Sanmati Library, Jaipur

Atharved Bhashyam Chaturdash Kandam

Trivedi, Kshemakarandas · 2009/10

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- ३) २३) । २) २) ॥ मो३म् ।। "वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है, वेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना सब आर्या का परम धर्म है। आनन्दसमाचार। अथर्ववेदभाष्यम्-जिन वेदों की महिमा सब बड़े २ ऋषि, मुनि और योगी गा आये हैं और विदेशी विद्वान् जिनका अर्थ खोजने में लग रहे हैं । वे अब तक संस्कृत में हो कारण बड़े कठिन थे । ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का अर्थ तो भाषा में हो चु है। परन्तु अथर्ववेद का अर्थ अभी तक नागरी भाषा में नहीं था , इस महानुटि को पूरा कर के लिये प्रयाग निवासी पं० शेमकरणदास त्रिवेदी ने उत्साह किया है। वे भाष्य को नाग (हिन्दी) और संस्कृत में वेद, निघण्टु, निरुक्त, व्याकरणादि सत्य शास्त्रों के प्रमाण से व परिश्रम के साथ बनाकर प्रकाशित कर रहे हैं। भाग्य का क्रम इस प्रकार है। १-सूक्त के देवता, छन्द उपदेश, २-सस्वर मूल मन ३-सस्वर पदपाठ, ४-मन्त्रों के शब्दो को कोष्ठ में देकर सान्वय भाषार्थ,५-भावार्थ, ६-आद श्यक टिप्पणी, पाठान्तर, अनुरूप पाठादि, ७--प्रत्येक पृष्ठ में लाइन देकर सन्देह निवृत्ति लिये शब्दों और क्रियाओं की व्याकरण निरुक्तादि प्रमाणों से सिद्धि । इस वेद में २० छोटे बड़े काण्ड हैं, एक एक काण्ड का भावपूर्ण संक्षिप्त स्त्री पुरुषों समझने योग्य प्रति सरल हिन्दी और संस्कृत भाष्य अल्प मूल्य में छपकर ग्राहकों के पार पहुंचता है । वेदप्रेमी श्रीमान् राजे, महाराजे, सेठ, साहूकार, विद्वान् और .सर्व साधारण से पुरुष स्वाध्याय, पुस्तकालयों और पारितोषिकों के लिये भाष्य मंगाय और जगत्पिता परमार के पारमार्थिक और सांसारिक उपदेश, ब्रह्मविद्या, वैद्यकविद्या, शिल्पविद्या, राजविद्या अनेक क्रियाओं का तत्व जानकर आनन्द भोगें और धर्मात्मा पुरुषार्थी होकर कीर्ति पाव छपाई उत्तम और काग़ज़ बढ़िया रायल अठपेजी है। स्थायी ग्राहकों में नाम लिखाने वाले सज्जन २०) सैकड़ा छोड़कर पुस्तक वी० पी० वा नगद दाम पर पाते हैं । डाकव्यय ग्राहक देते हैं १ भूमिका २ ३ सहित मूल्य ११) १३ । १४ १५ / १६ १७ १८ १९ २० पृष्ठ ३,४०० २) २०) |१) ११) २७-) काण्ड-१५ छप रहा है। कांड १६ शीघ्र प्रकाशित होगा। हवनमन्त्रा:-धर्म शिक्षा का उपकारी पुस्तक-चारों वेदों के संगृहीतमन्त्र ईश्व स्तुति, स्वस्तिवाचन, शान्तिक्रण, हवनमन्त्र, वामदेव्यगान सरल भाषा में शब्दार्थ सहि संशोधित बुढ़िया रायल अठपेजी पृष्ठ ६०, मूल्य ।)। रुद्राध्याय:-प्रसिद्ध यजुर्वेद अध्याय १६ (नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषवे नमः ब्रह्मनिरूपक अंर्थ संस्कृत, भाषा और अंग्रेज़ी में बढ़िया रायल अठपेजी, पृष्ठ १४८ मूल्य ।। रुद्राध्यायः-मूलमात्र वढ़िया रायल अठपेजी, पृष्ठ १४ मूल्य ) वेदविद्यायें-वेदों में विमान, नौका अस्त्र शस्त्र निर्माण, व्यापार, गृहस्थ, अति सभा, ब्रह्मचर्यादि का वर्णन मूल्य -)। पता-पं० क्षेमकरणदास त्रिवेदी ५२, लूकरगंज, प्रयाग। (Allahabad) काण्ड ५. ६ ७ 8 १. काराड ११ १२ लगभग २५ सितम्बर १७१। Onkar Press, Allahabad. ८ . १-सूक्त विवरण अथर्ववेद, काण्ड १४ ॥ देवता उपदेश सूक्त के प्रथम पद छन्द १, सत्येनासमिता भूमिः सोम इत्यादि मन्त्राः १-५, अनुष्टुप् आदि योग्य और प्र. प्रकाश करने फाशक विषय - om मन्त्राः ६-६४। विवाह संस्कार गृहाश्रम . तुभ्यमले पर्यवहन दम्पती 4 अनुष्टुप् श्रादि -अथर्ववेद, काण्ड१४ के मन्त्र अन्य वेदों में सम्पूर्णवा कुछ भेद से॥ अथर्ववेद (काण्ड १४) नसंख्या यजुर्वेद, सामवेद पूर्षा- ऋग्वेद,मण्डल, अध्याय, र्चिक, उत्तरा सुन्न, चिफ इत्यादि सूक्त, मन्त्र सूक्त, मन्त्र १-३ | सत्येनोत्तमिता भूमिः १।१-३ १०।५।१-३ ४ यत् त्वा सोमप्रपिवन्तिः १४ १०।५।५. ५ आच्छविधानगुपितो. १। ५ १०।५/४ ६ चित्तिरा उपयहिणं १०|| ७ः ७ भ्यासीदनदेयी १०।५।६ :-१३ स्तोमा त्रासन प्रति ११-१३ १०1८५1८-१३ १४ यदाश्वना पृच्छमाना १।१४ १०।५।१४,१५ १५ यदयातं शुभस्पती १। १५ १०1८1१४,१५ १६ ते चक्रे सूयें १।१६ १०।५।१६ १७ अर्यमणं यजामहे १। १७ ७।५। १२ ३६ १८,१६ प्रेतोमुञ्चामि नामुतः १।१८, १६/१०/२५, २४ २०,२१ | भगस्त्वेतो नयतु १। २०, २१/१०/५२६, २७ २२ इव स्तं मा वियोटं १।२२ १०।८५.४२ २३, २४ पूर्वापरं चरतो १। २३, २४ । १०१५,२६. २५ / परा देहि शामुल्य १। २५. १०१।२8. २६ नीललोहितं भवति १।२६ १०।८।२८. २७ अश्लीला तनूभवति १। २७ १०।३० २० माशसन विशंसन १०।५।३५ २०/तृटमेतत् कटुक १। २8 १०।५।३४ ३० अन्तरा ऋजयः १। ३४ १०। ५। २३ ३१ यो भनिध्मो दीदय १। ३७ १०।३०।४ ३२खे रथस्य खेऽनसः १।४१ 120वा:१७ ३३ | सम्राश्येधिश्वशुरेषु १।४४ १०।८५४६ ३४ जीवं रुदन्ति वि १।४६ १०।४०।१० ३५. गृह्णामि ते सौभ. १।५० १०1०५।३० ३६ सुकिंशुकं वहतुं १। ६१ १०।५।२8 ३७ तुभ्यमग्ने पर्यवहन्त्सू २।१ १०।८५ 1३८ १। २८ .

(२) ऋग्वेदः सूक, मन्त्र :, सूक्त, मन्त्र - -- अथर्व वेद । । यजुबंद सामवेद पूर्वा- मण्डल, मन्त्र (काण्ड २४) अध्याय, चिंक, उत्तरा संख्या मन्त्र र्चिक इत्यादि २८ पुनः पलीमन्निरदा २१२ ९011३६ । ३६ लोमस्य जाया प्रथमं. १०:५४० ४० सोमो दद् गन्धर्वाय २13 १०।५।४१ ४१ मा वामगन्सुमति २१५ १०।१०।१२ ४२ सा मन्दसाना मनला २।६ १०।४०६९३ ४३ ये वध्वश्चन्द शं १० ४४ मा विदनपरिपन्धिनो १०1५। ३२ ४५ उद्व कर्मिः शन्या ३१३३।१३ ४६,४७ अघोरचनुरपतिमी २। १७, १८९०-५४४ ४८ सुमजलीरियं १०-५१३३ ४. या दुर्हार्दा युवतयः २१२६ १०।५।३३ ५० 'उत्तिष्ठेतो विश्वावतो १०१-५॥२१,२२ ५१ : राया वयं सुमनलः १। १९३।१६।। ५२ 'तां पूषं छिवत १०।५।३७ ५३ श्रा वा प्रजा जनयतु ३1४० १०१-५४७ ५४ सूर्याय देवेभ्यो १०५.१७ ५५ । य ते चिमिश्रियः ।१।१२ पू०३।६१२ ५६ जनयन्ति नाचतवः ।१७२ ७६६४ ... - . " सू०१ [४८३] चतुर्दथं काण्डस् ॥ १४ । (३,०२८.) ॥ ओ३म् ॥ अथर्ववेद 001 .. बमुर्दशं काण्डम् प्रथमोऽनुवाकः॥ . । i सूक्तम् १॥ १-६४॥ १-५ सेमो देवता, ६-१६ सूर्या देवता, .१७-६४ दम्पती देवते ॥ १-१३, १६, १८, २२, २५-२८, ३०, ४१, ४२, ४४, ५१, ५२, ६३ अनु- 'टुप् । १४ विराट् मस्तारपङ्क्तिः । १५ निचूदास्तारपङ्क्तिः । १७, ३६ भुरि- गनुष्टुप् : १६. २०, २४, ३३, ३७, ३६, ४७, ५०,५३, ५६, ५७, ६१ त्रिष्टुप् : २१ [अन्त्यपादौ निवृत् ], ४६ जगती ; २३, ३१, ५६ भाषर्षी त्रिष्टुप , २६ निवृत् पुरस्ताद् वृहत्ती; ३२, ४०, ४५, ५४, ६४ भुरिक् त्रिष्टुप् , ३४, ६० आर्षी पक्तिः ३५, ४३, ६२ निदनुष्टुप् ; ३८ आर्युष्णिक ; ४८ पथ्या पङ्क्तिः । ४६ विराट त्रिष्टुप: ५५ विराट पुरस्ताद् वृहती ; ५ निचुत् त्रिष्टुप् ॥ मन्त्राः १-५, प्रकाश्यप्रकाशकविषयोपदेश:-मन्त्र १-५, प्रकाश करने योग्य और प्रकाशक के विषय का उपदेश । सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्य णोत्त'भिता द्यौः । ऋ तेनादित्यास्तिष्ठन्ति दिवि भामो अधि श्रुितः ॥ १॥ सत्येन । उत्त'भिता । भूमिः । सूर्यण। उत्त'भिता। द्यौः ॥ ऋ तेन । मादित्या तिष्ठन्ति । दिवि । सोम:। अधि। श्रितः। भाषार्थ-(सत्येन ) सत्यस्वरूप परमेश्वर करके : (भूमिः)..भूमि उत्तभिता) [आकाश में ] उत्तमता से थांभी गयी है, और ( सूर्येणे ) सूर्य १-(सत्येन) नित्यस्वरूपेण ब्रह्मणा (उत्तभिता) उत्तमतया धारिता • (भूमिः ) ( सूर्येण ) आदित्यमण्डलेन ( उत्तभिता ) (धौः ) प्रकाशः' (ऋतेन ) - (३,०३०) अथर्ववेदभाष्ये सू.१ [४८३] लोक करके (यौः) प्रकाश (उत्तभिता) उत्तम रीति से थांभा गया है। (ऋतेन) सत्य नियम द्वारा (प्रादित्याः) प्रकाशमान किरणे [वा अस्त्रण्ड सूदम परमाणु ] (तिष्ठन्ति ) ठहरते हैं, और (दिवि) [सूर्य के प्रकाश में (सोमः ). चन्द्रमा (अघि ) यथावत् (श्रितः ) ठहरा हुआ है ॥ १ ॥ भावार्थ-लोक दो प्रकार के हैं एक प्रकाश करने वाले जैसे सूर्य प्रादि और दुसरे अप्रकाशमान जैसे पृथिवी चन्द्र श्रादि । परमेश्वर के नियम से प्रका- शक सूर्य आदि लोक प्रकाश्य पृथिवी चन्द्र श्रादि लोकों को अपने प्रकाश से प्रकाशित करते हैं ॥१॥ १-मन्त्र १ तथा २ महर्षि दयानन्द कृन ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, प्रकाश्य प्रकाशक विषय पृ० १४३, १४४ में व्याख्यात हैं। २-मन्त्र १-३ ऋग्वेद में हैं -१०-५ ! १-३ । मन्त्र ३ भेद से है। सोमनादित्या बुलिनः नोमैन पृथिवी महौ । अथो नक्षत्राणामे षामुपस्थे सेम माहितः ॥ २ ॥ सोमैन । श्रादित्याः। वुलिनः। सोमैन । पृथिवी । मही ॥ अयो इति । नक्षत्राणाम् । एषाम् । उप-स्थे । सोमः। मा-हितः।।२ भाषार्थ-(सोमेन ) चन्द्रमा के साथ (श्रादित्याः) सूर्य की किरणें (बलिनः ) बलवान् [ होती हैं और । लोमेन ) चन्द्रमा [ के प्रकाश के साथ (पृथिवी ) पृथिवी ( मही ) बलवती अर्धात् पुष्ट [ होती है ] 1 (अथो) और भी (एषाम् ) इन (नक्षत्राणाम् ) चलने वाले तारागणों के (उपस्थे) समीप में (सोमः) चन्द्रमा (श्राहितः ) ठहराया गया है ॥ २ ॥ सत्यनियमेन (श्रांदित्याः) श्रादीप्यमानाः किरणाः ! अखएडाः सून्माः परमाणव: (तिष्ठन्ति ) वर्तन्ते (दिवि ) सूर्यप्रकाशे ( सोमः ) चन्द्रमाः (अधि) यथाविधि (श्रितः) स्थितः ॥ २-(सोमेन ) चन्द्रेण सह संयुज्य (आदित्याः) आदीप्यमानाः किरणाः (पलिनः ) बलं कर्तुं शोला भवन्ति ( सोमेन ) चन्द्रप्रकाशेन सह (पृथिवी ) (मही ) बलवती । पुंष्टा (अथो) अपि च (नक्षत्राणाम् ) गतिशीलानां तारागणा- नाम् (एषाम् ) दृश्यमानानाम् ( उपस्थे ) समीपे (लोमः) चन्द्रमाः (माहितः) स्थापितः॥ - - चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ सू० १ [४८३] (३,०३१) भावार्य-चन्द्रमा शीतल स्वभाव है, सूर्य की किरणे उसके ऊपर गिर फर शीतल हो जाती हैं, और जब वे चन्द्रमा से उलटकर वायु से मिलकर पृथिवी पर पड़ती हैं, तब शीतलता के कारण पृथिवी के अन्न श्रादि पदार्थों को पुष्ट करती है। इसी प्रकार सूर्य और चन्द्रमा का प्रभाव नक्षत्रो पर होता है ॥श सोम मन्यते पपिवान् यत् सैपित्याधिम् । सोम यं ब्रह्माणी विदुर्न तस्याश्नाति पार्थिवः ॥ ३ ॥ सोमस् । मन्यते । पुषि-वान् । यत् । सम्-पिषन्ति । ओष- धिस् । सोमम् । यम् । ब्रह्माणः । विदुः।न। तस्य । प्रश्नाति । पार्थिवः ॥ ३ ॥ भाषार्थ-(सोमम् ) चन्द्रमा [ के अमृत ] को (पपिवान् ) मैंने पी लिया, ( यह यात मनुष्य ] ( मन्यते ) मानता है, (यत् ) जव (ओषधिम् ) ओषधि [अन्न, सोमलता आदि ] को (संपिंपन्ति ) वे [ मनुष्य ] पीसते हैं । (यम् ) जिस ('सोमम् ) जगत्स्रष्टा परमात्मा को ( ब्रह्माणः) ब्राह्मज्ञानी लोग (विदुः ) जानते हैं, (तस्य ) उसका [अनुभव] ( पार्थिवः पृथिवी [के विषय], आसक पुरुषः (न) नहीं ( प्रश्नाति ).भोगता है ॥३॥ भावार्थ-चन्द्रमा से पुष्ट हुये अन्न सोमलता आदि के सेवन से मनुष्य शरीर पुष्टि करते हैं, परन्तु जो मनुष्य विद्वानों का सत्संग करके ईश्वर ज्ञान से मात्मा को पुष्ट करते हैं, वे शरीर पोषकों की अपेक्षा अधिक भानन्द पाते हैं ॥३॥ यत् त्वा सेम मुपिन्ति तत ना प्यायसे पुनः । वायुः सोमस्य रक्षिता समानां मासु प्राकृतिः ॥ ४ ॥ ३-(सोमम् ) चन्द्रामृतम् (मन्यते) जानाति (पपिवान् ) पा पाने-वसु । अहं पीतवानस्मि ( यत् ) यदा (संपिंषन्ति ) सम्यक् चूर्णीकुर्वन्ति (ओषधिम्) मनसोमलतादिकम् (सोमम् ) जगत्स्रष्टारं परमात्मानम् ( यम्) ( ब्रह्माणः) ब्रह्मशानिनः पुरुषाः ( विदुः ) जानन्ति । साक्षात्कुर्वन्ति (न) निषेधे (तस्य ) ब्रह्मणोऽनुभवम् ( अश्नाति ) भुनक्ति । अनुभवति (पार्थिवः) पृथिवीविषयाss. सक्तः पुरुषः॥ गर , - • अथर्ववेदभाष्यैः सू०१ [ ४८३] यत् । त्वा । सोम । मुं-पिबन्ति । ततः । प्रा। प्यायमे पुनः ॥ वायुः । सोमस्य । रक्षिता । समानाम् । मासः । आ कृतिः ॥ ४ ॥;:: भाषार्थ-सोम ) हे चन्द्रमा: (यत्) जब (त्वा) तुझ को (अर्पि- वन्ति ) वे [ किरणे ], पी जाती हैं, (ततः) तव (पुनः ) फिर (श्रा प्यायसे ) तू परिपूर्ण होजाता है । (वायुः) पवन (लोमस्य ) चन्द्रमा का (रक्षिता) रक्षक है और (मांसः) संव का परिमाण करने वाला [ परमेश्वर (समानाम् ) अनु. कूल क्रियाओं का (प्राकृतिः ) बनाने वाला है ॥ ४ ॥ भावार्थ-जंब चन्द्रमा के रस को सूर्य की किरणें खींच लेती हैं, वह रस पृथिवी पर किरणों द्वारा आता और पदार्थो को पुष्ट करता है, फिर वह पार्थिव रस किरणों से वायु द्वारा खिंचकर चन्द्रमा को पहुंचता है। इस प्रकार चन्द्रमा ईश्वर नियम से प्राणियों को सदी उपकारी होता है ॥ ४॥ .. 11: यह मन्त्र कुछ, भेद-से ऋग्वेद में, है.-१०१५ ५ ॥ अच्छद्विधान पितो बाहतैः साम रक्षितः । ग्राव्णामिच्छृण्वन् तिष्ठसि न ते प्रश्नाति पार्थिवः ॥ ५ ॥ माच्छत्-विधानैः । गुपितः। बार्हतैः । सोम । रक्षितः ॥ ग्राव्णाम् । इत् । शृण्वन् । तिष्ठसि । नः । ते । प्रश्नाति । पार्थिवः ॥५॥ भाषार्थ-(सोम ) हे सर्वोत्पादक परमेश्वर ( आच्छविधानैः ) - । . ४--(यत्) यदा (त्वा ) (सोम) हे चन्द्र (प्रपिवन्ति) आकर्षन्ति रश्मयः (ततः.) अनन्तरम् (आ प्यायसे) प्रवर्द्धसे ( पुनः) (वायुः) (सोमस्य) चन्द्रस्य ( रक्षिता) रक्षकः ( समानाम् ) सम-टाप् । अनुकूलानां क्रियाणाम् (मासः) मसी परिमाणे परिणामे च-घञ् । परिमाणकर्ता ( प्राकृतिः) अकर्ता। रचयिता ५-(आच्छविधानैः ) आच्छादनं कुर्वद्भिनियमः (गुपितः) अन्तर्हितः .. ::. 1 सू० १ [४८३ ] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ ( ३,०३३) ढक लेने वाले विधानों से (गुपितः) गुप्त [अन्तधान किया गया और (बार्हतैः ) चेदवाणियों द्वारा कहे गये नियमों से ( रक्षितः ) रक्षा किया गया, " (प्राणाम् ) विद्वानों की [ प्रार्थना ] ( इत् ) अवश्य ( शृण्वन् ) सुनता हुआ तू (तिष्ठसि ) ठहरता है, (पार्थिवः) पृथिवी [ के विषयों में आसक पुरुष (ते) तेरे [ अनुभव को ] (न) नहीं (अश्नाति ) भोगता है ॥५॥ . भावार्थ-सर्वव्यापक परमात्मा अपने अमन्त सर्वश्रेष्ठ नियमों से सुर- क्षित रह कर बड़े उपकार करता है, उस को विधान ही जानते हैं, सामान्य मनुष्य नहीं जान सकते । इस लिये सब मनुष्य विद्वान् होकर ईश्वर शान से उन्नति करें॥५॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१०।५।४॥ मन्त्राः ६-६४ । विवाह संस्कारोपदेशः-विवाह संस्कार का उपदेश । चित्तिरा उपबर्हणं चक्षुरा मृभ्यञ्जनम् । द्योभूमिः काश पासीद् यदात् सूर्या पतिम् ॥ ६ ॥ चित्तिः। भाः। उप-बहणस् । चक्ष': । श्राः । अभि-अञ्जनम् ॥ द्यौः । भूमिः । कोशः। भासीत् । यत् । अयात् । सूर्या । पतिम् ॥ ६॥ भाषार्थ-(चित्तिः).चेतना [ कन्या की ] (उपवहणम् ) छोटी ओढ़नी [समान ] ( आ. ) होवे, (चक्षं :) दर्शन सामर्थ्य ( अभ्यञ्जनम् ) उबटन (चाहतैः) वृहती-श्रण । वृहतीभिदवाभिर्विहितैर्विधानः ( सोम ) हे सर्वो- त्पादक परमेश्वर (रक्षितः) (ग्राणाम् ) अ० ३ । १० । ५ । अन्येभ्योऽपिटश्यन्ते । पा० २।३। ७५ 1 गृ विज्ञापे स्तुतौ च-क्वनिप्, पृषोदरादित्वात् साधुः । गृणातिः स्तुतिकर्मा-निरु० ३।५ । विदुषां [ प्रार्थनाम् ] (इत् ) एष ( शृण्वन् ) आकर्ण- यन् ( तिष्ठसि) वर्तसे (न ) निषेधे (ते) तवानुभवम् ( अश्नाति ) भुनक्ति ( पार्थिवः) पृथिवीविषयेष्वासक्तः ॥ ६-(चित्तिः) चेतना । बुद्धिः (श्राः) बलं छन्दसि । पा० ७।३।६७ ! अस्तेर्लङि, ईडभावः, तलोपे सकारस्य रुत्वविसर्गौ । प्रासीत् । छन्दसि लुङ्लङ- लिटः । पा० ३।४।६। इति लिङथै लङ् । स्यात् । एवमन्यत्रापि ज्ञातव्यम् । ( उपवहणम् ) उपवस्त्र यथा ( चक्षुः ) दर्शनसामर्थ्यम् । (माः) स्यात् (अभ्य. . .

(३,०३४) अथर्ववेदभाष्ये सू० १ [ ४८२) - [शरीर मलने के द्रव्य के तुल्य ] (मो.) होवे । (द्यौः ) श्राकोश और (भूमि:) भूमि (कोशः) निधिमञ्जूषा [पेटी पिटारी समान ] (आसीत् ) होवे, (यत्). जब (सूर्या) प्रेरणा करने वाली [वा सूर्य को चमक के समान तेज घाली] कन्या (पतिम् ) पति को (अयात् ) प्राप्त होवे ॥६॥ . भावार्य-जब कन्या वाहिरी उपकरणों की उपेक्षा करके भीतरी विद्या- वल से चेतन्य स्वभाव, और पदार्थों को दिव्य दृष्टि से देखने वाली, और प्राकाश. और भूमि से सुवर्ण श्रादि प्राप्त करने कराने वाली हो, नव सुयोग्य पति से ज्याद करे॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१०।५।७॥ रैभ्यासीदनुदेयी नाराशे सी न्योचनी । सूर्यायो भुद्र मिद् वासो गार्थयति परिष्कृता ॥ ७ ॥ भी । श्रासीत् । अनु-देयौ। नाराशं सीं । नि-नोचनी । सूर्यायाः। भुद्रम् । इत् । वासः। गार्थया । एति । परिष्कृता। भाषार्थ-(भी) वेदवाणी ( सूर्यायाः) प्रेरणा करने वाली [ वा सूर्य की चमक के समान तेज वाली ] कन्या की (अनुदेयी)- साथिन [ समान ] अनम् ) शरीरमर्दनद्रव्यं यथा (द्यौः ) श्राकाशः (भूमिः ) ( कोशः) निधिमञ्जूषा यथा (आसीत् ) स्यात् (यत् ) यदा (अयात् ) या प्रापणे-लङ् । यायात् । 'प्राप्नुयात् (सूर्या ) अ०६।४ । १४ । राजसूयसूर्य० । पा० ३।१।११४ । स गतो यद्वा पू प्रेरणे निपातनात् क्यपि रूपसिद्धिः । सूर्या देवतायां चाव वक्तव्यः । वा० पा० ४.१ । ४८ । इति चाप् । सूर्या वाङनाम-निघ० १ । ११ । पदनाम- निघ०५।६। सूर्या सूर्यस्य पत्नी-निरु० १२ । ७। पत्नी विभूतिर्दीप्तिः। प्रेरिका । सूर्यदीप्तिवत्तेजस्विनी कन्या (पतिम् ) भर्तारम् ॥ ७-(भी) रेभ-अण, डीप । रेभः स्तोतृनाम-निघ० ३ । १६ । रेभस्य स्तोतुरियम् । वेदवाणी (आसीत् । स्यात् ( अनुदेयी) अनुद्रीयमानावयस्या (नाराशंसी) नर+शंसु स्तुतौ-श्रण । अन्येषामपि दृश्यते । पा०६।३। १३७ । इति दीर्घः ततः प्रमादित्वात् स्वार्थिकोडण, नगशंस एव नाराशंसः । येन नरा: - । - .4 ०१. [४८३) चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०३५) और (नाराशंसी) मनुष्यों के गुणों की स्तुति (न्योचनी) नौची [छोटी सहेली समान] (आसीत् ) हो। और (भद्रम् ) शुभ कर्म ( इत् ) ही (वासा) वस्त्र [समान ] हो [ क्योंकि वह ] (गाथया) गाने योग्य वेद विद्या से (परिष्कृता ) 'सजी हुयी (एति ) चलती है ॥ ७ ॥ कन्या वेदों और इतिहासों को पढ़कर विचारकर शुभ कर्म करती हुयी उत्तम विद्या से अपनी शोभा बढ़ावे ॥ ७ ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१०।५।६॥ स्तोमा मासन् प्रतिधयः कुरीरं छन्द श्रीपशः। सर्यायो अश्विनी वरागिरोसीत् पुरोगवः ॥ ८॥ स्तोमाः । श्रासन् । प्रति-धयः । कुरोरस् । छन्दः। श्रोप शः।। सूर्यायोः । अश्विना । पुरा । अग्निः । मासीत् । पुर:-गवः । भाषार्थ-स्तोमाः ) स्तुति योग्य गुण (सूर्यायाः) प्रेरणा करनेवाली [वा सूर्य को चमक के समान तेज वाली ] कन्या के (प्रतिधयः) वस्त्रों के अंचल [ समान ] (अासन् ) हो, (कुरीरम् ) कर्तव्य कर्म और (छन्दः) आनन्द. प्रद वेद (:ोपशः ) 'मुकुट [ समान हो] और (अग्निः ) अग्नि [शारीरिक और बाहिरी अग्नि द्वारा स्वास्थ्य, शिल्प, यज्ञ श्रादि विधान ] (पुरोगवः) अन- प्रशस्यन्ते स नराशंसो मन्ना-निरु०६।।स्त्रियां ङीप् । मनुष्यगुणानां स्तुतिः (न्योचनी) नि+उच समवाये-ल्युट, डीप् । लघुसहचरी ( सूर्यायाः) म०६। प्रेरिकायाः सूर्यदीप्तिवत्तेजस्विन्याः कन्यायाः (भद्रम् ) शुभकर्म (इत्) एव (वासः) वस्त्रम् ( गाथया ) उषिकुषिगार्तिभ्यस्थन् । उ०२।४ । गै गाने थन् । गानयोग्यया वेदविद्यया (पति ) गच्छति (परिष्कृता) मलङ्कृता । -(स्तोमाः) स्तुत्यगुणाः (आसन् ) स्युः (प्रतिधयः ) प्रतिधीयन्ते ये । वस्त्रान्ताः (कुरीरम् ) का उच्च । उ० ४ । ३३ । डुक करणे-ईरन् । कर्तव्यं कर्म (छन्दः) श्राह्लादको वेदः (ओपशः ) मा+उप+शीङ् शयने- ड । शिरोभूषणम् । मुकुंटः (सूर्यायाः) म० ६ (अश्विना) अ० २ । २६ । ६ । अश्वी च अश्विनी च अश्विनौ । पुमान् स्त्रिया । पा० ३ । २ । ६७ । इत्येकशेषः । अश्विनौ..."राजानौ पुण्यकृता-निरु० १२ । १ । प्राप्त विद्यौ वधूवरी (वरा) - - (३,०३६ ) , अथर्ववेदभाष्ये . सू० १ [४८३] गामी [ पुरोहित समान ] (आसीत्) हो, [जवं कि ] (अश्विना ) विद्या को प्राप्त दोनों [वधू वर ] (वरा ) परस्पर चाहने वाले [वा श्रेष्ठ गुण वाले] हो॥८॥ भावार्थ-जब कन्या ब्रह्मचर्य से विद्या प्राप्त करके स्वास्थ्य आदि विधान में निपुण हो और जब वैसा ही वर ब्रह्मचारी विद्वान् हो, तब दोनों पर- स्पर विवाह की कामना करें ॥ ८ ॥ मन्त्र :-१३ कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं-१० | ५1८-१३ ॥ ' सामौ वधुयुरंभवदश्विनास्तामुभा वरा। सूर्या यत् पत्ये शंसन्तीं मनसा संविताददात् ॥ ८ ॥ सोम वधु-युः। । अभवत्। अश्विनी । भास्ताम् । उभा । वरा ॥ सूर्याम् । यत् । पत्यै । शंसन्तीम् । मनसा । सविता! अददात् ॥६॥ भाषार्थ-(सोमः) शुभगुणयुक्त ब्रह्मचारी (वधूयुः ) वधू की कामना करने हारा (अभवत् ) हो, (उभा) दोनों (अश्विना) विद्या को प्राप्त [वधू वर (वरा) परस्पर चाहने वाले [वा श्रेष्ठ गुण वाले] (प्रास्ताम् ) हो, (यत् ) जब (पत्ये) पति के लिये (मनसा) मनसे (संशन्तीम् ) गुग कीर्तन करती हुयी (सूर्याम् ) प्रेरणा करने वाली [वा. सूर्य की चमक के समान तेजवाली ] कन्या को ( सविता) जगत् का उत्पादक परमात्मा (अददात् ) देवे॥8॥ वृञ् वरण-अप । वरश्च च वरा च वरौ । परस्परेच्छुकौ । श्रेष्ठौ (अग्निः ) शारीरिको वाह्यो वा अग्निः (आसीत् ) स्यात्. (पुरोगवः ) गोरतद्धितलुकि । पा०५।४।१२। पुरस् + गो-टच् । अग्रगामी । पुरोहितः ॥ E-(सोमः ) शुभगुणयुक्तो ब्रह्मचारी ( वधूयुः) सुप आत्मनः क्यच् । 'पा० ३।१।८। वधू-क्यच् । क्याच्छन्दसि । पा० ३।२। १७० । उप्रत्ययः । वधूकामः ( अभवत् ) भवेत् (अश्विना) म० । प्राप्तविद्यौ वधूवरौ (प्रास्ताम् ) स्याताम् ( उभा ) द्वौ (वरा ) म0 परस्परेच्छुकौ । श्रेष्ठौ (सूर्याम् ) प्रेर- यित्रीम् । तेजस्विनी कन्याम् (यत् ) यदा ( पत्ये ) स्वाम्यर्थम् (संशन्तीम् ) गुणकीर्तनं कुर्वनीम्' (मनसा) हृदयेन ( सविता) सर्वोत्पादकः परमेश्वरः (अददात् ) दद्यात्॥

- . A भू०१ [४८३] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,091). भावार्थ-ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी पूर्ण विद्या प्राप्त करके परस्पर गुणे को परीक्षा करके कराके गृहाश्रम में प्रवेश करें और परमेश्वर को धन्य- वाद दें कि बड़े भाग्य से तुल्य गुण कर्म खभाव वालें स्त्री पुरुषों का जोड़ा मिलता है ॥8॥ यह मन्त्र महर्षि दयानन्दकृत संस्कार-विधि ग्रहाश्रम. प्रकरण में व्याः ख्यात है। मनी मस्या अन भासीद् द्यौरीसीदुत छुदिः । शुक्रावनड्वाहावास्तां यदयात् सूर्या, पतिम् ॥ १० ॥ ८.१ ) मनः । अस्याः । अनः । मासीत्।। द्वरः । मासीत् । उत । छुदिः । शुक्रौ। अनड्वाहौ । श्रास्ताम् । यत् । अयात् । सर्या । पतिम् ॥ १० ॥ (१) भाषार्थ-(मनः ) मन (अस्याः) इस [ब्रह्मचारिणी ] का (अना) रथ [ समान ] ( आसीत् ) झेचे, ( उत') और (यौः) सूर्य का प्रकाश (छदिः) छत्तर [ समान ] (आसीत् ) होवे । (शुक्रौ ) दोनों वोर्यवान् [वधूवर ] (अन- ड्वाह) रथ चलाने वाले दो बैल [ के समान ] (प्रास्ताम् ) होवे, (यत्) जयं ('सूर्या) प्रेरणा करने वाली [चा.सूर्य की चमक के समान तेज वाली कन्या. (पतिम् ) पति को (अयात् ) प्राप्त होवे ॥ १० भावार्थ-जब कन्या वेद आदि शास्त्र पढ़कर मननशील, ताप आदि सहने योग्य हो और जब वैसा ही सुयोग्य पति हो, तब गृहाश्रम के चलाने में समर्थ होकर दोनों प्रीति पूर्वक विवाह करें...१० ॥ ऋक्सामाभ्यामभिहिती गावा ते सामुनावैताम् । श्रोते चक्रे प्रास्ता दिवि पन्याश्चराचुरः ॥ ११ ॥ - - . १०-('मनः) मननम् । अन्तःकरणम् (अस्याः) कन्यायाः ( अता); रथः (आसीत् ) स्यात् ( द्यौः) सूर्यप्रकाशः (आसीत् ) ('उता) अपि (छदि) छत्रम् । श्रातपत्रम् ( शुक्रौ ) शुक्र-अर्श प्राद्यच्। वीर्यवन्तौ दम्पती (प्रामाहौ) रथवाहको वृषभौ यथा (प्रास्ताम्) स्याताम्।। अन्यद्गतम्-०६ ॥ . २ (३,०३८) अथर्ववेदाज्ये सू०१/४८३] अक्-सामाभ्याम् । अभि-हितौ । गावा। ते । सामनौ । सेताम् ॥ श्रोचे इति । ते । चक्रे इति । आस्ताम् । दिवि । पन्यो । चराचुरः ॥ ११ ॥ भाषार्थ-(ऋक्सीमाभ्याम् ) पदार्थों को स्तुति विद्या और मोक्षज्ञान द्वारा (अभिहितौ ) कहे गये [दो प्रकार के बोध ] (गावा) दो चैल[स्थ के दो बैलों के समान ] (ते ) तेरे (सामनौ=समानौ ) अनुकूल (ऐताम् ) चलें । (ते ) तेरे (श्रोत्रे ) दोनों कान (चक्रे ) दो पहिये [ समान] (प्रास्ताम् ) होवे, (दिवि) प्रत्येक व्यवहार में (पन्थाः) मार्ग (चराचरः) चलाचल [रहे] ॥११॥ भावार्य-कन्या घेद विहित कर्मों में प्रवीण होकर श्रवण मनन द्वारा संसार के पदार्थों से गुण ग्रहण करके गृहाश्रम के व्यवहार चलाने में समर्थ होवे ॥ ११ ॥ शुचौ ते चक्रे यात्या व्यानो अक्षु माहेतः । अना मनुस्मयं सूर्यारोहत् प्रयती पतिम् ॥ १२ ॥ शुची इति । ते । चक्रे इति । यात्याः । वि-ग्लानः । अक्षः भा-हतः ॥ अनः । मनुस्मयम् । सूर्या । भा। अरोहुत् । म-यती। पतिम् ॥ १२ ॥ भाषार्थ-(यात्याः ते ) तुझ चलती हुयी के (सुची) दो शुद्ध [कान- । - । ११-(ऋक्सामाभ्याम् ) पदार्थानां स्तुतिविद्यया मोक्षक्षानेन च (अभि- हिती ) विहितौ वोधौ ( गावा) रथस्य गमयितारौ वृषभौ यथा (ते) तव (सामनौ) समानौ। अनुकूलौ (ऐलम् ) गच्छताम् ( श्रोत्रे ) गुणग्राहको कर्णी (ते) तव (चक्रे ) रथाले यथा (आस्ताम् ) स्याताम् (दिवि ) प्रत्येक- व्यवहारे (पन्थाः )मार्गः (चराचरः ) चरिचलिपतिवदीनां द्वित्वमच्योक् चाभ्यासस्य । वा० पा०६। १ । १२ । इति रूपसिद्धिः । चलाचलः । अत्यन्त गमनयोग्यः ॥ १२-(शुची) पवित्र श्रोत्रे (ते) तव (चंके) रथाङ्गे.यथा (यात्याः) ) मुं०.१ [४८३] चतुर्दशं. काडम् ॥ १४ ॥ (३,९३८) मन्त्र-११] (चक्रे ) दो पहिये [ समान हो ] और (ज्यानः)::व्यान..[ सर्वशरीर व्यापक वायु] (अक्षः) धुरा[समान] (आहतः) [ पहियों में लगा हो। (पतिम् ) पति के पास को (प्रयती) चलती हुयी (सूर्याः) प्रेरणा करने वाली [वा सूर्य की चमक के समान तेज वाली] कन्या (मनस्मयम्) मनोमय [विचार रूप] (अनः ) रथ पर (भा प्ररोहत्) चढ़े ॥१२॥ भावार्थ-जंव कन्या श्रवणं मेनन द्वारा ध्यान वायु अर्थात् इन्द्रियों को दमन कर सके, तब पति के समीप रहकर गृहाश्रम की गाढ़ी को चलावे ॥१२॥ सूर्यायां बहुतुः प्रागात् सविता यमवासृजत् । मुघानु हुन्यन्ते गावः फल्गुनीषु व्यु'यते ॥,९३, Fin सूर्यायाः । बहुतुः । म । अगात् । मुविता । थेम् । अधु-अमृत जत् ॥ मघासु' । हुन्यन्तै । गाय। फल्गुनीषु । वि । उहते १३ भाषार्थ-(सूर्यायाः) प्रेरणा करने वाली [वा सूर्य की चमक के समान तेज वाली ] कन्या का (वहतुः) दाय [यौतुक, फेन्या को दिया. पदार्थ] (म अगात् ) सन्मुख चले, ( यम् ) जिस [ पदार्थ को ( सविता) जन्मदाता पिता (अव असृजत्) दान करे। (मघासु) सत्कार क्रियाओं में (गावः) वाचाय (हन्यन्ते ) चलें, और वह [वधू] (फल्गुनीष्ठ) मफल क्रियाओं के बीच %3D १ यान्त्याः । गच्छन्त्याः (: व्यानः ) सर्वशरीरव्यापको. घायुर्यथा । इन्द्रियसमूह इत्यर्थः (भक्षः) चक्रधारणकाष्ठभेदः । धुरा (आहतः) संयोजितः (अनः) रयम् '( मनस्मयम् ) मनोमयम् । मननेन सिद्धम् (सूर्या) प्रेरयित्री । सूर्यवत् तेजस्विनी कन्या (आभरोहत्) आरोहेत् (प्रयती) प्रयाणं कुर्वती (पतिम्) भर्तारम् ॥ १३-(सूर्यायाः) प्रेरिकायाः । सूर्यदीप्तिवत्तेजोवत्याः कन्यायाः (वहतुः) एधिवयोश्चतुः।उ०१।७७ ॥षह प्रापणे-चतुविवाहकाले कन्याय देयपदार्थः । विषाहः । वहनकारणम् (प्र अगात् ) प्रकर्षण गच्छतु (सविता) जनकः । पिता (यम् ) पदार्थम् (वालजत्) दत्तवान् (मघासु) मह पूजायाम्-अचू अर्श माघ । घं घनम-निघ०२ । १० । सत्कारपतीषु क्रिया। धनवतीषु प्रियाम् (हन्यन्ते ) हन हिंसागत्योः । गम्यते । प्राप्यन्ते (: गावः). वाचः- (फल्गुनीषु ) फलेगुक च । ३० ३ । १६ । फ.ल. निष्प तौ उनन्, । गुक च, नीप . " - (150) अथर्ववेदभाष्ये सू० १ [४८३1. (वि उहते) ले जाई जावे ॥ १३॥ . .:: भावार्थ-पिता को योग्य है कि विवाह के समय कन्या. ही स्त्रीधन अर्थात् योग्य वस्त्र, अलंकार, धन दान करे और सब लोग आशीर्वाद चोल कर उस क्रिया को सफल करे ॥ १३॥ यदश्विना पृच्छमानावयांतं त्रिचक्रण वहुतु सूर्यायोः । कैक चक्र वौमासीत् क्व दे ष्ट्राय- तस्ययुः ॥ १४ ॥ यत् । अश्विना । पृच्छमानौ । अयातम् । वि-चक्रेण । वह- तुम् । सूर्यायोः ।। क्व । एकम् । चक्रम् । वाम् । मासीत् । क। देष्ट्रीय । तस्ययुः ॥ १४ ॥ भाषार्थ-(अश्विना ) हे विद्या को प्राप्त [दोनों स्त्री पुरुष समूहः । (यत) जब (सूर्यायाः) प्रेरणा करने वाली वा सूर्य की चमक के समान तेजवाली ] कन्या के (बहतुम् ) विवाह को (पृच्चमानौ ) पूछते हुये [तुम. दोनों ] (त्रिचक्रण) अपने तीन पहिये चाले [कर्म, उपासना, और शान वाले, रथ से.(अयातम् ) पहुंचो। (व.) कहां पर (वाम् ) तुम दोनों का (एकम् ) एका आत्मबोधरूप] (चक्रम् ) पहिया (आसीत् ) रहे, (क), कहां पर (देष्ट्राय ) उपदेश के लिये.(तस्थथुः ) आप दोनों ठहरें॥ १४॥ 3- भावार्थ-स्त्री पुरुष विवाह उत्सव परं एकत्र होकर अरस्पर आत्मो: भौति और परस्पर उपकार में स्थिति का विचार करें। भागेमन्त्र १६देखो॥१४ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-2014 1४, २५ ॥ : । --- सफलक्रियासु (न्युहिते) विविधं नीयते । १४ यत् ) यदा (अश्विना) प्राप्तविद्यौ स्त्रीपुरुषसमाजौ (पृच्छ- मानौ ) प्रश्नान कुर्वन्तौ (अयातम् ) ) या गतौ लङ् । अगच्छतम् (त्रिचकोण), कमोपासनोज्ञानरपेण चक्रत्रययुक्तन रथेन (बहतुम्) म० १३ । विवाहोत्सवम् (सूर्यायाः) प्रेरिकायाः । सूर्यदीप्तिवत्तेजस्विन्याः कन्यायाः (क) कुत्र (एकम् ) (चक्रम्) आत्मचोधरूपम् (धाम) युवयोः (आसीत् ) अस्तु । भवतु (क) (दंष्ट्राय) उपदेशाय (तस्थंधुः) विष्टतम् ॥

- सू०१ [४८३) चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०४१ ) यदयातं शुभस्पती वरे यं सूर्यामुपं । विश्व देवा अनु तद् वामजानन् पुत्रः पितरमवृणीत पूषा १५ यत् । नयाँतम् । शुभः। पुती इति । वरे -यस् । सूर्याम्। उप॑ ।। विश्व । देवाः'। अन् । तत् । वाम् । भूजानन् । पुत्रः पितरंम् । अवृणीत । पूषा ॥ १५॥ भाषार्थ-(शुभः पती.) हे शुभ क्रिया के पालन करनेवाले [स्त्री पुरुष समूह ! ] तुम दोनों ( यत् ) जव (सूर्याम् -सूर्यायाः) प्रेरणा करने वाली [वा सूर्य की चमक के समान तेजवाली] कन्या के (घरेयम् ) श्रेष्ठ कर्म में (उप) आदर से(अयातम् ) पहुंचो। ( विश्वे देवाः) सव विद्वान् लोग (वाम् :) तुम दोनों के (तत्) उस [फर्म] में (अनु अजानन्.). सम्मति दे [कि.] ( पूषा) पोषण करने वाला (पुत्रः ) पुत्र ( पितरम. ) पिता को ( अवृणीत ) स्वीकार करे ॥१५॥. भावार्थ-शुभचिंतक स्त्रीपुरुष विवाह में आफर प्रयत्न करें कि विद्वान् 'लोग प्रसन्न होकर आशीर्वाद दें कि उन पधू वर का पुत्र पोषण करनेवाला विद्वान पराक्रमी होवे ॥ १४ ॥ .यह मन्त्रः ऋग्वेद में है-१०।५ । १४, १५ ॥ द्वे ते चक्रे सूर्य ब्रह्माणं ऋतुथा विदुः । मथैक चक्रं यद् गुहा तदद्धातय इद् विदुः ॥ १६ ॥ कै इति । ते। चक्रे इति । सूर्य । ब्रह्माणः । ऋतु-या। विदुः॥ अर्थ । एकम् । चु क्रम् । यत् । गुहो । तत् । युद्धातयः। इत् । विदुः ॥ १६ ॥ १५-( यत् ) यदा ( अयातम् ) अगच्छतम् ('शुभस्पती) शुभक्रियायाः पालको (वरेयम् ) णालोपः। वरेण्यम् । श्रेष्ठ कर्म (सूर्याम् )षष्ठ्यर्थे द्वितीयां। सूर्यायाः। प्रेरिकायाः कन्यायाः ( उप ) आदरेण (विश्वे) सर्वे (देवाः) विद्वांसः (अनु अजानन्) अनुकूलं जानन्तु । स्वीकुर्वन्तु (तत्) वक्ष्यमाणं-कर्म (वाम्) युवयो।- (पुत्रः) सुत्तः ( पितरम्.) जनकम् ( अवृणीत ) स्वीकरोतु, (पा.) पोषका -- -- -- . . - - (३,०४२) अथर्ववेदभाष्ये सू० १ [४८३] भाषार्थ-(सूर्य) हे प्रेरणा करनेवाली [चा सूर्य की चमक के समान तेज वाली ] कन्या ! (ते ) तेरे (द्वे) दो [कर्म और उपासना रूप] (चके) पहियों को (ब्रह्माणः) ब्रह्मज्ञानी लोग (ऋतुथा) सव ऋतुओं में (विदुः) जानते हैं। अथ ) और ( एकम् ) एक [ज्ञानरूप ] ( चक्रम् ) पहिया (यत्) जो (गुहा.). हृदय में है, (तत्) उस को (श्रद्धातयः ) सत्य ज्ञान वाले पुरुष (इत् ) हि (विदुः) जानते हैं ॥ १६ ॥ भावार्थ-वेदवेत्री कन्या और वेदवेत्ता वर के कर्म, उपासना, शान की योग्यता को विद्वान् लोग विचारें। पीछे मन्त्र १४ देखो ॥ १६ ॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१०11५1१६ ॥ अर्य मणं यजामहे सुबन्धुं पंतिवेदनम् । उर्वारुकमिव बन्धनात् प्रेतो मुञ्चामि नामुतः ॥ १७ ॥ सुर्य मणस् । यजामहे । सु-बन्धु म् । पति-वेदनम् ॥ उर्धा- सुकम्-इव । बन्धनात् । प्र । इतः । मुञ्चामि । न । अमुतः१७ भाषार्थ-(सुवन्धुम् ) सुन्दर बन्धु, ( पतिवेदनम् ) रक्षक पति के शान करानेहारे वा देने हारे (अर्यमणम् ) श्रेष्ठों के मान करने हारे परमात्मा को ( यजामहे ) हम पूजते हैं। (उर्वारुकम् इव) ककड़ी को जैसे (बन्धनात्) लता बन्धन से, [ वैसे दोनों वधू वर को] (इतः ) इस [ वियोग पाश] से प्रमुञ्चामि ) मैं [विद्वान् ] छुड़ाता हूं, (अमुतः ) उस [ प्रेम पाश] से (न १६-(छ) (ते) तव (चक्र) कर्मोपासनारूपे रथांगे (सूर्ये ) हे.प्रेरिके कन्ये (ब्रह्माणः) ब्रह्मज्ञानिनः (ऋतुथा) ऋतुषु (विदुः )जानन्ति (अथ) मनन्तं- रम् ( एकम् ) ज्ञानरूपम् ( चक्रम् ) ( यत् ) (गुहा) गुहायाम् । हृदये (तत्) (श्रद्धातयः) अद्धा सत्यनाम निघ०३।११+ त सातत्यगमने-इन् । सत्य- शानिनः । मेधाविनः-निघ०३।१६। ( इत् ) एव (विदुः)। १७-(अर्यमणम् ) श्रेष्ठमानकर्तारम् ( यजामहे ) पूजयामः (सुबन्धुम् ) (पतिवेदनम् ) पत्युः प्रज्ञापकं प्रापकं वा (उर्वारुकम् इव ) उरु+आर+कम् । क वापाजिमि । उ०११। ऋगतौ-उरण । कर्कटीफलम् (इव ) यथा (पन्धनात्) लतात्तात् (प्र) (इतः) भस्मात् । वियोगपाशात् (मुशामि) मोचयामि न) - ०१ [४८३] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०४३): नहीं [ छुड़ाता] ॥ १७॥ भावार्य-परमात्मा की महती कृपा का ध्यान करके विद्वान् लोग वधू पर को वियोग के कष्ट से छुड़ाकर परस्पर प्रेमास्पद बनावें ॥ १७ ॥ . यह मन्त्र कुछ भेदसे ऋग्वेद में है-७ । ५8 । १२ और यजुर्वेद में-३॥६॥ प्रेतो मुञ्चामि नामुतः सुबुद्धाममुतस्करस् । । यथे यमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रा सुभगासंति ॥ १८ ॥ इतः । मञ्चामि । न । अमुतः। सु-बद्धाम् । अमुतः करम् ॥ यया । इयम् । इन्द्र । मीढ्वः । सु-पुत्रा ।- सु-भगा:। म। अमेति ॥ १८॥ , ३ भाषार्य-(इतः ) इस वियोग पाश] से [इस वधू को] (प्र मुश्चामि) मैं [वर] अच्छे प्रकार छुड़ाता हूं, ( अमुतः ) उस [प्रेम पाश से (न ) नहीं [छुड़ाता ], (अमुतः ) उस [प्रेम पाश ] में [इस वधू] को (सुबद्धाम् ) अच्छे धन्धनयुक्त ( फरम् ) मैं करता हूं। यथा ) जिस से, (मीढ्वः) हे सुख की वर्षा करने वाले (इन्द्र) परम ऐश्वर्य वाले परमात्मन् ! (इयम् ) यह [वधू] (सुपुत्रा) सुन्दर पुत्रों वाली और (सुमगा ) बडे ऐश्वर्य वाली (असति ) होवे ॥ १८ ॥ भावार्थ-वधू वर को चाहिये कि आपस में बड़े प्रेम का बरताव करें, और परमात्मा की उपासना करके प्रयत्न पूर्वक घर में श्रेष्ठ सन्तान और ऐश्वर्य माप्त करके दोनों आनन्दित रहे ॥ १८ ॥ मन्त्र १८, १६ ऋग्वेद में कुछ भेद से हैं-१०। ८५ । २५, २४, और दोनों मन्त्र महर्षि दयानन्द कृत संस्कारविधि विवाहप्रकरण उद्धृत हैं और (न) निषेधे (अमुतः) तस्मात् । प्रेमपाशात् । १८-(प्र) प्रकरण (इतः) अस्मात् । वियोगपाशात् (मुश्वामि) मोचयामि (नः ) निषेधे (अमुतः) तस्मात् । प्रेमपाशात् ( सुबद्धाम् ) सुष्टु बन्धनयुक्ताम् (अमुतः ) तस्मिन् ! प्रेमपाशे ( फरम् ) करोमि (यथा ) येन प्रकारेण ( इयम् ) वधूः ( इन्द्र ) हे परमैश्वर्यवन् परमात्मन् ! (मीदवः) मिह सेचने-कसु। हे सुखवर्षक ( सुपुत्रा) शोभनपुत्रयुक्ता (सुभगा) लौभाग्य- घती (असति ) भवेत् ॥ में ।

३ - अस्तु सुहस- १ । . (३,०४४) अथर्ववेदभाष्ये सू०१ [४] विनियोग इस प्रकार है कि वर इन दोनों मन्त्रों को बोलकर 'वधू के बंधे हुये. केशो को छोड़े ॥ म त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद् “येन त्वाबनात्' सविता मुशेवाः। ऋ तस्य योनी सुकृतस्य लोके योनं ते भलाये ॥१८॥ प्र । त्वा । मुञ्चामि । वरुणस्य । पाशात् । येन । त्वर । अंबनात् । सविती । सु-शेवाः।। तस्य । योना । सु-कृतस्यों लोके । स्योनस् । ते । अस्तु । सह-संभलायैः॥ १८ ॥ भाषार्थ-[ हे वधू ! ] (त्वा) तुझे (वरुणस्य ) रुकावट के (पाशात् । बन्धन-से (प्र मुञ्चामि ) मैं [व] अच्छे प्रकार छुड़ाता हूं, ( येन ) जिसके साथ (त्वा) तुझे(सुशेवाः ) अत्यन्त सेवा योग्य ( सविता) जन्मदाता पिता ने ( अबध्नात् ) बांधा है। (ऋतस्य ) सत्य नियम के योनौ) घर में और (सुकृतस्य ) सुकृत [पुण्य कर्म ] के ( लोके ) समाज में ( सहसम्भलाय) सहेलियों सहित वर्तमान (ते ) तेरे लिये (स्योनम् ) आनन्द (अस्तु ) होवे ॥१॥ भावार्थ-जिस कन्या को पिता ने योग्य प्रति मिलने तक रोका था, उस को पिता के घर से प्रसन्नता के साथ लेकर वर बड़े प्रेम से रक्खे और घर सब धर्मात्मा विद्वान्, स्त्री पुरुष श्रेष्ठ. व्यवहार करके उसे सुख देते रहे ॥१६॥ मन्त्र १८ की टिप्पणी देखो। . . १४-(प्र) प्रकर्षेण ( त्वा ) वधूम् ( मुञ्चामि) मोचयामि (वरुणस्य) वृक्ष संवरणे-उनन् । श्रावरणस्य विघ्नस्य (पाशात् ) बन्धात् (येन) (त्वा) (अवनात् ) बन्धे कृतवान् ( सविता) जन्मदाता पिता ( सुशेवाः) अ०२ २।२। २। सु+शे सेवने-असुन् । सुष्ठु सेवनीयः (ऋतस्य ) सत्यनियमस्य (योनौ) गृहे (सुकृतस्य) पुण्यकर्मणः (लोके) समाजे (स्योनम्) सुखम् (ते) तुभ्यम् ( अस्तु.) ( सहसम्भलायै ) सह+सम् +भल परिभाषणहिंसादानेषु-अच्, टाप् । सम्भलीभिः सम्भाषिकाभिः सखिभिः सह वर्तमानायै ।।

... सू० -१ [४८३-] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,२४५) भगस्त्वे तो नयतु हस्तगृयाश्विनी : त्वा म वहतां येन । गृहान् गच्छ गृहपत्नी ययासो पशिनी; त्वं विद्यमा वदासि२०१२ भगः । त्वा । हुतः । नयतु । हुस्त-गृखें । अश्विनी वा भ। बहुताम् । रयन ॥ गृहान् । गच्छ । गृह-पत्नी । ययों प्रसः । वृशिनी । त्वस् । विदयम् । मावदामि ॥ २०॥ (२) भाषार्थ- हे वधू । ] ( भगः ) ऐश्वर्यवान् घर (वा.) तुझे ( इतः) यहां से ( इस्लगृह्य ) हाथ पकड़ कर ( नयतु) ले चले, (अश्विना) विद्या को प्राप्त दोनों [स्त्री पुरुप समूह ] (त्वा ) तुझे (रथेने ) रथ द्वारा प्रवर्हताम् ) अच्छे प्रकार ले चलें। (गृहान ) घरों में (गच्छ) पहुंच, यथा) जिससे (गृहपती ) गृहपती [घर की स्वामिनी ] (असः) तू होवे औरः (वशिनी) घश में करने वाली (त्वम् ) तू (विदथम् ) सभागृह में (आ' वदासि बात- 'चीत करे ॥२०॥ भावार्थ-प्रतापी वर गुणवती बंधू को आदर से ले चले, विधानि स्त्री रथ पर चढ़ावै । सभ्या वधू पतिगृह में पहुंच कर अपनी विद्वत्ता और शुभ गुणों के कारण प्रिय बचन और बरताव से सर्व को प्रसन्न करे॥२०॥ मन्त्र २०, २१ भेद से ऋग्वेद में हैं-१०।५ । २६, २७. । दुहमियं मुजाय ते समृध्यतामुस्मिन् गृहे गार्हपत्याय जागृहि । एना पत्या तन्वं. सं स्पं शुस्वाय जिर्वि विदयमा वदासिंह इह प्रियम् । म-जाय । तें । सम् । ध्यताम् । अस्मिन् । गृहे . गाई-पत्याय । जागृहि ॥ एनो । पत्यो । तन्वम् । २०. (भगः ) ऐश्वर्यवान् वरः ( त्वा )वधूम् (: इत: ) अस्मात स्थानात् । पितृगृहात् (नयतु ) ( हस्तगृह्य.) १० ५.१४।४। हस्तेन गृहीत्वाः (अश्विना) प्राप्त विद्यौ स्त्रीपुरुषसमूहौ (त्या ) (प्र) प्रकर्षण ( वहताम् ) नयताम् -(रभेन) (गृहान ) पतिगृहान् (गच्छ) प्राप्नुहि (गृहपत्नी) गृहस्वासिनी--(यथा) येन प्रकारेण (असः) भवेः ( वशिनी ) गृहगतानांवशं प्रापयित्री, त्वम् ) (विद्- थम् ) सभागृहम् (श्रा ) प्राभिमुख्येन ( वदासि.)ब्रूयाः ॥rls . पुरुष १ IMM . •omr- ܬܐ - ३ .. (32) अथर्ववेदभाव्ये सू०.१ [.४८३] सम् । स्पृशुस्व । अयं । जिविः । विदयम् । आ । बुदासि २१ .... - ‘भाषार्थ-[ हे वधू!] (इह ) इस [पति कुल ] मैं (ते) तेरा (प्रियम) हित (प्रजाये) प्रजा[सन्तान, सेवक श्रादि ] के लिये ( सम्) अच्छे प्रकार. (ऋध्यताम् ) बढ़े, (अस्मिन् गृहे ) इस घर में (गार्हपत्यायं ) गृहपनी के कार्य के लिये (जागृहि ) तू जागती रह [ सावधान रह] 1(एना पत्या) इस पति के साथ (तन्वम् ) श्रद्धा को (सं स्पृशंख ) संयुक्त कर, (अर्थ) और (निर्वि:): स्तुति योग्य तू (विद्यम् ) सभागृह में (आ वदासि ) यातचीत कर ॥ २१ ॥ भावार्य-वधू को योग्य है कि पतिकुल में पहुंचकर प्रसन्नचित्त होकर सन्तान, सेवक आदि का यथावत् पालन करके घर के कामों में सावधान रहे, और पंति से भक्ति करके संसार में कीर्ति बढ़ावे ॥ २१ ॥ : यह मन्त्र कुछ भेद से महर्षि दयानन्द कृत संस्कार विधि विवाह प्रकरण. में उद्धृत है-घर पहुंचकर वधू के रथ से उतारना आदि कर्म करके वर इस मन्त्र को योलकर वधू को सभामण्डप में ले जावे ।। दुहैव कृतं मा वि योष्टं विश्वमायुयश्नुतम् । क्रौडन्तौ पुर्नप्न भिमोदमानौ स्वस्तकौ ॥ २२ ॥ इह । एव । स्तम् । मा। वि । यौष्टम् । विश्वम् । प्रायुः। वि। प्रश्नुतम् ॥ क्रीडन्तौ । पुत्रैः । नन -भिः । मोदमानौ । 1. सु-मुस्तकौ ॥ २२ ॥ भाषार्थ-[ हे वधूवर !] (इह एव ) यहां [गृहाश्रम के नियम में ही : २१-(इह) अन पतिकुले (प्रियम् ) हितम् (प्रजायै सन्तानसेवकादि- -पालनाय (ते) तव (सम् ) सम्यक् (ऋध्यताम् ) वर्धताम् (अस्मिन् ) (गृहे) (गाहपत्याय) गृहपत्नीकर्तव्यसिद्धये (जागृहि.) बुध्यस्व । सावधाना भव (एना) अनेन (पत्या) स्वामिना संह (तन्वम् ) तन उपकारें श्रद्धायांच- को श्रद्धा भकिम् (सं स्पृशस्व )संयोजय (प्रथ) अनन्तरम् ( जिर्विः) । १६ाज़ स्तुतौं-क्विन् हस्वर, जरा स्तुतिर्जरते स्तुतिकमाः-निरु० १० ।। जीविः स्तुत्या । अन्यद् गतम्-म० ॥ २० ॥ २२-(इइ) अस्मिन् गृहोश्रमनियम (एव) अवश्यम् (स्तम् ) भवतम् . - .. - - . सू०.१ [३] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०४७) (स्तम् ) तुम दोनों रहो, (मा वि यौष्टम् ) कभी अलग मत होगी, और (पुत्र) पुत्रों के साथ तथा ( नसृभिः) नातियों के साथ (क्रीडन्तौ) क्रीड़ा करते हुये, (मोदमानी) हर्प मनाते हुये और (स्वस्तको) उत्तमघरवाले तुम दोनों (विश्वम् आयुः) सम्पूर्ण आयु को (वि अश्नुतम् ) प्राप्त होमो ॥२२॥ भावार्थ-स्त्री पुरुष दोनों पढ़ प्रतिशा करके प्रसन्नता पूर्वक पुत्र पौत्र मादि के साथ धर्म से रहकर पूर्ण आयु भोगकर यशस्वी होवें ॥ २२ ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१०।५।४२, और महर्षि दया. मन्द कृत संस्कारविधि गृहाधम् प्रकरण तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका विवाद विषय पृष्ठ २66 में व्याख्यात है। पूर्वापरं चरतो माययै तौ शिशू क्रीडन्तौ परियातोऽर्ण वम् । विश्वान्यो भुवना विचष्ट ऋतूंरन्यो विदधज्जायसे. नवः॥२॥ पूर्व-परम् । चुरतः । मायया । एतौ । शिशू इतिः । क्रीडन्ती तः । अर्ण वम् ॥ विश्वा । अन्याः भुवना । वि-चष्टे । ऋतून् । अन्यः। वि-दधत्। जायसे । नवः ॥ २३ ॥ भाषार्थ-(पतौ) यह दोनों [ सूर्य, चन्द्रमा] (पूर्वापरम् ) मागे पीछे (मायया) बुद्धि से [ईश्वर नियम से] (चरतः ) विचरते हैं, (क्रीडन्तौ) खेलते हुये (शिशु) दो चालक [जैसे ] ( अर्णवम् । अन्तरिक्ष में (परि ) सब ओर (यातः) चलते हैं। (अन्य ) एक [ सूर्य ] (विश्वा ) सव (भुवना.), भुवनों को (विचष्टे) देखता है, (अन्यः) दूसरा तू[चन्द्रमा] (ऋतून ) : ऋतुओं को [अपनी गति से ] ( विदधत् ) बनाता हुआ[ शुक्ल पक्ष में ] (नवः) नवीन (जायसे) प्रकट होता है ॥ २३ ॥ . । परि । यातः (मावि यौष्टम् ) वियुक्तौ माभवेताम् (विश्वम् ) सम्पूर्णम् (मायुः) जीवनम् (वि) विविधम, (अश्नुतम् ) प्रामुतम ( कीडन्तौ ) धर्मेण खेलन्ती ( पुत्रैः) ( नतृभिः) पौत्रैः ( मोदमानौं) आनन्दं कुर्वन्तौ (स्वस्तको) शोभनगृहयुक्ती ।। २३-भयं मन्त्री व्याख्याता-०७।१।१॥ . :: 2.

." करो ॥२३॥ WA- M परो देहि शामल्य ब्रह्मस्यों वि भजी (108) अर्थववेदभाष्ये सू० १ ४६ भावार्थ -सूर्य और चन्द्रमा प्रकाश में घूमते हैं। चन्द्र श्रादि लोकों को सूर्य प्रकाश पहुंचाता है। चन्द्रमा शुक्लपक्ष में एक एक कला बढ़ता और घसन्त श्रादि ऋतुओं को बनाता है। हे स्त्री पुरुषो जैसे यह सूर्य चन्द्रमा ईश्वर नियम पर चलकर संसारका उपकार करते हैं, वैसे ही तुम दोनों उपकार मन्त्र २३, २४ कुछ भेद से. ऋग्वेद में हैं:-१० १५.१८, १६और ऊपर आ चुके हैं. अशा ! ८१, १, २, तथा मन्त्र २३ के तीन पाद फ़िर भाये हैं- अ.-१३ १.३.११.॥..... नवौनवो भवसि जायमानाऽन्हाँ के तुरुषसामे ध्यIस् । भाग देवेभ्यो विदधास्यायन प्रचन्द्रमस्तिरसे दीर्घमायुः ॥२४॥ नव-नवः । भवसि । जायमानः । महोम् । केतु उप- सम्।ि एपिः। अग्रंम् ॥ भागम् । देवेभ्यः । वि। दुधासि । भा-यन् । में चन्द्रमा । तिरसे । दीर्घम् । मायुः ॥ २४ ॥ भाषार्थ चन्द्रमः ) हे चन्द्रमा ! तू [ शुक्ल पक्ष में): (नवोन नया नया. ( जायमानः) प्रकट होता हुआ ( भवसि ) रहता है, और (श्रहाम: दिनों का ( केतुः ) जताने वाला तू (उषसाम.) उषाओं [प्रभात वेलानों ] के (अप्रम् ) आगे (एषि ) चलता है और (आयन ) आता हुआ तू (देवेभ्यः) उत्तम पदार्थों को (भागमे ) सेवनीय उत्तम गुण (विं दधासि) विविध प्रकार देता है और ( दीर्घम ) लम्बे (आयुः ) जीवन काल को (प्र) अच्छे प्रकार तिरसे पार लगाता है ॥२४॥ i भावाय चन्द्रमा शुक्ल पक्ष में एक एक कला बढ़कर नया नया है, और दिनों अर्थात् प्रतिपदा आदि चान्द्र तिथियों को बनाता और पृधित्री के पदार्थों में पुष्टि देकर प्राणियों का जीवन बढ़ाता है, इसी प्रकार स्त्री पुरुष संसार में उपकार करके अपना जीवन मुफल करें ॥ २४॥ - :- २४-अयं मन्त्रो व्याख्यातः ||२॥

7 . सू ०४८३"] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०४) कुत्यैषा पद्बती भूत्वा जोया विशते पतिम् ॥ २५ ॥ परी । देहि । शासु ल्यस् । ब्रह्म-भ्यः । वि। भज । वसु ॥ कृत्या । एषा । पुत्-वतौ । भूत्वाः। भा। जाया। विशते । पतिम् ॥ २५ ॥ भाषार्थ-[ हे वर! ] ( शामुल्यम ) [हृदय की] मलीनता (परा देहि) दूर कर दे, (ब्रह्मभ्यः) विद्वानों को ( वसु) सुन्दर वस्तु ( विभज) बाट । (षा) यह (कृत्या) कर्तव्य कुशल (जाया) पत्नी (पती) ऐश्वर्यवती (भूत्वा ) होकर (पतिम् ) पति में (आविशते) आकर प्रवेश करती है ॥ २५ ॥ भावार्थ-गृहपति शुद्ध अन्तकिरण विदुषी स्त्रियो.और विद्वानों की यथावत् आदर सत्कार करे जिन के शिक्षा आदि प्रयत्न से स्त्री रत्न उसको मिली है ॥ २५॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१०। ५ ॥२६॥ नीललोहितं भवति कृत्यामुक्तिव्य ज्यते एधन्ते अस्या चातयः पतिर्ब न्धेषु बध्यते ॥ २६ ॥ नील-लोहितम्, कृत्या । सासुक्तिः । वि। अज्यते ॥ एधन्ते । अस्याः । ज्ञातयः। पतिः । बन्धेषु' . भवति । ॥ ६ बध्यते ॥ २६ ॥ ।' . भाषार्थ-(नीललोहितम् ) निधियों का प्रकाश (भवति) होता है, २५-(परा देहि) दूरं कुरु (शामुल्यम् ) सानसिवर्णसिपर्णसितण्डु 'ला० । उ०४ । १०७ । शमु उपशमे-इलचू, शमुलं, शमलम अशुद्धम, तस्य, भावः- प्य ! चित्तमालिन्यम (ब्रह्मभ्यः) वेदशेभ्यः (वि भज) साहितको दीर्घः । प्रयच्छ (वस) श्रेष्ठं वस्तु ( कृत्या) विभाषा कवृषोः ।, पा०३।१। १२०॥ करोते:-क्यप् ॥ मत्वर्थे अर्शश्राद्यच् । टाप । कृत्यायां क्रियायां कुशला (एषा.) (पद्धती) पत ऐश्वर्ये-क्विप् , मतुप् । ऐश्वर्यवती (भूत्वा ) (जाया) पत्नी (पा विशेत.) प्रतिशेत् (पतिम् ) पतिहृदयम् ॥7 ! २६ । नीललोहितम्) नि+इल गतौ-क+रुहेरचालो वा । उ०३। ।

: (३,०५०) अथर्ववेदभाष्ये सू०१ [४८३ [ [जव कि] ( कृत्या कृत्यायाः) कर्तव्य कुशल [ पत्नी] की (आसक्तिः ) प्रीति ('वि अज्यते ) प्रसिद्ध होती है। (अस्याः) इस [वधू] के (शातयः ) कुटुम्बी लोग (एधन्ते ) बढ़ते हैं, और ( पतिः) पति (बन्धेषु) [वधू के साथ प्रेम के ] बन्धनों में ( वध्यते ) बंध जाता है ॥ २६ ॥ भावार्थ-जिस कुल में कर्मकुशल बुद्धिमती स्त्री धन का लाभ व्यय मादि विचारकर कर्तव्य करती है, वहां धन सम्पत्ति बढ़ती है । उस की समृद्धि से माता पिता आदि और सब कुटुम्बी वृद्धि करते हैं और पति उस से हार्दिक प्रीति करता है ॥ २६ ॥ ! यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१० । ८५ ॥ २८ ॥ अश्लीला तुनूभवति रुती पापयामुयो । पतिर्यद् वध्वो३', वासस्: स्वमङ्गमभ्यूर्ण ते ॥ २७ ॥ अश्लीला । तनूः। भवति । रुशती। पापयो । अमुया। पतिः। यत् । वध्वः । वाससः । स्वम् । अङ्गम् । अभि-जणु ते ॥२७॥ • भाषार्थ-(रुशती) चमकता हुआ (तनूः) रूप (अमुया) उस (पापया) पाय क्रिया से (अश्लीला) अश्लील [ हतभी ] ( भवति ) हो जाता है, ( यत्) जब कि (पतिः) पति ( वध्वः) वधू के (वाससः ) वख से स्वम् .अङ्गम् ) अपने अङ्ग को (अभ्यूर्णते) ढक लेता है ॥ २७ ॥ भावार्थ-जब पति पुरुषार्थ छोड़कर कुकामी होकर बुरी स्त्रियों के समान कुचेष्टा करता है, तव उस दुर्वलेन्द्रिय का रूप बिगड़ जाता है और वह ६४ । रुह प्रादुर्भावे-इतन् , रस्य लः। नीलानां निधीनां प्रादुर्भावः (भवति) (कृत्या) म० २५। सुपां सुलुक् । पा०७।११३६ । षष्ठीस्थाने प्रथमा । कृत्यायाः कर्तव्यकुशलायाः पत्न्याः (श्रासक्तिः) प्रीतिः (व्यज्यते) अञ्जू व्यक्तीकरणे। ध्यक्तीक्रियते । प्रसिद्धिं गच्छति (एचन्ते ) वर्धन्ते (अस्याः) वध्वाः (शातयः) संगोत्राः (पतिः) (बन्धेषु) प्रेमपाशेषु (वध्यते ) बद्धो भवति ॥ २७-(अश्लीला) श्रीरहिता। कुरूपा (तनूः) रूपम् (भवति) (रुशती ) रोचमाना (पापया) पापबुद्धया ( अमुया) प्रसिद्धया (पतिः) (यत्) यदा (वध्वः) परन्याः (वाससः) धनात् (स्वम् ) स्वकीयम् (अङ्गम् ) (अभ्यूपते) आच्छादयति ॥

। । सू०१ [४८३] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०५१) लज्जा को प्राप्त होता है ।। २७ ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१०।५।३० शिसन विशसनु भयो अधिविकर्तनम् । सूर्यायाः पश्य रूपाणि तानि ब्रह्मोत शुम्भति अा-शसनम् । वि-शसनम् । अथो इति । अधि-विषतिनम सूर्यायोः । पश्य । रूपाणि । तानि । ब्रह्म । उत । शुम्भति२८ भाषार्थ-(सूर्यायाः) प्रेरणा करने वाली [वा सूर्य की चमक के समान तेज वाली] कन्या की प्राशसनम् ) प्राशंसा [ अप्राप्त के पाने की इच्छा], (विशसनम् ) विशंसा [प्राप्त का शुभ कर्मों में व्यय] (अयो) और भी (अधि- विकर्तनम् ) अधिकार पूर्वक विघ्नों का छेदन, (रूपाणि) इन रूपों [सुन्दर लक्षणों ] को ( पश्य ) तू देख, (तानि ) उन [सुन्दर लक्षणों ] को (ब्रह्मा) ब्रह्मा [ वेदवेत्ता पति ] ( उत) ही (शुम्भति ) शोभायमान करता है ॥ २८ भावार्थ-जब वधू वर परस्पर शुभ गुणों और मर्यादाओं को मान फरते हैं, तब उत्तम प्रवन्ध से उस गृहाश्रम की शोभा बढ़ती है ॥ २८ ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१० | ५ । ३५ ॥ तृष्टमें तत् कटु'कमपाष्ठवद् विषन्नैतदत्त'वे। सूर्या यो ब्रह्मा वेद स इद् वाधू यमर्हति ॥ २६ ॥ तृष्टम् । गुत्त् । कर्ट कम् । अपाष्ठ-वत् । विष-वत् । न । एतत् । अत्तवे ॥ सूर्याम् । यः । ब्रह्मा । वेद । सः । इत् । वाधू यम् । मुई ति ॥२८॥ -(प्राशसनम् ) आङः शसि इच्छायाम् ल्युट, नकारलोपः । प्राशंला । अप्राप्तस्यं प्राप्तीच्छा (विशसनम् ) वि+शसि इच्छायाम् ल्युट, नलोपः । प्राप्तस्य शुभकर्मसु व्ययः (अथो) अपि च ( अधिविकर्तनम् ) कृती, छेदने वेष्टने च-ल्युट । अधिकृत्य विनानां छेदनम् ( सूर्यायाः ) प्रेरिकायाः कन्यायाः (.पश्य-) अवलोकय ( रूपाणि ) लक्षणानि ( तानि ) लक्षणानि ( ब्रह्मा ) वेदवेत्ता पतिः (, उत) एव (शुम्भति) दीपयति । शोभयति ॥ . .

. , r . (३,०५२ ) . :, : अथर्ववेदभाष्ये , सू० १ [१४३J भाषार्थ-(एतत् ) यह [पूर्वोक्त शुभ लक्षण वधू घर के विरोध में ] .(तृष्टम् ) दाह जनक, ( कटुकम् ) कडुवां [अप्रिय ], (अपाष्ठवत् ) अपस्थान [अपमान] युक्त और (विषवत्) विष-समान-[होता है], (तत्) यह [विरुद्ध- पन] (अत्तवे ) प्रवन्ध करने के लिये (न ) नहीं होता] (यः) जो (ब्रह्मा) ब्रह्मा [वेदवेत्ता पंति] (सूर्याम् ) प्रेरणा करने वाली [वी सूर्य की चमकं के.. संमान तेजवाली ] कन्या को (वेदं ) जानता है, ( सःइत्) वही (बाधूयम् ) विवाह कर्म के (अर्हति ) योग्य होता है ॥ २६ ॥ भावार्थ-जहां पर वधू वर परस्पर विरोधी निर्गुणी होते हैं, वहां गृहाश्रम में विपत्ति रहती है, और जब दोनों पूर्ण विद्वान् और युवा होकर पर. स्पर गुण, जानकर विवाह करते हैं, तब वे गृहाश्रम में श्रानन्द भोगते हैं ॥ २६ ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१० । ८५.. ३४ ॥ सं 'इत् तत् स्योनं हरति ब्रह्मा वासः सुमङ्गलम् । प्रायश्चित्ति यो जाया न रिष्यति ॥ ३० ॥ (३). सः । इत् । तत् । स्योनम् । हरति । ब्रह्मा । वासः । सु- मुङ्गलम् ॥ प्रायश्चित्तिस् । यः । अधि-रति । येनं । जाया । न । रिष्यति ॥ ३० ॥ (३) भाषार्थ-(सः इत्) वही (ब्रह्मा ) ब्रह्मा [वेदवेत्ता पति ] (तत्) , तवं (स्योनम् ) सुखदायक और (सुमङ्गलम् ) बड़े मङ्गलमय (वासः) वस्त्र w भध्येति येन २४-( तृष्टम् ) दाहजनकम् (पतत् ) पूर्वोक्तम् ( कटुकम् ) अप्रियम् (अपाष्ठवत् ) अपस्थानेनापमानेन युक्तम् ( विषयत् ) विषसमानम् (न ) निपेधे (एतत्.) विरुद्ध कर्म (अत्तवे ) तुमर्थे सेसनसे० । पा०३।४।६। अत बन्धने-तवेन् । प्रबन्धं कर्तुम् (सूर्याम् ) (यः (ब्रह्मा.) वेदज्ञः पतिः (वेद) जानाति (सः) (इत् ) एव (वाधूयम् ) वैवाहिक विधानम् ( अर्हति ) कर्तुं योग्यो भवति । पूजयति ॥ .३०-(सः) (इत् ) एव (तत्) तदा (स्योनम् ) सुखदम् (हरति) प्रापयति । प्राप्नोति (ब्रह्मा ) वेदशः पतिः (वासा) वस्त्रादिकम् (सुमङ्गलम् ) ..

- । m - रोचय । चार। -- सू०१ ६४८३] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (-३,१५३) आदि [घर में ] (हरति ) लाता है, (यः) जो [पति ] (प्रायश्चित्तिम् ) प्रायश्चित क्रिया को (अध्येति) जानता, है, ( येन ) जिस के कारण (जायाँ) पत्नी (न रियति) कष्ट नहीं पाती.॥ ३० ॥ भावार्य '-'जब मनुष्य विद्वान् दूरदर्शी होकर गृहाश्रम में प्रवेश करता है, वही.परिश्रम करके वस्त्र प्रादि लावश्यक पदार्थ लाकर घर में पत्नी सहित आनन्द पाता है ॥३०॥ युवं भग सं भैरतं समृद्धमृतं वदन्तावृतोद्येषु । ब्रह्मणस्पते पतिमस्यै रौचय चारूं संभलो वदतु वाचमे ताम् ॥ ३१ ॥ युवम् ! भगम् । सम् । भरतम् । सम्-ऋद्वम् ।. ऋतम् । वदन्तौ । ऋतु-उद्येषु ॥ ब्रह्मणः । पते .। 'पतिम् । अस्यैः।। सुम्-भलः । वदतु । वाचम् । एताम् ॥ ३१ ॥ " भाषार्य-[हे.वधू वर)! (ऋतोयेषु ) सत्य वचनों के बीच (ऋतम.) सत्य ( बदन्तौ ) बोलते हुये ( युवम् ) तुम दोनों (समृद्धम् ) अधिक सम्पत्ति घाले (भगम् ) ऐश्वर्य को,(सम् ) मिलकर (भरतम् ) धारण करो। ब्रह्मणः पते ) हे वेद के रक्षक [ परमेश्वर,1].(अस्यै) इस वधूः] के लिये (पतिम्) पति को (रोचय ) आनन्दित कर-(पताम् वाचम् ) इस वचन को संभला यथार्थवक्ता पुरुष (चाक),मनोहर रीति-से (बदत) बोले ॥ ३१ ॥ ॥ .. भावार्थ-विज्ञान लोग परमेश्वर से प्रार्थना करके आशीर्वाद देवें. कि यह दोनों स्त्री पुरुष अपनी प्रतिक्षाओं में बढ़ रहकर सम्पत्ति और ऐश्वर्य प्राप्त करके सदा प्रसन्न रहें ।। ३१ ॥. Errey महाहितकरम् । प्रायश्चित्तिम् ) प्रायश्चित्तक्रियाम् । पापक्षयंविधानम् (यः ) (अध्येति) जानाति ('येन) कारणेन (जाया') पत्नी (ना) निषेधे (रियति दुःखं प्राप्नोति ॥ ३० ॥ ३१-युवम् ) युवा वधूवरौ (भगम् ) 'ऐश्वर्यम् (सम्मिलित्वा (भरतम् ) धारयतम् ( समृद्धम् ) बहुवृद्धियुक्तम् (ऋतम्) सत्यम बदन्ती) कथयन्तौ (मृतोद्येषु) वद-क्यप् । सत्यकथनेषु (ब्रह्मण) घेदस्य (पते) रक्षर्क परमेश्वर (पतिम् ) भारम् (अस्यै) वधूहिताय (रोचय) प्रसादय (चार) यथा तथा, मनोहररीत्या (संभलः) सम्यग्वता वाचम् ) घाणीम् (एताम)।" ANrn Moreem Pape !

- - - ... ३,०५४) अथर्ववेदभाष्ये सू०१ [३] इहेदसाय न परो गमाथे मं गावः प्र॒जया वर्धयाय । शुभ यतीरुस्त्रियाः सोमवर्चसो विश्वे देवाः क्रनिह वो मनासि ।२३ इह । इत् । साय । न । पुरः। गमाथु । इमम् । गावः । म-जयो । 'वर्ध याथ ॥ शुभम् । यतीः। उस्रियाः। साम-वर्चसः। विश्व । देवाः । ऋन् । इह । वः । मनौसि ॥ ३२ ॥ भाषार्थ-(गावः) हे गतिशील [पुरुषार्थी कुटुम्बी लोगो 1.1 (इह इत् ) यहां पर ही हम में] (असाथ ) तुम रहो, (परः) दूर (न गमाथ) मत जाओ, और (मम्) इस [ पुरुष ] को (प्रजया.) प्रजा [पुत्र, पौत्र, सेवक आदि ] से (वर्धयाथ.) बढ़ानो । (शुभम् ) शुभ रीति से (यती..) चलती हुई (उस्त्रियाः) निवास करने वाली स्त्रियां और (सोमवर्चसः) ऐश्वर्य के साथ प्रताप वाले (विश्वे ) सब ( देवाः) विद्वान् लोग[अर्थात् घर के विद्वान स्त्री पुरुष] (4) तुम्हारे (मनास ) मनों को (इह) यहां [गृह कार्य में ] (कन्) करें। ३२॥ भावार्थ-सव कुटुम्बी लोग पुरुषार्थ करके मिलकर धैर्य से घर में रहें और सन्तान आदि को शिक्षा दान से बढ़ावे और सम्पत्ति और ऐश्वर्य बढ़ाकर गुहाश्रम को शोभायमान करें॥३२॥ इस मन्त्र का प्रथम पाद आ चुका है-०३१४॥ दुम गावः मुजया. सं विशायायं देवानां न मिनाति भागम् । अस्मै वः पूषा मुरुतश्च सर्व अस्मै वो धाता सविता सुवाति ३३ ३२-(इह) अंत्र। अस्मासु (इ.) एव (असाथ ) भवत (न) निषेधे (पर) परस्तात् । दूरम् (गमाथ.) गच्छुत ( इमम् ) पुरुषम् (गावः) गमे। इ० २।६७ । गच्छते प्रत्ययः । गौः स्तोतमाम-निघ० ३ । १६। हे गतिशीला: पुरुषार्थिनः कुटुम्बिनः (प्रजया) सन्तानसेवकादिरूपया (वर्धयाथ) वर्धयत (शुभम् ) शुभरीत्या (यतीः) गच्छन्त्यः ( उस्त्रियाः) स्फायितञ्चिवबिच । १०.२॥ १३॥ क्स. निवासे-रक्, स्वार्थे घप्रत्ययः । निवासशीला स्त्रियः (सोमवर्चसः) ऐश्वर्येण प्रतापिनः (विश्वे ) सर्वं (देवाः) विद्वांसः (कन् ), कुर्वन्तु (इह) गृहाश्रमे (वा.) युष्माकुम् ( मनांसि ) चित्तानि ॥ . .. - ।

. ० १ १ ४३] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०५५) इमम् । गावः । प्र-जयो । सम् । विशाय । ऋयम् । देषानाम् । न । मिनाति । भागम् ॥ अस्मै । वुः । पूषा । 'मुरुतः । च । सर्व । अस्मै । वः । धाता । सुवित्ता । सुवाति ॥ ३३ ॥ भाषार्थ-(गावः) हे गतिशील [पुरुषार्थी कुटुम्बियो ! ( इमम् ) इस [पुरुष ] में (प्रजया ) प्रजा [ सन्तान, सेवक आदि ] के साथ (सम् ) मिलकर (विशाथ ) तुम प्रवेश करो, (अयम् ) यह [पुरुष],(देवानाम् ) विद्वानों के (भागम् ) भाग को (न) नहीं (मिनाति) नाश करता है। (अस्मै) इस [पुरुष ] के लिये (वः) तुम को (पूषा) पोषक वैद्य (च) और ( सर्वे) सय (मरुतः ) शूर पुरुष, और (अस्मै ) इस [पुरुष] के लिये (वा) तुमको (धाता) धारण करने वाला (सविता) प्रेरक प्राचार्य (सुवाति ) आगे बढ़ावे ॥ ३३॥ भावार्य-कुटुम्बियों को योग्य है कि सब सन्तानों और उपयोगी पुरुषों सहित मिलकर विद्वान प्रधान पुरुष का आदर मान करें ॥ ३३ ॥ सन्तु पन्यानो येभिः सखायो यन्ति नो वरे यस् । सं भगैन समर्थ म्णा सं धाता सृजतु वर्चसा ॥३४॥ अनुक्षराः । स जवः । सन्तु । पन्यानः । येभिः । सखायः । । वरे -यम् ॥ सम्। भगेन। सम् । अर्यमणा । . . सम् । धांता । सृजतु । वर्चसा ॥ ३४ ॥ ३३-(इमम् ) पुरुषम् (गावः) म० ३२ । हे गतिशीला पुरुषार्थिनः कुटुम्बिनः (प्रजया) सन्तानसेवकादिना सह (सम्) मिलित्वा (विशाथ ) प्रविशत (अयम् ) जनः ( देवानाम् ) विदुषाम् (न) निषेधे (मिनाति ) मीम् वधे, हस्वः । मीनाति नाशयति (भागम् ) अंशम् ( अस्मै) पुरुषाय (वा युग्मान (पूषा) पोषको वैद्यः, (मरुतः) शत्रुमारकाः शूराः (च) (सर्वे) (अस्मै ) (स्व) युष्मान् (धाता) धारकः ( सविता ) प्रेरक आचार्यः (सुपाति) अनुक्षरा ऋजषः यन्ति । नः प्रेरयेत् A. . .

- - (३,०५६) अथर्ववेदभाष्ये सू० १ [३] भाषार्थ (अक्षरी) विना कांटों वाले (ऋजवः ) सीधे (पन्थानः ) मार्ग:(सन्तु) होवे (येभिः ) जिन से (नः ) हमारे (सखायः) मित्र लोग (वरैयम्-वरेण्यम् ) सुन्दर विधान से.(यन्ति ) बलतें हैं। ('धाता) धारण करने वाला परमेश्वर भगन लम्) ऐश्वर्य के साथ, (अंर्यम्णा समें) श्रेष्ठों के मान करने वाले व्यवहार के साथ और (वर्चसा सम् ) प्रताप के साध -हिम को (सृजतु) .सैंयुक्त करे ॥ ३४ ॥ भावार्थ-सँव घर के लोग परमेश्वर की उपासना के साथ विद्वानों के समान विनों का नाशंकरके श्रेष्ठी के सन्मान से ऐश्वर्यवान और प्रेतापी हो इस मन्त्र का पूर्वार्ध कुछ भेई से अंग्वेद में है-10 15 ! २३ ॥ यच्च व ग्रंक्षघु सुरीयां च यदाहितम् ।' यद् गोष्वश्विना वर्च स्तेने मां वसावतम् ॥ ३५ ॥ यत् । च । वचः। अक्षेपु'। सुरयाम् । च । यत् । प्रा-हितम् ॥ यत् । गौं। अश्विनी । वः । तेन । इमाम् । वर्चसा ! अंवतम् in भाषाय (यत्) जौ (वर्चः ) तेज (अनेषु ) व्यवहार कुशेतों (च) और (यत् जो [ तेज ] (सुरायाम् ) ऐश्वर्य [वा लक्ष्मी] में (अाहितम्) रक्खा गया है । ( यत् ) जो. (वर्चः) तेज (गोषु) गतिशील [पुरुषाध | लोगों में है, (अश्विना ) हे विद्या को प्राप्त दोनों [स्त्री पुरुष ३४-(अनृतराः) अकण्टकाः (ऋजवः) सँरला (सन्तु) ( पन्थानः) मांगी येभिः) यः (सखायः) सुहृदः । यन्ति ) गच्छन्ति (नेः) अस्माकम् (वरयम् ) गालीपः । यथा तथा, वरेण्यम् ! धरणीयेन विधानन (सम्) संह (भगेन ) ऐश्चर्येण (सम्) (अर्यम्णा) श्रेष्ठानां मानकर्तुभ्यर्वहारेण (सम्) (धीतां) धारकः परमेश्वर (सृजतु ) योजयतु ) वर्चसा) प्रेतापेन ।। - ३५ यत्) () (चर्चः ) तेजः (अघोषु ) अक्षे-मर्श आधेच्. व्यव- हारकुशलेषु (सुरायाम् ) धुरदीप्ती ऐश्वर्य चै-क टाप । ऐश्वर्ये लदम्याम् (च) (यत्) (माहितम्) स्थापितम् (यत्) (गोषु) म० ३२ । गतिशील -पुर- 4 vie । 2 . A । . मुं०.५ [४८३] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ समूही!] (तेन वर्चसा ) उस तेज से (इमाम् ) इस [वधू को (अवतम् शोभायमान करो॥ ३५॥ भावार्थ-सव स्त्री पुरुष प्रयत्न करके शिक्षा दे कि वे विद्वान् पति पंती अपने कर्तव्यों को सकुशल सिद्ध करके तेजस्वी होवें ॥ ५ ॥ येन महानघ्न्या जघनमश्विना येन वा सुरों । येनाक्षा अभ्यर्षिच्यन्तु तेने मां वर्चगावतम् ॥ ३६ ॥ येन । महा-नघ्न्याः। जधनम् । अश्विना । येन । था । सुरा ॥ येन । वृक्षाः । अभि-असिच्यन्त । तेन । इमाम् । वसा । भूवतम् ॥ ३६ ॥ भाषार्थ-( येन ) जिस [ तेज ] के कारण (-महानन्याः) अत्यन्त निर्दोष स्त्री के (जघनम् ) पौरुप, (येन) जिस के कारण (मुरा) ऐश्वर्य [लक्ष्मी); (वा) और (येन ) जिस करके (अताः) सय व्यवहार (अभ्यषि: ज्यन्त) सीचे जाते है । बढ़ाये जाते हैं ], (अश्विना) हे विद्या को प्राप्त दोनों [स्त्री पुरुष समूहो ! ] ( तेन वर्चसा) उस तेज से ( इमाम् ) इस [पंधू के (अवतम्) शोभायमान करो॥३६॥ भावार्थ -सब स्त्री पुरुष मिलकर उपाय करें कि वधू बड़ी बड़ी स्त्रियों के समान पौरुपं, ऐश्वर्य और व्यवहार पढ़ाकर। तेजस्विनी होवे ॥ ३६॥ पार्थिषु (अश्विना) हे प्राप्तविद्या स्त्रीपुरुषसमूहौ ( वर्चः ) ( तैन) (इमाम् ) वधूम् ( वर्चसा) तेजसा (अवतम् ) अव रक्षणशोभादिषु । शोभयतम् ॥ ३६-(येन ) वर्चसा (महानन्याः) कप्रकरणे मूलविभुजादिभ्य उपस. ख्यानम् । वा० पा० ३।२।। महा+न+हन हिंसागत्योः-क, डीप गिन हन्तव्या न दण्डनीया सा ननो तस्याः ।अतिशयेन निर्दोषायाः स्त्रियाः (जधनम्) हन्तः शरीरावयवे च । उ०५ । ३२ । हन हिंसागत्योः-अच, द्वित्वं च धातोः। गमनम् । पौरुषम् ( अश्विनौ ) हे प्राप्तविद्यौ स्त्रीपुरुषसमूहौ (येन ) (वा.) समुंश्चयें' (सुरा) में० २५ । ऐश्वर्यम् । लक्ष्मीः (येन.) ('अक्षाः), व्यवहाय: (मभ्यषियन्त) अभिषिक्ता भवन्ति । वृद्धि गम्यन्ते.. , .:. ... ... .. . 6 - (३,०८:) अथर्ववेदभाष्य सू० १ [३] यो अनिध्मा दीदयदुप्स्वन्तयं विप्रोस ईडते अध्वरेषु । अपां नपान्मधु मतीरपो दा याभिरिन्द्रौ वावृधे धीयावान्३७ यः । अनिध्मः । दीदयत् । अप्-सु । अन्तः । यम् । विप्रासः । ईडते । अध्वरेषु' । अपाम् । नपात् । मधु-मतीः । भूपः । दाः । याभिः । इन्द्रः । ववृधे । वीर्य-वान् ॥ ३७ ॥ भाषार्थ-(यः) जो परमेश्वर ] (अनिध्मः ) बिना चमकता हुआ [अन्तर्यामी ] रहकर ( अप्सु अन्तः) प्रजाओं के भीतर ( दीदयत् ) चमकता. है, (यम् ) जिस [परमेश्वर] की, (विप्रासः ) बुद्धिमान् लोग (अध्वरेषु) सन्र्माग बताने वाले व्यवहारों में, (ईडते) वड़ाई करते हैं, [सो तू] (अपाम् ) प्रजाओं के मध्य (नपात् ) नाशरहित [परमेश्वर !] (मधुमतीः ). मधु विद्या से.युक्त [ पूर्ण विज्ञानवती:] (अपः) प्रजायें (दाः) दे, (याभिः ) जिन प्रजाओं] से (इन्द्रः) बड़ा ऐश्वर्यवान् मनुष्य (वीर्यवान् ) वीर्यवान् [धीर, वीर, शरीर, इन्द्रिय, और मन की अतिशय शक्तिवाला] होकर ( ववृधे.) बढ़ता है.॥ ३७ ॥ भावार्थ-वधू वर को उचित है कि विद्वानों के समान सर्वान्तर्यामी सर्पमियन्ता परमात्मा की उपासना करके ब्रह्मचर्यादि से विद्वान् सन्तान, सेवक मादि प्राप्त करें और वेदविद्या द्वारा बढ़ाकर सदा उन्नति. करते रहे ॥३७॥...' यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१० । ३०॥ ४, और निरुक्त १०॥ १६ में भी व्याख्यात है। ३७- (यः) परमेश्वरः (अनिमः ) अंप्रकाशः । अन्तर्यामी सन् (दीद. यत् ) दीप्यते (अप्लु.) आपः = प्राप्ताः प्रजाः दयानन्दभाग्य, यजु०६. २७ । प्रजाउ (अन्तः ) मध्ये ( यम् ) परमेश्वरम् (विप्रासः) मेधाविनः (ईडते) स्तुवन्ति (अध्वरेषु ) श्रध्वन्+रा दाने-क । सन्मार्गदातृषु व्यवहारेषु (भपाम्) 'प्रजानां मध्ये (नपात् ) अपतनशील:। अविनाशिन् (मधुमतीः) मधुविद्यया पूर्ण- विज्ञानेनं युक्ता (अपा) प्रजाः (दाः) देहि (याभिः) प्रजाभिः (इन्द्रः) पर: मैश्वर्यवान् मनुष्यः (वधेः) वर्धते (वीर्यवान ) धीरकर्मयुक्तः सन् ॥ 1 - सू०.१ [४३] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०५८) हुदमुहं रुन्तं ग्राभं तनूदूषिमपोहामि ।। यो भद्रो रौचनस्तमुदचामि ॥ ३८ ॥ हुदम् । बृहस् । रुशन्तम् । ग्राभम् । तनू-दूषिम् । अप । ऊहामि ॥ यः । भद्रः । रोचनः । तम् । उत् । अचामि ॥ भाषार्थ-(इदम् ) अब [गृहस्थ होने पर ] ( अहम् ) मैं [स्त्री वा पुरुष] (रुशन्तम् )सताने घाले, (तनूदूपिम्) शरीर को दोप लगाने वाले (ग्राभम) माही मलबन्धक रोग वा दुष्ट व्यवहार] को (अप ऊहामि ) हटा देता हूं। (यः) जो (भद्रः) मङ्गलमय, (रोचनः ) रोचक व्यवहार है, (नम् ) उसको (उत्) उत्तमता से (अचामि) प्राप्त होता है ॥३६॥ भावार्थ-धूवर पीडाप्रद, रोगकारक फर्म और स्वभाव छोड़कर स्वास्थ्य वर्धक व्यवहार करके गृहाश्रम में आनन्द बढ़ावे ॥ ३८ ॥ .. नास्य ब्राह्मणाः स्नपनीहरुन्त्ववीरघ्नीरुदजन्त्यापः । अर्य- म्णो भुग्नि पर्यंत पूषन् प्रतीक्षन्ते श्वशु रो देवरश्च ॥ ३८ ॥ श्रा । अस्यै । ब्राह्मणाः । स्नपनीः । हुरन्तु । अवीर-घ्नीः । उत् । भुजन्तु । आपः ॥ अर्यमणः । अशिम् । परिः। पूषन् । प्रति । ई क्षन्ते । श्वशुरः । देवरः । च ॥ ३८ ॥". भाषार्थ-(अस्यै ) इस [वधू] के लिये (ब्राह्मणाः ) ब्राह्मण विद्वान लोग] ( स्नपनीः ) शुद्धिकारक सामग्रियों को ( श्री हरन्तु ) लावे, (अवीरनी) ३८ (इदम् ) इदानीम् । गृहाश्रमग्रहणसमये (रुशन्तम्) रुश हिंसायाम् शत् । हिंसन्तम् (प्राभम् ) मलवन्धकग्राहिरोग, दुष्टव्यवहार वा (तनूदू- षिम् ) शरीरदूषकम् (अपोहामि ) अपगमयामि (यः) (भद्रा) मङ्गलमयः (रोचना) रुचिरो व्यवहारः ( तम् ) व्यवहारम् ( उत्) उत्तमतया (अचामि) अचु गतौ याचने च । प्राप्नोमि । याचे ॥ ३६-(अस्यै) बवै (ब्राह्मणाः) : विद्वांसः ( स्नपनी);शोधयित्रीः सामग्री: (प्रा हरन्तु ) प्रापयन्तु (अवीरघ्रीः ) वीराणां हितकरी: (उत्) उत्त. एतु ।

." शस्व: (२०६०) अथर्ववेदभाष्ये सू०.१ [३] पीरों की हितकारी (प्रापः प्रजायें :( उत्.) उत्तमता से (अजन्तुं) प्राप्त होवे- (पूषन् ) हे पुष्टिकारक [विद्वान् 1] (अर्यम्णः) श्रेष्ठों के मान करने वाले [पति की.(अग्निम् ) अग्नि की [प्रत्येक पति पत्नी ] (परि एतु) परिक्रमा करे, (श्वशुरः) ससुर [ प्रति का पिता] (च) और (देवरः) देवर लोग [ पति के छोटे बड़े भ्राता] (प्रति ईक्षन्ते.) बाट देखते हैं ॥ ३ ॥ भावार्थ-वर के घर पहुंचकर वधूवर विद्वानों की आज्ञानुसार शुद्ध जल आदि से स्नान करके अग्नि होत्रादि करके यज्ञकुण्ड की परिक्रमा करें. और सब कुटुम्बी लोग सन्मान से स्वागत करें ॥३६ ।। शं ते हिरण्यं शमु सन्त्वापः शं मे यिभवतु शं युगस्य त । शं तु आपः शुतर्पवित्रा भवन्तु ...शम पत्या तन्व १ सं स्पृश ॥४०॥ (18) . ........ शम् । ते । हिरण्यम् । 'शम् । ऊ इति । सुन्तु । प्रापः । शम् । मे थिः । भवतु । शस् । युगस्य । तदें ॥ शम् । ते । प्रापः । शुत पवित्राः । भवन्तु । शम् । ॐ इति पत्यो। तन्वम् । सम् । स्पृशस्व ॥ ४० ॥ ( ४ ), ...:: भाषार्थ-[हे वधूः ! ] (ते) तेरे लिये (हिरण्यम् ) सोना [ द्रव्य, आभूषण प्रादि] (शम् ) सुखदायक [हो]:(उ) और ( आपः) प्रजाये सन्तान, सेवक आदि ] (शम् ) शान्तिदायक ( सन्तु.) होवें, ( मेथिः ) पशु बांधने का मतया अजन्तु,) गच्छन्तु प्रामुवन्तु.(श्रापः) स० ३७ । प्रजाः (अर्यम्णः ) ओठ मानकरस्य पत्युः (अग्निम्.) होमाग्निम् ( पर्येतु ) प्रत्येकं वधूश्च वरश्च गच्छतु विषन) हे पोषक विद्वन् (प्रतीक्षन्ते) प्रतीक्षया पश्यन्ति (श्वरः)शावशेराप्तौ। उ० २१४४। शु+अशू प्राप्ती, व्याप्ती-उरन् । शुश्रांशु अश्यते प्राप्यते यदम्पत्योः पिता (देवर) दिवे २ ।। दिवु क्रीडादिषु-ऋप्रत्ययः। पत्यु कनिष्ठ- ज्येष्ठमातरः (च)॥ ४०-(शम् ) शान्तिदायम् । सुखकरम् । शान्तये (ते) तुभ्यम् ( हिर सबम् । सुवर्णम् । 'सुवर्णभूषणम् (शम् (उ) समुच्चये । अवधारणे (सन्तु) (आप) म०३७ प्रजाः (शम्) (मेथिः) मेंथ सङ्गे-इन् । पशुबन्धनकाष्ठदण्ड: . -- . 44" . सू० १ [४८३] चतुर्दशं कापडम् ॥ १४ ॥ (३,०११) काष्ठदण्ड (शम्) आनन्दप्रद और (युगस्य ) जूये का (त) छिद्र (शम्) शान्तिदायक (भवतु ) होवे ।(ते) तेरे लिये (शतपवित्राः) सैकड़ों प्रकार शुद्ध करने वाले (आपः ) जल (शम् ) शान्तिदायक (भवन्तु ) होवे, (शम्) शान्ति के लिये (उ) ही (पत्या ) पति के साथ (तन्वम् ) अपनी श्रद्धा को (सं स्पृशस्त्र ) संयुक्त कर ॥ ४० ॥ भावार्थ-सासु ससुर श्रादि स्वागत करके सुवर्ण आभूषण आदि जो कुछ पदार्थ देवें, वधू उन्हें प्रसन्न होकर स्वीकार करे और धरके सन्तान, सेवक पशुओं, अन्न, जल आदि के प्रबन्ध में प्रवृत्त होकर आनन्द पाव और पति में सदा पूर्ण प्रीति रक्खे ॥ ४०॥ खे रथस्य खेऽनसः खे युगस्य शतक्रतो । . अपालामिन्द्र विष्पूत्वाकृणोः सूर्यत्वचम् ॥ ४१ ॥ खे। रयस्य । खे। अनसः । खे। युगस्य । शुतकतो. इति शत-क्रतो ॥ अपालाम् । इन्द्र सूर्य-त्वचम्-॥ ४१ ॥ भाषार्थ-( शतक्रतो । हे सैंकड़ों प्रकार की बुद्धियों वा कर्मा वाले .. ( इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्य,वाले [पति! (रथस्य ) रथ [स्थ.रूप शरीर] के (खे) गमन [चेष्टा ] में, (अनसः) जीवन के (खे ) गमन [ उपाय] में और (युगस्य ) योग [ ध्यान ] के (खे ) गमन [ चलने ] में ( अपालाम्- अपाराम् ) अपार गुणवाली [ब्रह्मवादिनी पत्नी] को (त्रिः) तीन बार [कर्म, 1 ॥ विः । पूत्वा । अकृणोः । (भवतु) (शम् ) (युगस्य) रथहलादेरङ्गभेदस्य (तन) तर्द हिंसायाम्- मनिन् । छिद्रम् (शम् ) (ते) तुभ्यम् (आप') जलानि ( शतपवित्राः) बहुः प्रकारेण शोधनशीलाः (शम् ) (3) ( पत्या) स्वामिना सह ( तन्वम्) तनु विस्तारे, तन श्रद्धायामुपकारे च-ऊप्रत्ययः । श्रद्धाम् (संस्पृशस्व ) संयोजय ।। ४१-(खे ) खर्व गतौ-ड । गमने । चेष्टने । उपाये (रथस्य ) रथरूपस्य शरीरस्य (खे) उपाये-(अनसः) अन जीवने-असुन् । जीवनस्य ( ख ) गतौ (युगस्य ) योगस्य । ध्यानस्य (शतक्रतो) हे बहुप्रश । बहुकर्मन् (अपालाम् ) रस्य लः । अपाराम् । अपारगुणवती ब्रह्मवादिनी पत्नीम् ( इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् ५.

- (३,०६३) अथर्ववेदभाध्ये सू० १ [-४८३ ] पपासना और शान से ] (पूत्वा ) शोधकार (सूर्यत्वचम् ) सूर्य के समान तेज. वाली (मकृणोः) तु कर ॥ ४१ ॥ भावार्थ-बुद्धिमान् विद्वान् पति प्रयत्न करे कि विदुपी पत्नी वेदशान सें शुद्ध होकर शरीर को उचित चेष्टा में, जोवन को सुन्दर उपाय में, और मन को ईश्वर भक्ति में लगाकर संसार में कीर्ति पावे ॥४१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-सायण भाष्य :1201७और अजमेर पैदिकयन्त्रालय पुस्तक.म 181 ७ ॥ श्राशासाना सौमनसं प्रजां सौभाग्यं रयिम् । पत्युरनुव्रता भूत्वा सं नास्वामृतीय कम् ॥ ४२ ॥ भा-शासाना । सौमनसम् । मु-जाम् । सौभाग्यम् । यिम् ॥ पत्युः। अनु'-व्रता । भूत्वा । सम् । नास्वः । अमृताय । कस् ॥ ४२॥ भाषार्थ-[हे वधू !] (सौमनसम् ) मन की प्रसन्नता, (प्रजाम् ) प्रजा [ सन्तान, सेवक आदि ], (सौभाग्यम् ) बड़ी भाग्यवाली और (रयिम् ) धन को.( आशालमाना.) चाहती हुई तू ( पत्युः) पति के (अनुव्रता) अनुकूल कर्म घाली. भूत्वा ) होकर ( अमृताय.) असर पंन [ पुरुषार्थ और कीर्ति ] के लिये (कम) सुन.से (सं. नद्यस्व ) सन्नड़ होजा [युद्ध के लिये कवच धारण कर ॥४२॥ भावार्थ-सव कुटुम्बी लोग वधू को शिक्षादे कि वह विदुषी वधू योग्यता के साथ पति से प्रीति करके प्रसन्नतापूर्वक गृहकार्यों को सिद्ध करे ॥ ४२ ॥ पते. (नि.) त्रिवार कर्मोपसनाशानः (पूत्वा ) शोधयित्वा (अकृणाः) त्वं कुर्याः (सूर्यत्वचम्) त्वच संवरणे-असुन् । सूर्ववत्तेजस्विनीम् ॥ ४२-(शासमाना ) कामयमाना (सौमनसम् ) मनःप्रसादम् (प्रजाम) सन्तानसेवकादिरूपाम् (सौभाग्यम्.) सुभगत्वम् ( रयिम् ) धनम् (पत्युः) स्वामिनः अनुव्रता) व्रतं कर्मनाम-निघ० २।१ । अनुकूलकर्मा ( भूत्वा) (सेनापस्व.) सन्नद्धा भव । सन्नाहं युद्धाय कवचं धारय (अमृतोय) अमरणाय । पुरुषार्थाय कीर्तये च (कम् ) सुखेन ॥

. . . 2 सू०.१ [:४८३] चतुर्दर्श काण्डम् ॥ १४ ॥ यथा सिन्धु नदीनां साम्राज्यं सुषुवे वृषो । एवा त्वं समाये'धि पत्युरस्त परेत्य ॥ ४ ॥ या । सिन्धु': । नुदीनाम् । साम्राज्यम् । सुसुवे. वृषो । एवं। त्वम् । सुम्राज्ञी। मुधिं । पत्यु' । असतम् । पर इत्य । भाषार्थ-(यथा) जैसे (वृषा ) बलवान (सिन्धुः ) समुद्र ने (नदी- नाम) नदियों का (साम्रीज्यम् ) साम्राज्य [चक्रवर्ती राज्य, अपने लिये ] (सुषुवे) उत्पन्न किया है। [हे बंधू ] (4) वैसे ही (त्वम्) हूँ (त्यु) पति के (अस्तम् ) घर (परेत्य) पहुंचकर ( सम्राज्ञी ) राजराजेश्वरी चक्रवता रांनी ] (पंधि ) हो ॥४३॥ ":. भावार्थ-बड़े लोगों की शिक्षा और आशीर्वाद से वधू सावधानीः के साथ घर के सब कामों को अपने हाथ में लेकर महारानी बनकर रहे ॥४३॥ सुमाध्यधि श्वशुरेषु समाझ्युत दे वृषु' । नान्दुः समायेधि समायुत श्वश्र्वाः ॥ ४४ ॥ सुम्-राज्ञी । एधिः । श्वशुरेषु । सम्राज्ञी । उत। दो वृषु । ननान्दुः । सुम्राज्ञी । एधि । सुम्-राजी। उत्त। श्वश्र्वाः ४४ भाषार्थ- हे वधू । तू (श्वरेषु ) अपने ससुर आदि मेरे पिता आदि गुरु जनों के बीच (सम्राशी) राजराजेश्वरी, ('उते) और (देषु) अपने देवरों [ मेरे बड़े और छोटे भाइयों के बीच (सम्राशी ) राजराजेश्वरी न .. ... ४३-(यथा) येन प्रकारेण (सिन्धुः:) समुद्रः (नदीनाम् ) सरिताम: ( साम्राज्यम् ) सार्वभौमत्वम् । चक्रवर्तिराज्यम् (सुषुवे ). उत्पादयमास (-वृषा) बलवान् (एव) तथा-(त्वम् ) ( सम्राशी ) राजराजेश्वरी ( एधि ) भव (पत्युः) (अस्तम्:) गृहम् (परेत्य) प्राप्य । ७४--(सम्राशी) सम्यक् प्रकाशमानी । रोजराजेश्वरी (पधिः) भव (श्वशुरेषु) श्वशुरादिषु मान्येषु (सम्राका) (त) अपि (देवषुः) म०३01 पत्या, कनिष्ठज्येष्ठभ्रातृषु (ननान्टुः) नभिच नन्दः । उनम्नदि ܀ - (5,०६४), अथर्ववेदभाष्ये भू०.१ [३] (पधि) हो। (ननान्दुः) अपनी ननंद [ मेरी बहिन ] की (सम्राज्ञी) राजरा- जेश्वरी, (उत ) और ( श्वश्र्वाः) अपनी सासु [ मेरी माता..] की ( सम्राशी) राजराजेश्वरी (एधि) हो ॥४४॥ भावार्थ-वधू विद्या और बुद्धि के बल से अपने कर्तव्यों में ऐसी चतुर हो कि ससुर, सासु, देवर, ननद आदि सब बड़े छोटे जन उस की बड़ी-प्रतिष्ठा करें॥४४॥ E: यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१०।८५ । ४६ । और महर्षि दयानन्द छत संस्कारविधि विवाह प्रकरण में पति के घर पहुंचकर, वधू घर के हवन करने में व्याख्यात है। या अकृन्तनवयन् याश्च तत्निरे यादे वीरन्ताँ भितोऽददन्त। तास्त्वा जुरसे सं व्ययन्त्वायुष्मतीदं परि धत्स्व वासः ॥४५॥ याः। प्रकृन्तन् अवयन् । याः । च । निरे । याः । देवीः । अन्तोन् । अभितः । अददन्त ॥ ताः । त्वा । जुरसे । सम् ध्ययन्तु । भायुप्मती । इदम् । परि । धुत्स्व । वासः ॥ ४५ ॥ भाषार्थ-(या) जिन [स्त्रियों ] ने (अकृन्तन् ) कांता है, (च) और (यो..) जिन्होंने (ततिरे) तन्तुओं को फैलाया है, और (अधयन ) धुना.. है, और (याः देवीः ) जिन देवियों ने (अन्तान् )[वस्त्र के ] अांचल.. (अभितः) सब प्रकार से अददत्त ) दिये हैं। [.हे वधू11 (ता.) वे सब स्त्रियां (.त्वा) ... सन्तोषे-ऋन वृद्धिश्च । भर्तृभगिन्याः (सम्राशी) (एधि.) (उत) (श्वश्र्वाः) श्वसुरस्योकाराकारलोपश्चं. वक्तव्यः। पा० पा०४।१। ६ । श्वशुर-अङ् उकारस्य अकारस्य च लोपः । श्वशुरस्य भार्यायाः॥ .४५-(याः) स्त्रियः (अन्तम् ) कृती वेष्टने, छेदने च । वेष्टितवत्यः (अवयन् ) वेश् तन्तुसन्ताने। श्रोतवैत्यः (याः) (च) (तलिरे) तन्तून विस्तारितवत्यः (याः).(देवी) देव्यः । दिव्यंगुणाः. स्त्रियः (अन्तान् ) वस्त्रो- न्तान (अभितः) सर्वतः (अंन्त) दद दाने । दुचवत्यः (ता.) (त्वा) त्वां घधूम (जरसे.) स्तुतिलाभाय (सं.व्ययन्तु ) ज्येन स्यूतो, परणे व भाच्छादः - भू०१ [४८३] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ ( ३,०६५) तुझे (जरसे ) बड़ाई के लिये (सं व्ययन्तु) वस्त्र पहिनावे, (आयुष्मती) बड़ी आयु वाली तू (इदं वासः ) इस वन को (परि धत्स्व ) धारण कर H५॥ भावार्थ-बड़ी बड़ी गुणवती स्त्रियां भादर करके सुन्दर सुन्दर वसं वधू को देकर पहिनावै और आशीर्वाद देवे कि वह प्रसन्न रहकर बड़ा यश प्राप्त करे॥४५॥ जीव संदन्ति वि नयन्त्यध्वर दीर्घामनु प्रसितिं दीध्युर्नरः वाम पितृभ्यो य इदं समीरिरे मयः पतिभ्यो जुनये परिष्वजेट जीवम् । रुदुन्ति । वि । नयन्ति । अध्वरम् । दीर्घाम् । अनु । प्र-सितिस् । दीध्युः । नरः । वामम् । पितृभ्यः । ये। इदम् । सुम्-ई रिरे । मयः । पति-भ्यः । जनये । परि-स्वजेद भाषार्थ-(नरः) नर [नेता लोग ] ( जीवम् ) [ संसार के जीवन के लिये [प्रेम से ] (रुदन्ति ) आंसू बहाते हैं, (अध्वरम् ) हिंसा रहित व्यव- हार को (घि) विविध प्रकार (नयन्ति ) ले चलते हैं, और (दीर्घाम् ) लम्बी (प्रसितिम् अनु) प्रबन्ध क्रिया के साथ ( दीध्युः) प्रकाशमान होते हैं। (ये) जिन [पुरुषार्थियों ] ने (पितृभ्यः ) पिता आदि मान्य लोगों के लिये (इदम् ) यह (वामम् ) श्रेष्ठं पदार्थ (समीरिरे) पहुंचाया है, (पतिभ्यः', उन रक्षक पुरुषों के लिये [पति से ] (जनये परिष्वजे) पत्नी का मिलना (मयः) सुख- दायक है ॥४६॥ यन्तु ( आयुष्मती ) पूर्णजीवनवती त्वम् (इदम् ) (परि धत्स्व ) परिधारय ( वासः) वस्त्रम् ॥ ४६-(जीवम् ) संसारस्य जीवनार्थम् (रुदन्ति ) अश्रून विमोचयन्ति. (वि) विविधम् (नयन्ति) प्रापयन्ति । गमयन्ति (अध्वरम् ) हिंसारहितं व्यवहारम् ( दीर्घाम् ) (अनु) अनुसृत्य (प्रसितिम् ) प्रबन्धक्रियाम् (दीध्युः) दीधी दीप्ती । प्रकाशन्ते (नरः) नयतेर्डिच्च । उ० २। १०० । णी प्रापणे- ऋ, डित् । नेताः पुरुषाः (वामम् ) श्रेष्ठ पदार्थम् (पितृभ्यः ) पितृतुल्यमाननी- येभ्यः (ये) पुरुषाः (.इदम् ) ( समीरिरे) प्रेरितवन्तः (मयः) सुखप्रद कर्म ( पतिभ्यः) तेभ्या पालकेभ्यः (जनये) भार्याय (परिग्वजे) क्विवन्तः प्रयोगः। संगमाय । संगन्तुस्॥

(३,०६६) अथर्ववेदभाष्ये सू० १ [४३] - भावार्थ-करुणाशील, शूरवीर पुरुष गृहाश्रम में हिंसा त्यागकर द प्रबन्ध करके यश पाते हैं । जो मनुष्य इस श्रेष्ठ सिद्धान्त को विद्वानों में फैलाते हैं, वे विद्वान् गृहीश्रमी स्त्री पुरुपों से विद्यांवृद्धि में सुख पाते हैं ।। ४६ ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं-१०।१०। १०, और महर्षि दया- नन्द कृत संस्कारविधि विवाह प्रकरण में वधू को पितृ गृह छोड़ते समय आंख में आसू भर लाने पर वर के बोलने में लिखा है । स्योन ध्रुवं मजायै धारयामि तेऽश्मानं दे ध्याः पृथिव्या उपस्थे । तमा तिष्ठानुमाद्या सुवची दीर्घ त प्रायु': सविता कृणोतु ४७ स्पोनस् । ध्रुवम् । मु:जाय । धारयामि । तेः। अश्मानम् । देव्याः । पृथिव्याः । उप-स्थे ॥ तम् । बा । तिष्ठ। अनु: माद्यो । सु-वची । दीर्घस् । ते. आयु: । सविता। कृणोतु ॥४॥ भाषार्थ-(स्यानम् ) सुखदायक, (ध्रुवम् ) दृढ़ (अश्मानम् ) पत्थर को ( देव्याः), दिव्य गुण वाली (पृथिव्याः) पृथिवी की ( उपस्थे) गोद में. (प्रजायै ) प्रजा [ सन्तान, सेवक आदि ] के निमित्त (ते ) तेरे लिये (धार- यामि.) मैं [ पति ] रखता हूँ। (अनुमाद्या ) निरन्तर हर्ष मनाती हुयी और (सुवर्चाः) बड़ी प्रताप वाली तू (तम् ) उस [ पत्थर] पर (आ तिष्ठ) खड़ी हो, (सविता ) सब का उत्पन्न करने वाला परमेश्वर (ते) तेरी (श्रायुः) आयु को (दीर्घम् ) लम्बी (कृणोतु ) करें ॥४७॥ भावार्थ-जिस प्रकार पृथिवी पर पत्थर पहाड़ दृढ़ होकर रहते हैं, इसी प्रकार बंधूवर दृढ़े प्रतिज्ञों के साथ 'गृहाश्रमको सिद्ध करकेशानन्द पावेwesn ४७-(स्योनम् ) सुखदायकम् (ध्रुवम् ) दृढम् (प्रजायै ) सन्तानसेव- कादिनिमित्ताय (धारयामि ) स्थापयामि (ते) तुभ्यम् (अश्मानम्) शिला: खण्डम् ( देव्याः) दिव्यगुणवत्याः (पृथिव्याः) ( उपस्थे ) अङ्के (तम् ) अश्मा- नम् ( आ तिष्ठ ) आरोह (अनुमाद्या) निरन्तरहर्षयुक्ता (सुवर्चाः) महातेज.. स्विनी ( दीर्घम् ) चिरम् (ते) तव (आयुः) जीवनम् ( सविता) सर्वोत्पा- दकः परमेश्वरः (कृणोतु] करोतु ॥ . .

धनेन च ॥४८॥ ... . सू० १ [४८३ ] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०६५.) इस मन से वधू को वर शिला पर खड़ा करावे ।महर्षि दयानन्दकृत संस्कार विधि विवाह प्रकरण में वधू के लिये शिला पर चढ़ाना अन्य मन्त्र से लिखा है, येनाग्निरस्या भूम्या हस्तै जग्राह दक्षिणम् । तेन गृणामि ते हस्तं मा व्यथिष्ठा मया सुह मुजयो च येन । अग्निः । अस्याः । भूम्याः । हस्तस् । जग्राह । दक्षिणम् ॥ तेन । गृणामि । ते । हस्तम् । मा। व्यथिष्ठाः । मया । सु.ह । मु-जयो । च । धनेन । च ॥४८॥ भाषार्थ-(येन ) जिस [ सामर्थ्य ] से (अग्निः) तेजस्वी पुरुष ने (अस्याः भूम्याः) इस भूमि [ प्रत्यक्ष भूमि के समान धैर्यवती अपनी पत्नी] का (दक्षिणम् ) बड़े बल वाले वा गति वाले [अथवा दाहिने] ( हस्तम् ) हाथ को (जग्राह ) पकड़ा है। (तेन ) उसी [ सामर्थ्य ] से (ते हस्तम् ) तेरे हाथ को (गृह्णामि ) मैं [पति] पकड़ता हूं, (मया सह ) मेरे साथ रहकर (प्रजया) प्रजा [सन्तान सेवक आदि ] के साथ (च.च ) और ( धनेन ) धन के साथ (मा व्यथिष्ठाः ) व्यथा को मत प्राप्त हो ॥ ४ ॥ भावार्थ-जिस प्रकार पूर्वज लोग पाणिग्रहण करके उपकार करते आये है, इसी प्रकार वधूवर पाणिग्रहण करके प्रीति के साथ परस्पर हित करते हुये सन्तान आदि का पालन और धन की वृद्धि करें ॥ ४ ॥ दे वस्तै सविताहस्तं गृह्णातु सोमो राजा सुमजस कृणोतु । अग्निः सुभगा जातवेदाः पत्ये पत्नी जुरदष्टिं कृणोतु ॥ ८॥ ४-( येन ) सामर्थ्येन (अग्निः ) तेजस्वी पुरुषः (अस्याः) प्रत्यक्षायाः (भूम्याः) भूमिसमानधैर्यवत्याः स्वपत्न्याः (हस्तम्) करम् (जग्राह) गृहीतवान् (दक्षिणम्) द्वदक्षिभ्यामिनन् । उ० २१ ५०। दक्ष गतिवृद्धयोः-इनन् । बलवन्तम् । गतिमन्तम् । दक्षिणभागस्थम् (तेन) सामर्थ्येन (गृहणामि) (ते तंघ (हस्तम्) (मा व्यथिष्ठाः) व्यथां मा प्रामुहि (मया ) (सह ) (प्रजया ) (च) (धनेम) च ॥

. - - (३,०६८) अथर्ववेदभाष्ये सू०१ [४८३] देवः । ते । सविता । हस्तस् । गृह्णातुः। सोमः । राजा। सु-जसम् । कृणोतु ॥ अग्निः । सु-भास् । जात-वेदाः । पत्य। पत्नीम् । जरत्-अष्टिम् । कृणोतु ॥ ४ ॥ भाषार्थ:-(देवः) व्यवहार में चतुर, (सविता) सर्वप्रेरक [परमेश्वर] (ते हस्तम् ) तेरे हाथ को.(गृहांतु ) पकड़े [सहाय करें], (राजा) ऐश्वर्य- वान् (सोमः)-सर्वोत्पादक [ परमात्मा] (सुप्रजेसम्) सुन्दर सन्तान वाली (कृणोतु ) करे। (जातवेदाः) धनों का प्राप्त कराने वाला (अग्निः ) सर्वव्यापक . [जगदीश्वर] (पत्ये) पति के लिये ( पत्नीम्) पत्नी को (सुभगाम् ) बड़े ऐश्वर्य वाली और (जरदष्टिम् ) स्तुति के साथे प्रवृति वाली वा भोजन वाली (कृणोतु) करे ॥४॥ भावार्थ-वधू वर सदा परमेश्वर की उपासना करके परस्पर सहाय करने, सन्तान को, सुशिक्षित बलवान् बनाने, और धनों के सङ्ग्रह करने में तत्पर रहकर संसार में कीर्तिमान् होवें ॥ ४६॥ गृह्णामि ते सौभगत्वाय हस्त मया पत्या जरदष्टिर्ययासः । भगो भर्य मा सविता पुरैधिर्मी त्वादुर्गार्हपत्याय दे वाः ५०॥(५) गृहामि । ते । सौभग-त्वार्य । हस्तम् । मया । पत्यो । जुर- त्-ष्टिः । यथा । असः ॥ भगः । सुर्यमा । सविता । पुरम्- धिः । मह्यम् । त्वा । अदुः। गार्ह-पत्याय । दे वा ॥ ५०n(५), ४४-(देवः) व्यवहारकुशलः (ते) तव (सविता) सर्वप्रेरकः परमेश्वरः (हस्तम् ) (गृह्णातु ) (सोमः) सर्वोत्पादकः (राजा) ऐश्वर्यवान् (सुप्रज- सम्) सुसन्तानयुक्ताम् (कृणोतु ) करोतु (अग्निः ) सर्वव्यापको जगदीश्वरः (सुभगाम ) वह श्वर्यवतीम् (जातवेदाः ) जातानि प्राप्तानि वेदांसि धनानि यस्मात् सः (पत्ये ) स्वामिने (पत्नीम् ) ( जरदष्टिम् ) अ० २१ २८1५। जरतेः स्तुतिकर्मणः [निरू० १० १%] अतॄन् + अशू व्याप्ती, अश भोजने वा-क्तिन् । जरता स्तुत्या सह अष्टिः कार्यव्याप्ति जनं वा यस्यास्तथाभूताम् (कृणोतु) ॥ - सू० १: [ ४८३ ] - चतुर्दशं काएउम् ॥ १४ ॥ (३,०८.) भाषार्थ-[हे वधू !] (सौभगत्वाय ) सौभाग्य [अर्थात् गृहाश्रमे में सुख-] के लिये (ते हस्तम् ) तेरे हाथ को (गृह्णामि ) मैं [ पति ] पकड़ता हूँ, (यथा) जिससे (मया पत्या) मुझ पति के साथ (जरदष्टिः) स्तुति के साथ प्रवृत्ति पाली वा भोजन वाली (असः) तू रह । (भगः) सकल ऐश्वर्य वाले, (अर्यमा ) श्रेष्ठों का मान करने वाले, (सविता) सब का प्रेरणा करने वाले, (पुरन्धिः ) सब जगत् का धारण करने वाले [ परमेश्वर ] और ( देवाः) सब विद्वानों ने (मह्यम्) मुझको (त्या) तुझे (गार्हपत्याय) गृहकार्य के लिये (अदुः) दिया है ॥५०॥ भावार्थ-वधूवर परमेश्वर और विद्वानों को साक्षी करके परस्पर हाथ- पकड़ कर दृढ़ प्रतिज्ञा करें कि हम दोनों निष्कपट परस्पर सहायक होकर परमेश्वर और विद्वानों को मर्यादा पर चलकर गृहाश्रम का कर्तव्य सिद्ध करेंगे ॥५०॥ n . यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१०। ५ । ३६, और महर्षि दया; नन्दकृत .अग्वेदादिभाष्यभूमिका विवाह विषय पृष्ठ २०८ में व्याख्यात है। भगस्ते हस्तमग्रहीतु सविता हस्तमग्रहीत् । पनी त्वमसि धर्मणाहं गृहप॑तिस्तव ॥ ५१ ॥ भगः । ते । हस्तम्। प्रगृहीत् । सविता। हस्तस् । अगृहीत् ॥ पत्नी । त्वम् । असि । धर्मणा । अहम् । गृह-पतिः। तां ॥५१॥ भाषार्थ-(भगः ) ऐश्वर्यवान् [ परमात्मा ] ने (ते) तेरा (इस्तम्) r ~ T : ५०-(गृहणामि ) (ते ) तव (सौभगत्वाय ) सुभगत्वाय । गृहाश्रमे सुखप्राप्तये (हस्तम् ) पाणिम् ( मया ) (पत्या) स्वामिना सह (जरदष्टिः). म०४६ । स्तुत्या सह प्रवृत्तियुक्ता भोजनयुक्ता वा (यथा ) येन प्रकारेण -(अस) त्वं भवेः (भगः) सकलैश्वर्यसम्पन्नः (अर्यमा) श्रेष्ठानां मानकर्ता (सविता) सर्वप्रेरकः (पुरन्धिः ) सर्वजगद्धारकः परमेश्वरः (मह्यम् ) मदर्थम् (त्वा ) त्वां वधूम् (अदुः ) दत्तवन्तः (गार्हपत्याय ) गृहकार्यसिद्धये (देवाः) विद्वांसः। ५१-(भगः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा (वे) तव (हस्तम्) (अग्रहीत् ) - . (३,०७०) प्रयर्षवेदभाध्ये सू०१ [४८३] हाथ (अग्रहीत् ) पकड़ा है [सहाय किया है ], (सविता) सर्वोत्पादक जग. दीश्वर ने (हस्तम् ) हाथ (अग्रहीत् ) पकड़ा है । (धर्मणा) धर्म से, (त्वम्) तू (पत्नी) [मेरी] पत्नी [पालन करने वालो ] (असि) है, (अहम् ) मैं (तब) तेरा (गृहपतिः) गृहपति[घर का पालन करने वाला हूं]॥१॥ भावार्थ-पति पत्नी दृढ़ प्रतिज्ञा करें कि परमेश्वर के अनुग्रह से हम दोनों मिले हैं, हम दोनों मिलकर गृहाश्रम में धर्म मार्ग पर चलेंगे और परस्पर सहाय करेंगे। ५१ ॥ ममे यमस्तु पोष्या मी त्वादाद् बृहस्पतिः । मया पत्यो प्रजावति सं जीव शुरदः शतम् ॥ ५२ ॥ मम । इयम् । अस्तु । पोया। मह्यम् । त्वा । अदात् । हुस्पतिः ॥ मया । पत्यो। मजा-ति । सम् । जीव । शरदः । शुतम् ॥ ५२ ॥ भाषार्थ-(इयम् ) यह [पत्नी ] ( मम ) मेरे (पोया) पोपणयोग्य (अस्तु) होवे, (मह्यम् ) मुझ को (त्वा) तुझे (वृहस्पतिः ) बड़े लोकों के स्वामी [ परमात्मा] ने (प्रदात् दिया है । (प्रजापति )हे श्रेष्ठ प्रजा वाली ! दू (मया पत्या) मुझ पति के साथ (सम् ) मिलकर (शतम् । लौ (शरदः) वर्षों तक (जीव) जीती रहे ॥ ५२ ॥ भावार्थ-पति को योग्य है कि बस्त्र, अलंकार श्रादि पदार्थों से पत्नी का सन्मान करता रहे, जिससे दम्पती प्रसन्न रहकर सन्तान प्रादि का पोपण . पालन करते हुये पूर्ण आयु भोगें ।। ५२॥ गृहीतवान् (सविता) सर्वोत्पादको जगदीश्वरः (हत्तम् ) (अग्रहीत् ) (पत्नी) पातयित्री (त्वम् ) (मलि) (धर्मणा) शास्त्रविहितकर्मणा (अहम् । (गृहपतिः) पृहखामी (तव)॥ ५२-(मम ). (इयम् ) पत्नी (अस्तु ) (पोष्या) पोपणीया (मह्यम् ) पत्ये (त्वा) त्यां पत्नीम् (अदात् ) दत्तवान् (बृहस्पतिः) वृहतां लोकानां पालका परमात्मा (मया ) (पत्या ) भर्ना (प्रजावति) हे सन्तानसेवकादियुक्त (सम् ) मिलित्वा (जीव) प्राणान् धारय (शरदः ) वर्षाणि (शतम् ) ॥

. सू०.१ [ ४८३] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०७१) त्वष्टा वासो व्यदधाच्छुभे कं बृहस्पतेः मुशिषा कवीनाम् । तेने माँ नारी सविता भगश्च सूर्यामिव परि धत्तां जया ॥५३॥ त्वष्टा । वासः। वि अधात् । शुभे । कस् । बृहस्पतेः । प्र-शिषा । कुवीनाम् ॥ तेन । इमाम् । नारीस् । सुविता । भगः । च । सूर्यास्-ईव । परि । धुत्ताम् । प्र-जयां ॥ ५३ ॥ भाषार्थ-(त्वष्टा) सूक्ष्मदर्शी [आचार्य ] (बृहस्पतेः) बड़ी 'वेदः वाणियों की रतिका [वृहस्पति पदवी वाली स्त्री ] के (शुभे) शुभ [ आनन्द ] के लिये ( कवीनाम् ) बुद्धिमानों की ( प्रशिपा) अनुमति से (कम् ) आनन्द के साथ (वासा) वस्त्रे [वेष ] (वि) विशेष करके (श्रदधात् ) दिया है। (तेन) इस कारण से (सूर्याम् इव ) सूर्य की चमक के समान [शोभायमान ] (इमाम् नारीम् ) इस नारी [ नर की पत्नी ] को ( सविता) प्रेरक विद्वानों का समूह (च) और ( भगः) ऐश्वर्यवान् पति, दोनों (प्रजया) प्रजा [ सन्तान सेवक आदि ] के साथ (परि ) सब ओर से (धत्ताम् ) धारण करें॥ ५३॥ भावार्थ-जिस विदुषी स्त्री ने विद्या प्राप्त करके विद्वानों के समाज में बृहस्पति, स्नातक श्रादि पदवी लेकर विद्यासूचक वस्त्र अर्थात् वेष प्राप्त किया हो, विद्वान लोग और पति उसकी सदा प्रतिष्ठा करें जिससे वह उत्तम प्रजा' घाली होवे ५३॥ इन्द्राशी द्यावापृथिवी मातरिश्वा मित्रावरुणा भगा अश्वि- नोभा । बृहस्पतिर्म रुती ब्रह्म सोम इमां नारी अजयों वर्धयन्तु ॥ ५४ ॥ -- ५३- (त्वष्टा ) सूक्ष्मदाचार्यः (वासः) वस्त्रम् । वेषम् (वि) विशे- घेण (अदधात् ) दत्तवान् ( शुभे ) शुभाय । सुखाय (कम् ) (बृहस्पतेः ) अह- तीनां वेदवाणीना रक्षिकायाः । बृहस्पतिपदवीयुक्तायाः खियाः (प्रशिषा) अनु.. मत्या (कवीनाम् ) मेधाविनाम् ( तेन.) कारणेन ( इमाम् ) प्रसिखाम् (नारीम्) नरपत्नीम् (सविता) प्रेरको विद्वत्समूहा (भगः) ऐश्वर्यवान् पतिः (च.) ( सूर्याम् इव ) सूर्यदीप्तिमिव शोभायमानाम् (परि ) सर्वतः (धचाम् ) धारय. ताम् (प्रजया ) सन्तानसेंघकादिना सह ॥ -- (३,०७२) अथर्ववेदभाष्ये सू०.१ [४] इन्द्राग्नी इति । द्यावापृचिवी इति । मातरिश्वा । मित्राव- 'रुणा'। भगः । अश्विना । उभा । बृहस्पतिः । मुरुतः । ब्रह्म। सोमः । ईमाम् । नारीम् । म-जया । वर्धयन्तु ॥ ५४ ॥ भाषा-(इन्दाग्नी) विजुती और भौतिक अग्नि, (यावापृथिवी) सूर्य और भूमि, (. मित्रावरु) प्राए और अपान, (उमा) दोनों (अश्विना) दिन मौर रात्रि, (मानरिश्वा) प्रकाश में इतने वाला [ सूत्रान्ना वायु.], (बृहस्पतिः) बड़े तोकों का रक्षक श्राकाश], (सोमः) चन्द्रमा. (गः) सेवनीय यश. (ब्रह्म) अन्न, और (मत्तः) विद्वान् तोग (इमाम् नारीम् इस नारी को (प्रजया) प्रजा सन्तान, सेवक आदि से (वर्धयन्तु) बढ़ावें । १४ । भावार्य-विहुयो स्त्री और विद्वान् पुरुष को योग्य है कि संसार के सब पदार्थो को उपयोगी बनाकर सन्तान प्रादि को वृद्धि युत करें ।। ४ ।। बृहस्पतिः प्रय॒मः सूर्यायाः शौर्षे कैशौं अकल्पयत् ॥ तेने मामश्विना नारी पत्ये संशोभयामति ॥ ५५ ॥ वृह स्पतिः । मृयुमः । सूर्यायोः । शीर्षे । केशान् । अकल्पयत्। तेन ।दुमाम् । अश्विना । नारीम् । पत्यै । सम् । शोभ्यामसि ५५ भाषा-(प्रथना) पहिते से ही वर्तमान (बृहस्रतिः) बड़े बड़े तोको के स्वामी [ परनेश्वर ने (सूर्यायाः) प्रेरणा करने वाली [वा सूर्य की बनेक 'के समान तेज वांती कन्या के (शीर्षे ) मस्तक पर ( शान् ) केशों को (अंक- - ५४-(इन्द्राग्नी ) विद्युत्पादकौ (शावापृथिवी) र्यभूमिलोको (मात- रिश्वा ) भाकाशे गमनशीतः त्रामा वायुः (नित्रावरुणा) प्रासापानी ( भगः) सेवनायं यशः (अश्विना ) अहोरात्री ( उभा ) द्वौ (वृहसतिः) चहतां लोकानां 'पालक प्रकाशः (मल्तः) विद्वांसः (ब्रह्म) अनन् (सोमः) चन्द्रः (इमाम् ) विदुषीम् ( नारीम् ) नेरपत्नीम् (मजया) लन्तानलेवादिना (वर्धयन्तु) उभयन्तु। ५५-( वृहस्पतिः ) महतातोकानों पालिका परमेश्वरः (प्रथमः) अप्रे वर्तमानः (सूर्यायाः) प्रेरिकायाः र्ववतेतहिन्याः कायायाः (शी मस्तके . सू०१:[४८३] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (2004 'ल्पयत्) बनाया है। (तेन ) इस [कारण ].से ( अश्विना) हे विद्या को प्राप्त "दोनों [स्त्री पुरुषों के समाज ! ] ( इमाम् नारीम् ) इस नारी को ( पत्ये) पति के लिये (सम् ) ठीक ठीक (शोभयामसि ) हम शोभायमान' करते हैं ॥५॥ भावार्थ-परमेश्वर ने शिर के केशों और वैसे ही शरीर के अंगो को अपने अपने प्रयोजन के लिये सुडौल बनाया है। गुरुजनों को योग्य है कि वधू वर को संसार के हित के लिये विद्या सुशीलता आदि से.सुशिक्षित करें किचे अपने शरीर के अंगों को सुडौल और हृष्ट पुष्ट रक्खें ॥ ५५ ॥ इदं तद्रूपं यदवस्त योषो जायां जिज्ञासे मनसा चरन्तीम् । तामन्वतिष्ये सखिभिनवाचे : क इमान् विद्वान् विचचर्त पाशान् ॥ ५६ ॥ 'इंदम् । तत् । रूपम् । यत् । अवस्त । योषी। जायाम् । जिज्ञासे । मनसा । चरन्तीम् ॥ तास् । अनु' । अति ष्ये । "सखिभिः । नव-ग्वैः। कः । इमान् । विद्वान् । वि। पाशान् ॥ ५६ ॥ भाषार्थ-(इदम् ) यह (तत् ) यह (रूपम् ) रुप सुन्दरता व स्व- भाव ] है, (यत् ) जिसको (योषा) सेवनीय (वधू) ने ( अवस्त) धारण किया है, (मनसा ) विज्ञान के साथ ( चरन्तीम् ) चलती हुई ( जायाम् ) पत्नी को (जिज्ञासे ) मैं जानना चाहता हूं। (नवग्वैः) स्तुति योग्य चरित्र वाले अथवा नवीन नवीन विद्या को प्राप्त करने और कराने हारे. (सखिभिः) मित्रों ( केशान) (प्रकल्पयत्.) रचितवान् ( तेन) कारणेन ( इमाम् ) विदुषीम् (अश्विनी) हे प्राप्तविद्यौ स्त्रीपुरुषसमूहौ (नारीम् ) नरपत्नीम् (पत्ये) खामिने (सम् ) सम्यक् (शोभयामसि ) शोभयामः । भूषयाम!! . ५६-(इदम् ) इदानी वर्तमानम् (तत्) दृश्यमानम् (रूपम् )सौन्द- यम् स्विभावः ('यत् ) ('अवस्त) आच्छादितवती । भधारयत् स्योषा) वृत. धदिवंचि० । उ० ३१६२ । यु मिश्रणामिश्रणयो-सप्रत्ययः । यद्वायुष वने- प्रिय टाप् । मिश्रणयोग्या । सेवनीया पत्नी (जायाम् ) पुत्रोत्पादिकां पत्नीम् i (जिशासे 'शातुमिच्छामि (मनसा) मननेन । विक्षानेन सह (चरन्तीमाचलन्तीम् (ताम् ) पत्नीम् ( अनुः) अनुसत्य (अतिप्ये) ऋत गती गमिष्यामि - .

. (1,038) अथर्ववेदभाष्ये सू०.१ [ ४८३] के सहित (ताम् अनु.) उस [ पली ] के साथ साथ (अतिष्ये ) मैं चलूगा, ( विद्वान् ) विद्वान् (कः) प्रजापति [ परमेश्वर] .( इमान् गोशान) इन [अविद्या के ] फंदों को (वि चचर्त ).खोल दिया है.॥५६॥ .. भावार्थ-विद्या सुशीलता आदि गुणों से सुभूषित पतिपत्नी सुयोग्य : इष्ट मित्रों सहित शुभ गुणों का श्रादर करके परस्पर हित करें और परमेश्वर को धन्यवाद दें कि जिसके अनुग्रह से ऐसा शुभ अवसर मिला है ॥५६॥ अहं वि व्यामि मयि रूपमस्या वेददित् पश्यन् । मनसः कुलायम् न स्तेयमनि मनसोदमुच्ये स्वयं मनुमोदमुच्ये स्वयं अन्नानी वरुणस्य पाशान् ॥ ५७ ॥ अहम् । वि । स्यामि । मयि । रूपम् । अस्याः । वेदत् । इत् । पश्यन् । मनसः । कुलायम् ॥ न । स्तेयम् । अभि । मनसा । उत् । अमुच्ये । स्वयम् । श्रश्ना नः । वरुणस्य । पाशान् ॥७॥ भाषार्थ-(अस्याः ) इस [ पत्नी] के (रूपम् ) रूप [स्वभाव वा सौन्दर्य ] को ( मनसः) अपने मन का (कुलायम्) आधार (वेदत्) जानता. हुआ और (पश्यन् ) देखता हुश्रा ( इत्) ही (अहम्.) मैं [वर ] (मयि ) अपने में (वि ष्यामि ).निश्चय करके . धारण करता हूं । (स्तेयम् ). चोरी के. पदार्थ को. (न) नहीं (अमि) खाता हूं, ( मनसा) विज्ञान के साथ ( वरु- सखिभिः) मिनः (नवग्वैः) णु स्तुतो-अप + गम्ल गौ-ड्वप्रत्ययः । नवग्वाः नवगंतयो नवनीतगतयो वा-निरु० ११ । १६ । स्तोतव्यचरित्रैः। नवशिक्षाविद्याप्राप्तः प्रापयितृभिश्च (का) सर्वकर्ता प्रजापतिः (इमान् ) विद्यमानानं (विचचत) चती हिंसाग्रन्थनयोः-लिट् । विमोचितवान् (पाशान् ) अविद्याषन्धान ॥ ५७-( अहम् ) वरः (विष्यामि ) व्यवसायेन निश्चयेन धारयामि (मयि ) आत्मनि (रूपम्.) स्वभावम् । सौन्दर्यम् (अस्याः) पल्याः ( वेदत्). विदन् । जानन् (इत् ) एव ( पश्यन् ) अवलोकयन् (मनसः) अन्तःकरणस्य (कुलायम्) आधारम् (न ) निषेधे (स्तेयम् । स्तेन यत् ; नलोपः। चौर्यपदार्थम् । (अभि) भक्ष्यामि (मनसा) विज्ञानेन ( उत् ) उत्कर्षण .. .

॥ सू० १ [४८३ ] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०७५) णस्य ) रुकावट [अर्थात् विन] के (पाशान ) फन्दों को (स्वयम् ) अपने आप [अर्थात् पुरुषार्थ से (श्रथनानः ) ढीला करता हुश्रा (उत् अमुच्ये ) मैं छुट गया हूं।। ५७॥ भावार्थ-विद्वान् पति पती परस्पर उत्तम गुण स्वभाव को हृदय में धारण करके विचार पूर्वक विघ्नों को हटाकर निष्कपट होकर उन्नति करें ॥५॥ म त्वा मुञ्चामि वरुणस्य॒ पाशाद् येन त्वाबनात् सविता सुशेवाः। उर लोकं सुगमत्र पन्या कृणोमि तुभ्यं स हफ्त्न्यै वधु ॥ ५८ ॥ प्र। त्वा। मुञ्चामि । वरुणस्य । पाशात् । येन । त्वा । अय॑नात् । सविता। सु-शेवाः ॥ उरुम् । लोकम् । सु-गम् । अ । पन्यास् । कृणोमि । तुभ्यस् । सुह-पत्न्यै । वधु ॥५८॥ भाषार्थ-[ हे वधू ! ] (त्वा ) तुझे (वरुणस्य ) रुकावट [विन] के (पोशात् ) बन्धन से (प्रमुञ्चामि ) मैं [वर] अच्छे प्रकार छुड़ाता हूं. (येन) जिसके साथ ( त्वा) तुझे (सुशेवाः) अत्यन्त सेवा योग्य ( सविता) जन्म 'दाता पिता ने (अवनात् ) बांधा है। (वधु ) हे वधू ! (सहपल्यै ) पति के साथ वर्तमान (तुभ्यम् ) तेरे लिये (अत्रं ) यहां [गृहाश्रम में ] (उरुम् ) चौड़ा (लोकम् ) घर और ( सुगम् ) सुगम (पन्थाम् ) मार्ग ( कृणोमि ) मैं [पति jबनाता हूं ॥५॥ भावार्थ-जिस कन्या को पिता ने योग्य पति के मिलने तक रोका था, वह कन्या योग्य पति के साथ सुखपूर्वक सुप्रबन्ध करके गृहाश्रम का कर्तव्य करे और उसी प्रकार पति भी पुरुषार्थ करके पत्नी के साथ प्रीति से रहे ॥५॥ इस मन्त्र का पूर्वार्द्ध ऊपर मन्त्र १६ में आ चुका है ॥ ५ ॥ (अमुच्ये) मुक्तोऽस्मि (स्वयम् ). आत्मना । पुरुषार्थेन (अथनानः ) शिथिलीकुर्वन् ('वरुणस्य ) श्रावरणस्य । विनस्य (पाशान् ) वधान् ॥ ५८-पूर्वार्दो व्याख्यातः-म० १६:( उरुम् ) विस्तृतम् (लोकम् ) गृहम् (सुगम् ) सुखेन गन्तव्यम् (अत्र) अस्मिन् गृहाश्रमे (पन्थाम् ) पन्थानम् । (कृणोमि ) करोमि (तुभ्यम् ) (सहपत्यै ) पत्या सह वतमानायै ( वधु) हे पति॥ -- .

. ( ३,००६) अथर्ववेदभाष्ये सू०.१ [४] उद्यध्वमप रक्षौ हनाथे मां नारी' सुकृते दंधात । धाता विपश्चित् पति मस्यै विवेद भगो राजापुर एंतु प्रजानन ५८ उत् । यच्छुधवम् । अपा. रक्षः । हुनाय । इमाम् । नारीम् । सु-कृते । दुधात ॥धाता। विपः-चित् । पतिम् । अस्यै । विले दु । भगः । राजा । पुरः । एतु । मु-जानन् ॥८॥ भाषार्थ-[हे चीरो ! शस्त्रों को] (उत् यच्छध्वम् ) उठाओ, (रतः ) राक्षसाको (अप हनाथ) मार हटानो, (इसा नारीम् ) इस नारो [ नर की पत्नी.].को (सुकृते) सुक्कत [पुण्य कर्म] में.(दधात्) धारण करो । (विपश्चित्:) बुद्धिमान् (धाता) धारण करने वाले [ परमेश्वर ] ने ( अस्य.) इस [धधू ] के लिये (पतिम् ) पति (विवेद) प्राप्त कराया है, (प्रजानन्ः) पहिले से जानने वाला.( सजा) प्रकाशमान (भगः ) ऐश्वर्यवान [परमात्मा] (पुरः ) आगे (पतु) प्राप्त होवे ॥ ५ ॥ भावार्थ-धर्मात्मा वीर लोग प्रयत्न के साथ विघ्नों से पृथक् करके वधू घर को.धर्म में प्रवृत्त रक्खें, और परमात्मा का सदा ध्यान करें कि जिस ने कृपा करके विद्वान् पति पत्नी को मिलाया है, वही उनका सदा.सहाय करे 48 भगस्ततक्ष चतुरः पादान् भगस्ततक्ष चत्वायुष्पलानि । त्वष्टा, पिपेश मध्यतोऽनु वर्धान्तमा नौ अस्तु सुमङ्गुली ॥६० ॥ ॥ , - 1148-( उत् यच्छध्वम् ) शस्त्राणि उन्नयत (रक्षा) राक्षसम् । विनम् (अप हनाथ ) लेटि रूपम् । दूरहित । मारयत ( इमाम् ) विदुषीम् (नारीम्।) , मरस्य पत्तीम् (सुकृते ).पुण्यकर्मणि, (दधात.) धारयत (धाता.) धारकः पर- मेश्वरः, (विपश्चित् ) मेधावी (पतिम् ) भर्तारम् (अस्यै.). वध्वे (विवेद.) प्रापितवान् (भंगः).ऐश्वर्यवान् जगदीश्वरः ( राजा.), दीयमानः '(पुरः):पुर- स्तात् । अग्रे (एतु ) गच्छतु (प्रजानन् ) अग्रे विदन ॥ 1 . ॥ सू० १ [४८३] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ।। (३,०७७) भगः । ततक्ष । चतुरः । पादान् । भर्गः । तता । चत्वारि । उष्पलानि ॥ त्वष्टौ । पिपेश । मध्यतः । अन । वनीन् । सा । नः । अस्तु । शु-मङ्गली ॥ ६० ॥ 'भाषार्थ-(भगः) भगवान् [ऐश्वर्यवान जगदीश्वर ] ने (चतुरः) चार [ धर्म अर्थ काम मोक्ष रूप] (पादान ) प्राप्ति योग्य पदार्थ (ततक्ष) रचे है, (भगः) भगवान ने (चत्वारि ) चार [ ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम रूप ] ( उज्पलानि ) हिंसा से बचाने वाले कर्म (ततक्ष) बनाये हैं। ( त्वष्टा ) विश्वकर्मा [ परमेश्वर ] + (मध्यतः ) बीच में [स्त्री पुरुषों के' भीतर] (वन् ) वृद्धिव्यवहारों की (अनु ) अनुकूल (पिपेश) व्यवस्था की है, ( सा ) वह [ वधू] (नः ) हमारे लिये ( सुमङ्गली ) सुमङ्गली [ बड़ी आनन्द देने वाली] (अस्तु ) होवे ॥ ६० ॥ भावार्थ-परमेश्वर ने वेदों द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और उनके साधन ब्रह्मचर्य नादि आश्रमों का उपदेश कर के संलार के उपकार के लिये स्त्री पुरुषों को ज्ञान और बुद्धि रूप वृद्धि का सामर्थ्य दिया है ॥ ६० ॥ भुकिंशुक बहुतं विश्वरूपं हिरण्यवर्णं लुवृत सुचक्रम् । श्री. रोह सूर्ये अमृतस्य लोकं स्योनं पतिभ्यो बहुत कणु त्यस् ६१ सु-किंशुकस् । वृहतुम् । विश्व-रूपस् । हिरण्य-वर्णम् । सु-वृतम् । सु-चक्रम् ॥ श्रा। रोहु । सूर्य । अमृतस्य । लोकम् । स्यानम् । पति-भ्यः । वृहतुम् । कृणु । त्वम् ॥ ६१ ॥ . ६५ ६०-(भगः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा (ततक्ष) रचितवान् (चतुरः) चतुःसंख्याकान् धर्मार्थकाममोक्षान् (पादान ) प्राप्तव्यानू पदार्थान् (भगः) (ततक्ष) (चत्वारि ) चतुःसंख्याकानि ब्रह्मचर्यगृहस्थवानप्रस्थसंन्यासांभम- रूपाणि ( उष्पलानि ) उप दाहे हिंसायां च-क्विप+ पल रक्षणे-मंचू । उषो हिंसनाद् रक्षककर्माणि ( त्वष्टा ) विश्वकर्मा परमेश्वरः (पिपेश ) पिश अवयवे व्यवस्थायां च । व्यवस्थापितवान् (मध्यतः) स्त्रीपुरुषयो मनसि (अनु) अनु- कूलम् (वान ) वृधिवपिभ्यां रन् । उ० २१.२७ । वृक्षु वृद्धौरन् । वृद्धिग्यवः हारान् (सा) वधूः (नः) अस्मभ्यम ( अस्तु) (सुमङ्गली) अत्यन्त सुखदायिनी ।। . ७ (.३,०७) अथर्ववेदभाये सू० १ [ ४८३ ] :- भाषार्थ-(सूर्य) हे प्रेरणा करने वाली [ वाट्य की चमक के समान तेज वाली ] क्यू ! (युकिंशुक अच्छे चमकने वाले अग्नि श विजुली घालें] वा बहुन प्रशंसनीय चार वाले, (विश्वकरम् । नाना करों वाले [शु, मौल, पीत, रक्त मांदि वर्ण वाले. अथवा ऊनीचे मध्यम स्थान वाले ], (हिर- एयवर्णम् ) सुवर्ण के लिये चाहने योग्य, { ऋतम ) अच्छे घूमने वाले सम मोर मुड़ जाने वाले . ( सुचनन् । सुन्दर दृढ़, शांत्रगामी ] पहियों वाले (वस्तुम् }, रथ पर [गृहाश्रम कर गाड़ी पर ] (त्वम् ) तू (श्रा रोह) बढ़ और (पतिभ्यः ). पति कुल वालों के लिये बहनुम् ) [अरने पहुंचने को (अमृतस्य ) अमरपन पुत्वार्थ ] का (चोनम् ) सुसहायक लोकम् ) लोक [संसार वा स्यान ] (यु) चना ॥ ६ ॥ भावार्थ-जैसे बनुर महारथी धन धान्य से परिपूर्ण सुदृढ़ रथ पर अपने साथियों सहिन चढ़ कर इच्छानुसार विवर कर कार्य सिद्धि करता है, बैले हो समझवार स्त्री तथा पुरुष गृहाश्रम में प्रवेश कर के सुप्रवन्ध ले अपने कुटुम्वियों सहित सुख भोगे ।। ६६ ।। यइ मन्त्र कुछ सेव ले ऋग्वेद में है-२०! ३ ! २०, तथा महर्षि दया. नन्दकृत संस्कार विधि विवाह प्रकरण में रथ पर वधू को वर के चढ़ा ले जाने में विनियुक्त है, और निहत १२ : में व्याख्यात है। संभातघ्नीं वसूणापशुघ्नी वृहस्पते । इन्द्रापतिघनी पुषिणीमास्मभ्य सवितर्वह ॥ २ ॥ M . क्ष-(बुकिंशुक्रम् ) बुकिंशुकम्नुकाशनम्, किंशुक अंशतः प्रकाश यतिकर्मणः-नित० १९ यता, कायतेडिमिः । उ०४:१५% ! सु: के शन्दे -डिमि शुक गतौ-क । अतिशयेन प्रकाशमानमन्निविद्युत्प्रयोगेण । अनि- शरेन प्रशंसनीयगतिमन्तम् (वहतुम् ) वहनलाधनं रथम् (विश्वरूपम् । शुक्रनीलपीतरतादिवर्णयुक्तम्, अथवा, उशनीचमध्याकारयुकम् (हिरण्यवर्णम) हिरण्याय सुवर्णाय वरणीयं स्वीकरणीयम् (नुवृतम् ) सर्वतो वर्तनशीलम् (उ.. चक्रम् ) इडशीघ्रगामिचक्रयुक्तम् ( प्रारोह ) प्रातिष्ठ (सूर्ये हे प्रेरणगोते. सूर्य- दीप्तिवत्तेजोयुक्त. (अमृतस्य ) अमरणस्य । पुरुषार्थस्य (लोकन् । संसारम् । स्थानम् (स्योनम् ) सुखप्रदन् (पतिभ्यः । पतिपक्षेभ्यः (बहनुम् ) वहनम् :- स्मप्रापणम् (कृणु) कुत-त्वम् ) . सू०६ [४८३] चतुर्दर्श काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०७८ ) अभ्रातृ-घ्नीस् । वरुण । अपशु-घ्नीस् । बृहस्पते ॥ इन्द्र। अपति-घ्नीम् । पुत्रिणीस् । मा । अस्मभ्यस् । सवितः । वहु६२ भाषार्थ-(वरुण ) हे श्रेष्ठ ! (वृहस्पते) हे वेदवाणी के रक्षक ! (इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्य वाले ! ( सवितः ) हे प्रेरणा करने वाले [ वर !] (अमातृघ्नीम् ) भाइयों को न सताने वाली, (अपशुनीम् ) पशुओं को न मारने वाली, (अपति. नीम् ) पति को न दुःन देने वाली और (पुत्रिणीम् ) श्रेष्ठ पुत्रों की उत्पन्न करने वाली [ वधू] को (अस्मभ्यम् ) हमारे हित के लिये (भा वह ) तू तो चल ॥ ६२॥ भावार्थ-सव विद्वान् लोग आशीर्वाद देवे कि विधान समर्थवर विदुषी व्यवहारकुशल वधू को गृहाश्रम की सिद्धि के लिये आदर पूर्वक ग्रहण करे ॥६२ इस मन्त्र का मिलान करो-ऋग्वेद १०। ८५ । ४४ ॥ मा हिसिष्टं कुमार्य १ स्थूणे देवकृ'ते पथि । शालायो दे व्या द्वार स्योनं कृण्मी वधूपृथस् ॥ ३ ॥ मां। हिंसिष्टम् । कुमार्यम् । स्थूणे इति । देष-कृ'ते । पुथि ॥ शालायाः । देव्याः । द्वारस् । स्योनम् । कृपमः । वधु- पृथस् ॥ ६३ ॥ भाषार्थ-(स्थूणे ) हे दोनों स्थिर स्वभाव वाली [स्त्री पुरुषों की पक्ति !] (कुमार्यम् ) कुमारी [ कन्या अर्थात् वधू ] को (देवकते) विद्वानों के बनाये (पथि ) मार्ग में (मा हिंसिष्टम्) मत कष्ट पाने दो। (देव्या) व्यवहार ६२-(अभ्रातृघ्नीम् ) हन्तेः का, मूल विभुजादित्वात् । भ्रातॄणामहन्त्री मुखप्रदाम् (वरुण ) हे श्रेष्ठ (अपशुनीम् ) पशूनां सुखयित्रीम् (बृहस्पते ) बृहत्या वेदवाण्या रक्षक (इन्द्र ) हे परमैश्वर्यवन् (अपतिनीम् ) पत्युमोद- यित्रीम् (पुत्रिणीम् ) श्रेष्ठपुत्राणां जनयित्रीम् ('अस्मभ्यम् ) अस्माकं पित. पक्षाणां हिताय (लविता ) हे प्रेरक वर (श्रा वह ) श्रानथ ॥ ६३-(मा हिंसिष्टम् ) दुःखं मा प्रापयतम् ( कुमार्यम् ) कुमारीम् । वधूम् (स्थूणे ) रास्नासास्नास्थूणावीणाः । उ०३ । १५ । ष्ठा गतिनिवृत्ती-नप्रत्ययः, टाप, आकारस्थ ऊत्वं मस्य णत्वं च । हे स्थिरस्वभावे स्त्रीपुरुषपती (देव- . -- . N . . (३,०८०) अथर्ववेदभाष्ये सू० १ [४८३] योग्य (शालायाः) शाला के (स्योनम्) सुखदायक (द्वारम् ) द्वार को (वधूपथम्) वधू का मार्ग (करमः) हम बनाते हैं ॥ ६३ ॥ भावार्थ-सब स्त्री पुरुष प्रयत्न करें कि पितृकुल ले पृथक होकर वधू प्रसन्न रहें और जैले सुन्दर खच्छ शाला के सुन्दर स्वच्छद्वार में होकर जाने आने में सुख होता है, वैसे ही सुप्रबन्ध वाले गृहाश्रम में वधू को सुख मिले ॥ ६३ ॥ ब्रह्मापरं युज्यतां ब्रह्म पूर्व ब्रह्मान्तता मंध्यतो ब्रह्म सर्वतः । अनाव्याधां देवपुरां प्रपद्ये शिवा स्योना पंतिलोके वि रोज ॥ ६४ ॥ (६) अम । अपरम् । युज्यताम् । ब्रह्म । पूर्वम् । ब्रह्म । अन्ततः । मध्यतः । ब्रह्म। सुर्वतः ॥ भूनाव्याधास् । देव-पुराम् म-पा। शिवा । स्योना । पति-लोके । वि । राज ॥६४॥ (६) भाषार्थ-(ब्रह्म ) ब्रह्म [ परब्रह्म परमात्मा ] (पूर्वम् । पहिले, (ब्रह्म) ब्रह्म (अपरम् ) पीछे, (ब्रह्म ) ब्रह्म' (अन्ततः) अन्त में और (मध्यतः) मन्त्र में, और (ब्रह्म ) ब्रह्म (सर्वतः) सर्वत्र ( युज्यताम् ) ध्यान किया जावे। [हे !] (अनाव्याधाम् ) छेदन रहित [अटूट, दृढ़] ( देवपुराम्-) देवताओं [विद्वानों.] के गढ़ में (प्रपद्य ) पहुंचकर (शिवा) कल्याणकारिणी और (स्योना) सुखदायिनी तू (पतिलोके) पतिलोक [ पति के समाज ] में (वि राज ) विराजमान हो ॥ ६४ ॥ भावार्थ-वधू तथा वर को योग्य है कि परमात्मा को सब स्थानों और कृते ) विदुषां रचिते ( पथि ) मार्गे (शालायाः) (देव्याः) व्यवहारयोग्यायाः (स्योनम् ) सुखप्रदम् (कृण्मः ) कुर्मः (वधूपथम्) वधूगमनमार्गम् ॥ ६४-(ब्रह्म) परमेश्वरः (अपरम् ) पश्चात् ( युज्यताम् ) समाधीयताम् (ब्रह्म.) (पूर्वम् ) अने (ब्रह्म) (अन्ततः) अन्ते (मध्यतः ) मध्ये (ब्रह्म) (सर्वतः) सर्वत्र (अनाव्याधाम् ) व्यध ताडने-घम् । छेदनरहिताम् । सुरढाम् (देवपुरम् ) विदुषां दुर्गम् (प्रपद्य) प्राप्य.(शिवा) कल्याणकारिणी (स्योना) सुनदायिनी (पतिलीफे ) पतिसमाजे (विराज) विराजमाना भव ।। .

सू०२ [४८४). चतुर्दशं काण्डम् ॥. १४ ॥ (३,०८१) सब कालों में प्रत्यक्ष जानकर वीरता और निर्विघ्नता से गृहाश्रम में अपने कर्तयों को प्रसन्न होकर पूरा करें !! ६४ इति प्रथमोऽनुवाकः॥ साथ द्वितीयोऽनुवाकः ॥ .. - . :०स्परा. - . - सूक्तम् २॥. १-७५ ॥ दम्पती देवते ॥१-४, ७, ८, १०, ११, १५, १६, २१-२३, २७-३०, ५३-५८, ६३-६६, ७२, ७३, अनुष्टुप् , ५ जगती ; ६ निजगती, ६व्यवसाना षट्पदा भुरिगष्टिः .१२ निचूदार्षी जगती , १३, ३५, १३ भुरि- गार्थी पङ्क्तिः । १४, १७-१६, ३४, ३८, ४२, ७०, ७४, ७५ त्रिष्टुप नुष्टुप् ; २४ विराट् त्रिष्टुप्, २५, ३६, ४१, ४६, निवृत् त्रिष्टुप् ; २६ त्रिपदा विराड् गायत्री ; ३१, ३६ स्वराट् त्रिष्टुप् ; ३२, ३७ भुरिक त्रिष्टुप् । ३३ भुरि- गुपरिष्टाद् बृहती, ४० खराड् जगती ; ४४ मिचुत् प्रस्तारपङ्क्तिः ; ४५, ९, ५१, ६७ भुरिंगनुष्टुप ; ४७ पथ्या बृहती ; ४८ श्रार्षी पङ्क्ति , ५० निचुङपरि- द् बहती ; ५२ विराट् परोपिणक; ५३, ६०, ६२ पथ्या पङ्क्तिः, ६१ भुरिक पथ्या पक्तिः, ६८, पुर उष्णिक, ६६ व्यवसाना षट्पदाऽतिशकरी, ७१ निवृत्य- पा पङ्क्तिश्छन्दः ॥ गृहाश्रमोपदेशः-गृह आश्रम का उपदेश तुभ्यमये पर्यवहन्त्सूया बहुतुनो मुह । स नः पतिभ्यो जायां दा भग्ने प्रजया सुह ॥ १ ॥ तुभ्यम् । अने। परि । अवहुन् । सूर्यास् । वह तुना । मुह ॥ 1 नः । पंति-भ्यः । जायाम् । दा: । अग्ने । ग्रु-जयो । मुहार भाषार्थ-(अग्ने ) हे सर्वज्ञ परमात्मन् ! ( अप्रे) पहिले से वर्तमान (तुभ्यम् ) तेरे लिये [.तेरो आज्ञा पालन के लिये ] (सूर्याम् ) प्रेरणा करने १-( तुभ्यम् ) तवाज्ञापालनाय (अने) आदौ वर्तमानाब (परि) सर्वतः ( अवहन ) प्रापितवन्तो विद्वांसः ( सूर्याम् ) प्रेरयित्रीम् । सूर्यदीप्तिक-- J .

(०२). अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [४] पाली. [चा सूर्य की चमक के समान तेज वाली ] झन्या को (बहतुना सह) दाय [यौतुक, अर्थात् विवाह में दिये हुये पदार्थ ] के साथ (परि ) सब प्रकार से (भवहन् ) वे [विद्वान् लोग ] लाये हैं, (सः) सो तू [ हे परमेश्वर !] (नः पतिभ्यः) हम पतिकुल वालों के हित के लिये (जायाम् ) इस पक्षी को (प्रजया सह) प्रजा [ सन्तान सेवक आदि ] के साथ (दाः) दे॥१॥ भावार्थ-अनादि परमात्मा की उपासना कर के विद्वान् लोग गुणवती बा को यौतुक भादि के साथ पति कुत में आनन्द से रहने के लिये माशी- बाद देवें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद ले ऋग्वेद में है-१० । = '1३८, और महर्षि दया- नन्दकत संस्कारविधि विवाह प्रकरण में वधू वर के यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा करने में उद्धृत है॥ पुनः पत्नीमुगिरदादायु षा नुह वचैता । दीर्घायुरल्या यः पतिर्जीवाति शुरदः शुतम् ॥ २ ॥ पुनः । पत्नीम् । अग्निः । अदात् । प्रायु'षा । सह । वर्चसा ॥ दीर्घ-श्नायुः । अस्याः। यः । पतिः। जीवाति । शुरदः। शुतस् २ भाषार्थ-(मग्निः) सर्वव्यापक परमेश्वर ने (आयुषा ) आयु और (वर्षमा सह) तेज के साथै (पक्षीम् ) पत्नी को (पुनः ) निश्चय करके (मदात्) दिया है । ( अस्याः ) इस [ पत्नी ] का ( यः) जो ( पतिः) पति है, [व] (दीर्घायुः ) दीर्घ आयु वाला होकर ( शतम् शरदः) सौ वर्षों तक ( जीवाति ) जीता रहे ॥२॥ . तेजस्विनी कन्याम् ( वहतुना ) विवाहकाले देयपदार्थन (लह ) ( सः) स त्वं परमेश्वरः (नः) भस्मभ्यम् ( पतिभ्यः) पतिकुलस्थानां हिताय (जायाम् ) पनीम् (दाः ) देहि ( अग्ने ) अगि गतौ-नि, नलोपः। हे सर्वश परमात्मन (.प्रजया) सन्तानसेवकादिना ( सह) ॥ २-(पुनः ) निश्चयेन ( पत्तीम् ) ( अग्निः) सर्वव्यापकः परमेश्वरः (भदात् ) दत्तवान् (आयुषा) जीवनेन (सह ) ( वर्चसा ) (दीर्घायुः) चिरंजीवी (अस्याः) पत्न्याः ( यः) (पतिः) (जीवाति ) जीवतु (शरदः) संवत्सरान् (शतम् )॥ .

. - । सू०२ [४८४.] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०८३) भावार्थ-जिस परमेश्वर के अनुग्रह से आयुष्मती पुण्यवती 'वधू प्राप्त हुयी है, उस परमात्मा से बुद्धिमान लोग प्रार्थना करें कि उसका पति भी यश और कीर्ति के साथ पूर्ण आयु भोगे ॥२॥ यह मन्त्र अग्वेद में है-१० १५ । ३8 । सोमस्य जाया प्रथमं गन्धर्षस्तेऽपरः पतिः तृतीयो भुमिष्टें पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः ॥ ३ ॥ सोमस्य । जाया । प्रथमस् । गन्धर्वः । ते । अपरः । पतिः। तृतीयः । अग्निः । ते । पतिः । तुरीयः । ते । मनुष्यु -जा। १-लामान्य अर्थ॥ भाषार्थ-[हे वधू ! ] ( सोमस्य ) सोम [शान्ति प्रादि शुभ गुण ] की (जाया ) उत्पत्ति स्थान (प्रथमम् ) पहिले [ पहिलो अवस्था में है, (गन्धर्वः ) गन्धर्व [ वेदवाणी का धारण करने वाला गुण ] (ते) तेरा (अपरः) दूसरा ( पतिः) पति [ रक्षक ] है । ( अग्निः.) अग्नि, अर्थात् विद्या और शरीर फा तेज] (ते ) तेरा (तृतीयः) तीसरा ( पतिः) पति [रक्षक ] है, भौर (मनुष्यजाः) मनुष्य [अर्थात् मनन शीलों में उत्पन्न विद्वान युवा पुरुष (ते) तेरा ( तुरीयः) चौथा [ पति ] है ॥३॥ भावार्थ-जव कन्या प्रमचर्य से पहिली, दूसरी और तीसरी अवस्था में कम से माता, पिता और प्राचार्या से सुशिक्षा पाकर और शरीर से स्वस्थ युवती होफर तेजस्विनी हो, तब अपने सदृश मातृमान् पितृमान और प्राचार्य: वान् नीरोग ब्रह्मचारी पुरुष से विवाह करे ॥ ३॥ इस मन्त्र का अर्थ श्रीमान् परिडत काली प्रसाद शर्मा आचार्य को ३-(सोमस्य ) शान्त्यादिगुणस्य ऐश्वर्यवतः पुरुषस्य (जाया) जायतें यस्यां सा जाया। उत्पत्तिस्थानम् । पत्नी (प्रथमम् ) प्रथमवारम् (गन्धर्वः) गोर्वेदवाण्या धारको गुणः पुरुषो वा (ते) तव (अपरः) द्वितीयः (पतिः) रक्षको भर्ती (तृतीयः) (अग्निः) विद्याप्राप्तिशरीरपुष्टिजन्यं तेजः । ज्ञानवानं पुरुषः। .(ते).तव (पतिः) (तुरीयः) चतुर्थः (ते) ( मनुष्यजाः ) अं० १२ । ४४३॥' मनुष्य + जनी प्रादुर्भावे-विट् । मनुष्येषु मननशीलेपनः । .

(३,०८४) अथर्ववेदभाष्ये सू० २.[४८४] -- सम्मति से किया गया है जिन को बहुत धन्यवाद देता हूं ॥३॥ २-नियोग विषयक अर्थ ॥ - भाषार्थ-[हे स्त्रो! तू ] ( सोमस्य) सोम [अर्थात् ऐश्वर्यवान विवाहित पुरुष ] की (जाया) पत्नी (प्रथमम् ) पहिली बार [होती है, (गन्धर्वः) गन्धर्व [अर्थात् वेद वाणी का धारण करने वाला नियुक्त पुरुष.] (ते) तेरा (अपरः) दूसरा (पतिः) पति अर्थात् रक्षक [ोता है ], (अग्निः) अग्नि [अर्थात् शानी नियुक्त पुरुष ] (ते) तेरा (तृतीयः) तीसरा (पतिः) पति [ होता है ] और ( मनुष्यजाः) मनुष्य [ मननशीलों में उत्पन्न नियुक्त पुरुष] (ते ) तेरा (तुरीयः) चौथा [ पति होता है ॥३॥ भावार्य-श्री को योग्य है कि विपत्तिकाल में अर्थात् विवाहित पति के रोगी होने वा मर जाने पर अन्य तीन पतियां तक एक दूसरे के पीछे..नियोग. करके सन्तान उत्पन्न करे, पहिले विवाहित पति का नाम लोम होता है और अन्य तीन जो नियोग के पति हैं, क्रम से गन्धर्व, अग्नि और मनुष्य कहाते ई इसी प्रकार विवाहित स्त्री सोस्या, और नियोग की तीनों, स्त्रियां क्रम से . गन्धर्वी, आग्नेयी और मानुषी कहाती हैं ॥३॥ . :- यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१०। ८५1 ४० और महर्षि दया नन्द कृत लत्यार्थप्रकाश चतुर्थ समुल्लास नियोगविषय और ऋग्वेदादि- भाष्यभूमिका नियोगविषय में व्याख्यात है। इस मन्त्र का पाठ और शब्दार्थ इस प्रकार है- सोमः प्रथमो विधिदे गन्धर्वो विविद उत्तरः । तृतीया अशिष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः ॥ [हे स्त्री!] (सोमः) सोम [अर्थात् शान्ति आदि शुभ गुण, वा ऐश्वर्य- बान् पुरुष ] (प्रथमः) पहिला (ते) तेरा ( पतिः ) पति [ रक्षक] (विविदे) [विद सत्तायाम्- लडथै लिट] होता है, (उत्तर) दूसरा ( गन्धर्वः) गन्धर्व [अर्थात् वेदवाणी का धारण करने वाला गुण वा पुरुष ], (तृतीयः) तीसरा (मग्निः) भग्नि[अर्थात् विद्या और शरीर का तेज वा शानी 'पुरुष ], और (मनुम्बजाः) मनुष्य [मननशीलों में उत्पन्न हुना पुरुष ] ( ते )तेरा (तुरीयः) चौथा-[पति ] (विविदे) होता है ।।

] . सू०२ [४८४ चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०८५) सोमो ददद् गन्धर्वाय गन्धर्यो दददग्गये रयिं च पुत्रांश्चादादग्निर्मामथौ बुमाम् ॥ ४ ॥ सोमः। दुदुत् । गन्धर्वाय । गन्धर्वः। त् । अग्नये ॥ रयिम् । च । पुत्रान् । चामदात् ।अग्निामह्यम्।प्रथो इतिाईमास् ngn १-सामान्य अर्थ ॥ भाषार्थ-(सोमः) सोम [शान्ति आदि शुभ गुण ] (गन्धर्वाय) गन्धर्व [ वेदवाणी के धारण करने वाले गुण ] के लिये [ कन्या को ] (ददत्) देता है, (गन्धर्वः) गन्धर्व [वेदवाणी के धारण करने वाला गुण ] (अमये) पनि विद्या और शरीर के तेज ] के लिये (दवत्) देता है। (मथो) फिर (ममिः) भनि [ विद्या और शरीर का तेज] ( इमाम् ) इस [खी ] को (च) भौर (रयिम् ) धन को, (च) और (पुत्रान् ) पुत्रों को ( मधम् ) मुझ [युवा प्रमचारी ] को (अदात् ) देता है ॥ ४॥ भावार्य-अब कन्या माता पिता और प्राचार्या से यथाक्रम सुशिक्षित होकर युवती हो जावे, तय येथाक्रम माता पिता और प्राचार्य से शिक्षा पाया हमा युवा ब्रह्मचारी वैसी गुणवती कन्या से विवाह करके धनवान् और पुत्र- बान होवे ॥४॥ २-नियोगविपर्यक अर्थ। भाषार्थ-(सोमः) सोम [ऐश्वर्यवान् विवाहित पति ] (गन्ध- चोय ) गन्धर्व [वेदवाणी के धारण करने वाले दूसरे नियुक्त पुरुष] के लिये [स्त्री को] (ददत्) छोड़ता है । (गन्धर्वः ) गन्धर्व [ वेदवाणी का धारण करने पाता दूसरा नियुक्त पुरुष ] (अग्नये ) अग्नि [शानी तीसरे नियुक्त पुरुष ] के "-(सोमः ) शान्त्यादिगुणः । ऐश्वर्यवान् विवाहितपुरुषः (दद ) दर्द दाने त्यागे च । ददाति । त्यजति कन्यां स्त्रियं चेति शेषः (गन्धर्वाय ) वेदवाणी. धारकाय गुणाय नियुक्तपुरुषाय वा (गन्धर्व:)( ददत्) (अग्नये) विद्याप्राप्तिशरीर- पुएिजन्यतेजसे । शानवते तृतीयनियुक्तपुरुषाय (रयिम् ) धनम् (च) (पुत्रान). (च) (अदात् ) ददाति । त्यजति (अग्निः) शानवान् तृतीयनियुक्तपुरुषः (मयम् ) यूने ब्रह्मचारिणे। चतुर्थनियुक्तपुरुपाय (अथो) पुनः (इमाम्) लिवम् ।।

(३,०८६) अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [-४४.] लिये (एदत्) छोड़ता है। (प्रथो) फिर (अग्निः) अति [पानी तीसरा नियुक्त पुरुष ] ( इमाम् ) इल' [ स्त्री] को, (च) और ( रयिम् ) धन को (4) और (पुत्रान् ) पुशे को ( मह्यम् ) मेरे लिये [अर्थात् चौथे नियुक्त पुरुष के लिये ] ( अदात् ) छोड़ता है ॥ ४ ॥ भावार्थ-मनुष्य को योग्य है कि सदा एक स्त्रीवत रहे बाहे वह विवाहित हो वा नियुक्त हो, और विवाहित स्त्री के मरजाने पा रोगी हो जाने पर आपत् काल में ही एक दूसरे के पीछे अन्य तीन स्त्रियों तक नियोग करके धन और सन्तान प्राप्त करे । इसी प्रकार स्त्री भी एक विवाहित पति के मरजाने पारोगी हो जाने पर श्रीपत् काल में ही अन्य तीन नियुक्त पतियों के साथ एक दूसरे के पीछे रह कर धन और सन्तान की रक्षा करे ॥४॥ यह मन्त्र ऋग्वेद में हैं-१०। ८५ । ४१ ॥ मा वामगन्त्सुतिवाजिनीवसू न्यश्विना हुत्सु कामा अरंसत अभूतं गोपा मिथुना शुभस्पती मिया अर्थ म्णो दुर्गा प्रशीमहि ॥ ५॥ ना। वास् । मृगन् । सु-मुतिः । वाजिनीवसू. इति धाजिनी- वन । नि । अश्विना । हुत्-स । कालोः । अरं तु ॥ अभू- तम् । गोपा। मिथुना । शुभः । पती इति । मियाः । अर्य- म्णः । दुर्यान् । अशीमहि ॥ ५ ॥ भाषार्थ-(वाजिनीवसू ) हे बहुत वेग घाली वा अन्न बाली क्रियाओं . में निवास करने वाले दोनों [स्त्री पुरुषो !] (घाम् ) तुम दोनों को (सुमति:-) सुमति (आ) सय ओर से (अगन् ) प्राप्त होवे, (अश्विना ) हे विद्या को 'प्राप्त दोनों (हृत्सु) [ तुम्हारे हृदयों में (कामाः ) शुभ कामनायें (नि) निर- ५-(श्रा ) समन्तात् (वाम् ) युवाभ्याम् (अगन् ) प्राप्नुयात् (सुमतिः) . मुबुद्धिः (वाजिनीवसू) वेगवतीषु अन्नवतीषु वा क्रिया निवसतस्तौ (नि.). निरन्तरम् ( अश्विना ) हे प्राप्तविद्यौ श्रीपुरुषो ( हसु) युवयोह दयेषु (कामाः) शुभाभिलाषाः ( अरंसत ) रमन्ताम् । तिष्ठन्तु (अभूतम् ) भक्तम् .

*: सू०२४४] चतुर्द काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०८७) तर (अरंसत) रमण करें[रहे ] 1 (शुभः पती ) हे शुभ क्रिया के रक्षको! ( मिथुना ) तुरा दोनों (गोपा) रक्षक (अनूतम् ) होमो, (प्रियाः) हम लोग प्रिय होकर (अर्यम्णः) श्रेष्ठों के मान करने वाले पुरुष के (दुर्यान) घरों को (अशीमहि ) प्राप्त करें॥५॥ भावार्यत्री पुरुषों को चाहिये कि फुरती से सुमति पूर्वक अन्न आदि सामग्री प्राप्त करके शुभ कामनायें सिद्ध करते हुये सब के रक्षक बने, लिस से विद्वान् लोग प्रीति फरके उनका आश्रय लेवे।। ५ ।। ' पह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१० ॥ ४० ॥ १२॥ "': मा मन्दसाना मनसा शिवेन रयिं धेहि सर्ववीरं वचस्य॑स् । सुगं तीचं अप्रपाणं शुभस्पती स्थाणं, पर्थिष्ठामपं दुर्मति इतम् ॥ ६ ॥ का।मन्दुमाना। मनमा। शिवेन । यिस् । धे हि । सर्व-वीरम् । पचुस्य॑म् ॥ सु-गस् । तीर्थम् । सु-अपानम् । शुभुः ।, पती इति । स्थाणुस् । पयि-स्वास् । । दुः-मतिम् । हुतम् ।। भाषार्थ-[हे षधू । ] (सा) सो तू (मन्दसाना ) आनन्द करती ,पुटी( शिवेन ) कल्याणयुक्त (मनसा ) मन के साथ (सर्ववीरम् ) सबधीरों वाले (वयम् ),स्तुति-योग्य ( रयिम् ) धन को (धेहि) धारण कर । (शुभः पती) हे शभ किया फेरक्षक तुम दोनो । (सुगम् ) सुख से जाने योग्य, (सुप्र- (गोपा.) गोंपायितारी । रक्षको (मिथुना) उभी (शभः ) शुभक्रियायाः (पती), पालकी (प्रियाः) हिता वयम् (अर्यम्णः) श्रेष्ठानां मानयितुपुर- पस्य ( दुर्यान ) अघ्न्यादयश्च । उ०.४ । ११२ । दुर्वी हिंसायाम्-यक्वकारः -खोपे दी भाषश्च । हिलन्ति दुःखम् । हान्-निघ० ३३४-(अशीमहिः) मा पुलाम । (सा.) सा त्वम् ('मन्वसाना) ऋजिवृधिमन्दिसहिभ्यः कित् । उ०२।८७ । मदि श्रामोदस्तुतिदीप्यादिषु-असानच कित् । भामोयित्री (मनसा ) चिन ( शिवेन) फल्याणयुक्तेन ( रयिम् ) धरम् (हि) धारवं (सर्व पीरम् ) सर्वकारांपेतम् (वचस्यम् ) प्रशंसनीयम् (सुगम् ) सुखेन गात- अप . 4 (३८) अथर्ववेदभाष्य सू०:२ [ ४८४] पाणम् ) सुन्दर पानी वाले (तीर्थम् ) तीर्थ [ उतरने के घाट.] को [भारण करो], और (पथिष्ठाम् ) मार्ग में खड़े हुये (स्थाणुम्) ठूठ [भाड मंकड़ मादि समान ].(दुर्मतिम् ) दुर्मति को (अप हवम् ) नाश करो॥६॥ भावार्थ-जहां पर गुणवती स्त्री प्रसन्न होकर धन का प्रबन्ध करके सन्तानों को शूर, धीर, यशस्वी बनाती है, वहां पर दोनों पति पत्नी विनों को हटाकर गृहाधम को ऐमा. सुखदायी करते हैं, जैसे विद्वान् शिल्पी मार्ग के कण्टक भादि मेंटकर नदी का सुगम तीर्थ अर्थात् घाट मनाता है जिस पर होकर सब सुख से उतरते.और जल से स्नान पान करके आनन्द पाते हैं ॥६॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१०॥४०॥ १३ ॥ पा ओषधयो या नद्यो ।' यानि क्षेत्राणि या बना। तास्त्वां वधु प्रजावती पत्य रक्षन्तु रक्षसः ॥ ७ ॥ पा। ओषधयः । याः । नद्यः। यानि । क्षेत्राणि । मा। बना। ताः। त्वा । वधु । मजा-वतीम् । पत्यै । रक्षन्तु । रक्षसः॥७ भाषार्थ-(या) जो (औषधयः ) ओषधियां [अन, सोमलतामादि), ६.पाः) जो (नया) नदियां, (यानि) जो (क्षेत्राणि) खेत और (या) जो ..(धना) बन [वृक्ष बाटिका आदि.] हैं.। (ताः ) वे सब [ ओषधि मादि], (प) हे वधू ! (त्वा प्रजावतीम् ) तुझ श्रेष्ठ सन्तान वाली को (पत्ये) पति के लिये ( रक्षसः ) राक्षस:[विघ्न] से रतन्तु) बचावें ॥७॥ म्यम् (तीर्थम् ). पातृतुदिवचि० । उ० २।७। तृ प्लवनतरणयो-थक् । तरण.. स्थानम् (सुप्रपाणम्) स्वच्छप्रकृष्टपानयुक्तम्. ( शुभः पती) हे शुभक्रियायाः .पालको (स्थाणम् ) शास्त्राशून्यवृक्षादिकम् (पथिष्ठाम्) मार्गस्थम् (दुर्मतिम्) लिम् (अप हतम् ) दूरे नाशयतम् ॥ म् (दु ७-(याः) (मोषधयः) भन्नसोमलतादयः (याः ) ( नद्यः) (यानि) क्षेत्राणि मनोत्पत्तिस्थानानि (या) यानि (वना) वनानि । वनोपवनवाटिका- दीनि (वा.) पूर्वोक्ता मोषध्यादयः (त्वा ). (वधु) हे पति (प्रजावतीम् ) तमसन्तानयुक्ताम् (पत्ये ) स्वामिहिताय (रक्षन्तु) पालयन्तु (रक्षमः) पणीयं पस्मात् तस्मादक्षिसात् विनात् ॥ . - . ०.२ [४८४] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (A). भावार्थ-गृहाश्रमी स्त्री पुरुषों को योग्य है कि भन्न, मोषधि, नदियों, बन उपवन मादि मावश्यक पदार्थों का यथावत् उपयोग करके कयों से बचकर सुनी रहे॥७॥ एमं पन्यामरुक्षाम सुगं स्वस्तिवाहनम् । यस्मिन् वीरो न रिष्यत्युन्येषां विन्दते वसु या। इमम् । पन्योस् । अरुक्षाम् । सु-गम् । स्वस्ति-वाहनम् ॥ पस्मिन् । वीरः । न । रिष्यति। अन्येषाम् । विन्दते। यमु' in भाषार्थ-(इमम् ) इस [वैदिक] (सुगम् ) मुख से चलने योग्य, (स्वस्तिवाहनम् ) आनन्द पहुंचाने वाले (पन्थाम् ) मार्ग पर भा भरुवाम) इम चढ़ें। (यस्मिन् ) जिल [मार्ग] में (वीरः ) वीर पुरुष (न:रिष्यति) कष्ट नहीं पाता है, और (अन्येषाम् ) दूसरे [ अधर्मियों ] का (.प.) मन [पण्ड द्वारा ] (विन्दते ) लेता है ॥ ८ ॥ भावार्थ-गृहस्थियों को चाहिये कि धार्मिक वैदिक मार्ग पर चलकर पौरपन से अधर्मियों को दण्ड दे और धन वृद्धि करें | नरः शृणुत ययाशिषा दंपती धाममश्नुतः ये गन्धर्षा अप्सुरसंश्च दे धीरेषु वानस्पत्येषु येऽधि तस्थुः स्योनास्तै भ्रस्य वृध्य भवन्तु मा हिंसिपुर्वहुतुमुह्यमानम् ॥८॥ इदम् । सु । मे । नरः। शृणुत। ययौ। भा-शिषा। दंपती इति दम्-पती । वामम् । अश्नुतः :॥ ये । गन्धर्वाः । अप्सुरमः। च । दैषीः । सुषु । वानस्पत्येषु' । ये। अधि । तस्युः ।। . इदं में . :-(इमम) प्रसिद्ध वैदिकम् (पन्थाम् )मार्गम् (भा भरक्षाम) माह 'हेम (सुगम् ) सुखेन गमनीयम् ( स्वस्तिवाहनम् ) भानन्दप्रापकम् (यस्मि) 'पंथि (वीरः) पराक्रमी पुरुषः (न) निषेधे (रिष्यति.) दुःखं प्राप्नोति (मन्ये वाम् ) अंधर्मियाम् (विन्दते) ममते (पर) अनम् ॥

॥ (6,00) अथर्ववेदभाष्य सू०३ [४८४] स्योनाः । ते । अस्यै । वुध्वै। भवन्तु । मा। हिं सिषुः । वहतुस् । उहयमानम् ॥ ६॥ भाषार्थ-(नरः ) हे नरो (एवम् ) अब-(मे) मेरी [नात ] (ब) अच्छे प्रकार ( शृणुत) सुनो, (यया भाशिषा ) जिस आशीर्वाद से (बम्पती, पति पती,दोनो ( वामम् ) श्रेष्ठ पदार्थ (मश्नुतः) पाते हैं । (ये) जो ( गन्धर्वाः) गन्धर्ष [वेदवाणी के धारण करने वाले पुरुष] (च) और (अप्सरसः) कामो में व्यापक रहने वाली (देवीः) देवियां [बड़ी गुणवती नियां] हैं, और (ये) जो पुरुष (पेषु) इन (वानस्पत्येषु ) सेवनीय शास्त्र के रक्षक जन से संबन्ध पाते पुरुषों में (अधि) ऊंचे (तस्थुः ) ठहरते हैं । वे सब हे वधू !]( ते अस्यै वध्वै) तुझइस बधू के लिये ( स्योनाः) सुखदायक ( भवन्तु ) होवे, वे ( उद्यमानम् ) 'चलते हुये ('वहतुंम् ) रथ [ रथ समान गृह कार्य] को ( मा हिंसिषुः ) न हानि पहुंचा ॥३॥ भावार्थ-सब निपुण विद्वान् पुरुष और गृहकार्य में चतुर स्त्रियां मिलं कर ऐसा प्रयत:करें कि वे दोनों सी पुरुष गृहाश्रम में यथावत् सिद्धि प्राप्त करें, और कभी उनके चलते हुये गृह कार्य में विघ्न न पड़ने पायें | ail m इदम् इदानीम् (सु) सुविचारेण (में) सम वाणीम् (नरः) मेतारः ((गृणुत-) आकर्णयत (गया) (आशिषा) आशीर्वादेन (दम्पती.) नावापती (वामम् ) श्रेष्ठ पदार्थम् ( अश्नुतः ) प्रामुतः (,वे) (गन्धर्वाः ) गां -पेदवाणी धरन्ति ते विद्वांसः ( अप्सरसः) अप. कर्मनाम-निघ०२।१।सते प्पूर्वादसिः। उ० ४ । २३७ । अपा+स गतौ-असि । अपांसि कर्माणि मरन्ति प्रामुवन्ति मास्ताः । कर्मकुशलाः स्त्रियः ( देवीः ) उत्तमगुणवत्यः (एषु ) प्रसि. इंधु वानस्पत्येषु) वन्यते लेव्यते स वनः, तस्व.पतिर्वनस्पतिः । [वनस्पते] वनस्य संभजनीयस्य शालयस्य पालक-यानन्दभाष्ये, यजु० २७ । २१ । ततः। दियवित्वादित्य० । पा०४।१। ८५ । एय। संभजनीयस्य शास्त्रस्य पालकस्य जनस्थ सम्बन्धिषु पुरुषेषु (ये ) (अधि ) उपरि ( तस्थुः ) तिष्ठन्ति ( स्योनाः ) सुखदायकाः (ते) तुभ्यम् (अस्यै प्रसिद्धायै (बध्वै ) पत्न्यै ( भवन्तु ) (मा हिंसिषुः ).मा नाशयन्तु (बहतुम् ) पहनसाधनं रथतुल्यं गृहकार्यम् ( उद्य- .. मानम् ) गम्यमानम्॥ - १४ ...

। ०२ [४८४] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (10) वे बुवश्चन्द्र बहुतु यक्ष्मा यन्ति जनाँ भर्नु पुनस्तान् यज्ञियां दे वा नय॑न्तु यत आगता:॥ १० ॥ (..):: थे । पयः । चन्द्रम् । बहुतुम् । यदमाः । यन्ति । जनान् । मन ॥ पुनः । तान् । यज्ञियाः । देवाः। नय॑न्तुः । यतः। . मा-गताः ॥ १० ॥ (७) : भाषार्थ-(ये) जो (वधमाः) क्षय रोग (जनान् भनु) मनुष्यों में वर्तमान ( वचः) पंधू के ( चन्द्रम् ) आनन्द देने वाले [वी सुनहले (वस्तुम् । रथ को (पम्ति ) प्राप्त होवें । (तान् ) उन [ रोगों ] को (यषिया) पूजा योग्य ( देवाः ) विद्वान लोग (पुनः) अवश्य [वहाँ] (नवन्तु) पहुंचा (बता ) महां से जिस कारण से ] (आगताः) चे रोग] आये हैं गरिमा भावार्थ-जब कभी मार्ग भादि स्थान में स्त्री या पुरुष को योग का उपद्रव मा पड़े, विद्वान् वैध लोग कारण जानकर उसका प्रतिकार करें ॥ १० ॥ वह मन्त्र कुछ भेद से अंग्वेद में है-१०।५।३॥ मा विदन् परिपन्थिनो य भ्रासीदन्ति दंपती । सुगेन दुर्गमतीतामपं द्वान्त्वरीतयः ॥ १९ ॥ मा। विदुन् । परि-पन्थिनः । ये । श्रा-सीदन्ति । दंपती इति दम्पती ॥ सु-गेन । दुः-गम् । अति । हुताम् । अप! ॥ :- - । ". . द्वान्तुः। अत्तयः ॥ ११ ॥ , भाषार्थ-(ये) जो ( परिपन्थिनः ) षटमार लोग ( दम्पती) पति. .... १०-(ये) ( वध्वः ) वध्वाः । पल्याः (बन्द्रम् ) आहादकम् । सुवर्ण:- गुकम् ( वहतम् ) वाहन स्थम् ( यक्ष्माः .) राजरोगाः ( यन्ति ) प्राप्नुवन्ति (जनान् ) मनुष्यान् (मनु) प्रति (पुनः) अवधारणे(तान्)रोगानं (यज्ञियाः) पूजाहाः ( देवाः ) सुखदातारो वैद्याः ( नयन्तु ) प्रेरयन्तु ( यतः ) यस्मात, कारणात् (आगताः) प्राप्ताः ॥ ११-(मा विदन्) मा प्राप्नुवन्तु ( परिपन्थिनः) भ०.१ । २०:२१. IN .4 ।

: (३,८२) अथर्ववेदभाष्येः ०२ [४८8 ]. पत्नी के ( भासीदन्ति) घात में आकर बैठते हैं, (मा विदन् ) वेज मिले। (सुगेन ) सुगम [मार्ग] से (. दुर्गम्.) कठिन स्थान को ( भति.) पार करके (इताम् ) दोनों चले जावे और (अरातयः ) शत्रु लोग (अप द्रान्तु ) भाग जावे ॥१९॥ भावार्थ-मार्ग चलने में स्त्री पुरुष सावधानी से प्रबन्ध करने कि सकजुटेरे भादि के उपद्रवों से बचकर कुशल से ठिकाने पर पहुंचे ॥१॥ पह मन्त्र कुछ भेद से अंग्वेद में है-१०। ८५ । ३२, और महर्षि दयानन्द कत संस्कारविधि विवाहप्रकरण में चोर आदि ले भय वा भयङ्कर स्थान होने पर बोलने के लिये उद्धृत है । इस मन्त्र का चौथा पाद.ऊपर मा चुका है- अ०-६.. १२६ । १-३॥. सं काशयामि बहुतु ब्रह्मणा गृहैरघौरेणु चक्षुषा मित्रियेण । पर्याणद्धं विश्वरूपं यदस्ति स्योनं पतिभ्यासविता तत् कृणोतु९२ सस् । काशयामि । बहुतुम् । प्रह्मणा । गृहः । अघोरेण । चक्षुषा । मित्रियेण ॥ परि-मानद्धम् । विश्व-रूपम् । यत् । अस्ति । स्योनम् । पति-भ्यः । सुविता । तत् । कृणोतु ॥१२॥ भाषार्थ-( ब्रह्मणा ) वेदज्ञान द्वारा (गृहैः) घरों के पदार्थो]. सहित [विराजमान ] (वहतुम् ) वधू को (अधोरेणं ) प्रकर [ कोमल ], (मित्रियेण ) मित्रता - युक्त (चक्षुषा ) नेत्र से (सम् काशयामि ) मैं यथावत् दिनाताई। (यत्) जो कुछ पदार्थ (विश्वरूपम् ) सब प्रकार का (पर्याणम्) -- प्रतिकूलाचारिणः (आसीदन्ति ) आगत्य घाते तिष्ठन्ति ( दम्पती ) पतिपत्न्यो : (सुगेनः) सुगमनीयेन मार्गेण (दुर्गम् ) दुर्गम्यस्थानम् ( अति ) प्रतीत्य (इताम् ) गच्छुताम् ( अप द्रान्तु ) पलायन्ताम् (अरातयः) शत्रवः ॥ १२-(सम्) सम्यक् ( काशयामि ) दीपयामि । दर्शयामि (बहतम् ). बंधूम् । नवोढाम् ( ब्रह्मणा ) वेदज्ञानेन (गृहैः) गृहपदार्थैः सह वर्तमानाम् (अघोरेण ) अकरण (चक्षुषा ) नेत्रेण (मित्रियेण ) मित्रत्वोपेतेन (पर्याणम्) संर्वतः प्रबन्धन धृतम् (विश्वरूपम् ) सर्वप्रंकारम्प यत्) पदार्थजातम् (अस्ति) । सू०२ [.४८४] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,०६३). सय ओर बंधा हुश्रा (अस्ति) है, ( सविता ) सब का प्रेरक [ परमात्मा ] (तत्) उस को (पतिभ्यः) पतिकुल वालों के लिये (स्यानम् )सुखदायक (फणोतु ) करे ॥ १२॥ :' भावार्थ-विद्वान् वर घर में आयी विदुषी वधू के साथ श्रेष्ठ व्यवहार करता रहे, जिससे सब कुटुम्बी लोग घरके पदार्थों में आनन्द पावें ॥ १२ ॥ शिवा नारीयमस्तुमार्गन्तिमं धाता लोकमस्य दिदेश । तामय मा भगो अश्विनोभा मजापतिः प्र॒जयो वर्धयन्तु ॥१३॥ शिधा । नारी । इयम् । अस्तम् । प्रा। अगन् । दुमम् । धाता । लोकम् । अस्यै । दिदे श ॥ तास । अर्य मा । भगः । अश्विना । उभा । मुजा-पतिः ! मु-जयो । वर्ध यन्तु ॥१३ ॥ भाषार्थ- इयम् ) यह (शिया ) मङ्गलदायिनी (नारी) नारी [नर- की पत्नी] (अस्तम् )घर में (श्रा अगन् ) प्राप्त होवे, (धाता ) सर्वपोषक [परमात्मा ] ने.( अस्यै). इस [ वधू ] को (इमम् ) यह (लोकम् ) जोक [समाज ] ( दिदेश ) दिया है । ( ताम् ) उस [वधू] को (अर्यमा ) श्रेष्ठों का मान करने वाला [राजा], (.भगः) ऐश्वर्यवान् [आचार्य], (उभा) दोनों (अश्विना) विद्या को प्राप्त [स्त्री पुरुषों के समाज ], और ( प्रजापतिः ) प्रजा- पालक [ परमेश्वर ] ( प्रजया) उत्तम सन्तान से ( वर्धयन्तु ) बढ़ावें ॥ १३ ॥ भावार्थ -जब परमात्मा की कृपा से उत्तम वधू उत्तम वर को प्राप्त हो, राजा की व्यवस्था, प्राचार्य की शिक्षा, विद्वान स्त्री पुरुषों की सत्संगति और परमात्मा की भक्ति से वधू वर दोनों गुणवान् श्रेष्ठ सन्तान उत्पन्न करें ॥ १३ ॥ (स्यानम् ) सुखदम् (पतिभ्यः) पतिकुलस्थेभ्यः ( सविता) सर्वप्रेरकः पर- मात्मा (तत्) पदार्थजातम् (कृणोतु ) करोतु ॥ १३-(शिवा) मङ्गलदायिनी ( नारी) नरस्य पत्नी ( इयम् ) गुणवती (अस्तम् ) गृहम् (श्रा अगन् ) प्रागच्छतु (इमम् ) दृश्यमानम् ( धाता) सर्वधारकः परमेश्वर (लोकम् ) समाजम् ( अस्यै ) वध्वै (दिदेश ) दत्तवान् (ताम् ) वधूम् ( अर्यमा ) श्रेष्ठानां मानयिता राजा (भाः) ऐश्वर्यवानाचार्यः . (अश्विना) प्राप्तविद्या स्त्रीपुरुषसमूहो ( प्रजापतिः ) प्रजापालको जगदीश्वरः (प्रजया) श्रेष्ठसन्तानेन (वर्धयन्तु ) उन्नयन्तु ॥ . ॥ . an - - [ (३,०४) अंथर्ववेदभाष्ये सू०२ [४] मात्मन्वत्युवरा नारीयमागुन् तस्या नरो वपत बीजमस्याम् । सा वः प्रजर्जा जनयद् वृक्षणाभ्यो बिभ्रती दुग्धमृषभस्य रेत:१५ श्रात्मन्-वती । उर्वरी । नारी । दुयस् । भा । अगन् । तस्याम् । नरः । वपत । बीजम् । अस्यास् ॥ सा। वः। प्र-जाम् । जनयत् । वक्षणाभ्यः । बिभ्रती । दुग्धम् । ऋषभस्य । रेत:१४ भाषार्थ-(आत्मन्वती ) आत्मा [ भीनरी बल ] वाली (उर्वरा ) उप: जाऊ धरती [ के समान ], (इयम्) यह (नारी) नारी [नर की पत्नी] (मा. अंगन् ).आयी है, ( नरः) हे नर ! [वर] (तस्याम् ) उस (अस्याम्) ऐसी. [गुणवतो वधू ] मैं (बीजम् ) बीज (वपत) यो । (सा) वह [नारी] (ऋष. भंस्य) वीर्यवान् पुरुष. के (दुग्धम् ) दूध समान (रेतः) वीर्य को (विभ्रती) धारण करती हुयी (वक्षणाभ्यः) अपने पेंट की नाड़ियों से (घः) तेरे लिये (प्रजाम् ) सन्तान (जनयत्) उत्पन करे ॥१४॥ भावार्य-जैसे बलवती उपजाऊ भूमि में विधि पूर्वक जोतकर उत्तम बीज बोने से उत्तम अन्न उत्पन्न होता है, वैसे ही पूर्ण ब्रह्मचारिणी बलवती स्त्री के साथ पूर्ण ब्रह्मचारी वीर्यवान् ऋतुगामी पुरुष का यथाविधि संयोग होने से उत्तम सन्तान उत्पन्न होते हैं ॥ १४ ॥ प्रति तिष्ठ विराडसि विष्णु रिवे ह सरस्वति । सिनीवालि प्रजायतां भगस्य सुभृतावसत् ॥ १५ ॥ ॥ , - १४-(आत्मन्वती ) आभ्यन्तरशक्तियुक्ता (उर्वरा ).शस्योत्पादनयोग्या भूमिर्यथा (नारी) नरस्य पत्नी (इयम) वधूः (आ'अगन् ) आगमत् (तस्याम् ). नार्याम् ( नरः ) सुपां, सुपो भवन्ति । वी० पा०७। १ । ३६ । एकवचनस्य बहु- वचनम् । हे नः । नायक (वपत) तिडां तिङो भवन्ति । वा० पा० ७।१।३६ । एकवचनस्य बहुवचनम् । वप.। प्रक्षिप (बीजम्.) (अस्याम् ) ईडश्यां गुणव- त्याम् (सा) (वः) पूर्ववद्बहुवचनम् । तुभ्यम् (प्रजाम् ) सन्तानम् (जनयत्) जनयेत् (वक्षणाभ्यः) वक्षःस्थलेभ्यः । उदरनाडीभ्यः (बिभ्रती) धारयन्ती (दुग्धम् ) क्षीरतुल्यम् (ऋषभस्य ) वीर्यवतः पुरुषस्य ( रेतः ) वीर्यम् ॥ . - - सू०२ [] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ ( ३,०८५) प्रति । तिष्ठ । विराट् । असि । विष्णु:-इव । इह । सुरु- स्वति ॥ सिनीवालि। प्रजायताम् । भगस्य । सु-मतौ। असत् ॥१५ भाषार्थ-(सरस्वति) हे सरस्वती [ श्रेष्ठ विज्ञान वाली ] (प्रति तिष्ठ) दृढ़ रह, (विष्णुः इव ) व्यापक सूर्य के समान तू (इह ) यहां पर [गृहा- श्रम में] (विराट् ) विविध प्रकार ऐश्वर्य चाली ( असि ) है। (सिनीवालि ) हे अन्न वाली पत्नी! [ तुझसे ] (प्रजायताम् ) उत्तम सन्तान उत्पन्न होवे और यह [ सन्ताम ] (भगस्य) भगवान् [ऐश्वर्यवान परमात्मा ] की (सुमतौ) सुमति में (असत्) रहे ॥ १५ ॥ भावार्थ-गर्भवती स्त्री विज्ञानपूर्वक समर्थ होकर घेदादि शास्त्रों के स्वाध्याय और बड़े बड़े पुरुषों के चरित्रों के विचार से श्रेष्ठ धर्मात्मा ईश्वर भाक सन्तान उत्पन्न करे।॥ १५॥ . उद्व ऊर्मिः शम्या हुन्त्यापो योक्वाणि मुञ्चत । मादु'ष्कृतौ व्यनसावुघ्न्यावशुनमारताम् ॥ १६ ॥ उत् । वः । ऊर्मिः । शम्याः । हुन्तु । श्रापः । यात्राणि । मुञ्चत ॥ मा । अदु:-कृती। वि-एनसौ । न्यौ। अर्थ नस् मा। भरताम् ॥ १६ ॥ भाषार्थ-[ हे स्त्री पुरुषो।) (वः) तुम्हारी ( ऊर्मिः) उत्साह रूपी लहर (उत् हन्तु) ऊंची चले, (आप) हे आप्त प्रजाओ! (शम्याः) कर्म १५-(प्रति तिष्ठ ) दृढं वर्तस्व ( विराट् ) विवधैश्वर्यवती (अलि) (विष्णुः) व्यापक सूर्यः (इव) यथा (इह ) अस्मिन् गृहाश्रमे ( सरस्वति) हे श्रेष्ठविज्ञानवति (सिनीवालि ) ०२॥ २६ । २। षिभू चन्धने-नक, डीप पल संवरणे, यद्वा बल जीवने-दाने च-अण, डीप् । सिनीवाली सिनमन्नं 'भवति सिनाति भूतानि बाल पर्व वृणोतेस्तस्मिन्नमवती-निरु० ११ । ३१ । हे भन्नवति पनि (प्रजायनाम्) उत्तमसन्तान उत्पद्यताम् ( भगस्य ) ऐश्वर्यवतः परमेश्वरस्य (सुमतौ) धार्मिकबुद्धौ ( असत्) भवेत् ॥ १६-( उत् ) उपरि (वः) युप्माकम् (ऊर्मिः) ऋ गती-मिप्रत्ययः । उत्साहपतरः (शस्थाः ) शमी फर्मनाम निध०२।१। शमी-यत् । शमीषु ॥

- (३,०८६ ) अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [ 881 कुशल होकर तुम (योक्त्राणि) निन्दित कर्मों को ( मुश्चत ) छोड़ो। (अदुष्कृतौ) दुष्ट आचरण न करने वाले, (व्येनसौ) पाप रहित, ( अध्न्यौ) नहीं मारने योग्य [दोनों स्त्री पुरुष] (अशुनम् ) दुःख (मा आ भरताम् ) कभी न पावें ॥१२॥ भावार्थ-सब कर्मकुशल स्त्री पुरुष निन्दित कर्मों को छोड़कर शुभ कर्मों में अपना उत्साह बढ़ावें, जिन के अनुकरण से यह दम्पती पापों से मुक्त रहकर धर्मात्मा होते हुये उत्तम सन्तानों के साथ सुख भोगें ॥१६॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-३। ३३ । १३ ॥ नधौरचक्षुरपतिघ्नी स्टोना शुग्मा सुशेवा सुयमा गृहेभ्यः । वीरसूर्दै वृकामा सं त्वयैधिषीमहि सुमनस्यमाना॥ १७ ॥ 'अघोर-चक्षुः। अपति-नी। स्याना । शुग्मा। सु-सेवा । सु-यमा । गृहेभ्यः ॥ वीर-सूः । दे वृ-कोमा । सम् । त्वया । एधिषीमहि । सु-मनस्याना ॥ १७ ॥ भाषार्थ-[हे वधू!]तू (गृहेभ्यः) घर वालों के लिये (अघोरचक्षुः) प्रिय इष्टि वाली, (अपतिघ्नी) पति को न संताने वाली, ( स्याना) सुखदायिनी (शग्मा) कार्यकुशला, ( सुशेवा ) सुन्दर सेवा योग्य, (सुर्यमा) अच्छे नियमों वाली, (वीरसूः ) वीरों की उत्पन्न करने वाली, (देवृकामा ) देवरों [ पति के छोटे बड़े भाइयों] से प्रीति रखने वाली और (सुमनस्यमाना) - कर्मसु कुशलाः ( हन्तु) गच्छतु (श्रापः ) हे आप्तप्रजाः (योक्त्राणि ) युज, निन्दायाम्-ट्रन्प्रत्ययः, नित्स्वरः । निन्दितकर्माणि (मुञ्चत.) त्यजत (मा) निषेधे (अदुष्कृती) अदुष्टकर्माणौ । व्येनसौ) विगतपापी (अन्यौ) हन्तुमनी स्त्रीपुरुषौ (अशुनम् ) शुन गतौ-क। शुनं सुखनाम-निघ० ३. ६ । मुखरहितं दुःखम् (आ) समन्तात् (अरताम् ) ऋगतौ-लुङ । प्रामुताम् ॥ १७-(अधोरचक्षः) अभयङ्करनेत्री ( अपतिनी ) पत्युरहिंसिनी ( स्याना ) सुखप्रदा ('शग्मा) युजिरुचितिजा कुश्च । उ०१ । १४६ । शक्ल शक्ती-मा, कस्य ग, अर्शनाद्यच, टाप । शक्म शम्भ कर्म नाम–निघ० १।२। कर्मकुशला (सुशेवा) मुसवनीया (सुथमा) मुनियमवती (गृहेभ्यः) गृहपुरुषेभ्यः सू०.२ [४८४] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ ( ३,०८७) प्रसन्न चित्त वाली [रह ], ( वया) तेरे साथ ( सम् एधिषीमहि ).हम मिल कर.बढ़ते रहे ॥ १७॥ भावार्थ-गृहपनी कर्मकुशल होकर शुद्ध अन्तःकरण से सदा सब का हित करें, जिस से सब घर वृद्धि करता जावे ॥ १७ ॥ यह और आगे का मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं-१०।५।४४, और यह मन्त्र महर्षि दयानन्दं कृत संस्कारविधि विवाहप्रकरण में वधू वर के या कुण्ड की प्रदक्षिणा करने में और फिर वर के घर पहुंचकर उनके आज्याहुति देने में व्याख्यात है। मदेवघ्न्यतिनीहैधि शिवा पुशुभ्यः सुयमा सुवचीः । मजा- वती वीरसूर्दे वृकामा स्योनेमग्निं गार्हपत्यं सपर्य ॥ १८ ॥ प्रदेव-नी। अर्पति-घ्नी । इह । एधि । शिवा । पशु-भ्यः । सु-या। सु-वीः॥ प्रजा-वती । वीर-भूः। दे वृ-कामा। स्योना। इमम् । अग्निम् । गाह-पत्यम् । सुपर्य ॥ १८ ॥ भाषार्य-[हे वधू !] (इह ) यहां [गृहाश्रम में ] (अपविघ्नी )पति को न सताने वाली, (अदेवघ्नी) देवरों को न कष्ट देने वाली, (शिवा) मङ्गत करने वाली, (पशुभ्यः) पशुओं के लिये ( सुयमा) सुन्दर. नियमो पाली (सुवर्चाः) बड़े तेज वाली (पधि ) हो । (प्रजावती ) श्रेष्ठ प्रजाओं [ सेवक आदि ] रखने वाली, (वीरसूः) वीरों की उत्पन्न करने वाली, (देवकामा) देवरों से. प्रीति करने वाली, (स्याना ) सुख युक्त तू (गार्हपत्यम् ) रहस्थ सम्बन्धी ( इमम् ) इस ( अग्निम् ) अग्नि की ('सपर्य) सेवन कर ।। १ ।। (वीरसूः) वीराणां प्रसवित्री ( देवृकामा ) देवृषु पतिभ्रातृषु प्रीतियुका (सम्) सम्यक् ( पधिषीमहि ) वर्धिषीमहि (सुमनस्यमाना) प्रसन्नचित्ता ।। १८-(अदेवघ्नी ) देवृणामहिंसित्री (अपतिनी ).(इइ) मस्मिन् गृहा- श्रमे (एधि ) भव (शिवा) हितकरी ( पशुभ्यः ), गवादिभ्यः (सुयमा) शोभन- नियमयुक्ता (सुवर्चाः ) बहुतेजाः (प्रजावती) श्रेष्ठसेवकादिमिः युक्ता ( देव. कामा)म० १७ (स्योना) (इमम् ) प्रसिद्धम् (अग्निम् ) भौतिकमग्निम् (गाईपत्यम् गृहपतिसम्बन्धिनम् । सपर्य) सपर्यतिः परिचरणकर्मा-निघः ३। ५ । सेवख ॥ . .

: - (Eo.c) . अथर्ववेदभाष्य सू०२ [४८४] भावार्थ-गृहिणी को चाहिये कि अपने पति और सब कुटुम्बियों और पशुओं को प्रसन्न रखकर उत्तम सन्तान उत्पन्न करे और गृहकार्य की सिद्धि के लिये शिल्पकर्म, हवनकर्म और पाकक्रिया आदि मे.अग्निं का यथावत् प्रयोग करती रहे ॥१॥ उत्तिष्ठतः किमिच्छन्तीदमाग अहं त्वेडे अभिभूः स्वाद् गृहात् । शुन्यै षी नि ते याजगन्धोत्तिष्ठागते प्रपंत मेह स्थाः ॥१८॥ उत् । तिष्ठ । दुतः। किम् । इच्छन्ती । इदम् । मा । अगाः। अहम् । त्वा । ई डे । अभि-भूः । स्वात् । गृहात् ॥ शून्य- सुषी। निः-ऋते। या। श्रा-जगन्ध । 'उत् । तिष्ठ । अराते। में। पुत। मा। इह । र स्थाः ॥१८॥ भाषार्थ-(निऋते) हे अलक्ष्मी ! [ दरिद्रता प्रावि.] (इतः) यहां से [सुप्रवन्धयुक्त घर से ] (उत् तिष्ठ) उठ, (किम् ) क्या [बुरा] (इच्छन्ती) जाहती हुयी (इदम् ) इस [घर ] में (श्रा अंगः) तू पायी है, ( अभिभूः) विजयी (अहम् ) मैं (त्वा ).तुझे ( खात् 'गृहात् ) अपने घर से (ईडे-ईरे ) निकालता हूं। (शून्यैषी ) शून्य [ निर्जनपन ] चाहने वाली (या) जो तू(प्राज- गन्ध) आयी हैं, (अराते ) हे कंजूसिन् ('उत् तिष्ठ) उठ, (प्रपत) चलती हो, रह) यहाँ (मारंस्थाः ) मत ठहर ॥ १६ ॥ १९-(उत्तिष्ठ) दूरे गच्छ ( इतः) अस्मात् सुप्रवन्धयुक्तगृहात् (किम् ). अहितम् ( इच्छंन्ती) (इदम् ) गृहम् ( अगाः) आगतवती ('अहम् ) पुरुषार्थी गृहस्था ( त्वा ) त्वाम् (ईडे ) रस्य डः । ईरे । प्रेरयामि (अभिभूः) अभि- भविता विजयी (स्वात्) (गृहात्) (शुन्यैषी ) शूनायै प्राणिहिंसायै हितम्, शूना यत् + इष इच्छायाम्-अच, ङीप् । निर्जनत्वमिच्छन्ती (निऋते ) अ० १-१३१.२ । हे. कृच्छापत्ते-निरु० २१७ । हे अलक्ष्मि (या) या त्वम् (भाजगन्धः) थस्य धः। श्राजगन्थ । प्रागतवती . ( उत्तिष्ठ) (अराते) हैं भदानशीले (प्रपत) बहिर्गच्छ (इह) अस्मिन् गृहे (मारंस्था) नैवोपरम ॥

सू०२ [४८४] चतुर्दशं कार डम् ॥ १४ ॥ (३,०८६) भाषार्थ-जिस घर में स्त्री पुरुष विद्वान् चतुर कार्यकुशल होते हैं,वहां पर दरिद्रता, कंजूमी आदि दुर्विन नहीं रहते, वह घर धन धान्य से भरा पूरा सदा मङ्गलमय रहता है ॥ १६ ॥ . . . युदा गाई पत्युमसपर्यंत पूर्वमुग्मिं वरियम् । प्रधा सरस्वत्यै नारि पितृभ्यश्च नमस्कुरु ॥ २० ॥ (८) युदा । गाई-पत्यम् । असपर्यंत । पूर्वम् । अग्रिम् । वधूः । इयम् ॥नधासरस्वत्यै । नारि। पितृ-भ्यः च । नमः। कुरु । २०(८ भाषार्थ-(यदा) जव (इयम् वधू) इस घधू ने (गार्हपत्यम् ) गृहस्थ सम्बन्धी (अग्निम् ) अग्नि को (पूर्वम् ) पहिले से (असपर्यत् ) सेवन किया है । (अध ) इस लिये ( नारि ) हे नारी ! (सरखत्यै) सरस्वती [विज्ञान के भण्डार परमेश्वर ] को (च) और (पितृभ्यः) पितरों [ पिता समान मान्य पुरुषों को (नमः) नमस्कार (कुरु ) कर ॥ २० ॥ भावार्थ-जिस परमेश्वर की और जिन महान् पुरुषों की कृपा से इस वधू ने हवन, शिल्प, अन्न, ओपधि आदि में अग्नि की विद्या को यथावत् जाना है, उस परमेश्वर और उन,बड़े लोगों को वह कुलवधू सदा धन्यवाद देती रहे ॥ २०॥ शर्म व तदा रास्यै नायी उपस्तरे। सिनीवालि प्रजायतां भर्गस्य सुमतावसत् ॥ २१ ॥ शर्म । वर्म । सतत् । था। हर । अस्यै । नाय । उप-स्तरै । सिनीवालि । प्र । जायताम् । भगस्य । सु-मतौ । असत् ॥२१॥ भाषार्थ:-हे विद्वान् ! ] ( एतत् ) यह [ गृहकार्यरूप] (शर्म) A -- -. - २०-(यदा ) यस्मिन् काले (गार्हपत्यम् ) गृहपतिसंबन्धिनम् (अस. पर्यत् ) असपर्यत् । सेवितवती (पूर्वम् ) अग्रे (अग्निम् ) अग्निविद्याम् (वधू) (इयम् ) (अध) अथ (सरस्वत्यै ) सरो विज्ञानं विद्यते यस्यां चितौ सा सर खती, तस्यै । सर्वविज्ञानवते परमेश्वराय (नारि) हे नरस्य पत्नि (पितृभ्यः ) पितृतुल्यमान्येभ्यः (च ) ( नमः) नमस्कारम् (कुरु ) ॥ २१-(शर्म) सुखप्रदम (वर्म) कवचम् (एतत् ) (आहर) अनिय - (३,१०० ) प्रथर्ववेदभाव सू०२ [४] सुखदायक (वर्म) कवच ('अस्यै नाय ) इस नारी को (उपस्तरे ) प्रोदने के लिये (आ हर) लो। (सिनीवालि.) हे अन्न: वाली पत्नी! [ तुझ से] (प्र जायताम् ) उत्तम सन्तान उत्पन्न होवे, और वह [ सन्तानः] (भगस्य) भगवान् [ऐश्वर्यवान् परमात्मा की (सुमतौ ) सुमति में (असत्) रहे:२१ भावार्थ:-पति श्रादि सब-वधू को गृह कार्य में सदा सहाय देवें, जैसे योद्धा को कवच रणक्षेत्र में सहाय देता है, और सब पुरुष उस वधू के वीर ईश्वरभक्त संन्तान से सुख प्राप्त करें ॥ २१॥ इस मन्त्र का उत्तरार्द्ध ऊपर मन्त्र १५ में प्राचुकी है। यं बल्बज न्यस्यथ चर्म चोपस्तृणीयनं । तदा रोहतु सुमज़ा या कन्या विन्दते पतिम् ॥ २२ ॥ यम् । बल्बजम् । नि-अस्यथ । चमै । च । उप-स्तुणीयन । तत् । प्रा। रोह तु । सु-प्रजाः । या। कन्यो । विन्दते। पतिम् २२ if; . भाषार्थ-[ हे विद्वानो! ( यम् ) जिसः (बल्यम् ) बल्वज [तृण विशेष के आसन ] को (न्यस्यथ ) तुम विछाते हो (च) और (धर्म ) मृग... सिंहमादि का चर्म, उस पर'] ( उपस्तृणीथन ) तुम फैलाते हो । (सुप्रजाः) सुन्दर जन्म वाली (कन्या) वह कन्या [ कमनीया वधू] (तत्) उस पर (मा रोहतु) ऊंची बैठे, (या) जो (पतिम् ) पति को (विन्दते) पाती है ॥ २२ ॥ ॥ 1 (अस्यै ) (ना.) ( उपस्तरे ) प्रवचने च । पा० ३।४,1.१५ । स्तृम् स्तृश् माच्छादने एश् प्रत्ययो बाहुलकात् तुमर्थे । उपस्त्रे। उपस्तर्तुम् । आच्छाद: यितुम् । अन्य व्याख्यातम्-म० १५ ॥ २२-(यम) (बल्बजम् ) अशुषुषिलटि० । उ० १ । १५१ । वल संवरणे घेटने--कन् +जन-ड। बलते भुवं वेष्टयतीति बल्बः पर्वतस्तत्र जायते । तृण- विशेषासनम् । मुअभेदम्-यथा मनु० २।४३ (न्यस्यथ ) निक्षिपथ (चर्म ) सिंहमृगादिचर्म (च.) ( उपस्तृणोथन) भाच्छादयथ. (तत्) श्रासनम् (आ रोहतु) प्रातिष्ठतु (सुप्रजाः ) जनी प्रादुर्भावे-विद । सुजन्मा (या) (कन्या) कमनीया वधू (विन्दते ) लभते (पतिम् ) भर्तारम् ॥ .. + . . तत्रापविश्य ०२ [४८४ ] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (६,१०१ भावार्थ-घर के विद्वान् लोग योग्य आसन आदि से पतिव्रता कुलवधू का आदर सत्कार करते रहे ॥ २२ ॥ (बल्बज) एक तृण विशेष मूज वा कुश का भेद है जिसमन मिलने पर मेखला बनाने को मनु० २। ४३ में लिखा है ॥ उप स्तृणीहि बल्बजमधि धर्मणि रोहित सुमजा हुममनिं संपर्यतु ॥ २३ उप । स्तृणीहि । बल्बजम् । अधि । चर्मणि । साहितही तय । उप-विश्य । गु-प्रजाः । इमम् । अग्निम् । सपर्य तु ॥ २३ ॥ भाषार्थ-(रोहिते) रोहित [हरिण विशेष ] के (चर्मणि अधि)... चर्म पर ( बल्बजम् ) बल्बज [तृण विशेष का श्रामन ] ( उप स्तृणीहि.) तू फैला। (तत्र ) उस पर (सुप्रजाः) सुन्दर जन्म वाली वधू (उपविश्य ) बैठकर ( इमम् ) इस (अग्निम् ) अग्नि [व्यापक परमेश्वर वा भौतिक अग्नि] की (सपर्यतु । सेवा करे ॥ २३ ॥ भावार्थ-विद्वानों के दिये श्रासन पर बैठकर कुलवधू परमेश्वर की उपासना और यज्ञ आदि में अग्नि का प्रयोग करे ॥ २३ ॥ प्रारोह चर्मोप सौदामिमे ष दे वो हन्ति रक्षासि सवी मजा जनय पत्ये अस्मै मुज्यैष्ठ्यो भवत् पुत्रस्त एषः ॥२४॥ मारोह । चमै ! उप। सीद। अग्निम् । एषः । देषा। हुन्ति । रक्षासि । सवा ॥ इह । -जाम् । जनय । पत्यै । अस्मै । भु-ज्य ष्ठ्यः । भवत् । पुत्रः। ते । एषः ॥ २४ ॥ . .. - ~ २३--( उप स्तृणीहि ) आच्छादय (बल्वजम् ) म० २२ । तृणविशेषा- सनम् ( अधि ) उपरि (चर्मणि) म० २२ (रोहिते ) रोहित-अर्शमाधी- मृगविशेषसम्बन्धिनि । गोकर्णपृषतैणयरोहिताश्चमरो मृगाः । भमर० १५ । १०. (तत्र),पासने-( उपविश्य ) ( सुप्रजाः) सुजन्मा वधू (इमम् ) प्रसिद्धम् (भग्निमा व्यापक परमेश्वरं भौतिकाग्निं वा ( सपर्यतु) परिचरतु ।

(३,९०२) अथर्ववेदभाष्ये सू० २ [४८४ : भाषार्य-[हे वधू !j (वर्म) चर्म [जुग सिंह श्रादि के चर्म ] पर (प्रा रोह) ऊंचो वैड, । अन्निम् ) अनि व्यापक परमानावा मोनिक अग्नि ] की , उप तोइ) लेश कर. ( एषः देवः ) यह देवता (सर्वाः) सब (रक्षांति) राक्षसों विघ्नों को ( इन्नि) नाश करता है। (इड् । यहाँ । गृहाश्रम में ] (भस्मै पत्ये । इस पति के लिये (प्रजाम् ) लन्तान (जनय) उत्पन्न कर. (एषः) यह (ते पुत्रः) तेरा पुत्र (बुध्ययः ) बड़े ज्येष्ठपन वाला भायु में वृद्ध और पद में श्रेष्ठ] (भवत् ) होवे ॥ २४ ॥ भावार्य वधू सावधान और प्रसन्न चिन्न होकर परमेश्वर की उया सना और हवन प्रादि क्रिया करे और विद्वान् लोग चिरजीवी पुरुषार्थी सन्तान उत्पन्न करने के लिये वधू को दिन शिक्षा और आशीर्वाद देव ॥ २४ ॥ वि तिष्ठन्तां मातुरस्मा उपस्थानानारूपा:पशवो जार्यमानाः। सुमङ्गल्युपं सौदे ममनिं संपत्नी प्रति भूषे ह दे वान् ॥ २५ ॥ वि। तिष्ठन्ताम् । भातुः । अस्याः । उप-स्यात् । नाना-रूपाः। पशवः । जाय॑माना: ॥ सु-मङ्गली। उप । सौद । मम् अग्निम् । सम्-पत्नी । प्रति । भष ! इह । देवान् ॥ २५ ॥ भाषार्थ-(अस्याः मातुः) इल माता की (उपस्थात् ) गोद से नानारूपाः ) नाना स्वभाव वाले. (जायमानाः) प्रसिद्ध होते हुये । पशवः ) रष्टिवाले विद्वान् लोग (वि) विविध प्रकार (निष्ठन्ताम् ) उपस्थित हो। (सुमहती ) बड़ी मङ्गल वाली तू (इमम् ) इस अग्निम् ) अग्नि [व्यापक २४-(भारोह) आतिष्ठ (चर्म) म० २२ (उप नीद) उपतिष्ठ (अग्निम्) म्यापकं परमात्मानं भौतिकाग्निं वा (एषः) (देवः ) ( हन्ति ).नाशयति (रक्षांसि ) विघ्नान् । सर्ग:) सर्वाणि ( इह ) गृहाश्रमे (प्रजाम् ) सन्तानम् (जनय ) उत्पादय (पत्ये ) स्वामिने (भस्मैः) (तुज्यैष्ठ्यः) ज्येष्ठ-भावे यश् । मायुषा सुवृद्धः पदेन सुश्रेष्ठो वा ( भवत् ) भक्त् (पुत्रः) (ते) तव ( एषः) २५-(वि) विविधम् ( तिष्ठन्ताम् ) वर्तन्ताम् (मातुः ) जनन्याः (अस्याः) (उपस्थात् ) क्रोडात् (नानारूपाः ) बहुस्वभावाः (पशवः ) बहु-, दर्शिनो देवा विद्वांसः (जायमानाः) प्रादुर्भवन्तः (सुमङ्गलो ) बहुमङ्गलवत्ती भू०२ [ ४८४ ] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (६,९०६) 'परमेश्वर वा भौतिक अग्नि ] की (उप सीद) सेवा कर, और ( संपती) प्रति सहित तू ( इंह ) यहां [गृहाश्रम में ] ( देवान् प्रति ) विद्वानों के लिये (भूष) शोभायमान हो ॥ २५ ॥ ''भावार्थ-विद्वान् लोग उपायं पूर्वक आशीर्वाद दे कि उस वधू की पूरी ध्यानक्रिया के कारण अनेक दूरदर्शी वीर कीर्तिमान् सन्तान उत्पन्न होवे,. भौर वह सौभाग्यवती विद्वानों का मान करके शोभा प्राप्त करे ॥ २५ ॥ सुमङ्गली मुतरणी गृहाणी सुशेवा पत्ये श्वशुराय शंभूः । म्योना श्वश्र्वै प्र गृहान् विशे मान् ॥ २६ ॥ सु-मङ्गलो । म-तरणी । गृहाणाम् । सु-शेवो । पत्यै । श्वशु'- राय । शस्-भूः॥ स्योना। श्वश्र्वै । म। गृहान् । विश ।हुमान् २६ भाषार्थ-[ हे वधू ! ] (सुमङ्गली) बड़ी मङ्गल वाली, (गृहाणाम् ) घरों [घर वालो] फी (प्रतरणी ) बढ़ाने वाली, ( पत्ये ) पति के लिये-(सुशेवा) घड़ी सुख देने वालो, (श्वशुराय ) ससुर के लिये (शंभूः) शान्ति देने वाली और ( श्वश्व ) सासु के लिये (स्योना) आनन्द देने वाली तू ( इमान ग्रहान.) इन धरों[अर्थात् गृहकार्यो ] में (प्रविश) प्रवेश कर ॥ २६ ॥ भावार्थ-वधू को योग्य है कि सब प्रकार चतुर होकर घर वालों की उन्नति करती हुई पति, सासु, ससुर आदि को प्रसन्न कर घर के कामों में प्रवेश करे ॥ २६ ॥ मन्त्र २६ और २७ महर्षि दयानन्दकृत संस्कारविधि गृहाभम प्रकरण में व्यास्यात् हैं। उप सीद) परिचर ( इमम् ) (अग्निम् ) व्यापक परमात्मानं भौतिकाग्नि वा (संपत्ती ).पतिसहिता ( प्रति ) (भूष) शोभस्व (इह) पृहाश्रमे (देषान्) विदुषः पुरुषान् ॥ २६-(सुमङ्गली) बहुमङ्गलवती ( प्रतरणी) वर्धयित्री (गृहाणाम् ) गृह 'पुरुषाणाम् (सुशवा । बसु खवात्री ( पत्ये ) ( श्वशुराय ) पतिजनकाय (शंभूः ) शान्तिप्रदा (स्याना) सुखप्रदा (घवे ) पतिजनन्यै ( गृहान ) एहकार्याणि (प्रविश) (इमान ) ॥ - -- . ܙܟ (.1,१०४) अथर्ववेदभाष्ये सू०.२ [ ४८ स्योना भव श्वशुरेभ्यः स्योना पत्य गृहेभ्यः । स्योनास्यै सर्वस्यै विशे स्योना पुष्टायैषां भव ॥ २७ ॥ स्योना । भव श्वशुं रेभ्यः । स्योना । पत्यै ।गृहेभ्यः। स्योना। भ्रस्य । सर्वस्य । विशे । स्योना । पुष्टाय । एषाम् । भव ॥२७॥ भाषार्थ-[हे वधू !] तू (श्वशुरेभ्यः) ससुर आदि के लिये (स्योना) सुख देने वाली, ( पत्ये) पति के लिये और (गृहेभ्यः) घर वालों के लिये {स्योना) सुख देनेवाली (भव ) हो । ( अस्यै ) इस (सर्वस्यै विशे) सब अंजा के लिये (स्योना) सुख देने वाली और (एषाम् ) इनके (पुष्टाय ) पोपण के. लिये (स्योना) सुख देने वाली (भव ) हो ॥ २७ ॥ भावार्थ-उत्तम वधू पालन पोषण करके लव कुटुम्थियों को प्रसन्न रक्ने ॥ २७॥ 'मन्ध २६ देखो। सुमङ्गलीरियं बुरिमा समेत पश्यत । सौभाग्यमुस्यै दुत्त्वा दौभाग्यैर्दि परेतन ॥ २८ ॥ सु-मङ्गलीः । इयम् । वधूः । दुमाम् । सुम्-एत । पश्यत । सौभाग्यम् भूस्यै । दुत्वा । दौः-भाग्यैः । वि-परतन ॥ २८ ॥ भाषार्थ -[ हे विद्वानो ! ] ( इयम् वधूः ) यह वधू (सुमङ्गलीः) बड़े मङ्गल वाली है, (समेत ) मिलकर श्राओ और ( इमाम् ) इसे (पश्यत ) देखो। २७-(स्योना) सुखप्रदा (भव ) (श्वशुरेभ्यः) श्वशुरादिभ्यः (स्योना) (पत्ये ) स्वामिने (गृहेभ्यः) गृहपुरुषेश्यः (स्योना) (अस्यै ) (सर्वत्यै - (विशे) प्रजायै (पुष्टाय ) पोपणाय (एषाम् ) पूर्वोक्तानाम् (भव) । २८-(सुमङ्गलीः ) छान्दसो विसर्गः । बहुमझलवती (इयम् ) दर्शनीया (बधूः) (इमाम् ) (समेत ) समेत्य आगच्छत( पश्यत अवलोकयत (सौभा- पम्) भगत्वम् । पतिप्रियत्वम् । ववैश्वर्यवावम् (स्य) ( वध्वे ) ( दत्त्वा) PA ::.

. याः । सू०.२ [४] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ ( ३१५) (अस्यै ) इस [वधू ] को (सौभाग्यम् ) सुभागपन [ पति की प्रीति ] (दत्त्वा) देकर ( दौर्भाग्यः ) दुर्भागपनों से [ इस को ] (विपरेतन ) पृथक रक्त्रो ॥२८॥ भावार्थ-सय विद्वान् लोग मिलकर आशीर्वाद देवें कि बंधू पति की प्राणप्रिया होकर सदा आनन्द से रहे और कभी कष्ट न उठावे ॥ २ ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१० १५ ॥३३, और महर्षि दयानन्द- फत संस्कारविधि विवाह प्रकरण में आशीर्वाद देने के लिये विवाह में पाये लोगों के बुलाने में बिनियुक्त है। यो दुर्हादा युवतयो याश्चे हजरतीरपि । चर्चा -१ स्यै सं दुत्ताधास्तै विपरैतन ॥ २६ ॥ दुः-हार्दः। युवतयः ।या:। च । दुह । जरतीः । अप्ति ॥ वर्चः । नु । अस्यै । सम् । दुत्त । अर्थ। अस्तम् । वि-परतन २८ भापाय-(याः ) जो तुम (युवतयः ) है युवा खियो । (च) और (याः) जो तुम (जरतीः) वृद्ध स्त्रियो। ( अपि) भी (दुर्दिः) दुष्ट हदय पाली ( ६ ) यहां पर हो । घे तुम ( अस्यै ) इस [वधू ] को (पर्चर) अपना तेज (नु) शीघ्र ( सम् दत्त) दे डालो, (अथ ) फिर (अस्तम् ) अपने अपने घर (विपरेतन ) चली जाओ ॥ २६ ॥ भावार्थ--जो दुष्ट स्त्रियां घर में आ जावें, वधू अपनी चतुरायी से उन्हें पैसा परास्त कर कि वे अपना तेज गंधाकर चली जावें और फिर कभी माघे ॥२६॥ इस मन्त्र का चौथा पाद ऋग्वेद १० । ८५ (-३३ में चौथा,पाद है। पर न्य महर्षि दयानन्दकृत संस्कारविधि गृहाश्रम प्रकरण में व्याख्यात है (दीर्भाग्यः , दुर्भगत्वैः। ऐश्वर्य राहित्यैः। पतिस्नेहशून्यकर्मभिः (विपरेतन ) अन्तर्गतण्यर्थः । विपरोगमयत । पृथक् कुरुत ताम् ॥ २8-(याः) नियः (दुर्दिः) अ०२।७1 हार्दम् भानुकूल्यं करोति हार्द यतीति, हार्दयते:-किपि एिलोपे रूपम्। दुष्टहृदयाः । रचित्ता (युव. तयः) तरुणखियः ( याः) (च) (इह.) गृहे ( जरती ) हे वृद्धस्त्रियः (भपि) (घर्चः ) स्वतंजः (नु ) शीघ्रम् (अस्य) वध्वै (सम् ) सम्यक् (दत्त) प्रयच्छत (मथ) अपि च ( अस्तम् ) स्वगृहम् (विपरेतन ) विपरां विविधं दूरे गलत।। उस - . (३/१०६) प्रर्वधेदभाष्ये - सू०३ ( ४८४ ] रुक्मप्रस्तरणं वह्यं विश्वा रूपाणि विभ्रतम् । आरोहत् सूर्या सावित्री बहुते सौभगाय कम् ॥ ३० ॥ (८) कुक्म-प्रस्तरणम् । वुहवस् । विश्वा । सुपाणि । बिभ्रतम् ॥ श्रा । रोहत् । सूर्या । सावित्री। बृहुते । सौभगाय । कम् ३०८ भाषार्थ-( रुक्मप्रस्तरणम् ) सुवर्ण के विछौने वाले, (विश्वा) सब (रूपाणि ) रूपो [उत्तम मध्यम-नीच आकार वा बैठको] को ( विनतम् ) धारण करने वाले ( वह्यम् ) [गृहाश्रम रूप ] गाड़ी पर ( सावित्रो ) सविता [.सर्व. जनक परमात्मा ] को अपना देवता मानने वाली (सूर्या ) प्रेरणा करने वाली [वा सूर्य की चमक के समान तेज वाली ] वधू (बृहते ) बड़े ( सौभगाय) सौभाग्य पति की प्रीति, बहुत ऐश्वर्य श्रादि सुख-] पाने के लिये ( कम् ) सुस ले (आ भरुहत्) चढ़ी है ॥ ३० ॥ भावार्थ-हे विद्वानो ! यह ब्रह्मवादिनी तेजस्विनी वधू गृहाभम में प्रविष्ट हुई है, हम ऐसा उपाय करें कि वह पतिप्रिया और ऐश्वर्यवती होकर सदा सुख भोगे ॥ ३०॥ मा रौह तल्प सुमनुस्यमाने ह प्र॒जां जनयु पत्य अस्मै । इन्द्राणीव,सुबुधाबुध्यमाना ज्योतिरमा उषःप्रति जागरासि३१ पा। रोह ! तल्पम् । सु-मनस्यमाना। इह । 'म जाम् । जनयु । पत्यै । अस्मै ॥ इन्द्राणी-इव । सु-बुधौ । बुध्यमाना। ज्योति:-श्रवाः । उषसः। प्रति। जागरासि ॥ ३१ ॥ . .. ३०-( रुक्मप्रस्तरणम्) स्तृञ् आच्छादने-ल्युट । सुवर्णच्छादनयुक्तम् (वयम् ). गृहाश्रमरूपं यानं रथम् (विश्वा) सर्वाणि ( रूपाणि ) भाकारान् (-बिभ्रतम्) शतृरूपम् । धारयन्तम् (आरोहत् ) प्रातिष्ठत् ('सूर्या ) प्रेरमित्री 'सूर्यदीप्तिवत्तेजस्विनी वा वधूः ( सावित्री) सविता सर्वोत्पादकः परमात्मा देवता यम्याः सा ( बृहते ) महतं ( सौभगाय) सुभगत्वाय । पतिप्रियत्वाय। यह श्वर्याय (कम् ) सुखेन ।

• . , । . ०२ [ ४८४ ] : चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,९०७). भाषार्थ:-हे वधु!]तू (सुमनस्यमाना) प्रसन्न चित्त होकर (तल्पम् ) पर्यक पर (श्रा रोह) चढ़, ओर (इह) यहाँ [गृहाअप में ] (:अस्मै पत्ये३), इस.पति के लिये (प्रजाम् ) सन्तान ( जनय) उत्पन्न कर । (इन्द्राणी इव): इन्द्राणी [बड़े ऐश्वर्यवान मनुष्य की पत्नोवा सूर्य की कान्ति] के समान, (सबुधा). सुन्दर शान पाली (बुध्यमाना ) सावधान तू (ज्योतिरमाः ) ज्योति को आगे रखने वाली ( उपसः प्रति ) प्रभात बेलाओं में ( जागरासि जागती रहे ॥३१॥६.. भावार्थ-वधू को योग्य है कि प्रसन्न चित्त होकर पति के साथ. पद पर विराजकर उत्तम सन्तान उत्पन्न करे और सावधान रहकर स्योदय से पहिले उठकर शारीरिक और आत्मिक उन्नति करे ॥३१॥ मन्त्र ३१ और ३२ महर्षि दयानन्दकृत संस्कारविधि ग्रहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात है। दे वा अग्रे न्यपद्यन्त पत्नीः समस्पृशन्त तन्वस्तनूभिः । .. , सूर्यवं नारि विश्वरूपा महित्वा प्रजावती पत्या सं भवे ह ३२ देवाः । अने। नि । अपद्यन्त । पत्नीः । सम् । अस्पृशन्त । सुन्नः। तनूभिः। सूर्या-इव । नारि । विश्व-रूपा । मुहि-त्वा । प्रजा-वती । पत्यो । सम् । भव । इह ॥ ३२ ॥ भाषार्थ-(देवाः ) विद्वान् लोग ( अने), पहिले (पत्नीः ) अपनी पतियों को ( नि ) निश्चय करके (अपयन्त) प्राप्त हुने हैं, और उन्होंने (तन्यः). शरीरों को (तनूभिः ) शरीरों से (सम् ) यथाविधि (अस्पृशन्त ) स्पर्श किया है। ३१,-(आ रोह ) श्रातिष्ठ (तल्पम् ) पर्यकम् । उच्चपदम् (सुमनस्य- माना ) प्रसन्नचित्ता सती (इह) गृहाश्रमे (प्रजाम् ) सन्तानम्..(अनय उत्पादय ( पत्ये ) (अस्मै ) (इन्द्राणी) इन्द्रस्य पत्नी । ऐश्वर्यवतः पुरुषस्य भार्या । सूर्यकारितः ( इव ) यथा (सुवुधा ) बहुशानवती (बुध्यमाना.). साव: :. धाना (ज्योतिरमाः) ज्योतिः प्रकाशोऽये यासां ताः (उषसः)-प्रभातवेला, (प्रतिः) अनुलक्ष्य (जागरासि ) जागृता भवेः ॥ ३२-( देवाः ) विद्वांसः ( अने) पूर्वकाले (नि) निश्चयेन (अपद्यन्त.) प्राप्तवन्तः:( पत्नीः) (सम् ) सम्यक् । यथाविधि ( अस्पृशन्त ) स्पृष्टवन्तः ।, (सन्वः) शराराणि ( तनूभिः ) शरोरैः ( सूर्या ) सूर्यकान्तिः (इव) यथा (नारि): - १ . .. . -- . (३,१०८) अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [ ४८ [वैसे ही ] ( नारि ) हे नारी! (इव) सूर्य की कान्ति के समान (महित्वा अपने महत्व से (विश्वरूपा ) समस्त सुन्दरता बालो. (प्रजावती) उत्सम सन्तान को प्राप्त होने हारीतू (पत्या) अपने पति से (इह ) यहां [गृहाश्रम में] (संभव ) मिल ॥ ३२ ॥ भावार्य-पूर्वज महात्माओं के समान पति पत्नी आपस में प्रीति से प्रयत्न करके उत्तम सन्तान उत्पन्न करें और गृहाश्रम के बीच सुन यदावें ॥३॥ मन्त्र ३१ की टिप्पणी देखो। उत्तिष्ठे तो विश्वावसौ नमसेडामहे त्या जामिमिच्छ पित पदन्यक्तां स ते भागो जनुषा तस्य विद्धि ॥ ३३ ॥ उत् । तिष्ठ । इतः । विश्ववसो इति विश्व-वसो । नमसा। ई डामहे । त्वा ॥ जामिम् । इच्छु । पितु-सदस् । नि-प्रक्ताम् । सः । ते । भागः । जनुषो । तस्य । विद्धि ॥ ३३ ॥ भाषार्च-(विश्वावसो हे समस्त धन वाले घर ! ( इतः । [भपने ]. इस स्थान से (उत् तिष्ठ ) उठ, (नमता) श्रादर के साथ (वा.) तुझ से (ईडामहे ) हम यह चाहते हैं । ( पितृपदम् ) पितृकुल में रहती हुयी, (न्यक्ताम् । नियम से तैल आदि लगाये हुये [विवाह संस्कार किये हुये] (जामिम् ) कुलवधू से (इच्छ) प्रीति कर. ( जनुया) जन्म [ मनुथ जन्म के कारण (ल) यह (ते) तेरा (भागः) सेवनीय पदार्थ है, ( तस्य इसका (विद्धि). शान कर ॥ ३३॥ - हे नरस्य पत्नि (विश्वरूपा । सर्वलोल्दयोपेता (महिन्या) महत्त्वेन (प्रजावती) प्रशस्तसन्तानयुक्ता (पत्या ) (सं भव ) संगच्छत्व (इइ) गृहाने । ३६-( उत्तिष्ठ ) उद्गच्छ (इतः) स्यानात् (विश्वावसो ) हे सर्व धनोपेत, वर (नमसा) सत्कारेण (ईडामहे ) यात्रामहे (जामिम् ) कुल. नियम् । अत्र मनुः३१५७ शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् (इच्छ) प्रीणीहि (पितृपदम् ) पितृकुलस्थिताम् (न्यताम् ) अजिघृसिभ्यः क्तः । उ० ३। । अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणादिषु-क्त । नियमेन कृताभ्यजनाम् । कृतविवा-ह संस्काराम् (सः) पूर्वोक्ता (ते तव (भागः ) संवनीयः पदार्थः- (जनुषा: मनुषजन्मना ( तस्य ) पूर्वोकस्य (विद्धि ) ज्ञानं कुरु ॥

सू०.२.४८४ चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,१०८) भावार्थ-पूर्व मन्त्र में घर के साथ मिलने के लिये वधू से कहा गया था, अव वर से कहा है कि अपनी विवाहित स्त्रो से) यथाशास्त्र मिलकर. सन्तान उत्पन्न करके मनुष्य जन्म सुफल करे ॥ ३३ ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१०। ८५ । २१, २२ ॥ अप्सरसः सधमाद मदन्ति हविर्धानमन्तरा सूर्य च । तास्ते जनि–मुभि ताः परहि नमस्ते गन्धर्व तुनो कृणोमि ॥ ३४ ॥ अप्सरसः। संध-मादम् । मन्ति मदन्ति । हुविः-धानम् । अन्तरा। सूर्यम् । च ॥ ताः। ते। जनित्रम् । अभि । ताः। परी।हि । नमः । ते । गन्धर्व -ऋतुनो । कृणोमि ॥ ३४ ॥ भाषार्थ-(अप्सरस') अप्सराये [ कामों में व्यापक स्त्रियां ] (इवि. निम् । ग्राह्य पदार्थो के आधार [वधू] (च) और (सूर्यम् अन्तरा) प्रेरणा करने वाले [घर के पास (सधमादम् ) परस्पर आनन्द ( मदन्ति ) मनाती हैं। [ हे वधू वा घर !] (ताः ) वे [ स्त्रियां ] ८ ते ) तेरे (जनित्रम् ) जन्म का कारण हैं, (ताः अभि ) उनके सामने होकर (परा) निकट ( इहि ) जा, (गन्धर्वर्तुना ) विद्या धारण करन वाले मनुष्य से [ यथार्थ समय के विचार से (ते) तेरे लिये ( नमः) श्रादर (कृणोमि ) मैं करता हूं ॥ ३४ ॥ भावार्थ-कुलस्त्रियां शान्तिकरण, स्वस्तिवाचन आदि गान से आनन्द मनाचे, सादर प्रेरणा किये हुये वधू वर उन को सविनय नमस्कार करें ॥ ३४ ॥ इस मन्त्र का पूर्वार्द्ध आचुका है अथर्व० ७ । १०६।३॥ के ऋतु . - " ३४-(अप्सरसः ) म08| अपासु कर्मसु व्यापनशीला स्त्रियः ( सध. मादम् ) परहारानन्दोत्सवम् ( मदन्ति ) हर्षयन्ति ( हविर्धानम् ) प्राद्यपदार्था- धारभूतां वधूम्:(अन्तरा) निकटे (सूर्यम् ) प्रेरकं वरम् (च) (ताः) स्त्रियः (ते) तव ( जनित्रम् ) जन्मकारणम् (अभि) अभीत्य (ताः ) ( परा) निकटे (इहि ) प्राप्नुहि ( नमः ) सत्कारम् ( ने ) तुभ्यम् ( गन्धर्वर्तुना) गन्धर्वस्य विद्याधारफस्य ऋतुना यथार्थकालविचारेण (कणोमि ) करोमि । ११ (३,११० ) . प्रयर्ववेदभाष्ये सू०२ [४] नौ गन्धर्वस्य नमसे नमो भानायु चक्षुषे च कृएमः । विश्वावसों ब्रह्मणा ते नमोभि जाया अप्सरमः परैहि ॥३५॥ नमः । गन्धर्वस्य । नमसे । नमः । भामाय । चक्षुषे । च । कृण्मः ॥ विश्ववतो. इति विश्व-वसो । ब्रह्मणा । ते । नमः। अंभि । जायाः । सरसः । परी । एहि ॥ ३५ ॥ भाषार्थ-(गन्धर्वस्य) विद्या धारण करने वाले पुरुष के ( नमसे ) श्री भोजन ] के लिये ( नमः ) [यह ] अन्न है, (च) और (भामाय) प्रकाश युक्त ( वन नेत्र अर्थान् इन्द्रियों के हित के लिये ( नमः ) अन्न (कुरामः) हम बनाते हैं। (विश्वावसो) हे समस्त धेन वाले वर ! (ते) तेरे लिये (ब्रह्मणा ) जल सहित (नमः) अंन्न है, जीया ) जन्म के कारणों, (अप्स- रसः अलि अप्लरानी[कामों में व्यापक स्त्रियों के सामने (परा इहि) . निकट जा॥३५॥. न -- भावार्य-सुन्दरं स्वच्छ रोचक सान पान से वधू वर को सन्तुष्ट करें और वे दोनों सव बड़े कार्य कुशल स्त्री पुरुषों का उपकार मान कर उनका सत्कार करें॥३५॥ रायाः वयं सुमनसः स्यामादितो गन्धर्वमावोवृताम । प्रमुन्त्स दे दः परमं सुधस्युमगन्म यत्र प्रतुिरन्तु आयु': ॥३६॥ राया । दयम् । स्थान । उत् । इतः । गन्धर्वम् । सु-मनसः ३५-(नमः ) अन्नम्-निघ०२ १७ (गन्धर्वस्य ) विद्याधारकपुरुषस्य (नमसे) अनाय । भोजनाय ( नमः) (अन्नम् ) (भामाय ) अर्तिस्तुमुहुः संभृतिषभायाः । उ० १ । १४० । भा दीप्तौ-मन् । दीप्यमानाय ( चक्षुषे) मेत्राय सर्वेन्द्रियायेत्यर्थः ( च ) ( एमः ) कुर्मः ( विश्वावसो) हे सर्वधनिन् वर(ब्रह्मणा) उदंकन सह-निघ० ११ १२ (ते) तुभ्यम् ( नमः) भन्नम् (अंभि) अभीत्य (जायाः ) उत्पत्तिकारणानि (अप्सरसः) म०।। कर्म व्यापनशीला खियः (परा ) निकटे (इहि) गच्छ ।

4 . भू०२ [४८४] चतुर्दशे.कापडंम् ॥ १४ ॥ ( ३,१११) मा। अवीवृताम ॥ अर्गन् । सः । देवः । परमस् । सध- स्थम् । अगन्म । यत्र । म-तिरन्ते । आयुः ॥ ३६ ॥ भाषार्थ-(राया) धन के साथ (वयम् ) हम (सुमनसः ) प्रसन्न चित्त (स्याम ) हो, ( इतः ) यहां से [अपने बोत्र से ] ( गन्धवम् ) विद्या- धारण करने वाल पुरुप को ( उत् श्रा अवीवृताम) हम सब प्रकार ऊंचा वर्तः मान करें। (सः देवः ) वह विद्वान् (परमम् ) सब से ऊंचे ( सधस्थम् ) सभा स्थान को ( अगन् ) प्राप्त हा, (गाम ) हम [ उस पद पर ] पहुंचं ( यत्र.) जहां [ लोग ] ( आयुः ) जीवन को ( प्रतिरन्ते ) अच्छे प्रकार पार करते हैं।॥३६॥ भावार्थ-सब विद्वान लोग मिलकर आशीर्वाद देवे कि वह, विद्वान पर अपने उत्तम गुणों से बड़ा धनी और ऊंचे पद वाला होकर महात्माओं के समान अपना उच्च जीवन बनावे ॥ ३६ ॥ इस मन्त्र का चौथा पाद ऋग्वेद में है-१।११३ । १६ तथा ८।४८ ॥ ११ ॥ सं पितरावृत्विये सृजेथां माता पिता च रेतसा भवाथः। मर्य इव योषामधिरोहयैनां मां क श्वाथामिह पुष्यतं रयिम् ॥ ३९ ॥ लम् । पितरौ। ऋत्विये इति । सृजे थाम् । गाता। पिताः। च । रेतसः । भषायः ॥ मयः-इव । योषाम् । अधि । रोहय । सनाम् । मु-जाम् । कृपयायास् । इह । पुष्यतम् । रयिस् ३७ भाषार्थ-(पितरौ) है [ होने वाले ] माता पिता ! ऋत्विये । ३६-(राया ) धनेन (वयम् ) ( सुमनसः ) प्रसन्नचेतसः ( स्याम ) (उत् ) उत्कर्पण ( इतः ) अम्मात् स्थानात् (गन्धर्वम् ) विद्याधारक पुरुषम् (मा.) समन्तात् (अवीवृताम् ) णिचि लुडि रूपम् । वर्तमानं कुर्याम ( अगन् ) प्राप्नोतु (सा) (देवः ) विद्वान् ( परमम् ) उत्कृष्टम् ( सधस्थम् ) सभास्थानम् (अगन्म ) वयं गच्छेम (यत्र ) यस्मिन् पदे (प्रतिरन्ते ).प्रकर्षण तरन्ति प यन्ति (मायुः) जीवनम् ॥ ३७-(पितरौ) भाविनी मातापितरौ (ऋत्मिये ) .अ०१२ - ३ । पार उत्पन्न N (३,१९२) अथर्ववेदभा सू०२ [. ऋतुकाल [गर्भाधान योग्य समय.] को प्राप्त दो वस्तु [ के समाना] (संसजेधाम) तुम दोनों मिलो, (च) और . (रेतलः) वीर्य से [वीर्य और रज के मेल से ] तुम दोनों (माता पिता ) माता पिता ( भवाधः ) होना । (मर्यः इव ) नर के समान [हे पति !] ( एनाम् ) इस (योपाम् ) अपनी पत्नी के ('अंधि रोहय.) ऊपर हो, और ( प्रजाम्) सन्तान को ( करवाथाम् ) तुम दोनों उत्पन्न फेरो, और (इह ) यहां [गृहाश्रम में ] ( रयिम् ) धनको (पुप्यतम् ) बढ़ाश्रो ॥३७॥ भावार्थ-जैसे वृक्ष आदि के बीज के मिले हुये दो टुकड़े वर्षा ऋतु में पृथिवी के संयोग से अङ्कर उत्पन्न करते हैं, वैसे ही युवा पति पत्नी गर्भा- धान विधि के अनुसार रतिक्रिया परके वीर्य और रज के संयोग से सन्तान करें और धनी होकर सुखी हो ॥ ३७॥ मन्त्र ३७ और ३८ महर्षि दयानन्दकृत संस्कारविधि गृहाधम प्रकरण में व्याख्यात हैं। तां पूष छिवतमामेरयस्व यस्यां बीज मनुष्या ३ वन्ति । या न ऊरू उती विशयोति यस्यांमुशन्तः महरम शेपः ३८ ताम् । पूषन् । शिव-तमास् । ना। ई रयस्व । यस्याम् । बीजम् । मनुष्याः । वन्ति ॥ था । नः । ररू इति । उतिौं । वि-श्रोति । यस्याम् । उशन्तः । म-हरम । शेपः ॥ ३८ ॥ भाषार्थ ( पूषन् ) हे पोषक पति । (ताम् ) उस (शिवतमाम् ) अतिशय कल्याण करने हारी पत्नी को (श्रा ईरयस्व ) प्रेरणा कर ( यस्याम् ) २६ । छन्दसि घस । पा०५।१ । १०६ । ऋतु-घस । द्विषचनान्तप्रयोगोऽयं नसके। ऋतु गर्भाधानयोग्यशालं प्राप्ते द्वे द्रव्ये यथा ('संस्जेथाम् ) युयाँ संयुक्तौ भवतम् (माता ).(पिता) (च) (रेतसः ) वीर्यात् । वीर्घरजः संयो- गात् ( भवाथः ) युवां भवतम् (मर्यः इवं) नरो यथा (योषाम् ) सेवनीयां पत्नीम् (अधि.रोहयः) उपरि गच्छ ( ए नाम् ) गुणवतीम् (प्रजाम् ) सन्तानम् (कराचार्थीम ) जनयतम ह) हाश्रमे (पुष्यतम् )वयतम् (रयिम् धनमें ॥ ३८-(ताम ) युवतीम् (पृषन ) हे पोषक पते (शिवतमाम् ) अतिशय- मानन्दकरीम् (परयर) औरय (यस्यांमपत्न्याम् (बीजम् )वीर्यम् मनुष्याः) सू० २ [ ४८४ ] चतुर्दशं कोएडस् ॥ १४ ॥ (३,९१३ ) जिस [पती ] में (मनुष्याः) मनुष्यलोग [मैं पति] (बीजम् ) वीर्य (वपन्ति)बोवें। (या) जो (ना) हमारी ( उशती ) कामना करना हुयी (ऊ) दोनों जंघाओं को (विश्रयाति ).फैलावे, और ( यस्याम् ) जिस में ( उशन्तः) [ उसकी ] फामना करते हुये हम लोग (शेपः) उपस्थेन्द्रिय का (प्रहरेम) प्रहरण करें॥ ३८ ॥ भावार्थ-मन्त्र में बहुवचन विद्वत्ता, बलवत्ता और प्रीति के सूचनार्थ है। युवा पति पत्नी दोनों परस्पर कामना करते हुये प्रसन्नवदन होकर गर्भा- धान के लिये अपने अहो को यथाविधि ठीक करें ॥ ३८ ॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है १०। ५ । ३७ । ऊपर मन्त्र ३७ भी देखो ॥ - मा रोहोरुमुप॑ धत्स्व हस्तं परि ध्वजस्व जायां सुमनस्य- मानः । मुजां के गवायामिह मोदमानौ दीर्घ वामायु': सविता कृणोतु ॥ ३८॥ भा। रोहु । कुरुम् । उप । धुत्स्व । हस्तम्। परि । स्व- जस्व । जायास् । सु-मनस्यमानः ॥ मु-जाम् । कृण्वाथाम् । इह । मोदमानौ । दीर्घम् । वास् । मायु: । सविता। कृणोतु ३८ भाषार्थ-[हे पति !] लू (अरुम ) जंघा के (श्रा रोह ) ऊपर श्रा, (इस्तम् ) हाथ का ( उप धास्व) लहारा दे, और ( सुमनस्यमान:) प्रसन्न चित्त होकर तू ( जायाम् ) पती को (परि ध्वजस्व) चिपटा ले । [ हे स्त्री पुरुषो!] (इह ) यहां [ गर्भाधान क्रिया में ] (मोदमानौ ) हर्ष मनाते हुये तुम दोनों (प्रजाम् ) सन्तान को (कृण्वाथाम् ) उत्पन्न करो, ( सविता) सब नराः (वपन्ति ) निक्षिपन्ति (या) पत्नी (नः अस्मान ( अरू ) जंघाप्रदेशौ (उशती) कामयमाना (विश्रयाति) विविधं श्रयेत् । विस्तारयेत् ( यस्याम् ) ( उशन्तः ) तां कामयमानाः (प्रहरेम ) प्रहृतं कुर्याम ( शेपः) उपस्थेन्द्रियम् ॥ ३६-(आ रोह) आतिष्ठ (ऊरुम् ) जंघाम् ( उप धत्स्व) उपेत्य व्याप्य धारय ( हरतम ) (परिजरव ) बालिन (जायाम् ) पत्नीम् (सुमन- स्यमानः.) प्रसन्नचित्तः (प्रजाम् ) सातानम् (कृण्वाथाम् ) जनयतम् (इहे) + (३,११४ ) अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [४८४ का उत्पन्न करने वाला [परमेश्वर] (वाम् ) तुम दोनों का (आयुः ) भायु (दीर्घम् ) दीर्घ (कृणोतु) करे ॥ ३९ ॥ ; भावार्थ-पति पत्नी दोनों प्रसन्न वदन होकर मुख के सामने मुख, नासिका के सामने नासिका आदि अगों को यथा योग्य सूधा रक्खें । पुरुष के प्रक्षिप्त वीर्य को खेंचकर स्त्री गर्भाशय में स्थिर करे जिस से गर्भाधान क्रिया सफल होवे, और परमेश्वर के अनुग्रह से उत्तम सन्तान उत्पन्न कर के वे दोनों अपने जीवन में प्रसन्न रहे ॥ ३६ ।। श्रा वा र्जा जनयतु म॒जाप॑तिरहोरात्राभ्यां समनक्त्वर्य मा। अदुमङ्गली पतिलोकमा विशे मं शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ॥ ४० ॥ (.१०) आ । वाम् । प्र-जाम् । जनयतु । मुजा-पतिः । अहोरात्रा- भ्याम् । सस् । अनक्तु । श्रर्य मा ॥ अदु': मङ्गली । पति- लोकम् । भा । विश । इमम् । शम् । नः । भव । द्वि-पदै। शस् । चतु:-पदे ॥ ४० ॥ (१०) भाषार्थ-[हे वधू वर ! ] प्रजापतिः ) प्रजापालक, (अर्यमा ) श्रेष्ठों का मान करने वाला, [ परमान्मा] नाम) तुम दोनों को (प्रजाम् ) सन्तान (श्रा जनयतु ) उत्पन्न करे और ( अहोरात्राभ्याम् ) दिन और रात्रि के साथ [सब को ] ( सम् अनक्तु.) संयुक्त करं। [हे वधू !] (अदुसङ्गली ) दुष्ट लक्षण रहित तू ( इमम् ) इस ( पतिलोकम् ) पति लोक पति कुल ] में (श्री . - ' ३ . . गर्भाधान विधौ ( मोदमानौ) इर्पन्नौ । दीर्घम् ) (वाम् ) युवयोः ( आयुः ) जीवनम् ( सविता) सर्वोत्पादक परमेश्वरः (कृणोतु ) करोतु ॥ ४०-(वाम् ) युवाभ्याम् (प्रजाम् ) सन्तानम् (श्रा जनयतु) उत्पाद यतु (प्रजापतिः ) परमेश्वरः ( अहोरात्राभ्याम् ) रात्रिदिनाभ्याम् । सर्वदेत्यर्थः ( समनक्त ) संयोजयतु (अर्यमा ) श्रेष्ठानां मानकर्ता (श्रदुर्मङ्गली ) दुष्टलक्षण रहिता (पतिलोकम् ) पनि कुलम् (श्रा विश) प्रविश (इमम् ) (शम् ) सुख- ०२ [ ४८४] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,११५) विश ) प्रवेश कर, और (न:) हमारे (द्विपदे ) दोपायों के लिये (शम् ) सुख- दायक और (चतुष्पदे ) चौपायों के लिये (शम् ) सुखदायक (भव ) हो ॥४०॥ भावार्थ-जगत्पालक परमेश्वर की उपासना करके युर. आहार विहार ऋतुगमन आदि योग्य क्रिया के साथ पति पत्नी चिरजीवी सन्तान उत्पन्न करें, जिससे पति कुल में उस वधू के शुभागमन से सब मनुष्य और गौ श्रादि पशु बढ़कर प्रसन्न रहे ॥४०॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१०।५।४७ ॥ दे वैदत्त मनुना खाकमे तद् वा) यं वासा वुवश्च वस्त्रम् । यो ब्रह्मणे चिकुितुषे ददाति स इद् रक्षासि तल्पानि हन्ति ४१ देवैः। दुत्तम् । मन ना । साकम् । एतत्। वाधू'-यम् । वासः। - वृध्वः । च । वस्त्रम् ॥ यः । ब्रह्मण। चिकितुषै। ददाति । सः । इत् । रक्षासि । तल्पानि । हुन्ति ॥ ४१ ॥ भाषार्थ-(यः ) जो [विद्वान् पिता आदि ] ( मनुना साकम् ) मनन- शील राजा के साथ ( देवैः ) विद्वानों करके ( दत्तम् ) दिया हुआ ( एतत् ) यह (वाधूयम् ) विवाह का ( वासः ) पहिरने योग्य ( वस्त्रम् ) वस्त्र [ योग्यता का चिह्न ] (चिकितुषे ) ज्ञानवान् । ब्रह्मणे ) ब्रह्मा [वेदवेत्ता बर] को (च) और ( वयाचे ) वधू को ( ददाति ) देता है, ( सः इत् )वही (तल्पानि ) प्रतिष्ठा [ सम्मान, गोरव ] में होने वाले ( रक्षालि ) दोषों को ( हन्ति ) नष्ट फरता है ॥४१॥ प्रदान ) अस्माकम् (भव ) ( द्विपदे ) मनुष्यादिसमूहाय ( शम्।.) (चतुष्पदे ) गवादिपशुसमूहाय ॥ ४१- देवैः ) विद्वदुभिः (दत्तम् ) (मनुना) मननशीलेन राशा (साकम्) सह ( एतत् ) दृश्यमानम् (वधूियम्') वैवाहिकम् (वासः ) परिधानीयम् ( वध्वः) चतुर्थ्यर्थ बहुलं छन्दसि । प० २।३। ६२ । इति षष्ठी । वचै (च) ( वस्त्रम् ) योग्यतासूत्रकं वसनम् ( यः ) विद्वान् ' (ब्रह्मणे) वेदवेत्ते पुरुषाय (चिकितुषे) विद्यावते ( ददाति ) प्रयच्छति ( सः) (इत् ) एम'( रक्षांसि ) दोषान् ( तल्पानि ) खप्पशिल्पशष्प० । १०३ । २८ । तलं प्रतिष्ठायां-पंप्रत्ययः; ततः अर्श आधच । तल्पे प्रतिष्ठायां सम्मान भवानि ( हन्ति ) नाशयति॥

. अनु. । युवम् । ब्रह्मणे । अथर्ववेदभाप्ये सू०.२ [४८४ ] भावार्थ-पिता आदि गुरुजनों को योग्य है कि राजव्यवस्था के सार प्राचार्या और आचार्य से सुशिक्षित ब्रह्मचारी, विद्यासूचक वस्त्र आदि से सुभूषित वधू वर का विवाह भर जिप से संसार में उन सब की निर्विघ्न प्रतिष्ठा बढ़े ॥ ४१ ॥ यं में दत्तो ब्रह्मभाग वधूयाधूि'यं वासो वुवंश्च 'वस्त्रम् । युवं ब्रह्मण ऽनु मन्य मानो बुईपने साकमिन्द्रश्च दत्तम् ॥ ४२ ॥ यस् । मे । दत्तः । ब्रह्म-भागम् । वधु-याः । वाधू -यम् । वासः । वुध्वः । च । वस्त्रम् ॥ अनु-मन्य- मानौ । बृहस्पते । साकस् । इन्द्रः । च । दुत्तम् ॥ ४२ ॥ भाषार्थ-( यम् ) जो ( ब्रह्मभागम् ) ब्रह्मा [वेदवेत्ता ] का भाग [अर्थात् ] (वाधूयम् ) विवाह का ( वासः ) पहिरने योग्य (वस्त्रम्) वन [ योग्यता का विह ] ( वधूगो: वधूयचे ) वधू की कामना करने वाले ( मे ) मुझ (ब्रह्मणे ) ब्रह्मा [ वेदवेत्ता वर] को (च) और (वध्वः वृध्व) वधू को (दत्तः) वे दोनों [वर और वधू के पक्ष वाले ] देते हैं । ( वृहस्पते ) हे वृहस्पति ! बड़ी विद्या के रक्षक आचार्य] (च) और ( इन्द्रः) हे बड़े ऐश्वर्यवाले राजन् ! ( साकम् ) साथ साथ ( अनुमन्यमानो) अनुमति देते हुये ( युवम् ) तुम दोनों . [वह वस्न] (दत्तम् ) देश्रो ॥ ४२ ॥ भावार्थ -जय वधू वर के पक्ष वाले युवा युवती का विवाह निश्चित करें, तब वे राजव्यवस्था और गुरुकुल आदि की शिक्षा के अनुसार दोनों की आयु, विद्या, स्वस्थता, सुशीलता आदि योग्यता को अवश्य विचार लेवें ॥ ४२ ॥ ४२-( यम् ) ( मे ) मह्यम् ( दत्तः ) प्रयच्छनः, तो वधूवरपक्षी ( ब्रह्म- भागम् ) ब्रह्मणा वेदशेन लेपन पदाथम् ( वयोः । चतुयर्थ बहुलं छन्दसि । पा० २।३ । ३२ । इति षष्ठी । वधूयवे । वधूकामाय वराय ( वामः) परिधानीयम् (वध्वः ) म० ४१ । वध्वै (च) ( वस्त्रम्) योग्यतासूचकं वसनम् (युवम् ) युवाम् (ब्रह्मणे ) वेदवेत्ते, पुरुषाय ( अनुमन्यमानौ ) अनुमतिं ददमानौ (बृह., स्पते ) वृहत्या विद्यायाः पालक । प्राचार्य (साकम् ) ( इन्द्रः ) हे परमैश्वर्यवन राजन् (दत्तम् )प्रयच्छनम् ॥

al ॥ इति : - सू०३ [ ४८४ ] चतुर्द काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,१९७१ स्योनाद्याने रथि बुध्य मानौ हसामुदो महमा मोदमानौ । सुंशू सं.पुत्री सुगृहो तराथो जोवानुषसा विभातीः ॥ ४३॥" स्योनात् । यानः । अधि । बुध्यमानो । हुसामुदौ । मेहसा। मोदमानौ। सु-स् । सु-पुत्रो । सु-गृहौ । तरायः । जीवौ । उषस : । वि-भातीः ॥ ४३ ॥ भाषार्थ-[हे स्त्री पुरुषो ! ] ( स्योनात् ), सुखदायक (योनेः) घर से (अधि) अच्छे प्रकार (बुध्यमानौ) जागते हुये; (हसासुंदी) हँसी और भानन्द करते हुये (संह पा) बड़े प्रेम से (मोंदमानौ') हर्ष मनाते हुये, (सुगू) सुन्दर चाल चलने वाले [वा उत्तम गौत्रों वाले ]i (सुपुत्रौ ) श्रेष्ठ पुत्रों वाले, (सुगृहौ ) श्रेष्ठ गृह लामनी वाले, (जीवौ ) प्राणों को धारण करते हुये तुम दोनों (विभानीः) सुन्दर प्रकाश युक्त ( उषसः) बहुत प्रभात बेलाओं को ( नराथः ) पार करो॥ ४३ भावार्थ-स्त्री पुरुषों को उचित है कि अपने घरों को आवश्यक गृह- सामग्रियों से भरपूर रक्खे और पुत्र पोत्र आदि के साथ प्रसन्न रहकर चिर जीवी होकर यशस्वी होवें ॥ ४३ ॥ यह मन्त्र महर्षि दयानन्दकृत संस्कारविधि गृहाश्रम प्रकरण व्याख्यात है। नवं वसानः सुरभिः सुवासा उदागा जीव उषसा विभातीः । भाण्डात् पंतचीवामुक्षि विश्वस्मादेनसुस्परि ॥ ४ ॥ ४३-( स्योनात् ) सुखप्रदात् ( योनेः ) गृहात्-निघ० ३।४ (अधि) यथाविधि ( बुध्यमानौ) जागरूको। अप्रमत्तौ (इसामुदौ) हास्येनामोद कुर्वन्तौ ( महसा.) महता प्रेम्णा ( मोदमानौ ) हर्षन्तौ ( सुगू ) सु+गच्छतेडु, यद्वा । गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य । पा० १।२।४ । इति गोईस्वः । शोभनचरित्रौ। उत्तमगोयुक्तौ ( सुपुत्रौ ) श्रेष्ठ पन्तानो (सुगृहौ ) श्रेष्ठगृहसामग्रीयुक्तो (तराथः ) पारयतम् ( जीवौ) प्राणान् धारयन्तौ ( उषसः ) वहुप्रभातवेला (विभातीः) विविधप्रकाशमानाः ॥ न F । . - १२ - (पतत्री.) पक्षी. (इव). यथा (भमुक्षि) मुक्तो भवानि ( लवस्मात् (३,९१८.), अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [४] नवम् । वानः। सुरभिः। सु-वासाः । उत्-मागोम् । जीवः । जुषसः । वि-भातीः ॥ भाण्डात् । पतवी-ईव । अमुक्षि । विश्वस्मात् । एनसः । परि ॥ ४४ ॥ भाषार्थ-(नवम् ) स्तुति को (वसानः) धारण करता हुश्रा, (सुरभिः) 'ऐश्वर्यगन् . ( सुवासाः) सुन्दर निवास वाला, (जीवः) जीव- [जीवता हुआ] मैं (विभातीः) सुन्दर प्रकाशयुक्त ( उषसः ) प्रभात बेलाओं में (उदागाम् .) उदय होता रहूं । (प्राण्डात् ) अण्डे से (पतत्री इव) पक्षी के समान (विश्व. स्मात् ).सब ( एनसः ) कष्ट से (परि ):सर्वथा (अमुक्षि ) छूट जाऊं ॥४४॥ भावार्थ:--मनुष्ण गृहाश्रम में प्रवेश करके प्रयत्न करे कि वह प्रभात के . सूर्य के समान उदय होता हुआ तेजस्वी, प्रशंसित, बलवान, धनवान्, चिरजीवी होकर सुख भोगता रहे ॥४४॥ शुम्भनी द्यावापृथिवी अन्तिसुम्ने महिवतेः । आपः सुप्त सुनुवुर्दै वीस्ता नेो मुञ्चन्त्वंहसः ॥ ४५ ॥ शुस्मनी इति । द्यावापृथिवी इति । अन्तिसुम्ने इत्यन्ति- सुम्ने । महिवते. इति महि-व्र ते ॥ प्रापः । सप्त । संस्त्रवः । देवीः । ताः । नः । मुञ्चन्तु अंहसः ॥ ४५ ॥ भाषार्थ-(शुम्भनी ) शोभायमान ( द्यावापृथिवी ) सूर्य और पृथिवी लोक (अन्तिसुम्ने ) [अपनी ] गतियों से सुख देने वाले और (महिवते) बड़े मत [नियम ] वाले हैं. ! (. देवीः ). उत्तम गुण वाली ( सप्त) सात (आपः) ४४- ( नवम्:) णु स्तुत्तौ-अप । स्तवम् । स्तुतिम् ( वसानः) धारयन् (सुरभिः);अ. १२१ १।२३ । पुर ऐश्वर्यदीप्त्योः-अभिच् । ऐश्वर्यवान् (सुवासाः). सुनिवासयुक्तः ( उदागाम् ) उदयं प्राप्नुयाम् ( जीवा ), प्राणान् धारयन् (उषस:). प्रभातवेला (विभातीः); विविधप्रकाशयुक्ताः( पाण्डात) स्वार्थे-अण् । अण्डात् (पनसः ),कष्टात् ( परि.) पृथग्भावे ॥ ४५-मा मन्त्री पाण्यातः-०७।११२।१॥

सू० २ [ ४८४ ] चतुर्दशं ,काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,११८ ) व्यापनशील इन्द्रियां [दो काट, दो नथने, दो आंखें और एक मुख ] (सुनुवा) [ हमें ] प्राप्त हुयी हैं, (ताः) वे ( न: ) हमे ( अंहसः ) कष्ट से ( मुश्चन्तु, छुड़ावें ॥ ४५ ॥ भावार्थ-जैसे सूर्य और पृथिवीलोक ईश्वर नियम से अपनी अपनी गति पर चलकर वृष्टि अन्न आदि से उपकार करते हैं, वैसे ही मनुष्य इन्द्रियो को नियम में रखकर अपराधों से बचें ॥ ४५ ॥ यह मन्त्र ऊपर आ चुका है-०७। ११२ ॥ १॥ सूर्याय दे वेभ्या मित्राय वरुणाय च । ये, भूतस्य प्रचैतसुस्तेभ्य इदमकर नमः ॥ ४६ ॥ सूर्याय । दे वेभ्यः । मित्राय । वरुणाय । च ॥ ये । भूतस्य । प्र-चैतसः । तेभ्यः । दुदम् । अकरम् । नमा४६। भाषाथ-(सूर्याय) बुद्धिमानों का हित करने वाली विद्या के लिये, ( देवेभ्यः ) उत्तम गुणों के पाने के लिये (च) और ( वरुणाय ) श्रेष्ठ (मित्राय) मित्र की प्राप्ति के लिये ( ये ) जो पुरुष (भूतस्य ) उचित कर्म के ( प्रचेतसः) जानने वाले हैं, (नेभ्यः ) उनके लिये (इदम्) यह (नमः) नमस्कार (अकरमें) करता हूं॥४६॥ भावार्थ--जो मनुष्य विद्या प्राप्त करके उत्तम गुणों और श्रेष्ठ मित्रो को प्राप्त करते हैं, वे संसार में प्रशंसनीय होते हैं ॥ ४६॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है-१०।५ । १७ ॥ य ऋ ते चिद श्रिषः पुरा जत्रुभ्यं मातृदः संधौता सुधिं मघवा पुरूवसुनिष्कर्ता विहं तं पुनः ॥ ४७ ॥ यः। ते । चित् । अभि-शिषः। पुरा । जत्रु-भ्य: । मातृदः ।। ४६-(सूर्याय) सूराः सूरयो वा मेधाविनः, तेभ्यो हिता, सूर सूरि वा- यत् । सूर्या वाङ्नाम-निघ० १ । ११ । विद्यामाप्तये (देवेभ्यः) उत्तमगुणानां लाभाय ( मित्राय ) मित्रलाभाय ( वरुणाय ) वरणीयाय श्रेष्ठाय (च) (ये) विद्वांसः (भूतस्य ) उचितकर्मणः (प्रचेतसः) प्रहातारः (तेभ्यः) (इदम् ) (भकरम् ) करोमि ( नमः ) नमस्कारम् ॥

सू०.२ [४८४ . [ (३,१२१) अथर्ववेदभाष्ये समु-धाता:। सुम्-धिम् । मुघ-वो । पुरु-वनु' । निः-कर्ता । वि-ह तस् । पुनः ॥ ४ ॥ भाषार्थ-(यः) जो [ परमेश्वर ] (पुरा ) पहिले से [वर्तमान ] (ऋते ) सत्य नियम में (चित् ) ही (अमिश्रिषः ) चिपकाने के साधन [ वीर्य के बिन्दु ] से (जत्रुभ्यः ) ग्रीवा आदि जोड़ों के [ बनाने के लिये ( आतृदः) [रुधिर के ] सब ओर टकराने [ घूमने ] से ( सन्धिम् ) हड्डी के जोड़ को . (संधाता) जोड़ देने वाला है, (मघवा ) वह पूज्य ( पुरुवसुः । वहुत श्रेष्ठ गुणों वाला [ परमात्मा ] ( विहृतम् ) टेढ़े हुये अंग को (पुनः) फिर (निष्कर्ता) ठीक करने वाला है.४७.॥ भावार्थ-परमेश्वर के अनादि सत्य नियम के अनुसार, वीज चाहे सीधा पड़े चाहे टेढ़ा, वह पृथिवी की भीतरी गति से ऐसा ठीक होजाता है कि उससे ऊपर को श्रङ्कुर और नीचे को जड़ उपजती है, इसी प्रकार वीर्य गर्भाशय में ठीक होकर नाभि से लम्बन्ध करता है, तब रुधिर के संचार से बालक अङ्ग सीधे होकर पूरे और पुष्ट होते हैं ॥ ४७ ॥ यह मन्त्र सामवेद में है-पू० ३ । ६। २, तथा कुछ भेद से ऋग्वेद में है।-१।१२॥ अपास्मत् तम उच्छतु नील पिशङ्गमुत लोहितं यत् । निर्द- हुनी या पृषातक्यं १ स्मिन् ता स्थाणावध्या संजामि ॥४८॥ तसेः । नीलम् । पिशङ्गम् । उत । के अप । अस्मत् ! । उच्छतु . ४७-(यः) परमेश्वरः (ऋते) सत्यनियमे ( चित्') एव (अभिविषः) अभिश्लिषः । श्रभिश्लेषणात् सन्धानद्रव्यात् । वीर्यविन्दुसकाशात् (पुरा) पूर्व- काले (जत्रुभ्यः) जव्वादयश्च । उ० ४ । १०२ जनी प्रादुर्भावे-रु, नस्य तः । प्रीवादिसन्धीनां रचनाय (आतृदः) उ तृदिर हिंसानादयोः-विप् । प्रातर्द- नात् । प्रताडनात् । रुधिरस्य संचारात । सन्धाता) संयोजयिता भवति -(सन्धिम् ) अस्थिसंयोगम् (मघवा ) अं० २ । ५। ७ । श्वनुक्षापूपन्प्ली: हन् । उ० १ १५६ । मह पूजायाम-कनिन्, हस्य घः, अबुगागमेश्च । पूज• नीयः ( पुरुवसुः) साहितिको दीर्घः । बहु श्रेष्ट र ए रक्तः परमात्मा ( निष्का) संस्कर्ता । सन्धाता भवति (विहतम् ) हवृ कौटिल्ये-क्त । कुटिलमाम् (पुन:) 4+ चतुर्द ईशं (३,१२१ ॥ . . सू०.२..[ ४८४ ] काण्डम् ॥ १४ ॥ १२१) लोहितम् । यत् ॥ निः-दुःहुनी । या। पृषातकी। अस्मिन् । ताम् । स्थाणौ । अधि। ना । अजामि ॥ ८ ॥ भाषार्थ-(अस्मत् ) हमसे (नमः ) अन्धकार (अप उच्छतु ) वाहिर जावे, (उत ) और [ वह भी ], ( यत् ) जो कुछ (नीलम् । नीला, (पिशङ्गम् ) पीला और (लोहितम् ) रक्त वर्ण [ अशुद्ध वस्तु ] है । (निर्दहनी ) जला देने वाली ( या) जो (पृषातकी ) वृद्धि बांधने वाली [पीड़ा] ( अस्मिन् ) इस ( स्थाणा ) स्थिर चित्त वाले मनुष्य में है, ( ताम् ) उस [ पीड़ा] को (अधि) अधिकार पूर्वक (श्रा सजामि ) मैं बांधता [ रोकता हूं ॥ ४ ॥ , भावार्थ- मनुष्य स्थिर चित्त होकर अपने शारीरिक, मानसिक और मामाजिक अशुद्धि, रोग आदि विघ्नों को हटावं ॥ ४८ ॥ यावतीः कृत्या उपासने यावन्तो राजी वरुणस्य पाशीः । व्यूद्धयो या असमृद्धयो या मुस्मिन् ता स्थाणावधि सादयामिट यावती: । कृत्याः । उप-वासने । यावन्तः । राज्ञ': । वरु- णस्य.! पाशः ॥ वि-कद्धयः । थाः। असंस्-ऋद्धयः । याः । अस्मिन् । ताः । स्थाणी । अपि । सादयामि ॥ ८ ॥ भापार्थ-( उपवासन ) निवास स्थान [ ग्राम आदि में ( राज्ञः) ऐश्वर्यवान् पुरुष की ( वरुणस्य ) रोक की (यावतीः ) जितनी ( कृत्याः) ४---(अस्मत् ) अम्माकं सकाशात् ( तमः ) तम खेदे-असुन् । अन्ध- कारः ( अप उच्छतु ) उच्छी विवास । दूरं गच्छतु (नीलम् ) (पिशङ्गम् ) पीतवर्णम् ( उत ) अपि च (लाहितम् ) रक्तवर्णम् । रोगविशिष्ट वस्तु (यत् ) वस्तु (निर्दहनी ) नितरां दहनशीला ( यो ) पीडा ( पृषातकी ) पृषु सेचने- क + ब?लमन्यत्रापि । उ० २ । ३७ । अत बन्धन-कुन् , गौरादित्वाद् डीए । सेच- नस्य वर्धनस्य बन्धनशीला निवारणशीला (अस्मिन् ) ( ताम् ) पीडॉम् । स्थाणी ) स्थिरस्वभावे मनुष्ये (अधि) अधिकृत्य (श्रा सजामि) पंज सङ्गे । प्रवन्नामि । रुणमि ॥ ४६-(यावती) यत्परिमाणाः ( कृत्या) कृञ् हिंसायाम्-क्य तु च । हिंसाः । पीडाः (उपवासने) निवासस्थाने । उपवरूथे । प्रामे ( यावन्तः) (राब:) प्र - Inannuxarna TINormous - या तनः सा - - (३,१२३) अथर्ववेदभाष्य सू०२ [ ४८४ पीड़ायें और (यावन्तः ) जितने (पाशाः ) फन्दे हैं। और (याः ) जो (व्युद्धयः) निर्धनतायें और (याः) जो (असमृद्धयः) असिद्धियां ( अस्मिन् ) इस (स्थाणो) स्थिर चित्त वाले मनुष्य में हैं, (ताः) उन [ लब याधामों ] कों (अधि) अधिकार पूर्वक ( सादयामि ) मैं मिटाता हूं ॥ ४६ ॥ भावार्थ-ग्राम आदि देशों में जो विद्वानों की वृद्धि रोकने वाले विन उपस्थित होवें, उनका प्रतीकार शीघ्र करना चाहिये ।। ४६ ॥ में प्रियतमा : सा में विभाय वासंसः । तस्याग्रे त्वं वनस्पते नौविं कृणुष्व मा वुयं रिषाम 1५० (११ या। मे । प्रिय-तमा । तनूः । सा । मे विभाय । वाससः ॥ तस्य । अग्रे । त्वम् । वनस्पते । नीविम् । कृणुष्व । मा। वयम् । रिषाम् ॥ ५० ॥ ( ११ ) भाषार्थ-[हे वीर!] (या) जो (मे ) मेग (प्रियतमा) अत्यन्त प्रिय (तनूः) शरीर है, (सा) वह (मे) मेरा शरीर (वाससः ) हिंसा कर्मसे (बिभाय ) डरता है । ( वनस्पते ) हे सेवनीय व्यवहार के रक्षक ! (त्वम् ) तू (अग्रे) पहिले से (तस्य ) उस [हिंसा कर्म ] का ( नीविम् ) बन्धन ( कृणुष्व ) कर, (वयम् ) हम लोग ( मा रिषाम ) कभी न कष्ट पावें ॥१०॥ ऐश्वर्यवतः पुरुषस्य (वरुणस्य) प्रावरणस्य ! रोधनस्य ( पाशाः ) बन्धाः (व्युद्धयः ) असम्र्पत्तयः ( याः ) (असमृद्धयः ) असिद्धयः ( या ) (अस्मिन् ) (ताः ) वाधाः ( स्थाणी ) दृढस्वभावे पुरुषे ( अधि) अधिकृत्य (लादयामि) षद्ल अवसादने ! नाशयामि ॥ ५०-(या) (मे) मम (प्रियतमा) अतिशयेन प्रिया (तनूः ) शरीरम् (सा) तनूः (मे) मम (बिभाय ) विभेति (वासमः) वर्णित् । उ०४। २१८ । वस हिंसायाम्-असुन् , णित् । हिंसाकर्मणः सकाशात् ( तस्य ) हिंसा- कर्मणः (अने) आदौ (त्वम्) (वनस्पते) वननीयस्य सेवनीयव्यवहारस्य रक्षक (नीविम् ) नौ व्यो यलोपः पूर्वस्य च दीर्घः । उ० ४ । १३६ । नि+व्ये संघरणे-पूण् डित्, यलोपः, उपसर्गस्य दीर्घः। कटिबन्धनम् । प्रबन्धन (कणुष्व ) कुरु ( वयम् ) (मा रिषाम) दुःखिता न भवेम ॥

अन्ता २०. २.४८४.] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,१२३) भावार्थ-विद्वान् गृहस्थों का कर्त य है कि दूलरो को सताकर अपने को दूधिन न करें और उस का पहिले से विचार करके राजदण्ड आदि के पश्चात्ताप से बच कर सुखी रहे ॥ ५० ॥ ये यावतीः मिचो य श्रोतवो ये च तन्तयः वासो यत् पत्नौभिरुतं तन्नः स्योनमुपं स्पृशात् ॥ ११ ॥ ये। अन्ताः । यावतीः। सिचः । ये । श्रोतवः । ये तन्तवः ॥ वासः । यत् । पनौभिः। उतम् । तत् । नः । स्यो नम्। उप स्पृशात् भाषार्थ (ये ). जो (अन्ताः ) बन के आंचल, (यावतीः ) जितनी (सिचः ) कोरें, (ये) जो (श्रोतवः । बुनावटे, (च) और (ये) जों (तन्तवः ) तन्तु [ तांते ] हैं । ( यत् ) जो ( वासः ) वस्त्र (पत्नीभिः ) पतियों करके ( उत्तम् । बुना गया है, (तत् ) वह (नः ) हम से ( स्योनम् ).सुख के साथ ( उप स्पृशात् ) चिपटा रहे ॥ ११ ॥ भावार्थ-जैसे विदुषी चतुर स्त्रियों के बुने और बनाये वस्त्र शरीर को सुख देते हैं, वैसे हो विद्वानों के विचार पूर्वक किये काम उपकारी होते हैं ॥५१॥ उशतीः कुन्यला इमाः पितृलोकात् पति यतीः । स्वाहा ॥ ५२ ॥ उVतीः । कुन्यलाः । इमाः। पितृ-लोकात् । पतिम् । यती।। अव । दीक्षाम् । असृक्षत । स्वाहा ॥ ५२ ॥ - ५१-- (ये) (अन्ताः) वस्त्रान्ताः ( यावतीः) यत्संख्याकाः (सिचः) पिच श्राीकरणे-क्विप् । वस्त्रान्तविशेषाः ( ये ) ( गोनवः ) सितनिगमिमसि सच्यवि०।उ०१ । ६६ श्रव रक्षणादिषु-तुन ,ऊच,यद्वा प्राङ्+ वेतन्तुसन्ताने तुन् संम्प्रसारणं च । पटे दीर्घतन्तयः( ये ) (च ) (तन्तवः) तनु विस्तारे-तुन् । सूत्राणि ( वासः) वस्त्रम् ( यत्) (पत्नीभिः) ( उतम् ) वेश् तन्तु सन्ताने-क..। स्यूतम् ( तत् ) (नः ) अस्मान् ( स्थानम् ) सुखेन ( उप ) उपेत्य (स्पृशात्) स्पशेत् ॥ अव दीक्षामवृक्षत - - AN :- . . (३,१२४ ) अथर्ववेदभाप्दै सू०३ [४८४] भाषार्थ-(इमाः ) यह (उशी ) कामना करनी हुई ( कन्यलाः } शोभावती कन्यायें (पितृलोकात् ) पितृलोक [पितृत ] ले ( पतिम् ) अपने भपने पति को (यतीः ) जाती हुई (स्वाहा ) सुन्दर वाणी के साथ (दीक्षाम् ) दोज्ञा [नियम बर को शिक्षा ] को (अर जुन 1 ) दान करें ॥ ५२ ॥ भागर्य-गुणवती विदुषी स्त्रियं विनाइ करके घर के सुप्रबन्ध से सन्तान आदि को वेद द्वारा उत्तम नियम और कर्म रिखाने ।। ५२ ॥ बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अंधारयत् । वक़ गोषु प्रविष्ट यत् तेने मां उं सृजामसि ।। ५३ बृहस्पतिना । अव-सृष्टास् । विश्व । देवाः । अधारयन् ॥ बचः : । गोषु'। प्र-विष्टम् । यत् । तेन इमाम् । सम् । 'सुजा- मसि'। ५३ ॥ भाषार्थ-(वृहस्पतिना) वृहस्पति [बड़ी वेदवाणी के रक्षक प्राचार्य करके (अवसृष्टाम् ) हो यो [दोक्षा, नियम व्रत की शिक्षा मन्त्र ५२] को (विश्वे देवाः ) सब विद्वानों ने (अधारयन् ) धारण किया है। ( यत् ) जो (वर्चः ) प्रताप (गोषु ) विद्वानों में (प्रविष्टम् ) प्रविष्ट है. (तेन । उससे (इमाम् ) इस [प्रजा, स्त्री सन्नान आदि को (सं सृजामसि) हम संयुक्त करते हैं ॥ ५३॥ ५२-(उशतीः कामयमानाः ( कन्यलाः ) ० ५.!!३! अघ्न्याद- यश्च । उ० ४१ ११२ । कनी दोनिकान्नितिषु-यक + ला आदाने-रु. टाए । शोभाग्रहीयः ( इमाः ) विदुष्यः (पितृलोकात् । पितृकुलान् (पतिम) स्वस्वभ- तारम् (यनीः ) गच्छन्त्यः : दीक्षाम् । दीन मौएड्येज्योपनयननियमबना. देशेषु -अप्रत्ययः। नियमव्रतयोः शिक्षाम् (श्रव सुजन् अवसृजन्तु । इदतु (स्वाहा ) अ०२।१६।१ । सुवाण्या । रेवाचा । ५३-(वृहम्पतिना ) बृहत्या वेदवाण्या रक्षण । प्राचार्येण ( अवसृ- धाम् ) दत्ताम् , दीनाम्-इति पदम्य पूर्वमन्नादन वृत्तिः(विश्वे ) सर्वे, देवाः ! विद्वांसः (अधाग्यन् ) धारिनवन्तः (वर्चः ) प्रतापः ( गोषु ) गच्छति जाना नीति गौः । गौः स्तोतनाम-निध० ३ . १६ । विद्वन्तु ( प्रविष्टम् ) व्याप्तम् (यत् ) (नेन । ( इमाम् ) समानां प्रजान् (नामसि । वयं संयोजयामः। . ।

सू०२ [ ४८४] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,१२५) भावार्थ-जिस प्रकार पाबार्य से सुशिक्षा पाकर पूर्वज विद्वानों ने . उत्तम पद पाये हैं, वैसे ही मनुष्य अपने लोगों को सुशिक्षा देकर उन्नत करें ॥५३, बृहस्पतिना ० । तेजो गोषु प्रविष्टं यत् तेन ॥ ५४ ॥ ॥ तेजः । गोषु' । प्र-विष्टम् । यत् । तेन । ०॥ ५४ ॥ भाषार्थ-( बृहस्पतिना) वृहस्पति.........। (यत्) जो (तेजा) तेज (गोषु) विद्वानों में (प्रविष्टम् ) प्रविष्ट है, (तेन) उस से .....[मन्त्र ५३]॥५४॥ भावार्थ: -मन्त्र ५३ के समान है ॥ ५४॥ बृहस्पतिना। भगो गोषु प्रविष्टो यस्तेन० ॥ ५५ ॥ ० ॥ भगः । गोषु' । प्र-विष्टः । यः । तेन । ० ॥ ५५ ॥ भाषाय-(वृहस्पतिना ) बृहस्पनि...... । (यः) जो (भगः) सेव- नीय प्रभाव [पेश्वर्य ] ( गोषु ) विद्वानों में (प्रविष्टः ) प्रविष्ट है, ( तेन ) उस से... [म० ५३ ] ॥ ५५ ॥ भावार्थ-मन्त्र ५३ के समान ॥ ५५ ॥ बृहस्पतिना ०.। यशो गोषु प्रविष्टं यत् तेन० ॥ ६ ॥ ॥ यशः । गोषु'.। म-विष्टम् । यत् । तेन । ० ॥ ५६ ॥ भाषार्थ-(वृहस्पतिना) वृहस्पति......। ( यत्) जो ( यशः ) यश [दान शूरता भादि से बड़ा नाम ] (गाँउ) विद्वानों में ( प्रविष्टम् ) प्रविष्ट है, (तेन ) उससे......[म० ५३] ॥ ५६ ॥ भावार्थ-मन्त्र ५३ के समान है ॥ ५६ ॥ बृहस्पेतिना० । पयो गोधू प्रविष्ट यत् तेन० ॥ ५७ ॥ ॥ पयः । गोषु । प्र-विष्टम् । यत् । तेन । ० ॥ ५ ॥ ५४-(तेजः ) ज्योतिः । अन्यत् पूर्ववत्-म० ५३.॥ ५५-( भगः ) सेवनीयः प्रभावः । ऐश्वर्यम् । अन्यत् पूर्ववत् ॥ ५६-(यशः) दानशूरतादिप्रसवं सुनाम । अन्यद् गतम् ॥

- (३,१२६ ) अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [४] भाषार्थ-(बृहस्पतिना) बृहस्पनि...... । ( यत् )जो ( पयः ) विज्ञान (गोषु ) विद्वानों में प्रविष्टम् ) प्रविष्ट है, (तेन ) उससे......[म० ५.३] ।।५.७॥ भावार्थ-मन्त्र ५३ के समान है ।। ५७ ।। बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अंधारयन् । रसो गोषु प्रविष्टो यस्तेने मां सं सृ'जाससि ॥ ५८ ॥ . बृहस्पतिना। नव-सृष्टाम् विश्व । देवाः। अधारयन् ॥' रसः। गोषु । म-विष्टः । यः । तेन । इमाम् । सस् । सुजामसि।५८। भाषार्थ-(बृहस्पतिना) बृहस्पति [पडी वेद वाणी के रक्षक आचार्य ] करके ( भवसृष्टाम् ) दी हुयी [दीक्षा, नियम व्रत की शिक्षा-म०५२] को (विश्वे देवाः ) सब विद्वानों ने (अधारयन ) धारण किया है । ( यः ) जो ( रसः) रस [वीर्य वा वीर रस ] ( गोषु ) विद्वानों में (प्रविष्टः ) प्रविष्ट है, (तेन) उस से ( इमाम् ) इस [ प्रजा, स्त्री सन्तान प्रादि ] को ( सं सृजामसि ) हम संयुक्त करते हैं ॥५॥ भावार्थ-जो मनुष्य पूर्वज विद्वानों के समान अपने लोगों को सुशि. क्षित करके वीर बनाते हैं, वे सुप्रतिष्ठित हो कर सुख भोगते हैं ॥ ५ ॥ यदीमे के शिनो जनो गृहे ते सुमनतिष रो<न कृण्वन्तो'. ऽघम् । अनिष्वा तस्मादेनः सविता च प्रमुञ्चताम् ॥ ५ ॥ पदि । इमे । के शिनः । जनाः । गृहे । ते । सम्-अनर्तिषुः । रोदैन । कृण्वन्तः। घम् ॥ श्रृंग्निः । त्वा । तस्मात् । एनसः । मुक्षितो । च । प्र । मुञ्चतास् ॥ ५ ॥ भाषार्थ-(यदि ) यदि (इमे ) यह ( केशिनः ) क्लेश युक्त ( जनाः) ५७-(पयः ) पय गतौ-असुन् । विज्ञानम् । अन्यद् गतम् ।। ५८-(रसः) वीर्यम् । वीररसः । अन्यद् गतम् ॥ ५६-(यदि ) सम्भावनाया (इमे) समीपस्थाः (केशिनः ) मिशेरन् - भू०२ [४८४] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ ३,१२० ) मनुष्य (ते गृहे) तेरे घर में .( रोदेन ) विलाप के साथ (अघम् ) दुःख (कण्वन्तः ) करते हुये ( समनर्तिषुः ) मिलकर इधर उधर फिरें। (अग्निः) तेजस्वी (च) और ( सविता ) प्रेरक मनुष्य ( त्वां) तुझे (तस्मात् एनस) इस कन्ट से (प्र) सर्वथा (मुञ्चताम् ) छुड़ावे॥ ५ ॥ भावार्थ-यदि घर के लोग'रोग वा दरिद्रता श्रादि के कारण से क्लेश रठावे, प्रधान पुरुष अपने मानसिक और शारीरिक उत्साह और परमेश्वर में विश्वास से तेजस्वी होकर उन का दुःख दूर करे ॥ ५६ ॥ यदीयं दुहिता तवं विके श्यरुदद् गृहे रोदैन कृण्वत्य घम् । अग्रिष्ट्वा ०॥६० ॥ (१२) यदि । दुयस् । दुहिता । तव । वि-के शी। अरुदत् । गृहे । रोदैन । कृण्वती । अघस् ॥ ० ॥ ६० ॥ ( १२ ) भाषार्थ-[हे गृहस्थ ] (यदि) यदि ( इयम् ) यह (तघ) तेरी (दुहिता) पुत्री ( विकेशी ) बाल बिखेरे हुये, (रोदेन .) चिलाप के साथ (अधम् ) दुःख (करवती ) करती हुयी (गृहे ) घर में (अरुदत् ) रोवे । ( अग्निः) तेजस्वी (ब) और......म० ५६ ॥.६० ॥ भावार्थ-[ मन्न 48 ] के समान है ॥ ६० ॥ यज्जामयो या वतया गृहे ते सुमन तिषू रोदैन कृण्वतीर घम् मुंगिष्ट्वा ०॥६१ ॥ लो लोपश्च । उ०.५। ३३ । क्लिश उपतापे-अन्, लस्य लोपः । केश-इनि । क्लेशिनः । क्लेशयुक्ताः जनाः ) मनुष्याः (गृहे )-(ते ) तप ( समनर्तिषुः ) (मिलित्वा नर्तनम् इतस्ततो गमनं कुयुः ( सेदेन ) विलापेन (कृण्वन्तः) कुर्वन्तः (अधम् ) दुःखम् (अग्निः).नेजस्तो (त्वा ) त्वाम् (तस्मात् ) (एनसः) कष्टात् ( सविता ) प्रेरकः पुरुषः (च) (प्र) प्रकर्षेण (मुञ्चताम् ) एकवचनं लोट् । मोचयतु ॥ ६०-( इयम् ) उपस्थिता-( दुहिता) पुत्री (तव ) (चिकेशी) विकी.. किशा (सरदत् ) रुधात् ( करवती ) कुर्वती ॥ अन्यद्गतम्-म०५६॥ . " . (३,१२८ ) अथर्ववेदभाष्ये सू०२ [४८81 यत् । जामयः । यत् । युवतयः । गृहे । ते । सम्-ननर्तिपुः । रोदन । कृण्वती । अघम् ॥ ० ॥ ६१ ॥ भाषार्य-(यत् ) जो ( जामयः ) कुल खयां और ( यत् ) जो (युव- तयः) युवा स्त्रियां (ते रहे । तेरे घर में (रोदेन ) विलाप के साथ ( अघम्) कष्ट (रावती) करती हुयी (समनर्तिपुः) .मिलकर इधर उधर फिरें। (अग्निः ) तेजस्वी (च) और......म० ५६ ॥ ६ ॥ भावार्थ-मन्त्र ५६ के समान है । ६१ ॥ यत् ते मजायो पशुषु या गृहेषु निष्ठितमध्कृद्भिरघं कृतम् । शिष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च म मुञ्चताम् ॥ ६२ ॥ यत् । ते । म-जायाम् । पशुई । यत् ।। रहेषु' । नि- स्थितम् । अघवृत्-भिः । सम् । दृतम् ॥ मृतिः । हा। तस्मात् । एनसः । सुदिता ।। । मुस्ताम् ॥ ६२ ॥ भाषार्थ -[हे गृहस्थ ! ] ( यत्) यदि (ते ) तेरी ( प्रजायाम् ) प्रजा [जनपद के लोगों ] में, (पशुषु ) पशुओं में, (वा) अथवा ( यत् । यदि (गृहेषु ) घरों में (अघङ्गिः ) दुःख करने वाले [ रोगों वा मनुष्यों ] करके. (रुतम ) किया गया (अघम् ) दुःख (निष्ठितम् ) स्थित कर दिया गया है ! (अग्निः ) तेजस्वी (च) और ( सविता) प्रेरक पुरुष (वा) तुके ( तस्मात् एनला ) उस कप्ट से (प्र) सर्वथा (मुञ्चताम् ) छुड़ावे ।। ६२ ।। भावार्च-यदि प्रजा के लोगों, पशुओं या शिल्पशाला श्रादि घरों में । ६२-(यत्) यदि ('जामयः) २०३६ । कुलखिरः (यत् ) (युक्तयः) तरस्यः (क्तीः ) पूर्वमा अन्यद् गंतम्-म० ५६ ॥ ६२-(यत्) यदि (ते ) तव ( प्रजायाम् ) जनपदपुरुषेषु (शुषु) गवादिषु ( यत् ) यदि { चा ) अथवा ( गृहेषु) शिल्पादिस्थानेषु ( निष्टितम् ) स्थापितम् (याभिः) दुरूदभिः (म) दुःहम् (हतम) सम्पा. दितम् । अन्यत् पूर्ववत्-म० ५४ ॥

- - सू० २ [ ४८४ ] . चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,१८) रोगों से वा दुष्ट मनुष्यों से कष्ट उपस्थित हो, विद्वान लोग विद्यावल-से और परमेश्वर के सहाय से उस कष्ट को हटावें ॥१२॥ इयं नायुपं ब्रूते पूल्यान्यावापन्तिका । 'दीर्घायु'रस्तु मे पति वाति शरदः शतम् ॥ ३ ॥ इयम् । नागे। उप । ब्रूते। पूयानि । श्रा-वपुन्तिका । दीर्घ- आयुः । अस्तु । मे ।पतिः । जीवाति । शरदः । शतम् ॥ ६॥ भाषार्थ-(इयम् ) यह (नारी ) नारी [नर की पत्नी] (पूल्यानि ) संगति के कर्मों को [ बीज समान ] (धावपन्तिका) घोदेती हुयी ( उप व्रते) बोलती है-" (मे ) मेरा ( पतिः) पति (दीर्घायुः) लम्बी भायु वाला (अस्तु) होवे, और ( शतं शरदः) सौ वर्षों ( जीवानि) जीता रहे" ॥६३ ॥ भावार्थ पत्नी प्रयत्न करके परमात्मा की प्रार्थना करे कि उस का पति सुख से पूर्ण आयु भोगे और इसी प्रकार पति भी पत्नी की पूर्ण भायु के लिये पुरुषार्थ करे ॥ ६३ ॥ हुहेमाविन्दु सं नु'द चक्रवाके दंपती । मुजयनौ स्वस्तु नौ विश्वमायुव्यश्नुताम् ॥ ६४ ॥ दुह.। हुमौ । इन्द्र । सम् । नुदु । चक्रवाका-इव । दम्पती इति दम्-पती ॥ मु-जयो । एनौ । सु-अस्त को । विश्वम् । मायु': । वि। अश्नुताम् ॥६४॥ भाषार्थ-( इन्द्र ) हे परमैश्वर्ययुक्त राजन् ! (इह ) यहां संसार में ] । - ६३-( इयम् ) (नारी) नरस्य पत्नी ( उपवते ) कथयति ( पूल्यानि) पूल संहतो-फ्यप् । संहतिकर्माणि । संगतिबीजानि (आवन्तिका) टुथप बीजतन्तुसन्ताने-शत, स्वार्थे कन् , टाप् बोजवद् विस्तारयन्ती (दीर्घायुः ) दीर्घजीवनः (अस्तु) (पति।) जीवाति) जीवेत् ( शरदः ) वर्षाणि ( शतम्) बहूनि ॥ ६४-(इह ) संसार ( इमौ) प्रसिद्धौ ( इन्द्र) हे -परमैश्वर्यवन रामन । . . । उप-धाने (३,१३०) अथर्ववेदभाध्ये सू०२ [४८४ (इमो ) इन दोनों (चक्रवाका इथ) चकवा चकवी के समान (दम्पती) पति पत्नी को ( सं नुद) यथावत् प्ररणा कर (प्रजया ) प्रजा के साथ (एनौ ) इन दोनों (स्वस्त को ) उत्तम घर वालों को ( विश्वम् ) सम्पूर्ण ( प्रायः) भायु (वि प्रश्नुताम् ) प्राप्त होवे ॥ ६४ ॥ भावार्थ-राजा व्यवस्था करे कि पति पत्नी चकवा चकवी के समान बड़े प्रेम से मिलकर रहे और ब्रह्मचर्य के पालन और धनादि के रक्षण से बल. धान और सुखी होकर पूर्ण आयुं भोगें ॥ ६४॥ यहमन्त्र महर्षि दयानन्दकृत संस्कार विधिगृहाश्रम प्रकरण में व्याख्यात है। यदासुन्द्यामु'पधाने यद् वापुवासने कृतम् । विवाहे कृत्यां यां चक्रुरास्नाने तां नि दंधमसिः॥ ६५ ॥ यत् । अा-सुन्धार । यत् । वा । उप-वासने। कृतम् ॥ वि-वाहे । कृत्यास् । यास् । चक्रुः। मा-स्नान। ताम्। नि । दुध्मसि ॥६५॥ भाषार्थ-( यत् ) जिंस ( कृतम् ) हिंसितः कर्म को (आसन्धाम् ) सिंहासन में, (उपधाने ) गही में,(वा ) अथवा ( यत् ) जिस [हिंसित कर्म ] को (उपवासने) छत्र में, ओर (याम् ) जिस (कृत्याम् ) दुष्प्रक्रिया को (भास्नाने) स्नानगृह में (विवाहे ) विवाह के बोव ( चक्रुः ) [वै दुष्ट लोग] करें, (ताम् । इस दुष्टक्रिया ] को ( नि दध्मलि ) हम नीचे धरे ॥ ६५ ॥ ( सं नुद) सम्यक् प्रेरय (चक्रवाका-इव) स्वनामख्यातो खगौ यथा (दम्पती) जायापती (प्रजया) सन्तानेन (एनौ) द्वितीयाटौस्वेनः । पा०.२।४।३४ । इति द्वितीयायाम् एनादेशः । पूर्वोक्तौ ( स्वस्तको) अस्तं गृहनाम-निघ० ३।४। उत्तमगृहयुक्तौ (विश्वम् ) सम्पूर्णम् (आयुः ) जोवनम् ( अश्नुताम् ) प्रामोतु ॥ 1. ६५-( यत्) (आसन्धाम् ) श्रासम् आसनं ददातीनि श्रासन्दी; आस उपवेशने-किप् + दा-ड, ङीप् । सिंहासन (उपधाने ) उपवन (यत् ) (घा) ( उपवासने ) छत्रे ( कृतम् ) हिसितं कर्म (विवाहे ) विवाहोत्सवे (कृत्याम् ) हिंसाक्रियाम (याम् ) (चक्रुः ) कुर्युर्दष्टपुरुषाः ( भास्नाने ) स्नानगरे .(ताम) हिंसाम (नि) नीचैः (दध्मसि ) धारयामः । . .

१०२ [ ४८४ ] . चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,१३१) भावार्थ-यदि विवाह कर्म में कोई दुष्ट पुरुष विघ्न डालें, चतुर लोग सस का प्रतीकार करके विवाह को निर्विघ्न समाप्त करें॥६५॥ यद् दुष्कृतं यच्छमलं विवाहे वहुतौ च यत् । तत् संभलस्य कम्बुले मुज्महे दुरितं धूयम् ॥ ६६ ॥ यत् ।दुः-कृतम् । यत् । शमलम् । वि-वाहे। हुतौ। च। यत् ॥ 'तत् । सुम्-भलस्यं । कम्बले । मृज्महै । दुः-इतम् । वयम् ६६॥ भाषार्थ-( यत् ) जो (दुष्कृतम् ) दुष्ट कर्म ( च ) और ( यत् ) जो (शमतम् ) मलीनता (विवाहे ) विवाह में [अथवा] (यत् ) जो (वहती) विवाह में दिये पदार्थ में [ होवे ] 1 (तत्) उस ( दुरितम्) खोट फो (संभों लस्य ) प्रापस में समझा देने वाले पुरुष के (कम्बले) कामना योग्य कर्म पर .' (वयम् ) हम (मुज्महे ) शोध लेवें ॥ ६६ ॥ भावार्थ-जो कोई दोष विवाह की प्रवृत्ति वा समाप्ति में भा पड़े, बुद्धिमान लोग समझ बूझ कर उसका निबटेरा कर लें ॥ ६६ ॥ सुभले मल सादयित्वा कम्बले दुरितं त्यम् । अभूम युज्ञियाः मगन प्राय षि तारिषत् ॥ ६७ ॥ सम्भले । मलम् । सादयित्वा । कुम्बले ।दुः-इतम् । त्यस् । प्रभू'म । यज्ञियाः । शुद्धाः । प्रा नः। प्राषि। तारिषत् ॥६॥ भाषार्थ-(संभले =संभलस्यं ) आपस में समझा देने वाले पुरुष के (कम्बले) कामना योग्य कर्म पर (मलम् ) मलिनता और (दुरितम् ) खोट को (सादयित्वा.) मिटा कर (वयम् ) हम ( यशियाः) पूजा योग्य और (शुद्धाः) शुद्धा: - ६६- ( यत्) ( दुम्कृतम् ) दुष्टकर्म (यत् ) (शमलम् ) मालिन्यम् (विवाहे ) (वहनी ) विवाहे दातव्यपदार्थे ( च ) ( तत् ) दुष्टकर्म (संभलस्य) भल निरूपणे-अच् । सम्यग् निरूपकस्य (कम्ब ज्ञे ) कमेधुक् । उ० १ । १०७ । कमु कान्तौ-कलप्रत्यये बुक् । कमनीये कर्मणि ( मृज्महे ) शोधयामः ( दुरि- सम्) दुष्कर्म (वयम् ) पुरुषार्थिनः ।। ६७-(संभले ) म० ६६ । षष्ठ्यर्थे सप्तमी । संम्यग् निरूपकस्य, (मलम्); मालिन्यम् (सादयित्वा ) नाशयित्वा (कम्पले ) म०६६ । कमनीये कर्मणि . .

-- - . (३,१२). कृत्रिमः । १ । अथर्ववेदभाष्ये , सू०.२ [४८४ शुद्ध ( अभूम ) होवे, [और यह कर्म ] (नः ) हमारे ( आयूपि') जीवनों को (प्रतारिषत् ) बढ़ावे ॥६७ ॥ भावार्थ-चतुर विद्वान् पुरुष के निर्णय पर परस्पर ग्लानि मिटाकर', वधू वर के पक्ष वाले प्रसन्न होवें ॥ ६७ ॥ कण्टकः शुतदन् य एषः। अपास्याः केश्य मलुम शीर्ष ण्यं लिखात् ॥ ६८.॥ कृत्रिमः । कण्टकः । शुत-दन् । यः । एषः ॥ सप । अस्याः । केश्यम् । मलम् । अपं । शीर्षण्यम् । लिखात् ॥ ६८ ॥.. भाषार्थ-(कृत्रिमः) शिल्पी का बनाया हुअा, (शतदन् ),सौ [बहुत] दांतो वाला (यः एषः) जो यह (कएट : ) कोटो वाला [ कंघा आदि ] है। वह ( अस्याः ) इस [प्रजा अर्थात स्त्री पुरुषों ] के (केश्यम् ) केश के और ( शोषण्यम् ) शिर के (मजम् ) मज को (माअप तिखात्) सर्वथा खरोंच शाले॥ ६८॥ भावार्थ-जैसें शिल्पी के बनाये कंघा कक्रई से काढ़ने पर केश शुद्ध होते और शिर का क्लेश दूर होता है, वैसे ही अनेक प्रयत्नों से अंशानं के मिटने पर प्रात्मा की शुद्धि होती है. ॥ ६ ॥ अङ्गादगाद् वयमस्या अप यक्षम नि दधमसि । - (दुरितम् ) दोषम् (वयम् ) पुरुषाः (अभूम ) भवेम (यशियाः) पूजाहाः (शवाः) प्रसन्नाः (प्र तारिषत्.) वर्धयेत् (नः) अस्माकम् (आयूषि) जीवनानि ॥ १८-(कृत्रिमः ) शिल्पिनाः कृतः (कण्टकंः ) कटि गतौ-खुल्. अर्श. भाधच् । कण्टका कन्तपो वा कृन्ततेर्वा कण्टतेर्वा स्याद् गतिकर्मणः-निरु०६। ३२ । करटकयुक्तः कन्तकः (शतदन्) छन्दसि च । प्रा०५१४। १४२ दत इत्ययमादेशः । बहुदन्तोपेतः ( यः) (पः) (अस्याः.) प्रजायाः ( केश्यम् ) केशे भवम् (प्रलम् ) मालिन्यम् (शीर्षएवम् ) शिरसि भवम् (अंप अप लिखात् ) मर्श दिलिप दूरीकुर्यात् ॥ .

०३ [४] चतुर्द काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,१३३.) तन्मा मापत् पृथिवीं मात दे वान् दिवं मा मापदुर्वन्तरि- क्षम् । अपो मा मापुन्मलये तदग्ने युमं मा मार्फत् पुितं श्च सवान् ॥ ६ ॥ अङ्गात्-अङ्गात् । यम् । भूस्याः । अयं। यक्ष्मम् । नि। दुधमसि ॥ तत् । मा। म । मापत् । पृयिवीस् । मा । उत । देवान् । दिवम् । मा । म । नापत् । कुरु । अन्तरिक्षम् ॥ अपः । मा । म । मापुत् । मलम् । एतत् । अग्ने । युमम् । मा । म । मापत् । पितॄन् । च । सान् ॥ ६ ॥ भाषार्थ-(अस्याः ) इस [प्रजा अर्थात् स्त्री पुरुषों) के (अजाद- मात्) अङ्ग अफ से (वयम् ) हम ( यदमम् ) क्षय रोग को (नि) निश्चय करके (अरवमसि ) बाहिर डालते हैं । (तत्) वह (देवान ) नेत्र श्रादि इन्द्रियों में (मा प्रभापत् ) न पहुंचे, (उत ) और (मा)न (पृथिवीम् ) भूमि में, (मा) न (दिवम् ) धूप में और ( उरु) चौड़े (अन्तरिक्षम् ) अन्तरिक्ष में (प्रभापत् ) पहुंचे । (अग्ने ) हे विद्वान् ! ( एतत् ) यह (मलम् ) मैल (अपः ) जलों में (मा प्रापत् ) न पहुंचे, और (यमम् ) घायु में (च) और ( सर्वान् ) सप ( पितॄन् ) ऋतुओं में ( मा प्रापत् ) न पहुंचे ॥ ६६ ॥ ६8-(अलादज्ञात् ) सर्वस्मादङ्गात् (धयम् ) (अस्याः) प्रजाया (अप) पूरीफरणे ( यक्ष्मम् ) राजरोगेम् (नि) निश्चयेन (वध्मसि ) धारयामः (तत्) मतम् (मा प्रापत् ) मा प्रामुयात् (पृथिवीम् ) (मा) निषेधे (उत) अपि च ( देवान् ) चक्षुराधीनोन्द्रियाणि, यथा महीधरस्य दयानन्दस्य च भाष्ये-यजुः० ४०१४ (दिवम् ) प्रकाशम् (मा प्रापत् ) (उस) विस्तृतम् (अन्तरिक्षम् ) (अपः) जलानि (मा प्रापत् ) (मलम् ) मालिन्यम् ( एतत् ) (अ).हे विवन . (यमम् ) वायुलोकम् । यमो यन्तीति सतः इति मध्यस्थानदेवतासु पाठः- निरु० १०॥ १६ । यमः। मध्यस्थानोवायुः इति देवराजयज्वा निघण्टुटीकायाम् (मा प्रापत्) (पितॄन ) अतून , यथा दयानन्द भाष्ये-यजुः० = । ६० (सर्वान ) समस्तान् ॥ .

. (३,१४) अथर्ववेदभाष्ये सू० २ [ ४८४ ] भावार्थ-विज्ञान राजा और सबलोग हवन और अन्न शोधन क्रियाओं नगर पाम मादि में से रोग जनक दुर्गन्ध आदि दोषों को हटाकर अपने प्रजाजनों को नीरोग स्वस्थ रक् ॥ ६॥ सं त्यो नहयामि पय॑सा पृथिव्याः सं त्वां नह्याम पयुसौर्ष- धीनाम् । सं त्वां नह्याम मुजया धनेन सा संनद्धा सनुहि वाजमेमम् ॥ ७० ॥ (१३) सम् । त्वा । नह्याम । पय॑सा । पृथिव्याः । सेस् । त्वा । नह्यामि । पय॑सा । प्रोषधीनाम् ॥ सम् । त्वा । नहामि । मु-जयो । धनैन । सा । सम्-नद्धा । सुनुहि । वाजेस् । मा। हमम् ॥ ७० ॥ (१३) भाषार्थ-[हे प्रजा !] (त्वा ) तुझे (पृथिव्याः ) पृथिवी के (पयसा) बान से (सं नमामि ) मैं कवचधारी करता हूं, (त्वा ) तुझे (ओषधीनाम्.) मोषधियों [अन्न सोमलता आदि ] के ( पयसा) शान से (सनह्यामि) कवच- धारी करता हूं। (वा) तुझे (प्रजया) प्रजा [ सन्तान सेवक मादि] से और (धनेन) धन से (लं नह्यामि ) मैं कटिबद्ध करता हूं, (सा) सो तू [हे मजा!] (सममा) सन्म [ कटिबद्ध ] होकर ( इमम् ) यह ( वाजम् ) बल (मा)लय ओर से ( सनुह) दे ॥ ७० ॥ भावार्थ-राजा को योग्य है ऐसे ऐसे विद्यालयों को पनावे, जिन में. प्रजागण भूगर्भ विधा, भूतल विद्या, अन्नविधा, मोषधिविधा भादि प्राप्त करके सम्मान और धन से बढ़ती करें और राजा को भी यथा योग्य सहायता देकर समर्थ बनाये ॥७०॥ -.. ७०-(वा) त्वां प्रजाम् (सं नह्यामि) सनद्धां धृतकवचा कटिबद्धा : करोमि (पयसा).पय-प्रता-असुन् । ज्ञानेन (पृथिव्याः) ( त्वा) (सनद्यामि) (पयसा) (ोषधीनाम् ) अमसोमलतादीनाम् (त्या) (स नह्यामि) (प्रजया) सन्तानसेषकादिना (धनेन ) सम्पत्या (सा) सा त्वं प्रजे (संनद्रा) पटिक्वा ,सती ( सनुहि) षणु दाने । देहि (पाजम) बलम्-निमः। (मा) समन्तात् (इमम् ) मसिद्धम् ॥

. जनयावहै ॥ ०१ - । सू० २ [ ४८४ ] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ प्रमोहमस्मि सा त्वं सामाहमस्म्यक् त्वं द्यौरई पृथिवी त्वम् । ताविह संभवाय पुजामा प्रमः । अहम् । अस्मि । सा । स्वम्। साम। । अहम् । अस्मि । ऋक् । त्वम् । द्यौः। अहम् । पृथिवी । त्वम् ॥ तौ। हुह । सन् । भवाव । प्र-जाम् । प्रा । जनयाव है ॥ १ ॥ भाषार्य-[हे वधू! ] ( अहम् ) मैं [वर ] (अमः ) ज्ञानवान (अस्मि ) ,इं. (सा) सा (त्यम् ) [ज्ञानवती है ], (अहम् ) मैं (साम) सामवेद [ मोक्ष ज्ञान के समान सुखदायक ] (अस्मि ) हूं, (त्वम् ) तू (ऋक् ) ऋग्वेद फो ऋचा [ पदार्थो के गुणों की बड़ाई बताने वाली विद्या के तुल्य आनन्द देने पालो ] है. (अहम् ) मैं (योः) सूर्य [वृष्टि श्रादि करने वाले रवि के समान उपकारी] हूं, और (त्वम् ) तू (पृथिवी) पृथिवी [अन्नादि उत्पन्न करने वाली. भूमि के समान उत्तम सन्तान उत्पन्न करने वाली ] है । (तो) वे हम दोनों (इह ) यहां [गृहाश्रम में ] ( स भवात्र ) पराक्रमी होवें, और (प्रजाम् ) प्रजा [ उत्तम सन्तान ] को ( आ जनयारहै) उत्पन्न करें ॥ ७१ ॥ भावार्थ -वधूपर राज्य प्रबन्ध से सन्तुष्ट होकर और अनेक प्रकार की विद्या और सम्पत्ति की प्राप्ति और सुमन्तान की उत्पत्ति से सुखी हो। ७१ यह मन्त्र कुछ भेद से महर्षि दयानन्दकृत संस्कारविधि विवाह प्रक. रण में वधूवर के परस्पर प्रतिक्षा करने में व्याख्यात है। जनियन्ति नावग्रंवः पुचियन्ति सुदानवः । ७१- (श्रमः ) श्रम गतौ भोजने च-असुन्; मतुपो लोपः । शानवान् (महम् ) (अस्मि ) (सा) तादृशी ज्ञानवती (त्वम्) (साम) सामवेदेन मोक्षशानेन तुल्यः सुखदायकः (अहम् ) (अस्मि ) (ऋक् ) ऋग्वेदस्य वाणी । पदार्थगुणप्रकाशिकाविद्यावत् सुखप्रदा (त्वम् ) ( द्यौः ). सूर्यतुल्यवृष्ट्यादि. नोपकारकः (अहम् ) (पृथिवी) अनोत्पादयिनी, भूमिरिव सुसन्तानोत्पाद यित्री (त्वम् ) (तो) आवां वधूवरौ (ह) गृहाश्रमे (सभवाय) परा. कामिणौ भवाव (प्रजाम् ) सन्तानम (.मा जनयावहै ). उत्पादयाघहै.॥ .. -

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(३,१३६ )
अथर्ववेदभाष्ये सू० २ ४८४ ].
अरिष्टा सचेवहि वृहते वाजसातये ॥ १२ ॥
जुनि-यन्ति । नौ । भवः। पुनि-यन्ति । सु-दानवः ॥ अरि-
ष्टासु इत्यरिष्ठ-असू । सुचे वहि । बृहुते । वाज-नातये ॥७२॥
भाषार्थ-(अप्रवः ) उद्योगी, (सुदानवः ) बड़े दानी लोग (नौ)
हम दोनों के लिये ( अनियन्ति ) जनों भक्तजनों ] को चाहते हैं और (पुत्रि-
यन्ति) पुत्रों को चाहते हैं । (अरिष्टालू) विना नाश किये हुये प्राणों वाले सदा
पुरुषार्थी ] हम दोनों (बृहते ) बड़े ( वाजसातये ) विज्ञान, वल और अन्न के
दान के लिये (सचेवहि ) सदा मिले रहे ॥७२॥
भावार्थ-
-सव इष्ट मित्र यथावत् पुरुषार्थ से धन का व्यय करके
चाहते हैं कि उनके पुत्रों के उत्तम सन्तान उत्पन्न हो, इस लिये पुत्र और पतोहू.
प्रीति पूर्षक उपाय करें कि उत्तम सन्तान होने से उनको विज्ञान, चल और
अन्न आदि धन व । ७२ ॥
यह मन्म महर्षि दयानन्दकृत संस्कारविधि गृहाथम प्रकरण में व्या.
ख्यात है। इसका पूर्वार्ध कुछ भेन से ऋग्वेद में है--७१६६ ॥४॥
ये पितरों वधूदुर्शा इमं बहुतुमार्गमन् ।
ते अस्यै वृध्दै संपत्त्यै पुजाकुच्छर्म यच्छन्तु ॥ ७३ ॥
ये। पितरः। वधु-दर्शाः। इमम् । वहुतुम् । भा। अगमन् ॥
ते । अस्यै। वृध्दै । सम्-एल्यै । प्रजा-वत् । शर्म । यच्छन्तु ७३
७२-(जनियन्ति ) सुप प्रात्मनः प्रयच् । पा० ३.१ 1 = ! सन -क्यच् ।
अपुत्रादीनामिति वक्तव्यम् । वा० पा० । ४। ३५ । इति प्राप्तस्य ईत्वस्य
छान्दलो इस्वः। जनीयन्ति जनान् भक्तजनान् इच्छन्ति (नौ ) नावाभ्याम्
(अनवः) रशात्तिभ्यां मुने । उ० ४ ॥ १०३ । अग गतौ-छैन् । गन्तारः। उद्यो-
गिनः ( पुत्रियन्ति ) पुत्र-यचि, ईत्वस्य छान्दसो हस्वः । पुत्रीयन्ति । पुत्रान्
इच्छन्ति (सुदानवः ) सुदानित( परिष्टासू) रिष हिंसायाम्-क। अहिंसित-
प्राणौ । महापुरंपार्थिनी (सभेवहि.) षच समवाये विधिलिन् । नित्यसम्बन्धिनौ
भवेष (वृहते) महते (धाजसातये ) वाजानां विज्ञानलान्नानां दानाय ॥ ७३.॥

--re - सू०२ [ ४८४] चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ ( ३,९३७) भाषार्थ-(ये) जो (वधूवर्शाः) वधू के देखने पाक (पितरः) पिता भादि लोग ( इमम) इस (बहतुम.) विवाह उत्सव में (आ अगमन्) आये है। (ते ) वे सब (सम्पत्न्यै ) पति सहित वर्तमान (मस्यै बध्धै ) इस घधू को (प्रजापत्) प्रजा सन्तान, सेवक श्रादि जनता] वाला (शर्म) सुख (यच्छन्तु ) देवें ॥ ७३ ॥ भावार्थ-हितैषी बड़े लोगों का कर्तव्य है कि विद्वान् बलवान् वधूवर से विद्वान् , शूर, बीर सन्तान उत्पन होवें ॥ ७३ ॥ येदं पूर्वागन् रशनायमाना जानुस्य द्रविणं चे हदत्त्वा । तां वहुन्त्यगतस्यानु पन्या विराडियं सुमजा अत्यजैषीत् ॥३४॥ या। इदम् । पूर्वा। अन् पूर्वा। अन् । रशना-यमाना । रशना-यमाना। प्र-जाम् । अत्यै। द्रविणम् । च । दुह। दुत्त्वा ॥ ताम् ।. वहन्तु । भगतस्य । अनु' । पन्योस् । विराट् । हुयम् । सु-प्रजाः । अति । अजै पीत् ॥ ७४ ॥ भाषार्थ-(या) जो [वधू] (पूर्वा) पहिली [सब से ऊपर ] होकर (रंशनायमाना ) कटि बांधे हुये (इदम् ) इस [स्थान ] में ( अंगन् ) आवे, (अस्यै ) इस [व] के हित के लिये ( इह ) यहां (प्रजाम् ) प्रजा [सन्तान, सेवक आदि जनता] (च) और (द्रविणम् ) धन (दत्त्वा) देकर (ताम् ) उस को (अगतस्य ) विना प्राप्त हुये [आगे आने वाले काल] के (पन्थाम् ७३-(ये ).(पितरः) पित्रादयः (वधूदर्शाः) उशिर् दर्शने-अण् । वधू- दर्शकाः( इमम् ) दृश्यमानम् (वस्तुम् ) विवाहोत्सवम् (आगमन् ) आगताः (ते )पूर्वोक्ताः(अस्यै) विदुयै (वध्वै) (सम्पत्म्य) पत्यासह वर्तमानायै (प्रजावत्) सन्तानसेवकादियुक्तम् ( यच्छन्तु ) ददतु । ७४-या) वधूः (इदम् ) स्थानम् ( पूर्वा) प्रथमा । मुख्या (अगन् ) आगच्छतु ( रशनेयमाना) रशनों कटिबन्धन करोतीति रशनायते । तत्करोति तदांचष्टे । वा० पा०३।१।२६.। रशना-णिच, शानच् । कटिबन्धनं कुर्वाणा। सदा पुरुषार्थयुका (प्रजाम् ) सन्तानसेवकादिजनताम् (अस्यै) वधूहिताय (द्रविणम्) धनम् (इह) गृहाश्रमें (दुत्वा ) (ताम् )वधूम् -(वहन्तु), नयन्तु .

(३,१३८) अथर्ववेदभाध्ये सू०२ [ ४८४] अनु) मार्ग के पीछे पीछे (वहन्तु ) वे [पिता आदि ] ले चलें, (विराट) पड़े ऐश्वर्य वाली (इयम् ) यह (सुप्रजाः ) उत्तम जन्म वाली [वधू) (अति) अत्यन्त (अजैषीत् ) जय पावे ॥ ७४ ॥ भावार्थ -~लव बड़े लोग सेवक धन आदि से प्रयत्न करें कि महावि- दुषी, पुरुषार्थिनी, स्त्रीरत्न कुलवधू उत्तम सन्तान उत्पन्न करके श्रागे को यश चढ़ावे ॥ ४॥ प्र धु'ध्यस्व. सुबुधा बुध्यमाना दीर्घायुक्त्वार्य शुरुशारदाय । गुहान् गच्छ गृहपत्नी यथास । दीर्घ त भायु': सविता कृणोतु ॥ १५ ॥ (१४) प्रे.। बुध्यस्व । सु-बुधो । बुध्यमाना। दीर्घायु-त्थाय । शुत- शोरदाय । गृहान् । गच्छु । गृह-पत्नी । यो । असः । दीर्घम् । ते । प्रायु': । सविता | कृणोतु ॥ ७५ ॥ (१४ ) भाषार्थ-[हे पत्नी !] तू (शतशारदाय) सौ वर्ष तक (दीर्घायुत्त्वाय) दीर्घ जीवन पाने के लिये (सुबुधा) उत्तम बुद्धि वाली और (बुध्यमांना ) सावधान रहकर (प्र बुध्यत्व ) जागती रहे । (गृहान् ) घरों [घर के पदार्थो] को (गच्छ ) प्राप्त हो, (यथा ) जिस से तू (गृहपत्नी) गृहपत्ती (मला) होवे, (.सविता ) सब ऐश्वर्य वाला परमात्मा (ते) तेरे (आयुः ) जीवन को (दीर्घम् ) दीर्घ (कृणोतु ) करे ॥ ७५ ॥ . (अंगतस्य ) अप्रोप्तस्य । अनागतस्य कालस्य (अनु) अनुसृत्य ( पन्थाम् ) पन्धानम् ( विराट् ) विविधैश्वर्यवती (श्यम् ) गुणवती (सुपजाः)जनी-विट् । सुजन्मा संती (अति) अत्यन्तम् (अजैपीत् ) जयेत् ।। ७५-(प्र वुध्यस्व ) प्रकर्षेण जागृता वर्तस्वं (उबुधा) उत्तमबुद्धिमतो (बुध्यमाना ) सावधाना (दीर्घायुत्वाय ) दोर्घजीवनप्राप्तये (शतशारदाय) शतवर्षयुक्ताय (गृहान् ) गृहपदार्थान् (गच्छ) प्रामुहि (गृहपत्नी) गृहस्वामिनी. (यथा ) येन प्रकारेण (अस) त्वं भवेः (दीर्थम्) (ते) तव (आयुः) जीवनम् ( सविता) परमैश्वर्यवान जगदीश्वरः (कृणोतु ) करोतु ॥ .

सू०२ [४८४] . चतुर्दशं काण्डम् ॥ १४ ॥ (३,१३६) भावार्थ-पत्नी को योग्य है कि परमात्मा का सदा ध्यान करके गृह- कार्यों में सावधान रहकर और चिरंजीविनी होकर कुल की वृद्धि करे॥ ७५ ॥ यह मन्त्र महर्षि दयानन्दकृत संस्कारविधि गृहाश्रम प्रकरण में व्याख्यात है। इति द्वितीयोऽनुवाकः॥ इति चतुर्दशं काण्डम् ॥ इति श्रीमद्राजाधिराजप्रथितमहागुणमहिम श्री सयाजीराव गायका- पाड़ाधिष्ठित बड़ोदे पुरीगतश्रावणमासपरीयांक्षाम् ऋफ्सामाथर्ववेदभाष्येषु लब्धदक्षिणेन श्री पण्डित क्षेमकरण दास विवेदिना कृते अथर्ववेदभाष्ये चतुर्दशं कारांड समाप्तम् - O इदं काण्ड प्रयागनगरे भाद्रमासे शुक्षपञ्चम्यां तिथौ १९७५ [ पञ्चसप्तत्युत्तर एकोनविंशतिशतके. ] विक्रमीये संवत्सरे धीर-वीर-चिरप्रतापि-महायशस्वि श्रीराजराजेश्वर पञ्चमजार्ज महोदयस्य सुसाम्राज्ये सुसमाप्तिमगात् '. मुद्रितम्-श्राविश्नकृष्णा ५ संवत् १६७५ वि० ता०२५ सितम्बर १९१८ ई० ॥

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- अथर्ववेदभाष्य सम्मतियां ॥ श्रीमती मार्य प्रतिनिधिसभा, पंजाब, गुरुदत्त भवन लाहौर अन्तरंग सभा के प्रस्ताव संख्या ३ तिथि ६-१२-७३ की प्रति । ला० दीवान चन्द प्रतिनिधि आर्य समाज बटाला का प्रस्ताव, कि पं०ोम- फरणदाल को अथर्ववेर भाष्य के लिये ४०) मासिक की सहायता दी जावे, उपस्थित हुआ। निश्चय हुआ कि २५) मासिक की सहायता एक वर्ष के लिये दी जावे और उसके परिवर्तन में उतने मूल्य की पुस्तके उनसे स्वीकार की जावें ॥ श्रीमती मार्यप्रतिनिधि सभा संयुक्त प्रदेश प्रागरा और प्रवध, स्थान बुलन्दशहर, अन्तरंग सभा ता० ४ जून १८१६ ई० के निश्चय संख्या १३ (अ) और (ब) की लिपि । (अ) समाजों में गश्ती चिट्ठी भेजी जावं कि वे इस भाष्य के ग्राहक बने तथा अन्यों को बनाये। (व) सभा सम्प्रति १ वर्ष पर्यन्त १५) मासिक एक क्लर्क के लिये पं० क्षम- करणदास जी को देवे, जिसका विल उक्त पंडित जी कार्यालय सभा में भेजते रहे । इस धन के बदले में पंडित जी उतने धन की पुस्तकें सभा को देंगे। लिपि गश्ती चिट्ठी श्रीमती प्रार्यप्रतिनिधि सभा जो पूर्वोक्त निश्चय के अनुसार समाजों को भेजी गयी ( संख्या ३८७६ प्राप्त २० जूलाई १८१६ ई०) .॥ ओ३म् ॥ मान्यवर, नमस्ते। आपको ज्ञात होगा कि आर्यसमाज के अनुभवी वयोवृद्ध विद्वान् श्री पं० क्षमरणयाम त्रिवेदी गत कई वर्षों से बड़ी योग्यता पूर्वक अथर्ववेद का भाष्य कर रहे हैं। आप ने महर्षि दयानन्द के अनुसार ही इस भाष्य का करने का प्रयत्न किया है। भाग्य काण्डों में निकलता है अब तक ६ कांड निकल चुके हैं। नार्यसमाज के वैदिक साहित्य सम्बन्ध से वस्तुतः यह बड़ा महत्वपूर्णकार्य होरहा है। निवेदी महाशय के भाष्य की जानकारी-ने खूब प्रशंसा की है। परन्तु खेद है कि अभी भार्यसमाज में उच्च कोटिके साहित्य को पढ़ने की ओर लोगों की बहुत कम रुचि है। जिसके कारण त्रिवेदी जी अर्थ हानि उठा रहे । भाष्य के ग्राहक बहुत कम हैं । लागत तक वसूल नहीं होती वेदों का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना आर्यमान का प्रधान कर्तव्य है। अतएवं सविनय निवेदन है कि वैदिक धर्मामान श्री त्रिवेदी जी को उनके महत्त्वपूर्ण गुरुतर कार्य में साहस प्रदान करें। स्वयम् ग्राहक बने और दूसरों को बनाये। ऐसाकरने से भाष्यकार महाशय उले छापने की अर्थ सम्बन्धिनी चिन्ताओं से मुक्त होकर भाष्य को और भी अधिक उत्तमता से सम्पादन करने की ओर प्रवृत्त होंगे। श्राशा है कि वेदों के.प्रेमी उक्त प्रार्थना पर ध्यान दे इस ओर अपना कुछ कर्तव्य समझेगे। प्रत्येक आर्य के घर में वेदों के भाग्य होने चाहिए। समाजके पुस्तकालयों में तो उनका रखना बहुत ही जरूरी है । भाष्य के प्रत्येक कांड का मूल्य त्रिवेदी जी ने बहुत ही थोड़ा रक्खा है। त्रिवेदी जी से पत्र व्यवहार ५२ लूकरगंज, प्रयाग के पते पर कीजिये। जल्दी से भाष्य मंगाइये। भवदीय- नन्दलाल सिंह, चिट्ठी संख्या २७० तिथि १०-१२-१५१४ । कार्यालय श्रीमती प्रार्य- प्रतिनिधि सभा, संयुक्तप्रान्त मागरा व अवध, बुलन्दशहर । आपका पत्र संख्या १०१ तथा अथर्ववेद भाष्य का तृतीय कांड मिला। इस कृपा के लिये अनेक धन्यवाद है। वास्तव में आप आर्यसमाज के साहित्य को समृद्धि शाली बनाने में बड़ा कार्य कर रहे हैं, आपकी .विद्वत्ता और कृपा के लिये आर्य संसार ही नहीं, प्रत्युत प्रत्येक शिखा सूत्रधारी को प्रभारी होना चाहिये । ईश्वर श्राप को उत्तरोत्तर उस महत्वपूर्ण कार्य के सम्पादन और समाप्त करने के लिये शक्ति प्रदान करें, ऐसे उपयोगी अन्य प्रकाशन को आप सदैव जारी रस्म यही प्रार्थना है। भवदीय मदनमोहन सेठ (एम० ए० एल० एल० वी०) मन्त्री सभा। भीमान् पण्डित तुलसीराम स्वामी--प्रधान त्रार्य प्रतिनिधि सभा संयुक्तप्रान्त, सामवेद भाष्यकार, सरूपादक वेदप्रकाश, मेरठ-१६१३ । ऋग्यजुर्वेद का भाप्य श्रीवामी दयानन्द सरस्वती जी ने संस्कृत और भाषा में किया है, सामवेद का श्री पं० तुलसीराम स्वामी ने किया है, अथर्ववेद के भाष्य की बड़ी आवश्यकता थी। पं० क्षेमकरणदास जी प्रयाग निवासी ने इस प्रभाव को दूर करना प्रारम्भ कर दिया है । भाष्य का क्रम अच्छा है। यदि इसी प्रकार समस्त भाष्य बन गया, जो हमारी समझ में कठिन है, तो चारो वेदों के भाषा भाष्य मिलने लगेंगे, पार्यों का उपकार होगा। श्रीयुत महाशय नारायणप्रसाद जी-मुख्याधिष्ठाता गुरुकुल वृन्दावन मथुरा-उपप्रधान आर्य प्रतिनिधि सभा, संयुक्तप्रान्त । श्रार्यमित्र आगरा, जनवरी १६१३ । श्री पं० क्षेमकरदास त्रिवेदी प्रयाग निवासी, ऋक् साम तथा अधर्ववेद सम्बन्धी परीक्षोत्तीर्ण अथर्ववेद का भाषा भाष्य करते हैं, मैंने सम्पूर्ण [प्रथम ] कांड का पाठ किया। त्रिवेदी जी का भाष्य ऋषि दयानन्द जी की शैली के अनु- सार भावपूर्ण संक्षिप्त और स्पष्टतया प्रकट करने वाला है कि मन्त के किस शब्द के स्थान में भाषा का कौनसा शब्द आया, फिर नोटों में व्याकरण तथा निरुक्त के प्रमाण, प्रारम्भ में एक उपयोगी भूमिका दे देने से भाष्य की उप- योगिता और भी बढ़ गई है, निदान भाष्य प्रत्युत्सम, आर्यसमाज का पक्षपोषक और इस योग्य है कि प्रत्येक आर्यसमाज उसकी एक २ पोथी (कापी) अपने पुस्तकालय में रक्खे। त्रिवेदी जी ने इस भाष्य का प्रारम्भ करके एक बड़ी कमी के पूर्ण करने का ( ५ ) उद्योग किया है। ईश्वर उनको पल तथा वेद प्रेमी आवश्यक सहायता प्रदान करें निर्धिनता के साथ वह शुभ कार्य पूरा हो...छपाई और काग़ज भी अच्छा है। श्रीयुत महाशय सुन्शीराम जी-जिशा-मुख्याधिष्ठाता कुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार-पत्र संख्या ६४ तिथि २७~१०-१९६६ । अथर्ववेद भाष्य श्राप का दिया व किया हुभा अवकाशानुसार तीसरे हिस्से के लगभग देख चुका हूं पाप का परिश्रम सराहनीय है। तथा-पल संख्या ११४ तिथि २२-१२-१६५8 । अवलोकन करने से भाष्य उत्तम प्रतीत हुआ। - श्रीयुत पं० शिवशंक्षर शर्मा काव्यतीर्थ- छान्दोग्योपनिषद् भाष्य- कार, देदतत्त्वादि ग्रंथकर्ता वेदाध्यापफ कांगड़ी गुरुकुल .महाविद्यालय, आदि आदि सम्पादक आर्यमित्र - फ़रवरी १९१३ । अथर्ववेद भाप्य । श्री पं० क्षेमकरण दास त्रिवेदी जी का यह परिश्रम प्रंश- सनीय है।......आप बहुत दिनो तक सरकारी नौकरी कर और अब वहां से पेन्शन पाके अपना सम्पूर्ण समय संस्कृत पढ़ने में लगाने लगे। अन्ततः नापने घेदों में विशेष परिश्रम कर बड़ौदा राजधानी में वेदो की परीक्षा दी और उनमें उत्तीर्ण हो त्रिवेदी बने हैं। श्राप परिश्रमी और अनुभवी वृद्ध पुरुष हैं। आप का अथर्ववेदीय भाष्य पढ़ने योग्य है। श्रीयुत पंडित भीमसेन शर्मा इटावा-उपनिषद् गीतावि भाष्यकर्ता वेदाव्याख्याता कलकत्ता यूनीवर्सिटी, सम्पादक ब्राह्मण सर्वस्व इटावा, फरः वरी १६१३॥ अथर्ववेदभाप्य-से प्रयाग के परिडत क्षमकरणदास निघेदी ने प्रकाशित किया। इसका क्रम ऐसा रखा गया है कि प्रथम तो प्रत्येक सूक्त के प्रारम्भ में......अभिप्राय यह है कि भाष्य का ढंग अच्छा है"भाज्यकर्ता के मानसिक विचारों का झुकाव आर्यसामाजिक सिद्धान्तों की तरफ़ है. अतएव भाष्य भी आर्य सामाजिक शैली का हुआ है। तब भी कई अंशों में स्वामी दयानन्द के भाग्य से अच्छा है। और यह प्रणाली तो बहुत ठीक है। श्रीमती पंडिता शिवप्यारी देवी जी, १६७ हकीम देवी प्रसाद जी अतर- सुइया, प्रयाग, पन ता०२१-१०-१६१५ ॥ श्रीयुत पण्डित जी नमस्ते, महेवा के पते से आपका भेजा हुआ पत्र और अथर्ववेद भाष्य चौथा फांड मिला, मैं ने चारों कांड पढ़े, पढ़कर अत्यन्त आनन्द प्राप्त हुश्रा । आपने, हम समों पर अत्यंत कृपा की है आपको अनेको धन्यवाद है। आशा है कि पांचवां कांड भी शीघ्र तैयार होकर धी० पी० द्वारा मुझे मिलेगा। - .

। दो पुस्तक हवनमन्त्राः की जिसका मूल्य 1)। है कृपाकर भेज दीजिये मेरी एक बहिन को आवश्यकता है। श्रीयुत पण्डित महावीर प्रसाद द्विवेदी-कानपुर, सम्पादक सर- 1 स्वती प्रयाम, फरवरी १९१३ । अथर्ववेद भाष्य-श्रीयुत क्षेमकरणदास त्रिवेदी जी के वेदार्थज्ञान और श्रम का यह फल है, कि आप ने अथर्ववेद का भाष्य लिखना और क्रम कम ले प्रकाशित करना प्रारम्भ किया है...बड़ी विधि से श्राप भाष्य की रचना कर रहे हैं | स्वर सहित मूलमन्त्र, पद पाठ, हिन्दी में सान्वय अर्थ, भावार्थ पाठा- न्तर, टिप्पणी श्रादि से आपने अपने भाष्य को अलंकृत किया है:..आपकी राय है कि "वेदों में सार्वभौम विज्ञान का उपदेश है" | आपका भाष्य स्वामी दया- नन्द सरस्वती के वेदभाष्य के ढंग का है । श्रीयुत पण्डित गणेश प्रसाद शर्मा:-संपादक भारतसुदशाप्रवर्तक फतहगढ़, ता०.१२ अप्रैल १९१३ । हर्ष की बात है कि जिस वेद भाष्य की बड़ी आवश्यकता थी उसकी पूर्ति का श्रारम्भ होगया । वेद भाष्य बड़ी उत्तम शैली से निकलता है। प्रथम मन्त्र पुनः पदार्थयुक्त भाषार्थ, उपरान्त भावार्थ, और नोट में सन्देह निवृत्ति के लिये धात्वार्थ भी व्याकरण व निरुक्त के आधार पर किया गया है, वैदिक धर्म के प्रेमियों को कम से कम यह समझ कर भी ग्राहक होना चाहिये कि उनके मान्य ग्रन्थ का अनुवाद है और काम पड़े पर उससे कार्य लिया जा सकता है। ': ' बाबू कालिकाप्रसाद जी-लिल्क मर्चेन्ट कमनगढ़ा, बनारस सिटी संख्या ५८४ ता. २७-३-१३। आप का भेजा अथर्ववेदभाष्य का वी० पी० मिला, मैं आपका भाप्य देखकर बहुत प्रलन्न हुआ, परमेश्वर सहाय करे कि आप इसे इसी प्रकार पूर्ण करें। आप बहुत काम एक साथ न छेड़कर इसी की तरफ समाधि लगाकर पूर्ण करेंगे । मेरा नाम ग्राहकों में लिख लीजिये, जब २ अङ्क छपे मेरे पास भेज देना। श्रीयुत महाशय रावत हरप्रसाद सिंह जी वर्मा मु० एकडला पोस्ट 'किशुनपुर, जिला फतेहपुर हसवा, पंत्र ६ दिसम्बर- १६१३ । वास्तव में आप को किया हुशा."अथर्ववेद भाय। निष्पक्षता का आश्रय लिया चाहता है ।.श्राप ने यह साहस दिखाकर साहित्य भण्डार की एक बड़ी भारी न्यूनता को पूर्ण कर दिया है। ईश्वर आपको वेद भण्डारे फे आवश्य- कीय कार्यों के सम्पादन करने का बल प्रदान करें। श्रीयुत महाशय पंडित श्रीधर पाठक जी, ( सभापति हिन्दी साहित्य सम्मेलन. लखनऊ)-मनोविनोद.आदि अनेक प्रन्थों के कर्ता, 'सुपरिन्टेन्डेन्ट गवर्नमेंट सेक्रेटरियट, पी० डब्ल्यू. डी० श्री प्रयागराज, पत्र ता० १७-8-१३ । . ।

14510 आपका अथर्व चेदभाष्य अवलोकन कर चित्त अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ। भाप की यह पारिहत्य-पूर्ण कृति वेदार्थ जिज्ञासुओं को बहुत हितकारिणी होगी। आप का व्याख्यानाम परम मनोरम तथा प्रांजल है, और ग्रन्थ सर्वथा उपादेय है। प्रकाश लाहौर १२ पापाढ़ संवत् १८७३ ( २५ जून १८१८- लेखक श्रीयुत पं श्रीपाद दामोदर सातवलेकर जी) हम परिडव मकरणदास जी का धन्यवाद करने से नहीं रह सकते- स्वामी ( दयानन्द ) जी ने लिखा है-कि वेद का पढ़ना पढ़ाना श्रार्यों को परम धर्म है-इसके अनुकुल श्री पंडित जी अपना समय वेद अध्ययन में लगाते है-और आर्यों के लिये परम उपयोगी पुस्तक प्रकाशित करने में पुरुषार्थ फरते रहते है--पंडित जी ने इस समय तक हपन मन्त्री तथा मद्राध्याय का भाषा में अर्थ प्रसिब किया है-जो कि आर्यों के लिये पठन पाठन में उपयोगी हैं। इस सम्यन्ध में यह अधर्ववेद के पांच पांड छपवा कर निःसन्देह बड़ा लाम पहुंचाया है। पार्यों की जो शिक्षा प्रणाली थी उसको टूटे श्राज पांच एजार वर्ष हो चुके हैं । ऐसे अंधेरे के समय स्वामी जी ने वेद के ऊपर लोगों के भीतर रद विश्वास उत्पन्न करके एक धर्म का दीपक प्रकाशित किया। परन्तु हमें शोक यह है येह के पढ़ने पढ़ाने में प्रार्य नोग इतना समय नहीं लगाते जितना वे प्रबन्ध सम्बन्धी झगड़ों को बातों में लगाते हैं । हमारा विश्वास है कि जब तक पं० से वेदाभ्यासी परुषार्थी लोग अपना समय वेदों के खोज आर्य समाज का कोई गौरव नहीं बढ़ सकता । अथर्ववेद ही कठिनता है । इसके ऊपर सायण भाप्य उपलब्ध नहीं है क छपा हुआ है वह बड़ी अधूरी दशा में है, सूक्त के हूँ कार अब तक कोई टीका नहीं हुई। ....इस सा । भाष्य पंडित जी ने प्रका- शित किया है उसके लिखने पौर सुगम है। प्रथम उन्होंने सूक के तथा मन्त्रों के देवता :...विद्वानों का यहो काम है कि वह जैसे जैसे साधन उन सोचकर वेद मन्त्रों का अर्थ प्रकाशित करें। ऐसे में गे, तव सच्चे अर्थ खोज फरना आगामी विद्वानों को र स समय बड़ी भारी कठिं. नाई यह है कि प्रकाशित पुस्त ख्या में ग्राहक नहीं मिलते हैं और विद्वानों के पास सम्म के कारण हानि के डर से पुस्तकों का प्रकाशित करना। लिये सब आर्यों को परम उचित है कि पंडित क्षमकर.. न् पुरुषार्थी के ग्रन्थ मोल लेकर उनको भन्य ग्रन्थ प्रकाशित करने की आशा देते रहे । त्रिवेदी जी कोई धनाट्य पुरुष नहीं है, उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति जो कुछ उनके पास है ..त्रिवेदी जी ने जो कुछ किया है वह वैदिक धर्म के प्रेम से प्रवृत्त होकर-इस लिये न केवल सव आर्य पुरुषों का यह कर्तव्य है कि इस भाष्य को मोल लेकर त्रिवेदी जी को उत्साहित करें किन्तु धनाढ्य आर्य पुरुषों का यह भी कर्तव्य है कि उनकी आर्थिक सहायता करें। लगा दी है....

( 5 ) The VIDYADHIKARI (Minister of Education), Baroda Slatt, Letter No. 624 dated 6th February 1913. ... It has been decided to purchase 20 copies of your book entitled gyalag ArcGF. It has been sanctioned for use of the library and the prize distribution. Please send them..,also add on the address lable "For Encouragement Fund.'. RAI THAKUR DATTA RETIRED DISTRICT JUDGE, Dera Ismai! Khan. Letter dated March 25th, 1914. The Atharva Veda Bhashya:-It is a gigantic task and speaks volumes for your energies and perseverance that you should have undertaken at an advanced age. I wish I had a portion of your will. power. Letter dated 30th April 1914. I very much admire your labour of lore and hope...the venture will not fail for want of pecuniary support, . THE MAGISTRATE OF ALLAHABAD. Letter No. 912 dated 21st May 1915 Has'the honour to request bim to be so good as to send a copy each of the 1st and 3rd Kandas of Atharva Veda Bhashya to this office for transmission to the India Office, London . THE ARYA PATRIKA LAHORE, APRIL 18, 1914. THE Atharva Veda Bhashya or commentary on the Atharva Veda which is being published in parts by Pandit Khem Karani Das Trivedi, does great credit to his energy, perseverance and scholarship. The first part contains the introduction and the first landa or Book. There is a learned disquisitiosi, on the origin of the Vedas and the pre-eminent position in Sanskrit literature...... The arrangement is good, the original Mantra is followed by ac literal translation and their Bhavarth or purport in Arya Bhasha. The footootcs are copious they give the dérivation and meaning in Sanskrit of the various words quoting the authority of Ashtadhyayi of Panini, Unadikosha of Dayananda, Nirukia of Yaska, Yoga Darshana of Patanjali and other standard ancient works..... The Pandit appears to have laboured very hard and the Book before us does credit to his erudition; scholars may not agree with certain of his renderings, but like a frue. Arya, who vencrates the Vedas, he has made an bonest attempt to and in the Vedic verses something which will elevate and ennoble mankind. Cross references to verses where the word has already occurred in this Veda are also given to enable the re der to compare notes. There can be no finality in Vedic interpretation, but honest attempts like these which shall render the task easy to others are coniinendable, We are glad to call public attention to this scholarly work, and hope that Pandit Khem Karan Das Trivedi will get the encouragement which he so richly deserves...... Our earnest request is that the revered Pandit will go on with this noble work and try to finish the whole before he is called to eternal rest...... V.B.- The printing and paper are good, the price is moderate.

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Atharved Bhashyam Chaturdash Kandam

Author
Trivedi, Kshemakarandas
Title
Atharved Bhashyam Chaturdash Kandam
File name
Atharved Bhashyam Chaturdash Kandam
Text
OCR done
Citation
1918
Published
2009/10
Publisher
Lucknow, Munshi Navalkishor Press
Language
Sanskrit
Pages
122
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Atharved
DLI number
344206
Barcode
99999990234084.00
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Banasthali University
Digital publisher
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