Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Mai Nahi Makhan Khayo

Janmejay · 2011/03

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मैं नही माखन खायो

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मैं नहीं माखन खायो
प्रेस जनमेजय
पचशील प्रकाशन, जयपुर
-

प्रेम जनमेजय
ISBN 81-70560632
प्रकाशक पचशील प्रकाशन
फिल्म कालोनी, जयपुर-302003
सस्करण प्रथम 1990
मूल्य तीस रुपये
मुद्रक जितेन्द्र प्रिंटस, गाहदरा दिल्ली 32
MAI NAHI MAKHAN KHAYO
by Japmejay
(Satires)
Rs 3000
-

समर्पण
अपने व्यग्यकार साथियो-
शकर पुणताबेकर, लतीफ घोघी, हरीश नवल
ज्ञान चतुर्वेदी, अज्नी चौहान, बालेंदुशेखर तिवारी,
प्रकाश पुरोहित, श्रीराम आयगार विनोद
शकर शुक्ल, सुदेशकात, राजेशकुमार, यज्ञ शर्मा,
यशवत व्यास।
और हम सबके प्रिय
स्वर्गीय लक्ष्मीकात वैष्णव
के लिए।

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अनुक्रम 9 थाह दिल्ली वाह दिल्ली। आतकवादी चूहे जाना सुदामा का कृष्ण से होली खेलने लागा चुनरी मे दाग घर मे इक्कीसवी सदी डॉक्टरी सर्टिफिकेट महिमा मेरा अच्छा पडोसी सुरेश सुदर पडोस रावण पूजन 15 19 23 26 32 37 42 47 51 56 61 65 68 71 74 वो नही आयी बालम गये सिंगापुर मुझे भी हो गया है मैं नहीं माखन खायो मुफ्त की दीपावली शुभकामनाए हूबते सूरज का इश्क भाराम म राम छिपा है अध्यापक एक माट फिल्म बाबा। हिदी के नाम पर कुछ राधेलाल जी का कलयुग सावधान ! क्रियेटवा रहा है 90 95 97 100 104

साहित्य का शेयर बाजार वार्षिक समीक्षा
फिर आइयो खेलन
मैंने किरायेदार राख्यो
कजक्टिवाइटिस आयोग
आदमी के बच्चे
प्रमाण पत्र
मागने वाले
भगतो की महिमा
होवा नही हौआ
107
112
116
121
124
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127
129
133

आह दिल्ली! वाह दिल्ली! कहते हैं दिल्ली कई बार उजडी है, कई बार बसी है, बसी हुई दिल्ली को उजाड़ने के लिए लुटेरे बादशाह आते थे और दिल्ली को उजाड कर चले जाते थे। आजकल रूम बदल गया है। दिल्ली उजड नही रही है, दूसरो को उजाड रही है। बादशाह आजकल यही बस गये है। देश उजड रहा है और दिल्ली फल फूल रही है। केद्र को मजबूत करने के नारे लगाए जाते है। केंद्र मजबूत हो रहा है। केंद्र के बादशाह मजबूत हो रह हैं । मजबूत ही नहीं हो रहे है, मोटे-ताजे हो रहे है। देश को उजाडने की गति शोल पचवर्षीय योजनाए इसी दिल्ली मे बनती हैं। यह लुटेरापन दिल्ली की नम नस मे ब्लड कसर की तरह फैल गया है। उपभोक्ता और बिक्रेता मे शिकार और शिकारी का सबध स्थापित हो गया है । लुटेरो के लिए राजधानी स्वग बनी हुई है जिसमे रहने के लिए देवता भी तरसते हैं । दिल्ली देश का ही केंद्र नहीं है, अय-अ यो का केंद्र है, भ्रष्टाचार, अन तिक, बेईमानी, शोषण, हत्या, अयाय आदि सब कुछ मिलेगा। माई- थाप यही तो सब कुछ फलता फूलता है यहा आपको अपने देश के कणधार भी मिलेंगे, जिनके कधो पर आपने पाच वर्षों के लिए अपन देश का भार सौंपा हुआ है, यह दीगर बात है कि उन कधो पर बदूकें रखी हुई हैं, जिनका मुह आपकी ओर है। इस दिल्ली में आपके वे सेवक भी रहते है जिहे आपने चुन कर देश- सेवा के लिए भेजा । कभी भावर अपने सेवको के दशन करने का प्रयत्न तो कीजिए, लगेगा जैसे क्मिी विले मे घुसने का भीष्म-बम कसा हो। और आपके महासेवक ऐसे किले मे छुप हैं जहा परिदा भी पर नही मार सकता फिर आप क्या है । आप क्तिने महान हैं कि स्वयं टूटी फूटी झोपडियो में रहते हैं और आपके सेवक कई एक्डो मे फेने महलो म रहते हैं । पय है आपका स्वाग, धन्य है आपकी महानता और घय है आपको शराफत!

10 यह नयी दिल्ली ही है श्रीमान | जिसने दिल्ली को पुराना ही नही किया है, पूरे देश को बदबू और कूड़े के ढेर मे वदल दिया है । जिसने अपन को नया बनाने के लिए अपने को इक्कीसवी सदी मे ले जाने के लिए सबको पुराना और घटिया माल बना दिया है। नया तभी नया होगा जब पुराना उसके बगल में होगा। पुराना जितना पुराना होगा, नया उतना ही नया लगेगा । इसलिए नये की निरतर यह कोशिश होती है कि पुराना सण्डहर हो जाए जिससे नये का तुलनात्मक सौंदय बना रहे। दिल्ली को हिंदुस्तान का दिल कहते हैं परतु यह दिल नये और पुराने में वट गया है। पुराना दिल आज भी चादनी चौक, सदर बाजार, पहाडगज और शाहदरा के गली कूचो मे धडकता है। नया दिल दिनोदिन बस फूलता जा रहा है, उसको घडकन शायद उसको ही नही सुनाई देती है । जो कभी दिल्ली थी आजकल नयी और पुरानी दिल्ली है । नयी और पुरानी ही नहीं अब बह पूर्वी, पश्चिमी, उत्तरी और दक्षिणी दिल्ली हो गयी है । हर तरह की दिल्ली मिलगी आपको यहा माई बाप | कसी चाहिए, अमीर गरीब, सुदर असुदर महल भोपडी सब मिलेगा यहा माई-बाप । दक्षिणी दिल्ली तो रावण की लका हो गयी है । जहा स्मगलर हैं, काल गल हैं, भ्रष्ट अफसर हैं पैसा ही पैसा है। दक्षिणी दिल्ली में रहना 'स्टेटस सिंबल' धन गया है। एक कमरे मा हजार रुपये किराया दने वाला अपने आपको नदन-फानन मे अनुभव करता है। चाहे खाने को दाने न हो, रहना दक्षिणी दिल्ली में है। दक्षिणी दिल्ली में रहना सम्मानजनक है तो पूर्वी दिल्ली मे रहना गाली है। पूर्वी दिल्ली को नानी जन 'जमनापार' कहते हैं। जमनापार सुनते ही सभ्य सुसस्कृत लोगो की नाक पर रूमाल आ जाता है। "जमना- पार रहता हूँ" कहते ही व्यक्ति का अवमूल्यन हो जाता है। वह व्यक्ति बादमी नहीं रह जाता है बदबूदार गलियो और कुठे या ढेर बन जाता है । गाहदरा, सीलमपुर गाधी नगर, कृष्णा नगर आदि की मिली-जुली सरकार है यह जमनापार, यहा के रहनेवाले अपने को दिल्ली म नही समझते हैं। जैसे भारत में रहनेवाले भारत में रहते हुए भी भारतीय नही समझते हैं।)

जबकि वह रहते दिल्ली मे हैं। लालकिले के पीछे बहनेवाली यमुना नदी ही, विभाजक रेखा है। फिर भी भमुना पार वाले लोग चादनी चौक, कनॉट- प्लेम या रेलवे स्टशन की ओर रुख करते हैं तो कहते हैं-दिल्ली जा रहे हैं। दिल्ली में रहते हैं और दिल्ली जा रहे हैं, यह एक आध्यात्मिक चितन का प्रश्न हो सकता है। आप कीजिए, मैं जरा आगे बढता हूँ। हमारे एक मित्र हैं रामफल, यमुनापार शाहदरा मे रहते हैं । अत्यधिक परिश्रम करके उहोंने इजीनियरिंग पास की, इजीनियर बन, अच्छी नौकरी मिली । इच्छा हुई कि अच्छी पत्नी भी मिल जाए । मच्छी नौकरी, अच्छा वेतन तो उन्हें मिल ही रहा था परतु जमनापार रहते थे। इसलिए जहा भी अच्छे रिश्ते की बात चलती, सब कुछ तो ठीक रहता परतु जैसे ही लडकी- वाला को पता चलता कि लडका जमनापार रहता है सब ठप्प हो जाता। का वेंट मे पढी, शॉप इलाके मे रह्नवाली लडकी साफ मना कर देती-~~में जमनापार नही जाऊगी, बेचारे बहुत दुखी, बाप दादो का मकान भी नहीं छोर सकते हैं, वरना भाई सभाल लेगा और अच्छी पत्नी का मोह भी नहीं त्याग सकते हैं । छह साल से इसी दुविधा मे फसे हुए देश की जनसंख्या को कम करने में सहायता दे रहे हैं। जमनापार का यह योगदान इतिहास मे, चाहे तो लिखा जा सकता है। अव तोयमुनापार इलाके के लिए चार पुल हो गये हैं पाचवा निर्माणा- धीन है परतु एक जमाना था बेचारा एक पुल ही धोबी के गधे सा सारा बोझ ढोता था । शाहदरा के भासपास के क्षेत्रो से आनेवालो को दिल्ली' लाने ले जाने का सुकम आज भी यही गधा करता है। उधर पुल चार हुए तो जनसख्या भी बढी है। सुबह शाम इस पुल पर पैदल, रिक्शा, तागा, बैलगाडी, ठेला, स्कूटर, बस आदि का बो रेला चलता है कि 'रगना' शब्द भी शरमा जाता है। पुल का मौखिक इतिहास बनाता है कि इस पुन पर खड़ी दक्ती ने अपने को प्रसूति गह मे बदला है अनेक बच्चो का जम हुआ है, यहा खडी टैक्सियों में । अग्रेजो के जमाने के इस पुल का समय पूरा हो चुका है। यह खतरनाक टैक्सी कार, द्र, 12 भी घोषित हो चुका है परतु हम अब भी इसे अग्रेजी और अग्रेजियत की तरह गले से लगाये हैं। झोपडी डालने से पुलिस को रिश्वत देने के रेट तक जमनापार या दक्षिणी दिल्ली जैसे इलाको के हिसाब से तय होते हैं। दक्षिण दिल्ली म पुलिस का चाय पानी महगा है जमनापारवालो को इसम विरोप छूट मिलती है। दिल्ली क्तिने ही क्षेत्रो मे घटी हो परतु विद्वान और ज्ञानीजन इसे दिल्ली और नयी दिल्ली के भेदो के रूप मे जानते हैं। नयी दिल्ली, नयी है, न्यारी है प्यारी है। क्या साफ सुथरी सडकें और लोग हैं | शाम के समय बने-ठने मद और बाल कटी महिलाए मारुति मे चमचमाती हैं । सीक क्वाब चाइनीज, पित्जा, चिक्न तदूरी आदि इद गिद सजी सवरी मक्खियो से महराते सभ्य सुसस्कृत पश्चिमी संस्कृति के कणघार अपने का तरह-तरह स 'पोज' करते हैं। देवता भी देख कर पुकार उठते हैं कि प्रमु हम कलयुग में अवतार देना तो यही देना। अप्सराओ स अब हमारा मन भर गया है। अन्दर मे दक्षिणी दिल्ली की भडकीली आत्माए चाहे कितनी भी खोखली हो परतु बाहर से महान आत्माए अपनी सज धज बिगडने नही देती हैं। कितनी महान हैं ये आत्माए जो विकी हुई हैं। परतु पुरानी दिल्ली तेरे पास क्या है ? रिक्शे-तागे, छाबडिया ओर तग गली कूचो मे भडभडाती दिल्ली तेरे पास क्या है | जहा चलते हुए क्षे एक-दूसरे से टकराते हैं फिर भी लोग 'ब्लडीफूल' या स्टुपिड' नही कहते हैं असभ्य हिंदी भाषा म पुकारते हैं। जहा आ कर लगता है सडे गरीव हिंदुस्तान मे रह रहे हैं। अग्रेजियत जब सारे देश ने नही छाडी है, तू क्यो छोड बैठी है, पुरानी दिल्ली । तेरी गलिया और कूचे क्यो घडरते हैं ! गले आप बार राजधानी आरहे हैं तो ध्यान से आइएगा, क्योकि सावधानी हटी दुघटना घटी का नियम राजधानी के चप्पे चप्पे पर लागू होता है। यहां सड़क पर ही नहीं, जेबो पर भी दुघटना घटती हैं । राजधानी म प्रवेश 13 करते समय कुछ यूनतम गुण उसके पास होने चाहिए, यदि आपका शरीर ईमानदारी और नैतिकता की तरह सूख कर काटा हो गया है तो डी० टी० सी. की बसो मे चढ़ने का साहस मत कीजिएगा वरना आपका हाथ व टाग या शरीर का कोई भी हिस्सा आप से अलविदा कह सकते हैं। यदि आपका शरीर भ्रष्टाचार की तरह फूल कर कुप्पा हो गया है तो इस 'कुप्प' को भी डी० टी० सी० की नजर से बचाइएगा वरना आप किसी दिन फुटबॉल की तरह सडक पर लुढकते नजर आयेंगे। यदि आपको आत्महत्या करनी है तो दिल्ली की सडको पर आ जाइए, स्कूटर चलाइए, साइकिल चलाइए, कोई न कोई बम, ट्रक मापको नीचे दे ही देगा। दिल्ली को किसी 'रेड लाइट' पर खड़े होकर देखिए, वाहन पर बैठा हर व्यक्ति आपको फायर ब्रिगेडवाला लगेगा। हर व्यक्ति जैसे कही आग बुझाने जा रहा हो। या ऐसा लगता है वाहनो की कुर्सी प्रतियोगिता चल रही है, हर कोई एक-दूसरे को गिराने मे व्यस्त है । दिल्ली की सडको पर आपको लाल-बत्तियो का ढेर मिलेगा। कभी रामकृष्णपुरम से मूलचद की ओर रिंग रोड पर चले जाइए 6 किलोमिटर के इस क्षेत्र मे आपको दस लाल बत्तियो के दशन होगे । आप चाहें तो इसे लाल बत्ती क्षेत्र कह सकते हैं, वैसे भी यह दक्षिण दिल्ली का इलाका है। लाल बत्ती क्षेत्र से इसका गहरा ताल्लुक है। आपको दिल्ली मे दरियागज' मिलेगा, 'पहाडगज' मिलेगा परतु इन इलाका मे न तो कोई दरिया मा पहाड है और न ही ये इलाके गजो की फसल के लिए प्रसिद्ध हैं। राजधानी मे जो पहली बार आता है वह अपने आपरो गवार ही महमूम करता है, ये दीगर बात है कि कुछ दिन टिक जाने के बाद वह अच्छे-अच्छे को गवार सिरने की योग्यता प्राप्त कर लेता है । पर कुछ गवार ऐसे होते हैं जो महानगर की सभ्यता का पाठ नही पढ़ सकते हैं, अनपड होते हैं और जिंदगी भर गवार बने रहते हैं। रेलवे स्टेशन या बस अहरे पर उतर कर देखिए स्कूटर वाले ऐसे गले मिलेंगे जैसे आपरे भाई हों परतु नापको गवार सिद्ध करने में ऐसा चमत्कार दिखायेंगे कि अच्छे-से- अच्छा जैवक्तरा भी पारमा जायेगा। आप महसूस करेंगे इतना सच तो - 14 रेल से दिल्ली आने में नहीं हुआ जितना दिल्ली पहुच पर किसी के घर पहुचने मे हो गया। मुझे लगता है जिन डाकुओ ने आत्म समषण किया है वो सभी स्कूटर चलानेवाले बन गए हैं। खर, दिल्ली की यही खूबी है कि यहा आह भी निकलती है और वाह भी निकलती है। यहा मरकार उठती भी है, गिरती भी है । यहा बोफ्स है, यहा जनसेवक हैं । यहा भूख है यहा अमौरी है। कह सकते हैं जो दिल्ली मे है वह भारत मे है और जो दिल्ली मे नही है, वह कहीं भी नहीं है।

आतकवादी चूहे 7" " कालेज मे घर पहुचा तो देखा पत्नी बहुन व्याकुल है। घाय पानी पूछने की जगह उसने मुझसे कहा, "तुम्हारे पास एक किताब थी न कुछ वो चूहो की मौत जैसी।" मैं चितित कि घरेलू पत्रिकाए और 'सामाजिक नावेल' पढनेवाली मेरी पली साहित्यिक कैसे हो गयो? उसे बदीउज्जमा के प्रतीकात्मक व्यग्य उप यास 'एक चूहे की मौत' म कैस रुचि जाग गयी? मैंने कहा, "थोडा दम ले लू, बहुत उसम है, यह अच्छा है कि तुम मे साहित्यिक उपन्यास पढने की रुचि जाग रही है "उपन्यास | उप यास मे चूहो को मारने के तरीके दिए हुए हैं क्या पत्नी के चौंकते हुए कहा। मैंने चौंकते हुए कहा, "चूहो को मारने के तरीके | तुम्ह चूहो को मारनवाली किताब लगी वह ? हद है "डाटते क्यो हो' मुझे क्या पता, कौन सी किताब है , ढेरो किताबें जमा कर रखी हैं तुमने कहने को, पर काम की कोई किताब नहीं है तुम्हारे पास। न स्वेटर की डिजाइन की, न पकवान बनाने की, चूहो को मारने तक की किताब नहीं है तुम्हारे पास।" "पर तुम्हें चूहो को मारने की क्या आवश्यकता पड गयी?" मैंने पूछा। "तुम्हें तो कोई जरूरत नहीं है न ! मरी नयी साही कुतर दी माज उहोंने । अभी किसी को पहन कर भी नही दिखाई है। तुम्हे तो घर का कुछ देखना नही होता है न ! मैं ही बस, घर मे खटकती रहू । कृष्णलाल जी को देखो, घर का कितना काम करते हैं आजकल । सुबह का खाना वो ही बनाते हैं और शर्मा जी घर के सारे कपडे अपने आप धोते हैं, प्रेस हैं। देखो, तुम भी इन चूहा का कुछ करो। मैं तग मा गयी इनसे । घर 16 चौपट कर के रख दिया है। रमोई मे काम करो तो छोटी छोटी चुहिया परो रे ऊपर नीचे दौडती हैं "उई मा ' उसी समय एक चुहिया पली के पाव के ऊपर से निकल गयी। "देखा तुमन । अब चूहे तो ऐसे घूमते हैं, जैसे घर से हमे निकाल कर ही दम लेंग। इह नही रोकोगे तो सारे घर म विल ही बिल नजर आयेंगे, पत्नी का चेहरा चुहिया आतक से पीडित था। "इतनी छोटी छोटी चुहियो से तुम घबरा रही हो ?" मैंने चुटकी लेते हुए कहा। "छोटे 1 छोटे लगनेवाले ही खोटे होते हैं । छिपा शत्रु बहुत खतरनाक होता है । पता नहीं किस बिल से निकलते हैं, नुक्सान करके चले जाते हैं।' "चूहेदानी क्यो नही लगाती हो?" मैंने कहा। "चूहेदानी | वडे चालाक हो गए हैं, पता नही कैसे चूहेदानी मे से रोटी निकाल कर ले जाते हैं। इ हैं तो अब खत्म करना होगा । बरना सारे घर का सत्यानाश करके रस देंग।" पत्नी ने अपनी नीति की घोपणा की। 'इहें मारोगी, यह तो तुम्हारे गणेश जी की सवारी हैं ?" मैंने पत्नी की धार्मिक भावना को उभारा। 'तो शर जी गले मे साप पहनते हैं, तो मैं घर मे साप पालना गुरु कर दू । बडे लोगा के सेवक ऐसे ही होते हैं, उह अपने स्वामी की गह मिली होती है। स्वामी की इमेज की आड मे जो कुछ करते हैं, उसका उमरे स्वामी को भी पता नहीं होता है । पत्नी ने बड़ी समझदारी की बात कह दी थी। 'बडे लोग अकसर 'छोटे काम' अपने आसपाम घिरे 'छोटे लोगो से ही करवाते हैं। उनसे उनकी 'बडी छवि' भी बनती है और आर्थिक आधार भी सुदृढ होता है। घर से बाहर निकल कर देखा तो पता चला कि पत्नी ही नहीं सारा मोहल्ला चूहो से आतक्ति है। सिहा जी और तिवारी जी चूहेदानी लिए जा रह थे। मुझे देखते ही तिवारी जी बोले, "शिकार छोडने जा रह हैं। वही मुसिल मे फ्मा है। देखिए सा-सा वर क्तिना मोटा हो गया है। आप तो जानते ही हैं ईश्वर की कृपा से हमारे यहा खाने पीने मे खुला सर्व 17 होता है । देशी घी खा कर चूहे मोटे नही होगे तो क्या होगा यह कह वर उ हाने बडे गव से चूहेदानी मेरे मुह से आगे टिवा दी, "देखिए, देखिए मुफ्त की खावर कितना मोटा हो गया है।" "हो, यहुत मोटा है।" मैंन प्रमाणपत्र दिया। "सिहा माहव की चूहेदानी मे बहुत छोटा है, चुहिया है, चुहिया। दिखाइए मिन्हा साहब।" सिहा जी ने हीनभावना से ग्रस्त हो कर गदन लटका ली। मैंने कहा, "पर आप इसे ले कहा जा रहे हैं?" "दूर छोडने जा रहे हैं जी, बडा तग कर रखा है इहोंने। अभी मैं हफ्ते पहले ही काजू, बादाम और विशमिश लाया था। सबका सत्यानाश कर दिया इहोंने ।" तिवारी जी ने फिर अपने चूहो का 'स्टेटस' बताया। मेरी भी मेरी भी एक इपोर्टेड पेंट का सत्यानाश कर दिया इहाने।" सि हा जी ने अपने चूहो का स्टेटस वढाया । ‘इपोर्टेट पेंटें तो हमारी कई खा गए । बडा दुखी कर रखा है भाईजान इहाने ।" तिवारी जी ने फसे चूहे की ओर घूरते हुए कहा। लग रहा था कि तिवारी जी शाकाहारी न होते तो शायद कच्चा ही चबा जाते । "एक बार मापने इहें पकड लिया है, तो इहें छोडते क्यो हैं ? यह अपनी आदत से बाज तो आयेंगे नही, फिर उत्पात करेंगे।" मैंने अपनी जिज्ञासा रखी "फिर क्या करें?" सिहा जी की आखो मे रहस्य जागा। "मार दीजिए ?" "नही जी, हत्या नही । जीव हत्या हम नही कर सकते।" तिवारी जी ने अहिंसा का श्लोक पढा। "चाहे जीव आपकी हत्या कर दे।" "कोई नही, जब अपनी आनी है आयेगी। ऊपर वाला सब देख रहा है। वहीं कुछ करेगा।" तिवारी जी ने धार्मिक होते हुए कहा । दोनो चूहे छोडने चल दिए। तभी मैंने देखा कृष्णलाल जी बदूक पकडे अपनी बाल्कनी में आ गये । मुझे देखते ही बोले, "ऊपर आओ, एक बढिया चीज दिखाए।"

18 " वदूर के आगे बडे-बडो के छक्के छूट जाते हैं और मैं तो अचारा मास्टर हू । मन ने सोचा यही परल-यरल घर में तो नही बठे है ! मन ने कहा, वैसे घबहाने की क्या आवश्यकता है, कृष्णलाल जी अच्छे पहासी और मित्र हैं पर तु अनुभव ने बताया कि अपन साग ही गोली चला देते हैं। इसलिए मैंने नीचे से पूछा, 'क्या हो रहा है, इस बदूव स?" "चूहे मार रहा हूं, हे तीन मार चुका है। पम्यस्ता ने बहुत दुखी कर रखा है । पिता जी की पदूक है यह । एन० सी० सी० की ट्रेनिंग काम आ रही है हा हा हा आप भी लगाओ निशाना, एक-दो आप भी मारो। हा हा हा कृष्णलाल जी हसते हैं तो लगता था जैसे दावत के लिए बुला रहे हो। "नही जी वस, फिर कभी। जरा काम है ।" मैंने पीछा छुड़ाने के लिए कहा। "क्यो, सब्जी बनानी है या वतन साफ करने हैं? हा हा हा अब मुझे लगा सारा मोहल्ला हस रहा है। मैं झैफ्ते हुए घर के अंदर घुस गया। घर में घुसते ही पत्नी बोली, "तुम छरेवाली बदूक के चक्कर में मत पडना, बच्चो का घर है।" इधर चूहो पर मैंने अनुभव के आधार पर काफी खोज कर ली है। खाने के मामले में चूहो में भी शाकाहारी और मासाहारी पाए जात हैं। कुछ घर लूटते हैं, कुछ आदमी साते हैं। चूहे पढे लिखे भी होते हैं। एक साहब के चूहे उनकी अथशास्त्र की पुस्तक ही कुतरते हैं, बेकार की हिंदी विताबो को हाथ तक नही लगाते। चूहो का भी सगठन है । जो पर ज्यादा तग करता है, वहा सब मिल कर हमला करते हैं। यह छुप कर हमला करने मे अधिक विश्वास रखते हैं। यह धीरे धीरे घर को खोखला करते हैं। इहें पकडने के लिए चूहेदानी की नही, खत्म करने के लिए कृष्णलाल जी की बदूक की जरूरत है।

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20 ? उसे चौंकाना चाहते थे । सुदामा न द्वारका मे श्रीकृष्ण के महल के पास पहुचकर देखा कि वहा आदमी कम सैनिक अधिक थे। सब सैगिक आधु निक हथियारों से लैस थे। और गिद्ध सी दृष्टि से इधर उधर देख रहे थे। सुदामा न एक सैनिक से पूछा, 'क्यो भाई, क्या युद्ध छिड गया है जो इतन सैनिक हथियारी से लैस होकर घूम रहे है ? 'नही, हम सब महाराज श्रीकृष्ण के अगरक्षक हैं । तुम कौन हो, यहा कैमे घूम रहे हो?' एक सैनिक बोला। मुझे श्रीकृष्ण से मिलना है। मैं उनसे होली खेलना चाहता हू।" सुदामा ने भोलेपन से कहा । 'होली खेलने | लाता है ब्रज के गोपाल हो। तुम्हें तो आगरा जाना चाहिए यहा क्या करने आ गए । होली खेलेंगे हू यहा परिंदा भी होली खेलने नही आ सकता, तुम क्सि खेत की गाजर हो । होली खेलने के लिए समय लिया हुआ है । क्या ?' 'होली खेलने के लिए समय सुदामा ने साश्चय पूछा हा बिना आज्ञा के महल के अदर जाना तो क्या, तुम उस ओर देख भी नही सकते हो।' सैनिक बोला। पर कृष्ण तो हमारी झोपडियो में घुसते हुए हमसे कोई समय नहीं लेते हैं वे तो घडघडाते हुए किसी की झोपड़ी मधुस जाते हैं, वह भी अकेले नहीं । जब कृष्ण हमारे झोपडे मे बिना समय लिए घुस सकते हैं तो हम क्या नहीं उनके महल मे घुस सक्तै सुदामा ने थोडा क्रोध से प्रश्न किया। में बताता हू क्यो । क्योकि श्रीकृष्ण राजा हैं और तुम प्रजा हो। प्रजा का महल की ओर बढने का अथ होता है। विद्रोह और राजा का झोपडी म जाने का अथ होता है । जनसेवा । वह राजा होने के अतिरिक्त जनता के सेवक भी हैं। तुम क्या हो, केवल प्रजा। श्रीकृष्ण महाराज झापडी म तुम्हारा दुख-दद जानने जाते ह, होली खेलने नहीं आते । सैनिक पर जनता भी तो अपना दुम्व-दद बताने आ सकती है और फिर मैं तो केवल होली खेलने आया हू। अरे मैया थोडी सी होली ही तो खेलनी है गुलाल या टीका लगाकर जल्दी आ जाऊगा।' . वोला।

21 यह सुनकर सैनिक ने बहुत जोरो से अट्टहास किया, 'हा हा हा जल्दी लोट आओगे । यहा से अदर जाना और बाहर आना, दोना तुम्हारी इच्छा पर निमर नहीं करते। जानते हो, श्रीकृष्ण के महल तर पहुचने के लिए दस तरह की तलाशिया होगी । तुम्हारे वस्त्र उतारे जाएगे तुम्हारे द्वारा लाए गए गुलाल को वैज्ञानिक जाच होगी । हथियारबद सनिको के बीच तुम्हे ले जाया जाएगा। इस सनमे एक मास भी लग सक्ता सुदामा आश्चर्य से अपने सहपाठी की सुरक्षा व्यवस्था का पाठ पढ रहे थे। उन्होंने कहा, 'पर भइया, होली तो मुक्त त्योहार है। होली म कोई छोटा वडा तो होता नही । हमने तो कृष्ण को यही छवि सुनी है कि वे गरीवा मे और अपने में कोई अतर नही समझते हैं । सबको बराबर मानते - 'हे भोले ब्राह्मण, मानने से क्या होता है ? झोपडी मे दोक्षण के लिए घुसना और पूरा जीवन उसमे विताना, क्या बराबर है ? तुम जीवन के गणित को नहीं जानते अच्छा यही है कि तुम अपनी औकात पहचाना और मुझे अपना कतव्य करने दो।' औकात की बात सुनत ही सुदामा को गहरा सदमा पहुचा । वे जोर जोर से चिल्लाने लगा, 'इसका मतलब जो प्रचार हो रहा है वह धोखा है। कृष्ण की साफ-सुथरी छवि भम है। वह गरीबा के दुख दद जानन नहीं, अपनी छवि सुधारो के लिए झोपडियो मे जाते हैं सुदामा चिल्ला चिल्लाकर बोल रहे थे कि वहा से श्रीकृष्ण के प्रचार मत्री का रथ निकला। उन्होने ये शब्द सुने तो रथ एक्दम रोक दिया। अगर ये शब्द श्रीकृष्ण महाराज के कानो मे पड गए तो वह मत्री क्या, उनका सेवक भी नहीं रहेगा । उहोने सुदामा से वारण जाना । सारी बात सुनने के बाद होने तत्काल उस सैनिक का निलबित कर दिया और उसकी जगह एक गगे सनिक का खडा कर दिया। प्रचार मत्री ने सुदामा को शीतल पय पिलाया। श्रीकृष्ण के हस्ताक्षर युक्त अनेक चित्र से दिए । इसक पश्चात वे बोले, 'आप गरीबो मे मिलने को भगवान हर समय उत्सुर रहते ह । आप तो जानते ही हैं कितनी दूर-

22
दूर गावों में जाते हैं, राना होकर झोपडी मे घुसते हैं, वहा का भोजन
खाते हैं । परतु राजा होने के कारण उनके कितने पतव्य हैं। हर समय
गरीवा की तो नही सोच सकते हैं ।
आप भगवान श्रीकृष्ण से होली
खेलना चाहते हैं मैं प्रबंध करा देता हू, परतु सोचिए कि क्या प्रजा का
राजा के प्रति कोई क्तव्य नहीं है ? क्या हम अपने राजा को एक दो दिन
का एकात नही दे सकते हैं?
'क्यो नही ।' सुदामा ने कहा ।
तो फिर मेरा आपसे अनुरोध है कि भगयान से फिर कभी हाली
खेरा लीजिएगा। उनके होली खेलते चित्र चाहिए तो मैं दे दूगा। प्रतीक्षा
कोजिए, क्या पता किसी होली को भगवान आपकी झोपडी मे स्वय दर्शन
। आप समझ गए न।'
सुदामा अब तक बहुत कुछ समझ गए थे।

लागा चुनरी में दाग . कुछ लोगो की चुनरी में दाग लग जाए तो उन लोगो का सारा जीवन इस दाग को मिटाने में ही व्यतीत हो जाता है। बचारे प्रायश्चित के आसुओ से उसे घोते रहते हैं और गा गाकर लोगो को इस दाग के बारे में जानकारी भी देते रहते हैं। उनकी मूल चिंता 'पी' के पास बेदाग जाने की होती है। कुछ लोगो की मूल चिंता 'कुरसी के पास जाने की होती है। इनमे से कुछ की चुनरी दागा से भरपूर होती है । परतु ये 'चुनरी' के दागो को इस सफाई से छिपाकर रखते हैं कि रॉ या सी० बी० आई० की आखें भी वहा पहुच नहीं पाती हैं । ऐसे लोग दाग लग जाने पर चुनरी को न तो प्रायश्चित के आसुओ मे घोते हैं और न गली गली दाग का विज्ञापन करते हैं। विज्ञापन का काम अखबार वाले करते हैं। ये बस बेशर्मी से मुमकराते भर रहते हैं। प्रजातत्र में किसी भी विवाद का निणय बहुमत के माधार पर किया जाता है । बहुमत ने 'गधे' को 'घोडा' कह दिया तो उसे घोडा ही मानना पहना है। विधानसभा ने कह दिया कि यह उपमुख्यमत्री है तो उसे उपमुख्यमत्री मानना ही पडेगा। प्रजातन्त्र के इस महान गुण का माश्रय लेकर महान प्रातिकारी, समाजसेवी एव देशसेवक चुनरी के दाग की सौदे- बाजी करने से नहीं चूकते हैं। वे हवाई जहाज से उतरे तो पत्रकारो ने कहा, "आपकी चुनरी में भयकर दाग लग गया है।" "जानते हैं मेरे पीछे कितने एम० एल० ए० हैं । वे सब विधानसभा मे मिद्ध कर देंगे कि मैं निर्दोप है।' कितना आसान तरीका है स्वयको निर्दोष सिद्ध कराने का । आपके पास पैसा है, सभा की तारत है तो आप नौ सौ क्या नौ करोड चूहे खाकर 24 भी हज कर सपते हैं, पियानगमा मापी जेब में है। परतु एर गयट हो गयी, आम पुनाय मरीय आ गए । पार्टी को अपनी छवि' बनानी है । उह त्यागपत्र दना पस। यह तो सरासर ना इसापी है जनमेयर पे प्रनि पिया गया अभाव है। वपारे उपमुख्यमको बनकर देश सया' पर रह पे, उनम यह अयसर ीा सिया गया। प्रजातन मे बिना मत्री बने दश सेवा ही पी जा सरनी। यह दीगर बात है कि जब उह मत्री बनाया गया था तो उनको मनोमाने की इच्छा नहीं थी, जनता ये लिए बने ५ वो। मत्री या प्रधानमत्री तप को यह जनता जबरदस्ती पुर्मी पर बैठा दती है और पहती है है-आ वैस मुझे मार। विसी दासवर से उमपी धुर्गी छिन जाना उमरे जीवन की बड़ी दुर्घटना और असतुष्टो पो विजयदामी होती है। येचारे देशमवत्र का तो जीव ही धुर्मी म होता है, बिना जीव ये परीर कसा? निष्क्रिय, वेगान, निरयर और कुर्सी विहीन शरीर या याई क्या करे ? सोचा, बेचारे देशसेवक यो यहा सदमा पहना है, घलू सहानुभूति ही प्रफ्ट पर आऊ । वस सहानुभूति प्रकट करते समय हमारा उद्देश्य दूसर को नगा और बेचारा देखकर आदि प्राप्त करना हाता है। सहानुभूति प्रक्ट करने के माध्यम से अक्सर लोग मनोरजन करने जाते हैं। 'बडा बुरा हुआ आपके साय।" मैंने सहानुभूतिपूर्वक पहा । • मैं एक एक को देख लूगा, मुझे सब पता है, असतुष्ट नहीं चाहते हैं मैं उपमुख्यमत्री बना रहू जनता की सेवा करता रहू । मैं जनता का सेवक हू मरते दम तक जनता की सेवा करूगा । मुझे फसाया गया है।" उनकी आवाज म अतुले का दद था । यह दद कुर्सी जाने के बाद उठता है। इसका मतलब अखबारो मे जो आपके बारे मे छपा है "वो सब गलत है सब गलत है मेरा चरित्र हनन किया जा रहा "" f तो त्यागपत्र आपके हाईकमान के कहने पर दिया है।" 'नही अपनी मर्जी से दिया है।" जब आपने कुछ किया ही नही तो आपने त्यागपत्र क्यो दे दिया अपनी मर्जी से दिया उनके अदर से तोता बोला। 2॥

25 - "सुना है आपके कारण पार्टी को छवि धूमिल हो रही थी।" "पार्टी की छवि, कैसी छवि म' जो मुझ पर अगुली उठा रहे हैं, इहें आप दूध का धुला समझते हैं । पार्टी को क्या चाहिए वोट एम०एल० ए०एम० पी० । छवि से क्या मिलेगा? हमारे पास कम एम० एल० ए० नहीं हैं।" "सुना है हाईकमान आपकी हरकतो से नाराज है।" "नही, बिल्कुल नहीं। मैं आखिरी दम तक साथ हू । (चाहे वो साथ न हो) मुझे कुर्सी का मोह नहीं है। (झूठ बोलते हुए उनकी जुबान लड- खडा रही थी।) मैं अपनी नेता को मुश्किल मे नही डालना चाहता हू । मैंने त्यागपत्र दे दिया है अपनी मर्जी से । मैंने कुछ नही किया फिर भी त्यागपत्र दे दिया है । आप सोच सकते हैं कोई उपमुख्यमत्री ऐसा नीच काम करेगा।" वे बोलते हुए 'उत्तेजित' हो गए थे। "पर आपने भविष्य में कभी भी शराब न पीने की सौगध खायी है।" वो हकबका गए । उहोने बगलें झाकी, तो उसमे से शराब की गध आई। वे लडखडा गए । "हा खायी है, शराब न पीने की कसम । अखबार वाला के सामने खायी है इन अखबार वालो को मसाला चाहिए न अब आप यहिए किसी को चोर, डाकू या हत्यारा कहने से पहले उसे याय- लय मे सिद्ध किया जाता है चोर, डाकू और हत्यारे हम उपमुख्यमत्री क्या हम चोर, डाकू और हत्यारे से भी गए बीते हैं अब वो जो कसम है एक बात मैं कह दू कि मैं पूरी तरह से साथ हू अखबार वाले तो ये असतुष्ट मैंने त्यागपत्र अपनी मर्जी से दिया है वो हडबडा गए थे, उनका जीव कुर्सी मे था, वो छटपटा रहे थे। । " 'घर मे इक्कीसवी सदी जो कालेज से पढाकर घर लौटा लो घर मे धंसने से पहले लगा क्सिी दूसरे के घर मे घुस रहा इ. एक वार दोबारा अपनी पलट का नम्बर पढा, यह मेरा ही घर था। जैस मथुरा वाले श्रीकृष्ण के पास से लौटकर अपनी झोपड़ी के स्थान पर महल खडा देवकर सुदामा को आश्चय हुआ था, वैसा ही आश्चय मुझे भी हुआ। पर तु न तो मैं सुदामा की तरह गरीब हू और न ही मैं मयुरा तो क्या शाहदरा वाले श्रीकृष्ण के पास गया था। फिर मेरे पलट मे यह परिवतन कैसे हुआ? नया सोफा, रगीन टो० वो डाइनिंग टेवल, झाड फानूस, लगा जैसे किसी फाईव-स्टार होटल के कमरे में पहुच गया ह पाच घटे मे इतना बडा परिवतन । मैंने अपनी घर मे धुसन के लिए घटी बजाई और आश्चय चक्ति उम जादूगर के बाहर आने की प्रतीक्षा करने लगा जिसने यह चमत्कार किया था। तभी पत्नी के सुमधुर स्वर ने मेरे आश्चय को तोडा, "अरे आप बाहर फ्यो खडे हैं, अदर आआ न" मैंने पत्नी की ओर देखा वह पहनानीनही जा रही थी। लग रहा था जैम कोई ब्यूटी पारलर मेरे सामने खडा हो। मैंने पूछा, "यह सब क्या है "तुम अदर तो आओ, सब बताती हू," आज वह पत्नी की तरह नहीं वोल रही थी अपितु चिहिया की तरह चहा रही थी। में अदर घुमा तो डरत डरत नये साफे पर बैठा।बैठने में तकलीफ हुई "यह कसा साफा है चित्तुल आरामदायक नही है। "तुम्हें तो काई भी नयी पीन अच्छी नहीं लगती है, पद्रह सात बा एम ही सोफे बनेंगे, मैंने अभी से बनवा लिया है," पत्नी ने समझाया। "पर यह पार क्या है ?" मैंने कमरे में अपनी अजनबी निगाहें घुमाते हुए पूछा। - " 27 - "चक्कर ! तुम्हारे पकार म ही तो सारा घर बबाह बना हुआ था। कोई दम की चीज दिखाई ही नहीं देती पो । लगता था जैसे वाया आदम के जमान में रह रहे हैं । पडोस म कभी लोगो पर देरी हैं, देखकर लगता है जम आज के जमाने म जी रहे हैं । और एक हमारा घर-~पचाही को दूकान लगता था । तुम तो बाहते नही घर सुदर दिसे, आधुनिक बने, तुम्हें तो अपनी मास्टरी सेमतलब है, लेक्चर झाड दिया, हो गया याम। घर भी अपनी तरह बना रखा था।" पत्नी मुझे डाटने के स्वर में था गयी थी 'भाग्यवान बौन नही चाहता है कि उसका घर अच्छा लग । पर घर में खाने को न हो और हम सेंट लगाते फिर क्या अच्छी बात है ! जितनी चादर हा उतने ही पाव पसारने चाहिए न," मैने भास्टरी-मुद्रा मे कहा। रहने दा अपनी मास्टरो वाली नेक्चरवाजी । धादर और पाव पमारन की बातें पुरानी हो गयी हैं, अब तो पाय पसारो और चादर मडी करो।" 'चाह चादर ही फट जाए और हम नगे दिखाई देने लगें।"मैंने जिनासा प्रक्ट की। "तुमस तो बहस रकार है, इस घर मे मरा भी कोई हर है कि नहीं। आखिर पर चलान कीजिम्मदारी विमकी है ? मेरी न कुछ दिन मैं अपनी तरह से घर चलाना चाहती हू, पला नही सकती है भया?" पत्नी नाराज हो गयी। ' शादी के बाद से तुम ही तो चला रही हो। सारा घर हो तुमने वनाया है, अब इस घर मे तुम्ह खराबी नजर आ रही है । "मरा एक सपना है उसे मैं पूरा करूगा, सब कुछ नये तरीके से होगा।' पत्नी की आखा मे मपना तरने लगा । और मेरी आखो में रेगिस्तान की रेत । ~पर इस सबके लिए पैसा कहा से आएगा, देवी? त खाह तो उतनी है, एक माघ डी० ए० और मिल जाएगा।" -'फ्लिहाल तो उधार से काम चलाएगे।' 'उधार उधार बडी बुरी दलदल है, राजनीति से भी बड़ी दल- दल।"

28 - "ह, सारा देश उधार पर चल रहा, तुम्हारामतलब है देश दला मे फसा है । हम तो वैसे भी धीरे धीरे बचत करके सब चुका देंगे।" पत्नी ने अपनी पचवर्षीय योजना की घोषणा की। "से" --"घर की प्रगति के लिए हम सबको कुछ न कुछ कुर्वानी करनी होगी। कज उठाना होगा, तुम्ह अपने सब फालतू खर्च बद करने होंगे।' . जसे ?" -~~"फिल्म देखकर आखें खराब करना और पान खार पमा यूषना।" -"पान तो वैसे ही बहुत कम खा रहा है, पर तुम जो रोज ढरों लिपिस्टिक खा जाती हो, वह ?" मैंने आखें मटकाइ । --"वह लिपिस्टिक जरूरी है, सुदरता के लिए। तुम तो चाहते नहीं हो कि मैं सुदर दिखाई दू, लाग तुम्हारी पत्नी को सदर कहे खुशी नहीं मिलेगी?" पत्नी ने चेहरा मटकाया। मुझे तो पान खाने से भी खुशी मिलती है । पान पर खच ही क्तिना होता है ? तुम जो विदेशी लिपिस्टि खाती हा उमका दसवा हिस्सा भी नही होता होगा। हम तो देशी पान चाहिए, तुम्हें लिपिस्टिक भी विदेशी चाहिए, देख रहा हू आजक्ल विदेशी चीजें तुम्हें बहुत पसद आन लगी हैं । विदेशी कार विदशी टी० बी०, विदगी सूट, विदेशी कबल, तुम तो विदेशमय होती जा रही हा । 'तुम तो दषियानम हो।' ओर तुम? तुम भी तो गांधीवादी हो जब भी कोई सक्ट होता है- गांधी गाधी !'पुकारन लगती हो, गांधी जी ने तो म्वदा पर बल दिया वितगी की हाली जलाई थी। उन परिस्थितियो म यह आवश्यर था। तय हम गुलाम थे और बाबाद हाना चाहते थे । अव ता हम पूरी तरह म भानात हैं ' और यपूरी तरह म गुनाम होना चाहत हैं । अब नई तरह। गुलामीम पगार है, इक्वीगयो सदो की, क्यों?' -तुमग तो यह कार है। मैंन दस लिया मेरा इस पर कोई . था, " 29 " अधिकार नहीं, में नाम को घर को रानी, मेरी मम्मी के घर में 'मम्मी' मेरी पत्नी की आखिरी और कारगर हथियार है । यह रोती है मोर 'मम्मी' थे पर भी प्रामा म पुराण वाचने लगती है। मैं भावुक होकर हपिपार हाल देता हूँ भायुक्ता भारतीय गुण जो है । सात सन परने वाला भी रो दे तो हमारा दिल पसीज जाता है, इस पार भी मैंने हथियार डालन को स्वणिम परम्परा निभाते हुए पहा, "अच्छा बाबा ! रोप्रो मत, और यह बतायोनि वचन के लिए और मया पटौती करनी होगी ?" ~"अब तुम यॉलेज स्कूटर की जगह बस म जाया करोगे।" -"वप मे! क्यों?" "पट्रोल बचाओ, सर्वा पमरो।" -~"पर वम भी तो बहुत महगी हो गयी है।" -"यूटर के खर्चे से बहुत कम महगी है । जब बहुत जरूरी हो तभी स्वटर पर जाना।" --"चलो यह अक्लबदी की बात कही तुमने, हम लोग पार यध देते हैं, यह भी बहुत पदाल खाती है । साती क्या हो पाती है।" "बार बेच देते हैं ! मुझे और बच्चा को जाना होगा तो किस पर जायेंग, तुम्हारे वटारा स्कूटर पर" -घस मे जायेंगे।" मैंने शिखर वार्ता मे समझोता रसा। -'हमस बस म नही जाया जाएगा। बस में कितने गदे गद लोग बैठे होते हैं । वस म सुरक्षा भी क्या है ?" -बार म मरे सूटर से चार गुणा पेट्रोल खर्च होता है। मैं जब स्कूटर मे भी जाने लायक नही रहू और तुम कार मे मजे करो, भई । - -बार मे तो हम जरूरी काम से जाते हैं।" ~~"जरूरी काम मायो हर हफ्ते जाना जरूरी है ? सहेलियो के साथ विदी शापिंग के लिए जाना जरूरी है ? सहेलियो को लादकर सडक पर 'सडक गश्ती करना जरूरी काम है ' तुम तो सब्जी भी कार पर खरीद कर लाती हो, क्यो?" --"देखो तुमने, फिर बहस की, तुमने अभी समझोता किया था न, 30 " - रही हूँ अच्छी चीजो के लिए बाजारोम चप्पलें घिस रही हूँ हरममय घर हुआ है सावन की अघी है, उमे पतझड क्यो दिखाई देगा। आखिर उमकी अब तोडने भी लगे।" मुझे लगा कि पली अब फिर 'मम्मी' को याद करने के मूड म है। मैंने फिर हथियार डाल दिए । 'अच्छा गृहदेवी ! अब और क्या क्या परिवतन कर डाला है जल्दी बताओ। मुझे 'चायास' लग रही है।" -"तुम्हारी चाय के लिए हीटर वाली केतली लाई हूँ, यह देखो कपडे घोने की मशीन और यह देखो वैवयूम बलीनर । यह आटा गूथने की मशीन कितनी अच्छी है न ।' -~-"काम वाली और नौकर की छुट्टी करने वाली हो क्या -"नही तो। 'क्या मतलब ?" -मतलब यह कि यह सारी चीजें चलेंगी बिजली से । और हमारे यहा बिजली का भरोसा है नही। यह चीजें तो घर की शोभा बढाएगी। आने वालो पर कितना रोव पडेगा, नहीं।" "ह भगवान "मैंने अपना माथा ठोक लिया। -'तुम क्या अपना माया ठोक्ते हो, माथा तो मुझे अपना ठाना चाहिए । मैं तो घर की प्रगति के लिए इधर उधर से उधार मागती फिर को इक्कीसवी सदी मे ले जाने की टेंशन में रहती है और एक तुम हो "मेरी सरकार ! मेरी गहदेवी | मेरी घर की रानी ! मेरी सब कुछ अपनी यह टेंगन छोड दो। अपने पाच सितारा सपने को छाडकर मोचो कि तुम्हारा गरीब पति क्या चाहता है । वठन को नया सोफा या खाने को यह कह कर चाय बनाने के लिए मैं रसोई म चला गया । जानता हूँ वह मेरी बात पर सोचगी नही । उसन रगोन चश्मा पहना 'मम्मी ने उस पतझड देखने पहा दिया है। इस बीच मरी पत्नी ने घर को इक्कीमवी मदी म ले जाने क लिए, अपने सपन को पूरा कर लिए बहुत कुछ किया है। मेरी और बच्चों को अलमारी में बचत के काम पर जोछ या छापा मार कर उसे ग - मना - 31 जब्त कर लिया है। उसकी अपनी अलमारी सुरक्षित पडी है, उस पर छापा मारने की हम मे हिम्मत नहीं है। घर म सब्जी, धोबी, दूध आदि का हिसाब लगाने के लिए केलकुलेटर खरीद लिया गया है । मौसम, शेयर मार्केट का हाल जानने के लिए 'टेलीटेक्सट' लगा लिया गया है । बच्चो की पत्रिकाए वद हो गयी हैं, अखबार बद हो गया है । केवल दूरदशन हाजिर है हर मज की दवा के लिए, पत्नी खाना एक समय ही खिलाती है। हमारे स्वास्थ्य के लिए यह बहुत जरूरी जो है। पत्नी का सपना हमारो खुली माखो को बंद करन की कोशिश म है।

डॉक्टरी सर्टिफिकेट महिमा हम उस कालोनी मे नये-नये थे। मुझे जुकाम हो गया था और गला खराब था। जुकाम से मैं बहुत घबराता है। अपने अदर की गदगीको इधर उधर फेंकना पडता है। नाक से निकला द्रव बार बार मुह से सम्बध स्थापित करने का प्रयत्न करता है परन्तु रूमाल उहें मिलने नहीं देता। (इम जालिम जमाने मे दो दिलो को किसने मिलने दिया है ?) जुकाम भ्रष्टाचार के समान इधर उधर गदगी तो फैलाता ही है, दूसरो कोभी भ्रष्ट करता है। दूसरे लोग आपकी इस नीति को पसदन करते हुए भी अपनी विवशता मे इस व्यवस्था को स्वीकार करते हैं । मैं डॉटर की खोज मे निकला। देखा डॉक्टर डी० डाबर की दुकान पर अधिक भीड थी। जिस डाक्टर की दुकान पर अधिक भीड होती है वही अच्छा डॉक्टर होता है। प्रजातन का भीडवादी सिद्धात यही कहता है । अपनी बारी आने पर मैं डाक्टर साहब के पास पहुचा। इससे पहले कि मैं अपना रोग बताता, डॉक्टर डी० डाबर बोले, "कितने दिन का दू?" 'कितने दिन का 'सुनकर मैं चौंका। उहोने मेरा रोग पता लगाने से पहले ही क्तिने दिन की दवाई देनी है की जानकारी चाही थी। क्या उहोने मुझ लिफाफे को खोले बिना मजमून भाप लिया था? मैंने कहा "जितने दिन मे ठीक हो जाम उतने दिन की दवाई दे दीजिए।' "दवाई ।' डॉक्टर डाबर ऐसे पोंके जैसे मैंने पसारी की दुकान समझ पर उनसे धनिया मांग लिया हो। "जी, मुझे बहुत सस्त जुकाम है उसके लिए दवाई चाहिए "मैंने पहा। डॉक्टर डावर ने मुझे अबोध समझते हुए कहा, "आपको शायद पता नही, मैं दवाई नहीं देता है।

33 मुझे समझ मे आ गया, मैंने कहा, "ओह, तो आप हिंदीवाले माहित्य के डाक्टर हैं । मैं भी हू मिलाइए हाथ।" उन्होने हाथ नहीं मिलाया और खीझकर बोले, "मैं हिंदी विदीवाला डॉक्टर नहीं हू, मेडिकल डॉक्टर हू । पर तु दवाई की जगह मेडिकल सर्टि- फ्टि देता है। आपको दफ्तर से छुट्टी चाहिए है ना?" "नही, छुट्टो क्या करनी है, मुझे तो जुकाम है डाक्टर डाबर फिर मुझला गये । बोले, "आप बार बार क्यो बता रहे हैं कि आपको क्या बीमारी है । माप तो यह बताइए कि आपको दफ्तर से क्तिने दिन की मेडिकल लीव चाहिए-दस दिन की, पद्रह दिन की। बीमारी तो मैं लिखूगा। आप पेड क्यो गिनते हैं, आराम से मेडिकल मटि- फिकेट लीजिए और घर जाकर आराम कीजिए।" "मेडिकल सर्टिफिकेट से जुकाम ठीक हो जाएगा क्या?" मैं फिर जिनासु बन गया। "आराम करने से कोई भी रोग ठीक हो सकता है।" 'आप तो पढ़े लिखे हैं । सब जानते ही है। दवाई देने में कितने झझट हैं । और आजकल कौन सी असली दवाइया आ रही हैं। रोगी ठीक न हो तो बदनामी अलग होती है। हमने तो साफ सुथरा काम रखा हुआ है । बस मेडिकल मटिफिकेट देते हैं, कोई चलेंज नहीं कर सकता है । जनता का भला अलग होता है ।" डॉक्टर डाबर ने अपनी हाक्टरी प्रक्रिया समझाते हुए कहा। . मरी जिज्ञासा इस महापुरुप के बारे मे बढ रही थी। मैंने कहा, "मेडिकल सर्टिफिकेट देने से जनता का क्या भला होता है?" "आप बहुत ईमानदार लग रहे हैं, इसलिए इतनी मूखतापूर्ण बात कर रहे हैं। आपको समझाना ही पड़ेगा, वैसे पढे लिखे को समझाना बहुत कठिन है। भैडिकल सर्टिफिकेट होने से आप आराम से बच्चे पाल सकते हैं, शादी-ब्याह मे जा सकते हैं, कोट मे तारीख माग की डलवा सकते हैं, बच्चो को घूमने ले जा सकते हैं, घर के काम काज कर सकते हैं और न हो तो मुह ढक कर आराम से सो सकते हैं। केजुअल लीव खत्म हो जाए और 34 । सर्टिफिकेट तो कलियुग का वरदान है। सतयुग त्रेता या द्वापर में मेडिकल सर्टिफिकेट मिलते तो पई दुघटनाए होने से बच जाती। हरिश्चद सर्टिफिकेट छुट्टी चाहिए हो तो, तनख्वाह क्टवायेंगे क्या? मेडिक्ल लीव के लिए बीमार होने का सर्टिफिकेट चाहिए ही न०, मह सेवा हम करते हैं। और हमारी रेट भी कितनी कम हैं। एक हफ्ते के पाच रुपये, दम दिन क दस रुपये, तीन महीने के बीस रुपये । वीस रुपये दीजिए और तीन महीने आरीन से कोई काम कीजिए, बिजनस कोजिए, बच्चे पालिए।" मैं उनके ज्ञान से चमत्कृत था। मैंने कहा, 'हे महापुरुष मेडिकल सर्टि फ्केिट से बच्चे कसे पलते है, इसकी व्याख्या करें।" 'बड़ी सरलता से पलते हैं। आजकल पति पत्नी दोनों समान हैं, ज्वाइट फेमिली रही नहीं। छोटा बच्चा कैसे पलेगा, विदाउट लीव ? कभी पति मेडिकल लीव ले और कभी पत्नी तीन महीने की एवाशन लीव'" ‘एवाशन लीव ? ' मैंने आश्चय से पूछा, "बिना एवाशन के क्या सर्टिफिकेट मिल जाता है ?" डॉक्टर डाबर ने मुस्कराते हुए कहा 'क्या नहीं । अजी साहब मडिकल - दे सकते थे कि उह झूठे सपने देखने का रोग है। श्री राम मेडिकल सर्टिफिकेट द सकते थे कि वह वन जाने के लिए मेडिकली फिट नहीं हैं। जुए म हार जाने के बाद शेष पाडव युधिष्ठिर के सवध में मेडिकल सटि फिकेट दे सकते थे । महाभारत का युद्ध नहीं होता जनाब । आप क्या जाने इस मडिकल सर्टिफिकेट की महिमा ।" "पर यह ता सब झूठ है, गलत 'भाईजान आप क्सि दुनिया में जी रहे हैं। आजकल तो सत्य भी भूल के कधे पर चढकर जीतता है । सत्यवादी तो मुमीवत मे फमता है। दवाई देने मे आदमी मर सकता है, पर तु झूठा सर्टिफिकेट तो लोगों को मुमावत से बचाता है।" मैंने उनके घरणो पर लोटते हुए कहा, 'आप तो देश और जनता की बहुत सेवा कर रह हैं। डॉक्टर डावर ने मुझे अपने घरणो मे उठाने के बाद अपन परा उगलियां गिनते हुए कहा, "अजो कहा, यह तो हमारा फ्ज है।" की 35 मैं समझ गया कि फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट देना उनका फज था। डॉक्टर डाबर ने मुस्कराते हुए कहा, "आप तो बहुत भोले हैं, कहा काम करते हैं। "जी, कॉलेज मे पढाता हूं।" ?" 7 यह सुनते ही डॉक्टर डाबर अट्टहास कर उठे, "अरे साहब, आप तो बडी ऊची चौज हैं। फर्जी सर्टिफिकेट के ढेर पर वठे हैं। मुझे बना रह थे क्या आप लोगो के यहा तो यह धघा बहुत जोरों पर है। पाचवी पास बी० ए० की डिग्रिया लिए घूमते हैं। जानते हैं मैं डॉक्टर कसे बना आपको ही राज की बात बता रहा हूँ। आप तो अपने ही हैं । नम्बर कम थे। अनुसूचित जाति का सर्टिफिकेट बनवाया और घुस गये डाक्टरी मे । अपनी जान पहचान है आपको कभी चाहिए तो बताइएगा।" मैंने यह सुनकर ईश्वर का धयवाद दिया कि उसने इस महापुरुप को झूठे मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने की सदबुद्धि दी, वरना यह क्तिनो के स्वग के लिए सर्टिफिकेट काट देता। "हाजी, कितने दिन का दू फिर मर्टिफिकेट?" डॉक्टर अपने व्यवसाय । पर लौट आए। 'जी अभी नही, फिर कभी। अभी जरूरत नहीं है ।" मैंने कहा। "अजी इतना समय लगाया है, एक हफ्ते का तो ले ही जाइए, वेवल पाच रुपये की बात है। पाच रुपये आजकल के जमाने मे हैं ही क्या, आदमी पान खाकर थूक देता है चलिए आपको हम एक रुपये का कसेशन द देते यह कहकर डॉक्टर डाबर ने मेरे नाम का सर्टिफिकेट बनाना शुरू कर दिया। चलते हुए वह मुझसे गले मिले, ' देखिए हम आपके काम आये है आप हमारे काम आइएगा। आप अपने कालेज मे हमारे बारे मे बता दीजिएगा और मैं कुछ लोगो को आपके पास भेजू गा, दिलवा दीजिएगा बी० ए० के सर्टिफिकेट आप भी। आपके यहा तो स्टूडेंटम को भी एटेंडेंस के चक्कर मे मेडिक्ल चाहिए होता है।' - 36 मैं जानता नहीं है कि ऐसा कहकर उहोंने मेरा दर्जा बढाया था, मेरा सम्मान किया था या मेरे मुह पर यूका था। मैं डॉक्टर डाबर होता तो मुह पर पडे थूक को साफ करके मुस्करा देता, परतु मैं गदन झुकाकर घना आया। एक नगे ने कपड़े पहनने वाले को शर्मिदा कर दिया था । धन्य ह के लोग जो फज और फर्जी मे अतर समाप्त कर देते हैं।

मेरा अच्छा पडोसी सुरेश वह मेरा पडोसी है, अच्छा पडोसी है। उसका नाम सुरेश है। सुरेश मेरा शाश्वत पडोसी है। पहले वह मेरे घर के पास रहने के कारण पडोसी है । दक्षिण दिल्ली से पूर्व दिल्ली में मकान बदलने पर भी वह मेरा दिली पडोसी है । हरियाणा, उत्तरप्रदेश अथवा राजस्थान म चले जाने पर वह मेरा राज्य पडोसी होगा । विदेश जाने पर वह मेरा विश्व पडासी होगा। हमारा पडोसी होना शाश्वत है। जैसे-जैसे वह मुझसे दूर होगा यह सम्बन्ध और व्यापक होंगे। हम दोनो के पडोसी सम्बध बहुत अच्छे है--भारत पाकिस्तान, इराक ईरान, रूस-अमरीका की तरह अच्छे पडोसियों के समान हम बाहरी तौर पर सदा एक दूसरे की भलाई और सम्व धो मे सुधार की बातें करते हैं, पर तु अपनी अपनी बगल मे निरतर हथियार छुपाये रखते हैं। हम दोनो को एक दूसरे की पीठ बहुत पसद है और अवसर मिलने सो हम छुरे का प्रयोग करते हैं । हम ही दोनों शान्ति के कबूतर उडाते हैं, परतु अपनी अपनी बदूको से उसका निशाना भी बाधते रहते हैं। हम जब भी मिलते हैं, एक दूसरे से गले मिलते हैं और यदि फोटोग्राफर हो तो मुस्करा भी दते पडोसी होने के कारण सुरेश मेरे स्वास्थ्य का बहुत ध्यान रखता है। वह मुझे कभी चाय नही पिलाता। मैं उसे चाय पीने के लाभ बताताहू और पह चाय न पीने के लाभ बताता है। अच्छे पडोसियो की तरह हम अगली घाय तक बहस स्थगित कर देते हैं तथा चाय पीने किसी मित्र के पास चल देते हैं। उस दिन रात दस बजे क्सिी ने मेरी घटी बजायो। "कोन है ?" मैंने शक्ति स्वर में पूछा।

38 "हम हैं।" किसी ने जवावी अदाज मे कहा। "हम कौन?" "सुरेश जी के अभिन मित्र दरवाजा खोलिए, देखिए, सुरेश जी ने आपके लिए क्या भेजा है।" सुरेश से कुछ मिलना, काजल की कोठरी मे सफेदी और रेत मे मछली पकड़न जसा है। पर यह व्यक्ति सुरेश नही था जा झूठ बोलता और फिर इतनी रात गये कौन झूठ बोलेगा। (वसे झूठ और रात में कोई सम्बध है क्या') मैंने दरवाजा खोल दिया। मरे सामने एक भयावह व्यक्ति खडा था-साढे छह फुट शरीर, बढी दाढी, बिखरे बाल और बडी-बडी लाल आखें। उसके हाथ मे बिस्तरबद और जटची थी। उसने अटैची और बिस्तरबद नीचे रखकर जेब से पेन निकालते हुए कहा, "यह पन सुरेश जी ने भेजा है, आप उनके पास एक महीने पहले भूल आये थे।" मेरी पत्नी ने उस व्यक्ति को देखा तो आतक के कारण चीख पड़ी। उसका हुलिया किसी को भी भयभीत कर सकता था। मैं समझ गया कि पन भेजना सुरेश का मुख्य उद्देश्य नहीं है। इसके पीछे बहुत बडी साजिश छिपी हुई थी, क्योकि वह पेन मेरा नहीं था। कही यह व्यक्ति 'अतिथि' बनाने की योजना से तो नहीं भेजा गया है ?" "ठीक है पेन मुझे मिल गया है, सुरेश जी को मेरा धयवाद कहिएगा।' मैंन दरवाजा बंद करने की प्रक्रिया मे कहा। पडोसी मित्र ने दरवाजा खोलने की प्रक्रिया म कहा, "सुरेश जी को तो ध यवाद हम अब कल ही कहगे। इस समय तो आप थोडे से जल का प्रवध करवाइए, बहुत गर्मी पड़ रही है। बच्चे बड़े प्यासे हैं।' "बच्चे । " मेरा मुह आचश्य से खुला रह गया। उ हांने मेरे खुले मुह को खुला ही छोडकर दरवाजा खोला और एक पत्नी तथा तीन बच्चो सहित सोफे पर पधार गये। जरा पखा तो चला दीजिए। अरे, आपके पास तो फ्रिज भी है ! सुर जी यहा ता हम गम पानी ही पीना पडा था। यहा बढिया रहेगा, क्या 39 अब मैं क्या कहता। सुरेश ने ऊट को पूरी तरह प्रशिक्षण देकर भेजा था। कट ने सोफा सभाल ही लिया था और थोडी देर म चारपाई भी सभालने वाला था। "आपको मैंने पहचाना नहीं।" मैंने हाथ मलते हुए जिज्ञासा प्रकट "हमे पहचानेगे भी कैसे ? पहली बार मेंट जो हो रही है। पर पत्रिकाओ म हम आपसे निरतर भेंट करते हैं न हम रामऔतार 'मयूख' है। आपने हमारी कविता तो पढी ही होगी। सुरेश जी ने पिछले से पिछले बरस जो कविता विशेषाक निकाला था, उसके चौबीसवें पेज पर छपे थे हम । सच, सुरेश जी हमे बहुत प्रोत्साहन देते है। अब देखिए न, आप जैसे महान साहित्यकार के दरसन करवा दिये । आप भी हमारी रचनाओं पर अवश्य राय दीजिएगा। हम लाये है रचनाए साथ में। आज रात हमारी आपकी कवि गाष्ठी जमेगी। बच्चा और पत्नी के खाने सोने का जम जाये तो हम दोनो जमते ह हा हा वह न जाने क्यो हम पड़ा। जैसे लोगो को कॉकोच, छिपकली आदि का देखकर लिजलिजाट हाती है वैसे मुझे 'मयूख' जैसे कविया को देखकर होती है । जब ये कविता सुनाने की बात कहते ह तो लगता है जैसे परमाणु-युद्ध आरम्भ होने वाला है। मैंने उहे टालने के इरादे से कहा, ' देखिए, मुझे सुबह बहुत आवश्यक काम से जाना है, पत्नी और बच्चा को स्कूल जाना है, इसलिए देर रात " तक "चले जाइएगा न सुबह । सच्चा साहित्यकार रात रात भर जागकर ही तो विश्व के हलाहल को पीता है। आप तो महान साहित्यकार है न, साहित्य से मानश्यक क्या काम होगा। अब आप और हम जमे बुद्धिजीवी माम आदमी की नहीं सोचेंगे तो कौन मोचेगा, छाबडी वाला? अरे, हम और आप पर ही तो गहरी जिम्मेदारी है, कुछ कर दिखाने की। समझ गये न आप हमारी बात को? देखिए, इस गीत म हमने इस बात को किस 40 ?" तरह से उठाया है।" यह कहकर वह अपना थैला टटोलने लगे। मैं समझ गया कि 'मयूख' जी का साहित्यिक प्रेम मेरा ही नहीं, मुहल्ले का जगराता करायेगा। मैं सारी रात उनके स्वर से आतक्ति होता रहा। परतु सुबह उनके उठने से पहले, 'मयूख' जी को सोया छोड सुरेश नामक सत्य की खोज में निकल पडा। मैंने सुरेश से मिलते ही कहा, "यह किस बीमारी को भेज दिया मेरे यहा "क्सिकी बात कर रहे हो? मैंने तो किसी को नहीं भेजा है तुम्हारे यहा।" सुरेश के चहर पर भोलापन था। "क्या, रामऔतार मयूख को नहीं भेजा है तुमने "मैं क्या भेजने लगा। तुम्हारा पता पूछ रहा था, मैंने बता दिया, बस। "और वह पेन" "पेन, कौन सा पेन ।" सुरेश ने साश्चय कहा। मैं समझ गया कि सुरेश कुछ भी स्वीकार नहीं करेगा। इससे हमारे पडोसी सम्बधो में दरार पड़ने का खतरा था। अच्छे पड़ोसियो की तरह हमने मेंटवार्ता को और अपनी-अपनी बातो पर अड़े रहे । मैंने मुस्कराते हुए उमसे हाथ मिलाया। चलते समय सुरेश ने अच्छे पडोसी का परिचय दतें हुए कहा, मेरी सहायता की आवश्यक्ता हो तो बताना।" ?" घर लौटा तो कृष्ण के पास से लौटे सुदामा की तरह मैं भी चौंक गया। वह फ्लट मेरा नही लग रहा था। सुदामा को तो झोपडी के स्थानपर महल घना मिला था। परतु मेरे पलट को 'मयूख-परिवार ने जिस हालत मे पहुंचा दिया था, उसे क्बाइसाना क्ह्ना हो उचित होगा। मयूख जी के बच्चो ने हर चीज को खिलौना समभा था। टेलिविजन- स्त्रीन खिडक्यिो के पीशे, शृगारदान यानी जिमका भी दिलशी का था, वह हजार टुक्डों मे विखरा पड़ा था। मेरे दोनो बेटा माथे पर बधी पट्टियां मयूष जी के बच्चो द्वारा किये गये वीर-कम की खुली घोषणा कर 41 रही थी। और इस सबके बीच 'मयूख जी' मुहल्ले के तथाकथित कवियो की 'गोष्ठी' जमाये अच्छे जलपान के साथ काव्यपाठ कर रहे थे। यह देखकर मेरे मुह से आह के स्थान पर निक्ला-'सुरेश'। अब मुझे किसी और 'मयूख' की तलाश है। अच्छे पडोसी, सुरेश का बहुत ख्याल जो है मुझे।

सुन्दर पडोस इन दिनो मैं मोहल्ले मे अचानक महत्वपूर्ण हो गया हू, मरी पूछ बढ़ गई है। पडोसियो को मरे हाल चाल की चिता रहने लगी है । मैं जरा सा भी छीकता हू तो सारे मोहल्ले को जस नुमोनिया हो जाती है । खासता हूँ तो तपदिक के भय से शकित मोहल्ला प्रमु स्मरण करने लगता है । वारी बारी से मोहल्ल के पुरुष मरा हाल चाल पूछने चले आते हैं । मैं नहीं चाहता है फिर भी वे चले आते हैं । मैं इस अतिरिक्त सौहाद स घबरा गया है । मरे छीकने पर सक्सेना साहब को प्रतिक्रिया "आज सुबह तो आपने बडी जोर से छीक दिया । मेरा तो दिल ही बैठ गया, पता नहीं क्या हो गया जापको, मैं शेव बना रहा था। उसके बाद नहाना था, पर तु मुझसे रहा नही गया और आपको दखने चला आया। आप ठीक है न । 'ऐमा कहते हुए वह मेरी ओर नही मेर पडोस म झाकते हैं और माय मे हैं है की शली म बेमतलब हाल पूछते रहते हैं । उनके जाने के कुछ समय बाद राधेलाल जी आ जाते हैं। इस मुद्रा मे हडबडाए हुए है जस चुनाव के समय टिकटार्थी हडबडाए रहते हैं । ' आप- आप भी कमाल के हैं झे बताया तक नहीं कि सुबह आपको बहुत जोर से तीन छीके आइ । अब यह बात भी हम सक्सेना से पता चली । बडे शम की बात है अब पडास में रहत है हमारा भी ता कुछ घम है ।' यह कहते हुए राधेलाल जी पडोस धम निभाने के लिए पडोस दशन करने लगते हैं । राधेलाल जी ही नही, जाशी जी शर्मा जी, वासल साहब, कपूर साहब, आयगर साहब, सबको पडोस घम याद आ रहा है ।" पहले पडोस घम किसी को याद नही आता था। मेरा बेटा बीमार रहा, इलाहाबाद म दादा जी का स्वगवास हुमा परतु मोहल्ला लोकसभा अध्यक्ष सा निलिप्त होने का सफल अभिनय करता रहा । राजधानी की भागदौड में सब बुरी तरह फसे हुए थे, फुसत कहा थी | किसी बीमार को 43 च देखना, किसी का हाल चाल जानना, किसी को सात्वना देना, ये सब फुसत के ही काय हैं । कितने लोग रोज बीमार होते हैं, मरते हैं, आज के महा- नगरीय आदमी के पास कहा इतना समय है । और फिर इमसब मे मिलने वाला क्या है? पर तु अब जैसे बदल गया है। मानसून की वर्षा अच्छी हो गई है। सूखे के स्थान पर हरियाली छा गई है। पहले मेरे पडोस मे 62 वर्षीय वुढिया रहा करती थी। दमे की मरीज, कौन आता बलगम का मोदय निरखन, खामी की सरगम सुनने । आजकल मरे पडोस में पहाडी का प्राकृतिक सौदय आ बसा है । झरने फूट रहे हैं और कोयल जमे विजय गीत गा रही है, बाईस वध की सोदय प्रतिभा जो सदव परफ्यूम मे डूबी रहती है, नाम है निहालिका-अकेली रहती है । (अकेला सौदय वैसे भी आकपा हाता है ।) उसके अकेले रहने से मोहल्ला निश्चित भी है, चिंतित भी है । मरे घर से यह प्राकृतिक मौंदय साफ दिखाई देता है-कभी चाय पीता हुना और कभी नहाता हुआ। मोहल्ले के अधिकाश 'मद' एक पत्नी व्रत और मर्यादाशील जाने जाते है। इसलिए वेचारे सीधै दशन का लाभ उठाने से डरते हैं । वहान से मेरे घर आते हैं, मेरी छोक हाल पूछते हैं और मन ही मन भजन गाते रहते हैं-दशन दा धनश्याम नाय मरी अखिया प्यामी रे। जिन्हे दान मिल जात है वह निहाल हो जाते हैं । जिह दर्शन नहीं मिलते हैं वे भरी पत्नी के अभिभावक बन जाते हैं, उ है चारो ओर पतन-ही पतन दिखाई देता है । "भाभी जी, यह आजकल आपके पडोस म कौन आ गई है, बड़ी टिप टाप से रहते है । कुछ अजीब सा ढग है इसका।" वधारी भाभी जी-मरी पत्नी जिह हर सुदर नारी अपने चालीस वर्षीय खिचडी वालो वाले प्रौढ पति के लिए मनका लगती है अपना दुखडा रोने लगती हैं। न जाने कहा से आ गई है चुडल मी। न मा का पता है न वाप का टिचर पिचर करती है । जब देखो सेंट से भरी होती है । मुझसे तो बात नहीं करती है जब देखो इनसे आलें मटका-मटका कर बात करती है और ये भी भावधानी हटी दुपटना घटो के अदाज में श्रीवास्तव साहब मेरी पत्नी 44 1 को समझाते हैं, "भाभी जी ऐसी लडकिया तो बडो घालवाज होती हैं, पूरी जादूगरनी होती है। योडा-सा मुस्कराकर मदों को बेवकूफ बना लेती हैं और अपने इशारो पर नचाती हैं। आप तो इसे घर मे बिल्कुल न घुमने दिया करो।" (यह दीगर बात है कि श्रीवास्तव साहन ने अपने घर में ही नही, दिल के भी सारे दरवाजे खुले रखे हैं, उस चालबाज के लिए ।) एक दिन गुप्ता जी मेरी खासी की आवाज सुनकर आते हैं, चाय पीते हैं, पडोस की बद खिडकी देखते हैं और मेरी पत्नी के लिए सूचना केंद्र बन जाते हैं, "भाभी जी, पता नही कैसे कैसे लोग माते हैं इसके यहा रात रात भर आना जाना लगा रहता है । एक दिन तो यह रात के डेढ बजे पर आई। (आप डेढ वजे क्या कर रहे हो गुप्ता जी)कई बार तो रात रात भर गायब रहती है। (और बेचारे गुप्ता जी सो नहीं पाते हैं।)पर हमे क्या, हम तो अपना ध्यान रखते हैं। हमारा तो मन साफ है । (दूमरो पर कीचड उछालने के लिए।)" मोहल्ले का हर मद और उस मद की पत्नी हमारे सलाहकार, हित चिंतक और कृपा करने वाल हो गए हैं। मोहल्ले के इस धम पालन से मेरा पारिवारिक सिंहासन डोल रहा है । मैं घुट घुटकर छोकता हू, जिससे कोई पडोसी घम पालन की ओर हठात प्रेरित न हो जाए । मैं दबा-दबा खासता हूँ जिससे पडोस घम की हानि समझ कोई महान आत्मा मेर पर अवतार न ले ले। इस सुदर पडोस का कुछ कुछ लाभ भी हो रहा है। कोई खीर दने के बहाने से आता है तो कोई घर के बने बाजार-जैसे, छोले भठूरे दने आ जाता है। कोई सौंदय उपासक बाजार से सब्जी खरीदकर लाता है और अपने खेत की ताज़ा सब्जी बताकर हमे दे जाता है। डाकिया तक हर चिटठी देकर जाता है यहा तक कि कभी कभार रविवार को भी आ जाता । और निहालिका भी अपने भक्तो को निराश नहीं करती है। मुस्करा- कर दशन देती है । वह मुस्कराती है तो चरित्र का सिंहासन डोलने लगना है। परतु सम्यता व्यक्ति को कायर बना दती है। मभ्य व्यक्ति किंतु 45 परतु, लेकिन को शैली में चितन करता है । सीधे आक्रमण का साहम नहीं जुटा पाता है । अनेक चरित्रवान चरित्रहीन होने की उत्कट लालसा रखते हैं पर तु साहस नहीं कर पाते हैं, अपनी कायरता को छिपाने के लिए अपने चरित्र का ढोल पीटते रहते हैं। ऐसे ढोल पीटने वाले बन्दुक पलाने में लिए अक्सर दूसरे के कघेतलाशते रहते हैं । लुक-छिपार परित्रही होने में विश्वास रखते हैं। चरित्रवान सभ्य मदों ने मोहल्ले का मौसम अपने अनुरूप पर लिया है, उन्हे अब मेरे कधे की आवश्यकता नहीं रही है। मेरी छी और खामन की आवाज सुनकर उनका दिल नही बैठता है, क्योकि दिल तो सुदर पडोस को दे बैठे है । अब मैं भी खुलकर छोर सकता हू, खांस समता हूँ। चतुर मदं सीधा सम्पर करके डायल कर रहे है । सौन्य दशन के लिए वे मेरे घर नहीं आते हैं। निहालिका ये घर जाते है । मोहल्ले की परिष- वान पलिया अब मेरे यहा आती हैं, अपना दुम्बडा रोती है, निहालिया पो कोसती हैं, सुबकती हुई चाय पीती हैं और चली जाती हैं। जिन श्रीवास्तव साहब ने मेरी पत्नी को सावधानी की सलाह दी थी, वही असावधान हो गए हैं । एक दिन निहालिका ने उनसे गुस्करापरमह दिया कि उस दरीबे को जलेबी बहुत अच्छी लगती है । बस फिर क्या था, श्रीवास्तव साहब हरी घास को देखकर झूम उठे । लोगो को सो आरामा से तारे तोडने पड़ते हैं। श्रीवास्तव को तो जलेबी लानी थी, यह भी दरीमे से । श्रीवास्तव साहब ने अपना बढिया सफारी सूट पहना, एष सो दस मे० की वस पक्डी और बस मे धक्के खाते पहुच गए चांदनी पौष । यहाँ से 40 २० किलो भाव की जलेबी परीदी और इस हर गे विही जसेवी ज्यादा ठण्डी न हो जाए स्फूटर रिक्शा पकड लिया। है है परते गलेगी पालिफाफा लिए पहुच गए निहालिया के पास ! अपनी फिगर पाध्याा रखने वाली निहालिया ने एक टुक्डा साया यामी शेप गलेपी गौरमो दे दी । बचारे श्रीवास्तव इसी में निहाल हो गए । (वेयल शो रूपये ही सो खच किए।) जो हमे निहालिका से दूर रहने की सलाह देते थे, यही उससे ज्यादा समीप हो गए हैं । सक्सेना साहब ने उसे फोन परी और गाने की सुविधा । ।

46 प्रदान कर दी है~कोई उससे गुलाब का फूल पाकर गदगद है और कोई अग्रेजी का फूल बनकर गदगद है। पतियो के जीवन मे बहार है और पत्नियो का जीवन पतझड बना हुआ है । मोहल्ले की नौजवान पीढी खूसटो को इस शोषण के विरुद्ध क्राति करने का विचार कर रही है, कुछ युवा तो खूनी क्राति के पक्ष में हैं । कुछ युवा चितक, अध्ययन कर रह हैं कि माक्स ने ऐसे सभा के लिए क्या कहा है। बाईबल मे कहा गया है कि पडोसी से प्यार करो, अत करना ही चाहिए और सुदर पडोसी से तो एक्दम ही करना चाहिए । सुदर पडोस तो बहुत भाग्य वालो को मिलता है। आजकल या तो पाकिस्तान जसा पडोस मिलता है या फिर श्रीलका जैसा पडोस मिलता है । मुझे ता अच्छा पडास मिला हुआ है। इसलिए सोचता हू, इससे पहले वि घिडिया खेत चुग जाए मैं भी बाईवल की बात मान ही लू ।

रावण पजन (दशहरा जब भारत में आता है तो सारा भारत भक्ति-भाव से भर जाता है। भक्ति का एक नशा, हवा मे बस जाता है। ऐसे ही नशे से वशी- भूत मैं, कुछ भक्ति लाभ प्राप्त करने के लिए पत्नी और बच्चों को जागता छोड चल पड़ा। घर मे, त्योहार पर उठने वाली फरमाइशो की चिल-पो मची थी और इधर मरा हृदय, महगाई आतक से आतकित था । ऐसे मे घर से पलायन के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था जो मैं खाता । घर से बाहर निकलकर कुछ दूर पर भक्तो की भीड दिख गई। एक व्यक्ति प्रवचन कर रहा था पर तु पहनावे से वह साधु महात्मा नहीं लग रहा था। उसने अमूल्य आमूपणो से युक्त चमकदार वस्त्र धारण किए हुए थे । मैं प्रवचन सुनने के लिए रुक गया, आप भी रुकिए।) हे दुष्ट भक्तो ! बहुत हो चुकी हमारी उपेक्षा, बहुत मूख बन चुके हम । हमारा दुष्ट समुदाय इतनी बडी जनसरया के होते हुए भी उपेक्षणीय क्यो है ? क्या आपने कभी सोचा है ? सतयुग या वेता म हमारी सरया कम थी परन्तु कलयुग तो हमारा युग है । इस युग मे अगर बुराई की निंदा होगी, वेईमानी को लताडा जाएगा और 'सत्यमेव जयते' जसे नारे लगाए जाएगे तो समझ लो हम जड से उखड जाएगे। कलयुग हमारा युग, जो करना है हम इसी युग में करना है वरना दुष्ट शक्तियो का भी उचित विकास नहीं हो पाएगा। कभी आपने सोचा कि हम क्लयुग मे भी पिछडे हुए क्या हैं ? हम पर यह अ याय क्यो हो रहा है ? मैंने सोचा है । इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हम दुष्टों का कोई ईश्वर नही है । बाज जबकि सज्जनों के करोडों देवी देवता हैं। हमारा एक भी ईश्वर नहीं है। अपने कप्टो के लिए हम सज्जनो के देवी देवताओके शरण में जाना पड़ता है। धिक्कार है । इतने युग बीत गए, हम अपना एक भी भगवान खडा नही कर पाए, उसके लिए 48 - एक मदिर का भी निर्माण नही कर पाए। और सज्जनो ने हर युग मे अनेक देवी देवता खड़े कर लिए हैं। यह कलयुग है, हमारा युग है। इस क्लयुग मे जो दुष्ट है उसी को सुखी रहने का अधिकार होना चाहिए। यह बडे हष की बात है कि भारत मे चारो ओर लूट पाट, हत्या साम्प्रदायिक झगडो का बाजार गम है । हमें इसे और गम करना है । इमसे हम दुष्टो की कुसिया बची रहेंगी। हमे नेताओ को और भ्रष्ट करना है। हम अच्छे और भले लोगो का मनोबल तोडना है, उन्हें दूध मे से मक्खी की तरह निकाल कर फेंक देना है । झे गुडागर्दी के हथियार से सज्जनो का मुह बद करना है। हमे यह भी देखना कि कोई भला आदमी अपना सर उठाकर न चल सके, हमे यह भी देखना है कि जो अगुली हमारी दुष्टता की ओर उठे उसे तोड दिया जाए। सच्चा क्लयुग तभी आ सकता है, जब किसी को किसी पर विश्वास नहीं रहे । हमे उन शक्तियो से सावधान रहना है जो देश मे सच्चाई को जमाने में लगी हुई हैं । हमे स्वय तो दुष्ट बनना ही, प्रयल करना है कि एक दिन सभी दुष्ट बन जाए। इसके लिए हमे सज्जनता का लबाना ओढना पडे तो भी घबराना नही चाहिए। सबसे महान दुष्ट वही है जो दिखने मे सज्जन है परतु तन मन और धन से दुष्ट के अतिरिक्त कुछ और नहीं है। 1 आइए आज के इस शुभ अवसर पर हम दुष्टो के भगवान का निमाण करें। वैसे तो इस देश में प्रजाता है और फैसला सब की राय से होना चाहिए पर तु हम दुष्टो का कोई तत्र नहीं होता है, जो कुछ होता है, दुष्टता होती है। उसी दुष्टता के नाम पर मैं अपने अराध्य का नाम प्रस्ता- वित कर रहा हूँ आशा आप सब उसे स्वीकार करेंगे। मैं आपके सामने उम महान दुष्ट वोर का नाम प्रस्तावित कर रहा है, जिसने सज्जनो क छक्के छुड़ा दिए । जिसन ससार की धन-सम्पत्ती को अपने कदमो पर विछाया। जिसन हत्या, अपहरण जसे कम ओको वार किए और कभी लग्जित नहीं हुआ। जिसने सज्जनों का जीना दूभर कर दिया। हमारे उस महान अराध्य का नाम है--रावण! रावण तालिया तालिया 49 रावण उस महाशक्ति का नाम है जिसने अपने जीवित रहते हुए सज्जनोसे हार नहीं मानी । कुबेर जिसके चरणो मे भेड की तरह पड़ा रहता था। जिसके राज्य मे सभी ऐश करते थे। कोई प्रतिबन्ध नही था। जिसके राज्य मे मदिरा और मास की नदिया बहा करती थी। अपहरण, हत्या, चोरी डकैती रिश्वतखोरी का अधिकार राजा या मत्रियो को ही नहीं था, अपितु यह अधिकार प्रजा को भी था। दुष्ट-शक्तिया फल-फूल रही थी। हमारे अराध्य रावण को सच्चाई नही मार सकी। उसे मारने के लिए धोखे और विश्वासघात का आश्रय लेना पडा । हमारा अराध्य रावण मरा नही है। उसने तो बलिदान किया है । धोखा और विश्वासघात जैस दुष्ट- मूल्यो का विकास हो, लोग इही पर विश्वास रखें, इसके लिए उस महान दुष्ट वीर ने अपने प्राण त्याग दिए । हम दुष्टो को उस वीरता और दुष्टता का विकास करना है। हमे प्रतिदिन रावण पूजन करना चाहिए जिससे हमम दुष्ट शक्तिया विकसित हो । हम चाहते हैं कि रावण का एक विशाल 'दुष्टालय बनाया जाए। उसम करोडो रुपया से बनी हीरे जवाहरात की ऐसीरावण प्रतिमास्थापित की जाएगी, जिसके सामने सज्जनो के भगवान फीके लगेंगे। इसके लिए हमे अपार धन की आवश्यकता होगी जो हमे दुष्ट-समुदाय से तो मिलेगा ही हम सज्जनो से भी लूट खसोट कर लेंगे । इसके लिए हम मत्रियो पुलिस वालो भ्रष्ट सरकारी कमचारियो, ठेकेदारो आदि का सहयोग लेंगे। हमारे मदिर मालीशान होंगे, क्योकि हमारे भक्त आलीशान होग। आजक्ल दुष्टो को ही आलीशान होने का अधिकार है। हमारे अराध्य के मस दर मे डिस्को होगा, कबरे होगा। मदिरा और स्मैक की नदिया बहेंगी। चारो ओर ऐश-ही ऐश होगी । हम इस बात का प्रचार करना है कि हमारा मराध्य न स्वय कष्ट सहता और न अपने भक्तो को सहने देता है। वह भक्तो की भी परीक्षा नहीं लेता। वह मदिरा पीता है। छत्तीस व्यजन खाता है । आजकल हर व्यक्ति ऐसा करना चाहता है, विशेषकर हमारे नवयुवा । हमे युवक-युवतियो को भक्त बनाना है। हमारी योजना है कि आज रात नगर के बीचो-बीच ससद भवन के सामने रावण प्रतिमा को गाडा जाए। दशहरे वाली सुबह यह प्रतिमा धरती 50 का सीना फोडकर निक्लेगी । बस उसी समय प्रेस-कास बुलाई जाएगी। और दुष्ट मनियो, भ्रष्ट नौकरशाहो की सहायता से हम वहा रावण मदिर की घोषणा करेंगे। इस बार दशहरे पर रावण मरेगा नही जलाया नही जाएगा उसा) अवतार होगा। हम देखेंगे कि कैसे और कौन-सी पक्निया सत्य की विजय करती हैं। अब असत्य और अयाय की विजय का नारा लगेगा। रावण मदिर की घोषणा होते ही हम दूरदशन और आकाशवाणी से भनेर प्रायोजित कायक्रम प्रस्तुत करेंगे जो यह बताएग कि दुष्ट होना कितना सुवकारी है। हम ऐसे नाटको और कहानियो का निर्माण करेंगे जिमस आप जनता को नाम होगा कि रावण पूजन से स्तिनी सपत्ति मिलनी है, क्तिनी एश होती है । रावण भगवान का नाम स्मरण करने से पुलिस तग नहीं करती और बिगडे काम स्वय बनने लगते हैं। तो मेरे साथ आप मब नाग बोलिए---दुष्ट सम्राज्यपति रावण को जय । दुष्ट वीर रावण की जय । भ्रष्टाचाराधिपति रावण की जय !

वो नही आयी शाम को घर लौटा तो पाया घरेलू-वातावरण बहुत उदास है । पत्नी क्सिी विरहिणी यक्षिणी-सी आखो मे देश को दुदशा सा जल भरे बठी है । जिस धूल मे खेल खेलकर हम बडे हुए हैं, वही धूल डाईग-रूम मे मुक्त- भाव से खेल रही थी। रसोई म पडे जूठे बतन जैसे सकरुण पुकार रहे ----'क्या हमे इक्कीसवी सदी मे ले जाने वाला कोई नही है' मक्खिया मुक्त भाव से गदगी का आत फला रही थी और पत्नी हाथ पर हाथ धरे जसे किसी समझौते की योजना बना रही थी। एक समय वह भी था कि मुझे देखते ही पत्नी की आखो में प्रेम तरने लगता था। उस दिन करुण रस तरने लगा बोली, 'दखा आज वो फिर नही आयी।" आप भी चि तन मे पड गय होगे कि यह वा कौन है जिसके कारण पति पत्नी के बीच मे शृगार के स्थान पर क्रुण रस बरसने लगता है। क्या यह पति पत्नी के बीच का 'वो' है ? प्रेमी प्रेमिका के बीच का 'या' है तुम बडे वो हो, वाला वो है ? या फिर कुआरो की सौ दय दष्टि मै जो 'बडी वम चीज होती है' 'वो' ? जो नही इस 'वो' का प्रेम कथा स कोई सम्बध नहीं है । क्योकि जैसे दिये तले अधेरा होता है वैसे प्रेम तल कुछ हाता है। मेरा नाम प्रेम अवश्य है परतु प्रेम कथाओ से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है । अन चितकों ! इस 'वो' का भी प्रेम से कोई सम्ब व नही है। जैसे एक ईश्वर को हम अनेक नामो से जानते हैं। वैसे ही इस 'वो' को भी अनेक नामो से जानते हैं । कोई इसे माई कहता है, कोई बाई जी, कोई काम वाली कोई पाटटाइम काई चौका बतन वाली, कोई अम्मा और कोई आदि आदि। यही 'वो' उस दिन हमारे यहां नही आयो थी, जिमक । घर भातक्ति लग रहा था। (कुछ लोगो के आने से आत कुछ ना बाने से छाता है। बच्चे इम बीच एक दो बार पिट चुके थे, लापहर को येवल खिचडी बनी पी और यह निश्चित था कि रात का खाना बाहर खाना पड़ेगा। अत पारिवारिक शाति के लिए 'वो' का आना बहुत आवश्यक है। शुट आती रहे तो घर मे वमत खिला रहता है न याये तो एक ही सण में पनमड छा जाता है। यह 'यो' ईश्वर है जो अवतार नही से तो घरेलू गाति की हानि होने लगती, भगत परीक्षा के सक्ट में पड़ जाता है और चारो ओर प्राहि त्राहि मच जाती है। 'वो नही आये तो मोहल्ले में अफ- वाहो का बाजार गरम हो जाता है, फोन घनघनाने लगते हैं। दृश्य एक मोहल्ला और मोहल्ले की औरतें। पहली देखा, खमनुखानी मज फेर नहीं आयी। सरी अभी पिछले हफ्ते दो छुट्टिया की हैं । वच्चा बीमार था। पहली सब झूठ बोल दी है। मैंने तो इसे निकाल ही देना है। पैसे काटूगी तब होश ठिकाने आ जायेंगे। तीमरी इसे निकालकर रखोगे किसे, सारी की सारी एक ही बंसी हैं। पहली मैंने तो मिसेज़ मेहरा वाली माई रख लेनी है। बहुत कम छुट्टिया करती है। दूसरी पर वो पूरी चोर है चोर । पहली यह वाली भी तो कम नहीं है। हर बकत मागने को मुह अडगा (खुला) रखती है। कभी साडी दे दो, कभी बच्चों के कपडे दे दो, काम थोड़ा ज्यादा हो जाय तो नानी मरती है। अब देखो इतना बकत हो गया, महारानी जी का पता नहीं है। कब झाडू पोछा होगा, कब बतन साफ होगे। मेरे तो सिर में दरद होने लगा है। तीसरी हमारे यहा तो शाम किसी ने आना भी है। दिन भर झाड. चौके में लगी रही तो शाम तक बीमार बुदिया-सी लगने लगूगी। (यह सुनकर पहली और दूसरी आखो-आखों में . १

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मुस्कराई कि अब तू कोन कम लगती है।) मैंने सोच लिया है,
मिसेज मेहरा वाली से काम करा लूगी।
पहली वो जरा नचढी है। ऐस काम करती नहीं है।
तीसरी पूरा दम का नोट दूगी और साथ मे खाना भी, भगवान का दिया
वहुत कुछ है । खुला खरचते हैं। कजूसी नही करते हैं।
पहली होता तो सबके पास है, पर अपने भी हडड पैर आदमी को
चलाने चाहिए। बठे-बैठे तो चरबी ही चढती है जी।
तीसरी खाते पीते हैं तो चरबी चढती है, दूसरो के घर से घी चीनी की
कटोरिया नही मागते फिरते हैं। हमारे घर को तो दखकर
लोगो की छातियो पर साप लोटते हैं । यहा तो काम वाली को
भी हम औरो से पाच रुपये ऊपर ही देते ह । काम देखकर
हमारे सिर में तो नही होता दद
पहली
इतना गुमान ठीक नहीं होता, रावण भी अपनी लका बचा नहीं
पाया था।
दूसरी तूने रावण कहा कुत्ती।
पहली तूने कुत्ती कहा खसमनुखानी।
दूसरी तूने खसमनुखानी कहा हरामजादी।
पहली तूने हरामजादी कहा राड ।
इन उपमाआ को सुनकर कालिदास का सिंहासन डोलने लगा और
मोहल्ले की ललनाए वीडियो फिल्म बद कर दशक दीर्घा मे खडो हान
लगी। जैसे कष्ण को मधुर मुरली सुनकर गोपिकाए 'गृह-वारज छोडकर
जसी अवस्था म होती थी, चल पडती था वसे ही इस समय मोहल्ले की
सलनाए फसी-ड्रेस में निकल आयी थी। किसी के हाथ में बेलन था, किमी
के हाथ बतन धोने वाली राख से भरे थे, कोई पेटिकोट मे थी, कोई गाऊन
में और कोई नहाने के बीच तीलिये मे अपना यौवन छुपाए आ गयी थी।
अत है स तो। सिद्ध हुआ कि मोहल्ले की शान्ति के लिये 'वो' का
आना आवश्यक है।

54 दृश्य दो . फान-वात्ता। वार्ताकार दो सात महिलाए। पहनी हैलो, क्या कर रही है तू? दूसरी चुछ ही गोच रही थी थोडा शापिंग पे बहाने धूम पिर आऊ । पहली हा लपको यू मार दूसरी क्या, क्या आज भी तेरी पाटटाइमर नही आपी। पहली नहीं (स्वर म प्रावी पीडा है) दूसरी हाऊ संह। तेरा तो नौकर भी छुट्टी पर गया हुआ है, तू मैनेज कैसे परेगी, तू तो यहुत वगै मुमीयत म फस गयो । कितनी टॅगन हो रही होगी तुझे। ज्यादा टेंशन ठीक रही है। तू मेरे साथ गापिंग पर चल लच बाहर परेंगे और आते हुए बच्चो लिए पर करवा लेना। तुझ पाटा रिलीप भी मिल जाएगा। (जसे बाढ पीडितो को रिलीफ मिलता है।) पहली आह वा बहुत काम फना हुआ है। इस समय सारा घर कवाड बना हुआ है और शाम को मल्होयाज आने वाले ह, डिनर पर दूसरी फोन पर मना कर दे न, एक्सक्यूज मांग ल। पहली नहीं हो सकता वटी मुश्विल स फिक्स हुआ है। शरद को प्रोमोगन म मल्होत्रा साह्व हेल्प करेंग न, मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है मेरा ता रोना निकल रहा है सुबुक सुबुक दूमरी देख देख ऐमे नही करते, बी ए ब्रेव गल न नरो मत बहादुर बन । हम लेडिज यो तो अभी बहुत लडना है यू नो, आदमी न हम बहुत सताया है । घर का सारा भार हम पर लाद दिया है, हम क्यो करें घर की चिंता, पति के प्रोमोशन की चिंता, हम कमजोर होगी, रोती रहेगी तो ऐसे ही हम रुलाया जाएगा। विद्राह कर दे। हम लेडिज को रोना नही स्ट्रगल करना है (जा भाषण दूसरी न 'महिला जागरण समिति में दिया था उसे याद था उसने यहा पिर दे डाला) पूर एक घटे तक राष्ट्र की सचार व्यवस्था का एक अग-टेलीफोन सक्रिय रहा और जूठे 55 बतन निष्क्रिय रहे। इस 'वो' का महिलाओ के ही नहीं कुछ पुरुपो के जीवन मे भी महत्व पूर्ण योगदान है। हमारे एक मित्र कालेज मे पढाते ह और उनकी पत्नी सरकारी स्कूल में पढाती है, पत्नी सुबह साढ़े छह बजे स्कूल के लिए निकल पडती है और पतिदेव की कालेज में पढ़ाने की सदिग्ध गतिविधि ग्यारह बजे शुरू होनी है । पत्नी के जाने के बाद बच्चो को स्कूत्र भेजने से लेकर 'वो' से घर का काम करवाने का गुरू भार वही ढोते ह । पर तु जब 'वो नही आती है, उस दिन विद्यार्थियो को पढते समय गुरुजी के हाथ में रसोईघर के दशन होते है । छात्र छात्राए मुस्कराती है और गुरुजी झिपियाते है । ऐस मे अनेक बार उनके छात्र छात्राओ ने उहे 'वो तोडती पत्थर के' अदाज में पड़े कूटते और बतन तोडते रगे हाथा पकड़ा है। कैसी विडम्बना है किसी काम को नारी कर तो यह उसका कतव्य है और पुरप करे तो हास्यास्पद घटना । हम मौसम के कारण अपना मन बेईमान करने का तो है पर तु कोई और करे तो आगोश के कारण हमारी मुटिठया कस जाती हैं। सरदी मे अपना मन रजाई मे छोड कर आफ्सि जाने का न हो तो फोन पर काम चल जाता है और अगर 'वो' रजाई छोडकर न भाय तो घर का काम ठप्प हो जाता है। 'धो' को न ता मन वेईमानी करने का अधिकार है, न तबीयत खराब करने का और न ही उसके बच्चे का बीमार होने का अधिकार है। 'वो' वो है हम 'हम' ह । पूरा अधिकार बालम गए सिगापुर डाली। बालम महोल्ले मे एकाएक महत्वपूण हो गये थे। वह मलेशिया की राजधानी कुआलालपुर विभागीय ट्रेनिंग के लिए जा रहे थे। पर तु दाने सभ्रात लोगो का भूगोलीय ज्ञान इन दिनो अदभुत हो गया है । चाहे इहें देश में स्थित विभिन्न राज्यो का न पता हो परतु सिंगापुर, हागकाग और दुबई के बारे मे इनका ज्ञान आश्चयजनक है । सव समझ गये कि बालम सिंगापुर जा रहे हैं। कुछ समाजसेवको ने तो बालम को कुआलालपुर से सिंगापुर जाने के यातायात साधनो, आने जाने के खचों की पूरी जानकरी दे व्यक्ति जमनी, फास या इग्लड ना कर इतना महत्वपूर्ण नहीं होता है जितना सिंगापुर जा कर होता है । बालम ही नहीं उनकी पत्नी भी मोहल्ले मे एकाएक महत्वपूर्ण हो गई थी। हर कोई हाल चाल पूछने लगता था, मोहल्ले मे अब फेयरफक्स महत्वपूर्ण नही था, वालम महत्वपूर्ण थे। इधर बालम सिंगापुर जा रहे थे, उधर कुछ के सीने पर साप लोट रहे थे (कितने बहादुर हैं वे जो अपने सीने पर सापो को लोटन के लिए क्रीडा स्थल देते हैं)। मोहल्ले की ब्रजबाला निशा सूरी के साथ भी यही हो रहा था। निशा सूरी के हसबड रूस गये थे, मोहल्ले ने घास भी नही डाली थी। 'हाय, बेदर्दी तुम क्यो नही गये सिंगापुर। मेरी किस्मत ही खोटी है। जाओ बेदर्दी, गुडगाव ही एक महीन के लिए चले जाओ वहा पुश्तैनी जायदाद ही देख आओ, जिसमे मैं मोहल्ले को कम से-कम यह कह सकू कि वाम तो दम दिन को सिंगापुर गये हैं, मेरे हस्वड ता एक महीने के लिए वेस्ट जमनी गये हैं । गुडगाव से आते हुए दिरली पालिका बाजार से कुछ विगी वस्तुए खरीद लाना । मोहल्ले म मेरी नाक कुछ तो बचेगी" ऐसा कह कर ब्रजवाला मूरी ने पति के चरण छुए और सजल नयनों से विदेश युद्ध के लिए पति को तपार करने लगी। - 57 वालम मोहल्ले मे ही नहीं मित्रो और रिश्तेदारो मे भी चचित और महत्वपूर्ण हो गये थे । भाई-बहन, मामा मामी, मोमा मौसी, चचेरे भाइया और दूर-दूर के रिश्तेदारो का प्यार अचानक उमडने लगा था। हर कोई उहे आकर बधाइया दे रहा था और अपने प्यार तथा अपनी नजदीकी का अहमास दिला रहा था। बालम के यहा दूध और चाय की खपत बढ गयी थी। बालम लोगो की निगाह मे मरकारी अफसर नही एक स्मगलर हो गय थे। किसी को वह वी० सी० आर० दिखाई दे रहे थे, किसी को टू-इन वन, किसी को कलर टी० वी०, किसी को केलकुलेटर, किसी को साडी का थान और किसी के लिए वह विदेशी सैंट की बोतल बन गये थे। बालम ईश्वर की तरह अनेररूपा हो गये थे। किसी को वह हनुमान के रूप में दिखाई दे रहे थे । हर भक्त यह सोच रहा था कि बालम विदेशी वस्तुओ की सजीवनी का पहाड ही उठा लायेंगे और प्रत्येक को नवजीवन प्रदान करेंगे। किमी को वालम सुदामा लग रहे थे जो झोपड़ी का सुख छोड कर जाने को थे और महलो का सुख लेकर लोटन को थे। सारी बातचीत सारा घर जसे सिंगापुरमय हो रहा था और इन सबके बीच बालम एक उजबेक की तरह खडे थे। जो भी आता वह सिंगापुर से शुरू होता और सिंगापुर ही समाप्त होता। बालम नक्कारखाने म तूती हो गये थे, जिनको तूनी नही बोल रही थी। वे सबको बताना चाहते कि वह किस ट्रेनिंग पर जा रहे हैं, उससे क्या लाभ उन्हे और विभाग को होगा। परन्तु नक्कारखाने मे सिंगापुर सिंगापुर' की ध्वनि ही गूजती रहती। बालम के लिए ट्रेनिंग महत्वपूर्ण थी पर तु मोहल्ले और रिश्तेदारो के लिए सिंगापुर जानेवाले बालम महत्वपूण थे। अब बालम कुआलालपुर मे ट्रेनिंग करते करते, उनके लिए सिंगापुर जाना आवश्यक हो गया था। बालम के जाने से पहले सलाह मश्वरो का एक सिलसिला चालू हो गया था। यहा से बालम क्या ले जायें और वहा से वालम क्या लायें, इसके सबध मे अनेक सिंगापुर विशेषन अपनी राय प्रकट कर रहे थे। हर समझ- दार एक सूची बालम को पक्डा रहा था।

58 -यहा से सूती साडिया, अचार, चाय और नमकीन वगैरह ले जाना। -यहा से किसी टूटे-फूटे बंग या अटैची में समान ले जाना, वहा से बढिया बैग और अटैची ले कर आना । -वी० सी० पी० ठीक नहीं रहता है वी० सी० आर, लाना आजकल जी 7 बढिया चल रहा है। -~-कलर टी० वी० तो सोनी का बढ़िया रहेगा। -अपने कपडे ज्यादा ले जान की जरूरत नही है, वहा बहुत बढ़िया मिल जायेंगे । मेरा साईज 34 है। -डॉलर चाहिए होगे, क्टिने दिलवाऊ? -कस्टम पर अपना ही एक बदा है, आने से पहले फोन कर दना या चिटठी लिख देना सब करवा दूगा। -पुत्तर तेरी दोनो मना दे ब्याह करने मे मैना वास्ते चगिया साडिया ले आयी। –मेरे लिए स्टीरियो नही लाए तो भाया जी आपसे मेरी कुटटी हो जाएगी। -साले साहब, हमारा भी कुछ हक है न तुम पर --अवे ओ घोचूराम, आते ही बढिया दारू पार्टी होनी चाहिए नहीं लाया तो बेटा घुसने नहीं देंगे। एक बालम और सौ बीमार। पर लग रहा था इस बोझ से वेचारा अनार ही बीमार पड़ जायगा । बालम पछता रहे थे कोस रहे थे उस घडी को जब ट्रेनिंग पर जाने का पता लगाने पर खुश थे। बालम समझ गए थे कि मोहल्ले की दष्टि म यदि मूख नहीं बनना है तो उह सिंगापुरिया बनकर लौटना ही होगा। घर म वी० सी० आर० से पहले बहुत चीज की आवश्यकता है परतु अक्लमद दिखने के लिए उह कलर टी० वी० और वी० सी० आर० लाना ही होगा, चाहे इसके लिए कितना ही उधार लेना पडे । कितना बढिया है अक्लमदी का सिंगापुरिया 1 मापदण्ड। वसे तो उघार प्रेम को कची होती है परतु इन दिनो बालम के लिए 59 उधार प्रेम की लस्सी बना हुआ था, जितना चाहे बढा लो। जो भी उधार देता, अपनी फरमाइश लगा देता, जितना बडा उघार उतनी बड़ी फरमाया। बालम ट्रेनिंग पर चले गये । पूरा मोहल्ला अपनी निकटता सिद्ध करने क लिए विदाई गीत गाने एयरपोट पहुचा। बालम के जाने से पूरा मोहल्ला जैसे विहारी की नायिका हा गया था। बालम-पत्नी ही नही सब मिल कर विरह का सामूहिक गीत गा रहे थे लगातार जसे मोहल्ले के कृष्ण मथुरा चले गये हैं । जरा-मी आहट होती तो मोहल्ले का दिल सोचने लगता कि कही यह बालम तो नही। और बालम निष्ठुर कठोर उनकी ट्रेनिंग की अवधि बढ गयी, वह बीच म नही आए । बालम-पत्नी अपनी सखी से बोली, "सुन री, बालम के न आने से मेरा वजन बिना डाइटिंग के घट रहा है। यह निष्ठुर कलमुही ट्रेनिंग मुझे बहुत पोडित कर रही है। हे प्रियससि, ऐसे मे दस नम्बरी क्या कम थी जो स्टीरियो बजा कर दिल दुखाती थी, देरा जब पद्रह नम्बरवाली वी० सी० पा० ले आई है। मेरे बालम कब आएगे हे बादलो, हे घटाओ, हे पडो, ह सखी, जब भी कोई बी० सी० आर० का नाम भी ले लता है तो मर हृदय मे टीस उठने लगती है। आखें विदेशी साडिया देखने को तरस रही हैं । कान स्टीरियो को आवाज सुनने को बेचन हैं, नाक विदेशी सेंट सूघने को मरी जा रही है, होठ विदशी लिपिस्टिक न हाने के कारण सूखे जा रहे हैं और हाथ साडियो का स्पश-सुख पाने को तरस-तरस जा रहे हैं । हाय, आएन बालम वादा करके जव बालम लौटे तो वे सिंगापुरिये हो चुके थे। वह लदकर आए थे। लदने में होने धोबी के सेवक को भी मात कर दिया था। वालम काहा बने हुए विदेशी वस्तुओ का पीताम्बर पहने, मोर मुकुट लगाए विराजमान थे और गापिकाए उहे घेरे हुए उनके मधुर मुरली से स्वर को सुनने के लिए तडप रही थी । बालम जमीन से दो-तीन इच ऊपर उठे हुए थे । उह " 60 यह देश, यहा के लोग गदे-मैले, असभ्य लग रहे थे। यहा की मिट्टी से उन्हें सिंगापुर का मोमेट अधिक याद आ रहा था। उहें ट्रेनिंग पर जाकर सिंगापुर का महत्व का पता चल गया था। पहले वह ट्रेनिंग पर जान के कारण सिंगापुर हो माए थे। अब वह सिंगापुर जाने के लिए ट्रेनिंग का जुगाड विठा रहे थे।

मुझे भी हो गया है कुछ हो जाए तो लोग दुखी हो जाते हैं । मुझे कुछ नहीं हुआ था, इस. लिए मैं दुखी था । मैं बहुत दिनो से नही, वर्षों से इस प्रतीक्षा में था कि मुझे कुछ हो । जब मे पतीस वष का हुआ हू तब से प्रतीक्षा कर रहा हूं कि शायद किसी दिन मुझे कुछ हो जाए। पर तु यह जालिम जमाना मुझे कुछ होने नहीं दे रहा है। कुछ होने के लिए अनेक महापुरुषो ने क्या-क्या नही किया, क्या-क्या नही सहा, वही आजकल में भी सह रहा हूँ। मेरे महापुरुष बनन मे अब अधिक देर नहीं है । मुझे डॉक्टरो पर पूरा विश्वास है। डाक्टरों का कहना है कि पैतीस की अवस्या के बाद व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए वरना रोग उसका ध्यान रखते हैं । मैं अपना ध्यान नहीं रख रहा था फिर भी रोग मेरी ओर ताक नहीं रहे थे। इतजार का मजा इश्क मे ही आता है, किसी और तरह का इतजार तो नीम चढा करेला हो जाता है। उस दिन जब डॉक्टर ने देखने के बाद मुझसे कहा, 'आपको तो ब्रोका. इटिस लगता है, तो सुनकर लगा जसे उसने स्विस बैंक मे एकाउट सोल दिया हो । मुझे विश्वास नहीं हुआ। मैंने पूछा, "सच ? सच? आप सच कह रहे हैं डॉक्टर साहब ? मुझे सच्ची ब्रोकाइटिस हुई है ?' मैंने डॉक्टर से गमजोशी से हाथ मिलाया और 'थक्यू वेरी मच' कहा । मन परोडो की दलाली पाने सा खिल उठा। चारो और विश्व शाति के स्वर सुनाई देने लगे और इसकीसवी सदी मया के साक्षात दशन होने लगे। में ब्रोकाइटिस से पीडित होकर प्रसन था परतु पत्नी प्रसन नहीं थी। मेरे खासने और खखारने के कारण घरेलू शान्ति भग हो रही थी। पत्नी को यह बाहरी शक्तियो का पडयत्र लग रहा था जो टोटने-टोटको द्वारा उसके घर को मस्थिर करने मे लगा था।

62 । अगर आप पतीस वप से ऊपर हैं, मध्यवर्गीय परिवार के हैं, शारी शुदा हैं तो आप भी महसूस करते होगे कि बिना शरीर के रोगी हुए आप महत्वहीन हैं । अगर आप हृष्ट पुष्ट हैं, निरोग हैं तो समझ लीजिए आपने हमाम मे कपडे पहने हुए हैं । आप किसी जमदिन या विवाह की पार्टी मे उजबक मे घूमते रहगे और आपसे बातचीत करने को कोई नहीं मिलेगा। मौसम, देश की राजनीति, खूबसूरत औरतो या देश मे वढते भ्रष्टाचार के भारे मे आप कितनी बातें कर लेंगे? अब तो इन विषयो पर बात करते लगता है जैसे हम भैस हो गए हैं और जुगाली कर रहे हैं । मैं ऐसी मस या व्याकरण द्वारा शुद्ध करके कहू कि भैसा कई बार बना हू । सवादहीनता का यह कष्ट मैंने कई बार भोगा है। बार बार-और फिर क्या हाल' 'सब ठीक है न 'और फिर 'की शैली मे उतरना पड़ा है। अपनी महत्वहीनता का यह अपराध मुझे तब से होना शुरू हुआ जब से पत्नी से अपनी सखी या कार्यालय सहयोगियो के यहा जन्मदिन या विवाह के अवसर पर बलपूर्वक ले जाना आरम्भ क्यिा । मैंने देखा लगभग प्रत्येक पत्नी सखी पति रोगी है और इस कारण महत्वपूर्ण है । कोई अपने ब्लड प्रेशर के कारण महत्वपूर्ण है, कोई पथरी के कारण, कोई शुगर के कारण, कोई स्पाडिलइटिस के कारण और कोई बार-बार के नजले, जुकाम के कारण ही महत्वपूण हुआ बैठा है । हर व्यक्ति अपने रोग का ऐम बखान कर रहा है जसे कवि वसत का या चादनी रात का करते हैं। जुकाम न हुआ चादनी रात मे गिरते हिमरण हो गए या ब्लड प्रेशर न हुआ पूनम के चाद को देखकर समुद्र मे उठता ज्वार हा गया या शुगर नहीं हुई वसत मे खिलते फूलों का पराग हो गया। जब मुझे ब्रोकाइटिस नहीं हुई थी ऐसे अवसरो पर मैं पत्नी को सम्पी के किसी पति से कभी देश के हालात और कभी नौकरी के हालात का सूत्र पकडकर सवाद कामिलसिला चलाया करता था। यह हम दोनों जानते थे दि हम एक-दूसरे को बोर कर रहे हैं। ऐसे में कोई वासल साहब आ जाते और पत्नी-मसी के पति से पूछते, और मक्सेना साहब आप स्टोन या क्या हाल है? ऑपरेशन करवा लिया क्या?" यह सुनते ही सक्मना साहर खिल उठते और एक्सक्यूज मी कहत ।

63 और इससे पहले कि मैं एक्सक्यूज करू वो वासल साहब की ओर आत्मीयता से उ मुख हो जाते । वासल माहब भी इसी रोग से पीडित हैं । दोनो चोच से चोच भिडा कर चर्चामय हो रहे हैं। ऐसे महानुभावो के लिए ही क्सिी शायर ने कहा है-'खूब धनती है जब मिलते हैं दो दीवाने । ऐमे मे कौन- सा डॉक्टर ठीक है, होम्योपैथिक या एलोपथिक, दद होने पर कौन क्या करता है, क्सि चाचा मामा को जब यह राग लगा था तो उसने क्या किया था आदि आदि विपयो पर जो महाकाव्यात्मक चर्चा होती है, उसे देखकर कवि लज्जित हो उठते हैं । ऐसे में या तो धैयवान श्रोता बनकर गम्भीर होने की नौटकी कीजिए या फिर अपने जैसे किसी निरोगी को पकडिए। यही कारण है कि जब डॉक्टर न मुझसे कहा कि ब्रोकाइटिस हुई है तो मैं दुखी न हुआ और न ही मैंने डॉक्टर से दवाई हो ली। मैंने डॉक्टर को फोस थमाई, 'थक्यू जी' कहा और प्रसन मुद्रा म घर लौट आया। लोग जीवन में कुछ बनने के लिए, समाज मे प्रतिष्ठित होने के लिए क्या-क्या नहीं करते हैं, क्या-क्या नही सहते हैं, मुझे तो बार बार की खासी ही महनी . थी। बीमार पति को देखकर पत्नी का प्यार भी अधिक उमड़ने लगता है। उसकी निगाह मे आप बेचारे जो हो जाते हैं । इन दिनो मेरी पत्नी का प्यार भी उमडने लगा है। विवाह के दो वर्ष बाद ही प्रेम की जो माग बठने लगी थी, अब फिर बनने लगी है। पली को पति की सेवा का सुदर अवसर मिल गया है, उनका परलोक तर सुधर गया है । वह भी अपनी सखियो के बीच अपने पति की बीमारी की ग्लैमरपूण चर्चा कर सकती है। वह भी अपने मडिकल बिल का रोब मार सकती है। आजक्ल मेडिकल बिल भी स्टेटस सिंबल बन गए हैं। धाराइटिस कारण पर मे गधा बनने से बच गया है। जरा-सा भी बोझ सदता है तो मैं सासना शुरू कर देता है। पहले धूल स एलर्जी थी, अब मुझे अनेक चीजो से हो गई है। जब कोई काम करने को मन न हो तप यह एलर्जी काम पाती है। ।

64 डाक्टर भी मुझसे खुश रहता है, उसका रेगुलर पेशेंट जो बन गया हू । अब वो मुझे दवाई ही नहीं देता है, अपना सुख दुख भी देता है। मेरे मित्र और पडोसी भी खुश हैं । कुछ यह सोचकर प्रसन हैं कि बडा निरोग घूमना था और कुछ इसलिए प्रसन हैं कि अब वो मुझ बेचारे की बीमारी की चर्चा करके महत्वपूर्ण हो सकते हैं । अब मुझे किसी से मिलकर देश की गजनीति या मौसम के बारे में चर्चा नहीं करनी पड़ती है । अब अखबार पढना भी जरूरी नहीं है। बीमार होकर मैं ही नही भारतीय सरकार भी महत्वपूर्ण और चर्चित हो जाती है । मरकार आराम से चल रही हा, कोई गडबड घोटाला न हो रहा हो, चारो ओर सुख चैन की वपा हो तो लगता है जैस देश म लोक्तत्र मर गया है । अखवारें इमानदार नेता सी सूखी नदी लगते हैं और दूरदशन के समाचार गणित के पहाडे के समान । जैसे ही सरकार को रोग लगता है, लोक्त का मुर्दा उठकर बैठ जाता है, उसे बचाने के स्वर सुनाई पडने लगते हैं, रेलिया अगडाई लेने लगती हैं और पत्र पत्रिकाए भल्ले पापडियो के समान चटपटी हो जाती हैं । अत यह जरूरी है कि सरकार को बोफस या फेयरफैक्स जैसा रोग लगा ही रहे, वरना पत्नी की निगाह म उसकी भी इज्जत नहीं रहेगी।

मै नही माखन खायो मक्खन ऐसे लोग ध य कहे जाते हैं जो मक्खन खाते नहीं लगाते है । ऐसे लोग आदरणीय हैं । अनुकरणीय हैं जो मक्खन खाकर बड़ी सफाई से पोंछ लेत हैं और डकार तक नहीं लेते। कोई भी सरकार हो यह अपना मक्खन निकाल लेते हैं । इनसे पूछो कि क्या मक्खन खाया है तो ये अपना चेहरा सराट कर लेते हैं और गूगे बहरे हो जाते है । ये कुछ नहीं कहते हैं जो कुछ कहता है इनका मौन कहता है। परन्तु ऐसे लोग परम आदाणीय हैं, अनुकरणीय हैं जो धपा खात हैं, बेशर्मी से मुस्कराते हैं और मानते नहीं हैं कि इ होने मक्खन को छुआ तक हो । जनता इहे दपण दिखाती है, वीभत्म चेहरा देखकर ये आग बबूला हो उठते हैं और चिल्लाते हैं, 'य सब बाहरी शक्तियो का पडयत्र है उन्होने मुझे बदनाम करने के लिए सोते समय बरबस ये मक्खन मेरे मुह पर लिपटा दिया है। ऐसे मे वे मक्खन को मुह से पोछने की चेष्टा नही करते, लगा रहने देते हैं जिससे सिद्ध हो सके कि बाहरी शक्तिया क्तिनी सक्रिय हैं । वे गाते हैं, 'मैं नहीं माखन खायो' और उनके साथ उनके चरण सेवन समूहगान गाते है 'तू नही माखन खायो' । चरण सेवक जिनके जीवन का एक मात्र लक्ष्य कम, पुण्य सब कुछ इन श्रीचरणों पर लगा हुआ है । अपने वाल गोपाल का चेहरा तो आज तक इहाने देखने का साहस नहीं किया है। इनके लिए चरण ही मुख है, चरण ही हाथ, चरण ही पेट है चरण हो आदि आदि है । ये चरण पवित्र हैं, और भक्तों का अथ मागर का लाभ देने वाले हैं इन चरणो पर जब भी सकट आता है तो तोड़ हिलने लगती हैं । ऐसे आपात समय से घरण कसकर पक्ड लिए जाते हैं, ये चरण कभी बालते हैं, कभी गलती नहीं करते हैं, स्वच्छ एव साफ-सुथरे रहते हैं ऐसे झूठनही 66 चरण थामने वाले को कुछ और दिखाई नही देता है। इन चरणो मे ही सारा देश सिमटा रहता है। ये चरण नहीं होंगे तो देश नहीं होगा। इन चरणो की घूल ही देश को साफ सुथरा बना सकती है । चाह इन चरणो का मुख स्विटजरलैंड की ओर क्यो न हो। मुझे माखन चोर ने स्वप्न म दशन दे डाले। (त्रिजटा की तरह भी स्वप्न देखता हू।) मैंने कहा, हे राजीव नयन, हे चरण कमल, आपके श्रीमुख पर यह मक्खन कैसे लग गया ? 'वे देश मधुवर बोल यह सब माया का प्रभाव है। मक्खन तो सत्य नहीं है जो सत्य है वह दिखाई नहीं दे रहा है और जो असत्य है वही नजर आ रहा है। इसके लिए एक जाच आयोग बिठाना पडेगा। मैंने कप्यूटर से पता किया है। यह सब देश के गद्दारो का काम है जो विदेशी शक्तियो से मिल गए हैं। ये मरे सिंहासन को हिलाना चाहते हैं । गददार कसे हैं सवज्ञानी। मैंने जिज्ञासा प्रकट की। 'जो हमारा विरोध करे, हमारी छवि खराब करे वही देश का गददार है। ऐसे गददारो को हम सब कुछ याद करा देंगे।' भाषण देने की मुद्रा मे आ गए। उहाने हाथ को माइक की तरफ अपने मुह के आगे लगा लिया। मैं बेईमानी और भ्रष्टाचार से उनना नही घबराता हू जितना भाषण से घबराता हू । बेईमानी और अयाय तो दिखाई दे जाते हैं पर तु भाषण मे क्या-क्या छिपा है कोई नहीं जानता । छिपा शत्रु सबसे अधिक खतरनाक होता है। मैंी टोकते हुए कहा, 'अगर ये सब वाहरी क्तियो का पडयत्र है तो नटवरलाल, वाहरी गक्तियो से हाथ मिलाने के लिए सान समदर पार जाने की क्या आवश्यक्ता है।' 'यह राजनीति है अतरराष्ट्रीय राजनीति है वे मुस्कराए। और भारतीय राजनीति क्या है-मुत्र पर मक्खन लिपटे हुए होने के बावजूद मक्खन सा झूठ बोलना कि मैंने मक्खन नहीं साया है। मैंने पूछा। 'मैं दापय खापर वह मक्ता हूँ कि मैंने और मेरे परिवार के सस्या ने मक्सन नहीं साया है। यह तो मित्र लोग खा रहे थे। उस पार्टी मे मैं भी 67 . पहुच गया। पोडा सा लग गया होगा।' माखन प्रिय क्रुद्ध होकर बोले । 'ऐसे मित्रो का साथ अब तो छोड दो श्याम । वरना सारा जमाना आपको माखन चोर के स्थान पर माखन डकंत पहेगा और आपकी वश परपरा उनका क्रोध यकायक बढ गया और वे मेरे स्वप्न से भाग गए। माखन चोर अब भी माखन खा रहे हैं। देश मे छाछ रह गया है वह भी सूख रहा है। प्रेस विज्ञप्तिया जारी हो रही हैं, रेलिया आयोजित की जा रही है चारो ओर राजनीतिक मेले की घूम है । करोडो रुपया खच हो रहा है । गरीब का विनाश हो रहा है । वह मुफ्त दिल्ली दशन कर रहा है। जाच आयोग की कठपुतलिया नाच रही हैं जनता सूरदास हो गई है और गा रही है- बाल विनोद मोदमन मोह्यो भक्ति प्रताप दिखयो।

मुफ्त की दीपावली इस बार देश में दीपावली कुछ पहले ही आ गयी है । पिछले वष दीपा- वली पर या उससे एक दो दिन पहले ही कानफोड धमाके सुनाई देत ये परतु इस बार बहुत पहले सुनाई दे रहे हैं। पहले दीपावली के धमाके कुछ जानदार नहीं होते थे, पर तु इस बार जानलवा हैं । एक धमाके से सारा देश हिल जाता है। इस बार दीपावली अकेले नही आयी है, दो-दो त्योहारों का मजा लेकर आयी है। इस बार दीपावली के साथ होली की भी घूम है-खून की होली की । कुछ लोगो की जिद्द है कि वह दीपावली के साथ होली का उत्सव भी मनायेंगे। धम निरपेक्ष लोकतानिक और समाजवादी सरकार इसम क्या कर सकती है, बेचारी ? घम का मामला है, ठेस कैसे पहुचाये ? और फिर आम चुनाव भी तो आने वाले हैं, अत सारा प्रजातनशात बा हुआ है। चिंतन कर रहा है अगला एलेक्शन जीतने का। सगठित हो रहा है लगना चुनाव जीतने के लिए । सयुक्त मोर्चा बना रहा है मत प्राप्त करने के लिए। कितने महान काय मे व्यक्त हैं हमारे प्रजातत्र के रक्षक उस दिन जब मेरी पत्नी ने मुझे सुबह-सुबह 'बड-टी' की जगह हाट पिलाते हुए कहा-"तुम तो ओपोजीसन की तरह हाथ पर हाथ धरे बठे रहना । जब चुनाव आए तो इससे उससे हाथ मिलाने को तडपते रहना। दीवाली करीब आ रही है और तुम्हें होश नही है। कुछ लाना-बाना है या कि नहीं। या फिर डी०ए० मिलने से महगी चीजें खरीदने का शौक हो गया है।'-तो मैं महात्मा बुद्ध की तरह तटस्थ मुद्रा मे बैठा रहा। मैंने चुस्की लगाकर पत्नी की डाट को पिया। वह अज्ञानी है, प्रजातत्र की नब्ज नहीं जाननी है, उससे मैं क्या करता वह क्या जाने प्रजातत्र की खूबसूरती। कितना आराम है इस व्यवस्था मे। विरोधी दल विरोध कर रहे हैं और मरसार उस विरोध का विरोध कर रही है और बेधारी जनता को मालूम .

69 नहीं है कि वह क्या करे ? वह तो पिंगपाग' की गेंद की तरह दोनो में हाथो में खेलने को विवश है। मैं पत्नी की बात कर रहा था, यह प्रजातनबीच में कहा से आ गया पत्नी और प्रजातन्त्र मे क्या सम्बध है ? परतु हमारे देश की व्यवस्था ही ऐसी है कि चाहे वो खेल हो या पति पत्नी सम्बध, राजनीति उसमें आ ही ? जाती है। २ मुझे मालूम है कि इस बार दीपावली पर बम्ब और पटाके लान की आवश्यकता नही है । देश के कुछ हितचिंतक जनता के मनोरजन का भर- पूर रूपाल कर रहे हैं । बेचारे अमीर तो ले आयेंगे गरीबो का क्या होगा उन्ह भी नो मनोरजन चाहिए। फिल्म से मनोरजन करना अच्छी बात नहीं है। उससे बुजुर्गों की आखें खराब हो जाती हैं और युवक आखें धार करने लगते हैं । लडकी घर से भाग जाती है और लडका विना मा-बाप की आना से शादी कर लाता है। अत्त फिल्म देखना बुरी बात है। पर तु मूख जनता समझती कहा है ? बैचारे शुभचिंतक बास और बासुरी का सबध ही ममाप्त कर देना चाहते हैं। न सिनेमाघर हागे न लोग फिल्म देखेंगे, इसलिए सिनेमा घरो को बमो से उडा दो। अव ऐस मे कुछ लोग भी उड जाए तो हमे माफ करना । हर अच्छे काम के लिए बलिदान की आवश्यकता होती से मोहक और लुभावने दृश्य दिखाई दे रहे हैं इस बार दीपावली मे पहले। शरारती बच्चे कुत्ते की दुम मे पटाखा की लडी बाधकर उसमें आग लगा देते हैं । कुत्ता डर से उछलता है, कूदता है और बच्चे खुशी मे उछनते कूदते हैं। किसी को कुत्ते की दुम से पटाखा की लडी बाधना अच्छा लगता है तो किसी को रेल इंजन की दुम काट देने मे आन द आता है । जो हाथ मजदूरी को लालसा में फैले हो वह क्ट जायें तो कितना सुदर लगता है। जिन पैरो ने आपने गाव को कासो दूर छोड दिया हो, वो अब साथ छोड दे तो कसा जादू लगता है। कितने पतित पावन हैं वो लोग जिहोंने अनक मायाग्रस्त ससारी जीवो को इस असार भवनागर से पार लगा दिया। घय हैं वो लोग, धय है वो भारतभूमि जहा उहाने जम लिया और जहा जन्म 70 लेने को देवता भी तरसत हैं । इस बार दीपावली पर जुआ खेलने की भी इच्छा नही रही है। जब से महाभारत पढा था तबसे जुआ इस उम्मीद मे खेल रहा था कि कभी तो कोइ युधिष्ठिर फसेगा। परतु अब अपनी जुआ खेलने की इच्छा तुच्छ लगन लगी है। देश महान लगने लगा है। सबसे बड़ा जुआ तो इस समय यहा हा रहा है । एक तरफ सरकार है और दूसरी ओर पैदल घोडे, हाथी-सव एक दूसरे से लडकर मर रहे हैं। उहें चलने वाले जिदा हैं जिदा रहगे। दोनो म से कोई भी 'शो' कराने या पैक करने को तयार नहीं है । चालें चली जा रही हैं और मोहरे पिट रहे हैं। वैसे आजकल देशी चालें चलने मे हमारे प्रधानमत्री का विश्वास नहीं रहा है । इस देश मे अव उनके लिए रखा क्या है ? देश की समस्याओ का एक्मान हल है गुट निरपेक्ष आदोलन का अध्यक्ष पद । वैसे इससे भी बडे- बडे हल हैं, बस वहा पहुचने की सीढी चाहिए और देश अतिथि को सत्कार देना हमारी उज्जवल परम्परा रही है। इसलिए हम 'एशियाड और 'गुट निरपक्ष आदोलन' के लिए ऐसी सुरक्षा का प्रबंध कर मक्ते हैं कि परिंदा भी पैर न मार सके परन्तु घर की मुर्गी हमारे लिए तो दाल बराबर है। 'एशियाड' और नम एम० के साथ हमारी प्रतिष्ठा, हमारी राजपूती शान जुडी हुई थी। हम सर कटा सकते हैं झुका नहीं सकत । प्रतिष्ठा बनी रहनी चाहिए, लोगो का क्या है वो बीमारी से न मरे रेल दुर्घटना मे मर गए । प्रतिष्ठा बनी रहनी चाहिए।

शुभकामनाए नया वष आ गया है, शुभकामनाए भी भा रही हैं । जैसे मत्री, पुलिस ठेक्दार, इजीनियर, बडे बाबू, छोटे वायू, सबके साथ भ्रष्टाचार जुडा हुआ है वम नये वर्ष के साथ शुभकामनाए जुड़ी हुई हैं। आपको नहीं चाहिए तब भी आपको मिलेंगी। डारिया नए वष पर आपको सलाम मारकर शुभ- कामनाए देगा और लेने के लिए हथेली मागे वर दगा। यदि आपो उसकी आर्थिक स्थिति सुदृढ नहीं की तो वह वप भर मापी डाय व्यवस्था सुदा नहीं होने देगा। यह तो सजग भारतीय नागरिखो का चरित्र है । खाली हथेली खुजाती रहती है, काम नहीं कर पाती है। जिस बचारे को अपने पट की चिता है वह दूसरे ये पेट की क्या चिन्ता कर सकता है । वह तो दूसरे की रोटी पर अपनी नजरें गड़ा सकता है। इसी ज्ञान के फलस्वरूप हमारे सम्माननीय नेता पहले अपनी गरीबी मिटाते हैं फिर देश की गरीबी मिटाने की साचते हैं यह दीगर बात है कि उनकी गरीबी सुरसा की तरह पढ़ती चली जाती है और देश कही दूर घुघलने मे खो जाता है। वैसे हम लोग एक दूसरे के लिए मान नए वप पर ही शुभकामनाए प्रकट करते हैं पर तु कुछ लोग हैं जो देश का सदा शुभ चाहते रहते हैं । मे लोग देश को शुभस्वास्थ्य का लाभ पराने के लिए उसे पई आरान एक साथ कर डालते हैं देश को उलटा लटकाकर सीसिन मरवाते हैं और स्वय सीधे होकर अपना उल्लू सीधा करते हैं । ब्रह्मचारी होकर देश को मोहमामा से दूर रहने की सद् शिक्षा देते हैं और स्स्य देवा थी थराराम लिए गोले वारूद से खेलते हैं। दश निरतर जागा रहे, उराये शुभ में लिए देश के अन्दर शत्रु पंदा करते रहते हैं, बलेंस बराबर। इनयी शुभ- कामनाओं के फलस्वरूप ही देश जनसरया मी दृष्टि से छुटकारा । है। ये इनकी दुआओ काफ्ल है कि जनता मे निहरसा मा भाय है, उसके हाथ में स्टेनगन आ गया है और हमे हाथ गै शुभछ 72 ब्रह्मचारी होता भी ऐसा ही है कीचड, मे कमल के ममान । मोहमाया, धन घाय के लिए परतु उससे अलग । वैसे विदेश के लिए निर तर गुभ और शुभ के अतिरिक्त सोचने वाले और भी बहुत लोग हैं। इनके लिए प्रत्येक दिन नए वप का आगमन हाता है। ये कभी दश की नाक बचाने के लिए जेब काट लेते हैं तो कभी पाने बल आधुनिक कपडे पहनाने के चक्कर मे उसे नगा कर डालते हैं । ये भूखे लोगो के लिए महगे मेलो का आयोजन करते हैं और उसमे करतब दिखा कर वाहवाही लूटते हैं । ये देश की नाक लम्बी करने के चक्कर म उमका चेहरा बिगाड देते हैं। ये अपनी कुर्सी के अतिरिक्त देश को सब कुछ मारी शुभकामनाए दे सकते हैं। कुछ लोगो का शुभकामनाए देने का तरीका बहुत लाभदायक होता है । दूमरो का नव वर्ष शुभ कराते-कराते अपना शुभ करवा जाते हैं । सुबह सुबह शुभकामनाए देने के बहाने से आते हैं और चाय-नाश्ता हडप जाते हैं, दोपहर दोपहर को कही और शुभकामना देकर भोजन करते हैं और दर आयद दुरस्त आयद के अदाज मे रात को नव वष को शुभ करते हुए दूसरे की जेब हल्की करते हैं। वैसे नव वर्ष के भक्त चाहिए ये तो ऐसे पराक्रमी जीव हैं कि सारा साल ही नया करते रहे और आपको पता भी नही चल । ये नए वर्ष की शुभकामनाए व्यापार भी चोखा करवाती हैं। अनेक लोगो की जीविका का साधन बनती हैं । ग्रीटिंग कार्डी, डायरियो, कलेंडरा की भरमार हो जाती है । लोग देने नए वप की शुभकामनाए की जाते हैं ? हायरी और कलेंडर आते हैं । ऐसी शुभकामनाए नौकरी से लेकर ठेके तक दिलवा देती हैं। क्योकि खाली चीज देने का भारत मे रिवाज नही है। चाय के माप विस्कुट और डायरी और कैलेंडर के साथ बच्चो के लिए मिठाई और पत्नी के लिए उपहार देने का रिवाज हमारी भारतीय परपरा की ही देन है । चतुर सुजान लोग भी खाली शुभकामनाए, ग्रीटिंग कार्डी स नही भेजते हैं अपितु स्वयं जाकर शुभकामनाए देकर आते हैं और बदले मे भरी गुमनामनाए ले भी आते हैं। मेरी पत्नी मुझे नकारा समझती है क्यादि मुझ मास्टर के पास कोई भारी शुभकामनाए नहा लेकर आता है, चौरह नम्बर वालो के वो बड़े सकारा हैं क्योकि उनके पास कार मे नए वप की 73 भरी शुभकामनाए आती हैं। इसलिए जब नया वय आता है तो मैं अपनी पत्नी के सामने गिर जाता हूँ। आजकल ये विद्यार्थी भी बहुत ज्ञानी हो गए हैं भरी शुभकामनाए सीधे परीक्षा विभाग के क्लकों को दे आते हैं । अत हे पाठको इस सनी (राजनतिक ज्ञानी नही क्योकि राजनीति मे हर शब्द उल्टा हो अथ देता है) प्रेम जनमेजय का कहना है कि तुम भी नए वर्ष का लाभ उठाओ और इस अवसर पर जब कुत्ते की टढी दुम भी सीधा हो सकती है तुम अपना उल्लू सीधा करो। आज का युग कुछ लेकर ही देने का है इसलिए किसी को व्यथ में शुभकामनाए देकर अपने को व्यय मत करो। ब्रह्मचारियो के ममान कीचड मे कमल के समान वास करो और याग औरब दूक की विद्या मीखो। मेरी ममस्त शुभकामनाए जापके साथ है। आपको नव वष मे मध्यावधि चुनाव मिले और आप अपने वोट की कीमत वसूल कर सके । देश में भ्रष्टाचार फले फूले जिससे लापके बिगडते अनैतिक काय सरलता से बनें । मेरी शुभकामनाए हैं कि आपको ऐसा नेता मिले जो निर तर आपकी नाक को लम्बाई की चिता करे। और हा इन सब शुभ 'कामनाओ के लिए मुझे कुछ नही चाहिए क्योकि मुझे जो चाहिए वह सम्पादक दगा और सम्पादक को शुभकामनाए डूबते सूरज का इश्क क्लब में पहुचते ही श्री ज्ञानप्रकाश त्रिपाठी की आखो ने जो पहला काम किया, वह था श्रीमती आभा मुखर्जी को ढूढना। श्रीमती मुखर्जी क्लब की नई सदस्या हैं और जब से आई हैं श्री त्रिपाठी की आखो के सहारे दिल मे उतरकर हलचल मचा रही है। यही कारण है कि दिल से विवश श्री त्रिपाठी की आखें क्लब मे कुछ और देखना पसद नही करती हैं। जबकि क्लब मे कई सु दर वस्तुए हैं--मबसे बढकर श्री त्रिपाठी का मन पम द खेल 'पपलू' है जिसमें वह जीतते हैं और जब तक क्लब का चौकीदार हाथ जोडकर विनम्रतापूर्वक उठा नही देता है, तब तक न तो वह स्वय जात हैं और न ही दूसरे को जाने देते है । परतु बुरा हो आमा मुखर्जी का, जब से आई हैं आखें ताश के पत्तो पर टिक्ती ही नही है। जब तक क्लब मे नही आती हैं, आखें दरवाजे पर टिकी रहती हैं और जब आ जाती हैं तो उन पर टिक जाती हैं । ऐसे म पपलू जाए भाड मे । दिल की हालत ऐसी तो कभी नहीं हुई थी। ताश के पत्तो से हर रग के बावन वस त देख डाले परतु किमी वसत म कभी ऐसा नहीं हुआ। उस उम्र म भो नही, जब उम्र का तकाजा ही यही होता है। और फिर थी त्रिपाठी का प्रेम के मामले मे सिद्धात यही रहा है कि इसे हृदय रोग न बनाया जाए। चार्वाक के सिद्धातानुमार श्री त्रिपाठी न कई बार उधार लेकर घी पिया है और फिर उस गली म जाने या सोचा भी नहीं है । ईयर या दिया हुया चेहरा भी ऐमा है कि यौवन म जिसने इह देखा उमो मन म श्री त्रिपाठी यो दिन दने की इच्छा हुई। और हमारे त्रिपाठी जी भी इनने उदार हृदय रहे कि होने किसी को कभी निराश नहीं किया। इमलिए न कोई टिका और न वात दिल तक पहुंची। घरवालो ने विवाह ये व घन म बांधा तो सौभाग्य मे पत्नी ऐसी मिती निस अपनी घर गरस्थी म फुरसन ही नहीं मिल पाई। एक के बाद एक पाय सतानों के 15 पालन पोषण मे जीवन की चचलता कब डूब गई उसे स्वय पता नहीं चला। अब तो घर से बाहर निकलते जैसे श्रीमती त्रिपाठी की आखें चुधियाती । पर तु श्रीमती आभा मुखर्जी को देखते ही श्री त्रिपाठी के हृदय मे न जाने कैसा-क्सा होने लगा था। देखते ही पाने की इच्छा जागरित हो गई थी। मन ने जसे कहा था ज्ञान बाबू चीज अच्छी है, बुढापा सवर जाएगा । और आभा मुखर्जी देखने मे आकपक, सुगठित । आयु चालीस के आस पास की परन्तु वगाल के सौदय ने जैस उम्र को छुपा दिया था। बडी बडी आखें जिनम डूबने की गहराई अब भी विद्यमान है, बस उतरने वाला धाहिए । काले लम्बे बाल, (डाई दिए हुए) व्यक्तित्व मे ऐसा दब- दवा कि पहली बार मिलने वाला व्यक्ति हिचकिचाए, एक अजीब-मी हीन भावना मे ग्रस्त हो जाए । यही श्री त्रिपाठी के साथ हुआ और जीवन मे पहली बार हुआ। कहा श्री त्रिपाठी का पहली बार में 'आई लव यू, बहत हुए अगुली पकड पहुचे पर पहुचने वाला व्यक्तित्व और कहा यह हालत कि एक नजर को तरस रहे हैं। ऐसा भी क्या? परतु हो कुछ ऐसा ही रहा है । आखो के रास्ते आमा मुखर्जी हृदय तक पहुंच गई हैं । निगाहें मिलते ही श्री त्रिपाठी के शरीर मे झरझुरी सी दौड जाती है और फिर त्रिपाठी जी बगले झाकने लगते हैं। चार दिन म श्री त्रिपाठी की यह हालत हो गई है। बुढापे म (बुढापा आए दुश्मनों पर) एक तो वैसे भी नीद नहीं आती है और जो आती थी उसे थीमती आभा मुखर्जी ले उडी । क्लय से घर पहचते हो लगन लगता है जम ससार भर की घडिया रुप रुककर चल रही हैं। सबको सब जस श्री त्रिपाठी की दुश्मन हो गई हैं। पर अजनबी-मा लगता है। आखें तारो प समूह मे भाभा की आवृति बनाती और टूढती रहती हैं । पई बार सोझ आनी है कि क्लव शाम को ही क्यो मुलता है, सारा दिन क्यों नहीं खुला रहता है । और फिर बलय खुलने के आधे घंटे बाद मामा मुखर्जी क्यो आती हैं क्लय खुलने से पद्रह मिनट पहले भी तो आ सकती हैं। इन हिन्दुस्तानियों में यही तो बुराई है कि कभी समय १ पहले नहीं पहचत हैं। और विडम्बना यह नि श्री विपाठी को इस पोहापून दना की श्रीमती 76 आभा मुखर्जी को भनक भी नहीं है। चार दिन हो गए पर तु अभी तक आभा मुखर्जी से सही तरह से 'हैलो' तक नही हो पाई। 'हैलो' तो हो जाती परतु श्री त्रिपाठी को हिम्मत ही नही पड रही है। बस क्लब की लगभग सभी (सुदर) महिलाआ से श्री त्रिपाठी का परिचय है और यह परिचय आते ही श्री त्रिपाठी न पा लिया था, परतु यह आभा मुखर्जी। आज श्री त्रिपाठी सोचकर हीघर से चले हैं कि हैलो' तो हो ही जाए। अक्सर आभा मुखर्जी वर्मा की टेबल पर वठती है । वमा खूसट, बुढऊ खस्सी । दात आगे को निकने हुए हैं, गाल पिचके हुए, आखें धसी हुई, बाल खिचडी डाई भी नहीं करता है। श्री त्रिपाठी ने इस प्रसग म अपने सौंदय की तुलना उससे कर डाली और स्वय को उससे कई गुना सुदर पाया। पर तु इस साले वर्मा मे क्या है कि आभा मुखर्जी उसी के साथ चिपकी रहती है। ऐसे घुल घुल कर बात करती है जसे और वमा, आदमी को स्वय भी सोचना चाहिए । अपनी नौकात पहचाननी चाहिए। ऐसे वात करता है जैसे 'विश्व सुदर' का ग्विताब इसे ही मिला हो और आभा मुखर्जी उस पर अपनी जान छिडकती हो । परसु आभा मुखर्जी से 'इट्रोडक्शन' के लिए गघे वर्मा का सहारा तो लेना ही पडेगा, यानी गधे को वाप बनाना ही पड़ेगा। हैल्लो ओ वमा साहेब । क्या बात है, क्या ठाठ हैं ? क्यो भई आज कौन-सा परफ्यूम लगाया है कहा बिजली गिरानी है ?' श्री त्रिपाठी ने गधे को बाप बनाने की प्रक्रिया मे कहा। "हैलो त्रिपाठी।" वर्मा के स्वर मे उदासीनता थी जसे कह रहे हो हम तुम्हारे जैसे वेटो को खूब जानते हैं । वमा आखो से क्लब म कुछ ढूढ़ने का उपक्रम करते हुए त्रिपाठी को वाई पास करने की मुद्रा मे आग बढने लगे। और श्री त्रिपाठी इस सीज में कि लो इम कुत्ते के भी दिन बदल गए हमारी बिल्ली हमसे ही म्याक परन्तु विवशता का नाम अहिंमा के अनुसार वर्मा की म्याऊ सुनते हुए 'हड्डी' के लालच म जीम लपलपाते, हैं हैं हैं करते उसके पीछे हो लिए । जिस तरह वर्मा की आसें त्रिपाठी को 'इग्नोर कर क्लव म कुछ 7 S 77 खोज रही थी, श्री त्रिपाठी समझ गए कि एक लम्बी लडाई लडनी पडेगी। और इससे पहले वि वर्मा को कुछ पता चले उसे सोढी बनाकर त्रिपाठीजी आभा तक पहुंच जाओ। इसके लिए जितना गिरना पडे गिरा, वरना बुढाप (?) मे असफलता की वो कालिख पुतेगी कि जवानी का सारा किया- कराया धरा रह जाएगा। और फिर औरत के आगे पुरुप हार जाए पुरुष जिसकी नारी चेरो है, दासी है, भोग्या है। कुछ करो श्री त्रिपाठी, कुछ बगे। n- | "और वर्मा साहेब | बाल बच्चे ठीक ठाक है?" "हा पत्नी भी ठीक है।" वर्मा अपनी टेबल की ओर बढा। "घढिया भई वर्मा आज तो हम तुम्हारी टेवल पर ही बैठेंगे।" श्री त्रिपाठी ने ढीठ बनकर वह तो दिया परतु अन्दर ही अदर भयभीत भी हा गए कि कही इस बात पर वर्मा चाटा ही न जड दे। धडक्ते दिल से विस्फोट की प्रतीक्षा करने लगे। परतु शब्दकोश म औपचारिकता भी एक शन होती है। इसके कारण व्यक्ति मन मे घाह गाली दे रहा हो परन्तु मुख पर मधुर मुस्कान चिपकाने को बाधित रहता है। चाय पिलाने की इच्छा न हो फिर भी घर आए व्यक्ति को बार-बार चाय के लिए पूछना है। बेचारा वर्मा औपचारिक्ता का मारा बोला, "हा हा क्यो नहीं, वठो। पर त्रिपाठी मैं साफ कह दू कि तुम्ह अपने साथ हम पपल नहीं खिलाएगे। "क्यो भई, ऐसा क्या हो गया वमाजी?" "पुरा मत मानना त्रिपाठी," वर्मा ने दुर्मी पर जमते हुए, कहा "बैठो सो त्रिपाठी हम जूए के लिए ताश नहीं खेलते हैं। हम तो मनोरजन के लिए थोडे-बहुत पैम इधर रघर कर लेते हैं । और तुम्हें आदत पड़ गई है जए को। तुम वेवल जीतने के लिए सेलते हो। मिसेज मुखर्जी को भी ज्यादा जमा पसद नहीं है । तारा में हार-जीत हो तो मजा आता है। यह क्या हुआ विसिफ हारते रहो या जीतते रहो। यू नोत्रिपाठी मिसज मुखर्जी को यह सब अच्छा नही लगता है । आई कि तुम माइह नही भरोगे। मू विल महरस्टैड मो।" 'और है, वर्मा जसा तुम कहो । में येवल तुम लोगो का खेल ही 1 है 78 देखूगा।" त्रिपाठी ने उम कट की तरह फिलहाल अपना सर टेंट मे घुमाना उचित समझा जिसने अतत कट वाले को ही टेंट से बाहर कर दिया था। 'आइए मिसेज मुखर्जी, आइए | आप का ही इतजार हो रहा था।" वर्मा आभा मुखर्जी के स्वागत मे उठ गया और कुर्मी की ओर बठने का सकेत करते हुए लगभग ऐसे झुका हुआ था जैसे 'एयर इडिया' का महाराजा। "हैलो वर्मा । हैलो एवरी बौडी।" आभा मुखर्जी ने मुस्कान बिखेरी और वर्मा तथा त्रिपाठी के बीच की कुर्सी पर बैठ गई । श्री त्रिपाठी, बेचारे त्रिपाठी। इस समय उनका हृदय घडक घडक कर अपनी उपस्थिति की सूचना दे रहा था। टागें न जाने क्यो काप-सी रही थी। लग रहा था कि जैसे कुछ प्रफुल्लित शब्न बाहर आना चाहते हैं परतु आ नहीं पा रहे है। इस समय वह अपने चेहरे पर यथासम्भव सौम्यता लान का प्रयत्न कर रहे थे। अपने को अच्छा-अच्छा सा दिखाने की चेष्टा मे वह अनावश्यक ही मुस्करा रहे थे और उनकी दष्टि आभा मुखर्जी के अनुग्रह की इच्छा मे निरतर उनके इद गिद चक्कर काट रही थी। उहे वमा पर गुस्सा भी आ रहा था जो उह आभा मुखर्जी से मिलवा नही रहा था, अपितु खुद चपर-चपर बातें किए जा रहा था। इस समय अगर ईश्वर कहता--"वत्म हम तुमसे बहुत प्रसन हुए। कहो भक्त त्रिपाठी, क्या मागते हो?" तो श्री त्रिपाठी एक वरदान के बदले मे धर्मा को यमराज के पास पहुंचा देते । स्वय श्री त्रिपाठी को आभा मुखर्जी से बात करने का साहस नही हो रहा था। वही उसने वात न की तो कितना बड़ा अपमान होगा सबके बीच । गलत प्रभाव भी तो पड़ सकता है, सोचेंगी कि मैं उनसे मिलने के लिए लार टपका रहा है । पहला ही इम्प्रेशन ऐसा पड़ गया तो पस्ट इम्प्रेशन इज दी लास्ट इम्प्रेशन । वर्मा ने ताश बाटनी शुरू की तो त्रिपाठी को ताश नही बाटे। इस व्यवहार को श्रीमती मुखर्जी न लक्षित किया और बोली, 'मिस्टर वर्मा, इनके ताश भी बाटिए । क्या इसे खेलना नही आता है कौन हैं ? अपने बारे में ऐसी जिनासा देखकर श्री त्रिपाठी का मन बल्लियों उछल गया। उनको लगा कि यह औरत नहीं देवी है -सौंदय और उदारता 79 की देवी । अपनी प्रशसा आप ही करने को श्री त्रिपाठी ने मुह खोला ही था कि वर्मा बोला, "नही मिसेज मुखर्जी, हम इहे अपने साथ नहीं खिलाएगे। मिस्टर त्रिपाठी जरा दूसरे ढग से खेलते हैं । हम अगर इनके साथ ले तो वह 'खेल' नही जूआ होकर रह जाएगा। यह सिफ जीतने के लिए खेलत है । दूसरे को जीतने नहीं देते। हम लोग तो सिफ मनोरजन के लिए खेलते हैं न मिसेज मुखर्जी "हाऊ हाक आप हर बार जीतते हैं। इतना बढ़िया खेलते हैं। मिस्टर त्रिपाठी, मुझे तो बिल्कुल ही नही आता है । मेरा बडा लडका जय स्टेटस मे आता है नो वह हर बार मुझे हरा देता है और कहता है कि मम्मी तुम कोई 'कोच' रख लो । श्री त्रिपाठी, आप मुझे 'हैल्प' करेंगे। प्लीज मुझे कुछ सिखा दीजिए।" आभा मुखर्जी ने मारक मुस्वान थी त्रिपाठी के आगे बिखेरते हुए कहा। श्री त्रिपाठी को लगा कि हृदय मे वसत छा गया है। वह इद्र बने बैठे हैं और अप्सराए मधुर स्वर मे गीत गा रही है । चादनी खिली हुई है और वह आभा मुखर्जी के हाथो मे हाथ डाले युगल गान गाते हुए चले जा रहे हैं । आकाश से फूल बरस रहे हैं । और देवता भी इस दश्य को देख कर तरसते हुए कह रहे हैं कि हम क्यो न त्रिपाठी हुए। बस अप कोई इच्छा नहीं है, न हद है, न कोई विकार । सच ईश्वर कही है और जब भी छप्पर पाडता है । बेचारा वर्मा, उसने देखा ऊट पूरे घर मे समा गया है, और वह विवश सा बाहर जा रह है। पर इस तरह वर्मा ऊट को जमने नहीं देगा । उसकी करवट बदल देगा । आज वर्मा पूरे दिलो दिमाग से 'पपलू' सेलेगा और जीतेगा । त्रिपाठी को 'नीचा' दिखाने या इससे अच्छा अवसर फिर कभी नहीं मिलेगा। "यम मिमेज मुखर्जी, माप जैमी सुन्दरी की सहामता करवे मुझे प्रसनता होगी। आप देखती जाए, मैं आपको इस क्लब बाम्पियन बना दूगा। वर्मा जैसे आपके सामने पानी भरेंगे।" त्रिपाठी पा भास्मविश्वारा लोट आया था। उन्होने अपनी कुर्सी मिसेज मुखर्जी से और दी। ताश बटे सेल आरम्भ हुना। पहले श्री त्रिपाठी दूर से 80 था। ओर सकेत करके उठाने और फेंकने के लिए कहने लगे, फिर पास सरक आए । और फिर अगुली का स्पश हुआ। एक करेंट सा सारे शरीर म (श्री त्रिपाठी के) दौड गया। मस्तिष्क शू य हो गया, हृदय मे ज्वार उठ आया । ब्लड प्रेशर हाई हो गया। मस्ती के झोके स्पश सुख को अनुभव करने मे डूबने लगे। अब श्री त्रिपाठी की आखें ताश के पत्ते नही देख रही थी, त्वचा स्पश सुख अनुभव कर रही थी। श्री त्रिपाठी ने आज तक ऐसा अनुभव नही किया था। पत्नी के सम्पूण शरीर से वह रोमाच नहीं मिलता था। मिला था, जो आभा मुखर्जी की एक अगुली से इस समय मिल रहा श्री त्रिपाठी का नशा तब टूटा जब श्रीमती आभा मुखर्जी ने कहा, "हाय, मैं हार गई। इतने सारे 'पाइटस' । आप तो मुझे जितवा रहे थे। मिस्टर त्रिपाठी | यह क्या हुआ? इससे अच्छा तो मैं खुद ही खेल लेती हू। इतने पाइट्स मैंने आज तक नही दिये।" श्री त्रिपाठी ने यह विलाप' सुना तो सक्ते मे आ गए । आसमान से गिरकर खजूर मे अटरे बिना धरती सूघ गए । जीवन मे पहली बार 'पपलू' म इतनी बुरी हार । क्या सोचेंगी आभा मुखर्जी ? क्या 'इम्प्रेशन' पडा है ? बचने के लिए बगलें भाक्ने लगे और मेंप मिटाने के लिए बहाना ढूढने लगे । वर्मा की विजयी मुस्कान उनके दिल पर छुरिया चला रही थी। "मिसेज मुखर्जी, आज जरा ध्यान भटक गया। लाइए मैं आपकी तरफ से खेलता हू ।' कहकर श्री त्रिपाठी ने गडडी हाथ मे पकड ली। "आप लोग ही खेलिये मुझे आज जरा जल्दी जाना है। मेरे हस्बड टूर मे लौट रहे हैं । तीन चार दिन रहेंगे फिर चले जाएगे। सोचती हू, उनको कम्पनी दे दू, और थोटी बहुत शापिंग भी कर लू । ओके, बाय, बाय।" श्रीमती आभा मुखर्जी ने उठते हुए कहा । श्रीमती आभा मुखर्जी क्या गई श्री त्रिपाठी के हृदय का सारा उत्साह समाप्त हो गया। जिस ताश की गडडी को उहोने बड़े उत्माह से पकडा था उसे एक उदासीनता के साथ मज पर रख दिया। अब जीतने से क्या लाभ ? किसके लिए जीतें श्री त्रिपाठी ? सारा क्लब सूना-सूना सा लगने लगा। श्री त्रिपाठी वस सिगरेट नही पीत हैं, पर ऐसे अवसरोपर मागकर - ।

81 एकाध सिगरेट पी लेते हैं जब जीवन निरथक लगने लगता है। "क्या बात है त्रिपाठी, हमारे माय 'पपलू' नही सेलोग।" वर्मा का स्वर व्यग्यात्मक था। श्री त्रिपाठी नहीं चाहते थे कि इन लोगो को कुछ शक भी हो कि श्रीमती मुखर्जी के लिए उनके मन मे कुछ है । यह सब मिडिल क्लास की मटेलिटी के लोग हैं ऐसे ही बात को ले उड़ेंगे और फिर न जाने वात कहा कहा पहुचे । बेटे हैं, बहुए हैं, एक बेटी ब्याहने योग्य है । भारत का ममाज अभी बहुत पिछडा हुआ है, 'फडशिप' की बात यहां के लोगो के गल मे नही उतरेगी। इसलिए आभा मुखर्जी के अभाव के कारण हुई उदासीनता दूर हटाते हुए श्री त्रिपाठी मुस्करा कर बोले, "क्यो नही, वा चली गई तो क्या खेल नहीं होगा।" 'यम, देटस दी स्प्रिट,' वर्मा ने मुस्कराकर कहा। खेल आरम्भ हो गया परतु श्री त्रिपाठी का मन होता तो लगता । तरह-तरह के जोड-तोड वह अदर ही अदर जोड रहे थे । अब तो बस एक ही इच्छा थी, आभा मुखर्जी से प्रेम-मम्न घ। इस इच्छा मे श्री त्रिपाठी 'पपल' मे हारना शुरू हुए तो हारते रहे । उहे इस बात पर खोज तो आई पर सोचा हारना ही ठीक है। कभी भी जीवन मे बडी वाजी जीतने के लिए हारना भी आवश्यक होता है। अगर नहीं हारा तो कल से ये लोग अपनी टेबल पर नहीं बैठाएगे। मनुष्य कितना चतुर है, वह अपनी असफलता को भी कसे सफलता में बदल देता है। आभा मुखर्जी अब तीन दिन बाद क्लब लौटेंगी। तीन दिन । श्री त्रिपाठी को पहली बार अनुभव हुआ कि कुछ परिस्थितियो मे तीन दिन, तीन दिन नही होते महीने हो जाते हैं। इसके हस्बड को भी अभी दूर स आना था। खरामा खरामा बातचीत शुरू हुई थी, थोडा अपनापन बढ जाता, पर अब तो फिर शुरू करना पड़ेगा। और यह तीन दिन कैसे पटेंगे। उस रात श्री त्रिपाठी ने क्लब से लौटकर खाना नहीं खाया। वहाना मार दिया कि आज क्लब में पार्टी थी। आभा मुखर्जी के विरह मे एक रात का खाना ता श्री त्रिपाठी छोड हो सकते थे। वह चाहते थे कि आज उह कोई रोके टोके नहीं। वह मामा मुखर्जी वे स्पश सुख स मिले आनद 82 मे खो जाना चाहते थे। वह जल्दी से जल्दी अकेलेपन मे यादो के सहारे आभा मुखर्जी को लोटा लेना चाहते थे। वह प्रेम गाडी को आगे घलान के लिए योजनाए बनाना चाहते थे। अत श्री त्रिपाठी ने रात का खाना नहीं खाया। तीन दिन, तीन रात । कसे कटेगा यह समय ? क्या प्रतीक्षा मे जीवन के अनमोल क्षण खो दिए जाए ? नहीं, श्री त्रिपाठी आभा मुखर्जी को जी जान से ढूढेंगे। छोटी सी इस 'दिल्ली' में कही तो आभा मुखर्जी टकरा ही जाएगी। वह नही टकराएगी तो श्री त्रिपाठी उनका घर खोज कर स्वय टकराएगे। और जब वो टकराएगी श्री त्रिपाठी तारों भरी रात मे दिवास्वप्न लेने लगते हैं वहाभा मुखर्जी के घर के आस पास इस मुद्रा मे घूम रहे हैं कि किमी आवश्यक काम से कही जा रहे हो । कनखियो से याचना भरी दष्टि इधर उधर डालकर दिल चाह रहा है कि कस भी आभा मुखर्जी टकरा जाए। मन सभी देवताओ का स्मरण कर रहा है, कई भगवानो के मदिर मे मवा पाच रुपये का परसाद चढाने का निश्चय कर रहा है । श्रीमती आभा मुखर्जी के घर का दरवाजा खुलता है, श्री त्रिपाठी की धडकनें बढती हैं। कोई बाहर आता है। आह । आभा मुखर्जी दिल बाहर निकला कि निक्ला । श्री त्रिपाठी तीव्रता से आभा मुखर्जी, के घर स दस गज पीछे की ओर भागते हैं और फिर धीरे धीरे इस मुद्रा मे चलने लगते हैं कि हमे पता नही है कि आप यहा रहती हैं। हम तो अपने काम से जा रहे हैं। "अरे मिसेज मुखर्जी आप, आप यहा कसे?" 'मेरा तो घर है वो सामने आप कैसे ?' "मैं मैं वो एक जरूरी काम से यहा आया था।' "जरूरी काम से किस काम से, कहा आए हैं "बस वो बस ऐसे ही एक काम से। बहुत जरूरी काम से आया था, यही इधर ही। कैमी हैं आप?' "अच्छी हू । आपको बहुत जल्दी नही हो तो थोडी देर बठते हमारे यहा । आज तो मेरे हस्बैड भी घर मे हैं।" " - 83 "नही, ऐमा कोई जरूरी काम नहीं है । आपके हस्बड से तो मैं जरूर मिलूगा।" श्रीमती मामा मुखर्जी त्रिपाठी को घर ले जा रही हैं । स्वग है और यही है तथा उसे श्री त्रिपाठी अनुभव भी कर रहे है । आभा मुखर्जी चाय पिलाती हैं और अपने 'पति' को बतलाती हैं कि श्री त्रिपाठी 'पपल' के कितने अच्छे खिलाडी हैं । श्री पतिदेव त्रिपाठी से आग्रह करते हैं कि वह आभा मुखर्जी को रोज एक घटा 'पपलू' ही सिखा दिया करें। हाय श्री त्रिपाठी के ताश का महल ढह जाता है। वह अपने को घर मे पली के सम्मुख पाते हैं जो हाथ मे दूध का गिलास लिए खडी है। "क्या बात है, किम चिता मे खोए हुए हो। देखती हूँ कुछ दिनो से तुम रात को ठीक सो नहीं पाते हो। काम्पोज ले लो दूध के माय ।" पत्नी ने बड़े प्यार से कहा। पर तु यह प्यार श्री त्रिपाठी का अपने कल्पना लोक के गुब्बार मे सुई मा धुभा । वह जल्दी से जल्दी दरवाकर फिर अपने कल्पना लोक मे खो जाना चाहते थे। "नही, ऐसी कोई बात नहीं है मैं ठीक ह "मैं जानती नही हू क्या आपको बिटटो के ब्याह की चिता रहती है। मैं आपका स्वभाव नहीं जानती क्या ? पर, सुनो चिता से क्या होगा ।करने वाला तो ऊपर है । जब जो होना है, जैस सजोग मिले होगे, वैसा ही तो होगा। तुम मत चिना किया करो जी!" श्री त्रिपाठी को सुनकर अच्छा लगा। उहोंने सोचा पत्नी का यह भ्रम बना रहे तो अच्छा है वरना प्रेम के कल्पना लोक मे वह ऐसे ही अपनी टाग अडाती रहेगी। और फिर इस बात को स्वीकार कर वह जिम्मेदार पति की भूमिका भी अदा कर सकते हैं । 'चिता करनी पड़ती है, भाग्यमान । भगवान पर तो सब कुछ छोडा नही जाता । स्वयं भी ता हाथ पैर हिलाने पड़ते हैं। पर तुम चिता मत करना। तुम सो जाया करो। खैर, आज तो मुझे गहरी नीद आ रही है । तुम भी सो जाओ।" श्री त्रिपाठी ने पत्नी को बहलाया और उमके जाते ही कल्पना ताक में अपने को बहलाने लगे। । 1 84 अव विसी तरह आभा में घर का पता चल जाए तो बात बने । पर पूछे किससे श्री त्रिपाठी ? यमा को पता है परतु उससे पूछना अपना आपका बदनामी के कुए म ढकेलना है । दस जगह बात करगा और काई आश्चय नहीं वि परिवार म भी सोगा से मजाय मजार म नमः मिच ल गावर यह द अब तक श्री त्रिपाठी पाविचार या मिसलनायक फेवल फिल्मो म होत हैं, उनका हमारे जीवन से कोई सम्बध नही होता है परतु इस घटना से उनका विचार बदल गया है। श्री त्रिपाठी को विश्वास हो गया है कि खलनायर हमारे जीवन मे भी हो सकते हैं और उनका हमारे जीवन से गहरा सम्बध हाता है । अव इस ईश्वर की कृपा कहिए कि श्री त्रिपाठी परिश्रम वा फल, एक दिन उहें बाजार मे श्रीमती मुसजी मिल गई और वह भी अकेली। उनके पति ने उह मिलने का समय दिया था और अभी पहुचे नही थे। श्री त्रिपाठी को देखकर वह मुस्कराई तो वह न दन फानन मे पहुच गए। पति की प्रतीक्षा मे पहले तो वह अपने इग्लड और अमेरिका गए बेटों के वार में धारा प्रवाह बोलती गई और फिर श्री त्रिपाठी से यह पूछकर कि उनके बेटे विदेशो मे कहा कहा हैं, उन्हें हीन भावना से ग्रस्त करने लगी। काश | श्री त्रिपाठी ने अपनी जमा पूजी लगाकर एक बेटे को ही विदेश भेज दिया होता तो आज यह नाक नहीं कटती। बेचारे चुपचाप इस अपमान को पीते रहे । श्रीमती मुखर्जी ने किसी रेस्तरा म चाय के लिए आमत्रित किया तो श्री त्रिपाठी को अचानक कोई काम याद आ गया। काम क्या, बस बहाना था। अचानक मिल इस निम प्रण पर वह एकदम हडबडा उठे थे। चाहे कुछ भी हुआ हो श्री त्रिपाठी को एक बात का पूणत विश्वास हो गया कि श्रीमती आमा मुखर्जी उनको चाहती हैं । बस अब वह किसी भी दिन अपना प्रेम निवेदन कर ही देंगे। पर यह निवेदन कैसे हो ? सीधे कह दें कि 'आई लव यू । श्री त्रिपाठी यह भारत है। श्रीमती मुखर्जी के लडके चाहे विदेशो में रहते हो परतु वह खुद शुद्ध वगालन हैं। और फिर अपनी उम्र तो देखिए । जवानी मे करते तो लोग उम्र का तकाजा मान लेते पर इस उम्र में कही कच-नीच हो गई तो वो भद्द उडेगी, वो मिट्टी - 85 पलीत होगी कि मुह दिखाने लायक न रहोगे। पत्नी क्या कहेगी, बेट क्या कहगे, बेटो की बहुए क्या कहेगी। और फिर यह 'जालिम समाज'। छोड दू यह सब लफडा। मान लू हार। इस बात को श्री त्रिपाठी का दिल कतई स्वीकार करने को तैयार न था। एक बार कदम बढाया तो वह मदं का बच्चा ही क्या जो उसे पोछे उठा ले आज क्लब में क्या न किसी रेस्तरा मे चाय के लिए निमत्रण दे दू। किसी न देख लिया तो? यहा कोन से लोडे लपा है, इज्जतदार लगते हैं। किसी को क्या पता मेरे साथ कौन है ? इस उम्र में यही तो लाभ है, कोई शक नही करगा । पर क्या मिसेज मुखर्जी मान जाएगी? कैमे कहूगा? सीधे चाय के लिए कह दू । क्यो न अपने जन्म दिन का बहाना बनादू । यह ठीक रहेगा। "हेलो मिमेज मुखर्जी, कैसी है " श्री त्रिपाठी ने आभा मुखर्जी को क्लब में प्रवेश करने से पहले दरवाजे पर पकड लिया। "फाइन, आप कसेह "अच्छा हू, और आपको देखकर तो वैसे ही तबीयत खिल उठती है।" श्री त्रिपाठी न बडे साहस के साथ रोमाटिक होते हुए कहा। अह हा यू नॉटी" थोडा सा हसकर आभा मुखर्जी ने पहा तो श्री त्रिपाठी के हृदय की बगिया खिल गई। "क्ल मेरा जन्म दिन है, मेरी इच्छा है कि आप मेरे साथ चाय पिए ।" श्री त्रिपाठी ने हकलाकर कह तो दिया परतु विस्फोट की प्रतीक्षा भी करने लगे। "ओह ! कामेच्यूलेशस, हाई नाट | कहा पिलाएगे चाय?" श्री त्रिपाठी की झोली सितारो से भर गई। धरती पर स्वग उतर आया। ईश्वर ने छप्पर फाड दिया। मन मयूर नाच उठा । ब्लड प्रेशर "अच्छा । फिर हाई हो गया। बुढाप म नीद वसे ही नहीं आती थी, उम रात तो यो बरन हो गई। श्री त्रिपाठी सारी रात करवटें बदलते रहे। पत्नी ने टोका, "क्यो जी, तबीयत ठीक नहीं है।' बेटे ने कहा, "पापा, रात का कम खाया करो।' और दिल ने कहा, 'त्रिपाठी, बाबू, सब बकवास करते है। मजे कर जाओ। सोच लो जो योजना बनानी है । (सोच लो) जो क्ल कहता है ।

86 आख फिर यह दिन नही आएगा। अपने मन की एक-एक बात कह डालना। कल चूक गए लो गई मिसेज मुखर्जी हाथ से । फिर टापते रहना।" याजनाए बनने लगी, रात बीतने लगी, सुबह होने को हुई लग गई। श्री त्रिपाठी वेमनी मे शाम की प्रतीक्षा करने लगे । पाम को 'स्टडंड मे आभा मुखर्जी मिलेगी और श्री त्रिपाठी उमके सामने अपने दर्दे दिल का हाल बयान करेंगे। कैसे करेंगे? अभिव्यक्ति के इस सक्ट के लिए श्री त्रिपाठी कई 'आइडियाज' सोच चुके हैं । जसे कोई काल्पनिक प्रेम-कहानी आरम्भ करेंगे और बीच मे अपना प्रेम निवदन कर देंगे। या फिर आभा मुखर्जी के सौंदय की प्रशसा करेंगे और अपन हृदय के आक्षण को वह देंगे । अथवा बदले हुए माडन जमाने की प्रशसा करेंगे, स्त्री-पुरुष की मित्रता पर बल देते हुए अपनी बात कह देंगे। या जव आभा मुखर्जी 'हैप्पी बथडे कहते हुए प्रेजट देंगी, तब श्री त्रिपाठी उसके हाथो को अपने हाथों में लेकर नशीली आखो से निहारेंगे और बहुत ही मधुर आवाज मे 'धक्स माई लव कहेंगे। पर इतना साहस क्या वह बटार पाएगे? साहस तो करना ही पडेगा श्री निपाठी वरना अकेलेपन का यह सुनहरी अवसर निकल जाएगा। पर अगर आभा मुखर्जी प्रेजेण्ट न लाई तो? सारा सोचा सुचाया धरा रह जाएगा। शाम होते होते श्री त्रिपाठी 'स्टडड' मे पहुंच गए--ममय से एक घटा पहले । वो किसी भी प्रकार का रिस्व नही लेना चाहते थे । और फिर जा कुछ आज होना था उसके लिए श्री त्रिपाठी को अपने आपको तैयार भी करना था। श्री त्रिपाठी की चाल किसी नजगामिनी महिला से कम नहीं थी। वह एक नशे मे लहराते हुए से चल रहे थे। ओठा पर रहस्यात्मक मुस्कराहट थी । अनात नशे में डूबी हुई माखों को सारा ससार हरा हरा दिखाई दे रहा था । लब्बो-लुवाय यह कि श्री त्रिपाठी अपने को जितना हो सके रामाटिक दिखाने और बनाने मे प्रयत्नशील थे। उन्होंने रेस्तराम एक कोन की मेज खाजी और बठ गए। श्री त्रिपाठी की आखें दरवाजे पर लगी थी। मस्तिष्क आभा मुखर्जी व सामन स्वय को अभिव्यक्त करने की योजना बना रहा था, हाय प्रतीक्षा 87 मे चाय तैयार कर रहे थे और दिल समय की माला के प्रत्येक क्षण के मनको को फैरता हुआ एक ही नाम जप रहा या आमा । क्तिना प्यारा नाम है। परन्तु तभी श्री त्रिपाठी चोंके । उहोंने रस्तरा के दरवाजे पर जो देखा उसे देखकर वह सकपका गए। जी नही, न ही अपने पति के साथ आभा मुखर्जी थी और न ही विलेन ~वर्मा था बल्कि दरवाजे पर श्री त्रिपाठी के सुपुत्र सुनील अपनी गल फड के साथ उपस्थित थे। सुपुत्र जी रेस्तरा म खालो मेज ढूढ रहे थे। यह यहा कैसे आ गया? श्री त्रिपाठी घबराए । तो जनाव आजक्ल यह रिसच' कररहे हैं ? आजकल रोज जो पुस्तकें खरीदने के नाम पर पैसे खच किए जाते है, वो इस पुस्तक पर ग्वच किए जा रहे हैं । तभी लाठ साहए प्रैक्टिकल के बहाने देर रात गए घर आते हैं। यह प्रैक्टि- कल हो रहा है। श्री त्रिपाठी का मन हुआ कि अभी उठे और उठकर एक चाटा घर दें। पर तु अगर सुनील ने पूछा कि वह यहा क्या कर रहे हैं तो क्या जवाब देंगे? आजकल की सवान तो है ही ऐसी, बाप से मवाल जवाब करती है। छोडो श्री त्रिपाठी, क्यो अपना मूड खराब करते हो, घर चल- कर देख लेना। श्री निपाठी ने मन मसोसा और सर झुलाकर चाय पीने लगे। मूड खराब तो हुआ हो। अब पता नहीं सुनील को कोई खाली मोट नहीं मिली या उमने थी निपाठी को देख लिया, दोनो रेस्तरा मे नही वठे। इस पर श्री त्रिपाठी को जो सास भाई वह राहत की सास थी। थोरी देर बाद दरवाजे पर आभा मुखर्जी दिखाई दे गई, वह श्री त्रिपाठी की तलाश मे इधर उधर अपनी प्यारी आखें धुमा रही थी। श्री त्रिपाठी ने बुलाने के अदाज म दा-तीन बार हाय हिलाया भी परतु उसे आभा मुखर्जी देख नहीं पाई। देखा भी तो एक वेटर ने, वह आ गया। श्री त्रिपाठी जब तक वेटर को कुछ कहते, आभा मुपर्जी ने श्री त्रिपाठी को देख लिया और मुस्कराती हुई मेज की ओर चल दी। श्री त्रिपाठी स्वागत म उठे कुछ लडखडाये और फिर बैठ गए । साहम कर पिर उठे, मेजपोश खिंच गया शीशे का गिलास और चाय के बतन फर्श पर गिर गए। सारे रेस्तरा का ध्यान खिच गया! थी त्रिपाठी ये चेहरे पर रोमास की जगह 68 70 क्षमा का भाव आ गया। "और कोई नहीं आया "बठिए, मैंने सिफ आपको इवाइट किया था। "नो, दिस इज वैरी बैंड । बथ-डे ऐसे थोडी मनाया जाता है । चलिए क्लब का टाइम हो गया है, आज क्लब मे आपका बय-डे सेलिब्रेट करेंगे।" "कुछ देर तो बैठिए मिसेज मुखर्जी कुछ चाय वाय हो जाए।' "आह ना, चलिए उठिए । क्लब चलते हैं।" आभा मुखर्जी ने श्री निपाठी को हाथ से पक्डकर उठाते हुए कहा। श्री त्रिपाठी के शरीर में करेंट दौड गया। क्तिना मनमोहक स्पश था । श्री निपाठी समझ गए कि क्यो वह रेस्तरा से बाहर जाने की बात कह रही है। भई अच्छे घरो के लाग हैं, किसी ने देख लिया तो | अभी सुनील ही आ गया था। श्री त्रिपाठी को इतनी सी बात समझ नहीं आई। हाय क्तिनी अच्छी है मिमेज मुखर्जी । कनाट प्लेस के बरामदो मे क्लब की ओर चलते हुए श्री विपाठी का वई बार मन हुआ कि श्रीमती आभा मुखर्जी का प्यार से हाथ थाम और उसे झुलाते हुए आग बढे । एक दो वार चलते चलते हाथ को टकराया भी। थीमती आभा मुखर्जी ने कुछ नही कहा कहती भी क्या। श्री त्रिपाठी भौका है, हाथ पकड लो । श्री त्रिपाठी ने हाथ पकड लिया, और उसे प्यार से दबा भी दिया। श्रीमती आभा मुखर्जी ने रुक्कर घूरते हुए श्रीत्रिपाठी की ओर देखा। श्री त्रिपाठी के चेहरे पर आश्चयजनक भय से युक्त वेचारा-सा रोमास तैर रहा था। देखें क्या होता है का भाव था। श्रीमती मुखर्जी ने जार से हाय झटका, बोली-"व्हाट आर यू डूइग मिस्टर त्रिपाठी। डाट य मो हाउ बिहब । यह क्या तरीका है ? आराम से चलिए।' श्री त्रिपाठी की बगिया उजड़ गई । आमा मुखर्जी दुर्गा माता के रूप में दिखाई दने लगी। त्रिपाठी ने बगलें भाकी, सॉरी कहा और सर मका कर चलने लगे। उह अपने को समझती क्या है ? दम क्लब जाती है, माडन वनती है। हाय पकड लिया तो तूफान उठा लिया। और वो तो हमने सोचा कि इमरा ।

89 दिल बहला दें, पति टूर पर रहता है, वरना यहा कोन पास डालता है। हमारी भी इज्जत है । सोचती होगी गुस्सा दिखाकर ब्लैक मेल कर लेगी। मरे जब ऐसी-वैसी बात नही थी तो रेस्तरा मे क्या करने आई थी, घर आने को क्यो कहा था? खूब समझता हूँ इन लोगो को। ऐसी औरतो की नजर तो मरदो के पर्स पर रहती है। साफ-माफ बच गया मैं । शुक्रिया भगवान तेरा लाख-लास शुक्रिया। और उस दिन कब से पहली बार घर जल्दी पहुचकर श्री निपाठी ने अपने 'सुपुत्र' सुनील को खूब खबर ली । पेट भर खाना खाया, जी भर पत्नी को डाटा।

आराम में राम छिपा है कभी आप आराम से मुह ढवर पडे हैं? क्या आपने आराम के ऐसे क्षणो मे मिलने वाले सुख का अनुभव क्यिा है? क्या आपने आराम के कारण मिलने वाले ब्रह्मान द सहोदर का आनद उठाया है ? यदि नही तो इस लेख को पढने के बाद, तुरत आराम से मुह ढक्कर पड जाएगा, देखिएगा कसा आध्यात्मिक आनद मिलता है। न पली का मोह है, न बच्चो को माया है, न बास का क्रोध है और न बक बैलेंस का अहकार है । व्यक्ति का मोह और अहकार तो तभी जागता है जब उसकी आख और उसके कान खुले रहते हैं । परायी चूपडी दीसती है तो जीभ जलेबी बन जाती है । अपने महल के सामने खडी झोपडी को देखकर वीरो की छाती चौडी हो जाती है और दिमाग सकुचित । मस्तक अहकार मे आसमान पर थूकने लगता है । यह दीगर बात है कि उस थूक को अपने मुह से स्वय ही साफ करना पडता है। कान खुले हो तो पत्नी और बच्चा की फरमाईशें क्रोध जगाती हैं, बास को डाट क्रोध की ऐसी प्रसव पीडा को जन्म देती है, जिसम पीडा तो होती है परतु प्रसव नहीं होता। अनादि काल से हमारे ऋषि मुनि कहते या रहे हैं कि जीव काम, क्रोध, मोह अहकार मे फ्सा हुआ, इस सारा संसार मे भटकता रहता है । उसे ईश्वर नही मिलता है । जीव भटके नही इसलिए हमारे ऋषि मुनि भटकते रहें। कभी गुफा के अदर भटके और कभी वट वृक्ष के नीचे । भटकने के बाद जब आराम से बैठे तो उन्हें राम मिल गया। तो हे सतोराम म ही आराम है । मुह ढककर आराम से सो जाइए, जीव तो क्या उसकी अम्मा तक नही भटकेगी। जो आरामद्रोही है, वह राम को सपने मे भी नही पा सकता । उसका जीव बह-टी की अखवार से लेकर देर रात आकाशवाणी के समाचारो तक निर तर भटक्ता रहता है । वह क्रोधित होता है पीडित होता है और - 91 विवशता मे हाथ-पैर पटक्ता है। आरामद्रोही सुवह का अखबार पढता है। निमम हत्याओ, चोरी-डकैती और भ्रष्टाचार के पनपते राक्षस को देखकर उसका खून खौलने लगता है। वह अपने आपको बौना महसूसने लगता है। वह राम को पुकारता है, परतु राम कहा ! राम ता आराम भक्त सपनो में विचरण कर रहे हैं। भाराम-भक्त दोपहर को सुबह मानकर आराम से उठता है । सरदी हो तो रजाई मे दुबका रहता है, और गरमी हो तो कूलर की ठडी हवा का यान द उठाता है। बरसात में रिमझिम का आनन्द उठाता है । परोंठो का पेट भर दोपहरी नाश्ता करता है और भोजन की प्रतीक्षा मे मुह ढककर आराम की शरण में चला जाता है। सुबह की अखबार न आकाशवाणी के समाचार । कहा है हत्या, चोरी-डकैती और भ्रष्टाचार का राक्षस | आराम- भक्त ने राम का पुकारा नहीं पर तु माराम मे छिपी राम शक्ति ने उसके सार कप्टो का निद्रा के बाण से सहार कर दिया। जो आराम करता है उसे राम मिलता है और आराम ही करता है वह सासारिख, तुच्छ माया मोह के पीछे भटकता रहता है वह दो चार और चार का आठ करने के लिए नियानवे के फेर मे पड़ा रहता है। उसे राम नहीं मिलते हैं, नक्ष्मी मिलती हैं । लक्ष्मी जो स्वय राम के श्रीचरणाम पडी रहती है । अत पूजीपति ऋपियो का कथन है कि जीव को आराम की शरण में उस राम का ध्यान करना चाहिए जिसके चरणो मे लक्ष्मी पड़ी है। उसे लक्ष्मी प्राप्त करने की इच्छा म भटकना नहीं चाहिए, अपने आराम मै बाधा नही पहुचानी चाहिए। तो, हे पाठको | आराम की महिमा महान है । जिसे यह नहीं मिलता हैं वह भटकता रहता है और जिसे मिल जाता है, वह भवसागर तक पार 1 आराम तो देवता है जिसको पूजने से सुख चन की वर्षा होती है। राम की असीम अनुकम्पा होती है। आराम-भक्त को न राशन की चिंता व्याप्ती है, न प्रमोशन का दुख सलता है, राम की कृपा से उसके सारे दुख म्वन दूर होते हैं। पर तु आरामद्रोही को न दिन मे चन है न रात को आराम है । वह अपने मुख चन का दुश्मन तो होता ही है दूसरो के सुख- चन को भी छीनता है। - करजाता 92 हे पाठको। आपको आराम पर श्रद्धा हो अत में दो सत्यकथाए आपके समक्ष कहता हू । इस कथा को कहने-सुनने से आराम देवता के प्रति मन मे श्रद्धा का भाव जागता है और सारे दुख कष्ट दूर होते हैं । मन बार वार आराम की चाह करने लगता है । बैठे बठे आखें मुदने लगती हैं और मन पलग पर लेटने का सुख पाना चाहता है। ऐसे म मन को एकाग्रचित्त रखकर यह कथा सुनिए। सावधान सिंह नामक जीव अत्यधिक दुखपूवक अपना जीवन यतीत करता था। सावधानिया के कारण उसका जीवन हर समय सावधान की मुद्रा म दिखाई देता था। उसकी इच्छा थी कि उसके पास अच्छा मकान हो, एअरकडीशड कार हो और सुदर पत्नी हो। वह नगर मे निर्मित कची-ऊची इमारतो को देख देखकर इच्छा के दुख से पीडित होता था। वह निर तर काम मे डूबा रहता है ऊंचा उठने के लिए कडा श्रम करता रहता । वह फूक फूक कर कदम रखता परतु उसका जीवन जल रहा था। एक दिवस की बात है, सावधानसिंह को एक वडा सरकारी ठेका मिलने की आशा पधी, परतु इस सुखद आशा मे एक माराम भक्त अफसर -विधामकुमार वाघा बन रहा था। विश्राम कुमार हर समय आराम की सुखदायक मुद्रा म रहता, अत कार्यालय सम्बधी काय तुच्छ काय उसकी दृष्टि के प्यासे रहते । सावधान सिंह को लगा कि ऐस मे चिडिया खेत चरा सकती हैं और ठेका कोई और घुरा सकता है। खेत को चिडियो से बचाने के लिए अफ्सर रूपी श्रीराम की अचना-पूजा आवश्यक थी । अत सावधान सिंह बडी सावधानी से विश्राम कुमार के घर जा पहुंचे। साहब आराम पर रहे थे। सावधान सिंह ने नौकर से कहा, "साहब को जगा दोन।" सुनते ही नौकर ये चेहरे पर तीसरे विश्व-युद्ध का आतक छा गया बोला, 'न बाबा मुझे मरना है क्या?" "मुझे बहुत आवश्यक काम है प्लीज जगा दो।" सावधानसिंह गिह- गिहाया। 'माहब के याराम मे जरूरी दुछ नहीं है। नोरर वडबहाया। मावधान सिंह स्वर में मासन भाव साया और बोला, "तुम समभठ 93 क्या नहीं हो । साहब सोये रहे तो मेरा भाग्य भी सो जाएगा, जाग गये तो सब कुछ मिल जाएगा।" यह सुनते ही नौकर मुस्कराया, "जाग गये तो सब कुछ जा भी सकता है। खैर, मुझे क्या मिलेगा अक्लमदजी।" सावधान सिंह को इशारा काफी था, उसने दोहरे नोट नौकर को दिखा दिए। नोट और वा भी हरे नोट, भाई के द्वारा भाई के लिए भाई की हत्या तक करवा सकते हैं, यहा तो केवल जगाने का अपराध करना था। नौकर ने ऐसे समय मे विश्राम कुमार को जगा दिया जब वे घोर विश्राम की मुद्रा मे थे। धरती कापने लगी, आकाश थरथरान लगा और घर मे प्रलय का दश्य उपस्थित हो गया। सावधान सिंह को उसका राम नही मिला और नौकर को हरे नोट नहीं मिले, वह पिटा अलग। अब मैं वह कथा बहता हू कि आराम मे राम कैसे मिलता है। भ्रष्टनगर में एक जीव रहता था। उसका एकमात्र लक्ष्य था, आराम भरा जीवन व्यतीत करना । इम महत्वपूण देव दुलभ आरामदायक जीवन को प्राप्त करने के लिए उसने चोरी, डकैती, हत्या जैसा कठोर तप किया और अपने पद का लाभ उठाते हुए उसन भ्रष्टाचार को पनपने का पूर्ण अवसर प्रदान किया। पुलिस विभाग में कायरत ये समाजसेवी दिनो दिन फलने फूलने लगे, जो जालिम जमाने की निगाहो मे खटकता था। जमाना उसके लिए नरक के द्वार खोलने को उत्सुक था। पर तु वह आराम प्रेमी जीव अब चौबीस घटो मुह ढक कर पड़ा रहता । अपनी कठिन तपस्या से उसने इतना पुण्य-धन एकत्रित कर लिया था कि अब उसे अगुलिया तक हिलाने की आवश्यकता नही पडती थी। माराम से लगाव होने के कारण उसने अपने छोटे बेटे का नाम 'आराम रख छोडा था। उस अपने बेटे से बहुत लगाव और आशाए यो। जहा अ य बेटे पिता की सपत्ति मे निरतर वद्धि की चिंता में व्यस्त रहते बहा छोटा पुत्र आराम पिता के साथ सुख चैन को बासुरी बजाता, माराम से मुह ढककर पडारहता।

94 उसे एप दिन उस आरामप्रेमी का अत समय पहुंचा। उस समय उसके पास कोई नहीं था और यमदूत उसके पास थे। उसने छोट पुत्र को तिम पुकार लगाई-आराम ! और धमवार देखिए राम आ गय, अपने साथ धकुछ ले गये। उस पापी का माराम शब्द ने उद्धार कर दिया। देखी आपने बाराम पशब्द की महिमा । जो Tद भवसागर पार कर दे, जम-जम के पाप काट दे, वह कितना महान है। आइए आप भी चाहे जितना पाप कम करें, अन्त समय मे आराम कहने से आपके कष्ट दूर हो जाएगे । आप मेरे साथ इस महान शब्द के आगे नतमस्तक हो और तीन बार बोले-आराम देवता की जय ।

अध्यापक एक आर्ट फिल्म ईश्वर आदमी को गधा चाहे बना दे पर प्राध्यापक न बनाए । जिन्दगी के सारे सुनहरे अवसर समाप्त हो जाते हैं। अध्यापक एक ऐसा शरीर हो जाता है जिसके दिला होता है पर वह प्यार नही कर सकता । या कहा जा सकता है कि वही एक ऐसी फिल्म है जिसमे मार घाड, नाच फलाग, इडली उडलू कुछ नहीं है । नीरस । एकदम कलात्मक फिल्मो की तरह । जब उम्र उछल-कूद की थी, फिल्मी ज्ञान प्राप्त कर बुद्ध बनने की थी, तब हम कोस की किताबो मे सर मारकर करियर बनाने के चक्कर में थे। करियर बना तो सीधे बुढापे मे आ गए। हाथ कगन को आरसी क्या, अनपढ को फिल्म क्या? दखिए। पलश-बैंक करियर बना तो आर्थिक दशा मे अभूतपूर्व सुधार आया। घर वालो को सारी तखाह देकर भी कुछ काला धन बच जाता था। पैसे बचे तो फिल्मो ने पुकारा और हम चले गए। फिल्मी सभ्यता का रंग चढने लगा और दिल गाना गाकर किसी से प्यार करने के लिए बल्लियो उछलने लगा। अब तलाश थी एक प्रेमिका की जिसे फिल्मो मे हिरोइन कहते हैं। तलाश मे कहा-कहा नही भटका | वस, गाडी, सडक, पहाडियों, गुफाओ, भीड भाड, यहा-वहा । कभी पुकारता-तू छुपी है पहा? कभी गुनगुनाता -अब तो आजा। परतु सयोग नहीं हुआ। न क्सिीसे साईकिल टकरावे ? और न कोई हमसे। फिल्मो ने ज्ञान दिया था कि हिरोइन छेडा-छाडी से भी मिल सकती है। परतु वहा भी करियर आडे आ गया। बस मे आगे की सीट पर बैठी हिरोइन को चिोटी काटी और मुस्करा कर देखा परन्तु उस नासमझ ने 96 इसे प्यार न समझा। उसके मुह से घाराप्रवाह गालिया फूट पडी-- बदत्तमीज, स्टूपिड, बास्टर्ड । और हमने सर झुका लिया । पीछे से आवाज आई-क्या बात हो गई सर | अगले स्टाप पर उतर कर सर का दो मील पैदल जाना पड़ा। हीरो फिल्मो में पैक्ट भी बदलते हैं। हमारे फिल्मी ज्ञान ने हमे प्रेरित किया। एक दूकान मे पैकेट बदला, पर तु हमे हीरो न समझकर घोर समझा गया। हम सफाई दे रहे थे और गदगी पसद सफाई नहीं ले रहे थे। हमे पीटा भी गया। (देखिए समाज का अत्याचार ।) अगले दिन एक नालायक विद्यार्थी व्यग्य म मुस्कराता हुआ वोला- क्ल बाजार मे क्या हुआ था सर सारे साल उस नालायक को लायक करना पडा। परचो के नम्बर बढाए और अध्यापक की इज्जत बढाई । कान पकड लिया कि अब दिल को बल्लियों क्या मिली मीटर भी नही उछालेंगे। इस वार मा बाप ने हमारी शादी कर एक हिरोइन प्रदान की। दिल फिर उछला प्रेरित हुआ। पत्नी की बाहो मे वाहें डाल वागो मे घूमे, पत्नी बेसुरी थी इसलिए गाना नहीं गा पाए । बाजार मे प्यार से गोलगप्पे ही खाकर गुजारा कर । लिया। परतु दुर्भाग्य ने यहा भी पीछा नहीं छोहा । अगले दिन लहरियो सुम-पुस करती मेरो तरफ तुच्छ दृष्टि से देखती कह रही थी-सर बाजार यै गालगप्पे पाते हैं, किसी के माय। एक विद्यार्थी कात-स्सर मे बोला-मैंने इहें याहा म बाहें डाल घूमते देगा, साला हम संक्चर पिलाता है और सुद ? मैं भी पल पियो को लेकर घूमूगा। दस्खता हूँ क्या करता है? अब योई इज्जत वाता हो तो उसी धक्न नौकरी छोड़ दे, परन्तु हम याम अटर हुए हैं। जिदगी आर्ट फिल्म हो गई। पर की छत प नीचे ही समातर फिल्मों माप्रेम परते हैं। हो रजत यपाने के लिए फिल्म मी छोर दी है । न रहेगा योग पोरन विद्यापी हमारी मुरी बजाएग ।

बाबा। हिन्दी के नाम पर कुछ में धोसे मै बहुत दिन रह लिया हू, परतु अब नही रहूगा। पहले मैं हिंदी को बहुत तुच्छ समझता था । इस लेने देने के जमाने में अगर किसी वस्तु से कोई लाभ न हो वह तुच्छ ही होती है । हिदी से कोई लाभ नहीं दिखाई देता था। परन्तु विश्व-हिदी सम्मेलन मे जाकर मेरी आखें तो क्या दिमाग तक खुल गया है। पहली बार महसूस हुआ कि पत्नी जो मुझे वोडम कहती है, सही महती है। उसका कहना है कि इस प्रजातन मे लोग बाल मे से तेल निकाल लेते हैं तुम हिदी के प्राध्यापक होकर कुछ नही निकाल पाते हो । इस सम्मेलन में पता चला कि हिदी की दुम पकडकर मत्रीपद तक को प्राप्त किया जा सकता है । हिदी सूरीनाम, फिजी, मारी- रास, इगलड, रूस, जमनी और न जाने कहा-कहा की यात्रा करा सकती है, टी० ए०, डी० ए० बनवा सकती है। विश्व हिन्दी सम्मेलन आरम्भ होने से पहले मैं उनसे मिला तो उहे बहुत चितत पाया। मैं उनकी चिता और हिंदी के प्रति उनके अनय प्रेम से अभिभूत हा गया। कितना समर्पित है यह व्यक्ति हिन्दी के प्रति ! देखकर लगता था जसे या तो इसका बाप मर गया है या इसे लड़की की शादी करनी है। हमारे यहा लडकी की शादी करना बाप के मरने के दुख जैसा ही है। बाप के मरन से सर से साया उठता है, लडकी शादी करने में घर का सब कुछ उठ जाता है। मैंने कहा, "क्या बात है आप बहुत वितत हैं, क्या खाने पीने ठहरने मादि की व्यवस्था ठीक नही हो पायी है ?" 'अरे नहीं बाबा, इसकी चिंता किसे है ?" वह ऐसी विनमता से वोलते हैं जैसे बड़े बेचारे से हों। "तो क्या हिदी के रास्ते मे अग्नेजी आ गई है हमारी बला से उर्दू फारसी भी आए, हिदी जाए वही ?"

98 - समझे । थाप कुछ समझते हैं नही हमे कहे इ परेशान करते हैं । आप हमारी चिता नहीं समझ पायेंगे।" "क्या पी०एम० ने आने से मना कर दिया है " "अरे वो तो आ रहे हैं । वही तो चिन्ता भी है। दो वरस हमने जान लगा दी । अब कल कोई हमसे मच छीनने की तैयारी करे तो हमे चिता नही होगी ? हमे उनसे दूर बैठाने का षड्यत्र करे तो हम चिंता न करें। यह भी तो हमारी चिता है कि कल पी०एम० आए और स्टेडियम न भरा तो इत्ता बडा स्टेडियम ले लिया किराये पर, लोग न आये तो? (हि दी को सयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाना है) कुछ लोगो का इतजाम तो किया है । ये सब तो हो जायेगा पर किसी ने हमसे मच छीन लिया तो ? हम इननी चिताओ म घिरे हैं और लोग पूछते हैं प्रतिनिधियो के भोजन की व्यवस्था का क्या हुआ सबका खाने को पडी है । (किसी को भोजन और किसी को पैसा) वो इतजाम भी हो जायेगा, पहले पी० एम० तो प्रसन हा जाए । नाराज हो गयी तो हमारा टिक्ट तो गया न।" मैं उनकी पीडा और पिता को समझ गया था। वह हिदी की सीढी पर चढकर पार्टी का टिकट लेना चाहते थे। जिहे टिक्ट मिल चुवा था, यह मत्री पद चाहते थे। क्तिनी बार मनिमडल में परिवर्तन माए पर ससुर उनका नम्बरका न आवा। इहोंने क्या कोई जुलम किए हैं। इस बार खुश हो जाये तो शायद बतवा बन जाए । पर खुस करने की खातिर सब कुछ अपने हाय में करना होगा। कइसल जानेगी कि इत्ता बड़ा सम्मेलन हमारे किए से हो रहा है। ये ही सबसे बड़ी चिता हब। कइसल होइल यह सब । म कइसे पकहा जाब । कइसल? वइसल? यही सोचकर उहोंने उदघाटन से पूर्व माइक एक 'अपने' को पकडा दिया था। उनके हाथ म माइक था और वह हिनी ये प्रति अपनी चिंता प्रक्ट कर रहे थे। लग रहा था जैस हिदी के चुनाव होने वाले हैं, अत वह नारे पर नारे लगा रहे थे-जय हि दी जय नागरी । जैसे ही पी०एम० जी पहचा, हिंदी गायब हो गयी। उनके नारों ने करवट बदल ली।हिदी के स्थान पर पी०एम० जी आ गए थे।

99 एर के बाद एक भारतीय हिदी सेवियो ने अपने भाषणों म जिस प्रकार पी०एम० जी को हिदीमय कर दिया उससे यही लग रहा था कि वह विश्व हिदी नहीं, पो०एम० सम्मेलन हो रहा है। पी०एम० ने उद्घाटन किया और चले गए, लगा मच से हिदी चली गई। आयोजको को लगा कि उद्घाटन के साथ समापन समारोह भी हो गया। सबने तसल्ली से हाय झाडे, स्टेडियम मे जुटी भीड को गव से देखा और हैं हैं हैं करते पी०एम० के पीछे हो लिए। सवाल था उनकी दया दष्टि का। सव की चिता यही थी कि उनकी नजर उन पर पड़ती है कि नहीं। बेचारे आरम्भ से अत तक चिता मे रहे। सम्मलन में सब कुछ था परन्तु हि दी गायब थी। एक सज्जा एक विदेशी विद्वान को बगल मे लिए घूम रहे थे, बार- बार उनके देश की प्रशसा के गीत गा रह थे। गोरी चमडी के मुह से हिन्दी सुनकर वह गदगद हुए जा रहे थे। कुछ सज्जन इस खोज मे थे कि देखें अगला सम्मेलन कहा होता है, वहा के प्रतिनिधि के ही चरण ढूढे जाए। निष्कर्ष यह कि वहा लगभग हरेक के हाथ म कटोरा था, उसमे हिदी के नाम पर कुछ भी मिल जाए।

राधेलालजी का कलयुग राधेलालजी पान के बहुत शौकीन हैं। पान वाले तिवारीजी उहें देखते ही चादनी सादी का जोडा लगाने लगते हैं। राधेलालजी कभी पान लगान के लिए कहते नहीं हैं, बस, आ कर तिवारी का हाल चाल पूछते हैं और तिवारीजी उनकी पसद का पान उनके हाथ मे पक्डा देते हैं। राधेलालजी मेरे मित्र हैं और मित्रता म अक्सर पान खिला देते हैं । खाना खाने के बाद जुगाली करने की आदत उही की देन है । उस दिन भी खाना खाने के बाद मैं जुगाली करने के इरादे से तिवारीजी की दुकान पर खडा था। देखा, राधेलालजी मानिनी नायिका के समान पान की दुकान से मुह फेरे चले जा रहे हैं। यह मेरे लिए आश्चय का विषय था। मैंने राधेलालजी को पुकारा, 'राधेलालजी, राधेलालजी ! क्या हाल- चाल है?" राधेलालजी रुके और मेरी ओर देखते हुए वही खडे हो गए, बोले, 'ठीक हू आप सुनाइए। मुझे लगा वह पान की दुकान तक नही आएगे, मुझे ही उन तक जाना पडेगा। मैंने हाथ मिलाते हुए कहा, 'आइए, पान हो जाए।' मायूम आवाज में राधेलालजी बोले, 'नही भइया, अपना तो आजकल कलयुग चल रहा है । चाय भी बिना दूध शक्कर की चल रही है।' 'आपका क्लयुग | कलयुग तो सारी दुनिया मे छाया हुआ है। और आज का नहीं, हमारे पैदा होने से पहले अवतरित हो चुका है। ये एकाएक दा दिन मे आपके यहां आपका कलयुग' कहा से आ गया ?' मैंने मुस्करात मेरे यहा क्या भइया, इन दिनो तो हर बाबू के यहा कलयुग चल रहा है। वधारा निरीह वावू क्लयुग की मार से पीडित सतयुग की प्रतीक्षाम पभी बच्चों को डाटता है और कभी चिडचिही पली से हाट खाता है।'

101 सतयुग और कलयुग की बात करते हुए राधेलालजी ब्रह्मज्ञानी लग रहे थे । मैंने प्रणाम करते हुए कहा, 'हे परम ज्ञानी मैंने रामचरितमानस में तुलसीदास द्वारा लिखा कलयुग का वणन पढा है। दुनिया में कलयुग के प्रभाव को दिन प्रतिदिन देखता हू । पर एक बाबू के जीवन मे कलयुग के बाद सतयुग और सतयुग के बाद कलयुग कसे आता है-यह मेरी अल्प- बुद्धि से बाहर है । अत आप अद्भुत व्याख्या द्वारा मुझे समझाइए कि यह कसे होता है और मेरे अज्ञान को दूर करें।' राघेलालजी ब्रह्ममुद्रा मे खडे हो गए। परतु मुझे लगा कि उनकी आत्मा भटक रही है। मैंने उन्हें चादनी-सादी का जोडा ला कर दिया, तो वह भ्रष्टाचार के समान खिल उठे और खिलते हुए बोले, 'भइया ऐसा है, एक महीने मे बाबू को सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग-सभी के दर्शन हो जाते हैं। पूछो, कसे? तो वो ऐसे कि जिम दिन वेतन मिलता है, उस दिन बाबू का मन सात्विक भावोसे भर उठता है। न किसी से कोई द्वेष नघृणा । न कोई दुख,न पत्नी से लडना-झगडना औरनबच्चो को पीटना। बाबू मे सत्यवादी हरिश्चन्द्र की आत्मा आ जाती है । इन दिनो दुकानदार अगर पैसे लौटाते समय गलती से अधिक दे दे तो बाबू उसे सघ यवाद लौटा देता है । स्वप्न मै भी मित्रो को पार्टी देने का वायदा बाबू इही दिनो निभाता है। बाबू-पत्नी वेतन मे से दस रुपये निकाल कर प्रसाद चढाती है। परन्तु यह सतयुग अधिक दिन नहीं रहता। 'सतयुग के बाद आता है श्रेता युग । मिला हुआ वेतन ईमानदारी-सा क्षीण होने लगता है। परम आसुरी शक्तिया सिर उठाने लगती हैं । ये आसुरी शक्तिया कभी मेहमानों के रूप में आती हैं, तो कभी तीज-त्योहारा के रूप मे । चाबू पैसे को दातो से पकड लेता है। घर मे युद्ध का वातावरण तैयार होने लगता है। वावू-पत्नी अपने-अपने हथियारों से सजने लगत है। ऐसे में गृह-युद्ध के लघु सस्करण सेले जाते हैं । अनेक बार कद मूल से गुजारा करना पड़ता है। 'वेता के बाद द्वापर आता है। बाबू दुविधाग्रस्त हो जाता है। यह सरोदू या न खरीदू-की चिन्ता उसे निर तर सताती है। पति पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-भाई म महाभारत या जेवी ससरण लढा जाता है। इस 102 महाभारत का आखो देखा हाल, पडोस का सजय मोहल्ले के धृतराष्ट्रो को नमक मिर्च के साथ सुाता है। आमुरी शक्तिया अक्सर गिर उठाती 'इसके बाद आता है क्लयुग- -बाबू जीवन के भ्रष्टाचार से भी अधिक काला युग। आसुरी शक्तिया अपना आधिपत्य जमा लेती है। बाबू सब्जी खरीदते समय बैगन पुरा कर थैले म डाल लेता है। दुकानदार से गलती मे मिले दस पैसे को वह चुपके से जेब में डाल लेता है और चेहरे पर बेईमानी के भाव को माने तक नही देता । पली द्वारा छिपाए काले धन वो खोज मे बाबू अपने ही घर मे चोरी करता है। बच्चे पिटते ह, पत्नी चिडचिडाती है। विश्व युद्ध के बादल मडराने लगत ह । घर मैं अनेक विस्फोट होते हैं । जेब मे सिगरेट होते हुए भी वाव दोस्तो से सफेद झूठ बोलता है। इस समय न कोई मित्र होता है, न कोई पत्नी और न कोई भाई वधु होता-क्योंकि जेब म पैसा नहीं होता है । कलयुग का समय दस से पद्रह दिन का होता । भूखे पेट भजन करता हुआ बाबू सतयुग के आने की बेकरारी मे प्रतीक्षा करता है।' इस अद्भुत व्याख्या को सुन कर मैंने राधेलालजी के चरण थाम लिए और कहा, 'प्रमु आपन मुझे अज्ञान से ज्ञान की आर ला दिया है। कितना अनानी था मैं कि कलयुग को भोग रहा था और जान नहीं रहा था कि आजक क्लयुग चल रहा है।' 'क्या तुम्हे पता नही था कि आजकल तुम्हारा कलयुग चल रहा है राधेलाल जी आश्चय से बोले । 'नहा-~-फ्लयुग ज्ञानी । वरना मैं पचाम का नोट तुडवा कर पान खान यहा आता 'इम क्लयुग मे तुम्हार पाम पचास रुपए हैं 'उनकी आखो मे सतयुग की चमक थी। हा पर वो गम के लिए!' मैं हकलाया। पर उहोने मरी बात नहीं सुनी और बोल, 'मुझे तीस रुपए देना, सतयुग म लौटा दूगा। उहोंने मेरी जेबें टटोनी और तीस रुपए लेकर तेजी से चल दिए। राधेलालजी 7 मुझे क्लयुग के साक्षात दर्शन करवा दिए थे। पत्नी -

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सावधान ! क्रिकेट आ रहा है सावधान क्रिकेटद्रोहियों इस बार भारत में क्रिकेट महामारी के रूप मे फलने वाला है। पहले तो एक ही विदेश टीम क्रिकेट-आक्रमण करती, थी, इस बार रिलायस कप की मोट लेकर सात विदेशी विकेट महारथी आक्रमण करने वाले है । सात महारथियो के आक्रमण से, चक्रव्यूह मे घुसा अभिम यु भी अपने आपको नहीं बचा पाया था, आप तो किसी भी खेत की मूली नहीं हैं। इसलिए कहता ह मावधान हो जाओ। क्रिकेट ज्वर की दवा हवीम लुकमान के पास भी नहीं थी । आपको अपनी रक्षा स्वय करनी है। सावधानी हटी कि दुघटना घटी। यदि आपको किसी सरकारी दफ्तर मेकाम है तो टालिए मत, अभी कर डालिए पानी का बिल जमा कराना है, टेलिफोन का बिल देना है, मकान के लिए ऋण लेना है, पेंशन का मामला है या जम प्रमाणपत्र बनाना है, बिना देर पिए कर डालिए। विकेट की चिडिया खेत चुगने वाली है। एक महीने तक मदान साफ दिखाई दगा। दफ्तर मे कही कानों में ट्राजिस्टर लगे नजर आयेंगे और वही टी. वो० सेट। आप पूछेगे, "मैया, मेरे हाउसिंग लोन का क्या हुआ। उत्तर मिलेगा, "चौदह पर दो हो गये!" अय सुलझाते रहिए गुत्पी चौदह पर दो की। आपका मनहूस या भाग्यशाली होना, क्रिकेट पर निमर होने वाला है। विट के इस मौसम म बिसी र घर जाना हो तो सावधानी से जाइएगा। परे घर में घुसते ही मगर गावसकर या वेंगसरवर ने धोका ध्यया सगा दिया, या कपिलदेव न विरट पटवा दी तो आप भाग्यशाली यहलायेंगे। मारका स्वागत हागा ।आपमे पाप-पानी को पार जागा अपितु चाय के साय विस्मिट भी में घुसते ही कोई भारतीय खिलाहोर 'नही पर 4 नो भाप की रफ्तार की तरह बढने वाले हैं। जितना आराम करना है, वरलो। ले जायेगी।" आप देश की महगाई की चर्चा करेंगे। वहा विकेटो के पतन तो अभी मे बतन धोने, कपडे धोने, बतन माजने और खाना बनाने का अभ्यास थारम्भ कर दो, नही तो उपवास के दिन आने वाले हैं। इधर आपके पेट मे चहे कदेंगे, दौड़ेंगे। पत्नी उनको छोड पाएगी? यदि आपके पाम काला सफेद पुराना टी०वी० है तो दस हजार का जुगाड कर लो। पास नहीं है तो उधार ले लो। वरना अपने बच्चो के सामने खूसट बाप और पत्नी की दष्टि में कजूम पति सिद्ध होने वाले हो। लिए सोतन का प्रवेश हाने वाला है जिसका नाम क्रिकेट है। आपके पति एक महीने के लिए काम से जाने वाले हैं। आपके यहा क्रिकेट की धमा 105 है। क्रिकेटप्रेमी परिवार आपको ऐसे देखेगा जैसे कच्चा चबा जायेगा। बिन बुलाये मेहमान-सा स्वागत होगा जिससे अपमान ही अच्छा होता है। पाय- पानी की दूर बठने वोजगह मिल जाये तो बहुत है। इसलिए किसी के घर मे घुसने से पहले अच्छा होगा कि मैच में भारत की स्थिति जानकर ही घुसे। क्रिकेट के बारे मे थोडा सामाय ज्ञान बढ़ा लीजिए। आप अतर्राष्ट्रीय राजनीति मे कितने ही बड़े ज्ञाता हो, या गणित के वेत्ता हो पर यदि आपको क्रिकेट को राजनीति के बारे मे कुछ पता नहीं है या क्रिकेट के आकहो स आप अनजान हैं तो आप ज्ञानी होते हुए भी अज्ञानी हैं। किसी भी पार्टी, शादी-ब्याह मे आप अकेले पड जायगे और खोई गाय के समान बोराये स घूमते रहेंगे। आपको पास डालने वाला कोई नही मिलेगा। आप कहेंगे, "इराक-ईरान युद्ध का क्या होगा?" जवाब मिलेगा, "इराक ईरान को टीम भी आई है क्या खर कोई भी लडे कप तो वेस्ट इडोज ही । का स्वर सुनाई देगा। है पति परमेश्वरी, सावधान ! यदि तुम्हारी पत्नी क्रिकेट प्रेमिका है . हे पत्नियो सावधान यदि आपके पति क्रिकटप्रेमी हैं तो तुम्हारा दिन रात का सुख चन गायब होने वाला है। तुम्हारे घर में एक महीने के चौकडी मचने वाली है। घर का बजट ब्लड प्रेशर की तरह बहने वाला है। घर पे गिनास विकेटो की तरह गिरनेवाले हैं। दूध-चाय चीनी रनो 106 -- - पति से जितनी प्रेम की पोग बढानी है, बढा लो। वरना अब पति त्रिवेट की पीग बढाने वाले हैं। है माता पिताओ सावधान ! बच्चो को जितना पढाना है, पढा लो वरना बच्चो की कॉपी किताबो मे गोद लगने वाली है । आप पहाहापूर्छगे, वो स्कोर बतायेंगे। आप अलाउद्दीन के बारे में पूछेगे, वो अजहरुद्दीन के बारे में बतायेंगे। हे अध्यापको! तुम भी अपना कोस जल्दी कराओ वरना तुम्हारी कक्षाओ मे छात्रो के स्थान पर कौए बोलेंगे। अपने सुदर विद्यार्थियो का सौंदय बार-बार निहार लो वरना कॉलेज मे सूखा पडने वाला है। हे प्रेमियो, यदि आपकी प्रेमिका विकेटप्रेमिका भी है तो सावधान एक महीने के लिए वो आपके पहलू से गायब होने वाली है। उमे वाधार रखना है तो स्वयं भी क्रिकेट के खूटे से वघे रहो। अपने बाल रवि शास्त्री, गैटिंग या इमरान के स्टाइल मे पटवा लो। ध्यान रखना जिस भी स्टाइल मे कटवाओ वो प्रेमिका का चहेता खिलाडी हो वरना पासा उल्टा पड सकता है। ह पटेहाल आशिको, यदि लडकी हाथ में नहीं आ रही है तो यह सुनहरा अवसर है। यदि वो क्रिकेट आशिक हो तो बन गया काम। आसमान के तारे साड लाने के बजाय क्रिकेट मैच की टिकट ले आओ। हे नौकरीशुदा निकेटप्रेमियो, चाह शरीर कितना भी बीमार पडा छुट्टी मत लेना। छुट्टिया तो तुम्ह विकेट का विश्वकप देखने के लिए बधा- कर रखती हैं। जिसने इस विश्व कप का एक भी मैच छोडा उसे क्या स्वग म स्थान मिल पायेगा। परिवार नियोजन का यह नारा अब वेकार लगने लगेगा-छोटा परिवार सुखी परिवार । इन दिनो नारा बदल जायेगा-रिकेट परिवार सुखी परिवार ।क्तिना अच्छा लगता है, क्रिकेट खा रहे हैं, बिछा रहे हैं, पी रहे हैं मोढ रहे ह। इन दिनो तो देवता भी स्वग से भारतभूमि की ओर निहारेंगे। देवता को वो सुख कहा जो भारतवासियो को है। यही कारण है कि दवता भी मारतभूमि म जन्म लेने के लिए उत्सुक हो उठेगे। भष्टाचार, महगाई, अनैतिकता के कारण देवताओमा विश्वास उठ गया था। उसे श्रव त्रिवेट जमा देगा।

साहित्य का शेयर बाजार . वार्षिक समीक्षा आप शर्मा जी को नहीं जानते हैं । मैं जानता हू। हो सकता है, आपके आस पास कोई शर्माजी रहते हो, या आपके दफ्तर मे ही काम करते हो, क्याकि शर्मा नामक व्यक्ति कही भी पाया जा सकता है, परतु मैं जिन शर्माजी की बात कर रहा है ये 'वो' वाले शर्मा जी नहीं हैं। यह शर्मा जी टी० आर० शमा हैं । बैंक में काम करते हैं और मेरे अच्छे पडोसी मित्र हैं। पडोसी मित्र होने के बावजूद हम दोना, सीमाआ पर सेना जमा करने की नौटकी नही करते हैं। शर्मा जी का साहित्य से विशेष सबध नहीं है । साहित्य के नाम पर वह सुरेंद्र शर्मा, शैल चतुर्वेदी या अशोक चक्रधर को जानते हैं । वे मुझे भी नही जानते हैं। क्योकि मैं उन्हे कविता सुनाकर साता नहीं है । उन्होने मुझे कई बार नेक मलाह दी है कि में भी ऐसी कविताए लिखू । शमा जी का शेयर बाजार से बहुत गहरा सम्बध है। शमा जी के कारण शेयर बाजार से मेरा भी मधुर सम्बध स्थापित हो गया है । शेयर बाजार से प्रेम करना दोधारी तलवार की तरह है । अखबार का वह प ना जो पहले बेकार लगना था, आजकल महत्त्वपूण लगने लगा है। अब यह चिन्ता नहीं होती है कि पजाब यासोर या क्रिकेट का स्कोर क्या रहा। चिता यह रहती है कि यर चढा कि नही गर्माजी मिलते हैं तो मुझमे साहित्य का हाल चाल पूछते हैं और मैं शेयर बाजार का पूछता हूँ। शेयर बाजार और साहित्य में अत सम्बध स्थापित हो रहा है। कई बार सोचता हू तो लगता है कि साहित्य भी किमी शेयर बाजार से कम नहीं है। मैंने कई लेखको के भाव चढते गिरते देसे काफी पहले, जब मैं नवोदित व्यग्यकार पातो मैंने समीक्षा में शाति- 108 कारी परिवतन किया था। आज युवा व्यग्यवार होकर एक और काति कारी परिवतन प्रस्तुत कर रहा है। इस तरह की प्रांतिया करके ही मैं प्रगतिवादी साहित्यकार कहलाऊगा। अंत में समीक्षा या एक नया प्रति मान प्रस्तुत कर रहा है । जिससे मुझे भी प्रगतिशील आलाचक का गौरव प्राप्त हो। साहित्य बाजार के वप का आरम्भ उदासी भरा रहा, पिछले वष पड़े साहित्यिक छापों के कारण और प्रकाशको की उदासीनता के कारण सुम्ती रही। बजट मे वित्तमत्री द्वारा डाक की बढ़ी हुई कीमतो की घोषणा ने कई नई कपनियो की हालत सस्ता कर दी। टाइप के पर्चे और डाक-व्यय बनने से नये लेखको के प्रकाशन मे गिरावट आई साहित्यिक छापो मे कमी थाने से तथा वित्त मत्रालय प्रधानमत्री के हाथ मे होने से बाजार में उछाल की भविष्यवाणी की जा सकती है। पजाव के हालात के कारण पत्रकारों की चादी रही। अखबारी मसाले के लिए भटकना नहीं पडा। नित्य नई सनसनीखेज खबरों के कारण पत्र कारिता मे लाभ का अधिकृत सूचकाक 20 प्वाइट ऊपर चढ गया। इस बढत मे पजाब के अतिरिक्त श्रीलका, टी० एन० वी० और पाकिस्तान ने भी सहयोग दिया। इन सस्थाओ के कारण पब्लिक ने भी पत्रकारिता म रुचि दिखाई। इसके प्रभावस्वरूप अनेक पत्र पत्रिकाए बाजार मे आयी और उनको पब्लिक का अच्छा समथन प्राप्त हुआ। इस तुलना मे साहित्य की हालत खस्ता ही रही। कुछ पत्रिकाओ को तो पाक्षिक की जगह मासिक होना पड़ा। एक-आप साहित्यिक पत्रिका भी आई पर तु उसे विशिष्ट पब्लिक का ही समथन मिला। छोटी कपनियो द्वारा साहित्यिक पत्रिकाओ का प्रकाशन बहुत कम देखने को मिला। अभी भी बाजार सुधरने का सकेत नहीं है । वित्तीय सस्थाए इस बारे मे सुगबुगा भी नहीं रही हैं। आलोचना के क्षेत्र मे मदडियो की चादी रही। आलोचकों का न तो कोई नया इशू ही बाजार में आया और न ही पुराने तथा प्रस्थापित आलोचकों के बाजार भाव मे तेजी आई। कोई पुरानी पनी बोनस के रूप 109 नकिनी न लद्धक को मानने में बन रही। रेले पापा भार हो दीपाल्परहोमन मिल,जिनके बाजारभार इस वर्ष जार गई हो। किती न मानावक कामा नी इस वर्ष नही दिखाई दिया। कहानी और पास के क्षेत्र में जवस तेजडियो ने अVIभाष दिखाया। अनेर न मन्यान और कहानी-सार बागार पाये जिहें पनिक का बच्छामर्थन प्राप्त हुआ। इस क्षेत्र में पुरानी पोडी के सेखको को अधिक मा रही। 'जनेंद्र', पन्तलाल नाार, रमेशपद शाह' जैसे साहि कारों का बाजार भाव तो बडा ही, गरिराज किशोर गरेर कोहली', 'रानदमित्र और सजीव' को भाषिक आधार मिला । मुद्रा- रासस पत्रकारिता के क्षेत्र में काफी सपना रहे। कहानी के क्षेतमे 'मदुला गग', 'मजल मगठ', 'काशीनापतिह', 'धीरेद्र आस्माना, "रमेश गया', 'अजित कुमार', 'राजकुमार गौतम', 'बलराम' भादि ने अपो सकलन और कहानिया दो। पब्लिक का समथन सामान्य रहा। मच के समथन के कारण मचीय रचनाकारो के शेयर भावो मे सेगी हो रही। कभी होली, कभी गणत दिवस, कभी स्वत "ता दियरा और कही शादी-ब्याह के मौको पर सस्थाओ की मांग होने के कारण हा बाजार भाव बटन पर ही रहे। 'अ चक्रधर' मे 'अपना उत्सम पे दौरा दूरगान की रुचि के कारण इममे काफी तेजी आई। कुछ पुराो मधोमो के माव काफी नीचे आ गए हैं। उनमे से तो कुछ इस मागार मे रियायती दाग पर मिलने लगे हैं और कुछ का अता पता ही नहीं है पारद जोशी के भाग, मच और साहित्य पर काफी तेजी मे रहे। सेनानियो मे इमैं पापी गि दिखाई है। मच और साहित्य के अतिरिक्त ददला जैसी सरकारी और फिल्म जैसी गैर-सरकारी संस्थाओ ने भी दामे निशेष दिवाई है। इना विकास की दर बढ़ रही है। फिल्मी सस्याओ एव दूरदर्शी द्वारा पिसोपे कारण 'मगोहर माग जाशी की बुनियाद भी कापी सुदा रही। पिछले वर्ष मागार मे आए घरा इयूका पब्लिक वा गहरा राम प्राप्त हुआ। जिस होगा गमा उसस 70 गुना अधिर' समर्थन प्राप्त हुभा। इधर रामायण थे 110 आने से सभवत इस कपनी पर कुछ प्रभाव पड़े। कविना के क्षेत्र मे पूजी लगाने वालो का अभाव ही बना रहा। अनेक कवियो ने इस बार पूजी लगाने वालो का दरवाजा खटखटाया परतु इमे ने तो सस्थाओ का ही विशेष समथन मिला और न ही पब्लिक ने कोई रुचि दिखाई। वप के आरम्भ म तो हालात बहुत ही खराब रहे और अनेक नये कवि समयन के अभाव मे औंधे मुह गिरे रहे। कविता के क्षेत्र में मदडिया की चादी रही। पर्याप्त समथन न मिलने के कारण अनेक नये कवि कुम और हीन भावना की अथियो के शिकार हुए। उन्हें छोटी पत्रिकाओ का भी पर्याप्त समथन नही मिला। वप के मध्य मे ज्ञानपीठ जैसी मस्थाने कदम बढाया और उसके कविता के बाजार में आने से कुछ सुगबुगाहट हुई । विनोद दास के कविता सग्रह को ज्ञानपीठ का ममथन मिलने से सुधार हुआ। विनोद दास की माग अचानक बढ़ गई और अनेक छोटी बडी पत्रिकाओ ने उसकी माग की। साहित्य अकादमी, हि दी अकादमी के कारण गिरावट मे कमी बाई, और बाजार का अधिकृत शेयर सूचकार बढ़ गया। इस वष भोपाल द्वारा साहित्य मे विशेष रुचि न लेने के कारण मदी आई। अनेक नम सकलन, पुस्तकें खरीद के अभाव में प्रशासका के पास एई रहे। इम मदी का अधिक प्रभाव नये लेखको पर पडा। प्रकाशर बाजार से उतना पैसा नहीं उठा पाए, जितना उहोंने सोचा था। इस कारण अनक लेखको को मिलने वाली रायल्टी में कटौती हुई। कुछ प्रकाशको ने तो हानि दिखाकर रापल्टी को घोपणा ही नही की। इस कारण लेखको पर आर्थिक सतरा मडरा रहा है। भोपाल के बाद हिमाचल खरीद में रुचि दिखा रहा है। कनिया के पुछ निदेशक वहा के मुख्यमत्रो मे सम्बप जाडे हुए है, और उह आर्थिक लाभ भी हुआ है. परतु जनता म उनकी मास गिरी है। पुछ र पनियों म नये सपादक आने से उन पनिमाया वो मांग मद्धि हुई। 'राजेद्र अवस्यी' की इम क्षेत्र मे माग रही। 'डॉ. पमवीर भारती माठ व दे होने से और अधिक महत्वपूर हो 111 गए । पब्लिक मे इस शेयर की साग्व और वढी। अनेक पत्रिकामो मे छपी रिपोर्टों के अनुसार यह कम्पनी पाठको का पयाप्त लाभ ले रही है और इसे भविष्य मे पूरा समथन मिलने की सभावना है। इस कम्पनी ने कोई नया प्रोडक्ट बाजार नही दिया, परतु इसके पुराने प्रोडक्ट ही काफी लाभ दे रहे कुल मिलाकर पिछला वष मिश्रित रहा। आगामी वर्ष में भी पत्र- कारिता को सस्थाओ, पब्लिक एव तेजडियो द्वारा पर्याप्त समथन मिलने की सभावना है। नये इशू के प्रति जनता का विश्वास अभी जमा नहीं है। हा, कई पुरानी कम्पनिया अवश्य नये वष मे और अधिक सुदढ होगी। 'जनेंद्र जी' म ज्ञानपीठ इम वप अवश्य रुचि दिखाएगा। 'अज्ञेय' विदेशी कम्पनियो से मिलकर, बाजार मे अपनी माग बनाए रखेंगे। कुछ नये नामवर आलोचक शायद कोई नया इशू बाजार मे दें। ज्ञानपीठ इस वष व्यग्य के क्षेत्र को समथन देगा। कविता के क्षेत्र मे मदडियो की बनी रहेगी।

फिर आइयो खेलन होली से मैं वैसे ही घबराता हू जैसे आजकल लोग ईमानदारी, नैतिकता और सदाचार से घबराते हैं। होली का आगमन सुनकर मेरा हृदय ससुराल जाती नव वधु सा कापने लगता है। मेरा वायर हृदय उस दिन भी कापा था जब विवाह के बाद पहली होली ससुराल मे खेलने का निमत्रण मिला । साली शब्द वैसे तो बडा आनददायक, मनोहर और रोमासकारी लगता है परतु होलो और साली जुडकर जीजा के लिए खतरनाक स्थितिया पैदा कर देते हैं। द्रोणाचाय द्वारा रचे गये चक्रव्यूह को नो अभिम यु ने भेद दिया था परतु अगर साली द्वारा रचे गये होली व्यूह को भेदने की समस्या होती तो शायद अभिम यु भी साफ-साफ कह देते, "आई एम सॉरी युधिष्ठिर अकल ।" होली भी तो एक युद्ध ही है, जो रगो से लड़ा जाता है। होली का आगमत जानकर होली वीर पिचकारियो के रूप में अपने अपने हथियार सभालने लगते हैं। किसको कैसे रग लगाना है, इसके लिए मत्रणाए आरभ हो जाती हैं । जो इस युद्ध को नही लडना चाहता, उसी से जबरदस्ती युद्ध लडा जाना है । परतु इस युद्ध में शत्रु को समाप्त नही अपितु शत्रु की शत्रुता को समाप्त किया जाता है । मैं ससुराल में सालियो के साथ होली युद्ध लडने से घबरा रहा था। अपने घर मे कुत्ता शेर होता है और ससुराल मे साली रनी होती है। ऐमी शेरनियो से तो भगवान कृष्ण भी घबरा गये थे। जिन गोपियो को कृष्ण भी मुरली की तान पर नचाया करते थे, उही कृष्ण को गोपिया ने होली पर नचाया, छकाया और फिर मुस्कराकर बोली, 'लला फिर आईयो खेलन होरी।' एसा ही मेरे साथ भी होने वाला था। मुझे मालूम था कि रग रोगन से पोतका अतत मुझे उजबक सिद्ध करके सालिया कहेंगी, "जीजा फिर आइयो खेलन होरी। मैंने भगवान का नाम लिया न भी ललकारते हुए कहा, "होली पर तुम्हें भूत नहीं बनाया तो मैं 113 सालिया की निरतर धमक्यिा सुनकर मेरा अदरका पुरुष जाग उठा और आव सूमा यो न सुबह होने से पहले मुह अपरेसालियो वे मह रग से पालसरपाले परदू! परतु रंग यहां से मायेगा? मैंन बघरे म पर- उपर दसा कुछ नहीं दिखाई पडा। में उल्लू तो था नहीं जिसे रात में गार-साफ दिखाई देता है, मैं तो गधा या जो बिना हमियार युद्ध सहन तो भगवान कृष्ण आकर मेरे मन को धिक्कारने लगे और होली गीता का प्रवचन करते हुए बोले, "रे मूढ, कैसे समय मे तू अपने हथियार डाले वठा है, उठ और मालियो के माथ होली युद्ध लह । जब विवाह को मोखली मे सर दिया ही है तो मूसलों से क्यो डरता है। हाली का रग न तो तुझे जला सकता है और न ही गला सकता है। अच्छी तरह से नहाने के बाद तो तू फिर वैसे का वैसा हो जायेगा। तेरा मल दूर हो जायेगा। तू तो ससुराल में जाने का कम कर फल को तू सालियों पर छोड़ दे, तुझे तो फेवन कम का ही अधिकार है न, तू चिंता मत कर, जब-जब हानि होगी मैं तेरी सास के रूप मे, तेरी रक्षा रूगा।" इसके बाद भगवान कृष्ण ने विराट रूप दिसाया जिसमे सारा ससार होली खेल रहा था वही काले धन की होली खेली जा रही थी और कही गरीबों के खून से होली मेली जा रही थी और कही मुभ जैसे कायर मालियो से होली खेल रहे थे। मैंने भी अपनी कमर कमी और ससुराल होली खेलने के लिए चल दिया। में ससुराल पहुचा तो मेरी सास ने मेरी बहुत आवभगत की, मुझे माति भाति के पक्वान खिलाये। इधर वो पकवान खिला रही थी और उघर सालिया चेतावनी दे रही थी। कि कल होली मे जीजाजी की वो गत बनाएगे कि जाजी पहचान नही पाएगी। मैं बलि के बार सा पवार भी खा रहा था और मालियो को भी दख रहा था । पाठयो, आपकी जन- रस नॉलेज के लिए बता दू कि मेरी दो सालिया है और वो दोनो सौ-सौ कौरवों के समान हैं। एक माला है जो छोटा है परतु बहुत खोटा है । साले- तुम्हारा जीजा नहीं।" किसी को विरह म नींद नहीं आती है, किसी को काले पन पे धारण नौर नहीं आती है। मुझे होली के कारण नहीं आ रही थी। अचानक मुझे

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115 को बोपचारिकता थी। अपनी सास से आख मिलाने का साहस नहीं हो समेत ससुराल से चलने लगा तो साली ने कहा, "जीजा फिर आइयो मैं समझ गया कि भक्तो को दर्शन देने का उचित समय आ गया है । अगर अब भी मैं गुसलखाने से बाहर नहीं निकला तो लाठियो की वो चौधार होगी कि मेरे खून का रग सबको पता चल जायेगा । यह सोचकर मैंन, "मैं हूँ मैं हू मुझे लाठी मत मारना, मैं प्रेम हूँ" कहकर चिल्लाना रारू कर दिया। और मैं गुमलखाने से बाहर निकला । मोहल्ले ने मेरी हालत देखोतो हसी का फव्वारा छूट गया। बूढी औरतें राम-नाम का जाप छोड पोपलोहसी हसने लगी। बच्चे आचल से निकल किसी जतु को देखने का भाव से मदान में आ गए और युवक लाठिया जमीन पर पटक पटक्कर अट्टहास करने लगे। मैं उजब-सा अपनी सास और साली की ओर देख रहा था। मेरा सारा शरीर रगीन पानी से निचुड रहा था और मेग हृदय शम स पानी पानी हो रहा था। लोग मुझमे पूछ रहे थे, “क्या हुआ क्या हुआ?" और मैं निरुतर बटेर की तरह इधर-उधर देख रहा था। अगले दिन ससुराल मे मैंने जो होली खेली, वह होली नही थी, होली रहा था। सालियो की आखें वार-बार मुस्करा उठती थी और जब मैं पत्नी 7 सलन होली।"

114 - के लिए आ गया था। मुझे अपने पर बहुत क्रोध आ रहा था । खैर मैंने अधेरे मे इधर उधर हाथ मारे तो जूते पालिश करन की डिब्बी हाथ मे आ गई मन मयूर नाचने लगा । मैंने पालिश हाथो पर मिली और जनानखान की ओर चल दिया जहा मेरी पत्नी, सालिया और मरी सास सोयी हुई थी। मैंने धीरे धीरे वडी साली क चेहरे को पालिश से पोतना शुरू कर दिया। उसे रगन के बाद मैं विजयी भाव से दूसरी साली की ओर बढा वह घोडे बेचकर सोयी लग रही थी। मैंने बूट पालिश से भरा हाथ उसक चेहरे पर लगाया ही था कि चोर-चोर की आवाज से कमरा गूज उठा । यह मेरी सास को कोयल कूक थी। जिसे मैं माली समझा था वो मेरी सास निकली। मैं सरपट बाहर की ओर भागा। छुपने के इरादे से गुमलखाने मे घुमा परतु अघेरे म वाल्टी से टकरा गया और औंधे मुह फश पर जा गिरा । कपडे गोले हो गये और वत्तीसी हिलकर दद करने लगी। मैंने दद को दबाने के लिए हाथ से मुख के अजर-पजर ठीक किये तो सारा मुह अपने-आप बूट पालिग से रग गया। जिन हाथा से में सालिया को रगना चाहता था, उही हाथो न मेरे चेहरे को जूता समझकर पालिश कर दी। बाहर चोर की ढूढ मच रही थी और मैं गुसलखाने के अधेरे मे छिपा हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा था। घर मे चारो ओर बत्तिया का प्रकाश फैल गया था। चोर चोर की आवाज सुनकर सारा मोहल्लाइक्टठा हो चुका और मेरी सास और साली को देखकर मद मद मुस्करा रहा था। मेरी साली ने मेरी सास को और मेरी सास ने साली को बताया कि चहरे पर काला रग पुता हुआ है । दानो गुसलखाने की ओर श्याम रग छुट्टान लिए भागी । मोहल्ला सोच मे पड गया कि ऐसा कौन सा चोर था जो हाली खेलने आया था। रुपया चोर, दिल चोर और टैक्म-धोर के बारे में तो मोहल्ले ने सुना था परतु होली चोर के बारे में पहली बार जाना था । इधर गुमलखाने मे घुसने को उत्सुक भारत नारिया मुझे देखते ही भूत मूत के नारे लगाती हुई उलटे पाव लौटी। मोहल्ले की बूढिया ने भूत का नाम सुनते ही राम भजन आरम कर दिया, बच्चे मा के आचल म छप गये और मवर लाठिया लेकर मत के दान करने चल दिये।

मैं समझ गया कि भक्तो को दशन देने का उचित समय आ गया है। अगर अब भी मैं गुसलखाने से बाहर नहीं निकला लाठियो की वो बौछार होगी कि मेरे खून का रग सबको पता चल जायेगा। यह सोचकर मैंने, "मैं हूँ मैं हू मुझे लाठी मत मारना, मैं प्रेम हूँ" कहकर चिल्लाना शुरू कर दिया। और मैं गुमलखाने बाहर निकला। मोहल्ले ने मेरी हालत देखीतो हसी का फव्वारा छूट गया। बूढी औरतें राम नाम का जाप छोड पोपली हसी हसने लगी। बच्चे आचल से निकल किसी जतु को दम्बने के भाव से मैदान मे आ गए और युवक लाठिया जमीन पर पटक पटककर अट्टहास करने लगे । मैं उसब-सा अपनी सास और साली की ओर दख रहा था। मेरा सारा शरीर रंगीन पानी से निचुड रहा था और मेरा हृदय शम से पानी पानी हो रहा था। लोग मुझसे पूछ रहे थे, "क्या हुआ क्या हुआ?" और मैं निरुत्तर बटेर की तरह इधर उधर देख रहा था। अगले दिन ससुराल में मैंने जो होली खेली, वह होली नही थी, होली की औपचारिकता थी। अपनी सास से आख मिलाने का साहम नहीं हो रहा था। सालियो की आखें वार बार मुस्करा उठती थी और जब मैं पत्नी समेत ससुराल से चलने लगा तो साली ने कहा, "जीजा फिर आइयो 7 खेलन होली।"

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117 उससे फ्लंट मे 'वृह वक' करवाना ही विवेक है । समाजशास्त्री ने समझाया कि नई कालोनी मे दो वर्ष बाद जाना ही उत्तम है। दो वप मे बस और बाजार को सुविधायें बढ जाती हैं और वसावट भी हो जाती है। कानून वेत्ता ने अभय दान देते हुए कहा कि दो वप के लिए एग्रीमेट करचाकर दने स कोई खतरा निकट नही आता है। धार्मिक ने बताया कि हनुमान जी को हर मगलवार प्रसाद चढाने से भूत पिशाच निकट नही आते हैं । जनसेवक ने आश्वासन देते हुए कहा- हमारे होते हुए आप क्यो चिता करते हैं। इतने सारे वायकर्ता अब काम आयेंगे। साले ने तीन पाच की तो उठवा न दिया तो कहिएगा।" इतने सारे शुभचितक हो तो आदमी भ्रष्टाचार से युद्ध कर सकता है यहा तो मुकाबले में किरायेदार था। पर्याप्त गभीर चिंतन मनन के पश्चात् पारिवारिक निर्णय हुआ कि स्वय त्यागी (रवीदनाय, नही बनकर किरायेदार को दो वप के लिये अपने फ्लैट का सुख उठो का सुअवसर प्रदाा किया जाय । जसे महान भारतभूमि मे भ्रष्टाचार सवत्र सुलभ है वसे ही एक ढूढो तो दस वे अनुपात म किरायेदार सुलभ हैं। परतु जमे ईमानदारी और नैतिकता गजे के सर पर बाल की तरह अलभ्य हैं वसे ही अच्छा किराये- दार भी। यह ज्ञान हमे पयाप्त भाग दौड के पश्चात प्राप्त हुआ हमारी तपस्या एक दिन रग लाई और हम अपने एक रिश्तेदार के रूप में अच्छा किरायेदार उपलब्ध हो गया। जिससे दो वप से अधिक के लिए किराये दार नहीं बनना था क्योकि दो वष बाद हमारी तरह वह भी फ्लट लाड छाछ को भी फूककर पीने वालों ने फिर समझाया कि चाहे रिश्तेदार है उसस अनुबघ अवश्य करा लिया जाय। जिस असार ससार मे भाई भाई भू-संपत्ति का सार तत्त्व प्राप्त करने के लिए मुकदमेबाजी करते हो उसमें बेचारे दूर के रिश्तेदार को बाद म दोप देना उचित नहीं है। धारा इक्कीस के आधीन अनुबध न हो पाय तो सब रजिस्ट्रार के यहा अनुबध रजिस्टर करवा लेना अच्छा सुरात्मक कदम है। मैं दूध से नहीं जला था फिर भी मैंने छाछ को फूका और अनुबंध की प्रक्रिया मे जुट गया। मैंन एक वकील किराये पर लिया, उसने अनुबध का प्रारूप बनाया बनने वाला था।

मैने किरायेदार राख्यो ग्रुप हाउसिंग वाला की कृपा से हमे पश्चिमी दिल्ली में पलट मिल गया था और हम भी 'पलट लाड हो गये थे। (लेड लाइ नही हो सकते थे क्याकि पलट बाले जमीन पर खडे तो होते हैं परतु जमीन उनकी नहीं होती है। ) दिल्ली जैसे शहर में आपके ऊपर छत हो और नीचे अपना वाहन तो आधी समस्यायें हल हो जाती हैं जनता जनादन के अनुसार हमारी भी हो गई थी। जब नक पलट नहीं मिला था, उसके न होने की चिंता सालती रहती थी, मिल गया तो उसके होने ने चिंता में डाल दिया, चिता की पहली रेखा यह भी थी कि फ्लंट को किराये पर देकर स्वय किराये पर रहकर दक्षिण दिल्ली म रहने का गव उठाया जाय। चिता की दूसरी रेखा यह थी कि पलट में स्वय रहा जाय और पश्चिमी दिल्ली के प्रेमी मच्छरो द्वारा काटने का सुख उठाया जाय। पत्नी कुछ दिन किराये के मकान मे रहकर मकान मालकिन होने का गौरव पाना चाहती थी। दूध के जलो ने किरायेदारी के बारे मे हमे ऐसे-ऐसे अनुभव सुनाए कि छाछ भी हम जहर लगने लगी, उसे फूक फूक्कर पीने की बात दूर थी। किरायेदार हमे ऐमा राक्षस लगने लगा जो छत से, पहले सुदर राजकुमार का रूप धारण कर किसी राजकुमारी को फमाता है और फस जाने पर अपा असली राक्षसी रूप म आ जाता है। किरायदार शब्द से ही हमे हर लगन नगा । नफरत होने लगी। यह दीगर बार है कि उस समय हम स्वय एक शरीफ और ईमानदार मकान मालिक के किरायेदार थे। प्राणी वज्ञानिक ने समझाया कि पाचा अगुलिया बराबर नहीं होती हैं, जत ऐसे में किरायेदार को भी अगुली समझार व्यवहार करो। यथ- शास्त्री ने हमे समझाया कि दो वप तक किराये का अर्यालाभ उठावर 117 उससे फ्लंट मे 'वुड वक' करवाना हो विवेक है । समाजशास्त्री ने समझाया कि नई कालोनी में दो वर्ष बाद जाना ही उत्तम है। दो वष में बस और बाजार की सुविधायें बढ जाती हैं और बसावट भी हो जाती है। कानून वैत्ता ने अभय दान देते हुए कहा कि दो वर्ष के लिए एग्रीमेट करवाकर दने से कोई खतरा निकट नहीं आता है । धार्मिक ने बताया कि हामान जी को हर मगलवार प्रसाद चढाने से मूत पिशाच निकट नही आते हैं । जनसेवक ने आश्वासन देते हुए कहा- हमारे हाते हुए आप क्यो चिता करते है । इतने सारे कायकर्ता अब काम आयेंगे। साले ने तीन पाच की तो उठवान दिया नो कहिएगा।" इतने सारे शुभचित्तक हो तो आदमी भ्रष्टाचार से युद्ध कर सकता है यहा तो मुकाबले मे किरायेदार था। पयाप्त गभीर चिंतन मनन के पश्चात पारिवारिक निर्णय हुआ कि स्वय त्यागी (रवीन्द्रनाथ, नहीं) बनकर किरायेदार को दो वर्ष के लिये अपने फ्लंट का सुष उठाने का सुअवमर प्रदान किया जाय। जसे महान भारतभूमि मे भ्रष्टाचार सवन सुलभ है वैसे ही एक ढूढो तो दस के अनुपात मे किरायेदार सुलभ हैं। परतु जैसे ईमानदारी और भतिकता गजे के सर पर बाल की तरह अलभ्य हैं बसे ही अच्छा किराये दार भी । यह ज्ञान हम पर्याप्त भाग दौड के पश्चात प्राप्त हुआ हमारी तपस्या एक दिन रग लाई और हमे अपने एक रिश्तेदार के रूप में अच्छा किरायेदार उपलब्ध हो गया। जिससे दो वप से अधिक के लिए किराये दार नहीं बनना था क्योकि दो वर्ष बाद हमारी तरह वह भी फ्लैट लार्ड बनने वाला था। छाछ को भी फूककर पीने वालो ने फिर समझाया कि चाहे रिश्तेदार है उससे अनुबध अवश्य करा लिया जाय । जिस मभार समार म भाई-भाई भू-संपत्ति का सार तत्त्व प्राप्त करने के लिए मुकदमेबाजी करते हो उसमें बेधारे दूर के रिश्तेदार को बाद में दोष देना उचित नहीं है। धारा इक्कीस के आधीन अनुबध न हो पाय तो सब रजिस्ट्रार के यहा अनुबध रजिस्टर करवा लेना अच्छा सुरात्मक कदम है ! मैं दूध से नही जला था फिर भी मैंन छाछ को फूका और अनुबध की प्रक्रिया में जुट गया । मैंन एक वकील किराये पर लिया, उसने अनुवध का प्रारूप बनाया 118 और उसे डेढ सौ रुपये के स्टाम्प पेपर पर टाईप करवाने का निर्देश दिया। पलट लाड बनने की प्रक्रिया मे गर भ्रष्टाचारी और गैर-कालाघधाकारी मध्यवर्गीय मनु-पुत्र आर्थिक रूप से इतना खस्ता हो जाता है कि कजूस पुत्र बन जाता है । मैंने भी बचत की दृष्टि से प्रारूप को स्वय ही टाईप करने का निणय ले लिया। नियत दिन मे, मेरा किरायदार और ग्रुप हाउसिंग के सचिव महोदय अनुवध सहित, नौ बजे वकील महोदय की शरण म पहुंचे वकील महोदय स्वय को बहुत व्यस्त प्रदर्शित कर रहे थे। उ हाने हम तीनो को अनुवध के कागजा पर हस्ताक्षर करने के निर्देश दिये और स्वय पुन व्यस्त प्रदर्शन मे डूब गये । हम तीनो ने वारी बारी से अच्छे बच्चो की तरह हस्ताक्षर कर दिये। वकील महोदय ने हस्तासर वाले अनुबध को लापरवाह दृष्टि से देखा और फिर मेरे हस्ताक्षरा की ओर इगित करके बोले, "यह सिगनेचर क्सि के हैं, बहुत अजीब से लग रहे हैं।' 'मेरे हैं, क्या अजीव लग रहे हैं ?" मैंने पूछा। "कुछ नहीं। बड म कुछ हिंदी जैसे लग रहे थे पर आप तो लेक्चरर हैं आप कहा हिंदी म 'यह हिंदी मे ही हैं वकील साहब । मैं अपने हस्ताक्षर सदा अपनी राष्ट्रभाषा मे ही करता हू," मैंने गव से मस्तक कचा करते हुए कहा। "हिंदी मे।" वकील महोदय के मुह से जसे नीम चढा करेला घुस गया था। उनके मस्तक पर चिंता की पहली दूसरी तीसरी चौथी अनेक रेखायें खेलने लगी। "क्या, क्या गडबड है" गव से मरा मस्तक ऊचा था परतु मन शकित हो गया। "वकील महोदय ने सिगरेट का जोर से कश खीचा मोर घुआ उगलते हुए कहा, "हा, हिंदी म सिगनेचर के साथ अगूठा लगाना पडता है, आपको अगूठा। मैं आपको अनपढ दिखाई देता हूँ, एम०ए०पी-एच०डी० हू, वकील साहब।" मेरा आक्रोश फूटा।

119 । (डोट "माफी चाहता हूँ, नियम यही कहता है । पर आप घबरायें मन, आप के सिगनेचर देखकर कोई नहीं कह सकता है कि यह अंग्रेजी के नहीं हैं। वैसे क्लक को पाच का नोट देंगे, मब हो जायेगा । डोट वरी वरी-हिंदी में काम करना आरम्भ कीजिय । धीर धीरे सब कठिनाई दूर हो जायेगी। है राष्ट्रभाषा तू ध य है जिसके कारण एम०ए०पी एच०डी० अगूठा छाप हो जाता है । है राष्ट्रभाषा तू महान है जो पाच रुपये के सहारे चल जाती है। वकील महादय और श्रीमान रुपय की सहायता से हम सब रजिस्ट्रार के दशन करने में सफल हो गये । सब-रजिस्ट्रार निर्विकार ईश्वर की तरह लग रह थे। हमे देखते ही उनमे विकार पैदा हुआ और उन्हाने हम तीनो को उडती निगाह से देखा, कागजो पर लापरवाह दृष्टि डाली और वकील से आखें चार की। कुछ देर तक अनुबंध के कागजा पलटने के बाद जसे अचानक बोले, "यह आपने क्या किया है ?" मैंने कोई, हत्या, चोरी, डकती या वलात्कार नहीं किया था। फिर भी मुझम अपराध भावना आ गई और मैंने पूछा, "क्यो सर, क्या हो गया" . स्टैम्प पेपर तो ठीक हैं, बाकी मैटर आपने बाड पेपर पर क्यो टाईप करवाया है। यह नहीं चलेगा। मैटर दोबारा टाईप करवा कर लाइय।" यह कहकर उहोने अनुबंध के कागज मेज पर फेंक दिये और निर्विकार हो गये। मैंने अपनी तरफ से सुदर टाईप क्यिा था, अच्छे कागज पर । सुदरता ने मुझ फमा दिया। मैंने विनयपत्रिका प्रस्तुत करते हुए कहा, "सर, दोबारा टाईप करवाने में ममय और धन दोनो लगेगा। बड़ी मुश्किल से भाज की छुट्टी को है तीनों ने। 'देखिये धन तो लगेगा ही, समय कैसे बचाना है, यह आपको सोचना है।" निर्विकार ईश्वर ने सूत्र छोडा। वकील महोदय ने रिश्वती दष्टि मेरी आखो मे डाली, मैंने कहा, "सर, अगर दम-पाच रुपये मे कुछ वात बन सकती हो तो " 120 । "आपने मुझे चपरासी समझा है क्या ?" वह गुर्राया (घर मे कुत्ता भी ) मुझे समझ नही आया कि इस प्रक्रिया मे वह सब रजिस्ट्रार से चपरासी कसे हो गये। रिश्वत तो चपरासी से लेकर मत्री तक को एक आव से देखती है । कही यह जीव रिश्वत द्रोही तो नही । रिश्वत की बात करके कही मैंने इसका आदरणीय पद गिरा तो नही दिया। साफ सुथरी मरकार के साफ सुथर सब रजिस्ट्रार के प्रति मेरे मन में सम्मान उमडने लगा पर तु अधिक उमड नही पाया। वकील महोदय धर्मयुद्ध मे कूद पड़ें, बोले, "साहब, बीस ठीक है।" "नही पच्चीस वकील साहब ने मुझ पर दष्टि डालकर पच्चीस के माग पर चलने का सकेत किया। अक्लमद को इशारा काफी होता है मुझे भी बहुत था। मैंने कहा, 'सर, बाहर चलिये वहा आपके चाय पानी का इतजाम करते "यहा ठीक है।" उहोंने बडे लापरवाह से कहा, और अनुबंध के कागजो पर हस्ताक्षर करने आरम्भ कर दिये। वह स्थितप्रज्ञ योगी से अपने 'ध्यान' मे डूबे थे और मैं लाल बुझकड-सा आश्चय से मुह फाडे न्याय के आगन मे नगा नाच देख रहा था। मैं मूख था इसलिए चक्ति हुआ था। उस हमाम म तो सभी नगे थे, कौन क्सिी की तरफ देखता, बगुली उठाता । गलती तो मेरी ही थी, कि मैं बार बार अपनी खिसक्ती हुई पेंट ठीक कर रहा था। मैंने उहें उनका मेहनताना दिया। उहोंने सहज भाव से ग्रहण किया परतु न जाने क्यो उनके पीछे लिखे शब्द-सत्यमेव जयते, सहज नही थ, मुस्करा रहे थे। सत्य को मुस्कराने का अधिकार है क्या ?

- कजक्टिवाइटिस आयोग। बॉलिज से पढ़ाकर लौटा तो पडोसी जोशी जी को बनियान पायजामे में, आंखों पर धूप का चश्मा पहने खडा देखा । उनकी इस राष्ट्रीय पोशाक पर पाला चश्मा असगत लग रहा था। इस समय उनका घर पर दिखना भी असगत लग रहा था । क्योकि इस समय उ हें दफ्तर में होना चाहिये । इससे पहले कि मैं अपनी जिनासा का कोई समाधान पाता, जोशी जी ने मुझे देखते ही नेताई हसी हसे और बोले, "क्यो आपको भी हो गया या" मैं आश्चयचकित कि मुझे 'वो' क्या हो गया है, जिसका मुझे पता तक नहीं है। मैंने अपनी का प्रक्ट को, "क्या हो गया मुझे जोशी जी?" "अरे वही कजक्टिवाइटिस आलो की छूत की बीमारी नेत्र रोग । मुझे भी आज सुबह ही हुई सेक्शन मे श्रीवास्तव को थी बस उसी से गलती से हाथ मिला लिया था अब तो सारे सक्शन को होगी। बडी नामुराद बीमारी है। आप भी फस हो गये। काला चश्मा चढ हो गया आपको?" "मुझे कुछ नहीं हुआ है जोशी जी। यह चश्मा मैंने धूप और धूल से बचने के लिए लगाया है। स्कूटर चलाते समय आखो मे हवा नही लगती है । आपकी कृपा से मैं इस बीमारी से बचा हुआ है।" 'आपको नही हुई है, अच्छा है वह बहुत मायूस हो गये थे। जितने उत्माह से वह मिले थे उतनी मायूसी से वह घर के अदर जाने के लिए भारी पर उठान लगे । मैंने देखा उहान रूमाल से अपनी आखा को पाया भी। उनकी बिरादरी घट गई थी। मेरे धूप के चश्मे ने उहें धोखा " दिया था। "क्या जमाना आ गया है। लोग तो लोग अब चश्मे भी धोखा देने लगे हैं।" में बुजुग की तरह जमाने को कोसने लगा। एक जमाना था कि 122 लोग धूप मे पश्मे के सौंदय से प्रभावित होते पे और एक जमाना यह है कि चश्मेधारी को देखकर घबराते हैं। उसे पाली बिल्ली समझकर रास्ता बदल लेते हैं। चश्माघारी पुपारे तो बहरे हो जाते हैं, सामने आये तो अधे हो जाते हैं छुए तो स्पराहीन हो जात हैं। डी०टी०सी० की वस म इसके कारणो पर चर्चा हो गई। डी०टी० सी० से बढकर, सामयिक विषयों पर चर्चा वा मच और कोई देखने को नहीं मिल सरता। पजाव समस्या हो या नत्र समस्या, जनता के विचार तुरत उपलब्ध हो जाते हैं । अथ पर्चा "यह तो हाथ मिलने भर से हो जाती है। जहां आपने हाथ मिलाया वहा कीटाणु आप तक पहुचे। इसलिए ही तो अपनी भारतीय सस्कृति की नमस्ते अच्छी, न हैलो न चला सिफ हाय जोडकर नमस्कार ।" यह कह कर सज्जन ने नमस्कार को मुद्रा ग्रहण कर ली। "आप सौ पैसे सही कह रहे हैं बडी गदी बीमारी है। किसी को टोक भर दो तो हो जाती है । मुझे तो ऐसे ही हुई।" कोई कुछ बाल रहा था, कोई कुछ । बेचारा कहक्टर भी ताजा ताजा इस रोग में फसा टिक् बाट रहा था। इसी बीच एक तिलकधारी बोल, "मैं बताऊ सोलह आने कि कैसे होती है। यह सब बुरे कर्मों का फल है। पृथ्वी पर पाप बढ़ गया है। लोग बुरे क्मो मे फसे हुए हैं। ईश्वर का स्मरण नहीं करते हैं। बुरी चीज पर नजर डालने से ही बुराई आती है ।" यह कहकर वह पास खडी वाला ये पास और सरक गये। यह प्रवचन सुनते ही कडक्टर को क्रोध आ गया, बोला, "मैंने क्या पार किया जो 'यह हो गई भगत ।" "कुछ तो किया होगा । बिना बुरे क्म के ईश्वर कष्ट नहीं देता है। मैं तो रोज हनुमान चालीसा का पाठ करता हू भगवान का भजन करता हूँ। मुझे तो नहीं हुई और न होगी। कोई चाहे तो लिखवा ले।' कडक्टर को ताव आ गया। वह खडा हुआ और अपना चश्मा उतार कर बोला, 'देख देख मेरी आखो में देख। मैं देखता हू तेरा भजन- कीतन क्या करता है देख।" इस बीच नेत्र रोग से पीडित एक यात्री ने पहले अपने नेत्रो पर हाथ 123 लगाया और फिर भगत जी के नेत्रो पर मलते हुए बोला, "जा बच्चा काजक्टिवाइटिस तेरा कल्याण करेगा।" इतना होना था कि देश की प्रगति रुक गई। भगत जी दुष्टो का सहार करने के लिए मदान में उतरे और ड्राइवर ने बस रोक दी। इस तरह इस नेत्र रोग के चक्कर अजब-अजब हैं । अगर कुछ पिट रहे हैं, अछूत बने हुए दुखी है तो कुछ के लिए यह लाली ईश्वर का वरदान हैं । ऐस जीवन महान हैं जो बीमारी मे से लाभ ढ्ढ लेते हैं । बाँस बडा अडियल है, छुट्टी नहीं देता है और राम अवतार को फिल्म देखने जाना है। राम अवतार धूप का चश्मा धारण करता है, बॉस के कमरे म जाकर कहता है, "सर मुझे 'वो हो गया है, दिखाक ।" "नहीं नहीं नही, तुम घर जाओ जल्दी। बाँस की मजाल कि राम अवतार की ओर ाख उठाकर देख भी ले।" उधार चुकाने वाले धूप का चश्मा पहन निधडक धूम रहे हैं। उधार लेने वाले दूर से नमस्कार करवे कहते हैं, अच्छा आपका 'बा' हो गया है। अगल हफ्ते मिलूगा। मकान मालिक दरवाजे से ही लौट रहा है। घर सुरक्षित हो गया है। पड़ोसियो की बुरी नजर से बचा हुआ है। सुनने में आया है कि गृहणियों को खाना न पकाने के लिए बहाना मिल गया है। पति खाना बना रहा है, होम वर्क करा रहा है और बच्चो को, सुरक्षा की दष्टि से अपने साथ सुला रहा है। जिधर देखता हू उधर 'वो' ही छाया हुआ है। भारत मे हर बुरा रोग छूत की तरह बढता है। बाढ, सूखा, भ्रष्टाचार, रेल दुर्घटनायें, आतकवाद जैसे राष्ट्रीय रोगो मे एक रोग और जुड़ गया है। भारत मे नेत्र रोग तेजी से फैल सकता है, प्रेम रोग नहीं । पुछ भी हो यह एक राष्ट्रीय समस्या बन गई है। हमारे यहा राष्ट्रीय समस्या का हल नही, उससे समझौता का रिवाज है । यह बीमारी भी समझौते से दूर की जा सकती है।

आदमी के बच्चे "तुम कौन हो?" 'रामू तुम्हारा भी नाम होता है क्या? पापा तो तुम लोगो को सिफ गरीब कहते हैं। मेरे पापा कहते हैं गरीब नोग गदे रहते हैं । तुमने इतने गदे कपडे क्यो पहने है ?" "पैसे नहीं हैं।" "तुम नहाते भी नही हो क्या? हमारा तो टामी भी रोज नहाता है, हमारी माया नहलाती है, मुझे भी वही नहलाती है। तुम्हारी आया नही नहलाती" "आया! आया कोन?" "वो जो घर का सारा काम करती है-नौकरानी।" तुम्हारे यहा नौकरानी नहीं है क्या? "है 5 s, मेरी मा नौकरानी है वो ही घर का सारा काम करती है। दूसरो के घर मे भी काम करती है।" "तुम सारा दिन कैसे खेलते रहते तुम्हार यहा ट्यूटर नही आता है क्या ? होम वक नहीं करना पडता क्या ? तुम स्कूल नही जाते हो क्या? "नही बापू के पास स्कूल भेजने के लिए पमे नही हैं । टोली, कालू, गोली, रमती--कोई भी स्कूल नहीं जाता है । बडे होकर हमे मजूर बनना है। बापू कहते हैं, मजूर बनने के लिए पढना नही होता है, बस बडा होना होना है।" 'पापा मुझे तुम्हारे साथ खेलने को सस्त मना करते हैं । कहते हैं तुम लोग गटर म पलन वाले कीडे हो । पर तुम तो मेरे जैसे लगते हो, बस, गदे कपडे पहनते हो। हमारी टीचर कहती हैं आदमी का खून लाल होता है,

125
?"
तुम्हारा भी है क्या
"हा, देखो।" और उसने अभी-अभी खेल मे लगी चोट से रिसता सून
का रग दिखा दिया।
"अरे। तुम्हें तो चोट लगी है, जल्दी डिटोल से साफ कर लो, डाक्टर
से टिटनेस का टीका लगवा लो, नही तो सप्टिक हो जायेगा।"
"कुछ नहीं होगा, ऐसे तो रोज लगती रहती है।"
"तुम तो बहुत वहादुर हो । मुझे पापा से बहुत डर लगता है । वो मुझे
हरदम पढने को कहते हैं, घर के अन्दर खेलने को कहते हैं । बाहर नहीं
जाने देते हैं। पापा जितना बडा होकर मैं तुम्हारे साथ खेलने बाहर आ
सकूगा।"
"नहीं, तब भी तुम नही मा सकोगे।"
"क्यो?"
"तब तुम पापा बन जाओगे।"

प्रमाणपत्र
पहला, "नमस्कार, भाई साहब । मुझे अपने बच्चे के जम का प्रमाण
पत्र चाहिए।"
दूसरा, 'ठीक है, इस काम को भरकर एक रुपया जमा कर देना,
पद्रह दिन बाद मिल जायेगा।"
पहला, “पद्रह दिन मे । मुझे तो जल्दी चाहिए, एडमिशन फाम के
साथ देना है।"
दूसरा, "आप लोग ठीक समय पर जागते नहीं हैं और हमे तग करते
हैं। ठीक है । वडे बाबू से बात करनी होगी, दस रुपये लगेंगे। एक हफ्ते में
सर्टिफिकेट मिल जायेगा।'
पहला, "माई साहब मुझे दो दिन मे चाहिए, आप कुछ कीजिए न
प्लोज "
"दूसरा, ठीक है, बीस दे दीजिए, लच के बाद ले जाइयेगा।"
पहला, में विजिलस से हू, तो तुम रिश्वत लेते हो।"
"दूमरा, "हुजूर माई-बाप हैं यह आज की कमाई आपकी सवा में
हाजिर है।"
पहला, "गलत काम करते हो और हम तग करते हो। तुम्हें सस्पड भी
किया जा सकता है।'
दूसरा, हजूर, एक हजार और दे दूगा।'
पहला, "तुम मुझे घम सक्ट मे डाल रह हो, मुझे तुम्हारे बाल-बच्चों
का ध्यान आ रहा है, परतु डयूटी इज ड्यूटी।"
पहला, ठीक है, ठीक स काम किया करो। आदमी को पहचानना
मीखो। मुझमे मिलते रहा करो। तुम जैसे कुशल कमचारियो को दा को
बहुत आवश्यकता है।"
यह कहकर उमने हाथ मिलाया, सधि पर हस्ताक्षर किये और देश
तीव्रता से प्रगति करने लगा।

मागने वाले वह आधे घटे से प्रतीक्षा में इस बहुमजिला इमारत के दरवाजे पर सदा हुआ है। उमे प्रतीक्षा है कम्पनी के मैनेजिंग डायरेक्टर खोसला की। उसे नौकरी चाहिए और यह नौकरी उमे खोसला साहब ही दिलवा सकते हैं। पहले उसे अपनी योग्यता पर बडा गव था। उसने मित्रा के सामने कई बार दावा किया था कि वह नौकरी अपनी योग्यता के बल पर ही लकर दिखाएगा। परन्तु पारिवारिक जिम्मेदारियो और बेरोजगारी ने उसके सिद्धाता और गव को तोड़ दिया। मान के श्री खोसला के नाम किमी का पर थामे प्रतीक्षा मे खडा है। थो खोसला की कार उसने दूर से ही देख ली। वह इमारत के दरवाजे पर पहुंचा । कार रुकते ही उसने ड्राइवर से पहले कार का दरवाजा खाला और 'गुड मानिंग' कहते हुए खोसला साहब के सामने धनुषाकार मे झुक गया । वह इस कदर झव गया था कि जैसे उसके शरीर से रील की हड्डी गायब हो गई हो। तभी उसने महसूम किया कोई उसे स्पर्श कर रहा है, उसन एक आवाज भी सुनी, "बाबूजी बाबूजी बच्चा भूखा है मिफ दम पैसे दे दो भगवान तुम्हारा भला करे।" उसने देखा उससे थोडा हटकर मैले कपडो मे लिपटी, अधनगे पेट-फूने बीभत्स बच्चे को गोद में उठाए भिखारिन उसकी ओर माधना भरी दष्टि से देख रही है। उसे बहुत क्रोध आया। उसने भिखाराि को दुतकारत हुए कहा, “भाग यहा से कोई काम धाम नहीं है।" और इस बीच खोसला साहब कार से बाहर निकले तो वो उनके लिए रास्ता बनाता हुआ भिखारिन के भागे इस अदाज में खड़ा हो गया जिसमे उस वीभत्स भिखारिन पर खोसला साहब की दृष्टि न पडे । खोसला साहब आगे बढे तो यो भी लगभग उनके पीछे दौडना हुआ साथ हो लिया । उसने कापते हाथा -

125
मगिरिलोपत्र गोगमा मारय गोल हुए कहा, 'नीर सर पर पूरी
गाव मे पिा पार गर देगिएमा मुनिमगर पर
मग मीर हमारे पास नही है--गर मीर पर मुझे हिम
जाए तो frri भरमाराएगा माननगर
नौर।
नाममा गाएर हा मोर पारामी माप Pिrerमा
गए।

भगतो की महिमा किसी ने कहा है.---'सच्चाई छुप नही सकती बनावट के उसूलो से, खुशबू आ नही सक्ती कभी कागज के फूलो से।' परतु आजकल जो खुशबू कागज के फूलो से आती है, उसके सामन ताजे फूलो का सत्य शरमा जाता है। ऐसे ही एक दिन मैं भी गरमा गया था। मेरी फाइल आगे खिसक नही रही थी। मुझे घर बनवाने के लिए ऋण चाहिए था। पता चला कि जिन अधिकारी के पास फाइल रुकी हुई है वह बड़े भक्ति भाव के प्राणी है। दफ्तर मे भी धूप अगरबत्ती जला कर हनुमान जी की पूजा अचना करते रहते हैं । मुझे आशा बधी। यदि मैं अपने कप्टो का वणन एक भक्त के सामने करूगा तो वह अवश्य मुझ पापी का उद्धार करेंगे । अत एक मगलवार को मैं उनके पास पहुच गया। मैं उनके पास दफ्तर खुलते ही पहुचा था। पता चला कि आज मगल- वार है इसलिए भगत जी एक घटा लेट आएगे । मगलवार को वह हनुमान मदिर होकर दफ्तर आते हैं । मैंने उसकी मेज़ के वातावरण का निरीक्षण विया तो पाया कि सारा वातावरण हनुमानमय था। मेज पर हनुमान जी का विशाल बिल पडा था। कुर्सी के पीछे दीवार पर एक छोटा-सा हनुमान मदिर सुशोभित हो रहा था और फाइलो के ऊपर हनुमान चालीसा की एक प्रति पड़ी हुई थी। लगभग दो घण्टे की प्रतीक्षा करवाने के बाद भगत जी ने मुझ पापी को दशन दिए । सफेद कुर्ता पायजामा पहने, माथे पर तिलक लगाए वह हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए प्रविष्ट हुए थे। उसके प्रविष्ट होते ही पापी सुदरियो ने दुपट्टे मे मुह दबा कर खी खी करना शुरू कर दिया और जिनके पास दुपट्टा नही था उन्होंने हाथ मे मुह दबा लिया। पुरुषो ने शरारती निगाहो से एक-दूसरे को देखा और अपने काम में जुट गए । भगत जी ने पापो ससार की परवाह नहीं की और भक्ति भाव से अपनी सीट पर

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निपारितोपत्र गोगा माट्य सोशए महा, 'नीर गर महगरी
गाम मे
पिपरगर देगिमा बगै मुशिमगर पर
समोरमाने पामगर नौर पर मोर मुझे किस
ant friyar TICm मागागर नीर।
a.mगारमें मोर पारामीराप सिमा

भगतो की महिमा किसी ने कहा है-~-'सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलो से, खुशबू आ नही सक्ती कभी कागज के फूलों से।' परतु आजकल जो खुशबू कागज के फूलो से आती है, उसके सामने ताजे फूलो का सत्य शरमा जाता है। ऐसे ही एक दिन मैं भी शरमा गया था। मेरी फाइल आगे खिसक नही रही थी। मुझे घर बनवाने के लिए ऋण चाहिए था। पता चला कि जिन अधिकारी के पास फाइल रुकी हुई है वह ब. भक्ति भाव के प्राणी है । दफ्तर मे भी धूप अगरबत्ती जला कर हनुमान जी की पूजा-अचना करते रहते हैं । मुझे आशा बधी । यदि मैं अपने कष्टो का वर्णन एक भक्त के सामने करूगा तो वह अवश्य मुझ पापी का उद्धार करेंगे । अत एक मगलवार को मैं उनके पास पहुच गया। मैं उनके पास दफ्तर खुलते ही पहुंचा था। पता चला कि आज मंगल- वार है इसलिए भगत जी एक घटा लेट आएगे। मगलवार को वह हनुमान मदिर होकर दफ्तर आते हैं । मैंने उसकी मेज के वातावरण का निरीक्षण दिया तो पाया कि सारा बातावरण हनुमानमय था। मेज पर हनुमान जी का विशाल चित पडा था। कुर्सी के पीछे दीवार पर एक छोटा-सा हनुमान मदिर सुशोभित हो रहा था और फाइलो के ऊपर हनुमान चालीसा की एक प्रति पड़ी हुई थी। लगभग दो घण्टे की प्रतीक्षा करवाने के बाद भगत जी ने मुझ पापी को दशन दिए । सफेद कुर्ता पायजामा पहने, माथे पर तिलक लगाए वह हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए प्रविष्ट हुए थे। उसके प्रविष्ट होते ही पापी सुन्दरियो ने दुपट्टे मे मुह दबा कर खी खी करना शुरू कर दिया और जिनके पास दुपट्टा नही था उन्होने हाथ मे मुह दबा दिया। पुरुषो मे शरारती निगाहो से एक-दूसरे को देखा और अपने काम में जुट गए । भगत जी ने पापी ससार की परवाह नहीं की और भक्ति भाव से अपनी सीट पर

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पहप गए। में सोते से जगापा।
मैंने कहा, "यो मेरो हाउस-सान की पाइस आपरे पाग पड़ी है।'
मगत जी न मरी यात माध्यान नहीं दिया मोर यो, " हनुमाज
गुमाई," उपरे ने पद।
मने कहा, "म उग फाइम रेमिममिमे म मापरे पास आया।'
भगत जी बोले, "मापिशाप frre नही आयें, महापौर पर नाम
गुमायें।"
में समझ गया कि यह मुझे भाविताप यही समझ रहे । ।
उनको हामार भक्ति म बाधा या रहा
पार पुगी पर पर
गग और उारी गापा पूजहाना परोममा उगौशार
पाम मरिमे भूप प्रगायती उपाई, मर पर हमारी पूति
RIFIमरिया मोरगीत वार शुमार पारीमा बारमारे या
मरी मोर राष्टिमी।
भात भगरी तिर गौम्य मरमा थे, मग मी
भोर कर उनीहीपरिगोप।
TIMEमोकामार
रहामामेटि"

जमाकर बोले, "तुम्हारे रास्ते मे तो मगल क्रूर दृष्टि डाल रहा है । काय होने में सदह है।" "कोई उपाय प्रमु 6 "हनुमान जी की भक्ति करो। उनके मदिर मे कुछ सेवा चढाओ।" "मैं आज ही जाकर सवा पाच रुपये काप्रसाद चढाऊगा।" मैंने भक्ति भाव से प्रतिज्ञा की। "सवा पाच रुपये का ?" हनुमान भगत ने मुझ पर तुच्छ दष्टि डालते हुए कहा । "लोन साठ हजार चाहिए और प्रसाद सवा पाच रुपये का।" "फिर आप ही माग दशन करें।" मैंने हाथ जोडते हुए कहा। "कम से कम दो परसेंट, समझे।" में कसे न समझता। इस समय मेरी समझ के सारे द्वार खुल चुके थ। मुझे उस हनुमान भगत पर अपार श्रद्धा हो रही थी। जब ऐस भक्त अपने भगवान का इतना ध्यान रखेंगे तो हमारे भगवान न सम्पन होग। मैंने आश्वासन देते हुए कहा, "जमी आपकी जाज्ञा प्रमु, मैं आज शाम ही मदिर मे प्रसाद चढाऊगा।" "माज शाम नही, अभी, भगवान सब जगह होते हैं । यहा भी है और देखिए हनुमान चालीसा की चालीस प्रतिया बाटने की राशि भी दे दीजिएगा आपको बकायदा रमीद मिलेगी। ससार मे बहुत भ्रष्टाचार बढ गया है, कुछ धम का काम कीजिए।" हनुमान भगत ने मुझे आधे घंटे तक बढते भ्रष्टाचार, पाप और धम की हानिलाभ का भाषण पिलाया। मैंने भाषण पीते हुए देखा कि सफेद कुर्ता पायजामा पहने वह कभी बगुले के आकार में आ जाते थे और कभी भगत के आकार में । उनके माथे पर लगा तिलक लाल चोच मे बदल जाता था। मैं मछली बना उह हाथ जोडकर प्रणाम करने की मुद्रा मे बैठा था। अब मुझे सुरिया के खी-खो पर हसने और पुरुषो की शरारती निगाहो का अथ समझ आ गया था। मेरी मजबूरी यह थी कि उहें बगुला जानते हुए भी उह सच्चा भगत - समझता था। ऐसे भगतो को समाज बगुला जानते हुए भी मच्चा मानने को विवश 132 है। और ऐसे भगतो की जनसख्या निरतर बढ़ रही है। जो भगत हैं, बगुला नही है उसे कोई नहीं जानता है। परतु जो बगुला है वह अपनी भक्ति का ढिंढोरा पीटता है। आजकल जो जितना ढिंढोरा पीटता है। आजकल जो जितना ढिंढोरा पीट सकता है, अपना विनापन कर सकता है, वह उतना ही सच्चा है । सत्य का विज्ञापन करना सत्य बोलते से अधिक सरल है और विश्वसनीय है। आप किसी को दस बार चाय पिलाते हैं परतु उस चाम का ढिंढोरा नही पीटते हैं तो कौन जान पाएगा कि आप पाय पिलाते हैं । परतु जो सच्चा बगुला होता है वह एक बार चाय के लिए पूछने का भी विज्ञापन कर डालता है, अपनी दरियादिली का ढिंढोरा पीट देता है। समाज उसे ही दरियादिल समझता है, मान देता है। जो जन सेवा की भक्ति करता है परतु उसे अखबार मे खबर नहीं बनवाता है फोटो नहीं छपवाता है, उसे दूर-दूर तक बठे लोग कैसे जान पाएगे। परतु जो बगुला ऐसा कर लेता है उसके पास मछलिया स्वय चारा बनने आ जाती हैं। सच्चे बगुले भगतो के मुह मे सदा राम का नाम होता है और बगल छुरी की म्यान बनी होती है । वह अवसर पाते ही शिकार पर आक्रमण करते हैं और काय पूण होते ही आमूद कर राम नाम के सत्य की खोज मे जुट जाते हैं। घय हैं ऐसे सच्चे भगत जिनके भरोसे दपतरो की फाइलें मरक जाती हैं। कातिल खून करके बच निकलता है और मुझ गरीब को घर बनाने के लिए ऋण मिल जाता है।

होवा नही होआ । , मैं जल्दी में था मुझे अस्पताल पहुचना था, अस्पताल की ओर जाने वाला हर व्यक्ति जल्दी में होता है, यह अलग बात है कि अस्पताल वाले कभी जल्दी मे नही होते। आपका हाथ टूट गया है, आप दद से मराह रहे हैं और आपको लग रहा है कि आपसे अधिक पीडित व्यक्ति इस दुनिया मे और कोई नहीं है। आप उम्मीद करते हैं कि आपको पीडा मे देखकर डॉक्टर आपकी मा की तरह चीखता हुआ आपसे लिपट कर कहेगा, "हाय, मेरे मरीज को क्या हो गया । तेरी यह हालत किसने कर दी मरीज " यह कहते हुए डॉक्टर की आखो से जासू बहेंगे और वह सारा काम छोडकर आपको सेवा में लग जाएगा। पर उसे जल्दी नहीं है। उसे डॉक्टर सखी से पतरस का आनन्द उठाना है और नसों के सौंदय पर रिमच करनी है। डॉक्टर ही क्या, आप पाएगे कि अस्पताल का हर कमचारी अपने में व्यस्त है। आपको देखने की किसी को भी जल्दी नहीं है । आप अधिक जल्दी मचाएगे तो वह आपके पट में कची छोडकर पेट सिल देगा। आपकी हाय तौबा अस्पताल वालो के लिए दूर- दशन के कायक्रम की तरह है। यदि आप किसी के द्वारा प्रायोजित हैं तो मारा अस्पताल रुचि के साथ देखेगा, नही तो आप कृषिदशन हो जाएगे कुछ करने को नहीं होगा तो आपको देख लिया जाएगा। मेरा हाथ नहीं टूटा था और न ही मैं मरीज होने के कारण जल्दी मे था। जल्दी का कारण मेरा मित्र था । वैसे हुआ उसे भी कुछ नही था, जो कुछ होना था वह उसकी पत्नी को होना था। वह मैरा मित्र है और महवर्मी भी। दोपहर को मित्र के घर से फोन आया कि उसकी पत्नी की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए उसे अस्पताल ले जा रहे हैं। उसकी पत्नी मा बनने वाली थी और वह बाप बनने वाला था। फोन सुनते ही उसके चेहरे पर प्रसव पीडा का दद छा गया। यह दद सुख ।

134 ?" का कारण भी बनता है और दुख का कारण भी। वह दो लड़कियों का पिता है। वह मुझे अस्पताल की सीडियो पर मिला था। उसका चेहरा अब भी प्रसव पीडा लिए था। मैंने उत्सुकता दिखाते हुए पूछा, "क्या हुआ "क या रत्न की प्राप्ति हुई है," कहते हुए उसका चेहरा कोयला हो रहा था। उसके चेहर पर पराजित नेता की मुस्कान थी जो जनता को मामने पाकर विवशता मे आती है। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं नवजात शिशु के आगमन की बधाई दू या सहानुभूति प्रकट करू । "दानो ठीक हैं न 7" "हा ठीक हैं' वीतरागी योगी के स्वर मे वह बोला । "तू चल मा भी ऊपर है 46 नम्बर कमरा है सैकेंड फ्लोर पर मैं अभी आ रहा हूं।" और वह भारत की आर्थिक प्रगति सा निर्जीव अपने को आगे धकेलने लगा। मुझे देखकर मित्र को मा के चेहरे पर ऐसी मुस्कान छायी जसे फोटो- ग्राफर ने किसी मुर्दे से कहा हो, स्माइलपलीज, और वह मुस्करा दिया हो । उ होन कहा, "लक्ष्मी आयी है । " पर लगा जसे लक्ष्मी गयी है। मैं मा के रूप मे उस होवा के सामने नतमस्तक हो गया जो एक और होवा के कारण पीडित थी। ध य है ऐसी व्यवस्था जिसम औरत औरत को दुश्मन बनने को विवश है। हे महान् पुरुष तू प य है जिसन औरत की माखो के पानी का गुणगान किया और औरत की महानता को रोने मे सिद्ध किया। सुना है आजक्ल वैनानिको ने ऐसी खोज कर ली है जिससे भ्रूण- यवस्था मे ही पता चल जाएगा कि लडका होने वाला है या लडकी । पय हैं ऐसे वैज्ञानिक जिहाने होवा की पीडा को समझा और उसका उद्धार किया। हम उतनी ही औरतें चाहिए जो घर की चाकी मे पिसती रहें। फालतू औरतों का दिमाग पालतू कामो मे लगकर वह होवा से होमा बनेंगी, पुरुष को भयभीत करेगी। शब्दकोप के अनुसार हौवा शब्द स्वालिंग है और वह सोदय तथा कोमलता से पूर्ण है। परतु हौवा जद पुल्लिग होती है तब वह होआ बन 135 जाती है। होमा डराने के काम आता है। जो बच्चे दूध नहीं पीते हैं अच्छे बच्चे नहीं बनते हैं, हौआ उन्हें डराता है। होचा जब तक स्त्रीलिंग रही है, सौदय और कोमलता की प्रतिमा बनी रहती है, पुरुप के चरणो की दासी रहती है, घर की रानी बनी रहती है, पुरुष निश्चित होकर अपनी मर्दानगी का सुख भोगता है । पर तु जव होवा जागती है, पुल्लिग होती है, आदम से जागे बढ़ने का स्वप्न देखती है, तब वह होआ बन जाती है। अब भी हौवा आदम बनन को होती है, पुरुष का सिंहासन डालने लगता है। आजकल राधेलाल जी का सिंहासन डोल रहा है। पिछले रविवार उनके घर गया तो दरवाजा खोलते ही किसी जातकवादी की तरह होने प्रश्न दाग दिया, "तुम तुम ही बताओ आजक्ल के जमाने मे पत्नी का क्या फज़ है ?" मैं पजाब-पुलिस-मा चकिन हो था कि उ होने स्वय उत्तर दे डाला । "उसका यही फर्ज है न कि अपनी गृहस्थी ठीकठार मभाले । घर के छाट मोट काम नाश्ता तैयार करना, खाना बनाना, बच्चो को स्कूल भेजना, झाडू पोछा करना, बतन साफ करना, थोडी-बहुत सिलाई नरना और घर की देखभाल करता। अब यह काम गृहणी नहीं करेगी तो क्या गणा करेगा? आदमी शादी क्यो करता है उसे सुख मिले इसलिए मैं समझ गया कि उनके घरेलू हालात ठीक नहीं है। परन्तु एक अच्छे पडोसी की तरह उनके घरेलू मामलो में हस्तक्षेप न करते हुए अजान होकर मैंने पूछा, "पर हुआ क्या राधेलात जी? "होना क्या है मैं दफ्तर से पक कर आया और इन महारानी जोस बोला कि कुछ चाय नाश्ता दे दो। तो जानते है महारानी जी ने क्या कहा? बोलो, मैं भी थकी हुई है, आज चाय तुम पिला दो। शिव । शिव । शिव इतना घोर अनथ घर का स्वामी चूल्हा चौका करे? बाहर जाकर थोडा बहुत कमा क्या लाती है हम पर हुक्म चलाने लगी, अपने पति पर। पहले की औरतें कितना काम करती थी खुद चक्की से आटा पीसती यो, कुरा से पानी लाती थी, बच्चो को पालती थी, गोबर से उपले थापती थी और आजकल, थोडा बहुन पढ़ लिख गयो कमाने लगी तो सारी 136 गृहस्थी भूल गयी चॉय बनाने को कहो तो सिर मे दद होने लगता है।" राधेलालजी का रक्तचाप आतकवादियो की गतिविधियो-सा बढता जा रहा था और मैं पजाब सरकार सा विवश खडा था । राधेलाल जी की मूछ को नारी जाति ने ललकारा था, आज उहोंने अपने तरकस के सारे तीर खोल लिए थे। वह सत्सग माला उठा लाए और कापते हाथों से उसे खोलते हुए जैसे किसी महामन्त्र का जाप करने लगे। ' जानते हैं इस किताब मे महापुरुषो ने क्या लिखा है नारी नक का द्वार है पति की आज्ञानु- सार चलने का व्रत रखने वाली स्त्री कभी दुखी नहीं होती। पति की आनापालन करना स्त्री का परम धम है। वह इतना ही कर ले तो स्वग जाती है और यह स्त्री यह तो नक का कीडा बनेगी। मुझे उम दिन राधेलाल के रूप मे महान पुरुष के दशन हुए। हे राधेलाल तू महान है। तू नारी को आज्ञा देता है जिससे तेरी थाना का पालन करके वह पतिव्रत धम का पालन कर सके। तू अपने कोमल हाथो से कुलटा नारी की देह को पीटता है, जलाता है जिससे उसे स्वग मिले। सूने ही नारी को बलिदान का माग दिखाया । तूने नारी को महान बनाने के लिए उसे बनवास दिया, सती बनाया शिला बनाया क्या क्या नहीं बनाया। तू त्याग के इम पथ पर खुद नही चला, इसे नारी के लिए त्याग तेरा त्याग महान है। हे पुरुष जाति तू भी राधेलाल की तरह जाग। देख जमाना क्तिना बदल गया है । एक वो जमाना था कि पति नारी से कह दे कि तुझे अग्नि परीक्षा दनी है तो वह हंसते हंसते चिता पर चढ जाती थी और आजकल चाय का पानी चढाने को कहकर तो देखें। हे आदम तू जाग और हौवा को होआ मत बनने दे। ऐसी व्यवस्था बना कि हौवा हौआ को दुश्मन बनी रहे। तू दहेज के माप को पाल, नारी ईश्वर-भक्ति की अफीम खिला और उसकी आखो पर पतिव्रत घम का चश्मा चढ़ा तथा सुदपन की बसरी वजा। ।

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नाम
प्रेम जनमेजय
18 माच 1949,
इलाहाबाद
शिक्षा एम ए एम लिट पी एच डी (हि दी)
प्रकाशित रचनाएँ
व्यग्य
1 राजधानी मे गवार
2 बेशममेव जयते
3 पुलिस ! पुलिस !
4 में नही माखन खायो
मालोचना
1 प्रसाद के नाटको मे हास्प पम्प
2 व्यग्य का स्वरूप (प्रकाश्य)
बात साहित्य
1 अगर ऐसा होता 2 शहद की चोरी
3 बल्लूराम
सम्प्रति
कॉलेज प्राफ वोकेशनल स्टडीज शेख सराय II
नई दिल्ली के हि दी विभाग विभाग मे प्राध्यापक ।
सपर्क
73 साक्षरा अपाटमेट्स ए-3
दिल्ली-110063
श्चिम विहार नई
ISBN 81-7056-063-2

Mai Nahi Makhan Khayo

Author
Janmejay
Title
Mai Nahi Makhan Khayo
File name
Mai Nahi Makhan Khayo
Text
OCR done
Citation
1963
Published
2011/03
Publisher
Panchshil Prakashan Filam Colony Choda Rastha Jaipur
Language
Sanskrit
Pages
146
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551179
Barcode
4990010031946.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
EaDIHp607T4
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