां, ऐश्वर्य और ममता, यहां से उन्होंने शुरू किया था। लेकिन सिर्फ ऐश्वर्य के लिए भाग गए थे वह मधु के पास । मधु ममता नहीं थी। वह तो ऐश्वर्य थी, धन-दौलत की दुनिया में खुशियां उसके लिए बहिर्मुखी दौर थी''अन्तर्मुखी प्रवाह नहीं। वह महेश मेहता को चाहती थी, उन्हें उसने पाया था। एक तरह से मधु ने महेश मेहता का शिकार किया था । जव मधु महेश मेहता को चाहती थी तब महेश मेहता मधु को नहीं चाहते थे। उन्हें ममता अच्छी लगती थी, वह उसे प्यार करते थे। ममता उनके सपनों, उनकी जिन्दगी का हिस्सा थी। तब वह सोचा करते थे, ममता से अलग धन-दौलत-ऐश्वर्य का उनके लिए कोई मूल्य नहीं था। आज उन्हें लग रहा था, उन्होंने हर जगह गलती की। ममता को छोड़ना जिस तरह गलत था, मधु को ठुकराना भी उसी तरह गलत था। किसी भी नक्श का एक हिस्सा तोड़कर अलग नहीं किया जा सकता, परछाईं को छोटा-बड़ा तो किया जा सकता है, लेकिन उसे वांट कर नहीं छोड़ा जा सकता । उनको अपने अन्दर किसी बूंखार जानवर की . - हलो: 107 वहशियत, किसी दरिन्दे की अपट के साथ आदमी के दिमागी दन्म के 'मिश्रण का अमाम होने लगा था। ममता को छोड़कर माने के बाद, महेश मेहता ने उमी तरह पीछे मुड़कर नहीं देखा था, जिम तरह दौलत पाने के बाद उन्होंने मधु को पोद 'छोड़ दिया था । मधु और ममता उनकी जिस्मानी और रूहानी हत्या के प्रतीक थे। मधु ने महेश मेहता के जिम्म को चाहा था, प्यार किया था। दौलत के लिए विना शिक्षक महेग मेहता ने वह तो दाव पर लगा दिया सेक्नि दांव जीत जाने के बाद, अपने जिस्म को वह मधु से दूर ले गए। मधु जिस दुनिया का हिस्मा पी, वहा इन चीजों को माग कर नहीं छीन कर लिया जाता पा । उसने भी महेश मेहता को ममता से छीन कर ही लिया या । वह वनब जाती थी, वह शराब पीती थी, गैर मर्दो को बाहों में झूल कर यह महेश मेहता से इतकाम नहीं ले रही थी। वह तो उन दिन के इंतजार में थो, जब महेश मेहता अपने पति, मालिक होने के हक का इस्तेमाल करेंगे, उमे रोकेंगे, उने मना करेंगे । वह तो रात-गन-भर जागकर पार्टि भरकर सोने हुए महेश मेहता को नम थाखों में देया करती। उसके मन में महेश मेहता के लिए अमीम श्रद्धा थी। वह उमर एव शारे पर अपनी जान छिडक साती यो । उसे पता लग गया था, वह दिन कमी नही आएगा, जव महेश मेहता उसे रोकेंगे, तभी तो, वह रास्तो पर और बढ़ती गई, जो उसे किसी निश्चिन अत की तरफ ले जाते थे। महेश मेहता यूं तो कभी फर्क नहीं कर पाते, कहा वह चूक गए, वहा उन्होंने गलनी की। माया की मौत ने उनके अहम को सतह मे उपाइ कर फेंक दिया था। यक्त के उस टुकडे में, जब उन्होंने माया की लाश देनी थी, एक तरल विस्फोट हुआ या उनके अदर, जिसमे सब कुछ नष्ट हो गया था, यही कुछ भी वाकी नहीं बचा पा । इनकार, हिकारत, तिरस्कार, नफरत इम मवमे एकाएक वह दूर चले गए थे। अदर ही अदर उन्हें तब यही लगा था, -वह पद ही तो जिम्मेदार थे माया की मौत के । माया की मौत के वह पद जिम्मेदार इसलिए पे कि उन्होंने माया को भी अपनी आलीशान जिदगी का सिलोना बना कर छोड़ दिया था। माया कभी भी महेश मेहता के सोने से अलग होकर नहीं जी सकी। सब लोग उसके इर्द-गिर्द हवम की हिमा 106 : हलो - को नहीं बचा पाए थे। माया को न वचा सकने के अहसास के साथ जुड़ा था कितनी-कितनी नाकामियों का सिलसिला! उन्हें लग रहा था "एक साथ हकीकत उनके सामने उजागर हो चुकी थी। उनके अन्दर "खुद उनके अंदर आत्मविश्वास, अहंकार, बड़ाई के पत्तों के नीचे एक खुदगर्ज किस्म का इंसान छिपा था, जिसने वक्त के टुकड़े-टुकड़े में, अपने लिए सिर्फ अपने लिए सभी से सब कुछ छीन लिया था। ममता, मधु और फिर माया, सभी के साथ, उन्हें लग रहा था, उनका सलूक एक जैसा था। ममता के साथ गांव के ऊंचे टीले पर, खाई के किनारे, जंगल की छांव में महेश मेहता ने अपना खेल शुरू किया था। न जाने कितने सपने, न जाने कितना ऐश्वर्य, न जाने कितनी खुशियों के रंग उन्होंने वटोर लिए थे। अपनेपन की उस पहिचान में उन्होंने दायरों में सिमटना नहीं सीखा, विस्तार में फैलना सीखा था। एक तेज दौड़ में ममता के साथ बुने हुए रंगीन सपनों, खुशियों के रंग और मन के समीकरण को पीछे छोड़कर, ऐश्वर्य की ओर बढ़ चले थे। तब उन्होंने एक पल को भी यह नहीं सोचा था कि ममता का क्या होगा, वह कहां जाएगी, क्या करेगी। सपने, खुशियां, ऐश्वर्य और ममता, यहां से उन्होंने शुरू किया था। लेकिन सिर्फ ऐश्वर्य के लिए भाग गए थे वह मधु के पास। मधु ममता नहीं थी। वह तो ऐश्वर्य थी, धन-दौलत की दुनिया में खुशियां उसके लिए बहिर्मुखी दौर थी 'अन्तर्मुखी प्रवाह नहीं। वह महेश मेहता को चाहती थी, उन्हें उसने पाया था। एक तरह से मधु ने महेश मेहता का शिकार किया था । जब मधु महेश मेहता को चाहती थी तव महेश मेहता मधु को नहीं चाहते थे। उन्हें ममता अच्छी लगती थी, वह उसे प्यार करते थे । ममता उनके सपनों, उनकी जिन्दगी का हिस्सा थी। तव वह सोचा करते थे, ममता से अलग धन-दौलत-ऐश्वर्य का उनके लिए कोई मूल्य नहीं था । आज उन्हें लग रहा था, उन्होंने हर जगह गलती की। ममता को छोड़ना जिस तरह गलत था, मधु को ठुकराना भी उसी तरह गलत था। किसी भी नक्श का एक हिस्सा तोड़कर अलग नहीं किया जा सकता, परछाई को छोटा-बड़ा तो किया जा सकता है, लेकिन उसे बांट कर नहीं छोड़ा जा सकता । उनको अपने अन्दर किसी खूखार जानवर की हलो : 107 वहशियत, किसी दरिन्दे की झपट के साथ आदमी के दिमागी इल्म के मिश्रण का अहसास होने लगा था । ममता को छोड़कर आने के बाद, महेश मेहता ने उसी तरह पीने मुड़कर नहीं देखा था, जिस तरह दौलत पाने के बाद उन्होने मधु को पीछे छोड़ दिया था । मधु और ममता उनको जिस्मानी और हानी हत्या के प्रतीक थे। मधु ने महेश मेहता के जिस्म को चाहा था, प्यार किया था। दौलत के लिए विना झिझक महेश मेहता ने वह तो दाव पर लगा दिया लेकिन दाव जीत जाने के बाद, अपने जिस्म को वह मधु से दूर ले गए। मधु जिस दुनिया का हिस्मा थी, वहां इन चीजों को माग कर नहीं छीन कर लिया जाता था। उसने भी महेश मेहता को ममता ने छीन कर ही लिया था । वह क्लब जाती थी, वह शराब पीती थी, गैर मदों की बांहो में झूल कर वह महेश मेहता से इतकाम नहीं ले रही थी। वह तो उस दिन के इंतजार मे थी, जब महेश मेहता अपने पति, मालिक होने के हक का इस्तेमाल करेंगे, उसे रोकेंगे, उसे मना करेंगे । वह तो रात-रात-भर जागकरयटि भरकर सोते हुए महेश मेहता को नम आखो से देखा करती। उसके मन में महेश मेहता के लिए अमीम थद्धा थी। वह उसके एक इशारे पर अपनी जान छिडक सकती थी। उसे पता लग गया था, वह दिन कभी नहीं आएगा, जब महेश मेहना उसे रोकेंगे, तभी तो, वह रास्तों पर और बढ़ती गई, जो उसे किसी निश्चित अत की तरफ ले जाते थे। महेश मेहता तो कभी फर्क नहीं कर पाते, कहां वह चूक गए, कहां उन्होंने गलती की। माया की मौत ने उनके अहम को सतह में उखाड कर फेंक दिया था। वक्त के उस टुकड़े में, जब उन्होंने मामा की लाश देयी थी, एक तरल विस्फोट हुआ था उनके अंदर, जिसमे सब कुछ नष्ट हो गया था, कही कुछ भी वाकी नहीं बचा था । इनकार, हिकारत, तिरस्कार, नफरत इस सबसे एकाएक वह दूर चले गए थे। अंदर ही अदर उन्हें तब यही लगा था, वह खुद ही तो जिम्मेदार ये माया की मौत के। माया की मौत के वह खुद जिम्मेदार इसलिए थे कि उन्होंने माया को भी अपनी आलीगान जिंदगी का खिलौना बना कर छोड़ दिया था। माया कभी भी महेश मेहता के सी से अलग होकर नहीं जी सकी। सब लोग उसके इदं गिदं हवस .
? 108 : हलो का प्रदर्शन करते थे, जिसके खौफ से डर कर वह महेश मेहता के करीब भाग आती। माया के करीव आने पर, महेश मेहता उसे दिलासा नहीं देते, उसके डर की कभी दूर नहीं करते, बस उसे अपने सीने में समेट लेते। इतनी बड़ी दुनिया में क्या औरत ऐसे ही जीती है ? हवस, हिंसा, अत्याचार की आंधी के बीच अनगिनत लड़कियां, औरतें अपना-अपना जीवन बिता देती हैं । हवस, हिंसा अत्याचार तो जीवन का हिस्सा है। इसे छोड़ देना मुमकिन नहीं और इससे डरकर किसी अंधेरी कोठरी में छुप जाना कौन- सी बात थी? माया ने यही किया था और महेश मेहता को लग रहा था वह उसे बंधेरी कोठरी में अंदर और अंदर खींच लाए। इतनी दूर तक खींच लाए थे.''जहां से लौट कर बाहर आना, खुली रोशनी में आत्मसात् कर सकना सम्भव नहीं था। माया ऐसी भी नहीं बन गई थी। मन के कोने- कोने में फूटते हुए डर के बुलवुले वहीं से उठते होंगे। महेश मेहता को लग रहा था, वह उस डर की बुनियाद नहीं मिटा सके थे। तभी तो वह डर उसे खा गया था। कहीं कुछ तो ऐसा होता जिसे वह बचा सकते ।। ममता उनके करीव आई, तबाह हो गई, मधु इस दुनिया से चली गई और माया को मार डाला गया। महेश मेहता ने फिर से शराब पीनी शुरू कर दी थी। नशे की पर्त-- दर-पर्त नीचे छिपा हुआ दर्द सुवकता रहता, तभी तो इन दिनों किसी अजीव अहसास की गिरफ्त में थे महेश मेहता । गुलाबी नशे में डूब जाने पर उनके अंदर जहां एक तरफ किसी दयनीय यातना के खोल फट पड़ते, वहां दूसरी तरफ जिंदगी के कोने किनारों से खुशियों के वह क्षण तलाश किया करते । खुशियां ही खुशियां तो भरी थीं। चारों तरफ उन्होंने बस अपने लिए, दूर-दूर तक शानो-शौकत के मीनार खड़े किए थे, वह हर चीज उन्होंने पाई थी, जिसकी चाहत थी। धन, दौलत, औरत, ऐश्वर्य, यश, प्रतिष्ठा सभी तो मिला था उन्हें । भाग्य के इतने बड़े दौर के वह हिस्सेदार बने थे। कहीं कुछ कमी नहीं रह गई थी, लेकिन अब उन्हें लग रहा था, वह सारा वैभव, वह सारा ऐश्वर्य, वह सारा सुख मिला तो जरूर था उन्हें, लेकिन किस कीमत पर, कितनी कुर्बानियों के अम्बार पर बैठकर । वह सब कुछ मिला था उन्हें । पाने और खोने के बीच एक दूरी होती है तो , ।
हलो : 109 दोनों स्थितियों के पीछे वही होता है जो दूसरी स्थिति में। 23 दिसम्बर को महेश मेहता अपने सर से दो बजे के पहले ही निकल गए थे। एक मीटिंग के बाद उनको दिल्ली जाने के लिए एभरपोर्ट पहुंचना था। मीटिंग यत्म होने पर एक बार उनके मन में ध्यान आया था, माया को एयरपोर्ट तक साथ ले चलने का। फिर उन्हें माया की, उनके साथ दिल्ली चलने की जिद की याद आई थी। हालांकि वह माया को लेकर ही दिल्ली जाना पाहते थे, जिसकी वजह दस्तर का माहौल पा, गुमनाम चिट्टियां थीं, राजी यन्ना की अकड़बाजी थी। लेकिन यह चाहते ये, माया कुछ जिम्मेदार वने, हालातों का मामना करना सीगे । यह कोई हमेशा तो जिंदा रहने वाले थे नहीं। एक न एक दिन उन्हें माया पोसले छोड़कर जाना ही था। तब क्या होगा इमको भी चिता पो उन्हें । इडिया ट्रैवल्स के उत्तराधिकारी के रूप में यह चाहते थे, माया स्वतत्रता में काम करना जान जाए । तभी तो महेश मेहता ने माया को अपने गाप बाहर ने जाना छोड़ दिया था। जायदाद, धन-दौलत और दण्डिया ट्रेवल्म की जिम्मेदारी, यह सब संभालने के लिए मापा को हालातों पा गुद ही मुगा. चला करना पड़ेगा। और कोई भी तो नहीं पा उमा वाद, इतने बड़े कारोबार को चलाने के लिए । उनको मालूम था, माया की मा, ममता, यह सब देगी नहीं, एएगी भी नहीं । तब उन्हें क्या मासूम था, वह मही जानते थे, माया के पर मौत का गाया मंडरा रहा था! एक भोली, नादान यच्ची का भला कौन दुश्मन हो माता था ! पिर मौत, पून, वरवादी, यह सब तो उनकी पल्पना मे परे था। अव महेश मेहता को याद पा रहा था "एअरपोर्ट जाने ममय अगर यह माया को साय ले जाते तो वह यव जाती “वह मौत का मापा टल जाता। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया था, यह हाय उन्हें गाए जा रही थी। पर के कोने-किनार में, दफ्तर के हॉल में, उनके अपने दिन में माया की दर्द-भरी चीरा बार-बार उनके मीन में उतर जाती पप्पा बहा करती थी वह उन्हें "जैसे मित्री को हलो चिलकर कान में गिर पहनी ..."टम दिन 23 दिसम्बर को जरूर मामा ने यही कहा होगा" मही यहर हुए वह पीनी होगी. यही सो वह हुए उसने बार-बार उनमें ..
110 : हलो याचना की थी साथ दिल्ली लेकर जाने की। एअरपोर्ट जाते समय वह मन ही मन मुस्कुरा रहे थे। सोचा था उन्होंने, वहां से फोन करेंगे उसे कुछ वादा भी कर आए थे "लौट कर आने पर कहीं बाहर घूमने जाने के लिए। शंका तो थी मन में 'राजी खन्ना के व्यवहार से उन्हें कुछ अजीव-सा लगा भी था लेकिन उसे नौकरी से अलग करने का फैसला लेने के बाद एक संतोप भी हो गया था कि उनकी गैरहाजिरी में माया को कोई तंग नहीं करेगा। एअरपोर्ट पहुंचने पर, महेश मेहता ने चेक इन किया, सामान जमा करने के बाद वह टेलीफोन बूथ की तरफ बढ़े ही थे कि भोला चौधरी सामने आ गया। "अरे भोला तुम क्या माया भी साथ आयी है ?" महेश मेहता ने पूछा था। . "नहीं..." भोला ने धीरे से लेकिन सख्त आवाज में कहा था। "तो फिर रुको मैं उसे फोन करता हूं पहले 'फिर तुमसे वात । होगी। फोन की घंटी बजती रही."बजती रही 'हार कर महेश मेहता बूथ से बाहर निकल आए। तब तक भोला भी कहीं जा चुका था । भोला का एअरपोर्ट आना और बिना बताए ही यूं ही चले जाना महेश मेहता को अजीव जरूर लगा था, लेकिन उनको इस बात का पता कई दिन बाद लगा था कि भोला एअरपोर्ट क्यों आया था और विना उनसे बात किए वापस क्यों चला गया था। उस समय जहाज का वक्त हो चुका था, इसलिए भोला को उन्होंने तलाश नहीं किया। तलाश करने पर भी वह उन्हें कहां मिलता, वह तो महेश मेहता के फोन बूथ में घुसते ही चला गया था। उसे मालूम था, महेश मेहता माया को ही फोन करने गए थे, उसे इस बात का भी अंदाज हो गया था कि फोन पर बात होने पर माया उन्हें दफ़्तर में हुए झगड़े के बारे में बताएगी। जिस अंदाज में वह आया था, उसके जो तेवर थे, क्रोध एवं अपमान का जो लावा उसके अंदर फट रहा था, उसे मालूम हो गया था, उसे खुद ही जाना ठीक था। तभी तो महेश मेहता के टेली- फोन बूथ के अंदर घुसते ही भोला वापस चला गया था । अव महेश मेहता को लग रहा था कि अगर भोला वापस ना जाता, अगर माया से उनकी लो: 111 बात हो जाता और अगर कहीं पंधपोट जाते समय बहुमाया को साप भर ले लेते, तो शायद "माया वजाती। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से माया को मौत को दे वहीं था, जब उन्होंने चससे टेलीफोन पर बात करने की कोशिश को पी, उस बचाने का समय तभी पा, जब उनके मन में उसे लेकर एभरपोर्ट आने का ख्याल आया था। महश मेहता ने ऐसी गलती पहली बार नहीं की थी। कई वार ऐमा होता, उनके मन से कोई एक आवाज उठती'"हल्की-हल्की दस्तक-भरी आवाज जो बार-बार उन्हें किसी बात के लिए प्रेरित करती। जब भी वह यह दस्तक-भरी आवाज सुनकर भी अनसुनी कर देते, जरूर कोई गड़बड़ होती। "उन्हे याद आ रहा था, जब मधु कार दुर्घटना मे मरी थी, तव भी ऐसी ही दस्तक भरी आवाज, बार-बार उन्हे मधु को रोकने के लिए प्रेरित कर रही थी। तब भी उन्हें लग रहा था मधु को एक बार रोकना चाहिए "लेकिन उनके अहकार ने उन्हें तब ऐसा नहीं करने दिया था। माया के करल का मुकद्दमा कई महीनो से चल रहा था। मोला चौधरी महेश मेहता की इम शहादत पर कि 23 दिसम्बर को एअरपोर्ट पर उनसे मिला, छूट गया था, राजी खन्ना के ही खिलाफ थे वह । पुलिस ने भी राजी खन्ना के ही खिलाफ केस बनाया था। महेश मेहता ही नही सभी लोगों को इस बात का यकीन था कि पून राजी पन्ना ने ही किया था .."सभी सबूत, सारे गवाह उसके खिलाफ थे। महेश मेहता घुद राजी पन्ना के फासी पर चढाए जाने के हुक्म का इतजार कर रहे थे। महेश मेहता ने दफ्तर जाना छोड़ दिया था। कभी कचहरी, कभी पुलिस स्टेशन, कभी मरकारी वकील के यहा चले जाने थे। उनकी जिंदगी इसी मुकदमे मे जुड गई थी। उन्हें लग रहा था, उनका अत समय आ गया था। कुछ ऐसा अहसास होने लगा था उन्हे कि जिनने दिन यह मुकदमा चल रहा था, उतने दिन ही वह जिंदा थे। एक और चोर उनके मन में वार-बार उठकर बैठ जाता" ममता ममता को अपनी बेटी की मौत की पर नहीं दी थी उन्होने । उनके अदर इतना माहस ही कहा बचा या जो वह ममता को यह सब बताने। फिर भी उन्हें पता था, ममता जेन से छूट कर उन्ही के पास आएगी, अपनी बेटी से मिलने । महश मेहता को - 112 : हलो इन दिनों कुछ भी अच्छा नहीं लगता"सिर्फ केस के बारे में वह बात करते या सोचते । सोचते-सोचते कभी वह सो जाते तो कभी सोते-सोते गुत्थियों के बवडर में उलझने लगते। उस दिन महेश मेहता की जरा आंख लग गई थी। वह दिन में सोते नहीं थे । कहीं नींद ना आ जाए, इसलिए, वह खाने के बाद विस्तर पर लेटते भी न थे, बस बालकनी में आराम कुर्सी पर पर फैलाकर बैठे रहते । इधर कई दिनों से रात-भर सो नहीं पाते थे वह । माया की आवाज का कैसेट, माया के फोटो की एलबम, उसके हाथ की लिखाई, इन्हीं सब में घिरे रहते । बंद कमरे में एक छोटी-सी दुनिया वना ली थी उन्होंने । कोई माया को छीन ले गया हो तो क्या 'माया की आवाज उनके पास थी.''वह मेज, अलमारी, मैन्टलपीस, कमरे में चारों तरफ माया की तस्वीरें सजाकर रख दिया करते और फिर टेपरिकार्डर में माया के हंसने, रोने, गाने, चीखने-चिल्लाने का कैसेट लगा देते। खुद अपने ही साथ, लड़कियों के साथ, रामू काका के साथ, टेलीफोन की वातचीत तक की माया की आवाज उसमें होती । इन आवाजों के बीच न जाने कितने अक्स, दीवार की रोशनी काटकर उभर आया करते। माया की फिल्म भी बनवाई थी उन्होंने। उस फिल्म में आवाज नहीं थी, फिल्म प्रोजेक्टर पर चलाते और आवाज टेपरिकार्डर पर । महेश मेहता की जिंदगी में जैसे वक्त, माया की मौत पर आकर ठहर गया था। उससे और बढ़ ही नहीं सके थे वह । एकाएक महेश मेहता की आंख खुल गई। किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई थी। बालकनी से झांककर बागीचे की तरफ देखा उन्होंने । गाड़ी से उतरकर मानवेन्द्र सक्सेना अंदर की तरफ आ रहे थे। राजी खन्ना के वकील का इस समय उनके घर आना महेश मेहता को एक तरह से ठीक ही लगा था। कुछ केस के ही वारे में वात होगी, यही समझ में आया । वह गाऊन का स्ट्रेम्प बांध कर कमरे से बाहर निकल आए । "आइए सक्सेना साहब..." नौकर महेश मेहता को देखते ही अलग हट गया था। "मेहता साहब यह आपका आदमी तो कह रहा था, आप घर पर नहीं हैं।" "इसे क्या मालूम आप कौन है''आजकल किसी से मिलने का मन हमी: 113 नहीं होता।" "मैंने आपको हिस्टवं तो नहीं किया?" "नाट ऐट बाल । आदए ना।" "मेहता साहय, आपको याद होगा कोर्ट में आपने एक बार गारे घर आने को दायत दी थी।" सकंगना ने बैटने हुए पहा । "हा"हां"जस्ट ए गेह.. रामसिंह !" "हा सर" "चाय-विस्फुट लेकर आना।" "अभी लाया हुजूर " "हा सक्सेना साहब, फैमे हैं पाप?" "मैं तो ठीक है, लेकिन"याप..." "मेरा क्या'नथिंग इज लेफ्ट फार मी।" "आय अहरस्टेंट।" "शी वाज आस फार मी। मैं उममें बिना अब... "आपकी मजबूरी 'आपके जजयात में गमझता "पिन मका भी अहसास है मुझे कि आप फातिल को सजा दिलाना चाहते हैं।" "शायद । इसीलिए जिंदा हूँ मैं।" "और शायद इसीलिए आपन माजीक्यूशन की तरफ से गुद अपने यकील लगाए हैं।" "राइट!" "मेरा भी मही उद्देश्य है।" "यापका?" "नी हो।" यह केस मैंने राजी गन्ना के लिए ही हाप में सिया पा .. लेफिन"" "लेकिन..." "अव मुझे लगता है. इस कंग में "इसमे भी ज्यास"बुध है।" "गगे भी ज्यादा...?" "दैपिए मेहता माहब ! मैं यापकी भावनाओं को चोट नहीं पहुंचाना चाहता लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि राजी गाना . यिसाफ परित
114 : हलो
गत रूप से आप नहीं..
"नेवर।"
"यस ''यही मेरा भी गेस था ''यह तो हो सकता है कि जब तक
आप राजी खन्ना को खूनी समझते हैं. आपकी उसके खिलाफ जंग जारी
रहेगी."
"करेक्ट ।"
"लेकिन मुझे लगता है आपके लिए अधिक महत्त्व इस बात का है
कि माया जी की हत्या किसने की।"
"यस ।"
"प्राजीक्यूशन ने अपनी बहस खत्म कर ली है। अब मुझे बहस करनी
है।"
"नेचुरली।"
"मुझे इस केस में कुछ ऐसी बातें पता हैं, जो शायद आपको भी मालूम
हों...
"कौन-सी बातें ?"
"जस्ट ए मिनट। मैं आपको बताता हूं..'कहां से शुरू करूं मैं...
पहले तो मेहता साहेब यह बताएं.."कैन आय टाक फेकली..."
“यस "
"इट इज नाट हर्ट योर फिलिंग्स।"
"दे आर आलरेडी हर्ट ।"
"आय एम आल फार दिस । लेकिन मैं यह सोच रहा था, कहीं ऐसा
न हो कि आप स्वयं अंधेरे में रहें 'सही कातिल का पता भी न लगे
और कोई वेकसूर फांसी पर चढ़ा दिया जाय ।"
"आप राजी खन्ना को वेकसूर समझते हैं ?"
"मैं यह नहीं समझता''इस केस को मैं साधारण केस नहीं समझता
"ऐसा लगता है मुझेइधर की ईंट उधर का रोड़ा जोड़कर प्राजीक्यू-
शन ने जो कहानी बनाई है, उसमें मिसिंग लिंक्स हैं.''आपने स्वयं बहुत
कुछ देखा है 'मसलन, राजी खन्ना की दफ्तर में की गई हरकतें"लेकिन
हलो: 115 मेहता साहब ! कई वार अनुमान ही काफी नहीं होता "सोचते आप कुछ और हैं."होता कुछ और है किसी भी कल के मुकदमे में मुलजिम का गुनाह साबित करने के लिए दो खास मुद्दे होते हैं। पहला मुद्दा होता है, सबब का, वजह का, मकसद का दूसरा मुद्दा होता है चश्मदीद गवाह का या पक्के हालाती सबूत का।" "हालातो सबूत 'सर्फमस्टेन्सियल इवीस तो है खन्ना के खिलाफ।" "यही तो मैं आपको बताना चाहता हूं."ऐसा नहीं है। मैंने अभी कहा था "पूरी कहानी में मिसिंग लिक्स हैं "जब तक पटना-जम और घटनाक्रम हर पहलू को ठीक-ठीक न बैठा लिया जाए कुछ नहीं कहा जा सकता। ".."पुलिस ने दो आदमियों को गिरफ्तार किया था ना'.." "हां।" "दोनों के खिलाफ ही सकंमस्टेन्सियल इवीडेंस थी।" "लेकिन भोला चौधरी मुझे एअरपोर्ट पर मिला था।" "और राजी खन्ना भी किसी को मिला था।"खैर छोड़िए'"पुलिस को भोला चौधरी पर अधिक शक था "भोला चौधरी के लिए खून कर देने की वजह भी थी।" "वजह ?" "हां मेहता साहय वजह""वजह थी भोला चौधरी के पास कत्ल करने की "उस वजह में वजन है. उस वजन के कारण पून होते हैं... किए जाते हैं।" "क्या कह रहे हैं आप..." रामसिंह चाय को दे लेकर आ गया। उसने साइड टेबिल पर दे रख दी और प्यालो में चाय बनाने लगा। "रामसिंह, तुम जाओ, चाय हम खुद बना लेंगे।" "जी हुजूर।" महेश मेहता ने नजरें नीची किए हुए दोनो प्यालो मे चाय डाली। एक प्याली सक्मेना साहब की तरफ बढाकर दूसरी प्याली से चाय की चुस्कियां लेते हुए उन्होंने कहा, "रामसिंह चाय बच्छी बनाता है।"
116 : हलो . "जी।" "हां तो आप क्या कह रहे थे 'अच्छा किया आप आ गए.''मैं यही चाहता हूं कि कातिल को सजा मिले"उसे फांसी पर चढ़ाया जाए"सिर्फ खानापूरी के लिए मैं इस केस में दिलचस्पी नहीं ले रहा हूं।" "मुझे विश्वास था''आपके बारे में मुझे सब पता है तभी तो..." "मेरे बारे में क्या पता है आपको?" महेश मेहता ने आवाज को सख्त बनाते हुए कहा। "यही कि माया चौधरी आपकी सिर्फ वेटी ही नहीं, रूह का हिस्सा बन चुकी थी।" "सच में।" महेश मेहता की आंखें भर आई। एक हाथ से आंखों को दवाकर पोंछ डाला उन्होंने । “सक्सेना साहव ! आय विश''मैं आपसे -सहमत हूं. 'कातिल का सही पता लगाना जरूरी है 'मैं इसमें रिस्क नहीं ले सकता..." "यही विश्वास था मुझे इसीलिए यहां आया हूं।" "इन ए वे, आय शुह 'अच्छा वाद में क्या कह रहे थे आप ?" "23 दिसम्बर को सबसे खास, सबसे अहम वारदात थी, माया और ला चौधरी का झगड़ा' 'सारा दफ्तर तमाशा देख रहा था "भोला “चौधरी ने निहायत फूहड़ तरीके से इलजाम लगाया था माया जी के ऊपर ''आपके..." "डोन्ट से आल दैट...." "नहीं कहूंगा, लेकिन उसने बदला लेने की धमकी दी थी..." "हां, एयरपोर्ट भी मुझसे झगड़ा करने ही गया था वह ।" "एक और बात कही थी उसने...।" "क्या?" "यही कि उसके और माया जी के संबंध नहीं थे 'सामान्य पति-पत्नी के संबंध नहीं थे। दर्जन-भर लोगों के सामने, कत्ल के सिर्फ दो-ढाई घंटे 'पहले "खुद आपके केविन में भोला चौधरी ने इसी बात पर तो एतराज 'किया था कि उसे अपने पति के अधिकारों से वंचित किया गया था." नवकि माया जी, आपको और राजी खन्ना को लेकर तरह-तरह की बातें " हलो: 117 कही जा रही थी मेहता साहब, एक क्षण को सोचिए, क्या यह एक निहायत खास वजह नहीं हो सकती थी कत्ल करने की? जहां एक तरफ पति को पत्नी का शरीर तक छूने की इजाजत नहीं थी वहाँ अगर उसे इस बात का यकीन हो जाए""पूरा यकीन हो जाए कि उसे तो सिर्फ इस्तेमाल किया गया है और उसकी अपनी पत्नी के मन और शरीर पर किन्ही अन्य लोगो का अधिकार है तो मेहता साहब, कौन ऐसा मदं होगा, जिसके सर पर खून नहीं सवार हो जाएगा...?" "लेकिन यह सब "गलत था. यह आप कह रहे हैं. और आज कह रहे हैं "यही तो आपको बताना चाहता था जिस दफ्तर में यह सब चल रहा हो... जहां इस तरह के आरोप लगाए जा रहे हों "जहां अश्लील, गंदी "भोडी चिट्ठियां आ रही हो. 'बहा कुछ भी हो सकता है वहां एक नही कई कातिल हो सकते हैं।" "लेकिन भोला तो मुझे" "एअरपोर्ट पर मिला था"भूल जाइए उस यात को कुछ देर के लिए भूल जाइए सर । पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिखा हुआ है." यत्ल के पहले माया जी का रेप..." "डोन्ट मेन्शन दैट ।" "ओ० के० सर ! लेकिन मैं कह चुका हू भोला चौधरी को इस बात का गम था "अफमोस था "उसके जेहन मे""उसके तसन्दुर मै, अपनी पत्नी के साथ, अपने सामान्य सवध न होना"एक बड़ी वजह पी. 'एक बहुत बड़ी वजह हो सकती थी। इस सभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।" "तो बाप यह कहना चाहते हैं कि कल भोला ने..." "आय डोन्ट नो"आय डोन्ट मीन दैट'"लेट अस सी. "आप भी देखें "हालात क्या कहते है ? आप मानेंगे ही भोला पौधरी के पास मरल करने का इरादा भी था और वजह बहुत बडी थो"हमेशा वस्ल इन्ही मामलों मै होते हैं । उधर देखा जाए"राजी खन्ना क्या था और कत्ल करने की धजह मया पी.. मकसद क्या था? सर ! छब्बीस साल का, अच्छे खानदान 118 : हलो , . ? का लड़का जिसने जिंदगी में पहली नौकरी की थी, जिसने इससे पहले कभी चिड़िया भी नहीं मारी' 'क्या इतना बड़ा जुर्म कर सकता था? नशे की गोलियां, अश्लील फिल्मी किताबों का प्रयोग आज के जमाने में नई उम्र के नये फैशन के सरपरस्त कितने ही नौजवान करते हैं । यह सब क्या मुजरिम होते हैं ? यह एक क्या खून कर बैठते हैं ? यह हो सकता है कि राजी खन्ना माया चौधरी से इश्क करता हो। यह भी हो सकता है कि वह उससे अकेले में मिलना चाहता हो। यह भी हो सकता है, उसने लव लेटर्स लिखे हों लेकिन मासूम इश्क करने वाला नौजवान क्या अपनी महबूबा का खून कर सकता है ? नामुमकिन है, मेहता साहब ! यह नामुमकिन है । फिर राजी खन्ना के वयान से जाहिर है, जव उसने मिसेज माया से मोहब्बत करनी शुरू की थी, उसे उनके व्याहता होने का पता नहीं था। खुद सोचिए सर ! जो नौजवान महज एक हलो के सहारे अपने इश्क का मंजर खड़ा कर - सकता है, जो निहायत मासूम तरीके से प्रेमपत्र लिखता था, जिसने तव तक अपने इश्क का इजहार तक नहीं किया था और फिर जिसका पहला और आखिरी प्रेमपत्र उसकी महबूबा ने पढ़ा तक नहीं था''' वह क्या उसका कत्ल कर सकता था और वह भी जब कि गवाहों के अनुसार राजी खन्ना माया चौधरी को अच्छा लगता था। अगर एक बार यह मान भी लिया जाए कि उस दिन माया जी से अकेले में मिलने के लिए आपके केविन में गया, तो यह कहां सावित होता है कि कत्ल उसने किया? जैसा मैंने आपसे अभी कहा था, इस मुकदमे के दो पहलू हैं "एक है रैप का और एक मर्डर का। अगर इन दोनों को अलग-अलग रखकर देखा जाए तो एक बात और नज़र आएगी, यह बात है, अगर राजी ने किसी जनून में माया चौधरी के साथ बलात्कार किया भी, तो फिर वह भला उनका खून क्यों करेगा? नौकरी छोड़ने का उसे नोटिस मिल ही चुका था। आप उस दिन दिल्ली जाने के लिए निकल चुके थे "उसके सामने रैप करने के बाद वहां से भाग जाने का पूरा मौका था। फिर वह माया चौधरी का कत्ल क्यों करने लगा? हकीकत तो यह है, मेहता साहब, राजी खन्ना जैसा भावुक नौजवान न तो रेप जैसा संगीन जुर्म कर सकता है और न ही कत्ल करने का घिनौना कदम उठा सकता है । जिस नौजवान के अंदर पाक मोहब्बत हनो:119 के सजद जाग गए हों, जिसके अंदर माया के लिए इग्जत हो, प्यार हो, वह ऐसा काम हरगिजहरगिज नहीं कर माता। ग्रामपर जब एमा करने की, उसके पास कोई वजह नहीं थी. "सवर नहीं था।" "यू हैव ए प्वाइन्ट मि० अरमेना! यह हम लोग का बर वडे... रिपती राजी खन्ना की प्राड का तड़का वन क्राइम कर ममता है"पह तो मैंने मोचा ही नहीं, पा."यह काम फिर किमी और का है।" "हां सर! जुर्म तो हुआ है. एक ऐना संगीन जुर्म "एक ऐमा घिनौना जुर्म, जिमकी मिसाल जुम रे इतिहाम में बड़ी मुखिल से मिगी "माया जैसी खूबसूरत, नाजर. मामून और दिमागी तौर में कमजोर... शहरात में हरी हुई सड़की के माय " यह सय कोई पेंगवर मुजरिम या कोई छंटा हुआ वदमाश या गर्राट ही पर मरता है।" "यू मीन आम आय राईट यू मीन यह काम भोला चौधरी का भी नहीं है ?" "यम, नाय मीन दंट' "बान कुछ और लगती है 'वर्ना मैं आपके पास भयों आता.''इतना सब काफी या "राजी पन्ना को बचाने के लिए। मैं जुर्म की तह में पहुंचना चाहता है. 23 दिसम्बर को 1 बजे के बाद "मापके चले जाने के बाद · दासर में दो लड़कियां मौजूद यो। एक पी माया, दूसरो यो शबनम । माया का तो कल हो गया लेविन मवनम महाँ है. माया को दफ्तर में छोडकर भवनम अस्पताल गई पी, यानी को देखने। वहां से लौटकर माया के माप उसे आप पर जाना पा.." यही कह गए ये ना आप?" "हां, ईदम राईट।" "लेकिन शवनम लौटकर नहीं आई.."या बाई"उन दिन एक पल हा या दोइनका पता लिए हैं।" "यो माई गॉड ।" महेश मेहता का हाय मारने लगा। "अगर शवनम न मिलती तो हो सकता है। .."उस दिन एक नहीं हो बल हुए हों. यह सब इन बच्चों का काम नहीं हो सकता।"
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हलो: 121 जोड़कर कभी न खत्म होने वाली तलाश में भटकती रहती। ममता दी हो चुकी थी। खुरदरे हाय, सफेद बाल, रियों याला चेहरा और उसकी ओयों पर सफेद कमानीदार चश्मा लग चुका पा। लेकिन उसके चेहरे पर एक ऐसी चमक थी, एक ऐमा यात्मविश्वास पा, जिसे देगकर पाद-मितारे कांप उठने थे। ममता इधर कई सालों से अपनी जिंदगी में और अपनी जिंदगी में जुही तमाम यादो से दूर बहुत दूर चली गई थी, लेकिन पाल रिहाई की बात एक नश्तर बनकर चुभ गई थी उसके मन में । जमा एक तरफ इन तमाम सालो में जैसे उसके पैरो मे भारी पत्थर बंध गए थे. वही दूसरी तरफ मभी- कभी अंधेरी, काली, सन्नाटी रातो मे, एक दिये की तरह माया या नाम, उसकी बेटी माया का नाम, घड़कनो में, मानो में, जहनियत के विस्तार के हिस्मे-हिस्से में एक गर्माहट, एक अनूटा अपनापन घोट जाता । मय कुछ तो पीछे छूट चुका था तो भला अब ममता फिसे याद करती । उसके मां- वार, उसका घर-संसार, उसके सपनो का राजकुमार, उसका पति, उगकी बच्ची, सब कुछ, इसी तरह बिखरता रहा, टूटता रहा कि यही युछ रोपने, यामने का वक्त ही नहीं मिला। यह कौन-सी आग थी, यह कौन-मा जन्म था, यह कौन-सी जिदगी थी, अपनी बैरक में बैठकर ममता मोच रही थी। सवाल उसके सामने जेल से छूटकर कही और जाने का नहीं था। कई मरग पहले रात के अंधेरे में मन को टटोलते हुए, उसने अपने आप से पूजा पा कि आपिर उसे चाहिए क्या? वह निंदा क्यो है ? क्या यह राब पाने के लिए उसने अपने पति माधव का पून किया था? माघय ने जो कुछ भी किया था, वह हर मर्द, किसी-न-किमी रूप में, किमी-न-किसी तरह करता है। शिवा ने भी तो वही किया था। माघष एक कालिग की तरह उसकी अद- रूनी रह को काला कर गया था जबकि शिवा ने वह प्यार का रोशन दिया था, जो उसके नन्हे, धडकते मन में पुद उमी ने जलाया था, बुधरा दिया पा। हर लमहा काला हो गया था और माधय ने उस दिन बस एक हाटके में उसके मन की तमाम थियो को पोसकर रय दिया था, जिसके बाद उसे कुछ भी याद नहीं लग रहा था । कई बरस पहले जेल को सलायो के अदर ममता यह समझ लिया 122 : हलो था कि उसे इस तरह जिंदा रहने का कोई हक नहीं था। तभी तो उसने शिवा की हर कोशिश नाकाम कर दी थी और माधव के खून का इल्जाम भरी अदालत में अपने सर पर ले लिया था। उसने तो मौत मांगी थी। उस दिन भी उसने मौत मांगी थी, जव वस्ती से वाहर, ऊंचे टीले पर शिवा उसे अकेला छोड़कर चला गया था। और पति का खून करने के बाद भी उसने मौत मांगी थी। उस वार माधव ने उसे बचाया और इस वार शिवा ने उसे मरने नहीं दिया था। उसे फांसी नहीं हुई थी। वह वच गई थी। लेकिन ममता ने तय कर लिया था कि भले ही यह दुनिया उसे मरने न दे, वह जिदा भी नहीं रहने वाली थी। मौत और जिंदगी का यह सफर उसे कितने सालों से छलता आया था। वह सोचा करती, इतनी बड़ी दुनिया में, इतने तमाम लोगों में अगर सिर्फ वह न होती तो ऐसी कौन-सी कमी आ जाती, किसी का कौन-सा नुकसान हो जाता? एक असीम यातना का संकट उसे हमेशा डसता रहा था और वह एक घुप्प अंधेरे से निकलकर और अंधेरी दलानों की तरफ चली गई थी। फिर भी ममता जिदा थी। मन की तमाम खुशियों, सपनों के तमाम दायरे, जिंदगी की हर खुशी कुर्वान करने के बाद भी जिदा थी और उसे इंतजार था बस एक उस आखिरी लमहे का जब वह यह तो देख ले कि उसके जिगर का टुकड़ा, उसके जिस्म का हिस्सा, उसकी अपनी कोख से जन्मा हुआ उसका प्यार कहां था, किस हाल में घा । तरह-तरह के ख्याल आते थे उसके मन में। कभी अच्छा सोचती थी, कभी बुरा, कभी हंसती थी तो कभी रोती थी, बस हर पल हर सांस जैसे वहीं आकर ठहर गई थी, रुक गई थी। माया, ममता की अपनी बेटी माया न जाने कहां थी, लेकिन उसकी पहचान तब भी उसके अंदर थी और जब जेलर साहब ने उसे रिहाई का हुक्म सुनाया था तब उसके अंदर बड़े दिन बाद वह छोटी-सी खुशी उठकर बड़ी बहुत बड़ी होने लगी थी, जिसके इंतजार में कितनी रातें उसने काली की थीं और कितने दिन स्याह किए थे। कोर्ट रूम की घड़ी में दस बजने वाले थे। सफाई के वकील मानवेन्द्र हलो: 123 सक्सेना अपने जूनियर के साय कितायें और कागजात देखने में मशगूल थे। उधर सरकारी वकील ओकार जौहरी जज के मामने जरा नीचे पर रगी मेज से लगी हुई कुर्सी पर बैठे हुए किसी मुद्दे पर सोच रहे थे। पृष्ठ लोग अलग-अलग झुह मे खडे थे और कुछ लोग अपनी-अपनी बुखियों पर बैठकर मुकदमे के ऊपर गर्मजोशी से वहग कर रहे थे। जज की गुर्मी पाली पी, लेकिन पेशकार उनकी मेज पर केस के कागजात तरतीयदार सगा रहा या । युमियों की पहली लाइन में राजी के मां-बाप, महेश मेहता अपने किमी दोस्त के साथ बैठे थे। दूसरी लाइन में दाहिनी तरफ हित्तन बाबू, भवानी बाबू, रावत वगैरह बैठे थे। ऐगे ही एक शुद्ध में बातचीत हो रही थी। पहला आदमी : "अमा! सरकारी वकीन ओंकार जौहरी यह मुकदमा हार गए।" दूसरा : "नहीं"अभी वृछ कहा नहीं जा सकता।" तीसरा : "कहने को यव वचा ही क्या है, डिफेंग काउन्रोल ने धग्गियों उड़ा दी धज्जियां।" पहला आदमी : "वेनीफिट बाफ डाउट तो मिलेगा ही मिलेगा। तीसरा : (उचकते हुए) "वह भोला चौधरी वाला प्वाइन्ट गजब का था।" दूसरा : (हाय नचाने हुए)"और शबनम वाला?" पहला : "अरे हा जय शवनम को लाते हैं तो मुसीबत, नहीं लाते हैं तो मुसीवत । भोला चौधरी और शवनम के बीच टांग दिया उसने मुकदमे को।" चोया आदमी : "शवनम मिली या नहीं दिखती तो नहीं है।" पहला . "पुलिस वाले कहते है.."शवनम का कोई पता नहीं।" तीमरा: "हा"हां, मजाक है जो कह देंगे पुछ पता नहीं, जज पान नहीं उधंड देगा।" चौथा आदमी : "सपाई के वकील मानवेन्द्र मोह्न सक्सेना ने पद तो नहीं छिपा दिया।" पहला : "क्या पता इसी मुद्दे पर छुड़ा लें राजी गन्ना को।' ..
24 : हलो दूसरा : "अरे इन वकीलों की तिकड़म भगवान ही जाने । सुना है राजी के वाप पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं। सुनते हैं प्राइवेट डिटेक्टिव की मदद ली. 'शवनम को छोड़ेंगे नहीं ये लोग।" पहला आदमी : "अमां क्या यह नहीं हो सकता, कातिल शवनम हो? दोनों राजी खन्ना पर मरती थीं।" दूसरा आदमी : "और वह वेचारा एक हलो पर लटक गया।" [सव हा हा हा हू हू हू'खी खी करके हंसने लगे। जज के दाखिल होने पर सव लोग खड़े हो गए और जज के कुर्सी पर बैठते ही वैठ गए।] सरकारी वकील ओंकार जोहरी ने अपनी दलील पेश की, "मी लार्ड, पिछली तारीख पर अदालत ने शवनस को पेश किए जाने का जो हुकम दिया था, उसे पूरी करने की भरसक कोशिश के बाद भी पुलिस काम- याव नहीं हो सकी है। ऐसा नहीं, मी लार्ड प्राजीक्यूशन लिस्ट में शवनम नाम नहीं था, लेकिन जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ा 'बड़े मुद्दे सामने आए, उस समय तक शवनम की हैसियत महज एक गवाह की बन चुकी थी. वैसे ही गवाह की जैसे हमने पेश किए हैं, अदालत में। मी लार्ड ! मेरे फाजिल, डिफेंस काउन्सेल ताड़ और तिनकों का पहाड़ बनाना चाहते हैं । अदालत के सामने अपने तसव्वुर अपने ख्यालातों का पहलू पेश करना चाहते हैं. ऐसे ख्यालातों की जिनका इस मुकदमे से कोई ताल्लुक नहीं हो सकता। मी लार्ड ! डिफेंस काउन्सेल अदालत का ध्यान आकपित करते हुए वरावर इस कोशिश में लगे हैं कि शक-शुबह के हालात पैदा हो जाएं। पहले उन्होंने भोला चौधरी का मुद्दा उठाया। शहर के जाने-माने इज्जत- दार, रुतबेदार महेश मेहता पर कीचड़ उछाला और फिर शवनम की शक्ल में अदालत के सामने एक गुमनाम, गुमशक्ल, गवाह पेश किया। मी लार्ड ! अगर शबनम मुर्दा है"तो एक मुर्दा शख्सियत को गवाह की शक्ल नहीं दी जा सकती "उसे अदालत में चल रहे मुकदमे का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता । खुदा न करे शवनम मुर्दा हो मी लार्ड ! लेकिन अगर शबनम मर चुकी है, तो उसकी मौत का सबब या उसके कत्ल का मामला एक - . - 1 हलो : 125 अलग मामला होगा, उसफा इस मुकदमे से कोई ताल्लुक नही हो सकता; क्योकि मी लाई, शबनम की अभी न तो लाश मिली है और न ही उसकी मौन की जगह, तारीय और हालात जाने गए हैं । एक चीज, एक शाहिम- यत या एक लड़की जिसका वजूद, जिसको मौजूदगी या नामौजूदगी का अभी तक फैसला नहीं हो पाया उसको विना पर भला इस मुकदमे को कैसे और कब तक टाला जा सपता है। लेकिन मी लॉर्ड, अगर शवनम जिंदा है और वह किसी वजह से सामने नहीं आ सकी है तो "तो भी क्या है... इसमे ऐसा क्या है, जिसकी वजह से हम कातिल को मुलजिम को सजा नहीं दे सकते?" "मी लार्ड ! शबनम क्या है, उसका इस मुकदमे से ताल्लुक क्या है और ऐमी कौन-सी बात है जिसका पता उसके जरिए लगाया जा सकता है ? 23 दिसंबर की शाम पांच बजे माया चौधरी का कत्ल हुआ पा। उमके काफी देर पहले शवनम इंडिया ट्रेवल्स के दफ्तर से चल चुकी थी । मी साई ! दफ्तर से शबनम अस्पताल गई थी,.."अपनी मा के पाम धी। मी लार्ड, पुलिस के रिकार्ड से यह बात साबित हो जाती है"शाम पाच बजे... उस रात'."23 दिसम्बर को शाम पांच बजे "शयनम अस्पताल में थी। अस्पताल से यह पांच बजे के करीब ही निकली थी जब माया चौधरी का पत्ल हो चुका था। अगर शवनम, मकतूला माया के कत्ल की चश्मदीद गवाह नहीं है, अगर वह करल के वक्त, कत्ल की जगह से चार मील दूर थी, अगर उसने कल होते नहीं देवा, करल के याद भी माया चौधरी की लाश को वह देखने वाली पहली नहीं थी और न ही उसने करल की पहली सूचना पुलिस को दी, तो मी लार्ड ! उसका, शबनम का, इस मुकदमे में कितना महत्त्व रह जाता है ? शायद कुछ भी नहीं। मी लार्ड ! पुलिस ने शरनम के गायब हो जाने का अलग मामला दर्ज कर लिया है। उसको योज "उसकी तलाश जारी है। अपवारो मे इश्तहार छापे गए हैं तमाम पुलिस थानों को इत्तला कर दी गई है कई पुलिस पार्टिया उसे दूउने के लिए जा चुकी हैं, कई और जगहो पर फोन, वायरलेस से बराबर सम्पर्क रखा जा रहा है। फिर भी, मी लार्ड ! अगर शबनम मिल जाती है तो यह 126: हलो । - - एक अलग किस्सा होगा । उसे यदि गायव किया गया है तो यह एक अलग मामला होगा, क्योंकि पुलिस के पास उसके गायब किए जाने के सवव मौजूद हैं। मी लार्ड, पुलिस को पता है", शवनम गायब की जा सकती थी... उसने कई लोगों के खिलाफ अभी कुछ दिन पहले ही परेशान होकर रिपोर्ट लिखवाई थी। शादी और अगड़े वाली खानदानी जायदाद का चक्कर था' फिरोज नाम का एक गुंडा लगातार उसे तंग कर रहा था। फिरोज ने जो मव पुलिस की हिरासत में है, बयान दिया है कि वह शवनम से शादी करके उसकी खानदानी जायदाद का मालिक बनना चाहता था क्योंकि उसे मालूम था यही सूरत थी उस जायदाद को शवनम की खातिर रिश्तेदारों के झगड़ों से निकलवाने की। उधर शवनम, फिरोज को नापसन्द करती थी। फिर वह रिश्तेदार भी तो हैं, जिनसे शवनम का झगड़ा चल रहा था। वह भी तो उसे गायब करवा सकते थे। इसीलिए.."मी लार्ड ! इसीलिए मैंने अदालत से कहना चाहा था "शवनम शवनम का गायब हो जाना, । महज एक इत्तफाक नहीं तो क्या है ?" सफाई वकील मानवेन्द्र मोहन सक्सेना ने उठकर जवाब दिया, “योर आनर ! यह एक महज इत्तफाक नहीं है तो शवनम 23 दिसम्बर को गायब हुई । महज इत्तफाक तो यह है कि फिरोज के किस्सों को उन किस्सों को बयान किया गया। "सहज इत्तफाक तो है उसका उस सीधी-सादी लड़की का चन्द रिश्तेदारों से मामूली झगड़ा जो हर घर में होता है। योर आनर ! फिरोज और शबनम का किस्सा खत्म हो चुका था'.. 23 दिसम्बर से सात महीने पहले खत्म हो चुका था ''मैं भी फिरोज से मिला था. उन रिश्तेदारों से मिला था जिनके ऊपर हमारे सरकारी वकील ओंकार जौहरी शवनम के गायब किए जाने की तोहमत लगा रहे हैं। मैं अदालत से दरख्वास्त करूंगा मुझे फिरोज और उसके रिश्तेदारों को बतौर गवाह पेश करने की इजाजत ! दी जाए। "यह मुकदमा योर आनर ! एक वेकसूर नौजवान के ऊपर उस कत्ल का है, जो उसने नहीं किया। कहीं ऐसा तो नहीं सरकारी वकील ओंकार जोहरी अदालत से कुछ छुपाना चाहते हैं।"
..." . हलो : 127 "मी लाई "योर आनर । येफगूर की मजा देना दस पगूरवार में हर जागे भी बड़ा होता है। कानून को नजर में एक वेगुनाह को राजा एमा देवगूर नौजवान को मुलाजिम करार देना, काफी बड़ी अहम वजह होती है, उन मुद्दों को देख लेने की जिनका मुकदमे से दूर-दूर तक तात्नुप होता है।" जज ने सरकारी यकील ओंकार जोहरी से पूछा, "मापिर आपको एतराज यया है।" "मी लाई । यह तो · यह तो। "आब्जेक्शन ओवर स्लेह।" जज ने कुर्सी के पिछले हिस्से में टेक सगा ली। गवाह के कटघरे मे पहले फिरोज, फिर पारी-यारी से शाम सीन रिश्तेदार आए, जिनमे दो मदं हैं और एक औरत थी। पहले गफाई वकील मानवेन्द्र मोहन सक्सेना ने उनसे रायाल रिए और फिर गगारी यकील ओकार जौहरी ने। गवाहो के चले जाने बाद जज जदाता मुरतवी कर दी। लन्च ग्रेक के बाद कोर्ट मम में जज यो आने ही अक्षरान की कार्यवाही शुरू हो गई। पंशकार ने गवाहों के बयान की दागविष्टज 'सामने रणदी और तभी वकील मानवन्द्र मोहन गवगेना अपनी बरग जारी करने के लिए पडे हो गए। "योर यानर यह फिरोज मा फिम्गा, ये रिश्तेदारी, मग काहगामा अदालत से, दम मुकदमे में असली मुद्दो को तोड-मरोड़ पर दूर से जाना था, जो अब गवाहों के बयान के बाद माफ-साफ जाहिर हो गया है। पार आनर! फिरोज का शवनम से यप कोई वान्ता नहीं रह गया पा-युद उसने हलफ पर बयान दिया है कि सवनम को उसने उधर गई महीनों से मूरत नहीं देनी थी। उन हालातो में दूर-दूर तप गी बोई यह नगर नहीं आती है, जिगके तहत उगने शवनम को गायव पर मेने कागदामा । रिया हो। "योर वानर ! फिरोज, भय ग्याल रता है, उग रोज 23 दिगम्बर को फिरोज इस शहर में नहीं पा तो गायन सरकारी वकीर गर जोहरी यह कहना चाहेंगे जो फिरोज के यहाँ न होने से पया भरतम की 128 : हलो उठाई जा सकती।" "दैट्स इट मी लार्ड !" जोहरी अपने मुद्दे पर जमे रहे। सफाई वकील मानवेन्द्र मोहन रागसेना ने हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ बहस जारी रगी : "यह बात सही है, फिरोज जैसे मशहूर गुंडे के लिए शहर में मौजूद रहना कोई जरूरी नहीं होता. 'वह अपने आदमियों से भी यह काम करवा रागता था । यह तो हो सकता था। यह मुमकिन था लेकिन तब योर आगर जब उस रोज फिरोज के जहन में ऐसी कोई स्कीम होती''वह उस रोज इस फाबिल होता। हां पोर आनर ! वह उस रोज इस काविल होता।" फागज हिलाते हुए, "फिरोज उस दिन 23 दिसंबर को रेल पुलिस के कब्जे में शा..'18 दिसम्बर की रात उसे मालगाड़ी के डिब्ने तोड़ते हुए पकर लिया गया था।" वकील मानवेन्द्र मोहन सक्सेना ने एक लिखा हुआ कागज जो सामने रख दिया। "योर आनर ! रही उन वेचारे रिश्तेदारों की बात' 'गवाही के पाटघरे में जब वे आए थे तो उनको देखकर और उनको बयान सुनकर आपने जरूर यह नतीजा निकाला होगा जो ऐसा काम करने की न तो उनकी हसियत है और न ही उनके पास ऐसा करने का कोई सवव था। शबनम जो रिशोदारों ने अदालत को बताया था, जो भी उनका जायदाद के सिल- सिले में शगड़ा था वह शवनम से नहीं शवनग की मां से था। और फिर उस शगड़े के सिलसिले में मुगादमेबाजी अलग चल रही थी। उनमें न तो इतनी हिम्मत थी और न ही उनका इरादा था कि शबनम को उड़ा ले जागेगी पतरनाक साजिश वेगारते । "योर आनर ! लेकिन शवनम को किसी न किसी ने उड़ाया जरूर था। शवनग को उस रोज गायब कर देने वाला सबसे पहला और सबसे भारिपरी आदगी वही हो सकता है, जिसने माया का पत्ल कर दिया। माया और शवगग दोस्त थी. 'योर आनर' अच्छी दोस्त । महेश मेहता जब भी शहर से बाहर जाते थे 'शबनग ही माया को साथ रहा करती थीदातर में उनकी मेज एक-दूसरे के बगल में थीं। ये दोनों एक साथ उठती-बैठती थी, लंच, चाय-नाश्ता वगरा भी उनका साथ रहता पा। दोनों को भगसर रेस्ट्रो और पियेटरों में साथ-साथ देखा जाता था करने वाला, हलो:129 और उस रोज 23 दिसम्बर को भी शवनम माया चौधरी के साथ यागिर तक थी। महज दो घंटे के लिए, उम रोज मनम, माया में अलग हुई थी। उसे अस्पताल यपनी मां को दंगने जाना था। असताल से लौटकर उसे दफ्तर जाना या दफ्तर में माया, सवनम का ही नजार कर रही थी। "जब वह हादसा हुआ था पोर वानर ! यह भी हो सकता है, जय शबनम अस्पताल से लौटकर इडिया ट्रेवल्स के दफ्तर में माई, तब उमरी दोस्त का कत्ल हो चुका था और उमने वहां पर ऐमी चीज देगी या विमी ऐसे आदमी को देखा, जिसकी वजह से उन गायब कर दिया गया । गापर करने वाला राजी खन्ना नहीं हो सकता क्योकि वह पर मौजूद है । गायव शबनम को उड़ा ले जाने वाला वहीं आदमी हो सकता है, जो गुमनाम है"छुपा हुआ है जिसे पुलिस ने नहीं पकड़ा है और जिसने पोर आनर ! माया चौधरी का खून किया है । दैट्स आल योर वानर !" सरकारी वकील ओकार जौहरी को हाय मे निगलता मुकदमा बचाना था, "मी लाई ! अगर फिरोज 23 दिसम्बर को रेल पुलिम के लॉकअप में था या रिश्तेदारों के बयान में इन लोगो के जरिए शबनम को उया नेने यी साजिश का पता नहीं लग पाया हो, तो इन सबने यह भी तो गावित नहीं किया जा सकता कि शवनम को उद्धा से जाने के लिए किन्ही पेगेवर गुडो का सहारा नहीं लिया गया। हालातों की बह्म में भवनम के गायर रिए जाने की किसी और पुस्ता साजिश का जब तक पता नहीं लग पातामा फिर कोई और मदव जान नहीं लिया जाता, तब तक शबनम कोस मुकदमे से मीधा कैसे जोड़ा जा सकेगा। यह धुर्म तो हुआ है मी लाई ! एक. मासूम लड़की का खून हुआ है । मुलजिम के हाप से लिग यत पोर अन्य पागजात कत्ल के इराद को साबित करते है। इन यतो से यह भी जाहिर हो जाता है कि मुलजिम कई दिनों से जुर्म करने के चक्कर में पा । दातर के साथियों और गवाहों के बयानात में उसके इरादी और जुर्म की पनपती हुई गाल भी सामने आती है."उसका, मुलजिम का"नशीली गोलियो का इस्तेमाल इस बात को साबित करता है कि मुलजिम अपने मामद में कामयाव होने के लिए किस हद तक जा सकता था. गिर सकता था...
130 : हलो "फिर हादसे की जगह पर उसका हादसे के बाद पाया जाना 'फर्श पर उसके जूतों के निशान' 'टेलीफोन पर और केविन के दरवाजे पर उसकी उंगलियों के निशान मिले हैं.. उसके बाद यह जाहिर हो जाता है.'सावित हो जाता है कि खून राजी ने किया है।''जुर्म को सजा का जिम्मेदार राजी खन्ना है । जैसा हर कत्ल के मुकदमे में होता है, मुजरिम खूनी अपने को निर्दोप कहता है. 'जुर्म से इंकार करता है और अपने बचाव के लिए कोई झूठी कहानी गढ़कर अदालत को गुमराह करता है, वैसा ही इस मुकदमे में हो रहा है, हर मुलजिम का वकील हालातों को तोड़-मरोड़कर झूठे किस्से वेबुनियाद हालातों में अदालत को उलझाकर वेनिफिट आफ डाउट का सहारा लेना चाहता है । लेकिन "मी लार्ड. मेरी जिंदगी में इस मुकदमे जैसा साफ-साफ दिखने वाला जुर्म और कभी नहीं देखने को मिला । वैसे हर जुर्म की एक मिसाल जरूर होती है। इस जुर्म की कोई मिसाल नहीं होगी। यह जुर्म जिस्मानी कत्ल और रूहानी खून का है। यह जुर्म एक "दिमागी तौर पर वीमार लड़की को गला घोंटकर मार डालने का है। यह जुर्म कत्ल का नहीं है, इसमें वलात्कार जैसी वहशीयत का जुर्म जुड़ा हुआ है । यह जुर्म सवकी, मी लार्ड, सबकी आंखों के सामने हुआ है. 'सबकी आंखों के सामने पैदा हुआ है."सबकी जानकारी में इसने शक्ल अख्तियार • की हालात 'सबूत, दलीलें, जुर्म के इरादे, तदवीर और तरीके खुद-ब- खुद सामने आ जाते हैं, हमें उसके लिए किसी संभावित कहानी का सहारा नहीं लेना पड़ा था। जिस स्कार्फ या बड़े रूमाल से कत्ल किया गया. "उस ' पर मुलजिम का नाम लिखा हुआ है। इसके बाद यह वेमाने रह जाता है कि शवनम कहां है, मी लार्ड ! जिंदा है या मुर्दा जिंदा है या मुर्दा ।" . नौ महेश मेहता की कुछ समझ में नहीं आ रहा था। कोर्ट रूम की बहस के बाद वह काफी देर तक, सरकारी वकील ओंकार जौहरी से बात करते रहे। खुद ओंकार जौहरी के दिमाग में तब तक राजी खन्ना के कातिल होने के । । हमो:31 बारे में संदेह हो चुका था। इस मुकदमे में महेश मेहता मी योपिनी वाकी रह गई थी। उनकी दिलचस्पी न सो राजी गाना में घी भोरगही भोला चौधरी में । कचहरी, पुलिस पाना, राजोपना, भांपा गौधरी, सार के तमाम लोग, वकील, ओंकार जौहरी, यशील मागम मगेना पद गय जिंदा हस्तियो यो नाम नहीं थे, बल्कि गैज पुमनी की तार पूमती तस्वीरें थो, जिनकी हरकतें, जिनकी बातें, यह सिदगि मुना 411, सय कुछ इमलिए देवा करतं कि वह बातें, यह हमने गाया गे जुदा होते हुए भी माया में जुड़ी हुई थी 'माया का नाम, सिए या बड़ा नाम था 'इतना बडा नाम था, ईश्यर ग, दुनिया गे, गंगारगे, विश्व से भी बड़ा नाम था। वक्त यही वग उगी नाम पर आगरटर गया था कुछ भी तो नहीं बचा था जगरे याद । डिफेंस वकील मानवेन्द्र मगेना को घर पर जर गेली पाई थी, न जाने कितने सवाल उनके असर उठा परे । यह उन गानों का जबाव दूढने-दूटने पक जात । कोर पा पाशिfrik किया था "किमने उनका सय पुछ छीनकर जग पिमा पूरे माप दिया था''बस सड़ने के लिए "पल-पल कर मिटने में लिए। पर अजीब-गी तपन, एक झुनझुनी, टूट-टकर बिगर जाने वाली गिहान यम इनर प्रदर उठती रहती। महेश मेहता को मालूम था "नी रिदा मामा यो और अधिक दिन वह नहीं दो मकेंग । यह मब टाटारमान ता पाहा, रित चले जाने में पहले एक यानिगै नमना र दी यो उतीर और वह घी माया के यातिल को पहचान पत्र दान पात्र "किनने मापा को मार डाला "उमा महामात गेला पार बह । वह यादमी "यह चहरा दाला गया या दादा दादानी , रावत, ठितन वायू, दातरी, निकारी,भदौरिया, पलार, करीम, शिफ यह सब पाल-योगकर उन्होंने बगा में काम याए . इनमें म कोई भी उन्हें गगा रन नहीं कर सम्वा 1 वाहर के किसी आदनों में तीनदार जिमका ददला मने के लिए माया को मारना 132 : हलो थक जाते वह तब कभी सरकारी वकील को, कभी मानवेन्द्र सक्सेना को, कभी प्राइवेट जासूसी एजेंसी को, कभी पुलिस अफसरों को फोन किया करते ''कहीं से कुछ भी पता नहीं लग रहा था। चारों तरफ बस अंधेरा-ही-. अंधेरा था। उस दिन महेश मेहता लॉन में बैठकर चाय ले रहे थे। दोपहर के अखबार के पन्ने पलटकर वहीं घास के ऊपर डाल दिया था। दूर-दूर तक फूलों की क्यारियां, ऊंचे-ऊंचे पेड़, हल्की हल्की हवा के झोंके, उनके अंदर की असहनीय पीड़ा को कम नहीं कर पा रहे थे। दर्द से उनका सर फटा जा रहा था। उन्होंने थोड़ी-सी चाय पीकर छोड़ दी थी । वह उठकर अपने कमरे में जाने ही वाले थे कि रामसिंह ने शाम की डाक से आया हुआ एक लिफाफा लाकर मेज पर रख दिया। "हुजूर, बैरंग चिट्ठी थी, टिकट के पैसे देकर ले ली थी।" एक अजीब-सा बदरंग-बैरंग लिफाफा, जिस पर खूबसूरत लफ्जों में उनका नाम और पता लिखा था। उन्होंने देखा पता पूरा नहीं था। मकान नम्बर तो था ही नहीं, सड़क का नाम भी सही नहीं था। सरदर्द में छट- पटाते हुए उन्होंने वह लिफाफा अखवार के ऊपर गिरा दिया और उठकर अंदर की तरफ चल दिए। पोटिको के पास ही पहुंचे होंगे महेश मेहता, तभी उनके दिमाग में यह ख्याल गुदगुदी मचाने लगा कि घर के पते पर उन्हें खत लिखने वाला कौन हो सकता है? उनका कोई दूर-दराज का रिश्ते- दार भी नहीं था। घर के पते पर सालों से कोई चिट्ठी नहीं आई। उनके खत तो दफ्तर में आते थे। फिर घर के पते पर, वदरंग लिफाफे में, विना टिकट लगाए, यह खत किसने भेजा था ? कौन हो सकता था ? तभी हाथ की लिखावट "उन्हें कुछ पहचानी-सी लगी। कुछ देर वह ठहर गए" काफी याद करने पर भी उन्हें यह तो याद नहीं आया कि वह लिखावट किसकी है, लेकिन इतना जरूर समझ गए वह कि लिखावट उन्होंने कहीं देखी जरूर थी। महेश मेहता थके कदमों से धीरे-धीरे वापस लौट आये । कुर्सी पर बैठ- कर उन्होंने लिफाफा उठा लिया और उलट-पलट कर देखने लगे और कुछ जब उनकी समझ में नहीं आया तो लिफाफा खोलकर उन्होंने खत निकाल हनी:133 लिया। कई पैज थे.""आपिरी पेज पर भेजने वाले का नाम देखने के लिए जैसे ही उन्होंने पलटा 'एक धमाका-मा हुमायांगों के मानने अंधेरा छाने लगा"सुत शवनम का था। डियर पापा, माया दीदी होती तो आपको पापा ही कहती ना । आज वह नहीं है ""यह सोचकर """इसका अहसास करके एक अनमुनी-मी सारे बदन में छूटने लगती है। आपका हाल क्या होगा इसका अनुमान करते ही मेरे रोंगटे पड़े हो जाते हैं। मेरी तो मिर्फ दोदो गई है, मेकिन मुझे मालूम है आपका सब कुछ लुट गया है। 'वरवाद हो गया है । उस दिन 23 दिसम्बर को दफ्तर में चार बजने वाल पे जब मैं मापा दीदी को वहीं रहने को कह कर अस्पताल, अपनी मां मे मिलने को चली गई थी। दादी उस दिन डिस्टर्व थी. बेहद परेशान और डरी हुदै - दहगत के मारे पर. पर कांप रही थी, क्योकि उनके याविन्द भोला चौधरी ने उनके कार और महेश मेहता के ऊपर मूठे इल्जाम लगाए थे। मैं हमेशा दीदी के माप रहा करती थी और आपको भी हम अम में जानन थे। अमल में भोला को दपनर के लोगों ने भडकाया पादपतर के लोगो ने पा"मारी आग लगाने वाला यह छित्तन यादू ही या तिन बाबू दीदी पर गत दिन पहले से बुरी नजर रखता था। लेकिन एक तो आपकं हर से और फिर अपनी उन की वजह से उमने सामने कभी भी कुछ नहीं कहा। राजी पन्ना शायद इतना आगे नहीं बढते अगर टिनन याय ने हर वा उनके अन्दर एक फर्जी मोहब्बत का भूत नहीं जगाया होता। इतना आगे बढ़ने में मेरा मतलव चुपके चुपके इस करने लगने या यत वगैरह लिवने की कोशिश करने से है। इससे आगे दोनों में किसी प्रकार का मध नहीं पा। लेकिन छित्तन याबू की सफ्फाजी से, आम को हवा देने की हरकतों मे, एक बवण्डर यड़ा हो गया या, उन दिनो स्तर में भोना जंक्षा सौधा-मामा आदमी भी उसकी चपेट में बच नहीं सका और उम दिन 23 दिसम्बर को उसने दीदी को बुरा-भला कहा"एक तरह मे मानिया दो"उन्हें 134 : हलो धमकाया जिसकी वजह से दीदी का दिमाग खराब होने लगा था और डर के मारे वह अकेले घर नहीं जाना चाहती थी। आप तो पहले ही प्लेन से दिल्ली जाने के लिए निकल चुके थे। हमने आप तक पहुंचने की बड़ी कोशिश की. "हर जगह टेलीफोन किया 'एयरपोर्ट पर एनाउन्समेन्ट भी करवाई, लेकिन आप नहीं मिले नहीं मिल सके। उम्मीद थी शायद हमारा मेसेज मिल जाने पर आप फोन करेंगे, इसलिए वहां, दफ्तर में दीदी का रुकना जरूरी हो गया था। इसलिए और क्योंकि घर का उनका टेलीफोन खराव था। दीदी किसी भी तरह उस रोज आपके करीव रहना चाहती थी। वह बेहद डरी हुई थी। उस रोज सबसे ज्यादा शायद जिन्दगी में सबसे ज्यादा उनको आपकी जरूरत महसूस हो रही थी और आप मिल नहीं रहे थे। मुझे अस्पताल जाना जरूरी था. 'मां को देखने के लिए.. 'दीदी के साथ घर जाने पर अस्पताल के लिए मुझे उल्टा जाना पड़ता था... दीदी मेरे लोट आने तक वहीं दफ्तर में इन्तजार करती रहेगी। अस्पताल से आने में मुझे जरा-सी देर हो गई थी। फिर भी सवा पांच के पास का वक्त होगा, जब मैं दफ्तर के अन्दर दाखिल हुई। चारों तरफ सन्नाटा था । सिर्फ दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी और दाहिनी तरफ के क्यूवीकल में टेलीफोन की घंटी लगातार बज रही थी। एक वार मैंने सोचा शायद दीदी चली गई और मुझसे बात करने के लिए टेलीफोन किया होगा, फिर मुझे आपका ख्याल आया क्योंकि फोन उनका भी हो सकता था। मैं सीधे क्यूवीकल में टेलीफोन सुनने के लिए चल दी। अभी मैं पयूवीकल के अंदर गई ही थी कि मुझे लगा आपके केविन का दरवाजा बड़ी जोर से किसी ने खोला, उसके फौरन बाद, खट-खट जूतों की तेज आवाज आने लगी.. जैसे कोई बाहर की तरफ जा रहा था। यह खट-खट जूतों की तेज आवाज दफ्तर के सभी लोग जानते थे वह सिर्फ छित्तन बाबू के जूतों की थी, क्योंकि वे अपने जूतों की हील में लोहे की नाल लगवाया करते थे। एक तरफ टेलीफोन की घंटी बज रही थी, जिसे फौरन उठा लेना जरूरी था और दूसरी तरफ जूतों की खट-खट की आवाज बाहर की तरफ निकलती जा रही थी। अगर मैं क्यूवीकल से बाहर नहीं निकलती और टेलीफोन पहले उठा लेती तो छित्तन बाबू या जो कोई भी बाहर : हलो: 135. जा रहा था, उसके बाहर निकल जाने की पूरी सम्भावना पो । टेलीफोन मे भी ज्यादा मुझे छित्तन बाबू या जो कोई जा रहा था, उमसे दीदी के बारे मे जान लेना जरूरी लगा था। मैं फौरन बाहर निकली तो छित्तन बाबू शायद क्यूवीकल डोर की आवाज से चलते-चलते रक गए। मैं जब पूरी तरह बाहर निकली तो छित्तन यावू धीरे-धीरे पीछे की तरफ मुह रहे थे । में कुछ कहना चाहती थी कि मैंने छित्तन बाबू का हुलिया देगा । उम 23 दिसम्बर को जाड़े की शाम को भी चित्तन वादू पमीने से नहाये हुए पे.." उनको कपडे फटे थे जमे किमी ने नाखून से नोचा-सोटा हो"उनवी गर्दन में एक मफलर था और चेहरे पर खूखार वर्शियत । उनके माथे पर एक जगह हा याद आया दाहिनी तरफ"कान और आय के वीच हल्का- हल्का खून निकल रहा था। छित्तन बाबू का यह हुलिया देखकर मै उनमे जो पूटना चाहती थी, वह न पूछ सकी । उधर टेलीफोन की घंटी तब भी बज रही थी। मुझे कुछ गडबड का अंदेशा होने लगा, उसी लमहे मे मुझे याद आया जब मैं पवी- कल के अन्दर थी तो आपके केबिन का दरवाजा तेजी से खोलकर किसी के वाहर आने की आवाज आई थी, जिसके साथ वहा दीदी के होने का भी स्माल मेरे अन्दर जाग उठा । एक बार मेरे पेट मे बड़ी गन्दी मरोड़ हुई जिसके साथ कलेजे मे दहशत-भरी चोख उभरी जो मेरे मुह के अन्दर तालुओ से चिपक गई। उसी वक्त मैंने देखा छित्तन बाबू वहशियत के अदाज में मेरी तरफ बढ़ रहा था। उसने अपने गले में बधा मफलर निकाल लिया था जिसके गर्दन से हटते ही वहा पर नायूनी के बड़े-बडे घाव साफ-साफ दीखने लगे थे। वह मजर इतना भयानक या"इतना भयानक था जो आज भी याद करके मेरे रोगटे खड़े हो जाते हैं। मैं तेजी से क्यूवीकल के अन्दर जाने के लिए मुड़ी। अंदर पहुंचते ही कि इससे पहले मैं वहा का दरवाजा बन्द करती, छित्तन बाबू ने मुझे दबोच कर पकड़ लिया । टेलीफोन की घटी तव भी बज रही थी और मेरा इरादा टेलीफोन उठाकर यह सब बता देने का था। लेकिन मैं अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकी"छित्तन बाबू ने सबसे पहले मेरे मुह पर मफ्लर बांध दिया फिर उसी मफलर से खीचते हुए मुझे बाहर ले आया । * चो 134 : हलो धमकाया जिसकी वजह से दीदी का दिमाग खराब होने लगा था और डर के मारे वह अकेले घर नहीं जाना चाहती थी। आप तो पहले ही प्लेन से दिल्ली जाने के लिए निकल चुके थे। हमने आप तक पहुंचने की बड़ी कोशिश की. "हर जगह टेलीफोन किया एयरपोर्ट पर एनाउन्समेन्ट भी करवाई, लेकिन आप नहीं मिले 'नहीं मिल सके। उम्मीद थी शायद हमारा मेसेज मिल जाने पर आप फोन करेंगे, इसलिए वहां, दफ्तर में दीदी का रुकना जरूरी हो गया था। इसलिए और क्योंकि घर का उनका टेलीफोन खराव था। दीदी किसी भी तरह उस रोज आपके करीब रहना चाहती थी। वह वेहद डरी हुई थी। उस रोज सबसे ज्यादा शायद जिन्दगी में सबसे ज्यादा उनको आपकी जरूरत महसूस हो रही थी और आप मिल नहीं रहे थे। मुझे अस्पताल जाना जरूरी था. 'मां को देखने के लिए: 'दीदी के साथ घर जाने पर अस्पताल के लिए मुझे उल्टा जाना पड़ता था.. दीदी मेरे लौट आने तक वहीं दफ्तर में इन्तजार करती रहेगी । अस्पताल से आने में मुझे जरा-सी देर हो गई थी। फिर भी सवा पांच के पास का वक्त होगा, जव मैं दफ्तर के अन्दर दाखिल हुई। चारों तरफ सन्नाटा था । सिर्फ दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी और दाहिनी तरफ के क्यूवीकल में टेलीफोन की घंटी लगातार बज रही थी। एक बार मैंने सोचा शायद दीदी चली गई और मुझसे बात करने के लिए टेलीफोन किया होगा, फिर मुझे आपका ख्याल आया क्योंकि फोन उनका भी हो सकता था। मैं सीधे क्यूवीकल में टेलीफोन सुनने के लिए चल दी। अभी मैं क्यूवीकल के अंदर गई ही थी कि मुझे लगा आपके केविन का दरवाजा बड़ी जोर से किसी ने खोला, उसके फौरन वाद, खट-खट जूतों की तेज आवाज आने लगी. जैसे कोई बाहर की तरफ जा रहा था। यह खट-खट जूतों की तेज आवाज 'दफ्तर के सभी लोग जानते थे वह सिर्फ छित्तन बाबू के जूतों की थी, क्योंकि वे अपने जूतों की हील में लोहे की नाल लगवाया करते थे। एक तरफ टेलीफोन की घंटी बज रही थी, जिसे फौरन. उठा लेना जरूरी था और दूसरी तरफ जूतों की खट-खट की आवाज बाहर की तरफ निकलती जा रही थी। अगर मैं क्यूवीकल से बाहर नहीं निकलती और टेलीफोन पहले उठा लेती तो छित्तन वावू या जो कोई भी बाहर हलो: 135. जा रहा था, उसके बाहर निकल जाने की पूरी सम्भावना थी । टेलीफोन से भी ज्यादा मुझे छित्तन बाबू या जो कोई जा रहा था, उससे दीदी के बारे मे जान लेना जरूरी लगा था। फौरन बाहर निकली तो छित्तन वाचू शायद क्यूवीकल डोर की आवाज से चलते-चलते रुक गए। मैं जब पूरी तरह बाहर निकली तो छित्तन बाबू धीरे-धीरे पीछे की तरफ मुड़ रहे थे। मैं कुछ कहना चाहती थी कि मैंने हितन वाबू का हुलिया देषा । उस 23 दिसम्बर की जाडे की शाम को भी छित्तन वादू पसीने से नहाये हुए थे... उनके कपडे फटे थे'"जैसे किमी ने नाखून से नोचा-खसोटा हो "उनकी गर्दन में एक मफलर था और चेहरे पर सूखार वहशियत । उनके माथे पर एक जगह हां याद आया दाहिनी तरफ "कान और आंख के बीच हल्का- हल्का खून निकल रहा था। छित्तन बाबू का यह हुलिया देखकर मैं उनमे जो पूछना चाहती थी, वह न पूछ सकी। उधर टेलीफोन की घटी तब भी बज रही थी। मुझे कुछ गडबड़ का अंदेशा होने लगा, उसी लमहे में मुझे याद आया जब मैं क्यूवी- कल के अन्दर थी तो आपके केविन का दरवाजा तेजी से खोलकर किसी के बाहर आने की बावाज भाई थी, जिसके साथ वहा दीदी के होने का भी घ्याल मेरे अन्दर जाग उठा। एक बार मेरे पेट में बड़ी गन्दी मरोड़ हुई जिमके साथ कलेजे में दहशत-भरी चोख उभरी जो मेरे मुह के अन्दर तालुओ से चिपक गई। उसी वक्त मैंने देखा छित्तन बाबू वहशियत के अंदाज में मेरी तरफ बढ़ रहा था। उसने अपने गले में बधा मफलर निकाल लिया था जिसके गर्दन से हटने ही वहां पर नाखूनो के बड़े-बड़े घाव साफ-माफ दीखने लगे थे। वह मंजर इतना भयानक था"इतना भयानक था जो याज भी याद करके मेरे रोगटे खड़े हो जाते हैं। मैं तेजी से कवीकल के अन्दर जाने के लिए मुड़ी। अंदर पहुंचते ही कि इससे पहले में वहां का दरवाजा बन्द करती, छित्तन बाबू ने मुझे दबोच कर पकड़ लिया। टेलीफोन की घटी तव भी बज रही थी और मेरा इरादा टेलीफोन उठाकर यह सब बता देने का था। लेकिन सपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकी"छित्तन दाबू ने सबसे पहले मेरे मुंह पर मफलर बांध दिया फिर उसी मफलर से खींचते हुए मुझे बाहर ले बाया । मैं चीख 136 : हलो । "भी नहीं सकी थी छित्तन बाबू ने मुझे मारा था ''मेरा सर दीवार पर पटक दिया था और मुझे घसीटते हुए"दफ्तर के पिछले हिस्से की तरफ ले गया । दफ्तर के पिछले हिस्से में रिकार्ड रूम है। उसी रिकार्ड रूम में छित्तन बाबू ने मुझे उस रोज बंद कर दिया था । रिकार्ड रूम बंद करने से 'पहले उसने मेरे हाथ-पैर बांध दिए थे। दीदी की मौत के शोक में दफ्तर तीन दिन बंद रहा। तीसरे दिन जव अंधेरा हो चुका था तो छित्तन आया। उसके साथ एक आदमी और था, जो बाद में पता लगा टैक्सी ड्राइवर था। उसके हाथ उस कमीने छित्तन बाबू ने मुझे बेच दिया था "दो हजार रुपये में मुझे बेच दिया था 'पापा, यह सब लिखते-लिखते मैं रो रही हूं। मेरी सिसकी, इस सन्नाटे में 'सुबकती हुई आवाज के सन्नाटे में गूंजने लगी है। उसके बाद एक जगह, दूसरी जगह और न जाने कहां-कहां वे लोग 'मुझे ले गए थे। इसी दौरान एक जगह छित्तन वावू भी आया था। मैंने "उसे खुश करने की कोशिश यह सोच कर की थी कि वह शायद मुझे छुड़वा दे, तभी उससे मैंने यह भी पूछा था आखिर उसने दीदी को मारा क्यों ? वह कह रहा था, दीदी को मारने का उसका पहले से इरादा नहीं था । वह तो दीदी ने जव आपको सारी बात बता देने की धमकी दी थी तो यह सोच- कर कि ऐसा हो जाने पर इस तारी से निकाल दिया जाएगा, उसने दीदी का गला घोंट कर खून आपकी वेटी सरीखी-शबनम Adarshi FactAcarah Nagai R00 जिला जेल की बैरक नं० में उस दिन ममता सवेरे जरा जल्दी उठ गई थी। रात की कालिमा मिट चुकी थी और सवेरे की हल्की-हल्की धूप नम पत्थरों और सीखचों को चीरती हुई उसकी वैरक में आने लगी। दूर- दूर तक सन्नाटा था और सिर्फ जेल के दरख्तों पर चिड़ियों के चहकने की आवाज आ रही थी। चिड़ियों की आवाज, हवा की सनसनाहट और नम पत्थर, लोहे के सीखचों और सूरज की किरणों को चीरती हुई, कभी- कभी बड़ी दूर से कोयल की आवाज आ रही थी। यह कोयल की आवाज इधर कई दिनों से ममता को तंग कर रही थी, न जाने कौन-सा रिश्ता था, न जाने कौन-सा बैर था जिसकी वजह से जब भी यह कोयल की आवाज । - एमो:17 ममता के कानो में गजती, एक अड्या पासीपन उमरे अंदर पंठने सगा। पूरी एक जिन्दगी का हिसार, समहा-ममहा, दुकोसों में परी टूट-टूट कर तार-तार होती हुई एक जिन्दगी मा भयम, टोहियो में जुड़कर उसके सामने घूम जाता। जेन की दीवारों के पीरमीणों से सटी हुई, दूर गाली आममान में आज भी ममता पनि तमाम रही पी। अपना वह सितारा जो हर पिगी की जिंदगी में एकमार र मिलता है। ममता अगल में उन ये दरादौर में, भीममा करती कि यह सितारे, यह आगमान, यह पाद, यह जमीन, पाय, दुनिया, यह सब अब उसके विग काम मी पी। एक पित, Afon उसमी धडकनो से, उसकी मामी से उठकर द-यागुपद दिया पानी, एहसास करा देती कि सब कुछ तो गत्म हो गया पागि तय भी उगा एक सितारा, उसके पून, उसके जिम्म का एक हिग्गा रही परपाजार और उसी के लिए ममता जिन्दा थी। पत्पर की दीवारों पर गर पटक कर उसने जान नही दी थी। ममता धीरे-धीरे बैरक में बाहर निकलकर जैसी मादी मे, परगर के उसी पेड की तरफ पल दी, जिसके चतरे पर पेटफर यह रोग गां हुए मूरज को देखा करती थी। आगमाग गे उनगी मागिगा, उसकी आंखों में मुनहरा म्याय बनकर गमा जाती और यह भी बटी माया के गुलाबी गालों को उस सालिमा मे जोर दिया जाने कितनी हगरत, न जाने कितने अरमान उगये अंदर कायट या पगा। वह वही देर तक, जब तक गरज पूरी नरह नहीं निरम सा, गामांग निगाहो मे मूने आकाश को देगनी रहती। इसी तरह, हरनि शाम वह मूरज का डूबना भी देगा परती। यो दिनों तक वह टारगर की लालिमा और डूबने हुए मूरन की पानी में फनी दी। लेकिन धीरे-धीरे उमकी समझ में गव पुष्ट थाने मगाथागत कीनाली माय जुडी हवी रात को वारिमा और टाइगर की लालिमा के माय जुड़ी हुई दो दिन की मार पार गरें। समके तन और मनरा फर्क था। जेब के बहाने व मी दरगट क पनीर गरी गरी 138: हलो । आया करता था । जिस तरह ममता के लिए जेल का कोई कानून नहीं था उसी तरह राजी यो बड़े बाप का बेटा होने गी वजह से गगता से मिलने की इजाजत मिल चुगी थी। ममता से राजी की मुलाकात जेलर के नामरे में हुई थी। चेहरे से जहीन शरीफ दीखने वाले राजी के लिए ममता के मन में न जाने पौन-सा अपनापन पहली ही नजर में जाग उठा था। बड़े प्यार से उसके माथे पर हाथ फेरते हुए गमता ने पहली बार ही उसे स्नेह पा दान दे आला था। जेल की दीवारों के पीछे, भगोलेपन, कब और गया- यह यातना की सुलगती हुई विभीपिका राजी को बार-बार ममता के फरीव खींच ले जाती । वह अपने मन का सारा दुःख, रामूचा हाहाकार गमता से कह देना चाहता था। रागी की मां जेल से बाहर थी और राजी जेल के अंदर था। उधर ममता की बेटी जेल से बाहर थी और ममता जेल के अंदर थी। दोनों अनजान से, एक दूसरे से, अंदरूनी रिश्ते की गर्माहट से, अभाव और एकाकीपन से अपनी आस्था के बंधन में जकड़ गए थे। राजी गमता को मां और मगता राजी को बेटा गाहने लगी थी। गाई दिन, गाई हपते, कई महीने गुजर गए थे, गगता भोर राणी एक-दूसरे के कारीब बरगद गे - पेड़ नीचे बैठ कर उगो हुए सूरज की लालिगा और डूबते हुए सूरज की ली देखा करते । गमता ने राजी को देख कर ही जान लिया था कि जस लड़की के खून मे जुगं में उसे पकड़ा गया था, वह उसने नहीं किया था। उसकी भात्मा राजी को खूनी गानने को तैयार नहीं थी । पिसी अन- पहे, अनजान रागश के तहत राजी ने भी तब तक ममता की पिछली जिंदगी को बारे में पुछ नहीं पूण था । जेलर ने ममता के पति की बाबत उरो सब गुछ बता दिया था। फिर भी मगता की गुरता, उरागी गंभीरता, उसने गेहरे पी गगग और सूखी आंखों में गलती हुई, तापती हुई गका ने राणी को यह हिम्मत गाभी नहीं दी, जो यह गमता से कुछ और जानने गी कोशिश गारता । यह तो न जाने गिस गुगन के लिए ममता के पारा पला आता था । न ममता कुछ बोलती थी, ग राजी पुछ पाहता । दोनों गुपचाप बरगद गे पेड़ के नीचे बैठते थे और मुछ देर बाद उठपर अपनी- अपनी बैरक में गले जाते थे। हो, उठते वगत एक बार ममता जरूर राणी .
हनो:139 के माथे पर दिलासा का हाम फेर दिक्षा करती दी। पर उसी मुनहरे स्पर्ग के लिए राजी वार-बार उनकै पाम आया परतापा। एमे ही एक दिन शाम के वक्त ममता योर रात्री बरगद का नौ बैठे हुए इबने हुए सूरजको लालो देव रहे थे। राजा मन बहा वचन था । उसका मुकदमा शुरू हो चुका था। उसे मजा होगी मावह घट जाएगा, इसका किमी को पता नहीं पा । गररारी दवीत ओगार नौहरी ने उम दिन राजी के जुर्म को मादित करने के लिए जो जोरदार दलील दी पी, उनमें राजी के अंदर एक माम तरह का हर पैदा हो गया था। वह ममता के पास बैठकर भी अपने को वैद मरेता महसूम पर रहा पा। उसे न तो बरगद का पेड दिख रहा पा, न ही डूबते हुए भूरज मी सानी। उसका तो मन वार-चार ममता से सब कुछ यह देने को बेताब पा। वह नहीं जानता या, यद ममता उसकी बातें, उमर खून का रिमा मुनना चाहती थी या नहीं, लेकिन उमर भदर एक जजया बार-बार करवट दान रहा था। वह जजवा, ममता की नेकनिति से जुगहुआ पा, उमरी पार दोस्ती, उमरा मनीम म्नेह, उसपे नूर से जुड़ा हुआ था। रानी को मरने बच्चे मरीतं मन को समझाने का और कोई राम्ना नहीं नजर आ रहा था। उधर एक और कम उमे तग कर रही थी। यह य समाग भी ममता में जुडी हुई थी, इसका भी रिता ममता से ही था। राजी असत में बात से नहीं डर रहा था कि मुबदमे का पिम्मा ममता मुनना भी पारंगी या नहीं, वह डर इस बात में रहा था कि कहीं पूरा रिस्मा मुनने के बाद ममता को भी विश्वास हो गया कि यह यूनी या, तब क्या होगा? वह तो ममता को जज बनाकर कचहरी में होने वाली दसीनों की बात मय पर बताना चाहता था। उसके अंदर न जाने यहां में मह बहमान जाग उटा था कि अगर सरकारी और बचाव के वकीस, दोनों को दलीलें वह ममता को यता दे, तो जो फैमला ममता का होगा वही फेमना जज का होगा। हरते-डरते राजी ने ममता से कहा, "मां!" "हां"!" ममता ने चौकार राजीगोदेण "एक बात कहनी थी।" "कहो।"
140 : हलो "भाज.मेरा मुकदमा शुरू हो गया ।" "अच्छा ।" "मां, एक काम करेगी मेरा?" "क्या?" "मैं तुम्हें जज बनाकर, मुकदमे की सारी जिरह बताऊंगा।" "क्यों?" "मैं जानना चाहता हूं, मुझे फांसी होगी या नहीं।" ममता ने राजी के मुंह पर अपना हाथ रख दिया, "ऐसा नहीं कहते । उम्मीद ही तो दुनिया है।" "उम्मीद की बात नहीं है मां ! मैं सच जानना चाहता हूं।" "और वह सच तू मुझसे जानना चाहता है ?" "हां।" "यह मुझसे नहीं होगा।" "मेरा मन बड़ा उदास है। मेरा दिल न तोड़ो ! मैंने आज कचहरी में अपनी मां, अपने बाप की आंखों में शक की परछाई देखी है।" "लेकिन मैं कोई वकील नहीं हूं, कानून भी नहीं जानती मैं "फिर कैसे..." - "यह कानून की बात नहीं है."मुझे तुम्हारे ऊपर'"तुम्हारे चेहरे के नूर पर''पूरा विश्वास है । न जाने क्यों लगता है, जो फैसला तुम्हारा होगा, वही फैसला जज का होगा।" "मैं तुम्हें निराश नहीं करूंगी राजी ! लगता है कहने से तेरा मन हल्का हो जाएगा।" "तो ठीक है। इसी बरगद के पेड़ के नीचे इसी चबूतरे पर तुम बैठोगी, ठीक जज की तरह और मैं नीचे खड़े होकर वकीलों की दलीलें दोहराऊंगा।" "मेरी वह सब कुछ समझ आएगा ?" "हां, सब कुछ समझ आएगा तुम्हारी । मैं तुम्हारे सामने कचहरी का पूरा खाका खींचूंगा''मैं तुम्हें वह सब कुछ बताऊंगा, जो वहां रोज होता है। हर रोज शाम को पेड़ के नीचे तुम जज वनोगी और मैं कभी सरकारी .4 । हनो:11 यशील और कभी बचावका वरील।" "लेकिन मैं कुछ बोगी नहीं।" "हां मो, तुम मिर्फ मुनोगो और सब कुछ सुनने में मार पिरता सरोगीन?" "हां, भदों नहीं।" "तो ठीक है।" राजो चबूतरे के नीचे उतर आया। कुछ देर तक वह दूर बाममान के सन्नाटे को देखता रहा। जेल के अंदर, बडी दूर से शादियों के धोयने- चिल्लाने की आवाजें आ रही थी। सभी कोई वाहन सोटी बजाना तो कभी कोई पहरेदार दौड़ता हुआ निकल जाता । उस पार से परे के कार हयोडे की चोट से होने वाली आवाज धीरे-धीरे राजो को दिन मे पचहरी के अदर हुई वहस को याद-सो दिलाने लगी थी। उसने पतरे मे इतर कर अपनी पीठ ममता की तरफ कर ली थी। घंटे की आवाज साप वह धीरे-धीरे ममता की ओर घूमने लगा। ममता के पास मे दो पदम पौधे हटकर उसने सब कुछ कहना शुरू कर दिया था- ... मी लाई, जर, जोरू और जमीन इन तीनों पीजो पर कार से नही संकड़ो-हजारो साल मेगडे होते आए है। ए तो हर जगहा मुलगाया जा सकता है । झगडे मुलझाने के लिए हाकिम, परवान और पपहरी बनाई गई है, लेकिन कमी-कभी ऐसा भी होता है जब आदमी अपने सगों से खुद-ब-खुद निपट लेना चाहता है और कभी ऐमा भी होता है वापर आदमी अपने दिमागी फितूर के तहत एक पदार यार लेता है और फिर उस ववष्टर की शोक में सारा फैसला कर लेना पाहता है। फैमला, मी लाई, फैसला। एक फैसला जो उसके हक में हो, को यह पाहता हो। या फिर जो वह चाहता हो उसे मुमपिन न कर पाने पर हालात सोया उस हर चीज को मिटा देना चाहता है । यह जोर, मह जबरदस्ती यो मिल न जाने पर उस चीज को मिटा देने का फैमला, उस पीजयोग्राम कर डालने का फैसला जिस आदमी का हो उसे बरा हमारा सभ्य समान मानेगा, नही"नहीं, कभी नहीं। मी साई, हमारी मोमाटी समाज मे यह नहीं हो सकता, यह कभी नहीं हो साता।"
142 : हलो - - . "आज का मुकदमा, मी लार्ड, महज एक मामूली कल्ल का मुकदमा नहीं है । इससे जुड़े हैं कई एक और सवाल । पहला सवाल है, क्या एक व्याहता औरत के साथ एक नौजवान का इश्क फरमाना वाजिब है, दूसरा सवाल, अगर एक व्याहता औरत इश्क में साथ न दे तो उसके बाप को धमकाना, उसके खिलाफ साजिश करना वाजिव है; और तीसरा और आखिरी सवाल है, क्या उस औरत को हासिल कर पाने की साध पूरी न होने पर उसका खून कर डालना वाजिव है ? कानून तो बाद में हिसाब मानेगा, पहले तो इंसानियत का तकाजा क्या इसे सही मानेगा...?" "मी लार्ड ! यह राजी, राजी खन्ना, एक पढ़ा-लिखा अच्छे खानदान का लड़का है। लेकिन फिल्मी मोहब्बत, यौनशास्त्र से संबंधित पत्रिकाओं की तस्वीरें, चरस, सिगरेट और मेंडक्स की गोलियों ने धीरे-धीरे उसके अंदर जहर घोलना शुरू कर दिया था। माया चौधरी एक निहायत खूब- सूरत पढ़ी-लिखी नौजवान लड़की थी, जिसके लिए उसके खाविंद की खुशियां ही सबसे ऊपर थीं । राजी खन्ना को पहले ही पता लग चुका था, माया चौधरी व्याहता थी। उसको अपने नापाक इरादों पर रोक लगा देनी थी। लेकिन मी लार्ड ! उसने ऐसा नहीं किया ऐसा नहीं किया। वह बार-बार माया का पीछा करता रहा। "मी लार्ड ! माया हुस्न और नूर में नहाई, आसमानी रंगीनियों की पाक रोशनी में डूबी एक नौजवान हसीन लड़की थी । उसकी पलकों में नादान मोहक सपनों की खूबसूरत महक जगमगाती रहती थी। उसके पाक दामन में मचलते हुए जजबाती मंजर एक ऐसे मोड़ पर आकर रुक गए थे । "ठहर गए थे जहां से आगे जाकर कुछ जान लेने या लेने तक की तमन्ना उसके अंदर वाकी नहीं है । यह मुकदमा महज सोच-समझ कर किए गए खून से ताल्लुक नहीं रखता है, यह मुकदमा ताल्लुक रखता है न सिर्फ जिस्मानी बल्कि रूहानी कत्ल से । रूहानी और दिमागी खौफ से बीमार माया चौधरी के कत्ल से कानून का सीधा संबंध तो नहीं है । लेकिन यह मुजरिम के जुर्म को, उसके खतरनाक, घिनौने इरादों, नापाक वहशियत में जूझे" उलझे उस तमाम घिनौने खेल का पर्दाफाश करता है, जिसकी सजा शायद अपने कानून में नहीं है।" ...
हना: 13 "मी साह ! राजी गन्ना ने, इसलिए मैं कह रहा था एक नहीं हो गून किए हैं । एक तो माया का जिम्मानी और माया सम्मानी गन । माया का रूहानी पून जुर्म को "राजी गन्ना के जुर्म को और मगोन बना "मी लाई, राजी पन्ना जो मापा का पातिल है. जिसने सोच समन- कर जानबूझकर एक सधो-मयाई माजिग घड़ी की "एक बहसा हमा नौजवान है, जिसे नशे की गोलियां चरम पी गिगरेटोपी बात पर चुकी थी। गवाहो के ययानात, मूत और हालातों के बिना पर यह बात साफ-साफ सावित हो जाती है। राजी सूनी है"पूनी है । उमने माया -~बेहद मामूम, सूबसूरत, नाजुक और नफीस माया पौधरी मा बस्न किया है.'मी लाई, कोल्ड ब्लेडेड मर्डर।" "मी लार्ड, करल और जुर्म के इतिहाग में ऐसा कोई वाफया नही हुआ, जहा अपनी हवस के जुनून मे किमी इन्सान ने एक मासूम सामी का सिर्फ इसलिए सून कर दिया जो न्याहता होने की वजह से यह उमरे, साथ नहीं जा सकी। इस वेमिसाल जुर्म की बुनियाद महज एक मामूली लफ्ज पर पड़ी हुई है। यह लफ्ज़ है 'हलो हलो। यह सपज हलो हम और आप हमारे सभ्य ममाज में दिन में कितने ही पार यहा जाता है। दफ्तर में, घर में, बाजार में मिलने-जुलने पर मामूली जान-पहचान होने पर भी आपस में हली कह देना "भले ही नहको हो''कोई ग्राम अहमियत नहीं रखता। मकतून माया चौधरी ने अपने दफ्तर में होने बाली मुलाकातों में राजी खन्ना से स्वाभाविक तरीके से हलो पह दिया या। राजी यन्ना ने उस हलो के सहारे अपने पारो तरफ एक यथार गा कर लिया"इश्क, मी लाई, एकतरफा इश्क । वह किमी फर्जी मोहम्बत का खतरनाक रोल खेलने सगा। राजी पन्ना को हरश्तों की वजह से पहले सो मरहूम माया को दफ्तर में, दप्तर से बाहर और अपने पावितको निगाहों में जलील होना पड़ा और फिर इस यतरनाक पेस ने उसकी जान से लो।" "उम दिनमी साहं 23 दिसम्बर थी। शनिवार का दिन पा, सिर दो बजे बंद हो चुका था। महेश मेहता को जरूरी काम से दिल्ली जाना:
- 144 : हलो था, इसीलिए वह दफ्तर से एक बजे के करीब चले गए। माया उनके केविन में काम करती थी । वह दिन, मी लार्ड माया के लिए बड़ा ही मन- हूस या'"गलतफहमियों के शिकार उसके खाविंद भोला चौधरी ने उसके ऊपर तमाम झूठी तोहमत लगाई'"जिसकी वजह से वह दुखी थी, परेशान थी, डरी हुई थी और दफ्तर बंद होने पर भी घर नहीं गई थी। दफ्तर में अकेली बैठी हुई वह शवनम का इंतजार करती रही। राजी खन्ना ने इस हादसे के एक दिन पहले भी शाम के वक्त उसे घेरा था "जैसा दफ्तर के लोगों, ड्राइवर और चौकीदार के बयानों से जाहिर हो चुका है, वह कई दिनों से माया से अकेले में मिलना चाहता था। राजी खन्ना के हाथ का लिखा हुआ वह खत जो महेश मेहता को माया के पास से आई हुई फाइल में मिला था, पुलिस रिकार्ड और सबूतों की लिस्ट में है। यह खत कत्ल से एक दिन पहले लिखा गया था। इस खत से उसके नापाक इरादों का पर्दाफाश हो जाता है। उस दिन काफी देर तक जव माया महेश मेहता के केविन से बाहर नहीं निकली और जव चौकीदार दफ्तर में ताला लगा देने के बाद बाहर निकलने लगा था, तब मी लार्ड, इस घिनौने कारनामे का पता लगा था। महेश मेहता के केविन की कुर्सियां उलटी पड़ी थीं. वहां के माहौल से और डाक्टरी रिपोर्ट से सावित हो चुका था." मुजरिम ने पहले तो माया की इज्जत लूटी और उसके लगातार विरोध करते रहने पर रूमाल से गला घोंट कर उसका खून कर दिया । दफ्तर के चौकीदार ने राजी खन्ना को कत्ल के बाद दफ्तर से निकलकर जाते हुए देखा था। वह रूमाल या स्कार्फ जिससे माया का खून किया गया, राजी खन्ना ने चंद रोज पहले ही खरीदा था। राजी के अधलिखे प्रेम-पत्र उसकी मेज की दराज से पाए गए वह तमाम कागज जिन पर हलो"हलो माया'माया "लिखा हुआ था और जिन पर भद्दी, गंदी, बेहूदी तस्वीरें बनी थीं, तमाम फिल्मी पत्रिकाएं, विदेशी सचित्र अश्लील कितावें जिनके अंदर नग्न, अर्घ-नग्न औरतों की तस्वीरें थीं और हर तस्वीर पर माया के लिखे हुए नाम से राजी खन्ना की जुर्म से पहले की मानसिक स्थिति को जाना जा सकता है। महेश मेहता से राजी खन्ना का झगड़ा, दफ्तर के लोगों के बयान मुजरिम के जुर्म को पूरी तरह सावित करते हैं । सवसे ऊपर .
हलो:145 राजी पन्ना का यह साबित न कर पाना गोया परन के समय वह कहीं था"उसे मुजरिम करार करने के लिए कापी है। मो नारं, मुजरिम राजी पन्ना बालिग या, उसे पता पा माया पाहता थी।"उममा गाभिना चौधरी उसी दफ्तर में काम करता था.."उमे मालूम पाचदिनों बार उसका माया से मिलना-जुलना बंद हो जाने वाला था। महेश मेहता ने उसकी हरकतों से तंग आकर उसे नौकरी में निकाल देने का नोटिम दे दिया था। इसलिए उस दिन 23 दिसम्बर को उमने अपने नापार इरादों को, अपनी हवस, अपनी जहनियत के जुनून को पूरा करने की ठानी । उस दिन उसको मालूम था कि महेश मेहता दिल्ली चले जाने के लिए जा चुके थे। दफ्तर बाली था और माया वहां अकेली थी। इसलिए मी लाई! मुजरिम राजी पन्ना ने सोच-समाकर पहले दातर पोती. दार को रेलवे स्टेशन भेज दिया और कुछ ही देर बाद एक गतरनार पेशेवर मुजरिम की तरह उसने अपनी बनाई हुई योजना पर अमल किया । मी लाई ! इससे पहले राजी पन्ना किसी और मासूम लड़की की जिदगो छीन ले, अपनी हवस के लिए एक और खून करे, भोले लोगों पर गहर बन कर टूट पड़े, मैं दरख्वास्त करूंगा कि ताजीरात हिंददा 302 के तहत उसे फासी की सजा दी जाए।" ममता सोच रही थी माया हो तो था वह नाम, उसकी बेटी का नाम । आज यहां जेल के अंदर दरख्त के नीने शाम के धुघलरे में एक गुमनाम लड़के के मुंह से बार-बार अपनी बेटी का नाम मुनकर ममता के मन में एक पौफ को पनी छाया उठ कर बडी होने लगी थी। एक छोटा-मा सा यौफ बन कर उसके जहनियत के विस्तार के हिम्मे-हिस्से में परोच पीर गया था। उसने कई बार राजी गला को बीच में रोगना चाहा पा, फिर उमने सोचा, ऐसा करने से उस लड़के का मन टूट जाएगा"उमरी तारतम्यता बिखर जाएगी। फिर उसने सोचा, एक ही नाम के न जाने कितने लोग इस दुनिया में रहते हैं और फिर माया कोई ऐगा नाम तो नहीं, जो किसी और का नहीं हो सरता। इतनी ही देर में ममता जो खराब हो गया था और यह न जाने कब उटकर बरगदो तरफ पल दी। पी।
146 : हलो राजी खन्ना की कुछ समझ में नहीं आया कि जेल की दीवारों में कैद कोई औरत उसके बारे में बार-बार क्यों सोच रही थी। वह दूर तक उसे जाते हुए देखता रहा 'जब तक कि वह अंधेरे कोने में वह गायब नहीं हो गई। अगले कई दिनों तक ममता उसे दिखाई नहीं दी और वह चुपचाप वरगद के पेड़ के नीचे बैठकर डूबते हुए सूरज को देखता रहता। वेहद अकेलापन उसे बार-बार तड़पाता रहता । एक ही सहारा था वीरान जेल के बीच एक ही आसरा था, उसे लगा उसने वह भी खो दिया।
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