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Pitamberji

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॥ ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्रीपीतांबरजी
पुरुषोत्तमजी महात्मा श्रीमद्रामगुरु
अखंडानंदसरस्वतीके प्रशिष्य
औ
पूज्यपाद श्रीमद्वापूसरस्वतीके शिष्य ॥

श्री
विचारचंद्रोदय.
तीसरी आवृत्ति.
ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री पीतांबरजीकृत,
सुमुक्षुके हितार्थ
शरीफ सालेमहंमदने छपाया-
दोहा.
ब्रह्मरूप अहि ब्रह्मवित्, ताकी वानी वेद;
भाषा अथवा संस्कृत, करत भेद भ्रम छेद.
(वि. सा. तृ. त.)
.
"
मुंबईमें निर्णयसागर छापखानैमैं छपा.
संवत् १९४२-सन १८८६.

HIF
[ सरकारके सन १८६७ के २५ पचीसवे कायदे अनुसार
यह ग्रंथ प्रकट कर्ताने रजिस्टर किया है. 1

ॐ गुरुपरमात्मने नमः ॥
॥ तृतीयावृत्तिकी प्रस्तावना ॥
यह प्रश्नउत्तररूप ग्रंथ मुमुक्षुजनोंकू अति
उपयोगी भया है। काहेते जो वेदांतअभ्यासके
आरंभकाल में इस ग्रंथके समान अन्य ग्रंथ नहीं है।।
इस आरत्तिमैं ग्रंथकर्ता ब्रह्मनिष्ठ पंडित
श्रीपीतांवरजी महाराजकी मूर्ति रखी है । तथा
नवीन अकारादि अनुक्रमणिका रखी है ॥ वे-
दांतपदार्थसंज्ञारूप षोडशकला जो ग्रंथके अंतमें
है। तिसमैं " अजिव्हत्वादि ६।१४०" है ।
तहां ६ का अंक षट्पदार्थनका सूचक है । औ
१४० का अंक श्रीपदार्थमंजूषागत क्रमांकका
सूचक । ऐसै अन्यठिकाने बी जानना.
इस ग्रंथका सारभूत " वेदांतविनोद अंक १
वेदांतपदावली" नामसै लघुग्रंथ प्रकट किया है,
सो मुमुक्षुनकू कंठ करनेमें अति उपयोगी होवैगा.
श० सा..

॥ ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः ॥ ॥ प्रस्तावना ।। सर्वमतशिरोमणि श्रीवेदांतसिद्धांत है ॥ ताके जाननैवास्ते कनिष्ठ औ मध्यमआदिक अधि- कारिनके अर्थ अनेकसंस्कृत औ प्राकृत ग्रंथ हैं। परंतु जाकी बुद्धिमैं विशेषशंका होवै नहीं । ऐसा मंदमतिमान् परमआस्तिक शुद्धचित्तवाला जो उत्तमअधिकारी है। ताके अर्थ सरल श्रेष्ठ अल्प औ विख्यात वेदांतप्रक्रियाका ग्रंथ कोउ नहीं है। यात मैंने यह विचारचंद्रोदय नामक वेदांत- प्रक्रियाका प्रश्नोत्तररूप ग्रंथ किया है ॥ यामैं घोडशप्रकरण हैं। तिनका "कला" ऐसा नाम धन्य है ॥ एकएक कलाविषै एकएक विलक्षण ॥ विचारचंद्रोदय ॥ प्रक्रिया धरी है ॥ मुमुक्षुकू ब्रह्मसाक्षात्कारविषै अवश्यउपयोगी जो प्रक्रिया हैं । वे सर्व संक्षेपते यामें हैं ॥ अंतकी षोडशवींकलाविषै अनेकवे- दांतपदार्थनके नाम रखे हैं । सो धारनेसे अन्य महग्रंथनके श्रवणविषै उपयोगी होवेंगे ॥ या ग्रंथकू ब्रह्मनिष्ठगुरुके मुखसैं जो मुमुक्षु कंठ क- रैगा वा याके अर्थकू बुद्धिमें धारण करैगा । वा- के चित्तरूप आकाशमैं अवश्य ज्ञानरूप युवाऽव- स्थाकू धारनेवाला विचाररूप चंद्रमा उदय होवैगा औ संशय अरु भ्रांतिसहित अज्ञानरूप अं. धकारकू दूरी करेगा। याहीते याका नाम विचार- चंद्रोदय धन्य है। याका विषय नीचें धरी अनु- क्रमणिकाविषै स्पष्ट लिख्या है। तहां देखलेना ॥ ( या ग्रंथके विशेषज्ञान विषै उपयोगी श्रीसटीक बालवोध हमने किया है । जाळू इच्छा होवै सो PARKETTE ॥ प्रस्तावना ॥ देखे ) विशेष विज्ञप्ति यह है किः—यह ग्रंथ ब्रह्मनिष्टगुरुके मुखसँही श्रद्धापूर्वक पढना । स्वतंत्र नहीं ॥ काहेरौं । गुरुविना सिद्धांतके रह- स्यका ज्ञान होता नहीं । औ गुरुमुखसै सकल अ- भिप्राय जान्या जावै है । यातें गुरुके मुखसँही पढना चाहिये ॥ लि. पंडित पीतांबरजी. भारती

।
अनुक्रमणिका
জাহg.
१
१
....
४
...
कलाअंक. विषय.
उपोद्धात
२ प्रपंचारोपापवाद
१७
३ देहतीनका मैं द्रष्टा हूं.
२४
मैं पंचकोशातीत हूं
५ तीनअवस्थाका मैं साक्षी हूं
६. प्रपंचमिथ्यावर्णन...
१०७
आत्माके विशेषण
१३१
< सच्चिदानंदका विशेष वर्णन १४७
अवाच्यसिद्धांत वर्णन.
१६१
१० सामान्य विशेष चैतन्य वर्णन. १६८
" तत्त्वं" पदार्थोक्यनिरूपण.... १८६
......
....
९

अनुक्रमणिका. आरंभपृष्ठ- कलाअंक. विषय. १२ ज्ञानीके कर्मनिवृत्तिका प्रकार.... २०४ १३ सप्तज्ञानभूमिकावर्णन ......... २०८ १४ जीवन्मुक्ति विदेहमुक्ति वर्णन, २१४ १५ वेदांत प्रमेय (पदार्थ) वर्णन. २१९ १६ वेदांत पदार्थसंज्ञा वर्णन २२३

MUSIASREENERGARHETHERPRIMAMATA
।। श्री विचारचंद्रोदय ॥
तृतीयात्तिकी
अकारादि अनुक्रमणिका ॥
अढअपरोक्षज्ञानका
अखंड आत्मा १३९
स्वरूप औ हेतु ६
अजन्मा आत्मा १४ १ अद्वैत आत्मा १४१
अजहवलक्षणा १९० अधिदैव ६३+
अजहवलक्षणा असंभ- अधिभूत ६४+
व १९२
अधिष्ठान ८३+९५+
अत्यंतनिवृत्ति ४८+ अधिष्ठानरूप विशेष
अत्यंताभाव ४६+ १०४+
अदृढअपरोक्षज्ञानका अध्यस्तरूपविशेष
फल औ अवधि ७
१०४+
।

॥ विचारचंद्रोदयकी
अध्यारोप ३०+
अध्यात्म ६२+
अन्योन्याध्यास १२९।
<९+
अन्योन्याभाव ४६+
अध्यास १२५
अन्वय ७१+
अध्यास षट् १२९
अन्वयव्यतिरेक १०७
अनंत आत्मा १३८
अपंचीकत पंचमाहाभूत
अनादि षट्वस्तु ३१+
५९.
अन्तःकरण ६२ । ७०
अपरोक्षब्रह्मज्ञानेका
अन्तःकरणकी कृपा
स्वरूप औ हेतु. ५
१९+
अपवाद २३।३७+
अन्तःकरणकी त्रिपुटी अभानापादक १७+
अर्थाध्यास दो १२७
अन्तःकरणके देवता९३ अवाच्य सिद्धांतवर्णन
अन्तःकरणके विषय९४ १६१
अन्धमंदपटुपना ७५ अविद्या १८
अन्नमयकोश ७९ अव्यक्त आत्मा १४४
अन्यतराध्यास ९०+ अव्यय आत्मा १४४

अकारादि अनुक्रमणिका ॥ अष्टम कला १४७ आत्मा कैसा है ? ९० असंग आत्मा १३९ आत्मा कौन है ? ८९ असत् १४९ आनंद १४५।१४७ असत्वापादक ११+ आनंद आत्मा १३ ३ असंभावना १२+ आनंद औ दुःखमें अ- असंसक्ति २१० न्वयव्यतिरेक १५८ अक्षर आत्मा १४४ आनंदपुच्छ ५७+ अज्ञान २१+ आनंदमय कोश ८७ अज्ञानका ज्ञान ५३+ आपेक्षिक व्यापक ३६+ आरोप ३०+ ई आकार च्यारि १४३ आकाशके पांच तत्व ३०।३९ ईश्वर १८११९९।२५+ आत्मा आनंदरूप ९९+ ईश्वरका कार्य १९ आत्माका स्वरूप २२१ ईश्वरके देशादिक १९३ आत्माके विशेषण ईश्वरके धर्म १९४ १३१ ईश्वरकृपा १९+

॥ विचारचंद्रोदयकी
कर्मइंद्रियनकी त्रिपुटी
उत्तम जिज्ञासु २७+
उपद्रष्टा आत्मा १३७ कल्पित ३२+
उपोद्धात १+
कल्पित कार्य ८४+
उपोद्वातवर्णन ? कल्पित विशेष ८४+1
ए
१०४+
एक आत्मा १३८ कारण ५४४
एकादश कला १८६ कारणदेह ७७
कारणशरीरका मैं दृष्टा
ॐ
अ
अ
कर्ता ७२
क
कर्म २०५
क"भोक्तापनकी भ्रांति काल दुःखरूप ९९
७४+
कूटस्थ आत्मा १३९
कतोपासन १०९+
अन कर्मइंद्रिय ६१ । ६८ केवल धर्माध्यास ८७+
५०-F
केवल संबंधाध्यास८५+
कर्मइंद्रियके देवता ९३ कोश ७९
कर्मइंद्रियके विषय ९४ क्रियमाण २०६
अन्न
अन्

अकारादि अनुक्रमणिका ॥ - T जगत्का निमित्त कारण गुरुकृपा १९+ ३५x जड १२ । १५६ चतुर्थ कला ७८ जलके पांचतत्व३५/४५ चतुर्दश कला २१३ जहत् लक्षणा १८९ चित् १४५।१४७ जहत् लक्षणा असंभव चित् आत्मा १३३ १९१ चिज्जडमैं अन्वयव्य- जाग्रत् अवस्था ९१। ९८।५९+ चिदाभास १६९ जीव १९।१९७२४+ जीवका कार्य १९७ चौदा इंद्रिय ९२ [९४ चौदा इंद्रियनके देवता जीवका स्थानादि ९८॥ चौदा त्रिपुटी ९५ १०० । १०२ जीवके देशादिक १९६ जगत्का उपादानकारण जीवके धर्म १९ ३५४ जीवन्मुक्ति २१३ तिरेक १५५ चैतन्य ११ Tama MAT

॥ विचारचंद्रोदयकी
जीवन्मुक्तिविदेहमु- तृतीयकला २४
क्तिवर्नन २१३ तेजके पांचतत्व ३४।४३
त
त्रयोदश कला २०८
तत् " पद १८७
त्रिपुटी ९५
तत्पदलक्ष्यार्थ १९५ त्रिपुटीनका स्वभाव ९७
तत्पदवाच्यार्थ १९५ " त्वं" पद १८८
तत्त्वंपदार्थैक्यनिरूपण त्वंपदलक्ष्यार्थं १९७
१८६
त्वंपदवाच्यार्थ १९७
तनुमानसा २१०
तन्मात्रा ५९
दशम कला १६८
तमःप्रधान प्रकृति १८ दुःख १५७ । ३+
टीनअवस्था ९०
दृढअपरोक्ष ब्रह्मज्ञानका
तीनअवस्थाका मैं स्वरूप औ हेतु ८
साक्षी हूं ९०
दृढअपरोक्ष ज्ञानका
व तीनसंबंध १३९
फल औ अवधि ९
तुरीयगा २११ दृष्टांत:-
तूला अविद्या ७९+
आतपविधै घृत १०३
"

. मैं १४५ अकारादि अनुक्रमणिका ॥ " आत्माके विशेषणो- " बिंबप्रतिबिंब ११६ भूतकी निवृत्ति ५६ कनकविर्षे कुंडल "महाभारत युद्ध २१४ १२३ रज्जुविषै सर्प १२१॥ कारंज्या ७३ २१४ काशीका राजा२०२ " रज्जुविधै सादिक कूपविषै भूषण १०२ १७३ गंगाजल औ गंगा-" राजा औ रबारी जलकलश २०१ २०१ घटाकाश ११९ । समुद्रविषै घट १०५ २०० सागर औ जल- नृत्यशाला ६३ बिंदु २०१ पांच छिदवाला घट सीपीविषै रूपादि- ६४ क १०७ पुरुषकी उपाधि सूर्यप्रकाश १७० २०२ स्थाणुविषै पुरुष वालकका खेल १०४॥ ११२ " " ॥ विचारचंद्रोदयकी ११८ प स्फटिकविषै रंग निर्विकार आत्मा १४३ नित्ति ४ + हंडी औ मृत्तिका निषेध्य ९८ + २०० निषेध्य विशेषण १३ देह ६४ + १०१ + देह तीन २४ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं पंचकोशातीत हूं ७८ ૨૪ पंचदश कला २१९ द्रष्टा आत्मा १३७ पंचम कला ९० द्वादश कला २०४ पंचमहाभूत २४ द्वितीय कला १७ पंचमहाभूतके पचीसत- त्व २५ धर्मसहित धर्मीका अ-पंचीकरण २६।४०+ ध्यास <<+ पंचीकृत पंचमहाभूत२६ न पदार्थनविषै पांचअंश. नवम कला १६१. १७४ निराकार आत्मा १४३ पदार्थाभाविनी २११ अकारादि अनुक्रमणिका ॥ वधि ५ योग १३ परमानंद ५ + प्रक्रिया २८ + परिणाम ८२ + प्रथम कला १ परोक्ष ब्रह्मज्ञानकी अ-प्रध्वंसाभाव ४६ + प्रपंच २० + । २६ । परोक्ष ब्रह्मज्ञानका स्व-प्रपंचके विचारका उप- रूप हेतु औ फल पांच कर्मइंद्रिय ५८ मपंचमिथ्यावर्णन पांच कोशके नाम ७९ १०७ पांच प्राण ५९।६२।७० प्रपंचारोपापवाद १७ पांच प्राणके स्थानक्रिया प्रमाणगत संशय १२. <१ प्रमेयगत संशय १२ + पांच भेद १३९ प्रागभाव ४६ + पांच ज्ञानइंद्रिय ५४ । प्राणमय कोश ८१ प्राणवायु ८१ पुरुषार्थ २. प्राप्ति ६ + पृथ्वीके पांचतत्व ३७ प्रारब्ध २०५ [१५९ प्रीतिका न्यूनअधिकभाव .................................. ४७

१०
॥ विचारचंद्रोदयकी
ब्रह्मआत्माकी
ब
भ्रांतिसंसार पंच ११६
बाघ ७२ +
बाधितानुत्ति १११ + मनोमयकोश ८४
एकता मलिन
सत्वगुणयुक्त
२२१
३४+
ब्रह्मका स्वरूप २२१ महावाक्य १६ +
ब्रह्मरूप आत्मा १३३ महावाक्यनका
अर्थ
ब्रह्मविद्याग्रहणविधि १०७ +
४७+
माया १८
ब्रह्मज्ञान ३ मुख्य पुरुषार्थ २ +
मूलाविद्या ८० +
भागत्यागलक्षणा १९० मोक्षका साक्षात् साधन
भागत्यागलक्षणा संभव २२०
मोक्षका स्वरूप३।२२०
भूत २२ +
मोक्षका हेतु <+
भेदभ्रांति ७३ -
मोक्षके अवांतर साधन
२२०
१९२
भौतिक २३ +

अकारादि अनुक्रमणिका ॥
११
विजातीयसंबंध १४०
लक्षणारत्ति १८८ विधिपूर्वक शरण ४७+
लक्ष्यअर्थ १८९ विधेय ९७ +
लक्ष्य सदादिकका
विधेयविशेषण १३२॥
१०२ +
१०० +
विपरीतभावना १३ +
वाच्यअर्थ १८८
१५ +
वाच्य सदादिकका
विवर्त ८४+
१०२+
विवर्त उपादान ८३ +
वायुके पांचतत्व ३३। विशेष १६९
विशेष चैतन्य १६८ ।
विकार ८२ +
विकारभ्रांति ७६ +
विक्षेप १८ +
विचारका फल १३
विचारका विषय ११ विज्ञानमयकोश ८५
विचारका स्वरूप हेतु रत्ति १.८८
फल ओ अवधि १० वेदकृपा १९ +
४१
१७०

१२ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ २४ प्रश्न:- जड सो क्या है ? उत्तर:- जो आपकुं न जानैं औ दूसरेळू बी न जानें । ऐसै जो अज्ञान औ तिनके कार्य भूत भौतिक पदार्थ । सो जड हैं ॥ प्रश्नः- उपर कहे तीनवस्तुनके विचारका किसरीतिलै उपयोग है ? " तत्त्वमसि' महावाक्यमें स्थित "त्वं"पद औ "तत्"पदका वाच्यअर्थ जो जीवे ॥२१॥"नहीं जानता हूं"ऐसे व्यवहारका हेतु आव- रणविक्षेपशक्तिवाला अनादिभावरूप अज्ञान पदार्थ है। ।। २२ ॥ आकाशादिक पांचभूत ॥ ॥ २३॥ भूतनके कार्य पिंडब्रह्मांडादिक ॥ ॥२४ ॥ चिदाभासयुक्त अंतः करणसहित कुटस्थ चैतन्य । सो जीव है। ।

उपोद्धातवर्णन ॥ १ ॥ १३ EMA NAHATECIAL औ ईश्वर । तिनकी उपाधिरूप जो प्रेपैच । ति- सर्वं जेवरीमें सर्पकी न्याई । औ ठौंठमैं पुरुषकी न्याई औ मरुभूमिमैं मृगजलकी न्याई । विचार करि मिथ्या जानिके त्याग करना । यह प्रपंचके विचारका उपयोग है ॥ "मैं जो ("त्वं" पदका लक्ष्यार्थ) आत्मा । सो ( "तत्" पदका लक्ष्यार्थ ) ब्रह्म हूं" इसरीतिसे ब्रह्मआत्माकी एकताकू विचारकरि सत्य जानि- के अवशेष रखना । यह " मैं कौन हूँ?" औ ब्रह्म कौन है ?" इस विचारका उपयोग ( फल ) है ॥ ॥ २५ ॥ चिदाभासयुक्त मायासहित ब्रह्मचैतन्य। सो ईश्वर है ॥ ॥ २६ ॥ समष्टि औ व्यष्टिरूप तीनशरीर । पंच- कोश । तीन अवस्था आदिक नामरूप ॥

१४ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ प्रश्न:- इस विचारका अधिकारी कौन है । औ सो क्या करे ? उत्तरः--इस विचारका अधिकारी उत्तमजि- ज्ञासु है । सो सद्गुरुकी कृपासे उपोद्घात आदि- ककी प्रक्रियाँ कू विचारिके ''मैंही आप ब्रह्म हूं" इसरीतिसें ब्रह्मआत्माकू अपरोक्ष जाने । प्रश्न:- तिन प्रक्रियाके नाम कौन हैं ? उत्तर:- ॥ १ ॥ उपोदात ॥ ॥२७॥विवेक वैराग्य षड्संपत्ति औ मुमुक्षुता । इन च्यारीसाधनकरि सहित होवै औ ब्रह्मवितगुरु अरु वेदांतशास्त्रके वचनविषै परमविश्वासी हो । कुतर्क कदाचित् करै नहीं। ऐसा जो स्वरूपके जाननैंकी तीव्र इच्छावाला अधिकारी । सो उत्तमजिज्ञासु है ॥ ॥ २८ ॥ अद्वैतके बोध करनैका कोइ बी प्र- कार । सो प्रक्रिया है॥

उपोद्धातवर्णन ॥ १
॥ २ ॥ प्रपंचका आरोप
॥ ३ ॥ देह तीनका मैं द्रष्ट
॥ ४ ॥ मैं पंचकोशातीत हूं
॥५॥ अवस्था तीनका
॥ ६ ॥ प्रपंचका मिथ्यापन
॥ ७ ॥ आत्माके विशेषण
॥ ८ ॥ सच्चिदानंद विशेष
॥ ९ ॥ अवाच्यसिद्धांत व
॥ १० ॥ सामान्यचैतन्य औ
॥ ११ ॥ "त्वं पद औ "तत्
अर्थ औ लक्ष्य
लक्ष्यअर्थकी एकता
॥ १२ ॥ ज्ञानीके कर्मकी नि
॥ १३ ॥ सप्तज्ञानभूमिका ॥
॥ १४ ॥ जीवन्मुक्ति औ दि

॥ विचारचंद्रोदयः ।। ॥ १५ ॥ वेदांतप्रमेय ।। ॥ १६ ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा ॥ ये तिन प्रक्रियों के नाम हैं ॥ इति श्रीविचारचंद्रोदये उपोद्धातवर्णन नामिका प्रथमकला समासा ॥ १ ॥ ॥२९॥ प्रपंचंका विचार प्रथम द्वितीय षष्ठ द्वादश त्रयोदश औ षोडशवीं प्रक्रिया (कला) विष किया है। औ " प्रपंचसहित में कौन हूं?" याका विचार तृतीय चतुर्थ औ पंचम प्रक्रियाविषै किया है। औ परमात्मा कौन है ? याका विचार दशमप्रक्रियाविषै किया है । औ ब्रह्म आत्मा दोनूंके स्वरूपका विचार सप्तम अष्टम नवम एकादश औं चतुर्दशवी प्र- क्रियाविषे किया है । प्रपंच औ ब्रह्म आत्माके स्वरू- पका विचार पंचदशवीमक्रियाविषै किया है ॥ सर्व प्रक्रियाका " तत् "लं" पदार्थका शोधन और तिनकी एकताका निश्चय प्रयोजन है।

प्रपंचारोपापवादं ॥ २ २॥ १७ अथ दितीयकलाप्रारंभः॥२॥ ॥ प्रपंचारोपापवाद ॥ प्रश्न:- शुद्धब्रह्मविपै प्रपंचका आरोप कैसे हुवा है? उत्तर:- अनादि शुद्धब्रह्मकेविषै अनादि- कल्पिते प्रकृति है ॥ तिस प्रकृतिका ब्रह्मके साथि ॥ ३० ॥ वस्तु (ब्रह्म)विषै अवस्तु (अज्ञान तत्कार्य) का कथन आरोप है । याहीकू अध्यारोप बी कहै हैं। ॥ ३१ ॥ उत्पत्तिरहित वस्तु । स्वरूपसे अनादि है ॥ ऐसे शुद्धब्रह्म । प्रकृति । तिनका संबंध । ईश्व- र । जीव । औ तिनका मेद । ये षट् हैं । अरु प्रवा हरूपसैं प्रपंच बी अनादि है ॥ ॥ ३२ ॥ जो हो नहीं औ स्वमपदार्थकी न्याई नांतिसे भासै । सो कल्पित है ॥

॥ विचारचंद्रोदय ॥ अनादि कल्पिततादात्म्य (कल्पितभेदसहित वास्तवअभेदरूप ) संबंध है । सो प्रकृति । माया ओ अविद्या औ तमःप्रधान प्रकृतिरूपकरि वि- भागळू पावतीहै ॥ तिनमैं जो शुद्धसत्वगुणयुक्त । सो माया है औ जो मलिनसत्वगुणयुक्त । सो अविद्या है । औ जो तमोगुणकी मुख्यताकरि युक्त है । सो तमःप्रधान प्रकृति है ॥ मायाविषै। जो ब्रह्मका प्रतिबिंब है । सो अधिष्ठान (ब्रह्म) औ मायाँसहित जगत्कर्ता सर्वज्ञ ईश्वर कहिये ॥३३|| क्षत्रिय औ शूद्ररूप मंत्रीनसैं ब्राह्मणरूप राजाकी न्याई जो रज तमसे दबे नहीं। किंतु रज तमकू आप दबावै । ऐसा सत्वगुण ॥ ॥ ३४ ॥ जो रज तमकू दबाव नहीं । किंतु शूद्र- रूप दोराजकुमारनसे ब्राह्मणरूप न्याई रज तमसैं आप दबै । ऐसा सत्वगुण ।। ||३५|| इहां मायाशब्दकारि माया औं तमःप्रधान एक मंत्रीकी प्रपंचारोपापवाद ॥ २ ॥ २१ Jii: HuTHEIDIDIHIRAL है ॥ त उत्पन्न भये ॥ तिनका पंचीकरण नहीं सो था । तब अपंचीकृत थे । तिनतें समष्टिव्य- भोक्ता सूक्ष्मसृष्टि होयकें। पीछे ईश्वरकी ईच्छासे जीव बनका पंचीकरण भया। तब सो भूत पंची- पाधि गे। तिनतें समष्टिव्यष्टिरूप स्थूलसृष्टि भयो। प्रकृति । समष्टि स्थूलसूक्ष्मकारणप्रपंचका अभिः नमैं मायावकी दृष्टिसै ईश्वर है । औ व्यष्टि स्थूल- त्का निर्माणप्रपंचका अभिमानी जीव है । तिनमैं ईश्वर । मृज्ञि होनै नित्यमुक्त है औ जीवअल्पज्ञ ॥३६॥ई है ॥ इसरीतिसे शुद्धब्रह्मविषै प्रपं- सीकी अपे कहिये है। सीप हुवा है ॥ व्यापक है यह आरोप सत्य है वा मिथ्या है ? आपेक्षिकव्य- यह आरोप जेवरीविषै सर्पकी न्याई अपेक्षासें शेषै स्वप्नकी न्याई औ दर्पणविषै नग- अपेक्षासे पविकी न्याई मिथ्या है ।

२२ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ प्रश्न:- यह आरोप किससे होवै है ? उत्तरः- यह आरोप अज्ञानसं होवै है ।। प्रश्न:-यह आरोप कबका औ काहेर्नू हुवा होवैगा । यह विचार कैसे होवै ? उत्तरः-जैसें कोइ पुरुषके वस्त्र उपर तैलका दाग लग्या होवै। तिसकूँ जानिके ताकू मिटा- वनेका उपाय किया चाहिये औ यह दाग क- बका काहेकू लग्या होगा। इस विचारका कछु प्रयोजन नहीं है । तैसें यह प्रपंचका आरोप क- बका औ काहे. हुवा होवेंगा। इस विचारका बी कछु प्रयोजन नहीं है। परंतु इसकी निवृत्तिका उपाय करना योग्य है। प्रश्नः- इस सर्वआरोपकी नित्ति किस रीतिलै होवै है। उत्तरः- ब्रह्मज्ञानसे माया औ अविद्याकी PRIOR प्रपंचारोपापवाद ॥ २॥ २३ नित्ति होवै है। तिसते कार्यसहित प्रकृतिकी नि- वृत्ति होवै है। तिसतै प्रकृति औ ब्रह्मके संबंधकी नित्ति होवै है । तिसत जीवभाव औ ईश्वरभा- वकी निवृत्ति होवै है । तिसत जीवईश्वरके भेद- की निवृत्ति होवै है। तिसत बंधकी नियत्ति होयके मोक्ष सिद्ध होवै है ॥ इसरीतिसे एककालविषहीं सर्वआरोपकी निरत्तिरूप अपवाद होवै है ॥ प्रश्न:- यह ब्रह्मज्ञान किससे होवै है ? उत्तरः- यह ब्रह्मज्ञान आगे कहियेगा जो विचार । तिससे होवै है ॥ इति श्रीविचारचंद्रोदये अपंचारोपापवाद वर्णन नामिका द्वितीयकला समाप्ता ॥ २ ॥ ॥ ३७॥ सर्पका औ ताके ज्ञानका बाधकरिके रज्जुरूप अधिष्ठानके अवशेषकी न्याई । मपंच औ जाके ज्ञानका बाधकरिके अधिष्ठानरूप शुद्धब्रह्मका जो अवशेष । सो अपवाद है ॥ S २४ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ अथ तृतीयकलामारंभः॥३॥ ॥ १ ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ प्रश्न:- पहिली प्रक्रिया । " देह तीनका दृष्टा हूं" ॥ सो देह तीन कौनसे हैं ? उत्तरः- स्थूलदेह सूक्ष्मदेह औ कारणदेह । ये देह तीन है ॥ प्रश्न:- स्थूल देह सो क्या उत्तर:- पंचीकृतपंचमहाभूतके पचीसतत्त्व- नका स्थूलदेह है ॥ प्रश्न- पंचमहाभूत कौनसे हैं ? उत्तरः- आकाश वायु तेज जल औ पृथ्वी । ये पंचमहाभूत हैं ॥ प्रश्न:- पंचमहाभूतके पचीसतन्त्व ( पदार्थ कौनसे हैं ।

देह तीनका में द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ २९
UDHUD LUTFITIO FITTI: BUTTRS **
॥ १ ॥ आकाशके पांचतत्व:-कॉम
क्रोध शोक मोहूँ औ भय
॥ २ ॥ वायुके पांचतवः-चलन वलन
धावन प्रसारण औ आकुंचन ॥
॥ ३ ॥ तेजके पांचतत्व:-क्षुधा तृषा
आलस्य निद्रा औ कांति ॥
॥ ४ ॥ जलके पांचतत्त्व:-शुक्र (वीर्य)
शोणित (रुधिर) लाल मूत्र औ स्वेद (प्रसीना) ।
॥ ६॥ पृथ्वीके पांचतवः- अस्थि
(हाड) मांस नाडी त्वचा औ रोम ।।
ये पंचमहाभूतके पचीसतत्त्वनके नाम हैं ।।
प्रश्नः-पंचीकृतपंचमहाभूत कौनकू कहिये ?
॥ ३८ ॥ कोई बी भोगकी इच्छा ॥
॥ ३९ ॥ अहंता ममतारूप बुद्धि ।

२६ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ उत्तरः- जिन भूतनका पंचीकरण भया है। तिन भूतनकू पंचीकृतपंचमहाभूत कहिये । प्रश्नः- पंचीकरण सो क्या है ? उत्तरः-पंचभूतनमैसैं एकएकके दो दो भाग किये। सो भये दश । तिनमैसे पहिले पांचभाग रहने दिये औ दूसरे पांचभागनमैसें एक एक भागके च्यारीच्यारीभाग किये ॥ सो च्यारी च्यारी भाग । आकाशादिक भूतनका आपआप- का जो अर्थ अर्थ मुख्यभाग रहने दिया है। ति- सविर न मिलायके आपआपसे भिन्न च्यारी भूतनके अर्ध अर्थ भागनविषै मिलावनै । सो पं. चीकरण कहिये है। ।। ४० ॥ प्रथम अपंचीकृतपंचमहाभूत थे। तिनका ईश्वरकी इच्छा0 स्थूलसृष्टिद्वारा जीवनके भोगअर्थ परस्पर मिलापरूप पंचीकरण भया है । 14UTIL

२८
॥ विचारचंद्रोदय ॥
॥२॥ वायुके दोभाग किये । तिनमैसें
एक भाग रहने दिया औ दुसरेभागके च्यारी-
भाग किये । तिनमैसें वायुविषै न मिलावना औ
एक आकाशविषै । एक तेजविषै । एक जलवि-
पै । अरु एक पृथ्वीविषै मिलावना ॥ ऐसेंही
॥ ३ ॥ तेजके दोभाग किये । तिनमैसे
एक भाग रहने दिया औ दूसरेभागके च्यारीभाग
किये । तिनमैसें तेजविषै न मिलावना औ एक
आकाशविषै । एक वायुविषै। एक जलविषै ।
अरु एक पृथ्वीविषै मिलावना ॥ ऐसेंही
॥ ४ ॥ जलके दोभाग किये । तिनमैसे
एक भाग रहने दिया औ दुसरेभागके च्यारीभाग
किये । तिनमैसै जलविषै न मिलावना औ एक
आकाशविषै । एक वायुविषै। एक तेजविषै ।।
अरु एक पृथ्वीविषै मिलावना ॥ ऐसेंही
IAS
Sart
14

रा देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ २९ ॥५॥ पृथ्वीके दोभाग किये । तिनमैसें एक भाग रहने दिया औ दुसरेभागके च्यारीभाग किये। तिनमैसें पृथ्वीविषै न मिलावना औ एक आकाशविषै । एक वायुविषै । एक तेजविषै । अरु एक जलविषै मिलावना ॥ , इसरीतिलै पचीसतच होयके पंचमहाभूतन- का परस्पर मिलाप है॥ प्रश्नः-पंचमहाभूतनके पचीसतत्त्व कैसे भये ? उत्तरः-सर्वभूतनका आपका एक एक मुख्य- भाग है औ अमुख्यच्यारीभाग अन्यभूतनके मिले हैं ॥ तिसत एक एक भूतके पांचपांच तत्व भये । सो सर्व मिलिके पचीसतत्त्व भये ॥ प्रश्नः-स्थूलदेहविषै ये पचीसतत्त्व कैसें रह- ३० ॥ विचारचंद्रोदय ॥ ० उत्तर:- ॥ १ ॥ आकाशके पांचतत्त्व:- ॥४१॥ कोई ग्रंथविषै शिर कंठ हृदय उदर कटि- देशगत आकाश। ये आकाशके पांचतत्व हैं ॥ तिनमैं शिरोदेशगत आकाश आकाशका मुख्यभाग है। अनाहत शब्द का आश्रय होने ।।कंठदेशगत आकाश वायुका भाग है। श्वासप्रश्वासका आश्रय होनै ।।हृदयदेशगत आकाश तेजका भाग है। पित्तका आश्रय होनै ॥ उदरदेशगत आकाश जलका भाग है। पान किये जल- का आश्रय होनैः ॥ कटिदेशगत आकाश पृथ्वीका भाग है। गंधका आश्रय होनैः ॥ इसरीतिलै काम- क्रोधादिक स्थूलदेहके तत्व नहीं । किंतु लिंगदेहके धर्म हैं औ अन्यग्रंथनकी रीतिसैं तो कामादिक लिंग- देह के मुख्यधर्म हैं औ स्थूलदेह विष घटमैं जलकी शीतलताके आवेशकी न्याई इनका आवेश होते है । याः स्थूलदेह के बी गौणधर्म कहिये हैं ॥ INTUR प्रयास

देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ३१
काम क्रोध शोक मोह औ भय ॥ तिनमें
॥१॥ कामे:-आकाशविषै वायुका भा-
ग मिल्या है। काहेरौं । कामनारूप वृत्ति चंचल है
औ वायु बी चंचल है। यातें यह वायुका भाग है।
॥२॥क्रोधः-आकाशविर्ष तेजका भा-
म मिल्या है। काहे । क्रोध आवता है तब श.
रीर तपायमान होता है औ तेज बी तपायमान
है। यातें यह तेजका भाग है ॥
॥ ३ ॥ शोकः- आकाशका मुख्यभाग
॥ ४२ ॥ पिताके तुल्य पुत्रकी न्याई । काम ।
वायुके तुल्य है । यात वायुका भाग है ॥ ऐसें अन्य
तत्त्वन विषै बी नानि लेना ॥
॥ ४३ ।। यद्यपि वायु आदिक भूतनके भागनविषै
बी आकाशके अन्य च्यारीभागनमैसैं एक एक भाग
मिल्या है। सो आकाशका मुख्यभाग नहीं कहिये है

३२
॥ विचारचंद्रोदय ॥
॥
है ॥ काहे । शोक उत्पन्न होवै तब शरीर शून्य
जैसा हो है । औ आकाश बी शून्य जैसा है ।
याते यह आकाशका मुख्यभाग है ।
॥ ४॥ मोहः- आकाशविषै जलका भाग
मिल्या है ॥ काहेते । मोह पुत्रादिकविषै प्रसरता
है औ जलका बिंदु बी प्रसरता है । यातें यह
जलका भाग है ॥
॥ ५५ ॥ अय:-आकाशविर्ष पृथ्वीका भाग
मिल्या है।।काहेते।मय होवै तब शरीर जड(अक्रिय)
होयके रहता है औ पृथ्वी बी जडता स्वभाववाली
तथापि शोक औ आकाशको अतिशयतुल्यता है।
याते शोक आकाशका मुख्यभाग है ॥ कहिंक लोभ
बी आकाशकी न्याई पदार्थकी प्राप्तिकार अपूर्ण
होनै आकाशका मुख्यभाग कहाहै | इसरीतिसे
अन्यभूतनविषै बी जानि लेना ॥
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॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ३३
है। याते यह पृथ्वीका भाग है ॥
॥ २॥ वायुके पांचतच ॥
चलन । वलन । धावन । प्रसारण । औ आकुं.
चन । तिनमैसे
॥ ६ ॥ चलनः-वायुविषै जलका भाग
मिल्या है ॥ काहेरौं । चलन नाम चलनैका है
औ जल बी चलता है। याते यह जलका भाग है ।।
॥ ७ ॥ वलनः-वायुविषै तेजका भाग मि-
ल्या है ॥ काहे । वलन नाम अंगके वालनेका
है औ तेजका प्रकाश बी वलता है । याते यह
तेजका भाग है ॥
॥ ८॥ धावन:-वायुका मुख्यभाग है ॥
काहे । धावन नाम दौडनेका है औ वायु बी
दौडता है । याते यह वायुका मुख्यभाग है ॥
॥ ९॥ प्रसारण:-वायुविषै आकाशका
ESTINAMwi... गगना
२

Son- ३४ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ भाग मिल्या है ॥ काहेरौं । प्रसारण नाम प्रसर- नैका है औ आकाश बी प्रसया हुवा है । यात यह आकाशका भाग है ॥ ॥१०॥ आकुंचन:-वायुविषै पृथ्वीका भाग मिल्या है ॥ काहेत । आकुंचन नाम संकोच करनैका है औ पृथ्वी बी संकोचकू पायी हुयी है । यातें यह पृथ्वीका भाग है ॥ ॥ ३ ॥ तेजके पांचतत्त्व ।। क्षुधा । तृषा। आलस्य । निद्रा । औ कांति । तिनमैं ।। ११॥ क्षुधाः-तेजका मुख्यभाग है। का- हेरौं । क्षुधा लगे तब जो खावें सो भस्म होने है औ अग्निविपै. बी जो डारें सो भसा होवै है। यातें यह तेजका मुख्यभाग है ॥ ॥ १२ ॥ तृपाः-तेजविषै वायुका भाग मिल्या है ॥ काहेत । तृषा कंठकू शोषण करै ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ३५ है औ वायु बी गीलेवस्त्रादिककू सुकावे है । याः यह वायुका भाग है ॥ ॥ १३ ॥ आलस्यः-तेजविषै पृथ्वीका भाग मिल्या है ॥ काहे । आलस्य आवै तब शरीर जड होय जावै है औ पृथ्वी बी जडस्वभाव- वाली है। यातें यह पृथ्वीका भाग है ॥ ॥ १४ ॥ निद्राः-तेजविषै आकाशका भाग मिल्या है ॥ काहेते । निद्रा आवै तब शरीर शून्य होवै है औ आकाश बी शून्यतावाला है । यति यह आकाशका भाग है ।। ॥ १५ ॥ कांतिः-तेजविषै जलका भाग मिल्या है ॥ काहेरौं । कांति धूपसे घटै है औ जल बी धूपसैं घटै है । यातें यह जलका भाग है ।। ॥४॥ जलके पांचतत्त्व ॥ शुक्र । शोणित । लाळ । मूत्र । औ स्वेद । तिनमैसे

३६
॥ विचारचंद्रोदय ॥
।
॥ १६ ॥ शुक्रः-जलका मुख्यभाग है ॥
काहेते । शुक्र श्वेतवर्ण है औ गर्भका हेतु है अरु
जल बी श्वेतवर्ण है औ वृक्षका हेतु है ॥ यात
यह जलका मुख्यभाग है ॥
॥ १७॥ शोणित:-जलविषै पृथ्वीका भाग
मिल्या है ॥ काहेरौं । शोणित रक्तवर्ण है औ
पृथ्वी, बी कहिंक रक्त है । यातें यह पृथ्वीका
भाग है ॥
॥ १८ ॥ लाळ-जलविषै आकाशका भाग
मिल्या है ॥ काहे लाळ ऊंचा नीचा होवै है
औ आकाश बी ऊंचा नीचा है । यातें यह
आकाशका भाग है ॥
॥१९॥ मूत्र:-जलविषै तेजका भाग मिल्या
है ॥ काहेत । धर्म है औ तेज बी धर्म है। यातें
यह तेजका भाग है ॥
antar

Rhe
॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ३७
॥ २० ॥ स्वेदः-जलविषै वायुका भाग मि-
स्या है ॥ काहेते । प्रसीना श्रम करनेसे होवै
है औ वायु बी पंखा आदिकसैं श्रम करनेसें
होवै है । यातें यह वायुका भाग है ॥
॥ ५ ॥ पृथ्वीके पांचतत्त्व ॥
अस्थि । मांस । नाडी । त्वचा। औरोम । तिनमैसे
॥ २१ ॥ अस्थि:-पृथ्वीका मुख्यभाग है ॥
काहेरौं । कठिन है औ पीतवर्ण है औ पृथ्वी बी.
कठिन है अरु कहींक पीतरंगवाली है । यातें यह
पृथ्वीका मुख्यभाग है ॥
॥ २२ ॥ मांसः-पृथ्वीविषै जलका भाग
मिल्या है ॥ काहेरौं । मांस गीला है औ जल बी
गीला है । यति यह जलका भाग है ।।
॥ ४४ ॥ नख औ दंतनका हड्डीमैं अंतर्भाव है।

विचारचंद्रोदय ॥ ॥ २३ ॥ नाडी:-पृथ्वीविषै तेजका भाग मिल्या है ॥ काहेरौं । नाडीसें तापकी परीक्षा होवै औ तेज बी तापरूप है । याते यह तेजका भाग है ॥ ॥ २४ ॥ त्वचा:-पृथ्वीविषै वायुका भाग मिल्या है ॥ काहेते । त्वचासें शीत उष्ण कठिन कोमल स्पर्शकी मालम होवै है औ वायु बी स्प- र्शगुणवाला है। यातें यह वायुका भाग है ॥ ॥ २५ ॥ रोम:-पृथ्वीविषै आकाशका भाग मिल्या है ॥ काहेते। रोम शून्य है । काटनैंसें पीडा होवै नहीं औ आकाश बी शून्य है । यातें यह आकाशका भाग है। ॥ ४५ ॥ केश ( मस्तकके बाल )का रोम (शरीरके बाल ) विषै अंतर्भाव है ॥ HTRA ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ३९ इसरीतिसें स्थूलदेहविषै पचीसतत्व रहते हैं । प्रश्न:- पचीसतच जाननैका क्या प्रयो- जन है ? उत्तरः-पचीसतत्व में नहीं औ ये मेरे नहीं । ये पंचीकत पंचमहाभूतके हैं । इनका जाननै- हारा में द्रष्टा घटदृष्टाकी न्याई इनते न्यारा हूं। ऐसा निश्चय करना । यह पचीसत्यके जानने का प्रयोजन है ॥ भश्न: पचीसतच्च मैं नहीं औ ये मेरे नहीं" सो किसरीतिसे समजना ? ? - ॥ १ ॥ आकाशके पांचतत्त्वाविषैः- कामः-होवै तव बी मैं जानता हूं औ काम न होवै तव तिसके अभावळू वी मैं जानता ।। ४६ ।। कार्यकी उत्पत्तिसैं पूर्व जो अभाव।सो माग- ॥ विचारचंद्रोदय ॥ हूं । यातें यह काम में नहीं औ यह मेरा नहीं। यह आकाशका है । मैं इसका जाननहारा द्रष्टा घटदृष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ १ ॥ क्रोधः-होवै तब बी मैं जानता हूं औ क्रोध न होवै तब तिसके अभावकू वी मैं जानना हूं। याते यह क्रोध मैं नही औ यह मेरा नहीं। यह आकाशका है । मैं इसका जाननैहारा दृष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ २॥ शोकः-होवै तब बी मैं जानता हूं औ शोक न होवै तब तिसके अभावळू बी मै जा- नता हूं । यातें यह शोक में नहीं औ यह मेरा भाव है || नाशके अनंतर जो अभाव सो मध्वंसाभाव है ॥ तीनकालमें जो अभाव सो अत्यंताभाव है ।। अ. न्यवस्तुसैं जो अन्यवस्तु का भेद । सो अन्योन्याभाव है ।। इसरीतिलै अभाव च्यारीमकारका है ।।

.... FFiler/ANI ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ४१ नहीं । यह आकाशका है। मैं इसका जाननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ ३ ॥ मोहः-होवै तब बी मैं जानता हूं औ मोह न होवै तब तिसके अभावकू बी मैं जानता हूं । यातें यह मोह मैं नहीं औ यह मेरा नहीं यह आकाशका है । मैं इसका जाननहारा द्रष्टा घट- द्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ ४ ॥ भयः-होवै तब बी मैं जानता हूं औ सय न होवै तब तिसके अभावकू बी मैं जानता हूं । याते यह भय मैं नहीं औ यह मेरा नहीं। यह आकाशका है । मैं इसका जाननैहारा द्रष्टा घ- टद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ ५ ॥ ॥ २ ॥ वायुके पांचतत्वविषैः- चलनः-शरीर चले तब बी में जानता हूं औ शरीर न चले तब तिस चलनेके अभावकू

.
॥ विचारचंद्रोदय ।।
•kot
बी मैं जानता हूं । यातै यह चलन मैं नहीं औ
यह मेरा नहीं। यह वायुका है। मैं इस-
का जाननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इस
न्यारा हूं ॥ ६ ॥
वलन:- शरीर वले तब बी मैं जानता
औ शरीर न वले तब तिस वलनेके अभावकू
बी मैं जानता हूं । याते यह वलन में नहीं
औ यह मेरा नहीं । मैं इसका जाननेहारा द्रष्टा
घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ।। ७ ।।
धावनः-शरीर दौडै तब बी मैं जानता हूं
औ शरीर न दौडै तब तिस दोडनैके अभा-
वकू बी मैं जानता हूं । यातें यह धावन मैं
नहीं औ यह मेरा नहीं । यह वायुका है । मैं इ-
सका जाननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते
न्यारा हूं ॥८॥

SHI ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ मसारण:-शरीर प्रसरे तब बी मैं जानता हूं औ शरीर न प्रसरे तब तिस प्रसरणेके अभा- वकू बी मैं जानता हूं । याते यह प्रसारण मैं नहीं औ यह मेरा नहीं । यह वायुका है । मैं इसका जाननहारा द्रष्टा घटदृष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥९॥ आकुंचन:-शरीर संकोचकू पावै तबी मैं जानता हूं औ शरीर न संकोचकू पावै तव तिस संकोचनैके अभावकू बी मैं जानता हूं। यात यह आकुंचन मैं नहीं औ यह मेरा नहीं । यह वायुका है। मैं इसका जाननहारा द्रष्टा घटद्व- टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ १० ॥ ॥ ३॥ तेजके पांचतत्त्वविषैः- क्षुधाः-लगे तिसकू बी मैं जानता हूं औ क्षुधा न होवै तब तिसके अभावहू बी में || विचारचंद्रोदय ॥ जानता हूं । याते यह क्षुधा मैं नहीं औ यह मेरी नहीं । यह तेजकी है । मैं इसका जाननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ ११ ॥ तृषाः-लगे तिसर्नू बी मैं जानता हूं औ तृषा न होवै तब तिसके अभावकू बी मैं जानता हूं । यातें यह तृषा में नहीं औ यह मेरी नहीं यह तेजकी है । मैं इसका जाननैहारा द्रष्टा घट- दृष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ १२ ॥ आलस्य:-होवै तिसर्दू बी मैं जानता हूं औ आलस्य न होवै तब तिसके अभावळू बी मैं जानता हूं। याते यह आलस्य मैं नहीं औ यह मेरा नहीं । यह तेजका है। मैं इस- का जाननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ १३ ॥ निद्राः-होवै तिसळू बी मैं जानता हूं औ TOX RELEARNATAKAAMSATARATHISEKSahana मैं ।। देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ४९ निद्रा न होवै तब तिसके अभावकू बी मैं जानता हूं । याते यह निद्रा में नहीं औ यह मेरी नहीं । यह तेजकी है। इसका जाननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ १४ ॥ कांतिः-होवै तिसळू बी मैं जानता हूं औ कांति न होवै तब तिसके अभावकू बी मैं जा- नता हूं । या यह कांति में नहीं औ यह मेरी नहीं । यह तेजकी है । मैं इसका . जाननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ १५ ॥ ॥४॥जलके पांचतत्त्व विषैः- शुक्र:-(वीर्य) शरीरविषै बढे तिसकू वी में जानता हूं औ वीर्य घटे तब तिसके अभावकू बी मैं जानता हूं । याते यह वीर्य में नहीं औ यह मेरा नहीं । यह जलका है। मैं इसका ४६ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ जाननहारा द्रष्टा घटदृष्टाकी न्याई इसते न्या- रा हूं ॥ १६ ॥ शोणितः-( रुधिर ) शरीरविषै बढे तिसकूँ बी मैं जानता हूं औ रुधिर घटे तब तिसके अभावकू बी मैं जानता हूं। याते यह रुधिर मैं नहीं औं यह मेरा नहीं। यह जलका है । मैं इसका जाननैहारा द्रष्टा घटदृष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ १७ ॥ लाळ-गिरे तिसकू बी मैं जानता हूं औ लाळ न गिरे तब तिसके अभावळू वी में जानता हूं । यातें यह मैं नहीं औ यह मेरा नहीं। यह जलका है। मैं इसका जाननहारा दृष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ १८ ॥ भूत्र:-आवै तिसळू मैं जानता हूं औ मूत्र न आवै तब तिसके अभावकू बी में जानimmine PRICREASTERNERNSARATISEMESTEeness ar ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ४७ TAINARE ता हूं । यातें यह मैं नहीं औ यह मेरा नहीं । यह जलका है । मैं इसका जाननैहारा द्रष्टा घट- द्रष्टाकी न्याई इस न्यारा हूं ॥ १९ ॥ स्वेदः-(प्रसीना) होवै तिसकू बी मैं जानता हूं औ पसीना न होवै तब तिसके अभा- वळू बी मैं जानता हूं। याते यह प्रसीना मैं नहीं औ यह मेरा नहीं । यह जलका है । मैं इस- का जाननैहारा द्रष्टा घटदृष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ २० ॥ ॥ ५ ॥ पृथ्वीके पांचतत्वविषै ॥ अस्थि:-(हाड)सूधे होवै तिसकू बी मैं जा- मता हूं औ हाड सूधे न होवें तब तिसके अभावळू बी मैं जानता हूं । या ये हाड मैं नहीं औ ये मेरे नहीं। ये पृथ्वीके हैं। मैं --amanainitLALPlanetlaws ॥ विचारचंद्रोदय ॥ इनका जाननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इनतें न्यारा हूं ॥ २१॥ मांसः-बढे तिसळू बी मैं जानता हूं औ मांस घटे तब तिसके अभावकू बी मैं जानता हूं । यातें यह मांस मैं नहीं औ. यह मेरा नहीं । यह प्रथिवीका है । मैं इसका जाननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ २२ ॥ नाडी:-चले तिनकू बी में जानता हूं औ न चले तब तिनके अभावकू बी मैं जान- ता हूं । यातें ये नाडी मैं नहीं औ ये मेरी नहीं। ये पृथ्वीकी हैं । मैं इनका जाननैहारा द्रष्टा घट- द्रष्टाकी न्याई इनते न्यारा हूं ॥ २३ ॥ त्वचाः-स्पर्शकू ग्रहण करे तिसकू बी जानता हूं औ स्पर्शकू - ग्रहण न करै तब तिस ग्रहण करने के अभावकू बी मैं जानता MARATI SHAYAR SHA प्रयाग १८८६ AADHITIERSITE: ॥ देह तीनका द्रष्टा हूत हूं । यातें यह त्वचा में नहीं औAयह मेरी नहीं। यह पृथिवीकी है। मैं इसका जाननहारा द्रष्टा घ- टद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ २४ ॥ रोमः-बहुत होवें तिनकू बी मैं जानता हूं औ रोम कमती होवें तब तिनके कमती- पनळू बी मैं जानता हूं । यात ये रोम में नहीं औ ये मेरे नहीं । ये पृथिवीके हैं। मैं इनका जाननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इनः न्या- रा हूं ॥ २५ ॥ इसरीतिलै पचीसतत्त्व मैं नहीं औ मेरे नहीं । यह समजना॥ प्रश्न:- “पचीसतन्त्व में नहीं औ मेरे नहीं इस जाननैसे क्या निश्चय भया ? उत्तर:- स्थूलदेह औ तिसके धर्म जो १ नाम । २ जाति । ३ आश्रम । १ वर्ण ।

५० ॥ विचारचंद्रोदय । ? •nco l घ ५ संबंध। ६ परिमाण । ७ जन्ममरण । इत्यादिक बी मैं नहीं औ मेरे नहीं । यह निश्चय भया । प्रश्नः-- नाम मैं नहीं औ मेरा नहीं। यह कैसे जानना उत्तर:- जन्मसें प्रथम नाम नहीं था औ जन्मके अनंतर नाम कल्पित है औ शरीरके भिन्न भिन्न अंगन विष विचार कियेत नाम मिलता, नहीं । याते यह नाम मैं नहीं औ मेरा नहीं। यह स्थूलदेहविषै कल्पित है । मैं इसका जाननैहारा द्रष्टा घटदृष्टाकी न्याई इसतै न्यारा हूं ॥ ऐसे ना. म मैं नहीं औ मेरा नहीं । यह जानना ॥ १ ॥ प्रश्न:-जाति (वर्ण) मै नहीं औ मेरी नहीं। यह कैसे जानना ? उत्तर:- ब्राह्मणादिक जाति. स्थूलंदेहका धर्म है । सूक्ष्मदेह औ आत्माका धर्म नहीं ॥ काहे- ता ये ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ५१ ते । लिंगदेह औ आत्मा तौ जो पूर्वदेहविषै होवै सोई इस वर्तमानदेहविषै औ भावीदेहविषै रह- ता है । औं जाति तौ जो पूर्वदेहविष थी सो "इस देहविषै नहीं है औ जो इस देहविषै है सो आगिले देह विषै रहेगी नहीं । यातें जाति स्थूल- देहकाही धर्म है। लिंगदेहका औ आत्माका धर्म ही है । औ शरीरके अंगनविषै विचारिके देखि- ये तौ स्थूलदेहविषै जाति मिले नहीं । यातें यह जाति में नहीं औ मेरी नहीं। यह स्थूलदेहविर्षे आरोपित है । मैं इसका जाननैहारा द्रष्टा घटद्व- तेष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ ऐसें जाति में नहीं औ मेरी नहीं। यह जानना ॥ २ ॥ प्रश्न:- आश्रम में नहीं औ मेरा नहीं। यह कैसे जानना ? उत्तर:- ब्रह्मचारी। गृहस्थ । वानप्रस्थ । औ २२ ॥ विचारवंद्रोदय ॥ संन्यासी । ये च्यारीपाश्रम भिन्न भिन्न कम करा- वनके लिये आरोपकरिके स्थूलदेहविषै माने हैं । सो बी मनुष्यमात्रविधै संभवते नहीं । यात ये आश्रम में नहीं औ मेरे नहीं । ये स्थूलदेह- विषै आरोपित है । मैं इनका जाननहारा द्रष्टा वटवष्याकी न्याई इनते न्यारा हूं । ऐसें आश्रम मैं नहीं औ मेरे नहीं । यह जानना ॥ ३ ॥ प्रश्नः-वर्ण ( रंग ) मैं नहीं औ मेरे नहीं । यह कैसे जानना ? उत्तरः-गौर झ्याम रक्त पीत इत्यादि जो रंग हैं । सो स्थूल देहविषै प्रत्यक्ष देखिये हैं जाते मैं स्थूल देह नहीं । तातें ये रंग में नहीं औ मेरे नहीं । ये स्थूलदेहके हैं | मैं इनका जाननहारा दृष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इनते न्यारा हूं।। ऐसे वर्ण में नहीं औ मेरे नहीं । यह जानना ॥४॥ ॥

॥ देह तनिका नैं इष्टा हूं ॥ ३ ॥ ५३ RELATOLEJIMITE...SAHITE IME MINE प्रश्नः-संबंध में नहीं औ मेरे नहीं । यह कैसे जानना उत्तरः- पितापुत्र गुरुशिष्य स्त्रीपुरुष स्वामिसेवक । इत्यादि संबंध स्थूल देहके परस्पर प्रसिद्ध मिथ्या माने हैं औ विचार किये0 मि. लते नहीं. ॥ जाते मैं स्थूलदेह से न्यारा असंग । यातें ये संबंध में नहीं औ मेरे नहीं । ये स्थूलदेहविबै आरोपित हैं । मैं इनका जाननैहारा दृष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इनते न्यारा हूं ॥ ऐसे संबंध में नहीं औ मेरे नहीं । यह जानना ॥९॥ प्रश्न:- परिमाण (आकार ) मैं नहीं औ मेरे नहीं । यह कैसे जानना : उत्तरः-लंबाट्का जाडापतला टेढासूधा । इत्यादि आकार बी प्रसिद्ध स्थूलदेहविषै देखिये हैं । जाते में स्थूलदेहते न्यारा निराकार हूं ।

॥ विचारचंद्रोदय ॥ यातें ये आकार में नहीं औ मेरे नहीं। ये स्थू- लदेहके हैं । मैं इनका जाननहारा दृष्टा घटद्र टाकी न्याई इनते न्यारा हूं ॥ ऐसे परिमाण नहीं औ मेरे नहीं । यह जानना ॥ ६ ॥ प्रश्नः-- मैं जन्ममरणवान् नहीं। औ मेरा जन्म मरण होवें नहीं। यह कैसे जानना ? उत्तर:-आत्माका जन्म मानिये तो आत्म अनित्य होगा । सो वार्ता मीमांसकसे आदि- लेके परलोकवादी जो आस्तिक हैं । तिनकुं इष्ट नहीं ॥ काहे । जो आत्मा उत्पत्तिवान् होवै तौ नाशवान् वी होवैगा । तातै पूर्वजन्मवि नहीं किये कर्मसें सुखदुःखका भोग औ इसजन्मविषै किये कर्मका भोगसैं विना नाश । ये दो दूपण हेविगे । यात कर्मवादीके मतसें आत्मा जो कीमोक्ता मानिये । तौ वी जन्ममरणरहितही .

॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ६५ तौ मानना होवैगा ॥ औ आत्माके जन्मका कोई कारण बी संभव नहीं ॥ काहेत । आत्माका कारण होवै सो आत्माते भिन्नहीं चाहिये । औ आत्माते भिन्न तौ अनात्मा नाम रूप हैं । सो तौ आत्माविषै रज्जुसर्पकी न्याई कल्पित हैं । य़ाते कारण बनें नहीं ॥ औ ब्रह्म घटाका- शके स्वरूप महाकाशकी न्याई आत्माका स्वरू- पहीं है । तिसतै भिन्न नहीं । यात सो कारण वनै नहीं ॥ तात आत्माका जन्म नहीं ॥ औ जाते जन्म नहीं तात आत्माका मरण बी नहीं। औ जाते आत्माविषै जन्ममरणका अभाव है । ताते १ जायते (जन्म) । २ अस्ति ( प्रगट- ता)। ३ वर्धते ( वृद्धि ) । ४ विपरिणमते विपरिणाम) । ५ अपक्षीयते (अपक्षय ) । ६ नश्यति ( मरण )। इन षट्विकारनः बी ARNEAR

॥ विचारचंद्रोदय ॥
आत्मा रहित है ॥ यात मैं जन्ममरणवान् नहीं
औ मेरेकू जन्ममरण होवें नहीं । ये स्थूलदेहकू,
कर्मसे होवै हैं ॥ मैं इनका जाननैहारा द्रष्टा
घटद्रष्टाकी न्याई इनते न्यारा हूं ॥ ऐसे
जन्ममरणवान् नहीं औ मेरेकू जन्ममरण होवै
नहीं । यह जानना ॥ ७ ।।
प्रश्नः- पंचमहाभूतनकी निवृत्तिविषै दृष्टांक
क्या है ?
उत्तर:- दृष्टांत:- जैसै कोइकू भूत लग्या
होवै । सो धानक ( भोया )कुं बुलायके डमरु
बजायके लवणादि पांचवस्तु मिलायके तिसका
बलिदान देके भूतकी निटत्ती करै है ॥ सिद्धां-
तः- तैसें आकाशादिक पंचमहाभूत शरीररूप
होयके जीवकू लगे हैं । तिनकी निति
वास्ते ब्रह्मनिष्ठगुरुरूप धानक ( भोया)के
.
NAMANG
vali

॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ५७ विधिपूर्वक शरण जायके वेदशास्त्ररूप डमरु ( डाक) बजायके ऊपर कहे जो पचीसतत्त्व ! तिनमैसें पांचपांचतच्वरूप बलिदान एकएकभूतकू आपआपका भाग अर्पण करिके । मैं इन पची- सतवनका द्रष्टा हूं। इसरीतिलै निश्चय करनैतें इन पांचमहाभूतनकी अत्यंत निरत्ति होवै है ॥ इसरीतिसँ स्थूलदेहका मैं द्रष्टा हूं ॥ ।। ४७ ॥ विवेकादि शुभगुणसहित मोक्षकी इ- च्छावाला अधिकारी हाथमैं भेटा लेके गुरुके शरण होयके साष्टांगनमस्कार करिके । "हे भगवन् । मेरे… ब्रह्मविद्याका उपदेश करो।" ऐसे कहिके "बंध कि. सकुँ कहिये । मोक्ष किसकू कहिये । अविद्या किसकूँ कहिये औ विद्या किसकू कहिये?" इत्यादि प्रश्न करे । औ गुरुकी प्रसन्नता वास्ते तन मन धन वाणी अर्पण करिके सेवा करे। यह ब्रह्मविद्याके ग्रहणका विधि है। ॥४८॥ पीछे लगें नहीं । यह अत्यंत निवृत्ति है ।

५८
॥ विचारचंद्रोदय ॥
॥ सूक्ष्मदेहका मैं द्रष्टा हूं ॥
प्रश्न:- सूक्ष्मदेह सो क्या है ?
उत्तर:- अपंचीकृत पंचमहाभूतके सतरात
त्वका सूक्ष्मदेह है ॥
प्रश्नः- सूक्ष्मदेहके सतरातत्त्व कौनसे हैं
उत्तरः- पांचज्ञानइंद्रिय । पांचकर्मइंद्रियः ।
पांचप्राण । मन औ बुद्धि । ये सतरातत्व हैं ।।
प्रश्न:- पांचज्ञानइंद्रिय कौनसे हैं ?
उत्तरः- श्रोत्र त्वचा चक्षु जिव्हा औ घ्राण।
ये पंचज्ञानइंद्रिय हैं ।
प्रश्न:- पांचकर्मइंद्रिय कौनसे हैं ?
उत्तर:- वाक् पाणि पाद उपस्थ औ गुद
ये पांचकर्मइंद्रिय हैं।
॥ ४९ ॥ ज्ञानके साधन इंद्रिय ॥
॥ ५० ॥ कर्मके साधन इंद्रिय ।।

॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ५९
औ
प्रश्न:- पांचप्राण कौनसे हैं?
उत्तर:- प्राण अपान समान उदान
व्यान। ये पांच प्राण हैं ।।
प्रश्न:-- मन कोन• कहिये ?
उत्तर:- संकल्पविकल्परूप जो बत्ति । ताकू
मन कहिये ॥
प्रश्न:-बुद्धि किस• कहिये ?
उत्तरः- निश्चयरूप जो वृत्ति । ताकू बुद्धि
कहिये॥
प्रश्न:-अपंचीकतपंचमहाभूत कौनळू कहिये ?
उत्तर:- जिन भूतनका पूर्व कही रीतिसैं
पंचीकरण न भया होवै । तिन भूतन• अपंची-
कृतपंचमहाभूत कहिये । तिनहींझू सूक्ष्मभूत औ
सन्मात्रा बी कहै हैं॥

६० ॥ विचारवंद्रोदय ॥ प्रश्न:- अपंचीकृतपंचमहाभूतनकै सतरातत्व कैसे जाननैं ? उत्तर:- पांचज्ञानइंद्रिय औ पांच कर्मइंद्रियविषैः- ॥१-२॥ आकाशके सत्वगुणका भाग श्रोत्र है औ आकाशके रजोगुणका भाग वाक् है ॥ श्रोत्रइंद्रिय शब्दकू सुनता है । औ वाक्इंद्रिय- शब्दकू वोलता है ॥ श्रोत्र ज्ञानइंद्रिय है औ वाक् कर्मइंद्रिय है । इन दोनूंकी मित्रता है। ॥३-४॥ वायुके सत्वगुणका भाग त्वचा है औ वायुके रजोगुणका भाग पाणि है ॥ त्वचा- इंद्रिय स्पर्शळू ग्रहण करै है औ हस्तइंद्रिय ति- सका निर्वाह करै है ॥ त्वचा ज्ञानेंद्रिय है औ हस्त कर्मेंद्रिय है । इन दोनूंकी मित्रता है । ॥५१॥ सर्वपदार्थनमें सत्व रज तम। ये तीनगुण वर्तते हैं ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ६१ ॥५-६॥ तेजके सत्वगुणका भाग चक्षु है औ तेजके रजोगुणका भाग पाद है । चक्षुइंद्रिय रूपका ग्रहण करै है औ पादइंद्रिय तहां गमन जरै है । चक्षु ज्ञानेंद्रिय है औ पाद कर्मेंद्रिय है । इन दोनूंकी मित्रता है ॥ ॥७-८॥ जलके सत्वगुणका भाग जिव्हा है औ जलके रजोगुणका भाग उपस्थ है । जिव्हा- इंद्रिय रसका ग्रहण करै है औ उपस्थइंद्विय रसका त्याग करै है ॥ जिव्हा ज्ञानेंद्रिय है औ उपस्थ कर्मेंद्रिय है ।। इन दोनूंकी मित्रता है । ॥९-१०॥ पृथिवीके सत्वगुणका भाग घ्राण है औ एथिवीके रजोगुणका भाग गुद है । घ्राणई- द्रिय गंधका ग्रहण करै है औ गुदइंद्रिय गंधका त्याग करै है। घ्राण ज्ञानेंद्रिय है औ गुद कम- -द्विय है । इन दोनूंकी मित्रता है।

६२ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ पांचप्राण औ मनबुद्धिविषैः- ॥११-१५॥ इन पांचभूतनके रजोगुणके भाग- मिलिके पांचप्राण भये है ॥ औ ॥१६-१७॥ इन पांचभूतनके सत्वगुणके भाई मिलिके अंतःकरण भया है ।। यहहीं अंतःकरण मन औ बुद्धिरूप है । इहां चित्त औ अहंकारका। मन औ बुद्धिविषै अंतर्भाव है। ऐसे अपंचीकृत पंचमहाभूतनके कार्य । सतरातत्त्व जानने ॥ प्रश्न:- सतरातत्त्वके समजनैका क्या फ. उत्तर:-ये सतरातत्व मैं नहीं औ मेरे नहीं। ये अपंचीकतपंचमहाभूतके है । यह सतरातत्वके समजनेका फल है ॥ प्रश्न:- ये सतरातत्व मैं नहीं औ मेरे नहीं। यह किस कारणसे जानना ?

HINurna HICHRWARI ।। देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ६३ उत्तरः- इन सतरातत्त्वका मैं जाननैहारा हूं ॥ जो जिसकू जाने सो तिसतै न्यारा होवै है । यह नियम है । इस कारणसे ये सतरातत्व में नहीं औ मेरे नहीं । यह जानना ॥ प्रश्न:-इसविषै दृष्टांत क्या समजना ? उत्तर:- दृष्टांत:-जैसे नृत्यशालाविषै स्थित दीपक । राजा प्रधानादिक नायका वाजंत्री औ अन्य सभाके लोक बैठे होवें । तब बी प्रकाशे है औ सर्व उठि जावै तव शून्यग्रहकू वी प्रका- शे है ॥ सिद्धांत:-तैसें स्थूलदेहरूप नृत्यशाला- विषै साक्षीरूप जो मैं दीपक हूं। सो चिदाभा- सरूप राजा औं मनरूप प्रधान औ पांचप्राण- रूप अनुचर औ बुद्धिरूप नायका औ दशइंद्रि- यरूप वाजंत्री औ शब्दादि पंचविषयरूप स- भाके लोक । ये जागृत्स्वप्नसमयविषै होवै तब ६४ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ इसकू प्रकाशता हूं औ सुषुप्तिसमयविषै ये न होवें तब तिनके अभावकू बी में प्रकाशता हूं ॥ इस विषै यह उक्त दृष्टांत समजना ॥ प्रश्न:- सो कैसे समजना ? उत्तर:- जागृत्अवस्थाविषै इंद्रिय औ अं. तःकरण दोकी सहायतासे में प्रकाशता हूं ( जानता हूं ) । औ स्वप्नअवस्थाविषै इंद्रियनसे विना केवल अंतःकरणकी सहायतासें मैं प्रका- शता हूं। औ सुषुप्तिअवस्थाविषै इंद्रिय औ अं- तःकरण दोनूंकी सहायता विना केवल मैंही प्र. काशता हूं । ऐसे समजना ॥ प्रश्न:-इसविषै और दृष्टांत क्या है ? उत्तर:- दृष्टांत:- जैसे पांचछिद्रवाले घ- टके भीतर पात्र तैल औ बत्तीसहित दीपक जल- ता है। सो दीपक । पात्र तैल बत्ती घटके भीतरके LLBasnet.indiaNAIADMRADHEENDRAPALI CURRIA ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३॥ ६६ अवयव औ घटके छिद्रनकू प्रकाशता हुया घ. टके बाहिर छिद्रनके सन्मुख क्रमते धरे जो वीणा । पुष्पनका गुच्छ । मणि । रसपान । औ अत्तरकी सीसी। तिन सर्वकू छिद्रद्वारा प्रकाशता है औ सूर्यरूपसे सारै ब्रह्मांडकू प्रकाशता है। औ महातेजमय सामान्यरूपसे सर्वव्यापी है ।। सिद्धांत:- तैसे पांचज्ञानेंद्रियरूप छिद्रवाले स्थूलदेहरूप घटके भीतर हृदयकमलरूप पात्र है। तामैं मनरूप तैल है औ बुद्धिरूप बत्ती है । तापर आरूढ आत्मारूप दीपक है । सो हृदयरूप पात्रकू औ मनरूप तैलकू औ बुद्धिरूप बत्तीकू औ देहके भीतरके अवयवनकू औ इंद्रियरूप छिद्रनकू प्र- काशता (जानता ) हुया । इंद्रियनसे संबंधवाले शब्दादिक विषयनकू बी इंद्रियद्वारा प्रकाशता है। औ ईश्वररूपसे ब्रह्मांडादि सर्ववाह्यमपंचकू प्र- HTRA NA SHREE ॥ विचारचंद्रोदय॥ Ther काशता है। औ सामान्यचैतन्य ब्रह्मरूपमै सर्वव्यापी है | यह इसविषै और दृष्टांत है ॥ प्रश्न:- ऐसे कहनैसें क्या निर्णय भया ? उत्तर:- कहे जो सतरातत्व सो मैं न औ ये मेरे नहीं । ये पंचमहाभूतके हैं ॥ मैं इ- नका जाननहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इनसैं न्यारा हूं ! यह निर्णय भया । प्रश्न:- सतरातत्त्व में नहीं औ मेरे नहीं । सो किसरीतिसे समजना ॥ ? पांचज्ञानइंद्रियविषैः- ॥ १ ॥ श्रोत्रः- शब्दहूं सुनै तिसकूँ वी मैं ।। ५२ ॥ इहां और यज्ञशालाका दृष्टांत है । सो आगे ७ वीं कलाविषै उपद्रष्टारूप आत्माके विशेष- णके प्रसंगमैं कहियेगा ॥ DIRE ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ६७ जानता हूं औ न सुनै तब तिस सुननैके अभा- वकू बी मैं जानता हूं । याते यह श्रोत्र में नहीं औ मेरा नहीं । यह आकाशका है। मैं इसका जाननहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्या- रा हूं। ॥ २ ॥ त्वचा:- स्पर्शकू ग्रहण करै तिसकूँ बी मैं जानता हूं औ ग्रहण न करै तब तिस ग्र- हण करनैके अभावकू बी मैं जानता हूं । यातें यह त्वचा में नहीं औ मेरी नहीं। यह वायुकी है। मैं इसका जाननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ ॥ ३ ॥ चक्षुः- रूपकुं देखे तिसळू वी मैं जानता हूं औ न देखे तब तिस देखनेके अभा- वकू बी मैं जानता हूं । यातें यह चक्षु मैं नहीं औ मेरा नहीं । यह तेजका है । मैं इसका जान- MORERNET ॥ विचारचंद्रोदय ॥ नैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूँ ॥ ॥ ४ ॥ जिव्हा:- रसका स्वाद लेवे तिस- कू बी मैं जानता हूं औ स्वाद न लेवे तब तिस स्वाद लेनेके अभावळू वी मैं जानता हूं । याते यह जिव्हा मैं नहीं औ मेरी नहीं । यह जलकी है । मैं इसका जाननहारा द्रष्टा घटदृष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ ॥ ५ ॥ घ्राणः- गंधका ग्रहण करै तिसकूँ बी मैं जानता हूं औ न ग्रहण करे तब तिस ग्रहण करनेके अभावकू बी मैं जानता हूं । यात यह घाण में नहीं औ मेरा नहीं। यह पृथ्वीका है। मैं इसका जाननहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ कर्मइंद्रियविषैः- ॥ ६ ॥ वाकः- (वाचा ) बोले तिस• बी - ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ मैं जानता हूं औ न बोले तव तिसके अभावकू बी मैं जानता हूं । यातें यह वाक् मैं नहीं औ मेरी नहीं । यह आकाशकी है। मैं इसका जाननै- हारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ ॥ ७ ॥ पाणि:- (हस्त ) लेना देना करे तिसकू बी मैं जानता हूं औ न करे तब तिसके अभावकू बी मैं जानता हूं । यातें ये हस्त में नहीं औ मेरे नहीं ये वायुके हैं । मैं इनका जा- ननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इनते न्यारा हूं। ॥ ८ ॥ पादः- चले तिसकू बी मैं जानता हूं औ न चले तब तिसके अभावकू बी मैं जान- ता हूं । यातें ये पाद मैं नहीं औ मेरे नहीं । ये तेजके हैं । मैं इनका जाननहारा द्रष्टा घटदृष्टाकी न्याई इनतें न्यारा हूं ॥ ॥ ९ ॥ उपस्थः- रस (मूत्र औ वीर्य )का EPARATISHNAMASTIPATILBELATERALLAMIRINTum... । RATHI

॥ विचार चंद्रोदय ॥
त्याग करै तिसकू बी मैं जानता हूं औ त्याग न
करै तब तिसके अभावकू बी मैं जानता हूं।
यातें यह उपस्थ मैं नहीं औ मेरा नहीं । यह
जलका है । मैं इसका जाननहारा द्रष्टा घटद्र-!
टाकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥
॥ १० ॥ गुदः- मलका त्याग करै तिसकूँ
बी मैं जानता हूं औ त्याग न करै तब तिसके
अभावकू बी मैं जानता हूं । यातें यह गुद मैं
नहीं औ मेरा नहीं । यह पृथ्वीका है। में
इसका
जाननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं।
प्राण औ अंतकरणविषैः-
॥ ११-१५ ॥ पांचप्राण:-क्रिया करें
तिसळू बी मैं जानता हूं औ क्रिया न करें
तब क्रियाके अभावकू बी मैं जानता हूं । याते
ये प्राण मैं नहीं औ मेरे नहीं । ये मिले हुये

॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ७१
इनका जाननैहारा
BHd
पंचमहाभूतके हैं ॥ मैं
द्रष्टा
घटद्रष्टाकी न्याई इनते न्यारा हूं ॥
॥ १६ ॥ मन:-- संकल्प विकल्प करै ति.
सकू बी मैं जानता हूं औ न करै तब तिसके
अभावकू वी मैं जानता हूं । यातें यह मन में
नहीं औ मेरा नहीं । यह मिले हुये पंचमहाभू-
तका है । मैं इसका जाननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी
न्याई इसते न्यारा हूं ॥
॥ १७ ॥ बुद्धिः- निश्चय करै तिसकू बी
मैं जानता हूं औ निश्चय न करै तब तिसके
अभावकू बी मैं जानता हूं । यातै यह बुद्धि मैं
नहीं औ मेरी नहीं । यह मिले हुये पंचमहाभू-
तकी है । मैं इसका जाननहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी
न्याई इसते न्यारा हूं ॥ इसरीतिसे ये सतरातत्त्व
में नहीं औ मेरे नहीं । यह समजना ॥

७२ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ ? प्रश्न:--ऐसें कह से क्या निश्चय भया उत्तरः-१ लिंगदेह औ तिसके धर्म पुण्यपा- पका कर्त्तापना औ तिनके फल सुखदुःखका भोक्तापना । २ औ इसलोक परलोकविषै गमनआ- गमन । ३ औ वैराग्यशमदमादि सात्विकीय- त्तियां ।औ रागद्वेषहर्षादि राजसीरत्तियां । औ निद्राआलस्यप्रमादादि तामसीरत्तियां । ४ तैसे क्षुधातृषा अंधमंदपटुपना इत्यादिक मैं नहीं औ मेरे नहीं । यह निश्चय भया ॥ प्रश्न:-पुण्यपापका कर्त्ता औ तिनके फल सुखदुःखका भोक्ता मैं कैसे नहीं औ क पना भोक्तापना मेरा धर्म नहीं । यह कैसे जानना ? उत्तरः-जो वस्तु विकारी होवै सो क्रिया. वान् होनैतें कर्ता कहिये है । मैं निर्विकार कू- ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ७३ टस्थ होनेते क्रियाका आश्रय नहीं । यात पु- ण्यपापरूप क्रियाका मैं कर्ता नहीं। औ जो कर्ता नहीं सो भोक्ता वी होवै नहीं ॥यात ये अंतःकरणके धर्म हैं। मेरे नहीं । मैं इनका जाननैहारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इनते न्यारा हूं। ऐसें जानना ॥ १॥ प्रश्न:-इसलोक परलोक विषै गमनागमन मेरे धर्म नहीं । यह कैसे जानना ? उत्तर:-अंतःकरण (लिंगदेह ) परिच्छिन्न है। तिसका प्रारब्धकर्मके बलसैं गमनआगमन संभव हैं ॥ औ में आकाशकी न्याई व्यापक हूं। यात मेरे धर्म गमनआगमन नहीं । ऐसें जानना ॥२॥ प्रश्नः-सात्विकी राजसी औ तामसीहतियां मैं नहीं औ मेरा धर्म नहीं । यह कैसे जानान ? उत्तर:- दृष्टांत:- जैसे कोई महल में बैठे ७४ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ राजाके विनोदअर्थ कोई कारीगर कारंजा ब- नावे है । तिस कारंजेकी कलके खोलनेसे जल- की तीनधारा निकसतीयां हैं । तिन तीनधाराके भीतर प्रवाहरूपसे अनंतधारा निकसतीयां हैं जब सो कल बंध करिये तव तीनधारा बंध होयके अकेला राजाही बाकी रहता है ॥ सि- द्धांतः- तैसें स्थूलशरीररूप महलमें अधिष्ठान कूटस्थरूपकरि स्थित परमात्मारूप राजा है । तिसके विनोदअर्थ माया ( अज्ञान)रूप कारिंग- रने अंतःकरणरूप कारंजा किया है। जाग्रत् स्वप्नविषै तिसकी प्रारब्धरूप कलके खोलनेसैं तीनगुणके प्रवाहरूप तीनधारा निकसतीयां हैं। तिन तीनधाराके भीतरसे अगणितरत्तियां उ- ठतीयां हैं । औ सुषुप्तिविष प्रारब्धकर्मरूप क- लके बंध हुयेते तिन वृत्तियांके भावअभावका व 11. ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ७५ प्रकाशक आनंदस्वरूप केवलपरमात्मारूप राजा बाकी रहता है । सोई मैं हूं । याते ये सात्विकी राजसी तामसी वृत्तियां मैं नहीं औ मेरी नहीं। ये अंतःकरणकी हैं ॥ में इनका जाननैहारा द्र- ष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इनते न्यारा हूं । ऐसें जा- नना ॥ ३ ॥ प्रश्न:- अंध मंद औ पटुपना मैं नहीं औ मेरे नहीं । यह कैसे जानना ? उत्तर:- नेत्रादिक इंद्रिय आपआपके वि- षयकू कछू बी ग्रहण न करें सो तिनका अंधप- ना है । तिसकू बी मैं जानता हूं । औ विषयकू स्वल्प ग्रहण करें सो तिनका मंदपना है । ति- सळू बी मैं जानता हूं । औ विषयकू स्पष्ट ग्रह- ण करें सो तिनका पटुपना है । तिसळू बी में जानता हूं । यातें ये मैं नहीं औ मेरे नहीं। ये ७६ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ ? कहता है कि आज मैं इंद्रियनके धर्म हैं । मैं इनका जाननैहारा द्रष्टा घटदृष्टाकी न्याई इनते न्यारा हूं ॥ ४ ॥ इसरीतिसैं सूक्ष्मदेहका मैं द्रष्टा हूं ॥ २ ॥ ॥ कारणशरीरका मैं द्रष्टा हूं ॥ प्रश्न:- कारणदेह सो क्या है उत्तर:- पुरुष जब सुषुप्तिते उठे । तब कछू बी न जानता- भया" इसने सुषुप्तिविषै अज्ञान है । ऐसा सि- द्ध होवै है । औ जाग्रतविषै बी “ मैं ब्रह्मळू जानता नहीं औ मेरी मुजकू खबर नहीं है। मैं ॥ ५३॥ सुषुप्तिसैं उठया जो पुरुष । तिसकू " मैं कछूबी न जानता भया" ऐसा ज्ञान होवै है । सो ज्ञान अनुभवरूप नहीं है। किंतु सुषुप्तिकालवि- अनुभव किये अज्ञानकी स्मृति है ॥ तिस स्मृति- का विषय सुषुप्तिकालका अज्ञान है । बै ॥ देह तीनका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ ७७ ? यह नहीं जानता हूं । मैं यह नहीं जानता हूं" इस अनुभवका विषय अज्ञान है । औ स्वप्नका कारण बी निद्रारूप अज्ञान है । ऐसा जो अज्ञा- न । सो कारणदेह है ॥ प्रश्न:- कारणदेह मैं नहीं औ मेरा नहीं। यह कैसे जानना? उत्तर:- “मैं जानता हूं" औ “ मैं न जानता हूं" ऐसी जो अंतःकरणकी पत्तियां हैं । तिनकुं ज्ञातअज्ञातवस्तुरूप विषयसहित में जानता हूं । यातें यह कारणदेह मैं नहीं औ मे- {। ५४ ॥ अज्ञान । स्थूलसूक्ष्मदेह का हेतु है । यात इसकू कारण' कहते हैं ॥ तत्त्वज्ञानसैं इसका दाह होवै है । यातें इसकू देह कहते हैं । यह अज्ञान गर्भमंदिरके अंधकारकी न्याई ब्रह्मके आश्रित होयके ब्रह्मकुंही आवरण करता है॥ AMIL ७८ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ में रा नहीं । यह अज्ञानका है। इसका जाननै- हारा द्रष्टा घटद्रष्टाकी न्याई इसते न्यारा हूं। यह ऐसें जानना ॥ इसरीतिसै कारणदेहका मैं द्रष्टा हूं ॥ ३ ॥ इति श्रीविचारचंद्रोदये देहत्रयद्रष्टुवर्णन- नामिका तृतीयकला समाप्ता ॥ ३ ॥ अथ चतुर्थकलाप्रारंभः ॥ ४ ॥ ॥ मैं पंचकोशातीत हूं ॥ प्रश्न:- पंचकोशातीत कहिये क्या ? उत्तरः-पंचकोशातीत । कहिये पांचकोशनने में अतीत । नाम न्यारा हूं ॥ ॥ ५५ ॥ कारणदेह आप अज्ञान है । तिसकू अज्ञानका है" ऐसैं कह्या । सो जैसैं राहुकूही रा- हुका मस्तक कहते हैं । तैसें है ॥ ? ६ ALTRATHI ।। मैं पंचकोशातीत हूं ॥ ४ ॥ ७९ प्रश्न:- कोश कहिये क्या है ? उत्तरः- कोश नाम तलवारके म्यानका औ धनके भंडारका औ कोशकार नामक कीडेके ग्रहका है ॥ तिनकी न्याई पंचकोश आत्माकू ढापें हैं। यात अन्नम्यादिक बी कोश कहावै हैं ।। प्रश्न:- पांचकोशके नाम क्या हैं ? उत्तर:- १ अन्नमयकोश । २ प्राणमयकोश। ३ मनोमयकोश । ४ विज्ञानमयकोश । ६ औ आनंदमयकोश । ये पांचकोशके नाम हैं । प्रश्न:- अन्नमयकोश सो क्या है ? उत्तर:- मातापिताने खाया जो अन्न । तिसते भया जो रज वीर्य । तिसकरि जो मा- ताके उदरविषै उत्पन्न होता है । फेर जन्मके अनंतर क्षीरादिक अन्नकरिके जो वद्धिकू पावता है । फेर मरणके अनंतर अन्नमयष्टथिवीविषै लीन

॥ विचारचंद्रोदय ॥
होता है । ऐसा जो स्थूलदेह । सो अन्नमयकोश है।
प्रश्न:- अन्नमयकोश कैसा है ?
उत्तरः- सुखदुःखके अनुभवरूप भोगका
स्थान है ॥
प्रश्न:- अन्नमयकोश” में न्यारा हूं। यह
कैसे जानना?
उत्तर:- जन्मतें प्रथम औ मरणते पीछे अ-
नमयकोश ( स्थूलशरीर )का अभाव है। यातें
यह उत्पत्तिनाशवान् होनेते घटकी न्याई कार्य
है । औ मैं सदा भावरूप हूं। ताते उत्पत्तिनाशर-
हित होने इसते विलक्षण हूं । यातें यह अन्नम-
यकोश में नहीं औ मेरा नहीं । यह स्थूलदेहरूप
है । मैं इसका जाननहारा आत्मा इसते न्यारा
हूं ॥ इसरीतिसैं अन्नमयकोश” मैं न्यारा हूं। यह
जानना ॥ १ ॥

॥ मैं पंचकोशातीत हूं ॥ ४ ॥ ८१ ............ ......... प्रश्न:- प्राणमयकोश सो क्या है ? उत्तर:- पांचकर्मइंद्वियसहित पांचप्राण । सो प्राणमयकोश है। प्रश्नः- पांचकर्मइंद्रिय औ पांचप्राण को- नसे हैं। उत्तरः- पांचकर्मइंद्रिय औ पांचप्राण पूर्व सूक्ष्मदेहकी प्रक्रियाविषै कहेहैं ॥ प्रश्नः-पांचप्राणके स्थान औ क्रिया कौन हैं ? उत्तर:- (१) प्राणवायु:- हृदयस्थान- विषै रहता है औ प्रत्येकदिनरात्रिविषै २१६०० श्वास उच्छ्वास लेनेरूप क्रियाकुं करता है ॥ ( २ ) अपानवायु:- गुदस्थानविषै रहता है औ मलमूत्रके उत्सर्गरूप क्रियाकू करता है ।। ( ३ ) समानवायु:- नाभिस्थानविषै र- हता है औ कूपजलकुं बगीचेविषै मालीकी न्याई २ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ भोजन किये अन्नके रसकू निकासिके नाडीद्वारा सर्वशरीरविषै पहुचावनैरूप क्रियाकू करता हैं ।। ( ४ ) उदानवायुः-- कंठस्थानविषै रहता है । औ खाए पिए अन्नजलके विभागकू करता है । तथा स्वप्न हींचकी आदिकके दिखावनेरूप क्रिया करता है ॥ ( ५ ) व्यानवायु:- सर्वांगस्थानविषै रहता है औ सर्वअंगनकी संधिनके फेरनैरूप क्रियाकू करता है । इसरीतिसे पांचप्राणके मुख्यस्थान औ क्रिया हैं॥ प्रश्न:- प्राणादि वायु शरीरविषै क्या क- रते हैं ? उत्तरः- प्राणादि वायु सारेशरीरविषै पूर्ण होयके शरीरकू बल देते हैं औ इंद्रियन• आप- व HTTARA HI मैं पंचकोशातीत हूं ॥ ४ ॥ SENTERPRISESENTERNMENT आपके कार्यविर्षे प्रतिरूप क्रियाके साधन होते हैं । प्रश्नः- प्राणमयकोश” मैं न्यारा हूं। यह कैसे जानना? उत्तरः- निद्राविषै पुरुष सोया होवै तब प्राण जागता है । तौ बी कोई स्नेही आवै तिस- का सन्मान करता नहीं औ चोर भूषण ले जावै तिसकू निषेध करता नहीं । तातें यह प्राणवायु घटकी न्याई जड है। औ मैं चैतन्यरूप इसते वि- लक्षण हूँ। यातें यह प्राणमयकोश में नहीं औ मेरा नहीं । यह सूक्ष्मदेहरूप हैं ।। मैं इसका जाननैहारा आत्मा इसते न्यारा हूं ॥ इसरीतिलै प्राणमयको- शते मैं न्यारा हूं । यह जानना ॥ २ ॥ प्रश्न:- मनोमयकोश सो क्या है ? ...

...........-
LateECEDEK
॥ विचारचंद्रोदय ॥
उत्तरः- पांचज्ञानइंद्रियसहित मन । सो
मनोमयकोश है॥
प्रश्न:- पांचज्ञानइंद्रिय औ मन कौन हैं ?
उत्तर:- ये पूर्व सूक्ष्मदेहकी प्रक्रियाविषै
कहेहे ॥
प्रश्न:- मन कैसा है ?
उत्तर:- देहविषै अहंता औ ग्रहादिकविषै
ममतारूप अभिमानकू करता हुया इंद्रियद्वारा
बाहीर गमन करता हुवा करणरूप है ॥
प्रश्न:- मनोमयकोश” मैं न्यारा हूं। यह
किसरीतिसें जानना ?
उत्तर:- कामक्रोधादित्तियुक्त होनैते मन
नियमरहित स्वभाववाला है । ताते विकारी
है ॥ औ में सर्वत्तिनका साक्षी निर्विकार हूं।
यातें यह मनोमयकोश मैं नहीं औ मेरा नहीं ।
।

॥ मैं पंचकोशातीत हूं ॥ ४ ॥ arrotPANARSIKERNHINE उत्तर:- यह सूक्ष्मदेहरूप है । मैं इसका जाननैहारा आत्मा इन” न्यारा हूं ॥ इसरीतिसे मनोमयकोश में न्यारा हूं। यह जानना ॥ ३ ॥ प्रश्न:- विज्ञानमयकोश सो क्या है ? - पांचज्ञानइंद्रियसहित बुद्धि । सो विज्ञानमयकोश है ॥ प्रश्न:- ज्ञानइंद्रिय औ बुद्धि कौन हैं ? उत्तर:- ये पूर्व लिंगदेहकी प्रक्रियाविषै कहे हैं ॥ प्रश्न:- बुद्धि कैसी है ? उत्तरः-सुषुप्तिविषै चिदाभासयुक्त बुद्धि वि. लीन होवै है औ जाग्रविषै नखके अग्रभागते लेके शिखापर्यंत शरीरविषै व्यापिके वर्तती हुयी क रूप है ।। ?

८६ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ प्रश्न:- विज्ञानमयकोश” मैं न्यारा हूं । यह कैसे जानना ? उत्तर:-बुद्धि। घटादिककी न्याई विलय आदि अवस्थावाली होनै विनाशी है । औ में विलय आदि अवस्थारहित होनैते इसते विलक्षण अ- विनाशी हूं । यातें यह विज्ञानमयकोश में नहीं औ मेरा नहीं। यह सूक्ष्मदेहरूप है । मैं इसका जाननैहारा आत्मा इसते न्यारा हूं । इसरीतिसे विजॉनमयकोश” मैं न्यारा हूं। यह जानना।॥४॥ ॥५६॥ जैसे दीपकका प्रकाश औ आकाश अभिन्न प्रतीत होवै हैं। तौबी भिन्न हैं। जैसें तप्तलोह विषै अग्नि औ लोह अभिन्न प्रतीत होवे हैं। तौबी भिन्न हैं। तैसैं अंतःकरण औ आत्मा अभिन्न प्रतीत होवे हैं। तौबी भिन्न हैं । काहेरौं । सुषुप्तिविषै अंतःकरणके लय- हुवे आत्माकू अज्ञानका साक्षी होनेकरि प्रतीयमान । होनेतें ॥

॥ मैं पंचकोशातीत हूं ॥ ४ ॥ <७ HEREMOHINITEL anema प्रश्नः-- आनंदमयकोश सो क्या है ? उत्तर:- पुण्यकर्मफलके . अनुभवकालविषै कदाचित् बुद्धिकी रत्ति अंतर्मुख हुयी आत्मस्व- रूपभूत आनंदके प्रतिबिंबकू भजती है औ जो प्रिय मोद प्रमोदरूप कहिये है । सोई वत्ति पुण्य- कर्मफलके भोगकी नियत्तिके हुये निद्रारूपसे विलीन होवै है । सो वृत्ति आनंदमयकोश है ॥ प्रश्न:- आनंदमयकोश कैसा है ? उत्तर:-इष्टवस्तुके दर्शन से उत्पन्न प्रियवृत्ति जिसका शिर है औ इष्ट वस्तुके लाभसे उत्पन्न मोदत्ति जिसका एक ( दक्षिण )पक्ष है औ इष्टवस्तुके भोगसैं उत्पन्न प्रमोदवृत्ति जिसका द्वितीय (वाम )पक्ष है औ बुद्धि वा अज्ञानकी त्तिविषै आत्मस्वरूपभूत आनंदका प्रतिबिंब जिसका स्वरूप है औ विवरूप आत्माका स्व- ॥ विचारचंद्रोदय ॥ ? रूपभूत आनंद जिसका पुच्छ (आधार ) है । ऐसा पक्षीरूप भोक्ता आनंदमयकोश है ॥ प्रश्न:- आनंदमयकोश” मैं न्यारा हूं। यह किसरीतिसें जानना उत्तर:- आनंदमयकोश बादल आदिक प- दार्थनकी न्याई कदाचित् होनेवाला है । यात क्ष- णिक है औ में सर्वदा स्थित होनेते नित्य हूं । यातें यह आनंदमयकोश मैं नहीं औ मेरा नहीं। यह कारणदेहरूप है। मैं इसका जाननैहारा आ- त्मा इसतै न्यारा हूं ॥ इसरीतिसैं आनंदमयकोशते मैं न्यारा हूं। यह जानना ॥ ५ ॥ ॥ ५७ ।। ब्रह्मरूप आनंद आधार होनते श्रुति- विषे पुच्छशब्द करि कहा है ॥ ॥ ५८॥ ऐसें अन्य च्यारीकोशनकी पक्षीरूपताअ- स्मत्कृत तैत्तिरीयउपनिषद्के भाषाटीकाविषै सविस्तर लिखी है । जाळू इच्छा होवै सो तहां देख लेवे ।। ६ auan-man. 2RMATSHEENASEHA2yee -८ ॥ मैं पंचकोशातीत हूं ॥ ४ ॥ ८९ । प्रश्न:- विद्यमान अन्नमयादिककोश जब आत्मा नहीं। तब कौन आत्मा है ? उत्तर:-बुद्धि आदिकविषै प्रतिबिंबरूपकरि स्थित औ प्रिय आदिक शब्दसे कहिये है ऐसा जो आनंदमयकोश है । तिसका विवरूप कारण जो आनंद है । सो नित्य होनै आत्मा है । प्रश्न:- पांचकोश जो हैं सोई अनुभववि आवते हैं । तिनते न्यारा कोई आत्मा अनुभव- विषै आवता नहीं । यात पांचकोशते न्यारा आत्मा है । यह निश्चय कैसे होवै ? उत्तर:-यद्यपि पांचकोशहीं अनुभव विषै आ- वते हैं । इनते न्यारा कोई आत्मा अनुभवाविषै आवता नहीं । यह वार्ता सत्य है। तथापि जिस अनुभवतें ये पांचकोश जानिये हैं । तिस अनुभmit ITIDUTID MUU Tutar Tree ******** ॥ विचारचंद्रोदय ॥ वहूं कौन निवारण करैगा । कोइ बी निवारण करि शके नहीं ॥ यति पांचकोशनका अनुभव- रूप जो चैतन्य है । सो पांचकोशनते न्यारा आत्मा है ॥ प्रश्न:- आत्मा कैसा है ? उत्तरः-सत् चित् आनंद आदिस्वरूप है ॥ इति श्रीविचारचंद्रोदये पंचकोशातीत- वर्णननामिका चतुर्थकला समाप्ता ॥ ४ ॥ अथ पंचमकलाप्रारंभः ॥ ५॥ ॥ तीनअवस्थाका मैं साक्षी हूं प्रश्न:- तीनअवस्था कौनसी हैं ? उत्तर:- १ जागृत् । ।। ५९ ॥ स्वम औ सुषुप्तितै भिन्न इंद्रियजन्य ज्ञानका औ इंद्रियजन्य ज्ञानके संस्कारका आधारका- ल । सो जाग्रत्अवस्था कहिये है ।

...
॥ तीनअवस्थाका मैं साक्षी हूं ॥ ५॥ ९१
२ स्वप्न । ३ औ सुषुप्ति । ये तीनअवस्था हैं ।
प्रश्नः- जागृत्अवस्था सो क्या है ?
उत्तर:- चौदाइंद्रिय अध्यात्म हैं । तिनके
चौदादेवता अधिदैव हैं । तिनके चौदाविषय
॥६० ॥ इंद्रियसै अजन्य । विषयगोचर अंत:-
करणकी अपरोक्षवृत्तिका काल । स्वमअवस्था कहिये
sho
॥
॥ ६१ ॥ सुखगोचर औ अविद्यागोचर अविद्या.
की वृत्तिका काल । सुषुप्तिअवस्था कहिये है ॥
॥ ६२ ॥ आत्माकू आश्रय करिके वर्तमान जो
.. इंद्रियादिक । सो अध्यात्म कहिये है ॥
॥ ६३ ॥ स्वसंघातसे भिन्न होवै औ चक्षुइंद्रिय
का विषय हो । सो अधिदैव कहिये है।

९२
॥ विचारचंद्रोदय ॥
॥
अधिर्भूत हैं । इन बेचालीस तत्वनसैं जिसविषै
व्यवहार होवै । सो जाग्रत्अवस्था है ॥
प्रश्न:- चौदाइंद्रिय कौनसे हैं ?
उत्तर:- ज्ञानइंद्रिय पांच:- १ श्रोत्र ।
२ त्वचा । ३ चक्षु । ४ जिव्हा । ५ औ घ्राण ॥
कर्मइंद्रिय पांच:- ६ वाक् । ७ पाणि ।
८ पाद । ९ उपस्थ । १० औ गुद ॥
अंतःकरण च्यारी:- ११ मन । १२ बुद्धि ।
१३ चित्त । १४ औ अहंकार ॥ ये चौदाइंद्रिय
अध्यात्म हैं।
॥ ६४ ॥ वसंघातसे भिन्न होवै औ चक्षुआदि-
इंद्रियका विषय हो । सो अधिभूत कहिये है ॥
।। ६५ ॥ यह स्थूल दृष्टिवाले पुरुषनकू जानने
योग्य जाग्रतका लक्षण है । तेसैंही स्वम सुषुप्तिविषै
बी जानना ॥

॥ तीनअवस्थाका मैं साक्षी हूँ ॥ ५॥ ९३ प्रश्न:- चौदाइंद्वियनके चौदादेवता कौन- हैं? उत्तरः- ज्ञानइंद्रिय पांचके देवता:- १ श्रोत्रइंद्रियका देवता। दिशा ॥ २ त्वचाइंद्रियका देवता । वायु ॥ ३ चक्षुइंद्रियका देवता । सूर्य ॥ ४ जिव्हाइंद्रियका देवता। वरुण ॥ ५ घ्राणइंद्रियका देवता । अश्विनीकुमार ॥ कर्मइंद्रिय पांचके देवता:- ६ वाक्इंद्रियका देवता। अग्नि ।। ७ हस्तइंद्रियका देवता। '८ पादइंद्रियका देवता। वामनजी॥ ९ उपस्थइंद्रियका देवता। प्रजापति ॥ १० गुदइंद्रियका देवता। यम ॥ अंतःकरण च्यारीके देवता:- BETIREYA

९४
॥ विचारचंद्रोदय ॥
११ मनइंद्रियंका देवता । चंद्रमा ॥
१२ बुद्धिइंद्रियका देवता ।
ब्रह्मा ॥
१३ चित्तइंद्रियका देवता। वासुदेव ॥
१४ अहंकारइंद्रियका देवता । रुद्र ॥
ये चौदादेवता अधिदैव हैं |
प्रश्नः-चौदाइंद्रियनके चौदाविषय कौनसे हैं ?
उत्तरः- ज्ञानइंद्रिय पांचके विषयः-
१ शब्द । २ स्पर्श । ३ रूप । ४ रस । ५ गंध
कर्मइंद्रिय पांचके विषयः-
६ वचन । ७ आदान । ८ गमन । ९ रति-
भोग । १० मलत्याग ॥
अंतःकरण च्यारीके विषय:-
११ संकल्पविकल्प। १२ निश्चय। १३ चिंतन।
॥ ६६ ॥ अंतरिंद्रियरूप अंतःकरण ।
॥ ६७ ॥ मनका संकल्पविकल्प विषय नहीं ।

। ॥ तीनअवस्थाका में साक्षी हूं ॥ ५ ॥ ९५ १४ अहंपना ॥ये चौदाविषय अधिभूत हैं । प्रश्न:- अध्यात्म अधिदैव अधिभूत । ये तीनतीन मिलिके क्या कहिये हैं ? उत्तर:- अध्यात्मादि तीन पुट (आकार ) मिलिके त्रिपुटी कहिये हैं ॥ प्रश्न:- चौदात्रिपुटी किसरीतिसें जाननी ? उत्तर:- ॥ ज्ञानइंद्रियनकी त्रिपुटी । इंद्रिय देवता विषय- अध्यात्म ॥ अधिदैव ॥ अधिभूत ॥ १ श्रोत्र । दिशा। शब्द ॥ २ त्वचा। स्पर्श ॥ ३ चक्षु । सूर्य। रूप ॥ ४ जिव्हा । वरुण । रस ॥ किंतु जिस वस्तुका संकल्प होवै । सो वस्तु विषय है। तैसेंही बुद्धि चित्त अहंकार औ कर्मइंद्रियन. विषै बी जानना ॥ वायु। ॥

६ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ इंद्र। ६ घाण। अश्विनीकुमार । गंध ॥ ॥ कर्मइंद्रियनकी त्रिपुटी ॥ इंद्रिय- देवता- विषय- अध्यात्म ॥ अधिदैव । अधिभूत ॥ ६ वाक् । अग्नि। वचन (क्रिया)॥ ७ हस्त। लेना देना ॥ < पाद । वामनजी । गमन ॥ ९ उपस्थ। प्रजापति । रतिभोग ॥ १० गुद ॥ यम । मलत्याग ॥ ॥ अंतःकरण ४ की त्रिपुटी ॥ ११ मनः। चंद्रमा । संकल्पविकल्प ॥ १२ बुद्धि। निश्चयः॥ १३ चित्त । वासुदेव । चिंतन ॥ १४ अहंकार । रुद्र। अहंपना ॥ इसरीतिसें चौदात्रिपुटी जाननी ।। ब्रह्मा।

.... HED ॥ तीनअवस्थाका में साक्षी हूं ॥ ५ ॥ प्रश्न:- इन त्रिपुटीनका क्या स्वभाव है ? उत्तर:- तीनतीन पदार्थनकी जो त्रिपुटी । तिनमैसें एक न होवै तो तिसतिसका व्य. वहार न चले ॥ जैसे इंद्रिय औ देवता होवै ति- सका विषय न होवै तौ बी व्यवहार न चले । विषय औ इंद्रिय होवै अरु देवता न होवै तौवी व्यवहार न चले । ऐसें सर्व त्रिपुटीनविषै जानना॥ प्रश्न:- मेरा क्या स्वभाव है । यह कैसे जानना उत्तरः- त्रिपुटी पुर्ण होवै तिसकू बी मैं जा- नता हूं औ त्रिपुटी अपूर्ण होवै तिसकू बी मैं जानता हूं। तैसें त्रिपुटीसे व्यवहार चले तिसकूँ बी मैं जानता हूं औ व्यवहार न चले तिसकूँ बी मैं जानता हूं। ऐसा मेरा स्वभाव है। यह जानना। प्रश्न:- इस कथनसैं क्या सिद्ध भया ? ४ SANEL ॥ विचारचंद्रोदय ॥ उत्तरः-- त्रिपुटीसें जिसविषै व्यवहार चलता है । ऐसी जाग्रत् अवस्था है। यह सिद्ध भया ॥ प्रश्न:- जाग्रत्अवस्थाविषै जीवका स्थान वाचा भोग शक्ति गुण औ जाग्रतके अभिमा- नसैं तिस ( जीव )का नाम क्या है ? उत्तरः-- जाग्रत्अवस्थाविषै जीवका १ नेत्र- स्थान है । २ वैखरी वाचा है । ३ स्थूल भोग है। ४ क्रिया शक्ति है। ५ रजोगुण है ।६ औ जाग्रतके अभिमानसे विश्व नाम प्रश्न:-- जाग्रत्अवस्थाके कहनेसे क्या सिद्ध Chor भया?. ॥ ६८॥ यद्यपि जाग्रत्विषै इस चिदाभासरूप जीवकी नखसे लेके शिखापर्यंत सारेदेहविषै व्याप्ति है। तथापि मुख्यता करिके सो नेत्रविषै रहता है। यातें ताका नेत्रस्थान कहिये है ॥ CANSPSC PAN ....- RELI ॥ तीनअवस्थाका मैं साक्षी हूं ॥ ५॥ ९९ उत्तरः- यह जाग्रत्अवस्था होवै तिसकू बी मैं जानता हूं औ स्वप्न सुषुप्तिविष न होवै तब तिसके अभावकू बी मैं जानता हूं । यात जाग्रत् अवस्था मैं नहीं औ मेरी नहीं । यह स्थू- लदेहकी है.। मैं इसका जाननैहारा साक्षी घटसा- क्षीकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ इसरीतिसे जाग्रतअवस्थाका मै साक्षी हूं ॥ ॥ स्वप्न अवस्थाका मैं साक्षी हूं। प्रश्न:- स्वप्नअवस्था सो क्या है ? उत्तरः- जाग्रत् अवस्थाविषै जो पदार्थ देखे होवें। सुने होवें । भोगे होवें । तिनका संस्कार बालके हजारवें भाग जैसी बारीक हिता नामक नाडी जो कंठवि है तिसविषै रहता है ॥ ति- ससे निद्राकालमैं पांचविषय आदिक पदार्थ औ तिनका ज्ञान उपजता है । तिनसैं जिसविषै व्य- TRENA १०० ॥ विचारचंद्रोदय ॥ वहार होवै सो स्वप्नअवस्था है। प्रश्नः- स्वप्नअवस्थाविषै जीवका स्थान वा- चा भोग शक्ति गुण औ स्वप्नके अभिमानसैं तिस ( जीव )का नाम क्या है ? उत्तरः-स्वप्नअवस्थाविषै जीवका १ कंठ- स्थान है। २ मध्यमा वाचा है । ३ सूक्ष्म (वासनामय) भोग है। ४ ज्ञान शक्ति है । ५ सत्व गुण है। ६ औ स्वप्नके अभिमानसें तैजस नाम है। मश्नः- स्वप्नअवस्थाके कहनेसैं क्या सिद्ध हुवा ? उत्तर:- स्वप्नअवस्था होवै तिसकू बी जानता हूं । औ जाग्रत्सुषुप्तिविषै न होवै तब तिसके अभावकू बी मैं जानता हूं । यातें यह स्वप्नअवस्था मैं नहीं औ मेरी नहीं । यह सूक्ष्म- ॥६९ ॥ कितनैक रजोगुण बी कहते हैं। SPIRA MARATHASTRIES ॥ तीनअवस्थाका मैं साक्षी हूं ॥ ५ ॥ १०१ देहकी है । मैं इसका जाननैहारा साक्षी घटसा- क्षीकी न्याई इसते न्यारा हूं । यह स्यनके कह- नेसैं सिद्ध भया ॥ इसरीतिसे स्वप्न अवस्थाका में साक्षी हूं ॥ ॥ सुषुप्तिअवस्थाका मैं साक्षी हूं ॥ प्रश्न:- सुषुप्तिअवस्था सो क्या है उत्तर:- पुरुष जब निद्रासैं सोयके उठे तब सुषुप्तिविषै अनुभव किये सुख औ अज्ञान- का स्मरण करिके कहता है । जो "आज मैं सु- खसे सोयाथा औ कछु बी न जानता भया" यह सुख औ अज्ञानका प्रकाश । साक्षीचेतनरूप अ- नुभवसें जिसविषै होवैहै । ऐसी जो वुद्धिकी वि- लयअवस्था । सो सुषुप्तिअवस्था है ॥ भश्न:- सुषुप्तिअवस्थाविषै जीवका स्थान TIRIT ANDE १०२ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ वाचा भोग शक्ति गुण औ सुषुप्तिके अभिमानसैं तिस (जीव )का नाम क्या है ? उत्तरः- सुषुप्तिअवस्थाविषै जीवका १ हृदय स्थान है । २ पश्यंति वाचा है । ३ आ- नंद भोग है। ४. द्रव्य शक्ति है । ५ तम गुण है।६ औ सुषुप्तिके अभिमानसे प्राज्ञ नाम है। प्रश्न:- सुषुप्तिअवस्थाविषै दृष्टांत क्या है। उत्तरः-प्रथमदृष्टांत:- जैसें कोईका भूषण कूपविषै गिय हो । तिसके निकासनैकू कोई तारूपुरुष कूपविषै गिरे । सो पुरुष भूषण मिले तिसळू बी जानता है औ भूषण न मिले तिसकू बी जानता है। परंतु कहनेका साधन जो वाक्- इंद्रिय है । तिसके देवता अग्निका जलके साथि विरोध होनैः तिरोधान होवै हैं। यातें कहता नहीं । औ जब पुरुष जलसे बाहीर निकसै तब Souldamagam ARRESTIMATRICTUREPuti ॥ तीनअवस्थाका में साक्षी हूं ॥ ५ ॥ १०३ कहनेका साधन देवतासहित वाक्इंद्रिय है । यात भूषण मिल्या अथवा न मिल्या सो कहता है ।। सिद्धांत:- तैसैं सुषुप्तिअवस्थाविषै सुख औ अज्ञानका साक्षीचेतनरूप सामान्यज्ञान है । परंतु विशेषज्ञानके साधन जो इंद्रिय औ अंतःकरण । तिनका तब अभाव है। यातें सुख औ अज्ञान का विशेषज्ञान होता नहीं। जब पुरुष जागता है तब विशेषज्ञानके साधन इंद्रिय औ अंतःकरण होवैहें । यात सुषुप्तिविर्षे अनुभव किये सुख औ अज्ञानका स्मृतिरूप विशेष- ज्ञान होवैहै ॥ द्वितीयदृष्टांत:-जैसे आतपविषै पिगल्या घृत होवै । सो छायाविषै स्थित होवै तौ घटारूप होवै है । फेर आतपविषै स्थित होवै तौ पिगलता है । सिद्धांत:- तैसें सुषुप्तिविधै कारणशरीररूप १०४ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ अज्ञान है । सो जाग्रत स्वप्नविषै बुद्धिरूप होवैहै । फेर सुषुप्तिविषै अज्ञानरूप होवैहै ॥ तृतीयदृष्टांत:- जैसे कोई बालक लडकनके साथि खेल करनैकू जावै । सो जब श्रमकू पावै तब माताके गोद मैं सोयके ग्रह के सुखका अनुभ- व करता है । फेर जब लडके बुलावें तब बाहीर जायके खेलकू करता है ॥ सिद्धांत:- तैसे कारणशरीर जो अज्ञान । तिसरूप माता है । तिसका बुद्धिरूप बालक क- मरूप लडकनके साथि जाग्रत्स्वप्नरूप बहिर्भूमि- विषै व्यवहाररूप खेलकू करता है । जब विखे- परूप श्रमकू पावै। तब सुषुप्तिअवस्थारूप ग्रह- विषै अज्ञानरूप मातामैं लीन होयके ब्रह्मानंदका अनुभव करता है । फेर जब कर्मरूप लडके बु.

॥ तीनअवस्थाका में साक्षी हूं ॥ ५ ॥ १०५ लावें तब जाग्रतस्वप्नरूप बहिभूमिविषै व्यवहार- रूप खेलकू करता है ॥ चतुर्थदृष्टांत:- जैसे समुद्रजलकरि पूर्ण घट- कू गलेमैं रस्सी बांधके समुद्रविषै लीन करें । तब घटविषै स्थित जल समुद्रके जलसै एकताकू पा- वता है । तौ बी घटरूप उपाधिकरि भिन्नकी न्याई है । फेर जब रस्सीडूं खीचीये तव भेदकू पावता है। परंतु जलसहित घट औ समुद्रका आधार जो आकाश सो भिन्न होता नहीं। किंतु तीनकालविषै एकरस है ॥ सिद्धांत:- तैसें अज्ञानरूप समुद्रजलकरि पूर्ण जो लिंगदेहरूप घट है । सो अदृष्टरूप रस्सीसे बांध्या हुया सुषुप्तिकालविषै । औ ति- सके अवांतर भेदरूप मरण मूर्छा अरु प्रलयका- लविषै समष्टिअज्ञानरूप ईश्वरकी उपाधि मा- BASE द १०६ ॥ विचारचंद्रोदय ।। याविषै लीन होवैहै। तब सो व्यष्टिअज्ञानरूप जीवकी उपाधि अविद्या । समष्टिअज्ञानसे एक- ताळू पावैहै । तौ बी लिंगशरीरके संस्काररूप उपाधिकरि भिन्नकी न्याई है । फेर जब अदृष्ट- रूप रस्सी• अंतर्यामी प्रेरता है । तव भेदर्दू पावै. है। परंतु व्यष्टिअज्ञानरूप जलसहित लिंगदेहरूप वट औ समष्टिअज्ञानरूप समुद्रका आधार जो चिदाकाश सो भिन्न होता नहीं। किंतु तीनका. लविषै एकरस है ॥ प्रश्न:-- सुषुप्तिके कहनेसे क्या सिद्ध भया ! उत्तरः- सुषुप्तिअवस्था होवै तिसकू बी में जानता हूं औ जाग्रतस्वप्नविषै यह न होवै तब तिसके अभावकू वी में जानता हूं । यातें यह सु- पुप्तिअवस्था मैं नहीं औ मेरी नहीं । यह कार- TATERNALMiDATEKARTERESEARABHASTROMITTENTIRE ESTINEE ॥ प्रपंच मिथ्या वर्णन ॥ ६ ॥ १०७ ARTA णदेहकी है । मैं इसका जाननैहारा साक्षी घटसा- क्षीकी न्याई इसते न्यारा हूं ॥ इसरीतिसैं सुषुप्तिअवस्थाका मैं साक्षी हूं ॥ इति श्रीविचारचंद्रोदये अवस्थात्रयसा- क्षीवर्णननामिका पंचमकला समाप्ता ॥५॥ अथ षष्ठकलाप्रारंभः ॥ ६ ॥ ॥ प्रपंच मिथ्या वर्णन ॥ प्रश्न:- आत्माविषै तीनअवस्था किसकी न्याई भासती हैं ? उत्तर:- दृष्टांत:- जैसे सीपीविषै रूपा अ- थवा भोडल ( अभ्रक) अथवा कागज । ये तीन सीपीके अज्ञानसैं कल्पित भासते हैं ॥ तिन तीन- वस्तुनका परस्पर वा सीपीके साथि व्यतिरेक है।

१०८ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ औ सीपीका तीनवस्तुनविषै अन्वय है ॥ जैसे किः- सीपीविषै जब रूपा भासै तब भोडल औ कागज भासता नहीं। औ जब भोडल भासै तब रूपा औ कागज भासता नीं । औ जब कागज भासै तब रूपा औ भोडल भासता नहीं। यह तीनवस्तुनका परस्पर व्यतिरेक है ॥ सीपीविषै आदिमध्यअंतमैं इन तीनवस्तुनका व्यावहारिक औ परमार्थिक अत्यंतअभाव है ॥ यह सीपी- 'विषै वी तिन तीनवस्तुनका व्यतिरेक है । औ भ्रांतिकालविणे “ यह रूपा है'. " यह कागज है '' इसरीतिसैं सीपीका इदं- अंश तिन तीनवस्तुनविषै अनुस्यूत भासता हैं । यह तिन तीनवस्तुन विषै सीपीका अन्वय है ॥ इहां सीपीके तीनअंश हैं:- सामान्यअंश । विशे- पअंश । कल्पितविशेषअंश ॥ इदंपना सामान्य- है यह भोडल ॥ . NEETISAR ॥ प्रपंच मिथ्या वर्णन ॥ ६ ॥ १०९ RAILETTEERIES अंश है ॥ काहेरौं । जो अधिककालविषै प्रतीत होवै सो सामान्यअंश है ॥ इदंपना जाते भ्रांति- कालविषै प्रतीत होवै है। औ भ्रांतिके अभावका- लविषै बी " यह सीपी है" ऐसे प्रतीत होवै है। यति यह इदंपना सामान्यअंश है औ आधार बी कहिये है ॥ नीलप्टष्ठ तीनकोणयुक्त सीपी विशे- षअंश है ॥ काहेरौं । जो न्यूनकालविषै प्रतीत होवै सो विशेषअंश है ॥ भ्रांतिकालविषै इन नीलप्टष्ठ आदिककी प्रतीति होवै नहीं। किंतु इनकी प्रतीतिसैं भ्रांतिकी नियत्ति होवैहै । यात यह विशेषअंश है औ अधिष्ठान बी कहिये है ॥ रूपा आदिक कल्पितविशेषअंश है ॥ काहे । जो अधिष्ठानके ज्ञानकालमें प्रतीत होवै नहीं। सो कल्पितविशेषअंश है ॥ जैसे रूपा आदिक । सीपीके अज्ञानकाल विषै प्रतीत होवैहै औ सीपीके TOP

आत्माके अज्ञानसैं होवै है ॥ तिनका परस्पर
औ अधिष्ठान आत्माके साथि व्यतिरेक है औ
आत्माका तिनविषै अन्वय है। जैसे किः-जाग्रत्
भासै है तब स्वप्न औ सुषुप्ति भासै नहीं औ
स्वप्न भासै है तब जाग्रत् औ सुषुप्ति भासै नहीं।
औ सुषुप्ति भासै है तब जाग्रत औ स्वप्न भासै
नहीं । यह तीनअवस्थाका परस्पर व्यतिरेक है ॥
औ अधिष्ठानविषै इन तीनअवस्थाका पारमा-
॥ ७० ॥ अभाव वा व्यावृत्ति ॥
॥ ७१ ।। भाव वा अनुवृत्ति ॥
ciमा

- muTURALLE स्वम है १५ ६ ।। इहा जात्माक आवद्याउपाधिस आरा- पित तीनअंश हैं:- सामान्यअंश विशेषअंश कल्पितविशेषअंश ॥ सत् ( हैपनै )रूप सामा- न्यअंश है । काहेते। "जाग्रत् सुषुप्ति है।" इसरीतिसैं आत्माका सत्पना भ्रां. त्तिकालविषै बी प्रतीत होवैहै औ भ्रांतिकी निव- त्तिकालविषै " मैं सत् हूं। मैं चित् हूं। मैं आनं: न हूं । मैं परिपूर्ण हूं । मैं असंग हूं। मैं नित्य- मुक्त हूं। मैं ब्रह्म हूं"।इसरीतिसै आत्माके सत्प- नैकी प्रतीति होवैहै । यातें यह सत्रूप सामान्य- अंश है औ आधार बी कहिये है ॥ चेतन आनं- स २ होवैहै । औ " में ब्रह्म हूं" ऐसे आत्माके ज्ञान- कालमैं आत्मासै भिन्न सत् प्रतीत होवें नहीं। या यह तीनअवस्थारूप प्रपंच कल्पितविशेष- अंश है औ भ्रांति बी कहिये है ॥ इसरीतिसें ये तीनअवस्था आत्माविषै मिथ्या प्रतीत होवै हैं । प्रश्नः-आत्माविषै मिथ्याप्रपंचकी प्रतीतिमैं अन्यदृष्टांत कौनसे हैं? उत्तरः-जैसे स्थाणुविषै पुरुष प्रतीत होवैहै ।

तैसैं आत्माविषै अपने अज्ञानतें प्रपंच प्रतीत
होवैहै । सो मिथ्या है | इसरीतिलै प्रपंचके
मिथ्यापनैका निश्चय करना । सोइ प्रपंचका
बाँध है ॥
प्रश्न-भ्रांतिरूप संसार कितनै प्रकारका है?
॥ ७२ ॥ मिथ्यापनके निश्चयका नाम बाध है।
सो शास्त्रीय यौक्तिक औ अपरोक्ष भेदते तीनभांति-
का है॥

११४ ॥ विचारचंद्रोदय ।। उत्तरः-१ भेदभ्रांति । २ काभोक्तापनकी । भ्रांति । ३ संगकी भ्रांति । ४ विकारकी भ्रां- ति । ५ ब्रह्मसे भिन्न जगतके सत्यताकी भ्रांति । ॥ ७३ ॥ जीव ईश्वरका भेद । जीवनका परस्पर भेद । जडनका परस्पर भेद । जीव जड का भेद । औ बड ईश्वरका भेद । यह पांचप्रकारकी भेदभ्रांति है ॥ ॥ ७४ ॥ अंतःकरणके धर्म कीपनैं भोक्ताप की आत्माविषै प्रतीति होवैहै। यह कतीभोक्तापने- की भ्रांति है। ॥ ७५ ॥ आत्माका देहादिकविर्षे अहंतारूप औ ग्रहादिकविषै ममतारूप संबंध है । वा सजातीय विजातीय स्वगतं वस्तु के साथि संबंधकी प्रतीति । सो संगभ्रांति ।। ७६ ॥ दुग्ध विकार दधिकी भ्याई । ब्रह्म- का विकार जीव तथा जगत् है । ऐसी जो प्रतीति । सो विकारांति है॥ . है ॥ RE- ॥ प्रपंच मिथ्या वर्णन ॥ ६ ॥ ११ यह पांचप्रकारका भ्रांतिरूप संसार है ॥ प्रश्न:-पांचप्रकारके भ्रमकी नित्ति किन दृष्टांतनसे होवैहै ? उत्तरः- ॥ १ ॥ विवप्रतिविवके दृष्टांतसे भेदभ्रमकी निवृत्ति होवैहै ॥ ॥ २ ॥ स्फाटिकविषै लालवस्त्रके' लालरंग- की प्रतीतिके दृष्टांतसैं कर्त्ताभोक्तापनैके प्रांतिकी निवृत्ति होवैहै ॥ ॥ ३ ॥ घटाकाशके दृष्टांतसैं संगभ्रांतिकी निटत्ति होवैहै ॥ EMAINSTITUTE-POTATE ।। ७७ ॥ सूत्रभाष्यके उपर पंचपादिका नाम टीका पद्मपादाचार्य ने करी है। तिस पंचपादिकाका व्याख्यानरूप विवरण नाम ग्रंथ है । तिसके कर्त्ता श्रीप्रकाशात्मचरण नाम आचार्य है। तिसकी रीतिक अनुसार यह उपर लिख्या बिंवमतिबिंबका दृष्टांत है।

.....
ATLAB
॥ विचारचंद्रोदय ॥
॥ ४ ॥ रज्जुविषै कल्पितसर्पके दृष्टांतसे
विकारांतिकी निरत्ति होवैहै ।
॥ ५ ॥ कनकवि कुंडलकी प्रतीतिके -
ष्टांतसे ब्रह्मसै भिन्न जगत्के सत्यपनैकी भ्रांतिकी
नित्ति होवैहै ॥
प्रश्न:-बिंबप्रतिबिंबके दृष्टांतसे भेदभ्रांतिकी
नियत्ति किसरीतिलै होवै है ?
उत्तरः-जैसे दर्पणविर्षे मुखका प्रतिबिंब
भासता है । सो प्रतिबिंब दर्पणविष नहीं है।
किंतु दर्पणकू देखने वास्ते निकसी जो नेत्रकी
त्ति । सो दर्पणकू स्पर्श करिके पीछे लौटिके
मुखळूही देखती है । यात बिंब जो मुख तिसकें
साथि प्रतिबिंब अभिन्न है। ताते प्रतिबिंब मिथ्या
नहीं । किंतु सत्य है ॥ औ प्रतिबिंबके धर्म जो
बिंबसे भिन्नपना औ दर्पणविषै स्थितपना ओ

BREAKERAYASATHEETITIRETREPACHHITA NELUAN IHIM । ॥ प्रपंच मिथ्या वर्णन ॥ ६ ॥ ११७ बिबसे उलटेपना । ये तीन औ तिनकी प्रतीतिरूप ज्ञान सो भ्रांति है । यातें इन धर्मनका मिथ्याप- नैका निश्चयरूप बाध करिके बिंब औ प्रतिबिं- बका सदाअभेद निश्चय होवैहै ॥ सिद्धांतः-तैसें शुद्धब्रह्मरूप बिंब है। तिसका अज्ञानरूप दर्पणविषै जीवरूप प्रतिबिंब भासता है । तिनमें स्वप्नकी न्याई एकजीव मुख्य है । औ दूसरे स्थावरजंगमरूप नानाजीव भासते हैं । सो जीवाभासहैं ॥ सो जीवरूप प्रतिबिंब ईश्वर- रूप बिबके साथि सदा अभिन्न है ॥ परंतु मा- याके बलसैं तिस जीवके धर्म । बिंबरूप ईश्वरसे भेद । जीवपना । अल्पज्ञपना । अल्पशक्तिपना। प- रिच्छिन्नपना । नानापना । इत्यादि। औ तिनकी प्र- तीतिरूप ज्ञान । सो भ्रांति है। यात तिनका मिथ्या- पनैका निश्चयरूप बाध करिके। जीवरूप प्रतिबि- ११८ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ ७८ ब औ ईश्वररूप बिंबका सदाअभेद निश्चय हो- बैहै ॥ इसरीतिसैं बिंबप्रतिबिंबके दृष्टांतसैं भ्रांतिकी नित्ति होवैहै ॥ १ ॥ प्रश्न:-स्फाटिकविषै लालवस्त्रके लालरंगकी प्रतीतिके दृष्टांतसे कीमोक्कापनकी भ्रांति कि. सरीतिसे निवृत्त होवैहै ? उत्तरः-जैसें लालवस्त्रके ऊपर धरे स्फाटि- कमणिविषै वस्त्रका लालरंग संयोगसंबंधसैं भास- ता है । परंतु सो वस्त्रका अर्म है ॥ वस्त्र औ स्फाटिकके वियोगके भये स्फाटिकविषै भासता ।। ७८ ॥ मुख्य जीवईश्वरके भेदके निषेधसैं तिसके अंतर्गत च्यारीभेदनका निषेध सहज सिद्ध होवैहै ।। सर्वभेद उपाधिके किये हैं । उपाधि सर्व मिथ्या हैं । ताते तिनके किये भेद बी सर्व मिथ्या हैं । यात वास्तव अद्वैतब्रह्मही अवशेष रहता है ।।

॥ प्रपंच मिथ्या वर्णन ॥ ६॥ ११९ नहीं । यात स्फाटिकका धर्म नहीं है। किंतु स्फाटिकविषै भ्रांतिसें भासता है ॥ सिद्धांत:-तैसें अंतःकरणका धर्म जो कर्ता- भोक्तापना सो आत्माविषै तादात्म्यसंबंधसे भा- सता है। परंतु सो अंतःकरणका धर्म है ॥ सु- पुप्तिविषै अंतःकरण औ आत्माके वियोगके भये आत्माविषै भासता नहीं । यात आत्माका धर्म नहीं है। किंतु आत्माविषै भ्रांतिसे भासता है । इसरीतिसे स्फाटिकविषै लालरंगके प्रतीतिके ह- टांतसैं कर्त्ताभोक्तापनकी भ्रांति निवृत्त होवैहै २ प्रश्न:-घटाकाशके दृष्टांतसैं संगभ्रांतिकी निवृत्ति किसरीतिसे होवैहै ? उत्तर:-जैसे घटउपाधिवाला आकाश घ. टाकाश कहिये है । सो आकाश घटके संग भासता है। तौ बी घटके धर्म उत्पत्तिनाश ग- मनआगमन आदिक हैं । सो आकाशकू स्पर्श १२० ॥ विचारचंद्रोदय ॥ करते नहीं । यातें आकाश असंग है। औ आ- काशका संबंध घटके साथि भासता है। सो भ्रांति है ॥ सिद्धांतः-तैसे देहआदिक संघातरूप उपा धिवाला आत्मा जीव कहिये है। सो आत्मा संघा- तके संग भासता है । तौ बी संघातके धर्म ज. न्ममरणादिक हैं । सो आत्माकू स्पर्श करते न. हीं । काहेरौं । संघात दृश्य है औ आत्मा द्रष्टा है। तातें आत्मा संघातसैं न्यारा असंग है ॥ जा- तें आत्मा संघातरूप नहीं । तात आत्माका संघा- तके साथि अहंतारूप संबंध बी नहीं । औ जाते आत्माका संघात नहीं । किंतु संघात पंचमहाभूत- का है।तात आत्माका संघातके साथि ममतारूप संबंध बी नहीं ॥ जाते आत्मा संघातसे न्यारा है। तात आत्माका संघातके संबंधी स्त्रीपुत्र ग्रहादि- कनके साथि बी ममतारूप संबंध नहीं । ऐसें आ. PantaTam CalendLATod H-47 ॥ प्रचंप मिथ्या वर्णन ॥ ६॥ १२१ त्मा असंग है । इसका संघातके साथि अहंतामम- तारूप संबंध भ्रांति है । इसरीतिसे घटाकाशके दृष्टांतसे संगभ्रांतिकी नियत्ति होवैहै ॥ ३ ॥ प्रश्न:-रज्जुविषै कल्पितसर्पके दृष्टांतसे वि- कारभ्रांतिकी नित्ति किसरीतिलै होवैहै ? उत्तरः-मंदअंधकारविषै रज्जु स्थित हौवै । तिसके देखने वास्ते नेत्ररूप द्वारसैं अंतःकरणकी उत्ति निकसै है । सो वृत्ति अंधकारादि दोषसे रज्जुके आकारकू पावती नहीं । यात तिस - त्तिसैं रज्जुके आवरणका भंग होवै नहीं । तब रज्जुउपाधिवाले चैतन्यके आश्रित रही जो तूला- अविद्या । सो क्षोभकू पायके सर्परूप विकारकू धारती है । सो सर्प । दुग्धके परिणाम दधिकी ॥ ७९ ॥ घटादिरूप उपाधिवाले चैतन्यकू आव- रण करनेवाली जो अविद्या । सो तूलाअविद्या है ॥ TARATAMIm १२२ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ न्याई अविद्याका परिणाम है। औ रज्जुउपाधिवाले चैतन्यका विवर्त है । परिणाम (विकार) नहीं । सिद्धांत:-तैसें ब्रह्मचैतन्यके आश्रित रही जो मुलाअविद्या. । सोप्रारब्धादिक निमि- तसे क्षोभकू पायके जड चैतन्य ( चिदाभास ) प्रपंचरूप विकारकू धारती है । सो प्रपंच अवि- याका परिणाम है औ. अधिष्ठान ब्रह्मचैतन्य- ॥ ८० ॥ शुद्धब्रह्म औ आत्माकू आवरण करनै- वाली जो अविद्या । सो मूलाअविद्या है ।। 11८१॥कार्य करनेके सन्मुख होनें कू क्षोभ कहै हैं ।। ॥ ८२ ॥ पूर्वरूपकू त्यागिके अन्यरूपकी जो प्रा- प्ति सो परिणाम है ॥ वा उपादानके समानसत्तावाला जो अन्यथारूप ( उपादानते औरमकारका आकार ) सो परिणाम है ॥ जैसैं दुग्धका परिणाम दधि है । याहीकू विकार बी कहै हैं । ॥ ८३ ॥ जो आप निर्विकाररूपसें स्थित होने MARATTIWAL JanuTINATESTREENERATE ॥ प्रपंच मिथ्या वर्णन ॥ ६ ॥ १२३ FARIOM.i का विवत है। परिणाम नहीं ॥ इसरीतिसैं रज्जु- विषै कल्पितसर्पके दृष्टांतसे विकारभ्रांतिकी नि- रत्ति होवैहै ॥ ४ ॥ प्रश्नः- कनकवि कुंडलकी प्रतीतिके - ष्टांतसे ब्रह्मसै भिन्न जगत्के सत्यताकी भ्रांतिकी नित्ति किसरीतिसे होवैहै ? उत्तर:- जैसे कनक औ कुंडलका कार्य- औ अविद्याकृत कल्पित कार्यका आश्रय होवै । सो अधिष्ठान है ॥ जैसे कल्पितसर्पका अधिष्ठान रज्जु है । याहीकू परिणामीउपादानसैं विलक्षण दूसरा वि- वर्तउपादान बी कहते हैं । ।। ८४॥ अधिष्ठानतें विषमसत्तावाला ( अल्प अरु भिन्न सत्तावाला ) जो अधिष्ठानसे अन्यथारूप ( औ. रप्रकारका आकार ) सो विवर्त है । जैसैं रज्जुका विवर्त सर्प है । याहीकू कल्पितकार्य औ कल्पितवि. शेष जी कहते हैं।

१२४
॥ विचारचंद्रोदय ॥
कारणभावकरि भेद भासता है सो कल्पित है ।
औ कनकसैं कुंडलका भिन्न स्वरूप देखीता,
नहीं । यात वास्तव अभेद है । तातें कनकसैं
भिन्न कुंडलकी सत्ता नहीं है ॥
सिद्धांत:- तैसें ब्रह्म
औ
जगत्का कार्य-
कारणभावकरि अरु विशेषणकरि भेद भा-
सता है सो कल्पित है ॥ औ विचारकरि दे-
खिये तो अस्तिभातिप्रियसै भिन्न नामरूपजगत्
सत्य सिद्ध होवै नहीं। किंतु मिथ्या सिद्ध हो-
वैहै ॥ औ जो वस्तु जिसविषै कल्पित होवै सो
वस्तु तिसतै भिन्न सिद्ध होवै नहीं । यात ब-
मसे जगत्का वास्तवअभेद है । ताते ब्रह्मसैं
जगत्की भिन्न सत्ता नहीं है । इसरीतिसे कनक-
विष कुंडलकी प्रतीतिके दृष्टांतसे ब्रह्मसै भिन्न
जगत्के सत्यताकी भ्रांतिकी निवृत्ति होवैहै॥६॥

FREETA ॥ प्रपंच मिथ्या वर्णन ॥ ६ ॥ १२५ प्रश्न:- भ्रांति सो क्या है ? उत्तरः- भ्रांति सो अध्यास है ॥ प्रश्न:-- अध्यास सो क्या है ? उत्तरः- भ्रांतिज्ञानका विषय जो मिथ्या वस्तु औ भ्रांतिज्ञान । तिसका नाम अध्यास है ॥ प्रश्न:- यह अध्यास कितनै प्रकारका है ? उत्तरः- ज्ञानाध्यास औ अर्थाध्यास । इस भेदते अध्यास दो भांतिका है ॥ तिनमें अर्थाध्या- स । केवलसंबंधाध्यास । संबंधसहित संबंधीकाअ- ॥८५॥ अनात्माविषै आत्माका अध्यास होवैहै। तहां आत्माका अनात्माके साथि तादात्म्यसंबंध अ- ध्यस्त है । आत्माका स्वरूप नहीं । यात अनात्माविषै आत्माका केवलसंबंधाध्यास ॥ ८६ ।। आत्माविषै अनात्माका संबंध औ स्व- रूप दोनूं अध्यस्त हैं । यात अत्माविषै अमात्माका संबंध सहित संबंधीका अध्यास है। ॥

१२६ ॥ विचारचंद्रोदय ।। ध्यास । केवलधर्माध्यास । धर्मसहित धर्मीकाअ- ध्यास । अन्योन्याध्यास । अन्यतराध्यास । इन भे- * ॥ ८७ ॥ स्थूलदेहके गौरता आदिक औ इंद्रिय- नके दर्शन आदिक धोकाही आत्माविषै अध्यास होवैहै । तिनके स्वरूपका नहीं । याः आत्माविषै देह औ इंद्रियनके केवलधर्मका अध्यास है॥ ॥८॥अंतःकरणके कर्तापना आदिक धर्म औ स्क रूप दो आत्माविषै अध्यस्त हैं । यातें अंतःकरणका आत्माविषै धर्मसहित धर्मीका अध्यास है। ।। ८९ ।। लोह औ अग्निकी न्याई आत्माविषै अनात्माका औं अनात्माविषै आत्माका जो अध्यास । सो अन्योन्याध्यास है॥ ॥९०॥ अनात्माविषै आत्माका स्वरूप अध्यस्त नहीं । किंतु आत्माविषै अनात्माका स्वरूप अध्यस्त है । यहहीं अन्यतराध्यास है । दोमेसें एकका अध्यास अन्यतराध्यास कहिये है ।। या

॥ प्रपंच मिथ्या वर्णन ॥ ६ ॥ १२७
दत षट्प्रकारका है ॥ अथवा स्वरूपाध्यास औ
संसर्गाध्यास। इस भेदते अर्थाध्यास दो प्रकारका है।
ताके अंतर्गत उक्त षड्भेद हैं । औ ऊपर लिखे
॥ ९१ ॥ ज्ञानसैं बाध होने योग्य वस्तु । अधिष्ठा-
नविषै स्वरूपसे अध्यस्त होवैहै । देहादि अनात्माका
अधिष्ठानके ज्ञानसैं बाध होवैहै । यात ताका आत्मा-
विषै स्वरूपाध्यास है॥
॥ ९२ ॥ बाधके अयोग्य वस्तुका स्वरूप अध्यस्त
होवै नहीं । किंतु ताका संबंध अध्यस्त होवै है। या.
तें अनात्माविषै आत्माका संसाध्यास है। याहीकू
संबंधाध्यास बी कहे हैं।
॥ ९३ ॥ केवलधर्माध्यास । धर्मसहित धर्मीका
अध्यास । औ अन्यतराध्यास | ये तीन स्वरूपाध्या-
सके अंतर्गत हैं।केवलसंबंधाध्यास । संसर्गाध्यास ही
॥ संबंधसहित संबंधीका अध्यास संसर्गाध्याससहित
स्वरूपाध्यास है। औ अन्योन्याध्यासमैं संसर्गाध्यास
REL,
ELESer
REE
SARA
HTTER

१२८ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ भेदभ्रांति आदिक पांचप्रकारका भ्रम बी याहीके अंतर्गत है ॥ औ आगे नेडेही कहियेगा जो आत्मा अनात्माके विशेषणोका अन्योन्याध्यास सो बी याहीके अंतर्गत है । सो ताके टिप्पण- विषै दिखाया जावेगा। प्रश्न:-अहंकारादिक अनात्माका औ आ- औ स्वरूपाध्यास दोन हैं । काहेरौं । आत्माका स्वरूप तौ सत्य है । यातें अध्यस्त नहीं। किंतु ताका संसर्ग कहिये तादाम्यसंबंध अनात्माविषै अध्यस्त । या- ते ताका संसर्गाध्यास है ॥ औ अनात्माका स्वरूप- ही आत्माविषै अध्यस्त । यातें ताका स्वरूपा- ध्यास है ॥ तातै अन्योध्याध्यास दोनूंके अंतर्गत है। ॥ ९४ ॥ भेदभ्रांति आदिक पांचप्रकारका भ्रम जो पूर्व लिख्या है । तिनमैं संगनांतिकू छोडिके च्यारीप्रकारका भ्रम स्वरूपाध्यासके अंतर्गत है औ पांचवी संगनाति । संसर्गाध्यासके भीतर है । है - प ॥ प्रपंच मिथ्या वर्णन ॥ ६ ॥ १२९ त्माका जानने में विशेष उपयोगी कौन अध्यास है? उत्तरः-अन्योन्याध्यास है ॥ प्रश्न:--अन्योन्याध्यास सो क्या है ? उत्तर:-परस्परविर्ष परस्परके अध्यासका नाम । अन्योन्याध्यास है ॥ ॥९५||इहां सर्व अध्यासनके स्वरूप औ. उदाहरण विस्तारके भयसै विशेष लिखे नहीं। किंतु संक्षेपसे लिखे है। परंतु अन्योऽन्याध्यासका स्वरूप तौ विशेष उपयोगी जानिके स्पष्ट दिखाया है ॥ तामें अनात्मा. के धर्म दुःख भो द्वैतसहितपना । आत्माके आनंद औ अद्वैतपनै विषै स्वरूपसैं अध्यस्त होयके तिनकू ढांपे हैं औ आत्माके धर्म सत् अरु चित् । अनात्माके असत्ता औ जडताविषै संसर्ग ( संबंध )द्वारा अध्यस्त होयके तिनकू ढापे हैं ॥ कार्यसहित अज्ञानसैं जो आवृत्त (ढाप्या) हो । सो अधिष्ठान कहिये है ॥ इसरीतिलै आत्मा औ अनात्माका यह अन्योन्याध्यास बी संसर्गाध्यास औ स्वरूपाध्यासके अंतर्गत है ।

नात्माके हैं ॥ तिनमें अनात्माके दुःख औ द्वैत- ॥ विचारचंद्रोदय ॥ प्रश्न:- आत्मा. औ अनात्माका परस्पर अ- ध्यास किसरीतिसे है ? उत्तरः- सत् चित् आनंद औ अद्वैतपना । ये च्यारीविशेषण आत्माके हैं ॥ असत् जड दुःख औ दैतसहितपना । ये च्यारीविशेषण अ- सहितपना । इन दोविशेषणोने आत्माके आनंद औ अद्वैतपनैकुं ढांपे हैं । तातें आत्माविषै " में आनंदरूप औ अद्वैतरूप हूं"। ऐसी प्रतीति होवै नहीं । किंतु " मैं दु:खी औ ईश्वरादिकसै भिन्न हूं" । ऐसी प्रतीति होवै है ॥ औ आ त्माके सत् औ चित् । इन दोविशेषणोनें अना- त्माके असत् औ जडपनैकुं ढांपे हैं । तातें 'अ- नात्मा जो अहंकारादिक । तिसविषै । असत् है। अभान ( जड)रूप है"। ऐसी प्रतीति होने ॥

PRIL BHARA TI BHAVAN, भारती भवन ॥ आत्माकै विशेषण । खाना १५१ AL LAA HABA नहीं। किंतु विद्यमान है भासता (चेतन ) है"। ऐसी प्रतीति होवै है ॥ इसरीतिसे आत्मा औ अनात्माका परस्पर अध्यास है ॥ इति श्रीविचारचंद्रोदये अपंचमिथ्यावर्ण- ननामिका षष्ठकला समाप्ता ॥ ६ ॥ । KUTTA अथ सप्तमकलाप्रारंभः ॥ ७॥ ॥ आत्माके विशेषण ॥ प्रश्न:-आत्माके विशेषण कितनै प्रकारके है ? उत्तरः-आत्माके विशेषण । विधेय (सा- ॥ ९६ ॥ ब्रह्म औ ईश्वरका अरु कूटस्थ औ जीवका जो परस्पर अध्यास है। सो आगे ग्यारवींक- लाविषै कहेंगे। ॥ ९७ ॥ जैसे "सधवा शब्द । विधवास्त्रीका

१३२
॥ विचारचंद्रोदय ॥
क्षात्वोधक ) औ निषेध्य ( प्रपंचके निषेधद्वारा
बोधक ) भेदते दोप्रकारके हैं |
प्रश्न:-आत्माके विधेयविशेषण कौनसे हैं ?
उत्तरः-- १ सत् । २ चित् । ३ आनंद ।
४ ब्रह्म । ५ स्वयंप्रकाश । ६ कूटस्थ ।
निषेध करिके सुवासिनीस्त्रीका साक्षात्बोधक है । तैसे
'सत्' आदिक विधेयविशेषण 'असत्' आदिक
प्रपंचके विशेषणोंका निषेध करिके सदादिरूप ब्रह्मके
साक्षात्बोधक हैं । यात " विधेय" कहिये हैं ।
॥ ९८ ॥ जैसें अविधवा शब्द विधवास्त्रीका नि-
षेध करिके अर्थात् ताते विलक्षण सुवासिनीस्त्रीका
बोधक है । तैसे अनंतआदिक जो निषेध्यविशेषण
हैं । वे अंत आदिक प्रपंचके धर्मोंका निषेध करि-
के अर्थात् तिनतें विलक्षण ब्रह्मके बोधक हैं । यातें
निषेध्य कहिये हैं॥

ASANTERNATANEERINNARRATIONAL 1j आत्माके विशेषण ॥ ७ ॥ १३३ Lilal ७ साक्षी। द्रष्टा । ९ उपद्रष्टा । १० एक । इत्यादिक हैं ॥ प्रश्न:-सत् आत्मा कैसे हैं ? उत्तर:-जिसकी ज्ञानसे वा और किसीसैं बी नित्ति होवै नहीं । सो सत् है ॥ आत्माकी जाते ज्ञानसे वा और किसीसें बी नित्ति होवै नहीं । यात आत्मा सत् है ॥ १ ॥ प्रश्न:-चित् आत्मा कैसे है ? उत्तरः-अलुप्तप्रकाश सो चित् है ॥ आत्मा जाते अलुप्तप्रकाशरूप हैं । याते चिद है ॥ २ ॥ प्रश्न:- आनंद आत्मा कैसे है ? उत्तरः-परम (सर्वसैं अधिक) प्रीतिका जो विषय । सो आनंद है। आत्माविषै जातें सर्व- की परमप्रीति है । यात आत्मा आनंद है ॥ ३ ॥ प्रश्न:-ब्रह्मरूप आत्मा कैसे है ? उत्तर:-आत्मा सचित्आनंदरूप श्रुति LAMICHAEL

H-
१३४
॥ विचारचंद्रोदय ॥
युक्ति औ अनुभवसे सिद्ध है । औ ब्रह्म बी
शास्त्र ( उपनिषद् )विषै सचित्आनंदरूप कह्या
है । तात आत्मा ब्रह्मरूप है ॥ किंवा ब्रह्म
नाम व्यापकका है ॥ जिसका देश अंत न
होवै सो व्यापक कहिये है ॥ आत्मा जो ब्रह्मसैं
भिन्न होवै तौ देशनै अंतवाला होवैगा । जिसका
देशते अंत होवै तिसका कालते बी अंत होवै है।
यह नियम है ॥ जिसका देशकालते अंत होवै सो
अनित्य कहिये है । तातें आत्मा अनित्य होवैगा।
यात आत्मा ब्रह्मसे भिन्न नहीं ॥ औ आत्मासे
भिन्न जो ब्रह्म होवै । तौ ब्रह्म अनात्मा होवैगा ॥
जो अनात्मा घटादिक हैं सो जड हैं । तातें आ-
त्मासै भिन्न ब्रह्म जड होवैगा । सो वार्ता श्रुतिसे
विरुद्ध है । यति आत्मासै भिन्न ब्रह्म नहीं ।
ताते ब्रह्मरूप आत्मा है ॥ ४ ॥

॥ आत्माके विशेषण ।। ७ ॥ १३५ प्रश्नः-स्वयंप्रकाश आत्मा कैसे है ? उत्तरः-जो दीपककी न्याई आपके प्रकाश- नैविषै किसीकी बी अपेक्षा करै नहीं। औ आप सर्वका प्रकाशक होवै। सो स्वयंप्रकाश कहिये है।। ऐसा आत्माहीं है। यात आत्मा स्वयंप्रकाश है । अथवा जो सदाअपरोक्षरूप होवै औ किसी ज्ञा- नका विषय न होवै । सो स्वयंप्रकाश कहिये है ॥ आत्मा जाते सदाअपरोक्षरूप है । औ प्र- काशरूप होतैतें किसी बी ज्ञानका विषय (प्र- काश्य ) नहीं । यात स्वयंप्रकाश है ॥ ५ ॥ प्रश्नः-कूटस्थ आत्मा कैसे है ? उत्तरः-कूट नाम लोहारके अहिरनका है । ताकी न्याई जो निर्विकार ( अचल)रूपसे स्थि- त होवै सो कूटस्थ कहिये है ॥ जैसे लोहार अनेक घाट घडता है। तो बी अहिरन ज्यूंका उत्तरः-लोकव्यवहारविषै उदासीन ( रागद्वे- परहित ) । समीपवर्ती । औ चेतन होवै । सो सा- क्षी कहिये है ॥ जाते आत्मा देहादिकसैं उदासीन है। औ समीपवर्ती है। औ चेतन (अजडप्रकाश) है। यात आत्मा साक्षी है ॥ वा अंतःकरणरूप उपाधिवाला चेतन साक्षी कहिये है ॥ वा अं. तःकरण औ अंतःकरणकी उत्तिनविषै वर्तमान चेतनमात्र (केवलचेतन ) साक्षी कहिये है । ऐसा आत्मा है । यति साक्षी है ॥ ७ ॥ प्रश्न:-द्रष्टा आत्मा कैसे है?

उत्तर:-जस यज्ञशालावष यज्ञकायक कर- नहारे १५ ऋत्विज होवै हैं । औ सोलवां यज- मान होते है। औ सतरावी यजमानकी स्त्री होने औ अठारवां उपद्रष्टा (पास बैठके देखनैहारा) होवै है । सो कछु बी कार्य करता नहीं ॥ तैसे स्थूलदेहरूप यज्ञशालाविषै पांचज्ञानइंद्रिय पांच- कर्मइंद्रिय औ पांचप्राण । ये १५ ऋत्विज हैं । सोलवां मनरूप यजमान है। औ सतरावी बुद्धि- रूप यजमानकी, स्त्री है । ये सर्व आपआपके वि- षयके ग्रहण करनैरूप भोगमय यज्ञका कार्य क- रते हैं । औं इन सर्वका समीपवर्ती जाननैहारा .

१३८ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ आत्मा अठारवां उपद्रष्टा है ॥ ९ ॥ प्रश्नः-एक आत्मा कैसे है ? उत्तरः-आत्माका सजातीय (जातिवाला ) और आत्मा नहीं है । यात आत्मा एक है ॥१०॥ इत्यादिक आत्माके विधेयविशेषण हैं। प्रश्न:-आत्माके निषेध्यविशेषण कौनसे हैं ? उत्तरः-१ अनंत । २ अखंड । ३ . असंग । ४ अद्वितीय । ६ अजन्मा । ६ निर्विकार । ७ निराकार । ८ अव्यक्त । ९ अव्यय । १० अ- क्षर । इत्यादिक हैं। प्रश्न:-अनंत आत्मा कैसे है ? उत्तर:-आत्मा व्यापक है । तातें आत्माका देशते अंत नहीं । औ जाते आत्मा नित्य है तातें आत्माका कालते अंत नहीं। औ जाते आत्मा अधिष्ठान होनैः सर्वका स्वरूप है । ताते S ॥ आत्माके विशेषण ॥ ७ ॥ १३९ आत्माका वस्तुते अंत नहीं । औ जाते आत्मा- ' का देश काल औ वस्तुते अंत (परिच्छेद ) नहीं । तातें आत्मा अनंत है ॥ १ ॥ प्रश्न:-अखंड आत्मा कैसे है ? उत्तरः-(१)जीवईश्वरका भेद ।(२) जीवनका परस्पर भेद । (३) जीवजडका भेद । (४) जडईश्व- रका भेद। (५) जडजडका भेद । ये पांचभेद हैं। तिनतें आत्मा रहित है॥अथवा (१) सजातीय । (२) विजातीय । (३) स्वगत भेदतें आत्मा रहित है । यात आत्मा अखंड है ॥ २ ॥ प्रश्न:-असंग आत्मा कैसे है ? उत्तरः-संग नाम संबंधका है ॥ सो संबंध तीनप्रकारका है:-(१) सजातीयसंबंध । (२) विजा- तीयसंबंध । (३) स्वगतसंबंध ॥ अपनी जातिवालेसे जो संबंध है । सो सजातीय है । जैसे ब्राह्मण.

११० || विचारचंद्रोदय ॥ का अन्यब्राह्मणसें है ॥ अन्यजातिवालेसें जो संबंध है । सो विजातीय है। जैसे ब्राह्मणका शूद्रसैं है ॥ अपनै अवयव ( अंग)नसे जो संबंध है । सो स्वगत है । जैसे ब्राह्मणका अपनै ह- स्तपादमस्तक आदिक अंगनसे हैं । आत्मा (चेतन ) एक है । तातै ताकी जा- ति नहीं । औ जीव ईश्वर ब्रह्मा विष्णु शिव । मैं तूं इत्यादिकभेद तौ उपाधिके किये हैं । ताते मिथ्या हैं । यात आत्माका क्लार्के साथि सजातीयसंबंध बनै नहीं ( १ )। तैसे आत्मा अद्वैत है औ सत् है । तिसते भिन्न माया ( अज्ञान ) औ मायाका कार्य स्थू- लसूक्ष्मप्रपंच, प्रतीत होवै है । सो असत् है । औ असत् कछु वस्तु नहीं । यात आत्माका काहूके साथि विजातीयसंबंध बनै नहीं ( २ ) ॥

॥ आत्माके विशेषण ॥ ७ ॥ . तेसै आत्मा निरवयव है औ सच्चिदानंदा- दिक तौ आत्माके अवयव नहीं । किंतु एकरूप होनैते आत्माका स्वरूप है। तात आत्माका काहूके साथि स्वगतसंबंध बनै नहीं ( ३ ) । इसरीतिसे आत्मा सर्वसंबंधसै रहित है । या- ते असंग है ॥ ३ ॥ प्रश्नः-अद्वैत आत्मा कैसे है ? उत्तरः-द्वैत जो प्रपंच । सो स्वप्नकी न्याई कल्पित होनै वास्तव नहीं है । यातें आत्मा द्वैतसे रहित होनै अद्वैत है ॥ ४ ॥ प्रश्न:-अजन्मा आत्मा कैसे है ? उत्तरः-स्थूलदेहका धर्म जन्म है ॥ सूक्ष्मदे- हका धर्म बी नहीं तो आत्माका धर्म जन्म क- हांसे होवैगा ॥ फेर जो आत्माका जन्म मानिये तौ आत्माका मरण बी मानना होवैगा । ताते HALLENTERTIERREKIRTS १४२ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ आत्मा अनित्य सिद्ध होवैगा । सो परलोकवादी आस्तिकनकू अनिष्ट (अवांछित) है ॥ काहेते जन्ममरणवाला वस्तु है ताका आदिअंतविषै अभाव है । तातै पूर्वजन्मविषै आत्मा नहीं था औ तिसके कर्म बी नहीं थे। तब इस जन्मविषै आत्माकू कर्मसैं विना भोग होवै है ॥ औ मर- णसे अनंतर आत्मा नहीं होवैगा। ताते इसजन्म- विषै किये कर्मका भोगसैं विना नाश होवैगा । ताते वेदोक्तकर्मकी व्यर्थता होवैगी। याते आ- त्माका धर्म जन्म नहीं।तातें आत्मा अजन्मा है औ अजन्मा कहनैसे अजर अमर अर्थसे सिद्ध भया॥५॥ प्रश्नः-निर्विकार आत्मा कैसे है ? उत्तरः-(१) जैसे घटके जन्म (२) अस्तिपना (प्रकटता) (३) वृद्धि।(४) विपरिणाम (५) अप. क्षय । (६) विनाश । ये षट्धर्म हैं । परंतु घटविषै ?

॥ आत्माके विशेषण ॥ ७ ॥ १४३ स्थित औ घटसे भिन्न जो आकाश हैं। तिसके धर्म महीं ॥ तैसें "देह जन्मता है" यह जन्म (१)। "देह जन्म्या है" यह अस्तिपना ( पूर्व नहींथा अब है ) ( २ )। "देह बालक भया" यह वृद्धि (३) । "देह युवा भया" यह विपरिणाम (४)। "देह वृद्ध भया" यह अपक्षय (५)। "देह मर- णकू पाया" यह विनाश (६) । ये षट्विकार देहके धर्म हैं ॥ देहळू जाननैहारा अरु देहसे न्यारा जो आत्मा है। तिसके धर्म नहीं। इसरीतिलै षट्- विकारनते रहित आत्मा निर्विकार है ॥ ६ ॥ प्रश्न:-निराकार आत्मा कैसे है ? उत्तर:-(१) स्थूल । (२) सूक्ष्म । (३) लंबा। (४) ढूंका (छोटा)। ये च्यारीप्रकारका जगविषै आकार है। आत्मा। इंद्रिय औ मनका अविषय होनैः सूक्ष्म है । तातें स्थूल नहीं ( १ ) । आत्मा ALTIMEwlauna . १४४ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ व्यापक है । तातें सूक्ष्म ( अणु ) नहीं ( २ )। आत्मा सर्वठिकाने ओतप्रोत है । तातें लंबा औ ढूंका नहीं (३-४)। यात निराकार है ॥ ७ ॥ प्रश्न:- अव्यक्त आत्मा कैसे है ? उत्तर:- आत्मा । जाते मनइंद्रियआदि- कका अगोचर होनै अस्पष्ट है । यात अव्य- क है ॥ ८ ॥ प्रश्न:- अव्यथ आत्मा कैसे है ? उत्तरः-जैसे कोठेमै धान्यके निकासनै औ डालनकरि धान्यका व्यय ( घटना बढना ) होवै है। तैसें आत्माका व्यय होवै नहीं। यातें आत्मा अव्यय है ॥ ९॥ प्रश्न:-अक्षर आत्मा कैसे है ? उत्तर:- आत्मा जाते क्षर ( नाश )ते रहित हैं । यात अक्षर है ॥ याही• अक्षय अमृत औ Aho CINE ॥ आत्माके विशेषण ॥ ७ ॥ १४५ अविनाशी बी कहै हैं ॥ १० ॥ इसरीतिलै आत्माके निषेध्यविशेषण हैं । प्रश्न:- ये कहे जो आत्माके विशेषण । सो परस्परअभिन्न किसरीतिसें हैं ? उत्तरः-सच्चिदानंदादिक जो आत्माके गुण हो । तौ परस्पर भिन्न होवें ॥ औ ये आत्माके गुण नहीं । किंतु स्वरूप हैं । यात परस्पर भिन्न नहीं । किंतु अभिन्न हैं ॥ औ एकही आत्मा नाशरहित है । यात सत् कहिये है । औ जडसें विलक्षण प्रकाशरूप है । यात चित् कहिये है । औ दुःखसे विलक्षण मुख्यप्रीतिका विषय है । यातें आनंद कहिये है । ऐसें सर्वविशेषणनविर्षे जानना ॥ दृष्टांत:-जैसे एकहीं पुरुष पिताकी दृष्टिसै पुत्र कहिये है । औ पितामहकी दृष्टिसैं पौत्र

Man
१४६
| विचारचंद्रोदय ॥
कहिये है । औ पितृभ्राताकी दृष्टि से भ्रातृज क-
हिये है। औ मातुलकी दृष्टिसें भेणीज कहिये है।
किंवा जैसे एकही संन्यासी । पशु स्त्री गृहस्थ अ-
दंडी आदिकनकी दृष्टि से मनुष्य पुरुष त्यागी
दंडी इत्यादी विधेयविशेषणोंकरिके कहिये है ॥
औ घट पाषाण वृक्ष आदिककी दृष्टिसै अघट
अपाषाण अक्ष आदिक निषेध्यविशेषणोकरिके
कहिये है ।। तैसें एकही आत्मा प्रपंचके विशेषण
असत् जड दुःख औ अंत खंड संग आदिककी
दृष्टिसै सत् चिव आनंदादिक औ अनंत आदिक
कहिये है ॥ इसरीतिसँ कहे जो आत्माके विशे-
पण सो परस्पर भिन्न नहीं । किंतु अभिन्न हैं ।
इति श्रीविचारचंद्रोदये आत्मविशेषण-
वर्णननाभिका सप्तमकला समाता ॥ ७ ॥

॥ सतूचित्आनंदका विशेषवर्णन ॥ ८ ॥ १४७ CERITALIAMEETITHEM.IE अथ अष्टमकलारंभः ॥ ८॥ ॥ सचित्आनंदका विशेषवर्णन ।। प्रश्न:- सत् सो क्या है ? उत्तरः- तीनकालमैं जो अबाधित होवै। सो सत् है ॥ प्रश्न:- चित् सो क्या है ? उत्तरः- तीनकालमें जो. सर्व• जानें । सो चित् है ॥ २॥ प्रश्न:- आनंद सो क्या है ? उत्तरः-तीनकालमैं जो परमप्रेमका विषय होवै । सो आनंद है ॥ ३ ॥ प्रश्न:- मैं सत् हूं । यह कैसे जानना ! उत्तर:- तीनकालविषै मैं हूं । यात मैं सत् AMGARILLER १४४ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ ? हूं। यह ऐसें जानना ॥ प्रश्न:- तीनकालविषै मैं हूं । यातें सत् हूं यह कैसे जानना? उत्तरः- जाग्रविषै मैं हूं। स्वप्नविषै मैं हूं। सुषुप्तिविषै मैं हूं ॥ तैसें प्रातःकालविषै मैं हूं । मध्यान्हकाल विर्षे मैं हूं । सायंकालविषै में हूं।तैसें दिवसविषै मैं हूं। रात्रिवि मैं हूँ । पक्षविषै मैं हूं ॥ तैसें मासविषै मैं हूं। ऋतुविषै मैं हूं। वर्षविषै मैं हूं॥ तैसें बाल्यअवस्थाविषै मैं हूं । यौवनअवस्था- विषै मैं हूं। दृद्धअवस्थाविषै मैं हूँ॥तैसें पूर्वदेहविषै मैं हूं । इसदेहविषै मैं हूं। भावीदेह विषै मैं हूं ॥ तैसे युगविषै मैं हूं। मनुविधै मैं हूं । कल्पविषै मैं हूं ॥ तैसें भूतकालविषै मैं हूं। भविष्यत्कालविषै मैं हूं । वर्तमानकाल विषै मैं हूं ॥ इसरीतिसें तीन- कालविषै मैं हूं । यात सत् हूं। यह जानना !! IITRIT TAM । सचितआनंदका विशेषवर्णन ॥ ८ ॥ १४९ SAdsize प्रश्नः--मेरेसे भिन्न नामरूपवस्तु सहित तीन- काल क्या जानने ? उत्तरः- मेरेरौ भिन्न नामरूपवस्तु सहित तीनकाल असत् हैं । ऐसें जानने ॥ प्रश्न:- सत् औ असतका निर्णय किससे HITRALIACEETimes उत्तर:- सत् औ असत्का निर्णय अन्वय. व्यतिरेकरूप युक्तिसे होवै है ॥ प्रश्न:- सत्असत्के निर्णयविषै अन्वयव्य- तिरेकरूप युक्ति कैसे जाननी ? उत्तरः- जो मैं जाग्रत्विष हूं । सोइ मैं स्व- प्रविषै हूं। यात मैं सत् हूं । जाग्रत् मेरेविषै नहीं। यातें यह असत् है ॥ जो मैं स्वप्नविषै हूं । सोई मैं सुषुप्तिविषै हूं । यात मैं सत् हूं । स्वप्न मेरे- बाव नहीं । याते यह असत् है ॥ जो मैं सुषुप्ति-

१६० .
॥ विचारचंद्रोदय ॥
विषै हूं । सोई में प्रातःकालविषै हूं । याते में सत्
हूं। सुषुप्ति मेरेविषै नहीं । यातें यह असत् है ।
जो में प्रातःकालविषै हूं। सोई में मध्यान्हकाली
विधै हूं । यात मैं सत् हूं । प्रातःकाल मेरोविषै
नहीं । यातें यह असत् है । जो मैं मध्यान्हकाल.
विषै हूं । सोई में सायंकालविषै हूं । याते मैं सत्
हूं । मध्यान्हकाल मेरेविषै नहीं। यातें यह अ
सत् है ॥ जो मैं सायंकालविषै हूं । सोई में दि-
वसविषै हूं । यात मैं सत् हूं । सायंकाल. मेरेविषै
नहीं । यति यह असत् है ॥ जो मैं दिवसविषै
हूं। सोई मैं रात्रिविषै हूं ! यातै मैं सत् हूं । दि
वस मेरेविषै नहीं। यातें यह असत् है ॥ जो मैं
रात्रिविषै हूं । सोई मैं पक्षविषै हूं । यात मैं सत्
हूं । रात्रि मेरेविषै नहीं । यातें यह असत् है ॥
जो मैं पक्षविष हूँ । सोई में मासविपै हूं। यात ।
PAR

का सत्चित्आनंदका विशेषवर्णन ॥ ८ ॥ १५१
में सत् हूं । पक्ष मेरे विषै नहीं । यातें यह असत्
हैं ॥ जो मैं मासविषै हूं । सोई में ऋतुविषै हूं ।
च्यात मैं सत् हूं । मास मेरेविषै नहीं। यातें यह
असत् है ॥ जो मैं ऋतुविषै हूं । सोई मैं वर्ष विषै
हूं। यात मैं सत् हूं । ऋतु मेरेविषै नहीं यति
यह असत् है ॥ जो मैं वर्षविषै हूं । सोई में बा.
त्यअवस्थाविषै हूं । याते मैं सत् हूं वर्ष मेरेविषै
नहीं । याते यह असत् है । जो मैं बाल्यअवस्था
विषै हूं । सोई में यौवनअवस्थाविषै हूं । यात
मैं सत् हूं । बाल्यअवस्था मेरेविषै नहीं यातें
-यह असत् है ॥ जो मैं यौवनअवस्थाविषै हूं ।
सोई में वृद्धअवस्थाविषै हूं । यात मैं सत् हूं ।
यौवनअवस्था मेरेविषै नहीं । यति यह असर
है ॥ जो मैं रद्धअवस्थाविषै हूं । सोई में पूर्वदे-
'हविषै हूं । यति मैं सत् हूं। वृद्धअवस्था मेरे-
MARREATREAT
PRISGARH

१५२ ॥ विचार चंद्रोदय ॥ मैं ॥ विषै नहीं । याते यह असत् है ॥ जो मैं पूर्वदेह- विषै हूं । सोई मैं इसदेहविषै हूं । यात मैं सत् हूं। पूर्वदेह मेरेविषै नहीं । यातें यह असत् है । जो मैं इसदेहविषै हूं । सोई में भावीदेहविषै हूं । यति सत् हूं । यह देह मेरेविष नहीं। या यह असत् है । जो मैं भावीदेह विषै हूं सोई में युग- विषै हूं । यात मैं सत् हूं। भावीदेह मेरेविषै नहीं । यातें यह असत् है । जो मैं युगविषै हूं। सोई में मनुविषै हूं । यात मैं सत् हूं। युग मेरे- विषै नहीं । यार्ते यह असत् है ॥ जो मैं मनुविषै हूं । सोई में कल्पविषै हूं । याते मैं सत् हूं। मनु मेरे विषै नहीं । यातें यह असत् है ॥ जो मैं कल्प- विषै हूं। सोई में भूतकालविषै हूं । याते मैं सत् हूं। कल्प मेरेविषै नहीं । यातें यह असत् है ॥ जो में भूतकालविर्ष हूं । सोई मैं भविष्यवकालविषै हूं।

॥ सतचित्आनंदका विशेषवर्णन ॥ ८ ॥ १५३ यात मैं सत् हूं । भूतकाल मेरेविषै नहीं । यात यह असत् है ॥ जो मैं भविष्यत्कालविषै हूं । सोई में वर्तमानकालविषै हूं । याते में सत् हूं। भविष्यत्कालविषै मेरेविषै नहीं । यातें यह असत् है ॥ जो मैं वर्तमानकाल विषै हूं। सोई में सर्व- कालविषै हूं । यात मैं सत् हूं । वर्तमानकाल मे रेविषै नहीं । यातें यह असत् है ॥ इसरीतिसैं सत्असत्के निर्णयविषै अन्वयव्यतिरेकरूप युक्ति जाननी ॥ १॥ प्रश्न:- चित् मैं कैसे हूं ? उत्तरः- तीनकालविषै मैं जानता हूं । याते मैं चित् हूं ॥ प्रश्न:- तीनकालविषै मैं जानता हूं यात चित् हूं । यह कैसें जानना ? उत्तर:- जाग्रत• मैं जानता हूं । स्वप्नकू १६४ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ जानता हूं । सुषुप्ति• मैं जानता हूं तैसें प्रातः- काल• मैं जानता हूं । मध्यान्हकालकू मैं जान- ता हूं । सायंकालकू मैं जानता हूं ॥ तैसें दिवसकू मैं जानता हूं । रात्रिकू मैं जानता हूं । पक्षकूँ मैं जानता हूं ॥ तैसें मासळू मैं जानता हूं । ऋतुकू मैं जानता हूं । वर्ष• मैं जानता हूं ॥ तैसें बाल्य- अवस्थाकू मैं जानता हूं । यौवनअवस्थाकू में जा- नता हूं । वृद्धअवस्थाकू मैं जानता हूं ॥ तैसे पूर्व- देहळू मैं जानता हूं । इसदेहदूं मैं जानता हूं । भा- वीदेहळू मैं जानता हूं ॥ तैसें युगडूं मैं जानता हूं। मनुकूँ मैं जानता हूं। कल्पकू मैं जानता हूं ॥ तैसे भूतकाल• मैं जानता हूं। भविष्यत्कालकूँ मैं जानता हूं । वर्तमानकालकूँ मैं जानता हूं। इसरी- तिसे सर्वकालविषै मैं जानता हूं । यात मैं चित् हूं। यह जानना ॥

। सत्चित्आनंदका विशेषवर्णन ॥ ८ ॥ १५५ प्रश्न:-मेरेरौ भिन्न नामरूपवस्तुसहित ती. नकाल क्या जाननैं ? उत्तरः- मेरेसे भिन्न नामरूपवस्तुसहित तीनकाल जड हैं । ऐसें जाननें ॥ प्रश्न:- चित् औ जडका निर्णय किससे होवै है ? उत्तर:- चित् औ जडका निर्णय अन्वयव्य- तिरेकरूप युक्तिसैं होवे है ॥ नमः- चित् औ जडके निर्णयविषै अन्वय- व्यतिरेकरूप युक्ति कैसे जाननी ? उत्तर:- जो मैं जाग्रत्कू जानता हूं । सोई मैं स्वप्नकू जानता हूं । यात मैं चित् हूं । जाग्रत् मेरेकू जानै नहीं । यातें यह जड है ॥ जो मैं स्व- तळू जानता हूं । सोई मैं सुषुप्तिकू जानता हूं। यातें मैं चित् हुँ । स्वप्न मेरेकू जानै नहीं । यात HITRALREE १५६ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ यह जड है ॥ इनसे आदिलेके औरसर्वकाल पूर्वकी न्याई जान. ॥ इसरीतिसै चित् औ जडके निर्णयविषै अन्वयव्यतिरेकरूप युक्ति जाननी ॥२॥ प्रश्नः- आनंद मैं कैसे हूं: उत्तरः- तीनकाल विषै मैं परमप्रिय हूं । यात मैं आनंद हूं ॥ प्रश्न:- तीनकालविषै में प्रिय हूं। यातें आनंद हूं। यह कैसे जानना ? उत्तरः- जाग्रविषै में प्रिय हूं । स्वप्न विषै मैं प्रिय हूं । सुषुप्तिविषै मैं प्रिय हूं ॥ तैसें प्रा- तःकालविषै मैं प्रिय हूं। मध्यान्हकालविषै मैं प्रिय हूं । सायंकालविषै मैं प्रिय हूं ॥ तैसें दि- वसविषै मैं प्रिय हूं । रात्रिविषै मैं प्रिय हूं । पक्ष- विषै मैं प्रिय हूं ॥ तैसें मासविषै मैं प्रिय हूं । ऋतुविषै मैं प्रिय हूं । वर्षविषै मैं प्रिय हूं ॥ तैसें । 2

॥ सचित्आनंदका विशेषवर्णन ॥ ८ ॥ १५७
बाल्यअवस्थाविषै मैं प्रिय हूं । यौवन अवस्था-
विषै मैं प्रिय हूं । बद्धअवस्थाविषै मैं प्रिय हूं ॥
तैसें पूर्वदेहविषै मैं प्रिय हूं । इसदेहविषै मैं प्रिय
हूं। भावीदेहविषै मैं प्रिय हूं ॥ तैसें युगविषै मैं
प्रिय हूं। मनुविषै मैं प्रिय हूं । कल्पविष में
प्रिय हूं ॥ तैसें भूतकालविषै मैं प्रिय हूं । भवि-
ध्यत्काल विषै मैं प्रिय हूं । वर्तमानकालविषै मैं
प्रिय हूं ॥ इसरीतिसें तीनकालविषै मैं परमप्रिय
हूं यात मै आनंद हूं। यह जानना ॥
प्रश्नः-मेरेसै भिन्न नामरूपवस्तुसहित ती-
नकाल क्या जाननै ?
उत्तर:-मेरेसै भिन्न नामरूपवस्तुसहित
तीनकाल दुःख है। ऐसे जानने ॥
प्रश्न:-आनंद औ दुःखका निर्णय किससे

१५८ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ उत्तरः-आनंद औ दुःखका निर्णय अन्वय- व्यतिरेकरूप युक्तिसै हौवै है ॥ प्रश्न:-आनंद औ दुःखके निर्णयविषै अ- न्वयव्यतिरेकरूप युक्ति कैसे जाननी ? उत्तरः-जो मैं जाग्रत् विषै ( परम)प्रिय हूं। सोई मैं स्वप्न विषै प्रिय हूं याते में आनंद हूं। जाग्रत् मेरेईं प्रिय नहीं । याते यह दुःख है ॥ इनसैं आदिलेके औरसर्वकाल पूर्वकी न्याई ॥ ९९ ॥ जो जो जाग्रत्आदिककाल आत्माविषे भासता है । सो सो काल यद्यपि दुःखरूप है । त- थापि अध्यास करिके आत्माकू चिदाभासद्वारा प्रिय भासता है । तब अन्यकाल प्रिय भासते नहीं। या- ते सर्वकालमें व्यभिचारी प्रीति है । तातें ये वास्तव दुःखरूपहीं है । औ आत्मा (आप)मैं अव्यभिचारी (सर्वदा )प्रीति है। यातें आत्मा आनंदरूप है।। .

14. -- । सत्चित्आनंदका विशेषवर्णन ॥ ८ ॥ १५९ जाननै ॥ इसरीतिसे आनंद औ दुःखके निर्णय- विषै अन्वयव्यतिरेकरूप युक्ति जाननी ॥ प्रश्नः-मैं परमप्रिय हूं । यह कैसे जानना ? उत्तरः-दृष्टांत-जैसें पुत्रके मित्रविषै प्रीति है। सो पुत्रवास्ते है । औ पुत्र विषै जो प्रीति है सो तिसके मित्रवास्ते नहीं । याते पुत्र अधिक प्रिय है। तैसें धनपुत्रादिकविषै जो प्रीति है। सो आत्मा- के वास्ते है। औ आत्माविषै जो प्रीति है । सो धन- पुत्रादिकके वास्ते नहीं । यात आत्मा अधिकप्रिय ॥ इसरीतिरों में परमप्रिय हूं। यह जानना ।। प्रश्नः-प्रीतिका न्यूनअधिकभाव कैसे जानना? उत्तर:-जाग्रविषै सर्वसें प्रिय द्रव्य है। का- हेते । धनवास्ते पुरुष देश छोडिके परदेश जाता है। औ अनेक नीचकर्म करता है । यात द्रव्य प्रिय है ॥ द्रव्यते पुत्र प्रिय है । काहेरौं । पुत्र १६० ॥ विचारचंद्रोदय ।। दुष्टकम करिके राजग्रहविषै बंधनकू पाया होवै। तब तिसकू धन देके छुडावता है । यातें धन पुत्र प्रिय है ॥ पुत्रतें शरीर प्रिय है । काहेरौं । जब दुर्भिक्ष ( दुष्काळ ) होवै । तब पुत्रकू बेचके शरीरका निर्वाह करै है। यात पुत्रः शरीर प्रिय है । शरीरते इंद्विय प्रिय हैं। काहेरौं । कोई मारनै आवै तब इंद्रियनकू छुपायके “मेरे शरीर विषै मार परंतु आंख कान नाक मुखविषै मारना नहीं" ऐसे कहता है । यात शरीरतें इंद्विय प्रिय हैं ॥ई- द्रियः प्राण ( मन ) प्रिय है । काहेरौं । किसीकू दुष्टकर्म करनैसैं राजाका हुकुम भया होवै कि इसके प्राण लेने" तब कहता है कि । मेरे धन पुत्र स्त्री ग्रह लूट ल्यो । परंतु प्राण मत लेना । तौबी राजाकी आज्ञा तौ प्राणके लेने वि- पै है । तब कहता है कि । “ मेरा कान काटो ।

॥ अवाच्यासिद्धांतवर्णन ॥ ९॥ १६१ नाक काटो । हाथ काटो । पांउ काटो । परंतु मेरे प्राण मत लेना।" यातें इंद्रियतें प्राण प्रिय है। प्राणते आत्मा प्रिय है। काहेरौं । किसीअतिश- यव्याधिसे पीडा होती होवें । तब कहता है कि मेरे प्राण जावें तब मैं सुखी होऊ" यांतें प्राणते आत्मा प्रिय है । इसरीति से प्रीतिका न्यू: नअधिकभाव जानना ॥ इति श्रीविचारचंद्रोदये सचिदानंदबि- शेषवर्णननामिका अष्टमकला समाप्ता ॥८॥ CLASARALREER 0-400 अथ नवमकलाप्रारंभः ॥ ९ ॥ ॥ अवाच्यसिद्धांतवर्णन ॥ प्रश्न:- ब्रह्मात्मा जव वाणीका विषय नहीं तब सचित्आनंद आदिक विशेषणनसें कैसे कहिये है ?

१६२
॥ विचारचंद्रोदय ॥
१००
उत्तर:- ब्रह्मात्माके कितनैक विधेयविशे-
षण हैं औ कितनैक निषेध्यविशेषण हैं । तिनमें
विधेयविशेषण जो सदादिक हैं । सो प्रपंचका
निषेध करिके अवशेष ( बाकी रहे ) ब्रह्मळू
क्षणासें साक्षात्बोधन करै हैं । औ निषेध्यविशे-
॥१०० ॥ " सत् है" । "चित् है" । इसप्रकार
विधिमुख से ब्रह्मके बोधक पद ॥
।। १०१ ॥ "अनंत (अंतवाला नहीं)" "अखंड
( खंडवाला नहीं)". इसप्रकार निषेधमुखसैं ब्रह्मके
बोधक पद ॥
॥१०२||माया औ प्रपंचविषै आपेक्षिक सत्यता है।
औ ब्रह्मविषै निरपेक्ष सत्यता है । दोनूं मिलिके 'सत्'
पदका वाच्य है । औ मायाकी सत्यताकू त्यागिके
केवलं ब्रह्मकी सत्यता लक्ष्य है ॥ अंत:करणकी वृ-
त्तिरूप ज्ञान औ चेतनरूप ज्ञान । दोनूं मिलिके 'चित्'

T- ॥ अवाध्यसिद्धांतवर्णन ॥ ९॥ १६३ षण जो अनंतादिक हैं । सो तो साक्षात् प्रपंच- पदका वाच्य है । वृत्तिज्ञानकू छोडिकें केवल चे- तनरूप ज्ञान लक्ष्य है | विषयानंद वासनानंद औ ब्रह्मानंद । तीन मिलिके ‘आनंद पद का' वाच्य है। दोनूकू छोडिके केवल ब्रह्मानंद लक्ष्य है ।। माया औ ताके कार्य आकाशादिकविषै आपेक्षिकव्यापकता है। अरु ब्रह्म ( आत्मा ) विषै निरपेक्षव्यापकता है । दोनूं मिलिके 'ब्रह्म' ( विभु ) पदका वाच्य है। केवल ब्रह्म लक्ष्य है । साभासबुद्धि विषै आपेक्षिकस्वप्रका- शता है औ चेतनविषै निरपेक्षस्वप्रकाशता है । दोनूं मिलिके स्वयंप्रकाशपदका वाच्य है। केवल चेतन लक्ष्य है ॥ रज्जुआदिकवि आपेक्षिकअविकारिता है । औ चेतनविषै निरपेक्षअविकारिता है। ये दोन मिलिके 'कूटस्थ' पदका वाच्य है । औ केवल चेतन लक्ष्य है ॥ लौकिकसाक्षी औ मायाअविद्या. उपहितचेतन (ब्रह्म औ आत्मा ) दोनू मिलिके - -- ॥ विचारचंद्रोदय ॥ काही निषेध करै हैं । औ तिसते विलक्षण ब्रह्मा- त्मा अर्थते सिद्ध होवै है । तातें ब्रह्मात्मा अवा- च्य होनेः किसी विशेषणसे नहीं कहिये है ॥ प्रश्न:- सदादिक विधेयविशेषण । प्रपंचका साक्षी' पदका वाच्य है । औ केवल मायाअविद्या. उपहितचेतन लक्ष्य है ॥ साभासअंतःकरणकी वृत्ति- रूप दृष्टि करिके विशिष्ट ( सहित) चेतन । द्रष्टा पद का वाच्य है । औ केवल चेतनभाग लक्ष्य है। यज्ञका उपद्रष्टा औ प्रत्यगात्मा दोन मिलिके ' उप- द्रष्टा' पदका वाच्य है। केवल प्रत्यगात्मा लक्ष्य है।। लोकगत एकाकीपुरुष औ सजातीयभेदरहित ब्रह्म एक' पदका वाच्य है। केवल ब्रह्म लक्ष्य है। ऐसे अनुक्त अन्य विधेयविशेषणोविषै बी जानी लेना॥इ- सरोतिसैं प्रपंचके ' असत्' आदिक विशेषणोके नि- षेधक सदादिपदोंके अर्थविषै बी भागत्यागलक्षणाकी मवृत्ति है। - Soययन ॥ अवाच्यसिद्धांतवर्णन ॥ ९॥ १६५ निषेध करिके अवशेषब्रह्मळू कैसे बोधन करै है ? उत्तरः- सत् कहनेसे असत्का निषेध भया। वाकी रह्या सद्रूप । सो लक्षणासै सिद्ध है ।। चित् कहने से जडका निषेध भया । बाकी रह्या चिद्रूप । सो लक्षणासै सिद्ध है ॥ आनंद कहनेसैं दुःखका निषेध भया। बाकी रह्या आनंद (सुख)रूप । सो लक्षणासै सिद्ध है। ब्रह्म कहनेसें परिच्छिन्नका निषेध भया । बाकी रह्या व्यापक । सो लक्षणासै सिद्ध है ॥ स्वयंप्रकाश कहनेसैं परप्रकाशका निषेध भया। बाकी रह्या स्वयंप्रकाश । सौ लक्षणासे सिद्ध है ॥ कूटस्थ ( अविकारी) कहनेसैं विकारका निषेध भया । बाकी रह्या निर्विकारी । सो लक्ष-

६
॥ विचारचंद्रोदयं ।।
,
णासे सिद्ध है ॥
साक्षी द्रष्टा औ उपद्रष्टा कहनेसैं साक्ष्यदृश्य
औ उपदृश्य (समीपगत वस्तु ) का निषेध
भया । बाकी रह्या साक्षी दृष्टा औ उपद्रष्टा ।
सो लक्षणासे सिद्ध है ॥
एक कहनेसै नानाका निषेध भया । बाकी
रह्या एक । सो लक्षणासे सिद्ध है ॥
इसरीतिसे अन्य विधेयविशेषणविषै बी
जानना ॥
प्रश्न:- अनंतादिक निषेध्यविशेषण । प्रपं-
चका निषेध कैसे करै हैं ?
उत्तर:- अनंत कहनेसै देशकालवस्तुकृत
परिच्छेदका निषेध है । अखंड कहनैसैं पंचविध
वा त्रिविध भेदका निषेध है । अजन्म कहने से
जन्मका निषेध है ॥

॥ अवाच्यसिद्धांतवर्णन ॥ ९॥ १६७ इसरीतिसे अन्य निषेध्यविशेषणनविषै बी जानना॥ प्रश्नः- इन विशेषणनका ऐसें अर्थ करनैका क्या प्रयोजन है? उत्तरः- इन विशेषणनका ऐसें अर्थ करनैका प्रयोजन यह है कि । चेतनकुं मनवाणीका अ- विषय कहनैहारी श्रुतिके अर्थका अविरोध होवै है ॥ जातें गुण क्रिया जाति औ संबंध आ- दिक जो शब्दकी अरु मनकी प्रतिके निमित्त रूप धर्म हैं । सो ब्रह्ममें नहीं हैं। किंतु निर्धर्मक होने ब्रह्म निर्विशेष है । यात श्रुति बी ताडूं मनवाणीका अविषय कहती है ॥ किंवा जो कछु बोलना है सो द्वैतसे होवै है। अद्वैतसे नहीं । यात इन विशेषणनका ऐसें अर्थ करनैसैं श्रुतिविरुद्ध द्वैतकी सिद्धि होवै नहीं। औ अद्वैत सुखसै सम्- ALLADI ॥ विचारचंद्रोदय ॥ जनैकुं शक्य होवै है ॥ इति श्रीविचारचंद्रोदये अवाच्यसिद्धांत- वर्णननामिका नवमकला समाता ॥९॥ अथ दशमकलाप्रारंभः ॥१०॥ ॥ सामान्यविशेषचैतन्यवर्णन ॥ प्रश्न:- विशेषचैतन्य सो क्या है ? उत्तर:- अंतःकरण औ अंतःकरणकी वृत्ति- नविषै जो सामान्यचैतन्य ब्रह्मका प्रतिबिंबरूप चिदाभास । सो विशेषचैतन्य है । प्रश्न:- चिदाभासका लक्षण क्या है ? ।। १०३ ॥ इहां चिदाभासरूप जो विशेषचैतन्य कहा है । सो षष्ठकलाविषै उक्त कल्पित विशेषअंशके अंतर्गत है ॥ P- ANT ॥ सामान्यविशेषचैतन्यवर्णन ॥ १० ॥ १६९ उत्तरः- चैतन्य (ब्रह्म )के लक्षणसे रहित होवै औं चैतन्यकी न्याई भासै । सो चिदाभास कहिये है ॥ प्रश्न:- यह चिदाभास विशेषचैतन्य काहेत कहिये है ? उत्तर:- अल्प देश औ कालविषै जो वस्तु होवै । सो विशेष कहिये है ।जाते चिदाभास अं- तःकरणदेश औ जाग्रत्त्वप्नकाल वा अज्ञानका- ॥१०४॥अधिष्ठान औ अध्यस्त । इस भेदः वि- शेष दोप्रकारका है । तिनमें भ्रांतिकाल विषै जाकी प्रतीति होवे नहीं । किंतु जाकी प्रतीतिसैं भ्रांतिकी नि- वृत्ति होवै । सो अधिष्ठानरूप विशेष है। औ भ्रांति- कालविषै जाकी प्रतीति होवै औ अधिष्ठानके ज्ञान- कालविषै जाकी प्रतीति होवै नहीं। सो अध्यस्तरूप विशेष है । याहीकू कल्पितविशेष कहै हैं ।

१७०
॥
॥ विचारचंद्रोदय ॥
लविषै है । यात विशेषचैतन्य कहिये है ।।
प्रश्न:- विशेषचैतन्यविषै दृष्टांत क्या है ?
उत्तरः- जैसे सूर्यका प्रकाश सर्वत्र समान
है । परंतु सर्व ठिकानै प्रतिबिंब होता नहीं । औ
जहां जल वा दर्पणरूप उपाधि होवै । तहां प्रति-
बिंबरूप करि विशेष भासता है ॥ किंवा जैसे
सूर्यका प्रकाश सर्वत्र समान है। परंतु सो वस्त्र
कपास आदिककू जलावता नहीं । औ जहां
आगिआ (सूर्यकांतमणि )रूप उपाधि होवै । तहां
अग्निरूपसे विशेष होयके वस्त्र कपास आदिककू
जलावता है ॥ तिनमै सामान्यरूप है । सो सर्वदा
ज्यूँका त्यूं होनेते यथार्थ (बहुकालस्थायि)है । औ
उपाधिकरि भासता है जो विशेषरूप । सो व्यभि.
चारी होनेते अयथार्थ ( अल्पकालस्थायि.) है ।
तैसें सामनयचैतन्य जो अस्ति भाति प्रिय ।

॥ सामान्यविशेषचैतन्यवर्णन ॥ १०॥ १७१ सो सर्वत्र समान है। परंतु तिससे बोलना चल- ना इत्यादिक विशेषव्यवहार होता नहीं । औ जहां अंतःकरणरूप उपाधि होवै । तहां चिदा. भासरूपसे विशेषचैतन्य होयके बोलना चलना। कर्त्तापना भोक्तापना । परलोक इसलोकविषै ग- मन आगमन । इत्यादिक विशेषव्यवहार होवै है। तिनमें सामान्यचैतन्य जो ब्रह्म । सो सत्य है । औ उपाधिकरि भासता है जो विशेषचैतन्य चिदा- भास । सो मिथ्या है ॥ तैसें पुण्यपापका कर्ताप- ना । सुखदुःखका भोक्तापना । परलोक इसलोक- विषै गमनागमन । जन्ममरण । चौरासीलक्षयोनि- की प्राप्ति । इत्यादिक संसाररूप धर्म बी चिदा- भासके हैं । यति मिथ्या हैं । प्रश्नः- विशेषचैतन्यके जाननैमैं क्या नि- श्चय करना?.

१७२ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ उत्तरः- विशेषचैतन्य जो चिदाभास औ तिसके धर्म । सो मैं नहीं औ मेरे नहीं । किंतु ये मेरेविषै कल्पित हैं॥ इनका अधिष्ठान सा- मान्यचैतन्य इनते न्यारां हूं। यह निश्चय करना।। प्रश्न:- सामान्यचैतन्य सो क्या है ? । उत्तरः- आकाशकी न्याई सर्वत्र परिपूर्ण । सर्व नामरूपका अधिष्ठान । अस्ति भाति प्रियरूप। निर्विकार जो ब्रह्म है । सो सामान्यचैतन्य है ।। प्रश्न:- ब्रह्म । सामान्यचैतन्य काहेते क- हिये है ? उत्तर:- अधिक देश औ कालविषै जो व- स्तु होवै । सो सामान्य कहिये है ॥ जाते ब्रह्म । बुद्धिकल्पित सर्वदेश औ सर्वकाल विषै व्यापक है । ताते ब्रह्म सामान्यचैतन्य कहिये है ॥ म

॥ सामान्यविशेषचैतन्यवर्णन ॥ १० ॥ १७३
प्रश्नः- सामान्यचैतन्य - जाननै विषै दृष्टांत
क्या है?
उत्तरः-दृष्टांत:-जैसे एक रज्जुकेविषै नाना
पुरुषन• किसी• दंडकी । किसीकुं सर्पकी ।
किसीकू पृथ्वीके रेषाकी । किसी• जलधाराकी
भ्रांति होवै है ॥ तिस प्रांतिविषै दोअंश हैं ॥
एक सामान्य इदंअंश है । औ दूसरा सर्पादिक
विशेषअंश है ॥ तिनमें 'यह दंड है । यह सर्प
है। यह प्रथिवीकी रेषा है । यह जलधारा है।"
इसरीतिलै सादिक विशेषअंशनविषै सामान्य
इदंअंश सर्वत्र व्यापक । औ सो रज्जुका
स्वरूप है । सो सामान्य इदंअंश जाते भ्रांति-
कालविषै बी भासता है । औ भ्रांतिकी निवृत्ति-
कालविषै बी "यह रज्जु है”। इसरीतिलै भा.
सता है । यात अव्यभिचारी होनै सत्य है । औ

व्याभचारी जो सादिक विशेषअंश सो कल्पित है ॥ सिद्धांतः-तैसें सर्वपदार्थनविषै पांचअंश हैं:- १ अस्ति। २ भाति । ३ प्रिय। ४ नाम ५ रूप ।। (१) घट है" यह अस्ति ( सत् ) । २) “घट भासता है" यह भाति (चित्)। (३) घट प्यारा है " । काहे जो घट जल भरनैकुं उपयोगी है । यति यह प्रिय ( आनंद ) ॥ सर्पसिंह आदिक वी सर्पिणी औ सिंहिणीकू प्रिय है। ( ४ ) “वट" यह दो अक्षर नाम है ॥ (५) स्थूलगोलउदरवान्घटका रूप (आ- कार । ) है॥ एसें । घट आदिक सर्व भूत औ भूतनके कार्य- नविषै बी जानना ॥ यह बाहीरके पदार्थन-

विषै पांच अंश दिखाये ॥
तैसें भितर देह आदिकविषैः
( अ ) "मैं हूं" यह अस्ति ।
(भा ) "मै भासता (जानता) हूं" यह भाति।
(प्रि) “ मै आप आपकू प्यारा हूं”. यह
प्रिय है।
(ना) औ देह । इंद्रिय । प्राण । मन । बुद्धि ।
चित्त । अहंकार । अज्ञान । औ इनके
धर्म । ये नाम हैं।
(रू) औ ईनके " यथायोग्य आकार" सो
रूप है।
ये अंतरके पदार्थनविषै पांच अंश दिखाये ॥
इन सर्वके नामरूपके त्याग कियेसे
( अ ) " पृथिवी है"।
(भा) " पृथिवी भासती है।

१७६
॥ विचारचंद्रोदय ॥
Chc
(प्रि ) पृथिवी प्रिय है" । काहेते प्रथिवी
रहने दूं स्थान देती है।
( ना ) " पृथिवी " ऐसा नाम है । औ
रू ) " गंधगुणयुक्त' रूप है ॥
पृथिवीके नामरूपके त्याग कियेसे
(अ) जल है"।
( भा) जल भासता
(प्रि) जल प्रिय है
। काहेत जल
तृषाकू दूरी करता है।
( ना ) " जल" ऐसा नाम है। औ
रू ) " शीतस्पर्शगुणयुक्त" रूप है ॥
जलके नामरूपके त्याग कियेसैं
(अ) “ तेज है"।
( भा ) " तेज भासता है"।
(प्रि ) "तेज प्रिय है " । काहे तेज शीत
"
"

॥ सामान्यविशेषचैतन्यवर्णन ॥ १० ॥ १७७ वायु है”। औ अंधकारकू दूरी करता है। ( ना ) "तेज" ऐसा नाम है । औ ( रू) " उष्णस्पर्शगुणयुक्त " रूप है ।। तेजके नामरूपके त्याग कियेसैं ( अ ) "वायु (भा ) "वायु भासता है"। ( प्रि ) " वायु प्रिय है। काहे वायु प्रसी. नाळू दूरी करता है। (ना) "वायु ऐसा नाम है । औ ( रू) 'रूपरहित अरु स्पर्शगुणयुक्त रूप है। वायुके नामरूपके त्याग कियेसे ( अ ) " आकाश है"। (भा) आकाश भासता है"। (प्रि.) “आकाश प्रिय है " । काहेते आ- काश रहने फिरनकू अवकाश देता है। .

कियस
(प्रि)
( अ ) "पीछे क्या है सो मैं जानता नहीं।
ऐसा अज्ञान है । सो
(भा) अज्ञान भासता है"।
अज्ञान प्रिय है " काहेते अज्ञानी
जीवनळू प्रिय है । औं अज्ञान प्रपं-
चका कारण होनेसे जीवनका निर्वाह
करता है।
(ना) अज्ञान" ऐसा नाम
आवरणविक्षेपशक्तिवाला अनादि
अनिर्वचनीय भावरूप" यह रूप है ॥
अज्ञानके नामरूपके त्याग कियेसैं
(अ) " कछु बी नहीं ” ऐसे प्रतीयमान
सर्व वस्तुनका अभाव ऐसा शून्य है ।
(रू) "

(1) शून्य शून्यवादिनामय ह । याका (ना ) " शून्य ऐसा नाम है । औ (रू ) " सर्व वस्तुनका अभाव" रूप है ।। शून्यके नामरुपके त्याग कियेसै ( अ ) शून्यके अभावत्वका अधिष्ठान । सत्- वस्तुहीं अवशेष रहता है । सो (भा ) शून्यके भावअभावपनैकू प्रकाशता है । याते चित् है । औ ( प्रि) दुःखसै भिन्न है । यात आनंद है ॥ इसरीतिसे सर्व नामरूपविष अनुगत अव्य- भिचारी नामरूपका अधिष्ठान ब्रह्म सामान्य चै- तन्य है ॥ औ घटके नामरूप पटविषै नहीं। ॥ १०५ ॥ सुषुप्ति । मूर्छा । औ समाधिका प्र- । काशक सामान्यचैतन्य है ।। "घटकू मैं जानता हूं" RANILE १०६ रूप घटावष नहीं । ताते परस्पर व्यभिचारी ये नामरूप मिथ्या हैं । यह सामा- न्यचैतन्यके जाननैविषै दृष्टांत है ॥ इसरोतिसें प्रमाता प्रमाण औ प्रमेयरूप त्रिपुटीका प्रकाशक साक्षी सामान्यचैतन्य है ॥ जाग्रदादि अ- वस्थाकी संधिनका प्रकाशक सामान्यचैतन्य है। तैसेंही वृत्तिनको संधिनका प्रकाशक सामान्यचैतन्य है ॥ अंगुष्ठके अग्रभागका प्रकाशक सामान्यचैतन्य है ॥ देशांतर विषै वृत्ति गई हो । तब तिसके म- ध्यभागका प्रकाशक सामान्यचैतन्य है ।। सूर्यचंद्राकार वृत्ति हुयी होवे तिसके मध्यभागका प्रकाशक सामा- न्यचैतन्य है ।। " मेरुकू मैं नहीं जानता हूं" ऐसे अज्ञान विशिष्ट मेरुका प्रकाशक सामान्यचैतन्य है ॥ १०६ ॥ जो वस्तु कहींक होवै औ कहींक न हो । सो वस्तु व्याभिचारी है । ॥

प्रश्नः- उक्त सामान्यचैतन्यरूप ब्रह्मकी
सर्वते अधिक सूक्ष्मता औ व्यापकता कैसे हैं ?
उत्तर:- जो जो कार्य है । सो स्थूल औ
परिच्छिन्न होवै है । औ जो जो कारण है सो
सूक्ष्म औ व्यापक ( अधिकदेशवर्ति ) होवै है ।
यह नियम है ॥ जाते ब्रह्म सर्वका कारण है
यात सर्वसे अधिक सूक्ष्म औ व्यापक है ॥ सो
अब दिखावै हैं:- जाते समुद्रजलसे कठिन फेन
औ लवण होवै है । यात जान्या जावै है कि
एथिवी जलका कार्य है। तातै एथिवीतें जल
सूक्ष्म औ व्यापक है ॥ किंवा एथिवीके पाषाण
आदिक अवयव वस्त्रविषै डाले हुये निकसते
नहीं औ जल वस्त्रविषै ठहरता नहीं । औपृथि-
वीमें जहां जहां खोदके देखो तहां तहां जल नि-
कसता है । औ पुराणोविषै पृथिवीते दशगुण

१८२
॥ विचारचंद्रोदय ॥
॥
अधिकदेशवर्ति जल कहा है। यात बी एथिवीतें
जल सूक्ष्म औ व्यापक है । तैसें अग्नि आदि-
कके तापसे शरीर विषै प्रस्वेद (प्रसीना ) छूटतो
है औ वर्षा होवै है । याते जान्या जावै है कि
जल अग्निका कार्य है । तातें जलते अग्नि (तेज)
मूक्ष्म है औ व्यापक है ॥ किंवा जल वस्त्रविषै
ठहरता नहीं परंतु घटविषै ठहरता है औ सूर्या-
दिकका प्रकाश घटविषै बी ठहरता नहीं । औ
पुराणोविषै जलते दशगुण अधिकदेशवति तेज
कहा है । याते बी जलते तेज सूक्ष्म है औ व्या-
पक है। तैसें अग्निका जन्म औ नाश पवनके
आधीन है । यातै जान्या जावै है कि तेज वा-
युका कार्य है । ताते तेजते वायु सूक्ष्म है औ
व्यापक है ॥ किंवा सूर्यादिकका प्रकाश घटादि
पात्रविषै ठहरता नहीं परंतु नेत्रसैं दीखता हैं।

॥ सामान्यविशेषचैतन्यवर्णन ॥ १०॥ १८३ औ वायु तौ नेत्रसैं बी दीखता नहीं । अरु पुरा- णोविषै तेजते दशगुणअधिक वायु कहा है। यातें तेजते वायु सूक्ष्म है औ व्यापक है । तैसे वायुकी उत्पत्ति स्थिति अरु लय आकाश (पु- लार) विषै ही होवै है । यति जान्या जावै है कि वायु आकाशका कार्य है । तातै वायुते आकाश सूक्ष्म है औ व्यापक है ॥ किंवा वायु नेत्रसैं दीखता नहीं परंतु त्वचासे स्पर्शगुणद्वारा ग्रहण होता है। औ आकाश तौ त्वचासै बी ग्रह- ण होता. नहीं औ पुराणोविषै वायुः दशगुण अधिकदेशवर्ति आकाश कहा है ॥ यात बी सो वायुः सूक्ष्म औ व्यापक है ॥ तैसै "आकाशसें आगे क्या होवैगा' ऐसा विचार किये हुये "मैं नहीं जानता हूं" ऐसै बुद्धिके कुंठीभावका आश्र. य ( विषय ) अज्ञान प्रतीत होता है । यात जा- ।

१८४
॥ विचारचंद्रोदय ॥
न्या जावै है कि आकाश अज्ञानका कार्य है
तातें सो अज्ञान । आकाशते सूक्ष्म औ व्यापक
है ॥ किंवा आकाश त्वचासे ग्रहण होता नहीं
परंतु मनसे ग्रहण होता है। औ अज्ञान मनसैं
बी ग्रहण होता नहीं । औ आकाशते अनंतगुण
अधिक अज्ञान शास्त्रवि कहा है । यात बी सो
आकाशते सूक्ष्म औ व्यापक है ॥ तैसे " मैं नहीं
जानता हूं" इस अनुभवका विषय जो अज्ञान ।
ताका प्रकाश जाननेवाले चेतनसें होवै है । औ
"अज्ञान है अज्ञान भासता है । अज्ञान अज्ञपुरु-
पन• प्रिय है" । इसरीतिसे अज्ञान विषैः अनु-
स्यूत अस्ति भाति प्रियरूप ब्रह्मचेतन भासता
है । याते अज्ञान । ब्रह्मचेतनके आश्रित है।
ताते ब्रह्मचेतन अज्ञानतें सूक्ष्म औ व्यापक है ॥
किंवा अज्ञान मनकरि ग्रहण होता नहीं । परंतु

॥ सामान्यविशेषचैतन्यवर्णन ॥ १० ॥ १८५ " मैं नहीं जानता हूं" इस अनुभवरूप लिंग- करि ताका अनुमान होवे है । औं ब्रह्मचेतन स्वयंप्रकाशरूप होनेतें किसी बी प्रमाणका विष- य नहीं। औ शरीरविषै तिलकी न्याई ब्रह्म के एक देशविषै अज्ञान स्थित है । औ अवशेष रहा ब्रह्म शुद्धस्वप्रकाश है । ऐसै श्रुतिविषै कहा है। यात बी सो अज्ञानतें सूक्ष्म औ व्यापक हैं । इ- सरीतिसें सामान्यचैतन्यरूप ब्रह्मकी सर्वप्रपंचसैं अधिक सूक्ष्मता औ व्यापकता है । प्रश्नः- सामान्यचैतन्यके जाननैसें क्या नि- श्चय करना उत्तर:- अस्ति भाति प्रियरूप सामान्य तन्य जो ब्रह्म । सो मैं हूं । औ में सो अस्ति- भातिप्रियरूप सामान्यचैतन्य ब्रह्म हूं । औ PRESETTERRITYARTERSATI ॥ विचारचंद्रोदय ॥ नामरूप जगत् मेरेविषै कल्पित है । यह नि- श्चय करना ॥ प्रश्न:- इसरीतिलै निश्चय कियेसै क्या होवै ? sha RAMANARTH उत्तर:- इसरीतिसें निश्चय कियेसै सर्वअन- थकी नित्ति औ परमानंदकी प्राप्तिरूप मोक्ष होवै है ॥ इति श्रीविचारचंद्रोदये सामान्यविशेषचै- तन्यवर्णननामिका दशमकला समाप्ता ॥१०॥ 66 अथ एकादशकलाप्रारंभः ॥ ११ ॥ तत्त्वं ” पदार्थक्यनिरूपण ॥ प्रश्न:- " तत्" पद सो क्या है ? उत्तरः- सामवेदकी छांदोग्यउपनिषद्के पष्ठ ?

॥ तत्त्वंपदार्थक्यनिरूपण ॥ ११ ॥ १८७ प्रपाठक ( अध्याय ) विषै श्वेतकेतु नाम पुत्रके प्रति तिसके पिता उद्दालकमुनिने उपदेश किये तत्वमसि' महावाक्यका जो प्रथम पद । सो "तत्" पद है ॥ ॥ १०७ ।। इसकी न्याई और "प्रज्ञानं ब्रह्म" यह ऋग्वेदका वाक्य है । औ " अहं ब्रह्मास्मि" यह यजुर्वेद का वाक्य है। औ "अयमात्मा ब्रह्म" यह अथर्वण वेदका महावाक्य है ।। जो तत्पदका वा- च्यअर्थ ईश्वर है औ लक्ष्यअर्थ शुद्धब्रह्म है । सोई उपर लिखे तीनमहावाक्यगत "ब्रह्म" शब्दका वाच्य- अर्थ अरु लक्ष्यअर्थ है । औ जो वंपद का वाच्यअर्थ जीव है अरु लक्ष्यअर्थ कूटस्थसाक्षी है । सोई उक्त तीनमहावाक्यगत"प्रज्ञानं" "अहं" "अयं" पदसहित "आत्मा" इन तीनपदनका वाच्यअर्थ औ लक्ष्य अर्थ है। औ सारे "तत्वमसि" वाक्यका जो जीवब्रह्मकी ए. कतारूप अर्थ है। सोई उक्त तीनवाक्यनका अर्थ है।। "

१८८
॥ विचारचंद्रोदय ॥
?
प्रश्नः- "त्वं " पद सो क्या है ?
उत्तर:- इसीही 'तत्वमसि' महावाक्यका
दूसरा पद । सो 'त्वं' पद है ॥
प्रश्नः- वाच्यार्थ औ लक्ष्यार्थ सो क्या है?
उत्तर:- शब्द का अर्थके साथि जो संबंध ।
सो शब्दकी वृत्ति कहिये है ॥ सो वृत्ति दो प्र.
कारकी है ॥ एक शक्तित्ति है औ दूसरी लक्ष
णात्ति है ॥ शब्दविषै अर्थके ज्ञान करनैका
सामर्थ्यरूप जो शब्दका अर्थके साथि साक्षात्-
संबंध । सो शब्दकी शक्तित्ति है ॥ औ श.
क्तित्तिसै जाने हुये अर्थद्वारा जो शब्दका अ.
थके साथि परंपरारूप संबंध है । सो शब्दकी
लक्षणारत्ति है। तिनमैं शक्तिरतिकरि जो अ.
थं जानिये है । सो शब्दका वाच्यअर्थ कहिये
है । ताहीहूं शक्यअर्थ औ मुख्यअर्थ बी कह हैं।।

॥ तत्त्वंपदार्थैक्यनिरूपण ॥ ११ ॥ १८९ औ लक्षणात्तिकरि जो अर्थ जानिये है । सो शब्दका लक्ष्यअर्थ कहिये है ॥ प्रश्नः- लक्षणारत्ति कितनै प्रकारकी है ? उत्तरः- १ जहत् २ अजहत् औ ३ भा. गत्यागके भेदते लक्षणारत्ति तीनप्रकार की है ॥ प्रश्न:- तीनप्रकारकी लक्षणाके लक्षण औ • उदाहरण कौनसे हैं? उत्तर:-॥१॥जहां संपूर्ण वाच्यअर्थका त्याग- करिके वाच्यअर्थके संबंधीका ग्रहण होवै। सो जहवलक्षणा है ।। जैसे कोईक पुरुष काहूकू पू- छचा किः- “गाईका वाडा कहां है ?" तब तिसनें कहा कि " गंगाविषै गाईका वाडा है।" इहां गंगापदका वाच्यअर्थ देवनदीका प्रवाह है। तिसविषै गाईका वाडा संभव नहीं । यात संपूर्ण वाच्यअर्थ जो देवनदीका प्रवाह । ताका त्याग ॥ wpuchinese PARAMETERMIRE १९० ॥ विचारचंद्रोदय ॥ करिके । तिसके संबंधी तीरका ग्रहण ॥ २ ॥ जहां वाच्यअर्थका त्याग न करिके तिसके संबंधीका ग्रहण होवै । सो अजहतलक्ष- णा है ॥ जैसे किसीनें कह्या किः- “शोण दौ- उता है ” ॥ तहां शोणपदका वाच्यअर्थ जो लालरंग है। तिसविषै दौडना संभव नहीं। याते लालरंगवाला घोडा दौडता है । ऐसें वा- च्यअर्थका त्याग न करिके तिसके संबंधी घोडे. रूप अधिकअर्थका ग्रहण होवै है ॥ ॥ ३ ॥ जहां विरोधी कछुक वाच्यभागका त्याग करिके तिसके संबंधी अविरोधी कछुक वाच्यभागका ग्रहण होवै । सो भागत्यागलक्ष- णा है ॥ जैसे पूर्व किसी देशकालविषै देख्या पुरुष । अन्य देशकाल विषै देखने में आवै । तब देखनेहारा पुरुष कहता है कि:-"तिस (दूर ) ? di ॥ तत्त्वंपदार्थक्यनिरूपण ॥ ११ ॥ १९१ देश औ तिस ( भूत ) कालविषै जो पुरुष दे- ख्या था । सो पुरुष इस (समीप ) देश औ इस ( वर्तमान ) कालविषै आया है" ॥ इहां तिस देशकाल औ इस देशकालरूप वाच्यभागकी एक- ताका विरोध है । याते तिनकी दृष्टि त्याग करिके । “पुरुष यहहीं है" ऐसे अविरोधी वांच्यभागका ग्रहण होवै है ॥ प्रश्न- तीनप्रकारकी लक्षणामैसें महावाक्य- विषै कौनसी लक्षणा संभव है ? उत्तरः-जहां जहत्लक्षणा होवै । तहां संपूर्ण वाच्यअर्थका त्याग होवै है ॥ जो महावाक्यविषै जहवलक्षणा मानिये तो " तत् 'त्वं" प- दके वाच्यअर्थविधै प्रवेश भये ब्रह्मचैतन्य औ साक्षीचैतन्यका त्याग होवैगा औ तिनतें भिन्न असत् जड दुःखरूप प्रपंचका ग्रहण करना होवै.

१९२ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ ॥ त्वं गा। तात महाअनर्थकी प्राप्ति होवैगी । तिसते पुरुषार्थ सिद्ध होवै नहीं । याते महावाक्यविषै : जहत् लक्षणा संभव नहीं ॥ १ ॥ जहां अजहत्लक्षणा होवै, तहां वाच्यअर्थ- का कछु वी त्याग होवै नहीं । जो महावाक्यविषै अजहत्लक्षणा मानिये तौ " तत् त्वं" पदके वाच्यअर्थकी एकताका विरोध दूरी होवै नहीं । तातै लक्षणा करनैका कछु प्रयोजन सिद्ध होवै नहीं । यात महावाक्यविषै अजहत्लक्षणा संभव नहीं ॥ २॥ जहां भागत्यागलक्षणा होवै । तहां विरोधी भागका त्याग करिके अविरोधीभागका ग्रहण होवै है ॥ जो महावाक्यविषै भागत्यागलक्षणा मानिये तौ " तत् ' ' त्वं' पदके वाच्यअ- र्थमैसें धर्मसहित मायाअविद्यारूप विरोधीभा- ॥ तत्त्वंपदार्थैक्यनिरूपण ॥ ११ ॥ १९५ ब्रह्म । ये सर्व मिलिके ईश्वर कहिये है । सो तवपदका वाच्यअर्थ है॥ इन सर्वसहित माया औ चिदाभासभागका त्याग करिके अवशेष रह्या जो विराट् हिरण्य- गर्भ औ अव्याहतका अधिष्ठान ईश्वरसाक्षी शुद्ध- ब्रह्म सो “तत्" पदका लक्ष्यअर्थ है ॥ प्रश्न:-ब्रह्मका औ मायामें प्रतिबिंबरूप ईश्वरका परस्पर अध्यास (अन्योन्याध्यास) कैसे है? उत्तर:- अविचारदृष्टिसैं ब्रह्मकी सत्यताका ईश्वरविषै संसर्ग (तादात्म्यसंबंध) अध्यस्त है। यातें ईश्वर सत्य प्रतीत होवै है औ ईश्वर अरु ताकी कारणताका स्वरूप ब्रह्ममें अध्यस्त है । यात ब्रह्म । जगत्कारण प्रतीत होवै है ॥ याहीका अनुवाद । तटस्थलक्षणके बोधक श्रुति पुराण RAMNATARRIA साता ॥ विचारचंद्रोदय ॥ a औ आचार्यों के वचन करै हैं ॥ इसरीतिसैं ब्रह्म औ ईश्वरका परस्परअध्यास है ॥ प्रश्न:-- उक्तअध्यासकी नित्ति किससैं होवै है ? उत्तर:- उक्त अध्यासकी नित्ति विवेक- ज्ञानसे होवै है॥ प्रश्न:- " त्वं" पदका वाच्यअर्थ औ ल. क्ष्यअर्थ क्या है? उत्तर:- १ चक्षु कंठ औ हृदय । ये तीन जी. वके देश हैं ॥ २ जाग्रत् स्वप्न औ सुषुप्ति । ये तीन जीवके काल हैं ॥ ३ स्थूल सूक्ष्म औ का- रण । ये तीन जीवके वस्तु ( भोगकी सामग्री) हैं ॥ ४ औ यहहीं शरीर है ॥ ५ विश्व तैजस औ प्राज्ञ । ये तीन जीवपनेके अभिमानी हैं। ६ जागृत्• आदिलेके मोक्षपर्यंत जो भोगरूप सं- १ statsAORasiaNETES ॥ तत्त्वंपदार्थैक्यनिरूपण ॥ ११ ॥ १९७ ॥ सार । सो जीवका कार्य है ॥ ७ अल्पशक्ति- पना । अल्पज्ञपना । परिच्छिन्नपना । नानापना । पराधीनपना । असमर्थपना । अपरोक्षपना। औ अविद्याउपाधिवान्पना । ये आठ जीवके धर्म हैं । इन सर्वसहित जो अविद्या औ तिसविषै प्रतिबिंबरूप चिदाभास औ तिनका अधिष्ठान कूटस्थ । ये सर्व मिलिके जीव कहिये है ॥ सो "त्वं" पदका वाच्यअर्थ है ॥ इन सर्वसहित चिदाभासभागका त्याग क- रिके अवशेष रह्या जो स्थूल सूक्ष्म कारण शरी- रका अधिष्ठान जीवसाक्षी कूटस्थ आत्मा । सो "त्वं ” पदका लक्ष्यअर्थ है ॥ प्रश्नः- कूटस्थका औं बुद्धिमें प्रतिक्विरूप जीवका परस्पर अध्यास कैसे है ? उत्तर:- अविचारदृष्टि कूटस्थकी सत्यarticRUWANATANT HAR १९८ || विचारचंद्रोदय ।। ताका संसर्ग (तादात्म्यसंबंध) जीवमै अध्यस्त है। यात जीव मिथ्या प्रतीत होवै नहीं। किंतु सत्य प्रतीत होवै है । औ जीव अरु ताके क- तापने आदिक धर्मका स्वरूप । कूटस्थमैं अध्यस्त है। याः कूटस्थ अकर्ता अभोक्ता असंसारी नि. त्यमुक्त असंग ब्रह्मरूप प्रतीत होवै नहीं। किंतु ताते विपरीत प्रतीत होवे है । इसरीतिसे कूट- स्थका औ जीवका परस्पर अध्यास है ॥ प्रश्नः- उक्तअध्यासकी नित्ति किससे होवे है ? उत्तरः- उक्तअध्यासकी निवृत्ति विवेक- ज्ञानसे होवै है ॥ "तत्" पद औ " त्वं " पदके अर्थकी महावाक्यविषै कथन करी एकता कैसे संभवै ।

॥ तत्त्वंपदार्थैक्यनिरूपण ॥ ११ ॥ १९९ " उत्तर:- यद्यपि “तत्" पद औ त्वं' पदके वाच्यअर्थ जो उपाधिसहित चैतन्य (ई- श्वर औ जीव ) हैं । तिनकी एकताका विरोध है। तथापि “तत्" पदका लक्ष्यार्थ ब्रह्म औ "त्वं" पदका लक्ष्यार्थ आत्मा । तिनकी एकता- का कछु बी विरोध नहीं ॥ ऐसें “तत्" पद औ" त्वं" पदके अर्थकी महावाक्यविषै क- थन करी एकता संभव है ॥ प्रश्न:- “ मैं ब्रह्म हूं" ऐसा ब्रह्मआत्माकी एकताका ज्ञान । किसकूँ होवै है ? उत्तर:- यह ज्ञान । चिदाभासळू होनै है। प्रश्न:- ब्रह्मते भिन्न जो चिदाभास । आपकू ब्रह्मरूप करिके कैसे जान है ? उत्तर:- जीवभावके अधिष्ठान कूटस्थका ब्रह्मके साथि मुख्य अभेद है औ बुद्धिसहित चि. MAHANI TARA २०० ॥ विचारचंद्रोदय ॥ कूटस्थका “मैं दाभासका ब्रह्मकेसाथि अपने स्वरूपकू बाध करिके अभेद होवै है ॥ यात चिदाभास अपने स्वरूपका बाध करिके आपकू अहंशब्द के लक्ष्य- अर्थ कूटस्थरूप जानै है । औ अपने निजरूप " मैं कूटस्थ हूं" ऐसे अभिमान क- रिके " मैं ब्रह्म हूं' ऐसें जाने है ॥ इसरीतिसैं चिदाभास आपकू ब्रह्मरूप करिके जाने है ॥ प्रश्नः- इन “ तत्" औ " त्वं” पदके लक्ष्यार्थकी एकताविषै दृष्टांत क्या है ? उत्तर:- ॥ १ ॥ दृष्टांत:- जैसे घट मठ उपाधिसहित घटाकाश औ मठाकाशकी एक- ताका विरोध है । तथापि घटमठरूप उपाधिकी हष्टिळू छोडिके केवल आकाशकी एकताका विरोध नहीं ॥ ॥ २ ॥ जैसे काचकी हँडी औ मृत्तिकाकी T ॥ तत्त्वंपदार्थैक्यनिरूपण ॥ ११ ॥ २०१ हंडीविषै दीपक जलता होवै । तिनकी उपाधि दो हंडीकी एकताका विरोध है । तथापि अग्निपनकरि दीपककी एकताका विरोध नहीं । ॥ ३ ॥ जैसे राजा औ रबारी ( भेड) हो । तिनकी उपाधि सेना औ अजावर्गकी एकताका विरोध है । तथापि मनुष्यपनैकी ए- कताका विरोध नहीं ॥ ॥ ४ ॥ जैसे गंगाजल औ गंगाजलका कलश होवै । तिनकी उपाधि नदी औ कलशकी एक- ताका विरोध है । तथापि केवल गंगाजलकी एकताका विरोध नहीं ॥ ॥ ५ ॥ जैसे सागर औ जलका विदु होवै तिनकी उपाधि सागर औ बिंदुकी एकताका विरोध है। केवल जलकी एकताका विरोध नहीं ॥ STARAMETE TIME TRAILER २०२ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ ॥ ६ ॥ जैसे कोइएक पुरुषकू पिताकी अपे- क्षासैं पुत्र कहते हैं औ पितामहकी अपेक्षासें । पौत्र कहते हैं । तिनकी उपाधि पिता औ थि- तामहकी एकताका विरोध है। केवलपुरुषकी ए- कताका विरोध नहीं॥ ॥ ७॥ जैसे कोई काशीका राजा था । सो हस्तीपर वैठिके स्वारीमें निकस्या था। ताळू कोई यात्रावासी पुरुष– अछीतरहसे देख्या था । पीछे सो स्वदेशकू गया औ काशीके राजाळू कोई अन्यराजाने राज्य छीनके निकास दिया ।। तब सो लंगोटी पहरके अंगर्ने विभूति लगायके हाथमैं तुंबी औ दंड लेके नग्नपादसे तीर्थयात्राकू गया॥ फिरते फिरते तिस यात्रावासीपुरुषके ग्राममैं गया ॥ तवं तिसळू देखिके सो यात्रावासीपुरुष अन्ययात्रावासीपुरुषनकू कहता भया किः- अ.

॥ तत्त्वंपदार्थैक्यनिरूपण ॥ ११ ॥ २०३
सो
पननै काशीविषै जो राजा देख्या था ।
यह है"। तब अन्ययात्रावासीपुरुष कहते भये
किः- ॥ १ ॥ सो देश अन्य । यह देश अन्य
॥ २ ॥ ताका काल ( अवस्था ) अन्य । याका
काल अन्य ॥ ३ ॥ तिसकी वस्तु ( सामग्री)
अन्य । याकी वस्तु अन्य ॥५॥ तिसका अभिमान
अन्य । इसका अभिमान अन्य ॥ ६ ॥ तिसका
कार्य अन्य । इसका कार्य अन्य ॥ ७ ॥ ति-
सके धर्म अन्य । इसके धर्म अन्य ॥ यात तिस
काशीके राजाकी औ इस भिक्षुककी एकता कैसे
बनै ? " तब सो प्रथम यात्रावासी पुरुष कहता
भया किः- " तिसके औ इसके देश । काल ।
वस्तु । अभिमान । कार्य । औ धर्मका त्याग
करिके दोविषै अनुगत ( अनुस्यूत ) जो पु-
रुषमात्र सो एकहीं है" ॥
MPLETE_MT IMDIL HARIETIE

। . २०४ ॥विचारचंद्रोदय ॥ " सिद्धांत:- तैसें जीव ईश्वरके बी देश काल आदिकका त्याग करिके । दोनूंविषै अनुगत जो चेतनमात्रब्रह्म औ आत्मा । सो एकहीं ॥ याते "ब्रह्म सो मैं हूँ। औ मैं सो ब्रह्म । ऐसा दृढनिश्चय करना । सोई तवज्ञान है ॥ याहीते सर्वदुःखकी निवृत्ति औ परमानं- दकी प्राप्तिरूप मोक्ष होवै है ॥ इति श्रीविचारचंद्रोदये “तत्त्वमसि" महावाक्यगत " तत्त्वं " पदार्थैक्यनिरूपण- नामिका एकादशकला समाप्ता ॥ ११ ॥ अथ द्वादशकलाप्रारंभः॥ १२ ॥ ॥ज्ञानीके कर्मनिवृत्तिका प्रकारवर्णन ॥ प्रश्न:- कर्म सो क्या है? क EDITORI.. ॥ ज्ञानीके कर्मनिवृत्तिका वर्णन ॥ १२॥ २०५ उत्तरः-शरीर वाणी औ मनकी जो क्रिया। सो कर्म है ॥ प्रश्न:- कर्म कितनै प्रकारका है ? उत्तर:- ॥ १॥ संचित ॥ २॥ प्रारब्ध औ ॥ ३॥ क्रियमाण ( आगामि ) भेदः कर्म तीन प्रकारका है। प्रश्न:- संचितकर्म सो क्या है ? उत्तरः-- अनेक अतीतजन्मोवि संचय किया जो कर्म । सो संचित है ॥ १ ॥ प्रश्न:- प्रारब्धकर्म सो क्या है ? उत्तरः- अनेक संचितकर्मनके मध्यसै प- रिपक्क भया औ ईश्वरकी इच्छासें इस वर्तमान- देहका आरंभक जो कोई एक संचितकर्म । सो प्रारब्ध है ॥ २॥ प्रश्न:- क्रियमाणकर्म सो क्या है ?

॥ विचारचंद्रोदय ॥ उत्तरः-ज्ञानतें पूर्व वा पीछे इस वर्तमान देहविषै मरणपर्यंत करिये है जो कर्म । सो क्रि- यमाण है ॥ ३ ॥ प्रश्न:- ज्ञानीके कर्मकी नियत्ति किसरीति- उत्तरः- ज्ञानसें अज्ञानके आवरणअंशकी निरत्ति होवै है । आवरणकी नित्तिके भये आ- वरण• आश्रय करिके स्थित संचित (पूर्व के अनेकजन्मविषै किये ) कर्मकी नियत्ति (नाश) होवै है । औ ज्ञानके आगे पीछे इसजन्मविषै किये क्रियमाणकर्मका " मैं अकर्ता । अभोक्ता। असंग । ब्रह्म हूं।” इस निश्चयके बलसे अपने आश्रय भ्रमजतादात्म्यके नाश करिके औ रा- गद्वेषके अभावते जलविङ्ग स्थित कमलपत्रकी न्याई ज्ञानीकू स्पर्श होवे नहीं । किंतु ज्ञानीके

॥ ज्ञानीके कर्मनिवृत्तिका वर्णन ॥ १९ ॥२०७
क्रियमाण ( इसजन्मविषै किये ) शुभ औ अशुभ
कर्मका क्रमतें सुहृद ( सकामीभक्त ) औ द्वेषी
(निंदकजन ) ग्रहण करै हैं । औ अज्ञानकी वि-
क्षेपशक्तिके आश्रित ज्ञानीके प्रारब्ध (पूर्वके
किसीएक जन्मविषै किये इसजन्मक आरंभक )
कर्मकी भोगसे निवृत्ति होवै है । तातै ज्ञानी सर्व-
कर्मसे मुक्त है ॥ याहीतें कर्मरचित जन्मादिक
संसारसैं बी मुक्त है। इसरीतिसँ ज्ञानीके कर्मकी
निवृत्ति होवै है ॥
इति श्रीविचारचंद्रोदये ज्ञानिकर्मनि-
त्तिप्रकारवर्णननामिका द्वादशकला स-
माता ॥ १२॥

२०८ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ अथ त्रयोदशकलाप्रारंभः॥ १३॥ ॥ सप्तज्ञानभूमिकावर्णन ॥ प्रश्न:- सर्वज्ञानिनका निश्चय तौ एकहीं है । परंतु स्थितिका भेद काहेते है ? उत्तरः- सर्वज्ञानिनकी स्थितिका भेद ज्ञा- नभूमिकाके भेदते है॥ प्रश्न:- सो ज्ञानभूमिका कितनी हैं ? उत्तर:- १ शुभेच्छा । २ सुविचारणा । ३ त. नुमानसा । ४ सत्वापत्ति। ५ असंसक्ति । ६ पदा- थीभाविनी । ७ तुरीयगा । ये सात ज्ञानभूमिका हैं । प्रश्नः- शुभेच्छा सो क्या है ? उत्तरः- पूर्वजन्मविषै अथवा इसजन्मविषै किये निष्कामकर्म औ उपसनासै शुद्ध औ ग्रचित्तवाले पुरुषकू विवेक वैराग्य षट्संपत्ति एका- RENT ॥ सप्तज्ञानभूमिकांवर्णन ॥ १३ ॥ २०९ औ मोक्षइच्छा। ये च्यारीसाधन होयके जो आ- त्माके जाननैकी तीव्रइच्छा होवै है । सो शुभेच्छा नाम ज्ञानकी प्रथमभूमिका है ॥ १ ॥ प्रश्नः- सुविचारणा सो क्या है ? उत्तरः- आत्माके जाननैकी तीव्रइच्छासै ब- मनिष्ठगुरुके विधिपूर्वक शरण जायके । गुरुके मुखमैं जीवब्रह्मकी एकताके बोधक वेदांतवा- क्यकू श्रवण करिके । तिस श्रवण किये अर्थदू आपके मनविषै घटावनैवास्ते अनेकयुक्तियांसे मनन (विचार) करना । सो सुविचारणा नाम ज्ञानकी दूसरीभूमिका है ॥ २ ॥ प्रश्न:- तनुमानसा सो क्या है ? उत्तरः- स्वरूपके साक्षात्कार ( अपरोक्ष- अनुभव )अर्थ श्रवणमननद्वारा निर्णय किये ब्रह्मात्माकी एकतारूप अर्थके निरंतर चिंतनरूप FASHIREn_ITML_HHETIRE २१० ॥ विचारचंद्रोदय ॥ ? निदिध्यासनसें जो स्थूल (बहिर्मुख )मनकी सू- क्ष्मता (अंतर्मुखता) होवै है । सो तनुमानसा नाम ज्ञानकी तीसरीभूमिका है ॥ ३ ॥ प्रश्न:- सत्यापत्ति सो क्या है ? उत्तरः- श्रवण मनन निदिध्यासनसें संशय औ विपर्ययसै रहित स्वरूपसाक्षात्काररूप नि- विकल्पस्थितिके भयेते । शुद्धसत्त्वगुणकी वा स्व- रूपसत्ताकी जो चित्तविषै प्राप्ति होवै है । सो सत्वापत्ति नाम ज्ञानकी चतुर्थभूमिका है ॥ ४ ॥ प्रश्न:- असंसक्ति सो क्या है ? उत्तरः- निर्विकल्पसमाधिके अभ्यासकी परिपक्वतासे देहविषै सर्वथा अहंता ममता गलि- त होयके । देहादिकविषै जो सर्वथा आसक्ति (प्रीति)का अभाव होवै है । सो असंसक्ति नाम ज्ञानकी पांचवीभूमिका है ॥ ५॥ 1 . M ॥ सप्तज्ञानभूमिकांवर्णन ॥ १३ ॥ २११ प्रश्न:- पदार्थाभाविनी सो क्या है ? उत्तरः- अतिशय निर्विकल्पसमाधिके अ- भ्याससैं देहादिक सर्वपदार्थनका अधिष्ठानब- ह्मरूपसे प्रतीति होनैकरि जो अभाव (अप्रतीति) होवै है । सो पदार्थाभाविनी नाम ज्ञानकी षष्ठ- भूमिका है ॥ ६ ॥ प्रश्न:- तुरीयगा सो क्या है ? उत्तरः- ज्ञाता ज्ञान औ ज्ञेयरूप त्रिपुटीकी चतुर्थपंचगभूमिकाको भ्याई भावरूपकर औ षष्ठभूमिकाकी न्याई अभावरूपकरि प्रतीति बी जहां होवै नहीं। ऐसी जो स्वपरसें उत्थानरहित तुरीयपदविषै मनकी स्थिति । सो तुरीयगा नाम ज्ञानकी सप्तमभूमिका है ॥ ७ ॥ प्रश्न:- ये सप्तभूमिका किसके साधन हैं ? उत्तरः-प्रथम द्वितीय औ तृतीय भूमिका ।

२१२ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ तत्त्वज्ञानके साधन हैं। औ चतुर्थभूमिका तौ तत्त्वज्ञानरूप होनैनै जीवन्मुक्ति औ विदेहमुक्ति- का साधन है । औ पंचम षष्ठ औ सप्तम भूमिका ॥१०९॥ कृतोपासन ( ज्ञानतें पूर्व करी है पूर्ण उपा- सना जिसने सो) औ अकृतोपासन (ज्ञानतें पूर्व नहीं करी है उपासना जिसने सो)। इस भेदतै चतुर्थभूमिका- रूप ज्ञानका अधिकारी दोप्रकारका है ॥ तिनमैं कृ- तोपासन जो है सो तौ सम्यक्वैराग्यादि साधनकरि संपन्न होवै है औ ज्ञानके अनंतर अल्पाभ्याससैं झ- टिति पंचमआदिक भूमिकाविषै आरूढ होवे है । औ अकृतोपासन जो है तामै सर्वसाधन स्पष्ट प्रतीत होते नहीं। किंतु एक दो साधन प्रकट होवै हैं औ अन्यसाधन गोप्य रहते हैं । याते सो बुद्धिमान् हो तौ चतुर्थभूमिकारूप तत्त्वज्ञानकू पावता है । परंतु बहु कालके अभ्याससे कदाचित् कोईक पंचम- आदिक भूमिकाविषै आरूढ होवै है। झटिति नहीं ॥

॥ जीवन्मुक्तिविदेहमुक्तिवर्णन ॥ १४ ॥ २१३ जीवन्मुक्तिके विलक्षणआनंदके साधन हैं ॥ इति श्रीविचारचंद्रोदये सप्तज्ञानभूमिका- वर्णननामिका त्रयोदशकला समाप्ता ॥ १३॥ अथ चतुर्दशकलाप्रारंभः॥ १४ ॥ ॥ जीवन्मुक्तिविदेहमुक्तिवर्णन ॥ मन:- जीवन्मुक्ति सो क्या है ? उत्तरः- देहादिक प्रपंचकी प्रतीतिके होते ब्रह्मस्वरूपसे स्थिति । सो जीवन्मुक्ति है ॥ प्रश्नः- जीवन्मुक्ति विषै प्रपंचकी प्रतीति काहे होवै है ? उत्तरः- आवरण औ विक्षेप। ये दो अवि- द्याकी शक्तियां हैं । तिनमैं आवरणशक्तिका ज्ञा- नसे नाश होवै हैं। तातें ज्ञानीकू अन्यजन्म iTATRITIERRIEगामाप २१४ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ chcho होवै नहीं । परंतु प्रारब्धके बलसें दग्धधान्यक- णकी न्याई विक्षेपशक्ति ( अविद्यालेश ) रहै । तातें जीवन्मुक्तिविषै प्रपंचकी प्रतीति होवै है। प्रश्न:- जीवन्मुक्तिविषै प्रपंचकी प्रतीति कै- उत्तरः- जैसे रज्जुके ज्ञानसँ सर्पभ्रांतिके नि- वृत्त भये पीछे कंपादिक भासते हैं । औ जैसे दर्पणके ज्ञानीकुं प्रतिबिंब भासता है । औ जैसे मरुस्थलके ज्ञानी मृगजल. भासता है । तैसे तच्वज्ञानी• जीवन्मुक्तिदशाविषै बाधित भये प्रपंचकी प्रतीति होवै है ॥ प्रश्न:- बाधित भये प्रपंचकी प्रतीतिविषै अन्य दृष्टांत क्या है ? उत्तर:- दृष्टांत:- जैसें महाभारतके यु-

॥ जीवन्मुक्तिविदेहमुक्तिवर्णन ॥ १४ ॥ २१५
मैं द्रोणाचार्यके मरण भये पीछे अश्वत्थामाके
साथि युद्ध भया है ॥ तिसी दिन सत्यसंकल्प
श्रीकृष्णपरमात्मानै यह संकल्प किया किः-
आज फिरके ग्रहदूं आवें तहांपर्यंत यह रथ
औ घोडे ज्यूंके त्यूंही वनै रहैं"। यह चिंतन
करिके युद्धभूमिमें आये ॥ तहां अश्वत्थामाने
ब्रह्मास्त्र ( अग्निअस्त्र ) डाय। तिसकरि तिसी
क्षणविषै अर्जुनके रथ औ घोडे भस्मीभूत भये ।
तौ बी श्रीकृष्णपरमात्मारूप सारथिके संकल्पके
बलसँ ज्यूंके त्यूं बने रहै । जब ग्रहकू आये तब
भस्मीका ढेर हो गया ॥
सिद्धांतः- तैसे स्थूलदेहरूप रथ है । ताके
पुण्यपापरूप दो चक्र हैं औ तीनगुणरूप ध्वज
है औ पांचप्राणरूप बंधन है औ दशइंद्रियरूप
घोडे हैं औ शुभ अशुभ शब्दादि पांचविषयरूप
TIPRITm
11

६
२१६
॥ विचारचंद्रोदय ॥
मार्ग हैं औ मनरूप लगाम है औ बुद्धिरूप सा-
रथि ( श्रीकृष्ण ) है औ प्रारब्धकर्मरूप ताका
संकल्प है औ अहंकाररूप बैठनका स्थान है
औ आत्मारूपी रथी ( अर्जुन ) है । ताके वैरा-
ग्यादि साधनरूप शस्त्र हैं । सो रथपर आरूढ
होयके सत्संगरूप रणभूमिमें गया । ता• गुरु-
रूप अश्वत्थामा. महावाक्यका उपदेशरूप
ब्रह्मास्त्र माय। तिसकरि ज्ञानरूप अग्नि उदय
होयके तिसी क्षणविषै देहादि प्रपंचरूप रथा-
दिक सर्वका बाध भया । तौ बी श्रीकृष्णरूप
सारथिस्थानी बुद्धिके प्रारब्धकर्मरूप संकल्पके
वलसें देहादिकका नाश होता नहीं। किंतु
पीछे बी देहादिककी प्रतीति होवै है ॥ याहीवू
॥ ११० ॥ जिसका नाश होवै सो नाशका प्रति-
योगी है। ता प्रतियोगीकी नाशवि प्रतीति होने है औ

.. ॥ जीवन्मुक्तिविदेहमुक्तिवर्णन ॥ १४ ॥ २१७ ។ ទ។ बधितानुवृत्ति कहै हैं | इसरीतिसैं यह बाधित अये प्रपंचकी प्रतीतिविषै दृष्टांत है ॥ १॥ प्रश्न:- विदेहमुक्ति सो क्या है ? उत्तर:-प्रपंचकी प्रतीतिरहित ब्रह्मस्वरूपसे स्थिति । वा प्रारब्धकर्मके भोगसें नाश भये पीछे स्थूल सूक्ष्मशरीरके आकारसैं परिणामळू प्राप्त भये अज्ञानका चेतनविषै विलय । सो विदेहमुक्ति है ॥ बाधविषै प्रतियोगीकी प्रतीति होवै नहीं। किंतु ती- नकालअभाव प्रतीत होवै है। यह नाश औ बाधका भेद है ॥ ॥ १११ ॥ जैसैं कुलालका चक्र । दंडसैं फेरनेका प्रयत्न छोडे हुये पीछे बी वेगके बलसे फिरता है। तैसें बाध हुये पीछे बी प्रारब्धकर्म से देहादि मपं- चकी जो प्रतीति होवै । सो बाधितानुवृत्ति है । TILLIH. Am २१८ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ प्रश्न:- प्रारब्धके अंत भये कार्यसहित अ- ज्ञानलेशका विलय किस साधनसे होवै है ? उत्तर:- प्रारब्धके अंत भये अधिक न्यून मूर्छाकालमैं यद्यपि ब्रह्माकारयत्तिका असं. भव है औ विद्वानकू विधि बी नहीं है । तथापि सुषुप्तिकी न्याई ता मूर्छाकालमैं बी ब्रह्मवि- द्याका संस्कार है । तामें आरूढ चेतनसँ कार्यस- हित अज्ञानलेशका विलय ( नाश ) होवै है ।। औ काष्ठआरूढअग्निसे तृणादिकका दाह हो- यके आपके बी दाहकी न्याई । ता संस्कार आ- रूढ चेतनसैं प्रपंचका विनाश होयके आप (ज्ञा- नके संस्कार )का बी विनाश होवै है। पीछे असं-. ग शुद्ध सच्चिदानंद स्वप्रकाश अपना आप ब्रह्म अवशेष रहता है ॥ २ ॥ इति श्रीविचारचंद्रोदये जीवन्मुक्तिवि- -.

॥ वेदांतप्रमेय (पदार्थ) वर्णन ॥ १५ ॥ २१९ देहमुक्तिवर्णननामिका चतुर्दशकला स- माता ॥ १४॥ अथ पंचदशकलाप्रारंभः॥ १५॥ ॥ वेदांतप्रमेय (पदार्थ) वर्णन ॥ प्रश्न:- मोक्षका स्वरूप क्या है ? उत्तर:- कार्यसहित अज्ञानरूप अनर्थ (बं- ॥ ११२॥ वेदांतशास्त्ररूप प्रमाणसें जन्य जो यथार्थज्ञान । सो प्रमा है ॥ ता ममासे जानने योग्य जो पदार्थ । सो प्रमेय है ॥ तिनका इहां कथन है ।। यातें इस (पंचदशम ) कलाके विचारतें प्रमेयगत संशयकी निवृत्ति होवै है ॥ प्रमेयगत सं- शयका कथन | हमारे कीए बालबोधिनी टीकासहित बालबोध नामक ग्रंथके नवम उपदेशविषै किया है। तहां देखलेना ॥ शाHITRIFLJALABHISHIRTELLS Samsal २२० ॥ विचारचंद्रोदय ॥ है N ध)की नित्ति औ परमानंदरूप ब्रह्मकी प्रा- प्ति । यह मोक्षका स्वरूप है ॥ प्रश्न:-तिस मोक्षका साक्षात्साधन क्या है ? उत्तर:- ब्रह्म औ आत्माकी एकताका अ- परोक्षज्ञान । मोक्षका साक्षात्साधन है। प्रश्न:- मोक्षका अवांतर (ज्ञानद्वारा) सा- धन क्या है ? उत्तरः- निष्कामकर्म औ उपासनाआदिक अनेक मोक्षके अवांतरसाधन है ॥ प्रश्न:- तिस ज्ञानका विषय क्या है ? उत्तरः-- आत्मा औ ब्रह्मकी एकता । ज्ञान- का विषय है। प्रश्न:- आत्माका स्वरूप क्या है ? उत्तरः- देह । इंद्रिय । प्राण । मन । बुद्धि ।

॥ वेदांतप्रमेय (पदार्थ) वर्णन ॥ १५ ॥ २२१ अज्ञान । औ शून्यसै भिन्न । अकर्ता । अभोक्ता । असंग । व्यापक । चेतन । आत्माका स्वरूप प्रश्नः- ब्रह्मका स्वरूप क्या है ? उत्तरः- निष्प्रपंच । असंग । परिपूर्ण । चे- तन । ब्रह्मका स्वरूप है। प्रश्न:- ब्रह्मआत्माकी एकता कैसी है ? उत्तर:- सच्चिदानंद । ऐश्वर्यस्वरूप । सदा विद्यमान । ब्रह्मआत्माकी एकता है । प्रश्न:- जानका स्वरूप क्या है ? उत्तर:-- जीवब्रह्मके अभेदका निश्चय । ज्ञान का स्वरूप है। प्रश्नः- ज्ञानका साक्षात् अंतरंग ( समीपका ) साधन क्या है ? उत्तरः- ब्रह्मनिष्ठगुरुके मुखसैं महावा- क्यके अर्थका श्रवण । ज्ञानका साक्षात् अंतरंग- साधन है॥ HTTLOCATTLEगापELLA...

२२२ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ प्रश्न:- ज्ञानके परंपरासें अंतरंगसाधन को- नसैं हैं ? उत्तरः- विवेक । वैराग्य । षट्संपत्ति (शम । दम । उपरति । तितिक्षा । श्रद्धा । समाधान)। मुमुक्षुता । " तत्" पद औं "त्वं" पदके अ- र्थका शोधन । श्रवण । मनन । औ निदिध्या- सन । ये आठ ज्ञानके परंपरासें अंतरंगसाधन हैं। प्रश्न:-ज्ञानके बहिरंग (दूरके) साधन कौन हैं? उत्तर:- निष्कामकर्म औ निष्कामउपासना आदिक । ज्ञानके बहिरंगसाधन हैं। प्रश्न:-ज्ञानके सर्व मिलिके कितने साधन हैं ? उत्तर:- ज्ञानके सर्व मिलिके एकादश ११ वा कछु अधिक) साधन हैं ॥ इति श्रीविचारचंद्रोदये वेदांतप्रमेयनिरू- पणनामिका पंचदशकला समासा ॥ १५ ॥ का ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा वर्णन ॥ १६ ॥ २२.३ अथ षोडशकला प्रारंभ ॥१६॥ ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा वर्णन ॥ तलातल अजिव्हत्वादि६।१४० रसातल अजिव्हत्व नपुंसकत्व पंगुत्व अंधत्व बधिरत्व मुग्धत्व अतलादि ७१४९ अतल वितल सुतल महातल - पाताल अध्यात्मताप २०१७ आधि (मानसताप) व्याधि (शारीरताप) अध्यात्मादि ३।३९ इंद्रिय ( अध्यात्म ) देवता ( अधिदैव) विषय ( अधिभूत) मामा CRETAILY २२४ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ अध्यास २०२२ अर्थाध्यास ज्ञानाध्यास अनात्माके धर्म १२।१६९ अनित्य विनाशी अशुद्ध नाना क्षेत्र आश्रित विकारी परप्रकाश हेतुमान व्याप्य संगी आवृत अनादिपदार्थ६।१४५ जीव ईश शुद्धचेतन अविद्या चेतनअविद्यासंबंध तिनका संबंध अनुबंध ४।८५ अधिकारी विषय प्रयोजन संबंध अन्तः करणा८६ मन । चित्त बुद्धि । अहंकार अन्तःकरण दोष३७१ मल । आवरण ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा वर्णन ॥ १६ ॥ २२५ विक्षेप अभाव ५। १२६ प्रागभाव प्रध्वंसाभाव अन्योऽन्याभाव अत्यंताभाव सामयिकाभाव अरिवर्ग ६। १२८ काम । मोह क्रोध । मद लोभ । मत्सर अर्थवाद ३।६८ अनुवाद गुणवाद भुतार्थवाद अवधि ३।५३ बोधकी वैराग्यकी उपरामकी अवस्था ३।२९ जाग्रत । सुषुप्ति स्वप्न अवस्था ७।१४६ अज्ञान आवरण विक्षेप परोक्षज्ञान अपरोक्षज्ञान शोकनाश तृप्ति अवस्था। १३३ शिशु । किशोर कौमार । यौवन पौगंड । जरा

२२६
॥ विचारचंद्रोदय ॥
असंभावना २८ आत्मा३।६५
प्रमाणगत
ज्ञानात्मा । शांतात्मा
प्रमेयगत
महानात्मा
अहंकार २।१४ आत्माकेधर्म १२।१६९
शुद्ध ( सामान्य ) नित्य । अविक्रय
अशुद्ध ( विशेष )
अव्यय । स्वप्रकाश
अज्ञान रा२
शुद्ध । हेतु
समष्टि । व्यष्टि एक | व्यापक
अज्ञानकी शक्ति २५ क्षेत्रज्ञ । असंगी
आवरणहेतु
विक्षेपहेतु आत्माके भेद ३ । ७२
अज्ञानके भेद ५।१२३
मायाअविद्यारूप गौणात्मा
ज्ञानक्रियाशक्तिरूप आनंद ३६०
विक्षेपआवरणरूप
ब्रह्मानंद
समष्टिव्यष्टिरूप विषयानंद
कारणरूप
वासनानंद
आश्रय । अनावृत
मिथ्यात्मा । मुख्यात्मा
SCreati

॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा वर्णन ॥ १६ ॥ २२७ आन्ध्यादि ३।५५ ईश्वरके ज्ञान ६।१४४ आन्ध्य । मांद्य । पटुत्व उत्पत्ति । आगति आादि भक्त ४।९७ पलय । विद्या आर्त । अर्थार्थी गति । अविद्या जिज्ञासु । ज्ञानी उत्पत्यादि क्रिया ४। आश्रम ४१८२ ब्रह्मचर्य उत्पत्ति । विकार गृहस्थ प्राप्ति । संस्कार वानप्रस्थ उद्देशादि ३ । ७५ संन्यास उद्देश । परीक्षा ईश्वरके भग ६।१४३ लक्षण समग्रऐश्वर्य उपवायु ५। १०८ समग्रधर्म नाग । देवदत्त समग्रयश कूर्म । धनंजय समनश्री ककल समग्रज्ञान उपासना २ । २३ समग्रवैराग्य सगुण । निर्गुण NE २२८ ॥ विचारचंद्रोदयं ॥ उर्मि ६।१३१ जन्म । तृषा प्रारब्ध कर्म ५। १०९ मरण । हर्ष नित्य । प्रायश्चित्त क्षुधा । शोक नैमित्तिक । निषिद्ध एषणा २।७५ काम्य पुत्रैषणा कर्म६।१३७ वित्तषणा स्नान । अर्चन लोकैषणा जप । आतिथ्य करण ३२० होम । वैश्वदेव मन । वाणी । काय कर्मइंद्रिय ५। १०५ कर्तव्यादि ३।७२ वाक् । उपस्थ कर्तव्य । प्राप्तव्य पाणि । गुद ज्ञातव्य कर्म ३।३१ पुण्य । पाप । मिश्र पाद कर्मादि ३।७४ कर्म । अकर्म विकर्म कारणवाद ३। ४० कर्म ३।६१ संचित । आगामी ERESTiewPRAHARLEng, VISTANTOPRE ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा वर्णन ॥ १६ ॥ २२९ आरंभ । विवर्त परिणाम काल ३।४२ भूत भविष्यत् वर्तमान कोश ५ । १०२ अन्नमय प्राणमय मनोमय विज्ञानमय आनंदमय कौशिक ६।१३० त्वक् । मेद मांस । मज्जा रुधिर । अस्थि क्लेश ५। १२० अविद्या अस्मिता राग द्वेष अभिनिवेश ख्याति ५। ११९ असत् आत्म अन्यथा अख्याति अनिर्वचनीय गन्ध २।१६ सुगंध । दुर्गंध गुण ३।४१ सत्व। रज | तम चैतन्य ७।१४७ ईश्वर । प्रमाण S Jan ATE

२३०
॥ विचारचंद्रोदयं ॥
श्रोत्र । मन
चक्षु । चित्त
जीव । प्रमेय तप
शुद्ध । प्रमा विसंवादाभाव
प्रमाता
दुःखनिवृत्ति
जाग्रत ३।६२ सुखप्राप्ति
जाग्रत जाग्रत तत्व ९।१६५
जाग्रत स्वप्न
जाग्रत सुषुप्ति
त्वक् । बुद्धि
जाति २।२४
पर । व्याप्य जिव्हा । अहंकार
अपर । व्यापक घ्राण
जीव ३।२७ तादात्म्य ३।५६
पारमार्थिक ( प्राज्ञ) भ्रमज ।
व्यावहारिक (विश्व सहज ।
प्रातिभासिक (तेजस) कर्मज
जीवन्मुक्तिके प्रयोजन ताप ३।३९
२।१२१ अध्यात्म । अधिभूत.
ज्ञानरक्षा
अधिदेव

॥ वेदांत पदार्थसंज्ञा वर्णन ॥ १६ ॥ २३१
मेद
रज्जुविधै सर्प
त्रिपुटी १४ । १७३ रस
। मज्जा.
देखो पृष्ठ ९९
रुधिर । अस्थि
दृष्टांत ५।११८ मांस ।रत
शुक्तिविषै रजत
नाडिका औ देवता
स्थाणुविषै पुरुष १०।१६६
गगनविषै नीलता इडा. ( चंद्र ) हरि
मरीचिकाविषै जल पिंगला (सूर्य) ब्रह्मा
द्रव्यादिपदार्थ७।१५५/ सुषुम्णा (मध्यमा) रुद्र
द्रव्य । समवाय
गांधारी (दक्षिणनेत्र)
गुण । अभाव
इंद्र
कर्म । विशेष हस्तिजिव्हा (वामनेत्र)
सामान्य ।
वरुण
धर्मादि ४ । १००
पूषा(दक्षिणकर्ण)ईश्वर
धर्म । काम
यशस्विनी (वामकर्ण)
अर्थ । मोक्ष
ब्रह्मा
धातु ७॥ १५२
कुहू (गुदा) पृथ्वी

२३२
॥ विचारचंद्रोदय ॥
अलंबुसा ( मेटू) सूर्य निःश्रेयस २।६
शंखिनी (नाभि) चंद्र अनर्थनिवृत्ति .
नादादि ३।६७ परमानंदप्राप्ति
नाद । बिंदु । कला परमहंससंन्यास २०१२
निग्रह २ । १३
विविदिषा । विद्वत्
क्रम । हठ पापकर्म ३॥ ३३
नियम ५। ११३ उत्कृष्ट । सामान्य
शौच
संतोष
पाश ८।१६०
मध्यम
तप
दया । निंदा
शंका । कुल
। शील
स्वाध्याय
ईश्वरप्रणिधान भय
नित्ति (तादात्म्यकी) लज्जा। धन
पुण्यकर्म ३ ॥ ३२
भ्रमज
उत्कृष्ट सामान्य
सहज
मध्यम
कर्मज
पुरी ८१ १५

॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा वर्णन ॥ १६ ॥ २३३ पृथ्वी । आकाश जल । मन अग्नि । बुद्धि ज्ञानेंद्रियपंचक कमौद्रियपंचक अंतःकरणचतुष्टय प्राणादिपंचक भूतपंचक काम त्रिविधकर्म वायु । अहंकार प्रतिबंध३।३६ भूत । भावी . वासना वर्तमान प्रतिबंधनित्तिहेतु ४। ७९ शमादि पुरुषार्थ ४।८० धर्म । काम अर्थ । मोक्ष पूजापान ४ । ९९ ब्रह्मनिष्ठ मुमुक्षु हरिदास स्वधर्मनिष्ठ प्रकृति ८ । १५७ AULICHITRAILERTIES श्रवण मनन निदिध्यासन प्रपंच ३। ४५ स्थूल । सूक्ष्म । कारण अपंच २१ बाह्य । आंतर HEREIRRIEREST AIMPLBARIES

२३४
॥ विचारचंद्रोदय ॥
प्रमाण ४।८८
स्थितप्रज्ञा
प्रत्यक्ष । उपमान अस्थितप्रज्ञा
अनुमान । शब्द प्राणादि ५। १०७
प्रमाण ६।१२८ प्राण | उदान
प्रत्यक्ष
अपान | समान
अनुमान
व्यान
उपमान
प्राणायाम ३।५४
शब्द
रेचक । कुंभक
अर्थापत्ति
अनुपलब्धि मारब्ध ३।३५
प्रलय ५।११५ इच्छा । परेच्छा
नित्यप्रलय
अनिच्छा
नैमित्तिकप्रलय बल ३॥ २६
दिनप्रलय
विराट । ईश्वर
महाप्रलय
हिरण्यगभ
आत्यंतिकप्रलय ब्रह्मचर्यके अंग८१५९
प्रज्ञा २.। १०
स्त्रीका दर्शन
पूरक

FELLL ॥ वेदांत पदार्थसंज्ञा वर्णन ॥ १६ ॥ २३५ minium-HITTE LHN.In श्रुत । दान इनसैं विपरीत स्पर्शन दम । यज्ञ कैलि कीर्तन अमात्सर्य । धैर्य गुह्यभाषण भागवतधर्म १३।१७२ संकल्प सकामर्कमके फलका निश्चय विपरीत दर्शन । क्रियाजन्यसुख धनगृहपुत्रादिकविर्ष ब्रह्मविदादि ४ । ९२ दुःखबुद्धि औ च- ब्रह्मवित् लबुद्धि । ब्रह्मविद्वर परलोकविषै नश्वर- ब्रह्मविद्वरीयान् बुद्धि। ब्रह्मविद्वरिष्ठ शब्दब्रह्म औ परव- ब्राह्मणकेवत । १२॥ ह्मविषै कुशल गु- १७१ रुप्रति गमन । ज्ञान । लज्जा गुरुविषै ईश्वरबुद्धि औ सत्य । तितिक्षा निष्कपट सेवा । शम । अनसूया परमेश्वरविषै सर्व कर्म MUSTITIRALLETITISEELPLIER NMENSAR .n:RN: 12 २३६ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ समर्पण। भक्तिवैराग्यसहित स्व- मौन। दर्शन औ भगव- द्रूपआत्माविषै सर्व रूपानुभव। भूतनका दर्शन। साधुसंग। जन्मकर्म वर्णाश्रमा- शौच । तप। तितिक्षा। दि करि देहविषै निरभिमान औ स्वाध्याय । आर्जव स्वपरवुद्धिकाअ- ब्रह्मचर्य । अहिंसा । भाव। औ द्वंद्वसमत्व । भूतग्राम ४॥ ९१ सर्वत्र आत्मारूपईश्व, जरायुज । उद्भिज्ज रका दर्शन। अंडज । स्वेदज कैवल्य । ग्रहनबांधना। भूमिका ७ । १५० अनिकेतता । एकांत शुभेच्छा (विविक्त) चीरवस्त्र । सुविचारणा तनुमानसा सर्व भूतनविषै आत्मा सत्वापत्ति के भगवद्भावका) असंसक्ति संतोष।

॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा वर्णन ॥ १६ ॥ २३७ कुल । वर्ण भर् । जन भुवर् । तप पदार्थाभाविनी स्त्रम६।१४१ तुरीयगा भूरादिलोक ७१४८ गोत्र । आश्रम जांति । नाम. भ्रमविवर्त दृष्टांत ५। स्वर । सत्य ११७ महर् विंबप्रतिबिंब भेद ५। १२५ लोहितस्फटिक जीवईशका भेद घटाकाश जीवजीवका भेद रज्जुसर्प जीवजडका भेद ईशजडका भेद कनककुंडल जडजडका भेद सद८।१६१ श्रम ५।११६ भेद । विकार शील । विद्या कर्तृत्व । सत्यत्व धन । तप संग रूप । राज्य ARRID RIPTETTLATITTERIALISATTATE-HEIRAHA कुल । यौवन est २३८ ॥ विचारचंद्रोदय ।। .. अव्यक्त महत्ता हेतुधर्म १२ । १७० धनाढ्यता। तेज अव्याकृत अंजा । पौरुष अभिजन । प्रभाव अज्ञान रूप । बल तम तप तुच्छा श्रुत । बुद्धि अनिर्वचनीया ओज । योग मिश्रकर्म ३।३४ महायज्ञ ५। १२२ उत्कृष्ट । सामान्य देव । मनुष्य मध्यम मूर्ति ३।४३ पितर ब्रह्मा । विष्णु। शिव मायाकेनाम १५।१७४ मर्तिमद ८ । १६२ माया । सत्या पृथ्वी । आकाश जल । चंद्र प्रकृति । तूला शक्ति । योनी पवन । आत्ममद ऋषि । भूत अविद्या । मूला तेज । सूर्य ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा वर्णन ॥ १६ ॥ २३९ THESIDEREST HARPATIEReatment करुणा । उपेक्षा । विचार मैत्र्यादि ४।९० अस्तेय मैत्री । मुदिता युक्ति ४ । ९५ अध्यात्मविद्या मोक्षद्वारपाल ४।१०१ साधुसंग शम वासनात्याग संतोष । सत्संग प्राणायाम मौनादि ७ । १५१ योगभूमिका ५।११४ मौन क्षेप । एकाग्र योगासन विक्षेप । निरोध योग मूढ तितिक्षा योगभूमिका ४ । ९४ एकांतशीलता वाणीलय निःस्पृहता मनोलय समता बुद्धिलय यम ५। ११२ अहंकारलय अहिंसा । ब्रह्मचर्य रस ६।१४२ सत्य मधुर । कटुक | अपरिग्रह AHMEJURELATED TEASERTREENCE २४० ॥ विचारचंद्रोदय || शुक्ल । हरित आम्ल । कषाय फल लवण । तिक्त अर्थवाद रूप ७ । १५४ उपपत्ति लोक ३।४६ कृष्ण । कपिश स्वर्ग । मृत्यु । पाताल पीत । चित्र वचनादि ५ । १०६ रक्त वचन । रति लक्षण २। २० आदान । मलत्याग स्वरूपलक्षण गमन तटस्थलक्षण वर्ण ४।८२ लक्षणदोष ३ । ७६ ब्राह्मण । वैश्य अव्याप्ति । असंभव अतिव्याप्ति वर्तमान प्रतिबंध४७८ 'लिंग ६।१३२. विषयासक्ति उपक्रम उपसंहार बुद्धिमांद्य अभ्यास कुतर्क अपूर्वता विपर्ययदुराग्रह क्षत्रिय । शूद्र CALL || वेदांतपदार्थसंज्ञा वर्णन || १६ ॥ २४१ वाक्य २।१९ अपक्षय अवांतरवाक्य विनाश महावाक्य विधिवाक्य ३।६९ वाद २ । १८ अपूर्वविधि प्रतिबिंबवाद नियमविधि अवच्छेदवाद परिसंख्याविधि वादादि ३ । ७७ विपरीतभावना २१९ वाद । जल्प। वितंडा प्रमाणगत वासना३ । ४८ प्रमेयगत लोकवासना विवेकादि ४।८४ शास्त्रवासना विवेक देहवासना वैराग्य विकार ६।१२९ षट्संपत्ति जन्म मुमुक्षुता अस्तिता वेद ४ । ८७ वृद्धि अग् । साम विपरिणाम यजुइ । अथर्वण AL HESHUR २४० २४२ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ गुण । संबंध रूप ७ कर्म । ज्ञान रक्त आर वेदोंग ६ । १३६ जाति । क्रिया लव शिक्षा । निरुक्त कल्प । छंद. शब्दशक्तिग्रहण हेतु व्याकरण । ज्योतिष ८।१६३ कृष्ण वेदके कांड ३।७० व्याकरण पीत उपमान उपासना कोश लक्षण व्यसन ७। १५३ आप्तवाक्य स्वरु तन । धन वृद्धव्यवहार तट मन । राज्य वाक्यशेष लक्षण क्रोध । सेवकव्यसन विवरण अन्न सिद्धपदकी सन्निधि शब्द २०१५ शब्दसंगति २।२५. 'लिंग वर्णरूप शक्तिवृत्ति उपः ध्वनिरूप लक्षणावृत्ति शब्दप्रतिनिमित्त शब्दादि ५। १०४ शब्द । रस विषय। अति SarECE । ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा वर्णन ॥ १६ ॥ १४३ स्पर्श । गंध रूप । शमादि । १३९ शम | तितिक्षा दम | श्रद्धा उपरति । समाधान शरीर ३ । २८ स्थूल । कारण सूक्ष्म शान६।१३४ सांख्य योग न्याय वैशेषिक पूर्वमीमांसा उत्तरमीमांसा शृंगारादि रस १० । १६७ शृंगार । भयानक वीर । बीभत्स करुणा । रौद्र अद्भुत । शांति हास्य । प्रेमभक्ति श्रवणादि ३। ४९ श्रवण मनन निदिध्यासन श्रवणादिफल ३ १५० प्रमाणसंशयनाश प्रमेयसंशयनाश विपर्ययनाश संशय २ । ७ प्रमाणगत POORLS २४० २४४ ॥ विचारचंद्रोदय ॥ आ शुहः कर पी लक्षण स्वर प्रयेगत आंतरनिर्विकल्प संन्यास ४।९३ समाधिके अंग ८।१५८ कुटीचक यम बहूदक नियम हंस आसन परमहंस प्राणायाम संपत्ति २ । २१ प्रत्याहार दैवी । आसुरी धारणा समाधि २॥ ११ ध्यान. सविकल्प सविकल्पसमाधि निर्विकल्प समाधिविन ४।८९ समाधि ६ । १२७ लय । कषाय बाह्यदृश्यानुविद्ध विक्षेप । रसास्वाद आंतरदृश्यानुविद्ध संबंध ३ । ३७ बाह्यशब्दानुविद्ध संयोग । तादात्म्य आंतरशब्दानुविद्ध समवाय . बाह्यनिर्विकल्प संसार ९।१६४ तट लक्षण अब आ लिंग उप - ... । HELPermane ॥ वेदांतपदार्थसंज्ञा वर्णन ॥ १६ ॥ २४५ UTIL.com ज्ञाता । भोग ज्ञान । कर्ता ज्ञेय । करण भोक्ता । क्रिया भोग्य सुषुप्ति ३ । ६४ सुषुप्ति जाग्रत सुषुप्तिस्वा सुषुप्तिसुषुप्ति. सुपुयादि ३ । ५९ सुषुप्ति । समाधि मूर्छा सूत्र ६।१३५ जैमिनीय आश्वलायन आपस्तंव बौधायन कात्यायन वैखानसीय सूक्ष्मभूत ५। ११० शब्द । रस स्पर्श गंध, रूप सक्ष्मशरीर २३ समष्टि । व्यष्टि स्थूलभूत ५।१११ आकाश । जल वायु तेज स्थूल शरीर २१४ समष्टि । स्पर्श ४९ शीत । कोमल उष्ण । कठिन . । पृथ्वी

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वेदान्त २ १ 011 ४ ... ... ... १ .. ४ प्रीपंचदशीका प्रथम औ पंचम प्रकरण. श्रीपंचदशी मूलमात्र.... श्रीईशायष्टोपनिषद् । मूल औ श्रीशंकरभाष्य अनुसार हिंदुस्थानीमैं. श्रीवालबोध टीकासहित. ०|| उक्तग्रंथ चित्रित कपडेके पूठेसहित. श्रीपदार्थमंजूषा ( वेदांतपदार्थ कोश) श्रीवेदः गुति । अन्वययुक्त । तथा गुर्जर भाषा श्रीवेदांतविनोद. इस नाम अनेक लघुग्रंथ प्रकट किये जाते हैं ।। ति- नमैं वेदप्तपदावलि तथा वेदांतपदार्थसंज्ञा छपे हैं | प्रत्येक अंककी कीमत .)- रखी है । औं कोइवी अंकका मात्र रु० ०||| पडेगा. १ वेदांपदावलि (श्रीविचारचं. ५ अखाभक्तके पद. 5. द्रोदयका सार) ६ प्रस्ताविक श्लोक अर्थ वेदांतपदार्थसंज्ञा. सहित. 3 सूफीओंके गजल. ७. वेदांतस्तोत्र संग्रह अर्थ देवाभक्तके पद. सहित. - इनसे आदिलेके अनेक लघुग्रंथ ऊपरि लिखे क्रमसैं नहीं परंतु समयसजोग अनुसार प्रकट किये जायेंगे ।

Shree Vicharchandraodaya

Author
Pitamberji
Title
Shree Vicharchandraodaya
File name
Shree Vicharchandraodaya
Text
OCR done
Citation
1942
Publisher
Mumbai
Language
Sanskrit
Pages
251
Library
Bb Library Allahabad
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Literature
DLI number
274021
Barcode
5990010894364.00
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IIIT, Allahabad
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