Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Shraman Sanskriti Manaveer Jayanti Bhag 2
Front matter
महावीर जयन्ति उत्सव समिति म तु क्लाथ माट, इंदौर -सपादक- श्री नेमीचर जैन श्री अजितप्रसाद प्रबध सपादक श्री मिश्रालाल सोना अन्तदशन - ५ भी बोरेद्रकुमार जैन स्व वाडीज्ञाश मोतीलाल शाह २ श्री शिखरच द जैन भी माखनलालजी चतुर्वेदी भी सागरचद जैन मौला - । भी शिस्तरचद जैन भी नाथूलाल जैन श्री स्वरूपकुमार गागेय ३४ - १ रहिद कसाओ हवे समणो २ भ्रमण तीर दाज होता है- ३ हम तो स्वाधीन विधरते है। (कविता) ४ महावीर ने कहा- भ्रमण अमिताभ (कहानी) ६ धमकी देन- मग वशन (कविता) ८. भमण-संस्कृति का राष्ट्रीय महत्व भगवान महावीर की देन १० मुक्तिपत्र (कहानी) ११ मनुष्य को अहिंसा (पर सुखीकरण) धर्म की भाव श्यकता क्यों? १२ नाम विज्ञप्ति मात्र है १३ संस्कृति का जीना मरना मही होता १४ धर्म और क्य १५. रे मन तेरीबोटेव (कविता) १६ गति का गीत (पिता) सस्य फैसे खोजा जाय! १८ ओमानवता के पर्णधार (कविता) १६. उसकी याद (विता) २. दिगम्बर २१ जिनफे परोपर राष्ट्र पलता २२. सम्पादकीय धौ दौलतराम जैन 'मित्र' श्री प्रदपकुमार जैन श्री नेमाचन्द जैन भी प सुखनात संघवी व पं दौलतराम जी भी स्वरूपकुमार गाय महात्मा भगवानदान ye ५.६ भी प्रकाश उप्पन ६ भी कुजरिहारीलाल पारडेप ६६ भी जैनेद्रकुमार ६४ सुश्री द्वाराधी जैन नलिनी ॥
No text on this page.
रहिद कसाश्रो हो समणो A अमण इहलौकिक समत्व- समसत्तुयधुवग्गो समसुहदुक्खो पससणिदसमो। समलोटठुकचणो पुण जीविदमरणे समो समणो॥ -प्रवचनसार ३४१ । और यधु सुख और दुख, प्रशसा और निदा मिट्टा और सोना तथा जावन और मरण में श्रमण समादि होता है। निरक्ति- इहलोगणिरावेक्खो अपडिबदो परम्मि लोयम्हि । जुत्ताहारविहादसाय हवे समयो ।। -प्रवचनसार ३।२६। और पारलौकिक विषयाकादाओं म रहित होता है। इसका प्रहार देता है । यह कषाय वास नात्रों में निमुक्त रहता है। व्याक्ति-स्वातन्य- अण्णदवियेण अण्णदवियस्स णो कीरदे गुणुप्पादो। तम्हा दु समेदवा उपाते सहावेण ॥ समसार गा०३८५। कोई भी द्रव्य अर्थात् चर्दन या अचेतमा व्यक्ति किसी अन्य द्रव्य का गुणोत्पाद नहीं कर सकता। इसलिए सभी यानी अपना उपादान योग्यता के अनुसार उत्पन होते स्थीर परिण परकर्तृत्व का तिषेध- जो धम्हि जाणो ५०वे सोण देण संपमदि दवा सो अण्णमसक्तो कह त परिणामए दव्य ।। चेतन या अचेतन जिस द्रव्य के मो गुण और धर्म है वे उसी मेंदते है अन्य द्रय में संक्रान्त नहीं होते । जब एक दायर गए और मान्य में - ना माना जानेवाला से हो सकता शF श्रीनगर- श्रमण तीरन्दाज होता है (बौद्ध साहित्य में "मिलिद प्रश्न" का स्थान बहत कचा है। चेकिर के ग्रीक गजायों में 'मिनाएहर' बड़ा प्रतापा और मान-वारिधि था। स्थवि नागमन और इसक बीच हुए नकपूर्ण प्रश्नोत्तर इतने मर्वाङ्गीण और पूर्ण हैं उगई पढ़ जाने पर श्रमण मान्यताओं की स्पन कप गेम्वा मम्मुम्ब पा जाता है । अमय का भान कितना अनल, पूरा, अधिकृत र मनोवैज्ञानिक होना था हमका : माम हम नीचे दिया उद्धरण म लगा मक्ते हैं। पशु-पक्षी नया मानव श्रादिम प्रवृत्तियों का जिनना पमान उनका होता था अौर जायन की गह ममस्याओं को चितन, मनन और नियमान श्रावति गरा हत्यगम करान जो मनोवृत्ति उनमें था यह अाज र ऋगि समाज म उट गइ । । सादिक पर्यवेद और उसका व्यावहारिक जीवन में प्रयोग 'मिलि द प्रश्नों को विशेषता है।) 'भात नागसेन ! श्राप जा कहते हैं कि भ्रमण में तोर दाज के चार गुण चाहिय वे चार गुण कौनस हैं। मान के तूणीर साली नहीं होत- १ महाराज! तार दाज तीर चलाने के लिये अपने पैरों को जमीन - ठीक से जमाता है, घुटनों को सीधा करता है। तूणीर को कमर से श्रार देव स्थिर रखता है। सारे शरीर को रोक लता है, एक हाथ में धनुष पकडता और दूसरे से तीर चढ़ा लेता है, मुट्ठी को कसकर दबाता है, अंगुलियां को स लेता है, निशाना सीधा करना है और इतमिनान करता है कि मार ही दूग सहायोग माधन करने वाला योगो शील को प्रथ्वी पर पीय रे पैरों को जमा है क्षमाशीलता और दया की साधा करता है सयम में चित्त का श्राद देना भमरिया से अपने को रोक रखता है, इच्छा और उत्कएटा को दवा देता मना करने के अभ्यास स चित्त को लगा लेता है। उत्साह को खींच लेता है, दरवाजा को बद कर लेता है खयाल को जगा लेता है, और विश्वास करता s ..
ग वि शान नीर से क्लेगों को वेष होगा। भ्रमण नीरदा का यही पहला गुण होना चाहिये। वह स्मृति प्रस्थान का 'पाला रसता है- २ महाराज | पिर, मार दाज अपने पास एक भालक रखता है, जिसस टेदे बुबहे तोर का सीधा कर लेना है। वैसे ही, मोग साधन करो वाने मिा का अपने रढे-युरड़ चित्त को मात्रा करने क लिये स्मृति प्रस्थान का पालक माय में बराबर रखना चाहिय । उमण धनुर्वि का यही दूसरा गुण होना चाहिये। लक्ष्य पर एकाग्र दृष्टि ग्यता है- ३ महागज । नीर दाज लदर बनाकर उसी पर अभ्यास करता है। वैसे ही, योग साधन करने वाले मिनु (मण ) को अपने शरीर पर मनन करने का अभ्यास करना चाहिय । महाराज | शरीर पर मनन करने का प्रयास कैस करना चाहिय ! "यह थरार अनित्य है दुम है अनाम है, रोग का घर है, कट है, पीडा जनक है, पापी है, राघा बाला है, अपना बनकर रहने वाला नही है, मर माने पाला है, पिनास मरा है हममें बड़े बड़े उपद्रव होते है, इसमें मय ही भय है मनहूम है, चंचल है वणमगुर है, अध व है, असहाय है, अशरण है, निसार है शूय है, दोषों वाला है, प्रसार है, मारने वाला है, सस्कार है, उत्पन होने वाला है, वृद्धा होने वाला है, बीमार पड़ने वाला है, मर जाने वाला है, शोक देने वाला है, परिदेव वाना है, केवल परशानी देने याला है, क्लेश देने वाला है, ऐसा हो मनन करना चाहिये। महाराज ! योग साधन करने वाले मिठ (श्रमण) को इसी तरह मनन करने का प्रयास करना चाहिये । तीरदाज का यही तीसरा गुए होना चाहिय । अथर अभ्यासी होता है- ४ महाराज ! और दाज साम और मुबह अभ्यास करता है। वैसे ही, योग सापन करने वाले मितु को माझ मुबह ध्यान का अम्पार करना चाहिये । वारदा का यही चौपा गुए होना चाहिये।
عنهم ب
यमण के गुण और चिन्ह -
(१) वे अरण्य, वृक्ष-मूल, तथा शून्यागार इन तीन श्रेष्ठ भूमियों में पास
(२) वे सभी अच्छी बातों में धागे रहते है
(३) अच्छे नियमों में प्रतिष्ठित रहते हैं,
(४) सदाचारी होते हैं,
(५६) शान्त और दात होकर विहार करते हैं,
(७) संयमी होते है,
(८) शान्ति (दमा) से युक्त होते हैं,
(E) मुरत होते हैं
(१०) श्रेष्ठ श्राचार विचार वाले होते है
(११) ची और पवित्र इच्छानों वाले होते हैं,
(१२) विवेक सम्पन्न होते हैं,
(१३) पाप कामों मे लज्जा और मय रखने वाले होते हैं,
(१४) वीर्यवान् होते हैं,
(१५) अप्रमादी होते हैं,
(१६) शिक्षापदों की श्रावृत्ति करने में सदैव उत्साहशील रहते है,
(1) धर्म को जानने के लिये सदा उत्सुक रहते हैं,
(१८) शीलों के पालन करने में तत्पर रहते हैं,
(१६) तृष्णा पर विजय पाने वाले होते हैं और
(२०) शिक्षापदों को पूरा करते हैं-ये उनके अपने वीस गुण होते हैं।
-मिलि प्रश्न से
विरक्ति के पथ पर- --- + wand Hm - Surve A Y . ५० + अात्म चितन मलीन सर मेठ हुक्मच दनी
No text on this page.
। हम तो स्वाधीन विचरते हैं। श्री पोरे द्रफुमार जैन (धर्म के कृत्रिम विधि विधान की लौ पोटन पाले यहूदी पाधा पुरोहितोंने महात्मा ईसाको मुक्त चर्या पर बर श्रापति उठाई, और प्रहारको धमकियाँ दी यो तर उनने श्रमणों के निर्वाध विहार को जो तेजस्वी घोषणा की उसीके भाव को प्रस्तुत गत में बाँधा गया है। यह शेखक के अप्रकाशित-गीतिप्राय ज्योति पुत्र' एक अंश है।ले.) हम तो स्वाधीन विचरते हैं। इम नहीं किसी के कहने से, घरते हैं या कि ठहरते हैं। हम जीवों के कल्याण हेतु ही, इस धरती पर फिरते है॥ हम जहोरहें, भव भीतेजनौक, पाप ताप सप हरते हैं। इमसे न श्ररे, भप की पाया, हम तो स्वाधीन विचरते हैं? इस धरती के फानून नहीं, हम मस्तों की पथ-मर्यादा। क्या फभी मनुज के शासन ने, आजाद हवाओं को थापा ? जीवन प्रवाह हम निर्य धन, उमुक्त सम दर बहते हैं। हमको न श्ररे, छोइ वधन, हम तो स्वाधीन विचरते है। हम पाल पुरुष के राजपुर, है पही हमारा पय नेता । जब वह घड़ियाज पजाता है, तर अपना पूच कदम होता। हम अरे, मौत की रातों में, चिर जीवन दीपक जलते हैं। बलिदान हमारी शैला है.
घाडी।सनिन दो नित है। र, दबन्ने वनको । साप चलते-चलने मेरा दम फूल गया है, माफ गया है। हवाका रान मेरे 'दया और रक्षा की माषनाने का भरकर मुझे नारे की घोर न्हावा- १.माज मोसा Prina rr जना, र Brizergrat| ना, प्रार ramtarrer के पास है । लोग्ने । recrmat नमी दया पार रद' का अन्वया का मन forts, और विट मारा नन पग्नाडोको दिना एक महरकत में प्रय बजाय है।" को गियरी र भर काट इतने में मने एक रोशन रादौर मी दरह महज मरस दा रहा था कि मामने मारिति मुझे दूसरी टकरार निर्मप बदनात का, दिल इदा ! सिता और यरको गौतमो पुकारा-'भाबन्। शानद का उस मञ्य मन्त्र को दपकर में पर महापी पित पतित प्रगे बने समझ गया कि यही नोंके यात हो गए । पाये की तरफ देख मी तीर्थंकर महावीर है। महावारने मुझे नी। इशारा किया, मैं पाचेगा वरने लगा। श्रागगे महावीर और पालेमा हे ल देवे मेरे पयत शिरोपर प्राले एक दुगम शिसरके पास को और ग्रातिको निर्माल्य बना दिया है और सोच रहा है। दया करके थोड़ी देर काता तथा मरशी भावना ने प्रायो अपने सपा हारा बता सिवाय शेष दुनियाका किया है। दुनिया भूल गई राघुजय पवनको एक टेडी में करन लगे- मारान् और [२] अभी तक तपर मी नहीं। और दया, रीतरहभूल सकता हो कतरात्र अप' यह भी भगवान् के माय ही मर गई। गिरिराज पर रह सकता है और वो हा हा हा महावीरने सिन सिना की ग्रारोग्य योर शचि दायिनी हयाका उपभोग कर सकता है। देवबल्लम पत्रों के कारण नीचे को खिर नग होने और नग्न रहने को शरम को हा है, तो क्यों नहीं उहें पक दता! इन शरम भरे पस्त्रों में ही लपेकर पत्र अय (काम क्रोधादि सत्र को जीतने फेंक दे इस शरममरी दुनिया पर" ये पा उच्च भूमिका) गिरि शिखर को फिर बोले- स्पस्य हया चाहता है तो शरीर पर वस्त्र 'और देवबल्लभ, शत्रु जय गिरि क्यों लाद रसे है। यह हसी पयों राजपर चढ़ते समय की गिरन जाऊ' परा रहा है। पानी मूर्तता और इस भय के परा हो त् हाय पकरने की अग्रचि से गित गाए गए शरीर को भाया रखता है। हम पाया और शुरूपता को ढम्ने के लिए और दुनियाँ मय को यहाँ की खुशनुमा हवा में उड़ा को पोलादो के लिए दुनियापी विद्वानों दे। और पाशा और भय चक्र से ট গল্প মাছ স্থীং মাৰি 7ণর परेरानेवाला नहाया बाल बन जा, को पाप, अनाति और जंगलीपन बताया। पालक" परतूतोहरा समय हवा की तरह प्राकृतिक "गुरुदेव, जैसी प्रारकी शाखा T, यरमरहित और नंगली धनना गौतम ने कहा। पर गुरु के पालम्बन चाहता है वय पत्र की क्या जरूरत! का त्याग कैसे छिया जाय। इसी विचार दीपावी विद्वानों इस जाल को में गौतम का मन उलझ गया। दुनिया की ही धरफ फेंक ६" महावीर "गौतम, मैफभीमाश नहीं करता। 'प्राशा, प्रार्थना और हाय हाय करना' 'और गौतम, पर्वत की टेकरियों ये तीनों बनाए मुझरे दूर हासती हैं। पर विहार करोय ले तेरे जैसे सिंहको ये मुझमे हरती है। ये तीनों बलाएँ पत्रों का जाल! यह कसना ही असहन दुनियावी एवरों के पेट में घुस गई। है।दुनियादारों के लिए 'नीति 'प्रनीति' यह गौतम से कहकर महावीर पत्रु यस्त्रों में बाल रचे गए हैं। पर सिंहों के लिए तो प्राकृतिक नग्नपि ही है। जय की एक अत्यात दुर्गम शिखर पर सिंह और पोरों के लिए कोईयरम की नग्न निमर प में एक पैरसे खड़े हुए पात ही शरमा रामकोश में खिलखिलाकर अहहास करने लगे। है, उनमे पास छिगने लायक गौतम महावीर के इन गम्मीर पुष नहीं। सरम और भर दनको मो उद्गारों का मर्म नहीं समझे। वे उतरे गिरिराज पर निकल पो २ क्या इसीलिए मार्यो को भरेता अन धाजपुष्परावामा, दीन, परके मोरवीन लोगों को भाकाहर और स्वमान का मान न रलनेवाला करने के लिर ही में अग्नी सा- अनुदार बन गया है। देश्यल्लम, यदि स्वावलम्बी रिसर से कुछ नीचे उमर मुझमें परका वृक्ष मी करने की गति धाया। हरेक पखको नवीन होती तोमपहचावा कियाज के दरहा हूँ, नया नाम शोरगयामा पुरुष को धन तेरस उनमें कुछ रहा हूँ। इसीसे पुराने मूल्य के घर विशप मनुष्यता प्रकर होती। चोर का प्रासादिल रहा है। वेकोhिare गौतम, अपने तो इस समय मनुष्यताही मुभार प्रसार करने में भी नहीं चूकचे । पर इससे फ्या? प्रत्येक प्रहार मानन्द का नया पाठ देवा। और [४] पड़ा गए। मायोरको पारि 'गौतम, प्राश की कि गौतम के मनोभायों को बराबर देख की पगारही है और पुरर. रही थी पर उसकी शानन्योति नी के मान सबका लक्ष्य रित सतेज पी कि उसमें दया की शीतलता दिलास हो रा है, और पर कोअवकाश होनहीं मिला। पासागर मात्र एरा पाराम ही। धीरन मे गम्भीर और शिम्पर जमे उच्च मुक्ति के स्थान पर पेरा भारान IE मन्य पर कटिन हदस से गौतम ये प्रति सा रखा है। पाराम और मुन। फिर जोर से खिलखिलाए और पोले- मामय माकर 'दुनियात्री वा रोप दुनियों से मनुष्यों के लिए "देवयालम, मेरा य माँगता नीति के सपा और एस र. मेरा प सांडलें । गौरय प्रादि के गिा हुद कर हान मुझे स्त्री बनाया चाहता है। निदरी रिताना सियाम | यही तेरी गुमति है। सुन, मैं तुझे कई पन्लभ, तू भी इन राय दता हूँ कि स्त्री हाय ती देती है पर पारम्परों में उलझ र पदले में हरय ल लती है। दया का सहारा माँगता है। पर ही हिम्मत उसी के साप चली जाती है। दवल्लम, राममा रचोलिए स्त्रियों का हिम्मतवासी है। धर्म के प्राडारों को सोने से 10 मूतन पर्म का प्रतियोप देने के लिए आप का सहारा चाहने याला, साल से परिम्मत वाले व्यक्तियों का निर्म मगता है। पर में स्त्री नहीं है। D नहीं, किन्तु देवय,परमदेवल और सिद्ध त्व प्रकट करने के लिए शत्रु जय पह मूल गया महाशी
No text on this page.
[१] की समर्प प्रेरणा नहीं दे रहे हैं।गौतम जिन्दगी बिताने को बोला मिल के मैंने यह पहिले ही कहा था कि इस मुग्ध में आते ही पुस्ने का साहस क्या दुनिया में से 'प्रभु' मर गया 'उन्च सानदानी' ही है। पेट के बल है, और अब रि यह कहता हूँ कि- चलकर ग रेंगकर दस र्व जापन इस समय प्रभु तुझमें 'अवतार' लेना लम्बा करो की अपेक्षा कूदना नानना चाहता है। इसके लिए तैयार होजा। इसना उड़ना और सर्प करो में इसके बाद महावीरने नेत्र खोले क्या अधिक मना नहीं है। दूसरे को और पूर्ण तेजस्विता से कहा- गौतम, मदद, रक्षा और दया से जीवित रहने देवपल्लम, भाषी भगवान, खड़ा हो की अपेक्षा मय को मरदानगी की भेंट जा, और पहाइपर चढ़ने लगे, वृक्षता बढ़ाने में क्या अधिक स्वारस्य मुख हुश्रा, पलाग मारवा हुश्रा और पीण नहीं है ? पुरुषोंकी हँसी करता हुआ और टेकरि ऐ नाजुक बदन की गुलामी में गले योको थपड़े देता हुआ ऊँचे और तक फैमे हुए मनुष्य, इस भय को ऊँचे चदने लगा। तूने ही उसल किया है। तू सच मता, इसी समय गौतमके शरीर में क्या इसी तरह तूने दुनिया में भय' को यष्टि नहीं की है। यासिंह तुझे बिजली की शचि सी भाई। उसने माया ऊँचा किया और वह धागे हराता है, पर तू चाहे जितने सिंही बढ़ने लगा। शरीर पर के सारे पक्ष के फान पकड़ सकता है। इस सत्य को उसने हवा में फेंक दिए। दू क्यों भूल गया है।" इस प्रकार महावीर ने कहा। एक, दो, तीन टेकरियों पार की होगी कि एकाएष गौतम को रिहगर्जना "देवघल्लम, मैं वझे एक प्रती सुनाई दी। गौतम वही रुक गया और उसके गौतम, में एक दिन इसा शिवर मुँह से सदज में निकल पा-"प्रमो, पर बैठा हुआ अनन्त श्राकाश में खेल सहाय फरो, रक्षा करो।" रहा था! लेग इसे ध्यानदशा कहते हैं। "श्रो भय के वातावरणको चाहने पर इस दशा में जो अनेक युद्ध चलते वाली दुनियाकी मछली, दिन रात है, और समुद्र लान, सूपस्नान तथा मय भयसे ही तदपड़ाती रहती है। भयकर तूफान चलते हैं, उनको सर मदि मैंने क्रोधादि सभी दुर्गचियों इछ हो विवेकियों को होती है। पर जय नदिमा होता तो तुम बुछ गायों को लेकर असीम कोप धाटा। इस तरह भी बीती सुनाता हूँ। सुन, . । मुझे याधु [७] समभकर बोला-बाधाजी, मैं जब तक मेरा स्वयं किसी को खेद पहुँचाने पा पादिस आता हू तय तक इन गायों को किसी पर दया करने का स्वभाव सम्हालना। यह कहकर चला गया। नहीं था। गौतम, सममा १ ये गायें और ग्वाला इसीलिये मैंने उन गायों की पर दयाहा ये मनुष्य गायें और इनके वाहन की और अपने ध्यान में मस्त दिल पर सत्ता चलाने वाले राजा और रहा। मुझे इस तर लापरया देख धर्म के ठेद्वार गुरु ये ग्वाल हैं। त् कर गायें स्वयं किसी गांव के रास्ते समझा। चल गई। उस ग्वाले ने विनारा होगा कि "गौतम घे विनारी गायें का मैं मी एक साधु होने से इन गायों को पाथ रखने की कला जानता होऊँगा। चित् यह समझनी होगी कि उम ग्वाले और इसीलिये यह मुझे गायों को सौंप की तरह मैं उई स्टे से बाँधू गा कुछ हरी पास हालू गा दो चार पुकारा कर चल दिया। देकर और पीछे एकाध पटा जमाकर पर म तो टेकरी पर पेठा दुश्रा बादलों के उस पार उह रहा था, यहीं उई दुइ लगा।" यूद रहा था। मुझे उन गायों को क्या "उन विचारी गायों को खुने परवाह थी। मैदान में चरने की मनाई थी। ये तो प्राकारा से कामधेनु लाने की शक्ति खूटे के भागे पड़ी हुई हरी पाएको मुझ में थी, पर मैं बेगरज, मुझे इन साती थीं। अत उनकी वही यात गायों की क्या परवाह पर गई थी और उसी में उ मुग्न जिस तरह मुमे गाय का पाला लगना था।" या मालिक बनने की इच्छा नहीं थी, "उन चिनारी गायों के आगे सदा उसी तरह लकड़ी से मार मारकर रस्सी और दण्ड रहता था। वह उनका दूध छीनने वाले उहें सदा बधि मेरे पास उनने देसा नहीं । गौतम, रखने वाले वाले से उन गायों को बता, उन गायों को मेरे पास रहना छुड़ाने की भी इच्छा नहीं थी। कारण, केमे मुहाता !" मैं प्राति के नियम और उसकी पर गोनम, मुन, महावीर लोगों प्रक्रिया को बराबर जानता था। मुझे के साथ अधिक बोलनाल नहीं करता। किसी भी दशा में सेद नहीं होता था। सिंहनी का दूध स्वर्णपात्र में हो ठहर मैं लागी मात्र से परे था। मेरी प्रकट सकता है। महावीर यह जानते थे शचिया किसी को तृषा मेटने में सहा कारण कि वे गुफा में मा देख यक हो जाय, यह दूसरी बात है, पर सकते थे।"
ऊँचे चदने लगा। की समर्थ प्रेरणा नहीं दे रहे है गौतम बिगी बिताने को प्रोत्रा fer मैंने यह पहिले ही कहा था कि इस मान में मौतेगी पुरने का साहस या दुनिया में से 'गु' मर गया 'उन्न सानदानी पट पे बस है, और अररिया कहा हूँ कि- पलार गरेंगकर दा पाश्न इस समय प्रभु तुममें 'अवतार' लेना लम्बा करने की अपेक्षा पूचना ना बना वाला है। इसके लिए तैयार होना। हा उल्ना धार बप करने में इसके पाद महापारने नेर सोच पया अधिक मजा नहीं है। दूसरे को और पूर्ण तेजस्विता से कहा-गौतम, मदद रदा और दया से जीवित रहने देषवल्लम, मायो मगयान, सहा दो का अपेश मप को मरदाागो की भेंट जा, और पहाइपर चढ़ने लग, दता पाने में क्या अधिक स्पारप मुख हुधा, पलाग मारता हुया और धोए नी है। पुरुषोंकी हँसी करता हुआ और टी ऐ नाजु पदन की गुलामी में गले भोको थपेदे देता हुआ चचे और सक परे हुए मनुष्य, इस मय को सूने ही उसन किया है। सामना, इसी समय गौतमके शरीर में क्या इसी तरह ने दुनिया में भव' बिजली की शचि मी आई। उसने की सुधि नहीं की है। यदि झे माथा ऊँचा किया और यह आगे इरावा है, पर तू चाइनिने सिंहों बढ़ने लगा। शरीर पर के सारे पक्ष के कार पका सकता है स सत्य को उसने हवा में दिए । तू क्यों भूल गया है।" घर प्रकार एक, दो, तीन रेकरियाँ पार की होगी कि एकाएक गौवम को सिंहगर्जना "देवयल्लम, मैं तुम एक अपनी सुनाई दी। गौतम वही रुक गया और उसके गौतम, मैं एक दिन सो शिवर मुंह से सहज में निकल पड़ा-"प्रभो, पर बैठा हुया अनान श्राशय में खेल सहाय करो, रक्षा करो।" रहा यागिइसे ध्यानदयण करते है। "यो भय के वातावरणको चाहने पर इस दशा में जो अनेक युद्ध चलते वाली दुनियाकी मछमी, तु दिन रात हैं, और समुद्र स्नान, धरास्नान तथा मय भयसे ही तडपड़ाती रहती है। भयकर तूफान चलने हैं, उनको तर यदि मने होपादि सभी दुनियों बुध हो यिवेशियों को होती है। पर जय न किया होता तो मुमार प्रमो समय कुछ गायों को लेकर असीम झोप शाता। सरए महावीर ने कहा भीती सुनाता हूँ। मुन, पास थापा । मुझे पाय परमती टेकरी पर बैठा हुआ उहे घुइ लूगा।" समार पोला-शापाजी, मैं जब तक मेरा स्वयं किसी को खेद पहुंचाने या पापिस पाता हू तय तक इन गायों को किसी पर दया करने का स्वभाव सम्हालना । यह कहकर वह चला गया। नहीं था। गौतम, सममा १ ये गायें और ग्बाला इसीलिये मैंने उन गायों की पर पया है । ये मनुष्य गायें और इनके वाहन की और अपने प्यान में मस्त दिल पर सत्ता चलाने वाले राजा और रहा। मुझे इस तरह लापरवाह देख धर्म पे टेरेदार गुरु ये वाले हैं। कर गायें स्वयं किसी गाँव के रास्ते सममा। चल गई। उस ग्याले ने विचारा होगा कि "गौतम, ये विवारी गायें का मैं मी एक साधु होने से इन गायों को साध रखने की कला जानता होऊँगा। चित् यह ममझनी होगी कि उम गाले और इसीलिये वह मुझे गायों को सौंप की तरह मैं उ है तू टे से बाँध गा कुछ हरी घास ढालू गा, दो चार पुचकारा कर चल दिया। देकर और पीछे एकाध पटा जमाकर बादलों के उस पार उड़ रहा था पही द रहा था। मुझे उन गायों की क्या "उन रिचारी गायों को खुले परवाह थी! मैदान में चरने की मनाई थी। ये तो श्राकाश से कामधेनु लाने की शक्ति खूटे के भागे पड़ी हुई हरी घास को मुझ में पी, पर मैं बेगरज, मुझे इन साती थी। प्रत उनकी पही यात गायों की क्या परवाह पड़ गई थी और उसी में उहै मुत्र जिस तरह मुझे गायों का पाला लगता था।" या मालिक बनने की इच्छा नहीं थी, "उन चिनारी गायों के प्रागे सदा उसी तरह लकड़ी से मार मारकर रस्सी और दण्ड रहता था। वह टनका दूध छीनने याले उहें सदा बांध मेरे पास उनने देखा नहीं । गौतम, रखने वाले ग्वाले से उन गायों को बता, उन गायों को मेरे पास रहना छुपाने की भी इच्छा नहीं थी। कारण कमे मुहाता " में प्रकृति के नियम और उसकी 'पर गौतम, सुन, महावीर लोगों प्रक्रिया को बराबर जानता था। मुझे के साथ अधिक बोलचाल नहीं करता। किसी भी दशा में खेद नहीं होता था। सिंहनी का दूध स्वर्णपात्र में ही ठहर में लागणी मात्र से परे था। मेरी प्रकट सकता है। महावीर यह जानते थे शत्तियां किसी को तृषा मेटने में सहा कारण कि वे गुफा में मी देख अक हो जॉय, यह दूसरी बात है, पर सकते थे।"
की समर्थ प्रेरणा नहीं दे रहे है।गौतम जिदगी बिनाने की अपेक्षा सिंह के मैंने यह पहिले ही कहा था कि इस मुगप में जीते मी घुस्ने का साहस क्या दुनिया में से प्रभु मर गया 'उच्च खानदानी नहीं है। पेट के बल है, और अब पिर यह कहता हूँ कि- चलकर रंग रेंगकर दस वर्ष जीवन इस समय प्रमु तुझमें 'अवतार लेना लम्बा करने की अपेक्षा कूदना ना बना चाहता है। त इसके लिए तैयार होगा। हसना उपना और सवर्ष करने में इसके पाद महावीरने नेत्र खोले क्या अधिक मजा नहीं है। दूसरे की और पूर्ण तेजस्विता से कहा- गातम, मदद, रक्षा और दया से जीवित रहने देवपल्लम, भाषी भगवान्, खड़ा हो की अपेक्षा मय को मरदानगो की भेंट ना, और पहाइपर चढ़ने लगे, कूदना चढ़ाने में क्या अधिक स्वास्थ्य सुख हुश्रा, फलाग मारता हुधा और क्षीण नहीं है ? पुरुषों को हँसी करता हुया और टेकी ऐ नाम बदन की गुलामी में गले योको यपेड़े दवा हुश्रा ऊँचे-ऊँचे और तक फंसे हुए मनुष्य, इस मय को ऊँचे चढ़ने लगा। सूने ही उत्पन्न किया है। तू सच पता, इसी समय गौतमके शरीर में क्या इसी तरह तूने दुनिया में भय' विली की शक्ति सी श्राई। उसने को यष्टि नहीं की है ? यह सिंह तुझे मापा ऊँचा किया और पह आगे हराना है, पर तू चाहे जितने विहों पदने लगा। शरीर पर के सारे वस्त्र के कान पकड़ सकता है। इस सत्य को उसने हवा में फैश दिए। तू क्यों भूल गया है।" इस प्रकार एक, दो, तीन टेकरियों पार को महावीर ने कहा । होगी कि एकाएक गौतम को सिंहगर्जना म तुझे एक अपनी सुनाई दी। गौतम परी रुक गया और उसके गौतम, मैं एक दिन इसी शिखर मुँह से सहज में निकल १६.--"प्रभो, पर बैठा हुआ अनन्त श्राकाश में खेल सहाय फरो, रक्षा करो।" रहा था लेग इसे प्यानदशा कहते हैं। "श्रो मय के पातावरणको चाहने पर इस दशा में जो अनेक युद्ध चलते वाली दुनियाकी मछली, तू दिन रात है, और समुद्र स्नान, सूरास्नान तथा मय भयसे ही पड़ाती राती है। मयार तूफान चलते हैं उनको खबर क्रोधादि सभी दुचियों कुछ ही विवेकियों को होती है। इसी समय पुछ गायों को लेकर श्रावा। इस तरह भय की एक माला मेरे पास याया। मुझे साई "देवनल्लम, पीती सुनाता हूँ। मुन, JAN न किया होता तो मुमार सम्मार पोला-वापाजी, मैं अब तक मेरा स्वयं किसी को खेद पहुंचाने या पासि श्राता हतब तक इन गायों को किसी पर दया करने का स्वभाव सम्हालना। यह कहकर वह चला गया। नहीं था। गौतम, समझा १ ये गायें और ग्वाला इसीलिये मैंने उन गार्यों की पर क्या हैं । ये मनुष्य गाय और इनके याह न की और अपने ध्यान में मस्त दिल पर सत्ता चलाने वाले राजा और मुझे इस तरह लापरवाह देख धर्म के टेरेसार गुरु ये वाले हैं। कर गायें स्वयं किसी गाँव के रास्ते समझा। चल गई । उस ग्वाले ने विचारा होगा कि मैं मी एक साधु होने से इन गायों को "गौतम, वे बिनारी गायें का बांध रखने की कला जानता होऊँगा। चित् यह समझनी होगी कि उस पाले और इसीलिये यह मुझे गायों को सौंप की तरह मैं उसे स्टे से बाँधू गा कुछ हरी घास हालू गा, दो चार पुचकारा कर चल दिया। देकर और पीछे एकाप उपस जमाकर पर म तो टेकरी पर पेठा बादलों के उस पार उस रहा था, वहीं उहे दुह लूगा।" द रहा था । मुझे उन गायों की क्या "उन रिचारी गायों को खुले परवाइ थी? मैदान में करने की मनाई थी। ये तो अाकाश से कामधेनु लाने की शक्ति खूटे के श्रागे पडो दुई हरी घास को मुझ में थी, पर मैं बेगरज, मुझे इन खाती थी। श्रत उनकी यही था त गायों को क्या परवाह पड़ गई थी और उसी में उहे सुग्य जिस तरह मुझे गायां का ग्बाला लगता था।" या मालिक बनने की इच्छा नहीं थी, "उन विचारोगयों के आगे सदा उसी तरह लकड़ी से मार मारकर रस्मी और दण्ड रहता था। वह उनका दूध छीनने वाले उहें सदा बांध मेरे पास उनने देखा नही । गौतम, रखने वाले बाले से उन गायों को यता, उन गायों को मरे पास रहना हाने की भी इच्छा नहीं थी। कारण हमे मुहाता ।" में प्रति के नियम और उसकी "पर गौतम, सुन, महागीर लोगों प्रक्रिया को बराबर जानता था। मुझे दे साथ अधिक बोलचान नहीं करता। किसी भी दशा म खेद नहीं होता था। सिंहनी का दूध स्वर्णपात्र में ही ठहर मैं लागणी मात्र से परे था। मेरी प्रकट सकता है। महापौर यह जानते थे शक्तियां किसी को तृषा मेटने में सहा कारण कि वे गुफा म मी दस यक हो जाय, या दूसरी बात है, पर सकते थे।" .
[0] और महावीर की भाषा शिनी समझदारी को जागने वाला मन सिंह और बालक समझ सकते हैं उतनी पालक मौगो और ग्रागे रहेंगे। गाय और वाले नहीं समझ सकते। और कुछ समय बाद उन मस्त बालकों कारण कि सिंह के उच्छवार को भी को नहीं देराने पाली गार उन गार्य दुगध मानती हैं। इसीलिये मैं चोटियों को पूजने जायंगी।" गुफाओं, पर्वतशिखरों, पादलों या 'और गोतम मैं हसी नहीं करता, अपने विचारपुत्रों से ही बात करता है। और यदि कभी दुनिया में के पाले का ईश्वर' बनने में थानाकानी मैं तुम्हारे जैस शत्रुजर पर चढ़ने बलवा करने वाला शेर दिख जाता है कर रहा हूँ और ये रिचारी गायें तो तो उसके पाय मी पाते कर लेता हूँ। पत्थर के टुकड़े को भी ईश्वर पनाकर 'यो देवघल्लभ, मेरी समझदारी पूजती हैं । इन गायों और बालों की और शान बाहर की गुफा म रहा था, कितनी ग्रोही महत्वाकांक्षा है, कितनी अतः शहरी लोगों को यह मयेकर मोदी ढीठता है । इस महत्वाकाक्षा मालूम होता था। मेरी समझदारी पर तू हसता नही ! 'ये पत्पर को एकान्त गिरिशिखर की शिला पर श्वर मना रहे है। इसी से मालूम जमी थी, और उसका यालक जन्म से होता है कि इनका हृदय कोई दूसरी ही समुद्रतल से अनन्त प्राकारा तक वस्तु को नहीं चाहता, घेवल ईश्वरत्व के लिये तरस रहा है। यह तदुरुस्ती, यह मस्ती और यह 'गौतम, पत्थर को श्वर बनाने जमसिद्ध अति दुनिया को भड़काने वालों के प्रति तुझ इसो नहीं पाती। पाली है । फारण कि बाड़े में या घर ऐश्वर्य तो विश्व में सब जगह फैला में, खूटे से बधे रहने में या दो गज की हुआ है। इसलिये जब माण अग्ना जमीन में लोटने या पेट घसीटकर ऐश्वर्य स्वीकार करने और जाहिर बसने जसा प्रवृत्ति में इनकी 'सुरक्षित करने में जितना विकत बनता है, उतना मिन्दगी' काखैर है। जब हरी घास ही उसके अन्दर का दया हुया ऐश्वर्य एनके सामने पद आती है तो ये उसे किसी दूसरे पात्र या पदार्थ को 'ईश्वर' खाकर तथा वही लोट-पोट कर सुश बनाने लिये प्रवृत्त होता है। यह दवा है। यही भात इनकी प्रकृति में बैठाने हुआ ऐश्वर्य ही कहता है कि-'चलो के लिये युगों से अनन्त ग्वालों ने श्रम पत्थर को ही ईश्वर बनाकर पूजा जाय है । 'और ऐ देववल्लभ, चोटी क्योंकि ईश्वर-यूमा के बिना सब पर और गुफागुफा में मेरी भूल है।' उछलता था।
[१] 'गौतम, इन ग्वालों ने गायों को भर लोग गुरुयोंसे कहते हैं कि अपने ऐश्वयं को पहिचानने, स्त्रीशर हमारा धन ही नहीं किन्तु तन मन फरने और जाहिर करने में शरम, पार, और श्रात्मा भी तुम्हें समर्पित है। तुम अनीति और अपराध मानने की शिक्षा जो कहते हो वही हमारी नीति है । दी। क्योंकि जर पर ही सहज रोति तुम कहाँ ले जानो षही हमारा से राज किया जा सकता है। इसीलिये मोक्ष है।" इन पालों ने गाया को विनय मी 'और गौतम ऐसा बोलोवाले सिवाद। लोकगणनीय हृदय तो परमरको भी लम्बे समयसे इस प्रकार सिसाई ईश्वर बनाने के लिए तरसते हैं, यह गई गायें स्वय ग्वालोंसे कहती है कि तुम उन विचार को कहाँ पता है इसीलिए हमारे शरीर में से दूध दुह लो, और उस कहता हूँ कि मैं गायोंसे नहीं बोलता दूधको मलाईसे सशक्त बनकर अनन्त और न पालों से । मैं सिंहां और काल तक हमारे उपर स्वामित्व करो, पालकांसे बोलता हूँ । श्रोर अपनी और हमारी जिंदगी को 'मुरदिन' उमति करने वाला दुनियासे बोलता रखने लिए हम यूँटेसे बाँधों, रस्सा हूँ । गरी बात तो यह है कि मैं ईश्वरको और डएडेका प्रयोग करो। जैसा उतान करता हूँ।" इसलिए हे देय तुम्हारा मन चाहे हम रखो ! तुम्हारी वालम, मुझे उन गायों के विषयमें कोई शरण में ही हमें सुग्न है।" विचार नहीं पाया। और गाएँ मी नागरिक हाकिमोंसे कहते है हमारे जिन चीनमि खुश होती, पहलती पे पास कर लो और तुम्हें अपनी कानि मेरे पास थी ही नहीं । यह देणार को कायम रखने और बढाने के लिए गाएँ स्वयं अपने निवासको श्रोर चली किये गये युद्धों में होमने के लिये गई। वे बिहारी गरीष गाएँ क्य हमारे शरीर चाहिए तो वे भी माला बाहेकी तरफ चली गई। तैयार है । कोंकि हमें तुम्हारे इस कुछ समय बाद वह ग्वाला एक कपनमें विश्वास है कि तुम जो कुछ कर गाय को साथ लिए हॉफ्ता हुआ मेरी कर रहे हो, वह हमारी रक्षावे लिए तरफ पाया। गौतम, उसका चेहरा हो कर रह हो।"हम पो तुम्हारा अचन प्रोध से लाल हो रहा था। उसकी सूय और अपना अखएड 'चुइलो प्रोन्ने अग्निवरा रही थी। उसके चॉटलो' चाहने है । और इसलिए हाथ में देत्य का बल अा गया था । तुम्हारी बिना शर्त वफादारी बतानेम उसने रस्मीका दौड़ मेरे ऊपर जोर से ही हमारा कल्याण है। फटकारते हुए गरजकर कहा । इस [१०] गरजना से श्राकाश के परदे भो फ्टने लिए ? किस प्रकार किस कारण! लगे। और सहायता १इन बातों का कुछ 'रे धून, त् मेरो गायों को अपने विचार मा किया है ? त् मुझमे मदद बाड़े म छिपाना चाहता था दूसरे को स्वीकार करनेकी प्रार्थना करता है ? सम्पत्ति चुराने में ही अपने प्रचौर्य पर इस प्रार्थना में ही मेरा सरल व्रतको सार्थक मानता है।" अपमान भरा हुन्या है ? तू समझता इसी समय श्राकाश म बादल है ? मदद, सहाय, दया, रक्षण किसका ? घिर आए और उनसे एक प्रकाश क्या मुझे 'विचारा' मान लिया है ? निकला । उसमें इद्र अपने पूरे ठाठ में क्या तूने मुझे दुप के नामने ही तड़प प्रकट हुआ और कहने लगा-"प्रभो, नेवाला मान लिया है ? क्या मार, बारह बारह वर्ष तक अापके ऊपर पास और कुदरतको पीडादायक श्राफत अानेवाला है । मनुध्ययन और घटनाएँ बीमारी श्रादिम, जि हे मनुष्य देवकृत सकटों के बीच श्रापको बड़ा और दर भी हटाना चाहते हैं हमारी समय बिताना है। श्रत मुझे अपने सुप्त अॉय कोइ अजीव प्रकारको खूबी देह रक्षक रूप से रहने की श्राशा श्रानद और लज्नत नहीं देख सकती? दीजिए।" यो इन्द्र, समझ, तरे वनम अनन्त गुणी सामथ्य मेरा इच्छा शक्तिम है। जिस इद्राकाशम अधर सडा हुश्रा था। उसको एक लाख मेरी तरफ थो गुस शक्तिको स्थूल रूपम प्रकट करनेम तथा दूसरी श्रॉख ग्वाले कार अनि मुझे कोई रस नहीं है । श्राज मनुष्यम शक्तिका सिलाव बहुत कम है। वह बरसा रही थी वह श्रॉख मानो कह रही थी कि यदि पाशा मिले तो एक किसी भी तरह बढ़े यह देखनेम ही मुझे खुशी है। यदि मनुष्य मेरे ऊपर क्षण म इसे भस्म कर दू अाफ्त लाकर मी अपनी शक्तिका मैं मौन रहा। खिलाव करना है इसमें मुझे मानद 'प्रभो, मेरा धीरज टूट रहा है। ही आन द है । यह उदत हाथ पक रहा है। और "श्रो इद्र सामने पत्थर ऊपर बन्न मस्ती से गिरने के लिए पड़पड़ा उगे हुए पौधपर निगाह डाल यह चारों रहा है।" इद्र ने फिर कहा है और मैं और हरियाली छोड़ता हुआ पैसा सिलखिलाकर हँस पड़ा । इद्र, तुम्हारे सिल रहा है । दग इसे किसने पन में मस्ती है यह स तोप की सिखाया ? सरल बरमात ओर भाग सी बात है पर तुम्हारी मति में विवेक किरणों के सामने यह नानु पौधा कर श्रायण जरा बनायो तो? तू अपनी रक्षाके लिए किन मनुष्य और मदद करने प्राया है ? किसकी ? किस देवोंसे कहता फिरता है " [११J "यो इन्द्र, यह समझ कि-'सहा माई, इस समय त् अपने स्थानको यता' की निरन्तर इच्छा करना यही सिधार, मुझे अपना शानद अकेले मनुष्य का नरक है। सहायता करनेवाले हो लेने दे।" जिसकी सहायता करते हैं उसका 'हे देवल्लभ गौतम, इन्द्र तो नुकसान ही करते हैं इस तत्वको मनुष्य माथा मुकावर अदृश्य हो गया, और तो क्या देव भी नहीं समझ सके हैं। मेरी दृष्टि के सामने वही झोपावर तू मुझे 'जिन' और 'अरहत' को दोन, ग्वाला था । वह सब क्षणमात्र म हो लाचार, परमुगापेक्षी पामर प्राणी गया। उस पाले ने न तो इद्रको बनाना चाहता है यह तेरे विचारमे देसा और न उक्त बातचीत ही मुनी । भी नहीं पाया। सहायता का मूल्य क्या दुनियाँ का कीड़ा देवों के देव को थाक्नेनाले, तुम मेरी सोटी कीमन कर देख सकता है ? मेरे मौन ने ग्बाले की रह हो । सहायता करनी है तो क्रोधाग्नि पर घी का काय क्यिा । वह शक्ति बढ़ाने में मदद करो। दीन हीन साँप की तरह पकार कर रस्सी को बनाने और पराधीन बनाने के लिए मता के चारों ओर घुमाते हुए सहायता न करो। स्वरक्षा प्ररि जय बोला-रे पापी, दूसरे की गायें चुराने की शक्ति प्रत्यक जीवात्मा म है। उसे समय तुझे नरक का भी भय नही प्रकट करने में उसके विकासम सहायता करनी हो तो करो, पर परोक्ष रीतिमे, दूर रहकर सूर्य को किरणा का तरह मैंने उस ममय ग्यालेकी ओर भाग प्राकृतिक मानसे करो | नावात्माओं उठा कर कहा-रे गुमानी, पाली दुइ की खरी सहायता यही है । इद्र,त् गायों को भी गुमाने वाला पामर, किस कितना हो बलवान क्यों न हो पर घल से तू मुझ एक पहाड़ी पुरुषको रोष अभी भी तू सो चाँदीकी बडियोसे, दिखाता है ! श्रारम ठग, शरम खा, सुग्न दुसकी भावनाओंसे जकड़ा दुश्रा शरम खातू अपनी कागज की तल 'गुलाम' है । पासना का दास है। जो धार को म्यान में रख । नहीं तो तू धंधनमात्रको हसता है, और वासनाओं ही अधिक दुखी होगा । मुझे पहिचानता को अपना लिंगरापर नाच नचाता है है। नहीं नहीं, जब त् अपने को ही वह 'वीर' एक 'गुलाम' की सहायता नहीं पहिचानना तो मुझे क्या पहिचान चाहेगा या इच्छा करेगा ? हा हा सक्गा ? पर तुझे इतनी खबर तो हा पर तुझे अमा इस असीम सत्यको होनी ही चाहिए कि मैं किसी ग्राम में सममनेमें समय लगेगा। हीरा और या सीमा में नहीं, किन्तु पहाड़ पर माणिको से सजा हुश्रा तू इस 'नग्न हूँ। जहाँ बाड़ा होता ही नहीं। और सत्य' को नहीं समझ सकता । भला जहाँ गायों का दुर्गध भी नहीं होती।
१० गरजना से श्राकाश के परदे भी पटो लिए ? किस प्रकार । विस कारण ! लगे। और सहायता १ इन बातों का कुछ 'रेधूर्त, तू मेरी गायों को अपने विचार भी किया है। मुभरो मदद चार म छिपाना चाहता था दूसरे को स्वीकार करनेकी प्रार्थना करता है ? सम्पत्ति चुराने में हो त् अपने अचौर्य पर इस प्रार्थना में ही मेरा सुरन प्रनको साथक मानता है।" शपमान भरा हुआ है ? तू समझता इसी समय श्राकाश में बादल है। मदद, सहाय, दया, रक्षा किमका ? घिर श्राए और उनसे एक प्रमाश क्या मुझे 'विचारा' मान लिया है। निक्ला । उसम इन्द्र अपने पूरे ठाठ म क्या तूने मुझे दुख पे नामसे ही तड़प प्रकट हुया और कहने लगा-"प्रभो, नेपाला मान लिया है ? क्या मार, बारह बारह वप तक श्रापरे ऊपर पास श्रार पुदरती पीड़ादायक श्राफर्ने अानेवाला है। मनुष्यहान और पटनाएँ बीमारी श्रादिम, जि हे मनुष्य देनात सकटों के बीच श्रापको बड़ा और देव भी हटाना चाहते है, हमारी समय बिताना है। श्रत मुझे अपने मुप्त अॉग्ने कोद अजीब प्रकारकी खूबी देह रक्षक रूप से रहने की प्राशा थानद और लजत नहीं देस सक्ती' दीजिए।" श्रोद्र, समझ, तेरे वनमे अनन्त गुणी सामध्य मरी इच्छा शक्ति में है। जिस इद्राकाश म घर खडा हुधा गुन शक्तिको स्थूल रूपम प्रकट करनेम था। उसकी एक अखि मेरी तरफ थी मुझ कोई रस नहीं है। ग्राज मनुष्यम तथा दूसरी अॉस पाले के ऊपर अग्नि शत्तिका पिलाव बहुत कम है। वह बरसा रही थी वह श्रॉस मानो कह रही थी कि यदि श्राशा मिले तो एक किसी भी तरह बढ़े यह दखनेम ही मुझे खुशी है। यदि मनुष्य मेरे ऊपर क्षण में इसे भस्म कर दू श्राफ्त लाकर भी अपना शत्तिका मैं मौन रहा। खिलाव करता है इसम मुझे शानद 'प्रभो, मेरा धीरज टूट रहा है। ही भान द है। यह उद्धत हाथ फड़क रहा है। और 'श्रो इद्र, गामना पत्थरने उपर वन मस्ती से गिरने के लिए फड़फड़ा उग हुए पौधपर निगाह डाल यह चारा रहा है।" इद्र ने फिर कहा । और में और हरियाली छोड़ना हुआ कैसा खिलखिलाकर हस पड़ा। इ, तुम्हार सिल रहा है । देस इसे क्सिने वन में मस्ती है यह सतोप का सिसाया ? रारत वरसात ओर भाग सो बात है पर तुम्हारी भनि म विवेक किरणों के सामने यह नानुक पौधा कब श्रायना १ जरा बनायो तो? त् अपनी रक्षाव लिए किन मनुष्य और मदद करने श्राया है । किसकी ? किस दवोंसे कहता फिरता है।"
[११] "श्रो इद्र, यह समझ कि-'सहा माई, इस समय त् अपने स्थानको यता' की निरन्तर इच्छा करना यही सिधार, मुझे अपना श्रानद अले मनुष्य का नरक है। सहायता करनेवाले ही लेने द ।" जिसकी सहायता करते हैं उमका 'हे देववल्लभ गौतम, इद्र तो नुकसान ही करते हैं इस तत्वको मनुष्य माथा झुकाकर अश्य हो गया, और तो क्या देव भी नहीं समझ सके हैमेरी दृष्टि के सामने यही मोघातुर तू मुझे 'जिन' और 'श्ररहन' को दोन, ग्वाला या ! वह सब क्षणमात्र में हो लाचार, परमुम्वापक्षी पामर प्राणी गया । उस पाले ने न तो इन्द्र को बनाना चाहता है यह तेरे विचारम देवा और न उक्त बातचीत ही मुनी । भी नहीं पाया। सहायता का मूल्य क्या दुनियों का कीड़ा देवों के देव को क्नेिवाले, तुम मेरी सोटी कामन वर देख सकता है। मरे मीन ने ग्वाले की रहे हो १ सहायता करना है तो मोधाग्नि पर घी का काय क्यिा। वह शक्ति बढ़ाने में मदद करो। दीन हीन साँप की तरह फुफ्कार कर रस्सी को बनाने और पराधान बनाने के लिए मस्तक के चारों ओर घुमाते हुए सहायता न करो। स्वरक्षा और जय बोला-रे पापी, दूसरे की गोयें चुराने की शक्ति प्रत्यक जावात्मा म है। उस समय तुझे नरक का भी भय नहा प्रकट करनेम उसके विकासमें सहायता लगा। करनी हो तो करो, पर परोक्ष रातिसे, दूर रहकर सूर्य की किरणां की तरह मैंने उस समय ग्वालेकी ओर भाग प्राकृति भावसे करो । जीवात्माओं उठा कर कहा-रे गुमानी, पालो हुद का खरी सहायता यही है । इद्र,त् गायों को मी गुमाने वाला पामर, किस किनना ही बलपान क्यों न हो पर पल से तू मुझ एक पहाड़ी पुरुषको रोब अभी भी तू सोने चांदीकी येडियोंस, दिखाता है । यात्म ठग, शरम खा, सुम दुसकी भावनाओंसे जाड़ा हुआ शरम खा! तू अपनी कागन की तल 'गुलाम' है । वासना का दास है । जो वार को म्यान में रख । नहीं तो तू बंधनमानको हसता है, और वासनामों ही अधिक दुखी होगा। मुझे पहिचानता को अपनी हिंगरीपर नाच नचाता है है। नहीं नहीं, जब तू अपने को ही वह 'वीर' एक 'गुलाम' को सहायता नहीं पहिचानता तो मुझे क्या पहिचान चाहगा या इच्छा करेगा ? हा हा सकेगा ? पर तुझे इतनी खबर तो हा पर तुझे अमा इस असीम सत्यको होनी ही चाहिए कि मैं किसी ग्राम में समझने में समय लगेगा। होरा और या सीमा में नहीं, किन्तु पहाड़ पर माणिकों से सजा हुआ तू इस नग्न हूँ। जहाँ 'बाहा' होता ही नहीं। और सत्य' को नहीं समझ सकता । मला जहाँ गाय की दुर्गध मी नहीं होती।
"[१२] भोले, तू अपनी गायों से ही पूछ, क्या नहौ करों इन निषेधों को 'हा' की इस स्वतन्त्र खुली इवा में रह सक्ती सद्भावनाम बदल दो। यह समझ लो हैं १ सिंह और अवधूतों के निवास रूप कि इन सब पासण्डों का काल महावीर इस पहाड़ो प्रदेश म 'बाहा कैसा और पैदा हो गया है। लौकिक भ्रमौकी जगह 'चोरा' केसी १ चोरी की इच्छा रखने लोकोत्तर दिव्यताको ज्योति जगानेवाला वाले बालों ने ही ये बाड़े बनाय है। केशरी सिंह जाम ले चुका है। यह जान तुमने भक्तों को चोरी में पाप बताया पर चुपचाप गायों को मुक्त करो और और चोरोमाप का, क्वल इयको ही अपना पुराना गन्दा खेल बद करो। नहीं किन्तु बुद्धि स्वमान पल और साई अपनी मालिकी के पीछे मरनेवाले ग्वाने सिक वृत्तिकी चोरी का अवसर मी तुम्ही दूसरेपर मालिशी चलाने के पहिले खुद लाए। चोरीमे मिल सक्ने वाली तमाम अपने ऊपर मालिसी चलाना सीखो। यस्तुओं पर अपना अकेला अधिकार जो अपने ऊपर हुक्म कर सकता है और करके और उसने को निरावाय स्वयं अपने प्रति नमकहलाल हो सकता बनाने क लिए ही उमने दूसरों को चोरी है वही दूसरे पर हुकुम चलाने या उन करने का निषेध दिया। सारे सुख को पर सत्ता पानेका अधिकारी हो सकताहै। अकेले ही भोगने की लालसासे ही 'जो अपने भीतरकी अनेक प्रपियों दुनिया के दूसरे लोगों को चीनमारमें वासनाओं और पत्तियों के साथ स्वय युद्ध करता है और प्रत्येक संघष म पाप बताकर भड़काया और भयपरित निखरे अपने स्वरूप में मानद ले त्याग और सन्तोष म भविष्य का मुख' सकता है वहीं राय करने लायक है।" समझाया। सच पृछा आय तो तुम्ही दुनिया के सरे चौर हो। इतना होने 'यो ग्याले तू मेरे सामने नजर कर, पर भी दुनिया के रक्षक के रूपमें पुजने तु राजा है या गुलाम ? मालिक है या के लिए नित्य नये विकल्प उठाते हो। मिल्कत १ इस प्रश्न के विचार की मत्री म तपकर अपने स्वरूप को प्राप्त कर।" परम तो चोरों का भार पृथ्वीपर "यो देववल्लम, मैं अपना तिम से कम करने पाया है। और रस्सी वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया था कि वेदी तथा बाडेका सहार करने में कभी वह ग्वाला जमीनपर गिर पड़ा और कभी मजा लेता हूँ। गायके मास पर उसके शरीर के पुद्गल निक्ल निकल जीवित रहनेवाली मविसर्यो, नुम थपनो पर नए श्राकारको धारण करने लगे। मदी मनमनाइट पर करो तुम अपने दसवे देखते ग्वालेक्शरीरकी जगह अट मादेकी दोवाले सोड़ दो, रस्सी और दिसा । वह अपनी पीठपर मानो भार दया भसा दो और यह नहीं क्रोयह सादनको कह रहा था। वह जर चलने 1 [१३] लगा। थोड़ी दूर गया होगा कि वह रूप सिंह बन जाता है। जिस पराये बोझ पलटकर गरजता हुया सिंह बन गया। को बार बार ढोता था उसे उठाने से देखते ही देखते सिंहने बालकका रूप इनकार करता है। और बोझेके सिवाय धारण कर लिया। गौतम, यह बालक स्वतत्र जीवन बिताने की श्रावश्यक्ता मी हसता हसता अदृश्य हो गया। मेरे उसे पहिले पहिल मालूम होती है। बोके सामने मात्र पर्वतकी शिखरें और त्रिविध का त्रास और एकात स्थान ये दोनों तापको इसनेवाले अपना विकास स्वय उसे उसमें स्वातन्यका भान कराते हैं। करनेवाले और अपने श्रान दमें मात 'यह नीति' यह श्रनीनि' 'इस तरह होलनेवाले वृक्षोंके सिवाय दूसरा कुछ चल, इस तरह नहीं 'अपना हितश्चिय नहा रहा। करने का अधिकार से ही है' श्रादि श्राप बीती घटना पूरी हुई पर विधि निर्धारे श्राधीन रहने को अब गौतमने इसका मम नहीं समझा। तब वह तैयार नहीं होता। वह पुरागी महावीरने गौतमसे फिर कहा-देववल्लम कीमतोंको तोड़ने के लिए सिंह बन तू सममा ! मनुष्यमात्र इन तीनों जाता है पर नये मूल्य उत्पन्न करनेका दसायोंसे गुतरता है। योग्यता अभी उसमें नहीं पाई।" "ग तम, जर जिस तरह जितना "देववक्षम, अब वह बालक बन जाता है। जो सिंह नहीं कर सकता चाहे और जैसा पाहे बोझा अपनी पीठ वह चालक करेगा। बालक निदापताका पर लदवानेको स्वय बैठता है और दूसरे अवतार है। अतीतकाल और अतीत का बोझा दोनेम ही मरदागी और काल को गुलामियोंका उसे स्मरण ही 'सद्गुष्य' मानता है उसी तरह मनुष्य नहीं, इसीलिए उसमें निर्दोषना भी है पहिली अवस्थामें समी मनुष्यकृत कायदा, निडरता भी। भविष्यके सम्बधमें वह कानून, विधान, स्मृतिया, शास्त्र नीति सकस विकल्प रहित होकर धान द और रीति रिवाज के बोझेको अपनेऊपर स्वरूप है। बालक नइ जिदंगी है, नया लदवानेम और इस बोमेको ढोने में ही खेल है, पहला प्रवृत्ति है, जीवनस्त्र का मरदानगी मनुष्यता सद्गुण और किस पनि विधान है, किसीको इच्छाके थे लिए बोभा लादा जा रहा है और पीछ खिचना नहीं, स्वयं अपना अनुस क्सि रूप रंग और स्वादका यह बोझा रण करता है। यह निर्दोष निर्विकल्प और निडर प्रवृत्ति, प्रत्येक वस्तुको "परन्नु नो देवपल्लम, कट जिस उसके हित और नुकसानम उसकी समय पीठपर बोभा लादे दौरता पाता कमत देनेम भाग्रही होती है। इसका है और चारों तरपसे गरम युद्ध क्षेत्र में उत्साह श्रामह और प्रात्मश्रद्धा अटूट जा पहुँचना है नो मस्ती सोसता है और होती है।"
।१४ "और गौतम, यदि तू अभी तक हुधा भी वही। महावीर निवाए बालक नहीं बन सका तो 'वीर' कहाँसे पे याद गौतम महादु ती हुए और धन सकेगा । श्री देववल्लभ, अपनी इसी महादुसरे पादलोसे ही स्वरूप निहरता और अपना प्रानद जैसे योधकी ज्यानि प्राटी और वे पेवली चालकका स्वाभाविक है वैसा तेरा हुए। उसी समय गौतमका जयघोष हुश्रा, है क्या।" इसा समय गौतमने शत्रु जय गिरिये "श्री गौतम, कहो, श्रय तु हारा उच्च शिसरसे महावीर सिखाए वच मेरा हाथ पकाने की नादानी छूटी या नामृतोंका जयनाद किया। वे बचन नहीं। अब तुम अपने स्वरूपका विश्वास श्राज भी शनुञ्जय गिरिपः मुनाई कर सके हो? तुम्हें अपनी खानदारी दते हैं- यतका भान हुआ ! कहो, भट पट कहो।" "पुरिसा, तुममेव तुम मित्त भक्तिपरायण गौतम दौनतासे कि बहिया मित्तमिच्छसि" बोला-"प्रभो पानाथ, मुझे शानकी पुरुपो, तुम ही अपने मित्र हो, क्यो गहरी बातोंकी घबराहटमें न डालो। बाहर मित्र हूँढ रहे हो? मुझे तो श्राप गुरुदेवकी शरण, दया एग पामे से पहू णामे, और सहायता चाहिए।" जे बहू णामे से एग णामे" महावीरने सोचा और फिर सोचा "जो अपनी प्रास्माको नमाता है और मनमें ही फरा--मेरे इन शदोम वही सबको नमाना है। और जो इसे छान श्राता नहीं दिखता। प्राशा के पेन्द्रकी श्रोरसे एक जोरका तमाचा सबको, मनाता है यही एक कोनमाता है। जवतक मनुष्यको नहीं लग जाता तब "सवतो पमत्तस्य भर्य, तक मनुष्य श्राधाकी गुलामीसे मुक्त सन्वतो अप्पमतस्य पत्थि मर्य" होकर स्वावलम्बी नहीं बन सकता ।' प्रमादीकोचारों ओर भयही मय है मेरा वियोग ही इसे अपनी श्रावोसे अप्रमादी (नाग्रत अात्मज्योति वाले) देखनेवाला और अपने पखोसे उदने को कहीं भय नहीं। वाला बनायगा। मेरी सहायता माँगने की वृतिपर वह क्ल पटवायगा और "समय गोयम मा पमायए" अपनी इस दीनवृत्तिकी निदा करेगा। गौतम, क्षत्रमान मा प्रमाद न कर और इसी पश्चाताप और स्वनिदाकी "सम्मत दसीख करेति पाव" अनिमें तपकर गौतम सवशतिमान सम्यष्टि पाप नहीं करता। इसकी क्रियाए निर्जराका कारण होती हैं। E - सपूर्ण मानवता के प्रभापूर्ण प्रतीक की भावभरी कहानी श्रमण अमिताभ श्री शिखरपद जैन पानाम को कौन नहीं जानता। जीवराज कुए म गोने लगा रहा है। वह सबसे परिचित है, और उससे सब । वाला घबराये इधर उधर देख रहे थे, सौ एक दिन उसने देखा जीवराज, और अमिताभ ने देखा, समझा कुबेर धन, रलप्रभा, धुटि, सूर्य मल्ल और कुए में कूद गया। जीवराजने उसे आदि बालक बालिकाएँ-राज्योद्यान जकड़ लिया। उसने उसे अपने क्यो में खेल रहे हैं । उहां के बीच एक पर चढाया, और फिर बालकों से बड़ी बालक ग्रामिनाम भी रोल रहा है। को कहने और रस्सा लाने को कहा । जीवराज जरा नटखट था। रत्न बड़े भाये रस्सा थाया। अमिताभ के प्रभा मोजी, कुबेर चंचल, धुडि तीरगति कंधों पर चढ़ जीवराज बाहर निकला । और सूर्यमल्ल हसोहा और अमिताभ यह था अमिताभ । एकदिन फिर सब परही पद्मनाम का ध्यान उस दिन बार बालक खेल रहे थे। धुडि सबसे धागे बार खिंच जाता था। खेलते सेलते दौड़ने म निक्ल जाया करता था, पर जीवराज कुए ये पाट पर ना पहुचा। श्राज सबने उसे छकाने की सोचली थी वहाँ पहुँच उचक उचक कर विनोद दौड़में जब वह भागे बढ़ता, कोई न्यग वाण छोड़ो लगा। उसने अमि थालक उसे धक्का दे देता, कोई उसके ताभ का प्यान भग करने के लिये उसे सामने आ जाता, कोई उसे गिरा देता। ककरिये मारना शुरू किया, और जब उस दिन न वह खेल पा रहा था अमिताभ का ध्यान उस मोर न गया और न अागे ही बढ़ पाता था। सब तो उसने चिल्लाकर एक बड़ी कफरी चाहते थे कि अमिताभ सबके भागे चलाई। पर यह क्या नीवराज खुए म रहे। श्राज वह धागे था । पर जब वह था। पालकों ने दगा यह पानी से युद्ध दौड़म अधिक श्रागे पहुचगया उसे लगा कर रहा है। ये चीसे, चिल्लाये, तव कि वह तो अयाय कर रहा है। इस वही अमिताम को भी मालूम हुआ कि स्थल तक तो हि को थाना चाहिये । "बापू तुम था। धु हि पछि रो रहा था। उसने उसने अपने सहयोगियों को दम्मा अपन भीतरी नेनों से दसा, उसने उसे लगा पिर भी कही कुप कमी है। बालों को स्थिति को समझा, और उसका मारह रह कर उसे रहा परनाम ने प्राश्चय से दवा वह पाई है। उग्रो देगा मैंगन श्रव पेधन रत्न को और दीद रहा है लड़ हैराण प्रभा पे ही पारा है। दूसरों के पास है। बह धुडि को उठाकर भागने नहीं। उसने सोचा, "रन ये पास हो लगा है, और गनव्य स्थान के पहले उमे क्यों हो। और क्या जीवराम, पुति, धक्ल परयागे कर दिया है। सूपमल्ल सब इनर बिना ही रह अमिमाम पे पिता पिदेश गये थे। जायें! क्या ये गार अच्छे न वे उरावे लिये मणि कण लाये है। लगेंगे। ये सब मुभमे किस पात में कम है, और फिर पमनाम ने देखा कि माता उसे पहनाकर बड़ा प्रसन्न है। अमिताभ मेल नहीं पाया। घर पर मणि कणों से युवक अमिताभ देवपुत्र उसो पिता से पृछा दो कैगन सा मैंचता है। यह ग्येलते खेलत ही क्यों लाये १२ जाना तो सबके बाहर निकला है । राम उसे रन लिय दो दो लाना।" प्रभा मिली है। उसने ललचाई दृष्टि से श्राप अमिताम को, व उसपे भय रूप पचनाभफिर देखा कि अमि को दवा है । वह उममे बहुन छाटा ताम हिम उपयका एक सुर गुपकुल है। उसने कहा "अभी तुम कितने में प्रविउ दिया गया है। गुरुकुम उद्यानों अच्छे लगते हो। तुम्हारे ककए ची और उपवनों के मध्य में है। पास ही चमकते हैं। मेरे बाप जब दूर जायेंगे, एक धनाटयी है। वह अमिताभ एसे ही कगण लायेंगे न?" अपनो श्रामा से गुस्ल को प्रकाशित हा रन् । लायेंगे तो! और तम पर रहा है। प्रात काल अन्य छात्रों स हम दोनों में पास कगन होंगे, ऐसा पहले जागता है। गुरुदेव और गुरुमाता कहकर उसके साथ वह खेलने लगा। को नमन और उनपे नरयों की अमि पर अमित का मन क्चोट रहा था। वंदना करता है, नित्य नियायों के उसके करण उसे भारी लग रहे थे। उपरात अध्ययन करता है। प्रात वायु वह खेलता रहा, और फिर उसने सवनार्य वह गुरुजी व सहपाठियों के वगन उतार कर रन को पहना दिये। साथ ही जाना ठाक समझता है। उसे पहनाकर वह बड़ा खुश हुमा। उसो अध्ययन का क्रम जारी है। उसे लगा उसकी आत्मा का बोझा वह जितना पढ़ता है, उससे अधिक हल्का होगया है। वह और रोला। पढ़ाता है । अपोकमोर साधियों का कार्य है। [१७J सहायता करता है। क्या होगया है। मेघावी, कुशल, पलिष्ठ, कार्य तत्पर, उसे ? अमिवाम न रुकना जानता है, गुरुमेवानिष्ठ, गुरुषिय, स विषय न प्रमाद करना। उसने जैसे अभी से पारगत दस प्रभाकर की अपनी टोली जीवन का लक्ष्य स्थिर कर लिया है। है। वह उसका सेनापति है यह उनकी सेगा सहायता उसके मनोरजन के मुख्य गुरु वाइना से रक्षा करता है। वे राय उसकी सेवा करते हैं उसके प्रादेश की कानिदेव सब विषयों म कमजोर प्रतीक्षा करते हैं । जब मा अपार है। गुरूजी-बार यार उसे अधिक श्राये हैं रघु, कौमुद, नदन, पोस तय अभ्यास के लिय प्रेरणा करते हैं। यह की सेवा महायता उसने की है। और मोला, अच्छा छात्र है पर उसे पाठ कम प्रभाकर । उनकी सर पछी है स्मरण रहता है। पर वह अमिताभ उनले दोषों के लिये साटा है और रोगों ही है जो उसका साथ बना हुया के कारण हूँढने की नेटा की है, और है। अन्य सहपाठी उसका मजाक यहां उद्देश्योचा है, और यह अमिताभ उडाते हैं, उसे तग करते हैं, पर अमिन है जो इनकीच्यादती जिनका सामना उसे उसे बौधारों से बचाता है, । सदा श्राये दिन करना पड़ता सह जाता है उसके साथ रहने की चेष्टा करता है। हँसकर भूनजाता है,यह सदा ऐमा करता उसो भूले हुए अभ्यास को बार बार है, रादा करता रहता है । उसको भाई स्मरण करवाता है। पूल याय होने से जर टेढी नहा होती,उसके सिरपर यल नहीं उसका काम कम हो पाता है तब श्रमि श्राना, उसकी श्रादें मरमराना नहीं ताम उसमें भी उमरा साथी बन जाता छोड़नी, उसका मन सेवा राहायता मे है। जब वह वागवाणका शिकार होता मुँह नही मोहता । एमा वह बना हुआ है, अमिताभ सूझ-बुझ और नमता से, है और रहगा, एसा है उसका दृढ़ रिना किसी पर प्रहार पिय रक्षा निश्चय। करता है। और अमिनाम का कोई पर प्रभाकर उससे ड द करता है, अमिन नहीं। कान्तिदेव के लिए जो वह रय कमी उमे व य-पशु शायत अटवी है वही वह सवा लिऐ है. समानम्प । की गहनता म छोड़ पाना चाहता है। हृदय की पूरी सचाई के साथ 1 प्रति कौमुदी दो ती इच्छा रही है कि पल दिन का उसका यहो क्रम है, यही चयो तोड़ते समय श्रमिताम ऊँचाई से गिरे, 1सा वह है। ऐसाही वह रहता उसको टाग टूटे और वह हमे । नदन जारहा है। सोचता कि अमिताभ किसी दिन नदीके पर हाँ प्रभाकर भी है, इयुसन, प्रवाह में अरश्य यह जायगा। या कोई मगरमच्छ उसका अश्य भदरा कर ध्यापक विस्तार पण होगई है। वादेष तेगा । और यदि ऐमा नहीं होगा नो रहा है, यहां तक देरा सकता है। उसने यह स्वयं किमी दिन उपरे से गहरे पाणी एक मगर को गदा का पीछा करते म उसे सींच कर उस पार शिल देसा। दा को कोई ध्यान नहीं। जायगा। और पोप सदा उसकी कम उसये साथियों म स बुध उसकी जोरियों, छिद्रों और दोषों को तार म लम्बी डादों को देख लिया है। वे भाग रहता । यह किसी दिन रह पा-जाता रहे हैं। नंदन की उई छ मुध ही तो उसे इतनी प्रसन्नता होती कि रक रही है। और वे नदाफे लिये अपने को कुर के कोष मिलने पर भी शायद प्राणों की पति दो को प्रस्तुत THI न होती, और उसे तो जैसे स्वग हा अमिताभ ने देखा । उसो स्थिति की मिल गया हो। गभीरता को समझा । अब समय शेष अमिताभ या, प्रभाकर था, और, न था वह छन से ही गंगा माता की ये सब थे, गुरुकुल का जीवन कम चल धारा में कूद गया। कुछ समय तक तो रहा था। उसका पता न था। वह अब पानी से सो एक दिन पव-स्नान पाया। ऊपर दूर पर निकला है नदन पड़ा श्राचार्य और कुलपति के साथ सब रहा है। मगर से दूर माग रहा है। बटु गगा-स्नान को पहुँचे । भी अधिक पर मगर नदन पायें पर यो पर थी। गुरुकुल के छात्र मंदिर में स्थित लिया है। अमित मगर ये पोये है। पाथ शाला में ठहरे थे। यही को उसने उसे ललकारा । मगर ललकार ऊंचाई से गगा माता के दशन होते थे। सुनार सहम गया है। यह मदन प्रात काल का समय था। अमिताभ कोखीच भागना चहता है। अमित ने छत पर से ग गा माता की मोहर उसे रोक लिया है । उसपे पैरों को साकार प्रतिमा देख लुभा रहा था। पर लिया है । यह उसे नीचे उससे उसने देखा उसरे अनेक साथी पेट म चोटें कर रहा है। मगर दो नदी में क्लिोलें कर रहे तैर रहे तरफ से विंचा रहा है। वे तीनों सँच खाच रहे है । पर यह क्या दूसरे उट की भोर पहुंच रहे हैं। मदन धारा के मध्य प्रवाह को श्रोर कम गहरे पानी में मगरराज याउल कुछ साथियों के साथ निकल गया है। हो गये हैं। अब वे न दन से अधिक वह माता के पक्ष पर चढ़ा उस पार अमिताभ पर बुषित हैं । अमिताभ जारहा है। अमित देख रहा है, उसकी मनोदशा को समझ गया है। सपाई के कारण उसकी दृष्टि बड़ी उसने नदन को मटका देकर भाग ।
एक गाड़ीमें छिप गये हैं। तीर्थया [१६] जाने को कहा है। नदन ने ऐसा ही हैं। श्राज वास्तविकता की छाती को किया है। वह भागना नहीं चाहता, मी गइन अरण्य वे पार कर रहे हैं। पर प्राणों का मोह । कृतज्ञता के प्राचार्य ने कुछ दूर पर एक सिंह नियमों को तोड़ वह श्रागे बर किनारे शावक को ऊँची चट्टान से लुढ़ककर पर पहुच गया । अब अमिताम ने मगर नीचे गिरता देख लिया है। अब उनका को पीछे के पैरों से एक अोर ठेल दयाद मन नहीं मानता । घे जानते हैं दिया है । इसके पहिले कि वह पीछे पास ही वहीं सिंह परिवार भी अवश्य मुझे । अब वह भी किनारे पर है। होगा। उन्होंने सहयोगियों से आगे थक गया है । बेहोश सा होकर गिर बढ़ने का श्राग्रह किया है। और वे पड़ा है। उस खड्ड में उतर रहे हैं उनके सह फिर एक दूसरे दिन की बात है। योगी पहले तो स्तम्भित हो खड़े रह वर्षों बाद गुरुकुल के छात्र तीर्थाटन को गये हैं पर पीछे सतकता के साथ कुछ मिक्ले हैं । उहोंने काशी देखी है। दूर पर उनके पीछे हो लिये हैं । उन्होंने चे मयुरा देख चुके हैं । वे शिप्रा दर्श टोली को रुकने का श्रादश दे दिया है। नार्थ उज्जयिनी की पोर पल पड़ है, श्राचार्य सिंह शावक के निकट उनम अानद, उत्साह और उमगें है। पहुंच चुके हैं। वह चेतनत्व हीन पड़ा साल दो साल में वे गृहस्थ जीवन में था। गुरूजी ने उसे श्रौषधोपचार द्वारा प्रवेश करेंगे । एक महान गौरवशाली सचेन किया है। सचेत होते ही अपने को राष्ट्र के नागरिक होंगे तपस्या की पाच मानव कर स्पर्शित पा वह खीझ उठा है। में खरा सोना बनकर वैभर और लोक दहाद उठा है । प्राचार्य को खरोंच चुका न्यवहार की सीमित परिस्थितियों में है। उसकी मा जो उसे दूदने निकटी अपने को सुग्वी और सन्तुष्ट समझगे। थो, उसकी धीव को सुन चुकी है । मार्ग विद्याटवी में से होकर जाता वह उसी अोर लपकी है। पर भीड है। वे समवेत स्वर में गाते पतिवध्द भम्भड़ को देख कर एक पई है। होकर जा रहे हैं। पायशाला श्रमी सिंहराज भी दहाड़ मारठा श्रा पहुचा दूर है ! साया हो रही है। उन्हें शीघ्र है। वह गोल पर टूट पड़ना चाहता गतय स्थान पर पहुंचना है । गुरुजन है, पर अग्नि शिजायें उसे भयभीत पोछे रह गये हैं । और ये निश्चित, कर देती हैं। अब उनका शिशु उहे पुरषार्थी, निर्भय, भारतीय नवमार है मिल गया है। व लौट रहे हैं। भागेगा ओ दि में कुछ सकते हैं। अन्नु धियों को पार करने का हौसला रखते अपने माग पर शोध श्रागे भर पर उसका विवाह [२०] रघु थक गया है । लंगड़ा गया है। सब और अय पद्मनाभ ने देखा श्रस्त यस्त हो आगे बढ़ रहे हैं । सव निर्मोही अमिताभ को गाहस्स्य शकट में साहसी कुछ प्रमवावस्था से भयभीत मोही बना देखा । वह पत्ती को चाहता हैं । रघु पिछड़ जाता है। विप्रगति था या नहीं इसे तो पद्मनाम अमिताभ भी पिछड़ जाता है । वह रघु अभी तक यहां समझ पाया, पर परित के भी पीछे धीरे धीरे चल रहा है। वह को प्यार करते, उमकी प्राकक्षिाओं रघुकी दयनीय परिस्थिति को समझ गया को पूरी करते भी उसने देखा । अमित है । भयभीत रघु अमिताभ के पीछे हो अपो बचपन से ही शिशु बालक प्रिय जाने से सभल गया है। उसका शैथिल्ल था।उसको ये प्रभु के परदान के समान, कम होगया है । झाड़ी में दूर सिंह ये प्यारे थे । पर स्वत इनकी श्राकांदा रहारता है । रघु शक्ति बटोर दौड़कर से रहित था साथियों में मिल गया है। श्रीर यह हुमा था, उसकी पनि थी । अमिताम निभय मद गति से चल ससार की स्वाभाविक गति में वह पिता समूह में मिल गया है। बना और जो यह क्रम चला सो चलना चला गया। उसने अपनी सतति पद्मनाभ ने देखा अब अमिताभ को भरपूर प्यार दिया | अपना गाईस्थ्य जीवन म प्रवेश कर रहा है। विकास दिया । अपनी भाकादाये मेंट हच्छा तो उसमी सारा जीवन ही की और इसप्रकार वह जीवन क्रम में गुरु कुल में यतीत करने की थी किन्तु आगे बढ़ता रहा।पीजरे मेंबद पक्षी के घर पर माता का स्वगवारा हो गया समान पड़ पड़ाता रहा । था। पिता जीवन की दौड़ में थक गये राष्ट्र की पुकार पाइ, वह सैनिक थे। उई अतिम लक्ष्य अमित को बना। समाज ने उसे कसा वह मार सोपने ही में दिखाई देता था। सोना निक्ला । मन ने नागरिकता का और उसकी घर वापिसी के पहले ही तकाजा किया। उसके समक्ष उसने उहोंने उसके विवाहाथ या नलाश अपना सिर मुकाया। काम में भाग ली थी। अमित को गुरुबुल छोड़ना पड़ा। शोहरत म पीछे वह अपने कोटेलता रहा घर जाना पड़ा । गृहस्थी सभालना एक दिन एक साधु ग्राया। पानी पड़ी। विवाह करना पड़ा। म जात म भीगा, उड से टिटुरा उसने अपना सयासी को गाहेस्य जीवन के प्रवेश कम्बल उठाया और उस साधु को दे द्वार पर माया के सय बधन मिले, दिया । पलि चाखी, नाराज हुई, मोह मिला। समभाया। पर अमिताभ ने इसीवात पर [२] -विना कम्पल निकाल दी। वाता, वाणी में कटुना और प्राचरण उसके मित्रों ने बसनोत्सव मनाया। में निर्ममता थी। और मृगराज का अमिताम भी शामिन हुआ । उनमें कीडक अमिवाम एक बारगी ही सहम एक बाहरी मित्र भी मिल गया, वहलुट गया, माग चना | मागा जहाँ तक गया। अब क्या करें ? कौन पहायवा उससे भागते वनापर दूर नावर उसने करे उसकी। जयन्त महाराजको पुत्र का सोचा उसकी सेना। उसका मार्गावरोध पशोषीत करना था। सुमेरसिंह को अपनी करने लगी। जिनदास ने कहा पापू कपा का विवाह । अन तदास को मैं क्या करूगा ! अजिवदास ने कहा, पाणियार्थ-विदेश जाता था। बापू इतने निर्मम न बन जाओ। और अमित को-उसे तो कुछ भी सुशीला ने अासों में श्रासू भर मौनता नहीं करना था उसके पिता को एक में अपना भविष्य दिखाया । काति का निशानी थौ-स्वर्ण मुद्रिका । इसलिये भोला मुसका, निर्मालू की निरीहताने अमितने बानना चाहा मित्ररा कष्ट उसके हृदय को पचोटा। और अमि- उससे दूर हो सकमा है क्या । मित्र ताम अव रुका । पीछे लौटा। मित्रों ने निहात होगया । वह उसका मूल्य मजाक उड़ाया । पलि ने भत्सना की, लौटा देगा। यह मुद्रिका उसके मित्र के “यग वायों से विद दिया। पड़ोसियों साय चली गई, फिर भी वापिस नहीं ने अपने यार किये। पड़ोसियों ने कासि यों मे देखा और कायरता के आरोप और उसकी पनि ने कहा देखो। लगाय । अमिताभ ने देखा, चारों ओर मस्या समाज में नंगी रहूँ ! और देवा । उसो अपनेसे कहा,ठीक है। मेरा अमिवाम पलि को स्वण से देखने म दद निरवस्त्र है । श्राने दो तीरों को। शुट गया । उसोन दिन देखागरात, तीर श्राये उहोंने अपना काम किया। न सुख देसा दिन उ मित्र अमिताभ शीना तान खड़ा हो गया। दसेन मनोरंजन | पलि की लालण गुरसा के समान बढती गई और वह रामदास १ कहा "अमिताम, भोको पाता रहा । अब उसकी पागल बो। थन माना हो तो पनि स्वर्ण मदित है। पर सर नहीं। यों कमायो।" मुपाकरने मागदा अमितामने पीछे फिर पर देखा वह शट करते हुए कहा । “अमित बाण नुम भी गया , मुलस गया है, उसने क्या सत्य और इमानदारी से पीछे ओर देखा, सोचा हाथ धोकर पड़े हो । जीवन और विश्व यह मुस्करा दे। प्रेम और प्रसन्नता की में "असत्य" ही सक्त बहा 'सत्य है, । एक सि से ले। पर पतिकी गौरों में व्यावहारिकता ही एबमे पड़ी प्रामा लौटी।
[२२] पिकता है ।" और चक्रधरने कहा सूत्र उसके हाथों में है। वह अब जैसे "माई दवे दये तो इस शतादी में हलका होगया है, ऊचा उठ रहा है। काम नहीं चलेगा । श्रागे प्रायो, है। उसकी दृष्टि व्यापक होगई है। जैसे चिल्लायो, चीखो, । दमी कीर्ति के सब उसके अपने हैं। वह अव साधू वितरक ये महाप्रभु तुम्हें अपना घर हो गया है, पूण मानव होगया है। देंगे।" और लोग अमिताम को मिले। अमिताभ श्रव भ्रमण को निकला किसी ने बड़ों की बातें की, किसाने है। युग चन फिर गया है। घर तो शक्ति सम्पनों की । पर यह अमिताभ से उसके शरीर पर है ही नहीं, क्यों है, जो अतरमुख है । उसके चारों कि उसने कभी चिन्ता नहीं की, इसी तरफ फीकापन है। वह जान गया है। लिये सबका पहचाना-वह सबका उसे जाना है। और उसे इसीप्रकार अपहिचाना हो रहा है। वह चाहता जाना है। इसीलिए वह जा रहा है । है कोई उसे देखे न, पहचाने न, यह उसका जीवन वही है जो था । उसने चोर सा बदवा है । यह तो अपना सेवा दिया ही दिया, और जब लेने का स्थान, म स्थान दढ रहा है, जिसे अवसर श्रया उमे सार द्वार बद अन्यों ने त्याग दिया है। मिले । उसे उठी हुई महफिल मिली नगर में हरिजन यादोलन चल उसने मेवा की, साधना में बह गला । रहा है । इइतालें हो रही है और यह श्रय पद्मनाम और अमिताभ ने छगू, मग, कुक्च्, रमिया, लच्छी की श्रात्म-वल्याण विश्व कल्यान का इटिया में घरों म पहुचा है। छगू का मार्ग पालिया है । नगर उसकी सेवा पैर लँगड़ा गया है। वह प्रतिदिन का क्षेत्र है, अरण्य उसकी साधना का मालिस करने श्राता है । भगू को फोड़े नगर में अब उसका कोई स्थान ने घाव कर दिया है, वह मरहम पट्टी नहीं है, अरण्य म एक छोटी टूटी कर जाता है । पुजू की नहीं बिटिया कुटिया । नगर उसकी निया शीलता मरणासन है वह उसकी सेवा मुश्र पा का प्रतीक है । अरण्य उसके चिरतन कर रहा है। उसे धीरज घधा रहा सत्यों की शोधशाला । अब उसने है। रमिया का पति शराब पीकर उस जीवन के रहस्य को, विश्व की गुत्थियों पर अत्याचार करता तब अमित को, साकेत, निर्वाण, मोक्ष को समझ उसे समझाता है । लच्छी सड़ रही है, लिया है। उसने अपकार में प्रकाश उसके पास कोई नहीं जाता पर अमि प्रकाशमें अधकार की परिधियों को देख ताभ उसे स्वच्छ रखने की भरसक चेष्टा लिा है। वह है और सारे विश्व के करता है।
१२) श्राम अमिताम मजदूर बस्तियों है कोई बुरा। और वह अमिताम है की भोर निकल गया है। यहाँ वहा अभाव रहित श्रटालिकाओं की ओर उजित वातावरण है । महामान्य भी निकल जाता है । तब सहम नेतागण आये हैं और उहोंने उनको नाते हैं, हर जाते हैं, शक्ति होजाते हैं। सच्ची स्थिति बताकर समय कर दिया कोई उसका मजाक उड़ाता है। कोई है। उनमें प्रतिकार की मावना भर दी उससे घृणा करता है । कोई उसे अपना है। डाकी, उनो बालकों को शिक्षा शत्रु समझता है। पर अमिताम है जो का प्रवध कर लिया है। उनले स्वा नगर की गदगी साफ करता रहता है। स्थ्य के लिये व्यायामशालार्य स्थापित और श्रव यह अपनी अरण्य करवा दी है। पर लछमा के कमरे में स्थित कुटिया में है। मृग छौने उससे तेल न होने से धान श्रधेरा है। हिल गये हैं। शशक उसको कुटिया मुलमन को श्रार मांगे से ज्वार भी ये निकट श्रा जाते हैं। चिड़िये चेच नहीं मिली है। श्रार वह भूखी ही करती अमिताभ के सिर पर मॅदराती सो गई है। हरि की पलि बीमार है। रहती है। क्लरव शील पक्षी उसके अस्पतालों ने जगह नहीं दी है, श्रास पास है। पक्षिराज और मथक क्योंकि उस सरोम्ने श्रनेको पहले अन्यत्र चले गये हैं। मृग हैं, दूर पर से स्थान पागये है। अब दयालु सर मृगराज भी, पर निर । स्वाभाविक कार, बजट पर सरकार जब अस्पताल नुषा से अधिक किसी को नहीं पाहिये। बनवायेगी तब उसकी परिन को शायद सुदर सरोवर पर मुरम्य प्रकृति के स्थान मिल सकेगा । गोपान अपनी वद पर क्लिोलें करते हैं। झोपड़ी में कराह रहा है। सब निकालने और कोई पाथ जयतब भटक्कर है पर यो माँद है, देखते हैं बोलते अमिताम की बुरिया मश्रा जाता है है, सेवा पहायता करना चाहते हैं, तब, सवा, शुश्रुषा और प्रातिप्य पाता धागे रद जाते हैं। और अमिताभ है है। उसकी दुटिया सबकी कुटिया है। जो पसे अधिकार में कमी कभी अपने ग्यास्टोंने उसमें प्यास बुमाई है, टूटे प्रकाश की किरणें छोड़ जाता है । पहिये श्रार दृटी टाँगे टोक की है। चुपके स शान्ति से, बिना पहिचाने । सैनिकों और सेनापनियोंने अपनी फरता और यह मध्य वित्त लोगों में जाता श्रओं को इसमें भूला है, गलाया है, और है । बहाँ उगे पाला पन, अभाष थे निसरकर यहाँ से निकले हैं | रा दिसता है, उसमें वह अपने को भर धिप मी यहीं से गुर है, विजयी भी देता है। इनमें कोई उसे अम्मा कहता पराजित मी । विजेताओं के मान इसके [२४] निकट मोम के पुतले का है और परा बना ! यह सब में समाया । सब जिनों की लग्जाने यहाँ श्रासरा उसमें ममाये । पाया है। सो अमिताम एक दिन पूरा गल और अमिताभ है आज गौरी गया । विम्बर गया । 7 किसीने शकर के समान स्वच्छ, निरम्र, सिर उसका अनि सतार किया, न उनै उटाये । पर अब यह गलने लगा है। समाधिस्प तब उसके चिर सहनर उसे गलनाही है। यह माना ही है। पक्षिराज, कृमिरान श्रादि प्राय । वह सम्पूर्ण होगया तो क्या,। प्रकृति उहोंने महोत्सव मनाया । अपशिष्ट के नियमों को अवहलना करना उसका पृथ्वी माना पर निखर कर समा गपा. ध्येय नहीं । प्रति म याप्त विमाको कपूर साउद लोको लोको में व्याप्त हो श्रामलान किया वह प्रकाश पुन गया। अहिसा का स्वरूप- प्रमाद के कारण द्रव्य तथा भार प्राणों को किसी प्रकार का मापात पहुँचाना हिंसा है । २ प्रमाद का अथ है वर्त यविश्मृति । प्रत्येक जीव का कतव्य है सम्यम् शान, सम्यग्दर्शन और सम्यक् चारित्र रूप श्रात्मीध गुणों का विकारा । जीय का अपने स्वभाव को भूलकर शाध श्रादि कषायों के वशीभूत होकर प्रवृत्ति करना प्रमत्त योग है । प्रमत्तयोग के द्वारा किसी को कट पहुँचाना हिसा है। इस दो मंद है- द्र यहिंसा और भारहिंसा । किसी को कष्ट पहचा या मारना द्रय हिंसा है। दूसरे के प्रनि मन में बुरे विचार याना भावहिंसा है । भ्रमण परपरा में भारहिंसा के त्याग पर विशेष जोर दिया गया है। जब मनुष्य असय बोलता है। चोरी करता है या अन्य किसी प्रकार को कुप्रवृत्ति करता है तो उसको श्रात्मा में अशान्ति उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार वह दूसरे की हिंसा करने से पहले अपनी हिसा करता है। इसलिए किसी के प्रति राग या द्वेष आदि का उत्सन न होना ही अहिसा है और उनका उत्पन होना हिंसा है। यही श्रागमों का सार है । जो पति अपने श्रात्मविकास रूपी कर्तय की उपेक्षा नहीं करता, राग और द्वेष में नहीं पड़ता, उसके हायसे यदि प्राणिवध हो भी तोमी हिंसा नहीं मानी जाती।
धर्म की देन पं माखनलालजी चतुर्वेदी जैन धर्म का प्रारम्भ चाहे भगवान मार दइ लेकर मानों ईसाई धर्म के पार्श्वनाथ से हुआ हो या भगवान पहिले धम भावना ही पृथ्वी पर 7 रही - महावीर से, धर्मों के विश्व परिवार में हो इसमें धमों का अपराध कम, मानव जैन धम ने अपना हिम्सा अत्यत भेष्ठ का बचपन अधिक है जब जब धमों सतह पर उपस्थित किया है । पृष्मी के से ऊचे उठकर धर्मों पर मत देने का निर्माण की विधि कोटि यों में लगाई दाना ने निष्पक्ष प्रयास किया, उसे जाने मानव का निर्माण तिथि लद लक्ष मातिा कह दिया गया इस तरह, वर्षों में द दी जाने, और माना सस्कृति दानव को धार्मिक राकीण ना के कारण को तिथि इतिहास और प्रागैतिहास विश्व पर और अपनी पवित्र से पवित्र की धारा ये दोनों सितारों के बीच रचना पर अपना स्पष्ट मत देनेवाले सहसू सहसू वर्षों से बहती पाने के विश्वमानव के निर्माण में महुन विनम्न - पश्चात् भी, घों की याकलाशीलता के लगता आया है, और श्राज मी, जब प्रति विश्व को मानव भावना नहें दो धर्म पर मत दता है तो चिन्तित बच्चों जैसी नहीं बनी हुई है । पूर्वी होता है और जिस तरह ऋषिवर गोनाध के एशिया महाद्वीप म धर्म परिष के प्राश्रम का सिंह श्राश्रम की भावना का महान परिवार निगास अहिंसा वृत्ति के कारण अपने ही पनों करता है। किन्तु हमारा व चपन यह है, सेहता था कि कहीं वे किसी को कि जो हमारे धर्म में ह, यह सर्व श्रेष्ठ गड़ न जायें, उसी प्रकार विश्वमानव है और सब कुछ अच्छा है, और जो धर्म पर मत देने से डरता रहा है यह हमारा धम नहीं है, यह तो है य पर खुला अनुयायी और सुला शत्र होकर सह, यानी जो तो मन देता रहा,कि तु मन मथन, मत पराया सो पराया । उघर पश्चिम में, धम की भावना निश्चय, मत सहिष्णुता, मन प्रकाशन अथ और मतानुकूल बनन पे चिननपूर्ण है ईसाइयत को गदि श्राधारों पर मत देने से बचता रहा है किसी भ्रम की अच्छाई की जाच विश्व ने इनका परिणाम मी मोगा पश्चिमी विद्वान करें तो ईसाइयत का है। धर्म राज्य संचालन को गहियों पर भावना से उतारा गया, धर्म जीवन संचालन क्षत्रियों के उपकरण पानी राय को दैनदिा परम्परानो से पचित लेकर भगवान परसराम ने चत्रियों के किया गया, दव मदिरों और अघि प्रतिक्ल विद्रोह किया, और फिर, माग कांश देव मदिरों म बुद्धिजीवियों की वाा रामचन्द्र नामक एक क्षत्री के श्ररुचि बढ़ती गयो, और देवमदिरों सामने ही हार खाई विद्रोह के समय के वातावरण म बुद्धिजीवियां के प्रति समाज या जाति जिन उपकरणों को तिरस्कार बलवान होना गया। महण करती है, विजय प्रास होने पर धर्मों के पास एक धारणा पलपान उनके परिणाम विरोधी समाजों को है उनका प्रभु श्राकाश के अप्रत्यक्ष में प्राचीन समाजों में परिवर्तित कर दिया कहीं निवास करता है, जिसको सत्ता करते हैं। जिस तरह श्राज का शोष, अणु अणु पर याप्त है और जिसका श्राज का याविष्कार धनकर भी कल का अवतार, जिसका पुत्र, यदायदाहि साहित्य और परमों की रूदि कहलाने ঘর্ময় ক্লানিমৰবি মার গান প্রকা, ওটী সাং স্মাত্র যা বি धर्मस्य तदात्मानम् सृजाम्यहम् की कल का धम कहलाकर परसों वैसे ही या की सी कोई वानि कहकर या को बधनों में हम बाथ लिया करता है जैसे- बात सोच कर पृथ्वी पर धाया करना बधनों के खिलाफ हमो विद्रोह किया था। इस सम्पूर्ण भावना ने प्रतिकूल सा, जैसा कि मैने निवेदन किया एक विद्रोह हुथा, वह भारत वर्ष में यह विद्रोह ग्राम्हणों को परम्परा के प्रतिकूल यज्ञों की हिसा भावना के प्रति क्षत्रिय जैन धम माझणों की रुदि परपरा नौ क्षत्रियों का था एक विद्रोह क्षत्रियों की का विद्रोह था इस विद्रोह ने ससार परम्परा के प्रतिकूल ब्राह्मण ने भी किया को एक महान वस्तु का दान किया पा। पुराणों में चला है कि भगवान उसने मानव का प्रभुसत्ता को स्वीका परशराम क्षत्रियों को उदंडना के प्रति किया, उसने मा को पासमान कुल हो गया । उहोंने एक के बाद दूसरे उतर कर थानेवाला और अप्रत्यक्ष राजा का नारा प्रारम्भ कर दिया प्राज पिलीन हो जाने वाला मानने के बजार भी भाई कहैयालालजी मानिक्लालजी जगत को यह सदेश दिया कि र मुशी जैसे तेजस्वी माण भगवान परश मानव ही अचा उठकर तांधकर राम के उस तेज की प्रशसा करते हैं तारक हो जाया करता है यदि किन्तु मेरे अपराध मैं क्या करने में इस प्राय उपल ध न होते तो शायद के घटना का वेन समझ नहीं पा रहा नहीं मानता कि माक स वे पच्चीसौद --- धम के पहिल किसी ने ईश्वरत्व की भावना के यह भी सच है कि धर्म भावना ही एक खिलाफ मानव की प्रभुसत्ता को ईश्वर ऐसा ततु है जो मनुष्य को प्रारम शत्र स्व का नाम दिया तब, यह मावना होने से रोकता है वह मानव की ईमान घम क्यों कहलाई। इसके नाम पर दारी का उच्चतर श्राधार होता पाया प्रापनायें क्यों हुई। इसके लिये प्रयों है और उसकी समर्पण भावना और की रचना क्यों हुई। दोषों के प्रति ग्राम स्वीकृतिक मव को इसका पहिला कारण तो यह है मानव में जगमगाता और उभारता माया कि मारतीय स्वभाय सदा धम निरपेक्ष है। प्रार्थना पुरुषार्थ को दूर और उदष्ट रहा है। उसने विश्व की धम मावनाओं होने स और श्रद्धा को कायर होने से का सदेव खुले हाथों स्वागत किया है रोती है इसी लिये साधकों और जिस समय यूरोप या पूर्वी एशिया से साधिशनों अषणों और अवणिकाओं श्राज भी इस्लाम और मसीही धम के को श्राधार बनाने के पश्चात भी जैन पिलाप अन्य धम संस्थानों का निमाण मानव का तीथकर पे और लाखों की तादाद म अनुयाइयों रूप में विकास पूजा और का मिलना दुर्लभ है, भारत में जर प्रार्थना से परिवेच्छित किया गया दोस्प धर्म के पारसियों को सपूर्ण है यहतिक कि इस देश में रहनेवाले याभय दिया गया जैन और बौध धर्म २८ करोड ६२ लाख हिन्दुओं के बीच का खुले विद्रोह में उदय हुश्रा, कन् जैनों की तादाद सौ में एक भी नहीं क्यूशियस धर्म के चीनी यात्री यहाँ वे केवल १५ लाख के लगभग है किन्तु को धर्म निरपेक्षता और समस्त धर्मों हिदु रामान और जैन समाज पे धर्म के प्रति सहिष्णुता को प्रर्शमा फरते मयों को एकत्रित करें और वरान के रहे, और इस्लाम तथा मसीही धर्म ने तौल के पल्लों पर रखे, और गुण और भारत की इसी मावना से लाम उटा गरिमा के विवेचन में न पड़े, तो दोनों कर अपने अनुयायियों को तादाद के तौल में मुझे सदेह है कि ३० करोड करोड़ों और लार्वा की इस भारतीय सरल्या जातिमन्य १४ लाख राख्या ये धम भाव को उच्चता में हो जैन धम मातिप्रथा से सोल म जैसे सवथा नवीन धर्म का उदय हो इतने धर्ममयों का निमाय हुआ कि सकता था सो हुया जिनम तक, दर्शन और कयायों मे पर सच है कि प्राचीन युगों में स्थान पाया विचारों के परिवर्तन के लिये धर्म यू तो अहिंसा हिन्दू धर्म का महान भावना और सम्प्रदाय निर्माण का ही आधार है और यह धर्म ही केसा, घाभप लिया जाता था। किन्तु सापही जिसका प्रापार अहिंसान हो। यो नहीं होंगे
No text on this page.
पहिले किसी ने ईश्वरत्व की भावना के यह मी सच है कि धर्म भावना हो एक खिलाफ मानव की प्रभुसत्ता, को ईश्वर ऐसा तनु है जो मनुष्य को प्रात्म शत्र व का नाम दिया तब, यह भावना होने से रोकता है यह मानव की ईमान धम क्यों कहलाई। इसके नाम पर दारी का उच्चतर माधार होता आया प्रापनायें क्यों हुई। इसके लिये प्रयों है और उसकी समर्पण भावना और की रचना क्यों हुई? दोषों के प्रति यात्म स्वीकृति के वैमन को इसका पहिला कारण तो यह है मानव में जगमगाता श्रीर उभारता याया कि भारतीय स्वभाव सदा धर्म निरपेद है। प्रार्थना पुरुषार्थ को दर और उर्दष्ट रहा है। उसने विश्व की धमभावनात्रों होने से और भद्धा को कायर होने से का सदैव खुले हाथों स्वागत किया है रोकती है इसी लिये साधकों और जिस समय यूरोप या पूर्वी एशिया से साधिकानों श्रवणों और अवणिकाओं पातमी इस्लाम और मसीही धम के को आधार बनाने के पश्चात भी जैन खिलाफ अन्य धम सस्थानों का निर्माण धर्म के मानव का तीर्यकर के और लाखों की तादाद म अनुयाइयों रूप म विकास पूजा और का मिलना दुलम है, भारत में जर प्राथना से परिवेच्छित किया गया दोस्थ धर्म के पारसियों को समूर्ण है यहातक कि इस दश म रहनेवाले साथय दिया गया जैन और बौध धर्म २८ करोड ६२ लास हिदुओं के बीच का खुले विद्रोह में उदय हुश्रा, कन् जैनों की तादाद सौ में एक भी नहीं फ यूशियस धर्म क चीनी यात्री यहा थे देवल १५ लाख के लगभग है किन्तु की धम निरपेदना और समस्त धर्मों हिंदु समाज और जैन समाज के धर्म फे प्रति सहिष्णुता की प्रशंमा करते प्रयों को एकत्रित करें और तराजू के रहे, और इस्लाम तथा मसीही धर्म ने तौल के पल्लों पर रख, और गुण और भारत की इसी भावना से लाभ उठा गरिमा के विवेचन में न पड़े, तो दोनों कर अपने अनुयायियों की तादाद के तौल में मुझे सदेह है कि ३० करोड करोड़ों और लाखों की इस भारतीय सल्या व जातिप्राय १४ साख सल्या य धम भावा की उच्चता में हो जैन धम जातिप्रथा से तौल म मारी नही होंगे असे संपया नवीन धर्म का उदय हो इतने धम मयों का निर्माण हुश्रा कि सकता था सो हुश्रा जिनमें तक, पया और क्यानों ने पह सच है कि प्राचीन युगों में विचारों के परिवर्तन के लिये घम यू तो अहिंसा हिन्दू धर्म का महान भावना और सम्प्रदाय निर्माण का ही आधार है और यह धम हो कैसा, धाभय लिया माता था। किन्तु सायही मिसका मापार अहिंसा न हो। सो स्थान पाया [२८J की तरह पह विश्वभर के धर्मों का प्राधार है नन दर्शन से उन सन्तनों को पाता है वो कितु ईण की महा त्याग भावना प्यार होता है कि भारत की महान फे बावजूद जोवन, मोजा, और परमरा में भूपण जैन दर्शन व्यवहार में हिंसा का पालन न चमकता है यल यहाँ तो इसकी चर्चा ईसाई जाति से सघा, न ऋषियों को करनी नहीं। सपोपूत परपरा के अनुकूल सम्पूर्ण किन्तु विश्व माना हमसे कुछ प्रश्न हिन्दू जाति से सपा । मुस्लिम जाति से वो सपना ही क्यों था, क्यों किंतु पूछ सकता है और में उपर भी ध्यान भगवान बुद्ध के अनुयाइयों से भी नहीं देना होगा विश्व रक्षक चनी तलवार सघा हिंसा के भेद प्रमेद करके खाद्य फेंक कर चितन और लेखनी में उतरे पदार्थों का निण ये हुया, ससार म तब जैन घम बना । किन्तु उसके विषम पेवल एक जन जाति ही ऐसी है कि परिणामों से कैसे बच सकते १ जिन अहिंसा को अपने जीवन और भोजन साक्षणों से अधिक ता और त्याग की में उतारने का १०० पीसदी प्रयत्न भावना बढ़ाने का उद्योग किया गया था किया। मासाहार, विश्व म पेवल उन्हीं तप और त्यागों का पुज बनकर इसी एक धम के अनुयायी नहीं करते। जैन नाति रह गई श्योर देश के शासन और इस तरह इस जाति का जीवन और रक्षा के क्षनिय तन्नु शतादियों अहिंसा के सम्पर्श अनुकूल सिद्ध हुना। कीम पारा मन जाने कहा विलीन इस तरह इस जाति ने दो बातें विश्व हो गए । इनियत्व बामन को पराजित को दी एक वो मानव हा को ईश्वरत्व करने गया था और स्वयं परंपरायों की कल्पना को आधार बनाया और से माझण बन कर बैठ गया | इसका दूसरे सम्पूर्ण अहिंसा को जीवन और असर धम के विस्तार पर पड़ा मोजन में न फेवल उतारने का प्रयत्न हिंसा के चरमत्व से पाणि बोलकर किय घरन् समव भी करके दिखा विश्व में महान युद्धों का करनेवाला दिया । यहा मैं उस जैन दशन को बौध धम पूर्वी और दक्षिणा देशो पर बात नहीं कहता जिसके प्रभाव ने ही छा गया और अहिंसा को जीवन पर मुझे जैन धम के प्रति अधिक अग्रसर उतारने के सपूर्ण प्रया में जैन धर्म किया था क्योंकि वह अपने में एक राजश्री के महान तेज से वचित हो गया अलग विषय है और विश्व दर्शन के अत्यत प्रतिभाशाली होकर भी अपनी भवति न भपति की समीक्षा में विस्तार से त्याग भावना के जो फल देखने की वस्तु है मेरे जीवन का वैष्णव लिये अभिशाप बनाये ठीक उही अभि भूमि के निवास करने वाले मामय ने अपने यापों को जैन जाति ने अपने में दुहरा - नाम से नेक दिया। विश्व का राज्य संचालन देश में है, किन्तु युद्ध और जैन लोगों की गद्दी से उतारा गया था, भारत का की परपराए मानस मनोभावों को लेकर प्रामय राजगुसराय के महान गौरव से रंगों और पत्थरों पर उतारने में उतारा गया, और भारत का जैन धर्म, जिठनो नामत नितनी विस्तृत, जितनी उसी तरह, शाखों के स्वर्ग में निवास गहरी, जितनी सफन हुई है यह इस करते हुये विश्व की विजय पराजय से देश के सशनि के इतिहास में मूल्य निर्वाण पा गया । तर यदि इस महान वान निधि के रूप म सग्रहीत है। किंतु देश में उस को गणना केवल १४-१५ जैन हो या हि, अाज तो हम मानो लाम्ब रह गई तो वह तो होना ही था। कला के हत्यारे ही धान के भारतीय चिंतक को, केवल नाम हो सकते हैं । एक मूर्तिकार जैन चिंतक को ही नहीं, अंगा मूर्ति का निर्माण करता है प्रेग्ने निस्तान के मारतीय राजदूत अतर में चमक उठने वाले स्नेह भाव विंग कमा हर सचन्द्रजा तथा उनकी को, सौ-सौ सानों से ग्यार, वह तोह के व्यरित्व निर्माण करने में पत्थर पर उतारता है और यह गौरव प्रामय करना चाहिये क्योंकि पापाय प्रतिमा किस लिए निर्मित होनी जैन तवों और दशनो को हानि पहुँ है कि सहस सहस मति की मनो चना इस देश की बहुत बड़ी हानियों में कामना उस मनोभावमनी मूर्ति के होगा जैन और ौष धर्मों ने भारत दर्शन से पूर्ण हो सकती है । रथ पर वर्ष को एक महान देन और दी है चढ़ कर और हदयों के शानद से भागे वह है कला को दैन। बदकर शास्त्रों के मत्रों से गजित यह मानव के मुकोमल, कलित त्रित मूर्ति मन्दिर में श्राई, और द पापाय मनोमापों को जिसने हमारी चापि पर प्रतिमा के उच्चतर मुद्रा भाषों के चरणों उतारा उमे हमने कालीदास कहा, और पर शन शत राशि समषित कर दी ऐसे कुछ और नाम दिये। किनु मानव गई। किन्तु कोई इन पूतों से पूछे कि के मनोमायों को जैन और पौध जातियों पूजकों तुम शत-प्रत यहा हो, किन्तु ने अपनी कथाओं के रूपम इस देश के यह मूर्तिकार कहां रह गया जिसकी कि गिरि खडों को दीवारों और पत्थरों पर धेनी छोर हॉकी ने यह मूर्ति बनायो। उतार दिया भौध और जैन युगों के हम जैन हो कि हिन्दू, यह मूर्तिकार बिना भारत पर म मूर्ति क्ला का वह अछूत है, वह हमारे घम का नहीं है, वैभव न होता जो श्राज भारत के संद यह हमारी जाति का नहीं है, वह हरों तक में विद्यमान है मूर्ति कला के हमारे मदिर में कैसे प्रवेश पा सकता हिन्दू जाति के कृष श्रेष्ठ नमूने मी इस है। और इस तरह विशाल मन्दिर [३०] के पत्थरों में प्रतिमा हीनता गूज उठी तब बताइये मूर्ति और कला की मा और हमारी प्रतिमा का चरम सौभाग्य देवत्व परपरा, पत्थरों पे रगों पर हमारा चरम दुर्भाग्याचाकर मूर्तिकार मानव के मुकोमल मनोमावों को उतारने और उस जैसे उपेदितों के साथ मदिर हुये, हम अाज के युग में जीवित से बाहर रिलखता खड़ा रह गया। रहे तो कहां जीवित रहने से। जग दर्शन सागरमल जैन 'मौला घेदना को इलचलों में एक अद्भुत सार देखा। चेतना कब तक रही है और भी क्व तक रहेगी जिदगी अवसाद होकर दुस अभी स्तिना सहेगी? धाज क्षण-क्षण पल-पठक में एक हाहाकार देखा। श्राज सदियों की पुरानी अनल लय मैंने मुनी है, थाह फी नि सोम सांसें पफ उगजी पर गिनी है, प्रति हृदय के बीच मैंने एक चुभता तार देखा। शति तो मुर्दा जगत् की भ्राति की वेबस पिपासा थी कभी मेरे हृदय में स्वप्न की यह सणिक आशा, 'अब सुके मल फूल को चोटों भरा लाचार देखा। जिस हृदय में था श्रधेरा हो न पाता था सवेरा, कायरों का घेरा पाप का दुर्दिन बसेरा, 'माज उसी में क्राति का फूठा फज्ञा ससार देखा।
श्रमण-संस्कृति का राष्ट्रीय महत्व शिसाचद जैन, सारा श्रमण सस्कृति का यतिगत, धार्मिक यद्यपि जोश-सरोरा और ए सहन और पारलौकिक महत्त्व तो अपार रहा, वैसाही था । जैन धम की उमति पतु सायमौमिक, राष्ट्रीय या इहलौकिक का कारण भी जैन श्रेष्ठि-बग था महत्व कहीं अधिक कल्याएकारी रहा। सम्राट नहीं रहे। घे तप की श्राग म इसी सवय को श्राज हमें चर्चा करना नापने को मुलमाने वाले एकासनीपरम है। श्रौदाय पाउ रहे जिहोंो सवत्र त्याग इतिहास इस बात का साक्षी है कि कर अहिंसा का मार्ग प्रशस्त किया और बम तयागत गौतम बुद्ध के बौद्ध धमका प्राणि मात्र का अप्रतिम कल्याण युगों प्रसार हुश्रा तर श्रमणों के द्वारा ही युगों तक किया। जहाँ उनके जीरन में ही अनेक 'यक्ति भमण बनकर सारे भारत म फेल गये, किसको है । इसम सदेह नही लेनिन, अब सोचिय सीक्राति का भय यहाँ प्रियदर्शी सम्राट अशोक को यह ट्रात्सकी सतह पे ऊपर या नीचे रहकर ठीक उत्कठा थी जिसने इन अमणों में सूत्र सचालक रहे, परन्तु सी वित अपने परिवार को पग दिया, उद्भावक, प्रसारक क्रांति थे और इसका ही परिणाम निकला कि वे अनेा अगणित रुसी तरुण थे जो बौद्ध धर्म का प्रसार भारत म अट भूखे प्यासे रह, मारे मारे सारे देश में कर विदेशों में पैन गया। घूमते और बसते रहे । उहोंने साहवे ईसाई धर्म के प्रसारक कौन थे? रिया की भयकर रह और जेलों का ईसाई सत-महात्मा ये । इसाई श्रमण ही सामना किया, अपनी हड्डियाँ गलाई, थे जो जले, गले देशनिर्वासित हुए, और फिर रूसी जनता म मिल गये । फिर भी प्रभु ईसा का सदेश लेकर ये तम्ण भी श्रमणों से कम न थे।रहोंने थे पृथ्वी के कोने कोने में पहुचे । जहाँ हा, इनो त्याग शौर्य और कष्ट सहन एर्य की भी गम न थी वहाँ वे पहुँचे ने ही रूसी जनता के क्ल्याण और शान और उहोंने ईश्वर पुत्र ईसा की दीन का माग उद्बुद्ध किया। ये अपरिचित बधुता का उका बजाया । रहे, अज्ञात रहे, अपशी रहे, काल के हो, इस्लाम का मर्ग मिन रहा, गाल में समा गये। आज उहे कोई [२२] महीं जानता, परन्तु उनका एकसिंचन उनके सारे गुण इममें पाये जाते हैं। रूस के उधार का स्वाद बना। इन भमयों ने राष्ट्र का कितना और हम अपने युग में प्रायें । हम कश्याण किया। इस प्राचीन युग में अपनी स्वतत्रता की जड़ में देखें वह जावें। इहोंने अपनी सरया बढ़ाई, कौन सी शक्ति थी, कौन सी सस्कृति अर्थात् अनेक स्पृिही, त्यागी व्यक्तियों थी जिसने हम स्वतत्रता दिलाई। उस को वृष्दि को, जिहोंने ससार के वैभवों, विश्वषय महा विभूति ने किस परिग्रहों, प्रलोमनों को निलाजलि देकर अदम्य शक्ति या अवशिष्ट मानरों एव प्रहस्थ के तौकिक मचय दिया जिसरे विस्फोट ने नगद प्रख्यात सुखों का माग प्रशस्त किया। जितने श्रमण घदे उतनी सौसारिक, साँपत्तिक कुटिल साम्राज्यवादी ब्रिटेन को घुटने टिकरा दिये । भारत का एक वृति धारण कर खाय समस्या के मुन्न समस्याए कम हुई। इहोंने एकारानी एक दृष्टा जानता है एक महात्मा ने झाने में, उस भयकर न होने देने में थ्रनेक महात्मा पैदा किये श्रमणों के रही भारी सहायता पहुंचाई। रहोंने स्तर पहुंचे हुए अनेक थ्रने त्यागी मठों सघों विहारों की स्थापना कर राबर धारी, निस्पृह सेवक पैदा किय, लोक कल्याण के बहुमुखी दार सोले । जिने अपनी कालाने छोड़ी, और तब कहीं श्रमण संस्कृति की पाप डॉक्टरिये छोड़ा, सूल, कालेज श्रीर कता से शताब्दियों तक मुख शांति का जजिये छोड़ा, जिहोंने अपने बहुमुल्य, वरदान मास होता रहा।होंने बिना प्रिय विदेशी वस्त्रों की होली जलाई अपो नाम या अन्य काति के साधनों और सुदर्शन चक्र सँभाला | वैभव को का उपयोग फिया वैदिक टुकराया, जैलो का यातनाएँ सही, अपिया के समान अपन को देश में वाग्माणों की वर्षा की बौछारें झेली। सा दिया, और तब ही लोक कल्याण पर गहर के लोगों ने उन दीवानों सपटित हुआ, एक सीमा तक स्थायी का मजाक उड़ाया और फिर भी वे बन सका। इहोंने शासन, शासन डटे रहे, गुट रद्द, तब कहीं जाकर सचालन और शासकीय शक्ति सचय हम कह सकते है कि हम स्वता हैं। की ओर से अपने को हटा लिया और श्रय चाहे श्राप चौद्ध और जैन धर्मों की सीमाओं में जूटने दाल इसका परिणाम देश के लिए महा तेजस्वी माधुनों को श्रमण कहें, परतु शुभ और लाभप्रद रहा। मैं तो उन रूसा सरणे और पहले इसी प्रकार पहले खेमें के गांधी खेम कांग्रेसियों को गणना मासो मह कमेडम उस समय प्राये जब लिए श्रमलों में करता हूँ, क्योकि निटेन की प्रभुता का प्रातक सारे [२३ जर्मनी था जिसने उसका ससार पर छाया हुआ था । उसे श्रादर करना होगा, भारतीय जीवन साम्राज्य में कभी अल न होने वाले में उसकी प्रतिष्ठा करना होगी। महा सूर्य का गौरव प्राप्त था, और वह सूर्य माजौने यही किया, जवाहरको यही मध्याह समान तप रहा था। उसरे करना होगा। यदि वाहर यह नहीं सामने तब अमेरिका नग य और करता तोराजनीति की स्वाभाविक कुरूप उसी को सत्ता में अपने को लीन करने नीतिता और शासन यत्रों को कोच भरी की धुन में था । रूए उसके वैभव का सत्ता इस देश कोडुवा देगी।नीति वैकल लाहा मानता था । जापान उससे नेताओं द्वारा जनता को कोसने और हरता या । विश्व में फेवल एक मारों में दवे मानवों से अधिक परिश्रम सामना की माग करने से कुछ न होगा। करन का साहस किया था और मुँह श्रत श्रमण सस्कृति को स्थापना की साई थी । उस समय भारत म सृद्धि और प्रसार के लिये उसके महामाजी का अनिश्वास किया जाता श्राधार श्रमणों की एक वृहत् संख्या था, उनका मसोल उड़ाया में पैदा करनी होगी, और यह महान खाता था । उनको योजना की और राष्ट्रीय कार्य यदि कोद कर सकता है मग दशन का धज्जिय उड़ाई जाती तो वह केवल तरुणों का ताज जवाहर यीं। तव ब्रिटिश सिंह की माद में प्रवेश फरने का कार्य उन वीर कासिया ही कर सकता है। श्राज भी उसके किया और पिछले सेमें वालों का माग श्राहान पर देश का बच्चा बच्चा प्रशस्त और सरल बनाया। उन मागी अपने को न्यौछावर कर सकता है। रथ तपस्या और घुल घुलकर मरजाने श्रत आज की महान राष्ट्रीय श्रावश्य पाले काग्रेसियों को आज कौन जानता क्ता प्रेसवार्य या वक्तव्य नहीं है, है । ये सच्चे श्रम और उनकी और न प्रतिशत बधे हुए या कारी तपस्या, सेना, साधना थी जिसो देश श्रामदनी का माग सोलनेवाली सर को सतत्रता दिलाई, लोक कल्याण के पारी योननाएँ । क्यों कि इनमे तो माग पर लाकर छोड़ दिया। श्राराम से, ढिलाई से, खास पीने के इसीलिए मेश्राप से कहना चाहता बाद प्रवशिष्ट वियाशीलता से काम कि यदि हम देश का सचा कल्याण होगा जिसमें होगी यही-बड़ी बातें, चाहते हैं, देश की स्वतत्रता को अनुगण बड़े-बड़े विवरण जनता-जनादन को रण चिरस्थायी बनाना चाहते हैं कमजोरियों का दिग्दरान और अपने तो हमें भमयों का एक समूह पैदा को दवदूत, विशप प्रकट करने की करना होगा, हमें भ्रमण सस्कृति का भ्रष्ट चेष्टाएँ।
, भगवान महावीर की देन - ले-मायूलाल जैन (साहित्यरत शारी) "यह ससार बड़ा ही विचित है। भूख न्यास श्रादि से पीड़ित हो रहा है। हसमें दृष्टि पलाकर कहीं भी देसो, मुग विध प्रकार में इस दुप से छुटकारा शॉति का लेश भी दिपाई हां देता। पाऊं और हम दृश्य जगत या दुप चाहे धनिक हो या गरीब, रयामा हो मेरे द्वारा निरा तरह दूर हो । याश या सेवर, पति हो या पत्नी, पिता हो मैं दुीिया ये दुप दद में पाम ग्राऊ, या पुष, गुरु हो या शिष्य और कृपा इस समाग पर लगा सकू?" रही हो या जमादार किणी भी दशा म कोह महान विचारों के द्वारा पूप ज म ममहा भी प्राणी हो वह दुस्ख रूपा दावानल में वीर ते तीधर कम का बध किया और मुलसा हुया ही दियाई पड़ रहा है। जाउद्धारवीभावना सेरेनर से नारायण दूसरों को क्या मोचू , म स्वयं इस होने की योग्यता को पा सके। इस श्राँति से दूर नहीं हूँ। मेरे भातर का योग्यता को पाकर भी महावीर ससार ही स्त्रय श्रसार और राग, द्वेप अपने नाम में त्याग और तप से अन्य मोद श्रादि प्रवृतियों से भरा पड़ा है धातु मिश्रित मुरण के समान फर्म मैं स्वय रोग, शोक, म जरा और सवव अशुन ग्रात्मा को शुद्ध बनाने के यदि वाहर या देश त्यागी, समय भी ब य उनका निरस्सार निगृही, सेवा भानी, क्मट, चरित्रवान करेंगे । यह काय कदिन नहीं है यायकायों या श्रमण की सष्टि नहा गोस्वामीजी ने कहा है, पर हित' करता है तो फिर उसके उध्दार की जिन के मन म होता है उनके मरने के बात करना स्वतनता के स्थायीत्व को लिए मसार में कोई काय इतम नहीं श्राकाक्षा रकमा व्यय है । नता, होता। श्रत प्र से प्राधना ह यह मानव समूह का एक बड़ा भाग तो श्राज स्वादर पार देश को मुमति दे ताकि भी वैसा ही है सा वह पहले था और युग के अनुरूप पु7 धमण-सस्कृति भविष्य में मां कैसा ही रहग | और के द्वारा हम मानव कल्याण और इसीरे सच्चे कल्याण के लिए इन अपनी ना जान सनत्रता की रक्षा कर श्रमणों को काय करना होगा उस लिए कटिबद्ध हुए । उहोंने राज्य, श्रादर्श भी नहीं रसा। क्योंकि संसार सपचि को कराया, प्रारभ से ही मोग में दूसरा कोई किसी मनुष्य का न विलामों के साधन कामिना नादि कभी कुछ मनाथुरा कर सकता है और सवध का परित्याग किया । एक्ल नकर सकने में समय हैं । एक दुखा का विहारी होकर वन को अपना निवास दूसरा दुष्षी कुछ भी यहीं कर सकता। स्थान बनाया । समता को अपनी सह उध होता है अपोदारा हा। यह चरी बनाकर बाय शत्रों पर ही जीर अपने ही काय से मुम्बी भाता है वरन अतरग शत्रु यो पर वे विजय और अपने ही काम से उगी। 'ईश्वर पाने के लिए ध्यान रूपी खड्ग लार प्रेरितो मच्छेत्स्वगवा श्वभ्रमेवया' (ईश्या निकल पड़े । बारह वर्ष की पार से प्रेरित होकर ही हरेक प्राणी स्वग के पश्चात् उहें सिद्धि प्रात शुर। वे पूर्ण वीतराग और सवा बा या नरस को पाता है) इसे मी महा वीर प्रभु ने काल्लनिक बताया । समन्वय गर ! इस प्रकार स्वय निर्विकार, दृटि मे उच दोश्रों म प्रथम का रागादि अतरग दुग्वों से रहित होकर जनन मुन्ध और अनत शान धनी अभिप्राय सगत हो सकता है कि ईश्वर महदार ने अपने कल्याण दे मार्ग से की भक्ति करने वाला पहले दास रूप से विश्व क भय प्राणियों को, जिसमें भक्ति करता है और जब वह ईश्वर मनुष्य मा और पशु भी, सुम्न और के गुणों का अनुकरण करता एश्रा उन शाति का उपदेश दिया। गुरषों का अपने म विकास कर लेता है तर वह स्वय मुक्त हो जाता है । इस भगवान महावीर ने, जो अपने ही पुरुषाय से सामान्य मनुष्य से विशेष प्रकार इश्वर के श्रालवन से वह मुक्ति या अईन्तपद को पास हुए थे, अपने प्राप्त कर लेना है । दितीय श्रश से तो श्रादश द्वारा अपने स्वभाव और ईश्वर ही स्वग या नरक म भेगने वाला सिद्ध होता है, पर ईश्वरभक्त को ईश्वर सामथ्य' को भूल रही जनता को के प्रति श्रारमसमपण के पल के प्रति उसके स्वभाव और सामय का बोध श्रकर्नल या उदासीनता की प्रेरणा ही कराया। भ महावीर ने स्वयम योग्यता रख कर परोपदेश का मिलती है यह माना चाहिए। उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया, जिसका श्रात्मा के शत्रु राग द्वे यादि को कोई प्रमान जनमानस पर नहीं होना । महावीर स्वामी ने नीता श्रत वे जिन उहोंने 'अस्त्वामु दरिष्यामि मामेक कहलाये और उनो अनुयायी-उहें शरणं ब्रज' (म तुम्हारा उध्दार करूगा अपना अराध्य माननेवाले-जैन कह तुम मेरी शरण में या जायो) का लाते हैं । गतानुगतिकता से या बुल परमरा से हम महायोर ये प्रामायो र स विचार किया जाप त म मा मोरई और उस पापर्य गुणों में पोरोपन सत्यार किया था। ए? मी गुण को श्री जाम1 dो घोर प्रो. उतारे सोइयर्स TT ही हिल उ बनाया। होगा और दूसरों का।माण जीवा अनि, य, सामादि पदार्प मार ममाप्यता का महावीर पाया 4 काम पाते हैं उगा मार रा स मिलना चाहिए । हम अनोपदा, फरा धादिमे सीट पति और अरोयम्प प प्रारूप म मापीर मी भम्पादियों का भो तमी महावीर प्रभु से भर पहला भार ! मेरा और यो योग्य हा सकते हैं। यस सार लिही रसार का मुशार और पर्म का गए भरोशाने पुष्प की पार प्रचार मी पहा प्यक्ति कर सकता है कि पार्यों से शाम जो लय मुपगमा है प ा मिन m | मर, प्रालि को धर्म से मुगतान करता है। आज ति, मीनिमादिका प्रकोर पाहीनी विश्व में बढ़ी हुई अमावाति और ना परता । हमें ग्रास्तिकों को युद्ध जय विमापिया को दूर करन में प्रमो पूर्वामिव कम का फल सभा गमप केवल शाजविद तपशान नहीं मानना चाहिए। हम मापता से मारना है बल्कि अपने नाचरा द्वारा उन्नत कम, उसार, मुक्ति यादि में रिारा ग्यचित्व ही समय है। महाभागाँधी ने संगदाहोरा है और पुरा भागोवा हिसा का प्रतिपादन प्रपो जोग को है। पर शुमा कर्म भी हो पाने अहिंसक बनाकर ही किया था। मह पूप पुस्पा द्वारा ही धपा करना वीर जयता का उद्देश्य यही है कि है। सागरों की स्थिति वाले धर्म महावीर का हिसा, अपरिग्रह और मी या प्रारमा भने पुरा में पर अनेकान्त सिद्धांत समस्त विश्व में फैले। कर निकला नित्य शुरवाता है। इससे जन धम का प्रचार हा इसलिए अपने विचारों को निषय, असा नही किन हिंसा और परिग्रह धादि दायिक और समयमा पो के कार्यों से ससार प्रत्यत अमात ओरल लिएभ मायारो भने कान्त का दुखा बन रहा है उसको शाति और 'और जीवन को ऊचा उठाने पे लिए मुख पहुँचाना ही मावीर को जयनी अहिंसा एवं प्रारिमा का उपदेश अथवा महावीर पे सिद्धांत का प्रति दिया । म महावार को विश्व के प्रति पादक साहित्य या अप उपदश नादि यह देश है जो ससार ५ बल्याय पे साधनों के प्रचार का उद्देश्य है। सूक्ष्म लिए है। उारे पूर्व भ भादिनाथ मुक्तिपत्र स्वरूप कुमार गागेय सरिता के उस तट पर सम्राट वाली सशच अडलिका भी निर्विघ्न पयोवीर्य का ग्रीष्म कालोन महल है। नहीं निकाल सकती । इस में कुदन और माल से लगभग तीन मील की कृषक अपने छोटे से परिवार को लेकर दूरी पर, पूरब की अोर पाटलपुर की रहता था, और वेठी श्रादि से अपनी अमराइयों में एक पुराना जोपं शीण जोविरा उपाणी कर सतोषपूर्वक कुटिया है, गो इन दिनों सूनी है, और अपना जीवन व्यतीत करता था । अपने बिछुड़े हुओं का वर्षों से किंतु घटना चक्र कुछ ऐसा चला कि जोनी सी निराकद खड़ी है। प्रचड वह चहकता हुआ सम्पूर्ण परिवार बड़े श्रोधियों और भीषण तूफानों ने उसे बड़े प्रहारों के कारण नष्ट भृष्ट होगया। प्परत कर डालने के सतत प्रयत्न किये सो कुटिया अाम्र वन के उदात किन्तु कुटिया किन्हीं दृढ़ विश्वासों की उदायन में उदास सिहर रही है । हवा जड़ों के अाधार पर अभी तक जीपित कीव्याकुल लहरें आती है तो चुपचाप है, और अमराई की पारी में लम्बे पल्लवों में विरह गीत के कपा भरती लम्बे दिन काट रहा है । लोगों को हुई इस पार से उस पार निकल जाती श्राश्चर्य है कि इस कुटिया ने जितने हैं। सावन की बरसती हुइ रातों में बरस निरालम्ब रहकर निकाल दिये, मिजलियाँ चमकती दमकती किसी को उनने परस तो देख रेख में रहने दूदने खोजने आती है और निराश धादि तीथकरों भी यही उपदेश मेरी दृष्टि में यही है। पर महावीर दिया था। जनता का विश्वास संपा जयन्ती का पुतीत पर्व मी हमें यहा दन करने के हेतु प्रामाणिकता को स्मरण कराता है। हम इस पर्व की आवश्यकता है। प्रक जैन कहलाने प्रेरणा पाकर विशेष उत्साह और घाला या अपने प्राररण और साहस को जाम कर सके और अपने व्यवहार से जो बने और तब प्रपो दायित्व निवाइ करने में समय हो कम दारा विश्व की सेवा करे 1 जैन सके तो महावीर शासन का प्रचार खिदानों के प्रकार का प्रथम प्राधा होकर महावीर जय मनानासायंकहोगा।
[३८] लौट जाती है। मेघ भी किसी की याद वेव यानी । श्रमराई के कुछ झार भी में रो रो उठते हैं) और सुटिया का उसकी अपनी सम्पत्ति थे। उनसे भो वह टूटा द्वार तो हवा के झोका में बार उसे थोड़ी बहुत नामदगी हो ही जाती पार पद हो होकर पुरा खुल पड़ता था। इस प्रकार उस दिन कटते चले है। विभीपक तूफागी रात में ऐसा भी जा रहये। लगने लगता है मागो कोई यहाँ कुदा बहुत मुदर थी। बर वह पुरापुसाकर रो रहा है या किल्ला लादियां या श्राम बचा शहर जाता कर हग रहा है। पमी ऐसी है तो उसे देख कर कह रूपस्तिार' मार्ग कोई किसी का चुला रहा है श्राश्चर्य से ठिठकी रह जाती उपक सौंदर्य या टुमककर छुमक ठुमक नाच रहा फा छग दबकर लोग तो यहाँ तक है। कभी कभी एसा संशय या घरता वह उठते कि पाटलपुर या अमरावा है कि भूत मनगियों का नाच हो रहा है में साक्षात् देवागा हो उनर कर या उनके किसी प्रान दोराव पे पाने श्रा बगी है । किन्तु कुदा तो जैसे बन रहे हैं। अधिक रात शते कोई भी अपने श्राप से अपरिचित हो थी उसे पथिक इस सूनी अमरा के पास से अपने सौंदर्य का भार ही नहीं था । निकलने का साहस नहीं कर पाता है। सबसे अधिक चिता रहता थी उस जिन लोगों को इसमें रहो वाले अदा कुदन का । घइ उसे पदय से प्यार किसान के परिवार पर घटी हुई भयकर करनी थी, और रात दिन उसा की घटनाग्रां की जानकारी है, वे तो श्रधि सेना म जुटी रहती थी। कुदा यदुन यारी-सूनी रातों में पदापि इस पथ पर सरल था। श्रीर उराकी सरलता पर नही याते-जाते। न्योछावर होते हुये उन्दा बरसती हुई अदा के परिवार म चार प्राणी भादियों म कभी-कमी नाच-नाच थे । पत्नी कुदा, लड़का उनल, लड़की उठनी थी। 'सो इस तरह कजरी पामिगी और वह स्वय । नदो के कछार मेघ मल्लार हेमत होली, बहार श्रीर म उराका एक छोटासा सेत था, साग अलापती कृती, लय की तरह जिसम याग माजी उगाकर वह अपनी प्रवाहित होती हुई सी जीविका चलाता या । यदि क्यार कुदा के साथ जीउन पथ को मजिले की रोती से निर्वाह नहीं हो पाता पार करती जा रही थी। और चुदन था तो जगल से लड़िया काट भी था शुद्ध सरनपा सर, जो कि काट कर ले पाता और उसकी पत्नी जीवन के बाराह अवरोह पर निरतर कुदा उहै सर पर लाद र उस पार अपनी हृदयसरी लय को निभाता नगर की डगर गर घूम फिर कर चला जारहा था।
- [३६] एक दिन सम्राट यशोषीर्य के बदलते बदलते जर शिथिल हो गये तो समक्ष उनके मुह लगे मृत्यों ने कुदा निद्रा ने उन पर अधिकार कर लिया। के अलौकिक सौदय की यारी छेड़ा। भमाके साथ बरसात उसी तरह होती और यहा ता कह डाला कि अनेरों रही। थोड़ी देर बाद सम्राट जव रूपसिया उस कृषक स्त्री के समक्ष गहरी सुषुप्ति की गोद में थे, गुप्त द्वार लग्नित होकर नतमस्तक हो जाती है। धारे से उघड़ा श्रीर दूसरे ही वण चार कुदा ये रूप का वए । मुनकर सम्राट खड़ग धारी रनिकानों साथ अनेक काममि से याकुल हो ऐसी भुवन श्राभूषणों से विभूषित अपसरा सी मोहिनो को श्रालिंगन पाश में बाधने सौदर्यमयी रमणीने सिसक्ते हुये शय धे लिये अधार हो उटे। उहाँने मृत्यों नागार में प्रवेश क्यिा । घरगगन इस वो दूर हटाकर गुप्त विभाग के मुख्य समय कुछ कम होगइ थी और अब विश्वास पात्र अधिकारी को धुनाया केवल शाही उद्यान के वृक्षों पर परसनी और श्रादेश दिया कि पाटलपुर की श्रम दुई यू दों का मधुर संगीत चल रहा था। राहयों में रहने वाला उवग्रो युदा को प्रधान रक्षिकाने, मसूर मुखी यात्र यन वह भातरात दूबने के पहिले पहिले के तारों पर मधुर राग्निी का प्रथम विशेष पिलास गृह के शयनकदम चरण छेड़ते हुये सम्राट को जगाया। उपस्थित परे । श्रादेश मिलते ही मे ही सम्राट ने पास खोली रक्षिा अधिकारी दटा और बिजली की तरह ओं ने मुस्कर अभिवादन क्यिा । कक्ष के बाहर सघन प्रधकार में रिलीन रितु मणि मोतियों से लदी हुइ हो गया। मावातों के साथ ही युदा ग्रामों में अॉसू भरकर वातायन मसलाधार बरा हो रही थी। मेघों के से दूर सधनता में दृष्टि गढ़ाये खड़ी रही। गम्भीर गजन ये साय विरलिया भी श्राभूषणों से विभूषित किसान स्त्री कुदा थोड़ी थोड़ी देर में पढ़ा रही थीं। अाज वास्तव म अप्सरासी ही लग रही सम्राट की अधीरता भी क्षए क्षण वढ़ती थी । सम्राट उस रूप को अपलक देखने ही जा रही थी। वे पार बार शय्या रहे । प्रमुख रविका ने विनयपूर्व सतक से उट उठकर पूर्वी गवाह से, दूर स्वरों म यहा कि सम्राट के श्रादे की अमराइयों की ओर दृष्टि शानुसार दन कृषक को स्त्री श्राभू फैलाकर देखने लग जाते थे, किन्नु पनी पणों से विभूपित कर चरणों म प्रस्तुन बरसात में उन्हें कुछ भी नहीं दोच की जा रही है। सनाट ने जैसे उछ पड़ता था। मुना हा नहीं। वे कीलित से जैसे कोई रात साधी बीत गई, सनाट करवटें स्वप्न देख रहे थे। कुछ क्षण बाद वे पाटलपुर [४०] और मृत्यु नौट गई। 4 ० अपने भाप में तब लौट जव कुन्दा के पुतल था पेयल दो यरस या सर की चूडामणि मणिचपों में जलते ये जाने व छह महीपाद उनित देख हुये दीपां दीप्त प्राय म यायक रेरा ये प्रभार में पुतल बीमार पड़ा दमकी ! सम्राट मधुर मुस्तान के साथ मुगम चला गया। पयक से उटे, श्रीर रदिकाए पदा रह गई यामिनी सोधुदन उसे किसी को वहीं छोड़ार उसी द्वार से वापरा तरह सम्हाले हुये उद्भात रधिक की सरह जीवा ये उतार चढ़ाय पार पररी लगाान उस गति का ध्यान था और नमजिल का। रात वाती, दिन मीता, सप्ताह, सम्राट यशोवीय का शासन का महिना थार वर्ष भी बीत गया । मुदा यातक पूर्ण शासया। उसने राज्य में या क्या हुआ यह किसी को भी शात न प्रजा प्रत्याप और दुसी थी। उसमें हो सका । हा कानोंका कुछ दिनों मुह लगे जागीरदार सेठ सहकार और तक यह जन श्रुति अवश्य चलती रही अमीर उमराव रात दिन जनता का कि एक दिन सम्राट ने पिक्षिमावस्था म गोपए करत थे। राय पे छोटे बड़े पुदा का विषपात कराकर मसार से धूर्त अधिकारी निर्धनों को घूमने में मुक्ति दिला दो। सलग्न थे। दुखियों को चीय पुकार जिस रातदा का अपहरण मुनने वाला वहा कोई नहीं था। राना हुमा था, कुदन तर से ही पे पास शिकायत ले जाने वाला देश बड़ी विचित्र मनोदशा में था। द्रोही समझा जाता था, और उसकी उस हृदय विदारक घटना के बाद से कड़ी सजा भुगतना पड़ती थी। उराका साना-पाना सोना राव कम हो सम्राट चारित्रिक दृष्टि से तो गया। रोती काम में उसका जी अत्यन्त दोन पुरुष था। यह इतना नहीं लगता था और मजदूरी करना भी उसने छोड़ दिया था। वह पागलो विलासी और लम्पट राजा या कि विसर्गिक सौदर्यगाली बुल कामिनिया की सी अवस्था म दिन दिनभर अमराई केपिसापने वृक्ष के पास बैठा बैठान राज भय से सदा प्रकम्पित रहा करती जाने क्या सोचा करता था और मन थीं। ऐसे श्रापदापूर्ण शासन में सब ही मन न जाने क्या बुदगुदाया करता लोग येवल भाग्य के भरोसे रहकर था। कुदा अपने पोछे लड़की यामिनी अपना जीवन बिता रहे थे। और पुर कुतल को छोड़ गई थी। एक दिन सम्नाट के जीवन म सबसे गाती थी बारह बरस की और बड़ा खुशो का दिन आया। पटरानी विमावनी को कोग से शुभ घड़ी में पुत्र फुफकारती पर बोलो,दो वर्ष पहलेइयो । ने जम लिया। नमी तक सम्राट की काई स तान न यो इसलिये पुत्र जन्म दिन हुई मा के अपहरण को घटना को की खबर पाकर वे हृदयोल्लास से उछल क्या भूल गये वापू! आप ही कहाया पड़े। मदमाने गाराज की तरह झूमते कि एक न एक दिन ऐसे राजा के विन्द हुए उन्होंने मुग्य रायाधिकारियों को विद्रोह का मरना उठाया जायगा और श्रादश दिया कि राजकुमार का जमो देवी हुद दुष जनता को उसके उदार सिव सार राज्य में बड़ी धूमधाम से का मार्ग मुझाया नायगा । इन पहती मनाया जाय ! और ताव स्वरों म यह हुई हवायो म माँ की चीख पुकार मुझे मा कहा कि ऐसे समय में जो लोग कह रही है कि वह दिन श्रागया है । उदासी अथवा व्याकुलता का प्रदशन कुदन हिचकिया मर कर रो पड़ा । करें उई तुरत कड़ा से कड़ा दण्ड बरबस आसुओं को रोकते हुये दिया जाय। सम्राट के मुख मे यह पिर बोली भयभीत होने की निकल हुने शद का श्रदरश श्रावश्यकता नहीं है वापू ! मत जलाइये पालन हो इसलिये घोषणापत्र तैयार दी। भरी सभा म इसका उचरम किया गया और तुरन्त राग्य य कोने दूगी, म चूम् गा मृत्यु का। मेरी मृत्यु काने में विस्तारित कर दिया गया। रंग लायेगी। मुझे विश्वास है मेरे ममाचार फैलते हा गर-नगर और बलिदान से लाग्य लाख जाता का गर डगर सवत्र यादियों से धनियाँ उदार होगा। कुन्दन श्राश्चय नपिन उठने लगी और जनाकारी हाट-बाट, हो अपनी बिटिया को देवता रहा। चौराहों पर वार-क्याए नाच गान धीरे धारे उसकी आखों से अविरल अश्रुधाराए प्रवाहित होने लगा। सदन सो उस दिश रात को जब सम्पूया के प्रवल वेग म उसासे भरते उसने नगरा रानकुमार के जन्म की खुशी म कहा, 'विटिया | व्यर्थ की पित्ति मोल दाप से चमचमा रही थी, पाटलपुर की न लो। नो राजा है, जो राशक्त है श्रमराइयों में प्रगाढ़ अंधकार था। उसका हम क्या बिगाड़ सकते हैं! भय से कातर पुदन ने याखों में नादानी छोड़ो और चार दीये तो श्रामू भरकर दोपमालिका जलाई तो सला हो दो। यामिनो ने नकारात्मक चौदह वर्षीय यामिनी शेरनी ही तरह सर हिलाया और दृढ़ता पूर्वक बोली, दौड़ी और सब दिये बुझा दिये। दुदन 'नही, नहाँ, अाजदीप मालिकाए हां, ने १च प्रावाचक नाखे सोले हुए ज्वालाएं धधकाऊ गी' 1 इदन चुप उसकी भोर देखा तो नागिन की तरह हो गया। मुछ देर सोचता रहा, फिर करने लगा।
[१२] कुदन और उसकी प्रोखों में भी लाल लाल डोरे यह रहे थे, और कुटिया की छत पर उभर याये । उसकी स्मृतियां जाग उठी छाई हुई पल्लवित डालिया भूम भूम और उसकी भगे भरी नासा के सामने पर मुक्ति गीत गा रही थी। कुदन कुदन की चीसनी चिप्लाती मुद्रा साकार और यामिनी को द.ढने के लिये हो उठी। अाखिर रात चीत सिपाही श्रमराई में चारों ओर दौड़ गई और पाटलपुर की कुटिया ने पड़े। भान फी यात में सब दूर उनके दीपोत्सव में भाग नहीं लिया । भाग निरलने के समाचार पैल गये। सम्राट यशोवीर्य के प्रोध का ठिकाना दूसरे दिन प्रभात कालीन हिरणे न रहा । मुरय राज्याधिकारी की नाशा ज्य शाम्र परुलां पर थिरक रही थीं, से सारे राज्य म ढिंढोरा पिटया दिया और कोयल यूक रहा था, सम्राट के गया कि जो कोह सिपाही गुस विभाग के निर्देशानुसार यामिनी को श्राश्चय देगा वह मृत्यु बुदन और यामिनी को पकड़ने के दएन का भागी होगा । सम्रट लिय श्राये । कुटया का द्वार बद था। के हस्ताक्षरों से घोषणापत्र भी सिपाहियों ने पहिले शीम ही बुटिया विस्तारित पिया गया हिजो को इन को घर लिया, और फिर उनक सर दशद्रोहियों को जीवित या मृत अवस्था दार ने श्रागे बदवर द्वार खटखटाया में सम्राट के समक्ष उपस्थित करेगा यह दार खटसटाते ही भीतर से किसी की क्षीण नानाज श्रई, किन्तु द्वार जीवन पयत सम्राट का विशेष कृपा पात्र रहेगा, यहा नहीं उस बाद उसकी सुला नहीं। वारुपी के मद में चूर सरदार ने क्रोध से उबन कर पाव की पीदियों को मी रायाभय मिलता रहेगा। पक ठोकर लगाइ, कपाट खुल पड़े। दिन पर दिन पर बीतते चलेगये। उसी क्षण एक काली बिलाई गुर्राती झटती बाहर दी और देराने ही इदन और यामिनी का कही पता न देखत घने वृक्षांमें विलीन होगइ । सिपा हो लगभग एक वर्ष रियों ने पुटिया में प्रवेश क्यिा। बाद एक दिन उदन और यामिनी कुटिया सूती थी। सरदार पाश्चयं के रक्तिम हस्ताक्षरों सहित एक और भय से टिटका रह गया। उसने 'मुक्तिपत्र राजधानी के प्रमुख नाकीर्ण ऊपर नाखें उठाई तो देखा कि एक चौराहे की मीनार पर चिपका हुश्रा भोर से छत तुली हुई है वह सब कुछ देखा गया। उमम लिसा था दुख की सम्भकर भी कुछ क्षए इधर उधर रात बीत रही है और अरुणोदय होने देखता रहा । उस समय वासी म अब दर नहीं है। हमारे लास लास हपाशा के झोंके इस पार से उस पार माहयों और वाहनों । युटिया की चला।
मनुष्य को अहिंसा (पर सुखीकरण) धर्म की आवश्यकता क्यों ? मनुष्य को अहिंसा पर मुग्वी करण) व्यवहार करे, जैसा को वह दूसरों से धर्म की श्रावश्यक्ता यों है कि मनुष्य चाहता है। जो चाहता है, वह उसे बिना अहिंसा अतएव अहिंसक (सरल सत्य धर्म के प्राप्त नहीं हो सकता। माम्य) व्यवहार का नाम पड़ा धर्म । मनुष्य चाहना है सुप । अर्थात् जैसाकि ऋषि वाक्य है कि- मनुष्य चाहता है कि दूसरे मनुष्य उसके 'श्रूयतां धर्म सवत्व श्रुत्वाचवावधायनाम्। श्रारमन प्रतिकूलानि परेपान समाचरेत् ।" प्रनि अहिंसक (सुग्वकर हितकर सरल श्रयान्-धर्म का सार सुनो और सत्य) व्यवहार करे। -मन, वचन, मुनकर उसे हृदय मघारण परो । तन, को अविरूद्ध सम्यक एकता का दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार मत करो नाम है, सरलता अथवा सत्यता । कि जिससे, जिन दुपद परिस्थितियों परन्तु यह तभी सभव है जब कि को तुम नहीं चाहते हो, ये उहे प्रास यह भी दूसरों के प्रति वैसा ही साम्य हो जाय। भोर दखो वही से हमारी मुक्ति का प्वनि कुटिया के चारों ओर निरतर सूरज निकलेगा। यह विश्वास करतो मदरा रही है । इसलिये अधड़ो, कि सम्राट शाम को मी इस मुदर तूफानों और पनघोर बरसाता में भी संमार में अब हम सोवित नहीं रहने गिरती पड़ती युटिया गहरे विश्वासों की धरती पर आज ज्यों की त्यों पड़ी जिस समय लोग यह रक्तिम है। लोग कहते हैं, त दिनां रात दिन मुक्तिपत्र पढ़ रहे थे, दूर रानप्रासाद में कुटिया में मणिपराग और नागिन पादित्रों साथ मगल सूनक ग्रहनाद का जोड़ा फिरता रहता है। देखने बहुनही क्षीण और विश्व स्वरों में वालों ने तो यहां तक देखा है कि बोल रही थीं। अंधियारी राठों में कभी-कभी वे दोनों प्रखर प्रकाश युक्त मणि से पन-पयों सो, यह है पाटलीपुत्र कीअमरा इयों में निगेयं कुटिया की कया। को दूरतक द तिमान करते हुरे इटिया के दर परराव-रात भर पहरा दिया इन दिनों से उरोक मताय को करते हैं।
मनुष्य को [४] सारय यह निकला कि-णि लिपे पशुकला। पाने मनुष्य को (पर मुग्यो करण) की पापा मनुष्य मनुष्य का शिता भाग अन्य का पर्म है। किसीका नहीं। यदि यह टोक है सचमुन मास तो माप्य पशु से भी चाहिये कि वह हिंसा को पर्यायों से गिर गया है। श्री अगजीवनरामो ठोकपदा है- पचा रहे । अन्यथा प्रतिमा पर मुन्नी "भाशाल माय को अपश परण घम) की साधा ही सोगी। पगुना में अधिक पारस्परिक स्नेह हिंसा की पयायें यह है- दिाई देता है। क्योकि पशु पानी १ मिग्यात (अनात्मवाद वमा भूल मिग तो के बाद दूसरों की एकांतवाद) पेर मरने कीशागत वो दे देना है। परन्तु मनुष्य तो अग्नी अपर पूरी ४को, मान, माया, लाभ। २ काम (सा पुप ना एक निगों हिमा लेने मी देता।" होने के बाद भी दूसरों को उनका में शासदि)। यही कारण है कि भाज मनुष्य ६ हास्य रवि परति शोक भय मुमो नजर नहीं पा रहा है। जुगुप्मा (त्या)। अाजका माप अहिंसा (पर मुनी द्वार फा सही मार्ग- पिब्यासीका उपदश है- करण) धर्म को त्याग कर हिंसा को उस पयायों (अथ काम मह) "उवयाविरोग्यप नेय शिद पोतिम धारे (नादमें) लगा हुआ है-- दूसरों धर्मादयश्व कामच सधम नि से पते । में मुख साथ का रटवारा करना अर्थात्-मऊना हाथ कर छोड़कर अथवा "जियो और जाने दो पुकारता है, पर मरो कोई गुनता नहा। इस हिसावाद (आध्यात्मिक साम्य घम में ही अप काम समाया हुआ है। पाद) को छोड़कर मुख साधनों ( एसे सरल धम का लोग क्या सया नही फाम) का लूट खसोट में लगा हुआ है। श्राज यह ऐसा भयंकर स्यार्थी हो सर गुरुदास मनर्जी (गा और गया है कि इसके स्वार्थ के शिकार अन्य कर्भ में) लिस1 - चराचर पशु जगत तो होता ही है इतने प्रविधिन रूप से य हुए है कि "मनप्यों में साथ और पराध परन्तु स्वय मनुष्य मी मनुष्य का शिकार होता है। पशु जगत से सुरक्षित रहने हो सकता।" सथा स्वार्य परार्थ छोड़कर हो ही के लिये मनुष्य इतना प्रयत्न नहीं करता जितना कि मनुष्य से सुरक्षित रहने क भी ५ राजमल (वाम्यामी में) " लिखते हैं- 'प्रामे तरागिपामग रक्षणं यामत स्मृतो! अपेक्षा अधिक मनोहर नहीं है। इस तर स्वात्म रक्षाया कृतनातपरत्र यत् ॥ सरलता से न रहने पर सभ्यता की अर्थात- अपने से मिन दूसरों सारो सुदरता जाती रहती है । क्योंकि को रक्षा का नो विधान है, वह केवल स्वास्थ्य नहीं रहता। मनुष्य प्राति का अपनी ही रक्षा के लिये है। इसम स्वास्थ्य सरलता ही है। वस्तुत दूसरों की बात कुछ नहीं है। 'यदि सम्यता प्रत में सरलता के म गाधी कहते हैं- साथ में सम्मिलिन नहीं होगी तो उसे "हिंसा श्रात्मपाती है । उसके अपने श्रादर्श की पूर्णता भी प्राप्त नहीं सामने यदि प्रतिहिंसा न हो तो यह हो सकती।" जिंदा नहा रह सकती।" श्री वकिमचन्द्र (चौवे काचिढामें) लिम्बते हैं- एक गुरुजन का कयन है- 17 जाने यह मनुष्य समान कब "हम परसर में हृदय से मिलने सच्चे मुस के पाने का उपाय खोनेगा। क लिय श्राये थे-माद माई मनने के जितने पिदान, युद्धिमान दार्शनिक, लिय श्राये थे, परतु अपनी दीनता के और तत्ववेत्ता है, वे सब मिनकर देखें कारण वैसा न कर सक और वादी कि औरों को सुसी बनाने के सिवाय प्रतिवादी बन गय । जिस दिन हम अपने मुग्वी होने का और कोई उपाय मोग अपने पाने का उद्देश्य पूरा कर है या नहीं। मैं कहता हूँ कि नहीं है। लेंग, वह दिन हम लोगों का यथार्थ मुप का दिन होगा।" मनुष्य के मुख्य का मूल कारण दूसरों को श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर (विचित्र सुग्वी करने के सिवाय और नहीं है। अवध में) लिगते हैं- पान जैसे लोग धन मान श्रादि के पीछे "सारे भान और विश्वास को पागल एसे फिरते हैं, वैसे ही एक दिन पा (सम्यक) करके अपने स्वभाव सारी मनुष्य जाति दूसरों को सुली (कार्य) पे साथ मिला दने का नाम बनाने के लिये पागल हुई फिरेगी। म सरलता है । यही मानसिक स्वास्थ्य है। मर कर मिट्टी में मिल जाऊ गा मगर तरह तरह के ज्ञान तथा ओक प्रकार मेरी यह श्राशा एक दिन अवश्य केमतों का नाम स्वास्थ्य नहीं है। "सरल विश्वास मनुष्यत्व का सब इस प्रकार मनुष्य को अहिंसा से बड़ा प्रधान अंग है। यदि मुझसे (पर मुखो करण) धम की आवश्यकता कोई मेरे हृदय की यात पूछे तो म साफ है । भारत की यही मु सस्कृति है। साफ यह कहूगा कि ससार में और बिना इसके मनुष्य सुखी नहीं हो दूसरी कोई भी वस्तु सरल विश्वास की सम्ल होगी। सकता।
शतादियां के श्चतराष्ट्र से
नाम विज्ञप्ति मात्र है।
संसृति मे द्विविधा या एक अति भयकर अलानचक्र
अपनी सम्पूर्ण उष्णता के साथ श्रास्तपान है। इस निरन्तर
प्रवहमान अग्निचन की प्रचलित अराओ और अविश्रांत
श्रावता में एक भैरव सघषणा है । वस्तु अवस्तु, प्रात्म अनात्म,
नाम नाम क्यनी परनी, आलोक तिमिर श्राग पानी और
जीवन मरण पा यह विराम विहीन संघर्ष जगत के होने का
इकलौता प्रमाण है । इस महायुद्ध के दामन में नींद ले रही
विश्व का दुग्धारमा के दर्शन नाम है मोच और अदर्शन फा
नाम हे जगत ।
अस्तमित नामों की घुमती नागती
के लिये आये उपासकों के अताल में
मिामिलाहट के बीच प्रकाश इम दिविधा का निरन्न र द हिड़ा था।
प्रकार झून रहा था जैसे तक्षशिला ज्योति और तमम् , क्यनी श्रोर करनी
बिहार के प्रवारण वनमण पर निश्चल
जिदगा और मौत, पानी और श्राग,
मैटे बोधिसत्व के तपस्या से अत्यत
पस्तु आर श्रमस्तु के घोर युगों से छिडे
स्पीर मुग्वमदल पर विराग । तक्षशिला युद्ध को देख बोधिसत्व की विचारणा
के प्रासादों का रव बोधिसत्त्व को पलकों मौन थी। उहाँन पहिरग + माना
पर पहुँनकर नारव हो गया था। घर से लड़ना छोड़कर अतरग के मानव
भगवान अमिताम के मुख पर अतिशय से युद्ध श्रारंम दिया था। भगवान बुद्ध
गतिशीलता के साथ विचार डूब उतर
का दैनदिनी का प्रमुख कार्यक्रम उप'
रहे थे उधर उसमदा और दशना
काल में परिवेण चंक्रमण पर बैठकर
जोककन्च मनं दिखा धनपालिन्च दुग्गा,
पथकञ्च धने मूलई पापको पुनरागतो।
-लामसिद्धि जातक
. x उपासकों श्रामणेरों, शिक्षमारोंग और को समझो। मन से गिरवर युर परो। भिवाओं को देखना दना या वक्षशिल नाम कर्म का मैद गत राममो। यश के सहस्त्रों नागरिक मानस में शान की प्राति के लिये रसे गये नामों का । तर पिपासा लिये प्रतिदिन परिवेष वस्तु मे कोई सही है। श्रमज्य में पहुँचते श्रार शास्ता को अमृत-वाणा यानुनों वे समारोह में से विशेष के प्रहण करते। लिये धिारित सुक्त ही नाम है। प्रभी बोधिसत्व का ध्याा दृटा हो म तो पुगरने के लिय है उनका था कि उनकी दृष्टि सय प्रति शिव पास्तविकता से विशिमात्र भी सपर मारण भिवायु 'पापक' पर पड़ी। तथागत नहीं है। प्रत्येक पदार्थ एक क्षण म मे दखा पापक के निष्प्रभ मुग पर नाम जो है दूगरे पण यह, वह नहीं है । जात् धनाम का भैरव रुपात एकषित था। पानी प पुसद की तरह भगुर है। यह कमी नासिकापुरी म प्रश्वारा रोक x X लता तो कभी महाकार सप की तरह निश्चित समय पर दशना विस उस सिसकार देता । उसकी मुख- मुदायों का बनना मिटना अभ्याम जित हुइ और बोधिसत्य परिषेण पे कर रह चित्रकार पे चित्रपट पर प्रमुख अध्यया यर में चले गये। रनी मिटी प्राकृतियों का स्मरण दिला किनु परयुगा पापा २ मानस में नाम-बमका श्राकपए भिवषण धारभ रहा या यद्यपि पारक का मानस मुस पर श्रा। यह याहरी बात पर विचार श्राकार कई मार उलीच नाता पर करने पाला युगा है। उसकी ग्रांतों व सर उघ क्षणों के उपरान्त अल-पात्र की पुतलियों पर विचार हम तरह ममथित बारीक मिट्टी की तरह पुन दौड़ा करते हैं जैसे भयर श्रांधा म समनल हो जाते। पापक का ऊहापोह तिन । यहाँ तक कि पलकें अोद लेने पर भी उसका दूद सपर उभर के प्रति दिक्तमाव होते हुए बोधिसत्व नाता है। वह अहरह पहिरग ये ने यथासमय देशना प्रारम को। तपस्या को सरह उप्ण और विक विश्लेषण में यस्त रहना । कर्म को अपक्षा नाम की सिवि की उहापोह की तरह सालित स्वर म शास्ता ने पापक म अधिक है। इसीलिये पर यमी कोई उसे पापक कहार पुकारता 'उपासको । संसार में दुख ही है तब वह पापर प्रहार पाये रुप दुख है । अयानु दुम्ब का माग है। की तरह भीतर ही भीतर रिखार राग से बचो। विराग को ग्रहण करो। उठना है । अतरग में मिल अग्नि शरीर को अधिक कष्ट मत दो। प्रात्मा की तरह महक रहना उसका स्वभाष है। पह सोचता मेरा नाम 'पाक' है। अभी चला हो पा उसे तवतिमा निश्चय ही मने श्रागिनत पाप किये के उपर क्षेत्र में एक मृत्युका पाद नागे तभी तो मेरे ग्राम शरीर मिला। जोगा को स्थिरता विचार के साथ यह विमति जोड दारद है। में ना उतगता मे इस वा आगे यो अनरग स यह पूरी तरह पिण्याय पदा उमे शर-यात्रा दिखाई दोश है, पर रहिरग का पाप उस पर एत यात्रियों से पुख्ता करने पर उस पदा छत्र होकर बोल रहा है। उस पापा लगा कि 'जीया, नाम: नागरिक का सम्बोधन से गिरविन हो है। उसका दार हो गया हथौर उमा पारि यश चल तो यह क्षणभर म इस विशति वारिक उमे उनका दाकिया ये निय का यदल हाले । चितो काले साँप की ले जा रहा है। इगा समय पाप ने तरह उसका श्रमागनि म उग्रफ गारपूर्वक एक राय । गात्री में रन श्रवरग म ड मारने लगा है। इसी किया-'का नाम क्या था।' लिये सारजनिक देशना की समाप्ति पर उसने बोधिसत्व स ग्रामह किया "कार" 'मते । मेरानाम अशुभ और अमांग वया जीपा मी इस तरह मरा लिक है। मुझे इसमे विरक्ति हो । करने हैं। आम की नित्यता यस्तु की है। प्रभो मुझ पर शाम +1 का नि यता को प्रकट करती है। या यमुग्रह कर। नगंभय है। 'श्रायुष्मार नाम ना मतमात्र "मते मनो प्रति मात्र है। है । वह तो बुलाने भर को है। म यह तो सम्बाधा काम है। रासार से किसी प्रकार की श्रथ सिद्धि म 'जीवर'बार'जीव' ममी मरा होनी । तू इसी नाम स स रह।- करत है। शवयात्री ने विराम्रभाव स शास्ता ने विक श्रार निवारणायक पाम को उपदेश दिया। प्रन्युवर दिया। लगी। किन्तु जब पापक न बार बार प्राग्रह किया तो तयागत न उमे श्रादेश दिया कि-'मतपत दश देशम परि भ्रमण कर अपनीमच कानाम दूर तेरा नाम वैसा ही रख दिया है x x प्रान में " धनपालो।" मन की सतह पर पाते बैठते युगल कपोनों पर शरीर का समग्र विचारों से उलमना मुलझवा वा वन र सिमट अाया। वह नापाद स्वेद ग्रिना के प्राय सोमात पर से माग उठी। उसकी शरीर यटिको प्राचा । यह उपनगर प्रेछिन् ग फर किन रोमाली पापर के समग्र प्रश्नों को बस्ती है । यहा तक्षशिला के ऐश्वर्य का उत्तर देने के लिये तसरता से का प्रावर्तन विर्तन होता है। पापक उठ बैठी कितु लज्जा ने झिडकार अतिशय निश्छल भाव से गगन चूमती उसे वहीं परज दिया। यह सिर झुकाये प्रालिकाओं को देखता यागे रद रहा भूमि अरेदो लगी। पां। प्रोगा पर पड़ी स्यणाम झालरें एन के मोक विक्षिप्त मन पापक ने नारी सौदर्य पर चितामात विचारों प्रति ग्रनायास ही उगाये स्वाभा की तरह मल रही थीं । स्त्र पुरुष नम की नलिमा से उतर कर प्रताची विक श्रापर्षण को श्रनमियत रखने की लालिमा में डूब चला था। दिन हुए पृछा--- " तुम्हारा नाम ? मुमपम्फ नये बन रहे प्रासाद से भमिकवर्ग पहियां की भाति लौट रहे थे । अनायास ही वह उस "धनपाली !!" पालक ने विस्फा और बढ़ गया। अब वह प्रासाद की छत रित नेत्रों से श्रमिक कन्या के शरीर को क ठीक नाचे भाग्या। यहां अमित को प्रायोपान पढ़ डाला और बोला- पारिशमिक वितरित किया जा रहा "फिर तुम इतनी दरिद्र क्यों हो?" या। विन्तु इन सब अभिजात नाटका को चोरनी हुई पापक की हाट मुमेधर 'भते!" धनसली ने गमीर होते के द्वार पर चिलम बिलख कर रो रहा हुए कहा-"नाम में कोई सिद्धि नहीं। एक दरिद्रमिककया पर ठहर गई। नाम पे साथ कम की सगति श्रावश्यक उसने रुदन कर रही कन्या के समीप कम को सिदि नाम की सिद्धि से पहुचकर पूछा- श्रेष्ठतर है। 'धनगलो' हो या 'अधन "भते तुम्हें कौनसा दुख है।" पालो मतिय तो शनिवायदा के साथ "तात, न पूछिये ! मैं अमिक कन्या प्रकट होता है। हूं। प्रतिदिन श्रम करती है और जो कुछ मिल जाता है उससे अपना और उत्तर पाकर पापक श्रागे बढ़ गया। अपने परिवार का उदर पोषण करती धनरालीको बानों ने 'नीवर के शव पाहते कहते श्रमिकन्या से मिले 'शिव' को और भी दृढ़ कर की परीनिया पर प्रोसू लटक गए। दिया। देखते देखते यह किसी बोमाली दिया। [roj श्राति से घिर गया । मनमें प्रायोजन किया गया है। इसीलिये गमौर चिता ठहरने को हुई ही थी पथक भी पय भ्रट हो सकते हैं, अश्या कि श्रायुध के धनुष से छूटे वाण की भो। तरह पूरी सर्राहट और गति के साय 'तो'नाम' का कोई महत्व नहीं।' उसका मा फिर हाथ से मिल गया । चिरति उसके डा विजन "सर्वथा नहीं, मते। पन की ओर कर दिये । नाम प्रनाम के समय में व्यस्त 'पाप' ने वन में एक पापक ने पथरु को सकेत दिया रेंगती सौ छाया देयी । वह पूर्ति में और यह पाटलिपुत्र की दिशा में चल साथ उसके निकट पहुँचा और प्रश्न किया कि-'तुम कौन हो, मते ! पापक बोष परिवेण में लौट 'पथिक'-थका सा स्वर उस विजन धाया। अब उसरे मुख-मान पर एक अपरिमेय मतोष, वीतरागता और वन में गूज उठा। विरति छा गह है। शास्ता ने पूछा-- 'तुम्हारा म 'मते' इचिका नाम मिल गया। पपक' 'नहीं, भन्ते अतुमधान विफल रहा मैंने अपनी यात्रा में दसा कि जीवई' 'यहा क्या कर रहे हो।' भी मरते हैं, 'नजीवक' भी धनपालो 'मग भटक गया हूँ उपासक ! है, बा दाग तो बड़ा मह मानूगा । मी मुझे पाटिलिपुत्र पहुंचना है।' है अपथ' भी भगान् ! लगत् मिथ्या है, अस्थिर है, भंगुर है पर तुम 'पयक' होकर पथ मुझ स्थविर की दीक्षा दोनिय प्रमो कैसे भूल गये, मते ! यह तो बड़े श्राश्य का यात है।" युछ ही क्षणों के उपरात आस- वर्ग ने देवा पापक' शमिनामक "मने, मम तो फेवल पहचान चरणों म यह कहते हुए कि 'न है उसका वस्तु की वास्तविकता से कोई विशति मात्र है, सिद्धि कर्म में है। सम्पच नहा । अविशप म से विशप को वर्ष भर के शिशु की तरह लौट रह दूद निकालने के लिये ही सजाधों का था। श्रनिराली पयर हाते भी । पय संस्कृति का जीना मरना नहीं होता हाई नही कर दायो मिलकर सरगति का निमाण करती हैं। और फिर सस्कृति में मनर का जितना बोई है वपुस का उतना नहीं है। पति और सभ्यता का सबसे बड़ा और युनियादी पर्क यही है कि रास्कृति मन की नौव पर गपनी प्राचरि खड़ा करते है और सम्यता अपनी जड़ें वपुस में रोपती है। चूति सत्ताविका विकास टीक उसी तरह का है जिस तरह भूगम म प्रास्थियों से पापाए, कोरले से हीरकरण और क्षार पदार्थों से गधक का, इसलिये उसे अरमान था मनीने प्रयत्नों से जब चाहे तब बदला नहीं जा सकता। रास्कृति का विकास मानवीय नियंत्रण से परे एक ऐसा विकास है जो युगों से निरतर चला आ रहा है और जो नित्य नवीन और सतुलित है। एटम और ईव, मनु और पक्षा या और मा अधिक न्यायहारिक होने पर यो वह कि श्रादि पुरुष और प्राद्या शारी के ग्राभ्यान्तरिक सबों का निरन्तर रूप ग्रहण करते रहना 'सस्कृति' है । जिहे हम श्रादिम प्रवृत्तियां या इस्टिफ्ट्स' कहकर पुकारते हैं वे ही सस्कृति के तल पी तत्वों की धातुए है।ही धातुओं के सयोग और वियोग, भाकपक और विश्परा से सस्कृति का मरना जीना होता है। सचाइ तो यह है कि संस्कृति का जीना मरना होता ही नहीं। सहस्रों श्रदों से चली आ रही सस्थति पर अपना प्रवाह बदल कर उसके समाना तर युर्गा से चना आ रही पस्मृति के प्रभाह म मिल जाती है और जब परवर्ती या प्रवर्ती प्रवाह का पानी रग बदल लेता है तब हम कह उठत हैं कि एक सस्कृति दूसरे पर विजित हुई है। पर पारमार्थिक राचाह इससे परे यह है कि विकास की प्रक्रिया में कोई जीता मरता ही परन् निर्वाध चले पा रहे प्रवाह को बल देता है, योग देता है। 'श्रमण सस्कृति' मी एक ऐसा ही प्रवाह है जो प्रागैतिहासिक काल से मनुष्य की श्रादिम प्रवृत्तियों के याविकपण, विजय पराजय को सरगों का पालोपन दिलोडन सहना अवता विद्यमान है। चूकि 'श्रमण' में मिहनत का खरा पानी है इसीलिये यह 'श्रमिक समृति' अपना पानी, अपनी प्रतिष्ठा पान तक बनाये हुए है। वपस्या को इटों से जिस भोत की चिनाइ हुइ है उसकी दीवारें इतनी मजबूत है कि प्रालेय प्राधियों के श्राने पर भी उसके ढहने का कोई डर नहीं। श्रमण सस्कृति के 'माइल स्टोन' महाभमण अषम, पाश्व, नेमि, महावीर, बुद्ध, कविक्षल, गांधी, विनोवा सभी है और फिर अभी ५५ समाप्त नहीं है मोष जैन M धर्म और पथ 40000666062 . प्रथम अर्थात् धर्म में प्रदशन -१० मुखमाल सपको होता है। यह यात्मा 4 श्रदर से उत्पन्न होता है, वहाँ स्थिर रहता है, वास्तविक अभेद भूमि को भूलकर भेद' और मनुष्य को उमा अोर प्रार হী লঞ্চ থিকাধিক রা কারা? करता है। जबकि दूमर अथार पथ दूसर का दुस उस पर असर नहीं म बहिदशन होता है। वह माय वाता परता । अपने मुख के लिए वह वरण तथा दसादग्बी स उत्पन होता लालायित रहता है। या यां काना है, इसलिये बाहर की धार आकृष्ट चाहिये कि उस मनुष्य के मुख दुःख करता है और मनुष्य को बाहर की दुनिया के मुग्व दुखों से सर्वधा अलग तरफ देखने में रोखता है। हो जाते हैं। इनमें मनुष्य को अपना और पराया ये दो शद पद पद पर धन गुणजीवी और गुणावलम्बी पप स्पतीया और रूपावलम्बा। याद बात है। धर्म म स्वाभाविक नमता होने के कारण मनुष्य अपने की उसका आधार बाहर रूप रग और ऊपरी अाडम्बर है। वह वेश, कपड़ों अभिमान मरोहा कोई बात ही नहीं छोटा और हलका समझता है। उसमें का रग, पहनने की राशि, पास रखो थे साधन तथा उपकरण की ओर शेती । चाहे जितने गुण तथा सम्पत्ति विशष रुचि दिखलाता है तथा उही प्राप्त हो जाय वह अपने को सबसे छोटा ही देखता है। धर्म में ब्रह्म अथात् का आग्रह कराता है। सच्चे जीवन की झांकी होने से उसकी घम म एकता और अभेद के भाव यापकता के सामने मनुष्य को अपना उठत हैं और समानता की तरगे उछ यक्तित्व हमेशा छोटा सा प्रतीत होता लती है। पथ म भेद और विषमता की है। पथ में इससे उल्टा है। इसम गुण दरारें पड़ती और बढ़ती जाता है। और वैभव न होने पर भी मनु य घम मे मनुष्य दूसरा के साथ भेदभाव अपो को दूसरों से बात मानता है भूलकर अभेद को और भकता है। और दूसरों से मनवाने का प्रयल दूसरे के दुव में अपना सुख भूल जाता कराता है। उसमें यदि नम्रता होती है, या यों कहना पाहिये कि उसके है तो वह बनावटी होती है। उस मुख दुख कोई अलग वस्तु नहीं रहते । मनुश्य को सदा अपने बड़प्पन का दूसरों के मुष दुख ही उसके सुख दुख खपाल बना रहता है। उसकी नम्रता बन जाते हैं। पथ में मनुष्य अपनी बड़प्पन का शोषण करने के लिए हती है सचे जीवन को मौकीन होने पान दिया बाता है। अमुक व्यक्ति के परम गुणों को अनवता तथा किस बाति का है। पुरुष है या स्त्री। अपनी पामरता का भान न होने से उमर क्या है ! वेश कैमा है ! कौन सी गरय पथ में पड़ा हुआ मनुष्य अपनी भाषा बोलता है। किस प्रकार उठता सा का अनुभव नहीं कर सकता। बैठना है ! पथ में ही बातों पर पहलघुता का केवल दिखावा करता। ध्यान दिया जाता है। इहों को मुल्य मान कर चारित्र को गौण पर दिया धर्म म सत्य की दृधि होती है। उसमें मी ठरफ दलने तथा जानने जाता है। बहुत बार ऐसा होता है कि का धैर्य होता है। सभी पक्षों को सह जिस जाति, लिंग, उमर, वेश या देने को उदारता होती है। पथ म चिह की पथविशेष के मायायियों में ऐसा नहां हाटा। उसम सत्याभास का प्रनिष्ठा नही है उई धारण करने कोई ररिहती है। वह सम्पूर्ण सत्य को अच्छे चरित्रवाला व्यक्ति भी पा जाय अपने ही पन म मान लेता है इसलिए तो वे लोग उसकी तरफ ध्यान नहीं दूसरी तरफ दखने तथा जानने के लिए दते । कई बार तो उसे अपमाीित उमा झुकाव हो नहीं होता। विरोधी कर निकाल तक दते हैं। पड़ों को सहने अथवा समभो की उदारता उसमें नहीं होती। धर्म में सारा ससार एकही नौका है। छोटे-छोट चौक न होने के कारण घम में अपना दोष दशन मुरन्य उसमें छुवाछूत या घृणा देष की बात "ता है और दूसरों के गुणों का हा नहा । यदि कोई बात बुरी समझो दर्शन मुल्य होता है। पथ में इससे जाती है तो यह कि प्रत्येक व्यक्ति को उलग है। पथवाला दूसरों के गुणों अपना पाप ही बुरा लगता है। की अपेक्षा दोष ही अधिक दखता म चौकेबाजी इतनी जबर्दस्त है और अपने दोषों को अपना गुणों को होती है कि हर एक बात म छुवाछूत अधिर देता है । अपने हो गुणों की गघ पाती है। इसी कारण पंथ का बखान करना रहता है । उसको पालों की नाक अपने पाप अखिों में अपने दोष पाते ही नहीं। दुर्गध तक नहीं पहुंचती उई जित- घम में केवल चारित्र पर ध्यान दुगंध अपने पथ के बाहर दिया भाता है। जाति, लिंग, उमर, संपाती है उतनी अपने पाप से नहीं वेश, चिह, माषा तथा दूसरा बाल स्वयं जिते स्वीकार कर लिया है वस्तुओं के लिए उसमें स्थान नहीं है। उ है मुगधिन लगता है। अपना पा पंप में इन बास बस्नुओं पर ही अधिक हुश्रा रास्ता ही भेट दिखता है पथ . वात धर्म और पथ । 100440000००० प्रथम अपात् धर्म म प्रदान - मुखमाल सपवी होता है। वह प्रात्मा ५ अदर मे उसन्न होता है, यही स्थिर रहता है, वास्तविक भेर भूमि को लकर भर और मनुष्य को उमी श्रार प्राप की तरफ अधिकाधिकरता जाता है। करता है। जबकि दूमर प्रभात पथ दूसर का दुल उस पर असर नही मनदिरान होता है। यह पाग पाना करता । अपने मुग के लिए का वरण तथा दवादला स उत्पन होता सामायिन रहता है। पापा काना है इसलिये बाहर की प्रार प्राइष्ट पहिये उस माप मुग्न दुम करता है और मनुष्ण को बाहर की दुनिया के मुख्य दुई से पथपा अना तरफ दबने में रोक रखता है। हो जाते हैं। इनमें मनुष्य को अरना धौर पराया ये दो राम्द पद-पद पर धनं गुणनोवा और गुणावलम्बी है। पय रूपतीवी श्रार पावलम्बी है। याद पान । म मामाविर नम्रता हराने के कारण मनुष्य अपने में उसका प्राधार मान्य रूप रंग और ऊपरी श्राइबर है। या वय, कपड़ों छोटा और उसका समस्या है। उपमें घमिमान मरोसी को मातही नही का रग, पहनने की रानि, पास रखो साधन तथा उपकरणों की ओर होती। चाहे जितने गुण तथा समाधि विशप चि दिखलाता है तथा उही प्राम हो डाय या अपने को सबसे छोटा का श्राम कराना है। ही देखता है। धर्म में बम प्रचार सच्चे जीवन की झोकी होने से उसकी धर्म म एकता और अभद के भाव व्यापकता के सामने माष्य को अपना उठते हैं और समानता की तरगे उष्ट्र लती है। पथ में मेद और विषमता की है। पर इससे उल्टा है। इसम गुप पतित्व मशा छोटा सा प्रतीत होता दरारें पड़तो और बढ़ता जाता है। और वैभव न होने पर भी मनुष्य धर्म में मनुष्य दूसरो क साथ भेदभाव अपो को दूसरों से PP मानता है भूलकर श्रमद की ओर झुकता है। और दूसरा से मनवाने का प्रयत्न दूसरे के दुख म अपना सुख भूल जाता कराता है। उसमें यदि नम्रता होती है, या यों कहना चाहिये कि उसक तो यह बनावटी होती है। उस मुख दुख को अलग वस्तु नहीं राते। मनुष्य को सदा अपने मन का दूसरों के मुरा दुख ही उसके मुख दुख खयाल बना रहता है। उसकी नमक्षा बन जाते हैं। पथ में मनुष्य अपनी वापन का शोषण करने के लिए होती है सन्चे बीवन सौ मौका न होने पान दिया बाता है। प्रमुरुम्पत्ति के परम गुषों की अनन्तता तथा किस जाति का है! पुग्ण हे या स्त्री! प्रश्नी पामरता का भान न होने के. उमर क्या है ! वेश कैसा है। कौन-सी रय पथ में पड़ा हुआ मनुष्य अपनी भाषा बोलता है ! किस प्रकार उठता पुता का अनुभव नहीं कर सत्ता ! बैठना है ! पथ में रह पादों पर लघुदासा देवज्ञ दिप्तावा करता। ध्यान दिया जाता है। पहों को मुग्न्य मारकर चारित को गौण कर दिया धम में सत्य की हार होती है। समें सभी तरफ दावने तया मानने जाता है। बहुत सार एमा होता है कि धैर्य होता है। सभी पक्षों को सह मिस जाति, लिंग, उमर, वेश या ने को उदारता होता है। पय में शिका पविशप के अनुयायियों म रेशा नहीं होता। उसमें सयामाग को प्रनिया ही हैं उहें धारण करके कोई दृष्टि होती है। वह सम्पूर्ण सत्य को अच्छे मरित्रवाना व्यक्ति भी पा जाय प्रश्न ही पद म मान लता है इसलिए तो वे लोग उसकी तरफ प्यार नही दूसरी तरफ देखने तथा जानन लिए दवे। कई बार तो उसे अपमानित उपका मुकाव ही नहीं होता। विरोधी कर निकाल ता दते है। पक्षों को सहने अथवा समझने की उदारता उसमें नहीं होती। धर्म में सारा ससार एक ही चौका है। छोटे-छोटे चौके न होने के कारण घम में अपना दाप दशन मुख्य उसमें छुआछूत या घृणा देष की बात जाता है और दूसरा पे गुणों का ही नहीं । यदि कोई बात मुरी समझो रान मुख्य होता है। पथ में इससे जाती है तो यह कि प्रत्येक व्यक्ति को उल्टा है। पपवाला दूनरों 4 गुणों अपना पाप ही बुरा लगता है। को अपना दोष ही अधिक दखता पथ म चौकेबाजी ही नरदस्त है और अपने दोषों का अपना गुरों को होती है कि हर एक बात म हवाछूत ही अधिक देखता है। अपन ही गुणों की गय पाती है। इसी कारण पंथ का पखान करता रहता है। उमको पालो की नाक अपने पाप बी श्रोखों में अपने दोपत्राने ही नहीं। दुर्गध तक नहीं पहुंचती है जितनी घम में केवल चारित्र पर ध्यान दुग अपने पथ के बाहर वाला दिया जाता है। जाति, लिंग, उमर, से पाती है उनी अपने पाप से नहीं। वय, चिह, भाषा तथा दूसरावान स्वय जिने स्वीकार कर लिया वही वस्तुओं के लिए उसमें स्थान नहीं है। उ मुगधित लगता है। अपना पका पप में इन बाल वस्तुओं पर ही अधिक हुश्रा रास्ता ही भेट दिखता है ।
उसके सिवाय सभी बदबूदार तथा पंप हिदुओं के पड़े ये पानी सरीला सभी मार्ग अपने से पटिया मालूम होता है। उसके लिए अपो सिवाय पड़ी है। दूसरे सब पाणी असश्य होते हैं। उगे सक्षेप म कहा जाय तो धर्म मनुष्य अपना स्वाद और अशा ही रूप अन्दा को दिन रात पुष्ट होने वाले भेदभाव लगता है। प्राणान होने पर भी पर्य फे सस्कारों से निकाल कर अभेद की दूमरों के घड़े को धो मे रोकता है। तरफ घरेलदा है। पथ इन सारी पथ यापिघम में से हा उत्पन को अधिकाधिक पुत्र करता है। यदि दैवयोग से कोइ अभेद को तरफ धारे होता है और अपने को धर्म का प्रचार मानना है कि हमशा धर्म का पात तो पथ को सताप होता है । धर्म में ही करता रहता है। जैसे नीवित मधिर दुनिया के छोटे बड़े भगड़े, जर, जोरू, तथा मारा म से उगा दुधा नख जैस जमीन, छुटपन, चदारावादि के सय जैसे बढ़ता जाता है वैमे म कधिर तक्रार यात हो जाते हैं । पंप इसमें ऐसा मालूम पड़ो लगता है कि झगड़े है। इसलिए जर बद हुए नरा का और मास का भी सान पहुँचाता ये विना ६म की रक्षा ही नहीं हो काट दिया जाता है तभी हाइपिंजर सकती। मुरक्षित रहते हैं। इसी प्रकार धर्म से धम और पथ का अनर समझने अलग पड़ा हया पथ, चाहे वह धम में के लिय पानी का उदाहरण में तो पथ सही पैदा दुभा हो, जर काट कर ऐमा पानी है जो समुद्र, दी, तालाब, सास कर दिया जाता है सभी मानव मुथा श्रादि मर्यादाओं से भी अधिक समाज मुजी होता है । यहाँ यह प्रश्न सकुचित होकर हिंदुओं के पानी पीने होता है कि धर्म और पथ में किसी फे घड़े में पड़ा हुया है। किसी दूसरे प्रकार का मेल है या नहीं, और यदि व्यक्ति के छूते ही इसके अपवित्र एव है तो किस तरह इसका उत्तर सरल भए हो नाने का डर है। धम अाकाश है। जीवित ख को कोई नहीं वाटता से गिरते हुए वर्षा के पासी सरोसा है। यदि वह कट जाय तो दुरस होता है। इसके लिए कोई स्थान या यदि ऊचा रुधिर और मास की रक्षा को भी नीचा नहीं है। इसम एक जगह एक धक्का पहुंचता है। वे सड़ने लगते है। स्वाद और दूसरी जगह दूसरा स्वाद इसी प्रकार पथ में यदि धम का जीवन नही है। इसमें रूप रंग का भी भद हो तो हजार पथ मी बुरे नहीं है। नहीं है । प्रत्येक यचि इसे प्राप्त कर जितनं मनुष्य है, चाहे उतने पर हो सकता है और पचा सकता है । जाये फिर भी लोगों का कल्याण ही [५] रोगा क्योंकि इस में प्रति भेद और पता के साथ यदि कुछ श्रुटियां भी दूसरी विसरतानों के अनुसार हजारों मालूम पड़े तो उहं भी दिना सकोच मिनदाए होो पर भी क्लेश नहीं साकार करता जाय । ग, प्रेम का रहेगा। अभिमान नहीं (२) जिस प्रकार अपनी दृष्टि सम होगा, नम्रता बनी रहेगी। नुमाव झाने का श्रेय चाहिए, उसी प्रकार नहीं होगा, मित्रता कायम रदगा। दूढने की दृष्टि समझने के लिये भी पूरी उत्तेजना नहीं होगी, क्षमा-भाव उदारता तथा तत्परता होनी चाहिए। स्थिर रहेगा। पय पहले थे, अब है एक वस्तु के विषय में जितने पक्ष तथा और भागे रईगे। उनमें मुधारने या जितने दृष्टिकोण हो सक सभा की समा करने लायर इतना ही है कि उससे नवा करय बलावल जानने का मृत्ति श्रालग पड़े हुए धर्म ये तत्व को फिर से होनी चाहिए । इतना ही नहीं यदि उसमें दाल दिया नाय । हम किसी भी अपना पक्ष निचल और भ्रा त मालूम पथ को माने कितु उसमें धर्म के तत्वों पड़ तो उसका त्याग करने म इतनी को सुरक्षित रखते हुए ही उसका अनु प्रसनता होनी चाहिए जितनी स्वीकार मरण कर । अहिंसा के लिए हिंसान करते समय भी न हुई थी। करें । सत्य के लिए असत्य न बोलें । पथ में धम के प्राण फूक्ने की रात यही (४) सम्पूण सत्य देश, काल अथवा सकारों से सीमित नहीं होता। इस है कि हमारी हटि सत्य का श्राग्रह लिए प्रत्येक पहलू में जोखड सत्य रखा करने वाली बन जाय । संक्षेप में मत्या मही लय इस प्रकार है- हुश्रा है, उन सबका समवय करने की कृचि होना चाहिए! (१) स्वय जिस बात को मानत या पथ में धम नहीं है इसीलिए पथ करत हो उसकी पूरी समझ होनी चाहिए। अपनी समन पर इतना समाज और राष्ट्र थे लिए पातक बने विश्वास होना चाहिए कि दूसरे को हुए हैं । जहाँ समाज और राष्ट्र की सष्टता और हदसाय साथ यमझा सके। एकता का प्रश्न श्राता है वहीं पर निपाए पथ या या बाते हैं। धम (१) अपनी मान्यता के विषय में जनित पर्चा की सटि तो मानव समाज (मारी समझ तथा हमारा विश्वास तथा विश्वमार को एक करने पे लिए पपार्थ ममी कमोटी यही है कि दुइ पी। इस काय करने का पथ दावा दूसरे को समझाते समय हमें वनिा भी करते हैं । किन्तु हम देख रहे हैं कि भी मारा मा कोम न पाये । दूसरे को पंथ ही हमारे एर होने और मिलने में एमाले उमप अपनी मान्यता की विशे रोड़ा अटका रह । पथ का मर्प और कुछ नहीं है। इसका अर्थ है, धर्म के करेगा । इसप्रकार पंच ग्राप और नाम पर उत्पन्न तथा पुरा हुए हमार एकता थे श्राई मासिक गकोच का मिथ्याभिमान अथवा या बहना चाहिए कि हम स्वय जब लोक-कल्याण या राष्ट्र कल्याण के पथमय सतार दे शम्न में सत्य लिए एक सामाय सी बातमी प्रचलित और एवण के साथ द्रोह कर रहे हैं। कराा होता है तो पथ पं जहरीले इसीलिए पप का अभिमान करने वाले और सचिन मस्कार प्रापर कहत है- तथा य बोमा नाोयाले धमगुरु, सावधान ! नुम ऐमा नहीं कर सकने। पडिन या पुरोहित कमी प्रारण म नहीं ऐसा करोग तो धर्म रसातल म चला मिल मरते। वे कभी एकरण हो मायगा । लोग क्या समझेगे पार क्या माते । जबकि माधारण मनुष्य कहेंगे? कोई दिगम्बर या श्वेताम्बर श्रागातीस मिल गाते है। पापोलगे या अघ कोई अपो पक्ष की तरफ से कि एकना और लोक कल्याण का दावा चलो वाले भगढ़ेम भाग न ले अथवा करने वाले पर य गुरू हाक दूगरे से पैसा होने पर भी उस झगड़े ये फ्र में अलग-अलग रहते हैं । यदि ये धमगुरू दान देने से इन्कार कर, न्यायालय में एक हो जायें अथान् एक दूमर का प्रभाव होने पर भी साक्षी न बने तो नागर करने लगे, साथ मिल कर काम उसका पय उमप लिए क्या करेगा? करें और भगः को पैदा हो न होने दे मुसलमानों का सारा जत्या हिंदू-मन्दिर नो गमभना चाहिए कि अब पधम के पास से तानिया ले जा रहा हो धम श्रागया है। और कोई सच्चा मुसलमान हिंदुयों की मायना दुखाने र उद्देश्य से दूसरे लावें । यदि एसा न हो सके तो पों हमारा कम्य है पथों म धम को रास्ते जाने को कर या गौ हत्या करने की मनाही करे तो उस मुसलमान के को मिटा दा धर्म शय-पथ की अपेक्षा साप पथ वाले कैसा व्यवहार करग। विना पथ का मनुष्य या पशु होना भी एक अार्यसमाज का सभ्य कभी मन्ची लोक हित को दृष्टि से अधिक अच्छा है। दृष्टि से मूति के सामने बैठ नाय ना इमम किसी को विवाद नही होसकता। उसका समान पथ उमर लिए क्या [श्रा इद्रचन्द्र, एम ए] + 800900980888888888888OS जय हिन्द तार--"मिल" दीर फोन नं ५५८१ और ४५७ हर प्रकार के अाकर्षक और मजबूत कपड़ों के लिये EDEEOBORUEROEROOMesSEd980SEMISEASRUS हमेशा याद रखिये दीकल्यागामल मिल्स लिमिटेड इन्दौर सेधा और स्वदेशी हमारा ध्येय है मेनेजिग एजन्ट- मेसर्स-तिलोकचन्द कल्याणमल एण्ड कम्पनी, इन्दौर 2300886880030000003880CUDOTOROSESEGOR000000 SASABADOOS232068eeeeee RWEARHERERNMEMEREMORRRRR तार का पता -राजशॉप टेलीफोन-४१३ भोजन शरीर के लिये जितना आवश्यक है उतना ही स्वास्थ्य और शरीर-रक्षा के लिये वस्न भी आवश्यक है। जोवन की इस आवश्यकता की पूर्ति के लिये - XXRAL WARRRRRRRRRRRRRRRRRRAN दी राजकुमार मि. लिमिटेड, इन्दौर आपकी सेवा में सदेव प्रस्तुत है ! PORRRRRRRRRRRRRRRRRRRRRRRRRRRRRRRRREKXKARIRAL XXXMARTE20182008 -: यहा सर्व प्रकार की आवश्यकताओं के लिये जन साधारण को रुचि का सस्ता एब उत्तम नित्य के व्यग्हार योग्य टिकाऊ और सुदर सर्व प्रकार का कपड़ा समय और सुविधाजनक उपल ध हो सकेगा। हमारी विशेषताए- हरक, बायल, सफद रगोन एव प्रिंटेड, लट्ठा, मलेशिया, शटिंग, पक्के रंग की मुदर डिजाइनदार छो प्रादि । मैनेजिंग एजेट्स- सर सरूपचद हुकमचंद एड कंपनी क्लाथ शाप -एम टी क्लॉथ मार्केट, इन्दौर PRANER NARRRRRRRRRRRRRRRRENA
रे मन तेरी को कुटेव यह ।
रे मन तेरी को कुटेर यह
मरन-विषय में धार्य है।
रे मन० ॥
इनही में धातू अनादि म.
नित स्वरूप न लसा वे है।
पराधीन छिन-छन समाकुन,
दुरगति विपति घरवान है।
रे मन
परस विषय के कारन चारन,
गरन परन दुख पात्र है ।
रसना इद्रीरस झप जलमे,
फरक कट छिदारी है।
गध लोन पज मुद्रित में,
अलि निज मान खपा है।
नयन विषय वरा दीपशिखामे,
थंग पतग
जरा है।
रे मनः॥३॥
परन विषय पहिरन अरन,
खसफर भान लुमा है।
दौलत तज इनको जिनको भज,
यह गुरु सीब मुनाये है॥
रे मन तेरी फो मुटेव यह
मरन में धारे है ॥
रे मन ॥४॥
गति का गीत श्री स्वर कुमार गांगेय इक अडिग विश्वास पर, डग भर रहा हूँ-बढ़ रहा हूँ। सधन, समुचित सजल निशि मे, सतत सत्वर पल रहा है तन विकम्पित, मन व्यथित है, प्राण फा प्रति-पल कुपित है, जिन्दगी का स्वर पक्ति है, मजिलों का पथ अमिन है, मैं किसी परितप्त प्रण की, प्रखरता ले पल रहा हूँ। इक अडिग विश्वास पर, डग भर रहा हूँ-बढ़ रहा है" दिग-दिगतों की प्रवाही- श्राग मुझको घेरती है, लपलपाती सपिणी सी, काल निशि भी भूलती है इस विभीषण रता में, भी विभावित पल रहा हूँ । इक अडिग विश्वास पर, टग भर रहा हूँ-बैद रहा हूँ । बहुत है शैथिरय मुझ में, विवशता है-रिफलता है सृष्टि के विस्तार में तो विषमता है-कुटिलता है, श्वास की भीनी डगर पर, मैं अनापद चल रहा इक अडिग विश्वास पर, डग भर रहा हूँ-घद रहा हूँ जानता हैं यो फि बेयस, मौत के क्षण जी रहा हूँ, अनमनी इस जिदगी मे, दूर बहता जा रहा हूँ । पर प्रकम्पित पथिक, सा मैं दामिनी लख चल रहा हूँ । इक अटिग विश्वास पर, डग भर रहा हूँ-बढ़ रहा हूँ" है विजय की रागिनी द्रुत-गामिनी-उमादिनी-सा, अवनि-नम्वर में तरगित, अपरिमित लोलिनी सी ! इन निनादित लहरियों पर, में विचिद्धि इक अडिग विश्वास पर, दगभर - ॥
। सत्य कैसे खोजा जाय। . हमारे जीवन में भूलें भरी पड़ी महात्मा भगवानदान हैं। यह कहना बदकर कहना नहीं होगा सत्य ही उाकी जान है। सत्य और कि भूलों से ही हमारा जीवन बना है। उन्नति एक ही चीज है। यह सुनकर हमारे जीवन में अवेरा है। हम अचरज नहीं होना चाहिये कि हम अधरे में ऐसे जी रहे हैं मानों उजाले सवको पैदा होते ही सबसे पहले सत्य की भूख लगती है और वह क्या मरते इस भूल भरे और अधेरे म दमतक कभी नहीं मिट पाती है, बढती बीतने वाले जीवन में एक ही राधी है ही रहती हैं । उस भूख को मिटाने के किन भूलों और अंधेरे में हम जिसको के लिय जब कभी हम एक कण भी मिन दूदते फिरते हैं वह बेहद चमकदार जाता है तो हमारी स्तुशी का ठिकाना और सत्य है । यह भी नहीं रहता । उस सत्य के एक कण से सी है कि सत्य और हमारे बीच ही हम बुरे से मले बन जाते हैं, नीचे से में पड़े हुए पदं घोरे धार उठते हैं और जो उठ जाते हैं, अपवित्र से पवित्र बन बारी-बारी से उठते नहीं तो हम एक जाते हैं। हमारा श्रादमी के रूप में एम सत्य की चमक देखकर ही पैदा होना सफल हो जाता है । अब एक प्रापवीती मुनिए- भाते और कुछ भी न देख पाते । "सन् १८८६ का जिक है, मैं था हमारे मस्तक की मालदारी इमा बारह बरस का | मदिर में शास्त्र सभा से नापी जाती है कि हमारा सत्य को हो रही थी। उस सभा में में अकेला जानकारी कितनी है। और मालदार ही सबसे छोटा था। मुझसे बड़ा एक बनना किसे नहीं मुहाना । इसलिये और लड़का था, जो सोलह बरस का मालदार बनने के लिये इससे पड़ा होगा। मादा का श्राखरी दिन था। और का धंधा हो सकता है कि हम उस दिन प्रदिशा लेने का रिवाज सत्य की खोज में लग जायें। पुराना है। रिवाज की रस्म निमाने के वरकी देवी की हडिया सत्य की लिये शास्त्र-समा के खतम होने पर बनी हुई है। उनका माना और चरनी प्रतिज्ञा लेने का नम्बर पाया । सोलह मृत्य की बनी हुई है। उनकी मास बरस व उस लड़ा दो यह प्रतिज्ञा पेशियां सत्य की बनी हुई हैं। उनमें ली कि वह एक महीने तक दिया नहीं सत्य का ही नून बहता है। उनमें जलाया करेगा । उसको यह प्रतिज्ञा कान आप जीम, सब सत्य है और सुनार उसका राप इस पड़ा . [६०] भी हँस दिए । वाप तो यों हँसा कि घर श्रावर बहन ने तो वृध सम दूकान का दिया जलाने का काम उस भायात्रुभाया मी पर मा ने एक शद लड़के , सुषुद था और बस वही भी नहा कहा । एक काम उसके मुपुर्द था । उमने एक मेरे ऊपर व्रत का बड़ा गहरा रग काम न करने की प्रतिज्ञा लेकर उससे भी छुट्टी पा ली। इस काम की वजह चढ़ा और इता गहरा चढ़ा कि मैं शामको खेल में बाधा पड़ती थी इस अपने साथियों के साथ खेलने तक को लिए वह इस के सिवा और क्या नहा गया। घर में बैठ ही धर्म को रितायें पढ ता रहा । तीन बजे तक कोई तक प्रतिज्ञा लेना १ अार लोग यों हसे कि लीफ नहीं हुई। उसके बाद से पित्त वे यह समझ ही ना पाए कि यह अनोखी प्रतिज्ञा किस लिए ली जा बदना शुरू हुश्रा और पीले रंग को रही है। हल्की सी के हुई । बहन दौड़ी दौड़ी अाइ और उसने मुझ कुल्ला कराना अब मेरी बारी श्राइ। मो उस चाहा पर मने कुल्ला करने स इकार दिन के लिए निर्जल व्रत रखने की कर दिया क्योंकि मैं यह समझता था प्रतिज्ञा का। यह बात दिन नौ बन की है। शास्त्र सभा के पहले मन नाश्ते कि कुल्ले के बहाने पानी मुँह में नाना के तौर पर भी कुछ चीन न ली थी। भा व्रत तोड़ना है। इसलिए मने हाथ उस दिन घर में, म, मेरी मां और मेरी धोकर होंठ भर पोंछ लिए। एक के बड़ी बहन थी और काई घर पर नहीं स ही मेरी तबियत निढाल हो गई। था। मा और बहन पहल ही से उस बहन ने मेरे लिए चारपाई बिछा दी। दिन कुछ न खाने का व्रत लिए हुए मा यह सर देग रही थी पर वह थी इसलिए शास्त्र सभा में जाने के बिलकुल कुछ न बोली । श्राध घटे पहल मेरे लिए हलवा, पूही श्रीर शाक चाद फिर कै दुइ । फिर बनाकर तैयार कर दिया गया मा बहन न ही सभाला उस था पर अब म भी प्रतिज्ञा ले चुका था के के बाद थोड़ा चैन मिला । इसलिए उस साने का कोई उपयोगन घटे भर के बाद फिर कै हुइ और म्यूब रह गया था। पित्त गिरा। अब मा पास नाकर खड़ी मदिर में जिस वक्त प्रतिज्ञा ली थी, हो गई पर और सब काम बहन ही मेरा मा और बहन दाना ही वहाँ करती रही। जब फिर में चारपाई पर मौजूद थीं। पर उनम से किसान लेट गया तो मा ने मेरी बहन को मुझ प्रतिज्ञा लेने से नहीं रोका क्योंकि किसी काम लिए क्मिी के घर भेज ऐसा करना समाज की सर में बुरा दिया और उसके चले जाने के बाद समझा जाता है। वह मुझे समझाने बैठ गई।
दिखोरेग, तुमने कल पाँच बजे 'मा अम्मा, शरबत पीने से तो वन माना साया था उसके बाद अबतक टूट जायगा।' 'ना नहीं खाया और देखो अब 'हा टूट जायगा, पर तुम्हारे मन पाच बज है पूरे चौबीस घटे हो गए। ने तो व्रत बहुत पहले से तोड़ रखा है। चौबीस घरे का एक दिन होता है तुम्हारी चालाको मत का खेल कर इसलिये तुम्हारा एक दिन का व्रत पूरा रही है। हो चुका 'अम्मा, म तुम्हारी बात तो नहीं 'पर अम्मा, प्रत तो मैंने नौ बने सममा । पर इतना जरूर जानता ह लिया। कल नौ बने चौबीस घटे होंगे।' और कह सकता है कि मेरा मन खाने 'यह तो ठीक है पर तुम्हारी के लिये बहुत मचल रहा है। और तमियत इतनी निढाल हो गई है कि अम्मा म सच सच कहता हूँ कि मैं घन में दिन में जितनी शाति रहनो तुमसे तो बिलकुल नहीं डरता। तुम्हारे चाहिये उतनी शान्ति तुम अपने मन म सामने तो मशवत क्या, खाना भी खा नहीं रख सकोगे। सकता है पर जीजी के सामने तो ऐसा 'अम्मा यह तो तुम ठीक कह नहीं कर सकता। जीजी चाह मेरी रही हा पर मत तो दुख मानकर हो इसी न भी उडाए पर जीजी यह सब निभाए जाते हैं। शास्त्र में तो सारी बात मेरे साथियों तक जरूर पहुँचा दगी। और फिर मेरे साथी मुझे क्या कथाए ऐसे ही पठकर सुनाई जाती है।' समझगे। मेरी खिल्ली उडाए गे और 'घटा, यह तो तुम ठीक कहते हो। और खमानी, जिसने दिया न जलाने पर मन का श्रानद तो उस वत्त की प्रतिज्ञा ली है वह तो मुझसे कहा चल देता है जब चित्त प्रत से डिगने आगे बढ जायगा और मेरी इसी की बात सोचने लगता है। अब तुम करेगा। ही बताओ क्या तुम्हारे मन में इस 'तो क्या नुम, इसी के डर से वक्त यह मान नहीं पा रही है कि और तारीफ के लोम से अपने मन को अगर कोई न हो तो तुम चुपके से बिगड़ने दोगे १ और यह टोक है कि अगर भौर कुछ न मिले तो पाता अगर तुम चाहो तो म तुम्हारी बात ही पी लो। किसी तक न पहुंचने दूगी। पर मैं इस 'हॉ श्रम्मा ऐसो यात तो मन में बात म नुम्हारा भला नहीं समझती। पा रही है । मेरा जी तो बार बार हां या टीक है कि मैं जीजी की तरह कुछ तातेको भी मचलता है।' से तुम्हारी बात तुम्हारे साथियों स वो मैं शरबत झाऊँ।' नहीं कहूँगी। में जिस तरह कहूँगी " - उससे तुम्हारे साथियों में तुम्हारी का कोई डर नहीं रह जायगा । देखो इज्जत घटेगी नहीं। सचाई से कहीं अब तुम सोचो नही,, पर्वत पीकर इज्जत घटती है, उससे तो इज्जत अपना मत पूरा करलो और पित और बढ़ती है। यह व्रत तोड़ना मी कहां है। चौबीस 'अम्मा, तो क्या तुम भी मेरे घटे तुमको हो ही गए । इसलिए एक साथियों से मेरे खाने पीने की बात दिन पूरा हो गया । बस अब तुम कह दोगी? रावत पी लो। दो एक घंटे के बार रबड़ी जैसी चीज खा लेना। 'नहीं, तुम अगर चाहोगे तो नहीं कहूँगी पर मैं यह नहीं चाहती कि तुम 'अम्मा, तुम तो मेरा मन बलदा यह चाहो कि में तुम्हारे साथियों से रही हो।' यह बात न हूँ। 'न, बेटा, ऐसा नहीं। मैं तुमको 'अम्मा, जब तुम उसे कहोगी तो सच का पाट दे रहो हूँ। में अपने बेटे का मन क्या ललचाने लगी। वह मेरा हँसा नहीं उडाएगे।' 'अम्मा, तो जीजी नहीं इसेगी। 'मैं जिस तरह कहूँगी, उससे तो ऐसा मालूम होता है कि वह तुम्हारी 'जरूर इसेगा। पर जब म उस् हँसी नहीं उड़ाए गे! और अगर वे समझा दूंगी तो वह नहीं हँसेगी।' तुम्हारी हँसी उड़ावें भी तो क्या तुम 'और मेरे और साथी न हँसी उडाने से बचा के लिए झूठ बोलना पसद करोगे? फिर क्या व्रत 'दे भी अरूर हँसेंगे । उनको म का फायदा रह जायगा। समझाना पड़ेगा। 'और तुम समझती हो कि तुम 'अम्मा, तुम बात तो बिलकुल उनको समझा लोगी।' ठीक कहती हो पर मेरा मन झूठ बोलने से इतना नहीं रता जितना अपनी 'हो सकता है ये मेरे समझा हँसी उड़ती देखने से। न समझे। पर इससे क्या? वे समन या न समझें । मुझे तो अपने बेटे = 'बटा, इस बुरे धर्म का रिवाज पर समझाता है। और उसे सच्चा श्री- गया है और इसी रिवाज की तुम्हें पका बनाना है। अब तुम बतायो । भी श्रादत है। इसलिए मिमक होती तुम भी मेरी बात समझ गये कि नहीं है। जब सच बोलने की प्रादत हो 'अम्मा, मैं समभा तो कुछ नहीं हा, मेरा मन तुम्हारे कहने पर शव तुम में आ पायगा तो पिर भूठ बोलने पीने को तैयार है और रात को छ मिमक हुआ करेगी और इसी उड़ने खा लेने के लिए भी तैय्यार है।' पापगी और इसी उड़वाने की बरदाश्त रिना उनसे सच सच कह दूगा । और दादा तुम्हारे लिये मुश्किल है का पूरा पूरा तत्व तब समझ पाया = नुम समझने और समझ जाने पर जब मने धर्म के एक बड़े ऊचे प्रथ में 1 मो यह समम सको 'कि तुम समझ यह लिखा देखा कि 'जोश में रहा और यह तो और भी मुश्किल श्रावर पाल बुद्धि से या कम जानकार है कि तुम मुझे बता सको कि तुम गुरुओं के उपदेश से या गुस्से में श्राकर सनम गए। पर मने यह समझ जो प्रतिज्ञाए कर ली जायें उनको निया है कि मुमारा मन सचाह को तोड़ते हुए अगर डर लगे तो यही मनझ गया और यह सचाइ मन से समझना चाहिए कि धर्म का सच्चा नीचे उतर कर वहां जा पहुची है जहां से दर बह जल्दी भागने वाली नहीं।' प्रदान तुममें नहीं है। 'नग्मा न जाने तुम क्या कहती मैं नहीं जानता मेरी श्रनपद माता । मेरी समझ मनहा श्राता । मैं म इतना लचा तक कहां से और से दुम्हार कहने से खा-पी लू गा और श्रागया। में इसके सिवा क्या कह मरे साथी जब मुझसे पृढेंगे तो मैं डरे सहज बुद्धि यो। एक नहीं अनेक सक्ता है कि उसम सत्य के समझने पररि मेरी हसी उहायगे, तो म बार उहोंने मुझे ऐसी सीख दी जिनको म उस यच तो उसको मा के पगा कि म कुछ नहीं जानता है। ना ही मान लेता था । पर बड़े अम्मा ने कहा और मने खा लिया।' 'अपने साथियों के साथ तु हारा होकर ही मैं समझ पाया कि मेरी मा पहत तो ठीक रहगा ही पर क्या की सीख हर तरह से इस योग्य थी कि उहको गुरु को सीप के समान दुहारे मन में सी बात नहीं उठती जाय और वैसा वितुम झूठ न बोलकर अब निडर होकर सच बोल सकोगे।' श्रादर मने दिया मी। उही सीता 'अम्मा, यह नुम कह रही हो के बल पर आज मरिना किसी झिझक इसलिए मान लेता हू । मेर मन पर तो के यह कह सकता हूँ कि अपने श्राप अभी भी प्रत न तोड़ने का धर्म ही अपो अदर तक करने से सत्य जरूर सवार है। खोजा जा सकता है। हमारे ननु सत्य 'वटा, यो नहा यों कहो कि मरे की खोज में बड़े मददगार सारित होते मन पर तो अभी वतन तोड़ने काही है। सत्म खोज की चीज है और वह भून सवार है। खोजने से ही मिलती है। म अम्मा की यह बात सुनकर सत्य के खोजने में किसी योग्यता एकदम चिल उठा। पर मैं उस वर की शर्त लगा खोजी को खोर से यह नहीं समझ पाया कि क्यों सिल रोक्ना है। हर आदमी को अपनी उठा था। मैं अम्मा के उस उपदेश योग्यता के अनुसार सत्य की खोज में प्रादर दिया .
1 पायगा। लगने देना चाहिए। जब तक इस बेमतलर सर्दी, गर्मी, परमात के रास्ते में समाज व्यक्ति को पूरी श्राजादी सहकर सिमनन चितन से हाथ या नहीं देगा तब तक न्यौहारी सचाद जाय, उसके लिए दो उसका मस्तक का कुछ हिस्सा भले ही प्रादमी के मन के साथ-साथ उनसहाय और हाथ लग जाय पर पारमाथिक सत्य परों से एमा ही काम लगा पहेगा का एक अश भी उसके हाथ न लग जैसे मजदूर अपने पट पे लिए, रोटी जुटाने व लिए, आने काम लता ह। निस श्रादमी को किसी तरह की मजार जिन हाथों स रोटी जुगता रोक नहीं है, निसके लिए कोई बात है, सत्य का स्वोनी मस्तक मा की मदद छिपी हुई नहीं है जिसको कुछ भी स उही हाथों से सत्य की खोज करने की मनाही नहीं है, वह अादमी निकालेगा। पारमाथिक मत्य को जितना जल्दी पा यह ठाक है समान महता ने सकता है उतनी जल्दी कोई नहीं पा सफ्ता। पुराण हमें चिल्ला चिला कर और सभी महापुरुषों ने सम्म सामने यही इशारा कर रह हैं कि पुण्य-कमल ये लिए हजारों वर स चले श्रार पाप की कोचढ़ से ही सिलता है। रियाज के अनुसार पहाड़ों की गुफाओं श्रधेरे से ही घबरा कर हमप्रकाश में श्रासन जमा कर, शिलानो से की भोर भागते हैं । अवरा इम म अपना माया टकराया है। परत प्रकाश की चाह पैदा करता है। में वे इसी नतीन पर पहुंचे कि उनका जो सत्य एमा है जिसक समझने यह चिंतन समय का बाद करता की किसी फलिए भी मनाही है वह ही रहा। राज्य तो उनको समाज के सत्य हो ना हो सकता । जिस देवता भीतर प्रवेश करक ही हाथ आया। कपास किसी एक को भी जाना मना एक ऋषि ने क्या हो अच्छा कहा है कि है, यह देवता नहीं बनावटी दक्षता है। इच्छाग्री पर साधू पाना ही तपस्या है, दह की तपस्या तो दहको काबू बस सत्य की खोज में लगने वाले कृष्ट देना है। को यह समझ ही लेना चाहिए कि यह खोज के रास्ते म इस लोक और इच्छाएँ काबू में भाई नहीं कि परलोक के दह से कभी न घबरायगा। मस्तक खिला, मनमें विद्यालता पाई, इतना उसे और भी गमझ लेना उदारता ने जगह पाई और हाथ धार चाहिए कि पारमार्थिक सत्य कोई पाव में सरसराहट पाई और फिर एसी चीज नहीं है जो एकात में बैठकर वह इस ढग से बढे कि सत्य का कोई पहाड़ों की गुफा में श्रासन लगा कर, न कोई हिस्सा उसके हाथ लगा।
ओ। मानवता के कर्णधार । (प्रकाश "उपल") यो, मानपना के कर्णधार धरती पर आ जायो नीचे। है ठीक कि, उस युग म तुमने ही हमको राह बताई थी, घृणा द्वेष हिंसा के शव-- पर जीवन ज्योति जगाई थी, युग बीते तुमको देवों की दुनिया में सोते पडे पड़े ने ग्राम प्रतीक्षामय आस- तेर चिहाँ पर आज खड़े हम गीत तुम्हारे गाते हैं, हो समाविस्थ आवें मीचे। तुम जगो' जगो। हम महानाश के आलिंगन में घदी हैं। स्वय मनुजता के शव मानत्र मानव प्रतिददी है तुम महानाश के पहले ही धामो जीवन के प्रदन के, श्रानो, तोडो गोपित पीड़ित- मानव के उलझे वधन को, सिर पर धर दोश्रा घरदरत, श्रीमू से मानवता सींचे। पर
उसकी याद
(श्री तुजविहारीलाल पाण्डेय)
-
उसकी नाज याद आई है।
जन मगन स्क्याण भावना से जिसने जग को दुलराया
ज्ञान पर्म का पाठ पढ़ाते थकी न जिसको निर्मन काया
जैनधम का दीप जलाया, नवयुग के प्रोगन में जिसने ।
मानवता का सन्या पथ दिसलाया नर पशुओं को जिसने ।
पाटी भेदभरी खाई है
उसकी प्राज याद आई है।
चेतन क्या ? जाता को निसने, 'दया करो' आदेश सुनाया
पर हदय के मकस्थरों म, शाति-सुधा का स्रोत वहाया
गिरि, बन, सरिताश्रा का अरलुप सवमें जीवन गान भर गया
सूरज, चांद, सितारा सी प्रामाओं या अभिमान भर गया
जिससे धरती अमराई है।
उसकी आज याद श्राई है।
स्मतमता की मुक्त रश्मियों ने जिसका शृगार किया था।
अणु अणु ज्योतिर्मय फर जिसने असिल विश्वको प्यार दिया था
सदियता थी, 'सव मुसिन भव तु' की सार्थकता थी।
समता ममतामय जनप्रियता की अद्भुत समता थी।
जग में जिसकी धरणाइ है।
उसकी आज याद आई है।
।
दिगम्बर -जैनकुमार गरमाताको प समय नहीं इसी को दूसरी भाषा में सम्यवा ama सब भी वन उम्के का विकास कही है। उस विकास के मयी बातेवनों का उपयोग साय देह का हास हुआ है। Tोन के कल दिए ही है। मनुष्य, कहते हैं, उस विकास में दत्य का मुमयन दो प्रकार के उत्तरोतर सामाजिकता प्राप्त करना रसों में है, एक हिक, दूसरा गया है। और सच पूछिय तो वन की Rai { धम्म गर्न सहमें पामता के पीछ देहिता उननी समोर हा देकन के काम नहीं जितनी को सामाजिकता FIL कारण है। ऋतु तो नम तन पर सद भी ली नाय, पर सभ्यता तन को नम सारा जहां तक सबध नहीं रहने दती है। वत्र इसलिए सर्दी कोपयोगिता सपद है। सदी गर्मी के लिए कम और सभ्य व्यवहार को ऋतु प्रभाव से प्रान ही हैं। क लिए अधिकतर पावश्यक है। निर बनने के लिए किसी यो भी दीनता तो यह है कि यान 51 और दूसरे का ज्याश कपों का है।शुपक्षी पिना का सम्यता मुख्यना से बन्न पर टिकी 11 के हो बार बलाते हैं । जानी है बरिया कपड़ सामाजिक उच्चता रे mपी प्ररथा में सत्य लोग लए माने जाते हैं। में काम किया करते दस्त्र में कीमत डालो के लिए थे, 47 पार की गहिवाना और सोने और चादी के तार पिने जाते हैं, पनि यीशु-पक्षियों चाहे उनका स्वर्ग शरार को तनिक मी पर रवि नाम मुदकर न होता हो। प्रकार और प्री इस वन मनी लादिक सभ्यता को में कार मनुन में गहराइस समझना चाहिये । तब जान ने सस पहना कि उसक जहम काहा है। वहा शों को प्रबह सामाजिकता की सिद्धि नहीं बल्कि लन र मान नहीं कर शोर की वृद्धि है। पर और पवने क सामादिका निपुदा यदि या है। विमस वे लिए आवश्यक है। मिल गुलकर ही यहा काम चल सकता है। कहने का श्रावश्याना नहीं है। वह सहयोग सदा अनिवाय है। लोक-जीवन के लिए अनिवार्य है। क्ति एक पैदा हुआ है, पर उससे मर्यादा शीलता और शुचिता इसलिए का रक्षण होता है। वह वासना पर कि यथासम्भव किसी के भी प्रति यह दूसरा न रहे । श्रावरण है। पर नहीं, पत्र वहीं तक तभी सूरकार ने कहा - "परसरो नहीं रहा है। वासना को ढकने नहाँ, पग्रहो जीवाना" एक दूसरे के काम दिखाने और पढ़ाने तक का साधन थाना जीव का लक्षण है। मनुष्य के वह होने लगा है। वर की सस्था इस स्वभाव में से मनुष्य को जम मिला। इधर भार तो शव रोग की गांठ हो पड़ी है कारण है मेरी समझ में हम इस सामाजिकना के उदय के साथ मनुष्यों की समान को अपनी परिधि वस्त्र का उदय हुआ। पशु-पक्षी वस्त्र मान रहना और समष्टि-दृष्टि को का अावश्यक्ता से मुक्त हैं क्योंकि भूल बैठना। उनम सचेष्ट सामाजिकता नहीं है। उनम लगा और मर्यादा की भावना समाज को परिधि मानकर ही नहीं हैं। वे स्वच्छ द है। मनुष्य चलना मेरी दृष्टि में भ्रात है। मेरा मर्यादाशील प्रायी है। उसका समाज मानना है कि उसके कारण हमने बहुत है, जिसमें श्रेणिया है छोटे बड़े है, रोग अपने बाच बसा लिए हैं और मान सभ्रम है । मनुष्य समाज में सबसे सभ्यता श्रपती मौलिक श्रवाश्यकता अधिकार बराबर नहीं है, कतय भद स दूर पड़कर इतनी कृत्रिम होती से उनके अधिकारों में भी भेद है। जा रही है कि पाखड बन उठी है। उनमें परिवार भावना है धार सम्बर्धा श्रावश्यकता है कि उस सभ्यता को में दायित्व और पवित्रता की कल्पना फिर अपने मूल श्रादश से जोड़ा आय है। शिक्षा-नम से उनमें गुरू शिष्य का और उसे स्वस्थ किया जाये। भेद है । और एक चरण छूता दूसरा समाज म मान और मान्यता मायेपर रखकर उसे प्राशीवाद प्राप्त करना यदि उन्नति का लक्ष्य हो देता है। तब तो धन को श्रावश्यक रूप में इसका यह जो मर्यादाशीलता का उद्भः साधन बनाया ही जायगा । तब मनुष्य और विकास है, यही क्या मनुष्य जाति की चेटा वस्त्र की सस्था को जटिल की अनि सस्कृति और सभ्यता नहीं बनाने म लगेगी। है, इसी क साय वस्त्र की सस्था ने विकास पाया है। यहा तक कि वह एक समस्या और शोषण का केन्द्र बन रहगी। लोग हर इस दृष्टि से वज़ के विरुद्ध कुछ पण नया पैशन निकालेंगे और बीते वण का फैशन पुराना पड जायगा। है और मनुष्य उसका भोक्ता ठहरवा नतीजा यह होगा कि लोग उस दौड़ में है। इस वृत्ति में से स्वार्थ को महत्व वस्त्रों का ढेर पास रखकर भी सतोष मिलता और सम्पदा याडम्बर का रख सकेंगे कि वे काफी अाधुनिक है। संचय होता है। हर कपड़ा क्षण चलने के साथ पुराना हो किन्तु म मानता हूँ कि सामाजि जायगा और नये की माग होती जायगी कता से पिरो इसी वृत्ति म मच्ची डिजाइन और कट के नयेजय षि सामाषिकता का बीज नहीं है। कार होंगे और न जाने कितने लोगों की बुद्धिसी में लगी रहा करेगी। इसके समान में उससे विषम म थियो कारण दूसरी ओर पत्र का अकाल पड़ती है । विरोधी स्वार्थों को लेकर होगा और लाज और शीत से उन उनसे वर्ग, समूह, और सत्ता गाती ढक्ने को भी वे चीथड़ा ना पायेंगे। हैं जो अपनी अहता में दूसरों से स्पर्धा यह चमक-दमक की प्रासुरी सम्यता ठानती हैं। इससे विग्रह और विस्फोट होगी और वहाँ वैभव के शिखर को जन्म मिलता है। श्रासमान को चूमना चाहेंगे। हीरा वे लोग जो लौकिकता की परि मोती, सोना चांदी से घरों को भाषा में ही धम को देखते है जाने अनसान इस स्वाय निग्रह की याच में जायगा कि उधर अनेक मगे रहे, जिहें रहने को ठौर और खाने को कि उस श्रादर्श को हम सदा स्मरण में हमा पहुँचाते हैं । अत श्रावश्यकता है कौरन हो। रक् जो समाजपरभाकर नहीं रुकवा यह सभ्यता प्रादमी को परिमह ागे समष्टि कक जाता है, जो अपनी के सचय में सुख दिखायेगी और अनुभूति में मानने पर समाज को वैसे अवस्य सहानुभूति और अहिंसा को ही अपनाना चाहता है जैसे मानव भावना को चूसती जायगी । मनुष्य समाज को? तब अपने स्वाथ में रत होकर शोषक समाज के लिए पत्र आवश्यक है, बनेगा और अपने को सभ्य मानेगा! कि तु समष्टि के पत्र में उस वस्त्र का सामानिकता को अतिम समर्थन मला क्या अर्थ रह जाता है। सूर्य और उसी को चरम धर्म मानकर क्या पृथ्वी के प्रति अपने को ढकेले, या चलने म यह खतरा है हो। भौतिक पृषी को सूरज से घूघट से ले ! दर्शन उसी में हमें ला पटकता है। प्राकारा के चमकते तारे, बहती अगर दीवनेवाला पदाथ ही सच है वो वायु, कुला अाकाश, झूमते पेड़ और उसका भोगोपभोग जीवन का चरिताय तरगित सागर, क्या सब भी वन योदे बनता है तब पदार्य मात्र भोग होता और परिने । तब वह पुरुष शे मला [७०] कैसे अपो को पहो म मदे को जिसे साधार ही यह परिपूर्ण नहीं हो उन सब म रसलीन और सासर हो जाता। आगे भी उसकी समावनायों रहना है । दिगत व्यापी श्रवर उमे अवर को विस्तार पाने जाना है। ठमे बन है । कपड़ा जो ता को, धूपले स्वास्थ्य सति से, यागु से, पृषी से, जल से, और वायु की यप से पचित पता तुना से मो यामंजस्य प्रास करना है, क्यों उसके लिए आवश्यक है। है। उस लिए गत मानव जाति जिसे घायु कगाय पहना और धूप के साथ तक परिमित नहीं है समूचे प्रमाएर के खिलना है, जिसके प्राण श्रपती याप्ति प्रति उस मिश्रण है। ऐसा पौरुपमय में कोई परिधि नहीं मानते और लोगन पुरुष गमाज स पार, समरि म मिलने को हुए विना जिराको सहाभूति चैन का प्रयासी दापता है, और, मानव न पायगी-एसा महा अहिंमक पुग्ण को ही Trt, निखिल जगत को उसका किससे यचो को कपड़े पहिने । श्रारमदान प्राप्त होता है। निसे सबर प्रति गुला रहना है यह मुक्ति का प्रादरी है। या सपको अपने में ले लेगा है, वह वैसे पादरा उपयोगिता की सीमा रेलानी वस्त्र का व्यवधान सह क्या वर से भागे जाता है। यह लोकोपकार की ऋतुओं से और सत्यतात्रों से अपने को मापा का सहम नहीं पाता और को बचाने का निमित्त ही नहीं है? श्राम केवच्य को मापा ही इसे छू पाती क्या वह भीति का प्रतीक ना है कि है। कारण, लोक तो ससौम है, प्रात्मा जिसका सामाजिक रूप सजा और उसे कुछ पाने से न रहा । जिसने ही असीम है। जिसोमात्मा को पाया, देहिक रूप सर्दी-गर्मी है। लेकिन वा अपने तर कुछ न एमा उसने सबको कि जिसमें निखिल के प्रति प्रीति है जो सब देकर सब पा पालिया । यह यात्म ऋतुओं का ग्राहान करता है, और साधना और मुनि का श्रादर्श रान्ये प्राणिमात्र के प्रति जिसका हृदय करुणा लोककल्याण का प्राराक है। नहीं तो से खुला पड़ा है, उसम किसके प्रनि उपयोगिता-पमान दर्शन और सदनु भीति शेष रहे कि यन्त्र को श्रापश्य सारी लोक प्रवृत्तिया सचाई म विशेष लोक मगल नहीं साध पाता । कारण, यह दिगम्बरता का श्रादर्श जहाँ वे लक्ष्य मानती हैं वह वहां नहीं असामाजिक नहीं है, यद्यपि सामाजिकना उसके पार है ! और माय समाज पर से सीमित नहीं है। सामाजिक होकर सत्य ममास नहीं, सत्य उससे बड़ा और मानर प्राणी समाप्त नहीं है। अपने ध्यापक है। जैसे दूसरे मानवों के साथ सम्पर्क जो हटि सामाजिकता से पीमित कना हो।
[१] है यह दिगम्बरता के श्रादर्श को नहीं समझा जाता है कि उत्पादन से यह समझ सक्ती । लेकिन स्पष्ट है कि होगी। पर उत्पादन की कमी से समाज की सत्ता घर सष्टि से स्वनत्र वह पैदा नहीं हुई, वितरण की विष नहीं है। विज्ञान बताता है कि वैसे मना के कारण यह पाई है। इससे सहस्त्रादियों के अतराल में उत्पादन ५ गुणानुगुणित करने से भी मानव को जम मिला और उसम नाना वह तब तक दूर नहीं होगी जब चेष्टायों ने विकास पाया । वह बताता तक वितरण की व्यवस्था समी है कि किस प्रकार मानव शेष सृष्टि से चीन नहीं होगी। श्राज तो तृष्पा का अलग नहीं उसका अगीभूत ही है। अन्त नहीं है। जो जितना पा जाव मानव इतिहास और मानव सभ्यता थोड़ा है। इससे कोरे उत्पादन बढ़ाने से महारएड की रोपप्रतिक्रिया से अलग होकर इस सिवा और क्या होगा कि जिनके मम्मन्न नहीं होते । मानव चेष्टा विश्व पास बहुत है यह और बहुत हो जायगा “यापी विराट कर्मचा का एक अंग और तिसके पास कम है, वह उससे भी ही है। उससे उच्छिन्न होकर उसका कम रह जायगा । अरे, उद्योगीकरण मूल्य कुछ भी नहीं रह जाता। स यही तो हो रहा है । करोड़पति यह समष्टि मूलक दृणि धर्म की है। श्ररयपति और दान दरिद्र वन रहा उसका प्रारभ विंदु धात्म-चेतना है। है। प्रधुरता और प्रभाव दोनों साथ उस चेतना को परमात्म चेतना साथ बढ़ रहे हैं। में रूपातरित करना है। व्यरि को ऐसे समय दिगम्बरता का ही समष्टि होना है। इस साधना के मध्य प्रादर्श काम पा सकता है । वह म ही सामाजिकता था जाती है। अपरिग्रह धर्म का चरम उत्कर्ष है। व्यष्टि अपने को समष्टि में लीन करने श्रानश्यकता बढ़ाकर हम समस्याए को साफना म अगायास उत्तरोत्तर भी बढ़ाते हैं। इस तरह वपन बढ़ता सामाजिक होता जाता है । उसका यह है और मोक्ष इटता है । लग्नपति श्रीर कार शान होता और उसकी सहृदयता करोड़पति, राजा और सम्राट क्या प्रसार पानी गती है। हिंसा से वह अपने लास करोड़ और राय साम्राज्य अहिंसा की ओर बढ़ता है। यहाँ तक के स्वामी होने के बहाने कैदी ही नहीं कि अपने लिए वह कुछ भी नहीं है ? क्या वे अाजाद है कि जैसे पक्षी वाजाद होता है। क्या उनका वैभव रहता, कुछ नहीं जकड़ और यहप्पन बोझ भी नहीं प्रात्यन्तिक अपरिग्रही बनता है। है। और घर सत है कि सब घर उसे श्रान प्रभाव की समस्या है। समान हैं, सब तन अपने है और कोई रखता, और [२] परिधि उसको शारमा पर मापा यमने है ही नहीं, एक परिपूर्णता है। उसने के लिए नहीं आ पाती है। शौक या धामह नहीं है, एक शान्तरक अनिवार्यता है । भाश को किस अपरिग्रह का यह भादश जितना प्रविरित दरका अावश्यकता है। शनिवार्य है, उतना दुगम भी है ! धन्य है वे कि जो उस तक पहुँचते हैं। ये दिनको और रातको किस श्रापरणक उसी तरह धूपयो, और चांदनी को कि जिसपे लिए वह साधना नहीं आवश्यकता है ? यह उई नियम नहीं अनायासता है। वे सचमुच मेरे लेसे मिलता है। इसी तरह दिगम्बर श्रेय घय है कि दिगम्बरवा जिनकी हिंसा स्थिति का देश है नत उस दिगम्बर का अमि यति है। थे पद म साधारण तल के तको । अमराका और जमना यादि देशों गति मुझे तनिक भी नहीं दीखती है मेरा मानना है कि विदेश की नमता में नग्नता के प्रयोग हुए है । पाया गया प्रयोग रिचित असामानिक प्रवृत्ति है कि दैहिक और मानसिक साम्य के सूचक है। जबकि सच्चे योगीको दि लिये नमता गुणकारी है । लेकिन विचार का वह धरातल मेरे लिए श्रम म्बरता का श्रादश विश्वननीन f- स्तुत धौर अविचारणीय है । जिस माधना से हो प्राप्त होता है। दिगम्बरताव अादश यो पात ऊपरकहा, श्रादर्श का मूल्य स्वतंत्र है । वर्तमान कहने की आवश्यकता नहीं उसको भूमिका एकदम भिन्न है। वह श्राध्यामिक है। वैवल्य की दिगम्बरता की टि उसपर धारोप बनकर में अहिंसाकी, हृदयकी, अपार करुणा या सकती। की अभिव्यकि है। उसमें अभाव तो -"पूर्वाद जिनके चरणों पर राष्ट्र चलता है -सुनी तारादेवी मलिनी' यथापि अाज का भारतीय नारी उतने हो शिकार हैं जितने कि पाजसे समाज पिछनी दा शतादियों से बहुत कई शताब्दिमें पहले ये बल्कि हम बुद्ध आगे बना है किन्तु अभी भी उसमें तो यहा तक मानते हैं कि साक्षरता दिपा, अध विश्वास, निरदरता और शाा के हास के साथ ही हमारे और सानितना ज्यों-कास्यों है। शिल्प का हास भी हुआ है नहीं तो अप ठक नारी को चाकी, चूल्हा और शिल्प और कला भारतीय परिवार चब चस्व को 'च त्रयों से निर्मुच कर के श्रमित थे। मुगल और ब्रिटिश उस विधायक दिशा में हम नहीं ले काल को पार करती हुई नौद थोर जाते तबतक उसका उत्थान असभव परवर्ती युग की नारी श्राज मानसिक है । नाकी चूल्दे से मोद देने का और शारीरिक दोनों दृष्टियों से तात्पर्य गाई स्थिर कामों स उदासीन थपाहिज है। एक सबसे बड़ा और कर दना नहीं अपितु उसे- इन कामों वाला तत्व जो कि हमार समाज को के अतिरिक्त विश्व रे घटना चक्र में देश विदेश के प्रगतिशील नारी समाज बड़ों को कुतरता रहा है वह है उनका से अधिकाधिक परिचित कराना है मात्र भोग्य-पदाथ माना जाना। हम मानते है कि श्राज भोय' और योग्य जिसस वह न सिप अपने जीवन को ये भयकर सघप है और अतत परन समस्त परिवार को जिसका कि 'योग्य' की ही विजय होगा और नारी या पाधार शिला है, अधिकतम श्रल्हाद और मुख पहुंचा सके । को-भोग्य- पलानों से मोक्ष देकर हम उस अधिकाधिक योग्य बनाने में जुट बब हम भारतीय नारी-समाज को विश्व के दूसरे दशों का मारियों जायेंगे किन्तु इसके पहले कि हमहसकाय स तुलना करते तब यह बात किम समको प्रारम करें यह बहुत जरूरी है कि श्रमी उत्थान का दौर में एकदम बहुत हम उस रिसत वातावरण को जिसम पौछ है, स्पट हो जाती है। हमारा देश कि प्राधुनिक नारी समाज घिरा हुआ मदियों से गुलाम रहा है और याज है परिशुद्ध और राहत करें ताकि भी भले ही हम उपरीतौर से स्वतंत्र इमारा अभिध्यय सरलभाव स पूरा होगये हो किन्तु मनोवृतियों की स्वत हो सके। ता हममें अभी तक पैदा नहीं हुई है। निस्मदे अाधुनिक भारी समात्र दरा के अधिकाश देहान-रूढ़ियों, अप वारी रूप-सजा के प्रति निना विश्वासों और प्रशान पान मा अपिक सावधान है अंतरण के विपस ।
{७४] और विस्तार का मोह उसे इतना नहीं है। को भी पूरी ताकत से कह देना चाहत नहीं है सो कोई बात नहीं समाज का है कि तक हम उस जमीन को उन वातावरण हा कुछ ऐसा बना दिया गया आधारों को जिन पर IT की मदि है कि उसे इस परिवनन पर कुछ भी प्रस्त नारी खड़ी हुई है बदल नहीं देने विचार जाने का अवकाश ही नहा है। तरतक इम उसका ईप्सिम उद्धार नहीं गार प्रसाधनों ही ने उसका दैनिक कर सकते पर्या को इतना अधिक यस्त कर लिया सबसे पहला आदोलन जो कि है कि उसे अन्य दूसरे कामों के करने का नारी समाज के लिय अावश्यक है या तो कोई चिता ही है और न कोई है उसके परिवार' का कायाकल्य आकाक्षा । यह निनियता और मृत्यु उसके चहुँ मुखी वातावरण का परि की ओर झझोदकर खींचो वाला कार । उत्त श्रादोलन की सफलत संतोष कि वह जिस वातावरण म युगां और क्रियान्विति के लिये हमें कुटुम्ब सचला पा रहा है वही टाकार श्रावश्यक हे नारा समाज को जड़ा को नारी के स्थान की पुनप्रतिष्ठा करन दीला कर रहा है। मंत्र का दूसरा होगी । जैसाकि था। से! युगों पहल जाम ही मौत है। इसलिये यह बात से घर का व्यवस्थापक और मागदर्शक जरूरी है कि हम अाज नारी समाज माना जाता था, उसी रूप की प्रतिष्ठा से बुझ रही-श्राकाक्षा, वात्सल्य अार श्राम मीरूरी है। प्रत यह प्राव प्रगतिशील तत्वों का ज्ञान, विज्ञान और श्यक है कि हम 'नारी' को व्यथ के अच्छ वातावरण के स्नेह से सित करें वधनों स मुक्त कर उसे शिशु सरक्षण के और उसके प्रकाश को अखड श्रार लिय आधुनिक ज्ञान विज्ञान से परि अ-बुझ बनायें। चित और पुम्प की सहयोगिनो की अाज का नारी समाज जीवन की सरह क्ला, विश्व घटनाचत्र तथा निन वास्तविकताओं से हटता ना विविध गतिविधियों की जानकारी से रहा है हमारा सबसे पहला । प्रत्यक है कि हम ऐसा होने स रोक ताकि का यह प्रयल होना चाहिये कि नारी उसका मानमिक चरण जोकि युगों में नैतिक संरक्षण के साथ ही विधायक स चल रही सामाजिक विवशताओं को प्रवृत्तिया का भी उत्थान होशिससे वह कला और शिल्प के निमाणकारी कर गया है, थम सके। इस सचार कार्यों में लग सके। स कि नारी में नवयुग का प्रवेश जारी है हम मुदतही मोदते किन्तु इस बात समूण परिवार में बालकों का स्थान अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। ये नहे युत्त करें पज सामाजिक प्राधियों से और मी मयकर रूप ग्रहण न होनहार हो यो चनार पारि प्राशायद बन सके। वारिक मानानिक, राणाप और अन्न यह मईमान्य है कि परिवार ही गोय बना है। अत सावतक इम यह विश्व विद्यालय है जहा धागामी ना निर्माण को और ध्यान नहीं देते जाग्न का अाधार शिलाए रखी जाती मद का निश्चय मानिय भविष को है श्रार यदि यह शिला याग विधि रन बना पाना असभव है। प्रायड यणविधि ममा नहीं हुई तो सम्बन्धित ने इस बात को बिना किसी हिचक के पारिवारिक का अनागत अनुप स्वीकार किया कि बच्चा जम से और अधकारपण हा जाता है। इम एकरम परित, मुगोल पार स्वस्थ लिये यह बहुत जरूरी है कि हम छोट होता है किनु ममाग क अवाछित छोट नागरिको नया उनके भावी वातावरण से उमकी अधिकार शक्यिा सरक्षकों (नारियों) के जीवन को काफी कुरित और अविकसित रह जाती हैं। सतुण, गाधन-सम्पन और प्रण बनायें। इसलिय इम चाहिय कि उनको जिनके बच्चों का मनोवैज्ञानिक दृष्टि से शिक्षित चरा पर राष्ट्र भाग बढना है, उप बनाये और नारी को सादगी से पूर्ण युक्त मरनए और वातावरण दें जिससे मुखी परिवार का सभा और राष्ट्र का हि अनागत अधिकाधिक उबल और विधाना बनने की प्रेरणा दें। श्रमण-सस्कृति प्राप्ति स्थान दुलीचन्द जैन, न्यूज पेपर एजट १, खजूरी बाजार, इदौर हिदी, उई, इग्निश, मराठा और गुजराती दैनिक, सामाहिक एवं मामिक पत्रों के मिलने का एकमात्र स्थान | सम्पादकीय-- wwwm ही श्राज घरा के एक ध्रुव से दूसर तक पहुंचते हैं तब हम सहज भाव ऐस वक्त जबकि सारा संसार और घर की तरह मल-मूत्र का खाद घरज्वार भड़ियों की तर एक दूसरे खाकर सोना उगलते हैं, अपने पथ भ्रष्ट को भपटने की दुश्चिता स घिरा हुश्रा सहोदरों को अनुभूत इगिनों द्वारा हैं और युद्ध की दिगतयापा सभा राहत का मार्ग बताते हैं। धर्म की बोली वनात्रों ने तमाम समस्याग्रा को निपट में हम जिहै ताथवर (तीय निर्माना) पचीदा बना दिया है, सस्कृति, समपण या अवतार कहकर पुकारते हैं सब और स्वाथ त्याग विशषत दिक् + श्रमरी की बोला में उई ही हम 'युगचेता (सषया अहम् त्याग) वाली सस्कृति को मानव'कहकर पुकारते है। पुराणों को बातें करना विद्रप विडम्बना है। निश्चय पालङ्कारिक और अतिशयोक्ति पूए भाषा से बचते हुए जब हम उसके ध्रुप तक परिग्रहवाद और हिंसा का भयकर चुचक्र अपना सम्पुण गति मे से कह सकते है कि श्रीसतन मनुष्य प्रवहमान है । एक मनु पुर दूसरे मनु ही निरतर विकास और सस्कार पुत्र को रस शिराओं के ठप्प रत को द्वारा महामानवक स्तर तक पहुंच भूगे भेदिये की तरह चूस जाना चाहता जाता है । एमे ही महापुरुषों के चरणों है। एसो तृप्ति शष विभाषिका में पर सस्कृति रश्मि, श्रणु, और वाप वात्सल्य, स्नेह, अपरिग्रह, मवस्व से निमुक्त होकर आग बढ़ती है । समपण और मनन चितन का प्रसग यह सवमान्य है कि सस्कृति राज जगखार मुल्कों के एलानों और बुश्त्यों नीति, इतिहास पुराण, मनोविज्ञान नीति अथनीति, समाज-नीति, कूट की निगाह में अक्षम्य अपराध हो सकता है किन्तु कोरिया, मिश्र, टय नी खगोल, भूगोल, भाषा सभी की तलवी शिया, हिचान श्रादि के नरमेधों अनुवश और वातावरण एस दो खड़ों स्रोतस्विना है। उसे हम अपरातीर पर का तकाजा है कि हम मासूम जिन्दगियों में विभक्त कर सकते है। इनमें स के खिलाफ रची गरहा बेरहम मनहूस अनुवश एक ऐसा तत्व है जिसमें साजिशों का 'शाति और आध्यात्मिक पुरखों की 'इस्टिकट स' या प्रादम परमरायो द्वारा मुकाबला करें। इही प्रवृत्तियां ज्यों की त्यों उतरती चनी रक्तस्नात परिस्थितियों में स. कुछ आई है ! श्रायुध, उद्योग, वाष्य, अणु एसे मनस्वी और तश जोकि मनस् के और रश्मि के विविध स्तरों से गुजरती समृण ख गोल और भूगोल को अघि हुई मानव स तति श्रादिम प्रवृत्तियों और जानकारी रपते हैं म लेते हैं कोकिस हद तक परिष्कृत करती रही।
[७] इसी का लेवा जोगा सस्कृति है । मनो सस्पर्श से परिणमन करती है तब हने वैज्ञानिकों ने अनुवश का सम्बघि सोने हम सस्कृति का 'उत्याद" कहते हैं। रत्त से माना है । उनका विश्वास है वह नवीन प्रवाहों से मिलकर अपने कि सास्कृतिक तत्वों का सरचण परवर्ती अस्तित्व का नये अस्तित्व में जितना अधिक कामोसम्स" के जोड़ों रूप में व्यय" करती है तब इने हम में होता है उठना अधिक वातावरए में सैदातिक शब्दावली में सम्पति का नहीं । वातावरणका सम्बध अक्सर यय करते हैं । इस उद्गम और यच सभ्यता से जोड़ा जाता है। मनस् वेत्तात्रों के अतिरिन सस्कृति की एक और की मान्यता है कि मनुष्य को अधिकाश स्थिति है जिसे हम 'सम्मृति का निमिति "जनक-जननी" से हम्ता नरित स्थैय" कहते हैं। यहाँ "सस्कृति का "प्रोमोसम्स" में होता है। उसका धारा" नई धागों से मिलकर भी बनना बिगड़ना "क्रोमोसम्स" के जोड़ा अपनी बुनियादा धातुओं को कायम में ही निहित है। यो मान लिया जाना चाहिए कि अनुवश संमृति को रखता है इसे हम सस्कृति की “ीय" बनाता है और वातावरण सभ्यता स्थिति कहकर पुकार सकते हैं । इस को-फितु कही गई बातको खडश तरह संस्कृति साधारण 'वत्थु" का नहीं अवहश मानना चाहिए तरह उत्पन्न, विनष्ट और फिर भी क्योंकि दोनों एक दूसरे मे इतने द्रयार्षिक दृष्टि स अविनष्ट रहनी है । अधिक जुड़े हुए हैं इस तरह यदि हम ससार की इस दोनों की स्थिनियां अलग-अलग करके खू ख्वार स्थिति को-सिम कि मनुष्य नहीं दख सकते । दोनों को एक दूसरे का श्रावरिक हा हा कार और वैषम्य ये पड़ोस में रखकर देखना पढ़ेग। पूरी तरह स्पष्ट हुअा है-बदलना अनुवश एक अविरल प्रवाह है जो चाहते हैं तो हम सस्कृति का सहारा अाद्या नारी और श्रादि नर मे उसकी लेना होगा । हमारा यह सांस्कृतिक उप सततियों में क्रमश विभक्त होता दावा है कि वन विश्व की खतरनाक हुया विस्तीण होगया है इसलिये यह और विस्फोटक स्थिति पर अन्तराष्ट्रीय बहुत जरूरी है कि हम इस प्रवाह के शस्कृतिक स्तर पर विचार नहीं किया उद्गम और विकास को मनोयोगपूर्वक जाता तबतक विश्वसन तत्वों का घटाना समझें । जब तक हम यह नहीं मानलेते कटिन है प्रत विश्व की तमाम सतत कि सस्कृति का विधस होना है उत्पाद, और इस श्रात्मानों से हमारा विनम्र यय, धौय के उसूल पर-तब तक हम कितु कटोर निवेदन सस्कृतिक अतवर्ती अथ तक नहीं पहुँच वे अपने सांस्कृतिक स्तर को सकते । सस्कृति जर वातावरण के दृढ करें और अपने रर म ..
。 दिन की तरह साफ करदें कि शाति पठनीय है। यों मिलिद प्रश्न में वह अपरिमेय शक्ति है जो किसी स्वाध्याय और मनन की चीज है। मो हिमावादो भारत को शिरत प्रत्यक श्रावक को इस अपने दैनिक दने का मामय रखती है । हमें स्वाध्याय की वस्तु बनाना चाहिय चाहिये कि हम अपने म इस सामर्थ्य महास्थपिरागसेन स वक्ट्रिया र को यवहार और यथाथ में मामत्रस्य राजा मिनाण्डर ने ठीक नैस ही प्रश्न का स्थिति कायम कर विकसित कर स्यि है जैसे राजा 'पणिक' ने गणधर और युगों को छाती चोरती चनो गौतम स किय थे। नाम पिशाति मान प्रारही इस उनवल परम्परा को है' जातक कथा + आधार पर लिखित अनुनवल होने से रोके । एक उत्कृष्ट कहानी है जिसम लिबास प्रस्तुतक- अन्यामार जैन का है और यात्मा 'श्रमण सस्कृति' का दूसरा धक बोधिसत्व की ! -सके अतिरित अपन पाठकों को दते अहा एक शोर भी कारेद्रन का हम ना स्वामोन हमें अतुल हर हे वहीं इस बात का विचरत है' कविना, स्वशाह का ग्दद भी है कि हम इस प्रक को श्रपने 'महावीर ने कहा, श्री शिखरच द और अविराम प्रयत्नों के बावजूर मी की पौराणिक कहाना ने मा अद का निश्चित समय पर निधारित रूप सजा स्रोतस्विनी को बहुत कुछ प्रवाह दिया के साथ प्रकाशित नहीं कर सके। फिर है । यद्यपि हम इस बात स इन्कार भी हमें इस बात स पूरा सन्तोष है नहीं करते की श्रक का अद्धाश क्लेवर कि अव में सकलित सामग्री निता त श्रमौलिक है, ऐसा जो कि कई पुस्तकों उपयोगी और अपने ध्येय को पूरा या जैन मासिका में प्रकाशित हो चुका करने वाली है। श्रमण सस्थति' के है, किन्तु इसक वावद भी उन अश मम्पादन म हमार पूरे प्रयत्न रहे हैं इस श्रेणी के हैं कि उन का प्रत्या कि पाठक को 'श्रमण' और 'सस्कृति' पुनरावृति नित्य-नवान दृधि का दता * स्पधाओं से परिचित कराया जाय है। महात्मा भगवानदीन का बहानानुमा ग्रार 'प्रम-युग' स 'विनोबा युग' दाशनिक निवध इसी श्रेणी का है । 7 तमाम परिवतनों की एक हम हादिक विश्वास है कि भविष्य म भाका दी जाय । जैनेद्रजी भी हम अपने नरुण और शतकश दिगम्बर' निध हमारे इस ध्येय साहित्यिकोंस इसो तरा सहयोग मिलता का पत्र पूर्ति करता है। रहेगा जिससे हम अागामी अकों का 'मिलिइ प्रश्न' से उद्भूत श्रशों पूरी मफलता के साथ प्रकाशित कर में 'श्रमण' को ओ यारया हुई है वह श्री महावीर जयन्ती उत्सव समिति इन्दौर आय व्यय विवरण परक, चीर सपत् २४७६ श्री प्रभात फेरो खर्च सभा पर्च, सभा २011-1 भी मिला शकी भी दिगम्बर जैन पहा El-)| श्री कमेंटो भात पर कहा छपाई, प्रवार, मादोर भी श्वेतार 7 मूर्ति ३६२॥) प्रवास पृर मात पडा मोजन यवस्था पर्न माट और पोज, नार मकान बर्थ भी सामान स्थानक वामी मान ८ पड़ा ८०७-00 टोर २६) श्री सिनकबाकी लाइट, रडिया इत्यादि 4 मामानों की v मजदूरीपून वगेरची सा आय व्यय विवरण पत्रक, परि मरद २४७७ २६३) श्री शिमलाही प्रभात फरा पर्न श्रो दिकर मैन पक्ष २६२) ममा लय छगई, प्रनार कमटा या कपड़ा घर र दियो। माटर १२॥) भोरखदीवान मधिल 111) हारमोन पोष्ट प्रा पा ४१-) गरथी मात्र मागे पन मोरवrt TES मार PRE) भीमाको
@219506C0930&OTOSDEBEOOTSDE33
तीर्थकर महावीर के पुनीत जन्म पर्व पर
हम आपको अमिनन्दन करते है
दैनिक जीवन के ग्रावश्यक वस्त्रों के लिये
M
P
एक विश्वस्त स्था-
-
OV302921033033322382319 PODPPERSFEDPIS
दि हुकुमचन्द मिल्स लिमिटेड
इन्दौर
को याद रखिये
हमारी विशेषताएँ-
पक्के रंग की चोल
पो रग की साडियां और पातलें
@ पक्के रंग को सुन्दर डिझाइनो,को छीटे
@ शटिंग, कोटिंग, टावेल्म, मलमल, हरक मादि
मारतीय मिलों में उत्कृष्ट युनाई, मजबूती और
आपंक हिमाइनों के लिए प्रख्यात
2020BEFRIA BOPPOPIERBESTEFEESEEPEROGERSEVECERATEⓇ
-
मेनेजिंग एजेन्टस् .
सर हुकुमचद एँड मन्नालाल क इन्दौर
--
1000030CB082882@8888883 00384@@CCOOPE
8880098SaamaaasneRecie
मंगलमय, महावीर के पुनीत जन्म की
स्मरण की.बेला में
सुपरफाइन कपड़े के लिये मध्यभारत का
-एक मात्र स्थान
जिसे भाप सदैव याद रख सकत है
दि हीरा मिल्स लि०
उज्जैन
द्वारा निर्मित
* सुपर फाइन धोती जोडे
* काम्ब्ड सूत की मलमल
* उंची जात की जगन्नाथी, हरक
* पक्के रंग की साडिया, पातल
* हरक, चादर, लुगडे
मोर
नित्य प्रति उपयोग में आने वाले वस्त्रों की प्राप्ति के लिये
मैनेजिंग एजेन्टस्
सर सरूपचंद हुकमचंद एंड
कम्पनी, इंदौर
CgSEOCOMOS-8888@CESee
-
BEO330003088888888880889USSEavecomme
म -- । . 3 टेलीफोन न १०६ सार का पता-NAND स्वदेश की उन्नति कीजिये श्रीर गृह उद्योग धन्धों को प्रोत्साहन दीजिये दी नंदलाल भंडारी मिल्स लिमिटेड इन्दौर १९२२ में रजिस्टर्ड हमारी विशेषताए सर्व प्रकार के कामों के लिये सर्व साधारण को रुप का सस्ता पवे नत्तम, नित्य के व्यवहार योग्य, नये प्रकार का टिकाऊ व्यवहार कर्ता की पावश्यकता पूर्ति के लिये सब प्रकार का कपडा कोटिंग्ज, ट्विन्स, लठ्ठा, प्लेन और फ.सी शटिंग, टावेल्स और नेपकि स, धोतियां और सादियां, दो सूती और मजरी, जाकेट्स और दरिया गिल्ल चातुप भोर परिश्रम इसकी सफलता की कुजीह एजेट्स दि नन्दलाल मराडारी एराड संस हेड आफिस कपड़ा दूकान मिल्स विडिग ८१ एमटी लाथ मार्केट [ सेण्ट्रल इण्डिया एडवरटाइजर्स दौर] 4 न .
. स्थापित १९१४ तार का पता-पिनोद, जैन विनोद मिल्स लिमिटेड, उज्जैन (दीपचन्द मिल्स सहित) श्रीमत सिधिया नरेश,राजप्रमुख मध्यभारत सघ द्वारा सर क्षत हमारी कई विशेषताए १ कपड़ा-उपयागी, मस्ता, टिकार, सभी प्रकार का । जिसे लोग बड़े चाव से खरीदकर उपयोग में लाते हैं। एक बार अवश्य खात्री करें। २ एकसारपेंट फादन घून-खात्री में भारत मरकार द्वारा पसद । मध्यमारन, राजपूताना श्रादि प्रान्तों के अस्पतालों में काम में लिया जाता है। ३ लिट-~-इस हमने अभी चालू किया है। बम्बई की सनिकल ट्रेसिंग कम्पनी ने पसन्द करके अमी ज्यादा तादाद में खरीदा है। आर्टिफीशियल सिल्प क्लाय- तरह तरह के फेसी और रग बिरगे कपड़े, मलमल, बदिया जारजेट वायल व साटन वगैरह तैयार दिये जाते हैं। ५ नरेद्र फेमिकल वर्क्स- इसमें चेजाटेबल टेलो, साफ्ट सोप, टरको रेड आइल साम्पिग व ग्लेज बेस्ट बिनोटेक्स फिनाइल प्रादि पनते है मो मिलों में काम शाते हैं । मध्यभारत म एकही फेक्ट्री है । अवश्य इस माल का उपयोग करें। फैलाश सोप फेक्ट्री- इसमें बढ़िया हिरम का साबुन नहाने व कपड़ा धोने के काम का तैयार किया जाता है, जो कीमत में सस्ता है। भूपेद्र आयन एएड मेटल धर्स-८ नरेद्र आइल मिल्स - दोनों कारखाने भी चालू है। उपरोक्त वस्तुथों को अवश्य एकवार खरीद कर परीक्षा करें दि विनोद मिल्स लि. उज्जैन मैनेजिंग एजट्स-- मेसर्स विनोदीराम बोलचद बैंकस -
* कोटिंग, शटिंग, काग, मादी
*दो सती काली मन र
* मिलने का एकदम
पूर्णतया भारतीय कायम के
उपयोग पनि
देश में अपनी विकार
दी गेंदालाल निल्म लि.
जन
ई
महागीर जयन्ती
याद
१का छपरा
दी गेंदालाल जस लि
जलगाव
फोन न ३५
नदेश]
बडजात्या विलि
फोन न ५३२
TRI,
अहिंसा का एक वाला आचरण
भी सेकडों मन कोरी किताबी
और सैद्धान्तिक अहिंसा
से कहीं अधिक
श्रेयस्कर है।
दि इदौर मालवा युनाइटेड
मिल्स लि,
--
No text on this page.