Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shriarnath Jinstava
Front matter
उरसि मे यया सिक्तं स्नेहदुग्धं तपोमयम् । श्यामाय मातृरूपाय सूनुनेदं समर्प्यते ।। श्यामासून- विनय
:-
भूमिका
उपाध्याय श्रीवल्लभ रचित अरनाथ-जिनस्तव वृत्ति-
सहित पाठकों के सामने है । इसमें अठारहवें तीर्थङ्कर
श्रीअरनाथ का स्तवन किया गया है । कुल मिलाकर इसमें
५५ छन्दों में स्तुति की गई है, जिनमें से प्रत्येक पर लेखक ने
स्वयं वृत्ति लिखी है, जैसा कि वृत्ति के अन्तिम पद्य से पता
लगता है
येषां स्फुरत्प्रतापाधिक्यजितः सन्निरन्तरं भानुः ।
भ्रमतितमांवियति हि ते, ज्ञानविमलवाचका नन्धुः ।।
तत्पादाम्बुजमधुकरशिप्यश्रीवल्लभेन गणिना वै ।
विहिता स्तववृत्तिरिय, यदनृतमिह तद्बुधैः शोध्यम् ।।
इस पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें एक सहस्र रकारों का
प्रयोग किया गया है। एक रकार यहाँ एक कमलदल
का प्रतीक है; अतः सहस्र रकारों के प्रयोग द्वारा एक
सहस्रदल कमलरूप स्तवन की कल्पना की गई है। ऐसा
करने में सचमुच बड़े प्रयल, पाण्डित्य और प्रतिभाकी
आवश्यकता थी । अतएव लेखक ने एक प्रकार की गर्वोक्ति के
रूप में प्रारम्भ में ही कहा है :
१. अरनाथका चरित देखनेके लिये देखें, हमचन्द्राचार्य प्रणीत
त्रिप्टिमलाकापरपचरित ।
६ स्वकीयविद्यागुरुसत्प्रसादात्, करोमि वृत्ति स्तवनस्य चार्वीम् । अरं जिनं हर्पकरं प्रणम्य, सहस्रपत्राम्बुजगर्भितस्य ॥ सहस्रदलकमल का सम्वन्ध इस देश में योगशास्त्र से रहा है। वस्तुतः यह कल्पना उद्भूत ही वहाँ से हुई । योग में उच्चतम अनुभूति को विभिन्न पद्धतियों में शतदलकमल या सहस्रदलकमल के प्रतीक द्वारा व्यक्त किया गया है । वैदिक- साहित्य में इसे कभी कभी सहस्राक्षरा वाक् या महस्रधार- पवमान भी कहा गया है। यह सहस्राक्षरा वाक् ही संभवतः पुद्गल -परमाणुओं के आत्यन्तिक निरसन के पश्चात् अवशिष्ट शुद्ध चैतन्यस्वरूप आत्मा है जिसके इस स्प को ही "सहस्रमुख शेप"के प्रतीक मे मूर्तिमान किया गया हो । यही कल्पना सहस्रारचक्र के मूल में भी है, क्योंकि इसमे सन्देह नहीं कि जैन, बौद्ध तथा वैदिक वाडमय में विविधरूप में प्रयुक्त चक्र अन्त मे कमल के साथ तादात्म्य करने लगा था; अशोक स्तम्भों पर निर्मित चक्र की रचना इसका सब से बड़ा प्रमाण है। अस्तु, महनदलकमलगर्भित स्तवन का प्रयोग एक तीर्थङ्कर के लिये अत्यन्त ही उपयुक्त है। 'तीर्थङ्कर' गब्द का अर्थ प्राय: चतुर्विधसपकर्ता किया जाता है । यद्यपि इस अर्थ को अव्यवहार्य नहीं कहा जामकता, परन्तु इसका एक अर्थ और भी है जो 'तीर्थ' शब्द की मूलधातु 'न' के प्रकृति अर्थ को ध्यान में रखकर संस्कृत साहित्य में . :
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किया गया है । इसके अनुसार तीर्थ एक घाट है, एक
मार्ग है जिसके द्वारा भव-सरिता को जीव पार कर सकता
है। इसी मार्ग को दिखलाने वाले तीर्थकर है; और इस
मार्ग पर चलने के लिये समाज को चतुर्विध सङ्घ के रूप में
संगठित किया, अतः बाह्य सामाजिक दृष्टि से यह चतुर्विध
सङ्घ ही वस्तुतः उस तीर्थ या मार्ग का स्थूलतम रूप है।
परन्तु इसमें संदेह नहीं कि इस स्थूल तीर्थ का सूक्ष्मरूप
और चरमलक्ष्य वह आध्यात्मिक तीर्थ या मार्ग ही था
जिसके द्वारा उस आध्यात्मिक सिद्धि को प्राप्त किया जा
सकता था जिसका प्रतीक सहस्रदलकमल है । इसी मार्ग को
जानने वाले ‘गातुविद ' तथा बनाने वाले 'पथिकृत'
नाम से वेदों में आये है । इसी मार्ग को संसार के लिये प्रकट
करने के कारण ऋषभदेव आदि महापुरुप 'तीर्थङ्कर' नाम से
अभिहित हुये । अतः तीर्थकर और सहस्रदलकमल का स्वा-
भाविक संबन्ध है।
काव्य की दृष्टि से, यह स्तवन वस्तुत. एक चित्रकाव्य
है जो साहित्यशास्त्र में एक अधम काव्य माना गया । परंतु
इसमे सन्देह नही कि चित्रकाव्य की रचना छन्दशास्त्र,
व्याकरण, निवंचन तथा कोप सादि पर पूर्ण आधिपत्य होना
आवश्यक है। यही कारण है कि इस प्रकार की रचनाएँ
साहित्य में नहीं के बराबर है। श्रीवल्लभ उपाध्याय ने भी अपने
ग्रंथ की रचना में ऐसे ही पाण्डित्य का परिचय दिया है, जंसा
कि परिशिष्ट पसे स्पष्ट है। इतने सीमित काव्य में सहस्र
रकारों का प्रयोग इस पाण्डित्य से ही संभव हो सका । अतः
चाहे भावाभिव्यक्ति या रस-निष्पत्ति की दृष्टि से इसे उत्कृष्ट काव्य न माना जाय, परन्तु विचार-बंदग्ध्य, रचना-कौशल तथा उक्ति-वैचित्र्यकी दृष्टि से प्रस्तुत काव्य एक सर्वोत्कृष्ट चित्रकाव्य है और जो पण्डित काव्य-प्रेमी इस प्रकार के काव्यो मे निपुण और अभ्यस्त है उनके लिये एक उच्च- कोटि का मनोरजनकारी स्तवन है। जो पाण्डित्य और पाटव लेखक ने रकारों के विविध प्रयोग में दिखलाया है उसके कुछ उदाहरण देना यहाँ असगत न होगा । प्रथम दो छन्दों के रकार-गभित गब्दों को ही ले लीजिये असुरनिर्जरवन्धुरशेखर-प्रचुरभव्यरजोभिर पञ्जिरम् । क्रमरज शिरसा सरस वरं, जिन रमेश्वर! मेदुरराङ्कर ।।१।। प्रवरवर्णरमागरचन्दिर-जठररागरसाविरसङ्गर! । मुचिरकृनरभीतरभद्रर ! कुरु रमं भर मामरहत्यर ! ।।२।। इन दोनों इलोकोंमे कुल ३२ रकार है । इनमें आमरहत्यर, चन्दिर आदि शब्दों को रकार गर्भित करने के लिये जिस प्रतिभा और पाण्डित्य को नावश्यकता भी वह उनकी स्वो- पज्ञवृत्ति मे भलीभाति प्रगट है । इस सम्बन्ध में विशेष विवेचन अरजिनस्तव-वृत्ति प्रकरण में आगे करेंगे। श्रीवल्लभ ने अपनी इस पुस्तक मे जिस पाण्डित्य का परिचय दिया है, वह केवल उनही तक सीमित नहीं थी। उनकी गुर परम्परा में जैसा कि हम देखेंगे बड़े-बड़े माने हुए विद्वान् उपाध्याय हुए, और इसमें संदेह नहीं कि ऐमी
ज्ञान-समृद्ध परम्परा मे जिसका व्यक्तित्व विकसित हुआ हो
वह अपने कृतित्व और व्यक्तित्वके लिये उस परम्परा का
सब से अधिक ऋणी होगा । इसीलिये कवि के परिचय से पूर्व
ग्रन्थ के माहात्म्य की पृष्ठभूमि को समझने के लिये सर्वप्रथम
गुरु-परम्परा को जान लेना आवश्यक है।
गुरु-परम्परा
प्रस्तुत पुस्तक के रचयिता कवि श्रीवल्लभ वाचनाचार्य
उपाध्याय श्रीज्ञानविमल गणि के शिष्य थे । आपको गुरु-
परम्परा बहुत ही उच्चकोटि के विद्वानों तथा गीतार्थों से
अलंकृत रही है, जैसा कि आपने अपनी टीका ग्रन्यों की
प्रगस्तियों में दिखलाया है
गुशुभिरे जिनराजमुनीश्वराः, सरतराहगणाभ्रदिवाकराः ।
तदनु भूरिगुणा जयसागरा, जगति रेजुरनुत्तमपाठकाः ।।७।।
तेपां शिस्या मुख्या दक्षा आमन्नदूष्यगुणलक्षाः ।
धीरलचन्द्रनामोपाध्यायाः साधुपरिघायाः ॥८॥
तत्पट्टस्फुटपमप्रकाशनोदारमूरसङ्काशाः ।
श्रीभक्तिलाभनामोपाध्यायाः शास्त्रकारः ।।६।।
धीमन्तोऽन्तिपदस्तेपां कलाकौशलपेशलाः ।
ममजायन्त राजन्ती ग्रन्यायम्भोधिपारगाः ॥१०॥
चारित्रसारपाठकः-भायाकर-सट्टणीश्वरा दक्षाः ।
श्रीचारिपचन्द्रवाचकधुर्याः स्मार्या मुनीशानाम् ।।११।।
तेपां क्रमशः पट्टव्योमाङ्गणगीतरश्मिसवागाः ।
श्रीभानुमेयाचक-जीयफलश-कनरुफलशाह्वाः ॥१२॥
तत्र चारित्रसाराख्या उपाध्यायाः महाशयाः । वभूवुः श्रुतपाथोधिपारीणाः साधुवृत्तयः ॥१३॥ तत्पट्टे समभूवन् विलसत्संवेगरङ्गसंल्लीनाः । वाचकपदप्रधानाः श्रीमन्तो भानुमेर्वाह्वाः ।।१४।। सौभाग्योघ निविडजडतां व्यञ्जयत्यन्तयन्ती, यद्वक्त्राम्भोरुहसु वसति प्राप्य गौालसीति । गम्भीरा ये वृहदुदधयः स्फूर्तिमन्तो महान्तो, गाम्भीर्यादिप्रवितसुगुणैर्वर्ण्यलावण्यपुण्याः ।।१५।। जयन्ति क्षमाया समयकथित ज्ञानविमला- श्चिर चञ्चत्पाठकपदवरा शानविमलाः । लसत्तत्पट्टे वचनरचनारञ्जितजना, महावादिवाजप्रमितिकथनावाप्तविजया. ॥१६।। वैराग्यरससॅल्लीना तद्गुरुभ्रातरोऽधुना । विजयन्ते महान्तः श्रीतेजोरङ्गगणीश्वराः ।।१७।। तेपा जयन्ति जयिनः सुनया विनेया., मद्भागधेयमतिमत्प्रतिवाद्यजेयाः । थीज्ञानसुन्दरसुधी-जयवल्लभाद्या वाग्देवताप्रतिमसत्प्रतिभाप्रवानाः ॥१८॥ श्रीज्ञानविमलपाठकसत्पादाम्भोजचञ्चरीकेण । श्रीवल्लभेन रचिता गिलोञ्छशास्त्रे शुभा टीका ॥१६।। सीलोञ्छनाममालावृत्ति-प्रशस्ति । -
राजच्छीजिनराजसूरिगुरवोऽभूवन् पुरा भूतले,
विख्यातामलकोतिपूरितचतुर्दिडमण्डलाः सर्वदा ।
मानोन्मतवदावदप्रवरधीवाद्योपदुर्दन्तिनां,
सिंहध्वाननिभाः प्रणाशनविधौ लब्धप्रतिष्ठोच्चयाः ।।७।।
तत्पट्टे विवुधाचितांहिकमलाबाम्याप्तचञ्चद्वराः,
नानागास्त्रपवित्रवृत्तिरचनाविख्यातसवुद्धयः ।
रेजुस्ते जगतीतले वरगुणाजीवावतारा इवो-
पाध्याया जयसागराः सुयशसः सत्पात्रशोभावहाः ।।८।।
तत्पट्टोदयशंलवालविलसत्सूर्योदयाः पाठका,
आसन् वाग्जितदेवसूरिकवयः श्रीरत्नाचन्द्रायाः ।
तेपामन्तिपदो दिदीपिर इह दमायास्तले पाठका,
नानागास्त्रकृतोवदातयशसः श्रीभक्तिलामाह्वयाः ।।६।।
चारित्रसार-भावाकर-चारशुद्धांशुनामका: शिप्याः ।
पाठक-गणीश-वाचकामुख्यास्तेपामजायन्त ॥१०॥
श्रीभानुमेरुवाचक-जीवकलश-कनककलशनामानः ।
समजायन्त महान्तस्तेपां पट्टे क्रमेणते ।।११।।
श्रीभक्तिलाभपाठकशिप्याश्चारित्रसारनामानः ।
वेदेन्दुसवयाविद्यापारीणाः पाठका आसन् ।।१२।।
सिद्धान्तानुगतक्रियालयलसत्सम्प्राप्तशोभोदया,
दुमिथ्यात्वमतोत्कटोत्पलवनव्याघातसूर्योदयाः ।
तत्पट्टे विलसज्जगज्जनितमुच्चारित्रलदमीघराः,
श्रीमद्वाचक भानुमेरुगुरवो धाभ्यां विरेजुश्चिरम् ॥१३॥
वेदग्रन्थविदन्यशास्त्रजडधीर्नारायणोऽयं पुन- विज्ञायेति सरस्वती भगवती सम्यग्गुणान्वेपिणी । माद्धं यन्मुखपङ्कजेऽखिलगुणः किं लालसीति वसत्, तर्क-व्याकरणाद्यनेकको ठनग्रन्थावलीपाठकाः ॥१४॥ जगन्द्वन्द्यास्तेजोपति हि सतत पाठकवरा, इदानी तच्छिप्या मुनिवरगुणा ज्ञानविमलाः । यश: शीतज्योतिर्धवलितलसक्षोणिवलया, स्फुरत्तेजःपुञ्जग्रहपुपमुपः पुण्यवपुपः ॥१५॥ युग्मम् । तत्सतीर्थ्या दिराजन्ते तेजोरङ्गगणीश्वराः । साम्प्रत स्थविरा नित्यं तपोजपपरायणाः ।।१६।। श्रीज्ञानसुन्दरसुधी-जयवल्लभाद्या, शिष्या जयन्ति च भविप्रथितावदाताः । विद्वत्तमा वरगुणाः सुवचस्विनश्च, तेषां स्फुरद्गुणमणिप्रवरोदधीनाम् ।।१७।। नयां विख्यातकीर्तीना गुरुणामन्तिपदाणुना । गता श्रीवल्लभेनेय शेपसडग्रहदीपिका ॥१८॥ शेषसडग्रहदीपिका-प्रशस्तिः । इन प्रशस्तियों के आधार पर यदि इनका वंशवृक्ष यनाया जाय तो इग प्रकार होगा-
जिनराजसूरि
उपाध्याय जयसागर
।
रत्लचन्द्रोपाध्याय
मेघराज' सोमकुञ्जर सत्यरुचि
भक्तिलाभोपाध्याय
।
चारित्रसारोपाध्याय भावनागरगणि चारुचन्द्र वाचक
भानुमेरुउपाध्याय जीवकलश
कनककलश
T
ज्ञानविमलोपाध्याय तेजोरङ्गगणि
J
श्रीवल्लभोपाध्याय
शानसुन्दर
जयवल्लभ
यहां पर संक्षेप में इन मनीपियों का परिचय देना
असङ्गत न होगा । अतः प्रत्येक के विषय में कुछ शब्द लिखे
जा रहे हैं:-
१. मेघराज, मोमकुंजर और सत्यरुचि ये तीनो नाम 'विज्ञप्ति
त्रिवेणी' के आधार पर।
जिनराजसूरि युगप्रधानाचार्य गुर्वावली के अनुसार श्रमण भगवान महावीर की पट्ट-परम्परा में जिनराजसूरिजी ५४ ३ पट्ट पर हुए है। आपकी जीवनी के सम्बन्ध में विशेप ज्ञात नही होता । स. १४३३ फाल्गुन कृष्णा पष्ठी के दिवस अणहिलपुर (पाटण) मे श्रीलोकहिताचार्य ने इन्हें आचार्य-पद प्रदान कर जिनोदयसूरि का पट्टधर घोषित किया । पट्टाभिषेक का पद-महोत्सव सा. धरणा ने किया था। आपने अपने कर- कमलों से सुवर्णप्रभ, भुवनरत्न और सागरचन्द्र इन तीन मनीपियों को आचार्य-पद प्रदान किया था। आपने सं. १४४४ मे चितोडगढ पर आदिनाथ मूर्ति की प्रतिष्ठा की थी। मं. १४६१में देवकुलपाटक ( देलवाडा ) में आपका स्वर्गवास १- आपको जिनोदयसूरि ने आचार्य-पद प्रदान किया था । २-सागरचन्द्राचार्य मे, जेसलमेर के चिन्तामणि पार्श्वनाथ के मदिर में श्रीजिनराजमूरि के आदेश मे, म १४५९में जिन विम्बकी स्थापना की थी 'नवेपुवार्थीन्दुमितेष (१४५९) वत्मरे, निदेशत. श्रीजिनराजमूरे. । अम्यापयन् गर्भगृहेत्र विम्ब, मुनीश्वरा. सागरचन्द्रसारा. ॥२१॥' जेमलमेर वा तत्कालीन राजा लक्ष्मणदेव राशुल सागरचन्द्राचार्य या बहुत कुछ प्रामक और भक्त था; जमा कि. निम्नलिखित पद्य से माना जाता है: " गाम्भीर्यवत्वाटररमोदरत्वाद्दधार य सागरचन्द्रलदमीम्। यका ग भेजे मदिद वृतज्ञ मूरीश्वरान् सागरचन्द्रपादान् ॥ १४॥ (वि. वि.प्र.) आपकी रचित नारचन्द्रटिप्पन प्राप्त है। - " :- हुआ था। भक्तिवश आराधनार्थ देलवाड़ा के सा. नान्हाक श्रावक ने आपकी मूर्ति वनवाकर उनके पट्टघर श्रीजिनवर्धनसूरि से प्रतिष्ठा करवाई थी, जो आज भी देलवाड़ा में विद्यमान है । इस मूर्ति पर निम्नलिखित लेख उत्कीर्ण है :- "सं. १४६६ वर्षे माघ सुदि ६ दिने ऊकेशवंशे सा० सोपा सन्ताने सा० सुहडापुत्रेण सा० नान्हाकेन पुत्र वीरमादिपरिवारयुतेन श्रीजिनराजमूरिमूर्तिः कारिता प्रतिष्ठिता श्रीखरतरगच्छे श्रीजिनवर्द्धन- सूरिभिः। आपके करकमलों से प्रतिष्ठित मूर्तियां आज भी अनेक नगरों में बड़ी संख्या में प्राप्त होती है। उपाध्याय जयसागर अर्बुदगिरि ( आवु ) खरतरवसही (चौमुखजी का मन्दिर )के लेखों से ज्ञात होता है कि आप ओसवाल वंश के दरडागोत्रीय थे। आपकी माता का नाम सोखू था और पिता का नाम था आसराज । आपके भाई श्री मण्डलिक ने' प्रस्तुत खरतरवसही (जिनालय ) वनवाकर, सं.१५१५ आषाढ कृष्णा प्रतिपदा को जिनभद्रसूरिके पट्टधर जिनचन्द्रसूरि से प्रतिष्ठा कराई । ओसवाल दरडागोत्रीय होने से आप राज- स्थान के निवासी हों यह अधिक सम्भव है। किन्तु यह १. बाबू खरतरवसही के लेखों में मण्डलिक को 'श्री जयसागर- महोपाध्यायदान्धवेन' लिखा है जो अत्यन्त ही महत्वपूर्ण उल्लेस है।
ज्ञात नही कि कब और किस स्थान पर जन्म हुआ और कब दीक्षा ग्रहण की । आपने सं. १५०३ मे प्रह्लादनपुर (पालनपुर ) मे शिप्य मत्यरुचि की अभ्यर्थना और गिष्य गणि रत्नचन्द्र को सहायता से पृथ्वीचन्द्रचरित्र नामक कथानक काव्य की सृष्टि की, जिसकी प्रशस्ति से कुछ उत्लेख अवश्य प्राप्त होते है :-- तत्पट्टशाड्वलवृक्ष', स्थलकौस्तुभसन्निभः । श्रीजिनराजसूरीन्द्रो, योऽभूद्दीक्षागुरुर्मम ।।३।। तदनु च श्रीजिनवर्धनसूरिः श्रीमानुदैदुदारमनाः । लक्षणसाहित्यादिग्रन्थेषु गुरुर्मम प्रथितः ।।४।। श्रीजिनभद्रमुनीन्द्रा , खरतरगणगगनपूर्णचन्द्रमसः । ते चोपाध्यायपदप्रदानतो मे परमपूज्याः ।।५।। श्रीजयसागरगणिना तेन मया वाचकेन शुचिवाच्यम् । पृथ्वीचन्द्रचरित्रं विरचितमुचितप्रविस्तारम् ॥६।। प्रह्लादनपुरनगरे त्रिविन्दुतिथिवत्सरे कृतो ग्रन्थः । माल्हावावरुवसतो समाधिसन्तोपयोगेन ॥७।। अभ्यर्थनया सत्यरचेर्वभूव, साहाय्यकारी गणि-रलचन्द्रः । उपक्रमोऽय फलवान् ममाभूत्, क्रिया हि साहायक- मव्यपेक्षया ॥८॥ आपके दीक्षागुरु थे जिनराजसूरि, और विद्यागुरु थे जिनवर्धनमूरि, जो जिनराजमूरि के ही पट्टधर थे । आपको उपाध्याय पद श्री जिनभद्रसूरि ने प्रदान किया था । जिनराजमूरि के करकमलों से निप्पादित आचार्य सागरचन्द्र ने जिनराजसूरि के पट्टधर आचार्य जिनवधन को, जिन पर देवीका प्रकोप हो गया था, गच्छ को उन्नति के निमित्त पट्ट से उतारकर सं. १४७५ मे जिनभद्रसूरि को स्थापित किया था । जिन जिनवर्धनसूरिजी से खरतर गच्छ की पिप्पलक शाखाका प्रादु- र्भाव हुआ था, उनके पक्ष से हटाकर अपने पक्ष में लेने के लिये सभवतः सं. १४७५ मे इनको उपाध्याय पद दिया होगा, क्योंकि मं. १४७८ मे रयप्रणीत ‘पर्वरत्नावली' में जयसागरजी ने स्वयं अपने को उपाध्याय पद से व्यक्त किया है। आचार्य जिनभद्रसूरि ने जो ग्रन्थोद्धार का महत्त्वपूर्ण कार्य प्रारम्भ किया था उसमे उ. जयसागरजी का सहायक- रूप से पूर्ण सहयोग था । आपने भी अपने उपदेशों से बहुत से ग्रन्थ लिखवाये, जो जेसलमेर, पाटण आदिके भण्डारों में आज भी उपलब्ध है। आप साहित्य के उच्चकोटि के मर्मज्ञ थे। आपने कई मौलिक ग्रन्यों, टीकाओं एवं स्तोत्रों की रचना की, जिसमें से कई तो काल-कवलित हो चुके हैं और कई शोध के १. श्रीसरतरगच्छेगा, श्री गिनराजमूरयः । गठिय श्रीउपाध्यायः रिचितो ज्यगागर ।। अपिच निगमगप्तगतु मितयुनिमिले परितः परिवगरे । नगणतनगेत्य समपिता, जयनु पर्माया जिनगागने ।। (पर्व रनावली प्रशस्ति) २. आपके म्नयन, ग्लोनादि गंग्रहको कई प्रतिमा अवलोपन में आ, परन्तु ये गभी मार्ग में मिली है । १ गयचदजी नदार बीरानेर, २. पुष्परिजपजी सग्रह. ३. और मेरे मग्रहती,ये तीनो प्रनियां समकालीन होने पर भी अपूर्ण मिली है। ।
१८ अभाव में अभी तक उपलब्ध नहीं हुए है। वर्तमान में जो कुछ साहित्य उपलब्ध है उसकी तालिका निम्नलिखित है मौलिक रचना १. पर्व रत्नावली कथा' (र. सं. १४७८ पाटण) २. विज्ञप्ति त्रिवेणी (सं. १४८४ सिन्धुदेश मलिकवाहण- पुर से पाटण थी जिनभद्रसूरि को प्रेपित) ३. पृथ्वीचन्द्र चरित्र ( स. १५०३ प्रह्लादनपुर, गि. सत्यरुचि के आग्रह से, माल्हा श्रावक की वसति (उपाश्रय )मे) टीका-ग्रन्थ ४. सन्देहदोलावली लघुवृत्ति' (सं. १४६५, श्लो. १५५०, इसका प्रथमालेखन शि. सोमकुञ्जर ने किया था और सशोधन स्वयं आ. जिनभद्रसूरि ने) १ इसकी १६वी गतीकी लिखित एक प्रति मेरे मग्रहमें है। २. जैन आत्मानद सभा भावनगर मे प्रकाशित ,मुनि जिनविजयजी द्वारा सम्पादित, ३. जयपुर खरतरगच्छ शानभण्डार में प्राप्त । 6. प० हीरालाल हमराज जामनगर द्वारा प्रकाशित ५. देखिये, जनेन्द्रागमतत्त्ववेदिभिरभिप्रेतार्थकल्पद्रुभि , मद्भिः श्रीजिनमद्रमूरिभिरिय वृत्तिविशुद्धिकृता!
५. गुरुपारतन्त्र्य वृत्ति ७. भावारिवारणस्तोत्रवृत्ति ६. नेमिजिनस्तुति टीका ६. उपसर्गहर स्तोत्र वृत्ति ८. रघुवंश सर्गाधिकार २ " भाषा-साहित्य १०. जिनकुशलसूरि छन्द (सं. १४८१ मलिकवाहणपुर) ११. वयरस्वामी रास पद्य ३६ (सं. १८८६ जूनागढ) १२. गौतमरास पद्य १२ १३. नगरकोट महातीर्थ चैत्य परिपाटी १७ १४. अष्टापद तीर्थ बावनी ५३ १५. चौवीसी १६. चैत्य परिपाटी २१ १७. वीतराग वीनती १५ १८. वीतराग स्तोत्र १६ १६. शत्रुञ्जय आदिनाथ वीनती १३ २०. शान्तिनाथ बीनती ( सं. १५०३) ११ " " तद्वतार्किकचत्रिभि श्रुतपपाध्वन्यमहावादिभिः, प्रामाण्यं गमिता विचार्य च तपोरत्नैः पुरा वाचक.॥ सोमकुजर नामास्ति, विनेयो विनयी हि नः । न्यधित प्रथमादर्शे, ग्रन्थमेनमनाकुलः ॥ विक्रमतः पचनवत्यधिकचतुर्दशशतेषु वसु । ग्रथितेयं श्लोकरिह, पचदशशतानि सार्द्धानि।। १. प० ही ह० द्वारा प्रकाशित, २. तपागच्छ भडार जैसलमेर, पत्र३. ३ पाटणभंडार पत्र६.
१२ " " २१ " ७ " १७ १३ " २० २१. नेमिनाथ वीनती (गिरनार ) २२. नेमिनाथ वीनती २३. (गिरनार ) २४. नेमिनाथ मनोरथमाला २५ नेमिनाय विवाहलउ २६. नेमिनाथ भावपूजा स्तोत्र २७ नवपल्लव पावं लघु वीनती २८. पार्श्वनाथ लघु स्तोत्र २६. अजितनाय वीनती (खभात) ३०. महावीर वीनती ३१, सीमन्धर स्तवन ३२. चतुविशति जिनस्तोत्र ३३. पञ्चतीर्थी नमस्कार स्तोत्र ३४. अर्युदतीर्थ विज्ञप्तिस्तव स्तोत्र--साहित्य ६५. तीर्थयात्रा स्तव ३६. पञ्चपरमेष्ठिस्तव २७. वीतराग स्तव ३८. वीतराग विज्ञप्ति ३६. तीर्थराजी स्तव ४०. पञ्चजिनाद्भुत स्तव ४१. नगरकोट आदिजिनस्तव ( हारवद्ध) ४२. अजितदान्ति लघु स्तव १४ १६ १३ " पद्य १२ " " १६ " २५ " " " २४ " २१ " १५ ४ " ७ ४ " " ५ " ४३. शान्तिजिन स्तोत्र ४४. नेमिनाथ पूजा स्तव ( माण्डव) ४५. नेमि स्तुति ४६. नेमि स्तुति ४७. पार्श्वनाथ लघु स्तव ४८. पार्श्वनाथ लघु स्तव ४९. पार्श्वनाथ स्तोत्र ५०. पावस्तोत्र ५१. पाच लघु स्तव ( यमकमय ) ५२. पार्श्व स्तुति ५३. पार्श्वस्तोत्र ( संभात ) ५४. पाश्वनाथ स्तोत्र ( शंखेश्वर ) यमकमय (संभात) ५६. पार्श्वनाथ स्तोत्र (मरुकोट ) ५७. पार्श्वस्तोत्र (नागद्रह ) ५८. पार्श्वनाथ स्तोत्र ( जीरावली ) ५६. पार्श्वस्तोत्र (पञ्चवर्गपरिहार) ६०. पार्श्वनाथ विज्ञप्ति ६१. महावीर विज्ञप्ति ६२. विहरमान जिन स्तव ६३. विहरमान जिन स्तुति ६४. अष्ट प्रातिहार्य स्तोत्र ५ ७ ७ " ७ 1 " ४ " ७ ७ " ६ " ४ ३
२२
आपने अपने जीवन में अनेक तीर्थयात्राएँ की थी,
जिनका वर्णन 'विज्ञप्तित्रिवेणी' जैसे आलङ्कारिक ग्रन्यो में
पाया जाता है । आपकी शिप्य परम्परा भी विपुल थी,
जिनमे उ० रत्नचन्द्र, पं. मेघराज गणि, सोमकुञ्जर',
स्थिरसंयम, सत्यरुचि गणि, प. मतिशील गणि, पं. हेमकुञ्जर,
पं. ममयकुञ्जर, कुलकेशरि, अजितकेशरी आदि मुख्य थे।
उपाध्याय रत्नचन्द्र
उ० जयसागर प्रणीत ‘विज्ञप्ति त्रिवेणी 'मे जिसकी
रचना सं. १४८४ मे हुई थी, रलचन्द्र को 'क्षुल्लक रे' पद से
अभिहित किया है और आगे चलकर “रत्नचन्द्रक्षुल्लक
चाधीयमानस्वाध्यायं शब्दब्रह्मव्याकरणमधिजिगापयिपन्तः४॥
से ज्ञात होता है कि उपाध्यायजी स्यय इनको व्याकरण
शास्त्र का अध्ययन करवा रहे थे । इस क्षुल्लक (नवदीक्षित)
विगेपण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि स.
१४८४ के आम-पास ही आपकी दीक्षा हुई होगी । आपने
मगः स्वशास्त्र और परशास्त्र का अध्ययन कर अच्छी
विद्वता प्राप्त की । पृथ्वीचन्द्र चरित्र को प्रशस्ति के स्वे
पद्य के अनुसार ' साहाय्यकारी गणिरलचन्द्रः' में व्यक्त
१. आपली प्रगीत 'मग्नग्गनाट्टायली प्राप्त
. आप्यादती के गयन्द में विशेष जानने . दिप--
किाग्निरिणी की प्रानावना
है दम, मिनि त्रिवेणी प."
८ दा, दि.f1० पृ. २१
होता है कि चरित्र की रचना में आप अपने गुरु के सहायकारी थे और उस समय तक उन्हें 'गणि' पद भी प्राप्त हो चुका था । विशेष योग्यता प्राप्त करने पर तत्कालीन गणनायक श्रीजिनभद्रमूरि के पट्टधर आचार्य श्रीजिनचन्द्रसूरिने आपको 'उपाध्याय' पद प्रदान किया था । पाटन वाडीपुर-पार्श्वनाथ मन्दिर के मण्डार में स्थित सिद्धहेम- व्याकरण की लेखन प्ररास्ति' 'श्रीरत्नचन्द्रोपाध्यामानां' मे स्पष्ट है कि सं. १५२१ के पूर्व ही आपको उपाध्याय पद प्राप्त हो गया था । उ० भक्तिलाभ-भानुमेर उ० रत्नचन्द्र के शिष्य उपाध्याय भक्तिलाभ हुए । इनके संबंध में कोई विशेप उल्लेख प्राप्त नही होते । आपके लिये सं. १५३२ में प्राकृतव्याकरण लिखा गया था, जिमकी लेखन पुष्पिका इस प्रकार है:- "सं. १५३२ वर्षे श्रीजयसागरमहोपाध्याय- शिष्य-रत्नचन्द्रोपाध्यायराजानामुपदेशेन गिप्य-भक्ति- ५ "ग० १५२१ वर्षे धीरोही वास्तव्य उगवीय माल्दगोत्रीय माह मया मार्या मोनलदे पुत्र माह ईला मुश्रावकेण भ्रातृ मेला बापा जिनदार प्रमुबारिवारमहितेन श्रीसरतरगच्छे योजयगागर- महोपाध्याय-शिष्य-धीरतचन्द्रोपाध्यायानामुपदेशेन धीगिदहमलक्षणबृहद्- वृत्तिानापट्टप्रन्योटेवि।। देखें वि०वि०प्र०प० ७८ ६. पाटण मप के भण्डार में सुरक्षित है। - पमा " २४ लाभाय [पठनार्थ] स्तम्भतीर्थवास्तव्य थीमालवंशे फोफलियागोत्रे श्रे. वाछा भा. देल्हू पुत्र लाखाकेन भार्या लीलादे जागा जेसिंघादिपरिवारेण स्वपुण्यार्थ लिखापितम् ॥ इससे यह निश्चित है कि आपको भी दीक्षा सं. १५३२ के पूर्व हो चुकी थी। आप भी उपाध्याय-पदधारी थे, जमा कि उपाध्याय ज्ञानविमल द्वारा प्रणीत शब्द- प्रभेदवृत्ति प्रशस्ति के १५वें पद्य से ज्ञात होता है :- तच्छिप्या सकलाचलावलयसत्प्रस्यातकीयुच्चयाः, सिद्धान्तोदधिगाहनकरसिकाः कारुण्यपाथोधयः । मद्भाग्योदयदीप्तपाठकपदधीराजिता रेजिरे, दपिप्ठप्रतिवादिमानमयनाः श्रीभक्तिलाभाभिधा ॥१५॥ आपकी निम्नलिखित रचनायें अभी तक प्राप्त १. बालशिक्षा व्याकरण' २. लघुजातक टीका ( म. १५७१ बीकानेर ) ३ कल्पान्नवांच्या ४. वरकाणा पाश्चंनाथ स्तव १ मलमेर गप मडार, ला ५५ ग १०८ पत्र ८ अपूर्ण, गिरा प्रणम्य ग्यगुन् िभपया, ध्यारया देवी सरस्वतीम् । हिमा भपिनमाभंग, वालक्षिा विधीयते ।। २. मी गपामें
२५
८.
५. जीरावला पाश्र्वनाथ म्तव
६. भीमन्धर म्तव' (मफलमंमार)
७. रोहिणी तप स्तव
जिनसमूरि गुरुगीतम्
आपके दो प्रधान नियों का उल्लेग मिलता है, प्रथम
उपाध्याय चारित्रमार और दूमरे गणि चामचन्द्र । प्रधान
मिप्य र. चारित्रमार के मम्बन्य में कुछ भी उल्लेखनीय
मामग्री प्राप्त नहीं है। केवर गब्दप्रमेदवृत्ति प्रगस्नि पद्य
१६. के आधार पर ही यह निश्चित है कि आप उपाध्याय
पद धारक थे । यथा :--
मयंपासवराङ्गोवरगद गुवापासूरवाराग्रणी,
प्रागल्भ्यप्रवरास्तपो विधिपराः मदघुदारामयाः ।
तेषामन्तिपदी बभूवुरजिता दृष्यत्प्रवादिग्रजः,
श्रीमत्पाठकमेखरा मुनिवराश्चारिप्रसाराह्वयाः ।।१६।।
द्वितीय शिष्य वाचक चारचन्द्र के जीवन के सम्बन्ध
में तो मामग्री प्राप्त नहीं है; किन्नु आपको निम्नलिखित
रचनायें जात हुई है:
१. उतमकुमार चरित्र (१५७२ बीकानेर)
२. हरिवल चौपाई (सं. १५८१)
३. नन्दन मणियार गंधि (सं. १५८७)
४. गतिमार फेवली चतुष्पदी
.
:-
१.प्रकाशित.
२
... वा, गं, में प्रकाशित
प
५. महावल मलयसुन्दरी रास.
६. पञ्चतीर्थी स्तवन, (सं. १५६८)
७ भाषा विचार प्र० सावचूरि.
८. युगमन्धर गीत.
आपके शिष्य वाचनाचार्य ज्ञानविमल के गुरुवर उपाध्याय
भानुमेरु हुए । आश्चर्य है कि आपके शिष्य ज्ञानविमल
और प्रशिप्य श्रीवल्लभ ने केवल श्रद्धापूर्ण स्तुत्यात्मक पद्यों के
अतिरिक्त अपने साहित्य में किञ्चित् भी उल्लेख नही
किया । वे केवल स्तुति करते हुए कहते है-
वराग्यं प्रवलं शमेऽतिविमल: शास्त्रौघवार्ताद्भता,
सिद्धान्तकरुचिमनोरमतमा भव्योपकारः परः ।
चारियं च जगत्यनुत्तरतर तत्पट्टगोभावहा,
येपा श्रीयुतभानुमेरुगुरवस्ते वाचका भ्रजिरे ।।
आपको किसी साहित्य सर्जना का भी पता नही
चलता । आपके प्रधान दो शिप्य थे
ज्ञानविमल और दूसरे थे तेजोरङ्ग गणि ।
वाचनाचार्य ज्ञानविमल
मानविमलजी की 'विमल' नन्दी एवं स्वरचित
मादप्रमेदवृत्ति (र. स. १६५४ ) को देखते हुए (यु.
श्रीजिनचन्द्रगरि के नन्दिपत्र के अनुगार एट्टी नन्दी
'विमल' है, तो) गन्दी क्रमानुमार संभव है कि आपकी
दीदा १६१५ और १६१८ के मध्य में हुई हो । आपके
एक वाचनाचार्य
२७ शिष्य श्रीवल्लभ द्वारा रचित 'शिलोच्छ व्याख्या' (र. सं १६५४) और स्वयं रचित शब्दप्रभेदवृत्ति मे "श्रीज्ञानविमल- पाठक" पाठक पद को देखने से यह तो स्वत: सिद्ध सा हो जाता है कि सं. १६५४ के पूर्व ही आप उपाध्याय पद से अलङ्कृत हो चुके थे । आपको पाठक पद तत्कालीन गच्छ- नायक युगप्रधान श्रीजिनचन्द्रसूरि ने ही दिया था । साहसाङ्कचरितकार' श्रीमहेश्वर कवि प्रणीत 'शब्दप्रभेद' नामक कोप पर आपने सं. १६५४ आषाढ शुक्ला द्वितीया को विक्रमनगर (बीकानेर) नरेश श्रीरायसिहजी के विजय राज्य मे ३७०० ग्रन्थाग्रन्थमय विस्तृत टीका पूर्ण की। इसमें उनके शिष्य श्रीवल्लभ का पूर्ण सहयोग भी था और इसका प्रथमादर्श आपके शिष्य श्रीज्ञानसुन्दर और जयवल्लभ ने लिखा था, जैसा कि प्रशस्ति से ज्ञात होता है अस्मदन्तिषदो गाढसाहाय्यात् मिद्धिमागता । विद्वच्छीवल्लभाह्वस्य युक्तायुक्तविवेचिनः ॥२०॥ प्रयमादर्श लिखिताऽस्मच्छिष्य ज्ञानसुन्धरावेन । जयवल्लभगणिनाऽपि च विचारविज्ञेन भक्तेन ॥२३ ।। १ श्रीसाहसाकचरितप्रमुखासु गद्यपद्यप्रवन्धरचनासु वितन्वतव । व्युत्पत्तिमुज्ज्वलतमा परमा च शक्तिमुल्लासिता जगति येन सरस्वतीयम।
२८ श्रीमद्विक्रमनगरे राजच्छीराजसिंहनृपराज्ये । सल्लोकचक्रवाकप्रमोदसूर्योदये सम्यक् ॥२४।। चतुराननवदनेन्द्रियरसवसुधासम्मिते लसद्वर्षे । श्रीमद्विक्रमनृपतोऽतिक्रान्तोऽतीव-कृतहर्षे ॥२५।। शुभोपयोगे शुभयोगयुक्ते, वरे द्वितीयादिवसेंतिशुद्ध । आपाढमासस्य विशुद्धपक्षे, पुप्यर्कसयुक्तगभस्तिवारे ।। २६ ।। अस्यास्त्रीणि महसाण्यधिकानि सप्तभिः शनैः । इत्येव प्रमितिज्ञेया, श्लोकमानेन निश्चिता ।। २७॥ इस टीका को देखते हुए ज्ञात होता है कि पाठफ जी की प्रतिभा विशाल थी । व्याकरण और कोप माहित्य पर तो उनका एकाधिपत्य सा नजर आता है। स्थान-स्थान पर प्रायः सभी व्याकरणों और अनेकार्थादि कोपो के उद्धरण प्रचुर परिमाण में दृष्टि गोचर होते है । शब्दप्रभेद के प्रारम्भिक मङ्गलाचरण पद्य की भूमिका देखने मे ही उनके वंयाकरणत्व का परिचय प्राप्त हो जायगा इह हि प्रेक्षापूर्वकारिणा महाकवीना ग्रन्यारम्भ ययाभीष्टदेवतागस्तयन-मभ्युदयनिदान नयंयोत्कृष्टप्रशब्दप्रहण गकपमङ्गलनिदानमस्तीनि स्यमनसि निधाय श्री मन्महे यर- 'प्रगद' आदी प्रयुजन | उपनञ्च- प्रगदाचाय गपश्च, द्वावेतो ब्रह्मणः पुरा । कपट भित्त्या विनिर्याती, तम्मान् मङ्गलवारको ।। यवय इति । यथा च थीकात्यायनाचार्याः नित्ये गब्दार्थसम्बन्ध इति वक्तव्ये 'सिद्ध शब्दार्थसम्बन्धः' इत्युक्तवन्तः । यथा श्रीपाणिग्याचार्या अपि पाणिनीयव्याकरणादो आदच् वृद्धिः इति वक्तव्ये वृद्धिशब्दमादी प्रयुज्य ‘वृद्धिरादच्' इत्य- मिहितवन्तः । यथा कुमार अपि वर्णसमाम्नायः सिद्ध इति वक्तव्ये कलापव्याकरणादो 'सिद्धो वर्णसमाम्नायः' इति प्रयुक्तवन्तः । यथा इन्द्रा इन्द्रव्याकरणादौ रूढेरनुक्ताना सिद्धि इति वक्तव्ये 'सिद्धिरनुक्तानां ढेः' इति रचित- वन्तः । यथा श्रीहेमवन्द्राचार्या अपि सिद्धहेमचन्द्रव्याकरणादौ स्याद्वादात् सिद्धिरित्यभिधेये 'सिद्धिः स्याद्वादान्' इति कषितवन्तः । यया योहेमगब्दोपदेव विद्वांसोऽपि मुग्धबोध- व्याकरणादौ शब्दैः शमिति वक्तव्ये 'शं शब्दैः' इति कृति- वन्तः । यथा श्रीशायटायनाचार्याः स्वोपज्ञशब्दानुशासनवृत्ता- बादी 'श्रीवीरममृतं ज्योतिर्नत्वादि सर्ववेदसाम् ' इति मङ्ग- लार्थ श्रीशब्दप्रयोग सन्दृव्धवन्तः । यया श्रीअनुभूतिस्वरूपा- चार्या अपि सरस्वती प्रक्रियां ऋजुकुर्वाणा: 'प्रणम्य परमा- स्मान' इति गङ्गलायं प्रगब्दप्रयोग धृतदन्तस्तथा धीमल: श्रीमहेश्वर कवयोऽपि शब्दप्रभेदनामा ग्रन्थादी प्रशब्दलक्षणं मङ्गलं हृद्यवधार्य प्रशब्दप्रयोगं न्यस्तवन्त इत्यवमेयम् । . कवि-परिचय उपाध्याय श्री वल्लभ कहाँ उत्पन्न हुए ? किस मंवत में उनका जन्म हुआ? उनका वात्यपन का क्या नाम था? उनके माता-पिता का क्या नाम था? उन्होंने . कव दीक्षा ग्रहण की? और कब उनका स्वर्गवास हुआ? इत्यादि बातों का तो कुछ भी पता नहीं लगता। उनके ग्रन्थों एवं तत्कालीन अन्य रचनाओं से इस सम्बन्ध में कुछ भी ज्ञात नहीं होता। किन्तु इनके मौलिक एवं टीका ग्रन्थों के अवलोकन करने से उपाध्याय जी के विषय में जिन कुछ ज्ञातव्य बातों का पता चलता है, वे उपस्थित की जा रही है जन्मस्थान अभिधान चिन्तामणि नाममाला की सारोद्धार नाम्नी टीका में एवं हेमलिङ्गानुशासनविवरण की दुर्गपदप्रयोषवृत्ति में कई स्थलों पर शब्दों के पर्याय देते हुए ‘इति भाषा 'इति प्रमिद्धे' से जो प्रचलित प्रान्तीय शब्द प्रयुक्त किये है, उनमें यह स्पष्ट हो जाता है कि वे किम प्रान्त के निवामी थे। उदाहरण के लिये यहाँ कुछ शब्द दिये जाते है। उद्योत -उजवाला, तावडा विवाद%झपड़ा मर्गचिका झाझूआ अन्योन्यविरुद्धवचन: -अण- पारिपावंक: -पामवाण मिलता वचन यावरिया पृष्ठमांसादन = पाडी गन्फाल-तिवारहज अमहोपागेपण = अणहतो यादम्बिनी-फलाइणि दोप जयकम =याट छुट उन्घुष्ट-पोषणक आहान तेडण, लावण, अगुभवचन = मूंडा वनन निहुंनग प्रताप झवण हल्लीसक = घूमरी भक्ष्यपिण्ड% कवा वादियादि -वाजा, रवाव, कूपसि = कांचली खूटी, खोली, ढोल, घान्यागार कोठार वरघू, नफेरी, ढोलादिक निचुलक= उतरणा, खाट, वजावणरा डांडिया, पटेवड़ी मनाक स्मित = मुरकण भित्तिनिसातकोलक= घोर- महतिहास: खड सड हसणो लो, खूटा स्वपक्षमय =ग्रामियांरउ भय शमीवृक्ष खेजड़ी लप्पिका = लापसी मीफल = सांगरी अवपुजित -ऊकरडओ मन्दर्भ =गूंथणट उपालम्भ = योलम्मओ चुलुक = चलू संस्तव = बोलखाण, पिछाण वस्त्र लूगड़ा इन शब्दों को देखने से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि कवि का जन्म एवं वाल्यकाल राजस्थान प्रान्त में ही व्यतीत हुआ है । राजस्थान प्रान्त में विशेप कर उपरि उल्लिखिन 'मुंडावचन, करडओ, ओलंमओ, कवा, कांचली खेजड़ी, सांगरी, लूगड़ा' आदि शब्दों को देखते हुए चे जोधपुर राज्य के ही निवासी हों, अधिक संभव है । यहाँ यह मंभावना की जा सकती है कि दीक्षा के पश्चात् इनका जीवनकाल राजस्थान में अधिक व्यतीत हुआ हो और वहां निरंतर जन-मम्पर्क के कारण उनको नापा में देसी शब्दो का प्रयोग अधिक हुआ हो, परन्तु ध्यान देने की वात यह है कि जिन घरेलू गब्दों का व्यवहार उन्होंने ३२ किया है वे बाल्यपन के संस्कार के विना भाषा में नही आ सकते । दीक्षा खरतरगच्छालङ्कार' १ आचार्यप्रवर श्रीजिनमाणिक्य- मूरि२ के पट्टधर शाह अकब्बर द्वाग प्रदत्त युगप्रधान १ इनका खरतरगच्छ का होना निम्नलिखित प्रमाणोमे सिद्ध है तत्रासीद् विधागणीर्गणगुरुश्रीवर्ड मानान्तिपद्, सूरीन्द्र स जिनेवरो दातागोत्यामिते सवति। जित्वा धोअपहिल्लपत्तनपुरे दुर्यादिनो दुर्लभ - क्ष्मापास्याद्विरुद घर परतरत्यास्प यर प्राप्तवान् ।।२।। म चि ना. वृप्र. श्रीमान खरतरगन्छ, मच्छेभूवावा झवृत्तिकरा । श्रीमदमयदेवाग्या, आचार्या लशगुणदक्षा "१॥ सी ना टी.प्र श्रीमत्खरतरगच्छं च ये रानयागमरवृनि । थीमन्नोमयदेदाचार्या ज्याया दिरेजुस्ते ।।१।। मटी प्र योनितम्वरगूरीन्द्रनिग्याति प्रापित शितो। पर परतो पणे, पगाने ममामि । १ ।। प्र २ गा गाण उपाध्यार धीम ने पई स्थानों पर दिया है मालागणाधिगमलामनरजनीपतियाराणाम् । नपानपनगणा, श्रीनिमागिपरीणाम् । १॥
विरुदधारक आचार्य श्री जिनचन्द्रसूरि ने अपने ५८ वर्ष विल्यातयगनस्लेषा, पट्टक्रमेण मूरयः । श्रीमच्छीजिनमाणिक्याचार्या. नाया विरेजिरे ॥३।। पो. ना. वृ.प्र श्रीजिनमाणिक्यमूरि का जन्म स. १५४९ में हुआ। पिना कूबड़ चोपड़ा गोपीय संघपति राउटदेव ये और माता थी रयमादेवी। म. १५६० में ११ वर्ष की अल्पायु में उन्होने आदार्य दिनहंससरि के पास दीक्षा ग्रहण की। म. १५८२ माघ शुबन्द परमी को गच्छनायक जिन- हनमूरि ने उन्हें जाचार्य पद प्रदान किया । स. १५९३ नाव शुक्ला प्रतिपदा गुरुवार को उन्होने विक्रमपुर (बीकानेर) के मत्री कर्मसिंह द्वारा निर्मापित नमिनाय चैत्य की प्रतिष्ठा की। तत्कालीन गच्छ दे माघुओ में मिथिलाचार देखकर वे नियोद्धार का विचार कर रहे थे। इमोनिय वे देरावर में 'दादा' की यात्रा करने गये और वहा से जैसलमेर आते हुए मार्ग में ही म. १६१२ आषाढ शुक्ला ५ को उनका स्वर्गवास हो गया था। १. इनका श्रीवल्लमजी ने श्रद्धापूर्वक स्मरग किया है : एवं मूरिपरम्परागत इह श्रेले गणे दीपिते, म श्रीमज्जिनचन्द्रसूरिमुगुचारित्रपाविन्यभृत् । नेज. श्रीमदवबरामिघनृपः श्रीपातिसाहिर्मुदा- वादीद्यत्सु युगप्रधान इति सनाम्ना यथार्येन वै॥४॥ श्रीमन्त्रीस्वरटर्मचन्द्रविहितोद्यकोटिटड्काम्ययं, श्रीनन्द्युत्सदपूर्वक युगवरा यस्मं ददा स्व पदम्। श्रीमल्लामपुरे दयादृढमतिथीपातिमाह्याप्रहा- नन्द्याच्छौजिनचन्द्रमूरिमुगुरु. मस्फीतनेजोयसाः ॥ ५॥ अ, चि. ना. वृ. प्र.
विशद आचार्य काल में ४४ -नन्दिों' (नामान्तपदों)
की स्थापना की थी। उसमें २६वीं मंख्या की नन्दि
'वल्लम' नाम की है, जिस में १६वीं नन्दि 'सिंह' की
स्थापना सं १६२३ में हो चुकी थी। अतः अनुमानत:
'वल्लभ' नन्दि की स्थापना मं. १६३० एवं १६४० के
मध्यकाल में हुई होगी। इस अनुमान का मुख्य कारण
एक यह भी है कि श्रीवल्लभ ने शीलोञ्छनाममाला पर
सं. १६५४ चैत्र कृष्णा मप्तमी को नागोर में वृत्ति की
रचना पूर्ण की। किसी भी अन्य पर लेखनी चलाने के
लिये, विशेषकर व्याकरण एवं कोष पर विशेष अध्ययन
और योग्यता की अपेक्षा है। अतः शीलोटनाममाला जंसी
पुस्तक पर वृत्ति रचने के लिये दीक्षा के पश्चात् १५-१८
दर्प का समय तो उन्हें अवश्य ही तैयारी के लिये लगा
होगा । यहां यह संभावना भी की जा सकती है कि
दीक्षापूर्व ही वे संस्कृत माहित्य के विद्वान हों। पर
प्रायः जैन समाज में देखने में यह आता है कि
१६७० आश्विन कृष्णा द्वितीया को बिलाड़ा में उनका स्वगंचान
हुआ था। नं. १६१७ दियदममी के दिवस पाटण में आचापं जिन
वल्लभसूरि प्रणीत पौषपविविप्रकरण पर ३५५४ श्लोक परिमाण की
उन्होंने विशद टीका की रचना की थी। विशेष परिचय के लिये
देखें, धीमगरचन्द्र भंवरलाल नाहटा द्वारा लिखित " 'युगप्रधान
जिनचन्द्रसूरि"
१. देखें युगप्रधान जिनचन्द्रमूरि का प्रथम परिमिष्ट.
गार्हस्थ्य-जीवन में रहे हुए इने-गिने ही संस्कृत- साहित्य के विद्वान प्राप्त होते है। हाँ, जैन धार्मिक साहित्य एव कर्म सम्बन्धी साहित्य के उच्चकोटि के मर्मज्ञ अवश्य मिलेगे। अत. यह अनुमान उपयुक्तसा ही प्रतीत होता है कि युगप्रधान ने १६३० और १६४० के बीच मे आपको दीक्षा प्रदान कर श्रीवल्लभ नाम प्रदान किया हो। श्रीवल्लभ-प्रतिभा-परिचय । थीवल्लभ की प्रतिभा बहुमुखी थी । उनमे अगाध पाडित्य था और था उनका सस्कृत एव प्राकृत साहित्य पर पूर्ण अधिकार । वैसे तो उन्होंने किन किन शास्त्रों का अध्ययन किया और किनके पास किया, ऐसा कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु आपको गुरु 'पाठक' परम्परा एक विद्वत्परम्परा थी एवं आपके गुरु स्वसाहित्य और पर- माहित्य के निष्णात थे । इसलिये यह अनुमान किया जा मकता है कि विद्याभ्याम आपने अपने श्रीगुरु चरणों में ही रहकर किया होगा । वेदप्रन्यविन्यासमयीनांगरपोर पुन- विज्ञायनि मगाती भगवती मम्यागुणान्वपिणी । गादं यामतपसिलगणे. वि मालगानि बगन्, तयारपाचनपटिनपल्यावाली पाटा ॥१४॥ (गे. ग. व. प्र.) .
आपके टीका-ग्रन्थों के अवलोकन से यह भली भांति मिद्ध हो जाता है कि आप केवल जैन-शाहित्य के ही विद्वान नहीं थे, अपितु समग्न संस्कृत साहित्य के जानकार थे । संस्कृत-साहित्य में टीकाकारों की बहुलता रही है किन्तु इनके समान टीकाकार विरले ही हुए है । एक अभिधानचिन्ता- मणिनाममाला की टीका में ही लगभग १७० ग्रन्थों के उद्धरण - वे भी एक दो नही - किन्तु संकड़ों की संख्या में देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि आपने इन इन विषयों के निम्नलिखित ग्रन्थों का भली-भाति अवलोकन अवश्य ही किया था । उद्धृत व उल्लिखित ग्रन्थों की तालिका इस प्रकार है.. व्याकरण -सिद्धहेमशब्दानुशासन, वृहद्वृत्ति, लघुन्यास', न्यास', ढुण्ढिका, धातुपारायण (हेमचन्द्रीय), हैम- लिङ्गानुशासन और स्वोपज्ञ टीका, प्राकृतव्याकरण (हेमचन्द्रीय) टीका सहित, देशीसूत्र टीका सहित', १ निवृत्त्यर्थ इति द्वितीय ग श्रवण न स्यात् इति न वाच्यम्, रूपमेव हि भिद्यते न श्रुतिः, शब्दस्य श्रोत्रग्राह्यत्वात इति, पूर्वन्यासापेक्ष. इति, निवृत्तमिति लघुन्यास. (अ. २४,१) २. गर्भिणी पुदद्भावे सप्तमाध्याय-चतुर्यपादवृत्तिपचाशत्तम- सूत्रेण 'सयोगादिन ' इत्यन्तलोपप्रतिषेधः, गर्भवती स्त्रीवचनात्तु इको- प्राप्तरोत्सर्गिकवचनाण, इति न्यासकारः (अ १३०,१) ३. 'अणु ' रालकादिधान्यविशेष , इति तद्धिनडूठी। शम्बशब्द स्तिर्यगर्थ , इति तद्धितढूढी। ४. यद्देशीसूत्रे 'सिड्डोतलहपिशल्ला' इति, शलभः पिशाचश्च इति सट्टीका। . - पाणिनीय व्याकरण, पाणिनीय शिक्षा, महाभाष्य', काशिकाकार', शाकटायन', सारस्वत, कविकल्पद्रुम (बोपदेवीय), कृष्ण पण्डित कृत प्रक्रिया कौमुदी वृत्ति, माधवभट्ट, उज्ज्वलदत्त', गणरत्नमहोदधि टीका सह, न्यायमञ्जूपा टीका सह, दुर्गलिङ्गानुशासनवृत्ति', चन्द्राचार्य, श्रीकण्ठपुरुषोत्तमदेवादयः". आदि । कोष • अमरकोप टीका सहित, क्षीरस्वामी (अमरकोप टीका- कार), अभिधान चिन्तामणि नाममाला टीका सहित, अनेकार्थ संग्रह (हेमचन्द्रीय) टीका सहित, श्रीजिन- भद्रमूरिपादा. ( अपवर्ग नाममाला), अमरमाला', - कात्यः', गौडः२, देशीनाममाला टीका सहित, धनपाल: ध्वनिमज्जरी (एकाक्षरी नाममाला) निघण्टुशेषनाममाला' (हेमचन्द्रीय) टीका सहित, पुरुषोत्तमदेव, भागुरि, महेश्वर ( १. यत्कात्य -अमात्याद्याश्च पौराश्च, सद्भिः प्रकृतय' स्मृता । (अ. ६०-१), कात्यत्तु --प्रच्छन्नमन्तर यत्पक्षद्वारं नदुच्यते । (अ ६९-२) २. गौडस्तु ---- मुक्ताशुद्धौ पुमास्तारो, ननाक्षक्षिमध्ययो। (अ ४६-१), यद्गौड ---स्त्रोनपुंसकयोः कोहा-वक्षसि स्यात् फिरौ पुमान्। क्रोडे पोनपयोधरे मृगइशः कः क्रीडितु नेति । (अ.४९-१) आदि ३. यद्देशी ~ मादिषु शब्देयु अनेकार्येषु मड्डा बलकार आणासु मन्दा बलात्कार बाज्ञा च इति तटोका-कार्येषु पदेषु बलझारम्मि पिणाओ इति । (अ.६९-२) ४ धनपाल यदाह-व्यातायातवो यातुधान, इति (अ १४-१), धनपालस्तु- - आसदी विष्टर पीठमामनमिति । (अ ५७-२) ५ पटोले तु पाण्डुफलः, कुला कर्कशरछर.। राजीफल क्फहरो, रान- मान्योऽमृताफा.1 इति हेमनिषष्टशेषः । ६ पासवस्त्वर्द्धचोलक, इति पुरुषोनमदेव । (अ ५६-२), उदाह- पुरुषोतमदेव. ---प्रेतादिभिर्गृहीतो य, म आविप्टो ममत् वहिरति। (अ.३७-१) ७. भागुरिस्तु-कुकुंदरौ ममाचप्टे, जनो जघनकूपको, इति (अ. ४९-२) - . - टीका सहित, मालाकार', लिङ्गयसूरि२, व्याडिः', विश्व, विश्वशम्भु (एकाक्षरी नाममाला), वाचस्पति, वैजयन्ती, शाश्वत', श्रीधर टीका सहित, श्रीभोज', शेपसग्रह (हेमचन्द्रीय), सुधाकलश (एकाक्षरी नाममाला) सौभरि (एकाक्षरी नाममाला), हलायुध टीका सह, हारावली आदि. काव्यादर्श, काव्यशिक्षा, भानुदत्त (रमतरङ्गिणी) विदग्धमुखमण्डन, छन्दोनुशासन, छन्दश्चूडामणि, वृत्तरत्नाकर, लक्षण - १ मालाकारस्तु - मृत्वत्सा सवद्गर्भा, इनि (अ ११५-२), माला- पारस्तु --- धुण्डो विपरोत्माश्च कृपपा, इति । (अ. ९८-१) २ श्रोलियमूरिस्तु-धानकीपुष्पमिश्रगुहमतिपान्याम्बुनमद्यनाम- मंग्य, पपवेभरमकृतमधनाम सीधु, यादवेधुरगतमद्यनाम आगर, इनि श्रीग्यपि भिन्नति। (अ. ८१-१), लाजादिवरणार्थ कृतम्य पटरपालम्य नाग्नी, इति लिएसमूरि । (अ.११-१), आदि ३ ययारि पितृगधर्मा य गन्नानाहीं मनोजव । (73-१) ४ गधिन्यवादग्पागोवंशावाला न मन्धिनि, प्रति (अ. ११५-२) ५ दिनम् इति श्रीभोज । (भा ५४-१) परिवान्द, तारक्षण पर-म्यो त्यो पेविरवम्। (अ.६७.१) दुर्भाग्य है कि आपापं गवार का या अन्य प्राय ।। मावत ४१ काव्य - रघुवंश, कुमारसंभव, किरातार्जुनीय, शिशुपालवध टीका सहित, नैपघ चरित टीका सहित, नरहरि (नपघटीकाकार), मेघदूत टीका सहित, द्वयाश्रय काव्य (हेमचन्द्रीय) टीका सहित (टी. अभयतिल- कोपाध्याय), महाभारत', हलायुध काव्य टीका सहित, रूपमाधवीय, भट्टिः, गीतगोविन्द, आदिनाथ चरित्र (हेमचन्द्रीय), नेमिनाथ चरित्र (हेमचन्द्रीय), चम्पू , विशतीकार', सौन्दर्यलहरी, महिम्नस्तोत्र टीका सहित, वोपालिनः", आदि. १ जल्द रितरक्षुपनग, इति हपं, तरक्षवश्चित्रमृगा. पन्नगा - मपश्चि गन तम् । इति नरहरि. (११७-१), उद्भिदास्तु गुन्माद्याः इति नरहरि (अ. १२४-१)। २ यद्भारतम् -- पत्य गस्त्रिगुर्ण रावं., क्रमादाच्या गातरम् । मेनामुन गुत्मगणो, वाहिनी पृतना चमूः । अनीकिनीदशगुणा- माहुरक्षोहिणी वुधा.। इति (दु. ३७) ३ तथा रूपमाधवीये-स्वरि क्मपि न चाल स्पलावण्पभाजी, पपुष उरकलाइयमीयते दृश्यते या। इति ४. मसौगन्धिकमारा विरानन्ते अन्तविपणयो वहिद मलिन्याश्रया. इति चम्पूगद्यम् (ज. १०५-१) ५. यथा न विगतीकार-पञ्चाश्नतुभिर्वराटक काकगी किनी (अ. १३७-२) ६. धनुपाणेर्यान दिनमभिमपत्राकृतमम्' इति महिम्नस्तोत्र। कि पिय अमु ? 'सपत्याकृत' पत्र मह यतमानेन भरेण शरीरे अन्तः प्रविश्य. उत्पादितमहाव्यमित्यर्व । इति तट्टोका (भ. १२६-१) ७. वातप्रमी ममीरमृग, इनि बोपादिनः (अ. ११८-२)
४३
नीति-- कौटिल्य' (अर्थशास्त्र), जय', मुनि, चाणक्य
(चाणिक्यनीति)
सामुद्रिकगास्त्र,
धनुर्वेद-- धनुर्वेद,
१. यत्काटिन्य. --ये द्रव्यहतोव्यालं हस्तिन चापि योधयंयुस्ते नीपणा,
(दु ९७), यत्कौटिल्य :-- कर्मणामारम्भोगाय', पुस्पद्रव्यमम्पत,
देशकालविभागः, विनिपातप्रतीकारः, कार्यनिद्विवेनि पञ्चाही
मन्त्र.। (अ.६२ २), उद्धवं हन्यते अनेन इति उद्घातन इति
कौटिल्य.। (अ. ९.८-२)
-गुल्को घटे निदाहाय वगद् ग्राम्य च वम्कनि इति
(अ६१-१)।
? यन्मुनि.~-गद्वितोप प्रापङ्ग (६४-२), यन्मुनि. -- अधिपाङ्ग,
मारमनं इदि(य ६५-२), पन्मुनि ~~-विधनायाभये नित्यं, नित्यं
चामृतभोजन । विषयो मुफ्नोष स्यात्, यज्ञशिष्टमयामृतम् ।
२ यज्मय
५ सद्धार्वेदः -- चना वानपाद तु, तीक्ष्ण चंदानुकुञ्चितम् ।
सागर तु प्रमानन्ध, हम्नद्वयमविस्तरम्। ।। पादी मविस्तरो
गारों, ममहम्मप्रमाणतः। बंगापम्यानवे वन्य, फूटलात्य
बंधन
प्रत्याली न कर्तव्यः, मदनानानुकुञ्चितः ।
नियंग्वाम' पुरम्नत्र, दूरापाते विशिष्यते ।३। ममपादे गम पादौ
निष्कामी च मुममनो। मण्डर मण्डलाबारी, बायतीणो
विपन:।। (अ. ६६-२)
पुराण- गरुडपुराण, नारदपुराण, पद्मपुराण, भविष्योत्तर- पुराण, विष्णुपुराण टीका महित, हरिवंगपुराण, भागवत टीका सहित, जैनागम माहित्य -~~ आवश्यकमूत्र', आवश्यकचूर्णि२, आब- म्यकसून वृहद्वृत्ति (हारिमद्रीय), नापारागसूत्र मवृत्तिक', मूत्रकृताङ्गमूत्र मवृत्तिक, ममवायाङ्गमूत्र वृति सहित', राजप्रश्नीयसूत्र आ. मलयगिरि टीका नहित", प्रज्ञापनासूत्र वृत्ति सहित', अदेगमाला कर्णिका टीका महित', तत्त्वार्थसूत्र, तिलकाचार्य गीलतर्राङ्गिणी (गीलोपदेशमाला वृति), भक्तामर आदि. २ १. ५८-01. शी. ५-३ अ ५७-31.अ.८२-२, ५.अ.२-01६.६-१८५४-०1८.१०९-१ '. परदेशनालागिकाटी-~नदा नगिन् तर बिन्दोमंनि मसिस। आजगामाविहार्यन्ना . कुडयमन्म्याटय नमः। म प्रत्ययोगदाद, प्रनिगूगंमयानरः । इति (म. ११८-२) १० यदुक्त निलमण: उगमेन्दादि यावाने वोः पनठा- मन्त्राा मानुन्चदंगस्वप्ना प्रथम प्रामांना कान पनि (२. ५-२), अवोत्याय गीना ना, मेश्यालयन दिगोमः। अगंगा नाराबहाहेला पन्चतरा इति निलकाचार्यः (अ२३-१)। नाट्याक्तिः बांहो, Tiमादार मानवान्, इनि निवाचार्य: (द. १३-1) ११ कागत् पम्मुगमापात, प्रनारितग्य पगा। हाहारमा लोक, पंचर हलवान् दिपम्। इनि गौरतरदिगनी (अ.!-1) ४६ , इन ग्रन्थों के नामोल्लेख तथा उद्धरणों के अतिरिक्त कई स्थलों पर 'इति ऋग्वेदकाण्डे, इति श्रुतिः२, इति स्मृति., इति आगम.१, इत्याचार्याः५, यल्लक्ष्यं ६, यद्वद्या "," आदि कहकर उन्होंने प्रचुरमात्रा में उद्धरण अपने टीका-ग्रंथों में दिये है। उपाध्याय पद गणि, वाचनाचार्य और उपाध्याय पद उन्हें कब और किसके द्वारा प्राप्त हुये इसका कुछ भी पता नही है । इनकी सर्व प्रथम कृति शीलोञ्छनाममाला टीका (र. स १६५४) में १ ज ७०-२ २ दशमे मामि सूने , इति श्रुते (अ. १८३-१) ३ नवमे दशमे वापि प्रबले मूतिमारुतं । निस्मार्यते वाण इथ, यन्त्र- छिद्रेण सज्ज्वर । इति स्मृतेश्च ॥ पुन्नाम्नो नरकाद् यस्मात् पितर गायरो मुत । तत पुत्र इति प्रोक्न , स्वयमेव स्वयम्भुवा। इति म्मृति (अ. ८३-१)। ४ कर्पूरागुरुकस्तूरी कक्कोलंयंक्षकदम । पत पिण्डीकृतक्षप्रिय पर. सदर मरित्यागम । (अ ५२-२)। यदागम --अभिचरन् श्यनेन यजेन इति, (अ. ७२-२)। अवेक्षण अवेक्षा अवधान इत्यर्थ , इत्याचार्याश्च । अतिमर्जन समर्प- गमिन्यथं , इत्याचार्या (अ १४१-१) । यथा एकमेव वरपुमा- मुनराज्यमुनाश्रम , इनि हम्माहरापायां, (अ. १४३-२) ६ यल्लक्ष्यम् -- उपाजितानामना, त्याग एर हि रक्षणम । सडागो- हरमग्यान परीयाह याम्भमा । (अ. ९७-२) ' यद्यचा ---कृष्ण मोयलगुणा स्वर्ण गन्धजिने । ( ८४-१)।
'श्रीज्ञानविमलपाठक-सत्तादाम्भोजचञ्चरीकेण ।श्रीवल्लभेन रचिता, शोलोञ्छनास्त्रे शुभा टीका |॥१६॥" श्रीवल्लभेन पद आता है और द्वितीय रचना गेपसग्रह दीपिका (र. सं. १६५४ था. कृ. ८) में भी "गुरूणामन्तिपदाऽणुना श्रीवल्लभेन" पद प्राप्त होता है। यही नहीं किन्तु इनके गुरु उ. श्रीज्ञानविमल रचित शब्दप्रभेद वृत्ति में, जो इनके गाढसहायता से पूर्ण हुई थी; 'अस्मदन्तिपदो विद्वच्छीवल्लभ : ' शब्द ही आता है। इनके नाम के साथ में मं. १६५४ तक किसी प्रकार की उपाधि या विगेपण प्राप्त नहीं होता । किन्नु तदनन्तर को समग्र रचनाओं में गणि और याचनाचार्य पद का प्रयोग देखने में आता है। मं. १६५४ के एक वर्ष पश्चात् ही की रचना ‘उपकेश गब्द व्युत्पत्ति' (र. स. १६५५) में पण्डितश्रीवल्लभगणि- विरचिता' उल्लेख है । अत : मभव है कि मं १६५४ के अन्न में ही अयदा १६५५ में के प्रारम्भ में ही आपको गणि पद प्राप्त हुआ हो! पच्चात् यरजिनस्तदवृत्ति में 'श्रीवल्लभेन गणिना वै ' दुगंपदप्रयोपवृत्ति (र. मुं. १६६१) में 'वाचक', अनिधान चिन्तामणि नाममाला टीका (र. मं. १६६७), विद्वत्प्रयोधकाव्य और मारस्वत मूत्र के कंगा पद्य की टीका मे क्रमटा : 'नच्छिप्यो वाचनानायों वादि श्रीवल्लभः'' 'वाचनाचार्यधुर्यश्रीगीवल्लभगणीश्वर :' गया 'वाचनाचार्य' लिना प्राप्त होता है । उपाध्याय पद का उल्लंग हमें सर्वप्रथम चतुदंगस्वर- म्यापन वादस्यल (रस. १६७४ मे १६६०) में श्रीवल्लभ ४९ होकर नहीं किन्तु वस्तु-निरूपण की दृष्टि से) अपने ग्रन्थों में उ. धर्मसागर प्ररूपित प्रश्नों को सरलता पूर्वक खण्डन कर स्वच्छ की आचरणाओं का मण्डन कर रहे थे । इन दोनों गच्छों के विवाद ही नहीं, किन्तु विजयदेवसूरि (जिनके लिये उ. श्रीवल्लभ ने विजयदेवमहात्म्य की रचना की) के समय मे तपगच्छ में भी 'विजय' और 'सागर' के विवाद समाज में ऐसे विपले बीजों का वपन कर रहे थे, जिससे समाज का संगठन छिन्न-भिन्न हो जाय । किन्तु तत्कालीन गच्छनायकों की चातुरी से समाज छिन्न-भिन्न तो नही हुआ परन्तु दो टुकडे अवश्य हो गये; जो आज भी मौजूद है। ऐसे विक्षेप के समय में 'वादी' होते हुए भी श्रीवल्लभ का इन प्रपञ्चों में फंसना प्रतीत नही होता और न किसी अन्य में इनका इस विषय में कोई उल्लेख ही प्राप्त होता है । अतः यह निश्चित है कि श्रीवल्लभ दोनों गच्छों के संघर्ष में तटस्थ ही रहे थे। वे किसी प्रकार के वादों में पड़कर स्वसमय को नष्ट करना नही चाहते थे। जिस समय तपगच्छ के साधु खरतरगच्छ के आचार्यों को प्रशंसा करना तो दूर उनकी कोति का श्रवण करना भी अच्छा नहीं समझते थे और इसी प्रकार सरतरगच्छ के माधु भी तपगच्छ के प्रमाविक पुरपों का कीर्तिगान करने में सकुचाते थे। यद्यपि उ. समयसुन्दरजी ने पार्श्व- १. देखें-विजयनिला मूरि राम
४८८
पाटक' पद मिलता है और विजयदेव माहात्म्य (जिसकी
रचना अनुमानत · १६८७ के आस-पास हुई थी, जो गायद
उनको अन्तिम रचना थी) में 'श्रीवल्लभोपाध्याय विरचिते'
मिलता है । अत · संभव है कि स. १६६७ और १६८७ के
मध्य में आचार्य जिनसिंहमूरि ने या आचार्य जिनराजसूरि
ने उन्हें यह पद प्रदान किया हो !
साथ ही अभिधान चिन्तामणि नाममाला-वृत्ति की
प्रशस्ति में "वादि : श्रीवल्लभ .' शब्द से यह अनुमान
लगाया जा सकता है कि इन्होंने सं. १६६७ पूर्व ही कहीं
पर किसी विद्वान से शास्त्रार्थ किया और उसे पराजित
कर स्वयं ने विजय पताका प्राप्त की हो । अन्यथा हेमें
उदारमना महर्पि अपने लिये व्यर्थ की उपाधि का प्रयोग
न करते।
विशालहृदयता
उस समय खरतरगच्छ और तपगच्छ मे विधिवाद
विषयक विवाद प्रवल वेग से चल रहा था. और उसमें दोनो
गच्छों के प्रमुख-प्रमुख व्यक्ति भाग ले रहे थे । इधर
तपगच्छ की ओर से उ० धर्ममागर, नेमिसागर, लब्धिसागर
और खरतरगच्छ की तरफ से महोपाध्याय धनचन्द्र,
महो, माघुतीति उ. जयसोम उ. गुणविनय, मतिकोनि
आदि लगे हुये थे। यही नहीं किन्तु सर्व गच्छ
माननीय मान्तमना महपि
समयसुन्दर
जंगे भी (किसी पूर्याभिनिवेग या दुराग्रह के बगीभून
उपाध्याय
४९ होकर नहीं किन्तु वस्तु-निरूपण की दृष्टि से) अपने ग्रन्यों में उ. धर्मसागर प्ररूपित प्रश्नों को सरलता पूर्वक खण्डन कर स्वगच्छ की आचरणाओं का मण्डन कर रहे थे । इन दोनों गच्छों के विवाद ही नहीं, किन्तु विजयदेवसूरि (जिनके लिये उ. श्रीवल्लभ ने विजयदेवमहात्म्य की रचना को) के समय में तपगच्छ में भी 'विजय' और 'सागर' के विवाद समाज में ऐसे विपले बीजों का वपन कर रहे थे, जिससे समाज का संगठन छिन्न-भिन्न हो जाय । किन्तु तत्कालीन गच्छनायकों की चातुरी से समाज छिन्न-भिन्न तो नहीं हुआ परन्तु दो टुकडे अवश्य हो गये; जो आज भी मौजूद है। ऐसे विक्षेप के समय में 'दादी' होते हुए भी श्रीवल्लभ का इन प्रपञ्चों में फंसना प्रतीत नहीं होता और न किसी अन्य में इनका इस विषय में कोई उल्लेख ही प्राप्त होता है । अतः यह निश्चित है कि श्रीवल्लभ दोनों गच्छों के संघर्ष में तटस्य ही रहे थे। वे किती प्रकार के वादों में पड़कर स्वसमय को नष्ट करना नहीं चाहते थे। जिस ममय तपगच्छ के साधु खरतरगच्छ के आचार्यों को प्रशंसा करना तो दूर उनको कीर्ति का श्रवण करना भी अच्छा नहीं समझते थे और इसी प्रकार सरतरगच्छ के गाधु भी तपगच्छ के प्रभाविक पुरपों का कीर्तिगान करने में सकुचाते थे। यद्यपि उ. समयसुन्दरजी ने पाश्व- १. देखें-विजयतिलरमूरि राम ५० " चन्द्रगच्छीय पूंजा ऋषि का गुणवर्णन मुक्तकण्ठ से किया है तथा खरतर, तपा, अञ्चल इन तीनों गच्छों के आचार्यों का सुललित पद्यों में " भट्टारक तीन भए बड़भागी' कहकर गुणगान किया है। जो तत्कालीन समग्र साहित्य में अपवादरूप ही समझना चाहिए। ऐसे समय में तप- गच्छीय प्रसिद्ध आचार्य विजयदेवसूरिजी महाराज के चारि- त्रिक गुणों से प्रभावित होकर कवि ने १८ सर्गात्मक विजय- देवमाहात्म्य नामक महाकाव्य की रचना की और इससे अपनी माध्यस्थता, उदारता, विशालहृदयता का परिचय दिया। इसके सम्बन्ध में मुनि जिनविजयजी विज्ञप्ति त्रिवेणी' की प्रस्तावना में लिखते है. "श्रीवल्लभोपाध्याय की कृतियों में से एक कृति वड़ी ध्यान खीचने लायक है। इसका नाम है विजयदेव- महात्म्य । इसमे तपगच्छ के प्रसिद्ध आचार्य श्री विजयदेव- सूरि का सविस्तर जीवन-चरित्र दर्णन किया गया है । (ध्यान में रहे कि चरित्रनायक और चरित्रलेखक दोनों समकालीन है और विजयदेवमूरि अपने महात्म्य के निर्माण के समय में विद्यमान थे।) उस समय परस्पर साम्प्रदायिक विरोध इतना वढा हुआ था कि एक गच्छ वाले दूसरे गच्छ के प्रतिष्ठित व्यक्ति के गुणानुवाद करना तो दूर रहे परन्तु श्रवण मे भी मध्यस्थता नही दिसला मकते थे । अर्थात् तपागच्छ वाले खरतरगच्छीय व्यक्ति के प्रति अपना बहुमान नहीं दिखा सकते थे और खरतरगच्छानुयायी नपागच्छ के प्रसिद्ध पुरुष की प्रमंमा करने दिल में दुःम
५१
मनाते थे। ऐसी दगा में, खरतरगच्छीय एक विद्वान
उपाध्याय के द्वारा तपागच्छे के एक आचार्य के गुणगान
में वड़ा ग्रन्य लिखा जाने वाला काम अवश्य आश्चर्य
उत्पन्न करता है । समाज की यह विरोधात्मक प्रकृति,
श्री वल्लभ पाठक के ध्यान से वहार न थी । वे इस वात
को अच्छी तरह जानते थे कि मेरे इन-भिन्न गच्छ के
आचार्य की प्रगंमा और स्तवना करने वाले ग्रन्थ के
लिखने रूप - कार्य से बहुत से दुराग्रही और स्वसाम्प्रदायिक
असन्तुष्ट होकर मुझ पर कटाक्ष करेंगे । इसलिये इन्होंने
अन्य के अन्त में, संक्षेप में परन्तु असरकारक गब्दों में
लिम दिया है
यदन्यगच्छप्रभवः कविः किं , मुक्त्वा स्वमूरि तपगच्छमूरैः ।
कयं चरित्रं कुरुते पवित्रं, शरेयमार्यनं कदापि कार्या ।।
आत्मार्थमिद्धिः किल कम्य नेप्टा.
मा तु स्तुतेरेव महात्मनां स्यात् ।
आमाणकोऽपि प्रथितोऽस्ति लोके,
गङ्गा हि कस्यापि न पंतृकीयम् ।।
नस्मान्मया केवलमयंसिद्धच-जिह्वापवित्रीकरणाय यद्वा ।
इति स्तुतः श्रोविजयादिदेवः, मूरिस्ममं श्रीविजयादिसिंहः ।।
अर्थात् -
अन्य (खरतर) गच्छ वाला कवि अपने
गच्छ के आवायं को छोड़कर तपागच्छ के आचार्य का
नरित्र कसे बनाता है, यह शंका विद्वान् मनुप्यों को न
लानी चाहिए। क्यों कि आत्ममिदि किमे अभीष्ट नहीं
५२ है?- सभी को इष्ट है। यह आत्मसिद्धि महात्माओं की स्तुति द्वारा होती है। और महात्माओं के लिये यह कोई नियम नहीं है कि वे अमुक पंथ या समुदाय में ही उत्पन्न हुआ करते है और यह भी कोई प्रतिवन्ध नही है कि अमुक मतानुयापी अमुक ही महात्माओं की स्तवना करे। जैसे गंगा किसी के बाप की नहीं है - सब ही उसके अमृतमय जल का पान कर सकते है - वैसे महात्माओ भी किसी के रजिष्टडं नही किये हुए है, सव ही मनुष्य अपनी अपनी इच्छानुसार उनके गुणगान कर अपनी उन्नति कर सकते है। इसलिये मैने- खरतर- गच्छानुयायी होकर भी - अपनी जिह्वा को पवित्र करने के लिये तपागच्छ के महात्मा श्रीविजयदेवसूरि और (उनके गिप्य) विजयसिंहसूरि का यह पवित्र चरित्र लिखा है। इस विषय में किसी को उद्वेगजनक विकल्प करने की जरूरत नहीं है। वाह ! कैसी उदार दृष्टि और गुणानुराग !। यदि केवल इन ही ३ पद्यों का स्मरण और मनन हमारा आधुनिक जैन-समाज करे तो थोड़े ही दिनों मे वह उन्नति के शिखर पर आरूढ हो सकता है । मामनदेव वह दिन शीघ्र दिखावें । (पृ. ८२-८४)" इनके उदारहृदय का परिचय देने वाली एक घटना और हुई । श्वेताम्बर जैनों में एक गच्छ है जिसका नाम है उपकेश। श्रीवल्लभजी के समकालीन उपकेशगच्छनायक श्रीमिदमूरि ने चाहा कि 'उनके गच्छ के नाम की एक गुन्दर व्युत्पत्ति हो जाय ।' इस काम के लिये उन्होंने -
श्रीवल्लभजी से आग्रह किया । इस पर उन्होंने उनके
आग्रह को स्वीकार कर "ओकेश-उपकेश-पद-दशार्थी"
की सं. १६५५ मे विक्रमनगर (बीकानेर) में बड़े विलक्षण
ढग से रचना की । इससे भी स्पष्ट है कि इनके हृदय
में साम्प्रदायिक भावों का लवलेश भी नही था, अपितु वे
सहृदय उदार थे।
बिहार और शिष्यपरम्परा
इनके ग्रन्यों के अवलोकन से ऐसा प्रतीत होता है
कि इनका वाल्यजीवन और प्रौढावस्था का समय राजस्थान
में ही व्यतीत हुआ है । किन्तु विजयदेव महात्म्य को
देखते हुए यह कल्पना की जा सकती है कि कवि वृद्धा-
वस्था में 'गुर्जर' देश पहुंचे और वही पर विजयदेव के
चारित्र और तप से आकृष्ट होकर विजयदेव महात्म्य की
रचना की । इसलिये बहुत संभव है कि उनकी वृद्धावस्था
वही पूर्ण हुई हो, और उनका स्वर्गवास भी उसी प्रदेश
में हुआ हो।
सब से बड़ी आश्चर्य की वस्तु यह है कि कवि की
परम्परा पली हो-ऐसा प्रतीत नही होता, और न इस
सम्बन्ध में किगी प्रकार के उल्लेस ही मिलते है । अथवा
उनके स्वय के शिप्य हों तो भी यह निश्चित है कि इनकी
परम्परा दीर्घकाल तक नहीं चली अन्यथा उनमें से कोई
तो विद्वान आदि भी होता जिनका कोई न कोई उल्लेख
अवश्य मिलता।
५४
साहित्य - सर्जना
उपाध्याय श्रीवल्लभ का अरजिनस्तव उनके अनेक
ग्रन्थों में से एक ग्रन्थ है। इस अन्य के अतिरिक्त उन्होने
अनेक ग्रन्थ लिखे जिन में से कुल मिलाकर छोटे-मोटे
१४ ग्रन्थ अबतक उपलब्ध हो चुके हैं। इनमे से ५ तो
मौलिक कृतियाँ है और अन्य व्याकरण एवं कोषों पर
टीकाएँ । चाहे इनके काव्यों को देखिए अथवा टीका
ग्रन्थों को, प्रत्येक पृष्ठ पर लेखक का प्रकाण्ड-पाण्डित्य
और सौजन्यपूर्ण औदार्य प्रस्फुटित हो रहा है । सब
रचनाओं का तो पूर्ण परिचय करवाना यहाँ सभव नही
है, केवल उनका संक्षिप्त परिचय मात्र यहाँ दिया जा
रहा है जो, मेरी समझ मे, लेखक की प्रतिभा और निपुणता
को प्रकाशित करने के लिये बहुत कुछ पर्याप्त है ।
मौलिक-ग्रन्थ
विजयदेवमाहात्म्य-महाकाव्य
१७वी शती के तपगच्छ साम्राज्य के अधिपति आचार्य
विजयदेवसूरि के माहात्म्य का वर्णन होने से इम महा-
काव्य का नाम भी विजयदेव माहात्म्य महाकाव्य रखा
गया। माहित्यदर्पणकार के मतानुसार महाकाव्य के जो
लक्षण पप्ठ परिच्छेद में विश्वनाथ ने दिये है उन लक्षणो
१. विजयदेवरोणा, माहात्म्य अधिक गा॥२॥
दिजय देवमाम्य, वयतन यतीन्दनम् ।
विजयदेवमाहाम्य, नामकाथ्य मन स्मृतम् ॥३॥
से तुलना करने पर यह 'माहात्म्य' भी महाकाव्य की कोटि में आता है । इसके नायक, विजयदेवसूरि धीरोदात्त और देवत्व गुण से परिपूर्ण है । इसमें शान्तरस मुख्य है । इराका कथानक महात्मा के जीवन-चरित पर आश्रित है और तत्कालीन परिस्थितियों का सांगोपाङ्ग वर्णन होने से ऐतिहासिक भी है। इसमे धर्मफल की प्रधानता है । आदि में नमस्कार और कथानक-वस्तु का निर्देश भी है । इसमे १६ सर्ग है, सर्गस्थ श्लोकों की संख्या मध्यम है, हाँ, नवम सर्ग के श्लोको की संख्या अन्य सों की अपेक्षा अधिक है। इसमें ३६६ पद्य है। प्रत्येक सर्ग एक ही छन्द मे अनुस्यूत है, तथा अन्तिम वृत्त अन्य छन्द में ग्रथित है। इसमें कई स्थलों पर 'सागर' आदि खलों को निन्दा और महापुरुषों का गुणगान भी किया गया है । प्रमङ्गोपात पुत्र जन्म, विवाह (दीक्षा), मुनि, स्वर्ग, सूर्य, चन्द्र, मागर आदि का वर्णन भी है। स्थान- स्थान पर अनुप्रास, इलेप, यमक, वक्रोक्ति, अर्थान्तरन्यास, अतिशयोक्ति, अन्योक्ति, विरोध, उपमा, रूपक आदि अलंकारों का इसमे अच्छा समावेश किया है। अत : यह काव्य वेवल महात्म्य ही नहीं है किन्तु लक्षणसिद्ध घटना पहल महाकाव्य है। इनका रचना ममय अनात है । महाकवि ने प्रगस्ति इनका कोई उल्लेरा नहीं किया है, किन्तु इन महात्म्य का आलोडन करने पर यह निणर्ष निकाला जा मकता २.देग, एदन गर्ग - है कि इसकी रचना सं. १६८७ के पश्चात् ही कवि ने की है । इसका आधार यह है कि कवि चरितनायक के जन्म काल १६३४ से लेकर १६८७ तक की क्रमवद्ध घटनाओं का वर्णन सांगोपाङ्ग करता है । नायक का देहावसान १७१३ में हुआ है। कवि उनके देहावसान का तो क्या, किन्तु चरितनायक के १६८० के बाद दक्षिण देश में पधारने और काफी समय तक इस प्रदेश में विचरण करने का उल्लेख भी नहीं करता । १६८४ मे विजयदेव- सूरि ने विजयसिंहसूरि को भट्टारक पद दिया और १६८६ में स्वर्णगिरि (जालोर) मे प्रतिष्ठा करवामी । स. १६८७ में मेदिनीतट२ (वर्तमान-मेड़ता सिटी) मे प्रतिष्ठा करवाई और उसके पश्चात् करवाया गंगाणी तीर्थ का जीर्णोद्धार । इसके पश्चात् काव्य मे कोई जीवन की उल्लेखनीय घटना नहीं है, किन्तु जहाँगीर पर प्रभाव, तपवर्णन, चारित्रवर्णन, और गुणवर्णनों मे ही आगे के सर्ग पूर्ण किये गये हैं। इसमें एक और घटना का उल्लेख है १ पोडास्य मतस्यास्मिन्, पडमीनितमेब्दके। प्रथमाषाढपक्षम्य, कृष्ण पञ्चमवासरे। ॥१६॥ प्रन्यनिष्ठ जिनेन्द्राणां, प्रतिमा प्रनिमाग्रिमा। विनपदेवगूरीन्द्रः श्री गायारपुरेवरे ॥ १७ ॥ त्रयोदा सर्ग । २. पोटगस्य शतस्यास्मिन्, गप्नागीतितमेदव। प्रतिमाना प्रतिप्टाऽभूदेव धीमेदिनीतटे ॥ १२॥ १३ स. २. देखें, १८ वा मर्ग
५७
मेघजी' आदि मुख्य श्रावकवर्ग ने 'सागरमत' का त्याग
कर, पुन: गुरु से वासक्षेप प्राप्त कर वोधिलाभ उपार्जन
किया । इसका भी समय अवचूरिकार ने सं. १६८७
दिया है । अत: यह अनुमान ठीक ही प्रतीत होता है
कि इसकी रचना १६८७ ने अन्त में ही हुई है । अन्यथा
१६८८ की भी कोई घटना का उल्लेस अवश्य किया जाता ।
कवि ने काव्य के प्रथम और द्वितीय मर्ग में
चरितनायक का जन्म, विद्याभ्यास, वैवाहिक बन्धनों को
न स्वीकार कर ब्रह्मचारी रहने की अत्युत्कट अभिलापा
और संयम के प्रति नाकर्षण का वर्णन किया है। ३-४
मर्ग में आचार्य हीरविजयमूरि का प्रभाव वर्णन और
विजयमेनमूरि का जीवन-चरित है । ५-७ सों माता
सहित चरितनायक को दीक्षा, गारयाभ्यास, विजयमेनमूरि
के नाय मम्राट अकबर में मिलाप तथा चरितनाव के
गणि और आचार्य पद प्राप्ति का वर्णन किया गया है ।
८ वे मर्ग में कनकविजयादि मिल्यों का और ६-१० में
प्रतिष्ठा, चातुर्माग, दीक्षाप्रदान और विजयसिंहमूरि को
स्व पट्ट पर अभिपिक्ति करने का वर्णन मिलता है।
११ में 'सागरपक्षीय' प्रतिवादियों को पराजित करने
का उल्लेख है । १२-१४ में पाली नवलक्ष प्रनाद पानाय,
१ गागरीय तं सपदा, मेघाद्या यादमुपाः ।
योधि माना गुरो रेव, पापनारयन् ॥ १९॥ १ ,
२. xxx १६८० या यन्मनरपि दरमागरी मनं पिबदा गा.
मंपादाः याः थावसा: xxx देखें. पृष्ठ १२६
. विद्वत्प्रबोधनामायं, ग्रन्थो विद्वत्प्रबोधकृत् । स्फूजच्छी बलभद्रे, श्रीपलभद्रपुरे बरे ॥२॥ विद्वद्गोप्ठ्यां विशिष्टायां, संजतायां प्रयोजनन् । एतद्ग्रन्यस्य मेघाव्यभिमानोन्मथनाय वै ।।३।। संयोगिवणं निगृणाति विद्वान्, योऽयं तमादौ च विधाय विद्वान् । दिव्येषु पादेषु चतुप्वंगः, सद्यः मुपद्य विदधातु हृद्यम् ।।४।। इममें तीन परिच्छेद है और प्रत्येक में क्रमशः ५६,६० तया २१ पद्य है । प्रथम परिच्छेद में चतुष्पादधारी गज, अश्व, वृपम, सिंह और उष्ट्र का वर्णन है । द्वितीय परिच्छेद में द्विपदधारी गुफ, तित्तिरि, हम, बक, चक्रवाक, मारस, टिट्टिभ, मयूर और चाप पक्षियों का वर्णन है तथा तृतीय परिच्छेद में माधु, पण्डित और वीर का गंयोगि वर्गों को ग्रहण कर वर्णन किया है । मंयुक्न वर्गों के आधार पर इस प्रकार की विद्वतापूर्ण रचना जैन-माहित्य में ही नहीं अपितु भारतीय माहित्य मे भी इनी-गिनी ही प्राप्त है । दम दृष्टि में यह काव्य कवि की कग्वल कीति को भारतीय वाटमय में अमर रखने के लिये पर्याप्त है । यह काव्य जिनदतमूरि ज्ञान भण्डार मूल द्वारा महावीर म्नोत्र के माथ प्रकागित हो चुका है। घतुर्दशास्वरस्यापनवादस्यल इम ग्रन्य में मारस्वत व्याकरण में उल्लिवित १४ चौदन स्वर्ग की स्थापना की गई है। किमी 'कूर्चाल मुरम्वतीविरदं मन्यमान ' प्रतिवादी ने पाच विकल्पों के ५८ जालोर, मेडता आदि प्रतिष्ठाओं का विशद वर्णन तथा तथा गँगाणी तीर्थ के जीर्णोद्धार का प्रसंग कवि ने सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है। १६ मे तपवर्णन, १७ वें में स्तम्भतीर्थ चातुर्मास वर्णन, १८ वे में सम्राट् जहाँगीर पर प्रभाव और महातपा विरुद प्राप्ति तथा सागर पराजय का वर्णन है और १९ वे सर्ग मे नायक के औदार्यादि गुणों का व्याख्यान है। यह कवि की अन्तिम रचना है। इसके पश्चात् की कोई भी कृति प्राप्त नही होती है । इस काव्य के ऊपर सम सामयिक प्रसिद्ध साहित्यकार उपाध्याय श्रीमेघ- विजयजी प्रणीत अवचूरि प्राप्त है । इस काव्य की दो सुन्दर प्रतियाँ जयचन्द्रजी भण्डार बीकानेर य हरिसागरमूरि भण्डार लोहावट में है । विद्वत्प्रयोप काव्य के अन्त में निर्माण काल का उल्लेस न होने मे ममयनिर्धारण नहीं किया जा गकता। किन्तु यह रचना अत्यल प्रोड, क्लिष्ट एव पाण्डित्य पूर्ण होने के कारण गं. १६६० के पश्चात् को ही लगती है। इसकी ग्लना बलमदपुर (गभव है उगे ही आज-कल 'बालोतरा' परते हों, जो जोधपुर स्टेट में पचादरा परगने मे है) में श्रीवासना की विशिष्ट विद्गोप्टी में प्रयोजन उपस्थित होने पर मेधादियों में अभिमान को मपन फरने या गिये पी गई है :- - - विद्वत्प्रबोधनामायं, ग्रन्थो विद्वत्प्रबोधकृत् । स्फूर्जच्छी बलभद्रे, श्रीपलभद्रपुरे वरे ॥२॥ विद्वद्गोष्ठयां विशिष्टायां, संजतायां प्रयोजनन् । एतद्ग्रन्यस्य मेधाव्यभिमानोन्मथनाय वै ॥३॥ सयोगिवर्ण निगृणाति विद्वान्, योऽयं तमादौ च विधाय विद्वान् । दिव्येषु पादेषु चतुर्वशङ्कः, सद्यः सुपद्यं विदधातु हृद्यम् ।।४।। इसमें तीन परिच्छेद है और प्रत्येक में प्रमशः ५६,६० तथा २१ पद्य है । प्रथम परिच्छेद मे चतुप्पादधारी गज, अश्व, वृपभ, सिंह और उष्ट्र का वर्णन है । द्वितीय परिच्छेद में द्विपदधारी शुक, तितिरि, हंस, बक, चक्रवाक, मारस, टिट्टिभ, मयूर और चाप पक्षियों का वर्णन है तथा तृतीय परिच्छेद में साधु, पण्डित और वीर का गयोगि वर्णों को ग्रहण कर वर्णन किया है । संयुक्त वर्गों के आधार पर इस प्रकार की विद्वतापूर्ण रचना जैन-माहित्य में ही नहीं अपितु भारतीय साहित्य में भी इनी-गिनी ही प्राप्त है। इस दृष्टि से यह काव्य कवि को कम्बल कीति को भारतीय वाडमय में अमर रखने के लिये पर्याप्त है। यह काव्य जिनदत्तमूरि ज्ञान भण्डार यूरत द्वारा महावीर स्तोत्र के गाथ प्रकाशित हो चुका है। धतुर्दशस्यरस्थापनवादस्यल इम ग्रन्थ में गारस्वत व्याकरण में उल्लिखित १४ गोदा स्वरों की स्थापना की गई है। किसी 'कूर्चाल गरस्वतीविरदं मन्यमान । प्रतियादी ने पांच विकल्पों के पुस्तिका से ज्ञात नहीं होता । यह रचना श्रीजिनराजसूरि के राज्य में हुई है, इवं इसमें अपने लिये कवि ने उपाध्याय पद का उपयोग किया है । अतः यह रचना सं. १६७४ के पश्चात् की है । यह वादस्थर बहुत ही छोटा है । इमको प्रेसकॉपी मेरे संग्रह में है । अभिधान चिन्तामणि नाममाला टीका की प्रशस्ति में कवि के नाम के साथ 'वादी श्रीवल्लभः' वादी विशेषण का प्रयोग देसने में आता है । अतः यह स्पप्ट है कि स. १६६७ के पूर्व में ही आपने किसी वादी के साथ शास्त्रार्थ कर उसे पराजित कर विजयलक्ष्मी प्राप्त कर अपने लिये 'वादी' विशेपण का उपयोग किया हो और सं. १६७४ के पश्चात् यह १४ स्वरों विषयक वाद दूसरी यार हुआ हो । उपयशशब्दव्युत्पत्ति सं. १६५५में विक्रमनगर (बीकानेर) में उपकेशगच्छीय फकुदाचार्य सन्तानीय श्रीसिद्धमूरि के आग्रह से उदारता पूर्वक ओफेश बोर उपकेया इन दोनों शब्दों के ५-५ अर्य व्युत्पत्ति प्रदर्गन पूर्वक बहुत ही सुन्दर पद्धति से लिरो है : "सं. १६५५व श्रीमद्विक्रमनगरे सकलवादिवृन्दकन्द- मुद्दालकदाचार्यसन्तानीय श्रीगच्छी शिद्धगूरीश्वराणामानहतः थोमवृरलारतरगच्छीय वाचनाचार्यधुर्यश्रीज्ञापविमल- १. पीडितरानगूरीन्द्रे, पनराज विधाारि । भस्मिन् परतरे ग, धर्मराग्यं पिघातरि ॥१॥ :- " श्रीवल्लभ ही इस में अपने लिये श्रीवल्लभ ने "श्रीवल्लभेन गणिना गणि शब्द का प्रयोग किया है। उपाध्याय पद प्रकरण में हम देख चुके है कि स. १६५५ में आप को गणि पद प्राप्त हुमा था; सं. १९५४ तक तो आप केवल मुनि । अतः इस की रचना १६५५ के बाद की ही है । और दूसरी बात, 'श्रीमच्छीजिनचन्द्राभिधान- मूरिष्वधीगेपु' श्रीजिनचन्द्रमूरि के विजय राज्य में आता है । आचार्य जिनचन्द्र का १६७० में स्वर्गवास हुआ था, अत: १६५५ और १६७० के मध्यकाल में दस की रचना हुई है, स्पष्ट है । साथ ही यह मानना भी अनुपयुक्त न होगा कि मूल और टीका की रचना माथ-माय ही हुई है। , इस यह लेसक के प्रौढावस्या की रचना है; अतइम की भाषा भी बहुत ही प्राञ्जल और प्रवाहपूर्ण है । म्नोग में लेखक को भनिणन और अप्रचलित शब्दों को खारमित करने के लिये जिम योजना-कौगल और पाण्डित्य की आवश्यकता थी यह इसमें पूर्णरूपेण विद्यमान है । जहाँ १००० रकार प्रधान काव्य की रचना करना हो, वहीं उस फाव्य में प्रायः अधिक शब्द तो अप्रसिद्ध ही प्रयुक्त होते हैं उन्हें सिद्ध करने के लिये उणादिगून और अनेकार्थी नपा एकाक्षरी नाममालाओ या आश्रय लेना पड़ता है । टीकाकार ने भी इनमें हमव्याकरण, उणादिमूग, धातु- पारायण, कविकल्पद्रुम, मोकायनाममाला, मोमरि, मुधा- पलग, विश्वगंभु, ध्वनिमञ्जरी आदि एकाक्षरी नाममालाओं ६२ " गणिशिप्य पण्डित श्रीवल्लभगणिविरचिता ओकेरा --उपकेश- पदद्वयदशार्थी समाप्ता । उपकेशशब्दव्युत्पत्ति की प्रायः प्रत्येक प्रतियों के साथ में ही "खरतरशब्दव्युत्पत्ति" भी लिखी हुई प्राप्त होती है । संभव है यह कृति भी आपको ही हो । टीका-ग्रन्य अरजिनस्तववृत्तिः अरजिनस्तव पर ही आप की यह स्वोपज्ञ टीका है सहस्रदलात्मक इस चित्रकाव्य पर आप की यह टीका न होती तो इस की मार्मिकता समझने में काफी असुविधाएं रहती । इस टीका का निर्माण काल लेखक ने प्रशस्ति में नहीं दिया है, फिर भी प्रशस्ति से कुछ अनुमान किया जा सकता है। परतरगणजलपिममुल्लासनरजनीपतिप्रकाराणाम् । नमानेकनराणां, श्रीजिनमाणिक्यसूरीणाम् ।। १ ।। पट्टे वरे[धि] विजयिपु, कुमतिलतायातनाशनहिमेपु । श्रीमच्छी जिन पन्द्राभिधानमूरिप्यधीशेषु ।। २ ।। येपा म्फुरत्प्रतापाधिक्रजिनः गन् निरलरं भानुः । भ्रमतितमांविपनि हिते, मानयिमलयाचका नन्द्यः ।। ३ ।। गपादाम्युजमधुकरगिप्पथोपसभेन गपिना । विरिता नववृमिरिय, पंदनतमिह तयुषः शोध्यम् ।। ४ ।।
६३ " " इस में अपने लिये श्रीवल्लभ ने श्रीवल्लभेन गणिना गणि शब्द का प्रयोग किया है। उपाध्याय पद प्रकरण में हम देख चुके है कि सं. १६५५ मे आप को गणि पद प्राप्त हुआ था; सं. १९५४ तक तो आप केवल मुनि श्रीवल्लग ही थे । अतः इस की रचना १६५५ के वाद की ही है । और दूसरी वात, 'श्रीमच्छोजिनचन्द्राभिधान- मूरिप्वपीगेषु' श्रीजिनचन्द्रसूरि के विजय राज्य में आता है । आचार्य जिनचन्द्र का १६७० में स्वर्गवास हुआ था, अतः १६५५ और १६७० के मध्यकाल में इस की रचना हुई है, स्पष्ट है । साथ ही यह मानना भी अनुपयुक्त न होगा कि मूल और टीका को रचना साथ-साथ ही हुई है। यह लेराक के प्रौढावस्या की रचना है; अतः इस की भाषा भी बहुत ही प्राञ्जल और प्रवाहपूर्ण है । इस म्नोत्र मे लेसक को अनिप्पन्न और अप्रचलित शब्दों को सारगर्भित करने के लिये जिम योजना-कौशल और पाण्डित्य यो आवश्यकता थी वह इसमें पूर्णरूपेण विद्यमान है । जहां १००० रकार प्रधान कार की रचना करना हो, वहीं उस काव्य में प्रायः अधिक शब्द तो अप्रनिद्ध ही प्रयुक्त होते हैं उन्हें सिद्ध करने के लिये उणादिगूय और अनेकार्थी तथा एकाक्षरी नाममालाओं का नाथय लेना पड़ता है । टोपाकार ने भी इसमें हमव्याकरण, उणादिनून, घातु- पारायण, कविक पदुम, अनेकार्थनाममाला, मौभरि, सुपा- पलम, विश्वरांमु, निमजरो आदि एकाक्षरी नाममालाओं दु.ख" "" के आधार पर ही शब्दों की निष्पत्ति की है। उदाहरण के लिये देखिए :- पद्य ४१ मे 'कठोरकालूरविदारसायुः' पद की व्याख्या-- "कटोरकालूरविदारमायु " कठोर-दृढ कं-दु.सं येपां ते कठोरकाः, "क शिर क सुसं तोयं, पयो सी. ए. २०] इत्युक्तेः, कठोरकाश्च ते आलूराश्च-विटाः कठोरकालूरास्तेषां विगतो दार:- भयं यस्मात् स कटोर- कालूरविदारः, आलूरशब्द उणादिविटवाची, सायाः-लक्ष्म्याः आयु:- जीवनं यस्मात् मायुः, द्वाभ्यां कर्मधारये कठोरकालूर- विदारसायुः, " ईण्क् गतो कृवापाजिस्वदिसाध्यशोदृस्ना- मनिजानिरहीणभ्य उण्" [सि है. उ मू. १ ] इति मूत्रण उण् प्रत्यये आयुरिति, पुरपः शफट औपध जीवन पुरुरवः पुत्रों का" इति आकारः पादपूरणार्थ ।।१४।। टनी प्रकार पद्य ४१ के कुछ अनी का रमास्वादन करिए .श्री अरनापजिन. 'गगरणनीरचितीर' गमरणं- ममारः " मगरण त्वराम्बाधनमूगती । ममारे" [अने. मं. का. ३ इली १४६३-६४ ] इति हमानेकाः, गसरण- गेपनीरधि:-मगारगागर., नीरसदो जलवानी मोगादिगा: सम्म नीर-पान सट पा मगरणनीरधिनीरं 'पस्कार' प्राप्तवान्, "गार फार मरणे, पदने []" नि धानुरागणवपनाद, गरपानां प्राप्यपलात् परोक्षायां गदि " ६५ रूपम् । किम्भूतः [सुश्रीः] ? , इत्वरनोद्धारपुष्करमुसूरविदार- जित्वरः' "इंण्क् गती" ज्ञानार्योऽत्र, यत्नीत्येवंशीलाः “सृजी- नशष्ट्वरप्" [सि. हे. ५-२-७७] इत्यनेन ट्वरपि इत्वरा:-पण्डिताः नाः नराः, "नो नरे च सनायेऽपि" [वि. ए. ७६] इति विश्वगम्भूक्तेः, तेषां उद्धारः-उद्धरणं संसारपातादिति येषां ते नोद्धाराः, इत्वराश्च ते नोद्धाराश्च इत्वरनोद्धाराः, त एव पुष्कराणि-पद्यानि तेषां विकासेन मुसूर इव -प्रधानभानुरिव योऽसौ इत्वरनोद्धारपुष्करसुमूरः, विदारे-सद्धग्रामे "विदारो युधि" [अने रां. का. ३ श्लो. १२०३] इति वचनप्रामाण्यात्, शत्रून् जयतीत्येवंशील: 'सृजीणनगष्ट्वरप्" [सि. है. ५-२-७७] इति ट्वरपि विदारः, इत्वरनोद्धारपुष्करमुसूरश्चासौ विदार- जित्वरश्चेति कर्मधारये इत्वरनोद्धारपुष्करमुसूरविदार- जित्वरः । पुनः किम्भूतः मुश्री: ? 'अकन्तुः' निष्काम:, 'कन्तुः कामकुमूलयोः" [अने. सं. कां. २ दलो. १७५] इत्युक्तेः । पुनः किम्भूतः सुश्रीः ? ' रपकोः' "रप भापणे' अकचि रपन्ति-मापन्ते स्याद्वादमिति रपकास्तान् अवति- रक्षति योगी तथा।" शिलोटनाममाला-वृत्ति कलिकाल सर्वज्ञ आचार्यप्रवर श्रीहेमचन्द्राचार्य प्रणीत अमिधानचिन्तामणिनाममाला की 'सिलो-४' करने की ॥
६७ दिवस मूलार्क में नागपुर (वर्तमान-नागोर) में टीका की रचना पूर्ण की। इसका ग्रंथमान १३०० श्लोक परिमाण है। संभव है इन टीका का प्रारम्भ फलवद्धि पाश्वनाथ (मेड़तारोड) में किया हो, कारण कि मङ्गलाचारण में 'श्रीमच्छोफलवद्धिकाभिधपुरी' स्थित 'पार्श्वनाथ' को नमस्कार किया है । जैसा कि प्रशस्ति से स्पष्ट है श्रीशानविमलपाठकसत्पादाम्भोजचञ्चरीकेण । श्रीवल्लभेन रचिता गिलोञ्छशाम्ने गुभा टीका ॥१६॥ हमव्याकृति-हेमोणादिग्रंयादिनामकोशांश्च । दृष्ट्वा विमृश्य वाद, प्रमादमासाद्यपूज्यानाम् ॥२०॥ वैदेन्द्रियरमपृथ्वीसहये वसु नागपुरनगरे । मधुमामाये पक्ष मूलार्के मप्तमोतिय्याम् ।। २१ ।। प्रयोदशगतान्येवं, ग्रन्यमान विनिश्चितम् । अस्याः गिलोञ्टीकायाः, अनुमित्या कृतं शुभम् ॥२८ ।। यह बाप की मर्वप्रयम टोकाकृति है । शेषसंग्रह दीपिका अभिपानचिन्तामणिनाममाला में कधित शब्दों के अतिरिवन शब्दों का संग्रह आना हेमचन्द्र ने 'मेषसंग्रह- नाममाला' फेम्प में किया । इन को टीका 'दीपिका' के नाम में, हमव्याकरण, हमोगादि, धातुपारायग, विश्व- गोष, अनेकार्यकोप, संजयन्ती, वाचम्पति, मारप्डेयपुराण आदि प्रन्यों का अपलोकन कर, गं. १६५४ श्रावण मुक्त ६८ . अष्टमी को बीकानेर में, नृपति श्रीरायसिंहजी के विजय राज्य में, १६०० ग्रन्य परिमाण रचना पूर्ण की :-- तेपां दिस्यातकोत्रीणां, गुरूणामन्तिपदाऽणुना । कृता श्रीवल्लभेनेयं, शेपसंग्रहदीपिका ॥ १८ ।। हमव्याकरणोणादिधातुपारायणानि च । विश्वकोपाद्यनेकार्थनामकोशकदम्बकम् ॥ १६ ॥ वर्षे शतानन्दमुखेन्द्रियेशपुत्राननाजप्रमिते वरिष्लै । अष्टम्यहे मासि नभम्य कृष्ण श्रेष्ठे पुरे विक्रमनामधेये ॥२०॥ थीविक्रमवगोद्भवमद्विक्रमराजसिंहनृपराज्ये । सल्लोककोकसम्मदविधानभानू परे रम्ये ।। २१ ॥ अभिधान चिन्तामपिनामनाला-सारोद्धार-टीका आपने आचार्य हेमचन्द्र प्रपीत अभिघानचिन्तामणि- गागमाला पर सं १६६७ में, जोयपुर गें, महाराजा श्रीगूरनिहजी के राज्यन्यकाल में 'मारोदार' नामक विस्तृत टीकापी रचना पूर्ण पी :- तथा योधपुरदमे, मूरनिहन रेगितु. । गये प पारे गपापटिपचन्द्रमम्मिो ।। ७ ।। गन्धियो वासनापार्यों यादी श्रीपालभोग्नुमन् । श्रीगनाममालाया , गाम्नां मारोनिनाम् ॥११॥ মালালাগিয়া इदगांवोधगम, नाम सूत्रवृत्त्यो सहस्राणि, नवपञ्चशतानि च । ग्रन्थमानमिह ज्ञेयं, सर्वमेवं विचक्षणः ॥१८॥ यह टीका बहुत ही प्रौढ और विशाल है । इसमें टीकाकार ने शब्दों के पर्याय मात्र देने के चक्कर में न फंसकर विशिष्ट शब्दों की सिद्धि और व्युत्पत्ति तथा भूरिशः ग्रन्थों के उद्धरणों द्वारा टीका को स्पष्ट और सरस वनाने का प्रयत्न किया है । इस टीका में उद्धरणों को अत्यधिक बहुलता है जो सामान्य-विद्वान् के अधिकार की वस्तु नही किन्तु प्रौढ-प्रतिभाशाली के निपुणता की द्योतक है । व्याख्या में लगभग एकसौ सत्तर ग्रन्थों के उद्धरण दिये है, वे भी एक दो नहीं किन्तु प्रचुर परिमाण में । साथ ही इसकी एक विशेषता यह भी है कि संस्कृत गब्दों का व्यवहार देश्यशब्दों में किस प्रकार होता है इसको दिखलाने के लिये उन्हों ने प्रायः 'इति भाषा कहकर राजस्थानी भाषा के घरेलु और साहित्यिक लगभग २५०० शब्दों का प्रयोग किया है, जो राजस्थानी भाषा तथा साहित्य की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है । भविष्य में यदि संभव हो सका तो श्रीवल्लभजी के टीका- अन्यों में उद्धृत सम्पूर्ण राजस्थानी शब्द कोप तयार कर माहित्य-मनोपियों की सेवा में रखने का प्रयल करूंगा। कही कहीं किसी शब्द की व्युत्पत्ति की मान्यता में और साधना में अन्तर है वही व्याख्याकार ने कई वैयाकरणों एवं कोषों द्वारा अपने मत को मिद्ध करने " ६८ अष्टमी को बीकानेर में, नृपति श्रीरायसिंहजी के विजय राज्य मे, १६०० ग्रन्य परिमाण रचना पूर्ण की :- तेपां विख्यातकीर्तीणां, गुरूणामन्तिपदाऽणुना । कृता श्रीवल्लभेनेयं, शेषसंग्रहदीपिका ॥ १८ ॥ हमव्याकरणोणादिधातुपारायणानि च । विश्वकोपाद्यनेकार्थनामकोशकदम्बकम् ॥ १६ ॥ वर्षे शतानन्दमुखेन्द्रियेशपुत्राननाब्जप्रमिते वरिष्ठे । अष्टम्यहे मासि नभस्य कृष्णे श्रेष्ठे पुरे विक्रमनामधेये ।।२०।। श्रीयिक्रमवगोद्भवसद्विक्रमराजसिंहनृपराज्ये । सल्लोककोकसम्मदविधानभानू परे रम्ये ॥ २१ ॥ अभिधानचिन्तामणिनाममाला-सारोद्वार -टोका आपने आचार्य हेमचन्द्र प्रणीत अभिधानचिन्तामणि- १६६७ में, जोधपुर में, महाराजा श्रीशूरसिंहजी के राज्यत्वकाल में 'सारोद्धार' नामक विस्तृत टीका की रचना पूर्ण को :- राथा योधपुरद्रङ्गे, सूरसिंहनरेशितुः । राज्ये च यत्सरे सप्तपष्ठिपट्चन्द्रमम्मिते ॥ ७ ॥ नाममाला पर स * * नच्छियो याचनाचार्यो वादी श्रीवल्लभोन्मन् । श्रीगनाममालाया , नाम्गो गारोनिशुभाम् ॥ ११ ॥ मम्पारणोगादिपाणिनीयादिपा भृशम् । दृष्ट्वंयोलोधगदपत्रे, नागमोगाप भूयगः ॥ १२ ॥ .
r मूत्रवृत्त्यो सहस्राणि, नवपञ्चशतानि च । ग्रंन्यमानमिह ज्ञेयं, सर्वमेव विचक्षणः ॥१८॥ यह टीका बहुत ही प्रौढ और विशाल है । इसमे टीकाकार ने शब्दों के पर्याय मात्र देने के चक्कर में न फंसकर विशिष्ट शब्दों की सिद्धि और व्युत्पत्ति तथा भूरिश ग्रन्थों के उद्धरणों द्वारा टीका को स्पष्ट और सरस वनाने का प्रयल किया है । इस टीका में उद्धरणों की अत्यधिक बहुलता है जो सामान्य-विद्वान् के अधिकार की वस्तु नहीं किन्तु प्रौढ-प्रतिभाशाली के निपुणता की द्योतक है । व्याख्या में लगभग एकसौ सत्तर ग्रन्थों के उद्धरण दिये है, ये भी एक दो नही किन्तु प्रचुर परिमाण में । माथ ही इसकी एक विशेषता यह भी है कि संस्कृत गब्दों का व्यवहार देश्यशब्दों में किस प्रकार होता है इसको दिग्वलाने के लिये उन्हों ने प्राय 'इति भाषा" कहकर राजस्थानी भाषा के घरेलु और साहित्यिक लगभग २५०० शब्दों का प्रयोग किया है, जो राजस्थानी भाषा नथा साहित्य की दृष्टि से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है । भविष्य में यदि संभव हो सका तो श्रीवल्लभजी के टीका- अन्यों में उद्धृत सम्पूर्ण राजस्थानी शब्द कोप तैयार कर माहित्य-मनोपियों की सेवा में रखने का प्रयल करूंगा। कही कहीं किसी शब्द की व्युत्पत्ति की मान्यता में और साधना में अन्तर है वही व्याख्याकार ने फाई वयाकरणों एवं कोषों द्वारा अपने मत को सिद्ध करने ७० " . का प्रयत्न किया है जो कि निम्नलिखित उद्धरण से स्पष्ट हो जायगा :- पडिक्तसमूहनामैक गाभिणम् ‘गभिण्या क्षेत्रपडक्तय- स्तासां गाभिणम्' इति गणरत्नमहोदधिवृत्तिः । अत्र गर्भिणी शब्दो मेघमालाशालापडक्तयादिवाचकत्वात् अचित्तविशेपवचन इति इकण प्राप्ती तद्वाधको 'भिक्षादे : 'इति सूत्रेण अन् ततो 'जातिश्चणि' इति पुवद्भावे, सप्तमाध्यायचतुर्थपाद- वृत्तिपञ्चाशतमसूत्रेण · संयोगादिनः' इत्यन्तलोपप्रतिषेध : । गर्भवतीस्त्रीवचनातु इकणोऽप्राप्तेरौत्सर्गिकवचनाण् इति न्यासकार: । अतो गर्भवतीनां स्त्रीणां वृन्दानामपि गाभिणामिति । तरूणीनां स्त्रीणा वृन्दनामक " यौवतम्" चतुर्थवर्गाद्यान्तोऽयम् । युवतिशब्दस्य मिक्षादिगणमध्ये पाठात् पुवद्भावो न भवति । यत् काशिकाकार :- 'युवतिशब्दोऽत्र पठ्यते । तस्य ग्रहणसामर्थ्यात् पुवद्भावो न भवति।' अतो ' अवर्णवर्णस्य' इति, युवतिशब्दसम्बधित. स्तवर्गप्रयमम्य तृतीयस्वरलोपे योवत चन्द्राचार्याभिप्रायेण । वस्तुतस्तु तद्धितप्रत्ययोत्पत्तेः प्रायेण पुवद्भावेन भवितव्यम् । ततो युवतीना समूहं यौवन, 'भिक्षादेः' इत्यण, 'जातिश्चणि' तद्धित-'यस्वर' इति पुवगावे तोतिवर्णलोपे यौवन चतुषवर्गपञ्चमान्तोऽयम् । यत. उक्त माध्यमारण- भिशादिषु युवतिग्रहणानर्थक्य पुवद्भावस्य सिद्धत्वात् प्रत्ययविधात् इति । रूपमतिनैपथ्यं कला- गुगलयोवनम् । यस्य पुण्यकृतः प्रप्यं मफलं तस्य यौवनम् ।। पनि, याय पुष्पात:- पुण्यकर्तुः पुरपग्य कलागल्यीयन. . - यथा- कि इस कलाचतुरतरुणीवृन्दं प्रेष्यं-आज्ञाकारि तस्या यौवनं-यूनो भावः सफलं इत्यन्वयः । कीदृशं स्वरुपं ? अतिनेपथ्यं यस्य तत् अतिनेपथ्यं इति श्लोकार्थः । यौवतं चतुर्थवर्ग- प्रथमान्तः स्वमते, परमते तु यौवनं चतुर्थवर्गपञ्चमान्त :, इत्युभयं तरुणीवृन्दवाचक ज्ञेयम् ।" (कां, ६. श्लो. ५१ की टीका, पृ. १३०-१) इससे इनका शब्द व्युत्पत्ति ज्ञान और कोश-काव्य- ज्ञान का परिचय मिलता है । दुर्भाग्य है कि इस प्रकार की महत्त्वपूर्ण टीका साहित्य-जगत में प्रकाश में अभी तक नहीं आई है। जैन संस्थाओं का कर्तव्य प्रकार की टोकाओं का प्रकाशन शोघ्र और अवश्य करे । इसमें कां. ६ पद्य १७१ को व्याख्या में संवत् शब्द का उदाहरण देने के लिये श्रीवल्लभजी 'सिद्धहेमकुमार संवत् ' का उल्लेख करते है जो ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत ही महत्त्व का है। इससे यह तो निश्चित है कि इस सिद्धहेमकुमार संवत् का नाम प्रचलन १७ वी शती के उतराद्ध तक अवश्य था-तदनन्तर तो संभवत: इन नाम का उल्लेग भी प्राप्त नहीं होता। निघण्टुशेषनाममाला टोका अमिधानचिन्तामणि नाममाला कां. ४ पद्य २०८ की टीका "राणिनामानि धोहमचन्द्राचार्यकृतहेमनिघण्टुदोषो. क्तानि जयानि । तद्यथा - राजादने तु राजन्या वादि । एतेषा म्युत्पत्तिस्तु अस्मत्कृत निघष्टुशेषटोकातो ज्ञेया ।"
७२
से स्पष्ट है कि आपने निघण्टुशेपनाममाला पर टीका की
रचना की, पर दुर्भाग्य है कि आज वह प्राप्त ही नहीं
है, सभव है नष्ट हो गई ।
सिद्धहेमान्दानुशासनवृत्ति
आचार्य हेमचन्द्र प्रणीत सिद्धहेमशब्दानुशासन पर
आपने वृत्ति की रचना है । इस की एक मात्र प्रति
'विजयधर्म-लक्ष्मी-ज्ञानमन्दिर, आगरा' में सुरक्षित है ।
पत्र संख्या १४३ है । इस प्रकार की सूचना भाई श्री
भंवरलालजी नाहटा से सं. २००२ में प्राप्त हुई थी।
टीकाकार ने कय इस की रचना की ? यह इन के प्रारम्भिक
काल की रचना है अथवा प्रौढावस्था की? इस विषय में
प्रति के मन्मुख न होने के कारण कुछ भी निश्चय से
नहीं कहा जा मकता। परन्तु इस को पत्र संख्या १४३
होने से यह अनुमान अवश्य होता है कि टीका विगद
और प्रोढ होनी चाहिये ।
दुर्गपदभरोधयत्ति
श्री हेमचन्द्राचार्य प्रणीत हेमलि गानुमासनवियरण पर
दुर्गपदप्रयोघ नामक टीका की रचना आचार्य जिनचन्द्रमूरि
एव तत्पट्टपर श्री जिननिहारि के धर्मराग्य में विचरण
करते हुए आपने वि. सं. १६६१ कार्तिक शुक्ला सप्तमी को
जोधपुर में नरेश मूमिहनी के विजय राज्य में अनेक भारत्रों
का अवलोकन कर २००० अन्ध परिमाण में वी:-
मोहद्रोहवनप्लुषः स्मरपिपः प्रध्वस्तदोपद्विपः, पापक्लेशमुपः सनद्गतस्पः चारित्रलक्ष्मीपुपः । पुष्पश्रीपजुपःप्रगान्तवपुषः स्फूर्जयशोज्योतिपः, तत्स? जिनसिंहमूरिगुरवो नन्दन्ति दिव्योजसः ॥३॥ * श्रीमद्योधपुरे द्रडगे सूरांसहमहीपतौ । प्राज्यराज्यधियं सस्वच्छास्तरि प्रभुतोदये ॥५॥ भूमिपड्रसतुनीशसङ्खचे वर्षे सुखाधिके । मासि कातिकिके कान्ते, मुदिने सप्तमीदिने ॥ * तेपां गिप्यवरश्चके, श्रीश्रीवल्लभाचकः । दुर्गपदप्रवोधोऽयं, प्रकटज्ञानहेतवे ॥६॥ थीहेमचन्द्रसूरीन्द्रकृते लिङ्गानुगासने । विद्यते या गुभावृत्ति-तत्यदुर्गार्थवोघदः ।।१०।। * . नहत्रद्वितयं ग्रन्थमानमत्रोदित गुभम् । गणनया च वर्णानामनुमित्यावसोचतं ॥१॥ वृत्ति को रचना मूल लिङ्गानुगामन पर नहीं की गई । इसमें 'या गुभावृत्ति विद्यते तत्व दुर्गायंबोधदः ने सष्ट है कि मा. हेमचन्द्र फा ही जो लिङ्गानुगासन के कार स्वोपन विवरण है उसमें जिन-जिन स्थानों में जहाँ दोगम्य या काठिन्य है उन ही स्थलों पर इसमें विवेचन किया गया है । इसीलिये इस विवरण का नाम दुर्गपद- प्रयोष रमा गया है।
७४
यह टीका भी बहुत सुन्दर है । इसमे भी 'इति
प्रसिद्ध' कहकर लगभग १४०० देश्य शब्दों का प्रयोग
किया गया है । इसका सम्पादन भी सुन्दर रूप से होकर
'थी अमी सोम जैन ग्रन्थमाला, बम्बई द्वारा प्रकाशित
हो चुका है।
सारस्वतप्रयोगनिर्णय
जिनराजसूरि के राज्य में (स. १६७४ मे १६६०)
इमकी रचना हुई है। इसकी एक-मात्र २३ पत्र की
अपूर्ण प्रति 'भावहीय परतर, भंडार, बालोतरा' मे
है । ऐमी मूचना भाई श्रीअगरचन्दजी नाहटा ने दी है।
जैसा कि नाम में ही स्पष्ट है कि मारस्वतव्याकरण के
प्रयोगों का इममे निर्णय-माधन किया गया है। प्रौढावस्था
को कृति होने के कारण मंभयत : यह भी महत्वपूर्ण हो,
पर प्रति के गन्मुम न होने के कारण विशेप कुछ भी नहीं
कहा जा सकता।
केशा :- पदमारपा
मारम्बन व्याकरणम्य 'येगा। इस पद की व्याम्या
इममें गुन्दरतम पद्धति मे यो गई है। इस एक लोक की
प्पाग्या में भी टीकाकार ने गिदहेम, पाणिनीय, विश्वसम्म,
अमर, मनिषष्ट, श्रीधर यादि थे. उमरणो के माप
मा जापागाभा , पारिनामा. ।
विविधांगर दो प . वानगोषग १॥
--
इसको मरल और सरस बनाने का प्रयल किया है ।
इसकी रचना कब हुई निश्चित नहीं कहा जा सकता।
इसकी एकमात्र प्रति महिमा भक्ति जैन ज्ञान भण्डार,
बीकानेर, पो. ७० नं. १८६० में सुरक्षित है। पत्र संख्या
केवल एक ही है । इसका आयन्त इस प्रकार है :-
आ-म.-- सारस्वतस्य सूत्रे यत्, केशा इति पदं स्फुटम्
तच्छ्लोकटीकामाचप्टे, श्रीश्रीवल्लभवाचक : ॥१॥
अ.- कृतश्वायं श्रीज्ञानविमलमहोपाध्यायमित्राणां शिष्य
वाचनाचार्यश्रीवल्लभगणिभि:, स च मिप्यादिभिर्वाच्य-
मानश्चिरं नन्द्यात्, श्रीगारदाप्रसादात् ।
चतुर्दशगुणस्यानस्वाध्याय
यह स्वाध्याय (मज्झाय) भाषा में गुफित है ।
इममे १४ गुणस्थानों का क्रमश : वर्णन है । इसके २३
पद्य है । इसका आद्यन्न इस प्रकार है
आदि :-
मारवि वीर जिणेमर देव, जमु मुरपति मवि मारइ मेव ।
मुगुरलगा वचन निमुणेयो, पमणि गुणठाणानुं भेवी ॥१॥
गय कुमलकारक दुपनिवारक चउद यांनिकी जाणीड,
जिन तगी दाणी होइ आगि सुमतिमान वरनांगीड ।
जे मुणिम निग्रत परि एक चित्त मुथिर नमकित तेह तणओ,
श्रीवल्लम मुनिवर मणि जिनवर तिहां घरी हुई सुखपणा
॥२३॥
परिशिष्ट परिचय
.
भारतीय वाडमय मे सहस्रदलात्मक चित्र-काव्यो में
यह दूसरी कृति है। इसका रचना समय अज्ञात है।
इसके कर्ता कौन है ? इस स्तोत्र की पंक्तियो से अस्पष्ट
है । 'श्रीरत्न' 'श्रीलब्धरङ्ग' नाम आते है पर निश्चित
नहीं कहा जा सकता कि किस कवि ने इसका प्रणयन
किया है।
पर हाँ, इतनी वात निश्चित है कि कवि
'खरतर" [पद्य ३७ ] गच्छीय विद्वान था । इस स्तोत्र
की विशेषताएं निम्नलिखित है
यह स्तोत्र चौवीसवें शासनपति श्रीमहावीर को लक्ष्य
में रखकर बनाया गया है। इसमे ३८ पद्य है। अनेक
प्रकार के छन्दों का कवि ने स्वतन्त्रता में प्रयोग किया
है । 'अरजिनस्तय' की तरह कयि ने "र" का प्रयोग
किया है। अरजिनस्तवकार ने दो अक्षरों के पश्चात् र
का प्रयोग किया है किन्तु इस स्तोत्रकार ने एक अक्षर के
पश्चात् ही र का प्रयोग किया है और वह भी १०१६
रवार । एक अक्षर के पश्चात् ही रकार होने के कारण
नपा यति का अभाव होने गे इसको मामिपत्ता को
ममझने में हम असफल रहे है । अत: मभव है यत्र नत्र
अगटियां रह गई हो।
१
७७
ख
शतदलकमलमय पार्श्व-स्तव के कर्ता उपाध्याय
सहनकोति खरतरगच्छीय क्षेमशाखा के वाचर - रत्नसार
के शिष्य थे। संस्कृत-साहित्य के विशेपतः व्याकरण,
कोप और साहित्य के आप प्रकाण्ड विद्वान थे, साथ ही
थे कवि भी । इनके ऋजुप्राज्ञ नामक व्याकरण, नामकोय
नामक कोप, सारस्वत वृत्ति, कल्पसून वृत्ति (कल्पमंजरी)
आदि उल्लेखनीय रचनाएँ प्राप्त है। वैसे रास और
छोटी-मोटी टीकाएँ आदि मिलाकर लगपग २८ अन्य
उपलब्ध है।
इस स्तोत्र को रचना सं. १६७५ मार्गशीर्ष शुक्ला
द्वादशी को लोद्रपुर (वर्तमान-लोद्रवा, जेसलमेर से ३ कोस)
में हुई है । लोद्रपुर पत्तन में जिनेश्वर प्रसाद (जो जीर्ण
हो गया था ) का जेसलमीर निवासी शाह थाहरु ने
जीर्णोद्धार करवाकर खरतरगच्छाचार्य जिनराजसूरि से
इसी दिवस प्रतिष्ठा सम्पन्न करवाई थी। उसी के
उपलक्ष में उसी दिवम कवि ने इसकी रचना पूर्ण की है।
ऐसा कमलस्य बहिःलेखन से प्रकट है।
उपर्युक्त दोनों चित्रकाव्यों से इसकी रचना-पद्धति
भिन्न है। इसमें "म" को मध्यविन्दु में रखा है और
अक्षरों के पश्चात् म का प्रयोग न करके प्रत्येक पाद के
अन्त में म का प्रयोग किय है। माथ ही प्रत्येक पाद के
७८
प्रथमाक्षर का संयुक्त और मुक्तक रूप से स्वतन्त्र ही ३
पद्यों में कवि ने रसास्वादन करवाया है । काव्य बहुत ही
सुन्दर बन पड़ा है । इससे कवि को उच्च प्रतिभा का भी
आभास प्राप्त होता है। इस काव्य में २५ पद्य यन्त्रस्य
है और एक पद्य प्रशस्ति रूप में तथा ५ पद्य लोद्रपुर
प्रतिष्ठा समय के सूचना देने और रचना का कारण
वतलाने के लिये लिखे गये हैं जो यन्त्र के वाहिरी भाग में
उत्कीर्ण है।
यह शिलापट्ट आज भी लोद्रवा पार्श्वनाथ मन्दिर में
अवस्थित है।
प्रकाशन का इतिहास
मेरे गिरच्छत्र पूज्यश्वर गुरुदेव श्रीजिनमणिसागरसूरिजी
महाराज का सं. २००४ का चातुर्माम कोटा में था ।
उम वर्ष में नेमिदूत का सम्पादन कर रहा था । उस
ममय परमपूज्य गुरुदेव को यह अभिलापा और आदेश
था कि 'तू अपने गच्छ के स्तोत्र-साहित्य एवं छोटे-मोटे
काव्यग्रन्यों का सम्पादन कर प्रकाश में ला ।' इसी विचार
मे प्रभावित होकर मैने श्रीनाहटाजी को बीकानेर लिया
और नादाजी ने भी तत्काल ही इम ग्रन्थ को प्रेमकॉपी
मुझे प्रकाशनार्थ भेज दी । वह प्रेसकॉपी पति में नहीं
की गई थी इसलिये नाहटाजी के द्वारा ही पूना में प्रति
मगवाकर, उमो वर्ष मैने अंगकॉपी नैयार की । मुद्रणार्थ
पी यो प्रेम में देने का दिपार या, परन्तु इस उम्नकोटि के
काव्य ग्रन्थ के प्रकाशन में अशुद्धि वाहुल्य न रह जाय
(कारण कि उस समय मेरा ज्ञान साधारण ही था) अिस
लिये कॉपी शुद्ध करवाने की दृष्टि से गणि श्रीवुद्धिमुनिजी
म० को भेज दी गई । उन्होंने भी अवकाश निकाल कर
उसे शुद्ध करके वापिस लौटा दिया ।
इसी बीच में परीक्षाओं के निमित्त अध्ययन कार्य
मे जुट गया । फलतः प्रकाशन का कार्य बन्द हो गया ।
गत वर्ष मेरा चातुर्मास अहमदावाद था । परीक्षाओं के
चक्र से विनिर्मुक्त हो चुका था । वल्लभभारती की
प्रेमकॉपी बनाने में संलग्न था । उस समय पुनः इस
स्तोत्र-काव्य की स्मृति आई, प्रकाशन के लिये हृदय
लालायित हो उठा । श्रावक वर्ग को उपदेश देकर मुद्रण के
लिये द्रव्य की व्यवस्था भी की और मुद्रणार्थ पुनः प्रेस
कॉपी तैयार कर नवजीवन कार्यालय 'को मुद्रणार्थ देदी ।
प्रति-परिचय
प्रस्तुत अरजिनस्तव का मम्पादन करने में हमें एक
ही प्रति प्राप्त हुई है और वह भी 'भाण्डारकर ओरिएन्टल
रिमर्च इन्स्ट्रीच्यूट, पूना' से । यद्यपि प्रति के अन्त में
लेखक ने लेखन संवत नहीं दिया है किन्तु प्रति को
देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि यह रचना के कुछ
ममय पश्चात् ही लिखी गई है । प्रति प्राय : शुद्ध है,
परन्तु कई स्थलों पर काव्यस्थ शब्दों की टीका प्रमाद से
८०
जिसकी सूचना टिप्पणी मे दे दी गई है । प्रति के १५
पत्र है । प्रत्येक पत्र मे २१-२१ पंक्तियाँ है और प्रत्येक
पक्ति मे ६२-६५ अक्षर है । प्रति की दीर्घता १०।।
इच है, और पृथुता ४॥ इंच है । प्रति अभी तक
अच्छी हालत मे है ।
परिशिष्ट क-शतदल स्तोत्र का सम्पादन श्रीपूर्णचन्द्रजी
नाहर के जैन लेख संग्रह भाग ३, और पं. लालचन्द्र
भगवान् गान्धी द्वारा सम्पादित 'जेसलमीर भाण्डागारीय
ग्रन्थाना मूचि' के आधार पर किया गया है ।
और परिगिष्ट स महस्रदलात्मक वीर स्तोत्र
श्रद्धेय भाई-मुनिराज श्रोपुण्यविजयजी महाराज से प्राप्त
हुआ है । इसका एक ही पत्र है । किनारे खंडित हो
चुके है । पत्र भी जीर्ण-शीर्ण दशा को प्राप्त हो रहा
है । अनुमान है यह पत्र १७यी शती के अन्त में अथवा
१८वी के प्रारभ में लिया गया हो ।
आभार-प्रदर्शन :-
इग ग्रथ के प्रकाशन में मुझे जिन जिन श्रद्धेय
मनीपियों का और इप्टमण्डली का महयोग प्राप्त हुआ
है उगरे लिये में हृदय में उनका
गयोग के यिना इग काम्य-ग्न का प्रयाग में आना ही
भूपिल पा ।
गर्वप्रथम में श्री अगरगन्द्रजी नाहटा को धन्यवाद
देता है जिनकी प्रेरणा में ही ग काम्य मे मम्पादन वा
कृतम है। उनके
विचार हुआ और सम्पादन के लिये समय-समय पर यथोचित
मामग्री तथा परामर्श भी प्राप्त हुआ । दूसरे, गणिवर
थी बुद्धिमुनिजी महाराज का भी मै आभारी हूँ जिन्होने
इसकी कॉपी को मेरे आग्रह पर शुद्ध कर भेजने का
कष्ट उठाया । तीसरे, थद्धेय मुनिराज थी पुण्यविजयजी
म. भी धन्यवाद के पात्र है जिन्होंने सारे ग्रन्थ के प्रूफ
देखने का कष्ट उठाया । चौथे, मेरे विद्यागुरु डा. श्री
फतहसिंहजी एम. ए. डी. लिट, का भी मैं कृतज्ञ हूँ
जिनके परामर्श से मुझे सम्पादन में बड़ी सफलता मिली है।
साथ ही भाण्डारकर ओरिएन्टल रिसर्च इन्स्ट्रीच्यूट
के क्यूरेटर श्री पी. के. गोडे को भी मै धन्यवाद दिये
विना नही रह सकता, जिनकी कृपा से ही सम्पादनार्थ
इस प्रति को ८ माम तक में अपने पास रख सका ।
सूत्रधार एवं यार्टिस्ट भाई श्री यमृतलाल मूलशंकर
त्रिवेदी भी धन्यवाद के पात्र है जिनने मेरे आग्रह को
स्वीकार कर प्रेम से इस सहस्त्रदलकमल का चित्र बनाया ।
और अहमदावाद का खरतरगच्छ संघ भी धन्यवाद का
भाजन है जिसने की इसके प्रकाशन के लिये द्रव्य की
व्यवस्था की ।
श्रावणी अमावस्या २०१०
कोटा
श्यामानन्-
विनयसागर
८०
जिसकी सूचना टिप्पणी में दे दी गई है । प्रति के १५
पत्र है । प्रत्येक पत्र २१-२१ पंक्तियाँ है और प्रत्येक
पक्ति मे ६२-६५ अक्षर है । प्रति की दीर्घता १०॥
इच है, और पृथुता ४|| इंच है । प्रति अभी तक
अच्छी हालत में है।
परिशिष्ट क-शतदल स्तोत्र का सम्पादन श्रीपूर्णचन्द्रजी
नाहर के जैन लेख संग्रह भाग ३, और पं. लालचन्द्र
भगवान् गान्धी द्वारा सम्पादित 'जैसलमीर भाण्डागारीय
ग्रन्थानां सूचि' के आधार पर किया गया है ।
और परिशिष्ट ख सहस्रदलात्मक वीर स्तोत्र
श्रद्धेय भाई-मुनिराज श्रोपुण्यविजयजी महाराज से प्राप्त
हुआ है । इसका एक ही पत्र है । किनारे खंडित हो
चुके है । पत्र मी जीर्ण-शीर्ण दशा को प्राप्त हो रहा
है । अनुमान है यह पत्र १७वी शती के अन्त में अथवा
१८वी के प्रारंभ में लिखा गया हो ।
आभार प्रदर्शन
इस ग्रंथ के प्रकाशन में मुझे जिन जिन श्रद्धेय
मनीपियों का और इप्टमण्डली का सहयोग प्राप्त हुआ
है. उसके लिये मै हृदय से उनका
महयोग के विना इम काव्य-रल का प्रकाश में आना ही
मुश्किल था ।
सर्वप्रथम श्री अगरचन्द्रजी नाहटा को धन्यवाद
देता हूँ जिनको प्रेरणा मे ही इस काव्य के मम्पादन का
:-
कृतज्ञ हूँ। उनके
विचार हुआ और सम्पादन के लिये समय-समय पर यथोचित मागग्री तथा परामर्श भी प्राप्त हुआ। दूसरे, गणिवर श्री बुद्धिमुनिजी महाराज का भी मै आभारी हूँ जिन्होने इसकी कॉपी को मेरे आग्रह पर शुद्ध कर भेजने का कष्ट उठाया । तीसरे, श्रद्धेय मुनिराण श्री पुण्यविजयजी म. भी धन्यवाद के पात्र हैं जिन्होंने सारे सन्थ यो प्रूफ देखने का कष्ट उठाया । चौथे, मेरे विद्यागुर सा. श्री फतहसिंहजी एम. ए. डी. लिट, का भी मैं पृतश हूँ जिनके परामर्श से मुझे सम्पादन में बड़ी सफलता मिली है। साथ ही भाण्डारपार ओरिएन्टल रिसर्च इन्स्ट्रीच्यूट के क्यूरेटर श्री पी. यो. गोडे को भी मैं धन्यवाद दिये विना नहीं रह सकता, जिनकी कृपा से ही राम्पादनार्थ इम प्रति को ८ गाम तक में अपने पास रख सका। सूत्रधार एव आर्टिस्ट भाई श्री अमृतलाल मूलशंकर दिवेदी भी धन्यवाद के पास हैं जिनने मेरे आग्रह को स्वीकार फार प्रेम से इस सहस्त्रदलयगल का चित्र बनाया। और अहमदाबाद या सरतरगच्छ संघ भी धन्यवाद का भाजन है जिसने की इसके प्रयागन के लिये प्रव्य की व्यवस्था की। श्रावणी अगावरपा २०१० श्यामारान- कोटा विनयसागर , अभि.चि.का. अ.चि.ना. वृ.प्र. अने.म.का. अ.स्त.क.प्र. ऐ.ज.का.म. कवि.क. जे. संकेतसूची अभिधान चिन्तामणि नामकोप अभिधान चिन्तामणि काण्ड अभिधान चिन्तामणि नाममाला वृत्ति प्रमस्ति अनेकार्य संग्रह नाममाला काण्ड अरजिनस्तव वृत्ति प्रशस्ति ऐतिहासिक जैन काव्य मग्रह %3D % 3D कवि कल्पद्रुम दु.प्र. दु.प्र.प्र. %3D पा.मि.को. वि.ए. वि.वि. दि.वि.प्र. जैसलमीर भाण्डागारीय ग्रन्थाना मूची दुगंपदप्रवोध दुर्गपदप्रबोध प्रशस्ति जैन लेस सग्रह भा. ३ (नाहर) पाणिनीय सिद्धान्त कौमुदी रचना मवत् विश्वशम् एकाक्षरी नाममाला विज्ञप्ति त्रिवेणी विज्ञप्ति त्रिवेणी प्रस्तावना चोलोमनाममाला वृत्ति गोलोछ नाममाला टीका प्रशस्ति मेष ममह टीका प्रशस्ति गिट हेम पदानुभागन गिद हेम उणादि गूग गुधारला एकासरी नाममास्ता गौरि एवाशरी नाममाला %3D %D पी.ना.टी.प्र. दो.गटी.प्र. मि. है. गौ..
स्योपज्ञयत्तिविभूषितः
श्री अरजिनस्तव:
(महस्रदलकमलमयः)
अहम्
श्रीमजिननमणिसागरसूरिपादपद्मभ्यो नमः
उपाध्यायप्रवरश्रीश्रीवल्लभोपाध्यायविहित :
स्वोपज वृत्तिदिभूषितः
श्रीअरनाथजिनस्तवः
(सहस्रदलकमलमयः)
{वृत्तिकारमङ्गलाचरणम् ]
स्वकीयविद्यागुरुसत्प्रसादात्,
फरोमि वृत्तिं स्तवनस्य चार्टीम् ।
अरं जिनं हर्पकरं प्रणम्य,
सहस्रपत्राम्बुजगभितस्य ॥१॥
तस्य चायमादि:--
असुरनिर्जरबन्धुरशेखर-
प्रचुरभव्यरजोभिर पञ्जिरम् ।
क्रमरजं शिरसा सरसं वरं,
जिन! रमेश्वर! मेदुरशङ्कर! ॥१॥
२ स्वापज्ञवृत्तिविभूषितः प्रवरवर्णरसागरचन्दिर! जठररागरसाविरसङ्गर! । मुचिरकृन्नरभीतरभद्रर!, कुरु रमं भरमामरहत्यर! ॥२॥ व्याख्या --- हे 'जिन! हे तीर्थकर! हे अरनाथ! तवेति शेषः, 'क्रमरज' रात्-जलाज्जातं रज-कमलं, क्रमः-चरणः,स एव रज क्रमरज 'शिरसा' मस्तकेन [वन्दे] इत्यध्याहार्यम् । किम्भूतं क्रमरज? 'पञ्जिरम्' पोतम्, कः? 'असुरनिर्जरबन्धुर- शेखरप्रचुरभव्यरजोभिः' असुराः-असुरकुमाराः निर्जरा:-वैमा- निकत्रिदशास्तेपा ये वन्धुरोखरा:-मनोहरापीडास्तेषां यानि प्रचुरभव्यरजांसि-बहुलचारपरागास्तैः । 'अ' पादपूरणार्थमव्य- यम् । पुनः किम्भूत क्रमरज? 'सरसं' रसयुक्तम् । पुनः किम्भूतं क्रमरज? 'वरं' प्रधानम् । किम्भूत हे जिन! ? 'रमेश्वर!' लक्ष्मीनाथ! । पुनः किम्भूत जिन! ? 'मेदुरराङ्कर!' प्रमोदेन मेद्यन्तीत्येवशीला: “भञ्जिभासिमिदो घुरः" [सि.हे.५।२।७४] इतिघुरः, मेदुराः-प्रमोदपिच्छिलास्तान् प्रति शं-सुखं करोतीति भेदुरशङ्करस्तस्यामन्त्रणम् ॥१॥ हे आमरहत्यर! "रह त्यागे" "इकिस्ति स्वरूपार्थे" [सि. हे. ५।३।१३८] इति विवि रहतिः-स्यजन, आमानां- रोगाणां रहतियंस्य यस्माद्वा आमरहतिः, स चासौ अरः- अरजिनस्तस्यामन्त्रणं हे आमरहत्यर! त्वं 'रमं भरं' प्रधानं पोपणं 'कुर' विहि । किम्भूत है भामरहत्यर! ? 'प्रवरवर्णर- सहनदलकमत्तमयः मरजिनस्तदः । ३ - सागरचन्दिर!' प्रवरा:-प्रकृप्टा ये वर्मा:-गौर्यगाम्भीर्यादयो गुणाः, यदुक्तं हेमसूरिभिः- ."वर्णः स्वर्णे मखे' स्तुती । रूपे द्विजादी शुक्लादो, कुयायामक्षरे गुणे ॥" [अने. सं. कां. २ श्लो. १६६] इति, त एव राणि-रत्नानि “रं रतं रोदनं धनम्" [सौ. ए. श्लो.८३] इति वचनात्, तेषां सागर :-समुद्रस्तस्याहाददाय- कत्वात् चन्दिर इव-चन्द्रमा इव यः सः सम्वोच्यते । किम्भूत त्वं ? 'जठररागरसाविः' जठरः कठिन: "जठरः कुक्षिरद्धयोः, कठिन च" [अने. सं. कां. ३ श्लो. ११५६] इत्युक्तेः, प्रस्तावाद् दृढोऽत्यन्तकरणादयो रागरस: नर्म तस्य आवि:-व्रजनं यस्मात् स तथा, “स्यात्तु नमणि, मुखोत्सवो रागरसः" [शेष. सं. श्लो. ११५] इति शेपः। पुनः किम्भूत हे आमरहत्यर! ? 'असङ्गर!' सङग्रामरहितः । पुनः किम्भूत आमरहत्यर! ? 'मुचिरकृन्नर- भीतरभद्रर!' मुचिरं-धर्म कुर्वन्तीनि मुचिरकृतस्ते न ते नराश्च मुचिरकृन्नरास्तेषां भीतरभद्रे-मयेतरमङ्गले राति ददाति यः स तथा स सम्बोध्यते । यदुक्तमुणादिवृत्त्याम्-"मुचिरो धर्मः मूर्यों मेघश्च" [सि. हे. उ. सू. ४१६] ।।२।। प्रदरपार्परदन्तुरभूघर- भिदुरतुल्य! रसासर! कं कर । कुनरकाकरदादरकास्वर! विदुरजेसरभक्तरमुत्कर! ॥३॥ १. "द्र।" इति मुद्विते ।
-- स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः व्याख्या-हे 'रसासर!' रसायां-वसुन्धरायां सरति- गच्छति रसासर:-पुमान् तत्सम्बोधनं हे रसासर! हे पुरुष ! हे अर! त्व 'क' सुखं 'कर' कुरुप्व । “कृञ् कृतौ" इति धातो- राशी.प्रेरणयोहिरूपम् । अथ सम्वोधनविगेपणयोविशेष्यते- किम्भूत हे रसासर ? 'प्रदरपार्परदन्तुरभूधरभिदुरतुल्य !' प्रदरा:-रोगाः महावणादयः “प्रदरः शरे ।। भङ्गे रोगे" [अने. स. कां. ३ श्लो. ११७२-७३] इति वचनात्, पार्पर:-यमः कालरूप: "पार्परो भस्मनि यमे" [अने. सं. कां. ३ श्लो. ११७६] इति वचनात्, तेपां द्वन्द्वे प्रदरपार्पराः, त एव दन्तुरभूधरा:-विषमपर्वता. “दन्तुरः, उन्नतदन्ते विपमे" [अने, सं का. ३ श्लो. ११६३] इत्युक्तेः, तेपां भञ्जने भिदुरं-वचं तत्तुल्य:-तत्समानो य स तथा स सम्बोध्यते । पुनः किम्भूत रसासर! ? 'कुनरकाकरदादरकस्वर !' कु:-कुत्सितः नरक:- निरयः कुनरकस्तस्मिन् यत् अकं-दुःख तद् रदन्ति-उत्पाटयन्ति ये ते फुनरकाकरदास्तेषु आदरं-पूजाविशेपं "कस गतो" कसती- त्येवशीलो यः सः, "स्थेशभासपिसकसो वरः"सि.हे.५।२।८१] इति वरः, कुनकाकरदादरकस्यरः तत्सम्बोधनम् । पुनः किम्भूत रसासर! ? 'विदुरजेनरभक्तरमुत्कर! ' विदुरेप-धीरेषु जेगराः- भूराः "जेसर पर." इत्युणादौ [सि. हे. उ. मू. ४३६] विदुर- जेगराः, ते प ते भक्तराइच-भक्तनरास्तेपां मुत्कर:-हपंकरो यः म तपा, म सम्वोध्यते ॥३॥ मुहिरगर्यरदुदंरसिम्पुर- विशरणाफरसिंहरहोऽगरम् ।
सहनदलकमलमयः अरजिनस्तवः। चतुरनं जरसाऽधरमं स्मर, शिवरमं वरसंचरबुद्धिरम् . व्याख्या है जन ! इति पदमध्याहार्यम् । त्वं 'अ' अर्हन्तं अरनायलक्षणं 'स्मर' मनसि चिन्तय । किविशिष्टं मं? 'मुहिरगर्वरदुद्धरसिन्धुरविशरणाकरसिंहरहोऽगरम्' मुहिर:- कामः "मुहिरो मूर्खकामयोः" [अने, सं. कां. ३ श्लो. ११९५] इति हेमाचार्याः, तस्य यो गर्वर:-अहङ्कारः, यदुक्तमुणादां- "गर्वरोऽहंकारः [महिपश्च]" [सि. हे. उ. सूत्र ४४१] स एव दुदंरसिन्धुरः- उत्कटमातङ्गस्तस्य विदारण-व्यापादनं तस्य आकर:-समन्ताद् विधानं तत्र सिंह इव-व्याघ्र इव यः स मुहिरगर्वरदुर्द्धरसिन्धुरविशरणाकरसिंहः, रह:-अज्ञानं तद् न गृणाति-न शव्दयति यः स रहोऽगरः, "गश् शब्दे" द्वाभ्यां कर्म- धारये मुहिरगवरदुर्द्धरसिन्धुरविशरणाकरसिंहरहोगरस्तम् । पुनः किम्भूतं ? 'चतुरनं' चतुरा:-विद्वांसो ना:-नरा यस्य स तथा तम् । “नो नरे" [वि. ए. ७६] इति विश्वः । पुनः किम्भूतं मं? 'जरमाऽधरम्' जरमा-वृद्धत्वेन अधर-हीनं रहित- मित्यर्थः । "अधरोऽद्धिहीनोप्ठेपु" [यने. सं. कां. ३ दलो. १११७ ] इति वचनप्रमाणात् । पुनः किम्भूतं अं ? "शिवरम' शिवे-मुक्ती रमते यः स तथा तम् । पुनः किम्भूतं ? 'वरसंबर- बुद्धिर' "वृ वरणे" वरन्ति धर्मश्रियं इति वरा:-श्रावकास्तेपां संवरबुद्धी:-वैराग्यमती राति-प्रयच्छति यः स तथा तम् ॥४॥ १. अधरोऽनूर्वहीनोप्टेपु” इति मु० स्वोपजयत्तिविभूषितः सुहीरसच्चीरविहारसीवर- प्रतारसाधारणकारवादर! । जनौर! निमरणधोरणीस्फिरं, मनोरमास्वारवतो रतक्षर ! ॥५॥ . व्याख्या हे 'अ!' जिन! तवेति शेष :, 'निर्भरणधो- रणीस्फिर' निर्मेराश्च -निर्मर्यादा ये णाश्च - प्रस्तुता ये ते निर्भरणाः- गुणास्तेषां धोरणी - श्रेणिः गुणावली स्फिरं- वृद्धि प्राप्नोतीति शेष. । कस्मात् ? 'मनोरमास्वारवतः' मनसा रमन्ते इति मनोरमाः- पण्डितास्तेपु आ- -समन्तात् स्वारवः- प्रधानशब्दस्तस्मात् । निमरणधोरणी किंविशिप्टा ? 'सुहीर- सच्चीरविहारसीवरप्रतारसाधारणका' सुहीरः- प्रकृष्टहीरः विशेपशुभ्रत्वात्, सच्चीरं-प्रशस्तवासोविशेषः, विहारः-विशि- प्टमुक्तावलीः, सीवर:-समुद्रः प्रस्तावात् क्षीरसमुद्रः, प्रतार:- . निर्धाररूपं, एपा द्वन्द्वे सुहीरसच्चीरविहारसीवरप्रतारा., तेपां साधारण एव - समाना एव ग्राह्यतया, स्वार्थे कः । किम्भूत है ब ! ? 'आरवादर!' आराणि-देवसमूहास्तेषु वादर-वचनं धर्मरूप यस्य स तथा, तत्सम्बोधनम् । “वार्दर कृमिजे जले । काकचिम्च्याश्ववीजे वारदक्षिणावतंसहयोः ।" [अने. सं. का. ३ श्लो. १२००,१२०१] इति हेमानेकार्यवचनात् । पुनः किम्भूत अ! ? 'जनो:!' जनान्-लोकान् अवति-प्रीणयति य. स तथा तत्सम्बोधनम् । पुनः किम्भूत [अ!]? 'रतक्षर!' रतात्- गम्भोगात् शरति-चलति य: स तथा, तत्सम्बोधनम् ।।५।। . .
सहस्रदलकमलमयः बरजिनस्तवः ।
.
डमरदुद्धरतस्करभीभर-
प्रहरणाविरहः किरताद् दरम् ।
सुकुरतीर्णरदस्वरधीघरः
प्रसरकीतिरजाहरनिदरः ॥६॥
व्याख्या---'प्रसरकोत्तिः' "सृ गतो" प्रसरति-सर्वत्र विस्त-
रयति या सा प्रसरा, एवंविधा कीतिः-पगो यस्य स प्रसर-
कोतिः-अरनाथः 'दरं' भयं 'किरतात्' क्षिपतात् । किंविशिष्टः
प्रसरकीतिः? 'उमरदुर्बरतस्करभीभरपहरणाविरहः' दुष्टो
ज्वरः दुर्वरः तस्करा:-चौराः भीमरो-भयवृन्दं प्रहरणं-युद्ध,
एषां द्वन्द्वः दुर्वरतस्करभीभरप्रहरणानि, डमराणि-भीष्यानि
दुर्बरतस्करभीभरप्रहरणानि, तेपां अ [?आ] विरहः-समन्ता-
द्विरहो यस्य स तथा । पुनः किम्भूतःप्रसरकीतिःो 'सुकुरतीर्णर-
दस्वरधीधरः' "कुरत् शब्दे" अलन्तः, सुकुरेण-समस्तजनप्रिय-
त्वात् विशिष्टशब्देन तीर्णः-अभिभूतो रदस्वरो धी:-बुद्धिस्त-
स्या घर:-गृहं धीघर:, द्वयोः कर्मधारये सुकुरतीर्णरदस्वर-
धीघरः। "हने रन् (त्)घ च" हन्ति हन्यते । “घरो गृहमिति
प्रासादे"। पुनः किविशिष्टः प्रसरकोतिः? 'अजाहरनिर्दरः'
अजः-नित्यः न हरतीति अहरः, स चासो निर्दर:-निर्भयो यः
स:, त्रयाणां कर्मधारयः ।।६।।
चकार हिंसीरविशारणं गिरः,
उदारसम्भारसुधीरकेकरः।
अमारमन्दारसमीरकन्धर-
प्रकार आचारविदीरनीवरः ॥७॥
८ - स्वोपज्ञवृत्तिविभुधिनः व्याख्या- -'उदारसम्भारसुधीः' उदारा:-दातारस्तेषां सम्भार:-गणः "सम्भारः सम्भृती गणे" [अने. स.कां. ३ श्लो. १२१६] इत्युक्ते , तेन सुष्ठु ध्यायते यस उदारसम्भारसुधी:- श्रीअरनाथजिनः "हिंसी रविशारण' हिंसीराः-हिंसाः प्रकरणात कर्माणि तेषां विशारणं-व्यापादनं हिंसीरविशारण कर्मनाशं 'चकार' कृतवान् । किम्भूत उदारसम्भारसुधी: ? 'गिरः' " निगरणे" गिरतीति गिर "नाम्युपान्त्यप्री-क-ग-ज्ञः कः"[सि.हे. ५।१।५४] इत्यनेन कप्रत्यय । पुन किम्भूत उदारसम्भारसुधीः? 'अकेकरः' न केकर: अवेयर -अवक्रदृष्टिरित्यर्थः। पुनः किम्भूत उदारसम्भारसुधी: ? 'अभारमन्दारसमीरकन्धरप्रकार:' मार:-- कन्दर्पः न मार:-अमार, नशब्दस्य पुत्सार्थवाद् अमार:- कुत्सितकन्दर्प., स एव मन्दार:-मन्दारवृक्षस्तं समीरयति-- सम्यक् प्रेरयति य स अमारमन्दारसमीर', कन्धरः-जलदस्त- प्रकार:-तत्समानोदानेनेति गम्यते य. स कन्धरमवारः, द्वाभ्यां कर्मधारये अमारमन्दारमभीरकन्धरप्रकारः । पुनः किम्भूत उदा- रसम्भारमुधी ? 'आचारवित्' आचारं वेत्तीति स तथा । पुनः किम्भूत उदारसम्भारमुधी ? 'इ' दीप्त. “इल कान्ती" क्वि- बन्तः, ईरयति-क्षिपति पापमिति वा ईर्, "ईरण क्षेपे" वियब- न्तः, पापनाशक इत्यर्थ. । पुनः किम्भूत उदारसम्भारसुधीः? 'अ- नीवरः' न विद्यते नीवर -पुरुपाकारो यस्य स तथा, सिद्धत्वात्, उणादिकोऽयम्, “णीड प्रापणे" नीमीकुतुर्दीर्घश्च"सि. है. उ. गू. ४४३] इत्यनेन वरट् प्रत्ययः, "नीवर पुरुपाकारः" ।।७।। पिभोरमोमोरमगोरगोचर- विफारसंहारफरोरडिङ्गरः।
सहनदलकनलमयः परजिनस्नयः।
जहार कण्ठीरववारसत्तर!,
स वीरकः स्मेरमखो रसातिरम् ।।८।।
व्याख्या है 'कण्ठीरखवारलत्तर!' कण्टीरवानां-गिहानां
वार:-निवारणं तस्मिन् मत्-प्रगस्तं तर:-बलं यस्य म कण्टी-
रखवारसत्तर! हे मुद्दत् ! , गः 'वीन्या' वीर. एव बीरकः-
मुमटः बरनायजिना 'जहान पनयनि स्म । कितन् ? "अं'
व्याधि " मान्तो ब्रह्मसंवाद, परब्रह्मप्रवाचकः । यमन व्या-
पिते व्याधी" [वि. ए. १६) इत्युक्ते । मः कः? पत्तदोनि-
त्याभिगम्बन्धाद् यम्मादिभो:-स्वामिनः 'अमोमो:' हपं कृत-
वान् । फ: ? 'अडिङ्गर' न विद्यन्ते जिग-दामाः यस्य स
अहिङ्गरः प्रकरणात् मायुजनः । किम्भूनाद्विभोः ? 'चमगो:'
न विद्यते मा-मानं येषां ते अमा:-निष्प्रमाणा गाव:-दीप्जयो
यस्य म बमगुस्तम्गात्तथा । पुनः किम्भूताद्विभोः? 'अगोचर-
विकारसंहारकरी:' न गोचरी यरिमन् म अगोचर:-अलक्ष्य
इत्यर्थः, "विकारो विकृती रोगे" [भने. नं. कां. ३ली. १२०३]
इति वचनात्, विकाराणां-रोगाणां महार-विनागं करोतीति
विकारसंहारकरः, अगोचरपचासी विकारसंहारकरच अगोचर-
विकारमंहारकरः, एवम्मूनः आ-धो यस्य ग अगोचरविकार.
संहारकरास्तस्मात्तया । "ऋगन्दः पादके मूर्य धर्म" [ए, इलो.
११] इति विश्वासम्भवचनप्रामाण्यात् । किम्मूनो वीरकः ?
'म्मेरमुखः' स्मेरं-विक्रस्वरं मुमं यस्य स नथा । पुनः किम्भूतो
वीरवः ?'रमानिः' ख्य-धनस्य "२ रत्नं रोदनं धनम्" [मो.
ए. दलो. ६६] मातिः-दानं यस्य म तथा, "पणूयो दानं" इति
घातोः क्तिप्रत्यये स्पम् ॥८॥
स्योपजवृत्तिविभूषितः भ्रमरवृत्तिरनन्तरमक्षरं, वितर मे शरणः सुरकन्नर! । इषिरवागरभन्दरचत्यरः, कमरतामरसाक्षिरमाधरः ॥६॥ व्याख्या-हे 'सुरकन्नर!' सुराणां-देवानां कं-सुखं नरपति-नयति यः स सुरकन्नरस्तस्यामन्त्रणं हे सुरकन्नर! "न नीती" अजन्तः, हे अरजिन! 'मे' मम 'अक्षर' मुक्ति 'वितर' प्रयच्छ । 'हि' इति निश्चये । किम्भूतं अक्षरं? 'अनन्तरं न विद्यन्ते अन्तराणि-रन्ध्राणि यस्मिंस्तत्तथा तत् । किम्भूतस्त्वम्? 'भ्रमरवृत्ति' भ्रमर'-मधुकरस्तद्वद् वृत्तिः-वर्तनं यस्य स तथा । पुनः किम्भूतस्त्वं? 'अरणः' सडग्रामहीनः, शत्रूणामभावात् । पुनः किम्भूतस्त्वं? 'इपिरवागरभन्दरचत्यरः'इपिरा:-सेव्याः, यदुक्तमुणादिवृत्त्यां ."इपिर अग्निः आहारः क्षिप्र: सेव्यश्च" [सि. हे. उ. सू. ४१६] इति, वागरा:-विद्वांसोऽन्तिपद., यदुक्तं हमानेकार्ये- "वागरो वारके शाणे, निरे वाडवे वृके । मुमुक्षौ पण्डिते चापि, परित्यक्तभयेऽपि च ।" [अने. स. कां. ३ श्लो. ११६६, १२००] इति, इपिराश्च ते वागराश्च इपिरवागरास्तेषां भन्दरचति- भदरचन' इयत्ति यः स तथा, "रचण् कृत्यां" ". 'इकिस्ति स्वरूपायें" [सि. है. ५।३।१३८] इति तिवि सिद्धम् ।पुनः किम्भू तस्त्य? 'कमरतामरसाक्षिः' यमरं-कोमलं "कमरो मूर्पः कार्मुकं १. " भन्द पत्याणे सोपे च" [बने. गं. कां. २ एलो. २४३] -- सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः। व्याख्या कोमलं चौर: कान्त श्च"[सि.हे. उ. सू. ३९७] इति हैमोणादि- वृत्तिवचनात्, यत्तामरसं-पद्मं ततुल्ये अक्षिणी-नेत्रे यस्य स तथा । पुनः किम्भूतस्त्वं? 'अमाधरः' न मा अमा-अमाया तां घरति यः स तथा । "मा माया" इति गोपालभट्टीवचन- प्रामाण्यात् ॥६॥ चटरविघ्नरवैरिरसाहरः, स्वतरसा स्परणं करताद् गरः । सुनर आदरतः स्मरतीदरः, स विरसः सरलस्वरणस्तरः ॥१०॥ -'सः' अरनाजिनः 'स्परणं' रक्षणं 'करतात्' क्रियात् । “स्मृ स्पृप्रीतिरक्षाप्राणने" अनट्प्रत्ययान्तः । किम्भूतः सः? 'स्वतरसा'स्ववलेन-स्वकीयवीर्येण चटरविघ्नरवैरिरसाहरः' चटरा:-तस्कराः, "चटण् वेष्टने" उणादिकोऽरप्रत्ययः, चटर:- तस्करः विघ्न-उपद्रवं रातीति विघ्नराःतेचते वैरिणश्च विघ्न- रवैरिणः, चटराश्च विघ्नरवैरिणश्च चटरविघ्नरवैरिणस्तेपां "रंतीक्ष्णे कर्कटे दृढे" [वि.ए. १०१.] इत्युक्तेःरा-दृढा या सा-- लक्ष्मीस्तस्या हरः-हरणं यस्य स तथा । किम्भूतः सः ? 'गरः' "गृ घृ सेके' गरति-भविकजनं देशनाजलेन सिञ्चति यः स तथा । स इति कः? यं 'सुनरः' शोभनपुमान् 'आदरतः' आदरात् 'स्मरति' ध्यायति, जातावेकवचनम् । पुनः किम्भूतः सः? 'इदरः [इ:-कामस्तं दुगिद्दन्नियि (?) दृणाति यःस तथा । पुनः किम्भूतः सः ? 'विरसः' विगतरसः । पुनः किम्भूतः सः? 'सरलस्वरणः' सरलाः-अकुटिलास्तेषु स्वरणं-अतिशयेन गमनं १२ रयोपजवृत्तिविभूषितः यस्य यस्माद्वा स तथा । पुनः किम्भूतः सः? 'तरः' तरति दुस्तरं संसारसागरमिति स तथा ॥१०॥ सुचरणं चरतः किरतः करं, प्रहरतः करणं धरतः सुरम् । व्रतरतश्चिरमाशरणागरः, सुनुरकं क्षुरतादुरगादरः ॥११॥ व्याख्या-'अरः' अरजिनः 'अक' दुःख क्ष-[? झुरतात्' छिन्द्यात् । कस्मात् ? 'उरगात्' उरगः-सर्पस्तत्प्रायत्वाद् उरगः संसारस्तस्मात् । कस्य ? 'सुनुः' श्रावकस्येति यावत् । किम्भूतस्य सुनुः? 'सुचरण' सुष्ठु चारित्र देशविरतिलक्षण 'चरतः' सेव- मानस्य । पुनः किम्भूतस्य सुनु ? 'कर' "कृञ् वर्धे" अलन्तः, कर-वधं 'किरतः' क्षिपतस्त्यजत इति यावत् । पुनः किम्भूतस्य सुनुः? 'करण' इन्द्रिय प्रहरतः । पुनः किम्भूतस्य सुनु.? 'सुरं' मुष्टु रा-दीप्तिर्यस्य स सुरस्त सुर-जिन 'धरतः' विभ्रतः, मनसीति गम्यम् । पुनः किम्भूतस्य सुनु.? 'चिर' चिरकालं 'प्रतरत:' प्रतानि द्वादशसहयाकानि, तेषु रमते इति व्रतरत् तस्य, “गमा वो" [सि. है. ४१२।५८) इति सूत्रेण क्विपि सिद्धम्। अकार: पादपूरणार्थः । किम्भूतोऽर:? 'अशरणागरस्' "शर हिंसने" अनट्प्रत्ययान्तः, न विद्यते शरणं-हिमन येषां श्रयणात् तानि अगरणानि, एवम्भूतानि यानि अङ्गानि-आचाराङ्गाद्यका- दशाङ्गानि तानि, “रस् शब्दे" पिवयन्तः, रसति-शब्दायते यः ग तथा ॥११॥ .
सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः। धीररमारिरमृतं रडामरं सभ्यरभाणि रसनं रतान्तरम् । उच्चरभीतिरनगारशिशिरः, पातूरनूतिरनपूरघुष्टिरम् । ॥१२॥ ललिता-छन्दः व्याख्या-स इति पदमध्याहार्यम् । 'अनगारशिशिरः' न विद्यते अगारं-गृहं येषां ते अनगारा:-साधवस्तेषां शिशिरः- पुञ्जो यस्मिन् सोऽनगारशिशिर:-श्रीअरनाथतीर्थकरः पातु' रक्षतु । कं ? 'अं' जनं "अः कृष्णः शङ्करो ब्रह्मा, शक्रः सोमो- ऽनिलोऽनलः । सूर्यः प्राणो जनः" [सौ. ए. २] इति सौभरि- वचनात्। स कः? यस्य 'रसनं' ध्वनित "रसनं ध्वनिते"[अने.सं. का. ३ श्लो. १००१] इति वचनात् । 'अमृत' सुधासम ‘उच्चः' अतिशयेन 'अभाणि' कथितं, अमृतमपि सर्वजनतुष्टिपुष्टिकर तथेदमपि । कैः ? 'धीरैः' विद्वद्भिः । किम्भूतैः धीरः ? 'सभ्यः' सभायोग्यः । किम्भूतं रसन? 'रडामरं' "रय गतौ" "क्वचित्" सि.हे.पा.५।१७१]डइति,रयन्ते-तीर्थकरविलोकनादपि नष्ट्वा यान्ति येते रा:-दौर्भव्यास्तेषां डामरं-भयङ्करं यतत्तथा तत् । पुनः किम्भूतं रसनं ? 'रतान्तरं रतानां-वचनश्रवणाऽऽसक्तानां अन्तरं-अवधिर्धर्ममर्यादा यस्मात्तत्तथा तत् । " अन्तरं रन्ध्रावकाशयोः ।। मध्ये विनार्थे तादयें विशेपेऽवस रेऽवधौ ।" [अने. सं. का. ३ श्लो. १११४-१११५] १. "धीररभाणि ललिता तभी जरौ" ३१५७ इति वृत्तरत्नाकरः। २. "स्यादागारमगारवत् ।" शब्दरत्नाकरः का ४३लो.. ३६.
४ स्वोपजत्तिविभूषितः इति हेमसूरय : । किम्भूतोऽनगारशिशिरः ? 'अमारिः' न विद्यते मारिः-मरणं यस्मिन् स तथा । पुनःकिम्भूतोऽनगारशिशिरः? 'अभीतिः' निर्भयः । पुनः किम्भूतोऽनगारशिशिरः? 'ऊ:' निशाकरः, तद्वदाह्लादकत्वात् । “ऊः परेतो जडत्वष्टा, विवस्वा- नग्निसारथिः । वह्निनिशाकरः" [सौ. ए. ७] इति वचनात् । पुनः किम्भूतोऽनगारशिशिरः? 'अनूतिः' न विद्यते नूति:-स्तवनं अन्येषां देवानां यस्मिन् स तथा, अस्तोता इत्यर्थः । पुनः किम्भूतोऽनगारशिशिरः ? 'अनपू:' "पुरस् अग्रगमने" क्विपि पू:-अग्रेसरः, न पू: अपूः, न अपूः अनपू., अग्रेसर इत्यर्थः। पुनः किम्भूतोऽनगारशिशिरः? 'अघृष्टिः' न विद्यते पृष्टि:-- स्पर्धा यस्य स तथा, “घृप्टि: स्पर्धापर्पणयोः" [अने. सं. कां. २ श्लो. १०३] इति हेमानंकार्थोक्तेः ।। १२ ।। अररतात् परणं जरणं भर- मररहच्च र आभरपा सरः । नधरणं शरणं वरताद् घुरः, सुखरयोऽमरदो मरतस्मरः ॥१३॥ द्रुतविलम्बितच्छन्दः व्याख्या–स इति पदमध्याहार्यम् । 'सुखरयः' सुखस्य रय:-प्राप्तिर्यस्मात् सुखरय:-श्रीअरनाथजिनः' 'शरणं' प्राणं- रक्षणं 'वरतात्' नियात् । कथम्भूतं शरण? 'नघरणं' "घृ. भासि" अनटि धरण, नाना-नराणां धरणं-भासनं यस्मात्तत् तथा तत्, "नो नरे च मनाथेपि" [वि.ए.७६] इत्युक्तेः। कस्य ? १. "द्रनविलम्बितमाह गमी भएँ" [३८] वृतरनाकरः।
सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तकः। १५ । 'र:' "रा दानाऽऽदानयोः" इत्युक्तेः राति-पञ्चमहाद्रतभारं गृह्णाति यः स रास्तस्य र:-साघोः, जातावेकवचनम् । स कः? यः 'परणं' "पृट् प्रीतो" अन्प्रत्ययः, परणं-प्रीति 'अररतात्' अनिर्मापयत् । 'चः' पुनरर्थे, यः 'जरणं' न्यक्कारं 'अररहत्' अत्यजयत् । कयं? 'भरम्' अतिशयेन, केन? 'आभरपा' आं-- लक्ष्मी वित्ति-पुप्णाति योऽसौ आभरः, पाति-संसारदुःख- जरामरणतो जगत्त्रयं रक्षति योऽसौ पा:-धर्मः, आभरश्चासौ पाश्च आभरपास्तेन आभरपा । किम्भूतः सुखरयः? 'खरः' धर्मव्यवहारपटुः “सत्यसन्धः खरो ज्ञेयः, खरोऽपि पुरपो मतः । खरो रासभ इत्युक्तो, व्यवहारे पटुः खरः ।।१।। इति ध्वनि- मञ्जाम् । पुनः किम्भूत: सुखरयः? 'घुरः' "धुर ध्वनी भीमार्थे" अजन्त:, घुरति-शब्दयति स्याद्वादमिति यसको तथा । पुनः किम्भूतः सुखरयः? 'अमरदः' "अम रोगे" अमा:- रोगास्तान् “रद विलेखने" रदति योऽसौ तथा । पुनः किम्भूतः सुखरयः? 'भरतस्मरः' मरताः-प्राणिनः, यदुक्तमुणादौ- "मरतः मृत्युः अग्निः प्राणी च" [सि. हे. उ. सू. २०७] इति तैः स्मर्यते यः स तथा ॥१३॥ चकोर भट्टारफपौरयोः पुरः, शमारवाहारमदौरघर्घरः। कठेरकान्तारसुवारणस्थिरः, कठोरकालूरविवारसायुरः ॥१४॥ व्याख्या-'अघर्घरः' न विद्यते घर्घर:-हास्यं यस्याऽसौ अयधर:-श्रीअरनाथजिनःशमारवाहारं' शं-सुखं तस्य 'आरः' प्रापणं यस्मात् स शमारः, ऊ:-रक्षाः "ऊः शब्दो रक्षणे" इति - स्वोपजवृत्तिविभूषितः विश्वशम्भूक्तेः, तं आहारयति-आनयति यः स वाहार:-धर्मः, शमारश्चासी वाहाराश्च शमारवाहारस्तं शमारवाहारं-धर्म 'चुकोर' कथयाञ्चकार, "कुरत् शब्द" इत्यस्य परो यांणपि रूपम् । क्व ? 'पुर:' अग्रे, कयो:? 'भट्टारकपौरयोः' भट्टारकाः- पूज्याः प्रस्तावाद् गणधरा देवा वा, पौर'-गागरः, भट्टारकश्च पौरश्च भट्टारकपोरौ तयोः, अत्र जातावेकवचनम् । किम्भूतोऽघर्घर.? 'अदौ' न दुनोति जनान् विचि अदौः । पुनः किम्भूतोऽधर्धरः? 'कठोरकान्तारसुवारणस्थिरः' कठोर.- दरिद्रः भावप्रधाननिर्देशात् कठोरः-दारिद्रयम्, उणादिकोऽयं शब्दः, स एव कान्तारं-वनंतित्र]सुवारणाः-शोभनगजास्तेष्वपि स्थिर -दृढो य: सः सुवारणस्थिरः, तद्भञ्जने सुवारणस्थिर इव सुवारणस्थिरो यस्य[? यः स] तया । पुनः किम्भूतोऽघर्घरः? 'कठोरकालूरविदारसायुः कटोरं-दृढं कं-दुखं येपा ते कठोरकाः, "फ शिरः कं सुखं तोयं, पयो दुःखम्" [सौ. ए. २०] इत्युक्तेः, कठोरकाश्च ते आलूराश्च-विटाः कठोर- कालूरास्तेपां विगतो दार:-भयं यस्मात् स कठोरकालूरविदारः, आलूरशब्द उणादिविटवाची, साया:-लक्ष्म्याः आयु.-जीवनं यस्मात् मायुः, द्वाभ्यां कर्मधारये कठोरकालूरविदारसायुः, "इण्क्गतौ" "कृवापाजिस्वदिसाध्यशो स्नासनिजानिरहीणभ्य उण्" [मि. हे. उ. सू. १] इति सूत्रेण उण् प्रत्यये आयुरिति, "पुरुषः शकटं औषध जीवनं पुरुरवः पुत्रो वा" इति । अकारः पादपूरणार्थः ।।१४॥ १. उदरणमिदं विश्वासम्भप्रणीकाक्षरलाममालाया "ऊ.-रसाई- वाचक. It" इति रूपेण वियते । " . सहस्रदलकमलमयः सरजिनस्तयः। १७ विज्ञरमानेरसितरकारि र. मच्यरनाकरहतेररुभिर। देवरसानरसनेरसंहर! लक्ष्मी ररी धोरफुटेर ! सोऽध्वरः॥१५॥ व्याख्या-है 'अकुटेर !' कुटेर:-शः, न कुटेरः अकुटे- रस्तत्सम्योपनं हे अकुटेर ! -हे पण्डित ! 'म अरजिनः 'लक्ष्मी' श्रियं 'ररी' ददौ । किम्भूतः मः ? 'धी:' "ध्ये चिन्तायाम्" ध्यायतीति फिपि धी:, ध्यातेत्यर्थः ।। पुन. किम्भूत: म: ? 'अध्यर:' “वृ कौटिल्ये" न ध्यरति यः स तथा । स कः ? यस्य विन:' विद्वद्भिः '' गव्दे" हे प्रत्यये रायते-- गव्दधते जनैरिति गुणगानं 'अकारि' कृतम् । किंम्भून विज्ञ: ? 'अमानः निरहङ्कारः । पुनः किम्भूतैयिन: ? 'अगित:' अपद्धः । पुनः किम्भूतविज्ञः? 'अहृतेः' अवधकस्य 'अच्यैः' 'अचंनीयः । पुन: किम्भूतविज्ञः ? 'अनाक: “अन प्राणने" अनन्ति-जीवन्तीति अना:-प्राणिनस्तेषां आ-ममन्तात् कां मुखं येभ्यस्ते अनाकास्तः । पुनः किम्भूतविज्ञ: ? 'अरुभिः' न विद्यते ट्-ईप्पा यंपा ते अरुपस्तः। अयाकारः सम्बोधनार्थमव्ययम् । पुनः किम्भूतविज्ञः? 'देव: "दिवु क्रीडाविजगीपाव्यवहारद्युतिस्तुति [मोदमदस्वप्न- कान्ति] गतिपु" इति वचनात्, दीव्यन्ति-स्तुवन्तीति देवास्तः, स्तोतृभिरित्यर्थः । पुनः किम्भूतविक्षः ? 'अमानः "पोच नारो" अनटि मानम्, न विद्यते सान-नागो येषां ते अमानास्तः। किम्भूत हे अकुटेर !? "पण मम्भरतो", "इकिस्ति स्वरूपार्थे" [सि. है. ५१३६१३८] इति इप्रत्यये सनिः-भक्तिः, न विद्यते सनियंस्य २ १८ " स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः स' असनिस्तस्य असने:-अभक्तस्य असंहर',न' विनाशक !, निरीष्यत्वाद् भक्ताभक्तयोरुपरि ममचेताः ॥१५॥ ववार लक्ष्मीररतीरधीश्वरः,- .., समौरकण्डूरसुधीरकटवरः । सुधारभृत्पूरतुपारदीप्तिरः, सुनारशौण्डीरकुटीरतुष्टिरः ॥१६॥ व्याख्या-'अधीश्वर' श्रीअरनाथजिनः 'लक्ष्मीः' श्रीः 'ववार' वृतवान् । लक्ष्मीरित्यत्र बहुवचनं नानाप्रकारत्वात् सङ्गतमेवेति । किम्भूतोऽधीश्वर. ? 'अरतीः' अरति-असुखतां एति-क्षिपति योसौ तथा, “इण् क्षेपे" किवन्तः । पुनः किम्भू- तोग्वीश्वरः ? 'समौः' सह मया-लक्ष्म्या वर्तन्ते ये ते समास्तैः अवति-वर्द्धते यः स तथा, अत्र अवधातुर्वृद्धधर्थो ज्ञेयः । पुनः किम्भूतोऽधीश्वरः ? 'अकण्डूरसुधी:'- न 'कण्डूराः अकण्डूराः- अकण्डूमन्तः सुधियः-पण्डिता यस्य म तथा । कण्डूर इति कथं शब्दनिप्पत्तिः? उच्यते-"मध्वादिभ्यो र:' [सि है.७।२।२६] मध्वादिभ्यो मत्वर्थे र: प्रत्ययो भवति इति सिद्ध रूपम् । पुनः किम्भूनोऽधीश्वरः ? 'अकट्वरः' "कट्वरस्त्यतिकुत्सितः" अभि. चि. का. ३ श्लो. १४] इति, हेमसूरयः, न कट्वरो अकट्वरः, अकुत्सित इत्यर्थः । पुनः किम्भूतोऽयोधरः ? 'सुधार- भत्पूरतुपारदीप्तिरः' "धारोत्कर्षे पङ्गाद्यग्रे, गन्याने याजिनां गती ॥ जलादिपाते गन्तत्यां" [अने..सं.: का. २. श्लो. ४३८. ४३६] इति हेमाने कार्यवचनात् । सु-शोभना 'धारा-सन्ततिः शिष्यप्रमिष्यादिका येषां ते मुधाराः, "डुमृत् 'धारणपोपणयोः" सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तयः। विश्नति-धारयन्ति गणमिति भृतः--गणधरास्त्रयस्त्रिंशत्सहया- काः, सुधाराश्च ते भृतश्च सुधारभृतस्तेषां पूरः-सुधारभृत्पूरः तदाह्लादकत्वेन तुपारदीप्ति:-चन्द्रमास्तद्वद् राजते-शोभते यः स तथा । पुनः किम्भूतोऽधीश्वरः? 'सुनारशौण्डीरकुटीर- तुष्टिरः' , नराणां समूहो नार, सुष्टु नारं सुनारं, तस्मिन् शौण्डीरा:-सत्यवन्तो ये ते सुनारगोण्डीरास्तेषां कुटीर:-राशि- स्तस्य तुष्टे:-सन्तोषस्य रा-दानं यस्य स तथा । कुटीरशब्द: औणादिकोऽस्ति राशिवाचकः ॥१६॥ भंव्यैरगोभिरहितरयुतैरकह्वरं, होनरधीभिरमितैरकररदुर्मुरः। सुस्वरमाररमणरजितरकार्यरं, पुष्टर नूतिरगदैरनरीरतेः पुरः ॥१७॥ मृदङ्गकच्छन्दः। व्याख्या-'अदुर्मुर:' "मूर्वी हिंसाया" किवन्तः, दुष्टामू:- दुर्मूः, न विद्यते दुर्मू:-जीवहिंसा यस्यासो अदुर्मूस्तस्य अदुर्मुर.- थोअरनायजिनस्य 'अरं अत्यर्थ 'नूतिः' स्तुतिः-गुणोत्कीर्तनं 'अकारि' कृता । 'क:? 'भव्यः' भविकजीवैः इति सम्बन्धः । कयमकारि? 'अकह्वर''"ह कौटिल्ये" • अलन्तः, अकाद्- दुःगाद् बर:-कौटित्यं यस्मात्तत् अक ह्वरं-ससुगमित्यर्थः, एवं यया स्यातथा। अथ भव्यानां विरोपणानि-किम्भूतभंव्यः ? 'अगोभिः' न विद्यते गाय:-फिरणाः येषां ते अगाव:-अदीप्तास्तैः अगोभिः 'अहितः' गत्रुभिः 'अयुतः' न सहितः, निस्तेज.मत्रु- १. "मी जो रो मुदताः।" [२-२६१] छन्दोनुशागनम् । प २० • स्योपज्ञवृत्तिविभूषितः । रहितरित्यर्थः । पुनः किम्भूत व्यः? 'अधीभिः' न धियः अधियः, नशब्दस्य कुत्सार्थत्वाद् अधियः-कुबुद्धयस्ताभिः अधीभिः- कुबुद्धिभि. 'हीनेः' रहितः,सुमतिभिरित्यर्थः। पुनः किम्भूतभव्यः? 'अमित.' न प्रमितः, प्रचुरेरित्यर्थः । पुनः किम्भूतैर्भव्यः ? 'अकरे ' दण्डरहितं । पुनः किम्भूतैर्भव्यः? 'सुस्वैः' शोभनद्रव्य', धर्मोपार्जितधनत्वात् । पुनः किम्भूतभव्यः ? 'अमाररमणः' न विद्यन्ते मारा:-विघ्ना येषां ते अमारा:-निर्विघ्नाः, अत एव रमणा:-रमणीया ये तेऽमाररमणास्तैः । पुन: किम्भूतभव्यैः ? 'अजितः' अपराभूत । पुनः किम्भूतभव्यः ? 'पुष्टः' पुष्टिमद्भिः, अकारः पादपूरणार्थमव्ययम् , अत एव 'अगदेः' नीरोगः । किम्भूतस्य अदुर्मुर ? 'अनरीरतेः' न अरयः-न शत्रव इति अनरय -मित्राणि तेपा ईरति -धर्मादिकार्येषु प्रेरणा यस्य स तथा तस्य । “ईर् प्रेरणे" "इकिश्तिव् स्वरूपार्थे" [सि. हे. १११३८] इति तिवि ईरति सिद्धम् । पुनः किम्भूतस्य अदुर्मुरः ? 'पुर' "पुरत् अग्रगमने" किंवन्तः, पू:-अग्रेसर- स्तस्य ॥१७॥ कठरकदरभङ्ग रम्यसारङ्गसारं, मठरविसरनाशं रण्डभारण्डचारम् । अमरनिकरपूज्यं रङ्गकारङ्गपारं, वमरकृदरसङ्घारक्तमारं सुतारम् ॥१८॥ मालिनीच्छन्दः। १. "ननमयययनेय मालिनी भोगिलो:"[11८१] वृतरानाकर।
व्याख्या- कदर:- सहन्नदलकमलमयः मरजिनस्तवः। २१ -'मुतारं' सुष्ठ तारं-उच्चैः थमि[ध्वनि] यस्य स त] मुतारं-धीरनायजिनं अहं 'आरं' प्राप्तवान्, देवत्वेनेति गम्यम् । किम्भूतं सुतारं? 'कठरकदरभङ्गे रम्यमारङ्गसारं' कठर:-दरिद्रः .भावप्रधाननियात् कठरः-दारिद्रयं म एव :-वृक्षविरोपस्तस्य भङ्गः-भजनं तस्मिन् करकदरभङ्गे रम्यसारङ्गतारभिव-प्रधानहत्तिबलनिव रम्यसारङ्गसारस्तम् । कठरकदरमब्दादोणादिको । पुनः किम्भूतं सुतारं? 'मठर- विसरनाशं मठराः-अनानिनः,यदुक्तमुणादिवृत्ती-“मटरं ऋषिः अनानी गोत्रं च" [सि. हे. उ. मू. ३९७] इति, तेषां विसर:- समूहस्तस्य' नागो यस्मात् स मठरविसरनागस्तम् । पुनः विम्भूतं सुतारं ? 'रण्डभारण्डचार' रण्डाः-निस्त्रीकाः भरण्डाः-भण्डा: भरण्डानां समूहो मारण्ड, रण्डाथ भारण्डानि च रण्डभारण्डानि चरणं चारः, रण्डभारण्डानां चारः-गमनं यस्मात् स तथा तम् । पुनः किम्भूतं मुतारं? 'अमरनिकरपूज्यं' अमरा:- T:-देवास्तेषां निकरः-वृन्दं तस्य पूज्यः-पूजनीयो यः स तया तम् । पुनः किम्भूतं मुतारं? 'रङ्गकारङ्गपारं' करङ्गाः कर्नगीला:, करना एव कारगाः,स्वार्थे अण, रङ्गस्य-हविशेषस्य कारङ्गा ये ते रङ्गकारङ्गास्तेषां पारः-पालनं यस्य स तथा तम् । पुनः किम्भूतं मुनारं ? 'वमरकृदरसङ्घारक' वमरा:-दुर्मेधसो ये कृदरा:-सर्वकर्मप्रवृत्तदस्युजनास्तेषां नड्वो दमरकृदरनडला अरक्त:--अनामत्तो यः म तथा तम् ॥१८॥ १.स्तस्नाशयो यस्य इति मलारों पाठः ॥
-- २२ स्वोपेजवृत्तिविभूषितः विभुरनकरसङ्घारञ्जितारक्ष्णशूर- प्रपुरजदरहोभी रक्षक रज्यसेर !i. । यतिरदितिरहङ्कारक्षितेरक्षधार- मकरमुदिरसुश्रीरदृसंरम्भवारः ॥१६॥ व्याख्या-हे 'अर!' अरनाथ ! त्व 'रज्यसे', रङ्गं कुरुपे । के.? 'रतकै.' रक्षन्तीति रक्षकास्तैः रक्षकः, साधु- भिरित्यर्थः । किम्भूतं रक्षकै ? 'अनकरसङ्घारणितारणशूर- प्रपुरजदरहोभि' न विद्यते अकं-दु.वं यस्मिन् सोऽनक: एवम्भूतो रमञ्च -धनममूहो यस्याः सा अनकरसङ्घा, सा चासौ आ न-लक्ष्मी: अनकरसवा, तया रजिता-रसीकृती आरक्ष्णशूराः- समन्ताज्जीवपालनसुभटा' ये ते अनकरसङ्घार नितारक्षणशूराः “पुर सुरत् ऐश्वयंदीप्त्योः" प्रपुरति-प्रकण सर्वज्ञानोत्तमत्वाद् ईप्टे यत्तत् प्रपुर-केवलज्ञानं तेन जत्-अत्यर्थं जायमानं अरहः-- अच्छन्नं येपा ते प्रपुरजदरहसः,अनकररावारजितारमणराव ते प्रपरजदरहमश्च अनकरमवारञ्जितारणशूरप्रपुरजदरहरा- स्त । जत् इति मायं निष्पत्तिरिति ? "जनैचि प्रादुर्भाव" इति धातोः पतरि जजन्तीति वाक्ये "जाज्ञा-"[गि.हे. ४।२।१०४) इनि गूत्रेण जादेश "नभातः" [गि. हे. ४।२।९६] इत्याल्थुकि गत् इति मिदम् । किग्मृनम्म्य है घर ! ? 'विभुः' स्यामी, मागान्यायलिनामिति गम्यते । पुनः किम्भूतम्यं ? 'यतिः' गाण. पुन: किम्भूनरत्वं? 'अदिति,' अराण्डनः । पुनः किनर ? 'महद्वारक्षित,' अहवारस्य-मयस्य क्षितं-शयं पनि प्राप्नोति यः ग तथा । पुन. शिम्भूनारय ? 'अक्षधारम.
२३ सहस्रदल कमलमयः.अरजिनस्तवः। करमुदि: अक्षः-ज्ञानं,"अक्षोरयस्यावयवे, व्यवहारे विभीतके। प्रासके शकटे कणे, तुपे ज्ञानात्मयोरपि ।।" [अने.सं.का.२ श्लो. ५६०] इति हैमानेकार्थोक्तेः, अक्षं-ज्ञानं धरतीति अक्षधारः, कर्मण्यण, मकर: :-निधिविशेपः, स इव मुदि:-प्रमोदो यस्मात् मः मकरमुदिः, यथा हि दरिद्राणां निधिविलोकनात्प्रमोदस्तथा अस्मादपीति, “मुद् हर्षे" "इकिश्तिव् स्वरूपार्थे' [सि. हे. ५५३।१३८] इति इंप्रत्ययः,. अक्षधारश्वासो मकरमुदिश्चेति कर्मधारयः । पुनः किम्भूतस्त्वं? 'अमुश्रीः' एषु-जनेषु सुश्री:- शोमनश्रीर्यस्यासो तथा, "अः कृष्णः शङ्करो ब्रह्मा, शक्रः सोमो- ऽनिलोऽनलः । सूर्यः प्राणो जनः" [सौ. ए. २] इति वचन- प्रामाण्यात् । पुनः किम्भूतस्त्वं? रम्भवारः' अर्द्ध-अत्यर्थ संरम्भ -परीरम्मोऽहतां यस्मिन् स अट्टसंरम्भः-निःश्रेयस, तस्य वार:-वरणं यस्य स तया, । अट्टो हट्टाट्टालकयोमशे"। [अने. सं. फा. २. श्लो. ९४] इति वचनात् ॥१६॥ नायरनुत्तरनररभिहारसत्वर- भद्ररदररहररमलेरघाशरः । देवरवस्कररहरवहारकूत्कर- नप्टरपाटि रसिकरदरंरवल्लरः ॥२०॥ मुदङ्गकच्छन्दः। व्याख्या-अनुत्तराः-प्रधानाः ये, नरा:-मनुप्या: अनु- तरनराः अनुत्तरतरः, अयं- गुरुरिति रोषः, 'अघादार'.", हिंसने" अलन्त., अघानां-पापानां आ-ममन्तात् घर:-हिंसनं १. " पारके शक्ट करें, जाने चारमनि रावनो" इति मुदिते । ॥
२४ स्वोपजवृत्तिविभूषितः, यस्मात् म.अघाशरः-पापनाशक: अपाठि'.पठित इति सम्बन्धः। किम्भूतोऽयागरः ? 'अवल्लर:' "वल्लरं कुञ्जमार्योः क्षेत्रे [ऽजम्भसि शाहले ।]" [अने. सं. का. ३ श्लो. ११६८] इति भगनाद्, न विद्यन्ते वल्लराणि-क्षेत्राणि धान्यवपनस्थानानि यस्यासी तया, त्यक्तगृहवासत्वात् । अथ सर्वाणि तृतीयाविशेष- गानि-किम्भूतैरनुत्तरनरैः? 'नाथः' स्वामिभिः। पुनः किम्भूतं- रनुतरनरः ? 'अभिहारसत्वरभद्रः' "अभिहारः सन्नहने, चौरि- कोद्यमयोरपि" [अने.सं.का. ४ श्लो, १६०८] इत्युक्ते. अभिहारेण- उद्यमेन सत्वरं-त्वरित भद्र-मङ्गलं येभ्यस्ते तथा तैः। पुनः किम्भूतैरनुत्तरनरैः? 'अदे.' न द्यन्ति जीवानिति ‘अदास्तैः, दयावद्भिरित्यं. । पुनः किम्भूतरनुतरनरः? 'अरहरः' ऋणन्ति- प्राणिनोऽत्यन्तदुःखं प्राप्नुवन्ति येभ्यस्तानि अराणि-घातिकर्माणि, तानि हरन्तीति अरहरास्तः । पुनः किम्भूतरनुत्तरनरः ? 'अमले.' निर्मलैः, गुणोज्ज्वलरित्ययः । पुन: किम्भूतरनुतरनरः? 'देवै.' दीव्यन्ति-धर्म रमन्ते इति देवास्तः, अथवा 'देवः' सुरैः । किम्भूतं. मुरै.? 'अवस्कररहः' "रह. त्यजि अलन्तः, अब स्करस्य-गूथस्य रह -त्यजनं येषां ते तया तः, "अवस्करो गूथगुह्ययोः” [अने. सं. का. ४ श्लो. १६०७] इत्युक्तेः, देवाना- माहाराभावे नीहारम्याप्पभाव इति । पुनः किम्भूतैरनुत्तरनरः? 'अवहारकूरकरनप्ट' अवहारस्तु युद्धादिविधान्तो ग्राह- चौरयोः ।" [अने. सं. का. ४ श्लो. १६०८] इत्युक्तेः अव- हाराणा-चौराणां यः कूत्कर:-कुत्मितममूहस्तस्मानप्टा गता ये ते तया तैः । पुनः किम्भूतैरनुनरनरः ? रसिकं.' इति सुगमम् । पुनः किम्भूतैरनुत्तरतरः ? 'अदरः' निर्भीकः ।।२०।। " सहमदलकमलमपः अरजिनस्तवः। २५ खारभिमरनाशं रञ्जनारन्तिभूर- हमुर दयर वाढं रकनारङ्गमौर !। प्रखरमिहिरकान्तेरन्धकारक्षयोर- समररिपुरनिप्टारक्षसोऽरम्भधूर ! ॥२२॥ मालिनीच्छन्दः। व्याख्या हे 'रजनारन्तिभूः!' रजना:-रञ्जकाः "रजनं रज" [रक्तचन्दने]" [अने सं. का. ३ श्लो. १००२] इति वचनात्, नेपा] या आ-लक्ष्मीम्नया रम्यादिति रज्जना- रन्तिः, "तिकृतो नाम्नि" [सि. हे, ५।१७१] इत्यनेन मूत्रण सिद्धिर्भवति, भद्रं यस्मात् सः भूः, विववन्तः, रज्जनारन्तिश्रासो भूश्व रञ्जनारन्तिभूम्तत्सम्बोवनं हे रजनारन्तिभूः! हे अरनाय! अहं 'वाढ' अत्ययं 'दघर' कृतवान् । किं तन् ? 'अभिमरनागं' "अभिमरो वये ।। स्वबलात् साध्वसे [युद्ध]" [अने. सं. का. ३. श्लो. १६०५, १६०८] इति मानेकार्यवचनात्, अभिमरस्प- साध्वसस्य नागः अभिमरनागस्तं-अभिमरनागं-भयनि शं, कस्मात् ? 'उ' धर्मात् । "ऋगव्दः पावके मूर्ये धर्म [दानं धने पुमान्]" [ए. ना. ११] इति विश्वशम्भुवचनान् । 'मः पादपूर्ती। किम्भूतो हे [रञ्जनारन्तिमू:! ?] 'वः' निदोवत्वाग्निर्मल: "यरु: मौदर्याह रयोददन्तसितेषु च।" [अने सं. का. २ श्लो. ४१४] इति वचनात् । किम्भूत है रञ्जनारन्तिमूः ! ? 'रकनारङ्गमौः! 'रदानि-कृपणानि यानि नारङ्गानि-जन्मिनः "नारङ्गं विटजन्मिनोः" अने. सं. का ३ श्लो. ७२१] इति १. "परः स्यादरवहरयोः" इति मुद्रिते।
जस्वोपवृत्तिविभूषितः :- वचनात्, तेपा मां-लक्ष्मी अवति-नाशयति योसो, रङ्कनार- ङ्गमी., तस्य सम्बोधन हे रकनारङ्गमो. !! एवंविधोतः अकारो निषेधार्थः । पुनः किम्भूत हे रजनारन्तिभूः! ? यो प्राणकः । पुनः किम्भूत हे रञ्जनारन्तिभूः ! ? 'अरम्भधूर!' न विद्यन्ते रम्भा-देवाङ्गनास्तत्सदृशत्वात् रम्भा-रूपसुन्दर्यः सुन्दर्यो येषां ने अरम्भा:-बरङ्गिका , "धूरंड गतो" अलन्तः, गत्यर्थानां प्राप्त्यर्थत्वात्, अरम्भाना धूर -प्राप्तिर्यस्यासौ तया, स सम्बो- ध्यते । किम्भूतोऽहं ? 'असमररिपुः' न विद्यन्ते समररिपवः- युद्धशत्रको यस्य स तथा । किम्भूतस्य उ: ? 'प्रखरमिहिरकान्तः' प्रखर--अत्यन्तकठोर', "प्रखर पुनः ॥ वेसरे हयसन्नाह, कुक्कुरेऽतिभृशं खरे ।" [अने. सं. का. ३ श्लो. ११७०-७१] इति वचनात्, स चासौ मिहिर:-सूर्यस्तस्य कान्तिरिय-रोचिं- रिव यः स प्रखरमिहिरकान्तिस्तस्य, कस्मिन् ? 'अन्धकारक्षे' क्ष.-क्षयं अन्धकारक्षं तस्मिन्, अज्ञानतमोविनाशने सूर्यस्येत्यर्थः । पुनः किम्भूतस्य उ: ? 'अनि- प्टारक्षस' अनिष्टानि-अनभीष्टानि आ-समन्ताद् रक्षासि- राक्षमा यस्मात् स तथा तस्त्र, राक्षस्यमयाभावस्येत्यर्थः ॥२१॥ विदारहर्तारमकारशाडुरं, विहारफारमशारभास्वरम् । . यभार चित्ते रमणीरसानरः फकारकं तारकधारके उरः! ॥२२॥ व्याख्या-है 'तारकधारके उर:!'तारका:-संसाराधि- पारगाः तान् धारयति इति नारकपारकस्तस्मिन् तारकधारके- अन्धकारस्य-अज्ञानतमस.
सहमदलकमलमयः परजिनस्तवः। साधुजने उर:-मुख्यः, "उरो वक्षमि मुस्ये स्यात्" [अने. सं. का. २ श्लो. ५८०] इत्युक्तः, हे साधुजनोत्तम ! 'रमणीरमानरः रंमण्य:-स्त्रियस्तामु रसः-रागस्तं न नरति-ने नपति योसौ रमणीरमानरः प्रस्तावात् मायुजनः 'चित्तै हृदि 'वभार' घृत- वान् । कं ? 'विदारहतार' विदार्यन्ते नरा अस्मिन् म विदारः- युद्धं, तस्य हर्ता-हारको यः स विदारहतां तं विदारहतार- श्रीअरनायजिनम् । किम्भूतं विदारहतारं ? 'अकारमाङ्करं न विद्यते कारः-प्रस्तावात् संसारकारागारं येपा ते सकारा:- मामान्यजिनास्तेषु मध्ये विगिप्ठत्वात् गाकर इव-वृषभ इव अकारमाङ्करस्तम् । पुनःकिम्भूतं विदारहर्तारं ? विहारकर्तार' विहार:-लीला निरुपमसंयमयीविलसनरूपा, "विहारस्तु जिना- लये, लोलायां" [अने. सं. का. ३ श्लो. १२०३] इति हेमाचार्याः, तस्य कर्ता विहारकर्ता, तम् । पुनः किम्भूतं विदारहर्तारं ? अगारभास्वरं' "गारण दोबत्ये" अन्दन्तः, न गारोऽगार:- अदोबल्यं, तेन भास्वर:-मनोजो यः म तथा तम् । पुनः किम्भूतं विदारहतार ? 'ककारक' मुखविधायकम् ।। २२ ।।. तनुरवसरवित्तेरफंसेरस्तदार!, प्रसुरति मुरविष्टेरहतेरभतेर । प्रवरभुदररे! भारत्यमेरस्यवेर! नवरजतरणेरेरडकारण्डजेर ॥२३॥ मालिनीच्छन्दः। व्याख्या-'अररे!' मम्बोधनाथमधयम् । हे 'प्रवरभृत् !' "प्रवरं मन्ततो गोत्र श्रेछे च]" [अने. मं. का.३ श्लो. ११७०] २८ स्वोपजवृत्तिविभूषितः । इति हेमाने कार्योक्तेः प्रवरं-मन्तति पुत्रपौत्रादिका विति- पुष्णाति योऽसौ प्रवरमृत्, तस्य सम्बोधनं हे प्रवरभृत् ! - हे मित्र! 'तनु. शरीरं 'प्रसुरति प्रशोभते । कस्य? 'अवसरवित्तेः' "अवसरो वत्मरे क्षणे" [अने. सं. का. ४ श्लो. १६०६] इति वचनात्, अवसर'-अतीतानागतवर्तमानकाललक्षणस्तस्य "वि- त्तिस्तु सम्मवे । ज्ञाने लाभे विचारे च]" [अने. सं. का. ३ श्लो. २०६] इति वचनाद्, वित्तिः- ज्ञानं यस्य यस्माद्वा स अवसरवित्तिस्तस्य अवमरवितः- श्रीअरनाथजनस्य । किम्भू- तस्य अअमरवित्तेः? 'अर्कसेः' "अर्क स्तुतो" अय॑ते-स्तूयते जनरिति अर्कः, सह इना-इन्द्रेण वर्तते यः स से:-सेन्द्रः, "इ: कामः स्याणुरिन्द्रः" [सौ. ए. ४] इति वचनात्, अर्कश्वासो मेश्च असेस्तस्य । किम्भूत हे प्रवरभृत् ! ? 'अस्तदार!' अस्ताः दारा:- परकलत्राणि येनासो अस्तदारस्तस्यामन्त्रणम् । पुनः किम्भूतस्य अदसरवित्तेः? 'मुरविष्टे:' "मुर वेष्टने" इति धातोः अचि मुरन्ति-आत्मानं आच्छादयन्ति पारिति मुराणि-कर्माणि तेषां विष्टि:-प्रेपणं मुञ्चनं यस्मात् स तथा तस्य,' "विष्टिः कर्मकरे मूल्ये, भद्रायां प्रेषणेऽपि च ।" [अने, सं. का. २ श्लो. ११४] इति वचनप्रामाण्यात् । पुनः किम्भूतस्य अवसरवित्तेः? 'अंतः अभ्रते.' "अंहतिस्त्यागरोगयोः". अनं. सं. का. ३ श्लो. ८४०इत्युक्तत्वात् अंहते.-रोगस्य, जातावेकवचनं, "अभ्र गतो" गत्यर्यानां प्राप्ययंत्वात् "इकिस्ति स्वरूपार्थे" सि. हे ५।३। १३८] इति तिथि अभ्रनिः-प्राप्तिस्तस्य अभ्रतैः, 'ब'न,अकारी निवार्यः, रोगानां नागयस्येत्ययः 1 पुनः किम्भूतस्य अयसर- १. "महाजूप्रेषषु " इति मुद्रिते । ।
सहनदलकमलमयः सरजिनस्तवः।
२९
वित्तः? 'भारत्यमेः भारत्याः-वाग्देव्या 'अमिः भजनं सेवन
यस्मिन् म तथा तस्य, 'अम् गती भजने दाव्दे" इति
काविकल्पद्रुमधातुपाठोthः, "इकिरित ०" सि. हे. ५।३।१३८]
इति मूत्रेण इप्रत्यये सिद्धिः । पुनः किम्भूत हे प्रवरभृत् !
!?
'अस्यवेर!' भजनीयारीर!। किम्भूता तनुः? 'नवरजतरणे:'
"रण गतो" रणयति-सरसि जन्म प्राप्नोति यत्तत् रणं-पा
न्वं-नूननं यद् रजतं-स्वर्ण तस्य रणं नवरजतरण-नवीनस्वर्ण-
कमलं, तदिव एति-शोभते या सा तथा, स्वर्णवर्णगौरीत्यर्थः,
"इन् (?इग्) कान्तो" शिवन्तः, यदुक्तं श्रीहेमसूरिपादः
अभिधानको-
"सुवर्ण पुनः ।
स्वणं हेम हिरण्यहाटकवमून्यप्टापदं काञ्चनं,
कल्याणं कनकं महारजतरंगाङ्गेयरक्मीण्यपि ।।
कलपोतलोहोत्तमवह्निवीजान्यपि गारुडं गरिकजातरूपे ।
तपनीयनामोकरचन्द्रभर्मा-र्जुननिष्ककार्तस्वरकवुराणि ॥
जाम्बूनदं भातकुम्भ, रजतं भूरि भूतमम् ।"
[का.४. श्लो. १०६-११]
पुनः किम्भूतस्य अवमरवित्तेः? 'ए:' "एघम् (? इण्क्) गतो"
गत्यर्थानां मानायंबाद् विचि एति-सर्वजनमनोगतं जानाति
य. ग ए, तस्य ए: । पुनः किम्भूतम्य अवमरवितेः?
(अङ्कमारण्डजेर'] "अकि गत्यां" अद्नं अद:-जानं स एवं
कारपड:-अमिन्तेन जस्तीति विचि, अद्वकारण्टजेस्तस्य,
अकारः पादपूर्ती, "कारण्यो मयुकोशेमौ" [अने.. सं. का.
३ टी. ७७५] इति वचनात् ॥२३॥
व्याख्या । स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः पूज्यरघोररमदर! तर, नेतारमायोरनयरपांसुरम्।। धरिमंहेरगसो रपं त्वरं, पातारमस्तेरकलेरमुष्करम् ॥२४॥ -'अ!' इति सम्बोधने, भो जनाः! इति पद- मध्याहार्यम्, प्रणमतेत्यपि शेपः । कं? 'जेतरं' "जि अभिभवे" जयतीति विचि जे -जेता प्रकृप्टोजेः जेतरस्तं जेतरं-श्रीअरनाथ- जिन "कित्याद्येऽव्ययादसत्त्वे तयोरन्तस्याम्" [सि. हे. ७.३।८) इत्येनन सूत्रेण तरप् । किम्भूतं जेत? 'पूज्य, पूजाहै:-साधुभिरि- त्यर्थोपलक्षितमित्यर्थ.1 किम्भूतं. पूज्यः? 'अघोरैः' अभयङ्करैः । पुन किम्भूतैः पूज्य:? 'अमदै.' निरहङ्कारः पुनः किम्भूतः पूज्यः? 'अनये.' "अन प्राणने" अनन्तीत्यचि अना:- :-प्राणिनस्तेपां. या- लक्ष्मीर्येभ्यस्ते अनयास्तः । पुन: किम्भूतं जेतर? 'आयोः' जीवनस्य 'नेतारं दातारमित्यर्थः, दयापालकत्वात् । “इएक गती" एतिी] त्यायु. "कृयापाजिस्वदि [साध्यशौइस्नासनिजानिरहीणभ्य उण]" [मि.हे उ.मू.१] इत्यनेन उण्प्रत्यये सिद्धम् । पुनः किम्भूतं जेतरं? 'अपामुरंपांमू-रेणुस्तत्प्रायत्वात् पांसव.-शठास्ते, विद्यन्ते यस्य स: पांमुरः, "मध्वादिभ्यो र." [सि. हे. ७।२।२६] इति रः, न पांसुरोमांमुरस्तम् । पुनः किम्भूतं.जेतरं? 'धर्तारं' धारकम् । कास्य ? , अहेः' भाग: “अहिक भासि" "इकिश्तिव" [सि. हे. ५॥३।१३८] इति इप्रत्ययः । पुनः किम्भूतं जेतरं ? 'रपं' १.---"पलि-धूल्यो पागु-गागू, रंजो ना सान्तपण रजः" इति शदरनाकरः का. ४ श्लो. ३३.
• सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः। । "रलयो: सावर्णम्" इत्युक्तः ‘लपं' "लपञ् सृहि" लपति- स्पृहतीति किपि लक(?) तं लपंवाञ्चकम् , कस्य ? 'अगसः' मायतक्षेमस्प, "अज क्षेपणे अजियुजिभृजेच" सि. है. मू. ६६६] इत्यनेन औपादिकमूत्रेण अम्प्रत्ययो गकारथान्ता- देशा भवतीति निप्पन्नं अगः-क्षेममिति । पुनः किम्भूतं जेतरं? 'स्वर' "त्वर स्यदि" मचि त्वरयति धर्मार्थ जनानिति त्वर- स्तम् । पुनः किम्भूतं जेतरं ? 'पातारं' पालकम् , कस्य ? 'बस्तेः' अस्त:-क्षिप्तः इ:-कामो येन म जस्तै:, तस्य अने:- माघो: । किम्भूतस्य अस्तेः? 'बकले:' कलहरहिनम्य । पुनः किम्भूतं जेतरं? 'अमुष्कर' मुका:-अण्डका विद्यन्ते येषां ते मुकरा:-पगवः, "मवादिन्यो रः" [गि. हे. ७।२।२६] इति रः, न विद्यन्ते मुफराः यस्यासौ तया तं, वृतदतत्वात् ।।२४।। अवरहसरयागारव्यवारण्टरोर- वपरवणरसालौरम्यलेरदूरम् । गुरुरवलिरघृत्योरङ्गनी रश्मिदोर- गिरिरशिपिरद्धि रक्षतात् रच्यपूरः ॥२५॥ व्याया-'रच्यगूरः' "गूर उद्यमे" अनन्तः, रच्य:- रचनीयो मूर:-उद्यमो धर्मार्थ यम्यानी रच्यगूरः-श्रीवर- नायनिनः रक्षतात्' पातु । 'रक्षनात्' अग्रे 'रत्र्यपूरः' इत्या "न मन्धिः" [नि. है. २] इत्यनेन मूग मन्थ्यकरणमा दुष्टम् । कं ? 'अगिधिरवृद्धि' न शिविरा-न या बुद्धियंच्यानो अशिविरदिन्तमित्यन्वयः । किम्भूतो रच्चपूरः? 'भवरह- सरयानारय्यवारण्डरोग्परयणलालो:' व-हीनं दः- स्वोपजवृत्तिविभूषितः अप्रकाश्यं यस्मात् सोऽवरहसः, यद्वा अव-हीनो रहमा यः सः अवरहस , “तप्तान्ववाद्रहसः [सि.हे.७३३८१] इति सूत्रेण समा. मान्त अप्रत्ययः, अवरहसा:-साधवस्त एव रथाङ्गाः-चक्रवाका- स्तेषा आह्लादकत्वेन रविरिव-मानुरिव योसौ अवरहसरथा- गारविः, “वरण्डो वदनामये" अने. सं. का. ३ श्लो..७८१] इति ववनाद्, वरण्ड एव वारण्ड , स्वार्थे अण्प्रत्ययः, न विद्यते वारण्ड:-बदनामयो मस्यानो अवारण्ड' रोर-दरिद्रः निर्घ- नत्वात्, यद्वा न वारण्डो अवारण्डः, नगन्दस्य कुत्सार्थत्वाद् अवारण्ड:-कुत्सितवदनामयस्तेन रोरः-दरिद्रो यः स अवारण्ड- रोरः, वृपं-पुण्यं रोतीत्येवंशीलो परवण:-धर्मवक्ता, "रसाला दूर्वाविदार्योजिह्वामाजितयोरपि।" [अने. सं. का. ३ श्लो. १२८०] इति वचनाद्, रमालया-जिह्वया अवति-दीप्यति जिहाया अत्यन्तरक्तत्वेन तनुत्वेन च यः स रसालोः, चतुर्णा कर्मधारये अवरहसरयागारव्यवारण्डरोरथपरवणरसालीः । पुनः किम्भूतो रच्यगूर.? 'अम्यले.' "अम गतौ भजने" अम:- शानं विद्यते येषां ते अमिन.-पण्डिताम्तेषां अल:-भूपा येभ्यम्त अभ्यलाः, अल यारणपर्याप्तिभूषासु" इति वचनात्, अनन्तः, अम्यला:-सुरगुरुमानमातङ्गमर्दनमारङ्गनाव (गाय) निमा गतनिभा (?) यादिनः पोटगतमसपाकारतरिति दीप्यते योमो तथा । कयं भवति? 'अदूर' - "अको भूपा हपकलक्ष्मगु ॥ चित्राजीनाटपाचशे, स्थाने प्रोडेलि. कागमोः।" [अनं. मं. का. २. लो. १७,१८] अद्वात्- भागमो दूरं यत्तत् अदूरं, एवं यथा स्यात्तथा । पुनः किम्मतो र व्यगूरः ? 'गुरुः' गरिष्ठः गुणरिति गम्यते । पुनः " महनदलर मनमयः बरजिनस्तवः। किम्भूतो रव्यमूर:? 'अङ्गनः' "यगि गती" गत्यर्थानां प्राप्त्यर्थ- त्वाद् बङ्गपति-प्रापयति अङ्गनः, कनयनट् । कयाः ? 'अब- लिरधृत्योः' न बलिरा: बलिरा:-अवक्रदृष्टयः, धृतिश्च- मुख घुनिश्च-अन्नोपः "स्यादादमधयः" (मि.ई.३।१।११६) इति मूणकोर्ष बृती, अबलिराणां-अवऋदृष्टीनां घृती अव- टिरवृती नयोः, “निर्योगविगे स्याद् वारणाययोः सुन्चे। मन्नोपाध्वयोवापि" [अने. सं. कां. २ सा. १८६] इत्युक्तः, अमुना विगेपणेन गीलवतयारिणां पुंसां मुखमन्तीपयोः प्रापक इत्यर्थः । पुनः किम्भूतो गच्यगूरः ? 'रश्मिदी: "दु उपतापे" विप्रत्ययान्नः, रदिमभिः शन् दुनोति-तापयति योना तया । पुनः किम्भूती रच्यगूरः? अगिरिः' “गिरिः पूज्येः क्षिनि कन्दुक । गले गिरियकर गोविपि" बने. सं. कां. २. लो. ४१६] इनि वचनाद् न विद्यते गिरिः अशिरुग् यस्यानो नया, प्रधानाय इत्ययः ॥ २५ ॥ कारोरनीतेरघृतेरदोपर! दारोरवाचो रजनौरमोधरम् । सद्दोरनतरमृतेरनम्बरः, सप्नोरिण्टेरन्तेरकर्करः ॥२६॥ म्यान्याहै 'अदोपर!' न दोपा अदीपाः तपां रा:-दानं यम्पामो अदोपरः तत्सम्बोधन है सदापर !-है २. "गिरियर:-गिरिगुः कामादिमयं कटनाम" नि टीकाया टदरक टिपन ।
- स्वोपज्ञवृत्तिविभूषित. थीअरनायजिन ! त्वं 'अवाच.' अत्यर्थ अब्रवीः । कि तत् ? ' परब्रह्म,“अं मान्तो ब्रह्मसंवादे, परब्रह्म प्रवाचकः।",[वि.ए .१६] इति वचनप्रामाण्यात् । कस्य? 'कारो:' इन्द्रस्य, जातावेकवचनं, "डुकंग करणे कुंग्ट् हिंसायां वा" निरनुवन्धग्रहणे सामान्य- ग्रहणान् करोति करति कृणोति वा "कृवापाजि स्वदिसाध्यशोद- स्नामनिजानिरहोण्भ्य उण्" सि. हे. उ. मू१] इति सूत्रण उण्प्रत्यये "कार: कारी नापितादिः इन्द्रश्च" । किम्भूतस्य कारो: ? 'अनीतेः' "णीम् प्रापणे" क्तिप्रत्यये नीति:-प्रापणं, न विद्यते नीति -प्रापणं यस्यासौ तथा तस्य । - कस्य ? 'अघृतेः' अमुखस्य । पुनः किम्भूतस्य कारो: ? 'दारो.' ददाति दयते यच्छति ति दाति दापयनि वा इत्येवंगीलो। दारु- स्तस्य, “दाधेसिगदसदो रुः" [सि.हे. ५।२१३६] इति र- प्रत्यये सिद्धिः । किम्भूतस्त्व ? रजनी-निशां कान्तात्वेन एति-- प्राप्नोति योऽसौ रजनी.-चन्द्रस्तद्वत् शीतलत्वाद् रजनीरिव रज• नीयः ग तया । पुनः किम्भूतस्त्व? 'अभीरः' न विद्यन्ते भीरवः-- स्त्रियो यस्यासो तथा । पुन. किम्भूतस्त्यं ? 'सद्दोः' सन्तो गोभनो अचितौ वा दोषी-[वाम] दक्षिणभुजी यस्यासी तथा । पुनः किम्भूतम्य कारो. ? 'अनत्तः' न विद्यते अनिः-पीडा यस्यागो अनिम्नस्य । पुनः किम्भूतस्य कारो:? 'अमृतेः' अगरणग्य । पुनः विम्भूगावं ? 'अनम्बर: न विद्यते अम्बर-- पानी पम्यानी तथा । पुनः किम्भूतम्य कारो:? 'अभृतः । विचने भूमि.-गोषण यासो तथा तग्य । यग्य? 'अरिष्ट' धनुभम्य । यम्य? 'गतो.' गती-विधमाना नः-स्तुविजनेषु - सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः। यस्य स सन्तु:-भक्तस्तस्य । पुनः किम्भूतस्त्वं ? 'अकर्करः' अककंग इत्यर्थः ।।. २६ ।। सृमरमुदिरसेरोरर्थधेरखिखोरं, ननर निगरणारच्छपेरम्बगारम् । सुमरठिकरटोतेरस्तजारामार- मधुरनविरलक्षे रथ्यदेरस्त्रपेर ॥ २७ ।। व्याख्या - अहं ननर' प्राप्तवान्, "नृश् नीती" परोक्षाया उत्तमपुरुषरूपम्'। किं तत् ? 'अत्खिखीर' "अत सातत्यगमने" शिवन्तः, गत्यर्वाना ज्ञानार्थत्वाद् ‘अद्-ज्ञानं तस्य खिखीरा- बहुत्वं यस्मात् म तथा तं अखिखोरं-जिनप्रणीतधर्मम्', "खिखीरा वद् । बहुत्वे च" [अने. सं. का. ३ श्लो. ११५०] इत्युक्तेः । कस्मात् ? 'समरमुदिरसे रो:' सरन्ति-मैथुननिमित्तं वेश्यादिपु गच्छन्ति ये ते समराः, "सृघस्यदो मरक” [मि. हे. ५।२।७३] इत्यनेन मरक, अत एव "मुदिरः कामुके मेघे" [अने. सं. कां. ३. श्लो. ११९६] इति वचनप्रामाण्याद् मुदिरा:- कामुकाः, "पिंगट वन्धे" सिनोति-बध्नातीत्येवंशीलो यः स समरमुदिरसेरु, "दाधेिसिगदमदो रुः" [सि. है. ॥२॥३६] इति रुः, तस्य [?तस्मात्] समरमुदिरसेरो:, श्रीअरनाथजिना- दित्यर्थः । किम्भूतं अस्लिमोरं?'अम्बंगारं' "अम्ब च गतौ"(?) अम्च्यते-ज्ञायते योग्यायोग्यमार्गमेभ्यो लोकरिति अम्बा-जिन- प्रणीतकादनाङ्गानि, तेषां गार:-विज्ञायो यस्मात् स तथा तम्, १. "निद्विरा सिद्विरी" इत्यपि पा० ॥
'स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः "गृक्ड विज्ञाये” इति कविकल्पद्रुमधातुपाठोक्तेः । किम्भूतस्य सृमरमुदिरसेरो. ? 'अर्थधे.' अर्थ-ज्ञानदर्शनचारित्ररूपं धनं धियति योऽसौ अर्थधेस्तस्य, "धित् धृतो" विचप्रत्ययान्तः । पुन: किम्भूतस्य सृमरमुदिरसेरो: ? 'निगरणाश्रेः' “गत् निगरणे" नितरा गरणं-अदनं येषां ते निगरणा:-प्राणिनः, ते आ- समन्तात् थयन्ति-सेवन्ति यमिति निगरणाश्रेस्तस्य, प्राणिभिः सेवितस्येत्यर्थः, "श्रिग् सेवने" विच्प्रत्ययान्तः । पुनः किम्भू- तस्य सृमरमुदिरसेरो ? 'अच्छपे.' "पित् गतौ" ज्ञानार्थः विजन्तः, अच्छ:-निर्मल: पे:-ज्ञानं केवलज्ञानं यस्यासो तथा तस्य । पुन. किम्भूतस्य समरमुदिरसेरो: ? 'सुमरठिकरटीते.' मरठाः-प्राणाः, यदुक्तमुणादिवृत्ती-"मरठः दध्यतिद्रवीभूतं कृमिजाति: कण्ठ प्राणश्च ।" [सि. हे. उ. सू. १६७] इति, ते विद्यन्ते येषां ते मरठिनः, मुष्ठु मरठिनः सुमरठिनः, तेषां मध्ये करटिन इव-गजा इव ये ते सुमरठिकरटिनः, तेषां इतिः- शोभा यस्मात् स तया तस्य, “इण् कान्तिगतिव्याप्तिक्षेप- प्रजनसादने" इति वचनात् । पुन. किम्भूतस्य संमरमुदिर. मेरो: ? 'अस्तनारण्डमारमपुरनविरलक्षे.' जरण्ड:-अतीतव- यस्याः, भावप्रधाननिर्देशाद् जरण्डशब्देन वृद्धत्वम्, जरण्ड एय चारण्डः, स्वा अण्प्रत्ययः, अन्तः-क्षिप्तः जारेण्ड:-वृद्धत्व- मेव येभ्यस्ते अस्तजारण्डा:-युवानः, मार.-पन्दपस्तद्वत् सुन्द- रम्पत्याद् मधुरा.-गवंजनप्रियाः मारमधुराः, अस्तगारण्डाभ ने मारमधुगध अस्नगारण्डमारमधुरा, ते प ते नाभ-नरा अलजारण्टमारमधुग्ना:-कामिपुमांमः, "नो मरे" [७६] इति विधानभवपनात्, सेभ्यो पिरला:-असंहना ये ते अग्नजारत- सहन्नदलकमलमयः अरजिनस्तवः। मारमधुरनविरलाः, तः “क्षि क्षयश्वर्ययो:" विचि क्षयति ईप्टे यः सः अस्तजारण्डमारमधुरनविरलोस्तस्य । पुनः किम्भूतस्य सृमरमुदिरसेरो: ? 'रथ्यदे:' "रथ्यो रयांशे रयवोढरि" [अने. सं.कां.२ श्लो. ३८६] इति वचनाद् रथ्याः-रथवोढारः, प्रस्ता- वाद् धर्मरथवोढारः, तान् “देंछ पालने" विचि दयते-पालयति योऽसौ रथ्यदेस्तस्य । पुनः किम्भूतस्य मृमरमुदिरसेरो: ? 'अस्त्रपे: अ' "अस्त्रं चापे प्रहरणे" [अने. सं. का. २. श्लो. ४००] इति वचनात् "पित् गतो" "ये गत्यर्यास्ते प्राप्त्यर्थाः" इति वचनाद् अस्त्राणां-चापानां पे:-प्राप्तिर्यस्य सोऽस्त्रपेस्तस्य अस्यपेः, एवंविधः 'अ' न, अकारो निषेधार्थः ।।२७॥ लोकरशोभि रपनरपनरखिसिरः, पूर्तरमातिरतरेरकदरघस्मरः । सुश्रीरनेमिरनतरतुधेरतोमर- 'प्रष्टरदुःखरजकरवनरमत्सरः ॥२८॥ मुदङ्गकच्छन्दः व्यास्या- -'असिखिरः' "बिङ्घिरस्तु शिवाभेदे,खट्वाङ्गे वारिवालके" [अने. सं. कां. ३ दलो. ११४६] इति वचनाद् न विद्यते सिविरः-चालकं सुगन्ध्ययं यस्य स असिबिर:-श्रीजर- नायतीयकृत् 'लोकः' थावकजनः साधुजन 'अशोभि' शोभितः । किम्भूतर्लोकः ? 'रपनैः' "रप भापणे" कर्तर्यनटि पन्ति-शुभवार्ता मापन्ते ये ते रपनास्तः।पुनः किम्भूतर्लोकः? 'भपन:' "नो युद्धौ ज्ञानयन्धयोः" [२७] इति सुघाकलगवचनाद् सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः। अकरणिरररस्यौरस्तु कारण्डको:! रो, बधिरविखुरणाघ्रोरश्च वारङ्गतौर । रुचिरखदिरदीप्तेरय॑खोरतिहार!, स्वदरवृदरपल्लूरस्य वैरङ्ग! पूर!॥२६॥ धास्या-'हे कारण्डक! 'करण्डक एव कारण्डकः, स्वार्थ अण्प्रत्ययः, हे कारण्डक ! । कस्य? 'र:' "ऋगब्दः पावके मूर्य धर्म" [वि. ए. ११] इति वचनप्रामाण्याद् ना-धर्मः, "ऋ दीर्घो देवमाता स्यादृभवस्तेन ते मुराः ॥ स्त्रीलिङ्गोऽयं धने यही, वासवे वरुणालये। ए. १२-१३] इति वचनाद् आ- धर्मः स एव ऋ ऋः, तस्य र:-धर्मधनस्य, अमुना विशेप- णेन धर्मवनालय इत्यर्थः । ऋ अग्रे ऋ इति सन्यो “समानानां तेन दीर्घः" [मि. हे. ११२।१] इति दोघे ऋ. तदनु पप्ठचेक- वचने 'र:' इति निप्पत्तिः । 'हे र: पारण्डक ! 'हे धर्मचनालय ! हे मित्र! 'अररन्य' भ्रमणस्य प्रस्तावात् समारभ्रमणस्य, यदुक्त- मुगादो-"अरर. कपाटः बुधः भ्रमगं" [मि. हे. उ. सू. ३८७] इनि, 'अकारणि.' अविधानमेव 'अस्तु' भवतु, जन्मस्येति चोपः । अकरपिरित्यत्र "नोऽनिः गाप" [मि. हे. ५।३।११५] इति मूत्रणानिप्रत्यये न करणं अकपिरिति, न विधानमेवेश्यः । कामान् ? 'मो:' "उंट गन्द"विवि अवनि-दानशीलतपोभाव- नाह धर्म परिगिव्दनि योऽमो औः, तम्माद् ओ:-योभर नाजिनात् । किन्भूत हे र: कार टक! ? 'औः !'है प्रोणक ! । विम्भूताद् ओ: ? 'वधिर विमुरणाप्रो.' वधिरा:-धुनिकिकलाः,
३८
स्दोपवृित्तिविभूषितः ।
अप-गतो न:-बन्धोऽकरणार्हवस्तुवातजो येभ्यस्तेऽपनास्तः ।
पुन: किम्भूतैर्लोकः ? 'पूर्त.' पवित्रैः । किम्भूतः असिद्धिरः ?
'अतरै अमातिः' "अत सातत्यगमने" गत्यर्थानां ज्ञानार्थत्वाद्
अतस्य-ज्ञानस्य "रित् गतौ" विजन्त. रे:-प्रापणं यस्मात् सं
अतरेः, नस्य अतरे:-धर्मस्य 'अमातिः' न विद्यते मातिः-मानं
यस्मात् स तथा । पुनः किम्भूतोऽखिबिर ? 'अवदै' "देव
शोधने" किवन्त , अकस्य-पापस्य दै-गोधनं यस्मात् स तथा ।
पुन: किम्भूतोऽखिसिर ? 'अघस्मर' अनदनशील: । पुनः
किम्भूतोऽखिड्विरः ? 'सुश्री:' "श्रिग् सेयायां" सुप्छु यति
पुण्यकर्माणमित्येवंगील: सुश्रीः, “दिद्युद्ददृ" [मि. हे. ५।
२१८३] इति सूत्रेण शीलादौ सत्यर्थे किमो-निपातः । पुनः
किम्भूतोऽपिसिर ? 'अनेमि' नमतीत्येवंशोलो नेमिः, न नैमि.
अनेमि , तीर्थकृत्त्वात्, “मरिच क्रिदधिज्ञिनेमिः" [सि.हे. ५।२।
३६] इत्यनेन मूत्रेण गोलादौ सदर्थे युक्तिमान् डयन्ती निपा-
त्यते उनि नेमिराम्यनिर्णत्ति । पुनः किम्भूतैर्लोक: ? 'अनतः
अनम्रीभूतैः परतीथए । पुन. किम्भूतोऽसिद्धिरः ? 'अगुधैः'
अमून्-प्राणान् घियति विचि यमुधेः, "धित् धृतो" । पुनः
किम्भूगलों: ? 'अनोमरप्रष्ट' न विद्यन्ते तोमरा:-गस्त्राणि
येपा ते अनोगगस्तेषां मध्ये प्रप्टा:-विशिष्टा अतोमरप्रष्ठा-
नः । पुनः किम्भूालों कः ? 'अदुःगरज' दु.रां नास्ति येभ्य-
ने अदु.माम्नान् “रस्जी रागे" रम्जतीति अकि अदु.पर-
जमानः, गुणकारनगरमारित्यर्थः । पुन: पिम्मूनलोप: ?
'अवन.' अयमि-गरमी वर्दयन्नि ये अनटि अवनाग्न. ।
पुनः विम्भूनामिदिरः? 'अमलर' मगररहित. ॥२८॥
सहस्रदलकमलमयः सरजिनस्तवः। अकरणिरररस्योरस्तु कारण्डकोः! रो, बधिरविखुरणाघ्रोरश्च वारङ्गत्तोर । रुचिरसदिरदीप्तेरय॑सोतिहार!, स्वदरवृदरपल्लूरस्य वरङ्ग! पूर! ॥२६॥ व्याख्या 'हं कारण्डक!'करण्डक एव कारण्डकः,स्वार्य अण्प्रत्ययः, हे कारण्डक! । कस्य? 'र:' "ऋगब्दः पावके सूर्ये धर्म" [वि. ए. ११] इति वचनप्रामाण्याद् ना-धर्म:, "ऋ दीपों देवमाता स्यादृभवस्तेन ते मुराः ।। स्त्रीलिम्होऽयं धने [वह्नी, वासवे वगणालये । वि. ए. १२-१३] इति वचनाद् आ- धर्मः स एव ऋ ऋः, तस्य र:-धर्मवनस्य, अमुना. विशेप- न धमंधनालय इत्ययः । ऋ अग्रे ऋ इति मन्यो "समानानां तेन दीर्घः" [मि. हे. १।२।१] इति दो ऋ. तदनु पप्ठचेक- वचने 'र:' इति निप्पत्तिः। 'हे रः कारण्डक!'हे धर्मवनालय ! हे मित्र ! 'अररम्य' भ्रमणस्य अन्तावान् मंमारभ्रमणस्य, यदुक्त- मुणादो-"परन: कपाटः बुधः समपं" [मि. हे. उ. मू. ३८७] इति. 'प्रारणिः' अविधानमेव 'अन्नु' भवतु, जन्मस्येति टोपः । पारपिरित्वय "नमोनिः नापे" [नि. हे. ५१३१११७] इति मूग्रंपानिप्रत्यये न करणं अकपिरिति, न विधानमेवेवयंः । गन्मा ? 'ओ: "गन्दे विधि अवनि-दानगीलतपोनाब- गारू धर्म परिपदिगदपति योनी औः, तम्माद् ओ:-श्रीगर- नाजिनान् । पिन्मन है :कार यः ! ? 'औ: !' हे प्रोगक!" किस्मताद् ओ:? 'यधिविमुरणाप्रो' बधिगः-युनिचिकलाः, स्वोपजवृत्तिविभूषितः विशेपेण सुरणसः-लघुनासिकावन्तः पुमांसः, बधिराश्च विखुर- पसश्च बधिरविखुरणसः, "ध्रु गतिस्थैर्ययोः" विचि धौः, तेषां प्रौः स्थैर्य यस्मात् स बधिरविखुरणाघ्रौः, तस्माद् वधिरवि- खुरणाघ्रो., एवंविघो 'मः' न । पुनः किम्भूताद् ओ: ? चकारः पादपूर्ती, 'दारङ्गतो. अ' “वारङ्गः काण्डखड्गयोः" [सि. हे. उ. सू. ६६] इति उगादिवृत्त्याम्, वारङ्ग:-खड्गः काण्डर्वा तौति- हिनस्ति योऽसौ वारङ्गतोः तस्मात्, एवंविधः 'अ' न, “तुल्यवृत्ति- हिंसापूतिपु" इति ववनाद् विजन्त. । पुनः किम्भूताद् ओ? 'रुचिरसदिरदीप्तेः' "खदिरो दन्तधावनचन्द्रयोः" [अने. सं. कां. ३. श्लो. ११४६] इति हैमानेकार्थोक्तेः रुचिरः-मनोहरो यः सदिर:-चन्द्रः तद्वद् दीप्ति. कायकान्तिर्यस्यासी तस्मात् । पुनः किम्भूताद् ओ: ? 'अ-ध्यं-सो:' "सुङ ध्वनी" विजन्तः, अा:- पूजाहाँस्ते खुवन्ति-ध्वनयन्ति गीतादिभिरिति यं स अध्य- खोस्तस्मात् । [पुन.] किम्भूत हे रः कारण्डक ! ? 'अत्तिहार!' पीडानागक!। पुनः किम्भूत हे र. कारण्डक ! ? 'वै:!' "ओवं शोपे" किपि वायति-शोपयति योऽसौ वः, तत्सम्बोधनं हे वैः! - हे गोषक!, कस्य' 'स्वदरबदरपल्लूरस्य' सु-अतिशयेन अद- वृदरावेव-मइ ग्रामभयावेव पल्लूरं-मितं पयो-निमलपयः स्व- दरवदरपलूरं तस्य तथा । अदरदराब्दी औणादिको मा प्रा- मभयवाचको, "पल्लूरं तु सित पय " शप. सं. श्लो. १६३] इति रोप., जग्याचा. । पुनः किम्भूत है रः कारण्डक ! ? अति वोमलामन्त्रगे, 'हे पूर!'"पूर पूता" अजन्तः, पूरपति अभीष्ट- मिनि पूरः, सरगम्बोधनं हे पूर!, पूरफेत्यपं: ।। २६ ।।
सहस्रदालकमलमयः अरजिनस्तवः। यक्ष्यरचोकू रपठं रमठ्यरः, सत्कारभूनीरनयरगत्वरः। सभ्यरधीशेरधनरपक्मरः, कष्टंरनन्तरदशरकच्छुरः ॥ ३० ॥ व्याख्या-'सत्कारभूनी:!' कारो-निश्चयः तत्र तेन वा भवतीति कारभू:-अग्रेसरः, सन्तश्च-साघवः कारभ्वथ-अग्रेसराः सत्कारभ्वः, तेभ्योऽपि विशिष्टत्वेन अग्रेमरत्वं नयति-प्राप्नोति योऽसौ तथा, तत्सम्बोधने हे सत्कारभूनीः! -श्रीअरनाजिन! त्वं "यक्ष पूजायां" यक्षे-पूजायां अर्हाः यक्ष्यास्तैयस्य :-साधुभिः 'अचोकू:' अत्यर्थं ज्ञानक्रीडामकार्षीः । किम्भूतैयक्ष्यैः ? 'रपठः' विद्वद्भिः, यदुक्तमुणादौ-"रपठः विद्वान् मण्डूकश्च" [मि.हे. उ. सू.१६७]। किम्भूतस्त्वं? 'रमठघर' रमठा:-कोडनशीला विद्यन्तै पेपां ते रमठिन:-चत्रवत्तिनस्तेषां अर:-सेवार्थ प्रापणं यस्य स तया, "ऋग् गत्यां" अलन्तः । यदुक्तमुणादिवृत्त्या-"रमठः देशः कृमिजातिः कोडनशील: म्लेच्छः देवश्च चिलातानाम्" सि. हे. • उ. मू. १६७] । पुनः किम्भूतस्त्वं? 'अनयः' अनयस्य-कुनयस्य ई:-धोपो यस्माद् यस्य वा स तथा, "इल् क्षेपे" शिवन्तः । पुनः किम्भूतस्त्वं ? 'अगत्वरः' अगमनशीलः, परदारादिविति गम्यते। पुनः किम्भूतयध्यः ? 'मभ्यः' सभाहः । पुनः किम्भूतयंक्ष्यः ? 'अधीशः' स्वामिभिः, शिष्यादीनामिति गम्यते । पुनः किम्भूत- यक्ष्यः ? 'अपनः' निर्धनः, यतिवात् । पुनः किम्भूतस्त्वं ? 'अप- कारः “कमर कौटिल्य" अलन्तः, अपगतः कमर:-कौटिल्यं ४२ स्वोपजवृत्तिविभूषितः यस्मात् स नथा। पुनः किम्भूनर्यक्ष्यः ?. 'अनन्तः' न विद्यते अन्तः-विनाशो येपा ते अनन्तास्नः अनन.-नाशरहितः । कः ? 'कप्टै ' अशुभैः । पुन किम्भूतैर्यक्ष्यैः ? 'अदगैः अवस्थाहीनैः। पुनः किम्भूतस्त्वं ? 'अच्छुर '२ सर्जूरहितः३ ॥३०॥ गुरुरनपरथा कं रद्धदौरटयपारः, खलु रचय रतीसारक्षकारण्यवीरः । विमरणपरमात्माऽऽरधनीरन्ध्रकोर- घनरससुरभिर्नेरब्जदग्रत्ननूरः ॥३१॥ व्यात्या-हे विभो ! त्वं 'खलु' निश्चितं 'क' सुसं, 'रचय' विधेहि । कथं ? 'अनपरथा' "प्रकारे था" [सि. है. ७।२।१०२] इति थाप्रत्यये अपरथा-अतया, न अपरथा अनपरथा-न अन्यथा प्रकारेण, प्रस्तावाद् एकयैव सेवया सुसं कुरु इत्यर्थः । किम्भूत- रत्वं ? 'गुरु:' गरिष्यः । पुन. किम्भूतस्त्वं ? 'रवीरटयपार.' "रघिद गमनं रद्धो-ज्ञानं अलन्तः, त ददति ये ते रदिप- ज्ञानदाः, “दा दागं" किन्न., "ग्ट् भार" अत एव रटन्ति- भापन्ने इत्येवंगीला ग्वदीरटिगः, तेरा न विद्यते पार:-प्रान्तो यस्य न तथा । पुनः किम्भूतस्त्व? 'रतीमारक्षारण्यवीरः' "रतिः नगरस्त्रियां गगं" [अने. ग. पा. २२२०३] इत्युका गतिः-रागः, तम्पा :-प्रापण यम्याः मा रतीः, सीधागो गा च-लक्ष्मी. १. "लवाया सा स्पिनि." अभि. पिता का ६मो. १३॥ २. "पापाचरे पानागाहिय" ने..ता. ३ मो. १९१३॥ ३. "प वाहन मर्ड" भि, दिमा धौ. पो. १२८॥
सहस्रदलेफमलमयः परनिगस्तवः। रतीसा, आरक्ष'-रक्षको यः सरतीसारक्षः, "आरक्षो रक्षके" [अने.सं.का. 3 श्लो. १३३०] इतिहमानेकार्थोक्तः, "कारणं घातनं हेतो" [थने. सं. कां ३ दलो ७६५] इति वचनात् कारणं-घातनं विद्यते येपा ते कारणिनः-घातकाः, तेपा ई:-नामो यस्मात् स कारणी., "इल् क्षेपे" किंवन्तः, “वीरा गम्भारिकारम्भाताम- लवयेलवालुपु ।" [अने. सं. कां ३ श्लो. ४६३] इति वचनाद् न विद्यन्ते वीरा:-रम्भागायत्वात् स्त्रियो यस्यासो अवीर, प्रयाणां कर्मधारये रतीसारक्षकारण्यवीर. । पुन, किम्भूतस्त्वं ? 'विमरण- परमात्मा',विगतं मरण-मृतिर्यस्मात् स विमरणः, परमवासी आत्मा च परमात्मा, विमरणश्वासो परमात्मा च विमरणपर- मात्मा । पुनः किम्भूतस्त्वं ? 'आरधनीरन्ध्रकोरधनरमसुरभिः' "कुरत् शव्दे" पन्तः, आरख्यः-प्रारब्यो नीरन्ध्रः-दृढः कोर:- गब्दो व्याख्यानावसरे येन स आरधनीरन्ध्रकोर, धनरसः- कर्पूरस्तद्वन् मुरभिः-मुगन्धो य: म धनरमसुरभि., आरब्ध- नीरन्ध्रकोरस्चानौ धनरससुरभिश्च तया । पुनः किम्भूतस्त्वं ? 'नेः' "नी प्रापणे" नयनि गर्म योऽमो नेः नेता विजन्त । पुन: किम्भूतस्त्वं ? 'अन्जदरला. जगदंगि-कमलनयनानि यानि रत्नानि-स्वजातिश्रेष्ठाः, "रल बगातिश्रेप्ठे स्यात्" [अने. सं. कां. २ श्लो. २६१] इति हैमानेकाक्तिः, अजगर स्नूयते यो:मो तथा । 'अ' पादमूत्ती ॥३१॥ संसारदुस्तरसुनीरपितारकानुर- टूढचरपातिरसितरहसरण स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः सिद्धरगायि रमतोरसितेरहोऽध्वरः, ख्यातरदातिर शतरगतीरकूबरः ॥३२॥ व्याख्या-अध्वरगब्दस्तीर्थकरनामवाची जिनसहस्रनाम- मध्ये पठितोऽस्ति, 'अध्वर.' श्रीअरनाथजिनः 'सिद्ध.' प्रसिद्धः श्रावक 'अगायि' प्राप्तः, "सिद्धो व्याडयादिके देवयोनी निप्पन्नमुक्तयोः । नित्ये प्रसिद्ध" [अने सं. का. २ श्लो. २६७) . इति मानेकार्योक्तेः । किम्भूतोऽध्वरः ? 'संसारदुस्तरमुनी- रवितारकानुः' संसारः-भवः स एव दुस्तरसुनीरधिः-गोमन- जलरागिस्तस्मात् तारयन्ति ये ते मनारदुस्तरमुनीरधिनारकाः, तेषु आ-ममन्ताद् नः-स्तवनं यस्य स तथा । किम्भूतः मिद्धः ? 'अदूढयः' दुष्टं ध्यायन्तीति “स्यादिभ्यः कः" [सि. है. ५।३।८२] इति के दूइया -दुर्जनाः, न दूढया अढयास्त: तथा, सज्जनरित्यर्थः, यत्र हिप्पोदरादित्वाद् दुसो दूनावो घस्य ढत्वे दूढय इनि । पुनः किम्भूतोऽयरः ? 'अपाति:' "पां पानें" पाति:-पानम्, न विद्यने पाति:-मदिरापानं यस्य म तथा । पुनः किम्भूतः मिद्ध.? 'यमितः' दीप्तः । पुन. किम्भूतः मिद्धः? 'अहमः' "हसे हसने" अलन्तः, न विद्यते हमः-हसनं येषु ते ब्रह्मास्त: । पुनः किम्भूतोऽध्वरः? 'अमर' न मन्ति मरा.- धूर्ताः यस्य म तया, "मपंग्स्तस्करे भिक्षापारे घूतं-कपालयोः" [मने. मं. का. ३ मो. ११४७] इत्युक्तेः । पुनः किम्भूनोऽध्यरः? 'रमनीः "रमुत्रीहे" "इपिस्ति स्वरूपा" [मि. है. ॥३॥ १३८] पनि निधि रमति:-रमणं, प्रनावाद मुस्तिश्रिया गर्म गमति-कोनं पनि-प्राप्नोति योऽमो तथा । पुनः किम्भूतो- महनदलकमलमपः अरनिनस्तकः। ज्वरः? 'असिते न सिता अमिता-अवद्धा ई-लक्ष्मीर्यस्यासो तथा, अत्यन्तलक्ष्मीदानदायक इत्यर्थः, धर्मकार्यसावधानत्वेन । पुनः किम्भूतः सिद्धः 'ख्यातः' प्रसिद्ध. । 'अहो !' इत्याश्चयें । पुनः किम्भूतोऽध्वरः? 'अदातिः' "दाव्क्लूनौ" क्तिप्रत्ययान्तः, न विद्यते दातिः-लवन यस्य स तया । कारः पादपूरणार्थ: । पुनः किम्भूतोऽध्वरः ? 'शतरगतो:' शतेर:-वायुस्तद्वद् गतिर्यपां ते मतेरगतयः-साधवः तेषां ई-लक्ष्मीर्यस्मात् स तथा, भतेर- शब्द औणादिको वायुवाचकः । पुनः किम्भूतोवर. 'अकूबरः' अकुब्जः, "कूवरः पुनः । कुब्जे [युगन्धरे रम्ये ।" अने. सं का. ३ श्लो. ११४३] इति वचनात् ॥३२॥ . अविरतमर! तुष्टोरस्कतीरहंदीरः, प्रचुरय चिरण कारम्भभूरजसोरः । यतिरकुचररासेरस्यवरप्रजौर- स्तिमिरखिदिरतम्यारस्विडा रक्षितारः ॥३३॥ ? व्याख्या-हे 'अर!' हे अरनायजिन ! त्वं 'अविरत' निरन्तरं विरज' विगतं रजः-पापमलो यस्मात् म बिरजः- धर्मस्तं विरजं 'प्रचुरय' बहुलीकुरा । किम्भूतम्त्वं ? 'तुष्टोरस्क- तो: तुष्टं उरो यस्मात् म तुष्टोरम्फः, "दघ्युर सपिमंधूपान- च्छाले:" [मि.हे. ७।३।१७२] इति मूत्रेण यहुदीहैः कच् समा- मान्तः प्रत्ययो जातः, तुप्टोरस्का:-धनः, तं तौति-पिपति विचि तुष्टोरस्वतीः, धनपूरक इत्यर्थः । पुनः किम्भूतस्त्वं ? 'बहंदीरः' सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः । विदाश्च-विदन्ति-जानन्तीत्यचि विद्वांसस्तै: अजर्जरदुर्वारकङ्क- रविदः । पुनः किम्भूतो वृन्दारकागरजिनौरसमौः ? 'असंस्तरः' "संस्तरः प्रस्तरे मखें" [अने. सं. का. ३ श्लो. १२१५] इत्युक्तेः न विद्यते संस्तर:-यज्ञः यस्य स तथा ॥३४॥ . प्रभुरचतुरवित्तारक्षवैङ्गिकारः, शुभरथविरहक्षोऽरम्रशारण्यसौरः । " अनरणिरिररिष्टरङ्गरेरङ्घजूरः, प्रदुरकृतिरराकाऽऽरक्षपूरम्यखोर ! ॥३५॥ व्याख्या-'अङ्गरे' !' इति सम्बोधनार्थमव्ययम् । 'हे अम्यखोर !' "अम भजे" अमतीत्येवंशीलोऽमी-भजकः, न खोरः अखोर:-अखञ्जः, अमी चासो अखोरथ अम्यखोर- स्तदामन्त्रणं हे अम्यखोर! -हे मित्र! , ‘पटुः' रोगविहीनः श्री- अरनायजिनः, “पटुस्तीक्ष्ण-पटोलयोः । स्फुट रोगविहीने च" [अने. सं. का. २ श्लो. १०८] इत्युक्तेः, 'अरिष्टेः' "अरिष्टं मूत्यगारेऽन्तचिह्न तक्रे शुभे" [बने. सं. का. ३ श्लो. ७५०] इति वचनप्रामाण्याद् अरिप्टस्य-शुभस्य ई:-क्षेपो यस्मात् स अरिष्ट- स्तस्य अरिप्टे:-पापस्य 'अनरणिः' न अरणं अनरणिः,"नओऽनिः शापे" [सि.हे. ५।३।११७] इति अनिप्रत्ययः, अनरणि:-अत्राण- मेव विदधातु इति शेपः । किम्भूतः पर्यु: ? 'प्रभु' स्वामी। पुनः किम्भूतः पटुः? 'बचतुरवित्तारक्षयरङ्गिकारः' अविद्य- मानानि अदृश्यानि वा चत्वारि घातिकर्माणि येपां ते अचतुरा नमुव्युपत्रेश्चतुरः", [सि. हे. ७.३।१३१ ॥] इत्यनेन नत्र - प्रत्ययात् परस्य चतुर्शब्दस्य वहुव्रीहेरप्समासान्तप्रत्यये अच- ४ ४८ स्वोपनवृत्तिविभूषितः वृन्दारकागरजिनोरसमो:-श्रीअरनाजिनः गुरुत्वेन देवत्वेन वा। किम्भूतो वृन्दारकागरजिनोरसमौः? 'अकरः'-"कर्बुरो राक्षसे पापे" [बने सं. का. ३ श्लो. ११२८] इत्युक्तेः नास्ति कर्बुर- पापं यस्यामौ तथा। [पुनः] किम्भूतो वृन्दारकागरजिनोरसमौः? ‘रदमौ' रतं-सुरतं करोति,"तत्करोति तदाचप्टे" इति [पाणिनि- गणसूत्रण] रतयते रतयतीति णिजि तल्लुकि किपि तल्लुकि च रत्, तस्मादमति-गच्छति योऽसौ रदमः, औ:-पालक, रदमश्चासौ औश्चेति कर्मधारये रदमौः । किम्भूत प्राज्ञः ? 'अशरैः' बाण- रहितः, निप्कोधत्वात् । पुनः किम्भूतोवृन्दारकागरजिनोरसमो:? 'अनिर्वर' "निवरं तु गतअपे" [अने. सं. का. ३. इलो. ११६६] इति वचनाद् न नियंर अनिर्वरः, सलज्ज इत्यर्थः । पुनः किम्भू- ते प्राज्ञ ? भव्ये.' मनोहरः । पुनः किम्भूतः प्रासं:?: 'अमालि- रभसे:' "अम गतो" गत्यर्थानां ज्ञानार्थत्वाद् अमस्य-ज्ञानस्य आलि-णि. अमालि. तथा रभसः-औत्सुक्र्य पादा येपां ते तथा ते । पुन किम्भूतः प्रातः? 'अनिमः २ नियाजः । पुनः किम्भूत प्रशि: ? 'अजित ' अपराभूत, कः? 'अजर्जरदुर्वारक- कुविद "जजरस्तु, वानवध्वजजीर्णयोः" [अने. सं. का. ३ दलो. ११५७] इत्युक्त: न जरा अगरा:-अजीर्णाः, नवीना इत्यर्थः, दुरा'-वारणामक्या कदराः कुत्सिताः, मिथ्याक्थ- बस्यात्, “कसरं कुलिते" [अने. न. का. ३ श्लो. ११३०] इति यवनप्रामाण्यान, प्रयाणां कर्मधारये अजजरवारकचरायते १. "उरो पक्षगि मुम्यं स्यात्" इति ने.म. रा. २६लो. ५८०। २. "निमः स्थान मणे भाई" धनं. गं. का. २ को. ३२२॥
सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः। विदाश्च-विदन्ति-जानन्तीत्यचि विद्वासस्तैः अजर्जरदुर्वारकडू- रविदः। पुन. किम्भूतो वृन्दारकागरजिनोरसमौः ? 'असरतरः' "संस्तरः प्रस्तरे मखें" (अने. सं. का. ३ श्लो. १२१५] इत्युक्तेः न विद्यते संस्तर:-यज्ञः यस्य स तथा ॥३४॥ प्रभुरचतुरवित्तारक्षवरङ्गिकारः, शुभरथविरहक्षोऽरम्रशारण्यसौरः।' अनरणिरिररिष्टेरङ्गरेरङ्घजूरः, प्रटुरकृतिरराकाऽऽरक्षपूरम्यखोर ! ॥३५॥ व्याख्या-'अङ्गरे' !' इति सम्वोधनार्थमव्ययम् । 'हे अम्पखोर !' "अम भजे" अमतीत्यवंशीलोऽमी-मजकः, न खोर: अखोर: अखञः, अमी चासो अखोरथ अम्यखोर- स्तदामन्त्रणं हे अभ्यखोर! -हे मित्र!, ‘पटुः' रोगविहीनःश्री- अरनाजिनः, "पटुरतीक्ष्ण-पटोलयोः । स्फुटे रोगविहोने च" [अने. सं. कां. २ २लो. १०८] इत्युक्तेः, 'अरिष्टे:' "अरिष्टं सूत्यगारेऽन्तचिह्न तक्रे शुभे" [अने. सं. का. ३ श्लो. ७५०] इति वचनप्रामाण्याद् अरिष्टस्य-शुभस्य ई:-क्षेपो यस्मात् स अरिष्टे- स्तस्य अरिप्टे:-पापस्य 'अनरणिः न अरण अनरणि.,"ननोऽनि: गापे" [सि.हे. ५।३।११७] इति अनिप्रत्ययः, अनरणिः-अत्राण- मेव विदधातु इति शेपः । किम्भूतः पटुः? 'प्रभुः' स्वामी।. पुनः किम्भूतः पटुः? 'अचतुरवित्तारक्षवैरङ्गिकार.' अविद्य- मानानि अदृश्यानि वा चत्वारि घातिकर्माणि येषां ते अचतुरा नव्युपत्रेश्चतुरः" - [सि. हे. ७।३।१३१ ।] इत्यनेन नन- प्रत्ययात् परस्य चतुशब्दस्य वहुव्रीहेरप्समासान्तप्रत्यये अच- . ४ . . स्वोपजवृतिविभूषितः तुरा:-केवलिनः द्वाविंगतिशतसङ्ख्याकाः, "वित्तं विचारिते ख्याते, धने" [अने. स. का. २ श्लो. २०६] इति पचनात् तेपा वित्तं-घनं संयमलक्षण तस्य आरक्षा-समन्ताद् रक्षण यस्य सः अचतुरवित्तारक्षः, वैरङ्गिका:-विरागाहस्तिः आरज्यतीति "क्वचिड्ड [सि. हे. ५।१।१७१].,इति ,डे वेङ्गिकार', अचतुरवित्तारक्षश्चासो वैङ्गिकारश्च. तथा । पुनः किम्भूतः पटुः । 'शुभरथविरहक्षः "रषस्तु स्यन्दने. पादे" [अने. सं. का. २ श्लो. २३३.] इति वचनात् शुभी-भद्रो रथो क्रमी यस्यासौ शुभरथ', विरहं क्षयतीति विरहक्षः, गुभरथश्चासौ विरहक्षश्च तथा । पुनः किम्भूतः पटुः ? 'अरम्रशारण्यसौरः' "रमि कीडाया" "भीवृधिधिवज्यगिरमि" [सि. हे. उ. सू- ३८७] इत्यौणादिके रप्रत्यये रम्र.-कामुकः, न रम्रः अरन-- अकामुक., शरण्यमेव शारण्यम्, स्वार्थे अण्, शरणयोग्यम्, मूरीणां समूहः मौरम्, शारण्य च तत् सौरं च यस्यासी शारण्य- सोरः, अरम्रश्वासी शारण्यसोरश्च तथा । पुनः किम्भूतः पटुः?' 'इ' पवित्र, गुणवत्वात्, “इ. कामः स्थाणुरिन्द्रोर्को, वरुणः पादपो द्विप. । शुचि," [सी. ए. ४] इत्युक्तेः । पुनः किम्भूतः पटुः? 'अरचजूर.' "रघिक भासि" अलन्तः, रघो-दीप्तिः "जुर्य इज्यानौ वर्ध" ("जूरच हानौ वर्ष"), तेन जूर्यते-हीनो भत्रति योगो रवजूरः, न रडुजूरः अरवजूर, प्रत्यहं प्रत्यह दीप्त इत्यर्थः । पुनः किम्भूतः पटुः? 'अकृतिः "कृत्र, वर्धे". तिप्रत्ययान्त, नास्ति कृतिर्यस्यासी तथा। पुनः किम्भूतः पटुः? १. "स्वचित्" इति मूत्र, ४ इत्यस्य त्वनुवृत्तिः ।
- स्वोपजवृत्तिविभूषितः । तुरा:-केवलिनः द्वाविंशतिशतसङ्ख्याकाः, "वित्तं विचारिते ख्याते, धने" [अने. सं. का. २ श्लो. २०६] इति वचनात तेषां वित्त-धनं संयमलक्षण तस्य आरक्षा-समन्ताद् रक्षणं यस्य मः अचतुरवित्तारक्षः, वैरङ्गिकाः-विरागाहस्तैि: आरज्यतीति "क्वचिड्डु' "१ [सि. हे. ५।१११७१]::इति डे -वेरगिकार, अचतुरवित्तारक्षश्वासो वैङ्गिकारच. तया । पुनः किम्भूतः पटु.? 'गुभरथविरहक्ष.., "रषस्तु- स्पन्दने पादे". [अने. मं. का. २ श्लो. २३३] इति वचनात् शुभी-भद्रो रथो क्रमो यस्यासौ शुभरथः, विरहं क्षयतीति, विरहक्षः, शुभरथश्चासो विरहक्षश्च तथा ! पुनः किम्भूतः पटुः ? 'अरम्रशारण्यसौर.' "रमि क्रीडायां" "भीवृधिरुधिवज्यगिरमि"' [सि. हे. उ. सू. ३८७] इत्योणादिके रप्रत्यये रम्र:-कामुकः, न रम्रः अरनः- अकामुकः, शरण्यमेव शारण्यम् , स्वार्थे अण् , शरणयोग्यम्, सूरीणां समूहः मौरम्, गारण्य च तत् सौरं च यस्यासौ शारण्य- मौरः, अरम्रश्चासौ शारण्यसौरश्च तथा । पुन. किम्भूतः पटुः ':' पवित्र, गुणवत्त्वात्, "इ. कामः स्थाणुरिन्द्रोकों, वरुणः पादपो द्विप. । गुचि," [सौ ए. ४] इत्युक्तेः । पुनः किम्भूतः पटुः ? 'अरवजूर' "रघिक भासि" अलन्तः, रघो-दीप्तिः "जुर्य इज्यानो वधै" ("जूरच्-हानौ वर्धे"), तेन जूर्यते-हीनो भवति योगी रवजूरः, न रद्धजूरः अरट्वजूरः, प्रत्यह प्रत्यहं दीप्त इत्यर्थः । पुनः किम्भूतः पटुः? 'अकृतिः' "कृत्र वधे" क्तिप्रत्ययान्तः, नास्ति कृतियस्यासी तथा । पुनः किम्भूत पटुः? १. "वचित्" इति मूत्र, १ इत्यस्य रवनुवृत्तिः ।
। ५१ अर्द्धन-समृद्धचा सहनदलरुमलमयः परजिनस्तवः 'अराकारक्षपूः' राकाः-दानार, न राका अराकाः-कृपणास्तेपां आ-लक्ष्मीस्तां रक्षति-पालयति या मा अराकारक्षा, एवंविधा पू:-गरीरं यस्य सः अराकारक्षपू.-11 ३५ ।। 'पपर प्रकरणावेरर्द्धपूरण्यभेर- जिंतरवंपरपुष्टाः! रद्धधीरङ्गयधेर!। 'सुनुरशिखरदप्यरर्यधोरप्रभोर- कनिरतवरधारः कपारय्यदोर ॥३६॥ व्याख्या. अकारः सम्वोधनार्थमव्ययम् । है 'अद्धपूरण्यभे- रजितरवपरपुष्टाः!' "धू वृद्धो" घनन्तः, "पूरचि आप्यायने" पूरणगीला:-वर्द्धनगीलाः ये ते अर्द्धपूरणाः- व्यवहारिणः,ते विद्यन्ते येषां ते अर्द्धपूरणिनः, भेरा:-कातराः, न भेराः अभेराः-शूराः, जित:-अभिभूतो वेन-शब्देन परपुष्टः- कोकिलो यस्ते जितरवपरपुष्टाः, अर्द्धपूरणिनथ ते अभेराश्च ते जितरवपरपुष्टाश्च अखंपूरण्यभेरजितरवपरपुष्टास्तेषां आमन्त्रणं हे अर्द्धपूरण्यभेरजित रवपरपुप्टा.! -हे राजानः ! यूयं 'पपर प्रीता अभूत, "पृट् प्रीतो". इति धातोः परोक्षायां मध्यम- पुरुषवहुवचनेषु रूपम् । कस्मात् ? 'प्रकरणावेः' प्रकरणस्य- प्रस्तावस्य अविः-ज्ञानं यस्मात् स तथा, तस्मात् प्रकरणावेः- श्रीअरनाथतीर्थकृतः, “अव गतो" गत्यर्यानां ज्ञानार्थत्वात् "इकिरितव् स्वरूपार्थे" [सि. हे. ५।२११३८] इति इप्रत्ययः । किम्भूतात् प्रकरणावेः ? 'रद्धधीरगययः' "रघौच हिंसा- संराद्धयोः": वेट्त्वात् क्तयोनेंट्, रद्धा-पक्का घी:-बुद्धिः येषां ते रघिया, "रगि गतो"-गत्यर्यानां प्राप्त्यर्थत्वा रङ्गयाः-प्राप्तुं स्योपजयत्तिविभूषितः योग्याः, रद्धधियश्च ते रङ्गयाश्च रद्धधीरङ्गयास्तान् धियति- दधाति योऽसौ रद्धधीरगयधेस्तस्मात् , "धित् घृती" विजन्तः । पुन. किम्भूतात् प्रकरणावेः ? 'सुनु.' सुप्छु ना सुना, तस्मात् सुनुः-शोभनपुरुपात् । पुनः किम्भूतात् प्रकरणावेः? 'अशिखर- दप्येः' शिखराग्रमिव दन्ता येपा-ते शिखरदन्तः, “वाऽग्रान्त- शुद्धशुभ्रवृषवराहाहिमूपिकशिखरात्". सि. हे ७३।१५४] इत्यनेन सूत्रेण शिखरशब्दात् परस्य दन्तशब्दस्य बहुव्रीही दत्रादेशे समासान्ते शिखरंदन , न शिखरदन्तोऽशिखरदन्तः, "प्या वृद्धौ" विचि तैः प्यायते योऽसौ अशिखरदप्यस्तस्मात् । पुनः किम्भूतात् प्रकरणावे: ? 'अयघोरप्रभोः' "धो गति- चातुर्ये " अत्रि घोराः-चतुरा , अाश्च ते-पूजनीया धोरांच चतुरा. अयघोराः, तेषां प्रभुः-स्वामी योऽसौ तथा तस्मात् । किम्भूताः अर्द्धपूरण्यभे रजितरवपरपुष्टाः 'अनिरतवरघरिः' "कं सुखं तोय पयो दुःखं" सी. ए. २०] इत्युक्तेः कं- दु.सं, न क अक-सुखं, तत्र निरता:-आसक्ता ये ते अनिरता. "वृद्धग् मम्भक्तो" वृणन्तीति वरा:-मेवकाः, अनिरताच ते पराश्च अनिरतवरास्तेपा धारो ये ते तथा । पुनः किम्भूतात् प्रकरणावे: ? 'कपारय्यदो:' के-सुखं पारयन्ति-पूरयन्तीति कपारयाः-भव्यजनास्ते श्रावकत्वेन विद्यन्ते यस्य म कपारयो, "दुद् उपतापे" विचि न दुनोतीति अदौ, कपारयो च अदौश्च कपारय्यदोस्तस्मात् । अकार: पादपूरणार्यमव्ययम् ॥ ३६ ।। सोऽफारयद् घरफ ! हारफदारजीवरः समं रमण्यरणतेरपचारफपिरः। . .
। सहस्रदलकमलमयः परजिनस्तवः। नेतार, आशिरपमारय आरदन्त्यर- मझेर प्रत्युरसनौरलभूरशावरः ।।३७॥ व्याख्या-'हे वरक!' हे मित्र ! , यदुक्तमुणादिवृत्ती- "वरक: वधूजानिः सहायः वाजसनेयभेदश्च" [सि.हे.उ.सू. २७] इति । 'नेतार.' प्रस्तावात् मुखप्रापकाः पुरुषा. 'अरं' शीघ्र 'आरवन्ति' समन्तात् शब्दयन्ति । किं तत् ? 'सः' अरनाथजिनः 'सम' सुखं, पदुक्तमुणादी-"सम' स्नानं सुखं च” सि. है. उ. सू. ३३८] इति, 'अकारयत्' अकरोदित्यर्थः, स्वार्थे गिजन्तत्वाद् णिगों न प्रतिपाद्यते, यथा-"रामो राज्यम- कारयत्" । कस्य? 'रमण्यरणते.' रमण्या-शोभना, "रमण्यं शोभन" [सि. हे. उ. सू. ३७६] इति उणादिवृत्तो, "रा लक्ष्मीः" [सौ. ए. ८२] इत्युक्तेः रमण्या-शोभना रा-लक्ष्मीर्यस्यासो रमण्यर., "णः प्रकटे" [सु. ए २२] इति मुधाकलशोक्तेः "पूजायां तिः स्त्रियां" [वि.एं. ६१] इत्युक्तेः णा:-प्रकटा. तयः-- पूजाः यस्यासी गतिः, रमण्यरश्चासौ णतिश्च रमण्य रणतिस्तस्य रमण्यरणते:-भावकजनस्य । किम्भूतः स.? 'हारकदारजीवर.' हारकस्य-कितवस्य “हारको गद्य विज्ञानभिदोः कितवचौरयो:' अने. सं. का. ३ श्लो. ७०६] इति वचनप्रामाण्यात् , दार:- विदारणं यस्मात् स हारकदार., जीवरः-दीर्घायुः, यदुक्त- मुणादो-"जीवरः; दीर्घायु." [सि.: है. उ. सू. ३६७] हारक- दारश्चामो जीवरच हारकदारजीवरः ! पुनः किम्भूत. सः? " १. "मर्म-सम नान्ताऽदन्ते, दन्ततालव्याचे . मते ॥४॥", शब्द- रत्नाकरः का. १. २. "स्थान" इति मुद्रिते । ,...'
'स्यौपावृत्तिविभूषितः
'अपचारकपिर' अप-गतश्चारक कारो येषां ते अपचारका',
"चारकोऽश्वादिपाले स्याद् वन्धे" [अनेः स.का ३ श्लो. ६४५)
इति वचनप्रामाण्यात् , अपचारकाच ते ऋषयश्च-साधवः अप-
चारकर्पयस्तै राजति-दीप्यते योऽसौ तथा । किम्भूता नेतार ?
'आगिरपमारय.' आशिरा इव-आदित्या इव ये. ते आशिराः,
यदुक्तमुणादी-"आगिरः [विष्णु.] आदित्यश्च" [मि. हे. उ.,सू.
४१५] अप-गता मारिय॑भ्यस्तै पमारय., यदुक्तं-“वष्टि भागु.
रिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयो." [पा सि. को. पृ. १०६] इति,
आमिराश्च ते पमारयश्च आशिरपमारय । पुनः किम्भूतः स.?
'अ) ' "दस निवासे” क्विवन्तः, अहं -योग्य. उस्-वासो
मुक्तिगृह यस्यासी तथा । अकार पादपूतो । पुन: किम्भूतः
स.? 'प्रत्युरमनौ' उरसि वर्तते देवत्वेन येषां ते प्रत्युरसाः,
यद्वा उरसि देवत्वेन प्रतिष्ठितो यस्ते प्रत्युरसा.-श्रावकास्ते-
भ्यो नो-स्तुतिर्यस्मात् म तया। पुन. किम्भूत. म.?
'अलभू.' "अल वारणपर्याप्तिभूपासु" इति वचनाद् अलन्तः,
अन्यस्य-भूपाया भूः-स्थान य. स तथा । पुन किम्भूतः सः?
'अगावर.' "शावरो रोध्रपापयो." [अने. स. का. ३ श्लो.
१२०८] इत्युक्ते. न विद्यते गायर -पापं यस्य यस्माद्वा
सतया ॥३७॥
-
सज्जूरनश्वर ! सुसोर किशोरभास्वरः,
कर्पूरहृत्करगुणोऽरथकारमेधिरः ।
सच्छारदीनरधनरविशारदागर-
प्राग्भारवियरवियुक रदनौरमन्यरः ॥३८॥
सहस्रदलकमलमयः परजिनस्तवः । व्याख्या-'हे अनश्वर !' "नगौच अदर्शन" नश्यती- न्येवंगीलो नश्वरः, "सुजीग्नगंष्ट्वरप्" [सि. है: ५५२७७] इत्यनेन गोलादिसदर्थे ट्वरप् प्रत्ययः, न नश्वरः अन- श्वर, तत्सम्बोधनं हे अनश्वर ! हे सखे! 'सज्जूः "जु गतो" सौत्रो धातुः, सत्सु-साधुपु जुवनि-गच्छतीत्येवंगील: सज्जूः, दिशुद्ददृज्ज." [सि. हे. ५२।८६] इत्यादिसूत्रेण शीलादी सत्यर्थे क्यिा निपात., 'मुसोर' शुशुभे । किम्भूतः राज्जूः ? 'किशोर- भास्वरः' किशोरा:-तरुणाः प्रस्तावाच्छिप्यास्त: भास्वर:- मनोज्ञो योऽसी तया, गिप्यशोभन इत्यर्थः । पुनः किम्भूतः सज्जूः ? 'कर्पूरहत्करगुणः' कर्पूरथ-घनसारः हुतरस-ईश्वर- स्तद्वद् निर्मला गुणा यस्य स कर्पूरहृत्करगुणः । पुनः किम्भूतः मज्जू ? 'अरयकारमेधिरः' "रथकारस्तक्षणि स्यान्माहिष्यात् करणीसुते ।" [अने सं. का. ३ श्लो. १६४६] इति वचन- प्रामाण्याद् रथकारा:-क्षत्राद् वैश्याया जातो माहिप्यः, वैश्या- च्छूद्राया जाता करगी, तयोः सुतः रयकारः, न रथकाराः अरयकाराः-उभयपक्षशुद्धा मेधिरा:-मेधाविनो यस्यासो तथा, मेधिर इत्यत्र "मेधारयान्नवरः” मि. हैं. ७२४१] इत्यनेन सद [मत्व]य इरप्रत्यये मेधिर इति निप्पत्तिः । पुनः किम्भूतः सज्जू: ? 'सच्चारदीनरचनैः' गरदि भव. शारदीन:-चन्द्रः सतां- मज्जनाना आह्लादकत्वेन गारदीन इव शारदीनः सच्छारदीन:, "रपोच हिंसासराभ्यो.",रध्यन्ति-घ्नन्ति जीवान् इति अनटि रघनाः-हिंसकास्तेभ्य एति-याति योऽसौ रघनः, सच्छारदीन- थासौ रधनश्च सच्छारदीनरघनैः । पुनः किम्भूतः सज्जू: ? "अविगारदागरप्राग्भारविड्वरवियुक्' आ:-जनाः "अः कृष्णः .
स्वोपनवृत्तिविभूषितः शङ्करो ब्रह्मा, शक्रः सोमोऽनिलोऽनलः । सूर्यः प्राणो जन." [सौ. ए. २] इति वचनात्, तेषां मध्ये विशारदाः-विद्वांसो ये ते अविशारदास्तान् आगरयन्ते-समन्ताद् विजानन्ति ये ते अविशारदागरा: “गृकड् (गणि) विज्ञाये विज्ञाने च” तेपां प्राग्भार. .-आधिक्यं यस्मिन् ‘स. अविशारदागरप्राग्भारः, विड्वरः-शत्रूद्भवस्तेन वियुग-रहितो योऽसौ विड्वरवियुक्, अविशारदागरप्राग्भारश्चासौ विड्वरवियुक् चेति कर्मधारयः । पुनः किम्भूत. सज्जू. ? 'रदनौः' रदनः-दन्तै: अवति-दीप्यते योऽसौ तथा । अविशारदागरप्राग्भारविड्यरवियुक् अग्रे रदनौरित्यत्र "न मन्धि." [सि हे. १।३।५२] इत्यनेन सूत्रेण सन्ध्यकरणमदुष्टम् । पुन किम्भूत सज्जू: ? 'अमन्थरः' अवक्रः, मरल इत्यर्थः, “मन्यर सूचके कोशे, वक्रे" [अने. सं. का ३ श्लो. ११६०] इति वचनप्रामाण्यात् ।।३।। बुद्धरबोधि रतिभूरानैरनार- नम्ररसूतिरयमेरदरैरदुर्द्धरः । सेव्यरकच्चरवररमभरसेश्वरः, साक्षरनूतिरदहरपररमुर्मुरः ॥३६॥ -'युद्ध' पण्डित: 'अयं' साम्प्रतं वर्ण्यमानो गुरुजिन 'रतिभूः' राम्च-दृढा' तयश्च-पूजा- रतयस्तामा भू:-स्थानं रतिभूः 'अबोधि' ज्ञात , श्रीअरनाथजिन: पण्डित. पूजास्पदं नात इत्ययं. । कथं ? 'अगनः' शीघ्रम् । किम्भूतः ? 'अनपरनग्रं.' “अदंप्सांक भक्षगं" अदन्तीत्यवंशीलाः "संघस्यदो मरम्" [गि. हे. ५।२।७३] इत्यनेन भीलादिरादर्थे मरफ्प्रत्यय व्याख्या-- .
. .. सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः। अमरा.-भक्षणमीलाः, न अनराः अनमराः; नम्राः- :-नमनशीलाः, अनद्मराश्च ते.. नम्राश्च : अनारतम्रास्तै:-1 किम्भूतोऽयं ? ‘असूतिः' न विद्यते सूति:-जननं यस्य , स तथा । पुनः किम्भूतोऽयं ? 'ए' एति-शिवश्रियं प्राप्नोति योऽसौ तथा, "इण् गतो" विजन्तः । पुनः किम्भूतैर्बुद्धः? 'अदरः' भयरहितः । पुनः किम्भूतोऽयम् ? 'अदुर्द्धरः नोत्कट इत्यर्थः । पुनः किम्भू- तैर्बुद्धः ? 'सेव्यैः' सेवाहः । पुनः किम्भूतैर्बुद्धः? 'अकच्चरवरः' "मलिन कच्चर" अ. चिं. ६।७१] इत्युक्ते न कच्चराः अकच्चरा.-गुणनिर्मलाः, अत एव वरा-थेष्ठा ये ते अक- च्चरवरास्तः । पुनः किम्भूतंयुद्ध: ? 'अमभः' "अम गती" गत्यर्थानां ज्ञानार्थत्वाद् अलन्तः, अमेन-ज्ञानेन भाति-शोभते अमभास्तः । पुनः किम्भूतोऽयं ? 'अमेश्वरः' "असू» क्षेपे" अचि अस्यन्ति-चत्वारि घातिकर्माणि क्षिपन्ति ये ते असा:- सामान्यकेवलिनस्तः ईप्टे योऽसौ, "स्थेशभासपिसकसो वर.' सि. हे.. ५।२८१] इत्यनेन शीलादिमत्यर्थे वरप्रत्यये असेश्वरः । पुनः किम्भूतैर्बुद्धः ? 'साक्षः' सह अक्षः-इन्द्रियः वर्तन्ते इति साक्षास्त. । पुनः किम्भूतोऽयं ? 'अनूति:' "अव वधे" स्तो ऊतिः, न विद्यते ऊति -वधो यस्मिन् स तथा । पुनः किम्भूतंर्बुद्धः ? 'अदहः" दहो-दाह., - न दहन्तीति अदहास्तः। पुनः किम्भूतर्बुद्धः? 'अपरं' अप-गतो र:-कामो येभ्यस्ते तया तः, “र: कामे" [मु. ए. ३६] इत्युक्तः, गत-- कामः । पुनः किम्भूतोऽय? 'अमुर्मुरः निर्मन्मथः, “मुर्मुरो मन्मये" [अने. सं का. श्लो. ११६७] इति वचनप्रामा- ण्यात् ।। ३६ ।।
-- . । .:. स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः । कविरमसुरसंस्कारः पदारप्रभारः;: प्रसुर उदरभूसीरः फुटारः कुवेरः। चतुरकदरकेदारप्रनग रद्विचारः, शबरविधुरशृङ्गारक्षरोरङ्गयहोरः॥ ४० ॥ व्याख्या-'प्रसुरः' “सुरत् ऐश्वर्यदीप्त्यो." प्रसुरति- प्रदीप्यते जगति यतिषु वा योऽसौ अचि प्रसुर.-श्रीअर- नाजिन भद्रं क्रियाद् इति शेप । किम्भूतः प्रसुर. ? 'कवि.' विद्वान् । पुन किम्भूत प्रसुरः ? 'अमसुरसंस्कारः' “ममूरो मसुरोऽपि च । ममुरा च मसूरा च, चत्वार पण्ययोपिति ।। तथा श्रीहिविशेषेऽपि" [अने सं का. ३ श्लो. ११६१, ११६२] इति वचनप्रामाण्याद् न विद्यन्ते मसुराः-पण्ययोपितो येपां ते अमसुरा -मुगीला. श्रावकास्त. मह संस्कार.-अनुभवनं यस्य म तथा, "संस्कार प्रतियलेऽनुभवे" [अने. सं. का. ३ श्लो १२१६ ] इत्युक्ते. । पुन. किम्भूत प्रसुर ? 'पदार- प्रभार' [पदारे-] पादालिन्दे-पादपीठे, "पदारः पादधूलिपु । पादालिन्दै" [अने मं. का ३ श्लो ११७४] इति हेमानेका- थोक्ते , प्रभया-कान्त्या राजते-दीप्यते योऽमो तथा। पुन. किम्भूत प्रसुर:' 'उदरभूसीर.' उदरमेव-व्याधिरेव भूः उदरभू. व्याधिपृथ्वी, तस्या विदारणे सीर इव-लाङ्गमिव यो मी तथा । पुन. किम्भूतः प्रमुर. 'कुटारः' रत., अर्थात् मिव यामक्त इत्यर्थः, "कुटार। कैवले रते" इत्युक्त: 'वाच्य- लिन । पुनः किम्भूत प्रसुर ? 'कुर्वरः' धनेन कुबैर इव- १. "कुटीर पम्बले रते" इति पाटा. अने. गं.का. ३ श्लो.११४२।
सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः । धनद इव योऽसौ तथा.।। पुनः किम्भूतः प्रमुरः ? 'चतुरकदर- केदारप्रनग, चतुराणां-विदुषः स्तुतिकर्तृणां कदर:-क्षुद्ररोगः कुष्ठादिः स एव,केदारः आलवालस्तस्य "नशौच अदर्शने" कि- वन्तः, प्रनशनं प्रनक, प्रनग-अदर्शन-नशनं यस्मात् स चतुर- कदर केिदार प्रनम्, “कदरः श्वतखदिरे, क्रकचक्षुद्ररोगयोः ।।" [अने. सं. काः '३ श्लो.'११२६] इत्युक्तेः, "केदारः क्षेत्रभिद्याल- वाले" [अने. सं. का. ३ श्लो. ११४५] इत्युक्तः । पुनः किम्भूतः प्रसुरेः ? "रद्विचारः' "रम क्रीडायां" "गमां को" [सि. है. ४।२। ५८] इति क्विपि [मकारलुकि] रमन्ते ज्ञानथिया' समं ये 'ते रत:-पण्डितास्तैः सह विचारो-विचरणं यस्य स तथा । पुन. किम्भूत. प्रसुर: ? 'शवरविधुरशृङ्गारक्षरोः शवरा:-म्लेच्छाः विधुरा.-विकलाः, ग्रथिला इत्यर्थः, "विधुरं स्यात् प्रतिश्पो (प्रविश्लेपे), विकले" [अने. 'सं. का. ३ श्लो.' १२०४] इत्युक्तः, शृङ्गार:-सुरत:, "शृङ्गारो गजमण्डने, सुरते" [अने. स. का. ३ श्लो. १२१४] इत्युक्ते', शवराश्च विधुराश्च शृङ्गारश्च शवरविधुर- शृङ्गाराः, तेभ्यः क्षरन्ति-चलन्ति ये ते शवरविधुरशृङ्गारक्ष- रास्तेषां उ:-पालन , यस्य स तथा, "रक्षार्थवाचकावेतो, व्या- म्याती लघुद्रीको।" [वि.ए. ११] इति विवशम्भूक्तेः । पुन: किम्भूतः प्रसुर: ? 'अङ्ग्यहोर',"अगि गतौ” यवन्तः, अङ्गयाः- प्रापणीयाः होरा:-शास्त्राणि प्रस्तावाद् आचारागादीनि सिद्धा- न्तानि यस्यासो तया, "होरा तु लग्ने राश्य.. शास्त्ररेखा- 'प्रभेदयोः ।।" [अने, सं. का. ३ श्लो.' ४७६] इति हैमानेकार्थ- वचनात् ।। ४०।।
६० स्वोपतवृत्तिविभूषितः पस्फार संसरणनीरधितोरमित्वर- नोद्धारपुष्करसुसुरविदारजित्वरः । सुश्रीरकन्तुरसकौरपको रशान्त्यरः, शान्तोरयोनिररतेरहतेरधूसरः ॥४१॥ व्याख्या--'असको सुश्री:' शोभनलक्ष्मीक श्रीअर- नाजिन. 'संस रणनीरधितोरं' ससरण-संसार., "संसरणं त्वस- म्बाधचमूगती । संसारे" [अने. मं. का ३ श्लो. १४६३-१४६४ इति हैमानेकार्थोक्ते., सारणमेव नीरधिः संसरणनीरधिः- संसारमागर., नीरशब्दो जलवाची औणादिकः, तस्य तीर-प्रान्तं तटं वा संसरणनीरचितीर, तत् ससरणनीरधितीरं 'पस्फार' प्राप्तवान् , “स्फर स्फलत् स्फुरणे, चलने [इत्येके]" इति धातु- पारायणवचनाद्, गत्यर्थानाप्राप्त्यर्थत्वात् परोक्षायां णवि रूपम् । किम्भूतः [सुश्री.] ? 'इत्वरनोद्धारपुष्करसुसूरविदारजित्वर' "इंण्क् गतो" ज्ञानार्थोऽत्र, यन्तीत्येवशीला: "सृजीनशष्ट्वरप्" [सि. है. ५।२।७७] इत्यनेन ट्वरपि इत्वरा:-पण्डिताः ना-नराः, “नो नरे च मनाथेऽपि" [वि. ए. ७६] इति विश्वशम्भूक्तेः, तेपां उदार:-उद्धरणं नमारपातादिति येषां ते नोद्धारा', इत्वराश्च ते नोद्धाराच इत्वरनोद्धाराः, त एव पुष्कराणि-पद्यानि तेषां विकासने सुमूर इय-प्रधानभानु रिव योऽमी इत्यरनोदारपुप्फरसुमूरः, विदारे-मडग्रामे “विदारो यधि" [अने. गं. का. ३ श्लो. १२०३] इति वचनप्रामाण्यान्, शत्रून् जयतीत्येवंशील; "मजोग्नशष्ट्वरप्" [सि. हे. ५।२१७७] इति ट्यरपि विदारजित्दरः, इत्वरनोदारपुष्करसुमूरघासो . सहनदलकमलमयः अरजिनस्तवः । विदारजित्वरश्चेति कर्मधारये इत्वरनोहारपुष्करसुमूरविदार- जित्वरः । पुनः किम्भूतः सुधीः ? 'अकन्तुः' निष्कामः, "कन्तुः कामकुसूलयो." [अने. संः का. २ श्लो. १७५] इत्युक्तेः । पुनः किम्भूतः सुश्री: ? 'रपको:' "रप भापणे" अकचि रपन्ति-मापन्ते स्याद्वादमिति रपकास्तान् अवति-रक्षति योऽसौ तथा । पुनः किम्भूतः सुश्री: ? “अशान्त्यरः' न शान्तिः अशान्तिः, अशान्ते:न विद्यते राः-दानं यरिमन् स तथा। पुनः किम्भूतः सुश्री: ? 'शान्तोः' शान्तानां-उपदामवतां उ:- पालनं यस्य स तथा। पुन: किम्भूतः सुश्री: ? - 'अयोनिः'. अकारणं, फस्य ? 'अरते.' असुखस्य, कस्य ? -'अहतेः' अहिं- सकस्य । पुन: किम्भूतः सुधी: ? “अधूसरः'- निर्दोषत्वाद् निर्मल इत्यर्थः ॥४१॥ विजर ! विफर शुभ्रेरं नसारण्डझार- गमिरटगरगान्धाराहेरस्वपोरः । छिदिरविधरदण्डारस्वभूरपदीर, प्रवरपदरविन्दो रम्बसूरथ्यपूरः ॥४२॥ व्याख्या-'हे विजर!' विगता जरा येस्मात् स विज-. रस्तत्नम्बोधनं हे विजर !-हे श्रीअरनाजिन ! 'अं' परब्रह्म 'विकर' विशेपेण कुरु, “अं मान्तो ब्रह्मसंवादे, परब्रह्म- प्रवाचकः ।" [वि. ए .१६] इत्युक्तेः । कस्य ? 'शुभ्रेः'- शुभ्रा निर्दोपत्वाद् धर्मोपार्जितत्वाद्वा इ:-लक्ष्मीर्यस्यासो. शुभ्रेः, तस्य शुभ्रे:-भक्तश्रावकस्य । किम्भूतस्त्वं ?. 'नसा-- रण्डझारगम'- सरण्डाः-धूर्ताः; - "सरण्ड: स्यात् कृकलासे, 1 .
६४ स्थोपनवृत्तिविभूषितः । रचयः? 'कान्तैः' वल्लभः । पुनः किम्भूतस्त्वं?: 'रमथेः' रमयस्य-प्रहर्पस्य ई:-क्षेपो यस्मात् स तथा, "रमथः प्रहर्षः", [सि. हे. उ. सू. २३२] इत्युणादिवचनात् । पुन: किम्भूतस्त्वं? 'अमुद्गरः' प्रहरणविशेषरहितः । पुनः किम्भूतस्त्वं? 'काश्मीर- • जाःि' काश्मीरजेन-धुसूणेन अचिः-पूजा यस्यासो तथा । पुनः किम्भूतस्त्वं ? 'अकुठेरकथेरपीवरनिचौरकः'- कुठेर:--. निस्सृतसारः, न कुटेरः अकुठेरः, कथेरः कथकः धर्मवक्ता इत्यर्थः, कुठेरकथेरशब्दी औणादिको, पीवरः-पुष्टः गरी रेणेति गम्यते, न तु कृगतनुः, निर्गतं चौरकं-चौरिका यस्मात् स निश्चौरकः, चतुर्णा कर्मधारयः, "चोरादेः" (सि. हे. ७४११७३] चोरादिभ्यस्तस्य भावे कर्मणि चाकप्रत्ययै चौरकम् । पुनः किम्भूतस्त्वं ? 'करचनोरलधू.'. कस्य-सुखस्य रचना-विरचनं यस्य म करचन , उरला:-उत्कटा:-मदोत्कटास्तान् धुवति योऽसौ उरलवू:, "घूत् कम्पै" किंवन्त , करचनश्चीसो उरलघू- श्रेति कर्मधारयः । पुनः किम्भूतस्त्वं ? 'अभङ्गरः' न भगुरः अभद्गुरः न नश्वर इत्यर्थः, "मगरी वक्रतश्वरौ" [अने. सं. का ३. श्लो ११८४] इत्युक्ते ॥ ४ ॥ वन्यूरनागरकभैरवचोरडस्फरः, फर्जूरवाशुरविमोरखटूरकपरः । पिण्डारशावरमसूरनिकारशापवरः, '. साधून ररक्ष रजतीरवनोरदर्वरः ॥४४॥ “ध्यारया-'अदर्वरः नास्ति दवर:-वर्ष यस्य सोज्दवर:- श्रीअरनापजिनः 'साधून्' मुनीन् . 'ररक्ष' पालयामाम ।
सहबदलकमलमयः अरजिनस्तवः। किम्भूतोऽदर्वरः? 'वन्धूरनागरकभैरवचोरडस्फरः' "वन्धूरो रम्यननयोः।" [अने.सं. का ३ श्लो. ११८१] इत्युक्तेः वन्यूराः- नम्रा रम्या वा नागरा:-लोका पस्मिन् स वन्धुरनागरः, केन- दुःखेन भैरवा:-घोराः कौरवा. ते च ते चोरडाश्च-तस्कराः कभैरवचोरडाः,तेषां स्फर:-गमनं यस्मात् स कभैरवचोरडस्फरः, "स्कर सफलत् स्फुरणे, चलने इत्येके" इति धातुपारायण- वचनाद् अलन्तः, वन्यूरनागरश्चासो कभैरवचोरडरफरश्चेति कर्मधारयः । पुनः किम्भूतोऽदर्वरः? 'कर्जूरवाशुरविमीः' कर्जूरा:-मलिनाः पापमलिनाः, अत एव शठत्वाद् वाशुरा इव- गर्दभा इव ये ते कर्जूरवाशुराः, तेषां विशिष्टा मी:-मतिर्यस्मात् म कर्जूरवाशुरविमी:, कर्जूरवाशुरैशब्दो औणादिको, "मीकि गत्यां मत्यां" [कवि क. श्लो.] इति कविकल्पद्रुमोक्तेः किवन्तः । पुनः किम्भूतोऽदर्वरः? 'अखटूरकर्परः' खटूर:-मणिविशेषः, "खटूरो मणिविशेषः" [सि. है. उ. सू. ४२७] इत्युणादिवृत्तौ, कर्पर.-शस्त्रविशेषः, सटूरश्च करिश्च खटूरकपरो, तो न स्त: यस्य स तया, "कपरस्तु कटाहे स्याच्छस्त्रभेदकपालयोः।" [अने स. का. ३ श्लो. ११३०] इति वचनप्रामाण्यात् । पुनः किम्भूतोऽदवर.? 'पिण्डारशावरमसूरीनकारशाकरः' पिण्डारः- भिदाकः, "पिण्डारी भिक्षुके” [अने. सं. का. ३ श्ली. ११७८ इति हेमाचार्याः, गावराः-घातुकाः “शार्वरं धातुके" [अने. सं. का. ३ श्लो. १२०६] इत्युक्तेः, मसूरा:-पण्ययोषितः, “मसूरो मसुरोऽपिच । मसुरा च मसूरा च, चत्वारः पग्ययोपिति ।। तथा व्रीहिविशेपेऽपि" [अने. सं.का. ३ श्लो. ११६०, ११६१] इत्युक्ते, गावराश्च मसूराश्व गावरमसूरास्तेषां निकारः-पराभवो येषां स्योपजवृत्तिविभूषितः ते “निकारस्तु पराभवे ।। धान्योत्क्षेपे" [अने. सं. का ३ श्लो. ११६६, ११७०] इत्युक्ते. शावरमसूरनिकाराः, पिण्डाराश्च ते गावरमसूरनिकाराश्च पिण्डारमावरमसूरनिकाराः, तेपांमध्ये भाकर' इव-वृषभ इव योऽसौ तथा । पुन. किम्भूतोऽदर्वरः ? 'रजती.' "रजी रागे" "इकिश्तिव् स्वरूपार्थे" [सि. हे. ५। ३।१३८] इति तिवि, रजति.-रागः प्रस्तावाद् धर्मरागः तस्य इ-प्रापण यस्मात् स तथा । पुनः किम्भूतोऽदर्वरः ? 'अवनोः' अव-निश्चितो नोः-स्तुतिर्यस्मात् स तथा, "णुक स्तुतौ" विजन्तः ।। ४४ ।। मृदरनिकरहारी रन्ध्रहोऽरक्षदारः, : : शिबिरभिदिरकृद् गौरप्रजीरः पवीरः। वठरवमरवित्ती रम्भतीरम्मदा रः, सदुरसिलररुरक्षपारक्कुरीरः ॥४५॥ व्याख्या-'मृदरनिकरहारी' मृदराणा-व्याधीनां निकर--- समूहः मृदरनिकर , तद् हरतीत्येवंशीलो मृदरनिकरहारी 'अर.' अरनाथजिन 'अरक्षत्' अपालयत् सेव[का]निति शेपः । किम्भूतोर. ? 'रन्ध्रह', रन्ध्राणि प्रस्तावात् पापन्छिद्राणि तानिहन्ति योऽसौ रन्ध्रह.-पापच्छिद्रभन्जक इत्यर्थः । आकारः सम्बोधनार्थमव्ययम् । पुन किम्भूतोऽर: ? "शिविरभिदिर- कृत्' मिविरस्य-संन्यस्य भिदिर-भेद तत् करोतीति यः स तथा, "भिदिरं वचं भेदश्च" [सि. हे उ सू. ४१६] इत्युणादौ । १. "साक्षरस्तूमा" इति अने. स. वा. ३ को १२१० । २. "भिदिर अनि भेदय" इति मुद्रिताया हमोणादिवृत्तौ ४१६॥
सहस्रदलकमलमयः परजिनस्तवः। पुनः किम्भूतोऽर:? 'गौः' "गुङ शब्दे" विचि गुवति-धर्म शब्दयति योऽसौ तथा । पुन. किम्भूतोऽर: ? 'अप्रजीर.' प्रकृष्टाः जीराः प्रजीराः-प्रधानावाः, यदुक्तमुणादिवृत्ती-" जीरः अजाजी अग्नि. स्नायुः अश्वश्च" [सि. हे. उ. सू. ३६२] इति, न सन्ति प्रजीरा यस्यासौ तया, त्यक्तगृहस्यावासत्वात् । पुनः किम्भूतोऽर:? 'पवीरः धर्मेण निर्मल:, यदुक्तमुणादिवृत्ती- "पवीरं रङ्गस्थानं फलं पवित्रं च" [सि. है. उ. सू. ४१८] इति । पुनः किम्भूतोऽर:? 'वठरवमरवित्तिः' वठराः रा-वृहदेहा ये वमरा:-मूर्खाः दुर्मेधसः, यदुक्तमुणादी-“वमराः दुर्मेधसः" [सि. हे. उ. सू. ३६७] वठरवमरास्तेषां वित्तिः-ज्ञानं यस्मात् स तथा, बृहदेहमठानां ज्ञानप्रद ईत्ययः । पुनः किम्भूतोऽर:? 'रम्भती- रम्मदाः' "रभिड शब्दे" , "इकिश्तिव् स्वरूपार्थे" [सि. हे. ५।३।१३८] इति तिवि, रम्भतिः- शब्दनम्, तं एति-व्या- ख्यानक्षणे प्राप्नोति योऽसौ। रम्भती, इरा-सुरा तया माद्यन्ति- हृप्यन्ति ये ते इरम्मदाः-मद्यपानकराः, तेभ्योऽस् गमनं-ब्रजनं यस्य स इरम्मदाः, “असञ् अवार्थ" "अवार्ये दीप्तिग्रहणगतिपु" इति कविकल्पद्रुमधातुपाठोक्तेः, रम्भतीश्चासौ इरम्मदाश्चेति कर्म- धारयः । पुन: किम्भूतोऽरः ? 'र' रवति शुभं योऽसौ डेरः, शुभरवका इत्यर्थः । पुन: किम्भूतोऽर: ? 'सदुरसिल' सन्तः प्रशस्ताः ये उरसिलाः सदुरसिला:-प्रशस्तोरस्वन्तस्तान् आचप्टे १. "वायुः" इति मुद्रितोगादिवृत्तौ। २. “वठर -मूर्खः वृहदेहश्च" इति हेमोगादिवृत्तो मू. ३९७ ॥ अनेकार्थे तु “वठरो मूर्खशठयो" १८१॥ इति ३११॥ ३. 'डे' प्रत्यये कृने इत्यर्थः।
८१२] स्वोपश्यत्तिविभूषितः इति सदुरसिलयति, सदुरमिलयतीति णिजि तल्लकि विनि तल्लुकि च रादुरसिल् । पुनः किम्भूतोऽर: ? 'अररुरक्ष- पारतकुरीर' अरव:- असुराः, यदुक्तमुणादिवृत्त्याम् - 'अररु: असुर आयुधं मण्डलं त्र" [सि. हे. उ. सू. तद्वत् क्रूरा ये ते अरस्क्रूरा :-दुर्दान्ता' शत्रवस्तान् क्षयति योऽसौ अररुक्रूरक्ष, “क्षि क्षयश्वर्ययोः” इत्युदतेः, पारजः-रत्नानि, प्रस्तावाद् गुणरत्नानि, यदुक्मणादिवृत्ती- "पारण कर्मसमाप्तौ" "पारेरज्" [सि. हे. उ. मू. ८७३] इति मुत्रेणाप्रत्यो “पारक् शाकविशेषःप्राकार- सुवर्ण गुणरत्नं च", इति, पारजां-गुणरत्नानां कुरीर:-आलयो योऽमो पारकुरीरः, अररुक्रूरक्षश्वासौ पारयकुरीरश्चेति कर्मधारयः ॥४५॥ शर्माररं नुररणेरमतेरभर्भर !, खेतेरमर्मरनुतेरगतेरपत्सर !। धीस्थूरकर्बरभजेरजजेरनातुर !, न्यक्कारहानिररपूरप्रतारणाघर ! ॥४६॥ व्याख्या--हे 'अभर्भर !' न भरोऽभभंरस्तत्सम्बोधनं है अभर्भर !-हे अच्छद्मवन् ', "भर्भर. छद्मवान्" [सि. हे. उ. सू. ६] इत्युणादिवचनप्रमाणात्, अहं 'शर्म' भद्र 'आरर' मत्वयं अप्रापम् । कस्मात् ? 'नुः' मनुष्यात् श्रीमरनाथ- लक्षणात् । किम्भूतान्नु ? 'अमतेः' कालस्य 'अरणे:' "रण गतो" गत्यर्थानां प्राप्त्यर्थत्वाद, न विद्यते रणिः-प्रापणं यस्मात् ग अरणिस्तस्मात् अरणेः । पुनः किम्भूतान्नुः ? 'सेतेः' गम्य-सुषम्य इतिः-प्रापणं यस्मात् स पेतिस्तम्मात्,“मिन्द्रियं . सहयदलकमलमयः अरजिनस्तयः। स्वर्ग शून्यं, भूपाउकागमुग्वेषु च ।" [म.ए.१२] इति सुधाकलश- वचनप्रामाण्यात् । पुनः किम्भूतान्नुः ? 'अममरनुतेः न विद्यन्त मर्मरा:-दानवाः गत्वेन येषां ते समर्मराः, यदुनतमुणादिवृतो- "मर्मरः गुप्कपत्रप्रकरः तद्धर्मायोऽपि क्षोदाहिष्णुर्दानवध" [सि. हे. उ. मू. ६] इति, अममरा:-चतुःपप्टिरिन्द्रास्तेभ्यो नुतिः-स्तुतिर्यस्य स तया तस्मात् । पुनः किम्भूनान: ? 'अगतेः' नास्ति गतिः प्रस्तावान्नरकगतिमान् म तथा नस्मात् । किम्भून हे अमभर ! ? 'अपार !' "हमर छागतो" अलन्त:, अपगतः त्सरः-छागतियंस्य तथा तत्सम्बोधनम् । पुन: किम्भूतान्नुः ? 'धीस्यूरकर्वरभजेः' धिया-बुद्धया स्थूरा:-ठच्चा ये ते धीस्थूराः-विद्वांगः, "स्यूर: विधिरः उच्चश्च" [मि. हे. उ, मू. ४२६] इति उणादिवचनात्, घीस्यूरेप कचंग इय-व्याघ्रा इव ये ने धीस्थूरकरास्तेषु भजिः-सेवा यम्य स तया तस्मात्, “मजत्रो भागमेवयोः” इत्युक्तेः, "इकि- स्तित् स्वयार्थ" [सि. हे. ५।३।१३८] इति : प्रत्ययः । पुनः किम्भूनान्नु.? 'अगजेः' निर्युदात्, “जन जजि युद्ध" द- प्रत्ययान्तः । पुनः किम्भूत हे अभर्भर ! ? 'अनातुर !' न भातुरः अनातुरस्तत्सम्बोधनम् । पुनः किम्भूनो ! 'न्यकारहानिः' न्यभारस्य-ज्यकारणस्य [हानि:-क्षतिः यस्य] स तथा। पुनः किम्भूनोऽहं ? 'भरपूर "ऋगती" ये ते सुगमपि यं प्राप्नुवन्ति, अविसरेमितप्णव.(?)। पुनः किम्भून हे यमर्मर ! ? 'गाना- रणाघर!"वचनं तु प्रतारणं"[अभि.चि. 3१४३] इत्यभिधान- कोपवचनाद, नास्ति प्रतारणं-बच्चगं यस्मिन् गः अग्रतारण:, १. 'वटर.' इति मुहिनोणादियनी।
७० स्वोपनवृत्तिविभूषितः, "घृ भामि" चि, अया-लक्षम्या जित्ति-भासते योऽसौ आधरः, अप्रतारणवासी आघनश्चेति कर्मधारये अप्रतारणाघर- स्तत्सम्बोधनम्।।४६॥ लक्ष्मीरबीभरदभीरतवरटेतरः, साधूरकर्तृरगुरोरहरेरदुष्करः। सह्योरसूकरमनोरथपारभु रः, सह्रीरऽझर्झरसवीरतरेरगह्वरः ॥४७॥ व्याख्या-'अभी' न विद्यते भी:-भयं यस्मात् मोऽभी:- श्रीअरनाथजिन 'लक्ष्मीः' थिय 'यबीभरत्' अत्यर्थ अपोषयत् । कथं ? 'अकर्तृ' "अन मातत्यगमने" अत्यन्ते-ज्ञायन्ते धर्माधर्म- फलानि एभ्य इति "कचिड्ड" [सि. हे. ५।१।१७१] इति डे, आ.-सिद्धान्तानि तेषां कर्तृ अर्तृ एव यथा स्यानया । कस्य लक्ष्मी अबीभरत् ? अगुरोः' "अज क्षेपे गती" विवन्तः, अक्- जानं नेन उरु -गरिप्ठो योऽसौ अगुरुस्तम्य अगुरो:-श्रावकस्य । अकर्तृ जने जगुरोरित्यत्र "इवर्णादेरस्वे स्वरे यवरलं" [सि हे. १२।२१] इति मूत्रस्य पञ्चमीव्याख्यानत ऋकारात्पर- स्याकारस्य रकारादेशे जाते अनुरगुरोरिति निप्पत्तिः । विम्भूनोभी ? 'गतवेरटेनर.' अतन्ति-जिनोक्तवर्मादपर धर्म मातन्येन प्राप्नुवन्ति येभ्यो ये ते अता-हरहरिब्रह्मादयो देवाः, ते च ते वेरटाश्च-नीचा अतवेरटाः, “अथ वेरटः।। मिश्रीकृते च नीचे च" [अने. म का ३ श्लो. ७६७, ६८] इति हैमानेकार्थ- वचनान्, अनवरटेभ्य इतर -अन्यो य स तथा । पुनः किम्भू- नोभी ?'माधू' माया:-लश्म्याः धू.-धुरामारो यस्यामी तथा। -
सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः।
किम्भूतस्य अगुरोः ? 'अहरेः' हरति परद्रव्याणि यः सः हरिः, न
हरि: अहरिस्तस्य तथा, साधोरित्यर्थः। पुनः किम्भूतोभीः?
'अदुष्करः' न विद्यते दुष्करं किमपि यस्यासौ तथा । पुनः
किम्भूतोऽभी: ? 'सह्योः' "सह्यो नीजि" इत्युक्तेः सह्या-नीर-
जस्तेपां उ:-पालनं यस्मिन् म तथा । पुनः किम्भूतोऽभी: ?
'अमूकरमनोरयपारभुर्भुरः' मूकरप्रायत्वात् सूकरा:-गठाः, न
सूकरा असूकराः-चतुरास्तेषां मनोरथपारा:-कामितपूरकाः
"कर्मणोऽण्" [सि. है. ५३११७२] इत्यण, असूकरमनोरथपाराः-
देवास्तेषां भुर्भुर:-निचयो भक्त्यर्थ यस्य स तथा, भुर्भुरशब्द
औणादिकः । पुनः किम्भूतोऽभी: ? 'सह्री.' सलज्जः । पुनः
किम्भूतोऽभी: ? 'अझर्झरसवीरतरे:' न सन्ति झईराः-वाद्यवि-
पा आत्मनो वादनार्थ येषां ते अझर्झराः, सह वीरतर:-
वीरश्रेष्ठः वर्तन्ते ये से मवीरतराः, “वीरतरो वीरथेप्ठे" [अने. सं.
का. ४ श्लो. १६५३] इत्युक्तेः, अझझराश्च सवीरतराश्च अझझं-
रसवीरतरा:-राजानस्तपां ई:-लक्ष्मीर्यस्मात् स तथा । पुनः
किम्भूतोऽभी:? 'अगह्वरः नास्ति गह्वरः-दम्भो यस्मिन् स
तथा, "गह्वरो विलदम्भयोः" [अने. सं. का. ३, श्लो. ११५०]
इत्युक्तेः ॥४७॥
वन्दारवो! निरयदारव ! आं ररास रः,
कञ्चारवो ! धरणधारण एरपञ्जरः ।
श्रीसारसासरणिपूरणसारणासिर-
विस्तारकोऽगिरणचूरणजारतत्परः ॥४८॥
७२ व्याख्या स्वोपत्तवृत्तिविभूषितः -भो'वन्दारव!' वन्दनशीला येते वन्दारवस्त- त्सम्बोधने हे वन्दारवः!-भो सुहृदः! 'र.' रम्भयति लोकान् योऽसो र:- श्रीअरनाथजिनः 'आ' थियं-धर्मलक्ष्मी 'ररास' अब्रवीत्, व्याख्यानक्षणे इत्यध्याहार्यम् । किम्भता हे बन्दारव.? 'निरयदारव. !' निरयस्य-नरकस्य दारव.-दारका ये ते निरय- दारवस्तत्सम्बोधनम् । पुन किम्भूताहे वन्दारव ? 'कञ्चारवः सुखप्रधानास्तत्सम्बोधनम् । किम्भूतोऽरः ? 'धरणधारण' धरणान्-लोकान् संसारसागरपतनाद् धारयति योऽसौ तथा, "धरणोऽहिपती लोके" [अने. स. का. ३ श्लो. ८०५] इति हेमानेकार्थात् । पुनः किम्भूतोऽर ? 'ए.' कृतार्थ , "एकुमारो. सुरोऽरातिर्शातीयोऽहित उद्धत । आत्मा शेपो विवस्वाश्च कृतार्थों मध्वरि शर, ।।" [सौ. ए १२] इति सौभरिवचनात् । पुनः किम्भूतोऽर ? 'अपञ्जर' नास्ति पञ्जर:-जीवबन्धन- म्थानं यस्मिन् स तथा । पुन. किम्भूतोऽर: ? 'श्रीसारमास- रणिपूरणसारणासि ' श्री:-शोभा लक्ष्मी मा एव मारम- पर तद्विकाशनार्थ आ-ममन्तात् मरणिरिव-भानुरिव ये ते श्रीमारमामरणयः, तेपा पूरण-प्रकरणात् सुपम्य पूरणं यस्मात्य श्रीमारमामरणिपूरण , नारण -अनीसारग्तस्य असि -क्षेपो यस्मान् ग गारणामि , "मारण म्यादतीगारे" [अने. मं. ना. ३ श्लो. ८२७] इति वचनप्रामाण्यात् । श्रीराारसारारणिपूरण- चागो गारणागिश्चेति गर्मधाग्य । पुन किम्भूतोरः ? 'अविग्तारक' आ.- r.-मुगिनन्तपा विस्तार एवं विस्तारको यम्मिन् ग तथा, " कृष्ण गहरो ब्रह्मा : मोमो:- गलोनर. : गूपं: प्रानो जनः कालो परानः प्राणतः गुगी ।।" 7 महस्रदलकमलमय: बरजिनस्तवः। [सौ. ए. २] इति वचनप्रामाण्यात् । पुनः किम्भूतोर:? अगि- रणचूरणजारतत्परः' गिरणाः-आचार्याः, यदुक्तमुपादिवृत्ती- "गिरण: मेघः आचार्यों ग्रामश्च" [सि. हे. उ. मू. १८८] इति, न गिरणा अगिरणाः, नगव्दम्य कुत्मार्थत्वाद् अगिरणा:- कुत्सिताचार्यास्तेषां चूरण-नागो येभ्यस्त अगिरणचूरणा:- बौद्धास्तपां जार:-चक्कारत्तत्करणे गन्पर: सावधानो योनी अगिरणचूरणजारतत्परः ॥४८॥ पुस्फोर कोत्तिरदनारतमेरमन्दिर- रन्तरतूबरचकोरनिशारमण्यर! । रहारयो हरय औरसवारकातर- कसेरवो मरकशूरणनीरवित्युर!॥४६।। व्याख्या हे 'मत् !' "अत सातत्यगमने" शिवनः, अतति-मातत्येन जिनप्रणीतं धर्म प्राप्नोति योसो अत्, नत्मम्बो- घनं हे अत् !-हे श्रावक ! 'हरयः' इन्द्राश्चतुःपप्टिमङ्खयाका रवन्ति इति शेपः । नत् किं ? 'पुस्फोर' चचाल, का? 'कोनि:' यगः, काय ?'अनारत' निरन्तरं कस्य ! 'ए: "ई गनो" दिचिम्, अयति-वेत्ति शुभाशुभमिति ए: तम्य ए: । 'अमन्दिररन्त:' न मलि मन्दिराणि-गृहाणि येपां ते अमन्दिरा:- यतिनस्तः नह रन्तिः-क्रीडा यस्यासो बमन्दिररन्तिस्तस्य । किम्भून हे अत् ? 'अतूवरचकोरनिगारमण्यर:!'तूबरा:-अजननीकाः कुमातृकत्वेन, यदुक्तमुणादो-"तूबरः मन्दश्मथू: अजननीकथ" मि. हे. र. १. 'नूवरः" इति मुद्रिने ७४ स्वोपनवृत्तिविभूषितः मु. ४४३] इति, न तूवरा अतूवरा:-उभयपक्षशुद्धाः पुमांसस्त एव चकोरास्तेषां आह्लादकरणाय निगाया रमणो निशार- मणः- चन्द्र स इव ये ते अतूबरचकोरनिगारमणाः, ते विद्यन्ते येषां ते अतूवरचकोरनिगारमणिनः, तेः रलयोरक्याद्, अलति- गोभते योऽसो अतूबरचकोरनिशारमण्यरस्तत्सम्बोधनम् । किम्भूना हरय ? 'रहारय' राया-द्रव्येण हारयश्चारको ये ते नथा, "चारु हारि" [६ । ८०] इति अभिधानकोपवचनात् । पुन किम्भूता हग्य.? 'औरमवारकातरकंसेरवः',उसा- हदा मनमा कृतानि सेवकजनानां वाञ्छितानि यस्ते ओरसाः- मामान्यदेवाः, "उरसो याणी" [मि. हे ६।३।१९६] इति सूत्रेण उग्मगब्दान् तेन कृते अण्प्रत्यये औरम इति निप्पत्तिः, वार एव वारकः, ममूह एवेत्यर्थः, औरसानो यारको येपु ते औरमवारका , “त तारे ऽभिभवे प्लुत्या" इत्युक्तः अलन्तः, आ-मामन्येन तर.-अभिमवो येषु ते आतरा.-दानवास्तेषां कं-गुवं []य मेरव -वन्धका ये से आतरकसेरवः, औरम- वारवादच ते आतरकमेवश्चेनि कर्मधारयः । पुनः किम्भूत ६ अत् ? 'मरयागरणनीरवित्युर!' "मरको मारि" [२।२३६] इत्यभिधानसोपोक्त मरकन्य-मारे मूरणं-नागो यस्मात्म मरमरण, "पूर पूर्व डीम्तम्भे हिने" इनि फयिकल्पद्रुमधातु- पाठोते , " वधे गया" प्रत्यये रवितं, निर्गत रविन वधी ययग्ने नीरदिना , गरकरणाश्च ते नीरविताश्च मरम्मरमनीरविताम्रो गलि येषा ते गगनगरपनीरवितिनः- नागार्या , गान् उति-प्राप्नोति गुरुत्वे यो.सी तथा, तदा मन पम् “उर गौ" गौत्रो भानुः अजन्त. Imell व्याख्या सहनदला मलमयः परजिनस्तदा। किौरचरनुगौरवकेरढस्परः, काण्डीरयोद्धरवतार ! ततार भास्करः । कल्हारदृष्टिरनवीरनुवारयित्वरः, कासारस,रगतीरणनीरमन्दरः॥५०॥ हे 'अवतार!'अवतार:-अवतरण भसारस्य यस्य न अवतारः,तत्सम्बोधनं हे अवतार!-हे गुटो!, "अव- नारत नद्यादितीज्वारणे.पि ।।" [अने. सं. का. ४ श्लो. १६१०]इन्युक्तेः । नास्कर' मूर्यःजानालोकप्रश्नामकारकत्लान्, भास्कर इत्र भास्करः- श्रीअन्नादिनः 'चनार जितवान् । किं तत् ? 'काण्डीरयोद्ध,' वाण्डाः आपाः विद्यन्ते येषां तं काण्डीराः, "काण्डाण्डमाण्डादीरः" [मि. है. ७१२१३८] इति मृगरप्रत्यये काण्डीरः, काण्डीरा योद्धारो विद्यन्ने यस्मिनत् काण्डीरयोद् तत् काण्डीरयोदृ-ग्रन्तादाद वादयुद्धम् । काण्डी- न्योट्ट अप्रे अवतार इत्यत्र "इवदिर स्वरे यवरलं" [मि. हे. ११२।२१] इत्यन्य मूत्रस्य पञ्चमीयाख्यानाद् ऋका. गत्तरस्याकारस्य रकारादेगे काण्डोरयोदृरखतानि सिद्धिः । किम्भूतो भास्करः? 'किर्मीरचक्षुग्नुगौरवकैरइस्परः' किर्मीरा इव-दत्या इवयेते किर्मीराः,प्रस्तादात् यत्रबः,“किर्मीर: गवले दत्ये" [अने.म.का. : इलो. ११३८] इति वचनात् किमीरा:- कपायचनुष्कलक्षपाः मत्रवले बङ्कुराः-अनदस्थिता यस्मात् म फिर्मीरचङ्करः, चरमब्द बोगादिकानदरियनवाची, नो:-तुतः गौरव-गुरुत्वं येषां ते नुनौरवाः, केन्डा:-राज्य राजानः "करडः राज्ये राजा" [मि.हे. उ. पू. १७२] इल्लु- स्वोपजवृत्तिविभूषितः,.. णादिवचनात् , नुगौरवाश्च ते केरडाश्च नुगौरवकेरडा., तान् स्पृणोति-प्राणयति योऽसौ नुगौरवकरइस्परः, "स्मृ स्पृ प्रोनि- रक्षाप्राणने" इति वचनात्, किर्मीरचकुरस्चासौ नुगौरवकेर- इस्परश्नेति कर्मधारयः । पुनः किम्भूतो भास्कर: ? 'कल्हार- दृष्टि' कमललोचन', कल्हारसद औणादिक उत्पलविशेष- वाची। पुनः किम्भूतो भास्कर.? 'अनवीन विद्यन्तं अव्य-- स्त्रियो यस्यामी नया, यदुक्तमुणादो-"अवीः प्रकागः आदित्यः भूमिः पगु राजा स्त्री च" [सि. है. उ. मू. ७११] इति । पुनः किम्भूतो भास्कर ? 'अनुदारथित्वरः' न विद्यते उदारथिः- विष्णुः देवत्वेन येषां ते अनुदारथय:-जैनास्तेपु त्वरा यस्यासो तथा, यदुक्तमुणादी -- "उदारधि विष्णु" [सि. हे. उ. सू. ६७२]। पुनः किम्भूतो भास्कर ? 'कामारसर्च्छरगतीरजनी' कसारा--हिंस्राः, "कमारः हिंस्रः" [मि है. उ. सू. ४०५] इति उणादिवृत्तः, कमारा एव कामाराः, ऋच्छरा:-वेश्याः कुलटा वा, यदुक्तमुणादौ-"ऋच्छरा वेश्या कुलटा त्वरा [अङ्गलिः] च" [मि. हे. उ. मू. ३६७] इति, सह ऋच्छराभिवर्तन्ते ये ते मछेराः, कामाराश्च ते सर्छराश्च कासारमच्छंरा:-हिमक- लम्पटाः, तेभ्यो गतिः-गमन येपां ते कासारमच्छरगतयः- श्रावकाः, तेषां ई:-लक्ष्मीस्तस्या लादकारित्वाद् रजनि- यामिनी अयनि-प्राप्नोति योशो रजनीः-चन्द्रः, रजनीरिव- चन्द्रमा इव यो:मो तथा । रजनिगब्दम्य उपादिवृत्ती इका- गन्नत्याग्नान पोनरक्त्यम् । पुनः किम्भूतो भास्कर. 'अमन्दर' अमन्द., "मन्दरो मन्यपर्वते । स्वर्गमन्दारयोमन्दे" [बने. मं. वा. : ो ११८७] इति हमानेकार्योक्तः ॥१०॥ ?
सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः। ७७ सनिरपुनरगहों रम्फसूरं ननार, जयिरकररलोकरकितोऽरनिधीरः । पदिरविविरतप्रारम्भदोरम्ब्यगीर, विहरणिमरणीमीरकंसूरः प्रटारः ।।५१॥ व्याख्या-'अ:' अर्हन् श्रीअरनाथजिन: 'ननार' प्राप्त- वान्, " नीती" । किं तत् ? 'रम्फसूरं' "रफि गतो" गत्यर्थानां ज्ञानार्थत्वाद् अलन्तः, रम्फः-ज्ञानं केवलज्ञानं तेन "शूर- पूर्यडी स्तम्भ हिसे” इत्युक्तेः अलन्तः, सूरो-हिंसनं चतुर्णा कापायाणा यस्मात् स रम्फसूर:-यतिधर्मस्तं रम्फसूरं । किम्भूतः अः? 'सनि:' सम्भक्ता, सनि: सम्भक्ता" [सि. हे. उ. सू. ६०७] इत्युणादि., तपसा मिति, तपःकर्तेत्यर्थः । पुनः किम्भूत. अः ? 'अपुनरगहः' पुनः अगन्ति-पुनः मुक्तिमार्गात् कुटिल यान्ति ये ते पुनरग.-मिथ्यादृष्टिनः, "अक अग] कुटिलायां गतो" शिवन्तः, न पुनरगोऽपुनरगः, तेषा अर्हः- योग्यो यः स तथा । पुनः किम्भूत. अः ? 'जय' राजा, माधूनां इत्यवगन्तव्यम् । पुनः किम्भूतः अः ? 'अकितः' स्तुत., "अर्वाग् स्तुतो" अलन्त , कैः ? 'अकाररलोकः' न करराः अकररा.-अदीनाः, "कररः खगे, करीरे ऋकचे दीने" [अने. सं. का. ३ श्लो. ११२७, ११२८] इति हैमानेकार्थात्, अकरराश्च ते लोकाश्च अकररलोकास्त. अकररलोक-अदीन- जन. । पुन. किम्भूतः अ: ? 'अरनिधीः' अरलि:-शमस्तं १. “सनि सम्भक्ता पन्था दान म्लेच्छ नदीतट च" इत्यु- गादिवृत्तौ ॥
७८ म्बापतवृत्तिविभूषितः घ्यायतीति योमो तथा, यदुक्तमुणादी-"'अरलिः वाहमध्यं गमः उत्कनिष्ठच हस्तः।" [सि. है. र. मू.६८२] पुन: किम्भूतः यः? पदिरविदिः' "पदिर:मार्गःनि.है. उ.मू. ४१३] इत्युपादिवृत्तेः पदिर:-मार्ग: प्रस्तावान्मुक्तिमार्गस्तस्य विदि:- नानं यस्य म तथा, 'विद जाने" "इकिरितव् स्वरूपायें" [नि. हे.५।३।१३८] इति इप्रत्यये सिद्धिः । पुनः किम्भूतः ? 'अतपारम्मदी: सत्यते-सातत्येन जायते धर्मो यन्यस्ते अता:- एकादगाङ्गानि, तेषां प्रारम्भः-प्रारम्भणं तेन यति-दुःखं द्यति योसौ विचि अतप्रारम्भदौः। पुनः किम्भूतः अः? 'अम्ब्यगी:' "अम्य च गतो" गत्यानां प्राप्त्यर्यत्वाद्, यपि अन्या-प्राणाहीं गी:-दाणीयम्यासी तथा। आरः पाद- पूरणार्थः । पुनः किम्भूतः अ: "विहरणिमरगिमी:' हरपि:- मृत्युः, यदुक्तमुपादो-"हरणि. कुल्या मृत्युश्च" [मि. है. उ. मू. ६३८] इति, भरणी-रायि, योणादिकः, हरपिरेव मरणो हरपिमरणी, दिगता हरणिमरणी यया मा विहरपिमरणी- मिद्धिः,नांमयति-प्राप्नोति योनी तया,"मीकि गत्यां" विदन्तः। पुनः किम्भूतः स ? 'अम्' स्तुतिजनक. । पुनः किम्भूतः कः? 'अ' दीप्त गपं:, “अन दीप्तो" शिवन्तः । पुनः किम्भूत. अ.? 'प्रटार' "टारो लिङ्गतुरङ्गयो:" [ओ. नं. का. २. ४२६] इत्युक्तो प्रगताः टारा:-तुरङ्गा यम्मात् ग तया ॥५१॥ , "यनरस्निः ॥६८२॥ र गताविन्दम्मानिः प्रन्यो भनि।" युपाश्विना । .
७९ व्यास्या- सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः। स्यविरमुनिरघोवा रण्टगत् रहखोरः, सरिरजकरदीप्रो रजूचोरप्रधोरः । चमरजितिरखर्जूरः सुसौरभ्यकारः, सुपरमपरमेष्ठी रम्बतौरः पपार ॥५२॥ --'सुपरमपरमेष्ठी' सु-अतिगयेन परमः-प्रकृष्टः मुपरमः, स चासो परमेष्ठी च सुपरमपरमेप्ठो-धीअरनायजिनः 'पपार' प्रीति अजनयत्, जनानामिति गम्यते। किम्भूतः सुपरम- परमेष्ठी ? 'स्यविरमुनिः' स्थविराः-वृद्धा मुनयो यस्यानी तथा। पुनः किम्भूतः सुपरमपरमेष्ठी?'अधीवा' निर्वाधिः, यदुक्तमुणादौ-"घीवा मनीपी निपादः व्याधिः मत्स्यश्च" [सि. हे. उ. ६०८] इति । पुनः किम्भूतः सुपरमपरमेष्ठी? 'रण्टगत्' "रटिस्तेये" सौत्रोघातुः-अलन्तः, रण्टात्-चौरिकाया गच्छति-दूरं याति योनी तथा। पुनः किम्भूतः नुपरम- परमेष्ठी ? रहखोरः "रहि गत्यां" ज्ञानार्यः अलन्तः, रंहः- ज्ञानं प्रस्तावाद् मिय्याज्ञानं नस्य खोरः-खोटने यस्मात्स तथा, "खो खोटने" अलन्तः । पुनः किम्भूतः सुपरमपरमेष्ठी ? 'मरिरजकरदीप्रः' मरिरे-पानीये जायते सरिरज-पद्यं, तद्वत् करौ-पाणी ताभ्यां दीप्रो यः स तथा । पुनः किम्भूतः सुपरम- परमेष्ठी ? 'रड्वचारप्रघोरः' रङ्कः-मृगास्ते इव रकवस्ते च ते चोराश्च रकचोरास्तेषु प्रघोरः-भयङ्करमब्दो यस्य स तथा, "धुरस् घ्वनी भीमा" पनन्तः । पुनः किम्भूतः १. "जलं रडं च मलिरं, सरिलं मदिन (?) तथा ॥९॥ मरिं" इति शब्दरत्नाकर, का० ४।
८० स्वोपजवृत्तिविभूषितः मुपरमपरमेष्ठी ? 'चमरजिति:' चमर:-दैत्यः, "चमरश्चामरे दैत्ये" [अने. स. का ३ श्लो. ११५४] इत्युक्तेः, चमर इव चमरः-कपायादिचतुप्कलक्षण. शत्रुस्तस्य जितिः-जयो यस्मात् म तथा । पुन. किम्भूत सुपरमपरमेष्ठी ? 'अखजूरः' नास्ति गर्जूर.-रूप्यं यस्यासी तया। पुनः किम्भूतः सुपरमपरमेष्ठी ? 'सुसौरभ्यकार.' "सौरभ्यं गुणगौरवे" [अने० सं० कां. ३ श्लो. १११] इत्युक्तेः मुष्ठु “सौरभ्यं--गुणगौरवं तस्य कार:- र:-यलो यस्य स तथा, “कारो बले वधे यत्ने" [अने. सं का. २ श्लो. ४०६] इत्युक्ते। पुनः किम्भूतः सुपरमपरमेष्ठी ? 'रम्वती.' "रम्ब गतो" तिप्रत्ययान्त', रम्यतिः-गतिः प्रस्तावात् स्वर्गा- पवगंगतिस्तस्य इ:-प्रापणं यस्मात् स तथा । पुनः किम्भूतः मुपरमपरमेष्ठी? 'अम् अस्यति-क्षिपति कर्माणि योऽसौ क्विपि अम् ॥५२॥ सत्पूरशर्करविभूरकडार ! वासरं, भण्डीरकिरकटीरगभीरकः किर। वापीरचाररणतीरपटीरसुन्दर- कोटौरपुष्परयहरसहोरफुजरः॥५३॥ व्यास्था--हे 'अकडार !' न कडारः-न विपमदन्तो प: मोऽकडारः, "कडारः पिङ्गलः विषमदशन" [सि. हे. उ मू. ४०५] इति उणादिवचनात्, तत्सम्बोधनं हे अकटार!- है मुदन् ! हे श्रीमरणाजिन! त्वं 'विर' क्षिप । कि तत् ? 'पागरं' कन्दपम्, यदुगामुणादी "वागरः दिवगः कामः अग्निः प्रादृट् च" [सि है. र मू ३९७] । किम्भूतस्त्वं ? 'गत्पूः' सहस्रदलकमलमयः अरजिनस्तवः। ८१ प्रधानकायः । पुनः किम्भूतस्त्वं ? 'अशर्करविभूः न शर्करा:- कर्कशाः प्रस्तावात् साधवो यस्य स अशकरः, यदुक्तमुणादौ- "शर्करा मत्स्यण्डिकादिः कर्कशः क्षुद्रपाषाणावयवश्च" [सि. हे. उ. सू. ४३५] इति, विशिष्टा भू-उत्पत्तिर्यस्य स विभूः, अशर्करश्चासौ विभूश्चेति कर्मधारयः । पुन किम्भूतस्त्वं ? 'भण्डीरकिङ्करकटीरगभीरकः' १“भडीर-भण्डोरौ योद्धृविशेष- याचको औणादिको, भण्डीराः-योद्धृविशेषाः किङ्करा -दासा यस्यासी भण्डीरकिङ्करः, - कटीरं-जलं तद्धेतुत्वात् कटोरं समुद्रस्तद्वद् गभीरो यः स: कटीरगभीरः, कटीरगभीर इव • कटीरगभीरक., स्वार्थे कः, भण्डीरकि करश्चासी कटोरगभीरकश्चेति कर्मधारयः । पुनः किम्भूतस्त्वं ? 'यापीर- चाररणती.' वापीर.-मेघस्तद्वत् चार:-प्रधानो यो रणतिः- शब्दस्तेन इ:-शोभा यस्यासौ तया। वापीरशब्द, औणादिको मेघवाची । पुनः किम्भूतस्त्व ? 'अपटीरसुन्दरकोटीरपुप्यरथहे:' नास्ति पटीर:-कामो येषां ते अपटीराः, यदुक्तमणादौ-"पटीरः कन्दर्प." [सि. है. उ. सू. ४१८] अपटीराणां सुन्दरकोटीर इव-- प्रधानमुकुट इव योऽसौ 'अपटीरसुन्दरकोटीरः, पुष्यरथ:-क्रीडा- रथः प्रस्तावाद् धर्मपुप्यरथः,तेन हिनोति-याति योऽसौ ,विचि. पुष्यरथहेः, "हि वर्द्धने गतौ” अपटीरसुन्दरकोटीरश्चासौ पुष्य- रथहेश्चेति कर्मधारयः । पुन. किम्भूतस्त्वं ? अमहोरकुञ्जर.' सहोर:-विष्णु,, नास्ति सहोरो देवत्वेन येषां ते. असहोरास्तेषु , . १." भडीर: भण्डीरश्च योद्धृवचने" इति हेमोगादिसूत्र ४२२ वृत्तौ । ६ ८२ १ स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः कुञ्जर इव योऽसौ तथा, “सहोरः विष्णुः पर्वतश्च" [सि. हे. उ सू. ४३३] इति उणादिवचनात् ॥५३॥ प्रसरसुपरवाणेरं ददार प्रखौरः सुगिरयऋरभारः परीरः स्वनेरः। कनिरसनरवृद्धेरयधीरंभ्यगोरः,' पतिरचिकुरसाधोरर्बसंरग्यलीरः ॥५४॥ व्याख्या-सुष्ट गिरयः-पूज्या ये ते सुगिरयः-विद्वामः, वदन्तीत्यध्याहार्यम्, "गिरिः पूज्ये" [अने. सं का. २ श्लो. ४१६] इत्युक्तेः । चतुर्थपादान्तै 'अ' सिद्ध.-श्रीअरनाथ जिनः 'ददार' अदारयत् । किं तत् ? 'अ' व्याधि “अं मान्तो ब्रह्मसंवादे परब्रह्मप्रवाचक. ।। व्यसने व्याधिते व्याधी [वि. ए. १६-२०] इति वचनप्रामाण्यात् । कस्य? प्रसरसुपरवाणेः' प्रसरः- प्रेमस्तदेतुत्वात् प्रसरः, "प्रमरस्तु मगरे प्रणये" [अने. सं. का. ३ श्लो. ११७३] इति हैमानेकार्योक्तः, गु-अतिशयेन परवाणि:- धर्माध्यक्षो यः म सुपरवाणिः, "परवाणिधर्माध्यक्षे" [अने. सं. का. ४ शो १४५७] इति यननप्रामाण्यात्, प्रसरहनासो मुपरवाणिश्च प्रारमुपरवाणिस्तस्य । तथा किम्भूतः अः ? 'प्रती:' प्रगता यौः-उत्पत्तियम्मात् ग तथा। कस्य ? 'रः' पापम्य, "अनिधो भय पूषा, यम्णोऽमरराडगः । फरी तरनरः पाप्मा" [गौ ए. (] इत्युक्ते.. "मय भूतिपूत्यरातो" वियन्तः । किम्भूताः मुगिस्य ? 'भारभार.' आ-धर्मः " रामः पायके १ 'अमीर: यम्य दास्गन मामात् पनिनमा । " सहसदलकमलमयः अरजिनस्तवः। ८३ सूर्ये धर्मे" [वि. ए. ११] इति वचनात्, रं-धनं, "रं रत्नं रोदनं धनं" [सौ. ए. ८३] इत्युक्तेः, आ च रं च ऋरे, तयोभार:- पोषका येते तथा । पुनः किम्भूतः अः ? 'परीर.' परीरहेतुत्वात् परीरः, यदुक्तमुणादो--"परीरं वलं" [सि. हे. उ. सू. ४१८] । पुनः किम्भूतः अः ? 'स्वनेरः' न मनि एराः-एडका यस्यासी अनेर., सुष्छु अनेरः स्वनेरः । पुनः किम्भूतः अ.? 'कनिर- सनरवृद्धेः' केन-दुःखेन निरसनाः-निरासाः वानिरसनाः, "निरसनं निसूदने । निष्ठोक्ने निरासे च" [अने सं का ४ श्लो. १५५०] इत्युक्तेः रा:-नरा., कनिरसनाश्च ते राश्च कनिरसनरास्तेपा वृद्धिः-हो यस्मात् स तथा, तस्य कनि- रसनरवृद्धः-यतिनः पतिः' स्वामी । पुनः किम्भूतः ः? 'अय॑धीः' उपार्जनाहघ्यानः । किम्भूतस्य कनिरसनरवृद्धः? 'अचिकुरसाधो:' "चिकुरोऽहो गृहे वभ्री, केशे चञ्चलशैलयोः।" [अने. सं का. ३ श्लो. ११५५] इत्युक्तेः न चिकुरः अचिकुरः-- अचञ्चलः, माधु.-मनोज्ञः, अचिकुरश्चासौ साधुश्च अचिकुर- साधुस्तस्य । पुन. किम्भूतः अः ? 'अर्बसंरग्यली:' "अर्व गती" अर्वन्ति-धर्माद् दूरं यान्ति ये ते अर्वा:-नास्तिकमतिनः, "रगक् स्वादाऽऽप्त्योः तान् संरागयन्ति-प्राप्नुवन्तीत्येवंशीला अवसंर- गिनः, तेन लीयन्ते-नाश्लिष्यन्ते यत्रासौ अर्वसंरग्यलीः ।।५४।। अयोपसंहारमाह- इत्थं देवेन्द्रसङ्घप्रणतनरपतिलाददस्तीर्थनाथो, भद्रं दद्यादरः सोऽभिमतधृतिततिप्राप्तिदःप्राप्तमुक्तिः।
स्वोपज्ञवृत्तिविभूषितः ख्यातीवाचकज्ञानविमलसुगुरूणां प्रसादाद्धि यस्य, चक्रेश्रीवल्लभेन प्रदलदशशताम्भोजगर्भस्तवोऽयम् ॥५५॥ व्याख्या-सः 'अरः' श्रीअरनाजिनः 'भद्र' मङ्गलं 'दद्यात्' प्रयच्छतु । सः कः ? यस्य 'अयं' प्रत्यक्षः 'इत्यं अमुना प्रकोरण 'प्रदलदशमताम्भोजगस्तव.' प्रकृष्टं दलानां पत्राणां दशशत-महतं यस्मिंस्तत् प्रदलदशशतं, तच्च तद् बम्नोज च-पन प्रदलदगमताम्भोज, तद्गमों यस्मिन् स प्रदल. दगगताम्भोजगभं , म चानो लवश्च-स्तवनं प्रदलदशशताम्भो- जगभस्तवः 'चके' अकारि । केन ? ['श्रीवल्लभेन'] श्रीवल्ल- नाम्येन माघुना इत्यर्थ । कत्मात् ? ख्यातथीवावकज्ञानविमल- मुगुरूणां प्रसादान् 'हि' इति निश्चये । किम्भूतोऽर: ? 'देवेन्द्र- सङ्घप्रपननरपतिहाददः' सुरेन्द्रनिकरनम्रमनुजेश्वरप्रमोद- दायकः । पुनः किम्भूतोर.? 'तीर्थनायः' चतुर्विधसवनाथः । पुनः किम्भूतोर.? 'अभिमततिततिप्राप्तिदः' अभिगता:- वाश्छिता घृतय.--गन्तोपमुखानि नामां ततिः-श्रेणिः अभिमत- निततिस्तस्याः प्राप्तिदो य म तया । पुनः किम्भूतोऽर: 'प्राप्तमुक्ति' अवाप्तगिद्धिः ॥५५॥ पनि धीसहस्रकमानितयोमानाप- जिनातपति: समाप्ता। ?
सहस्रदलकमलमयः सरजिनस्तयः। [वृत्तिकार-प्रशस्तिः।] खरतरगणजलघिसमुल्लासनरजनीपतिप्रकाराणाम् । नम्नानेकनराणां, श्रीजिनमाणिक्यसूरीणाम् ॥१॥ पट्टे वरे [ऽघि] विजयिप, कुमतिलतावातनाशनहिमेपु । श्रीमच्छ्रीजिनचन्द्राभियानसूरिष्वधीशेषु ॥२॥ युग्मम् । येषां स्फुरत्प्रतापाधिक्यजितः निरन्तरं भानुः भ्रमतितमांवियति हि ते,ज्ञानविमलवाचकानन्द्युः ॥३॥ तत्पादाम्बुजमधुकरशिष्यश्रीवल्लभेन गणिना । विहिता स्तववृत्तिरियं, यदनृतमिह तद्बुधैः शोध्यम् ॥४॥ युग्मम्। ।। इति वाचनाचार्यधुर्यस्मयनिकवादीन्द्र करीन्द्रवार- पुण्डरीकप्रकारनिर्मलदिङ्मण्टलव्यापिया.पुञ्ज- श्रुताधिपारीण-याचनाचार्यश्रीज्ञानविमलगणि- प्रवराणां शिप्य-पण्डित श्रीवल्लभगणिना कृता स्विोपन]सहनदलकमलगभितथी- अरनायजिनस्तरवृत्तिः समाप्तिमगमत् ।
८८ सहस्रदलकमलमयं वीरजिनस्तोत्रम्। सारदारदरक्षारवारपारं दुरन्तरम् । तारयारं तरस्तार-तरसा रक्तरक्त , . ॥ १० ॥ लस्य लजार, मारज्वरज्वलत्पुरम् । स्फुरद्विरतिरत्नार-नारवर पुरन्दर ! ॥ ११ ।। घोरचार चलद्घोरं, मरधारभरस्वरम् । निरन्तरसरं नीरसार तारय रन्ध्ररम् ।। १२ ।। बीरधीरस्फुरच्छीलशैलसारङ्गरगर । गारवो रतर • • • • • • रतरस्तर 11 १३ ।। सारं सारङ्गरङ्ग रविरतरतिरं सारसारं सुरङ्ग, रम्यं रम्यं रमारं मरकरमरकं रक्तरक्तारवारम् ! वारं वार विरक्त रविरविरमरं मारमारं निरस्तं, रक्ष्या रक्षारखारक्षरखरखरक स्मारं स्मारं सुरश्मि रसरसरसरं सारसारं शिरस्थं, रझारफोरगारस्थिरचरमुरसा रन्चरक्तारतं रम् । आरम्भारम्भरम्भेरमरपरपरं वारपारं परत्र, श्वरश्वरचुरचं लब्धरद्वार . . . . ।। १५ ।। स्वरं स्वरं शरणं रणरणरणिरं कारणारणपरण्या, रण्यारण्यं रसारं सरसरसरसा न्दरस्फारसी रम् । गोरं गोरङ्गिरं ता रगरगरगिरं गौरगोरगिल्तं, रङ्गारगारगारं करगिरमुरसा रङ्गिरगरगौरम् ।। १६ ।। सारं सारस्फुरदगीरसरपरपरं पारणैरन्तरस्या-, रख्यारम्भारमारं करणरणरणं रझिरङ्गरगारम् । यो रम्भा रन्तु रम्भोरवरवरतरस्पेरणोरं घरस्या, रस्त रसतोरजोर विरतिरविरतेरकर स्मारयारम् ।। १७ ॥ खारम् ।। १४ ।। .
. ९० सहन्नदलकमलमपं योरजिनस्तोत्रम् । गरधरचरकरवरतरसुरवर, चरटरचरटरवरटरकरटिर । - जरठरनरवरजरठरपरठिर, सरडरसरडरकरटरटरहर ।। २४ ।। प रसुरवरवरपर, परकरणरपरणरवरणरहर । निरजिरनिरजिरनिरजिरनिरजिर, दुरशिरदुरशिरदरहरनिरसुर ॥ २५ ॥ दुरसुरनिरघरनरघरचरघर, चरदरसरदरदर • • • रसर । स्वरचलचलनरकुलसरकलकल, भरतरभरतरवरतिलतिलकर ।। २६ ॥ कुरकुरङ्करकीरकरं करं, दर पुरन्दरदूरदरं दरम् । हरविरञ्चिरमारवरं चिरं, चिरतरं चर चौरचरं वरम् ।। २७ ।। घरं धरणोरधरं, विरतेरतरन्तरणीरतिरम् । किल कालहरं कुलकारकर, स्मर वीरवरं भरपोरतरम् ॥ २८ ॥ वरशीलवरं वरनीरवरं, सुरचीरसरं सरसोरसरम् । करवीरकरं करणरफर, स्मर व . . . स्मर वीरहरम् ।। २६ ।। घ...
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सहस्रवलकमलमयः योरजिनस्तोत्रम् ।
वीरं वरं वरतरं बरवेरवार,
धीरं घर घर धुरन्धरधीरपीरम् ।
सारस्वरं स्मर सरस्थिरसारसीरं,
धीरं परं धर धर वर वेरवेरम् ।। ३० ।।
दरभरदरदारं दूरदारं दुरन्त,
रदिरदरद . रं भारभारम् ।
भर भरभरभारं भैरवारम्भरहो,
रहरहरहरं होरं हरं हीरहीरम् ॥ ३१ ।।
सुरवर-सुरवर-सुरवर-सुरव,
रविरथ रविरथ रविरथरथर ।
करतरकरतरकरकरचरण,
रविरलरविरलरविरलरवल ।। ३२ ।।
वीरं परं वरपरं परवारवार,
हीरं हरं हर हर हरहार हूरम् ।
कोरं कर कर कर करकारकारं,
नीरं निरङ्करकरं निरगारसारम् ।। ३३ ।।
सुरद्रुरं सुरसुरं सुरशैलसारं,
सारङ्ग . रतरं हर सैरसारम् ।
सारत्वरं दरतरं गरयैरहारं,
हारं हिरण्यरपुरं परमेरपारम् ।। ३४ ।।
श्रीरत्नरत्नरमरं नरवारण रं,
हैरण्यरं वरकर करमालवारम् ।
हारं सुरस्युरसिरं गरमालचालं,
वरकर वर वीरवीरम् ॥ ३५ ।।
व्यारं . . .
९२ सहस्रदलकमलमयमयं वीरजिनस्तोत्रम् । वीरं स्मरन्त्युरतरं नरनीरजोरं, पारम्परं परपरं परमोरसारम् । तेरन्त्यर सुरपुरं सुरस रसालं, सारस्वरस्वरवलं मुरतरपारम् ।। ३६ ।। कैरक्षरखरतरक्षरनीरसीर- रस्थिरं स्थिरतरं सुरतैरतारम् । पारं दुरन्तरजलस्यरसारसारं, श्रीलब्धरङ्गरसरं सुरसालसालम् ॥ ३७ ।। आरम्भरङ्गरतरङ्करजोरहार, हेरम्बरं वरतुरङ्गरसूरचारम् । संरम्भरम्भरसलंम्भरसालवारं, सार शरण्यरवरं सुलयोरमारम् । शारं सुरं तुरघरं तुर . वीरं स्मर स्थिरकरं चरणोरचारम् ।। ३८ ।। पड्पदी, अत्र वन्धे १०१६ पोडशोत्तरसहस्रपत्रबन्धमिदम् । श्रीः ॥ • • र सारं, १ परिशिष्ट ख उपाध्यायधीसहणकीलिपणिसदृष्यः श्रीपार्श्वनाथजिनस्तवः (शतदलकमलमयः) श्रीनिवासं सुरथेणिसेव्यक्रम, दामकामाग्निसंतापनीरोपमम् । माधवेशादिदेवाधिकोपक्रम, तत्त्वसंज्ञानविज्ञानभव्याश्रमम् ।। १ ।। नव्यनीरागताके लिकर्मक्षम, य[य]स्य भव्यर्भजे नाम सम्पद्रमम् । नीरसं पापहं स्मर्यते सत्तम, तिग्ममोहात्तिविध्वंसतापाश्रमम् ॥ २ ॥ लब्धप्रमोदजनकादरसौख्यधाम, तापाधिकरप्रमदसागरमस्तकामम् । घण्टारवप्रकटिताद्भतकोतिराम, नक्षनराशिरजनानी]शनताभिरामम् ।। ३ ।। घण्टापयप्रथितकोतिरमोपयाम, नागाधिपः परमभक्तिवशात् सवामम् । गंभीरधीरसमतामयमातङ्गमं (?), म? मानतं नमत तं जिनपं निकामम् ॥ ४ ॥ १तायाभ्रमं' इति ना. । २ 'तापाधिक-' इति जे. । ३ 'रजनायलताभिरामम्' इति जे । ४ माजगाम' इति ना. ।
९४ शतदलकमलमयः पार्श्वनायजिनस्तवः। संसारकान्तारमपास्य नाम कल्याणमालास्पदमस्तसामम् । लाभाय वभ्राम तवाविराम, लोमाभिभूत. श्रितरागधूमः ॥ ५ ॥ कर्मणां राशिरस्तोकलोकोद्गम- संमृतेः कारणं मे जिनेशावमम् । पूर्णपुण्याढ्य दुःखं विधत्तेऽन्तिम, ण? नभमस्त्या विना कोऽपि त दुर्गमम् ॥ ६ ॥ कार्मणं निवृतेर्हन्तुमन्योऽसम. य? यक्षराट्पूज्य तेनोच्यते निर्मम । श्रीपते ! तं जहि द्राग् विधायोद्यम, दानशाण्डाय मे देहि ऋद्धिप्रमम् ॥ ७ ॥ यस्य कृपाजलविश्राम कण्ठगतागुमुभटसङग्रामम् । मं, जेतारं जगत. श्रिनधामम् ॥ ८ ॥ कक्षीकृतवसुभृतपुनाम, लापोच्चारमहा केशोच्चयमिह नयने क्षामं, लिङ्गति कमला' कुरु ते क्षेमम् ॥ ६ ॥ फलयति जगता प्रे म, लम्मयति सौम्यपटलमुद्दामम् । पाल हन्ति च गतपरिणाम, मह तं महिमस्तो , मम् ॥ १० ॥ १वमला' इति जे. । भयजनकव्याया मम् ।
९५ मातदलकमलमयः पार्श्वनायजिनरतयः। रसंन[न]पेप्सितदानसुरदुर्म, हितमहीरहवृद्धिजलोत्तमम् । तंत]णपुण्यरमोदय सङ्गम, समरसामृतमुन्दरसंपमम् ॥ ११ ॥ हिनस्ति सयानवशात् ' स्म मध्यम, तं तीर्थनाथं स्वमत.प्लवङ्गमम् । सुरासुगधीराममोधनयम, रैः नाय सम्पूजितपद्युगं स्तुमम् ॥ १२ ।। संसारमालाकुलपित्तमादिम, सा[? शा] प्रार्थसंवेदनशून्यमश्रमम् । रम्याप्तमायस्थितपूर्णनिधन, साङ्कितः गोषितपापकदमः ।। १३ ।। रलायालङ्कृतनित्यहेम! सोमाद्रिसारोपमसत्त्वसोम ! । शोमामयो ज्ञानमयं विसामं, पड्वगं मां देव विधेह्यकामम् ।। १४ ।। भावविभासकनप्टविलोम, स्कन्दितस्कन्दलतं प्रणमाम । रगपतङ्गनिवारणसुभीम, कम्बुदानं (गलं) जिनप हत ते भौमम् ।। १५ ।। १ 'त सदापुण्य ---- इति जे. । २ 'मन्दधानावस्थिनस्य' इति जे. । ३ "स्मरप्लवनम', इति ।
सातदलकमलमयः पारर्वनायजिनस्तदः।
.
मन्त्रेश्वरः पार्श्वपतिः परिथम,
लाभाश्रितस्यापनया मनोरमम् ।
कर्मोत्यितं मे जिन साधु नंगम,
रम्भाविलासालसनेत्रनिर्गमम् ।। १६ ।।
समितिमारगरीरमविभ्रम,
हरिनतोत्तम मूरिगमागमय ।
श्रयन तं नितमानभुजङ्गमं,
फलसमृद्धिविधानपराक्रमम् ॥ १७ ॥
णम्रर्यग.सृजति शं जिगसावंभीम.,
तारस्वरण विबुधैः श्रित
होम ।
शोलरिमारिविरहयतवात्तदाम,(?)
भव्यः स्तुतं निहतदुर्मतदण्डख
माद्याम्बुजध्वसविधी महदिम,
न वाजयत्यामुमनस्तुरटगमम् ।
मन्योपम ते जिन राम[? गपञ्चमं,
स्तवन युक्त गुणरत्नकुट्टिमम् ।। १६ ।।
कलिगलोरव्याधाम-
माहात्म्यं हृदयद्गमम् ।
लव्यथितयसुत्राम,
यन्तिवर्गस्तुत नुमम् ॥ २० ॥
लोकोत्पत्तिविनामसंस्थितिविदां मुम्ब जिनं वै स्तुमं,
द्रव्यारतमगायर नमत भो! पूजा परा पाश्चिमम् ।
परपक्षस्य तय स्तवं त्वग्निमित्त... करीन्द्रगे
सतद्भायमयं वस वदतस्त्रकाभ्यस्तवंदमम् (?) ॥ २१ ॥
मम् ॥ १० ॥
१७ सातदलकमलमयः पाश्र्वनायजिनम्तवः । नयनाननमद्रोमं, सन्तति तव जगम । स्थावरामस]मतां श्याम,(?) नयते सककृत्रिमम् ।। २२ ॥ दातानुदासस्य मम, नवानन्दविहगमम् । माद्यति प्राप्य सुप्रमं(?) नंपा [?नया] क्षत्तां महामम् ॥ २३ ॥ समायोहित्यनिर्याम, मानवाच्यं महाक्षमम् । गणिपूज्यं प्रीणयामः, ग्रिचित्तोमि नमनमम् ॥ २४ ।। स्मरन्ति यं सुन्दरयक्षकदम, रागात् समादाय नहन्ति कौथुमम् । मियो मिलित्वा नव(?) जाट्याङ्कुम, चन्द्राननं तं प्रविलोकनाद्रमम् ॥ २५ ॥ इत्थं पार्श्वजिनेश्वरो भुक्नदिक्कुम्भ्यगचन्द्रात्मके, व पाधकरत्नसारकृपया राकादिन कात्तिक । मासे लोद्रपुरस्थितः शतदलोपतेन पद्मनस- चूतोऽयं सहजादिकीतिगणिना कल्याणमालाप्रदः ।। २६ ।। श्रीमामातनयं नीतिलताधन धनागमम् । नकालोकसंपूर्णकायं श्रीदायकं भजे ॥ १ ॥ कलालि कलं कामरहितं सहितं मुरः । संसारसरसीयोपभास्कर कमलाकरम् ॥ २ ॥ सहस्रफगताशोममानमस्तकमालयम् । लोपत्तनसंस्थानदानमानं क्षमागुरुम् ॥ ३ ॥ म्मरामि च । [मतदलकमलबहिन्यो देखः] ९८ शतदलकमलमयः पाश्र्वनायजिनस्तकः। ऐ नम. । श्रीसाहिर्गुणयोगतो युगवरेत्यत्यं पदं दत्तवान्, येभ्य श्रीजिनचन्द्रसूरय इलाविख्यातसत्कोत्तयः । तत्पट्टेऽमिततेजसो युगवराः श्रीजनसिंहाभिघा- स्तत्पट्टाम्बुजभास्करा: गणधराः श्रीजनराजाः श्रुताः ।।१।। तर्भाग्योदयसुन्दररिपुसरस्वत्पोडशाब्दे (१६७५) सित- द्वादश्यां सहसः प्रतिष्ठितमिद चैत्यं स्वहस्तश्रिया । यस्य प्रौढतरप्रतापतरणे. श्रीपार्श्वनाथेशितु., मोयं पुण्यभरां तनोतु विपुला लक्ष्मी जिन: सर्वदा ।।२।। पूर्व श्रीसगरो नृपोऽभवदलकारोन्वये यादवे, पुत्री श्रीधरराजपूर्वकघरी तस्याऽय ताभ्यां क्षिती । श्री मल्लोद्रपुरे जिनेशभवनं सत्कारितं खीमसी, तत्पुत्रस्तदनुक्रमेण सुकृती जात. सुत. पूनसी ।। ३ ।। तत्पुत्रो वरधर्मकर्मणि रतः ख्यातोऽखिलस्सद्गुणः, श्रीमल्लस्तनयोऽथ तस्य सुकृती श्रीथाहरूनामकः । श्रीगत्रुनयतीर्घसङ्घरचनादीन्युतमानि ध्रुवं, यः कार्याष्यकरोत्तथा त्वमरफी पूर्णा प्रतिष्ठाक्षणे ।। ४ ।। प्रादात् सर्वजनस्य जनरामयं चालेखयत् पुस्तकं, सर्व पुण्यमरेग पावनमल जन्म स्वकीय व्यधात् । तेनायं भवनस्य यस्य जिनपम्योद्धारकः कारितः, साद सदरगजमेपतनयाभ्या पाश्यनायो मुदे ।। ५ ।। श्रीः ।
९८ शतवलकमलमयः पावनायजिनस्तकः। ऐं नम.. श्रीसाहिर्गुणयोगतो युगवरेत्यत्य पदं दत्तवान्, येभ्यः श्रीजिनचन्द्रसूरय इलाविख्यातसत्कीर्तयः । तत्पट्टेऽमिततेजसो युगवरा. श्रीजैनसिंहाभिधा- स्तत्पट्टाम्बुजभास्करा: गणधरा: श्रीजनराजाः श्रुताः ।।१।। तैर्भाग्योदयसुन्दरैरिपुसरस्वत्पोडशाब्दे (१६७५) सित- द्वादश्या सहसः प्रतिष्ठितमिद चैत्य स्वहस्तश्रिया । यस्य प्रौढतरप्रतापतरणः श्रीपार्श्वनाथेशितु., मोय पुण्यभरा तनोतु विपुला लक्ष्मी जिन: सर्वदा ॥२॥ पूर्व श्रीसगरो नृपोऽभवदलङ्कारोन्वये यादवे, पुत्रौ श्रीधरराजपूर्वकधरौ तस्याऽथ ताभ्यां क्षिती । श्रीमल्लोद्रपुरे जिनेशभवनं सत्कारितं खीमसी, तत्पुत्रस्तदनुक्रमेण सुकृती जात. सुतः पूनसी ॥ ३ ।। तत्पुत्रो वरधर्मकर्मणि रतः ख्यातोऽखिलस्सद्गुणः, श्रीमल्लस्तनयोऽथ तस्य सुकृती श्रीथाहरूनामकः । श्रीशत्रुञ्जपतीर्घसङ्घरचनादीन्युतमानि ध्रुवं, यः कार्याण्यकरोत्तथा त्वमरफी पूर्णा प्रतिष्ठाक्षणे ॥ ४ ॥ प्रादात् सर्वजनस्य जनसमय चालेखयत् पुस्तकं, सर्व पुण्यभरेण पावनमल जन्म स्वकीयं व्यधात् । तेनायं भवनस्य यस्य जिनपस्योद्धारकः कारितः, माद सद्धरराजमेघतनयाभ्यां पाश्वनाथो गुदे ।। ५ ।। श्रीः ।
९८ भातदलकमलमयः पावनायजिनस्तकः। ऐं नम. । श्रीसाहिगुणयोगतो युगवरेत्यत्यं पदं दत्तवान्, येभ्यः श्रीजिनचन्द्रसूरय इलाविख्यातसत्कीर्तयः । तत्पट्टेऽमिततेजसो युगवरा. श्रीजैनसिंहाभिधा- स्तत्पट्टाम्बुजभास्करा; गणघरा: श्रीजनराजा: श्रुताः ॥ १॥ तर्भाग्योदयसुन्दररिपुसरस्वत्पोडशाब्दे (१६७५) सित- द्वादश्यां सहसः प्रतिष्ठितमिद चैत्यं स्वहस्तश्रिया । यस्य प्रौढतरप्रतापतरण: श्रीपाश्वनाशितुः, मोयं पुण्यभरां तनोतु विपुलां लक्ष्मी जिनः सर्वदा ॥२॥ पूर्व श्रीसगरो नृपोऽभवदलङ्कारोन्वये यादवे, पुत्रो श्रीधरराजपूर्वकघरौ तस्याऽय ताभ्यां क्षिती । श्रीमल्लोद्रपुरे जिनेशभवनं सत्कारित खीमसी, तत्पुत्रस्तदनुक्रमेण मुकृती जातः सुतः पूनसी ।। ३ ।। तत्पुरो परधर्मकर्मणि रतः ग्यातोऽखिलस्सद्गुणः, श्रीमल्लस्तनयोऽथ तस्य सुकृती श्रीथाहरूनामकः । श्रीमत्रुञ्जयतीर्थसङ्घरचनादीन्युत्तमानि ध्रुवं, य: कार्याप्यकरोत्तथा त्वमरफो पूर्णा प्रतिष्ठाक्षणे ॥४॥ प्रादात् सर्वजनस्य जैनरामयं चालेखयत् पुस्तकं, सर्व पुण्यनरेण पावनमलं जन्म स्वकीयं व्यधात् । तेनायं भवनस्य यस्य जिनपस्योद्धारकः कारितः, मादं सद्धरराजमेपतनयाभ्यां पावंनायो मुदे ।। ५.. . 1:।
मातदलकमलमयः पाश्र्वनायजिनस्तक। ऍ नमः । श्रीसाहिर्गुणयोगतो युगवरेत्यत्थं पद दत्तवान्, येभ्य: श्रीजिनचन्द्रसूरय इलाविख्यातसत्कीर्तयः । तत्पट्टेऽमिततेजसो युगवरा. श्रीजैनसिंहाभिघा- स्तत्पट्टाम्बुजभास्कराः गणघराः श्रीजेनराजाः श्रुताः ।। १ ।। तर्भाग्योदयमुन्दररिपुसरस्वत्पोडशाब्दे (१६७५) सित- द्वादश्यां सहसः प्रतिष्ठितमिद चैत्यं स्वहस्तश्रिया । यस्य प्रौढतरप्रतापतरणः श्रीपार्श्वनाथेशितुः, मोय पुण्यभरां तनोतु विपुरा लक्ष्मी जिन: सर्वदा ।।२।। पूर्व श्रीसगरो नृपोऽभवदलङ्कारोन्यये यादवे, पुत्री श्रीधरराजपूर्वकघरौ तस्याऽय ताभ्यां क्षिती । श्रीमल्लोद्रपुरे जिनेशमवनं सत्कारितं खीमसी, तत्पुत्रस्तदनुक्रमेण सुकृती जातः सुतः पूनसी ॥ ३ ॥ तत्पुत्रो वरघमंकमणि रत: ख्यातोऽखिलस्सद्गुणः, श्रीमल्लस्तनयोऽथ तस्य सुकृती श्रीथाहरूनामकः । श्रीशत्रुञ्जयतीर्थसङ्घरचनादीन्युत्तमानि ध्रुव, यः कार्याण्यकरोत्तथा त्वमरफी पूर्णा प्रतिष्ठाक्षणे ।। ४ ।। प्रादात् सर्वजनस्य जनसमय चालेखयत् पुस्तकं, सर्व पुण्यभरेण पावनमल जन्म स्वकीय व्यधात् । तेनाय भवनस्य यस्य जिनपस्योद्धारकः कारितः, मादं सद्धरराजमेपननयाभ्यां पार्श्वनाथो मुदे ।। ५ ।।
परिशिष्ट ग -मूलपद्यानामकाराद्यनुक्रमणिका- लो. मं. पपर १ लो.सं. यकरणिररवस्यो २६ अररतात अवरहसर २५ अविरतमर! ३३ असुरनिर्जर- इत्थं देवेन्द्रसङ्घ ५५ कंठरकदरभडगे १८ कविरमसुर- कारोरनीते २६ किर्मीरचकुर- ५० खरुरभिमरनाशं २१ गुरमपरथा ३१ चकार चटरविघ्नर १० चुकोर इमरदुज्वर- तनुरयमरविते २३ धीररमारे-- ૧૨ नाघरन्तरनरः २० परफार पुस्फोर ४६ पूज्यरपोरैः २४ प्रदरपापर- ३ प्रभुरचतुर- प्रवरवर्णर २ प्रसरसुपरवाणे ५४ बुद्धरवोधि ३६ वघूरनागरक- भव्यरगोभि- १७ भ्रमरवृत्ति ६ मुहिरगर्वर- मृदरनिकरहारी ४५ यक्ष्यरचोकू ३० लक्ष्मीरवीभरत्- ४७ लोकरगोभि २८ ववार विजर ४२ ७ ६ १०० परिशिष्ट ग दलो. स. २२ १३. १५ दलो. सं. सनिरपुनर- स्थविरमुनि ५२ सुचरणं चरतः सुहीरसच्चीर- सृमरमुदिरसेरो २७ सोऽकारयद् ३७ संसारदुस्तर ३२ हृष्टरकान्ति. ४३ विदारहता- विभुरनकर- विभोरमोमो- विज्ञरमान- वृन्दारकागर- वंदारवो गरिरं सज्जूर सत्पूरशर्कर- ५ ४८ ४६ ३८ ५३
परिशिष्ट घ
वृत्तिकारोधृतग्रन्थानां तालिका
अनेकार्थनाममाला ३-४, ३-१०, ४-७, ६-८, ४-१०,
५-६, ५-१७, ६-१६, ६-२, ६-१५, १०-१५,
१३-११, १३-२२, १४-१२, १८-२२, २३-३,
२३-१४,२४-३,२४-८,२४-१८,२४-२१,२५-७,
२५-१४, २५-१६, २५-२२, २६-११, २७-२,
२७-१२,२८-१,२८-४,२८-६, २८-१७,२८-१६,
२६-२३, ३२,-५, ३२-११, ३२-२२, ३३-७,
३३-१२, ३५-११, ३५-१४, ३७-४, ३७-८,
३७-१८,४०-१०,४२-१८,४३-२,४३-३,४३-६,
४३-१६, ४४-६, ४४-२०, ४५-१०, ४६-५,
४६-१६, ४६-२०, ४८-३, ४८-१०, ४६-१७,
४८-२०, ४६-३, ४३-१४-१५, ५०-२, ५०-७,
५४-२, ५४-१७, ५५-१३, ५६-१२, ५७-२२,
५८-१०, ५८-१३, ५८-१६, ५६-६, ५६-७,
५६-१३, ५६-१४, ५६-२२, ६०-७, ६०-२०,
६१-३, ६२-१, ६२-७,६२-६, ६२-१७, ६२-१६,
६१-२१, ६४-१६, ६५-२, ६५-१७, ६५-१६,
६५-२१, ६५-२३, ६६-१, ७०-२१, ७१-१३,
७१-१७, ७२-६, ७२-१६, ७५-७, ७५-१६,
१०२
परिशिष्टः घ
७६-२४,७७-१६,७६-१६,८०-२,८०-६, ८०-८,
८२-८, ८२-१४, ८२-१५, ८३-८, ८३-१४
अभिधानचिन्तामणिनाममाला २६-२०, ४६-१२, ५७-८,
६६-२२, ७४-७, ७४-१७
कविकल्पद्रुम २६-३, ३६-१, ६३-७, ६५-१२, ६४-१६,
७४-१६
गोपालभट्टी ११-४
ध्वनिमञ्जरी १५-१०
धातुपारायण ६०-११, ६५-६
पाणिनीयव्याकरण ५४-८
पाणिनी गणसूत्र ४८-५
विश्वगम्भुनाममाला ५-१५, १-८, ९-२०, ११-१६,
१४-२२, १६-१, २५-१७, ३४-२, ३६-२४,
३६-७, ३६-६, ५३-१४, ५६-१८, ६०-१६,
६१-२०, ८२-११, ८३-१
गंपसग्रह ३-१२, ४०-२०
मिद्धहेम-उणादिसूत्र-सवृत्ति ३-१८, ४-१६, ५-६, ६-२१,
१०-१४, ११-१, १४-१५, १६-२०, २१-६,
३०-१६, ३१-८, ३४-६, ३६-१२, ३६-१५,
८०-६, ४१-११, ४१-१५, ४६-२४, ४७-२,
५०-११, ५३-४, ५३-७, ५३-११, ५३-२०॥
५४-६, ६४-३, ६५-१४, ६६-२१, ६७-४, ६७-६,
६७-६,
६८-१७,
परिशिष्ट घ
१०३
६६-११, ७३-३, ७३-२१, ७५-२३, ७६-४,
७६-७, ७६-११, ७६-१३, ७६-१५, ७७-१०,
७८-१, ७८-१३, ७९-१०, ८०-१६, ८०-२२
सिद्धहेमगब्दानुशासन २-१६, २-२०, ४-१६, ६-७,
१०-२१, १२-१७, १३-१६, १७-२२, १८-१५,
२०-१३, २२-१७, २२-१८, २३-६, २५-६,
२८-२१, २१-३, ३०-८, ३०-१८, ३०-२०,
३१-११, ३१-१६, ३२-२, ३३-४, ३४-१२,
३५-१३, ३५-१७, ३८-१०, ३८-१३, ३१-१२,
३६-१७, ४२-१०, ४४-११, ४४-२१, ४५-१६,
८७-१५, ४७-१६, ४६-१८, ४९-२२, ५०-५,
५१-२०, ५२-६, ५५-२,
५६-१०, ५६-२३, ५७-१५, ५६-८, ६०-१४,
६०-२१, ६४-१०, ६६-५, ६७-१२, ६६-१५,
७०-११, ७०-१५, ७१-८, ७४-१०, ७५-११,
७५-१५, ७८-५
मुधाकला ए. नाममाला ३७-२३, ५३-१३, ५७-२१,
सौभरि ए. नाममाला ३-६, ६-२२, १३-१०, १४-५,
१६-१४, २३-१०, २८-११, ४७-८, ५०-१७,
५२-१४, ५:-१२५६-२, ७२-१२, ७३-१,
हेगचन्द्राचार्य ३-२, १८-१८, २७-१२, २६-६, ६५-२०