Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Dahar Athava Sindh Ptan

Bhatt,shri Uday Shankar · 2011/02

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पजाप गवर्नमेएट द्वारा पुरस्कृत। पजाय और देहली यूनिवर्घिटी, राजपूताना चोर्ड अजमेर की हिन्दीरस, इण्टर एट्रेन्म भादि परीक्षाओं में स्वीकृत मोतीमाला का छठा रस अथवा सिन्ध-पतन (दुखान्त नाटक) Mama- नाटककार श्री उदयशकर भट्ट मोतीलाल बनारसीदास संस्कृत तथा हिन्दी पुस्वक विक्रेता सैदमिट्ठा पाजार, लाहौर। सन् १९३७ प्रकाशक- सुन्दरलाल जैन पंजाब संस्कृत पुस्तकालय, सैदमिश, बाहौर। तृतीय सस्करण (सर्वाधिकार सुरक्षित है) शान्तिलाल जैन मुम्बई संस्कृत प्रेस, यमिठा पाजार, लाहौर।

अपने पाठक से- इतिदास पर्वतों के अफ से निकलने पाली सरिता के सहचारी पत्यरी के यमान है, जो एक ही स्थान से पहते हुए मिष मिन्न आकार के होकर अपनी ख्याएँ दिपाए, मोनमाय से कर्म विलास के रहस्य को पद रहे हैं। एक ही विश्व प्रवाह में, एक ही प्रकृति के प्रान्तर में, बाम से लेकर एक ही मरणात फया में यह फर्म वैचित्र्य थपने चातुर्य का परिचय दे रहा है। विधाता का विधान प्रकृति का नाट्य, माया की गव्य विभूति यर में एक ही विचार काम कर रहा है । इस पेचिभ्य में व्यष्टिवाद के समान समटि. पाद को सता है। एक व्यक्ति का सत्यान और पतन जिस प्रकार समाज पर अपना प्रमाव थोर जाता है उसी प्रकार समाज का विकास और उसस नाश मी इतिहास का एक 'पराप्राम' है । यदि एक दूसरे में सम्बद्ध है तो उमरा तीसरे से और तीसरा चौथे से । इसी प्रकार काल की तीव्रगामिनी सरिता में व्यक्किल का, समाज का, देश फा और सखार का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ रहा है। वैविध्य ही ससार का प्रकरण है। जो दो जातियाँ एक ही दिशा मेचती, एक ही प्रकार के वातावरण में पली, ये भी अतमें भिन्न परिणाम वाली दिखाई देती है। भारत के महिमान्वित पर्जर और राष्ट्रक्ट उसी गति से चचे जिस गति से योरोप के फ्रेंच और जर्मन । कितु दोनों में पारश पाताल का अन्तर पड़ गया। उन गुर्जर और राष्ट्रकूटों का पाज पता तक नहीं, परन्तु इसके विरुद्ध फ्रेंच और ।

जर्मन अभी तक जीवित जागृत जातियाँ हैं । सातवां आठवीं सदी में अरव लोगों के प्राममण से जिस प्रकार सिन्ध का धघ पतन हुमा, ठीक उसी प्रकार ईसाइयों के गढ़ कुस्तुन्तुनिया पर तुकों का आक्रमण हुआ । सिन्ध पाज तक भी अपनी रक्षा करने में समर्थ न हुआ, कि तु योरोप ने तुर्को से बदला ले लिया । इस घटना में कितना साम्य है और कितना वैषम्य ? . परन्तु इतना तो माना ही पड़ेगा कि देश, काल और अवस्था के भेद से योरोप का व्यक्तित्व सिन्ध के व्यक्छित्व से भिन्न था । यदि एक जाति देश प्रिय थी तो दूसरी आलस्य प्रिय, रूढि प्रिय । यदि एक का समाज यगठित था तो दूसरी का असगठित, उच्कृष्टल, भाडम्बर पूर्ण । भारत के हिन्दुत्वनाश का कारण इतिहासज्ञ चाहे जो कहें, मुझे तो इनका विवेचनाशून्य अध्यात्मवाद ही मालूम होता है । इसी स्वार्थपूर्ण परलोकवाद ने हिन्दू और बौद्धों के जातीय अंगों में यक्ष्मा का रूप धारण कर उन्हें किसी काम का न छोड़ा। हमारी जातीयता में धर्म वाद की निकम्मी, योथी रूढियों ने हमें विवेक से गिरा दिया, मनुष्यत्व से खींचकर दासता, भ्रातृविद्रोह, विवेकशून्यता के गदे में लेजाकर पीस दिया। आज जिस नाटक को लेकर में हिन्दी समार के सम्मुस उपस्थित हो रहा हू उसमें भी इसी प्रकार का इतिवृत्त है, यही गाथा है । इसमें यदि एक और वीरता है तो उसी के शक में छिपा हुश्रा पशुत्व अपना ग . . अकाण्डताण्डव दिखा रहा है। यदि एक जगह देश प्रेम का उत्कट श्रादर्श है तो उसी के दाएँ बाँए, नीचे ऊपर, छल, कपट और नीच वासना रूप सौंपनी अपनी विषाक्त जीभ लपलपाए देश प्रेम को चाट डालना चाहती है। अपनी अपनी ढफली और अपना अपना राग है । उस समय भारत की क्या श्रवस्था थी, लोगों में कितनी आपाधापी थी, कितनी मूर्खता थी, कितना स्वार्थ था, कितना द्वेष था । प्रजा का राजा पर अविधास था, राजा लोग प्रजा को पीस डालना चाहते थे। श्राखस्य, अविवेक, अकिंचनता किस प्रकार अपने विनाशक मद से साधारण जन समाज को, साधुओं को अस्तित्व हीनता ब पाठ पढ़ा रही थी । हमने सदा ही धर्म से प्रेम करना सीखा है । धर्म की रक्षा के लिये हिन्दुओं ने जितना त्याग किया है, उतना और वैसा त्याग शायद आज ससार की किमी जाति ने न किया होगा । परन्तु हमारे मस्तिष्क द्वारा देश प्रेम की भावना शायद् कभी उठी ही नहीं ऐसा मेरा विश्वास है। हमें अध्यात्मवादी धर्म के अतिरिक्त लोकधर्म की, जातीयता की किसी प्रन्थ में सर्वोपरि शिक्षा दी गई है, ऐसा विश्वास करने को सहज ज्ञान गवाही नहीं देता। श्रात्मा और परमात्मा के सिंहासन से हम कमी नीचे नहीं उतरे। हमने सदा ही प्रत्यक्ष का अपलाप किया है, सदा हो वास्तविकता से दूर रहने की चेष्टा की है। जिन दो चार महापुरुषों ने अपने अमूल्य आत्मबलिदान के द्वारा हममें देश प्रेम की भावना पैदा की, हमने (साधारण जन समूह ने) उसका सदा तिरस्कार किया । भाज हमारे प्राचीन साहित्य में ऐसे कितने प्रथ हैं, जिनसे समाज ने ।

स्वतन्त्रता के चरमोत्कर्ष को समझा ! हमारा साहित्य या तो आनन्द और पाशवित कला का साहित्य है या फिर कोरा रूढिवादी। इस नाटक में भी पाठक को उसी रूढिवाद, उसी कल्पनावाद, उसी भाववाद की झलक दिखाई देगी। बौद्धों और हिन्दुओं का गौतमीय वाचार (छल) इसमें प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देगा। राजनीति की दृष्टि से सिन्धनाश में थरवों का रत्ती भर भी दोष नहीं है । और न कोई व्यकि इस मामले में किसी आक्रमणकारी को दोषी ठहरा है। सकता है, कारण कि सम्पत्तिवाद की सदा से प्रधानता रही है। इस दृष्टि से यदि एक देश दूसरे देश पर आक्रमण करता है तो उस में आवर्य किस बात का ? आज यदि इस विज्ञान के युग में सम्पत्तिवाद की प्रधानता है तो उस समय सम्पत्तिवाद अपने यौवन काल में था । उस समय सम्पत्तिवाद में धर्म का अश भी मिला हुआ था। जहाँ आक्रान्ता मुसलमानों में सम्पत्ति की इच्छा थी, वहाँ उनमें अन्धविश्वास भी अधिक था। मुसलमानों के विजयी और जीवित रहने का कारण उनकी जातीयता है, धर्म बढ़ाने की उत्कट भावना भी। इसी ने मुसलमानों को आज भी जीवित रक्सा है, अन्यथा आक्रमण के क्रीडादत्र भारत में अब से पहले सभी जातियाँ हिन्दू बन गई। जिस जाति की रगों में अपने देश और अपने समाज के प्रति अटूट श्रद्धा भरी हुई हो, वह जाति कभी दूसरी जातियों से नहीं मिल सकती। वह जाति कभी विजित जातियों के दृष्टिकोण को अपना नहीं बना सकती । उसके जीवन में तत्कालीन हिन्दुत्व ने च्यवनप्राश का काम दिया। वहीं सर पातों का दिग्दर्शन कराने के लिये यहाँ पर सिन्ध की इतिहास सामग्री देना भी अगुपयुक्त न होगा । यात यह है सिन्ध का इतिहास कुछ खास विशेषज्ञों की पुस्तकों के अतिरिक्ष श्राज बहुत कम लोगों को ज्ञात है । श्राज क्ल विद्यार्थियों को पढ़ाई जानेवाली पुस्तकों में तो सिघ का इतिहास बहुत कम तथा नाममात्र को है। सक्षिप्त इतिहास-ईसा की छठी शताब्दी में सिन्ध में देवाजी के घशजों में साहसीराय नाम के अन्तिम राजा हुए । इनकी राजधानी सिन्धु नद के पूर्वाय किनारे पर थी उसका नाम था थलोर * । इसे आज फल 'रोडी' कहते हैं । साहसराय बौद्ध कितु ब्राहाण राजा थे। इनके प्रधान मन्त्री का नाम था चच । यह बड़ा बुद्धिमान और नीतिकुशल मन्त्री था। इसके मनित्व में साहसीराय ने बगदाद के खलीफाओं को कई बार पराजित किया। साइसराय की मृत्यु के बाद चच ने राजगद्दी पर अपना अधिकार कर लिया। जिन लोगों ने इसका विरोध किया उन्हें इसने ख्य दवाया । न मालूम किस कारण से इसने वहाँ की पुरानी जाति, तोहानों, जाटों और गूजरों को पदच्युत करके इहें नाचे गिरा दिया। सेना में उनका कोई अधिकार न रहने दिया । सभा में उनके बैठने का कोई अधिकार न रह गया । घर के बाहर उन्हें नगे सिर, नगे पावो चलने की आज्ञा * कनिहम साहब ने अलोर के सम्बन्ध में खोज करते हुए लिखा है कि अलोर इसका पुराना नाम था। उन्होंने 'रोर' शब्द से अलोर की कल्पना की है वस्तुत अलोर नाम है पुराना । अलतेन्द्र के प्रारमण के समय भी स्ट्रैयो तथा एरायन नामक भूगोल पण्डितों ने इसका नाम 'अलोर' ही बताया है। , - दी गई। लकड़ी ढोना भर उनका काम था । इस प्रकार क्षत्रियों की संज्ञा से गिरा कर उन्हें पूरी तरह समाज च्युत तथा पद च्युत कर दिया गया। कदाचित् इसका कारण यही होगा कि इन लोगों ने स्वर्गीय साहसीराय की गहो पर चच को घेठने देने में विघ्न खड़ा किया हो। इसके बाद उसने साहसीराय की विधवा रानी से शादी भी कर ली । इसी वीर चच ने खगभग चालीस साल तक राज्य किया। इसके समय में भी अरवियों के आक्रमण हुए किन्तु उनकी एक न चली । चब ने बड़ी वीरता से शत्रु के दाँत खट्टे कर दिये। ६३७ में चच की मृत्यु हो गई। चच के बाद उसका माई चन्द्र गद्दी पर बैठा । इसने लगभग सात साल तक राज्य किया । यह बौद्ध विचारों का था। चीनी यात्री नसांग ने इसका वर्णन किया है । इसके सद ६४ में दार ने राजगद्दी संभाली । दाहर घड़ा प्रतापी, वीर और यशस्वी राजा या। चचनामे में, जो अरवियों के आक्रमण और उनकी बहादुरी में लिखा गया है, दाहर को सब जगह ' काफिर ' लिखा गया है। किन्तु इसकी पीरता को प्रशसा भी स्थान स्थान पर की गई है । दाहर के ही राज्यकाल में ७१२ में मुहम्मदविनकासिम का सिन्ध पर भयकर हमला हुया । जिसमें सिन्ध विघ्वस हो गया। कासिम ने दाहर की दोनों लड़कियों, सूर्यदेवी और परमालदेवी को बगदाद फे सलीका के पास भेज दिया। यहाँ उन दोनों की मृत्यु हो गई। इधर सम्पूर्ण सिन्ध पर मुसलमानों का प्रभाष जम गया । दाहर के लड़के जयशाह ने सिन्ध पर पूर्ववत् अधिकार करने के लिये बहुत कुछ दाय पर पोट किन्तु इसे कहीं से सहायता न मिली । बौद्धों ने समय पर धोखा दिया। यही इस कथा का अन्त है। नाटक की कला- क्ला इतना सूक्ष्मतत्व है कि मोटे तौर पर उसकी कोई परिभाषा हो ही नहीं सकती। यह अनुभूति का विषय है, प्रत्यक्ष या अनुमान का नहीं। किसी विशेष प्रकार के कौशल की निरन्तर साधना करते रहने पर जब उसके अग उपागों की विशेषता या सौन्दर्य की ओर हृदय आकृष्ट हान लगता है तब उस वस्तु के सवागं व्यापी सौन्दर्य को 'कला' के नाम से पुकारा जाता है। उस समय हृदय की उथल पुथल में मानसिक विचार-बीयी में वह कौशल एक दृश्यमान सी निश्चित सीमा बना बैठता है किन्तु होती वह इतनी सूक्ष्म है कि उसका कोई लक्षण नहीं किया जा सकता। अव्याप्ति एव अतिव्याप्ति दोष फिर भी उसे घेरे ही रहते हैं । नायकला का भी यही हाल है। हृदय की वर्गाभूत चेतनामों का, मानवीय राग द्वेष के द्वन्द्रों का, आशा और निराशा का, भावुकता और क्रूरता का, सुख और दुख का, प्रतिचित्रण और ऐसे विचार फी अवतारणा जिस कला के द्वारा हो, कदाचित् उसे ' नाट्यकला' के नाम से पुकारा जा सकता है। वैसे तो कला असीम है, अननुमय है और प्रतयं है। इसीलिये उसैस सम्बद्ध नाट्यकला भी असीम है, भानुमेय है और अतर्थ है । जैसे सुख की प्राप्ति एव सुखान्त अभिलाषा नाट्यकला की एक सीमा है, वैसे ही अनन्त चिन्ता, वियोग, वेदना और विषाद की वजकीलित रेखा भी उसकी एक .

ज परिभाषा है । अर्वाचीन युग के कतिपय नाट्यकारों ने अपूर्णता, कथा के एक भा को भी नाव्यकला में अभीष्ट स्थान दिया है। जब विश्व में घिरी हुई बादलों की घटाएँ झमावेग से ममक कर धरा की अभिलाषा को पूर्ण किये बिना ही दूसरी दिशा को चली जाती है, जय अकाल में ही कलियों की मृत्यु हो जाती है, जब श्राशा के मन्दिर में विहार करने वाले यात्री को अपने दिल पर पत्थर रख कर, अभिलाषाओं का सून कर के, उन्हें अधूरा छोड़ कर अनन्त की ओर लौट पहना होता है, तव अपूर्णता नाट्यकला का श्रग क्यों नहीं बन सकती ? अपूर्णता मी कला है। वही टीमों और और आहों के श्राकाश में हसरतों और अमि लापानओं के मेघ झूलते हैं, अतृप्ति की बिजली कड़कती है और अपूर्णता का अभिनय होता है । कदाचित् इसी प्रकार की अपूर्णता को लेकर योरोप के कुछ नाट्यकारों की कला प्रादुर्भूत हुई है । फलत क्ला के इन अगों पर मैं अधिक न कह कर इतना ही कहूँगा कि प्रत्येक चरिनचिनण में, स्वाभाविकता का त्याग न करते हुए नाटकीय कलाओं का आविर्भाव होता है। वस्तु, पान, घटना कथोपकथनादि में माटकीय कला सन्निहित रहती है। स्वागत और आकाश भाषित नाटक के आवश्यक अङ्ग नहीं हैं। सूत्रधार और नान्दी, विष्कम्भक और पूर्वरंग भी चौदहवीं सदी की तरह एक ही दृश्य में समाप्त हो गये हैं। वस्तुत प्रकरण की अपेक्षा नाटक कठिन है। नाटक में ऐतिहासिक तथ्य का सम्मिश्रण रहता है । इतिहास वस्तु नाटक की जान है यद्यपि लिखने का कदाचिन् मेरा यद प्रथम प्रयास है। मुफ मालूम है कि सस्थत साहिय में सयोगान्त नाटक लिराने की प्रथा रही है। यहाँ तक ई नाटककारों ने ऐतिहासिक अन्तिम तथ्य की रक्षा करते हुए उसके प्रकारों की अवहेलना भी कर डाली है और ऐसा होना स्वाभाविक भी है। कल्पना के क्षेत्र में इतिहास छोटे की तरह चूमता है । जहाँ कहीं उसे निगल कर फेंक देना पड़ता है वहाँ केवल फला को रक्षा के लिये। मैने इस नाटक में एतिहासिक तथ्य की पूर्णत रक्षा की है ऐसा दावा तो मैं नहीं कर सकता । उसका कारण एकमात्र यही है कि किसी भी इतिहास में फल के साधनों का, पूर्वरूपों का, विस्तृत विवेचन नहीं होता। नाटककार को वस्तु का आधार लेकर कल्पना की पूची से नाटक रूप चित्र में उत्थान और पतन के रग भरने पड़ते हैं। ऐसा ही मैंने भी मुझे विक्रमादित्य नाटक के बाद वियोगान्त नाटक की वस्तु के लिये धिन्ध का इतिहास बहुत ही आकर्षक प्रतीत हुआ। जिस समय मैंने सूर्यदेवी की प्रतिहिंसा अमि में कासिम को जलते देखा, उस समय मुझे भारतीय स्त्रियों में चमकती हुई यही सान्ध्यलालिमा दिखाई दी। यदि थान भारतवर्ष की नारियों सूर्यदेवी की क्या को जान पाती तो आये दिन के अपलाप से अपना रक्षा कर सकती। उनमें हिन्दू जाति, हिंदुस्तान के लिये वास्तविक अभिमान होता। यह वियोगान्त नाटक है। हिन्दी साहित्य में वियोगान्त नाटक किया है।

. कि उत्तररामचरित की कथा वस्तु को तोड़ मरोड़ कर भवभूति ने उसे सयोगान्त बना डाला। इसका कारण कदाचित् भारतीय दर्शनों का पुर्नजन्म सिद्धान्त और मुखप्राप्ति ही है । दुस में धानन्द की भावना का विचार हिन्दुओं को कमी अपनी ओर खींच सका । 'दुख से मुक्छि' ही इनका सिद्धान्त रहा है । तदनुसार लौकिक विश्वासों में भी यहाँ की दर्शकमण्डली उसी आस्था के अनुकूल बियोगान्त नाटक की कल्पना करने में असमर्थ सी रही है । इधर पायास साहित्य में दोनों ही प्रकार के नाटक लिखे गये। योरोप में सयोगान्त नाटफ दर्शकों को इतने आकृष्ट न कर सके जितने वियोगान्त नाटक । इसके अलावा वियोगान्त नाटकों की रचना भी कुछ सयोगान्त नाटकों से अच्छी हुई। शेक्सपीयर के वियोगान्त नाटक ही सब से सुन्दर और अच्छे माने जाते हैं। इस कोटि के नाटकों का प्रभाव दर्शकों पर देर तक रहता है । पात्रों की विवशता उन्हें अपनी ओर खींचे रहती है। नाट्याला का जो वास्तविक तत्व है यह वियोगान्त नाटकों में ही प्रतिफलित होता है । सयोग की कल्पना तथा उसका सुस ससीम है उसमें अनुभूति को बहुत हाथ पैर नहीं मारने पड़ते, परन्तु वियोग की अनुभूति मनुष्य को तन्मय बना देती है। किसी ने ठीक ही कहा है- सगमविरहविकल्पे वरमिहविरहोनसगमस्तस्य (नाटकस्य) सगे तत्तु तयक निभुवनमपि तन्मय विरहै । (परिवर्तित) शायद यही वजह है कि पश्चिमीय साहित्य में वियोगान्त नाटकों का बहुत ऊँचा स्थान है। - ट है वियोगान्त नाटकों की रचना न होने पर भी सस्कृत और हिन्दी साहित्य में विप्रलम्भ मृगार का वर्णन इस बात का सब से बड़ा प्रमाण कि वियोगान्तवस्तु का प्रभाव चिरस्थायी एव शाश्वत होता है। मुझे इस नाटक की ऐतिहासिक सामग्री तैयार करने में सनातनधर्म कालेज, लाहौर के इतिहासाध्यापक प्रोफेसर गुलशनराय पी ए. एल एल वी महोदय से अधिक सहायता मिली है एतदर्थ में हृदय से उनका आभारी हूँ। लाहौर। २५ दिसम्बर, १६३३ उदयशङ्कर भट्ट -nasama- श्रीठिया का प्रधान बीकानेर।

पात्र सूची दाहर सिन्ध का नृपति जयशाद दाहर का पुन पत्सराज शिवस्थान का सामन्त पलीफा यग्रदाद का नृपति हजाज़ पलीफा का वज़ीर शानयुद्ध देवल का सूयेदार मानू देवल फा सेनापति ( पूर्व डाकू) सिलवन चौद्धभिक्षु सागरदत्त (पूर्व डाकू) रसिल मोक्षवासव का भाई, बेन का सेनापति मोक्षवासव चेन का सामन्त अब्दुल्ला खलीफा का प्रथम सेनापति मुहम्मदबिनकासिम खलीफा का द्वितीय सेनापति मुहम्मद हारून मकरान का सूबेदार क्षपाकर दाहर का मन्नी साधारण पान देवकी, मधुमा, कचुकी, सशयचन्द्र । स्त्री पात्र लाड़ी दाहर की रानी सूर्यदेची दाइर की कन्या परमाल दूसरी कन्या -

श्रोसेठिया जन प्रथालय।
बीकानेर।
पहला अंक
पहला दृश्य
स्थान-देवल का राजपय ।
(दो टाकुओं का प्रवेश)
मान-(सुशी से रुपयों की पोटली उछालता हुया) हाहा हाहा,
तलवार की नोंक पर शत्रुओं को उछालकर नाचते हुए मुझे
कितना सुख मिलता है, आग की चिनगारियों में उडकर
चट चट करते मास के टुकड़ों का शहार करने में मुझे सत्र
कितना भानन्द मिलता है, भोलामुख,'हसते हुए और
ठण्डी सॉस लिये सोते हुए बच्चों को बर्ची के ऊपर उछालकर
सनसनसनाती हुई तलवार से खटपट करके दो टुकडे करने
में तो मानो मेरी चिर इच्छाएँ वल्लियों उछल पडती है।
घाह, कैसा भानन्द श्राया ।
सिलवन-बहुत उछला पड़ता है रे, जानता है मैंने भी
तो फन
फन करके कटने के दर्द से डकराती ओर आहों की
चिनाति
.
मोडीगोड़ी

1
दाहर
[पहला
धूम्रमाला में विद्यार करती मुई शत्रु स्त्रियों के आँसुओं की
एक एक बूंद से मानो असरय संपत्ति पाई है। और पिछली
लड़ाई में उन भरवियों को सट सट करके फाटते
मानो
मेरे हाथों में हनुमान का बल आगया था।
मान-मूर्स कहीं का, शत्रु फे शरीर की एक एक किर्च ।
जर मेरी किर्च से नहाई तर उस हाहाकार में मेरा हृदय
आनन्द का अट्टहास कर रहा था। (सलवार घुमाकर) अरी,
तभी प्यासी है ? फॅसने दे कोई और शिकार, तेरी प्यास
बुझा दूंगा। (चूमता है)
सिलबन-पर भाई, साफ बात तो यह है कि मेरा जी
अव डाकू के काम से उचट सा गया है। मैं कहने को तो
सब कुछ करता ही हूँ, पर तैसे कोई मुझे भीतर ही भीतर
टोच रहा हो। क्या किया जाय, पर अब मुझसे यह न होगा।
हो मानू-एक्खा, जैसे कोई भीतर ही भीतर टोच रहा
हो । क्या सुर्व, मानो मैं तुम्हारा गला घोटकर माल मता
छीन रहा होऊँ, क्यों न?
सिलबन-(ढाँटकर) तुझे हंसी सूझी है। तू अभी जवान
है, जव सलडी ढीली होगी, ताक़त सोती हुई नजर अावेगी,
साहस सहमता दीपेगा, तब तुझे ये मेरी याते सूझेगी।
चाहे जो कुछ हो मुझसे यह सब न होगा।
।

एश्य]
पहलायक
।
मान्-यह ओर भी रही। क्या दार कभी कमज़ोर भी
होते है! अरे सिला, डापयों के जीवन में यहादुरी कूट
स्ट कर भरी हुई है। हिम्मत के सहारे ये यासमान उधेप
सकते हैं, लोहे के फटघरों को दाँतों से चया सकते हैं। और
तो मैं कुछ जानता नहीं, दस बीस आदमियों से तो मेरी
अकेली तलवार दी पिलवाट फर सकती है। यह न समझना
कि हम कोई रुपयों के पीछे लोगों को लूटते हैं। नहीं, भाग
में फदकर उसके अँगारों से प्रेतना जो पसन्द करता है,
इस विपत्ति से लोहा ले सकती है, मौत से अठोलियाँ फर
सकता है। यही असली डाकू है।
नेतलता (एक मादमी का भाना)
आगन्तुक-अरे मान, ओ मानू, चल सरदार बुलाते है।
मानू-चुप, गधा फही का, मानू का भी कोई सरदार है?
यह तो स्वय सरदार है। अदद, सिलवन, डाक का भी कोई
सरदार होता है ? हा हा हा !
सिलवन-(अनसुनी करके) में अब तक भूता ही रहा।
हाय, हजारों हत्याएँ की, यकरी और भेड़ की तरह मनुष्यों
का सून यदाया ! हाय, मेरे ऊपर कितना पाप लदा
हुधा है!
मान-उन धूर्त, म्लेच्छ व्यापारियों को तो देखो। हमारे
स्लेच्छ
दरत

1
R
दाहर
[पहला
PSI धूम्रमाला में विद्यार करती हुई शत्रु नियों के ऑसुओं की
एक एक वृंद से मानो संरय सपचि पाई है। और पिछली
लड़ाई में उन थरवियों को खट सट करके काटते हुए मानो
मेरे हाथों में हनुमान का बल प्रागया था।
गान-मूर्ख कहीं फा, शत्रु के शरीर की एक एक किर्च
जर मेरी किर्च से नहाई तर उस हाहाकार में मेरा हृदय
र श्रानन्द का अट्टहास कर रहा था। (सलवार घुमाकर) अरी,
तू भी प्यासी है ? फॅमने दे कोई और शिकार, तेरी प्यास
युमा दूंगा । (घूमता है)
सिलवन-पर भाई, साफ बात तो यह है कि मेरा जी
नहातालाप
प्रय डाक के काम से उचट सा गया है। मैं कहने को तो
सब कुछ करता ही हूँ, पर से कोई मुझे भीतर ही भीतर
टॉच रहा हो। क्या किया जाय, पर अब मुझसे यह न होगा।
हो मान-पुसा, जैसे कोई भीतर ही भीतर टोच रहा
हो । क्या सूध, मानो मैं तुम्हारा गला घोटकर माल मता
छीन रहा होऊँ, क्यों न
सिलयन-(डॉटकर) तुझे हॅसी सूझी है। तू अभी जवान
है, जब खलड़ी दीली होगी, ताकत सोती हुई नज़र आवेगी,
नयभारसाहस सहमता दीपेगा, तब तुझे ये मेरी याते सूझेगी।
होता चाहे जो कुछ हो मुझसे यह सब न होगा।
?

पदसायफ
-
।
गार--यह और भी रही। क्या दाह कमी कमजोर भी
होते हैं। परे सिलया, डासुओं के जीया में यहादुरी फूट
इट कर भरी हुई है। हिम्मत के सहारे ये यासमा उधेड
सकते ६. लोहे के फटयरों को दौता से चया सकते है। और
तो में फुष जानता नहीं, इस पीस पादमियों से तो मेरी
अपेली तलपारी पिलवार फरसपती है। यह समझना
कि हम कोई यपयों के पाले सोगों को लूटने हैं। नहीं, माग
में फुदकर उसके अंगारों से रोराका जो पसन्द करता र
लपति से लोहा ले सकती.., मौत से अटोलियों पर
सफ्ता पदी असली टाए है।
संतो (एक मादमी का माना)
मागन्तुक-भरे मान, ओमान, घल सरदार घुलाते हैं।
मान-सुप, गघा पदों फा, मान का भी कोई सरदार है?
यह तो स्वय सरदार है। अदद, सिलयन, डाकू का भी कोई
सरदार होता है? दादादा!
सिनपन-(धनमुनी करके) में श्रय तक भूला ही रहा ।
हाय, हजारों इत्याएँ की, यकरी और भेष्ट की तरह मनुष्यों
फा सून यदाया ! दाय, मेरे ऊपर
केतना पाप लदा
मार--उन धूर्त, म्लेच्छ व्यापारियों को तो देखो। हमारे
बनत

7147
४
दाहर
पहला
ऊपर दी जबरदस्ती। हमारी बहू बेटियों को ही बदकाने का
यत, जल में रहकर मगर से वैर, हमसे ही आदर पाकर
हमारे देश में यह अनाचार' (ोध से दाँत पीसकर ) हमने
भी उसका भरपूर यदला लिया। धूर्त, दुष्टों को अपनी
छतमता का पूरा पूरा प्रायश्चित्त करना पड़ा । शत्रुनों के
खन से उनके जहाज को रंग दिया। यह तो कहो कि सरदार
ने उनमें से कुछ को ठोड़ी रगड़ कर क्षमा मांगने पर केवल
फैद भर कर लिया, नहीं तो एक एक यादमी से एक एक
दुर्व्यवहार का पूरा बदला लिया जाता । किन्तु नहीं, म इन
यवनों से पूरा बदला लूंगा।
'आगन्तुक परे माने, चल, सरदार घुला रहे है।
।
मानू-अच्छा चल, (जाता हुमा) मुझे ये सरदारी
फरदारी ठीक नहीं ऊँचती। डाकू का कोई स्वामी नहीं हो
सकता। यह उग्रता का अवतार, धीरता का श्रृंगार और
ऋरता का उद्गार है। देखो न, श्राज कैसा मजा आया ।
बहुत दिनों की प्यास बुझ गई ( खड़ा होकर उस धादमी से)
जा, मैं नहीं जाता।
आगन्तुक-अरे इतना अभिमान, सरदार बुलावें और
तून
चले । अच्छा ठहर-(मान को पकडता है दोनों ओर से तलवारें
सिंच जाती है लड़ाई होने लगती है। सरदार का प्रवेश)

दृश्य
पहला प्रक
५
सरदार-मानू यह क्या ? (दोनों अलग हो जाते हैं)
आगन्तुक-श्रापके बुलाने पर भी यह नहीं आ रहा था
सरदार !
सरदार-समझ गया। में जानता है यह बड़ा वीर है
और ढीठ भी।
मान-डाकुओं का कोई सरदार नहीं होता। मान् श्राज
से किसी को अपना सरदार नहीं मान सकता।
सरदार-(प्रसन्न होकर ) ठीक है ऐसे ही लोग डापने
की रक्षा कर सकते हैं। किन्तु मानू , यिना नेता के कभी
सफलता नहीं मिल सकती। दस्युओं की भी एक वृत्ति है,
उनका भी एक समाज है और उसके भी कुछ नियम है, उन
नियमों को पालने से डाकूपन की रक्षा हो सकती है। में
जानता हूँ तुम वीर हो, फिन्तु घृत्ति की रक्षा के लिये एक न
एक मुखिया की आवश्यकता तो है? शा
मामू-साफ बात तो यह है कि जबसे तुमने राजा दाहर
की अधीनता स्वीकार की है तब से मेरे शरीर में असरयों
बिच्छुत्रों के काटने की सी पीडा हो रही है। हम लोग डाकू
है। हमारे लिये राससमाज, राननियम नहीं हैं।
सरदार-तुम नहीं जानते कि हमने अधीनता क्यों
स्वीकार की हमारा छोटा सा टापू है । महाराज दाहर के
पिता महाराज चच ने हमारी लूटपाट से ऊब कर एक बार

६
दाहर
[पहला
इस टापू पर हमला किया। मेरे पिता के हार जाने पर भी
प्रसन्न हो महाराज ने यह टापू हमें देकर प्रतिज्ञा करा ली
कि हम लोग सिन्ध पर कभी हमला न करेंगे। आज
उसी के अनुसार हम लोग सिन्ध की फिसी मजा
पर अत्याचार नहीं करते। हॉ, अरब सागर में जो जहाज़
जाते पाते हैं उन्हीं को लूटना हमारा काम है। उस सन्धि
के अनुसार महाराज दाहर हमारे किसी बाहरी शनु को
लूट लेने पर भी हमारी रक्षा करने को बाध्य हैं। यही कारण न
है कि कई बार अरपियों के जंगी येई, जो हमारे ऊपर
आक्रमण करने आये समुद्र में दुचा दिये गये । प्राज जिन
शत्रुओं को उनकी दुष्टता का दण्ड देते हुए हमने लूटा है,
उनसे प्राप्त सामग्री को लेकर महाराज की सेवा में सूचना
देने के लिय तुम्हें जाना होगा। मानू, तुम इस काम के लिये
तैयार हो न?
मान-समझा, सब समझ गया । एक डाकू को यहे
डाकू के पास जाना होगा।
सरदार-चुप, महाराज को डाकू कहते हो?
मान-सरदार, राजगद्दी पर बैठनेवाले सभी लोग
डाफू है। उनमें और हममें सिर्फ इतना ही फल है कि
उन्होंने डाका डाल कर अपना राज बना लिया है और
हमने नहीं। जब एक राजा किसी देश पर हमला करता

दृश्य
पहला अंक
है तो उसका काम है पहले राजा के लोगों को मार पर
अपना रोय जमाना, उन्हें पुचल कर अपने भादमियों को
इकट्ठा करना और सजा, सेना आदि हथिया लेगा फ्या
यह साफा नदी है।
सरदार-दोगा, हमें इन यातों से कोई सम्बन्ध नहीं।
फिन्तु मान् , तुम क्या जानो, महाराज दादर फितने प्रजा
रक्षक, पानी और बीर हैं। उनके राज्य में शरीर यफरी
एक घाट पानी पीते हैं। जागे, (थैली देत हुए) यह
धेली भेंट करते हुए हमारी तरफ से महाराज को प्रणाम
करना। याज के भरपियों की लूट का सय हाल सुना देना।
(दौड़ते हुए एक भादमी का पाना)।
भागतुक-सरदार, अजय हो शत्रु थपना जवाज़
लेकर रात को भाग गये। उन्होंने सिपाहियों को यहका
कर अपना रास्ता निकाल लिया!
सरार-हे, यह पुरा हुआ? मान्, यह बात भी महाराज
से कद देना, यह तो बुरा हुश्रा! (सय इसी सोच में खपे रहते हैं)
पटपरिवर्तन

दूसरा दृश्य
( महाराज दाहर प्रासादोद्यान में मन्त्री के साथ बैठे हैं)
दाहर-कहीं सत्यरूप से स्पष्ट, कहीं असत्यरूप से
अस्थिर, कहीं कोमलाहिनी चीरागना के समान छल से भरी,
समय के उलटफेर में, हिंसा की उग्रता में, दयालुता के
श्रॉचल में, स्वार्थ की गोद में, उदारता की नोट में, धन
रन के प्रलोभन में राजनीति सदा अपनी साधना में जुटी
रहती है। यह दूतों की ऑखों से न्याय के काग से, निश्चय
के मुस से, सन्देहभरे सकरप से सय का निर्णय करती है।
विनों से इसकी शक्ति घटती है। उग्रता इसका रूप है,
साहस भुजाएँ और पड्यन्त्र गति । अहा, राज्य शासन
भी कितना भयकर है। विधाता के विधान की तरह इसका
रहस्य से भरा व्यापार है। मुझे ही देसो, सय की इच्छा
पूरी करने पर, प्रजा को प्राणों से अधिक पालने पर भी कौन
कह सकता है कि प्रजा मुझसे पूरी तरह सन्तुष्ट ही होगी!
न्याय की कठोरता से झुलसकर कुछ लोग अपने आप ही
राज्य के विरुद्ध हो जाते हैं, क्यों मन्त्रिन् ठीक है न?

पदला अक
हा
-
सपाकर-महाराज, सत्य है । यस्तुत सय लोगों को
प्रसस किया दो नहीं जा सकता और उस समय तो और
भा, जय छोटे छोटे राजाओं का राज्य हो । महाराज,
मुना है येन का सामन्त मोक्षवासय भीतर ही भीतर मदा
राज से डेप रखता है?
दाहर-फ्या, मोक्षासय हम मे उप क्यों रखता है?
चपापर-नाथ, मैं फेवल इतना ही जानता हूँ कि समान
विभूति के लोग डाद के वश में क्षेकर अपनी हीनता को
आत्मदर्प फे दर्पण में देखते ही व्याकुल हो उठते हैं । यही
कुछ कारण होगा और क्या? आपकी दया का अनुचित
लाभ उठाकर उसने कौरवों का अनुकरण किया है !
दाहर-इसका क्या कारण हो सकता है?
पपाकर-पापका वैभव, उसके ऊपर श्रापकी कृपा और
स्नेह।
दाहर और भी
आपाकर--नाथ, दूतों से सुना है कि यह पेन राज्य को
स्वतन्त्र करना चाहता
दाहर-हमने पिछले वर्ष अतिवृष्टि के कारण उससे कर
भी तो नहीं लिया था?

दाहर [दूसरा । . क्षपाकर-नाथ, अपराध क्षमा हो। आपकी नम्रता, दया से ही वह इतना उद्धत हो गया है। सिंह की दादों में असावधानी से लग जानेवाला फीडा भी उससे नहीं डरता। सूर्य का प्रकाश, जो सव को श्रानन्द देता है, उल्लू और कुमुद को नहीं सुहाता । चन्द्रमा अपनी शीतल फिरणों से संसार को प्रसन्न करता है, परन्तु कमल को अच्छा नहीं लगता । कॉटा उपेक्षा करके वाहर फेंक देने पर भी अवसर प्रात ही पैर में चुभ ही जाता है, यही उसका स्वभाव है। दाहर-हॉ ठीक है, प्रेम से पाला गया व्याघ्र भी तो हाथ चाटता हुआ रुधिर पीने के लिये स्वामी पर आक्रमण कर ही बैठता है। इसका उपाय- (प्रतिहारी का प्रवेश) प्रतिहारी-जय हो पृथ्वीनाथ, देवल के टापू का एक श्रादमी प्रार्थना के लिये वाहर सड़ा है। दाहर-देवल के टापू का आदमी' क्यों क्षपाकर, फिस लये श्राया होगा? पाकर-कोई लूटपाट की वात होगी । -(प्रतिहारी से) आने दे। (प्रतिहारी का प्रस्थान और मान् का प्रवेश) मान-(राजवैभव देखकर) अहा, अय समझा, राजा दाहर-

पहला श्रक
और
दृश्य]
डाकू में जीवन की दिशा का अन्तर है, उद्देश दोनों का
एक है। (सामने जाकर) जय हो महाराज की!
दाहर-(ग ढग से उस व्यक्ति को देखकर ) तू कौन है ?
यहाँ कैसे आया १ ऑखें फाड़ फाड़ कर क्या देख
रहा है?
मानू-महाराज, मैं यह देखता हूँ कि एक डाकू और
राजा में क्या अन्तर है?
--(प्राश्चर्य से) क्या अन्तर है?
क्षपाकर-( उस भादमी की ढिठाई पर क्रोधित होकर ) मूर्ख,
राजदरवार के नियमों का पालन कर।
मानू-अत्याचार के पर्वत पर रखे हुए सोने के सिंहासन
पर राजा बैठता है और खून की कीचट्ट से सूखी हुई सिल
पर डाकू।
दाहर-थरे निठल्ले, क्या तुझे राजा का इतना ही फर्तव्य
मालूम हुश्रा'
मानू--और भी होगा, पर म तो इतना ही जान पाया हूँ
महाराज!
दाहर-तू बडा निडर है । यता, किस लिये आया है ?
मान-(थैली सामने रख कर) महाराज, सरदार ने यह
थैली भेंट करते हुए कहा है कि अरयियों के जहाज़

. दादर [दूसरा सब को . क्षपाकर-नाथ, अपराध क्षमा हो । श्रापकी नम्रता, या से ही यह इतना उद्धत हो गया है। सिंह की दादों में नसावधानी से लग जानेवाला कीडा भी उससे नहीं रता। सूर्य का प्रकाश, जो अानन्द देता है, उल्लू और कुमुद को नहीं सुहाता । चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों a संसार को प्रसन्न करता है, परन्तु कमल को अच्छा ही लगता | कॉटा उपेक्षा फरके वाहर फेंक देने पर । अवसर आत ही पैर में चुभ ही जाता है, यही उसका वभाव है। दाहर-हाँ ठीक है, प्रेम से पाला गया व्याघ्र भी तो हाथ टता हुमा रधिर पीने के लिये स्वामी पर भाकमण कर बैठता है । इसका उपाय- (प्रतिहारी का प्रवेश) प्रतिहारी-जय हो पृथ्वीनाथ, देवल के टापू का एक गदमी प्रार्थना के लिये याहर सड़ा है। दाहर-देवल के टापू का श्रादमी ? क्यों क्षपाकर, किस लये आया होगा? चपार-कोई लूटपाट की बात होगी। दाहर -(प्रतिहारी से) आने दे। (प्रतिहारी का' प्रस्थान और नू का प्रदेश) मान-(राजवैभव देसकर) अहा, अब समझा, राजा दृश्य] पहला प्रक - दाँत गडाये बैठे है। किन्तु स्वर्गीय महाराजाओं के सामने उन्हें सदा मुंद की खानी पड़ी। महाराज, मुझे डर है कि की इस यहाने वे फिर थाम्रमण न कर बैठे। दाहर-आर्य लोग युद्ध से कभी नहीं डरते। युद्ध तो उनकी धुटी का रस है। जो कहा होते हुए भी अन्त में लाभदायक है। एक नहीं हजार चार अरवी लोग थायें। दाहर युद्ध से मुख न मोढ़ेगा। (ोध से) उन दुष्टों का इतना साहस कि अधीनस्थ टापू की स्त्रियों थौर पालकों को भगा कर ले जॉय ? (सोच कर) अच्छा हुआ, सरदार ने कोई भल नहीं की । यदि इस से अधिक दण्ड दिया जाता तो मैं अधिक प्रसन्न होता, क्षपाकर! -दीनबन्धु, दुष्टों को दण्ड देना ठीक है, यह उचित ही हुआ। किन्तु आजकल घरेलू झगड़ों में सिन्ध सब से बढ़ा हुआ है। आकाश में रहनवाले मेघ ही यदि सूर्य को ढक ले तो पृथ्वी उसकी गरमी से कैसे तप सकेगी? महाराज, इस समय बौद्ध, लोहान, जाट और गूजरों की अवस्था यहुत गिरी हुई है। कहा नहीं जा सकता, यदि युद्ध हुआ-- दाहर-मन्त्रिन् , तुम्हारा विचार ठीक है। यदि कीड़ा पुष्प को खा डाले तो ऑधी का झोंका उसे कैसे संभालेगा। चपाकर-

दाहर
[दूसरा
का कुछ सामान है।
दाहर-अरवियों का जहाज़ ?
क्षपाकर-अरवियों को फिर लूटा? सरदार ने बड़ी भूल की।
मान-महाराज , अरवियों का एक जहाज आँधी से
बचने के लिये हमारे बन्दरगाह पर श्राफर ठहरा । उसने
हमारी त्रियों को पकड़ कर जहाज के द्वारा भगा ले जाना
चाहा । इस प्रकार का स्त्रियों और बालकों को पकड़ भी
लिया। इस धूर्तता का समाचार जय भाग कर आये हुए
एक बालक से सरदार को मालूम हुधा तो अपने योधाओं
के साथ हमने जहाज़ घेर लिया। सरदार के द्वारा बालक
और त्रियों को लौटाने का श्राग्रह करने पर उन दुष्टों ने
हमें युद्ध के लिए ललकारा। इस पर घोर युद्ध हुश्रा । सरदार
ने उन कपटी व्यापारियों को लूट लिया। लड़ाई में पचासों
श्रादमी मारे गये । स्त्रियाँ हमने छीन ली । उनको
चन्दी बना डाला । बस, यही समाचार है। परन्तु उनमें से
कुछ लोग भाग गये।
क्षपाकर-महाराज, अनर्थ हुश्रा चाहता है !
दाहर-हूँ ! अनर्थ क्यों ? दुष्टों को दण्ड देना क्या अनर्थ
है ? (मानू से) यह ले जाओ, हमने सब कुछ जान लिया।
(मानू सिर मुकामर जाता है)।
क्षपाफर-देव, स्वर्गीय महाराज साहसी राय और
महाराज चच के समय से ये भरवी लोग हमारे देश पर
?

भय न था,
दृश्य]
पहला अक
शान्ति है, धर्म में शान्ति है, शान्ति के मूल स्तम्भों पर
इसका निर्माण हुश्रा है । यहाँ तक कि यह शान्तरूप भगवान्
बुद्ध से सजीवन पाकर भी ससार में राजधर्म का नाशक
सिद्ध हो रहा है। प्राचीन काल में जव शहरी शनुमों का
चौद्धधर्म भारत के लिये कितना ही हितकर क्यों
न हो, किन्तु इस समय तो यह केवल आडम्बर मात्र ही
रह गया है। इसके अतिरिक्त हमारा यह प्रान्त अरब की
नाक पर है। ऐसी दशा में कब क्या हो जाय यह कहा
नहीं जा सकता। दुर्भाग्य ने बौद्धों को अपनाकर ही शान्ति
लाभ नहीं की, उसने हिन्दुओं के चमकते हुए भाग्याकाश
में ऊँच नीच के वर्ण भेद का काला मेघ उभार कर अविवेक
का अन्धकार भी फैला दिया। स्वर्गीय पिता, तुम्हारे इस
प्रमाद का फल मुझे भोगना पडेगा। सिन्ध में जो धीर
जातियों थीं, उन्हें ऊँच नीच के भावों ने मसल कर
नष्ट कर डाला। हाय,
ये लोहान, जाट और गूजर जो
हमारे राज्य को शोभा, वीरता की मूर्ति थे, श्राज ऊँच नीच
के विचारों से पददलित हो रहे है। वीरता, शूरता, दृढता,
धीरज का श्रम उनमें नाम ही रह गया है। आज
राजनियमानुसार वे लोग रेशमी वस्त्र नहीं पहन सकते,
जीन कसे घोडे पर नहीं बैठ सकते, पैरों में जूते नहीं पहन
सकते, सिर पर पगड़ी नहीं बाँध सकते, पहचान के लिये

दादर
[दूसरा
क्षपार-नीति के अनुसार मोक्षवासव को अधीन
करना चाहिये।
दाहर-नीति के अनुसार साम से घोर आवश्यकता
पड़ने पर दमन से भी। मैं रसिल के द्वारा उसके
भाई पर नजर रगूंगा। यह योधा है, आज्ञाकारी है।
आज ही पत्र द्वारा रसिख को इधर बुलाना होगा।
क्षपाकर-अच्छा हो यदि येन का सेनापति भी रसिल
फो बनाया जाय?
दाहर-ठीक है, इस पर भी विचार किया जायगा।जाओ।
(छपाकर जाता है)
दाहर-वृक्ष को नाश करने के लिए अग्नि की अपेक्षा
जल का प्रवाह अधिक उग्न होता है। श्रत साम नीति भी
उपेक्षा करने योग्य नहीं है। (कुछ ठहर कर ) हमारे देश की
परिस्थिति भी बड़ी विचिन है। सारे प्रान्त में बौद्धधर्म ने
अपना अधिकार जमा रखा है। हिन्दुत्व तो नाममात्र
को रह गया है। सारा प्रदेश विहारों, भितुकों और मठा
धीशों से भरा है। कर्मचारियों में भी प्राय सभी बौद्ध है।
देखो न, देवल का सूबेदार ज्ञानयुद्ध यौद्ध ही है। बुद्धमत
परमार्थ और शान्ति का धर्म हो सकता है पर उसमें
राजनीति नहीं है। इसके वातावरण में शान्ति है, विचारों

पहला अंक
दृश्य]
में शान्ति है, धर्म में शान्ति है, शान्ति के मूल स्तम्भों पर
इसका निर्माण हुआ है। यहाँ तक कि यह शान्तरूप भगवान्
बुद्ध से सजीवन पाकर भी ससार में राजधर्म का नाशक
सिद्ध हो रहा है। प्राचीन काल में जब याहरी शनुओं का
भय न था, चौद्धधर्म भारत के लिये कितना ही हितकर क्यों
न हो, किन्तु इस समय तो यह केवल श्राडम्बर मात्र ही
रह गया है। इसके अतिरिक्त हमारा यह प्रान्त अरव की
नाक पर है। ऐसी दशा में कय क्या हो जाय यह फहा
नहीं जा सकता। दुर्भाग्य ने पौधों को अपनाकर ही शान्ति
लाभ नहीं की, उसने हिन्दुओं के चमकते हुए भाग्याकाश
में ऊँच नीच के वर्ण भेद का काला मेघ उभार कर अधिवेक
का अन्धकार भी फैला दिया। स्वर्गीय पिता, तुम्हारे इस
प्रमाद का फल मुझे भोगना पड़ेगा। सिन्ध में जो वीर
जातियों थीं, उन्हें ऊँच नीच के भावों ने मसल कर
नष्ट कर डाला । हाय, घे लोहान, जाट और गूजर जो
हमारे राज्य को शोभा, वीरता की मूर्ति थे, श्राज ऊँच नीच
के विचारों से पददलित हो रहे है। वीरता, शूरता, दृढता,
धीरज का भय उनमें नाम ही रह गया है। आज
राजनियमानुसार वे लोग रेशमी वस्त्र नहीं पहन सकते,
जीन कसे घोडे पर नहीं बैठ सकते, पैरों में जूते नहीं पहन
सकते, सिर पर पगड़ी नहीं यॉघ सकते, पहचान के लिये
.

दाहर
[पहला
फुत्तों के बिना बाहर नहीं निकल सकते। राज्य भर में
लकड़ी ढोना भर उनका कार्य रह गया है। (दुख से)
विधाता, तुम्हें क्या करना अभीष्ट है ? यदि हमारे पाप से
अरवियों ने इस देश पर आक्रमण किया तो में अपनी छोटी
सेना के साथ कैसे उनका सामना कर सकूँगा? हाय ! यह
घड़ी राजनैतिक भूल हुई ! हमने अपने हाथों अपना नाश
किया। यदि वे लोहान जाट और गूजर समय पर हमारी
सहायता न करें तो इसमें किसका दोप होगा। (हमी ध्यान में
उद्गार निकलते है)-
यह भूत अज्ञता का फल है, जो अवसर के तरु पर फूली ।
वह सदा चुभी काँटा बन कर, वे भूलें आजीवन भूली ।।
उनकी न विषमता नष्ट हुई, उनकी सत्ता न विलीन हुई ।
वे दव दब कर घमका करती, वे फल देकर ही पौण हुई।
पटपरिवर्तन

तीसरा दृश्य
(समय-दोपहर)
स्थान-इराक का राजपथा-
एक शरामी उन्मत्त होकर गाता है
है यह दुनिया का सार हृदय का मतवालापन इसमें
इन प्रांतों का ससार इवता उतराता है जिसमें
हा, पी विभोर मद योर नाचती कोयल यूकी बन यन
मधु सुरभि उदी इस पार यिद्याती जीवन के स्वर्णिल मन
हो सागर मदका भरा, स्वर्ण किरणें ही सुन्दर प्याले
मैं दिनकर बनकर पाऊँ वारुणी पन छायें मतवाले
रागत
ये
मदिरा, पवन मद्य के मकरन्दों से तर हो
ससार मय बनजाय, भरूँ, पाऊँ, फिर माँ अमर हो
(गाता हुधा चलता है और लड़खड़ाकर एक प्रादमी के उपर जागिरता है
फिर उठकर है यह दुनियों का सार' कहता हुमा गाता है।)
दूसरा-(पूर कर) मियाँ, आँखें खोलकर चलो, हिये की
फूट गई हैं क्या?
शराबी-(अनसुनी करके ) है यह दुनिया का सार,
A
-
हैं ! तुम कौन?

१८
दाहर
स
बता ।
दूसरा-दीयता नहीं है।
शरावी सब कुछ दीयता है। तुम श्रादमी की सूरत में
गधे हो यह भी
। अहा हा
दूसरा-(एक थप्पड़ जमाकर ) अब गधा तू है या मैं ?
शराची-(उठकर उसका हाथ पकद लेता है) फ् फ् या
मझता है ये उँट १ सम भ ता नहीं कौन जा
रहा है ? ( एक थप्पड़ मारकर ) अय
(लड़ते लगते दोनों गिर पड़ते हैं, सिपाही भाकर पकड़ लेता है)
सिपाही-चलो, तुम दोनों हैजाज़ के पास चलो।
दूसरा-हॉ चलो, इसने मेरे कपड़े फाड़ डाले हैं।
शराची-(मस्त होकर ) है यह दुनिया का सार
सिपाही-(शराबी को पकड़ कर ) गाता है या चलता है ?
(शरावी हाथ छुड़ाकर फिर गाता है। सिपाही एक थप्पड़ जमा देता है।)
सिपाही-चल।
शराबी-(होश में भाकर) हाँ चल भाई, पर मैंने क्या
किया, बता तो सही। (सिपाही पकड़ कर हैजाज की सभा में बे
जाता है, शरावी गाता हुया जाता है) है यह दुनिया का'
पटपरिवर्तन
१

चौथा दृश्य
(हेजा की सभा, पादाद के खलीफा वजीद बैठे हैं)
हैजाज-हे धर्मगुरु, जनाव के शासन भार संभालते ही
सारे राज में चैन की वसी बजने लगी है।
खलीफा-ठीक है। इसी लिये राज का दौरा करता हुश्रा
इधर या निकला।
(सिपाही और दो श्रादमियों का प्रवेश)
सिपाही-महाराज, इसने (शरायो की ओर इशारा करके)
शराब पीकर नगर में हुल्लड़ मचा रखा है। इसने इस भले
श्रादमी के कपड़े भी फाट डाले हैं।
शराबी-कपड़े फाड़ डाले हैं ? नहीं महाशय ! बिरकुल
है । भला, मुझ जैसे आदमी से इसके कपड़ों
का क्या सम्बन्ध ? कपड़े इसने अपने श्राप फाड़े हैं। मैं
निरपराध है।
दूसरा--अरे, इतना झूठ?
शराबी-यानी कितना?
खलीकायह ज़रूरशरावी दीपता है। इसके मुंह से शराय

२०
दादर
[चौधा
की यू पा रही है। हैजाज, क्या यहाँ शराब पीना मना नहीं
किया गया?
इजाज-धर्माचार्य, पूराफ में साल भर में एक उत्सव
मदिरापान का भी होता है। इसे 'हातगाह' कहते हैं।
सलीफा-नहीं हैजाज़, में इस उत्सव को हर तरह बुरा
समझता हूँ। शराय मनुष्यता के विरुद्ध, धर्म के विपरीत,
श्राचार के प्रतिकूल है। मैं अपने पूज्य सालीफाओं की तरह
इस अपवित्र यस्तु से घृणा करता हूँ।
शरापी-महाराज ! हमारे माननीय खलीफाओं ने शराय
को युरा ज़रूर कहा है किन्तु मदिरा अहा, यह क्या कोई
छोड़ने की चीज है ? जीवन में नया उत्साह, नई उचेजना,
नवीनता ही तो इसका गुण है। जय स्वर्ग में भी शराब
मिलेगी, तय इस दुनिया में उसे पीने से
खलीफा-चुप रह मूर्ख, (सिपाही से ) इसे पकड़ कर लेजा
ओर फैदपाने में डाल दे। इसने गदाद के सलीफा के
सामने दिठाई की है।
(सिपाही आज्ञा पाते ही उसे ले जाता है, अरावी फिर भी गाता हुआ
जाता है और दूर तक 'है यह दुनिया का सार' की आवाज़ सुनाई देती
है। सनीफ्रा घूर कर देखता रहता है, फिर जोश में पाकर)
हैजाज-आज से इराक में इस प्रकार का मेला बिलकुल
बन्द होना चाहिये । मैं अपने राज्य में मदिरा को यों ने बढ़ने
-
।

पहला अक
२१
दूंगा। मैं किसी ऐसी वस्तु को, जो मेरे धर्म के विरुद्ध है,
बुरी नज़र से देखता हूँ। मैं इस्लाम के विपरीत किसी
चीज को ससार में नहीं देखना चाहता । क्या रसुलिल्लाह ने
कुरान शरीफ के पॉचर्वे सूरा में शराब के विरुद्ध मुसलम नों
को उपदेश नहीं दिया है ! खुदा ने साफ कहा है कि
"ऐ मुसलमानो, शराय शैतान की बनाई हुई चीज है,
इसे छोड़ दो।"
हैजाज-आमीन (सब लोग आमीन कहते हैं।)
(दरवान का प्रवेश)
दरवान-(फर्शी सलाम कर के ) धर्मावतार, एक आदमी
बाहर खड़ा रो रहा है, कुछ प्रार्थना किया चाहता है।
खलीफा-रो रहा है? क्या मेरे राज्य में रोने वाले भी है।
बुलाओ।
(दरवान जाता है, यह भादमी भाता है)
आदमी-दुहाई है दुहाई, लूट लिया, मार डाला।
खलीफा-क्या बात है, क्यों रोता है?
आदमी-दे धर्माचार्य, में लुट गया, में बरबाद हो गया,
,
दाय!
हैअज-यात क्या है? कुछ बता भी तो!
आदमी-श्रीमान् ! मैं लका से कुछ नौमुसलिमों के

२२
दाहर
[चौथा
।
साथ इराक पा रहा था कि रास्ते में ऑघी के कारण देवल
के बन्दरगाह के पास हमें ठहरना पड़ा। इसी बीच में
दाहर के कुछ लोगों ने हमें लूट लिया । हाय लका
के
राजा ने कुछ भेंट भी जनाय के लिये भेजी थी, वह भी
दुश्मनों ने हम से छीन ली। महाराज, ( रोकर ) उन्होंने
हमारे श्रादमियों को भी हमसे छीन लिया।
सलीका-(दांत पीसकर) ऐसा, फिर क्या हुआ?
श्रादमी [---उन लोगों ने हमें कैद कर लिया।
हैजाज-फिर
आदमी हम लोग यही कठिनाई से छिप कर भाग आये,
हमारी सारी कमाई लुट गई । दायरे ! दुहाई है हजूर ।
खलीफा-हैजाज! इतना कुछ हो गया १ तोवा!
(उस आदमी से) अच्छा तू जा, हम इसका भरपूर वदला
लेंगे। सुदा ने फुरान शरीफ में कहा है कि कान का बदला
फान से, नाक का नाक से और दाँतों का बदला दाँतों से
लो। मुझे मालूम हुश्रा है मेरे स्वर्गीय पिता देवल की
बन्दरगाह चाहते थे, आज समय है कि उस इच्छा को पूरा
फरने के लिये अपनी सारी ताकत के साथ उस काफिर के
देश पर हमला किया जाय ।
हैजाज-हुजूर, हमें इस लड़ाई में कई वार हार

दृश्य]
पहला अक
२३
हुई है । दाहरसे पहले साहसीराय और चच ने हमें कई
बार हराया
है।
खलीफा--(और भी सीझकर ) वलीद देखेगा कि काफिर
इस बार कैसे जीतता है। क्या तुम्हें मालूम नहीं हजरत
ने ३१६ श्रादमियों के बूते पर मदीन के एक हजार काफिरों
को नष्ट कर डाला था।
एक सभासद-मान्यवर, मुमकिन है यह काम दादर का
न होकर किसी डाकू का हो। लड़ने से पहले दाहर का रग
ढग भी देख लेना चाहिये।
खलीफ्रा-डाकू का हो या किसी का। मैं सिन्ध को अब
यों न छोडूंगा। उसकी ईट से ईंट बजा दूंगा। जो मुरक
मेरे पूज्य खलीफा लेना चाहते थे, वह में ज़रूर लूँगा ।
दुश्मन को नाकों चने चया दूंगा। मैं मुसलमानों की हार का
बदला एक एक आदमी से लूंगा, एक एक शहर से लूंगा
और सारे प्रान्त को पीसकर धूल में मिला दूंगा।
हेजाज-जरूर, ज़रूर, इस काम के लिये यदि मुझे
देश विदेश फी धूल फॉक कर भी सेना इकट्ठी करनी पड़े
तो भी मैं करूँगा। लेकिन अलद्दजूरी के कहने के मुताबिक
दाहर का गुप्त और प्रत्यक्ष रूप से भेद लेना भी ज़रूरी
मालूम होता है, खलीफा साहब !

२४
दाहर
खलीफा-मैं
कुछ नहीं जानता हैजाज़, मैं वाहर का सिर
और छत्र चाहता हूँ और चाहता हूँ सम्पूर्ण प्रान्त पर
अधिकार । ( घुटने टेककर ) पे सुदा, हम लोग इस काम में
तेरी सहायता चाहते है । (सब लोग घुटने टेक कर प्रार्थना
करते है)
पटपरिवर्तन

पाँचवॉ दृश्य
P
स्थान-अलार का बा।
(सूर्यदेवी भौर परमालदेवी का कचुकी के साथ शिकारी वेश में प्रवेश)
सूर्य -इस निर्जन प्रान्त में मृगया की खोज करते हुए
जैसे मनुष्य के धीरज की परीक्षा होती है वैसे ही उसकी
थीरता भी जागृत होती है, क्यों रे कचुकी ?
कचुकी-राजकुमारी, यह कौन जानता है कि कठफोडा
जब लकड़ी पर चोंच मारता है, तब उसे यह सब पेट के
लिये नहीं करना पड़ता
सूर्य-अरे, फिर तू ने वही सिर पैर की हॉकनी शुरू
कर दी?
पर-हाँ, यदि इस समय सिंह तुझ पर हमला करे
तो तू क्या करे?
कचुकी-अहा, तुम इतना भी नहीं जानती? छोटी राज
कुमारी, वृक्ष की उत्पत्ति का फल यही तो है कि मनुष्य उन
पर चढ़े। मला, उसकी चोंच घिस न जाती होगी?
सूर्य-किसकी रे ? (पीछे मुड़कर) कचुकी, भागे आगे चल

दाहर
[पहला
कचुकी--(पीछे मुड़कर ) उसी कठफोड़े की तो ।
(चलने लगता है)
परमाल-(हँसकर) बहन ने तुझ से कहा कि हमारे धागे
चल और तू पीछे मुड़ रहा है।
कचुकी-तुम अपना मुँह मोड़ लो, में आगे हो जाऊँगा।
आगे और पीछे का प्रश्न इस गोलाकार पृथ्वी पर हो ही
नहीं सकता। श्रोहो, अव समझा, नाक से बोलनेवाले को
मुख और नाक दोनों का सहारा लेना पड़ता है, किन्तु प्रश्न
यह है कि वह किस से अधिक बोलता है और किस से
कम यह किसी ने न जाना।
सूर्य-(परमाल के साथ घूमती हुई श्रागे निकल जाती है, पीछे
फिर कर देखता है कि कचुकी एक वृक्ष की डाल से लटक रहा है)
अरे, यह क्या ! श्राता क्यों नहीं?
पर-विचारक जो ठहरा, कोई तरग आ गई होगी। अरे
कंचुकी, शो कचुकी!
कचुकी-इधर भाइये राजकुमारी, अब मैने यह प्रश्न हल
कर लिया है, दर तो यहुत लगी!
(सूर्य और परमाल लौटती हैं)
सूर्य-कैसे मूर्य से पाला पड़ा है, साथ क्यों नहीं
?
याता रे?

पहला अंक
पर-फ्या दल कर लिया?
कमुशी--राजकुमारी, इधर थाइये । अहा। यदी विचित्र
त। जरदो भाइये जल्दी, जरदी ।
(सूर्य और परमाज दोनों उधर जाती है)
दोना-या यात है?
कचुध-(गम्भीर मुद्रा से ) मैंने यह निधय कर लिया कि
माम के वृक्ष पर नींबू और नींबू के वृक्ष पर ग्राम क्यों नहीं
नगते?
सूर्य-(सीम फर) तेरा सिर, इसे साथ ला कर मूर्खता
ल ले ली।
परमाल-हॉ, फ्यों नहीं लगते?
फचुकी-तो तुम जानो, मैं भी जाता है। नींबू और शाम
हा प्रश्न-(जाने लगता है)
सूर्य-जा।
पर-बहन, बुला लोन।
(इसी पीच नेपथ्य से सिंह गर्जना के माय एक प्रादमी की चीत्र
सुनाई देती है)
सूर्य-है ! सिंह।
-किसी श्रादमी के ऊपर द्रट पड़ा है, हाय! (दोनों
पर--

दाहर
[पाँचवा
उस घोर दौमती है । परदा गिरता है और वे देखती है कि सिंह यानी
को दपाये बैठा है । इसी समय परमाल और सूर्य तीर से एकदम सिंह
को घायल कर देती है, वह गिर पड़ता है, दोनों उसको याँध कर
घायल की थोर मुदती है)
सूर्य-चोट तो नहीं लगी?
-अरे, यह तो (पपरा कर ) मूर्षित हो गया!
व्यक्ति-(कुछ देर पाद उन दोनों की ओर देखता हुधा ) श्राप
कौन है ? मुझे चोट नहीं लगी। खुदा तुम्हारा
सूर्य--(ध्यान से देखकर ) घयरात्रो मत, यताथो तुम
कौन हो?
व्यक्ति-(धराकर ) में सिन्ध का ही रहने वाला हूँ।
सूर्य-सिन्य का ? (सदेह से) कहाँ जा रहे हो, इधर कहाँ
से पा रहे हो, यह थैला कैसा है?
व्यक्ति-(छिपाता हुआ) कुछ नहीं, यों ही।
सूर्य-दिखाओ इसमें क्या है।
पर-यह कोई दूत मालूम होता है।
व्यकि-दूत क्या?मैं मैं दूत? या सुदा, हाय मरा
सूर्य-(सवाद का थैला छीनकर ) ओहो, यह तो अरवी
भाषा में है ! कचुकी जानता है। (पीछे फिरकर देखती है कि
कचुकी वहाँ एक वृक्ष की याद में छिपा यैदा है । परमान जाकर उसके
कान पकड़ लेती है।)

पहला अंक
२६
है
दृश्य]
कचुकी-(सिंह को अपने ऊपर पाया जान) श्रये गधे, फ्या
तू भी आदमी की तरह कान पकड़ता है ? (पीछे फिर कर)
राजकुमारी जी, ओह ! मैंने समझा कि
पर-तू इसीलिये वृक्ष की जड़ में छिपा बैठा था, क्या यह
नहीं सोच रहा था कि डर से वृक्ष की जड़ का क्या
सम्बन्ध है?
कचुकी -वाह खूब कही । मैं यह सोच रहा था कि भय
हृदय की वस्तु
या यादर की।
पर-क्या निश्चय किया?
कधुकी-यही कि भय रहने के लिये ससार भर का चकर
लगाकर मनुष्य के हृदय में जगह कर बैठा है।
सूर्य-कचुकी, क्या तू अरबी भाषा जानता है ?
कचुकी-जानने का ज्ञान जिसे हो वही जानता है । ज्ञान
गुण है वह द्रव्य में रहता है, द्रव्य ससार की
सभी वस्तुओं को कहते हैं, इसीलिये सभी सब कुछ
जानते है।
सूर्य-(पत्र दिसाकर ) क्या तू इसे पढ़ सकता है?
कचुकी यह सयुक्त क्रिया हे और दो धातुओं से बनी है।
एक पढ़ और दूसरीसका सकसे सामर्थ्य की प्रतीति होती है

-
-
दाहर
[पहला
और पढ़ से पढ़ने की तुम्हारा किस से श्राशय है,राजकुमारी?
सूर्य-(खाम कर ) तेरे सिर से, ले इसे पढ़ ।
पर-(हसकर ) बड़ा ज्ञानी है।
कचुकी-सिर, सिर से ससार की सभी क्रियानों की
उत्पत्ति है। विवेचना शक्तियों का आविष्कार सिर से ही
हुश्रा है। राजकुमारी, इसे पढ़ । यह वाक्य सानामिक कर्ता
फा है । वाफ्य की पूरी गति
सूर्य-(कान पकड़कर ) पढ़ता है या नहीं ?
कचुकी-(पत्र हाथ में लेकर) हाँ, बोलिये क्या पढूँ? (देखकर)
यह पत्र अलाफी के नाम इराक से पाया है।
सूर्य-(ध्यान से) हैं, इराक से ? अलाफी के नाम !
(यह थागन्तुक व्यक्ति अपना रहस्य खुलता देख पन छीनकर
भागने लगता है। सूर्य तार से उसे घायल कर देती है,
वह गिर पड़ता है)
सूर्य-(दोदकर दो लातें जमाकर ) धूर्त कहीं का, (पन छीन
लेती है) सच यता तू कौन है ?
कचुकी-(लात उठाता हुआ) जानता नहीं तू किसके
सामने सड़ा है ? ओहो ! क्या तू इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे
सकता? नहीं यों न छोडूंगा यता तू कोन हे? पर याद रख,
में अशुद्धि कोई नहीं है, हॉ उत्तर ठीक होना चाहिये ।
।

दृश्य]
पहला श्रक
व्यकि-(मार के डर से ) राजकुमारी, मारो मत । हाय !
पीडा हो रही है। हाय-!
सूर्यन, में तुझे यो दी न छोडूंगी। सच यता तू कौन है?
(कचुकी से) ले यह पत्र पढ़ कर सुना ।
कचुकी-(पन पदता है) हैजाज ने लिखा है-"अलाफी,
यदि तुम राज्य की सहायता करो तो अब्दुल्ला को मार कर
यहाँ से भागने और काफिर 'दाहर' की शरण में जाने का
तुम्हारा कसूर माफ किया जा सकता है। यह काम यह है
कि तुम दादर के राज्य के उन खास श्रादमियों का, जो दाहर
के खिलाफ है, नाम लिप फर भेजो और उनको दाहर के
विरुद्ध भड़कायो। हमारी तरफ से लालच देकर उनको
मदद के लिये तैयार करो। हमें विश्वास है कि तुम मुसल
मानों के विरुद्ध कोई काम न करोगे और जर अरवी लोग
सिन्ध पर आक्रमण करें, तब तुम उन्हें हर तरह से सहायता
दोगे।"
पर है!ये चाले पर अलाफी तो महाराज का बड़ा
विश्वासी आदमी है !
सूर्य-( उस श्रादमी को बाँध कर) सीधी तरह से हमारे
साथ चल, नहीं तो-(तीर चुभाती हुई) यही सब काम
तमाम कर दूंगी।

३४
दाहर
[छठा
चपाकर-(हाथ जोड़ कर) महाराज ! सामन्त सिंह
श्री वत्सराज का एक दूत पर लेकर आया है, उसमें
श्रीमान् से प्रार्थना की गई है कि गूजरों को पूर्ववत् अधिकार
दिये जायें । वे गूजरों की एक सेना बनाया चाहते हैं, जैसी
आशा हो।
जयशाह-वत्सराज बड़े दूरदर्शी है। महाराज, उन्हें
प्राशा मिलनी ही चाहिये ।
पुरोहित-धर्मावतार, क्या नीच जातियों को अधिकार
देकर उच्च वर्ण का नाश कर देंगे? महाराज, ऐसा नहीं
होना चाहिये।
क्षपाकर-पुरोहित जी,विश्वास और कर्म दो पृथक् वस्तुएँ
हैं। राजनीति में वरावरी का पद देना नृपति का श्राभूषण है !
(दूत का प्रवेश)
दूत-(हाथ जोड़ कर) दीनानाथ, बगदाद देश के राजा
का दूत श्रीमन के दर्शन किया चाहता है।
दाहर -प्राने दे, में जानता हूँ वह क्यों श्राया है। (सभासे)
वत्सराज की प्रार्थना पर विचार कर के ही उचित उत्तर
दिया जाय । सभ्य लोगो, आपका इस सम्बन्ध में क्या
विचार है ? मैं चाहता हूँ।

वश्य]
पहला श्रक
(मुमलमा दून का प्रवेश, सभास्थल के गौरव को देस तथा
महाराज के तेज के सामोयपनदूत का मस्तक अपने पाप मुक जाता है)
दूत-(सिर मुझ जाने पर भी अभिमान मुद्रा दिखाता हुआ) राजा
दादर, में माननीय पलीफा साहय के पास से पा रहा है।
उन्होंने तुमसे पूछा है कि तुम्हारे पुछ आदमियों ने निरपराध
अरवी व्यापारी के जहाज़ को क्यों लूट लिया और उनमें से
कुछक फो मार फ्यों डाला? इसलिये सलीफा ने तुम पर
अपगध लगा कर यह भाशा दी है कि तुम अपने अपराधों
की क्षमायाचना करते हुए पलीफा साक्ष्य को देवल का
वन्दरगाह दे दो और अरवी व्यापार का रास्ता खोल दो।
नहीं तो सिन्ध की भूमि सून से रँग जायगी। तुम्हें मालूम
है फारस, रोम और स्पेन तक हमारा राज्य हो गया है।
अर वह दिन दूर नहीं कि पलीफा की हकूमत का डका
सारे हिन्दुस्तान में बजेगा और तुम्हारे जैसे अपने किये
का फल पायेंगे।
दाहर-दूत का काम है कि अपने स्वामी के मनोभायों
को प्रकट करने में तनिक भी सकोच न करे । हमारे शास्त्र में
दूत अवध्य है। इसीलिये हमने तेरी दुष्टताभरी याते
शान्ति से सुनी है । तेरे स्वामी ने हमारे ऊपर दोप लगाया है
कि उस निरपराध अरवी व्यापारी को हमने लूटा । क्या तेरे

.
एक
दाहर
[छठा
स्वामी को यह मालूम नहीं कि उस दुष्ट ने हमारी सीमा में
भाकर हमारे प्रजाजनो. स्त्रियों और यालकों को चहका कर
भाग जाने की चेष्टा की। हमारी प्रजा ने जो उस का सत्कार
किया, उसका फल हमें यह दिया गया ! फिर तेरा
स्वामी देवल का बन्दरगाह किस बूते पर मॉग रहा है ? छी!
माँगने से देश नहीं मिलते । इससे पूर्व भी तो तेरे
स्वामी और उसके बाप ने अपने बल की अच्छी प्रकार
परीक्षा कर ही ली है। फिर किस बूते पर उसे ऐसा दु साहस
हुश्रा ? हम लोग नार्य है, हम में क्षत्रियत्व है,
बरादादी राजा की तो बात ही क्या, यदि समस्त ससार
भी दाहर पर अनुचित दवाव डाल कर उसके देश को
छीनने की चेष्टा करेगा तो दाहर उसके दाँत खट्टे
कर देगा। वीरत्व की विभूति, क्षत्रियत्व की गरिमा, शौर्य
के अवतार आर्य लोग व्यर्थ ही किसी से छेड़छाड़ नहीं
करते । यदि हस्तक्षेप द्वारा उन्हें कोई पददलित करना चाहे
तो एक बगदादी राजा क्या, ऐसे सैकड़ों राजा भी दाहर का
कुछ नहीं बिगाड़ सकते । जा, उस खलीफा से हमारी सय
वातें सुना दे । हमने जान बूझ कर किसी व्यापारी को कष्ट
नहीं दिया।
दूत-अच्छी तरह सोच लो। कहीं ऐसा न हो
कि एक व्यापारी के बदले तुम्हें सारा सिन्ध

दृश्य
पहला प्रक
३७
खलीफा को सौपना परे।
जयशाह-(शोध से) मूर्स ! यहुत मत यक, अपने
कर्म का पालन कर, अन्यथा तुझे मालूम नहीं कि महाराज
का नाम लेते ही तेरा सिर मेरे धीरों की स्त्रियों की मदायर
का पात्र बन जायगा!
दूत-(सहम कर ) तो क्या मुझे यही पाया है।
दाहर-हाँ, तुझे और तेरे स्वामी दोनों को।
(दूत डरता हुमा विदा होता है)
जयशाह-( क्रोध से कॉपते हुए ) इन दुष्ट अरयियों
ने उल्टा हमें दोषी ठहरा कर लड़ाई के लिये उभारा
है, मृत्यु को बुलाने का प्रयास किया है। इस समय श्राव
श्यकता है कि हम सदा के लिये इन अरचियों का नाश कर
दें। धीर लोगो, मुझे विश्वास है कि सिन्ध के एक एक
कण से एक एक वीर उठकर अपने जयनाद से सम्पूर्ण शनु
मण्डल को फंपा देगा।
सभासद्-अवश्य, अवश्य ।
(स्य और परमाल देवी का अरवी जासूस के साथ प्रवेश)
सूर्य-महाराज की जय हो, शिकार के लिये धूमते
हुए हमने एक अरबी का शिकार किया है। यह आपके
सामने है।

दाहर
[छठा
वाहर-बेटी, यह कौन है, कहाँ से थाया है ?
अलाफी-महाराज, यह तो इराक के वज़ीर का एक
सरदार मालूम होता है।
सूर्य--(थलानी से ) हॉ, यह वही है। ( अपनी जेब से
पन्न निकाख कर) यह पत्र लेकर अलाफी को
।
घूस देने
थाया था।
दाहर-(पाश्चर्य से ) घुस ! अलाफी यह क्या बात है ?
अलाफी-(धमरा कर ) मेरे पास ! मेरे पास क्यों?
(सभा में पन पड़ा जाता है)
दाहर-क्या अरव का खलीफा पाहुबल से दाहर का
सामना नहीं कर सकता
मनुप्यता
से गिरे हुए व्यक्ति
चलछिद्र से कार्यसिद्धि की आशा करते हैं । ( कुछ सोच कर)
अलाफी, तुम्हें शात है कि सलीफा के अपराधी होकर तुम
ने हमारी शरण ली थी!
अलाशी-महाराज, यह क्या भूलने की बात है। अलाफी
श्रापकी कृतज्ञता से कभी उऋण नहीं हो सकता।
दाहर-यदि तुम इस पत्र के द्वारा अपने अपराध क्षमा
की सूचना पाकर अरथ जाना चाहो तो प्रसन्नतापूर्वक जा
सकते हो । पार्यों के शास्त्र में शरणागत को सर्वदा अभयदान
लिया है।

. दृश्य] पदला सक घपाकर- -अलाफी, समय यरलता जा रहा है। शनु के पक्ष का कोई भी व्यक्ति इस समय साम्य नहीं है। यह मदा राज की दया है कि जो यह सय जान कर भी तुम्हें अभय दे रहे हैं। अलाकी-महाराज, तुच्छ अलाफी धीमान् फीदया के लिए महुत अाभारी है. यह ऐमा येईमान नहीं है कि मौके पर भाग जाय । जहाँपनाह देखेंगे कि अलाफी अपने पॉच सौ अरथियों के साथ सिन्ध के लिये किस तरह जान लगाता है। सभासद्-सिन्ध नृपति की जय, धन्य हो थलाफी । दाहर-तुम्हारी इच्छा है। यदि तुम रहना चाहो तो कोई रोक टोक नहीं। चपाकर-महाराज, श्रव हमें शत्रु का सामना करने के लिये उद्यत रहना चाहिये। -मन्त्रिन्, मैं सतर्क हूँ (जाते हुए) आज फिर देश की रक्षा का प्रश्न है । शत्रु के श्राने में कोई देर नहीं है। देश के सूय पर युद्ध केतु के समान एक ग्रह है, जिससे उद्धार पाने के लिये मनुष्यों की बलि देनी होगी। परतन्त्रता की हिलोरों से डगमगाती हुई स्वतन्त्रता की नौका को बचाने के लिये योग्य कर्णधारों की आवश्यकता है । मत्रिन्, हमें युद्ध के लिये तैयार रहना चाहिये। सेना की भरती प्रारम्भ दाहर- ।

४०
दाहर
[छठा
हो जाय । युद्ध के सम्बन्ध में फिर विचार करेंगे। इस व्यक्ति
को बन्दी करो।
क्षपावर-जो श्राशा।
दाहर--(सूर्य से ) तुम बड़ी वीर लड़की हो । सूर्य, मुझे
तुमसे ऐसी ही श्राशा थी । ( उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए
जाते है, सभा विसर्जित होती है, जासूसको सिपाही बन्दी या लेते है।)
पटाक्षेप

दूसरा अंक
पहला दृश्य
का हैजाज़ अपने कमरे में क्रोध से अधीर हो कर दाँत
पीसता हुआ रहल रहा है।)
हैजाज-श्रोह, अव तो सहा नहीं जाता। खलीफा और
मेरे प्यासे गले को ठडा करनवाले मदिरा के घूट के समान
ये सिन्धी कय तक निश्चेष्ट रह सकते हैं? मद की उत्तेजना
को पचा जाना ही उसकी विशेषता है । जिस दिन म
इस उत्तेजक यारुणी को घुट घूट करके पीलूँगा, जिस दिन
सिन्ध की धासन्ती सुरभि के उन्मत्त मकरन्दकण मेरे क्रोध
की उत्तप्त ऊष्मा से छनछना कर भस्म हो उठेंगे, उस दिन
मेरे हृदय में शान्ति की लहरिया धीमी किन्तु उत्कटता के
अनुपम राग के साथ सुन की क्षीण रेखाएँ दिखला सकेंगी।
मेरे ईमान के विरुद्ध सुन्दर काँच के प्यालों में रखी हुई,
पह शरार मुझे चैन से न बैठने देगी। इतना दुस्साहस,
इतना अभिमान, 'आर्य लोग युद्ध से नहीं डरते'!
देसूंगा, यह दादर कर तक मेरे सामने आनद मन्दाकिनी
की धारा में निरवछिन्न सान फरता रहेगा । हॉ, श्रय

૪૨
दाहर
[पहला
हज़ार सेना
बिलम्ब फिस बात का? मैंने भी वहतानसलामी के लड़के
अब्दुल्ला को देवल पर आक्रमण करने के लिये तैयार
कर लिया है । इधर सीरिया की छ
) और चार हजार वगदादी वीर प्रस्तुत हैं । अब्दुल्ला की
अपनी सेना है ही। वह मकरान का सूबेदार है। इस यार
सिन्ध को पीस न डाला तो घात ही क्या? हाय, हनफ,
रशीद, सिनान और मुज़िर बेचारे इन शत्रुओं के हाथों
मारे गये । चच के समय से लेकर अब तक हमें पराजय
ही मिली । किन्तु इस बार देखना है, देलूंगा-
(दरयान का प्रवेश)
हैजाज-सलाम कर के) सेनापति अब्दुल्ला साहय बाहर
हैजाज--ठीक, अच्छे अवसर पर आये, जा बुला ला ।
(दरवान जाता है।)
हैजाज -इस बार भूकम्प होगा। प्रचण्ड बज्र निर्धाप से
सिन्ध सिहर उठेगा। (आकाश की ओर देख कर ) देख रहा
हूँ, अच्छी तरह देख रहा हूँ। इस युद्ध में मुझे सिन्धी
शत्रुओं के शव दृष्टिगोचर हो रहे हैं । दर्द से कराहते, या
भरते, फूट फूट कर रोते बिलखते लोगों को देख रहा हूँ।
(पाँत पीस कर ) रोश्रो, भरपूर रोश्रो। (हस कर ) तुम्हारा
यदी दण्ड है।

दूसरा प्रक
बस,
दृश्य
(दरवान के साथ अब्दुल्ला पाता है।)
हैजाज-श्रानो मेरे सेनापति, शत्रु के कण्ठ पर कृपाण से
फ्रीडा करने वाले भाई अब्दुल्ला, सुनाश्रो कितनी देर है ?
अब्दुल्ला स्वामी, सब कुछ तेयार है । मकरान,
सीरिया और वगदाद की सेनाएँ तैयार है।
श्राशा की देर है।
हजाज-(उत्कण्ठा से अब्दुल्ला के गले में हाथ डाल कर )
बहुत ठीक । सुदा के नाम पर, अरर के नाम पर, देश की
उन्नति के लिये भाई अब्दुल्ला में तुम्हें विदा करता हूँ।
जानो । (तलवार देकर विदा करता है।)
अब्दुल्ला-(सिर मुका कर ) आमीन।
(दोनों जाते हैं, नेपथ्य में सेना का गगन भेदी घोप सुनाई देता है।)
पटपरिवर्तन

दूसरा दृश्य
(परमालदेयी प्रासादोधान में पीणा लिये गा रही है।)
पर-पदे हैं छोटे हृदय पटल पर इ सी रगत दिखा रहे हैं।
पुरानी स्मृतियों के चित्रपट पर नवीनतायें जमा रहे हैं।
विभूतियों की यना के मुन्दर मुहायनी सी विशुद मौकी-
युमुद को चदा की चाँदनी में हँसा हँसा कर लुभा रहे हैं।
ये फिलमिलाती चमक रही हैं तरगे रंग रंग की अनूठी,
उन्हें उठा के हवा के झोके थपक थपक कर सुला रहे हैं।
स्यय जनाकर स्वय बुझाते स्वय सुनाकर अतीत गाया,
हमारी आँखों के सामने यो विचार पर्दे उठा रहे हैं।
(वाणा हाथ से रस कर) हारिल पक्षी लकडी पर बैठ कर
जैसे उसे छोड़ना नहीं चाहता, उसी तरह ससार ने दुख
को पकड रखा है। दुखों, विपादों की रगड़ से चमकता
हुई हदय की कठोरता स्वार्थ बन कर मनुष्य को नवाती
रहती है। जब दो स्वाथों का आपस में संघर्ष होता है, तब
उसकी प्रचण्ड ज्याला में इस्व स्वार्थ का स्वामी भस्म हो
जाता है। यही ससार के विनाश की अन्तर्मुखी घोपणा है।
rain
उदारता, परोपकार और प्रेम के डण्ठों पर निकला हुमा
,

४५
दूसरा अंक
दृश्य]
सन्तोष का कमल उसी स्वार्थ के हिमपात से भस्म हो
जाता है। विधाता बड़ा फर है, जिसने विषैली लालसा की
भूमि पर विभूति की मृगमरीचिका उत्पन्न कर दी है। उसने
घाय धाय करके जलती हुई श्रात्मलिप्सा की मशाल देकर
मनुष्य के श्रन्धकार भरे श्रात्मप्रासाद के लाक्षागृह में
विभूतियों की सुन्दरता देखने की भावना पैदा करदी है।
देखने में सुन्दर विप के प्यालों में लगलब श्राशाभरे अमृत
का एक विन्दु टपका दिया है । (कचुकी का प्रवेश)
कचुकी-तलवार में चमक का जो उपयोग है यही साँप
में मणि का और परोपकार में स्वार्थ का है। पर निबोली
देखने में सुन्दर, पाने में मीठी और अन्त में कड़वी है। यही
संसार का प्रकार है।
पर-पायो कचुकी, तुम्हारी बातों में बड़ा आनन्द
मिलता है।
कचुकी-परमात्मा ने मुंद के ऊपर नाक क्यों बनाई
जानती हो?
पर मनुष्य पाने से पहले उसकी दुर्गन्धि सुगन्धि
को जान ले।
कचुकी-और नाक के ऊपर प्रॉ?
पर-उस गन्धमय वस्तु का रूप रंग देखते ।

दाहर
[दूसरा
वह सायिन लहरों से हँस कर हा ! क्रमश वहीं गई निगती
किसने परिणामों में पाया सचित आशा भरा सिंगार
मैं ससार विहारस्थल पर निरख रही यह वारवार
(ध्यानमम हो जाती है।)
पटपरिवर्तन

तीसरा दृश्य
.
(देवल का सूबेदार पानपुर अपन शिजू कमरे में
दो मुसादियों के साथ पैठा है)
शान-यह राजकाज भी कितना घेदक, कितना फठोर,
फितना फुरुचिपूर्ण और दायित्व से भरा है। प्रात काल से
साय काल तफ, रात से सयेरे तक, चौबीस घण्टे, आठ पहर,
उठते बैठते, साते पीते, राज्य के झमट पेमे पीछे पड़े रहते
है जैसे धुप के पीछे भाग। फरियादी की पुकार, रमा, पुर्जा,
हस्ताक्षर, आमापत्र, यह देख, यद देश के मारे नाक में दम
है। लोग कहते है-मै सुसी हूँ, स्वतन्त्र, कर्ता, धर्ता, विधाता
हूँ, पर सच तो यह है कि यह सबसे बड़ी परतत्रता और
सब से अधिक दुस है। नर्तकियों के नाच में, सगीत के उतार
चढ़ाव में, विलासिता के सरूर में जैसे राजकाज मुझे
पुकार पुकार कर टोंच सा रहा है। क्यों समुद्र, ठीक है न?
समुद्र-स्वामिन्, विलकुल ठीक, यावन तोले पाव रत्ती
सही है, दीनानाथ ! भला जितना काम आप करते है क्या
किसी और ने भी किया है ? फुत्ते की पूंछ की तरह दिन भर
हिलते
शाम-लाभ क्या, कुछ भी नहीं। फलम की तरह घिसे
?

दाहर
[तीसरा
जाना, काग्रज की तरह रंग जाना ही हमारा काम रह
गया है।
महापथ-और आग की तरह जलना, पानी की तरह
बहना, मिट्टी की तरह उसना, हवा की तरह फैलना क्या
कोई अच्छी बात है, महाराज?
ज्ञान-नहीं, मुझमे इतना काम न होगा । में घुन की
तरह अव न पिस सकूँगा, महापय!
समुद्र-नहीं, कभी नहीं। मैं तो जय आपको केवल
सकेत से 'हाँ' या 'न' करते देखता हूँ, तव चिन्ता के मारे
मेरा मुँह लटकने लगता है। हाय, इतना काम !
महापय-बुद्ध भगवान ने कहा है-शान्तिलाभ करो, शील
सचय करो, धैर्य रखो।भलाउस बैल की पूंछ का क्या फायदा,
जो न कभी कुछ साती है,न विश्राम करती है केवल मक्खियों
ही उडाया करती है।
समुद्र महाराज, श्राप और कार्य, दोनों परस्पर विरुद्ध
वस्तुएँ हैं, क्या श्राप काम करने के लिये उत्पन्न हुए हैं ?
नहीं, कभी नहीं।
महापय-ठीक है, उस काठ का सन्दूक बनने से क्या
लाभ है जो अच्छे अच्छे कपड़ों की रक्षा तो करता है
लेकिन उन कपड़ों को स्वय कभी नहीं पहनता।

दृश्य]
दूसरा अक
५३
?
यार
-
ज्ञान-वाह महापथ, क्या खूब, भई तुम्हारी जया
समुद्र-श्रीमान्, कलम कहिये !
महापथ---कलम 1 में फलम से कह रहा हूँ फ्या
तुमने तो सय
शान-गुरु गोयर कर दिया !
महापथ-निश्चय ही!
समुद्र--हाँ यात तो यहाँ से चली थी कि हमारे सूबेदार
साहय काम बहुत करते है।
महापथ-ऐसे काम से तो निफाम होजाना अच्छा।
समुद्र-मेरा यस चले तो मं श्रापको मिष्काम बना दूँ ?
महापथ--जय काग्रज के पन्ने हवा में फुरफुर कर के उडते
है, जय कोमल फिसलय पवन पर झूल कर इठलाते हैं, तब
फ्या वे काम करते है?
ज्ञान-काम काज से मनुष्य की आयु घटती है, शरीर
निर्मल होजाता है।
समुद-हॉ, महाराज, देखते रहने से नज़र कमज़ोर हो
जाती है, चलाने से हाथ थक जाते हैं, गाने से जवान
घिस जाती है। इसीलिये गाय केवल रंभा कर जवान की
रक्षा करती है। अहा ! खूटा तो पशुओं की जान है, यदि
अँटा न होता तो इन्हें कितनी तकलीफ होती, जानते हो!

दाहर
[तीसरा
महापथ-सव मर जाते जनाव, खूटा तो पशुओं का
भगवान है।
शान-समुद्र, तुम कभी गाते भी हो?
समुद्र-गाता था और सूब गाता था, पर अव घिसने
घिसाने के डर से गाना तो क्या, मैने रोना भी छोड़ दिया।
नहीं तो मेरे जैसा गाना क्या सब को पाता था?
ज्ञान - कुछ सुनाश्रोन?
महापथ-हॉ भाई, कुछ सुनानो न?
समुद्र-सुनिये । (गाता है)
मुकी है झमक घटा घनघोर, पर घटा सुई
कड़क उठी बिजली खेिं बन, चमक उठी जग कोर
शुकी है ममक घटा घनघोर
-बड़े सुन्दर पद हैं, चाह क्या कहने!
समुद्र-(गर्व से फूल फर)
पाती पनीर
पवन पस पर नाच रहे थे मेघ भरे उल्लास
नीचे लग नाचने सुन्दर जग के मृदु उच्छ्वास व समारसद,
नायका
गर्जना सुन मन हुआ विभोर
मुकी है झमक घटा घनघोर
(प्रसन्न होकर ) खून, बहुत खूब, मेघों का नाच
.
--

दृश्य]
दूसरा अक
फितना सुन्दर है!
"पवन पस पर नाच रहे ये मेघ भरे उल्लास'
महापथ-जरा नीचे का पद भी तो देखिये ।
'नीचे लगे नाचने सुन्दर जग के मृदु उच्छ्वास'
महाराज, ताले में अटकी हुई ताली के समान मेरा मन
इस गीत में अटक गया है।
समुद्र-मुझसे पूछो तो मेरे मन में यह गीत कछुए के
हाथ पैर की तरह घुस गया है।
शान-अरे, तुम सब ने तो फद्द लिया, पर मेरे मन का
फ्या हाल है, जानते हो?
महापथ-हॉ महाराज, झाड़ी में हिरन के समान श्राप
का मन इस गीत में उलझ गया होगा। आपका मन इसके
पद सौन्दर्य को चर कर ज़रूर बैल की तरह काम और
अतृप्ति की जुगाली कर रहा होगा।
--ठीक, यात तो तुमने लाख रुपये की कही महापथ,
लाख रुपये की!
(प्रविहारी का प्रवेश)
प्रतिहारी-जय हो महाराज की, महाराजाधिराज का
एक दूत सदेश ले कर पाया है, जैसी आशा हो।
ज्ञान-ई ! महाराज का दूत ? अच्छा जानो भेज दो।
प्रतिहारी--(सिर मुमाकर )जो आज्ञा ।
(जाता है)
ज्ञान--

दाहर [तीसरा - ज्ञान-समुद्र, दिनरात राज्य के झगड़े । दूत के रूप में यमराज का वाहन होगा। समुद्र- हॉ, और क्या? आशा क्या होगी-ग्रीवा के उभार का, जिता की चेष्टा का और यत्न से निकले अक्षरों का उत्सव होगा। भला, पूछो इन बछिया के ताऊ दूतों से कि तुम्हें क्या पड़ी जो इधर से उधर पर फटकारते हो, ईश्वर- । प्रदत्त मास को घिसाये डालते हो! महापय--चले पाये जैसे सर्प मिल में जाता है, गाय नोंद पर जा डटती है। उठते बैठते जय देखो तब दूत, दूत हैं या भूत? (दूत का प्रवेश) दूत--जय हो स्सेदार सादव की। महाराजाधिराज ने यह प्राशापन भेजा है। (सवादपत्र देता है, ज्ञानबुद्ध पन हाथ में लेकर ) सिर से लगा कर पढ़ता है) ज्ञान--(पन पढ़ता हुआ भोचछा सा रह जाता है । दूत से) जाओ । (दूत जाता है) हाय, फिर वही ! ( धमरा कर सुस्त हो जाता है) समुद्र- क्या हुश्रा महाराज, कुछ लग गया क्या? महापथ--(समुद से) पत्र में ज़रूर कोई ऐसीयात होगी, - समुद्र--जो सूयेदार साहब के मन से उल्टी के समान याहर निकलना चाहती होगी।

दृश्य] दूसरा अंक महापथ-नहीं, क्या महाराजाधिराज के महल में सॉप निकलने की बात नहीं हो सकती? समुद्र-क्यों नहीं, पर किसी को कुत्ताभीतो काट सकता है, गाय भी तो ग्दिक सकती है। महापथ-घर में आग भी लग सकती है, किसी का पॉव कीचड में भी फिसल सकता है। ज्ञान-नहीं समुद्र, महाराज का सवाद आया है कि युद्ध की तैयारी करो। अरवियों का देवल पर आक्रमण होनेवाला हे । सेना की भर्ती प्रारम्भ होनी चाहिये । युद्ध होगा। समुद्र-अरे बापरे, युद्ध होगा! ( उठकर इधर उधर छिपने की कोशिश करता है, फिर लौट पाता है।) महापथ-युद्ध ! (हैरान होकर ) युद्ध यही भयानक पीज है । हम यौद्ध लोगों का युद्ध से क्या सम्बन्ध ? समुद्र-ठीक है, हम लोगों का युद्ध से क्या सम्बन्ध ! -नहीं समुद्र, मुँह खोल कर मना भी तो नहीं किया जाता, पर मुझ से युद्ध न होगा। महापथ-नहीं महाराज, युद्ध तो हम लोगों के धर्म के विरुद्ध है। भगवान् ने हिंसा का निपेध किया है। ललित विस्तर में लिया है मैत्रीबलेन जित्वा पीतो मेऽस्मिनमृतमण्ड करणावलेन जिवा पीतो मेऽस्मि नमृतमण्ड ज्ञान-

दाहर
[तीसरा
।
महाराज, मेत्री और करुणा के वल से ससार के श्रावकों,
बौद्धों और बोधिसत्वों ने अमृत पान किया है। हिंसा तो
हमारी शत्रु है। भगवान ने दया, करुणा, चीतरागिता द्वारा
संसार विजय माना है।
ज्ञान-नहीं, हम लोगों के विचार से युद्ध करना अधर्म
है, और महापथ, तुम जानते हो मैं अधर्म का पालन
नहीं कर सकता, भगवान् के आदेश के विरुद्ध नहीं चल
सकता!
और क्या
१
महापथ-कभी नहीं श्रीमान्, अधर्म क्या हम तो ऐसे
धर्म का पालन भी न करें।
समुद्र-धर्म के विरुद्ध यात मानी भी नहीं जा सकती
और माननी भी नहीं चाहिये, क्यों महापथ ?
महापथ-हॉ,
हम क्या कोई पशु ई जो धर्म
के विरुद्ध आचरण करें।
-किन्तु में स्पष्ट रूप से महाराज का विरोध भी तो
नहीं कर सकता।
समुद्र-(हैरान होकर ) हॉ, आप तो विरोध भी नहीं कर
सकते!
महापथ-अरे भाई विरोध, विरोध का तो विचार भी
नहीं कर सकते।

. - दृश्य] दूसरा प्रक ज्ञान- -सेना' तैयार करनी होगी-अच्छा, समय यता देगा कि मैं क्या कर सकता हूँ, क्यों समुद्र ? समुद्र-हॉ, सो तो है ही श्रीमन् ! महापथ-यथार्थ है, मेरे देवता! ज्ञान -तुम बसे गुणी हो, महापथ । महापय-गुणों की परीक्षा फ्या सय कहीं होती है महा राज, किसी ने ठीक कहा है-- गुन न हिरानो गुनगाहक हिरानी है। समुद्र-किसी ने क्या ही ठीक कहा है- मानव बनाये, देव दानव बनाये यद किन्नर बनाये, पशु पछी नाग कारे है द्विरद बनाये, लघु दीरघ बनाये केते सागर उजागर बनाये नदी नारे हैं रचना सकल लोक लोकन बनाय ऐसी मुगति में 'वेनी' परवीनन के प्यारे हे (आपको) बनाय विधि धोयो हाथ जाम्यों रग ताको भयो चन्द्र, कर मारे भये तारे हैं महापथ-वाह क्या खूब, "अापको बनाय विधि धोयो हाय जाम्यों रग, ताको भयो चन्द्र, कर मारे भये तारे हैं। ज्ञान-किन्तु समुद्र इसका गुण से क्या सम्बन्ध है? .

६० दाहर महापथ-हॉ भाई, इसका गुण से क्या सम्बन्ध है ? समुद्र-सम्बन्ध, महाराज सम्बन्ध तो बहुत है, पिता का पुत्र से, नानी का नाना से और नाम का जामुन से । चतुर हो। -और महाराज में -तुम भी, पर युद्ध का क्या किया जाय ? दोनों-(गुमसुम होकर ) हा महाराज, युद्ध का क्या किया -समुद्र, तुम बड़े मदापथ- जाय? (सप ठोड़ी पर हाथ रख कर सोचते हैं) पटपरिवर्तन -

चौथा दृश्य
(सिन्ध के उस पार अब्दुल्ला अपने सेनानायकों के साथ बैठा है।)
अब्दुल्ला-सय कुछ तैयार है। सुदा ने चाहा तो कल
ही लड़ाई छिड़ जायगी। मैने फौज को लड़ने के लिये बॉट
तो दिया दी है। क्यों रहमान, क्या कुछ गाकी है ?
रहमान–श्रीमन् , बस अब तो लड़ाई ही बाकी है और
बाकी है हमारी विजय।
श्रन्दुल्ला-तुम सब लोग तैयार हो न?
रहमान-"तैयार" से अगर अधिक कुछ हो तो हम वह
भी हैं जनाय!
अब्दुल्ला-अनीफ तुम?
-मैं भी महाशय।
कादिर-मैं भी सेनापति।
अब्दुल्ला-तुम कैसे लड़ोगे रहमान !
रहमान-मै भाग की तरह जलाऊँगा।
अनीफ़-में विजली की तरह शत्रु पर गिरूँगा।
अनी-

?
दादर
[चौथा
कादिर-मैं हवा की तरह उडूंगा और शत्रुओं का सिर
भुट्टा सा उड़ा दूंगा।
अब्दुल्ला-रहमान, तुम दायें हो कर लड़ना, कादिर
तुम बायें होकर और अनीफ तुम फौज के सामने यानी
हमारे पीछे होकर।
सव-जो नाशा।
अब्दुल्ला याद रखना पीछे पैर न हटाना
सव-( कदम पीछे हटा कर ) कदम पीछे हटाना, यह तो हम
ने सीखा ही नहीं सेनापति।
अब्दुल्ला-ठीक है, जागो विश्राम करो, मैं भी थकामॉदा
है। किन्तु रहमान, एक वात का सदेह है, क्या सिन्धी
लड़ना जानते है ?
कादिर--हॉ सेनापति, यह प्रश्न तो अभी बाकी ही है,
अगर वे लोग लड़ना न जानते होंगे तो हम कैसे लड़ेंगे?
रहमान-मेरा सयाल है कि वे लोग लड़ना नहीं जानते।
शायद अलाफी और उसके आदमी ही केवल लड़ने के लिये
नायेंगे।
अनीश-पाँच सौ अरवी हम लोगों का मुकाविला नहीं
कर सकते।
अब्दुल्ला-तो फिर हम लोगों की विजय निश्चित है।

एश्य दूसरा अंक राप- -विचार तो पेसाब। भन्दुरा-मेरा पयाल है कि हमें एफ तरद अभी से विजय की सुशी मानी चाहिये । रहमान- ठीक है. शायद फिर नीमरान मिले ! भन्तुन्ता-जाम्रो, विश्राम करो, मौज उदायो । (सय जाते ६) पटपरिवर्तन

दाहर
[पाँचयाँ
क्षपाकर--महाराज, श्राशा हो तो प्रार्थना कल?
दाहर-हॉ, कहो।
-
क्षपाकर-महाराज, सूबेदार का निर्णय तो होगा ही, इस
समय हमें कुछ और भी
दाहर--(सोच कर) ठीक है। जिन लोगों ने में
विजय प्राप्त की है उनको राज्य की ओर से पारितो
पिक मिलना चाहिये। जयशाद, अपने धीरों की सूची बना
कर हमारे सामने लाओ।
जयशाह-महाराज, एक प्रार्थना है कि इस विजय के उप
लक्ष्य में लोहान, जाट और गूजर जाति के ऊपर से वे बन्धन
हटा दिये जॉय जिनमें श्राज तक ये लोग जफड़े रहे है। इस
चार और पिछले युद्ध में इन लोगों ने राज्य की आवश्यकता
से अधिक सहायता की है।
(सभास्थल में सन्नाटा सा छा जाता है।)
पुरोहित-पृथ्वीनाथ, धर्मशाल इन लोगों के साथ
कोई ऐसा व्यवहार करने की आशा नहीं देता जिससे ये लोग
उच्च जाति के लोगों से मिल सके। स्वर्गीय महाराज चच
ने जो विधान बनाये थे उन में
दादर--नहीं पुरोहितजी, व्यवस्था समय के अनुकूल
होनी चाहिये।

दूसरा अक एश्य] पुरोहित-कर्म और जन्म के विचार से एक पशु कभी तप फरने पर भी चाह्मण नहीं पन सकता महाराज! -पुरोदित जी ठीक कह रहे हैं। दाहर-नदी, फर्म फी श्रेष्ठता प्रत्येक व्यक्ति के अपने दैनिक व्यवहार पर निर्भर है। लोहान, जाट और गूजरों में पैसा दी क्षत्रियत्व है जैसा कि धीरता का कार्य करनेवाले अन्य क्षत्रियों में। छपाकर--पुरोहित जी, ससार में कोई ऊँचा नीचा नहीं है। यह भेद भावना मनुष्य-सृत । देखिये, भगवान का घनाया हुआ सूर्य सय को एक सा प्रकाश देता है। वायु सब को एकसा जीवन देता है। तुम्दै अधिक और उनको, जिन्हें तुम नीच कहते हो, न्यून जीयन नहीं प्रदान करता। पुरोहित-चीन धर्म का उल्लघन भी तो नहीं किया जा सकता महाराज | स्मृतियों के विरुद्ध क्या अब एक हिन्दू राजा को चलना होगा? स्मृतियों भी मृपियों ने यनाई हैं। क्या समय की आवश्यकता के अनुसार ऋषियों ने उनमें परिवर्तन नहीं किये हैं। यदि सय स्मृतियाँ एफ सी हैं तो इतनी स्मृतियों के निर्माण का क्या प्रयोजन ? इससे स्पष्ट है फि वे स्मृतियाँ समय के अनुसार ही लिखी गई है। पुरोहित-किन्तु स्मृतिकार पि लोग ही उनमें दाहर-

दाहर
[पहला
परिवर्तन कर सकते है, हम ससारी जीव नहीं।
दाहर-ठीक है, स्मृतिकार ऋपि लोग ही इसमें परि-
वर्तन कर सकते हैं। पर यह बतलाओ कि इन जातियों को
गिराने की चेष्टा किसने की? हमारे महाराज चच ने ही तो!
वे फौन पिये? इससे पूर्व क्या इन लोगों के साथ
वैसा ही व्यवहार होता था, जैसा कि आज ? पुरोहित जी,
जब मेरे पिता ने इनकी अवस्था को इतना गिरा दिया, तव
क्या मेरा कर्तव्य नहीं कि मैं श्रावश्यकतानुसार इनको फिर
उठा सकूँ।
(सारी ब्राह्मण मडली कानों पर हाथ रख कर निरुत्तर हो जाती है।)
दाहर-क्षपाकर, श्राज से मेरे राज्य में इन लोगों के साथ
किसी प्रकार का अत्याचार न हो । उनको पूर्ववत् अधिकार
दिये जायें तथा यत्सराज को श्राशादी जाय कि वे अपने प्रदेश
में लोहानों, जाटों और गूजरों की सेना तैयार करें।
चपाकर-जो आशा । (सारी सभा कुछ लोगों को छोड़ कर
जयनाद करती है।)
जयशाह-एक प्रार्थना और
दाहर-हॉ, कहो।
जयशाह, महाराज, इस युद्ध में मेरे लोहान वीरों ने ही
सहायता दी है, और उनमें जिसने अब्दुल्ला का सिर
--
-
--
.

दूसरा अक
दृश्य]
काटा है यह वीर मानू है ( उसे खड़ा कर के) देखिये, इसी
ने श्राज हमारे राज्य की रक्षा की है। मेरी प्रार्थना है कि इस
चीर को अरुण का सेनापति बनाया जाय।
सव--(देश भक्ति से गद्गद हो कर ) धन्य हैं, धन्य ।
दाहर-अवश्य, वीरों का पुरस्कार सड्ग है (इतना कहकर
पाहर उसे खड्ग देते हैं, मान सिर झुका कर ग्रहण करता है) तुम जैसे
वीरों पर सिन्ध को गर्व है।
सव-धन्य धन्य हैं।
दाहर-धीर मानू, आज से तुम देवल के सेनापति
नियुक्त हुए।
मान-(सिर झुका कर ) महाराज की बड़ी कृपा । देव !
वीरता किसी की बपौती नहीं है, साहस किसी के घर पैदा
नहीं हुआ, विजय की माता धीरता ससार भर को अपनी
कटीली विभूति बॉटती है, हमारी जाति को भी वह कुछ न कुछ
मिली ही है । सिन्ध की रक्षा के लिये सारी लोहान जाति
अपना तन मन धन अर्पण कर देगी।
सव-जय हो महाराज दाहर की, जय हो सिन्ध देश
की, जय हो वीरवर मानू की।
दाहर-श्रच्छा, अब सभा विसर्जित होती है। (सय जाते हैं
तथा मह राज के सकेत से मत्री, जयशाह आदि कुछ विश्वस्त लोग रह
जाते हैं, केवल झा बुद्ध थाना की प्रतीचा में बाहर खड़ा रहता है।)

७०
दाहर
[पाँचवाँ
जयशाह-शानद ने इस युद्ध में जिस कायरता का परि-
चय दिया उसे देखते उस पर विश्वास नहीं होता कि उसे
श्रागे भी इस पद पर रहने दिया जाय ।
दाहर-नहीं, राजनीति के अनुसार वह इस योग्य सिद्ध
नहीं
इथा
पाकर-महाराज, मेरा विचार है सेना सम्बन्धी सय
भार वीर मानू को सौपा जाय, तथा राज्य व्यवस्था के
लिये शानयुद्ध हो रहें। महाराज, शानयुद्ध के निकालने से
सारे बौद्ध विगढ़ बैठेंगे।
-
दाहर-(सोच कर ) तुम्हारा विचार मुझे उपयुक्त ज्ञात
होता है मत्री जी । क्यों जयशाह ?
जयशाह-जो महाराज की इच्छा।
दादर-मंत्री, ज्ञानयुद्ध को बुलानी। (मत्री के सकेत से
प्रतिहारी ज्ञाननु को युलाता है।)
(ज्ञानबुद्ध सिर अशा प्रणाम कर के एक और सदा हो जाता है।)
दाहर-शानवुद्ध, देवल की सेना का भार मानू को दिया
जाता है और राज्य का प्रवन्ध तुम्हारे हाथ में रहेगा।
ज्ञान--(खिन्न होकर ) जैसी प्रभु की आक्षा!
जयशाह--यही ठीक है, हमें विश्वास है शत्रु फिर उठेगा।

दृश्य]
दूसरा अंक
।
दाहर-मैं शानयुद्ध को देवल की राजव्यवस्था का
प्रवन्धक बनाता हूँ । जाश्रो शान, भगवान बुद्ध के विवेक का
यल लेकर हिन्दुओं की वीरता प्रहण करो। संसार में केवल
ठीक राज्यव्यवस्था रखने से ही काम नहीं चलता, उसकी
नीच हद करने के लिये वीरता, देशप्रेम और विवेक की भी
आवश्यकता है। हम अब अलोर को जाते हैं और तुम देवल
की रक्षा में अधिक उत्साह से उधत हो।
ज्ञान-(सिर झुका कर ) जो प्राक्षा ।
(सभा विसर्जित होती है।)
पटाक्षेप

तीसरा अंक
पहला दृश्य
इराक की राजसभा-
(हैजाज अपने दरबार में बैठा है, सभा में सन्नाटा है।)
हजाज-(दुख से') आज फिर हम लोगों की आशा
पर पानी पड़ गया। अरब का भाग्य चक समय के घुमाव
के कीचड़ में फंस गया । ताजे सजूरों में भी सडॉयद उठने
लगी । जीवन की दिशा करवटें बदल कर फिर सो गई ।
फूल तोड़ते समय कॉटों पर हाथ पहा । सारे हाथ छिल
गये । (क्रोध से ) पर था तो यह नहीं सहा जाता। ऐ
खुदा, क्या तुमको यही स्वीकार है ? क्या तू अपना
काश शत्रुओं पर नहीं डालना चाहता? क्या हम अब अरव
क बाजारों तक ही सीमित रहेंगे? क्या हज़रत की इच्छायें
पूरी न होंगी? क्या मेरे खलीफा का गोला हिन्दोस्तान
की सीमाओं से टकरा कर वापिस लौट पायगा? नहीं,
यह न होगा। शत्रुओं की भभिलापाओं को तोड
मरोड़ कर अरब सागर में वहा देना होगा । अच्छा देखो,
पलीफा साहब अब क्या जवाब देते हैं। पर नहीं, मैं

दृश्य]
तीसरा श्रक
७३
यो न मानेगा। ईमान और देश के इतिहास में हैजाज
का नाम पराजय में नहीं लिया जा सकेगा।
(दरबान का प्रवेश)
दरबान-हुजूर, देवल के सूबेदार फा एक आदमी
आया है
हैजाज-क्या, देवल के सूबेदारका श्रादमी? अवश्य इसमें
कुछ रहस्य है। भीतर आने दो। ( जाता है)
(दूत का प्रवेश)
दूत-(प्रणाम करके) देवल के सूबेदार ने श्रीमान की
सेवा में यह चिट्ठी भेजी है। (चिट्ठी देता है)
हैजाज-(चिट्ठी हाथ में लेकर पढ़ता है, खुशी से
फूल कर ) हज़ार बार धन्यवाद है उस खुदा का।
बस, अब मैदान मार लिया। मेरे प्यारे सभासदो, देवल
के सूवेदार ने अब्दुत्ता की मृत्यु पर शोक प्रकट करते हुए
क्षमा याचना की है। वह लिखता है कि हम लोग बौद्ध हैं
हमें लड़ाई से कोई सरोकार नहीं। यदि इस चार श्राप सिन्ध
पर हमला करें तो हम आपके सहायक होंगे, क्योंकि हमारे
श्रमण इस बार माप की ही जीत समझते है।
-
+

७४
दाहर
[ तीसरा
सभासद् बहुत ठीक, वहुत ठीक ।
हैजान--(दूत से) जाओ, हमारी तरफ से सूबेदार
से कहना हमने उसका अपराध क्षमा किया। यदि इस
चार शत्रु हारा तो उसे उचित पारितोपिक दिया जायगा ।
(दूत सलाम करके जाता है।)
(दरपान का प्रवेश)
दरबान-श्रीमन्, पूज्य सलीफा साहब का एक श्रादमी
पाया है।
हैजाज- आने दो।
दरवान-जो श्राशा । (जाता है )
हैजाश-देखना चाहिये गुरु जी क्या आज्ञा देते है इस
बार तो पौधारह है। यह किश्त और यह मात (मूछों पर ताव
देता है।)
(खलीका का रफा लिये दूत का प्रवेश, दूत सलाम करके रका देता है।)
हैजाज-(पढ़ते हुए) ठीक, ठीक बहुत ठीक-मेरे प्यारे
दीवान, हजूर फिर हमला करने को कहते है। और इस बार
दूने उत्साह से। अलहजूरी, देवल के सूबेदार के सदेश के
साथ धर्माचार्य कोहमारीतरफ से पूरी तैयारी की सूचना दे दो।
अलहजूरी-जो हुक्म (रका लिस कर देता है, दूत माता है।)

दृश्य]
तीसरा अक
७५
हैजाज हे पीरो, इस बार हमारी विजय है। म
चाहता हूँ तुम में से कोई यहादुर इस बार अाक्रमण
के लिये तैयार हो। (दरवार में सनाटा छा जाता है, एक नव
युवक उठता है।)
नवयुवक-प्रभो, मैं इस बार अपने भाग्य की परीक्षा
-
हैजाज-(प्रसन्न हो कर ) मेरे यहादुर बच्चे मुहम्मद विन
कासिम, मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम इस बार जीतोगे।
कल मैंने ज्योतिपियों से भी पूछा था। उन्होंने इसवार हमारी
विजय का सदेशा दिया है। अच्छा, मैं तुम्हें सेनापत्ति पनाता
हूँ। सेना की तैयारी करो। इस बार साठ हजार सेना के
साथ हमला करो। (सब लोग मुहम्मद बिन कासिम की तरफ
हसरत की निगाह से देखते हैं।) श्रानो, मैं तुम्हें अपने हाथ से
कवच पहनाना चाहता हूँ (पदनाने लगता है।)
मुहम्मद बिन कासिम--( तलवार हथ में लेकर) हुजूर,
आज भरे दरबार में में प्रतिशा करता हूँ कि यह कासिम
जयी हुए विना नहीं लौटेगा।
सब-श्रामीन श्रामीन ।
हैजाज-जानो मेरे यहादुर,सुदा तुम्हारी सहायता करे।

दाहर
(दरयार का एक कवि उठ कर गाता है।)
कवि -हे अरष-दुलारे जाओ, दुश्मन को खूप छमाओ।
निज देश धर्म की रक्षा करना बढ़ यह कर लड़ना
मत पीछे कदम हटाना मत दाएँ पाएँ जाना
दुनिया को रग दिसाना, अपना सब देश बनाना
हे श्ररप-दुलारे जानो, दुश्मन को सूर छकाओ।
हैजाज -घस बस। श्रव देर की जरूरत नहीं है।
(सय दरबारी सलवारें उठा कर विजय विजय चिएलाते हुए जाते हैं।)
पटाक्षेप

.
दुसरा दृश्य
(देवल का राजपथ, कुछ प्राह्मण तथा यौद्ध श्रमणों की परस्पर यातचीत)
देवकी-चाद, सृव युद्ध हुश्रा । हमारे युवराज भी कितने
वीर हैं । शत्रु एक मोर्चा भी न ले सका।
सशय-पर अपने राम को इसमें कुछ भी भलाई नहीं
देख पटती । जनार्दन, अय तुम क्या करोगे?
नधुना-क्यों, भलाई क्यों नहीं देख पडती महाराज,
क्या युद्ध में शत्रुओं की हार में श्रापको फुछ सन्देह है ?
सशय-नहीं भाई, ग्रहों का उत्पात, अशुभ लक्षणों का
होना ही हमें देय पड़ रहा है। शिव ! शिव !
देवकी-बुद्धि के शत्रु पेसे ही होते है, मधुश्रा।
सशय-अरे, महाराज ने लोहान और जाटों को पूर्ववत्
अधिकारदेदिये अर्थात् उन्हें हमारे वर्ण के साथ मिला दिया।
क्या अब राज्य सुरक्षित रह सकता है ? अर्थात् क्या राज्य
रह सकता है, भाई! शूलपाणि, देख रहे हो ? प्रकृति प्रत्यय
फा नाश हो गया! ऑधी से श्राम का चौर टूट टूट कर
गिर रहा है । देवकीनन्दन, तनिक तो देखो!

७८
दाहर
[दूसरा
महापथ-युद्ध क्या कोई करने की चीज है? भगवान्
बुद्ध ने इसफा निषेध किया है। पाँच शीलों में भी इसका
वर्णन नहीं है। अहिंसा के विरुद्ध बौद्ध लोग तो जा नहीं
सकते, भाई।
देवकी-देश का दुर्भाग्य है जो महापथ और सशयचढ़
जैसे आदमी सिन्ध में उपस्थित हैं। देशविद्रोही, धर्मविद्रोही
लोगों का नाश हो जाना ही ठीक है। (सराय और महापथ से)
तुम लोगों के कारण ही देश का नाश होगा । धर्म की
रूढियों के साथ सूंटे की तरह पंधे रहनेवाले ये ढोंगी पुरुष
देश के नाश का कारण बनेंगे । अहिंसा का राग अलाप कर
देशद्रोह का झएडा पहा करनेवाले चौद्ध क्या प्राज सञ्चे
यौद्ध ? इन परिडतों और प्राडम्पर से स्वार्थ सिद्धि करने
वाले ठूछे शानियों ने कर देश का साथ दिया है ? यह आज
कोई अनोसी बात नहीं है।
मधुश्रा--तो क्या देवकी इन लोगों का कहना झूठ है ?
सशय-क्या हम लोग धर्म के विरुद्ध बात कहते है
अर्थात् क्या धर्म हमारे साथ नहीं है, देवकी' पुरुषोत्तम, तुम
कव आयोगे?
महापय -क्या तुम चौद्ध
शाता हो
भगवान् पर कटाक्ष करते हा
.

७६
श्य]
तीसरा प्रक
नदी है? हम लोग मन, पाणी, कर्म से यौर ६ । यौन लोग
किसी पर अत्याचार करना जानते ही नहीं। यदि शनु लोग
आयें तो इसमें हनदी क्या है। हमारे लिये तो मुसलमान
और हिन्दू का राज्य एक जैसा है।
राशय-और जर हमारे ज्योतिषशास्त्र के अनुसार प्रदों
की फुष्टि दे तो इस एटि को हटा कर शत्रु के सिन्ध प्रवेश
को अर्थात् रामु फे इधर सिन्ध पर राज्य करने को फौन रोक
सकता है? जिस देश में उच्चयों के साथ नीचों को
मिला दिया जाय, यहाँ भगवान् उसकी रक्षा कैसे कर सकते
है, अर्थात् अय नाश तो अवश्यम्भावी है। हे यशोदानन्दन,
फय तक प्रतीक्षा करें?
देवकी-(दाँत पीस कर ) अरे दुष्टो, तुम इतने नीच और
पतित हो गये हो, इसका हमें शान नहीं था। होनहार और
अन्ध धर्म के थद्धालुभो, क्या तुम में विवेक और बुद्धि का
इतना अभाव है जो तुम एक देशी और विदेशी राज्य के
सम्बन्ध में विचार भी नहीं कर सकते । देश और धर्म के
शत्रुओ, क्या तुम्हें यह शान नहीं कि शत्रु और मित्र में
कितना अन्तर है ? कौन तुम्हारा हितू है और कौन अदितू ?
फ्यावे अरवी यहाँ पाकर राज्य करते हुए हमारे मित्र बन
जाँयगे! आज, शनु कितने दिनों से इस देश पर दाँत

८२
दाहर
यह अाज समय फिर आया है रुदाहास का सगर में
कण कण कर अरिदल दल देंगे रकों के न्हाकर सागर में
(सव नाते है)
पटपरिवर्तन

तीसरा दृश्य
स्थान-मोरयाहर उar में-
(म्म और परमाय देवी का प्रवेश।)
सूर्य-यासना के मुग्न पर कालीच लगा कर, लत्रा
की क्या फाद फराज मंतिकली अमर जीपा के
उगत पक्षस्थल पर नाचने। स्वर्ग की पटाएँ, ससार के
यमय अय मुम मरमा नहीं सकते। इन वृक्षों के पत्तों के
समान समय के समीरण से उत्तेजित होकर नाचूंगी। पर
माल, जानती हो मेरे इस ताण्डव का क्या प्रमाय होगा?
शिय के ताएडय के समाज मे दिलने लगेगा, शेप काँप उठेगा,
पच्दप सिहर उठेगा, पर्वत डगमगो लगेंगे, और धरा
घड़क्ने तगेगी। याज अवसर, ससार को मैं दिसला
आएंगी
फि मे क्या कर सकती हूँ!
पर-बहन, इतने आवेश में आने का कारण !
सूर्य-परमाल, प्राज तू मेरे थापेश में थाने का कारण
पूछती है तो ले सुन। विधाता के फोप की तरह शगु फिर
एक यही सेना के साथ सिन्ध को विध्वस करने पायाचाहता
है। इस बार यन्त है। पिताजी सैन्यसगठन में व्यस्त है।
-

दाहर
[तीसरा
सारा देश युद्ध की घटाओं से घिरा है। पश्चिम से बादल
उठा है। विश्व को कॅपानेवाली श्रॉधी उठी है। सिन्धी
लड़ने में थानाकानी कर रहे हैं । ऐसे समय क्या किया जाय?
सुन, मैंने निश्चय किया है कि सिन्ध के घरों, झोपड़ियों,
प्रासादों में जाकर देशभक्ति का उन्मादी गीत गाऊँगी।
कायरों को वीर और वीरा को रण के लिये उन्मत्त बना
दूंगी। इस परमी तू पूछती हे मेरे श्रावेश में आने का कारण ?
छी। बहन, क्या थव यह कहने का अवसर है?
पर-बहन,
क्या विश्वप्रेम और करुणा दोनों
भावनाएं जीवन की सुन्दर वस्तुऍ नहीं है? क्या जातीयता
प्रान्तीयता की विभूति ही सब कुछ है ? क्या प्रात्मा और
श्रात्मीयता की परितृप्ति में वास्तविक जीवन का सुस है?
में नो समझती है विवेक पूर्ण परतन्त्रता उच्छृखल स्वाधीनता
से कहीं चढ़ कर है! विनाश की ओर जाना ही जीवन
प्रगति की 'इति श्री' है।
सूर्य-हाय ! ऑधी और तूफान में कोमलता की भावना,
प्रचण्ड अग्नि में सन्तोप की कामना और सोन्यापी विना
शक विष की प्रबलता में क्या हाथ पर हाथ ररा बैठे रहने
से काम चलता है? जिस विश्वप्रेमाका तू राग अलाप रही
है वह पीव भरे घाव में नश्तर न लगा कर उसे दवा देने की
विष्टा के समान है। मृत्यु की पीडा से कराहते हुए पुरुप के

।
दृश्य
तीसरा धक
सामने विद्याग के राग अलापो के समान है। आज जय
शनु साठ इनार सेना रोकर सिन्ध पर श्रामामण किया
चाहता है, घमासा युद्ध होगा, सुनग्यचर हो जायगा ।उस
ममय पुरुषों के साथ नियों का क्या कर्तव्य है, यही बाज
हम सिन्ध फी नारियों को सीपना है। हमारे भाई और पिता
युद्ध में लड़ें और हम हाथ पर हाथ रखकर बैठारदें, यही क्या
हमारा कर्तव्य है? क्या खियाँ केवल देखने की वस्तु है,
क्या करने का भार पुरुषा के हिस्से में ही थाया है, क्या
वे पुरुषों के समान सुप का उपभोग नहीं करती, फ्या
परतनता के दुप से फेवल पुरुपों को ही दुस होगा, स्त्रियों
पर उसका कुछ प्रमाव नहीं पड़ेगा? नहीं पहन, श्रय में
उठना पड़ेगा।
पर-ठीक है, मैं साहित्य की रुचिर रूप राशि पर मुग्ध
थी। दार्शनिकता, भावप्रवीणता की विस्मयकारी झाडियों में
फंसी थी । आज मुझे ज्ञान हो गया कि स्त्रियों क्या है ? उन
में भी तीक्ष्णता, उग्रता थोर प्रचण्डता की चिनगारिया ह।
श्रात्मरक्षा, देशहित की उत्कट प्रमिलापाओं का उद्रेक है।
मैं भूली रही । आज मेरी श्रॉयें सुली ।। यद्दन, म तुम्हारी
अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। (बामग्लानि से रो कर बहन की गोद में गिर
पड़ती है)
सूर्य-(प्यार से) मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई । तुम में आज

-
दाहर
[तीसरा
असली स्त्रीत्व ना गया। तुम में भी सव शक्ति है, केवल
इस बात का ज्ञान और बोध होने की आवश्यकताथी । देसो,
सुनो, यह कौन गा रहा है-(दोनों मुनती है।)
। (नेपथ्य में देवकी और मधुश्रा का गाना सुनाई देता है।)
दोनो-उठो वीर भारत माता के, माँ ने तुम्हें बुलाया है
कस कर कमर अमर बनने का सुन्दर अवसर पाया है
शत्रु उठा आता आँधी सा करने को यह देश विनाश
पीस डालना उसे कुचल कर, रसना भारत माँ की पास
रण में जीवन देना डट कर सम्मुख यह सिखलाया है
उठो वीर भारत माता के, माँ ने तुम्हें बुलाया है।
सूर्य और पर-याह, क्या सुन्दर गाना है । (भागे सुनती है)
चार भावना जगे नसों में वीरों के से काम करें
वारों जैसा मरना सीखें वीर बनें कुछ नाम करें
सिन्ध देश के चद्रयिम्य पर अरब राहु वन पाया है
उज्ज्वल करना मरमुख इसका यह ही जीवन काया है
माता आँसू बहा रही है हृदय उभरता पाता है
इसे सँभालो गले लगालो, कायर ही कतराता है
समय परीक्षा देशभक्ति की लेने को यह पाया है
उठो वीर भारत माता के, माँ ने तुम्हें युलाया है
(दोनों रस भूमि में आ जाते है।)
।

श्य]
तीसरा अक
सूर्य-(भागे यह कर) फ, ठीक! इस गाने का ठीक यही
समय दे । चन्द्रमा में लगे हुए लाछा को धो डालने का
यही समय है। युद्ध के यवएडर से शत्रु को उड़ा देने का यही
समय है। भाई, तुम कौन हो?
देवी-भूमि भार से थके हुए शेप के उच्दास, परतमता
की प्रॉधी के लिए घनघोर धन की वर्षा के दा कण?
मधुमायनस्फोट के छोटे से निनाद । विद्युत् धारा फी
दो तरगें।
सूर्य-और शत्रुओं को कुचल डालने के लिए उत्साह
और उत्तेजना के दो रूप! चीरत्य के दो प्राममण, श्राश्रो
मैं तुम्हारा स्वागत करती हूँ यह मेरी यहन परमाल है और
मैं हूँ महाराजाधिराज दाहर की याचिन कन्या सूर्य।
देवकी-(समम से) माता आप की जय हो। हम श्राप को
प्रणाम करते है।
सूर्य-हॉ, फिर एक बार माता की पुकार सुनायो । मेरा
हृदय सुनने को येचैन हो रहा है। (फिर सुनते हैं, मुन कर)
धन्य हो वीरो, धन्य हो। श्रायो, सब लोग मिल कर मातृ
भूमि को शत्रुओं के श्राफ्रमण से बचाने के लिये सिन्ध के
प्रत्येक नर और नारी को नींद से जगावें।
देवकी और मधुका-(सिर झुका कर) जो श्राशा ।
।

दाहर
[तीसरा
सूर्य-अरण, ब्राह्मणावाद, शिवस्थान, देवल आदि सारे
प्रान्तों में विजली के समान कड़को, पॉवी के समान उहो,
वादल के समान गरजो पोर कायर देशद्रोहियों को युद्ध के
लिये उत्साहित कर दो। जायो, मैं भी अपनी बहन के साथ
देश देश घूसूंगी, वनों में विचरूंगी, पहाड़ों, को छान डालूँगी
लोगों को एकत्र करूंगी, और उन्हें सेना में भरती होने
के लिये उभारूँगी।
देवकी-माता, आपके लिये क्या असम्भव है ? त्रियों
यदि चाहें तो ससार को उलट दें । मुझे विश्वास है:-
धमक जायगी धरा पेगी भूघरमाला
कहगी जब स्त्रियाँ प्रसर बन विद्युज्ज्वाला
धिर धार वन सिन्धु शत्रुको मृत कर देंगी
पल पल शतदल काट रुधिरसागर भर देंगी
बिन्दु बना कर उदधि, उदधिको कण कर दोगी
शक्ति समुद्र नसों में जग की फिर भर दोगी
.
सूर्य-(हस कर ) चीर देवकी, घबरानो मत, स्त्रियों की
प्रत्येक निश्वास देश की रक्षा के लिये होगी। उनकी प्रत्येक
उमग पुरुप जाति के ऊपर न्यौछावर हो रहेगी।
के विलासों में साहस, उन के सौन्दर्य में सतीत्व, उनकी
उन

श्य]
तीसरा अक
अभिलापायों में देशानुराग और उनकी प्रत्येक चेष्टा में
सिन्ध के जीवन की रक्षा का प्रश्न होगा।
देवकी-( उठो घोर भारत माता के, माँ मुम्हें पुनाया है गाये
हुए जाते है।)
सूर्य-पहन, देया तुमने देवकी और मधुभा को। ये
लोग
साधारण परिस्थिति के श्रादमी हैं । यदि प्रत्येक देश
घासी में ऐसे विचार उत्पन्न हो जॉय तो अकेला सिन्ध प्रात
सारे ससार का सामना कर सकता
।
4w
।
पर-पर यहन (दुख से ) यदि ऐसा होता! मैंने सुना
है कुछ बौद्ध और ब्राह्मण महाराज द्वारा लोहानों और जाटों
को उच्चाधिकार दिये जाने पर येतरह बिगड़ उठे हैं।
सूर्य-वहन, हमें इनसे भय नहीं है। इस भावी युद्ध
में चे धौद्ध और ब्राह्मण लड्ने नहीं जायँगे, जायँगे केवल
लोहान, नाट, गूजर तथा क्षत्रिय लोग। ईश्वर इन्हें
सद्बुद्धि दे। परमाल, मुझे भय है फहीं ये लोग विद्रोह न
कर बैठे । यदि ऐसा हुआ तो हमारा सारा सुपस्वप्न पास के
कणों की तरह ढल जायगा । हमारी सारी चीरता, यहादुरी
और मैन्य सगठन धूल में मिल रहेगा । तय तो विधाता दी
रक्षक है।

ह.
दाहर
पर--यदि महाराज ऐसे विद्रोहियों को बन्दी कर लें
तो कैसा।
सूर्य-~यह असम्भव है। एक दो आदमी तो हैं नहीं।
सारे प्रान्त में इस प्रकार के श्रादमियों का ज्ञान कैसे हो ?
महाराज भी तो निश्चेष्ट नहीं है। चलो हम अपने कर्तव्य का
पालन करें।
(दोनों जाती हैं। )
पटवरिवर्तन

चोथा दृश्य ज्ञान- (देवन का राजप्रासाद । मायुद्ध, पेन का राजा भोपासव और उसके कुछ सहघर परस्पर घातर्घात कर रहे हैं।) -भाई मोक्षयासय, म इस यार दाहर को दिखला दूंगा कि झानयुद्ध शून्य की सम्पत्ति नहीं है, निकम्मे जीवन फी धूलि नहीं है। इतना तिरस्कार, इतना अपमान ? जयशाह ने भरी सभा में मेरा अपमान किया! अरवियों की क्रोधाग्नि में सिन्ध का प्रत्येक राजभक्त भस्म हो जायगा। मोक्ष--भाई शानयुद्ध, प्रानन्द की रागिणी गाकर स्वतत्रता की वीणा बजाने वाले दाहर का अन्त समझो। उसकी प्रत्येक चेप्टाएँ मेरे विद्रोह की भाग में स्फुलिङ्ग यन कर उड़ेंगी।। तुम्हारे कहने के अनुसार हम ने प्रत्येक बौद्ध और ब्राह्मण को दाहर के विरुद्ध कर दिया है। चौद्ध उपासक को बुलाकर भी मैं उसके द्वारा काम साधूंगा । लोहान, जाटों और गूजरों का पक्ष लेने के कारण मेने उच्च जातियों को येतरह भड़का दिया है। अब वे हमारे सहायक है। ज्ञान-और मैंने इराक के सूबेदार से साँठगाँठ कर ली है, मैं उसे सहायता दूंगा । उसने मुझे अभयप्रदान

१२
दाहर
[चौथा
करते हुए देवल का राजा धनाना स्वीकार कर लिया है,
समझे?
मोक्ष--और मैं
ज्ञान-तुम तो अपने नगर के शासक रहोगे ही। मैं
तुम्हारे लिये भी प्रार्थना करूँगा । श्रय आवश्यकता इस बात
की है कि अन्त तक हम लोग दाहर पर यह भेद प्रकट न
होने दें कि हमें उसके प्रति किंचिन्मान भी विद्वेष है।
मोक्ष-ठीक।
समुद्र-महाराज, जब बौद्धों का राज्य ही नहीं है तो
फिर बौद्ध लोग उनके सहायक ही क्यों हों, अपना भला
चुरा तो पशु भी पहचानते हैं हम तो फिर भी आदमी हैं।
अरब के लोग इसबार आपके भरोसे पर ही आक्रमण
करेंगे यह स्वय हैजाज ने मुझसे कहा है।
मोक्ष-भाई, मुझे येन के अतिरिक्त कुछ अधिक देश की
भी श्रावश्यकता है। सो तुम हैजाज़ से कह कर दिलवा
देना । पीछे झगड़ा न हो।
ज्ञान-कैसी यातें करते हो! देवल और अलौर पर
पूर्ण रूप से मेरा अधिकार होगा और ब्राह्मणावाद और
शिवस्वान पर तुम्हारा।दों, तुम अपनी ओर से दादर से
मिल पर युद्ध करने का समाचार भेज दो। और उसे

श्प] तीसरा अफ यिभ्यास दिला दो कि देयल पर माक्रमण के समय यह मानू के साथ रहेगा। मुझे मान् का डर है। यद विसी तरह भी कायू में आता नहीं दीयता पड़ा निप्टर और सच्चापीर है। मोप-मार को यहाँ से हटा देना होगा अन्यथा में सफलता की कोई आशा नही है। शान---यह सय समय पर ही किया जायगा, इसका भी मैंने प्रसन्ध कर लिया है। (पौद सम्पासा का प्रदेश) शा--(उठकर ) जय हो, उपासक । सागरदरा-शान्ति लाम हो । सुनामो स्पेदार, मुझे क्यों युलाया है। सुना है शत्रु फिर आक्रमण किया चाहता सान- महाराज श्राप सम्पूर्ण विहार के अधिपति तथा यौन धर्म के उपासक होकर भी शामित्र फा भाव रखते है। सागर- -जो है उन्हें शनु समझना विवेफ है। पाप कभी भी पुण्य नहीं कहा जा सकता। जिस प्रकार प्रात्मा की उन्नति में बाधा पहुँचाने वाले राग द्वेष हमारी दृष्टि में सदा हेय हैं उसी प्रकार यौद्ध धर्म के विघातक ये अरबी भी हमारे शनु है । उन्हें मित्र फैसे कक्षा जा सकता है शानवुद्ध ? शान-भगवान् ने 'महानिमाणसूत्त' में श्राउ प्रकार के ध्यानों में विश्वमैत्री, विश्व के प्रति करुणा का भाव सिखाया

६४
दाहर
[चौथा
।
हे । फिर महाराज, मनुष्य के प्रति ये भाव एक बौद्ध के हृदय
में कैसे नहीं रह सकते?
सागर-उपासक, तुम भूलत हो । भगवान् का यह प्राशय
कदापि नहीं । बौद्ध लोग मैत्री करुणा के उपासक हैं किन्तु
जिन कामों से मैत्री नष्ट हो, करुणा के स्थान पर प्रातक,
अत्याचार घर कर ले उन्हें भी ठीक ठीक समझना होगा।
हम लोग विश्वमैत्री किस धर्म से सीरो हैं, भगवान बुद्ध से
ही तो। सुनो, ये रवी लोग हमारे द्वारा विश्वमैत्री और
विश्वकरुणा के भाव सिखाये जाने पर भी चौद्ध धर्म का नाश
फिया चाहते हैं। मकरान प्रदेश में इन अरवियों ने निरीह
बौद्धों का नाश किया । उनके विहार सघारामों को छिन
भिन्न कर डाला, बलात्कार से बौद्धों को यवन बना डाला।
इस प्रकार इन दुष्टों ने जब चौद्धों ओर चौद्धधर्म के नाश का
बीड़ा उठाया है तब तुम्ही यताो इन से सुख शाति लाभ
करने की आशा हम लोगों को कव हो सकती है?
ज्ञान-महाराज, फिर विश्व के प्रति मैत्री का भाव तो
बौद्धों में न रहा । शत्रु मित्र उसकी दृष्टि में एक हैं। शत्रु चन
कर यदि हम पर कोई अत्याचार करे तो भी क्या वह क्षम्प
नहीं है महाराज?

।
दृश्य]
दूसरा प्रक
सागर-पित्य के प्रति मैत्री फा. अर्थ..है दुष्टों के प्रति
दया दिखाना और दुणे फी उपता दूर करना । घमारी
अहिंसा का अर्थ इतना ही है। हम मन, वाणी और कर्म से
अहिंसा का उपदेश देते हैं उसका अर्थ यही है। जिस धर्म
ने हमें ये भाव सिखाये है उसकी रक्षा करना क्या हमारा
धर्म नहीं है?
मोक्ष--पर महाराज, हिन्दूभी तो हमारे लिये पैसे दी ई जैसे
यवन। क्या चौद्ध धर्म से उनकी घृणा नहीं है, क्या येचौर और
बौद्ध धर्म को कोई अच्छी दृष्टि से देखते हैं महाराज?
सागर-तुम भूलते हो भाई, हिन्दू धर्म यौद्धों का
हो एक अंग है। धम्मपद के उपदेश हिन्दुओं के उपदेशों
से भिन्न नहीं है। उसके उपनिषद् उनकी स्मृतियाँ और उन
के घेद भगवान के उपदेशों के सहायक है। भगवान् ने उन
हिन्दुप्रन्यों के अर्थों में-जो उस समय के पण्डितों द्वारा
विरुद्ध रूप से किये गये थे-विश्वास न करके उन अर्थों का
त्याग किया! सर्वसाधारण के समझने योग्य भाषा में पढ़ता
पूर्वक मनन करके उन्हीं विचारों को 'धम्मपद' में स्थान दिया
है। हम हिन्दुत्रों से भिन्न नहीं है शान !
शान-(यात यदल कर 1) यदि हिन्दू राजा के बदले
एक यौद्ध राजा को राज्य मिले तो श्रापके विचार में यह
काम सर्वोत्तम होगा?

थावक
१
दाहर
[चौथा
सागर-(उसी भोलेपन से ) ठीक है, मुझे इसमें कोई
आपत्ति नहीं, पर सूबेदार,श्रय यह सम्भव नहीं है। मुझे डर
है कि धौद्ध लोग अपने राज्य की लालसा में इन अधिकारों
से भी कही हाथ न धो धै।
ज्ञान-तो क्या श्राप इस आगामी युद्ध में यौद्धों के उसमें
भाग लेने के पक्ष में है?
सागर-उसी तरह जिस तरह श्रात्मा की उन्नति के मार्ग
में आने वाले राग, द्वेप,मद, मात्सर्य और कपट की वाधाओं
को दूर करने में
मोक्ष -तब हम लोग इस में भाग लेंगे । श्राप को फेवल
इसीलिए काट दिया गया है कि इस समय हम चौद्धों को मार्ग
दिसला कर कृतार्थ करें।
सागर-भाई करयाण लाभ करो । परन्तु स्मरण
कि विद्रोह सब से यहा विघातक शत्रु है। मैंने भी तो
सिलयन नामक शरीर से बड़े बड़े महापातक और हत्या की
। मैं उस समय भगवान् से द्रोह करता था। इसी प्रकार
भूल चूक होने पर भी मनुष्य समय पर सावधान होकर
मनुष्यत्व, व्यक्तित्व के उच्च सिंहासन पर बैठ सकता है।
कुठे भ्रम और अनर्थकारी धारणाएँ व्यक्ति के विकास में
याधक शक्तियाँ है । इन्हें छोड़ो और सभे रूप से बाहर
Ma

दृश्य]
तीसरा श्रक
भीतर एक रहकर बौद्ध जीवन के उत्कृष्ट आदर्श बनो।
अच्छा, अब हम जाते हैं। (जाता है।)
शान-युद्दा बड़ा खुर्राट निकला। इससे काम बनने
की अाशा नहीं है। हमने सोचाथा, इसका श्रादेश लेकर प्रान्त
के समस्त बौद्धों को युद्ध के विरुद्ध उत्तजित किया जाय।
मोक्ष-पर उसने अन्त में जो कुछ कहा, वह यात मेरे
हृदय में जैसे बार बार चोर करती है। परन्तु स्मरण रहे
कि विद्रोह सर से बड़ा विघातक शत्रु है।'
शान-परे भोले भाई, ये यावें राजनीति के लिये नहीं
है । साधारण गृहस्थी ही इन बातों पर विश्वास कर सकते
है, हम मदी।
मोक्ष-हाँ और क्या? राज्य प्राप्ति की आशा में ये चोटें
उतनी उत्तेजक नहीं है।
ज्ञान-भाजही बेन पहुँच कर तुम महाराज को अपनी
पूर्ण तैयारी की सूचना भेज दो।
मोक्ष-ठीक है । (जाते हुए) 'परन्तु विद्रोह सब से बड़ा
विघातक शत्रु है' श्रोह ये शब्द कितने भयकर हैं। किन्तु
यह हमारे लिये नहीं है।
ज्ञान--गाता हुना जाता है
। हेपाशा, थय मत मचल, पूर्णता सरक रही है

१८
दादर
[चोथा
उठ साहस का दे साथ, भापना यहक रही है
भर भर कर उत्कट राग, हदय को समझा लेना
तू खेल द्रोह से फाग, प्रेम मत धुसो देना
हे पाशा, अन मत मचल, साधना सरक रही है
उठ साहस का दे साथ, भावना पहक रही है
पटपरिवर्तन

पॉचवॉ दृश्य
(मकरान के मैदान में मुहम्मदविनकासिम की छावनी पड़ी है, वह
शिविर में अपने सहायक प्रवुनमलिक के साथ बैठा बातें कर रहा है)
मुहम्मद-भाई अवुल, इस बार अगर खुदा ने चाहा तो
मय ब्याज के बदला लूंगा। मेरे मालिक हैजाज ने कृपा
करके मुझे यह अवसर दिया है। हर पड़ाव पर पहुँचते ही
उनके उपदेश मिलते हैं। जानते हो उन्होंने मुझे इस पडाव
पर आते ही क्या नसीहतें भेजी है।
अयुल-क्या महाशय?
मुहम्मद-उन्होंने कहा है कि छ हज़ार ऊँटों के अति-
रिक्त तीन हजार ऊँट तुम्हारे पास और भेजे जा रहे हैं,
जिनमें सारा सामान रहेगा । हर चार घुडसवारों का
सामान एक ऊँट पर लादा जाय। मैदान में डेरा डालना ।
खुदा से डरना। धीरज सब से बडा भूपण है। लड़ाई के
समय अपनी सेना के विभाग कर लेना। शत्रु पर चारों
तरफ से हमला करना । छ दर्जी भी सामान तैयार करने
के लिये भेजे हैं। मकरान से मुहम्मद द्वारून को अपने साथ
ले लेना।

दादर
पॉचॉ
अबुल-मेरे मालिक, इस वार श्राप ज़रूर जीतेंगे ।
हमारे अरवी ज्योतिपियों ने सितारों की चाल देस कर कहा
था कि 'इस वार फतह ज़रूरी है।'
मुहम्मद-फतह, फतद ऐसी कि एक भी शत्रु को जीता
न छोडूंगा । आग सी बरसेगी ।
एक तरफ तलवार
होगी और दूसरी तरफ होगी खलीफा की आज्ञा । या इधर
या उधर।
(दरपान का प्रवेश)
दरवान-हुजूर, मकरान के सेनापति श्रीमान् मुहम्मद
दारून पा रहे हैं।
मुहम्मद-भाने दो (आगे जाकर हारूा का स्वागत करता है।)
प्राइये महाशय, श्रादाय अर्ज ।
हारून--(लपक कर ) मेरे बहादुर सेनापति, तसलीम ।
(दोनों एक दूसरे से लिपट जाते हैं।)
मुहम्मद-सुनाओ सरदार, तैयार हो न
हारून तैयार? क्या इसमें भी कोई शक है? मेरी चार
हज़ार फौज भी तैयार है। इस बार दुश्मनों को श्राटे दाल
का भाव मालूम होगा। शत्रु का सर साहस मेरी विजय के
समुद्र में विलीन हो जायगा।
मुहम्मद-सुदा ने
च

दृश्य]
तीसरा प्रक
हारून-खुदा ने चाहा है तभी तो तुम्हारे जैसे वीर,
वहादुर जगजू को उसने काफिरों पर हमला करने भेजा है।
मुहम्मद अभी में अपनी सेना की कवायद देखनाचाहता
है, यच्छा हो आपकी सेना भी वहीं भा जाय ।
हारून-जो हुक्म । अब्दुर्रहमान, अपनी सारी सेना को
दुलाओ।
अब्दुर्रहमान--जो हुक्म ( जाता है।)
हारून-जनाव, अगर मजूर हो तो आज रात को मेरे
यहाँ ही मुजरा देखा जाय, शराव उद्दे'
मुहम्मद मुजरा, भाई हारून क्या कहते हो? क्या यह
मुजरा देखने और शराब पीने का समय है ? मेरे दिल में
देश प्रेम की नदी खहरा रही है, शनु का ध्यान पाते ही
गुस्से से बातें फटी पड रही हैं। और तुम्हें मुजरा और
शराब सूझी है। नहीं भाई हारून, इस काम का यह अवसर
नहीं है। अब तो वहादुरी के राग गानो। भरपियों को
पुरानी लड़ाइयों के जिक्र सुनाश्री । जैसे उस रोज द्वरा में
प्रायशा के नौकर के बाद से ससार कॉप उठा था। श्राज
उसी की कृपा से सिन्ध फॉप उठेगा जल और थल स्खलीफा
के आकार और प्रकार के बन कर सिन्ध में एक नया जीवन
डाल देंगे। आज हमारे ऊपर दुश्मनों ने जो अत्याचार किये
।

१०२
दाहर
हैं, उनका बदला लेने के लिये हर एक बहादुर सिपाही को
लड़ने, मरने और कटने के लिये तैयार कर दो । तुम्हें मालूम
हे हजरत खलीफा ने शराब की मनाही कर दी है।
हारून-मेरे वहादुर सिपहसालार, यह सिर्फ मैंने तुम्हारे
मन का भाव जानने के लिये कह दिया था। तुम चाफ़ई
बड़े बहादुर हो। श्राज तुम इस इम्तहान में पास हुए।
हैजाज ने सिर्फ तुम्हारी परीक्षा के लिये यह सदेश भेजा
या । उसी के मुताविक मैंने तुमसे कहा था। लेकिन अब
मुझे पूर्ण विश्वास है तुम विजयी होगे।
मुहम्मद हारून, वहादुरी और ऐश ये दोनों एक दूसरे के
विपरीत हैं । ऐश करने वालों ने कभी राज्य नहीं किया।
जिस फौज में एय्याशी घुस गई, वह कभी अपनी हकूमत
ठीक ठीक नहीं रस सकती। तुम्हें मालूम है, पहले अरवी
लोग शराय,औरत और श्रापस की लड़ाई में तबाह हो गये।
नीं भाई, अब हम लोगों का निशाना दूसरा है। हारून,
मुहम्मद अब भारत को खलीफा का राज्य यना कर ही
या वहीं इसकी जान नेगी।
झारून येशक, येशक! चलिये समय हो गया।
मुहम्मद-हाँ चलो (सब जाते हैं।)
पटपरिवर्तन

छठा दृश्य
(दो अरबी सैनिक मकरान के पदाव में बातें कर रहे हैं।)
धना-(मजाक में ) रशीद, ओ रशीद ! अव रशीद के
बच्चे, जरा इधर सुन ।
रशीद-चुप ये उरलू । जरा भी श्राराम नहीं करने देता।
अनफ्र-अवे अव आराम करने का मौका है या लसने
का देख, सिपहसालार हम लोगों की कवायद देखना चाहते
है। चल,
चले।
रशीद-यहाँ तो चलते चलते थक कर चूर हो गये,
तुझे कवायद की पडी है!
-अबे सुन, (नगादे की आवाज की तरफ इशारा करके)
सुन, यह क्या हो रहा है?
रशीद-अब चाहे नगाड़ा बजे या कुछ, मुझ से तो श्रय
कवायद हो न सकेगी भाई!
अनश-कवायद न हो सकेगी ! तो यहाँ क्या सिर
मुंडाने पाया था?
रशीद-श्रये! श्राज बीस रोज़ से बराबर चलते श्रा
रहे हैं, पिएडलियाँ बैठी जा रही हैं, धूप के मारे चॉद के बाल

दाहर [छठा अनफ- उड़े जा रहे हैं, होठों पर पपड़ियाँ पढ़ गई हैं और सेनापति को कवायद की सूझी है। -तुझे मालूम है जब हैजाज़ ने स्याम से फॉजें घुलाई थीं और उनमें हरएक रंगरूट से लड़ने की तैयारी के यावत पूछा तो उनमें से एक फौजी ने हेजाज से क्या कहा था? रशीद-हॉ, क्या कहा था ? अनफ़-उसने कहा कि मैं इस लड़ाई में नहीं जाना चाहता, मेरे धीवी बच्चे छोटे हैं। रशीद- -~क्या खूब, बीबी छोटी और बच्चे भी छोटे! अनफ़-उसका मतलब शायद बच्चों से था, बीवी से नहीं। रशीद--अच्छा, फिर हैजाज ने क्या जवाब दिया? -उसने चिल्ला कर कहा, दूर हो पाजी ! यहाँ से अपना मुंह काला कर जा! रशीद-फिर क्या हुआ? अनफ-जैसे ही वह हैजाज के सामने से हटा वैसे ही एक फौजी ने इस येहूदगी पर उसका सिर काट डाला। रशीद-अरे पापरे! इतना ग्रजय ! अनफ- -- दृश्य] तीसरा नक १०५ अना--सो मिया, नूनच न करना नहीं तो वही हाल होगा। १ रशीद-अवे, हमें यहॉ लड़ने के लिये लाया गया है, मरने तो हम यहाँ नहीं आय! जब तबियत ठीक होगी, दिल में चैन होगा, तभी तो लड़ा जायगा अना-अरे भोले भाई, लड़ाई में तबियत का क्या सवाल? वहाँ तो एक खजर इधर और एक सजर उधर । और कहीं दुश्मन ने इधर खजर रसीद कर दिया तो वेडा पार। रशीद-सचमुच अनफ़-इसमें भी कुछ शक है ? रशीद-भाई, मैंने तो सुना था कि लडाई में खूबसूरत औरते और माल मिलता है, मै तो इसी लिये आया हूँ। अना--ठीक है, औरतें भी और माल भी, पर लड़ाई के बाद। रशीद-तो क्या कोई तरीका ऐसा नहीं है कि जाते ही मिल जाय, अगर ऐसा हो सके तो मैं उसी यात छिप फर लौट पडूं। (नगाड़े की आवाज फिर सुनाई देती है)। -पहले कवायद तो करो, फिर औरतों की यात अनफ- [छठा दाहर रशीद- हा चलो, कमायद तो करनी ही होगी। यह रुघायद भी फैसी बुरी बला है। भला कवायद में होगा क्या? अनफ-जमा जमा कर कदम रपने होंगे, विगुल के साथ चलना होगा, दौड़ धूप, राजरों की चमक, तलवारें कभी ऊपर कभी नीचे। रशीद या खुदा तव तो औरतें लाने में पहले दिक्कतों का सामना ही है। दिक्कतों का क्या, मौत का सामना है, चलो। (दोनों जाते हैं।) पटपरिवर्तन घनफ-

सातवॉ दृश्य
जयशाह,
(महाराज दाहर युवरह में बैठे मप्रणा कर रहे है। युवराज
मनी पाकर, पीर मानू धादि कई अन्य विश्वस्त कर्मचारी
बैठे हैं।)
दाहर-तो क्या जयशाद, तुम्हें अलाफी पर सन्देह हे ?
जयशाह-पृथ्वीनाथ, सन्देह ! म जानता हूँ उस दिन
इतनी प्रतिज्ञा करने पर भी अलाफी अवसर पर हमारा साथ
न देगा। कहीं उसके कारण हमें हाहाकारमय पराजय का
मुँह न देना पड़े।
दाहर-परन्तु म तो उसके मुख पर छल अथवा सन्देह
का कोई चिन्ह नहीं देता।
क्षपाकर--ससार में विश्वासघात के भाव इतने दुरूह
और गुप्त हैं कि उनको जानना मानव शक्ति से यादर हे।
आँधी के आसार धुमस से ही जाने जाते हैं। मुझे
सन्देह है कदाचित् उसका आपकी शरण में आना भी लक्ष्य
रहित नहीं है।
मान-सम्भव है।

१०८ दाहर [सातवाँ १ दाहर-अच्छा, तो बुला कर उसके भावों का तारतम्य क्यों न मालूम कर लिया जाय युवराज-जैसी पिता जी की इच्छा, किन्तु में सर्प पर कभी विश्वास नहीं कर सकता। दाहर-मंत्रिन् ! अलाफी को बुलाओ। मत्री-जो आशा । ( बाहर जाता है।) युवराज-महाराज लगभग तीस हजार सैन्य संगठन हो चुका है प्रत्येक नगर में युद्धसामग्री प्रस्तुत है, इतना होते हुए भी यदि कुछ और सैन्यसग्रह हो जाय तो अच्छा है। -हॉ युवराज, तीस हजार सेना के अतिरिक्त प्रति दिन लगभग एक सहस्र सेना और प्रस्तुत की जा रही है। सूर्य की अध्यक्षता में यह कार्य हो रहा है मानू-पृथ्वीनाय! शिवस्थान का सामन्त वत्सराज, युवराज और मेरी सेना यदि शत्रु से आगे बढ़ कर युद्ध करे दाहर- - तो कैसा? दाहर-नहीं मान्, मैं देवल से बाहर तुम्हें नहीं जाने देना चाहता । वत्सराज और रसिल युवराज के साथ होंगे। मोक्षवासच ने उस दिन श्राफर मुझ से क्षमा याचना की थी। मैंने उसे क्षमा कर दिया है, किन्तु मैं पिना अधिक श्रावश्यकता के उसे युद्ध में न जाने दूँगा, वह मेरे पास रहेगा। थाह, यदि कहीं ज्योतिपियों ने मेरी याना का परामर्श दिया एश्य] तीसरा अंक दोता! विन्तु नहीं पीरो, मे आयश्यकता पड़ते ही प्रस्थान (मसारी का प्रवेश) अलापी-सिन्धनरेश की जय हो। मुझे क्या यामा? दाहर-अलाफ़ी. कर्तव्य फी फर परिस्थिति से प्रभावित दोफर मनुष्य शत्रु और मित्र को एक सा देखता है। उसी के उपागों में एक व्यवस्था यह भी है कि शासक शनु और मित्र को पहचाने । मलापी-महाराज, परिस्थितियाँ ही विचारों में तार- तम्य और उनकी उत्पत्ति और घिनाश का कारण है। युवराज-अलाफी, देश प्रेम के स्वार्थ में आहुति देने याले पक्षी भी कभी कभी उसी वृक्ष का विनाश करने के तिए कटिबद्ध होते देखे गये हैं जिसने उनकी रक्षा की है। अलापी-ऐसे समय उनका फर्तव्य कि मुख्य कर्तव्य की साधना में गौण का नाश कर दें। दाहर-यदि पालक पर शरणागत के बान्धव आक्रमण करें तो शरणागत का उस अवस्था में क्या कर्तव्य होता है अलाफी! अलाशो- परिस्थितियाँ और कर्तव्य जो फई चही तो महाराज!

दाहर
[सातवा
-
युवराज-उस अवस्था में प्रतिपालक का क्या यह
कर्तव्य नहीं है कि शरणागत पर ध्यान रखे।
अलाफी युवराज, श्राज एक मास से मैं इसी पर
विचार कर रहा हूँ, किन्तु मैं अभी तक किसी नतीजे पर
नहीं पहुँच सका।
दाहर-तुम ऐसी परिस्थिति में किस कर्तव्य का पालन
करोगे, आर्यशास्त्र और आर्य गौरव सर्वस्व लुटा कर भी
शरणागत फी रक्षा का उपदेश देता है।
अलाफी-महाराज, श्राप धन्य हैं, थाप का शास्त्र भी
महान है किन्तु छल और कूट युग में
मत्री-उस शास्त्र की व्यवस्था केवल वैसे ही व्यक्तियों
के लिये है महाराज, परिस्थिति शास्त्र की स्थिति का सब से
वडा तर्क है?
अलाफी-मैंने श्राप फी दया और
कृपा
के
उपदेशों से यह सार ग्रहण किया है कि मैं देश और जाति
सम्मुर विश्वासघात न कर के प्रतिपालक के प्रति अपनी
असमर्थता प्रकट करते हुए देश छोड़ दूं।
युवराज-तुम्हारे पाने से पूर्व मेरा इस सम्बन्ध में यही
नित्यय था।
दाहर-कर्तव्य की प्ररेसा से वाध्य हो कर मैं तुम्हें
पाचन

श्य]
तीसरा प्रक
भासा देता है कि तुम मेरा प्रान्त घोट कर शीघ्र ही चले
जामो।
भलाशा-में इस रुपा का पदुत आभारी हूँ। मैंने
श्राप के राज्य में यात सुख पाये हैं इस लिये यद अलाफी
श्रापका चिरपी है।
(प्रणाम करके माता है)
जयशाह-फिर न चुभने के डर से यदि पाँटे को
समूल भस्म कर दिया जाय तो यह पमी कष्ट नहीं देता।
दाहर-अभय प्राप्त मनुष्य के प्रति जो व्यवहार
शास्त्रों ने बताया है यही म ने किया है युवराज ! मने जिसे
एक बार 'अभय' कह दिया, यह सदा अवध्य है।
सय-धन्य हो महाराज, जय दो मिन्ध नरेश की।
जयशाह-(मान से इशारा करता है, मानू महाराज की आशा
बेकर थाहर चला जाता है।)(दाहर से) पिता जी, मेरा विचार
है शत्रु देवल पर ही प्रथम अाक्रमण करेगा यदि आप उस
समय युद्ध को देखने के लिये देवल में रहे तो-
राजज्योतिषी-नहीं युवराज, महाराज का अलोर न
छोड़ना ही श्रेयस्कर है।
दाहर-(सोच कर) ज्योतिषी जी, आप ने बड़ी उरी
व्यवस्था दी है, देश में इस समय आग लग रही है, शत्रु
.

११४
दाहर
[अाठवाँ
-
ज्योतिषी-नहीं, कभी नहीं । अच्छा प्राशा दीजिये ।
(जाता है)।
शान-सब सामनी प्रस्तुत है, आग लग जाने भर की देर
है। दाहर का सब कुछ भस्म हो जायगा । मोक्षवासच को
भी मैंने यहफा ही दिया है। अवसर पाते ही मैं अरवियों
से
चुलाकर अयशाह, मानू और रसिल का
नाश फराऊँगा। अदा! यह कैसा शुभ दिन होगा,
थलोर और देवल का मैं एकछत्र राजा बनूंगा । उस स्वप्न
की अनुभूति मुझे कितना सुस देती है। राज्य के चैभव
फो याद करके मेरा हदय वलियों उछल रहा है। खुशी से
गाता:-
को पृष्ठद्वार
जव
(इस स्वप्न सुख भवन में मन मस्त हो उठा है
निस्तब्धता में जग की आनन्द सो उठा है
मेरी हृदय विपनी फनकार कर रही है
श्राशायरी सुनाती, पालाप की छटा है
मुसका रहा है सूरज सकेत कर विजय का
जीवन को शिमरी में मन मोद प्रा डटा है
कोकिल की कूक में है उल्लास की मधुरिमा
मेरी तरफ निरखती, रिपु पर चढी घटा है

पश्य]
तीसरा अंक
अदर रामौर चलकर पोरग मचल मरत कर
मा माग्ग गाय कण देते निर हटा है
विदोद से विजय पा भठरोलियों फलंगा
मन मुग्ध हो रहा है अब भाग्य या पटा है
पटाक्षेप

११४
दाहर
[पाठवाँ
ज्योतिषी-नहीं, कभी नहीं । अच्छा आशा दीजिये।
(जाता है)।
शा-सय सामग्री प्रस्तुत है, आग लग जाने भर की देर
है। दाहर का सब कुछ भस्म हो जायगा । मोक्षवासव को
भी मैंने यहफा ही दिया है। अवसर पाते ही मैं भरवियों
को पृष्टद्वार से बुलाकर जयशाह, मानू और रसिल का
गाश फराऊगा। अहा ! वह कैसा शुभ दिन होगा, जय
अलोर और देवल का मैं एकछत्र राजा वनूँगा । उस स्वप्न
की अनुमति मुझे कितना सुख देती है। राज्य के वैभव
को याद करके मेरा हृदय वलियों उछल रहा है। खुशी से
गाता
य स्वम सुख भवन में मा मस्त हो उठा है
निस्तब्धता में जग की भानन्द सो उठा है
मेरी हृदय विपी मनकार कर रही है
आशायरी सुनाती, थालाप की छा है
मुसका रहा है सूरज सकेन कर विजय का
जीवन को शिमरी में मन मोद आ डटा है
कोकिल की कूक में है सल्लास की मधुरिमा
मेरी तरफ निरसती, रिपु पर चढी घटा है

पश्य]
तीसरा प्रक
--
गुदर समोर पसफर पोरग माल मचत कर
मम माग्य गन्य मण यो देते निकर हटा है
विद्रोह से विजय पा अठरोलियों फरूंगा
मा मुग्ध हो रहा है अर माग्य मा सटा
पटाक्षेप

नवा दृश्य
(युवराज जयशाह देवल के बाहर शिविर में)
जयशाह - सव कुछ प्रस्तुत है। विस्फोट में चिनगारी
की आवश्यकता है। श्राज विलास की चिता में वीरत्व की
अग्नि जला कर शनु को भस्म कर डालूंगा। (सोच कर)
प्रलाफी, तुम बड़े धूर्त निकले। पर मैंने भी तुम्हारी यथार्थ
व्यवस्था कर ही दी। तुम्हारा पूर्ण रूप से सत्कार कर दिया
है। अब अलोर के दुर्ग में अपराधी की भाँति तुम्हें पड़ा
रहना होगा। पर मुझे शानयुद्ध से बड़ा डर है । (सोच कर)
नहीं उसके पास अब कुछ भी नहीं है, वह कर ही क्या
सकता है । राजयोतिषी गुप्तचर के रूप में उसके पास
(मान का प्रवेश)
मान-जय हो युवराज की।
जयशाह-श्रानो भाई, सुनाश्रो शनु का क्या समाचार
मानू-युवराज, चरों मे शात हुश्रा है कि शत्रु भाया ही
चाहता है। सुना है बड़ी विशाल सेना है।

दृश्य]
तीसरा अंक
जयशाह-इस गार अन्तिम युद्ध है। या तो सिन्ध पर
महाराज का शासन होगा अथवा विनाश की कर
ज्वालाओं में प्रान्त की प्राहुति होगी। तुम्दारे धीरों का
क्या हाल है ? मानू, जिस प्रकार डाकू जीवन में तुमने
नृशसता, निर्दयता, फरता, कठोरता के नियमों को, जो डाकू
जीवन के अंग है, रक्षा की है, आज उसी दस्युता के
सदारे रुधिरसनी पुष्करिणी के सरोज वन कर अपनी
वीरता और शौर्य के मकरन्द से समस्त सिन्ध रूप भ्रमर फो
चचल कर दो।
मान-युवराज, निश्चित रहिये । ससार में जितनी क्षमता
है, मनुष्यत्व में जितना विश्वास है, उसको समग्ररूप से
एकत्रित कर के मैं कह सकता हूँ कि मेरे रहते शत्रु के जीवन
की झाई सिन्ध पर न पड़ने पावेगी। जन्तु जगत् में जिस
प्रकार शेर का पजा, जिराफ का खुर ओर खेल की दुम है,
उसी प्रकार इन तीन भयकर अगों के समान, जो प्ररुति ने
अपनी उग्रता से सृजन किये है, में भी मनुष्य सृष्टि की उग्रता
को लेकर विजय कीयोज करूँगा।
जयशाह ठीक है, मुझे तुमसे ऐसी ही श्राशा है। सेना
की फ्या अवस्था है?
मान- युवराज, मेरी सेना प्रस्तुत है, आशा की देर
.

दाहर
(दूत का प्रवेश)
दूत-सेनापति, शत्रु आगया है उसकी सेना ने यहाँ से
दस कोस पर छावनी डाली है।
युवराज-मानू, हमें आगे बढ़ कर शत्रु से मोर्चा लेना
चाहिये।
मान-ठीक है। (दोनों का प्रस्थान)
पटाक्षेप

पर
दसवॉ दृश्य
(एक गाय में एवं पौर परमाव देषी गांप के बोगों को एकत्र
करके उस्मारित कर रही है।)
पमा से एक मारमी-तुम्हारा उपदेश सदी है,
अभी उस दिन प्रानपुर के पादमियों ने तो एम से फदा
युर में कोई न जाय।
सूर्य-1 (भाव से) मानयुर देश का कृतघ्न
पीहा है। उसने महाराज के साथ विश्वासघात फरके
देवल शत्रुओं के दापों सौंप दिया है। क्या तुम लोग ऐसे
पापी की पाते सुनोगे?
पर-पहन, क्या दुष्ट पानपुर ने यहाँ तक एवम्नता
सूर्य--(परमाल की पात मनमुनी करके) तुम्हारे देश पर
विपत्ति श्रादहै। एक विदेशी तुम पर याक्रमण करने
श्रा रहा है। जिसके वृक्षों की छाया में तुमने विश्राम किया
है, जिस देश का तुमने श्रम साया है, जिस माता की
गोद में तुम इतने बड़े हुए हो, क्या उसके लिये जान लड़ा
देना तुम्हारा कर्तव्य नहीं है।

१२०
दाहर
[ दसवाँ
एक हम लड़ेंगे और सिन्ध के लिये सर्वस्व न्यौछावर
कर देंगे।
दूसरा-है तो ठीक, पर हमतो राजा होने से रहे । महाराज
दाहर राजा रहे तो भी हम प्रजा ही रहेंगे, यदि कोई दूसरा
राजा होगा तब भी हम प्रजा ही रहेंगे।
तीसरा-अरे मूर्ख, प्रजा की रक्षा करना जैसे राजा का धर्म
है ठीक उसी प्रकार आपत्ति में राजा की रक्षा करना भी प्रजा
का धर्म है।
सूर्य-यह राजा की रक्षा का प्रश्न नहीं है। राजा तुम
से अपनी रक्षा नहीं चाहता। वह तुम्हारे देश से शनुओं
को भगाना चाहता है जो तुम्हारे धर्म पर, तुम्हारे पाचार
पर, तुम्हारे गौरव पर, तुम्हारी प्राचीनता पर हाथ फेरना
चाहता है। शत्रुनों ने मकरान के मन्दिर तोड़ डाले,
विहार छिन्नभिन्न कर दिये, शहर लूट लिया, स्त्रियों, बच्चों
ओर पुरुषों को पकड पकड़ कर मार डाला, क्या यहाँ
भी तुम्हें ये बातें स्वीकार है?
नहीं, कभी नहीं, हम लोग सिन्ध की चप्पा
चप्पा भूमि के लिये, मन्दिर की एक एक इंट के लिये,विहार की
एक एक पुस्तक के लिये, श्रार्यगौरव की एक एक कहानी के लिये

तीसरा धक
,
दृश्य]
मर मिटेंगे। माता जी, हम सय युद्ध के लिये तैयार है।
श्राशा दीजिये।
स्त्रियाँ-हमें भी श्राशा दीजिये कि हम अपने पति,
भाइयों और बच्चों के साथ युद्ध में भाग ले सके।
सूर्य-(पुरषों से) तुम लोग यदि मरने को तैयार हो
तो अभी अलोर जाकर महाराज की सेना में भर्ती हो
जायो।। स्त्रियों से) तुम परमाल की अध्यक्षता में युद्ध में
घायल सिपाहियों की सेवा करो और देश का मुख
उज्ज्वल करो।
सप-जय हो महाराज दाहर की, जय सिन्ध देश की।
(जोश में जाते हैं।)
पटाक्षेप
.

चौथा अंक
पहला दृश्य
(युद्धवेश में महाराज दाहर दुर्गद्वार के शिखर पर उद्विमता से
टहल रहे है, मत्री, मोच्यासव यादि कुछ कमचारी पास खड़े हैं।)
दाहर-अभी रणपरिणाम का कोई सन्देश नहीं मिला,
मत्री जी, देखो कोई श्राया?
मनी-(भागे बढ़ कर देखता है फिर लौट कर) नहीं महाराज
कोई नहीं पाया।
दाहर-(उद्विमता से तूणीर चटचटारो लगता है) अव भी
कोई नहीं क्या? इतनी देर, श्राज प्रात काल से प्रतीक्षा के
वक्ष स्थल पर बैठा हुश्रा प्राशा निराशा के टॉके तोड़ रहा
हूँ। मेरी हथिनी चिंघाड़ कर युद्ध के लिये उतावली हो रही
है। मेरी सेना रणोन्माद का मद पीकर विकट ध्वनि कर रही
है। मोक्षवासव कहाँ है?
मोक्ष-आशा, पृथ्वीनाथ !
दाहर-भाई, अब मुझ से नहीं रहा जाता। अब देर
न करो। मैं स्वय जाकर युद्ध करूँगा । प्रस्थान करो। इस
समय मुझे कुछ नहीं दीखता। युद्ध, युद्ध, बस यही एक मेरी
गति है।
।

दृश्य]
चौथा धक
१२३
(दूत का प्रवेश)
दूत-महाराज, रक्षा कीजिये, शनु ने देवल पर आक्रमण
कर दिया, सय कुछ नाश दोगया।
क्षपाकर- - हे प्रभो।
दाहर--कैसे! कैसे शीघ्र कह ।
दूत-युवराज, मानू और वत्सराज ने दिन भर युद्ध करने
के
याद शत्रु को परास्त कर दिया था। रात्रि के समय
दोनों ओर से युद्ध स्थगित कर दिया । सब लोग लोट माये
थे, किन्तु श्राधी रात के समय देवल के मार्ग से एकदम भय
कर नाद सुनाई दिया। उसी अन्धकार में घोर युद्ध हुआ।
चारों ओर शत्रु ही शनु थे। इस युद्ध में वत्सराज देवगति
को प्राप्त हुए।
दाहर--हा वत्सराज!
दूत-पीछे से ज्ञात हुआ कि ज्ञानबुद्ध ने दक्षिण द्वार
से अरवियों को भीतर धुला लिया। मानू की सेना ने डट
फर लडाई की। इस समय देवल पर शत्रु का राज्य है।
दाहर-विश्वासघात, मनुष्यता के मुख पर कलक लगाने
याला विश्वासघात ! मत्री युद्ध की यात्रा करो।
(एक और दून का प्रवेश)
दूत--जय हो महाराज की, शत्रु अलोर की ओर

१२४ दाहर बढ़ रहा है। मुहम्मदयिनकासिम ने शानवुद्ध को केद कर लिया है। सुना है शानों ने नगर के मन्दिर, विहार, और सघाराम तोड़ डाले हैं। दाहर-इतना काण्ड हो गया, (मोघ से) जा, मैं स्वयं युद्ध के लिए प्रस्थान करूँगा। श्राज क्षत्रियत्व के विकास द्वारा, धर्नुदण्ड की टंकार द्वारा, पराक्रम के प्रकाण्ड ताण्डव द्वारा अरबियों को नए शासन, नए विधान और नई युद्ध- सला का पाठ पढ़ाऊँगा। कृतघ्नता के फर अग्निकुण्ड में नर रक्त रजित विभीषणों की आहुति दूंगा अथवा स्वय मृतप्राय मातृभूमि के वक्ष स्थल पर गिर कर स्वर्गलाभ करूंगा। मत्री, प्रासाद की स्त्रियों को युद्ध और मृत्यु के लिये तैयार होने की सूचना दे दो। मत्री-जो श्राशा ! ( जाता है) मोक्ष-महाराज, ज्योतिपियों ने शापका नगर त्याग निषेध कर दिया है। दाहर-सव कुछ नाश होने पर निज शुभ की आशा करना मूर्खता है। देश की विनाशिनी घड़ियों में व्यक्तित्व की रक्षा नहीं हो सकती, मोक्षवासर! अव मैं जाऊँगा। मेरा जाना आवश्यक है, हा, कदाचित् इस समय से पूर्व (प्रस्थान करते है। पटाक्षेप ।

दूसरा दृश्य (युवराज जयशाह निरुण के मन में पतविक्षत अवस्था में।) दुप से अधीर हो कर- गीतों में खर भग, हृदय में भय किस ने भर डाला भव्यभक्ति में द्रोह, राग में निर्विषयों की ज्वाला वीर भाव में य, प्रेम में अनयन केसी आई विधामों में वधकता ने छत्तकाई फैलाई घोल बार सागर में किसने उसका मद मयडाला खतनता में पारतश्य विष घोला कुत्सित काला राजनीति में क्यों उठ उसने झाति थपेड़ लगाई निर्मल पुष्करिणी में है विधि, क्यों पैदा की काई सिन्धहदय को है निर्दय, फ्यों रह रह पीस रहा है सब कुछ छिपा नाश की तह में, दुस क्यों दीस रहा है। सर्वस्व स्वाहा हो गया। विनाश, ध्वस, प्रलय के प्रकाण्ड नहदास में निराशा के वह्निकुण्ड में, विश्वासघात के कुत्सित चफ में, हिन्दुत्व का हृदय, बौद्धधर्म की शान्ति, आर्य इतिहास का गुरुत्व, धर्मशास्त्रों की महचा, प्राचीनता, सु- -- १२६ दाहर [दूसरा सस्कृति की सुरभि सदा के लिये विलीन हो गई । स्वतन्त्र रूप से विचरण करनेवाले निरीह पक्षियों के घोसलों में विधाता ने विद्रोह की वह्नि विखर कर आग लगा दी। हा! पिता जी सिन्ध के तट पर युद्ध में मारे गये । मोक्ष वासव, (दाँत पीस कर) उस नीच, नराधम, कृतघ्न, मोक्षवासय ने येन के मार्ग से बेड़े द्वारा शत्रुओं को बुला लिया। युद्ध स्थल में पूर्व ही से विस्फोटक पदार्थ पिछवा दिया गया था। उसी नीच ने अवसर पाकर उसमें भी आग लगा दी। महाराज तथा अन्य सैनिकों के हाथी और अश्व इस प्रकाण्ड अग्नि विस्फोट से विगढ़ पढ़े हुए। पिताजी की हथिली बहुत रोक थाम करने पर भी उन्हें सिन्ध में ले गिरी। मोक्षवासव ने नीच मरलाहों की सहायता से अरबी सेनापति को बुला लिया। तट घेर लिया गया । और अन्त में वही हुआ। हा पिता जी का सिर । क्षपाकर भी पकड़ लिया गया। हा, विद्रोही वृत्ति ने निज जीवन से विद्रोह क्यों न किया।मैं अब मैं भी सेना हीन, सहायता हीन हो गया है। शत्रुओं ने सब प्रदेश पर अधिकार कर लिया। (घावों की पीड़ा से कराह कर मूर्षित हो जाते हैं, फिर होश में भाकर और सामने की ओर देख कर ) है ! कौन है जो इधर दौड़ा पा रहा है। (देखते देखते यह भादमी पास था जाता ) आहा. मान् तुम कैसे ? कहा भाई- ?

दृश्य] चौथा अफ १२७ मा-(हॉपता हुमा) युवराज, फुछ न पूछिये, सब कुछ नाश हो गया। देवत के युद्ध में मैं घायल हो गया था, यह तो आपको मात दी है। जयशाह-हॉ, शानयुद्ध की करतूतों से हमारा नाश तुम्हारी और यत्सराज की अवस्था सुन फर मैं लडते रायते उस ओर यदा, पर शत्रु की असत्य सेना के सामने मेरी सब मेना कट गई । मेरा और मुहम्मद कासिम का घोर युद्ध हुना। मैने उसका घोडा मार डाला था, वह निराश था फिइसी बीच में सहनों लोग मेरे ऊपर टूट पड़े में घायल हो गया। शत्रु श्रागे बढ़ा। अन्त में पिता जी के साथ युद्ध हुया और उनका जो अन्त हुश्रा यह तुम्हें शात ही है, मानू! मान- -हाँ युवराज, महाराज की मृत्यु के बाद शनु ने अलोर पर आक्रमण किया। अलोर में श्रापकी माता लाड़ी ने शत्रु का सामना किया। और अन्त में ये भी अन्य वीर राजपूत स्त्रियों के साथ जल कर वहीं भस्म हो गई। जयशाह-दा, माताजीने वीर गति प्राप्त की। (मूछित हो जाते हैं फिर सज्ञा प्राप्त कर के) हा माता, तुमने आर्य ललनाओं की तरह जीवनोत्सर्ग क्यिा । तुम धन्य हो । मान्-युवराज, रसिल और मेने मिल कर शत्रु को निरुण की ओर बढ़ने से रोका । सूर्य भी अपनी सेना

१२८
दाहर
[दुसरा
लिये हमारे साथ थी। चाह, सूर्य ने फ्या वीरता दिखाई कि
शत्रु के छक्के छूट गये। रसिल मारा गया। में भी घायल
हो गया। पीडा के मारे मुझे मूर्खा आ गई। चेत होने पर
मेने देखा कि शनु ने निरुण छीन लिया है। ऐसी अवस्था में
निस्सहाय होकर में श्रापकी खोज में इधर पाया है। सुना
है सूर्य देवो पकड़ ली गई है।
जयशाह-सूर्य पफड़ ली गई ? उन दुष्टों के हाथ में
सूर्य पड़ गई मानू ? हा! कृतान्त की काली दादों में कमल
कुचला गया। हाय!
मान-हॉ युवराज, नगर भर में लूट पसोट हो रही है।
में अव में सेना की सहायता के लिये
काश्मीर नरेश के पास जा रहा है। जीवन के अन्त तक
रानु से युद्ध करूँगा।
मान-सूर्य और परमाल का क्या होगा युवराज
जयशाह-भाई, अब मुझे युवराज मत कहो, अब मैं राह
का भिपारी, पथच्युत पथिक, कीचड का क्ण हूँ। सूर्य
स्वय विज्ञ है वह शत्रु के पंजों में सीधी तरह न पायेगी।
हॉ, परमाल भोली और दार्शनिक विचारों की भावप्रवण
पालिका है किन्तु यह कुछ भी अब सोचने का अवसर
नहीं है। मैं भरसक सिन्ध को शत्रुओं से उन्मुफ्त करने
जयशाह-अब
१
-

एश्य] चौथा अफ की चेश करुगा। यही मेरे जीवन का ध्येय है। मान- 1-मैं आपका मुक्तभोगी अनुचर है, मेरे धाव श्री तक ठीक नहीं हुए, फिर भी मैं आपका साथ न छोईंगा। एकता का रस जयशाह--पया ही अच्छा होता यदि मैं स्वर्गीय दादा जी की प्रमाद में मीठी लगने वाली भूलों को गुणों में बदलकर हिन्दुओं और बौद्धों की जीवन धारा में सकता । धर्म के समान देश की भावनाओं को बलिदान की एक बहुत ऊची सीढ़ी बना सकता! यात्मा की अपेक्षा समाज और समाज सामने देश के जीवन को उन्नत बनाने में सहायक हो सकता पर नदी, वह एक खुमारी थी जो स्वत धन फर उद गई, यह एक राग था जो गूंज कर आकाश के किसी अन्तराल में जा छिपा, यह एक दीपक था जो टिमटिमा कर ऑषों से श्रोमल हो गया। अब अब क्या होगा? कुछ नहीं नहीं, नहीं, श्रव समस्त भारत में घूम कर हम लोग राजाओं से सायता मांगेंगे, उन्हें शनुनों के अत्याचार की रोती हुई कथा सुनाएँगे।हिन्दू और बौद्धों में युद्ध का जीवन फेंक देंगे। न होगा तो शत्रुओं के हाथों मर कर पचत्व करेंगे। (प्रस्थान) पटपरिवर्तन

तीसरा दृश्य
सन्ध्या का समय
। हताहत सैनिकों के ढेर में कुछ स्त्रियाँ)
एक सैनिक-हाय ! पानी के लिये जान छटपटा रही है।
पानी पानी, हाय!
एक स्त्री-(दूसरी से) देखो वहिन, किस तरफ से श्रावाज़
श्रा रही है। कोई सैनिक छटपटा रहा है।
दूमरी स्त्री-(ध्यान से सुनकर) उस ओर से। बेचारा कोई
पानी पानी चिल्ला रहा है। (थागे वदकर पास जाती है और उसके
मुँह में पानी डालती है, पानी पीकर सैनिक आँखें खोल देता है दूसरी
ओर से एक और आवाज़ आती है, उसके पास जाकर)
पहली स्त्री-अरे, यह तो अरची है, मैं अपने देश के शत्रु
को पानी न दे सकूँगी। अरे नीच, मैं तुझे पानी कदापि न
दूंगी।
अरबी सैनिक-भरी माई, खुदा के नाम पर एक बूंद पानी
पहली--इसी बूते पर मेरे देश पर अत्याचार करने

चौथा श्रक
आया था? तुझे पानी तो क्या (क्रोध में पाकर एक बात मारती
है, सैनिक धीमता उठता है उसी समय परमाल भाती है।)
परवदित, यद फोन है?
पहली- यह शनुपत फा आदमी है। मैं इसे पानी नहीं
दे सकती। इसके लिये सिन्ध की भूमि में पानी नहीं है।
पर-संसार के सय प्राणी एफ है पहिन, मरते हुए
यादमी को सब ससार एक है। इसे पानी दो।
पहलीनही यहिन, शत्रु मित्र की पहचान दी तो देश
की स्वतन्त्रता और परतन्त्रता की प्राप्ति का साधन है।
श्राग और पानी की पहचान तो विवेक है।
पर-अप हमारी इसके साथ कोई शनुता नहीं है। मृत्यु
शभुता, मित्रता, उदासीनता के नाटक की यवनिका है। यह
भेदभाव और विनाश की जागृति है। इसे भी पानी दो।
(स्थय जाकर उसके मुख में पानी डालती है, पद सैतिक माँखें खोल
उन्हें दुधा देता है परमाल उसको टाटस देकर दूसरे पायों की
परिचयों के लिए जाती है।)
(कुछ थरय सैनिकों का प्रवेश)
एक-यद खियाँ इधर ही तो आई हैं।
दूसरा-नहीं, वे यहाँ तो दीपती नहीं। (सैनिकों को देखते
हुए भागे यदते ई, एक घायल अरबी इशारे से उन्हें बुलाता है, और
वे लोग पास जाते हैं।)
।

। ૨૨૨ दाहर [तीसरा घायल-किसे ढूंढते हो? खोजी-तुझे नहीं ढूँढते रे, यता यहाँ कुछ औरतें श्राई थीं हम उन्हें पकड़ने आये हैं। ( उसके मुंह पर पानी के छोटे देखकर ) मालूम होता है तुझे किसी ने पानी पिलाया है। बता, चह पानी पिलानेवाला कौन था? घायल-(शक करके) तुम उन खुदा के बन्दों की बावत क्यों पूछते हो? योजी--(इकट्ठे होकर) हम उन्हें पकड़ने आये हैं। बता वे औरते किघर चली गई? घायल-तो मैं न यताऊँगा। आखिरी दम में उनके पह- सान को नहीं भूल सकता। गोजी-इसे मालूम है। अरे मूर्स, तू अागिरी दम अपनी जाति से विद्रोह न कर, बतावे औरतें कहाँ चली गई। सैनिक-समी खुदा के चन्दे हैं। (कुछ सोच कर ) क्या सचमुच हम एक नहीं हैं, क्या यह लडाई ससार की ऑखों में अधिक पानी वहाने के लिये नहीं है । मैंभूला,तुम भीभूले ! यह कैसी भूल है ? शायद दलीलें भी यहीं पाकर भूली हैं । खोजी-इस नालायक काफिर को यहीं करल कर दो। (सब उसे ठोकरों से मारते हैं, वह सय सह कर भी अन्त को मर जाता है। दूसरी भोर से कुछ सिन्धियों का परमाल को पकडे हुए प्रवेश ।)

दृश्य]
चौथा अंक
एक सिन्धा-देखो परमाल को मैंने पकड़ा है, यह बात
तुम्हें माननी होगी।
दूसरावाद ये, हम क्या यों ही रहे ?
तीसरा-बताया तो मैने ही था।
(परमाल बंधी हुई।
-अरे नीचो, राजकन्या को पकड़ कर शनु को
सोपते तुम्हें लजा नहीं पाती' श्रो, क्या यह भी देखना था!
सब-माल मिलेगा माल । सेनापति ने तुम्हें पकड़ने
का बड़ा पारितोषिक नियत किया है।
पर-तुम जैसों ने ही सिन्ध को पराधीन बनाया
है। मनुष्य जैसे एक बार घातक क्षय का ग्रास बन कर उस
से उन्मुक्त नहीं हो सकता, इसी प्रकार देश द्रोह रूपी क्षय
से देश नए हुए विना नहीं रह सकता। तुम लोगों ने सिन्ध
को पराधीनता की बेडी में डाला है, समझे?
एक सिन्धी-शहा, क्या अब भी राजा का प्रभुत्व स्वीकार
करना होगा।
दूसरा--प्रव महाराज दाहर मर गये, जिन्होंने इम उस
वर्णस्थ क्षत्रियों की अवज्ञा की, और जाटों को क्षत्रिय
बनाया। चलो, अब तुम्हारे भाग्य का निपटारा अरबपति
के दार्थों होगा। (ले जाते हैं।)
पटपरिवर्तन

-
चौथा दृश्य
-
रात का समय
(सेनापति मुहम्मदबिमासिम अपनी छावनी में बैठा है।)
फासिग-नोह, सिन्धी बड़े गजब के लड़ने वाले हैं।
मुझे यह बात तो अभी तक नहीं भूलती, जय दाहर ने सिन्ध
नदी की दूसरी ओर से तीर मार फर मुझे घायल कर दिया
था। वह तो कहो कि उस समय मेरे सामने एक नहीं दो
श्ररवी खड़े थे। उनके बदन को चीर कर वह तीर मेरे श्राफर
लगा। वरना मेरा तो खातमा था। लेकिन सुदा के फज़ल
से मैंने सिन्ध को जीत लिया है। बिच्छू का पेट अगर
मुलायम न होता और कहीं डक की तरह सारा बदन कड़ा
होता तो उसे मारना बड़ा मुश्किल था। ठीक इसी तरह
दगाबाज़ और फरेवी लोगों को विच्छू का पेट बना कर मैंने
यड़ी आसानी से सिन्ध रूप बिच्छू के डक को काटा है।
शानबुद्ध मोक्षवासच जैसे-आदमियों की मदद से मुझे यह
बीत मिली है। (कुछ सोच कर ) लेकिन जिन लोगों ने अपने
मुरक के साथ दगा की है, ये हम परदेशी अरवियों के साथ
नेकी का सलूक करेंगे, यह नामुमकिन है। मैं उन पर कभी
विश्वास नहीं कर सकता।

শাখা গুঞ্চ
(पुगसिपाहियों का प्रदेश)
(असिम गरी भोर देयर) पतामो, परमाल मिती
या नदी।
प-(सिर पुरा घर हो पाते हैं।) नहीं, गुजूर ।
कागि:-4 पुष नदी मुन्गा. मैं परमारा को चादवा
हैं। जमीन की सद से उसे एंट फर पायो।
ए-गुजर, पहुत हूँदा मगरह मिली।
पाधिम-नहीं मिली ! कहाँ गईजाश्रो उसे ढूँढो, यस
अर एक परमास यामी है, सूर्य तो पकड़ ली गई।
में फाफिर दादर का सिर, सूरज और परमाल को पलीफा
के पास भेजना चाहवा हूँ।
(दूसरी सर से पुष सिम्धी am परमान को पकये हुए
दाखिल होते है।)
एक सिन्धी-दुजूर, परमाल को पकड़ कर लाये हैं।
काधिम-(शुशी से उछल कर) शायाश, (परमाल को
देखकर उसके रूप सौन्दर्य पर मुग्ध हो जाता है। क्या यह राजा
दादर फी घेटी परमाल है?
सब-जी जनाय।
कासिम-~(अपने भादमियों से) इसको द करो।
(बाही बोगों से ) तुम लोगों को इसका फाशी इनाम मिलेगा।

दाहर
[चौथा
एक-हुजूर, इसे पकड़ा तो मैंने है। मुझे अधिक इनाम
मिलना चाहिये।
दूसरा-नहीं हुजूर, मैंने पताया था, मुझे ज्यादा इनाम
मिलना चाहिये।
कासिम-अच्छा जानो, तुम सब को काफी इनाम दिया
जायगा । (जाते हैं।)
कासिम-एक से एक बढ़कर है। गजब की सूबसूरती है।
अगर सूरज सूरज है तो परमाल चॉद है।श्रो (कुछ सोच कर)
सूरज बड़ी तेज़ औरत है, उसकी ऑसों से खूखारी, साती,
टपकती है। भला, उसकी लड़ाई क्या भूलने की बात है।
अरुण की लड़ाई में उसने मेरे तो होश बिगाड़ दिये। अफेली
औरत ने तमाम फौज में तहलका मचा दिया। या खुदा,
हिन्दू औरतें भी गज़य की होती है। और तोफ्या, अभी उसने
मुझे कमीना, डाकू कह कर पुकारा था। लेकिन परमाल बड़ी
सीधी मालूम होती है। या ! कहीं ये नहीं यह खलीफा
का उपहार है। लेकिन यह क्या ? मेरे इस सुनसान डेरे में
इसी की आवाज कहाँ से आ रही है? कौन हंस रहा है?
(तलवार उठाकर) कौन है ? हैं ! यह तो दाहर की इसी है-
(घयरा कर ) यह क्या चारों तरफ दाहर ही दाहर दिखाई दे
रहे हैं। हर एक कोने में दाहर की आवाज़ सुन रहा हूँ।
.
।

चौथा अफ
दृश्य
हवा में दायर की गध है । याय, याकूय । (माता हुआ एक
चोर गिर पपसा है।)
याक्य-(धन्दर थाकर ) हुजूर हुजूर, है यह क्या हुआ?
(सामने देख कर ) अरे, सिपहसालार साहय तो येहोश पड़े
हैं ? ( उपचार करता है कासिम सज्ञा मात करता है।)
कासिम, तू मुझ से क्या चाहता है !
यापूर-मुजूर, यहाँ तो कोई भी नहीं है। आप क्या कर
कासिम-कोई भी नही । क्या कोई भी नहीं था? नहीं
था। अभी दादर का सिर हँस रहा था। मैंने देखा, मैंने
उसकी देसी सुनी । श्रोफ, फैसा भयकर दृश्य था।
क्या अय कुछ भी नहीं !
याकूब-जनाथ, कुछ भी तो नहीं था!
कासिम-धच्छा तुम जानो, मैं सपना देख रहा था।
(याकूप पाहर जाता है, कासिम बैठा उस दृश्य को सोचता है)
पटाक्षेप

पाँचवाँ दृश्य
प्रात काल का समय
(एक लश्कर के साथ सूर्य और परमाल अरव की यात्रा में | सूर्य
शोध और प्रतिहिंसा की मूर्ति बनी बैठी है, परमाल अपने ध्यान
में मग्न है।)
सूर्य-अग्नि के सहयोग से काष्ठ पण्ड की तरह आज
सिन्ध रूप काष्ठ भी विद्राहाग्नि के कणों से भस्म हो गया।
अचानक ही प्रलय की एक घारा आई और एक वेग के
साथ उसे पहा ले गई। उत्कट प्रभंजन के एक झोके से
स्वतत्रता का कमल टूट कर मिट्टी में मिल गया। विद्रोह के
स्फुटिलों में परतत्रता का चित्र दिखाई पड़ने लगा। विलास
के सायनों में उत्तेजना जिस प्रकार विनाश की ओर अग्रसर
होती है, ठीक उसी तरह विभीपणों की विलास कामना में
सिन्ध का नाश हो गया, श्राह !
पर-वायुवेग से प्रताडित नदी की धारा में जिस प्रकार
वुलवुले उठते और लीन हो जाते हैं उसी तरह ससार की
राज्यसम्पत्तियों का हाल है । उत्पत्ति और नाश इस ससार
रूपी पान के दो किनारे हैं। विधाता के कालनद में हम सब
एक ओर को यहे जा रहे हैं। देखना चाहिये कहाँ पहुँचते हैं ?
सूर्य-(सीम कर) बगदाद के राजा का विनोद करने,
।

दृश्य]
चौथा श्रक
ययन साम्राज्य की समृद्धि करने और कहाँ ? बहन,
तुम्हारे इस दार्शनिक शान की बलिहारी है। इतना सब कुछ
होते हुए भी तुम्हें कल्पना का भूत नहीं छोड़ता !
पर-तो क्या हम लोग बगदाद के राजा के पास
ले जाई जा रही है बहन ?
सूर्य-(उसी मुद्रा से ) क्या तुम्हें यह सब पसन्द है?
पर-(सोच कर ) क्या यद भी देखना होगा? (कान पर
हाय रख फर) बहन, यचायो! मुझे कुछ नहीं सूझता !
(उद्विम दो फर सूर्य देवी की गोद में गिर पड़ती है।)
सूर्य-अरी भावप्रवण पालिके, (प्यार से) क्या करना
होगा, यह मैंने निश्चय कर लिया है ! ( हंस कर ) अब तुम्हें
राग की प्रकशायिनीयनना होगा इस के लिये तैयार होन?
पर-हर तरह तैयार हूँ । हा, मुझ निगोडी को
वास्तविकता की गोदी से अनहोनी के अक में सोना होगा,
इसका मुझे ज्ञान भी न था। मैं अरब में जीवन विताने
की अपेक्षा सग की अकशायिनी होने को सर्वथा प्रस्तुत हूँ
यहन!
सूर्य-विकट परिस्थितियाँ भी ससार यात्रा का एक
अग है ? धैर्य से देखो क्या होता है। अब हम लोग खलीफा
के पास ले जाई जा रही हैं। वहाँ क्या होगा, यह भी देखना

पाँचवाँ दृश्य
,
प्रातःकाल का समय
(एक लश्कर के साथ सूर्य और परमाल अरव की यात्रा में । सूर्य
मोध और प्रतिहिंसा की मूर्ति मनी बैठी है, परमाल अपने ध्यान
मैं मन है।)
सूर्य-अग्नि के सहयोग से काष्ठ सएड की तरह आज
सिन्ध रूप काष्ठ भी विवाहाग्नि के कणों से भस्म हो गया।
अचानक ही प्रलय की एक धारा आई और एक वेग के
साथ उसे वहा ले गई। उत्कट प्रभंजन के एक झोके से
स्वतंत्रता का कमल टूट कर मिट्टी में मिल गया। विद्रोह के
स्फुरिलहों में परतत्रता का चित्र दिखाई पड़ने लगा। विलास
के साधनों में उत्तेजना जिस प्रकार विनाश की ओर अग्रसर
होती है, ठीक उसी तरह विभीषणों की विलास कामना में
सिन्ध का नाश हो गया, श्राह!
पर-वायुवेग से प्रताडित नदी की धारा में जिस प्रकार
बुलबुले उठते और लीन हो जाते हैं उसी तरह ससार की
राज्यसम्पत्तियों का हाल है। उत्पत्ति और नाश इस संसार
रूपी पान के दो किनारे हैं। विधाता के कालनद में हम सर
एक ओर को यह जा रहे हैं। देखना चाहिये कहाँ पहुँचते हैं ?
सूर्य-(सीम कर) बगदाद के राजा का विनोद करने,

दृश्य]
चौथा श्रक
१३६
यवन साम्राज्य फी समृद्धि करने और कहाँ ? वहन,
तुम्हारे इस दार्शनिक शान की बलिहारी है। इतना सब कुछ
होते हुए भी तुम्हें करपना का भूत नहीं छोड़ता!
पर-तो क्या हम लोग बगदाद के राजा के पास
ले जाई जा रही हैं पहन ?
सूर्य-( उसी मुद्रा से) क्या तुम्हें यह सय पसन्द है ?
पर--(सोच कर ) क्या यह भी देखना होगा ? (कान पर
हाय रस्स फर ) यहन, पचायो! मुझे कुछ नहीं सूझता।
(उद्विम हो कर सूर्य देवी की गोद में गिर पड़ती है।)
सूर्य-श्ररी भावप्रचण वालिके, (प्यार से) क्या करना
होगा, यह मैंने निश्चय कर लिया है । (हस कर ) अब तुम्हें
खड्ग की अकशायिनीयनना होगा इस के लिये तैयार होन?
पर-हर तरह तैयार हूँ । हा, मुझ निगोड़ी को
वास्तविकता की गोदी से अनहोनी के शक में सोना होगा,
इसका मुझे शान भी न था! मैं अरव में जीवन विताने
की अपेक्षा सड्ग की अंकशायिनी होने को सर्वथा प्रस्तुत हूँ
बहन!
सूर्य-विकट परिस्थितियाँ भी ससार यात्रा का एक
अंग है १ धैर्य से देखो क्या होता है। श्रव हम
के पास ले जाई जा रही है। यहाँ क्या

पाँचवाँ दृश्य प्रात काल का समय (एक लश्कर के साथ सूर्य और पामान अरब की यात्रा में । सूर्य मोघ और प्रतिहिंसा की मूर्ति मनी बैठी है, परमान भपने ध्यान में मम है।) सूर्य-अग्नि के सहयोग से काष्ठ गएड की तरह भाज सिन्ध रूप काष्ठ भी विद्रोहानि के कणों से भस्म हो गया। अचानक ही प्रलय की एक धारा आई और एक वेग के साथ उसे घहा ले गई। उत्कट प्रभजन के पक को से स्वतत्रता फा कमल टूट कर मिट्टी में मिल गया। विद्रोह के स्फुरिलहों में परतंत्रता का चित्र दिसाई पड़ने लगा। विलास के साधनों में उत्तेजना जिस प्रकार विनाश की ओर अग्रसर होती है, ठीक उसी तरह विभीपणों की विलास कामना में सिन्ध का नाश हो गया, श्राह! -वायु वेग से प्रताडित नदी की धारा में जिस प्रकार वुलवुले उठते और लीन हो जाते हैं उसी तरह ससार की राज्यसम्पत्तियों का हाल है । उत्पति और नाश इस संसार रूपी पात्र के दो किनारे हैं। विधाता के कालनद में हम सब एक ओर को यह जा रहे हैं। देखना चाहिये कहाँ पहुँचते हैं ? सूर्य-(सीम कर) बगदाद के राजा का विनोद करने, पर- छठा दृश्य देश बादाद--(राजदरबार लगा है) (खलीफा समत पर बैठा है, सब दरवारी अपने अपने स्थान पर . কাল- खलीफा-हैजाज,चे सब उपहार जो वीर कासिम ने भेजे हैं हमारे सामने लाये जाय । हैजाज-~जो श्राशा । (रुप सामान पेश करता है) सलीफा-यह क्या है? हुजूर, यह शत्रु दाहर का सिर है। खलीफा-ऐसा खौफनाक, इतना बड़ा सिर! ठीक है, यही कारण है कि हम अब तक हारते रहे। ठीक है यह बड़ा यहादुर है ।श्रोह, यही तो हमारे सर्वनाश की जा था। इसे उठाकर गाड़ दो। हेजाज-हुजूर, यह छतरी है जो उसके तश्त पर लगी थी। और यह और सामान है जो उसी के सिर के साथ भेजा गया है। उसकी लड़कियाँ भी भाई हैं। में भेजा जाय । हैजाज, भाज

दाहर
भास्कर क्षीण हो गया।चारों तरफ विनाश है। पर मैं (यवर्षों
की तरफ सकेत करके) कस कर बदला लूँगी। यह सूर्य तुम्हें
विजय का पूर्ण आस्वादन कराकर चैन लेगी । विश्वास.
घातियों के साथ विश्वासघात, छल कपट से बदला लूंगी !
कासिम, तू समझता है विजय तेरी हुई, नहीं विजय मेरी
होगी । देख, भार्यकन्यायें क्या करती हैं! तू देख और
संसार देखे । हे नीच, तूने छल से, प्रलोभन देकर, यद्दका
कर देश के दुष्टों के सहारे विजय प्राप्त की। थाज सूर्य
उसी का बदला लेगी!
(सोचती हुई ध्यान मग्न हो जाती है)
पटपरिवर्तन
.
.
.

যাহা *
.
-
श्य]
पलाद--(फामारजित होकर ) घनी शाहजादी, में पहले
तुम से निकाह परूँगा, उसके याद इससे ।
सूर्य-(मोघ से दास पीस कर और रोनी सूरत या कर) श्राः!
पलीफा साहय, अब हमारे हदय नहीं है, प्रेम नहीं है, जीवन
नदी है, जो
| उस नीच, कृतन, पापी
मुहम्मदविनकासिम ने छल से हमारा घर उजाद डाला ।
दाय ! पलीफा सादर, हे ईश्वर! क्या तुम नहीं देखते
हा ! नीच तेरा पुरा हो । तूने हमारे माथ धोखा किया। तूने
खलीफा के साथ विश्वासघात किया। सलीफा नहीं
श्रर यह नहीं हो सकता। मेरी पहन भी प्रय
(ोर से रोती है।)
बलीद-(गुस्से में भर कर ) ई! क्या कहा ? (कुछ सोच कर)
ऐसा, उस कर्माने पाजी, दोजपी पुत्ते ने मेरे पास भेजने से
पहले पदले तुम्हें खराय कर डाला क्या ? (दास पीस कर) बोटी
चोटी कटवा दूंगा। कर्माना कासिम, सलीफा की इतनी
वेदपजती १ ( उठ खड़ा होता है और महल से बाहर धना जाता है।
सूर्य और परमाल रह जाती है।)
स्थ--देशा यहन तूने, इस तरह मैं उससे बदला
लूंगी। मौत का बदला मौत है । मैं मुहम्मद की मृत्यु चाहती
हूँ। मैं उसे दूसरे के देश पर हमला करने का मज़ा
चखाऊँगी।

प्रोसेठिया नन ग्रयाणय
वीकानेर ।
सातवॉ दृश्य
(यगदाद के महल में सूर्य और परमाल एक तरफ पैठी है,
सशस्त्र परिचारिकायें चारों तरफ से उन्हें घरे हुए है।)
पर~बद्दन, सुना है सलीफा था रहा है। हाय ! श्यय
पया होगा?
सूर्य-परमाल, परीक्षा फा घघसर है, तुम कुछ मत
बोलना। 'शठे शाउथ समाचरेत् ।
(वलीद का प्रवेश, खड़कियों को देखकर )
पलोद-चाह ! बला की खूबसूरती है । हिन्दुस्तान में क्या
ऐसी ही ओरते 1(सूर्य और परमाल उठकर खड़ी हो
नाती हैं।
सूर्य-जनाव, सलाम ।
वलीद-(मन ही मन मुग्ध होकर ) बैठो, तसलीम । क्या
तुम यता सकती हो तुम में से छोटी कौन है और बडी कौन,
और तुम दोनों के नाम क्या है ?
सूर्य-महोदय, में ही बड़ी हूँ। मेरा नाम सूर्य देवी है,
और यह मेरी छोटी बहन परमाख देवी है।

दृश्य]
चौथा थक
१४६
परमाल-यदन, तैयार हूँ, मैं उसी समय से तैयार
हूँ। पैदा होते ही मेने मरने का नाम सुना। मृत्यु, जीवन
की सहचरी, श्वासों की क्रान्ति, उत्थान रूपी मन्दिर की
पिछली दीवार है। मैंने उसे फूलों से हस कर उनका रस
चूसते देखा है, पत्तों का प्रालिंगन करके उन्हें पीला बनाते देखा
है, मेघों का सार खींच कर उन्हें निर्जल यनाते देखा है, शरद्
के बादलों में जीवन न था, फिर भी उनमें सौन्दर्य था। उस
सौन्दर्य का मैने सैकड़ों बार प्रालिंगन किया है। जीवन
की प्रतिच्छाया में, सरल परिहास में मैंने मृत्यु का नाद,
मधुर पालाप सुना है, रोज यही देखती हूँ । वहन,
यह क्या कोई भूलने की चीज है? पिता की मृत्यु, सेना
की मृत्यु, सामन्तों की मृत्यु, माता की मृत्यु, मृत्यु ही
तो मेरा विशाल गृह है। चलो में तैयार हूँ।
(दोनों इसी विचार में दूसरी तरफ़ जाती हैं ।)
पटपरिवर्तन
।

।
दाहर
[सातवा
पर--बहन, तुमने सलीफा से क्या कहा १ में तो
कुछ भी न समझी। हॉ, इतना समझी हूँ कि हमें उसकी
फ्रोधाग्नि में मरना होगा। मैं माँगी।
सूर्य- हम मरेंगी,मरनाथार्य कन्याओं के लिये कोई वडी
बात नहीं है। किन्तु शिक्षा देकर, आग लगा कर, घर जला कर।
(जोश में खौट कर बलीद)
वलीद-लड़कियो, तुम नापाक हो । में अब तुमसे
निकाह नहीं कर सकता । मैंने उस कुत्ते की लाश खाल में
भरवा फर मैंगाई है। तुम्हारा बदला लेकर ही मुझे चैन
होगा । श्रोह, इस्लाम के मालिक सलीफा की इतनी तौहीन !
( उसी तरह जोश में पकता हुआ चला जाता है)
सूर्य-मोह । प्रतिहिंसा, प्रतिहिंसा, तेरी आग ससार में
सब से भयकर है। पानी इसे नहीं बुझा सकता, अमृत
भी इसे ठडा नहीं कर सकता। आज मेरे हृदय में वही आग
लगी है । पहाड़ों से टकरा फर, समुद्र पर तैर कर,
गुफाओं में घुस कर, बिजली से लड़ कर भी यह शान्त न
होगी। यह उसी समय शान्त होगी जब अपना भोजन कर
लेगी, अपनी बलि लेलेगी। चल और चढ । बाग लग चुकी
है। श्रय मैं उसकी भस्म चाहती हूँ। छटपटाते, चिलाते हुए
लोगों को देखना चाहती हूँ। और इसी से मेरा भी जन्म है।
परमाल, मरने को तैयार हो जाश्रो।
पर्वतोंकी

चौथा श्रक
दृश्य]
परमाल-यहन, तैयार हूँ, में उसी समय से तैयार
हैं। पैदा होते ही मेने मरने का नाम सुना । मृत्यु, जीवन
की सहचरी, श्वासों की क्रान्ति, उत्थान रूपी मन्दिर की
पिछली दीवार है। मैंने उसे फूलों से हस कर उनका रस
चूसते देखा है, पचों का श्रालिंगन करके उन्हें पीला बनाते देखा
है, मेघों का सार खींच कर उन्हें निर्जल बनाते देखा है,
शरद्
के यादलों में जीवन न था, फिर भी उनमें सौन्दर्य था । उस
सौन्दर्य का मैंने सैकड़ों बार प्रालिंगन किया है। जीवन
की प्रतिच्छाया में, सरल परिहास में मैंने मृत्यु फा नाद,
मधुर पालाप सुना है, रोज यही देखती हूँ। बहन,
यह क्या कोई भूलने की चीज है? पिता की मृत्यु, सेना
की मृत्यु, सामन्तों की मृत्यु, भाता की मृत्यु, मृत्यु ही
तो मेरा विशाल गृह है । चलो मैं तैयार हूँ।
(दोनों इसी विचार में दूसरी तरफ जाती है।)
पटपरिवर्तन

पांचवाँ अंक
पहला दृश्य
(जयशाह चित्तौर की थोर जा रहे हैं।)
जयशाह-सप विफल हुश्रा। काश्मीर नरेश ने मुझे
सूखा टाल दिया। उसने कहा 'दाहर ने धार्शिया अपनी
यहन के साथ मेरे विवाह का घोर विरोध किया था, अत'
मैं तुम्हें कोई सहायता नहीं दे सकता।' मैं अब निराश,
निस्सहाय, नि:संग होकर लौट रहा है। कहा जाऊँ चित्तौर
की तरफ चलूं, देचू यही कहीं कुछ सहायता मिल जाय!
पर चलते चलते पैरों में छाले पड़ गये हैं। मेरा घोड़ा पहाड़ी
सर्दी के कारण वहीं ढेर हो गया। वहाँ से लौट फर मैंने मानू
को छल कपट द्वारा शानयुद्ध और मोक्षवासव को मारने के
लिये भेजा है। शान, मोक्ष, तुम दोनों अब ज़िन्दा नहीं रह
सकते । (थोड़ी देर विश्राम करवू । एक त के नीचे बेटते ही
सो जाते हैं।)
पटपरिवर्तन

.
दूसरा दृश्य
(सूयदेयी और परमालदेवी महल फे याग में टहल रही है।)
सूर्य-परमाल, अब मैं पागल हो रही है। प्रोक्ष। मेरे
दृदय की थाग बढ़ती जा रही है। इतने दिन गये थमी
मेरी इच्छा पूर्ण नहीं हुई। कहीं किसी के कहने सुनने से
खलीफा ने मेरे शिकार को छोड़ तो नहीं दिया?
पर--अगर ऐसा हुआ तो हम क्या करेंगी।
सूर्य-तो मुझे बोल चाहिये। मैं वलि लूंगी। (विप्नाकर)
में भेंट चाहती हूँ।
(सलीका और हैजान का प्रवेश)
खलीफा-श्रोह ! (सामने भाकर) लो, तुम्हें पराय फरने
घाले कुत्ते की यह लाश । (लात मार कर नौकर से) सोल,
घोल इसे । (नौकर लाश को धमदे में से निकालता है)
खलीफा-(नौकर से) इस लाश को तुम लाये हो ?
नौकर-जी धन्दा परचर!
खलीफा-मेरे हुक्म को पढ़ कर इसने क्या कहा।
नौकर-हुजूर, जैसे ही जनाब के हुक्म को लेकर हम

दाहर
[दूसरा
लोग हिन्दोस्तान पहुँचे तो मालूम हुआ कि सेनापति
अपनी फौज को लेकर पूर्व और उत्तर की तरफ बढ़ गये हैं।
हमने मुलतान के पास जाकर फौज को पकड़ा और
सेनापति को श्रापका श्राशापत्र दिया। उन्होंने पढ़ते ही
सिर झुका लिया। तमाम लोग सब बातें जानने के लिये
बेचैन हो उठे। तव सेनापति ने थोड़ी देर में सय प्रबन्ध
करके मुझसे कहा । खाल लाकर मेरा शरीर उसमे भर दो ।
शायद मेने कोई भारी गुनाह किया है। इस तरह बिना
हिचकिचाहट के सर के देखते देखते उनको उस चमड़े की
स्खाल में भर उसका मुँह सी दिया गया। वही हम आपके
पास ला रहे हैं। रास्ते में ही जान निकली है।
खलीफा-ठीक है, यह ऐसे ही दण्ड का अपराधी था ।
हैजाब-हुजूर, क्या आपको पूरा विश्वास है कि मुहम्मद
ने इन लड़कियों को अपवित्र किया होगा? मुझे तो इस
नौकर की कही हुई बातों से मालूम होता है कि सेनापति
नेक रहा होगा।
खलीफा-(सूर्य देवी से) क्यों री लड़की, जो तूने कहा
वह सच हैन ?
सूर्य-सलीफा, सच न होने पर भी सच है। मैं जो
चाहती थी, यह हो गया। श्राज मेरी कामनापूर्ण हो गई।
पिता का, माता फा, देश का यदला चुक गया। छलछिद्र
।

एश्य]
फ्या
चौथा अंक
से इसने मेरे देश को जीता उसी तरह मैंने तुम्हें यहका
कर अपना पदला ले लिया।
पलीद-(गुस्से से पैर पटक कर) यो पाजी औरत,
यह भूल है कि मुहम्मदयिनकासिम ने तुम दोनों को अपने
पास रखा और तुम दोनों को
सूर्य-सिर से पैर तक झूल । उसकी क्या मजाल जो
इमारी तरफ आँप उठा फर भी देखता । पलीफा, याद रख,
भेने चही किया जो एक दुश्मन दूसरे दुश्मन से करता है।
बलीद और हेजाज-इनकी योटी योटी काट कर पुचों को
पिला दो।
सूर्य-तू क्या मारेगा! (एक दूसरी के खजर भौंक कर मर
नाती है, मरते हुए)
सूर्य-प्रतिहिंसा पूर्ण हुई। इस वीभत्स काण्ड में, विश्व
विजयिनी वैजयन्ती में, स्वर्णाक्षरों में सिन्ध का यदला लिया
रहेगा । खलीफा
देख वह उड़ रहा है। (मर जाती हैं
सब लोग हैरान होकर देखते हैं।)
खलीफा-दा दाहर, तू ने अपनी मौत का बदला ले ही
लिया। है! यह क्या मैं अपने चारों तरफ दाहर का कटा
हुआ सिर देख रहा हूँ। यह इस कर मेरी तरफ देख रहा है।
यहुत हुश्रा। या खुदा काफिर, मुझे चारों
-

दाहर
तरफ से घेरे खड़े हैं। हँस रहे है-इसो खूप हँसो'। नहीं, मैं
न था। (कहता दुमा मूञ्छित होकर गिर पपता है सब लोग उपचार
के लिये दौड़ते हैं।)
हैजान-ऐसा युरा नजारा कभी न देखा था। श्रासमान
से तूफान उठ रहा है। शत्रुओं के रुएड हँस रहे हैं । (आँखें
मंद लेता है सय बोग स्तब्ध रह जाते हैं।)
पटाक्षेप

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Dahar Athava Sindh Ptan

Author
Bhatt,shri Uday Shankar
Title
Dahar Athava Sindh Ptan
File name
Dahar Athava Sindh Ptan
Text
OCR done
Citation
1937
Published
2011/02
Publisher
Sanskarit Press Lahore
Language
Sanskrit
Pages
164
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548654
Barcode
4990010028700.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
EXB7tJF2i9M
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