Sanmati Library, Jaipur
Chanyakyaneetidarpan Bhasha Teeka Va Doha Sahit
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ARO
चाणक्यनीतिदर्पण
भापा टीका व दोहा सहित
जिसमें
नीतिके अत्युत्तम दृष्टान्तयुक्त
सामयिक श्लोक वर्णित हैं।
जिसकी
सन्नाय प्रदेशान्तर्गत परीक्षा प्राम,
पं० महारामदान दीक्षित
सरल भापा.व दोनों
जितको
लाला श्यामलाल आनेवाली
अपने श्यामफाशी मैल मथुरा
छापकर प्रकाशित किया
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॥ श्री॥
चाणक्यनीतिदर्पण
* मापा टीका व दोहा सहित
-----::DONED::----
जिसमें
नीतिके अत्युत्तम दृष्टान्तयुक्त
सामयिक श्लोक वर्णित हैं।
जिसको
उन्नाव प्रदेशान्तर्गत वरोडा ग्राम निवासी
पं० महाराजदान दीक्षित ने.
सरल भाषावदोहोंसे अलंकृत किया।
जिसको
लाला श्यामलाल अग्रवालनेअपने
श्यामकाशी प्रेस मयुरामें छापकर
मकाशित किया.
सन् १९१४ ई.
चाणक्यनीतिदर्पणः । गायनमः Hamro -- प्रणश्यशिरसाविष्णुं त्रैलोक्याधिपतिप्रभुन । नानाशासोद्धृतवक्ष्ये राजनीतिसमुच्चयम् ।। दो सुमति वढावनसर्वजन, पालीतिप्रकाशं । भाषालचानकमैले भनतभावनादास ॥१॥ तीनों लोकों के पालन करने वाले सर्वशक्तिमान विध को शिरसे प्रणाम करके अनेक शोधों में से निकलकर राज नीतिसमुच्चयनामक ग्रन्थ को कहूंगा ॥१॥ अधील्येदयथाशास्त्रं नरोजानातिसत्तमः। धर्मोपदेशविख्यात कार्याकार्यशुभाशुभम् ॥ २ ॥ दोहा-तत्वसहित पहिशास्त्रपह, नरजानतसवात। काजकाजशुभाशुभहि, धरमरीतिविल्यात ॥२॥ जो इसको विधिवत् पढ़कर धर्मशास्त्र में प्रसिद्ध शुभका ये और अशुभ कार्य को जानता है वह अति उत्तम शिक्षा जाता है ॥ २॥ imala and- अणक्यनीतिः। लंदईसंभवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया । ... बेल विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते ॥३॥ दोहा-मैं सोइअबवरनन करूं, अतहितकारक अज्ञ । जांकनानत होतजन, सनही विध सर्वज्ञ ॥ ३ ॥ मैं लोगों के हितकी वांछासे उनको कहूंगा जिसके ज्ञान गांव से सर्वज्ञता प्राप्त हो जाती है ॥ ३ ॥ मुखशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीगरणेनच आखित संश्योगेण पण्डितोप्यवसीदति । उपदेसशिपसूटकहं, व्यभिचारिनिटेिंगवास गरि करत विसासेटर, विदुषहु लहत विलाप तिमि सिपको पढ़ाने से दुष्ट स्त्री के पापल से और स्त्रिया के साथ व्यवहार करने से पण्डित भीदुःख पाता । दुस्टाभार्याशमित्रं श्रुत्यायोत्तरदायकः ।।.. सत्तासमकालो मत्युरेव न संशयः । भनिनशठं; उत्तरदायकहत्य मगार में, सब सिधि भरितो सत्य सुमित्रा उत्तर देने वाला दास और सापक सत्युस्वरूनही है इसमें संशय नहीं । Bara Rani ॥चायतीति आपदर्थेधनरक्षहारावनोतरापि। आत्मानंसततरक्षेद्दारैरपिधनेरपि ॥६॥ दोधनगहिरासह विपतहित, धनते पत्रिकाधीर ।। तनिवनितापन कू तुरत, सचत रखा शरीर ॥ ६ ॥ आपत्तिनिवारण करने के लिये धन को बचाना चाहिये धन से स्त्री की रक्षा करनी चाहिये सब कालमें स्त्री औरधनों से भी अपनी रक्षा करनी उचित है ॥६॥ आपदवनरक्षेच्छ्रीमतश्चकिमापदः । कदाचिचलितालक्ष्मी संचितोऽपिविनश्यति॥ विपत्तिनिवारण के लिये धनकी रक्षा करती उचित स्या श्रीमानों को श्री आपति आती है ? हा कदाचित् देव- योग से लक्ष्मी चली जाती है उस समय सचित भी नष्टहो जाता है ॥७॥ यस्मिन्देशेनसन्मानो नवृत्तिनचबान्धवाः । नजविवागमोप्यास्ति वासस्तवनकारयेत् ॥८॥ दोहा-महानआदरजीविका, नहिभिषबन्धुनिवास नाहविद्याहि वसहनदिनइभवास ॥ ८॥ मित शान आदर न जीविका न बन्धु न . विधा शालाम वहीं पास नहीं करना चाहिये ॥ ८ ॥ antarietact म . . ॥. चाणक्यनीतिः । धनिकः श्रोत्रियोराजा नदीवधस्तुपमा पञ्च यत्र न विद्यन्ते. न तत्र दिवस वसेत् ।।९ दो०-धनिकवेदवितभूपजरु, नदीपेयपुगिसोय । बसहुनांहिइकदिवसतह, जैहयहपंचवहोय ॥ ९.।' धनिक पेदा ज्ञाता ब्राह्मण राजा नंदी और. पांचवां वैद्य ये पांच जहां विधमान न हों वहां एक दिन भी पास नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥ लोकयानाभयंलज्जा-शाक्षिण्यन्त्यागशीलता पचयत्रनविशन्ते नकोतवसंगति-900 -दानदच्छतालाजमय, जात्रालगनमान पंचनयहजहांपपये, तहानसहजान ॥२०॥ जीविका भय लज्जा कुशलता देने की प्रकृति जहायपांच नहीं वहां के लोगों के साथ संगति करनी न चाहिये ॥१०॥ जानीयातमेषणेकृत्यार बान्धवाव्यसलागौ।' मिश्चापत्तिकालतु भार्या च विभवक्षये ||990 दो काज चलाए पर स्वचर, वधुनरनदुखहोय । मित्रपरखियविपतमें, विभवनासित्तियसोख । ११ । काम में लगाने पर सेवकों की आने पर पाब दो R ----- ॥:चाणक्यनीतिः ॥ विपत्तिकाल में मित्र की और विभव के नाश होने पर स्त्री की परीक्षा हो जाती है ॥ ११॥ आतुरेव्यसनेप्राप्ते दुर्भिक्षशत्रुसंकटे। रोजहाश्मशानेच यस्तिष्टतिसबान्धवः ॥१२॥ दो दुखातरदर्भिक्षमें, अरिनवकलहंअभंग। भूपतिभौनमसानमें, बंधुसोईरहैसंग ॥ १२॥. आतुर होने पर दुख प्राप्त होने पर काल. पडनेपर वैरियों से संकट आने पर राजा के समीप और श्मशान पर जो साथ रहता है वही बन्धु है ॥ १२ ॥ योध्रुवाणिपरित्यज्य अध्रुवंपरिसेवते । सुवाणितस्य नश्यन्ति अब्रुवनष्टमेवहि ॥ १३ ॥ दो युवकुंतजिअनुवमहै, चित,अतिसुखचाहि । भूपतिनकेनासंततुरत, अधुवनष्ट आदि ॥ १३ ॥ जो निश्वत वस्तुओं को छोडकर अनिश्चित की सेवा करता है उसके निश्चित वस्तुओं का नाश हो जाता है अनि वित ती नष्टही हैं ॥ १३ ॥ वस्येत्कुलजाप्राज्ञो विरूपामपिकन्यकाम् । ... रूपशीलान नीचस्य विवाहःसहशेकुले ॥१४॥ दो-कुलजातीयविरूपतोडे, चतुरवरेकरिचाह ।
.. ॥ चाणक्यनीतिः॥ : रूपवतीतोउनीचतनि, समकुलकरियविवाह ॥ १४ ॥ बुद्धिमान उत्तम कुलकी कन्या कुरूपा भी हो उसे वरें नीच कुलकी सुन्दरी हो तो भी उसको नहीं इस कारण कि विवाह तुल्य कुलमें विहित है ॥ १४ ॥ नदीनां शस्त्रपाणीनां नखीनां शृंगिणांतथा। विस्वासोनवकर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषुच ॥१५॥ दो०-सरिताशृंगीशचकर, अरुमितनेनखवंत । तियकोनृपकुलकोतया, करहुविश्वासनर्मित ॥ १० ॥ अदियों का शस्त्रधारियों का नखवाले और सींगवाल ज- स्तुओं का स्त्रियों में और राजकुल पर विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥ बिपादप्यमृतंग्राहाममध्यादपिकाञ्चनम् । नीचादप्युत्तमांविधां श्रीरत्नंदुष्कलादपि ॥१६॥ दो-हसुधाविपतकनक, भलतेगडकरियल ! नीचहुतेविद्याविमल, दुमुलततियरल ॥ १६ ॥ विष में से भी अमृत को अशुद्ध पदार्थों में से भी सोने. को नीच से भी उत्तम विद्या को और दुष्ट कुल से भी स्त्रीरल को.लेमा योग्य है ।। १६ ॥ स्त्रीणांद्विगुणआहारो लज्जाचापिचतुर्गणा । -----
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॥ भागस्पनीति
साहसंपडणव कामवाटणतः !! १७ ॥
दो-तिय अहारदोयदगुणा, लाजनरामजान ! .
पटगुनतेहित्यवसायतिय, कामगुणगान ! १७ ।
पुरुष से स्त्रियों का आहार दूना लग्ना चौगुनी साहस
छगुना और काम अठगुना अधिक होता है ॥ १० ॥
इति प्रथमोऽध्यायः
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अनृतंसाहलमाया सूर्खत्वमतिलोलताः ।।
अशीचवनिर्दयत्न स्त्रीणांतोषाः स्वशारजा
दो-अन्तशीत्तानहता, कपटलकृतकमताइ ।
निरनयतात्मलीनता, तिच महारहाइ ॥ १॥
असत्य, विना विचार किसी कार मेंशापर लगमाना
उल भूसता अतिलेली अपवित्रता और निर्दयताधियों के
स्वाभाविक दोष हैं ।।.११.
मोज्यभोजनशक्षिश्च रतिशतिवरांगना।
बिस्वोतनशक्तियनारपस्यतपसः फलम् ॥२॥
ताजा जनशक्तिरति. शक्तिसदारनारि।
निकातिषह, कहतएमालमुवरि ॥२॥
॥चाणक्यनीतिः भोजन के योग्य पदार्थ और भोजन की शक्ति रति की शक्ति सुन्दर स्त्री ऐश्वर्य और दानशक्ति इनका होना थोडे. तप का फल नहीं है ॥२॥ 'परमपुत्रों वशी सूतो आर्या छन्दानुगामिनी । विभवे पश्च सन्तुष्टस्तस्य स्वर्ग है यहि ॥३॥ दोसुत आज्ञा कारी जिनहि, अनुगामिनि तियजान । विश्व अलग सन्तोष तेंहि, सुरपुर इहापिंछान ॥ ३ ॥ जिसका पुत्र वश में रहता है और स्त्री इच्छा के अनुसार चलती है और जो विभव में सन्ताव रखता है उसका स्वकी यहीं है। तेयुमा के पिताः सपिता यस्तु पोषकः । तमिषा विश्वासः सामाव्यत्र नितिः॥४॥ दोडत जो पितु भक्ति रत, हित काल पितु होय । जेहि विसास सौइमित्रवर, सुख दायक तियसाय ॥ ४॥ वही पुंन है जो पिता के भक्त हैं वहीं पिता है जो पालन करता है वही मित्र है जिसपर विश्वास है वही स्त्री है कि सुख प्राप्त होता है ॥ ४॥ परोक्षे कार्य हन्तारं प्रत्यक्षे प्रिय वादिनम् ।। वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भम्पयो मुख्य Porn.--- VAMERIAL IRAN her १०. ॥चाणक्यनीतिः॥ दो-कारज हनतपरोक्षमें, प्रियश्च मिलत विशेष. तेहिंदू सज्जन मूरितज. विष घट पयरस पेश ॥५. आंख के ओट होने पर काम विगाडे .सन्मुख होने पर मीठी २ वातबनाकर कहे ऐसे मित्र को मुहडे पर दूध से और सब विषेसे रे घड़े के समान छोड़ देना चाहिये ॥ ६ ॥ न विश्वसेत्कुमित्रेच, मित्रेचापि न विश्वसेत् । कदारिपितं मित्रं सर्व शुझं प्रकाशयेत् ॥६॥ दो बहिविश्वास कुभित्रकर, कीजिय मितहको न । कहि मितकवुकोष करि,गोपासनदुखभौन ॥ ६ ॥ क्षभित्र पर विश्वास तो किसी प्रकार से नहीं करना पा दिले और सुमित्रपर भी विश्वास द से इस कारण किकदा लित मित्र रुष्ट होकर सब गुप्त बातों को प्रसिद्ध करदे ॥६॥ मनसा चिन्तत कार्य बाचा नैव प्रकाशयेत् । मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं काय नियोजयेत॥७॥ -मन चिंतित काजजो, बने न त कहियेन । मंत्र मूढ राखिय कहिय देखि काज सुख देन ॥ ७॥ मन से सोचे हुये कामका प्रकाश पचन से न करे किन्तु मन्त्रणा से उसकी रक्षा करे और गुप्तही उस कार्यको काम में भी.लावै ॥७॥ कष्टञ्चखलु मूलत्वं कष्टचखलु यौवनम् । कष्टात कष्टन्तरचैव: परगेहे निवासनम् ॥ ८॥ MA ॥ चाणक्यनीति॥ ११ राखंता दुख देती है और युवापनभी दुःख देता है परन्तु दूसरे के गृह का वास तो बहुत ही दुःख दायक होताहै ॥ ८॥ शैलेशले न माणिक्य मौक्तिक न गजे गजे। साधवो नहिं सर्वत्र चन्दनं न बने बने ॥९॥ दो-गिरिमति नहि मानकगनिय, मोतिन प्रतिगजमाहिं । सबहि ठौर नहिं साधुजन, बनवनचन्दननाहि ॥ ९ ॥ एक पर्वतों पर माणिक्य नहीं होता और मोती सब झाथियों में नहीं मिलतासाधु लोग सब स्थान में नहीं मिलते सब इन में चन्दन नहीं होता ॥९॥ त्राचा विविधैः शीलैनियोज्याः सततंबुधः । . नीतिज्ञाः शीलसम्पन्न भवन्तिकुलपूजिताः।।१०॥ दो-चातुरता सुतळू सुपितु, सिखवतवारहिवार । नीति वंत बुधि वंत के, पूजत सब संसार ॥ ११ ॥ बुद्धिमान् लोग लड़कों को नाना मांति की सुशीलना में लगावें इस कारण कि नीति जानने वाले यदि शीलवान् होतो कुलमें पूजित होते हैं ॥ १० ॥ माता शः पिता वैरी थेन बालो न पाठितः। नशोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥११॥ -वातम्त अरि ल्य ते, सुतनपढावतनीचं । सभा मध्य शोभंतनसो, जिमबकहंसनबीच ॥ ११ ॥ CATED
mi
१२
.
चाणक्यताका
वह माता शत्रु और पिता वैरी है जिसने अपने बालक को
न पढाया इस कारण कि समांक पाच वह नहीं शोमता जैसे.
हसों के बीच बसला ॥ ११ ॥
लालनादबहवो दोपत्तिाडनावहमोगुणाः ।
तस्मात्पु वशिष्यतांडयेशतुम्हालय।।१२।।
दोहो-सतलोलन में दोषबहु. गुनबष्ट ताडन मांहि ।
तेहिते सुतंअरुशिखनफू लाडिय लालियनाहि ॥ १३॥
दुलारने से बहुत दोष होते हैं और दण्ड देने से बहुतगुण
इस हेतु पुत्र और शिष्य को दण्ड देना उचित ॥ १२॥
श्लोकेन वा तदनदक्षिरेजवा
अध्यदिवसंडग्यादानाध्ययनकसमिः।
दोहा सीपत श्लोकाअरष. पादहअच्छरकोय ।. .
इथागभारतदिवसला शुभचाहत निजसोयः ।। १३.
शोका वा लोक के आधेको अथवा आधे में से आधे को
मति दिन पर्दैना उचित है इस कारण कि दान अध्ययनआदि
कम लें दिलको सार्थक करना चाहिये ।। १३ ।।
कांतारियोग स्वजनापमानो
रणस्यशेषः कुनृपल्यसेवा।
दरिद्रभावोविषमालभाच
विनाग्नियेतेपदहीतकायम् ॥१४॥
। चाणक्यनीतिः । १३ ली, का विरह अपने जनों से अनादर, युद्ध करके बंचा शः कुत्सित राजा की सेवा, दरिद्रता और अविवेकियों की सभा ये दिना आगही शरि को जलाते हैं ॥ १४ ॥ नदीतीरे च ये वृक्षाः परगेहेषु कामिनीं। मंनिहीवाश्चराजनःशीधन्लश्यन्त्यसंशयम्॥ १६॥ दाहा तरुवर सरितातीरपर, निपटानिरंकुश नार। नरपति हीन सलाह नित, विलसतलगै न बार ॥ १५ ॥ नदोके तीरके वृश दूसरे के गृहमें जाने वाली स्त्री मंत्री रदित राजा निश्चय है कि शीन ही नष्ट हो जाते हैं ॥१६॥ बलविधवाचविणशसिन्यबलन्तथा। बलवितवैश्यानांसाणांपरिचर्यिका ॥ १६॥ बाहाणी का बल प्रगट दिया है वैसही राजा का बल सेना विश्य का बल धन और शूद्रों का वल सेवा है ॥ १६ ॥ निईनंपुरवश्याप्रमाभग्लन्नुपन्त्यजेत् । स्वंगापीतफलवृक्षम्भुस्त्वाचाभ्यागतामहम्।। ११७॥ वेश्या निधन पुरुष को मना शक्तिहीन राजा को पदी फल रहित वृक्षको और अन्यागत भोजन बार में हर छाडं देते हैं ॥ १७ ॥ गृहीत्वादक्षिणांविमाल्ल्यजन्तिनंजमाना। प्राप्त विद्यापुरुशिष्यादग्धारण्यमान्त:
aamama ॥चाणक्यनीतिः॥ शाह्मण दक्षिणा लेकर यजमान को त्यागदत है शिष्य 'विद्या प्राप्त हो जाने पर गुरु को वैसे ही जल हुये दर को मग छोड़ देते हैं ॥१८॥ दुराचारीदुराष्टिदुरावासीचदुर्जनः । बमैत्रीक्रियतेपम्मिनरः शीविनश्यति ॥१९॥ मितका आचरम बुरा है जिसकी दृष्टि पाप में रहती है बुरे स्थानमें बसनेवाला और दुर्जन-इन पुरुषों की मशः जिसके साथ की जाती है वह नर शाही नष्ट हो जाता है ।। १९ ॥ समाने शोभते प्रीति जिसवाचंशोभते । बाणिज्यव्यवहारेषु स्त्रीदिव्यागोभनेरहे ॥ २० ॥ समान जन में प्रीति शोमती है और सेवा राजाही शोभती है व्यवहारों में बनियाई और घर में दिव्य स्त्री शो भती है ।। २०॥ इतिदितीयोऽध्यायः ॥२॥ कस्वदोपःकुलेनास्ति व्याधिनाकोनपीडिता। व्यसनननमाप्त करयसौख्यंनिरन्तरम् ॥ १॥ किसके कुल में दोष नहीं है व्याधि ने शिसपीडिया जिया लिपको दुःख न मिला किसको सदा सही रखा ॥चाणक्यनीतिः॥ १५ आचारछुलमाख्याति देशमाख्यतिभाषणम् । सनमःस्नेहसाख्यातिपूराख्यातिभोजनम् ॥३ आचार फुलको वतलाता है बोली देशको जनाती है आ दर शीति को प्रकाश करताह भोजन शरीरको जनाता है ।२ । मुलेयोजयेत्कन्यां पुत्र विजास्तु योजयेत् । ज्यसनबोलच्छमिधर्मेनयोजयेत् ॥३॥ जन्या को श्रेष्ट कुलवाले वर को देना चाहिये पुत्र को दिवाल गाना चाहिये शको दुख पहुंचाना उचित है। मार मिल यो धर्मका उपदेश करना चाहिये ॥३॥ दुर्जनस्य च सर्पस्थ बसपा न दुजेनः। लोदशतिकालेतु दुर्जनरलपदेपदे ।। ४ ।। दुर्जग और सब इनसे सांप अच्छा दुर्गन नहीं इस कारण कि सांप काल आनेर काटता है खलता पदपद में ॥ ४॥ রক্তদানা বাণিনিংস। आदिमध्यावसानेषु न त्यजन्ति चते नृपम्।।५।।. राजा लोग कुलीनों का संग्रह इस निमित्त करते हैं कि वे : आदि अर्यात उन्नति मध्य अर्थात साधारण और अन्त अर्थात विपत्ति में राजाको नहीं छोड़ते ARA स्वापक्यनीतिः॥ प्रलयभिन्नमर्यादा अतान्तिलिलापाराः। सागरासेमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधा समुद्र प्रलय के समय में अपनी मां को छोडेदत और सागर भेद की इच्छा भी रखते हैं परन्तु साह लोग लय होन पर भी अपनी मर्यादा को नहीं छोडते ॥६॥ सूर्यास्तुपरिहर्सच्या प्रत्याशितः प्रभुः । मितवाक्यशल्येन अहर्शकदषया ।।७।। मूर्ख को दूर करना उचित है इसलिये कि देखने वह मदृष्यहै परंतु यथार्थ में पशु है और बाल्य रूप पाटस यताहै जैसे अन्ने का कांटा ७.३ सपथावन सपना विशालाकलसम्भवाः ।। विद्याहीता न शोते निघाइवर्किशुकाटा -संयुत जोक्न रूप से, कहियत बड़े बुलीन विद्याबिन शो नहीं पड्पगंध त होय ॥८॥ सुंदरता तरुणता और बडे कुल में जन्म इनके रहते भी विद्याहीन बिना रोय पलाश के कुलके समाज नहीं शोभते॥८॥ कोकिलानावरोस्य नारीचालितम् ॥ . . विद्यारूपंकुरमा मतारिकमाम्।। ॥ शिलों की. शेला त्या सियों की सोमा प्रालि है कुरूपों को शोभा दिखा है तालियों की शोमा अशा है. १९॥ railpear-westindiatrentinenerapan - ॥ चाणक्यनीति । त्यज़देकंकलस्यार्थे ग्रामस्थाथे कुलं त्यजेत् । मामंजनपदस्था आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्।।१९॥ दो कुलहित त्यागिय एकळू, गहु छोड़ि कुलगाम । जनपदहित ग्रामहि तनहु, तनहित अवनि तमाम ॥१०॥ लके निमित्त एक को छोड़ देना चाहिये ग्राम के हेतु पुलको त्याग करना उचित है देशके अर्थ गाय को और अपने अर्थ पृथिवी को अर्थात् सबका त्यागही उचित है ॥ १० ॥ उद्योगेनास्तिदारिद्यं जपतोनास्तिपातकम् । मोलेन कलहोनास्ति नास्तिजागरितोभयम्॥११॥ उपाय करने पर दरिद्रता नहीं रहती जपनेवाले को पाप नहीं रहना मौन होने से कलह नहीं होता जागने पाले के निकट भय नहीं आता ॥ ११ ॥ अतिरूपेण वे सीता अति गर्वेण रावणः । अतिदानालिबद्धो बतिसर्वत्रवर्जयेत् ॥ १२ ॥ अति सुन्दरता के कारण सीता हरी गई अति गवसे रावण मारा गया वत' दान देकर बलि को वैधना पड़ा इस हेतु अति को सब स्थल में छोड़ देना चाहिये.॥ १२ ॥ कोहिमारः समर्थानां किंदूर व्यवसायिनाम् । कोविदेशमविद्यानांकः पर प्रियवादिनाम् ॥१३॥ + १८ ॥ चाणक्यनीतिः॥ समर्थ को कौन वस्तु भारीहै काममें तत्पर रहने वाले को क्या दूर है सुन्दर विद्यावालों को कौन विदेश है मिय दादियों को पराया कौन है ॥ १३ ॥ एकेनापि सुवृक्षेण पुष्पितेन मुगन्धिना । वासितन्तद्वनसर्वसुपुत्रेण कुलं यथा ॥ १४ ॥ एक भी अच्छे वृक्षसे जिसमें सुन्दर फूल और गंध है उसे से सब वन सुवासित हो जाता है जैसे सुपुत्र से कुल ॥ १४ ॥ एकेन शुष्कवृक्षेण दहमानेन बहिना । दयतेतद्वनं सर्व कुपुत्रेण कुलं यथा ।। आग से जलते हुये एक ही सूरने वृक्ष से वह सब बन जल जाता है जैसे कुपुत्र से कुल ॥ १५ ॥ एकनापिं सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन साधुना। आवादित कुल सर्व ययाचन्द्रेणं शवरी ॥१६॥ विधायुक्तभलाएकभी तुमुत्र हो उससे सब कुल आनन्दित हो जाता है जैसे चन्द्रमा से रात्रि ॥१६॥ किं जातर्बहुभिःपुबै शोकसन्तापकारकैः। वरमेक कुलालम्बी या विश्राम्यते कुलम् ॥१७॥ शोक सन्ताप उत्पन्न करने वाले बहुत पुत्रों से क्या -- . " । पुत्र को पांच वर्ष तक दुलार उपरान्त :ना. १९ ॥ चाणक्यनीतिः॥ कुल को सहारा देनेवालाएकही पुत्र श्रेष्ठ है जिसमें कुल विश्राम पाता है ॥ १७॥ लालयेत्पंचवाणि दशवर्षाणिताइयेत् । प्रांतेतु षोडशेवर्षे पुत्रे मित्रत्वमाचरेत् ॥ १८॥.. ताइना करे सोलहवें वर्ष के प्राप्त होने पर पूर्व में मित्र समान आचरण करै ॥ १८॥ उपसर्गेऽन्यचक्रेच दुर्भिक्षेचभयावहे । असाधुजनसंपर्क यः पलायतिसजीवति ॥१७॥ उपद्रव उठने पर शत्रु के आक्रमण करने पर भयानक अकाल पड़ने पर और खलजन के संग होने पर जो भागता है वह जीवता रहता है ॥ १॥ धर्मार्थकाममोक्षेषु यस्याकोऽपिनविद्यते । जन्मजन्मानिमत्वोषु मरणन्तस्यकेवलम् ॥२०॥ दो०-परमादिक बहुं वरगमें, जो हिय एक न धार । जगतजनमि तेहिरनकै, मरिवहोतलवार ॥ २० ॥ धर्म अर्थ काम मोक्ष इनमें से जिसको कोई न मयां उस को मनुष्यों में जन्म होने का फल केवल नरण ही है । मृत्यलपूज्यते धान्ययमनुसचितम् । aruti- ENARENENEWANA
चाणक्यनीति
दाम्पत्येकलहोनास्ति तत्र श्रीस्वयमागता ॥२१॥
जहाँ मूर्ख नहीं पूजेनावे जहां अन्न सश्चित रहता है
और जहाँ खो पुरुष में कलह नहीं होती वहां आप ही लक्ष्मी
विराजमान रहती है ॥२१॥
इति तृतियोऽध्यायः ॥३॥
Somen
आयुः कर्मचवित्तञ्च विद्यानिधन मे च ।
पञ्चैतानिहिसृज्यन्ते गर्भस्थस्यैवदेहिनः ।। १.॥
यह निश्चय है कि आयु कर्म धन विद्या. और मरण
ये पाचों जब जीवं गर्भही में रहता है लिखदिये जाते हैं।
साधुभ्यस्तेनिवर्तन्ते, पुनभित्राणिवान्धवाः ।
यवतः संहगंतारस्तद्धर्मात्सुकृतंकुलम् ॥२॥
पुत्र भित्र पन्धु ये साच जनों से निवृत होजाते हैं और
मो-उनका संग करते हैं उनके पुण्य से टनका कुल सकती
हो जाता है।
दर्शनध्यानसंस्पर्शमत्सीकृचिपक्षिणी।
शिशुम्पालयतेनित्यं तथासज्जनसंगतिः॥१॥
मलती फाई और पक्षी ये दर्शन ध्यान और सस
चीको सर्वदा पालती है वैसेही सज्जनोंकी संगति है ॥३॥
। चाणक्यनीति २१ यावत्स्वस्थोझयंदेहो यावन्मृत्युश्चदूरतः । । -तावदात्महितंकुर्यात प्राणान्तेकिंकरिष्यति ॥४॥ जबलों देह निरोग है और जबलगमृत्यु दूर हैं तत्पर्यंत अपनाहित पुण्यादि करना उचित है प्राणके अन्त होमानेपर कोई.पा फरेगा ॥४॥ कामधेनुगुणाविद्या झकालेफलदायिनी । प्रवासेमासाशी विद्यागुप्तधनमृतम् ॥५॥ विद्या में कामधेनु के समान गुणहें इस कारण कि अकाल में भी फलदेती है विदेश में माता के समानहै विधाको गुप्तधन कहते हैं. ५ एकोऽपिगुणवानपुत्री निर्गुणेश्वशतवः । एकश्चन्द्रस्तमोहन्ति नचताराः सहवंश-६॥ एक भी गुणी पुत्र श्रेष्ठ है और सैकडों गुणरहितों से स्या । एकही चन्द अन्धकार नष्ट कर देता है सहस्त्र तारे नहीं॥६॥ मूर्खचिरायुजर्जातोऽपि तस्माज्जातमृतोवर। मृतस्तु. चाल्पदुःखाय यावज्जीवजडोदहेत ॥७॥ मुर्ख पुत्र चिरंजीविभी हो उससे उत्पन्न होतही जागरंगया पद श्रेष्ठ है इस कारण कि मरा थोडेही दुखका कारण होता ॥ वाणक्यनीतिः॥ है जड़ जबलों जीता है डाहता है ॥ ७॥ कुप्रामवासः कुलहीनसेवा कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या । पुत्रश्चसूखों विधवां च कन्या विनाग्निनाषट्प्रदहन्तिकायम् ॥ ८॥ कुग्राम में वास नीचे कुलकी सेवा कुयोजन कलही. खी सूर्ख पुत्र विधवा कन्या छ. विना आगही शरीर को जला दते हैं ॥८॥ किंतयाक्रियतेधेन्वा या न दोग्भी न गर्भिणी । कोऽर्थःपुत्रेण जातेन योनविद्वान्नभक्तिमान् ॥९॥ । उस गाय से क्या लाय जो न दूध देवे न गाभिन होने और ऐसे पुत्र इंए से क्या लाभ जो न विद्वान् भया न संसारतापदग्धानां त्रयोविश्रान्तिहेतवः । अपत्यंचकलत्रंच सतांसंगतिरेवंचः ॥१०॥ संसार के तापसे जलते हुये पुरुषों के विश्राम के तीन हैं लडका स्त्री और सज्जनों की संगति ॥ १० ॥ सकजल्पन्तिराजानःसकज्जल्पन्तिपण्डिताः। सकृत्कन्याः प्रदीयन्ते त्रीण्यतान सकत्सत ११ हेतु ॥चाणक्यनीतिः॥ २३ राजा लोग एकही बार आज्ञा देते हैं.पण्डित लोग एकही बार बोलतेहैं कन्या एकही बार दानहोती है ये तीनों बात एक ही बार होती हैं. ॥ १२ ॥ एकाकिनातपोद्वाभ्यां पठनं गायनं लिमिः। चतुभिर्गसनं क्षेत्र पंचभिबहुभीरणम् ॥ १२ ॥ अकेले में तप दोसे पटना जनसे गाना चार से पंथ चलना पांच से खेती और बहुतों से युद्ध भली भांति से बनते हैं ॥ १२ ॥ साभार्यायाशुचिर्दक्षा साभार्यायापतित्रता । सांगायापतिप्रीता साभार्यासत्यनादिनी ॥३॥ रही भाया है जो पवित्र और चतुर है वही भाया है जो पतित्रता है वही भार्या है जिसपर पतिकी भौतिहै वही भार्या है जो सत्य बोलतीहै अर्थात् दान मान पोषण, और पालन योग्य है।॥ १३ ॥ अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिश शून्यास्त्वबांधवाः ।, मूर्खस्य हृदयं शून्य सर्वशून्यादरिद्रता ॥१४॥ निपुत्री का घर सूना है बन्धु रहित दिशा.शून्य है मूर्खकर, हृदय शून्य है और सब शून्य दरिद्रता है ।। १४ अनभ्यासे विष शास्त्रमजीणे भोजनं विषम् । 44AN ----- २५ ॥ वाणस्यनायिः॥ दरिद्रस्यविषगोष्टीवृद्धस्पतरुणीविषम् ॥ १६॥ विना अभ्यास से शास्त्र विस हो जाता है बिना पवे भोजन विपहो जाता है दरिद्र को गोप्टी विष और वृद्धको युवती विस जान जडती है । १६ । त्यजेद्धर्मन्दयाहीनं विद्याहीनगुरुन्त्यजेत् ।. . . त्यजेत्कोचमुखीम्भार्यान्निस्नेहान्वान्धवांस्त्यजेत! दया रहित धर्मको छोड़ देना चाहिये विद्याहीन, गुरुका त्याग उचित है जिसके मुंह से कोध प्रकट होता. हों ऐसी भाया को अलग करना चाहिये और बिना प्रीति वांधवों का त्याग विहित है ॥ १६॥ अध्याजरामनुष्याणां वाजिनाबन्धनंजरा। अमैथुनंजरामीणां वखाणामातपोजरा ||१७|| मनुष्यों को पर्य बुढापा है घोडों को बांध रखना हद्धता है स्त्रियों को अमैथुन बुढापा है वस्त्रों को पाम वृहता है ॥१७॥ काकालकानिमित्राणि कोदेशकोव्ययागमो। कस्याहकाच शक्तिरितिचिन्त्यमुहुर्मुहु दोहा काल मित्र अरु देश कहा, कहा लाभ कहा हान । काम कैसी शक्ति इम, बार वार हिप ठान ॥१८॥ किस कालमें क्या करना चाहिये मित्र कौनहयह सोचना M.. Hanuman चाणक्यनीतिः पाहिये इसी भांति देश कौन है इस पर ध्यान देना चाहिये लामध्यम मयाई यह भी जानना चाहिये इसी भांतिफिसका मैं हूं यह देखना चाहिये इसी प्रकार शुभ में क्या शक्ति है यहकार वार विचारना योग्य है ॥१२॥ अग्निदेवोदिजातानां मनीनां दिदैवतम् ॥१९॥ प्रतिमास्वल्पबुद्धीनां सर्वत्रसमदर्शिनाम् ॥ १९ ॥ माझण क्षत्रिय वैश्य इन की देवता अग्नि है मुनियों के हृदय में देवता रहते हैं भत्स बुद्धियों को मूर्ति में औरसमद त्रियों को सब अस्पान में देवता है॥१९॥ इति चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥ --RRBItem- पतिरेवगुरस्त्रीणांसर्वस्वाभ्यागतोगुरुः। गुरुरग्निद्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणोगुरुः ॥१॥ दोहा-अग्निगुरु फुलदिजनक, विमपरणगुरुहोय । पतिगुन्जानो तियनको; अतिथि सर्वगुरु सोय ॥ १॥ त्रियों का गुरु.पतिही है अभ्यागत सबका गुरुहे अझण क्षत्रीय का गुरु अग्नि है और चारों वर्गों का गुरु साह्मणहै । यवाचताभ कनकपरीक्ष्यते ।। चाणक्यनीतिः॥ निवर्पणच्छेदनतापताडनैः ।। तथाचतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेनशीलेनगुणेनकर्मणा ॥२॥ दो०-घसत छेद तप दंडत. पारख कनक कहात! , . श्रुत कुल शील सुमर्मत, तसेइ नर परखात ॥ २ ॥ पिसना काटना तपाना पीटना इन चार प्रकारोंसे जैसे सोने की परीक्षा की जाती है वैप्सेही दान शील गुगऔर आचार इन चारों प्रकार से पुरुष की भी परीक्षा की जातीहै ॥२॥ तावद्भयेषुभेतव्यं यावद्भयमनागंतम् । आगतंतुमयवाक्ष्य प्रहर्तव्यमशंकया ॥३॥ तब तकही भयों से डरना चाहिये जबतक भवनहींआया और आये हुये भयको देखकर प्रहार करना उचितैहै ॥ ३॥ एकोदरसमुद्भूता एकनक्षत्रजातकाः । नभवन्तिसमाः शीले यथावदरिकण्टकाः ॥ ४॥ एलही गर्भ से उत्पन्न और एकही नक्षत्रमेंजायमान शोल समान नहीं होते जैसे बेर और उसकेकाटे ॥४॥ निस्पृहोनाधिकारीस्यानाकामांमण्डनप्रियः । नाविदग्धः प्रियन्यात स्पष्टवक्तानवञ्चकः॥६॥ में --- 4 २७ चाणक्यनीतिः ॥ जिसको किसी विषय की वाञ्छा न होगी वह किसी विषय का अधिकारी नहीं होगा जो कामी न होगा वहशरीर की शोभा करने वाली वस्तुओं में प्रीति नहीं रखेगा जो चतुर न होगा वह प्रिय नहीं बोल सकेगा और सष्ट कहने वाला छली नहीं होगा ॥ ५ ॥ मूर्खाणांपण्डिता द्वेष्या अधनानामहाधनाः। परांगनाः कुलस्त्रीणां सुभगानांचदुभंगा ॥ ६॥ 'मूर्ख पण्डितों से, दरिद्री धनियों से, व्यभिचारिणीकुलीन खियों से और विधवा महानिनियों से बुरा मानती हैं. ॥ ६ ॥ आलस्योपगताविद्या परहस्तेग धनम् । अल्पबीजहर्तक्षेत्रं हतसैन्यमनायकम् ॥ ७॥ आलस्य से विद्या नष्ट होजाती है दूसरे के हाथ में जाने धन निरर्थक हो जाता है बीजकी न्यूनता से खेत हत होता है सेनापति के विना सेन मारी जाती है ॥ ७ ॥ अभ्यासादायतेविद्या कुलंशीलेनधार्यते । गुणेनज्ञायतेत्वार्यः कोपोनेत्रेणगम्यते ॥ ८॥ अभ्याससे विद्या सुशीलतासे कुल गुण भलामनुष्य और नेत्रसे कोप ज्ञात होता है ॥ ८॥ वित्तेनरक्ष्यतेधों विद्यायोगेनरक्ष्यते । से 1 - २८ चाणक्यनीतिः॥ मृदुनारक्ष्यतेभूपः सत्स्त्रियारक्ष्यतेगृहम् ॥ ९॥ अनसे धर्मको रक्षा होती है पम नियम.मादि योग सेज्ञान रक्षित रहता है मृदुता से राजाकी रक्षा होती है भलो स्त्रीसे परकी रक्षा होती है। अन्यथा वेद पाण्डित्यं शास्वमाचारमन्यथा। अन्यथावदनाःशान्तलोका-क्लिश्यंतिचान्यथा१० घेदके पाण्डित्य को व्यर्थ प्रकाश करनेवाला, शास्त्र और उसके आचार के विषय में स्वयं विवाद करने वाला,का न्त पुरुषको अन्पया कहनेवासा ये लोग अपही क्लेश उठा दारिचनाशनन्दानं शीलंदुर्गतिनाशनम् । अन्नाननाशिनीप्रज्ञा भावनामयनाशिनी ॥१२॥ दान दरिद्रता को नाश करता है सुशीलता दुर्गतिको कोडूर कर देती है चुदि अज्ञान को नाश कर देती है भक्ति भय को नाश करती है ॥ ११ नास्तिकामसमोव्याधिर्नास्तिमोहसमोरिपुः । नास्तिकोपसमषिदिनास्तिज्ञानात्परंमुखम् ॥१२॥ काम के समान दूसरी व्याधि नहीं है अज्ञान के समान दूसरा वैरी नहीं है कोष से माल दूसरी आम नहीं है धान से परे सुख नहीं है ॥ १२॥ १० --- चाणक्यनीति जन्ममृत्यूहियात्येको भुनक्त्येकःशुभाशुभम् नरकेषुपतत्येकएकोयातिपरांगतिम् ।। १३ ॥ पेह निश्चय है कि एकही पुरा भन्म मरण पाता है बुर दुग्न एकही भोगता है एकही नरकों में पड़ता है और एकही मोक्ष पाता है अर्थात् इन कामों में कोई किसी की सहायता मीं कर सकता। १३॥ तृणं ब्रह्मविद स्वर्गस्तृणशूरस्य जीवितम् । जिवाक्षस्य पूर्ण नारी निस्पृहत्व तृणं जगत्।।१।। ब्रह्मज्ञानी को स्वर्ग तृण है शूर को जीवन हल है जिसने इन्द्रियों को वश किया उसे स्त्री तृण के तुल्य जान पड़ती है निस्पृह को जगद तृपा है ॥.१४॥ विद्यामित्रंगवासेषु भार्यामित्रगृहेषुच । ज्याधितस्योपचं मनं धर्म मिमृतस्यच १५ ॥ विदेश में विद्या मित्र होता है ग्रह में भार्या मित्र है गंग का भित्र औपाधि है और मेरे का मित्र धर्म है।॥ १५ ॥ वृथावृष्टिल्समुद्रे पापोभोजनम् । वृथादानधनाव्येषु वृशादीपोदिवापिच ॥ १६ ॥ समंदों में वर्षा क्या है और भोजन से तृप्त को भोजन ---..
३० ॥चाणक्यनीतिः॥ निरर्थक है धन धनी को दानदेना व्यर्थ है और दिनमें दीप: क वृथा है ॥ १६॥ नास्तिमेवसमतोयं नास्तिवात्मसर्मबलम् ।। नास्तिचक्षुः लमंतेजो नास्तिधान्यलमंत्रियम्।।१७॥ मेघ के जलके समान दूसरा जल नहीं होता अपने बल के.समाल दूसरे कम बल नहीं इस कारण कि समय पर काम आता है नेत्र के तुल्य दूसरा प्रकाश करने वाला नहीं और अन्ल के सहा दूसरा प्रिय पदार्य नहीं हैं ॥ १७ ॥ अधनाधनामिच्छति वाचंचेवचतुष्पदाः । मानवाः स्वर्गमिच्छति मोक्षमिच्छातिदेवताः ॥१८॥ धनहीन धन चाहते हैं पशु वचन और मनुष्य स्वर्ग चाहते है और देवता मुक्ति की इच्छा रखते हैं। ५९ ॥ सत्येनचायतेपृथ्वी सत्येनतपतेरविः । सत्येनवातिवायुश्च सर्वसत्येप्रतिष्ठितम् ॥ १९ ॥ सत्य से पृथ्वी स्थिर है और सत्यही से सूर्य तपते हैं। सत्यही से वायु कहती है सब सत्यही में स्थिर है ॥ २० ॥ पलालक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चलेजीवितमन्दिरे। चलाचलेचसंसारे धर्मएकोचिनिन्दनः ॥२०॥ लक्ष्मी नित्य नहीं है प्राण जीवन और घर स्था ov.
. . । चाणक्यनीतिः॥ ३१ चलायमान हैं चर अचर संसार में केवल 'धर्म ही निश्चल है । २०॥ नराणांनापितोधूर्तः पक्षिणांचैववायसः । चतुष्पदांशृगालस्तु स्त्रीणांधूर्ताचमालिनी ॥२१॥ पुरुषों में नापित (नाई) और पक्षियों में फौवा यंचक होता है पशुओं में सियार. वंचक होता है और स्त्रियों में मालिन धूर्त होती है ॥ २१॥ जानिताचोपनीतांच यस्तुविद्या प्रयच्छतिनः अन्नदाताभयाता पञ्चैतपितरः स्मृताः २२ ॥ दो-पिता मंत्रदायक अपर, विद्यानदं विख्यात । दौता भय त्राता प्रगट, पंचहि पिता कहात ॥ २२ ॥ जन्माने वाला यज्ञोपवीत आदि संस्कार करानेवाला जो विद्या देता है अन्न देनेवाला भय से बचानेवाला ये पांच पिता गिने जाते हैं ॥ २२ ॥ संजपत्नी गुरोःपत्नी मित्रपत्नीतथैवच । पानीमातास्वमाताच पञ्चैतामातरः स्मृताः॥ २३ को राजापतनी गुरुपतनि, पतनी मित्र वखान ! तिय माता निज मातयह, पंचह मात समान ॥ २३ ॥ . । 1 -- KALA
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चाणक्यनीतिः॥
रागा की भाया गुरु की खी पैसेही मित्र की पत्नी सासे
और अपनी नननी इन पांचों को माता कहते हैं । २३ ।।
इति पञ्चमोऽध्यायः ॥ ६॥
श्रुत्वाधर्मविजानाति श्रुत्वात्यजतिदुर्मतिम्
श्रुत्वाज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वामोक्षमवाप्नुयात् ॥ ३॥
दो शाखारने जानत घरम, नियकी दुर्गति नाय
होव अवनत ज्ञानहिप, अवन मुकिपदमाग.॥ १॥
मनुप्य शास्त्र ने सुन कर धर्म को जानता है और शाख
मुन कर दि को छोड़ता हे शास्त्र सुनकर बन पाता है
चौर शाख सरकर मोध पाता है। "
पक्षिणांकाकचाण्डाला पशूनांचैवकुक्कुटः ।
मुनीनांपापचाण्डालः सर्पश्चाण्डालनिन्दक
पलिय में कौवर और पशुओं में कुक्कुट पाण्डाल होताह
मुनियों में दाण्डाल पाप है सब से चाण्डाल निन्दक है ॥२॥
भस्मनाशुद्धयतकांस्य तानसम्लेनशुश्वाति ।
रजसाशुद्धयतेनारी नदीवेगेनशुब्वति ॥ ३ ॥
चाणक्यनीतिः॥ ३३. कासे का पान राख से शुद्ध होता है तारे का मल खाई से जाता है की रजस्वला होने पर शुद्ध हो जाती है और ग- दी धारा के वेग से पवित्र होती है ॥ ३ भ्रमन्सं पूज्यते गजा भ्रमन्सं पूज्यते द्विजः। भमन्सं पूज्यते योगी स्त्री अगन्ती विनश्यती॥४॥ भ्रमण करने वाला राजा आदर पाता है अपने वाला बाह्य- पूजा जाता है. भ्रमण करने वाला योगी प्रणित होता है परन्तु स्त्री घूमने से भ्रष्ट हो जाती है ॥ ४ ॥ यस्यास्तिस्यभित्राणि यल्यास्तस्यबांधवाः। यस्यान्सवाल्लोक्यस्यार्थाःसचपंडितः ॥ दो-जिनके धन तेहिं र्मित बहु, जेहि धन-पन्धु अनंत है । थन सोइ जग में पुरुष वर, धन सोइ जग जीवंत ॥ ५ ॥ जिसके धन रहता है उसी के मित्र और जिसके सम्प: तिसी के बांधव होते हैं जिसके धन रहता है वही पुरुष गिना जाता है और जिसके धन होता है वहीं पाण्डित कहा ताहशी जायते बुद्धिर्व्यवसायोपि तादृशः। संहायास्तादृशाएव यादृशीभवितव्युता ॥६॥ वैसीही बुद्धि और पैसाही उपाय होता है. और से ही सहायक मिलते हैं. जसी होनहार होती है । ॥
। चाणस्यनीतिः । कालः पचतिः भूतानि काल संहरतेजाः। कालः सुप्तेषुजागर्ति कालोहिदुरतिक्रमः ॥ ७ ॥ काल सब प्राणियों को खा जाता है और कालही मजा को नाश करता है सब पदार्थ के लय हो जाने पर काल जागता रहता है काल को कोई नहीं टाल सकता॥ ७ ॥ नपश्यतिचजन्मांधः कामान्धोनवपश्यति । मदोन्मत्ता नपश्यन्ति धर्थी दोषान्लपश्यति॥८॥ जन्न का अन्धा नहीं देखता काम से जो अन्धा हो रहा है उसको सूझता नहीं मदोन्मत्त लिसी को देखता नहीं और अर्थी दोष को नहीं देखता ॥ ८॥ स्वकर्मकरोत्यात्मा स्वयन्तत्फलमश्नुते । स्वयंभ्रमति संसारे स्वयन्तस्माद्विमुच्यते ॥ ९ ॥ जीव आपही कर्म करता है और उसका फल भी आपही भोगता है आपही संसार में भ्रमता है और आपही उसंस मुक्त भी होता है ॥ ९ ॥ रंजाराष्ट्रकृतम्पापं राक्षापापपुरोहितः । भताच स्वीकृतपापं शिष्या पापं गुरुस्तथा।।३०॥ अपने रास्य में किये हुऐ पाप को राज और राजा के ।
|| चाणक्यनीतिः॥ ३५ जाप को पुरोहित भोगता है स्वीकृत पाप को पति भोगता है से ही शिष्य के पाप का गुरु ॥ १० ॥ जातापिताशवर्माताचव्याभिचारणी.. भरूपमतीशः पुरः शत्रुरपण्डितः ॥ ११ ॥ अरण करनेवाला पिता शह है व्यभिचारणी माता और सुन्दरी स्त्री शव है और भूख पुत्र धैरी है ॥ ११ सुधमनगृहणीयात् स्तन्धनंजालिकमणा- मूखंछन्धानुकृत्याच यथार्थत्वजण्डितम् ॥१२॥ शे०-धनदे लोभी करिय वस, डीउ गरि जुगहात.। कहैं सुकरिके सूट कू, विदुष जथारय बात ॥ १२ ॥ लेभी को धन से अहंकारी को हाथ जोडने सेर्स की उसके अनुसार वर्तने स, और पण्डित को सचाई से कश करना, पाहिंगे ॥ १२ ॥ वरन्नराज्यन्नकुराजराज्य बरन्नमित्रन्नकुमित्रमित्रम् । घरन्नशिंष्योनमशिष्यशिष्यो. वरन्नदारालकुदारदारः ॥ १३॥ राज्य न रहना यह अच्छा परन्तु कुरामा का राज्य हो.. ना यह अच्छा नहीं, निलं का नहोलापजन्दा पनि । ।
1- ३६ चाणक्यनीतिः।। को मित्र करना अच्छा नहीं, शिंप्य न हो यह अच्छा पर निन्दत शिप्य शिष्य कहलावै यह अच्छा नहीं भार्या न रहै यह अच्छा पर भार्या का भार्या होना अच्छा नहीं ॥ १३ ॥ कुराजराज्येनकुतः प्रजामुख कुमित्रमिवणकुतोऽमिनितिः ।। कुदारदारश्चकुतोहरातिः कुशिष्यमध्यापयतः कुतोयशः॥१३॥ दो-सुख कहां प्रजा कुराज ते, भित्र कुभिव-न श्रेय । कह कुदार तें गेह सुख, फहँ कुशिष्य जसदेय ॥ १४ ॥ दुष्ट रागा के राज्य में प्रनाको सुख कैसे हो सकता है कुभित्र मित्रसे आन्नद कैसे होसत्ता है दुष्ट चीस गृह में गीति कैसे होगी और कुशिष्यको पढानेवाले की कीर्ति फैस होगी १४ सिंहादेकबकादेकं शिक्षेच्चत्वारिकुक्कुटात् । वायसात्पञ्चशिक्षेच्च पदसुनत्रीमिगईभात।१६ दोहा- इक गुण सिंहरु सफनते, अरु मुकुढत चारि। काक गंच पट श्वान ने, गरदन तीन विचारि ॥ १५ ॥ सिंह से एक माहम एक एक्कुट से चार पातें सीसना आहिये कौवसे पांच से छः और गदहे से तीनगुण सीखना उचित हैं ।। १५ ॥
-- चाणक्यनीतिः॥ प्रभूतकार्यमल्पंवा यन्नरः कमिच्छति । सर्वारम्भेगतत्कायं सिंहादेवचक्षते ॥ ६१ ॥ दोहा-अति उन्नत कारज कर, किय चाहत नर कोय । करै अनत आरंभते, गहत सिंह गुनसोय ॥ १६ ॥ कार्य छोटाहो वा बडा जो करणीय हो उसको सब प्र. फारफे प्रयल से करना उचित है इसे सिंहसे एक सीखना फाहते हैं ॥ १६ ॥ इन्द्रियाणियसंयम्य बकवल्पण्डितोनरः । देशकालबलंज्ञात्वा सर्वकार्याणिसाधयेत् ॥१७॥ दो देश काल बल मानिक, गहि इंनियको ग्राम । कक जैसे पण्डित पुरुष, कारज कर हित मान ॥ १७ ॥ विद्वान पुरुषको चाहिये कि इन्द्रियों का संयम करकंदेश काल और दलको समझ कर समान सबकार्यको साथै ॥१७॥ प्रत्युत्थानञ्चयुद्धन्च संविभागञ्चबन्धुषु । स्वयमाकम्यमुक्तञ्च शिक्षेच्चत्वारिकुक्कुटाव। १८ दोहा-प्रथम ? जुधमें जुरै, वन्तु विभागहि देत । निज सशुत भोजन करे, कुक्कुट गुन बहुलैत । बचित समय में जागना रणमें उद्यत रहना और नन्दुओं को भाग देना और जाप आक्रमण करके भोजन करना इन चार वातों को कुक्कुट से सीखना चाहिये । १८ १. ':
. । चाणक्यनीतिः॥ गढमैथुनचारित्वं कालेकालेचसंग्रहम् । अप्रमत्मविश्वासं पंचशिक्षेच्चवायसात ॥१९॥ दोहा- अधिक धीठ अरु गूठरति, समय सुआलय संच । महिं विश्वास प्रमादं जेहि, है बायस गुन पंच ॥ १९ ॥ छिप कर भैथुन करना समय २ पर संग्रह करना सावधान रहना और किसी पर विश्वास न करना इन पांचों को कौवे से सीखना उचित है ॥ १९ ॥ यहाशोवल्पसन्तुष्टः सनिबोलघुचेतनः। स्मामिभक्तश्चरश्च षडेतेश्यानतोगुणः ॥ २०॥ दोहा: बहु सुक थोरेहतोष अति, सोवहि शोजगात ॥ स्वामिभक्त वडवीरता, घट गुग खान गहात ॥ २० ॥ बहुत खाने की शक्ति रहते भी थोडे ही से संतुष्ट होना. गाठी निदा रहते भी झटपट जागना स्वामी की भक्ति और शूरता इन छः गुणों को कुक्कुट से सीखना चाहिये ॥ २० ॥ सुकन्तोऽपिवहेद्रारं शीतोष्णेनचंपश्यति । संतुष्टश्चरतेनित्यं त्रीणिशिक्षेच्चगर्दभात् ॥२१॥ दोहा । सार वहत थाकतनहीं, शीत उष्ण समजाहि । हिये अधिक संतोष गुन. गरदमतीलगहाहि ॥ २१ ॥ अत्यन्त थक जाने परभी बोझा को ढोते जाना शीत ॥ चाणक्यनीतिः॥ और उष्ण पर दृष्टि न देना सदा सन्तुष्ट होकर विचरना इनतीन बातों को गदह से सीखना चाहिये ॥ ११ ॥ यएतार दिशातिगुणानांचरिष्यतिमानवः । कार्यावस्थामुलवायु अजेयः समविष्यति॥ २२॥ दोहा-विसतिसीखविचारि यह, जो नर टर धारत । सो सवनरजीततअक्स, जय नस जगत लहंत ॥ २२॥ जोनर इन बीस गुणों को धारण करेगा वह सदो सय कायों में विजयी होगा ॥ २१ ॥ इति वृद्धचाणक्ये पष्ठोऽध्यायः ॥६॥ अर्थनाशं मनस्तापं गृहिणी चरितानिच । नीचवाच्यं चायमानं मतिमान्नप्रकाशयेत् ॥ ॥ दोहा-अरथ नाश मन ताप अरु. दुर चरित्र घरमाहि । पंचनता अपमान निन. सुघर प्रकाशत नाहि ॥१॥ धनका नाश मनका ताप गृहणी का चरित्र नीच का वचन और अपमान इनको बुद्धिमान न प्रकाश करै ॥१॥ धनधान्यप्रयोगेषु विधासंग्रहणेषुच । आहारव्यवहारेच त्यालज्जासुखीभवेत् ॥२॥ --- चाणक्यनीतिः॥ दी.-संवत धन अरू धानकू विद्या सीखत पार । करत अहार व्यबहारडू लाज न करिय लगार ॥ २ ॥ अन्न और धन के व्यापार में विद्या के संग्रह करने में आहार और व्यवहार में जो पुरूष लज्मा को दूर रखना वह सुखी होगा ॥२॥ संतोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तिरेषच । नवतंदनलुब्धानामितश्वतश्चधावताम् ॥ ३ ॥ दोहा- तृपद सुथा संतोष पित, शांत. लहत सुख सोय। इतं.उत दौरत, लोभ धन, कह सो सुख तेहि होय ॥३॥ सन्तोष रूप अमृत से जो लोग तृप्त होते हैं उनको जो शान्तिसुखं, होता है वह धन के लोभियों को जो इधर उपर, दौड़ा करते हैं उन्हें नहा होता ॥ ३ ॥ संसोपत्रिपुर्तव्यः स्वदारेभोजनेषरें। विषुवैवनकर्त्तव्योऽध्ययनेजपदानयोः ॥ ४॥ दोहा-तीन ठोर संतोष पर, नियंभोजन धन माहि । दाननमें अध्ययन में, सबमें कीजिये नां ।। ४ ॥ सनी श्री भोगन और यर इन तीनों में सन्तोष करना चाहिये पढ़ना जा और दान इन तीन में सन्तोष कभी न करना चाहिये ॥४॥ - -.-----..
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। चाणक्यनीति ॥
विषयोर्विप्रवहन्योश्च दम्पत्योःस्वामिमृत्ययो ।
अन्तरेणनगंतव्य इलस्य बृपभस्य च ॥६॥
दो बामण मि और अग्नि, स्त्री पुरुष, स्वामी और भृत्य ह;
है और वेल इनके मध्य होकर नहीं जाना चाहिये ॥ ५॥
पादाण्यां न स्पृशेदाग्नि गुरु बामणमेवच ।
नैवगां झुमारी च न वृद्धन्नशिशुन्तला. ॥६॥
दो-अनल विप्र अरुधेनु पुनि, कन्या कुमारी देति ।
वासक अरुबुलिवन्तकै, पग न लगाबहुपेति ॥ ६ ॥
'अग्नि गुरु और लक्षण उनको पैर से कभी नहीं छूना चा
हिये वैसे ही न गौ को न अमारी को न वृद्ध को न वालकको
पर से छूना चाहिये ।
सकट पंचहस्तेन दशहस्तेमवाजिनम् ।
हस्तीहत्तसहस्रण देशत्याग्नदुर्जनः ॥ ७ ॥
दोहा हस्ती हाय हजार तज. सब हायनत यानि ।।
गसहिततेहिहाथदस, दुष्टंदेशतजिमाजि ॥ ७ ॥
गाड़ी को पांच हायपर पांडे को दश हाथ पर हाथी को
इशार हायर दुर्गन को देवा त्याग करके छोडना चाहिये ७
इस्ती अकुशमात्रेण बांजी हस्तेनताडयतें।
शृगी लगुडहालेन खबरलेनदजनः ॥ ८॥
१२
चाणक्यनीयिः॥
दो० हस्ती अंकुसतै हनिय, ताजन परि तुरंग ।
सुंगधरनकू लकुट, असितै दुर्जन भंग ॥ ८ ॥
हाथी केवल अंकुश से घोड़ा हाय [चायुक] से माराजातो
है सींगवाले जन्तु लाठीयुत हाथ से और दुर्जन तलवार सेयुक्त
हाथ से दण्ड पाते हैं॥८॥
तुष्यन्तिभोजनेविनाः मयुराधनजिते ।
साधवः परसम्पत्तो खला परविपत्तिषु ॥ ९ ॥
भोजन के समय ब्राह्मण और मेषके गर्नने पर मयूर दूसरे
को सम्पत्ति प्राप्त होने पर साधु और दूसर को विपत्ति आने
पर दुजन सन्तुष्ट होते हैं ॥ ९ ॥
अनुलोमेन बलिन प्रतिलोमेन दुर्जनम् ।
आत्मतुल्यबलं शत्रु विनयेन बलेवा ॥१०॥
दोहा-बलवंतरहि अनकूलहि, प्रतिकूलहिबलहीन ।
गतिबलसमबलशचको. विनयवलहि वशकीन ॥१०॥
वली चैरी को उसके अनुकूल व्यवहार करने से यदि वह दु:
जन हो तो उसे प्रतिकूलता से वश करे बल में अपने समान
शत्रु को विनय से अथवा बल से जीते ॥ ११ ॥
बाहुवीर्यबल रामो प्राङ्गणोब्रह्माविबली ।
रूपयोवनमाधुर्य-श्रीणां वलमनुत्तमम् ॥ ११॥
॥शणस्यनीतिः॥ ४३ राजा को वाहुवीर्य वल है और ब्राह्मण ब्रह्मज्ञानी और वेदपाठीवली होता है और शियों को सुन्दरता तरुणता और मधुरता आदि उत्तम पल है ॥ ११ ॥ नात्यन्तं सरले व्यं गत्वा पवननस्थलीम् । छियन्ते सरलास्तत्र सुजास्तिष्ठन्तिपादपाः १२ दो०-अतिही सरल न होइये, देसह जन धनमाहि। कर सीधे छेदत तिनहि. वांले तर वचनांहि ॥ १२ ॥ अत्यन्त सीधे स्वभाव से नहीं रहना चाहिये इस कारण कि वन में जाकर देखो सीधे वृक्ष काटे जाते हैं और टेदेखडे रहते हैं ॥ ११॥ यमोदकं तत्र वसन्ति हंशा। स्तथैवशुष्क परिवर्जयन्ति। नईचतुल्येन नरेण भाच्यं पुनस्त्यजन्तः पुनराश्रयन्ते ।। १४॥ दोहा-संजलसरोपरहंसवसि. सूकतटडि हैं सोउ. ॥ देखि सजल आषत पहारे, हंस समान न होउ ॥१३॥ जहां जल रहता है तहां हो हंस वसते हैं वैस ही सूखे सरको छोड देते हैं नर को हंस के समान नहीं रहना चाहिये कि बार बार छोड़ देते हैं और बारबार आश्रय लेते है ॥
१४ ॥ चाणक्यनीतिः।। उपार्जितानां वित्तानां त्यागएपहिरक्षणम् ! तडामोदरसंस्थानां परित्रवइवांभसाम् ॥ १४॥ दोहा-धन संग्रह को पेपिये प्रगट दान प्रतिपाल। नों मोरी जल जानळू तव नहिं पटत नाल ॥ १४ ॥ अर्जित धनों का व्यय करना हो रहा है जैसे तडाग के भीतर के जलका निकलना यस्वार्थस्तस्यमिधाण यस्यार्थलायवांधवाः। रस्यार्थः सयुमाल्लोले यस्यार्थः सब जीवति १३ दो-जिनके धनतेहिमितबह गेहियनवंयुअनंत ! एनसोइनगमें पुरुषवर. धनसाइजगजीवंत ॥ १५ ॥ जिसमें धन रहता है उसी के मित्र होते हैं जिरा पास अ- ये रहता है उसी के वन्मुलाते है जिस के धन रहता है रही शुरुष पिना जाता है जिसके अर्थ है वही जीता है ॥ १६ ॥ स्वगस्थितानामिहजीवलोक- चत्वारि चितानि वसन्ति देहे। दानप्रसंगी मधुरा च पाणी देवाचन ब्राह्मणतर्पणं च ॥ १६ ॥ संसार में आने पर स्वर्ग स्थानियों के शरीर में चार , चित्र रहते हैं दान का स्वभाव मोठा दयन देवता की पूजा साणं --
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चाणक्यनीतिः॥
को तृप्त करना अर्थात् जिन लोगों में दान आदि लक्षण हैं
उनको जानना चाहिये कि वे अपने पुण्य के प्रभाव से स्वर्गवासी
मृत्युलोक में अवतार लिये हैं ॥ १६ ॥ .
अत्यन्तकोपः कटुका च वाणी
दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम् ।
नीचप्रसंगः कुलहीनसेवा
चितानि देहे नरकस्थितानाम् ॥१७॥
अत्यन्त कोष, कटुवचन, दरिद्रता, अपने जनों में वैर,
नीच का संग, कुलहीन की सेना, ये चिह गरकवासियों के
देशों में रहते हैं ॥ १७ ॥
गम्यते यदि मृगेन्द्रमन्दिरं
लभ्यते करिकपोलमौक्तिकम्
जम्बुकालयगते च प्राप्यते
वृत्तपुच्छखरचर्मखण्डनम् ॥१८॥
यदि कोई लिह की गुहा में जा पड़े तो उसको हाथी के
पाल को मोती मिलता है और सियार के स्थान में जानेपर
पछवे की पूंछ और गदहे के चमड़े का टुकड़ा मिलताहै ॥१८॥
शुनःपुच्छामिवव्यर्थ जीवितुं विद्यया विना ।
नः मुझगोपनेसक्तन च देशनिवारणे ॥ १९॥
ALRAM । चाणक्यनीतिः॥ कुत्ते की पूंछ के समान विद्या विना जीना व्यर्थ है कुते की पूंछ गोप्य इन्द्रिय को ढांप नहीं सकी है न मच्छर आदि जीवों को उड़ा सकी है ॥ १९ ॥ वाचशिौच च मनसः शौचमिन्द्रियनिग्रहः । सर्वभूतदयाशौचमेतच्छौचं परार्थिनाम् ॥ २० ॥ वचन की शुद्धि, मन की शुद्धि, इन्द्रियों का संपम मोधों पर दणा और पवित्रता ये परार्थियों की शुद्धि है || पुष्पेगन्यतिलेलं काष्ठेवहिपयोघृतम् । इशोडतथादेहें पश्यात्मानं विवेकतः ॥ २१॥ जैसे पूल में गन्ध, तिल में तैल, काष्ठ में आग, दूध में थी, उखेमें गुड़ वैसेही देह, आत्माको विचार से देखो ॥ २१॥ इति वृद्धचाणक्येसप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ अधमाधम मिच्छन्ति धनंमानंचमध्यमाः। उत्तमामान मिच्छन्ति मानोहिमहतां धनम् ॥१॥ अधम धन ही चाहते हैं मध्यम धन और मान उत्तम मानही चाहते हैं क्योंकि महात्माओं का धन मानही है ।
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॥ वाणक्यनीतिः॥ 9
इक्षुरापः पयोमूल तान्नूलालमौषधम् ।
भवपित्वापिकर्तव्यःस्नानदानादिका क्रिया २॥
ईस, जल, दूध, मूल, पान, फल और.औषधि इन वस्तु
ओं के भोजन करने पर भी लान दान आदि क्रिया करनी
चाहिये ॥२॥
दीपोमक्षयतेध्वान्तं कज्जलंच प्रसूयते ।
पदन्तं सत्यतनित्यं जायते तादृशीघ्रजा ॥३॥
दीप अन्धकार को खा जाता है और काजल को जमाता
है। सत्य है जैसा अन्न सदा खाता है उसको वैसीही सन्तति
होती है ॥ ३॥ .
वित्तं देहिगुणान्वितेषु मतिमन्नान्यत्रदेहिक्वचित् ।
प्राप्त पारिनिर्जलंघनमुखमाधुर्ययुक्त सदा ।।
जीरस्थावरंजगलांश्चसकलांसजीव्यभूमण्डलं ।
भूयः पश्यतदेवकोटिगुणिलंगच्छंतमम्भौनिधिम् ।।
हे मतिनन् ! गुणियों को धन दो, औरों को कभी मत
दो । सद्धरा सेब के सुख में मात्र होकर जल सदा मधुर
हो जाता है और पृथ्वी पर चर अचर. सब जीवों को
मिला पिर ही जल.कोदि गुणा होकर उसी समुद्र
चला जाता है ॥ ४॥
..४८ -- । चाणक्यनीतिः। चाण्डालानांसहश्च मुरिभिस्तत्वदर्शिभिः । एकोहियवनः प्रोक्तो न नीचोयवनात्परः ॥५॥ तत्त्वदर्शियों ने कहा कि सहस चाण्डालों के तुल्प एक यपन होता है और-यवन से नीच दूसरा क्षेई नहीं है । ५ तैलाभ्यंगचिताधूमे मैथुनेलौरकर्मणि । तावद्भवतिचाण्डालो यावत्स्नानं समाचरेत् ।।६।। तेल लगाने पर, चिता के धूम लगने पर, स्त्री प्रसंग करने पर, वाल बनाने पर मनुष्य तब तक चाण्डालही बना रहता है जब तक लान नहीं करता ॥६... अजीण भैषजवारिजीणेवारिखलप्रदम् । भोजनेचामृतंवारि भोजनान्तेविषप्रदम् ॥७॥ अपच होनेपर जल औषधि के समान है, पचनाने पर वह पलको देता है। भोजन के समय पानी अमृत के समान है किन्तु भोजन के अन्त में विषका फल देता है ॥ ७ ॥ .. हतंज्ञान क्रियाहीनं इतश्चाज्ञानतोनरः । हतन्निायर्क सैन्यं त्रियोनष्टाममर्तृकाः ॥८॥ क्रिया के विना ज्ञान व्यर्थ है, भज्ञान से नर मारा जाता सेनापति के विना सेना मारी जाती है, स्वामिहीन स्त्री नष्टः जाती है।। ८॥
NRELES: ---------- . ॥ चाणक्यनीतिः॥ पृष्कालेन्ताभार्या बन्धुहस्तगतंधनम् । भोजनेअपराधीनं तिस्रः पुंसां विडम्बना ॥९॥ बुद्धापे में मरी स्त्री, बन्धु के हाथ में गया धन, दूसरे के जाधीन भोजन ये तीन पुरुषों की बिडम्बना हैं अर्थात् दुरस दायक होते हैं ।। ९॥ हो विनावेदा नचदानं विनाक्रियाः । न भावेन पिला सिद्धि स्तस्मादावोहि कारणम् । भिदोष के बिना वेद का पढ़ना व्यर्थ होता है, दान के विना यज्ञादि क्रिया नहीं बनती, भाव के बिना कोई सिद्धि नहीं होती इस हेतु प्रेमही सबका कारण है ॥ १० ॥ नदेनोविधतकाष्ठे न पापाणे न मृन्मये । भावोदिविधतेदेवस्तरभादाबोहिकारणम् ॥११॥ दो वनाउ पर मृत, सूरतिमें न रहाय । भाष तहांही देवमल, कारन व कहाय ॥ ११ ॥ देपता काठ में नहीं हैं न पाषाण में हैं न मृत्तिका की मूर्ति में है । निश्चय है कि देवता भाव में विद्यमान है, इस हेतु भा वही सका कारण है ।। ११॥ शान्तिनुल्यंतपोनास्ति न सन्तोपात्परंसुखम् । न तृष्णायापरोन्याधिनचाँदयापरः ॥ १२॥ P ---
चायनी॥
दो०- नहिंसतोष-समान सुस, तपन क्षमासमान ।
तृष्णा सन नहिं व्याधि तन, धरम न दया,समान ॥१२॥
शान्ति के समान दूसरा तप नहीं है, न सन्तोष से परे
सुख, न तृष्णा से दूसरी व्याधि है न दया से अधिकधर्म॥१२
कोपावैवस्वतोराजा तृष्णावतरणीनदी।
विद्याकामदाधेनुः सन्तोपो नन्दनंबनम् ॥ १३॥
दो । तृष्णा वैतरणी नदी. धरम राम समरोप।.
काम धेनु विद्या कहिय, ननदन वन सतोप ॥ १३ ॥
कोष यमराज है और तृष्णा वैतरणी नदी है विधा का.
मधेनु गाय है और सन्तोष इन्द्र की वाटिका है ॥ १३ ॥
गुणोभूपयतरूपं शीलंभूषयतकुलम् ।
सिद्धिभूपयतेविद्या भोगोभूपयतेधनम् ॥ १४ ॥
दो !गुन अपन है आपको, कुलको शील कहाय ।
विद्या भूषण सिद्धि वन, धन तेहि खरच बताया १४॥
गुणरूपको सूषित करता है शील कुलको अलंकृतकरता
है, सिद्धि विधाको भूपित करती है और भोग धनको भूषित
करता है ॥ १४॥
निर्गुणस्यहतंरूपं तुःशीलस्यहराकुलम् ।
असिद्धत्यस्ता विद्या अभोगेनहतं धनम् ॥ १५॥
..
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। चाणक्यनीतिः॥
निर्गुणकी सुन्दरता व्यर्थ है शीलहीन का फुल निन्दित
होता है, सिद्धिक विना विद्या व्यर्थ है, भोग के विना धन व्य-
थ है,॥ १५॥
शुद्धम्भूमिगतंतोयं शुद्धानारीपतिनता।
शुचिःक्षेमकरोराजा सन्तोषीब्राह्मणःशुचिः॥१६॥
भूमिगत जल पवित्र होता है, पतिव्रता स्त्री पवित्र होती
है, कल्याण करने वाला राजा पवित्र गिना जाता है, सन्तोषी
ब्राह्मण शुद्ध होता है ॥ १६ ॥
असंतुष्पाद्विजानष्टाः संतुष्टाश्चमहीभृतः।
सलज्जागणिकानया निर्लज्जाश्चकुलांगनाः॥३७॥
दो-असंतोष तें विमहंत नृप संतोष ते स्वारि ।
गणिका विनसतलाजते,लाज बिना कुल नारि ॥ १७ ॥
असंतोपी ब्राह्मण निन्दित गिने जाते हैं और संतोषी
राजा, सलज्मा वेश्या और लज्जाहीन कुल ली लिन्दित गिनी
जाती हैं ॥ १७ ॥
किंकुलेनविशालेन विद्याहीनेनदेहिनाम् ।
दुष्कुलंचापिविदुषो देवैरपिसुपूज्यते ॥१८॥
दो-कहा होत वड संग जोनर विद्या हीन ।
परवट सूरत पूजिये. विद्या ते अकुलीन ॥ १८ ॥
६२
चाणक्यनीतिः॥
विद्याहीन बड़े कुल से मनुष्यों को क्या कामहै विज्ञान
का नीचभी कुल देवता से पूजा पाता है॥ १८ ॥
विद्वानप्रशस्यतेलोके विद्वान्सर्वनगौरवम् ।
विद्ययासमतेसर्व विद्यासर्वत्रज्यते ॥ १९ ॥
संसार में विज्ञान ही प्रशंसित होता है, विद्वान ही सब
स्थान में आदर पाता है. विद्या हो से सय मिलता है विवाही
सब स्थान में प्रनित होती है ।। १९ ॥ .
रुपयोक्नसम्पन्ना विशालकुलसम्मदाः।
विद्याहीना न शोभन्तै निर्गन्धाइबकिंशुकाः।२०
दो संयुतजोरन रूपते, महिपत बडे लोग।
विधा. विन सास न जिम, पुहुए गंध हीन ॥ २० ॥
सुन्दर तरुणतायुरा और बडे कुल में उत्पन्न श्री विद्याहीन
नहीं शोभते जैसे बिना संध के टाकक पूरा ॥ २० ॥
सांसभक्ष्न्या सुरापाना मुखाश्चाक्षार्जितः ।
पशुभिः पुरुषाकारभारानंतास्तिमेदिनी ॥२१॥
मांस के लक्षण करने वाले. मदिरा पान करने वालें.
निरक्षर मूल. पुरुषाकार पशुओं के भार से पृथ्वी पीडित
रहती है. ।। ६.१ ॥
अन्नहीनोदहनामन्त्रहीनश्यात्विजः।
युजमानंदानहानोनास्तियज्ञसमोरिपुः ॥ २२ ॥
। चाणक्यनीतिः॥ यज्ञ यदि अन्नहीन हो तो, राज्य को मंत्र हीन हो तो दिनों को दानहीन हो तो यजमान को जलाता है इस कारण यज्ञ के समान कोई शत्रु भी नहीं है ॥ २२ ॥ इति वृद्धचाणक्य चमोऽध्याय ॥ ८॥ मुतिमिच्छसिचेतात विषयान् विषवत्याज क्षमार्जनदयाशाचं सत्यंपीयूषवरिपव ॥ १ हे भाई ! यदि मुक्ति चाहते हो तो विषयों को विपके समान छोड़ दो सहनशीलता, सरलता दया, पवित्रता और सचाई को अमृत के समान पोओ ॥ १॥ परस्परस्यमाणि चेमापन्तेनराधमाः। तएबीवलययान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ॥ २ ॥ जो नराधम परस्पर अन्तर्रात्मा के दुःखदायक वचन को भाषण करते हैं निश्चय हैं कि वे नष्ट हो जाते हैं जैसे गांवो में पड़कर सोप। २॥ गन्धः सुवर्णेशलमिक्षुदंडे नाकाएपखलचन्दनत्य।
-"--- ५४ ॥ चांगक्यनीतिः॥ विद्वान्धनीनृपतिर्दधिजीवी। धातुः पुराकांपनाद्धिदोऽभूत ॥३॥ सुवर्ण में गन्य, उस में फल, चंदन में फूल, विद्वान धनी, राजी चिरंजीवी न किया इससे निश्चयाँकि विधाताको पहिले कोई बुद्धिदाता न था ॥३॥ सौषधीनामभृताः प्रधानाः सर्वेनुसौख्येष्वशनप्रधानम् । सर्वेन्द्रियाणांनयनंप्रधान सर्वेषु गात्रेषु शिरः प्रधानम् ॥ ४ ॥ सब औषधियों में गिलोय प्रधान है. सब सुख में भोजन भेट सब इनदियों में आंख उत्तम है, सब अंगों में शिर ठहै ॥४॥ दूतोनसंचरतिखेनचलेच्चवार्ता । पूर्वनजल्पितमिदनचसंगमोस्ति ।। ब्योम्निास्थितरविशशिग्रहणप्रशस्तं - जानातियोद्विजवर सकथनविद्वान्॥६॥ आकाश में दूत न जा सका नवाता की चर्चा चलसकती पहिलेही से किसी ने कह रक्खा है. न किसी से संगम होस. न MANDA A ------ ॥ वापदयनीतिः॥ का ऐसी दशामें आकाश में स्थित सूर्य के प्रहणको जो वि- जवर स्पष्ट जानता है वह कैसे विद्वान नहीं है ॥ ५ ॥ विद्यार्थीलेवकः पाथः क्षुधाता भयकातरः ।। मांडारीप्रतिहारीच सासुप्ताप्रबोधयेत् ॥ ६॥ विद्यार्थी, संवफ, पथिक, खरो पीड़ित, पयो कातर. में- तारी. द्वारपाल ये सात यदि सौतही तो जगादेना चाहिये।। ६ अहिपंचशादूल टिचबालक्तथा। परश्चानंचमूरखंच सप्तप्तबोधयेत् ॥ ७॥ सांप, राजा, माघ, वर, वालक, दूसरे का कुत्ता. और मूर्ख ये सात सांते हो तो नहीं जगाना चाहिये ॥ ७ ॥ अर्थाधीताश्चवेर्वेदास्तथाशमानमोजिनः ॥ तद्विजाः किंकरिष्यति निविपाश्वपन्नमाः ॥८ जिन्होंने धनके अर्थ वेदको पढ़ा रही जो शूद्रका अन्न भोजन करते हैं वे ब्राह्मण विषहीन सपके समार स्या कर सजे हैं ॥ ८॥ यस्मिन्रुष्टेभयनास्ति तुष्टेनैवधनागमः ॥ निग्रहानुग्रहोनास्ति सरुष्टः किंकरिष्यति ॥९॥ जिसके कोषित होनेपर नभय है, न प्रसन्न होने पर धनका ॥ चाणक्यनीतिः लाभ है. न दण्ड वा अनुग्रह होसकता है वह रुष्ट होकर क्या करेगा॥ ९॥ निविषणापिसपेणकर्तव्यामहतीपणा ॥ विषमस्तुनचाप्यन्तु वायोपोभकः ॥ १० ॥ विपहीन भी सांपको अपनी पण पाला चाहिये क्योकि विष हो या न हो आडम्बर भएजनक होता है ।। प्रातर्भूतप्रसंगेन मध्याहन्दीपलंगतः।। रात्रौचौरप्रसंगेन कालोगच्छतिधीमता ।। प्रातः काल में जुआरियोंकी कथासे अर्थात् महाभारत से, मध्यान्हमें लीप्रसंगले. अर्थात् रामपर्णक, सबिलें औरणी वातासे मर्याद भागवत ही पातासे हदिमाने पर समय पीतता है | तात्पर्य यह कि महाभारत के सुन ने से यह निश्चय होगाता है विरुवा कलह और उनका घर है। इसलो और परलोक में उपकार करनेवाले मनोने महाभारत में लिसी हुई रीतियों से कानपर उन कानोका पूरा फल होता है इस कारण दिमान लोग प्रातः कालही में महा- भारत को सुनते हैं जिसमें दिनभर उसी रातिसं काम करत जां- य! रामायण सुनने से स्पष्ट उदाहरण मिलता है कि श्री के पश होनसे अत्यन्त दुःख होताहै और परस्त्रीपर दिने से पुत्र सलाद जलने साथ हरुष का नास होनाता है इस -- चाणक्यनीतिः॥ ५७ "हा मम्मान में अच्छे लोग रामायणको सनते हैं और प्रायः रात्रि में लोग इन्द्रियों के वश होगाते है और इन्द्रियोंका यह स्वभाव है कि मनको अपने २ विषयों में लगाकर जीवको वि- पों में लगादेती हैं इसी हेतुसे इन्द्रियों को आत्मामहाशमीकहते है। जो लोग रातको आगवत सुनते हैं ये कृष्ण के चरित्र को सहरण करके इन्धियों के वश नहीं होत क्योंकि सोलह हज़ार से अधिक नियोक रहते भी बोहवणचन्द्रइन्द्रियों के वश न हुए और इन्द्रियों के संगमकी रीति भी जान जाते हैं ॥११॥ स्वहस्तगभितामाला वहस्तपुष्टचन्दनम् । स्वहस्तलिखितस्तोशकस्यापिनियहरेत ॥१२॥ अपने हाथ से गुथी माला, अपने हाथ से पिता चन्दन, अपने हाथ से लिखा खोब ये इन्दकी भी लक्ष्मी को हरलेते २॥ इक्षुदण्डाखिलाः शूमाः कान्ताहेमचमेदिनी । चन्दनन्दधिताम्बूलं सदनाजपाईनम् ॥ १२ ॥ शिल, शून, कांता, थ्वी, चंदन, दही. पान. ये से पदाय है कि इनका मर्दन गुणवर्णन है ॥ १३ ॥ दरिद्रताधीररायाविराजते वस्त्रनाशुनतयाविराजते। ॐ REA
। चाणक्यनीतिः॥
कदन्नताचोष्णतयाविराजते
कुरूपताशीलतयाविराजते ॥ १४ ॥
दरिद्रता भी धीरता से शोभती है, लच्छता से कुपस्त्र
सुंदर जान पड़ता है, कुअन्न भी उष्णता से मांग लगता है
कुरूपता भी सुशीलता हो तो शोभती है ॥ १४ ॥
इति वृद्धचाणक्येनवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
अथ वृद्धचाणक्यस्योत्तराईम् ॥
धनहीनोनहीलश्च धनीकः समुनिश्चयः ।
विद्यारलेनदीनोयः सहीनः सर्ववस्तुषु ।।६।।
दो० दीननहीं धनहीन जन, धन थिर नाहि प्रवीन ।
हीन न और वखानिये, दिशाहीनसुहीनः ॥ १
धनहीन हीन नहीं गिनाजाता, निश्चय है कि वह धन
हीन है। विश रल से जो होनहै वह सब वस्तुओं में हीन है ॥१॥
घटिपूतन्यसेत्पादं वस्त्रपूतंपिवेजलम् ।
शास्त्रपूतंबदेवाक्यं मनः पुतंसमाचरेत् ॥२॥
दृष्टि से शोधकर पांव रखना उचित है, पखसे शुद्ध कर
जल पावे, शास्त्र से शुद्ध कर वास्य वोले, मन से सोचकर
कार्य करना चाहिये ॥ २ ॥
सुखाचित्यजेविया विद्यार्थीचेत्यजेत्सुखम् ।
मुखार्थिन-कुवाविद्याः सुखंविद्यार्थिन कुतः ॥३॥
॥ चाणक्यनीति॥ ५९ यदि सुख चाहै तो विद्याको छोडदे. यदि विद्या चाहै तो सुखको त्याग करे, सुखार्थी को विद्या कैसे होगी और विद्या- र्थी को सुख कैसे होगा ॥३॥ कवयः किन्नपश्यन्ति किन्नकुर्वन्तियोषितः । मद्यपाकिन्लजल्पन्ति किन्लखादन्ति वायसा:४ कवि क्या नहीं देखते. स्त्री-क्या नहीं कर सती पद्यपी क्या नहीं बकते, कौवे क्या नहीं खाते ॥ ४ ॥ रहंकरोतिराजानं राजानं रकमेवचः । धनिन निईनं चव निर्द्धनं धनिनं विधिः ॥4॥ निश्चय है कि विधि रंक को राजा, राजको रंक. पनाको निईन और निर्द्धन को धनी कर देता है ॥ ५॥ लुन्धानां याचक शखाणां बोधकोरिमुः। जारस्त्रीणांपतिः शत्रुधौराणां चन्द्रमारिपुः ॥६॥ लोभियों को याचक वैरी होता है. मूखों को समझाने पाला शत्रु हाता है, पुंश्चलां स्त्रियोंको पति शत्रु है, चोरों का चन्द्रमा शड है ॥६॥ येपांन विद्या न तपो न दान न चापि शीलं न गुणा न धा .
H
। चाणचनातः॥
ते कृत्युलोके सुविचारमृता
मनुध्यारपेण मृगान्ति ॥ ७॥
जिम लोगों को न विधा है, न तप है, न दान है, नीर
नशुण है और न धर्म है वे संसार में पृथ्वी पर भाररूप
होकर मनुष्यरूप से मुम फिर रहे हैं ।। ७.॥
अन्तः सारविहीवानापदेशोन जायते।
मलबालसंलमान मुश्चन्दनायते ॥८॥
मारता दिन पुरुषों को शिक्षा देना सार्थक नहीं
होता। मलगायरा के संग से बांस बदन नहीं होजाता ॥८॥
पाल नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रतस्थ करोति किम् ।।
सोचना या विहीनत्य दषमा किरिष्यति ॥९॥
मिसकोस्वाभाविक दिनहीं है उसको शास्त्र क्या करसका
आँसों से हीन को दर्पण क्या करना ।। ९ ॥
दुर्जनं सज्जन अर्चनुपायो नहि भूतले। ..
अपान रातचापोतं न श्रेष्ठमिन्द्रियं भवेत् ॥१०॥
दुर्जन को सज्जन करने के लिये पृथ्वीतल में कोई उपाय
नहीं है । मल के त्याग करनेवाली इन्द्रिय सौ. पार भी धोई
माय तो भी श्रेष्ठ न होगी ॥ १०॥.
आप्तद्वेषाद्भयेन्मृत्युः परदेपाइनशयः।
राजद्वेषाद्भवेन्नांशो ब्रह्मद्वेषात्कलक्षयः ॥ ११॥
। चाणक्यनीतिः॥ बडों के द्वेष से मृत्यु होती है, शत्रु से विरोध करने से धनका क्षय होता है, राजा के हेए से नाश होता है भार या. जाणक क्षेप से फुल का क्षय होता है ।॥ ११ ॥ वरं बने व्याघमजन्द्रसविते। हमालयेषत्रफलाम्बुलेवनम् ॥ तृणेषु शय्याशतनाणवल्कलं। न दन्बुमध्ये धनहींगजीवनम् ॥१२॥ धनमें पाप और बड़े ने हाथियों से सक्ति वृक्ष के नीचे पता फल खाना वा अलग पीना घास पर सोना सो दुरडे. बल्कलों को पहिनना ये श्रेष्ठ हैं पर वन्धुओं के मध्य धन धीन जीना श्रेष्ठ नहीं है ! १२ ॥ विमोवृशस्तस्यमूलं च सन्ध्या। वेदः शाखाधर्मकर्माणिपत्रम् ॥ तरूपान्मूल यवतो रक्षणीयं। छिन्नेमूले नैव शाखा न पत्रम् ॥१३॥ समण वृक्ष है उसकी जड सन्ध्याहै पेद शाखाहै आरकर्म 'कर्ष : दचे हैं इस कारण भयल कर के जंड की रक्षा करनी चाहिये जड़ कटजाने पर शाला रहेगी न पत्ते ॥ १३... 'माता च कमला देवी पितादेवो जनार्दनः । बान्धवाविष्णुभक्तास स्वदेशो भुवनयत्रम् ।।१।।
દર । चाणक्यनीतिम जिसकी लक्ष्मी माता है और विष्णु भगवान पिता है. और विष्णु के भक्त ही वान्धव हैं उसका तीनोलोक स्वदेशहीह१४ एकवृक्षसमारदा नानावर्णविहंगमाः। प्रभातेदिक्षुदशम कातत्रपरिवेदना ॥ १४ ॥ नाना प्रकार के पखेरू एक वृक्ष पर बैठतेहैं प्रभात समयदश दिशा में उडनाते हैं उस में क्या शांच है ॥ १५ ॥ बुदिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धश्च कुतो बलम् । बनेसिंहोमदोन्मत्तःशशकननिपातितः ॥ १६ ॥ जिसकी बुद्धि है उसीको बलहै लिवद्धिको बल कहांसे होगा देखो वन में मद से उन्मत्त सिंह सस्सेसे मारा गया ॥ १६ ॥ का चिन्ताममजीवने यदिहरिविश्वम्भरोगीयते । नोचदर्भकजीवनाय जननीस्तन्यं कथं निःसरत् ।। इत्यालोच्यमुहुर्मुहुर्यदुपते लक्ष्मीपते केवल । त्वत्पादाम्बुजसेवनेनसततं कालोमयानीयते॥१७॥ मेरे जीवन में क्या चिंता है यदि हरि विश्वका पालने वाला, कहलाता है ऐसा न होतो बच्चे के जीने के हेतु माताकेस्तनमें दूकसे बनाते इसको वार २ विचार करके हे यदुपती हेलक्ष्मी पति ! सदा केवल आपके चरण कमलकी सेवासे में समय को विताताई ॥ १७ ॥ .
॥ यापश्यनीतिः । गीर्वाणवाणीषु विशिष्टबुद्धिस्तथापिभापान्तरलोल पोहमायथासुधायाममेरघुसत्यांस्वागनानामधरास वरुचिः ॥१८॥ यद्यपि संस्कृत भाषाहीसे विशेष ज्ञान है तथापि दूसरीभाषा का भी मैं लोभी हूं जैसे अमृतके रहते भी देवंतों की इच्छा स्वर्ग की स्त्रियों के ओष्ट के आसव में रहती है ।। १८॥ अन्नादशगुणं पिष्टम्पिटादशगुणंपयः । पयसोष्टगुणमांस मांसादशगुणंघृतम् ॥ १९ ॥ चबिल से दसगुणा पिसान में गुणहै, पिसान से दसगुणादूध में, दूधसे अठगुणा मांसने, मांससे दशगुणा घीमें ॥ १९ ॥ शाकेजरोगाबद्धन्ते पयसावद्धतेतनुः । वृतन वईते वीर्य मांसान्यांसंप्रवर्द्धते ॥ २० ॥ सागसे रोग बढ़ता है दूधसे शरीर बढता है धृतसे वीर्य वढ ता है और मांस सेमांस बढ़ता है ॥ २० ॥ इति वद्धचाणक्येदशमोऽध्यायः ॥१०॥ HomenaTORAGERam -- ॥ चाणक्यनीतिः ॥ अथ एकादशोऽध्यायः दातृत्वं प्रियवस्तृत्वन्धीरत्वमुचितता। अभ्यासेलनलभ्यन्ते चत्वारः. सहजागुणाः ॥9॥ उदारता मिय बोलना धीरता रचित का ज्ञान ये अभ्याससे नहीं मिलते ये चारों स्वाभाविक गुण हैं ॥ १ ॥ आत्मवगपरित्यज्य परवर्गलमाशयेत् । स्वयोवलयंगाति यथाराजन्यमतः ।। जो अपनी मंडलीको छोड़ कर पर वर्ग आभय लेता है. यह आपही लय को प्राप्त होजाता है जैसे राजअधर्म से १२ हस्तीत्थूलतनुःसचांकुशवशः सिंहस्तिमारोऽअशो दीपप्रज्वलितप्रणश्यतितमः किं दीपमानन्तमः बजणापिहताः पतन्तिागिरयः किं वजनाबनायाः तेजोयस्य विराजतेसहलवानस्थले पुकाव ॥३॥ हाथी का स्थूल शरीर है वहभी अकुशक के वश रहता है तो स्या हत्ती के समान अंकुश है ? दीक के जलने पर अंधकार आपही नष्ट हो जाता है तो क्या दीपक के तुल्य तनहै! विजली के मारे पर्वत मिरजाते हैं तो क्या दिनली पर्वत के समान जिसमें तेज विराजमान रहता है वह बलवान मिना जाता मोटे का कोना विश्वास है ॥३॥ water - HER ॥ चाणक्यनीतिः। कलौदशसहस्राणि हरित्यजतिमेदिनीम् ।' : तदईजाहवीतोयं तद ग्रामदेवताः॥४॥ कलियुग में दशसहस्रवर्ष के बीतनेपर विष्णु पृथ्वी कोड देते हैं उसके आधे पर मंगाजी जलको, तिसके आवेके बीतने पर माम देवता नामको ॥४॥ सूहासमास्यनोविद्या नोदयामांस भोजिनः। व्यलुब्धस्यनोसत्यं नेणस्यनपवित्रता ॥५॥ गृहमें आसक्त पुरुषों को विद्या नहीं होती,मांसकेमाहारी फोदया नहीं होती, द्रव्यलोभी को सत्यता नहीं होती और व्यभिचारीको पवित्रता नहीं होती॥ ५ ॥ नदुजन साधुदशामुपैति बहुप्रकारैरापिशिष्यमाणः। आमूलसिक्त पयसाधृतेन ननिम्बवृक्षोमधुरत्वमेतिध निधयहै कि दुर्जन अनेक प्रकारसे सिखलायाभी जायतोभी उस में साधुतानहीं आती दूध, और पी जड़में सांचों परन्तु नीम का वृक्ष मधुर नहीं होसक्ता ॥ ६ ॥ अन्तर्गतमलोदुष्टस्तीर्थ स्नानशतैरपि । नशुद्धयतितथा भाण्डं सुंरायादाहितञ्चयत् ॥७॥ जिसके हृदय में पाप है. वही दुष्ट है वह तीर्थ में सौ बार स्लान से भी शुद्ध नहीं होता जैसे मदिरका पात्रललापा भी जायतो भी शुद्ध नहीं होता॥७॥ - .
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६६
॥ चाणक्यनीतिः॥
नवेत्तियोयस्यगुणप्रकर्षसतंसदानिन्दतिनानचित्रम्
यथाकिरातीकरिकुम्भलब्धांमुक्तांपरित्यज्यविभर्ति
गुजाम् ॥ ८॥
जो जिसके गुण की प्रकर्षता नहीं जानता वह निरन्तर उस
की निन्दा करता है जैसे. भिल्लनी हाथी के मस्तक के मोती
को छोड धुपवी को पहिनती है. ॥
अनुसंवत्सरम्पूर्ण नित्य मौनेन सुञ्जते ।
युगेकोटिसह तैःस्वर्गलोकेमहीयते ॥ ९ ॥
जो वर्षभर नित्यनुपचापमोचन करता है वह सहनकोटि
सुपतक स्वर्ग लोक में पूजा जाता है ।।.९. 4
कामकोधी तथालो स्वादुश्रृंगार कौतुकें ।
अतिनिद्रातिसेवच विधार्थी लाटवर्जयेत् ॥ १० ॥
काम क्रोधलोभ भीठीवस्तु:शृंगार खेळ. अति निमा और
अति सेवा इन,आठों को विद्यार्थी छोड़ दे ॥ १० ॥
अकृष्टफलमूलानि बनवासरतिः सदा ।
कुरुतेऽहरहना मृविविधः सउच्यते ॥ 3-30
दिना जोती भूमि से. उत्पन्न फल वा मूल खाकर सदाः
इनवास करता हो और प्रतिदिन आई. करें ऐसा बाह्मण ऋषी
कहलाता है ॥ ११॥
-- Anm----- ६७ ॥ चाणक्यनीति॥ एकाहारेण सन्तुष्टः पट्कर्मनिरतः सदा । सतुकालाभिगामीच सविनोद्विजउच्यते ॥ १२ ॥ एक समय के भोजनसे सन्तुष्ट रह कर पढ़ना पड़ाना यज्ञ करना कराना दान देना और लैना इन छः सम्मामि सदारत हो और ऋतुफाल में स्त्री का संग करे ऐसे बाह्मण को दिन कहते हैं, ॥ १२ ॥ लौकिकेकम्मणिरतः पशूनांपरिपालकः । वाणिज्यकृषिकर्मायः साविमोनैश्याच्यते ॥१३॥ सांसारिक कर्म में रतहो और पशुओं का पालन बनियाई औरखेती करने वालाहो वह विभ वैश्यकहलाता है ॥ १३ ॥... लाक्षादितलनीलीनां कोसुम्भमधुसर्पिणाम् ।' विकेतामद्यमांसानां सविप्रः शूदउच्यते ॥ १४ ॥ लाह आदि पदार्थ तेल नीली पीताम्बर मत्रु पी मद्य और मसि इनका बेचने वाला वह ब्राह्मण शुद्ध कहा जाता है ॥ १४ ॥ परकारविशन्ताच दायिक स्वार्थसाधकः। उलीप पुरो.विणेमाज्जारजच्यहे ।। १६॥ दूसरे के कामका निभाने वाला दम्भी अपनभयका साथ. :তা ঈশা সহ যুক্ত আঁয় প্রন ল ব ছ এই शिलाय पाहा जाता है ।। १५ । । .५ANNA -- Sr.NERPLETERMANEDREPOATot.train -- चाणक्यनीति वापीकूपतड़ागानामारामसुरवेश्मनाम् । उच्छेदने निराशकः सविनोम्लेच्छ उच्यते ॥१६॥ वाली कुंआ तलाव बाटिका देवालय इनके उच्छेदन कर ने मैं जो निडर हो वह ब्राह्मण म्लेच्छ कहलता है ॥ १६॥ देवद्रव्यं गुरुद्रव्यं परदाराभिमर्शनम् ।। निर्वाहः सर्वभूतेषु विप्रश्चाण्डाल उच्यते ॥ १७॥ 'देवता का द्रव्य और गुरुका दव्य जो हरताहै और परस्त्री से संग करता है और सब प्राणियों में विवाह कर लताहै वह विन चाण्डाल कहलाता है अर्थात् (चण्डकोष) इस धातु से चाण्डाल पद साधु होता है। १७ ॥ देयं भोज्यधनघनसुकृतिभिनौसंचयस्तस्य वे श्रीकर्णस्य बलेश्वविक्रमपतेरघापिकीर्तिःस्थिता। अस्माकं मधुदानमोगरहित नष्टं चिरासंचित निर्वाणादितिनेजपादयुगलंघर्षरयहोमाक्षिकाः॥१८॥ .::सुहतियों को चाहिये कि भोगा योग्य धन का और दज्य को देवें कभी सम्बयनका कर्णबलिपिकलादित्य इन राजाओं. की कीर्ति इस समय पर्यावर्तमाव हैवान भोग से रहित बहुत शिल सषित हमारे लोगों का मधुन होगया निशय है.
॥ चाणक्यनीतिः कि मधु मक्खियां मधु के नाश होने के कारण दोनों पांवों की पिसा करती है।॥ १८॥ : इति वृद्धचाणक्ये एकादशोऽध्यायः॥११॥ ' अथ द्वादशोऽ अध्यायः॥ सानन्दसदनं सुतास्तु सुधियःकांताप्रियालापिनी इच्छापूर्तिधनस्वयोपितिरातः स्वाज्ञापरा सेवकाः आतिथ्यशिवपूजनप्रतिदिन मिष्टान्नपानगृहे साधो संगमुपासते चसततं धन्योगृहस्थाश्रमः। यदि आनन्दयुत घर मिले और लडक पण्डित हों स्त्री मधुर भाषिणी हो इच्छा के अनुसार धनहों अपनी स्त्री में रति हो आज्ञापालक सेवक मिले अतिषिकी सेक्षा और शिवको पूजाहो. ती जाय प्रति दिन गृहही में मीठा अन्न और जल मिलसर्वदा साधके संग की उपासना हो तो गृहस्याआश्रम ही धन्य है। आतेविग्रेषुदयान्दितश्चयच्छ्यास्वल्यमुपैतिदान अनंतपारंसमुपैतिराजनयहीयतेतन्नलभे-द्विजोभ्यः जो दयावान पुरुष आत बाह्मणों को श्रद्धा से थोडाभी दान देता है उस पुरुष का अनन्त . होकर वह मिलता है जो दिया.माता है वह माझगा से नहीं मिलता.॥२॥ . ---------- ----- ७० ॥ चाणक्यनीनिः॥ दाक्षिण्यस्वजनेदयापरजने शाञ्चंसदादुर्जने प्रीतिःसाधुजनेस्मयः खलजनेविद्वज्जनेचार्जवम् शौर्यशहजनक्षमागुरुजने नारीजनेधूर्तता इत्थंयेषुरुषाः कलासुकुशलास्तेष्वेवलोकस्थितिः। अपने जन में दक्षिता दूसरे जन में, दया सदा दुर्जनमें दुष्टता साधु जनमें प्रीति खल में अभिमान विद्वानों मैसरलता शत्रु जन में शूरता बड़े लोगों के विषय में क्षमा श्री में काम पड़ने पर पूर्तता इस प्रकार से लोग कला में कुशल होते. हैं उन्हीं में लोक की मर्यादा रहती है ॥ ३ ॥ हस्तादानविवर्जितोश्रुतिपुटौं सारस्वतद्रोहियो । नेत्रेसाधुधिलोकनेनरहिते पादौनतीर्थगती ॥ अन्यायार्जितवित्तं पूर्णमुदरंगणतुंगंशिरो॥ रेरेजम्बुकमुञ्चमुञ्चसहसानीचं सानियवपुः ।। हाथ दानरहित हैं कान वेदशास्त्र के विरोधीहै नेत्रोंने सा शुका दर्शन नहीं किया पावों में तीर्थ गमन नहीं किया अन्याय से. अर्जित धन से उदर भरा है और गर्व से शिर ऊंचा होरहा है, रे सियार ! एसे नीचं निध शरीरको शीघ छोड़ ॥४॥ येपो श्रीमशशोदासतपदकमले नास्तिभक्तिनराणी। पेशामाभीरकन्याप्रियगुणकथने नानुरक्तारसज्ञा " -- ॥ चाणक्यनातिः॥ मेषां श्रीकृष्णलीलाललितरसकथा सादरोनैवकणों . थिक्तांधितांधितांकययतिसततंकीर्तनस्थोमृदंग: श्रीयसादासुत के पद काल में जिग लोगोंकी भक्तिनहीं रहती जिन लोगों की जीभ अहीरों की कन्याओं के प्रिय अर्थात् कृष्णके गुणगान में मीति नहीं रखती और श्रीकृष्णजी की लीलाकी ललित कथा का आदर जिनके कान नहीं करते उन लोगोंको धिक है उन्हीं लोगोंको भिक है ऐसा कीर्जनका मृदंग सदा कहता है ॥ ५॥ पत्र नेव यदाकरीलविटये दोपोबसन्तस्य कि। नोलूकोऽप्यालोको यदिदिवासूर्यस्य किं दूषण । वर्षा नैव पतन्तिचातकमुखे मेषस्य किं दूषण। यत्पूर्वविधिनाललाटलिखितं तन्मार्जितुकक्षमा पदि करील के वृक्ष में पत्ते नहीं होते तो बसन्तका क्या अपराध । यदि उलूक दिन में नहीं देखता तो सूर्य का क्या दोष है वर्षा चातक के मुख में नहीं पडतो इस में मेघशाश्या अपराध है पहिलेही ब्रह्मा ने जो कुछ ललाट में लिखएक्खाहै उसे मिटाने को कौन समर्थ है ॥ ६ ॥ सत्संगाद्भवति हि साधनाखलानां साधला नहिखर
चाणक्यनीतिः ॥
सिंगता खलत्वमाआमोदकुसुमभवंमृदेवधत्तेमृदगन्य
नहिंसमानि धारयन्ति ॥ ७॥
निश्चय है कि अच्छे के संग से दुजनों में साधुताआजाती
है परंतु साधुओं में दुष्टों की संगति से असाधुता नहीं आती
फूलफी गंधको मिट्टी ले लेती है परंतु मिट्टीकी गयको फूलक
भी धारण नहीं करते ॥ ७॥
साधना दर्शनं पुण्यं तीर्थभूताहिसाधवः।
कालेन फलतेतीर्थ सद्यः साधुसमागमः ॥ ८॥
साधुओं का दर्शनही पुण्य है इस कारण कि साधुतीर्थरूप हैं
संमसे तीर्थ पल देताहै साधुओंका संग शोज काम देताहै।८
विप्रास्मिन्नगरेमहान्कथयकस्तालद्वमाणांगणः।
को दातारजको ददातिवसन प्रातगृहीत्वा निशि।।
को क्षः परवित्तदारहरणे सर्वोऽपि दोजनः ।
कस्माज्जीपसिहेसविषकमिन्यायेन जीवाम्यहम्
हे विम! इस-नगर में कौन वडा ताड के पेड़ों कासमुदाय
कौन दाता है धोबी प्रातःकाल वस्त्र लेता है और रात्रि में दे
देता है, चतुर कौन है दूसरे के धन और स्त्री. के हरण में संब
ही कुशल हैं आप कैसे जीते हो हे मित्राविष का काला विपक्ष में
जाता है वैसे ही मैं भी जीता हूं ॥९॥
। --- COM M ॥ चाणक्यनीति। .७३ नविप्रपादोदककर्दमानिन वेदशास्त्रध्वनिगर्जिता- निस्वाहास्वधाकारविवर्जितानिस्मशानतल्यानि- गृहाणितानि ॥ १०॥ जिनपरोंमें ब्राह्मण के पाऑकेजलसें कीचड़ नभयाहो और नवेद शास्त्र के शन्द की गर्जना और जो गृह स्वाहा स्वधासे रहित हो उसको स्मशान के समान समझना चाहिये ॥ १० ॥ सत्यं मातापिताज्ञानं धर्मो भ्रातादयासखा । शान्तिः पत्नीक्षमापुत्रः पडेतममवान्धवाः ॥११॥ सत्य मेरी माता है और ज्ञान पिता धर्मभेराभाई है और.दया मित्रं शान्ति मरीस्त्रीह और मोक्षपुत्र यही कामेरेवन्ध हैं ॥११॥ किसीसंसारी पुरुष ने ज्ञानीको देखकर चकित हो यह पूछा कि संसार में पिता भाई मिन धी पुत्र ये जितने ही अच्छे से 'अच्छे हों उतनाही संसार में आनन्द होता है तुझको परम आ- मन्द में मम देखताह तो तुझकोभी कहीं न कहीं कोई न कोई उन में से होगा ज्ञानी समझा कि जिस दशको देखकर यहचकित है यह दशा क्या संसारिक कुदुरपों से हो सकी है इस कारण जिन में तुझे परम आनन्द होता है उन्ही को इससे कई पदा चित यह भी इन को स्वीकार करें ।। ११५ अनित्यानिशरीराणि विभवानव शश्वताः ॥ निय सनिहितामृत्युः कर्तव्योधर्मसंग्रहः ॥१२॥ -----
७४
चाणक्यनीतिः ॥
शरीर अनित्याई विश्व भी सदानन्दतामृत्यसमा चिकट
ही रहता है। इस कारण धर्मका संग्रह करणा बाहिये ।। १२ ।
निमन्त्रणोत्सवाविप्रा गायोनवतृणोत्सवाः ।
प्रत्युत्साहयुतामायः अहं कृष्णरणोत्सवः ।।१३।।
निमन्त्रण ब्राह्मणों का उत्सव है नवीन घास गायों का
उत्सव है पति के उत्साह से नियों का उत्साह होता है कृष्ण
बुझ को रणही उत्सव है ॥ १३ ॥
मातृवत्परदारांश्च परद्रव्याणिलोष्ठवत् ।
आत्मवत्सर्वभूतानि यः पश्यति स पश्यति ।।१४।।
दूसरे की स्त्रियोंको माताके समान दूसरेके द्रव्यको डेलाके समान,
अपने समान सबप्राणियों कोजो देखता है वहीदेखता है॥१४॥
धमैतत्परतामुखमधुरता दानेसमुत्साहता।
मित्रेऽवचकतामरोविनयता चित्तेऽतिगंभीरता ।।
आबारेशुचितागुणेरसिकता शास्त्रेषु विज्ञानृता ।
रूपेसन्दरताशिवभजनतांत्वय्यस्तिभोरांषयः॥१६॥
धर्म में तत्पर मुख में मधुरता दान में उत्सुकता, मित्र के
विषय में पवित्रता गुरु से. नवता अन्तस्करण में गंभीरता
आचार में पवित्रता गुण भैकिता शाचों में विशेषज्ञता रूप
में सुंदरता और शिवकी भक्ति; हे राघवये आपही में हैं ॥१॥
७५
॥ चाणक्यनीतिः॥
काष्ठं कल्पतरू सुमेरचलश्चिन्तामणिः प्रस्तरः।
सूर्यस्तीवकर शशीक्षयकरःक्षारोहि वारान्निधिः॥
कामोनष्टतंतुलिदितिसुतो नित्यं पशुःकामगौ ।
नैतांस्तेतुलयामिभोरघुपते कस्योपणादीयते॥१६॥
कल्पवृक्ष काठ है सुमेरु अचल है चिन्तामणि पत्थर है
सूर्य की किरण अत्यन्त उष्ण है चन्द्रमा की किरण क्षीण हो
जमती है समुद्र खारा है कामके शरीर नहीं है बलिदैत्य है
फामधेनु सदा पशुही है इस कारण आपके साथ इनकी तुलनानहीं
देसक्त हैं पति ! फिर आपको किसकी उपमादी जाय ॥१६॥
विद्यामि प्रवासेच भार्यामित्रं गृहेषु च ।
व्याधिस्तस्यौषधौमित्रंधो मित्रं मृतस्य च ॥१७॥
प्रयास में विद्या हित करती है घरमें स्त्री मित्र हैरोगग्रस्त पुरुष
का हित औषध होता है और धर्म मरेका उपकार करता है ॥१७॥
विनयं राजपुत्रेभ्यः पण्डितेभ्यः सुभाषितम् ।
अनृतं धुतकारेभ्यः स्त्रीभ्यः शिक्षेतकेतवम् ॥१८॥
सुशीलताराजा के लड़कों से, प्रिय वचन पण्डितों से असत्य
शुभारियों से और छल स्त्रियों से सीखना चाहिये ॥ १८ ॥
अनालोस्यव्ययं कर्ता अनाथः कलहप्रियः।
आदरः सर्वक्षेत्रेषु नाशीनं विनश्यति ॥१९॥
om ७६ | নানাঃ } विना विचारे व्यय करने वाला सहायक के न रहने पर भी कलह में प्रति रखने वाला और सब जातिकी त्रियों में भोगके किये व्याटल होनेवालापुरषशीनही मर होगाता है ॥ १९॥ नाहारं चिन्तयेत्याशोधर्ममेकं हि चिन्तयेत् । आहारो हि मनुष्याणां जन्मनासहजायते ॥२०॥ पडित को आहारभी चिंता नहीं करनी चाहिये एक धर्म को निश्चय के हेतु . से सोचना चाहिये इस हेतु कि आहार मनुष्यों को जन्म के साथही उत्पन्न होता है ॥२०॥ धनधान्यप्रयोगेषु विधासंग्रहणे तथा । 'आहारेव्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखोमवेत् ॥२१॥ पर.धान्य के व्यवहार करने में सही विद्या के पटन पढ़ाने में आहार और राजाकी सभा में किसी के साथ विवाद फरने में जो सज्जाको छोडे रहेगा वह सुखी होगा । २.१.. जलविदुनिपातेन क्रमशः पूर्यतेपदः । सहेतुः सर्वविधानां धर्मस्वचधनत्यच ।रि|| क्रमकमसे जलेके एक र सूंदके गिरने सेघड़ा भर जाता यही संविद्या धर्म और थन का भी कारण है ॥ २२॥ वयस परिमाणेऽपि चाखलः खलएक्सः मायामात्रयं नोपयातीन्तवामा २३५
.
७७
"चाणक्यनीति
क्यके परिणाम पर भी जो खल रहताह सो खलहीवनारह-
ताई अत्यन्त पंकी भी तितली कभी माठी नहीं होती ॥२२॥
इति वृद्धचाणक्ये द्वादशोऽध्यायः ।
ANSERS
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
मुहूर्तमपिजीवेच्च नरः शुक्लेलकर्मणा
नकल्पमपिकटेन लोंकद्वयविरोधना॥१॥
उत्तम कर्म से मनुष्यों को मुहर्तभर का जीना भी भेष्टहदो
नों लोगों के विरोधी दृष्टफर्मस अल्पभरकाभी नीनाउत्तमनहीं।
गतेसोको न कर्तव्यो भविष्यनैवं चिन्तयेत् ।
वर्तमानेनकालन प्रवन्ति विचक्षणाः ॥२॥.
गत वस्तुका शोक नहीं करना चाहिये और भावीकी चिन्तान
करै कुशललोग वर्तमान कालके भनुरोध से प्रवृत हाते हैं ॥२॥
स्वभावेन हि तुष्यन्ति देवाः सत्पुरुषाः पिता।
-ज्ञातयः स्नानपानान्या वाक्यदानेन पण्डित
निश्चय है कि देवता सत्पुरुष और पिता.ये प्रकृतिसेसन्तुष्ट
होतेहैं बन्धुत्लान और पान से और पण्डित प्रिय वनसे
आयुःकम्मचक्त्तिन्च विद्यानिधनमेवच ।
एनानि च ज्यन्ले गर्भस्थस्यैव देहिनः॥४॥
॥ चाणक्यनीतिः॥ अयुदाय कर्म धन विद्या और मरण ये पांच जब जीवंगर्भः में रहता है उसी समय सिरजे जाते हैं ॥ ४ ॥ अहोवतविचित्राणि चरितानिमहात्मनाम् लक्ष्मी तृणायमन्यन्ते तद्भारेणनमन्तिच ॥ ६॥ आश्चर्य है कि महात्माओं के विचित्र चरित्र हैं लक्ष्मी को तृणसम मानतेहैं यदि मिलजातीहै तो उसके भारसे ननहाजातही यस्वस्नेहोभयं तस्य स्नेहोदुःखस्य भाजनम् । स्नेहसूलानिदुःखानि तानित्यक्त्वावसत्पुखम्॥६॥ जिसकी किसी में प्रीति रहती है उसीको भपहोता है स्नेहही दुख का भाजनहै और लेह ही दुःखका कारण है इस कारण उसे छोड़ कर सुखी होना उचित है ॥ ६ ॥ अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्न मतिस्तथा। द्वावतो सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति ॥७॥ आनेवाले दुःखका पहिलेसे उपाय करनेवाला और जिसकी बुद्धि में विपत्ति आजानेपर शीघही उपाय भी मानाता है ये दोनों सुख से बढ़ते हैं और जो सोचता है कि भाग्यवश से जो होनेडाला है. अवश्य होगा वह विनष्ट होजाता है ॥७॥ राशिधामणिधर्मिष्ठाः पापापा समेसमाः ।। राजानमनुवर्तन्ते यथाराजातथापना ८ ॥
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७९
॥ चाणक्यनीतिः॥
दो नृप धरमी धरमी मजा, पाप पाप मत जान ।
सग ते सम भूपति जया, परगट प्रजा-पिछान ॥ ८
यदि धर्मात्मा राजाहो तो मजामी धर्मिष्ट होतीहै यदि पा-
पोहो तो पापी समहो तो समै सब मना राजाके अनुसार
चलती है जैसा राजा है वैसी मजा भी होती है ॥ ८.६.
जीवन्तम्मृतवन्मन्ये देहिनन्धर्मवर्जितम् ।
मृतोधर्मण संयुक्तो दीर्घजीवी न संशयः ॥ ९ ॥
धर्मरहित जीतेको मृतक के समान समझता हूं निश्चय
धर्म युत मरा भी पुरुप चिरंजीवीही है ॥ ९ ॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां चस्येकोऽपि न विद्यते।।
अजागलस्तनस्येव तस्यजन्मनिरर्थकम् ॥१०॥
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन्मेंसे जिसको एक भी नहीं रहता
धरी के गलेके स्तनके समान उसका जन्म निरर्थक ही
दलमानाः सुतीयेश नीचाः परयशोऽग्निना।
अशक्तास्तत्पदंगन्तुं ततोनिन्दो प्रकुर्वते ।।११
इंजन दूर की पोनि दुलह अग्नि से जाम के
पदको नहीं पाते इरा लिये उसको निन्दा करने लगता हैं. १६१॥
सिन्धाधविषयासंगोमुक्त्यनिर्विषयम्मन ।
सनश्चमनुष्याला कारण बन्धमोक्षयोः॥ १२॥
॥ चाणक्पनीतिः ॥ विषयों में आसक्त मन बंधनका हेतुहै, विषयसे रहित मुक्ति फा मनुष्यों के बंधन और मोक्षका कारण मनहीं है...! देवाभिमानेगलिते ज्ञानेन पारमात्मनि ।। ययनमनोयाति तत्रतत्रसमाक्ष्यः ॥१३॥ परमात्मा के ज्ञान से देह के अभिमान के नाश होजाने पर नहाँ २ मन जाता है वही र समाविही है ॥१३॥ : ईप्सितं मनसः सर्व कस्व सम्पद्यते सुखम् । देवायत्तयतः सर्व तस्मात्सन्तोषमात्रयद ।। १ ।। मनका अभीप्सित सर मुख निसको मिलता है कशे किस देवके वश हैं इस से संतोष पर भरोल करना उचित है॥१४॥ यथाधेनुसहलेषु वत्सोगच्छतिमातरम् । सथायच्चकृतकर्म कतारमनुगच्छति ॥ १६ ॥ जैसे महलों धेनुके रहते बड़ा जाताही के निकट जाताहैवैसे ही जो कुछ कर्म किया जाता है कर्ता को मिलता है ॥१५॥ अनवस्थितकार्यस्य नजनेनबनेसुखम् । जनोदहतिसंसगावनं संगदिवर्जनात् ।। १६ ।। जिसके कार्य की स्थिरता नहीं रहती वहन जानमे सुख पाता है नाचनमें जन उसको संसर्ग.से. जलाता है और वन मेसन के त्याग ।। १६ ८१ चाणक्यनीति यथाखात्वाखनित्रेण भूतलेवारिविन्दति । तथागुरुगतांविद्यां शुश्रधुरधिगच्छति ॥ १७ ॥ जैसे खनने के साधन से खनके नर पाताल के जलकोपाता है वैसे ही गुरुगत विद्या को सेवा से शिष्य पाता है ॥ १७ ॥ कर्मायत्तं फलंपुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी। तथापितुधियश्चार्याः सुविचाथैव कुर्वते ॥१८॥ यद्यपि फल पुरुष के कर्म के आधीन रहता है और बुद्धिभी कर्म के अनुसारही चलती है तथापि विवेकी महात्मा लोग विचारही के काम करते हैं ॥ १८ ॥ एकाक्षरप्रदातारं योगुरुंनामिवन्दते। श्वानयोनिशतंभुक्त्वांचाण्डालेष्वभिजायते॥१९॥ जो एक अक्षर भी देने वाले गुरुकी बन्दना नहींकरता यह कुचेकी सौ पानि को भोगकर चाण्डालों में जन्मताहै ॥ १९॥ युगान्तेप्रचलन्मेरुः कल्पान्तेसप्तसागराः । साधवः प्रतिपन्नान्निचलन्तिकदाचन ॥२०॥ युगके अन्तमें सुमेरु चलायमान होता है और कल्पके अन्तमेसातों सापर परंतु साधूलोग स्वीकृत अर्यसे कभीनहीं विचलते ॥२०॥ इति वृद्धचाणक्ये त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३॥ DECerem 4
चाणक्यनीति
अथ चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १३
पृथिव्यांत्रीणिरत्नानि अन्नमापः मुमापितम् ।
सुरैः पाषाण खण्डेश रत्नसंख्याविधीयते ॥ १॥
पृथ्वी में जल अन्न और प्रिय वचन ये तीनही रत्नहैं सूखा
पाषाण के टुकडोंको रल में गिना है ।। ६ ॥
आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानिदेहिनाम् ।
दारिददुःख रोगानि बन्धनव्यसनानिच ॥२॥
जीवों को अपने अपराय रूप वृक्षो दरिद्रता, रोग, दुख,
वन्धन और विपत्ति ये फल होते हैं ॥ २॥
पुनर्वित्तम्पुनर्मित्रंयुनीयापुलमही।
सतत्सर्वपुनर्लभ्यन्नशरीरं पुनः पुचः॥३॥
धन. मित्र, स्त्री पृथ्वी ये सब सिर २ मिलते हैं परन्तु शरी,
रफिर २ नहीं मिलता॥ ३ ॥
बहुनां चैवसत्वानांसमवायोरिषजयः ।
बर्षधाराघरोमेधस्तृणरपिनिमार्यते ॥ ४॥
निश्यहै कि वहुत जनोंका सभाप शो जोतलेताहै तृगसम.
हभी वृष्टि को धारा के रनेवाले मेयका निवारण करता है।४
जले तेलं खरगुलाम्पावेदानेमनागपि ।
प्राज्ञे शास्त्रं स्वयंपाति विस्तारंवस्तुशक्तितः॥५॥
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॥ चाणक्यनीतिः॥
जल में तेल धुर्मन में गुस्वार्ता सुपात्र में दान बुद्धिमान में
शास्त्र थे थोडे भी हों तो भी वस्तुको शक्ति से आप से आए
विस्तार को प्राप्त हो जाते हैं ॥५॥
धर्माख्यानेश्मशानेच रोगिणां यामतिमवेद ।
सासर्वदेवतिष्ठेच्चकोनमुच्येतबन्धनात् ॥ ६॥
धर्म विषयकं कथा के समय श्मशानपर और रोगियों कोनों
बुद्धि उत्पन्न होती है वह यदि सदा रहती तो कौन पन्धनले
मुक्त न होता ॥ ६॥
उत्पन्नपश्चात्तापस्य बुद्धिर्भवतियाहशी।
ताशीयदिपूर्वस्याकस्यनस्यान्सहोदयः॥ ७॥
निंदित कर्म के करने के पश्चाद पछताने वाले पुरुषको जैसी
बुद्धि उत्पन्न होती है वैसी यदि पाहिले होतीतो किसको बड़ी
समृद्धि न होती ॥ ७॥
दालेतपसिशौर्येवा विज्ञानविनयेनये।
विस्ममयोनदिकर्तव्यो बहुरत्नावसुन्धरा ।।
दान में तपमें शुरला में विज्ञता में सुशीलतामें और नीतिमवि
समय नहीं करना चाहिये इस कारण कि पृथ्वी में बहुंतरल हैं।
दूरस्थोऽपिवदूरस्थो योयस्थमनसिस्थिती
सोयत्यायनास्ति समीपस्थोपितरतः ॥ ९॥
॥ चाणक्यनीति॥ जो जिसके हृदय में रहता है वह दूरभी होतो भी यह दूरनहीं जो जिसके मनने नहीं वह समीप भी होतो वह दूर है। ९ ॥ पस्माच्चप्रियभिच्छेत तस्य ब्रूयात्सदाप्रियम् । घ्यायोमगवनन्तुं गीतं गायतिसुस्वरम् ॥ १० ॥ जिससे प्रियकी वांच्छाहां सदा उससे प्रिय बोलना उचित्तहै पाप मृगके वध के निमित्त मधुर स्वरसे गीत गाताहै ॥ १० ॥ अत्यासन्नाविनाशाय दूरस्थानफलप्रदाः । सेन्यतांमध्यभागेन राजापतिगुरु स्त्रियः ॥१३॥ अत्यन्त निकट रहने पर विवाशके हेतु होतेहैं दूर रहने से पलं नहीं देते इस हेतु राजा आग्न गुरु और स्त्री इनको म. स्थावस्थाले सेक्ना चाहिये ॥ ११ ॥ आमिरापः स्त्रियोमूर्खः सर्पोराजकुलानिंच। नित्यंयत्नेनसेव्यानि सधः प्राणहराणिषट् ।।१२।। मान, बल, खी, सूर्स, सांप और राजा के कुल ये सदासा- बांधनवार सेवन के योग्यहँय छ गोत्रमाणके हरने वाले हैं ॥ १२ संजीवतिगणोयस्य यस्यधर्मः संजीवति ।:::: T-विहीनस्य जीवितं निष्प्रयोजनम्।। १३ ॥ जलत प्राशे जा है जिसको युग है और वही जोताहै जिसको धर्म धर्मत हीन पुरुषका जीता, व्यर्थ है ५.१२..
चाणक्यनीतिः॥
यदीच्छसिवशीकर्तुं जगदेकेन कर्मणा।
पुरापञ्चदशास्येभ्योगांचरन्ती निवारय ॥१४॥
जो एकही कर्मसे जगत को पश किया चाहतेहोतो पहिले
पदहोंके मुखसे मनका निवारण करो तात्पर्य यहहै कि आंख
फान, जीभ, त्वचा ये पांचो ज्ञानेन्द्रिय हैं । मुख हाय, पांव,
लिंग, गुदा ये पांच कम्म॑न्दिय हैं। रूप, शब्द, रस, गंध, स्पर्श
ये पांच ज्ञानेन्दियों के विषय हैं। इन पन्द्रहोंसे मनको निवारण
करना उचित है ॥ १४ ॥
प्रस्तावपहर्शवाक्यं प्रभासदर्शप्रियम् ।
आत्मशक्तिसमको योजानातिसपण्डितः ॥१६॥
प्रसंग के योग्य वाप प्रकृतिके सदृश प्रिय और अपनीश-
ति के अनुसार फोपको जो जानताहै वह बुद्धिमान है ।१६
एकरवपदार्थस्तु विधाभव तिवीक्षितः।
कुणपकामिनीमांसंयोगिभिकामिमिश्चमि॥१६॥
एकही देह रूप.वस्तुतीन प्रकारको देख पडता है योगीलोग
उसे अति निन्दित मृतक रूपसे कामी पुरुष कान्ता रूप से
और इत्ते मांस रूप से देखते हैं ॥ १६ ॥
मुसिद्धमोषधंधर्म गृहच्छिद्रंचमैथुनम् ।
कुमुक्तं कुश्रुतं चैव मतिमानप्रकाशयेत् ॥ १७॥
८६ । चाणक्यनीतिः ।। सिद्ध औषध धर्म अपने घरकादोष मैथुन कुअन्नका भोजन निन्दित क्वनइनका प्रकाश करना बुद्धिमानोंको उचितनहीहै१५ तावनमानेननीयन्ते कोकिले श्चैववासरा। यावसर्पजलानन्ददायिनीवाक्प्रवर्तते ॥ १८ ॥ तबलों कोकिल मौन साधनते दिन बिताती है जवलासंबंज- मोंको सानन्द देनेवाली वाणी प्रारम्भ नहीं करती ॥ १८ ॥ धर्म धनं च धान्यं च गुरोर्वचनमौषधम् । सुग्रहीतं च कर्त्तव्यसन्यथा तु न जीवति॥१९॥ धर्म,धन धान्य, गुरुका वचन और औपश्यदिये सुग्रहीतहों तो इनको भली भांति से करना चाहिये जो ऐसा नहीं करता पही नहीं जीता ॥ १९ ॥ त्यजदुर्जनसंसर्ग भजसाधुसमागमम् । कुरुपुण्यमहोरानं स्मरनित्यमनित्यतः ॥ ॥ २० ॥ खलका संग छोड साधुकीसंगति को स्वीकार करदिनरात पुष्प किया कर और ईश्वर का नित्य स्मरण कर इस कारण कि संसार भनित्य है ॥ २०॥ ..' इति वृद्धचाणक्ये चर्तुदशोऽध्यायः ॥१४॥ Aawee
।। चाणक्यनीतिः॥
अथ पञ्चदेशोऽध्यायः ॥ १५॥
यस्य चित्तन्द्रवीभूतं कृपयासर्वजन्तुषु । ...
तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटामस्मलेपनैः।। १॥
जिसका चित्त ब प्राणियों पर दया से पिघल जाताहै.
उसको बानसे मोक्षसेऔरजटासे. विभूति के लेप से क्या । १॥
एकमेवाक्षरयस्तु शुरुः शिष्यं प्रबोधयेत् । .
पृथिव्यांनास्तितदंद्रव्यं यहत्वाचानृणीभवत् ॥२॥
जो.गुरू शिष्यकोएकहीअक्षरकाउपदेशकरताहै पृथ्वी में
ऐसा द्रव्य नहींहै जिसको देकर शिष्य उससे उत्तीणहो ॥३॥
खलानांकण्टकानां च द्विविधैवप्रतिक्रिया।
उपानहास्यभंगोवा दूरतोवाविसर्जनम् ॥ ३॥
खल और कांटे इनका दोही प्रकार का उपाय है भूता से
मुख का तोडना वा दूरसे त्याग ॥३॥
कुचेलिनन्दन्तमलोपधारिणवहाशिननिष्ठुरंभाषिणं
चासूर्योदयेचास्तिमितेशयानं विमुञ्चतिश्रीर्यदिच
क्रपाणिः ॥४॥
मलिन वस्त्रपाले को जो दांतोक मल को दूर नहीं करता उस
को बहुत भोजन करने वाले को कटुभाषी, को सूर्य के उदय
और मस्त के समय में सोनेवाले को लक्ष्मी छोड़ देती है चाहे
षह.विष्णु भी हो ॥ १ ॥
ce । चाणक्यनीतिः॥ त्यजन्तिमित्राणिधनविहीनं दाराचा मृत्याश्च सहज्जनाश्च । नचार्थवन्तं पुनराश्रयन्ते बों हिलोके पुरुषस्य बन्धुः ॥५॥ मित्र, स्त्री, सेवक बन्धु ये धनहीन पुरुष को छोड़ देतेहैं वहीं पुरुषः यदि धनी हो जाता है फिर उसी का आश्रय करते हैं धनही लोक में बन्धु है ॥५॥ अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दसवर्षाणि तिष्ठति । प्राप्ते एकादशेवर्षे समूलं च विनश्यति ॥६॥ अनीति से अर्जित धन दश वर्ष पयन्त ठहरता है ग्यारहवें वर्षके प्राप्त होने परमूल सहित नष्ट होजाता है ॥ ६॥ अयुंक्तस्वामिनोवतं युक्तनीचस्य दूषणम् । अमृतराहवेमृत्युविषशंकरभूषणम् ॥ ७॥ अयोग्य भी वस्तु समर्थ को योग्य होतीहै और योग्य भोदु- जन को दूषण, अमृत वे-राहको मृत्यु दिया विष भी शंकरको भूषण हुआ ॥ तनोजनं यद्धिजभुक्तशेषतत्सोह्रदयक्रियतेपर- सिन् । साप्राज्ञता या नकतिपापं दम्भ निना यान्तेि सधर्मः॥८॥ J E-POST-- ॥ चाणक्यनीतिः ।। वही भोजन है जो ब्राह्मण के भोजन से बचाहै वही मित्रता है जो दूसरे में की जाती है वही बुद्धिमानी है जो पाप नहीं क- रती और जो पिना दम्भ के किया जाता है वही धर्म है ॥८॥ मणिझुण्ठतिपादाने काचः शिरसिधार्यते । क्रयविक्रयवेलाय काचः काचोमणिमणिः ॥९॥ मणि पांव के आगे लोटती होकांच शिर पर भी रक्खाहो परन्तु क्रय विक्रय के समय फाय कांचही रहता है और मणि मणिही है ॥ ९॥ अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याअल्पश्चकालो बहुवि- जनता चायन्सारभूतं तदुपासनीयं इसोयथांक्षारमिवा- म्बुमच्यात् ॥१०॥ शास्त्र अनन्त है और विधा बहुत है काल थोड़ा है. और विप्न बहुत हैं इस कारण जो सार है उसको ले लेना उचित है। जैसे हंस जलके मध्य से दूध को ले लेता है ॥ १२ ॥ दूरागतंपथिश्रान्तं वृथा च गृहमागतम् । अनयित्वायो मुफ्ते सचाण्डाल उच्यते ॥११॥ दूर से आये ही पंथ से थकेको और निरर्थक गृह पर आये को बिना पूजे जोसाता है वह चाण्डाल ही गिना जाता है॥११॥ पठान्तिचतुरोवेदान् धर्मशास्त्राण्यनेकशः। आत्माननवजानन्ति वीपाकरसंयथा ॥ १२ ॥ ।
चाणक्यनीतिः॥
चारों वेद और अनेक धर्मशास्त्र पढते हैं परन्तु आत्मा को नहीं
जानते जैसे कलछी पाक के रसको ॥ १२ ॥
धन्याद्विजमयीनौका विपरीताभवार्णवे।
तरनत्यधोगता सर्वे उपरिस्थाः पतन्त्यधः ॥१३॥
यह ब्राह्मण रूप नाव धन्य है संसार रूप समुद्र में इनकी
उलटीही रीतिहै इसके नीचे रहनेवाले तरते और ऊपरकेनीचे गिरते
हैं अर्थात् ब्राह्मण से जो नम्र रहता है वह तर जाता है और जो नम्र
नहीं रहता है वह नर्क में गिरता है ॥ १३ ॥
जयमभृतनिधाननायकाप्योषधीनांअमृतमयशरीरः
कान्तियुक्तोऽपिचन्द्रः । भवतिविगतरश्मिमण्डलं-
प्राप्यमानोःपरसदननिविष्टकोलघुत्वनयोति।१४।
अमृतकाघर, औषधियों के अधिपति, जिसका शरीर अमृ
तमय है और शोभायुत भी चन्द्रमा सूर्य के मण्डल में जाकर
निस्तेज होजाताहै दूसरे के घर में बैठकर कौन लघुता नहींपाता.२४
अलिरयनलिनीदलमध्यगःकमलिनीमकरन्दमदा-
लसः। विधिवशात्परदेशमुपागतःकुटजपुष्परसंबड्ड
मन्यते ॥ १५॥
यह भवराजब कमलिनी के पत्ते के मध्य था तव कमलिनी
के फूलके रससे आलसी बना रहताया अब दैववशसे परदेश
में आकर कौरैया के फलाको बहुत समझता है ॥ १४ ॥
-- ॥ चाणक्यनीतिः॥ पतिद्धनतातश्चरणतलहतोवल्लभोयेनरोपादावा ल्याद्विग्रवय्यः स्ववदनविवरेधार्यते वैरिणीमेगिईमे छेदयन्ति प्रतिदिवसमुमाकान्तपूजानिमित्तं तस्मा- त्खिन्नासदाहद्विजकुलनिलयनाथयुक्तंत्यजामि.१६ जिसने रुष्ट होकर मेरपिताको पीडाला औरजिसने शोधके मारे पावसे मेरे कान्तको मारा जो श्रेष्ठ ब्राह्मण बैठे . सदालडक पनसे लेकर मुखीवचर में मेरी वैरिणीको रखेत परप्रति दिन पार्वती के पतिकी पूजाके निमित्त मेरे गृहकोकाटतेहैं नाथइससे खेद पाकर ब्राह्मणों के घरको सदा छोडे रहती हूं ॥ १६ ॥ दन्धनानिखलुसन्तिबद्दनिप्रेमरज्जुकृतबंधनमन्यत् दारुभेदनिपुणोपिपंडप्रिनिष्क्रियोभवतिपङ्कजकोशे बन्धन तो बहुत हैं परन्तुप्रीति की रस्सी का बन्धन औरही काठ के छेदने में कुशल भी भँवरा कमलके कोश में निया पार हो जाता है.॥ १७॥ छिन्नोपिचन्दनतरुर्नजहातिगन्धवृद्धोऽपिवारणपति नजहातिलीलामायन्नार्पितोमधुरतांनजहातिचेच क्षीणोऽपिनत्यजतिशीलगुणान्कुलीनः ॥ १८॥ कटा हुआ चन्दन का पृक्षगन्धको त्याग नहीं देता बूढाभी गज पति विलासको नहीं छोडता कोल्ड में घेरी भो ऊख मंधरता
॥णक्यनीतिः।।
नहीं छोहती दरिद्र भी कुलीन सुंशीलता आदि गुणोंको त्याग
नहीं करता। १८॥
उन्या कोऽपिमहीधरोलघुतरोदोभ्या धृतोलीलया.
तेनत्वं दिविभूतले च सततं गोवर्द्धनो गीयसे।
वांग्रलोक्यधरंवहामि कुचयोरग्नेन तद्गण्यते ।
किंवा केशवभाषणेनबहुनापुण्यर्यशोलभ्यते॥१९॥
पृथ्वीपर किसी अत्यन्त हलके पर्वतको अनायाससे बाहुओं
के ऊपरधारण किया तिससे आप स्वर्ग और पृथ्वीतलने सर्व-
दा गोवीन कहलाते हैं तीनों लोकों के धरने वाले आपको केवल
कुचों के क्षेत्र भागमें धारण करतीह यह कुछभी नहीं गिनाजाता
है केशव बहुत कहने से क्या पुण्यों से यश मिलता है ॥१९॥
इति वृद्धचाणक्ये पञ्चदशोऽध्यायः ।
अथ पोडशोऽध्यायः।
नध्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत्संसारविच्छित्तये
स्वर्गद्वारकपाटपाटन पटुर्घमोऽपिनोपार्जितः ।
गारीपीनपयोधरोरु युगलं स्वप्नेऽपिनालिंगितं ।
मातुः केवलमेवयोवनवनच्छेदेकुठारावयम् ॥७॥
---- ॥ वाणस्थलातिः॥ ९. संसार में मुक्त होने के लिये विषसे ईश्वर के पद का ध्यान मुझसे न हुआ स्वर्गदार के फाटक के तोड़ने में समर्थ धर्म का भी अनन किया और स्त्री के दोनों पीनस्तन और जषों का आलिंगन स्वप्न में भी न किया मैं माता के युवागन रूप वृक्ष के केवल काटने में कुल्हाडी हुआ ॥१॥ जल्पन्तिसामन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्रमाः। हृदये चिन्तयत्यन्यं न श्रीणामेकतारतिः ॥२॥ भाषण दूसरे के साथ करती हैं दूसरे को विकास में खती हैं और हृदय में दूसरेही की चिन्ता करती हैं दीयों की प्रीत एक में नहीं रहती। ॥ योमोहान्मन्यतेमुढो रक्तेयमयिकामिनी। सतस्यावशमो भूत्वा नृत्यकोडाशकुन्तवत् ॥३॥ जो मूर्ख अवियफ से समझता है कि यह कामिनी मेरे, ऊपर प्रेम करती है वह उसके वश होकर खेल के पक्षी समान नाया करताहै ॥ कोऽर्थान्माप्यनगर्वितोविपचिणाकस्यापदोऽस्तंगताः स्त्रीभिकस्यनखण्डितंभुविमतः कोनामराजामिया करकालस्यनगोचरत्वमगमत् कोऽथींगतो-गोरस कोवाबुर्जनमेषु पतितः शाशेण यातः पथि ।।
RAN ९४ चाणक्यनीतिः॥ धन पाकर गर्वी कौन न हुआ किस विषयों की विपत्ति नष्ट हुई पृथ्वी में किसके मनको स्त्रियोंने खण्डित न, किया राजाको प्रिय कौन हुआ काल के वश कौन नहीं हुआ किस याचक नै गुरुजा पाई दुष्टकी दुष्टता में पड़कर संसार के पथ में कुशलता से कौन गया ॥ ४॥ ननिर्मिताकेन न हष्टपूर्वानशूयते हेममयी कुरंगी। तथापितृष्णारघुनन्दनस्यविनाशकालेविपरीतबुद्धि सोने की मृगी न पहिले किसी ने रची. न देखी और न किसी को सुन पड़ती है तो भी रघुनन्दन को तृष्णां उस पर हुई विनाश के समय बाद विपरीत हो जाती है ॥ ६ ॥ गुणरुत्तमतां यान्ति नोञ्चरासनसंस्थिता । प्रासादशिविरस्थोऽपि काकः किं गरुडायत॥६॥ प्राणी गुणों से उत्तमता पाते हैं ऊंचे आसनपर बैठकर नहीं कोठे के ऊपर के भाग में बैठा कौवा क्या गरुड होजाता है।६। गुणाः सर्ववपूज्यन्ते न महत्योऽपि सम्पदः । पूणेन्दुः किं तथावबो निष्कलंको यथाकृशः ॥७ सर्व स्थान में मुण पूजे जाते हैं बडी सम्पति नहीं :पूर्णिमा म पूर्ण भी चन्द्रमा व्या वैसा वन्दित होता. है जैसा दिना दालंक के द्वितीया का दुल भी ॥ ७ ॥ ** Wat 17437 AHMA ॥ चाणक्यनीतिः॥ परमोत्सगुणो यस्तु निर्गुणोपि गुणोभवेत् । इन्द्रोपि लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितYणे:/८॥ निसके गुणोंका दूसरे लोग वर्णन करते हैं वह निर्गुण' भी होतो गुणवान कहा जाता है इन्द्र भी यदि अपने गुणों को आप प्रशंसा करे तो उनसे लघुता पाता है ॥४॥ विवेकिनमनुप्राप्ता मुणायान्ति मनोज्ञताम् । सुतरांरत्नमामाति चामीकरनियोजितम् ॥९॥ विवेकी को पाकर गुण सुन्दरता पाते हैं जब रत्न सोने में जड़ा जाताहै तब अत्यन्त सुन्दर देख पड़ता है ॥ ९ ॥ गुणे-सर्वज्ञतुल्योऽपि सीदत्येकानिराश्रयः। अनयमपिमाणिक्यं हेमाश्रयमपेक्षते ॥ १० ॥ गुणों से ईश्वर के सदृश भी निरालम्ब अकेला पुरुष दुःख पाता है अमोल भी माणिक्य सोना के आलम्ब की अर्थात् उस में जड जाने की अपेक्षा करता है ॥ १० ॥ अतिक्लेशेनयेझार्थी धर्मस्यातिकमणतु । शंभ्रूणां प्रणिपातेन तेहार्थामाभवन्तुमे ॥११॥ अत्यन्त पीड़ा से, धर्म त्याग से और बैरियों की प्रगति से जो धन होते हैं सो मुझको नहीं ॥ ११ ॥ किन्तयाक्रियते लक्ष्म्या याबधूरिखकेवला । यातवेश्येवसामान्या पथिकैरपिमुज्यते ॥ १२॥ . .
- .९६ । चाणक्यनीतिः॥ उस सम्पति से लोग क्या कर सकते हैं जो वधू के समान असाधारण है जो वेश्याके समान सर्व साधारण हो वह पपि' कों के भी भोग मासक्ती है ॥ २ ॥ धनेषु जीवितव्येषु स्त्रीष्वाहारकर्मसु । अतृप्ता प्राणिनस्सर्वेशातायास्यन्तियान्तिच॥१३॥ धन में जीवन में स्त्रियों में और भोजन में. अतृप्त होकर सप पाणी गये और जांयगे व जाते हैं ॥ १३ ॥ क्षीयन्तेसर्वदानानि यज्ञहोमबलिकिया। नक्षीयतेपात्रदानमभयंसर्वदेहिलाम् ॥ १४॥ सब दान, यज्ञ, होम. वलि ये सब नष्ट होनाते हैं सत्पात्र को दान और सब जीवों को अभय दान ये क्षीण नहींहोते १५ तृभलघुतृणातूकं ठूलादपि च याचकः । वायुनाकिननीतोऽसो मामययाधयिष्यति ॥१५॥ तृण सब से लघु होता है तृणसे रूई हलकी होतीहै रुई से भी याचक इस वायु क्यों नहीं उडाले जाती वह समझती है कि यह मुझसे मी मांगेगा ॥ १५ ॥ बरंशाणपरित्यागो मानभनेनजीवनात। प्राणत्यागेक्षणदुःख. मानभंगदिनेदिने ॥१६॥ मान भंगपूर्वकानसे माणका त्याग कर प्राणत्यागकेसम क्षणभर दम्बहोता है मान के नाश होने पर दिन दिन ॥१६ SANA
.
॥ चाणक्यनीतिः ॥
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वेतुष्यन्तिजन्तवः । .
तस्मात्तदेववक्तव्यं वचनेकिंदरिद्रता ॥ १७ ॥
मधुर वचन बोलने से सब जीव सन्तुष्ट होते हैं इसकारण
इसीका.बोलना योग्य है. वचत में दरिद्रता क्या ॥ १७ ॥
संसारकूटवृक्षस्य देफलेवमृतोपमें ।
सुभाषितंचसुस्वादु संगतिःसजनेजने ॥ ३८ ॥
संसार रूप कूट वृक्षके दोही फल हैं रसीला प्रिय वचन
सज्जन के साथ संगति ॥१८॥
जन्मजन्मयदभ्यस्त दानमध्ययनंतपः।
तेनैवाभ्यासयोगेन देहीचाभ्यस्यतेपुनः ॥१९॥
जो जन्म २ दान पढ़ना तप इनका अभ्यास कियाजता है
उस अभ्यासके योगसे देही अभ्यासः फिर २ करता है ॥ १९ ॥
पुस्तकेषुचयाविद्या परहस्तेषु यद्धनम् ।
उत्पशेषुच कार्येषु नसांविधा न तदनम् ॥ २०॥
, जो विद्या पुस्तकोंही पर रहती है. और दूसरेके हाथोंमेंजी,
धन रहता है कामपड़जानेपर न घह दिया है न वह धन है।०
प्रति वृद्धचाणक्यषोडशोऽध्यायः ॥१६॥
. - - ९८ चाणक्यनीति अथ सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ पुस्तकमत्ययाधीतं नाधीतगुरुसन्निधौ। सभामध्येनयोभन्ते जारगर्भाइवलियः ।।१।। जिन्होंने केवल पुस्तककी प्रतिसेपदा गुरुंकेनिकट न पढ़ावे. सभाके बीचव्यभिचारसे गर्भवाली स्त्रियोंके समान नहीं शोभते । कृतेप्रतिकृतिकुवासिन प्रतिहिंसनम् । सत्रदोषो न पतति दुष्टे दुष्ट समाचरेत् ॥२॥ उपकार करने पर मत्युपकार करना चाहिये और मारनेपर मारना इस में अपराध नहीं होता इस कारण कि दुष्टता करने पर दुष्टता का आवरण करना वचित होता है ॥ २ ॥ यदुर यदुराराध्यं यच्चदरे व्यवस्थितम् । तत्सर्वं तपसासाध्य तपो हि दुरतिक्रमम् ॥ ३ ॥ जो दूर है, जिसकी माराधना नहीं हो सकी और जो दूर वर्तमान हेवेतपसे सिसहोसके हैं इसकारणसबसेभवलतपहै.॥६॥ लोभदगुणेन किम्पिशनतायद्यस्ति किम्पातक। सत्ईचत्तपसाच किंवाचिमनोयद्यस्तितीर्थन किम्।। सौजन्ये यदि कि गुणैःसुमहिमायद्यस्ति किमण्डनेः संविधायदिकिवनपयशोवद्यस्ति किंमृत्युना॥४॥ . RA LADEMITH -- चाणक्यनीतिः॥ यदि लोभ है तो दूसरे दोषसे क्या यदि चतुराई है तो और पापोंसे क्या यदि सत्यता हो तो तप से क्या यदि मन स्वच्छन्द है तो तीर्यसे क्या यदि सज्जनता है तो दूसरे गुणोंसे क्या यदि महिमा है तो भूषणोंसे क्या यदि अच्छी विद्या हो तो धनसे क्या और यदि अपयश है तो मृत्युसे क्या ॥४॥ पितारत्नाकरोयस्य लक्ष्मी यस्य सहोदरी । शोभिक्षाटनकुर्यान्नादत्तमपतिष्ठते ॥६॥ जिसका पिता रत्नोंकी खान समुद्र है लक्ष्मी. जिसकी बहिन ऐसा शंख भीख मांगता है सच है बिना दिया नहीं निलता ॥५॥ अशा भवेत्साक्षाचारी च निर्धनः।' व्याधिदेवभक्त अवृद्धानारीपतिव्रता ॥६॥ शक्तिमोर साइोता है निधन ब्रह्मचारी रोगग्रस्त देवता का भक्त होता है और वृद्ध स्त्री पतिव्रता होतीहै ॥६॥ नासोइकलमंदानं नतिथिदशीसमा । नांगायमापोगन्त्रो नमातुर्दैवतंपरम् ॥७॥ अन्न के समान कोई दान नहीं है न द्वादशी समान तिनि नापी बहकर कोई मन्त्र नहीं है न माता बढ़कर कोई दया . NA
- -
EATHA
.१०० ॥ चाणक्यनीतिः ॥
तक्षकस्यविषदन्ते मक्षिकायाविषशिरे। ...
वृश्चिकस्यविषपुच्छे सर्वांगेदुर्जनो विषम् ॥ ८॥
सांपके दांत में विष रहता है मक्खीके शिर में विष है
बिच्छूकी पूंछ में विष है दुर्जनं सब अगोंमें विषहीसे भरा
रहता है।
पत्युराज्ञांविनानारी उपरोष्यवतचारिणी।
आयुष्यहरतेभर्तुः सानारी नरबजेत् ॥ १॥...
पतिकीआज्ञा बिना उपवासनत करनेवाली स्त्री स्वामीकी
आयुको हरतीहै और वह स्त्री आप नरकमें जाती है ।।
न दान:शुध्यते नारी नोपकासशतैरपि ।
नतीर्थ सेवयातहद्भर्तुःपादोदयथा ।। १०
न दानोंसे, न सैकडों उपवासोंसे, न तीर्थक सेवनसेस्त्री
वैसी शुद्ध होती है जैसी स्वामी चरणोदक से ॥ १० ॥
पांदशे पतिशेष सध्याश तथैवच ।
श्वानमूमसमतोयं पीत्वाचान्द्रायणं चरेत् ॥११॥
; पांव धोनेसे जो जलका शेष रहजाता है पीने से जो
बच जाता है और सध्या, करपर जो अवशिष्ट जल, सो
कुत्तके मंत्रके समान है. इसको पीकर चान्द्रायणका व्रत करना
चाहिये ॥ ११ ॥
चाणक्यनीतिः॥. १०१ दानेनपाणि तुकणेनस्लानेनशुद्धिर्नतुचन्दनेन। मानेनतृप्ति तुभोजनेनज्ञानेनमुक्ति तुमण्डनेन।१२ दान से हाथ शोभता है कंकण से नहीं लान से शरीर शुद्ध होता है चन्दन से नहीं आदर से तृप्ति होती है भोजन से नहीं ज्ञान से मुक्ति होती हैं छापा तिलकादि भूषणों से नहीं ॥१२॥ नापितस्य गृहेक्षीरम्पाषाणेगन्धलपनम्।। आत्मस्पंजलेपश्यन्यशकस्यापिश्रियंहरत॥१३॥ माई के घर पर वाल बनवानेवाला पत्थर परसे लेकर चन्दन लेपन करने वाला रूपको पानी में देखने वाला इन्द्र भी हो तो उसकी भी लक्ष्मी को ये हर लेते हैं ॥ १३ ॥ . सद्यः प्रज्ञाहरातुण्डी सद्यः प्रज्ञांकरीवचा । सद्यः शक्तिहसनारी सद्यः शक्तिकरपर्यः ॥१४॥ कुंदरू शीघही बुद्धि हर लेती है और वच झटपटवद्धि देती है स्त्री तुरन्तही शक्ति हर लेती है दूधशीवही बलकर देताहै।१४। परोपकरणं येषांजागतिहृदयेमताम् । ... नश्यन्तिविपदस्तेषां सम्पदास्यु-पदेपढे -1136 || निन सजना के हृदय में परोपकार जागरूक है उनकी विप तिनष्ट हो जाती है और प्रदरमें सम्मति होती है स्लिाइन १०२ ॥ चाणक्यनीतिः। यदिरामायदिरमायदितनयोविनयगुणोपेतः । तनयेतनयोत्पत्तिःसुरवरनगरेकिमाधिक्यम् ॥१६॥ ..यदि कान्ता है यदि लक्ष्मी भी वर्तमान है यदि पुनः सुशी. लताःगुण से युक्त है और पुत्र के पुत्र की उत्पत्ति हुई हो फिर देवलोक में इससे आधिक स्याहै ? ॥ १६ ॥ आहारनिन्द्रामयमैथुनानिसमानिचेतानिनृणांपा नाम्। ज्ञानन्नराणामधिकोविशेषो ज्ञानेनहींना पशु भिः समानाः ॥ १७॥ भोजन, निंदा, भय, मैथुन ये मनुष्य और पशुओं में समान ही हैं मनुष्यों को केवल ज्ञान अधिक विशेष है ज्ञान से रहित नर पशु के समान है ।।. १७ ॥ दानार्थिनोमधुकराचदिकर्णताले रीकृताकरिवरें- णमदान्धबंदचा। तस्येवगण्डयुगमण्डनहानिरेखा भृगाःपुनर्विकचएनबनेसन्तिः ॥ १८॥ यदि मदान्धे गजराज में राजमंद के अर्थी भोरी मदान्यता से पूर्ण के तालों से दूर किया तो यह उसी के दोनों गण्डस्थल की शोभा, की हानि मई मारे फिर विकसित कमल वन में वसते हैं । समान का चाणक्यनीति। १०३ तात्पर्य यह कि यदि किसी निर्गुण मदान्ध राजा वा धनीके निकट कोई गुणी जा पंड उस समय मदान्धों को गुणीका आदर न करना मानो अपनी लक्ष्मी की शोभाकी हानिफरनाहै काल निरवधि है और. पृथ्वी. अनन्त है गुणों का आदर कहीं न कहीं किसी न किसी समय होहोगा। १८ ॥ राजावेश्यायमचानिस्तस्कृतवालयाचको । परतुःखन्नजानन्ति सुष्मागासकपटकः रोजा, धेश्या, यम, अमि, चोर, बालक, याचक और आठ ग्रामकण्टकं अर्थात प्रामनिवासियों को पीडा देकर अपना नियहि करने वाला ये दूसरे के दुःखों को नहीं जानते ॥ १९ ॥ अधःपश्यसिकिम्बालेपवितन्तवकिसवि। रे मूर्ख नजानालिगततारुच्यमाक्तिकम् ॥२०॥ हे बाले दोचेको क्या देखते हो तुम्हारा पृथ्वी पर क्या गिरपड़ा है वह स्त्री के सहारे झूख नहीं जानता कि मेरा वरुणता रूप-मोती चलाग२० व्यालाश्रयापिविफलापिसकटकापियापिपंकिल भवापिदुरासदायि गन्धेनबन्धुरसिकेतकिसर्वजन्ती कोगुण वलुनिहन्तिसमत्तापान १२९॥ इति श्रीवृदयागये मतदशोऽध्यायः ।
॥ चाणक्यनीतिः ॥ हे केतकी यद्यपि तु सांपों का घर है निष्फल है : तुझमें कांटे भी हैं टेढ़ी है कीचड से तेरी उत्पत्ति है और तूं दुख से मिलती है भी तथापि एक गन्धगुण से सब प्राणियों को बन्धु हो रही है निश्चय है कि एक भी गुण दोषोंको नाश करदेता है ॥ २१॥ इति श्रीउन्नावप्रदेशान्तर्गत वरोड़ा श्राम निवासी पं० आनन्दमाधव बीक्षितात्मज पं०महाजदीन दीक्षित कृत वृद्ध चाणक्य भाषा काय सप्तशोऽध्यायः समांतः
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