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प्रौढ़ शिक्षा के
बढ़ते
चरण
भवानीशंकर गर्ग
सन्मार्ग प्रकाशन, दिल्ली-110007
© लेखक
प्रकाराक
सन्मार्ग प्रकाशन
16 ५० बी, बंग्लो रोग,
जवाहर नगर, दिल्ली-110007
प्रथम संस्करण: 1991
आवरण : जोगी
मस्य : 4000 रुपये मात्र
मार: एम. एन. निरगं,
मशीन बाइपरा, दिम्मी-110032
अनुक्रम 5 7 9 12 16 20 24 26 27 32 35 37 दो शब्द मेरी दक्षिणी-पूर्वी एशियाई देशों की अध्ययन यात्रा क्यों? यात्रा संबंधी प्रारभिक तैयारी यात्रा के लिए प्रस्थान--प्रथम चरण यात्रा का दूसरा चरण-बम्बई बैंकॉक में प्रथम दो दिन प्रौढ शिक्षा एक जन-आन.ोलन साक्षरता आन्दोलन की क्रियान्वयन व्यवस्था एवं प्रशासन साक्षरता आन्दोलन का क्रियान्वयन अनुवर्ती कार्यक्रम शैक्षिक संग्रहालय-बैंकॉक अनौपचारिक तथा जीवन-पर्यन्त शिक्षा प्रक्रिया क्षेत्रीय अध्ययन यूनेस्को क्षेत्रीय कार्यालय में जनसख्या शिक्षण एस्पेबे सियाम जैसा देखा और पाया मलेशिया राष्ट्रीय एकता परिपद समीपता कार्यक्रम सामुदायिक विकास एवं प्रौढ़-शिक्षा कार्यक्रम कुआलालम्पुर में विभिन्न अभिकरणो का अवलोकन सिंगापुर यात्रा लोक समिति सेरेगाव सामुदायिक केन्द्र पर सिंगापुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय 43 48 50 54 55 58 67 68 71 80 85 94 100 101
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दो शब्द 1. राजस्थान विद्यापीठ कुल के कुल-प्रमुख तथा संस्थापक जीवन सदस्य भाई श्री भवानीशंकरजी गर्ग की यह थाईलैंड, मलेशिया और सिंगापुर के वयस्क तथा समाज शिक्षा कार्य के विशद अंनुशीलन का यह विवरण मैंने देखा-नि:सदेह थी गर्गजी जी ने उक्त तीनों राज्यों के प्रौढ़-शिक्षा कार्य के समस्त तथा समग्र का ही अनुशीलन किया है, यों कई प्रौढ तथा समाज शिक्षण के भारतीय विदेशी इस कार्य को देखने एवं अध्ययन करने के लिए जाते-आते रहते हैं; किन्तु पाईलैंड, मलेशिया तथा सिंगापुर के वयस्क शिक्षा कार्य को श्री गर्गजी ने जिस सूक्ष्म दृष्टि से देखा तथा व्यावहारिक दृष्टिकोण से समझने की कोशिश की है, वह भारतीय प्रौढ़-शिक्षा के कार्यकर्ता के लिए महत्वपूर्ण है । 2. थाईलैंड, मलेशिया तथा सिंगापुर के प्रोढ़-शिक्षा कार्य की परिधियां तो भारतीय परिप्रेक्षो के समान ही मुझे लगी; अवश्य इन राज्यों का यह प्रौढ़-शिक्षा कार्य राजकीय तथा सामाजिक स्तरो पर अधिक सुसगठित तथा उत्तरदायी लगता है, ऐसा लगता है कि थाईलैंड, मलेशिया तथा सिंगापुर की प्रौढ़ जनता सौभाग्य- शाली है, जिसकी राज्य व्यवस्थाएं उनके शिक्षण-दोक्षण के लिए स्वयं को उत्तर- दायी अनुभव करती दिखती हैं। भारतीय प्रादेशिक तथा केन्द्रीय राज्य तो प्रौढ़- शिक्षा को अब तक एक प्रचार तक शोभा का ही विषय मान कर कुछ प्रोजेक्टों के लिए रुपया दान देना तथा कुछ साक्षरता-प्रसार के लिए केन्द्र चला देना ही अहम् कार्य मानती हैं, तब थाईलैंड, मलेशिया और सिंगापुर का यह प्रौढ़-शिक्षा कार्य मुझको "जनता के प्रति मिशन" ही लगता है तथा यह स्पष्ट दिखता है कि जनता के समस्त और सर्वांगीण विकास और राज्य के चहुंमुखी विकास के लिए शील तथा शक्ति प्राप्त करने के लिए ही "प्रौढ़-शिक्षा" को आधारभूत मंत्र मानकर चलाया जा रहा है नि:संदेह प्रौढ़-शिक्षा के प्रति थाईलैंड, मलेशिया तथा सिंगापुर वालों को यह दृष्टि, मति और ति देखकर मुझे रश्क ही होता है । काश! हम भी यह भारत में कर सकते। 3. इस अनुशीलन के कई कार्यक्रम मुझे राजस्थान विद्यापीठ कुल उदयपुर के सन् 1939 ई० से आज दिन तक विकसित कार्यक्रमों के बहुत कुछ समान प्रतीत 6 हुए-~राजकीय पूर्ण समर्थन और पर्याप्त साधन होने के कारण थाईलैंड, मलेशिया तथा सिंगापुर के कार्यक्रमो का जीवन की पूर्ण परिधियो में विस्तार मुझे दियता है। राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर के प्रौढ-शिक्षा तथा समाज-शिक्षा के संस्थान, विभाग, केन्द्र तथा उनके कुछ आधारभूत कार्यक्रमो का ही हम विस्तार कर पाये हैं, हमारे इस लम्बे संघर्ष को हम साधनो की अभाव प्रसित अवस्था का सघर्ष ही कहते हैं, जहा तक प्रौढ़ तथा समाज-शिक्षा के दृष्टिकोणो, मतियों और विवेक प्रणीत व्यावहारिक राष्ट्र निर्माण कर सकने वाले समाज शिक्षा के कार्य- क्रमो का सवाल है, राजस्थान विद्यापीठ ने एक सम्पूर्ण प्रौढ-शिक्षा मन्दिर का ही पूर्णागी शिलान्यास संभव किया है, श्री गर्गजी ने पाईलैंड, मलेशिया तथा सिंगापुर के प्रौढ़-शिक्षा कार्यक्रमो के अवलोकन राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर के सन् 1939 ई० से स्फूर्त उद्भवित तथा विकसित प्रौढ़-शिक्षा के कार्यों तथा प्रयास को भी देखने एवं उनकी शक्य तुलना करने को सफल चेप्टा की है । श्री गगंजी का यह सूक्ष्य तथा तुलनात्मक अध्ययन उनकी प्रौढ शिक्षा की गहरी दृष्टि एव व्यावहारिक सूझ-बूझ का ही परिचायक है। 4. यह अब स्पष्ट होता जा रहा है (और श्री गगं के इस अनुशीलन को देखने के बाद तो मैं अभिनिश्चित हूं कि) राज्य तथा जन-संगठनो के समन्वित प्रयास से ही हम भारत मे प्रौढ़ एवं समाज शिक्षा का प्राणदायक तथा सप्राण आन्दोलन, कार्य तथा तंत्र-मंत्र विकास कर सकेंगे । व्यक्तिगत साधना या स्वय- सेवी संगठनों का इस विशाल राष्ट्र-निर्माण की चेतना को प्रदीप्त करने के यज्ञ की स्वाहा के लिए बूता ही कितना है। राज्य तथा समाज दोनो को समान भूमि पर बैठकर व्यक्ति तथा प्रौढ़-शिक्षा की भूमिका निभानी होगी। थाईलैंड, मलेशिया तथा सिंगापुर का प्रौढ-शिक्षा-चैतन्य उन राज्यों का राष्ट्रीय जीवन की क्षमता के लिए चेतना प्रवाहों-सा लगता है। भारत में भी हम राष्ट्र निर्माण, राष्ट्रीय जीवन की एकता और अखण्डता तथा भारतीय जीवन के शील, शक्ति तथा सौन्दर्य के सतत् आविर्भाव एवं समस्त राष्ट्रीय विकास के लिए हमे उत्तरदायी सर्वांगीण प्रौढ-शिक्षा कार्य करना ही होगा। भारत मे वयस्क शिक्षा अब प्राथमिक- माध्यमिक शिक्षण के समान हो, इससे भी अधिक महत्व ग्रहण करती जा रही है। हमारी जनता जब शिक्षित-दीक्षित होगी तभी राष्ट्र आलोकमय तथा सभ्य होगा और हमारी पौध को शिक्षित-दीक्षित करने के दिशा-बोध हमे प्राप्त होगे। इम गंभीर आकर्षक तया ज्ञानवर्धक अनुशीलन के लिए श्री गर्ग को बधाई तथा अभिनन्दन। ५ -जनार्दनराय नागर मेरी दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों की अध्ययन यात्रा क्यों? विदेश यात्रा की कल्पना से ही आदमी रोमांचित हो जाता है। विदेश यात्रा करने वाला अपने को सौभाग्यशाली समझता है। यह आज के युग की एक उपलब्धि मानी जाती है। वैसे भी देशाटन अपने आप में ज्ञानवर्धक, मानवीय विकास, भ्रातृत्व तथा भावात्मक एकता का महत्वपूर्ण अंग है। आज के इस भौतिकवादी युग मे मानवीय विकास की बड़ी चुनौतियों का एक के बाद एक का सामना किया जा रहा है तब विदेश यात्रा सद्भावना, सहकार, एक-दूसरे को समझने तथा विभिन्न चुनौतियों के समाधान मे बहुत सार्थक सिद्ध होती है। वैज्ञानिक विकास ने जहां विश्व को कई उपलब्धिया प्रदान की हैं, वही कई नई समस्याओ को भी जन्म दिया है। विश्व की विभिन्न संस्कृतियो के समन्वय ने आधुनिक नई संस्कृति को जन्म दिया है। इससे पारम्परिक एवं आधुनिक मूल्यों में संघर्ष स्वाभाविक है । इस संघर्ष मे मानवता के विकास का मार्ग अवरुद्ध न हो इसका प्रयल एवं एक-दूसरे को समझने एवं समन्वय एवं सामंजस्य स्थापित करने से ही करना होगा। अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का विशेषकर यूनेस्को का इस प्रकार के कार्यक्रमो को आयोजित करने मे बड़ा योगदान रहा है, शिक्षा, विज्ञान एवं संस्कृति के विकास, उत्पान एवं आपसी सहयोग एवं समन्वय का यह एक अनूठा प्रतिष्ठान है । इस संगठन द्वारा विश्व के विभिन्न देशों के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत कार्य- कर्ताओ, विशेषज्ञो, मनीषियों, विद्वानो आदि को एक-दूमरे देशो में भेजना तथा उनके अनुभवो एवं ज्ञान का एक-दूसरे में आदान-प्रदान करवाना इसकी एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इस कड़ी में यूनेस्को द्वारा प्रौद्ध शिक्षा, सहकारी शिक्षा तथा कार्यकर्ता शिक्षा के कार्यकर्ताओं को विभिन्न देशों में भेजने का आदान-प्रदान करना है। ताकि वे इन क्षेत्रों में किये जा रहे दूसरे देशों के कार्यक्रमों को देखें, अनुभव प्राप्त करें तथा अपने अनुभवों से दूसरे को लाभान्वित करें। साथ ही एक-दूसरे के अनुभवो से अपने कार्ययमों को परिमार्जित करें, परिष्कृत करें तथा समय-समय पर उन्हें 8 गतिशील बनाते रहें। भारतवर्ष एवं दक्षिणी-पूर्वी और प्रशान्त क्षेत्र के देशों का विशेष सम्बन्ध है । ये देश सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक दृष्टि से एक-दूसरे के नजदीक हैं। इनकी बहुत सी समस्याएं समान हैं। ये विकासशील राष्ट्र हैं तथा आपिक विकास के साथ ही मानवीय विकास की कई समस्याओं से घिरे हुए हैं। इन राष्ट्रों की संस्कृति एवं सभ्यता बहुत पुरानी है। इन देशों की संस्कृति और सभ्यता का एक-दूसरे पर किसी-न-किसी रूप में प्रभाव रहा है। ये पूर्ण रूप से अपनी पारम्परिक व्यवस्था, संस्कृति एवं सभ्यता को बदल भी नहीं सकते हैं और अर्वाचीन से अछूते भी नहीं रह सकते । इसी द्वन्द्व के भटकाव में इन देशों के नागरिक वह रहे हैं और यह यहकाव अनायास ही कई समस्याओं को जन्म दे रहा है । अतः आज की आवश्यकता आधारभूत सांस्कृतिक परम्पराओं को बनाये रखते हुए आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाना है । साथ ही विभिन्न संस्कृतियों व परम्पराओं को बनाए रखते हुए भी एकता एवं समन्वय कायम रखना है । विभिन्नता में एकता इन देशों की विशेषता रही है । और यही एक ऐसी विशेषता है जो हजारो वर्षों से, इन देशों को कई संघर्षों के बीच जिंदा रखे हुए है। विकसित, विकासशील तथा अविकसित राष्ट्रो के बीच राजनैतिक, सैनिक, भौगोलिक एवं आर्थिक दौड़ ने विश्व मंच पर नये संघर्षों को जन्म दिया है । विश्व दो महाशक्तियों में बंटा हुआ है। विकासशील एवं विकसित राष्ट्रों को ये महाशक्तियां किसी-न-किसी प्रकार से अपने प्रभाव मे रखने का प्रयत्न कर रही हैं, इस कारण इन देशो का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। आर्थिक, सैनिक या अन्य सहयोग के नाम पर ये महाशक्तियां विश्व में गुट- बाजी एव धड़ेबन्दी को प्रोत्साहन दे रही है। एक देश को दूसरे देश के पीछे लगाया जा रहा है। प्रभाव क्षेत्र में न होने के कारण इन देशो में अस्थिरता पैदा किये जाने के प्रयत्न किये जाते हैं.1, देश में ही नागरिको में असंतोप पैदा कर अशांतिपदा की जाती है। ऐसी गतिविधियों को प्रोत्साहन दिया जाये का प्रयत्न किया जाता है, जिससे कि इन देशों में विघटन को स्थिति बन जावे और ये महाशक्तिया अपना स्वार्थ सीधा कर सकें। इस प्रकार की स्थिति से उभरने का एकमात्र उपाय क्षेत्रीय देशों में अपनी भौतिक, सास्कृतिक परम्पराओ को बनाये रखते हुए आपस में सहयोग करना है। शिक्षा, विज्ञान एवं सास्कृतिक विकास के साथ-साप आर्थिक विकास की सम्भावनाओ पर भी कार्य करना होगा। दक्षिणी-पूर्वी एशिया के अनेक देश औपनिवेशिक पराधीनता से स्वतन्त्र हुए हैं। अभी भी इन देशों के लोगो में औपनिवेशिक काल के संस्कार तथा एजेन्ट मौजूद हैं, स्वयं वे देश जो इन्हें गुलाम बनाये हुए थे सीजे हुए हैं और बरावर प्रयत्न करते रहते हैं कि इन देशों में किसी-न-किसी रूप मे अस्थिरता बनी रहे।
9 अतः इस ओर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है। मेरी ऐसी मान्यता है कि भौतिक विकास के साथ ही मानवीय विकास आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है । ऐसा देखा गया है कि भौतिक विकास के साथ जो दोप स्वतः समाज मे आ जाते हैं उससे मानवीय मूल्यो का ह्रास होने लगता है । मनुष्य व्यक्तिवादी एवं स्वार्थी होने लगता है, मशीनी युग की भाग- दौड़ में स्वयं मशीनवत होने लगता है तथा मानवीय संवध एव मूल्य शिथिल होने लगते हैं। इससे तनाव बढ़ता है तथा संघर्ष की स्थिति पैदा हो जाती है यही आज की सबसे बड़ी चुनौती है । क्योकि इससे मानव मानव का दुश्मन होता जा रहा है। शिक्षा ही ऐक ऐसा माध्यम है जो इस स्थिति को बचा सकता है तथा मान- वीय सम्बन्धो मे मधुरता, भावनात्मक एकता एवं मूल्यो की रक्षा कर सकता है । विकसित देशो मे जहा निरक्षरता का 70%से ज्यादा हो वहां एक गुरुतर कार्य के लिए मिल कर बहुत कुछ करना होगा । कई स्तरो पर कई संगठनो द्वारा किये जा रहे कार्यों मे यूनेस्को द्वारा किया जा रहा प्रयत्न सराहनीय है । दक्षिणी- पूर्वी एशियाई देशों के लिए इस प्रकार की शिक्षा का महत्व बहुत ज्यादा है। मेरी विदेश यात्रा का महत्व इस दृष्टि से मैं बहुत अधिक मानता हूं क्योंकि शिक्षा के माध्यम से इन समस्याओ के समाधान में क्या कुछ किया जा सकता है उसे समझने का अवसर मिलेगा। यात्रा संबंधी प्रारंभिक तैयारी भारतीय प्रौढ शिक्षा संघ, नई दिल्ली के प्रस्ताव पर यूनेस्को द्वारा दक्षिणी पूर्वी एशिया के थाइलैंड, मलेशिया तथा सिंगापुर देशो मे किये जा रहे जनशिक्षण विशेषकर कामगार एवं सहकारिता शिक्षा एवं को-ऑपरेशन एज्यूकेशन के कार्य का अध्ययन करने हेतु मुझे वर्ष 1984-85 के लिए चुना गया। मेरे इस चुनाव को विद्यापीठ द्वारा किये जा रहे प्रौढ-शिक्षा, समाज एवं कार्यकर्ता के शिक्षण कार्यों को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्रदान करना मानता हू । विद्यापीठ मे रहकर मैंने जो भी कार्य प्रौह-शिक्षा एव जन शिक्षण के क्षेत्र में किया है उसकी उपलब्धि के रूप में इमे देखता हूँ। प्रस्तावित देशो की सामाजिक, शैक्षणिक, तथा आर्थिक समस्याएं समान हैं । निरक्षरता का प्रतिशत इन सभी देशो में बहुत ज्यादा है । सभी देश खेती प्रधान हैं । विभिन्नता में एकता 10 इन देशों की विशेषता है। सभी देश औपनिवेशक साम्राज्य के वर्षों तक शिकार रहे है । आर्थिक पिछड़ापन इन देशों की सबसे बड़ी चुनौती है। स्वास्थ्य वेरोज- गारी तथा सामाजिक विषमताए इन देशो के विकास में बहुत बड़ी बाधाएं हैं। भारतवर्ष मे भी इस प्रकार की स्थिति है। अतः इन देशों की इस अध्ययन यात्रा के द्वारा वहा इन समस्याओं के समाधान हेतु विभिन्न स्तरो पर किये जा रहे कार्यों का अवलोकन एवं अध्ययन करने का अवसर मिलेगा तथा अपने अनु- भवो का लाभ वहा के लोगों तक पहुंचा सकूगा । प्रौढ शिक्षा संघ द्वारा मुझे मनोनीत करने के प्रस्ताव के प्राप्त होते ही मैंने अपनी तैयारी आरम्भ कर दी थी। सर्वप्रथम मुझे अपने अध्ययन की रूपरेखा तैयार कर यूनेस्को की स्वीकृति हेतु भेजना था। क्योकि उसे स्वीकार किये जाने पर ही मेरे नाम की स्वीकृति प्राप्त होनी थी, मैंने अपना अध्ययन प्लान दिनांक 26 अप्रैल, 1985 को भेजा। मेरे अध्ययन को इस रूपरेखा मे इन देशों में किये जा रहे प्रौढ़ शिक्षा, रितरित शिक्षा, सहकारी शिक्षा तथा नेतृ कार्यकर्ता शिक्षा सम्बन्धी कार्यों का अध्ययन सम्मिलित है। इसमे वहा निरक्षरता निधारण से सम्बन्धित साहित्य-सृजन जिसमे प्राइमर, उत्तर साक्षरता तथा अनुवर्ती कार्यक्रमो से सम्बन्धित पुस्तको का निर्माण साक्षरता कक्षाओं का चलाना, पद्धतियां, प्रशिक्षण, श्रव्य-दृश्य साधनों का निर्माण आदि से सम्बन्धित योजनाओ का अध्ययन भी सम्मिलित है। मेरी इस अध्ययन योजना को राष्ट्रीय अधिकृतियों द्वारा एप्रूव कर यूनेस्को की स्वीकृति हेतु प्रेषित किया गया । मुझे खुशी है कि इस योजना को इडियन नेशनल कमीशन फॉर को-ऑपरेशन विथ यूनेस्को के द्वारा अनुमोदित कर स्वीकृति हेतु यूनेस्को कार्यालय पेरिस भेजा गया । यूनेस्को ने सहर्ष स्वीकार कर मुझे इस यात्रा पर जाने की औपचारिक स्वीकृति प्रदान कर दी। यूनेस्को ने अपनी स्वीकृति के साथ लिखा कि "The study plan accompaning the curriculum vita of Mr. Garg looks goods euongh to us" 27 जून 1985 को वह औपचारिक स्वीकृति प्राप्त हुई। लेकिन इस स्वीकृति मे स्पष्ट किया गया था कि यात्रा के लिए प्रस्थान, प्रस्तावित देशो द्वारा अध्ययन सम्बन्धी कार्यक्रम निर्धारित होने की सूचना प्राप्त होने पर ही किया जावे । अतः तैयारिया पलती रही और इन देशो से कार्यक्रम प्राप्ति का इन्तजार किया जाता रहा। विदेश यात्रा की तैयारी में पासपोर्ट बनवाना, हेल्थ प्रमाण-पत्र प्राप्त करना, वीजा (मलेशिया के लिए) प्राप्त करना, आय-कर क्लियरेन्स प्राप्त करना, तथा यात्रा की इटर्नरी के आधार पर सम्बन्धित देशो के लिये वायुयान यात्रा का रिजर्वेशन करवाना आदि कार्य मुख्य थे। हमारे देश की प्रशासनिक स्थिति ऐसी है कि इन सभी कार्यों को सहजतापूर्वक संपादित करवाना वडा याटिन था। प्रशासनिक उतनी हुई प्रक्रिया, नियमानुसार पार्य नहीं करने की प्रवृत्ति, दूगरों की कटिनाइयों का उचित आंकलन नहीं कर पाना तपा तुच्छ स्वार्य के पारण, इन कार्यों को पूरा करवाने में काफी श्रम, रामप य पंगा पचं करना पड़ा। इन कार्यों के लिए दो बार दिल्ली को भी पद यात्रा करनी पड़ी। गैर, जैसे-तैसे सभी कार्य पूरे किये गये। लेकिन एक कठिनाई फिर भी उत्पन्न हो ही गई सम्बन्धित देशों द्वारा हमारे अध्ययन कार्यक्रम के निर्धारण के बाद यूनेस्को के पेरिस स्थित प्रधान कार्यालय से औयोराइजेशन प्राप्त कर ही हमें यात्रा हेतु प्रस्थान करना था। थाईलैट, बैंकार का हमारा कायम 25-9-85 से प्रारम्भ होना था। प्रौड़-शिक्षा गप द्वारा हमें कहा गया कि आप यात्रा हेतु वायुयान का टिकट परीद लें-ऑयो- राइजेशन प्राप्त हो जायेगा । मैं 21-9-85 तक दिल्ली में पा। यूनेस्को से सपर्क किया परन्तु तब तक भी हमे ऑपोराइजेशन प्राप्त नहीं हुआ मुझे उदयपुर पहुंच कर वम्बई होते हुए बैंकाक पहुंचना पा । 24.9.85 तक बैंकाक पहुंचना असम्भव था। मेरे साथ इसी हेतु यात्रा करने वाली श्रीमती एम. ए. कुलकर्णी का वीजा भी नहीं बना था। अत. प्रौद्ध- शिक्षा सप के निर्देश पर हमे अपनी यात्रा 27-9-85 तक स्थगित करनी पड़ी। इसका परिणाम यह हुआ कि काक में पाईलंड सरकार द्वारा निर्धारित हमारा अध्ययन कार्यक्रम 25 से 27-9-85 तक का फेन्सल करना पड़ा। 21-9.85 को दिल्ली में भारतीय प्रौढ-शिक्षा संघ के कार्यकारी निदेशक श्री सचदेव तथा अन्य पदाधिकारियों ने मुझे कहा कि हमने नई दिल्ली स्थित यूनेस्को अधिकारी श्री राजवहादुर भण्डारी से बात कर ली है। आप 27-9-85 को बम्बई मे थाईलह बैंकाक के लिए रवाना हो जावें। ऑथोराइजेशन आपको सीधे बैंकाक में प्राप्त हो जावेगा। ऑथोराइजेशन की हमे इसलिए आवश्यकता पी कि हमारा इस यात्रा हेतु इन देशों में आने-जाने के लिए वायुयान का खर्च यूनेस्को द्वारा बैंकाक में प्राप्त करना था जो विना इस ऑथोराइजेशन के प्राप्त नहीं हो सकता था। दूसरा खर्च संस्था द्वारा वहन करना था। जिसकी स्वीकृति विद्यापीठ व्यवस्थापिका तथा संस्थापक उपकुलपति जी द्वारा प्राप्त हो गई थी । नियमानुसार मुझे विदेश यात्रा हेतु बैक से प्राप्त 500 (पांच सौ) डालर ही प्राप्त हुए थे। बाकी खर्च मुझे बैंकाक में प्राप्त होने वाली रकम में से करना था। अतः मेरे लिए ऑथोराइजेशन की बहुत आवश्यकता थी। इन तीनो देशों में रहने वाले तथा स्थानीय अध्ययन यात्रा पर व्यय प्रतिदिन 50/60 पचास-साठ डालर (अमरिको) से कम नही था।
12 पैर, श्री सचदेय के निर्देशानुसार मैंने अपना कार्यक्रम बना लिया तथा 26-9-85 को उदयपुर से वम्बई तया वम्बई से 27-9-85 को रात्रि के वायु- यान (एयर फ्रांस) से बैंकाक जाने हेतु टिकट आदि परीद लिये । इसके बाद 22-9-85 को उदयपुर आ गया तथा बैंकाक जाने की तैयारी मे लग गया। यात्रा के लिए प्रस्थान--प्रथम चरण जैसा कि मैने प्रारम्भ मे ही उल्लेख किया है विदेश यात्रा अपने आप में एक रोमाचकारी, प्रतिष्ठावाला एवं बडी मुश्किल से मिलने वाला कार्य है। हमारे देश मे आज भी कुछ ही सौभाग्यशाली व्यक्ति हैं जिन्हें यह अवसर मिलता है। इस दृष्टि से मैं भी अपने आप को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि यह अवसर मुझे प्राप्त हुआ है । वह भी विदेश मे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने का। मेरा अपना कार्य-क्षेत्र प्रौढ-शिक्षा एव समाज-शिक्षा का है । इसके लिए मैं विगत 38 वर्षों से लगातार लगा हुआ हूं। प्रौढ़-शिक्षा से सम्बन्धित साक्षरता कक्षाए चलाना, उनकी व्यवस्था करना शहरी समाज शिक्षा का कार्य जनपद द्वारा करना, सामुदायिक शिक्षण केन्द्रों का कार्य, जनप्रतिनिधियों, ग्रामीण संस्थाओं के कर्मचारियों तथा चुने हुए प्रतिनिधियों का प्रशिक्षण कार्य, जनता कॉलेज के माध्यम से अध्यापकों, ग्रामीण महिलाओं तथा अन्य जन साधारण से सम्बन्धित शिक्षण- दीक्षण एवं प्रशिक्षण कार्यों में लगा हुआ हूं। व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा जन- शिक्षण एवं प्रौढ़-शिक्षा का कार्य उदयपुर जिले के 400 गांवो मे लगातार वर्षों से करता आया हूं। प्रौढ एवं समाज शिक्षा से सम्बन्धित साहित्य-सृजन का कार्य लगातार करवा रहा हूं। कई पुस्तको का सम्पादन व लेखन किया है, 'समाज शिक्षण' मासिक पत्रिका सम्पादन एवं मूल्यांकन कार्य भी काफी पिया है, कई अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय अध्ययनों में योग दिया है, दृश्य-श्रव्य साधनो का विकास कर उन्हें क्षेत्र मे लागू किया है । क्षेत्रीय कार्यकर्ताओ का प्रशिक्षण, मार्ग-दर्शन एवं प्रशासन लगातार कई वर्षों से कर रहा हूं। प्रौढ शिक्षा, समाज शिक्षा, उच्च शिक्षा, विश्वविद्यालयी शिक्षा तथा ग्रामीण विकास की अन्य शैक्षणिक एवं विकास योजनाओं में सामंजस्य स्थापित कर शिक्षा से जोडने का वरावर प्रयत्न किया है। स्वय विद्यापीठ में शिक्षा के सभी क्षेत्रों, आयामों में एक-दूसरे के पूरक के रूप मे संजोने का प्रयत्न किया है। कई राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठियों, सेमिनारों में भाग लिया तथा अपने यहां आयोजन भी किया है। कई क्षेत्रीय, प्रान्तीय तथा राष्ट्रीय संगठनों से सम्मानित हूं तथा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष आदि के रूप में कार्य कर रही हूं। कई क्षेत्री योजनाओं को बनाने एवं लागू करने में सक्रिय योगदान दिया है, प्रौदे शिक्षा सत्र में कई नवीन प्रयोग कर उन्हे नई दिशा एवं गति दी है। क्षेत्रीय कार्य, प्रशिक्षण कार्य, साहित्य-सृजन एवं श्रव्य-देश्य साधनाका धनीया आधार पर निर्माण कार्य, शोध एवं मूल्यांकन कार्य, निदेशन एवं प्रशासन कायों में मौलिक रूप से समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न किया है। मेरी मान्यता है कि शिक्षा का प्रत्येक क्षेत्र एक-दूसरे का पूरक होना चाहिए उसे अलग-अलग भागों मे बांट कर चलना एवं बरतना अनुपयुक्त है। समाज के विकास और व्यक्ति के सर्वागीण विकास मे शिक्षा का योगदान कुछ समय के लिए निश्चित अभ्यासक्रम पूर्ति हेतु नहीं वरन् जीवन-पर्यन्त चलने वाला क्रम है। और इस दृष्टि से अलग- अलग समय में अलग-अलग रूप मे शिक्षा मनुष्य के लिए आवश्यक है प्रौढ़-शिक्षा का दायित्व इस दृष्टि से औपचारिक शिक्षा की अपेक्षा में अधिक मानता हूं। वह जीवन-पर्यन्त चलने वाता शिक्षाक्रम है । उसे समय, अभ्यासक्रमों या व्यक्तियो के चंधनों से नहीं बांधा जा सकता। इस दृष्टि से मेरे अनुभवों का लाभ मुझे अपनी इस विदेश यात्रा मे अवश्य मिलेगा इन अनुभवी के आधार पर मैं इन देशों में किए जा रहे कार्यों का तुलनात्मक अध्ययन कर सकूगा । इस अध्ययन के आधार पर अपनी संस्था व राज्य में प्रौढ- शिक्षा कार्यक्रम को अधिक सक्रिय एवं गतिशील बनाने में योगदान मिल सकेगा। विदेश यात्रा हेतु औपचारिकताएं पूरी करने की व्यस्तता और तत्सम्बन्धी व्यवस्था पूरी हो जाने तक इस यात्रा के लिए एक अजीब-सी उमंग बनी रही और उत्साह बढ़ता गया। परन्तु ज्योही सभी औपचारिकताएं पूरी हुई और यात्रा के लिए समय नजदीक आया एक अजीव-सा मानसिक तनाव शुरू हो गया। क्यों? समझ में नहीं आया। कई मित्रों से कई प्रकार की बातें उनकी यात्राओं एवं अनुभव के आधार पर सुनी हैं। अकेलापन, अनजान प्रवास अपने एवं समाज से बिलकुल भिन्न, खान-पान आदि का प्रश्न । क्योकि मैं शुद्ध रूप से शाकाहारी हूं। अध्ययन कार्य की रूपरेखा तथा उसे पूरा करने की कल्पना आदि कई बातें एक के बाद एक दिमाग में आती रही । जाने की उमंग परन्तु जिस विश्वास के आधार पर चुना गया हूं उसे पूर्ण रूप से पूरा करने की तमन्ना सभी कुछ तो मन मे आता रहा, विचार बनते रहे। फिर आजकल वायुयान का सफर आशा एवं उमंग मे झूलता हुआ विचार, साथ ही हाईजेकिंग, दुर्घटना आदि की कल्पना भी विचारों में आती रही। पर यही सब कुछ तो जीवन है । इसी में रहकर तो इन्सान आगे बढ़ता है। "हमेशा तो कुछ नहीं बिगड़ता। मुझे ईश्वर मे पूर्ण एवं प्रगाढ़ विश्वास है । विश्वास एव उसकी कृपा से ही तो मैं जीवन में कुछ नहीं होते हुए भी, किसी आत्मीय एवं 14 रिश्तेदार का सहारा नहीं होते हुए भी तो घोडा बहुत कुछ कर पाया हूं। मेरी आराध्य देवी कुलदेवी श्री वांगी देवी का ही तो सहारा रहा है, आज भी है। उसी की कृपा मुझ पर हमेशा है। और अब उसी के सहारे कई विचार आते हुए भी निश्चिन्त हू । और मानसिक रूप से भी पूर्ण तयारी कर रहा हूँ। उघर मेरे जीवन को सफल बनाने वाले, मुझे समाज मे आज जो कुछ भी हूं उसमे प्रतिष्ठित करने वाले, कार्य करने का अवसर देने वाले मेरे कार्य-क्षेत्र के अग्रज आदरणीय जनुभाई, संस्था के सैकड़ों कार्यकर्ता, उनका विश्वास आशीर्वाद एवं शुभकामनाएं भी तो मेरे साथ हैं। उधर मेरी पत्नी की मूकसाधना, मेरे लिए अनवरत तपस्या एव देवी से प्रार्थना उसका निस्वार्थ सेवा सहयोग भी मेरे लिए बहुत बड़ा सहारा है, विश्वास मेरी भूवासा, उनका छोटा पुत्र जो मेरे अकेले होते हुए भी सगे भाई से भी ज्यादा है। उनकी पुत्री जो मेरी जीजीवाई है, जीजासा, मेरे दोनों पुत्र और तीनो पुत्रिया व दामाद जो मेरे परिवार के कुलरत्न हैं मेरे इस प्रवास मे अपरोक्ष परन्तु भावना से साथ तो हैं। मेरी भुवासा इतनी वृद्ध होते हुए भी मुझे छोड़ने हवाई अड्डे आई, क्या मेरे जीवन मे उनसे बढ़ कर कोई हो सकता है । मेरा पुत्र बाबू, नरेश मेरे मना करने पर भी बम्बई तक आया, सारी व्यवस्था की । क्या मैं सौभाग्याशाली नहीं हू ? छोटा बेटा राजा दिन-रात दौड़-भाग कर कार्य करता है, मेरा सब कुछ तो है। मेरी भाभी (आदरणीया जीजी) मंजुला देवी नागर का मुझे देवी के सामने तिलक करना एवं प्रसाद देना और मुझे विदेश यात्रा के लिए विदा करना क्या मेरे लिए मूल्यवान सहारा इस यात्रा का नही है ? इस सबसे ऊपर मेरी संस्था के सैकडो सहयोगियो, कार्यकर्ताओ, नागरिक समाज मे मेरे अग्रजो, मित्रों तथा सैकड़ों व्यक्तियों द्वारा मुझे मेरे निवास स्थान तथा हवाई अड्डे पर फूलमालाओ से लाद देना, जयघोष करना, गुलाल उड़ाना तपा ताबूल देना व आशीर्वाद देना क्या मेरा विदेश प्रवास के लिए सबसे बड़ा सहारा नहीं है ? अवश्य है । और यह सव कुछ ये पक्तिया मैं यहा बैंकाक के 'श्री' गेस्ट हाउस के एक एयर कडीशण्ड कमरे में अकेला बैठकर लिख रहा हूं, परन्तु अकेला नहीं हूं। ऊपर वणित विश्वास, महारा व आशीर्वाद और साथ ही इस सुरम्य स्थान के परिसर में बने सुन्दर, आकर्षक सजे हुए भगवान ब्रह्मा, गणपति, लक्ष्मी तथा विष्णु भी तो हैं। क्या सांस्कृतिक सामंजस्य, जीने का विश्वास कोई कल्पना नहीं कर सकता। सब कुछ भिन्न भौतिक रूप से । केवल गेस्ट हाउस की स्वागत नारिया थोड़ी. सी अंग्रेजी जानती हैं, अन्यथा सभी अजनवीपन फिर भी एकता, भावात्मकता वही 15 - भारतीय संस्कृति, वही युद्ध, कृष्ण, राम, गाधी कहां अकेलापन है, सभी तो साथ हैं, मेरी शिक्षा अध्ययन यात्रा का उद्देश्य यही तो सब कुछ जानना है । हां, तो पता नहीं किम भावना में वह गया था। अभी उदयपुर हो तो हूं डायरी लिखने के हिसाब से। वैसे लिख रहा हूँ बैंकाक में, अतः शारीरिक रूप से यहां हूं। परन्तु मुझे डायरी अभी तिथिवद्ध लिखनी है । अतः पुनः उदयपुर चलता हूं। तो मैं उस मानसिक द्वन्द्व से उभर गया हूं और मुझे अपनी इस विदेश यात्रा के प्रथम चरण पर बम्बई के लिए हवाई जहाज से प्रस्थान करना है। विगत दो-तीन दिनो से बराबर घर पर बधाई एवं आशीर्वाद देने लोग आते रहे हैं। संस्था में कई जगह समारोह हुए, मुझे आशीर्वाद दिया गया। आग घर पर सभी वच्चियां, कुंवर सा आ गए हैं। पोते-पोती एवं नातियों में गजब का उत्साह है। दादा-नाना कल विदेश जा रहे हैं। पता नहीं विदेश क्या है ? मेरी पोती मीनू गुडिया लाने की माग कर रही है । पोता टीनू ऑटोमेटिक कार की फरमाइश कर रहा है। हनी, डोली डमू नाना अच्छी चीज लाने की मांग कर रहे है। बच्चिएं एवं बहू मौन हैं । परन्तु उनकी आखों से लगता है जैसे उन्हे भी कुछ चाहिए क्या? बाबूजी स्वय निश्चय करें। और पत्नी, पत्नी ने जीवन में कुछ नहीं मागा। समी कहते हैं आप भी साथ क्यों नही जाती? अच्छा मौका है मूक देखती रहती है । आंखों मे अजीब सुखद आश्चर्य-परन्तु न जाने क्या सोच कर आंखें छलका लेती है। कहती है एक माह कैसे अकेली रहूंगी? वैसे आप हमेशा बाहर जाते हैं, तब महमूस नही होता परन्तु इस बार अजीब लग रहा है । बहुत हो-हल्ला जो इस यात्रा का हो रहा है. स्वाभाविक है। सारे घर मे अभी उत्साह, उमग एवं उत्सव-सा माहौल है, चहल-पहल है, लोग आ रहे हैं, पता नही समय कब निकल गया । रात्रि के 11 बज गए, सवेरे जल्दी उठना है। अतः विश्राम के लिए सभी अपने-अपने शयन-कक्षो मे चले जाते हैं। मेरी इस यात्रा के लिए मुझे अनेक प्रकार के सहयोग देने वाले मेरे विभिन्न मित्रों एवं सहयोगियों मे श्री भाई भगवान श्री मदनलाल लाहोटी, श्री छन्नूसिंह चौधरी श्री हस्तीमल जैन तथा मुरलीधर वर्मा अग्रणो हैं । क्यो न हो ये सभी अपने आप मे जीवन्त संस्था हैं। भाई भगवान तो मेरे जीवन के विगत 25 वर्षों के सुख-दुःख के सहयोगी रहे हैं, जीवन के अच्छे व बुरे क्षण साथ व्यतीत किए हैं, उन्होंने स्वयं विदेश यात्रा की है। अतः सभी प्रकार से मुझे सहयोग दिया, स्वयं दिल्ली दोनों बार आए तथा औपचारिकताएं पूरी करवाई । क्यो न करवाएं बड़े भाई हैं उनका फर्ज है और सुशील, सुशील तो नरेश की तरह है ही। तो आज विदेश यात्रा के लिए प्रस्थान का दिन है । आज 26-9-85 है और मुझे प्रातःकाल के 10 बजे वाले हवाई जहाज से बम्बई के लिए पूर्व निर्धारित 16 कार्यक्रम के अनुमार प्रस्थान करना है। मवेरे तीन बजे नीद घुली कमरे के बाहर लाइट जल रही थी। वाहर आकर देखा पत्नी स्नान कर चुकी है तथा देवी की पूजा कर रही है। जाते ही मैंने पूछा इतनी जल्दी क्यों? जवाव आया नीद नहीं आई। थोड़ी देर बाद जब मुझे भी नीद नहीं आई तो चाय बना कर लाई तथा चाय पी कर मैं अपने दैगिक नित्य कर्म मे लग गया तथा छः बजे तक तयार हो गया। 18 00 बजे हवाई अड्डे के लिए रवाना होना था। इसके पूर्व मुझ आदरणीय जनुभाई तथा आदरणीय भाभी से आशीर्वाद लेने जाना था। अतः 7.00 बजे घर से रवाना हो गया । दोनो का आशीर्वाद प्राप्त कर घर आया तब तक घर में काफी भीड़ जमा हो गई थी। सबसे आशीर्वाद प्राप्त किया। मेरे एक मित्र श्री प्रेमजी नाहरा मगरा वाले बस लेकर आ गए। दो-तीन जी व कारें आ गई तथा सभी लोग हवाई अड्डे रवाना हो गए। हवाई अड्डे पर पहुचने पर मेरे आश्चर्य की सीमा नही रही जब मैंने देखा सकडो लोग वहा मालाएं आदि लेकर उपस्थित थे। पुष्पहारो, नारो, आशीर्वाद से भाव-भीनी विदाई-एक कार्यकर्ता को-आश्चर्य । मैंने जीवन में इस प्रकार का स्नेह एव प्यार समाज के बहुत बड़े तबके से पहली बार प्राप्त किया । भाव-विभोर हो गया। कहने को क्या था। मैंने इतना ही सोचा समाज मे थोड़ा-बहुत कार्य किया है उसके प्रति स्नेह, समाज के लोगो का परिजनो का, मित्रो का और अपने आत्मीयो का। क्या कहता, कुछ कहने को था नहीं । केवल आषो ने अपने स्वभाव के अनुकूल इस प्रेम का जवाब प्रेम के आसुओ से दिया। तभी वायुयान आ गया और सुरक्षा जांच के लिए बुला लिया गया। विमान स्थल की ओर समीपीजनों एव मित्रो के बच्चों के टाटा के गुंजन में तथा पत्नी के मूक अंबुजल भरे विदाई के क्षणो में वायुयान पर सवार हो गया। इस प्रकार मेरी यात्रा का प्रथम चरण प्रारम्भ हुआ। यात्रा का दूसरा चरण-बम्बई दिनाक 22-9.85 के प्रात.काल 10.15 पर उदयपुर से प्रस्थान कर 12.30 बजे अपराह्न बम्बई वायुयान द्वारा पहुंच गया। बम्बई हवाई अड्डे पर मुझे सस्था तथा हमारे हितपी समाजरत्न कृषि पडित श्रीमान् सांवरमलजी के सुपुत्र श्री पवनकुमार जी उपस्थित थे। मेरा बडा वच्चा वावू नरेश इसी कार्य हेतु एक दिन पूर्व चम मे गया था वह भी वहा उपस्थित था। सेठ साहब ने गाड़ी भेजी थी, 17 उसी मे हम सभी सेठ साहब के निवास पर पहुंचे। कई बार देखा गया है कि लक्ष्मी प्राप्त करना आसान है परन्तु लक्ष्मी प्राप्त करने के बाद उसके मद को सहन करना कठिन हो जाता है । अनायास ही लक्ष्मी- पति बनने के बाद कई लोग अपना व्यवहार, चलन, सौजन्य सब भूल जाते हैं तथा संसार की कई विसंगतियों मे फस जाते हैं। अहम्, ईया, द्वेष तथा राग उनके सहचर बन जाते हैं, बाहरी आडम्बर एवं दिखावा उनका विशेष गुण बन जाता है। स्वजनो एवं आत्मजनों की उपेक्षा करना वे अपना धर्म समझने लगते हैं। और इस प्रकार वे लोग अपनी विशेप दुनिया के लोग बन जाते हैं जिनका समाज से कोई सबंध नही रह जाता है। पैसे के बल पर हरेक को खरीदना या नीचा दिखाना उनकी आदत बन जाती है। उनमे मानवीय गुणों का ह्रास होने लगता है और उन पर दानवी गुण हावी होने लगते हैं, यह है आज के अधिकतर नवीन धनिको की स्थिति। कृषि पडित समाजरत्न सेठ साहब थी सांवरमल सेडमल इसके अपवाद है । सरल जीवन एवं उच्च विचार के जीते-जागते प्रतीक लक्ष्मी-पुत्र होते हुए भी स्नेह सरलता एव स्वावलम्बन की प्रतिमूर्ति हैं । आतिथ्य सत्कार इनका जीवन धर्म है। मेरे वहा पहुंचते ही आत्मीयता से मुझे ठहराया। श्री पवन बाबू को उनकी धर्म- पत्नी के साथ बीमार होते हुए भी हवाई अड्डे पर मेरी अगवानी हेतु भेजना उनका आत्मीयता एव पारिवारिकपन का द्योतक है। परोपकार एवं सद्कार्यों के लिए दिल खोल कर सहायता करते है। राजस्थान विद्यापीठ को तो आपने एक तरह से अपना ही लिया है। 26-9-85 को बम्बई पहुंचते ही भोजन व थोड़े विश्राम के बाद मैं बम्बई शहर समाज शिक्षा विभाग गया, वहां से श्रीमती एस. ए. कुलकर्णी जो मेरे साथ विदेश यात्रा पर आ रही है, उनके निवास पर गया । उनसे मिल कर अपने कुछ अन्य परिजनो एव मित्रो से मिलना हुआ, तदुपरान्त सेठ साहब के निवास स्थान पर जहा मैं ठहरा हुआ था पहुच गया। सेठ साहब इन्तजार कर रहे थे, भोजन के लिए । रुचि नही होने के कारण थोड़ा नाश्ता किया तथा विश्राम हेतु चला गया। 27-9-85 यह दिन संघर्ष पूर्ण रहा। वैसे मेरा जीवन ही संघर्षपूर्ण है । कुछ ठीक होते हुए भी थोड़ा बहुत संघर्ष आ ही जाता है। मेरा वायुयान का बम्बई-कॉक का टिकट ओ० के० था। फिर भी मैंने एव बाबू नरेश ने सोचा कि एक बार पुनः कनफरमेशन करवा लिया जावे। इस हेतु मैं बम्बई शहरी समाज शिक्षा विभाग कार्यालय होता हुआ एयर फ्रांस के ऑफिस जाना चाहता या। समाज शिक्षा विभाग पहुंचने पर संस्था के सचिव श्री गाडेकर से मिला। श्री गाडेकर ने टेलिफोन से एयर फ्रांस के कार्यालय टेलीफोन कर मेरे टिकट 18 यारे में जानकारी प्राप्त करना चाही उत्तर में बताया गमा शिमग टिकट मो. के नहीं है। मामिल हो गया है। कारण शास नहीं । मुम पर वमपात-गा हो गया । आज रात्रि को जाना । टिकट दिल्ली में ही ओ० के० करया कर आया था। फिर क्या बात हो गई, सो उमे के मिल कर दिया गया। तत्कात याबू के साथ एयर फास के ऑफिम ताज होटल भागा। वहां पहुंचने पर मधित क्लर्क से मालूम किया। उसने बताया कि कम्प्यूटर में स्लिप के कारण ऐसा हो गया है । कम्प्यूटर आज के युग की गवसे बड़ी उपलब्धि ! कभी नहीं गलती करने वाली मशीन-वाह क्या हो गया? पर हो गया सो हो गया फिर बड़ी कोशिश के बाद मेरा टिकट ओ० के० हुआ। तव जी में जी आया। वहा के फ्लोरा फाउटेन स्थित श्री वी० पी० सिन्हा साहब के कार्यालय उनमे मिलने गया वहां महिला मण्डल, उदयपुर की सचिव श्रीमती मोहन देवो दो अन्य महिला कार्यकर्ताप्रो के साथ श्री मिन्हा साहब के कार्यालय में मिल गये। यहा घोडी देर ठहर कर वापन गेस्ट हाउस आ गया। आज अनन्त चतुर्दशी का दिन है, महाराष्ट्र में गणपति की मूर्तिया समुद्र या जलाशयो में विसर्जन करने का दिवस है। बम्बई में अपार उत्साह है, जगह-जगह पाण्डालों में गणपति की मूर्तिया स्थापित कर उत्सव आयोजित किये जा रहे हैं । दो बजे के बाद विसर्जन की सवारियां सड़को पर निकलने लगेगी, जिससे काफी भीड हो जावेगी तथा रास्ते बन्द हो जावेंगे। अतः जल्दी अपने निवास स्थान पर पहुंचने हेतु वहा से चल पड़े। बम्बई मे मेरे सालेजो नौकरी करते हैं, उनसे भी मिलने गया। दोनों साले जी श्री मोहनलालजी सा० तथा श्री नारायणलालजी सा० तया दोनो के बच्चे श्री दिनेश एवं श्री गणेश भी कल रात्रि को मुझसे मिलने आए थे। आज मैं प्रातः एयर फ्रांस के कार्यालय जाते हुए इनके यहा गया था। इनके सेठ साहब एवं सेठाणीजी ने वड़ी आत्मीयता से स्वागत किया, शगुन के रूप में लक्ष्मीजी की एक चांदी की मूर्ति दी। उसे मैंने इस यात्रा मे साथ रखा हुआ है। कितना स्नेह, कितनी आत्मीयता । रात्रि को रवाना होने से पूर्व ये यभी पुनः मुझसे मिलने आये तथा सेठाणीजी द्वारा बनाया हुआ बहुत-सा नास्ता भी साथ लाये, स्वयं मेरे बड़े सालाजी एवं बहनोई साहव श्री मोहनलालजी सा० नाश्ता लाये एव शगुन के रूप में चांदी की एक लक्ष्मीजी की मूर्ति भी लाये जिसे मैंने बाबू नरेश को उदयपुर ले जाने हेतु दी और कहा कि यह मूति अपने मन्दिर में पूजा हेतु रख देना। रात्रि को 10 बजे बाद बैंकॉक को यात्रा के लिए रवाना होने की तैयारी प्रारम्भ कर दी। विदेशो मे भारतीय भोजन अच्छा नहीं मिलता है । शाकाहारी भोजन की तो बड़ी समस्या है । अत' जो नाश्ता मेरे सालेजी बना लाये थे उसे किसी तरह सामान में वाधा, हवाई यात्रा में ज्यादा सामान साथ में नहीं रखना चाहिए। अतः एक अटैची एवं हैण्डवंग ही तैयार कर रात्रि को 11.25 बजे हवाई अड्डे 19 रवाना हो गया। रवाना होने के पूर्व सेठ साहब श्री सावरमल जी साहब ने तिलक किया व पुप्पमाला दी जिसे साथ रखने का आग्रह किया। वम्बई से रवाना होते समय मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि जैसे मेरे बड़े भाई मुझे बड़े स्नेह से आशीर्वाद देकर विदेश यात्रा के लिए रवाना कर रहे हैं। सेठ साहब के इस स्नेह को जीवन भर नहीं भूल सकूगा। साढ़े ग्यारह बजे के करीव मैं बाबू नरेश तथा मेरे दोनो साले साहब के साथ हवाई अड्डे पहुंच गया। मेरे पहुचने के पूर्व ही श्रीमती कुलकर्णी वही बाहर अपने सभी परिजनो के साथ उपस्थित थी। इन लोगो के साथ कई फोटो खिंचवाये । फिर हवाई अड्डे की औपचारिकताओं को पूरा करने मे लग गये। हवाई अड्डे पहुंच कर वायुयान सवार होने तक अग्नि-परीक्षा से गुजरना पड़ता है, आजकल हवाई यात्रा तोड-फोड़ के कारण सुरक्षित नहीं रह गये हैं। अतः सुरक्षा के कई कड़े उपाय अपनाये गए हैं। अतः कई औपचारिकताओ से गुजरना पड़ता है । हवाई अड्डे पर कुली नहीं होते हैं, अपना सामान स्वयं को ढोना पड़ता है। विशेषकर विदेश यात्रा के लिए कई अन्य औपचारिकताएं भी पूरी करनी पड़ती हैं। वायुयान का बोडिंग टिकट प्राप्त करने हेतु पासपोर्ट आदि बनाकर क्लीयरेंस लेना पड़ता है। उसके बाद नाहजुवेशन फार्म भरना पड़ता है यह सय करने के बाद विदेशी मुद्रा वीस डालर रास्ते के खर्च के लिए मिलती है। 100 रुपये एयर पोर्ट डिपार्चर टेक्स जमा करना पड़ता है यह सब करने के साथ ही वायुयान मे बैठने का वोडिंग टिकट मिल जाता है। वोडिंग टिकट प्राप्त करने के पश्चात कस्टम वालों से क्लीयरेस लेना पड़ता है । इसके बाद सुरक्षा जांच होती है, स्वय को एव सामान की। सुरक्षा जाच के बाद आपको वायुयान मे बैठने हेतु एक अलग लाउज मे बिठा दिया जाता है। हमारा घायुयान आज 1.30 घण्टे लेट था। वायुयान का निर्धारित रवाना होने का समय 1.45 था, वायुयान 2.30 बजे आया और हम बैंकॉक की यात्रा हेतु 3.00 बजे प्रातः यम्बई से रवाना हुए। वायुयान की यात्रा अपने आप में एक रोमांच है। एयर फ्रान्स का बोइंग- 747 दुनिया की सबसे यच्छी वायुसेना है। भीतर जाते ही आप एक शानदार राजसी ठाट के वातावरण में प्रवेश करते हैं। शानदार गद्दी वाली लचीली गुनिया, पत्र-पत्रिकाएं, सॉफ्ट और हाई डिय तथा अन्य याने-पीने का सामान । मुन्दर विनीत-सेवा भाय ने पूर्ण प्योम यालाएं आपकी सेवा के लिए तत्पर, यात्रा संबंधी उचित निर्देशो के साप वायुयान अपने गन्तव्य स्थान की ओर रवाना हो गया । प्रातः 8.30 (भारतीय समय के अनुसार 6.40 प्रातः) वो हम भारतीय भूमि छोड़कर प्राचीन श्याम देश को यो आज का पाईलए है, राजधानी तक में पहुंच गए।
20 चकॉक के हवाई अड्डे पर आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की । डालर को थाईलैण्ड की करेंसी जो वाहट कहकाती है, में परिवर्तन करवाया। यहां का एक बाहट हमारे 50 पैसे के बराबर है। उसके गप अपना सामान प्राप्त कर गेस्ट- हाउस के लिए रवाना हुए। हवाई अड्डे पर यूनेस्को की गाड़ी हमें लेने आई थी उसी में हम रवाना हुए तथा 'श्री' गेस्ट हाउस पहुंचे। बैंकॉक में प्रथम दो दिन बैंकाक हवाई अड्डे पर हम 28-9-86 को प्रात. 8-30 बजे पहुंचे । हवाई अड्डे पर यूनेस्को की गाड़ी हमे लेने आई थी, एक प्ले कार्ड पर मेरा तथा मेरी कलीग श्रीमती कुलकर्णी का नाम लिखे ड्राइवर खड़ा था। हमने देखा और हवाई अड्डे की औपचारिकताएं पूरी कर गाडी मे बैठ गए । बैंकॉक में मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी तो इस बात की है कि इस महानगर मे मेरे ही नगर के निवासी मेरे अभिन्न मित्र, विद्यापीठ के पुराने सहयोगी और आज के युग-व्यक्तित्व श्री योगेश अटल यूनेस्को के सामाजिक एवं मानवीय विज्ञान सस्थान के मुख्य सलाहकार के बहुत बड़े पद पर कार्यरत हैं। मैं उनसे मिलने को बहुत उत्सुक था। गेस्ट हाउस पहुंच कर स्नान आदि कर थोड़ा विश्राम करने के बाद उनसे टेलीफोन पर सम्पर्क स्थापित किया । अवकाश होते हुए.भी सौभाग्य से वे कार्यालय में मिल गये। उनसे बातें करने पर जितनी खुशी हुई उसका वर्णन फरना सम्भव नहीं है। उन्होंने तपाक से कहा, 'मैं आ रहा हूं, घर चलेंगे।' विदेश मे अपना आत्मीय मिल जावे और घर का भोजन मिले, यह सौभाग्य नही तो क्या है ? ठीक 6.30 बजे श्री योगेश गेस्ट हाउस मे थे। वर्षों बाद मित्रो का मिलन क्या उपमा दूं-सिर्फ समझ की बात है, वहां गए, दो-तीन घण्टे आनन्द से गप- शप हुई। श्री योगेश ने आदरणीय जनुभाई, संस्था, उदयपुर तथा राजस्थान के बारे में नई तथा पुरानी कई चर्चाएं को । सच कहा है-जननी जन्मभूमि को कौन भूला है, कौन भूल सकता है, स्वर्ग का ऐश्वयं भी नहीं भुला सकता । बेटी सुश्री रुचि ने बड़े प्पार से खाना बनाया। क्या आनन्द आया-कहा नहीं जा सकता। वही पर भारत के दो प्रबुद्ध श्री शर्मा एवं श्री पन्त जो कि यूनेस्को मे ही कार्यरत है, मिलकर परिचय प्राप्त किया, बहुत ही खुशी हुई । मैं तो भूल ही गया कि भारत के बाहर विदेश मे हूं। स्वदेशी एवं आत्मीय जन का मिलन --221 अमूल्य मिलन ही तो है। 1-10-85 से थाईलैंड के शिक्षा मंत्रालय में हमारा अध्ययन कार्यक्रम सुचारु रूप से प्रारम्भ हो गया। यह कार्यक्रम जो 25-27 सितम्बर को आरम्म करना था वह 1-10-85 से पुनः आयोजित किया जाना निश्चित हुआ। मानवीय विज्ञान संस्थान का अवलोकन मैं पूर्व मे ही बता चुका हूं बैंकॉक स्थित यूनेस्को के रीजनल कार्यालय के साथ इस रीजन का सामाजिक और मानवीय विज्ञान संस्थान स्थापित है। इसके प्रमुख डॉ. योगेश अटल हैं, जिनके बारे मे संक्षिप्त परिचय पूर्व मे दे चुका है। इस संस्थान की स्थापना आज से 10 वर्ष पूर्व हुई थी। इस सस्थान का मुख्य कार्य समाज एवं मानव विकास से संबधित अध्ययन करना, उचित वातावरण बनाना, सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए अध्ययन करवाना, उनके लिए तकनीकी सलाह उपलब्ध करवाना, पुस्तकालय एवं अन्य साहित्यिक सेवाए प्रदान करना तथा इस रीजन के लिए सामाजिक विज्ञान सबंधी प्रशिक्षण की व्यवस्था करवाना है। इस संस्थान द्वारा कई शोध-कार्य करवाये गये हैं जिनमे औद्योगीकरण का सामाजिक जीवन पर प्रभाव तथा लघु उद्योगो का राष्ट्र के सामाजिक एवं आर्थिक विकास में योगदान है। सामाजिक ढांचे में परिवर्तन सामाजिक ढाचे मै विभिन्न संगठनों द्वारा विकास के कार्यों में योगदान । ग्रामीण क्षेत्र में नेतृत्व-जो विकास के लिए उपयुक्त वातावरण में भागी- दारी कर सके। शिक्षा एवं समाज शिक्षा का आर्थिक विकास में प्रभाव । -~-सामाजिक स्तर का वास्तविक मूल्यांकन जो आकड़ो से भिन्न परन्तु वास्तविक हो। --आय का सामाजिक सन्दर्भ में उचित बंटवारा आदि मुख्य हैं। इस संस्था द्वारा समय-समय पर गोष्ठिया व सेमिनार आदि विभिन्न विषयो पर क्षेत्र के सभी देशो मे आयोजित की जाती हैं। एक प्रकार से यह संस्थान सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन एवं विकास के अध्ययन का एक केन्द्रबिन्दु है । सामाजिक परिवर्तन एवं आर्थिक विकास कार्यक्रमों मे समन्वय, उसके विभिन्न पहलुओ पर चिन्तन एवं अध्ययन के आधार पर करना चाहिए। डॉ. योगेश अटल ने इस सस्थान को प्रारम्भ से ही अपनी योग्यता, निष्ठा एवं निपुणता मे संजोया, संवारा, संगठित किया व आगे बढ़ाया है। उसका ही 22 परिणाम है कि यह सस्थान आज इस क्षेत्र का सबसे अच्छा सुसंगठित और थोड़े से आधिकारियो द्वारा अधिक कार्य करने वाला प्रतिष्ठान बन गया है। प्रतिष्ठान का कार्य बहुत ही सुन्दर ढंग से विना बाहरी दिखावट एवं आडम्बर के सहज रूप से चलाया जा रहा है। संस्थान ने कई प्रकाशन निकाले हैं, विभिन्न समस्याओ पर अध्ययन रिपोर्ट स संस्थान में ही कम्प्यूटर के द्वारा निकाली जाती हैं तथा सुन्दर ढग से पुस्तकाकार में तैयार की जाती हैं। संस्थान के पास ऐसा कम्प्यूटर टाइपराइटर जो सभी आकार की टाईप कर सकता है। सस्थान के रेकाडिंग का सिस्टम बहुत अच्छा है। फाइलें आदि इस प्रकार से व्यवस्थित है कि कोई भी आसानी से उन्हें प्राप्त कर सकता है। यहा पत्रवाहक या चपरामी जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। अधिकारी आवश्यकतानुसार फाइलें स्वयं लेते हैं, यहा फाइलें अधिकारी के पास नही परन्तु अधिकारी फाइलो के पास जाता है। सुन्दर पुस्तकालय व्यवस्थित रूप से जमा हुआ है जिसमें सामाजिक विज्ञान सम्बन्धी आज तक की प्रकाशित पुस्तके मौजूद हैं । संस्थान मे चतुर्थ श्रेणी का एक ही व्यक्ति है जो सफाई, वागवानी, कम्प्यूटर आपरेशन, फाइलिंग आदि सभी कुछ करता है । डॉ० अटल उनका निष्कासन मानते हैं, परन्तु विद्यापीठ को अपनी मातृ-संस्था मानते हैं और कहते हैं कि सामाजिक जीवन में विद्यापीठ में किये गये कार्यों के अनुभव के आधार पर ही वे इस क्षेत्र मे बहुत कुछ कर पाये हैं। कुल मिलाकर डॉ. योगेश अटल विद्यापीठ एव विशेषकर जनुभाई के प्रति बहुत ही आदरभाव रखते है। वे कहते हैं कि जनुभाई को मेवाड, राजस्थान एव भारतवर्ष ने कुछ भी सम्मान नहीं दिया-कुछ किया जाना चाहिए। इसके लिए उनकी इच्छा है कि वे एक अच्छी पुस्तक लिखेगे। परन्तु इसके लिए जनुभाई को उन्हे लम्बे इन्टरन्यू देने होगे। मैंने इस कार्य में उनका सहयोग देने का आश्वासन दिया है । यूनेस्को के अधिकारियो के साथ मेरी इस बैठक में मेरा थाईलण्ड तथा बैंकॉक का अध्ययन सम्बन्धी कार्यक्रम विस्तृत रूप में बनाया गया। इसके बाद एक निश्चित कार्यक्रम के अनुमार हमारा अध्ययन कार्य प्रारम्भ हुआ। थाईलण्ड शिक्षा मंत्रालय-अनौपचारिक शिक्षा विभाग में विचार-विमर्श निर्धारित कार्यत्रम के अनुमार हम नौ बजे प्रात: थाईलण्ड के शिक्षा मयालय के अनौपचारिक शिक्षा विभाग में पहुंचे। वहा श्री सनग्रो सुनानची, डिप्टी डायरेक्टर जनरल, शिक्षा विभाग ने हमारी अगवानी की। हमारे वहा पहुंचते ही 23 - उन्होंने अनौपचारिक शिक्षा तथा प्रौढ़-शिक्षा से संबंधित सभी अधिकारियों की हमारे साथ बैठक रखी। इस बैठक में सर्वप्रथम तीन दिनों के कार्यक्रम पर चर्चा हुई और उनकी विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई । इसके बाद श्री सुनानची ने थाईलैण्ड की शिक्षा नीति, उद्देश्य विशेषकर अनौपचारिक-बुनियादी शिक्षा व प्रौढ शिक्षा पर प्रकाश डाला। श्री सुनानची के अनुसार भौतिकवाद के विकास के साथ मानवीय मूल्यो का भी समावेश शिक्षा मे होना चाहिए । उनकी शिक्षा नीति में इसी आधार को माना गया है । थाईलण्ड में साक्षरता 895% है । यहां की सरकार प्राथमिक शिक्षा पर बहुत ज्यादा जोर देती है। उसकी नीति के अनुसार प्राथमिक शिक्षा को प्रथम वरीयता प्रदान है । यह राष्ट्रीय नीति है अतः प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य है। इनकी धारणा है कि बुनियादी शिक्षा का अग प्राथमिक शिक्षा को महत्व देता है उसके बाद माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा प्राप्त कर प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह लड़का हो या लडकी किसी काम में लग जाता है । शिक्षा पर राष्ट्रीय बजट का पाचवा हिस्सा यानी 20% खर्च किया जाता है। साक्षरता आन्दोलन 1939 की प्रथम राष्ट्रीय जनगणना के आंकडो के अनुसार थाईलैण्ड में 68.8% अथवा साठ लाख अस्सी हजार व्यक्ति निरक्षर थे। इसके निवारण के लिए सरकार को प्रौढ़-शिक्षा कार्यक्रम को प्राथमिक आधार पर लागू करने का निर्णय करना पड़ा, 1940 मे प्रौढ शिक्षा विभाग की स्थापना शिक्षा मत्रालय मे की गई। इसके तीन वर्ष बाद सरकार ने एक कानून बनाया कि 25 से 45 वर्ष के बीच के आयु वाले निरक्षर व्यक्तियों को सरकार को वार्षिक शुल्क उस समय तक जमा कराना पड़ेगा जब तक कि वे थाई सरकार के निर्धारित माप-दण्ड के अनुसार साक्षरता प्राप्त कर सरकार से प्रमाण पत्र प्राप्त नही कर लेते । इस अवधि में प्रौढ़ एवं जन-शिक्षा पर सरकार के सभी माध्यमो ने प्राथमिकता दी। इस बीच अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भी प्रौढ़-शिक्षा को महत्व दिया जाने लगा। यूनेस्को जैसे सगठन ने इस कार्य के विकास आदि में बहुत योगदान देना शुरू कर दिया। थाईलैण्ड ने भी इस कार्य मे अपने अनुभवो के आधार पर दूसरे देशों के साथ महयोग प्रारम्भ कर दिया । प्रौढ शिक्षा के नये सिद्धान्त, उद्देश्य, प्रशिक्षण, साहित्य-सृजन तकनीक आदि के कार्यों में विकसित देशों के साथ थाईलैण्ड ने अपना संबंध बनाया तथा इन कार्यों द्वारा राष्ट्रीय विकास मे उपयोगिता पूर्ण कार्य करने का युग प्रारम्भ हुआ। दक्षिगी पूर्व तथा एशियाई देशों मे समन्वय व सहयोग का कार्य इस प्रकार ए० एस०पी०वी० ए० इ० के माध्यम से प्रारम्भ हुआ।
24 प्रौढ़ शिक्षा का राष्ट्रीय विकास एवं फाम-धंधों से सम्बन्ध थाईलण्ड मे 1968 से व्यावहारिक साक्षरता का कार्य प्रारम्भ हुआ। इस योजना से निरक्षर प्रौढ़ साक्षरता कार्यक्रमो की ओर बहुत आकर्षित हुए तथा निरक्षरता निवारण के कार्य में बहुत सफलता मिली। 1969 मे साक्षरता कार्यक्रम को पारिवारिक जीवन आयोजन के साथ जोड़ा गया। इस नये कार्यक्रम को 'खोट पेन' कार्यक्रम कहा जाता है इसका मुख्य उद्देश्य पढ्ने वालों द्वारा अपनी समस्याओं को स्वयं ढूंढना, उनके कारणों का पता लगाना और अध्ययन करना, उनका व्यक्तिगत विश्वासों, सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण के आधार पर अवलोकन करना, नये तकनीकी ज्ञान को प्राप्त करना तथा उनके आधार पर निर्णय लेकर समस्याओ के समाधान के लिए एक्शन लेना। यह थाईलैण्ड मे बहुत लोकप्रिय हो रहा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि थाईलैण्ड मे प्रौढ़-शिक्षा एवं जन- शिक्षा एक जीवन्त, हमेशा चलने वाला शिक्षाक्रम है । यह क्रम ग्रामीण स्तर पर जनता द्वारा ही चलाया जा रहा है । प्रौढ़ शिक्षा एक जन-आन्दोलन थाईलण्ड मे यद्यपि निरक्षरता का प्रतिशत दूसरे एशियाई एव दक्षिण एशियाई देशों के मुकाबले में कम है। फिर भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है । थाईलैण्ड में 1940 की योजना के अन्तर्गत वृहत साक्षरता अभियान चलाया गया जिससे 90% साक्षरता का स्तर अजित किया गया। 1980 की जनगणना से ज्ञात हुआ कि 30 लाख 50 हजार व्यक्ति निरक्षर थे। इनमे शेष 10% तथा अक्षर ज्ञान को भूल जाने वाले व्यक्ति शामिल थे। 1984 से द्वितीय अभियान आरम्भ किया गया है। इसके अन्तर्गत 100% साक्षरता प्राप्त करने का उद्देश्य रखा गया है । थाईलण्ड को पाचवी माथिक एवं सामाजिक विकास आयोजनों में प्रौढ़ प्रिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसी आधार पर देश में दूसरा निरक्षरता निवारण आन्दोलन प्रारम्भ किया गया। इस कार्य को ग्रामीण क्षेत्र में विशेष रूप मे किये जाने का निश्चय किया गया है। हमे बतलाया गया कि सरकार द्वारा यह टारगेट अंशतः पूरा कर लिया गया है । इम सफलता का श्रेय इस कार्यक्रम को समाज एवं सरकार के प्रत्येक स्तर पर सभी लोगो द्वारा सक्रिय रूप से इसे सफल बनाने में सहयोग देना है । थाईलण्ड मे
न
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डॉ. योगेश अंटल के साथ लेखक
थाइलैण्ड में NFE विभाग के कामों का अवलोकन, करते हुए लेखक
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प्रौढ शिक्षा कार्य ग्रामीण स्तर या किसी अन्य संगठन द्वारा नियु जाता है । उनकी योजना के अनुसार यह कार्य एक, एक को पढ़ाए सिद्धान्त के आधार पर घर मे किसी भी पढ़े-लिखे द्वारा घर के निरक्षर को पढ़ाना या पडोस वाले द्वारा दूसरों को पढ़ा या गाव में स्थित किसी भी सरकारी कर्मचारी द्वारा जो वहा कार्यरत है यह कार्य किया जाता है। विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियो, स्कूल अध्यापकों, शिक्षाविदों, स्कूल के विद्यार्थियों, ग्राम मुखिया, ग्रामीण क्राफ्ट्स- मेन, लोक कलाकारो, भिक्षुकों और अन्य धार्मिक प्रचारकों द्वारा यह कार्य किया जाता है। यहां तक कि गश्त करने वाले पुलिसमैन भी यह कार्य करते है। इस प्रकार का कार्य करने वाले व्यक्तियों को 'वालेंटियर्स' कहा जाता है। वे लोग किसी भी समय किसी भी पद्धति से किसी भी रूप मे चाहे एक व्यक्ति को, चाहे समूह को पढ़ाते हैं। प्रौढ़-शिक्षा की कोई पद्धति, अभ्यासक्रम या पुस्तकें निर्धारित नही हैं । प्रत्येक वालेंटियर किसी भी माध्यम, साहित्य से यह कार्य कर सकता है । सरकार का अनौपचारिक शिक्षा का मत्रालय आवश्यकतानुसार इनकी सहायता करता है जो साहित्य एवं अन्य शिक्षा सामग्री मागने पर इन्हे देता है। साक्षरता के मूल्याकन हेतु थाई भापा को पूरा करने सम्वन्धी एक निश्चित माप-दण्ड निर्धारित है । उसे पूरा करने पर ही सरकार द्वारा साक्षरता प्रमाण-पत्र दिया जाता है । यह मूल्यांकन नजदीक के किसी भी प्राथमिक विद्यालय मे वहा के अध्यापक द्वारा किया जा सकता है। कोई भी प्रौढ, किसी भी समय किसी भी संस्था मे जाकर परीक्षा देकर यह प्रमाण-पत्र प्राप्त कर सकता है । इस कार्य की सफलता का सबसे बड़ा राज मैं थाई भाषा मानता हूं। यह भाषा सारे राष्ट्र में अनिवार्य है। सरकार या किसी भी संगठन का कार्य इसी किया जाता है । अतः कोई भी व्यक्ति जो थाई भाषा जानता है वालेटियर वन सकता है । अतः सर्वत्र एक ही भापा का चलन व्यवहार इस कार्य मे बहुत सहायक है। यहा भापाओ या स्थानीय भाषाओं की कोई विविधता नहीं है, विदेशी का कोई महत्व नहीं है। यहा तक सरकारी कार्य में भी थाई भाषा का प्रयोग होता है कुछ ही लोग जिन्हें विदेशियो से या विदेशी सगठनो या सरकारो से डील करना पड़ता है वही अग्रेजी का प्रयोग करते है। हमारे लिए भी यहा यदि थोड़ी बहुत कोई कठिनाई रही तो यही रही कि थाई भाषा के अलावा अन्य भाषा को समझने वाला कोई मिलता ही नहीं है। जीवन के हर क्षेत्र में राष्ट्रभाषा ही है, यह बहुत बड़ी विशेषता है। इस प्रकार याई साक्षरता का आन्दोलन सही माने में जन-आन्दोलन है जो स्थानीय लोगों द्वारा बिना सरकारी द्वाचे, अभ्यासक्रम, पद्धति, समय, साहित्य या - 26 कार्यकर्मा किसी अन्य प्रकार के औपचारिक काम के बंधनों से मुक्त होकर चलाया जा रहा है। मैंने थाईलण्ड के क्षेत्रीय कार्य का भी अध्ययन किया। मैं अयुध्याय वान युपिन, चुन, आयनिक तथा मानोयिन आदि गावों में गया वहां मैंने देखा कि साक्षरता कार्य, उत्तर साक्षरता कार्य, वी०आर०सी०, घरेलू उद्योग केन्द्र आदि सभी हैं, जो स्वय गाव वालो के द्वारा ही चलाये जा रहे हैं। इनके बारे मे विस्तृत जानकारी आगे दूगा। साक्षरता को जन-आन्दोलन के प्रारम्भ करने से पूर्व निरक्षरों की संख्या निश्चित करने हेतु राष्ट्रीय स्तर पर सर्व-कार्य किया गया । यह कार्य तीन वर्षों मे पूरा हुआ। इस कार्य मे प्राथमिक स्कूलो के अध्यापकों तथा ग्राम मुखिया द्वारा घर-घर जाकर उन सभी व्यक्तियों की जिन्होने 4 वर्ष की प्राथमिक शिक्षा या साक्षरता अभ्यासक्रम पूरा नहीं किया फार्म भरवा कर सूची तैयार की। इस सूची को राष्ट्रीय स्तर पर कम्प्यूटराइज्ड किया गया तथा निरक्षरों की संख्या निश्चित की गई। इससे प्राप्त आकड़ो को छपवाकर सभी स्थानीय व्यक्तियों को जो साक्षरता आन्दोलन को चला रहे थे दिये गये ताकि इसके आधार पर अपनी योजना बना कर लागू करा सकें। साक्षरता आन्दोलन की क्रियान्वयन व्यवस्था एवं प्रशासन साक्षरता अभियान की सफलता व क्रियान्विती के लिए राष्ट्रीय, प्रान्तीय, जिला स्तर का प्रशासनिक संगठन तथा ग्रामीण विकास समितिया तथा उपजिला ग्राम स्तर की विकास समितिया सहयोग देती हैं । ये सस्थाएं इस अभियान हेतु टारगेट निश्चित करना, कार्यकर्ता तथा वित्तीय व्यवस्था करना और कार्य का अवलोकन, मोनीटेरिंग करना तथा सूचना देना आदि का कार्य करती हैं। ग्राम स्तर पर एक वालेंटियर दस निरक्षरों के लिए व्यवस्थापक का कार्य करता है। ये व्यवस्थापक देखते हैं कि जो निरक्षर साक्षरता के लिए भर्ती किया गया है वह बरावर आता है अन्यथा आवश्यकतानुसार नये भर्ती करता है। ये व्यवस्थापक ट्यूटर को आवश्यकतानुसार सहयोग भी देते हैं। प्रति तीन माह मे ग्राम मुखिया नव-साक्षरों एव वालेंटियर ट्यूटर की सूचना तपा सि तारीख को साक्षरता कार्य प्रारम्भ किया गया उसकी जानकारी और कितने प्रौढ़ों ने यह अभ्यासक्रम पूरा [पास] कर लिया है उनको भनामा अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों को भेजता रहता है। इस प्रकारको र सूचनाएं बैंकॉक शिक्षा मन्त्रालय मे अनौपचारिक शिक्षा विभाग हैं जहां कम्प्यूटर के माध्यम से सूचनाएं एकत्र कर फाइनल सूची बनाई जाती है। जैसाकि मैं पहले ही बता चुका हूं इस सारे अभियान की सफलता वालेंटियर ट्यूटर पर निर्भर है । अभ्यासक्रम पाठ्यपुस्तकों, समय, कार्यकर्ताओं के स्तर एव लिग आदि का कोई निर्धारण नहीं है। सरकारद्वारा साक्षरता प्राप्ति सम्बन्धी एक स्टैन्डर्ड निर्धारित कर रखा है जिसे पूरा करना आवश्यक है । अभ्यासक्रम आदि के लिए उस स्टैन्डर्ड के आधार पर मेनुअल सरकार द्वारा बनाये गये है-जिसका उपयोग वालेंटियर्स कर सकते हैं। सरकार द्वारा इस सम्बन्ध में समय-समय पर आवश्यक सुझाव दिये जाते रहे हैं। सामान्य वाकुबलरी के आधार पर जीवन से सम्बंधित विषयों में जानकारी ग्रामीण स्तर पर भेजी जाती रहती है, जो इम अभियान के उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक होती रहती है । पुनः जब पढ़ने वाला प्रौढ तथा पढाने वाला ट्यूटर वालेंटियर यह अनुभव करे कि किस प्रौढ़ ने साक्षरता सम्बन्धी अभ्यासक्रम पूरा किया है तो वह अपने टेस्ट के लिए प्रार्थना कर सकता है । उसकी परीक्षा नजदीक स्थानीय स्कूल में अथवा स्कूल द्वारा उसके घर पर भी ली जा सकती है । सफल प्रौढ़ को सरकार द्वारा साक्षरता प्रमाण-पत्र दिया जाता है जो प्रौढ सफल नही रहता है वह फार्म अपना अभ्यासक्रम पूरा करता है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि थाईलण्ड में इस अभियान को अधिक जनोपयोगी जन-आन्दोलन के रूप में चलाया जा रहा है । इस अभियान का प्रारम्भ 1984 मे राष्ट्र के 18 प्रान्तों में हुआ था। जिसमें 222 जिलों के 2069 उप जिले और 20254 गांव सम्मिलित थे। 1985 में इसका विस्तार 54 प्रान्तो तक कर दिया गया और आशा की जाती है कि 1986 के अंत तक सभी प्रान्तो मे यह प्रसारित हो जावेगा। इस कार्य में 1,50, 800 व्यक्तियों ने वालेंटियर टीचर या ट्यूटर की भांति कार्य किया है । साक्षरता आन्दोलन का क्रियान्वयन जैसे-जैसे निरक्षरता की समस्या ने विश्व समुदाय का ध्यान आकर्षित किया पाईलण्ड ने यूनेस्को के दूसरे सदस्य देशों के साथ साक्षरता प्रदान करने के नये तरीकों तथा नयी अवधारणाओं को खोज कर राष्ट्रीय विकास को प्राप्त करने के 28 लिए प्रौढ़ों को साक्षरता तया बेसिक शिक्षा देने का बीड़ा उठाया। इस ममप तक थाई शिक्षा व्यवस्था में कार्य पर आधारित व्यावहारिक साक्षरता को अवधारणा का समावेश हो चुका था और इस काम को 1968 में सफलतापूर्वक लागू किया जा चुका था तथा शिक्षार्थी भी कक्षाओ मे जाने को प्ररित हुए थे। सन् 1969 में साक्षरता को पारिवारिक जीवन नियोजन से जोड़ा गया। नये कार्यक्रम के अन्तर्गत नये सिद्धान्तों या समावेश किया गया, जिनके द्वारा शिक्षार्थी स्वयं की समस्याओ को पहचान सके, गमस्याओ के कारणों को जान सरे व अपने स्वय की व्यक्तिगत धारणाओ का विश्लेषण कर सके तथा उनके सामाजिक एवं सांस्कृतिक वातावरण को पहचान सके। नये तकनीकी ज्ञान के आधार पर समस्या व समाधान के विभिन्न विकल्पों को योजे तथा रामस्या के ममाधान के लिए इन विकल्पो मे से बुद्धिमतापूर्वक चुनाव करो यह सिद्धान्त अथवा प्रणाली 'KHITPEN' कहलाती है जिसका शाब्दिक अर्थ है "सोचने के योग्य होना" अपवा उपयुक्त सोचना है। आज साक्षरता कुछ लोगो का विशेषाधिकार न होकर प्रत्येक थाईलैण्डवासी का मौलिक अधिकार है। इसे व्यक्ति को अज्ञान से मुक्त करने का निर्णायक तत्व, सरकार के कार्यों में लोकतान्त्रिक विधि से सहभागी होने तथा राष्ट्रीय विकास का अपरिहार्य अंग माना गया है। 1960 की जनगणना मे उजागर हुआ है कि करीब 35 लाख थाईलण्डवासी निरक्षर थे । ये निरक्षर व्यक्ति निर्धनतम परिवारो से थे। इनमें 60% कामिक समूह से हैं तो 60% महिलाएं हैं। निरक्षरता निवारण की थाई सरकार की प्रतिवद्धता उमके पांचवें आथिक एवं सामाजिक आयोजन से स्पष्ट होती है। इसमे दी गयी नीति के तहत राष्ट्रीय विकास समिति ने शिक्षा मंत्रालय को राष्ट्रीय साक्षरता अभियान हाथ में लेने को निर्देशित किया। यह राष्ट्र के इतिहास में दूसरा अभियान था जिसे 1984 मे आरम्भ किया गया। पहले की योजनाएं साक्षरता दे. सम्बन्ध मे स्पष्ट नीति निर्धारण में असफल रही थी। वहीं पाचवी सामाजिक एवं आर्थिक योजना पहली योजना थी जिसमें सरकार ने 1981 की 14.5% निरक्षरता को घटाकर 1986 तक 10.50 तक लाने का लक्ष्य स्पष्ट रखा जिसमे ग्रामीण जनता पर विशेष ध्यान देना था। अभियान की सफलता हेतु साक्षर व्यक्तियों को स्वयसेवक बनने तथा निरक्षर व्यक्तियो को पढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। अभिभावक अब अपने बच्चो को पढाते ही हैं, बच्चे भी अभिभावको को पढा सकते है। पति अपनी पत्नी को पढ़ा सकता है तथा पडोसी भी एक-दूसरे को पढ़ा सकते हैं। इस विधि मे शिक्षण. शुल्क की आवश्यकता नहीं होती क्योकि इसमें साक्षर द्वारा निरक्षर को सह्योग 29 करने का कर्तव्य-बोध निहित है। विचार यह था कि इससे निरक्षरता कम की जा सकेगी। इस अभियान का उद्देश्य 14-50 आयु वर्ग के निरक्षर व्यक्तियों को थाई भापा लिखना व पढ़ना सिखाना था जो कि उनके जीवन को सुधारने तथा अधिक ज्ञान प्राप्त करने की पृष्ठभूमि का काम कर सके । जनता समुदाय तथा देश की भलाई लिए सरकारी, गैर सरकारी तथा व्यक्तिगत स्तर पर सहयोग प्रदान करने के प्रयास किये गये। स्कूली छात्रों, विश्वविद्यालय के विद्यार्थियो, शिक्षाविदों, धर्मगुरुओ, नवछात्रों तथा साधारण जनता को साक्षरता अभियान में स्वयसेवक वनने को प्रेरित किया गया। शिक्षा मंत्रालय कार्यक्रम अभियान में लगे सगठनों को कार्यक्रम हेतु पाठन-सामयी प्रदान करना, परिक्षण प्रदान करना, परीक्षा लेना तथा प्रमाण-पत्र देना आदि सहयोग प्रदान करता है, स्थानीय शासन तथा समुदाय आयोजन, संसाधन जुटाने, क्रियान्वयन तथा मोनिटेरिंग के जिम्मेदार होते हैं । लक्ष्य समूह अभियान का मुख्य लक्ष्य 14-50 आयुवर्ग के निरक्षर व्यक्ति है । परन्तु यदि कोई अन्य व्यक्ति भी अगर रुचि रखता हो तो वह भी भाग ले सकता है। अनुमान है कि अभियान काल में कुल 15 लाख निरक्षर कम हो जायेंगे ! निर्देशक सिद्धांत यह अभियान जो कि देश के इतिहास में इस प्रकार का दूसरा अभियान है निम्नलिखित सिद्धान्तों पर आधारित है---- वर्तमान अभियान पूर्ण रूप से स्वैच्छिक सहयोग के सिद्धान्त पर आधारित है, जबकि 1940 के प्रथम अभियान को सभी थाईलण्डवासियों को आवश्यक रूप से साक्षर हो जाने के कानून का सम्वल था। वर्तमान अभियान मे स्थानीय अधिकारियो तथा नागरिकों को जन-सचार के माध्यमों का सहयोग प्राप्त है जिससे कि वे सभी मिलकर कार्यक्रम को लोकप्रिय बना सकें तथा इसके लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर सके। इसके अतिरिक्त मोनिटरिंग तथा रिपोटिंग का तंत्र ऐसा बनाया गया है कि लक्ष्य समूह तथा स्वयसेवक दोनो को प्रेरित करें। देश के उच्च साक्षरता प्रतिशत (80% से ऊपर) को देखते हुए अभियान शिक्षित परिवारों तथा समुदाय सदस्यो को सगठक तथा अनुदेशक के रूप में कार्य में लगाना चाहता है। इस प्रकार का उपागम निरक्षर व्यक्ति को वैयक्तिक निदेश प्रदान करता है। अतः वो अपनी सुविधा के अनुसार पढ़ सकता है एवं कार्यक्रम की लागत को भी बहुत कुछ कम कर सकता है। इसमें समस्त जनता को कार्यक्रम में भागीदार होने का अवसर मिलता है जिससे 300 कि उनमें अभियान तथा इसके उद्देश्यो के प्रति प्रतिवद्धता का भाव जाग्रत होता है। अभियान का कार्य पूर्णतः विकेन्द्रित है, शिक्षा मंत्रालय केवल नियमन तथा तकनीकी सहयोग प्रदान करते हुए अभियान को प्रेरणा देने का कार्य करता है एवं कार्यक्रम को गति संसाधन आयोजन क्रियान्वयन एवं कार्यक्रम को गति देगे तथा मोनिटेरिंग का कार्य स्थानीय सरकार की इकाइयों तथा समुदाय में निहित है । सरकार समुदाय को कार्यक्रम में भागीदार बनाने में पहल करती अन्त मे यह अभियान एकाकी कार्यक्रम नहीं है बल्कि एक योजना है जो कि अन्य प्रयासों के साथ क्रियान्वित की जा रही है। इन सबमे महत्वपूर्ण यह है कि सार्वजनीन प्राथमिक शिक्षा को उच्च प्राथमिकता दी गयी है, जिससे कि यह सुनिश्चित हो जाए कि आगे से 15-50 आयुवर्ग के लक्ष्य समूह में कम- से-कम निरक्षर सम्मिलित हों। साथ ही सरकार ने यह भी पुख्ता आश्वासन दिया है कि अभियान के अन्तर्गत आने वाले गावो मे वाचनालय स्थापित किये जायेंगे जिससे कि नवसाक्षरों तथा अन्य व्यक्तियों की समाचार पत्र तथा अन्य पाठन-सामग्री तक आसान पहुंच हो सके। लक्ष्य समूह की पहचान अभियान प्रारम्भ करने से पूर्व एक त्रिवर्षीय सर्वे की गयी। पाम नेताओ, स्थानीय शाला अध्यापको के सहयोग से उन व्यक्तियो के नाम तथा पतों की सूची धनायी गयी जिन्होने 4 वर्षीय प्राथमिक शिक्षा प्राप्त न की हो तथा जो थाई भाषा पढ़ तथा लिख नहीं सकते हो इस दत्त को कम्प्यूटराइज्ड कर मुद्रित करा कर स्थानीय अभियान संचालको को दिया गया ताकि वे कार्यक्रम आयोजन तथा मोनिटेरिंग में इनका उपयोग कर सकें। अभियान संगठक अभियान द्वारा ग्रामीण विकास के विद्यमान प्रशासनिक तंत्र जिसमें राष्ट्रीय, प्रान्तीय तथा जिला स्तर को अन्तअभिकरण कमेटी चुनी हुई उप जिला समितिमा तथा ग्राम विशास समितिया आदि मे उनका उपयोग किया गया। ये समितिया अपने स्तर पर लक्ष्य तय करने व्यूह-रचना, संसाधन तथा कर्मचारी जुटाने मोनि- टरिंग तथा रिपोटिंग के लिए उत्तरदायी हैं। ग्राम-स्तर पर 10 निरक्षर व्यक्तियो पर एक सामुदायिक स्वयंमेवक संगठक का कार्य करता है । यह संगठन प्रत्येक निरक्षर व्यक्ति के लिए स्वयं सेवक- गिसककोम्पयस्पा करता है क्या यह ध्यान रखता है कि शिक्षक-विद्यार्थी का -- जोड़ा बराबर त्रियाशील रहे। यदि ऐसा न हो सके तो वहे दुसरे शिक्षक की व्यवस्था करता है । संगठक शिक्षक को मार्ग-दर्शन देने का कार्य भी करता है. ग्राम विकास समिति तथा ग्राम मुखिया इस स्वयंसेवक संगठकको सहयोग करते हैं । प्रत्येक तिमाही के बाद ग्राम मुखिया नये सहयोगियों तथा स्वयंसेवको उनके द्वारा कार्य प्रारम्भ की तिथि तथा अभियान की परीक्षा पास करने वाले व्यक्तियों के नामसम्बन्धित प्रान्त के अनौपचारिक शिक्षा विभाग को भेजते है। यह सूचना कम्प्यूटराइज्ड दत्त अन्वेषण तंत्र में संग्रह के लिए बैंकॉक भेज दी जाती है। ग्राम स्तर के प्रयासों को उपजिला समिति तथा उसकी अध्यक्षता करने वाले उपजिला मुख्य अधिकारी द्वारा अवलम्ब दिया जाता है । इस सम्बल में उसी व्यूह रचना का उपयोग किया जाता है जो स्थानीय आवश्यकता तथा ससाधनो के अनुकूल होती है। पाठ्यक्रम तथा अनुदेशन प्रक्रिया कार्यक्रम के उद्देश्यों के अनुसार ही पाठ्यक्रम होता है । यह साधारण शब्द- ज्ञान देता है जो दैनिक जीवन से सम्बन्धित जानकारी प्राप्त करने मे सहयोगी होता है। शिक्षार्थी को दो में से किसी एक को चुनने की स्वतन्त्रता होती है वही पुस्तक उसे प्रदान कर दी जाती है। परन्तु शिक्षक-शिक्षार्थी युग्म चाहे तो कोई अन्य मुद्रित सामग्री या पाठ्य-पुस्तक भी चुन सकते है । ग्राम-स्तर के स्वयसेवक शिक्षक अभियान की सफलता की कुञ्जी है । कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति चाहे वह किसी भी आयु, लिंग, शैक्षिक पृष्ठभूमि का हो स्वयंसेवक शिक्षक बन सकता है। परन्तु शिक्षक-शिक्षार्थी का सम्बन्ध बना रहे तथा बढ़े इसके लिए अभियान द्वारा परिवार सदस्यो अथवा निकट के पड़ोसियों को इस कार्य के लिए प्रोत्साहित किया जाता है । इसका पुरस्कार यह माना जाता है कि उन्होने अपने किसी नजदीकी व्यक्ति को सहयोग किया है तथा उनके कार्य को समाज द्वारा मान्यता प्रदान करना है। अनुदेशन की एक निश्चित प्रक्रिया है, संगठकों की पुस्तिका में कई सुझाव दिये गये हैं। हालाकि 'एक-एक को पढ़ाओ' प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया जाता है। यदि उचित लगे तथा सम्बन्धित लोग चाहे तो शिक्षक छोटे अथवा बड़े समूह को पढ़ाने का कार्य भी कर सकता है। - . मूल्यांकन तथा प्रमाण-पन्न देना जब शिक्षक तथा शिक्षार्थी यह अनुभव करे कि पर्याप्त कुशलता प्राप्त कर ली गयी है। शिक्षार्थी स्थानीय प्राथमिक विद्यालय में अपनी परीक्षा के लिए 32 आवेदन कर सकता है । स्कूल द्वारा नियुक्त व्यक्ति उसकी परीक्षा स्कूल में अथवा उसके घर पर ले सकता है। यह प्रश्रिया जब तक यह परीक्षा पास न कर ले तब तक चलती रहती है। सफल शिक्षार्थी को एक साक्षरता प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाता है। अनुवर्ती कार्यक्रम इस कार्यक्रम का उद्देश्य प्रत्येक नागरिक के लिए जीवन-पर्यन्त शिक्षा के विभिन्न कार्यक्रम प्रारम्भ करना है। इसके अन्तर्गत वर्तमान में चल रहे कार्यक्रमों को अधिक सुदृढ और विकमित किया जाएगा। वर्तमान में अनुवर्ती कार्यक्रम के अंतर्गत निम्नाकित कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं : ग्रामीण वाचनालय अपने नये अजित कौशल को धारण करने तथा उसे और आगे बढाने के लिए पाठन सामग्री तक नव-साक्षरो की आसान पहुच होनी चाहिए। साथ ही यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इन पाठन सामग्रियों में नवीनतम सूचना तथा ज्ञान हो जिसे कि व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में उपयोग कर सके । वर्तमान कार्यक्रम के अन्तर्गत चुनिन्दा गांवो में यदि समुदाय उस गाव मे साधारण वाचनालय चलाना चाहता है तो सरकार द्वारा एक दैनिक समाचार पत्र सामयिक पाठन सामग्री तथा एक छोटी पुस्तिका भेजी जाती है। अभियान के तहत इस कार्यक्रम को बहुत बढ़ाया गया है। अभियान काल मे देश के करीब सभी 60,000 गावो मे इस प्रकार के ग्रामीण वाचनालय खोलने का लक्ष्य है। इसके अतिरिक्त सभी प्रमुख ग्राम विकास अभिकरणों से आग्रह किया गया है कि नवसाक्षरो की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अपनी सामग्री को उसी रूप में तैयार करें। सभी प्रान्त साधारण दीवार-समाचार-पत्र जिसमे स्थानीय समाचारों तथा सूचनाओ को प्राथमिकता दी गयी हो, प्रामीण लेखको के सहयोग से प्रकाशित करते है। इसके लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा सहयोग प्रदान किया जाता है। इसके अतिरिक्त व्यावसायिक लेखको तथा कलाकारों का सहयोग लेकर कई चित्र तथा कार्टूनस से युक्त पुस्तिकाओं की शृंखलाएं प्रकाशित की जाती हैं। ।
33. निरन्तर व्यावहारिक शिक्षा कार्यक्रम जो व्यक्ति अपनी पढाई आगे जारी रखना चाहते हैं उनके लिए नियमित. कक्षाओं अथवा दूरस्थ शिक्षा माध्यमों द्वारा कई अनौपचारिक शिक्षा के कार्यक्रम उपलब्ध हैं । ये कार्यक्रम दैनिक जीवन से सम्बन्धित होते है, परन्तु इनके द्वारा औपचारिक शिक्षा व्यवस्था जैसे प्रमाण-पत्र प्रदान किये जाते है । अभियान के शिक्षार्थी अपना अध्ययन इन कार्यक्रमों से शुरू कर सकते हैं जिसमें सफल होने पर उन्हें कक्षा चार पास करने का प्रमाण-पत्र मिल जाता है। शिक्षार्थियों को सामान्य अभ्यासक्रम के अतिरिक्त रेडियो तथा ट्यूटर्स की सुविधाए भी उपलब्ध होती हैं। अभिरुचि समूह तथा अल्प-कालिक व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम अनौपचारिक शिक्षा विभाग तथा 10 अन्य सरकारी अभिकरण स्कूल ईतर जनता के लिए अल्प-कालिक व्यावसायिक अभ्यासक्रम आयोजित करते है। ये कार्यक्रम साक्षरता अभियान के अनुवर्ती कार्यक्रम के रूप में चलाये जाते है। प्रगति जनवरी 1985 के बाद अभियान प्रगति पर है। 1984 मे यह केवल 18 प्रान्तों तक सीमित था जो कि 1985 में 54 प्रान्तों में फैल चुका है। अभियान की प्रगति तथा इसमें आने वाली समस्याए सक्षिप्त में इस प्रकार हैं : (i) शिक्षार्थियों का सह्योग जनवरी 85 में कुल मिलाकर 239460 शिक्षार्थी अभियान का लाभ उठा रहे थे। यह संख्या 1984 के 18 प्रान्तों में चल रहे अभियान का अनुमानतः 65 प्रतिशत है। कई संगठनकर्ता व्यक्तियों को अभियान मे सम्मिलित होने के लिए प्रोत्साहित करने में कठिनाई अनुभव करते हैं तथा इसके लिए समय का अभाव, रुचि तथा इच्छा की कमी आदि कारण बताये जाते हैं। इन बाधाओ को दूर करने के लिए समुदाय द्वारा साधारणतया जो प्रयत्न किये गये तथा सफल सिद्ध हुए वे हैं बौद्ध संन्यासियो ग्राम मुखिया एवं स्थानीय नेताओ द्वारा व्यक्तिगत प्रोत्साहन, मनोरंजन के लोक साधनों तथा स्थानीय माध्यमो के प्रयोग, तथा शालाओं द्वारा उसके विद्याथियो को अपने माता-पिता अथवा मित्रों को पढ़ाने के लिए प्ररित करना रहा है। उन समुदायो में जहां निरक्षर व्यक्तियो को पढ़ने के लिए समय नहीं मिलता दूसरे तरीके अपनाये गये हैं। उदाहरणार्थ साम्रतास्कोन प्रान्त के 34 भौगोलिक क्षेत्रों में जहा कि निरक्षर श्रमिक बहुत बडी संध्या में 10-10 घण्टे तक कारणानी में कार्य करते हैं, प्रबन्धकों से प्रार्थना की गयी कि साक्षरता कार्य- कम हेतु कार्य के समय के बीच कुछ समय दें। (ii) स्वयंसेवको का चयन जनवरी 1985 के दौरान 146913 व्यक्ति स्वयंसेवक अनुदेशक का कार्य कर रहे थे। इनमें से अधिकांश परिवार के सदस्य अथवा पड़ोसी थे जो कि एक- एक को पढ़ा रहा था अथवा छोटे समूहों को पढ़ा रहे थे। आज तक के अनुभव स्वयंसेवक अनुदेशक के मूल्य तथा उसकी प्रभावशाली होने की धारणा को सुदृढ करते हैं । अधिकाश ग्रामवासी समाज सेवा के इस कार्य को करने को तैयार है, जबकि बहुत से इसे आगे बढ़ने का रास्ता समझते हैं, बहुत से ऐसे भी हैं जो अनुदेशक चुने जाने में गर्व का अनुभव करते हैं । कुछ क्षेत्रों मे समय-समय पर स्थानीय स्कूल अध्यापक के साथ होने वाले सत्र अनुदेशक के प्रयत्नों के पूरक का कार्य करते हैं । (iii) शिक्षार्थी एवं अनुदेशक को रुचि बनाये रखना अभियान की सबसे बड़ी समस्या शिक्षार्थी तथा अनुदेशक की कार्यक्रम मे रुचि बनाये रखना है। इस अभियान ने सिद्ध कर दिया है कि थाईलैण्ड मे स्वयं- सेवक अनुदेशक ने बिना किसी प्रशिक्षण के केवल साक्षर होते हुए भी लोगों को साक्षर होने में मदद की। कई वार साथी कुछ दिक्कतों का सामना करते हैं यदि उन्हें तुरन्त दूर न किया जाए तो एक अथवा दोनो व्यक्ति कार्यक्रम में रुचि खो वैठते है । साधारणतया ये दिक्कत छोटी-छोटी बातो के कारण होती है। इसीलिए अनुश्रवण तथा अभिवीक्षण तंत्र का प्रभावी होना कार्यक्रम की सफलता के लिए बहुत आवश्यक है। इसके लिए कई स्थानो पर बौद्ध भिक्षुओ, स्कूल अध्यापको, किसानो, स्थानीय नेत व्यक्तियो, ग्रामीण चिकित्सको तथा स्वास्थ्य सूचना अभिकर्ताओ, यहां तक कि पुलिस वालो का भी उपयोग स्थानीय संगठकों के रूप मे किया गया। थाई संस्कृति के परिप्रेक्ष्य मे इन लोगो की मध्यस्थता तथा इनके प्रोत्साहन से कार्य- क्रम को बहुत गति मिली। 4.कोशल धारण 18 प्रान्तो को 1984 के अभियान में शामिल किया गया था। इनमे 11000 से अधिक नये ग्रामीण वाचनालय केन्द्र स्थापित किए गए हैं। इन्हें मिलाकर अब देश में कुल 20,000 केन्द्र हो गये हैं। पूरे देश मे साधारण पाठन-सामग्री की 6,00,000 प्रतिया वितरित की जाती हैं।
35 शैक्षिक संग्रहालय-बैंकॉक 2 सितम्बर, 1985 को मैंने चंकॉक के शैक्षिर संग्रहालय का अवलोकन किया। वहाँ के सस्थान के निदेशक श्री यूनरेओंग पेशा तथा अन्य अधिकारियों ने हमारा स्वागत किया। कार्यालय मे औपचारिक वार्ता के पश्चात मैंने सस्थान को देखा। जन-सम्पर्क अधिकारी सुथी पेन्वाटं येनजय ने साथ रहकर केन्द्र का अवलोकन फराया । यह संस्थान वंशानिक ज्ञान के प्रसार का केन्द्र है जो कि स्कूली तथा गैर- स्कूली छात्रों मे स्व-शिक्षा के प्रसार तथा ज्ञान देने का कार्य कर रहा है। यह विज्ञान तकनीकी, खगोल-विज्ञान, अन्तरिक्ष योज तथा संस्कृति में शैक्षिक सेवाएं प्रदान करता है । ये सेवाए दोनों तरह की होती हैं-प्रदर्शनी के रूप में तथा वे जो समय के साय-माय समस्याओ, आवश्यकताओ, लोगों की रचियो अथवा वर्तमान शिक्षाक्रम के साथ बदलती है। इनके लिए व्याख्यान, गोष्ठियों, चलचित्रों, प्रदर्शनों, प्रयोगों, सेमिनार तथा प्रशिक्षणो का उपयोग किया जाता है । यह केन्द्र 11 विभागों में सचालित किया जाता है : (1) सचिवालय प्रभाग (2) बैंकॉक प्लेनेटोरियम प्रभाग (3) विज्ञान संग्रहालय प्रभाग (4) प्रकृति विज्ञान संग्रहालय प्रभाग (5) कार्यशाला प्रभाग (6) रूपांकन प्रभाग (7) कला प्रभाग (8) व्यवसाय प्रभाग (9) शैक्षिक सेवा प्रभाग (10) आर्ट-इतिहास एवं संस्कृति संग्रहालय प्रभाग तथा (11) चल प्रदर्शनी विभाग इन सबमे सबसे रुचिकर एवं शिक्षाप्रद विज्ञान संग्रहालय तथा बैंकॉक प्लेने- टोरियम है। विज्ञान संग्रहालय विज्ञान के महत्व को स्वीकारते हुए थाईलैण्ड के शिक्षा विभाग द्वारा विज्ञान एवं तकनीकी सम्बन्धी जानकारी के लिए केन्द्रीय स्रोत के रूप मे विज्ञान संग्रहालय की स्थापना की । यह सग्रहालय विद्यार्थियो तथा अन्य लोगो को विज्ञान तथा इसके उपयोग के सम्बन्ध मे सामान्य प्रदर्शों,प्रदर्शन व्याख्यानो, चलचित्रों दूरदर्शन 36 स्लाइड प्रोजेक्टर आदि के द्वारा जानकारी प्रदान करता है। 60% से 70% तक प्रदर्श स्थायी हैं जो कि विज्ञान के मौलिक सिद्धान्तों को प्रदर्शित करते हैं । शेप अस्थायी हैं जो कि प्रत्येक दो माह बाद वर्तमान स्थितियो के अनुसार बदल दिये जाते हैं। संग्रहालय अध्ययन के साथ-साथ मनोरंजन स्थल के रूप में भी काम आता है। यह संग्रहालय इकामाई बस टर्मिनल के पास बैंकॉक प्लेनेटोरियम तथा थाई- लैण्ड खगोल केन्द्र के क्षेत्र मे स्थित है, यहा से तारे अपनी खगोलीय स्थिति से अधिक स्पष्ट नजर आते है। अधिकांश प्रदर्श सग्रहालय के मशीन शॉप, इलेक्ट्रॉनिक तथा ग्राफिक विभाग को कार्यकर्ताओं द्वारा बनाये गये है । कुछ प्रदर्श बाहरी उद्योगो तथा राजकीय अभिकरणो द्वारा बनाये जाते है । सग्रहालय में न्यूनतम अवरोध हैं जिससे कि देखने वाला अपनी रुचि के अनुसार प्रदर्शों को देखते हुए आगे बढ़ सकता है । सभी प्रदर्शों को व्यवस्थित रूप से जमाया गया है तथा प्रत्येक स्वयं में पूर्ण है । अधिकांश प्रदर्श ऐसे हैं जिन्हें दर्शक स्वय चलाकर देख सकता है। अत. चलाकर आनन्द प्राप्त करता है । इस प्रकार दर्शक विज्ञान एवं तकनीकी के आश्चर्य को देखता, ज्ञान प्राप्त करता तथा आनन्द प्राप्त करता है। बैंकॉक प्लेनेटोरियम बैंकॉक प्लेनेटोरियम विश्व के प्रमुख प्लेनेटोरियम में से एक है । इसका स्काई पियेटर जेसिस एस० के० IV प्रोजेक्टर से युक्त है तथा इसमे 160 प्यक्ति बैठ सकते है । थाईलैण्ड के महामहिम राजा एव महारानी ने 18 अगस्त, 1964 को प्लेनेटोरियम के शुभारम्भ की अध्यक्षता की सब से अब तक करीब 30 लाख लोगो ने इस संग्रहालय को देखा है। सभी आयु के लोगों का इस संग्रहालय को और आकर्षित होना थाइलण्डवासियो के लिए एक आश्चर्य की बात है। स्काई थियेटर के बाहर प्रदशित सामग्री को देखकर दर्शक खगोल विज्ञान की जानकारी प्राप्त करते हैं तथा अपने ज्ञान को वृद्धि करते हैं। 18 अगस्त, 1964 को वैकॉक प्लेनेटोरियम के शुभारम्भ का दिन इसलिए गुना गया क्योंकि अगस्त 1964 को बैंकॉक में पूर्ण मूर्य ग्रहण हुआ था। महा. राजा राम धतुर्य (King mong kut) द्वारा मूर्य ग्रहण की गणना दो वर्ष पूर्व कर ली गई यो तया उमकी भविष्यवाणी भी की थी। वे स्वय दक्षिणी पाईलट के प्रचुरकिरी पान राज्य में सूर्य ग्रहण देयने म्हाकोर गये जहा से पूर्ण सूर्य ग्रहण देया गया। स्टार प्रोजेक्टर के अतिरिक्त शॉक सेनेटोरियम में अन्य प्रोजेस्टर भी पंपित है । इनमे बसावर प्रोजेक्टर, ग्लोब प्रोजेक्टर, ट्रान्जिट एवं सतीप्स 37 (ग्रहण) प्रोजेक्टर आदि मुख्य है । ये सभी नभ दर्शन को और भी अधिक रुचिकर बनाते है। प्लेनेटोरियम मे ग्रह तथा तारों को उस स्थिति में देखा जा सकता है जैसा कि उन्हे पृथ्वी पर से किसी भी तिथि को किसी भी स्थान से देखा जा सकता है। अनौपचारिक तथा जीवन-पर्यन्त शिक्षा प्रक्रिया थाईलण्ड मे सातवें दशक के प्रारम्भ मे अनौपचारिक शिक्षा-व्यवस्था की सकल्पना उभर कर सामने आ गयी थी। कुछ ही समय मे देश के मानव ससाधन विकास के तथा जीवन-पर्यन्त शिक्षा के लिए अनौपचारिक शिक्षा व्यवस्था शिक्षा तन्त्र का अविभाज्य अंग बन गयी। शिक्षा को जीवन तथा समाज का अविभाज्य अंग माना गया है तथा यह एक जीवन-पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है । यह माना जाता है कि शिक्षा मनुष्य को अपनी आवश्यकताओ की पूर्ति तथा बदलते परिवेश में सामजस्य रखने के लिए आवश्यक कोशल प्रदान करने वाली होनी चाहिए । शिक्षा के सभी वर्गों यथा बेसिक शिक्षा, समाचार तथा सूचनाए एव कौशल प्रशिक्षण तक सभी की समान तथा निरन्तर पहुंच के अवसर देने के लिए औपचारिक तथा अनौपचारिक शिक्षा की ऐसी योजना बनाई जाए कि ये दोनो एक-दूसरे के पूरक का काम करें । कार्यक्रम एवं गतिविधियां हालाकि अनौपचारिक शिक्षा उपर्युक्त तीनो क्षेत्रो मे सेवाएं देने के लिए प्रतिबद्ध है परन्तु किस सेवा तथा क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाए, इसके लिए यह ज्ञात कर लेना आवश्यक है कि औपचारिक शिक्षा के अन्तर्गत किन सेवाओ की व्यवस्था है । इसके बाद ही यह तय किया जा सकेगा कि अनौपचारिक शिक्षा किन सेवाओं को प्राथमिकता प्रदान करे, जिससे कि सभी प्रकार की सेवाओ में समा. नता रह सके। बेसिक शिक्षा जनता को स्वयं तथा बृहत समाज की आवश्यकताओ की पूर्ति के लायक बनाने के लिए आवश्यक योग्यताएं देने के लिए बेसिक शिक्षा को प्रारूपित किया गया है। इसमें ज्ञानार्जन के साधन यथा साक्षरता तथा गणितीय कौशल तिपेन' (Khit.
38 pen) समस्या निवारण की योग्यता का वर्धन, तकनीकी ज्ञान तथा स्वयं तथा समाज की स्थितियो के विश्लेपण द्वारा सम्मिलित है । वेसिक शिक्षा सामाजिकरण की प्रक्रिया द्वारा घर से आरम्भ होती है जोकि औपचारिक विद्यालयों में अधिक सुदृढ़ की जाती है । अनौपचारिक शिक्षा उन व्यक्तियों को व्यावहारिक शिक्षा का एक ओर अवसर देती है जिन्हे अनिवार्य शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्राप्त नही हुआ इसके अन्तर्गत मुख्य रूप से साक्षरता, उत्तरसाक्षरता एवं सतत शिक्षा के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं । साक्षरता कार्यक्रम वर्तमान मे इस क्षेत्र में मुख्य ध्यान राष्ट्रीय साक्षरता कार्यक्रम पर दिया जा रहा है जिसका उद्देश्य 14-15 आयुवर्ग के निरक्षरो (जिन्होने 4 वर्ष से कम स्कूली शिक्षा प्राप्त की है ) को साक्षर करना है। इसके लिए समाज के स्वयं- सेवकों को संगठक व अनुदेशक बनने के लिए प्रेरित करके निरक्षरों तक पहुचना है। राष्ट्रीय साक्षरता अभियान से लाभान्वित व्यक्ति कार्यात्मक साक्षरता कार्य- क्रम में शरीक हो सकते हैं जिसे पूर्ण करने पर उन्हें 5वी कक्षा पास करने का प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाता है । विभिन्न प्रजातीय तथा भापायी समूहो यथा पर्वतीय जन-जातियो या मुसलमानों तथा सीमावर्ती मेर भाषी लोगो के लिए विशेष पाठ्यक्रम बनाये गये हैं। उत्तर साक्षरता कार्यक्रम उत्तर साक्षरता तथा सतत शिक्षा कार्यक्रमों में उन समस्याओं तथा मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया जाता है जिनको प्रौढों द्वारा दैनिक जीवन मे सामना करने की अधिक सम्भावना रहती है । इनमे भाषा, कला विज्ञान तथा गणित के कौशल तथा ज्ञान को बढ़ाया जाता है तथा अधिक उच्च कार्यक्रमो मे व्यावसायिक विकल्प भी उपलब्ध रहते हैं । कार्यक्रम कक्षा में तथा रेडियो पर एव पत्राचार द्वारा उपलब्ध होता है, जिसमें रेडियो, स्वयं शिक्षण सामग्री तथा नियतकालीन ट्यूटो. रियल सत्रो का उपयोग किया जाता है। अनुमानतः 2 लाख शिक्षार्थी प्रतिवर्ष .कक्षा कार्यक्रमों मे भाग लेते है। जबकि 1984 मे दूरस्थ शिक्षण अध्ययनक्रम में 50,000 व्यक्तियो को पंजीकृत किया गया था। दोनो कार्यक्रमो के सभागी 6,10 तथा 12 कक्षा पास करने पर मिलने वाला प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के हकदार होते हैं तथा दोनों से प्राप्त प्रमाण-पत्रो को समान मान्यता प्राप्त है। समाचार तथा सूचनायें व्यक्ति जब एक बार औपचारिक स्कूल अथवा अनौपचारिक शिक्षा के माध्यम 39 से मूलभूत अधिगम साधन तथा विश्लेषणात्मक क्षमता प्राप्त कर लेता हो उसे अपने इन कौशलों को बनाये रखने तथा ऊपर उठाने के लिए निरन्तर प्राप्त होने वाली सूचनाओ तया समाचारों की आवश्यकता होती है । यहां पर अनौपचारिक शिक्षा प्रयत्नों को एक ऐसे तन्त्र की स्थापना तथा रख-रखाव करना चाहिए जोकि समयवद्ध रूप से ऐसी सूचनाएं दे सकें। ग्रामीण पाठन केन्द्र ग्रामीण कमेटी के सहयोग से स्थापित सामुदायिक सन्दर्भ केन्द्र को सरकारी सहयोग के रूप में 2 दैनिक समाचार पत्र, नियतकालीन दीवार-समाचार पत्र अन्य पाठन सामग्री तथा कृषि, स्वास्थ्य तथा ग्रामीण जनता से सम्बन्धित अन्य विषयों पर व्यावहारिक पुस्तकें प्रदान की जाती हैं। इनके अतिरिक्त जन सहयोग द्वारा सामान्य रुचि की पाठन सामग्री भी एकत्र की जाती है वर्तमान में पूरे देश में इस प्रकार के 20,000 केन्द्र विद्यमान हैं तथा 1990 ई० तक देश के सभी 60,000 गावों में इस प्रकार के केन्द्र प्रारम्भ कर देने की योजना है। सार्वजनिक पुस्तकालय राज्य तथा जिला स्तर पर सार्वजनिक पुस्तकालय है। ये पुस्तकालय पल सेवा द्वारा ग्रामीण पुस्तकालयों तक पुस्तकें पहुचाते है । शैक्षिक मीडिया इकाई ये इकाइयां देश के प्रत्येक प्रान्त में कार्यरत है तथा स्लाइड शो चलचित्र तथा चल प्रदर्शनी द्वारा लोगों को समाचार तथा सूचनाए प्रदान करती हैं। रेडियो शैक्षणिक कार्यक्रम सरकार के शैक्षिक कार्यक्रम, शिक्षा मंत्रालय द्वारा प्रायोजित विश्वविद्यालय के कार्यक्रम तथा अन्य राजकीय अभिकरणो के द्वारा प्रति सप्ताह 9000 से अधिक रेडियो शिक्षा कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। दूरदर्शन शैक्षिक कार्यक्रम थाईलैंड मे 10 से अधिक दूरदर्शन केन्द्र हैं। Sukhothaithammethirat Open University, शिक्षा तथा सहकारिता मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय तथा थाई शाही सेना कार्यक्रमो के मुख्य संयोजक तथा निर्माता है। विज्ञान संग्रहालय तथा प्लेनेटोरियम ये संस्थान सभी आयु तथा शैक्षणिक योग्यता वाले लोगों के लिए विज्ञान तथा तकनीकी के क्षेत्र मे सन्दर्भ केन्द्र का काम करते हैं । इनके पास कई चल इकाइयां 40 हैं जोकि वार्षिक कार्यक्रम के आधार पर ग्रामीण क्षत्रों में चयनित प्रदर्शनियां लगाती हैं। कौशल विकास मौलिक शिक्षा व्यक्ति को अधिगम साधनो से युक्त बनाती हैं तथा उसमे विश्लेषणात्मक सोच क्षमता पैदा करती है, सूचना तन्त्र उसको निर्णय क्षमता बढाने में सहयोग देता है । निर्णय के उपरात सफल क्रियान्वयन हेतु कभी-कभी अतिरिक्त तथा विशिष्ट कौशल एव ज्ञान की आवश्यकता होती है। तीसरी श्रेणी के कार्यक्रम व्यक्ति अथवा समूह मे इस प्रकार के वांछित कौशल के विकास का कार्य करते हैं। बड़ी संख्या मे राजकीय तथा निजी अभिकरण शाला से बाहर के लोगों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करते हैं । इनमे से अधिकांश कार्यक्रम मानक पेकेज कार्यक्रम हैं । हालाकि कुछ स्थानीय समूह की आवश्यकताओं के आधार पर विकसित किये जाते हैं। वर्ष 1984 मे करीव 9 लाख व्यक्तियों ने इस प्रकार के कार्यक्रमो में भाग लिया । इन कार्यक्रमों को निम्नानुसार वर्गीकृत किया जा सकता है: प्रदर्शन एवं प्रसार इस प्रकार के कार्यक्रम मुख्य-मुख्य ग्रामीण विकास अभिकरणो के क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं द्वारा आयोजित किये जाते है । अभिरुचि समूह किसी विशेष कौशल को सीखने की इच्छा रखने वाले 15 अथवा अधिक व्यक्ति मिलकर एक समूह बना सकते है तथा एक कुशल व्यक्ति को सीखने के लिए तैयार कर सकते हैं । इस व्यक्ति को सरकार द्वारा 6-30 घंटे के अनुदेशन का पैसा दिया जाता है। व्यावसायिक पाठ्यक्रम विभिन्न व्यवमायो के 100-300 घंटे के पाठ्यक्रम शिक्षण संस्थाओं, अनो. पचारिक शिक्षा केन्द्रो तथा चल इकाइयो द्वारा आयोजित किये जाते हैं । सघन प्रशिक्षण कार्यक्रम संभागी प्रशिक्षण संस्थानों में नियत समय के लिए रहते हुए मंदान्तिक तथा मापहारिसमान प्राप्त करते हैं।
41 अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रम में संलग्न अभिकरण 1983 ई० में की गयी एक सर्वे के अनुसार 30 से ऊपर राजकीय अभिकरण अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रम मे संलग्न हैं। उनमें से निम्नलिखित मुख्य हैं- --अनौपचारिक शिक्षा विभाग -व्यावसायिक शिक्षा विभाग -धामिक कार्य विभाग -- ललित कला विभाग --सामान्य शिक्षा विभाग --प्राथमिक शिक्षा आयोग सामुदायिक विकास विभाग -श्रम विभाग सुधार विभाग -जन कल्याण विभाग -बैंकॉक महानगर परिषद प्रशासन -कृषि प्रसार विभाग -कृषि तकनीक विभाग -कृपि भूमि-सुधार विभाग -मत्स्य विभाग -सहकारिता विकास विभाग --औद्योगिक विकास विभाग -~सुप्रीम कमाण्ड मुख्यालय -केन्द्रीय किशोर अपराध न्यायालय -स्वास्थ्य विभाग तथा -विश्वविद्यालय इनके अतिरिक्त 30 से ऊपर लाभ न कमाने वाले संगठन, बड़ी संख्या में बाणिज्यिक संस्थान तथा अनुमानतः 1915 स्कूल हैं जो कि शाला से बाहर की जनता को विभिन्न पाठ्यक्रम उपलब्ध कराते हैं। इन अभिकरणों के कार्यक्रम का समन्वय अनौपचारिक शिक्षा का राष्ट्रीय आयोग करता है । इसकी अध्यक्षता शिक्षा मत्री करते हैं तथा विभिन्न सरकारी तथा स्वय-सेवी संगठनो के 21 प्रतिनिधि इसके सदस्य होते हैं। आयोग अनौपचा- रिक शिक्षा कार्यक्रमों के नीति-निर्धारण, समन्वय तथा अनुवर्तन के लिए सिफारिशें करने के लिए उत्तरदायी है। राष्ट्रीय शिक्षा समिति द्वारा अनौपचारिक शिक्षा की नीतियों एवं योजनाओं 42 को सम्पूर्ण शिक्षा विकास योजना में जोड़ा जाता है । प्रान्तीय स्तर पर एक अनौपचारिक शिक्षा की अन्तअंभीकरण समिति का गठन किया जाता है जो कि अनौपचारिक शिक्षा गतिविधियों का समन्वय करती है तथा कार्यकारी योजना बनाती है। प्रान्तीय अनौपचारिक शिक्षा केंद्र इस समिति के सचिवालय का कार्य करता है। जिला-उपजिला तथा ग्राम स्तर पर ग्रामीण विकास प्रशासन तन्त्र अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रमों के समन्वय का कार्य करता है। भविष्य के कार्यक्रम अगले पांच वर्षों में (1987-1991) तक अनौपचारिक शिक्षा विकास योजना में निम्नलिखित कार्यों पर बल दिया जायेगा- 1. श्रमिक बलों से निरक्षरता निवारण, शाला से बाहर के बालकों एवं युवाओ को अनिवार्य शिक्षा तथा शाला से बाहर के लोगो के लिए आगे शिक्षण के अवसर। 2. प्रत्येक गाव में वाचनालय केन्द्र की स्थापना की जाकर सूचना एवं समाचार तन्त्र को फैलाना, प्रत्येक जिले में एक सार्वजनिक पुस्तकालय तथा अधिगम सन्दर्भ केन्द्र, एवं अधिक प्रभावी ढंग से शिक्षण हेतु जन- संचार के साधनों का उपयोग । 3. व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमो में सुधार तथा विस्तार जिसमें श्रम बाजार की आवश्यकताओं से समन्वय तथा स्थानीय नियोजन के अवसरों पर विशेष ध्यान दिया गया हो, निजी वाणिज्यिक क्षेत्रो से प्रशिक्षण में अधिक सहयोग तथा स्वरोजगार का संवर्धन । 4. सभी प्रकार के अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रमों में नैतिक एवं सास्कृतिक विकास के प्रयत्नों को जोड़ना । 5. विशेष उद्देश्य समूह यथा विभिन्न प्रजातीय तथा भापायी समूहो, विकलांगो, बन्दियो तथा अन्य पिछडे समूहों की समस्याओं तथा आव- श्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रमों का निर्धारण । 6. औपचारिक तथा अनौपचारिक शिक्षा के बीच निकट का सम्बन्ध स्थापित करना जिससे कि जीवन-पर्यन्त शिक्षा के अवसर उपलब्ध हो । 7. अनुसंधान, विकास तथा प्रशिक्षण कार्यक्रमो द्वारा भनौपचारिक शिक्षा के स्तर में सुधार। 8. शाला से बाहर जनता के शिक्षण हेतु समुदाय, शिक्षण संस्थाओं, धार्मिक संगठनों तथा निजी क्षत्रो का अधिक से अधिक सहयोग प्राप्त करना।
45 वर्तन, भालेय सपा प्रमाण पत्रों के लिए जिम्मेवार है। 4. ध्यावसायिक शिक्षा प्रभाग यह सामान्य कार्यालयी यायों में अतिरिक्त छोटे व्यावसायिक अभ्यासक्रमों, चल व्यावसायिक शिक्षा दल, व्यावसायिक अभिरुचि समूह, व्यावसायिक मार्ग दर्शन एवं सामग्री, अनुवर्तन, अभिलेय एवं प्रमाण-पत्रों का कार्य देयता है। 5. प्रशिक्षण एवं विकास प्रभाग प्रशिक्षण एवं विकास विभाग सामान्य कार्यों के अतिरिक्त प्रशिक्षण, शैक्षिक प्रौद्योगिको ग्रामीण तकनीको, सामान्य शिक्षा सेया, अनुवर्तन तथा प्रशिक्षण कार्यक्रमों के मूल्यांकन का कार्य करता है। 6.जन शिक्षा प्रभाग इस प्रभाग के अन्तर्गत सामान्य कार्यालयी कार्य, राज्य, जिला एव उपजिला स्तर के सार्वजनिक पुस्तकालय, पुस्तक सन्दूकों के लिए चल पुस्तकालय इकाइये, मामीण वाचनालय केन्द्र, जन तथा मीडिया शिक्षा, शैक्षिक गतिविधियो, पुस्तक दान केन्द्र तथा सह शैक्षिक गतिविधियों का कार्य देवता है। सहायता प्राप्त अभिकरण तथा नेटवर्क अयुध्या प्रान्तीय अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र का दायित्व है कि वह सामान्य जनता के लिए चाहे वे केन्द्र के अन्दर हों या बाहर विभिन्न प्रकार के अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रम चलाये। इस दायित्व को पूर्ण करने तथा प्रत्येक स्थान पर पहुंचने के लिए जिला, उपजिला तथा ग्राम स्तर पर प्रान्तीय केन्द्रों का नेटवर्क बिछा हुआ है । इसके अतिरिक्त यह विभिन्न अभिकरणो में समन्वय का कार्य भी करता है। ये अभि करण तथा नेटवर्क निम्नलिखित हैं- जिला सार्वजनिक पुस्तकालय वर्तमान में अयुध्या प्रांत में 16 जिलास्तरीय सार्वजनिक पुस्तकालय है। ये जनता को विभिन्न प्रकार की पुस्तकें उपलब्ध कराने के अतिरिक्त अन्य पूरक गतिविधिया भी आयोजित करते हैं। दो स्टाफ के सदस्य जिला संयोजक तथा जिला शिक्षा अधिकारी के साथ मिलकर इन पुस्तकालयों के कार्य का सयोजन करते हैं।
46 सामान्य शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा तथा प्रौढ़ शाला प्रान्तीय अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र, औपचारिक प्राथमिक स्कूल, सेकेण्ड्री स्कूल तथा व्यावसायिक शालाओ में समन्वय का सामान्य कार्य करता है। जिससे कि शाला से बाहर के लोगो के लिए स्तर 3,4,5, तथा 6 की सामान्य शिक्षा एव व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था हो सके । इनभै स्थान, साधन-सुविधाएं यहा तक कि जिले के औपचारिक विद्यालयों के अध्यापकों का भी शाला से अतिरिक्त समय मे उपयोग किया जाता है । उप जिला पुस्तकालय तथा ग्रामीण वाचनालय वर्तमान में अयुध्या प्रान्त मे 140 ग्रामीण वाचनालय तथा 60 उपजिला पुस्तकालय कार्य कर रहे हैं । वाचनालय ग्रामवासियों को विभिन्न प्रकार की पाठन सामग्री उपलब्ध कराने के अतिरिक्त ऐसे स्थान भी हैं जहां ग्रामीण तथा अन्य अभिकरण विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम यथा व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा सास्कृतिक एवं परम्परागत ग्राम सम्मेलन करते है। प्रान्तीय केन्द्र देखने के पश्चात हम मनोयेन गाव गये। मेनोयेन ग्रामीण वाचनालय सामान्य पृष्ठभूमि मेनोयेन ग्राम अयुध्या प्राप्त के केन्द्र से 20 कि० मी० दूर नाकोनं लोग जिले के टेम्वोन उप जिले में स्थित है। केन्द्र थाई शैली का बना हुआ है । जिसमे बांस की दीवारें तथा पत्तियों की बनी छतें हैं । इसके चारों ओर पेड़-पौधे हैं तथा फूलों की क्यारियां है । तीन मण्डप भी बने हुए हैं जहां पढ़ना-लिखना, आराम तथा अन्य ग्रामीण गतिविधियों का आयोजन किया जाता है । ऐतिहासिक पृष्ठभूमि इस केन्द्र के निर्माण हेतु सभी गांववासियो ने आर्थिक सहयोग दिया तथा श्रीमती मन्सरी मेनोयेन ने इसके लिए भूमि के अतिरिक्त और भी कई साधन मुविधाएं इसी कारण प्रदान की। वह इस केन्द्र की अध्यक्ष हैं तथा गांव को प्रहणियो की भी अध्यक्ष हैं । इसी कारण उनके नाम के पीछे गाव का नामकरण किया गया है। केन्द्र के कार्यों के अतिरिक्त अन्य विकास के कार्यों में भी वे बहुत रचि सेती हैं । श्रीमती मनोयन ने बड़ी गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया। संगठन एवं सेवाएं भनौपचारिक शिक्षा विभाग द्वारा केन्द्र को दो दैनिक समाचार पत्र उपलब्ध 41 कराए जाते हैं। इसके अतिरिक्त इसी विभाग तथा क्षेत्रीय अनौपचारिक शिक्षा विभाग केन्द्र को कई अन्य जर्नल, पुस्तिकाएं, दीवार समाचार पत्र तथा अन्म मुद्रित सामग्री भी उपलब्ध कराई जाती है। अयुध्या प्रान्तीय अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र चल पुस्तक वाक्स सेवा भी इन केन्द्रों को प्रदान करता है । केन्द्रों के कार्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए 6 सदस्यों की एक प्रशासन समिति का गठन किया जाता है जो कि केन्द्र का संचालन करती है। उद्देश्य समूह वाचनालय केन्द्र की स्थापना उस गांव के तथा पास के 3 गावो के निवासियों के उपयोग हेतु की गयी । औसतन 30 व्यक्ति प्रतिदिन इस केन्द्र का लाभ उठाते इसके पश्चात् हम वान मुस चुन नामक दूसरे गांव गये । इसका मुखिया श्री अमोक है । इस गाव की जनसंध्या 600 है तथा यहां शत प्रतिशत साक्षरता है। केवल एक व्यक्ति निरक्षर है जोकि मानसिक रूप से अस्वस्थ है। यहां 33 सदस्यों की एक ग्राम समिति है। भिक्षु श्री पैराता केन्द्र की विभिन्न गतिविधियों के संचालन में सहयोग देते हैं इस केन्द्र पर बिजली के काम तथा वस्त्र निर्माण का व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है, जहां प्रतिदिन 50 व्यक्ति प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं । इस केन्द्र पर विभिन्न विषयों की 500 पुस्तकें हैं। प्रत्येक ग्रामीण परिवार की वार्षिक औसत आय 20,000 याथ है जो कि भारतीय मुद्रा मे 10,000 रुपये के बराबर है। प्रत्येक परिवार में औसतन 5 व्यक्ति हैं। सामान्य रूप से देश में तथा विशेष रूप से इस गाव मे आध्यात्मिक वातावरण होने के कारण यहां शान्ति है। इस गाव का वाचनालय मठ के समीप स्थित है। यह केन्द्र भी गाव वालो के सहयोग से बनाया गया है। केन्द्र के आसपास घने पेड़ तथा फूलों की क्यारिया हैं । इसके पश्चात् हम भरानयिक गाव पहुंचे। यह गांव चाकू बनाने के लिए प्रसिद्ध है। प्रत्येक परिवार मे गृह उद्योग के रूप मे चाकू बनाये जाते हैं । यहा के चाकू पूरे देश मे बेचे जाते हैं। आजकल बेहतर चाकू बनाने के लिए वैज्ञानिक विधियो का प्रयोग किया जाने लगा है। इस तरह कृषि के साथ-साथ यह उद्योग भी पनप रहा है। यह गाव नदी के किनारे बसा हुआ है । इन गांवो का भ्रमण करने के बाद शाम को हम फिर अपने अतिथि-गृह पहुंचे । यह क्षेत्रीय भ्रमण बहुत ही शिक्षाप्रद, सुरुचिकर तथा सूचनादायक रहा। थाईलैण्ड का ग्रामीण जीवन भारतीय ग्रामीण जीवन से बहुत साभ्य रखता है। यह भी एक कृषि प्रधान देश है। यहां भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक 48 जीवन के दर्शन किए जा सकते हैं। यहां के निवासी बहुत नम्र तथा व्यावहारिक हैं। ये लोग कट्टरपथी नही हैं परन्तु धर्मप्रिय सोग हैं । यहा के लोगों का आर्थिक जीवन तथा जीवन स्तर हमसे बेहतर है। गांव साफ-सुथरे हैं। उनका भोजन तथा पहनावा हमसे बहुत भिन्न है । उनका सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन भी हमसे अलग है। अधिकतर लोग मांसाहारी हैं। वे चावल, मांस तथा हर प्रकार के जानवर तथा कीड़े खाते हैं। शायद इसीलिए उनमें से कोई भी किसी भी समय भूखा नजर नहीं आता। वे दोनों तरह के वस्त्र पहनते हैं। एकदम साधारण तथा बहुत ही सजीले। धार्मिक मतभेद की वात वे नही समझते । वे लोग पूर्ण उत्साह तथा रचि से राष्ट्रीय विकास तथा शिक्षा के कार्य में भाग लेते हैं तथा इन कार्यों के लिए एक- दूसरे को पूर्ण सहयोग देते हैं । प्रकृति इस देश पर बहुत दयालु है। यह मानसून क्षेत्र में है अत. बहुत अच्छी वर्षा होती है, चावल यहां की मुख्य फसल है । बड़ी संख्या में जंगल हैं। हमारे देश की तरह वहां भी लकड़ी की कटाई बहुत होती है, परन्तु अब सरकार सजग हो गई है तथा आवश्यक कदम उठा रही है । जनता सामाजिक रूप से जागरूक है । शिक्षा उनकी पहली प्राथमिकता है। अतः वहां 90% साक्षरता है। वैज्ञानिक ज्ञान तथा नयी तकनीक के प्रयोग से वे उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं। यूनेस्को क्षेत्रीय कार्यालय में 4. सितम्बर, 1985 को बैंकॉक स्थित यूनेस्को क्षेत्रीय कार्यालय में श्री टी० एम० साकिया, शिक्षा सलाहकार तथा अन्य अधिकारियो से प्रौद-शिक्षा के विभिन्न आयामो पर विस्तार से चर्चा की। श्री साकिया ने यूनेस्को द्वारा एशिया एवं पंसिफिक क्षेत्र में किये जा रहे कार्यों के बारे में जो जानकारी दी वह निम्ना- नुसार है। (1) यूनेस्को द्वारा तकनीकी सहायता प्रौढ-शिक्षा, सतत-शिक्षा, तया अनौपचारिक शिक्षा मे योजना निर्माण, प्रायोजना निमिति, साहित्य-सृजन, दृश्य श्रव्य मामग्री, अध्ययन, मूल्यांकन एवं भनुसंधान तथा पाठ्यक्रम निर्माण में सहयोग प्रदान करना।
49 (2) राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम : प्रौढ़-शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाले विभिन्न कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजन करने में सहयोग देना। राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय स्तर पर प्रौढ़ शिक्षा की विभिन्न समस्याओ के सम्बन्ध में राष्ट्रीय व क्षेत्रीय स्वयसेवी संगठनों के सहयोग से सेमिनार तथा कार्यशालाएं आयोजित करना। क्षेत्र के सभी देशो में राष्ट्रीय संगठनो के सहयोग से संकाय विकास हेतु कार्यशालाएं एव सेमिनार आयोजित करना। - (3) प्रलेख पोषण (Documentation) : यूनेस्को द्वारा कई देशों मे प्रौढ़-शिक्षा से सम्बन्धित अध्ययन एवं सर्वे करा कर उन्हें प्रकाशित किया जाता है। एशिया एवं पैसिफिक क्षेत्र के लिए यूनेस्को के शिक्षा विभाग द्वारा बंगलादेश, बर्मा, चीन, भारत, इन्डोनेशिया, नेपाल, पाकिस्तान, फिलीपाइन्स, वियतनाम, तथा थाईलैण्ड में साक्षरता स्थिति पर सर्वे कराकर प्रकाशित किया गया है । ये अध्ययन इस क्षेत्र के लिए भविष्य की योजनाएं बनाने के लिए बहुत उपयोगी हैं । इन अध्ययनों से यह भी निष्कर्ष सामने आये कि इस क्षेत्र के देशों ने निरक्षरता निवारण की दिशा मे सार्थक प्रगति की है। साक्षरता के प्रति धारणा मे बदलाव भाया है । इसे अब सास्कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक विकास की पूर्वापेक्षा माना जाने लगा है, साक्षरता को मूलभूत आवश्यकता, विकास नीति तथा जनता को विकास प्रक्रिया में भागीदार बनाने के लिए एक अविभाज्य अंग माना जाता है । यूनेस्को द्वारा इस प्रकार के अध्ययन दूसरे देशो मे भी किये जाकर प्रकाशित किये जा सकते हैं । एशिया एवं प्रशान्त क्षेत्र मे यूनेस्को के शिक्षा के क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा एक बुलेटिन भी निकाला जाता है । 4 अध्ययन यानाः यूनेस्को क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा विशेषज्ञों तथा प्रौढ़-शिक्षा क्षेत्र मे कार्य करने वाले कार्यकर्ताओ के लिए अध्ययन-यात्राओ का आयोजन किया जाता है । यूनेस्को द्वारा प्रोढ़-शिक्षा क्षेत्र के लोगों के लिए विभिन्न स्थानो पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है।
50 जनसंख्या शिक्षण 3 सितम्बर, 1985 को हम एशिया और दक्षिण प्रशान्त क्षेत्र के लिए यूनेस्को के क्षेत्रीय कार्यालय में जनसख्या शिक्षण विभाग देखने गये। यहां पर हमने डॉ० आर० पी० शर्मा तथा डॉ० खान के साथ यूनेस्को द्वारा इस क्षेत्र में किये जा रहे कार्यों की जानकारी प्राप्त की। सर्वप्रथम हमें यूनेस्को द्वारा क्षेत्र में जन- संख्या शिक्षा कार्यक्रमो पर एक वृत्तचित्र बताया गया। यह वृत्तचित्र बहुत ही सूचनादायक व ज्ञानवर्धक था। इसमें क्षेत्र में जनसंख्या विस्फोट तथा राष्ट्रीय विकास पर उसके विपरीत प्रभाव के बारे मे बताया गया। इसके पश्चात् डॉ. शर्मा तथा डॉ० खान ने क्षेत्र की ज्वलन्त समस्याओ तथा शिक्षा द्वारा उनके समा- धान के बारे मे बताया, उन्होंने हमें विभिन्न क्षेत्रीय देशों द्वारा यूनेस्को के सहयोग से चलाई जा रही शैक्षिक गतिविधियों के बारे में भी विस्तार से बताया। उन्होने बताया कि विकासशील देशों मे जनसंख्या वृद्धि परिवारों के लिए एक अभिपाप ही नही बल्कि देश के विकास में एक अवरोध बन गया है। जनसख्या शिक्षण का उद्देश्य उन मुद्दो पर जो कि उनके जीवन को प्रभावित करते हैं केवल सतही जानकारी देना नहीं है। बल्कि वास्तविक विकल्पो को खोजकर उनके प्रभावों को जांचना तथा जनता को जनसंख्या विषय पर सार्थक विचार-विमर्श के योग्य बनाना है। प्रस्तावना क्षेत्र के विकास मे जनसंख्या वृद्धि के प्रभाव के कारण एशिया तथा पंसिफिक क्षेत्र में क्षेत्रीय जनसख्या शिक्षा कार्यक्रम का उद्भव हुआ। 1982 के मध्य में एशिया और पैसिफिक क्षेत्र के 39 देशों (सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक को छोड़कर) की जनसंख्या अनुमानतः 26050 लाख अथवा विश्व की कुल जनसख्या के 56% से अधिक थी। विश्व के 10 सबसे अधिक आबादी वाले देश वंगलादेश, चीन, भारत, इन्डोनेशिया, जापान तथा पाकिस्तान इसी क्षेत्र में हैं। 1983 मे क्षेत्र की जनसंख्या वृद्धि-दर 1.7% प्रति वर्ष थी जिसके अनुसार क्षेत्र की जन- संध्या मे 420 लाख की प्रतिवर्ष वृद्धि हो जाती है। 2110 ई० मे जवकि जनसंख्या वृद्धि के स्थिर हो जाने की संभावना है। एगिया तया पैसिफिक क्षेत्र की जनसख्या विश्व को कुल जनसख्या का 60 प्रति- मत हो जाएगी उस समय यहा की जनता को वन भूमि तथा अपरिवर्तनीय निज पदार्थ को अत्यन्त कमी महसूस होगी, ऊर्जा के स्रोत कम पड़ने लगेंगे, चारागाह भूमि के बिगड़ने की समस्या सामने आएगी। नियोजन, आवास, शिक्षा तथा 51 स्वास्थ्य सेवाएं उस समय बहुत कम हो जाएगी। इन सभी का क्षेत्र के जीवन स्तर तपा विकास संभावनाओं पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। यूनेस्को जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम एशिया एवं पंसिफिक क्षेत्र में जनसंख्या समस्या के शैक्षिक समाधान को ध्यान में रखते हुए यूनेस्को ने विश्व, क्षेत्र तथा राष्ट्रीय स्तर के जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम विकसित किये। यूनेस्को के सत्रहवें अधिवेशन की साधारण सभा ने अपने प्रस्ताव संख्या 1221 के द्वारा महानिदेशक को जनसंख्या के प्रसार हेतु कार्यक्रम बनाने व चलाने के अधिकार दिये। क्षेत्र में इस प्रादेश को लागू करने हेतु 1972 मे संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या कार्यक्रम (UNFPA) के वित्तीय सहयोग से यूनेस्को क्षेत्रीय कार्यालय मे जन- संख्या शिक्षा कार्यक्रम सेवाएं सृजित की गयी। कार्यक्रम की देखरेख एक क्षेत्रीय सलाहकार परिषद् द्वारा की जाती है। जिसमे निम्नलिखित सदस्य होते हैं : एक पाठ्यक्रम निर्माण का विशेषज्ञ, एक शाला ईतर शिक्षा तथा प्रौढ़ का विशेपज्ञ, जनसंख्या शिक्षा के दस्तावेज का विशेषज्ञ तथा सुवा फिजी स्थित पंसि- फिक क्षेत्र का क्षेत्रीय सलाहकार । यूनेस्को क्षेत्रीय सलाहकार परिपद् ने एशिया क्षेत्र के 14 देशों तथा पंसि- फिक क्षेत्र के 16 देशों मे राष्ट्रीय जनसंख्या कार्यक्रम प्रारम्भ किया है । ये देश हैं:-अफगानिस्तान, बंगलादेश, चीन, माइक्रोनेशिया गणतंत्र फिजी, भारत, इन्डोनेशिया मलेशिया, मार्शल द्वीप, नेपाल, पाकिस्तान, पलाऊ, फिलीपाइन्स, कोरिया गणतन्त्र, वियतनाम समाजवादी गणतंत्र, सोलोमन द्वीप, श्रीलंका, थाई- लण्ड, टिंगा तथा टर्की। जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रम के उद्देश्य (1) सभी देशो में शाला तथा शाला से बाहर शिक्षा कार्यक्रमों से जुड़े प्रशासकों, अध्यापकों, प्रशिक्षकों, साक्षरता कार्यकर्ताओं, शिक्षक प्रशिक्षकों तथा विद्यार्थियों में.-- (अ) व्यक्ति, परिवार तथा राष्ट्र के जीवन स्तर को प्रभावित करने वाले जनसंख्या मुद्दों की समझ पैदा करना । (ब) जनसख्या के बदलाव, जीवन स्तर तथा विकास में केन्द्रीय अन्त- संम्बन्ध को ध्यान में रखते हुए जनसंख्या मुद्दों के प्रति निर्णय प्रक्रिया, अभिवृत्ति, व्यवहार आदि में बदलाव लाना ।
32 (2) जनसंख्या शिक्षा के विभिन्न मुद्दो यथा चेतना, जाति एवं अभिस्थापन, योजना निर्माण तथा आयोजना, राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में सहयोग, प्रायोजना पुनरावलोकन एवं मूल्यांकन, विकास के नये क्षेत्रों की खोज, आदि के सम्बन्ध में विभिन्न देशों द्वारा मांगे जाने पर तकनीकी सलाह सेवाएं एवं सहयोग देना। (3) सदस्य देशों को जनसंख्या शिक्षा की प्रलेख सेवा स्थापित करने में सहयोग देना तथा विभिन्न देशो के मध्य सूचना तथा साधन सामग्री के आदान-प्रदान को बढ़ाना । सदस्य देशो को जनसख्या शिक्षा कार्यक्रम सेवाओं द्वारा सहायता:-- (1) प्रथम चरण में जो कि तैयारी की स्थिति होती है ग्रामीण सलाहकार समिति UNFPA को आवश्यकता निर्धारण में सहयोग देती है जिससे कि देश में जनसंख्या की शिक्षा की विशिष्ट आवश्यकताओं एवं क्षेत्र का पता लगाया जा सके। (2) चेतना जागृति एवं पुनर्स्थापना के स्तर पर क्षेत्रीय सलाहकार समिति, चेतना जागृति, विस्तार कार्यक्रम, प्रशासकों तथा निर्णयकर्ताओं में जनसंख्या समस्या के सम्बन्ध में रुचि जगाना तथा शाला के बाहर शैक्षिक कार्यक्रमों के विकास की सम्भावनाओं को प्रशित करना सिद्ध करना। (3) क्षेत्रीय सलाहकार समिति, जनसंख्या शिक्षा कार्यक्रमों के आयोजन के संदर्भ में UNFPA, अन्य अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरणो तथा राष्ट्रीय सरकारों से पैसा प्राप्त करने हेतु प्रायोजना निर्माण मे सहयोग देती है। (4) राष्ट्रीय कार्यक्रमों की क्रियान्विति के सन्दर्भ मे क्षेत्रीय सलाहकार समिति सदस्य देशों को तकनीकी सहयोग, प्रशिक्षण कार्यक्रमों के अनुश्रवण (Monitoring) मे सहभागिता, पाठ्यक्रम तथा साधन सामग्री निर्माण, अनुसंधान एवं मूल्यांकन, प्रलेख एवं साधन सामग्री प्रदान करती है। (5) अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग हेतु राष्ट्रीय क्षमताओं को बढ़ाने, बनाने तथा गति- मान करने के लिए क्षेत्रीय सलाहकार समिति सदस्य देशों में राष्ट्रीय विशेषज्ञों का एक दल बनाती है। उत्प्रेरक का काम, विभिन्न देशों मे नवा- चार व प्रयोगों को सामने लाती है तथा अध्ययन यात्राओ के आयोजन तथा सूचनाओं एवं साधन सामग्री के आदान-प्रदान का कार्य करती है । सदस्य राष्ट्रों को सहयोग के आधार (1) क्षेत्रीय सलाहकार समिति के कार्यक्रम प्रत्येक चार साल वाद आयोजित होने वाती सेमिनार में क्षेत्र के देशों द्वारा बताई गई आवश्यकताओं के 53 . आधार पर तय किये जाते हैं। 2. क्षेत्रीय सलाहकार समिति के कार्यक्रम तथा सहभागिता के सिद्धान्त पर निर्मित एवं क्रियान्वित किये जाते हैं। 3. क्षेत्रीय सलाहकार समिति यूनेस्को क्षेत्रीय कार्यालय के कार्यक्रमों विशेषतः पाठ्यक्रम तथा अनुदेश सामग्री निर्माण, शिक्षक प्रशिक्षण अनौपचारिक शिक्षा आदि मे गहरी रुचि लेती है । इन सभी की जनसंख्या शिक्षा से जो कि सम्पूर्ण शिक्षा का ही एक अंग है सीधा सम्बन्ध है । शिक्षा को राष्ट्रीय विकास प्राप्त करने का साधन माना जाता है तथा जनसंख्या नीति एवं कार्यक्रम इसी राष्ट्रीय विकास के आवश्यक अंग है। 4. क्षेत्रीय सलाहकार समिति संयुक्त राष्ट्र संघ के दूसरे अभिकरणों यथा DTCP; ESCAP; FAO; ILO AT WHO TYT 31747 errefcetu तथा गैर सरकारी सगठनों से समन्वय के साथ काम करती है । सदस्य देशों की आवश्यकता तथा साधनों के अनुरूप सूचनाओ तथा साधन सामग्री को प्राप्त कर वितरण करने का कार्य जनसख्या शिक्षा समाशोधन गृह द्वारा सदस्य देशो की आवश्यकता एवं साधनों के तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय अभि- करण यथा ESCAP समाशोधन गृह, ILO संसाधन केन्द्र तथा DTCP के अनुरूप किया जाता है। जनसंख्या शिक्षा समाशोधन गृह द्वारा उपलब्ध सेवाएं जनसंख्या शिक्षा समाशोधन गृह का मुख्य कार्य शाला से बाहर के क्षेत्रों के लिए जनसंख्या शिक्षा प्रायोजना के सम्बन्ध में साधन सामग्री प्राप्त करना, विश्लेषण करना, रूपान्तरित करना था वितरित करना है। ये सामग्रियां बिब्लियोग्राफी, संघ सूचियों, संक्षिप्त विवरण, समाचार पत्र, समालोचन, पुन:- मुद्रित सामग्री, वास्तविक पाठ्यक्रम, प्रशिक्षण सामग्री तथा सदस्य देशों द्वारा विकसित सामग्री की द्वितीय प्रतियां होती हैं । इनके अतिरिक्त पूछताछ, नवीन- तम जानकारियां व सूचनाएं भी प्रसारित की जाती हैं। समाशोधन गृह सदस्य देशों को तकनीकी तथा सलाहकार सेवा भी प्रदान करता है। यह सेवा जनसंख्या शिक्षा पुस्तकालय निर्माण, उसके लिए स्टाफ को देने तथा प्रलेख एवं सूचना सेवा के रूप मे होती है।
54 एस्पेवे यूनेस्को क्षेत्रीय कार्यालय एस्पेबे के माध्यम से क्षेत्र के देशों के संगठनों तथा संघों से नियमित सम्पर्क में रहता है । उन देशों में जो कि सामान्य जन के जीवन स्तर तथा आर्थिक स्थिति को ऊपर उठाने का प्रयत्न करना चाहते थे, पांचवें दशक के अन्त में ही प्रौढ़-शिक्षा राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय सोच का विषय बन चुकी थी। यह अधिक सघनता से महसूसा जाने लगा था कि प्रौढ़ों में शिक्षा का निम्न स्तर राष्ट्रीय विकास की सफलता में सबसे बड़ा अवरोध है । सामान्य जन के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए मानव संसाधन का विकास अत्यन्त आवश्यक है जिससे कि सामन्ती तथा साम्राज्यवादी ताकतो द्वारा आज तक चलाये जा रहे सामाजिक आर्थिक तंत्र में मौलिक परिवर्तन लाया जा सके । इसके लिए यह आवश्यक हो गया था कि पुरुषों एव महिलाओ को प्रशिक्षण दिया जाये जिससे कि वै गाव, क्षेत्र तथा राष्ट्रीय स्तर पर उत्तरदायित्व निर्वाह करने मे तथा नेतृत्व देने में सक्षम हो सके। प्रौढ़ शिक्षा की आवश्यकता एवं इसके प्रति रुझान प्रथम बार 1960 में माण्ट्रियल मे हुए प्रौढ़-शिक्षा के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन मे दृष्टिगोचर हुई। परन्तु बहुत से प्रौढ-शिक्षाविदो ने महसूस किया कि यूनेस्को एक अन्त:- सरकारी अभिकरण होने के कारण प्रौढ़-शिक्षा की बदलती भूमिका के साथ स्वयं ढालने की चुनौती का सामना करने में सक्षम नहीं था। अतः राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गैर-राजकीय संगठन की आवश्यकता को महसूस किया गया क्योकि केवल सरकारें अकेली जनता की आशाओं एवं आकांक्षाओ के अनुरूप चुनौतियों का सामना करने हेतु जनता को बड़े स्तर पर गतिमान करने में सक्षम नहीं हो सकी थी। इस पर विश्व के प्रमुख प्रौढ़-शिक्षाविदों ने राष्ट्रीय, क्षत्रीय तथा विश्व स्तर पर गैर राजकीय संगठन बनाने पर विचार किया। सिडनी में मूनेस्को की एक एशियन सेमिनार में विभिन्न प्रतिनिधियो ने ऐसे तंत्र की स्थापना के लिए प्रतिबद्धता जाहिर को जो क्षेत्र, क्षेत्रीय तंत्र तथा विश्व के दूसरे भागों में स्थिति समान अभिकरणों के बीच निरन्तर सहयोग एवं सम्पर्क रख सके । इसका परिणाम एशियन एवं साउथ पैसिफिक ब्यूरो ऑफ एडल्ट एजुकेशन की स्थापना के रूप में सामने आया। इस बात पर आम सहमति थी कि ब्यूरो प्रौढ-शिक्षा के लिए समाशोधन-गृह स्थापित करेगा, एक सासिक 'न्यूजलेटर' तथा यदि संभव हो तो एक 'पत्रिका' यूनेस्को तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय राजकीय सगठनो के सहयोग से प्रकाशित करे, सम्मेलन एव सेमिनार के क्षेत्रीय आयोजन में सहयोग करे तथा सामान्य रूप से क्षेत्र के प्रौढ़-शिक्षाविदों तथा प्रौढ-शिक्षा संस्थाओ के बीच एक कडी का कार्य करे।
55 आरम्भ से ही यह संस्था सभी कार्य निरन्तर करती आ रही है । एस्पेबे द्वारा कई सम्मेलन आयोजित किये गये हैं । तथा क्षेत्र के देशों में प्रौढ़-शिक्षा के विकास में महत्वपूर्ण सहयोग दे रहा है । सियाम जैसा देखा और पाया मैं भाग्यशाली था कि मेरी प्रथम विदेश यात्रा एक ऐसे देश से प्रारम्भ हुई जो कि आज तक अपना पुरातन आध्यात्मिक जीवन, सांस्कृतिक धरोहर तथा सभ्यता को सजोए हुए है । यह पुराना सियाम आजकल थाईलैण्ड कहलाता है। विज्ञान एवं तकनालाजी के वर्तमान युग मे आध्यात्म, संस्कृति एवं सभ्यता की चर्चा करना एक विचित्र बात नजर आती है। ऐसी बात करना धर्मपरायणता समझी जाती है। तथाकथित प्रगतिशील लोग भौतिकता को जीवन की सर्वश्रेष्ठ वस्तु मानते है । उनके लिए नैतिक मूल्यो का अधिक महत्व नहीं। ऐसे विचारों के परिणाम स्वरूप पारिवारिक जीवन टूट रहे हैं। परिवारों, समाजों एवं राष्ट्रो मे अनुशासनहीनता बढ़ रही है । व्यक्तियो में खीचातानी आम बात हो गई है तथा इनके फलस्वरूप समाज में विघटन पैदा हो रहा है। थाईलैण्ड पहुंचने से पूर्व राजधानी बैकॉक के बारे मे मेरा विचार था कि यह भी विश्व के अन्य आधुनिक पश्चिमी देशों की राजधानियों के समान ही एक नगर होगा। मैंने लोगों से इसके बारे में कई विचित्र एवं काल्पनिक बातें सुनी थी। परन्तु मैंने इस शहर को बिलकुल ही भिन्न पाया । निस्सदेह यह एक आधुनिक शहर है परन्तु साथ ही थाईलैण्ड का पारम्परिक नगर भी। थाईलैण्ड एक बौद्ध देश है, यहा की अधिकांश जनता बौद्ध धर्मावलम्बी है। यहां अन्य धमों के माननेवाले लोग भी है परन्तु सभी मिलजुल कर समरसता के साथ रहते हैं । यहा पर किसी प्रकार का धार्मिक विद्वेष नहीं है। थाईलण्ड में 76% बौद्ध धर्मावलम्बियों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में चीनी तथा भारतीय भी हैं ये चीनी अथवा भारतीय न होकर थाईलण्ड निवासी हो गये हैं । संख्या मे चीनी भारतीय मूल के लोगों से अधिक हैं। थाई लोग जन्म व मूल से चीनियों के अधिक नजदीक हैं । अतः उनकी जीवन- पद्धति भी उनके अधिक करीब है । लोगों में धार्मिक सहिष्णुता की भावना अधिक है । वहा पर सभी धर्मों के लोग शान्ति तथा समरसता के साथ रहते हैं।
56 थाई लोगों के मन में भारतीयों के प्रति काफी श्रद्धा है। उनका मानना है कि बौद्ध धर्म भारत से यहां पहुंचा अत: यह अग्रज है तथा पूजने लायक देश है। परन्तु विश्व राजनीति तथा चीनियो के प्रभाव के कारण कुछ लोग थाईलण्ड निवासियों के मन में भ्रान्तियां पैदा करते हैं। पर वर्तमान में उनकी संख्या बहुत कम है। विचारो की शुद्धता तथा सौन्दर्य-चोध थाईलण्डवासियों की विशेषता है। वहाँ प्रतिदिन घर को साफ करना, सजाना तथा भगवान की पूजा करने की परम्परा है । वे लोग अपने जूते घर के बाहर उतारते हैं तथा अतिथि का स्वागत बहुत ही नम्रतापूर्वक करते हैं । वे अपने घरों, दुकानों तथा मन्दिरो को फूलों से सजाते हैं । स्वाभाव से थाईलैण्डवासी सरल एवं नम्र हैं। वे सामिप भोजी हैं । सामिप या निरामिप जो भी मिले वे खा लेते हैं । इस विषय में वे कोई अवरोध महसूस नहीं करते। उनके जीवन में स्वच्छता साफ-साफ देखी जा सकती है। स्वच्छ सड़कें, बाजार, पार्क-बगीचे, स्कूल आदि उनके सफाई प्रेम के घोतक हैं। महिलाओं और पुरुषों के कार्यों में वहा भेद नही किया जाता । घर का सारा कार्य घर के लोग ही करते हैं। घरेलू नौकर जैसी कोई चीज यहां नहीं है। महिलाए भी पुरुषों की तरह सरकारी व गैर सरकारी अभिकरणों में काम करती है। उनकी मजदूरी तथा वेतन भी पुरुपो के समान है। महिलाए केवल दिन में ही काम नहीं करती वे रात्रि में भी काम करती है । स्कूल, अस्पताल, सरकारी कार्यालयो तथा निजी अभिकरणो में काम करने वाली महिलाओ की संख्या पुरुपो से अधिक है। थाईलण्डवासियो की आर्थिक स्थिति हम भारतवासियों से बेहतर है । यहा पर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है तथा पातायात एवं सचार के अधिकांश साधन जापान अथवा पश्चिमी देशों से आयातित हैं। परिवार का प्रत्येक सदस्य कमाता है । वह घर मे अथवा बाहर काम करता है। थाई लोग अधिकतर भोजन होटलो मे करते अतः भोजन के स्टाल शहर मे हर स्थान पर नजर आते हैं। भोजन स्थल एकदम साफ-सुथरे हैं। भोजन को वतंनो में वन्द रखा जाता है । होटल अथवा स्टालों मे मच्छर-मविषयो के दर्शन नहीं होते। थाईलैण्ड मे प्रतिव्यक्ति आय 2000 बाथ है जो कि भारतीय मुद्रा में लगभग 1000 से 1200 रु० के बराबर है। सडको पर भीड़ नही है । सभी लोग यातायात के नियमो का पालन करते हैं तथा यातायात के नियमो के अनुसार ही सडक पार करते हैं । वहा भी राष्ट्र 57 भाषा 'थाई' है 'थाई लोग अपनी भापा को सर्वोच्च मेहत्व देते हैं। सब आपस में, इसी भाषा मे बात करते है । अंग्रेजी कुछ ही लोगो द्वारा बोली जाती है। सभी दुकानो पर, घर के बाहर नामपट्ट, संस्थानों के नाम, सार्वजनिक स्थानों, संगठनी तथा सरकारी कार्यालयों के नाम 'थाई भाषा में लिखे हुए हैं । केवल अन्तर्राष्ट्रीय कार्यालयो तथा वाहनों के नाम अंग्रेजी में है। यहां तक कि अन्तर्राष्ट्रीय अभिकरणों के अधिकारियो, कर्मचारियों तथा विदेशियों को भी 'भाई' भाषा सीखते पाया जाता है। बच्चों के लिए अंग्रेजी माध्यम के स्कूल अलग से हैं, पर उन्हें भी 'थाई' भाषा सीखनी पड़ती है । हमे 'थाई' भाषा का ज्ञान नही था अतः बातचीत में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा। कार्यालयों मे 'सहायक' रखने की प्रथा नहीं है। कर्मचारियों को निश्चित प्रकार का काम दिया जाता है। वे ही कार्यालय-समय में सफाईकर्ता, माली, कम्प्यूटर चालक आदि का काम करते है । वहां पर आदमी को बुलाने के लिए घंटी बजाने की प्रथा नही है । सामान्यतया सभी को कार्यालय में पीने का पानी अपने साथ लेकर आना होता है । अतिथि को प्रस्तुत किया गया पानी, कॉफी, चाय, फलों का रस अथवा बीयर वे नहीं पीते । यदि मांगा जाये तो उबला हुआ पानी दिया जाता है । नल का पानी केवल धोने के उपयोग में लाया जाता है। प्रत्येक कार्यालय के साथ एक केन्टिन होता है जो कर्मचारियो को चाय, कॉफी तथा अन्य पेय पदार्थ उपलब्ध कराता है। सभी लड़के और लडकियो के लिए सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करना आवश्यक है। 20 वर्ष की आयु से पूर्व सभी को 2 वर्ष का सैन्य प्रशिक्षण लेना होता है। उपर्युक्त सभी तथ्य मेरे 10 दिन बैंकॉक प्रवास के अनुभव पर आधारित है मुझ थाईलैण्ड के गांवो के जीवन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। हालाकि मैं एक दिन के लिए कुछ गांवों मे गया था। मुझे बताया गया कि ग्रामीणों का जीवन बहुत अच्छा तो नहीं कहा जा सकता पर हमारे ग्रामीणों से बेहतर है। थाई ग्रामवासियो का सामाजिक सांस्कृतिक जीवन भी हमारे ग्रामीणों से कही बेहतर है । न तो वे हीन भावना से ग्रस्त हैं न ही दिखावे में विश्वास करते हैं। हा, उनकी स्वयं की कुछ समस्याएं हैं । वे विज्ञान एवं तकनीको के गुलाम होते जा रहे हैं । परिणाम स्वरूप अधिक से अधिक आत्म-केन्द्रित एवं व्यक्तिवादी बनते जा रहे हैं । पारिवारिक जीवन ढोता होता जा रहा है । थाई नवयुवकों एवं नव- युवतियों में सहनशीलता तथा आज्ञापालन में कमी आती जा रही है। नशीले पदार्थों का सेवन भी बढ़ रहा है। विश्व के अन्य विकसित देशों की तरह पाई सरकार भी इन समस्याओ का सामना कर रही है ।
58 थाईलैण्ड मुख्यतः कृषि-प्रधान देश है। यहां पर पानी की कोई समस्या नहीं है। सभी किसानों को सिंचाई के लिए आवश्यकतानुसार पानी मिल जाता है। नदियां वर्ष भर बहती रहती हैं । भूमि उपजाऊ है । मकान लकड़ी के बने हैं । इनका रख-रखाव व सजावट उत्तम है तथा बहुत सुन्दर नजर आते है। गांवो में कई बौद्ध मन्दिर हैं व बड़ी संख्या मे बौद्ध भिक्षु हैं जो गाव जाते हैं तथा बौद्ध धर्म की शिक्षा देते हैं । संक्षेप में हमें थाईलण्ड मे पुरानी तथा आधुनिक सभ्यता व संस्कृति का अच्छा मिलाजुला स्वरूप देखने को मिलता है। मेरे मत में थाईलैण्ड पुरातन सस्कृति व सभ्यता के पद-चिह्नो पर चलता हुआ प्रगति कर रहा है। मलेशिया हमने अपनी थाईलण्ड यात्रा का निश्चित कार्यक्रम 6 सितम्बर, 1985 को पूर्ण कर लिया तथा उसी दिन शाम को मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर के लिए रवाना हो गये। रात्रि 8 बजे वहां पहुचे। कुआलालम्पुर हवाई अड्डे पर मलेशिया सतत् शिक्षा संघ के अध्यक्ष श्री गुणासिंघम तथा उनकी पत्नी श्रीमती अन्ना ने हमारा स्वागत किया। बैंकॉक में यूनेस्को के क्षेत्रीय शिक्षा सलाहकार श्री टी० एन० साकिया ने श्री गुणासिंघम तथा मलेशिया सरकार के यूनिटी विभाग के निदेशक को हमारे मलेशिया पहुंचने का टेलेक्स संदेश भेजा था । गलत पता दिये जाने के कारण यूनिटी विभाग को सूचना नहीं मिल पाई थी अत. उनकी ओर से कोई हमें लेने नही पहुंचा । श्री गुणासिंघम हमें अपने निवास स्थान पर ले गये तथा बड़ी सहयता से अपने निवास के अतिथि-गृह में हमे ठहराया, उन्होने मभी सम्बन्धित व्यक्तियों के विचार-विमर्श कर हमारी अध्ययन पात्रा की व्यवस्था की । श्री गुणासिंघम दूसरे दिन अपने व्यावसायिक कार्य से बैंकॉक के लिए रवाना हो गये। हमने निश्चित कार्यक्रम के अनुसार अपना अध्ययन आरम्भ कर दिया। मलेशिया उपभोक्ता संयुक्त संघ का अवलोकन मलेशिया मे हमारा प्रथम कार्यक्रम कुआलालम्पुर स्थित मलेशिया उपभोक्ता मंघ का अवलोकन रहा। 7 सितम्बर, 1985 को हम संघ कार्यालय गये, जहां पर शोध समन्वयक 59 श्री जोए० एस० सर्वोकोटमन ने हमें संघ के कार्यों तथा कार्य-पद्धति के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी दी। आथिक स्थिति मलेशिया के प्रचुर तथा विभिन्न साधनो, सुदृढ़ अवस्थापना, सन्तुलित औद्योगीकरण तथा मजबूत आर्थिक नीति ने देश एक त्वरित विकास दर बनाये रखने की क्षमता प्रदान की है। इतने असरदार विकास के उपरान्त भी राष्ट्रीय सम्पत्ति समान रूप व वितरित नहीं हो पाई है। हालांकि नई आर्थिक नीति (NEP) के अन्तर्गत आय के पुनवितरण पर बल दिया गया है यह नीति 1970 में लागू की गयी जिसके अन्तर्गत भूमिपुत्रों (मलेशियन तथा अन्य स्थानीय) को 1970 में 24 प्रतिशत की तुलना में 1990 तक पूंजी का 30 प्रतिशत तक हिस्सा दिलाना था। मलेशिया दृढ़तापूर्वक अधिक से अधिक विविधता की ओर बढ़ रहा है । अर्थतत्र के हर क्षेत्र मे अधिक से अधिक अवसर उपलब्ध होने लगे हैं। मलेशिया में उपभोक्ता विशेष रूप से जो कि निम्न आय वर्ग के हैं बहुत अलाभकारी स्थिति में हैं। आज मलेशिया में समस्त उपभोक्ता, विशेष रूप से निम्न आय वर्ग के उपभोक्ता बहुत ही अलाभकारी स्थिति में हैं । वे लोग हाथ- सफाई, गोषण, जमाखोरी,सामाजिक-आर्थिक तथा पर्यावरणीय अन्याय के शिकार हैं। सामान्य न्याय की माग है कि उपभोक्ता स्वास्थ्य संकट, कालाबाजारी, मिला- वट, हाथ सफाई तथा शोपण आदि जो उनके अधिकारों, उनकी अस्मिता तथा उनके जीवन स्तर को चोट पहुंचाते हैं उनका शिकार न हो। ऊपर वर्णित समस्याओं के निराकरण हेतु फोमका (FEDERATION OF MALAYSIAN CONSUMERS ASSOCIATION) ने उपभोक्ताओं के हितो की रक्षा करने के लिए अध्ययन किये हैं तथा भविष्य के लिए एक दीर्घावधि योजना बनाई है। मलेशियन उपभोक्ता संयुक्त संघ की स्थापना जून, 1973 में की गई थी। यह संघ देश के कुल 14 राज्यों मे से 13 राज्यो मे कार्यरत है। फोमका की स्थापना मलेशिया में संगठित उपभोक्ता आदोलन को सशक्त करने तथा फैलाने एवं समन्वय तथा सलाहकार अभिकरण का कार्य करने हेतु की गयी थी जिससे कि वह उपभोक्ता संघों को अपने-अपने उद्देश्य प्राप्त करने के लिए सूचनाएं, ज्ञान तथा संरक्षण प्रदान कर सके। फोमका, अन्तर्राष्ट्रीय उपभोक्ता संघ (International organisation of Consumers Union) का सदस्य है । तथा इसने दक्षिण पश्चिमी एशियाई देशों के उपभोक्ता समूहों से अच्छे सम्बन्ध बना लिये हैं !
60 फोमका की पांचवर्षीय कार्ययोजना उद्देश्य 1. मलेशिया मे उपभोक्ताओं को सूचना प्रदान करना, शिक्षित करना तथा उन्हें संरक्षण देना। 2. उपभोक्ताओं मे चेतना जागति, सामाजिक दायित्व, पर्यावरणीय दायित्व, सहभागिता तथा आपसी संबंधों को सुदृढ़ करना। 3. न्यूनतम स्तर से पोषित, आत्म-निर्भर तथा सुदृढ़ संगठन के निर्माण में सहयोग देना। 4. कमजोर सघों को मजबूत तथा मजबूत संघों को और भी अधिक उप- योगी बनाने के लिए व्यक्तियों एवं गैर राजकीय संस्थाओं को तैयार एवं प्रशिक्षित करना। 5. सामाजिक-आर्थिक तथा पर्यावरणीय शोपण तथा अन्याय के विरुद्ध प्रति- कार करना। उपर्युक्त उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित 16 विशिष्ट समितियो का गठन किया गया है- -प्रशासन समिति एवं सूचना केन्द्र । -उपभोक्ता शिक्षण सेवाएं। --उपभोक्ता जांच सर्वेक्षण तथा शोध सेवाएं। --उपभोक्ता विधि समिति । ---फोमका का बाल पोपण कार्यतंत्र । -मलेशियन स्वास्थ्य सेवा तंत्र। -मलेशियन पेस्टिसाइट कायंतंत्र । -पर्यावरण संरक्षण समिति । --आर्थिक तथा उपयुक्त तकनीकी समिति । -पारदेशीय सहकार समिति । --जागरूक उपभोक्ता योजना। -मजलाह पेनगुना (Majlah Penguna) -फोमका विकास कोष -स्वयं-सेवक एवं सलाहकार स्थल -मानव शक्ति एवं प्रबन्ध प्रशिक्षण समिति । हमने देखा कि फोमका के समप्र तपा समन्वित उपागम ने कई उपभोक्ताओ की समस्याओं को सुलझाकर बड़ा योगदान दिया है। इसने लोगों में स्वविवेक 61 तथा चेतना जागृत की है तथा आर्थिक असमानता दूर करने में सहायक हो रही है। भारत में उपभोक्ता आन्दोलन सहकारिता से जोड़ा गया है । परन्तु समग्रता एवं समन्वितता में फोमका के प्रयासो से भिन्न हैं । फोमका एक राष्ट्रीय संगठन वन चुका है जिसका सम्पूर्ण समाज पर असर है । अधिक से अधिक लोग आगे आ रहे हैं तथा अपनी रुचि के क्षेत्र में जुड़ते हुए अपना योगदान दे रहे हैं । फोमका को अपने सभी सम्बद्धों, स्वयसेवको तथा धन देने वाले अभिकरणो से पूर्ण सहयोग मिल रहा है । फोमका का यह प्रयोग मेरी दृष्टि में अपूर्व है जिसका अपने देश में भी प्रयोग किया जाना चाहिए । - मलेशिया में अनौपचारिक शिक्षा 8 सितम्बर, 1985 को हम मलेशिया सरकार के शिक्षा विभाग में गये तथा उपमहानिदेशक श्री भास्करन से मिले । श्री भास्करन ने हमे मलेशिया के शिक्षा कार्यक्रमों की जानकारी दी तथा राष्ट्रीय एकता विभाग के अधिकारियो से मिलने को कहा जिनको कि हमारे कार्यक्रम की व्यवस्था करनी थी। इस कार्य हेतु श्री जी० नारायण स्वामी को नियुक्त किया गया। मंत्रालय में हमने पुस्तकालय एवं वाचनालय का अवलोकन किया तथा श्री नारायण एवं अन्य अधिकारियों के साथ वयस्क एवं अनौपचारिक शिक्षा पर विचार-विमर्श किया। इसके पश्चात् थी नारायण और अन्य अधिकारी हमे एकता विभाग ले गये । श्री हसन समत ने हमें राष्ट्रीय एकता विभाग को विभिन्न गतिविधियो के बारे मे विस्तार से जानकारी दी। जैसाकि पूर्व मे उल्लेख किया गया है प्रभावी विकास के होते हुए भी मलेशिया मे राष्ट्रीय सम्पत्ति का समान रूप से वितरण नहीं हो पाया है । अतः नई अर्थ- नीति के अन्तर्गत आय के पुनर्वितरण पर अधिक बल दिया गया है। जिसके अन्तर्गत भूमि-पुत्रों के पूंजी के अंश को 1990 तक 2-4% से बढ़ाकर 30% तक लाना तभी से मलेशिया अधिक विविधता की ओर बढ़ रहा है। 1981 मे एक अनुमान के अनुसार कार्यबल के विभाजन की स्थिति निम्नानुसार होगी~~ --कृषि 44 प्रतिशत --निर्माण 14 प्रतिशत -अन्य क्षेत्र 42 प्रतिशत उपनति स्पष्टतः आर्थिक क्षेत्र में समाज के सभी वर्गों को अधिकाधिक अवसर उपलन्ध करने की ओर है । साथ ही आर्थिक विकास को सुस्थिर करने हेतु आवश्यक विभिन्न कौशल उपलब्ध कराने में औपचारिक तथा शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। मलेशिया की चौथी योजना मे ...
62 शिक्षा तथा प्रशिक्षण हेतु पर्याप्त साधन उपलब्ध कराये गये थे। शिक्षा पर कुल सार्वजनिक व्यय का 22 प्रतिशत खर्च किया गया। प्रौढ़ एवं अनौपचारिक शिक्षा अग्रिम शिक्षा कक्षाएं (F. E.C.) रजाक शिक्षा कमेटी की संस्तुति के आधार पर 1958 में अग्रिम शिक्षा कक्षाए (F. E.C.) आरम्भ की गयी। इस योजना के अन्तर्गत निम्नाकित वर्ग के व्यक्तियों के लिए साध्यकालीन कक्षाएं चलाई जाती हैं। (क) नियमित शालाओं में प्रवेश की आयु सीमा को पार कर गये व्यक्ति । (ख) नियमित शालाओ में पढने की क्षमता न रखने वाले व्यक्ति । (ग) रोजगार में लगे परन्तु अपनी योग्यता बढ़ाने के इच्छुक व्यक्ति । शिक्षकों के लिए सेवाकालीन शिक्षा कई प्रकार के शिक्षा कार्यक्रमो में शिक्षकों को अपनी सेवा अवधि मे सम्मिलित होना पड़ता है । इस प्रकार के सेवाकालीन शिक्षा कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य- (1) शिक्षकों में मलप भाषा में शिक्षण तथा अग्रेजी को द्वितीय भाषा के रूप में पढ़ाने के कौशल को विकसित करना। (u) विभिन्न अनुशासनो में प्रशिक्षित अध्यापको में शैक्षिक एवं व्यव- सायिक ज्ञान एवं अनुभव की वृद्धि करना। (ii) प्रशिक्षित अध्यापको को शिक्षण विधियो एवं तकनीकी मे नवाचार से अवगति देना। (iv) कक्षा में पढाने के अतिरिक्त अपनी भूमिका का प्रभावी ढंग से निर्वाह करने के लिए शिक्षको को पर्याप्त ज्ञान एवं कौशल प्रदान करना। (v) प्रधानाध्यापको, शाला संगठको तथा प्रशासको को शैक्षिक प्रशासन का प्रशिक्षण देना। विश्वविद्यालय मलेशिया मे विश्वविद्यालयो ने 10 वर्ष तक एक परिसर कार्यक्रम का सफलतापूर्वक संचालन किया। विद्यार्थी जो कि प्रौढ हैं तथा पूर्णकालिक रूप से व्यवसाय में लगे हुए हैं, त्रिवर्षीय स्नातक कार्यक्रम को 5 वर्ष में पूरा करते हैं। विद्यार्थी प्रथम वर्ष से लगाकर चतुषं वर्ष तक घर पर ही अध्ययन करते हैं परतु 63 पचम वर्ष में पूर्णकालिक रूप से विश्वविद्यालय में रहते हुए अध्ययन करते हैं । इसके अतिरिक्त, उन्हें प्रथम चार वर्षों में प्रतिवर्ष दिसम्बर माह में 3 सप्ताह के ट्यूटोरियल में भाग लेना होता है। मलेशिया में दूरस्थ शिक्षण का यही एक मात्र उदाहरण है। सामान्यता विश्वविद्यालय समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह निम्नलिखित तरीकों से करते हैं : (1) व्यावसायिक शैक्षिक संगठनों को व्याख्यान तथा सेमिनार आदि आयोजित करने के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराकर । (2) पुस्तकों, पत्रिकाओं, उद्घाटन भाषण तथा ज्ञान में मौलिक योगदान देनेवाली पीजो का प्रकाशन कराकर। (३) प्राध्यापकों तथा विद्यार्थियो द्वारा किये गये कार्यों अथवा परियोजनाओं की प्रदर्शनिया आयोजित कराकर । (4) सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन अथवा ऐसी गतिविधियों के आयोजन में सहयोग देकर । (5) दूतावासों के सहयोग से सामान्य जनता के लिए फिल्म समारोह आयोजित करके। ग्रामीण जनता तथा बागान कर्मचारियों के हितार्थ छात्र संगठनो द्वारा कुछ अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रम चलाये जाते हैं उनके द्वारा शाला छोड़ देने वाले छात्रों के लिए भाषा कार्यक्रम तथा महिलाओं के लिए नागरिकता शिक्षा कार्य- क्रम चलाए जाते हैं । छात्र संगठनों द्वारा ग्रामीणों के व्यवहार में परिवर्तन का प्रयास भी जारी है ताकि अपने बच्चों का शिक्षा के तथा व्यवसाय चयन के सम्बन्ध मे उनका ऋणारकक रवैया बदल सके। अधिकाश अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रम ग्रामीणों के लम्वे अवकाश के समय आयोजित किये जाते हैं। औद्योगिक तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा प्रौढ शिक्षा का एक बड़ा हिस्सा औद्योगिक तकनीकी तथा व्यावसायिक योग्यता मे अनुदेशन से सम्बन्धित है। मलेशिया में अनौपचारिक शिक्षा की इस शाखा का उल्लेखनीय विकास हुआ है। तथा इस कार्य को करने के लिए कई अभिकरण सामने आये हैं। अनौपचारिक शिक्षा की इस शाखा में व्यक्ति को अपने प्रथम व्यवसाय अथवा नये व्यवसाय के लिए तैयार करने के कार्यक्रम सम्मिलित किये गये हैं। इसमें व्यक्ति को अपने व्यवसाय की नवीनतम जानकारी देने के लिए अग्रिम शिक्षा की व्यवस्था भी की जाती है।
64 शिक्षा निजी क्षेत्र में आज विभिन्न व्यावसायिक कौशलों विशेष रूप से प्रबन्धकीय कौशलों की अधिक मांग है। मलेशियन प्रबन्ध संस्थान तथा राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद (Malaysian Institute of Management, National Productivity Council) ख्याति प्राप्त संस्थाएं हैं। मलेशियन प्रबन्ध सस्थान एक निजी संस्थान है जो कि आर्थिक रूप से निजी क्षेत्रो से प्राप्त अनुदान पर आश्रित है तथा राष्ट्रीय उत्पादकता परिपद संवैधानिक अभिकरण है। इन दोनों के द्वारा कार्यकारी दक्षता बढ़ाने के लिए विभिन्न पाठ्यक्रम, सेमिनार आयोजित किये जाते हैं तथा प्रकाशन किये जाते हैं । प्रतिवर्ष आयोजित किये जाने वाले पाठ्य. क्रमो में निम्नलिखित विषयो पर प्रमुखता से पाठ्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। बिक्रीकारिता, कामिक प्रबन्ध, विज्ञापन कम्पनी अधिनियम तथा कर औद्योगिक सम्बन्ध तथा प्रतिवेदन लेखन आदि । निजी क्षेत्र अपने कर्मचारियों को ज्ञानवृद्धि तथा मौलिक कौशल प्रदान करने हेतु प्रशिक्षण तथा शिक्षण कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । रबर, पाम आइल तथा नारियल बागान के प्रबन्धकों का प्रमुख व्यवसायिक सगठन Incorporated Society of Planters (I. S. P.) है इसके द्वारा संचालित अनोप- चारिक शिक्षा कार्यक्रम इसका एक अनूठा उदाहरण है । वाणिज्यिक शालाएं मलेशिया के बड़े नगरों में कई निजी मगठन हैं जो कि वाणिज्यिक कौशलो जिनकी कि आज मलेशिया मे बहुत माग है शिक्षण एव प्रशिक्षण का काम करते निजी अभिकरण तथा व्यवसायिक पाठ्यक्रम मलेशिया में ऐसे कई छोटे निजी तथा पूर्णकालीन व्यवसायिक संगठन हैं जो उन युवा महिलाओ को प्रशिक्षण एवं अनुदेशन देने का कार्य करती है जो कि कोई कौशल सीखना चाहती हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के अभिकरण राष्ट्रीय लोक प्रशासन संस्थान सभी श्रेणी के मिविल सर्वेन्ट्स के प्रशिक्षण का कार्यकर्ता है । सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य संस्थानों के भी अपने प्रशिक्षण सस्थान ' हैं यथा रेलवे प्रशिक्षण स्कूल, दूर संचार प्रशिक्षण स्कूल, राष्ट्रीय व्यापारिक नौपरिवहन अकादमी, अग्नि विभाग प्रशिक्षण स्कूल आदि तथा अन्य सर्वधानिक अभिकरणों के भी अपने स्वयं के प्रशिक्षण स्कूल है।
65 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में सभी प्रकार के उद्योगो का प्रशिक्षण दिया जाता है । इन संस्थानों का विभिन्न औद्योगिक इकाइयों से निकट का सम्बन्ध है तथा ये उतने ही लोगों को प्रशिक्षित करते हैं जिनको प्रशिक्षण प्राप्त करने के तुरन्त बाद कार्य मिल जाए। युवा, खेल एवं संस्कृति मंत्रालय युवा, खेल तथा संस्कृति मत्रालय के अपने तकनीकी, व्यवसाय तथा नेतृत्व विषयों से सम्बन्धित कार्यक्रम हैं । राष्ट्रीय युवा विभाग एक प्रकार का प्रशिक्षण प्रदान करता है । जिसमे अनुशासन तथा नागरिक चेतना प्रदान की जाती है। राष्ट्रीय पायोनियर कोर कृपि, भवन निर्माण, काष्ठ कला, मोटर मेकेनिक, रेडियो, दूरदर्शन सुधार तथा ट्रेक्टर चालन आदि विपयो पर 18 माह का कौशल सम्बन्धी प्रशिक्षण प्रदान करता है। - ट्रेड यूनियन तथा अनौपचारिक शिक्षा मलेशिया में सभी श्रमिक संघों की अपनी शिक्षा समितिया हैं । इनके अति- रिवत मलेशियन ट्रेड यूनियन काग्रेस (M T UC) सम्बद्ध सगठनो को इस कार्य हेतु आर्थिक सहयोग प्रदान करती है तथा स्वयं सेमिनार एवं पाठ्यक्रमों का आयोजन करती है । श्रमिक संगठनों तथा कामगार शिक्षा कार्यक्रमों के उद्देश्य निम्नानुसार है: (1) श्रमिक को उसके कार्य तथा सामाजिक उद्देश्यो की बेहतर समझ पैदा करने में सहयोग देना। (2) थमिक को अपने व्यवसाय मे प्रगति करने की भावना तथा क्षमता को विकसित करने में मदद करना। (3) श्रमिक में देश के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, सास्कृतिक तथा राज- नतिक जीवन में सक्रिय भाग लेने की भावना भरता । एम. टी. यू. सी. शिक्षा विभाग से योग्य तथा अनुभवी शिक्षक को दो से तीन साल तक के लिए अवकाश दिलाकर अपने यहा नियुक्त करता है, तथा विभिन्न सम्बद्ध श्रम संगठनो द्वारा सेमिनार एवं पाठ्यक्रम आयोजन के समय संदर्भ व्यक्ति के रूप में सहयोग देता एवं आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराता है । कुछ विश्वविद्यालयो के संकाय सदस्य श्रमिकों के लिए आयोजित सेमिनार में भाग लेते हैं। जहा तक श्रम संगठनों में अनौपचारिक शिक्षा के विस्तार का प्रश्न है यह सप्ताहान्त आवासीय पाठ्यक्रमो के माध्यम से किया जाता है।
66 ये पाठ्यक्रम, औद्योगिक सम्बन्ध, विधि, वाता, तकनीक, प्रारम्भिक अर्थशास्त्र अथवा सामाजिक सुरक्षा लाभ के सम्बन्ध में होते हैं। इनके अतिरिक्त विषयों पर भी सेमिनार आयोजित होते हैं। : अनौपचारिक शिक्षा : स्थानीय परम्पराएं एशियाई समाजो मे पुराने समय में समुदाय की शिक्षा का कार्य कुछ विशिष्ट परम्पराओ द्वारा किया जाता था-मलेशिया में ऐसी कुछ पुरातन स्थानीय परंपराएं हैं जिन्हें अनौपचारिक शिक्षा के रूप में लिया जा सकता है । मस्जिद युवाओं तथा वृद्धों के लिए धार्मिक निर्देशन का केन्द्र रही है। इसके अतिरिक्त कई मस्जिदें शादी का विचार करने वाले युवाओं को मार्गदर्शन एवं सम्मति देने का काम करती हैं। हिन्दू मन्दिर भी धार्मिक निर्देशन के लिए अनौपचारिक तरीके काम में लेते हैं । रामायण तथा महाभारत की कथाओं के आधार पर नाटक सेले जाते हैं। नैतिकता सिखाने का दूसरा परम्परागत तरीका कथाएं एवं कहानियों का कहना है। यह सभी कार्य बुद्धिमानी पूर्वक, रसिकता से एवं पद्यवद्ध तया गाने के साथ किया जाता है जिससे कि थोताओं की रुचि बनी रहे । मलेशिया मे रामायण जैसे महाकाव्य के ज्ञान के प्रसार हेतु छाया नाटक एक परम्परागत तरीका रहा है । ईसाई चर्च विवाहित जोड़ों को मार्गदर्शन देने, नैतिक एवं सामाजिक मुद्दो पर सेमिनार आयोजित करने, पिछड़े घरों के बच्चों को मुफ्त शिक्षण देने जैसे अनेक अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रम चलाते हैं। सार्वजनिक पुस्तकालय मलेशिया मे सार्वजनिक पुस्तकालयो को सख्या मे बहुत वृद्धि हुई है तथा यह अनौपचारिक शिक्षा तथा अनवरत शिक्षा कार्यक्रम का महत्वपूर्ण अंग हो गया नागरिकता, राजनीति तथा सामुदायिक शिक्षा में प्रवीणता प्रदान करना प्रौढ़ एव अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रम का महत्वपूर्ण अंग है। राष्ट्रीय एकता कक्षाओ द्वारा नागरिकता शिक्षण का कार्य किया जाता है इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय एकता शिक्षा के रूप मे लिया गया है जिसे चलाने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय एकता परिषद (National Unity Board) की है।
67 राष्ट्रीय एकता परिषद 10 सितम्बर, 1985 को हम राष्ट्रीय एकता परिषद का कार्य देखने गये। यहां पर विभाग के महानिदेशक श्री बावा तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने हमारा स्वागत किया। मलेशिया में हमारे कार्यक्रम के संयोजक श्री नार भी वहां उपस्थित थे। श्री बावा ने विभाग को गतिविधियों एवं कार्यक्रमों से हमें परिचित कराया। 1969 के जातीय दंगों के बाद मलेशिया सरकार ने साम्प्रदायिक एकता तथा सद्भाव बढ़ाने की निश्चित नीति की आवश्यकता अनुभव को। राष्ट्रीय एकता के विकास के लिए विभिन्न अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रम चलाने हेतु राष्ट्रीय एकता मंत्रालय की स्थापना की गई। यह मत्रालय बाद में एक विभाग मे परिवर्तित कर दिया गया तथा आजकल राष्ट्रीय एकता के उद्देश्यो को प्राप्त करने का कार्य राष्ट्रीय एकता परिषद् कर रही है। प्रधान मत्री के विभागों के अन्तर्गत इस परिषद को रखा जाना ही इसको दिये जाने वाले महत्व को दर्शाता है। परिषद के उद्देश्य निम्नानुसार हैं : देश में राष्ट्रीय एकता की भावना भरना जिससे एक ऐसे समाज का निर्माण हो जहां व्यक्ति को एक मलेशियन के रूप में न केवल समान पहचान तथा मूल्य मिले बल्कि मलेशिया मे इतना अपनत्व महसूस हो कि विभिन्न जातीय समूहो में टूटन लाने वाली साम्प्रदायिक तथा क्षेत्रीय ताकतें उभर कर न आ सकें। ---राष्ट्रीय विचारधारा 'रूकुनगारा' के अनुरूप एक, प्रजातात्रिक, न्याय- युक्त, उदारवादी तथा प्रगतिशील समाज के निर्माण में सहयोग देना। राष्ट्रीय एकता परिपद दो तरह के शैक्षिक कार्यक्रमों का संचालन करती देश की तीन जातियों-~मलय, चीनी तथा भारतीय के रीति-रिवाज, परम्परा तथा धार्मिक विश्वासों को जानने में रुचि रखने वाले गैर मलय लोगों के लिए भाषा का शिक्षण । राष्ट्रीय एकता कक्षा कार्यक्रमों का उद्देश्य (1) सभी जातीय समूहो के मलेशियावासियो को आपस में मलेशिया की राष्ट्र भाषा में सवाद के योग्य बनाना । तथा (2) संभागियों में सच्चाई तथा सुनागरिकता के तत्व भरना । जिससे कि वे देश के प्रजातान्त्रिक जीवन मे रचनात्मक भूमिका निभा सकें। राष्ट्र भाषा में प्रवीणता प्राप्त करने के लिए मौखिक अभिव्यक्ति को पहली सीढ़ी माना गया है । एकता कक्षाएं तीन स्तरीय होती है:- 68 प्रारम्भिक, माध्यमिक तथा उच्च स्तरीय। इनमें उच्च स्तर प्राथमिक विद्यालय की कक्षा 6 के स्तर का होता है। राष्ट्रीय एकता परिषद में निम्न खंड है:- प्रशासन खंड, वित्त खंड, अनुसंधान खंड तथा समुदाय सम्पर्क खंड । परिपद के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अच्छा प्रशासनिक एवं वित्तीय तंत्र प्रदान करने के लिए प्रशासन तथा वित्त खंड उत्तरदायी है । इसके अतिरिक्त परिषद के दो पाक्षिक पत्र 'बालाई' तथा 'मुहीवाह' के प्रकाशन का उत्तरदायित्व भी इन्ही पर है। विभिन्नता वाले समाज में आपसी समझ बढ़े, एक-दूसरे से निकट का सम्बन्ध स्थापित हो, राष्ट्र-प्रेम की भावना जगे तथा देश व देशवासियों के प्रति प्रेम बढ़े ऐसे सामुदायिक सम्पर्क कार्यक्रमो तथा प्रायोजनाओं का संचालन कर देश के विभिन्न जातीय समूहों मे एकता स्थापित करने का कार्य समुदाय सम्पर्क खंड का है । राष्ट्रीय एकता कक्षा चलाने का उत्तरदायित्व भी यह खंड वहन करता है जिसके अन्तर्गत प्रौढ़ो को मलय भापा तथा नागरिकता शिक्षा प्रदान की जाती है। अनुसधान खंड कार्य राष्ट्रीय एकता से सम्बन्धित नीतिगत विपयों तथा जातीय-सामाजिक शोध करना है। यह सीधे वार्तालाप सत्र, जातीय भेद-भाव की शिकायतों की जांच, वार्ताएं आयोजित करने, पुस्तकें तथा पत्र-पत्रिकाएं प्रका- शित करने का कार्य भी करता है । अनुसधान बड परिषद के सलाहकार मंडल को सचिवालय सहयोग भी प्रदान करता है । राष्ट्रीय एकता परिषद के सहयोग के लिए एक सलाहकार मण्डल होता है जिसकी अध्यक्षता परिपद का कार्यकारी अध्यक्ष करता है । सलाहकार मण्डल के सदस्यों को नियुक्ति माननीय प्रधान मंत्री की सहमति से की जाती है । राष्ट्रीय एकता परिषद मलेशियाई समाज के विभिन्न जातीय समूहो के सामाजिक सास्कृतिक रीति-रिवाजों तथा त्योहारो एवं धामिक पदों के सम्बन्ध में पुस्तकें प्रकाशित करता है । समीपता कार्यक्रम गया मलेगिया में समीपता कार्यक्रम को काम एक-दूगरे के साथ रहने, एक-दूसरे को | करने वो भावना में ही समीपता का सि पा
th
इस कार्यक्रम के मुख्य तत्व निम्नलिखित
1 गृह-पर्यावरण के प्रति प्रेम तथा गर्व ।
2 पड़ोसी एक-दूसरे को जानते हैं, अक्सर आपस में मिलते है तथा एक-दूसरे
के काम आते हैं।
3 आवासी सामान्यतया स्वयं को सामुदायिक समाज के सदस्य समझते है ।
4 भावासी अपने पड़ोस मे शान्ति तथा सद्भाव का वातावरण चाहते हैं।
5 आवासो अपने पड़ोस मे जन सुविधाएं, सफाई एवं सुन्दरता बनाये रखने
की अपनी जिम्मेदारी समझते हैं।
6 आवासी एक-दूसरे के लाभ के लिए सहयोग एवं सहकार प्रदान करते है ।
7 आवासियों के हितों को दर्शाने हेतु एक समिति है जहां समस्याओ का
समाधान किया जा सकता है।
कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं-
1 अन्तःक्रिया
2 विचारों का आदान-प्रदान
3समझ पैदा करना
4 कल्याण कार्यों की देखरेख
5 स्वच्छता तथा एकरूपता
6 सामाजिक कार्य, शैक्षिक कार्य तथा जन सुविधाएं।
.
70
समीपता कार्यक्रम
उद्देश्य
पडोसीपन की भावना के साथ
अन्तःक्रिया
विचारों का आदान-प्रदान
समझ पैदा करना
कल्याण करयों की देखरेख
जन-सुविधाएं
स्वच्छता एवं
एकात्मता
सामाजिक कार्य
शीक्षक कार्य
मलेशिया में समीपता कार्यक्रम
71 सामुदायिक विकास एवं प्रौढ़-शिक्षा कार्यक्रम मलेशिया में प्रोढ-शिक्षा कार्यक्रम विभिन्न सरकारी एवं गैर-सरकारी अभिकरणों द्वारा चलाये जाते हैं । ये कार्यक्रम विभिन्न रुचि समूहों के लिए चलाये जाते हैं। इन्हे निम्नलिखित समूहों में विभवत किया जा सकता है : (1) स्वास्थ्य, परिवार स्वास्थ्य, पोपाहार तथा समुदाय से सम्बन्धित मौलिक शिक्षा। (2) कृषि, पशुपालन, मत्स्यपालन, व्यापार, उद्योग आदि में व्यावसायिक कौशल प्रदान करना। (3) जो व्यक्ति शाला नहीं जाते अथवा जिन्हें पढ़ने का अवसर नहीं मिला उन्हें शिक्षा का अवसर दुबारा देने हेतु निरन्तरित शिक्षा । (4) साक्षरता। (5) पत्राचार द्वारा शिक्षा। (6) धार्मिक-शिक्षा। (7) प्रौढों के लिए सहकारिता शिक्षा तथा अन्य शैक्षिक कार्यक्रम । कृषि मन्त्रालय तथा संस्कृति मंत्रालय का सामुदायिक विकास विभाग, राष्ट्रीय एकता बोर्ड, फोमका, मलेशिया निरन्तरित शिक्षा परिषद, मलेशिया मजदूर संप आदि कुछ ऐसे संगठन हैं जो कि शिक्षा का कार्य करते है । परन्तु इन अभिकरणो मे किसी प्रकार का समन्वय न होने से बहुत काम दोहराये जाते है अतः राष्ट्रीय स्तर के एक ऐसे अभिकरण की आवश्यकता है जो कि इन कार्यों मे समन्वय स्थापित कर सके। मैंने उपर्युक्त सभी अभिकरणो के सम्बन्ध में विस्तार से जानकारी प्राप्त को । यहा पर केवल कृषि मंत्रालय के सामुदायिक विकास विभाग द्वारा सचालित प्रौढ़-शिक्षा कार्यक्रम के सम्बन्ध में जानकारी दी जा रही है । यह विभाग KE MAS अर्थात् "स्वच्छ एवं व्यवस्थित" नाम से जाना जाता है । इसका उद्देश्य समूह ग्रामीण क्षेत्र की जनता है जहां कि गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले तथा अन्त्यज अधिक हैं KEM AS के अन्तर्गत चलाये जानेवाले कार्यक्रम समुदाय के लोगों द्वारा व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से एक समुदाय के रूप मे लोगों को सामाजिक आर्थिक स्थिति सुधारने की ओर उन्मुख है। मलेशिया की यह सामुदायिक विकास (KEMAS) नीति भारत के सामुदायिक विकास कार्यक्रम के समान है। सामुदायिक विकास विभाग का मुख्य अधिकारी महा निदेशक होता है । विभाग में महानिदेशक के सहयोग के लिए प्रशासनिक तथा कार्यक्रम स्टाफ भी
72
:-
है। विभाग चार इकाइयों में विभात किया गया है। प्रत्येक इकाई का मुखिया
निदेशक होता है। चारों इकाइयां निम्नानुसार हैं
1 सामुदायिक शिक्षा
2 परिवार विकास
प्रशिक्षण
4 प्रशासन एवं वित्त
उद्देश्य एवं उपागम
सामुदायिक विकास कार्यक्रम के निम्नलिखित दो मुख्य उद्देश्य हैं।
1 समुदाय की भावना बदल कर इसे अधिक विकासोन्मुख बनाना तथा उसे
देश के शक्षिक, आर्थिक एवं राजनैतिक जीवन मे सप्रिय भागीदार बनने
के योग्य तथा इसके लिए तैयार करना।
(2) समाज मे आत्म-निर्भरता विकसित करना जिससे कि इसके सदस्य
अपनी स्वय की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति को सुधारने की जिम्मे-
दारी उठा सके।
इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित तीन उपागम
अपनाये गये:
(1) समुदाय की पूर्व तयारी :
विकास कार्यक्रमों को स्वीकार करने तथा उनमे भागीदार बनने के
लिए समुदाय को तैयार करना, उसमे रुचि जगाना तथा इस सम्बन्ध में
जागृति लाना।
(2) सामुदादिक पहल का विकास करना :
वर्तमान संसाधनो का उपयोग करते हुए समुदाय को विकास कार्यों में
भागीदार बनाना तथा उसे आत्म-निर्भर बनाना।
73 सामुदायिक विकास (KEMAS) कार्यक्रम एवं प्रौढ़-शिक्षा मुख्य भूमिका -- सामुदायिक शिक्षा (अनौपचारिक) सामुदायिक सेवाएं सामुदायिक परिवार कार्यक्रम 1 ग्रामीण पुस्तकालय 2 बालमन्दिर 3 ग्रामीण दस्तकारी सामग्री विपणन 4 समुदाय तथा सरकार द्वारा चाही गयो अन्य सेवाएं 1 इस्लाम धर्म की शिक्षा 1 आत्म निर्भरता 2 कार्यकारी साक्षरता कार्यक्रम .2 गृह अर्थशास्त्र 3 व्यावसायिक प्रशिक्षण समूह ग्रामीण कार्यक्रम 3 ग्रामीण औद्योगिक कार्यक्रम- 4 ग्राम विकास सह- कारी समितिया। 3. अन्य अभिकरणों के साथ सहकार- समुदाय द्वारा अन्य विस्तार सेवाओ को सहकार देना जिससे कि उनका अधिकतम लाभ उठाया जा सके तथा जहां यह सम्भव नहीं है वहां उपलब्ध संसा- धनों का ही प्रयोग किया जाये अथवा उस सेवा को प्रारम्भिक स्वरूप में ही प्रदान किया जाए। सामुदायिक विकास (KEMAS) विभाग अपने कार्यों को तीन मुख्य भागों मे विभक्त करता है: -- 74 - (अ) सामुदायिक विकास प्रायोजनाएं-इसके अन्तर्गत, गृह अर्थशास्त्र, ग्रामीण उद्योग, विकास, सहकारी समितिया तथा ग्रामीण आत्म- निर्भरता कार्यक्रम आते हैं। (ब) सामुदायिक शिक्षा। (स) अनौपचारिक शिक्षा। इनके अन्तर्गत कार्यकारी साक्षरता कार्यक्रम, इस्लामी धार्मिक शिक्षा, प्रामीण क्षेत्री में चलने वाले विभिन्न लघु व्यवसायों के लिए उपयोगी व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम तथा सामुदायिक सेवा जिसके अन्तर्गत ग्रामीण पुस्तकालय, विभिन्न हस्तकला वस्तुओ का विपणन, तथा ग्रामीण समुदाय के बच्चो के लिए वाल मन्दिर आदि आते हैं। ये सभी कार्यक्रम तीन विकास सिद्धान्तों-(1) अनुभूत आवश्यकता (2) स्वतन्त्र भागीदारी (3) स्वयं सहायता पर आधारित है। इसे तीन 'के' नाम दिया गया है। समुदाय के लोकतांत्रिक आधार को कायम रखा जा सके इसके लिए सामुदा- यिक, सास्कृतिक एव राजनैतिक विकास की ओर उन्मुख किया जाता है । सामुदायिक विकास विभाग अपने कार्यक्रमों का निर्धारण एवं क्रियान्वयन इस प्रकार करता है कि इसका लाभ ग्रामीण एवं गरीब वर्ग जो विशेष ध्यान के साथ- साथ सभी आयुवर्गों तथा समाज के सभी स्तर के लोगों को मिले । मोटे रूप से इन कार्यक्रमों को दो समूहों में विभक्त किया जा सकता है- पहले, वे कार्यकलाप जो सीधा आर्थिक लाभ देते हैं तथा दूसरे, शैक्षिक कार्य जो ज्ञान वृद्धि करते हैं तथा परोक्ष रूप से आर्थिक लाभ देते हैं। प्रत्येक गतिविधि के अपने उद्देश्य समूह हैं। मलेशिया में सामुदायिक विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत चलाये जानेवाले कार्य- क्रमो मे निम्नलिखित गतिविधिया मुख्य हैं- 1. व्यावहारिक साक्षरता कार्यक्रम 1961 में सम्पूर्ण मलेशिया में साक्षरता कक्षाएं खोलकर निरक्षरता उन्मूलन कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। 1963 मे यह कार्यक्रम सबाह तथा सरदाक में भी शुरू किया गया। 1971 तक 50 लाख प्रौढ़ो को साक्षर कर दिया गया। 1974 मे सवाह तथा सरवाक के अतिरिक्त सब स्थानो पर साक्षरता कक्षाएं समाप्त कर दी गयी तथा कार्यकारी साक्षरता कार्यक्रम आरम्भ किया गया । पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधि यहा प्रौढ़ निरक्षर होते हुए भी किसी-न-किसी व्यवसाय मे सलग्न हैं । उन्हें केवल अक्षर शान देने का पुराना तरीका पर्याप्त नहीं है । प्रौढ को अपने जीवन- ..
75 स्तर को ऊपर उठाने में कुछ सहयोग अवश्य मिलना चाहिए। पाठ्यक्रम प्रोड़ो की शक्षिक आवश्यकताओं पर आधारित है जिसमें स्वास्थ्य, जनसंख्या शिक्षा, नाग- रिकता, कौशल वृद्धि आदि तत्व सम्मिलित हैं । इससे पढ़ने एवं लिखने की योग्यता देने के साथ-साथ जीवन-रतर को ऊपर उठाने, उत्पादन वृद्धि तथा उसके द्वारा भौतिक एवं आत्मिक विकास के ऊपर चर्चा भी की जाती है । व्यावहारिक साक्षरता समस्या समाधान पर आधारित तथा शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं की ओर उन्मुख है। शिक्षण सामग्री अभ्यासपत्रों के रूप में होता है तथा प्रत्येक अभ्यासपन्न अथवा पाठ एक विषय को सम्पूर्ण रूप से लिये होता है। प्रत्येक सत्र में एक अभ्यास पर दिया जाता है । अत. नियमित आनेवाला शिक्षार्थी पाता है कि उसके पास कभी- कभी आनेवाले शिक्षार्थी से अधिक सामग्नी है। वितरण की यह विधि प्रौदों के लिए अधिक उपयोगी है क्योंकि- 1 यदि वे किसी सत्र मे अनुपस्थित हैं तो वे पिछड़ेंगे नहीं क्योंकि प्रत्येक पाठ अपने आप मे पूर्ण इकाई है। 2. शिक्षार्थी एक सत्र में केवल एक पाठ को ही देखेंगे, भतः बहुत सारा पढना है यह भावना उन पर असर नहीं करेगी। शिक्षार्थी की रुचि को देखते हुए विभिन्न विषय पढ़ाये जा सकते है । सह- भागिता को बढ़ाने के लिए शिक्षक घरों पर जाकर व्यक्तिगत स्तर पर भी पढ़ा सकता है । इससे पूरे परिवार की रुचि बढा सकता है । सामुदायिक भवन, मस्जिदें तथा अन्य उपयुक्त स्थानों को कक्षाओं के लिए उपयोग में लाया जाता है। शिक्षणक्रिया तीन स्तरों में विभक्त की गयी है पहले स्तर पर शिक्षार्थी शब्दों को पहचानता है, छोटे वाक्यों को बनाता है तथा सामान्य गणित को लिखकर करता है। दूसरे स्तर पर संभागी 3 से 5 वाक्यों का लेख लिखने, छोटे पैराग्राफ पढ़ने तथा सामान्य गणित करने के योग्य होता है । तीसरे स्तर पर सभागी पढ़ने- लिखने तथा सामान्य गणित जो उसके उपयोगी हो, कर सकता है । इस स्तर पर वे सामान्य पत्र लिखने अथवा साधारण पाठन-सामग्री दूसरों की सहायता के बिना पढ़ सकता है। 2. कार्योन्मुख कक्षाएं यह कार्यक्रम प्रौढ-शिक्षा गतिविधियों को बहुमुखी बनाने के लिए 1968 मे पायोनियर प्रोजेक्ट के रूप में प्रारम्भ किया गया। इसने 1971 में मलेशिया की द्वितीय योजना की शुरुआत के साथ ही गति पकड़ली। प्रारंभ में इसके अंतर्गत खाली समय के उपयोग के साथ प्रौढों को कुछ उद्योग तथा कौशल सिपाये जाते थे। वर्तमान में यह ग्रामीण समुदाय के सामाजिक आर्थिक विकास की ओर 76 उन्मुख हैं। कार्यक्रम के उद्देश्य निम्नानुसार हैं- - लोगों को उनकी रुचि के व्यवसाय एवं कौशल में प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराना। ---उनको अपना स्वयं का व्यवसाय प्रारम्भ करने का अवसर उपलब्ध कराना। -रोजगार का बेहतर विकल्प उपलब्ध कराना। -पारम्परिक कौशलों को प्रश्रय देना तथा स्थानीय संसाधनों के आधार पर नवीन खोजों को प्रोत्साहित करना । मलेशिया मे दो किस्म के व्यावसायिक अथवा कौशल कार्यक्रम हैं । प्रथम वर्ग मे निम्नलिखित व्यवसाय आते हैं : -मोटर मेकेनिक । -रेडियो एव टेलीविजन मरम्मत । ~~वायरिंग (विद्युत इलेक्ट्रोनिक) । --साइकिल/मोटर साइकिल मरम्मत । द्वितीय वर्ग मे निम्नलिखित व्यवसाय आते हैं- -सिलाई/कढ़ाई --शृंगार/प्रसाधन -बुनाई -टकण ---मुथारी -~-लकडी/वास/चमड़ा/ऊनी,हस्तकला तथा विभाग द्वारा स्वीकृत अन्य व्यवसाय/उद्योग। क्रियान्वयन पद्धतियों विभाग उन स्थानों तथा क्षेत्र का चयन नहीं करता जहां कार्यक्रम चलाना है । इसके स्थान पर समुदाय स्वयं तय करता है कि कक्षाए कहां चलाई जायेंगी। कथाएं प्रारम्भ करने के प्रार्थना पत्र ग्राम विकास एवं छानबीन समिति (VDSC) के द्वारा राज्य सामुदायिक विकास विभाग को भेजे जाते हैं। अथवा बी० डी० एम० सी० से निकट सम्बन्ध रखकर कार्य करने वाले जिला पर्यवेक्षक के द्वारा भेजे जाते हैं । कक्षाएं प्रारम्भ करते समय केवल दो बातो का विशेष ध्यान रखा जाता है-- -~-शिक्षक/अनुदेशक की उपलब्धता । --उपकरण क्रम के साथ-साथ आर्थिक स्थिति। कक्षाएं सुचारूप मे चलें इसके लिए प्रशासनिक समिति बनाई जाती है। प्रोत जिन्होंने शाला छोड़ दी है तथा 15 साल मे अधिक आयु के हैं इसमें शरीक हो पाते हैं। एक समूह के निर्माण के लिए कम में कम 10 संभागी आवश्यक हैं ।
२६४ शिक्षण अवधि प्रथम वर्ग के व्यवसायो के शिक्षाथियो को प्रति सप्ताह कम से कम 20, कक्षाओं में उपस्थित रहना होता है। यही समय द्वित्तीय वर्ग के लिए भी लागू होता है जहा कक्षाए कारखानों सामुदायिक सेवा केन्द्रों पर चलती है। द्वितीय वर्ग की कक्षाएं जहां सामुदायिक भवनो में अथवा कारखानो के अलावा अन्य स्थानों पर चलती है संभागियों को 10 घंटे प्रति सप्ताह उपस्थित रहना होता है। इन कक्षाओं के अध्यापकों को दो समूहों को साथ मे पढाना होता है जिससे कि कारखाने के अध्यापक द्वारा तिये जाने वाले समय के बीच समन्वय स्थापित रह सके। कक्षाओं का स्थान व समय संभागी तथा अध्यापक दोनों मिलकर तय करते हैं। संभागियों को उद्योग की परीक्षा देनी होती है । यह परीक्षा राष्ट्रीय औद्यो- गिक एव व्यावसायिक सर्टिफिकेट बोर्ड, मलेशिया (NITTEB) द्वारा ली जाती प्रथम वर्ग के संभागियों को इस परीक्षा में बैठने के लिए आवश्यक है कि वे उस व्यवसाय की कक्षाओ मे दो वर्ष तक जाएं। इन कक्षाओं में बोर्ड द्वारा निर्धा- रित पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है । उपकरण व्यवसायिक कक्षाओं के लिए आवश्यक सभी उपकरण पहली बार शिक्षक द्वारा अयवा संगठनों द्वारा उपलब्ध कराये जाते हैं । अतिरिक्त उपकरण विभाग द्वारा दिये जाते हैं। इसके लिए न्यूनतम आवश्यकता स्तर निश्चित किया गया है। शिक्षक प्रशिक्षण व्यावसायिक कक्षाओं के लिए शिक्षकों का चयन व्यवसाय विशेप में उनके अनुभव एवं कोशल के आधार पर किया जाता है। उनके ज्ञान को अधिक परि. मानित करने के लिए आोगिक प्रशिक्षण संस्थानों में व्यवस्था की जाती है। धार्मिक (इस्लाम) शिक्षा ग्रामीण समुदाय की शैक्षिक आवश्यकताओं को पूर्ति हेतु धामिक शिक्षा की यवस्था की गयी है । ग्रामीण जो धार्मिक शिक्षा के लिए उत्साहित हैं उन्हें बाद में समुदाय की विकास आवश्यकताओं को ओर मोड़ा जाता है । इस्लाम की शिक्षा का उद्देश्य लोगों में इस्लाम के सिद्धान्तो के आधार पर मानवता तथा इन्ही 78 सिद्धान्तों के आधार पर बनी राजकीय विकास प्रायोजनाओ मे सहयोग देने हेतु मार्ग-दर्शन देना है। ग्रामीण आत्मनिर्भरता कार्यक्रम स्थानीय भाषा मे इस कार्यक्रम को-"Rancanon Dass Usaha (R. D.U)" कहते हैं यह कार्यक्रम उन प्रायोजनाओ में से एक है जो कि समुदाय द्वारा स्वीकृत किया जाकर तथा उसकी अनुभूत आवश्यकताओ एवं स्व-सहायता तथा स्वतन्त्र भागीदारी के आधार पर उसकी शक्ति एवं सामर्थ्य का उपयोग करते हुए तथा सरकार के विकास-तन्त्र के न्यूनतम मार्ग-दर्शन तथा परिवीक्षण के साथ एक छोटे क्षेत्र का विकास करते है। कार्यक्रम में गांव की सभी गतिविधियां तथा सभी लोग सम्मिलित किये जाते हैं । समुदाय की आवश्यकता के आधार पर कार्यक्रम के अन्तर्गत होने वाली गतिविधियां अल्पावधि एव दीर्घावधि होती हैं । इन कार्यक्रमों मे कृपि प्रायोजनाएं, पशुपालन, मत्स्य संवर्धन, सहकारिता, स्वास्थ्य, शिक्षा, लघु उद्योग, मनोरंजन तथा स्व-सहायता प्रायोजनाएं चलाई जाती हैं। सामुदायिक विकास विभाग (KEMAS) इसके लिए एक समुदाय विकास कार्यकर्ता प्रदान करता है जो कार्यों को सुगम बनाता है। गृह विज्ञान कक्षाएं इनके अन्तर्गत पोषण, परिवार स्वास्थ्य, शिशु पालन, घर का बजट तपा हस्तशिल्प की शिक्षा दी जाती है । इन कक्षाओं का उद्देश्य सुखी एव समृद्ध परिवार एव समुदाय को बढ़ाना है । साथ ही महिलाओ को समुदाय मे उनकी भूमिका समझाना तथा अपने परिवार की आय में सहायता करने के लिए व्यावसा- पिक कौशल सिखाना तथा समय, धन एव श्रम के सही प्रबन्ध की जानकारी देना है। ग्रामीण उद्योग कार्यक्रम प्रचुर मात्रा मे उपलब्ध स्थानीय संसाधन जिनका पहले उपयोग नहीं होता था तथा दस्तकारी कौशल जिसे प्रोत्साहन नही मिलता था इन पर सरकार ने ध्यान दिया । अत सामुदायिक विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्रो में अच्छे उत्पादको की स्थानीय सामग्री का उपयोग कर अधिक उत्पादन हेतु प्रोत्माहित किया जाता है । सामुदायिक विकास कार्यक्रम कार्यकताओ द्वारा इन दस्तकारो के उत्पादन को एकत्र कर कुआलालम्पुर स्थित दस्तकारी केन्द्रो (Karyaneka) के माध्यम से वेचा जाता है। इस प्रकार ये दस्तकारी केन्द्र (Haryancka) ग्रामोद्योग एवं हस्तशिल्प विक्रय का केन्द्र बनते जा रहे हैं ।
79 ग्राम विकास सहकारी समितियां स्वयं सहायता का सिद्धान्त ग्राम स्तर पर सहकारी समिति की स्थापना को प्रोत्साहित करती है और इसी तरह जिला एवं राष्ट्रीय स्तर पर भी ग्राम विकास सहकारी समिति की स्थापना ग्रामवासियों को आत्म-निर्भर बनाने तथा एकजुट होकर समुदाय मे सामूहिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु सक्रिय भागीदारी हेतु की जाती है। राजकीय सहायता तथा अनुदान सहकारी संस्थाओं को दिया जाता है न कि व्यक्ति को, क्योकि वह सहायता पूरे समुदाय के काम नहीं आती है। ग्रामीण पुस्तकालय शहरो एवं कस्बो के सार्वजनिक पुस्तकालय का उपयोग न कर सकने वाले ग्रामवासियो के लिए ग्रामीण पुस्तकालयों की स्थापना की गयी है। ग्रामीण पुस्तकालयों की स्थाना का उद्देश्य नव साक्षरों को पुन निरक्षर होने से रोकना, ग्रामीण विद्याथियो को सन्दर्भ पुस्तकें उपलब्ध कराना, ग्रामीण क्षेत्रों में सन्दर्भ केन्द्र का कार्य करना तथा ग्रामवासियो में पढने की आदत डालना है । हालाकि गांवों की संख्या की तुलना में ग्रामीण पुस्तकालयों की मात्रा अपर्याप्त है। ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों के लिए बालवाड़ियां . गावो में रहने वाले तथा नगरों में रहने वाले सभी बालक समान हैं। परन्तु शहर के बच्चों को बेहतर शैक्षिक वातावरण मिलता है। सामुदायिक विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत औपचारिक शिक्षा से कोई भेद नहीं है क्योकि औपचारिक शिक्षा पूर्णत: शिक्षा मत्रालय के अधीन है । परन्तु जो औपचारिक शिक्षा में नहीं आते उनके लिए सामुदायिक विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत अनौपचारिक शिक्षा की व्यवस्था है अर्थात् औपचारिक शालाओं में प्रवेश से पूर्व बच्चों को बाल मंदिर में जाना होता है जो कि पूर्णतः अनौपचारिक है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वैच्छिक संस्थानों अथवा निजी वाल मन्दिरो के अभाव के कारण अभिभावकों को अपने बच्चों को सामुदायिक विकास कार्यक्रम के बाल मन्दिरों में भेजना पडता है जिन्हें पूर्व शालायी बालकों के सामाजिक, शारीरिक, भावात्मक एवं मानसिक स्तर को ऊपर उठाना होता है । "गांवों में ऐसे सैकड़ो बाल मन्दिर चल रहे है।
80 कुआलालम्पुर में विभिन्न अभिकरणों का अवलोकन कुआलालम्पुर में विभिन्न मन्त्रालयों तथा विभागो के वरिष्ठ अधिकारियों से वार्तालाप एवं वहा के अध्ययन के उपरान्त मैंने कई अभिकरणो का अवलोकन किया। सर्वप्रथम हम कुआलालम्पुर पर स्थित विभिन्न राज्यों के प्रदर्शनी एवं हस्तकला केन्द्रो तथा अन्तर्राष्ट्रीय हस्तकला केन्द्र देखने गये। श्री जलेहा तथा अन्य अधिकारियों ने साथ रहकर हमें ये केन्द्र वताये। ये केन्द्र एक ही परिसर मे स्थित हैं तथा सुन्दर तरीके से सज्जित एव विधिवत स्थापित हैं। जैसा कि पहले बताया गया है देश के विभिन्न भागों में बनाई गई कलाकृतिया एकत्र कर हस्तकला केन्द्र के माध्यम से विक्रय की जाती हैं जिसे कनिका कहा जाता है। कुआलालम्पुर राष्ट्रीय प्रदर्शन केन्द्र के अतिरिक्त सभी 14 प्रान्तों को पृथक प्रदर्श- नियां एव हस्तकला केन्द्र है । विक्रय की 50%आय को कलाकारों अथवा ग्रामीणो को जिन्होंने कलाकृति बनाई है दे दिया जाता है। सरकार अच्छे उत्पादको को सभी प्रकार की सहायता देती है जिससे कि वे आपने उत्पादन की गुणवत्ता बनाये रख सकें । अन्तर्राष्ट्रीय हस्तकला केन्द्र जो कि यूनेस्को के सहयोग से बनाया गया है सभी लोगों के आकर्षण का केन्द्र है। यह बहुत ही ज्ञानवर्धक तथा सूचना दायक है साथ ही देश की कला एवं संस्कृति की नीति को सुरक्षित रखने में सहायक है। सामाजिक आर्थिक विकास तथा अभिवृत्ति स्थापना अभिकरण (SEDAR) कुआलालम्पुर : 8 सितम्बर को हम SEDAR देखने गये। अभिकरण के प्राचार्य श्री मोहम्मद इस्लाम मोहम्मद शाहिर ने हमें साथ रहकर अभिकरण बताया। इस केन्द्र की स्थापना निम्नलिखित दो उद्देश्यो को पूर्ति हेतु की गमी है: 1. सामुदायिक विकास विशेषकर इसके तकनीकी एवं व्यावसायिक पक्ष का कौशल प्रदान करना। 2. ग्रामीण जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए समुदाय स्वयं में तया गैर सरकारी अभिारणों मे धाति अनुप्रिया पैदा करना। प्रशिक्षण देने के अतिरिक्त यह अभिकरण सामुदायिक विकास एवं प्रौड़- शिक्षा में शोध एव मूल्याकन का कार्य भी करता है। अभिकरण द्वारा नेतना पाठ्यक्रम भी चलाये जाते हैं जिसके अन्तर्गत वर्तमान गतिविधिया, शिक्षा नीति, माति, धार्मिक एव कार्यकारी साक्षरता आदि विषयों यो गम्मिनिताया जाता है । यह 2 मप्ताह का पाठ्यक्रम होता है जिसमें 50 में मेकर 100 ता गंमागी माग सेते हैं। गामुदायिक विकास विभाग के सभी 81 स्तरों के कर्मचारी इसके सम्भागी होते हैं । पाठ्यक्रम का वार्षिक लक्ष्य 13000 ध्यक्तियों को प्रशिक्षित करना है। विभिन्न स्तरों के सामुदायिक विकास कार्यकर्ताओं के कार्यों से सम्बन्धित पाठ्यक्रम भी इस अभिकरण द्वारा आयोजित किये जाते हैं । मह संस्थान भारत के राज्य सामुदायिक विकास संस्थान के समकक्ष संस्थान है। - वार्ता के समय राष्ट्रीय एकता विभाग के महानिदेशक श्री सी० वी० बावानन्दन भी उपस्थित थे । संस्थान के सम्बन्ध में किसी प्रकार का साहित्य हमें उपलब्ध नहीं कराया गया। क्षेत्रीय भ्रमण सायंकाल हमें सम्पर्क अधिकारी श्री नारु तथा जमील शादात एवं अन्य अधिकारियो के साथ गाव रनतुअन पानजग जिला कलाग ऑफ देखने गये। इस गांव में हमने कौशल सिखाने, महिलाओं के लिए इस्लाम शिक्षा के प्रौढ़-शिक्षा केन्द्र तथा गृह विज्ञान कक्षाएं चलती हुई देखीं । कार्यकारी साक्षरता तथा कौशल विकास के अन्तर्गत धुनाई कक्षाएं चल रही थी। यह कक्षाएं ग्रामीण समुदाय के, आर्थिक उन्नयन कार्यक्रम के अन्तर्गत चलाई जाती हैं। उत्पादन को ग्रामीण सह- फारी समितियो द्वारा कर्यानका के माध्यम से 50-50%लाभ के आधार पर वेचा जाता है । इस कक्षा को प्रभारी श्रीमती मोहम्मद हासिन थी तथा केन्द्र पर 15 महिलाए काम कर रही थी। इस्लामी धार्मिक शिक्षा केन्द्र पर 25 महिलाओं का नामाकन था। जिस समय हम केन्द्र पर गये 22 महिलाएं यहां उपस्थित थीं। सभी अच्छी तरह से पढ़ना जानती थीं। श्रीमती राजमही केन्द्र,पर,पढ़ा रही थी। गृह विज्ञान कक्षा में 15 महिलायें उपस्थित थी जो संतरे का शबंठ तथा विस्सिट बना रही थी । श्रीमती सीताराम लाह इस कक्षा की प्रभारी थी। गांव के मुखिया तथा स्थानीय कार्यकर्ता भी वहां उपस्थित थे । मैंने सामुदा- यिक विकास कार्यक्रम (KEMAS) की उपयोगिता तथा लोगों द्वारा इसमे ली जा रही रचि के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त की तथा इसमें लोगो की सहभागिता सपा समुदाय पर इसके प्रभाव को जानने का प्रयत्न किया। रेलतुअन पानजग देखने के बाद हमें कामज सुनगई कान्दिस गांव जिला कलांग प्रान्त मे मलोग देखने ले जाया गया। म समुदाय केन्द्र पर निम्नलिखित कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं : 1.पेन्टिग। 2. 4-6 आयु वर्ग के बच्चों के लिए पूर्वशालायो शिक्षा कायंत्रम। 1.इस्लामी धार्मिक शिक्षा कार्यक्रम सप्ताह में एक बार।.. .
82 4. महिला पाली केन्द्र सिलाई एवं वस्त्र निर्माण प्रौद्योगिकी। जब हम केन्द्र पर गये यह कक्षा चल रही थी। तथा 12 महिलाएं कार्य में संलग्न थीं। 5. आदर्श गृह। 6. कार्यकारी साक्षरता तथा ग्रामीण पुस्तकालय । यह गांव (KEMAS) कार्यक्रम का आत्म-निर्भर गाव है। इस क्षेत्र के पर्यवेक्षक श्री अबु कासिम ने साथ रहकर केन्द्र की सभी गतिविधियों से हमे परिचित कराया। सामुदायिक शिक्षक श्रीमती सिति पारतीह भी वहां उपस्थित थीं। इस केन्द्र का स्वयं का अपना भवन है जो कि पूर्णत. सुसज्जित एवं साधन- सुविधाओं से युक्त है । भवन के आस-पास का क्षेत्र भी बहुत ही अच्छा है । प्रत्येक केन्द्र की अपनी एक ग्राम समिति का अध्यक्ष संभागियों के अभिभावकों में से चुना जाता है। सामुदायिक शिक्षक चल शिक्षक है । केन्द्र पर केवल 3 घण्टे कार्य होता है । बाकी समय शिक्षक गाव मे अनुवर्ती कार्य करता है। आदर्श गृह इस केन्द्र के समीप ही हम आदर्श गृह देखने गये। इस घर के गृहपति श्री हादम बसाई हैं जिनके 5 बच्चे-बच्ची हैं श्री बसाई जहाज पर कार्य करते है तथा 5200 मलेशियन डालर वार्षिक कमाते हैं । इसके अतिरिक्त उनके 3 एकड़ का पास भाइल वृक्ष का बागान है, जिससे वे 4000 डालर प्रति वर्ष कमा लेते हैं। उनका मकान साफ-सुथरा तथा सुसज्जित है। उनका परिवार कृषि तथा अन्य कौशलो में लगा हुआ है। राष्ट्रीय युवा प्रशिक्षण केन्द्र 9 अक्टूबर, 1985 को हम राष्ट्रीय युधा प्रशिक्षण केन्द्र, गाव पेरेदक जिला कुआल कुबु बारु प्रान्त सिलेनमोर देखने गये । यह केन्द्र मलेशिया में ग्रामीण युवाओ को विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण देनेवाले केन्द्रों में से एक है। केन्द्र पर थी कमरुद्दीन, निदेशक युवा प्रशिक्षण केन्द्र ने हमारा स्वागत किया। पह केन्द्र मुवा संस्कृति एवं रोल विभाग के अन्तर्गत लगता है। इस केन्द्र पर जाने से पहले हम कुआलालम्पुर में इस मन्त्रालय में गये तथा वरिष्ठ अधिकारियो से चर्चा की। युवा मामलो के कार्यकारी मुख्य सेक्मन प्रभारी हसन समाज हमारे साप केन्द्र पर आये । केन्द्र के निदेशक ने हमे घूमकर केन्द्र बताया । तया इसने सम्बन्ध मे विस्तार से जानकारी दी। यह केन्द्र बन प्रान्त के मध्य में मुन्दर स्पान पर 83 सड़क के किनारे पर स्थित है । इसमे कई इमारतें है जिसमे पुरुषो एवं स्त्रियों के लिए अलग से आवास स्थल हैं । स्टाफ के लिए पृथक निवास बने हुए हैं । कई पूर्ण सज्जित वर्क शेप तथा शिक्षण सामग्नियो से युक्त है । मेरे विवार मे ये केन्द्र भारत में डेनिश फाक हाई स्कूल सघन ग्रामीण शिक्षा योजना 1953-54 के आधार पर स्थापित किये गये है। इनके उद्देश्य जो कि वहां के निदेशक ने बताये हमारे जनता कालेज के उद्देश्यो के समान ही है । निदेशक द्वारा बताये गये उद्देश्य निम्नानुसार हैं- --ग्रामीण नेताओं को नेतृ प्रशिक्षण देना। --ग्रामीण युवाओ को परम्परागत व्यवसायो मे सम्पल बनाने हेतु तथा आवश्यकता आधारित पाठ्यक्रमो मे व्यावसायिक प्रशिक्षण देना। यह प्रशिक्षण उन्हें कही नौकरी प्राप्त करने के लिए न दिया जाकर अपने परम्परागत व्यवसाय के साथ दूसरा कार्य भी करने के लिए दिया जाता है। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य व्यक्ति को तकनीकी रूप से दक्ष बनाना तथा अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने में सहयोग देना है। -ग्राम स्तर के सरकारी, गैर सरकारी अधिकारियो व जन प्रतिनिधियो को उनके कार्य सम्बन्धी विभिन्न अल्पकालिक तथा दीर्घकालिक प्रशिक्षण देना। इस केन्द्र के युवा खण्ड के अन्तर्गत निम्नलिखित चार भाग है- 1. युवा आर्थिक क्षेत्र 2. युवा एकता क्षेत्र 3. युवा सचलन क्षेत्र तथा 4. युवा प्रशिक्षण क्षेत्र शाला से बाहर के युवा तथा स्कूल छोड़ देने वाले युवाओ को भी उनकी रुचि के विभिन्न पाठ्यक्रमो मे केन्द्र मे प्रवेश दिया जाता है। ग्रामीण नेत प्रशिक्षण इस पाठ्यक्रम में नेत प्रशिक्षण का दर्शन, अवधारणा, उपयोगिता, ग्रामीण संस्थाएं, विभागीय योजनाएं, नागरिकता शिक्षण, सांस्कृतिक निधि, भावनात्मक एकता, मुक्ति आदि को सम्मिलित किया जाता है। प्रायोगिक प्रशिक्षण . इसके अन्तर्गत विभिन्न व्यवसायों को क्रियात्मक प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके लिए प्रशिक्षणार्थियो को विभिन्न व्यावसायिक संगठनो मे जब भी और जहाँ भी आवश्यकता हो ले जाया जाता है।
84 वर्तमान प्रशिक्षण कार्यक्रम में 21 महिलाएं एव पुरुष प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। श्री अजीज अहमद इस केन्द्र के प्रभारी थे। मैंने भी कक्षा की वार्ताओं में भाग लिया तथा भारत में इसी प्रकार के कार्य जो कि जनता कालेज, रूरल इन्स्टीट्यूट, आई० टी० आई, ट्राइसम तथा अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के अन्त- गंत पल रहे हैं उनके बारे में बताया। व्यावसायिक प्रशिक्षण इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के अन्तर्गत निम्नलिखित व्यवसायो में प्रशिक्षण आयो- जित किये जा रहे है- 1. अल्पाहार बनाना : इस पाठ्यक्रम में 15 लडकियां भाग ले रही थीं। इन्हें विभिन्न प्रकार के नाश्ते बनाना सिखाया जाता है । यह 6 माह का पाठ्यक्रम है। 2. भोजन सुरक्षा : इस पाठ्यक्रम में 15 लड़किया भाग ले रही थीं। 3. फोटोग्राफी : इस पाठ्यक्रम में 14 लड़के भाग ले रहे थे। 4. सिलाई : मुख्य पाठ्यक्रम में 21 लड़कियां थी तथा अग्रिम पाठ्यक्रम में (एक वर्ष का) 17 लडकियां थी। हमने पाया कि अग्रिम पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद प्रशिक्षणार्थी स्वतन्त्र रूप से स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने के योग्य हो जाते हैं तथा काफी अच्छा पैसा कमा सकते है। 5 भोजन बनाना तथा प्रवन्ध : इस पाठ्मक्रम में 15 लडकिया भाग ले रही थीं। हालाकि योजना बहुत अच्छी है पर शायद उत्प्रेरणा अथवा रुचि की कमी अथवा विभिन्न अभिकरणों में समन्वय की कमी के कारण इन प्रशिक्षणो में मम्भागियों की सख्या पर्याप्त नहीं थी। कर्मचारी भी उत्साही तथा रुचिशील नजर नही आ रहे थे। मैं सोचता हूं कि सभी दक्षिण पूर्व-एशियाई देशों में सामुदायिक विकास कार्यों की यही स्थिति है । यह एक शोध एवं अध्ययन का विषय है । एक युवा व्यवसाय को सफलता की कहानी युवाओं के समग्र विकास के लिए मलेशिया के ग्रामीण तथा शहरी क्षत्रों मे युवा क्लवो को स्थापना की जाती है। ये क्लब आर्थिक उन्नयन कार्यक्रम के अन्त- गंत सरकार तथा अन्य अभिकरणों के सहयोग से शैक्षणिक, सांस्कृतिक, शारीरिक तथा आर्थिक विकास के कार्यक्रम आयोजित करते हैं। ऐसे ही एक युवा क्लब के सदस्य श्री नमूहा ने 30,000/- मलेशियन डालर का ऋण सरकार से प्राप्त किया तथा कुत्रालालम्पुर मे करी पावडर फैक्टरी आरम्भ की।
85 9 अक्टूबर, 1985 को हम युवा मंत्रालय के अधिकारियों के साथ उनकी फैक्टरी देखने गये । वार्तालाप के दौरान ज्ञात हुआ कि श्री नसूहा ने हाथ से चलने वाली मशीन से यह उद्योग आरम्भ किया जो आज एक बड़ी फैक्टरी का रूप ले चुकी है वर्तमान में उनके पास 30 आदमी काम कर रहे हैं तथा वह 16000 डालर प्रतिवर्ष कमा रहे हैं। वे इसे सफलता की कहानी बताते हैं। पर ऐसे उदाहरण कम हैं। कुआलालम्पुर अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र पर 9 अक्टूबर, 1985 की रात्रि को हम अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र देखने गये जहां चीनी लोगों के लिए राष्ट्रभाषा शिक्षण का कार्य किया जाता है । जो लोग इस केन्द्र पर आते हैं उन्हें निरक्षर नहीं कहा जा सकता क्योकि उन्होंने अपनी मातृभाषा सीखी है । इस केन्द्र पर वे मलेशिया की राष्ट्रभाषा मलय सीखते है। उस दिन उन्होंने अपने पाठ्यक्रम समाप्ति के उपलक्ष मे समापन समारोह आयोजित किया था । संसदीय सचिव श्री हाजीमुस्तफा बिन मोहम्मद जो प्रधान मंत्री से भी जुड़े हैं वह भी इस समारोह में उपस्थित थे। इस समारोह मे मैंने भारत मे चल रहे विभिन्न प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमो के बारे में बताया। इस देश मे विभिन्न समुदायो के सास्कृतिक कार्यक्रम समान हैं । तथा ये प्रौढ- शिक्षा देने के बडे सशक्त माध्यम हैं । इस अवसर पर लोगो ने वहुत अच्छे कार्य- क्रम प्रस्तुत किये । शेर नृत्य उनमें बहुत ही प्रभावी रहा। सिंगापुर यात्रा कुआलालम्पुर (मलेशिया) में अपने अध्ययन कार्य को सम्पूर्ण करने के पश्चात् 12 सितम्बर, 1985 को हमने सिंगापुर के लिए प्रस्थान किया। सिंगापुर हवाई अड्डे पर सिंगापुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के एक्स्ट्राम्यूरल विभाग (Extramurat Department) के अधिकारी श्री लोयग फू हमारे स्वागत के लिए उपस्थित थे।थी फूहमे वाई० डब्ल्यू० सी० ए० के हास्टल ले गये जहा हम अपने सिंगापुर प्रवास के दौरान रहे । हम सिंगापुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के एक्स्ट्राम्यूरल विभाग के निदेशक श्री लीम होयपिक के आभारी है जिन्होंने हमारे अध्ययन का कार्यक्रम बनाया तथा उसमे हर सम्भव सहयोग दिया।
86 . 256 लाख की आबादी याला सिंगापुर एकद्वीप पर बसा एक शहरी देश है। यह एक सर्वदेशीय नगर है जिसमें भिन्न जातीय समूह (चीनी, मलम तथा तमिल) बसते हैं। यहां का समाज काफी समृद्ध है । सिंगापुर एक औद्योगिक नगर, पर्यटन स्थल तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यवसाय का केन्द्र है। इस देश में निक्षरता को कोई बड़ी समस्या नहीं है। केवल चार से पांच प्रतिशत लोग निरक्षर हैं। प्रौढ़-शिक्षा कार्यक्रम के अन्तर्गत निरन्तर शिक्षा, कौशल विकास, भाषा प्रशिक्षण तथा कार्यवलो के सशक्त करने पर बल दिया जाता है। सिंगापुरवासियो में ज्ञान तथा स्व विकास की भावना ने कई ऐसी संस्थाओ, क्लब, वाणिज्य अभिकरण तथा निम्नतम स्तर के संगठनों को जन्म दिया है जहा भिन्न-भिन्न रुचियो के निरन्तरित शिक्षा कार्यक्रम चलाये जाते हैं । व्यावसायिक तथा प्रौद्योगिकी वोर्ड, पीपुल्म एसोसिएशन, सिंगापुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का एक्स्ट्राम्यूरल विभाग, वाई० एम० सी० ए० वाई० डब्ल्यू० सी० ए०, सिंगापुर सशस्त्र बल, रिजविस्ट एसोसिएशन, आवासी समिति, नानेज ललितकला अकादमी तथा वाणिज्य स्कूल्स कुछ ऐसे संगठन हैं जो कि सतत् शिक्षा का कार्य करते है। हालाकि सभी अभिकरण स्वतन्त्र रूप से कार्य कर रहे हैं परन्तु ये एक-दूसरे के पूरक हैं। व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण बोर्ड, सिंगापुर सर्वप्रथम हम व्यावसायिक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण बोर्ड (VITB) देखने गये । वहां पर बोर्ड की सम्पर्क प्रबन्धक श्रीमती गेग एग नियो द्वारा हमारा स्वागत किया गया । उन्होने हमे वहा पर बोर्ड की कार्य-पद्धति से सम्बन्धित एक वृत्तचित्र बताया। वृत्तचित्र देखने के पश्चात् वी० आई० टी० बी० के बेसिक शिक्षा के प्रवन्धक श्री तान पेंग हौक से वेसिक शिक्षा पर विस्तार से चर्चा की। दूसरे दिन हम बी० आई० टी० बी० में सतत् शिक्षा निदेशालय देखने गये जहां पर श्रीमती अन्ना ही क्षेत्रीय निदेशक से मिले। श्रीमती ही ने हमें बोर्ड द्वारा चलाई जा रही विभिन्न गतिविधियो की जानकारी दी। तथा सम्बन्धित साहित्य भी दिया। सिंगापुर का व्यावसायिक एव औद्योगिक प्रशिक्षण बोर्ड (बी० आई० टी० बी०) सतत् शिक्षा की मुख्य जिम्मेदारी के साथ विकास तथा व्यावसायिक एव औद्योगिक प्रशिक्षण की व्यवस्था एव नियमन के लिए राष्ट्रीय सस्थान है । इसकी स्थापना अप्रैल 1979 मे प्रौढ शिक्षा बोर्ड (अप्रैल 1973 मे स्थापित) के विलयन द्वारा हुई। वी० आई० टी० बी० के मुख्य उद्देश्य निम्नानुसार हैं- 87 1. वाणिज्य एवं उद्योग में लगे अथवा लगना चाहने वाले व्यक्तियों के लिए प्रशिक्षण एव सशिक्षु प्रशिक्षण व्यवस्था करना तथा ऐसे लोगो को अग्रिम ज्ञान एवं प्रशिक्षण देकर उनके कौशल को बढ़ाना। 2. प्रशिक्षण की विधि एवं अवधि निर्धारित करना तथा यह तय करना कि प्रशिक्षण कब दिया जाये। 3. आवश्यकता के अनुसार समय-समय पर सतत् शिक्षा के कार्यक्रम सयो- जित करना। इस प्रकार बी० आई० टी० बी० का सम्बन्ध व्यवसायों तथा उद्योगों मे कौशल स्तर पर व्यावसायिक कार्यों से है । यह दस्तकारों कनिष्ठ तकनीशियनों तथा अग्रणी व्यवसाइयो की दक्षता में विकास कर उप दक्ष व्यक्ति बनाता है। सतत् शिक्षा वी० आई० टी० बी० के उद्देश्यों में से एक है सतत् शिक्षा की व्यवस्था करना जिसके अन्तर्गत अंशकालीन आधार पर प्रशिक्षण तथा शैक्षिक सुविधाएं प्रदान करना है। कार्यक्रम इस प्रकार सयोजित किये जाते हैं कि कामगार अधिक उत्पादक एवं सक्षम, बेहतर नागरिक एव वेहतर व्यक्ति बने । इस प्रकार वी० आई० टी० बी० का सतत् शिक्षा कार्य चोमुखी हो जाता है । 1. औद्योगिक, वाणिज्यिक, प्रयुक्त कला तथा सेवा क्षेत्रो के कामगारो के कौशल विकास तथा उन्हें आगे लाने की व्यवस्था करना । 2. वे व्यक्ति जो निजी विकास अथवा व्यवसाय में विकास हेतु शिक्षा प्राप्त करना चाहे उन व्यतियों एवं कामगारों के लिए औपचारिक शिक्षा तंत्र से बाहर शिक्षा की व्यवस्था करना। 3. भाषा में प्रशिक्षण अर्थात् सिंगापुर की मान्य भाषा मे प्रशिक्षण प्रदान करना इसके साथ ही सिंगापुर की अर्थव्यवस्था से सम्बन्धित भाषा मे भी प्रशिक्षण प्रदान करना। 4. कार्यबलों तथा सामान्य जनता के लिए सतत् शिक्षा कार्यक्रम की व्यवस्था करना। उपर्युक्त वातों को ध्यान में रखते हुए वी० आई० टी० बी० के सतत् शिक्षा कार्यक्रमों को निम्नलिखित चार भागो में बांट सकते हैं। 1. कौशल विकास कार्यक्रम 2. अकादमिक शिक्षा पाठ्यक्रम 3. भापा पाठ्यक्रम' 4. व्यक्तिगत विकास पाठ्यक्रम 88 प्रमाणीकरण एवं परीक्षण तंत्र वी० आई० टी० बी० के अन्तर्गत औद्योगिक सेवाओ तथा प्रयुक्त कलाओं का प्रमाणीकरण तत्र औद्योगिक प्रशिक्षण बोई द्वारा विकसित किया गया है। इसके अन्तर्गत तीन मूलभूत योग्यता स्तर उपलब्ध हैं : 1. औद्योगिक तकनीकी प्रमाण-पत्र 2. राष्ट्रीय व्यापार प्रमाण-पत्र 3 सक्षमता प्रमाण-पत्र औद्योगिक तकनीकी प्रमाण-पत्र व्यापार अथवा उद्योग आधारित कार्यक्रम है, इसके अन्तर्गत पर्यवेक्षीय कौशल विकास के साथ सैद्धान्तिक एवं प्रयोगशाला प्रशिक्षण भी दिया जाता है। यह दो वर्ष का पूर्णकालीन अथवा तीन वर्ष का अशकालीन कार्यक्रम है जिसमे 10 वर्ष की औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने वाले प्रदेश प्राप्त कर सकते हैं। राष्ट्रीय व्यापार प्रमाण-पत्र तंत्र कौशलो को मास्टर क्रॉफ्ट्समेन के स्तर तक पहुचने की क्षमता वाला विभिन्न कौशलो के प्रमाणीकरण हेतु निर्मित किया गया है। इस तंत्र का तीन स्तरीय वर्गीकरण किया गया है। 1. राष्ट्रीय व्यापार प्रमाण-पत्र प्रेड I यह उच्च कोशल स्तर का है जो कि मास्टर क्राफ्ट्समेन के समकक्ष है । यह प्रमाणपत्र कई वर्षों के अनुभव तथा कौशल में पूर्णता प्राप्त करने के बाद प्राप्त होता है। 2. राष्ट्रीय व्यापार प्रमाण-पत्र ग्रेड । यह पूर्ण प्रशिक्षित एव योग्य दस्तकार के स्तर का कौशल स्तर है जिसकी सशिक्षुकाल पूर्ण करने अथवा वर्षों तक कार्य के अनुभव के बाद दिया जाता है । 3. राष्ट्रीय व्यापार प्रमाण-पत्र प्रेड III यह अर्द्ध कौशल स्तर है जो कि सामान्यतया एक व्यक्ति किसी व्यावसायिक संस्थान में प्रशिक्षण प्राप्त करने अथवा 1 वर्ष का सशिक्षु प्रशिक्षण प्राप्त करने के वाद प्राप्त करता है। क्षमता प्रमाण-पत्र तन्त्र मानक स्थापित करने तथा कोशल के प्रमाणीकरण हेतु स्थापित किया गया है। पूर्णकालिक आवासीय प्रशिक्षण के प्रमाणीकरण हेतु प्रशिक्षार्थी के पाठ्यक्रम के दौरान प्रायोगिक कार्य तथा टेस्ट में प्रदर्शन के आधार पर मूल्याकन किया जाता है । उन्हें केवल पाठ्यक्रम समाप्ति पर एक परीक्षा (Test) मे बैठना होता है। इस पद्धति से प्रशिक्षणार्थियो की प्रगति का अनुश्रवण आसान तथा बेहतर होता है तया जहा भी आवश्यक हो सुधार किया जा सकता है । अशकालीन प्रशिक्षणार्थियो को एक मार्वजनिक परीक्षा में बैठना होता है । सार्वजनिक ब्यापार 89 परीक्षा उन व्यक्तियों के लिए भी खुली है जिन्होने अंशकालीन प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया है परन्तु अपने काम के दौरान अपने व्यवसाय क्षेत्र में पर्याप्त कौशल तथा तकनीकी ज्ञान प्राप्त कर लिया है। राष्ट्रीय व्यापार प्रमाण-पत्र एवं दक्षता प्रमाण-पत्र तंत्र राष्ट्रीय व्यापार प्रमाण-पत्र (अभी तक आरम्भ नहीं किया गया) ग्रेड I (NTCI) दक्षता प्रमाण-पन्न राष्ट्रीय व्यापार प्रमाण-पत्र प्रेड II (N.T.C.II) 5 वर्ष का समकक्ष 2 वर्ष का 2 वर्ष का सम्बद्ध माड्यूल मान्यता प्राप्त संबद्ध कार्यानुभव सशिक्षु कार्य प्रशिक्षण अनुभव 2 वर्ष का संबद्ध कार्यानुभव 2 वर्ष का राष्ट्रीय व्यापार प्रमाण-पत्र प्रेड III (N.T.C.III) 1 वर्ष का पूर्णकालिक 1 वर्ष का पूर्णकालिक आवासी मान्यता सम्बद्ध आवासी प्रशिक्षण के प्राप्त कार्यानुभव प्रशिक्षण समकक्ष राशिक्षु मॉड्यूल प्रशिक्षण राष्ट्रीय घ्यापार प्रमाण-पत्र के अन्तर्गत सार्वजनिक व्यापार परीक्षा में बैठना चाहने वाले व्यक्ति जिन्होने अंशकालीन प्रशिक्षण प्राप्त नहीं किया है उन्हें सार्व- जनिक व्यापार परीक्षा में बैठने के लिए स्वय को पंजीकृत कराने हेतु एक पूर्व परीक्षा देनी होती है। इस परीक्षा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल वे लोग ही परीक्षा मे बैठे जो कि इसमें बैठने की पर्याप्त तैयारी रयते है । इग पद्धति से उन व्यक्तियों पर साधन व समय नष्ट नही होता जो कि पूरी तैयारी नहीं रखता। साथ ही अदक्ष व्यक्ति के हाथ में न जाने से महगे उपकरण तथा औजार भी घराव नहीं होते। अशालीन पोशल विकास पाठ्यक्रम को नियमित उपस्थिति पाठ्यत्रम, विषयवस्तु मैदान्तिक एवं प्रायोगिक कार्यों मे भेद तथा पाठपत्रम अवधि को अपनी 90 सीमाएं हैं । इन कमियों को दूर करने के लिए वी० आई० टी० बी० ने 1980 मे इस पाठ्यक्रम के नियोजन योग्य कौशलो के माड्यूल्स को पुनर्गठित किया। प्रशिक्षण के मॉड्यूल्स के तन्त्र की मुख्य विशेषताएं निम्नानुसार हैं : 1. प्रत्येक मॉड्यूलर यूनिट पूर्ण पाठन कार्यक्रम हैं । 2. प्रत्येक मॉड्यूलर यूनिट एक पद कार्य मे कार्यसंगठन के अन्तर्गत एक स्वीकृत कार्यखण्ड को दर्शाता है। 3. प्रत्येक मॉड्यूलर यूनिट मे पाठन को सार्थक मात्रा समाहित है तथा कामगार के सामने एक निश्चित लक्ष्य होता है जिससे माड्यूल पूर्ण करने पर उसमे लक्ष्य प्राप्ति की भावना जाग्रत होती है। मॉड्यूलर तन्त्र को काम में लेने के तिहरे लाभ हैं । प्रथमतः, कामगार केवल उस मॉड्यूल में ही नामांकन कराता है जो कौशल वह सीखना चाहता है। इस प्रकार प्रशिक्षण अवधि कम हो जाती है। दूसरा, एक कामगार काम विशेष मे यदि वह चाहे तो उच्च कौशल प्राप्त कर सकता है। तीसरा, एक कामगार जो अपने कार्य की प्रकृति के कारण लम्बे समय तक प्रशिक्षण में उपस्थित नहीं रह सकता उसे जब भी समय मिले उसी स्थान से आगे आरम्भ कर सकता है जहा से उसने छोडा है। नियोजन योग्य कौशल के मॉड्यूल एक सम्पूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम है जिसमें कई मॉड्यूलर इकाइयों के समूह हैं जो कि निश्चित नियोजन योग्यताओं को प्राप्त करने की ओर अग्रसर करते हैं। यह एक विशिष्ट प्रशिक्षण आवश्यकता का विशेष उत्तर है जो कि नियोजन अवसरो अथवा योग्यताओ की ओर ले जाता है। इन प्रशिक्षण आवश्यक्ताओं पर जिन सामाजिक, सास्कृतिक, आर्थिक तथा अन्य बातों का भी असर होता है उनका भी ध्यान रखा जाता है। प्रत्येक नियोजन योग्य कौशल के अपने स्वयं के प्रशिक्षण उद्देश्य हैं। एक कामगार जव एक प्रशिक्षण मॉड्यूलर पूर्ण करता है तो मॉड्यूल परीक्षा का अन्त नहीं है । मॉड्यूल्स का केवल सार्वजनिक व्यापार परीक्षा के लिए उपयोग किया जाता है । वह कोई भी मॉड्यूल चुनने के लिए स्वतन्त्र है जिसमे वह प्रायो- गिक कौशल अयवा सैद्धान्तिक ज्ञान कम रखता हो । एक कामगार जो कि कम- से-कम एक मॉड्यूल में उपस्थित रहा है उसे सार्वजनिक व्यापार परीक्षा में बैठने के लिए स्वयं को पजीकृत नही करना होता । उमे इस स्तर का मान लिया जाता है कि वह यन्त्रों तथा उपकरणो पर विना उन्हे अथवा स्वयं को नुकसान पहुचाये काम कर सकता है। तकनीकी अथवा देश की आर्थिक संरचना में परिवर्तन के कारण जो कौशल पुराने हो जाते हैं ऐसे अकुगल, अद्धकुशल कामगारो को प्रशिक्षित करने के लिए मॉड्यूल बहुत उपयोगी हैं। प्रत्येक मॉड्यूल 1 वर्ष की अवधि का है जबकि 91 सम्बन्धित व्यवसाय में लगे कारोबार के लिए यह छ: माह का ही है । एक मॉड्यूल पूर्ण करने पर कामगार तकनीकी कार्यों पर लग सकते हैं तथा अन्य मॉड्यूल में प्रशिक्षण प्राप्त करना भी चालू रख सकते है । सिंगापुर में बदलते सन्दर्भ सिंगापुर का सामाजिक आर्थिक तानाबाना पचीला तथा तकनीकी आधारित है। एक कामगार के कौशल को उसकी क्षमता के भीतर पूर्णता के शिखर तक पहुचाना चाहिए । आज के वक्त मे कामगार की उत्पादकता सामूहिक कार्य पाबदी, कार्य अनुशासन, सुरक्षा तथा उसके कौशल पर निर्भर है। स्कूल छोड़ने वाले अव बेहतर शिक्षित, वेहतर आवासी तथा अलग से नजर आते है। कामगारो में गुणात्मक परिवर्तन ने कार्य स्थितियों, प्रबन्ध कामगार सम्बन्धो तथा वांछित प्रशिक्षण की प्रकृति तथा गुणात्मकता को प्रभावित किया है। बी० आई० टी० बी० का उद्देश्य है कि प्रत्येक मजदूर को उसके कौशल अथवा व्यवसाय में उच्चतम स्तर प्राप्त करने के अवसर प्राप्त हो । प्रशिक्षण आवासी कार्यक्रम के साथ आरम्भ होता है तथा जीवन-पर्यन्त चलता है। यह नियोजन के दौरान आगे बढ़ने, कार्य विस्तार पाठ्यक्रम बदलकर अथवा समकक्ष या उच्च योग्यताएं प्राप्त कर और सतत् शिक्षा द्वारा होता है। वी० आई० टी० बी० के कार्य हैं-पहला, शाला छोड़ने वालों को उद्योग अथवा वाणिज्य क्षेत्रो में कौशल स्तर पर कार्य करने के लिए तैयार करना तथा कामगारों व अन्य वयस्कों को आत्म-विकास के लिए अवसर प्रदान करना। बोर्ड का उद्देश्य प्रशिक्षण तथा सतत् शिक्षा प्रदान करना है जिसके अन्तर्गत सभी अशकालीन शैक्षणिक तथा प्रशिक्षण गतिविधियां सम्मिलित हैं । कार्यक्रम निम्नलिखित विशिष्ट उद्देश्यों के साथ चलाये जाते हैं : (अ) काम करने वालों को सक्षम तथा उत्पादक बनाना। (आ) शाला छोड़ देने वालो को शिक्षा प्राप्त करने का दूसरा अवसर प्रदान करना। (ई) व्यक्तिगत विकास के गुणों को बढ़ाना। अफादमिक शक्षिक पाठ्यक्रम ये पाठ्यत्रम शाला से बाहर के व्यक्तियों को तीन स्तरो के सामान्य शिक्षा पत्र (normal ordinary and advanced) प्राप्त करने की अकादमिक योग्यता प्राप्त करने के अवसर प्रदान करते हैं । अंग्रेजी तथा गणित के पाठ्यक्रम भी उपलब्ध हैं।
92 भापा पाठ्यक्रम सिंगापुर में भाषाई पाठ्यक्रम के अन्तर्गत चार सरकारी भाषाम्रो अंग्रेजी, मलय, मेण्डरिन और तमिल तथा अन्य विदेशी भापायो तथा अरबी, फ्रेंच, जापानी तथा थाई को भी पाया जाता है । इन पाठ्यक्रमो में वार्तालाप दक्षता एव वार्ता- ताप दक्षता के साय लिखित भाषा में दक्षता पाठ्यक्रम भी उपलब्ध है। ये पाठ्यक्रम समाज के विभिन्न वर्गों के तथा विभिन्न स्तरो के व्यक्तियों की आवश्य- कता से मेल खाते हुए होते है । . निर्देशिका वी० आई० टी० बी० द्वारा सतत् शिक्षा एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम के सभी पाठ्यक्रम प्रतिवर्ष दो निर्देशिकाओ में प्रकाशित किये जाते हैं । प्रवेश योग्यता सतत् शिक्षा एवं प्रशिक्षण पाठ्यक्रम उन व्यक्तियो की ओर उन्मुख है जो नियोजित होना चाहते हैं अथवा नियोजन में हैं । यह सुनिश्चित करने के लिए कि व्यक्ति उन पाठ्यक्रमों से लाभान्वित हो रहे हैं जो वे सीपना चाहते हैं। इसके लिए अधिकाश अकादमिक शिक्षा, भाषा तथा व्यावसायिक कौशल विकास पाठ्य- क्रमो मे उपयुक्त प्रवेश योग्यता रखी गयी है। सिंगापुर के नागरिक स्थायी निवासी तथा वे विदेशी जो कि कार्य करने का अनुज्ञापत्र अथवा नियोजन पास रखते हैं, इन पाठ्यक्रमों मे प्रवेश पा सकते है । अनुदेशन माध्यम यदि अन्य बात न कही गयी हो तो सामान्यतया अनुदेशन माध्यम अग्रेजी है। जहा तक सम्भव हो इन पाठ्यक्रमों का सचालन बोर्ड की अपनी स्वय की सुविधाओ मे ही किया जाता है। परन्तु वर्तमान मे 40 से अधिक केन्द्र शिक्षा विभाग द्वारा संचालित स्कूल्स मे चल रहे हैं । मामान्य जनता की सुविधा के लिए ये केन्द्र पूरे गणतन्त्र मे फैले हुए है। जहां तक सम्भव हो केन्द्र निर्दिष्ट स्थान पर ही चलाये जाते हैं केवल उपस्थिति को ध्यान मे रखा जाता है । कोई भी पाठ्यक्रम तभी चलाया जाता है जबकि न्यूनतम आवश्यक नामाकन हो जाये । नियोजको की प्रार्थना पर यदा कदा जब भी आवश्यक हो तदर्थ पाठ्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं । सामान्यतया सभी पाठ्यक्रम रात्रि सात से दस बजे के बीच चलाये जाते हैं। जो व्यक्ति निर्धारित जांच परीक्षा में सफल होता है उसे उपलब्धि स्तर का उल्लेख करते हुए कुशलता प्रमाण-पत्र दिया जाता है।
93 फीड बैंक (Feed Bacl.) समयबद्ध सर्वे तथा मूल्यांकन के द्वारा बोर्ड अपने प्रशिक्षण प्रयासो का फीड बैंक (feed back) प्राप्त करता है । इसका उद्देश्य पाठ्यक्रम की पर्याप्तता, विषय- वस्तु तथा संगठन की सम्बद्धता ज्ञात करना है । फीड बैंक के तथा अन्य प्रपत्रों को भरने के लिए सम्भागियों का सहकार चाहा जाता है। जिससे कि प्रशिक्षण तथा सत्त शिक्षा के दूसरे कार्यक्रम और भी अधिक अच्छे बनें। श्रमिक संगठन सिंगापुर मे महिलाओं सहित सभी नागरिकों को समान अधिकार है । सभी व्यक्तियो को समानता के आधार पर कार्य प्राप्त करने के अधिकार है । तथा सभी श्रमिक श्रम संगठनो के सदस्य बनने के अधिकारी हैं। मौलिक प्रशिक्षण कार्यक्रम श्रम संगठनो द्वारा चलाये जाते हैं। उन्हे इसके लिए सभी सुविधाए उपलब्ध हैं । सरकार भी उन्हें सभी आवश्यक सहायता प्रदान करती है। सरकार व श्रम संगठनों मे अच्छे सम्बन्ध हैं। कौशल विकास निधि सभी कामगारो को अपने वेतन का 2 से 4 प्रतिशत इस निधि के लिए देना आवश्यक है । इस निधि से प्रशिक्षण का खचं चलता है। बस्ट (Basic Education for Skill Training, BEST) इसका खर्चा भी कौशल विकास निधि से प्राप्त किया जाता है। जनसंख्या 1985 में सिंगापुर की जनसंख्या 25,60,000 थी । वहा पर जनसंख्या पूर्ण नियन्त्रण में हैं। आथिक स्थिति आर्थिक रूप से सक्रिय 11,18,000 असक्रिय 8,80,000 कार्यरत 10,77,000 बेरोजगार 39,000 घरेलू कामों पर 38,000 विद्यार्थी 3,48,000 1,54,000 भन्य 94 1 कोई शैक्षिक योग्यता नहीं 2,49,000 22% 2 प्राथमिक शिक्षा 5,61,000 50% 3 माध्यमिक शिक्षा 1,81,000 16% 4 उच्च माध्यमिक शिक्षा जी०ई०सी० सहित 85,000 8% 5 उच्च शिक्षा, अधिस्नातक एव डिप्लोमा सहित 40,000 4% 10 वर्ष से ऊपर आयु के आर्थिक रूप से सक्रिय व्यक्ति कोई योग्यता नहीं प्राथमिक शिक्षा 10-39 1,10,000 4,65,000 40 वर्प एव ऊपर 1,39,000 96,000 आयु वर्ग 2,49, 000 5,61,000 सरकार उपर्युक्त व्यक्तियों के कौशल विकास मे गहन रुचि ले रही है। 10-39 वर्ष की आयुवर्ग के व्यक्तियो के कौशल को बढ़ाने के लिए सर्वोत्तम कार्यक्रम बनाये जा रहे हैं। सिंगापुर मे केवल 1,10,000 व्यक्ति निरक्षर हैं। इन्हे माक्षर करने के लिए भापाई पाठ्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। मैं यहा पर सतत् शिक्षा एव प्रशिक्षण कार्यक्रम की क्षेत्रीय निदेशक श्रीमती अन्ना ही, बाह्य सम्बन्ध को प्रवन्धक सुश्री एंग नियो तथा बी० आई०टी० बी० के बेसिक शिक्षा प्रबन्धक श्री तानवेंग हॉक का धन्यवाद करना नहीं भूलूंगा जिन्होने मुझे अपने अध्ययन कार्यों में सहयोग किया। लोक समिति सिंगापुर में लोक समिति (Peoples Association) एक बहुत महत्वपूर्ण सगठन है जोकि स्वैच्छिा प्रयास द्वारा नागरिकता प्रशिक्षण, सामाजिक विकास एवं कल्याण सेवाएं प्रदान करने में विशिष्ट भूमिका निभा रही है । इन मैवाओं का केन्द्र सामुदायिक केन्द्र है जो कि पूरे देश में कार्यरत हैं। मैं 14 सितम्बर को लोक समिति के मुख्यालय पर गया जहा पर मुख्य जनसम्पर्क अधिकारी श्री चेन Nिus-950 चू ली ने इसके कार्यक्रमों की जानकारी दी तथा समिति के कार्यो पर बनाया गयो एक वृत्तचित्र वताया। लोक समिति एक वैधानिक संगठन है जिसकी स्थापना 1 जुलाई 1960 को हुई। उन दिनों साम्यवादियों के कारण देश में भारी अशांति थी । सम्प्रदायवादी तथा गुप्त संगठन गरीबों तथा असंगठित लोगों का शोएण कर रहे थे। सिंगापुर का जीवन ही खतरे में था। उस समय सरकार के सामने मुख्य समस्या राजनैतिक स्थिरता, जातीय सद्भाव तथा आर्थिक विकास एव जनरुचि कायम करने की थी। अत. लोक समिति ने एक मुख्य सगठन के रूप मे सिंगापुर की सांस्कृतिक जातीय एव धार्मिक विभिन्नताओं मे राष्ट्रीय एकता एव पहचान को विकसित करने मे सहयोग दिया तथा लोक समिति के राष्ट्रव्यापी सामुदायिक केन्द्रों के तंत्र ने सरकार तथा जनता के बीच एक सेतु का कार्य किया। लोक समिति ने हर सम्भव तरीके से जनता की सेवा करने मे सहयोग दिया। इस कार्य को अधिक प्रभावी रूप से सम्पादित करने हेतु समिति अपने संसाधनो को न केवल वर्तमान बल्कि नई आवश्यकताओं एवं रुचियों को पूर्ण करने की ओर अग्रसर करती रहती है। लोक समिति के उद्देश्य सिंगापुर के लोगों में सामाजिक, सास्कृतिक, शैक्षिक एवं पुष्टकार्य गति- विधियों में समूह भागीदारी तथा संगठन विकसित करना जिससे वे महसूस करें कि वे एक बहु जातीय समाज के अग हैं। नेताओं में बहुजातीत समुदाय के लिए प्रतिबद्ध सेवाएं प्रदान करने तथा राष्ट्रीय पहचान की भावना भरने हेतु ऐसे संगठनों की स्थापना करना जो कि नेतृत्व प्रशिक्षण के लिए आवश्यक है तथा ऐसे कार्य भी कर सके जो कि उद्देश्यों से मेल खाते हो। संगठन का स्वरूप प्रवन्ध बोर्ड लोक समिति की नीति का निर्धारण करता है। प्रधानमंत्री इम बोर्ड का अध्यक्ष होता है। वह एक मंत्री को उपाध्यक्ष नियुक्त करता है, आठ अन्य सदस्यों को नियुक्त किया जाता है तथा चार सदस्य निगम सदस्यों में से जाते हैं। नीतियो का वियाग्ययन सचिव कोपाध्यक्ष द्वारा किया जाता है जो कि गंगठन का मुख्य प्रबन्ध निदेशक भी होता है। चुन लिये 96 सामुदायिक केन्द्र तथा उसकी गतिविधियां लोक समिति की स्थापना विभिन्न जातीय, भाषाई, आय एवं धार्मिक समूहो को एक समरस एवं सशक्त समूह मे संग्रथित करने हेतु को गयो। यह कार्य सामुदायिक केन्द्र के कार्यक्रमो मे सामूहिक भागीदारी तथा मनोरंजक एवं शैक्षिक गतिविधियो द्वारा तथा राजनीति से दूर रहते हुए किया जाता है । सिंगापुर गणतन्त्र के विकास तन्त्र के निर्माण मे सिंगापुर की विशिष्ट संस्था सामुदायिक केन्द्र एक प्रमुख कारक के रूप में उभर कर आया है । यह महत्व सामुदायिक केन्द्र के उद्देश्यों में भी समाहित है । ये केन्द्र जैसे-जैसे अपने उद्देश्यो की ओर अग्रसर होते हैं सामूहिक रूप से राष्ट्र निर्माण के साधन बनते जाते हैं इस प्रकार सिंगापुर के भविष्य में इनकी भूमिका विशेष स्थान रखती है इस समय यह सुनिश्चित करना और भी अधिक आवश्यक हो जाता है कि सामुदायिक केन्द्र निर्दिष्ट क्षेत्रों मे काम करते हुए यह ध्यान रखें कि समय की मांग क्या है ? वर्तमान मे सिंगापुर तकनीकी औद्योगिक शान्ति तथा उच्च शिक्षा-स्तर वाले धनिक समाज के शहरीकरण की देहरी पर खड़ा है। गत दो दशको मे सिंगापुर की जीवन पद्धति मे आये मौलिक परिवर्तन को देखें तो सामुदायिक केन्द्रो की भूमिका को नये आयाम देने होगे । उन्हें पर्यावरण से उच्च घनत्व एव वढाय विशेष रूप से उपनगरों में समुदायो के केन्द्रीकरण के अनुकूल ढलना होगा। जन-विद्याकर्मियों की भविष्यवाणी कि सन् 2000 ता सिंगापुर में 12.7% जनसंख्या 55 साल से ऊपर की होगी तथा पुरुष का जीवन काल 70 तथा महिला का 73 वर्ष तक होगा। ऐसी स्थिति में जनता की आवक्षिाओं की पूर्ति के लिए सामुदायिक केन्द्रो को अपने कार्यकलापो को नये आयाम देने होंगे। ये पुछ प्रारम्भिा परिवर्तन हैं जो fr सामुदायिक केन्द्रो को करने होगे। परन्तु यह यान तप है कि आने वाले कई वर्षों तक मामुदायिक केन्द्रों के उद्देश्यो पा मूलभूत मूत्र वही रहेगा । यदलने मन्दों में कुछ अनुकुलन के साथ क्रियान्विति भेद हो सकता है। मोम समिति द्वारा 158 मे अधिक सामुदायिक केन्द्र स्थापित पिये गये है। इन केन्द्रों का प्रवन्ध लोक समिति व कर्मचारियो सपा प्रबन्ध समिति के सदस्योहारा जो कि स्पगेवर होते हैं किया जाता है। मामुदायिक वन्त्री कार्यों में जनहित गहभागिता यो वनाने तथा स्थानीय सामुदापित नेताओं को जन मेया के अवसर प्रदान करने के लिए सरकार ने गापुति पेन्द्रप्रयाय ममिति बनाने शानिय लिया है । इस समिति का मुग्य पाई ममी भावों में क्षिा, गेलर, गरिसनिा, मनोरजन और मामाविर पायो यहाना, गौर नीतियों को गमताना, तगा गरसार तर जनसा की प्रामासनामी तपा ममायामारोपापाना है। प्रपा पेन्द्र पार यह गहरी में 97 केन्द्र हो या ग्रामीण उसके अपना एक कार्यालय तथा भण्डारगृह होता है । शहरी केन्द्र पर इनके अतिरिक्त एक सभा कक्ष, एक वाचनालय कक्ष, विभिन्न समितियों के लिए एक कार्यालय कक्ष तथा अधिकांश केन्द्रों पर खेलों के लिए बास्केटबाल तथा वेडमिंटन कोर्ट है। एक शहरी केन्द्र के निर्माण में 20,000 डालर की लागत आती है जबकि ग्रामीण केन्द्र पर 8000 डालर ही लगते हैं। आर्थिक सफलताओं तथा धनाढ्यता से नई मांगें पैदा हुई हैं जो कि पुराने केन्द्रों पर पूर्ण नहीं की जा सकती। नये केन्द्र 8 करोड़ डालर की लागत से बने हैं जिनमें कि एक सामान्य कार्यालय, दो समिति कार्यालय, कान्फ्रेंस के कमरे, गृह उद्योग का कमरा, खेलकूद का कमरा, एक बड़ा हॉल तथा मंच तथा वाचनालय है। इसके अतिरिक्त एक लाउंज, विलियर्ड कक्ष, वातानुकूलित ध्वनि नियन्त्रित संगीत कक्ष, स्वास्थ्य कक्ष, फोटोग्राफी के लिए कृष्ण कक्ष, कला एवं उद्योग कार्यशालाएं दो बाल फुलवारी कक्ष, दो स्ववेश कक्ष तथा टेनिस का मैदान भी इसके साथ होते हैं। वहां पर 61 ग्रामीण केन्द्र तथा 35 अस्थायी केन्द्र हैं । 45 शहरी एवं अदंशहरी केन्द्र कार्यरत हैं तथा 17 आधुनिक केन्द्र पूर्ण हो चुके हैं । उनका कहना है कि सामुदायिक केन्द्रों की सफलता वहां की जनता पर निर्भर करती है सुविधाएं तथा केन्द्र संचालन के लिए सरकार कर्मचारी तो दे सकती है परन्तु नेतृत्व तथा अपनापन तो समुदाय द्वारा ही आता है। इन्हीं शब्दों के साय प्रधानमन्त्री श्री लोकुआन ये ने पहले सामुदायिक केन्द्र का उद्घाटन किया पा। सभी 158 केन्द्रों का प्रवन्ध स्वयं जनता द्वारा किया जाता है । जनता स्वयं इन केन्द्रों की मालिक है। 1971 से अब तक जनता द्वारा इन केन्द्रों के निर्माण हेतु 2 करोड़ डालर एकत्र किये गये। यह उन लाखो डालर के अतिरिक्त है जो कि जनता द्वारा केन्द्रों के दिन-प्रतिदिन के कार्यों हेतु लगाये जाते हैं। 1964 से जबकि प्रबन्ध समिति द्वारा केन्द्र संचालन की जिम्मेदारी उठाई गयी है । जनता द्वारा इसके दैनिक संचालन का 87 प्रतिशत सहयोग के रूप में दिया गया है। राष्ट्रीय युवा नेत प्रशिक्षण संस्थान सन् 1964 मे लोक समिति की प्रशिक्षण इकाई के रूप मे राष्ट्रीय युवा नेत प्रशिक्षण संस्थान (National Youth Lendership Training Iustitutc) की स्थापना की गयी। इसके उद्देश्य निम्नानुसार है: -गामुदायिक नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देना। -पामाजिक एवं राजनैतिक चेतना बढ़ाना। -नेतृत्व के गुण भरना। -सामुदायिक सेवाओं के लिए समर्पण का विकास करना।
98 संस्थान के कर्मचारी नियमित प्रशिक्षण के अतिरिक्त सामुदायिक प्रेरकों, विद्यार्थियों, श्रम संगठनो आदि तक विभिन्न नेतृत्व प्रशिक्षण कार्यक्रमों द्वारा पहुंचते हैं। संस्थान एशिया, राष्ट्रकुल तथा अन्य देशों के संभागियों के लिए कई अन्तर्राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय कार्यशालाओ, बैठको आदि का आयोजन स्थल रहता संस्थान में अन्तर्राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय कार्यशालाए एव वैठकें होती हैं जिनमे एशिया, राष्ट्रकुल तथा अन्य देशों के लोग भाग लेते हैं। युवा गतिविधियां लोक समिति की युवा गतिविधियों सामुदायिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । इसके अन्तर्गत युवाओं के लिए सेलकूद, मनोरंजन' शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधिया आयोजित की जाती हैं । जिसमें सामुदायिक सेवाओ में युवा भागीदारी एवं नेतृत्व को बहुत महत्व दिया जाता है। लोक समिति तथा युवा गतिविधियों के सदस्य सामुदायिक एवं कल्याण कार्यों तथा राष्ट्रीय अभियान जरूरतमन्द छात्रों की शिक्षण योजना, नशा छोड़ देने वालो के लिए सलाह सेवा तथा कल्याण अभिकरणों की सेवाए देना आदि में नेतृत्व अथवा सहयोग देते खेलकूद सामुदायिक केन्द्रो पर बास्केटवाल, वेडमिंटन तथा वालीबाल जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। 1977 के बाद लोक-समितियों ने अपनी गतिविधियों को तेजी से बढाया है, जिसके अन्तर्गत नयी पीढी के सामुदायिक केन्द्रों का निर्माण भी सम्मि- लित है। ये केन्द्र संगीत एवं नृत्य अध्ययन स्ववेश तथा टेनिस मैदान तथा स्वास्थ्य एव शारीरिक क्षमता उपकरणो से सज्जित है । वर्ष भर अन्त क्लब क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर खेलकूद, टूर्नामेंट, प्रति. योगिताएं तथा मैत्री खेल आयोजित किए जाते रहते हैं। निरन्तरित शिक्षा कक्षाएं सामुदायिक केन्द्र पर पाकशास्त्र से लेकर रेडियो तथा कार सुधारने की कक्षाए नियमित रूप से आयोजित की जाती हैं। ये कक्षाएं उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी हैं जो कि इसे शुगल के रूप में अथवा जीविकोपार्जन के लिए सीखना चाहते हैं ।
99 विशेष सेवाएं लोक समितियों तथा इसके सामुदायिक केन्द्रों के जाल द्वारा जो अन्य प्रायोजनाएं चलाई जाती हैं। वे निम्नानुसार हैं : -सेवा निवृत्त तथा सेवा योजना। -~पड़ोसीपन कार्यक्रम । -समय से पूर्व शाला छोड़ने वालो का कार्यक्रम । -वरिष्ठ नागरिक क्लब । --उप शिक्षण कक्षाएं। -- कल्याण गृहो एवं सगठनों हेतु स्वैच्छिक सेवाएं। समाज शिक्षा सामुदायिक केन्द्रो द्वारा विभिन्न भाषाओं में मामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक एवं अन्य विषयों पर फोरम, वार्ताएं तथा वाद-विवाद आयोजित किए जाते हैं । इन कार्यक्रमो का उद्देश्य लोगों को अपने पर्यावरण तथा मामाजिक उत्तरदायित्वों से बेहतर परिचित कराना है। सामुदायिक केन्द्र लोगों में सूचना प्रसार तथा वांछित सामाजिक मूल्यों की स्थापना के अच्छे माध्यम का काम करते हैं। बाल फुलवारियां लोक समिति द्वारा 1964 से ही बडे पैमाने पर बच्चो के लिए बाल- फुलवारियां अथवा पूर्व शालायी शिक्षा केन्द्र चलाये जा रहे हैं । कक्षाओं में योग्य अध्यापकों द्वारा अग्रेजी, मलय तथा मंडेरियन भाषाएं सिखाई जाती है। हाल के वर्षों में वाल फुलवारियों के लिए सुविधाओं में सुधार हुआ है, उपयुक्त उपस्कर लगाये गये हैं, कार्यपत्रों को नियमित रूप से संशोधित किया जाता है, शिक्षको के कौशल-स्तर को बढाने के लिए अधिक प्रशिक्षण कार्यक्रम तथा सेमिनार आदि आयोजित किये जाते हैं। बालकों की शिक्षा हेतु तथा औपचारिक शिक्षा को पूर्व तयारी के लिए अभिभावकों द्वारा सेल द्वारा शिक्षा पद्धति को मान्यता प्राप्त हुई है। सांस्कृतिक गतिविधियां सामुदायिक केन्द्रों द्वारा लोगो मे चेतना जागृति हेतु राष्ट्रीय स्तर पर सास्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। .
100 ये कार्यक्रम लोक समिति के सांस्कृतिक दल द्वारा आयोजित किये जाते हैं। इस दल में चीनी वाद्यव द, सेना का बैंड, युवतियों का बैग पाइप बैंड, एक कॉइर, एक रिंगिंग दल, एक नृत्य दल तथा कई अन्य संगठित समूह हैं । सामुदायिक केन्द्रों द्वारा मंच पर लोक कार्यक्रम के अतिरिक्त नाटक, नृत्य, सगीत आदि के पाठ्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं। यह सिंगापुर की संस्कृति के पोपण का महत्वपूर्ण कदम है। सिंगापुर लोक समिति की वार्षिक प्रायोजना जिसने स्थानीय तथा विदेशी लोगो का ध्यान अपनी ओर विशेष रूा से आकर्षित किया वह है, सिंगापुर मोनेके फेस्टिवल तथा चिगे प्रोशेसन । सेरेगांव सामुदायिक केन्द्र पर 14 अक्टूबर, 1985 को मै सेरेगांव बागान सामुदायिक केन्द्र देखने गया। वहां पर अधिकारियों एवं प्रतिभागियो से चर्चा की। यहा पर हम सामुदायिक केन्द्र प्रवन्ध समिति के अध्यक्ष श्री टेंकॉक हाव तथा संगठन सचिव श्री चियाग जिन पाई से मिले तथा पिपुल्स एसोसिएशन एव सामुदायिक केन्द्रों के सम्बन्ध के बारे में बात की । सामान्य मत यह था कि पिपुल्स एसोसिएशन अपने उद्देश्य विशेष रूप से समरस तथा एकता वाले समाज के निर्माण को प्राप्त करने में सफल रहा है। सभी का मानना है कि इन केन्द्रों का सिंगापुर में जन-स्तर (Grass-root) तक प्रभाव पड़ा है । सामान्य जन व्यावसायिक पाठ्यक्रम सीखते हैं तथा मनोरजन की गतिविधियो मे भाग लेते हैं । पर इसके साथ ही वे महसूस करते हैं कि बदलते समाज मे बालकों, युवाओ तथा वरिष्ठ नागरिको के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना शेप है। हालाकि ये सामुदायिक केन्द्र प्रबन्ध समिति द्वारा सचालित किये जाते हैं, परन्तु इनके सचालन में जनता द्वारा भी हर सम्भव सहायता की जाती है। प्रत्येक संसदीय क्षेत्र के लिए एक सामुदायिक केन्द्र है तथा वहा का संसद सदस्य इसका अध्यक्ष होता है। इस कारण इन केन्द्रों को राजकीय सहायता उपलब्ध होने में आसानी रहती है । सिंगापुर गणतन्त्र का यह एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है।
101 सिंगापुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय एक्स्ट्रा म्यूरल अध्ययन विभाग एक्स्ट्रा म्यूरल विभाग के निदेशक डॉ० लिमहोय पिक के हार्दिक स्वागत से हमारा अध्ययन कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। यहां पर हमने विभाग द्वारा संचालित केन्द्रों तथा गतिविधियों का अध्ययन किया तथा उन पर चर्चा की। यह विभाग 21 जून, 1966 को स्थापित हुआ। दो वर्ष बाद सिंगापुर विश्वविद्यालय द्वारा एक्स्ट्रा म्यूलर पाठ्यक्रमो का कार्यक्रम आरम्भ किया गया। अब यह सिंगापुर विश्वविद्यालय का असंकायी विभाग है। विभाग का उद्देश्य निम्नलिखित दो चीजें उपलब्ध करना है : -नव स्वतन्त्र राष्ट्र धित मूलभूत मुद्दो की समझ बनाने हेतु निरन्त- रित शिक्षा कार्यक्रम। -~-काम करने वाले लोगों के व्यावसायिक एवं तकनीकी कौशल स्तर को ऊपर उठाने के लिए प्रशिक्षण देना। एक्स्ट्रा म्यूरल, अध्ययन विभाग अपनी स्थापना के समय से ही शहरी समाज की आवश्यकता एवं रुचि के अनुरूप निरन्तरित शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्रदान कर रहा है अत: इसके पाठ्यक्रमों मे विभिन्न प्रकार के विषय यया कला, वाणिज्य, अर्थशास्त्र, शिक्षा, विधि, चिकित्सा, दर्शन, राजनीति तथा सामाजिक प्रबन्ध के विभिन्न क्षेत्र आभियान्त्रिकी तथा सामाजिक प्रबन्ध के विभिन्न क्षेत्र, अभियान्त्रिकी तथा कम्प्यूटर विज्ञान आदि सम्मिलित हैं। अधिकांश पाठ्यक्रमों में कोई प्रवेश परीक्षा नहीं है । ये पाठ्यक्रम अधिकतर अंग्रेजी तथा मेन्डेरियन भाषा में चलाए जाते हैं । ये सभी परीक्षा रहित पाठ्यक्रम हैं, अतः इनमें किसी प्रकार का प्रमाण-पत्र नहीं दिया जाता। इन कक्षाओ में होने वाली चर्चाओं में सभी की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाता है। अधिक-से-अधिक लोगो तक पहुंचने के लिए विभाग विकेन्द्रीकरण की नीति को महत्व देता है। संस्थान पर आयोजित होने वाली कक्षाओ के अतिरिक्त साप्ताहिक अवकाश एवं सेमिनार दिवसों को छोडकर अधिक-से-अधिक कक्षाएं घाटरलू केन्द्रों पर आयोजित की जाती हैं। करीब-करीब सभी कक्षाएं सार्यकाल 5.30 से 10 बजे के बीच आयोजित की जाती हैं। विभाग प्रति वर्ष चार माह के अंतराल से 3 पाठ्यक्रम आयोजित करता है। संभागी जो किसी पाठ्यक्रम विशेष मे 75% से अधिक उपस्थित हुआ है उसे प्रार्थना करने पर निदेशक द्वारा उपस्थिति प्रमाण-पत्र दिया जाता है। यह प्रार्थना 102 पाठ्यक्रम समाप्ति के 1 वर्ष के अन्दर अन्दर प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत कर दी जाती है । इसके बाद कोई प्रमाण-पत्र नहीं दिया जाता। प्रौढ़-शिक्षा में डिप्लोमा पाठ्यक्रम ब्रिटिश कोलम्बिया विश्वविद्यालय के प्रशासन, उच्च एव प्रौढ-शिक्षा विभाग द्वारा संयुक्त रूप से यह डिप्लोमा पाठ्यक्रम चलाया जाता है। यह दिसम्बर, 1985 मे आरम्भ होना था। उद्देश्य-यह कार्यक्रम प्रौढ-शिक्षा एवं प्रशिक्षण के क्षेत्र में काम करने वालो के लिए विकसित किया गया है । वे व्यक्ति जो प्रौढ-शिक्षा कार्यक्रम के प्रशासन एवं प्रशिक्षण के क्षेत्र मे नये कौशल सीखना चाहते हैं, इस पाठ्यक्रम में प्रवेश ले सकते हैं। विभिन्न पाठ्यक्रम 1. मानव का सीसना-मानव की सीखने की प्रक्रियाओ का अध्ययन जिसमे प्रौढ-शिक्षार्थी पर बल देते हुए सीखने को मुख्य सिद्धान्तो, प्रौढ-शिक्षाथियो के गुणों, आदि का अध्ययन । 2. प्रौढ़ों को प्रशिक्षित करने को तकनीक-विभिन्न अनुदेशन तकनीको का विवरण, उनका प्रभावी उपयोग, आवश्यक परिस्थितियों तथा विशेप परिस्थितियो मे उनका उपयोगी तथा प्रोढो के अनुदेशन में तकनीको के वास्तविक उपयोग पर बल दिया जाता है। 3. प्रौढ़-शिक्षा को संस्थायें--प्रौढ-शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत सस्थाओ का इतिहास, भूमिका एवं कार्यकलाप। सिंगापुर, कनाडा, ग्रेट ब्रिटेन तथा अमरीका की संस्थाओं पर बल के साथ दूसरे देशो की संस्थाओ की जानकारी भी दी जाती है। 4. अल्पकालीन प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यशालाए एवं सेमिनार आदि-प्रौढ़- शिक्षा तथा प्रशिक्षण की घटनाएं यथा अल्पकालिक अभ्यासक्रम, सेमिनार कार्यशालाए तथा सम्मेलन आदि का सगठन एव प्रशासन । 5. सामुदायिक स्थितियों में प्रौढ़-शिक्षा एवं प्रशिक्षण-समुदाय आधारित प्रौढ़- शिक्षा एवं प्रशिक्षण । व्यक्ति एव समूहों के साथ तथा उनके लिए सामाजिक, आर्थिक, सास्कृतिक और राजनैतिक वातावरण के ज्ञान को प्रौढ-शिक्षा कार्यक्रम के संचालन हेतु प्रयुक्त करना। 6. डिप्लोमा सेमिनार-सेमिनार को इस प्रकार प्रकल्पित किया जाता है कि वे संभागियो द्वारा सिद्धान्त एव अवधारणा अध्ययन को कार्यक्षेत्र में अनुभव के साथ युग्मित करें। - 103 । उपर्युक्त पाठ्यक्रमों के अतिरिक्त सभागियों को तीन चयनित इकाईयां लेना आवश्यक होता है । कक्षा के आरम्भ हो जाने तथा कार्यारंभ के बाद संभागी को कई विकल्पों में से चुनने की स्वतन्त्रता होती है। सिंगापुर मे प्रौढ़-शिक्षा तथा प्रशिक्षण से सम्बन्धित आवश्यकता, विश्लेषण मूल्यांकन शोध, कौशल, दृश्य-श्रव्य उपकरण तथा अन्य विषयों का भी चुनाव किया जा सकता है। इस पाठ्यक्रम का समय एक से डेढ़ साल का होता है। कार्यक्रम के पाठ्यक्रम निदेशक हैं- प्रोफेसर रोजर बोशियर श्री लिम हाय पिक पाठ्यक्रम की ममाप्ति पर संभागियों को ब्रिटिश कोलम्बिया विश्वविद्यालय द्वारा प्रौढ़-शिक्षा में डिप्लोमा का प्रमाण-पत्र दिया जाता है। उपसंहार राष्ट्रीय साक्षरता अभियान के कारण थाईलैंड ने 90% साक्षरता स्तर प्राप्त कर लिया है। --थाईलैण्ड में सभी लोगों के सहयोग कारण साक्षरता अभियान जन- अभियान बन गया है। ईच वन-टीच वन (एक पढ़ा-लिखा एक को पढाए) इस अभियान का मुख्य आकर्षण बन गया है । स्कूली छात्र, विश्वविद्यालय के छात्र, शिक्षित वर्ग, भिक्षु, सरकारी अधिकारी, सैनिक आदि सभी इस 'राष्ट्रीय कार्य में सलग्न हैं। ---देश का 20% बजट शिक्षा पर व्यय किया जाता है। राष्ट्रीय साक्षरता कार्य को राष्ट्रीय विकास से जोड़ दिया गया है जिससे कि निरक्षरता निवारण 7 । शीघ्र हो। - - इस अभियान की सफलता मे राष्ट्रभाषा 'थाई' की मुख्य भूमिका रही है। प्रत्येक व्यक्ति को यह भाषा सीखनी होती है । इस नीति के कारण सवार अधिक आसान हो गया है । इससे देश मे राष्ट्रीय एकता तथा देशभक्ति को बढ़ावा मिला है। --अनौपचारिक शिक्षा द्वारा जीवन-पर्यन्त शिक्षा एक बहुत ही महत्वपूर्ण उत्तर- साक्षरता कार्यक्रम बन गया है। -शिक्षा मंत्रालय का अनौपचारिक शिक्षा विभाग दूसरे राजकीय तथा गैर राजकीय अभिकरणो एवं व्यक्तियो के सहयोग से सम्पूर्ण राष्ट्र में उत्तर- साक्षरता कार्यक्रमो के लिए उत्तरदायी है। सूचनाए एवं समाचार, रेडियो, पत्राचार केन्द्र तथा शैक्षिक संग्रहालय केन्द्र इस कार्यक्रम की प्रमुख गतिविधियां हैं । 4 104 -~-थाईलैण्ड में अनौपचारिक शिक्षा की सफलता के मुख्य कारण देश का आकार, जनसंख्या तथा भाषा है। -~-अनौपचारिक शिक्षा विभाग द्वारा खिट पेन अवधारणा तथा व्यक्तियों एवं समूह द्वारा समस्या समाधान ने विकास कार्यक्रमों की सफलता में मुख्य भूमिका निभायी है। थाई सरकार के 1984 के अभियान ने राष्ट्रीय साक्षरता अभियान में महत्व. पूर्ण एवं निर्णायक भूमिका निभायी है। निरक्षरता निवारण का श्रेय पांचवी आर्थिक एवं सामाजिक विकास योजना को जाता है। योजनाकारों तथा सरकार ने यह माना है कि साक्षरता ही व्यक्ति, समाज एवं सम्पूर्ण देश की खुशहाली एवं सम्पन्नता का एकमात्र साधन है । अत: उन्होने साक्षरता अभियान तथा आर्थिक एवं सामाजिक विकास योजना के बीच समन्वय स्थापित किया है। भारत तथा मलेशिया में भी इस वास्तविकता को स्वीकारा गया है तथा उसी के अनुसार निरक्षरता निवारण का कार्यक्रम बनाया गया है। थाईलैण्ड में ग्रामीण वाचनालय केन्द्र तंत्र (वी० आर० सी०) उत्तर साक्षरता एव निरन्तरित शिक्षा एवं जीवन-पर्यन्त शिक्षा के लिए उत्तरदायी है। स्थानीय जनता द्वारा इन केन्द्रो का संचालन किया जाता है तथा इन पर स्वामित्व भी उन्ही का है। स्थानीय आवश्यकता के आधार पर राज्य तथा प्रादेशिक केन्द्रो के माध्यम से सरकार ग्रामीण वाचनालय केन्द्रों को तकनीकी सहायता तथा पाठन सामग्री उपलब्ध कराती है । सरकार द्वारा दृश्य-श्रव्य सामग्री सृजित कर प्रदान की जाती है। अनौपचा- रिक शिक्षा विभाग द्वारा रेडियो तथा दूरदर्शन के विशेष कार्यक्रम तैयार किये जाते हैं तथा उन्हें प्रसारित किया जाता है। चल प्रदर्शनियों का आयोजन भी नियमित रूप से किया जाता है। पाई मरकार ने जन साक्षरता कार्यक्रम के अन्तर्गत 15-50 वर्ष आयु वर्ग के निरक्षर व्यक्तियो पर निरक्षरता कर लगाया गया है । यह कर उनको तब तक देना होता है जब तक कि वे साक्षर होकर सरकार से साक्षरता प्रमाण-पत्र न प्राप्त कर लें। अनेकता मै एकता दक्षिण-पूर्व एशिया तथा प्रशान्त क्षेत्र के देशो की विशेषता है । सभी देशों को शिक्षा एवं विकास कार्यक्रमो में कम-अधिक-समान समस्याओं का सामना करना होता है। अतः वे अपने अनुभवों को वोट रहे हैं तथा अपने शिक्षा एवं विकास कार्यों में समन्वय स्थापित कर रहे हैं। भारत में भी स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद तथा प्रथम पंचवर्षीय योजना के भारम्भ होने के साथ ग्रामीण जनों के लिए साक्षरता, उत्तर साक्षरता एवं सतत् 1 105 शिक्षा की कई योजनाएं लागू की गयी! प्रथम पचवर्षीय योजना मे सघन ग्रामीण शिक्षा कार्यक्रम के अन्तर्गत जनता कॉलेज, रूरल इन्स्टीट्यूट, कम्युनिटी सेन्टर्स तथा समन्वित पुस्तकालय आदि आरम्भ किये गये। जन शिक्षा अभियान के अन्तर्गत कई साक्षरता प्रायोजनाएं भी आरम्भ की गयी । राजस्थान में विशेष रूप से उदयपुर जिले मे राजस्थान विद्यापीठ ने जनता कॉलेज, पांच कम्युनिटी सेन्टर तथा गिर्वा तहसील मे समन्वित पुस्तकालय सेवा आरम्भ की। इनके साथ ही राजस्थान विद्यापीठ के प्रौढ-शिक्षा विभाग द्वारा कई साक्षरता कक्षाएं भी आरम्भ की गयीं । जनता कॉलेज ग्राम्य नेताओं, ग्रामीण युवाओ तथा ग्रामीण कार्यकर्ताओं विशेष रूप से पंचायत एवं सहकारिता सचिव तथा स्कूल अध्यापकों के प्रशिक्षण का केन्द्र बना। जनता कॉलेज की स्थापना डेनिश फॉक हाई स्कूल की अवधारणा के आधार पर की गयी। कम्युनिटी सेन्टर्स की योजना उत्तर साक्षरता एव सतत् शिक्षा की योजना थी। प्रत्येक केन्द्र 20 गांवों के संकुल मे कार्य करता था। इन केन्द्रों की प्रमुख गतिविधियो में वाचनालय एवं पुस्तकालय सेवाओं द्वारा साक्षरता-उत्तर साक्षरता का कार्यक्रम, स्थानीय समाचार प्रसारण केन्द्रों, भित्तिपत्र, श्यामपट्ट, समाचार सेवा एव रेडियो द्वारा सूचनाएं एवं समाचार ग्रामीण युवाओ के लिए सास्कृतिक गतिविधियों एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण कैम्प एवं पाठ्यक्रमो का आयोजन था। रूरल इन्स्टीट्यूट ग्रामीण युवाओं के लिए उच्च व्यावसायिक प्रशिक्षण का केन्द्र था। परन्तु ये सभी योजनाएं अच्छे परिणाम नही दे पाई । जैसा कि सभी दक्षिण- पूर्व एशियाई देशो में हुआ ये सभी कार्यक्रम फेशन, फिगर एवं डिमोस्ट्रेशन के कार्यक्रम बन गये । जागरूकता एवं उत्साह की कमी से, बढ़ा-चढ़ाकर दर्शायी गयी उपलब्धियो की चाह के कारण तथा ट्रिकल डाउन अवधारणा के कारण केवल अनुकूल एवं चयनित क्षेत्रों को ही इन योजनाओ मे सम्मिलित किया गया। पका- पकाया खिलाना आरम्भ किया गया। सामान्य जन को कभी सामाजिक रूप से जागरूक नही बनाया गया। राजनैतिक इच्छा तथा अधिकारियों की प्रतिवद्धता की कमी दोनो की इन कार्यक्रमो के असफल होने में महत्वपूर्ण भूमिका रही। राष्ट्रीय नीति तथा उपयुक्त कार्य-योजना के अभाव से भी ये योजनाएं अच्छे परिणाम नही दे सकी। पेचवर्क थ्योरी के कारण इन योजनाओं मे काफी गड़बड़ी एवं दुविधाएं बनी रही। लेकिन 1978 मे इन गलतियों को दूर किया गया तया भारत में प्रथम बार प्रौढ़-शिक्षा की राष्ट्रीय नीति बनाई गयी। सातवी पचवर्षीय योजना मे नई शिक्षा नीति के शुभारम्भ के साथ ही भारत में प्रोढ़-शिक्षा अपना उचित स्थान एवं महत्व प्राप्त कर रही है ।
106 नई शिक्षा नीति के अन्तर्गत जन शिक्षा अभियान पर बल दिया गया है। अभियान ईच वन-टीच वन (हर पढ़ा-लिखा एक को पढाए) पर आधारित होगा, जमाकि थाईलैण्ड में किया गया है। पाईलण्ड में इस कार्यक्रम की सफलता का श्रेय इसका जनाधार तथा प्रत्येक साक्षर नागरिक का इसमे सम्मिलित होना था। प्रत्येक नागरिक ने इस अभियान को अपना राष्ट्रीय कर्तव्य माना । सम्पूर्ण देश में राष्ट्र भाषा का उपयोग भी इस कार्यक्रम की सफलता का प्रमुख कारक है। भारत में जनता कॉलेज एव कम्युनिटी सेन्टर्स का अभियान सरकार की अरुचि तथा अस्पप्टता के कारण धीरे-धीरे समाप्त सा हो गया। इनमें से अधि- काश प्रतिष्ठान औपचारिक शिक्षा के केन्द्र बन गये। केवल राजस्थान विद्यापीठ उदयपुर तथा कर्नाटक राज्य प्रौढ़ शिक्षा संघ की इन संस्थाओ के मौलिक स्वरूप को बनाए रख सके। राजस्थान विद्यापीठ का जनता कॉलेज सभी जनस्तर के युवा प्रशिक्षणों की धुरी बन गया तथा कम्युनिटी सेन्टर्स तथा लोक शिक्षण केन्द्र ग्रामीणों को सतत् शिक्षा एवं जीवन-पर्यन्त शिक्षा के केन्द्र बन गये। नई शिक्षा नीति के अन्तर्गत भारत सरकार ने सतत् शिक्षा एवं जीवन-पर्यन्त शिक्षा के महत्व को स्वीकारा है तथा 3-4 गावों के समूह पर एक जन शिक्षण निलयम स्थापित करने का प्रावधान किया है । नई शिक्षा नीति में एक और महत्वपूर्ण कदम चुनी हुई स्वय-सेवा सस्थाओ के माध्यम से दीर्घकालीन, क्षेत्र आधारित प्रौद-शिक्षा प्रायोजनाओ के संचालन का है। इन सस्थाओं को राज्य सरकारों द्वारा उनके अनुभव, गुणात्मकता; शिक्षा के क्षेत्र मे तथा विशेष रूप से प्रौढ़-शिक्षा के क्षेत्र मे उनके योगदान के आधार पर चुना जाएगा। नई शिक्षा नीति में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात जो सम्मिलित की गयी वह है थाईलैण्ड, मलेशिया एवं सिंगापुर की तरह इसमें भी स्त्री शिक्षा तथा विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओ की शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना है। भारत में स्त्री शिक्षा को स्थिति अत्यन्त दयनीय है। राजस्थान जैसे राज्य मे तो यह और भी अधिक खराव है। यहां केवल 18% महिलाएं ही साक्षर हैं। भारत जैसे प्रजा. तान्त्रिक देश के लिए यह अभिशाप ही है। अतः इस कार्य को राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिकता देनी होगी । सिंगापुर, मलेशिया तथा थाईलण्ड आदि देशों मे महिलाए जीवन के सभी क्षेत्रों मे सैद्धान्तिक रूप से तो पुरुषों एव महिलाओं को समानता का दर्जा दिया गया है परन्तु वास्तविकता में आज भी भेदभाव विद्यमान है तथा इस भेदभाव का मूल कारण सामाजिक रीति-रिवाज, अन्धविश्वास, आर्थिक पिछडापन तथा अशिक्षा है । अत. महिला शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना अनिवार्य है और इसके लिए सामान्य जनता को सामाजिक रूप से जागरूक बनाना होगा।
107 मैंने पाया कि थाईलण्ड मे अनौपचारिक शिक्षा विभाग द्वारा उत्तर साक्षरता, सतत् शिक्षा, एवं जीवन-पर्यन्त शिक्षा का कार्य बहुत ही प्रभावशाली तरीके से किया जा रहा है। वह प्रौढ-शिक्षा का एक उत्तम उदाहरण है । शैक्षिक संग्रहालय, चल प्रदर्शनी, रेडियो एवं पत्राचार पाठ्यक्रम थव्य-दृश्य सामग्री तथा विभाग द्वारा सृजित साहित्य एव ग्रन्थ आदि कार्यक्रम की सफलता के साधन हैं। यूनेस्को का क्षेत्रीय कार्यालय भी बैंकॉक मे स्थित है वह भी थाईलैण्ड मे प्रौढ़-शिक्षा के कार्य को गति देने में सहयोग देता है। मलेशिया में भी भारत की तरह प्रौढ़-शिक्षा के कार्यक्रम विभिन्न राजकीय व गैर राजकीय संगठनो द्वारा चलाये जाते हैं। हालांकि ये कार्यक्रम विभिन्न समूहों की रुचियों के लिए बनाए गये हैं परन्तु इन्हे निम्नांकित समूहों मे विभक्त किया जा सकता है :- 1. स्वास्थ्य, परिवार कल्याण, पोपाहार से सम्बन्धित मौलिक शिक्षा 2.विभिन्न कौशलों में व्यावसायिक प्रशिक्षण । 3. शाला न जाने वाले तथा शाला से वाहर (Out of school) के प्रौढो के लिए शिक्षा का द्वितीय अवसर (Education for Second Chance)। 4. साक्षरता शिक्षण। 5. पत्राचार द्वारा शिक्षा। 6.धामिक शिक्षा। 7. सहकारिता शिक्षा एवं प्रौढ़ों के लिए अन्य शिक्षा कार्यक्रम । इन कार्यक्रमो का मुख्य उद्देश्य समुदाय को विचार का तरीका बदल कर उसे विकासोन्मुख बनाना तथा समुदाय में आत्म-निर्भरता लाना है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए कई कार्यक्रम यथा व्यावहारिक साक्षरता कार्यक्रम, गृह विज्ञान कक्षाएं, यामीण विकास सहकारी समितियां, ग्रामीण पुस्तकालय तथा शिशु क्रीड़ा केन्द्र चलाए जाते है । मलेशिया में व्यावहारिक साक्षरता तथा कौशल विकास के कार्यक्रमो पर अधिक बल दिया जाता है । परन्तु भारत की ही तरह मलेशिया को भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। किसी भी प्रौद-शिक्षा कार्यक्रम को क्रियान्वित करने, मे प्रमुख समस्या जो सामने आती है वह है कार्यकर्माओ की कमी यह कमी आयोजना से लेकर सनस्तर तक हर जगह पर है । हर स्तर पर प्रौढ़-शिक्षा कार्यकर्ताओं को न केवल प्रौढ़ो के साथ व्यवहार बल्कि कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए आवश्यक ज्ञान एवं कौशल से सज्जित किया जाना चाहिए। भारत की ही तरह मलेशिया में भी प्रोढ़-शिक्षा नई वात नही है । पारम्परिक ज्ञान एवं कौशल एक पीढी से दूसरी पीढी को सास्कृतिक विरासत के रूप में किया जाता रहा है । अब बदलती आवश्यकताओ के अनुसार नये आविष्कारो की 108 सूचनाए देने हेतु अध्ययन तथा ऑपरेशनल रिसर्च के लिए दृढ़ आधार स्थापित करने की आवश्यकता है। सम्बन्धित क्षेत्रों के सामाजिक आर्थिक अध्ययन के ऊपर आधारित होने चाहिए । शिक्षण की विषय-वस्तु की उपयोगिता को सुनिश्चित करने हेतु आपरेशनल रिसर्च की गहन आवश्यकता है। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि फोड बेक हेतु दोतरफा संचार की व्यवस्था है। कार्यक्रम का मूल्यांकन नियमित रूप से किया जाना चाहिए । मूल्यांकन का आधार क्षेत्र विशेष दिये गये समय में तय किये गये उद्देश्यों की तुलना मे उपलब्धि को माना जाना चाहिए । मूल्यांकन वास्तविकता परक होना चाहिए तथा उपलब्धियों की लागत से तुलना की जानी चाहिये । ग्रामीण समुदाय की सहायता करने के KEMAS खड तथा मंत्रालय के विशेष प्रयत्न के उपरान्त भी कार्यक्रम पूर्ण रूप से सफल नहीं रहा । हालाकि समुदाय द्वारा कार्यक्रम के परित्याग का कोई प्रमाण नही है । कार्यक्रम सम्पूर्ण ग्राम्य जनता तक नहीं पहुंच पाया है। भारत में भी साक्षरता कार्यक्रम में 3 आर० (पाठन लेखन एव गणित) का ज्ञान प्रदान करना उतना सफल नहीं हुआ है जितना कि होना चाहिये । अब हमने अपना उद्देश्य साक्षरता, व्यावहारिक ज्ञान और चेतना को बनाया है । आशा है हमें इसमें सफलता प्राप्त होगी। लेकिन यह कहा जा सकता है कि मलेशिया सरकार कार्यक्रम की सफलता के प्रति पूर्ण रूप से सचेत है तथा इस सम्बन्ध में हरसंभव प्रयास कर रही है । प्रौढ़-शिक्षा, कार्यकारी साक्षरता, कौशल विकास एवं अन्य विकास कार्यक्रमों में समन्वयात्मक उपागम को मलेशिया में भली प्रकार देखा जा सकता है । सिंगापुर एक नगरीय द्वीप देश । यह विभिन्न जातियो, औद्योगिक एवं व्यवसायी समूहों का जातीयता के पक्षपात से रहित एवं धार्मिक समाज वाला देश है इस देश में निरक्षरता की कोई बड़ी समस्या नहीं है। केवल 5% लोग ही निरक्षर हैं। प्रोड-शिक्षा के सन्दर्भ में यहां पर निरन्तरित शिक्षा कौशल विकास, भाषा शिक्षण तथा कार्यबलों को सवल बनाने पर महत्व दिया जाता है। सिंगापुर- वासियों में ज्ञान सपा आत्म-विकास की चाह ने वहां पर क्लब, याणिज्यिक प्रतिष्ठान तया जन-स्तर के सगठनों को विकसित किया है ।जहा पर विभिन्न प्रकार के निस्तारित शिक्षा कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। सिंगापुर के निरन्तरित शिक्षा कार्यक्रम पाईलैण्ड और मलेशिया के कार्यक्रमों से भिन्न हैं। सिंगापुर में निरन्तरित शिक्षा कार्यक्रमों का उद्देश्य कामगारो को अधिक निपुण एव उत्पादक, बेहतर नागरिक एवं बेहतर व्यक्ति बनाना है। सिंगापुर का सामाजिक आधिक tआतमान 109 स्तर तक विकास किया जाना आवश्यक है। इस सन्दर्भ में व्यावसायिक एवं मोद्योगिक प्रशिक्षण बोर्ड (VITB) बहुत अच्छा काम कर रहा है। सिंगापुर तकनीकी-औद्योगिक उद्भव एवं उच्च शैक्षिक स्तर वाले धनिक समाज के शहरीकरण की देहरी पर खड़ा है । गत दो दपाकों में सिंगापुर के जीवन के तौर-तरीको में बदलाव ने नागरिकों की शिक्षा एवं प्रशिक्षण के क्षेत्रों में नये आयाम जोड दिए हैं । सिंगापुर में पीपुल्स एसोसिएशन बहुत ही सशक्त संगठन है जो कि स्वच्छिक प्रयास द्वारा नागरिकता प्रशिक्षण एवं सामाजिक विकास एवं कल्याण कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इन सभी कायक्रमों का केन्द्र कम्युनिस्ट सेण्टर है जो कि पूरे देश में कार्यरत है । पीपुल्स एसोसिएशन की स्थापना कम्युनिस्ट सेण्टर्स में मनोरंजक एवं शैक्षिक कार्यक्रमों द्वारा बिना राजनैतिक हस्तक्षेप के सामूहिक भागीदारी को बढ़ाकर विभिन्न भापायी, आय एवं धार्मिक समूहो को समरस समाज में बांधने के लिए की गई थी। कम्युनिटी सेण्टसं की इन अद्वितीय सस्थाओं की राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जैसाकि पहले बताया जा चुका है भारत में भी इस प्रकार के कम्युनिटी सेण्टर्स 1953-54 में गांवों में आरम्भ किये गये। पर इनमे बहुत कम सफलता मिली। भारत मे भी औद्योगिक एव तकनीकी विकास से शहर बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं । शहरों में भीड़ बढ़ती जा रही है तथा यहा भी बड़े शहरों में उन्ही समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है जिनका कि विश्व के दूसरे देशो के बड़े नगरों में । अत: यहां भी सिंगापुर पद्धति के कम्युनिटी सेण्टर्स का अभियान शहरों में भी आरम्भ किया जाना चाहिए। शहरी समाज शिक्षा कार्यक्रम के अन्तर्गत राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर 1939 में नागरिकता शिक्षण एवं शिक्षा हेतु जनपद विभाग आरम्भ किया। इस विभाग का मुख्य उद्देश्य उस समय लोगों को राजतन्त्रता आन्दोलन के प्रति जागरूक करना तथा उसमे सक्रिय ग लेने हेतु विभिन्न शशिक कार्यों के द्वारा उन्हें तैयार करना था। मेवाड़ मे उस समय स्वतन्त्र होने से यह कार्य अत्यन्त कठिन था । अतः इस विभाग की गतिविधिया सूचना एवं समाचार, स्थानीय प्रसारण, गोष्ठियों, वाचनालय एवं चल पुस्तकालय सेवा तक ही सीमित थे। उदयपुर नगर में शहरी जनसख्या मे वृद्धि तथा औद्योगिक एवं वैज्ञानिक विकास के साथ इसके उद्देश्य एवं गतिविधियो मे भी सिंगापुर कम्युनिटी सेण्टर्स के कार्यक्रमों के आधार पर कुछ परिवर्तन करने होंगे। वर्तमान गतिविधियों के साथ-साथ जनपद को अब अपने कार्यक्रमों में खेलकूद, मनोरंजन के कार्यक्रम, वरिष्ठ नागरिक प्रशिक्षण पर्यवेक्षित अध्ययन, संगीत एवं नृत्य तथा अन्य व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम भी सम्मिलित करने चाहिए । इसी प्रकार के कम्युनिटी सेण्टर्स दूसरे शहरों में शुरू किए जाने चाहिए।
110 प्रारम्भ से ही राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर जन शिक्षा का कार्य करती आ रही है। वह भी विशेष रूप से समाज के पिछड़े वर्ग एवं उन लोगो के लिए जो दिन में कुछ काम करके जीविकोपार्जन करते हैं। जो व्यक्ति दिन में कुछ काम करते हैं वे दिन में दी जाने वाली औपचारिक शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। उसके लिए अनौपचारिक शिक्षा की व्यवस्था की गई। इस प्रकार सन् 1939 ई० से ही राजस्थान विद्यापीठ द्वारा शाला से बाहर शिक्षा (Out of school Education) एव द्वितीय अवसर (Second Chance) की शिक्षा की व्यवस्था करती आई है। सख्या द्वारा ये शक्षिक कार्य सम्पूर्ण उदयपुर जिले के ग्रामीण एवं शहरी दोनो क्षेत्रो मे किए जा रहे हैं । अव समय आ गया है जबकि हम अपने कार्यक्रमों को वैज्ञानिक आधार पर पुनः संयोजित करें। हमें अपने कार्यक्रमों को उच्च शिक्षा सस्थानी से जोड़ना होगा । शिक्षा की सभी शाखाओ के औपचारिक, अनौपचारिक प्राथमिक, माध्यमिक, विश्वविद्यालयो एवं व्यावसायिक आदि को सम्पूर्ण समाज को उन्नति में सहयोग देना चाहिए । उद्देश्यो एवं क्रियान्विती के सन्दर्भ मे कोई हिस्से नहीं होने चाहिए। उन्हे एक-दूसरे संसाधनों एवं कार्यकर्ताओ आदि का लाभ उठाना चाहिए। राजस्थान विद्यापीठ द्वारा इस दिशा में काफी कुछ किया गया है, इसी कारण विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के एक 'ल ने राजस्थान विद्यापीठ द्वारा विभिन्न स्तरों पर शैक्षिक गतिविधियो के समन्वय तथा ग्रामीण क्षेत्रीय कार्य को स्थायी एव मजबूत अवस्थापन की महत्ता को स्वीकार करते हुए इसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की मान्यता देने की अनुशंसा की। जो अनुभव मैंने विदेश यात्रा के दौरान प्राप्त किए वे मेरी सस्था, राज्य एवं देश में विभिन्न कार्यक्रमो को वैज्ञानिक आधारो पर पुनर्गठित करने मे सहयोगी होगे । इस यात्रा द्वारा प्रौढ़-शिक्षा के विभिन्न आयामो के बारे में मेरे ज्ञान एव जानकारी में वृद्धि हुई है। क्षेत्रीय भ्रमण के दौरान मुझे वास्तविक कार्य देखने का अवसर मिला । ये यात्राएं चर्चाए, अधिकारियो एव कार्यकर्ताओ से मिलना तथा जो साहित्य मै वहां से लाया उससे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है । इससे मुझे अपनी सस्या तथा उन स्थानो पर जहां से मैं जुड़ा हूं वहा के भावी आयोजनो में सहायता मिलेगी। अन्त मे मै भारतीय प्रौढ़-शिक्षा संघ के तत्कालीन अध्यक्ष वैरिस्टर श्री एम० जी० माने, महासचिव श्री जे० सी० सक्सेना, कोपाध्यक्ष श्री एस०सी० दत्ता एव निदेशक श्री जे० एल० सचदेव का आभारी हू जिन्होंने इस यात्रा के आयोजन में मेरा सहयोग किया । मैं यूनेस्को के अधिकारियो का भी कृतज्ञ हू जिन्होंने यह स्कॉलरशिप मुझे प्रदान की। मैं आर० ओ० ई० ए० पी० वैकॉक के निदेशक श्री ए. चीबा एव प्रोड- शिक्षा सलाहकार श्री टी० एम० साकया तपा यूनेस्को के मानविकी एवं समाज
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