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Raja Shangh Malika

2011/03

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मल्लिका

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जरासंध मल्लिका अनुवादक व्रजगोपालदास अग्रवाल

भूमिका
संसार में जो वस्तु जितनी दुर्जेय और दुलंध्य
होती है, उसके विपय में आदमी के मन में उतना ही
कौतूहल रहता है। मेरे लिए यह सिर्फ एक दार्शनिक
सत्य नही। श्रीकान्त की भाषा में 'बार-बार ठेके शेखा
सत्य' (बार-बार अनुभूत सत्य) है। हिसाव लगाया
जाए तो पता चलेगा कि तीन भाग 'लौह-कपाट' लिखने
में मुझे जितना समय और शक्ति खर्च करनी पड़ी थी,
उसकी तुलना में गत दस वर्षों में उसके पाठक-वर्ग के
असंख्य प्रश्नों के जवाब देने में समय तो शायद कुछ कम
लगा हो, मगर शक्ति और श्रम कही अधिक लगाना
पड़ा है । वह जवाब नहीं, एक प्रकार की जवाबदेही है।
मगर उन सारे प्रश्नों के पीछे क्या सिर्फ कौतूहल
या क्यूरियोसिटी है ? वीच-बीच में मुझे लगा है कि
नहीं, और भी कुछ है--कोई गहरी रुचि है, जो उसीके
लिए जाग्रत होता है, जिसे हम प्रियजन या प्रिय वस्तु
कहते है । यदि यही बात है, तो मैंने इन तीन खण्डों में
जिन लोगों की बात कही है, उन्हें शायद मेरे कुछ
पाठक-पाठिकाओं के निकट आत्मीयजनों के रूप में
स्वीकृति मिली है । इसके लिए मेरा गौरव चाहे जितना

- हो, कृतित्व वहुत ही सामान्य है, इस बात के प्रति में पूरी तरह जागल्क हूं। मैं जानता हूं, इसके मूल में मेरे वणित चरित्रों की विचित्र प्रकृति एवं आश्चर्यजनक जीवन है। एक विशेष नारी-चरित्र को लेकर मेरे पाठक- समुदाय के प्रश्नवाणों ने मुझे बुरी तरह वेवा है । उसका नाम है मल्लिका-'लौह-कपाट', द्वितीय पर्व, चतुर्व परि- ज्छेद में वर्णित दी कहानो को नायिका। इन प्रश्नों को भापा-शैली अलग-अलग होते हुए भी जाति प्राय: एक ही है और उनमें जिज्ञासा को जगह शिकायत का स्वर हो अधिक मुखर है। अर्थात् वे सिर्फ प्रश्न नहीं, प्रश्नवाण; जिज्ञासा के वहाने शिकायत और अभियोग। " 'लौह-कपाट' के ढेर सारे स्त्री-पुरुपों के बीच इस लड़को को क्यों ढकेल दिया? उन लोगों के साथ इसका मेल कहां है ?" "मल्लिका-चरित्र की एक जो विशिष्टता है, वह लौह-कपाट के अन्यतम चरित्र की दृष्टि से कतई स्पष्ट नहीं हुई।" "मल्लिका हर दृष्टि से अनन्य है; उसे अन्य सव कैदियों के साथ एकासन पर बिठाकर क्या उसके साथ अन्याय नहीं किया गया ?" "मल्लिका-मतीश को आश्चर्यजनक कहानी में जो सब उपादान हैं, उनसे एक बहुत अच्छा उपन्यास लिखा जा सकता था। ऐसा न कर उसे काट-छांटकर एक अध्याय में भर देने का उद्देश्य क्या है ?" " 'मल्लिका' आपका सबसे अधिक करुण, सबसे ज्यादा मधुर चरित्र है । उसकी बात और भी सुनने की ..

-
इच्छा करती है। यह कहानी इतनी जल्दी खत्म क्यों
कर दी?"
"लौह-कपाट के अन्यान्य चरित्रों की सृष्टि करने
में आपने बड़े दरदी मन का परिचय दिया है। मल्लिका
की वारी में उस दृष्टि में कंजूसी दिखाई दी है । लगता
है, जैसे छुटकारा पाने की नीयत से पूरा किया है।"
"मैं कहूंगा, मल्लिका आपकी 'काव्य की उपेक्षिता'
है। आपने जानबूझकर उसकी अवहेलना की है।"
इत्यादि...
इनके उत्तरों के प्रसंग में 'लौह-कपाट' पर डॉक्टर
श्रीकुमार वद्योपाध्याय महाशय की कुछेक उक्तियां
उद्धत करना चाहता हूं--विज्ञापन के उद्देश्य से नहीं
(तव तो विशेष रूप से प्रशंसा-ज्ञापक अश छांटे जाते),
अपना वक्तव्य सुगम करने के लिए। 'कारा साहित्य'
शीर्षक प्रबध मे उन्होने कहा है, " 'लौह-कपाट' ठीक
उपन्यास नही, बहुत-से उपन्यासधर्मी खण्डों और स्वयं
सम्पूर्ण कहानियों को समष्टि है। इससे उपन्यास को
सुविधा है, असुविधा नहीं। घटनाओं का सूत्र नहीं
पकड़ना पड़ेगा, कहानी और चरित्रों की संगति नहीं
दिखानी पड़ेगी, चरम परिणति का दायित्व ग्रहण नही
करना पड़ेगा। लेखक की दृष्टि मे जितना आया है,
उसमे जो आवेग और अन्तर्द्वन्द्व घनीभूत हो उठा है,
उसे चित्रित करके हो लेखक की छुट्टी, दायित्व की
इति। जहां यवनिका पतन हुआ है, उसके और आगे
जाने का हुक्म कौतूहल को नहीं है। गोया कि यह
साहित्य-राज्य में जेल कोड का प्रयोग है।"
पर लगता है कि मेरे पाठकों का एक दल कम से

कम मल्लिका के वक्त इस जेल-कोडवाले अनुशासन को
मानने के लिए तैयार नहीं। कारण शायद यही है कि
इस आख्यायिका में जीवन की व्याप्ति और वैचित्र्य न
होते हुए भी डॉक्टर बैनर्जी के शब्दों में 'जीवन-समा-
लोचना की करुण समवेदना-स्निग्ध यथार्थता' कुछ
परिमाण में निहित है। अन्यान्य चरित्रों की तुलना
में
इसमें उपन्यास के उपादान अधिक हैं, यह बात मैं
अस्वीकार नहीं करता । सम्भवतः उपन्यास की
'असुविधा' से बचने के लिए ही उस दिन इसे 'हाथ-पैर
बांधकर लौह-कपाट के घेरे में डाल दिया था' (एक
पाठक का मत)।
कुछेक अव्यावसायिक नाट्य-संस्थाओं ने इस
कहानी को नाट्य-रूप में विभिन्न रंगालयों में मंचस्थ
किया है। रेडियो से भी इसका अभिनय प्रसारित हो
चुका है। वह सब देखने-सुनने के बाद ऐसा लगा है कि
कहानी को नाटक का आकार देने में उन लोगों को जो
असुविधाएं हुईं-कथोपकथन आदि को लेकर वे सब
एक पूर्णांग उपन्यास हाथ में होने पर शायद टल सकती
थीं।
पिछले कई वर्षों से वीच-बीच में मेरे मन में
'मल्लिका-उद्धार' की वात उठ रही है, मगर यह निहा-
यत आसान काम नहीं। 'लौह-कपाट' के अंग से इस
परिच्छेद को काटकर अलग कर देने से ही काम नहीं
चलेगा, इसे फिर से नये रूप में गढ़ना पड़ेगा। अर्थात्
यहां-वहां एकाध परिवर्तन नहीं, एकवारगी पुनर्गठन !
यह उसका मात्र रूपान्तर नहीं, नव जन्मलाभ है ।
---जरासंध

और दो शब्द 'मल्लिका' के विषय में लेखक की इस लंबी भूमिका के बाद और कुछ कहना ममीचीन नहीं जान पड़ता। मूल पुस्तक पढ़कर पाठकों ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की, वह कहां तक सही है, इस बात का निर्णय हिन्दी पाठक स्वयं करेंगे, मैं इतना ही कहना चाहता हूं। इस पुस्तक के दूसरे उपन्यास 'वाधिन' की नायिका "वनानी' नारी के भीतर छिपी वन-कठोरता का ज्वलंत उदाहरण है। प्रतिगोध की ज्वाला में उसका बाधिन- स्वरूप इस तरह निखरा है कि पाठक अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता। पुस्तक के अनुवाद में श्रीमती संध्या मुखी और. सुश्री मंजु दासगुप्त से जो सहायता मिली, उसके लिए, मैं दोनों का आभारी हूं। -अजगोपालदास अग्रवाल

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मल्लिका रवीन्द्रनाय नै मानी 'काय की मेक्षिताएं' में कहा है--- संस्कृत माहिर में काम्ययनशाला के सीमाप्रदेश में जिन दुक बनानाओं के माय मेरा परिचर हुमा है, उनमें तमिया को प्रधान स्थान देता हूँ। पोचता हूं, इसका एक कारण यह है कि ऐसा मयुर नाम मस्त काव्य में और दूनरा नहीं।' कवि की इन दक्ति में ही अनुमान लला नकता हूं कि यह नान न होता. तो मनकार रामायण की मुद्री गोमापात्रा में यह दुराचाप बनने वाली बारिता वय पर मापद उनकी नजर न पड़ती। के "चिरमाभितप्त नम्र नना' लावारि मित्रन कर दे इस 'मिना' को हमारे हृदयान पर दिठा गए हैं, मने भी वह वंचित रह आठी। मैं वात्र निमकी वाट बजाने देशहूं, दह काय वीक्षिका नहीं, नादन के निकट शिता, मंमार के निकट 'दंचिता है। यदि उनका नार एकाएक मग रास्ता रोककरमड़ा न हुवा होता, नी में नीमको संसा कर बचा जाता। अमिला के माप उमान दिली बार उमारा परिचय किमी काम-नागाला अथवा माहित के ननदन में नहीं हुआ। परिश्रम का या ऐसी जगह, यहां यह नाम निकालापित नहीं, उस परिवेश में मंगटनी है। मापद यही जननी कारण था कि नाम के अन्तराल में जो व्यक्ति है, उसे भी जानने और उससे भी ज्यादा लाविष्कार करने का नशा उस दिन मुझपर अधिकार कर बैठा था। सिर्फ माधुर्य का नाकर्षण मुझे शायद इतनी दूर न ले जाता। जिस कहानी के परिचय में मैंने इतनी लम्बी-चौड़ी हांकी है, वह मेरे निकट भी अज्ञात रह जाती। सन चालीस-इकतालीस की बात है । एक पुलिस-अभियान को पूरा करने के लिए बड़ी जेल में तबादले पर आया हूं। तीस गांवों को लेकर दंगा हो गया है। बड़े पैमाने पर खून-खराबा, लूट, आगजनी और नारीमेघ यज्ञ । सब कुछ हो चुकने के बाद यथारोति पुलिस का आविर्भाव। पोड़ा-सा सकारण गोली-वर्पण । तत्पश्चात् बंधाधुंध घरपकड़ । जेल का लॉकअप-टोटल एक छलांग में कुछेक सौ से दो हजार तक जा पहुंचा है। रिकार्डरूम के रैक हटाकर अतिरिक्त स्टाफ के लिए जगह की गई है। विना जंगले के एक छोटे कमरे में हम तीन अफसर हैं। वीच में फैजुद्दीन साहब हैं, हम लोगों से कुछ सीनियर हैं, अत: उनकी मेज भी उसी मात्रा में खाली है। इस तरफ मैं हूं, उस तरफ नमल राहा । हम दोनों के आगे स्तूपाकार फाइलें रखी हैं । हम सभी नाम से 'एग्जिक्यूटिव', काम से बाबू हैं। दादा इसमें थोड़े-से व्यतिक्रम हैं। कलम रखकर वीच-बीच में लाठी लेकर निकल जाते हैं। इसी तरह एक दिन करीव घंटाभर चहलकदमी करने के बाद लौट, तो मेज पर नजर पड़ते ही चीख पड़े, "यह क्या ? ल्यूनटिक फाइल यहां क्यों ? तुम भी क्या पागल हो !" कहकर उन्होंने एक बड़ा बंडल मेरी मेज पर फेंक दिया। मैंने थोड़ी रसिकता की चेष्टा करते हुए कहा, "मैं पागल हूं? अच्छा, आपत्ति नहीं । 'प्रतिभा को साधारण लोग इसी नजर से देखते हैं।" "इनी लानन्द में रहो," फैजुद्दीन साहब ने व्यंग्य के स्वर में कहा । "एक बार पड़कर देखो न, क्या चीज है। दिमाग सराव कर देगा। फेल यों बड़ा दिलचस्प है। कल योड़ी नजर डाली थी। बड़े नामी घर की बहू है । खून किया था। बाद में पागल हो गई। देखो तो, फिल संक्शन । १२/मल्लिका 1 में कमिट किया है-४७१ या ४६६ ?" "यह सब क्या साप का मंत्र शुरू कर दिया ?" "पढकर समझ जाओगे, सांप का मंत्र है या कौन-सा मंत्र है। असली प्रश्न यह है-~असामी पागल-खूनी है, या खूनी-पागल ?" हाथ का काम छोड़कर फाइल खोच ली । यहा-वहां स्याही के दागों से भरा बदरंग कवर है, जिसके किनारे फट-फटा गए हैं । वहुत-से हाथों के स्पर्श से मलिन हो गया है। और उसके ऊपर चलते-फिरते लिखा गया एक नाम है-मल्लिका । मल्लिका गागुली । ऐसा कोई नया नाम नहीं। शायद पहले भी सुना होगा। फिर भी आंखें उसपर स्थिर हो गई। लगा कि यह सिर्फ नाम नही, चारो तरफ की इरा मलिनता- राशि के बीच एक बिन्दु-निर्मल शुभ्रता है। सर्वव्यापी अशुचि के बीच योड़ा-सा शुचि-स्पर्श है। फैजुद्दीन साहब अपनी दराज में से एक 'क्रिमिनल प्रॉसीजर कोड' निकालकर मेरे आगे रखते हुए विस्मय के स्वर मे बोले, "यह क्या ! कवर देखकर ही बेहोश हो गए ? यह लो, पहले ये दोनों सेक्शन अच्छी तरह पढकर देखो, नही तो केस अच्छी तरह नहीं समझोगे।" उसी क्षण केस समझने जमा मन मेरा नहीं था। उसका कोई तकाजा भी अनुभव नहीं किया। 'काव्य की उपेक्षिताए' मे आदमी के माधुर्य-प्रसंग को लेकर कवि ने लिखा है-'उसे हम लोग सिर्फ इन्द्रियों द्वारा प्राप्त नहीं करते, उसकी कल्पना द्वारा सृष्टि करते हैं । नाम सिर्फ उस सृष्टि-कार्य में सहायता करता है।' फाइल के ऊपर लिखे उस नाम का आश्रय लेकर मेरी कल्पना में भी उसी तरह एक मानवी मूर्ति ने जन्म लिया और वह अक्षरों का आवरण भेदकर धीरे-धीरे मेरी आंखो के आगे आकर खड़ी हो गई। मेरे मानस-लोक की मल्लिका। उसे मैंने मनपसन्द रूप दिया। नतमुखी तरुणी । अयल-क्लिष्ट दीर्घ क्षीण देह । माथे पर विसरे लये केश; आखो मे उद्भ्रान्त दृष्टि । चेहरा दिनान्त के मस्तिका-फुल.की तरह विपाद-मलिन। खून क्यों किया था ? सम्भव है, जीवन की कोई जटिल प्रति मल्लिका/१३ क्यों करता ? खोल पाई हो; अन्तर् का कोई गहन द्वन्द्व न मिटा पाई हो। सोचकर मन उदास हो गया । किसी एक अदृष्टा-अपरिचिता रहस्यमयी नारी के विध्वस्त जीवन के साथ एक प्रकार की आत्मीयता का अनुभव किया । तथ्य जो कुछ मिले, बड़े संक्षिप्त और अत्यधिक सरल थे। उनमें फैजुद्दीन साहब के प्रश्न का उत्तर तो शायद था, मगर वृद्धा पृथ्वी की उस चिरन्तन जिज्ञासा को उत्तर नहीं मिला -आदमी खून है ? वह कौन-सी दुर्जेय प्रवृत्ति है, जिसकी प्रताड़ना से उसके हृदय में नर-रक्त तृपा जागती है; आंखों की पलकों पर उसका अनन्त काल का मानव-धर्म-~~-दया-माया, स्नेह-प्रेम-सुन्न हो जाता है; जो हजारों साल की संस्कृति से तैयार हुए सभ्य मानव को एक क्षण में नखीदन्ती-शृंगी बना देती है कानून जितना कुछ देखता है, उसपर विचार करता है, वह उसका सिर्फ बाहरी रूप है। उसका काम, उसके हाथ-पैरों की अभि- व्यक्ति है--तुमने यह किया है, यह नहीं किया। इस करने और न करने के अन्तराल में उसका जो चिररहस्यावृत अन्तर्लोक है, वहां विचा- रफ (न्यायाधीश) की दृष्टि नहीं पहुंचती । फाइल देखकर पता चला कि मल्लिका ने खून किया था। बाद में सके हाथों में पहुंची, तो देखने में आया कि वह मानसिक रूप से मस्वस्थ है । विकृत मस्तिष्क वाले का मामला नहीं चलता। अभियोग का ममं वह नहीं समझेगी । अभियोग के खिलाफ स्वयं का समर्थन करने ती मनन-क्ति भी उसके पास नहीं। सिविल सर्जन का मत है । 'She is not fit to stand her trial.' इसीलिए जज साहब ने मामले की सुनवाई स्थगित कर दी है। यह विकृति यदि किसी दिन दूर हो जाती है, उसका मानसिक सन्तुलन लौट जाता है, तो उसे फिर अदालत में जाकर खड़ा होना पड़ेगा और अपना प्राप्य दंड ग्रहण करना पड़ेगा। उसे स्वस्थ-स्वाभाविक करने के लिए जो कुछ आवश्यक है, उसका दायित्व भी सरकार का है। पही कारण है कि जज साहब ने मामला स्थगित करके ही अपना कर्तव्य खत्म नहीं किया, उसकी उपयुक्त चिकित्सा का आदेश भी दिया है। १४ / मल्लिका - मल्लिका का गंतव्य स्थान है-रांची पागलसाना । वहां जब तक उसके लिए स्थान निर्दिष्ट नहीं होता, उसे जेल में रहना पड़ेगा। रांची के रास्ते अनिश्चितकाल के लिए यह कारावास । पिछले छः मास मल्लिका ने कलकत्ते को किसी बड़ी जेल मे, जनाने फाटक में, एक छोटै निर्जन कमरे में काटे हैं । वहाँ उसको नीरव उदासीनता हर बात के ऊपर थी। उसने किसीसे कोई प्रश्न नहीं किया, किमीके किसी प्रश्न का उत्तर भी नहीं दिया। जो संगिनी थी, उनमें किसीको भी वह पहचानती नहीं थी। उनके विराग-अनुराग दोनों के प्रति वह समदर्शी पी। एक दिन एक नई लड़की भर्ती हुई। गोद में दो- तीन महीने का बच्चा था। बच्चे को सुलाकर मां शायद नहाने या साने चती गई थी। लौटकर देखा कि बच्चे को गोद में लेकर उसके की पनी नजर से देख रही है वह 'पगली' । सर्वनाश ! उस लड़की की चीख सुनकर सभी दौड़े आए। बच्चे को जब उसकी गोद से खीच लिया, ती मल्लिका अपलक नेत्रों से सिर्फ देखती रह गई, फिर चुपचाप उठकर अपने उस छोटे सेल में जा घुसी। मा ने जेलर साहब से शिकायत की। अधिकारी लोग चिन्तित हो गए। मल्लिका के लिए स्पेशल गार्ड नियुक्त किया गया। उसका सेल सुबह से शाम तक बंद रहने लगा। इतने पर भी निश्चिन्त न हुए, तो अधिकारियों ने अन्त में उसे हमारी जेल में भेजने की व्यवस्था की । यहां जनाने वार्ड में बच्चे नहीं हैं। कुछ ही दिनों के भीतर वह मा गई । घोड़ा-गाड़ी का दरवाजा खोल- कर जव उसे उतारा गया तो एक बार गौर से देखा कि चारों तरफ जो लोग थे, सब मानो पत्थर हो गए हैं। पता चला कि हमारी कल्पना कितनी दीन, कितनी भीरु है । असली वस्तु के निकट जाने में भी डरती है । और पता चला कि विधाता के हाथ की अनिर्वचनीय सृष्टि का जो रूप है, उसे आदमी के हाथ की अनादर-अवहेलना किस दुर्गति में नहीं से जा सकती! मेरे जन्मस्थान में जो मकान है, उसकी बैठक के सामने एक अनार का पेड़ था । फागुन मे उसके सर्वांग पर सुन्दर चमकीले फूलों का मेला मल्लिका १५ राता था। वैशाख में रसभरे फलों का भार डाली-पत्तों को झुका या। एक बार न जाने कहां से एक झुंड हड्डों (कीड़ा विशेप) ने र उसकी डालियों पर अड्डा जमा लिया। हमारे एक बड़े ही अनुभवी से भावक ने उग हड्डों को उड़ाने के लिए एक दिन उस फल-फूल बनार-वृक्ष में आग लगा दी। उस वक्त में बच्चा था। आज भी द है, स्कूल से लौटकर उस पेड़ की जली डालों की ओर देखकर या था। जन्मस्थान छोड़कर आने के बाद भी जव-तब उसकी बात साद आ जाती थी। फिर मूल.गया था। आज इतने दिन बाद मल्लिका गांगुली की ओर नजर जाते ही वह दग्धपल्लव नष्टश्री वृक्ष मेरी आंखों के आगे तैरने लगा। हमारी फीमेल वार्डर मानदा विश्वास मल्लिका का हाथ पकड़कर उसे धीरे-धीरे मेरे दफ्तर में ले आई। एक कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए बोला, "वैठिए ।" वह नहीं बैठी। बड़ी-बड़ी नीली आंखें उठाकर मेरे चेहरे की तरह सिर्फ एक बार देखा। आश्चर्य हुआ। यह उन्माद की उद्भांत दृष्टि तो नहीं है । गांत-संयत मांखें हैं, जिनके अन्तराल में जाने कितने दिनों का पत्थर से दवा कंदन छिपा हुआ है । यदि वह पत्यर सरक जाए, तो अवरुद्ध अश्रु- धारा निकल जाएगी। सम्भव है, सारी दुनिया डूब जाए। वारण्ट में जो सूची है, उससे मिलान करने के लिए मानद उसके चीज-बन्यों-गहनों आदि के नाम बोलती जा रही थी। मैंने रोक कर कहा, "यह सब रहने दो, तुम इसे भीतर ले जाओ।" अगले सप्ताह 'नून ड्यूटी' का भार मेरे ऊपर पड़ा। यहां यह ब देना जरूरी है कि 'नून ड्यूटी' पूरी ड्यूटी नहीं, मध्याह्न-आराम उसका स्थान घर न होकर दफ्तर है। बस, यही थोड़ा-सा अन्तर मगर दफ्तर होते हुए भी गृह-सुलभ सुख-सुविधाओं में कमी नहीं रह 'मायात सेक्शन' की लंबी मेज का तख्त में रूपान्तर हो जाएगा। कपर तकिया और दरी के सहयोग से सुन्दर विस्त र तैयार हो जा गर्मियों के दिनों में सिर पर घूमता हुआ पंखा । जाड़ों में सीधा से निकाला कम्बल । खाली दफ्तर । चारों तरफ खामोशी । निव . १६ / मल्लिका का मनोरम परिवेग । कभी-कभार किसी-किसी दिन दो-एक बार टेलीफोन की झंकार या कोटं पुलिस की हुंकार-'यमामी आया है, हुजूर!' इन सब उत्पातों के होते हुए भी हमारे दादा लोग इस 'नून ड्यूटी' नामक वस्तु को एक तरह से पसन्द करते थे; कारण, तीन कमरों और तीन गुने बाल-बच्चों वाला वह सरकारी क्वार्टर दिवा-निद्रा के लिए प्रशस्त स्थान नहीं। दूमरी वात, पति को द्विपारिक निद्रा कोई भी स्त्री प्रसन्न दृष्टि से नहीं देखती। वे मोचती हैं कि उनपर गृहिणी जाति का एकछत्र यधिकार है। दोपहर के वक्त थोड़ी 'कमर सीधी करने की जरूरत यदि किसीको है, तो उन्हींको है, जो सुबह से शाम तक संसार-चक्र में चक्कर खा रही हैं। दफ्तर नामक अड्डे पर जो लोग काम के नाम पर ऊंघते हैं, अयवा गप्पों का मजमा जमाते हैं, वे लोग घर भाकर भी खरटि भरें, यह अन्याय कौन सहेगा ? मैं तत्र तक 'दादा' स्तर तक नहीं पहुंच पाया या। शून्य दीया का अभ्यस्त होने में कुछ देर थी। नन ड्यूटी सप्ताह उत्तौड़न-सा लगता था। यही कारण था कि उस दिन भी दरीबाले बिस्तर पर अप्रसन्न मन से करवटें बदल रहा था। जेल-गेट के भीतर की तरफ फाटक पर गोर सुनाई दिया । पुरुषों की आवाज के साथ जनानी आवाजें भी मिली हुई थी । जाकर देखता हूं कि खण्ड-प्रलय की सूचना है । एक तरफ धनी मूठों दाला गेटकीपर है, दूसरी तरफ आंखें लाल किए फीमेल वार्डर । क्या बात है? गेटकीपर ने उत्तर नही दिया, मानदा विश्वास के पैट की तरफ अंगुली से इशारा किया । चादर के सयल-आवरण के नीचे वह विपुल स्फीति अंधे यादमी की नजरों में थाए बिना भी नहीं रह सकती थी। में विस्मित हुआ। मानदा चिरकुमारी है। इसलिए यदि गेट कीपर इस घटना का कोई अनैसगिक कारण मंदेह कर फीमेल वार्डर को चुनौती देता हो, तो उसे दोप नहीं दिया जा सकता। मानदा भी रुकने वाली नहीं। नारी जाति के चिरन्तन निविलेज पर खड़ी होकर उसने भी गेटकीपर को चुनौती दे दी है। नागेन्देह की तलाशी' लेने का पुरुष को क्या अधिकार ? अतएव दूर रहो। मल्लिका /१७ मैं बड़ी दुविधा में पड़ गया। अंत में गेटकीपर का थोड़ा तिरस्कार कर मैंने मानदा से अनुरोध किया कि यदि सम्भव हो तो वह मेरे दफ्तर में जाकर अपना देहभार मुक्त करे। इस वक्त वहां कोई पुरुष नहीं । वह राजी हो गई। कुछ देर बाद मैंने दफ्तर में लौटकर देखा कि मेरी मेज पर एक जोड़ा साड़ी, पास में पेटीकोट-ब्लाउज, एक शीशी सुगंधित तेल, स्नो, पाउडर और बाल बांधने की चीजें....ये सब सजी रखी हैं। जिज्ञासु आंखों से देखते ही भानदा ने अपने स्वाभाविक रूखे स्वर से कहा, "ये सब आप लोग तो देंगे नहीं। तभी ललाट का लिखा मुझे ही भोगना पड़ता है। इनमें से किसी चीज के विना औरतों का काम चलता - है, वताइए ?" औरत फीमेल वार्ड में कोई नई नहीं आई, मगर अब तक तो यह दुर्भोग मानदा को भोगना नहीं पड़ा। आज जिस कारण भोगना पड़ा, वह भी समझ गया। फिर भी प्रश्न किया, "मगर औरतें तो तुम्हारे यहां सिर्फ पन्द्रह पन्द्रह हैं। और..." "हे मेरे राम !" वह जोर से हंसकर बोली, "ये सब क्या उन अभागिनों के लिए है ? वे स्नो-पाउडर मलेंगी?" फिर एकाएक गम्भीर होकर बोली, "अच्छा सर, जिस हाकिम ने मल्लिका को जेल भेजा है, आप एक बार मुझे उसके पास ले जा सकते हैं ?" "क्यों ?" "उससे एक बार कह आती कि पागलखाने में वह नहीं जाएगी, तुम जाओगे। और कहती कि उसके घरवालों को पकड़वाकर एक-एक कर फांसी दे दो। यह लड़की अभी वची हुई है, सिर्फ यीशु की कृपा से।" कहकर मानदा ने छाती पर क्रॉस-चिह्न बनाकर दोनों हाथ सिर से जा लगाए। मैंने कहा, "तुमने उसकी सारी वातें सुनी हैं ?" . "कैसे सुनूं ? वह तो बात करती नहीं। मगर उसके चेहरे की तरफ देखकर ही मैं सब समझ गई हूं। मुझे और कुछ दिन दीजिए, उसे थोड़ा स्वस्थ कर लूं । फिर सब जान सकूँगी। यदि कर सके सर, तो डॉक्टर १८ / मल्लिका . साहव से कहकर उसके लिए थोड़े दूध-वूध की व्यवस्था कर दीजिए। जेल का खाना वह बिलकुल नहीं खाती।" मैंने कहा, "करूंगा। और ये चीज-वस्त्र सब यही रहने दो। मैं तुम्हारे पास भिजवा दूगा।" दस-बारह दिन बाद किसी काम से जनाने वार्ड में जाना पड़ गया। मानदा बोली, "मल्लिका को नहीं देखेंगे?" "चलो।" बैरक के उस तरफ सेल-दलॉक है। उसके सामने पास से ढका चबूतरा है। बीच में एक धनी डाली-पत्तियों वाला आम का पेड़ है। नीचे का कुछ भाग पक्का किया हुआ है । उस वेदी के ऊपर ही मल्लिका बैठी हुई थी। पैरों में विदा लेते सूर्य की कुछ क्षीण किरणे लोट रही हैं । उसकी गोद में कांपती छाया है। एक शान्त-करुण छवि । यह जैसे कोई और मल्लिका है । देखकर पहचानी हो नही जाती। रूखे-जकड़े वाल बड़ी कोशिश से वश में आए हैं । दो सुन्दर लंबी वेणियां पीठ पर झूल रही हैं । पोशाक-एक लाल किनारी की साडी, साथ में लाल रंग का ब्लाउज । चेहरे पर सामान्य प्रसाधन के चिह्न। माथे पर सिन्दूर का टीका । काजल-लगी आंखों में अभी प्राप्त किए स्वास्थ्य का आभास है । शीणं कपोलों पर उस दिन जो मलिनता देखी थी, वह बहुत कुछ लुप्त हो गई है, और एक लावण्य-आभा फूट उठी है। उसी दिन की तरह उसने चुपचाप एक बार आखें उठाकर देखा। वही भान्त दृष्टि । मानदा ने आगे बढकर उसकी ठोड़ी से हाय लगाकर उसका मुह मेरी तरफ कर कहा, "इस लडकी ने खून किया था, आप विश्वास करते हैं, सर?" दो-तीन कंदी औरतें पास जाकर खडी हो गई थी। उनमें से एक से बोली, "जा तो तरला, दीदी के लिए दूध और फलो की.तरतरी ले आ।" मल्लिका | १६ तरला दौड़ गई। भानदा मेरी ओर मुड़कर बोली, "दो-एक किताव- विताव दे सकते हैं ?" "किताबें!" "हां । बच्चों की चित्रों वाली कितावें । देख नहीं रहे, वह अब दूध पीती बच्ची से भी बढ़कर है । सब करना पड़ता है।" "तुम्हें लगता है, किताब पढ़ सकेगी?" "शायद एकाध पन्ना उलट ले।" वापस आते-आते बोला, "वातचीत कुछ करती है ?" "बिलकुल नहीं।" मानदा ने सिर हिलाकर कहा, "उसकी खुद की बातें पूछकर देखा है। उससे उसका सिर्फ कष्ट बढ़ता है। ठीक हो जाए फिर धीरे-धीरे सब पता चल जाएगा।" पता चल गया कुछेक दिन बाद ही। सुबह का दफ्तर है । सांस लेने का वक्त नहीं। बड़े साहव ने 'सलाम' भेजा । जाकर देखता हूँ, उनकी मेज के पास एक अपरिचित खूबसूरत युवक वैठा है। उसकी ओर इशारा कर साहव बोले, "यह कलकत्ता से आए हैं । मल्लिका गांगुली से मिलना चाहते हैं । यह क्या वही लड़की है, जिसे उस दिन देखा था ?" मैं वोला, "हां, सर !" "तब तो इण्टरव्यू-रूम में सुविधा नहीं होगी । तुम अपने दफ्तर में विठाकर बात करा दो।" "ठीक है।" युवक के हाथ से उसकी दरख्वास्त लेकर उसका नाम देख लिया- मतीश गांगुली । उसने मेरे साथ आते-आते उद्विग्न प्रश्न किया, "अब कैसी है, सर?" मैं बोला, "पहले से बहुत अच्छी हैं । आपकी क्या लगती हैं ?" "मेरी पत्नी है।" . मल्लिका को ले. आने के लिए मानदा के पास खवर भेजी। कुछ :"२० / मल्लिका -- देर बाद वह आई, मगर अकेली। मैं बोला, "क्यों ?" "वह नहीं आई, बाबूजी!" "क्यों ?" "यह में कसे कहूं ?" मानदा ने अप्रसन्न स्वर में कहा । "उसके पति मिलने आए हैं, कहा था ?" "कहा क्यों नहीं ! एकदम लकड़ी होकर बैठी रही । किसी तरह भी नहीं ला पाई।" कहकर उसने कड़ी नजर से भद्र पुरुष की ओर देखा। उसे देखकर ऐसा लगा कि मल्लिका आना नहीं चाहती । इस बात से उसे खुशी ही हुई है। ये ही मल्लिका के पति हैं, यह समझने मे किसी असुविधा को बात नहीं हो सकती। मगर उसकी सारी दुर्दशा के लिए मन ही मन इन्हें उत्तरदायी समझने का क्या कारण था, मानदा ही बता सकती है। उसकी गुस्से से चढ़ी आखों के सामने मतीश भी थोडा परेशान- सा नजर आया। मैंने मानदा की ओर मुड़कर कहा, "अच्छा, तुम अब जाओ।" उसके चले जाने के बाद मतीश कुछ इस तरह बोला, जैसे वह अपने से ही बात कर रहा हो, "फिर तो लगता है, वह उसी तरह है।" मैं बोला, "क्या वहा भी मिलने नहीं आती थी?" "शुरू-शुरू में आती थी। तब बड़ी 'वॉइस्टरस' यो। चीखती, रोती- हंसती, जाने क्या-क्या बकती थी; मगर मिलने में आपत्ति नही करती थी।" "आप वरावर कलकत्ता मे ही रहे हैं ?" "जी नहीं, मैं इलाहाबाद रहता हूं। वहां से हर महीने भाकर देखता रहा हूं। बीच-बीच में थोड़ा पहचान भी लेती थी। बाद में एकाएक बिलकुल गुम हो गई । बात नहीं करती, पुलाओ तो आती नहीं।" थोड़ा रककर बोला, "इस बार बहुत दिन तक नहीं आ पाया । कल वहा पहुंचा तो सुना कि यहां भेज दी गई है। घर न जाकर सोधे स्टेशन पहुंचकर गाड़ी पकडी । न जाने क्यो ऐसा लगा कि इस वार मुलाकात होगी। भले ही बात न करे, माखों से तो एक बार देखेगी।" कहते-कहते गला भर आया। रूमाल निकालकर आंखों को दवा , लिया। व्यर्थ सान्त्वना देने की चेष्टा न कर मैंने हाथ के काम में मन लगाया । कुछ मिनट बाद फिर उसकी बात सुनाई पड़ी, "तो चलता हूं, सर!" मैं बोला, "आप ठहरे कहां हैं ?". "कहीं नहीं। स्टेशन से सीधा चला आया।" "अभी कहां जाना चाहते हैं ? आपको वापसी गाड़ी तो वही रात दस बजे मिलेगी।" "जाऊंगा और कहां? सोचता हूं, कुछ घंटे वेटिंगरूम में ही काट . "यहां आपकी जान-पहचान का कोई नहीं ?" "जी नहीं।" कहकर वह उठ पड़ा। मैं भी खड़ा होकर बोला, "चलिए, आपको थोड़ी दूर छोड़ आऊं।" "इसकी जरूरत नहीं। सिर्फ गेट पार करा दीजिए।' गेट पार करके भी मैं उसके पीछे चल रहा हूं, यह देखकर वह एकाएक पीछे मुड़कर खड़ा हो गया और नमस्कार कर बोला, "अब मैं चला जाऊंगा, सर ! आप और कष्ट न कीजिए।" "चलिए न !" एक छोटे इकंतला मकान के सामने आकर बरामदें की सीढ़ियों की भोर इशारा कर मैंने कहा, "इधर ही..." मतीश कुछ अवाक् होकर बोला, "यह..." "हां, यही मेरा घर है। पैतृक नहीं, सरकारी। फिर भी आपके वेटिंगरूम की तुलना में एकदम खराब नहीं रहेगा।" वह थोड़ी आनाकानी करते हुए बोला, "किंतु..." "मुझे असुविधा होगी, यही कहना चाहते हैं न !" "तो और क्या कहूंगा ?" तुरंत विना किसी औपचारिकता के दोपहर का भोजन कर दोनों बाहर बरामदे में कैम्प-कुसियों पर आ बैठे। सामने थोड़ी ही दूर पर जेल की खासी ऊंची दीवार थी। उधर कुछ देर देखते रहने के बाद मतीश धीरे-धीरे वोला, "उन लोगों का वार्ड किस तरफ है, सर?" - २२ / मल्लिका "वस यही, इस परकोटे के दूसरी तरफ ।" "देखिए, कसा आश्चर्य है ! इतने निकट, यानी कुछेक गज दूर बैठा हूं, फिर भी मुलाकात नहीं हुई।" में निरुत्तर रहा । मतीश ने जैसेकि अपने मन में ही मृदुकंठ से कहा, "और कुछ ही महीने पहले तक ऐमी हालत थी कि मुझे विना देखे घट- पटाती थी।" इमी वक्त मेरे कनिष्ठ सुपुत्र ने आकर मूचित किया, "मां कह रही हैं, बाहर वाले कमरे में चाचाजी का विस्तर बिछा दिया है।" मतीश की तरफ मुडकर बोला, "मतलब समझे 'इन्जंक्शन जारी हो गया है और बैठना नहीं चलेगा, अब सीचे जाकर पसर जाओ। जो आदेश आया है, उसपर अपील नहीं चलती।" मतीश ने मृदुभाव से हंसकर कहा, "तो ठीक है । और आप ?" "मैं भी उठता हूं। वह मेरे ऊपर भी कानून की भाषा में लागू होता है।" जेल के पास ही एक घुड़दौड़ का मैदान है, एक मील चौड़ा। उसीके बीच एक हरे कोमल गोल्फ-कोर्ट पर जाकर बैठ गए। सूर्य अस्त हो गया था। वैशाख मास या। शुक्ल पक्ष या। थोड़ी ही देर में सामने उस सुपारी, नारियल और बांस के जंगल से घिरे गाव को छूता चन्द्रमा निकलेगा । उसी परम आविभाव का पूर्वाभास पेड़ों के सिरो पर मिल रहा है। उसी तरफ देखता मतीश बहुत देर चुप बैठा रहा । फिर कुछ समय बाद बोल उठा, "ठेठ कलकत्ता के लोग हैं हम लोग । इतना सब खुला-जुला हम लोगो के अनुकूल नहीं पड़ता।" "इन इलाकों में कभी नही आए ?" "कोई दो साल पहले आया था। इस नारियल-सुपारी की घनी पंक्ति की ओर देखकर उसी दिन की बात सोच रहा था।" "घूमने आए मल्लिका / २३ ?" "हां, शुरू में एक तरह से घूमने ही।" "अंत में?" "अंत में जो हुआ, आज उसीका फल भोग रहा हूं। शायद जीवन- भर भोगकर भी छुट्टी न मिले ।" "सो तो देख ही रहा हूं। मगर सोच नहीं पा रहा कि यह सब क्यों, कैसे हुआ ?" "उस विचित्र कहानी को सुनेंगे तो आप धैर्य नहीं रख सकेंगे दादा !" "एक बार परीक्षा लेकर देखने में आपत्ति है कुछ "आपत्ति !" मतीश मृदुभाव से हंसा, "इन कुछ घंटों में आपका जो परिचय मिला है, उसके आगे यह चीज और खड़ी नहीं रह सकती। मगर वह एकरस दुःख की कहानी है." बाधा देकर बोला, "दुःख कोई नगण्य चीज नहीं, मतीश वाबू ! यदि किसी मनपसंद व्यक्ति को उसमें हिस्सा दे सकें, तो उसे भी संपदा बनाया जा सकता है । इस बात में दार्शनिक गंध होते हुए भी सत्यता है।" मतीश की मृदु हंसी लुप्त हो गई । वह कुछ देर चुपचाप जमीन की ओर देखते रहने के बाद निलिप्त शुष्क स्वर में बोला, "अच्छा, तो सुनिए।" २४ / मल्लिका २ "कालेज के दोस्तों में जिसके साथ सबसे ज्यादा मित्रता थी, कालेज छोड़ने के बाद भी उसमे दरार नहीं पड़ी, उसका नाम था हीरालाल । उसका घर बंगाल देश में कही था। मुझे ठीक पता न था । वह एक दिन 'एकाएक मेरे अध्ययन कक्ष में आकर बोला, 'मेरी शादी है । तुम्हें मेरे गांव चलना पड़ेगा। "मैं बोला, 'सर्वनाश। "सर्वनाश क्यो ?' " 'अरे हम लोग ठहरे पक्के कलकत्ता के लोग । सियालदह स्टेपन पर गाड़ी चढना हमारे शास्त्र में वर्जित है।' हीरालाल सुनना नहीं चाहता। उसे समझाकर कहा, 'कलकत्ता से बाहर भी बंगला देश है, मगर हम लोगो के लिए उसका अस्तित्व सिर्फ भूगोल के पन्नों में है। मेरो मा-बहन, बुझा-मौसी किसीने भूगोल नही पढ़ा । पढा होगा, तो भूल गई हैं।' "हीरालाल पूरा चेटू पा । 'गांव का गंवार' । उसने सीधे मेरे पिताजी के पास जाकर आवेदन प्रस्तुत किया, और एक तरह से जबरदस्ती उसे मंजूर करा लाया। मां नाराज हुई। विधवा बहन मंजरी भी गुस्से मे लाल थी। विदाई के दिन बिस्तर आदि तैयार कर सूटकेस लगाकर गंभीर होकर बोली, 'दादा, देखना, दोस्त के देश को कोई विद्यावती सिर पर सवार न हो जाए। " ." " मैं हंसकर बोला, 'तो हर्ज क्या है ? उस इलाके की लड़कियां वाकई सुन्दर हैं, जिन्हें कहते हैं छरहरी ! तेरे जैसी फफ्फस नहीं।' " 'मुंह में आग !' कहकर वहन ने ऐसा मुंह बनाया जो इसी बात की सहायता से संभव है। " अपने वंश में मैं ही पहली बार सियालदह स्टेशन पर गाड़ी में बैठा । यशोहर पहुंचकर जब मैंने अपना सामान खोला, तो देखा कि मेरी बहन ने इन पुछेक दिनों के लिए आवश्यक-अनावश्यक कोई भी चीज नहीं छोड़ी । मुख-शुद्धि का मसाला, दांत कुरेदने के नीम के तिनके, शरीर पर मलने का सरसों का तेल तक साथ में रख दिया है । हीरालाल की भाभी ने गंभीर होकर कहा, 'मगर दो चीज लाना भूल गए लालाजी !' । मैं वोला, 'क्या ?' 'थोड़े-से चावल और थोड़ा-सा नमक ।' " गंभीरता बनाए रखकर मैंने कहा, 'चिन्ता न कीजिए। क्या पता वह पार्सल से आ पहुंचे !' सभी एकसाथ हंस पड़े। यशोहर से कोई पंद्रह मील दूर एक गांव में लड़की वालों का घर था। जल्दी-जल्दी खाना-पीना कर दो बड़ी नावों में वर और बराती चल' पड़े। नाव में भी मैं पहली बार बैठा था। बरसात का समय था । नावें घान-खेतों के बीच होकर, पटसन के खेतों के पास से, धासं-पत्तों को ढकेलती, ताल-तलयों-मैदानों को पार कर चलने लगीं । दोनों ओर आम, कटहल, सुपारी, नारियल के जंगल थे । बांस की झाड़ियां पानी पर झुकी थीं। शाम के वक्त उन लोगों के घाट पर जाकर पहुंचे। वहां से एक मील पैदल रास्ता। वहां कन्या-पक्ष के लोग सिर्फ तीन-चार गैस लालटेन लिए प्रतीक्षा कर रहे थे। " बरातियों में कानाफूसी होने लगी कि दूल्हे के लिए पालकी नहीं आई, कैसी व्यवस्था है ? हीरालाल के पिता सबको चुप कर धीमे गले से बोले, 'यह तुम लोगों की बड़ी ज्यादती है। पालकी आएगी कहाँ से, यह नहीं समझते? लड़की की मां नहीं, बाप नहीं । गरीव बहनोई पंडित - २६ / मल्लिका आदमी है। किसी तरह राम-राम कहकर साली के हाथ पीले कर रहा है।' " थोड़ा स्ककर फिर बोले, 'और फिर गाड़ी-पालकी देखकर तो शादी कर नहीं रहा । सिर्फ लड़की देखी है। साक्षात् लक्ष्मी जैसी है। सही-सलामत काम हो जाए। घर की यह पर ले पहुंचे। गाड़ी-पालकी वहां पहुंचकर जितना चाहो चढ़ तो। क्या कहते हो पेटे, थोड़ी-सी दूर पैदल चलने में बहुत कष्ट होगा तुम्हें ?' कहकर उस बूढ़े आदमी ने मेरी पीठ पर अपना हाथ रखा। "मैं छूटते ही बोला, 'नहीं, नही ! मुझे बड़ा अच्छा लग रहा है चाचाजी" " चारों तरफ जंगल से घिरे दो-तीन कच्चे कमरे हैं । उन्हीमें से एक में वर और बरातियों के ठहरने की व्यवस्था की गई है। बड़े ढंग से गोबर से लीपा गया मिट्टी का फर्श है । उसपर दरी बिछी है । वर के लिए एक विशेष आसन तैयार किया गया है, माय ही झालरवाला तकिया है । आसन पर एक मुन्दर हिरन कहा है, तकिये पर आकर्षक गुलाव । सुरुचि और बारीक कला का परिचय मिलता है । मुग्ध होकर देखने लगा । कन्यापम के एक सरजन ने लक्ष्य कर कहा, 'ये सब लड़को के हाथ का काम है।' " मैं बोला, 'बड़ा सुन्दर है।" 'हीरालाल के चेहरे पर खुशी और गर्व की एक झलक दिखाई " लग्न नौ बजे थी । विवाह-मंडप में वर की पुकार पड़ी, मगर उसे थोड़ा बाहर जाना था। घर के निकट ही एक पुराना तालाव या 1 पंदन जाने का संकरा गस्ता था। दोनों तरफ जंगल । लालटेन लेकर एक आदमी रास्ता दिखाता मागे-आगे चलने लगा। बोला कि और जाने की जरूरत नहीं, यहीं बैठ लीजिए। हीरालाल कलकत्ता का आदमी है, इम वक्त दूल्हा है। बोला, 'तुम यहीं रहो।' कहकर वह तालाव की तरफ पोड़ा और बढ़ गया। एक मिनट बाद ही एक चीस, 'माप !" उम आदमी ने दौड़कर जाकर देखा कि पैर की एक उंगली 11 मल्लिका/२७ खून निकल रहा है। " लाठी-सोटा, मशाल लेकर लोग दौड़े आए। थोड़ी देर खोज-खबर लेने के बाद ही एक आदमी की नजर पूंछ की तरफ गई। साक्षात् यम था । उस इलाके में उसे कहते हैं-खैये गोखुरा। छू ले तो और रक्षा नहीं। हीरालाल को पहले ही वे लोग धर-पकड़कर कमरे में ले आए थे। ओझा ने आकर झाड़-फूंक शुरू कर दी। हाथ में बैग लिए एक डॉक्टर भी पाए, मगर हीरालाल ने और आंखें नहीं खोली, बात भी नहीं की। घण्टे-भर वाद उसका ऐसा साफ-गोरा रंग नीला हो गया। मुंह से झाग निकलने लगा। और थोड़ी देर बाद उस इलाके का सबसे बड़ा ओझा आया। उसने हलके से उसके बालों को खींचा । वालों का एक पूरा गुच्छा उसकी मुट्ठी में आ गया। ओझा का चेहरा काला पड़ गया। वह धीरे-धीरे बोला, 'और आशा नहीं।' " भीतर-बाहर रोना-धोना शुरू हो गया। लड़की के बहनोई 'हाय- हाय' कर चक्कर काट रहे हैं, और वर के पिता निश्चल पत्थर बने बैठे हैं। बीच में एक बार जाने किससे बोले, 'देखो तो, घाट तक के लिए कोई पालकी मिल सकती है या नहीं।' रुपये जो मांगे, दूंगा । तुम लोगों को डा शौक था...' " इसी वक्त जाने किसने आकर कहा कि लड़की वेहोश हो गई है। सुनकर किसीने कोई बेचैनी प्रकट नहीं की । जो जैसे था, मृत शरीर के आसपास बैठा रहा। " मैं कमरे के एक कोने में था। एक किशोरी आकर बोली, 'आप एक बार अंदर आइए।' - ॥ रंगोली है। हाथों और गले में एक-दो साधारण अलंकार है । एक नई चटाई पर आंखें बंद किए जो लेटी हुई है ; तगा, जैसे वह लड़की नहीं, किसी सुदक्ष शिल्ली के हाथ की गढ़ी प्रतिमा है । "औरतों का एक झुड उसके चारों ओर मोड़कर बातें कर रहा था। मुझे देखकर सब इधर-उधर हो गई। आघा-सा घूघट किए एक महिला आगे आकर भरे गले से वोनी, 'देखिए तो, लगता है, इसका भी काम हो गया । न आंख खोलती है, न जवाव देती है। " मैंने अन्दाजा लगाया कि यही लड़की की दीदी हैं । मैं अपनी चादर उतारकर आगे बढ़ा। बोला, 'एक बाल्टी में जल लाइए। और जंगले के पास से आप सब हट जाइए। हवा आने दीजिए।' क्षण भर में कमरा खाली हो गया। बहुत देर आंखो पर जल के छोटे मारे, तब कही पन एक-दो बार हिली। फिर धीरे-धीरे आखें खुल गई। दो सुन्दर नीले तारे निकल आए। काव्य में पढ़ा है, 'नीलोत्पल '। याज वह चीज आंखों से देखो।' " पहले तो वह शायद कुछ भी नही समझी । हठात् मुझे देखकर वह चौंक गई । हड़बड़ाती हुई उठी और अपनी साड़ी एडी तक खीचकर बैठ गई। गिरा हुआ आचल वक्ष पर रखा । मैंने जल्दी से उसे कंधे से पकड़कर लिटाते हुए कहा, 'नही, उठिए नही, लेटी रहिए ।' उसकी दीदी की ओर देखकर बोला, 'योड़ा-सा दूध ले आइए, गरम दूध ।' " लड़की ने करवट लेकर फिर या बद कर ली। लालटेन के धीमे प्रकाश में देखा कि आखों की कोरों से पानी की बूदें टपक रही हैं । " आंगन में एक तरफ एक छोटी-मोटी सभा हो रही है। सभी गांव के प्रमुख लोग हैं । सभी बड़ी उम्रवाले हैं । उधर से जब कमरे को वापस जा रहा था, तो एक ने पूछा, 'होश आ गया वेटे ?' "सिर हिलाकर उत्तर दिया, 'जी हां।' "'न आता, वहीं अच्छा था।' कहकर भद्र पुरुष ने एक लंबी सांस छोड़ी। एक अन्य सज्जन बोले, 'जो गया, वह तो गया । अब जो व है, उसको तो कोई व्यवस्था हो । तुम खड़े क्यों हो, बेटे! बैठ . मल्लिका/२० अरे, कौन है ? कोई स्टूल-फिस्टूल ले आओ।' . " मैं उस दरी पर ही एक तरफ वैठते हुए बोला, 'नहीं; नहीं । स्टूल की जरूरत नहीं। मैं यहीं बैठता।' 'अरे ! धूल में बैठ गए ? खड़े होओ, थोड़ा झाड़ दूं । कलकत्ता के लड़के हो । आज हमारे इस गांवड़े में आए हो । कपर से यह सर्वनाश और हो गया । तुम्हें बड़ा कष्ट हुआ, बेटे वह भद्र पुरुष अपने कंधे का अंगोछा लेकर धूल झाड़ने लगे। इधर एक सज्जन तम्बाकू पी रहे थे। हुक्का दूसरे को पकड़ाकर उसी प्रस्ताव को आगे बढ़ाते हुए बोले,'व्यवस्था और क्या? विवाह तो रात के भीतर-भीतर करना ही पड़ेगा । नहीं तो यादव बाबू समाज में पतित हो जाएंगे। फिर लड़की को भी जीवनभर कुंआरी रहना पड़ेगा।' " यादव बावू लड़की के बहनोई हैं। हाथ जोड़कर बोले, 'आप पांच लोग उपस्थित हैं ; जैसे भी हो, इस गरीव का उद्धार कीजिए। इस वक्त अच्छा-बुरा सोचने का समय नहीं।' " पहले वाले भद्र पुरुप वोले, 'हूं ! वड़ा मुश्किल काम है । लड़के- छोकरे सव विदेश में हैं। आस-पास कोई भी तो नहीं दिखता। एक विपिन चटर्जी महाशय हैं । उम्र तो कुछ अधिक है, पलियां भी तीन हैं। मगर कुलीन व्यक्ति के लिए यह कोई ज्यादा नहीं। और फिर माली हालत अच्छी है। वे राजी हो तो लड़की को और जो हो, खाने-पहनने का कप्ट नहीं होगा। "यादव बोले, 'वे राजी हो जाएंगे क्या ?' 'हां, हो जाएंगे, एक दन्तहीन भद्र पुरुष ने कहा,'तुम्हारी साली तो देपरों वाली परी है। हां, नकद कुछ जरूर देना पड़ेगा।' 'हां, अवश्य; मगर मेरी हालत तो जानते ही हैं । आप लोग दवा कर थोड़ा कह-सुनकर देखिए । मैं भी जाकर हाथ-पैर पकड़ता हूं। जो भी कृपा करें! " 'हम लोगों की जितनी भी सामर्थ्य है, अवश्य ही मदद करेंगे, पहले वाले वही सज्जन बोले, 'लड़की नहीं, वहन नहीं, साली है। फिर भी, तुमने जितना किया है भाई, उतना आजकल कितने लोग करते हैं ?' ३० } मल्लिका ॥ 'यह बात सौ बार भी कहें तो कम । आजकल ऐसा.देखने को नहीं मिलता, उन बुजुर्गों में से किसी और ने कहा, 'यह बात तो हम लोग कहते ही रहते हैं। " तो फिर और देर नहीं। चलो, सब मिलकर चटर्जी को पकड़ें। रात और ज्यादा नही वची।' यहां आकर मतीश का मृदु स्वर धीरे-धीरे लुप्त हो गया। कुछ मिनट का विराम रहा । मैंने उसके झुके हुए चेहरे की ओर देखा । लगा, जैसे वह कुछ कहना चाहता है, कह नहीं पा रहा । शायद कहीं रुकावट है। और थोड़ी देर इंतजार कर मैं बोला, "मेरे आगे आपको किसी संकोच की जरूरत नही, मतीश बाबू ! फिर भी यदि कोई बाधा है तो रहने दीजिए; मत बताइए । चलिए, वापस चला जाए।" "बाधा !" मतीश म्लान हंसी हंसते हुए बोला, "बाधा आपने और रहने कहां दी? नहीं दादा, इसलिए नही रका । वह रात मेरी आखों के आगे आ गई है। बरसात की रात होते हुए भी वह इसी तरह निर्मघ- निर्मल थी। उस दिन लगा था कि उसके भीतर एक विशेष संकेत है। यह आकाश ही मानो मेरे भाग्याकाश का सिम्बल या प्रतीक है। मगर ""छोड़िए।" रुद्ध स्मृति का द्वार ठेलकर उस दिन के न जाने कितने दृश्य उसके मन के भीतर आ रहे होगे। उसने मानी इस 'छोड़िए' शब्द से उन्हें बल- पूर्वक एक तरफ कर दिया । उसके बाद का अध्याय शुरू हो गया : " गांव के मुखियो ने जैसे ही उठने की शुरुआत की, मेरे अन्तस में एक हलचल मच गई । घरवाले याद आ गए। पिताजी का कठोर चेहरा, मा की आखों में आंसू, छोटी बहन का विपमिला इलेप, और इससे भी ज्यादा भयंकर हम लोगो का हातिबागान, बागबाजार और कालीघाट की रुद्र मूर्ति । हर चीज आंखों के आगे नाचने लगी, मगर इन सवको पीछे छोड़कर दो भीरु-असहाय आखों के नीले तारे सामने आ गए। मुझे लगा, जैसे यह अपूर्व सम्पदा मेरे लिए ही प्रतीक्षा कर रही थी। यदि ऐसा न होता, तो मैं इस अप्रत्याशित रूप से इस गाव मे आता क्यों ? हीरालाल इस तरह मरता क्यो, और इतने लोगों के होते हु मल्लिका | ३१ . उसकी मूच्छित दुलहन की आंखों में जल के छोटे मारने के लिए मेरा ही बुलावा क्यों आता? " यादव बाबू कमरे में से एक चादर लेकर बाहर निकले ही थे कि मैं खड़ा होकर बोला, 'अनुमति दें तो एक बात कहूं?' वह बड़े आग्रह के साथ बोले, 'कहिए ! " 'आप लोग यदि मुझे अयोग्य न समझें और यदि आपकी साली को आपत्ति न हो, तो उन्हें "हम लोग कुलीन गंगोपाध्याय" *" यादव वाबू मेरे दोनों हाथ कसकर पकड़कर झरझर आंसू बरसाते बोले, 'इतना सौभाग्य क्या मैं सह सकूँगा, भाई ?' " चारों तरफ लोग गद्गद हो गए। एक सज्जन बोले, 'कलकत्ता का लड़का है न । प्राण हैं, दया-धर्म है।' "एक और सज्जन कहने लगे, 'इसे भगवान ने भेजा है यादव ! यह नररूपी देवता हैं। " सभी इसी तरह की बातें करने लगे। बात हीरालाल के पिता के कानों में पहुंची। मुझे बुलवाया । अपराधी की तरह पास जाकर खड़ा हो गया। आगे बढ़कर उन्होंने एकाएक मुझे सीने से सटा लिया । बोले, 'हृदय से आशीर्वाद देता हूं वेटे, तुम लोग सुखी रहो । मेरी बेटी का किसी दिन भी अनादर नहीं करना ।' . " इतनी देर बाद उनकी आंखों में आंसू दिखाई दिए। " इधर मेरे मित्र का मृत शरीर पालकी में चढ़कर नदी के घाट पर चला गया। उधर मैं वर के आसन पर जाकर बैठ गया । एक ओर हर्ष- ध्वनि, दूसरी ओर उलूक ध्वनि । प्रत्येक मंत्र स्पष्ट रूप से श्रद्धापूर्वक उच्चारण कर मैंने मल्लिका को ग्रहण कर लिया। मतीश का मृदु स्वर हठात् फिर बंद हो गया । मैं बोला, "उसके बाद ?" " 'उसके बाद' का तो अन्त ही नहीं दादा! यह तो सिर्फ शुरुआत है । मगर अब मुझे गाड़ी पकड़नी है।" "गाड़ी पकड़ना कल एक वजे ।" मतीश चुप रहा। मैं बोला, "दोस्त के रूप में जब स्वीकार कर ३२ / मल्लिका म-२ लिया, तो भाई, जी थोड़ा हलका कर जाओ। अभी बहुत दिन जिन्दा रहना है।" कहकर अपना दायां हाथ उसकी पीठ पर रख दिया। वह दोनों घुटनी में मुंह छिपाए बैठा था। मेरा स्पर्श पाकर उसने मुंह उठाया। ज्योत्स्ना में देखा कि उसकी आंखें छलक रही हैं । धीरे-धीरे कर बार-बार विराम लेकर मतीश अपने स्वल्पजीवी विवाहित जीवन का सुदीर्घ इतिहास बता गया । सिर्फ दो साल का विवरण पा, मगर उसका प्रत्येक दिन कभी आनन्द मे उज्ज्वल, कमी वेदना में म्लान । प्रत्येक रात्रि कभी सुख से झिलमिल, कभी दुःख से जड़ित । चुपचाप सुनता रहा । इतिहास सत्म होते-होते चन्द्रमा अस्त हो गया। रात कितनी है, पता नहीं। अंधेरे मैदान मे चार-पांच रोशनियां भाग- दौड़ कर रही हैं । मतीश बोला, "इतनी बत्तियां लिए ये कौन लोग घूम मैंने कहा, "सिपाही लोग हमें खोजने निकले हैं। तुम्हारी भाभी ने हो सकता है, पुलिस को भी खबर कर दी हो । और बैठ रहना निरापद मल्लिका/ ३३ • - ३ - मतीश के श्रोता ने उस दिन जिस मन से प्रायः सारी रात उसकी दीर्घ कहानी सुनी थी, उस मन की आशा में अपने श्रोताओं से नहीं करता । मेरी अक्ल इतनी खराब नहीं हुई । यही कारण है कि रोजमर्रा की कितनी ही 'तुच्छ' बातें, कितने ही छोटे-छोटे अश्रु-हास्य, जो उसके लिए हीरे से भी ज्यादा मूल्यवान थे मगर मेरे स्वयं के निकट साधारण हैं-वे सब अनुक्त रह गए। और जितना कुछ कहा है, वह भी उसकी तरह नहीं कहा जा सका । जो कुछ वर्ण-संभार रहा, वह मेरे गहन अन्तर में है । उसे बाहर लाने की दुर्लभ विद्या मेरे पास नहीं । जो दे पाया हूं, वह सिर्फ रेखाचित्र है, जिसे आप लोग कहते हैं स्केच ! सुबह की गाड़ी से मतीश वहू लेकर अपने आमहर्ट स्ट्रीट वाले घर पहुंचा । दरवाजा खुला ही था। सीढ़ी चढ़ते ही मंजरी से मुलाकात हो गई। "यह कौन है दादा ?" "तेरी भाभी।" "मतलब?" "भाभी का मतलब नहीं जानती, तुझे इतना मूर्ख नहीं समझता था।" मल्लिका की ओर मुड़कर बोला, "मेरी छोटी वहन मंजरी है।" कुण्ठित हंसी से भरे चेहरे को लेकर मल्लिका ननद की ओर एक कदम बढ़ी, मगर वह एक अग्निष्टि डालकर जल्दी से एक ओर हट गई। मतीश बहू के साथ सीढ़ियां चढ़ गया। मां के कमरे के आगे पहुंचकर आवाज दी, "मां!" "कोन, मतीश या गण?" कहते हुए वह सरपट बाहर निकल माई । रेशमी साड़ी पहने थीं। पूजा-आरती कर अभी-अभी उठी थी। "तुम्हारी बहू ले माया मां !" रूखी हंसी हंसते हुए मतीरा ने कहा। मल्लिका झुककर पैर छूने लगी। देहली के उस तरफ से ही सुहासिनी रूखी आवाज में बोली, "रहने दे, वेटी!" कहकर वह थोड़ा-सा भीतर की तरफ हट गई। लड़के के मुंह की तरफ देखकर बोली, "बात क्या है मतीश ?" "वात तो देख ही रही हो। शादी कर ली है ! और जो जानना चाहती हो, धीरे-धीरे बताऊंगा । पहले..." वाक्य पूरा होने से पहले ही मा बगल से निकल गई। कुछ मिनट बाद ही उसके पिता का युद्ध स्वर कान में पड़ा, "ऐं ? क्या कहती हो ! शादी हो गई ! वुलाओ तो इस नालायक को !" बलाना नहीं पड़ा। मतीरा खुद ही पिता के कमरे में पहुंच गया। साथ ही साथ वह रूखी आवाज मे गरज उठे, "यह सब क्या सुन रहा हू ?" "जो सुन रहे हैं, सच है।" "हम लोगों की अनुमति लिए विना ही शादी कर ली है ? सूचना देने तक की जरूरत नहीं समझी ?" "सूचना भेजने का समय नहीं था । अनुमति लेने का भी उपाय नहीं या। सब सुनेंगे तो समझ जाएंगे।" "अब मैं कुछ भी सुनना नहीं चाहता," विश्वनाथ बाबू भड़क उठे, "जो सुना है, वही काफी है । अब तुम मेरी बात सुनो । तुमने खुद को जब इतना स्वाधीन समझ लिया, तब जिसे लाए हो, उसका भार भी अपने कंधों पर लेना पडेगा। मैं तुम्हारी यह शादी स्वीकार नहीं करता।" मतीश ने अपनी मां की ओर देखा। वहा भी इसी बात का नीरव समर्थन था। "अच्छा।" कहकर वह चला गया । मां के कमरे के बाहर बरामदे के एक कोने में लज्जा और अपमान मल्लिका | ३५ का बोझ सिर पर लिए उसकी सद्य:परिणीता स्त्री खड़ी हुई है- गांगुली-परिवार की प्रथम पुत्र-वधू, मगर गांगुली-परिवार ने उसे स्वीकार नहीं किया। मतीश सूटकेस उठाकर बोला, "चलो मल्लिका !" मल्लिका ने अपनी त्रस्त आंखें उठाकर एक बार पति के मुंह की ओर देखा । फिर चुपचाप उसके पीछे चल पड़ी। सीढ़ी के पास ही रुकना पड़ा । छोटा भाई जितेश ऊपर आ रहा है। घोती लुंगी की तरह है, विना वांहों वाली बनियान पहने हुए है और हाथ में टूथपेस्ट की ट्यूब और ब्रश है। देर से उठने की आदत है। अभी- अभी नींद टूटी है। उम्र की दृष्टि से दादा और उसमें ज्यादा अन्तर नहीं। लिखाई-पढ़ाई में बहुत अन्तर है। प्रथम वर्ष में ही दो साल कट गए, अर्थात् नाम कालेज के रजिस्टर में है, शरीर रहता है क्रिकेट- मैदान में । सीढ़ी पर खड़े होकर, इस तरह जैसेकि कुछ भी नहीं हुआ, उसने पूछा, "सूटकेस लेकर कहां जा रहे हो ?" "जहां मेरी मर्जी । तू हट ।" "अरे, तुम तो भले ही जाओ, मगर नई बहू को कहां लिए जा रहे हो?" "इससे तुझे क्या मतलब ?" "तो यानी किसी होटल-बोटल में जाकर रहोगे। तुम्हारे तो भाई- जान, साथी-संगी भी कहीं कोई नहीं। दुनिया में सिर्फ दो जगह जानते हो-घर और दरभंगा विल्डिग !" मल्लिका दादा के पीछे थी। उसके आगे जाकर बोला, "ठहरो भाभी, पर छूने का काम पहले कर लूं। गुरुजन हो न !" झुककर मल्लिका के पैरों से एक उंगली लगाकर वह खुले गले से बोला, "मेरे इस भैया को तुम अभी तक समझ नहीं पाई ! देखने में इतना लंबा-चौड़ा होने से क्या, बालिग होने में अभी बहुत देर है । बी० कॉम० होते हुए भी अक्ल निहायत कम है। आओ।" कहकर वह मल्लिका की पीठ पर हाथ लगाकर एक तरह से जवरन ही उसे मां के कमरे की तरफ ले गया। दरवाजे के आगे जाकर वोला, "अच्छा मां, ३६ / मल्लिका मैं तो तुम लोगों का कुपुत्र हूं, मूरख हूं, हर साल फेल होता हूं। मेरी बात की तो कोई कीमत ही नहीं, मगर कभी-कभार एकाच वात कहे बिना भी तो नहीं रहा जाता। नई बहू मगर होटल में जाकर रहेगी, नो क्या गांगुली-पराने का वडा नाम होगा?" "तुझे पंचायत करने को किसने कहा जितू ?" स्खे स्वर में सुहासिनी ने उत्तर दिया। "नहीं, मो किसीने नही कहा, मगर गले में आने पर पंचायत करनी पड़ती है। जो हो गया, जिसे एक दिन मानना पड़ेगा, उसे शुरू से ही मान लेना क्या वृद्धिमानों का काम नही? यह सीधी-ती वात पिताजी को समझाकर नहीं कह सकी ? चलो भामी..." उत्तर का इंतजार न कर जितेश अपनी मामी को मतीश के कमरे में ले गया । वोला, "यही तुम्हारा कमरा है । जंगल भी कह सकती हो। दुनिया भर की पुरानी किताबें, और फटी मैगजीन । पढने लायक कुछ नहीं पाओगी । सब बुक-कीपिंग, वैकिंग और जाने क्या-क्या ऊलजुलूल । इन्हीं चीजों में मग्न हैं, भूख लगी कि नहीं, यह भी दूमरे को बताना पड़ता है। कैसे अजीब आदमी के पल्ले पड़ी हो, दो दिन में ही पता चल जाएगा। मगर लगता है, अव सब ठीक हो जाएगा। क्या कहती हो ?" जितेश के हंसते चेहरे की ओर देखकर मल्लिका ने भी हंसने की चेष्टा की, मगर उसकी आखें भर आई। जितेश ने एक बार उधर आखें उठाकर यात बदल दी, "अच्छा, तो अब तुम नहा-धो लो। बगल मे ही वायरूम है । मैं थोड़ी चाय की व्यवस्था देखू ।" फिर स्वर नीचा कर बोला, "वह तो छोटी दीदी का डिपार्टमेण्ट है ! देर से उठता हूं, इस बात को लेकर बड़ी झल्लाती है । अच्छा, कुछ दिन बीत जाएं, फिर कभी असमय में चाय-बाय की जरूरत पड़ी तो तुम्हारे पास ही आऊंगा। दोगी न ?" मल्लिका ने उत्तर देने की चेष्टा की, दे नही पाई । जांचल से नाखें पोंछकर सिर हिलाकर स्वीकृति व्यक्त की। अगले दिन शाम से ही तरह-तरह के रंगो को, आकारों की गाड़ियां मल्लिका / ३७ गांगुली-भवन के गेट के आगे आकर इकट्ठी होने लगी। आरोही कुछेक ही थे, आरोहिणियों (जनानी सवारियों) की संख्या ही अधिक थी। एक-एक कर वे सब दो-तले वाले हॉल में इकट्ठी हो गई। पहले आपस में कोई घण्टाभर चर्चा-समीक्षा चली, फिर मतीश की पुकार पड़ी.। वह अपनी अटारी में बैठा जाने क्या पढ़ रहा था। जितेश ने अदालत के हरकारे की अदा से दरवाजे पर आकर हांक दी, "एक नंवर असामी हाजिर है ?" "क्या बात है ?" "वात गम्भीर है। ऑनरेवल फुल-बैंच का हुक्म है-मतीश गांगुली का सिर ले आओ.. क्विक !" "कौन-कौन हैं रे?" "कहा न, फुल बैंच । नाम चाहते हो ? कागज-पेन्सिल लो। श्यामबाजार से आई हैं छोटी बुआजी और उनकी दोनों लड़कियां, गीता और रीता। भवानीपुर से बड़ी दीदी और उनके चार रत्न, नाम भूल गया । चोरवागान से मंझली चाची और पटलडांगा से छोटी दीदी की सास । उनके साथ में हैं उनकी देवरानी कल्याणी देवी। और कौन- कौन हैं, अगर कहो तो जाकर याद कर आऊं।" "ठहर, और याद करने की जरूरत नहीं।" मतीश कटघरे में आकर खड़ा हो गया, मौसी-बुआओं के आगे अपनी हठधर्मी की कैफियत देने के लिए। बात-बात के लिए शपथ- बयानी और साथ ही साथ चारों ओर से जिरह । मतीश ने सारी घटना और दुर्घटना का आद्योपान्त विवरण पेश कर दिया। सिर्फ एक वही वात नहीं वताई, जो एकान्त रूप से उसकी निजी थी, जिसका पृथ्वी पर और किसीको प्रयोजन नहीं-भूच्छित मल्लिका के पास कटे वे कुछ विरले क्षण, जो उसकी इतने दिन की अभ्यस्त संकीर्ण जीवनधारा में न जाने कहां से भीषण बाढ़ का तीव्र प्रवाह ले आए हैं । निर्णायक मण्डली ने फैसला सुनाना शुरू किया। बुआजी बोलीं, "सो तो सब समक्ष गई, वेटे, मगर इतना तो तुम्हें भी समझना चाहिए था कि यह लड़को हमारे देश को नहीं, समाज की नहीं, वह कभी अपनी . ३८ / मल्लिका नहीं होगी । इसके अलावा, बंगाल देश के गांव मे कितनी कुशिक्षा, कितने रोगों के बीज लेकर आई है, कौन जानता है ? यह क्या हमारे घर के योग्य है ?" मंजरी की साम मृदु कण्ठ से बोली, "जिसका वर गादी के आसन पर बैठने-बैठते वेमौत मर जाए, उस कुलक्षणा बहू को जानबूझकर फोई घर लाता है ? पढ़े-लिखे होकर तुमने यह क्या किया ?" तीसे स्वर से चाची बोली, वहादुरी दिखाने की और जगह नहीं मिली तुम्हें ? हो जाती लस बूढे के साथ शादी। हमें क्या ? गावों में गरीव लोगो में ऐसा ही होता है। अभी उत्ती दिन तो हमारा नौकर शादी करके आया है। सुना है, लडकी की उम्र है बारह साल, और यह यादमी बस मरने को बैठा है। वे लोग हमारे कौन होते हैं, जो लड़के का कर्तव्य-ज्ञान उफन पडा?" "आया बड़ा कर्तव्य-ज्ञान !" बडी दीदी फट पड़ों, "चाद-सा मुह देखकर बच्चूजी का दिमाग ठिकाने नहीं रहा । कौन जाने क्या खिलाकर वा में कर लिया? सुना है, गांवो को औरतें बड़ी झाड़फूक जानती हैं।" "यह बात मैंने तो पहले ही कह दी थी दीदी," मजरी ने योगदान किया, "बोलो दादा, जाते वक्त वार-बार सावधान नहीं किया था ?" सबसे पीछे गृहस्वामिनी ने मत व्यक्त किया, "लडके को दोप देने से क्या होगा ! बच्चा है, भूलचूक हो ही जाती है । बूढ़े होकर इन्होंने क्या किया ? बार-बार मना किया कि जाने नहीं दो। न जाने कैसा देश, ऊपर से फिर गांव की बात । मगर सुनी मेरी बात? अरे दोस्त की शादी है; जाना चाहता है, जाने दो। अब मुगतो..." अब बारी थी दो नंबर असामी-किसी-किसीके मन में प्रधान असामी -को पुकारने को । मतीश छुट्टी पाकर कमरे से निकलने वाला था कि लड़कियों की टोली गिरते-पडते घुसी। रीता गंभीर चेहरे से बोली, "बुला- कर क्या करोगी, मा? डेढ घण्टे पीछे पड़ने पर डेढ़ बात सुन पाई । सो भी उर्दू या तेलुग, समझ में नहीं आई।" तरुणियो का दल सिलखिलाकर हम पड़ा। वही दीदी की चमेली लोरेटो में जूनियर कैम्ब्रिज पढ़ती है। दाब्दों को घवा- मल्लिका / ३६ - बोली, "वड़े मामा, बहू के साथ एक इण्टरप्रेटर लाना चाहिए था। उसकी यह रस्टिक बेंगाली तुम समझ लेते हो?" मतीश जाते-जाते वोला, "तेरी इस फिरंगी बंगला से तो ज्यादाही समझ लेता है।" चमेली का लंवा मुंह और भी लंबा हो गया। मंजरी की देवरानी कल्याणी बोली, "मगर कुछ भी कहिए, लड़की वाकई सुन्दर है । ऐसा रूप मेरे जान-पहचान वालों में तो मैंने नहीं देखा।" "रूप है खाक !" मंजरी ने भौंहें सिकोड़ी, "घोड़े-सा मुंह । आंखें देखो, लगता है, जैसे अफीम खाई हो । न वाल वांधना आता है, न कपड़े पहनना । सुवह आकर खड़ी हुई, तो सारे मुंह पर तेल ही तेल टपक रहा था । और फिर सारे माथे पर सिन्दूर का इतना बड़ा टीका लगा था। अरी मां!" रीता बोली, "अव भी देखकर माई हूं, मुंह पर कसा तेल ही तेल ! टॉयलेट का नाम ही नहीं सुना, तो व्यवहार क्या करेगी !" कल्याणी बोली, "यही तो मैं कह रही थी। हम लोग यहां बैठी हैं, हम सबको देखकर कोई कह सकेगा कि टॉयलेट की कोई गलती रही है! मगर वह ये सब घिसे-पोते बिना ही ऐसी दिखती है, कोई खड़ी हो सकेगी उसके बरावर ?" कल्याणी का यह स्पष्ट कथन महिलाओं में से कोई भी प्रसन्न मन से ग्रहण नहीं कर सकी । प्रसाधन का थोड़ा-बहुत चिह्न प्रवीणा-नवीना सभीके चेहरों पर साफ नजर आ रहा है। उसकी विधवा सास ने भी इस ओर कंजूसी नहीं की। रीता फिर कुछ कहने जा रही थी, दरवाजे पर नजर जाते ही रुक गई। क्रिकेट की पोशाक पहने जितेश और उसके पीछे गांगुली-परिवार की नववधू ने कमरे में प्रवेश किया। सभीकी विस्मित दृष्टि मानो एक- साथ जुड़कर उसके झुके चेहरे पर जाकर टिक गई । जितेश बोला, "माओ भाभी ! यहां जो वैठी हैं---इन हुल्लडबाज़ छोकरियों को छोड़कर सभी तुम्हारी गुरुजन हैं। सबके पैरों में सिर ठोकने लगोगी तो बाद में 'आयोडेक्स' की जरूरत पड़ जाएगी। इससे तो अच्छा ४० / मल्लिका तुम सबको एकसाथ साष्टांग प्रणाम कर दो।" बड़ी दीदी रुष्ट स्वर से बोली, "हम औरतों के मामलों में तुझे किसने बुलाया? फालतू पंचपना करता फिरता है ?" "अरे बुलाया नहीं, तभी तो आना पड़ा, बड़ी दीदी ! देख रहा हूं, गांगुली-घराने के मान-सम्मान को लेकर तुम लोग इतनी मायापच्ची कर रही हो । सभी कुछ सुना मगर सिर्फ यह बात समझ नही आई कि नई बहू के आने से तुम्हारा कौन-सा मान कहां जाता रहा !" "अच्छा, अव तुम जाओ जितू," कहकर कल्याणी ने आगे बढ़कर नई बहू का हाथ पकड़ा। कमरे के भीतर लाकर बोली, "आओ, मैं परिचय करा देती हूं।"

४ दीदी की गृहस्थी में सारे काम मल्लिका के हाथ में थे। रसोई करना, बर्तन साफ करना, कमरे लीपना, यहां तक कि गाय की सेवा करना । यहां उसको कोई काम नहीं । वह दो दिन में ही उकता गई। यहां रसोई करता है ब्राह्मण रसोइया; और कामों के लिए नौकर-चाकरों की पलटन है। सुबह-शाम चाय की व्यवस्था रहती है मंजरी के हाथों में । एक दिन साहस कर आगे आकर बोली, "मुझे थोड़ा करने दो न दीदी !" मंजरी ने होंठ टेढ़े कर उत्तर दिया, "क्षमा करो भई, तुम लोगों का फूल-सा शरीर, ये सब मुश्किल काम सहन नहीं करेगा।" इसके बाद मल्लिका फिर नहीं गई। अपने कमरे को झाड़-पोंछ लेती है। बाकी समय कटता ही नहीं। थोड़ा-बहुत पढ़ने-लिखने की चेष्टा करती है । किताब में मन ही नहीं लगता। आंखों में दीदी के घर में काटे वे दिन तैरने लगते हैं, जिन्हें वह पीछे छोड़ आई है। कर्मठ, कर्मशील दिन । सुबह से शुरुआत, काफी रात गए अन्त । एक नींद की गोद से उठकर दूसरी नींद की गोद में जा पड़ना । बीच में एक क्षण भी आलस्य का अवसर नहीं। जब याद आती है, आंखों से आंसू उमड़ पड़ते हैं । किताव के अक्षर अस्पष्ट हो जाते हैं। इसी तरह एक दिन वह सुबह अपने कमरे में जंगले के पास बैठी फिसी पुस्तक के पन्ने उलट रही थी। मतीश ऊपर अटारी में लिखने-पढ़ने में व्यस्त था। जितेश शायद अभी तक सोकर नहीं उठा था। नीचे शोर- ।

गुल सुनकर वह बरामदे में निकलकर आई। विशेष कुछ समझ में नहीं आया। धीरे-धीरे उतरकर गई ! सुना कि रमोइया नहीं आया । बहुत दिनों बाद आज हठात् उमका मन पुगी से भर गया 1 मंजरी का मिजाज तो यो ही चढ़ा रहता है, आज दह मीधे मप्तम पर जा पहुंचा। मल्लिका हरतो-डरती उनके पास पहुंचकर अनुनय के स्वर में चोली, "आज को रसोई मुझे करने दो दीदी !" "रहने दे । मैं ही कर लूंगी।" "तुम इन मव झंझटो में न पड़ो।" "तुम कर लोगी?" कंघे उचकाकर मंजरी ने पूछा। "कर ही लूगी । वहा तो हमेशा में ही करती थी।" "हे मेरे करम !" मजगे ने गालों से हाथ लगाकर आंखें फाड़ दी, "यह क्या तुम्हारे उम गावड़े की पूंइडांटा की चच्चडी है या लाउघण्ट ! जानती हो, क्या-क्या बनेगा? रुईमाछ नुनी हुई, मोगा मछली की मनाले वाली तरकारी, पिताजी के लिए मांस का स्ट, जितू के लिए अण्डे के कोफ्ते ! बना मकोगी ये सब ?" मल्लिका ने हताग स्वर मे कहा, "यह सब तो मैं नहीं जानती भाई ! रसोइया रोज जो बनाता है-सूप, रसा, मुजिया-ये सब तो मैं किसी तरह वना दूगी, ऐमी आशा है।" "अन्टा, बनाओ। मगर बहुत ज्यादा मिचं मत डाल देना । तुम लोगों के उपर तो हरी मिर्च के अलावा और कोई मसाला ही नहीं।" साते वक्त गृहस्वामी ने प्रश्न किया, "ये सब चीजें किसने बनाई हैं मंजू ?" "तुम लोगों को नई बहू ने, पिताजी !" मुनते ही विश्वनाथ बाबू गम्भीर हो गए। अन्त में देखने में आया कि थाली में कुछ नही बचा। यहां तक कि दो-एक चीजें पुनश्चः रूप में मआई, तो उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की। मल्लिका / ४३ , जितेश सुबह-सुबह कालेज चला गया था। एक बजे लौटकर खा- पीकर पेट पर हाथ फिराता-फिराता ऊपर आया । "भाभी!" "कौन, लालाजी ?" "हाथ लाओ।" "क्या लाऊं?" "अरे, हाथ बढ़ाओ न जरा!" कहकर इंतजार किए बिना उसने खुद ही भाभी का दायां हाथ खींचकर जोर से झकझोर दिया । मल्लिका अस्फुट स्वर में बोली, "उह, लगती नहीं ?" "देख लो, मामूली-सा कॉन्ग्रेचुलेशन सहन नहीं कर सकी ?" "क्या मतलब ?" "ओ ! तुम अंग्रेजी नहीं समझोगी। मगर मैं भी यह मरी बंगला भूल गया हूं।"हां-हां, याद मा गया। अभिनन्दन ।" "अभिनन्दन ! किसलिए ?" "नहीं समझी ?" इधर-उधर देखकर इस बार जितेश ने स्वर धीमा किया, "तुम लोगों के इस रसोइया महाराज का काढ़ा और छोटी दीदी का रसायन खा- खाकर पेट में जलन हो उठी थी। आज इतने दिन बाद भरपेट खाने को मिला।" फिर थोड़ा और नजदीक सरककर वोला, "मगर अपने पैरों खुद ही कुल्हाड़ी मार ली, भाभी !" "क्यों ?" "मां और पिताजी बातें कर रहे थे, 'रसोइया रखने की और जरूरत नहीं।' छिपकर सुन आया हूं। लगता है, तुम्हारी नौकरी परमानेण्ट हो "यह तो मेरा सौभाग्य है, लालाजी! यदि वे लोग सचमुच ही यह भार मुझे दे रहे हैं, तब तो मैं बच गई।" मल्लिका के दिन चाहे जैसे कटते हों, उसकी रातें मधुर स्वप्न की तरह कट जाती हैं । स्वामी के निविड़ सान्निध्य में उसका दिल धकin xx lafaat धक करता है, कष्ठ द हो जाता है, आंखों में आंसू आ जाते हैं । सोचती है, क्या में इतना सुन सहन कर सकूँगी ? बहुत रात तक मती को वाहर ही बाहर, ऊपर वाली अटारी में रहना पड़ता है। मां और पिताजी के कमरे का दरवाजा बंद होता है, उसके बाद वह नीचे उतर आता है । उस दिन जाने क्या जटिल चीज पहनी थी, लोटने में और भी देर हो गई । मल्लिका अभी तक जगी बैठी है। मतीश आकर उसकी गोद में सिर रखकर लेट गया। पति के लंबे-लंबे बालों मे अंगुलिया चलाते- चलाते मल्लिका बोली, "तुस इतने गम्भीर क्यों हो गए हो? हंसते नहीं, बोलते नहीं।" मतीश उमका एक हाथ अपने हाथ में लेकर बोला, "किस मुंह से हमू मल्ली ? हम लोगो ने बड़े सुख मे रखा है न तुम्हे !" "ये सब बातें करोगे तो मैं सचमुच नाराज हो जाऊंगी । क्यो, मुझे क्या कष्ट है ? तुम पास मे हो, यही तो मेरा परम सुम है। इसके अलावा, लालाजी हैं। उनके कारण मेरी क्या सामयं कि एक मिनट भी मन खराव करके रहू ?" "हां । अगर यह लड़का न होता""अरे, तुम्हे अभी तक बता नहीं पाया, मल्ली, मैं नौकरी देख रहा हूं। कलकत्ता से "बाहर !" मल्लिका चौंक गई । मतीश वाहर चला गया, तो वह रहेगी कैसे ? उसकी वह अस्त आवाज मतीश के कानो में नहीं पहुंची। यह तो अपने ही स्वप्न में विभोर था । गागुली परिवार के हृदयहीन अवरोध से अपनी 'मल्ली' को दूर हटा देने का स्वप्न ! उसे और भी प्रगाढ़ रूप से पाने की कल्पना !! उसी आवेश-भरे स्वर में धीरे-धीरे बोला, "एक छोटा-सा घर । न सही ऐश्वर्य, फिर भी वह सिर्फ अपना तो होगा। वहां तुम्हें कोई दुःख नही होने दूगा ।" असीम आनन्द में मानो मल्लिका के हृदय का स्पंदन रुक गया। झुककर लाजरक्त दायां कपोल पति के माथे पर रख दिया। मृदु गुजन के स्वर में बोली, "मुझे यहां भी कोई दुःख नहीं।" बाहर।" मल्लिका | ४५ कोई महीनेभर के भीतर ही मतीश को नौकरी मिल गई। इलाहावाद के किसी बैंक में असिस्टेण्ट अकाउण्टेण्ट । पिताजी बोले, "तुम्हें नौकरी करने की क्या जरूरत आ पड़ी ? एम० ए० पास कर लेते पहले ! "एम० ए० प्राइवेट करने का विचार है।" मां बोली, "घर छोड़कर इतनी दूर जा रहा है ! क्यों ? साल-भर बाद ये रिटायर हो जाते, इनके दफ्तर में ही लग सकता था। साहव ने वायदा किया है, ये कह रहे थे।" "किसीकी बात पर भरोसा कर हाथ आई चीज छोड़ देना क्या ठीक होगा?" मां ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। उस रात मल्लिका की आंखों में नींद नहीं आई। लगा, जैसे पति के सीने में मुंह छिपाते ही इतने दिनों के संयम का बांध बह गया । बहुत देर रो लेने के बाद मन जव कुछ हलका हुआ, तो बोली, "यह नौकरी तुम छोड़ दो। तुम्हारे विना मैं एक दिन भी नहीं रह पाऊंगी।" अपने हाथों से उसके चेहरे को पकड़कर अपनी ओर खींचकर सान्त्वना के स्वर में मतीश बोला, "इस तरह मन छोटा करने से तो काम नहीं चलेगा, मल्ली! तुम थोड़ी मजबूत न होगी, तो मुझमें जोर कहां से आएगा ?" उन दोनों का स्वप्न-जाल बुनना, और दोनों का मिलकर नीड़- निर्माण करने का स्वप्न बहुत रात तक चलता रहा। जाने का दिन आया, तो जितेश स्टेशन पहुंचाने गया । गाड़ी रवाना होने से कुछेक मिनट पहले बोला, "इसी महीने आ रहे हो न?" मतीश हंसकर बोला, "क्यों ?" जितेश नाराज हो गया। बोला, "क्यों का मतलब ? जितने दिन वहां मकान-वकान नहीं मिलता, तब तक वह बेचारी रहेगी कहां, बोलो ?" "कहां क्या ? जहां है, वहीं रहेगी, तू तो है ही।" "सो तो है! मैं विकेट देखूगा या तुम्हारी बहू को ?" " ४६ / मल्लिका

"इस वक्त तो दोनो को ही देख ।" कहकर मतीय गाडी में चढ़
गया।
दादा के चले जाने के बाद जितेश एक बार रोज ऊपर आकर
मल्लिका की खबर ले जाता है । बाहर से 'भाभी' कहकर आवाज देता
है, थोड़ी देर गपशप करता है, बुनने के लिए ऊन और पढने के लिए
पुस्तकें जुटाता है, छोटे-मोटे काम कर देता है।
एक दिन दोपहर के वक्त कमरे से निकलते ही देखा कि मंजरी
दरवाजे के पास से हट कर तेजी से चली गई। नागने का तरीका उसे
अच्छा न लगा। मगर इस बात को लेकर जितेश ने चूं भी नहीं की।
कुछ दिन बाद तीसरे पहर मल्लिका रसोई में चाय बना रही थी।
मंजरी आकर बोली, "इस वक्त यह चाय किसके लिए ?"
"लालाजी पिएंगे।"
"कहां है वह ?"
"मेरे कमरे मे।"
"चाय तो वह हमेशा नीचे ही आकर पीता है । आज तुम्हारे कमरे
में क्यो?"
"यह तो पता नही । पीना चाहा, सो बनाकर ले जा रही हूं।"
मल्लिका प्याला हाथ में लिए चली जा रही थी। मंजरी ने आवाज
दी, "सुनो.."
वह मुड़कर खड़ी हो गई । मंजरी के गले से विप निकल पडा,
"एक को खाकर पेट नहीं भरा; इम कच्चे को भी चबाकर खाना शुरू
कर दिया !"
"क्या मतलब ?" मल्लिका ने शान्त, लेकिन तीक्षण स्वर में जानना
चाहा।
"इम सीधी-सी बात का मतलब नहीं समझती, इतनी वच्ची तो
तुम नहीं हो बहू !"
मल्लिका /४७

मल्लिका की आंखों के तारों में सहसा विद्युत् खेल गई। सुबंकिम
मृकुटियों के संधिस्थल पर गहरी कुंचन-रेखा दिखाई पड़ी। दवे गले से
सिर्फ ये दो शब्द निकले, "छिः दीदी !"
उत्तर की प्रतीक्षा न कर वह द्रुतगति से ऊपर चली गई। मंजरी
सिर्फ उस ओर देखती रही। उसकी आंखों में जितना क्रोध था, उससे
कहीं अधिक विस्मय था। यह मल्लिका उसके लिए एकदम अपरिचित
है। एक पल दृष्टि और मात्र एक बात से एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को
इस तरह आहत कर सकता है, यह भी उसे पता न था।
मल्लिका के कमरे में घुसते ही जितेश ने उसके मुंह की ओर देखकर
विस्मय के स्वर में कहा, "क्या हुआ, भाभी ?"
"क्या, कुछ भी नहीं ।" चेहरे पर एक म्लान हंसी खींचकर
मल्लिका बोली।
"रसोई में कोन था ??"
"कौन क्या ? दीदी कुछ काम कर रही थीं।"
"हूं! क्या वोली ?"
"तुम्हें सब बताना जरूरी है ?'
"तुम छिपाओ, फिर भी मैं जानता हूं।"
"क्या जानते हो ?" मल्लिका चौंक गई।
जितेश ने उत्तर नहीं दिया। तुरन्त वह तूफान की तरह चला
गया । मल्लिका भी साथ ही साथ वाहर आकर पुकारने लगी, "लाला-
जी, सुनो..."
जितेश रुका नहीं।
उसी दिन दो चिट्ठियां मतीश के पास चली गईं। जितेश ने
लिखा-'तुम्हारे मकान की क्या स्थिति है ? मुझे कुछ ही दिनों में
दिल्ली जाना पड़ेगा।
मल्लिका ने लिखा---'तुम्हें देखे कितने ही दिन हो गए। एक बार
आओ। मेरा मन वड़ा छटपटा रहा है।'
४८ / मल्लिका

इलाहाबाद पहुंचकर दोपहर को नौकरी करना और सुबह-शाम मकान तलाश करना--यही मतीश का रूटीन हो गया। सिर्फ मकान नही, साय में ट्यूशन भी । सौ-डेढ सौ रुपयो को नाव पर चढकर ससार- समुद्र पार करने का साहस नहीं किया जा मकता। हर तरह के दुःख- देय मे मल्लिका की रक्षा करनी होगी। दीदी के घर वह अभाय के बीच बड़ी नहीं हुई, इस बात का प्रतीक है उसके दारीर का भरपूर स्वास्थ्य और अपूर्व लावण्य । मल्लिका के उस छोटे गाव के साथ मतीश का परिचय बहुत थोड़ी देर का है । फिर भी थोड़े-मे जितने भी लोगों को देखने का सुयोग उसे मिला, उनके शरीर पर वस्त्रों की कमी चाहे जितनी हो, मगर उनमें पुष्टि की दीनता दिसाई नहीं पडी। नंगे और अपनगे लडके-लडकियो के एक दल ने उसे घेर लिया था ताकि वे 'कलकत्त के वाबू' नामक अजीब जीव को देख सकें। उन लोगों के चालवलन में बाहरी चकाचौंध तो न थी, मगर एक सरल सहज स्निग्यता अवश्य थी। वयस्क लोगों से बातें कर इतना समझ में आया था कि उस इलाके के सेनों में धान है, ताल-जलयों में मछली है, गायें दुधारू हैं और आम, कटहल, नारियल के जंगलों में सदा फल रहते हैं। यशोहर जिले के किसी दूर दुर्गम देहाती इलाके में जंगल से घिरे इस गांव ने मपनी श्यामलथी लेकरमतीश के मन के एक कोने को ढक दिया था। यह बात वह हृदय में अनुभव करता है, इसी गांव की गोद में उसकी मल्लिका एक दिन कली के रूप में दिखाई दी थी और इसीके आकाशतले, इसीकी हवा का स्पर्श पाकर दिन पर दिन एक-एक कर उसकी रूप-माधुरी का सहस्रदल विकसित हुआ है। वहां से उखाड़कर लाकर इस मगताहीन रूखे वातावरण में उसे क्या देकर जीवित रखेगा, भतीश को यही एकमात्र चिन्ता है । मल्लिका के पत्र के उत्तर में उसने लिखा--- 'और कुछ दिन कण्ट उठाओ, मल्ली ! मकान की तलाश में हूं। जिस दिन मिलेगा, उसी दिन भाकर तुम्हें ले जाऊंगा। जितेश को लिखा-'अपना दिल्ली जाना इस वक्त ताक पर रख दे । जब तक मैं नहीं आऊं, तब तक अपनी भाभी को छोड़कर कहीं भी गया तो तेरी खैर नहीं।' - और कोई महीने भर चेष्टा करने के बाद एक छोटा मकान मिल गया। साथ ही एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान में शाम के वक्त दो घण्टे हिसाब-किताब का काम भी मिल गया। मतीश को लगा कि उरा जैसा भाग्यवान और कोई नहीं । सात दिन छुट्टी लेकर फलकत्ता आया । आते ही सुना कि बुआजी की लड़की गीता की शादी है। मां बोली, "उनके घर में यह पहला काज है। बहुत लोग इकट्ठे होंगे । वार-बार कह गई हैं, नई बहू को लेकर आना है । नहीं जाएंगे तो . बुरा लगेगा।" हारकर मतीश को राजी होना पड़ा। उसी दिन शाम को सास के कमरे में मल्लिका की पुकार पड़ी। जाकर देखा कि कांटा और मोटी बही लिए गांगुली-परिवार का पुराना . सुनार मोतीलाल बैठा हुआ है। सामने कई गहने रखे हैं। सुहासिनी- देवी बोली, "तो फिर यही तय रहा मोती-नेसलेट और ऊपर हाथ का नाप ले लो। चूड़ी के नाप की जरूरत नहीं। एक चूड़ी उतारने ते हो - 1 ५० / मल्लिका जाएगा ! मगर चीज मुझे सोमवार तक ही चाहिए।" मल्लिका की ओर मुड़कर बोली, "अपनी एक चूड़ी उतार दो। मल्लिका ने चूड़ी उतारकर साम के नागे रख दी। सुनार उठकर उमको मुजा, के ऊपर एक जड़ाऊ आमलेट रखकर बोला, "यही टीक है, अम्मा ! खूब फब रहा है, देखिए।" फिर अपनी जगह पर जाते-जाते बोला, "आपकी बहू माक्षात् मां दुर्गा जैसी है। सजाइए न, कितना सजाएंगी।" शाम के वक्त कपूरलाल वडे बाजार से बनारमी माड़ियों का गट्ठर लेकर माया। दोतले के बड़े हॉल में मौ पावर का बल्ब जलाकर मां- बेटी मिलकर फोई घण्टेभर तक छोटा-छांटी करती रहीं। तत्पश्चात् मल्लिका को बुलाया गया। दुकानदार एक वार उसकी ओर देखकर उच्च स्वर में बोल पडा, "रंग पसंद करने की और जरूरत नहीं, माजी ! यहूरानी को सभी रंग फवेगे। ये लीजिए..." कहकर उसने गहरे रंगो की चार-पांच दामी साड़िया मल्लिका की तरफ बढ़ा दी। रात ग्यारह बजे जब मल्लिका सोने आई तो मतीश बोला, "सुना है, बडे कपडे-गहने मिले हैं ?" "लगता है, तुम्हें जलन हो रही है ?" कहकर मल्लिका होठ दवाकर हम पड़ी। मतीश ने उस हंसी में योगदान नही किया, वह जाने कैसा गम्भीर हो गया । मल्लिका आगे आकर दायें हाथ में पति का गला पकड़कर बोली, "अरे तो गुस्मा क्यों करते हो? तुम्हे भी कुछ हिस्सा दे दूगी, अब तो . गुम हो ?" मतीश ने म्लान हमी हमकर कहा, "पुग होने की हो तो यात है। मगर तुम तो जानती नही, मल्लिका, ये गहने-कपड़े तुम्हारे लिए नहीं आए । आए हैं गांगुली परिवार की मान-रक्षा के लिए।" मल्लिका के चेहरे की हंसी विलीन हो गई। पति के और थोड़ा पास विमफकर योली, "पाकई इस शादी में जाते वक्त मुझे जाने कैसा .

र-सा लग रहा है। इससे अच्छा, हम लोग पहले ही चले जाएं । मां और पिताजी को समझा-बुझाकर कहें, तो निश्चय ही वे जवरदस्ती नहीं करेंगे।" "मैंने कहा है, वे लोग नहीं सुनेंगे।" और अगले ही क्षण मतीश जाने कैसे उत्तेजित होकर बोला, "नहीं, नहीं, यह ठीक ही हुआ । शादी में तुम्हें जाना ही होगा। नहीं जाओगी तो समझेंगे कि भाग गए। इससे तो अच्छा, उन लोगों का अस्त्र उन्हींके विरुद्ध प्रयोग किया जाए। इन वनारसी साड़ियों और जड़ाऊ गहनों का अस्त्र ! ये सब पहनकर, रानी की तरह सिर ऊंचा कर इन ओछे, ईर्ष्यालु, कुचक्री लोगों के बीच जाकर खड़ी हो जाओ। वे लोग अच्छी तरह देखें, देखकर जलें-मुनें। उनकी उस जलन को मैं अपनी आंखों से देखना चाहता हूं।" मल्लिका पति के पास बैठकर उसके हाथ परं धीरे-धीरे हाथ फिराने लगी। इस शांत-शिष्ट निरीह व्यक्ति के हृदय में इतनी आग छिपी हुई थी, उसने सपने में भी किसी दिन नहीं सोचा था । .

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हां रुकी नहीं हैं, शायद भेदकर किन्हीं स्मृति-मुखर अतीत के दिनों में हुंच गई हैं, जिनका पता मल्लिका को नहीं। गहने पहनाते वक्त मंजरी ने फिर मुंह खोला, "ऐसा नेकलेस आज- कल कोई पहनता है ? मां की भी कैसी पसन्द हैं ! और यह क्या ब्रेसलेट है । छि: !" कहकर वह कमरे से बाहर चली गई। अपने कमरे में गई। दरवाजा बंद कर अलमारी में से अपने गहनों का वक्सा उतारा। ढक्कन खोलकर बहुत देर तक उसी तरफ देखती रही। फिर अपनी तरफ देखा। शायद वह मंजरी याद आ गई, जिसके सर्वाग पर एक दिन ये सब गहने प्राणमय ज्योति की तरह सुशोभित थे। आज की इस मंजरी के लिए ये सब महज निष्प्राण स्वर्ण पिण्ड हैं। जल्दी से कुछेक गहने छांटकर वह मल्लिका के पास वापस आई। अब उसके कुशल हाथों से अंग-सज्जा चलने लगी। एक-एक स्तर पार हो और वह घूम-फिरकर चारों ओर से देखे, ठीक उसी तरह, जैसे एक शिल्पी अपने हाथ की गड़ी देवी-मूर्ति को देखता है दीर्घ प्रसाधन-पर्व पूरा हुआ, तो वह पास आकर बहू के रक्ताभ कपोल पर एक छोटा-सा चुम्बन रखकर बोली, "दादा की ओर से थोड़ी- सी एक्टिग की।" और कहते ही तूफान की तरह बाहर चली गई। मल्लिका अपनी इस दुर्योध-दुर्मुख ननद की ओर विस्मय-विमूढ़ नेत्रों से देखती रही। इतने दिन उसे जिस रूप में देखती आई है, उससे आज का यह रूप अलग है। यदि कुछ परिवर्तन आया है, तो कैसे भाया, उसका क्या कारण है, वह नहीं जानती। .

७ जितेग घर नहीं है । कई दिन पहले अपनी क्रिकेट की टीम लेकर दिल्ली या लखनऊ खेराने गया है। घर पर पांच प्राणी हैं। एक बडी गाडी में ही आ गए । जाने से पहते मतीश और मल्लिका ने गुप्तरूप से तय कर लिया कि उन्हें आखीर तक नहीं रुकना । दो-एक घण्टे वाद ही मल्लिका के सिर में भीषण दर्द होगा या जी मिचलाएगा और मंजरी के सहयोग में मतीग के ऊपर भार पडेगा उमे गाड़ी में बिठाकर घर पहुंचाने का । वे लोग टैक्सी लेकर घूमेगे । आलोकोग्ज्वल रलकत्ता का विचित्र रूप देखेंगे । फिर काफी रात गए पर लौटेंगे। दो दिन बाद ही तो यह शहर छोड़कर चले जाना है। फिर कब आएगे, कौन जानता - मल्लिका उत्साहित होकर बोती, "यडा अच्छा होगा। सचमुध, बचपन से ही कलकत्ता की कितनी ही कहानिया सुन रखी है । एक दिन भी अच्छी तरह देखना नहीं हुआ।" मतीश ने भार लिया है कि यह क्षोभ वह एक रात में ही दूर कर देगा। यह सारी व्यवस्था सफल होगी या नहीं, इस विषय में उन्हे सदेह कम नही था। बुआजी ने यदि छुट्टी न दी, मा यदि मुह फेरकर बैठ जाएं, मंजरी मदद न करे-ये सारी सम्भावनाएं थी। मगर एक सामान्य आकस्मिक घटना से उन लोगों का पथ सुगम हो गया। तीन तले के एक सुसज्जित वडे कमरे मे आमत्रित महिलाओं की - ! महफिल जमी है। अत्युज्ज्वल तड़ितालोक के साथ होड़ कर रूप और वेशभूपा की दीप्ति जल रही है । उनके वीच कन्या भी है। वरपक्ष की एक वयस्क महिला कमरे में घुसते हुए बोली, "कहां है, हमारी बहू कहां है, बहूरानी कहां है ?" एक बार चारों ओर नजर डालकर वह मल्लिका के पास पहुंच गई। बोली, "शायद यह है ? वाह, सुना है, लड़की सुन्दर है। इतनी सुन्दर यह तो साक्षात् । लक्ष्मी है। देखो, एकदम देवी-देवताओं का सा चेहरा है..." मल्लिका बड़ी परेशान । शर्म के मारे सिर नहीं उठा पा रही। फिर भी वह इतना समझ रही है कि चारों ओर सारी आंखें उसीपर टिकी हैं और उनमें से कोई भी प्रसन्न नहीं है । इसी वक्त जाने किसने उसकी रक्षा की। "यह रही दुलहन, इधर आइए दादीजी !" कहकर कोई उस वृद्धा का हाथ पकड़कर असली कन्या के पास ले गई। वह वृद्धा स्पष्टतः निराश ही हुई । यह खबर जब दुलहन की मां के कानों में पहुंची, तो वह बौखला उठी। सबके बीच में जमकर बैठने की क्या जरूरत थी ? रूप है तो ठीक है, मगर इस बात पर इतना दिमाग किसलिए? आई तो हो बच्चू गरीब-गुरबे के घर से । बर्तन मांजते-मांजते हाथों में छाले पड़ गए हैं। इस तरह के 'मधुर' वाक्यों का गुंजन कमरे-कमरे में होने लगा और ये सभी बातें मल्लिका के कानों में जा पहुंची। उसके सिर में सचमुच ही दर्द हो गया और चले जाने के प्रस्ताव पर स्नेहमयी अभिभाविकाओं के दल ने एकमत से सहमति व्यक्त कर दी। एक बड़ी नई क्राइसलर गाड़ी है । जोर से हॉर्न बजाती-बजाती चौरंगी की छाती पर दौड़ी चली जा रही है। स्वामी के भुज-बंधन में पड़ कर पीछे की सीट पर जब मल्लिका डूब गई, तो उसका दिल धुक- धुंक कर उठा । सिर्फ वही एक वात दिमाग में आने लगी, इतना सुख वह सहन कर सकेगी? मतीश के विवाहित जीवन में इस दुर्लभ क्षण को इससे पहले एक बार भी आने का सुयोग नहीं मिला । आज शाम से वह मचल रहा है। । ५६ / मल्लिका

मन में उत्सव का स्वार जग उठा है। गौमासिद व विमा को
रात्रि है । रूपैश्वर्य-भडिता जिस निशिक्षा का जान 6 रन
माग में व्याप्त है वह मानो उसकी नद्यारीता नायरमा
मानो आज ही प्रथम बार उसके जीवन में नाई है। कार में
और भी निविड़ सान्निध्य में पाना चाहता है। शिमोन पर
एकाएक जब दोनों मुंहों का व्यवधान भावन मोन हो साटो
मल्लिका ने धीरे-धीरे पति को ढकेल दिया। हादरी को
कर फुसफुसाकर बोली, "वह देख रहा है।"
"उसके पीछे ओखें लगी हुई है क्या ?" महोगने उसी तरह धोनी
आवाज में कहा।
"वाह, तो इसीलिए.."
शेप बात कहने का मौका नहीं मिला । नजिदरक कोई
सचमुच की आपत्ति थी, ऐमा भी नहीं लगा।
ईडन गार्डन को बा रसकर, बाउटरान पाट को छोटकर, गम के
तौर से चिपटती टमी तोर बैग में दौड़ी जा रही है। नदी केन्दार
मल्लिका का मन नाच उठा जल वाले इलाके की नली है. उन
रामका रक्त का संबंध है। प्रशस्त गंगा के कक्ष पर दड़े-बड़े उहाजनगर
डाले हुए हैं । उसी तरफ उंगली कर वह बोली, “६ रा है ?"
"कहां?"
7
"यही एक-एक मकान की तरह किन्ने सुन्दर है देखने में।"
"अरी बांपात ! जहाज नहीं पहबानही ?"
"वाह, मैंने कभी देखे हैं, जो पहबानू ?"
"ओह ! असली चीज तो तुम्हें दिखाई नहीं।"
"क्षा?" मल्लिका ने आई वड़ो मार का।
"हाईकोर्ट ।"
"चलो न, देख आएं।"
इमपर मतोश हा-हा कर हम पड़ा। मल्लिका भीतर का इम्प नहीं
पकड़ पाई, फिर भी इतना समझ गई कि बिना समझे वह नहीं बुध
मूबना दिया बैठी है। पति को उकेलकर मनग्न काल में बोली, "हटी,

तुग तो खाली गजाक करते हो।" रेसकोर्स के किनारे रो जैसे ही गाड़ी ने पूर्व की ओर मोड़ लिया, गड़-गड़ कर हठात् वादल गरज उठे। साथ ही साथ आंखों में चकाचौंध करने वाली बिजली की. चमक । मल्लिका पति के और भी करीव सरक आई। खिड़की से बाहर देखकर बोली, "अब घर चलो । लगता है, तूफान आएगा।" "आया करे ! पानी-तूफान में दौड़ने में ही तो मजा है।" "नहीं, मुझे डर लगता है।" "छि:, पगली!" प्रगाढ भुज-बंधन और भी दृहतर हो गया । गोई तीन घंटे घुगने के बाद वे लोग अबराहट, स्ट्रीट पहुंचे, उससे पहले ही जोर की बरसातें शुरू हो चुकी थीं। गाड़ी घर के आगे खड़ी की गई। गतीश उतर पड़ा। मल्लिका भी उतरने को थी किमतीश ने रोककर पाहा, "ठहरों, पहले दरवाजा खुलवाऊं, नहीं भीगकर ढेर हो जाओगी।" "तो होने दो; मैं उतरूंगी।" मल्लिका ने मृदु प्रतिवाद के स्वर में पाहा । इतनी देर में मतीश गाड़ी का दरवाजा बंद कर आगे बढ़ गया। चौड़ा फुटपाथ पार कर सांकल खटखटाने को था कि हठात् एक तीधी चीख सुनगार उराने पीछे मुड़कर देखा । गाड़ी ने चलना शुरू कर दिया है। "रुको, रको, ए ड्राइवर ! ए टैक्सी! चोर ! चोर ! पकड़ो !" जीखता-गीखता मतीश दौड़ने लगा। उसके मुंह पर केर-सा धुआं छोड़कर टैक्सी विद्युत्गति से अदृश्य हो गई। रास्ता सुनसान है। दुकानें बंद हैं । सिर्फ लैम्प-पोस्ट साक्षी गोपाल की तरह पड़े-खड़े भीग रहे हैं। मतीश घर नहीं लौटा । रातभर मूराला- पार वृष्टि सिर पर लिए पागलों की तरह रास्तों पर घूमता रहा। तत्पश्चात् एकाएक ध्यान आते ही सुबह के वात खबर करने थाने गया। गाड़ी का नंबर मालूम नहीं। कौन-सी गाड़ी थी, यह भी याद नहीं कर पाया । मोटा-गाला दाढीवाला ड्राइवर-सिर्फ यही कुछ तथ्य थानेदारजी ur Infor जान सके। अगले दिन सुबह आठ बजे शय यह एप शिम : none, उसमें और चलने की भक्ति नहीं पी। नहाया भगिन पागल गया । मां भागी आई, "कहाँ था गारी गीmutn. को ! और बहू कहा है ?" मतोग क्या उनर दे ! घुटनों में frri Int, HARIY vi, "सर्वनाग हो गया, मा!" और फकिराया पुलिस के उच्च पद पर गाणी गाय के pringh Rail लेकर उनके पास दोहे । पान याने में मम | meritsansar के बाहरी छोरों पर घोरबीन गई। Om nama तक टेलीग्राम दौड पढे । दमत- दान giframe जरी हुई है, उसकी चिन्ता नहीं करता । नर्व-शॉक दूर कर अच्छी होने में समय लगेगा। ट्रीटमेण्ट तो है ही। उससे भी ज्यादा जरूरी है, लांग एण्ड पेशेण्ट नसिंग । सहानुभूति के साथ सेवा । एक दिन, दो दिन नहीं, लगता है, कई महीने।" कमरा लोगों से भरा है। सभी निस्पन्द हैं, चुपचाप डॉक्टर के मुंह की ओर देख रहे हैं । हठात् पीछे से भीड़ को चीरती मंजरी आगे आई । दृढ़ कण्ठ से वोली, "इसकी चिन्ता न कीजिए डॉक्टर काका ! मेरे पास तो कोई काम नहीं है । यह भार मैं अपने ऊपर लेती हूं।" "तुम कर सकोगी बेटी ?" वृद्ध डॉक्टर ने संदेह के स्वर में कहा । "क्यों नहीं कर सकूँगी ?" "यह अनाड़ी हाथों का काम नहीं। नसिंग के लिए अवश्य ही प्राण वाहिए, मगर उसके साथ चाहिए ट्रेनिंग।" गांगुली साहब के साथ परा- मर्श कर तय हुआ कि वहू को फिलहाल किसी नसिंग होम में भेजा जाए। वहां दो सुदक्ष नसें उसका भार लेकर रहेंगी। अविलम्ब उसकी व्यवस्था करने के लिए डॉक्टर साहब उठ खड़े हुए।

पहली बार जिस दिन मल्लिया को होश आया। उमने आँखें पोल- कर चारो ओर थोड़ी देर देखा । जाने नया याद करने की चेष्टा की। तत्पश्चात् क्षीण स्वर मे चोली, "मैं यहां हूं ?" मतीश पास ही था । उसके चेहरे पर झुककर बोला, "तुम पर में हो मल्ली, मेरे पास हो।" "तुम ! नही नहीं," वह भीत कण्ठ में चीस उठी, "सरक जाओ। मुझे मत छूमो, मुझे छूना ठीक नही कहकर वह स्वयं साट पर दूमरी तरफ उसलकर चली गई। मतीन ने दोनो हाथों में उसे खीचकर लाने की चेष्टा की। बोला "मैं, में ! मेरे पाम हो तुम।" "तुम्हारे पैरो पड़ती हू, मुझे छोड दो ! मैं अशुचि हूं, अस्पृश्य हूं। मेरा सर्वनाश हो गया !" चीख सुनकर मीनियर नर्म मिम मरकार दोड़ी बाई। विरक्ति के स्वर में बोली, "क्या कर रहे हैं ! छोड दीजिए उमे।", मतीश अपराधी की तरह उह पड़ा। उत्तेजना के बाद मस्तिका ने हठात् क्लान्त बेहाल होकर आखें बंद कर ली। नम ने जल्दी से आगे बहकर उसकी नब्ज पर हाय रखा। मतीश को पड़ा हुक्म दिया गया-जितने दिन डॉक्टर न मिले, उतने दिन मल्लिका के कमरे में उसका प्रदेश निपिन -- । वह शाम होते ही नसिंग होम के दफ्तर में जाकर धरना दे देता है। इस सरकार से मिलकर पूछता है-आज कैसी है ? . उत्तर प्रायः एक ही होता है-थोड़ी अच्छी है, मगर पहले जैसी ही है। ऐसे वक्त इलाहाबाद से पत्र ाया कि और छुट्टी देना सम्भव नहीं। यदि तुरन्त जॉयन न किया तो वे लोग और किसीको रख लेंगे। उत्तर में मतीश ने तुरन्त त्यागपत्र लिख डाला। फिर जाने क्या सोचकर उसे धीरे-धीरे फाड़ फेंका। मल्लिका की वे बातें याद आ गई, 'चलो, हम इस शादी से पहले ही चले चलें। मां और पिताजी को समझाकर कहेंगे तो वे और जबरदस्ती नहीं करेंगे।' उसे लेकर गृहस्थी बसाने का स्वप्न अभी खत्म थोड़े ही हो गया है। मंजरी रोज एक बार आकर देख जाती है। उस दिन उसे थोड़ा स्वस्थ देखकर बोली, "भगा क्यों दिया री ? वेचारा रास्तों में सूखा मुंह लिए घूमता फिर रहा है।" मल्लिका का चेहरा करुण हो गया। बोली, "उन्हें तुम देखो, भाई !" "मैं देखू ! माने ? तू क्या घर नहीं जाएगी? इस अस्पताल में और कितने दिन लेटे रहना चाहती है, बता?" "घर जाने का रास्ता तो और नहीं रहा, दीदी !" "यह कैसी बात !" मल्लिका थोड़ी देर चुप रहकर बोली, "जो मैं खो चुकी हूं, उससे ज्यादा बड़ी चीज औरत के लिए और क्या है, भाई ? यह बात वह ते नहीं समझ सकते, मगर औरत होकर तुम तो समझती हो। यह देह क्य अब उनके पैरों में रखी जा सकती है, या इससे उनकी सेवा हो सकत . - . मंजरी ऊष्ण कण्ठ से बोली, "देख बहू, तेरी ये सब पंडिताऊभ वातें सुनकर मेरे शरीर में आग लग जाती है। देह की बात कहती है मगर इसे बचाने का तो कोई उपाय तेरे हाथों में नहीं था।" ६२/ मल्लिका

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सारा जीवन देकर अपने स्वामी का प्रेम चाहती हैं, मैं समस्त अंतःकरण से अपने स्वामी की घृणा चाहती हूं। बता सकती हो, क्या करने से वह मिल सकती है ?" कहते-कहते उसकी आंखें भर आई। मंजरी किसी बात का जवाव दिए बिना गुस्सा कर चली गई। घर पहुंचकर तूफान की तरह सीधे दादा के कमरे में जा घुसी। तिक्त कण्ठ से बोली, "परी देखकर खो गए थे; अब भुगतो ! जंगली पक्षी को घर लाकर रखने से ही वह पालतू हो जाता है, कभी अपना बन जाता है ?" उसी रात मतीश इलाहाबाद चला गया।

९ नर्स के साथ रोगी का जो सम्पर्क है, उसे वे दोनो चुपचाप कब पार कर गई, मिम मरकार और मल्लिका मे से किमीको पता नही चला। आज उनका वास्तविक मम्मकं क्या है, वे नही जानती। सिर्फ इतना जानती हैं कि वे एक-दूसरे के अन्त.करण के आमने-सामने खड़ी हैं और बीच में कोई अन्तराल नहीं है। उस दिन मंजरी के चले जाने के बाद मल्लिका बहुत देर तक उसी तरह निढाल होकर पड़ी रही । अन्तहीन विचारी के गहन अतल मे डूब गई । मिम मरकार क्य आकर उसकी चारपाई के एक सिरे पर बैठ गई, उमे पता नहीं चल सका। पता चला उस वक्त, जब उत्तका दाहिना हाथ उसके हाथ मे आकर लगा। चौककर उठ बैठी, "ओ मा ! तुम कर भाई?" मिग सरकार इसका जवाब न देकर बोली, "मंजरीदेवी ठीक ही कहती हैं। संसार में बचे रहने के लिए बहुत कुछ भूलना पड़ता है।" "भूल नहीं पा रही भाई !" "मैं कैसे भूल गई ?" "तुम?" मल्लिका करवट बदलकर नसं की गोद में हाथ रखकर बोली, "तुम भी मेरी ही तरह"" - मिस सरकार हंसकर बोली,"हां, तुम्हारे साथ जो हुआ, उससे बहुत कुछ मिलता है। थोड़ा-बहुत अलगाव भी है। मैं जिन लोगों के शिकंजे में पड़ी थी, उन्होंने मुझे टैक्सी में नहीं विठाया । मुंह में कपड़ा ठूसकर कंधे पर चढ़ाकर एक मैदान में जा पटका था । काम पूरा हो जाने पर जव दया कर मुक्ति दे गए, तब मेरे भाग्य में तुम्हारी तरह ऐसा नसिंग होम नहीं लिखा था, मुझे मिली थी सिर्फ एक पेड़ की छाया। वहां से अपने निढाल शरीर को खुद ही खींच-घसीटकर जव घर ले गई, तो मिला धक्का । " "क्या कहती हो !" मल्लिका चौंक गई। "हां । अवश्य ही गला पकड़कर धक्का किसीने नहीं मारा, मगर बहुत कुछ ऐसा ही हुआ । उसके बाद बचा सिर्फ रास्ता। कलकत्ता आई। कैसे, सो मत पूछो। कई बार कई लोगों के सम्पर्क में आकर अन्त में जव वाहर आई, तो एकदम विधिवत् परीक्षा पास नर्स । माज कौन कहेगा, यह रमा सरकार नोआखाली के एक प्रसिद्ध गांव के स्वनाम-धन्य मित्र वंश की लाडली वेटो वही वन्दना है ?" "नाम भी बदल डाला !" "आदमी ही जब नहीं रहा, तो तुच्छ नाम को बनाए रखने से क्या लाभ होता, मल्लिका ?" मल्लिका ने कुछ देर जाने क्या सोचा । फिर बोली, "मगर एक बात है, दीदी ! बहुत कुछ पा चुकी हो, समझ गई। घर तो नहीं बसा सकी।" "ठीक ही कहती हो, लेकिन उसका कारण जो तुम सोचती हो, सो नहीं है। कारण यह है कि घर से बाहर करने वाले अनेक सुहृद् होते बाहर से घर लाने वाला संगी आज तक एक भी नहीं आया।" "यदि वैसा साथी मिल जाए, तो क्या अपनी ओर से मन-प्राण से उसका संसार चला सकोगी ?" "क्यों नहीं ?" मल्लिका करुण कण्ठ से वोली, "मगर मैं तो नहीं चला पा रही, भाई ! मेरा देवता जैना स्वामी है। उसके चेहरे की ओर देखकर मेरा कलेजा फट जाता है। फिर भी तो उसकी पुकार का उत्तर नहीं दे पाती।" - - ६६ / मल्लिका मल्लिका को आंखें छलक उठी। मिस सरकार अपने आंचल से सस्नेह आंसू पोंछकर कोमल कण्ठ से बोली, "मैं सब जानती हूं, बहन ! मगर तुम्हें अपनी ये किताबी बातें मुलानी पड़ेंगी । तुमने बहुत पडा है, बहुत सीसा है। वे सर तत्त्व की बातें हैं । जीवन के मध्य से जव बिचाव बाता है, तो ये मब किमी काम नहीं आती। उस वक्त इन सबको झाड़- फेंककर सीधे सहे होना पड़ता है।" मल्लिका योलो, "नही दीदी, तुम गलती कर रही हो। जिसे लिखना- पढना कहते हैं, वह मैंने किनी दिन भी नही सीखा । ठेठ गांव में ब्राह्मण- पंक्ति के घर बड़ी हुई हूं। थोड़ी-सी वगला और संस्कृत सीखी है । और वह सब मुझे याद भी नहीं। जीवन में मैंने अगर कुछ पाया है, तो पुस्तकों से नहीं पाया । पाया है आदमी से | मेरे भीतर जो कुछ देखती हो, वह मय इस एक ही आदमी की देन है।" "कौन हैं वह ?" "मेरी किशोरावस्था के गुरु मेरी दीदी के पति ।" नौकरानी ने आकर बताया कि डॉक्टर साहब ने मिस सरकार को बुलाया है । नर्स जाते-जाते बोली, "अव उठकर मुंह-हाथ धो लो। तुम्हारा खाना यहीं लाने के लिए कहती हूं।" मिस सरकार क्या कह गई, यह मल्लिका ने शायद सुना ही नहीं। उसके कानों मे तो यादव तकरन का स्नेह-गम्भीर उदात्त कण्ठस्वर गूजने लगा। याद माया, एक दिन किसी प्रसंग में उन्होंने कहा था, 'यह जो मानव- देह हम धारण करते हैं, इसे तुच्छ मत समझो, मल्लिका ! देह तो देवता का मंदिर है । इसे शुद्ध-पवित्र रखकर ही इसमें देव-प्रतिष्टा सम्मर है। तुमने लड़की का जन्म लिया है। आज नही, कल एक दिन तुम्हें पति- वरण करना पड़ेगा। उस आसन पर आकर जो खडे होंगे, मपना यह देह- मन उनके पैरों में शुद्धिभाव से समर्पित कर मको, इस बात का ध्यान रहे-ठीक उसी तरह, जैसे हम लोग देवता के पंगे में फूल चढ़ाते हैं। मन में सो, मल्लिका, सुन्दर, निष्कलंक फूल ही देव-नोग्य होता है। फूल पूरे पर गिर पड़ा, जिसे कोई पैरों मे कुचल गया, वह देव-यूमा कभी नहीं लगता।' ये बातें मल्लिका के अन्तःकरण में जमकर बैठ गई हैं। कौन जानता था कि एक दिन उसके स्वयं के जीवन में ही इन बातों को मूल्य परीक्षा की जरूरत पड़ेगी ? मगर जब सचमुच ही जरूरत पड़ी, घर बसाते न वसाते ही उस घर को नष्ट करने की पुकार पड़ी, और सहसा तूफानी हवा से उसकी यौवनारति की सद्यःसज्जित दीपमाला वुझ गई, तो उसने सब कुछ फेंककर अपनी सारी शक्ति लगाकर इस निर्मम कठिन आदर्श को ही जा पकड़ा। मन ही मन कहने लगी, 'प्रथम ज्ञानोदय के साथ जिसे सत्य कहकर स्वीकार किया है, उसकी मर्यादा किसी भी तरह नष्ट न हो। उसके लिए कितना ही बड़ा मूल्य क्यों न देना पड़े, दूंगी। यह उच्छिष्ट देह त्यागनी. पड़ेगी, तो त्यागूंगी, मगर इससे मेरे देवता की पूजा असम्भव है।'

१० देखते-देखते कोई तीन महीने बीत गए । मल्लिका बहुत कुछ स्वस्थ हो गई है । नसिंग होम के इस सस्नेह मात्रय से विदा लेने का दिन दुत गति में पला आ रहा है। लगता है, मल्लिका शायद छोटी खाट पर लेटी-लेटी यही बात सोच रही थी। भोर हुए काफी देर हो गई। और रोज वह अब तक उठ जाती थी । माज जैसे कोई तकादा नहीं । जंगले में मे चुपचाप धूप से प्रकाशित आकाश की ओर देख रही थी। मिस सरकार नाश्ते की प्लेट लिए कमरे मे घुसते हुए बोली, "अरे, तुम अभी तक लेटी हो!" "उठने की इच्छा नहीं करती, भाई !" नसं मुंह दबाकर हंसी, "क्यो ?" "कई दिन हो गए, लगता है, जैसे दारीर में चल नहीं रहा । कुछ भी पाने को जी नहीं करता । सिर उठाते ही शरीर घूमने लगता है।" मिस सरकार मेज टीम करते हुए बोली, "यही तो होगा । तुम खा सको न खा मको, मगर हम लोगों के लिए पद यह भरपेट मदेश साने का मौका है।" फिर पोड़ा रुककर मल्लिका पी संदिग्य आंखो की ओर देखकर बोली, "रामल नहीं पा रही ! नोटिस नही मिला?" मल्लिका ने आसे मुमा ली। न जाने कहा से उसके दुर्बल पीले चेहरे पर एक झलक लानी उतर आई, मगर यह सिर्फ क्षग-भर फो।

अगले ही क्षण नर्स ने डरते हुए गौर किया कि उस चेहरे पर खून को एक भी बूंद नहीं । गोया कि वह एक सफेद कागज है। दोनों आंखें न जाने किस गहन आतंक की छाया से भर उठी हैं ! मिस सरकार हाथ का काम फेंककर दौड़कर आगे जाकर उसके विस्तर पर बैठी ही थी कि मल्लिका हठात् उसकी छाती पर जा गिरी और आतंकण्ठ से चीख पड़ी, "यह क्या सुना दिया, दीदी ! तुम जानती हो, जो आ रहा है, वह मेरे गर्व का धन है, या कलंक का टीका है ?" नर्स के मुंह में इस बात का उत्तर फौरन ही नहीं माया। वह तो उसे वस कलेजे से चिपटाकर उसके सारे शरीर पर हाथ फिराने लगी। कुछ देर बाद अस्फुट स्वर में बोली, "ऐसी बातें नहीं करते । छिः ! मंजरी आई अगले दिन तीसरे पहर । मिस सरकार के मुंह से खवर पाकर दौड़ती-दौड़ती आई । चौखट के उस तरफ से ही खुशी का स्वर, "क्यों पंडितानीजी, तुम्हारे लेक्चरों की टोकरी अव तो ताक पर पहुंच गई ? घर नहीं जाओगी ! ऐसी बुरी बात भगवान कभी सहन कर सकते हैं ? गर्दन पकडकर लाने के लिए प्यादा भेज दिया। कैसी जन्त हुई हो !" पास आकर बैठते ही मल्लिका शुष्क कण्ठ से वोली, "बड़ा डर लग रहा है, दीदी !" "जा मर ! डर किसका ? बच्चा जैसे तेरे ही हो रहा है, और किसी- . के कभी नहीं हुआ।" "नहीं, भाई, सो बात नहीं..." "रहने दे, तुझे कोई बात कहने की जरूरत नहीं।" हठात् गम्भीर होकर बोली, "सच, हंसने की बात नहीं बहू ! अब तुम अकेली नहीं रहीं। पेट में हम लोगों का लड़का है। गांगुली-परिवार का प्रथम वंशधर । उसकी मान-मर्यादा है, कल्याण-अकल्याण है । अव और इस नसिंग होम में पड़े रहने से काम नहीं चलेगा। पिताजी को जाकर कहती हूं। वह डॉक्टर को सारी बात समझा देंगे।" मल्लिका की वह रात प्रायः विना निद्रा के कटी। उसे लेकर विधाता का यह कैसा कौतुक है ! अब तक जो समस्या थी, क्या वही काफी नहीं थी? उसपर फिर यह क्या परीक्षा ! 'गांगुली-परिवार का प्रथम ७० / मल्लिका वंगधर !' मंजरी के मुंह ने यह बात सुनने के बाद भी उसका मारा कमेजा आनंद मे, गौरव से क्यों नहीं भर गया ? अन्तर के मनःस्यल ने कुत्सित सर्प भी सरह एक विपात मंदेह गिर उठा बैठा । उसका मारा अस्तित्व हिल उठा। मुबह की हवा में जाने कब असे बंद हो गई थी। नीद पुनी, उम वक्त मारा कमरा मुबह की कोमल धूप मे भरा हुआ था। जल्दी से आप धोकर आई तो देखा कि जूनियर नर्म मीरा उसके बाड़े लिए सड़ी है। उसकी तरफ देखकर बोनी, "अरे भाई, घोडा-मा कागज और कलम दे सकती हो?" "विट्ठी लियोगी ?" व अल्पवयमी लड़की मुह दबाकर हंसी। मल्लिका ने मिर हिलाया। "बड़ा कागज चाहिए ?" "हो, वहाही दे दो।" वहत दिनो याद यह दीदी को मह संबो चिट्ठी लिग रही है । गुरु में थोड़ी-मी मिकायत, अभिमान-तुम लोग विदा कर निश्चित हो गए हो । एक बार मासूम भी नही करना चाहते, वह मर गई या जिन्दा है। दरमादि। इसके बाद लिदा-बड़ा दर लगा था, दीदी! ठेठ गांव को मूग लइकी । ये लोग किम नजर में देखेंगे । मगर ज्यों-ज्यो दिन बीत रहे हैं, देखती हूं, जैमे सब लोग मेरे लिए ही रास्ता देश रहे थे । जगा देवर, मी ही ननद । और तुम्हारा वहनोई ? उमकी बात नही लिए तो ठीक। मी अन्त में रही उनके परम मर्वनाम की बात । उम दुर्घटना रात, नसिग होम, पति, ननद, मिम सरकार और इन ममस्या- जति सन्तान का आविर्भाव । सभी दुछ निष्कपट भाव में मविस्तार बताफर लिसा-दीदी रानी, अब तुम लोग बताओ, मैं रिस रास्ते पर पलू ! जीजा साहब का प्रपर उपदेश मेरे लिए अनय गुरु-मत्र है। इतने दिन उमीके प्रकाश में तय किया है। हठात् तूफान आ गया। पौर पृष्ट नहीं देग पा रही । आज नये निदेशवी मावश्यता दिमाई पड़ी है । इतनी बड़ी आवश्यकता मेरे जीवन में और कमी नहीं दिखाई दी। उत्तर आया सात-आठ दिन बाद । कुछ पंक्तियां दीदी की हैं, साथ ही कुछ पन्ने जीजा साहब के हैं। कुशल प्रश्नादि के बाद तर्करत्न ने लिखा है-आदमी के जीवन में तूफान आता है, और निकल जाता है। जो क्षति वह कर जाता है, उसका चिह्न भी एक दिन लुप्त हो जाता है । तूफान क्षण-भर का होता है, मगर सूर्यालोक शाश्वत होता है। तूफान की बात याद न रखो, सूर्य का अर्थात् ध्रुव का आश्रय लो। इसके बाद लिखा है-तुम मां बन रही हो, मल्लिका ! बस, यहीं तुम्हारे सारे प्रश्नों, सब समस्याओं का समाधान हो गया। हमारे शास्त्रों में लिखा है, नारी का परिपूर्ण रूप है मातृ-रूप । अन्यत्र वह खण्डिता है, अपूर्ण है । सन्तान के भीतर वह पुनर्जन्म-लाभ करती है । उसकी समस्त सत्ता एक इस क्षुद्र शिशु की सत्ता में विलीन हो जाती है। तव वह इस शिशु-देवता की सेवादासी होती है। वही उसका एकमात्र परि- चय है । अपना कहने को अव उसके पास और कुछ नहीं रहता । तुम्हारी अव कोई समस्या नहीं। चिट्ठी का उपसंहार मल्लिका ने बार-बार पढा-तुम्हारे विवाह के साथ ही साथ मेरी गुरुगीरी का काम खत्म हो गया, भाई ! अब तुम्हारे गुरु एवं पथ-निर्देशक तुम्हारे स्वामी, मेरे परम स्नेहास्पद मतीश- जी हैं। वह जो कहें, वही तुम्हारा मंत्र है । वह जहां ले जाएं, वहीं तुम्हारा तीर्थ है। चिट्ठी को कलेजे से लगाए मल्लिका बहुत देर तक आंखें बंद किए रही । मन ही मन कहने लगी-'तो ऐसा ही हो। मैं और सोच नहीं पा रही !' मंजरी की चिट्ठी पाकर मतीश फिर कलकत्ता आया । डरता-डरता मल्लिका के कमरे में घुसा । दूरी रखकर एक स्टूल पर बैठ गया । । ७२ / मल्लिका बलिहावे मन चिर हो कर प्रन ऊ सड़ा हुजा, बिना इनर मने निज नरनार ने जानना चाहा था। मगर पति की मार, मग्न, स्नेहयुक्त आंतों की ओर देखते ही दहन उसके मन में हो द गया। अपनी देह में प्रान बाली भूचना की दात पार कर उनके अमी-बनी रोगमुक्त हुए चेहरे पर एक नाइनरी हंनी फुट उनी। उनके दुनिवार्य आरम ले मतीश बालेवता । मत्तिका का एक हाप कपने हापों में मेरर मृदु स्वर ने बोला, "मैंने नव मुन लिया है, मन्नी! हॉक्टर से नी दाल कर ली है। मुधक दिनों में ही हम लोग तुम्हें घर में जा मगे।" पर को वान मुनते ही मल्लिका का अन्त:करण फिर चौर गया । नीन पण्ड ने बोली, "किन्तु..." "और कोई 'किन्तु' नहीं," मनीग ने साधा देकर कहा, "सारे "चिन्नु', सारी दुविधाएं नाइ-फेंककर तुम अपने को मेरे हाथो में छोड़ मल्लिका के कान मानो सुधा मे मर गए । यही सो उसके गुर का निर्देश है-'यह जहा से जाएं, वही तुम्हारा नीयं है ।' और कोई बात उसके होठों पर नहीं आई । उनका क्लान्त हाय पनि की गोद में जा गिरा। इसके कुछ ही दिन बाद गागुली परिवार के सिर पर फिर वयपात हुआ । मुहागिनीदेवी मीदियो पदकर कर जा रही थी। हठात् सिर में पककर साकर गिर पड़ी। प्रेशर का रोल । पहले भी एक-दो बार बाजीगरी दिखा गया है । वह डाक्टर के बार-बार मना करने पर भी माधान नहीं हुई। इस बार उसका नतीजा मामने आ गया। लटके घर पर नहीं, पति दपतर में थे। मंजरी अपनी बीमार सास को देराने गई हुई थी। नौकर-चाकर मिलकर संभाहीन देह को गिनी तरह कमरे में गए। डॉक्टर के आने से पहले ही यह उगके नियंत्रण से बाहर धनी पिता उस वक्त दिल्ली या गाहौर में कड़ी यंट मारता पूम रहा उमें सपर मिलने में देरी हो गई। उसके माने में पूर्व ही मारे 1

में सम्पन्न हो गए। सव देखा-सुना, फिर सीधे नसिंग होम पहुंचकर
रना दे दिया।
'भाभी !" दरवाजे के बाहर से ही उसने अपने स्वाभाविक ऊंचे
गले से पुकारा । मल्लिका भड़भड़ाकर उठकर बैठ गई।
"तुम अब तक बिस्तरे पर पड़ी हुई हो !" विना भूमिका के कठोर
प्रश्न किया।
"नहीं, भाई ! उठकर तो बैठी हैं।"
"तो फिर, जा कब रही हो?"
"कहां ?"
"कहां माने ? तुम्हारा मतलब क्या है, जरा खोलकर बताओ तो,
भाभी ! मां ने तो खूब छुट्टी ली। इधर छोटी दीदी का वारंट आ गया
है, उसकी ससुराल से । बुढ़िया सास जाऊं-जाऊं कह रही है । हम लोगों
को क्या अब वेमौत मारना चाहती हो ? अच्छा है, जो खुशी करो ।
मेरा क्या ? मूर्ख आदमी हूं, वैट कंधे पर रखकर एक तरफ निकल
पड़ेगा। मगर इस बूढ़े आदमी को कौन देखे, और तुम्हारे इस नाबालिग
बी-कॉमजी को ही कौन संभाले ?"
मल्लिका निविष्ट मन से सोच रही थी। दो मिनट इंतजार कर
जतेश ने फिर हांक मारी, "सोच क्या रही हो? उठती हो या कंधे प
विठाऊं?"
"बाबा ! तो क्या एकदम घोड़ा कसकर ही आए हो?"
"घोड़े पर नहीं, मोटर में । तुम भूल रही हो, यह राजस्थान -
है, वीसवीं शताब्दी का कलकत्ता शहर है । यहां वहुएं घोड़े पर चढ़
ससुराल नहीं जाती, मोटर में बैठकर जाती हैं।"
"जाओ वच्चू, ले आओ अपनी मोटर।"
"वाह, इसीको तो कहते हैं अच्छी लड़की । उठो, चटपट है
करो। अरे, ये लोग सब कहां गए ?"
"कौन लोग?"
"तुम्हारी नसिंग होम रेजीमेण्ट ? डाक्टर, नर्स, नौकर-नौ
दरवान एण्ड को ?" कहकर हांक-हूंक शुरू कर दी।
७४ / मल्लिका

११ गाड़ी गांगुली-बाड़ी के आगे आकर रुक गई । उतरते वक्त मल्लिा के पर हठात् कांप उठे । साथ ही बिजली की तरह उसकी आंखों में ऐमा ही एक और मेघाच्छन्न दिन तर आपा-जिन दिन वह वधू-पेश में स्वामी का हाथ पकड़कर पहली बार यहा आकर सही हुई थी। देराते. देसते कितने ही दिन बीत गए। उम दिन इम फुटपाथ का व्ययपान पार कर इतनी बड़ी अट्टालिका में प्रसस्त द्वार पर पैर राते ही उनके मिर्फ पंगे में ही नहीं, माने में भी अपरिचिन बायका का झटका लगा पा-क्या यहा उसे जगह मिलेगी? अगले ही क्षण ममल गई थी कि वह आपका निर्मूल नहीं। गांगुली-बाडी ने उमे ग्रहण नहीं किया। और उस कठोर अस्वीकृति की साधना और वेदना दिल में दवाए वह जब वापस पती जा रही थी, तय... लगता है, अपने अनजाने ही मल्लिका के स्निग्ध मण्ठ से निकल पड़ा, "लालाजी...!" जितेश गाडी के पौधे सड़ा होकर मामान उतार रहा था। जल्दी से आगे पढकर उत्तर दिया, "क्या है, भाभी?" मल्लिका ने जवाब नहीं दिया, मिर्फ दाया हाय देवर की ओर वडा दिया । उसके रोग से पीले हुए दुर्वल चेहरे की ओर एक बार देयने हो जितेग मन ही मन कह उठा, "इस्, तभी तो ! दिमाग मे बिलकुल ही नहीं आई। पलो, पहले तुम्हे पहुंचा आऊ।"

- उसी दिन की तरह वह हाथ पकड़कर भाभी को धीरे-धीरे लेकर चल पड़ा। शायद जितेश को वह बात याद न हो, मगर मल्लिका नहीं भूली, कभी नहीं भूलेगी। उसका अपना कोई नाई नहीं। इस बात को लेकर उसके मन में बड़ा क्षोभ रहता था। मगर उस दिन, उसके जीवन में एक महासंधि क्षण में, इस लड़के ने माकर अकस्मात् किस तरह उसका सारा क्षोभ, सारा अभाव एक क्षण में मिटा दिया था, यह बात सोचते ही उसके प्रति स्नेह, श्रद्धा, कृतज्ञता से मन भर उठता है । "लालाजी," जाते-जाते मल्लिका ने देवर के मुंह की तरफ आंखें उठाकर मृदुभाव से हंसकर कहा, "उस दिन की बात याद है ?" "कौन-सा दिन ?" "वह दिन, जब मैं तुम्हारे दादा के साथ पहली बार तुम लोगों के घर में घुसी थी?" "सब याद है।" "उस दिन यदि इस तरह मेरा हाथ पकड़कर' "उस वात को रहने दो, भाभी !" मल्लिका ठिठककर खड़ी हो गई। जितेश के गले में ऐसा करुण स्वर उसने कभी नहीं देखा । उसका विस्मय-भाव दूर होने से पहले ही जितेश फिर बोला, "उस घटना के भीतर हम लोगों की बड़ी शर्म छिपी है।" "शर्म क्यों कहते हो? उन लोगों की दृष्टि से देखें..." "नहीं, किसी भी दृष्टि से उस व्यवहार का समर्थन नहीं किया जा सकता।" "मगर उसके गद मुझे जो मिला है, उससे उस दिन का सारा क्षोभ मेरे मन से धुल गया है।" "इसका कारण है, तुम्हारा यह सुन्दर मन । और कोई होता, तो इतनी आसानी से नहीं धो सकता था। वैसे हम लोग भी बदल गए हैं, वह गांगुली-बाड़ी अव नहीं रही । मगर उसमें हम लोगों को कोई बहा- दुरी है, सो मत सोचना । वहां भी तुम्ही हो । तुमने उसे जीत लिया।" मल्लिका अब तक जितेश के गले से हलका स्वर ही सुनती आई ७६ / मल्लिका .

है। बाज की यह गम्भीरता एषदम नई है। वह चिरदिन पंचन है, गोरगुल चीनविल्लाहट लिए रहता है। जना भरपूर गला, वैना ही भरपूर प्रार। उसके भीतर एक ऐमी प्रमान-स्निग्ध गम्भीरता बारम- गोरन किए बैठी है, यह कौन जानता था ? मी सासिरी वात के प्रतिवाद में जाने क्या कहने जा रही थी, पर इसी बीच वे लोग मदर दरवाजा पार कर आगन में आ पहुंचे । मंजरी रमोई में यो। हठात् बाहर आई तो एकदम नौचक । माप ही चीप पड़ी,"ओ काली दामी, जल्दी से एक कुर्मी ले आमो । देसी इन लोगों की बात ! जो यादनी तीन महीने में विस्तरा छोडकर नहीं उठा, उमे हाय पकड़कर सीचते-सोचते ले आया ! पूछती हूं, तुझमें अक्ल कब थाएगी. जितू?" "वह तारीख तो मैं तुम्हें फिर साकर बता दूगा, छोटी दी ! फिल- हात तो तुम अपने दम मचल लगेज का चार्ज तो! मैं अचल चीजो की व्यवस्था करता हूं।" "अमागा कही ना!" महकर मंजरी ने आगे बढकर उसके हाच ने मल्लिया को सैकर दुसी की तरफ पर बढ़ाते हुए कहा, "वटकर पोडा सुस्ता सो। तबीयत खराब तो नही लग रही ? लेटोमी?" "नहीं-नहीं, रोट्रगी क्या? चलो न, कार चलकर ही वैठूगी।" "रहने दे, इतनी बहादुरी दिलाने की जरूरत नहीं । चप कर बहन पोडी देर यही में एक प्याला दूध गर्म करके लाती है।" "दूध !" गोया कि मल्लिका योई भयकर दुःनयाद सुनकर मिहर उठी हो। इसके बाद वातर स्वर में बोली, "तुम्हारे पैरों पड़ती हूं, दीदी ! दूध में बड़ी दुरीदू आती है।" कासी दासी एक पंगा लेकर 'भाभी रानी' को हवा कर रही थी। मिर हिलाकर समर्थन करते हुए बोली, "ऐमी हालत में यही होता है, हर चीज में बू माती है। मेरी छोटी लड़की जद पेट में पी..." "रहने दें, तुझे और वकालत करने की जरूरत नही ।" मंजरी मल्ला उठी। मल्लिका की ओर मुटकर योती, "तो और क्या सेगी, एक पाली पान्ता मान और एक दर्जन हरी मिर्च ?"

"सचमुच दोगी दीदी ?" ऐसे करुण स्वर में बात कही कि सभी हंस पड़े। सीढ़ियों के ठीक शुरू में ही सास का कमरा है। उस दिन इसो दरवाजे के आगे खड़े होकर मतीश ने मां को आवाज देकर कहा था, 'तुम्हारी बहू ले आया ।' उनका वह उत्तर आज भी उसके कानों में गूंज रहा है । वह आवाज अव कभी सुनाई नहीं देगी। दरवाजे पर लटकता यह ताला मानो इसी रूढ सत्य को आंख में उंगली डालकर दिखा रहा है। उस दिन ससुरजी दिखाई नहीं दिए थे, पास के कमरे से उनका सिर्फ क्रुद्ध स्वर ही सुन पाई थी। आज वह हंसते चेहरे से बाहर निकल आए। मल्लिका के आगे बढ़कर पैर छूते ही उसके सिर पर हाथ रख- कर सस्नेह आह्वान किया, "आओ वहू!" फिर लड़की की तरफ मुड़कर बोले, "इस कमरे की चावी कहां है, मंजू ?" "लाती हूं।" वह दौड़कर अपने कमरे से चावी लेकर आई, तो बोले, "खोलो।" इस कमरे में मल्लिका ने आज पहली वार पैर रखा। सास ने अपने कमरे में मल्लिका को कभी नहीं बुलाया था, वह खुद भी नहीं गई थी। विश्वनाथ वाबू ने एक बार चारों तरफ नजर दौड़ाई। शायद एक दोघं निःश्वास निःशब्द दवा गए । तत्पश्चात् हठात् लड़की से प्रश्न किया, "दादी की याद है तुझे, मंजू ?" "थोड़ी-थोड़ी याद है।" "थोड़ी-थोड़ी क्यों ? मुझे तो बुढ़िया एकदम साफ याद है।" यह जवाब था जितेश का। वह कव आकर सभीके पीछे खड़ा हो गया था, कोई जान नहीं सका। मंजरी बोल पड़ी, "सुना पिताजी ? अच्छा, यह तब कहां था ?" "यह, शायद हुआ ही नहीं था।" कहकर वह सरक गए। विश्वनाथ बाबू पुत्रवधू को संबोधित कर कहने लगे, "वह दिन जिन्दा रहीं, इसी कमरे में रहीं। उनसे पहले रहती थीं उनकी सास, यानी मेरी दादी। यही इस घर का नियम है। उसी हिसाब से, ७८ / मल्लिका मात्र से इस कामरे पर तुम्हारा अधिकार है । कम उन की हो तो पला, गागुनी-बाड़ी को बहू हो। मंज, चावी अपनी भाभी को दे दो। और कहा गया है, सब दिखा दो। तुम्हारी मां को तो यह सब करने का भी समय नहीं मिला।" पोमे उदाम मण्ठ से ये कुछ बातें कहते-कहते विश्वनाथ बाबू धीरे- घोरे बाहर चले गए। मल्लिका यहीं स्तव्य सदी रहो। एकाएक ध्यान गया कि मंजरी मुककर उसके पाचन में चारी बाप रही है।

१२ शादी के कई महीने बाद एक दिन काफी रात गए मतीश ने उसे एक कविता पढ़कर सुनाई थी-रवीन्द्रनाथ की 'नववर्ष'.-- 'पुरातन वत्सर जीर्ण क्लांत रात्रि। ओइ केटे गैलो । मोरे यात्री । तोमार पथेर परे तप्त रौद्र एनेछे आह्वान ।' (पिछला वर्ष और जीर्ण प्लांत रात्रि । अरे यात्री, यह सव बीत गया । अब तो तुम्हारे रास्ते पर तपती धूप का आह्वान है।) इस प्राचीन वंश में अनेक स्मृतियों से जुड़े इस प्रशस्त कमरे में खड़ी मल्लिका को सहसा लगा, जैसे उसके जीवन में भी उसी तरह का एक दीर्घ प्राचीन वर्ष अपनी सारी क्लांति और जीर्णता लेकर अभी-अभी बीत गया। अव जहां तक भी नजर जाती है, उसके आग धूप से प्रका- शित दीर्घ पथ प्रसारित है। यह वर्ष मानो एक तमसाच्छन्न तरंग-संकुल नदी की तरह था। बड़े कण्ट के साथ उसे तैरकर पार कर अभी-अभी किनारे पर आई है। संसार में बड़े-बड़े दुःखों के भीतर होकर ही महत् प्राप्ति का रास्ता जाता है। मल्लिका ने गृहस्थी अपने हाथों में संभाल ली। रसोइया है, मगर नाममात्र को। रसोई के अधिकांश कामकाज उसीको करने पड़ते हैं। जिस दिन नहीं कर पाती, उस दिन ससुरजी यह नहीं हुआ, वह नहीं - हुआ याहार शिकायत करते हैं, आधा पेट पाकर दफ्तर चले जाते हैं। पाने के वक्त रोज सामने जाकर बैठनी है। मगरजी गम्भीर आदमी हैं। बातचीत बहुत ज्यादा नहीं करते, मगर मल्लिका उनके मन की बात जान जाती है। एक दिन विश्वनाथ बाबू कह भी बैठे, "जानती हो बहू, में मां का इकलौता लड़का था। मां आकर पाम में नहीं बैठती पो तो पाना नहीं साता था । लगता है. बढ़ापे में वही आदत फिर लौट आई।" जितेश अपने क्रिकेट-साथियों का दल-बल लेकर आता है। जब-तब 'भाभी' कहकर हांक लगाता है। चैवत चाय को फरमाइश करता है। मौर बीच-बीच में आती है मिस रमा सरकार । मल्लिका उसे अपने पायनकदा के कोने में ले जाकर मिठाती है और घण्टे पर घण्टे अटकाए रगती है। रमा बोच में कहती है, "अब चलूं ।" मल्लिका रोक लेती है। "ड्यूटी है न ।" नसं समझाती है । "रहने दो ड्यूटी। यह मरी नौकरी तुम छोड़ दो।" "मयंना! नौकरी छोडकर पाऊगी पा ? तुम्हारे लड़का होने पर आया की नौकरी दे दो, तव तो छोड़ भी दूगी, मगर उसमे तो अभी कई महीनों को देर है।" मल्लिका ये मव बातें कानों में नहीं जाने देती। रमा के चेहरे की ओर देगकर बहत दुछ में अपने से ही कहती है, "घर नहीं, बपन नहीं, गिफै सरते-तैरते पककर काटना । भता यह क्या औरत की जिन्दगी "श्या कर भाई ? कोई राजकुमार नौका सजाकर तो आया नहीं। संरूं नहीं तो जाऊं वहाँ ?" "ये सब बेकार की बातें । अमल में गृहस्थी की तरफ तुम्हारा मन नही।" "शायद यही हो । ऐने मते मंदान में विना रोक-टोक धरने को मिने, तो नतार का जुआ कंधे पर कौन रखना चाहंगा, बताओ ?" मलिया को सपा कि भले ही यह यात परिहास के स्वर में रही .

गई है, अंत में जाने कैसा एक करुण स्पर्श लिए है। उसके मन को भी स्पर्श करती उसकी छाया उसके चेहरे पर जाकर पड़ी। कुछ देर उस ओर देखने के बाद रमा वोली, " तो सुनो, एक कहानी सुनाती हूं। यह मैंने अपने फुफेरे भाई से सुनी है । वह थे एक बहुत बड़े राजा के लड़के के प्राइवेट सेक्रेटरी। सिर्फ राजा का लड़का ही नहीं, ऊपर से नामी आर्टिस्ट। इसके अलावा और जो हुआ करता है, अर्थात् सिनेमा और उसके आस-पास जो सब 'ऐव' रहते हैं, उन सवने धीरे-धीरे उसे ग्रस लिया। " राजकुमार अब घर नहीं आए । राजा अभी जिन्दा थे। गुस्से में आकर उन्होंने पुत्र को उत्तराधिकार से वंचित कर दिया और बहूरानी के लिए रोज नई साड़ियां, गहने और पुस्तकें मंगाने लगे, गाने-बजाने का सरंजाम जुटाने लगे। जरा भी हिलती-डुलती, चारों ओर से चार दासियां दौड़ पड़तीं। ऐसी उसकी खातिर ! हठात् एक दिन बहूरानी को जाने क्या सूझी। नौ बजे के वक्त प्राइवेट सेक्रेटरी के घर घूमने के लिए निकल पड़ी। सौ रुपये का नोकर। मेरी भाभी उस वक्त आंचल बांधकर रसोई नामक अपनी झुपड़िया में बैठी मछली शून रही थी। मैली धोती पर हल्दी के दाग लगे थे। सारा शरीर पसीने और कालिख से भरा था। दादा अपने एकमात्र संबल विना हत्थे की एक कुर्सी को कंधे पर रखकर दौड़ पड़े। उस ओर ध्यान न देकर बहूरानी सीधी रसोई के दरवाजे पर जाकर खड़ी हो गई। भाभी हड़बड़ाकर बाहर निकलकर बोली, 'यहां आपको कष्ट होगा। उस कमरे में चलिए।' वह बोली, 'तो होने दो। यहीं वैठती हूं। आप रसोई बनाइए।' कहकर अपने-आप एक पीढ़ा खींच लिया। मछली भूनने का काम चलता रहा । रसोई धुएं से भरी थी। वहूरानी वार- आर आंखें पोंछने लगी। भाभी फिर बोली, 'आपको बड़ा कष्ट हो रहा है।' लगा, जैसे यह बात उसके कानों में नहीं पहुंची। उस कालिख- लगी जालों-भरी अंधेरी कुठरिया में चारों ओर नजर घुमाने के बाद बहू- रानी धीरे-धीरे बोली, 'अगर एक ऐसी रसोई मुझे मिल जाती...' खैर, छोड़ो, अब मैं चलती हूं।" कहकर मिस सरकार जल्दी से ८२ / मल्लिका उठ खड़ी हुई। मंजरी को प्राय: हो ससुर-बाड़ी भागना पड़ता है। कभी-कभी सात- आठ दिन बाद माकर हाप-पर पमारकर लेट जाती है। तय मल्लिका जबरन दो दिन रोक लेती है और उसकी प्रिय चीजें बनाकर सिलाती मंजरी कहती है, "तेरी नीयत अच्छी नहीं लगती बहू ! यह पान- पात खिला-सिलाकर लगता है, मुझे भी वागाल बना गलना चाहती है ?" यह पहकर वह और पोडी-सी पह. मोटा वाली मटर दाल या हरे पनिये का लाउपंट मिना लेती है। मल्लिका दिन-भर काम कर मरका मन जीतकर काफी रात गए जय सोने जाती है, तो नि:मंगया की तरफ देखकर उसका मन रो पड़ता है । पिस्तरे पर न जाकर किसी-किमी दिन यह फागज-कलम लेकर चिट्ठी लिापने बैठ जाती है। तरह-नरह की छोटी-छोटी बातें सोच-मोपकर लिराती है. फिर अपने को और रोक नहीं पाती, "मेरे इन के दिनों में तुम पाम नहीं, अब और नही सह पाती।' मतीश उत्तर देता है, 'मन्नी, अब तक तो तुम मिर्फ मेरी पी। तुम्हें यहुत ही छोटा मंकीर्ण बनाकर पाया था। भाज तुम सभी के बीप छिटक गई हो। अब तुम्हें नये हर में बड़ा बनाकर पा रहा हूँ। अपने इस मानंद को रमने के लिए मेरे पास जगह नहीं। तुमसे दूर रहकर भी में मुम्हें जाड़े हुए हूँ। मैं तुम्हारे पास नही आऊंगा। तुम मेरे पाग माभोगी। लोग नये मिरे में यात्रा शुरू करेंगे। उसी दिन की प्रतीक्षा में दिन गिन रहा हूं।'

१३ देखते-देखते महीना पूरा हो आया । सास नहीं है, परिवार में बड़ी- बूढ़ी कोई आत्मीय भी नहीं है । एक ननद है, मगर उसके जीवन में तो कभी किसी शिशु के पद-चिह्न नहीं पड़े। फिर है भी बच्ची, हर वक्त रह भी नहीं सकती। अतएव मल्लिका को फिर उसी नसिंग होम में जाना पड़ा । फिर एक दिन हठात् शुरू हो गई यम-यंत्रणा, जिसके हाथ से किसी भी मां का निस्तार नहीं। सारी रात यम-मानुप की खींचतान के बाद सुवह जाकर उसकी गोद में आया गोद भरने वाला लड़का। ससुरजी ने आकर गिन्नी देकर मुंह देखा । मंजरी और जितेश ने आकर कुछ देर हा-हुल्ला मचाया । सात-आठ दिन बाद आया मतीश । मल्लिका ने गुस्से में कहा, "इतने दिन बाद याद आई ?" मतीश ने उसका उत्तर न देकर कहा, "इस्, वड़ा छोटा है।" मल्लिका खिलखिलाकर हंस पड़ी, "ओ मां, छोटा नहीं होगा, तो क्या पेट से निकलते ही भागने लगेगा ?" मतीश निराश स्वर में बोला, "ले जाने लायक बड़ा होने में तो अभी बहुत देर है !" मल्लिका ने बंकिम नेत्रों से स्वामी की ओर देखा, "लगता है, बाबू- जी को अब और सबर नहीं ?" कुछेक दिन बाद नौकरानी सुवह दच्चे के तेल मालिश कर रही थी।

मल्लिका पाम बैठी स्लिप दष्टि में बार-बार देख रही थी। नौकरानी पोत उठी, "क्यों जी, लड़के का मुंह किमीपर नहीं गया; न यार पर, न मां पर।" मल्लिका का अन्तर्मन धक् कर उठा। इस बात का अर्थ क्या है ? सुक्कर मारक को गूब अच्छी तरह देखने लगी। सब ही तो है ! यह किनका चेहरा है? "कमा साल मुसं दृना है, देयो," नौकरानी फिर योती, "बडा होकर काला होगा। मा को बरादरी तो करेगा मया, याप का रंग भी नहीं लेगा।" मल्लिका का गिर हठात् पूम गया। फलेने में जाने कमा होने सगा । वह मानें बंद कर वही लेट गई। "या हुमा ?" कहकर नौकरानी लड़के को छोडकर उठ पडी। दोनों हापों से मल्लिका की परिचर्या में लग गई। पुछ देर छाती और पीठ पी मालिका होने के बाद मल्लिका ने थोडा स्वस्थ महसूस किया । उटकर वंटनी नौकरानी से सरके को उसकी गोद में देने के लिए महा। मौकरानी पहने सगी, "आहा ! हुमा करे माला, न राही मां-बाप की तरह । यया है। लड़के का चेहरा या देपना ? सो, पोडा दूध पिसानो। मेरे बच्चे का गला मूरा गया है।" मल्लिका के कानों में पायद उमको एक भी यात नहीं गई। यह सेज नजरों में अपने नवजात शिशुकी ओर देखती रही। अगले दिन सरके को देखने आई बुआजी। साथ में यडी दीदी । इधर-उपर की यातों के बाद भतीजी से बोली, "देर मलिता, कमा रहारट्टा हुआ है बच्चा ! देखने में कंगा मंडा-गुहा-मा है..." पहकर उन्होंने एक माम दंग गे माये मटकाई। बड़ी दीदी बोली, "यह तो मैंने माने हो गौर फर निया, युभानी ! और फिर देगा नहीं, सिर कंगा गोर और रिवना बर: है हमारे परिपार में ऐमा शिमीरा नहीं।" "परा पता, भाई ! दादा का पहला नाती है; या की पारा में मिलेगा, हर कोई ऐसी ही आशा करता है, मगर यह तो एकदम गोत से अलग..." कहकर एक दीर्घ निःश्वास छोड़कर बुआजी उठ पड़ी। "तो चलती हूं वहू !" कहकर बड़ी दीदी भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। उनके बंकिम होंठों की अर्थपूर्ण हंसी मल्लिका की नजरों से छिपी न रही। उन लोगों के चले जाने के बाद मल्लिका कुछ देर वजाहत की तरह बैठी रही, फिर धीरे-धीरे बिस्तरे पर जाकर लेट गई । नौकरानी ने बार-बार चिन्ता प्रकट की तो मल्लिका ने सिर्फ इतना कहा, "तबीयत अच्छी नहीं है।" रमा आकर देख गई, डॉक्टर भी एक बार चक्कर लगा गया। सभीकी बात का बस यही एक उत्तर दिया । क्रमशः सन्ध्या हुई। रात बढ़ती गई। रसोइया आकर रात का खाना रख गया । मल्लिका उठी नहीं, खाने को हाथ भी नहीं लगाया। इसके बाद जब नौकरानी सो गई, मल्लिका बड़ी सावधानी के साथ विस्तरे पर से उठी और लालटेन उठाकर सोते लड़के के चेहरे की ओर देखती रही। नौकरानी को अभी तक नींद नहीं आई थी। हठात् नजर पड़ी तो पूछ बैठी, "क्या देख रही हो ?" "कुछ नहीं।" जाने कैसे दवे गले से मल्लिका ने उत्तर दिया। "तुम कोई चिन्ता न करो। लड़का ठीक है। आराम से सो रहा है। तुम जाकर लेट जाओ।" कहकर नौकरानी करवट बदलकर लेट गई। कुछ ही देर में उसकी नाक आवाज करने लगी। उस दिन मल्लिका की विपर्यस्त विचारधारा किस रूप में, किस रास्ते से निकली, यह मालूम करने का कोई उपाय नहीं। नसिंग होम में किसीसे भी उसका कोई विशेष विवरण प्राप्त नहीं होता । कब, किस हालत से गुजरकर वह उस भयंकर परिणाम पर जाकर पहुंची थी, यह भी लगता है, हमेशा अजात ही रहेगा। मल्लिका के समस्त अन्तर्मन को मथकर जो तूफान उठा था, उसके विपुल वेग की हम सिर्फ कल्पना कर सकते हैं। और अनुमान कर सकते ८६ / मल्लिका हैं कि एक अनागिन नावार: सारी रात नारटेन हाय में लिए बार- बार दौडकरवानी नवराद प्रयन मंतान के विमान कारबड़ी हुई होगी । मंगवाल बिद्धल दृष्टि में परहना चाहा था कि समका परिचय क्या है। इनके दाद किनी मौके पर मिर हिलाकर मन ही मन कहा था- उन लोगों की दात ही सच है । इस लड़के वापरायोग निनाड़ी का, कर-मांड का है,आरला कायोग नहीं है। यह गांगुनी-वंदा का कोई नहीं; उसकी नानहीन, मोरहीन अदाहिन मन्ठान है। गिनीक दिए कोई कल्यान लेकर नहीं आना; सम इतने दुःखों में निर्मित नीड़ को, इव मुख से तडार संकार को निधनष्ट करने वाला 1इन मांसद की प्रत्येक रक्त-दिन्दु में उन निमन्त रात्रि को नत्रा, IT और कलंक घुला हुआ है। दीवन-मर वह बाहर स्मृति इनके भीतर जीवित रहेगी, जो प्रतिदिन, प्रतिसः उसके नारी-बीवन की परम वानिकी दाद याद दिलाती रहेगी। लगता है, यही दाद मोदते नौ मिनी धन उनकी प्रमान्न बांदों के नाते ठान में उनकी यो। मल्टक की गिराई दिटक- कर बाहर जाने को हो गई। उन दुन्द यंत्रमानेनं बार-बार दौड़कर जाकर गुमलनाने में नल के नीचे याना किरन्द दिया, मगर सकी लायुतंत्री की परत-परट में दो अनन-माना परिधान पी, पानी ठंडा नहीं करना । इसके बाद अपनी नांगो फेमन को लेकर दह ने दबाट के पात्र वासन मा गई। दम्य उन वक्त प्राकर रो रहा था। बन दाने कमरे में एक रोगियों ने दह रोना मुना था, और मुना या बीच-बीच में उसके विकृत वे मौका चौतार-चाकर!चा हो !" साथ ही साय धन-धन करर चलाने की मादान। करोगिनी में रग माक्ति नहीं की। पहले नन्निा, चिनौकरनी का नाम लेकर बार-बार पुकार या । किनीत उतर नहीं दिया। न जाने को हात् नौकरानी की नोंद टूट गई। हडबडारकर दो दो नकर गई-नाला दान के दिल्लरे पर झुककर बनेका देख, रही है। फटे-फटे गले से कह रही है, "क्या हुआ ? बच्चा रो क्यों रहा है ?" इसके बाद दौटकर लालटेन लेकर आते ही चीख पड़ी, "ऐं ! खून ! इतना खून कैसे ?" नौकरानी ने दौड़कर जाकर देखा कि बच्चे की छोटी-सी काया पत्थर की तरह निश्चल है, उसकी शुभ्र सुन्दर शैया खून से भरी है। उसके कुछ कहने से पहले ही नीरव रात्रि का कलेगा चीरता नारी-कण्ठ का तीन आर्तनाद फूट पड़ा, "अरे, तुम लोग उठो, दीदी, डॉक्टर बाबू, मीरा, जल्दी मामो !" नौकर-चाकर, नसों का दल दौड़ा आया। ऊपर से हड़बड़ाते डॉक्टर बाबू दौड़ते आए। उन सबकी ओर देखकर मल्लिका के श्लथ कण्ठ से पशात्रिक अट्टहास निकल "हा-हा-हा ! खून- मैंने खून यह देखो । हा-हा-हा-हा !" उस हंसी का और अन्त नहीं । पड़ा, किया है।

१४ अगले दिन एक बजे की गाड़ी से मतीग का जाना नहीं हुभा । पत्नी वोली, "सारी रात बरुवाकर मारा है लड़के को । अब योडा गोंने दो।" फिर पास आकर अनुनय के स्वर में बोली, "क्यों जी, भीतर ले जाकर एक बार मुलाकात नहीं करवा सकते ?" मैंने कहा, "सो कैसे होगा? जेलसाने का जनाना फाटक है।" "इस लडके के जाकर खड़े होने से ही तुम्हारी जनानियों का मान चला जाएगा? नहीं, सच कोई ध्यवस्था करी। एक बार मुलाकात करा दो।" मल्लिका की दीर्घ कहानी वह अभी तक जान नहीं पाई थी। मुबह उठकर सिर्फ थोड़ा-मा यानानमार मैंने दे दिया था। मैं बोला, "कोई लाभ नहीं। पहवान नहीं पाएगी।" "यह कौन कह सकता है ? एक बार चेष्टा करके देखो न ? पागल हो, जो भी हो, है तो औरस हो।" तीसरे पहर मती में वोला, "चलो, तुन्हें अपने राम में एक बार घुमा लाऊं।" उपके मन में कोई विशेष उत्साह दिवाई न दिवााम्नान हनी ईन- कर बोला, "चलिए।" दो-चार वार्डी और दकंगागों में बनकर इनानं फाटक पर : सांकन खटखटाई।

मानदा ने आकर दरवाजा खोलकर सलाम किया। भीतर पहुंचे। मतीश हिचकिचा रहा था। लगा, जैसे साइन बोर्ड की ओर देखकर उसके पैर नहीं वद रहे। मैं बोला, "खड़े क्यों हो? आयो " औरतों का साधारण वैरक छोड़कर हम लोग सैल व्लाक की ओर बढ़ गए। मानदा के दरवाजा खोलते ही देखा कि मल्लिका सामने के पास से ढके छोटे चबूतरे पर बैठी है। अपर्याप्त काले वाल पीठ पर फैले हैं। एक कैदी औरत उसकी परिचर्या में व्यस्त है। मतीश का हाथ पकड़कर धीरे-धीरे पास जाकर खड़ा हो गया । आवाज दी, "मल्लिका!" उसने आंखें उठाकर देखा । उसकी वही सुन्दर आंखें । "देखो तो कोन आया है !" मतीश को उसके आगे कर दिया । मल्लिका की नजर उसके चेहरे पर पड़ी। वैसी ही शान्त, निस्तरंग, भावलेशहीन । कहीं भी क्षीणतम परिचय का आभास नहीं मिला। उमड़ते आंसुओं को किसी तरह रोककर मतीश बोला, "मैं.. मैं आया हूं मल्ली! पहचान नहीं पा रहीं ?" मल्लिका ने उत्तर नहीं दिया। एक बार देखकर ही मानो क्लान्त होकर आंखें झुका "मल्ली!" मतीश ने प्रगाढ़ स्वर में पुकारा, "एक बार देखो'. मैं..." झुकी पलकें धीरे-धीरे फिर उठी और कुछ देर मतीश के चेहरे पर टिकी रहीं। सांस रोके उसी तरफ देखते-देखते सहसा लगा, जैसे वे अर्थहीन निप्पलक नीले तारे थोड़े-से कांपे और बहुत दिनों का संचित विस्मृति का घना आवरण थोड़ा दूर हो गया। मतीश की ओर देखने पर गौर किया कि उसका तमाम चेहरा जाने किस प्रकाश में चमक उठा है। वह और भी आगे बढ़कर आवेग-पद्ध कण्ठ से बोला, "पहचाना?" जवाव नहीं मिला। धीरे-धीरे मल्लिका के भापाहीन म्लान चेहरे ली। . . ६० / मल्लिका पर एक क्षीण वेदना की छाया घिर आई। गोया कि किसी दुरानुभूत यंत्रणा की प्रतिच्छदि हो । देखते-देखते उसीकी रेखाएं क्रमश: सप्ट गहरी हो गई । वह सुन्दर मुंह भिवकर सिकुडकर विकृत हो गया । लगा, जैसे कब-कब की अवरुद्ध अश्रुधारा मुक्ति चाहती है, पा नही रही । यह दृश्य आखों से नही देखा जाता । मानदा चीख उठी, "टन्हें चले जाने के लिए कहिए, सर ! देख नहीं रहे, लडकी को कितना कष्ट हो रहा है ?" मतीश को उस वक्त होश ही नहीं था। वह और भी पास जाकर खड़ा हो गया। उसकी ठोड़ी ऊपर कर वोला, "क्या कष्ट हो रहा है मल्ली ? बोलो, मुझे बताओ। मुझसे तो तुम कोई बात नहीं रिपाती थी?" जैसे बांध तोड़कर बाढ़ का पानी दौड़ पडता है, उसी तरह अकस्मात् उन सुन्दर आंखो को चीरती आसुओ की याढ़ उमड़ पड़ी। साथ ही मानो गले का बंधन भी कट गया । एक अस्फुट आर्तनाद कर एक झनक विद्युत्-शिखा की तरह मल्लिका दौड़कर मतीश के सीने पर आकर ठहर गई। कैदी औरतें जेल का नियम-शासन मूलकर जाने कब आकर हमें घेरकर खड़ी हो गई थी। मैट्रन भी उनमे शामिल हो गई। नजर पड़ते ही चौंक गया, मानदा की आखों में आंसू !

। मानदा ने आकर दरवाजा खोलकर सलाम किया। भीतर पहुंचे। मतीश हिचकिचा रहा था। लगा, जैसे साइन वोर्ड की ओर देखकर उसके पैर नहीं बढ़ रहे। मैं बोला, "खड़े क्यों हो ? आओ !" औरतों का साधारण वैरक छोड़कर हम लोग सैल ब्लाक की ओर बढ़ गए। मानदा के दरवाजा खोलते ही देखा कि मल्लिका सामने के घास से ढके छोटे चबूतरे पर बैठी है। अपर्याप्त काले बाल पीठ पर फैले हैं। एक कैदी औरत उसकी परिचर्या में व्यस्त है । मतीश का हाथ पकड़कर धीरे-धीरे पास जाकर खड़ा हो गया। आवाज दी, "मल्लिका!" उसने आंखें उठाकर देखा । उसकी वही सुन्दर आंखें । "देखो तो कौन आया है !" मतीश को उसके आगे कर दिया । मल्लिका की नजर उसके चेहरे पर पड़ी। वैसी ही शान्त, निस्तरंग, भावलेशहीन । कहीं भी क्षीणतम परिचय का आभास नहीं मिला। उमड़ते आंसुओं को किसी तरह रोककर मतीश बोला, "मैं...मैं आया हूं मल्ली ! पहचान नहीं पा रहीं ?" मल्लिका ने उत्तर नहीं दिया। एक बार देखकर ही मानो क्लान्त होकर आंखें झुका ली। "मल्ली !" मतीश ने प्रगाढ़ स्वर में पुकारा, "एक बार देखो मैं..." झुकी पलकें धीरे-धीरे फिर उठीं और कुछ देर मतीश के चेहरे पर टिकी रहीं। सांस रोके उसी तरफ देखते-देखते सहसा लगा, जैसे वे अर्थहीन निष्पलक नीले तारे थोड़े-ते कांपे और बहुत दिनों का संचित विस्मृति का धना आवरण थोड़ा दूर हो गया। मतीश की ओर देखने पर गौर किया कि उसका तमाम चेहरा जाने कित प्रकाश में चमक उठा है। वह और भी आगे बढ़कर आवेग-रुद्ध कण्ठ से बोला, "पहचाना ?" जवाब नहीं मिला। धीरे-धीरे मल्लिका के भापाहीन म्लान चेहरे ६० / मल्लिका पर एक क्षीण वेदना की छाया घिर आई। गोया कि किसी दूरानुभूत यंत्रणा की प्रतिच्यवि हो । देखते-देखते उसीकी रेखाएं क्रमशः सप्ट गहरी हो गई। वह मुन्दर मुह भिवकर सिकुड़कर विकृत हो गया। लगा, जैसे कब-कब की अवरुद्ध अश्रुधारा मुक्ति चाहती है, पा नही रही। वह दृश्य आंखों से नहीं देखा जाता । मानदा चीख उठी, "इन्हें चले जाने के लिए कहिए, सर ! देख नही रहे, लड़की को कितना कप्ट हो रहा है ?" मतीश को उस वक्त होश ही नहीं था। वह और भी पास जाकर खड़ा हो गया। उसकी ठोड़ी ऊपर कर बोला, "क्या कष्ट हो रहा है मल्लो ? बोलो, मुझे बताओ। मुझसे तो तुम कोई बात नहीं छिपाती पीं?" जैसे बांध तोड़कर बाढ़ का पानी दौड़ पड़ता है, उसी तरह अकस्मात् उन सुन्दर यांखो को चीरती बासुओं की बाढ़ उमड़ पड़ी। साथ ही मानो गले का बंधन भी कट गया । एक अस्फुट मार्तनाद कर एक झलक विद्युत्-शिखा की तरह मल्लिका दोहकर मतीश के सीने पर आकर ठहर गई। कदी औरतें जेल का नियम-शासन भूलकर जाने कब आकर हमें घेरकर खड़ी हो गई थी। मैट्रन भी उनमे शामिल हो गई। नजर पड़ते ही चौंक गया, मानदा की आखों में आमू ! 00 ܂ܗ वाघिन

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दूरी की एक निजी महिमा है। पास रहते जिसकी ओर एक बार भी आंख उठाकर नहीं देखा, दूर जाते ही वही सुन्दर लगने लगता है। मामने बैठकर जिसने मेरे मन को किसी दिन भी गति प्रदान नही की, एक दिन देखने में आया कि मेरी पहुंच के बाहर जाकर, वह जाने कत्र मेरे मन को जीत बैठा। यह बात नई नहीं, भूतनाप वावू को देखकर अनुभव नये सिरे से की गई । जीवन का साढे तीन भाग वे जिन लोगो के बीच काटकर आए हैं, उनमे हमेशा-हमेशा के लिए विदा ले चुकने के बाद आज जब पीछे मुडकर देखने का अवमर मिला है, तो देखते हैं कि उन लोगों के शरीर पर नया रंग लग गया है । यसलियत यह है कि वे लोग जैसे थे, वैसे ही हैं; बदला है इनकी आखो का रंग। भूतनाथजी के साथ जिस दिन हठात् मुलाकात हुई थी, उसके बाद कई महीने बीत गए हैं। फातिमा-तोफाजल' को याद धुपली पड़ गई है। ऐसे समय एक दिन फिर उनका आकस्मिक याविर्भाव ! भूतनाथ बाबू को ठीक मिजाज मे देखने के लिए अकला होना जरूरी है । पहली बार यही हुआ था। इस बार ऐमा नहीं हुआ। मेरे निकट एक और सज्जन बैठे हुए थे। हम दोनों के ही परिचित, दुर्घपं बाध. १.व्यक्तियों के नाम । लेखक को पुस्तक 'लौह-कपाट माग चार देविए।

शिकारी कालू चौधुरी। दलदल वाले इलाके के भादमी। किसी वक्त वहुत- से रॉयल बेंगाल टाइगरों की जान ली थी। उन्होंने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। एकदम भाग्य के जोर पर ही बच गए, मगर अक्षत देह से नहीं; हाथ-पैरों में, पीठ पर दाहिनी ओर प्रखर नख और तीक्ष्ण दंशन के गौरवचिह्न आज तक अक्षय हैं। वैठक से संलग्न दक्षिणी वरामदे में बैठकर मैं वही सव इतिहास सुन रहा था। आपाढ़ मास का एक अपराह्न । आकाश काले बादलों से ढका है। थोड़ी देर के चिराम के बाद बरसात फिर शुरू हो गई है। हरी घास से ढका प्रशस्त 'लॉन' है; उसके तीन तरफ कृष्णचूड़ा, वकुल और आम के पेड़ खड़े हैं, जिनके नीचे अकाल-सन्ध्या का धुंधलका छाया है । लगा- तार पानी पड़ने की आवाज आ रही है। नमीभरी हवा में भीगी मिट्टी की गंध है । इन सब बातों ने मिलकर शिकार-कहानी का अपना एक जो खास नशा है, उसे और भी गाढ़ा कर दिया था। सिर्फ शिकार में नहीं, उसका वर्णन करने में भी कालू चौधुरी का जोड़ा मिलना मुश्किल है। मैं तो तन्मय हो गया था। हठात् भारी जूतों की आवाज और सिगरेट की तेज गंध से चौंक पड़ा । कालू चौधुरी किसी समय छोटे-मोटे जमींदार थे । व्यसन के हिसाब से वे जैसे शिकार को निकलते थे, उसी तरह बीच-बीच में दो-चार दंगे- डकैतियां करना, औरतों को भगा ले जाना-ऐसे अभियान भी चलाते थे। आज भले ही दोनों का भीतरी सम्पर्क बदल गया है--एक पैन्शन ले रहे हैं, दूसरे शरणार्थी जीवन की असंख्य यातनाएं भोग रहे हैं- फिर भी उन्हें देखकर चौधुरी थोड़े सकुचा गए । भूतनाथ बाबू ने उनके संकोच को दूर करने की चेप्टा की। खुद ही एक कुर्ती खींचकर बड़े सहज और ऊंचे गले से बोले, "किसकी कहानी चल रही है ? शिकार वी? तो रुक क्यों गए चालू रखो न ।" मैंने भी उनकी बात का समर्थन करते हुए समयोपयोगी उत्साह दिलाया { चौधुरी थोड़ा आसन बदलने के बाद पहले प्रसंग पर आ गए, "एक चीज बरावर देखी है। बाघ और वाधिन जोड़े से हों और किसी तरह भाप उनमें से एक को खत्म कर दें, तो दूसरे के लिए आपको ? ६६ / मल्लिका ज्यादा दिन इंतजार नहीं करना पड़ता।" मैं बोला, "सो कैसे ? दूसरे को तो चोर भी सावधान हो जाना चाहिए।" "ठीक उलटा । वह तब प्रतिशोध लेने के लिए वेपरवाह हो जाता है। अपने प्राणों की तरफ नहीं देखता, अक्ल तक खो बैठना है। हिमक प्राणी-मात्र ही रिवेजफुल, भयानक प्रतिहिंसापरायण होता है। इनमें सदमे ज्यादा वाघ।" प्रतिवाद का स्वर इतना जोरदार था कि हम दोनों ही एकमाथ वक्ता के मुह की ओर देखने लगे। भूतनाथ वाबू उमी तरह दृढ स्वर में वोले, "आदनी उने भी पीछे छोड़ जाता है । खैर, आप सुनाइए।" चौधुरी ने फिर शुरू किया, "जोडे में में एक को मारने के बाद शिकारी को ही हर वक्त होशियार होकर रहना पटना है। यदि दूसरा उस वक्त कही आसपाम ही छिपा रहता है और प्राय: यही होता है, तो वह मारने वाले को पहचानकर रखता है। उसका दाव पड़ जाए तो रक्षा नहीं। और यदि मारनेवाला निकट नहीं मिलता, तो उसका आक्रोश जा पहुंचता है उन लोगों के ऊपर, जो उसके अपने हैं -बहू, लड़का, लड़को अयवा मंगो-माथी।" यह बात मुझे आश्चपंजनक लगी। मैं बोला, "मेरी तो यह धारणा थी कि बाघ की नजरो में मभी लोग समान शत्रु हैं। वह क्या आदमियों में भी चुनाव-चयन करता है ?" "करना क्यों नहीं ! दूसरे लोगों को वह बिलकुल ही न छुना हो, ऐमी बात नहीं । विशेषकर जो मैनईटर हैं, जो आदमी के खून का स्वाद पहले ही पा चुके हैं। फिर भी प्रायः ही देखा जाता है कि वाघ उसीसे बदला लेने को चेप्टा करता है, जो क्षति करता है। ऐसे आदमी के प्रति वह ऐमा हिंसक इस लिए बैठ जाता है, जो अन्य समय यानी स्वाभाविक अवस्था में वह कभी नहीं लेता। जैसाकि उस बार हुआ..." चौधुरी ने सुन्दरवन को अपनी खुद की ही एक शिकार-कहानी सुनाई। नरभक्षी बाघ नहीं था, कम से कम शुरू मे तो नहीं था, मगर भीपण दुर्दम्य ! कोई महीने-भर के भीतर पूरी सात गाय-भेड़ें उसके पेट में चली गई। उसका साहस इतना बढ़ गया कि दिन-दहाड़े जहां चाहे, हमला बोल दे। सात-आठ मील में फैला अच्छा-खासा इलाका था- उसके भय से सभी प्रस्त। खेतीबाड़ी, हाट-बाजार बंद होने की नोवत आ गई। खबर पाकर कालू चौधुरी अपने दो पुराने शागिर्दो को लेकर रवाना हुए। एक गांव में सुना कि इससे पहले भी तीन-चार शिकारी पन्द्रह-सोलह दिन लगातार इधर-उधर कोशिश कर गए हैं। पेड़ पर मचान बांधकर कई रातें काट गए हैं। बाघ के दर्शन भी नहीं होते। और सुबह होती नहीं कि खबर आ जाती है कि मचान से कुछ ही कदम दूर किसीके आंगन में रो बाघ दुधारू गाय लेकर भाग गया। उसकी विशेषता यह है कि 'किले' के आसपास भी आकर नहीं फटकता । उस तरफ से वह बड़ा निर्लोभी है। कालू चौधुरी ने कई गांवों में घूमकर छांट-छांटकर कई हट्टे-कट्टे मेमने इगठे किए । उस वक्त उधर जल का बड़ा अभाव था। घने जंगल में एक-दो ताल-गड्ढे तलाश किए गए। उनके चारों तरफ बाघ महाराज के पदचिह्न देखने में आए । इसका अर्थ था कि उसे खाद्य कहीं भी मिले, पेय के लिए तो बार-बार यहीं आना पड़ेगा । एक सुविधाजनक स्थान पर मेपशावक को बांधकर जितनी दूर सम्भव था---अर्थात् राइफल की रेंज के अंतिम बिन्दु पर पेड़-पौधों की गाड़ में मचान बनाया गया। इस तरह से कि वाहर से कुछ पता न चले। कांटों और डाल-पातों का एक- एक टुकड़ा तक बीनकर दूर फेंक दिया गया। एक-एक कर दो रातें बीत गई मगर वाघ नहीं आया। निवास पर लौटकर खाना-पीना खत्म कर और यह तय कर कि अगली रात और देखेंगे, चौधुरी साहब विश्राम कर रहे थे । उठे ही थे कि मन्तिक संवाद मिला। इस बार कोई गाय-मेड़-बकरी नहीं, इसी गांव का एका बाईस-तेईस वर्ष का दुःसाहसी जवान लड़का अभी-अभी बाघ का शिकार बना है। जंगल में लकड़ी काटने गया था। और अकेला नहीं, विधिवत् दल बनाकर । साथी लोग थे अपेक्षाकृत खुली जगह में, वह थोड़े घने जंगल में घुस गया था। किसीको विशेष कुछ दिखाई नहीं ६८/ मल्लिका । पड़ा । एकाएक उन लोगों के कानों में पड़ी उस लडके की चीख और साथ ही साथ वाघ को गर्जन । सव हा हल्लाकर दौड़कर पहुंचे तो देखा कि एक आधे कटे पेड़ के धड से थोड़ी दूर वह लडका पेट के बल पड़ा हुआ है। पहले पुकारा, आवाजें दी, फिर हिलाकर देखा-मत्र खत्म । कालू चौधुरी पहुंचे, उस वक्त भी लडके के कंधे के पास मे बुरी तरह खून बह रहा था। पीछे की तरफ सिर्फ एक माम का लोयडा वना था। हडियां तक टूट गई थी। अर्थात् आघात और मृत्यु के बीच ध्यवधान सिर्फ चन्द मेकेण्डो का था। शिकारी की अनुभवी नजरो से चौधुरी ने बहुत देर तक ताश और उसके नासपास की जगह की परीक्षा की। जाघ के पीछे एक और धाव नजर पड़ा । दात का था । वाघ अमित शक्तिशाली है, इसमे सन्देह नही पा । ऊपर से आदमी के सून का कुछ स्वाद भी उसकी रमना को मिल गया था। फिर वह देह को फेंक क्यों गया ? चारों तरफ और अच्छी तरह देखना जरूरी है । वं आगे बढने को ये कि हठात् आदमियों के पीछे से एक आतं तीक्ष्ण नारी-कण्ठ ने वाधा डाल दी। सबको ढकेलती आधी की तरह दौडती आकर उस मृत देह पर जो औरत गिर पडी, उसकी उन शायद सोलह भी पूरी नहीं थी। काला रंग, भरपूर स्वास्थ्य, बड़ी- बड़ी आंखें। कुछ ही महीने पहले उन दोनो की शादी हुई थी। पर से काफी पानी भरने गई थी। लौटते वक्त ही खबर मिली। कांख में दधी कलसी फेंककर मंदान-जगल पार करती दौड़ी चली आई है। साथ की औरतो ने पकड रखने की चेष्टा की थी, नहीं रोक पाई। स्वामी की पीठ पर पछाड वाकर अपने स्वलस्थायी विवाहित जीवन की स्मृतिभरी कितनी ही छोटी-छोटी बातें बखानती रोती जा रही थी। सिर मे नाचल हट गया, खुली केगराशि पीठ पर बिखर गई । मुह पर, कपाल पर, आखो के कोनों में अश्रुधारा के साथ रक्त मिल गया। लगा, जैसे उस रोने का अन्त नहीं। उस चोक को कोई तुलना नही। पूरे गाव के इतने सारे स्त्री-पुरुष अपना सारा कलरत्र, सारी उत्तेजना मलकर स्तब्ध पत्थर बन गए। कालू चौधुरी भी कुछ देर किंकर्तव्यविमूड हुए सडे रहे । ।

- जंगल की तरफ बढ़ गए। सूखे पत्तों पर थोड़ा-सा रक्त मिला। एक जगह नहीं, बीच-बीच में रिक्त स्थान छोड़कर रक्त की एक लाइन चली गई है। इसका अर्थ था कि आततायी अक्षत देह लेकर नहीं जा पाया। तभी याद आया कि लड़के के हाथ में जो कुल्हाड़ी थी, वह कहां है ? वह गायब है। भीड़ के भीतर एक सुरसुराहट मच गई। इस गहन शोकावह दृश्य ने इन सारे लोगों को सुन्न कर दिया था। उनके सूखे चेहरे एकाएक चमक उठे। सभीके मुंह से एक स्वतःस्फूर्त उच्छ्वास निकलने लगी। शावास जवान ! जान गंवा दी, मगर जो जान लेने आया था, उसे भी घायल किए बिना नहीं छोड़ा। कलाइयों का जोर देखो! कुल्हाड़ी ऐसी जगह चुनकर मारी है कि इतने बड़े वाघ की भी सामर्थ्य नहीं कि निकाल फेंके। बेटे को कंधे पर लगाए ही भागना पड़ा। ये सुन्दरवन के लोग हैं । वाघ, सांप, मगर, जंगली सुअर इनके नित्य संगी हैं। इनके अलावा, बीच-बीच में आती है बाढ़ और महा- मारी । उठते-बैठते मृत्यु से आमना-सामना होता है। यम से लड़ाई कर जिन्दा रहना पड़ता है। उस लड़ाई की उत्तेजना प्रियजन की विरह-वेदना को लेकर पड़े रहने नहीं देती। इन लोगों ने भी जब यह देखा कि गह मृत्यु कितनी ही करुण क्यों न हो, कायर की मृत्यु नहीं, तो क्षणभर में अपने को तान-खींचकर सब चंगे हो गए। कई युवकों ने आगे बढ़कर शिकारी को घेर लिया। कुल्हाड़ी लिए वाघ वहुत दूर नहीं जा सकता । अवश्य ही वह जस्म के कारण पस्त हो गया होगा। सभी मिलकर धावा बोल दें तो अभी पकड़ में आ जाएगा। यह सुयोग छोड़ना ठीक नहीं होगा। चौधुरी ने उन लोगों को मना किया। उन्हें बहुत अनुभव है। वे जानते हैं कि माहत बाध क्या वस्तु है। पकड़ तो शायद लेंगे, अन्त में मारना भी सम्भव हो जाए, मगर प्राण देने से पहले वह एक-दो जान लिए बिना नहीं छोड़ेगा। वे मन ही मन कुछ और वात सोच रहे थे, मगर व्यक्त करना मुश्किल था। बता भी देते, मगर ये लोग विशेषकर आत्मीयजन, राजी नहीं होते। फिर भी वे इस उत्तेजना का लाभ लेकर प्रस्ताव रख वैठे। भीड़ से थोड़ा हटकर एक पेड़ के नीचे लड़के का बाप बैठा हुआ - १०० / मल्लिका था। उसके मुंह से अब तक एक अस्फुट शब्द तक नहीं सुना गया । जाने कसा सुन्न-सा हो गया था । उसीके पास गाकर चौधुरी खड़े हो गए। चोले, "यदि इस देह को एक रात से है, धैसे ही रहने दें, तो मैं एक आखिरी चेष्टा और कर लू।" बाप ने विस्मय और बैदना से मुह उठा- कर देशा, कोई उत्तर नही दिया । इधर-उधर ताककर पड़ोसियों की तरफ देखकर कहा, "तुम लोग अभी तक बैठे हो? और वक्त नही, खयाल अरे हो ! आसपास बहुत-से लोग सतर्क हो गए। क्रिपाकर्म का आयोजन इसी वक्त शुरू करना चाहिए । श्मशान एकदम पास मे नही । सामने अधेरी रात है। कई प्रोट और युवक उठ पड़े। एक वयस्क व्यक्ति चौधुरी को एक और बुलाकर दवे गले से बोला, "यह नहीं होता बाबूजी । लाश को बासी नहीं करते । दोप होता है । यह काम हम लोग नहीं कर सकेंगे।" बहुतों ने चलने के लिए कदम बढ़ा दिए । औरतों में से कुछेक बहू को साथ ले जाने के लिए आगे बढी; उसी वक्त कानी में पहुंची उसकी बड़ एवं स्पष्ट आवाज, "ठहरो।" सभी ठिठककर खड़े हो गए। कालू चौधुरी ने भी अवाक होकर देखा कि लड़की उठ खड़ी हुई है, उसकी आखो मे आसू नहीं हैं, पूरे चेहरे पर एक स्थिर संकल्प की कठोरता है। वह धीरे-धीरे उन्होके निबट आकर तर्जनी उठाकर बोली, "उन्हें इसी जगह छोड दें तो तुम इसी गत वाघ को मार सकोगे ?" उस जरा-सी लडकी के मुह से इस तरह के प्रश्न के लिए चौधुरी प्रस्तुत नहीं थे । छूटते ही कोई उत्तर नही दे सके । मगर अगले ही क्षण अपने विस्मय-अनिश्चय के भाव को संभालकर बोले, "मार सकूगा या नहीं, यह कैसे कहा जा सकता है ? जहाँ तक होगा, चैप्टा करूगा।" "धेष्टा ?" सुनकर वह लडकी चौंक गई। लगा, जैसे उनके चेहरे पर किसीने कीचड़ फेंक दिया है । वह बोती, "चेष्टा गई भाड़ मे ! चेष्टा ही की होती तो नया आग मेरा.." कहते-कहते बह लडकी उच्छवसित रुदन के साथ उनके पैरो के पास हो बिन्चर गई। उसी तरफ देखने चौधुरी स्तन्यं खड़े रहे। क्या कहें, क्या बात कहकर उसे सान्त्वना दें, सोच नहीं पाए । वह नहना पुनः इस तरह कर खड़ी हो गई, जैसे बिजली ने छू लिया हो । आंखों से भाग छिकाती बोली, "तुन किस बात के शिकारी हो? जब एक बाथ नहीं मार सकते, तो इतनी बंदूकों का क्या करते 1 हो?" उनके गुरुमन आकर उसे एक ओर ले गए। किसीने मृदु स्वर में तिरस्कार करते हुए कहा, "छि:-हिः, कहीं इस तरह कहते हैं !" चौधुरी मानो सोकर उठे। बोले, "ठीक ही कहती है, इसका कोई दोष नहीं। तुम लोगों से मैं सिर्फ एक ही भीख मांगता हूं। आज मुझे आखिरी मौका दो। मारी रात रखने की जरूरत नहीं, सुबह चार बजे तमा उकबाट पाकर ले जाना।" फिर कुछ कदम आगे बढ़कर उस लड़की के सिर पर हाथ रखकर बोले, "पर जामो। बचन दिया, इस वाघ को मारे बिना मैं घर नहीं लौटुंगा।" लड़की ने आखें उठाकर देखा । चौधुरी ने देखा कि उसकी आंखों से गरल तजना उमदी पड़ रही है । जाने क्या कहने वाली थी, वोली नहीं, पायद शर्म आ गई । फौरन ही आंखें झुका लीं। दूसरे ही क्षण सभीकी और देवकार बहुत कुछ, गोया कि निर्देश के स्वर में बोली, "तुम लोग चले जायी।" कहकर और रुकी नहीं। द्रुत गति से चल पड़ी। बाकी लोगों ने भी मंत्रचालितों की तरह उसका अनुसरण किया।- गालू चौधुरी का अनुमान था कि वाघ यहाँ विश्राम कर रहा था, लड़ो पर आक्रमण करने की उसकी शायद कोई नीयत नहीं थी। वहीं हठात् बाघ देखकर कुल्हाड़ी चला बैठा होगा। बिगड़कर उछलकर वाघ गे उसका कंधा तोड़ दिया और लड़के का मरण-चीत्कार एवं लोगों का शोरगुल सुनकर वह लाश लिए विना ही भाग गया। कुल्हाड़ी उसके शरीर में कहीं विधी हुई है । बाद में वह निकल भी गई हो, मगर इस आपात की जलन वह नहीं भूल पाएगा। लोगों के चले जाने के बाद वह बदला लेने के लिए निश्चय ही आएगा। इसके आलावा उसकी रसना १०२/ मल्लिका भले ही क्षण-भर के लिए सही, आदमी का गर्म खून स्पर्श कर चुकी है। वह आकर्षण भी कम नही । इससे भी प्रबलतर याकर्पण है प्रतिहिंसा । वह आएगा ही, इस विषय मे चौधुरी प्रायः निश्चिन्त थे। मचान बाघने को लेकर मुश्किल हुई। बाघ को यदि ऐसा मामास हो जाए कि आस-पास कही शिकारी की बन्दूक घात लगाए तैयार है, तो उसकी प्रतिहिमा की ताडना कितनी ही तेज क्यों न हो, उमकी आत्म- रक्षा को स्वाभाविक प्रवृत्ति शायद उसे वाधा पहुंचाएगी। अतएव एक कमोपलेज जरूरी है-शिकार को आंखो में धूल झोंकने के लिए पेड़-पौधों का थोड़ा-सा अन्तराल ! समय बहुत थोड़ा था। उमीमे किसी तरह एक मचान खडा किया गया। बहुत-सी गलतियां रह गई, मगर उस वक्त और कोई चारा नहीं था। चौधुरी रात के लायक सामान्य-सा कुछ सा-पीकर एक होशियार सहायक और राइफल, टाचं आदि सरंजाम लेकर शाम के बाद से ही मचान पर जाकर बैठ गए। समय कटना ही नही चाहता। लगा, जैसे क्षण फमश, भारी हो रहे हैं, ढकेलकर हटाए नही जा रहे । मचान पर बैठकर रात विताना काल चौधुरी के जीवन में यह कोई पहली घटना नहीं थी। सुन्दर वन के मच्छरों का परिचय वे पहले भी प्राप्त कर चुके हैं । चीटियों का दल-बद्ध दंशन क्या चीज है, इसका स्वाद भी उन्हें मिला हुआ है । इनमे से कोई भी बात उन्हें विचलित नहीं करती। आज भी नहीं कर रही। शिकार को वे शिकारी की नजर से ही देखते याए हैं । या गया तो ठीक, नही आया तो वे सारी रात को व्यर्थ प्रतीक्षा मे क्लान्त या परेशान नहीं होते। इस बात को उन्होने बड़े ही महज भाष मे लिया है, मगर आज वे अधीर, अस्थिर, असहिष्ण है । इस आश्चर्य- जनक लड़की ने उन्हें वंचल बना दिया है। कभी उसकी वे चमकती आखें, कभी उसका वह अश्रुसिक्त करुण चेहरा उनकी आंखो में तैरने लग जाता। फिर खुद उसे वचन देकर आए हैं, उसके स्वामीहन्ता को खत्म किए से छुट्टी नही । और अब उनके हाथ में मात्र कुछ घण्टो का वक्त है । यदि सफलता न मिली, तो किस मुह से उसके आगे जाकर खड़े होगे? बिना उनकी यहा मन निश्चय करके ही उन्होंने शायद यह प्रश्न किया था । हम दोनों को ही थोड़ा आश्चर्य हुआ। भूतनाथ इस बात को लक्ष्य कर वोले, "आप लोग जो सोच रहे हैं, सो नहीं। कालू वावू की विद्या मैं नहीं जानता । जंगल की वाघिन का भी मुझ कुछ पता नहीं। घरों में जो एक-दो देखने को मिली हैं, उन्हींसे मैंने अन्दाज लगाया था।" बात और भी रहस्यमय हो उठी। उस विषय में और कोई प्रश्न करने से पहले ही कालू चौधुरी ने वर्षा-विरत आकाश की ओर देखकर उठने की इच्छा व्यक्त की। बहुत समय तक अदृश्य रहने के बाद उन्होंने जिस कारण से मुझसे मुलाकात करने की प्रार्थना की थी, उसके साथ भी शिकार का सम्बन्ध था। वे इतनी सारी वन्दूकों के लाइसेन्सों को लेकर थोड़ी मुश्किल में पड़ गए थे। मेरी सहायता से अधिकारियों का अनुदार मनोभाव दूर हो जाए, इस आशा को लेकर ही उनका आना हुआ था। मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि मेरी जितनी सामर्थ्य है, करूंगा। वे धन्यवाद देकर चले गए। चौधुरी को दरवाजे तक पहुंचाकर लौटकर मेरे भूतनाथ बाबू की तरफ देखते ही वे बोले, "क्या देख रहे हैं ? आज किसी मतलब से नहीं आया । यों ही चला आया।" गाड़ी पकड़ने की तो जल्दी नहीं ?" "नहीं, रात को लड़की के घर रुकना पड़ेगा। उस दिन नहीं रुका, इसलिए बुरी तरह नाराज है।" "तभी भागकर आना पड़ा ?" "क्या करूं, वताइए? इसके अलावा, आपके साथ वैठकर पुरा दिनों को उलट-पुलटकर देखना-~यह लोभ भी कोई कम है ?" कहक वे हंस पड़े। मैं बोला, "तो शुरू कीजिए । मुखबंध, यानी इण्ट्रोडक्शन तो हो । गया।" "किसका?" "क्यों, बाघिन ? .''जंगल की नहीं, घर की।" १०६ / मल्लिका - "ओ, मार यह शिकारनहानी तो नहीं है । मने और रो भी हो, ग्रिल नहीं पाएंगे।" "गिल से भी गहरी कोई चीज पा लूँगा । कालु आयगे प्रान आपने किया था, उसमें लगता है कि उनि निवाधिन की कहानी सुनाई है और आपने जिन दापिनों को देखा है, इन ती निक - ही कोई आधारनत समानता है।" "मेरा तो यही विश्वास है। आप शायद नहीं मानें। माहित्यिक व्यक्ति हैं। आपकी आखों में, और जि आपको ही क्यों, दुनिया में बहुत से लोगों की नजरों में पुर की तुलना में न्त्री डानि कहीं अधिक कोमल, स्नेह करणा-ममता मे दहो यामानी से मिल जाने वाली, कीर जाने क्या-क्या है । उसका एक दुदरा कप आप रोगों ने गाद नहीं देखा । करेंज में जब प्रतिहिता की आग अलती है, दद लोग तो कर सकती हैं या कर बैठती हैं में देखकर कादिरमुल्ला की हार मान जाम" अविस्मृति का पुल-घूमर आवरण नेदकर एक अमष्ट नारी-नि मेरी बासों में तैरने लगी। मैं बोला, "म जाति की एक मदन्या को मैं भी जानता हूं, मगर वाधिन की रक्षा नागिन के नाय मत्री बना- नता ज्यादा है।" "अपने कामिन फकीर की पवनी दीदी कटी दीदी की बात कर रहे है ? मगर कादिर की नर वह नी अनु में रक्षा नहीं कर पाई।" मेरी त्रिज्ञानु दष्टि की ओर देवकर उन्होंने दात को और नी मष्ट करने की चेष्टा की, "कादिर ने फिर भी दलदः बल की नन्दा चाहा था, फांमी का फंदा गले में पहनकर दह याने दहनोई में बन्न प्रतिमोध ले गया । कूटी बीवी को तो वह मान्दना भी नहीं। दिन निमसे 'बदना लुगी' कहकर वह वाईस मील दोडकर यान के बग- मदे में जाकर बेहोग होार पट गई थी, दूसरे दिन उमीका माल छुट्टा के लिए वह वकील के हायों सब कुछ नार देने में भी नहीं की।" "लगता है, शायद वह भी एकसरह का दद्रका नेता है. बदसूट १. 'लौह-कपार्ट' भाग चार देनर।

- का बदला "यदि ऐसी बात है, तो उसकी नागिन वाली केंचुली खुल गई, उतर गई। फिर तो आप लोगों की वही कविता वाली 'चिरन्तन नारी' ! गर मैं जिसकी बात कह रहा था, वह तो एकदम जात-बाघिन थी। उसने जो प्रतिशोध लिया, वह विशुद्ध और पूरी जैव प्रतिहिंसा थी।" कहते-कहते भूतनाथ वावू की आंखें धीरे-धीरे बंद हो गई और फिर एकाएक प्रवल वेग से धारा-वर्पण शुरू हो गया। मैंने अपनी कुर्सी थोड़ी और पास सरका ली। वर्पण मुखर अंधकार की ओर थोड़ी देर देखते रहने के बाद वे धीमे गले से बोले, "उसका नाम था "छोड़ो, असली नाम नहीं भी बताऊं । इससे अच्छा, आप एक नया नाम दीजिए।" मैं बोला, "बनानी।" "बड़ा आधुनिक नहीं लगता ?" "लगा करे, उसमें थोड़ा रहस्य का अंधकार है । आप शुरू कीजिए।" "अच्छा।" - भूतनाथ बाबू की प्राय: हर कहानी के शुरू में एक प्रारम्भिक प्रश्न हुआ करता है । ठीक प्रश्न नहीं, कह सकते हैं, कोई ‘एसम्प्शन' या कोई एक बात मान लेना, जिसकी शक्ल प्रश्न की होती है। "वचपन में भूगोल निश्चय ही पढ़ा होगा ?" मैं बोला, "पढ़ा था, यानी पढ़ना पड़ा था। परीक्षा ले बैठे तो मुश्किल में पड़ जाऊंगा। स्कूल के दिनों में यह भूगोल बड़ा तंग करता था।" " खैर, बंगला देश का मैप तो थोड़ा-बहुत दिमाग में होगा ही। पूरे बंगाल की बात कह रहा हूं, आप लोग जिसे अनडिवाइडेड बंगाल कहते हैं । यह बात मुझे कतई सहन नहीं होती। इसमें एक राजनैतिक मतलव छिपा है, अंग्रेजों की इस 'डिवाइड' नामक कीति को आंखों में उंगली डालकर दिखा देना ! नहीं तो अंश से पूरी चीज का परिचय, यह कौन-सा देशी नियम है ? - - ५ १०८ / मल्लिका ॥ "जो भी हो, उस पुराने बंगाल प्रेसिडेन्सी के मैप को याद करने की चेष्टा कीजिए। बाईं ओर से उतरती है भागीरथी, और दाई ओर से पया-मेघना । दोनों धाराएं जाकर गिरती हैं बंगाल की साड़ी में । बीच में एक वृहत् व-दीर (डेल्टा) है। हमारे भूगोल के मास्टर साहब कहते, 'बद् द्वीर। बादमी लोग मत्र बद हैं। तुम लोगो को देखकर ही पता चलता है। वे मेदिनीपुर के भादमी थे। इस 'ब' के बीच नही पाते । हम सभी 'ब' हैं। रमिकता के माथ कहते, फिर भी यह बात हम लोगो को चुननी । हम लोग सामने कुछ नही कहते, आड़ में कहते, लोटा मास्टर। इस त्रिभुज के तले की ओर बहुत-सी पतली-पतली हरी रेखाएं देखोगे । मद जाकर वे ऑफ बंगाल में मिल गई है। जैसे-जैसे दक्षिण में जाएंगे, उतनी ही ज्यादा मिलेगी। ये सब बड़ी-बड़ी नदिया है। कोई- कोई तो पद्मा-मेघना से भी दडी है। इस पार खड़े होने पर दूसरी पार दिखाई नहीं देती। मगर मैप या भूगोल में कोई नाम नहीं। आसपास जो लोग रहते हैं, वे कोई न कोई नाम लेकर बोलते हैं। गाववालों के दिए गंवारू नाम । आपको पसन्द नहीं आएंगे। इन्ही में से एक अनाम नदी के किनारे सुपारी, नारियल, मदार और ढाकाई अरेंडी के घने जंगल की नाई मे कुछेक टीन के छप्परों में एक छोटा परिवार रहता है । दुल चार प्राणी-अपेड़ उम्र का बाप, जवान लड़का, लरके की मां और बहू । बहू हुई आपकी बनानी । मैं हंसकर बोला, "मेरी बनानी कैसे हुई ?" "वाह, नामकरण में कुछ प्राप्ति तो होती ही है। और फिर ऐसा मुन्दर नाम ! वाप-बेटे दोनो के नाम भी आप रखेंगे ?" "नही, उनमें मेरी कोई रुचि नहीं।" "समझा ! तो मैं ही रखता हूं । मान लीजिए, गोपी और सुबल । मुनी परिवार ही मानिए । माली हालत ठीक है। नदी के कछार मे कई वौघे धान की खेती, सोना उगता है। सालभर का खर्च मजे मे चल जाता है। पर से सुपाड़ी वागान, उस इलाके का जो प्रधान धंधा है। इसके अलावा गोपी वर्मन का कुछ कारोबार भी था-निर्यात- व्यापार ! कभी सुपाडी-नारियल, कभी घान-चावल भरकर खास लोगों को , । - लेकर बड़ी-बड़ी नावों (जिन्हें वे लोग कहते हैं घासि नौका) में पाल लगाए शहर की ओर चला जाता । लौटने में दो-तीन महीन लग जाते हैं, कभी-कभी इससे भी ज्यादा। " यह निर्यात-व्यापार असल में शिकारी का 'केमोफ्लेज' था, जिसकी आड़ में बैठकर कालू चौधुरी वाघ की आंखों में धूल झोंकता है। गोपी की बहादुरी और भी ज्यादा है। वह झोंकता था पुलिस की आंखों में। असली कारोबार था उसके पीछे, शिकारी के मचान की तरह अंधकार में ढका। वह भी एक प्रकार का निर्यात है। अंतर सिर्फ यही है कि माल के रवाना होने की खबर मिल जाती थी, वह माल जाकर कहां पहुंचा, इसका कोई अता-पता नहीं मिलता। इसके अलावा, कारोवारी आदमी हर समय नेपथ्य में रहते । मान लीजिए, नाव सजाकर वाजे, वजा- कर वर शादी करने जा रहा है। साथ में कीमती चीज-वस्त्र हैं। इसके बाद क्या हुआ, कोई पता नहीं। शरीर को गहनों से लादे, पांच वक्से दहेज के लिए दुलहन ससुराल जा रही है। शुभ लग्न में नाव चल पड़ी, मगर जाकर घाट पर नहीं लगी। जमींदार के नायब ने सालभर के लगान के रुपये भरकर नाव सदर के रास्ते छोड़ दी। साथ में लाठी- मोटा, वन्दुक, पायक-वरकंदाज सब हैं। और ये सब सामानसहित कहां, किस तरह अदृश्य हो गए, इसकी खबर इस पार, उस पार कहीं नहीं पहुंची। पुलिस को पता था कि इन सब घटनाओं के पीछे है एक नाव, जिसकी तीर जैसी गति है, जिसमें कुछेक लोग हैं और उसे जो चलाता है, उसका नाम है गोपी वर्मन । मगर रिवर पुलिस की लांच उसे पकड़ नहीं पाती। पीछा करते ही वह आंखों के सामने धुएं की तरह विलीन हो जाती है। लांच के चालक और खलासियों का विश्वास है कि यह आदमी कोई बहुत बड़ा ओझा है, अदृश्य होने का मंत्र जानता है । जल- पुलिस के सिपाही-जमादारों, यहां तक कि कई दरोगाओं को भी यही वात कहते सुना है। लगता है, भूतशुद्धि, प्रेतशुद्धि, गोया कि हर तरह की विद्या वह जानता है । नहीं बन्दूक की गोली कैसे चूक जाती है ? सौ गज दूर से पक्का निशाना लेकर राइफल छोड़कर देख लिया, लगती . ३ .

॥ " नहीं। एक बार एक कटहल की नाव माल देचकर देश लौट रही थी। घोपाडांगा की छोटी नदी पार कर बड़ी नदी में पहुची ही थी किन जाने कहा मे आकर एक छिर (तेज गति की नाव) ने वाज की तरह झपट्टा मारा। मेरे चेहरे पर विस्मय फूट पड़ा, "कटहल की नाव ! उसमें भला कितने रुपये होंगे ?" "तो कम भी कितने ? तीन-चार हजार तो थे हो।" "क्या कहते हैं ! कटहल वेचकर इतने रुपये ?" "तो फिर आपने वे सब कटहल देखे नही, उनका नाम है भाटी कटहल । एक-एक का वजन होता है आधा मन, तीस सेर । एक-एक फांक पक्के एक पाव, पांच छटांक की होती है। लाहा नहीं, यानी रस निकाल- कर दूध के माथ मिलाकर पीने की चीज नहीं। कड़ा गूदा, कच-कच कर चबाकर खाते हैं । ढाका, फरीदपुर, यशोहर, खुलना मे भाटी कटहल की बड़ी पूछ है । उसके आगे रसगुल्ला क्या चीज | देशी कटहल खत्म होने के बाद, अर्थात् सायन-भादों के महीने मे हाट-हाट पर बडी-बडी नावों की भीड़ लग जाती है। छोटी-सी उस ढकी जगह को छोड़कर बाकी जगह पर कटहल का एक-एक पहाड नजर आता है। गृहस्थों के हाथों जूट की बिक्री से प्राप्त चमकते नोट होते हैं । इधर शरत्कालीन धान भी घरों में पहुंच गया है। दो-चार महीनों के लिए खाने की चिन्ता नही । बम, और क्या चाहिए ! हाट में लोटते हर आदमी के कंधे पर एक राम कटहल होता है, हाथ मे सेर-डेढ मेर की इलिश (मछला, होती है ।"थाने-थाने मे पुलिस का काम बढ़ जाता है।" "क्यों ? इसके भीतर पुलिस कहा से आ गई ?" "कोई यों ही थोड़े ही आ जाती है। इस कटहल और माछ के आकर्पण गे आना पडता है। शुरू मे मान की लड़ाई होती है, देस देसते वही असली लड़ाई में बदल जाती है।" "मान की लड़ाई कैसी?" "कैसी? मान लीजिए, माझपाडा के मुगीजी इलिश वाधिन / १११ 1 मछुआ कहता है तीन रुपये; वे सवा रुपये से पौने दो रुपये तक पहुंचे हैं कि इसी वक्त दक्षिणपाड़ा के चौधुरी साहब उधर से बोल पड़े-दो रुपये में दोगे? बस, हो गई शुरुआत । " पैसे की गरमी दिखा रहे हो मियां साहव ?' 'ऐसा सोचते हो, तो यही सही। पैसा होता है, तो उसकी गरमी भी होती है।' ॥ अच्छा !' दोनों तरफ लोग इकट्ठे हो गए। जवानी बातों से हाथापाई, फिर लाठी, भाला, वल्लम । माघ घण्टे के भीतर पांच जरूम, एक खून। मैं बोला, "यह सब तो मालूम ही नहीं था।" "कैसे जानेंगे ? हम लोगों की तरह गांवों में तो रहना नहीं पड़ता। डिस्ट्रिक्ट टाउन के बाहर तो किसी दिन पैर रखा नहीं ।" "सो तो नहीं रखा, मगर इन सब चीजों को लेकर तो मुझे भी घर चलाना पड़ा है।" आपको मिली है तैयार फसल । उसके पीछे जो जटिल क्रिया- कलाप है-बीज संग्रह करने से लेकर फसल घर लाने तक-उसकी तो हवा तक आपके शरीर से नहीं लगी। वह सब तो इस पुलिस के सिर पर है । छोड़ो। अब आगे सुनिए । " छिपवाले लोग जब उस बड़ी नाव पर लपककर पहुंच गए, तो व्यापारी लाठी, भाले आदि लेकर तनकर खड़े हो गए। बड़ी-बड़ी नदियों में होकर देश-देशांतर घूमना पड़ता है, इसलिए यह सारा सरंजाम रखना पड़ता है । मगर डकैत लोग दल में भारी थे, उनके हथियार भी मारात्मक थे। नतीजा यह कि इन लोगों में से एक तो साथ ही साथ खत्म और दो-तीन जख्मी। वाकी जो थे, नदी में कूद पड़े ! उन्हीं में से एक व्यक्ति किसी तरह तैरकर पार पर पहुंच गया। गोपी वर्मन के आस-पास ही उसका घर था। रंग-रोगन चढ़ा होने के बावजूद गले की आवाज सुनकर उसे पहचान लिया था। पूरे एक दिन का रास्ता चलकर किसी तरह थाने में पहुंचकर खवर दी। ११२ / मल्लिका " गोपी का पता नहीं चल रहा था। पुलिम ताक लगाए बैठी थी। कोई पन्द्रह दिन बाद घर लौटते ही उसे पकड़कर हाजत में रप दिया । मान-पत्र, रपया-पैसा कुछ नहीं मिला। जिस आदमी ने यवर दी थी, यह भी कुछ दिन बाद मुकर गया। गाववालों ने डरा दिया-गोपी के विरुद्ध 'साक्षीदी' तो 'दाग मार देंगे। वाण मारना किसे कहते हैं, जानते हैं ? "सुना तो है, पर क्या होता है, ठीक मालूम नहीं।" "एक तरह का मंतर है, जिसे लक्ष्य कर यह कहा जाता है, उसकी और रसा नहीं, तीन रात-दिन पूरे होने से पहले ही उसका सारा कुनवा मुंह से खून निकलने के कारण खत्म हो जाएगा। अतः फरियादी और घोजने पर भी नहीं मिला। "साक्षी नहीं, माल नहीं, मामला चलेगा किमपर अमामी को हाजन में ज्यादा भटकाए नहीं रखा जा सकता। रिवर पुलिस के इंस्पेक्टर कालीप्रसाद मुखर्जी स्वयं ही जांच कर रहे थे। अभी-अभी पदोन्नति हुई यो। आश कर रहे थे, गोपी वर्मन को फांस लिया तो रातोंरान कन- फरमेशन हो जाएगा। और यह आशा मन में ही नहीं रखी, एक साक्षी हाय में आते ही इष्टमित्रों के बीच बिखेरनी शुरू कर दी। इसीलिए आप समझ रहे होंगे, उन्हें बही मुश्किल का सामना करना पड़ा। हाकिम के हाय-'र पकड़कर किसी तरह और चौदह दिन जमानत बंद रखने की व्यवस्था की। फिर उसी रात लाच लेकर यमामी के गाव की योर.रवाना "पहले कई दिन तो तरह तरह के लोगों में खोज-बार लेने की क्षेपण करते रहे । देखने में आया कि आस-पास के लोगों में में वर्मनी में पोई साम मुश नही था भार असल बात पर सभीके मुंह वंद। तंत्र-मंत्र के मागे पुलिस की क्या गिनती ? इंटेरोमान के नाम पर कालीप्रसाद ने छांट-छाटकर किसी-किमी पर दो-चार जो डोड मारे, उन्हें इनका नहीं कहा जा सकता । मगर हमार भी हो नी का, दाप गरने की तुलना में वे कुछ भी नहीं। और वहीं दृछ हाय नहीं पहा दो अन्नु में मुगल को जा पकड़ा । वह तो जैसे देयछुल में प्रसाद ! चाप की पाग से दिलकुल अलग । बचपन से ही बड़मर की तरह ! मन में तुरनी..

मछुआ कहता है तीन रुपये; वे सवा रुपये से पौने दो रुपये तक पहुंचे हैं कि इसी वक्त दक्षिणपाड़ा के चौधुरी साहब उधर से बोल पड़े-दो रुपये में दोगे ? बस, हो गई शुरुआत । " पैसे की गरमी दिखा रहे हो मियां साहब ?' 'ऐसा सोचते हो, तो यही सही। पैसा होता है, तो उसकी गरमी भी होती है।' । 'अच्छा!' " दोनों तरफ लोग इकट्ठे हो गए। जवानी बातों से हाथापाई, फिर लाठी, भाला, वल्लम। आध घण्टे के भीतर पांच जख्म, एक . खून। मैं बोला, "यह सब तो मालूम ही नहीं था।" "कैसे जानेंगे ? हम लोगों की तरह गांवों में तो रहना नहीं पड़ता। डिस्ट्रिक्ट टाउन के बाहर तो किसी दिन पैर रखा नहीं।" "सो तो नहीं रखा, मगर इन सब चीजों को लेकर तो मुझे भी घर चलाना पड़ा है।" " आपको मिली है तैयार फसल । उसके पीछे जो जटिल क्रिया- कलाप है-बीज संग्रह करने से लेकर फसल घर लाने तक-उसकी तो हवा तक आपके शरीर से नहीं लगी। वह सब तो इस पुलिस के सिर पर है । छोड़ो। अब आगे सुनिए । ॥ छिपवाले लोग जब उस बड़ी नाव पर लपककर पहुंच गए, तो व्यापारी लाठी, भाले आदि लेकर तनकर खड़े हो गए। बड़ी-बड़ी नदियों में होकर देश-देशांतर धूमना पड़ता है, इसलिए यह सारा सरंजाम रखना पड़ता है । मगर डकैत लोग दल में भारी थे, उनके हथियार भी मारात्मक थे। नतीजा यह कि इन लोगों में से एक तो साथ ही साथ खत्म और दो-तीन जख्मी। बाकी जो थे, नदी में कूद पड़े। उन्हीं में से एक व्यक्ति किसी तरह तैरकर पार पर पहुंच गया। गोपी वर्मन के आस-पास ही उसका घर था। रंग-रोगन चड़ा होने के बावजूद गले की आवाज सुनकर उसे पहचान लिया था। पूरे एक दिन का रास्ता चलकर किसी तरह थाने में पहुंचकर खवर दी। ११२ / मल्लिका " " गोपी का पता नहीं चल रहा था। पुलिस ताक लगाए बैठी थी। कोई पन्द्रह दिन बाद घर लौटते ही उसे पकड़कर हाजत में रस दिया । मालपत्र, पपा-पमा कुछ नहीं मिला। जिस आदमी ने रावर दी थी, यह भी कुछ दिन बाद मुकर गया। गांववालों ने डरा दिया-गोपी के विरुद्ध 'साक्षीदी' तो 'वाण मार देंगे'। वाण मारना किसे कहते हैं, जानते हैं ? "सुना तो है, पर क्या होता है, ठोक मालूम नहीं।" 'एक तरह का मंतर है, जिसे लक्ष्य कर यह कहा जाता है, उसकी और रक्षा नहीं, तीन रात-दिन पूरे होने पहले ही उसका सारा कुनबा मुह से खून निकलने के कारण खत्म हो जाएगा।"अतः फरियादी और खोजने पर भी नहीं मिला। " साक्षी नही, माल नहीं, मामला चलेगा किमपर? मगामी को हागत में ज्यादा भटकाए नही रखा जा सकता। रिवर पुलिस के इस्पेक्टर कालीप्रसाद मुखर्जी स्वयं ही जांच कर रहे थे। अभी-अभी पदोन्नति हुई थी। आशा कर रहे थे, गोपी वर्मन को फांस लिया तो रातोंरात कन- फरमेशन हो जाएगा। और पह आशा मन में ही नहीं रखी, एक साक्षी हाय में आते ही इष्टमित्रो के बीच बिखेरनी शुरू कर दी। इसीलिए आप समझ रहे होगे, उन्हें बडी मुश्किल का सामना करना पडा । हाकिम के हाय-र पकड़कर किसी तरह और चौदह दिन जमानत बंद रखने की "व्यवस्था की। फिर उसी रात लांच लेकर असामी के गार की ओर रवाना " पहले कई दिन तो तरह-तरह के लोगों से खोज-खबर लेने की चेष्टा करते रहे । देखने में आया कि आस-पास के लोगो मे मे वर्मनों से कोई साम खुश नहीं था। मगर अमल बात पर सभोके मुंह बंद । तंत्र-मंत्र के आगे पुलिस को क्या गिनती ? इंटेरोगेशन के नाम पर कालीप्रमाद ने हाट-बाटकर किसी-किसी पर दो-चार जो होज मारे, उन्हें हलका नहीं कहा जा सकता । मगर हजार भी हों तो क्या, वाण मारने की तुलना में वे कुछ भी नहीं। और कही कुछ हाथ नहीं पडा तो अन्त में मुक्त को जा पकड़ा । वह तो जैसे देस्यकुल में प्रहाद ! बाप को धारा से बिलकुल अलग । वचपन से ही जहमरत की तरह पाली - " . माला, सिर पर लंबे बाल । दिन का वक्त खेतीबाड़ी में काटे, रात को नाम-संकीर्तन करे। बाप को उससे विशेष कुछ लेना-देना नहीं । वह भी वाप की कोई खोज-सबर नहीं रखता। वह तो वरन् मन ही मन उसे घृणा करता है। सिर्फ लड़के के साथ ही नहीं, अपनी स्त्री के साथ भी गोपी का उठना-बैठना बहुत ही कम होता है। वह बेचारी अपने तरह-तरह के असुख-विसुख लिए परेशान रहती है। सारी साल प्रायः लेटी ही रहती है। गृहस्थी चलाती है लड़के की बहू, आपकी बनानी। ससुर के साथ जो कुछ सम्पर्क है, उसीका है, मगर उसका असली व्यवसाय क्या है, इस विषय में ठीक-ठीक उसे भी पता नहीं। कालीप्रसाद ने सुवल से छूटते ही पूछा, 'तेरा बाप रुपये-पैसे, गहने कहां रखता है ? 'वह तो जैसे आसमान से आ गिरा, 'मुझे क्या पता ?' " 'कहां दवा पड़ा है, दिखा दे। किसीसे कुछ नहीं कहूंगा।' " 'पता हो तो दिखाऊं?' " तो समझ ले, तेरा बाप वापस नहीं पाएगा।' सुवल चुप हो गया। बाप के वापस भाने न आने को लेकर उसे कोई विशेष दुश्चिन्ता हो, ऐसा नहीं लगा। कालीप्रसाद बोला, 'तू नहीं जानता, तेरी मां निश्चय ही जानती है।' "'मां ! हारी-बीमारी से ही फुर्सत नहीं । रुपये-पैसे का हिसाब कव रखगी?' अपनी वहू फो वुला । उसले एक बार पूछकर देखता हूं।' " बनानी को बुलाया गया। लंबे चूंघट में सिर हिलाकर बताया कि उसे कुछ मालूम नहीं। "अब तो कालीप्रसाद बौखला उठा । एस० पी० को फहकर आया है, जैसे भी हो, गोपी को फंसाने लायक माल-मसाला जुटाकर फिर लौटेगा। सिर्फ चौदह दिन का समय है। इसमें से सात-आठ दिन बीत गए । कानून लेकर और कहां तक चलेगा? इस बार आखिरी अस्त्र छोड़ा। पड़ोस में किसी-किसीसे सुना था कि लड़के की अपेक्षा बहू के साथ ही बूढ़े की तालमेल ज्यादा वैठती है। इन्हें खुद देखकर भी लगा कि पागल- 'अच्छा, - ११४ / मल्लिका " सा मोदू लड़का तो असल में भला आदमी है, बहू बदमाश है। वही सिर है । कान सीचते सिर आ जाए, इस सिद्धांत को याद कर बहू के सामने ही सुबल को ले बैठा। शुरू हुई धुनाई । वाद की घटना काली. प्रसाद के ही शब्दों में सुनाता हू: ''यह सब हम लोगों के लिए कोई नई बात नही मापने भी की है, मैंने भी कम नहीं की। बराबर देखत्ता बाया हूं। घर के आदमियों को दो-चार घूसे-थप्पड़ मारे नही कि औरतें भाग जाती हैं, अथवा कमरे का दरवाजा बंद कर रोना-धोना शुरू कर देती हैं। ऐसी स्थिति मे यदि उन्हें मामने रहने को बाध्य करें तो दौड़कर आकर पैर पकड लेती हैं...- और मत मारिए बाबूजी ! यहां भी यही आशा करता था मगर जो देखा, उससे बड़ा ताज्जुब हुआ दादा ! थोड़ी देर उदास खड़ी रही। इसके बाद जो काड किया, वह आप सोच भी नहीं सकेंगे। एक उछाल में आगे बढकर छोकरे को आड़ मे लेकर खड़ी हो गई। कहा गया वह पूंघट ! एकदम मेरी नाक के ऊपर उगली उठाकर इस तरह से गोया कि हुक्म दे रही हो, बोली-मारपाड़ नहीं कीजिए। गलती की हो तो चालान कर दीजिए। " कालीप्रसाद तो एकदम स्तब्ध । वाकई, सोच नहीं सकते । जमाना भी तो देखिए ! सन् सत्रह-अठारह की बात है। अभी गाधी-युग शुरू नहीं हुआ था। अंग्रेज सरकार का पुलिस-युग था । और वह लड़की भी कोई पढ़ी-लिखी शहरी लड़की नही थी, ठेठ गाव के किसान की निरक्षर बहू थी । दल-दलवाले इलाके का गाव । मैप में बागला देश होते हुए भी, असल में उसके साथ इस गांव का कोई सम्पर्क नही । स्वदेशियों को छाया भी वहां किसीने नही देखी-उनके कार्यकलापों की एक छोटी- सी लहर तक उसके इर्द-गिर्द नही पहुंची। " कालीप्रसाद के चरित्र में और जो भी हो, औरतो को लेकर कोई पक्षपात नहीं था । दुर्बलता तो बिलकुल नहीं । विस्मयभाव दूर होते ही उसने एक धक्के में बहू को अलग कर सुबल को गर्दन पकडकर आगे खीच लिया। शोरे से हंसकर बोला, 'चालान ? अच्छा, वही करता हूं। तुम्हारे सामने ही करता हूं।

" दो सिपाहियों को बनानी की दोनों तरफ खड़ा कर दिया, ताकि वह चली न जाए, और एक ढाई मन के जमादार को एक विशेष इशारा कर हुक्म दिया, 'लेफ्ट-राइट चलाओ।' जमादार ने सुबल को ढकेल- कर दीवार से सटा दिया और अपने नाल-लगे वूट से उसका बायां पैर दवा दिया। उसके चीखते ही बूट उस पैर से उठाकर दायें पैर पर रख दिया। इसीका नाम है लेफ्ट-राइट । भूतनाथ दरोगा का 'कविराजी मुष्टि-योग' मैं जानता था । 'लेफ्ट- राइट' की बात यह पहली बार सुनी। मैं बोला, "क्या यह भी आपका आविष्कार है ?" "नहीं, यह कालीप्रसाद मुखर्जी का पेटेण्ट है।" "वह भला आदमी आपको बहुत पीछे छोड़ गया। खैर, फिर क्या हुआ, वताइए।" " एक बार वायां पैर, उसे छोड़कर फिर दायां-अंधाधुंध नहीं, कायदे से मार्च को ताल पर । सुवल मदद के लिए चीख रहा है, और उसके साथ होड़-सी करती भीतर के किसी कमरे से उसकी मां चीखती जा रही है । बुढ़िया गठिया के कारण पंगु है, हिलने की क्षमता नहीं। वनानी के मुंह में बोल नहीं, आंखों में एक आंसू नहीं। स्वामी के पैरों की ओर टकटकी वांधे देख रही है। कुचले जाने से खून से सन गए हैं। वनानी ने हठात् मुंह उठाकर देखा । आंखों के भीतर से भाग-सी वरस पड़ी। दोनों तरफ खड़े सिपाही कुछ समझें, इससे पहले ही वह तीर की तरह भाग उठी। उन लोगों के दोनों तरफ से पकड़कर खींच लेने से वह अधिक दूर नहीं जा सकी। वहीं से अपना बायां पैर बढ़ाकर जितना जोर लगा सकती थी, लगाकर ढाईमनी की जांच के पिछले भाग में लात जमा दी। " कालीप्रसाद का काम अब तक इकतरफा था। प्रवोकेशन के मभाव में थोड़ी असुविधा हो रही थी। अव किसी तरह की कोई वाधा न रही । चालान वाला प्रस्ताव बनानी ने ही रखा था, उसका प्रयोग इसीपर किया गया। ऐसी-वैसी बात नहीं थी। 'असाल्टिग ए पुलिस आफिसर'! इससे भी ज्यादा मारात्मक अपराध-सरकारी कर्मचारी ११६ / मल्लिका . को काम के बीच बाधा डालना ! ३२३ के साथ ३५३ । "गोपी वर्मन के घाट से थोड़ी-सी दूर रिवर पुलिस को लांच पहले से ही लंगर डाले यो । बनानी को गिरफ्तार कर फिलहाल वहां ले जाया गया । ऐसा डेन्जरस असामी, जो इतने पुलिस वालों की आंखों के सामने उन्हीके एक आदमी को लात मार सकता है ! बाम्ह पुलिम के संरक्षण को छोडकर और कही रखना निरापद नहीं। विशेष कर बरसात की रात । घर भी गांव के एक छोर पर है। दो तरफ वाप, पीछे मैदान, सामने नदी । भाग गई, तो सोज पाना मुश्किल । जनमानवहीन विशाल नदी के बीच कालीप्रसाद को लांच में उसकी वह रात किम तरह कटी, यह बिना बताए भी चलेगा । वह इतिहास, आपने उसके नामकरण-प्रसंग में जो बात कही थी-'रहस्य का संघ- कार'-उसीके नीचे छिपा रहे तो ठीक।" न जाने क्या सोचकर मैंने हठात् प्रश्न किया, "आपने उसे देखा है ?" "देखने में कैसी है, यह जानना चाहते हैं ? इस जगह वह प्रश्न अवातर है। वह स्त्री है, उसके शरीर में यौवन है-स्त्री-जाति के चरम सर्वनाश के लिए क्या ये दो फैक्टर ही काफी नहीं ?" इस प्रश्न का कोई उत्तर में नहीं दे सका। भूतनाथ बाबू ने अपनी कहानी का छिन्न मूत्र फिर पकड़ लिया : " पथि नारी विवजिता,' मह उक्ति शायद चाणक्य पंडित की है। कालीप्रसाद ने अब इमी गास्त्र-वाक्य का आश्रय लिया । अर्थात् जो हो गया, हो गया, अव और इस आफत को वीचकर सदर ले जाना बुद्धि- मानी का काम नहीं। केंचुआ खोदते-सोदते अगर सांप निकल आए, तो सिर को रक्षा कौन करे ? अतएव दिन निकलते न निकलते दो सिपाही उसे पकडकर उसके वनालय के एक कोने में डालकर चले आए। इसके थोड़ी देर बाद ही देखने में माया कि वह रोबोला जल-पुलिस का दल उस साधारण-सी औरत के बायें पैर को लात चुपचाप हजम कर पूरी गति से लाच दौड़ाए शहर की ओर चला जा रहा है। कालीप्रसाद जिस उद्देश्य से आया था और जिस मामले की सीढ़ी चढ़कर कार पहुंचने का सपना देख रहा था, उन दोनों ही चीजों को बीच रास्ते छोड़कर उसे । जाना पड़ा। "कालीप्रसाद ने गलती की थी। उसे आशंका थी कि वनानी उसे फंसा देगी । यह अलहदा जात है, वह समझ नहीं पाया। ये लोग नालिश नहीं करतीं। अपने लांछन की बात दूसरों के आगे खोलकर दया की भीख मांगना इनके स्वभाव में नहीं। कानून का आश्रय नहीं लेती, कानून अपने हाथ में ले लेती हैं। ये लोग अत्याचार का एकमात्र प्रतिकार जानती हैं, जिसका नाम है प्रतिशोध । सदर ले भी जाते, तो वह ऊपर वालों के दरवार में रोना लेकर नहीं बैठती, और न फरियादी के कठघरे में न्यायप्रार्थी होकर खड़ी होती। " यहां भी वह किसी आत्मीय या प्रतिवेशी के द्वार पर जाकर खड़ी नहीं हुई। रात के अंधकार में क्या घटित हुआ नहीं हुआ, उसके ऊपर एक और मोटा काला परदा डाल दिया। स्वयं का लोछन तो है ही, दैहिक यंत्रणा को भी उसने कलेजे में दवा लिया। गोया कि कुछ नहीं हुआ, इस भाव से उसने अपने दोनों हाथों में दो मुश्किल रोगियों का भार रख लिया। सास तो पहले से ही अचल है । अव पति भी उसी श्रेणी में मा गया। पैरों के घाव रोज बढ़ते चले गए। साथ में ज्वर। डॉक्टर कहने से जिपका वोव होता है, वैसा वहां कहीं कुछ नहीं, यानी उस वक्त नहीं था। कविराज वर्ग का एक व्यक्ति था। उसका एकमात्र संबल था जड़ी-बूटियां । शहर के अस्पताल में ले जाने की बात ही नहीं उठती। गांववाले जानते थे कि वहां जाकर वापस कोई नहीं आता। फिर ले भी कौन जाए ? पूरे वेग से वर्षा शुरू हो गई है । नदी की तरफ देखा तक नहीं जाता । नावों का आवागमन बंद है। "नासपास उसका कोई अपना नहीं था ?" "शायद था !" भूतनाथ ने धीमे से हंसकर कहा, “मगर पहले ही कह चुका हूं, गोपी के साथ किसीका भी ऐसा कुछ मेलभाव नहीं था। इसके अलावा फिर उस दिन जो काण्ड हो गया। गांव के लोग मुझसे- आपसे कहीं ज्यादा बुद्धिमान हैं । वे जानते हैं, बाघ छूने से अठारह घाव, पुलिस छूने से अठारह तीया चौवन ! अतएव शतहस्तेन " बनानी दिन-भर काम में लगी रहती है। रात होते ही कान खड़े - ११८ / मल्लिका कर लेती है, न जाने का समुरजी आकर चुकि में आवार दे वह । बहुत रात गए नींद एकाएक टूट जाती है. मायद वे वा गए । झटपट उठकर यानी है. नहीं, कोई नहीं। इस तरह दिन पर दिन बीत गए । गोरी नहीं याया। जेल से छुट्टी मिली कि नहीं, यह खयर भी किमीने आकर न दी। " कोई महीने-डेढ महीने बाद मुबल चल बना । घावों में पस पड़ गया था। बदबू के मारे पास नहीं जाया जाता था। उसके कुछ ही दिन बाद गोती आकर हाजिर ! पुलिस ने मुकदमा नहीं चला। वैमूर खलाम । मगर जेल से निकलते ही मीधा नहीं आ मा। 'जरी काम' पा। क्या जरूरी काम' था, यह किनीने जानना नहीं चाहा । यहा की सबर के विषय में बनानी प्रायः चा ही रही। बुढिया ने जो कहा, वह भी चलते-फिरते । मुबल के संदर्भ में कालीप्रसाद की बात चनी, तो गौती बोल पढा-'ईश्वर के पर संधेर नहीं । माला ! मेरा तो सर्वनाश कर -गया, पर मुद को भी मामानी मे छुटकारा नहीं मिला। धूम के मामले में फंस गया या; नौकरी खतरे में या गई । साविर में डिग्रेड(पदायनन) हो गया। जल-पुलिन के इन्स्पेक्टर ने कोतवाली का दरोगा। गूदे के नाम पर पृछ नही, मिर्फ हंठस..." कहकर बूटे ने दुहिया के आगे उंगली उठा दी। बनानी पाम ही जाने क्या कर रही थी। यान कान में पड़ते ही हठात् मुह उठाकर पूछ बैटो, 'कौन-मो कोतवाली ?' " बहू के इग अज्ञान को देखकर गोपी को दहा मजा आया। मकर बोला, कोतवाली और कितनी होती है बेटी ? महर के कार जो सदर पाना है, उमीका नाम कोतवाली।' ""ओ!' कहकर वह चली गई। बात उनके दिमाग में चक्कर खाने संगी। पृषेक दिन दाद रात में गोरी को एक बार उना पड़ा था। वाग की तरफ से लौटकर माने पर चौक उठा । बहू के कमरे का द्वार युला है. भीतर कोई नहीं । कुछ देर इनार रिया। सोचा, गायद बाहर गई है। फिर सालटेन लेकर खोजने निरल पड़ा-दाग में, मंदान में,नदी के किनारे । कही कोई चिह्न नहीं। .

- - " " अगले दिन बात और छिपाई नहीं जा सकी। जो पड़ोसी अत्यन्त दुःसमय में भूलकर भी कभी दरवाजे पर आकर खड़े नहीं होते, वे ही अव दल वना-बनाकर आने लगे। हर तरह का विश्लेपण होने लगा। एक-दो लोगों ने जल में डूब जाने की सम्भावना भी व्यक्त की, पर अधिकांश लोगों ने उसे सरासर अस्वीकार कर दिया । वहुत-सी मजेदार कहानियां भी गढ़ी गईं-उसे कव, कहां, किसके साथ देखा गया है, कितने दिन से यह काण्ड चल रहा है, इत्यादि । गोपी चुप रहा । खोजने जाने वाली बात एक बार भी दिमाग में न आई हो, सो नहीं, मगर पंगु स्त्री को अकेली छोड़कर जाना असम्भव है इसलिए हो, चाहे यह सोचकर हो कि जिस बहू ने घर में रहना नहीं चाहा, उसे वापस लाने की चेष्टा करने से क्या लाभ, निकलना नहीं हुआ। यहां थोड़ा विराम, नाटक के बीच में जैसे इण्टरवल । इसके बाद भूतनाथ बाबू की भूमिका भी बदल गई। अब तक इस कहानी के साथ उनका सम्बन्ध प्रत्यक्ष नहीं था। पुलिस क्लव में वैठकर सिगरेट पीते- पीते कालीप्रसाद मुखर्जी की बहादुरी का जो वयान सुना, उससे शुरुआत हुई । उसके बाद विभिन्न सूत्रों से खबरों के जो कतरे उनके कान में पड़े, उन्हींको अपने दिमाग में जोड़जाड़कर मुझे सुना गए। परवर्ती अंश उनका स्वयं संग्रह किया हुआ है। वहां वे जांच करने वाले पुलिस आफी- सर हैं। घटनाचक्र के किस मोड़ की वजह से उन्हें इस भूमिका में उतरना पड़ा, यह वात यथास्थान बताई जाएगी। फिलहाल एक बात कहनी जरूरी है। सरकारी दफ्तर में उन्होंने क्या रिपोर्ट दाखिल की थी, यह मुझे पता नहीं। मुझे जो मिली, उसका स्वर और प्रकृति अलहदा है। उसमें तथ्यों के साथ ऐसा और भी बहुत कुछ मिला है, जिसने सरकारी रिकार्ड में निश्चय ही स्थान नहीं पाया। ये सब चीजें सम्भव है, उनके निजी रिकार्ड-कक्ष के एकान्त में रखी हुई थीं। इतने दिन बाद वहां से धूल झाड़ने के बाद बाहर लाई गई तो पता चला कि आदमी का मन सिर्फ संग्रहकर्ता नहीं, स्रष्टा भी है। स्मृति के भंडार से तथ्यों का वोझ लाकर उन्हें सजाते वक्त उनमें जाने कव हृदय का रंग लग जाता है, शायद वह खुद भी नहीं जानता। इसलिए यदि कोई पूछ . १२० / मल्लिका चैठे-यह उन्हें कैसे पता चला, यह सबर उन्हें कहाँ से मिली, तो मुझे भी बाध्य होकर एक इसी उत्तर या आश्रय लेना पड़ेगा-मुझे पता नहीं। बनानी नदी के गर्भ में नहीं दी थी, उमने छलांग लगाई थी उससे भी कहीं अधिक विपदसंकुत अनिश्चय के अतल में। दस-ग्यारह साल की उम्र में वह एक बार मौसी के पर घूमने गई घी, शहर मे। यहां उसको मौसा पंसारी को दुकान करते थे। पास ही एक पुलिस स्टेशन था। इतनी पुलिस उसने इससे पहले कभी नहीं देखी थी। मौसी कहती, 'यह कोतवाली पाना है। उधर कभी मत जाना।' यह निरापद दूरत्व से डरती-उरती उस निपिर दुनिया को ओर देखा परती। शादी हुई बहुत दूर, सात समुद्र न राही, तेरह नदी पार । पहर- यास के वे कुछेक दिन और उससे जुड़ा यह अद्भुत पाद--कोतवाली- मन की तलहटी में जाने कहां खो गए थे। एकाएक ससुरजी के मुंह मे नये सिरे से सुनने के बाद यह नाम उसके सून फो कझोर गया । इस वार को कोतवाली ने उसे एकदम अलहदा और कही अधिक ऊंचे स्पर में आवाज दी। सिर्फ आयाज ही नही दी, दूर देहात मे नदी-घाट और बागों से घिरे, गृहस्प-वधू के स्नेह-भक्ति-वर्तव्य के बधन में बंधे, उम एकदम परिचित जीवन के बीच में उसे उसाटकर सोच लिया। महो ? यह सोचने का भी अवसर नहीं दिया । मोसा नहीं रहे, मौसी अभी थी। बहन की लड़की को देखकर यह विशेष सुरा नहीं हुई। एक अतिरिक्त व्यक्ति को खिलाने जैमी हालत भी उसकी नही थी। उस तरफ से बनानी ने उसे समल्ली दी। यह एक- दम साली हाथ नहीं आई। नकदी तो विशेष कुछ नहीं थी, पर कुछ गहने अवश्य थे। बहुत-मे प्रश्नों के उत्तर देने पड़े। उसके लिए यह तयार ही थी । आश्रय मिल गया । यह कोतवाली उसी तरह है, शायद घोडी-मी यही हो गई है । दरा वर्ष की उम्र मे उसे लेकर जो बाधा-निषेध था, आज उनका दामरा और भी बढ़ गया है। उस वक्त वह ओसो ने जितनी मर्जी देख सेती थी। उसे देखने की किसीको गर्ज नहीं थी। आज दूसरे को नजर से यबर वहां जाकर खड़ा होना बड़ा मुश्किल है। फिर भी जब भी मौका मिलता है, वह जाकर खड़ी होती है, एक विशेष आदमी की गतिविधि लक्ष्य करती है। इस तरह कुछ ही दिनों में बनानी समझ गई कि जिस तीव्र ज्वाला को कलेजे में लेकर उसने घर छोड़ा था, उसे शान्त करने का रास्ता उसके नागे खुला नहीं है । उसकी भांखें जिसका इतने पास रहकर अनुसरण कर रही हैं, वह असल में बहुत दूर है। फिर भी मन नहीं मानता। बीच-बीच में वह जव निराशा के कारण पस्त हो जाती है, ठीक उसी वक्त वह देखती है कि उसके प्रायः सामने से ही साइकिल चलाता वह निकल गया। कलेजे के भीतर उथल-पुथल होने लगती है। उसका हाथ स्वतः ही उसके कपड़ों के भीतर चला जाता है। स्पंदित हृत्पिण्ड से चिपटी हुई है एक चीज-कई साल पहले ससुरजी ने लाकर दी थी, उन्हींके किसी लुहार दोस्त की बनाई। कहा था, 'मुझे बाहर ही वाहर धूमना पड़ता है, लड़का विलकुल भोंदूराम है, उसपर मुझे भरोसा नहीं। जंगल से घिरा घर है, न जाने किसके मन में क्या हो, इसे हाथ के पास रखो। दिन हो या रात, सोते समय तकिये के नीचे रखकर सोना। उस भयंकर रात को भी तकिये के नीचे ही था। एक बार कारा, वह कमरे में जा पाती ! पुलिसवालों ने रास्ता रोक लिया था, जाने नहीं दिया । निष्फल आक्रोश के मारे कलेजा फिर जल उठता, आंखों में रौंदे-कुचले गए क्षत-विक्षत पर तैरने लगते हैं। एक दांतेदार सुअर उनपर उछल-कूद कर रहा है। बीच-बीच में दांत निकालकर उसकी तरफ देखकर हंस जाता है। वह और नहीं सह सकती। इसके बाद ? वाद के दृश्यों की बात सोचते ही सिर में आग लग जाती है। लांच के भीतर हलके से अंधकार से भरा वह छोटा कमरा । चारों और एक झुंड गिद्ध । वह निश्चय ही मर गई थी, और उसी मरी देह को लेकर और सोचा नहीं जाता। सिर के भीतर की नसें उलझ जाती हैं। उसमें हथोड़े की चोट की तरह सिर्फ ये तीन शब्द बोलने लगते हैं प्रतिशोध लेना होगा, प्रतिशोध लेना होगा..., मोसी को संदेह हो गया, और दिन पर दिन वह बढ़ता गया । इस IAS १२२ / मल्लिका

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वहां जाकर खड़ा होना बड़ा मुश्किल है। फिर भी जब भी मौका मिलता है, वह जाकर खड़ी होती है, एक विशेप आदमी की गतिविधि लक्ष्य करती है । इस तरह कुछ ही दिनों में बनानी समझ गई कि जिस तीव्र ज्वाला को कलेजे में लेकर उसने घर छोड़ा था, उसे शान्त करने का रास्ता उसके आगे खुला नहीं है। उसकी आंखें जिसका इतने पास रहकर अनुसरण कर रही हैं, वह असल में बहुत दूर है। फिर भी मन नहीं मानता। बीच-बीच में वह जव निराशा के कारण पस्त हो जाती है, ठीक उसी वक्त वह देखती है कि उसके प्रायः सामने से ही साइकिल चलाता वह निकल गया। कलेजे के भीतर उथल-पुथल होने लगती है। उसका हाथ स्वतः ही उसके कपड़ों के भीतर चला जाता है। स्पंदित हृत्पिण्ड से चिपटी हुई है एक चीज-कई साल पहले ससुरजी ने लाकर दी थी, उन्हींके किसी लुहार दोस्त की बनाई। कहा था, 'मुझे बाहर ही वाहर घूमना पड़ता है, लड़का बिलकुल भोंदूराम है, उसपर मुझे भरोसा नहीं। जंगल से घिरा घर है, न जाने किसके मन में क्या हो, इसे हाथ के पास रखो। दिन हो या रात, सोते समय तकिये के नीचे रखकर सोना।' उस भयंकर रात को भी तकिये के नीचे ही था। एक बार काश, - वह कमरे में जा पाती! पुलिसवालों ने रास्ता रोक लिया था, जाने नहीं दिया। निष्फल आक्रोश के मारे कलेजा फिर जल उठता, आंखों में रौंदे-कुचले गए क्षत-विक्षत पैर तैरने लगते हैं। एक दांतेदार सुअर उनपर उछल-कूद कर रहा है। बीच-बीच में दांत निकालकर उसकी तरफ देखकर हंस जाता है। वह और नहीं सह सकती। इसके बाद ? बाद के दृश्यों की बात सोचते ही सिर में आग लग जाती है। लांत्र के भीतर हलके से अंधकार से भरा वह छोटा कमरा। चारों और एक झुंड गिद्ध। वह निश्चय ही मर गई थी, और उसी मरी देह को लेकर और सोचा नहीं जाता। सिर के भीतर की नसें उलझ जाती हैं । उसमें हथौड़े की चोट की तरह सिर्फ ये तीन शब्द बोलने लगते हैं। प्रतिशोध लेना होगा, प्रतिशोध लेना होगा." मौसी को संदेह हो गया, और दिन पर दिन वह बढ़ता गया । इस N १२२ / मल्लिका कन्नी में पढ़ सड़की बनागिन बनी दी है। बकनी-कली वहां जाती है, वहां का नगी, किन पता? पर नोरते ही बनानी को टेर मारे प्रश्नों का मानना करना पड़ता है। कमी छ, कमी दुर कहकर दह दाल टाल दाती है। एक दिन वह मानषिी चीन नोनी की नजर पड़ गई-चार टन दत, अधिवह बाहर जाने में पही कार में नगार के अंदल ने कही पी। दुड़िया ने जोर देकर पूछा, "यह कदा है ?" दनानी ने दात को हलका करने की चेष्टा की, "तुम लोगों के इनारे में मुंहों का इदना तान है. भादवान होकर चलना पड़ता है।" " मद फलटू दा छोड़।" मौनी ने झिड़ककर कहा । वदानी कोम्बोबार करना पहा कि एक विशेष व्यक्ति उनका लक्ष्य है। कौन है दह, यह अदम्ब नहीं बताया। नौती मिहर उठी, "अरी नातानी नाही !" फिर सप्पका कह दिया कि वे मद घंचे मेकर दो पत्र नहीं न्ह नवदी। इनके अलावा एर और मुश्किल कुछ दिन में देखने में आ रही थी। मौनी की दुकान के कई ग्राहक (त्रिन याने के नौ दो लोग थे) 5 नही पर विशेष नहा रदने सर गए थे। यहां रहना उच हो और मन्ना नहीं था। मगर वहां जाएगी, बार उसका मनीष्ट न ही को पूरा होला? मौती के घर में दला दाना नर हो गया, निदिन-मुहूर्न तप नहीं हुआ, जो नियति में एक दिन नीनर पहर नदी पर हाय-पैर घोत वळ एक महकी से मुलाकात हो गई। घोडा मनोन भी हो गया। दो दिन बाद पौदे के मुकाई पड़ा, यही नहको गगर रगड़ते-रगड़ते मानी एक मंपिनी ने कह रही है, "काली दरोगा की बात मुनी ? मदना को तलाक देकर सुधा को पकड़ लिया। यह आदमी भी बन्द है बादा! दो-दो दिन पद न्वाद ददल दिना काम ही नहीं चलता।" "या ही दी है । एक दिन देश भी नंदर आएगा।" कहकर मंगिनी हूंन पड़ी। दह और भी कुछ कहने जा रही यो, बनाती को देवकर कराई। दनानी नमनगई, कमी लडकिया है । चिनी पोह-दल को संदेह था, उसे दूर करने के लिए उसने अपनी नई सहेली के साथ उसके घर घूम थाने का प्रस्ताव रखा । सहेली राजी नहीं हुई, तरह-तरह के बहाने कर वात टाल गई। इसके बाद वे दोनों शरीर की धुलाई कर कुछ दूर चली गई, तो बनानी छिपकर उनके पीछे चल पड़ी। गृहस्थों की वस्ती छोड़कर बाजार, उसके अंतिम छोर पर पतली-सी गली में एक वस्ती । वे दोनों उसमें घुस गई। उस वक्त वहां भीड़ नहीं थी, मगर बनानी को यह जानना वाकी न रहा कि वह कुछ देर और वहां खड़ी रहे, तो उसे सिर्फ ये ही नहीं, इनके साथ और बहुत- सी देखने को मिलेंगी, जो सुबह की उतारी गुड़मुड़ी हुई साड़ियां पहन- कर चेहरों पर पालिश और आंखों में काजल लगाए गली के किनारे एक- एक कर आकर खड़ी हो जाती हैं । और थोड़ी रात होने पर दो-दो दिन बाद स्वाद वदलने वाले उन विलासी महामान्य व्यक्ति से भी शायद मुलाकात हो जाए, जो आज उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, जिसके लिए उसकी समस्त वासनाएं खोल रही हैं । घर लोटकर उस रात उसने कुछ नहीं खाया, सारी रात मांखों की पलकें एक नहीं की, उठ-उठकर गिलास पर गिलास सिर्फ पानी पीती रही। दूसरे दिन सुबह होते ही कपड़ों की पोटली हाथ में लिए मौसी के पास जाकर बोली, "मौसी, मैं चलती हूं।" "किस चूल्हे में, सुनूं तो?" "देखती हूं, कहां कौन-सा चूल्हा मिलता है ।" कहकर गौर नहीं । रुकी। वे दोनों लड़कियां निश्चय ही एकदम अवाक् हुई होंगी। शायद समझाने की चेष्टा भी की थी, "अव भी कहती हैं, लौट जाओ। यह बड़े कष्ट का जीवन है।" फिर भी घरवाली की ओर से स्वागत-सत्कार में कमी नहीं थी। कुछेक गहने उर वक्त भी थे। उनके बल पर उन्हींके वीच एक बहुत अच्छे कमरे में ही स्थान मिल गया । साथ ही अच्छे कपड़ों का एक सेट भी पाने में सफल रही। मौसी ने खबर लिए बिना नहीं छोड़ा। उसकी दुकान के जिस लड़के के मन में रंग लग गया था, वही खबर लाया। बुढ़िया की भारी बीमारी के बहाने एक रोज दोपहर को उसे बुला लाया और मुलाकात १२४ / मल्लिका भी करा दी। मौसी ने दांत भीचकर कहा, "तेरी मौत क्यों नही थाई ?" "मौत तो हो गई मौसी," बनानी के चेहरे पर मृदु हास्य वी रेखा दिखाई दी, "बहुत पहले ही हो गई।" मौसी नही समझी, "इसका मतलव ?" "मतलब तुम नही समझोगी। मैं उसी दिन मर गई । यह तो उसकी चिता है।" कहते-कहते उसकी आंखों से भी तीव्र ज्वाला छिटक पडी। एक-दो दिन नहीं, पूरे तीन महीने । वह कैसी कठिन परीक्षा थी ! चेहरे पर रंग घिसकर रोज शाम को दरवाजे के आगे जाकर खड़ा होना पड़ता है । कब आकर किसी और कमरे मे चला जाए, कौन जानता है ? मगर वह नहीं आता, आते हैं दूसरे आदमी । उन्हे नहीं फंमाया जा सकता । भीतर बुलाकर हाथ-पैर पकड़कर कैसे-कैसे काण्ड कर आत्म- रक्षा करनी पड़ती है। साथ वाली मुंह टेढे कर कहती हैं, "चोचलेवाज ! नाचना और घूघट !" घरवाली कहती है, "इतनी छाटी-छांटी करेगी तो तेरा चलेगा कैसे ?" बनानी चुप रहती है। उसकी बात किसीको बताने की नही । कसे कहेगी-सभीकी नजरो मे वारागणा होते हुए भी उसे दुनिया में सिर्फ एक ही पुरुप की जरूरत है ? इस बीच एक-दो दिन वह न माया हो, सो नहीं; मगर हो सकता है, वह बनानी के एक कमरे तक नहीं पहुंचा हो, अथवा उसकी ओर अच्छी तरह देखे बिना अन्य कमरे में घुस गया हो। अन्त मे, पूरे तीन महीने प्रतीक्षा करने के बाद दिखाई दी वह 'शुभरात्रि'! वाछित व्यक्ति सामने आकर खड़ा हो गया। बनानी का कलेजा हिल गया, कही पहचान लिया? जवरन हंसी चेहरे पर बिखेरकर बोली, "खडे क्यों हैं ? अंदर आइए।" "लगता है, तुम्हे कही देखा है।" "मला मेरे ऐसे भाग्य कहां ! इतने दिन से हूं, एक बार भी तो गरीब पर नजर नहीं पडी।"मो मा, तो क्या रातभर यही खडी रहेगे?" कहकर खिलखिलाकर हंस पड़ी। "तुम तो बड़ी प्यारी बातें करती हो । हंसी बड़ी मीठी हैं।"

वनानी मुस्कराते हुए सिर झुकाकर पीछे हट गई । वह भी कमरे में घुस पड़ा। अकस्मात् विद्युत-शिखा की तरह एक नंगा छुरा चमक उठा ! मगर लगने से पूर्व ही सतर्क पुलिस की क्षिप्र सवल मुष्टि ने उसे छीनकर फेंक दिया। निरुपाय नारी अपने विधाता-दत्त दो अस्मों.-दांत और नाखून-~~-को लेकर ही पूरी ताकत के साथ अपने शिकार पर टूट पड़ी। यहत रात गए सर्कल इन्स्पेक्टर भूतनाथ घोपाल ने पुलिस अस्पताल जाकर देखा कि कालीप्रसाद आंखें बंद किए पड़ा है । मुंह से बराबर कराहने की आवाज आ रही है । कपाल-गंडस्थल, चिबुक और कंधों पर खरोंचने-खसोटने की गहरी रेखाएं हैं। उनमें से खून टपक रहा है । डॉक्टर ने धीरे-धीरे सीने के ऊपर से कपड़ा उठाकर दिखाया। बहुत बड़ी जगह में दांतों के तीखे निशान हैं, बीच में जरा भी मांस नहीं। सरकारी व्यवस्थानुसार हर तरह की चिकित्सा मिलने पर भी काली- प्रसाद को सुबल का रास्ता पकड़ना पड़ा। घावों में सेप्टिक हो गया था। मरने से कुछ दिन पहले भूतनाथ बाबू से कहा था, "दांतों और नाखूनों में निश्चय ही उस राक्षसी ने विष लगा रखा था।" भूतनाथ मुंह से : कुछ नहीं बोले, मन ही मन कहने लगे-~-गलती करते हो भैया, ये लोग बाधिन की जात है, विप लेकर ही पैदा होती हैं, लगाना नहीं पड़ता। दियासलाई जलाने की आवाज से चौंककर देखा कि भूतनाथ बाबू सिगार जला रहे हैं । साकाश की ओर देखकर बोले, "बरसात रुक गई है, अब चला जाए। कितने बजे हैं ?" मैने उत्तर दिया, "बनानी का क्या हुआ?" "पता नहीं। बहुत खोजी है। खोजना पड़ा है । साहब ने जांच मेरे ही हाथों में दी थी। मिली नहीं।" थोड़ा रुककर बोले, "मिलती तो कालीप्रसाद की लालिरी खबर दे देता । सुबल की मृत्यु का क्षोभ थोड़ा तो दूर होता।" - १२६ / मल्लिका "मुझे लगता है, वह जिन्दा नहीं ।" अब यही प्रार्थना करता हूं। सुना है, मृत्यु के बाद आदमी प्रेतलोक मैं रहकर मभी कुछ जान सकता है। तब नो वह भी जान गई । मारमा की कुछ तो तृप्ति हुई होगी, अवश्य ही यदि वापिनियों में यात्मा जैनी कोई चीज होती हो तो।

वनानी मुस्कराते हुए सिर झुकाकर पीछे हट गई । वह भी कमरे में घुस पड़ा। अकस्मात् विद्युत-शिखा की तरह एक नंगा छुरा चमक उठा । मगर लगने से पूर्व ही सतर्क पुलिस की क्षिप्र सवल मुष्टि ने उसे छीनकर दूर फेंक दिया। निरुपाय नारी अपने विधाता-दत्त दो अस्त्रों-दांत और नाखून-~-को लेकर ही पूरी ताकत के साथ अपने शिकार पर टूट पड़ी। वहुत रात गए सर्कल इन्स्पेक्टर भूतनाथ घोपाल ने पुलिस अस्पताल जाकर देखा कि कालीप्रसाद आंखें बंद किए पड़ा है। मुंह से बरावर कराहने की आवाज आ रही है । कपाल-गंडस्थल, चिबुक और कंधों पर खरोंचने-खसोटने की गहरी रेखाएं हैं। उनमें से खून टपक रहा है । डॉक्टर ने धीरे-धीरे सीने के ऊपर से कपड़ा उठाकर दिखाया। बहुत बड़ी जगह में दांतों के तीखे निशान है, बीच में जरा भी मांस नहीं। सरकारी व्यवस्थानुसार हर तरह की चिकित्सा मिलने पर भी काली- प्रसाद को सुवल का रास्ता पकड़ना पड़ा। धावों में सेप्टिक हो गया था। मरने से कुछ दिन पहले भूतनाथ बाबू से कहा था, "दांतों और नाखूनों में निश्चय ही उस राक्षसी ने विष लगा रखा था।" भूतनाथ मुंह से कुछ नहीं बोले, मन ही मन कहने लगे-~~-गलती करते हो भैया, ये लोग वाधिन की जात हैं, विप लेकर ही पैदा होती हैं, लगाना नहीं पड़ता। दियासलाई जलाने की आवाज से चौंककर देखा कि भूतनाथ बाबू सिगार जला रहे हैं । आकाश की ओर देखकर बोले, "बरसात रुक गई है, अव चला जाए। कितने वजे हैं ?" मैंने उत्तर दिया, "वनानी का क्या हुआ ?" "पता नहीं। बहुत खोजी है। खोजना पड़ा है । साहब ने जांच मेरे ही हाथों में दी थी। मिली नहीं।" थोड़ा रुककर बोले, "मिलती तो कालीप्रसाद की आखिरी खबर दे देता । सुबल की मृत्यु का क्षोभ थोड़ा तो दूर होता।" १२६ / मल्लिका "मुझे लगता है, वह जिन्दा नहीं ।" अब यही प्रार्थना करता हूं। सुना है, मृत्यु के बाद आदमी प्रेतलोक में रहकर सभी कुछ जान सकता है। तब तो वह भी जान गई । आत्मा की कुछ तो तृप्ति हुई होगी, अवश्य ही यदि वापिनियों में आत्मा जमी कोई चीज होती हो तो।

Raja Shangh Malika

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Not Available
Title
Raja Shangh Malika
File name
Raja Shangh Malika
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Rajputana Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
134
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
History
DLI number
552061
Barcode
4990010032792.00
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C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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Copyright permitted
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