Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )
Sanskrit Sopanam Bhag - I
Front matter
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संस्कृतसोपानम्
(प्रथमो भागः
क्षेत्रेशचन्द्र-चट्टोपाध्यायः, एम० ए० (Alld. & Cal.)
प्रयागविश्वविद्यालये
सस्कृताध्यापक,
तथा
रामनरेश-मिश्रः, एम० ए०, साहित्यशास्त्री, साहित्याचार्यः,
लक्नी-कलविन्-तालूकदार-हाई-स्कूले सस्कृताध्यापकः
इत्येताभ्या सकलितम्
इंडियनप्रेस-लिमिटेड-प्रयागे मुद्रितम्
१६४४
मूल्यम् ।।
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PREFACE In offering two Readers for use in the schools of these provinces for the beginners in Sanskrit, I beg to point out that I have strictly followed the new syllabus of the Intermediate Board in compiling the books According to the new syllabus Sanskrit teaching will commence at Standard VII instead of Standard VI and as such the boys will have to be given a good grounding in Sanskrit in two years The change made by the Committee 18 for the better, as by commencing to learn a difficult language a year later they will be able to understand it better and consequently their progress will be more rapid It will be found that all the reading lessons the books contain are classical pieces A word by way of explanation may be said heie why the beaten track has not been followed When I joined the Allahabad University as a teacher of Sanskrit a few years ago, I found the students using Hindi expressions in their composition On my challenging them they referred me to text-books which they read in their schools Right or wrong, anything seen in print in a text-book is taken by the boys to be absolutely correct As such the responsibility of a text-book writer is very great Unless author a master of the language in which he writes, he should not include his own compositions in a book A number of passages may be quoted as instances of bad grammar and composition from the text-books in use Although there is no dearth of authors who write faultless Sanskrit, once permission is given to insert original compositions into text-books, authors qualified and unqualified will come forward with their writings, and it may so happen that some of the books prescribed will have faulty passages which the Text-Book Committee would not like an 1S (9) The P 1 For the reasons stated above, I have drawn all th reading lessons from the classical works work of compiling was done by my pupil Pt Ramana Miśra, MA, but I revised, altered and rewrote passa, wherever necessary In the few reading lessons given i the Praveśikā of Part I, many short sentences had to b newly composed because at this stage it is impossible f the young learners to understand the difficult senten from a standard work But here too I have taken spec care to quote sentences from standard works wherev possible Matter for the reading lessons in the Pāthāvalı have been all taken from the Hitopadeśa, the Pañcatantra and the Purusaparīkşā but I have tried to simplify passages which seemed to be difficult for the beginners I have almost always avoided sandhı at the beginning, but still I insist on the careful teaching of the rules of sandhi to the students at a very early stage and have myself appended to the lessons searching questions on sandhı, along with other grammatical questions I lay emphasis on the critical questions which are meant for enabling the students to · converse in simple Sanskrit; as required by the syllabus. The teachers may add freely to these questions No attempt has been made to show learning in these books to confound the boys Simple and clear expressions have throughout been used to help the young learners Such matter as the student is expected to learn in the grammar of his own language has not been touched in the book Grammar has been explained in Hindi, which is the medium of instruction in most of the UP schools But if any school, which teaches through some other medium, likes to use these Readers, the teacher should explain the rules in the language of the student 30th March, 1930 University of Allahabad KSHETRESACHANDRA CHATTOPĀDHYAYA सूचीपत्रम - प्रवेशकः -) पाठः पृष्ठम् १ २ प्रथमः पाठः वर्णमाला वोच्चारणस्थानानि द्वितीयः पाठः तृतीयः पाठ चतुर्थ पाठः पञ्चम. पाठः षष्ठः पाठः पाठावली . in a sua पाठः पृष्ठम् १८ . २२ विषयः १-पथिक-व्याघ्र-कथा २-गर्दभ-शृगाल-कथा ३-त्रयाणां मत्स्यानां कथा ४-बक-कुलोरक-कथा ५-व्याघ्रचर्मावृतगर्दभ-कथा ६-मुनि-मूषक-कथा ७-राज-वानर-कथा ८-जामात-चतुष्टय-कथा ९-कुक्कुरनादेभ-कथा १०-शृगाल-दुन्दुभि-कथा ... २४ .. २५ २६ २७ २८ :
( च ) पाठः पृष्ठम् : : ३ ३२ ३३ ३५ ३६ ३८ ३९ ४२ . पृष्ठम् विषयः ११--सिह-मूपक-विडाल-कथा १२-ब्राह्मण-नकुल-कृष्णसर्प-कथा १३- घण्टा-वानर-कथा १४-ब्राह्मण-कर्कट-कथा १५-मूर्योपदेश-फलम् १६-मूषकभक्षितलौहतुला-कथा १७-सिह-शश-कथा व्याकरणम् विषयः सन्धिः अच्सन्धिः हल्सन्धिः विसर्गसन्धिः शब्दरूपाणि पुलिङ्गशब्दरूपाणि स्त्रीलिङ्गशब्दरूपाणि नप्सलिङ्गशब्दरूपाणि सर्वनामशब्दरूपाणि सख्यावाचकाः शब्दाः धातुरूपाणि परस्मैपदिनो धातवः आत्मनेपदिनो धातव. १ .. ... २ w ... १० . १५ २० २४ ३७ ३९ ५० प्रवेशकः
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प्रथमः पाठः
वर्णमाला
प्र, ह.
।
ऋ, लु, इनको हस्व स्वर कहते है।
श्रा, ई, उ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ, इनको"दोर्घ स्वर
कहते है।
अ से औ तक अच् या स्वर कहलाते है।
क, ख, ग, घ, डकवर्ग
च, छ, ज, झ, बचवर्ग
ट, ठ, ड, ढ, ण-टवर्ग क से म तक स्पर्श वर्ण
कहलाते है
त, थ, द, ध, न तवर्ग
प, फ, ब, भ, म पवर्ग
1
य र ल
व-अन्तःस्थ
श ष स ह% ऊष्म
क सं ह तक हल या व्यञ्जन कहलाते है।
= अनुस्वार
विसर्ग
F
श
स
( २ )
যাহাজানানি
श्र, श्रा, कवर्ग, ह, विसर्ग कण्ठ
इ, ई, चवर्ग, य,
तालु
स, ऋ, टवर्ग, र, प - मूर्धा
लु, तवर्ग, ल,
दन्त
उ, ऊ,
पवर्ग
श्रोष्ठ
ड, म, ण, न, म -नासिका और यथाक्रम से पूर्वकथित
कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त और श्रोष्ठ
- कण्ठ और तालु
श्रो, औ -कण्ठ और पोष्ट
-दन्त और पोष्ट
(अनुस्वार)= नासिका
।
व
( ३ )
द्वितीयः पाठः
सस्कृत मे शब्द के तीन वचन होते हैं-एकवचन, द्विवचन
और बहुवचन। जब दो वस्तु हो तव द्विवचन का प्रयोग होता
है, दो से अधिक मे बहुवचन लगता है। सज्ञा, विशेषण और
सर्वनाम मे लिङ्ग भी तीन होते है, पुलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और
नपुसकलिङ्ग।
पुंलिङ्ग
स्त्रीलिङ्ग
नपुंसकलिङ्ग
एका बालिका । एक पुस्तकम् ।
द्विवचन द्वौ वालकौ । वालिके । द्वे पुस्तके ।
बहुवचन त्रयः बालका.। तिनः बालिकाः। त्रीणि पुस्तकानि ।
भागीरथीतीरम् । वाराणसीनगरम् । सुन्दरः अश्वः ।
कपिला गौः। महान् राजा । देशभक्तिः। विद्यालाभः ।
सुखप्राप्तिः। कन्दुकक्रीडा । प्रकृष्टा बुद्धिः। कृषिकर्म ।
व्योमयानम् । वाष्पीयरथः । द्रुता गतिः ।।
एकवचन
एक:
बालकः ।
( ४ ) तृतीयः पाठः क्रिया में भी तीन वचन होते हैं, और हिन्दी की तरह तीन ही पुरुष होते हैं, प्रथमपुरुष, मध्यमपुरुष और उत्तमपुरुष; अपने लिए उत्तमपुरुष, जिससे कुछ कहा जाता है उसके लिए मध्यम- पुरुष और तीसरे के लिए प्रथमपुरुप । 'आप' या 'तुम' के अर्थ मे संस्कृत मे 'भवत्' शब्द का भी प्रयोग होता है जिसके साथ क्रिया प्रथमपुरुष में आती है, मध्यमपुरुष मे नहीं। त्वम्' प्रभृति 'युष्मत्' शब्द के रूप के योग से मध्यमपुरुष ही होता है। क्रिया मे लिग का कोई भेद नही होता है। एकवचन पठ-पढ़ना द्विवचन बहुवचन प्रथमपुरुष सः पठति । तौ पठता । ते पठन्ति । मध्यमपुरुष त्वं पठसि । युवां पठथः । यूयं पठथ । उत्तमपुरुष श्रह पठामि । श्रावां पठावः । वयं पठामः । नदी वहति । कोकिलः गायति । चन्द्रः उदेति । शोभा विद्यते । विद्यार्थी पठति । अहं गच्छामि । दरिद्रः भिक्षते । द्वौ बालको क्रीडतः । बहवः वीराः युध्यन्ति । दृद्धा माता भोजयति । दुःखी रोदिति । अपि कुशलं वर्तते ? कथं त्वं न आगच्छसि ? यूयं सुखिनः स्थ । भवान् उच्चैः भाषते ।
( ५ ) चतुर्थः पाठः संस्कृत शब्दो के छः कारक होते है। (१) कर्ता, (२) कर्म, (३) करण, (४) संप्रदान, (५) अपादान, (६) अधिकरण। कर्ता और कर्म प्रसिद्ध हैं। जिससे कुछ कार्य सिद्ध किया जाता है वह करण है, जैसे कुल्हाड़ी से लकडी काटी जाय तो कुल्हाडी करण है। जिसको कुछ दिया जाता है या जिसके लिए कुछ कार्य किया जाता है, वह संप्रदान है। जैसे, दाता भिक्षु को धन देता हो या राजा के लिए सिपाही लड़ते हो, तो भिक्षु या राजा सप्रदान है। जहाँ से कोई वस्तु चली आती है वह अपादान है; जैसे, वृक्ष से अगर फल नीचे गिरता हो, तो वृक्ष अपादान है। जिसमे कोई वस्तु रहती है उस आधार को अधिकरण कहते है; जैसे, जमीन मे घड़ा है तो जमीन अधिकरण होगा। कर्त्ता से लेकर अपादान तक पाँच कारको मे प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, तथा पञ्चमी, ये विभ- क्तियाँ होती है। और अधिकरण मे सप्तमी विभक्ति होती है। और सम्बन्ध सामान्य (जैसे 'वृक्ष का फल', 'फूल का रग',) मे पप्टी विभक्ति होती है। विभक्ति माने शब्दरूप या धातुरूप बनाने के लिए शब्द या धातु मे जो प्रत्यय जोड़े जाते है, जैसे सप्रदान मे 'मुझको इस हिन्दी पद मे 'को'। इन प्रथमा प्रभृति सात विभक्तियो की भिन्न भिन्न आकृतियाँ होती है। फिर, हर एक के एकवचन, द्विवचन और बहुवचन मे आकृतिभेद होता है। इस कारण कुल मिलाकर विभक्तियों के २१ रूप होते हैं। सम्बोधन मे रूप प्रथमा की तरह होता , (६ ) है; केवल एकवचन मे कहो कही कुछ अन्तर पड़ता है। सना, विशेषण और मर्वनाम मे ये ७ विभक्तियाँ होती हैं। सर्वनाम में सम्बोधन नहीं होता है। गज= हाथी एकवचन बहुवचन प्रथमा गज. द्विवचन गजो गजी गजाः द्वितीया गजम् गजान् गजे. तृतीया गजेन गजाभ्याम् गजाभ्याम् गजेन्यः चतुर्थी गजाय पन्चमी गजात् गजाभ्याम् गजेभ्यः पष्टी गजस्य गजयो. गजयो सप्तमी गजे गजानाम् गजेपु हे गजाः) (सम्बोधन गज गजी तद् = वह (सर्वनाम) प्रथमा स ती ते तम् तो तान् ते. तेन ताभ्याम् द्वितीया तृतीया चतुर्थी राजचमी तस्म ताभ्याम् तेभ्यः तस्मात् ताभ्याम् तेभ्यः पष्टी तस्य तयोः तयोः तेषाम् तेषु सक्षमी तस्मिन् ( ७ ) अस्मद् = मै (सर्वनाम) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रधमा अहम् वयम् माम्, मा श्रावाम् श्रावाम्, नौ आवाभ्याम् अस्मान्, न: अस्माभिः मया द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी मह्यम्, में श्रावाभ्याम्, नौ अस्मभ्यम्, न: मत् अस्मत् षष्ठी मम, मे आवाभ्याम् आवयोः, नौ श्रावयोः अस्माकम्, नः सप्तमी मयि अस्मासु युष्मद् = तुम (सर्वनाम) प्रथमा त्वम् युवाम् यूयम् द्वितीया स्वाम् त्वा युवाम्, वाम् युष्मान, वः युष्माभि स्वया युवाभ्याम् नृतीया चतुर्थी पन्चमी तुभ्यम, ते युचाभ्याम्, वाम् युतमभ्यम्, व स्वत् युष्मत् षष्ठी युवाभ्याग युवचो., वाम् युवयो युप्माकम्, वः तव, ते त्वयि . सप्तमी युष्मासु .
( ८ ) -- पञ्चमः पाठः वालकाः पाठशालायां पठन्ति । गुरूणां सकाशात् ते विद्यां लभन्ते । अहं जानामि विद्या परमं सुखम् इति । विद्यावान् सर्वेषु देशेषु मानं लभते । यस्य विद्या अस्ति तस्य सर्वम् अस्ति । अतः एव विद्यायाः अर्जनं युष्माकं परम कर्तव्यम् । अस्ति गोदावरीतीरे विशालः शाल्मलीतरुः । तत्र पक्षिणः नानादेशेभ्यः आगताः रात्रिसमये निवसन्ति । तेषां मध्ये एकः काकः अस्ति, यस्य नाम लघुपतनक: इति । काकानां शब्दः अतिकठोरः भवति । तस्मिन् कः अपि प्रीति न लभते । यदा अहं भोजनं करोमि, तदा मम माता काकान् तस्मात् स्थानात् अपसारयति । माता पुत्रस्य परमा देवना । पिता अपि तथा एव भवति । मातापित- निदेशे सर्वदा अवस्थातव्यम् । दरिद्राय धनं दातव्यम् । परस्य उपकारः अस्माकं धर्मः। परस्य अपकारः कदा अपि न कर्तव्यः । युष्मभ्यम् एतत् पुस्तकं लिखावः । अवहितेन मनसा एतत् पठनीयम् । बालकाः विद्यालये कश्चित कालं क्रीडन्ति । दीर्घः काष्ठखण्डैः कन्दुकं ताडयन्ति । ते द्वयोः पक्षयोः विभक्ताः
( १ )
भवन्ति । क्रीडास्थानस्य द्वे अर्धे भवतः । एकः पक्षः
एकस्मिन् अर्धे वर्तते, अपरः अन्यतरस्मिन् । प्रत्येकस्य
अर्धस्य अन्ते लक्ष्यस्थानम्
अस्ति ।
एकपक्षीयाः
बालकाः इच्छन्ति कन्दुकम् अपरपक्षस्य लक्ष्यस्थानं नयामः
इति । अपरपक्षीयाः अपि तथा एव इच्छन्ति । यः पक्षः
अपरपक्षस्य लक्ष्यस्थानं प्रति कन्दुकस्य नयने समर्थः
भवति सः एव जयति । क्रीडा उत्तमः व्यायामः।
व्यायामः शरीरस्य स्वास्थ्याय भवति ।
( १० ) धष्ठः पाठः काल तीन प्रकार के होते है, भूत, वर्तमान और भविष्य । कोई क्रिया कौन काल ( समय ) मे हुई है या वह किस प्रकार की है यह क्रिया को प्राकृति से मालूम होता है। इन भिन्न आकृ- तियों को लकार कहते हैं। सस्कृत दस लकार हैं। उनमें से लट् , लोट् , लङ्, विधिलिड् और लृट् के रूप इस भाग मे दिये मे गये हैं। लट् या वर्तमान-क्रिया वर्तमान काल की है, केवल यह अर्थ प्रकट करने के लिए इस लकार का प्रयोग होता है, जैसे, 'सः गच्छति' (वह जा रहा है), 'सः गृहे वर्तते' (वह घर मे है)। लोट् या अनुज्ञा-यह लकार कोई क्रिया करने के लिए अनुज्ञा या आदेश प्रकाश करता है; जैसे, 'स गच्छतु' (मै आज्ञा देता हूँ कि वह जाय), ‘स गृहे वर्तताम्' (मैं आज्ञा देता हूँ कि वह घर मे हो)। लङ् या अनद्यतनभूत-यह आज न हुई हो, किन्तु पहले किसो दिन हुई हो, ऐसी घटना को प्रकट करता है, जैसे, 'ह्यः सः अगच्छत्' (वह कल गया था ), 'ह्यः स गृहे अवर्तत' (कल वह घर मे था)। भूत या पूर्व काल को क्रिया समझाने के लिए और दो लकार होते हैं, लुङ्ग या सामान्यभूत (जा कि पूर्व की के ( ११ ) किसी घटना के लिए आ सकता है, जैसे, 'राम' राजा अभूत्' रामजी राजा हुए।), और लिट् या परोक्षभूत । लिट् पूर्व काल को केवल उन घटनाओ के लिए आ सकता है, जो कहनेवाले की आँखों के सामने न हुई हो; जैसे, 'सः गृह जगाम' ( वह घर गया, पर मैंने उसेजाते नहीं देखा ), 'सः मम जन्मनः प्राक् गृहे ववृते' (मेरे जन्म पहले वह घर पर रहा)। लट् लकारवालो क्रिया मे 'स्म' लगाने से भी अतीत का अर्थ होता है, जैसे, 'सः गच्छति स्म' (वह गया था)। विधिलिड्-कोई कार्य किया जाय इस इच्छा को प्रकाश करने के लिए इस लकार का प्रयोग होता है, जैसे, 'सः गृह गच्छेत्' (मै चाहता हूँ कि वह घर जाय, या उसे घर जाना चाहिए), 'स गृहे वर्तेत' (मैचाहता हूँ कि वह घर पर हो, या उसे चाहिए कि वह घर पर हो)। लृट् या सामान्य भविष्य-कोई क्रिया भविष्यत्काल में होगी, यह समझाने के लिए इस लकार का प्रयोग होता है, जैसे, 'सः गृह गमिष्यति' (वह घर जायगा), 'तस्य पुत्रः जनिष्यते' (उसका पुत्र होगा)। आगे की पाठावली मे लट, लोट्, ला, विधिलिङ् और तट लकार ही की क्रियायें मिलेंगी, दूसरे लकार की नहीं। परन्तु लिट के भी कुछ रूप हैं। इन लकारों में प्रत्यय कैसे लगते हैं, सो व्याकरण-भाग में मिलेगे। धातु दो प्रकार के होते हैं, परस्मैपदी और आत्मने-
The
.
( १२ )
पदी। परस्मैपदी धातुओ के लिए लकारो के रूप एक तरह के
है और आत्मनेपदी धातुओ के लिए कुछ और तरह के है।
कोई धातु (जैसे गम् =जाना, पठ = पढ़ना) परस्मैपदी होते है,
कोई आत्मनेपदी (जैसे वृत्-होना, जन् = पैदा होना) और कोई
उभयपदी अर्थात् दोनो रूप के ( जैसे ब्र = बोलना)। इनको
आकृतियाँ व्याकरण-भाग मे मिलेगी।
: कोई क्रिया होने के बाद दूसरी क्रिया हुई है, या हो रही है,
या होगी, यह अर्थ जब प्रकाश करना होगा, तब प्रथम क्रिया के
धातु मे लकार का प्रत्यय न लगाकर 'त्वाच् (त्वा )' प्रत्यय
लगाया जाता है, जैसे, 'सः गृह गत्वा भक्षयति' (वह घर जाकर
खाता है)।
धातु के पहले किसी समय प्र, परा, आ, आदि शब्द जोड
दिये जाते है जिससे प्रायः धातु के अर्थ मे कुछ परिवर्तन हो
जाता है; जैसे 'गम्' के माने 'जाना' और 'पागम्' के माने
'आना', 'उप-गम्' के माने 'किसी के सामने हाज़िर होना।
जब किसी धातु के पहले उपसर्ग हो, तब पूर्व-कथित अर्थ
मे 'त्वाच्' प्रत्यय न लगकर 'ल्यप् (य) प्रत्यय लगता है; जैसे,
'सः गृहम् आगम्य ('आगत्वा' नहीं) भक्षयति' (वह घर आकर
खाता है)।
धातु दो प्रकार के होते हैं, सकर्मक (जैसे, गम् =जाना,
प्रह-लेना) और अकर्मक (जैसे, अस् - होना, शी-
लेटना)।
,
( १३ ) हिन्दी की तरह सस्कृत में भी सकर्मक धातु कर्तृवाच्य और कर्मवाच्य में होते हैं। कर्तृवाच्य, यथा-'सः शत्रु हन्ति' (वह शत्रु को मारता है), 'सः शत्रु हतवान्' (उसने शत्रु को मारा)। कर्मवाच्य, यथा-'तेन शत्रुः हन्यते' (उससे शत्रु मारा जाता है ), 'तेन शत्रुः हत' (उससे शत्रु मारा गया)। इनके अतिरिक्त एक भाववाच्य भी है, जिससे कर्तृवाच्य की तरह कर्ता का प्राधान्य नहीं है, और न कर्मवाच्य को तरह कर्म का, किन्तु केवल क्रिया का अर्थ प्रधान होता है, जैसे, 'तेन स्थीयते' ( उनसे रहना हो रहा है)। भाववाच्य तभी होता है जब धातु अकर्मक है या सकर्मक होने पर भी वक्ता कर्म को विवक्षा नहीं करता है, इन स्थाना मे कर्तृवाच्य भी होता है।
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पाठावली
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(१) प्रथमः पाठः पथिक-व्यान-कथा - एकः वृद्धः व्याघ्रः स्नातः कुशहस्तः सरस्तीरे व्रते, "भाः भोः पान्थाः, इदं सुवर्णकङ्कणं गृह्यताम् ।" ततः लोभाकृष्टेन केनचित् पान्थेन आलोचितम् , “भाग्येन एतत् अपि संभवति । किंतु अस्मिन् अर्थसन्देहे प्रवृत्तिः न विधिः । तत् निरूपयामि तावत् ।" प्रकाश ब्रूते, "क तत् कङ्कणम् ?" व्याघ्रः हस्तं प्रसार्य दर्शयति । पान्थः अवदत्, "कथं त्वयि विश्वासः ?" व्याघ्रः उवाच, "इदानीम् अपि अहं स्नान- शीलः दाता वृद्धः गलितनखदन्तः कथं न विश्वासभूमिः ? मम च एतावान् लोभविरहः येन स्वहस्तगतम् अपि स्वर्ण- कङ्कणं यस्मै कस्मैचित् दातुम् इच्छामि। किंतु व्याघ्रः हि मानुषं खादति इति लोकापवादः दुर्निवारः। तत् अत्र सरसि स्नात्वा सुवर्णकङ्कणं गृहाण ।” इति वचनेन सञ्जात- विश्वासः यावत् असा सरः स्नातुं प्रविशति, तावत् महापङ्के निमग्नः पलायितुम् अक्षमः । तं दृष्ट्वा व्याघ्रः वदति, “हा हा पान्थ, महापङ्के निमग्नः असि। त्वाम् अहम् उत्थापयामि।"
( १८ )
इति अभिधाय शनैः शनैः आगम्य व्याघ्रः तं हस्ते धृतवान्
मारयित्वा खादितवान् च ।।
प्रश्नाः
(१) एषु पदेषु सन्धिः क्रियताम्'-
वृद्ध +व्याघ्रः, पान्थेन + आलोचितम्, भाग्येन + एतत् प्रवृत्तिः +
न, तत् + निरूपयामि, पान्थः + अवदत्, तत् + अन, शनैः+
श्रागम्य।
(२) अन्न सन्धिविच्छेदः क्रियताम्:-
सरस्तीरे, लोभाकृष्टेन, दुर्निवारः।
(३) पान्थ. कथं प्रथमं व्याघ्रात् बिभेति स्म ?
(४) कथं वा तस्य भयापनयन जातम् ?
(५) अपि स व्याघ्रः वस्तुतः विश्वसनीयः आसीत् ?
(२) द्वितीयः पाठः
गर्दभ-शृगाल-कथा
अस्ति कस्मिंश्चिद् अधिष्ठाने मदोद्धतः नाम गर्दभः ।
स दिवा रजकगृहे भारोदइनं कृत्वा रात्रौ स्वेच्छया चरति ।
अथ एकदा तस्य रात्रौ क्षेत्रेषु चरतः केनचित् शृगालेन सार्ध
मैंत्री अभवत् । तौ च वृतिभङ्गं कृत्वा कर्कटिकाक्षेत्रेषु
प्रविश्य तत्फलभक्षणं स्वेच्छया कृत्वा प्रत्यूषे स्वस्थान
व्रजतः।
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range
r
-
1
44
+
1
क्षेत्ररक्षकेण ताड्यमानो गर्दभ.
( १९ ) अथ कदाचित् क्षेत्रमध्यस्थितेन गर्दभेन शृगालः अभि- हितः, "भोः भगिनीसुत, पश्य अतिनिर्मला रजनी। तत् अहं गीतं करोमि । कथय कतमेन रागेण गायामि ॥ स पाह, "माम, किम् अनेन अनर्थप्रचालनेन । चारकर्मप्रवृत्ती आवाम् । चारैः निभृतैः एव स्थातव्यम् । किं च त्वदीयं गीतं शङ्खनादानुवादि, न मधुरम् । दूरात् अपि श्रुत्वा उत्थाय क्षेत्ररक्षका वन्धं वधं च विधास्यन्ति । तत् भक्षय तावत् अमृतरसाः कर्कटिकाः। मा त्वम् अत्र गीतव्यापारपरः भव ।" तत् श्रुत्ला गर्दभः आह, “भोः, वनाश्रयत्वात् त्वं गीतरसं न वेत्सि, तेन एतत् ब्रवीषि " शृगालः ग्राह, "अस्ति एतत् । परं कठोरम् उन्नदसि। तत् किम् अनेन नादेन स्वार्थहानिकारिणा ?" रासभः आह, “धिक, मूर्ख, किम् अहं गीतं न जानामि ? कथम्, भगिनीसुत, माम् अनभिज्ञ वदसि, निवारयसि च ?" शृगालः आह, “माम, यदि एवम्, तत् अहं ऋतिद्वारदेशस्थः क्षेत्ररक्षकम् अव- लोकयामि । त्वं पुनः स्वेच्छया गीतं कुरु ।" तथा अनुष्ठिते गर्दभः शब्दायितुम् आरभत । ततः क्षेत्ररक्षकः गर्दभशब्दं श्रुत्वा क्रोधात् दन्तान् दन्तैः निपीडयन् लगुडम् उद्यम्य प्रधावितः। अथ गर्दभः लगुड- महारैः तथा प्रताडितः यथा भूपृष्ठे पतितः मृतश्च ।।
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( २१ ) भवद्भिः यत् मत्स्यजीविभिः अभिहितम् ? तत् राबावे. गम्यताम् अन्यत् सरः। नूनं प्रभातसमये ने मत्स्यजीविनः अत्र समागम्य मत्स्यनाशं करिष्यन्ति, एतत् मम मनसि वर्तते । तत् न युक्तं साम्प्रतं क्षणम् अपि अत्र अवस्था- तुम् ।” एतत् श्रुत्वा प्रत्युत्पन्नमतिः प्राह, “भोः सत्यम् अभिहितं भवता । ममापि अभीष्टम् एतत् । तत् अन्यत्र गम्यताम् ।" अथ तत् श्रुत्वा उच्चैः विहस्य यद्भविष्यः प्राह, "ह हो न सम्यक मन्त्रित भवस्याम् । किं तेपां वाड- मात्रेण पितृपैतामहिकम् एतत् सरः त्यक्तु युज्यते ? यदि आयुःक्षयः अस्ति तदा अन्यत्र गतानामपि मृत्युः भविष्यति। तत् अहं न यास्यामि । भवद्भ्यां तु यत् रोचते तत् क्रियताम् ।" एवं तस्य तं निश्चयं ज्ञात्वा अनागतविधाता प्रत्युत्पन्न- मतिश्च निष्क्रान्तौ सह परिजनेन । अथ प्रभाते तैः 'मत्स्यजीविभिः जालैः तं जलाशयमालोड्य यद्भविष्येण सह तत् सरः निर्मत्स्यं कृतम् ॥ प्रश्नाः १) सन्धीयन्ताम्-- एतत्+सम, एतत् + श्रुत्वा, ममापि + अभीष्टम्, सम्यक् + मन्त्रितम्, सरः+ त्यक्त, प्रायु क्षय + अस्ति, मृत्यु + भविष्यति । (२) सन्धयो विच्छिद्यन्ताम् -- जलाशये, अभीष्टम्, वाङमात्रेण, निर्मत्स्यम् ।
(२२)
-
( ३ ) पत्र को सकारा: नयुफा., केपु घार्थेषु, तसिदिश्यताम्-
पतिषसन्ति रूम, अक्ययत, करिष्यन्ति, गम्यताम् ।
(४) फधं मत्स्येपु अनागतविधाता एव तत्सरस्स्यागस्य प्रस्तावम् अकरोत् ?
तत्र
(४) चतुर्थः पाठः
बक-कुलीर-कथा
अस्ति मालवविषये पागर्भाभिधानं सरः ।
एको वृद्धवकः सामर्थ्यहीन उद्विग्नम् इव आत्मानं दर्शयित्वा
स्थितः। स च केनचित् कुलीरण दूरादेव पृष्टः,
"किमिति भवान् अत्र आहारपरित्यागेन तिष्ठति ?' वकेन
उक्तम्, "भद्र, शृणु। मत्स्या मम जीवनहेतवः ।
मत्स्याश्च अवश्यम् अत्र कैवतैः व्यापादयितव्याः इति नगरो-
पान्ते पर्यालोचना मया श्रुता ।
तदतः
वर्तनाभावात
अस्मन्मरणम् उपस्थितम् इति ज्ञात्वा आहारस्यापि अहं
निरादरः ।" ततः सर्वैः मत्स्यैः आलोचितम्, "इह समये
तावत् उपकारक एव अयम् इति लक्ष्यते । तत् अयमेव
यथाकर्तव्यं पृच्छयताम् ।” मत्स्या ऊचुः, "कात्र रक्षणो-
पायः ?" बको ब्रूते, “अस्ति रक्षाहेतुः जलान्तराश्रयणम् ।
तत्र अहं युष्मान् नयामि।" मत्स्यैः भयात् उक्तम् , “एवम्
अस्तु"। ततः असौ दुष्टवकः तान् मत्स्यान् एकैकश:
( २३ ) नीत्वा अभक्षयत् । अनन्तरं कुलीरः तम् उवाच, "भो व, माम् अपि तत्र नय ।" ततो बकोऽपि अपूर्वकुलीर- मांसार्थी सादरं तं नीतवान् । अथ बकेन स्थले नीत्वा वृतः कुलीरः मत्स्यकवालाकीर्ण भूतलम् अवलोक्य अचिन्त- यतः “हा, हतोऽस्मि मन्दभाग्यः। भवतु । इदानीं समयोचितं व्यवहरामि।" इत्यालोच्य स कुलीरः तस्य बकस्य ग्रीवां दशनसन्दंशेन चिच्छेद ॥ प्रश्ना. " (१) सन्धिविच्छेदं कुरु- पद्मगर्भाभिधानम्, अस्मन्मरणम्, "मासार्थी, सन्दंशेन । (२) लकारनिर्देशं कुरु- लक्ष्यते, पृच्छयताम्, अभन्तयत्, चिच्छेद । (३) अपि स बक वस्तुत मत्स्यान् प्रति कृपावान् श्रासीत , (४) कथ मत्स्याना तस्मिन् विश्वासः न उचित. श्रासीत् ? (१) अपि अयं कुलीर अनागतविधाता आसीत्, उत प्रत्युत्पन्नमतिः भभवा यद्भविष्य.?
( २४ ) (५) पञ्चमः पाठः व्याघ्रचर्मावृतगर्दभ-कथा कस्मिंश्चिदधिष्ठान शुद्धपटी नाम रजकः मनिवसति स्म। तस्यैको रासभोऽस्ति । साऽपि घासाभावात् अनिदुबलः । अथ तेन रजकेन क्वापि व्याघ्रचर्म प्राप्तम् । ततच अचिन्त- यत, "अहो, शोभनम् अापनितम् । एनत् चर्म परिधाप्य रासभं रात्री यावत् क्षेत्रं उत्सनामि, येन व्यानं मत्वा समीपवर्तिनः क्षेत्रात् न निकासयन्ति ।" तथानुष्ठिते रासभो रात्री यथेच्छया यवमनणं करोति । रात्रिशेपेऽपि भूयो रजकः स्वाश्रयं नयति । एवं गच्छना कालेन स रासभः पीवरतनुर्जानः । कृच्छ्ात् बन्धनम् अपि नीयते । अथ अन्यस्मिन्नहनि स दूरात् रासभशब्दं शृण्क्न् तारस्वरेण शब्दायितुम् आरब्धः । अथ ते क्षेत्रपा रासभोऽयं व्याव- चर्मप्रतिच्छन्न इति मत्वा लगुडपहारी तं व्यापादितवन्तः । सुगुप्त रक्ष्यमाणोऽपि दर्शयन् दारुणं वपुः । व्याघ्रचर्मप्रतिच्छन्नो वाक्कृते रासभो हतः ।। प्रश्नाः (१) सन्धीयन्ताम्---एतत् + चर्म, पेनेषु + उत्सृजामि, कृच्छ्रात् + बन्धनम्, शृण्वन् + तारस्वरेण । (२) रासभस्य घासाभावे को हेतुः स्यात् ? (३) कथं रजकः त स्वगृहं नयति स्म ?
(२५)
(६) षष्ठः पाठः
मुनि-मूषक-कथा
अस्ति गौतमस्य महर्षेस्तपोवने महातपा नाम मुनिः।
तेनाश्रमसनिधाने मूषकशावकः काकमुखात् भ्रष्टो दृष्टः ।
पश्चात् दयालुना तेन मुनिना नीवारकणैः स परिपालितः ।
च मूषकं खादितुं यत्नात् अन्विष्यन् बिडालो मुनिना
दृष्टः । ततः तपापभावात् स मूषको विडालः कृतः ।
स विडालः कुक्कुरात् बिभेति । ततोऽसौ कुक्कुरः कृतः ।
कुक्कुरस्य व्याघ्रात् महत् भयम् । तदनन्तरं व्याघ्रः
| कृतः। अथ व्याघ्रमपि तं स मुनिः मूषकनिविशेषेण
पश्यति। तं च मुनिं दृष्ट्वा सर्वे वदन्ति, "अनेन मुनिना
। अयं मूषको व्याघ्रतां नीतः।” एतच्छु त्वा दृष्ट्वा च स
| व्याघ्रः सव्यथोऽचिन्तयत्, "यावत् अनेन मुनिना जीवि-
तव्यं तावत् इदं मम स्वरूपाख्यानम् अकीर्तिकरं न पला-
यिष्यते ।" इत्यालोच्य मुनिं हन्तुं गतः । तत् ज्ञात्वा
मुनिना पुनर्मूषकः कृतः।
नीचः श्लाघ्यपद प्राप्य स्वामिनं हन्तुमिच्छति ।
मूषको व्याघ्रतां प्राप्य मुनिं हन्तुं गतो यथा ॥
(२६) प्रश्नाः- (१) वाच्यपरिवर्तन क्रियताम्- तेन मुनिना नीवारकणैः स परिपालितः । (२) मुनी मृते मूषकस्य कः लाभः स्यात् ? (३) अपि अय भूपक. कृतज्ञः प्रासीत् कृतनः वा ? (७) सप्तमः पाठः राज-वानर-कथा कस्यचित् राज्ञो नित्यं वानरः अतिभक्तिपरोऽङ्ग- सेवकः अभवत् । एकदा राज्ञो निद्रां गतस्य वानरे व्यजनं गृहीत्वा वायुं विदधति राज्ञो वक्षःस्थलोपरि मक्षिका उपविष्टा । व्यजनेन मुहुर्मुहुः निषिध्यमानापि पुनः पुनः तत्रैव उपविशति । ततस्तेन स्वभावचपलेन मूर्खेण वानरेण क्रुद्धेन सता तीव्र खड्गम् आदाय तस्या उपरि प्रहारो विहितः। ततो मक्षिका उड्डीय गता परं तेन शितधारण असिना राज्ञो वक्षो द्विधा जातं राजा मृतश्च । तस्मात् चिरायुः इच्छता जनेन मूर्योऽनुचरो न रक्षणीयः॥
(२७) प्रश्ना:- (७) 'विदधति' इति कीदशं पदं, नाम, श्राख्यातं वा ? (२) 'सता' इति पदस्य केन सम्बन्ध. ? (३) सन्धीयन्ताम्-तस्मात् चिरायु. इच्छता । (४) कथं खङ्गप्रहारे सति मक्षिका न मृता ? (८) अष्टमः पाठः जामातृ-चतुष्टय-कथा अस्ति अत्र धरापीठे विकण्टक नाम नगरम् । तत्र महाधनः ईश्वरो नाम भाण्डपतिः । तस्य चत्वारो जामा- तरोऽवन्तीपीठात् प्राघूर्णका विकण्टकपुरे समायाताः ते च तेन महता गौरवेण अभ्यर्चिता भोजनाच्छादनादिभिः। एवं तेषां तत्र वसतां मासषटकं सञ्जातम् । तत ईश्वरेण स्वभार्या उक्ता, “यदेते जामातरः परमगौरवेण सत्कृताः स्वानि गृहाणि न गच्छन्ति, तत् कि कथ्यते ? विनापमानं न यास्यन्ति । तदद्य भोजनवेलायां पादप्रक्षालनार्थ जलं न देयं येन अपमानं ज्ञात्वा परित्यज्य गच्छन्ति" इति । तथा अनुष्ठिते गर्गः पादप्रक्षालनापमानात्, सोमो लघ्वासन- दानात्, दत्तः कदशनतो यातः । एवं ते त्रयोऽपि परित्यज्य ताः । चतुर्थः श्यामलको यावत् न याति तावत् अर्ध- वन्द्रमदानेन निष्कासितः । .
(२८)
ग! हि पादशौचाल्लघ्वासनदानतो गतः सोमः।
दत्तः कदशनभाज्याच्छ्यामलकश्चार्धचन्द्रेण ॥
प्रश्नाः
(4) सन्धिः क्रियताम्-अस्ति + अत्र, महाधनः+ ईश्वरः,
तावत् + अर्धचन्द्रप्रदानेन ।
(२) सन्धिविच्छेदः क्रियताम्-तत ईश्वरेण, विनापमानम्,
लक्ष्वासनदानात्, कदशनभोज्याच्छयामलकः ।
(३) कथं ते चत्वारो जामातरः श्वशुरगृहे मासपटकं यावत्
न्यवसन् ?
(४) पादप्रक्षालनादकम् अप्राप्यापि कथं सोम स्थितः ?
(१) श्यामलकेन के के अपमाना' लन्धा:
(8) नवमः पाठः
कुक्कुर-गर्दभ-कथा
अस्ति वाराणस्यां करिपटो नाम रजकः । स चैकदा
रात्रौ निर्भरं प्रसुप्तः। तदनन्तरं द्रव्याणि हतु चौरः
। तद्गृहं प्रविष्टः। तस्य प्राङ्गणे गर्दभो बद्धस्तिष्ठति
कुक्कुरश्च उपविष्टः। अथ गर्दभः कुक्कुरमाह, "तवायं
व्यापारः, तत् किमिति त्वम् उच्चैः शब्दं कृत्वा, स्वामिनं
न जागरयसि ?" कुक्कुरो ब्रूते, "मम नियोगस्य चिन्ता
त्वया न कर्तव्या । त्वमेव जानासि यथा अहम् एतस्य
( २९ )
गृहरक्षां करोमि। ततोऽयं चिरात् निर्भयः मम उपयोगं
न जानाति । तेन अधुना मम आहारदानेऽपि मन्दादरः ।
अतो विना विपदर्शनेन स्वामिनः अनुजीविषु मन्दादरा
भवन्ति ।" गर्दभी ब्रूते, "पृणु रे बर्वर,
याचते कार्यकाले हि स किंमृत्यः स किंसुहृत् ।"
कुक्कुरोऽपि आह, “पृणु तावत्
भृत्यान् संभावयेद्यस्तु कार्यकाले स किंमभुः ॥"
गर्दभः सकापम् आह, “पापीयांस्त्वम्, यः स्वामि-
कार्यापेक्षाम् एवं करोपि । भवत, यथा स्वामी जागति
तत् मया कर्तव्यम् ।" इत्युक्त्वा चीत्कारं कृतवान् ।
ततः स रजकः तेन चीत्कारशब्देन प्रबुद्धो निद्राभङ्गकोपात्
उत्थाय गर्दभं लगुडेन ताडयामास ॥
प्रश्नाः
(१) सन्धिं कुरु-
चौर.+तद्गृहम्, चिरात् +निर्भयः, स्वामिनः+मनुजीविशु ।
(२) लकारनिर्देशं कुरु-
जागरयसि, ब्रूते, शृणु, ताडयामास ।
( ३ ) सन्धिविच्छेदः क्रियताम्-
बद्धस्तिष्ठति, प्राहारदानेऽपि, पापीयास्त्वम्, स्वासिकार्योपशम् ।
(४) "भृत्यान् संभावयेद्यस्तु कार्यकाले स किप्रभुः” इत्यस्य स्पष्टार्थः
क्रियताम् ।
(५) चौरप्रवेशम् उपेक्षमाणः कुक्कुर. किमिच्छति स्म ?
( ३० ) (१०) दशमः पाठः शृगाल-दुन्दुभि-कया कश्चित् शृगालः क्षुत्क्षामकण्ठ इतस्ततः परिभ्रमन वने सैन्यद्वयसंग्रामभूमिम् अपश्यत् । तस्यां च दुन्दुभे पतितस्य वायुवशात् वृक्षशाखाग्रैः हन्यमानस्य शब्दा अशृणोत् । अथ क्षभितहृदयश्चिन्तयामास, "अहो विनष्टोऽस्मि । तद् यावत् न अस्य प्रोच्चारितशब्दस्य दृष्टिगोचरे गच्छामि तावद् व्रजामि । अथवा, नैतद् युज्यते सहसैव पितृपैतामहं वनं त्यक्तुम् । उक्तं च, भये वा यदि वा हर्षे संप्राप्ते यो विमर्शयेत् । कृत्यं न कुरुते वेगान्न स सन्तापमाप्नुयात्।। तत्तावत् जानामि कस्यायं शब्दः।" धैर्यम् आलम्ब्य विमर्शयन् यावत् मन्दं मन्दं गच्छति तावत् दुन्दुभिम् अपश्यत् । स च तं परिज्ञाय समीपं गत्वा स्वयमेव कौतुकात् अताडयत् । भूयश्च हर्षात् अचिन्तयत्, "अहो चिरात् एतदस्माकं महत् भोजनम् आपतितम् । तत्, नूनं प्रभूतमांसमेदोसग्भिः परिपूरितं भविष्यति । ततः पर- पचर्मावगुण्ठितं दुन्दुभिं कथमपि विदार्य एकदेशे छिद्रं कृत्वा
संहृष्टमना मध्ये प्रविष्टः । परं तं दारुशेषम् अवलोक्य
निराशीभूतः श्लोकम् इमम् अपठत्-
"पूर्वमेव मया ज्ञातं पूर्णमेतद्धि मेदसा ।
अनुप्रविश्य विज्ञातं याश्चर्म च दारु च ॥"
.
प्रश्नाः
() सन्धिविच्छेद क्रियताम्-
क्षक्षामकण्ठ , इतस्ततः, क्षभितहृदयश्चिन्तयामास,
प्रोच्चारितशब्दस्य, वेगान, पूर्णमेतद्धि, यावञ्चर्म ।
२) उपरितनसन्दर्भ यानि स्वाजन्तानि ल्यवन्तानि वा पदानि मन्ति
तानि निर्दिश ।
(३) एषु पदेषु लकारा विस्पष्ट निर्दिश्यन्ताम्-
व्रजामि, श्राप्नुयात्, अताइयत्, भविष्यति ।
(४) वाच्यपरिवर्तन
कुरु-
पूर्वमेव मया ज्ञातम्
(५) विकट दुन्दुभिशब्द शृण्वन् शृगालः प्रथम किममन्यत ?
( ३२ )
(११) एकादशः पाठः
सिंह-मूषक-बिडाल-कथा
अस्ति अर्बुदशिखरनाम्नि पर्वते महाविक्रमो नाम
सिंहः। तस्य पर्वतगुहायां शयानस्य केशराग्रं कश्चित्
मूषकः छिनत्ति । स सिंहः केशराग्रं छिन्नं दृष्ट्वा कुपितः ।
तं विवरान्तर्गतं मूषकं अलभमानोऽचिन्तयत्, "किं विधे-
यम् अत्र ? भवतु, एवं श्रूयते-
क्षुद्रशत्रुर्भवेद्यस्तु विक्रमान्नैव लभ्यते ।
तमाहतु पुरस्कायः सदृशस्तस्य सैनिकः ॥"
इत्यालोच्य तेन ग्रामं गत्वा दधिकर्णनामा बिडाला
स्वगुहायां सारमांसाहारं दत्त्वा प्रयत्नात् आनीय धृतः ।
तद्भयात् मूषको बहिर्न निःसरति । तेन असौ सिंह
अक्षतकेशरः सुखं स्वपिति । मूषकशब्दं यदा यदा शृणोति
तदा तदा सविशेषम् आहारं दत्त्वा बिडालं संवर्धयति ।
अथैकदा मूषकः क्षुधापीडितो बहिनि:सरन् बिडालेन प्राप्तो
व्यापादितश्च । अनन्तरं स सिंहा यदा कदाचिदपि तस्य
सूपकस्य शब्दं विवरात् न शुश्राव तदा उपयोगाभावात् तस्य
विडालस्य आहारदानेऽपि मन्दादरो बभूव ।
आहारदानविरहात् दुर्बलो दधिकर्णोऽनसन्नोऽभवत् ।
ततः सच
( ३३ ) निरपेक्षो न कर्तव्यः स्वामी भृत्यैः कदाचन । निरपेक्षं प्रभुं कृत्वा भृत्यः स्यादधिकर्णवत् ॥ प्रश्नाः (१) सन्धीयन्ताम्-अस्ति+अर्बुदशिखरनाम्नि, कश्चित् . मूपकः + छिनत्ति, भवतु + एवम्, प्रयत्नात् + श्रानीय, विवरात् + न । (२) प्रकृतिनिर्देशपुरस्सरम् अन्नत्यानि तवाजन्तानि ल्यबन्तानि च पदानि गणय । (३) अन्न प्रकृतिप्रत्यया निर्दिश-छिनत्ति, स्वपिति, शुभाव । (४) प्रयतमानाऽपि शूरः स सिंहः कथ मूषकं नालभत ? (५) स्वामिनं सदा सापेशं विधातु विडालेन किं करणीय- मासीत् ? (१२) द्वादशः पाठः जात्मण-नकुल-कृष्णसर्प-कथा अस्ति उज्जयिन्यां माधवो नाम ब्राह्मणः। तस्य ब्राह्मणी प्रस्ता। सा च ब्राह्मणी बालापत्यरक्षार्थं ब्राह्म- णम् अवस्थाप्य स्नातुं गता। अथ ब्राह्मणस्य कृते राज्ञः सर्वश्राद्धं दातुम् आह्वानम् आगतम् । तत् दृष्ट्वा ब्राह्मणः सहजदारिद्रथात् अचिन्तयत्, “यदि सत्वरं न गच्छामि तदा तत्र अन्यः कश्चित् श्राद्ध ग्रहीष्यति । उक्तं च, ततः तेन (३४. श्रादेयस्य प्रदेयस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः । क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिवति तद्रसम् ।। दारकस्य चात्र रक्षको नास्ति । किं करोमि १ यातु। चिरकालप्रतिपालितम् इमं सुतनिर्विशेष नकुलं बालकरक्षार्थ व्यवस्थाप्य गच्छामि ।" तथा कृत्वा गतः । नकुलेन बालकसमीपम् आगतः कृष्णसी व्यापादितः खण्डितश्च । तथा असौ नकुलो ब्राह्मणम् आयान्तम् अव- लोक्य रक्तविलितमुखपादः सत्वरम् उपगम्य ब्राह्मणस्य चरणयोः लुलोठ । ततोऽसो ब्राह्मणस्तथाविधं नकुलं दृष्ट्वा, "मम पुत्रः अनेन भक्षितः" इत्यवधार्य, तं व्यापादित- वान् । अनन्तरं यावत् असौ उपमृत्य पश्यति ब्राह्मणः तावत् बालकः सुप्तः सर्पश्च व्यापादितः तिष्ठति । योऽर्थतत्त्वमविज्ञाय क्रोधस्यैव वशं गतः । स तथा तप्यते मूढो ब्राह्मणो नकुलादिव ।। प्रश्नाः (१) सन्धिविच्छेदः क्रियताम्-बालापस्यरक्षार्थम्, निर्वि- शेषम्, इत्यवधार्य, क्रोधस्यैव । (२) वाच्यपरिवर्तनं क्रियताम्-तेन नकुलेन कृष्णसर्पो व्यापादितः। (३) कथं ब्राह्मण्याः प्रत्यावर्तनकालं स ब्राह्मणो नापेक्षते स्म ? (४) प्रादेयस्येति श्लोकस्य व्याख्या सरलसंस्कृतेन क्रियताम् । (१) नकुलं व्यापाध कथं ब्राह्मणोऽजानात् सर्प एव नकुलेन हतो न बालक इति? M 0 नकुलेन कृष्णसर्पो व्यापादिकः
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(३५)
(१३) त्रयोदशः पाठः
घण्टा-वानर-कथा
अस्ति श्रीपर्वतमध्ये ब्रह्मपुराभिधानं नगरम् । तत्र
घण्टाको नाम राक्षसः प्रतिवसतीति जनापवादः सदा
श्रूयते । एकदा घण्टाम् आदाय पलायमानः कश्चित् चौरो
व्याघ्रण व्यापादितः खादितश्च । तत्पाणिपतिता घण्टा
वानरैः प्राप्ता । ते च वानराः तां घण्टां सर्वदैव वादयन्ति ।
ततः तन्नगरजनैः स मनुष्यः खादितो दृष्टः । प्रतिक्षणं च
घण्टावादः श्रूयते । अनन्तरं घण्टाकर्णः कुपिता मनुष्यान्
खादति घण्टां च वादयति इत्युक्त्वा जनाः सर्वे नगरात्
पलायिताः । ततः कयाचित् नार्या विमृश्य, मर्कटा घण्टां
वादयन्ति इति स्वयं परिज्ञाय, राजा विज्ञापितः, "देव, यदि
धनोपक्षयः क्रियते, तदा अहम् एनं घण्टाकर्ण मारयामि ।"
ततो राज्ञा धनं दत्तम् । रमण्या च नानाप्रकारपूजागौरवं
दर्शयित्वो स्वयं वानरप्रियफलानि आदाय वनं प्रविश्य
फलानि आकीर्णानि । ततो घण्टा परित्यज्य वानराः फला-
सक्ता बभूवुः।
सा रमणी घण्टां गृहीत्वा समायाता
सकललोकपूज्या अभवत् ।
शब्दमात्रान्न भेतव्यमज्ञात्वा शब्दकारणम् ।
शब्दहेतुं परिज्ञाय रमणी गौरवं गता ॥
( ३६ ) प्रश्नाः (१) घण्टाकर्ण इति नाम्नः कोऽर्थः ? (२) वाच्यपरिवर्तनं कुरु-यदि धनोपक्षयः भियते । (३) कथं सा रमणी पूजाडम्बरं कृतवती ? स्मा (१४) चतुर्दशः पाठः शाहाण-कर्कट कथा कस्मिंश्चिदधिष्ठाने ब्रह्मदत्तनामा बामणः प्रतिवसति स च भयोजनवशात् ग्रामात् प्रस्थितः स्वमात्रा अभिहितः, "वत्स, कथम् एकाकी व्रजसि १ तद् अन्विष्यतां कश्चिद्वितीयः सहायः ।" स आह, "अम्ब, मा भैषीः । निरुपद्रवोऽयं मार्गः। कार्यवशात एकाकी गमिष्यामि " अथ तस्य तं निश्चयं ज्ञात्वा समीपस्थनाप्याः कर्कटम् आदाय मात्राभिहितः, "वत्स, अवश्यं यदि गन्तव्यं तदेप कर्कटोऽपि सहायः । तदेनं गृहीत्वा गच्छ ।" सोऽपि मातुर्वचनात् उभाभ्यां पाणिभ्यां तं संगृह्य कर्पर- पुटिकामध्ये निधाय पात्रमध्ये संक्षिप्य शीघ्रं प्रस्थितः । अथ गच्छन् ग्रीष्मतापेन सन्तप्तः कञ्चित् मार्गस्थं वृक्षम् आसाथ तस्याधः प्रसुप्तः। अत्रान्तरे वृक्षकोटरात् निर्गत्य सर्पः
( ३७ )
सत्समीपम् आगतः। सेोऽपि कर्पूरसुगन्धप्रियत्वाद् तं परित्यज्य
वस्त्रं विदार्य अभ्यन्तरगतां कर्परपुटिकाम् अतिलोल्याद्
अभक्षयत् । सोऽपि कर्कटः तत्रैव स्थितः सन् सर्पप्राणान
अपाहरत् । ब्राह्मणोऽपि यावत् प्रबुद्धः पश्यति तावत् समीपे
कृष्णसो निजपाचे कर्परपुटिकोपरि स्थितस्तिष्ठति, तं
दृष्ट्वा व्यचिन्तयत्, 'कर्कटेनायं हतः । इति प्रसन्नो भूत्वा
अब्रवीत्, “भोः सत्यम् अभिहितं मम मात्रा यत् पुरुषेण
कोऽपि सहायः काय:, नैकाकिना गन्तव्यम् । ततो मया
श्रद्धापरिपूरितचेतसा तद्वचनम् अनुष्ठितम् । तेनाहं ककटेन
सर्पव्यापादनात् रक्षितः । अथवा साधु इदम् उच्यते--
मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञ भेषजे गुरौ ।
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति ताशी ॥"
एवमुक्त्वा असौ ब्राह्मणो यथाभिप्रेतं गतः ॥
.
प्रश्नाः
(१) सन्धिविच्छेदं कुरु-
कस्मिंश्चिदधिष्ठाने, कश्चिद्वितीय , निरुपद्रवोऽयम्, माना-
भिहितः, कन्चित्, कर्पूरपुटिकोपरि, यथाभिप्रेतम् ।
(२) वाध्यपरिवर्तनं कुरु-कर्कटमादाय मानाभिहितः ।
(३) यदि स ब्राह्मणो मातुर्वचनेन कर्कटम् आत्मना सह न अनेष्यत्
तदा किम् श्रभविष्यत् ?
( ३८ ) (१५) पञ्चदशः पाठः मूर्योपदेश-फलम् अस्ति नर्मदातारे पर्वतोपत्यकायां विशालः श ल्मली. तरुः । तत्र तरौ निमिते नीडे पक्षिणः सुखं वर्षास्वपि निवसन्ति । अथ घनमेधैः आवृते नमस्तले धाराभिः महती वृष्टिर्बभूव । ततो वानरान् तरुतले तिष्ठतः शीतार्तान कम्पमानान् अवलोक्य कृपया पक्षिभिः आख्यातम् , "भो भो वानराः, अस्माभिर्निमिता नीडाश्चञ्चुमात्राहृतैरतृणैः । हस्तपादादिसंयुक्ता यूयं किमवसीदय ।।" तन्छु त्वा क्रुद्ध नरैः बालोचितम्, “निर्वातनीडगर्भाव- स्थानसुखिनः पक्षिणः अस्मान् उपहसन्ति । तद्भवतु तावत् सृष्टरुपशमः ॥ अनन्तरं शान्ते जलवर्षे तैर्वानरै- क्षम् आरुह्य सर्वे नीडा भग्नाः। तेषां पक्षिणाम् अण्डानि च अधःपातितानि । विद्वानेवापदेष्टव्यो नाविद्वांस्तु कदाचन । वानरानुपदिश्याज्ञान् स्थानभ्रंशं ययुः खगाः ।। उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये । पयःपानं भुजङ्गानां केवलं विषवर्धनम् ॥
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2. ..- । 7 HAN 11 प dam 2. th A. PRI . . ग 4 km Ttv 4 + , n- - वानर नीदो भग ( ३९ ) प्रश्नाः (१) अत्र ये सन्धयः सन्ति ते सर्वे विश्लिष्यन्ताम्- अस्माभिनिर्मिता नीडाश्चन्चुमात्राहृतैस्तृणैः । (३) पक्षिशन्दस्य रूपं सर्वासु विभक्तिषु दर्शय । ३) 'वर्षासु' इत्यत्र कथ बहुवचनम् ? (४) वाच्यपरिवर्तनं कुरु-वानरै. सर्वे नीडा भग्नाः । (५) नीडभनेच्छवो वानराः कथं वृष्ट्युपशमकामं प्रतीक्षितवन्तः ? (१६) षोडशः पाठः मूषकभक्षित-लौहतुला-कथा अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने जीर्णधनो नाम पणिक- 'पुत्रः। स च द्रव्यक्षयात् देशान्तरगमनमना आसीत् । तस्य च गृहे लोहमारघटिता पूर्वपुरुषोपार्जिता तुला आसीत् । तां च कस्यचित् वणिजो गृहे निक्षेपभूतां कृत्वा देशान्तरं प्रस्थितः । ततः सुचिरं कालं देशान्तरं भ्रान्त्वा पुनः तदेव स्वपुरम् आगत्य तं श्रेष्ठिनम् उवाच, "भोः श्रेष्ठिन् दीयतां ये सा निक्षेपतुला " स ाह, "नास्ति सा त्वदीया तुला। मूषकैः भक्षिता ।" जीण- धन आह, “भोः श्रेष्ठिन् नास्ति दोषस्ते यदि मूषकैः भक्षिता इति । ईडगेव ससारः न किञ्चिदत्र शाश्वतम् अस्ति ।
।
( ४० )
परम् अहं नद्यां स्नानार्थ गमिष्यामि । तत् त्वम् आत्मीयं
शिशुम् एतं मया सह स्नानापकरणहस्तं प्रपया। सेोऽपि
चौर्यभयात् शङ्कितः स्वपुत्रम् उवाच, "वत्स, पितृव्योऽयं
तव नद्यां स्नानार्थ यास्यति । तत् गम्यताम्। 'अनेन सह
स्नानापकरणम् आदाय ।"
अथ असौ वणिशिशुः स्नानोपकरणम् आदाय
प्रहृष्टमनाः तेन अभ्यागतेन सह प्रस्थितः । तथा अनुष्ठिते
जीर्णधनः स्नात्वा तं शिशं नदीगुहायां प्रक्षिप्य तद्वार
बृहच्छिलया आच्छाद्य सत्वरं गृहम् आगतः । पृष्टश्च तेन
वणिजा, “भी अभ्यागत, तत् कथ्यतां कुत्र मे शिशुः
यस्त्वया सह नदीं गतः ।" स आह, “नदीतटात् स श्येनेन
हृतः ।" श्रेष्ठी आह, “मिथ्यावादिन् , कि कश्चित् श्येनः
बालं हर्तुं शक्नोति ? तत् समर्पय मे
सुतम् अन्यथा राजकुले
निवेदयिष्यामि ।" स आह, “भोः सत्यवादिन् यथा
श्येनो बालं न नयति तथा मूषका अपि लोहमारघटितां
तुलां न भक्षयन्ति । तदर्पय मे तुलां यदि बालकेन
प्रयोजनम् ।"
एवं विवदमानी द्वावपि राजकुलं गता। तत्र श्रेष्ठी
तारस्वरेण प्रोवाच, "भो अब्रह्मण्यम् अब्रह्मण्यम् ! मम
शिशुरनेन चौरेण अपहृतः ।" अथ धर्माधिकारिणः
तम् ऊचुः, "भोः समर्म्यतां श्रेष्ठिसुतः ।" स आह, "किं
( ४१ )
करोमि ? पश्यतो मे नदीतटात् श्येनेन अपहृत शिशेर से
तच्छुत्वा ते प्रोचुः, “भो न सत्यम् अभिहितं भवता । कि
श्येनः शिशु हतु समर्थो भवति ?" स ाह, “भो भो
श्रूयतां मद्वचः ।
तुला लोहसहस्रस्य यत्र खादन्ति मूषकाः ।
राजस्तत्र हरेच्छ्येनो बालकं नात्र संशयः ॥
ते पोचुः, "कथमेतत् ?" ततः श्रेष्ठी सभ्यानाम्
आदितः सर्व वृत्तान्तं निवेदयामास । तत् तैः विहस्य
द्वावपि तौ परस्परं सम्बोध्य तुलाशिशुपदानेन सन्तापितौ ।।
प्रश्नाः
(१) देशान्तरगमनमना इत्यत्र कस्य शब्दस्य कस्या विभको, किं रूपं
तमिर्दिश।
(२) लोहतुनाया' परहस्ते निक्षेपस्य किं कारणम् ?
(३) प्रकृतिप्रत्ययनिर्देशेन निरुन्यन्ताम् एतानि पदानि-भ्रान्त्वा,
आगत्य, प्रेषय, पश्यत., प्रोचुः ।
(४) "तुला लोहसहसम्य" इति श्लोको व्याख्यायताम् ।
( ४२ ) (१७) सप्तदशः पाठः सिंह-शश-कया कस्मिंश्चिद्वने भासुरको नाम सिंहः प्रतिवसति स्म। असौ नित्यमेव अनेकान मगशशकादीन् व्यापादयामास । अथैकदा तद्वनवासिनः सर्वे वराहमहिषशशकादयो मिलित्वा तम् अभ्युपेत्य प्रोचुः, "स्वामिन् , किम् अनेन सकलमृग- वधेन । तव एकेनैव मृगेण तृप्तिर्भवति तत् क्रियताम् अस्माभिः सह समयः। अद्य प्रभृति प्रतिदिनम् एको मृगः तव भक्षणार्थ समेष्यति । एवं कृते तव तावत् प्राण- यात्रा क्लेशं विना भविष्यति, अस्माकमपि सर्वोच्छेदनं न स्यात् । तदेष राजधर्मोऽनुष्ठीयताम् ।। अथ तेषा तद्वचनम् आकण्य भासुरक आह, "अहो सत्यमभिहितं भवद्भिः। परं यदि नित्यमेव एको मगो न आगमिष्यति तदा सर्वानेव भक्षयिष्यामि ।" अथ ते "तथा" इति प्रतिज्ञाय निश्चिन्ताः तत्र वने निर्भयाः पर्यटन्ति । एकश्च प्रतिदिन क्रमेण आयाति । अथ कदाचित् शशकस्य वारः समायातः । प्रेषितश्च अनिच्छन्नपि स समस्तमृगैः। स च मन्दं मन्दं गत्वा वेलातिक्रमं विधाय व्याकुलहृदयः सिंहस्य वधोपायं चिन्तयन् दिनशेषे प्राप्तः। सिंहस्तु वेलातिक्रमण
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भासुरक स्वप्रतिबिम्ब सिहान्तर मन्यते
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( ४३ ) क्षधातः कोपाविष्टः अचिन्तयत्, "अहो मया प्रातरेव वन निःसत्त्वं कर्तव्यम् ।" एवं चिन्तयति तस्मिन् शशको मन्दं मन्दं गत्वा प्रणम्य तस्याग्रे स्थितः । अथ तं चिरात् आयातं लघकलेवरच अवलोक्य कोपज्वलितः तं निर्भर्त्स- यन् आह, “रे शशकाधम, एकतस्तावत् लघुस्त्वम्, अपर- तश्च वेलातिक्रमेण आगतः। अस्मादपराधात् त्वां निपात्य भातः सकलान्यपि सत्त्वानि उच्छेत्स्यामि ॥ अथ शशक: प्रणम्य सविनयं प्रोवाच, "स्वामिन् , नात्र अपराधो मम, न च अपरेषां सत्त्वानाम् । श्रूयतां कारणम् ।" सिंह आइ, "सत्वरं निवेदय, यावत् मम दंष्ट्रान्तर्गतो न भवसि " शशक आह, “स्वामिन्, समस्तमृगैः अद्य मम वारं विज्ञाय अहं मेषितः । मां तु लघुतरं दृष्ट्वा ते अपरान् पञ्च शशकान् मया सह प्रेषितवन्तः । ततश्च अह आग- छन् पथि महता केनचित् अपरसिंहेन विवरात् निर्गत्य अभिहिता, 'रे, क प्रस्थिता यूयम् ?' मया अभिहितम्, 'वयं वनस्वामिनो भासुरकसिंहस्य आहारार्थ धर्मेण तत्सकाशे गच्छामः ।' ततस्तेन अभिहितम् 'मदो. यम् एतद्वनम् । मया सह समयधर्मेण समस्तैः मगैः वर्तितव्यम् । चौरः स भासुरकः । अथ सोज्न वने राजा तहि पञ्च शशकान् अन्न धृत्वा तमाहूय द्रुतम् श्रागच्छ ।
( ४४ ) यः कश्चित् आवयोः पराक्रमेण राजा भविष्यति स सर्वानेव मगान् अक्षयिष्यति । ततोऽहं तेनादिष्टः स्वामिसकाशम् आगतः । एतत् वेलातिक्रमकारणम् । तदत्र वामी प्रमाणम् ॥ तच्छुत्वा भासुरक अाह, “भद्र, यद्येवं सत्वरं दर्शय मे तं चौरसिंहम् । येनाहं मृगकोपं तस्योपरि पातयित्वा स्वस्थो भवामि " शशक आह, “आगच्छतु स्वामी ।" एवम् उक्तवा असा अग्रे प्रस्थितः । ततश्च कञ्चित् कूप- मासाद्य स भासुरकम् आह, "स्वामिन्, कस्ते प्रतापं साई समर्थः । त्वां दृष्ट्वा दूरत एव स चौरः स्वदुर्ग प्रविष्टः । श्रागच्छ, दर्शयामि ।" तच्छत्वा भासुरक आह, “भद्र सत्वरं दर्शय मे दुर्गम् ।" तदनु दर्शितः तेन कूपः। सोऽपि मूर्खः सिंहः कूपमध्ये आत्मनः प्रतिबिम्बं दृष्ट्वा अपरं सिंहं मत्वा नादं मुमोच । ततः तत्पतिशब्देन द्विगुण- तरो नादः कूपात् समुत्थितः । अथ असौ तं नादम् आकर्ण्य कोपज्वलित आत्मानं कूपे क्षिप्त्वा प्राणान् मुमोच । तदा प्रभृति सर्वे मृगा निर्भयाः तत्र वने वसन्ति स्म। बुद्धिर्यस्य धलं तस्य निर्बुद्धस्तु कुतो बलम् । बने सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ।।
( ४५ ) प्रश्नाः (१) सन्धीयन्ताम् एतानि पदानि- मृगः+तव, तत् + एषः, तथा + इति, कदाचित् + शशफस्य, कोपाविष्टः + अचिन्तयत्, विवरात् + निगस्य, समस्तैः + मृगैः, असौ + अने, दर्शितः + तेन । (२) सन्धिविश्लेपः क्रियताम- अभ्युपेत्य, सर्वोच्छेदनम्, अनिच्छन्नपि, दंष्ट्रान्तर्गतः, तच्छुत्वा, मदोन्मत्तः। (३) वाच्यपरिवर्तनं क्रियताम्- मया वनं निःसत्वं कर्तव्यम्, अहम् अपरसिंहेन अभिहित., स स्वदुर्गं प्रविष्टः। (४) 'एवं चिन्तयति तस्मिन्' इत्यत्र मध्यमपदं नाम श्राख्यातं वा ? (१) अत्र लकारनिर्देशं कुरु-व्यापादयामास, प्रोचुः, समेष्यति, श्राह, आगच्छ, मुमोच। (६) भासुरकसमीपं प्रस्थितः शशकः तस्य के वधोपायं चिन्तितवान् ? (७) अपि सत्यं कोऽपि द्वितीयसिंहो भासुरकमयात् कूपं प्रविष्ट मासीत् ?
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व्याकरणम्
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व्याकरणम्
सन्धिः
दो वणों के परस्पर मिलाप का नाम सन्धि है। संयोग और सन्धि
इतना भेद है कि जहां वर्ण अपने स्वरूप से बिना किसी विकार के
मिलते है उसे संयोग, और जहाँ विकृत होकर अर्थात् उनके स्थान मे
कोई और श्रादेश होकर मिलते है उसे सन्धि कहते
जैसे 'शक' में 'क' और 'र' बिना किसी विकार या परिवर्तन के
अन्त्य 'अ' से मिले है, यह सयोग है और जैसे 'दध्यानय' में 'दधि' की
'ई', 'प' के रूप में परिवर्तित होकर 'पानय' के 'प्रा' से मिली है,
यह सन्धि है।
सन्धि तीन प्रकार की है १ अच् या स्वरसन्धि, २ हल या
व्यञ्जनसन्धि, ३ विसर्गसन्धि ।
अच्सन्धिः अच् (स्वर) के साथ जब अच् (स्वर) का मेल होता है तो उसे श्रच या स्वर-सन्धि कहते है। अच्सन्धि सात प्रकार की होती है (१) सवर्णदीर्घ, (२) गुण, (३) वृद्धि, (४) अयादिचतुष्टय, (५) यण, (६) पूर्वरूप, (७) पररूप । (१) सवर्णदीर्घ यदि हस्व वा दीर्घ 'अ', 'इ', 'उ', 'ऋ', से उसका सवर्ण अक्षर आगे रहे तो दोनों मिलकर एक दीर्घ श्रादेश हो जाता है और इसको सवर्णदीर्घसन्धि कहते है। जैसे- गिरि+इन्द्रः शश +अङ्कः = (अ+ अ आ ) হাহা महा+प्राशयः = (श्रा+श्रा-श्रा) = महाशयः (इ + इ = ई ) गिरीन्द्रः कवि + ईशः (इ+ई = ई ) कवीशः विधु + उदयः = (उ+ उऊ ) = विधूदयः वधू + उत्सवः = (ऊ + उ = अ ) = वधूत्सवः पितृ+ ऋणम् = (ऋ+ - पितृणम् (२) गुण हस्व अथवा दीर्घ श्रकार से आगे हस्व या दीर्घ 'ई', 'ब', 'अ', 'कृ' रहें तो '' (या 'श्रा')+ 'इ'मिलकर 'ए', 'ब' (या'मा')+''मिन- =ऋ) ( ३ ) कर 'ओ','म', (या'पा')+ 'ऋ'मिलकर 'अर्' और 'अ' (या 'श्रा)+ 'लु' मिलकर 'भल' आदेश होता है और इसी को गुणसन्धि कहते है । जैसे- उप+इन्द्रः (+इ=ए )= उपेन्द्रः रमा+इच्छा (मा+इ=ए )= रमेच्छा नील+उत्पलम् = अ+=ओ )= नीलोत्पलम् गङ्गा+उदकम् - (मा+=ओ )= गगोदकम् देव+अधिः भ+भा=अर्) =देवर्षिः ब्रह्मा+अपिः (आ+= अर) = ब्रह्मर्षिः तव+तृकार: अ+-अल)तवस्कार (३) वृद्धि हस्व अथवा दीर्घ श्राकार से श्रागे 'ए', 'श्रो', 'ऐ', 'प्रौ' रहे तो 'अ' (या 'श्रा')+ 'ए' वा 'अ' (या 'या')+ 'ऐ' मिलकर “ऐ" और 'प्र' (या 'आ')+'नो' वा 'अ' (या 'श्रा')+औ मिलकर "श्री" श्रादेश होता है और इसको वृद्धिसन्धि कहते है। जैसे- एक+एकम् (अ+ ए =ऐ )= एकैकम् मत+ ऐक्यम् श्र+ऐ=ऐ )=मतैक्यम् जल+ ओघा (श्र+ओ =औ )=नलौघः महा+ओषधिः (श्रा+ो-औ )=महापधिः सदा+ौरसुस्यम् (श्रा+श्री = औ)= सदौत्सुक्वम् (४) अयादिचतुष्टय 'ए', 'मो', 'ऐ', 'औ', इनके आगे यदि कोई स्वर हो तो इनको कम से 'अय', 'अव', 'आय', 'श्राव' ये आदेश हो जाते है । जैसे- (ए+4=अय)-शमनम् (ए+इ=अयि)= तयिह (भो+4= श्रव)= भवनम् = (ो+ए अवे) =गवे २ . शे+अनम् ते+इह भो+अनम् = गो+ए ( ४ ) विनै + अ = (ऐ+ श्राय) -विनायक +ो: == (ऐ+ओ आयो)-रायो। (श्री+अ-श्राव) =पावका (औ+3= श्रावु) = भावुक पो+अका भी+ सका % 3D (५) यण से अभि+ उदयः - न हस्व या दीर्घ 'इ', 'a', '', या 'लु', के भागे यदि कोई मिन्न म्वर रहे तो 'इ' (या 'ई'), 'उ' (या 'ज'), 'प्र' (या "'), 'लु' को क्रम '' '' 'ल' आदेश हो जाते हैं, और उसके साथ आगे का म्वर मिल जाता है। इसी को यण्सन्धि कहते हैं। जैसे- यदि+अपि (इ+श्रय )= यद्यपि =(इ + उ =यु )= अभ्युदया सुनि+मुषभः (इ + - य.)=मुन्युपमः देवी+ श्रागमनम् = (ई+श्रा=या)= देव्यागमनम् सु +ागतम् +ना=वा)=स्वागतम् साधु + ईहितम् उ+ ई =वी)=साध्वीहितम् = (उ+ =वृ)=मध्वृते पचतु+ोदनम् = (3+श्रो=वो)= पचत्वादनम् वधू+अवेक्षणम् = (ऊ+ श्रव)= वध्ववेक्षणम् पितृ + अनुमतिः =(+अर )=पित्रनुमतिः मातृ + उपदेशः (+उ = रु )= मात्रुपदेशः पितृ+ ऐश्वर्यम् = (+ ऐ38 )= पित्रैश्वर्यम् पितृ+ औदार्यम् =(ऋ+ औ=रौ)= पित्रौदार्यम् तृ+ श्राकृतिः =(ल+श्राला)= लाकृतिः (६) पूर्वरूप यदि पदान्त के 'ए', 'श्री' से परे ह्रस्व प्रकार रहे तो वह प्रकार 'ए' और 'ओ' में ही मिल जाता है। उस पूर्वरूप मे परिणत हुए प्रकार को (5) इस चिह से वोधित करते है। जैसे- मधु+मरते - मुने + अत्र=(ए+4=एs)= मुनेऽत्र गुरो+व+ (ो+4=ोs)= गुरोऽव [इनके अतिरिक्त एक साता प्रकार भी है जिसका नाम है पररूप- सन्धि । उसमें पूर्व स्वर नष्ट हो जाता है, और उत्तर स्वर रह जाता है। जैसे प्र + एजते - अ+ एजते =+ एजते - प्रेजते । पररूप-सन्धि के नियम पहले पहल विद्यार्थियों के लिए दिया पढ़ेंगे, इस कारण यहाँ नहीं लिखे गये।
हल्सन्धिः कस् कस -- स्वर या हल के साथ जो हलों (व्यम्जन) की सन्धि होती है से हल या व्यञ्जनसन्धि कहते है (१) यदि सकार और तवर्ग को शकार और चवर्ग का योग हो तो एनको क्रम से शकार और चवर्ग हो जाते है। जैसे- +शेते - (स् + श= श्श) = करशेते + चित् = (स+च =श्च) (स+चश्च) = कश्चित् सत् +चित् (त् + च =च) सचित् शत्रून् + जयति = (न् + ज अ) =शन्नूब्जयति २) यदि सकार और तवर्ग को पकार और टवर्ग का योग हो तो उनको क्रम से पकार और टवर्ग ही हो जाते है। जैसे- = (स्+प-प) = रामप्पष्ठः रामस् + टीकते = (स् + ट= ष्ट) =(स् + 2 = ) = रामष्टीकते तत् - (त् + ट= १) = तट्टीका चक्रिन् + ढौकसे =(न् + ढ=ण्ड) (न् + 3 =ण्ड) = चक्रिण्ढोकसे पेष = (प्+त = ) = पेष्टा (३) यदि तवर्ग के श्रागे लकार हो ता उसको लकार ही हो जाता है। जैसे-- (त् + ल = ल्ल) = तल्लय. भवान् +लिखति = (न् + ल= ल्ल) = भवाल्लिखति (४) यदि किसी वर्ग के प्रथम या तृतीय वर्ण से कोई अनुमासिक वर्ण आगे रहे तो पूर्व वर्ण को इस नासिक वर्ण हो जाता है। जैसे- रामस् + षष्ठः +टीका +ता तत् +लयः वर्ग का सानु- ( ७ ) धाक मम्राट +मयम् - (क +म= डम) = वाड्मयम् +नयति - (ट् + न = ण्न)=सम्राण्नयति जगत् +नाथ. = (त् + न= न)= जगन्नाथ. चित् +मात्रम् = (त् + म = न्म)= चिन्मात्रम् एतद् + मुरारि. = (द् + म = न्म)= एतन्मुरारि. (५) यदि किसी वर्ग के पहले, दूसरे, तीसरे या चौथे वर्ण से ससी या अन्य वर्गो के तीसरे, चौथे, पांचवे वर्ण अथवा स्वर भागे रहे तो उसको अपने वर्ग का तीसरा वर्ण हो जाता है। जैसे- श्रप + जातः प्राक + गमनम् = (क + ग = ग्ग)=प्रारगमनम् वाक् + दंडः = = (क् + दग्द) = वाग्दण्डः अच+अन्तः (च+= ज)= अजन्तः उत् +गमनम् = (त् + ग = द्) = उद्गमनम् (प+ज = ब्ज) = अब्जातः (६) यदि किसी वर्ग के पहले, दूसरे, तीसरे और चौथे वर्ण से हकार आगे रहे तो उस ह को उस वर्ग का चतुर्थ वर्ण हो जाता है । जैसे- घाग +हरिः = (ग + ह = घ)= वाग्धरिः उत् +हरणम् =(त् +हद्ध)= उद्धरणम् (७) यदि किसी वर्ग के पहले, दूसरे, तीसरे या चौथे वर्ण से उसी या अन्य वर्गों के प्रथम या द्वितीय वर्ण अथवा 'श', 'घ', 'स' आगे रहे तो उसको अपने वर्ग का प्रथम वर्ण हो जाता है। जैसे- सम्पद्+प्राप्ति उद् +थानम् -(+प्रा = प्रा.) त्पा,) =सम्पत्प्राप्ति. (द् =थ = थ = स्थ) = उत्थानम् उद् +तम्भनम् =(द्+त = त्त) = उत्तम्भनम् पुध् + संवरणम् = (४+ स= स्स) = पुरसंवरणम् ( ८ ) (८) वर्ग के पहले और तीसरे वर्ण से आगे शकार हो तो उस श को छकार हो जाता है, यदि उससे भागे कोई अच् या अन्तःस्थ या अनुनासिक वर्ण हो। जैसे- वाक + शरः =(क क + श= छ) - कछ) = वाकूछरः हत् +शयः (त् + श=च्छ) =हच्छयः महत् + शृङ्खला = (त् + शृ=5) महच्वृद्धला (१) यदि हस्व स्वर से आगे छकार हो तो वह चकार से संयुक्त हो जाता है। जैसे- परि +छेदः =(इ+छे = इच्छे) = परिच्छेदः तरु + छाया =(3+छा = उच्छा)=तरुच्छाया श्रव +छेदः = (श्र+छे = अच्छे) = अवच्छेदः (१०) पदान्त मकार को यदि उसके आगे कोई म्यान हो तो अनुस्वार हो जाता है। जैसे- (म् +व+व)-गुरुं वन्दे सत्वरम् + यासि = (म् + या= - या)=सत्वरं यासि धनम् + देहि = (म् +दे= -दे)= धनं देहि (११) यदि अपदान्त अनुस्वार से परे पांचों वर्गों में से किसी वर्ग का कोई वर्ण हो तो अनुस्वार को उसी वर्ग का अनुमासिक पर्व हो जाता है। जैसे- श्र + कित :( +कि = कि) = अङ्कितः अं + चितः-( + चि= न्चि)= अन्चितः कुं + ठित:-(- +ठि ण्ठि) = कुण्ठिता नं +दित:-(- +दि = न्दि) = नन्दिता + पिता=(- +पि = म्पि) =कम्पिता गुरुम् + वन्दे - है -- स्वङ्करोषि - - ( ६ ) पदान्त में विकल्प से होता है। जैसे- वं+करोषि-(- + =) प +करोषि =(-+क= -क) = त्व करोपि (१२) अपदान्त नकार या मकार को अनुनासिक और अन्तःस्थ वों को छोड़ कर कोई व्यञ्जन श्रागे हो तो उसको भी अनुस्वार हो जाता है। जैसे- पयान् + सि =(न् + स= -स)= पयासि रम् + स्यते=(म् + स्य = .. स्य)=रंस्यते (१३) यदि पदान्त 'न्' के श्रागे (यदि वह हस्व स्वर से श्रागे हो) कोई स्वर श्रावे तो 'न्' को द्वित्व होता है। जैसे- पतन् + अर्भकः =(न् + अ =न) = पतनर्भकः कुर्वन् + पास्ते -- (न् + श्रा-न)= कुर्वन्नास्ते दीर्घ स्वर के परवर्ता 'न्' को द्वित्व नहीं होता है। जैसे- विद्वान् + श्रागतः = (न् + श्रा=ना)= विद्वानागतः ४) यदि पदान्त 'न्' से भागे 'च', 'छ', 'ट', 'ठ', 'त' या 'थ' हो तो 'न्' को अनुस्वार होकर 'च' 'छ' को 'श' का श्रागम होता है। 'ट' 'ट' को 'प' का श्रागम होता है और 'त' 'ध' को 'स' का । जैसे- कस्मिन् + चित् = (न् + च = -श्च)= कस्मिंश्चित् संशयान् + छेत्तम् = (न् + 2 = - श्छे) संशयांश्वेत्तुम् कुर्वन् +टकारः = (न् + ट=-ट )=कुर्वष्टङ्कारः विद्वान् + ठक्कुरः = = (न् +=-8 )= विद्वाष्ठक्कुरः महान् +तडागः - (न् +त= - स्त)=महास्तडागः कुर्वन् + थूत्कार:-(न् + )= - स्थू) = कुर्वस्थकार -
विसर्गसन्धिः
.
स्वर या स्वर-संयुक्त व्यञ्जनो के साथ जो विसर्ग की सन्धि होती
है उसे विसर्गसन्धि कहते है।
(१) यदि एक पद मे या समास मे इकार-उकार-पूर्वक विसर्ग से
श्रागे 'क', 'ख', या 'प', 'फ' रहे तो विसर्ग को प्रायः मूर्द्धन्य 'ष' हो
जाता है। जैसे-
निः + कामः =(इ:+का=
(इ.+का=इष्का)= निष्कामः
दुः + करम् =(:+ क = उष्क) = दुष्करम्
निः +खेदः =(इ:+खे = इष्खे)= निष्खेदः
हविः + पानम् = (इ:+पा= इप्पा)= हविष्पानम्
चतु: + पथम् = (+== उष्प)= चतुष्पथम्
निः + फलम् = (इ:+फ=इष्फ)= निष्फलम्
दुः + फलम् =(:+फ= उष्फ)= दुष्फलम्
(२) कृ धातु से बना किसी पद से मिलने पर नमः और पुरः
शब्दो के विसर्ग को 'स्' होता है। जैसे-
नमः+ कृत्य-(+कृ=स्कृ)= नमस्कृत्य
पुर:+कारः =(+क= स्क) = पुरस्कारः
( ३) वैसे तिरः के विसर्ग को विकल्प से 'स्' होता है।
तिरः+कारः (:+ का= स्का)= तिरस्कारः
(+,:का)= तिरस्कारः
तिर+
( १ ) . - - निः+छल: निः+तारः - मनः+गत: मन:+जव: ४) यदि विसर्ग के आगे 'च', 'छ', हो तो विसग को 'श' और यदि 'त' आगे हो तो 'स्' हो जाता है। जैसे- निः+चिनोति=(:+चि=श्चि)=निश्चिनोति (+छ = श्छ) = निश्छलः =(:+ता=स्ता) = निस्तारः (५) यदि प्रकार के परे विसर्ग से वर्ग के तृतीय, चतुर्थ, पन्चम चर्ण या अन्तःस्थ वर्ण, या 'ह' श्रागे हो तो प्रकार और विसर्ग को 'ओ' श्रादेश हो जाता है। जैसे- (अ.+ग=ो ग)= मनोगत. =(श्रः+ज= योज)=मनेाजव. यशः+दा (श्रः + दा=ो दा)= यशोदा मनः+भवः =(श्रः+भ =ओ भ)=मनोभवः तेजः+ मयः = (श्र:+म =ो म)-तेजोमयः मनः + रथः = (श्रः+र =ो र) =मनोरथः (६) यदि हस्व श्रकार से भागे विसर्ग और उससे श्रागे फिर हस्व अकार हो तो पूर्व 'अ' से मिलकर विसर्ग को 'श्री' प्रादेश हो जाता है और पर प्रकार उसी मे मिल जाता है। जैसे- मना+अवधानम् -(श्रः+अ =ओs) =मनाऽवधानम् शिवः+श्रयः =(श्रः + अ = श्रेोऽ)= शिवोऽयः ७) यदि श्रकार को छोड कर अन्य स्वरो से आगे विसर्ग हो और उनसे श्रागे वर्ग के तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम वर्ण या ह, य, व, ल, या स्वर वर्ण हो तो विसर्ग के स्थान में रेफ होता है। जैसे- नि: + गुण:- (इ: +गु= इर्ग) = निर्गणः निः + जलम् = (इ.+ज= इज) = निर्जलम् दु: + दान्त: (+दा= उर्दा) =दुर्दान्तः (ोः + व= ओर्व) =तरोर्वनम् तरोः + वनम् = १२ ) - निः + रसः - मिः+हरणम् = (इः +ह = निह) = निहरणम् निः+रपायः = (इः+ उ = इरु )= निरुपायः (८)'भ' से आगे 'र' से आया हुआ विसर्ग हो". या 'इ', 'स', से श्रागे कोई विसर्ग हो और उससे श्रागे रकार हो तो विसर्ग' का लोप होकर उससे पूर्ववर्ण को दीर्घ हो जाता है। जैसे- पुनः+रकम् =(अः+र = श्रार) =पुनारक्तम् = (इ:+र = ईर )= नीरस. शम्भुः + राजते = (उ: +रा =जरा) = शम्भूराजते (१) यदि 'ए', 'ऐ', 'श्री' या 'श्री' से धागे विसर्ग हो और उससे आगे रकार हो तो केवल निसग का लोप होता है। जैसे- हरेः +रमणी =(ए: +र = एर )= हरे रमणी नरैः+रक्ष्यते - (ए:+र=ऐर )= नरै रक्ष्यते सामोः+ रुचि:-(ोः + 5 =ोरु)= साधो रुचिः ग्लौः+रानते =(औः + रा= औरा)=ग्लो राजते (१०) 'भ' से आगे विसर्ग का लोप हो जाता है जब कि उससे श्रागे हस्व 'म' को छोड़ कर कोई स्वर रहे। जैसे- कुतः+भागतः = (श्रः +श्रा = श्रा) = कुत आगतः नर+इव (श्रः+ इ = इ )=-नर इव इतः+ अर्ध्वम् = (अः + ऊ = अ अ )= इत ऊर्ध्वम् देवः +ऋषिः =(sः+ ऋ = अ ऋ)=देव ऋषिः कः +एष: =(अ.+ए-थए -क एषः (११) सः और एषः के विसर्ग का यदि आगे हल या 'अ' भित्र कोई स्वर हो तो लोप हो जाता है। जैसे- अन्तर्, पुनर्, प्रातर, स्वर या प्रकारान्त शन्दो के सम्बोधन के एकवचन में पितर, मातर् प्रभृति शब्दों में 'र' के स्थान मे जो विसर्ग हो जाता है (मातः पिता इत्यादि) उसे रजात या 'र' से श्राया हुआ विसर्ग कहते है। - ( १३ ) स: + क्रीडति-स क्रीडति सः +आगतःस श्रीगतः एष:+गति =एष गच्छति एषः + एति = एप एति [णत्वविधिः (1) 'ऋ', 'ऋ', 'र', 'ष के धागे उस्ली पद का 'न' हो तो 'न' 'ण' हो जाता है। जैसे, नृ+नाम् = नृणाम्, विस्तीर् + नम्, विस्तीर्णम्, पुष + नाति=पुष्णाति । (२) 'क', 'ऋ', 'र' या 'प' और न के बीच में, स्वरवर्ण, कवर्ग, पवग', 'य', 'व', 'ह' और अनुस्वार हो तो भी 'न' को 'ण' हो जाता है। जैसे, गुर्+र+ना=गुरुणा, मूर् + ख+ए+न= मूर्खेण, + + ह +श्रा+नाम् =ग्रहाणाम् । परन्तु अन्य किसी वर्ण के व्यवधान में 'न' को 'ण' नहीं होगा; जैसे, रो+द+नम् =रोदनम् (रोदणम् नहीं)। (३) पदान्त मे स्थित हलन्त 'न्' को 'ग' नहीं होता है, जैसे, पितॄन् (पितृण नही)। (४) 'ऋ' प्रभृति और 'न' भिरा पद मे होने से प्रायः 'न' को 'ण' नहीं होता है। परन्तु कई स्थानों मे भिम पद का 'न' भी उपसग प्रभूति पूर्वपद के '', 'मृ' 'र' या 'प' के कारण से 'ण' हो जाता है, जैसे,प्र-वनम् = प्रवणम्, राम-अयनम् = रामायणम्,प्र-नमति = प्रणमति । षत्वविधिः (१) 'अ', 'श्रा' से भिन्न स्वर, कवर्ग या 'र' के श्रागे प्रत्यय का 'स' हो तो उसको 'प' हो जाता है। जैसे, रामे+ सु =रामेपु, दिक् + सुदिचु, चतुर् + सु = चतुर्यु । (२) 'इ' प्रभृति स्वर, कवर्ग या 'र' और 'स' के बीच मे अनुस्वार या विसर्ग हो तो भी 'स' को 'प' होगा, अन्य वर्ण के व्यवधान से नहीं + सि= धनूषि, श्रायुः+:+सु=श्रायुःषु । (३) इनके अतिरिक्त और कई स्थानों मे 'इ' प्रभूति स्वर, कवग या 'र' के आगे 'स' को 'प' हो जाता है। जैसे, सि+ सेवे=सिपेवे, मि+ सद्य = निषय, मातृ + स्वसा = मातृष्वसा।] होता है। जैसे, धन+ शब्दरूपाणि संस्कृत में संज्ञा, सर्वनाम तथा विशेषणो की सात विभक्तिों होती है। प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, सप्तमी (सम्बोधन प्रथमा के ही अन्तर्गत होता है ) प्रत्येक विभक्ति के तीन तीन वचन होते है और इन्हीं विभक्तियो से २१ प्रत्यय होते है । विभक्तय एकवचनम् द्विवचनम् औ श्री बहुवचनम् श्रः श्रम् श्रा भ्याम भिः प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पन्चमी षष्टी सप्तमी ए भ्यः 4 भ्याम् भ्याम श्रोः श्रोः श्राम , ह सु पुंलिङ्गशब्दरूपाणि " " हे राम अकारान्त राम शब्द-किसी मनुष्य का नाम । एकव० द्विव० बहुव० प्रथमा रामो रामाः द्वितीया रामम् रामान् तृतीया रामेण रामाभ्याम् रामैः चतुर्थी रामाय रामेभ्यः पन्चमी रामात् पष्ठी रामस्य रामयोः रामाणाम् सप्तमी रामे रामेपु सम्बोधन हे रामौ हे रामाः कवि-कविता करनेवाले प्र० कवि कवी कवय द्वि० कविम कवी कवीन् तृ. कविना कविभ्याम् कविसि व० कवये कविभ्य पं० कवेः कन्योः कवीनाम का कन्योः कविषु सं० हे कवे हे कवी कवयः पति-स्वामी पतिः पती पतय. द्वि० पतिम् पती पतीन् ( १६ ) ए. द्वि० पतिभ्याम पस्या पत्ये पतिभिः पतिभ्यः ६० पत्युः ष. पत्योः स० पत्यौ हे पते पतीनाम् पतिषु हे पतयः सं० हे पती सखि-मित्र सखायौ . प्र. सखा द्वि० सखायम् सखिभ्याम् सखायः सखीन् सखिभिः सखिभ्यः सख्या सख्ये च. पं० सख्युः " प० सख्योः स० सख्यौ हे सखे सखीनाम सखिषु हे सखायः " सं० हे सखायौ सुधी-बुद्धिमान, विद्वान सुधीः सुधियो सुधियः द्वि० सुधियम् सुधीभ्याम् सुधिया सुधिये सुधिय. सुधीभिः सुधीभ्यः च. पं० " " सुधियोः स० सुधियि हे सुधी. सुधियाम सुधीषु हे सुधियः सं० हे सुधियो ( १७ ) शम्भु-शिव बहुव० शम्भद' प्र० एकव. शम्भु शम्भुम् शम्भुना शम्भवे शम्भोः द्विव० शम्भू शम्भू शम्भुभ्याम् द्वि० शम्भून् शम्भुभिः शम्भुभ्यः पं० शम्भवोः शम्भौ हे शम्भो शम्भूनाम् शम्भुषु हे शम्भव: सं० हे शम्भू पितृ-पिता पितरौ द्वि० पिता पितरम् पित्रा पित्रे पितुः पितर. पितन् पितृभिः पितृभ्य. पितृभ्याम् ECE पं. पित्रोः पितरि पितृणाम् पितृपु हे पितरः स० सं० " हे पितः हे पितरौ गो-बैल गौः गावो गाम् द्वि० ४० गोभ्याम् गवा गवे गा: गोभिः गोभ्य ( १८ ) पं. गोः द्वि० गोभ्याम् गवो गोभ्यः प. स० गवि सं० हे गौः गवाम् गोपु हे गाव हे गावौ ददत्-देता हुआ ददतौ ददतः प्र० ददत् द्वि० ददतम् तृ० ददता च० ददते पं० ददतः ददभ्याम् ददद्भिः ददद्भ्यः " प. स० ददति ददतोः ददतोः हे ददतौ ददताम् ददरसु हे ददता सं० हे ददत् राजन्-राजा राजानौ राजानः प्र० राजा द्वि० राजानम् राज्ञा घ. राज्ञे राज्ञः राजमिः राजभ्याम् राजभ्यः ६० राज्ञः प. राज्ञः राज्ञोः राज्ञाम् राज्ञि स० राजनि राजसु सं० हेराजन् हे राजानौ हेराजाना ( १६ ) करिन् -हाथो द्वि० करिणी च० करिणः " करिभ्याम् ए० करी द्वि० करिणम् करिणा च० करिणे पं०. करिणः करिणः करिणि सं० करिमिः करिभ्यः करिणो. स० करिणाम् करिषु हे करिणः हे करिन् हे करिणौ श्रात्मन् श्रात्मानौ प्र० पारमा अात्मान. द्वि० श्रात्मानम् श्रात्मनः श्रात्मभिः प्रात्मभ्याम् आत्मना प्रात्मने प्रात्मभ्यः पं० प्रात्मनः " प्रात्मनः " आत्मनि स० सं० श्रात्मनाम् प्रात्मसु हे भारमानः हे श्रारमन् हे श्रात्मानौ ।
स्त्रीलिङ्गशब्दरूपाणि रमा-लक्ष्मी द्वि० रमे रमा रमाः द्वि० रमाम् रमाभ्याम् रमाभिः तृ० च० पं० रमया रमायै रमाभ्यः रमायाः ० “५० रमयोः रमायाम् हे रमे रमाणाम् रमासु हे रमाः सं० हे रमे रुचि-कान्ति, अनुराग प्र० रुचिः रुचिम् द्वि० रुचयः रुचीः रुचिभिः रुचिभ्यः रुचिभ्याम् रुच्या रुच्यै, रुचये रुच्याः, रुचेः रुच्याः, रुचे पं. " म. रुच्योः रुचीनाम रुच्याम्, रुचौ रुचिषु हे रुचयः हे रुची ( २१ ) नदी व० द्वि० नद्यौ नद्यः द्वि० नदी नदीम् नद्या नये १० नदीभ्याम् नदीभ्याम् नदीः नदीभिः नदीभ्यः पं० नधा: नयोः नद्याम् हे नदि नदीनाम् नदीषु हे नद्यः म० हे नद्यौ श्रियः प्र. द्वि० नृ० श्री लक्ष्मी, शोभा श्री. श्रिया श्रियम् श्रिया श्रीभ्याम् श्रियै, श्रिये श्रियाः, श्रियः श्रियोः प्रियाम्, प्रिय हे श्री. श्रीभिः श्रोभ्य. " घ. श्रीणाम्, श्रियाम श्रीपु हे श्रियः स० सं० " हे श्रियः स्त्री स्त्रिया स्त्रिय. स्त्रिया, खी: द्वि० तृ स्त्री स्त्रियम्, स्त्रीम् स्त्रिया खिये स्त्रीभ्याम् स्त्रीभिः स्त्रीभ्य.
( २२ ) पं० स्त्रियाः द्वि० स्त्रीभ्याम् स्त्रियोः स्त्रीभ्य. स्त्रीणाम स्त्रोषु हे स्त्रियः स्त्रियाम् हे स्त्रि हे स्त्रियो धेनु-गाय धेनू धेनुः धेनुम् द्वि० " धेनवः धेनू. धेनुभिः धेनुभ्यः तृ० धेनुभ्याम् च. धेन्वा धेन्वै, धेनवे धेन्वा., धेनाः पं० " च. धेन्वोः धेन्वाम् , धेनौ हे धेनो धेनूनाम् धेनुषु हे धेनवः सं० हे धेनू वधू-बहू . वध्वी वध्वः प्र. द्वि० वधूः वधूम वध्वा वध्वै वधूभ्याम वधूः वधूभिः वधूभ्यः " म. वध्वाः " . वध्वाः स० वध्वाम वधूनाम वभूषु हे वध्व. सं० हे वधु हे वध्वी
( २३ )
मातृ-माता
ए.
द्वि०
मातरी
प्र०
माता
मातरः
द्वि०
मातरम्
मात.
मातृभ्याम
मातृभि.
मान्ना
माने
मातृभ्य.
५०
मात्रो.
मातुः
मातु:
मातरि
हे मात:
स०
सं०
मातृणाम
मातृषु
हे मातरः
हे मातरौ
नपुंसकलिङ्गशब्दरूपाणि ज्ञान ए. द्वि० ज्ञाने ज्ञानम् ज्ञानानि प्र० द्वि० " तृ० ज्ञानेन ज्ञानाभ्याम् ज्ञाने. ज्ञानेभ्यः ज्ञानाय - पं० ज्ञानात् ज्ञानयोः ज्ञानस्य ज्ञाने स० ज्ञानानाम् ज्ञानेषु हे ज्ञानानि सं० हे ज्ञान हे ज्ञाने वारि-जल प्र० वारि वारिणी वारीणि द्वि० वारिभिः वारिभ्यः च. पं० " वारिणा वारिभ्याम् वारिणे वारिणः वारिणोः वारिणि हे वारे, हे वारि हे वारिणी स. वारीणाम वारिषु हे वारीणि सं० ( २५ ) दधि-दही द्वि० दधिनी दधि दधीचि द्वि० दधिभ्याम् दधिभिः दधिभ्यः च० पं० दने दुनः दन्न: दन्ति, दधनि हे दधे, हे दधि दनोः स० दनाम् दधिषु हे दधीनि सं० हे दधिनी मधु-शहद मधुनी प्र० मधु मधूनि द्वि " मधुभ्याम् मधुना मधुन मधुन. मधुभिः मधुभ्यः च० प० " प० मधुन " मधूनाम् मधुषु स० सं० मधुनि हे मधो, हे मधु हे मधुनी हे मधूनि जगत्-संसार जगत् जगती जगन्ति प्र० द्वि० तृ. जगता जगदुद्भ्याम् जगद्भिः जगदभ्यः जगत " ( २६ ) ए. द्वि० जगद्भ्याम् पं० जगतः जगतो जगद्भ्यः जगताम् जगत्सु हे जगन्ति स० जगति सं० हे जगत् हे जगती नामन्-नाम नाम नाम्नी, नामनी नामानि द्वि० , " तृ० नामभ्याम् नामभिः नाम्ना नाम्ने नामभ्यः च० पं० नाम्नः नाम्नों: स० नाम्नि, नामनि नान्नाम् नामसु हे नामानि सं० हे नाम्नी, हे नाम, हे नामन् हे नामनी पयस-दूध . पयः पयासि पयसी प्र० द्वि० तृ० " पयोभ्याम् पयसा पयसे पयोभिः पयोभ्यः di पं० पयसः प. पयसोः स. पयसि पयसाम् पयस्सु हे पयांसि सं० हे पयः हे पयली सर्वनामशब्दरूपाणि प्र० द्वि० तृ० पं० प. स " . इदम्-यह पुंलिङ्ग द्वि० श्रयम् इमौ इमे इमम्, एनम् एनौ इमान्, एनान् अनेन, एनेन आभ्याम् एभिः अस्मै श्राभ्याम् एभ्यः अस्मात् एभ्यः अस्य अनयोः, एनयोः एषाम् अस्मिन् एपु सर्वनाम शब्दों का सम्बोधन नहीं होता है। स्त्रीलिङ्ग इयम् इमे इमाः इमाम्, एनाम् एने नया, एनया श्राभ्याम् श्राभिः अस्यै श्राभ्यः प्रस्या अनयोः, एनयोः प्रासासू अस्पाम् श्रासु नपुंसकलिङ्ग इमे इमानि एने शेष विभक्तियो के रुप पुलिग की तरह होते है। . " द्वि० तृ० , एनाः प. " خیال "" एनत् ", एनानि ( २८ ) तदु-वह पुंलिङ्ग द्वि० तौ ते सः द्वि० तम् तेन तस्मै ४० तान् ते: तेभ्यः ताभ्याम् पं० तस्मात् तस्य तस्मिन् तयोः तेषाम, तेषु स " स्त्रीलिङ्ग ताः प्र. सा . द्वि० ताम् १० तामिः ताभ्याम् तया तस्यै ताभ्यः " पं. तस्या " तयोः तापाम तस्याम् तासु नपुं० से तत् तानि द्वि० शेष विभक्तियों के रूप पुंलिङ्ग की तरह होते हैं ।
( २६ ) यदु-जो पुं० द्वि० यो द्वि० " यम् येन यस्मै याभ्याम् यान् यैः येभ्यः पं० यस्मात् यस्य यस्मिन् ययोः येषाम येषु स्त्री० प्र० या ये या: द्वि० . याम् यया यस्यै याभ्याम् याभिः च० याभ्या ६० यस्याः " ययोः , यासाम् यस्याम् यासु नपुं० क प्र० यत् यानि द्वि० शेष विभक्तियो के रूप पुंलिङ्ग की तरह होते है ।
( ३० ) किम्-कान पुं० द्वि० प्र. को 18 द्वि० कम् केन कस्मै काभ्याम् कान् कैः केभ्यः पं० कस्मात् " " प. कयोः कस्य कस्मिन् केषाम केषु स० स्त्री० का के काः द्वि० काम् कया कस्यै काभ्याम् काभिः काभ्याम काभ्यः ६० कस्याः काभ्य प. कासाम कयोः कयोः स० कस्याम कासु नपु० किम के कानि प्र० द्वि० . शेष विभक्तियों के रूप पुलिङ्ग के समान होते है।
( ३ ) एतद्-यह द्वि० द्वि० एषः एतम, एनम् एतेन, एनेन एतस्मै एतौ एना एताभ्याम् एते एतान्, एनान् एतै. एतेभ्यः १० पं० प. एतस्मात् एतस्य एतस्मिन् एतयो., एनयोः एतेपाम् एतेषु स० " स्त्री० प्र० एषा एताः द्वि० एते एने एताभ्याम् "" एना एताभिः एताम्, एनाम् एतया, एनया एतस्यै एतस्याः एताभ्य. प. " प. एतयो , एनयोः एतासाम् एतासु स० एतस्याम् नपुं० द्वि० एनानि एतत् एते एतानि एनत् एने शेष विभक्तियों के रूप पुलिग के समान होते है।
( ३२ ) श्रदस-वह द्वि० असो अमू श्रमी द्वि० तृ. अमूभ्याम अमूभ्याम् अमून् श्रमीभिः अमीभ्यः अमुम् यमुना श्रमुष्मै अमुष्मात् अमुल्य मुष्मिन् पं० प. श्रमुयो. अमीषाम अमीषु स० " स्त्री० अमूम. " . असो श्रमू श्रमू: द्वि० ६० प्रमुया श्रमूभ्याम श्रमूभिः च० अमुष्यै अमूभ्यः ६० अमुष्याः अमूभ्यः अमुयोः अमूपाम् स० अमुष्याम् श्रमूपु नपुं० प्र० श्रदः श्रमू अमूनि द्वि० शेष विभक्तिपो के रूप पुंलिङ्ग के समान होते है। " " संख्यावाचकाः शब्दाः Salog द्वे " " एक शब्द द्वि शब्द ए०व० द्वि० व. पुं० स्त्री० नपु० स्त्री० और नपुं० प्र० एका एका एकम् द्वि० एकम् एकाम् ४० एकेन एकया एकेन द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् एकस्मै एकस्यै एकस्मै प. एकस्मात एकस्याः एकस्मात् एकस्य एकस्य द्वयोः द्वयोः एकस्मिन् एकस्याम् एकस्मिन् 'एक' शब्द एकवचन ने प्राता है, किन्तु यदि उसके अनेक थभिधेय हो तो बहुवचन से भी श्राता है। 'द्वि' शब्द केवल द्विवचन श्राता है। इसके बाद के सख्या- पाचक शब्दसव केवल बहुवचन ने प्रयुक होते है।
( ३४ ) त्रि-तीन पुंलिङ्ग नपुंसक स्त्री० त्रय. त्रीणि तितः द्वि० जीन् " ४० त्रिभिः त्रिभिः तिमुभिा च. त्रिभ्यः त्रिभ्य: तिसभ्यः पं० त्रयाणाम त्रयाणाम तिमृणाम स० त्रिषु त्रिषु तिसषु चतुर-चार - प्र. चत्वारः चत्वारि चतमः द्वि० चतुरः ४० चतपमिा चतुर्भिः चतुः चतुर्भिः चतुभ्यः च. चतसृभ्यः पं० चतसृणाम् चतुर्णाम् चतुर्ष चतुर्णाम् चतुषु स० चतमषु पञ्चन् = पांच, षष = छः, सप्त = सात, नवन = नव, दशन् = दश ( ३५ ) च षट सप्त नव द्वि० नव दश तृ० पञ्चभि. सप्तभिः नवभि. दशभिः पड्भिः षड्भ्यः पञ्चभ्यः सप्तभ्यः नवभ्य. दशभ्य पं० पन्चभ्य " ष. पञ्चानाम षण्णाम सप्तानाम नवानाम् दशानाम् स० पञ्चसु षट्सु सप्तसु नवसु दशसु पन्चन् शब्द से लेकर नवदशन् तक सब शब्दों के रूप तीनों लिङ्गों में समान होते है। अष्टन-पाठ ब. व० प्र० अष्टौ, अष्ट , द्वि० "" अष्टभि , अष्टाभि , अष्टभ्यः, अष्टाभ्यः पं० घ. अष्टानाम् स० श्रष्टसु, श्रष्टासु अर्नावशति से लेकर भागे सब संख्यावाचक शब्द एकवचन में आते है। जैसे, विंशतिः वृक्षाः, पन्चविंशतिः कन्याः, निशत् फलानि । पर जब उस संख्या के कई का अर्थ हो तो तीनों वचन में पाते है यथा-एक शतम्, द्वे शते, त्रीणि शतानि (एक, दो या तीन सौ)।
( ३६ ) ११ १२ रिशत १३ १४ १५ १६ ७. १७ एकादश द्वादश त्रयोदश चतुर्दश पन्चदश षोडश सप्तदश अष्टादश नवदश ऊनविंशतिः विशतिः एकविंशतिः द्वाविशतिः त्रयोविशतिः चतुर्विशतिः १८ ८२ चत्वारिशत् नवचत्वारिशत् ऊनपन्चाशत् पन्चाशत् पष्टिः सप्ततिः अशीतिः द्वयशीतिः नवतिः पण्णवतिः शतम् एकाधिकशतम् द्वयधिकशतम् ज्यधिकशतम् दशाधिकशतम् द्वशते त्रीणि शतानि 80 } १ १६ २० २१ १०१ २२ १०२ २३ १०३ २४ ११० १२ २९ नवविंशतिः जनत्रिंशत् त्रिंशत् नवत्रिशत् अनचत्वारिंशत् सहस्त्रम् लक्षम् १००० १००००० } ३६ कोटि: १००००००० am- धातुरूपाणि क्रिया के दस गण होते है- (6) भ्वादिगण (२) अदादिगण (३) जुहोत्यादिगण (४) दिवादिगण (१) स्वादिगण (९) तुदादिगण (७) रुधादिगण (८) तनादिगण (१) ज्यादिगण (१०) चुरादिगण । भ्वाद्यदादी जुहोत्यार्दिवादिः स्वादिरेव च । तुदादिश्च रुधादिश्च तनत्यादिचुरादयः ॥ जैसा कि हम पहले कह पाये है कि कुछ क्रियायें परस्मैपदी, कुछ प्रारमनेपदी और कुछ उभयपदी होती है, इसी प्रकार से हम वहीं कह पाये है कि क्रिया के नव लकार होते है। इस पुस्तक में हम धातुओं के रूप केवल पांच लकारों मे देंगे-लट्, लोट, (विधि) और लूट् । इन लकारों के स्थान में निम्नलिखित प्रत्यय होते है लट् (वर्तमान) परस्मैपद श्रात्मनेपद ए०व० द्वि० व० ब० व. ए० व० द्वि० ० - लिङ, लग । ब० व० अन्ति अन्ते प्र० पु० ति म० पु० सि १० पु० मि ते से थः थ पाते श्राथे वहे महे ( ३८ ) लोट् (श्राज्ञा) श्रात्मनेपद परस्मैपद - प्र० पु० तु म० पु० हि ३० पु० श्रानि FF ऐ प्र० पु० यात् म० पु० याः उ० पु० याम् ताम् श्रन्तु ताम् श्राताम् अन्ताम् तम् त स्व श्राथाम् ध्वम् श्राव श्राम श्रावह श्रामहै विधिलिङ् याताम् युः ईत ईयाताम् ईरन् यातम् यात ईथाः ईयाथाम् ईध्वस् याव याम ईय ईवहि ईमहि लङ् (अनद्यतनभूत) ताम् अन् । त प्राताम् अन्त तमू था: प्राथाम् ध्वम् च इ वहि महि लुट् (सामान्यभविष्य) स्यतः स्यन्ति स्यते स्येते स्यन्ते स्यथ: स्यथ स्यसे स्येथे स्यावे स्याव स्याम स्ये स्यावह स्यामहे प्र० पु० त् म० पु० . उ० पु० श्रम् त म प्र० पु० स्यति म० पु० स्यसि ३० पु० स्यामि परस्मैपदी (१) भ्वादिगण पठ-पढ़ना प्र० पु० पठन्ति म० पु० पठथ उ० पु० पठामा वर्तमान काल (लट् लकार) एक व० द्वि० ० पठति पठतः पठसि पठयः पठामि पठावः अाज्ञा (लोट) पठतु पठताम् पठतम् पठानि पठाव विधिलिङ पठेत् पठेताम् पठे. पठेतम् पठेयम् पठेव पठन्तु प्र० पु० म० पु० १० पु० पठत पठाम प्र. पु. म० पु० १० पु० पठेयुः पठेत पठेम अनद्यतनभूत (लड) अपठत श्रपठताम् अपठन् प्र० पु० म. पु० यपठ अपठतम् अपठत्त १० पु० अपठाव अपठाम , ए०व० (४ सामान्यभविष्य (लट) द्वि० व. पठिष्यति पठिष्यतः पठिष्यसि पठिष्यथा पठिष्यामि पठिष्याव: प्र० पु० म. पु० ३० पु० पठिष्यन्ति पठिप्यथ पठिष्यामः (२) प्रदादिगण अस होना (वत्तमानकाल) ल: स्त. सन्ति प्र. पु० म. पु० १० पु० अस्ति असि अस्मि स्वः श्राज्ञा (लोट) स्ताम् सन्तु प्र. पु० म. पु० उ०. पु० प्रस्तु एधि असानि स्तम् श्रसाव असाम विधिलिङ्ग स्यात् प्र० पु० म. पु० स्याताम् स्यातम् स्युः स्यात स्याः पु० स्यामू स्याव स्याम (४१ पहुव. प्रासन् प्र० पु० म० पु० उ० पु० अनद्यतनभूत (लङ) एफव० द्विव० श्रासीत् श्रास्ताम् थासी: शास्तम् थासम् श्रास्व सामान्यभविष्य (लट्) भविष्यति भविष्यसि भविष्यथः भविष्यामि भविप्याव भविष्यत प्र० पु० म० पु० २० पु० भविष्यन्ति भविष्यथ भविष्यामः प्र० पु० म० पु० १० पू० (३) हादि (जुहोत्यादि) गण दा-देना वत्तमान (लट लट) ददाति दत्तः ददति ददासि दस्थः दस्थ ददामि दमः अाशा (लोट) ददातु दत्ताम् दद देहि दत्तम् दत्त ददानि ददाव ददाम विधिलिङ्ग दद्यात् दद्याताम् दद्या दधाः दद्यातम् दद्यात दद्याम् दघाव दद्याम प्र० पु० म० पु० २० पु० म० पु० म० पु० १० पु० -- -- - ( ४२ ) प्र० पु० म० पु० उ० पु० अनद्यतनभूत (लङ्) एकव० द्विव० अददात् अदत्ताम् अददाः प्रदत्तम् अददाम् श्रदद्व सामान्यभविष्य (लट्) दास्यति दास्यत दास्यसि दास्यथः दास्यामि दास्याव: बहुव० अददुः प्रदत्त श्रदम प्र० पु० म. पु० दास्यन्ति दास्यथ ४० पु० दास्यामः (४) दिवादिगण नृत्--नाचना वर्तमान (लट) नृत्यतः प्र० पु० म. पु० नृत्यति नृत्यसि नृत्यामि नृत्यथ नृत्याव. नृत्यन्ति नृत्यथ नृत्यामः उ. पु० आज्ञा (लोट) प्र० पु० म० पु० नृत्यतु नृत्य नृत्यानि नृत्यताम् नृत्यतम् नृत्याव नृत्यन्तु नृत्यत नृत्याम उ० पु० प्र० पु० विधिलिङ नृत्येताम् नृत्येतम् नृत्येव नृत् नृत्ये तृ येयम् स० पु० 3. पु० नृत्येयुः नृत्येत नृत्येम ( ४३ ) अनद्यतनभूत (लड्) द्विव० एकव० बहुव० प्रनृत्यन् अनृत्यत अनृत्याम अनृत्यताम् अनृत्यतम् नृत्याव अनृत्यत् अनृत्यः अनृत्यम् प्र० पु० म. पु० उ. पु० सामान्यभविष्य (लट्) नर्त्तिव्यति, नतिप्यत. नत्यति नत्यंत नतिष्यसि, निर्तिव्यथः, नपसि इनर्तिप्यामि, निर्त्तिव्याव., नामि नाव नतिष्यन्ति, नय॑न्ति नतिप्यघ, नत्स्यथ निर्शिप्याम., नामः प्र० पु० नत्स्यथ म० पु० उ० पु० (५) स्वादिगण श्रु-सुनना वर्तमान (लट्) शृणुत. शृण्वन्ति शृणुध शृणुम, शृण्मः शृणुथ. प्र० पु० शृणोति शृणोपि शृणोमि शृणुव, शृण्व: म० पु० आज्ञा (लोट) शृण्वन्तु । शृणुत शृणोतु शृणुताम् शृणुतम् शृणवास प्र० पु० म. पु० शृणवाव शृणवानि 80 पु० ( १४ ) विधिलिङ् एफव० দ্ভিন্ন ০ प्र० पु० शृणुयात शृणुयाताम् बहुव० शृणुयुः शृणुयात शृणुयाम म० पु० शाया. शृणुयातम् शृणुपाव २० पु० शृणुयाम् प्र० पु० अण्वन् म० पु० अशृणुत अशृणुम, अशृण्म अनद्यतनभूत (लङ) थशृणोत् प्रशृणुताम् अशृणो: थशृणुतम् प्रशृण्वम् अशृणुव, अशृण्व सामान्यभविष्य (लट्) श्रोष्यति श्रोष्यत श्रोष्यसि श्रोष्यथः धोष्यामि श्रोष्यावः म० पु० श्रेष्यन्ति श्रोष्यब श्रोष्यामः २० पु. प्र० पु० पृच्छन्ति म० पु० (६) तुदादिगण प्रच्छ –पूछना वर्तमानकाल (लट) पृच्छति पृच्छतः पृच्छसि पृथ पृच्छामि पृच्छावः श्राज्ञा (लोट) पृष्छतु पृच्छताम् पृच्छ पृच्छतम् पृच्छानि पृच्छाव पृच्छथ उ० पु० पृच्छामः प्र. पु० म० पु. पृच्छन्तु पृच्छत पृच्छाम ~~ पहुव० पृच्छेयुः पृच्छेत पृच्छेम पु० म० पु० ( ४५ विधिलिङ एकव० द्विव० पृच्छेत् पृच्छेताम् पु० पृच्छे पृन्छेतस् पृच्छेयम् पृच्छेव अनद्यतनभूत (लङ्) अपृच्छत् अपृच्छताम् अपृच्छ. अपृच्छतम् प्रपृच्छम् अपृच्छाव सामान्यभविष्य (लुट) पु० प्रक्ष्यति प्रक्ष्यतः प्रक्ष्यसि प्रक्ष्यथ: पु० प्रक्ष्याव: प्रपन्छन् प्रपृच्छत अपृच्छाम पु० BB प्रक्ष्यन्ति प्रक्ष्यथ प्रक्ष्याम: प्र० म० पु० प्रमामि (७) रुधादिगण रुध-रोकना वर्तमान (लट) रुन्ध. सन्ध ध. प्र० रुन्ध्व. म० पु० रुणद्धि पु० रुणत्ति पु० रणधिम आज्ञा (लोट) रुन्धन्तु रुन्धाम् रुन्धम् रुणधाव रणधाम रुण रुन्धि प्र० पु० रुणधानि पु० ( ४६ ) विधिलिङ् द्विव० रुन्ध्याताम् एकव० प्र० रुन्ध्यात् बहुव० रुन्ध्यु रुन्ध्यात म. BBB रुन्ध्या: रुन्ध्यातम् उ. रुन्ध्याम् रुन्ध्याव रुन्ध्याम प्र० अनघतनभूत (लङ) अरुणत् अरुन्धाम् अरुणः, अरुणत् अरुन्धम् अरुणधम् अरुन्ध्व अरुन्धन म. من معه من अरुन्ध अरुन्धम पु० रोत्स्यति पु० रोत्स्यसि पु० रोत्स्यामि सामान्यभविष्य (लट) रोत्स्यतः रोत्स्यथः रोत्स्यावः रोत्स्यन्ति रोत्स्यथ रोत्स्यामः (८) तनादिगण कृ-करना वर्तमान (लट) करोति कुरुतः कुरुथः करोमि कुर्व. प्र० पु० पु० करोपि कुर्वन्ति कुरुथ कुर्म. पु० आज्ञा (लोट) कुरुताम् कुर्वन्तु कुरुत म. पु० करोतु पु० कुर पु० करवाणि कुरुतम् त करवाव करवाम ( ४७ ) विधिलिड् बहुव० कुर्यु कुर्यात कुर्याम 영봉 왕 पु० पु० एकव० द्विव० कुर्यात् कुर्याताम् कुर्या कुर्यातम् पु० कुर्याम् कुर्शव अनद्यतनभूत (लङ) पु० अकरोत् अकुरुताम् अकरो. अकुरुतम् श्रकरवम् अकुर्व अकुर्वन् अकुरुत अकुर्म प्र. म० BBB करिष्यन्ति करिष्यथ करिष्यामः सामान्यभविष्य (लुट) करिष्यति करिष्यत. करिष्यथ. करिष्यामि करिष्याव पु० प्र० पु० करिष्यसि म० पु० (८) क्रयादिगण जानन्ति जानीथ जानीम. 영영영 पु० जानासि ज्ञा--जानना वर्तमान ( लट्) जानाति जानीत: जानीथः जानामि जानीव. आज्ञा (लोट) जानातु जानीताम् जानीतम् जानन्तु जानीत जानाम B पु प्र. जानाव म० पु० जानीहि पु० जानानि ( ४८ ) बहुव० जानीयुः जानीयात जानीयाम म. विधिलिङ् एकव० द्विव० पु० जानीयात् जानीयाताम् पु० जानीयाः जानीयातम् पु० जानीयाम् जानीयाव अनद्यतनभूत (लड्) अजानात् अजानीताम् प्रजानाः अजानीत श्रजानाम् अजानीव सामान्यभविष्य (लुट्) पु० ज्ञास्यति ज्ञास्यतः पु० ज्ञास्यसि ज्ञास्यथः पु० ज्ञास्यामि ज्ञास्यावः पु० म. अजानन् अजानीत अजानीम m ज्ञास्यन्ति ज्ञास्यथ ज्ञास्यामः (१०) चुरादिगण भक्ष-खाना वर्तमान (लट) भनयतः भक्षयन्ति म. भक्षपति भक्षयसि भक्षयामि अनायथः अक्षयथ पु० भतनाव भक्षयामः याज्ञा (लोट) भक्षयतु भक्षयन्तु भनयताम् भारतम् म. पु० भक्षय अक्षयत भनयाणि भनयाव भनयाम पहुव० भनयेयुः भक्षयेत भनयम म०प्र० ३० पु० अभक्षयन् घभक्षयत विधिलिङ् एकव० द्विव० भक्षयेत् भक्षयेताम् भक्षयः भक्षयेत भक्षयेयम् भक्षयेव अनद्यतनभूत (लड) अभक्षयत् अभक्षयताम् अभचय. प्रभचयतम् श्रभनयम् श्रभक्षयान सामान्यभविष्य (लूट) भत्तयिष्यति भनयिष्यत. भक्षयिष्यसि भक्षयिन्यथः भक्षयियामि भनयिष्याव 'प्रभआयाम प्र० पु० म. पु० १० पु० भक्षयिप्यन्ति भक्षयियथ भवयिष्यामः प्र० पु० म० पु० २० पु० आत्मनेपदी (१) भ्वादिगण सेव-सेवा करना लट - ए०व० प्र० पु० सेवते पु० सेवसे द्विव० संवेते सेवेथे सेवावहे ब०व० सेवन्ते सेवध्वे संवामहे म० पु० सेवे पु० सेवताम् सेवस्व लोट सेवेताम् सेवेथाम् सेवावहै म. पु० सेवन्ताम् सेवध्वम् सेवामहै पु० सेवै प्र० पु० सेवेत विधिलिङ सेवेयाताम् सेवेयाथाम् सेवेवहि म० पु० सेवेथा. पु० सेवेय सेवेरन् सेवेध्वम् सेवेमहि प्र० पु० असेवत लङ् असेवेताम् असेवेथाम् श्रसेवावहि म. पु० असेवथाः असेवे असेवन्त श्रसेवध्वम् असेवामहि पु० ( १ ) ल द्विव० बहुव० सेविष्यन्ते सेविष्यध्वे सेविष्यामहे सेविष्येते सेविष्येथे सेविष्यावह पु० एकव० सेविष्यते सेविष्यसे सेविष्ये प्र० म० पु० पु० (२) प्रदादिगण --कहना लट् बुवते ध्वे प्र० पु० महे म. ब्रूते पु० पे पु० ब्रुवे अवाते ब्रुनाये वहे लोद वाताम् वाथाम् ब्रवावहै विधिलिङ् ब्रुवीयाताम् ब्रुवीयाथाम् त्रुवीवहि ब्रुवताम् बुध्वम् बवामहै प्र० पु० ताम् पु० वष्व पु०' ब्रवै ब्रुवीरन् ब्रुवीध्वम् प्र. ब्रुवीमहि म. पु० ब्रवीत पु० ब्रुवीथाः पु० ब्रुवीय अब्रुवत ल अबुवाताम् अगुवाथाम् अववहि श्रध्वम् अत्रमहि प्र० पु० अवत अथा. म. पु० पु० अववि ( ५२ ) लट् द्विव० वक्ष्येते व० प्र. पु. वक्ष्यते म० पु० वक्ष्यसे उ० पु. वक्ष्ये वक्ष्येथे वक्ष्यावहे बहुव० वक्ष्यन्ते वक्ष्यध्धे वक्ष्यामहे (३) हादि (जुहोत्यादि) गण दा-देना लट् म० पु० दत्ते ददाते म. पु० दरसे ददाथे 3. पु० ददे दहे लोट दढते ददध्वे दद्महे प्र० पु० दत्ताम् दरस्व म० पु० १० पु० ददताम् दध्वम् 'ददामहै ददाताम् ददाथाम् ददावहै विधिलिङ् ददीयाताम् ददीयाथाम् ददीवहि ददीरन् ग्र० पु० ददीत म० पु० दवीथाः १० पु० ददीय ददीध्वम् ददीमहि "म० पु० श्रदत्त म० पु० श्रदत्था: २० पु० अददि अददाताम् श्रददौथाम् अदद्वहि अददत श्रदध्वम् अहि ( ५३ ) बहुव० द्विव० दाम्येते दास्यन्ते दास्यध्वे दास्यामहे एकव० दास्यते दास्यसे दास्ये दास्येथे दास्यावहे प्र० पु० म० पु० २० पु० (8) दिवादिगण मन्-समझना लट मन्येते मन्येथे मन्यावहे मन्यन्ते मन्यध्वे मन्यामहे मन्यते मन्यसे मन्ये प्र. पु० म. पु० २० पु० लोट मन्यन्ताम् मन्यध्वम् मन्यामहै मन्यताम् प्र. पु० म० पु० 7. पु० मन्यस्व मन्यै मन्येताम् मन्येथाम् मन्यावहै विधिलिड मन्येयाताम् मन्येयाथाम् मन्येवहि मन्येरन् मन्येध्वम् मन्येमहि प्र० पु० म० पु० ३० पु. मन्येत मन्येधा. मन्येय अमन्यन्त लङ् अमन्येताम् अमन्येथाम् अमन्यावहि श्रमन्यत छामन्यध्वम् अमन्यामहि प्र० पु० म० पु० श्रमन्यथाः श्रमन्ये १० पु० ( ५४ ) "प्र. पु० एकव० मंस्यते मंस्यसे मंस्ये लूट द्विव० मस्यते मंस्येथे मस्यावह बहुव० मस्यन्ते मंस्यध्ये मंस्यामहे म० पु० उ० पु० (५) स्वादिगण वृ-वरना लट प्र० पु० वृणुते वृणुषे वृण्वे वृण्वते वृणुध्वे म. पु० उ० पु० प्र० पु० म० पु० उ० पु० वृणुताम् वृणुष्व वृणवै वृण्वाते वृण्वाथे वृणुवहे, वृण्वहे, वृणुमहे, वृण्महे लोट वृण्वाताम् वृण्वताम् वृण्वाथाम् वृणुध्वम् वृणवावहै विधिलिङ् वृण्वीयाताम् वृण्वीरन् वृण्वीयाथाम् वृण्वीध्वम् वृण्वीवहि वृण्वीमहि वृणवामहै प्र० पु० म० पु० वृण्वीत वृण्वीधाः वृण्वीय उ० पु० प्र० पु० म. पु० अवृणुत श्रवृणुथाः श्रवृण्वि ल अवृण्वाताम् प्रवृण्वाथाम् श्रवृणुवहि, अचूण्यदि श्रवृण्वत प्रवृणुध्वम् श्रवृणुमहि, अवृण्महि उ० पु० ( १५ ) बहुव० एकव० वरीष्यन्ते वरिष्यते, द्विवः वरिष्येते, वरीयेते विरिष्येथे, रवरीष्येथे विरिष्यावहे, वरीष्यावहे चरिष्यन्ते, विरिष्यध्वे, वरीष्यध्वे वरिष्यामहे, वरीष्यते विरिष्यसे, रेवरीप्यसे वरीष्यामहे म० पु० वरिष्ये, वरीष्ये उ० पु० (६) तुदादिगण मुच-छोड़ना लट. मुन्चन्ते मुन्चध्ये मुन्चामहे मुन्चेते मुम्चेथे मुन्चावहे मुन्चते मुच्चसे प्र० पु० म० पु० ३० पु० मुन्चे लोट मुञ्चन्ताम् मुञ्चध्वम् मुच्चामहै प्र० पु० मुन्चताम् मुन्चस्व मुन्चै म. पु० उ० पु० मुन्चेताम् मुन्चेथाम् मुञ्चावहै विधिलिड् मुन्चेयाताम् मुञ्चेयाथाम् मुन्चेदहि मुन्चेरन् मुम्चेत्रम् मुम्चेमहि प्र० पु० मुन्चेत मुन्चेथा. मुखचेय म० पु० ( ५६ ) लड् एकव० प्र. पु० द्विव० अमुचेताम् अमुन्चेथाम् अमुच्चावहि श्रमुञ्चत अमुञ्चधाः अमुन्चे म. पु० बहुव० श्रमुञ्चन्त श्रमुञ्चध्वम् अमुञ्चामहि १० पु० प्र० पु० म० पु० २० पु० मोक्ष्यते मोक्ष्यसे मोक्ष्ये मोक्ष्येते मोक्ष्येथे मोक्षावहे मोक्ष्यन्ते मोक्ष्यध्ये मोक्ष्यामहे (७) रुधादिगण भुज-भोजन करना प्र. पु० म. पु० २० पु० मुक्त भुहरे भुजे मुलाते भुञ्जाथे भुजवहे भुलते भुडाचे भुम्जमहे लोट- प्र. पु. म० पु० ३० पु० भुक्ताम् भुड्क्ष्व भुनजै सुअताम् भुडाध्वम् भुनजामह भुभाताम् भुजाधाम् भुनजावहै विधिलिङ् भुञ्जीयाताम् भुञ्जीयाथाम् भुञ्जीवहि प्र० पु० म. पु० मुक्षीत भुञ्जीथाः भुजीय मुनीरन् भुञ्जीध्वम् भुजीमहि ( ५७ ) वहुव० द्विव० एकव० पु० अभुक्त भुइथा. पु० अभुति श्रभुञ्जत सभुइग्ध्वम् अभुन्जमहि पु० श्रभुक्षाताम् प्रभुञ्जाथाम् अभुङ्ग्वहि लट् भोयेते भोयेथे भोक्ष्यावहे भोक्ष्यते भोक्ष्यन्ते मोक्ष्यध्वे भोयामहे प्र० पु० पु० भोक्ष्यसे भोक्ष्ये (८) तनादिगण कृ-करना लट. कुर्वते कुरुचे कुर्महे प्र. पु० कुर्वाते कुर्वाथे कुहे कुरुने पु० कुरुपे पु० कुर्वे म० लोट कुर्वाताम् कुर्वताम् कुरुध्वम् घरवामहे पु० कुरुताम् करप्व कुळथाम् करवावहै ६० पु० करवै विधिलिङ कु:याताम् कुर्वीयाथाम कुर्वीवहि कुरिन् कुर्वाध्वम्, कुर्वीत प्र० कुर्वीमहि म. पु० पु० पु० कुर्वीथा कुर्वीय ( ५८ ) एकव. पु० अकुरुत ल द्विव० अकुर्वाताम् अकुर्वाधार अकुर्वहि अकुरुथा. पु० अकुवि बहुव० अकुर्वत अकुरुध्वम् अकुर्महि लूट म० पु० करिष्यते करिष्यसे करिष्ये करिष्येते करिष्येथे करिष्यावहे करिष्यन्ते करिष्यत्वे करिष्यामहे (E) क्यादिगण ग्रह-लेना पु० गृहोते पु० गृहीपे लट गृलाते गृहाथे गृह्णीवहे गृह्णते गृह्णीश्वे गृह्णीमहे Family लोट- पु० गृहीताम् पु० गृहीव पु० गृह गृह्नताम् गृहीध्वम् गृह्नामहे गृहाताम् गृहाथाम् गृह्णावहै विधिलिड् गृहीयाताम् गृह्णीयाथाम् गृहीवहि पु० गृहीत पु० गृहीथाः पु० गृहीय गृतीरन् गृहीध्वम् गृहीमदि " ( ५६ ) लड हिव० श्रगृहाताम् अगृह्णाथास् अगृक्षावहि वहुव० श्रगृह्नत अगृह्णोध्नम् अगृहीमहि एकव० पु० अगृहीत पु. गृहीथा पु० अगृह्नि हट . ग्रहीष्यन्ते ग्रहीष्यध्वे ग्रहीयेते ग्रहीष्येथे ग्रहीप्यावह ग्रहीष्यामह पु० प्र० म० प्रहीष्यते पु० ग्रहीष्यसे पु० ग्रहीये (१०) चुरादिगण अर्थ--मॉगना लट अर्थयेते अर्थयेथे अर्थयन्ते अर्थयध्वे अर्थयामहे पु० प्रर्थयते अर्थयसे अर्थये अर्थयावह प्रर्धयन्ताम श्रर्थयध्वम अर्थयामहै पु० म० अर्थय पु० लोट अर्थयताम् श्रर्थयेताम् श्रर्थयस्व श्रर्थयेथाम अर्थयावह विधिलिड श्रयेत श्रर्थयेयाताम अर्थयेथा. अर्थयेयाधाम श्रर्थयेय अर्थयेवहि अथेयेरन् श्रर्थयेध्वम. अर्थयेमहि पु० पु० पु०
( ६० )
बहुव.
प्र०
एकव०
पु० श्रार्थयत
पु० प्रार्थयथाः
पु० श्रार्थये
लङ्
द्विव०
श्रार्थयेताम्
श्रार्थयेथाम्
प्रार्थयावहि
म.
श्रार्थयन्त
श्रार्थयध्वम्
प्राध्यामहि
लूट
अर्थयिष्येते
अर्थयिष्येथे
पु० अर्थयिष्यते
पु० अर्थयिष्यसे
पु० अर्थयिष्ये
म०
अर्थयिष्यन्ते
अर्थयिष्यध्वे
अर्थयिष्यामहे
अर्थयिष्यावहे
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