Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Viram Chinh

Anchal · 2011/03

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विराम चिन्ह
'अंचल'
हिस्तपिचालय
वाराणसी-१.
rantine
कलकत्ता-७.

प्रकाशक : प्रोम्प्रकाश वेरी
हिन्दो प्रचारक पुस्तकालय
पो० बक्स नं०७०, ज्ञानवापी, वाराणसी-१
मुद्रक : सन्मार्ग प्रेस, वारागसी
प्रावरण-मुद्रक : विद्यामन्दिर प्रेस (प्राइवेट) लि.
मानमन्दिर, वाराणसी।
प्रावरण : काजिलाल
संस्करण : प्रथम-११००
दिसम्बर, १९५७
मूल्य : तीन रुपये मात्र

अनुक्रम १० सं० ३ ५ ६ ह १० १४ मारना खेल यह कैसा तुम्हारा! मत बुझना मेरे दीपक मन अपराजित सूर्य पो मेरे मन के अविनाशी। एक कण दे दोन मुसाको ज्योति तुम्हारी ही तो जलती पुकार उतना तुम पर विश्वास बढ़ा प्राण थके रोये ऐसी मेरी मति मारी मत टूटी नम के तारे की क्या प्राशा ! मांगे भी नहीं मिलते ধীনবার सचमुच कितनामच्छा होगा! बांदनी खुले शिशिरको श्याम पटा परदेशी सौरभचला गया पूरी बाजी लगी कहाँ! पब किससे? मैं मिली तुमसे जीवनात मो मेरे जन्मान्तर सायो? বনমালী दीप जल में बह घना १८ १९ २० २३ २५ २७ २६ ।

६ १० सं० करेंगे अब हम तुमको प्यार नहीं ३८ ४० यह फागुनकीरात मापू ४२ .. ४६ ५१ महाज्योति गांधीजी वर्तमान मेरी रागिनो, मुझे भूल जा माझी वापू प्रलय रात अंधियारी नवयुग कादीप जलायें ! सोचोतो यह था! रानी दुर्गावतो दलित उत्पीड़ित मनुज वेद ऋचायें थी सांसों में तुलसीदास बापू उनको भूल न जाना आलोक नहीं जलेगी जनजन के मन में नूतन अभियान गांधीजी के निधन के बाद प्रथम स्वाधीनता दिवस अलविदा! नवयुग की दीवारें ६० ६२ ૭૨ ७३ ७७ --:०- . - विराम-चिन्ह

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'झरना
है इर महासागर मेरा साक्षात लिटो
आता कोई
संघर्ष तरंग करती हैं, सोने में अज उठती उलझन.
गति फूटी पड़ती कर-कर में पज माल फ्टा पड़ता जीवन.
अब भर-भर जाती हो पुरवा बादल की छाती का विप्न.
अन आ-आ कर टकराती हो प्राणो में दुर्दिन की धड़कना
उन्मत किये देती धारा माशीस अमावस लाई हो.
विद्रोही पारो को हलचल कब तक चुपचाप सडे कोई.
है दूर महासागर मेरा पक्षात शिये आता कोई.
उस पार दिगन्तर से आई संकल्पभरी गति को वारी
इंगित पर लहराते जिसके तुफान पर अभिमानी
यह मामा--अहतो है उनमे यौवन की बिजली की धारा
पर अपने उद्गारों को तृष्णा भो तो मेरी पहचामी.
मैं आज र भो तो कैसे सब प्रोझा बहे माते
संघाती के संगी साधी विहगों की ममता भी रोई
है दूर महासागर मेरा अक्षात लिये जाता कोई
क्यो माज मधीन्हे की आशा प्याले प्राणों में महा भरती.
झंकार गरं के खारो को कुछ गंसिल और निकट करती.
क्यो स्वप्न असक्ष्य अतल के ले पाता है गृहहीन पवमा
है पान मस्ता को सीमा मोशा अम्बर गोलो घरला
में मोले सागर का राही, है गोल निशा साधिन मेरी
है जाग उठी जसे अन्मो-सन्मो को व्याकुलता सोई.
दर महासागर मेरा लक्षात लिये माता कोई
नो पामत प्रारा ! कहाँ का पागलपन है आमाकर घेरे
माईश उमंगो का आता पावन मेरे। प्रेमी मेरे ।

जो गंधन * पसनेसाड़ों । मैं हमको कसा लगता हूँ
सुल कितना टन्ट प्रामे में अब प्रोजन जीवन को रे
वह भी बदा दिन था मन में परमादी का ग सुना.
वह चोवन भो कसा जिसने पहनता से पहरात पोई
है इर महासागर मेरा मक्षात शिय
आता कोई
काफी है एक हो सपना दिनरात मनाने को पागल.
बस एया मिरान को मिला करती रहती प्रति घs.
मैं मुफ तरंगित लाहों पर गा गाकर माधा करता
* হবি না মানা ৪ সিম * ৯ মায়া মমত
है इर विसर्जन-गम सभी मादी पर्व नही माया
अभिशाप निराळे प्रेमी के समक्षा घरदान कर कोई
है दूर महासागर मेरा प्रक्षात लिये आता कोई
TE

खेल यह कैसा तुम्हारा ?
खेल यह कैसा तुम्हारा ?
जन्म-जन्मो के अमोही! खेल यह कैसा तुम्हारा ?
हे महिपत पोति पहले तो मुझे जो से लगाया
स्वप्न इतने दे दिए मैने म जिमका अन्त पाया.
तृप्ति की पहचान देकर दे दिर प्रणित प्रलोभन
बन गया में छाड-सा अनुगत मुझे इतना रिझाया
यदि बुझाना था मुझे तो क्यों अंधेरे से उबारा ?
लौटने की राह खोकर दिमित था मैं सभामा
था अवश इतना कि तुमसे भी कमी तो कुछ न मांगा
मुक थी मेरी व्यथा तुमने दिरा उसको नए स्वर.
दी जलन इतनी कि फिर से जल उठा मेरा बसा घर
राक झपकी हो लगी थी, किंतु दुदिन में एकारा !
दे दिया तुमको बमाकर प्राण का मैंने खिलौना
चाँद को छूने चला था मैं मरुस्थल और बौना
पर, पपीहे की रटन से है कभी मृगमल न बदला
सत्य माखिर सत्य हो है, हो भले सपना सुनहला
दे मुझे मझधार हरदम दूर कर देते किनारा !
कह दिया इस शून्यता में भी में मन का धीर त्यागो
हो भले आकंठ तृष्णा, कितु पानी भी न मांगो
चिर-प्रतीक्षा बन भले आए मिलन की राह तेरी
पर न आँखों मे झळकने कभी मन की धरी
तोड़ देते हो क्षणों में ही मुडे मन का सहारा

क्यो मुझे देकर पुरानी जिंदगी का जेलखाना
कह दिया तुझको नया हो नित्य यह नाता पुराना
कित क्षणभर को न तुममे युग-युगों का भेद खोला
बोलकर जैसे महनिशि रह गया यह मन अबोला
মীননা জানা
तरसते-हो-तरसते
सारा!
जन्म
.
हाथ-सा ऊपर उठार व्योम ने अब-अब बुलाया
देख नीचे गर्त जब विश्वास मेरा उगमगाया
कह दिया ऊपर न उठना और नीचे भी न गिरना
ले अकम्पित मन तृषा के बादलों मे तुम न घिरना
प्राण को बाजी लगाकर भी न में जीता, न हारा !
---
-
Pr
TAM
.inment

मत बुझना मेरे दीपक मन
रात अभी आधी बाकी है, मत बुझना मेरे दीपक मन ।
चाह चाँदनो को मुरझायो, छिपा घाँद यौवन का तम मे,
आयुरागिनी भी अकुलाती, रह-रह कर बिछुड़न के मम मे ।
अळते रहे स्नेह के क्षण थे, अब तक जोवन मे अंधियारा।
तुम बुझने का नाम न लेना अबतक एम्मुख है वतारा,
अपने को पी पीकर जीना है, हो कितना भी समापान ।
तमने विरहाकुल संध्या को भर दो माग अणिमा देकर ।
तम के घिरे बादलो को भी राह दिखायी तुम्ने अळ कर।
तुम जानत सपनो के साथी ! स्तब्ध निशा को सोने देगा।
धन्य हो रहा है मेरा विश्वास तुम्हीं से पूजित होकर,
अलती बाती मुक्ति कहाती दाह बना कब किसको धंधन ?
MARA
OPUR

अपराजित सूर्य
यह काळा यादन सरण को कहाँ लिये भाता है!
दिशा दिशा मेन कि कैसा ज्वार उठा है पर,
भय कातर प्रकाश की किरणे लटक गिरों धरती पर,
ना के मन में शांति नहीं है शाति नहीं है माहर,
दिन की प्रर्थी देख रहे है (द सितारे हिपकार,
परे दिवा खप्नों के खामी । पया होता जाता है।
जा पह सा ताप तेज यम गया कालिमा गहरी,
मरघट सा मन गया गगन होते होते दोपहरी,
सृष्टि भरी है गहन व्यथा से भरतो का दिल असता,
त्या केंधुली असा घारों ओर एंधक्षका गलता,
हुरा नदी के पाट अनमने पल भी अकुलाता है।
व्याप्त चदिक भव संशय के अनमाने ७ स्वर
अंतिम पोली किरर पी गये ये तम के यामावर;
कफनाती है सान्ध्य प्रतिमा अण, धरा और गगन पर,
कैसा स्तब्ध प्रलय-कंपन भी भूल गया है पर-पर,
कोटर में भयभीत खगों का कंठ न खुल पाता है।
सूरज का यह हाल हुआ तो धन्दा का क्या होता,
काले प्रेतो ने उसको दफना कर छोड़ा होला,
पर इबा सुरष संकट को चीर सदा चमकेगा,
काले बाइल को छाती को फूकेगा दमकेगा,
मेरी बात सुनो-~-युग-युग से यही घळा पाता है।

...ओ मेरे मन के अविनाशी!
मेरे विश्वासो में उतरो मो मेरे मन के अविनाशी
मेरे पतझड़ के फलों मे उतरो सब दिन के मधुमासी
तुम ने मेरी उत्कंठा में यह कैसी मादक लो धर दी
अकुलाये याद भरे मन में गोतो की तन्मयता भर दी
कब सीख भली विधि पाया था मैं प्रारण अलाना तिल-तिल कर
कवि की सौन्दर्य-पिपासा तुमने पूजा में परिणत कर दो.
इस मरु की धरती पर बरसो बरसो ओ मेरे आकाशी
मेरे विधासों में उतरो ओ मेरे मन के अविनाशी
मैं दृढ़ रहा अपने दिल में बहती तृष्णा का छोर यहाँ
पहचान नहीं पाया अब तक खोये मन का विनाम महाँ
भटकी भटकी सी फिरती है ये कैसी बिघुन की छाँहे
प्यासी मेरी लपला प्यासी-प्यासे जीवन का छोर कहाँ.
मेरे अवशेषों में उतरो मो उज्ज्वलता के अधिवासी
मेरे विधासों में उतरो ओ मेरे मन के अविनाशी
मेरे संशय-संशय मे तुम अपना संकल्प अगा माते
सुख-दुख को इस अनुहारो को कितनी संगीन बना पाते
प्रीम प्रभी तक हो पाई अधम थी आँत्यू को माला
मेरे मन में उमड़े जल को क्यो इतमा निष्फल कर जाते
मेरी जलधारों मे जो रस के जलधर अन्तर्वासी
मेरे विधासों मे उतरो ओ मेरे मन के अविनाशी
मेरी मासक्ति बने निष्ठा ममता अपित हो भक्ति बने
बिन जाने बिन अनुमामे जीवन की सीमा ही शक्ति बने
तुम पूर्ण प्रमरता में अपनी, है मुग्ध अधापन मेरा
मेरी चंचलता को उहका तुम तक पहुची अनुरक्ति बने
बैंच आमो मेरे सपने में ओ मेरे रागी सन्यासी
मेरे विश्वासों में उतरो ओ मेरे मन के अविनाशी
.

'एक कण दे दो न मुझको !
राक करा हे हो न मुझको ।
प्ति की मधु मोहलो का राक करा दे दो न मुसको ।
राक कर दे दो न मुझको ।
तुम गगन-भेदी शिखर दो में मरुस्थल का कगारा
फूट पाई पर नहीं मुझमें अभी तक प्रार धारा
अलवती होतो दिशा में पा तुम्हारा हो इशारा
फूट कर रसदान देते सब तुम्हारा या सहारा
जती जोवन-रसाका एक तृण दे दो न मुझको ।
एक करा दे दो न मुझको ।
जो महो तुमने दिया अब तक मुझे मैंने सहा सर
प्यास को तपती शिक्षाओ में अला, पर कुछ कहा कर
तृप्तिमे आकरठ उमड़ी श्बती थी मृगशिरा अब
राग पाती मे दबाये भो रहा मैं देवता ! तब
तुम पिपासाको बुझनका एक क्षण दे दो न मुझको !
एक करा ई दो न मुझको !
तुम मुझे देखो न देखो प्रेम की तो बात हो क्या
साँझकी बदली न अब मुझको मिलन की रात हो क्या
ढ़ान
के तुम सिंधु मुझको हो भला यह सात ही क्या
दाहमें बोहो म जो उसका तुम्हे प्रणिपात ही क्या
छाँहकी ममता भरी श्यामल शरण दो न मुझको!
एक कण दे दो न मुझको ।

ज्योति तुम्हारी ही तो जलती
मेरे स्नेह होन दीपक में ज्योति तुम्हारी हो तो अलतो
इन रेतीली प्रमाखों में अलबन्द तुम्हारी हो तो गलती
()
तुम न कभी प्राणों में छाये तुम न कभी दिल में भी नहरे
मन के मन में भी न दिखे तुम कैसे कितने भीतर गहरे
ओ मेरे आलोक देवता । अब-जब मन को बातो कॉपी
छायाकुल बधियारे ने अब जलती लों की प्रामा टॉपी
अझने का अछोर सामंत्रए लेकर आया पवन अकोरा
सचमुच ऐसा लगा किसी तुफानो ने आकर झकझोरा
नित विधास-वर्तिका मेरी रही धपेडों में ही पलती
मेरे स्नेहहीन दीपक में ज्योति तुम्हारी हो तो जलती
(२)
तृप्या-सागर को लहरो ने शशि को घने होड़ मचाई
उगे राक से अधिक चांद तो सागर की गति-मति बोराई
घेर नही पाती चांदो को बादल की सारी धियाली
रोक नहीं पाती पूनों को अगरित तारो की रखवाली
वैसे ही हर लिया तुम्हीने मेरे जीवन का तम सारा
पोस बुला लाया किरणों को प्यार भरा संकेत तुम्हारा
तुमको और निकट पाने को जीवन की हर सांस मचाती
मेरे मेहहीन दीपक में ज्योति तुम्हारी ही तो जलती
दर हो गई जीवन को सब दूरी फैली थी जो बाहर
दिखने लगी चरण की रेखा जागा जीवन जिसको पुकर
केवल पूना ही संभव है धोने का वरदान न मुझको
संभव केवल मन को निष्ठा, चरणों का मधुपाम न मुझको
तुमने क्या कर दिया कि जैसे मेरी नोंद सढ़ा को जागी
मेरे मरे खान ने तुमसे और अधि पीने की माँगो
अनायास सब हुआ, तुम्हों में मेरी बुझी साधना फलती
मेरे स्नेहहीन दीपक में ज्योति तुम्हारी ही तो अलती
२

पुकार
तुममें कहीं पुकारा।
रोम-रोम से ध्वनि पोतास उठा लन सारा
कहीं पुकारा।
यह भावाम पिपलते शीसे-सी कानों में माली
घाख गगम मरउल में बिजली येपरदा हो जाती
रात मधेरी से प्राणों में जगती व्याकुलता
सागु-अणु बन धोकार समावस के प्रदीप-साजलता
दर खड़ी संध्या-सो होकर तुमने कहीं पुकारा
तुमने कहीं पुकारा।
किसके जीवन के तट की तुम लहर भरी रंगरेलो
राकाको विरही की पलकें भर घलों अकेली
अडीभूत अंगों में केसी गहन न्यथा भर आती
अग में कितना एकाकी में मेरी प्यास न जाती
है विधना की भूल तुम्हारे भरे कराठ की धारा
तुममे
पुकारा।
१०

उतना तुम पर विश्वास बढ़ा
जितनी हम ने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढ़ा।
.
बाहर के आँधी-पानी से मन के तुफान कहीं बढ़कर,
बाहर के सब अचातो से, मन के अवसान कहीं अदकर,
फिर भी मेरे मरते मन मे तुम तक उड़ने की गति चाहो,
तुमने अपनी लों से मेरे सपनो की चंचलता दाही,
इस अनदेखी णों ने मेरी धुरूती पूजा मे रुप मदा,
जितनी तुममे व्याकुलता दी उतमा तुम पर विश्वास बढ़ा।
पासों मे एमडी थी कितने मनगाये गीतो को हलचल,
जो बह न सके थे वे ऑस् भीतर-भीतर थे तप्त निकल,
1 रुकते रुकते ही सीख गये वे सुधि के सुमिरन में बहना,
तुम जान सकोगे क्या न कभी मेरे अपित मन का सहमा,
तुमने सब दिन असफलता दी मैंने उसमें वरदान पढ़ा,
जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढ़ा ।
मैंने चाहा तुममें लय हो साँसों के स्वर सा खो जाना,
में प्रतिक्षण तुम में ही बीत् --हो पूर्ण समर्पण का मामा,
तुमने क्या जाने क्या करके मुझको भवरों में भरमाया,
मैंने अगणित मंझधारो में तुमको साकार खड़ा पाया,
भयकारी लहरो में भी तो तुम तक मामे का चाव घदा.
जितनी तुममे व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढ़ा।

(8)
मन को आधार यही, यह सब कुछ तुम हो देते हो,
च में तन्मयता देकर तुम सुख को मदिरा हर लेते हो,
ने सारे अभिमान तजे लेकिन न तुम्हारा गर्व गया,
संचार तुम्हारी करुणा का मेरे मन में है नित्य नया,
मैंने इतनी दूरी में भी तुम तक खाने का स्वप्न गढ़ा,
जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढ़ा !
मुझको न मिलन की आशा है अनुमान तुम्हें मैं कितना लं,
मन में बस एक पिपासा है पहचान तुम्हे में कितना लं,
'ओ साध न पूरी हो पाई उसमें ही तुम मँडराते हो,
ओ दोष न अब तक अल पाया उसमे तुम स्नेह समाते हो,
तुम जितनी दूर रहे तुम पर उतमा जीवन का फूल चढ़ा,
जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढ़ा ।
(6)
आभास तुम्हारी महिमा का कर देता है पूजा मुश्किल,
परिपूर्ण तुम्हारी वल्ललता करती मन की निष्ठा मुश्किण,
मैं सब कुछ तुममे ही देख सब कुछ तुमसे ही हो अनुभव,
मेरा दुर्बल मन किन्तु कहाँ होने देता यह सुख सम्भव,
Jजितनी तन की धरतो इबी उतना मन का आकाश बदा !
जितनी तमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढ़ा !
J
२

प्राण थके रोये
कर तक देखें राह तुम्हारी पर थके रोये !
मेरे यत्र तत्य को राम को भर आयात सहा दो,
अता मे बरुद्ध पड़े अन्तर का स्रोत बहा दो
केसे शान्ति मिले अब तक मह से असधार न पटे,
कैसे बल्ल मिले अव तक सपने का मोह न हटे;
जामे मेरे मन में अनम-जनम से जो सोधे,
कर तक देखें राह तुम्हारी पार पके रोये ।
मत रहने दो भग्न हृदय प्रोतमले हो इटा,
मत मिलने दो वह जो तमसे बिधुड़ गया इटा;
हो प्राप्य यह सब मुझको ओ तुमसे आज मना,
केवल होता रहे सदा तम पर विश्वास धना;
विलग हर का मुझसे जो तुम में जा खोये,
कब तक देखें राह तुम्हारी पार थके रोये ।
ले लो सब तृष्णाय ओ तुम तक न पहुच पाई',
ले लो असफलतायें जो अपने में अकुलाई,
बुझ जाने दो दीप-शिखा जो तुमसे नहीं ली,
झूठी मेरी तन्मयता प्रो तुममें नहीं फाली
दो मुझको सन्ताप गये जो तुमसे हो धोये,
कब तक देखो राह तुम्हारी पारा थके रोये ।
दूर करो दुख के भय को सुख का अभिमान हरो,
मेरो सुचि-सुधि में अपने सुमिरन की ज भरो;
मेरे संशय-संशय मे जय घोष तुम्हारा हो,
मेरी अनियन्त्रित गति में सन्तोष तुम्हारा हो;
कब तक मेरा मन सपने को मरु भूमि पर बोये ।
कब तक देखें राह तुम्हारी पारा थके रोये।

ऐसी मेरी मति मारी
पल पर पदज्ञ न पाया मन को ऐसो मेरो मति मारी
मेरे पग पीते पाते हैं ऐसी मेरी गति हारी
(१)
तुम से सदा लिपाता आया में जोवन को कमजोरी
तुम्हें नहीं संचित कर पाई मेरी घंघळता मोरी
सदा बटोरे फिरा हृदय में मैं प्रमाद को अस्थिरता
मेरे भीतर सदा रहा सन्देहों का मादल घिरता
(उस्तो रहीं मुझे रह रह अपनी असफलतायें सारी
पल भर बदल न पाया मन को ऐसो मेरी मति मारी
(0)
मान लिया तुम जीत गये हो में अपनेपन से हारा
बिना उमे ही इब गया मुझमें मेरा जीवन तारा
फिर भी मैं इतने प्रवरोधों में एकाको खड़ा रहा
रवि से विपुड़ी धूप सरीखा मैं कुम्हलाया पड़ा रहा
सहा न आता तेस तुम्हारा मुझ से मेरे अवतारी।
पल भर यदल न पाया मन को रोसी मेरी मति मारी
डिगती रहो कामना मेरी रह न सका विश्वास प्रचल
तुम तक पहुच नही पाता है मेरे प्राणों का संबल
तुमने अपना स्नेह भरा पर जल न सका मेरा अन्तर
कभी समर्पण के दीपक में ज्योति नहीं जागी पल कर
कभी न सपने में भी मुझ से सूटी मेरो अधियारी
पल भर बदल न पाया मन को रोसी मेरो मति मारी

मेरे दन्द्रों को निर्मित कर तुम ही हो उनको सहते
मैरी खठित सृयाओं से तुम्ही तरसने को कहते
मेरी दृट्टी तन्मयता को क्यों तुम लोड नहीं देते
क्यों तुम मह में पकड़ी पळधारा को छोड़ नहीं देते
मेरा वहमा रोके है एलमा को बट्टानें भारी
पहा भर यदा न पाया मन को ऐसी मेरी मति मारी
नहीं चाहता अपने मन को मेरे मन में लय कार को
'महीं चाहता मैं तुम पतित को महिमामय करलो
शेष भले हो अभी बहुत अभिलाषा में धोखा खामा
पन्ध भले दुई हो अतिशय और भले हो अनाना
सदा भटकता रहे नियति मनकर मेरी ही लाधारी
पल भर बदल न पाया मन को ऐसी मेरी मति मारी
A

कलाकारको बिक्री-
१
माज प्रभावोंने दाताके मागे होती है फैलाई।
माज गरीबी ने आ-आकर धनको अपनी भीख सुनाई।
जीवनभर था ऊँचा मस्तक ऊँची चितवन धीमभिमानो ।
मेरे मनके गौरवमे थी अब तक अगसे हार न मानी।
अब तक मेरे पादशौँका खान बिलकुल धा मुरझाया।
प्राज अकम्पित पौरुष मेरा धनके आगे विकने आया ।
૨
मैंने अपने विश्वासोंके बलपर सबसे लड़ो लडाई
घाह नही थी मुझको सुखको कभी न मैंने प्रॉख गड़ाई।
या संकल्पोंकी माशासे अगमग मेरा द्वारा जीवन !
शक्ति किसी ने वह दे दी थी शंकित होता था न कभी मन ।
या अभिशापोमे भी प्रविजित मेरा अंतर सुखमे इबा ।
संतापोंके अलते महमें में न कभी बरा भरको उज्बा ॥
तुम क्या समझोगे उसका दुख उसके जलते मनको ज्वाला ।
जिसको उडती ज्योति-शिखाका विष पीकर मर गया उजाला ।
- वह विश्वास-सृजनकी पीड़ा झेल जिसे कविने था पाया।
जीवनभर संघर्षों मे भी पाला जिसका गीत सुनाया
आज उसीकी अरथी सजती पाए म जैसे धीरज धरता।
उका बनकर देख रही है माँ इकलौता बेटा मरता

'मत टूटो
मत इट्टो मो मेरे जीवन के संरित सपने मत दो।
तमने ही मेरे प्राणों को अलने की रीति लिखाई हैं;
तुममें ही मेरे गीतो ने विश्वासमयी गति पाई है,
मेरे इबे-इबे मन का तुम ही तो ठौर ठिकामा हो
मेरी आवारा खिो मे तुमसे हो लगन लगाई है
काँटो से भरी विफलता में प्राधार में जीने का ल्टो
मत दृटो ओ मेरे जीवन के संचित सपने मत दृटो !
तुमको मनुहारा करती हैं ये दर्दीली प्यासें मेरी
तुम तक न पहुच क्या पाती हैं उत्पीडित प्रमिला मेरी
मेरी संतप्त पुकारें तुमको अब तक पूज नहीं पाई
मेरी मदरता को क्या जीवन दे न सकी साँस मेरी
तुम रोते-रोते ही बोतो मेरे सुख के घट मत फूटो
मत इटो ओ मेरे जीवन के संचित सपने मत दृट्टो
जीवन भर में पध मे भटका तुमने मुझको खोने न दिया
अर्पण में भी असमर्थ रहा लेकिन तुमने रोने न दिया
मन मे जैसी उत्कंठा थी वैसा तो जाग नही पाया
लेकिन तुमने क्षरण-मर मुझको अपमा होकर सोने न दिया
मत मंत्रित मन का दीप बुझा मन्धियारी रजनी में स्टो
मत दृटो ओ मेरे जीवन के संचित सपने मत दो।
नभ में उग माया शुक नया जीवन की आधी रात दली
सब दिन सुखदुख में हो रही सब दिन पीड़ा में प्रीत पली
उतरी माना-सी सकुचाई मेरी ममता छाया-छल में
इस मध्य मिशा में भोर छिपा इसमें किरणों की बंद गली
कल्पित रस जी भर ट धुके अब जीवन के विष भी धू टो
मत दटो ओ मेरे जीवन के संचित सपने मत दो।
a

• नम के तारे की क्या आश
अब घर ही का दीप बुझ गया, मम के तारे की क्या प्राशा ?
इब गई जब जीवन-जौका, दर किनारे की क्या प्राशा ?
बिधु सदा को गया, रहा ो हरदम इतना बडा समोपी;
कब-कब सुनी गगन ने तृष्णा में जलते चातक को 'पी-पी' !
बिधुड़ सदा को गया, रहा जो अन्तर में आलोक जगार
सूख सदा को गया, सुरभि मे जिसके प्राण घिरे, मंडरारा;
मेरे ऊपर सिमटी माती घमे धेरे की दीवारें,
शेष निराशा है काजल की घटते मन की मुक पुकारें;
अपना ही अपना न हुआ, आकाश-विहारी को क्या पाशा !
अब मन ही का फूल मर गया,क्या आकाश-कुसुम की पाशा !
(२)
कैसे देगा साथ, चमकता है जो इतने उपर, बाहर ;
कैसे प्यार करेगा मुझको, जो सुन्दरता से भी सुन्दर ।
कैसे ताप हरेगा, जो आवाज नही दिल की सुन पाता ;
कैसे ज्योति मरेगा, अपमा स्नेह न जो नीचे दुलकाता
कैसे अपने देश बसेगा, जो सपनो का बना विदेशी
कैसे स्वप्न-लोक से नीचे उतरेगा किरणो का वेशी।
अब अपना ही गीत मर गया, नभ के गीतो की क्या आशा !
जब अपना ही गीत हर गया, नम के मोतों को क्या माशा !
..
सचमुच बडे छली है, ये तो केवल प्यास बांटना जानें;
नये मशीले घाँद भला ये कब धरती का मन पहचाने ।
इनको चितवन में मदिरा है, इनके मारा बड़े निर्मोही;
ये केवल देखा करते हैं अपनी छवि को अपने को हो ।
इस आकाशी ज्योति-शिखा का कौन भरोसा, कोन सहारा;
अब घर हो का दीप मर गया असमय सफता का मारा।
अब घर ही का दीप खुल गया, नम के तारे को क्या आशा !
इब गई अब जीवन-नौका, इर किनारे को क्या आशा ।

मांगे भी नहीं मिलते
हमे तो स्नेह के दो बूंद मागे भी नहीं मिलते
पडे हैं खप्न जैसे रात के वीरान साये हो
पडे अरमान से अब हमेशा को पराये हो
अंधेरा इस कदर छाया कि भय के मेघ छाये हो
किसी के स्नेह के दो द मांगें भी नहीं मिलते
न प्रा गीत होता है न मन का मीत मिलता है
अकड़ ले प्राण प्राणो से न. वह मनजीत मिलता है
विकल है बुद खाती को.न कोई सीप मिलता है
हमें तो स्नेह के दो बोल मांगें भी नहीं मिलते
चिरी पाती घर्दिक अधबुझो तृष्णा बुझे मन की
सिसकती, जती, कुघली गयी ओ प्यास जीवन की
सहा को छा गई हर सांस मे प्रावास बिधुन की
हमें तो स्नेह के दो द मांगें भी नहीं मिलते।
A
समय
की

मानबूझ कर नहीं जानते हो तुम मेरे मन को भाया।
ठोक तुम्हारे आगे गुलको निगल गई है घनी निराशा ॥
कभी न भाता और न जाता यह कैसा संचार तुम्हारा ।
मुझे लय किरा था पहले भी ममतावाही मौन तुम्हारा ।
पडा अधबना नीड कल्पना का तुम मुझको छोडे जाते।
कैसे पध के राही तुम उम्मीद सनर की तोड़े आते ॥
सदा अपरिचित ही हम रह जाते कितना अच्छा होता।
जीवन पर पर कभी न मिल पाते कितना अच्छा होता ।
सg
AK

चाँदनी
चाँदनी में आज केवल घोड़की बाले करो!
प्रेमके इस राजपथपर मिल गये हम आज फिर
उग रहे आकाशको भरते हुए तारक शिशिर
माज ओ मधुरिरी। आये हगोमे स्वातिर
चाँदनी में माल केवल चाँदको बाले करो!
लग रही कटि को तुम्हारी किंकिणी जलधार-सी
कंकोले उठ रही है मन्त्रिता इनकार-सी
कनक बेसरके नगोंको ज्योति पारावार-सी
चाँदनी मे पास केवल घढिकी बाते करो।
हैं चमकते संगमरमर-से तुम्हारे अंग खुल
'हो मुंधे ज्यों कुन्तलों में मोतिया मोती मुकुल
हैं तुम्हारे रुपका सासाज्य यह अम्बर विपुल
घाँदनी में आज केवल चाँदकी बात करो।
बँध गया सौन्दर्य चितवन मे तुम्हरी अग मगर
आज तुम ओ भी कडो संगीत-सा होगा मधुर
ना पड़ा धनसार का उज्ज्वल दोबा तामकर
चाँदनी में प्रास केवल घाँदकी बातें करो!
मुख

खुले शिशिर की श्याम घटा
-
तुमसे कितनी मिलती-मुश्ती खुणे शिशिर को श्याम एटा।
तुम सो नही बरसती मुझ पर यह अल को अविराम घटा ।
कची धूप तनिक सो निकजे तो शरमा-शरमा आए ।
उडते विहगों को टोली में ठिठके और लमा आए।
सहसा हवा घले तो खुशबू से खेळे बाहें खोले
इर देस को लहर उठे तो सकुचो बोराई डोले ।
गोरे सपनों को जैसे हो नीली-जोली घनी लड़ी।
तुम्हें देखता ही रह जाऊँ मेरी तृष्णा बहुत बड़ी॥
पवन परस से मुंह पर मा जाती मेधित अमिराम लटा।
तुमसे कितनी मिलती-जुलती खुले शिशिर की श्याम घटा ॥
धमी हुई माशोक-सहरियाँ तुमको सूकर खुल जाती।
मुंह पर बन्दनवार सजातीं मोती और मुकुल लातों ॥
मुदी गगन की पलकें भीगे तारों को चितवन लेकर।
रंगे सविरे द्वार नयन के तुमने कब खोले पल भर ॥
सिक्त नीलिमा के शिखरों से वह न कमो नीचे उतरी।
तुमने मुझको कब पहचाना तुमने मेरी माश हरी ॥
पदा कुमारी नीले सीपों की घाटी को नई छुटा।
तुमसे कितनी मिलती-मलती खुले शिशिर की श्याम घटा ॥
वर्षा बीती शरद सो गया मागों तुहिनों की परियाँ ।
आगो नई भव्यता तुम में और नई सुषमावलियाँ
तुम-सी दूर-दूर रहती है यह मदमाती मामवती।
केवल मुन्ध पुलक की सिहरन को ढाबे रहती हसती ॥
कच्चे रंगों-सा धुल-धुल कर बह जाता मन का मर्मर ।
दुर्बल मेरे पंख तुम्हारा ऊंचा कितना रूप-शिखर ।
तुम-सी नहीं सोचती यह घातक मे कितना नाम रटा
तुमसे कितनी मिलती-जुलती खुले शिशिर की श्याम घटा
.२४

J
परदेशी सौरभ चला गया
अंत गया, तो मधु-अतु का परदेशी सोरम चला गया।
फिर वसन्त का छलिया सोरम घेत गया तो चला गया।
विटपी-विटपी बंधा पी रह गई मोह के पाश में;
यही प्रीति को रोति, गया को, सुधि उसकी हर साँसमें ।
दो दिन का था घाँइ, सजो दो दिन सपनों की चांदनी
कहीं उड़ा ले गया एवन रस क बहार की रागिनी ।
कोयल के घुप होते ही मधुपों का गुअन चला गया;
चैत गया तो मधु-लोभी बिहुगों का मर्तन चला गया।
स्ने तरुओं को छाया
में परे खड़े उदास-से;
देख रही इबी हरियाली शैण-वनों को प्यार से।
खेतों के मोले, कजरारे घाट खड़े उन्मन-उन्मनः
नई-नई फसलों के गोळे हुए विषादाकुछ लोचन ।
डाळी-डाली पर रोझा निर्मोही सौरभ घळा मया;
चंत गया, तो ममभारा परदेशी सौरभ चला गया।
S..
8
२५

पूरी बाजी लगी कहाँ!
पीत-हार का बात भी क्या, पूरी बाजी लगी कहाँ।
तृप्ति-प्यास की बात भी क्या, पूरी तृष्णा अगी कहाँ।
कौन सहारा है प्यासे को मरु के मृग-अल से बढ़कर;
कैसे कराठ धकेगा, कसे स्वर पथरार दलकर?
कितने गान बचे हैं, जिनके बोल नहीं अब तक टूटे
कितने खप पड़े हैं, जिनके प नहीं अब तक फूटे ?
ममी तपन का अन्त कहाँ, को घौमासे को पास करें;
कैसे इतनी रात रहे किरणों का विफल प्रयास करें?
लोट-लोट मा हो जाती है, जो की शंका भगो कहाँ;
जीत-हार को बात अभी स्था, पूरी बाजी लगी कहाँ।
कुचो जीवन का सारा उत्सर्गन सक्षित हो पाया;
उमड-रे सागर का सारा स्वार न सक्षित हो पाया।
मन को सारी शक्ति प्रभो तो भोंगी-भोंगी कुहराई;
कब सर्वख-समर्पण को ज्वाला मुझमें पलने पाई !
कहाँ किनारा अब दो पाटों में छाई इतनी इरी;
प्रगति नहीं है मुझसे आगे चलती मेरी मजबूरी।
हो तन-मन मालोकित, ऐसी प्राणों में जगमगी कहाँ;
जीत-हार की बात सभी क्या, पूरी बाजी लगी कहाँ!
प्रो बा तभो कि जब मन का विधास म काप
भीतर-बाहर की चिन्ता मन का सङ्कल्प ने दांपे।
Vक्या है ओत- हार माननेवाली एक पराजय;
क्या है तृप्तिमर मदरता पर अभिलाषा की अस्य ।
पास पहुँचकर फिर उतनी ही दूर चली जो जाती;
मेरी लगम में प्री होती और न मिटमे पाती।
अमित पथिक को साँझ सभी काली रातो ने रँगी कहाँ
जीत-हार की बात अभी क्या पूरी बाजी लगी कहाँ!

कब किससे? कब किससे मन मिल जाता है आँखों के मिलने के पहले ? जो लगता आज बहुत बाहर वह प्राणों तक छा जाता है; जो दिखता माज बहुत ऊपर वह तन-मन को महलाता है; सहसा जीवन की शा बदली की निर्धमता शरमाई भरमाये पन्थो की सम्ध्या फिर सपनों के वन में आई कब गन्ध पवन ले आता है कलिका के खिलने के पहले ? कब किससे मन मिल जाता है आँखो के मिलने के पहले ? मैं जान गयो था पहले ही अपनी वाणी की वचकता मैंने सब दिन पहचानी थी अपने भावों को रचकता निर्धाक सब था सहमो-सहमी धी मन की तन्मयता प्राण निपट एकाको दुख में डूबी थी दुख की मधुता; कब गीत स्वयं रच जाता है छाती के छिलने के पहले ? कब किससे मन मिल जाता है माखो के मिलने के पहले ? २०

है
का
वह घाँद बहुत ही बड़ा उठा
घुक गया गगन का अधियारा
अगमम वारों को घाटी
शेलों
पाया उजियारा;
पर मन को
रीत निराजो है
आकाश अनोखा जीवन
अनामे मनदेखे भो
सन्ताप सुझा जाता तन का
कब कहाँ घाँदनी उग माती है
चांद निकलने
कब किससे मम मिल जाता है
आँखों के मिलने के पहले ?
के पहले ?
VALI

मैं मिली तुमसे
में मिली तुमसे कि जैसे धूप से छाया मिली हो
दीप से बातो मिलो हो प्राण से काया मिट्टी हो
मैं मममी घी मिला था जय नहीं वर तुम्डे
में प्रबळी ही पड़ी थी बम थी पहन तुमसे
मुझ प्रबोलो अनकही को कह दिया तुमने जग
रह गये ये प्राण मेरे मुग्ध भावाड दिन
राक तुम हो जो बहुत-सी बात का पता
राक में ह कुछ म कह पातो मेरे
सोच भी पाती न क्या सुटतो हादरली
तुम न समझोगे सहन में क्या स्टिक
में मिली तमसे सज्जादै सर्वस
मैं मिझो तुमसे कि दंगे में हमारी
तुम माने धयों को इसी
किन्तु दुर्बन मन न मेरा ता की समान
आन मी सकते न तुम र बदिती imge
ये सती साधे रंग प्रत्यक्षी गर पता
माहतो रहती कि मेरी याद OFTET Ang
मामता करता यह कारगम
दूर रहती हूँ मुझे हर्न २ रा
पर मिलनों और भी धीमी दान मे
में मिट्टी हम किसे मरण in गर्म
रासको वंशी अधरपर नौं fire anो पवन

नाच उठतो शिशु सरीको क्यों अधो अधबनो में
भर अभय दोनों मुझे लगते अनोखी अनमनी में
जो न पा सकती से छोई भला किस भांति पाकर
सिद्धि मनसे भला था स्वर हो रहती अनममर
श्वासका हर कम्प लगता है म्हारो यामा
शोल कहता पर एशाना भी तुम्हें मुझको मना है
जन्म जन्मों के पटों को घोर तुम तक दौड आयो
कल्प-कल्पों के सुसधित पुरय फल में महायो
में मिली तुमसे मकेशीकी अकेली मैं अकेली
में मिली से रुधे आकाश से मिलती जेलो
J
र मुझे लगता बड़ा खाली न हो पहचान का घट
दो मुझे आपत्ति में विधाम-दो ऐसी न घटपट
जानकर अनमान बनतो मैं अनोंदी को रटन-सी
जागरण की सास भी लगती मुझे कैसी कटन-सी
अध जगी-सी भैरवी में स्वर नाभर पातो तुम्हारे
नित नये आनन्द से बजती तुम्हारे ही सहारे
तुन बने माराधना के बाद तुमसे प्यार भी क्या
तुम मुझे अप्राप्य इतने हो कर गार भी क्या
पा गयो तुमको चिन्ही पास ज्यों विश्वास पाणे
लाज रंजित साँझ असे भोर का सपना सजाले
MaraRedmraaml

जीवन नौका
तुफानी झंझा में दो पतवार में कभी रुकेंगे,
मोका लहरो से टकराये पालन कमी झाकेंगे।
कुचल रहा मन के साहस को मेघों का घन गर्जन,
भरा ध्वंस के अंधियारे में भयकारी प्रावर्तन,
#वरें उल्टी साँस ले रही घटनभरी अकुलाकर,
सब प्रदीप्त महान बुझ गये असे मझ में अलकर,
चली आ रहीं तम की छलनार धीरज पीने को,
लगता है सचमुच लालो पड जायेंगे जीने को।
पर ऐसे में भी मेरे विश्वास न कभी चुकेंगे,
तुफानी झंझा में दो पतवार ने कभी रुकेंगे ।
दिन भर रहो भटकता मेरा दिवाखा प्राधारा,
सुनता रहा एकारें तट की मन आशा का मारा।
• कौन झेलता वेग प्रलय का यदि यह नाव न होती।
पा के घड़े तमे तेवर की बातें किससे होती?
कोम थपेड़े तूफानों की अपने गळे लगाता,
बढ़कर कौन मरण की प्रासंका का धुआ उड़ाता,
प्रास बचाने को ये हो गतिवान न कमी लुकेंगे
तुफानी झंझा में दो पतवार न कभी रुकेंगे ।
भले बदल जाता हो जीवन लेकिन कभी न मिटता,
प्रबल मन में भी आगत का स्वर कमी न पिटता!
है परम्परा अमर ज्योति को रोज सवेरा जाता
लेकर नई किरण की सांसें रोज उप्रेला लाता।

भयकम्पित पैरों से दुर्भागो बादल कट जाते,
अन्धकार-माइत रात के प्रेत सभी छुट जाते ।
इस बीहड़ महिया में दो पतवार न कभी रुकेंगे।
मौका लहरों से टकराये पाल म कभी सकेंगे।
ऊपर-नीचे गाढ़ा-गादा एन्द उठा भराता,
पाळ प्राय श्वासों से फूले जल रह-रह धुआता !
काला रूप फटा पड़ता लहरों में नहीं समाता
बनी यईलाकार प्रकृति उन्मत पवन उफनाता !
घर हो गया धाँद दिशार कट-कट कर रह जातों
विप्लव के दर्पण बन कर ये फूट गई चलाती
तुफानी झंझा मे दो पतवार न कमी रुकेंगे!
नौका लहरों से टकराये पाल न कभी झुकेंगे।
"
मुझे लग रहा यह सब है वरदान तुम्हारा हो तो।
इन झटकों में मुजित है जयगान तुम्हारा हो तो !!
इब गया यदि सुख का दिन तो उसे इव जाने दो
आती है मरघट-सी कालीरात, घली मामे दो !
यह संकट को घटा शक्ति का मान तुम्हारा ही तो
इस दुर्दिन में ज्ाह्मत पन का मान तुम्हारा ही तो
ज्वाला में भी पूजा के अरमान न कभी फुकेंगे,
तुफानी झंझा में दो पतवार न कभी रुकेंगे।
नहीं चाहता ह तुम दुस्तर नद का पार दिखा दो,
नहीं चाहता मेरे हारे मन को जीत सिखा दो।
मैंने तुमसे अब तक मंगलकवच न कोई मांगा
पल भर को भी कोई अनुनय-भाव न मन में जागा
उठे तुम्हारे शाप गरज कर जीवन में दल के दल
रहा मुझे प्रतिक्षण ही अपनी ही तन्मयता का संबल
मेरे वन-हदय के ये संकल्प न कभी दुकेंगे
गुफामी संझा में दो पतवार न कभी रुकेंगे ।।

भरमाते हो माव तुम्हों अन्धड़ में, तुफानों में
तुम्ही शक्ति भरते छाती में, स्वर भरते मानों में
ज्वार उठा जाते हो जीवन की तरंगमाला में
सौ-सौ जोमें फैलाये लहरें उठती ज्वाला में।
यह झंझा लोडित गजित मंझधार तुम्हारा ही तो
मेरे साहस का, गति का अम्बार तुम्हारा हो तो।
तुफानी झंझा में दो पतवार न कभी रुकेंगे।
मोका लहरो से टकराधे पाल ने कभी झुकेगे।
रात

ओ मेरी जन्मान्तर साथिन ! रोम-रोम कहता तुम मेरी बड़ी पुरानो प्यास हो ओ मेरी जन्मान्तर साधिन! बडी पुरानी प्यास हो प्राणों की पूजा अनम-जनम को सखी। भला कैसे न तुम्हे पहचानता बिधुड़ी-बिधुड़ी याद लिये मन कब से तुमको जानता कितनी तृप्ति मिली थी तुमको पहली बार निहार कर कैसी गंज उठी थी अन्तर मे तुमको मनुहार कर तब से प्रतिक्षण यही लग रहा कितना तुम्हें एकार ल के पहले कितना तुम पर वार दिल की हर धड़कन कहती तुम बडी पुरानी पास हो रोम-रोम कहता तुम मेरी बडी पुरानी प्यास हो (२) थक गया हूँढ़ता तुमको पूरे देश में ले अतृप्त तृष्णा फिरता था अपना ही अवशेष में सब संवादी खर सोये थे असफलता को हार में. कर उन्हें अगाया तुमने एक नये संसार मे पाकर दरस तुम्हारा व्याकुल हुआ परस के ध्यान में तुम आकर छा गई युगों से खंडित मन में प्राण में तुम युग-युग से पले चेतना के सपने को साँस हो रोम-रोम कहता तुम मेरी बड़ी पुरानी प्यास हो होर-ठोर ./ कहीं मिलेगा तुमसे बदकर सुन्दरता का देश क्या हो सकता है तुमसे बढ़कर पावनता का वेश क्या सोच नहीं सकता था जो मैं वह सब तुमसे कह गया रातो-रात अमरता की भाषा बनकर में रह गया से प्रधम मेघ सावन का जलते मरु पर छा गया प्रगस्ति मधुमासों काज्यों हिल्लोळ विजन फिर पा गया दर कही भी हो तुम मेरी आत्मा का अधिवास हो रोम-रोम कहता तुम मेरी बड़ी पुरानी प्यास हो

मेरे पुरयो को निर्धनता तुमको देख लजा गई
मेरे पापी तन को कालो कैसे तुमको भा गई
मेरी जूठी प्रोति तुम्हारी स्वीकृति कैसे पा सकी
मेरी दरको माह तुम्हारे मन में कम्प अगा सको
मेरी तन्मयता को पूंजी कब को कितनी टुट गई
मेरे सब एकान्त समर्पण की निर्मलता घुट गई
तुमने मुझे उबारा पातक से--तुम पुरय-प्रकार हो
रोम-रोम कहता तुम मेरी बड़ी पुरानो प्यार हो
(५)
तुम न सुनोगी तो मैं किसे पुकार गा संसार में
सुम न रहोगी पास कहाँ देखंगा सुख का दाद*
तुम ने घुओगी पाऊँगा कैसे गति का संचट में
तुम न भरोगो स्नेह अलूंगा कैसे ?
इर-निकट की बात नहीं यह मन को
जनम-जनम से चलती आई यह पुत्र
इसो चिरन्तन पूजा का तुम मा
रोम-रोम कहता तुम मेरो नही र

"सावन-भादों-
पहिन लहरिया आसखी होगी यया उसी अटारीपर किर
तुम मेंहदी-रंजित हथेलियोपर रख अपना चिन्ताकुल सिर
जीवनका समस्त उमापन होगा धके हृदयपर छाया
मटियारी पावस-संध्याका धुंधलापन ज्यों सिमट समाया
आती होंगी याद तुम्हे भी वे अतीतमें इबो या
जिनमे कट जाती धी मिन सोये कितनी घरसाती रातें
बाहर फूटा करते थे नममें असंख्य झरनोंसे बादश
भीतर हेरा करता था मैं अपलक प्रान्त हगोंका काम
आप धके प्राणोंमें लेकर याद उन्हीं घड़ियोंकी रानी
तुम घुपचाप खडी होगी उफनाता होगा मन अभिमानी
इर खेतसे सुन घरवाहेको वंशीका मर्म-मधुर स्वर
माता होगा झिाली झनकारोंपर जो प्रतिक्षर बहराकर
क्या न ममोसे भारी हो उठतो होगी मुस्कान तुम्हारी
एक चमक-सी आती गहरी कर जो मानसको अधियारी
उस सतरंगी चुनरीमें भरकर खोये साधीकी ममता
आज खड़ी होती तुम जैसे मेघनीका स्रोत न धमता
भाल घूमते होंगे पुरवयाके झोंके आ जंगलसे
सिंचित करते होंगे तृष्णाको बाती सिहरनके अलसे
कन्दन करता है मेरा तन-मन अपने ही चीत्कारोंसे चिर
पहिन लहरिया माज खड़ी होगी क्या उसी पटारीपर फिर
तुम मेहदी-रंजित हथेलियोंपर रख अपना चिन्ताकुक्ष सिर

'दीप जलमें बह चला
दीप जलमें बह चला
कूलमे वन्दी विरहकी ज्योतिका प्राधास ले
एक भीगी वेदनाका खप्न ले उल्लास ले
दीप जलमें बह चला
साँझ होते ही नमित मुख भागई वह बालिका
मर्म-शंकित वक्ष-कपित अधखिली शेफालिका
दीप अलमे बह चला
नोदकी माती मिशा-सो किरण आँचल मे छिपा
एक कणमे मरण-जीवनकी मिलन-ज्वाला दिया
दीप जलमें बह घला
इर ऊपर व्योममे मुसका उठी नव तारिका
ले घली सरि गीत जिसका तृषित वह नीहारका
दीप जलमे बह चला
स्वर तरंगोंके लिये आते कहाँ अशातमें
ज्योतिमें निज ज्योति भरने दीप्त झझाबातमें
दीप जलमे बह घला
राम

करेंगे अब हम तुमको प्यार नहीं !
मा होती नाराज करेंगे अब हम तुमको प्यार नही
मिलते ही तुम लेते मुझको घेर स्वप्न के साये में
भर देते हो कैसो बिजलो मेरे मन भरमाये मे
प्राण मिला देते प्राणों से मेरी माखें मोंच कर
तन में लो-सी लहका देते मन मदिरा से सींच कर
दुपहर आती बीत करेंगे अब हम तुमको प्यार नही
मा होती नाराज करेंगे अब हम तुमको प्यार नहीं
घरटों दिल धडका करता है मेरा इसके बाद भी
तुम आते हो और तुम्हारी आती प्रति क्षरा याद भी
थाह न पाती इस उलझन से भूल न पाती खाद भी
इस बेचनी के मौसम की हो किससे फरियाद भी
है कैसा यह खेल करेंगे अब हम तुमको प्यार नहीं
मा होती नाराज करेंगे अब हम तुमको प्यार नहीं
जामे मन कैसा करता खिचता है तट की मोर रे
पाकुल पत्तो की वीणा मर्मर का ओर न छोर रे
रंगभरी रवि किरणे फुलझड़ियों सी पड़तों घट रे
| देते बेणी खोल घुटोले मेरे आते टूट रे
गंध लटो में फूल करेंगे हम फिर सब गार नही
मा होती नाराज करेगे अब हम तुमको प्यार नहीं
मैं शरमाती अपने गालो को लाली में डूबती
मैं बल देतो अपने माँचळ को दांतों से दुबती
में कोई देख न ले फिर कोई देख न ले लो मैं चली
मेरे तन में कम्प कपी तुम भर देते हो छली
तुमको लाज न लगती तुमको होता तमिक विचार नहीं
मा होतो नारा करेंगे अब हम तुमको प्यार मही
१६

गन्ध कनक चम्पा को लेकर चली उनींदी बात फिर
नोंद नहीं मेरी आँखों में मन सहता आधात फिर
पवन कंपा देता है रह रहमयी भाव को तीर पर
घोक रही हैं तम की साँसें मन में उठती पीर पर
है ऐसा क्षण कॉम कि उठते तुमको प्राण पुकार नहीं
मा होती नाराज करेंगे अब हम तुमको प्यार नहीं
मित पायेंगे गागर भरने इसी घाट की राह पर
बैंन मुडा लेंगे बातें कर नहीं करेंगे चाह पर
यदि छलकेगी व्यथा हगो से चल देंगे मुंह फेर कर
चल देती है लहर किनारे से क्यों बाढे फेर कर
भले पहुंच पाती फिर तट तक उसको विकल एकार महों
मा होती मारा करेंगे अब हम तुमको प्यार
-
रावण

यह फागुन की रात
यह फागुन को रात भोर में विकल पड़ा मन मारे ।
मेरे गीत मन गये रोदन, हसी व्यथा का पानी,
तुमसे विपुड़ बन गया में अपनी हो कररा कहानी,
मेरे घुझे हृदय पर घोंमुख याद तुम्हारी आती,
मन के मुंदे धुंधलके में जो सिर धुनती मंडराती,
तड़प सिसकता है अधजला अधमरा ज्यों परवाना,
शेष जिसे सब मुझी शमा पर है केवल मंडराना ।
भरे तुम्हारी याद तृषित मन मेरा,
है खग का कितना सुनसान बसेरा।
बाहर घरस रहो स्वों की शोभा मा से झरसर,
जैसे सुपमा के मुकुलों का फूट पड़ा रस भ पर,
भरा विरह का सिन्धु, बोच में,
चन्द्र ज्वाज सी दीप रही तुम उस तट,
मेरे प्राणों का कोको तुम्हें पुकारे,
यह फागन की रात और में विकल पडा मनमारे ।
(२)
गुधी पडी योवन के शिखरों पर वसन्त को माया,
है सोहाग को रात धरा ने दुल्हिन का मन पाया,
इबी जातो सृष्टि तरंगित कस्त्री के मद में,
रूप तुम्हारे भव मनों का बिम्बित सुधा अशद में,
तुमने भी साजी होगी ऐसी अंबिधारी घोलो,
मधु-गुजित होठों ने होगी नवल माधुरी घोलो ।
चमक रहा मन चम-घम चांदी को बेला-सा,
होगा कबरी में नव कलियों का मेला-सा,
झरनों के मर्मर-सा आँखों का आकाश तुम्हारा,
आग रहा होगा बस उसमें मेरी सुधि का तारा,

फैल न पातो
अधर रेख सिम्टो सिमटी सो रह जाती,
छिपा रही मुख मधु बयार ओसों के धन में
किस विवाद के मारे
यह फागन को रात और में विकल पड़ा मन मारे।
किस पर कर दे रात मिलन का सुख-शार निष्ठावर
उड़-उड़ बहते सौरम का मन रुके कहाँ शरमा कर,
तुम न दिखो तो किसकी राह निहारे पन्ध सजाये,
फूलों को रज-केशर किन घरखों से लिपट जाये,
यह वसन्त त्योहार सभी का केवहा एक न मेरा,
भरभो को श्रा ने भी अब खोया उल्लास न फेरा,
गुजित पंख मधुप के प्राज कटे है,
कोकिल के स्वर से आज फटे है,
किस सुन्दरता से प्रसिक्त हो मधु को मात्मा काँपे,
किन नयनों की करक-कोर से रति को ज्योल्मा काँपे,
मुझे घेर कर अब न बरसते शोभा के धन,
इस तरसे-तरसे-से मह की वोरानी में
शेष नहीं अब एक तृप्ति कण !
अपनी हो तृष्णा से अब ये प्राय सदा को हारे,
'यह फागुन को रात पौर में विकल पड़ा मनमारे

बापू
जो पाप धराके धोते हैं दुनिया उनका लोहू पोती।
जो मरुको जीवन देते हैं दुनिया उनका बध कर जीती !
है बात बड़ी पामरताको
है कथा मनुज की पशुता की।
युग-युगके एण्य-विधाताका नर कैसे प्राण हरण करता
जन-अमके सन्मतिदाताकी सांसोंकी गति कैसे हरता
है बड़ा पुराना रोना यह !
'जो चीर मरणको अधियारी घर-घरमें सुधा-ज्योति भरता
जो हिंसा-घृणा और मयसे जन-जनके हृदय मुळ करता,
जिसको जीवनधारा प्रतिक्षण सपनोमें सत्य कहा करतो
मन्दिर-मन्दिरको प्रतिमामें ईधरताको आग्नत करतो
मानव ही उसपर वार करे ?
नर हो उसका संहार करे ?
जिसके पुन्यों की छाँह तले करुणाकी बेलें लहराती
जीवनभर सबपर प्यार भरी थी जिसकी दृष्टि सदा जाती
जब-जब पथपर तम महराया जब-जब प्रकाशका पंध मुदा
उस रवि-सारधिकी दीप्ति सदा किरणोंके दोष अला जातो
जड़ है अन्धा इतिहास मगर
यह नस्ल जिसे कहते मानव पशुओंसे रही गई बीती !
जो तार जगतके पोते हैं दुनिया उनका लोहू पोतो ।
विश्वास नहीं होता सचमुच
ऐसा भी क्या होता है कुछ
जो प्यासी पृथ्वीमें ममताका सिन्धु बहाने आता है
जो आजादीकी गंगाको भूपर विमुक्त कर जाता है
जगकी शोषित मानवता जिसपर आस लगाये बैठी थी
दलितोको मातएकारों पर जो घर-घर दौडा जाता है

नर उसका हो घातक होता ! कळतक जिसको पूआ अपने हाथोंसे आअ उसे खोता ! विधास महो होता सचमुच मानव इतना खूनो होता साकार हुमा मादर्श सत्य मानवका तन धर पाया था समता स्वतन्त्रताका जीवित सन्देश धरापर छाया हममे न सुना हमने न गुमा केवल अपना ही स्वार्थ घुना पहले उसकी हत्या फिर हम रोये अपना शोश धुना देवत्व बधा जाता अगमें होती पापोको मनचीती। जो ताप घराके धोते हैं दुनिया उनका लोहू पोती। x X था यह राष्ट्रपिताका जन्मदिवस ! यह विपिताका जम्म-दिवस ! इस दिन किरणोंका करीधार गका विष पोमेको अत्या कल्याणमयी मानवताका घरदान गंगन-पर छाया घर-घरमें गड़े रहके घट सीताको शक्ति बने असे देखी विदेह कृषकोंने फिर विप्लवको क्रान्तिमुखी काया यह सृष्टिकारका अन्म-दिवस यह राष्ट्र-पाएका अन्म-दिवस प्रतिवर्ष घला आनेवाला वह आज नही सुखकर उतना यह जन्म दिवस उज्ज्वलताका इस बार मरण त्योहार मना यह पर्व शहादतका जिसमे बलिको बेदी पूजी जाती उसमें उत्सवको दोप्ति नही इसमे सुखका आधार मना यह अमर ज्योतिका जन्म-दिवस यह विश्व-ज्योतिका जन्मदिवस विश्वास नही होता सचमुच महाप्राणका अम्म-दिवस यह आगे आनेको मृत्य-दिवस महाप्रचार दिवस इस सुधि घेतमताको गति लगती कितनी रोती-रोतो! प्रो पाप घराके धोते हैं दुनिया उनका लोट पोती ! x x x ज्यों अम-मरस पालोंसे है परे चन्द्र-सूरज-तारे थे उसी तरह बापू लममें किरणोंका उदयाचल धारे हत्यारा समझा मार दिया लो मैंने उसका नाश किया कैसा कृतन मानन जिसने अपने बाताका अन्त किया ! ओवित देवालयको दाकर प्रतिमाको रजमे मिला दिया वह मुरख नहीं समझ पाया वह कायर नहीं समझ पाश विश्वास नही मरता जगमें विश्वास प्रकृति-सा अविनासो संकल्प नहीं मरता अगमें अमरत्व-विभा उसकी दासी मरती नक्षमाको ज्योति कमी वह केवल फैला करती हैं प्रधनीही होप-शिखाओंभे वह नित नूतन लौ भरती है बापूकी जीवन-सुधा फैलकर नमकी आँखों में हाई बापके जीवनको पक्षा अगमे सागर-सी लहराई घायल किस्मत मानवताको इस सहल प्रेमसे तृप्त हुई जिसको ज्वालाय धेरे धीं वह करुण जलसे घहराई अभिशम मनुअता शान्त हुई संतप्त मनुषता शान्त हुई सूखी नदियाँ अजपूर्ण हुई नमने खोया धीरज पाया फिर से सदियोका सूखा करुणाका सिन्धु मड़ आया नमको छातीको माग बुझी घाँदनी दाह खोकर सोई धरतीको छाती भरीभरी ज्यों पाई उर्वरता खोई मोगो किस रसे सृष्टि विकळ युग-युगको तृष्णा में बोतों! जो पाप धराके धोते हैं दुनिया उनका लोह पीती ! x x x हम उस विराटके समयुगीम उस महामके समयुगीन हमने उसके दर्शन पाये माधेपर लि लाये उस प्रेमीकी उस मरमीको करमा छायाको लाज हमे उसको परदुख-कातरताको, देवत्व शिखाको लास हमे उस अवतारीको लाज हमें उस तनधारीकी लाज हमें प्रसवोरोंको पूजा न कभी होती रोलोसे हारोसे होता न प्रवर्तकका पूजन निष्प्राण अर्ध्य उपहारोसे दीपोंका भी गार नहीं उनकी अर्धा प्री करता वे तो बस पूजे जाते हैं आत्माको विकल एकारोंसे बमती विवेकको तन्मयता उनकी पूजाका नीराजन अब सलती कल्मषकी होली तब होता है उनका वन्दन मानवको भीतिमरी लता बैंसे-से उठती होता उनकी उत्सर्ग-विमाका अभिनन्दन हम इस पूजाके योग्य बने इस माराधनके योग्य बने बिमती को इन अलियों में मनकी स्वातीका सार भरें ो महको जोवन देते हैं दुनिया उनका बध कर जीती। जो पाप धराके धोते हैं दुनिया उनका छोडू पोती!

महाज्योति
नाच रही कितनो दूरीसे फिर आ-आकर
घेर-घेरकर
ये सुधिको गौरवके सुखको दोप्त तरंगे-
चीर युगोंको अविरलताको
इतिहासोको अनुक्रम-गतिको
चली आ रही आज नहर-पर-सहर यादको
सदियों-अरे प्रकाश तमिसा हो-होकर
सदियों के उत्थान-पतनके भीतर होकर
स्नेहाच्छन्न प्रसन्न शरदके नझमे होकर
बडी पुरानी स्मृतियाँ सपनों-सी मडरातो
लगा रहा मेरी खोई-खोई माखोंमे
से कोई मोह-मरी तृष्णाका काजल
गुण रहो असे नमके छोरो तक फिर-फिर
विशुदसे संचालित मेरे रोम-रोममे
कैसी बल भरनेवाली अयनि अविनाशी !
व्याप्त हो रहा जीवनका कल्लोळ चतुर्दिक
शोक नहीं, परिताप नहीं जैसे प्राणों में
इस सुधिको गोरी गोरी अवदात अंगुलिया
शीतल करती से तप्त-ललाट घराका।
बड़ी इरसे-शुगों इसे यादें खातों
वह पावनता और प्रीताको परम्परा
इर-देशिनो यादोंमे उज्ज्वल हो जाती।
श्यामल पुलकोंसे पनव-पडव छा जाता
पल-सरा सिहर-सिहर अकुलाता
शुरु निवेदन सोरमका अर्घालि लाता।
दिगदिगन्तके मन आयोकित हो जग पाते ।

लम्मामत गोरजके पथसे बाहर प्रभाकर जैसे सान्ध्य सितारे नममें ज्योति जगाते। गा-अनुगत के पारवक्षपर मोड बांधकर युगों-शुगों से शान्त पड़ी है महाज्योति वह संस्कृतियों के अध:पतनके कुहरेसे घिर । पास उसीकी सुधिसे कविके प्राण भरे हैं आज उसीकी छविसे कवि के गान भरे है। किस युगने देखी है ऐसी महासाधना मोवित मर्यादाको ऐसी पुरुपोत्तमता ? किस युगमे है सुनी भमिने या नमने भी मुक्तिदायिनी ऐसी मधुवाणी कल्याणी ? कहाँ मिलेगा महात्यागका महासिन्धु को महादेशके महातटोंको याद नही है कबसे उर्वर करता आया ? जिसको ओस-भरी आँखोने सदा अमृतका स्रोत बहाया। किस युगने देखा है ऐसा जीवनदाता जिसे यादकर सेतुबन्धसे प्राज महासागर भी सिर धुनता टकराता? किस युगने देखा अभिषेक-उषामें उठकर फूलोंको छाँहों-सी कोमल शध्या तजकर सुख-मादकता-विभव-विलास-मधुरिमा तस्कर केवल आदीका सपना सत्य बनाने प्रद्धामें विश्वास और संकल्प अगाने केवल मिष्ठामें शिवका सौन्दर्य साने किस युगने देखा है दो-दो राजकुमारोंको पथ-मिक्षक बमते ? और कमक चम्पा-सी कोमल सुकुमारीको हल्के चाँद-अरे गोरे चरणोंसे थककर क्षत-विक्षत तलवोंसे केंटक-भरे पंथोपर किस युगमे देखा रमणीको पोड़ा सहते? युग-युगकी अविनित दूरीमे हो-होकर मार उसी स्वर्णिम युगकी यादें घिर पाती ।

दृश्य बदलता है फिर आत्माको माखोका
रुध-पके जीवनमे नव-आशा माती है
हारे उत्पीडित मानसमें किरणें नई उभर आती है।
नई स्फूतिकी विभा निखरती
नई चेतना तन-मन भरती।
अन्यायोंके गढ़ दह जाते
अत्याचारी उबर न पाते
पापोंकी लंका जाता है, क्षार वासना होती।
धू-धूकर जलती पामरता
ध्वंस सदा होती कायरता
पशुता मिटती रोती।
हो जाती प्रज्वलित अकल्पित ज्वालाएं
कितनी भीषण दाह शिखाएं
जिनसे कुन्दन-सी जीवनको सुषमा कढ़ती
पुण्योंकी धमकीली प्रखर कनकता बढ़ती
युग-युगके आलोक-तिमिर सरिता-पर्वत कर पार
घोर-चोरकर महायुगोंके अनुवर्तनके ज्वार
चली आ रही इस विजयोल्सवको सन्यामे
शब्दातीत-रूपातीत-भावातीत खरोमे
मेरी अक्षमता परवशता को बल देती
मनसे आराधक तन्मयता का कर लेती
बड़े पुराने बड़े पुराने युगकी यादें ।
फैली है घाँदनी सरीखी जिनको बाँहे
मुझे कसे लेती अपने व्याकुल घेरेमे
सोच रहा में भाव-स्निग्ध रूपाकुल मनसे
उस विराटकी वर्षों-व्यापी गहन वेदनासे ही
मानवता के सागरके मन्धनके इस विषसे ही
नोला यह आकाश हो गया
पोला तारक-हास हो गया
मधुमके आनन्दोच्छवासोंमे वियोगका दाह सो गया !

गाँधीजी!
गीत तुम्हारे गाते गाते हम तुमको ही भूल गये।
तुमने जीवन को पहचाना हम न तुम्हे पहचान सके,
तुमने मर कर दुमिया जीतो हम कब तुमको जान सके।
जाती है सब ओर तुम्हारी किररों पर हम भरमाये,
देव तुम्हारे पुरयों को हम अब तक खोल नहीं पाये।
याद हमें पसनाद तुम्हारा पर हम तुमको भूल गये,
गीत तुम्हारे गाते गाते हम तुमको हो मल गये ।
आप तुम्हारे जादों की छाया भी अवशेष नहीं,
भरी नदी में से गति की धड़कन का आवेश नहीं।
मरणशील इतिहास बन गई आप तुम्हारी कुरबानी,
क्षण भर को भी हमने तुमसे की लाज नही मानो। ..
शपथ तुम्हारी खाते खाते हम तुमको ही भूल गये,
गोत तुम्हारे गाते गाते हम तुमको ही भूल गये
मन्द नहीं होते बंदन के खर तुम तो भगवान बर्न,
हम पर-पीड़न मे, शोपण में और बड़े पुरावान बने ।
पूजा का पायाण बना कर हमने तुमको रख छोड़ा,
मंदिर में अगणित पत्थर थे एक अधिक उममें जोड़ा।
मंदिर में
ठहराया तुमको हम पापों मे झल गये,
गोत तुम्हारे गाते गाते हम तुमको ही अल गये।
मन के शेल-शिखर को तुमने सदा ज्योति से नहलाया,
जीवन के कुओं पर तुमने को शीतलता की छाया ।
सबके सुख के सार्थवाह तुम शान्ति-साधना के साधक,
तुम्हे बिताकर बने अनैतिकता के हैं हम माराधक ।
साथ तुम्हारे सत्य अहिंसा के दो जोवन-मूल गये,
गीत तुम्हारे गाते गाते' हम तुमको ही भूल गधे ।
-
७
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वर्तमान
'मैं अपनी जीवन-बीराराके कोमल तारोंको तोड़ धुका।
बिन हुई जिनके मीठे खर काशिका के खोरम से निकले,
जिनको रागिनियों में बहते रुपने बनकर साकार बड़े
जिनकी मीठों से मादकता घन्दा की किरणों-सी फूटी,
सौन्दर्यमयी करुणाके दीपक सुनकर जिनका माद् अहो ।
में संघर्षाकी कटुतामें सब पुरानाके घट फोड़ एका!
'मैं अपने गीतोंकी माला के छिल-मिस कर घुका तार !
मैंने वे परिमल के प्रतीक पाटल सुकुमार मसल डाले,
जिनके सुवास को मदिरा में अरमान पड़े थे मतवालो
जिनको पंखड़ियोंमें चित्रित थी मेरे यौवनको कीड़ा,
मेरी मुकुलित मंरियोको पड़ गए प्रारके ही लाले !
मैंने गीतोंकी मालाका खंडित कर डाला सब सिंगार ।
-मेरो कल्पमा-हंसिनीके झुलसे पंखोंकी मत उडान !
कविको कुमारिका घिन्ता र करती ने गगनके मेघ पार;
युगकी कठोर स्वासानों ने ली सोख रुप-रस-गर-धार,
मोतो के मेघामत कुंजरोमे बीते दिन, बीती रातें,
'विकी तुषार रंजित झीलोंमे बोत धुके कितने विहार ।
का समय, बहुत कम समय, क्रांतिका महालक्ष्य कितना महान ।
५०

मेरी रागिनी, मुझे भूल जा
मेरी रामिनी, मुझे भूल जा !
मुझे भूल जा, सपनों मरो,
प्रो सुहागिनो, मुझे भूल जा।
मेरी रागिनी, मुझे भल जा ।
तेरे लाल होठ मुलाल-से,
जो प्रकाश में सुरा घोलते;
तेरे कंप बीन की झाझ-से,
जिन्हे सुन सितारे भी बोलते ।
तेरे स्वर शमीम-से-कहना क्या,
जो पखुरियाँ रुप की खोलते ।
जो जवानी को भी जवान कर
दिल प्रेम का हैं टटोलते,
मुझे भल जा, मो स्वरों की
कामिनी रागिनी, मुझे भल जा ।
न रुकी अटकती निगाह की
शरमाई पुतलो मुझे
मत गर्म पलको को छाँह से
तरसाई बिजली मुझे दिखा;
न अतृप्तिपरिधान में कसे
मर गात का कँपना दिखा,
है खिले सुमन के उभार में
सपना दिखा,
मुझे भूल जा मेरो संगिनी,
मेरी साधिनी, मुझे भूल जा।
झपे रूप
का

a/
स विलीन हो पास शून्य में
जा सिंगार चंदा का कर वहां,
वहीं गूध बेगो निशोध को,
गर खप्न-हार बिखर जहां,
वहां घदिनी की मांग भर,
ओं' हगों में आअन सार दे,
स सुबक न, न छुलक तनिक,
मुझे मासुओ से उबार दे
तुं संभात आंघण दल घलो,
मेरी मानिनी, मुझे भूल जा
WARNIRA
NOW
IIMA

मांझी
माँझो ! जल का छोरन आता
बीत गया पूरा दिन चलते किन्तु न ओझल ल लखाता
मांझी ! जल का छोरन आता
भरी नदी बरसाती धारा
घन गर्जन अम्बर अंधियारा
कालो काली मेघ घटायें आ पहुंची रजनी अक्षाता
माँझी! जल का छोर न आता
नभ अशान्त गादी तम छाया
मन वियोगिनी का भर आया
प्राणों की माशा बादल पर खींच रही है मौन सुजाता
मॉझी । जल का छीर न आता
राक अकेला उल्कंठित जल पक्षी कब से उड़ता जाता
न्ये लहरें
ऊपर से शीतल
भरा इनका अन्तस्तल
तट न मिले पर अब तो इनकी ज्वाला से संबंध न खाता
माँझो ! जल का छोरन माता ।
-

बापू
हर सदियों का दासत्व, देश के सिर का पर्वतभार हरा;
ज्वाला अर्जर जीवन में शुमने ममत-मेय-डार भरा।
तुम सध्य-सिंधु, जिसको लहरों ने किया अमरताका प्रसार;
तुम महादेव, अमगंगा को जिसने मस्तक पर लिया धार ।
सुम मानवता के शुभ मुहर्त, निर्मलता को निर्महा करते;
करते पवित्रता को पवित्र आशीषों के निर्भर करते।
अवरुद्ध व्योम-पध मुह हुआ, किरणों में स्वर के पार समे
सोमारी सीमाहीन हुई, शुश को वाी के तार बसे ।
उदयाचज नई ज्योति लेकर अभिनंदन को दोडा माया;
बलि की मुहार ले, यौवन का पारावार उमर खाया।
तुमने जनता को मुक्ति-समर में मस्तक देना सिखलाया;
ललनाओ मे सिरों को होली का स्वधा-मंत्र पाया।
है देव ! मरी मिट्टी में हमने नई चेतना चमकाई;
की ऐसी सात्विक क्रांति, न जिससे बड़ी कथानों ने गाई।
ओ तुम अशेष के अभिमानी । ओ दिव्य स्वप्न के संधानी,
दासों के महाद्वीप में तुमने कैसी ज्वाणा, पहधामी,
साहस के बंद कपाट भस्म कर मन पर छा आनेवाली,
समिधा की अरुणा तुला पर खंडित सीवा हुलवानेवाली ।
कब रुके देश के घरण, झुका कर विद्रोही मस्तक उभरा;
तुफानो गति से चदा, न फिर संघर्ष-सिन्धु का अल उतरा !

प्रलय रात अँधियारी
प्रलय-रात अंधियारी।
चिरे बरसने को अनियंत्रित बादल परिवर्तन के
घनी रात अंधियारी।
बरस रहे फिर-फिर घिरने को- देकमे को
काँप रही सदियो की कारा
गिरी युगों को पापाणी प्राचीरें
तोड़ चुके बंदी अंजीरें।
मझ में तदन करते मील सितारे
म के सब बिखरे स्वर मिल-मिल कर बद चलते
मग में जलती बाधाओ के भरिणत स्फुलिंग उभरते
बढ़ते चलते नव जीवन के वेग सँभलते
अंधकार में मगन सूझता
बढ़ा जा रहा धरती का स्वामी विरोध से मिड़ा जझता
रूपों की बेला है यह प्रलय रात अंधियारी।
चळे जा रहे अपना ध्येय सभाले
मये चरण की नयी प्रगति,
कमी दिशाओं का सम होता
गहन सिन्धु बरसाती तम का मुक्ति-मार्ग को धेरे
रह-रह कर जल उठते संकल्पों सी घमको बिजली,
क्षण भर को पथ आलोकित कर जाती
काँप रहे संतरी धराशायी कारा के
देख-देख मिट्टी में चेतन को विद्रोही ज्वाला
इमकेगी अब या विभा को
फूट-फूट लहरायेंगे किरणो के निर्भर
खतंत्रता को जरुणाई से लोहित दिनकर
नष्ट करेगा दिनक्षम मार्स-मशिलता निशि की
पंधदान गति पा जायेगी

सो निरुपाय पड़े है प्रोवन में धंसने को
गगन शिखर पर घदने को
उन सबके व्यक्तित्व उठेंगे और उठेंगे
संहारों के मोघ रहेको लिप्त निरंतर
सत्यानाशों में भर तक पर्वख लुटाकर
होंगे रचना-मग्न वही विद्रोही मागी
उगते सूरज की उज्ज्वल पथ-ज्योति
भरमाये पोरन में सृजन-चेतना की अवतारी
कुन डियों को प्रलय-रात अधियारी।
विजयोन्मुख नतन भविष्य के घर घूमने
नव विधान के मंत्र पूजने
घली जा रही प्रलय-रात अधियारी
सरा

नवयुगका दीप जलाये !
बनाया
न्मका
किसकी ज्वालामुखी प्रगतिने राकाको अंजीरें काटी
इन रही लोहित किरणोंमें मरणशील तारोंको घाटी
तीर चलीं अस्तंगत अन्धकारको किसकी तरुण शिखायें
एक महाज्वाला बन फूटों किसकी बिजली-सो रेखामें
किस शोषणविहीन अनदेखी-सी समताका प्रबल तकाजा
उठा रहा घर-घरसे सदियोको हिंसाका रुका अनाजा
गुज रही अनगरपके कानों में जानातिको अरुण प्रभाती
उगती घेतनतामें विप्लवको चिनगारी उड़ती आता
पेट काटकर भूखे तमने जो सपनोंका महल
उसे रोदती और दहाती आली बदी नाशको छाया
मिटनेसे स्वतन्त्र आदर्शों में है नये
मारा
उमड़ रही संगीनोके सिरहामे आजादीको धारा
चली आ रही क्रान्ति पुजारिन-सी नवयुगका दीप जलाये
कॉन प्रवर्तक है जो शोलोंके मौसममें मागे माये
दूर नहीं हैं दीख रहा जनसत्ताका मंदिर बलिदानी
जिसकी इंट-इंटके गारे में लिपटों असंख्य कुरबानी
कदम-कदम बलिदान चाहता पथकी धुल नहूकी प्यासी
बढ़ते हो पाते हैं उसपर ये परिवर्तनके अभिलायी
समय बहुत कम-बिलकुल कम लिखनी है नये जन्मको पाटी
किसको ज्वालामुखी प्रगतिमे राकाकी जंजीरें काटी
जलते मनके गीत मला खाता अम्बर अजतो है मादी
इन रही लोहित किरणोंमे मरणशील तारोंकी घाटी
5

सोचो तो यह था!
सोचा तो यह था प्रेम तुम्हारा अक्षय मधुलाम होगा
सोचो तो यह था रूप तुम्हारा गीतों का संचय होगा
थे सपने कभी न टेंगे
सुख के घट कमों ने फूटेंगे
अरमानों को अमराई को
हुदिम आकर क्यों लूटेंगे
उड़े जीवन के मधुवन में यौवन का कोर सदस्य होगा
सोचा तो यह था अन्तहीन जीवन का प्रथम प्राय होगा
गहराई सोविलास मधा
मन का आवर्तन केन्द्र नया
एकाकी सन्ध्या तारों-सी
पाखो काधा निर्माल्य मया
इस व्रतमता के सोतों का जोवन में कभी न क्षय होगा
सोचा तो यह था अन्तहीन रूपति का रमेहाप्रय होगा
कर रहे रंग थे सुरापान
धा शिथिल चीर थे तृप्त प्राण
दिल की धड़कन को कोरों में
कर दिए कमी थे लाल कान
कर सोचा था तोडा के इन्द्रधनुष का फिर विक्रय होगा
सोचा तो यह था प्रेम तुम्हारा प्राय मतामय होगा।
-III
4

रानादुगविता
उस दिन प्यारो मातृभूमि पर मेरी थे घिर माथे,
रेवा के तट पर विपदा के बादल थे घहराये।
सचमुच लगने लगा तेज को निगल रहा अधिधारा,
कोच रही बिजली को खा लेगा बादल मटियार।।
बड़े आरहे थे अन्यायी दल के दल मतवाले,
चली आरही थी परवशता नागिन जीम निकाले ।
राजमहल से निकल युद्ध की ओर बढ़ी ज्वाला-सी,
महाकाल की ग्रीवा की विस्फोटक जयमाला-सी।
ज्योति-दग्ध होगई दिशाये चमक उठा न सारा,
रवि-किरणों की दीति दुख गई शरमाया उजियारा
शुचिता-कोमलता-सुषमा में सब दिन जिले सँवारा
सर्त हुई बलिवेदी उसमें विनत हुआ प्र.व तारा ।
रक्तरंजिता घरा सहम कर देख रही थी प्रति पक्ष,
खतंत्रता की देवी में संचित कितना होमानल ।
आतताइयो के दल काँपे काँप उठे सब जलथल,
महानाश से होड़ ले रही राजवटी घायल !
किया वीरता का उसने अभिषेक एत्र की बलि से,
सज्जित किया मरण को अपने लोह की अलि से ।
उस दिन प्यारी मातभूमि पर बेरी थे घिर माये,
रेवा के तट पर विपदा के बादल धे घहराये ।
शपशु

दलित उत्पीड़ित मनुज!
हलित उत्पीडित मनुन सुन ले परा।
राध की पुरा में बिखरे पड़े ये गान
ओ निराशा से पराजित स्वप्नदर्शी सुन ।
देख अपना ही बॅटा संडित हृदय
जोड़ सकता हूँ जिसे मैं
एक कर देंगे जिसे ये गीत मिट्टी के समक्ष अजेय
आघसा GT RTE हस गतिशील युग के ।
है यही वह मार्ग अब जान ले
कार अडिग विधार अणु-जरा से इसे पहचान ले
है हमें चपना कि मिस पर
हमें ही क्यों
विध को इतिहास को-अवितव्य की नव शहियों को।
है यही वह मार्ग को जन-एकता की पारदर्शी ज्योति देता
V देखता तु आग...श्रीपण यह दवाग
जल रही धरती शुगों की संस्कृति की
कंठ सूखा कर रही घोकार मानवता
जल रहा जिसका तृषित कण-कर
आग यह वैसी नहीं सो ध्वंस कर दे शोपणों को
धीर देको मुग-युगों की कालिमा को-नस शिखरों को
आग यह मनुषत्व को ही जो दहन करता
सभ्यता के मारा हरती
माघला आमाबमा होस या कि विराट
है धुझामा यह लपट--यह वाह का विभाट
यह निराशा और यता मठ है माया
सत्य केवल एक सीवन का-मम आशा स्वत दुर्भच साहब
बँटा खडित हृदय हो तेरा तुझे निर्बल बनाता

ओड़ दे तु खंड दोनों दर थे ओ बाम सके
एक हों दो झोत अस-विश्वास के
सर्वनाशी भाग यह अल से न--शोस्ति से घुझेगो
सुन प्रभागे औं' भाव ग्रसित मनुर सुन ले
देख अपना हो कटा खंडित हृदय से देखा
रा.स.

वेद ऋचायें थौं साँसों में !
वेद समायें थी सासो में, गुक्ति यसो यो मन में;
दृष्टि भरी थी वरदानों से मत विमा यो मन में;
स्वर्ग विका होता था बापू की आत्मा के दुख से;
राम नाम उज्ज्वल होता था कद उस करणा-मुख से
मोवित था विश्वास और संकल्प तय कंपन में;
विम्बित होती थी शिवता मुस्कानों के दर्पण में;
देह जलो पर प्रारणे का प्रसाद नहीं पळ पाया;
कॉन मला शया हिमगिरि को, कोन मुभा शशि पाया;
चुका वर का रक-परिमिव प्रेम सिन्धु जोवन का,
देता रहा मोल जो युग-युग के अभिशप्त मरर का;
अधिदेवत्व क्षमा का मानव-ममता को ईश्वरता
सूर्त हुई थी लापस तन में पर-सेवा-बल्सकला;
कौन सुनेगा मन पुकार पीडित जग के जन-मन की;
कौन हरेगा दाह-तृपा चेतनता के कण-कण को;
हाड घाम के पुतलों में बलि की बिजली का चालक
त्यागाति के शोलों का महापुण्य का पाएका
ऐसा था देवर्षि
बापू राष्ट्र-विधाता
ऐसा था वह मर ज्योति काम दोह का दाता;
निस्ति हो गई आरती राम नाम के जय की;
काँप रही है मोवें फिर प्रदा-निधा की, तर को;
वेद-धायें घों सांसो में, सत्य-शिखा अन्तर में
पदरज में संतत्व बसा था देवष्टि धो स्वर में;
रोम-रोम से घंल्य-चाँदनी का चन्दन झरता था;
रोता था र स्वयं कि अब बापू की मन भरता था !
वह सहिराता का देवल, वह शान्ति स्नेह का सम्बन;
वह तन्मयता का स्वामी---उज्ज्वलता से अति वक्ष
धी सदेह बढ़ात विमलता उस निकामी तन में
चे अभाएं थीं सालों में राम गुर्त था मन में ।

तुलसीदास!
बंदन के स्वर मंद न होंगे, सा-दीप जलेंगे हो।
बाई कवि के महानिधन का ज्योतिदायिनो पुण्य घड़ी,
फिर कवि की पूजा में रत है गोत-गोत को कड़ी कड़ी।
जिसने सपनों को ठुकराकर सत्य रघा-देवत्व रघा,
उसी प्रेररा-हामी की अन-मन के मन में मुर्ति गड़ी।
पलभर को भी जिसकी पावन लोकसाथमा नहीं रुकी,
सत्ता-सुख-वैभव के मामे कभी न मिसको प्राख झुकी,
कंठ-कंठ से उसको जय के महाघोष निकलेंगे।
वंदन के स्वर मन्दम होंगे, सादीप जड़ेंगे ही।
इब रहा था देश, दमन को संगोनों का साया था,
संस्कृति पाया सिसक रही थी, धर्न चकित भरमाया था;
धकार के उस रौरव में तुम रनि के विधास बने,
कमी न कोई पहले इतनी ज्योति जगत में लाया था।
..
तुम आरा, असे कातरता को स्वर का वरदान मिला
तुम आए, जसे दलितो की एक भया अभिमान मिला।
तुम-से महाप्रवर्तक के पथ पर प्रणवीर चलेंगे ही।
वंदन के खर मन्द म होंगे, प्रादीप जलेंगे ही।

एक नर के सत्र में एक नया इन्सान दशा,
नई शति का संगर ऐसार लोक घा, परलोक रखा,
पाप-पुण्य में, PATI-SAT मैं जो गति की होड़ लगी,
एम आरा, सेभ पर संशय-समद्र शोक घसा !
प्रगत शुम्हारे घर पर है HER विष का अभिनंदन
स्वर-स्वर में उज्वसित हो रहा भास तुम्हारा हो बंदन ।
देव । तुम्हारो पुरय-शिक्षा में युग के पाप गळंगे ही।
वंदन के स्वर मन्द न होंगे, पदोप अलेंगे हो।
Now

आप!
रसन्मान मिद तुमको सोजता!
देर ममी में जा पर सान्त में पड़ गया
दता में था मुक्ति में क्यों कह गया,
बत सूने-देवता यति-वैदिका पर पद गमा,
रह-रीच पुसा निस्पंद तुमको सोचता।
रो रहा खो सिन् रिसको विन्दु बह बिना ww,
वर सा है-रूपती बन पो बारे ras,
है चकित-देखो में सुगने साचना ऐसो विमल,
रस-जित युग खड़ा निस्पंद तुमको सोचता।
है च विश्वास कितना है अडिग कितना हर
है जनश्वर जोब कितना है अभी कितना अभय,
मञ्च है कितना सरल-संकरप है कितना मज्य,
-रजित युग सानिस्पंद हमको सोचता।
है निरामय देह कितनी बार कितने ज्योतिधर,
है समर्पर सत्य कितना-मोन कितना है मुखर,
है शिसा यह जर्व कितनी-भस्म कितनी है अमर,
रसनंजित युग खड़ा निस्पंद तुमको सोचता !
--

उनको
भूल न जाना
देशीम के ओ मतवालो, उनको भूल न आना।
महाप्रलय को प्रग्मि-सराच लेकर जो अग में आये,
विध-बली शासन के भय जिनके मागे मुरझाये ।
चले गये सो शोश चढ़ा कर पय लिये प्राणों का;
लो मजारों पर हम उनके पास प्रदीप जलायें।
टूट गई' बंधन को कड़ियाँ-स्वतन्त्रता को बेला;
लगता है मन आज हमें कितना मवसर अकेला ।
पध चिरन्तन मलिदानों का विप्लव ने पहिचाना,
देश-प्रेम के ओ । मतवालो, उनको भूल न जाना।
जीत गये हम-जोता विद्रोही अभिमान हमारा;
प्राण-दान विसुन्ध तरंगों को मिल गया किनारा ।
उदित हुआ रवि खतन्त्रता का व्योम उगलता जीवन
"आजादी की आग समर है' घोषित करता कण-कण ।
कलियों के अधरों पर पलते रहे विलासी कामर;
उधर मृत्यु प्रों से बांधे रहा अझता योवन ।
उस शहीद यौवन की सुधि हम क्षण भर को म बिसार;
उसके पग चिन्हों पर अपने मन के मोतो वारें।
झंझा-सुफानो ने जिस हदता का लोहा माना;
देश-प्रेम के सो मतवालो । उनको भूल न जाना ।
जा करता आह्वान प्रारुणो का वे विष अपनाते;
दुनिया सुख को भोख माँगतो वे सर्वस्व लुटाते ।
रहती उममे शक्ति धरा का वैभव ठुकराने को;
मिट्टी का लघु मात लिये वे लपटो मे लहराते !
आतताइयों को विर्घात करतों उनकी कारें
प्राण कती चलतों मुर्ती में उनको ललकारें।
समय-सिन्धु में इन बहते मूलो का शासन मामा;
देश-प्रेम के यो मतवालो ! उनको मुलम जाना ।
:

जिन्हे देखकर स्वयं नाश भय से कातर हो आता
जिनके आगे पशुता का सिर अफता-अब दह जाता।
करता था उपहास प्रति घर जिनका दंड दमन का,
उरते थे तुफान-न जिनसे पशुरन होड़ लगता।
चलो करें हम उनकी चाल का फिर से आवाहन
उनको सुधि की ज्योति अगाय करें हों का बंदन ।
उन परवीरों की मलि को जीवन त्योहार मनाना;
देश-प्रेम के खो दीवानो । उनको भन न माना।
इन मीनारों की नीवों में उनकी लाशें सोई
नेतृत्वों को जड़ें गयों उनके लोहे . से धोई।
आजादी का भवन उठ रहा उनके उत्सर्गों पर;
जिसको ईट-ईट में उनकी कुचली साधे खोई।
आप चलो हम उनके घट पर साध्य प्रदीप जलायें,
उनके त् से सिंचे पों पर गलियों पर मडरायें ।
पूरा हुमा न अभी हमारी प्रतिहिंसा का मामा;
देश-प्रेम के ओ मतवालो ! उनको भा जाना ।
--
-

आलोक नहीं
मरता है!
बुझ जाते हैं दोप, कमी आलोक नही मरता है।
क्यों न धुझे वह दीए रात भरका को स्नेह सारा,
नश्वर है वह दीप स्नेह के बल पर सो लहराए।
-
कर तक गंध सकेगा वह उब निमियोको माला;
जिसे पराई ममता के बज ने दे दिया उजाला ।
बंधती है कब लीक विमाको बासीके बंधन में;
अग्नि-शिखा कर बंधकर रहती खंगारों के तन
दीपक बढ़ते हैं-प्रकाश केवल फैला करता है !
सुरु आहे है दीर कमी माज़ोक नहीं मरता है।
स्लेहहीन होकर भी अनमिष अनचाहा मन दहला;
श्ता घुगतो हैं चिनगारी प्रार-पपीहा सहता।
यह अविराम जन-स्वाहा की सेज निही हो जैसे;
ऐसे प्रयास तो मनमें गुग-युग मुझेन से ।
है विसर प्रकाश मुन्ध घरिनो मनको
For बिहे सोई हला जोवनको।
Rोगों इस को करता है।
रुक
गमे FIR म मरता है
-
K
Kalam

नहीं जलेगी
नहीं जलेगी?
आग कान्ति को इन फँको से नहो अलेगी।
भरे पड़े है दाग विनासों के घुम्बन के
होठ तुम्हारे भीग गए हैं मन की रति से
सूख गया है बलिदानो का रक्त नसों में
नहीं जलेगी--विप्लव-ज्वाला नहीं जलेगी
नहीं तुम्हारो फूंकों में प्रेरणा र्गात की।
अत्याचारो के बूटों से दबी प्रजा को
जीवन-ज्वाला कब भड़केगी ?
इन सस्ते गीतों से ओ कवि ।
मँगनी की मोटर पर जाकर
जिम्हे सुनाते कवि-सम्मेलन मे तुम बढ़-बढ़
ख्वाब दिखा कर प्रोताओं को झोपड़ियों का
अगा वेदना मन की-पौरुष सुला-सुला कर
गाल फुझा कर दावा करते-मैने युग का दीप जलाया
और प्रगति का पंथ सजाया
नभ को छाँह तले सोधे प्रभात को बारम्बार बुलाया
झूठी है गर्वोक्ति तुम्हारी.
तुम न राख का करा दे पाये
न्यस्त स्वार्थ-धन-सत्ता को तुम कोसा करते
{किन्तु उन्हों की घाटुकारिता में रत रहते
तारीफों के लिये उन्हों का मुंह भी जोहा करते !!
यह पाखंडी मनोवृति अब नहीं चलेगी।

आलोक नहीं मरता है!
बुझ जाते है दोप, कमी आलोक नही मरता है !
क्यो न बुझे वह दीप रात भरका जो स्नेह सजाए,
नश्वर है वह दीए स्नेह के बल पर जो लहराय !
कब तक गूंथ सकेगा वह उज्ज्वल निमिषोंकी माला;
जिसे एराई ममता के बल मे दे दिया उसाला ।
बँधती है कब लीक विमाको बाबीके बंधन में;
अग्मि-शिखा कब बँधकर रहती गारों के तन मैं !
.
दीपक बढ़ते हैं-प्रकाश केवल फैला करता है !
बुझ जाते हैं दीप कभी मालोक नहीं मरता है।
स्मेहहीन होकर भी अममिल अनचाहा मन दहता;
तृष्णो चुगती है चिनगारी पाण-पपीहा सहता ।
यह अविराम जस्लम-ज्वाला की सेज बिछी हो जैसे;
ऐसो प्यास उमड़ती मनमें युग-युग बुझेन से ।
है अविनश्वर यह प्रकाश---यह मुग्ध चाँदनी ममकी।
प्रथम विरहसे जलती आई दीप-शिखा जीवमकी ।
स्नेह नहीं इसमें अभावको सुधिका पल झरता है।
बुझ जाते हैं दोप कमी भासोक नहीं मरता है।

नहीं जलेगी
नहीं अलेगी?
आग क्रान्ति को इन फूंको से नही अलेगी।
भरे पड़े हैं दाग विज्ञासों के के
होठ तुम्हारे भीग गए है मन को रति से
सूख गया है बलिदानों का रक्त नसों में
नहीं जळेगी-विप्लव-ज्वाला नहीं जलेगी
नहीं तुम्हारो फूकों में प्रेरणा ति की।
मत्याचारों के इटो से दबी प्रजा को
जीवन-ज्वाहा कर भड़केगी?
इन सस्ते गोतों से सो कवि !
मैंगनी की मोटर पर जाकर
जिन्हे सुनाते कवि-सम्मेलन में तुम बढ़-बढ़
ख्वाब दिखा कर प्रोतामों को झोपड़ियों का
अगा वेदना मन को-पौरुप सुला-सुला कर
गाल एला कर दावा करते--मैंने युग का दोष पनाया
और प्रगति का पंध सजाया
नम की छुहि तले सोये प्रमात को बारम्बार शुलाया
झूठी है गर्वोक्ति तुम्हारी
तुम न राख का करा दे पाये
न्यस्त स्वार्थ-धन-सत्ता को तुम कोसा करते
(किन्तु उन्हों को चाटुकारिता में रत रहते !
तारीफों के लिये उन्हीं का मुंह भी ओहा करते !!
यह पाखंडी मनोवृत्ति अब नहीं चलेगी।
६६

नकली को से समाज परिवर्तन ज्वाला नही अलेगी।
जोवन का खिसवा कर रहे कुछ टुकड़ो पर
मरो-मरी मुस्कान लिये पोरे अधरों पर
Jलगा नये साहित्य, कला, संस्कृति का बिल्ला
इतराते अपनी बायस्कोपो कृतियों पर
देखा किये जिन्दगी भर सपना आगति का
किन्स मात्मा (जिसका भो अस्तित्व माना)
रही सदा माता मै सोई।
नहीं जलेगी!
जाग क्रान्ति की इन कृत्रिम फकों से नहीं अलेगी।
नहीं जलेगी।
पैर भले उगमग हो मेरे मन मंजिल के पास है।
इब्ने इवे प्राण किसी की याद नहीं सह पा रहे।
मेरी अगति-भावना मेरे शब्द नहीं कर पा रहे।
प्राजको आँखों से मेरे गीत नहीं बहा रहे।
मेरे मल के सोत किसी के मन मे सूखे जा रहे।
कंपित हदय, अपित मेरी आशा का उल्लास है।
पैर भने जगमग हों मेरे मन मंजिल के पास है।
होता व्यर्थ धरी पूआ में प्रति उपहार कर ।
धुझनुस कर जलते दीपक का निष्फल ज्योति-प्रसार कर।
पूजा के पहले मुरझानेवाला फूल प्रसार कब ।
है संकल्प अडिग तो ठहरी दिल की विकल एकार कब
इस असफलता में भी तेरा अमय सहा अविनाश है।
पर मले उगम हो मेरे मन मंजिल के पास है।
मेरी हो मादकता मुझको लिपट लिपट कर धैरती।
नि गयो ओ साध सदा को जल दृष्टि से हेरती।
अभिमानी मन की Emन क्यों धार न अपनी फेरतो ।
जनम जनम की विफल वासना रह रह मुझको टेरती।

कुछ भी हो पर मुझे तुम्हारी करुणा पर विश्वास है।
पैर भले उगमग डों मेरे मन मंजिल के पास है।
/जीवन के आलोक-तिमिर सब मंजिल को पहचानते ।
पे अकाइ स्वप्न उसी को एक बसेरा मानते ।
मन के सारे कम्प-पुलक-आनंद उसे अनुमानते ।
वहाँ पहुँच कर राम और रस नहीं लौटमा पामते ।
हो कितनी भी इर मगर मिळता से आकाश है।
पर भले डगमग हो मेरे मन मंजिल के पास है।
सम

जन-जन के मन में
कैसे मैं मन-मन के मन में वह ज्वाला धधकाऊ
जिसमें प्राकर राख बने सदियों को मिदी गुजामी
में कैसे सुलगाऊँ धुनी यही मामी
मानवता की भूख-पराजय जिसमें ५-६ असतो
दलित पति को प्रतिहिंसा मिसके पीड़े भलती
को आपस को इट आपरा का मेद मिटाली
मखों नंगों और हताशों को को अमर बनाती
किस अनदेखे ज्वालागिरि से में वे लपटे लाज
कैसे में प्रम-प्रम के मन में वह ज्वाला चकाऊँ
केसे कू कंठ-कंठ में मैं विश्व को भेरी
मुझ में इतनी जलन मगर कितनी परवशता मेरी
कडे उर्वलित कर ई हृदय हृदय की बाती
मेरी शक्ति मात्र से लो को ही पकट न पाती
कसे आगे रत-सिंधु में ज्वार शुगों का सोसा
कैसे मिस हडियों में सो वा पुगो से सोया
मैं जलता माया पर बोलो कैसे हम्हें जलाऊ
कैसे मैं जन-जन के मन में वह ज्वाहा घधकाऊ
कैसे सुतिगाऊ में वह ओ आग युगों को प्यासी
है जिसके अंगारों का प्रमिसार सदा अविनाशी
बलिदानों के ऐसे सजती जिसकी सदा सलामी
होती जिसकी पारदों के महलों बीन सलामी
अहाँ बदलते युग अपने पापों का लेखा देते
ज्वालामुखी इसी का लावा संचित कर रख लेते
इंधन बहुत मिळेगा पर वह आग कहाँ से लाऊँ
कैसे मैं अन-प्रम के मन में वह ज्वाला धधकाऊ

नतन अभियान
.
जिसको अनगिनत शहीदों ने अपने वाजिदानों से का,
तुमनतन अभियानों से ये अवरोचो मार्म बदछ जाज्ञो ।
तुम भूतन में से प्रेरिर र पालो।
क्यों और रतन डे निमी हे ऐशा रोगी राई,
वों नवयुग के टडोर भादत पने सेल ,
तूफान से
मार गो,
वे बिले दुर्गा को चाहियो गिर पागो,
विक, कापवार-माल होगा धारा मी,
न है है रोयो कर्म मदर टाहो।
गंगा-जमुना नों-बापुर पुरातन इतना
फिर तो वह बायोटोजो विमोचन टा,
जो प्रतिदं दो भाग हे लगको नातास करतो,
जिसके मा प्रतिक्षा की कार हतो गित हरतो,
शों-सी हट रही है पुढे चर्चा को सूसी शायें,
सुम उन निधार ए के चिरर मर्म बदल डालो।
है I सुम्हारे कंधों में गों को एक कड़क दुर्द,
सोवा को पसरता में हो तो घिन्ता, कैसा मातम,
वे दोष बदलने होंगे जिको मोति पुरानी हो आयो,
को वे विधियां जोग ित्रिर चमक छायो,
तुम HIR पदारे को रारा में चुन अवानो का भर हो,
एम नतन अभियान से ये चिर पर मार्ग बदल डालो ।
तुम म्हारालि की नील-आशा ओ सेजे भावो के पर पर,
सूखे हाड़ों में हवा का नाद भरे जिसका प्रतिलर,
किर मार तुम्हारी आँखों के आगे हैं समता का खाका,
लता केद्र घरात सोया संहारक अळ लेकर,
G
१०

गाँधीजी के निधन के बाद प्रथम
स्वाधीनता-दिवस
आज राष्ट्र के महापर्व का सिंहासन है खाली।
यह कैसा त्योहार कि लगता इतना सूना-सूमा
कैसा यह मुहर्त जिसमें दुख-इई हो रहा दूना
सुका जा रहा सुन्ध तिरंगा झंडा आज हमारा
रुद्ध हो रहा कोटि-कोटि कठों में अय का नारा
घूम रहे खोये-खोये से वरुण धीर बलिदानी
शिथिल करों से डोर ध्वजा की खींच रहे सेमानी
देख नपती कही विषय गौरव की बोषित लाली
UTA राष्ट्र के महापर्व का सिंहासन है खाली !
सभी ठा था देश दासता के सागर से ऊपर
अभी-अभी गुजे थे पर्वत शिखरों पर सुख के
कितनी कठिन यालमा, निर्वासन, अपमान सहनकर
राह मौत की देख-देख फाँसी खेलों में गंभ कर
उसके आवाहन पर यौवन ने सर्वस्व लुटाया
कितना रस्त बहा तब यह आजादी का दिन आया
कित लग रहीं माज सूर्य की किरखें कितनी काली
SEX राष्ट्र के महापर्व का सिंहासन है साली !
जास तुम्हारा सध्या तरंण होगा राष्ट्र-विधाता
माम तम्हारा भाद-दिवस है मोमवयुग निर्माता ।
इतिहासों की रज में खोधे हिसक अत्याचारी
काल गर्भ में लीन हो गये कितने सता-धारी
देवा तुम्हारी सुधि के घर पर युग-युग सत्य पर्ने
महादेश के प्रार दीप बनकर चिरकाल अगे
किन्तु भार तो कसक रही पीड़ा अंगारों वाली
आस राष्ट्र के महापर्व का सिहासन है खाली!

अलविदा .
अलविदा नराश्य को धुमिल पराजी।
पृथुल चा पर समय का शीप रक्खे
शुगों से लेती प्ररात शव-साधना-सो
अलविदा!
यो पृष्टि के नंगे अधुरे गोर को प्रवसादिनी ।
एकाकिनी घिर शून्य संसृति मितिम को एकाकिलो
वेदना के अमित सोमव भार
युग युगो को तममयो वोभल्स हार
आल्म-मय की अकर्मण्य विधवा एकार
निस्पृहा को कान्ति-पोली भान्ति
अलविदा।
श्री स्वप्न घन की रुग्ण आत्म-प्रपूर्ति
रागहीन विरागहीन समत्व को हलमा
अपस्मारी घेतना के धुन्ध
मोलो बैंगनी ओं आस्मानी शुन्य
जिसमें इवती आई कला, संस्कृति, सरसता
ओ मरर को छह सो घटुं ओर फैलो
सो प्रगति की शक्तियों को तलहटी में
धुद्धि-मओंनी अहंकृति घन आज पायो
मनविदा ओ।

अ-मेघो मे छलकते मानता के सिन्धु सम्मिलित जीवन-रसा की वासना को शन्न, 'ऐकान्तिक अहम को विकृत अनुकृति शरमोली निशा के बुझे मन को कुहा ला-कुंठिता बन्ध्या दिशा की सूजन-अड़ता बोलमा लोखीम जो अभिव्यक्ति जिसको मर्म मे हो छुट मरी अभिव्यंजना की विकलता जागोन जिसमें माम पीड़न को त में ओ दंगो ही रह गई अलविदा अब जिन्दगी भर को विदा ! चिता के एस-सी मिस्लेख धी पारा पर छाई घटा को गलतों की वर्ग-संस्कारों की घनी घिरवृद्ध ममता मिथ्या आदशों की नकाली द्विधा मनविदा ! Pu- ..-.' ----

नवयुग
की दीवारें
परवशता के अंगारो में तप-तप कर
झ-बुझ कर बाधाओ की घट्टामों से
कितनी कठिन मापदाओं से, अवरोधों से,
हमने निर्मित कों ये नवयुग की दीवारें
धमकी दी मने तब जैसे फट पड़ने की
जोर्ण समामी धरती मे भूकम्प उठाये
कितने णिक धराशाई तुफ़ान मचाये
किना एका कब दीपक राग नई ज्वाला का
कब रुकता सम्मिलित चेतना का विधासी
परिवर्तन म का चिर विश्वासी
चीर विरीधो की छाती को उठी कोध कर
: नवयुग को ये घिर-रजिता दृद दीवारें
रुप मिला सांयमिक तृषा को
उष्ण रक्त मे तेरन्तर कर यौवन उभरा'
घला छुलांमें मरे शवों पर परम-प्रियो के
श्बा उभरा सुन्ध तरंगों पर लहराया
बलिदानों के इमे गारे सिमेट ले
हमने निर्मित को हैं मवयुग की दीवारें
ऊपर उठती आती-कितनी बढ़ती जाती
मानवता की समता का नव शशि ने को
इस मिला दुनिया की तकदीर बदलने
घरस-चिन्ह पशुता के थोड़े और बचे है
७.

(ो दबकर मर को पुरातन के मन में)
उसे मिटा देंगे श्रमसत्ता के निर्माता
फिर इन दीवारों पर नियों में रंग देंगे
सब के सुख की जीवन की लय मरो में
प्राकृतिक मानवी वियों को परिणति महान
टूटेंगे शोधरा को मकड़ी के पाले
जिनमें अकुलाता वर्गवद्ध मानव-समास
हमने अपना सत्य मनाया
और कुरुप सत्य जीवन का अपने-सा अति मन्य बनाया
इन नवयुग को प्रसरराशीला दीवारों पर
आगे हम चिर अंकुरित अरुलाई के
हाड़-मांस के संघर्षों के, बलिदानों के
नये जगत के आसानों के।

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Viram Chinh

Author
Anchal
Title
Viram Chinh
File name
Viram Chinh
Text
OCR done
Citation
1965
Published
2011/03
Publisher
Hndi Pracharak Pustkalya Kalkatta
Language
Sanskrit
Pages
89
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Poetry
DLI number
551600
Barcode
4990010032324.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
EaxBlRHgYfz
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Viram Chinh