Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Subodh Sangrah

Shri Amolak Rishi · 2011/03

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सुबोध-संग्रह.
संग्रहकती
बालब्रह्मचारी शास्त्रोद्धारक
श्रीअमोलक ऋपिंजी महाराज.
बाReg
प्रसिद्धकती
श्रीमति महासतीजी
श्रीमेहताव कुंवरजी महाराज का
नपोत्सव फण्टा की सहायता से
जैन साधुमार्गी संघ धुलिया, ( पश्चिम खानंदश ).
पथनानि
मत 2000
मूल्य-सद्वर्तन.
श्रीवीराब्द २४५६
विक्रमसम्बन् १९८६

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प्रस्तावना. इसयन में ज्ञान प्रमार के लिये यंत्रिक साधन की सहायता होनसे ज्ञान वृद्धी के इच्छु को नान के फैलाव का म्यूबही प्रयास कर रहे हैं. जिधर देखो उधर पूराना या नवीन साहित्य उसही म या रूपान्तर में लाखों पुस्तको द्वार प्रसिद्धी में आया है आरहा . औरभी सूत्रही आने की आशा है. जिस हेतु और जिस उत्सहा में रचयिका संग्रहिता लेखनी चनांत और प्रकाशक द्रव्यव्यय कर प्रसिद्धी में रग्बत हैं उमही उत्महा से ग्राहको पाठको ग्रहण करने देख जाते है अर्थात् पस्तक प्रसिद्ध होने की जाहीरात होतही ये हजारों पुस्तको म्यल्पही कालमें बीतीण होजाती है. क्याही अच्छा हो यदि उसका यमाही उपयोग होतो आज यह भारत वर्ष उमही पोपाक को उसे पुनः पापक बन जाये कि जैसे पुर्व कालमें अकिना को तापनाना.जिससे यह आयर्यालय मत्री देशाम 'आदर्श' वन रहाथा. वसाही बन जाव इसलिय विति है कि यह अहो पाटक गणों ! या मुबोध मंग्रह ' नाम स्थापन कर जो पुस्तक आपके कर कमल में उपस्थिन हुआ है. इसमें संग्रहित ग्रन्थों कोइ नवीन नहीं है किन्नु पराचीन और अनेक वक्त प्रसिद्धी आय हुए है. १ प्रथम जो छंद दिये गये है वे मंगल रूप सदैव पठन के योग्य हैं. २ जो शांती प्रकाश है मा उमर अर्थ घरमार्थ का निधिध्यासनपूर्वक पढकर उपदेश यर्तन में लानेसे आत्मा में अवश्यही गांति का प्रकाश होता है.६ समाधि मरण है सो आयुष्य के अन्त के निकट बनी को श्रवण करा उस. प्रमाणे वर्तन , करने सूचित करने से यह ममाधी से आयुष्य पूर्ण, कर भविष्य में सुखी हो सकता है. ४ दसरा समाधी मरण का भी यह मतलब है. किन्तु यह आतुरता के ममय सुनाने का है.५ इम के नीचे सामारी संधारा का पाठ रखा है वह भी भव भीरू ओं के लिये सदेव उपयोग में लेने जैसा है. ६ रत्नाकर पचीसी आत्मा को सम मार्ग में प्रवर्ती कराने एक सपदेसक का जैमा सोध काती है ७ मैरी भावना भी सन्मार्ग में प्रवर्तक को सूचित करने मार्ग दर्शक के ममान है.८ उपदेश शतक का प्रथम श्लोक तो मंगला चरणार्थ अन्य ग्रन्थ का मैने रखा हैं. बाकी के श्लोक अन्य पुम्नक में गुर्जर भाषा में छपे हुए हैं. जिसका मेरे हाथ से उतारा कर अर्थ का शुद्धी वृद्धी के साथ अनुवाद किया है. श्लोक अशुद्ध दृष्टी पड़ने से कच्छ देश पावन की आठ कोटी मोटी पक्ष के परोपकार परायण कवीश्वर प्रवर पंडित युवाचार्यजी श्री नागचंन्द्री . महाराज पास भेजे थे. उन महा पुरुषाने कृपा कर शुद्ध बृद्धा कर अन्तिम के दो नवीन श्लोक यना कर पीछे भेज. यह अन्य जैन .. कृत नहीं हैं, किन्तु उपदेशक व्याख्यान दाता ओं के वाक्यलंकार के लिये वडा उपयोगी है. ९ पृच्छीस: णं सुयगडाग सूत्र का छट्टा अध्याय वर्तमान सामनाधीश श्री महावीर स्वामिजी महाराज के गुणों का संक्षिप्त में वर्णनः है, यह प्रत्येक जैनों को निपठन मनन करने योग्य है. और १० नमिप्रया [ उत्तराध्ययन सूनाका ९ वा अध्याय ] इसका भी पाठ करनेका इसवक जैन साधुमार्गी यो में बहूत रिवाज है. इसलिए यह मी रखदिया है. इस में कथित इन्द्रकृत प्रश्नों का उत्तर जो नमिराय ऋषि ने दिया है. यह प्रत्येक मुमुक्षु ओं को मनन करने योग्य है. यह दोनों अध्याय अर्धमागधीसपराचीन आयो को परम माननिय ) भाषा में है इसका अर्थ अर्वाचीन वर्तनान के बहुत से पाठको कैसमझ में आना मुशकिल जान. सहज समझ जाव ऐसा प्रत्येक गाथापर छन्द वन्ध भाषानुवाद भी मैने यथा मति रचकर रखा है. इत्यादि महा मतीजी की सूचनानुसार योध मय ग्रन्यों कर यह ग्रन्थित होने के कारण इसका नाम " मुबोध संग्रह " रखा है.आशा करता हूं कि पाठकगण इममें संग्रहित ग्रन्थों का वक्तोवक्त यथोचित उपयोग कर सुखी बनेंगे. हिंतच्छुः-अमोलक ऋषि.

॥तपस्विनी जी श्री मेहताव कुंवरजी का परिचय।।' मारब देशके धारस्टेट में रहो नागदा ग्राम नियामी ओसवाल वंशज पुण्यात्म अनेक यतों के पालक निरंत्र सदैव मामायिक प्रतके समाचरक श्रमणोपाक शेठ मोतीलालजी चोरडिया की.धर्मात्मा शीलवती सती धर्म पत्नी दोलीयाइ से सम्बत् १९५३ चैत शुक्ला चतुर्थी बुद्धवार को जो कन्या रत्न उप्तन्न ऊमा जिसका नाम सुन्दर बाई रसा. और सम्बत १९५९ के अपाट शुला सप्तमी को गेठजी का स्वर्ग वास हुआ तब दोलीबाई आशासे थी. जिससे स० १९५९, कार्तिक के शुमा ६ को जो फन्यारत्न उत्पन्न हुआ जिसका नाम मुरजयाइ रखा. पती वियोगसे उद्दिन चित्त को शांति के लिये अपनी पुत्री दोलाबाई को बदनायर निवासी शेठ हिराचंदजी काटेड झालारयाले के सुपुत्र *कारलालजी और गेंदीयाई आदि सब कुटुम्ब मिल अपने घर को लेगये और धर्म निष्ठा मुनि गेंदीबाई ने अपनी पुत्री को दोनों पौत्री सहित बडे प्रेम में मुख गामग्री और धर्मापदेश से पोष तोप संतुष्ट की, धर्म में आत्म रमण होनेसे दुःस मंद हुआ इवत्त महातपम्धिनी महासती श्री उमाजी महा प्रमाविक व्याख्यांनी महोसती केशरीजी ठाणा से यहां पधारे और कहा कि बाई तुमारे मामाजी घोर नपस्वी पंचद्रव्योपरी सर्व आहार के परित्यागी नित्र बेले २ पाग्या के कर्ता श्री स्वरूप चंदजी महाराज जिम प्रकार आत्म कल्याण कर रहे हैं पैसेही तुम भी करना चाहिये. कालान्तर में दोलीमाइ को स्वम में स्वरूपचंदजी महाराजाने सूचित किया कि जो आत्म कल्याण करना हो तो १२ महिने के अन्दर करलो. इत्यादि सम्पन्य से दोलीबाई को वैराग्य जामत हुआ और दीक्षा की बात करी. यह समाचार वाईके मामी मुसरा दुलीचदजी को मालम टेनिसे वे बाइको आपने घर ले गये और बाइका दिल किसी प्रकार से दुःप नहीं पाये ऐसी तरह रखने लगे. तेमही बाइक काकी सुसराई कारलालजीभी सार- संमार अच्छी करने लगे किन्तु वाइका वैगंग्य कम हुआ नहीं. और अपना सीटतार्थ साधने जिनके घर अंदाज ४०-५० दीक्षा हुह होगी ऐसे धर्म दोपक राजमान श्रीमान शेठजी गोपालजी पन्नालालजी की दुकानकै . मालक धर्म धुरंधर पुण्यप्रभावक मुशश्रावक भाहजी मोतीलालजी किल्ले धारवालको बाइने अपना हेतू दीया. गेठजी ने कहा कि दोनों बच्ची नादान है. इनके होंगार हानेबाद दीक्षा लेलेना. किन्तु याईने कबूल नही किया. नर शेठनीने बडी पुत्री मुंदरबाइसे पूछ उसनेमी कहा कि ममो दीक्षा लेवूगी. दोनोंको बहुत परचाइ किन्तु किंचितभी चली नहीं, तब गठजीन कहाकि तुम दृढ म्ही तुआरी इच्छा पूर्ण हो जायगी. . . - * । (३.) दोलीबाइके दोनों पक्षगलों को यह समाचार मालुम पड़ने मे वे धार आये और दोनों को बहुत समझाइ- किन्तु किंचितही मानां नहीं: तय . राजमें किरयादकीः राजा माहबन दोनों को बोलाइ तब शटंजी ने कहा हमार घराने की स्त्रीयों वार में आ नहीं सकती है. तब सरकारने अहकारीको शेठजी के घर भेजकर-बाइकी जवानी ली. इत: ममझाइ.. - किन्तु निश्चय नहीं पलटा,तब सुन्दर बाइसे कहा तुमारी शादी की आयगी सब प्रकार मुख पायोगी दीक्षा मत लो इत्यादि.सुनकर मुन्दर यादन कहा यदि तीन वातका बन्दोबस्त हो तो मै दीक्षा नहीं ले. न्यायाधिसने पूछा क्या ? वाइने कहा ".१ मे रांड [ विधवा ] नहीं होवू. २ मैग मा नहीं मरे और ३ में नहीं मरूं " दशवपकी नन्ही बच्ची के मुहसे यह सुन सवहीं आश्चर्यचकित बन गये. लोगों के ऑग्यों से आशू छूट पड़े और आखीर मे नाइलाज संबी कुटुम्चियों ने रुदन करते आता प्रदानकी. परमपूज्य श्री धर्मदासजी महागंज की संप्र. दायक प्रभाविक पूज्य श्री नन्दलालजी महाराज तमा पाटविय मिथ्यातिभिरमारतंड पूज्य श्री माधवमुनिजी महाराज, नम पाटविय व्याख्यान याचम्पति पूज्य श्री चम्पालालजी महाजके अनुयाय: म्धविर मुनि श्री ताराचंदजी महाराज आदि मुनिवरों और सति- शिरोमणि महासतीजी श्री बालाजी महाराज. विद्वयं महासती श्री बई मन कुवरजी महाराज आदि मनियों उमवक्त धारा नगरी में उपस्थित- . - थे; वे सबी वर्गाचमें पधार और हाथी घाटे सेकडा स्त्री पुरुषों के परिवारस वादिम बजार गजाते दोनो वैरागण वाइ को उत्तम वस्त्र- भूपण से मज कर जयद्ववनी से बात वागमें लगयऔर मंचत१०६३ चेत शुक्ला१३ को सविधी दीक्षा दिलाकर दोली बाईका पहनाय कुवरजी नाम स्थपन कर महासती यडे मेन कुवरजाकी चर्चा दानों को बनाइ गई. छोटी पुत्रि मुरजाइ को गंदाबाइ अपने माथ मन परिवार के साथ लेकर स्वस्थान गट. दोनों मतियों ज्ञानाभ्यास तप संयम में आत्म रभण करने लगी. कितनेक वर्ष बाद माहमती या का बदनावर पधारना ऊया वहां मूर्यवाह दर्शनार्थ आई, माता भनी का माध्वी के दर्शन से और वारतालाप से मुरजबाद को भी वैराग्य जागनं हुआ, माता के साथ जाने लगी किन्तु परिवार में जाने नहीं दी. और जन महासतीयों का धार पधारना हुआ तब कारण वशात् सुरजें- बाइ का. भी वहां आना हो गया. महासतीयों के दर्शन कर दीक्षा की इच्छा प्रगट की सतीजी ने यह बात गेटजी मोतीलालजी को दीइ भेटीने सुरजबाइसे पूछा परिणाम निश्चल देख. खुनी हुए, कुटुम्बियों को खवर होतेहा सब जने आये. उक्त प्रकार बहुत पर्यन किया किन्तु डिगा - सके नहीं, तब .सं., १९५१ मुंगध शुक्ला.३ को महोत्सव:पूर्वक दीक्षा दिलाकर श्री सुंदर कवरजी की शिया बना दीगई. इन्हीके पास, संः १९७८ मृगश्र शुक्ला ५ को 1 v दीक्षा ली जिनका नाम तेजकवरजी रखा. यह चारोही. 'ठाण प्रामानुमान विहार करने वानदेश पधार और सं. १९८५"का भुमायल में चौमास किया. यो चारों सतीयों धर्म दीपा रही है.' यह पुस्तक प्रसिद्ध कैसी हुइ ? सं. १९८५ महामुद १३ गुरुवार को बालब्रह्मचारी श्री अमा- लक ऋपिजी महाराज. वृद्धि मुनि श्रीराज ऋषिजी महाराज. तपस्वी राजश्रीउदय ऋपिजी महाराज. 'विद्याविलासी श्रीकल्यान ऋषिजी महाराज. विनीत विचक्षण श्री मुलतान ऋपिजी महाराज टाये ५ धुलिये शेहर पधारे. यहां कारण यशात् अधिक काल रहना हुआ. तब अभिमालक ऋषिजी महाराज श्री से मिलने प्रसिद्ध वक्ता महाप्रमविक व्याख्यानी श्री चौधमलजी महाराज ठाणे ३ पधारे. एकही स्थान में बड़े प्रेम सेरहे. व्याख्याना दि द्वारा धर्म का खूब उद्यान हुआ. इनके विहारहु याद बंबइ सेहर चौमांस दीपाकर स्थविरं भगवंत महा मागवान श्री ताराचंदजी महाराज. पंडित सुव्यान्यानी श्रीकिसन लालजी महाराज. प्रभाविक व्याख्यानी शांत दांत श्रीसौभाग्यमलजी महाराज. वृद्ध मुनिश्री यच्छराजजी महाराज, पंडित कविराज श्री सुरजमलजी महाराज. घोर तपस्ची और चैयावची श्री भगवानदासजी महाराज. तपस्वीजी श्रीकेशरीमलजी महाराज. ठाण.७ धुलिये पधार. एकही स्थानमें बडे प्रेम मे रहे. विद्वान मुनि श्री केवलचंदजी ने २५ अवधान किये.

इम से भी धर्म खूब दीपा. इन महाराज क दशनार्थ तपस्वीजी महा
मती श्री मेहतार कंवरजी महाराज. मुव्याख्यानी श्री सुंदरकवरी
महाराज. बालयमचारीणी कवीयत्री श्री मुरजवरजी महाराज,
विनीन वयावची श्री जबरजी महागज ठाणा ४ पधारे श्री
तारानंदजी महाराज तो ग्लाम की तरफ विहार करगये और
महासतीजी का इरादा श्री अमोल ऋषिजी महाराज के मेले
चौमासा करनेका होनेगे विनंती पूर्वक चौमासा कराया. चीमासे
में १२५ के अंदाज अठाई आदि बडा तप ३५ स्कन्ध तथा
३-४ हजार मनुष्यका दर्शनार्थ आगम हुआ इत्यादि खूब धर्म तप
हुआ. जैन जैनेनर मबही कहते हैं कि ऐसा चौमामे का आनन्द
आजतक कभीभी यहां नहीं आया.
महामती श्री मेहताव कंवरजी ने ३२ उपवासका तप किया था
उमवक्त ४००.५०० मनुप्य बाहिर ग्राम के दर्शनार्थ आये थे
उस वक्त ज्ञान वृद्धी के बाम्ने कुछ चन्द हुआया. उसके खरच
मे यह पुस्तक प्रसिद्धी में रखी गद है जी.
गुणानुगगी-मानीलाल.

प्रकाशक:-श्रीमती गहासतीजी
श्रीमहताब कुंवरजी महाराज का तपोत्सव फण्डकी सहायता
धुलिया (प. खानदेश ) का जैन श्री संघ तरफसे
सेठजी पृथ्वीराज हेमराज दुधेडिया.
मुद्रक:-कालिदाम मिताराम पंडिन
समर्थ छापखाना,
आग्रारोड धुलिया, पश्चिम खानदेश,

उनमःसिद्धं . सुबोध-संग्रह महलाचरण 4 - ॥श्री प्रमेष्टी परमानन्द छन्द ॥ ॥दोहा॥ * नमो अरिहताणं । इम पांचं पदमाय । उन्हाँ हाँ श्रीहाँ स्वाहा ।जपना ही श्रीथाय॥१॥ १०८ अ. सि. आ. उ. सा.! ॥त्रिभंगी छन्द ॥ ग्रणमु सरम्वती । होयवर मती । चित हुलस अति । गुण धुणवा ।। शुद्ध भावे ध्याये । सो मुख पाये । एक चित्त चहावे यमः सुणवा।। जय जय परमेष्टी। जगम श्रेष्टी । दे पद जेष्टी । जगधारं ॥ जांजग मझारं । नाम उदारं । जय.सुखकारं । नवकारं ॥ १ ॥ बारे गुणवंता । श्री अरिहंता लोक महतां । गुण गैहरा ॥ धन धातिक कर्म. । मिथ्या भौ । त्याग अधर्म । विष लहरा ।।

: । • ( सुबंध-संग्रह) शुष्क मनध्याया ।केवल पाया । इन्द्र आया । तिण वार ! त्रि।। घर परिषद पारे । हपंपारे । मुणि अवधारे। निनवाणी ।। अमृत मे प्यारी । जंग हितकारी ।। मुर नर नारी । पहचाणी॥ केइ संयम धारे । केइ बतबारे । कर्म विदारे शिवत्यारं ॥ त्रि॥॥ द्वितीय पद ध्यागे । सिद्ध गुणगावो । फिर नहीं आवो। तिहांजाई ।। जे अलख निरंजन । मवि मनरंजन । कर्म के भजन । शिव सांई ॥ पुद्गलदा फंदा । दूर निकंदा परमानन्दा । अविकारं ॥ त्रि॥ ४ ॥ अ2 गुण को धारे । जात् निहारे । काल नमारे । उनताई ॥ जिहां मुख अनंता । केवलवंता । गुण उच्चरंता । छे नाई ॥ निन बास बताइ । यो मुझताइ । तुमसा नाहीं। दातारं ॥ त्रि॥५|| गणिवर पद तीजे । नित्य नमाने । सेवा कीजे हर्ष घरी ।। पंच महाबत पाले । दूषण टारे । गजजिम माले। शूर हरी ॥ पांचे वश करते । पंच उच्चरते। पांचूही हरते । दुःखकारं ।। वि॥६॥शीतल जिमनंदा। अचल गिरंदा । गणपति इंदा ।भिरदार।। मागर जिम गहेरा । ज्ञान लेहरा । मिथ्या अन्धेरा। परिहारं ।। मम्पद यस पाये । न्याय वढाये । पाले पलावे। आचार। त्रि.७ ।। गुरु मेवा साधी । विनय आराधी । चित समाधी । ज्ञान भणे ॥ बारे अंग वाणी । पेटी समाणी । पूर्व गाणी । संशय हणे ।। निर्वद्य सत्य भाव । शास्त्र माखे । गुण अभिलाखे । निजसा।। त्रि॥८॥ उकसाया म्यामी । अन्तरयामी । शिव गन गामी। हितकारी ।। । IA ३ ( सुदोष संग्रह) शीखग ने आई। योग शिखावे । न्याय सावं । उपकारी ॥ दुगातमा पडतो । कादव गडतो । चित करे चहता। तिगवारं ॥ त्रि ।। ९॥कञ्चुक अही त्यागे दूरा भागे ।तिम वरागे। पाप हरे ॥ झुठा पर छन्दा | मोहनी फन्दा । प्रभु का बन्दा । योग धेरै ॥ सन माल खजीना । त्याग न कीना। महायत लीना । अणगारं ।। त्रि ॥१०॥पाले शुद्ध करणी। मवजल तरणी। आपद हरणो दृष्टी रखे। बोले सत्य वाणी । गुप्ति ठाणी । जगका प्राणी सम लखे ॥ शिव मार्ग ध्यावे । पाप हटावे । धर्म बढावे । सत्यसार त्रि॥११॥ ए प्रणमें भावे । विचन हटावे ! अरी हरी जावे। दूर सही ॥ जे तप तेजारी । दल विमारी । सोग सवारी । आत नहीं । अह पीडा भागे । दृष्टी न लागे । शत्रु न जागे । लीगार ॥त्रि ॥१२॥ ये मंत्र नीको | तारक जीको । त्रिजग टीको । सुखदाता ।। ये मंत्र करारी। महिमा भारी । लहे नरनारी । सुखसाता ॥ सरजीवन बलीदे धन टेली। भव भव केली । यह सामात्रि॥१३॥ पद्मासन वाली । रंग निहाली । आरत टाली। ध्यान धरे। तिलोक पयंपे । भावसु जपे । ऋद्धि सिद्धि मम्पे । जेह घरे ।। यह छंद त्रिभंगी। गाव उमंगी।भव भव संगी। जय कारंत्रि॥१४॥ ॥श्री पंच प्रमेष्ठी स्तुति ॥ ॥ नारच छद॥ तिलोक संत श्रेष्टिकं । नमामि परमेष्टिक !! भजे भने उदंगलं। - (मुबोध-प्रह) भवामि सदा मंगलं॥ १ ॥ सर्वाम अंग मुन्दरं । मारत मार दुध ।। सहश्र अष्ट लंछन । समस्त शुद्ध स्वच्छनं ॥ २॥ तितिक्ष जे चतुष्टकं । हणंत कर्म दुष्टकं ॥ तपश्चर्या से पुष्टकं । धरंत ध्यान सुष्टुकं ॥३॥ सुशान पूर्ण धारकं । अज्ञान भर्म वारकं ।। सुअष्ट प्रतिहारकं । सुभव्य जीय तारकं ॥४॥प्रमाद याद खण्डितं । अनन्त गुण मंण्डित।। अशुभ योग दण्डित । नमामि परम पण्डिा२॥पुभानु कोटीभास्करं । भवादी तारकं परं विकार दृष्टि मोचनं । नमामि शांति लोचन ॥६॥ सर्वत्र पाप खण्डन । मुजैन धर्म मण्डनं ॥ अनन्तमुख दायक। नमामि संघ नायकं ॥७॥ विशिष्ट गुण अष्टक समस्त शत्रु नष्टकं॥ अरूप रूप रासकं । सदेव स्थिर वासकं ॥८॥ अनन्त सुख मुस्यिते । रहंत सद्म निर्मित ॥ भयोघ सर्व वारकं । नमामि निर्विकार की॥९॥ छत्तीस गुण शोभितं । कपाय चउ अक्षामित।।मु सम्पदाष्ट माचकं । नमामि नित्य वाच॥१०॥ प्रमाण नय संश्रुतं । पच्चीस गुण संश्रुतं ।। मुज्ञान अन्य दायणं । नमामि उपाध्यायणं॥११॥तजत जगत् जालकं । पर प्राण रक्षपालकं ॥ वर्जत पाप कारणं । गर्जत धर्म धारणं ॥१२॥ तर्जत काम क्रोधकं । लर्जत सो विरोध ॥ वीतराग आण शोधकं । नमामि संत जोधकं ॥१३ अनानता प्रहारणं । अखील सुख कारण।। हणंत मोह फेणतं । नमामि जिनवणतं॥१४॥ मिथ्यान्धकार भंजनं । ददाति नान अंजनं !! प्रमाद दु.ख चूरणं । नमामि सत् गुरूणं ॥१५॥ तिलोकऋपि संम्नवे । शरणं सदा भवोभवे ॥ कृपाणय मया करी +4 (सुदोघ--मंग्रह) । मदेव ची हिरी सिरी ॥ १६ ॥ दोहा:-जय जय श्री प्रमेष्टीको । जय जय श्री जिनत्रण ।। जय जय श्री गुरु की रहो । दिया सुमार्ग जैन ॥ १७ ॥ ॥ श्री परमेष्टी गुण ॥ ॥ श्रीभगा-छंद ॥ श्रीनवकारं । जग जयकारं । शास्त्र सारं । है भ्रष्टा ।। अपो नित्य नरनारी । शुद्ध ध्यान धारी । मंत्र श्रेयकारी । ग्रमेष्टी ।। त्रीकरण शुद्ध घ्यावे । पाप पलाये । चिन्तिन थाये । देसारं ॥ अहो भव्य हितं । एकण चितं । समरोनित्यं ।नवकारं ॥१॥ श्री अरिहंता । जगत् महंता । इन्द्र नमंता । चरणारी ।। उत्तम गुण बारे । पावे ज्यारे । दोष अठारे ! दीय टारी ।। मह'वसु लक्षण । रवी तेन तिक्षण । वरे तत्क्षण । शिवद्वाराअहो।२।। हुये अविकारी । कर्म रिपु मारी। त्रिदुःख टारी । सिद्ध सिरी ॥ अलख अपं । विश्व के भूपं । सुख अनूपं । ज्ञान हिरी ।। अष्ट गुणधारी । एकतीस अतिमारी । उक्त मे जहारी । जप सारं ।। अहो ॥ ३॥गण नायक ज्ञाता । समाकत दाता। सूरी पद पाता। गुण मेहरा ॥ गुण छतसिं । तज रागरीसं । चउ संघ ईस 1 दिस चेहग। बड़े विचक्षण । दे शुद्ध शिक्षण । पट काय रक्षण । आचार ज्ञानमें पूरा । चरचा में मूग । पापंडी दृरा। मगजावे ॥ ।

६ ६ (मुरोध-प्र) अंग इग्याग । उपांग बाग । पटमत सारा । मुणाय । श्री उवम्झायं । संशय मिटायं । जिन मग टायं । नार मार ॥ ॥४॥ मंयम धारी। ममता वारी । करणी करा | करता है। प्रणाम समं । आत्म दमं । परीपह समं चरता है ।पटकाय पाले । कर्म को जाले । शुद्ध मग हाले । अणगारं ॥ अ.॥यह परम इंटे । सय में श्रेट । मुख उत्कृट । देता है ॥ सिंह अही कुंजर। दय रण सागर । बन्ध जलोदर । हरता है ॥ दुरित पलावे। रोग शोग जाये। सब सुख पावे । जग मझारं ॥ अ. ॥ ७ ॥ समरत अटक. ।। विश्वकै कष्टक । छिनमें नष्टका होजावे ।। शत्रु विनाश मित्र उल्लासे । मिल भक्त आशे । पूराव ॥ कहे अमोल अणगारं । नित्य नमस्कार । देवो पद सारं । दातारं हो ॥८॥ ॥श्री अरिहंत स्तुति ॥ ॥ मोतीदास छंद ।। सदा जगन्नायक सहायक हंस, मुकायक वायक लायक वंस ॥ सुश्रेष्ठ विशष्ट सुज्येष्ट कहत, अहो अरिहंत करो मुख संत ॥ १॥ सुतात सुमात मुभात मुजात । सुगात सुयात सुपात सुआत ॥ लंछन सुअष्ट सहस्त्र कहत।।अहो.॥२॥विशाल सुभाल सुवाल अबाल, दयाल मयाल अजाल कृपाल ।। सुमाल मुलाल भविक इच्छंत ।। अहो. ॥शाअखंड अडंड अचंड अतंड, अगंड अवंड भसंड सुसंड अफड पछंड भय गुणवंत।।अहो.॥णामहावीर गंभीर ध्यान मुाम्धिरा - ( सुबोध-मग्रह) अचार विचार अगीर सुगीर ।। अपार सुपीर मुबोध कहत ।। अहो.१५॥अरीमा विरीश शत्रुद पीस,जगोश मीश गुणीश वरीश। अखेह अछेह अमेह रहंत । अहो ॥शाउत्थापक पाप तीर्थकर आप॥ अपंत जिनंद वधं प्रताप ॥अनंत गुणातम श्री भगवंताअहो.||७|| अनेह विनह अगेह नगेह, अमेह विमेह अदेह विदेह।। अलेप मुलेप सदा दरमंत || अहो. ।। ८ । नकर्म नमर्म नगर्म उछाह, अक्रोध अमान अमाय अदाह ।। अरांग असोग अभोग तरंत । अहो.||सुज्ञान अराध समाधि प्रणाम,विहार फरंत भवी हित काम।। भजंत मुरासुरम्बामि महंत अहो.॥१०॥ कहंत सदा उपदेश रसाल। हरत मिथ्याता बंधन जाल | अराधक होय तिरंत अनंत ।। अहो. ॥११॥ रटंत कटंत दुरीत समस्त, लहंत मुखामृत पंछित यम्त ।। उद्धारक वृद्ध सहित हितयंत । अहो ॥१२॥ त्रिजोग निवार वसे शिव लोक, चग्णांबुज धोक,दे रिख तिलोक ॥ विलोक मुदेव जपो जग कन। अहो ॥॥ १३ ॥ इति ॥ ॥श्री सिद्धाष्टक स्तुति॥ ॥ नारायछन्द ॥ प्रसिद्ध सिद्ध गिय कंत,संत श्रेष्ठ देव हो||झटक दी मकल पाप, बेत्र नीरलेब हो ॥ कलंक डंक बंक अंक, रंच त्वं नडंबर ।। कृपा करो द्रयानिधी, ऋद्धि वृद्धी सिद्धी करं ॥ १ ॥ टेक ॥ - 1 सुबोध--मंद) अरूप रूप स्व अनूप, भूपधू . अखंड हो। अफंड भंड डंड गंड, छंडके प्रचंड हो ॥ अनंत ज्ञानरंप तोय, पाप मेल सहरं ।कृपा.॥२॥ प्रमाद क्रोध मान माय, लोभ लेश सो नहीं ॥ अनंत काल स्थीत है, अनंत सूख रासही ॥ अष्ट महा गुण मूल, त्वं सदा मुसंवरं । कृपा ॥ ३ ॥ विकार खार दूर टाल,राग द्वेष संहन्याअगाध जो भवोदधि सो धर्मपाती तया ॥ प्रत्येक एकमेक आप, व्याप हो गुणागर ॥ कृपा ॥ ४ ॥ अलेख रेख रुप नाही, पापफंद बंध सो । आहार भार हास्य त्रास, नाम काम धंधसोअभंग ज्ञान संग चंग, गुप्त ना उजागरं ॥ कृग ॥ ५ ॥ अलोक लोक द्रव्य क्षेत्र, काल भाव जाण हो । त्रिलोकनाथ त्रात भ्रात, मंद्र चंद्र भाण हो।। विनाम किया रोग सोग, भोग भाव भंगुरं ॥ कृरा० ॥ ६ जपंत जाप आग नाग, सिंह चोर सो हटे । कटत अंध द्रव्य भाव, रोग जे मिटे॥ विषय कषाय लाय जाय, आय मूख सागरं ॥ कृपा. ॥ ७ ॥ तिलोकारिख हस्त जोड, करत दित्य वंदना ।। निरोग वोध लाभ चहाय, कर्म की निकंदना" नहीं जगत्माही ओर, पापमो विश्वगरें । कृपा नित्यमेव एसिद्धाष्टकं,पठति जे मनोहर।। विज्ञान मुक्ति सुख द्वन्य, भाव होत नागरं नान्यत्र देवलोक माही, मिद्धस्थान उपरं ।। कृपा. ॥९॥ दोहा:-अजर अमर अविकार हो, सिद्ध निरंजन देव ॥ किंकर पर करुणा करो, दीजो अविचल सेव ॥१०॥ इति ।। 4 (छन्द-मप्र) ॥ श्री आचार्य स्तुति ॥ ॥ मरहद्दा छंद। जे ज्ञान महंता, समकितवता,चारितर तपशर ॥ उत्कृष्ट करणी. भवजल तरणी, पंचम वीर्य आचारसास्वयं पाले पलावे, पाप हटावे. उपदेशे नर नाया गणिवर पद श्रीज,नित्य नमीजे,कीजे सफल जमार॥१॥ ॥ टेक ॥ सब हिंसा टाले, दया सो पाले, निरवद्य बोले विचार ॥ दत्त व्रत ब्रह्मधारी, परिग्रह टारी, पंच जाम शुद्ध धार । मुरन चक्खु नासा, रसना फासा, इंद्रीय जीतन हार ॥ गणि. ॥२॥ पशु पंडग नारी, थानक टारी, नारिकथा परिहार"अंग निरखवा पारे, आसन टारे, मुणे न शन विकासकोडा न संभारे, सरस रस टारे, करे नहीं अधिको आहार ॥ गाण. ॥ ३ ॥ अंगशोमा टाले, वाट ए पाले, क्रोध न करे लगा।।अभिमान तजंता, कपट वरजंता, ममतादी सब मार कापाय एह चारी,महा दुःखकारी,भरमावे संसार। गणि ॥ ४ ॥ कर्मनका फंदा, दर निकंदा, चाले इर्या विहार । निरपद्य मुल वाणी, ले शुद्ध अन्नपार्णी, दोष' बयालिस टार ॥ जयणा कर लेवे, विधि परटेंच, समिती मुखकार गणि. ॥५॥ मन बचन काया, गुप्ति त्रिहुं डाया, गुण छत्तीस उदार । शुद्धकिरिया धारी, नान भंडारी, करता पर उपकार उपदेश सुनाये, भर्म उडांव, नारे मवि नर नार गाणे. ॥ ६॥ वर रूप दीपंता. - . ( सुबोध-संग्रह) महाबलवंता, वाणो अमृत धार ॥ अक्षर शुद्ध बोले,सातू नय खोले, डोले नहीं लगार ॥ विद्या निघांना, युगप्रधाना, गुणंगण रत्नाकार.॥ गणि.॥७॥ कुपक्ष नहीं ताणे, सम मत जाणे, अन्य मतको परिहार।। शीतल शशि जीप, रवि जिम दीपे, साथै बहु अनगार ॥ पाखंड हटावे, जैन दिपावे, पाले संजम भार ॥ गणि. ॥ ८ ॥ आचार्य नाणी, गुणनिधि वाणी,आचारज मुखकारा।समरण सुखकारी, महिमा भारी, अरिकरी भय परिहार ॥ दुःख जाये दूर, संकट चरे, पूरण रहे भंडार ॥ गणि. ॥ ९॥ आचार्य स्वामि, अंताजीमी, सिद्ध पदके दातार ॥ गणिवर गुण गावे, पार न पावे, रसना रचे हजार ५ अलप गुण गाया, मन समझाया. तिलोक करे नमस्कार ॥ गणि० , ॥ १० ॥ संवत उगणीसे, वर्ष चोतासे, वैशाख पूनम शशि वार ॥ जो अपशे भावे, सोही सुख पावे, छंद मरहठा धार ॥ प्राते उठ वंदे, दुरित निकंदे, रिद्ध सिद्ध जय जयकार । गणि० ॥ ११ ॥ इति ॥ , ॥ श्री उपाध्याय स्तुति ॥ ॥ हाटकी छन्द ।। संसार सागर, दुःख आगर, जाणे नागर, ततकाल त्याग, दूर भागे. शूर मागे, वीर ए॥ मुनिराज पासे धीर ए.

(छन्द--संग्रह) ग्रहे दीक्षा, ज्ञान शिक्षा, आप ए ॥ चउथे पद उवज्झाय सुखकर, कीजे नित्य प्रनि जाप प ॥ १ ॥ टेक ॥ आचारंग चंग, अंग सुयगड, टाणायंग मुखकार ए ॥ चउथो समवायांग नीफो, भगवइ ज्ञाता सार ५ ॥ उपासक अंतगड, अंग अष्टम, अनुतरो- ववाद थाप ए ॥ चउथे. ॥ २॥ प्रश्न व्याकरण, भण्या पूरण, अंग विपाक, रसाल ए || गुरुदेव पासे, अर्थ धान्य, चउदै दूपण टाल ए ॥ ग्यारा अंग, संगो-पांग, शीख्या अति, चित्त चाप ए॥ चउ. ॥ ३ ॥ उत्सात अमी, वीर्य तृतीय, आम्ति ज्ञान सत्त जाणाए ॥ आतम प्रवाद, अरु कर्म पूरव, प्रत्याख्यान वखाणीप ॥ विद्या अबंध, प्रवाद पूरव, धारत ताहि न धाप ए || चउ. ॥४ ।। प्राण क्रिया, विशाल' पूरव, लोकविंदु, मार ए ॥ चतुर्दश पूरव, अंग ग्यारा, पाठ अर्थ, सुधार ए | अभिमान तज कहे, वेण चारु, नहिं करत कूडी थाप ए ॥ चट. ॥ ५ ॥ भविकजन जो, प्रश्न पूछे, नव पदारथ, भाय ए॥ सूक्ष्म बादर, द्रव्य पटनो, पूछ कोई, प्रस्ताव ए | तब देत उत्तर, शोध मुत्तर, दे जिनागम, छाप ए॥ चऊ. ॥ ६ ॥ ज्ञानदाता, धर्मराता, बोले निरवद्य, वेण प॥ मिय्यात खंडण, जन मंडण, पाले जिनवर, केण ए॥ गणिपदने, जोग सोह, नामकम, आताप ए॥ चउ. ॥७॥ महावत पाले, दीप टाले, चाले. इरना, शोध ए ॥ कर्मरूपी शत्रुधातक, परम शुरा: जोध ए ॥ मन वचन काया, करण तीर्नु, (मुवधि-संग्रह) , करत नहीं, सो पाप ए ॥ चउ. ॥८॥ उपाध्याय भात, करत जुक्ति, ज्ञानागर, जीवत प॥ मिथ्यात जावे, बोध आवै, थावे शिवपुर, कंत ए॥ जैनमारग, तरण तारण, अपर सब. कलाप प. उ. ९॥ जिन नहीं, जिनराज सरखा, वेण सत, सुखकार ए॥ देश जिनपद, मांहि विचरे, करता पर,, उपकार ॥ मिय्यात्व अंधा, फर्म फंदा, ज्ञान अस्सि कर, काप ए॥ चउ. ।। १०॥ भवप्राणी तारे, संशय टार, यहू सूत्र, विस्तार ए ॥उस- राध्ययन, इगियारमा से, कयो वर्णव, जहार ॥ तिलोक रिस्त्र, कर जोडि बंद, सदा पुण्य प्रताप ए॥ चउ. ॥ ११ ॥ इति ।। ॥ श्री साधु स्तुति ॥ कामनी मोहनानी छन्द ।। साधु निर्मथने वंदना कीजीए, मानवको भव सफल करीनाए । धन्य जे संत गुणवंत सोभागिया, भोग किंपाकसा जाणके त्यागीया ॥.१.॥ पंच महावत समकित पालता, चार कपाय दावानल- टालता ॥ भाव सच्चे मुनि वंदूं में निच ए, कर्ण सच्चे जोग सर- सुकित्तए ॥२॥ धन्य जे क्षमा वैरागमें राचिया, द्रब्य छ नए पदारथ जाचिया ॥ मन वचन काया सम धारता, ज्ञान दर्शन चरण शुद्ध. सारता ॥ ३ ॥समभावे करी वेदना खमता. मरण

(छन्द-मंग्रह)
आया थकी जे करे समता । गुण सत्तावीस संयम जे धरे, राग
अने द्वैप जे किंचित नहीं करे ॥ ४ ॥ तीन ही शल्य सो मूल
निकंदिया, मोहनी कर्मसं ते नहीं फांदया ॥ नही कर विकथा
धर्म सुध्यावता, शुक्ल ध्यान धर कम खपावता ॥ ५॥ दया
छकायकी पालता जे मुनि, क्रिया भेद मद नहीं करे महागुणी ॥
नव वाड मुनिधर्म पाले अखंद ए, सकल मिथ्यात्वको छड्यो
अफंड ए ॥ ६ ॥ बावीस परिसह जीतिया ते सही, यावान
प्राणरक्षक विचरे मही ॥ बावन आनाचीरण टालता, चोरासी
उपमायुक्त वे चालता ॥ ७ ॥ एक एक चऊथादि पष्ठमासी करे,
एकावली रतनावली आदरे ॥ गुण रतन संवच्छर धारता,
प्रतिमादिक संसेसना जहारता ॥ ८॥ तप ऊणोदरी छे अति
मोटको, भिक्षाचरी रमत्याग नहीं छोटको ॥ कायकिलेस ने
पडिसलीनता,
तप धारक तंन करे क्षीणता
॥ ९ ॥ प्रायश्चित्त विनय वैयावच्च जे करे, . सज्झाय
ध्यान काउसग्ग आदरे । प्रच्छन्न पर नप साधे अणगार ए.
टाले सही जिक कर्मको सार प॥ १० ॥ चंद्र ज्यूं सोमदृष्ठी
करी दीपता, तपतेने रविकिरणने जीपंता ॥ सागर जेम गंभीर
कहीजीप, कुंजर जेम धीरजता लीजीए ॥ ११ ॥ लब्धि पाया
भली प्रगट तपस्या फली, सलीसही जलांसही प्रसिद्ध प्रगटी भली ||
वेगासही केइ आमोसही पत्निया, मञ्चोसही कोटबुद्धि केइ
पष्ठ

मुबोध-संग्रह) मत्तिया ॥ १२ ॥ वीजबुद्धी वली पदानुसरिया, एकक मुनिवर वैक्रय धारिया ॥ चारण विजाहरा मुनिगजिया, ऋजु विपुलमति संशय भांजिया ॥१३॥ एकेक मति श्रुति अवधी धणी, मनःपर्यव केवल शोभा घणी ।। केवली दोय कोडी सुखकार ए, नवकोडी उत्कृष्ट विचार ए, ॥ १४॥ जघन्य दोय सहस्र कोडी जती, सहस प्रत्येक उत्कृष्ट पद संयती ॥ आतां जिनंदकी पालता जे सदा।। जगतमें सकल'छोडे आपदा ॥१५॥ दुरित टले मुनि भोवसू जपता, तम दलित हो निम रवि तपता ।। कर्म शत्रु जीके करत निकंदना, रिख तिलोकजी करे तस वंदना ॥ १६ ॥ संवत उग- णीशे तीस मझारए; ज्येष्ट आदि छट मूरज धारणकामनी मोहना छंदमें जाणीए, मुखवेली जले पुष्कर मानीए ॥१७॥ कलश ॥ इम ऋद्धि वृद्धि समृद्धि कारण, जपो मुनियर भावसु ।। धर्मदेव महन्त प्रणमु थुग्या मुगुरु पसायंसू ॥ एम डाणी सेवो प्राणी मुसाधु मन खंत ए ॥ ते लहे शिवपद रूप निश्चय, निर्भय शिवमुख संत प॥१॥ इति ॥ ॥श्री चित्तामणी पार्श्वनाथ स्तोत्रम् ॥ किंकर्पूरमयं सुधारसमयं किं चन्द्रराचिर्मयं । लावण्यमयं महा माणिमयं कारुण्य केलिमयं ॥ विश्वानन्दमयं महोदयमयं शोभाम - (छन्द-संप्रद) चिन्मयं । शुक्लध्यानम्यं वपुर्जिनपत भूयाद्भवालम्बनम् ॥१॥ पातालं कलयन् धरां धवलयन्नाकाम मापूग्यन् । दिक्चत्रं क्रमयन् सुरासुर नरश्रेणि च विस्मापयन् ।। ब्रह्माण्ई मुखयन् जलनिजलधः फेनच्छलालोलयन् । श्रीचिन्तामणि पार्श्व संभवयशो हंसश्चिरं राजते ॥ २॥ पुण्यानां विपणिम्तमादिनमाणः कामेम कुम्मेथ्रीण । मोक्षनिम्सरणिः सुरेन्द्रकारिणी ज्योतिः प्रकाशाराणिः ।। दाने देव मणिनतोत्तम जनश्रेणिः कृपासारिणी । विश्वानन्द सुधा घाणभव- भिदे श्रीपार्थचिन्तामणिः ॥३॥ श्रीचिन्तामणिपार्थ विश्वजनता सज्जीवनस्त्वं मया । दृष्ट मतात ततः श्रियः समभवन्ना शक्रमाच- क्रिणः । मुक्तिः क्रीडति हस्तयोर्बहुविधं सिद्धं मनोवांच्छितं । दुर्दैवं दुरितंच दुर्दिन भयं कष्टं प्रणष्टं मम ॥ ४ ॥ यस्य पादत्तम प्रताप तपनः प्रोदामधामा जगजङ्घालः । कलिकाल कलिदलना मोहान्ध विध्वसकः ॥ नित्योद्योतपदं समस्न कमला केलिगृह राजते । स श्री पार्धजिनो जनहित कृत चिन्तामणिः पातु · मम् ॥५॥ विश्व व्यापितमा हिनस्ति तरणियालोपि कल्पांकुगे । दारिद्राणि गजवली हार शिशुः काष्टानि यहेः कणः ॥ पीयूषम्य लोपि रोग निवहं यद तथा ते.. विभो । मूर्तिः मर्तिमती सती त्रिजगती कष्टानि हतु क्षमा ॥ ६ ॥ श्रीचिन्तामणि मंत्र मोकृति- युतं ही कार साराश्रितं । श्रीमहं नमिऊण पास कालतं त्रैलोक्य वश्यावहम् ॥ द्वेधा मूत विद्यापहं विपहरं श्रेयः प्रभावाश्रयं ।

(सुबोध-मंग्रह) सोल्लासं वसहावितं जिनपुलिझा नन्ददं देहिनाम् ॥ ७ ॥ नहीं श्री कारवरं नमोक्षर परं ध्यायतिय योगिनो । हृत्पमे विनिवेश्य पार्थमधिपं चिन्तामणि संज्ञकम् ॥ भाले वाम मुजेच नाभिकरय भूयो भुजे दक्षिण । पश्चादलेपु ते शिवपद द्वित्रैर्भवैर्यान्त्यहो।। 20 नो रोगा नैव मोका न कलह कलना नारिमार प्रचारा । नवाधिनो समाधिनच दरदुरित दुष्ट दारिद्रतानी ॥ नो शाकिन्यो ग्रहानो नहरिकरि गणा व्याल वैतालजाला । जायन्ते पावचिन्ता- मणि मतिवंशतः पाणिनां भाक्तिभाजनम् ॥ ९ ॥ गीर्वाण द्रुमधेनु कुम्भ मणय स्नस्याङ्गणे रशियो। देवा दानव मानवाः सविनय तस्म हित ध्यायिनः।। लक्ष्मी तम्यवशा यशेव गुणिनां ब्रह्माण्ड संस्थायिनी । श्रीचिन्तामणि पार्श्वनाथ मनिशं संस्तातिया ध्यायने ॥१०॥ इतिजिनपति पाच पार्श्वव्ययक्षः । प्रदलित दुरितीयः प्रीणित प्राणी सार्थः । त्रिभुवन जनयांच्छादान चिन्तामणिकः । शिवपद तरुबाज बोधिवीज ददातु ॥ ११ ॥ इति ॥ MONAL (गानि प्रार-मंप्रद ) शान्तिप्रकाश प्रारम्भ प्रार्थना अग॥ दोहा प्रेम सहित यन्दो प्रथम, जिन पद कमल अनूप । नाक सुमरन अधम नर, हायन शांत स्वरूप ॥ १ ॥ तुम शरण आयो प्रभू, राग्वी लेओ निज टेक। निर्विकल्प मम सिद्धजी; देयो विमल विवेक ॥२॥ का बन्दना माव युन; त्रिविध जोग थिर धार । रतन रतन सम देव मुझ, ज्ञान जवाहर सार ॥३॥ থাকায় প্রত্যয়ন খুনি; নিবিল কর সন্ধান। दीन यंधु मुज दीजीये, सम दम जान विलास ॥ ४॥ सो साधु याचा हरी, कर्म शत्रु रणजीन । निपुणजो हरी ज्या लग्यो, आलम रतन पुनीत ||५|| अधिक प्रीय नव रसन में, है रस शान्नि विशेष । स्थाई भाव निर्वेदसे, मेदो सकल क्लेश ॥ ६ ॥ चीकलमती अभिलाश अति, कपट मिया गुण चोर। मैं चाहत का शांत रस, तुम से करी निहार ॥ ७ ॥ काप जांचों जायक, तुम सम नहिं दातार । करुणा निधी किरपा करी; दर्ज शान्लि विचार ||

(सुबोध-संग्रह)
मैं गुलाम हो रावरो, मेरो विगरत काज ।
नाही सुधार यनि रहै; मेरी तेरी लाज ॥९॥
शान्ति छयो निरग्वत रहं, जांच नहीं कछु और ।
अरजी हुकुम चढायदो; परयो रह तुम पार ।। १० ॥
जिहीं गुणते खुश होई तुम, सो गुण नही लवलेश।
तुम चरणन आश्रित रह; सो घुद्धि देहुजिनेश ॥११॥
तलपत दुनिया में अति, पलक परत नहीं चैन ।
अव सुदृष्टि करि निरखिये, दीले रहे बनै न ।॥ १२ ॥
यह सम्बन्ध भलो यन्यो, हम तुमसा सर्वज्ञ ।
त्यागै ताहि न संग रग्व, पिता पुत्र लग्वि अज्ञ॥१३॥
मेटहु काठेन क्लेश तुम, परमातम परमेश ।
दीन जानिके बकसिय, दिन दिन ज्ञान विशेष ॥१४॥
कृपा करी निर्वद्धि पै, लखू ज्यूं अनुभव रीति ।
अशुभ और शुभ देखिक, करूं न कहुं प्रीति ॥१५॥
सय प्रकार धनवन्त हो, सुनी गरीब निवाज ।
आरत म्द्र कुध्यान ते, यकसि २ महाराज ॥१६॥
धर्म शुक्ल ध्यावत रहुं, दोय ध्यान सुम्वकार ।
या जग ममता उदधी तै, दीजे पार उतार ।। १७ ॥
करुणा करिक मेटिये, विषय वासना रोग
मैं कुपथी चेदन प्रयल, लग्ब मत जोग अजोग ॥१८॥

(शान्ति प्रकाश-मंग्रह)
मैं गरजी अरजी कम्, सुनिही जग-प्रतिपाल ।
चाह सनारे दास. यह दुःव दीजे टाल ॥ १९ ॥
प्रभु तुम सनमुन्ध होरहुँ, जग को देऊं फूट ।
कृपादृष्टि पसी करो, ज्यूं भय जाये छुट ॥ २०॥
मैने जे कुकरम किये, दोवत है सय नो हि ।
महर करी ज्यू दीन पै, फेर न दुः ग्ब दे मोहि ॥२१॥
मिपनि रही मो धेरक, सुनि न अजहुं पुकार ।
मेरी चिरियां नाथ तुम, कहां लगाई यार ॥२२॥
ऐसी थिरियां में कहां, दरि गये दीन दयाल ।
बिना कयां कैसे रहे अयती करो प्रतिपाल ॥२३॥
जो कद्दलाउं और प, मिट न मम उरझार ।
मेरी नेरे सामने, मिटसी मनकी सर ॥ २४ ॥
दुष्ट अनेक उधारीक, थाक रहे क्या दयाल ।
भोर २ नारिये, मेरा भी लम्वि हाल ।। २५ ॥
॥ अथ राग निवारण अंग ॥
अरे जीव भय वन विप, नेरा कयन सहाय ।
जिन के कारण पचि रया, नंती नर नाय ॥२६॥

(सुयोर-ग्रह) संसारी को देबिले, सुम्बी न एक लगार। अब नौ पीडा छोडिदे, मनि धर सिर प भार॥२७॥ झूठे जगक कारण, तृमति कर्म बंधाय । तूं तो रीताही रहै, धन पैलाही पाय ॥ २८ ॥ तन धन संपति पायकै. मगन न हो मन मांय । कैसे सुम्विया होयगा, सोय लाय लगाय ॥२०॥ ठाट देव भूले मनी, प पुद्गल परयाय । देखत देग्वत थांहरे, जासी थिर न रहाय ॥३०॥ लूटेंगे ज्ञानादि धन. ठग सम ये संसार । मीठे पचन उचारिक, मो फांसी गल हार ॥ ३१ ॥ किसी भूत तोकी लग्पो, कर न तनक विचार । ना मान सौ परनिले; मतलय को संसार ॥ ३२ काया उपर थाहरै सब सं अधिकी प्रीत । याती पहले सयन में; देगी दगा मिचीन ॥३॥ विषय दुस्खन को मुग्व गिन; कहुं कहां लगि भूल । आंख छतां अंध हुया; जाणपणा में धूल ॥ ३४ ॥ नित प्रति दीवतही रह; उदै अस्त गति भान । अजहुं न ज्ञान भयो कहूं तृती पडो अपान ॥ ३५ ॥ किस के कहे निति तु; सिर पर फिरै जु काल । याधे है तो यांधलें पानी पहिला पाल ॥ ३९ ।। . ++ --

( शान्ति प्रकाश-गंप्रह)
आया सो सयही गया; अवतारादि विशेष ।
मुंभी यौही जायगा; इण में मीन न मेप ॥ १७ ॥
यो अवसर फिर ना मिल; अपनो मतलय सार ।
चुकते नाम चुकायदे; अय मति राव उधार ॥ ३८॥
कैसै गाफिल हो रहा; निवडा आतकरार;
निपजी ग्वती देय क्यूं; बाटी सर्ट गंवार ॥ ३९ ॥
धर्म विहार कियो नहीं; कीनो विषय विहार ।
गांठ ग्वाय रीत चले; आकै जग हटवार ॥ ४० ॥
काज करत पर घरन के अपना काज विगार।
सीत निवारै जगत का; अपनी झंपरी यार ॥४१॥
नहिं विचार तैन किया; करना था क्या काज ।
उदै होयगा कर्म फल; तब उपजंगी लाज ॥ ४२ ॥
झुटे संसारीन की, छूटेगी जब लाज!
इनसों अलगा होयगा, तब सुधरंगा काज ॥ ४ ॥
अपणी पूंजी सं करी, निश्चल कार विहार.!
यांध्या साही भोगल, मति कर और उधार ।। ४४ ॥
नया कर्म ऋण कादिके, करसी कार बिहार।
देणां पडसी पार का, किम होसी छुटकार ॥ ४५ ॥
विषय भोग किंपाक सम, लखि दुःख फल परिणाम
जय विरक्त यूँ होयगा, नय सुधरेगा काम ॥ ४६॥

२२ .. ( मुबोध-गप्रह) येरे मन मेरे पधिक तु न जाय यह टीर । घटमारा पांचं जहां, कर साह के चार ॥ १७ ॥ आरंभ विपय कपाय कू, कीनी यहुन हि यार । कछ कारज सरिया नहीं, उलटा हुवा ग्वुवार ! ४८ ॥ च्या सज्ञा में सदा, सुत निपुन चित लाग। गुरु समझायें कठिन सं, उपजै तउ न वैराग ॥ ४ ॥ बर हुवा जो कुछ हुवा, अब करनो नहिं जोग। विना विचान्या ने किया, नाकाही फल भोग ॥५०॥ ॥प निवारण अंग। बुरा कहे कोउ तो भणी, तो तृ भलाजु मान । बूरा मीठा होय है; सय पनि है पकवान ॥ ५१ ।। कटु निक्षण अति विप भरी; गाली शस्त्र समान । अशुभ कर्म गुम्मड भिद्यो,या जिय सुलटी जान॥५२॥ कटुक वचन को कहदिया; लगेजु दिल में तीर । सम दृष्टि यूं समझ ले: मोजान्या अति वीर ॥ ५३॥ चरी होता तो कपहुं; नहिं कहता कटु यात । सजन दास माहिरा, मज लाग्वे कटुक ग्ववान ॥५४ ॥ औगुन सुनिक आपणा; रेमन सुलटी धार । मौ गरीय कुंजानिक; लीना बोझ उनार ॥ ५५॥ man (शान्ति प्रकाश-मंग्रह) मैं भूल्या शुभ राह कं, उसने दई वनाय दुरजन जानि पर नहीं, सजन सो दरसाय ॥ ५३॥ अस्त ज्ञान सूरज हुवा; मैं भूल्यो निज जाह । निंदा रूप मशाल ले; इने दिग्बाइ राह ।। ५७ ।। सुनि निंदक के वचन कू; चिन मनि करै उचाट । यह दुंगधित पवन अनि, यहती कुंमत दाट ॥ ५८ ॥ कुवचन शर क्या करे सैक, तूं होजा पापाना । तेरा कछु विगरै नहीं, याकाही अपमान ॥ ५ ॥ कुपचन गोली के लगे, जो ले मन कूमार । आप हि ठंडी होयगी, हो जो शीतलगार ॥६० ॥ नैने उपरतूं कही, मै तो समझी ठेट। सयही ग्घटका मिटगया, एक रह गया पेट ॥ ६१ ॥ र चेतन सुलटी समझ, तेरा सुधर्या काज । कुवचन धरयर थाहरी, इणने सौंपी आज ॥ ६२ ।। होगी सौही नीसरे, यस्तु भरी जिहि माहिं । याका गाहक मति यनै, तेरे लायक नहिं ॥ ६३ ॥ अपना अवगुण सुण करी, मति माने जिय रीस। मन में तूं यूं समझले, मुझको द आसीस ॥ ६४ ॥ क्रोध अग्निदिल मति:लगा, सुन अजथार्थ थाल । क्षमा रूप जल छिटकिये, नेक न लागै मोल ॥ ६५ ।।

'( मुबोध-संग्रह)
दुरजन चुप होये नाही, तु नो छिन युप सघि।
तृन पिन परिह अगनि कहुँ,आपहि होय समाधि॥६॥
तूं तृण सम कटु वचन सनि, क्रोध अग्निमति दांश।
उपल नार सम करहु मन; तय मिली है शिवराजा६॥
आई गइ करि गालि कुं, ग्रोध चंडाल समान ।
नेत्र पिछान चंडालनी, पहली पकड आन॥६८॥
प्रभु सहाय नहि होहिगे, रे जिय सो जान ।
शोध करी ज्यु होगयो, साधू रजक समान ॥ ६९ ॥
आत्म वस्त्र मला लग्बी, इणने दीना घाय।
कटुक बचन श्रावन करी, नियल जानिके माय ।।७०
जोहरि होके मति कर, कुंजमी के संग रार ।
रतन विग्वरसी धांदरा, भाजी सदै गंवार ॥ ७ ॥
साला की गोली दई, ए विचार चित्त टारी।
भगनी समइणको प्रिया, इस समझो व्रत धारी ॥२॥
कृतघ्नी बननो नहीं, दई गार इण मोय ।
इस आतम सीनल करो, मम उधार तय होय ॥७३
गारी एकही होत ह, योलत होत अनेक।
र जियतुं बोल नहीं, नौ यही एककी एक ॥ ७४. ॥
अनंत काल पहले प्रभु, देव रव यह भाय ।
परिह कटु यच अयन में, ने किमि टाले जाय ॥ ७५ ॥

२ (मान्ति-प्रका) ॥ अथ धैर्य अङ्ग॥ अय दिल चाह परम पद, नर धीरज गुणधार । निंदा स्तुनि अरु रिपु प्रिय, एकहि दृष्टि निहार ॥७६|| धीरज धरि भ्रम को नजो, ए पुदगल के ख्याल । पर परछांही पर हरी, तूंतो चेतन लाल ॥ ७७ ॥ चंचलना छांडीदे, धीरज की कर हाट । कर बिहार गुन माल को. ज्यूं होवे बहु ठाट ॥ ७८ ॥ निज गुन में जिय ठहरि तूं, पर गुन पद मत धार । पर रमणी सुं राधिकर, मन कहलाये जार ॥ ७९ ॥ नर रजनी नास नहीं, दीपक की काहि यात । परण ज्ञान उद्योग बिन, हदै भरम नहीं जात ॥ ८० ॥ यथा लाभ संतोप करि, कछ्न चहै दिल बीच । याविध सुग्व अनि अनुभवै,तो न फसै दुम्ब कीच ॥८१॥ मेहि जानन दुग्ध विकल पन, अथवा सुख सरूप । गिर्ने दुई सम धीर धरि, तो न परै भवकूप ।। ८२ ।। अपनं २ गुनन में, थिरकै सबही वस्त। पग थिर करले अपन , नो मुख लहै समस्त ॥८॥ दुःण्व सुग्व दोन फिरत है, धूप छांह ज्यो मिन । । हरप सोक क्यों करते है, धीरज धार नचित्त ।। ८४ (मुवोध- गंप्रद ) अणहाणी होये नहीं, होणी नाही टलात । दग्विी परसी आगल, जो होली ज्या स्थान ॥ ८५ ॥ चाह किये कछु ना मिले, कारक जहां तहां देव । चाह छोडी धीरज धरहु, पग पग मिलं विसेप ।। ८६ सुनि उलझे मनि रेजिया, करी विचार चुप साध। यही अमोलक औषधी, मेंट भय दृग्य व्याध ॥ ८७ ॥ रे चेतन संसार लाग्नि, हद करी नक विचार । जैसी दे वैसी मिल, कूवा की गुजार ॥ ८८ ॥ चंचलता कुं छोडक, काटि मोह गल फांस । सम दम यम दृढता किये, निज गुण होय प्रकास ॥८॥ अभिलापा कुं त्यागिकै, मनफू रवि मजबून ! जय कयु सूज अगम की, यह सांची करटुन॥१०॥ वो तो यहां ही यस्तु है. जाकी तेरे चहाय । क्षण इक धीरज धारि लै, सहजैही मिल जाय॥११॥ मति करि परगुन मे रमन, ज्युं न लग गल तोग्य निश्चल रद्द निज गुणन मैं,आपहि होगी मोग्य ॥१२॥ निश्चलता सुं होयगा, यह जीव व्रम समान । तृण ही का घृत होतहे, गाय चरै पय पान ॥९३ जो तूं चाहै अमर पद करि हहना अग्वत्यार । चाल न यांका होयगा, जीवन ही दिल मार॥ ९४ ME (शान्ति--प्रकाश) धीरज गुण धारण किये, सयही दुग्न कटजाय । जैसे ठंड लोहे सैं, नत्ता लोह कटाय ॥ ९५ ॥ जल जिम निर्मल मधुर मृदु, करत नप्त को अंन । इम धीरज गुण ज्यार लम्बि, क्यों न गहै बुधवंत ॥१६॥ कला घटन अम बहन है, नहिं ससि मंडल जान । जनम मरण गति देह की, यु लम्बि धीरज ठान ॥ ९.७॥ मुग्व दुग्व दोनों एकसं, हे समझन को फेर । एक शब्द दो अर्थ ज्युं, लाग्य टका को सेर ॥ १८ ॥ सुग्न दुग्न दोउ वेद मति, येदे तो सम भाय। जैसे मकरी जालको, पसरे अरु ग्वाजाय ॥... समना कंधारण किये, क्यान ईट मन लहर ।। घाणी सुाण कलापीकी, स्पांपाइंदा जहर ॥ १०० ॥ ॥ अनुभव तथा विचार ज्ञान अंग ॥ --- कूकस विषय विकार सम, मति भावि मुह गंवार ।। । अनुभव रस तु चाग्विल; गुममुग्न करि निरधार ॥११॥ पाट किये ने एक गुन, अनुभव किये हजार । । नानै मन रोकिकै, क्योन करै विचार ॥ १०२ ।। किय पाट अनुभव बिना, मिट न भातर पाप । । याहिर सीसी घोय के, करी चहै तूं साफ ॥ १०३ ।।

(गुज.) - A अल्प भार पापान को जिमि लाग जल मांहि । निमि अनुभव थिर कर्म का, या पंधन नांगि? || मन बचन नन घिरते पुर्य जोमुख अनभय मालि। इन्द्र नरिंद्र फानेंद्र केना समान सुवानाही ॥१५॥ अनुभव से प्रभु मिलन है, अनुभव सुग्यका मुल अनुभव चिंतामणी तजी. मनि भटके कई भूल।१०।। अनि अगाध संसार नद, विपय नीर गंभीर । अनुभव दिन पार न लह, कोटि कर नदार ॥१०॥ जिहि विचार ते पायह, मनकुं घिर मुग्न ठार । नाकू अनुभव जानिले, अनुभव नहिं कछु और ॥१०॥ विना विचार जानके.तं. जंगलका रोक्ष । मिथ्या यही पचन हे, क्योन करे अब ग्बोज १००|| मन मतंग यंस करन इं, ज्ञानांबूस पिन धार । क्षमा थंभ सौ यांधि, लज्या शृंग्वल टार ॥ ११०॥ भ्रमतो मन रवि दादलै. मान मुकरके म्यान । हिंदू सुभ उपयोग से, करम तृल की हान ॥ १११ ।। सीसां सम संसार है, गुरु कृपा आदित्त । झान नेत्र चिन किम लग्ब, आपनपी सपचिन ॥१२२ विषय वासना करत जो, आज्ञान जगीस। वेसट काउन समय में दिन में होय उनीस ॥ ११३ -- *"

(शान्ति प्रकार)
जो तूं चाई जान सुग्ध, ना विपयन मन फेर !
और जगह भटके मनी, अपनेही में हेर ॥१४॥
मान रूप दीपक कने. बचे न करम पतंग।
जो रह तो दोनन, झुठो एक प्रसंग ॥ ११५ ॥
ज्ञान संचर जिहिं सम, रहे न करम समाज
और न पंछी वहांटिक, जहां बसेरा साज ॥ ११६ ।।
घर नहिं हट्यो एकसो, छुट्या कर्म कुढंग ।
जान नणां सत संगथी, देवा ठाणायंग ॥ ११७ ॥
अण इक ज्ञान विचारले, विषय दृष्टि को फेर ।
नेरी मेरी त्यागदे, यो होवे मुरझोर ॥ ११८ ।।
अष्ट पहरढिग राग्विले, ज्ञान बम्पी दाल ।
मोह अरीक विपय शर, लगे न नाकी माल ॥ ११०
माया मोह निवारके, विपयन सो मन ग्वींच ।
जो सुग्व चाहे आपणा, रहे ज्ञानके बीच ॥ १२० ॥
भेद लह निन ज्ञानके, मनि भुसे ज्यूं स्थान ।
लोक गडरिया चाल तजि, आपनपो पहचान ॥ १२५
जगत मोद्द फांसी प्रवल, कटै न और उपाय।
सत संगन कार ज्ञान की, सहज मुकत होजाय ॥१२॥
कामधेनु अम कल्पतरू, इण भव सुग्वदातार ।
इण भव पर भर नहुन में, ज्ञान कर निस्तार ॥१२॥

( मुबोध-संप्रद) पिच पारस अम जान के, अंतर जानि महंन । यह लाहा कंचन करे, यह गुण देय अनंत ॥ १२४ ॥ प्रथम ज्ञान पीछे दया; यह जिन-मन को सार। जान सहित किरिया करो, नय उतरो भव पार ॥१२५॥ अति आलस परमादियो, भज्जुलाल मुझ नाम । जानोद्यम कछु ना हुवे, किम सुधरे मुझ काम ।।१२६॥ दरशण पिण निश्चल नहीं, नहीं निश्चल चरित्र मन भ्रमतो निस दिन रहे, नहिं ठहरे एकत्र ॥१२७॥ ऐसी करी विचारना, रे जिय अवतो चत। राग द्वेश पतला हुवे, ऐसा करि संकेत ॥ १२८ ।। च्यारि परण गुरु रतनजी, तासुभेद चावीस ॥ * नामें भेदजु नेर, करी जान यकसीस ॥ १२ ॥ * १ रतनजी ९रजीतन १० नजीरत २ तरनजी १० जीरतन १८ जीनरत ३ रनतजी ११ तजरिन १९ ननजीर १ नरतजी १२ जीतरन २० नतजीर ५तनरजी १३ रनजीत २१ तजीनर ६ नतरजी १४ नरजीत २२ जीतनर ७ रतजीन १५ रजीनत २३ नजीतर ८ तरजीन १६जीरनत २४ जीनतर (नि--प्रकार) ज्ञान पाय हुलसी समति, गुलछर मधु मास । संचन रस अमिंक भु,(१५३६)रच्यो शांतिपरकाग। अरिहंत सिद्ध गण इसजी, उपाध्याय सय साध । पंच परम गुरु दीजिय, निसले ज्ञान समाध ॥११॥ इति श्रीशांति प्रकाश समासम्.

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( समाधि-मरण)
काल अनादि भयोजगभ्रमत,सदा कुमरण हि कीन।
एक वार हसम्यक युत मैं, निज आलम नहिं चीनो ।।
जो निज पर को ज्ञान हो तो, मरण समय दुग्व काई।
देह विनासी में जिन भासी ज्योति स्वरूप सदाई ।।
। विषय कपायन के वश होकर, देह आपनो जानो।
॥ कर मिथ्या सरधान हिये विच,आतम नहीं पिछानो।
यों कलेश हिय धार मरण कर,चारों गति भरमायो।
सम्यक दर्शन ज्ञान नीन ये, हिरदे में नहीं लायो॥६
अब या अरज करूंप्रभु सुनिये,मरण समय यह मांगो।
रोग जनित पीडा मत होऊ, अरु कपाय मत जागो।।
मुझ मरण समय दुग्वदाता, इन हर साला कीजे ।
जो समाधि युन मरण होय मुझ,मिथ्या मम छीजे।।
यह नन सान कुधान मई है, देग्यत ही धिन आये।
चर्म लपेटी ऊपर सोहै, भीतर विष्टा पाच ॥
अंनि दुर्गध अपावन सों यह, भूरग्व प्रीति बढावे ।
देह विनासी यह अविनाशी,नित्य स्वरूप कहावे ॥८
यह नन जीर्ण कुटी सम आतम, यात प्रीति न कीजे।
नूतन महल मिले जब भाई, नव या में क्याछीजे ॥
मृत्यु होन से हानि कौन है,या को भय मन लावो ।
समता से जो देह तजोगे, तो शुभ नन तुम पायो ॥९
।

२ (मुवोधसंग्रह ) ॥समाधि-मरण॥ ( नरेंद्र छंद) वन्दो श्री अरहन्न परम गुरु, जो सब को सुखदाई। इस जग में दुग्व जो मैं भुगते, सो तुम जानो राई ।। अब मैं अरज कर प्रभु तुम से कर समाधि उर माही . अन्न समय में यह वर मांगू.सो दीजै जगराई ॥१॥ भव भव में तन धार नये मै,भव भव शुभ सगं पायो। भव भय में नृप ऋद्धि लई में, मात पिता सुत थायो। भव भव में नन पुरुष तनो घर, नारी हनन लीनो। भव भय में मैं भयानपुंसक,आतम गुण नहिं चोनो॥२ भव भव में मुर पदवी पाई,नहीं सुग्व अनि भोगे। भव भव में गति नरक ननी घर, दुग्व पाये बिय योगे।। भय भव में नियंच योनि धर, पायो दुम्ब अति भारी । भव भय में स्वधर्मी जन को. संग मिला हितकारी॥३॥ भव भव में जिन स्मरण कोनो दान सुपात्रहि दोनो। भव भव में समवसरण में, देवी गुणी जन भीनो। पती वस्तु मिली भव भव में, सम्यक गुण नहिं पायो।। ना समाधि युन मरण कियो में,ना नै जग भरमायो॥

( ममाधि-मरण)
काल,अनादि भयो जगभ्रमत,सदा कुमरण हि कीन।
एक बार हसम्यक युन में, निज आलम नहिं चीनी ॥
जो निज पर को ज्ञान हो तो, मरण समय दुख कांई।
दह बिनासी में जिन भासी,ज्योनि स्वरूप सदाई।।
विपय कपायन के वश होकर, देह आपनो जानो।
कर मिथ्या संरधान हिये विच,आतम नहीं पिछानो।
यों कलेश दिय धार मरण कर,चारों गति भरमायो।
सम्यक दर्शन ज्ञान तीन ये, हिरदे में नहीं लायो ।
अप या अरज करूंप्रभु सुनिये,मरण समय यह मांग।
रोग जनित पीडा मत होऊ, अरु कपाय मत जागो।।
ये मुझ मरण समय दुग्वदाता, इन हर साता कीजे ।
जो समाधि युन मरण होय मुझ,मिथ्या मम डीजे॥७
यह नन सान कुधात मई है, देखन ही घिन आर्य।
चर्म लपेटी, ऊपर साह, मीनर विष्टा पार्य ।
अति दुर्गंध अपावन सों यह,, मूरग्यं प्रीति बढाये ।
देह विनासी यह अविनाशी,नित्य स्वरूप कहाये ॥८
यह तन, जीर्ण कुटी सम आतम, यातेप्रीति न कीजे ।
नूतन महल मिल जय भाई, तय या में क्या छीजे !!
मृत्यु होन से हानि कान है,या को मय मन लावो ।
समना से जो देह तजोगे, तो शुभ नन तुम पायो ।

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(सुबोध-मग्र )
मृत्यु मित्र उपकारी तेरो, इस अवसर के माहीं।
जारन तन से देत नयो यह. या सम साह नाहीं ॥
या सेती इस मृत्यु समय पर, उत्सव अति ही कीज।
क्लेश भाव को त्याग सयाने,समनाभाय धरीज ॥१०
जो तुम पूरय पुण्य किये हैं, तिन को फल सुग्वदाई।
मृत्यु मित्र विन कौन दिखावे, सर्व संपदा भाई ॥
राग द्वेशको छोड सयाने, सात व्यसन दुग्वदाई ।
अन्त समय में समता धारी,पर भव पंथ सहाई ॥११
कर्म महा दुष्ट धैरी मेरो, तो सेती दुग्न पावे ।
नम पिंजरे में बंध कियो मोहि, तासों कौन छुडावे ।।
भूग्य तृपा दुग्व आदि अनेकन, इस हीनन में गाहे।
मृत्युराज अय आय दया कर,तन पिंजरे से काहे ॥१२
नाना वस्त्राभुपण मैं ने, इस नन को पहराये ।
गंध सुगंधित अतर लगाये, पट रस असन कराये ।।
रात दिना मैं दास होय कर, सेव करी नन करी ।
सो तन मेरे काम न आयो, भूल रहो निधि मेरी ॥१३
मृत्यु राय को शरन पाय, तन नूतन ऐसा पाऊं
जा में सम्यक रतन तीन लहि, आठों कर्म ग्यपाऊं।
देवो नन सम और कृती, नाहिं सु या जग माही।
मृत्यु समय में ये ही परिजन,सब ही हैं दुग्वदाई ॥१४
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(ममात्रि-मरण )
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4
यह सब मोह बढावन हारे, जिय को दुर्गति दाता।
इन से ममत निवारो जियरा, जो चाहो सुख साना ॥
मृत्यु कल्पद्रुम पाय सयाने, मांगो इच्छा जेति ।
समता धर कर मृत्यु करो नो, पावो संपत्ति तेती॥१५
चौ आराधन सहित प्राण तज, नौ ये पदवी पायो।
हार प्रति हारे चक्री नीर्थकर, स्वर्ग मुकति में जायो ।
मृत्यु कल्पद्रुम सम नहिं दाता, नीनों लोक मझारे ।
नाका पाय कलेश करो मत,जन्म जवाहर हारे ।।१६
इस तन में क्या राचे जियरा,दिन दिन जीरन ही है ।
तेज कांति यल नित्य घटन है,या सम अधिर सु कोहे।
। पांचो इन्द्री शिथिल भइ अय, स्वास शुद्ध नहिं आये।
। ता पर भोममतानहिं छोडे,समता उर नहिं लावे॥१७
१. मृत्युराज उपकारी जिय को, नन से तोहि छुडावे ।
। नातर या तन चंदिग्रह में, परयौ परयौं विललावे ॥
दंगल के परमाणू मिल के, पिंड रूप तन भासी।
यही मूरती में अमूरनी ज्ञान ज्योति गुण ग्यासी ॥१८
रोग गौक आदिक जो वेदन, ते सय पुदगल लारे।
। मैं तो चेतन व्याधि घिना निन, हैं सी भाव हमारे।।
। या तन से इस क्षेत्र सम्बन्धि, कारण आन यनो है।
। ग्यान पान देया को पायो,अब सम भाव ठनो है ।।१९
-
३

(मुयोग-संग्रह) मिथ्या दर्शन आत्म ज्ञातविन; यह नन अपनी जानी। इन्द्री मोग गिने सूम मैं ने, आपो नाहि पिछानो । तन विनशन ते नागजानि निज,यह अयान दुखदाई कुटुम्य आदि को अपनी जानो,भूल अनादि चाई॥२० अय निज भेद यथारथ समझो,में हं ज्योति स्थापि|| उपजे विनस सो यह पुदगल, जानो या को पि॥ इष्ट निष्ट जेते सुग्व दुग्य हैं, सो सय पुदगल त्यागे। मैं जयं अपनी म्प विचारी,नय रे सय दुम्ब भार्ग ॥२१ विन समता नन नन्त घरे मैं, तिन में ये दुग्व पायो । शस्त्र घान नै नन्त घार मर, नाना योनि भ्रमायो॥ चार नन्न ही अग्नि माहिं,जर मूवो समनी न लायो। सिंह व्याघ्र अहि नन्नवार मुझ,नाना दुव दिग्यायो२२ विन समाघि ये दग्ना लहे मैं. अय उर समता छाई । मृत्युराज को भय नहिं मानो, देव नन मुग्वदाई ।। या 'ते जय लग मृत्यु न आये, तय लग जपनप कीजे।' जपनविन इस जग के माही,कोई भी ना सीज॥२३॥ स्वर्ग संपदा तप से पाच. तप से कर्म नसाये। तपही से शिव कामिनि पनि है,यासोनपचित लाया अब मैं जानी समता विन मुझ,कोजनाहिं है सहाह । मान पिता सुन यांधव तिरिया,ये सब हैं दुग्वदाई२४ (समाधि-माण । मृत्यु समय में मोह करें ये. ता ने आरन हो है। आरत ते गति नीची पाथै, यो लख मोह नजो है ।। और परिग्रह जेते जग मानिन संप्रीति नजो जे। पर भय में ये संग न चाले,नाहक आरत कीजे ॥२५॥ जे जे वस्तु लसन है ने पर, निनसे नेह निवारो। पर गति में ये स्मथ न चाले, ऐसी भाव विचारो !! जो परभय में संग चलें तुझ,निन से प्रीति सु कीजे। पंच पाप तंज समता धारो, दान चार विध दीजे ॥२६ दश लक्षण मय धर्म घरी उर, अनुकम्पा चिन लाव। डिश कारण नित्य चिन्नवो,द्वादश भावन भावो । चारों परवी पापध कीजे, अशन रात को त्यागी। समता घर दुरभाष निवारो,संयम सो अनुरागी २७ अन्न समय में ये शुभ भावहि, हो आन सहाई। स्वर्ग मोक्ष फल तेहि दिम्यावे, रिद्धि देहि अधिकाई।। बोटे भाव सकल जिय त्यागो,उर में समता लाके। जा सती गति चार दर कर,यसो मोक्षपुर जा के ॥२८ मन धिरता कर के तुम चिंनो, ची आराधन भाई। ये ही तो को सुग्न की दाना, और हित कोउ नाई ॥ आगे यहु मुनिराज भये हैं, तिन गहि थिरता भारी। हु उपसर्ग सहे शुभ भावन,आराधन उर धारीः

(मुरार-पद)
निन में कछु इक नाम कह में, सामुन जिय पिनला।
भाव सहित अनमोद ना से, दुर्गनि होय न जाके ।।
अरु समता निज उर में आये, गव अधीरज जाये।
यांनिशिदिन जो उन मुनिवर को,ध्यान हिय यिरला-
३०॥धन्य धन्य मुकुमाल महामनि,कैसे धीरज धारी।
एक श्यालनी जुग यचा जुन, पाय भयो दुग्यकारी।
यह उपसर्ग सही धर भिरता, अपराधन चित धारी ।
मा तुमरे जिय कौन दुःख है मृत्यु महोत्सय यारी३१
धन्य धन्य जु मुकाशल स्यामी. व्याधी ने सन ग्यायो।
नी भी श्री मुनि नक डिगे नहि,आतमसो हित लायो।
यह उपसर्ग सहो घर चिता,आराधन चिन धारी।
मोतुमरे जिय कौन दुव है? मृत्यु महोत्सव पारी ३२
देखो गजमुनि के सिर ऊपर,विप्र अगिन यह धारी
शीश जले जिमिलकडी मिन की, नाभी नाहि चिगारी।
यह उपसर्ग महो धर धिरता.आराधन चिन धारी।
नीतुमरे जिय कौन दुःसा है? मृत्यु महोत्सव वारी ॥३३
सनतकुमार मुनि के नन में, कुष्ट-वेदना व्यापी।
छिन्न भिन्न तन नास हवा. तय चिन्नो गुण आपा
यह उपसर्ग सहो धर धिरना, आराधन नित धारी।
नो तुमरे जिय कान दुख है? मृत्यु महोत्सव पारी ३४
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( समावि-मरण ।
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अंणिक सुन गंगा में ड्यो नय, जिन नाम चितारो ।
घर सलेखना परिग्रह छांडो, शुद्ध भाव उर धारी।।
यह उपसर्ग सहो घर थिरता,आराधन चित्त धारी।
तो तुमरे जिय कौन दुग्व है,मृत्यु महोत्सव वारी॥३५
समतभद्र मुनिवर के नन में, क्षुधा वेदना आई ।
ता.दुग्ध में मुनि नेकन डिगिये,चिंतो निजगुण भाई।
यह उपसर्ग सही धर थिरता, आराधन चित्तधारी ।
तो तुमरे जिय कौन दुग्व है मृत्यु महोत्सव बारी३६
लालन घटादिक तीस दोय मुनि, कौशांची नट जानो।
नदी में मुनि यह कर मवे,सो दुम्ब उन नहि मानो।।
यह उपसर्ग सही धर धिरता,आराधन चित्त धारी।
तो तुमरे जिय कौन दुग्व है मृत्यु महोत्सव बारी ३५
धर्म घोष मुनि चंपा नगरी, वाह्य ध्यान धर गाढो।
एक मास की कर मर्यादा, तृपा दुःख सह ठाडो ।
यह उप सर्ग सही धर धिरता, आराधन चित धारी।
तो तुमर जिय कौन दुःग्व? मृत्यु महोत्सव वारी ३८
श्रीदत मुनि को पूर्व जन्म को. बैरी देव मुआके ।
'विक्रिय करंदुग्व शीत तनो,सो सही साध मन ला के।
यह उपसर्ग सहा घर थिरता, आराधन चित्तधारी॥
नौ तुमरे जिय कौन दुःग्य है मृत्यु महोत्सव वारी ॥३१
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( मुवोध-संग्रह)
वृषभ संन मुनि उष्ण शिला पर,ध्यान धरोमन लाई
सूर्य घाम अग उष्ण पयन की येदन सहि अधिकाई।
ग्रह उपसर्ग सहो घर धिरना, आराधन चिनधारी।
तो तुम जिय कान दुग्य है मृत्यु महोत्सव यारी॥४०
अभय घोष मुनि. काकंदी पुर, महा वेदना पाई।
यरी चट ने सय नन छेदी. दुग्य दानो अधिकाई ।।
उपसर्ग सहो घर थिरता,आराधन चित धारी।
नो तुमरे जिय कौन दुःग्य है .मृत्य महोत्सव वारी ॥४१
विद्युतचर ने यहु दुग्य पायो, तो भी धीर न स्यागी।
शुभ भावन से प्राण तजे निज,धन्य और यह भागी॥
यह
उपसर्ग सही धर धिरना, आराधन चिन धारी।
तो तुमरे जिय कौन दुग्व है, मृत्यु महोत्सय पारी ॥१२
पुत्र चिलाती नामा मुनि को, बैरी ने नन पाती।
मोटे मोटे कीट पडे नन, ता पर निज गुण रात।
यह उपसर्ग सहो घर थिरना, आराधन निनधारी।
नो तुमरे जिय फौन दुख मृत्यु महोत्सब वारी॥४३
दण्डक नामा मुनि की देही. वाणन कार अरि भेदी।
ना पर नेक डिगे नहिं ये मुनि,कर्म महा रिए छेदी।।
यह उपसग सही पर थिरता, आराधन चितधारी।
नौ तुमरे जिय कौन दुःबह? मृत्य महोत्सव बारी।।१४

(समाधि-माग
+अभिनंदन मुनि आदि पांच सै,यानी पेलि जु मारे।
तो भी श्री मुनि समता धारी, पूरब कर्म विचारे ।
यह उपसर्ग सहो घर थिरता, आराधन चित धारी।
तो तुमरे.जिय कौन दुग्व है? मृत्यु महोत्सव चारी४५
चाणक मुनि गोधर के मांही,मृदि अगिाने पर जालो।
श्री गुरु उर सम भाव धारके, अपनो रुप समालो।
यह उपसर्ग सहो घर थिरता आराधन चितधारी।
तो तुमरे जिय कौन दुःख है?मृत्यु महोत्सव यारी॥४६
सात शतक मुनियर ने पायो, हथनापुर में जानो
चली ब्राह्मण कृत घोर उपद्रव, मोमुनिवर नहीं मानो।
यह उपसर्ग सहो घर थिरता, आराधन चिन धारी।
मी तुमरे जिय कौन दुःव है? मृत्यु महोत्सव धारी॥४७
लोहमयी आभूषण घढ के, नाने कर पहराये ।
पांचो पाण्डव मुनि के नन में, नी भी नहिं चिगाय।
यह उपसर्ग सहो पर घिरता, आराधन चितधारी।
नातुमरे जिय कौन दुग्य है? मृत्यु महोत्सव वारी ॥४८
।
+ यह ग्रन्थ दिगम्बर आम्ना वाले ने बनाया होनेसे इसमें
दिगम्बर ग्रन्थ कथितं साधु आ के नाम दिए हैं.श्वेताम्बर समाजम
म्कन्धाचार्य को०० शिष्य महित धानीमे पीसनेका कथन है.

(शुशेप-भप्रा)
और अनक भये इस जग में: समतारस के स्वादी।
वे ही हम को हो सुग्व दाता, हर हटव प्रमादी ।।
सम्यक् दर्शन ज्ञान चरन नप, ये आराधन चारों :
ये ही मो को सुम्प की दाता, इन्हे सदा उर धारों४९,
यो समाधि उरमाही लावो, अपनी हिन जो चाहो !
तज ममता अरु आठोमदको ज्योति स्यम्पीध्यायो।
जो कोई निज करत पयानो, ग्रामांतर के काजे ।
सो.भी शकुन विचारे नीके,गुभ शुभ कारजसाज.५०
मात पितादिक सर्व कुटुम्ब सी, नीके शयुन बनाये।
हलदी धनियां पुंगी अक्षत, दुध दही फल लाये ।।
पक ग्राम के कारण एते, कर शुभा शुभ सारं ।
जब परिगति को करत पयानो,तय नहिं सोच प्यारे ५१
सर्व कुटुम्य जय रोचन लाग, नाहिं मलायें सारे ।
ये अपशकुन करें सुन नो को, त यो क्यों न विचार।।
अय परगति को चालत विरियां,धर्म ध्यान उर आना
चारों अराधन प्यारे आराधो.मोहननो दुग्वहान ३५२
सो निशस्य नजो सब दुविधा, आतमराम सुध्यावो
जब परगति को करहु पयानो, परम नत्त्व उर लायो।
मोह जाल को काट पियारे, अपनी मप विचारो।
मृत्यु मित्र उपकारी नेगे.या उर निश्चय धारो ।। ५.

(समाधि-मरण 63 " दोहा। मृत्यु महोत्सव राठ को, पढो सुनी बुद्धिचान । सरधा घर नित्य सुख लही. सूरचन्द शिव धान॥५४ पंच उभय नर एक नम, सम्बन सो सुग्वदाय । आश्विन श्यामा सप्तमी, कहो पाठ मन लाया ।। ५. इति समाधि मरण ॥ दूसरा-समाधि मरण। जागी रासा या नरेंद्र छन्द्र। गातम स्वामी बन्दो नामी, मरण समाधि भला है मैं कर पाऊनिश दिन ध्याऊ, गाऊं बचन कला है। देव धरम गुरुप्रीति महाद, सप्त व्यसन नहिं जाने। त्यागीयाईस अभक्ष संयमी बारहमत नित्य ठाणे॥१॥ की उम्बरी चूलि बुहारी, पानी स न विरोधे। चनिज करे पर द्रव्य हरे नहिं छही करम इमि सोधे। स्मरण शास्त्र गुरुम की संघा, संयम नप 3 दानी। पर उपकारी अल्प अहारी, समायक विधि ज्ञानी॥२ जाप जप निहुँ योग धर दृढ, नन की ममना टारे । अन्त समय वैराग्य सम्हार, ध्यान समाधि विचार।

(मुबोध-गप्रह) आग लगे अम नाय जु इवे.धर्मविधन जय आय। चार प्रकार अहार त्यागि के, मंत्र सुमन में ध्याये ॥ रोग असाध्य जरा पहु देवे, कारण और निहारे । यात घडी है जो यनि आवे, भार भवन को डार ।। जो न घने तो घर में रह करि सय सो होय निराला। मात पिता सुततिय को सोपे, निज परिग्रह अहि का. ला। कछु जानालय कछु श्रावक जन,कर दुग्विया धन- दीक्षमाक्षमा सय ही सो कहि के,मनका शल्य हुनेछ। शत्रुन सों मिलि निज कर जॉर. मैं बहुपरी है बुराइ। तुम से प्रीतम को दुग्य दीनो,ने सप क्षम है। भाई॥५ धन घरनी जो मुख सो मांगे, सो सय दे सन्तापे । छहो काय के प्राणी ऊपर, करुणा भाय विशेपे । ऊंच नीच घर बैठ जगह इक,कुछ भोजन कुछ पले । दूधाधारी फम क्रम तजि के,छाछ अहार कर पहेले ॥६ छाछ त्याग के पानी राखे, पानी तजि संथारा ।. भूमि मांहि थिर आसन मांडे, साधर्मी लिंग प्यारा।। जब तुम जानो यह न जप हैं, तब जिन वाणी पदिये। यो कहि मौन लिया सन्यासी,पंच परम पद गहिये|| चार आराधन मन में ध्याये, यारह भावन भावे । दश लक्षण मन धर्म विचारे, रत्नत्रय मन न्याये ॥

(ममाधि-मरण) पंतिस सोलह पट पन चारों,दुइ इक वरन विचार !" काया तेरी दुःग्य की देरी, ज्ञान मयी तृ सारे ॥ ८॥ अजर अमर निज गुण सो पूरे, परमानन्द सुभावे । आनन्द कन्द चितान्द साह्य तीन जगत पति ध्याये।। श्रुपा तृपादिक होइ परिपह, सह भाव सम राग्वे । अतिचार पांच सब त्यागे,ज्ञान सुधारस चाग्वे ॥१॥ दाड मांस सब सूग्वि जाँय जय, धरम लीन तन त्यागे। अद्भुत पुण्य उपाय स्वर्ग में, सेज उठे ज्यों जागे ॥ दहा ते आवै शिव पद पाय, विलसे सुश्व अनन्तो। यानत यह गनि होय हमारी,जैन धरम जयवन्तो॥१० सागरी संथारा का पाठ दोहा-आहार शरीर उपाधी । पचपाप अठार ॥ मरजावू तो बोसीरे । जीयूं तो आगार ॥ १ ॥ 'सूचना:-शयन करती वक्त या आमि सिंह सदि किसीभी प्रकारका भय उप्तन्न होवे तत्र यह पाठ कहना. जाग्रत होकर तथा उपसर्ग निवृते तब ५ नवकार मंत्र का स्मरण करने से खुल्ला होय. णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धार्ण, णमो आयरियाणं, • गमो उवझायाणं, णमो लोए सव्य साहणं । यह ॥ ३५॥ अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपन्याय, साधु, ॥ यह ॥ १६ ॥ अरिहंत, सिद्ध ॥ यह.६ ॥ अ. सि. आ. उ. सा. ॥ यह ५॥ सिद्ध, साधु । यह ४.सिद्ध ॥ यह २ ॥ई ॥ यह १ ॥ इसने में हर किसिका ध्यान करे । , मुनरोध-मनट) रत्नाकर--पच्चीसी. शुभ फेलिके आनन्द के । धन के मनोहर धाम हो । नर नाथ से सुर नाथ से । पूजित चरण गत फाम हो । सर्वज्ञ हो सर्योच हो । सय से सदा संसार में ॥ प्रज्ञा कलाके सिन्धुहो । आदर्श हो आचार में ॥ १॥ संसार दुःव के वैद्य हो । त्रैलोक्य के आधार हो । जय श्रीश!रत्नाकर प्रभी। अनुपम कृपा अवतार हो। गत राग! है विज्ञप्ति मैरी । मुग्ध को सुन लीजीये ।। क्या किप्रभुतुम विज होमुझको अभय यर दीजीयार माता पिताके सामने । योली मुना कर नौतली ॥ करता नहीं क्या अज्ञयालकायाल्य यशलीला वली॥ अपने हृदय के हालको । त्यों ही यधो चित्तरीनसे॥ मैं कह रहा हूं,आपके । आगे विनय से प्रीतिसे ॥१॥ मैने नहीं जगमें कभी। कुछ दान दीनों को दिया । मैं सचरित भी नहीं। मैंने नहीं नप भी किया। शुभ भावनाएं भी हुई। अय नक न इस संसार में। मैं घूमना व्यर्थ ही । भ्रमस भयोदधि धार में || शोधाग्नी से मैं रातदिन हा । जल रहा हं हे प्रभो । में लाभ नामक साँप से । काटा गया है हे प्रभो। 12 .

(रत्नाकर-पच्चीमी ) ! । अभिमान के खल ग्राह से।अजान वश में ग्रहस्त हूं। किस भाँति हो स्मृत आपामाया जाल से में व्यस्त हुं ५ -लोकेश! पर-हित भी किया।मैंने न दोनों लोक में || सुखलेश भी फिर क्यों मुझे हो। चोंग्वता हु शोक में। जग में हमारे से नरांका । जन्म ही सब व्यर्थ है ॥ मानो जिनेश्वर ! वह भवों की। पूर्णता के अर्थ है॥६॥ प्रभु! आपने निज मुग्व सुधाका । दान यद्यपि दे दिया। यह ठीक है, परचित्तने। उसका न कुछभी फल लिया। आनन्द रस में डूय कर। सद्भुत यह होना नहीं । है वज सा मरा हृदय ।कारण घडा यस है यही॥७॥ रत्न त्या दुष्प्रप्य है । प्रभु से उसे मैंने लिया ॥ यहुकाल तक यहुयार जय ।जगका भ्रमण मैने किया। हा ! ग्वागया यह भी विवश ।मैं नींद आलस में रहा। अब बोलिये उसके लिए रोजंत्रभु किस के यहां।।८।। संसार ठगने के लिए। वैराग्य को धारण किया । जग को रिझाने के लिए। उपदेश धोका दिया। 'झगडा मचाने के लिए। मम जीभपर विद्या वरी॥ निर्लज्ज हो कितनी उडाजीप्रभो !अपनी हंसी॥९॥ परदोप को कहकर सदा । मेरा बदन दृपित हुआ। लख कर पराइ नारियों को । हा! नयन पिन हुआ।

(सुवोध-प्र) -- । मन भी मलीन है सोचकर। परकी राष्ट्र हे प्रभो ।। किस भाति होगीलोक मेरी मलाइ हे प्रभो ॥१०॥ मैंने पढाई निज विवशत्ता । हो अवस्था के यशी । भक्षक रतीश्वर से हुई । उत्पन्न जो दुःम्य राक्षसी ॥ हा : आपके सम्मुग्य उपसे । अति लाज प्रगट किया। सर्वज्ञ हो सब जान तास्थय मेव संमृति की मिया||११ अन्यान्य मंत्रों से परम । परमेष्ट्री मंत्र हटा दिया । सच्छास्त्र वाक्यों को । कुशास्त्रों से मने दया दिया। विधि उदय को करने वृधा । मैने कु देवाश्रम लिय।। नाथायोंभ्रम यश अहितामने नहीं क्या क्या किया हा नज दिया मैंने प्रभो । प्रत्यक्ष पाकर आप को ।। अज्ञान या मैं ने किया। फिर देवीय किस पाप को। यामाक्षियोंकि कुच कटाक्षों । पर सदा मरता रहा । उन के विलासो को हृदय में ध्यान को करता रहा ।।१३ लग्ब कर चपल दुग युवनियों के।मुख मनोहर रस मई।। जो मन पटल पर राग!भावों की मलिनता पसगई। वह शाम्न निधी के शुद्ध जल से। गेन क्योधोई गई। यनलाइ ए यह आपही। मम बुद्धि नी ग्बोई गई ॥१४ मुझमें न अपने अंग के । सौंदर्य का आभास है। मुझमें न गुणगण हे विमलान कला कलापविलास है।

(ग्नावर-पचीमा) भुता न मुझमें स्वप्न कोभो । चमकती है देग्विए ।। ना भी भराह गर्व से मैं मृद हो किस के लिए ॥ १५॥ E!नित्य घटती आयु है। पर पाप मनि घटति नहीं। आई बुट्टानी परविषय से । कामना हटती नहीं । नं यत्न करता हं दवा । धर्म में करता नहीं। इमोह महिमा से ग्रसित हूं। नाथ बच सकता नहीं१६ अब पुण्य को भव आत्म की। मैंने कभी माना नहीं। हा! आप आगे हैं ग्बडे ! दिन नाथ सं यद्यपि यही ॥ नोभी ग्यलों के वाक्य को । मैंने सुना कानों वृथा ।। धिक्कार मुझ को है। गया मम जन्म ही माना था१७ सत्पात्र दान देय स्तरग। कुछ नहीं मंने किया। मनि धर्मश्रावक धर्म का भी नहीं सावेघि पालन किया। नर जन्म पाकरही वृथा ही। मैं उसे ग्वोता रहा। मानो अकेला घोर यन में व्यर्थ ही रोता रहा ।।१८।। प्रत्यक्ष सायकर जैन मत में प्रीति मेरी थी नहीं। जिन नाथ ! मेरी देखिये है मृहना भारी यही ॥ हा ! काम मधुक कल्पद्रुमादिक । के यहां रहने हुए। हमने गंवाया जन्मको । धिक्कार दुःग्य सहते हु॥१२ मने न रोका रोग दुय । संभोग मुग्य देवा किया.॥ मन में न मृत्यु भय । धन-लाभही लेग्वा किया ।

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(मुयोध-संग्रह)
हा! अपम युवति जनोंके ध्यान नित करना रहा।
पर नरक कारागार से। मन में न म डरता रहा२०॥
सवृत्ति से मन में न मैंने ! साधुना हा साधिता ।
उपकार करके कीर्ति भी। मैन नहीं कृष्ठ अर्जिता
चार तीर्थ के उद्धार आदिक । कार्य कर पाये नहीं
नर जन्म पारस तुल्य निज । मैंने गयांयाव्यर्थदी २
शास्त्रोक्त विधि वैराग्य भी। करना मुझे आना नहीं
ग्वल वाक्या भी गत मोघ होतहना मुझे आतानही
आध्यात्म विद्या है न मुझ में। है न कोई सत्कला
फिर देव! कैसे भवोदधि । पार होये गा मलां ||२
सत्कर्म पहले जन्म में । मैंन किया कोई नहीं।
आशा नहीं जन्मान्य में । उसको करूंगा मैं कहीं
इस भाँतिका यदिह जिनेश्वर क्यों न मुझको कष्ट ः
संसार में फिर जन्म तीनों । क्यों न भैरे नष्ट हो॥२-
है पूज्य! अपने चरित्र को । यहु भाँति गाऊं क्या -
कुछ भी नहीं तुमसे छिपी। है पाप मय मैरी कथा
क्यों कि निजग के रूप हो तुम । ईश हो सर्वज्ञ
पथके दर्शक हो तुम्ही । मम चित्त के मर्मज हो ।
दीनोद्धारक धीर । आपसम अन्य नहीं है।
कृपा पात्र भी नाथ! न मुझसा अपर कहीं है।
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1
५

( मैरी-भावना) तो भी माँगू नहीं धान्य । धन कभी भूल कर ॥ अन् । केवल घोधिरत्न । होवे मंगल कर ॥ श्री रत्नाकर गुण गान यह । दुरित दुःश्व सब के हरे।। बस एक यही प्रार्थना । मंगल मय जग को करे ।। २० ।। मेरी भावना" भावना का रहस्यः---किसी विषय को पुष्ट यनाने, उसमें चित्तकी स्थिरता, भावोंकी दृढता, सम्पादन करने अथवा नद्रुप होने. या उसकी समाप्ति के आदि के लिए, जो उसका तथा उस के साधनों का पुनः पुन:संचिन्तन और समिहन किया जाता है, उसे भावना कहते हैं. " याहारी भावना यस्य, सिद्धिर्भवति नाशी" अर्थात जो मनुष्य सचे हृदय से शुद्ध अन्नःकरण से जैसी भावना करता है उसको वैसी ही सिद्धि को प्राप्ति होती है. गुरुमंत्रः---"आत्मनः प्रतिकूलानि, परेपनि समाच- रत," जो जो बातें किया ऐ चेष्टा में तुमारे प्रतिकूल हैं, जिनके दूसरो द्वारा किए हुप व्यवहारोंको तुम अपने लिए पसंद नहीं करने, अहित कर और दुग्य दाई समनने हो, उनका आचरण तुम दूसरों प्रति मन

(मुवोध-मंग्रह)
करो" यही पापों से बचानका गुरुमंत्र है, इसका
अनुष्ठान की निरंत्र भावना रग्यनी चाहिये. (छन्द)
जिसने राग द्वेप कामादिकाजोत सय जगजानलिया।
सय जीवों को मार्ग मोक्ष कानिस्पृह हो उपदेश दिया
वुद्ध वीर जिन हरिहर व्रमाया उसको स्वाधीन कहाँ
भक्ति भाव से प्रेरित हो यहाचित्त उही में लीन रहो?
विषयों की आशा नहींजिन कोसाम्प-भाव धन रखते
हैं॥निजपरके हित साधनमें जानिशदिन तत्पर रहने
स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या। विना ग्वद जो करते हैं।
ऐसे ज्ञानी साधु जगत् के । दुःव समुह को हरने हार
रहे सदा सत्संग उन्हीका । ध्यान उनहीका नित्य रहे।
उन ही जैसी चर्या में यह । चित्त सदा अनुरत रहे ।।
नहीं सताऊँ किसी जीव को।झूट कभी नहीं कहा करूं॥३,
अहंकार का भान न रक्खू नहीं किसीपर क्रोध का
देख दूसरों की बढती को । कमी न ईपी भाव धस् ॥
रहे भावना ऐसी मेरी । सरल सत्य व्यवहार कर॥
यने जहाँतक इस जीवन में।औरों का उपकार कस्तार
मैत्री भाव जगत में मेरा । सयजीवों से नित्य रहे,
दीन दुःखी जीवों पर मेरे । डर से करुगा स्रोत :
।

मेग-भावना)
दुर्जन कर कुमार्ग रतीपर । क्षोभ नहीं मुझको आये।।
साम्य भावरम मेंउनपरासी परिणति हो जाये।
गुणी जनों को देख हृदय में । मेरे प्रेम उमड आय ।।
बने जहांतक उनकी सेवा। कर के ये मन सुख पाये।
हा नहीं कृतन कभी में । द्रोह न मेरे उर आवे ।।
गुग ग्रहण का भाव रहनेमाष्टोन दापों पर जावे॥
कोई बुरा कही या अच्छा। लक्ष्मी आवे या जाये ।।
लाखों वर्षों तक जीऊं या । मृत्यु आज ही आजाये।
अथवा कोई कैसा ही भय या लालच देने आवे ॥
नो भी न्याय मार्ग से मेरा|कभी न पद डिगने पाये।
होकर मुम्बमें मग्नन फलोदुःश्व में न कभी घबराये ॥
पर्वत-नदी-श्मशान-भयानकाअटवी से नहीं भय ग्यावे
• रहे अडोल अप निरन्तरा यह मन दृढतर यन जावे॥
दृष्ट वियोग अनिष्ट योगमीप्तहान शीलनादिग्वलावे।।८
सुखी रहे सब जीव जगत के। कोई कभी न घबराये ।।
वैर पाप अभिमान छोड जगानित्य नये मंगल गाय।।
घर घर चर्चा रहे धर्म की । दुष्कृत दुटकर हो जाये ।
ज्ञान चरित उन्नत क अपनामनुज जन्म सय फल पावर
ईति भीनि व्यापे नहीं जगावृष्टि समय पर हुआ करे।
धर्मनिष्ट होकर राजा भी । न्याय प्रजाका किया करे ॥
+

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{ सुबोध-संग्रह)
रोग-मरी-दुर्भिक्ष न फैले। प्रजा शांति सजिया करे।
परम अहिंसा-धर्म जगत मोफैल सर्वहित किया करे१०.
फैले प्रेम परस्पर जगमें। मोह दूर पर रहा करे ॥
अप्रिय-कटुक-कठोर शब्दं नहीं। कोई मुग्य से कहा करे।।
बन कर सय 'युग-वीर' हृदय से देशोन्नति रत रहा करे।।
वस्तु स्वरूप विचार स्खुशी सेसिय दुःश्व-संकट सहा करे।।
५
तथास्तु
॥दोहा
सो यात की एक बारत सकल शास्त्र को सार ।।
दया दान दम आत्मा । तिलोक कहे उरधार ।।
शमता
सीधी साही मोक्ष दे। उलटी दुर्गन देन ।।
अक्षर नीन है ओलयो । दोय लघु गुम एक ॥
4

(प्राउपश-शतक) * श्री उपदेश शतक * मङ्गलाचरणम् ( अनुग्य माक्ष मार्गस्य नेतारं । भेतारं कर्म भ भृत्ताम् ।। ज्ञातारं विश्वतत्त्वनां । वन्दं तद्गुण लब्धये ॥ १ ॥ अर्थ-जिनों ने कर्म रूप पर्वतों को भेद कर केवल ज्ञान केवल दर्शन प्राप्त किया, जिसके द्वारा सर्व लोक में रहे पदाथाको युगपत जाने देखे. जिस कर उद्धर्म स्थापन कर मोक्ष के नेता ले जाने वाले वन प्रथम उन जिनेश्वर को नमस्कार करताहुं।।१।। जेहर का कीडा जेहर में खुशी" [लोक-शाईल विकीदित वृनम ] विनाऽस्मिन्नगर महान वसाने क? स्ताल द्रुमाणांगणः। को दाता? रज को, ददाति वसनं प्रातहित्या निशि ॥ को दक्षः? परदार वित्त हरण सर्वेपि दक्षा जनाः । कस्माजीवासे हे सग्वे? विपकृमि न्यायेन जीवाम्यहम्।। भावार्थ:-एक पण्डित परदेश में जाते हुए किसी वडे गेहर को देख सम्मुख आते ब्राह्मण से प्रश्न किया कि--अहो भाई ! इस शहर में बडा कोण है: ब्रह्मण ने कहा-ताडवृक्ष वई हैं.

( मुबोध-गग्रह) फिर पण्डित ने पूछा कि-बोद वडा न हो तो कुछ हरकत नहीं, किन्तु कोइ दातर तो है! । ब्राह्मण ने कहां-हां, धोयी. क्यों कि प्रातः काल में लोगों लम्बे हाथ कर उस मे याचना करते हैं, उन्हे वह वस्त्र दान देता है; अर्थात् धोबी के सिवाय और कोई दातार नहीं है.। फिर पण्डिन ने पछा-ठीक, कोई दातार नहीं है तो कुछ हरकत नहीं, किन्तु कोइ होशार [चतुर ] मनुष्यभी है ! बाग ने कहा-हां, परधन हरने में और परखी गमन करने में सवही बडे होश्यार हैं. तर फिर पण्डित ने कहा-ओ भाई ! गमे ग्रहर में तृ किस प्रकार जीता रहता है ? माह्मणने कहा कि जैसे हरका कीडा जहर में मजा मानता है. तसे में भी यही मजा मानता हूं. “विनाश काल में बुद्धि भी विपरित हो जानि हे (लोक-टपति वृनम् ) नभूत पूर्योनच केन दृष्टोहिम्नः कुरंगोन कदापि बातों। नापि तृष्णा रघुनन्दनस्याविनाशकालेविपरित बुद्धिः अर्थ:--सुवर्ण मृग (हिरन) पहिले कभी ऊआ नहीं सेही कभी किसी ने देखा भी नहीं. और न कमी किसी के मुह से मुना कि सुवर्ण मृग होता है. नधापि रामचन्द्रजी को मायामय मुवर्णमृग को पकड नेकी तृप्णा हुई.ती तो रावण सीताजी का हरण कर गया. अर्थात विनाग के काल में वृद्धि भी विपरित हो जाती है.

- " (श्रीउपदेश-शतक) पुण्योदय में जो करे सो अच्छा होवे (श्लोक-अनुष्टुप वृत्तम् ) औपधं शकुन मंत्री । नक्षत्रं ग्रह देवताः ॥ भाग्य काले प्रासीदतिाअभाग्येयांति विक्रियाम् ॥३॥ अर्थ:-औषधी, शकुन, मंत्र, नक्षत्र,ग्रह और देवता, इत्यादि सवी पुण्य के उदय में मुख दाता हो जाते हैं और पाप का उदय होता है नव दुःख दाता हो जाते है. ग्रह सेभी कर्म बलवान हैं कर्मणो हि प्रधानत्वं । किं कुर्वन्ति शुभग्रहा : ।। यशिय दत्त लग्ने पिरामः प्रत्रजितो वने॥४॥ अर्थ:-जो ग्रह बलवान् हो तो, ज्योतिष शास्त्र के विशारद बशिष्ट ऋपिने रामचन्द्रजी को राज्यारोहण का मुहूर्त निकाल दिया था, उसही मुहूर्त में रामचन्द्रजी को वनवाम के लिये गमन करना डा ! इस लिये कर्म काही प्रधान पना है, नकि ग्रहका : बुढे से बच्चेका प्रश्न बुद्ध बाबा : तुम सदेव नीचे झुक कर क्या ढूंढते चलते हो। बुट्टे बाबाने जवाब दिया की- जरा दंड प्रहारंग । भग्न कटि रहं कृतः ।। गर्ने मे यौवन रत्नं । पश्यामि नत्पदेपदे।। - ॥ - - ( सुबोध-प्रद) अर्थ:-हे बच्चे ! जरा ( वृद्धावस्था ) रूप राक्षसी के दंड प्रहार से मेरी मम्मर बाँकी होगई और यौवन [ युवनी ] रूप ग्ल गुम गया, उसही को पग पग पर ढूँढता हुआ सदैव फिरता हुं. किन्तु मिलना ही नहीं है ! 'कौनसा मनुष्य पशु के जैसा?' उत्तर (श्लोक-उपजाति वृत्तम्) येपनि विद्यान तपो न दानं न चापि शीलं न गुणोन धर्मः ॥ ते मृत्युलोके भुविभार भृता । मनुष्य म्पेण मृगाश्चरंति ॥ ६॥ अर्थ:-जिनने सद्वीद्याभ्यास नहीं किया, तप धर्म भी नहीं किया, सत्पात्रमें दान भी नहीं दिया, स्ववम शील भी नही पाला किसके गुणग्रहण भी नहीं किये, धर्मागधन भी नहीं किया, ऐसा मनुष्य मनुष्यलोकमे पृथवी पर भार भूत, मनुष्य देह धारी जंगल के मृग के समान नीरा पशु जाणना. "दानार्थ-राजा प्रधान के प्रश्नोत्तर (श्लोक अनुष्टुप) आपदर्थ धनं रक्षेत् । भाग्यवंतः कचापदः ॥ कदापि कुपितं दैवं । संचितोपि विनश्यति ॥ ७ ॥ अर्थ:-दान शूर राजा को दान मार्ग में अपरिमित द्रव्य व्यय करता देख भंडार खाली होनाने का डर ला, प्रधान ने राजा " (प्रउिपदंशदातक) को दानसरोकने के लिये राजाजी की दृष्टि पड़े वहां लिखा कि " आपदर्थ धनं रक्षेत्" अर्थात् आपदा का निवारण करने लिये धन की रक्षा करना आवश्यकीय है.। राजा पढकर मतलब हेतु समझा और उसके नीचे लिखा कि-'माग्यवंत कचापदः" अर्थात् भाग्यवान् को आफत थातीही नहीं है. उसके नीचे प्रधान ने लिखा. कि-"कदापि कुपितो देव" अर्थात्- कदाचित् 'देव-कर्म कापित हो जाये तो किसे मालुम, उसके नीचे राजा 'ने लिखा कि-"साचितोपि विनश्यति" अर्थात्-जो देव कुपित हुए तो संचित कर रखा धन भी नाग पा जायेगा. इसलिये दान में लगा कर उसका सार्थक करनाही अच्छा है. पत्ते की पनातल पे जेमन का पाप" गृो द्वादश जन्मानि । दश जन्मानि शूकरः।। कुकरः शन जन्मानि ! पत्राली भाजने भवेत् ।। ८ ॥ अर्थः पत्त की पनातल ( पवावली ) में भोजन करने वाला १२ मव गीध के, १० भव मदरके, और १००भव कुर्कुट ( मुग) के करने पड़ते हैं !! कंद मूल खाने का पाप, और छोडने का धर्म". रक्त मूलं भवेत् कन्दं । तुल्यं गोमांस भक्षणम् ।। मक्षणानरकं याति । वर्जनात स्वर्गमाप्नुयात् ॥९॥ अर्थ-लाल कांदे, मूले, ताल, गाजर, शकरकन्द -

( मुबोध-संग्रह)
आदि खानेसे गाय के मांस भक्षण जैसा पाप लगता है. कंद मूल
खानेवाला नरकमें जाता है और त्यागने छोडाने)वाला स्वर्गमें जाता है:
सिंह और बकरे की कहानी
बकरे बकरी के यूथ से विछुडकर एक बकरा किसी गहन
जंगल में चला गया. वहां मन मुक्ता खाने के लिये हाधाम पत्ते
पानके लिये झरनाका ठंडा पानी मिलनेसे खा पी कर बकग लप्ट पुष्ट
घिष्ट बनगया. बाल बडे २ होगये, शृंग लम्बे हो वा हो गये,
नेत्र हलदी के जैसे पीछे हो गये इत्यादि. शरीगकृति ऐसी विकाल -
हो गइ कि किसी के पहचान ने में न आवे कि यह बकरा है. एक
वक्त वहां सिंह आगया और अनोखा जानवर देख डरगया,
किन्तु हिम्मत बान्ध उसके सम्मुख चला. वकरा सिंह को सन्मुख
आता देख डरा तो सही, किन्तु उसे एक श्लोक का स्मरण हो गया
उद्यम साहसं धैर्य । बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः ॥
पडैते यत्र वर्तते । तत्र देवः सहाय कृत् ॥ १० ॥
अर्थ:-जिनमें-१ उद्यम,२ साहस, ३ धैर्य, ४ बुद्धि, ५ः
शक्ती और ६ पराक्रम. यह ६ गुण होते हैं, उनका सहायक
देवता होता है. ऐसा विचार कर हिम्मत धर खडा रहा. और उस से
सिंहने पूछा की-
किमर्थ युद्बुदा कारं । किमर्थ नेत्र पिंगलम् ॥
किमर्थ केश धारित्वं । किमर्थं वन संचितम् ॥११॥

(श्रोउपदेश-शतक) अर्थ:-हे विलक्ष शरीरके धारक प्राणी : तुम कौन हो ? नुमार जैसे शरीस्याला प्राणी मैने कहींभी देखा नहीं. और तुमारा जैसा बडबडात बोलना किसिका सुना नहीं. तैसेही तुमारी जैसे रिली आँखो वाला और लम्बे बालवाला प्राणी मेरे जानने में भी नहीं आया. अही इति आश्चर्य, तुम यहां किसको ढूंढते फिरते हो सो कृपाकर फरमाइये? तब बकरा बोला:- शतं, व्याघ्र मयाहत्या । हस्तिनां च शतत्रयम् ॥ एकासिंहो न पश्यामि । तस्माद वनं च सेधिनम् ॥१२ अर्थ:-अहो वनवासी प्राणी ! मैने सो व्याघ्र को मारे हैं और तीन सो हात्ती को मारे है. किसी ने मुझ से कहा की इस वन में एक सिंह रहता है उस को यदि तुम मार डालो तो बहुत अच्छा होवे. इस लिये में ढूँढता फिरता हूं. किन्तु अवीतक मेरं देखने में आया नहीं: तुमोर देखने में आवे तो मुझे बताना. यों मुन कर सिंह घबराया और विचारने लगा कि मेरे अहो भाग्य हैं कि इसने अबीतक मुझे पहचाना नहीं.यों सोच यह कहने लगाकि- मुझे मिलेगा तो आपको बतागा. यों कह कर वहां से भग गया. और किसी पहाड, पर खडा रहकर उसको देखने लगा, तो वह चकरा आक के पत्ते खा रहा है. तब सिंह को विचार हुआ कि वकर के सिवाय दुसरा कोई भी पशु आक के पत्ते खाता नहीं है, इसलिये यह बकराहि हुआ . चाहिये. यो विचार दौडकर वहां " (सुरोध-संप्रद ) आया और उस बकर को मार गिराया! इसलिये ही कहा है कि-- कर्नव्यं भोजनं गुप्तं । दुर्बलेन विशेषतः ॥ अर्क पत्र प्रसादन । अजा पुत्री विनश्यति ॥ १३ ॥ अर्थ:-भोजन करना तो गुप्त करना, तैसेही दुर्वलोको तो प्रसिद्ध-कोई देखे ऐसी जगह भोजन कभी नहीं करना. क्योंकि सिंह के देखते बकरेने आक के पान खाये तो यह मारा गया।। जान के दाता गुरु का उपकार मानना एकाक्षर प्रदातारं । यो गुग नैव मन्यते ॥ श्वान योनि शतं गत्वा । चंडाले श्वपि जायते ॥१४॥ अर्थ--जो कोइ एकभी अक्षर पढानेवाले गुरुका उपका नहीं मानेगा. उनकी बुराइ करेगा, उनको दुःख देगा. यह १०८ भव कुत्तेका करेगा और फिर अनेक भव चांडाल का भी करना पडेगा ब्राह्मण और शृंगाल की कहानी किसी जंगल में एक शियाल को तीन दिन खाने को = मिलने से वह क्षुधातुर बना, नदी के किनारे में मुडदे को चहत देख खंच लिया और उसे खाने लगा. तब उस मुडदे को पहचा कर एक. ब्राम्हण उस शियालसे कहने लगा कि--अरे शियाल ये तेरे माने लायक नहीं हैं. क्यों कि:- श्लोक--पाईले विहित मृत्तम् ) हम्ती दान विवर्जिती । शनि पटी सारस्वतं द्रोहिण " - (श्रीउपदेश-शतक) नेने साधु विलोक नेन रहित । पादौन तीर्थ गती ॥ अन्यायार्जित वित्त पूर्ण मुदरं । गण तुंगं शिरो। सरे! जम्बूक! मुंच मुंच सहसा। नीचस्य निन्द्यं यपु॥१॥ अर्थ- हे सियाल! इस मुडदेके हाथने कभी दान दिया नहीं, इस लिये हाथ खाने लायक नहीं हैं, कान से कमी शास्त्र श्रवण नहीं किये, कभी सुना भी होगा तो ज्ञानी का द्रोह किया. इस लिये इसके कान भी खाने के लायक नहीं है. आँखो से कभी सरसुरुषों के दर्शन किये नहीं, इसलिये आँखोभी खाने लायक नहीं हैं, पावोंसे कभी तीर्थ यात्रा-साधु साध्वी के दर्शनार्थ गमन किय नहीं, इसलिये पावभी खाने लायक नहीं हैं. अन्याय--अनीतिम द्रव्योपार्जन कर उदारपूर्ण किया है, इसलिये पेटभी खाने लायक नहीं है, और यह मरा वहांतक इसके मस्तक में से अहंकार दूर हुवा नहीं. इसलिये मस्तकभी खाने लायक नहीं है. यो इसका सब शरीर निन्दा पात्र है. जो तूं इसका भक्षण करेगा ते: इस भव में तेरी बुद्धि प्रष्ट होगी और आगे के भवों में दुःख पविगा. यो सुन शृंगाल उस मुरदे को छोड़ चला गया. सारांस-पापी मनुष्या का सब शरीर निकम्मा है, उसकी संगत भी कामकी नहीं. राजा और ब्राह्मणकी कहानी किसी ग्राम के राजा का विश्वास मनुष्यों के उपर से ऊठ जाने से उसने अपने पत्यंक की रक्षा करने के लिये एक मुशिक्षित विश्वाम न " । माध--महो महाजनों की महिमा भोक-उपजानि वृत्तन] यपि सिंहामृगमांस भक्षिगायुभुक्षिता नैव तृणं चरंति ।। एवं कुलीना व्यसनाभिभूतान नीच कर्माणि समाचरंति॥२९॥ अर्थ-वनमें निवास करने वाला सिंह भूखकर अतिही पीडित हुआ तृण [थास] कभी नहीं खायगा. यह तो मृगादि का मांसही भक्षण करेगा. मेही जो महाजन-ऊत्तम पुरुष हैं वे मरणांतिक मंकट पडने परभी चोरी जारी मांस भक्षणादि नीच कमका आचरण कभी भी नहीं करेंगे. वे तो मदेव उत्तम कोसेही जीवन बीतविंग. . महाजनो ही परोपकारी होते हैं" पिबंनि नद्यःस्वयमेव नाम्बुस्वियंन वादति फलानिवृक्ष ॥नादति सस्यं बलु बारियाहाः, । परोपकाराय सतां विभूतयः ॥ ३०॥ अर्थ:--नदी अपने पानीको आप पाती नहीं है, वृक्षों अपने फल को आप स्वयं खाते नहीं हैं. वांद वर्षन में धान्य की उप्तत्ति होती है.उम धान्य को यदि खाता नहीं हैं.मतलव कि उक्त तीनों ही परोपकारार्थ ही इतना परिश्रम उठाते हैं, यही कर्तव्य उत्तम पुरुषों का है. ये परोपकागर्थहि परियन्न करते रहते हैं.

"
(श्रीउपदेश-शतक)
सन्तों के
लक्षण
सारं जलं वारिमुचः पियांते।नदेव कृत्वा मधुरं चमंति।।
मंत स्नधी दुर्जन दुर्वचांसि । पीत्यादि सूक्तानि
समुद्रिंति ॥ ३१॥
अर्थः-जैसे समुद्र का खा । पानी बद्दलों पीकर, उसे मधुर
मिन्ट य कर जगत् को बांट देते हैं. तैसे ही सन्त महात्मा ओ
दुर्जन मनुष्यों के कटु वचनों का श्रवणेंद्रिय से पान कर उनको
अमृत जैसा मिष्टोपदेश मुनाकर सुखी करते हैं.
'दुर्जनों सज्जनों का कुछ नुकशान नहीं कर सकते'
कणे जपानांवचन प्रपंचा।महात्मनः कापि न दूपयंति।
भुजंगमानांगरल प्रसंगानापयतां यांनि महा सरांसि।।
अर्थ:- जैसे बड़े तलाव में अनेक वडे २ सो अपने मुखस
गरल [ जहर ] का वमन करते हैं किन्तु तलाव को वह जेहर
बहना नहीं है, तसेही दुष्ट पुरुष ने वमन किया दुर्वचन रूप
हृदय रुप सरोवर में कभी
विपकी अमरभी मजन पुरुषों
नहीं होता है..
r-
दुर्जन छोडने योग्य है,
[श्रीक अनुष्टुप]
दुर्जनः परि हर्तव्यो । विद्ययालं कृतो पिसन् ।
माणेना भाषनः सर्पः । किमसी न भयंकरः ॥ ३३ ॥

( सुबोध-सप्रद) अर्थ:-जैसे मणिधर सर्प को भयंकर जान काई मनुष्य अपने घर में प्रवेश नहीं करने देता है, तैसेही दुर्जन मनुष्य यदि विद्यादि गुण- कर संयुक्त होवे तो भी उसकी संगति कोई पसंद करता नहीं है. दुर्जन काँटे जैसे होते हैं" ग्वलानां कंटकानां च, द्विविधैव प्रतिक्रिया।। उपानह मुग्व भंगो वा । दृरनो वापि वर्जनम् ॥ ३४ ॥ अर्थ:--इस जगत में दुर्जन और काँटे दोनों ममान ( तुल्य ) होते हैं. इसलिये जिस प्रकार जहां काँटे विम्बरे होयें वहां पगरवी से उनका मुख भंग कर मनुष्यों जाते हैं तैमेही मजन पुरुष सज्जनाताम उसे सज्जन बनाते है या दुर्जन से दूर ही रहते हैं. : दुर्जन पे किया उपकार भी दुःख प्रद होता है। उपकारोपि नीचानां, मपकारोहि जायते ॥ पयापानं भुजंगानां । केवलं विष बर्धनम् ॥ ३५ ॥ अर्थ:-जैसे सर्प को पाया हुआ दुध विष रुप बन जाता है.तसही दुर्जन मनुष्यपर किया हुआ उपकार भी दुःख दाता हो जाता है. दुर्जन, सर्प से भी बुरा होता है " सर्प दुर्जनयोर्मध्ये । वरं सपा न दुर्जनः ।। सपी दशति कालेन । दुर्जनस्तु पदे पदे ।। ३६ ॥ अर्थ:-दुर्जन और सर्प में बडा जबर अन्तर है, सर्प तो कद " " ३५ किसीमी उपाय " (ोउपदेश--शतक) चेनु दंग करता है और दुर्जन हरवक्त दुःखदेनेरूप देश करताही हता है. इसलिय सर्प से भी दुर्जन यहुत बुरा है. तथाचः- सर्पः करः ग्यल: क्रूरः। सपात् करतरःग्वलः ।। मंत्रण शाम्यते सपा । न खलः शाम्यते कदा ॥३७॥ अर्थ:--- सर्प और दुर्जन दोनों ही क्रूर खरावही होते हैं. किन्तु फरक इतना होता है कि सर्प का जहर तो मंत्र में उत्तर जाता है किन्तु दुर्जन के हृदय में रहा द्वेष रूप जहर से दर होता नहीं है. दुर्जन बुरे से भी बुरा होता है नक्षकस्य विय दंने । मक्षिका या विपं मुग्वे ॥ वृश्चिकस्य विपं पुच्छे । सर्वागे दुर्जनो विपम् ॥३८॥ अर्थ:-माप के दाढ में जहर होता है, मद्यमक्खी के मम्तक में जहर होता है. बिच्छु के पूंछ [ काँटे ] में जहर होता है. और दुर्जन के रोम २ में अर्थात सब शरीर में जेहर होता है. इमलिये दुर्जन सबसे बुरा होता है. "छे का विश्वास नहीं करना नदीनां च नग्वि नांच शृंगिणां शस्त्र पाणिनाम् ।। विश्वासी नैव कर्तव्यः । स्त्रीपु राज कुलेपु च ॥ ३९॥ अर्थः-१ पानी से भरी नदीका. २ नाखूनवाले पशु पक्षीका, " । - (मोव--संग्रह) ३ सींगवाले पशु का, ४ जिसके हाथमे तरवारादि गम्न हो ऐसे मनुष्यका, ५ स्त्री का और ६ राजघराने वालेका. इन छ का विश्वास कभी नहीं करना. छे की संगत नहीं करना ग्वरं श्वानं गजं मतं । रंडांच बहु भापिगीम् ।। राज पुत्रं कुमित्रं च । दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ४० ॥ अर्थः --१ गद्धा, २ कुत्ता, ३ मदोन्मस्त-हाथी, ४ वहूत बोलने चाली-विधवा स्त्री, ५ राजपुत्र और ६ दुर्जन मनुष्य. दन छ ही को दूर से ही त्याग देना चाहिय. तीनोंका संचित मालं दूसरे हर लेते हैं ? पिपीलिकार्जितं धान्यं । मक्षिका संचितं मधुः ।। लुब्धेन सञ्चितं द्रव्यं । समूलं च विनप्यति ॥४१॥ अर्थ:-चींटियों ने संग्रह किया घान्य को तीतरादि खा जाते हैं, मधु मक्खीने संग्रह किया मद्य ( सेहत ) को भीलादि और लोभीयों का उपार्जन किया द्रव्य राज चौरादि हैं, वक्त पर तीनों का अकाल मृत्यु भी हो जाता है.' पांचों जकार को संतोपित करना जामाता जठरं जाया। जात वेदा जा पूरिता नैव पूर्यते । जकारा पंच और F ७७ " ( श्रीउपदेश-दशनक अर्थ:- जमाई, २ जठरामि--क्षुधा, ३ जाया-स्त्री, ४ जातवेदा अमि और ५ जलाशय-समुद्र, इन पांच 'ज' नाम के बालीका ज्दर पूर्ण कोई नहीं कर सकता है. " अच्छे पदार्थ थोडेही होते है" शैले शैले न माणिक्यं । मौक्तिकं न गजे गजे ॥ साधवो नहि सर्वत्र । चंदनं न बने पने ॥ ४६॥ अर्थ:--सबी पर्वतों में माणिक की स्थान नहीं होती है,मबी हम्ति यों के मम्नक में माति उप्तन्न नहीं होते हैं,और मबी जंगल में चंदनके वृक्ष नहीं होने हैं. तसेही साधु (सत्पुरुष) भी सर्वम्थान नहीं होते हैं. दश मकार चंचल होते हैं मनो मधुकरी मेघो। मानिनी मदनो मरुत् ॥ मा मदो मर्कटों मत्स्यो। मकारा दश चंचलाः ॥४४॥ अर्थः-१ मन, २ भ्रमर, ३ मेघ-बद्दल, ४ स्त्री, ५ लंपट-पुरुष, ६ मरुत-हवा, ७ मा चपला-लक्ष्मी ८ मद-अभिमान, ९ मर्कट- वंदर, और १० मत्स-मच्छ, ये १० बडे चंचल अम्थिर स्वभाव वाले होते हैं. नव काम गुप्त रखना आयुर्वि गृहच्छिद्रं । मंत्र भेपज मैथुनम् ॥ दानं मानापमानं च, नव गोप्यानि कारयेत् ॥ ४५ ॥ " ८ है ( मुबोध-संग्रह) अर्थ:--- १ अपना आयुष्य, २ घर का धन, ३ घर के मनुप्यके छिद्र [ दुर्गुण ] ४ मंत्र, ५ औषध, ६ मेधुन की बात, ७ दान- दिया हो सो, ८ अपने मुंहम अपने गुन, ९ अपना अपमान किसीने किया सो. यह ९ काम छिपाकर रखना. छे लक्षन से नाकार सझना " मानं काल विलम्यश्च । प्रयाणं भूमि दगर्नम् ।। .., सक्रोधान्य मुग्वे वानी। नकार पड्विधः स्मृतः॥४६॥ अर्थः-. १ मौन धारन करे-उत्तर नहीं दे, २ उत्तर देने में बिलाम्ब करे कि-मे निचारके कहुंगा. ३ उठ कर चला जावे. १ नाच भूमि तरफ दृष्टि कर बैठा रहे. ५ क्रोध करने लगे और ६ दूसरे से बातों करने लग जावे. इन छ लक्षणों से 'समझना कि यह काम करने का इसका मन नहीं है, धर्म और कीर्ति सिवाय सब अस्थिर है अस्थिरं जीवितं लोके । अस्थिरं धन यौचने ।। अस्थिरा पुत्र दाराश्च । धर्मः कीर्ति यं स्थिरम्॥४७॥ अर्थ:--इस लोक में--आयुष्य, धन, योवन, बी और पुत्र. यह सवही अस्थिर-नाशवान है. केवल धर्म और कीर्ति ही स्थिर है. भाग्य बिना वस्तु मिलना मुशकिल पदे पदे निधानानि । योजने रस कृपिका ॥ भाग्य होना न पश्यति । यह रत्ना वसुंधरा ॥ ४॥ " अर्थ:-१ इडं;सांठा-स्वयं पिलाकर अन्यको मिष्ट रस देता है. - ( उपटेझ- शतक -इम वसुंधरा-रत्नगर्भा पृथ्वीम पग पग पर द्रव्य का न है, योजन योजनपर रस कृषिका (कीमिया करने की तु) है, किन्तु जिनके भाग्योदय नहीं हुए हैं उनके देखने में ही आती है.. 'आठ जने दूसरे के दुःख को नहीं जानते राजा रामा यमो वन्दिः । प्राहुणा याल याचको । पर दुःख न जानाति । अष्टमी ग्राम कंटकः ॥४॥ अर्थ:-१ राजा, २ स्त्री, ३ यम, ४ अमि, ५ मेहमान, ६ बालक, ७ याचक, और ८ कोटवाल अथवा निंदक, चुगलखोर वैगरे. यह ८ अपना मतलब साधने मे दुसरे के दुःग्य का खियाल नहीं करत है. नव वस्तु स्वयं दुःखसह दूसरे को सूखी करती है. इक्षु दंडा.स्तिलाः शूद्राः। कांनाः काशन मंदिनी ।। चंदनं दधि ताम्बूलं । मर्दनं गुण वर्धनम् ॥ ५ ॥ २ निल-स्वयं पिलाकर अन्यको तेल देता है, ३ शुद्र-कृपी.शीतता तापादि महा फष्टसह कर जगत् को धान्यादि उप्तन्न कर देते हैं. ग्रीयों अनेक कष्टसह कुटुम्बियों का पापण करती है,५ सुवर्ण क रिटा कर अन्य के श्रृंगार के काम में आतारता है.६ पृथवी शीनर ८. “ ( मुबोध-मग्रह) खोदनादि का कष्टसह कर अनेक पदार्थ उप्तन्न कर देती है. ७ चंदनपिसनेसे जलाने से मुगंधही देता है, ८ दही का मंथन करने से मक्खन देता है. और ९ ताम्बूल-पान चायनेवाले का मुख्य मंडन करता है. यों यह नवहीं स्वयं कप्टसह कर दूसरे को सुख देते हैं. दूसरा अर्थ-इन नवका ज्या ज्या अधिक मन किया जाता है-कट दिया जाता है-त्या त्यों इनमें अधिक २ गुण युद्धी पाता है. कहां क्या नहीं होता? नस्कर स्य कुतो धमाँ । दुर्जनस्य कुनः क्षमा ॥ वैश्यानांच कुतः स्नेहः कुतःसत्यं च कामिनाम्॥५१॥ अर्थ:-चोर के हृदयमें धर्म बुद्धि, दुर्जन के हृदय में क्षमा. वेश्याके हृदय में सच्चा प्रेम सच्चा प्रेम और कामी के हृदय में सत्य, नही होता है. श्रोता विन वक्ता क्या काम के किं करिष्यंति वक्तारः । श्रोता यत्र न विद्यते।। नग्न क्षपण के देशे । रजकः किं करिष्यति ॥ ५२ ।। अर्थ-जस जहां सर नग्न-लंगोटी लगाने वाले ही रहते हो तो यहां धोबी गया क्या काम का ? अर्थात् कुछ काम का नहीं. तमे ही जहां सुननेवाले ही नहीं हो तो यहां पण्डित वक्ता भी क्या काम का २ अर्थात्-निकम्मा है.

। [ श्राउपरा-1, अन्याय का धन टिकता नहीं. अन्यायोपार्जितं द्रव्यं । दश वर्षाणि तिष्ठति ।। मात चकादशे यये । समूलं च विनश्यति ॥५३॥ अर्थ-अन्याय से उपार्जन किया धन. ज्यादासें ज्यादा दश वर्ष रह सकता है. कदाचित् इग्यारव वर्ष रह जाय तो वह पहिले के पन को भी साथ में लेकर चला जाता है. ." उत्कृष्ट-तप-सुख-व्याधी और धर्म.'' क्षमा तुल्यं तपो नास्ति । न संतोपात्परं सुखम् ।। मच तृष्णा परी व्याधि । न च धी दया परः।। ५.४ ।। अर्थ:-क्षमा के समान दूमरा कोई तप नहीं. संतोष के जैसा दूसरा कोद मुग्य नहीं. तृष्णाके जैसा दूसरा कोई रोग नहीं और दया के समान दुमरा कोद्द धर्म नहीं. नीच को नीच और उंच को उंच इच्छा" मक्षिका व्रण मिच्छति । धन मिच्छति पार्थियाः॥ नांचा कलह मिच्छति। शांति मिच्छति साधवः।।५।। अर्थ:-मक्खीयों पर गुम्बडा हूंढती फिरती है, राजा धन तथा राज इंढता फिरता है. नीच मनुष्य लेग-अगहे. हूंढना है ? माधु महात्मा ओ मांति को ढूंढन हैं.

८० ( सुबोध-संग्रह) . . सूपात्र दानका फल शिक-उपजाति वृत्तम् सुपात्र दानाश्च भवेदनाढ्यो ।धन प्रभावेण करोनि पुण्य।। पुण्य प्रभावात् सुरलोक वासी । पुन र्धनाढ्यः पुनरेव भोगी॥ ५६ ॥ अर्थ: --सुपात्र में दान के देने से धन की प्राप्ति होती उस घन से पुण्य करनेकी इच्छा होती है, पुण्य के प्रभाव से देव लोक में जाना होता है. और वहां से मर कर पुन्ह: मनुष्य लोक में धनाढ्य का पुत्र हो पूर्ण सुख का भोक्ता बनता है. इसलिये अहो सुखार्थी जनो ! मुपात्र में दान दीजीये. कुपात्र दान का फल" कुपात्र दानाच भवेद्दरिद्री । दारिद्रय दोषेण करानि पापम् । पापप्रभावान्न रकंप्रयातिापुनदरिद्री पुनरेव पापी॥५७ अर्थ:-कुपात्र में दान देने से दरिद्रता की प्राप्ति होती है, उस दारिद्र के प्रभाव से पुनः पाप करता है. और पाप के प्रभावं से मरकर नर्क में जाता है, वहां से निकल कर पुनः दरिद्री के कुल जन्म लेता है और पुनः पापी बनता है. "जीवे वहां तक हाथ न आवे' सर्पस्य रत्ने कृपणस्य वित्तोसत्याःकुचे केसरिणाश्चकैश म

( श्रीउपदेश-दातक)
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वस्तु उन
के मरे याद ही
मानन्निनानांगरणागतेचामृतो भवे दन्य कर प्रचारः
अर्थ:-जीते सर्प की मणि, कृपण का धन, सती स्त्री के पयोघर,
मान्यवंत का अभिमानिका शरणागत. ये
दुसरे ले सकते हैं.
"वद्धिका विकास पांच स्थानपर होता है"
देशाटन पण्डिन मित्रताचावारांगनाराजसभा प्रवेशः
अनेक शास्त्रार्थ विलोकनचाचातुर्य मूलानि भवंति पंच
अर्थ:-१ अनेक देशों में फिरनेसे, २ पण्डितों से मित्रता करने
भे, ३ वैश्या के ठगने की कला जानने से, ४ राजा, पंच, साधु
की सभा में जाने से और ५ अनेक शास्त्रों का अर्थानुप्रेक्षा करने
सें,कम बुद्धि मनुष्य भी चतुर-होशार हो जाता है.
"स्नेही के संयोग से हर्प वृद्धी होती है"
अधीनराणां पति रंगनानां । वर्या नदीना मृतराद
तरुणांम्।
स्वधर्मचारी नृपतिः प्रजानां,गनं गनं यौवन मानयंति।।
अर्थ: -वृद्धावस्था को प्राप्त हुआ मनुष्य अचानक द्रव्य की
प्राप्ति हो जानेसे युवान के जैसा बन जाता है, परदेशी पति के वियोग
मे वृद्धापरी दुर्बल वनी बी पति के आनेसे युवति बन जाती है.
मुखी हुई नदी वर्षाद ऋतु में युवा-वेगवती बन जाति है,पत्र रहित

(मुबोध-संपद) वृक्षा वसंत ऋतु में नवपल्ट हो तरुण बन जाते हैं. और धर्मामा गजा के संयोग से प्रजा जन भी नवयवन रूप दयने हैं. सम्पूर्ण ताका येही चिन्ह है कि झलके नहीं' सम्पूर्ण कुम्भोन करोनि शब्द ।.. मी घटो घोप मुनि ननम् ।। विद्वान् कुलीनो न करोनि गर्न । गुणविहिना बहु जल्पयंति ॥ ६ ॥ अर्थ-जैसे भरा हुआ घडा झलकता भी नहीं है और अयाज भी नहीं करता है. तैसे कुलवंत मनुष्य यहा विद्वान होकर भी गर्व- अहंकार करता नहीं है; और जैसे अधभरा पडा हग२ गन्द कर- ता है और पानी को उछाल देताह तैसे कुलहीन गुण हीन मनुष्य भी बडे अहंकारी और चकवाद करने वाले होते हैं. "किसका किससे नाश होता है? रूपंजरा सर्व सुग्वानि तृष्णाायलपु सेवा पुरुपा भिमा- नम् ॥ यांचा गुरुत्वं गुणमात्म पूजा। चिन्तावलं हत्य दयांच लक्ष्मीम् ॥ ६२॥ अर्थ-वृद्धावस्था रूप का नाश करती है, सृष्णा मुख का नाश करती है. दुष्ट जनों की सेवा प्राप्त मान का नाश करती है, मंगने से बड पन का नाश होता है, अपने गुनों की अपने मुखमे प्रशंसा - ( श्रीउपदेग-शतक। " करने से गुणका नाग होता है. निकम्मी चिन्ता करने में यलका नाम करती है, और लक्ष्मी दयाका नाग करती है!! १.: "काम बिगडे बाद चिन्ता निकम्मी निर्वाण दीप किमु नैल दान । चौरे गर्ने वा किमु सावधानम् । वयोगते किं वनिता विलासः। पोगने किं चल सेतु पंधः ।। ६३ ॥ अर्थ-दीपक बुझगय बाद तेल डालना निकम्मा, चोर धन लेगये बाद जागरण करना निकम्मा. वृद्धावस्था प्राप्त हुए स्त्री संभोग की इच्छा करना निकम्मी. और यदिवप गये याद पार बान्धनी निकम्मी (व्यर्थ ) होता है . छ जने विना अग्नि जलते हे कुग्राम वासः कुजनस्य सेवा । कुभोजनं क्रोध मुर्खाच भार्या ।। मूर्खश्च पुत्रो विधयाच कन्या । विनाग्नि नाय दहते शरीरम् ॥ ६४ ॥ अर्थ-१ खराब ग्राम में रहने वाला, २ नीच मनुष्य की सेवा करने वाला, ३ अमनोज भोजन खाने याला, ४ रीसाल भार्या का पनि, ५ मूर्ख पुव का पिता और ६ विधवा पुत्री के मा बाप, ये छही जने बिना अंगार से हमेगा. जलते रहते हैं.

(मबोध..मना) साधु का कुटुंब (शोक-माल विवीडितनतम् ) धर्य यस्य पिता क्षमाच जननी । शांति चिरं गहिनी॥ सत्यं सूनरयं दया च भगिनी। भ्राता मनः संयमः ।। भय्या भूमिनलं दिशोपि वसनीज्ञानामृत भोजन,मे ते यस्य कुटुम्बिनो यद सखे!|कस्माद भयं योगिनः॥६५॥ अर्थ: धैर्यरूप पिता, क्षमापी माना, शान्ति रूप निरंतर संगमें रहनेवाली प्रिय पत्नी [स्त्री ] मत्य रूप पुत्रवधु, दया रुप वहीन; मन निग्रह रूप भाई है.और पृथ्वी ही जिन के शयन करने मुखद शैया है. दशों दिशा रूपी वर जिन के पहने को है. और ज्ञान रूप अमृत भोजन सैदेव करते हैं. कही मित्रों! इतना जिनके कुटुम्ब है उन को किमका भय है. अर्थात् किसीकाभी नहीं ये मदेव आनन्दमें रहते है. किस के विना क्या नहीं शोभे राज्यं निःसचिवं गत महरणं सैन्यं विनेनं मुग्य।। वर्षा निर्जलदा धनीच कृपणी। भोज्यं तथा ज्यं विना।। दुःशीला गृहिणी सुन्न कृतिमान राजा प्रतापोझितः शिप्यो भक्ति विवर्जितोयन नथा देहय धर्म विना॥६६॥ अर्थः---१ प्रधान विना का गज, २ शस्त्र बिना की सेना, ४ ऑम्ब विना मुख ५ वर्षाद विना वर्षा ऋतु, ६ कृपणता युत्तः धनश्वरी, ७ धृत विना का भोजन. ८ सदाचार विना की बी, " " ( उपदेश-शनक) ९ गुण मूलने वाला मित्र, १० प्रताप बिना का राजा, ११ भक्ति विना के शिप्य' और १२ धर्म विना का शरीर. इन सी को शोभा किस प्रकार से भी होती नहीं हैं. धर्म विना मनुष्य की शोभा नहीं. निईनः करटी योगत ज व श्चंद्रं विना शर्वरी ॥ - निर्गधं कुसुमं सरोगत जलं, झापा बिहीनस्तम् ॥ भोज्यं निलवणं सुतो गतगुण श्चरित्र होनो यति-1 निदेय भवनं नरजति सदा धर्म चिना मानवः॥६५॥ अर्थः-१ दाँत विना हाथी, २ चालविना घोडा, ३ चंद्र विना रात्रि, ४ सुगंध विना फूल, ५ पाणी विना तलाव, ६ छाया चिना वृक्ष, ७ निमक विना भोजन, ८ गुण विना माधु, १० देव विना मंदीर, जिस प्रकार शोभता नहीं है, उमही प्रकार धर्म विन मनुष्य भी शोमता नहीं हैं. " किस विना किसकी शोभा नहीं।" मीनि दृष्टि विना सुबंधन विना गेहंच भार्या विना। विमा वेद विना यती गुण चिना ग़जा च सैन्यं विना ।। शरःशस्त्र विना त्रियः पति विना पूजा विना देवता। सर्व तच न शोभते किम परं देहश्च जीवं विना ।। ६८॥ अर्धः? आँखों मिले विना प्रीनि, २ धन विना मुग्य, (सुबोध-संग्रह) ३ स्त्री विना घर, ४ वेदपाठ बिना ब्राह्मण, '५ गुण विना माधु ६ मना विना का राजा, ७ हथीयर विना मूत्रट ८ भक्ति विना का शिप्य, और ९ धर्म विना कर शरीर शोभता नहीं है. "वृद्धावस्था की स्थिति" गानं संकुचित गनिर्विगलिता भ्रष्टाच दंतावली । दृष्टिनश्यति चर्द्धते बधिरता वक्त्रंच लालायते ।। वाक्यं नैव करोति वान्धवजनः पत्नीन शुश्रूपते ।। धिक कष्टं जरया भिभूत पूरूपं पुत्रोऽप्य य ज्ञायते ॥ अर्थ:--वृद्धावस्थामै शरीर संकोचित होजाता है. चाल बाँकी होजाती है, दौत नष्ट हो जाते है, आँखों से अच्छा दीखता नहीं है. बॉन से पूरा सुना जाता नहीं है. मुंह में से लाल टप कने सग जाती है. भाइ बन्ध कहना नहीं मानते, प्रिय पत्नी भी सेवा नहीं करती आर पुत्र भी अवज्ञा करने लग जाते हैं. टसलिये धिक्कार ह वृद्धावस्थाको. "देव के कोप की वक्त बुद्धि भ्रष्ट हो जाती हैं" (शोक अनुय्य) धातुर्वाद तथा ते ! यक्षिणि मंत्र साधने ॥ परदारे तथा चारे । देवे म्प्रे मतिर्भवत् ॥ ७० ॥ अर्थ: जर मनुष्यके अशुभ कमोदय होता है तब मुवर्ण सिद्धि आदि कीमीया साधन करने का मन होता है. परस्त्री गमन (उपदेशशतक) करना चहाता है चोरी करने प्रवृत होता है, यह पापोदय के नमण जानना. . " पाणी के गुण" अजीण भेषजं वारि, जीणे धारि बल प्रदम् ।। भोजन चामृत वारि । भोजनांते विष प्रदम् ।। ७ ।। अर्थ:- अजीर्ण पर गरम पाणी औषध तुल्य गुण करता है, निरणे काठमें पाणी पीने से बल वृद्धी होती हैं, भोजन करते बीच में पाणी पांना मो अमृत तुल्य है. भोजन किये याद पानी विष तुल्य होता है. बुरा काम करने से, नहीं करना ही अच्छा (थोक-शिपरणी वृत्तम्) बरं मौनं कार्य, नच वचन मुक्तं यदि नृतं । घरं क्लीयं पुसां, नच पर कलवाभि गमनम् ॥ वरं प्राण त्यागो, नच पिशुनताया मभिरुचि ॥ वर भिक्षाशित्त्व, नच परधना स्वादन सुवम् ॥७२॥ अर्थ--झूट बोलने से तो मोनस्य रहनाही अच्छा है, परस्त्रीके गमन करने से नपुंसक (नामर्द) रहनाही अच्छा है. चुंगली आदि लबाडी करके उदर पूर्ण करने से तो मरनाही अच्छा है, ओर दूमेर के धनकी आशा करने से तो भीशोपजीवी होनाही अच्छा है.

(माप- मह
"
"धर्मकाममें विलम्ब नहीं करना
(शोक शादलविकाडिन)
यावत् स्वस्थमिदं कलेवर गृहं यावजरा दूरती ।
यावच्चेन्द्रिय शक्तिर प्रतिहना यावत् क्षयो नायुपः ।
आत्म श्रेयसि नायदेव विदुपा कार्यः प्रयतो महान ।
संदीप्ते भवने च कृप ग्वननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ।।७।।
अर्थ-- जहांतक शरीर सुखमें है, जहांतक वृद्धावस्था प्राप्त
नहीं हुई है, जहांतक इन्द्रियों की शक्ति कम नहीं पड़ी है, और
जहांतक आयुप्य का क्षय नहीं हुआ है. यहांतक अहो मुन्न पुरुष:
आत्मश्रेयका धर्म कार्य गीघ्रता से करले. क्योंकि जिस प्रकार घरमै
अंगार लगे बाद उसे बुझाने को पाणी के लिये क्या खोदना निरर्थक
है, तेसेही शारीरिक शक्ति नाग हुए. वाद धर्म होना भी असंभवह.
"कौनसा देश त्यागने योग्य ?
छेदश्चन्दन आन चम्पक यने रक्षापि शाग्वाटके।
हिंसा हंस मयूर कोकिल फुले काकेशु नित्यादरः ।।
मातंगेन खर प्रयः समतुला कपूर कासियो
रेपायन विचारणा गुणिगणे देशाय तस्मै नमः।।७६
अर्थ:-जिस देश में चन्दन, आम्य और चम्पा के
उत्तम वृक्षों का छेदनकर, बबूल थूवर जैसे नान वृक्षाका
होता हा. जहां हंस, मयूर. कोकिला असे उत्तम •

(श्रीउपदेश-शतक) नागकर को . " घुघु जैसे नीच पक्षियोंका पोषण होता हो. जहां हाथी और गद्धे की एक हि किंमत होती हो. जहां कपूर और कपास को समान मानने हो. अर्थान् सद्गुणी और दुर्गुणी की परीक्षा नहो, मगुणी का अपमान और दुर्गणी का सम्मान होता हो. ऐसे देश को दरसेही नमम्कार करना. अर्थात् दूरसेही त्याग देना अच्छा है. परस्पर एक से एक की एक शोभा है.' मणिना वलयं बलयेन मणि,मणिना वलयेन विभानि करः । कविना च विभुर्पिनाच कविः कविनाविभुनाच विभाति सभा ।। ७५ ॥ शशीनाच निशा निशयाच शशी,शशिनानिशयाच विभनिनभा पयसाकमलं कमले न पयः, पयसा कमलेन विभाति सरः॥ ७६ ॥ अर्थ:- मणि मे कंकण की शोभा है, और कंकण से मगिकी शामा है मणि और कंक्रय दोनों कर हाथ शोभता है. कवी मे राजा की शोभा है और राजा से कवी की शोभा है की और राजा दोनों कर ममा की शोभा है चंद्रमासे रात्रि की शोमा है और रात्रि से चन्द्रमाकी शोभा है चन्द्रमा और रात्रि दोनाकर आकाश की शोभा है. पाणी से कमल को शोभा है और कमल से : पाणी की शोमा हे पाणी और कमल दोनों कर तलावकी शोभा है. यो परम्पर एकक से एकेक अच्छे लगते है. अच्छेसेही ग्राम की .

(सुबोध-संग्रह) शोभा होती है. प्राप्त वस्तु की सफलता (ोक उपजती वृत्तम् ) बुद्धेफलं तत्त्व विचारणंचादेहस्थसारं व्रत धारणं च ।। अर्थस्य सारं किल पात्र दानं । बाचाफलं प्रीतिकर नराणाम् ॥ ७७ ॥ अर्थ:-बुद्धि प्राप्त होने का सार है कि तत्त्वातत्त्व का विचार करना. मनुप्य शरीर प्राप्त करने का सार है कि मम्यक्त्व पूर्वक व्रतों का स्वीकार करना, धन प्राप्त करने का मार है कि सुपात्रमें दान देना और बचन प्राप्त करनेका सार है कि मी मे प्रीति कर वचन बोलना. ज्ञानी के १० लक्षण" अक्रोध वैराग्य जितेन्द्रियत्त्वं । क्षमा दया सर्व जन प्रिय क्यम् ॥ निलाभ दाता भय शोक हर्ता। जानिनराणां दश लक्षणानि ।। ७८ ॥ अर्थः-१ क्रोध रहित, २ वैराग्यवंत, ३ जितेन्द्रिय, ४ क्षमा बान, ५ दयाल, ६ सधी को प्रियकारी. निलोभी, ८ दातार. ९-१० भय ओर शोक दूर करने वाला, यह १० लक्षण जिम- में हो सो जानी- (उपदेश--शतक) ज्ञान दान की महिमा " [श्रीक मालिनी वृनम्] सगजरथ तुरङ्गं गोगनं भूमिदान, कनकरुचिर पानं मेदिनी सागरांतां॥ उभय कुल विमुद्धं कोटि कन्या प्रदानं, न भवति ग्वलु तुल्यं ज्ञानदानेः समानम् ।। ७९ ॥ अर्थः-सेंकडो-हाथी घोडे रथ गायों पृथ्वी (खत ) सुवर्ण पात्र समुद्र के अन्त तक पृथवी का राज, निर्मल जाति कुल की कोई कन्या, इन सभी का दान कर देताभी ज्ञान दान के तुल्य न आये. सब में श्वष्ट ज्ञान दान है. दारिद्र की प्रशंसा (पाथा-आयी वृत्तम्.) दीसंति जोग सिद्धा । अंजन सिद्धाय केड़ दीसंति ॥ दारिद्र जोगसिद्धा। पास विट्टिया न दिसंति॥ ८०॥ (शोक.अनुष्टुप वनम् ) भो दारिद्र नमस्तुभ्यं । सिद्धो हं तव दर्शनात् ॥ अहं सवांश्च पश्यामि । नमां पश्यति कश्चन ॥ ८१ ॥ अर्थ:-दरिद्री कहता है कि-जो योग का साधन का सिद्धं पुरुस बने है, भी देखनेमें आते है. और अंजन सिद्धी से अदृप्य बने है, किसी प्रयोग से भी देखने में आजाते हैं.

। (सुबोध-भप्रह) किंतु दरिद्री मनुष्य यदि दातार के नजीक बैठा हो तोमी यह , उसे देख सकता नहीं है. ।। ८० ॥ इस लिये हे दारिद्र मै तुझे : नमस्कार करता हूं क्यों कि मैं तेरे दर्शन से (प्रताप से ) सिद्ध के समान अदृश्य बन गया हूं, कि मुझे कोई देखही नहीं सकता ॥८॥ समान कोण " (काव्यम् ) पुत्राय सीसाय समं विभत्ता । रिसिणोय देवाय समं विभत्ता॥ मुक्ग्या तिरिक्वाय समं विभत्ता । मुआ दरिदाय समं विभत्ता ।। ८२ ॥ अर्थ:--पुष्ट और शिष्य दोनो सरीख, ऋपि और देव दोनो सरीख, मूर्ख और तिच ( पशु ) दोनो मर्राग्ये, मुग्दा और दरिद्री दोनो सरीखे. "जो प्रार्थना भंग करे सो सर्व से तुच्छ ( गाथा-आयी वृतम्) नण तहुयं तुस लहुयंच, आनण तुस लहुयं च पस्थणा लक्ष्य तत्तोवि सोय लहु ओ । पत्थणा भंगो कओ जेण ॥ ८ ॥ अर्थः-मबसे तुच्छ तृण होता है. उसमे मी तुच्छ तुश होता है. और तृण तुश से मंगने वाल तुच्छ होता है. किन्तु जो " , (प्रोउपदेश-शतक) दक्तिमान् हो मंगनेवाले की प्रार्थना करता है वह उस मांगनेवालम मी तुच्छ होता है ! परपत्थणा पवित्ति। माजणणी ! जणय परिसं पुत्रं ॥ उपर विमाधरिज्जयं । पत्थण भंगोकओजेण ।। ८४ ।। अर्थ:--अहो मातेश्वरी दूसरेके पास याचना करनेवाले पुत्र को जन्मना नहीं. कदाचित ऐसे भी पुत्र को जन्म दे तो तेरी इच्छा किन्तु प्रार्थना का भंग करने वाला-मंगत को नकारा कहने वाले पुत्र. का तो तू पेट में धारण ही मत करना अर्थात जन्म नहीं देना. "विधाता को उपालंभ (शोक-मालिनी वृतम् ) शशिनि,खल कलंक कंटकं पमनाले । जलधि जलम पेयं पण्डिते निर्धनत्वम् ।। दायित जन वियोगो दुर्भगत्वं स्वरूपे । धनपनि कृपणत्वं रत्नदोपी विधाना ॥ ८५ ॥ अर्थ:-अहा विधाता तैने यह क्या किया ? चन्द्रमा को कलंकित कर दिया, कमलकी नाल को कॉट लगादिये, समुद्र का पानी खारा कर दिया, विद्वानको निर्धन रख दिये, रूपवती स्त्री को विधवा कर दी, प्रियजनको वियोगी बनाया, सूरूपवानको दुर्भागी बनाया, और धनेश्वरी को कृपण बना दिया विघी के प्रतापसे गों . स्नो भी संतोसताप होते है.

( मुबोध-संग्रह) सात दुर्व्यसन ( श्लोक- उपाजात वृत्तम.) द्युतं मांसंच मुराच वेश्या, पापर्द्धि चौरी परदार- संवा। एतानि सप्तव्यसनानी लोक,घोराति घोरं नरक ददन्ति ।। ८६ ॥ अर्थः-१ जुवा खेलना, २ मांस का खाना, ३ मदिरा का पीना, ४ वेश्यागमन करना, ५ मिकार खेलना, ६ चोरी का करना और ७ परस्त्री गमन. इन सातो दुर्व्यसनों के सेवन करने वाले मरकर अति दारुण दुःस्ववाली नरक में जाते हैं । " रात्रि भोजन रोग कर्ता (शोक अनुप) मेधां पिपीलिका हान्त । यूका कुर्याज्जलोदरम् ।। मक्षिका कुरुते यान्ति । कुष्ट रोगं च कोलिकः ।। ८७॥ अर्थ.--रात को भोजन करने से-जो चिंटी खाने में आ जाये तो बुद्धि का नाश होवे. जो यूंका (ज्यू ) खाने में आजाये तो जलोदर का रोग हो जाई. मक्खी खाने में आजावे तो यमन हो जाये, और जो मकटी साने में आजावे' तो कुष्ट-कोड रोग उत्पन्न हो जाये. ।

(श्रीउपदेश-गतक) " व्यर्थ काम ६ 7 था वृष्टी समुद्रपु । वृथा तृत्पेषु भोजनम् ।। या दान धनाढ्यपु । वृथा दीपो दिवापेिच ॥ ८८ ॥ अर्थ:--समुद्र में वाद वर्षना व्यर्थ, तप्त (धाप हुए ) को भोजन ऋगुना व्यर्थ, धनेश्वरी को दान देना व्यर्थ और दिनको दीपक माना व्यर्थ. ब्राह्मण के लक्षण सत्यं ब्रह्म तपो ब्रह्म । ब्रह्म चन्द्रिय निग्रहः ॥ सर्व भूते दया ब्रह्म । एतद् ब्राह्मण लक्षणम् ॥ ८॥ अर्थ:-जो मत्य ही बोले, तपश्चर्या करे, पांचा इन्द्रियका निग्रह करे-नियम रख और सब जीवोंपर दया करे,सोही ब्राह्मण होता है. २७ व नाम की वस्तु होवे सो शेहर (श्लोक-शार्दुल विकिदित वृतम् ) बाप ववहार वर्ग बनिनः । वाग्मी वनं वाटिका।। वैद्या ब्राह्मण वारि वादिविवुधावेश्या वणिक वाहिनो। विद्या वीर विवेक वित्त विनया । वाचायमा यल्लिका वन्न वारग वाजी वेगर व राज्य वभिः शोभते ॥ अर्थ-१बावडी, २ वप्र-किया, ३ वर्गाचा ४ अठोर : वर्ण, केलोगो ५ वनिता-खी, ६ चाचाल, ७ वन, ८ वाडी, १० ब्राह्मण, ११ वार्ग-पाणी, १२ चर्चा-बादी; १३.विबुद्ध . संघ F (सुबोध-संग्रह) १४ वैश्या, १५ वनिक, १६ वाहिनी-नदी, १७ विद्यावंत, १८ वीरपुरुष, १९ विवेकी, २० वितधन, २१ विनय वान,२२ वाच. क-साधु, २३ खेल-बलियो, २४ यन्त्र, २५ चारण-हायो, २६ वाजी-घोडा, और २७ वैशर-खच्चर, घर-यह २७ ही वकार के प्रथम अक्षर वाली जहां प्रधान वस्तु हो, वहीं गहर है. मर्यादमें रहने वालाही फते पाव (श्लोक अनुष्टुप) नक्रः स्वस्थान मासाद । गजेन्द्रमपि कर्पनि ॥ सएर प्रत्युत स्थानाच्छुनापि परि भूयते ॥११॥ अर्थ-मगर मच्छ स्वस्थान अर्थात् पानी में रहकर हाथी जैसे बड़े प्राणीका भी नाश कर सकता है. और जो वह म्यम्थान को छोड कर अर्थात् पानी बाहिर आजाये तो उसे कुत्ते जपा भी मार सकता है. सारांश यह हैं कि हद्दी मर्याद में रह कर काम करने वालाही फत्ते पा सकता है, मर्याद का उलंघन करने वाला वक्त पर अकाल में मारा जाता है. "मर्याद भंग कर्ताक मित्र भी वैरी हो जाते हैं।" पद स्थितस्य पनस्य । मित्र यरूण भास्करी ॥ पदच्युतस्य तस्य । क्लेशदाह करा युभौ ॥१२॥ अर्थ-कमल पुष्प स्वस्थान मरोवर में रहता है उस वक्त उसके मित्र हवा और सूर्य दोनों ही सुखदाता होते हैं. और वहीं कमल जो 6 ( श्रीउपदेशशतक) स्वस्थान त्याग कर जो पृथवी पर जा पडे तो येही मित्र उसे दुःख दाता होजाते हैं. हवा उड़ा देती अथात् है और सूर्य मुका देता है. "कितनीवस्तु स्वस्थान में ही अच्छी लगती है." राजा कुलयर्विमा । मंत्रिणश्व पयोधराः ॥ स्थान भ्रष्टा न गोमंत। दंताः केशा नग्वा नारः ॥२३॥ अर्थ:--राजा, कुलवंती स्त्री, ब्राह्मण, प्रधान. वाद, दांत, बाल, नख और मनुप्य. ये सब स्थान में ही अच्छे लगते हैं. स्थान भ्रष्ट हुए बने नहीं गोभी नहीं पाते है. सारांश ग्रहण करो" (लोक उपजती वृत्तम) अनेक शास्त्रं यहु वेदितव्य-मल्पश्च कालो पहपश्च यत्सार भूतं तदुपसितव्यं । सो यथा क्षीर भिवाम्युमध्यात् ।। ९४ ॥ अर्थः जगत् में शास्त्रां बहूत है,पढना भी बहुत हैं, किन्तु आयुष्य थोडा है और उस में भी विधन बहून आते है, इसलिये जैसे हंस के सम्मुख पाणी और दूध दोनों मिलाकर रख दे तो वह दुध २ पी जाता है और पाणी को छोड़ देता है, तैसेही शास्त्र पढकर सार २ ग्रहण कर लना और असार को छोड देना चाहिए. क्रोध शरीर को भी जलाता है क्रोधोहि शत्रु प्रथमो नराणां । दहस्थितो दे विघ्नः ।। " १०० . (सुबोध-संप्रद ) शनाय ॥ यथास्थितः काष्ट गतोहि वनितः । सएव वन्हिदहते शरीरं ॥ ९४ ॥ अर्थ:-से यांश के अंदर रही अमी यांश का नाश करती है, तैसेही शरीर में रही क्रोध रूप अग्नी शरीर को जलाती है. इसलिये क्रोध त्यागने सेही शांति पान होती है. " अच्छे की संगत से अच्छा " वनता है. यति बनीचापि पतिव्रता च । वीराश्व गुराश्च दया पराश्च ॥ त्यागीच भोगीच बहुश्रुताश्च । सुसंग मात्रेण दहति पापम् ॥ १६ ॥ अर्यः -नितेंद्रिय, बतधारी, पतिवता स्त्री, बोरपुरुष, शूर पुरुप, त्यागी पुरुष, और बहूत शास्त्र के पढे हुए. इनकी संगत करनेवाला भी उनके जैसाही गुनवान बन जाता है. " एक से दूसरे की शोभा होती है ' (शाक यशस्थ वृत्त) श्रुतेन बुद्धि र्व्यसनेन मुर्वता । मदेन नारी सलिलै निमग्ना।। निशा शशांकैन धृतिः समाधिना: नयेन चालंक्रियते नरेंद्रता ॥ ९७ ॥ अर्थ: :-शास्त्र से बुद्धि, दुर्व्यसन से मूर्खता,, मद से स्त्री. पाणी, से नदी, चन्द्रमामे रात्रि. समाधि से धैर्यता. और न्याय -- १.१ (भाउपेदा-दातक) " मे राजा गोमा पोता है. " सब धर्म सब गुरु सरीखे नहीं (शांक अनुष्ट्रप वृत्तम्.) वाजि धारण लोहानां । काष्ट पापाण याससाम् ।। नारी पुरुप तोयाना, मंतरं महदंतरम् ॥१८॥ अर्थः घोडे घोडे में, हाथी हाथी में, लोह लोह में, लकड लकड़ में, पत्थर पत्थर में, वन्न वस्त्र में, पुरुष पुरुष में, पाणी पाणी में, और रात्रि दिन में, जितना अंतर होता है, तैमहि धर्म धर्म में, और साधु साधु में भी बडा अन्तर होता है. सब सरीखे नहीं होते है. " कितनीक वस्तुकी परिक्षा भी नहीं करना" नदीनां च कुलांनाच । मुनीनांच महात्मनाम् ॥ परीक्षा नही कर्नव्या । स्त्रीणां दुश्चरितस्य च ॥१९॥ अर्थ:-नदी के मूलकी, साधु के कुल की,और स्त्री के दुश्च- रित्रकी परिक्षा नहीं करना चाहिये.क्योकि इसका परिणाम श्रेष्ट नहीं. "पांच महा पापी धर्म निन्दी पंक्ति भेदी। निद्रा छेदी निरर्थकः। कथा भंगी गुण द्वेपी । पचे ते परमा धमाः॥१०॥ अर्थः--१ धर्म की निंदा करने वाला, २ पंक्तिका भेद करने चाला, ३ विना काम मूने को जगाने वाला, ४ चलते व्यायान T

1०२
-
(सुरोध-प्रह)
में भंग डालने वाला और ५ गुणी जन का ट्रेप करने वाला,
ये पांच महा पापी होते हैं.
'मक्खी हाथ घिसकर शिर क्यों कूटती हैं ?'
(ोक-शार्दूलविक्रीडित)
देयं भोज धनं सुकृतिभिनी संचितव्यं कदा।
श्रीकर्णस्य घलेश्च विक्रमपनेरद्यापि कीर्ति स्थिता ।।
अस्माकं मधु दान भोगरहितं नष्टं चिरात् संचितं ॥
निर्वाणादपि पाणिपाद युगलं घर्पत्य हो मक्षिका १०१
अर्थ- एक वक्त भोजराजा पण्डितों सहित सभाम बैठे थे,
उस वक्त एक मक्खी भोज राजाके हाथ पर आ बैठी. राजा उसको
देखता है तो यह हातों को मल मल कर शिर को कूट रही है,
तब राजा ने पण्डित से प्रश्न किया, कि यह मक्खि क्या
करती है? तब पाण्डत बोले कि-अहो राजेन्द्र! यह मक्खी इसा
प्रकार सूचना कर रही है कि मैने बहुत पुष्प के वृक्षों पर परि
भ्रमण कर उन का रस चूस २ कर लाइ और मद्य ( सहेत ) को
का छत्ता बनाया, उसकी रक्षा करनेको अहो निश उसपर बैठी
रही, किसी को हाथ भी नहीं लगाने दिया और न मने खाया.
' अवी एक भिल्ल आकर अग्नि आदि प्रयोग मे हमे दुःखी कर
वहां से भगादि,और वह सत्र मद्य(सहत)वहां से लेगया.वहां से उड
कर में आप के सम्मुख आ अर्ज करती हूं कि-जी भैरे जैसे
.

(धारपदेश-शतक)
दुःसी नहीं होना हो तो, आपने पूर्व पुण्योदयसे राज ऋद्धि
आदि बहुत धन प्राप्त किया है उसका शीघही सद्व्यय कर
दी बीये ! संचय करके रखना नहीं. दान के देने में करणराजा
बलिराजा और विक्रम राजा इत्यादि गजा ओं की कीर्ति जगतमें
ताजी बनी हुई है. इतनी सूचना करने पर भी जो आप दान धर्म
का समाचरन नहीं करोगे तो हमारे जैसीही स्थिति आपकी होगी!!
॥ सत्पुरुषों के सद्गुणों ।।
॥ शादुल रिकारितन ॥
धर्म तत्परता मुख मधुरता दाने समुत्साहिता ॥
मियश्चकना गुरी विनयता चित्तऽतिगम्भीरता।
आचार शुचिता गुणे रसिकता शास्त्रेऽतिविज्ञानिता.
रूपे सुन्दरता प्रभी भजनिता सत्स्वैव सदृश्यते१०२
अर्थ:--धर्म में तत्परता, मुहमें [ वचन में ] मीठाश,
दान में उत्साह, मित्रों के साथ निष्कपटपणा, गुरुका बिनय, चित्त
अति गंभीरपना, आचारमें पवित्रपना, सद्गुनोपर प्रीति, शासका
संपूर्ण ज्ञान, आकृति में सुंदरपना, और परमात्मा में भक्ति. यह
सद्गुनी सत्पुरुषामें ही देखने में आत हैं ।
॥ अंतिम प्रार्थना ॥
सर्व मुखिनः सन्तु, सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु. मा कश्चिदुःवमान्पुयात्।।१०३

१०४ . ( सवोर- मनह) अर्थ:--सर्व जीवा मुखी होवो, मजीया आरोग्यवान बनो, सर्व जीवों अपने आत्माका कल्याण करो,और कोई भी प्राणी दुःखी न होवे यही प्रभुसे मेरी प्रार्थना है। ॥ प्रशस्ति । शाल विवादित वृश्यम् ॥ श्रीजनाभिधदर्शने स्तुतियुते घेतम्बराख्य मने, नामूरभूदिह कानजी मुनिवरः श्रीसाधुमार्गिबजे । नद्गच्छे सुविहार्यमोलक ऋषिःस्वस्मै पदार्थ मया, तेनेदं विविधो पदेश करणं प्रासंगिकं वर्णितम् ॥ १ ॥ अनुप ग्वानदेशे ऽ धुना ग्रामे, धूलियाख्ये स्थिते नच । हिंदिव्याख्यां विधायोप-देशशतं प्रकाशितम् ॥ २॥ रसाष्टाङ्ककुवच, विक्रम शुभ विक्रम । नभस्य ऋषिपञ्चम्यां, शोभने रविवासरे ॥ ३ ॥ ॥निभिः कुलकम् ।। भावार्थ:-विश्व में प्रशंसनीय और सुप्रसिद्ध श्रीजनश्चे. तांबरसाधुमार्गी-स्थानकवासी महाजबमें परमपूज्य श्री कहानजी ऋषिजी महाराज हुए. उनके संप्रदायमें शांतिपूर्वक पृथ्वीपर विचरता हुआ ऐसा मैने [ अमोलक ऋपिने] स्वपरहितार्थ विविध प्रकारका उपदेश करनेवाला, प्रासंगिक ( जिसमें प्रसंगचित्त श्लोका संग्रह .

(श्रीदपदेश-शतक)
है ), सा यह ' उपदेशशतक ' हिंदीभाषा में अनुवाद कर के.
पधिम खानदेश में धुलिया गाममें रहकर विक्रम संवत १९८६
का भाद्रपद ऋषिपंचमी रविवार के दिन पूर्ण किया (लिखकर
तैयार किया)॥
॥ई शांति गांति शांति ।।
इति उपदेश शतकं
उन्नति अवनति का मार्ग
आ गया है कर्म युग कछु कर्म करना. ए देशी
इस फूटने ही हम सभीको गतिहीन बना दिया । इस फूटन
जातियों को-छिन्न भिन्न बना दिया, इस फूटने ही धर्म को
ग्लानी पूर्ण बनाढिया,इस फूटने ही देशको भी नष्ट भृष्ट बना दिया
इस फूटका सिर फोड कर अब ऐक्य करना चाहिये ।। सब गच्छ
वालों को परस्पर मेल रखना चाहिये । विद्या तथा बलका प्रचारण
कार्य करना चाहिये।। इस मार्ग में जिन-धर्म का उद्धार करना चाहिये।
.

(पद्यान्मक) पद्यात्मक-श्री महावीर स्तुति. पच्छिस्तुणं समणामहणायाआगारिणो या परनित्थीयाय|| संकद नेगन्त हिय धम्म माहाअणेलिसंसाह समिकावयाए।। पूछेगे साधु श्रायक आदि । गृहस्थि तथा कोइ परतीर्थ यादी ।। कहा किस ने धर्म एकन्त हित कारी अनौपम अच्छा कहो सम्यग् प्रकारी।।१।। कहंच णाणं कई दसण से । सीलं कई नाय सुत्तस्स आसि॥ जाणासिणं भिक्खु जहा तहेणाअहासुत्तं यूही जहा णिसंतं! कैसे ज्ञानी कैसे दर्शनी कहिये । आचारी कैसे जातपुत्र भइये ।। आप जानते हो जैसे थे वैसे । जैसा सुना कहो मुझे भी तसे ॥ २ ॥ खयन्ने से कुसले महेसी।अणन्त नाणीय अणन्त दंसी॥ जसं सिणो चक्खु पहठियस्स।जाणादि धम्मंच धिइंच पहि खेदके जाण थे कुशल महा ऋषि । अनन्त ज्ञानी और अनन्त दी । यशस्वी च भूत मोक्ष पन्थ देखे । जानते धर्मको धैर्य को पंखे ॥३॥ उड़े अहेयं तिरियं दिसासु । तसाय जे थावर जेह पाणा ।। से णिच णिचेहि समिक्ख पन्ने शिवेच धम्म समियं उदाहु। ऊंची नीची रु तिरछी दिशा में ही त्रस और स्थावर प्राणी जेही ।। नित्य आनित्य सम्यग् तरेह जाना । दीपासा धर्म सभा में यखाना ॥ ४ ॥ से सव्वदंसी अभिभूय णाणी।णिरामगन्धे धियम ठिनप्पा॥ अणुत्तरे सव्व जगसि विजं । गंथा अतीने अभय अणाऊ॥

१०७ (श्रीवीर स्तुति ) उन सब देखा न हरासके नाता । सर्व दोष रहिन धैर्य में स्थिर आता। नवं जगत् की उत्तम विद्या जाने । अभय अनायु भेदी ग्रन्थी ताने ॥५॥ संभू पन्ने अणिए अचारी।ओहंतरे धीरे अनन्त चक्षु।। अगुत्तरे नप्पइ सूरिएवा । वइरोयणी देव तमं पगासे ॥ ६॥ दार्थ प्रजी अप्रातिबन्ध विहारी । भोध तीरे धीर अनन्त नेत्र धारी ।। श्रेष्ट तप जग में सूर्य समान । मिथ्या तम नशाने आमिसे जान ॥६॥ अगत्तरं धम्म मिणं जिणाणाणेया मुनि कासव आसुपन्ने। इन्देय देवाण महाणुभावे । सहस्सणेतादिविणं विसिहे। प्रधान धर्म के नायक जिनेश्वर । न्यायी मुनिश्वर दीर्घ वृद्धिधर ।। देविन्द्र देवों में महा भाग्यवान । हजार आँखो देवों में श्रेष्ट जान ॥ ७॥ सेपन्नया अक्वय सागरे यारामहोदहीया यी अणन्त पारे । आणोइ लेया अकसाइ भिक्षुासक्केच देवा दिवइ ज्जुइम।। अक्षय नानी समुद्र नीर जैसे । सयंभुरमण अअन्त अपार तैसे ।। रज मैल रहित वे अकपाद यति । सकरेन्द्र की जैसी दीपती जोती ॥८॥ से वीरीपण पडिपुन्न वीरीए । सुदंसणेवा णग सव्व सेहे। सरालंप वासिमुदागरे से । विरायएणेग गुणो वयेय॥९॥ प्रतिपूर्ण बलवन्त महावीर । सर्व पर्वतों में श्रेष्ठ मेरू से धीर, देवों भी वहां रहे आनन्द पाधे । अनेक गुणों से विराजे शोभावे ॥२॥ सयं सहस्साण उजोयगाणं तिकण्डगे पण्डग वे जयन्त से जोयणे णवणवाते सहस्सोउटुस्सितो हे १०८ (गद्यमा.. । सो सहन योजन का उंचा जान । प्रिकाण्ड पन्दगवनहाजा समान ॥ निन्याणु सहश्र योजन उससे ऊंचाएक महश्र योजन पृथयों में गांच॥१०॥- पूढे णभे चिट्टइ भूमियाठिगा सूरिया अगृपरि वयन्ति । से हमवन्न यहु नंदणयजिसी रनि येदयतिमहिन्दा॥१॥ म्पनी आकाश यो जमीपे रहीया । सूर्य सदा जाम प्रदक्षिणा दइया ॥ .. मुवर्ण वरण बहुत आनन्द करी। यहां साता पाने महेन्द्र भारी ॥ ११ ॥ से पव्वा सद्द पहाप्पगासे । विरायती कंचन मह यन्ने । अणुत्तरे गिरिसुयपव्य दुग्गागरो वरेसे जलिय भीम।१२ यो पहाड माले नामांसे प्रकाशे । अति शोभिती कंचन दग भादो ॥ विपम मेम्बला से अति प्रधानो । पृथवी के सब पहाडॉम दिव्य जाना ।। १२॥ महिइ मनमि ठिय णगिन्दे । पन्नाय ते मुरिये सुद्धलेसे " एवं सिरीपउस भूरि यन्नामणोरम जावट अच्चीमाली॥१३ पृथकि मध्य में नगेन्द्र रहा है । सूर्य मरिखा निर्मर कहा है ॥ इत्यादि लक्ष्मी से अनेक वरणा । दिन कर सम ज्योति मनहरणा ॥१३॥ सुदंसणंस्से य जसो गिरिस्स । पयुचइ मदनो पव्ययस्स। गतोयमे,समण नायपुत्ते । जानी जसोदसण नाणसीला?? सुदर्शन पर्वत सर्व गिरी में । कहा है यडा मर्व गिरी सिर्ग में ! यह ओपमा साधु श्री महावीर जाति या ज्ञान दर्शन गीर सिरे ॥ १४ ॥ गिरि बरेवा निसहाय गाणाम्ययेव सेहे वलयायताण । तओवर्म से जग भइ पन्नामुणीण मझे तमुदाष्ट्र पन्ने ॥ १५ ( भांवर स्तुति) म्यगिरी में निपध श्रेष्ट जागो । गोळे गिरी में रूचक को वखाणा॥ ह ऑपमा जगभे दोष बुद्धिवंत । मुनियों में वीर महाबुद्धि मन्त ॥ १५ ॥ नणुसरं धम्म मुहरहत्ता । अणुतरं झाण घरं झियाई । उसु सुई अपगन्ट मुशासविन्दु वेगंतच दान सुझा१६ से उत्तम धर्म को उच्चारा 1 सर्व उत्तम ध्यान को धारा ।। ज्यल से उम्बल अतिही उज्यल। शंख दूध चन्द्रमा से अति मिल ॥ १६ ॥ नगुंतरंग्ग परमं महेसी । असेस कम्मं सचिसोह इला । सद्धिंगत साइ मत पत्तानाणेण सीलेण यदसणेणार वि मुनियों में प्रधान महा मुनि । निर्मळ हुवे सब कर्म रज धुनि ।। पद्धहो शाधत अनन्त युबपाया। ज्ञान दर्शनले चारित्र से सिधाया ।।१७।। बाव मुणायजह सामलीया । जसीरति वेदयन्ति सुवन्ना गणेसु चाणंदण माह सट्टामाणेण सीलेण यति पाने।।१८ हों में उत्तम गामली जाना । उमपे सुवर्ण कुमार रहा मुरष मानो । नों में श्रेष्ट नंदन वनको बसानो ज्ञान लि. महाबुद्धि त्यो वृद्धपानी।।१८ रणियेव सदाण अणुत्तर चिन्दोव तारण महाणु भावे।। न्धेमु चा चंदन माहु सट्टाएवं मुणीणं अपडिन्न मा॥१९ जीरव शब्द शब्दों में प्रधान । चन्द्र ताराओं में महानुमव ,मान || पुगंध में श्रेष्ट है वावना चन्दन । त्यो वीर मुनियोंमें अप्रति बन्धन १:११ नहा सयंम उदहीण सेंट्टानागेमु या धरणिन्द माह से। वोओदा वा रसये जगन्नातयो पहाणे मुणिय जयन्न ।

(पशामक) ज्यो सयंभुरमण समुद्रों में जेष्ट । धरणिन्द्र नाग कुमारों में श्रेष्ट । इक्षाका रस सब रस में प्रधानो । तप में प्रधान न्या वारमुनि जाना ॥ २० ॥ हत्धीसु परायण माहु णापासीहोमियाण सलिलाणगंगा| पंकवी सुवा गेम्ले घेणु देवाणिव्याण वादी णिहणायपुत्तो२१ हस्तीयों में एरावण कहा श्वामी । मृगाम सिंह नदीमें गहा नाभी ।। पक्षियों में गरुड वेणु देव मोटा। त्यो निर्वाण यादी में सिद्धार्थ बटा ॥२१॥ जोह सुणाए जहा वीससेणापुप्फेट वा जहा अरिविन्द माह। ग्वतःण से? जहा दन्तय इसीण सेट्टै तह पद्धमाणे ॥ २२ जोधा ओं में श्रेष्ट है वासुदेवो । पुष्पों में अरविंद कमल लेबों ।। क्षत्री यों में श्रेष्ट चक्रवर्ती राजा । ऋषियों में श्रेष्ट वृद्धमान झाजा ॥ २२ ॥ दाणाण से अभय प्पयाणाप्तचेस या अणयज्ज घयन्ति। नयेसु वा उत्तम भयेरोलोगुत्तमे समणे नायपुते ॥ २३ । दान में श्रेष्ट अभय को वखाना । मत्य वचनों में भी निद्ययेण माना। तप में उत्तम है ब्रह्मचर्य सूत्र । लोको में उत्तम साधु ज्ञात पुत्र ॥ २३ । ठिइण सेट्टा लवसत्तमावा।सभा सुहम्माव सभाण सेट। निवाण सेहाजहा सव्य धम्पाणिणायपुत्ता परमत्योनार्ण आयुप्प श्रेष्ठ है सर्वार्थ सिद्धका । सभा में मुधर्मा श्रेष्ट मुर रिखका । = मोक्षदाता धर्म सबध में भारी । अन्य नहीं ज्ञात पुत्र सा ज्ञान धारी ॥२४॥ पुढोवमे धुणइ विगय गहि । न सणिहिं फुयद आसूपन्न। नरितु समुदंच महाभयो ।अभयं फरे वीर अणन्त चम्म पृथ्वी पर देह ममत्त्व त्यागी । दीप प्रज्ञी अगदी वीनरागी।

(श्रीवीर स्तुति )
तोरे समुद्र महा भवोध रूप । अनन्त चक्षु अमय को चीर भूप ॥२५॥
कोहंच माणच तहेव मायं । लाभ घउत्थं अझत्य दोसा ॥
आणीयंता अरहा महेसी॥ण कुव्यइ पाव ण कारयेइ।।२६
तैसही क्रोध मान और माया। लोभ चौथा आदि आत्म दोषी पाया ।
सर्व को खपा हुवे बह महा ऋपिन कर करावे पाप न धरे खुगी ।। २६ ॥
"किरिया किरियं वेणझ्याणु वायं ।
अणाणी याण पडियच्च ठाणं॥
सेसव्य वार्य इतिवेय इत्ताउवठीए संजम दी रायं ॥ २७॥
किरीया अकिरयिा विनय अन्नानी। चारों कुवादि दुर्गति दाता आनी ।
उन सब वादीको जान के छोडाअही निश मंयम में त्रियोग जोडे ॥२७॥
से वारिया इत्थी सराइ भनाउवहाणयं दुःकाव खय व्याय
लोगं विदिता आरं पारंचासत्वं पभु वारिया सन्चावारं ।।
वो वीर नारी निशी भक्त त्यागी । दुम्कर करणी से गये दुःख मागी।
लोक परलोक मर जानन हार । प्रभु ने रोके सब आश्रव द्वार ॥ २८ ॥
सोचाय धम्मं अरहंत भासियोसमाहितं अट्ठ पदो विशुद्धं।
नं सहहन्ताजणा अगााइन्देवदेवा हिव आग मिस्सति।
तिमी ॥२०॥ इति विरत्थुइझपणं सम्मत्त।
सुना धर्म ऐसे अहंत का फरमायार्थ पाठ शुद्ध सम हित से दर्शाया ।
इमे श्रद्ध कर हुबे अजरा अमर । केइ इंद्र देव हो आगे सिद्धीवर ॥ २९ ॥

(पन्नात्मक)
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4
...
.
.
कळश.
श्री महावीर गुण गणधर फरमये ।।
नस्यानुसार अमोलक ऋषिगाये ॥
अशुद्धि विद्वजन शुद्ध कराई ॥
पढते सूनने मङ्गल होवे सादाई ॥ १ ॥
॥ इति श्री महावीर स्तुति प्रद्यात्मक समाप्तम् ।।
पंच महव्यय सुन्वय मूलासमणा मणाइल साह सुचिन्न।
घर वरामण पन्जवसाणासन्य समुह महोदधितित्थं ॥१॥
पांची महावत सब सूबत मूल । श्रावक के बारह व्रत अनुकूल ॥
व विरोध परिणामों से समाये । वे सब जगोदर्धाका अंत पाये ॥१
नित्थं करे हिं मुदसिय मग्गं ।
नरगतिरिक्स्व विवन्जिय मग्ग।
सव्य पवित्तं सुनिम्मिय सारं ।
सिद्धि विमाणं अवगुय दारं ॥२॥
तीर्थ कारों ने अच्छा उपदेशा मार्ग । टालेय दुर्गति तिर्थच नग ।।
मर्व से पवित्र सर्व का सार : सिद्ध गति के खुल्ले किये द्वारा॥ २ ॥
देय नरिन्द नमसिय पूयं ।
सव्य जगुत्तम मंगल मग्गं ।।
दूदरी संगुण नायक मेगं ।
मोग्य पहस्स चडिंसंग भूयं ॥ ३ ॥
देवेंद्र नरेंद्र नमे उस नरको । सर्व जगोत्तम मार्ग आचर को ॥
यह धर्म अपार गुणी ज्यों असमानामातम मोक्षमार्ग मुगट समान ॥ ६ ॥

113 - - (बाधार स्तात) श्रीनमि पवज्या अध्ययन चाकण देवलोगाओ। उपचन्नी माणुसम्मि लोगमिा उयसन्न माहणि ज्यो । सर पारणियं जाई....॥ ९ ॥ चवकर दवलोक में आये । मनुष्य लोक में जन्मज पाये ।। मोदणीय कर्म उपममाय । जाति स्मरण ज्ञान प्रगटाये ॥१॥ जाई सारनु भयवं । सह संयुद्धो अगुजरे धम्मे ॥ पुत्तं उपितु रज्जे अभिषिक्त्रमई नमि राया ॥२॥ जातिम्मरण पाकर भगवंत । धर्म प्रधान, स्वयमेव समझत. पुत्र राज पर स्थापन कीना | नमी रायजी संयम लीना ॥२॥ सो देव लोग सरिसे। अन्लेउर वरगओ रे भौए। भुजित्तु ननिराया । युदो भोगे परिच्चयई ॥ ३ ॥ जिन के 4 देव लोक संमान | अन्तेउर वर्ग भोग प्रधान । भोगवते थे उसे नमिराय तत्त्वज्ञ बन दिय छिटकाय ॥३, महिल सपुर जणवयं । बल मारोहच परियणं सत्यं । चिच्चा अभित्रिकवता । गत मीहष्टिी भय ॥ जनपद देश युत मिथिला नगरी । परिवार सेना सब अन्डरी रोड के निकले वन में गये एकान्त में स्थिर भगवंत रये ॥४॥ कोलाहलगभूयं । आसी मिहिलाइ पत्र्यंयंत्तम्मि। नइया सपरिसिम्मिानमिम्मि अभिीनखमतस्मि५ कालल भून शब्दज मया । दीक्षा काज मिथिला पुरी मंया उस वक्त ने राय ऋषि । नमिनी निकल गये होखुपि । " । ( पद्यात्मक) अभूहि रायरिसिं । पयज्जा ठाणमुत्तमं । सको माहण रूपेण । इमं वयण मन्बी॥६॥ राजरुपि सावधान भये । दीक्षा के उत्तभ स्थान रये ।। शकेंद्र ब्राह्मणका रूप धर । करने लगे प्रश्न इसपर ॥६॥ किन्नु भो अज्ज मिहिलाए । कोलाहलग संकुला ॥ सुच्चति दारुणा सदा । पामाए सुगिहमु अ॥ ७ ॥ अहो किसलिय आज मिथिला माही । कोलाहल व्याकुल भयाइ ।। दारूण शब्द यह रहे मुनाइ । प्रशाद गृह इत्यादि ठाइ ॥ ७ पअमदं निसाभित्ता हेड कारण चोइ ओ ।। तओनमि रायरिसी। देविन्दं इणमव्यवी ॥८॥ उक्त प्रकार से अर्थ सुनी । हेतु कारण से प्रेरित बनी । उसही वक्त नमि ऋपि राय । देवेन्द्र से यो दरशाय ॥ मिहिलाए चेइए पच्छे । सीअच्छाए मणोरमे। पत्त्त पुष्फ फलोवेए । यहणं यह गुणे सया ॥ ९ ॥ मिथिला के वन मे था वृक्ष । शीतल छाय मनोरम रक्ष । पत्र पूष्प फल से उपपेत । बहु पक्षी आश्रय गुणशेत ॥९॥ वाएणं हीरमणम्मि । चेइअम्मि मणोरम । दुहिआ असरणा अना। एए कंदाति भोग्वगा॥१०॥ वायु वेग से स्थिल थाय । बन का मनोरम वृक्ष गिराय ॥ दुःखी अशरण आतंरंत । भो ! इन्द्र ये पक्षी आरंडत ॥ १० ॥ प्यम निसामिला । हेऊ कारण चोई ओ ।। तओ नमीरापरिसिं । देविंन्दी इण मन्ची ।। ११ ॥ ८॥ - ।

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(श्रीवीर स्तुति)
उक्त प्रकार से अर्थ मुनी । हेतु कारण से प्रेरित बनी ।
उसही वक्त नमिऋषि राय । को देविन्द्र यो दरमाय ।। ११ ।।
स अग्गि अवाज अ। एडज्झइ मंदिरं॥
भयवं अंतउर तणं। कीसणं नाय पिक्सह ।। १२ ।।
यह अमि और
वायु प्रयोग । ये मंदिरादि बने यही भोग।
अहो भगवं अन्नपुर तुझारो । क्यों नहीं आप नयन निहारो ॥ १२
अम निसामिता । हेऊ कारण चोई ओ ।
नआ नमीरायरिसी । देविन्दं इणमध्यवी ।। १३ ॥
उक्त प्रकार से अर्थ सुनी । हेतु कारण से प्रेरित बनी।
उसही वक्त नमिऋपि गय । देविन्द्र से यो दरगाय ॥१३॥
मुहं यसामो जीवामी। जेसी मो नत्धिचिणं ॥
मिहिलाए डझमाणीए । नमे डनडे किंचणं ॥ १४ ॥
मुख में यमने जाय है हम | उस में नहीं मैरी किंचित रकम ।।
मिथिला नगरी याह जो जले | उस में मेरा किंचित नहीं वले ॥ ११ ॥
उत्त पुत्त कलत्तस्सा निव्याचारस भिक्खुणो ।
पिनविनपकिंचि। अप्पियं पि न विजए ॥१५॥
मैन पुत्र कला त्याग । सब व्यापार विन साधु सागे ।
प्रियकारी तय किंचित नाही | अप्रिय कारी मी नहीं कांही ॥ १५ ॥
यहरखु मुणिणों मई । अगगारस्स भिक्खुणो।।
सव्व आ विप्प मुस्स । गतं मणुपस्स ओ॥१६॥
बहुत मुखी साधूनी रहते । घर रहित भिक्षुक हैं में ते॥
सर्व परिग्रह गहित भया । एकान्न आरम सुख देख रया ॥१६॥

पाम्मा. . । एअम निसामित्ता । हेऊ कारण चोड ओ। नओ नामि रायसिसि । देविन्दा इण मन्यवी ॥१७॥ उक्त प्रकार से अर्थ सुनी हेतु कारण से प्रेरिन वनी ॥ उसही वक्त नमिपि राय । को दविन्द्र यो दरशाय ॥ १७ ॥: : .. पगारं कारहत्ताणं । गोपुरवा लगाणि ओ॥ ओसूलग संयग्धीओ। तओ गच्छसि ग्वात्तिआ । १८॥ नगर चौ और किल्ला बन्धाय । दरखन्ने रु झरोख लगाय॥ चा और खाद सत्पनी स्थाप ! पीछे दीक्षा लेना आप ॥ १८ ॥ एवमझु निसामित्ता । हेऊ कारण चोइ ओ॥ नओ नमिरायरिसी। देविन्दं इणमन्धी ॥ १० ॥ उक्त प्रकार से अर्थ सुनी । हेतु कारण से प्रेरित बनी ॥ उसही वक्त नमिऋषि राय । देविन्द्र से यो दरशाय ॥ १९ ॥ सद्धं च नगरं किच्चा । नव ,संबर मंगलं। खंती निऊण पगारं । तिगुतं दुप्पधं सम् ॥ २० ॥ श्रद्धा रूप तो नगर बनाया । तप सम्बर; आर्गल लगाया क्षमा रूप मजबूत है कोट ! तीन गुप्ति गुप्त न लगे चोट ॥ २० ॥ घणुं परमं किच्चा । जीवंच इरि सया ॥ घिई च केअणं किच्चा। सचगं पलि मया ॥२१॥ धर्म में पराक्रम रूपी धनुष्य । इया समिति जीवा प्रकर्ष । धैर्य रूपी मूट लगाई । सत्य रूप बन्धन से बन्धाइ ॥ २१॥ नव नाराय जुत्तेणं । भितणं कम्म कंचुअं॥ मुणि विगय संगामी । भवाओ परि मुच्चड़ ॥ २२॥ . . द , 4 ( श्रीमहावार स्तुति) अभ्यन्तर तप बाग सहित भेदे करें शत्रु.खचित ॥, मुनि ने तमा द्रव्य संग्राम भवसे :अम से, पाये,विराम, ॥ २२॥ पाम निसामिता. हे कारण चोइओ।। नओ नाम रायरिति । देविंदो इणमम्मवी ॥ २३ ॥ उक्त प्रकार से अर्थ सुनी हेतु कारण से मेरित बनी। उसही वक्त नमिऋषि राय को देविन्द्र या दरशाय ॥ २३ ॥ पासाए कारइताण । यद्धमाण गिहाणि अ॥ बालग्ग पोइ आ आ आत ओगच्छसि ग्वस्ति आ॥२४॥ विविध प्रकारे महल बनाय । युद्धमान गृह मी कराय । वायु जल भुवन सजाय । फिर दीक्षा लो क्षत्री राय ॥ २४ ॥.. एअ म निसामित्ता। हेऊ कारण चोइ ओ तओ नाम रायरिसी। देविंदं इण मव्यवी ॥ २५ ॥ उक्त प्रकार से अर्थ मुनी ! हेतु कारण से प्रेरित बनी। उसही वक्त नमिपि राय । देविन्द्र को यो दरशाय ॥२५॥ संसयं ग्बल सो कुण्ड । जो मांगे कुणइ घरं ।। जत्धेय गंतुमिमातिय कुयिन सासायं ।। २६ ॥ जिस को जाने का संशय होय । रस्ते में घर करता सोय ।। जो जानेको इच्छे नर । वहां करे यह शाश्वत घर ॥ २६ ॥ पअमह निसामित्ता. हे कारण चोइ ओ । तओ नमिराय रिसिं । देविन्दो हणमव्ययी ॥ २७॥ • उक्त प्रकार से अर्थ मुनी हेतु कारण से प्रेरित थनी ।।.. उसही वक्त नमि अपिरायः को देविन्द्र या.दराय १,२७ ॥१, - " -14 ( पद्यामक) मोसे लोमहारे अ । गंठी भेग अतकर ॥ गरस्स बम काऊगं- नओ गच्छसि बत्तिया ॥ २८ कार ठग लटारे ताई 'ग्रन्थी छेदक चोरों नशाइ । गर देश में क्षेम वरताय । फिर दीसा लो क्षत्रीराय ॥ २८॥" अमझु निसमित्ता । हेऊ कारण चोइ ओ ।। आ नमी रायरिसी। देविन्द इगमव्यवी।। २९॥ उक्त प्रकारसे अर्थ सुनी । हेतु कारण से, प्रेरित बनी । सही वक्त नमि ऋषिगय । देविन्द्र से यो दशराय ॥ २९ ॥ असई तु मगुस्सेहिं । मिच्छा दंडो पजुज्जए । अकारिणोत्थ यज्झंति । मुच्या कारगो जगो॥ ३०॥ संसार में नर अनेकवार । झूठा दंड देते दुःख कार | बाहुकार को दंडित करे । चोरी करता को परिहरे ॥ ३० ॥ अमदं निसामित्ता। हेऊ कारण चोइ ओ । ओ नमि रापरिसिं । देविन्दो इगमव्यवी ॥ ३१ ॥ उक्त प्रकारे अर्थ सुनी । हेतु कारण से प्रेरित वनी ॥ उसही वक्त नमिऋपि राय । को देविन्द्र यो दरशाय ॥३१॥ जे के पथिया तुम्भ । न नमति नराहि वा ॥ चसे ने ठावइत्ताणं, तओ गच्छसि खत्तिआ॥ ३२ ॥ जो जो कोइ राजा तुम.ताय,। अहो नराधिप नम ते नाय॥ उनको पहिले वश में,लाय; फिर दीक्षा लो क्षत्री राय ॥ ३२ ॥ नयम निसमित्ता । हेऊ कारण चोइ ओ॥ तओ नमि रायरिसी। देविंदं इण मव्यवी ॥ ३३ ॥ .

( श्रीमहावीर स्तुति) उक्त प्रकार से अर्थ सुनीहेतु कारण से प्रेरित बनी । उसही वक्त नमि ऋपि राय देविंद से यो दर गार ॥ ३३ ॥ जो सहस्सां सहस्साणं। संगामे दुज्जा जिणे ॥ पगं जिणिज्ज अप्पाणं रस से परमो जओ ॥ ३४ ॥ जो दश लक्ष मुभटो भणी। दुर्जय को जीते, एक धणी । एक जीते निजात्म ताय । परम जयवंत वही कहाय 1.३४॥ अप्पाण मेव जुज्झाहि । किं ते जुज्रेण यज्झओ ॥ अप्पाण मय अप्पाणं. जदत्ता सुमेहा ॥ ३२ ॥ निजाल में कर संग्राम । अन्य से लड़ने का क्या काम । शुद्धात्म अशुद्धात्ममे लडे । जीते के मुख मुक्ति के वरें। ३५ ॥ पबिदियाण कोहं माणं मागं नहेब लोहं च ॥ दुज्जयं चेव अप्पाणं । सन्धमप्पे जिए जि॥ ३६॥ पांचों इन्द्रिय कोच के संग । मान माया लोम से जंग || दुर्जय अपने ए शत्रु जब जीत उसने जीत रिपु सर्व ॥ ३६॥ एयम निसामेत्ता । हेऊ कारण चोइ ओ। तओ नाम रायरिसिं । देविंदो इण मव्यपी ॥३७॥ उक्त प्रकार से अर्थ सुनी । हेतु कारण से प्रेरित बनो उसही वक्त नमि ऋषिराय । को देविन्द्र यो दरमाय । ३. जइत्ता विउले जपणे । भोदत्ता समण माहणे ॥ दचा भुच्चा य हाय तओ गच्छसि बलि आ॥३. विविध प्रकार के यन्त्र कराय । सन्यासी ब्राह्मण जिमाय । देकर दान भोगय के भोग । फिर क्षेत्रांगेज लेना गो " (पान्मक) अमट्ट निसाामत्ता। देऊ कारण चोइ ओ ॥ नओ नमी रायरिसी दिविन्दं इण मृबवी॥ ३९ ॥ उक्त प्रकारसे अर्थ सुनी । हेतु कारण से प्रेरित बनी ॥: ... , उमही वक्त नमिऋषि रय । देविन्द्र से यो दरशाय ॥ ३९ ॥ जो सहस्सां सहस्साणं । मासे मासे गवं दए । नस्सावि संजमो से ओ। अदितस्सवि किंचणं ॥ ४० जो दस दस लक्ष गाय के तांय ' महिने महिने दान दिराय ॥ : उसको भी संयम श्रेयकार 1 न दे उस मी थेय संयम मार ॥:४०.! पयम निसामिसामिा । हेड कारण चोइ ओ॥ नओनर्मि रायरिसी। देविन्दो इण मध्यवो॥४१॥ उक्त प्रकार से अर्थ सुनी । हेतु कारण से प्रेरित बनी ॥ उसही वक्त नमिऋषि गय । को देचिन्द्र यो दिरशाय ॥-४१.०५: घोरासमं चइत्ता णं । अन्नं पत्धेसि आसमं॥ इहेच पोसह रओ। भवाहि मणुआ हिना ॥ ४२॥ दुष्कर ग्रहस्थाश्रम को छोड । चारित्राश्रम लेने की कोड : .. घर में रही पोपधादि ठाय । अहो नृपति मनो यही वाय ॥ ४२. । एअमलृ निसामित्ता। हेऊ कारणं चोइ ओ। नओ नमी रायरिसी । देविन्दं इणमव्यवी ॥४३॥ . उक्त प्रकार से अर्थ सुनी ! हेतु कारण से प्रेरित बनी। उसही वक्त नमि ऋषिराय 1.को देविन्द्र यो दरशाय ११४३॥ : मामे मासे उ जो.यालो । कुसग्गेणं तु भंजए । न सो सुअरग्वाय धम्मस्स ।कलं अग्धद सोलसिं॥ १४ ॥ . *

(श्रीमहावीर स्तुति)
१२१
अज्ञानी तप करे भास मास । कुशाग्र जेता पारणे प्रास ॥
संयम धर्म तुल्य नहीं आये । सोलमी कला लायक नहीं थारे ॥ १४ ॥
एअम निसामित्ता। देउ कारण चोइ ओ।।
नओ नमि रायरिसी। देविन्दो इणमव्यवी ॥ ४५॥
उक्त प्रकार से अर्थ सुनी । हेतु कारण से प्रेरित बनी ।।
उसही वक्त नमि ऋषिराय । को देविन्द्र यो दरशाय ॥४५॥
हिरण्णं सुघण्णं मणिमुत्तं । कंसं दुसं च याहणं ।
|कोसं पट्टावइत्ता णं । तओ गच्छसि ग्पत्तिआ ।। ४६ ।।
मणि मोती चांदी और मुवर्ण | धातु वरतन वस्त्र और वाहन ।।
प्रथम इन मे भगे खजाना । अहो क्षत्रीराज फिर तुम जाना ॥ ४६॥
पअमह निसामिना । हं कारण चोइओ।।
नआनमी रायरिसी। देविन्दं इणमयी ॥ १७ ॥
- उक्त प्रकार से अर्थ सुनी हेतु कारण से प्रेरित यनी ।।
उमही वक्त नमिऋपि राय । देविन्द से या दरसाय ॥४७॥
मुबण्ण झप्पस्स पश्वा भवासिआहु केलाससमा असंग्वया।
नरस्स लुदरसन नेहि किंचि।इच्छ हुआगाससमा अणंतिआ।।
सोने रुपे के पर्यंत होय | कमी केलास से असंख्य सोय।
लोभी को देते नहीं तृपताय । तृष्णा अकाशसी अनन्त कहाय ।। ४८॥
पुढवी साली जवाव हिरणं पसूभिस्सह ।।
पडिपुष्णं नाल मंगरस । इइ विज्ज तवंचरे ॥४॥
पृथवी गाल जवादि धान । रूपादिधन पशु भी सब जान ।
सब दिये एक को तृप्ति न करे । ऐसा जान संयम आदरे ॥४॥

( पभारमक) । - । पअमह निसामिता । हेऊ कारण चोइओ। नआनर्मि रायसिस । देविन्दो इणमव्यवी ॥ ५० ॥ उक्त प्रकार से अर्थ मुनी । हेतु कारण से प्ररित बनी। उसही वक्त नमि ऋषिराय ! को देविन्द्र यो दरसाय ॥५०॥ अच्छेरगम भुदए । मोए चयसि पत्थिया असंत कामे पत्थेसि । मंकप्पेण विहष्णसि ॥५१॥ अहो मुझ भूपति आश्चर्य आय , अद्भुत भोगों को तजी के जाया. अन होते भोग इच्छा करी । संकल्प से रखे हानी हो तरी ॥ ५१ । एयम निसामित्ता। हेउ कारण चौइ । ननमीरायरिसी । दविन्दं इणमव्यवी ॥ ५२ ॥ उक्त प्रकार से अर्थ सुनी । हेतुं कारण से प्रेरित वनी ॥ उसही वक्त नमि ऋपिराय । देविन्द्र से या फरमाय ॥ ५२ ॥ सहं कामा विसं कामा । कामा आसी विसोवमा ॥ कामे पत्थे माणा । अकामा जति दुग्गई ॥ ५३ ॥ काम भोग शल्य विप समान । आसी विष अही की उपमान । काम भांग की इच्छा करे । विन भोगे ही दुर्गति में पडे ॥ ५३॥ अहवयइ कोहेणं । माणेणं अहमागइ ।। माया गइपडिग्या ओ! लोहा ओ दुह् ओ भयं ॥ ५४ ।। नीची गति में क्रोध से जाय । मान अधर्म गति में ले जाय ॥ माया से उत्तम गति का नाम । लोभ से दोनों भव में त्रास ॥ ५४ ॥ अव उझिजण मादण रूचं । विउरू विजण इंदचं । बंदद अभिन्धुणं नो । इमाहिं महुराहि यग्गृहि ॥ ५५ ॥ - .

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( श्रीमहावीर स्तुति)
त्याग दिया ब्राह्मणाका रूपमा वैकय कर इन्द्र का स्वरूप ।
चंदन कर के स्तुति करे मधुर वचन इसपर उच्चरे ॥५५ ॥
अहो ते निजि ओ कोहो । अहो ने माण पराजिओ ॥
अहो ते निरकिया माया अहो ते लोहो यसीक ओ५६
अहो आश्चर्य तुम जीते:क्रोध आश्चर्य हरा दिया मान योध ॥
अहो आश्चर्य माया दूर हरी । अहो आश्चर्य सृष्णा या करी ॥ ५ ॥
अहो ते अज्जयं साहु अहो ते साहु मद्दयं ॥
अहो ते. उतमा. ग्वनी । अहो ते मुति उत्तमा ५७ ॥
आश्चर्य तुझारी गरलता श्रेष्ठ । आश्चर्य तुमारा मार्दव जेष्ट ',
आश्चर्य तुमरी उत्तम क्षमा । आश्चर्य निलभिता में रमा ॥ ५७
इहसि उत्तमो भंते । पञ्चा होहिसि उलमो ॥
लागुतमत्तम ठाणं सिंहिं गच्छसि नोरओ। ५८.॥
यहां भी उत्तम हो भगवंत । आंग भी उत्तम होवंगे संत ।।
लोकते उत्तमोत्तम स्थान । जावोगे मोक्ष करी कर्म हान ।।५८॥
एवं आभित्युणं तो रायरिसिं उत्तमाइ सदाए ।
पायाहिणं कुणंतो। पुणो पुणो बंदए सको ॥ ५९॥
उक्त प्रकारे स्तुति, करी । राज ऋषि की उत्तम श्रद्धा धरी ।।
प्रदक्षिणा वर्त करता तेह । बारम्बार धकेन्द्र वढे ए ॥ १९ ॥
नो वंपिऊण पाए । चास लावणे,मुनिवरस्स ।।
आगासणप्पड़ ओ । ललिों चंचल कुंडल तिरिडी॥ ६०॥
फिर उभय पद वंदन किए। चकांकुश अंकित मुनि के लिए।
आकाश मार्ग स्वस्थान गये । ललिन कुंडल मुगट चमक रये ॥३०॥

. (पगामा) । नमी नमे अप्पाणं । सरखं सफेण चोह ओ॥ चइऊण गेहं विदेही । समपणे पज्जुवटिओ॥ ६१ ।। नमिराय ऋषि आत्म नमाई ! शक प्रत्यक्ष प्रेरै चलेना ॥ विदेह देश घर त्यागन करी । शुद्ध चारित्र उद्यम समाचरी ॥ ११ ॥ एवं करिति संबुद्धा । पंडिआ पविअक्ग्वणा ॥ विणियहति भोगेसु । जहासे नमी रायरिसि ।। ६२ ।। इस प्रकार तत्त्वज्ञ करे । पंडित विचक्षण गुण आदरे ॥ काम भाग से निवृत्ती पाय । नमी राज ऋपि ज्यों मुखी थाय ॥ १२ ॥ नमिराज पि गुण जिन कोतस्यानुसार अमोल ऋपिरचे अशुद्धी विज्ञजन लेना सुधार । पढते सुनते होवे मंगलाचार श्री धीराब्द चौवीस सो पच्चावन । चवदश कृष्णा रवी पुष्प श्रावन ।। पांच माधु मुखे रहे चौमास । धुलिया शहर खानदेश खास ।। ६३ ।। सभामा

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Subodh Sangrah

Author
Shri Amolak Rishi
Title
Subodh Sangrah
File name
Subodh Sangrah
Text
OCR done
Citation
1929
Published
2011/03
Publisher
Dhuliya,jain Sadhumargi Sangh
Language
Sanskrit
Pages
132
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
551876
Barcode
4990010032572.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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