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Sanskrit Vyakaran Me Ganpath Ki Parampara Aur Acharya Panini

Shastri,kapildev · 2012/08

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समर्पण
जिनके उपकार मुझे भुलाये नहीं भूलते,
उन परमश्रद्धेय एवं उदार-हृदय
शुरुचरणा डा० सूर्यकान्तजी
(शास्त्री, एम० ए०, डी फिल (अाक्सन् ) डी० लिट, (पंजाव),
मयूरभंज प्रोफेसर, अध्यक्ष-संस्कृत-प्राकृत-पाली-विभाग
तथा प्रिंसिपल कालेज आफ इण्डालाजी)
की सेवा में
सादर सविनय
समर्पित

भारतीय-प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान उद्देश्य इस संस्था के उद्देश्य "भारतीय प्राचीन वाङ्मय का अन्वेषण, रक्षण और प्रसार" है। कार्य-क्रम उपर्युक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रतिष्ठान के कार्यक्रम को निम्न विभागों में बाटा है- १-भारतीय प्राचीन वाड्मय का अनुसन्धान । ---भारतीय प्राचीन वाडमय के अनुसन्धान द्वारा विभिन्न विषयों पर मोलिक ग्रन्थो तथा निबन्धो का लेपन और प्रकाशन । ३-भारतीय घाड्मय के विविध विभागों के इतिहास तथा भारत के प्राचीन इतिहास सम्बन्धी ग्रन्थों का लेखन और प्रकाशन । ४-भारतीय प्राचीन वाडमय का शुद्ध सम्पादन तथा प्रकाशन । ५-भारतीय प्राचीन वाडमय का राष्ट्रमापा (हिन्दी) में प्रामाणिक अनुवाद। ६-संस्कृत वाङमय तथा इतिहास सम्बन्धी गवेषणात्मक त्रैमासिक "पनिका" का प्रकाशन । ७-उपर्युक्त कार्य क्रम की पूर्ति के लिए "बृहत् पुस्तकालय" का निर्माण। -प्राचीन वाडमय की रक्षा और प्रसार के लिए 'सागवेद- विद्यालय का संचालन । -उद्देश्यों की पूर्ति करने हारे विशिष्ट साहित्य के प्रचार के लिए “विनय विभाग का संचालन । विशेष विवरण के लिए "प्रतिष्ठान की योजना, कार्यक्रम तथा कृतवार्य विवरण" पुस्तिका विना मूल्य मगवाइये । संचालक-भारतीय-प्राच्यविद्या-प्रतिष्ठान २४,२१२ रामगज ४६४३ रेगपुरा, गली ४० अजमेर वगेज़बाग, नई दिल्ली।

सम्पादकीय प्राचीन संस्कृत वाङ्मय। का तुलनात्मक और आलोचनात्मक अध्ययन करने वाले, विशेषगसंस्कृत व्याकरण शास्त्र में रुचि रखने पाले विद्वन्महानुभावों के सन्मुस अपने मित्र श्री पं० कपिलदेवजी साहित्याचार्य, एम० ए०, पीएच० डी० प्राध्यापक संस्कृत विश्वविद्या- लय कुरुक्षेत्र का "संस्कृत व्याकरण में गणपाठ की परम्पग और प्राचार्य पाणिनि" नामक ग्रन्थ उपस्थित करते हुए में परम प्रसन्नता अनुभर करता हूँ। हिन्दू विश्वविद्यालय काशी से संस्कृत में ससम्मान एम० ए० परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् मित्र महोदय ने पीएच. डी० के लिए. संस्कृत व्याकरण से संबद्ध किसी विषय का निर्देश करने के लिए मुझ से कहा । मैंने अपने अनुभव के आधार पर पाणिनीय गण- पाठ के शुद्ध संस्करण का सर्वथा अभाव देखते हुए "पाणिनीय गणराठ फा आदर्श संस्करण और समस्त गणपाठों का तुलनात्मक अध्ययन" चिपय का निर्देश किया। मैं जानता था कि यह विषय अत्यन्त परिश्रम साध्य है और इस विषय में वही व्यक्ति सफल हो सकता है, जिसे पाणिनीय व्याकरण का पूर्ण ज्ञान होने के साथ साथ अन्य अनेक विषयों फा परिज्ञान हो और उत्साही तथा धैर्यवान् हो । मेरे मित्र महोदय में ये सभी याते सम्मिलित रूप से विद्यमान है । अतः चे अनेक विघ्न. वाधानों के, ओ कि भारतवर्ष में साधारण परिस्थिति के अध्ययनार्थी के सन्मुरा आती है और विशेषकर संस्कृतश के सन्मुस, उपस्थित होने पर भी धैर्यपूर्वक अपने कार्य में लगे रहे और उसमें पूर्ण सफलता प्राप्त करके हिन्दू विश्वविद्यालय फाशी से पीएच० डी० की उपाधि प्राप्त की। पीएच. डी० उपाधि के लिए उपस्थापित उक्त निबन्ध के तीन भाग हैं। प्रथम-गणपाठों का तुलनात्मक अध्ययन, दूसरा-गणपाठ का श्रादर्श संस्करण और तृतीय-पाणिनीय गणपाठ पर आलोचनात्मक टिप्पण। इस नियन्ध का प्रथम और तृतीय भाग मूलतः अग्रेजी भाषा २ में लिपे गए थे, क्योंकि उस समय तक हिन्दू विश्वविद्यालय काशी में पीएच० डी० के लिए संस्कृत अथवा राष्ट्रभाषा हिन्दी में लिखे नियन्ध स्वीकृत नहीं होते थे। प्रस्तुत पुस्तक यद्यपि उक्त निबन्ध के प्रथम भाग का ही हिन्दी रूपान्तर है, तथापि यह भाग इस रूप से लिखा गया है कि यह अपने रूप में स्वतन्त्र ग्रन्थ न गया है। इसलिए मैं पहले इस भाग को प्रकाशित कर रहा है, निवन्ध के शेष भाग भी यथासम्भर शीघ्र प्रकाशित होंगे। वर्तमान युग में संस्कृत वाङमय के तुलनात्मक और बालोचना- स्मक अध्ययन का प्रारम्भ पाश्चात्य विद्वानों द्वारा हुआ है। उन के बाड्मय में संस्कृत वाङ्मय के समान हट-उपाशात प्रोक्त कृत ये भेद नहीं है। इसलिप ये इन विभागों से विशेषकर प्रोक्त और कृत वाङ्मय के भेद से अनभिज्ञ है । इस अनभिज्ञता के कारण उन्होंने प्रोक्त निन्थों के विषय में तुलनात्मक और आलोचनात्मक अध्ययन के आधार पर जो परिणाम प्रस्तुत किए, ये प्रायः न केरल सत्य से दूर ही हैं, अपितु कई अंशों में तथ्य से सर्वथा विपरीत भी है। यद्यपि प्रा. कपिलदेवजी ने पीएच० डी० के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले इस निबन्ध में पाश्चात्य अध्ययन परिपाटी को ही अपनाया है, तथापि उन्होंने संस्कृत वाङ्मय के प्रोक्त तथा मृत भेदों में भले प्रकार विश होने के कारण अनेक स्थानों पर पूर्व प्रमरित श्रथमा लिखित भ्रान्त धारणाओं का निराकरण किया है। इस दृष्टि से यह ग्रन्थ अधिक उपयोगी बन गया है। मैंने इस ग्रन्य का सम्पादन तथा संशोधन करते समय लेखक फे भायों की पूर्ण रक्षा करने का प्रयत किया है। अनेक स्थलों पर मैं अपनी टिप्पणियां परिशिष्ट रूप में देना चाहता था, जिनसे पाठक महा- नुभायों को उग उन स्थलों पर मेरे विचार भी ज्ञात हो जाएं । परन्तु प्रारम्भिक चार फार्मों में नीचे पद विषयक संमेत फरके भी शरीर की श्रयम्बना और कार्याधिक्य के कारण इस ग्रन्थ में न दे सका। यह प्रन्ध अाश्विन मास तक प्रकाशित हो जाता, किन्तु उसी फाल में मेरे अन्यधिक रुग्ण हो जाने तथा वृधा ही शल्यचिकित्सा फगने प. काग-४ मास यिलम्य मे प्रकाशित हो रहा है।

३ मेरा 'संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास' अन्य का द्वितीय भाग, जो कई कारणों से अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ श सम्प्रति छप रहा है। उसके 'गणपाठ के प्रवक्ता और व्याख्याता' अध्याय के संशोधन में इस ग्रन्थ से पर्याप्त सहायता ली है। इसलिए यद्यपि दोनों ग्रन्थों में अनेक विषयों में समानता उपलब्ध होने पर भी दृष्टिभेद के कारण यहुत स्थानों पर वैमत्य दृष्टिगोचर होगा। प्राचीन संस्कृत वाङ्मय के उद्धार, अध्ययन तथा प्रसार की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करना में अपना परम कर्तव्य समझता है। इस लिए पाणिनि आदि के काल तथा कतिपय अन्य मतभेद होने पर भी मैं इस ग्रन्थ को यथाशक्ति सम्पादित करके प्रकाशित कर रहा हूँ। वादे वादे जायते तत्वबोधः शास्त्रकारों की इस उक्ति के अनुसार मित्र महोदय के अत्यन्त धैर्य, दृढ़ अध्यरसाय तथा विद्वत्ता से किए गए इस अनुसन्धान कार्य से गवेषण कार्य में रत महानुभावों को निश्चय ही लाभ होगा और भविष्य में इस क्षेत्र में कार्य करने वालों को न केवल विचार विनियम के लिए इससे नई सामग्री प्राप्त होगी, अपितु उनके लिए यह अन्य प्रकाश-स्तम्भ के समानपग्म उपयोगी सिद्ध होगा। भारतीय प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान ) विदुषा वशवद २४/२१२ रामगज, अजमेर युधिष्ठिर मीमासक १. यह भाग २-३ मास तक तैयार हो जायगा । प्रथम माग का भी संशोधित तथा परिवर्धित सस्करण शीघ्र प्रकाशित होगा।

लेखक का आत्मनिवेदन लोकोत्तर महापुरुषो तथा महान् मनोपियो के इस भारत देश में न्यूनातिन्यून ढाई सहा वर्ष पूर्व परम-ओजस्विनी प्रतिभा से समन्वित शब्द शास्त्र के एक महान् आचार्य का प्रादुर्गाव हुआ जिसका नाम था पाणिनि । इस प्रमाणभूत महार सृषि ने अपने से पूर्व विद्यमान लौक्कि तथा वैदिक संस्कृत की दृष्टि से लिसे गये काशकृत्स्न, भागुरि, आपिलि आदि अनेक आचार्यों के विभिन्न व्याररणो से पूरी सहायता लेते हुए भी उन्हे अपनी सक्षिप्तता, व्यापकता तथा सुविहितता से अतिक्रान्त पर जाने वाले, आदर्श सूत्र-शैली मे निवद्ध एक ऐसे व्याकरण शास्त्र की रचना की जो अद्ययावत् संस्कृत वाड्मय के सम्पूर्ण प्रदेशो को अपनी सून रश्मियो से सर्वथा सुप्रकाशित करता हुआ तया उतरवर्ती चन्द्रगोमी, दवनन्दो (जैनेन्द्र) पाल्यकीति (जेन शाक्टायन) हेमचन्द्र तथा भोज आदि के अनेक व्याकरणो यो अपनी आभा के मुक्त दान से साकार बनाता हुआ, महान प्रकाश-स्तम्भ का कार्य कर रहा है। इस व्याकरण का लोकप्रसिद्ध नाम है अष्टाध्यायी। यह अपने निमिनि-काल से ही इस विषय के विशिष्ट विद्वानो को निरन्तर अपनी ओर आष्ट करती रही और तब तक करती रहेगी, जब तक संस्कृत भापा का किसी न किसी रूप मे इस धरातल पर अस्तित्व पाया जा सकेगा। अपने इस क्थन की पुष्टि मे मै उन अनेक वृत्तिकारो वार्तिककारो भाष्यकारो टीकाकारो, व्याख्याताओ तथा लेसको को साक्षी के रूप मे प्रस्तुत करना चाहूँगा, जिन्होंने यथावसर अपनी अमूल्य सेवाये उस महान आचार्य के पवित्र चरणो मे प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रूप से अर्पित कर अपने को कृतार्थ माना है । इनमे मूर्धन्य है कात्यायन तथा पतञ्जलि । किसी भी व्याकरण के लिये यह आवश्यक है कि वह जिस भाषा का हो, उसके सामान्य गठन एवं परिष्कार के लिये विभिन नियमो तथा उपनियमो की कलना को तो उस व्याकरण मे आकार दिया ही जाए, साथ १ २ । . लेखक का आत्मनिवेदन ही उस भाषा के यथा-सभव सभी शब्दो की सुनिष्पन्नता की दृष्टि से भी प्रकृति प्रत्यय की वैज्ञानिक स्वाभाविक एव सुव्यवस्थित निर्धारणा को भी सुप्रतिष्ठित किया जाए, जिससे यदि एक ओर सम्पूर्ण शब्दो के विभिन्न अर्थो का परिज्ञान अल्पप्रयास से हो जाए तो दूसरी ओर शब्दो को अपभ्रष्टता के समर्फ से दूर रखा जा सके । 'येन अल्पेन यत्नेन महतो महतः शब्दोघान् प्रतिपद्येरन्', म्लेच्छा मा भूम' इन वाक्यो द्वारा महाभाष्यकार पतञ्जलि ने व्यावरण के इन्ही प्रधान प्रयोजनो की ओर सकेत किया है। जिस प्रकार सक्त की परिप्कृति के लिये सक्तशोधक उसे सहत्र छिद्रो से युक्त चालनी से गोवता है, ठीक उमी प्रकार वैयाकरण भी सहस्रो प्रकृति प्रत्यय-निर्धारक नियमो की चालनी से स्वसम्बद्ध भाषा को उसकी परिष्कृति के लिये छानना चाहता है। कहने की आवश्यकता नही वि पाणिनि की परम ओजस्विनी अष्टाध्यायी मे विशाल मस्कृत वाङ्मय के यथासम्भव सभी शब्दो के प्रकृति- प्रत्यय के निर्धारण वा परिगणन का निश्चित ही वडा व्यापक, परन्तु सक्षिप्त एवं वैज्ञानिक प्रयाम दिया गया है। इनमे प्रत्ययो का प्रदर्शन तो सामान्य तथा विगेप अथवा उत्सर्ग और अपवाद सूनो का साहाय्य लेकर थोडे सूत्रो द्वारा हो गया है । परन्तु अनेकविध एवं सहप्रश प्रकृतियो के परिगणन के निये पाणिनि ने धातु-प्रकृतियो की दृष्टि से धातुपाठ तथा नाम अथवा प्राति- पदिर प्रतियो की दृष्टि से प्रातिपदिपाठ अथवा गणपाठ का सूत्रपाठ से पृथा निरिण पिया । क्योरि अष्टाध्यायी के सूत्रो की सक्षिप्तता को देखते हुए उनमे इन धातु तथा नाम रूपी सभी प्रतियो का प्रदर्शन सभव अथवा उचित नहीं था। यो तो पाणिनि से पूर्व भी धातुपाठ तथा गणपाठ वा निर्वारण अयवा दूमर गदो में गणशैली या उद्भव हो चुका था, इसके अनेक प्रमाण पाठकों को अगले पृटो में मिनेगे परन्तु पाणिनि के धातुपाठ तथा गणपाठ मा आना एप विशिष्ट महत्त्व है जिसे प्राय मभी विद्वान् स्वीकार करते इनिये पाणिनि की अष्टाध्यायो के सूत्रपाठ वे समान ही उसो अभिन्न या धानुगट तया गणपाठ का अध्ययन भी मंस्तृत व्याकरण के जिज्ञासुओ रेगि महान् आदेय है। इस बात को यदि और अधिक स्पष्टता के साथ कहा १. महानयादिक, ५२ २. महा.नवाधिक पृष्ठ २६ ।

लेसक का आत्मनिवेदन जाए तो यो कहा जा सकता है कि अष्टाध्यायी के अनेकानेक सूत्र इन धातु. पाठ तया गणपाठ से इतने अधिक मुसम्बद्ध हैं कि इनके सम्यग अध्ययन एवं परिज्ञान के विना अष्टाध्यायी की व्याख्याहो ही नहीं सक्ती और यदि की भी जाए तो वह अपूर्ण रहेगी । इमलिये इस रूप मे धातुपाठ तथा गणपाठ सस्कृत व्यावरण को आधार शिला होने के कारण, विशिष्ट महत्त्व रखते ही हैं, परन्तु व्याकरण के क्षेत्र से बाहर भी इन दोनो की जो वक्त कुछ उपादेयता एवं महत्ता हैं, उसकी उपेक्षा नही की माती। जहाँ तक धातुपाठ का सम्बन्ध है यह मन्तोप का विषय है कि विद्वानो ने उसकी ओर पर्याप्त ध्यान दिया है। इसके फलस्वरूप धातूप्रदीप, धातु वृत्ति तथा क्षीरतरङ्गिणी सदृश पाणिनीय धातुपाठ से सम्बन्ध प्रामाणिक व्याख्या ग्रन्थ आज भी उपलब्ध एवं सुप्रतिमित हैं । परन्तु गणपाठ सम्भ- वत सदा से ही विद्वानो एव व्याख्यानाओ तथा टीवाकारो की उक्षा का पान रहा है। यह सत्य है कि पाणिनीय गणपाठ की दो एक व्याख्याये अवश्य लिखी गई थी ( जिनकी चर्चा आगे की जायगी) पर आज उनका केवल नाम मात्र ही, और वह भी यही कही उद्धरणो के रूप मे ही रोप रह गया है। पाणिनीय व्याकरण-सम्प्रदाय के क्षेत्र से बाहर, किमी अज्ञात व्याकरण से सम्बद्ध, वर्षमान को गणरत्नमहोदधि अवश्य एक ऐसी व्याख्या वा वृत्ति है, जिसे देखकर महती प्रसनता होती है । तथा इससे गणपाठ की स्थिति चाहे वह किसी भी व्याकरण से सम्बद्ध क्यो न हो मर्यादित, सुसयमित एवं सुस्पष्ट रूप मे हमारे समक्ष उपस्थित होती है । परन्तु पाणिनीय सम्र- दाय की दृष्टि मे गणपाठ के विस्तृत अध्ययन की आवश्यकता की पूर्ति इस ग्रन्थ से नहीं हो पाती। सम्भवत वर्षमान की गणरत्नमहोदधि के आधार पर ही गत शताब्दी मे भट्ट यज्ञेश्वर नामक किमी विद्वान् ने पाणिनीय गणपाठ वी गणरनावली नामक व्याख्या लिखी । परन्तु यह व्याख्या भी इतनी सतिप्त एवं अस्पष्ट सी है कि साम्प्रतिक विद्वानो की दृष्टि से सर्वथा उपेक्षित एवं ओझल हो कर नगण्यता की श्रेणी मे आ चुकी है। गणपाठ के साय की गई इस मेक्षा का कारण यह प्रतीत होता है कि इन टोकाकारो की दृष्टि मे, गणपाठ की अपेक्षा धातुपाठ का महत्त्व लेखक का आत्मनिवेदन - अधिक रहा । परन्तु केवल व्याकरण दृष्टया गणपाठ की अपेक्षा धातुपाठ का अधिक महत्त्व स्वीकार करते हुए भी गणपाठ का महत्त्व किसी प्रकार भी कम नही आका जा सकता । पाणिनीय अष्टाध्यायी तथा संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से इसका जो महत्त्व है, वह तो है ही, परन्तु उसके अतिरिक्त प्राचीन भारत के ऐतिहासिक, सास्कृतिक, साहित्यिक एवं भौगोलिक अध्ययनो मे भी इससे विविध उपयोगी सहायता एवं समेत प्राप्त किये जा सकते है। प्राचीन भारती के गम्भीर अन्वेपक एवं सतत अध्यवसायी उपासक डा. वासुदेवशरण अग्रवाल को प्रतिष्ठित पुस्तक 'इण्डिया एज नोन टु पाणिनि' को इस तथ्य के स्पष्ट उद्योपक के रूप मे प्रस्तुत किया जा सकता है। साथ ही गोत्रनामो की मूल प्रकृतियो से अपत्यार्थ तद्धित प्रत्ययो का विधान करता हुआ पाणिनीय गणपाठ गोमनामो की एक विस्तृत सूची प्रस्तुत करता है जो बहुत कुछ श्रौतसूत्रो के प्रवराध्यायो की सूचियो से मिलती जुलती है । इसलिए सम्प्रति उपलब्ध गणपाठो मे सवमे प्राचीन पाणिनि के इस गणपाठ की ओर से आखे बन्द नही की जा सकती। इतना होने पर भी दुर्भाग्य की बात है कि इस गणपाठ के सथ की गई उपेक्षा के परिणाम स्वम्प आज वह विभिन्न पाठभेदो तथा भ्रष्टपाठो से परिपूर्ण एर ऐसा रद्दी का टोकरा बन गया है, जिसके बहुत से अश वैयाक- रणो की ममझ से भी परे की वस्तु बन गये है । पाणिनीय गणपाठ के दो तीन विभिन सस्करणों को आपस मे अथवा इनकी पारिणनि से इतर अा- चीन वैयाकरण सम्प्रदायो से सम्बद्ध गणपाठो की पारस्परिक तुलना करने पर पाठभेदो को जो भयंकर स्थिति सन्मुख उपस्थित होती है, उसे देखकर हृदय कन्चित हो उठता है । इममे अनावश्यक शब्दो का अमर्यादित सन्निवेश तया गणपूत्रो की भयंकर उलझने पाठभेदो तथा अपभ्रष्ट पाठो के साथ मिलार गणराठ के अनेर स्थलो वे स्वरूप के विषय मे सन्देह उत्पन करने लगते हैं। वैसे तो संस्कृत भाषा का कोई भी प्राचीन ग्रन्थ, विशेषत. इस प्रभार का, पाठभेदो के दोष से बचा नहीं है, परन्तु पाणिनीय गणपाठ इस दृष्टि से सबसे आगे है । इमतिये इमकी तयाविध महत्ता, एवं साथ ही इस प्रकार की दयनीय स्थिति को देखते हुए इमरे विशुद्ध सम्पादन एवं तत्सम्बद्ध विभिन्न ममस्याओं के विषय में विस्तृत अनुसन्धान की प्राथमिक आवश्य- पता स्वीगार यग्नी ही पडती है।

लेखक का आत्मनिवेदन ५ सन् १८४० मे ओटो बोलिक महोदय ने पाणिनि के सूनपाठ तथा धातुपाठ के साथ गणपाठ का भी एक अपेक्षाकृत अच्छा सस्करण निकाला था। इसके लिये वे निश्चय ही धन्यवाद के पात्र हैं, परन्तु इस संस्करण को ध्यान से देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि वह भट्ट यज्ञेश्वर को गणरत्नावली तथा पाणिनीय गणपाठ के दो एक हस्तलेखो के आवार पर ही आश्रित है। इसलिये इसे भी विशेष प्रामाणिकता नहीं दी सक्ती । इसके अतिरिक्त केवल मूल पाठ के प्रकाशित कर देने से ही आपेक्षिक कार्य की पूर्ति नहीं हो जाती। वस्तुत गणपाठ को अपने विशुद्ध रूप मे प्रस्तुत करने अथवा उसके स्वरूप को सर्वथा सुस्पष्ट करने के लिये तीन प्रकार के कार्य परम आवश्यक हैं । प्रथम-गणपाठ के प्रत्येक शब्द का निश्चितीकरण, पाठभेदो की बहुलता मे अक्षित शब्द का चयन और इस रूप मे पाणिनीय-गणपाठ का पुनर्गठन ( Reconstruction)। द्वितीय-गणपाठ के सभी शब्दो का अर्थ परिज्ञान ( Interpretation ) तया तीसरा- इसमे संगृहीत ऐतिहासिक, भौगो- लिक, साहित्यिक अथवा इसी प्रकार के अन्य वैयक्तिक नामो की ठीक ठीक पहचान ( Identification )। वैसे तो ये तीनो ही कार्य थोडा बहुत एक दूसर कार्य पर आश्रित है। फिर भी सशोपन वा पुनर्गठन रूपी प्रथम कार्य निश्चित ही प्राथमिक महत्त्व रखता है । इसके यथासाध्य पूर्ण हो जाने पर ही अन्य दोनो कार्य भले प्रकार किये जा सकते है। मैने अभी तक गणपाठ के केवल सामान्य सशोवन तक ही अपने अध्ययन को सीमित रखा है। इसके दो कारण है-एक तो इसकी प्राथमिक आवश्यकता, दूसरे अन्य दोनो कार्यों की बहुत अधिक समय सापेक्षता। सम्माननीय डा० रघुवीर, अध्यक्ष “सरस्वती विहार" देहली ने गणपाठ के कठिन शब्दो के अर्थ निश्चय का कार्य करने के लिये बडे सहानुभूतिपूर्ण शब्दो मे प्रेरणा की थी, जिससे प्रेरित होकर इस दिशा मे मैने कुछ प्रयास किया भी। परन्तु कुछ कार्य करने पर सबसे बड़ी कठिनाई जो मामने आई, वह थी कि गणपाठ के अज्ञातार्थक शब्दो मे ऐसे शब्दो की बहुत अधिक सख्या, जिनके विषय मे कही से कोई सहायता अथवा सकेत मिलने की आशा नहीं थी। इसलिये इस कार्य को कुछ काल के लिए स्थगित कर देना पडा, परन्तु इसे करने की इच्छा अवश्य है । ।

ur लेखक का आत्मनिवेदन जहां तक तीसरे कार्य का सम्बन्ध है, उस विषय मे मै प्राचीन भार- तीय इतिहास एव सस्कृति के क्षेत्र के किसी अन्धेपक साथी से आशा करूंगा कि वह इस कार्य को अपने हाथ मे ले । इस विषय मे कार्य करने की दिशा तथा पद्धति के पर्याप्त सकेत श्री डा. वासुदेवशरण अप्रवाल ने अपने पूर्वनिर्दिष्ट पुस्तक मे दिए हैं, उनके सहारे पर्याप्त आगे वढा जा सकता है। पाणिनीय गणपाठ के संशोवन एव सम्पादन का यह कार्य मैने Ph. D. की उपावि की दृष्टि से बनारम हिन्दू विश्वविद्यालय मे आरम्भ किया था। इस निबन्ध को मेने जिस रूप मे प्रस्तुत किया था, वह तीन भागो मे विभक्त था-भूमिकाभाग, ग्रन्यभाग, (पाणिनि का गणपाठ ) तथा आलो चना भाग अथवा आलोचनात्मक टिप्पणी। प्रथम भाग मे मैने यथासाध्य यह प्रयास किया है कि पाणिनीय गणपाठ सम्बन्धी विभिन विषयो एवं समस्याओ पर अपने विचार विस्तार से प्रस्तुत करू । जिन विषयो पर विचार प्रस्तुत किया जा सका है उनमे प्रमुख है- संस्कृत व्याकरण की सूत्रशैली मे गणपाठ की आवश्यकता, पाणिनि से पूर्व के गणपार, पाणिनि के गणपाठ का स्वरूप तथा उसकी विभिन्न समस्याएं, पाणिनि से अर्वाचीन वैयारणो के गणपाठो का पाणिनीय गणपाठ से मम्बन्ध, पाणिनीय गणपाठ का महत्त्व तथा उसके ससोवन का सम्भव प्रकार। द्वितीय भाग मूल ग्रन्यभाग है । इसमे पाणिनीय गणपाठ को यथा मम्भव शुद्ध रूप म प्रस्तुत किया गया है । इस भाग का प्रत्येक पृष्ठ सामान्य- तया तीन अंशो में विभक्त है। प्रथम-सब से ऊपर के अंश मे पाणिनीय सम्प्रदाय की दृष्टि से प्रत्यर गण यो प्रस्तुत किया गया है । इममे प्राय उन्ही शब्दो यो स्थान गया गया है जो पाणिनीय गणपाठ । विभिन्न स्रोतो मे उपलब्ध होते है अथवा रिमी अन्य प्रमाण । आधार पर पाणिनीय प्रमाणित हो जाते हैं। इगी भग म प्राय प्रत्येर गण के अन्त मे 'परिशिष्टम्' शीपर मे मन न गभी सदा मंग्रह वा प्रयाम पिया है, जो पागिनीय सम्प्रदाय के न पुष्ट योगो म अथवा बिल अपाणिनीय मम्प्रदाय ये गणपाट सम्बन्धी गांत मही सन्न होते हैं, जिन्द यहीं पाणिनीय गणपाट मे स्थान नहीं दिया। पानी पुट नोट में देखि गये हैं।

लेखक का आत्मनिवेदन ७ द्वितीय ( मध्य का ) अश'पाठभेदा.' का है । इस अंश मे पहले यह दिखाया गया है कि पाणिनि के, ऊपर के प्रथम अश मे निर्दिष्ट वे वे गण स्वयं पाणिनि सम्प्रदाय के विभिन्न प्रमुख स्रोतो मे तथा अपाणिनीय अथवा पाणिनि मे अर्वाचीन विविध व्याकरण-सम्प्रदायो मे वहाँ कहाँ मिलते हैं । इन सबके अध्याय आदि के अनुसार पते दिये गये हैं । तदनन्तर इन सभी स्रोतो मे मिलने वाले आवश्यर एवं उपादेय पाठभेदो का संग्रह किया गया है। तीसरे ( सबसे नीचे के ) अश मे 'विशिष्टं किंचित्' के शीर्पन से जिस किमी भी शब्द के विषय मे कोई महत्त्वपूर्ण विवाद, उद्धरण, विशेष प्रयोग अथवा अन्य किसी प्रकार की कोई उपादेय सामग्री मिल सकी उन सव का चयन इस दृष्टि से किया गया है कि उन सबके प्रकाश मे उन शब्दो की स्थिति के विषय मे कुछ प्रकाश प्राप्त किया जा सके । यहाँ मै इतना और निवेदन करदूं कि गणमूनो को तथा अन्य अनेक शब्दो के पाठ को विभिन प्रमाणो के आधार पर यद्यपि मै पाणिनीय नही मानता, फिर भी पाणिनीय गणपाठ के अन्य भाग मे उन्हे इसलिये स्थान देने के लिये वाध्य हूं कि मेरे पास कोई ऐसा अकाट्य प्रमाण नही है कि मैं इदमित्थतया सुनिश्चित रूप से पूरे विश्वास के साथ यह कह सक् कि ये गण सून अथवा ये शब्द क्थमपि पाणिनि-प्रोक्त अथवा तनिर्धारित नहीं है। वस्तुत ऐसे प्रमंगो मे इस प्रकार के सर्वथा निश्चायक प्रमाण प्राय उपलब्ध भी नहीं होते। वैसे पूरी सम्भावना इस बात की ही है कि ये पाणिनीय नही है। मै केवल इतना ही आवश्यक समझता हूं कि अपने विचार विद्वानो के समक्ष प्रस्तुत कर दूं। केवल अपने विचारो के अनुसार, भले ही वे सप्रमाण भी क्यो न हो, पाणिनीय गणपाठ मे परिवर्तन करने अथवा उसके किसी अश को घटाने बढाने को मैं उचित नही समझता । विशेषत उस अवस्था मे, जव कि ये गणसूत्र सभी पाणिनीय स्रोतो मे उपलब्ध होते चले आरहे है। तीसरे भाग-आलोचनात्मक टिप्पणी मे पाणिनीय गणपाठ के कुछ विशिष्ट शब्दो तथा गणो के स्वरूप के विपय मे प्रामाणिक आचार्यों तथा विद्वानो क उपलब्ध विचारो विवादो, उद्धरणो अथवा प्रयोगो के आधार मैं अपना यह लेखक का आत्मनिवेदन पर कुछ विचार प्रस्तुत किये गये है। इनमे उन उन स्थलो की वास्तविक स्थिति तथा स्वरूप आदि के परिज्ञान विषय मे अपना निर्णय दिया है। ऊपर के तीन भागो मे से केवल यह प्रथम-भूमिका-भाग 'संस्कृत व्याकरण मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि' इस नाम से प्रका- शित होकर आपके समक्ष है। शेष दो भाग अभी प्रकाशन की प्रतीक्षा मे हैं । परन्तु उनके प्रकाशन मे भी बहुत देर नहीं लगेगी, ऐसी आशा है । पुस्तक के विषय मे इतना निवेदन करने के पश्चात् पुनीत कर्तव्य समझता हूँ कि उन पूज्य हितैषियो तथा आत्मीय गुरुचरणो के प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा निवेदन करूं, जिनकी कृपा, अनुकम्पा और आगी के बल से ही मैं इस योग्य हुआ कि इस विषय पर कुछ लिख सक् । इस प्रसग मे सर्वप्रथम में अपने ज्येष्ठ भ्राता सन्तहृदय श्री सन्तबली जी आर्य के पावन चरणो मे अपनी श्रद्धा अर्पित करना चाहता हूं जिनकी सन्निष्ठाओ, सत्प्रेरणाओ, शुभकामनाओ, तथा आशीर्वाद ततियो ने मुझे संस्कृताध्ययन मे लगाया तथा इस योग्य बनाया। परम श्रद्धेय गुरुवर श्री प० ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु, अध्यक्ष पाणिनि महा- विद्यालय, मोतीझील, वाराणसी, के पुनीत चरणो मे हृदय की पूरी विनम्रता के साथ मै श्रद्धानत हूं, जिन्होंने अपने पहले के आश्रम-विरजानन्द सागवेद विद्यालय, गाहदग, लाहौर-मे वर्षों रखकर सस्कृत व्याकरण के मौलिक ग्रन्यो के अध्ययन के लिये मुझे बौद्धिक आंखे दी तथा मेरी हर प्रकार से परम सम्मान्य गुरुचरण डा. सूर्यकान्तजी शास्त्री, एम० ए०, डी० फिन् (आक्सन), डी. लिट् (पजाव ) मयूरभंज प्रोफेसर, अध्यक्ष-संस्कृत प्राकृत, पाली विभाग तथा प्रिमिपल कालेज आफ इण्डालाजी के अनेकानेक उपकारो को मैं विनीत श्रद्धा के साथ स्मरण करता हूँ तथा उनके प्रति मै सर्वात्मता नत हूं, जिन्होंने आलोचना के आज के नवीन दृष्टिकोण से मुझे परिचित कराया। संस्कृत वाङ्मय के प्रतिम्ति उपासक तथा अपने श्रद्धेय गुरु श्री प. बलदेव उपाध्याय का मै परम कृतज्ञ हूं, जिनके सफल निर्देशन मे यह निरन्च पी एच० डी० की थीसिस के रूप मे सम्पनता की स्थिति को प्राप्त सहायता की। - पर सपा।

लेखक का आत्मनिवेदन ६ समादरणीय श्रीमान डा० राजवली पाण्डे एम ए. डी लिट् भूत- पूर्व अध्यक्ष प्राचीन भारतीय इतिहाम एवं संस्कृति तथा प्रिंसिपल कालेज आफ इण्डालाजी के प्रति मै विशेष आभारी हूं, जिन्होंने इस विषय के अध्य यन में पुस्तको को यथेच्छ सहायता तथा अन्य सुविधाये प्रदान पर मुझे मदा अनुगृहीत रिया। परन्तु जहा तक इस पुस्तक का सम्बन्ध है, मै सर्वागि ऋणी तथा आभारी हू अपने पूज्य गुरुचरण तथा प्राचीन भारती के गम्भीर एव यशस्वी उपामक श्री पं० युधिरिजी मीमासक, अध्यक्ष-अनुसन्धान विभाग महर्षि दयानन्द स्मारक, टडारा ( सौराष्ट्र ) मस्थापक भारतीय प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान अजमेर, या, जिन्होंने, सर्वप्रथम अनुसन्धान के निय पाणि नीय गणपाठ की ओर न केवल मेरा ध्यान आकृष्ट क्यिा अपितु निरन्तर मुझे इस कार्य को पूर्ण करने के लिये प्रेरित करते रहे समय समय पर उपयोगी निर्देशन तथा पयप्रदर्शन द्वारा मेरी कठिनाइयो को दूर करते रहे, तथा अन्त मे थीसिस के पूर्ण हो जाने पर उसके समादन तथा प्रका दान का पूरा भारे अपने उपर लिया और असाधारणतया अस्वस्थ होने हुए भी अपने विशेप अध्यवसाय एवं परिथम स इस पुस्तक व प्रकाशन को पूरा फिया, जिसका परिणाम पाठको के समत है। पूज्य पण्डितजी ने पुस्तक का सम्पादन करते हुए कुछ स्थलो पर मरे विचारो से असहमति दिखाई है । अनुसन्धान मार्ग मे विपत इस तरह के विषयो मे असहमति का होना अस्वाभाविक न होकर सर्वथा स्वाभाविक ही है । परन्तु म पण्डितजी का विशेष कृतज्ञ है जिन्होंने इन असहमतियो के होते हुए भी उदारता पूर्वक अपने प्रतिष्ठान' से न केवन इस पुस्तक को प्रकाशिन ही किया, अपितु इमको सर्वथा अपनी पुस्तक सम यते हुए इसकी स्वरूप निपति म अपनी सम्पादन कुशलता का भी प्रा योग दिया। सम्म ननीय पण्डितजी के विषय मे में इतना और निवेदन करना चाहता हूँ कि अपनी प्रतिभा एव शास्त्रव्युत्पत्ति की पूजी के साथ विभिन्न सासारिक मघर्षों तथा अपनी शारीरिक अस्वस्थताओ मे सतत जूयते हए प्राचीन मस्कृत भारती की अनेक जटिल गुत्थिया के उद्धरण, अन्वेषण । २ लेखक का आत्मनिवेदन एवं अनुसन्धान मे मीमासक्जी जितना, जो कुछ कर रहे है तथा जिस तन्मयता स्क्ष्मदर्शिता और निष्ठा के साथ निरन्तर कार्यरत है, उसका पूरा पूरा सत्परिणाम, केवन सुविधाओ एव साधनो के अभाव के कारण, भले ही विद्वानो के समक्ष न आसके, परन्तु उनके आत्मीयजन उन सबसे भली भाति परिचित है । विश्वविद्यालयो के इस क्षेत्र मे अन्वेषण-कार्य जिस शिथिलता के साथ गति कर रहा है उसे गतिमान ओजस्वी एवं प्रौढ बनाने के लिय पण्डितजी जैसे शास्त्रज्ञो तथा प्राचीन-पाण्डित्य-परम्परा के कुछ बचे हए प्रतिनिधियो का सहयोग परम उपादेय एवं हितावह हो सकता है, जिससे आज का विश्वविद्यालयीय वातावरण केवल इमलिये सर्वथा अद्धता * रि इनके पास विश्वविद्यालयो के कागजी प्रमाणपत्र नही है । निश्चित ही इस स्थिति को आज के अनुन्धान मार्ग का दुर्भाग्य कहा जा सकता है । कृतज्ञता के इस प्रसग मे अपने परम स्नेही मित्र श्री जगदीश- नागयण तिवारी एम ए प्राध्यापक प्राचीन भारतीय इतिहास एव संस्कृति विभाग, बनारम हिन्दू विश्वविद्यालय बनारम को भी विशेष रूप से याद करता हूँ जि-होने थीसिस आदि लिखते समय मुझे तदविषयक अनेर उपयोगी मम्मतिया दी तथा विविध रूपो मे मेरी सहायता की। कुरक्षेत्र २६ सितम्बर १२६१ विद्वानो का परम विनीत कपिलदेव कतिपय सांकेतिक-शब्द अ० प्रा० या अथर्व प्राति० अम० मृप्रा० का० अथर्व प्रातिशाख्य अमरकोप प्रातिशाख्य काशिका कात० का०छ० प्र० चन्द्र० चा० वृक्ष चा० सू० जै० ते० ० प्रा० धा० वृ० प० म० परि० कातन्त्र व्याकरण कातन्त्र छन्द प्रक्रिया चन्द्रगोमी चान्द्र वृत्ति चान्द्र-च्यावरण सूत्र जैनेन्द्र-व्याकरण तैत्तिरीय प्रातिशाख्य धातुवृत्ति पदमञ्जरी परिभाषेन्दुखिर पाणिनीय-अष्टाध्यायी प्राकृतसूत्र भोज-सरस्वतीकण्ठाभरण महाभाष्य महाभाष्य नवाहिक मुग्धवोव-व्याकरण मोगलान-गणपाठ पा० प्रा० सू० भो० महा० महा० नवा० मु० चो० मो० ग० लघु० वा० प्रा० व्या० सि० सु० नि. लघुशब्दन्दुशेखर श० को वाजसनेय प्रातिशाख्य व्याकरण सिद्धान्त मुधा निधि ब्दकौस्तुभ शाक्टायन व्याकरण-अमोधावृत्ति शा० अ०

१२
कतिपय सारेतिक शब्द
शाकटायन
सं० व्या० शास्त्र का इतिहास
सारस्वत
सि०च०
शाकटायन व्याकरण
सस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास
सारस्वत व्याकरण
सिद्धान्त चन्द्रिका
स्वरसिद्धान्तचन्द्रिका
हैम-व्याकरण
हैम-व्याकरण बृहद्वृत्ति
स्व. सि. च.
है या हेम
है. वृ°

विषय-सूची पृष्ठ १-३ ४-६ ७-१० १०-११ ११-१२ १२-१४ १६-१७ अध्याय विषय १. संस्कृत-व्याकरण शास्त्र तथा गणशैली सस्कृत-व्याकरण-शास्त्र का प्रयोजन संस्कृत-व्याकरण मे सूत्र-शैली सूत्रशैली का स्वरूप सूत्रशैली की परम्परा सूत्रशैली मे गणपाठ और धातुपाठ का स्थान गणपाठ का अभिप्राय गणशैली का आरम्भ २. पाणिनि से प्राचीन वैयाकरण और उनके गणपाठ ऐन्द्र व्याकरण तथा गणशैली वैदिक प्रतिशाख्यों की पाणिनि से प्राचीनता ऋक्-वाजसनेय-तैत्तिरीय-प्रातिशाख्यो मे गणशैली ऋक्तन्त्र तथा गणशेली अथर्व प्रातिशाख्य तथा गणशैली भारद्वाज शिक्षा तथा गणशैली भागुरि तथा गणशैली काशकृत्स्न तथा गणशैली आपिशलि तथा उनका गणपाठ उणादिसूत्र तथा गणशैली फिट्सूत्र तथा गणशैली अष्टाध्यायी से प्राप्त सकेत पाणिनीय गणपाठ से प्राप्त संकेत कात्यायन तथा पतञ्जलि के सकेत चारवर्मण का सर्वादिगण वर्धमान के सकेत १७-१६ १६-२१ २१-२३ २३ २३-२४ २५ २५-२६ २७-२८ २८-२९ २६-३० ३६-३७ ३७-३८ ३८-३६ विषय-सूची पृष्ठ ४०-१०५ ४०-४१ ४१-४२ ४२-४६ ४६-४७ ४७-४८ ४८-४६ ४६-५२ ५२-५३ अध्याय विषय ३. प्राचार्य पाणिनि और उनका गणपाठ पाणिनि का समय पाणिनि की सूत्रशैली सूत्र-रचना के पूर्व ही गणपाठ का निर्धारण सूत्रो का साक्ष्य वातिको का साक्ष्य महाभाष्य का साक्ष्य न्यासकार के आक्षेप न्यासकार के आक्षेपो का समाधान न्यासकार का वदतोव्याद्यात आई० एस० पावते की हेय कल्पना गणनिर्धारण मे प्राचीन गणकारो की अनुकृति गणो के दो प्रकार आकृतिगण आकृतिगणो मे व्याख्याकारो द्वारा प्रक्षेप हमारा मन्तव्य आकृतिगण तथा उत्तरवर्ती वैयाकरण आकृतिगणता के द्योतक शब्द आकृतिगण-शैली की प्रथम आविष्कृति पाणिनीय-तन्त्र मे आकृतिगणता का उपयोग आकृतिगणात्मक शैली पर आक्षेप पठितगण समाप्तिबोधार्थ वृत्करण गणपाठ का द्विविध पाठ कतिपय गणो मे निष्पन्न शब्दो का पाठ निपातन शेली पर आक्षेप और उसका समाधान गणो मे शब्दो का निविभक्तिक पाठ कचित्-सविभक्तिक पाठ कचिद् वाक्य-प्रयोग गण मे शब्द विशेष के प्रथम पाठ का कारण ५४-५६ ५६-५७ ५७-५८ ५८-६० ६० ६० ६१-६२ ६२ ६२-६३ ६३-६४ ६४-६६ ६६-६६ ६६ ६६-७० ७० ७१-७४ विषय-सूची अध्यया विपय पृष्ठ गणपाठ मे अवान्तर गण ७८-७७ गणपाठ में शब्दो का क्रम ७७-८१ पाणिनीय गणपाठ मे अपाणिनीयगण ८१-८३ पाणिनीय गणपाठ में औणादिकगण गनिवारण मे शब्दो का इयत्ता गणपाठ मे उपलभ्यमान गणसूत्रो की समस्या गणनो व अपाणिनीयत्व मे हतु ५५-६० गणसूना के विषय मे हमारा मत ६०-६१ कात्यायन तथा पतञ्जलि की दृष्टि मे पाणिनीय गणपाठ ६२-६८ जयादित्य वामन और पाणिनीय गणपाठ ६६-१०१ पाणिनीय गणपाठ ने व्याख्याकार १०१-१०३ श्लोकगणकार १०३ नामपारायण १०३-१०४ गणरत्नावली १०५ ४ पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उनके गणपाठ १०६-१४६ चन्द्रगोमी तथा उसका गणपाठ १०७-११३ जैनेन्द्र-व्याकरण तथा उसका गणपाठ ११३-११४ जैन शाक्टायन व्याकरण तथा उसका गणपाठ ११४-१२३ हेमचन्द्र तथा उमका गणपाठ १२३-१२६ श्रीभोज तथा उसका गणपाठ १२६-१२८ वैयाकरण वामन तथा उसका गणपाठ १२८-१२९ भद्रेश्वर तथा उसका गणपाठ १२९-१३० अरुणदत्त का गणपाठ १३० वर्धमान तथा उपकी गणरत्नमहोदधि १३०-१३६ कातन्त्र-व्याकरण में प्राप्त गण १३६-१३८ सारस्वत-व्याकरण मे प्राप्त गण १३८-१४१ मुग्यबोध व्याकरण मे प्राप्त गण १४१-१४२ जोमर सम्प्रदाय मे गणपाठ विपय-सूची . अध्याय विषय पृष्ठ सौपद्म सम्प्रदाय में गणपाठ १४३ प्राकृत तथा पालि व्याकरणों में गणपाठ १४३ प्राकृत सूत्रों मे गणपाठ १४३-१४४ मोगलान के पालि-व्याकरण मे गणपाठ १४४-१४६ ५. पाणिनीय गणपाठ का महत्त्व १८६-२५२ व्याकरण विषयक महत्त्व १४८-१४६ प्राचीन वैयाकरणों के नाम १४९ तत्कालीन वैदिक तथा लौकिक साहित्य का परिचय १४६-१५० गोत्रनाम १५०-१५१ ऐतिहासिक तथा भौगोलिक नाम १५१-१५२ ६. पाणिनीय गणपाठ के संशोधन की समस्या तथा उसका समाधान १५३-१६८ प्रक्षेपों तथा पाठभेदों का प्राचुर्य १५४-१५७ गणपाठ की दुरवस्था का कारण १५७-१५८ गणपाठ के संशोवन मे पाणिनि कात्यायन तथा पतञ्जलि १५८-१६० गणपाठ के संशोधन मे काशिका का स्थान १६०-१६१ प्रक्रिया-कौमुदी में प्राप्त गणपाठ का उपयोग १६१-१६२ गणरत्नावली का उपयोग १६२ गणपाठ के विविध हस्तलेख १६३-१६४ अपाणिनीय सम्प्रदाय के विभिन्न गणपाठों का उपयोग ओटो बोलिक सम्पादित गणपाठ गणपाठ के संशोधन का सम्भव प्रकार १६५-१६८ उद्धृत प्राक्पाणिनीय गण १६६-१७१ उद्धत पाणिनीय गण १७२-१७८ उद्धृत कात्यायनीय गण १७६-१८० उद्धत प्रत्यक् पाणिनीय गण 151-१८३ पाणिनीय गण जिनका नाम शूर्वाचीन वैयाकरणों ने बदल दिया १४-१८८ प्रमुख सहायक तथा उद्धृत पुस्तकें, पत्रिकाएं तथा हस्तलेख १६-१६२ संशोधन पत्र की सहायता ओम् संस्कृत व्याकरण में गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि प्रथम अध्याय संस्कृत व्याकरण-शास्त्र तथा गणशैली संस्कृत व्याकरण-शास्त्र का प्रयोजन कोई भी भापा जब अपनी लोक प्रियता एव मुसम्पतता को प्राप्त हो जाती है तब उस भाषा के मर्मज्ञ विद्वान उस भाषा की सुव्यवस्था, तद्गत- शब्दावली को अपम्रश मे बचाने, एव उत्तरकाल मे उम भापा के यथार्थ- स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिए उम भापा के व्याकरण की रचना करते है। सस्कृत वैयाकरणो की शब्दावली मे इस प्रयोजन को सक्षेप मे शब्दानुशासन कहा जाता है । कैयट सदृश उद्भट विद्वानो ने इसे व्याकरण का साक्षात् प्रयोजन कहा है।' कात्यायन और पतञ्जलि द्वारा उपस्थापित व्यापरणाध्ययन के १८ प्रयोजन इसी साक्षात् प्रयोजन (=शब्दानुशासन ) के व्याख्यान मान ह । व्युत्पत्ति की दृष्टि से व्याकरण तथा शब्दानुशासन दोनो ही शब्द पर्याय माने जा सकते है। इसीलिए सस्कृत व्याकरण-शास्त्र मे शब्दो के साधुत्व प्रतिपादन के लिए प्रकृति प्रत्यय विभाग की कल्पना की गई। इसी दृष्टि १. भाष्यकारो विवरणकारवाद् व्याकरणशास्त्रस्य साक्षात् प्रयोजनमाह- अथ शब्दानुशासनमिति । महा० नधा० पृष्ठ ६। [यनक प्राचीन ग्रन्थकारों के मत में 'श्रय शब्दानुशासनम्' पाणिनि का श्राद्य स्त्र है । द्र० स० व्या० शास्त्र का इतिहास, भाग १, पृष्ठ १४३ १४५ (प्र० स०)] २.द्र० महा० नवा० पृष्ठ १८-४६ । ३. अनुशिष्यन्ते शन्दा श्रनेनेति शन्दानुशासनम् । व्याक्रियन्ते शन्दा अनेनेति व्याकरणम् ।

२ स० व्या० म गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि से वेदविदामलकारभुत प्रमाणितशब्दशास्त्र' आचार्य भर्तृहरि ने व्याकरण शान्त्र को सकृत भाषा क स्वरपज्ञान के लिए उपाय अथवा सावन मान के रूप मे सार्थक माना है। इस प्रकार स्वसवद्ध भाषा के स्वरूपज्ञापन को ही व्याकरणो का आदिम तथा अन्तिम प्रयोजन स्वीकार कर लेने पर यह आवश्यक हो जाता है कि जिस भाषा का व्याकरण वने उममे उस भापा क सम्पूर्ण क्षेत्र को सर्वतो भावन व्याप्त करने की प्री क्षमता विद्यमान हो । दूसरे शब्दो मे व्याकरण द्वारा निपारित नियमो से तत्सबद्ध भाषा के सभी शब्दो की ठीक ठीक व्याख्या एवं साधुना का ज्ञान हो सके तभी उम व्याकरण को चरितार्थता स्वीकार की जासकती है अन्यथा नहीं । ससार की अन्य भापाओ के व्याकरण मे व्याकरणशास्त्र क इस मौलिक उदेश्य की पूर्ति का कहा कि ध्यान रखा गया है यह तो उन उन भाषाओ के व्याकरण शास्त्री ही जाने पर जहा तक सस्कृत व्याकरण-शास्त्र का सवन्ध है यह अत्यन्त गौरव के साथ कहा जा सकता है कि वह इस उद्देश्य की पूर्ति में पर्याप्त सफर है । प्रो० मैक्समूलर ने उपर्युक्त तथ्य को निम्न शब्दो मे स्वीकार किया हे. सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में केवल भारत और ग्रीक दो ही ऐसे राष्ट्र हैं, जिन्होंने बिना किसी की सहायता तथा सम्मति के स्वतन्त्ररूप में क्रमश दो विज्ञानों व्याकरण तथा तर्क का अद्भुत श्राविकार किया। प्रो० मैक्डानन न अधिक सष्टता एव विस्तार के साथ सस्कृत व्याकरण शास्त्र की विशेषता को जिन शब्दा मे अभिव्यक्त किया है उनका आशय इस प्रकार हैं। १. भतृहरि के लिए य विशषण गणरजमहोदधिकार न प्रयुक्त किए हैं। द्र०पृष्ठ १२३॥ २ उपाय शिक्षमाणाना बालाना ध्युपादनम् । श्रसत्य वमनि स्थि वा तत सत्य समीहते ॥ वाक्यपदीय २।२४०॥ ३ मरतीय इतिहास के अनुसार ग्रीक म तर्क शास्त्र के प्रादुर्भाव से सहस्रों या पृष भारत में तर्कशास्त्र पणरूपण प्रतिष्ठित हो चुका था । सम्पा० । ४. हिस्ट्री श्रॉफ एशिए सस्कृत लिटरेचर, पृट ८१ ।

m सस्कृत व्याकरण-गान्त्र तथा गणशैली शब्दरूपों के विश्लेषण में, धातु और प्रत्यय के बीच के भेद को पहचानने में, प्रत्ययों के विभिन्न कार्यों के विनिश्चय में, एक वाक्य में, अन्य देशों के लिये अनुपम तथा अद्वितीय हो, ऐसे व्याकरण के विकास में सस्कृत वैयाकरण सर्वप्रथम थे।' संस्कृत व्याकरण में सूत्र-शैली उपर्युक्त प्रयोजन को आदर्श मानने वाले व्याकरण मनीपियो के मस्तिष्क मे सस्कृत भापा के व्याकरण-गान की रचना करने से पूर्व इस प्रश्न का उठना स्वाभाविक ही था कि सतत-परिवर्तमान स्वरूप वाले विशाल सस्कृत वाङ्मय को, जिसकी सीमा का निर्देश पतजलि ने सप्तद्वीपा वसुमती त्रयो लोकाश्चत्वारो वेदाः सागा. सरहस्या' इत्यादि शब्दो द्वारा किया है, व्याकरण के नियमो मे कैसे वाधा जाए। प्रतिपदपाठ-आरम्भ मे कतिपय विद्वानो के ध्यान मे शब्दो के गौ, अभ्यः, पुस्प , हस्ती इस रूप मे प्रतिपदााठरूपी उपाय की क्ल्पना आयी थी। इसके आधार पर शन्दपारायण' नाम के कतिपय व्याकरणो की रचना भी हुई थी। इसका सकेत पतजलि के एव हि श्रूयते-बृहस्पतिरि- न्द्राय दिव्य वर्षसहस्र प्रतिपदोस्तानां शब्दानां शन्दपारायण प्रोगाच, नान्त जगाम क्थन के मूल मे सनिहित है । इस स्थिति की सामान्य सत्ता वैदिक व्याकरणो अर्थात् प्रातिशारयो मे आज भी किसी न किसी रूप मे विद्यमान है । परन्तु शब्दो के प्रतिपदपाठ की कभी भी ममाप्त न हो मक्ने वाली एक ऐसी प्ररिया थी, जिसे शब्दानुगामन का उचित प्रकार किमी भी रूप मे स्वीगर नही किया जा सकता था। इस बात की सष्ट घोपणा पनजलि ने इन गब्दो मे की है-- अनभ्युपाय एप शब्दाना प्रतिपत्ती प्रतिपटपाठ. वृहस्पतिश्च प्रवक्ता इन्द्रश्चाध्येता दिव्य वर्पसहस्रमध्ययनकालो न चान्त जगाम ।" १. इण्डियाज पास्ट, पृष्ठ १३६ । २. महा० नपा० पृष्ठ ६४। ३. शन्दपारायण मंदिशब्दोऽय कम्यचिद् ग्रन्थम्य । महा० भर्तृहरिरीका, पृष्ठ २१ । तु० नामधातुपारायणादिषु । काशिका, श्राद्य श्लोक । ४.महा० नया०पृ३५०। ५ महा० नवा. पृष्ठ ५.।

स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि अर्थात्-यह प्रतिपद-पाठ शब्दो के परिज्ञान मे उपाय (साधन) नही हो सकता। बृहसति सदृश प्रवक्ता, इन्द्र जैसा अध्येता और दिव्य वर्षमहत्र अध्ययन का काल, फिर भी शब्दो का अन्त नहीं पाया । सामान्य विशेष लक्षण-सस्कृत व्याकरण के स्वरूप के निखार के साथ-साथ शाब्दिक महर्षियो की अद्भुत मनीषा ने उपर्युक्त समस्या का उचित समाधान सामान्यविशेषरल्लक्षण प्रवर्त्यम्' के रूप मे प्राप्त कर लिया। इसका अभिप्राय कुछ सामान्य तथा विशिष्ट नियमो का निर्धारण अथवा वैयाकरणो की पारिभाषिक शब्दावली मे उत्सर्ग और अपवाद रूप नियमो का अवतारण हे। लक्षणों की लघुता-ये मामान्य तथा विशेष नियम ही सूत्रकारो की तेजस्विनी प्रतिभा का मस्पर्श पाकर लघु, लघुत्तर और लघुतन होते हुए सूत्र का रूप धारण करके लघूनि मूचितार्थानि खल्पाक्षरपदानि च । सर्पत सारभूतानि सूत्राण्याहुर्मनीषिण । अथवा- अल्पाक्षरमसन्दिग्ध सारवद् विश्वतोमुखम् । श्वस्तोभमनपद्य च सूत्र सूत्रविदो विदु, ॥' जैमी उक्तियो को चरितार्थ करने लगे । इन्ही सूनो के उदाहरण, प्रत्युदाहरण वाक्याध्याहार आदि से युक्त व्याख्यानो द्वारा विशाल सस्कृत वाटमय के सम्पूर्ण प्रागण को प्रकाशित करने की अनुपम क्षमता सस्कृत व्याकरण-शास्त्र को प्राप्त होमकी । सूत्रशैली का स्वरूप सून शब्द का मौलिक अर्थ है सूत ( धागा ) । परन्तु उत्तर काल मे शब्द का प्रयोग उम विशिष्ट प्रकार के साहित्य के लिए भी किया जाने लगा, जिम मे छोटे छोटे अर्थपूर्ण वाक्यो द्वारा विस्तृत अर्थों को उपस्थापित १.महा० नवा० पृ ५२ । २. द्र० महा० नवा० पृष्ठ ५२ । ३ वायुपुराण ५१४१४२॥ ४ उदाहरण प्रत्युदाहरण वाक्याध्याहार इत्येतत् समुदित व्याख्यान भवति । महानगा.पृष्ठ ६३ । इस सस्कृत व्याकरण-शास्त्र तथा गणशैली ५ - वकर करने का प्रयत्न किया गया । इस प्रकार के साहित्य मे जिस तरह के छोटे छोटे वाक्यो अथवा सूत्रो का प्रयोग हो रहा था, उन्हे यथेष्ट लघुता तथा व्यापकता प्रदान करने के लिए आचार्यों ने सूत्रो को सक्षा, परिभाषा, विधि, नियम, अतिठेश, तथा अधिकार इन छः प्रकारो मे विभक्त किया,' तथा प्रत्याहारो और अनुबन्धो का आविष्कार किया । लाघव की दृष्टि से सूनो मे सामान्यतया इतनी छोटी छोटी सज्ञाओ को स्थान दिया, जिनसे छोटी कोई सज्ञा ढूढने पर भी न मिले। ये छोटे छोटे सज्ञासून तथा परिभापासूत्र यथोद्देश सज्ञापरिभाषम् तथा कार्यकाल समापरिभाषम् जैसी मान्यताओं के आधार पर व्याकरण-शास्त्र के किसी एक कोने मे स्थित होकर अथवा कार्य की आवश्यकतानुसार यथास्थान उपस्थित होकर पूरे शास्त्र को प्रकाशित करते है । इसी प्रकार अधिकार सूत्रो की व्यापकता को ध्यान मे उनको भी तीन विभागो मे विभक्त क्यिा।' इन मे प्रथम प्रकार के अधि कार सूत्र वे है जो एक स्थान पर स्थिर होकर भी सम्पूर्ण शास्त्र को उभा- मित करते है, नैसे गृह के प्रकोष्ठ (कमरे) के एक कोने मे स्थित दीपक पूरे प्रकोष्ठ को प्रकाशित करता है। दूसरे प्रकार के अधिकार सूत्र वे है जिन्हे चकार के द्वारा रस्सी या लोहे (के तार) से वाध कर खीची गई लकडी के समान खीच कर अभिलषित सूनो मे उपस्थापित किया जाता है ।" तोमर प्रकार के अधिकार सून वे है जो प्रतिसून मे उनका निर्देश न करना पडे इमलिए स्वय प्रत्येक सून मे उपस्थित हो जाते है। इसी प्रकार अत्यन्त १.द्र० सशाच परिभाषा च विधिनियम एव च । अतिशोऽधिकारश्च पविध स्त्रलक्षणम् ॥ २. द्र० सशाच नाम यता न लघीय । महा नवा० पृष्ठ ३००, ३४०। ३. परि० संख्या २, पृष्ठ ३० । ४. परि० सख्या ३, पृष्ठ ३० । ५. अधिकारो नाम निप्रकार । महा० नवा० पृष्ठ ३७३ । ६. कश्चिोकदेशस्थ सर्व शास्त्रमभिचलयति यथा प्रदीप सुप्रज्वलित सर्व वेश्माभित्रलपति । महा नवा. पृष्ठ ३७३ । ७. अपरोऽधिकारो यथा रज्ज्याऽयसा वा बद्ध काठमनुष्यत तदनुष्यत चकारेण । महा. नवा० पृष्ठ ३७३ । ८. अपरोऽधिकार प्रतियोग तस्यानिर्देशार्थ इति योगे योग उपतिष्ठन 1 महा० नया० पृष्ठ ३७३।

६ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि अप्राप्ति की अवस्था मे विधान करना,' विधि के सर्वथा प्राप्त होने पर विशेष स्थिति मे नियमन करना, तथा अन्य धर्म का अन्यन आरोपण करना क्रमश विवि, नियम तथा अतिदेश सूनो का कार्य माना गया है । सूनो के इन विभिन्न प्रकारो मे सूत्र शैली को न्यूनाविक रूप मे लघुता और व्यापकता प्रदान करने का सामर्थ्य विद्यमान है। इसी परम आश्चर्यजनक लाघव के कारण व्याकरणमित्यस्य कः पदार्थः। सूत्रम्, यो ह्यत्सूत्र कथयेन्नादो गृह्येत' जैसी बलवती ध्वनिया सस्कृत व्याकरण शास्त्र मे श्रवणगोचर होने लगी और पतञ्जलि मुनि के प्रामाणिक शब्दो मे व्याकरण शास्त्र की आत्मा ने यह गम्भीर घोषणा की-- लवर्थ चाध्येय व्याकरणम् । ....."न चान्तरेण व्याकरण लघुः नोपायेन शन्दा शक्या विज्ञातुम् । वसुत सूत्र-शैली के मूल मे सन्निहित, आचार्यों की सामान्यविशेष- वल्लक्षण प्रवर्त्यम्" धारणा को चरितार्थता भी तो इसी बात मे थी कि येन अल्पेन यत्नेन महतोमहत. शब्दोवान् प्रतिपद्येरन् अत्यल्प प्रयास मे बड़े से बडे शब्दसागर को हृदयङ्गम किया जा सके । यह सत्य है कि यदि सस्कृत व्याकरण-शाम्न ने सामान्य विशेष नियमो वाले लघुतम, परन्तु अत्यन्त व्यापक प्रभाव वाले सूनो के इस झीने परदे को न अपनाया होता तो अति- विशाल सस्कृत वाड्मय के अनन्त शब्दो को अपने नियमो द्वारा व्याप्त कर लेना किसी भी वैयाकरण के लिए कभी भी सम्भव नहीं था। आचार्य शबरस्वामी ने अपने मीमासाभाप्य मे विसी प्राचीन आचार्य का एक श्लोर उद्धृत करक इस तथ्य को सष्टत स्वीकार एव परिपुष्ट किया है। १२. विधिरत्यन्तमप्राप्त नियम पादिरे सति । तन्त्रवार्तिक २२॥३४॥ ३. अतिदेशो नाम इतरधर्मस्य इतरस्मिन् प्रयोगायादेश । श्राटे कोश । ४.महा० नया०६६ । ५ महा० नेवा० पृष्ठ ७२ । ६ महा० नया० पृष्ठ २४ । ७.महा० नवा०पृध५२। ८ महा० नवा० पृष्ठ ५२। ६. ऋषयोऽपि पदार्याना नान्त यान्ति पृथक्वश । लक्षणन तु सिद्धानाम् अन्त यान्ति विपश्चित ॥२॥१॥३२॥ यही श्लोक निरुक्त-वृत्तिकार दुर्ग ने पृष्ठ १२ (श्रानन्दाश्रम) पर उद्धत किया है । वहा प्रथम चरण का पाठ 'ऋषयोऽप्युप- देशस्य है।

७ सस्कृत व्याकरण-शास्त्र तथा गणशैली सूत्र-शैली की परम्परा अति प्राचीन काल मे जब अध्ययन-अध्यापन दोनो ही मौखिक हुआ करते थे उस समय प्रत्येक पाठ्य ग्रन्थ का पूर्णतया कण्ठाग्र होना अध्यापक और अध्येता दोनो के लिए सर्वथा आवश्यक था । इमलिए स्मरण करने की प्रक्रिया को सरल और अल्प परिश्रम साध्य बनाने के लिए ही सम्भवत सूत्र- शैली का आविष्कार हुआ । अनेक विद्वानो का विचार है कि ब्राह्मण ग्रन्थो मे सूत्र शैलौ की प्राम्भिक रूपरेखा उपलब्ध की जा सकती है। साथ ही कर्मकाण्ड की विस्तृत, जटिल एव न ना भेद प्रभेदो वाली प्रक्रिया को अच्छे प्रकार स्मरण करके उमर ठीक ठीक परिपालन की अनिवार्यता (अन्यथा प्रत्यवायभार होने का डर था) को देखते हुए क्ल्पग्रन्थो मे प्राचीनतम सूनो की उपलब्धि स्वाभाविक ही है। उत्तर काल मे इसी शैली मे शिक्षा, व्याकरण छन्द ज्योतिप दर्शन, आयुर्वेद आदि विभिन विपयो के शतश ग्रन्थो की रचना हुई । यह दूसरी बात है कि आज व सारे ग्रन्थ अपने वास्तविक रूप मे हमारे समक्ष विद्यमान नहीं है । हा, जहा तक सस्कृत व्याकरण-शास्त्र के साथ सूत्र-शैली का सबन्ध है यह कहा जा सकता है कि अन्य सभी क्षेत्रो की अपक्षा इस क्षेत्र मे सूत्रशैली का स्वरूप उत्तरोत्तर अधिकाधिक मजता गया । यही कारण है कि सस्कृत व्याकरण के क्षेत्र में ही सून-शैली पूर्णत प्रतिष्टित हो सकी। यह दूसरी बात है कि अति प्राचीन इन्द्र चारायण प्रभृति वैयाकरणो के भी कुछ सून अन्वेपको ने ढूढ लिए है, परन्तु अधिक सभावना इसी बात की है कि वैयाकरण काशकत्स्न से पूर्व सूनो की रचना प्राय छन्दोबद्ध होती रही। इस प्राचीन मस्कार का प्रभाव पाणिनि के भी कुछ सूनो पर देखा जा सकता है। इन छन्दोबद्ध सूत्रो मे जैसा कि स्वाभाविक ही था लाघव को वह प्रधानता नहीं दी जा सकती थी जो वाद की सूत्र-शैली का एक महत्त्वपूर्ण वैशिष्टय बन गया। २. हिस्सी ग्रॉफ एशियण्ट संस्कृत लिरेचर, पृष्ठ १०६ । २. द्र. सस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास, माग? पृष्ट६२-७८ (प्र० स०)। ३ द्र० सम्भृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास, भाग१ पृष्ठ८३, २०३ (प्र० स०) ४ द्र० वृद्धिरादेजदड गुण । पा० २११-२॥ पतिमत्स्यमृगान् हन्ति परिपन्य च तिप्रति पा. ४४४३५,३६॥

स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि श्री प० युधिष्ठिरजी भीमासक के मतानुसार आचार्य वाशकृत्स्न के समय अपनी प्राचीन छन्दोबद्धता को अनावश्यक चार दिवारी से सून शैली मुक्त हुई और सर्व प्रथम काशकृत्स्न ने तथा उनके उत्तरवर्ती वैयाकरणो की परम्परा ने इम स्वरूप को यथासभव सवारने का प्रयास किया। इस प्रयास से इसमे उत्तरोत्तर अपूर्व लधुता एव व्यापकता आती गई। सून शैली के इतिहास में एक समय वह भी आया, जव शब्दलाघव और अर्थगौरव को एक दूसरे से आगे बढाने के लिए विभिन्न सून शिल्पियो की तेजस्विनी मनीष की आश्चर्यजनक, पर साथ ही साथ रोचक प्रतियोगिता व्याकरण के इस बीहड एव शुष्क प्रदेश मे दिखाई देने लगी। इस विचित्र प्रतियोगिता को देखते हुए ही अर्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सव मन्यन्ते वैयाकरणा" जैसे व्यङ्ग्य वाण भी वैयाकरणो पर फेके गये । परन्तु वास्तविकता तो यह है कि सूक्ष्मता एव व्यापकता का एक साथ महान प्रगतिशील, पर उतनी सुनियन्त्रित यह दौड सस्कृत व्याकरण शास्त्र की एक ऐसी विशेषता है, जो विश्व के किसी भी व्याकरण को अप्राप्त है। निस्सन्देह वैयाकरणो की इस जागरूक प्रतियोगिता मे सर्वश्रेष्ठता का सेहरा उस महान शब्द मनीपी आचार्य पाणिनि वे सिर बावा जायगा, जिसकी अद्भुत कृति अष्टाध्यायी के एक एर अक्षर की सार्थकता का प्रतिपादन कात्यायन तथा पतञ्जलि ने महाभाग्य के अनेक स्थनो पर ताल ठोक कर किया है। भले ही पाणिनि के उत्तरवर्ती वैयाररणो ने एकमान लाघव को ही प्रधानता देते हुए पाणिनि के कुछ सूना के स्थान पर उनसे भी छोटे सूनो को उपस्थित किया हो, अथवा पाणिनि द्वारा स्वीकृत कुछ बडी बडी अन्वर्थ सज्ञाओ के स्थान पर अनेक छोटी छोटी सज्ञाआ का आविष्कार किया हो । परन्तु हमे यह भूलना नही चाहिये कि १ स० व्या० शास्त्र का इतिहास पृष्ठ ८३, टि० ३ (प्र० स०)। २. तुलना कीजिए-काशकल गुरुलाधवम् । काशिका ३ ४ ११५ । सरस्वती कण्टाभरण, हृदयहारिणी टीका ४।३।२४६॥ शाक्यायन लघुवृति ३ १११८२॥ ३ तुलना कीजिए-क-मकारस-ध्यक्षरान्त , गणसूत्र १ ११३७, तथा कन्मेजन्त , पा.११॥३६॥ ४ परि० सख्या १३३ । ५. सामध्ययोगान्नहि किचिदत्र, पश्यामि शास्त्रे यदनर्थक स्यात् ॥ महा ० ६१९४७७, पृष्ठ ६०५ ।। तनाशक्य पणेना यनर्थवेन भवितुम् । महा० नवा०, पृष्ठ १२३ ।

सस्कृत व्याकरण शास्त्र तथा गणशैली ९ वैयाकरणो की मुदी परम्परा मे आचार्य पाणिनि ही एक ऐमा वैयाकरण हुआ, जिसका व्याकरण लौकिक और वैदिक दोना प्रकार के अनन्त गन्दा कोपरमरा को स्वरसहित यथासम्भव प्रशस्त रूप में समेट पाने मे सर्वथा समर्थ होता हुआ व्याकरण के सभी अगो मे अपने को सम्मन बना कर अपनी उद्देश्य प्राप्ति मे भव्य सफलता प्राप्त कर सका । जब कि पाणिनि से प्राचीन अथवा अर्वाचीन सभी वैयाकरण केवल वैदिक अथवा केवल लौरिक शब्दो के अन्वाम्यान को ही अपने अपने व्याकरण का पिय बना सके ।' साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जहा कही भी पाणिनि न बडे बडे सूनो अथवा मज्ञाआ को अपनी अष्टाध्यायी मे स्थान दिया है, वहा सर्वत्र कोई न कोई विशेष अभिप्राय निहित है। हा, कुछ स्थानो पर प्राचीन परम्परा का भी स्वाभाविक प्रभाव उपलब्ध होता है । पाणिनीय व्याकरण की उपयुक्त विशेषता को लक्ष्य मे रख कर ही पतजलि ने लौकिकाना वैदिकाना च' अथवा सर्ववेदपारिपद हीद शास्त्रम् जैसे वाक्य कह । अपनी हिस्ट्री आफ बुद्धिज्म' नामक पुस्तक मे तिब्बन के प्रसिद्ध ऐतिहामिक तारानाथ ने पाणि नीय व्याकरण के विषय मे जो प्रशस्ति प्रस्तुत की है, वह सर्वथा उद्धर्तव्य है। उमके इगलिश अनुवाद का मक्षिप्त हिन्दी रूपान्तर इस प्रकार है- पाणिनीय व्याकरण सम्पूर्ण व्याकरणों का मूल है। पाणिनि से पूर्व लिखित रूप में शब्दरचना के पूर्व कोई व्याकरणशास्त्र नहीं था और नाही किसी ऐसे सम्प्रदाय का अस्तित्व ही था, जो इस विषय को किसी सुनिश्चित प्रक्रिया से सुसद्ध कर सका हो। व्यक्तिगत रूप से कुछ ऐसे नेयाकरण अवश्य थे, जिन्होंने भाषा के किसी विशिष्ट स्वरूप को लेकर कुछ विशेष विचार किया था। ऐसे लोगों को महान विद्वान माना जाता था। यद्यपि तिश्यत में यह कहा जाता है कि कि इन्द्रन्याकरण पाणिनीय व्याकरण से प्राचीनतर है तथा भारत जैसे विशाल देश में सम्भवत इन्दच्याकरण पहले प्रविष्ट दृया हो, तो भी पाणिनीय व्याकरण को ही प्राचीनतम मानना होगा। पण्डितो , सम्पादकीय मत इस से मिन है । उमे परिशिप में देखिए । सम्या । २.मग० नया० पृष्ट १०॥ ३ महा०६।३३१४।। ४. इस लपक विषय में सम्पादकीय मत परिशिप में देखें। ५. यह तिन्दतीय अनुभूति भारतीय एतिहा की पुरि करती है । सम्पा-1 १० म० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि का यद्यपि यह भी निश्चय है कि चान्द्र व्याकरण पाणिनीय व्याकरण के अनुकूल है तथा कलाप व्याकरण इन्द्रव्याकरण का अनुगमन करता है, तो भी यह सर्वत्र स्वीकार किया जा चुका है कि प्राचार्य पाणिनि का व्याकरण अपने सूत्रों की व्यापकता तथा विचारों की साम्प्रदायिक परिपूर्णता के कारण सर्वथा अनुपम है। सूत्रशैली में गणपाठ और धातुपाठ का स्थान सस्कृत व्याकरण-शान के लिए अत्यावश्यक एवं उपयोगी सक्षेप शैली ने जहा एक ओर सूत्र-शैली, तत्सबद्ध प्रत्याहारो, अनुवृत्तियो तथा अनुबन्धो को जन्म दिया, वहा दूसरी ओर सूत्रो की परिपूर्णता के लिए गणपाठ और धातुपाठ को सूत्रो से पृथक् परिशिष्ट रूप मे उपस्थापित करने की आवश्यक्ता का उद्बोधन कराया, क्योकि शब्दो के साधुत्व की दृष्टि से वैयाकरणो के लिए यह अनिवार्य हो गया कि वे यथासम्भव सपूर्ण प्रकृतियो तथा समस्त प्रत्ययो का परिगणन करावे । इन मे प्रत्ययो का प्रदर्शन तो अपेक्षाकृत अत्यल्प होने के कारण सामान्य तथा विशेष नियमो काले सूत्रो को सहायता से सूनपाठ मे ही सम्पन्न होगया, परन्तु प्रकृतियो के परिगणन में कठिनाई उपस्थित हुई। सूत्रपाठ मे ही सम्पूर्ण प्रकृतियो को देने पर सूत्रो का कलेवर अमर्यादित रूप मे विस्तृत हो जाता है । अत. प्रकृतियो का निर्देश सूरपाठ मे किसी प्रकार मभव नही हो सकता। इस समस्या के समाधान के लिए सूनो से पृथक् धातु तथा प्रातिपदिक दोनो प्रकार की प्रकृतियो के कुछ विशिष्ट गणो का निर्धारण करना सूत्रकारो के लिए अनिवार्य होगया । इस प्रसग मे पाणिनि के भूवादयो धातवः' सूत्र में प्रयुक्त श्रादि पद के विषय मे पतञ्जलि द्वारा उपस्थापित रोचक विवाद एव उसके निष्कर्ष की ओर विद्वानो का ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक है। नामो अर्थात् प्रातिपदिको तथा क्रियाओ के रूपो की फारसरिक समानता और भिन्नता की दृष्टि से इन द्विविध प्रकृतियो को अनेक गणो मे विभक्त १ पा० ११३११६ २ अयादिग्रहण किमर्थम् । यदि तावत् पठ्य-ने, नार्थ श्रादिग्रहणन | अन्यनापि ह्यय पठन्नादिग्रहणं न करोति । • अर्थ न पश्यन्ते, नतराममं आदिग्रहणेन । न ह्यपठिताः शक्या आदिग्रहणेन विशेषयितुम् । एवं तर्हि सिदे सति यदादिग्रहणं करोति तज्ज्ञापयत्याचार्यः-अस्ति च पाठो बाह्यश्च सूनात् । महा० १।३.१, पृ १५४-१५५ ।।

मस्कृत व्याकरण-शान्त्र तथा गणशैली
किया गया। साथ ही इन गणा के आदि मे लाघन की दृष्टि से प्राय लघुतम
प्रकृति को स्थान देकर उसी प्रारम्भिक प्रकृति को आदि' अथवा प्रभृति
शब्दो से युक्त करके अथवा उसका वहुवचनान्त से निर्देश करके सूनो मे
उपस्थित किया गया । इस प्रकार सुनो की लघुता को सर्वथा अक्षुण्ण रखते
हुए, उन उन गणो की सम्पूर्ण अभीष्ट प्रकृतियो का सक्षेप से सूत्रो द्वारा
निर्देश सभव हो मका । सूत्रो की लघुता की सुरक्षा, भाषा-गत सम्पूर्ण प्रकृ
तियो का यथासभव सुव्यवस्थित परिगणन, एव निर्देशन का इससे अधिक
अच्छा उपाय और कोई नहीं हो सकता। इस प्रकार गणपाठ तथा धातुपाठ
के निवारण की स्थिति संस्कृत व्याकरण शास्त्र के क्षेत्र मे मुप्रतिष्ठित हुई।
इम निर्धारण ने सस्कृत व्याकरण का एक अनिवार्य अङ्ग बन कर, उसके
सूत्र-पद्धति के गागर म प्रकृतिया के अनन्त सागर को भरते हुए उसे कितना
वैज्ञानिक एव सयन बनाया है, यह व्याकरण-शास्त्र के मर्मज्ञो से छिपा हुआ
नही है । इसी कारण गणपाठ तथा धातुपाठ की इस प्रक्रिया के प्रादुर्भाव को,
प्रत्याहारो के आविष्कार की अपेक्षा किसी प्रकार भी अल्प गौरव नहीं
दिया जा सकता।
गणपाठ का अभिनाय
यद्यपि गणपाठ शब्द का यौगिक अर्थ समूहरूपेण पठन, प्रवचन अथवा
उपदेश है । इसलिए किसी भी प्रकार के शब्दो के सामूहिक प्रवचन अथवा
निर्धारण को, यौगिक अर्थ के अनुसार गणपाठ कहा जा सकता है, तथापि
व्याकरण-शास्त्र की पारिभाषिक शब्दावली मे जिस ग्रन्थ मे प्रातिपदिको
अथवा नाम प्रकृतियो के गणो अथवा ममूहो का सकलन होता है, उसे गण
पाठ और जिस ग्रन्थ मे धातुओ अथवा आख्यात प्रकृतियो के विभित
ममूहो का पाठ किया जाता है उसे धातुपाठ कहते हैं।
इस प्रकार गणपाठ शब्द अर्थविरोप में स्ढ होकर केवल उन प्राति
पदिक प्रकृतिया के अनेक समूहा के उम सकनन के लिए व्यवहत होता
है, जिनका व्याकरण के विभिन मूत्रा में प्रयुक्त श्रादि अथवा प्रभृति अथवा
१ यया-सर्वादीनि सर्वनामानि । पा० २१ २७॥
• यथा-अदिप्रभृतिभ्य' शप । पा० २४१७२।।
३ यथा-सप्तमी शौण्डै । पा० २१॥४०॥

१२ म० व्या० मे गणपाठ की परमरा और आचार्य पाणिनि ववचनान्त शब्दो की मुव्यवस्थित व्याख्या के लिए मूनकारो द्वारा सूत्रपाठ मे पृथक् उपदेश किया गया है। यद्यपि गणपाठ' शब्द का प्रयोग धातुपाठ के लिए भी क्वचित् देखा जाता है (क्योरि वातपाठ मे भी भादि अदादि जुहोत्यादि आदि को एक एक गण मानकर उन मे अभिप्रेत वातु-प्रकृतियो का परिगणन किया गया है ) तथापि गणपाठ शब्द का प्रयोग गोयलीपर्दन्याय से प्राय प्राति पदिक पाठ के लिए ही प्रयुक्त होता है । इसीलिए जहा गणपाठ और धातु- पाठ दोनो का एक साथ निर्देश करने का अवसर उपस्थित होता है , वहा यद्यपि केवल गणपाठ शब्द यौगिक अर्थ द्वारा दोनो का निर्देश करने मे समर्थ हो सकता है तथापि वहा सर्वत्र गणपाठ और धातुपाठ दोनो का नामोच्चारण पूर्वक पृथक् पृथक् निर्देश उपलब्ध होता है। उदाहरण के लिए धातुसूत्रगणोणादिवाक्यलिङ्गानुशासनम् । आगम प्रत्ययादेशा उपदेशा प्रकीर्तिता ।।' इत्युक्त्वान्तर्दधे रुद्र पाणिनि स्वगृह ययौ । सूत्रपाठ धातुपाठ गणपाठ तथैव च ॥ श्लोका को उपस्थिन किया जासकता है। न्यासकार ने काशिका के खिलपाठश्च अश की धातुपाठ चकारात् प्रातिपदिकपाठश्च व्याख्या करते हुए गणनाठ को प्रातिपदिक पाठ के रूप मे स्वीकार दिया है । गणरत्न महोदधि तया गणरत्नावली जैसे व्य ज्यान ग्रन्थो मे भी केवल प्रातिपदिक पाठ मे आए शब्दा की ही व्यारया मिलती है । गणपाठ और धातुपाठ के नाम से आज भी दो पुस्तके पृथर पृथक् रूप में उपलब्ध है । अत गणपाठ मे धातुपाठ का अन्तर्भाव नहीं किया जा सकता। गणशैली का प्रारम्भ जैसा कि ऊपर दिखाया जा चुका है, गणपाठ का सूत्रपाठ के साथ अजागी सम्बन्ध होने के कारण एक के विना दूसरे की स्थिति सम्भव नहीं। यदि किसी प्रकार मम्भव भी हो सके तो उसका कोई मूल्य नहीं कोई प्रयो १.प्रनियाकीमुदी, पूर्वाध', पृष्ठ १६ । २. भविष्य पुराण, प्रतिसर्गपर्य, कलियुगतिहाससमुच्चय ३१११३।। ३. न्यास १।३।२, भाग १, पृट २११ ।

सस्कृत व्याकरण शास्त्र तथा गणशेली जन नहीं । उदाहरण के लिए यदि पाणिनि के सदीनि सर्वनामानि अथवा कयादिभ्यप्ठ जैसे सूत्रो मे आदि शब्द से ग्रहण किए जाने वाले सादि अपवा कथादि शब्द समूहो का निवारक गणपाठ विद्यम न न हो तो पाणिनि तत्तद् गणपम्बद्ध सूत्रो मे आदि अथवा प्रभृति जैसे शब्द सर्वथा नि प्रयोजन हो जाते है। इसी प्रकार सादि अथवा कथादि जैसे शब्दसमूहो गणो का पाणिनि के सादीनि सर्वनामानि' अथवा कथादिभ्यप्ठ जैस सूत्रो मे आदि प्रभृति आदि शब्दो से निर्देश न किया गया होता तो इस प्रकार के गणो के निवारण का क्या प्रयोजन होता ? यद्यपि शब्दो क प्रतिपद-पाठ की पद्धति को अपनाने वाले इन्द्र आदि वैयाकरणो तथा वैदिक प्रानि तारयकारो ने एक नियम सबद्ध सभी अभिप्रेत शब्दो को तत्तन सूनो मे स्थान देकर गणपाठ की आवश्यकता से मुक्ति पा ली तथापि इस प्रकार के अमर्यादित एव दीर्घकाय सूत्रो को आदर्श सूत्र शेली मे स्थान नहीं दिया जा सकता। इसलिए किसी भी आचार्य के व्याकरण मे यदि वह वस्तृत प्रक्षिप्त सून शैली मे निबद्ध है तो उसकी सूत्र शैली की लघुता तथा पूर्णता क लिए यह आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य है कि सूत्ररचना के पूर्व ही सूत्रकार द्वारा वातुपाठ और गणपाठ का सुव्यवस्थित निवारण हो चुका हो । इस तथ्य को हृदयगम कर लेने पर यह धारणा स्वभावत उपस्थित होती है कि जब कभी भी मस्कृत व्याकरण के क्षेत्र मे सतिप्त सूत्र पद्धति का आदर किया गया होगा, तभी गणमाठ तथा धातुपाठ की वैज्ञानिक कल्पना ने भी वैयाकरणो की मनोपा को सनाथित क्यिा हागा । इसलिए यह कहना कि आचार्य पाणिनि ही गणशैली के प्रथम उद्भावक है, सर्वथा अनुचित है। पाणिनि से प्राचीन अनेक वैयाकरणो के गणपाठ विषयक विभिन प्रमाण अगले अध्याय मे उपस्थित किए जाएगे । यहा इतना ही कहना पर्याप्त है कि जिस प्रकार प्रत्याहारो तथा अनुबन्यो की पद्धति पाणिनि की अपनी ही उपज्ञात अथवा आविष्कृत नहीं है, अपितु पाणिनि से पूर्ववर्ती आपिलि तथा शान्तनव आदि आचार्यों ने भी क्रमश प्रम् तथा अप हय् आदि १.पा० १३१॥२७॥ २.पा०४/४/१०॥ ३. द्र० स० व्या० शास्त्र का इतिहास भाग १, पृष्ठ ६६ (प्र० स०)। ४. लघावन्न योश्च नइयो गुरु । फिर सत्र ४२ । ५ हयातीनामसयुक्तलान्तानामन्त पूर्वया । फिर सत्र ४८ ।

सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि प्रत्याहारो का प्रयोग किया है, उमी प्रकार गणपाठ को शैली का आविष्कार भी पाणिनि द्वारा ही हुआ, ऐसा कदापि नही माना जा सकता। हा, इतना अवश्य है कि इस वैयाकरण-मूर्धन्य ने अपने पूर्ववर्ती आचार्यों से विरासत मे प्राप्त प्रत्याहार तथा गणपाठ आदि की पद्धतियो का किसी भी प्राचीन आचार्य की ओक्षा अत्यधिक प्रयोग करके अपने सूत्रों मे सुव्यवस्थित लघुता तथा व्यापकता की वह अपूर्व चकाचौष उत्पन्न कर दी, जिस के समक्ष प्राचीन वैयाकरणो के सभी व्याकरण न केवल फीके ही पड़ गए, अपितु विद्वानो को दृष्टि से उपेक्षित होकर सदा के लिये अपने अस्तित्व तक से हाथ धो बैठे। १. सम्पादकीय मत इस से भिन्न है । उस का निर्देश परिशिष्ट मे किया है। सध्या.॥

द्वितीय अध्याय पाणिनि से प्राचीन वैयाकरण और उनके गणपाठ सस्कृत वाङ्मय मे इतस्तत विकीर्ण व्याकरण विषयक सामग्री, यास्क के निरुक्त, वेदो के विभिन्न प्रातिशाख्यो तथा पाणिनीय अष्टाध्यायी मे उपलब्ध होने वाले अनेक वैयाकरणो के विविध मतो के आधार पर अन्वेषको का यह सुनिश्चित विचार है कि आचार्य पाणिनि से पूर्व सस्कृत वैयाकरणो की एक सुदीर्घ परम्परा विद्यमान थी।' इम परम्परा मे आने वाले वैयाकरणो के वहुत से सूत्र भी अन्वेषक विद्वानो ने उपलब्ध कर लिए है। कुछ समय पूर्व ही प्रकाशित चन्नवीर कविकृत काशकृत्स्न शब्दकलाप धातुपाठ की कन्नड टीका मे आचार्य काशकृत्स्न के लगभग १३५ सूत्र भी मिल गए है । निस्सन्देह इन १३५ सूनो की उपलब्धि से वैयाकरण काशकृत्स्न की सूनशैली पर विशद प्रकाश पडता है । सस्कृत व्याकरण-शान्त्र मे ऐतिहासिक मनीपा रखने वाले सुप्रतिष्ठित विद्वानो मे सम्भवत क्षितीशचन्द्र चटर्जी ही एक ऐसे विद्वान है, जो वैयाकरण काशकृत्स्न को पाणिनि का उत्तरवर्ती मानते हैं।' पाणिनि द्वारा स्मृत होने से आपिशनि पाणिनि से पूर्ववती है, यह सर्व सम्मत तथा सुसष्ट तथ्य है । पाणिनि ने अपने शब्दानुशासन के प्रवचन मे आपिशल व्याकरण मे पर्याप्त सहायता ली है। इस तथ्य के प्रकाश मे पत अलि का वह लेख अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, जिसमे उन्होंने पाणिनि आपिशलि १ इस परम्परा के २३ वैयाकरणों के परिचय के लिए देखिए स० व्या० शास्त्र का इतिहास, भाग १, अध्याय ३, ४ (पृष्ठ ५७ १२८)। २. द्र० स० व्या० शास्त्र का इतिहास भाग १ अध्याय ३,४ (पृष्ठ ५७१२८)। ३. इन सूत्रों की विस्तत व्याख्या के लिए देखिए श्री ५० युधिष्ठिर जी मीमा सक द्वारा लिखित 'काशकृत्स्न व्याकरण और उसक उपलब्ध स्त्र' नामक निबन्ध । १.क्निकल टम्स एण्ड ग्नीवस श्राफ सस्कृत प्रामर, पृष्ठ २, ७७ ॥ ५. वा मुप्यापिशन । पा० ६११२६॥ स एवमापिशने पञ्चदशभेदारख्या वर्णधर्मा भवन्ति । पाणिनीय शिक्षा 8 इस स्वात्मक पाणिनीय शिक्षा का प्रका शन शंघ्र ही 'भारतीय प्राच्यविद्याप्रतिष्टान' से हो रहा है। ६. द्र० पदमञ्जरी भाग ५, पृष्ठ ६, ७॥

१६ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि आर काशकृत्स्न तीनो के शब्द नुशासनो का एक साथ उल्लेख किया है। इस लेख मे पहले पाणिनीय, तदनन्तर आपिशल और तत्पश्चात् कागकृत्स्न तन्त्र का उल्लेख मिलता है। महाभाष्य के टीकाकार यटर तथा वाक्यपदीय के टोकाकार हेलाराज क वे वाक्य भी हमारी इस विषय मे पर्याप्त महायता करते है जिनमे आपिगलि स पूर्व काशकृत्स्न की सत्ता का मकेत विद्यमान है । उक्त दोना विद्वाना ने अपन वचनो मे पहले आपिशलि और तदनन्तर कागकृत्स्न के नाम का उल्लेख किया है । उपर्युक्त तीनो स्थलो के समन्वित प्रमाग मे यदि काशकृत्स्न का ममय निर्धारित किया जाए तो काशकृत्स्न का समय पाणिनि के पश्चात् तो क्या आपिशलि के पश्चात् भी नहीं माना जा सकता। ऐन्द्र व्याकरण तथा गणशैली प्राचीन वैयायाकरणो की परम्परा मे साहित्यिक प्रमाणा' तथा तारा नाथ जैसे ऐतिहासिको के कथन के आधार पर आचार्य इन्द्र को प्रथम स्थान दिया जाता है । ए० सी० बर्नेल ने वैदिक प्रातिशास्या यास्क के निरुक्त, कात न व्याकरण तोलकापियम् तथा कच्चायन (कात्यायन ) क प्राकृत व्याकरण का सबन्ध उक्त ग्रन्यो मे प्राप्त होने वाली पारिभाषिक शब्दा वनी आदि की कुछ समानताओ तथा पाणिनि की अष्टाध्यायी मे उपलव्य होने वाली विषमताओ के आधार पर ऐन्द्र व्याकरण से स्थापित किया है ।। सम्प्रति दुभाग्यवश ऐन्द्र व्याकरण अनुपलव्य है । परन्तु ए० सी० वर्नेल क मतानुसार उसका अनुगमन करने वाले उपयुक्त विभिन्न व्याकरणो की गतिविधियो के अनुशीलन के पश्चात् जैसा कि प्रो० ए० सी० बर्नेल का विचार है " हमे यह स्वीकार करना पडता है कि ऐन्द्र व्याकरण मे गणशैली १ पाणिनिना प्रोक्तपाणिनीयम् प्रापिशलम् काश नम्।महा० ना० पृष्ठ७० २ प्रापिशलकाशालयोस्वाथ । महा० प्रतीप ५११२१॥ ३ यापिशला काशा नाश्च सूत्रमेतन्नाधीयते । पृष्ठ ७१४ । v तै० सहिता ६।४७, तथा 'श्रान दी ए द्रस्खल ग्राफ सस्कृत प्रामरियन्स, पृ५ ५ द्र० दी इण्डियन एण्टिकरी, अप्रल १८७५ पृष्ठ १०२ तथा उसस अागे । ६ द्र० ग्रान दी एन्द्रकुल श्राफ सख्त ग्रामेरियस पृष्ठ १२ । ७ द्र० पान दी ऐन्द्रस्वल आफ सम्बत ग्रामेरियन्स पृष्ठ २६ ।

पाणिनि से प्राचीन वैयाकरण और उनके गणपाठ १७ के प्रयोग का सर्वथा अभाव था। यदि पतञ्जलि के इन्द्र-विषयक शब्दो के प्रतिपद-पाठ-सबन्धी कयन मे अर्यवाद के साथ साथ कुछ तथ्याश भी माना जाए तो उपर्युक्त धारणा की थोडी बहुत पुष्टि भी होती है । वैदिक प्रातिशाख्यों की पाणिनि से प्राचीनता सम्प्रति उपलब्ध वैदिक प्रातिशाख्य पाणिनि से प्राचीन है अथवा अर्वा चीन, इस विषय मे बहुत काल से ऐतिहासिक विद्वानो मे पर्याप्त मतभिन्न्य चला आ रहा है। परन्तु पाणिनि की अष्टाध्यायी तथा प्रातिशाख्यो मे प्रयुक्त अनेक पारिभाषिक शब्दो की गम्भीर तुलना करके विद्वानो ने ऐसे पर्याप्त सकेत प्रस्तुत किए है जो हमे ए सी वर्नेल के निष्कर्ष को मानने के लिए वाध्य कर देते है कि सम्पूर्ण विद्यमान प्रातिशास्य अपने वर्तमान रूपों मे पाणिनि से अर्वाचीन है। परन्तु ये सभी प्रातिशाख्य किसी न किसी प्रकार एक ऐसे व्याकरण-सम्प्रदाय से सबद्ध है, जो पाणिनीय मम्प्रदाय से पूर्व प्रतिष्ठित था। ऋक्-वाजसनेय-तैत्तिरीय प्रातिशाख्यों में गणशैली ऋक्प्रातिशाख्य के येत्यादिषु (४।९१), वाजसनेय प्रातिशाख्य के उत्तम्भनादीनि (५३८) तथा तैत्तिरीय प्रातिशाख्य के शैत्यायनादि (१०) मन्दादि ( २३१२) तथा अक्षरसंहितादि (२११४) जैसे सूत्रो के प्रयोगो मे 'आदि शब्द मे रहते हुए भी इन से किसी गण का निर्देश अभीष्ट है, ऐसा १. अथर प्रातिशाख्य, डा० सूर्यकान्त सम्पादित, भूमिका माग । २. अथर्व प्रातिशाख्य, ५० विश्वबन्धु शास्त्री सम्पादित, भूमिका भाग पृष्ठ ३३ तथा उससे अागे। ३. द्र० वही, पृष्ठ वही। ४. इस प्रकार के शब्दों से पश्चात्य मतानुयायी सस्कृत वाडमय के प्रामाणिक अन्यों के स्वरूपों में अनास्था उत्पन्न करने का प्रयास करते हैं। जब तक इन ग्रन्थों का पूर्व ऐतिहासिक रूप प्रकट न किया जाए, इस प्रकार की कल्पनाए तथ्य से दूर भटकाने वाली होती हैं। ५. सम्पादकीय मत इससे सर्वथा भिन्न है । सम्पादक के मत में वाजसनेय प्रातिशाख्य तथा लघु मृक्तन्त्र के अतिरिक सभी प्रातिशास्य और ऋक्तन्त्र पाणिनि से पूर्ववर्ती हैं। ६ अपर्व प्राति० ५० विश्वबन्धु शास्त्री संभा, भूमिका पृष्ठ २३ तथा श्रागे।

सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि नही माना जा सकता, क्योकि ऋक्प्रातिशाख्य के येत्यादिषु (४।९१) से अभिप्रेत शब्दो का परिगणन प्रातिशाख्यकार ने स्वय ही अगले ( ४१९३) सून मे कर दिया है। वाजसनेय प्रातिशाख्य के उत्तम्भनादि निर्देश से 'उत्तम्भन' के साथ-साथ दो अन्य उत्थाय और उत्थिताय शब्द ही अभिप्रेत है। इनके लिए किसी विशेष गण के निर्धारण का अनुमान कर, उसे गण- शैली के उपयोग करने के प्रमाण मे उपस्थित करला, निश्चय ही वाजसनेय प्रातिशाख्यकार द्वारा अपनाई गई शैली के साथ अन्याय करना होगा। इसी प्रकार तैत्तिरीय प्रातिशाख्य के शैत्यादि जैसे आदि शब्द युक्त निर्देशो से जिन शब्दो को अभिप्रेत माना गया है, उनका निर्देश प्रातिशाख्यकार ने स्वय ही अन्य सूत्रो मे कर दिया है। यह भी ध्यान रहे कि मन्द्रादि तथा अक्षरसहितादि के निर्देश करने वाले सूत्रो को कतिपय विद्वानो ने प्रक्षिप्त इतना ही नहीं, यदि इन प्रातिशाख्यकारो को गणशैली अपनानी होती तो इन प्रातिशाख्यो के सूनो का ढाचा ही कुछ और होता । पाणिनि के प्रादयः ( ११४१५० ) जैसे छोटे सूनो के स्थान पर पूरे बीस बीस उपसर्गों की गणना सून मे न की जाती। इसी प्रकार गणशैली के अपनाने पर वाजसनेय प्रातिशाख्य के बृहस्पतिवनस्पति जैसे दीर्घकाय सून के स्थान पर गृहस्पत्यादीनि, तैत्तिरीय प्रातिशाख्य के नातिनूननृत्यन्त्य०" के स्थान पर नात्यादीनि जैसे लधुकाय सूनो की रचना को ही प्रशस्त माना जाता । स्मरण रहे कि आचार्य पाणिनि के वनस्पत्यादि गण (६।२।१४०) तथा शुभ्नादि गण (८।४।३९) का निर्धारण क्रमश उपर्युक्त सूत्रो मे पठित प्रयोगो को ध्यान में रखते हुए ही किया गया होगा और उसी १. द्र०-दी क्रिटिकल स्टडीज श्रान कात्यायनाज शुक्ल यजुर्वेद प्रातिशाख्य, वी. वी. शर्मा, पृष्ठ ८१ । २.द्र०-श्रान दी ऐन्द्रस्कूल ग्राफ सस्कृत ग्रामेरियन्स, पृष्ठ २३, तथा उससे श्रागे। ३. द्र० प्रा० १२।२०,२१; वा० प्रा० ४।२४; ते० प्रा० १११५, श्र० प्रा०११।१७॥ ४ या०मा०२॥४७॥ ५ ते. प्रा० ११६॥

पाणिनि से प्राचीन वैयाकरण और उनके गणपाठ
आधार पर उभे वनस्पत्यादिषु युगपत्' तथा तुम्नादिपु च जैसे लघुकाय
सूत्रो की रचना सम्भव हो सकी होगी।
सम्भवत शब्दो के प्रतिपदपाठ की प्रक्रिया को अपनाने के कारण ही इस
प्रकार के दीर्घकाय सूत्रो से तीनो प्रातिशाख्य भरे पडे है । अतः यह निश्चित
है कि इन तीनो प्रातिशास्यो मे गणशैली को यत्किंचित् भी प्रश्रय नही
मिला था।
ऋक्तन्त्र तथा गणशैली
सामवेद से सबन्ध रखने वाले मृक्तन्त्र मे अविरादि (सूनसंख्या १४१),
फौतस्कुतादि (१२८), पटादि (१६४), पृपोदरादि (१६६), वत्सरादि
(१०६), तथा शकन्धुकादि (८७) कई गण मिलते है । इन गणो मे अभिप्रेत
शब्दो का निदर्शन भी ऋक्तन्त्र की विवृत्ति मे मिलता है । इस मे कोई सन्देह
नहीं कि यदि एक ओर उपर्युक्त पृपोदरादि, पटादि वत्सरादि तथा शकन्धु-
कादि गण न केवल इस बात का अनुमान करने के लिए वाध्य करते है कि
ऋक्तन्न का जोरुप हमे मिलता है उसका कुछ भाग पाणिनि की अष्टाध्यायी
से तो अर्वाचीन है ही, कात्यायन के वातिको से भी अर्वाचीन है । साथ ही
दूसरी ओर इसी ऋक्तन्त्र मे वर्तमान कौतस्कुतादि (१२८) गण इस बात
का बहुत कुछ निश्चय करा देता है कि पाणिनि ने अपने कस्कादि गरण
(८।३।४८) की रूप रेखा का निर्धारण इसी कौतस्कुतादि गण के आधार पर
किया था। पाणिनि ने गण निर्धारण करते समय 'कौतस्कुत' शब्द को
केवल लाघव की दृष्टि से ही अपने सूत्रपाठ मे प्रथम स्थान से हटाकर उसका
स्थान 'कस्क' शब्द को देते हुए ऋक्तन्न के कौतस्कुतादि को ही कस्कादि
गण के रूप मे स्वीकार किया है । 'कस्कादि' जैसे छोटे नाम के रहते हुए भी,
उसका अनुकरण करने वाला कोई वैयाकरण 'कौतस्कुनादि' जैसे बडे नाम को
अपनी सूत्र-पद्धति मे स्थान देना चाहेगा, ऐसा सोचना भी अस्वाभाविक होगा।
इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि पाणिनि के 'वस्कादि' गण के अनुकरण
पर ऋक्तन्नकार ने 'कौतस्कुतादि' गण की निर्धारणा की होगी। इस रूप
मे न्यूनातिन्यून 'कौतस्कुतादि' गण की सत्ता तो हमे पाणिनि के क्स्कादि'
गण से पहले की माननी होगी । इतना ही नही, यदि यही माना जाए कि
१.पा०६।२।१४०॥
२.पा० ८४॥३६॥

२० सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि अक्तन्त्रकार ने गणशैली का उपयोग पाणिनि तथा कात्यायन के अनुकरण पर ही किया, तो इस वात का भी उत्तर देना होगा कि ऋक्तन्त्रकार ने पाणिनि के पारस्करादि गण (६।११५७) का उपयोग न करके पार पर्वते जैसे अनेको सूत्रो (१९४-२११ ) की रचना क्यो की ? ऋक्तन्त्रकार के इस सुट प्रकरण वाले (१९४-२११) स्थल से उलटे इस सभावना को बल मिलता है कि पाणिनि के 'पारस्करादि' गण की पृष्ठभूमि ऋक्तन्त्र के सुट- प्रकरण के सूत्र है । इनके अनुकरण पर ही गणशैली को अपनाते हुए भी पाणिनि ने बहुत से ऐसे सूत्रो' को अपनी अष्टाध्यायी मे स्थान दिया, जिनका प्रयोजन उनका पारस्करादि मे अन्तर्भाव करके सिद्ध किया जा सकता था और वह भी विशेषकर उस अवस्था मे जब कि 'पारस्करादि' गण को आकृति गण माना जा सकता है। डाक्टर सूर्यकान्तजी का यह विचार कि ऋक्तन्त्र का सर्वप्रथम प्रणयन औदवजि ने किया तथा थोडे बहुत परिवर्तन और परिवर्धन के साथ शाक- टायन ने उसका द्वितीय सस्करण किया । ऋक्तन्त्र का सम्प्रति जो सस्करण उपलब्न है, वह उसका तीसरा सस्करण है । इस संस्करण की रचना निश्चित ही पाणिनि के पश्चात् हुई है। उस समग्री के विषय मे, जो ऋक्तन्त्र तथा अष्टाध्यायी अथवा वात्यायन की वार्तिको मे सर्वथा समान रूप से मिलती है, अपनी विस्तृत विवेचना तथा गम्भीर समीक्षा के पश्चात् डाक्टर महोदय ने अन्तिम निष्कर्ष यह निकाला है- १द्र०पा०६।१।१४३-१५५ । २ यह बात लक्षणैकचक्षुष्क वैयाकरणों के मतानुसार लिपी है । प्राचीन मतानुसार इस प्रकार की तुलना से कोई विशिष्ट सिद्धान्त स्थिर नहीं किया जा सकता । प्राचीन श्राचार्य केवल लक्षणेकचद नहीं थे । वे लक्ष्यैक्चक्षु थे। लक्ष्यों के मुगमता से परिशान के लिए वे सप और विस्तार दोनों प्रकार से लक्षणों का प्राचन करते थे। श्रतएव महाभाष्यकार ने कहा है-~'अथ किमर्थ लुगलुगनुनमण प्रियते, न तत्पुरुषे कृति बहुलम् ६।३११४) इत्येव सिद्धम् । उदाहरणमयस्त्वात । ते चै सल्वपि विधय सुपरिगृहीता भवन्ति, येषा लक्षण प्रपन्चश्च । केवल लक्षण, केवल प्रपञ्चोथा न तथा कारक भवति । सरंवेदपारिषदं हीदं शास्त्रम् । तत्र नैक पन्या शक्य श्रास्थातुम्' (महा० ६।३।१४) । सम्पादक । ३.८० सूर्यकान्तजी सम्पादित ऋक्तन्त्र, भूमिका भाग, पृष्ठ ३६-४३ ।

पारिणनि से प्राचीन वैयाकरण और उनके गणपाठ . १ प्रकाश इन समानताओ के आधार पर अधिक से अधिक यह निष्कर्ष निकाल सकते है कि ऋकन्न के ये सूत्र सम्भवत पाणिनि तथा कात्यायन से लिए गए हो, परन्तु पाणिनि तथा कात्यायन ने भी उन्हे शाकटायन तथा अन्यो से ग्रहण किया हो। यद्यपि मृक्तन्त्र कुछ सूनो के लिए पाणिनि, यहा तक कि कात्यायन का भी ऋणो हो सकता है, फिर भी ये दोनो (पाणिनि कात्यायन ) ही गाकलायन के ऋणी हैं और शाकटायन ऋक्तन्न का कर्ता है। निश्चय ही विद्वान लेखक के ये विचार विशेष महत्व के ह । इन के उपरि निर्दिष्ट दोनो परसर विरोधी परिस्थितियो का सम्यक् समन्वय हो जाता है। इस प्रकार ऋक्तन्त्र के पाठ की कोई सीमा निर्धारित न होने के कारण यह निश्चय पूर्वक कहना तो कठिन है कि उसका कौनमा अश कितना प्राचीन है और कौनसा अश कितना अर्वाचीन है, तथापि कौतस्कुतादि गण के विषय मे यह सभावना अवश्य उपस्थापित की जा सकती है कि ऋक्तन्न का यह अश पाणिनि से प्राचीन है, इसके रचयिता समवत आचार्य शाकटायन रहे हो। अथर्य-प्रातिशाख्य तथा गणशैली अथर्व प्रातिशाख्य मे वृहस्पत्यादि (११११४) व्याघ्रादि (१११११९), अजिरादि (१।२७), पदादि (१।३।८) शतादि (२111) अश्वादि (३।३।१५) सनसाहादि (३३३३१९) एनाश्रहादि (२।३।९) दीर्घायुत्वायादि (२।४।८), भूतादि (२१३।१०) शाकल्येप्यादि (२१११५) के रूप मे गणशैली के प्रचुर प्रयोगो को देखकर अथर्व प्रातिशाख्यकार के पाणिनि से प्रभावित होने की संभावना की जा सकती है परन्तु कुछ एसे हेतु भी उपस्थित किए जा सकते हैं, जिनके आधार पर अथर्व प्रातिशाख्य को पाणिनि से पहले का ठहराया जा सकता है । यथा- - १ डा० सूर्य का तजी सम्पादित क्त भूमिका पृष्ट ४३ । २ सम्पादकीय मत इससे भिन्न है। ऋक्तन का उपलब्ध पाठ निश्चय ही पाणिनि से पूर्वक्ता है । दलिये -स० च्या० शास्त्र का इतिहास माग २ प्रातिशाख्य श्रादि के प्रवक्ता और च्याख्याता' अध्याय ।

२२ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि पहला हेतु यह है कि अथर्व प्रातिशाख्यकार सार्वधातुक सजा को सर्वथा सामान्य सज्ञा मानते हुए उसकी कोई परिभाषा नही करता, उसे अपरिभाषित ही रहने देता है, परन्तु पाणिनि की अष्टाध्यायी मे यह शब्द सामान्य सज्ञा के रूप मे न रह कर एक विशिष्ट तथा नियत सज्ञा का रूप धारण कर लेता है । इसलिये पाणिनि ने तिशित् सार्वधातुकम् (३।। ११३) सूत्र द्वारा उसकी परिभाषा करते हुए उसे केवल तिड और शित् प्रत्ययो से सबद्ध कर दिया है । 'सार्वधातक' संज्ञा की जो यह सामान्य तथा विशष परिस्थिति है, उसमे सामान्य स्थिति को प्राचीन तथा विशेष स्थिति को उत्तरकालीन मानना ही युक्तिसगत होगा। इस रूप मे अथर्व प्राति- शाख्य वाली स्थिति ही प्राचीनतर सिद्ध होती है । इसलिये यहाँ यह सभावना करना अनुपयुक्त न होगा कि पाणिनि के 'सार्वधातुक' सज्ञा की पृष्ठभूमि सम्भवत अथर्व प्रातिशाख्य की सार्वधातुक सज्ञा रही है। इसके विपरीत यदि कोई यही हठ करे कि पाणिनि की सार्वधातक सज्ञा का अनुकरण अथर्व प्रातिशाख्यकार ने किया तो उसे इस बात का भी उत्तर देना होगा कि प्रातिशाख्यकार ने पाणिनि के प्रत्याहारो और अनुबन्धो से अपना परिचय क्यो नहीं दिखाया ? दूसरा हेतु यह है कि अथर्व प्रातिशाख्य के स्वरविषयक नियम इतने परिष्कृत नहीं दिखाई देते जितने पाणिनि के । उदाहरण के लिए अथर्व- प्रातिशाख्य के द्विरुदास बृहस्पत्यादिनाम् (१।११४) सूत्र को, तथा पाणिनि क उमे वनस्पत्यादिषु युगपत् (६।२।१४०) तथा देवताद्वन्द्वे च (६।२११४१) सूत्रो को उपस्थित किया जा सकता है । पाणिनि की सूत्रशैली मे बृहस्पति वनस्पति जैसे शब्दों को जिनमे द्विरुदात्तता तथा पष्ठीसमास दोनो है, एक विभाग मे रखा और उपासानक्ता मित्रावरणा इत्यादि शब्दो को, जिनमे द्वन्द्वममास की स्थिति है, दूसरे विभाग मे रसा । इसलिए दो विभागो के आधार पर पाणिनि ने उपर्युक्त दो सूत्रो की रचना की। परन्तु प्रातिशाख्य की सूप पद्धति ने वृहस्पत्यादि गण मे ही द्विरुदात्त दिखाई देने वाले सभी १. सम्पादकीय विचार में पाणिनीय 'सार्वघातक' सगा की पृष्ठममि प्रापिशलि की साधातुका' राणा है । द्र० काशिका श६५ में उधृत श्रापिशल सूत्र । २.द्र० ५० विश्वम्धुजी सम्पादित अथर्व-प्रातिशाख्य, भूमिका भाग, पृष्ठ ३३ ।

पाणिनि से प्राचीन वैयाकरण और उनके गणपाठ २३ - शब्दो का समावेश माना है। पाणिनि द्वारा स्वीकृत द्विविध विभागों से उसका कोई परिचय नही जान पडता । इस रूप मे पाणिनि के सूत्रों की अपेक्षा अपनी प्राचीनता का ज्ञापन करती हुई इस बात का भी अनुमान प्रस्तुत करती है कि पाणिनि को अपने वनस्पत्यादि गण की पृष्टभूमि अथर्व-प्राति. शाख्य के 'बृहसत्यादि गण मे मिली हो । भारद्वाज-शिक्षा तथा गणशैली भण्डारकर अनुसन्धान सस्थान पूना से एक भारद्वाज शिक्षा प्रकाशित हुई है। उसके अन्तिम श्लोक' तथा शिक्षा के व्याख्याकार नागेश्वर भट्ट के मतानुमार यह शिक्षा आचार्य भरद्वाज प्रणीत है । प्र.क्तन्न के उल्लेख से पता चलता है कि भरद्वाज नाम का एक बहुत प्राचीन वैयाकरण हो चुका है। यह शिक्षा उस प्राचीन भरद्वाज को बनाई हुई है ऐसा पूर्ण विश्वास नही होता ।' यदि यह सिद्ध हो सके कि यह शिक्षा उसी प्राचीन वैयाकरण भर- द्वाज आचार्य की है, तो भारद्वाज शिक्षा मे मिलने वाले दो गण पाणिनि से पूर्व गणशैली के आविष्कार की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है । वे गण है-- शीमादि तथा मेण्यादि। भागुरि तथा गणशैली आचार्य भागुरि ने सामसहिता का प्रवचन किया था। पतजलि सकेतित उन आचार्यो मे भागुरि भी एक है, जिन्होने हलन्त शब्दो से स्त्रीलिङ्ग मे टाप् प्रत्यय का विधान किया था। अतः वैयाकरण भागुरि को पाणिनि से प्राचीन मानने मे कोई वाधा नहीं है । १ 5० अ० प्रा०, विश्वबन्धु सम्पादित भूमिका भाग, पृष्ठ ३३ ३४ । इस विषय में सम्पादकीय टिप्पणी परिशिष्ट में देखें। २ यो जानाति भरद्वजशिक्षामर्यसमन्विताम् | पृष्ठ ६६ । ३. प्रवक्ष्यामि इति भरद्वाजमुनिना उक्तम् । पृष्ठ १। ४ दू०-इन्द्रो भरद्वाजाय, भरद्वाज ऋषिम्यः । ऋक्तन्त्र २४॥ ५ द्र० सं० व्या शास्त्र का इतिहास, भाग १, पृष्ठ ६६ (प्र० स०)। ६ वैशम्भल्या च शोभादी पवर्गे च चतुर्यगः । श्लोक ५८ ! ७ मेण्यादी प्राकृतश्च णः । श्लोक ६३ । ८ द्र० स० व्या शास्त्र का इतिहास, भाग १, पृष्ठ ६६, ७० (प्र० सं०)।

से० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि जगदीश तर्कालकार ने वैयाकरण भागुरि के व्याकरण विषयक कतिपय नियम अपनी शब्दशक्तिप्रकाशिका मे उद्वृत किए है । इन नियमो मे गणशैली की दृष्टि से निम्न श्लोक विचारणीय है'- मुण्डादेस्तत् करोत्यर्थे गृह्णात्यर्थे कृतादितः। वक्तीत्यर्थे च सत्यादेरङ्गादेस्तन्निरस्यति ॥ तूस्ताइ विधाते संछादेर्वस्त्रात् पुच्छादितस्तथा । सनातश्चाभियाने णि श्लोकादेरप्युपस्तुतौ ॥ ऐमा प्रतीत होता है कि पाणिनि के पुच्छभाण्डचीपरारिणड (३३१।२०) मुण्डमिश्रलक्षण ( ३।१।२१) सत्यापपाशरूप ( ३।१।२५ ) इन सूत्रो को ही गणशैली का सहारा लेकर उन्हे लघुरूप मे उपस्थित करने का प्रयास क्सिी अर्वाचीन वैयाकरण द्वारा श्लोको मे किया गया है । परन्तु यदि ये श्लोक वस्तुत प्राचीन आचार्य भागुरि के ही हो तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि भागुरि ने पाणिनि की अपक्षा कहीं अधिक गणशैली का उपयोग किया था। इन श्लोको के आधार पर भले ही हम भागुरि के व्याकरण मे गण गेली के उपयोग के विषय मे निश्चित रूप से कुछ न कह सके पर भापा वृत्तियार ये साक्ष्य पर इतना तो स्वीकार करना ही होगा कि भागुरि के व्यापरण मे गणशैली अवश्य अपनायी गई थी। भाषावृत्तिकार ने यह सूचना दी है कि भागुरि के स्थस्रादि गण मे नप्त शब्द का भी पाठ था १ सं० च्या शास्त्र का इतिहास, भाग १, पृष्ठ ७१ । २. सम्पादक के मत में ये श्लोक भागुरि प्रोक्त ही हैं। द्रव्य इसी ग्रन्थ का परिशिष्ट । ३ नप्तति मागुरिः । ४११०॥ [कातन्त्र-परिशिष्ट की गोपीनाथ कृत टीका पृष्ठ १८९ गुरुनाथ विद्यापति का संस्क०) में 'नप्तति मागवृत्ति., नप्त्रीति मगुरिः पाठ मिलता है । 'नप्त शम्द से स्त्रीलिष्ट्र में होप नही होता' यह मत भागवृत्तिकार के नाम ये शब्दकोस्लम (भाग ३, पृष्ठ १०) तथा दुर्घवृत्ति (पृष्ठ ७४) में भी उद्धृत है । ६. हमारा मागाचि संकलन, ४११।१०। हमारे विचार में भाषावृत्ति का पाठ यहा गरिस्त है। पाठ कुछ भी हो, दोनों पदों में भागुरि ये व्याकरण में 'स्वसादि' गण था, mअंग तो रागा पर है। स०] पाणिनि से प्राचीन वैयाकरण और उनके गणपाठ काशकृत्स्न तथा गणशैली डेकेन कालेज पूना से ए. एन. नरसिम्मैया सम्मादित 'काशकृत्स्न शब्द कलाप धातुपाठ' नाम का एक ग्रन्थ प्रकाशित हुआ है।' इस धातुपाठ पर चन्नवीर कविकृत बन्नड टीका भी है। इस टीका मे आचार्य काशकृत्स्न के लगभग १३५ व्याकरण सूत्र उद्घृत हैं। इन से काशकृत्स्न व्याकरण की रूपरेखा का पर्याप्त परिचय प्राप्त हो जाता है। इन्ही सूत्रो मे सौभाग्य से एक ऐसा सूत्र भी है, जिस से संकेत मिलता है कि काशकृत्स्न व्याकरण मे गणशैली का उपयोग किया गया था। वह सूत्र है-- क्षिप्नादीनां न नो णः । पृष्ठ २४७ । इस सून के द्वारा तिम् आदि धातुओ से निप्पन्न शब्दो मे णत्व का निपेय किया गया है। काशकृत्स्न के इम सूत्र को पूरी तुलना पाणिनि के तुझ्नादिपु च (४।३९) सूत्र से की जा सकती है। आपिशलि तथा उनका गणपाठ पाणिनि ने अपने से पूर्ववर्ती वैयाकरण आपिशलि का अपने शब्दानुशासन मे साक्षात् उल्लेख किया है। श्री प० युधिष्ठिर मीमासक ने व्याकरण शास्त्रीय विशाल वाड मय मे इतस्तत विप्रकीर्ण आपिशलि के दस सूत्रों को प्रस्तुत किया है। पतञ्जलि ने आपिाल के एक नियम को प्रमाणरूप मे महाभाष्य मे उद्वृत किया है । पदम जरीकार हरदत्त ने आपिशलिच्याकरण को पाणि- १ काशकस्न व्याकरण के सबन्ध में विशेष देखे-स. व्या० शास्त्र का इतिहास भाग २, अ० २०; तथा 'काशकृत्स्न व्याकरण और उसके उपलब्ध सूत्र' नामक निबन्ध ! २ वा सुप्यापिशने. 1 पा० ६.१६[ श्रापिशलि-प्रोक्त शिक्षा का उल्लेख भी पाणिनि ने अपनी सूत्रात्मक शिक्षा के पाठचे प्रकरण में क्यिा है-'स एव. मापिशनेः पञ्चदशभेदाख्या वर्णधर्मा भवन्ति' (पूर्णसख्या ११६) । द्रष्टव्य हमारे द्वारा सम्पादित पाखिनीय शिक्षा सम्मा] ३ स० व्या० शास्त्र का इतिहास, भाग१, पृष्ठ ६८-६६ (प्र० स०)। ४ एव च कृत्वा श्रापिश नेराचार्यस्य विधिरुपपन्नो भवति-धेनोरनजिकमुत्पा दयति । महा० ४।२।४५|| ४ २६ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि नीय-व्याकरण की पृष्ठभूमि स्वीकार किया है।' इस प्रकार निश्चित रूप से पाणिनि से प्राचीन एव सुप्रतिष्ठित वैयाकरण आपिशलि के धातुपाठ की सत्ता को पतञ्जलि और काशिकाकार ने अस्पष्ट रूप मे तथा स्कन्दस्वामी और जिनेन्द्रबुद्धि' ने नाम निर्देशपूर्वक स्पष्टरूप मे स्वीकार किया है । इसी प्रकार आपिशलि के सर्वादि गण की ओर मी पत अलि और कैयट ने अस्पष्टरूप से सकेत किया है। आचार्य भर्तृहरि ने आपिशलि का नामोल्लेख पूर्वक इस बात की स्पष्ट सूचना दी है कि आपिशलि के सर्वादिगण मे पाणिनि के सर्वादिगण की अपेक्षा शब्दो के विन्यास मे कुछ भिन्न क्रम अपनाया गया था। उसमे त्यद् आदि शब्दो से पूर्व किम् को और उससे लेकर अस्मत् पर्यन्त शब्दो का पाठ करके पूर्वापराधर आदि गणसूयो अथवा शब्दो को स्थान दिया गया था। उक्त सूचनाए इस तथ्य को प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त प्रमाण है कि आचार्य आपिशलि ने अपने व्याकरण की दृष्टि से गणपाठ और धातपाठ दोनो की निर्धारणा की थी। १-कथं पुनराचायण पाणिनिना अवगतमेते साधव इति ' आपिशलेन पूर्व व्याकरणन । प० म० भाग १, पृष्ठ ६ । पाणिनिरपि स्खकाले शब्दान् प्रत्यक्षयन् श्रापिशलादिना पुरस्मिन्नपि काले सत्तामनुस धत्ते, एवमापिशलिरपि । ५० म० भाग १, पृष्ठ [पाणिनीय शिक्षासूत्रों की प्रापिशल शिक्षासूत्रों के साथ तुलना करने से भी यही परिणाम निकलता है कि पणिनीय शिक्षास्त्रो की पृष्ठभूमि श्रापिशल शिक्षा सूप ही थे। सम्पा०] २ अस्ति सकारमात्रमातिष्ठते । महा० ११३।२२।। काशिका १९३१२२|| ३ उपिजिघताति छादसौ धात् व्याकरणस्य शासान्तरे श्रापिशलादी स्म रणात् । निरुत भाष्य, भाग २, पृष्ठ २२ । ४ सकारमात्रमस्ति धातुमापिशलिराचार्य प्रतिजानीते । तथाहि न पाणिनरिव श्रस भुवीति पाठ । न्यास १२२२२, पृष्ठ २२६ । ५ द्र. त्यादादीनीति गण पटि वा वैश्चित् पूर्वादीनि पठितानि । महा० नवा० - तस्य ६ इह यदादीन्यापिशले विमादीनि अस्मत्पर्यन्तानि, तत पूर्वापराधरेति । उद्धृत सं० च्या० का इतिहास, भाग १, पृष्ठ १०२ (प्र० स०)।

पाणिनि से प्राचीन वैयाकरण और उनके गणपाठ उणादिसूत्र तथा गणशैली उणादि सूनो के कर्ता तथा उनके समय के विषय मे व्याकरण शास्त्र मे ऐतिहासिक मनीपा रखने वाले विद्वानो मे पर्याप्त मतभेद है । नागेश भट्ट का विचार है कि उणादि सूर प्राचीन आचार्य शाकटायन द्वारा रचित हैं।' प्रो० मैक्समूलर ने इन स्त्रो को पाणिनि से प्राचीन माना है। गोल्डस्टूकर ने यह विचार उपस्थित किया है कि सम्प्रति उपलव्य उणादि सूत्रो का प्रणयन आचा र्य पाणिनि ने शाकटायन-व्याकरण के आधार पर किया था। पर उनमे बाद मे कात्यायन ने प्रचुर परिवर्तन, परिवर्धन तथा सशोधन किया । इसी कारण वैयाकरण-परम्परा ने उनकी रचना का श्रेय कात्यायन को देना आरम्भ कर दिया, जिनका दूसरा नाम वररुचि था।' थोडेर आफेक्ट ने उणादि सूत्रो का उज्ज्वलदत्त की वृत्ति के साथ सम्पा- दन किया है । इस स्वसम्पादित ग्रन्थ की भूमिका मे कुछ रोचक हेतुओ को प्रस्तुत करके यह प्रतिपादन किया है कि "उणादि सूनो के कर्ता तथा उनके समय का पूरा-पूरा निश्चय भले ही न हो, पर इतना तो सर्वथा निश्चित है कि उणादि सून अपने को पाणिनि से पर्याप्त प्राचीन प्रमाणित करते हैं।" सम्पादक का कहना है कि "उणादि सूनो मे कृपेर्वृद्धिश्चोदीचाम् (१९६) तथा कृत्र उदीचां कारुपु (५६५) इन दो सूनो से यह पता लगता है कि इस ग्रन्थ के रचयिता के समय, उत्तर देशवासियो के द्वारा खेती करने हारो के लिए कार्पक तथा शिल्पी के लिए कारी शब्द का प्रयोग होता था । उत्तर देशवासियो के शब्द प्रयोग की यह स्थिति निश्चित ही पाणिनि के समय नहीं थी।'' इसी तरह "भूसूधूभ्रस्जिभ्यश्छन्दसि (२३८) तथा अशि- १ द्र० लधुशन्देन्दुशेखर, पूर्वार्ध ३।३।३१, पृष्ठ ४८६, ४८८, ४६० । २ ए हिस्टरी श्राफ एन्शिएएट संस्कृत लिटरेचर, पृष्ठ ७७ । ३ पाणिनि हिज प्लेस इन सस्कृत लिटरेचर, पृष्ठ १६७-१७० । ४ द्र० भूमिका भाग, पृष्ठ १३ । ५ पाणिनि ने अाध्यायी में कई स्थानो पर उदीच्य और प्राच्य देशवासियों द्वारा प्रयुक्त शन्दों का अनुशासन किया है। यथा-अभ० ४११११५३, १५७, १६० ॥ अतः प्राक्ट का लेस हेतुरहित कल्पनाप्रसूत होने से प्रमाणाहं नहीं हो सकता सम्पा०1 पाणिनि से प्राचीन वैयाकरण और उनके गणपाठ २९ मैक्समूलर फिटसूत्रों को पाणिनि से प्राचीन मानते है ।' गोल्डस्टूकर ने भट्टोजी दीक्षित की फिटसूत्र विषयक व्याख्या के दो एक स्थलों को उपस्थित करते हुए (केवल उन्हीं के आधार पर ) फिटसूत्रों को पाणिनि से अर्वाचीन मानना चाहा है । परन्तु चन्द्रगोभी की चान्द्रवृत्ति के एक स्थल से यह पूर्ण निश्चय हो जाता है कि फिटसूत्र पाणिनि से प्राचीन है। वह स्थल इस प्रकार है- एप प्रत्याहारः पूर्वव्याकरणेऽपि स्थित एव । अयं तु विशेषः-- एरोप् इति यदासीत् तद् एनोज इति कृतम् । तथाहि लघायन्ते द्वयोश्च वह्वपो गुरुः, तृणधान्यानां च द्वधेपाम् इति पठ्यते ।' चान्द्रवृतिकार ने इन पक्तियों में प्रत्यहार शैली की पाणिनि से प्राचीनता तथा प्राचीन प्रत्याहारों की पाणिनीय प्रत्याहारों से भिन्नता दिखाते हुए उदाहरण के रूप मे फिट्सुत्र के दो सुत्र उद्धृत किये है । इम उद्वरण से फिटसूत्रों की पाणिनि की अपेक्षा प्राकालिकता के विषय में उत्पन्न होने वाली सभी शङ्काएं समाप्त हो जाती है । इस प्रकार पाणिनि से सुनिश्चित प्राचीन फिट्सूत्र जैसे छोटे संग्रह में घृतादि (११), 'प्रामादि (३८), कर्दमादि (५९), एवादि (८२) तथा वाचादि (८३) जैसे आकृति-गणों को विद्यमानता हमारी पूर्वोक्त 'गणशैली के पाणिनि से पूर्व आविर्भूत होने की' धारणा का पर्याप्त एवं अकाट्यरूपेण पोपक है। पाणिनि से पौर्वकालिक गणपाठों की सत्ता के अन्य संकेत अब कुछ ऐसे प्रमाण अयवा वचन उद्धृत किये जाते है, जिन से पाणिनि से प्राचीन आचार्यो के गणपाठों के विषय मे थोडा बहुत आभास मिलता है ( अधिक कुछ नहीं ) । विद्वानों का ध्यान इस ओर आकृष्ट करने के लिए इन संकेतों को उपस्थित करना आवश्यक है। अष्टाध्यायी से प्राप्त संकेत पाणिनि के चूर्णादीन्यप्राणिपष्ठया. ( ६।२।१३४) स्त्र का पाठान्तर चूर्णादीन्यप्राण्युपग्रहात् के रूप मे उपलब्ध होता है। इस पाठान्तर मे १. द्र० ए हिस्टरी ग्राफ एशियेण्ट संस्कृत लिटरेचर, पृष्ठ ७८ । २. चान्द्रवृत्ति, क्षितीशचन्द्र चटर्जी सम्पादित, प्रथम भाग, पृष्ठ ६ । ३.द्र० काशिका ६।२।१३४॥

सं० व्या० में गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि पाणिनि के सूत्र में विद्यमान षष्ठी पद के स्थान में उपग्रह शब्द का प्रयोग मिलता है । पाणिनीय सम्प्रदाय के वैयाकरण अच्छे प्रकार जानते हैं कि पाणिनि ने कही भी उपग्रह पद का प्रयोग नहीं किया । इस सम्प्रदाय में यदि कहीं उपग्रह पद का प्रयोग मिलता भी है तो वह आत्मनेपद और परस्मै- पद का वोध कराने के लिए किया गया है, न कि पष्ठी विभक्ति के लिए। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि चूर्णादीन्यप्राण्युपग्रहात् सूत्र किसी प्राचीन आचार्य का है । अर्थ की दृष्टि से सर्वथा समान दिखाई देने के कारण चूर्णा- दीन्यप्राण्युपग्रहात् सूत्र भी उपर्युक्त पाणिनीय सूत्र के पाठान्तर रूप में वृत्तिकारों द्वारा निर्दिष्ट होता चला आ रहा है । इसलिए यह संभावना स्वीकार्य हो सकती है कि पाणिनि के चूर्णादि गण का निर्धारण, पाठान्तर के रूप में स्मृत प्राचीन सूत्र के रचयिता आचार्य द्वारा हो चुका था । यह भी ध्यान रहे कि यह सूत्र समास-स्वरविषयक है, इसलिए पाणिनि से पूर्ववर्ती व्याकरणों भी पाणिनि के समान ही स्वर का विधान था, यह भी सष्ट है । पाणिनीय गणपाठ से प्राप्त संकेत पाणिनि के यस्कादि गण (२०४।६३ ) में पुष्करस्त् शब्द का पाठ मिलता है । यदि विचार किया जाए तो इस शब्द के यस्कादि गण में पढ़ने की कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। यस्कादि गण में विद्यमान शब्दों मे बहुवचन में वर्तमान गोत्रप्रत्यय के लुक् का विधान किया जाता है । यनः पुष्करसत् शब्द प्राच्यगोत्र से संबन्ध रखता है, इसलिए इस से अभीष्ट लुगविधान कार्य पाणिनि के एक अन्य सूत्र यवन इनः प्राच्यभरतेपु (२।४।६६ ) से हो जाता है। यस्कादि गण में पठित 'पुष्करसत्' शब्द को, : उक्त अनावश्यक पाठ की स्थिति से बचाने के लिए हरदत्त ने अपनी पदमचरी मे यह विचार उपस्थित किया है कि सम्भवतः पाणिनि से प्राचीन किमी वैयाकरण ने अपने गोपयनादि गण में तौल्यल्यादयश्च' दाक्य भी पढा था (ध्यान रहे कि पाणिनि के गोपवनादि गण में तौल्यल्यादयश्च १. द्र० 'मुतिपग्रहलिन्ननराणान् । महा० ३३०८।। २. द्र० यस्तादिम्यो गो। पा० २।४।६३ ।। ३. यहां प्रा० २।४१६१ में पठित 'न तोल्वलिम्या' स्त्र का पाठ न करके गोरानादि फे अन्तर्गत ही तोल्पल्यादि को पढ़ा या, यह अभिप्राय नहीं है । क्योंकि पाणिनि से प्राचीन वैयाकरण और उनके गणपाठ पाठ नही है ) । इस का अभिप्राय यह हुआ कि किसी प्राचीन आचार्य ने तौल्बल्यादि गण मे विद्यमान शब्दो की प्रकृतियो का भी गोपधनादिगण मे अन्तर्भाव माना था । यत 'तोल्वल्यादि गण मे 'पुप्वरमत् गब्द भी पठिन है इसलिए उस प्राचीन आचार्य के गणपाठ की दृष्टि से उसो 'गोपवनादि' गण मे 'पुष्करसन्' शब्द भी अन्तर्भूत था। तदनुसार न गोपवनादिभ्य (२४६७) मून जो गोपवनादि गण मे पठित शन्दो मे यस्कादिभ्य गोत्र ( २१६३ ) इत्यादि से प्राप्त होने वाले गोत्रप्रत्ययो की लुक्प्राप्ति का प्रतिपेय करता है, वह 'पुष्परमत्' शब्द के साथ सयुक्त होने वाले गोगप्रत्यय के लुक् का भी प्रतिषेध कर देता है । इसलिए न गोपथना दिभ्य ( २ ॥६७ ) से प्राप्त लुकप्रतिपेव को रोकने के लिए अर्थात् पुन लुक् की प्राप्ति कराने के लिए यस्त्रादि गण मे 'पुपरसत्' शब्द का पाठ क्यिा है।' दूमरे शन्दो मे हने यह स्वीकार होगा कि आचार्य पाणिनि ने रिमी प्राचीन आचार्य के गणमाठ की दृष्टि से अपने यस्त्रादि गण मे पुष्करमत्' शब्द का पाठ किया है। यदि कोई यह कहे वि फाणिनि के अपने गणपाठ को दृष्टि से कोई अव्यवस्था उत्पन्न नही हो रही थी, पुन पाणिनि ने यस्कादि गण मे पुष्करसत् शब्द का पाठ क्यो किया ? इस का उत्तर यह है कि जिस प्रकार अनेक स्थानो मे महाभाष्यकार अनर्थक सज्ज्ञापयत्यावार्य न्याय 'न तौल्वलिभ्य.' ( २।४.६१ ) सूत्र पृथस्त्र से प्राप्त युवप्रत्यय क लोप का निषेध करता है, और 'न गोपपनादिभ्य ' (२।४।६७) स्त्र गोत्र में विहित प्रत्यय के बहुवचन में विहित लुम्विधान का प्रतिषेध करता है । दोनों का अपना भिन्न भिन्न कार्य है । इस- लिए गोपवनादि गण में पठित 'तौल्वल्यादयश्च' सूत्र का 'न तौल्वलिम्य' सूत्र के कार्य से कोई समन्य नहीं है । हा, 'न तौल्वलिभ्य' सूत्र में निर्दिष्ट तौल्वल्यादि गण का इसमें भी समावेश माना है। तदनुसार 'तौल्वलि तौल्वली, तौल्वलय' अादि में बहुवचन में इप्रत्यय का लोप नहीं होता । सम्पादक । १ एव तर्हि गोपवनादिषु केचित् तौल्वल्यादयश्चेति पठन्ति । तौल्वल्यादिषु पठिता प्रकृतिभागा अपि गोपवनादिषु द्रव्या इत्यर्थ । तेन 'न गोपवनादिभ्य' इति निषेधे प्रासे अवास्य पाठ । अयमेव च पाठो शपयति गोपवनादिषु तौल्वल्या दयोऽपि पठिता । पदमञ्जरी, माग १ पृष्ठ ४८६ । [ यही मत न्यासकार जिनेन्द्रबुद्धि काभी ह । द्रष्टव्य न्यास २।४।६३, भाग १, पृष्ठ ४७३ । सम्पादक] - ३० स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि पाणिनि के सूत्र में विद्यमान पष्ठी पद के स्थान मे उपग्रह शब्द का प्रयोग मिलता है। पाणिनीय सम्प्रदाय के वैयाकरण अच्छे प्रकार जानते है कि पाणिनि ने कही भी उपग्रह पद का प्रयोग नही किया । इस सम्प्रदाय मे यदि क्ही उपग्रह पद का प्रयोग मिलता भी है तो वह आत्मनेपद और परस्मै- पद का बोध कराने के लिए किया गया है, न कि पष्ठी विभक्ति के लिए। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि चूर्णादीन्यप्राण्युपग्रहात् सूत्र किसी प्राचीन आचार्य का है । अर्थ की दृष्टि से सर्वथा समान दिखाई देने के कारण चूर्णा- दीन्यप्राण्युपग्रहात् सून भी उपयुक्त पाणिनीय सून के पाठान्तर रूप मे वृत्तिकारो द्वारा निर्दिष्ट होता चला आ रहा है । इसलिए यह सभावना स्वीकार्य हो सकती है कि पाणिनि के चूर्णादि गण का निर्धारण, पाठान्तर के रूप मे स्मृत प्राचीन सूत्र के रचयिता आचार्य द्वारा हो चुका था। यह भी ध्यान रहे कि यह सून समास स्वरविषयक है, इसलिए पाणिनि से पूर्ववर्ती व्याकरणो मे भी पाणिनि के समान ही स्वर का विधान था, यह भी सष्ट है। पाणिनीय गणपाठ से प्राप्त संकेत पाणिनि के यस्कादि गण (२।४।६३) मे पुष्करसत् शब्द का पाठ मिलता है । यदि विचार किया जाए तो इस शब्द के यस्कादि गण मे पढने की कोई आवश्यक्ता प्रतीत नही होती । यस्कादि गण मे विद्यमान शब्दो से बहुवचन मे वर्तमान गोत्रप्रत्यय के लुक् का विधान किया जाता है। यन. पुप्फरसत् शब्द प्राच्यगोत्र से सबन्ध रखता है, इसलिए इस से अभीष्ट लुगविधान कार्य पाणिनि के एक अन्य स्त्र यहच इञः प्राच्यभरतेषु (२।४।६६ ) से हो जाता है। यस्कादि गण मे पठित 'पुष्करसत्' शब्द को, 'उक्त अनावश्यक पाठ की स्थिति से बचाने के लिए हरदत्त ने अपनी पदम जरी में यह विचार उपस्थित किया है कि सम्भवत पाणिनि से प्राचीन किमी वैयाररण ने अपने गोपवनादि गण मे तौलल्यादयश्च वाक्य भी पटा था (ध्यान रह दि पाणिनि के गोपवनादि गण मे तौल्बल्यादयश्च १ द्र० 'मुतिष्पग्रहलिङ्गनराणाम् । महा० ३३११८५॥ २ द्र० यस्तादिम्यो गोधे । पा० २।४।६३ ।। ३ यहा अण. २०४१६१ में पठित 'न तोल्यलिम्य.' स्त्र का पाठ न करके गोरयनादि फे अन्तर्गत ही तौल्पल्यादि को पढ़ा था, यह अभिप्राय नहीं है। क्योंकि पाणिनि से प्राचीन वैयाकरण और उनके गणपाठ पाठ नही है ) । इस का अभिप्राय यह हुआ कि किसी प्राचीन आचार्य ने तौल्बल्यादि गण मे विद्यमान शब्दो की प्रकृतियो का भी गोपरनादि गण मे अन्तर्भाव माना था । यत 'तौल्बल्यादि' गण में 'पुष्करमत्' शब्द भी पठिन है इसलिए उत प्राचीन आचार्य के गणपाठ की दृष्टि से उसने 'गोरवनादि' गण में 'पुष्करमन्' शब्द भी अन्तर्भूत था। तदनुसार न गोपयनादिभ्यः (२०६७) मूत्र जो गोपवनादि गण में पठित शब्दो से यस्कादिभ्य गोत्र ( रा॥६३ ) इत्यादि से प्राप्त होने वाले गोत्रप्रत्ययो की लुप्राप्ति का प्रतिपेय करता है, वह 'पुष्करमत्' शब्द के साथ सयुक्त होने वाले गोत्रप्रत्यय के लुक् का भी प्रतिपेच वर देता है । इसलिए न गोपना दिभ्यः ( राहा६७ ) से प्राप्त लुकप्रतिषेध को रोकने के लिए अर्थात् पुन लुक की प्राप्ति कराने के लिए यस्तादि गण मे 'पुपरसत्' शब्द का पाठ किया है। दूसरे शब्दो मे हने यह स्वीकारहोगा कि आचार्य पाणिनि ने किमी प्राचीन आचार्य के गणपाठ की दृष्टि से अपने यस्मादि गण मे 'पुष्करमत्' शब्द का पाठ किया है । यदि कोई यह कहे कि पाणिनि ने अपने गणपाठ को दृष्टि से कोई अव्यवस्था उत्पन्न नहीं हो रही थी, पुन. पाणिनि ने यस्कादि गरण मे पुष्करसत् शब्द का पाठ क्यो निया ? इस का उत्तर यह है कि जिस प्रकार अनेक स्थानो मे महाभाष्यकार अनर्थक सज्ञापयत्याचार्य. न्याय 'न तौल्वलिभ्य.' ( २।४.६१ ) स्त्र पृथस्त्र से प्राप्त युवप्रत्यय के लोप का निषेध करता है, और 'न गोपपनादिम्य ' (२।४१६७) स्त्र गोत्र में विहित प्रत्यय के बहुवचन में विहित लुम्विधान का प्रतिषेध करता है। दोनों का अपना मिन भिन्न कार्य है । इस लिए गोपवनादि गण में पठित 'तौल्वल्यादयश्च' स्त्र का 'न तौल्वलिभ्य' सूत्र में कार्य से कोई सपन्य नहीं है। हा, तौल्वलिभ्य' सूत्र में निर्दिष्ट तौल्बल्यादि गण का इसमें भी समावेश माना है। तदनुसार 'तौल्वलि तैोल्वली, तौल्वलय' श्रादि में बहुवचन में इन्प्रत्यय का लोप नहीं होता । सम्पादक । १ एव तर्हि गोपवनादिषु केचित् तौल्यल्यादयश्चेति पठन्ति । तौल्वल्यादिषु पठिता प्रकृतिभागा अपि गोपवनादिषु द्रष्टव्या इत्यर्थ । तेन 'न गोपवनादिम्य इति निषेधे प्राप्ते अवास्य पाठ । अयमेव च पाठो रापयति गोपवनादिषु तौल्वल्या दयोऽपि पठिता । पदमञ्जरी, भाग १ पृष्ठ ४८६ । [ यही मत न्यासकार जिनेन्द्रबुद्धि का भी है । द्रष्टव्य न्यास २।४।६३, पृष्ठ ४७३ । सम्पादक , ." भाग १, स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि के अनुमार किसी पाणिनीय पद की अनर्थकता से अर्थ विशेष का ज्ञापन करते हैं । उसी प्रकार यहा भी यस्कादि गण मे 'पुष्करसत्' पद का पाठ अनर्थक होकर ज्ञापन करता है कि गोपवनादि गण मे तौल्बल्यादि प्रकृतियो का भी पाठ है ( यही ज्ञापन पदमरीकार हरदत्त और न्यासकार जिनेन्द्र बुद्वि ने किया है ) । इस ज्ञापक से तौल्पलि आदि शब्दो के बहुवचन मे इन का लोप नही होता । यदि यह ज्ञापन न माना जाय तो यस्कादि मे पुष्कर मत् शब्द का पाठ तो अनर्थक होगा ही, साथ मे तौल्वलि आदि शब्दो के वहुवचन मे गोनप्रत्यय का लुग प्राप्त होगा, जो कि इष्ट नहीं है। पाणिनीय गणमाठ मे उस्थादि (४।२०६०) तया कथादि (४४१०२) गणा मे वृत्ति, संग्रह, गण, आयुर्वेद प्रभृति शब्दो का समान पठ मिलता है। ये सभी शब्द विभिन विषयो तया उनके ग्रन्थविशेपो के वाचक है। इन में भी वृत्ति और संग्रह ये दो शब्द तो सभवत व्याकरण क्षेत्र के ही ग्रन्थो के वाचक है। अत दोनो गणो मे ममानरूप से पठिन गण शब्द भी, जैसा कि भट्ट यज्ञेश्वर का निश्चित विचार है, गणपाठ का ही वोधक है ।' अत यह स्वीकार करना पडेगा कि यहा गणकार पाणिनि ने अपने से प्राचीन किसी या फिन्ही गण पाठो को ध्यान मे रसकर गणमीधयानो चिदन या अथवा गणे साधु इन अर्थों मे प्राज्यमान गाणिक शब्द के माधुत्व के लिए गए शब्द को उपर्युक्त गणो मे प्रस्तुत किया है। श्री डा. वासुदेवशरण अग्रवाल ने उक्थादि गण में केवल काशिका के मुद्रित पाठ वे अनुवरण पर गण गुण शब्दो के स्थान मे गुणागुण पाठ माना है। तया 'गुण' गब्द को अदेड्गुण (११११२) सूत्र से सहित गुण और 'अगुण' को वृद्धि का वोवर स्वीकार किया। परन्तु फेवल काशिका मुद्रित गणपठ को छोडकर अन्य किसी भी पणिनीय अथवा पाणिनीयेतर मुद्रित गणपाठो मे तया उनो हस्तलेखा मे उक्यादि गण में गुणागुण पार नहीं मिलता । सर्वत्र गुण, गण इन दो शब्दो का ही पाठ मिलता है। 'क्यादि' गण के पाठ की तुलना से यह वात और भी स्पष्ट हो जाती है । वहा वाशिमा में भी गुण, गण इन दो शब्दो का ही पाठ मिलता है । यह भी ध्यान रहे कि 'उक्यादि' तथा 'क्थादि' दोनो गणो में वृत्ति, संग्रह, १. गणो गणगाठ 1 तमधीयानो चिदन् वा गारिक । गणरमाली, पृष्ठ ६८ । २. इण्डिया एज नोन टु पाणिनि, पृष्ठ ३४८ -- पाणिनि से प्राचीन वैयाकरण और उनके गणपाठ गुण, गण, आयुर्वेद ये पाचों शब्द लगभग एक ही क्रम से पठित हैं। केवल गुण तथा गण शब्दों के विन्यास मे पौर्वापर्य है । 'उक्यादि' गण में गण शब्द प्रयम पठित है और गुण वाद में, परन्तु 'कथादि' गण मे गुण प्रथम है गण बाद में । इसलिए दोनों गणों में गुण तया गण शब्दों का ही पाठ मानना होगा और वह भी पृथक्-पृथक् । ऐसी स्थिति गुणागुण पाठ के अनौ. चित्य स्वीकार करने के लिए हम वाध्य हैं। इतना ही नहीं, डा० अग्रवाल के द्वारा किया गया अगुण शब्द का वृद्धि अर्थ समूर्ण वैयाकरण वाङ्मय उपलब्ध नहीं होता। इसलिए डा० अग्रवाल द्वारा स्वीकृत तथा व्याख्यात पाठ के साय हम किसी भी प्रकार सहमत नही हो सकते । ऐसी स्थिति मे गण शब्द का पाठ ही स्वीकार्य होता है । उस अवस्था में गण शब्द को पाणिनि से प्राचीन किसी गणपाठ का अयवा गणप्रक्रिया का बोवक मानना सर्वथा युक्तियुक्त है। इसके अतिरिक्त पाणिनि के गौरादि (१११४१) गण के अन्त में पिप्प- ल्यादयश्च एक गणसूत्र मिलता है । इस गणसूत्र के द्वारा किसी पिप्पल्यादि गण का निर्देश किया गया है, यह सर्वथा स्पष्ट है । परन्तु पाणिनि ने अपने गणपाठ में पिप्पल्यादि नाम के किसी गण का निर्देश अन्यत्र नहीं किया। हां, इस गणसूत्र के साथ ही पिप्पली, हरीतकी, कोशातकी, शमी, करीरी, पृथिवी, क्रोष्ट्री' इतने शब्दों का पाठ भी पाणिनीय गणपाठ में उपलब्ध होता है, जो सम्भवतः वृत्तिकारों द्वारा संगृहीत है । यहां यह विचारणीय है कि 'गौरादि' गण में पिप्पल्यादयश्च गणसूत्र की तथा उसके द्वारा पिप्पल्यादि गण के निर्देश की क्या आवश्यकता है। यह तो संस्कृत व्याकरण का सामान्य विद्यार्थी भीजानता है कि गौरादिगण आकृतिगण है। आकृतिगण की परिभाषा करते हुए वैयाकरणों ने यह स्वीकार किया है कि प्रयोग की समानता के आधार पर आकृति गणों मे यथेच्छ शब्दों का अन्तर्भाव किया जा सकता है। पदमञ्जरीकार ने स्पष्ट कहा है-प्रयोगदर्शनेन आकृति-ग्रायो गण श्राक- तिगणः । इसलिए गौरादिगण के आकृतिगण होने के कारण पिप्पल्यादि से निर्दिष्ट पिप्पली, हरीतकी इत्यादि सभी शब्दों का गौरादिगण में स्वतः १. महाभाष्य १६७ तथा उसके प्रदीप व्याख्यान के अनुसार डीघ्रहित उकारान्त 'क्रोध' शब्द का पाठ होना चाहिए । २. १०म० माग १, पृष्ठ ३८० स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि अन्तर्भाव हो आता है और इस रूप मे पिप्पल्यादि गण के शब्दो से डी की प्राप्ति सर्वथा सुगम है। यदि पिप्पल्यादि गण की सत्ता ही अभीष्ट हो तो स्वयं उसके भी आकृतिगण होने से उसमे ही गौरादिगण से निष्पन्न गौरी' आदि अभीष्ट शब्दो का अन्तर्भाव हो जाएगा । तदनुसार गौरादिगण की सत्ता अवा ञ्छनीय एवं अस्वीकार्य हो जाती है । इसलिए न्यूनानिन्यून पाणिनीय गणपाठ की दृष्टि से गौरादिगण मे पिष्पत्यादयश्च गणसून तथा उससे निर्दिष्ट पिप्प ल्यादि गण का निर्धारण सर्वया अनावश्यक है। लोहितादि (४।१।१८) हरितादि (१११००) अयवा करमादि (११११११) जैसे अवान्तर गणो के समान इस पिप्पल्यादि गण को अवान्तर गण भी नहीं माना जा सकता क्योकि अष्ट ध्यायी के किसी सूत्र मे अवान्तरगण के रूप मे इस गण का प्रयोग पाणिनि ने नही किया है। इतना ही नही दोनो गौरादि तथा पिप्पल्यादि गणो के शब्दस्वरूपो मे एक मौलिक अन्तर भी है। यदि एक के शब्द अकारान्त है तो दूसरे के ईकारान्त । तथा यदि एक के शब्द अनिप्पन (रोप रहित ) है तो दूसरे के निप्पन्न (डीपन्त ) । इसलिए भी पिप्पल्यादि को गौरादि का अवन्तरगण नही माना जा सकता । अत हमारी यह निश्चित धारणा है वि गौरादि गण मे गणसूत्र के रूप मे दिखाई देने वाना पिप्पल्यादयश्च वाक्य पाणिनि से प्राचीन किसी वैयाकरण सूत्रकार का सत्र है उसीने अपने गणपाठ म पिप्परयादि गण का भी निर्धारण दिया था। पाणिनि ने सम्भवत लाघव की दृष्टि से पिप्पल्यादि नाम न रखकर उम व स्थान मे गौरादि नाम ही रखना उचित समझा परन्तु दोनो गणो या अभिप्राय एक होने के कारण अनावश्यर होने पर भी प्रमादवश पाणिनि व गोरादिगण म पूवाचार्य निधारित पिप्पल्यादि गण अपने कुछ गन्दा क माय अपनी आकृति गणनाको द्योतन करते हुए आज भी अपनी मत्ता बनाए हुए है। १ सिल्यादयो गौरादिशु पटपन्न । सीप तपाटस्तु चिन्यप्रयोजन । किच अवान्तरगण वाभ्युपगमोऽपि । बालमनोरमा (४११:४१)। २. 'रियल्यादयश्च गणराव और उसके उदाहरणभूत 'पृथिवी मोटी अादि पदों के विषय में अशा E६ का 'एव गौरादिशु पाटादीकारो भविष्यति गोरादिपु न पश्यत । हि विधि मन्तं गौरादिपु पटवते इति' भाप्यमय और पाणिनि से प्राचीन वैयाकरण और उनके गणपाठ ३५ इसी प्रकार पाणिनीय गणपाठ के कुछ गणो के शब्दो तथा उनमा निर्देश करने वाले अध्यायी के उन उन सूत्रो मे आए शब्दो के स्वरूपो पर विचार करे तो प्रस्तुत प्रसग से संबन्ध रखने वाले कुछ और संकेत भी उपलब्ध हो सकते हैं । उदाहरण के लिए नन्द्यादि (३।१।१३४), प्रद्यादि, (३६१११३४ ) पचादि ( २।१।१३४ ) तथा भिदादि ( ३२३३१०४ ) गण द्रष्टव्य है । स्पष्ट है कि इन गणो मे नन्दन. ग्राही, पचः तथा भिदा जसे निप्पन्न शब्दो का पाठ किया गया है । यह स्वरूप उन उन सूत्रो से विधीय. मान प्रत्ययो का उन उन धातुओ के साथ सयोग होने पर ही बनता है, परन्तु इन गणो से सबन्ध रखकर अभिप्रेत प्रत्ययो का विधान करने वाले नन्दि- ग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः (३।१।१३४) तथा पिभिदादिभ्योऽङ ( ३।३।१०४ ) सूत्रो में इनकी प्रकृतिभूत नन्दि, अहि, पच, भिद आदि धातुओ का ही निर्देश दिया गया है। इस विषमता के साथ साथ, ठीक इस पे विपरीत स्थिति भी गणपाठ में उपलब्ध होती है। नित्य सपल्यादिपु (४११६३५ ) सून गणपाठ के सपल्यादि गण से संबन्ध रसता है । परन्तु दोनो मे पर्याप्त विपमता है । गणपाठ के इस गण मे समान, एक, पीर आदि पत्नी-शब्दरहित केवल पूर्वपद के शब्दो का ही पाठ मिलता है। परन्तु सूत्र मे गणनिर्देशक शब्द सपत्न्यादि है। सूत्रनिर्देश के अनुसार गणपाठ मे सपत्नी एकपली आदि शब्दो का पाठ होना चाहिए था, अथवा इस गण मे पठिन शब्दो के अनुसार इस गण का नाम समानादि होना चाहिए था। तदनुमार इस गण से सम्बद्ध पाणिनि के सूत्र का पाठ होना चाहिए था-नित्यं समानादिभ्यः । प्रकरण को दृष्टि मे रखते हुए यह सून रचना स्वाभाविक थी और पर्याप्त भी। क्योनि पत्युनों यासयोगे (१११३३ ) इस पूर्व सून से पति शब्द की अनुवृत्ति तो आ ही रही है, उससे पत्यन्त अभिप्राय सूनार्थ मे स्वत उपस्थित हो जाता । उस का व्याख्यानभूत 'गौरादिपाठादिति-पृथिवी कोण पिम्पल्यादयश्चेति छेदाध्यायिन' पटन्ति । न किञ्चिदिति-सहिताध्यायिनो न पठन्ति' प्रदीप ग्रन्थ विशेष द्रष्टव्य और विचारणीय है। कैयट के 'छेदाध्यायिन' और 'सहिताध्यायिन' निर्देश अत्यधिक महत्त्व रखते हैं । सम्पूर्ण गणपाठ का इस दृष्टि से भी विचार करना श्रावश्यक है। सम्पादक।

३६ सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि पणिनीय सूत्रपाठ और गणपाठ दोनो मे एक प्रकार की विषमता और भी उपलब्ध होती है। पाणिनि का सूत्र है-अध्ययीभावाञ्च (४।३।५९), परन्तु गणपाठ मे इस मे प्रसङ्ग परिमुख, परिहनु आदि विशिष्ट शब्दो का पाठ मिलता है । यहा सूत्र और गणस्थ शब्दो मे न पूर्वपद की समानता है, न प्रकृत्यश की और न सूत्रविहित प्रत्ययसन्नियोग से निप्पन्न शब्दो का ही निर्देश है। उपर्युन तीनो प्रकार की विषमताए इस सभावन को व्यक्त करती हैं कि पाणिनि ने अपने से पूर्वभावी किसी आचार्य के गणपाठ अथवा सूत्रपाठ का अनुसरण करते हुए सूत्ररचना के अनुकूल इन गणो के स्वरूप का निर्धारण नहीं किया, अथवा गणो मे विद्यमान गब्दो के स्वरूप के अनुक्ल सूपरचना को नही अपन या। दोनो मे से किसी भी एक स्थिति को मानने पर उपर्युक्त गणो की सत्ता पाणिनि से पूर्व स्वत सिद्ध होती है । कात्यायन तथा पतञ्जलि के संकेत पाणिनि के गोपाययवात् (४।११७९) सूत्र की आवश्यक्ता पर विचार करते हुए कात्यायन के सिद्ध तु रौढत्यादिपूपसंख्यानात् वातिक भी इस प्रसग मे विरोप विचारणीय है। कात्यायन का यह विचार है कि पाणिनि के उक्त सूत्र को कोई आवश्यकता नहीं है । इस सूत्र के द्वारा जिन गब्दो से प्यड् आदेग अभीष्ट है उन का रोढयादि गण मे उपसख्यान कर दिया जायगा। परन्तु प्रश्न यह है कि रोढयादि गण है कहा पाणिनि के गणपाठ मे तो इस नाम का कोई गण है ही नहीं । महाभाप्यकार पतञ्जलि ने यह सूचना दी है कि पाणिनि के गणपाठ मे जिसे कोडयादि १. कई पेयाकरण अध्ययीमावाच' (४.३५६) स्त्र पर 'परिमुखादिम्य उप- सल्यानम्' यातिक को देखकर परिमुसादि को वार्तिकग मानते हैं । न्यासकार ने परिमुगादि को यातिकगण न मानकर गणपाठस्थ गण ही स्वीकार किया है और साठ तथा गणपाठ की विषमता के कारण का विस्तार से प्रतिपादन किया है। गएरनायलीकार यशेशर भट्ट ने भी परिमुसादि गण को गणकार का ही वीकार दिया है (पृष्ठ २६, हमारा हम्तनेस) । बालमनोरमा औरतचोधिनी के रचयितानों का भी यही मत है। सम्या । २. महा० ४.१७६|| सम्पादक के मत में यह कायायन का यातिक नहीं है। इस पर विशेष विनार परिशिष्ट में दे। 7 पाणिनि से प्राचीन वैयाकरण और उनके गणपाठ नाम दिया है, उसे ही किमी पूर्वाचार्य के गण मे रोढयादि नाम दिया गया था। पर आश्चर्य है कि पाणिनि के क्रोड्यादि गण मे 'रोढि' शब्द क्यो नही दिखाई देता? अपने गणपाठ मे रौढ्यादि गण का निर्देश करने वाला यह प्राचीन आचार्य कौन था, यह ठीक ठीक निश्चय पूर्वक नही पहा जा सकता। व्याकरण के वाड्मय मे एक रोढि नाम का आचार्य प्रसिद्ध है। क्या रौढयादि गण के साथ उसका कुछ मवन्ध हो सकता है । प्रो० वुहलर तथा उनके अनुयायी प्रो० बर्नेल का यह विचार है कि 'अष्टाध्यायी मे प्राचीन आचार्य शाकटायन के जो दो तीन मत उद्घृत है, वे मभी अर्वाचीन जैन शाक्टायन व्याकरण मे भी उपलब्ध होते हैं ।" यत कही भी उस प्राचीन आचार्य का नाम लेकर उन मतो को जैन शाक्टायन व्याकरण में उपस्थित नहीं किया गया, इसलिए इन विद्वानो की धारणा है कि पाल्यकीर्ति के जैन शाकटायन व्याकरण का आधार पाणिनि द्वारा स्मृत प्राचीन शाकटायन व्याकरण ही था। यद्यपि यह धारणा वहुत सुस्पष्ट तथा प्रौढ युक्ति वाली नहीं है, पर यदि इनकी यह धारणा किसी प्रकार ठीक मानली जाए तो उमी धारणा के आधार पर यह संभावना भी की जा सकती है कि पाणिनि के क्रोडयादि गण का पूर्वप गेढ्यादि गण का निर्धारण भी प्राचीन आचार्यशाकटायन द्वारा ही किया गया होगा। प्राचीन शाकटायन के रौढ यादि नाम का दूसरा रूप रूढादि आज भी जैन गाकटायन व्याकरण मे विद्यमान है। चाक्रनमण का सर्वादिगण पाणिनि की अष्टाध्यायी मे स्मृत आचार्य चाक्रवर्मण के मत मे द्वय शब्द की भी सर्वनाम मज्ञा होती थी, ऐसा कतिपय विद्वानो का कथन है ।' १. के पुना रोढयादय १ ये मोडयादय । महाभाष्य । द्र० कैयर-'पूर्वाचार्य- सख्या एवमभिहितम् इत्यर्थ । महा० प्रदीप ४२११७६ ! २ इस प्राचार्य के सामन्य परिचय के लिए स० व्या० शास्त्र का इतिहास भाग १, पृष्ठ ६६ (प्र० स०) देसिए । ३. द्र० पान दी ऐन्द्रस्कूल आफ सस्कृत ग्रामेरियन्स, पृष्ठ ६६ तथा टसके ४ स्टादिभ्य ११३।४ ॥ ५. यत्तु कश्चिदाह चाक्रवर्मणव्याकरण द्वयपदस्यापि सर्वनामताभ्युपमात् । शन्दकौस्तुम १२।२७॥ अागे।

स० व्या० मे गणमाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि पाणिनि के व्याकरण मे द्वय शब्द की सर्वनाम संज्ञा नहीं होती, क्योकि मनाम सज्ञा करने वाले सादीनि सर्वनामानि ( ११११२७) सून से सबद्र सादि गण व्यवस्थित गण है आकृति गण नही है। इसलिए उसमे किसी अन्य शब्द का समावेश नहीं हो सकता ! पाणिनि के सर्वादिगण मे 'द्वय' शब्द पठित नहीं है । यद्यपि द्वि शब्द अवश्य पठित है, परन्तु द्वि तथा द्वय दोनो शब्दो के स्वरूप मे पर्याप्त अन्तर है । उपरिनिर्दिष्ट विद्वानो की सूचना के अनुसार चारचर्मण के मत को दृष्टि मे रखते हुए यह सम्भावना की जास कती है कि चाक्रवर्मण ने अपने 'सर्वादिगण मे 'द्वय' शब्द को भी पड़ा था। वर्धमान के सङ्केत वर्षमान ने अपनी गणरत्नमहोदधि के शरदादि गण मे पथिन् शब्द के पाठ को निष्प्रयोजन मान कर भी वृद्ध वैयाकरणो के अभिप्रायानुसार इसका पाठ किया है।' यहा वृद्ध वैयाकरण शब्द से वर्वमान को पाणिनि क्यमपि इष्ट नहीं है । इममे दो हेतु है । प्रथम-जहा कही भी पर्वम न को पाणिनि के निर्देश की आवश्यक्ता उपस्थित होती है, वहा सर्वन बर्धमान पाणिनि के नाम का सष्टरूप से उल्लेख करता है । दूसरा वृद्ध-वैयाकरणो के जिन मतो को बर्धमान ने यथावसर अपनी व्याख्या में प्रस्तुत किया है, वे मत पाणिनि की अष्टाध्यायी मे नही मिलते । यथा ब्राह्मणादि गए के शब्दो सो व्याघ्या के प्रमग मे वर्षमान ने गडुलदायादयिशस्तिविरिशम्पुर- शडेभ्यस्त्यतली न भवत इति वृद्धा वह कर वृद्ध वैयाकरणो का जो मत उद्दन पिया है वह स्पष्टन पाणिनीय व्याकरण मे नही मिलता । इन हतओ मे वर्षमान पे पूर्वपाठ मे वृद्ध वैयाकरण शब्द द्वारा पाणिनि से प्राचीन मिमी एमे वैयाकरण या निर्देश दिया गया है, जिसके शरदादि गण मे पधिन गद का पाठ स्वर की दृष्टि से किया गया था । उसी के आधार पर पाणिति ने भी अपन शग्दादि ( ५।४।१०७ ) गण मे चित्तर यी दृष्टि से पथिन् मनमा निरग पिया होगा । ( वर्धमान आदि उत्तसालीन वैया- १. प्रतिपयमनुपथम् अपरन्यू इयानेय समासान्तस्य सिद्धत्वाद् अस्य पाठी गत प्रतिभाति, पर दयाकरणमतापुरोधेन पठित । गणरत्नमहोदधि ६५. २. गएर नमहोदाप, २२५ ।

तृतीय अध्याय आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ इसमे कोई सन्देह नहीं कि आचार्य पाणिनि से पूर्व वैयाकरणो की एक सुदीर्घ परपरा भारतवर्ष मे विद्यमान थी। इस परम्परा के जिन विभिन्न व्याकरणो की पृष्ठभूमि पर पाणिनीय व्याकरण का निर्माण सभव हो सका. वे सभी प्राचीन व्याकरण सम्प्रति अनुपलब्ध है। ऐसी स्थिति मे उन के स्वरूप के विषय मे कुछ भी धारणा बनानी अनुचित होगी, फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि पाणिनि से पूर्व के व्यापरण-दीपक विशालतम सस्कृत भापा के एक एक कोने को ही प्रकाशित कर पात थे। भापा-धारा की सतत परिवर्तमान स्वाभाविक एव स्वच्छन्द गतिविधि से परित्यक्त तथा अधिकृत सभी पुराने तथा नये प्रदेशो का ययावश्यक सूक्ष्म ध्यान रखकर सम्पूर्ण संस्कृत वाड्मय को प्रकाशित करने वाले स्पष्ट, सरल एव सूक्ष्म सूत्र शेली मे निबद्ध व्याकरण के महान् अभाव की पूर्ति एक मात्र आचार्य पाणिनि के द्वारा ही सम्भव हो सकी। सम्भवत. यही कारण है कि लौकिक वैदिक्ष शब्दो को व्याप्त करने वाल पाणिनीय शब्दानुशासन ने महान् प्रकाशस्तम्भ के जाज्वल्यमान पारदर्शी प्रकाश के सम्मुख प्राचीन व्याकरण अभिभूत होते गए और कुछ ममय पश्चात् नाम शेपता को प्राप्त हो गए । इतना ही नहीं, अपने उत्तरवर्ती आचार्य चन्द्रगोमी, पूज्यपाद ( देवनन्दी), पाल्यकीर्ति, श्रीभोज, हेमचन्द्र तथा नरेन्द्राचार्य जैसे अनेक वैयाकरणो को अपनी विशिष्ट आभा का मुक्तहस्त दान देता हुआ, विद्वन्मूर्धन्य भाषा तत्वजो की उत्कृष्ट प्रतिभा की खरी कसोटी बना हुआ ढाई महान वर्षों के करान-श्रूर घटना-चको से उत्पन्न अनिवार्य परिस्थितियो का तिरसार करता हुआ महान् सुविहित पाणिनीय गन्दानुशासन आज भी अमिताभ एवं चिर- तेजस्वी बना हुआ संस्मृतवाङ्मय वे अगाध महारांव के मुक्ताग्राहा गम्भीर गोताखोरों के लिए मार्ग प्रदर्शन का कार्य कर रहा है। पाणिनि का ममप पाणिनि का समय भी ऐनिहामित्र अन्वेषों के लिए प्राम मे ही आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ ४१ पर्याप्त विवाद का विषय रहा है। डा० वासुदेवशरण अग्रवाल ने इस विषय में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक इण्डिया एज नोन टु पाणिनि' मे पर्याप्त विस्तार से विचार किया है । बहुविव हेतुओ साहित्यिक युक्तियो, अष्टाध्यायी मे मिलने वाले मग्वलि गोमाल का वाचक 'मसरी' शब्द कुमारीथमणा, निर्वाण, निकाय इत्यादि बौद्ध शब्द, श्रविष्ठा नक्षत्र की प्राथमिकता, तारानाथ, कथासरित्- सागर, मञ्जूधीमूलकल्प, यूवान् च्वाग और राजशसर आदि के पाणिनि तथा नन्द विषयक उल्लेखो पाणिनि-कालिक राजनैतिक स्थितियो, मुद्राआ और मनुष्य नामो की गम्भीर परीक्षा के आधार पर पणिनि का समय पाचवी शताब्दी ईस्वी पूर्व निश्चित किया है, जिसे हम भी पर्याप्त प्रामाणिक मानते हैं। पाणिनि की सूत्र-शैली या तो ब्राह्मण ग्रन्या के कर्मकाण्डी वातावरण मे जन्म ल कर श्रीत, गृहय तया धर्मसूत्रो म ही नहीं अपितु दर्शन आयुर्वेद प्रभृति अनेक क्षेत्रा मे और विपत व्याकरण व क्षेत्र म सूनशैली उत्तरोत्तर अपन, स्वरूप निर्धारित करनी जा रही थी। एसे समय मे सस्कृत व्याकरण के विपुल आकाश मे परम तेजस्वी महान् सूत्रशिल्पी आचार्य पाणिनि का उदय हुआ। आचार्य पाणिनि की गम्भीर और तेजस्विनी प्रतिभाने, अपने से प्राचीन आचार्यों के, उपसर्ग अर्थ क वाचक ह अथवा द्योतक, शब्द का अर्थ व्यक्ति है अथवा जाति, सभी नाम आख्यातज हैं अथवा नहीं, इन विभिन्न मतभेदो से अपने को दूर रख कर तटस्थता की नीति अपनाते हुए अथवा दूसरे शब्दा मे मध्यम मार्ग अर्थात् ययावसर उपर्युक्त सभी विचारो का आश्रयण करते हुए प्राचीन अचार्यों की लोकप्रसिद्ध कालविषयक अथवा उस प्रकार की अन्य परि- भाषाओके अनावश्यक भार से सूत्र पद्धति को मुक्त करते हुए, सूत्रो के सज्ञा, १ द्र० इण्डिया एज नोन टु पाणिनि । पृष्ठ ४५५-४५७ । विशेप-इस विषय में सम्पादकीय मत सर्वथा भिन्न है । परिशिष्ट में इस विषय में टिप्पणी देखें। २ पाणिन्युपशमकालक व्याकरणम् । काशिका २ ४।२१, सरस्वतीकण्ठामरण हृदयहारिणो टीका ३।३।१२६तुलना करिए-पाणिनापशमकालक व्याकरणम् । चाद्र- पृत्ति २।२।६॥ ६ मं० च्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि परिभाषा, विधि, नियम, अतिदेश, तथा अधिकार इन सभी प्रकारो को अपनाकर अनुवृत्तियो की सहायता से इन सूनो को यथासम्भव अधिकाधिक सूक्ष्म और व्यापक बनाते हुए, नए नए प्रत्याहारो तथा अनुबन्यो के आकर्पक अलकारो तथा गणपाठ और धातुपाठ के तानेबाने वाले झीने पर अछोर परिधान देकर सून शैली को वह प्रौढता तथा अनुपम निखार प्रदान किया, जिसके बल पर सूत्र शैली ने अपनी अदाओ मे संस्कृत भाषा के किन किन गम्भीर रहस्यो को अभिव्यक्त किया यह तो कात्यायना पतञ्जलि तया भर्तृहरि जैसे पाणिनि के हृदय को समझनेवाले विद्वान् ही बता सकते है, परन्तु इतना अवश्य स्वीकार करना होगा कि पाणिनि की इम विशिष्ट सूनशैली का ही वह प्रभाव था, जिसने पूरे संस्कृत व्याकरण को ही सूत्रमय बना दिया तथा उस के विषय मे महती सूक्ष्मेक्षिका पूर्तते सूत्रकारस्य' एव पाणिनीय महत् सुधिहितम्' जैसे स्तुति के आघोप सर्वत्र सुनाई देने लगे । ऐसी अवस्था मे पाणिनि का नाम लोर मे इतना प्रकाशित हुआ कि उनके यश के कथामृत से देश के छोटे छोटे बच्चे भी अपने कानो को पवित्र करने लगे। सूत्र-रचना के पूर्व ही गणपाठ का निर्धारण आचार्य पाणिनि ने अष्टाध्यायी के सूत्रो की रचना करने से पूर्व ही गणपाठ या सुव्यवस्थित निर्धारण कर लिया था इस तथ्य के बडे सुसष्ट प्रचुर प्रमाण अष्टाध्यायी, वार्तिकपाठ तथा महाभाष्य से प्राप्त किए जा सकते हैं। सूत्रों का साक्ष्य सर्व प्रथम हम अष्टाध्यायी के ऐसे सूत्रो का साक्ष्य उपस्थिन करते हैं, जिनमे सूत्ररचना मे पूर्व गणपाठ के निर्धारण कर लेने का ज्ञापन होता है । य सूत्र पई प्रकार हैं । यथा- १-इस प्रमंग मे अष्टाध्यायो य उन सूत्रो यो उपस्थापित किया जा सरता है, जिनम सूत्रधार न आदि अथवा प्रभृति अथवा किमी शब्द का १ काशिका ४२१७४ ॥ २ महाभाध्य ४॥३॥६६॥ ३ पाणिनिशन्दो लारे प्रकारात । काशिका २०६ ॥ ४ अायुमार यरा पाणि । कशिका २।१।१३।।

आचार्य पाणिनि और उन या गणपाठ वयचनान्त प्रयोग करके पिसी गण अथवा विशिष्ट शब्द समूह का संकेत पिया है। यथा- सादीनि सर्वनामानि । १।१॥२७॥ साक्षात्प्रभृतीनि च । १।४।७८ ॥ सप्तमी शौण्डै । ११॥४०॥ इन सूत्रो से सबद्ध सर्यादि, साक्षादादि तथा शौएडादि शब्दो का सम्या निर्धारण स्त्रय सूमार ने न क्यिा होता तो वह इस तरह की सूप्ररचना गो मे अपना सकता था ।' २-दूमरे प्रभार के वे सूत्र हैं, जिनमे सूत्रमार ने किसी गण के कतिपय शब्दो को विशिष्ट आनुपूर्वी का सोत पिया है । यथा- अदड्डतरादिभ्यः पन्चभ्य' । ७१।२५ ।। पूर्वादिभ्यो नयभ्यो या । ७११११६ ॥ त्यदादीनि च । १।१।७४ ।। त्यदादीनि सधैनिन्यम् । १।२।७२ ।। सर्वत्र लोहितादिकतन्तेभ्य.1 1१1१८ ।। इन सूत्रो मे से पहले चार सूत्रो मे पाणिनि ने सर्वादिगण मे पठित इतर आदि पाच, पूर्व आदि नव और त्यद आदि शब्दो के विशिष्ट बम अथवा सुव्यवस्थित पाठ वा सकेत पिया है । यदि उक्त सूत्रो की दृष्टि से पाणिनि ने सवादिगण मे इन शब्दो का सुव्यवस्थित पाठ न किया होता तो उक्त सूत्रो से विहित कार्य स्वादिगण के अन्य शब्दो से भी प्राप्त हो जाते, उस अवस्था मे इन सूनो द्वारा पिन्ही विशिष्ट शब्दो से विशिष्ट कार्यो का विधान करना ही व्यर्थ हो जाता । प्रथम दो सूत्रो मे पठित पञ्चभ्यः और नरभ्य शब्द तो उक्त सोत के और भी अधिक सष्ट द्योतक हैं । अन्तिम सर्वत्र लोहितादिकतन्तेभ्य सून से गर्गादिगण के अन्तर्गत लोहितादि अवा- न्तरगण के लोहित से कतपर्यन्त शब्दो की विशिष्ट आनुपूर्वी का सकेत प्राप्त होता है। १. द्र० यदादिग्रहण करोति तज्ज्ञापयत्याचार्य -अस्ति ह पाठो बाह्यश्च सूत्रात् । महा० ११३१ ॥ २. यह सूत्र सकेतित फ्रम गणपाठ में आज भी उसी रूप में उपलब्ध होता है।

स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि ३-तीसरे प्रकार के वे सूत्र है जो गणशैली का आश्रयण लेकर विधान किए गए किमी प्रत्यय विप के परे रहने पर कार्य विशेष का विधान करते हैं। यथा- प्रयाहरणस्य ढे1 ७३॥२८॥ बिल्यकादिभ्यश्छस्य लुक् । ६।४।१५३ ।। वादयश्च । ६।२।१३१ ।। इनमे प्रथम ढक् प्रत्यय के परे रहने पर प्रवाहण गब्द के उत्तरपद के अदि अच को वृद्धि का विधान करता है । 'प्रवाहण' शब्द से ढक की प्राप्ति केवल शुभ्रादिभ्यश्च (४११११२३) सून निर्दिष्ट शुभ्रादिगण मे प्रवाहण' शब्द के बल पर ही सम्भव है। इसलिए प्रवाहणस्य हे सूत्र इस बात का निश्चायक है कि इस सूत्र को दनाने से पूर्व ही सूत्रकार ने शुभ्रादि गण उप मे प्रवाहण' शब्द का पाठ और शुभ्रादि गण से ढक् प्रत्यय का विधान इन तीनो कार्यों को सम्पत कर लिया था। द्वितीय सून बिल्वर आदि शब्दो से उत्तर विद्यमान भसज्ञक छ प्रत्यय का तद्धित प्रत्यय परे लुक् का विधान करता है । इस सून मे निर्दिष्ट विल्व. कादि शब्द नडादिना कुक च (१२।९१) सूत्र विहित कुक् आगम युक्त है । इस लिए बिल्पकादिभ्यश्छस्य लुक सूत्र मे कृत कुगागम विल्वकादि गब्दो का निर्देश, नडादि गण और उस मे बिल्व आदि शब्दो की पूर्व प्रकल्पना को द्योतित करता है। तृतीय सूत्र यत्प्रत्ययान्त वर्ग आदि उत्तरपदो का कर्मधारयभिन तसुरुप समाम मे आधदात्तत्व का विधान करता है। वर्ग आदि शब्दो स यत् प्रत्यय की प्राप्ति दिगादिभ्यो यत (४।३।५४ ) सूत्र निर्दिष्ट दिगादि गण मे वर्ग आदि शब्दो के पाठ के बल पर ही सम्भव है । इसलिए चर्यादयश्च सूत्र मे यत्प्रत्ययान्त वर्ग आदि शब्दो का निर्देश दिगादि गण उस मे वर्गादि गन्दी का पाठ और उम से यत्प्रत्यय का विधान इन तीनो वातो की पूर्व प्रकल्पना का घोतक है। -चौधे प्रकार के सूत्र वे है जो पिन्ही गणा म पढे गए अवान्तर गणो वा निर्देश करते हैं । यया- सर्यन लोहितादिक्तन्तभ्य 1 81१।१८।। फण्यादिभ्यो गोने । ४४२११११ ।।

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ न गोपवनादिभ्यः । २।४।६७ ।। हरितादिभ्योऽनः । ४।१।१०० ।। प्रथम सूत्र मे गर्गादिभ्यो गोत्रे ( ४|१११०५ ) सूत्रनिर्दिष्ट गर्गादि गण के अन्तर्गत पठित लोहितादिगण का और द्वितीय तृतीय और चतुर्थ सूनो मे क्रमश बिदादिभ्योऽञ् (४११११०४) निर्दिष्ट विदादि गण के अन्तर्गत पठित कण्वादि, गोपवनादि तथा हरितादि गणो का निर्देश मिलता है । इन अवान्तर गणो के निर्देशो से स्पष्ट है कि पाणिनि ने उक्त अवान्तर गणो के निर्देश करने वाले सूत्रो की रचना से पूर्व गर्गादि और बिदादि इन प्रधान गणो के शब्दो का निरिण कर लिया था। ५-पाचवे प्रकार के वे सूत्र है, जिनमे निर्दिष्ट गणो के अन्तर्गत पठित शब्दो से सामान्यविहित कार्य की स्वत प्राप्ति होने पर भी, उन शब्दो का किमी गण विशेप मे पाठ होने के कारण पुन. सामान्यविहित कार्य का विधान करना पडा । यथा- शुण्डिकादिभ्योऽण । ४१३७६ ॥ सूत्र पठित शुण्डिक आदि शब्दो से प्रारदीव्यतोऽण (४११३८३) सूत्रविहित यथाप्राप्त अण प्राप्त था, परन्तु कतिपय गब्दो मे पूर्वविहित ठक्, 'उदपान' शब्द का उत्सादिगण ( ४।१।८६ ) मे पाठ होने से 'अञ् 'तीर्थ' शब्द का धूमादिगण ( ४१२।१२७ ) मे पाठ होने से वुञ् आदि की प्राप्ति थी।' उन को हट कर अण ही होवे, इसलिए इस सूत्र और एतत्सून निर्दिष्ट गण का पठ सूत्रकार ने पिया है । इस से सष्ट है कि इस सूत्र और गण की रचना से पूर्व उत्मादि तपा धूमादि गणो को प्रकल्पना की जा चुकी थी। ६-इसी प्रसङ्ग मे अष्टाध्यायी के धातु-प्रकरण में पठिन कण्ड्या- दिग्यो यक् (३।१।२७) सून तथा कण्ड्वादि गण मे पठिन कराडू आदि दीर्घान्त शब्दो की ओर विद्वन्महानुभावो का ध्यान आकृष्ट करना भी आवश्यर है। यहा सूत्रकार और गणकार दोनो के द्वारा 'कण्ड्वादि' गण पठित शब्दो के वैविध्य यातुत्व तथा प्रातिपदिकत्व के प्रतिपादन १ इस प्रकरण के स्पष्टीकरण के लिए इसी सूत्र का न्यास ग्रन्थ देखना चाहिए।

सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि १ के लिए सहत प्रयन किया गया है। यह सहत प्रयत्न भी इस तथ्य का पयाप्त उपोबलक है कि अष्टाध्यायी के सूत्रो तथा तत्सबद्ध गणपाठ दोनो की रचना तथा निवारण एक ही आचार्य ने किया था। वार्तिकों का साक्ष्य आचार्य कात्यायन के वार्तिको से भी इस विषय के पर्याप्त सकेत मिलते है कि गणपाठ और सूनपाठ का प्रवक्ता एक ही आचार्य है। गणपाठ से मम्बद्ध वार्तिको और उनके द्वारा उपस्थापित विषयो को तो यथावसर अन्यत्र प्रस्तुत किया जायगा, यहा केवल प्रस्तुत प्रसग से सबद्ध कतिपय प्रमुख वार्तिको की ओर ही पाठको का ध्यान आकृष्ट कर रहे हैं। १-गरणपाठ के साथ अष्टाध्यायी का साक्षात् सवन्ध दर्शाने वाली निम्न वातिके अत्यन्त महत्त्व की है- क-अयरादिना पुन सूनपाठे ग्रहणानर्थक्य, गणे पठितत्वात् ।' प-लोहितडाज्भ्य फ्यमचनम्, भृशादिषितराणि ।' ग-पाठात्पर्यु दास , पठितानां सशाकरणम् ।' घ-एकशितिपात्स्वरवचन तु ज्ञापक निमित्तस्वरवलीयस्त्वस्य ।' ड-भ्रातुपुत्रग्रहण शापकम् एकदेशनिमित्तात् पश्चप्रतिषेधस्य । इत्यादि कयायन के वातिक बडे स्पष्ट शब्दो मे यह घोषणा कर रहे है कि सूत्रकार और गणकार एर ही व्यक्ति है, और वह है आचार्य पाणिनि । २–कतिपय वातिको मे अष्टाध्यायी के स्नो की व्याख्या के प्रमग मे विभिन्न गणो मे पठित विशिष्ट शब्दो के पाठ पर विचार किया है। यथा- -भिक्षादिपु युवतिग्रहणानर्थस्यम्, पु पद्भागस्य सिद्धत्यात् प्रत्ययविधी ग-रिल्यादिषु गधीधुयाग्रहण मयट्प्रतिपेधार्थम् । १.महा० नवा० १११।३३ ३१०। ३. महा० नवा० १।१।२६ पृष्ठ २६४ 1 ५ महा०1३४१॥ ७ महा०४३।१३४|| २ महा० ३।१।१३।। ४.महा०२।१११॥ ६. महा०४।२।३८॥

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ ३-कात्यायन की कुछ वाति ऐसी है, जिनमे किसी गण मे पठित शब्दो की न्यूनता देखकर उनमे अन्य शब्दो के उपसख्यान की आवश्यक्ता दर्शाई है । यथा-- क-मरुच्छब्दस्योपसंख्यानम् ।' ख-श्रच्छन्दस्योपसंख्यानम् ।' -कतिपय वातिके ऐसी हैं, जिनमे विभिन्नगणो मे पठिन कुछ एक शब्दो के साथ विशिष्ट उपाधियो का सयोजन किया है। यथा- क-तिष्ठद्गुः कालविशेपे। स-पलेय पादीनि प्रथमान्तान्यन्यपदार्थे ।' ग-शूदा चामहत्पूर्वा जातिः । इन उपाधियो के विना अनिष्ट प्रयोगो की प्राप्ति होती है। ५-कुट वाको मे कात्यायन ने यह विचार व्यक्त किया है कि सप्तमी शोण्डैः ( २२११४० ) अथवा अर्धर्चाः पुसि च ( २।४।३१) जैसे सूत्रो मे जहा पाणिनि ने बहुवचान्त प्रयोग द्वारा गणनिर्देश दिया है वहा स्पष्टत आदि पद का निर्देश करना चाहिए । यथा- क-शोएडादिभिः। ख-अर्धर्चादयः ।। उपर्युक्त वार्तिको से स्पष्ट है कि आचार्य कात्यायन सूत्रकार और गण कार को एक ही व्यक्ति मानते हैं और मून की रचना से पूर्व गणपाठ के निरिण का सकेत भी करते है। महाभाष्य का साक्ष्य महाभयकार पतञ्जलि ने स पूर्वः पाठः, अयं पुनः पाठः कह कर बडे स्पष्ट शब्दो मे यह स्वीकार किया है कि पाणिनि ने सूत्र-रचना से पूर्व ही गणपाठ का निर्धारण कर लिया था। इस प्रतिज्ञा मे हेतु उपस्थित करते हुए पतञ्जलि ने लिखा है- यदयं 'पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा' (७॥१६) इति नवग्रहणं करोति । नव हि पूर्वादीनि !" T १.महा.१४४५८।। २. महा०२।१।१७॥ ३. महा०४।१।४।। ४. महा०२।१४०॥ ५. महा०२४॥३१॥ ६.महा नवा० शरा३३, ४ ३११।। ७ महा.नवा० १२११३३, पृट ३११॥

, स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि कैयट इसकी व्यारया में लिखता है- तत्र हि नरग्रहण त्यदादीना निरासार्थ क्रियत । यदि च नियतसनि वेशो गणपाठ पूर्व , ततोऽधिकव्यवच्छेदाथ न ग्रहण कर्त यम् । इतना ही नहीं आचार्य पतनि ने अनेक स्थनो पर गणपाठ में पठित गब्दा को सूत्रवत् पाणिनीय स्वीकार करते हुए और सूत्रवत् ही प्रामाणिक मानते हुए उनके द्वारा सूनबार आचार्य पाणिनि की विविध प्रवृतिया का ज्ञापन किया है । इस दृष्टि से क-एक तह आचार्यप्रवृत्तिापयति नोदात्तनिवृत्तिस्वरः शुन्यर तरति यदय श्वनशब्द गौरादिपु पठति अन्तोदात्ताथ यत्न करोति सिद्ध हि स्यान्डीपेय । महा० १।४।२ ६४१२२ ।। स-एव तर्हि आचार्यप्रवृत्तिापयति न तद्विशेपेभ्यो भाति यदय विपाटशब्द शरतप्रभृतिषु पठति । महा० नवा० ११११२२ पृष्ठ २७६ ॥ ग-एव तर्हि, सिद्धे सति य सवनादिपु अश्वसनिशब्द पटति तज्ज्ञापयत्याचार्योऽनिण-तादपि पत्व भवतीति । महा० ८।३।११० ।। घ-प्राचार्य प्रवृत्तिापयति भवत्यृकारानो गत्वमिति यदय क्षुम्ना दिपु नगम शब्द पठति । एर तर्हि यत्तृमोतिशब्द पठति। महा० नवा० १११ । प्रत्या०८, पृष्ट १०८ । उद्धरण विशप महत्व के है । इन मे व्याकरण-शास्त्र के महान मनोपी पतञ्जलि ने क्रमश गौरादिगण ( ४।११४१ ) के श्वन शब्द शरत्प्रभृति (५।४।१०७ ) के 'विपाद शब्द सवनादिगण (८ ३१११० ) के अश्वसनि' गब्द और क्षुम्नागिण (८ १।३९) के नूनमन् तथा तृप्न शब्दो का निर्देश करके इन के पाणिनियत्व की सष्ट घोषणा की। इस प्रकार पाणिनि की अष्टाध्यायी के अतासाक्ष्य तथा उसक प्रामा एिक व्याख्याता कात्यायन और पतजलि के पूर्वनिदिष्ट प्रचुर प्रमाण प्रस्त कर देने के पश्चात् उनके अनुयायी काशिकाकार कैयट भट्टोजी दीक्षित तथा नागेश भट्ट आदि के वचनो को विद्वानो के समक्ष उपस्थित करना पिष्ट पेपणमात्र होगा। न्यासकार के श्राक्षेप काशिकाविवरणपञ्चिका अथवा न्यास के रचयिता जिनेन्द्रबुद्धि का मत इसम भिन्न है । वह पाणिनोय तत्र संबद्ध गणपाठ को अपाणिनीय आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ ४९ १ मानता है । उसके अाणिनीयत्व प्रतिपादक हेतु इस प्रकार है- १-न्यासकार का प्रयम हेतु है कि यदि सूत्रकार और गणकार एक हो व्यक्ति होता तो 'गर्गादि' गण मे तथा उसी प्रकरण के मधुरभ्योर्दाह्मणको शिकयो ' सूत्र मे दोनो स्थानो पर 'वभ्रु' शब्द का पाठ न करके केवल गर्गादि गण मे ही यभ्र कौशिके एसा गणसून पढ देता । इस प्रकार सूत्रपाठ मे लाघव हो जाता। २-जिनेन्द्रबुद्धि का दूसरा हेतु यह है कि यदि सूत्रपाठ और गणपाठ दोनो का रचयिता एक ही होता तो वह 'सर्वादि' गण मे द्वि' प्रभृति शब्दो से पूर्व ही किम् शब्द का पाठ कर देता । इस प्रकार पाठ करने से कि सर्वनामवहुभ्योऽद्वयादिभ्य सूत्र मे 'किम्' शब्द के पाठ की आवश्यक्ता न होती। ३-तीमरा हेतु न्यासकार का यह है कि यदिसूनपाठ और गणपाठ का कर्ता एक ही होता तो वह यौधेयादि गण को चतुर्थ अध्याय के प्रथमपाद ( सून- १७८ ) तथा पाचवे अध्याय के तृतीय पाद (सून ११७ ) मे दो स्थानो पर न पढता।" इन तीन हेतुओ अथवा आक्षेपो को उपस्थिा करके न्यासकार ने यह निर्णय दिया है कि स्त्रकार पाणिनि से गणकार कोई भिन्न व्यक्ति है । अत गणपाठ के ययास्थित पाठ के आधार पर पाणिनि पर कोई आक्षेप नहीं किया जा सकता। न्यासकार के आक्षेपों का समाधान न्यासकार ने गणपाठ के पाणिनीयत्व पर जो आक्षेप किये हैं, व ऐसे अकाटय नहीं है कि उनका उचित उत्तर ही न दिया जा सके । वस्तुत न्यासकार के तीनो हेत हेत्वाभासमान ह । अत उन से किसी विशिष्ट मत का प्रज्ञापन नही हो सकता। प्रथम हेतु का समानान-सकार के प्रथम हेतु का ममावान यह है कि गणमूनशैली आचार्य पाणिनि की ही उपज्ञात नहीं हैं । उसके गण गएसून निर्दिष्ट मिलते हैं वे प्राय प्राचीन आचार्यों के सगृहीत १.पा०४।१।१०६ ।। २द्र० न्यास ४११०६ ।। ३. पा० ५.३.२॥ ४.द्र० न्यास ५॥३२॥ ५द्र० न्यास ५।३।११७ ॥ पाठ मे जो स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि है। अत. पाणिनि ने गर्गादि गण मे ही वभ्र कौशिके ऐसा सूत्र क्यो नही पढा, यह आक्षेप ही नहीं उठता । इतना ही नहीं, आचार्य पाणिनि ने अनेक स्थानो पर प्राचीन आचार्यों के अनुसार सूत्ररचना की है। यथा--- औङ प्रापः १७११८ ॥ प्राङिचापः ७४३११०५. ॥ श्राङो नाऽस्त्रियाम् ।७।३।१२० ॥ इन सूत्रो मे निर्दिष्ट औङ तथा आङ् प्रत्यय पाणिनि के सभूर्ण शब्दानुशासन मे वही पर भी निर्दिष्ट नही है । तथापि पाणिनि ने इन का निर्देश किया है। इसी प्रकार पाणिनि ने वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद् वृद्धम् (१।१।७३ ) सूत्र द्वारा स्वीय वृद्धसज्ञा का निर्देश करके भी वृद्धो यूना तल्लक्षणश्चेदेव विशेष. ( १।२।६५ ) सूत्र मे वृद्ध शब्द का निर्देश गोन के स्थान पर किया है । पाणिनीय शब्दनुशासान मे भी इस प्रकार परसर विरोव होने पर यदि वह अपाणिनीय नही माना जा सकता और उस मे निर्देशोऽयं पूर्वसूत्रण वा स्यात पूर्वमूनानुसार निर्देश मानकर विरोध अथवा असंगति का परिहार हो सकता है तो उसी के अनुपार उक्त आक्षेप का परिहार भी अनायास हो सकता है। इतना ही नहीं, न्यासकार स्वय अपने 'सूत्रकार अन्य है और गणकार अन्य' समाधान से मन्तुष्ट नही था, क्योकि गणकार को अन्य मानने पर भी प्रश्न हो सकता है कि उसने ही लाघव के लिए गण में बभ्रु कौशिके ऐसा सूत्र क्यो नही पढा ? इसलिए न्यासकार लिखता है- गणकारेणापि हि न कृतं वैचियार्थम्, विचित्रा हि गणस्य कृतिर्गण- कारेण ।' अर्थात्-गणकार ने भी यभ्र कौशिके ऐसा सूत्र नहीं बनाया वैचित्र्य के लिए । गणक र के गण की कृनि विचित्र है। प्रथम तो यह कोई समावान नहीं, यदि इसे समाधान मान लिया जाए तो यही समाधान पाणिनि कोही गणकार मानने पर क्यो नही दिया जा सक्ता र द्वितीय हेतु का समाधान-न्यासकार ने जो दूसरा हेतु दिया है, उन से वह स्वय सन्तुष्ट नहीं है । अत एव उम्ने स्वय समाधान करते हुए लिखा, १. न्यास ४।१।१०६, भाग १, १४६०१द्र० न्यास ५।३।१०७, पृष्ठ १४१ ।

? आचार्य पणिनि और उन का गणपाठ है कि त्यदादि शब्दो मे जो जो शब्द परे है वह एकशप मे अवशिष्ट रहता है।' त्यदादियो के साथ किम् की सहविवक्षा मे किम् का ही शेप इष्ट है । यथा-त्व च कश्च को, भवाश्च कश्च को। यह व्यवस्था किम्' को त्यदादि स पूर्व पढने पर नहीं बनती। अत गणपाठ का यथान्यास पाठ ही ठीक है। इस प्रकार न्यासकार का दूसरा हेतु उनके समापन स ही समाप्त हो जाता है। तृतीय हेतु का समाधान-न्यासकार ने जो तीसरा हेतु दिया है कि गणपाठ मे यौधेयादि गण का दो स्थान पर पाठ क्या किया है । इसका सीधा साधा उत्तर यह दिया जा सकता है कि यावेयादि का पुन पाठ सम्भवत नखक प्रमादजन्य हो । इतना ही नहीं गणपाठ का रचयिता अन्य व्यक्ति को मानने पर भी न्यासकार का आक्षेप तदवस्थ ही रहता है कि उसन यौधेयादि का पाठ दो वार क्यो किया ? इस आपत्ति म बचने क लिए न्यास कार ने लिखा है- विचिना हि गणाना कृतिर्गणकारस्येति पुन पठिता ।' अर्थात् गणकार की गणो को कृति विचित्र है इसलिए उसने इन्द पुन पढा है। प्रथम तो यह कोई उत्तर नही ह आर यदि यह उत्तर परिणनि म भिन्न गणकार के लिये हो सकता है तो यही उत्तर पाणिनि को ही गणकार मान कर क्यो नही दिया जा सकता ? न्यासकार ने सूनक र क लिए भी ऐसे समाधान अन्यत्र दिए है । डे प्रथमयोरम् ( ७ १।२८ ) सूत्र पर न्यासकार ने लिखा है कि पाणिनि ने डे सुटोरम् एसा लघु यान न कस डे प्रथमयोरम् ऐसा सून वैचिन्यार्थ किया है। या. पणिनि को सूत्रकार मानते हुए उम के सूनो क लिए पैचि यार्थम् उत्तर हो सकता है तो उन्ही को गणकार मानने नुए गणपाठ के लिए क्या नहीं हो साता? " त्यदादीना मथा यद्यत पर तत्तच्छिप्यत । स च यश्च यो यश्च कश्च को । काशिका श२।७२।। २ "यास ५।३, ४१०६ । ३ यास ५३१११७, पृष्ठ १४१। द्रश्य न्यास ४।१।१०६ पृ३६०१ । ४ र मुगेरिति वक्तव्य रे प्रथमयाराित वचन वैचि यार्थम् । ७।११ ८, पृष्ठ ६३६॥

५२ सं० व्या० मे गणपाठ को परम्परा और आचार्य पाणिनि इस विवेचना से स्पष्ट है कि न्याँकार ने गणपाठ को अपाणिनीय चताने के लिए जो हेतु दिए है, वे हेत्वीभास मात्र है । उन से गणपाठ का अपाणिनीयत्व क्थमपि सिद्ध नही हो सकता। न्यासकार का बदतोव्याघात इतना ही नही न्यासकार के ऐसे स्थल भी उपस्थित किए जा सकते है, जिन की उचित सगति पाणिनि कोही गणकार मानन पर लग सकती हे । दूसरे शब्दो मे न्यासकार ने अस्पट रूप से पाणिनि को ही गणकार स्वीकार किया है । यथा- १-न्यासकार कहता है कि पारस्करादिगण ( ६।१।१५७ ) के आकृतिाण होने से उसी मे प्रतिप्कशश्च कशे ( ६।१।१५२ ) से लेकर इस सुट् प्रकरण के अन्त तक के सभी सूत्रो का समावेश हो जाने पर भी इन सूत्रो का पृथक् पाठ पाणिनि न केवल प्रपञ्चार्थ किया है।' इम से सष्ट है कि पारस्करादिगण को न्यासकार पाणिनीय ही मानता है । अन्यथा वह सुट् प्रकरणस्थ सूत्रा के पृथक् निर्देश को प्रपञ्चार्थ न कह कर अन्यो हि गणकार , अन्यश्च सूनकार समाधान देता। २-न्यासकार धातुपाठ को सूत्रकार पाणिनि की रचना मानता हुआ लिखता है- न तस्य (श्रापिशले ) पाणिनेरिर अस भुवीति गणे पाठ ।' अर्थात्-पाणिनि क धातुपाठ के समान आपिशलि के धातुपाठ भुवि पाठ नही था । यदि धातुपाठ और सूत्रपाठ मे अनेक विषमताए होने पर भी धातु- पाठ पाणिनि का माना जा सकता है तो गणपाठ को पणिनीय स्वीकार करने मे क्या आपत्ति हो सकती है ? १. यदि तहि पारस्करप्रभृतिरामातगण 'प्रतिष्क्शश्च कशे' इत्यारम्य पर्व स्न न पठित यम् । तस्याप्यननैव संग्रहात् । सत्यमेतत् , प्रपञ्चायं तु पठितव्यम् । ६।१।१५७, पृष्ठ २६६ । तुलना क्रो-'त वै सल्वपि विधय सुपरिगृहीता भवन्ति, यथा लक्षण प्रपञ्चश्च । केवल लक्षण वेवल प्रपञ्चो वा न तथा कारक भवति । महाभाष्य ६३१५।। २ न्यास १।३।२२, पृष्ठ २२६ । ३ यह ध्यान रहे कि न्यासकार ने दो एक स्थानो पर धातुपाठ को अपाणिनीय , मे अस आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ ५३ हुए रिखा है- -न्यासकार न उपदेशेऽजनुनासिक इत् (१।६।२) सूत्रस्य उपदेश शास्त्रवाक्यानि सूत्रपाठ खिलपाठश्च इस काशिका वचन की व्याख्या करते खिलपाठो धातुपाठ प्रातिपदिकपाठश्च । जव यहा न्यासकार को सूत्रपाठ से पाणिनि का सूत्रपाठ ही नि श्चित रूप से अभिप्रेत है ताधातुपाठ और प्रातिपदिक्पाठ (गणपाठ) भी पाणिनि का ही क्या नहीं ? उपदेशे ऽजनुनासिक इत सूत्र की रचना करते हुए आवश्यक ही नहा अपितु अनिवार्य है कि अनुनासिक अचा के उपदेश क लिए सूनसाठ के समान ही धातुपाठ तथा प्रातिपदिकपाठ ( =गणपाठ) का भी प्रवचन पाणिनि द्वारा ही किया जाए । इसम सष्ट है कि न्य नकार के सभी वचन वदताव्याघात दाप से पूर्ण हैं । अत उन के द्वारा यह कदापि सिद्ध नहा हो सकता कि आचार्य पाणिनि की अष्टाध्यायी से सबद्ध गणपाठ का निवारण उन स पूर्व किसी अन्य आचार्य द्वारा किया जा चुका था, अथवा अपन से पूर्व आच र्य द्वारा निपारित गण पाठ का ही तादात्म्यन अपनाकर पारिणनि न अपने सूना की रचना की थी। आई० एस० पारते की हेय कल्पना एमी स्थिति म न्यासकार क उपर्युक्त तथा कतिपय अन्य वचना आधार पर आई० एम० पावते का यह निर्णय अष्टाध्यायी कत्ता न गणपाठ और धातुपाठ दोना का अपन पूर्व आचर्यो स प्राप्त किया" युक्ति रहित होन से सर्वथा हेय है। इम विवेचना स सर्वय पष्ट है कि सूत्रकार पाणिनि ने ही अपने शास्त्र म सम्बद्व गणपाठ का स्त्रय प्रवचन किया थ और उसका निर्वाग्ण सूत्रपाठ पाठ स पूर्व ही हा गया था यही सिद्धात युक्तियुक्त है । भी रसीकार किया है। द्र०७४।२, पृष्ठ ८४० ७४१७५ पृष्ठ ८७३। न्यासकार का धातुपाटविषपक कथन भी वदताव्याघात दापयुक्त है। धातुपाठ के पाणिनीयत्व र लिए दोसए क्षारतरङ्गिणी को भूमिका पृष्ठ ८ ( रामलाल कपुर ट्रस सस्करण ) तथा स० व्या० शास्त्र का इतिहास भाग २, २० २१ । The nuthor of the orit received both the गणपाठ and धातुपाठ fion his प्राचाय s 10 उपरश। दी स्ट्रक्चर श्राफ अाध्यायी, पृय ६१ 1 1 सं० व्या० मे गणपाठ वी परम्परा और आचाय पाणिनि गणनिर्धारण में प्राचीन गणकारों की अनुकति गणपाठ के प्रवक्ता की समस्या पर विचार करते हुए हमे इस बात का पूरा पूरा ध्यान रखना चाहिए कि व्याकरण के नियमो का निर्धारण करने वाले वैयाकरणो को प्रवक्ता माना गया है न कि कर्ता । इसीलिए तेन प्रोक्तम् ( ४।३।१०१) सूत्र के उदाहरण के रूप मे पाणिनीयम् आपिशलम् तथा काशरत्स्नम्' प्रयाग काशिकाकार द्वारा उपस्थित किये गये है। इसका अभिप्राय यह है कि इन वैयाकरणो ने परम्परा स चने आ रहे भाषा विष मक नियमो का अपनी दृष्टि से शब्दानुपूर्वी क थोडे बहुत परिवर्तन तथा परि वर्वन के साथ उपदेश किया था न कि जिस प्रकार कोई कवि अपनी श्लोक रचना में प्रतिभा के बल पर अपनी नवीन कल्पनाओ गब्दावलियो चित्ता क्पक अलकारो तथा छदो का चामत्कारिक नवीन प्रदान करता है उम प्रकार काई नवीन आविष्कार किया था। इसीलिये व्याकरण शास्त्र को प्रोक्त और काव्य आदि को कृत माना जाता है । वस्तुत भाषा की गतिविधि का अनुसरण करता हुआ उसके शब्दा के सावुत्व अमावुत्व का निर्णयमान करने वाला वैयाकरण व्याकरण के नियमो की रचना मे काई मौलिक वस्तु उपस्थित हो क्या कर सकता है ? 'प्रोक्त आर ऋत' के उपर्युक्त भेद को दृष्टि मे रखकर ही पाणिनि ने तेन प्रोक्तम् (४।३।१०१) तथा कृते ग्रन्थे (३।११६) इन दो सूत्रो की रचना की । पतनि ने भी मश यत्तेन प्रोक्त न च तेन कृतम्' तथा यत्तेन कृत न च तन प्रोक्तम्' कह कर प्राक्त और कृत का भेद स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है। इम प्रकार पाणिनीय व्याकरण के भी प्राक्त हाने के कारण उसमे प्राचीन आचार्यो से विरासत मे प्राप्त प्रचुर सामग्री की वर्तमानता स्वाभाविक ही नहीं आवश्यक भी है। यह दूसरी बात है कि सस्कृत भाषा की तात्कालिक विभिन्न गति विनिया का सूक्ष्मातिसूक्ष्म ध्यान रख कर आचार्य पाणिनि ने प्राचीन नियमा में पय त परिवर्धन एव समापन करते हुए उसे सर्वथा नवीन रूप प्रदान किया। इसनिय पाणिनीय व्याकरण में प्राचीन वैयाकरणा द्वारा निर्धारित परि वर्तित अयरा अपरिवर्तित क्तिनी सामग्री ली गयी और कितनी पाणिनि महा ४॥३...1 २ महा०४।३।१०१ आचार्य पाणिनि और उनका गणपाठ के द्वारा स्वय निर्धारित ह, यह कह सकना कठिन ही नहीं, अपितु असभव भी है।' वह भी विशेषत उस स्थिति मे जव कि हमारे समक्ष प्राचीन व्याकरणो का सर्वथा अभाव है। हरदत्त के कथनानुसार' इतना तो स्पष्ट ही है कि पाणिनि ने अपने व्याकरण की रचना मे आपिशलि के व्याकरण का पर्याप्त उपयोग किया था। इसके अतिरिक्त पक्षिमत्स्यमृगान् हन्ति, परिपन्थ च तिष्ठति (811 ३५,३६) जैसे कुछ सून उपस्थित रिये जा सकते है, जिनमे प्राचीन आचार्यों की सूररचना का सष्ट प्रतिविम्ब दिखाई देता है। इसी प्रकार गणपाठ के नन्यादि, ग्रहयादि पचादि, भिदादि तथा सपत्न्यादि जैसे स्थलो के सून निर्दिष्ट शब्दो तथा गणपठिन शब्दो मे विद्यमान स्वरूपवैपम्य भी प्राचीन आचार्यो के शब्दा शासन से किसी न किसी प्रकार प्रभावित होने का सकेत देते है। इस विषय मे विस्तार से पूर्व लिख चुक है।' पूर्वत प्राप्त गणपाठ मे किए गए परिवर्तन के प्रमग मे ऋक्तन्न के कौतस्कुतादि गण के स्थान पर पाणिनि के लव तथा नवीन नाम कस्कादि', अथर्व प्रातिशाख्य के वृहस्पत्यादि गण के शब्दो का यनस्पत्यादि तथा देस्ताद्वन्द्वे च सून मे पाणिनि के द्वारा किये गये वर्गीकरण, आपिशलि के 'सवादि' गण मे पठित 'द्वि' गब्द के पाठनम मे पाणिनि द्वारा 'सर्वादि' गण में किये गये परिवर्तन तथा प्राचीनो के रोढयादि नाम के स्थ न पर १. p. It will be long before ne understand, If indeed we ever come to do so, wbrt and how niuch of it is aga's onu in addition to the work of his grammatical predecessors दी यदान इन पाणिनि, पृ ।। २ कप पुनरिटमाचार्य ग पाणिनिना अवगतमेन साधव इति ? श्रापिश नन पृवव्याकरगन • ।प.म. भाग १, पृ४६ । ३ सस्कृत व्याकरणशास्त्र का इतिहास भाग १, (पृष्ठ ८३ ८४)) पाद रिपण ४. द्र०यं पृष्ट ३५ ५. द्र० पूर्व पृष्ठ १६ । ६. द्र० पूर्व पृष्ठ २२, २३ । ७ द्र० २६ । सं०३1 सं० व्या० मे गणपाठ को परमरा और आचार्य पाणिनि . पाणिनि द्वारा रवे गये कौड्यादि' नाम की ओर विद्वानो का ध्यान आकृष्ट किया जा सकता है गणों के दो प्रकार पाणिनीय गणमाठ मे दो प्रकार के गण उपलब्ध होते है-एक आकृति- गण तथा दूसरे पठितगण । यो तो अथर्व-प्रातिशाख्य' ऋक्तन्त्र', फिटसूत्र उणादिसूनों मे भी आकृतिगण के दर्शन हो जाते हैं, परन्तु पठिनगणो की उपलब्धि, अर्थ प्रातिशाख्य के सूत्रो आपिशलि के सर्वादिगण-विषयक भर्तृ- हरि के कथन के अतिरिक्त, पाणिनि-व्याकरण से पहले अन्यत्र कही नहीं होती। प्रायः सूत्रो मे गणो का निर्देश करने के लिये उन उन के प्रथम शब्द के साथ 'आदि' अथवा 'प्रभृति' पद का प्रयोग सूत्रकार ने किया है। कही कही गण के प्रथम शब्द का बवचनान्त प्रयोग भी पाया जाता है, परन्तु जह सूर मे कोई गण अभिप्रेत है, वह चाहे 'आदि' अथवा 'प्रभृति' पद का प्रयोग हो अथवा बहुचनान्त का प्रयोग, उसका अभिप्राय ऐसे स्थलो मे सर्वत्र 'आदि'ही होता है। इस 'आदि' शब्द का प्रयोग सामान्यत सामीप्य, व्यवस्था प्रकार तथा अवयव इन चार अर्थो मे विद्वानो ने स्वीकार किया है। इन मे से गण के निर्देश के लिये व्यवस्थावाची तथा प्रकारवाची 'आदि' शब्द का ही प्रयोग उपयुक्त जान पडता है। उसमे भी 'आदि' शब्द जब 'प्रकार' अर्थ को अभिव्यक्त करता हुआ किसी गण का निर्देशक बनता है तो वह निर्दिष्ट गण आतिगण माना जाता है और जब 'व्यवस्था' अर्थ की अभिव्यक्ति करता हुआ किसी गण का बोध कराता है, तो वह निर्दिष्ट गण आकृतिगण न होकर पठितगण माना जाता है। इसे यो भी कहा जा सकता है कि जब १. द्र० पृ पृष्ट ३६,३७॥ २ द्र० पूर्व पृष्ठ २१ । ३.द्र. पूर्व पृष्ठ १६ ! ४. द्र० पूर्व पृष्ठ २६ । ५.२० पूर पृष्ठ २७, २८ । ६ द्र०पूर्व पृष्ठ २६ । ७. संभव है कि गण निर्देशन की ये तीन प्रकार को प्रवृत्तियाँ पाणिनि ने अपने प्राचायों को तीन पद्धतियों के अनुकरण पर अपनाई हो। ८. सामीप्येऽथ व्यवस्थाया प्रकारेऽपयो तथा। चतुर्थेषु मेधावी श्रादि- शन्दं तु लक्षयेत् ।। कातन्त्र सन्धिस्त (८) त्रिलोचन का ।

५७ आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ क्मिी 'आकृति 'गण के निर्देश के लिये 'आदि' अयना तदर्थर रिमी गब्द का प्रयोग किया जाता है, तब वह 'आदि' अयवा तदर्थक गद प्राारवाची होता है परन्तु जन विसो 'पठित गण के निर्देश के लिये 'आदि अथवा उस अभि प्राय वाले किसी अन्य शब्द का प्रयोग रिया जाताहै, तब वह प्रकारांचा न होकर व्यवस्थावाची होता है । पतजलि न 'आदि शब्द के इस द्विविध वैशिष्ट्य को निम्न शब्दो मे उदाहरण । साथ स्पष्ट किया है- अयमादिशब्दोऽस्त्येन व्यवस्थाया वर्तते । तद्यथा देवदत्तादीन् ममुपविष्टानाह 'देवदत्तादय श्रानीयन्ताम् । त उन्थाप्य अानीयन्ते । अस्ति च प्रकारे वर्तते । तद्यथा देवदत्तादय पाढया अभिरूपा दर्शनीया पक्षवतः । देवदत्तप्रकारा इति गम्यते।' आकृति-गण आतिगण की परिभाषा वैयारणो ने निम्न प्रकार दशाई है- १-पदमजरीकार हरदत्त आरतिगण की परिभापा इस प्रकार लिखता है- प्रयोगदर्शनेन प्राकृतिग्राह्यो गण आरतिगण ।' इसका अभिप्राय है कि प्रयोगो की समानता के आधार पर जिन गणा मे शब्दा का सन्निवेश किया जाए, वह 'आकृति' गण होता है। २–वर्धमान ने अपनी गणरत्नमहोदधि मे कम्पादिगण की आकृति गणता स्वीकार करते हुए 'आकृति'गण के स्वरूप को- प्राकृतिगणश्चाय तेनापरिमितशब्दसमूद । आरत्या प्रकारेण लक्ष्यते स प्राकृतिगण । इन शब्दो मे और अधिक स्पष्ट किया है । तदनुमार वर्वमान आकृति गण मे अनन्त शब्द-समूह का अन्तभाव मानता है । अथात् आकृतिगण में प्रयोग अथवा स्वम्प अथरा शब्द सावुत्व की परिस्थितियों को समानता को आधार बना कर, समान आकृतिता के आधार पर, गणपठित शदा के समान जितने भी शब्द प्राप्त हो सके, उन सव का अन्तर्भाव तत्सम्बद्ध आकृतिगण मे माना जाता है। २ प० म० भाग १ पृष्ठ ३८० । १ महा० १३ ॥ ३ गणरत्नमहोदधि पृष्ठ ४३ ।

स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि बालमनोरमाकार के शब्दो मे इसी अभिप्राय को- आकृत्या एव जातीयकतया निर्णेतन्योऽय गण इत्यर्थः । लोकप्रयोगा- नुसारेण एव जातीयका शब्दा अस्मिन् गणे निवेशनीया इति यारत् । इस प्रकार अभिव्यक्त किया जा सकता है प्राकृतिगणों में पठितशब्दों की उपलक्षणता ऊपर लिखी गई परिभापाओ स यह सर्वथा स्पष्ट है कि आकृतिगणो मे शब्दो की अनन्त परम्परा का समावेश सम्भव है, तथा उनका साक्ल्येन परिगणन कथमपि सम्भव नहीं है । इसीलिए गणपाठ के प्रवक्ता द्वारा आकृतिगणा मे उपलक्षण के रूप मे कतिपय शब्दो का ही पाठ किया जाता पठितगणो के समान गन्दा की पूरी गणना नही की गई है । सक्षेप म आकृतिगण शब्दो का वह अपठित समूह है, जिसमे तद्गरण सम्बन्धी सून मे स्थान दिए गए विशिष्ट शब्द की प्रयोग रूप आकृति की समानता रखने वाले सभी शब्दो का समावेश माना जाता है।' वस्तुत पठितगणा और आकृतिगणो का भेद पूर्ण तथा अपूर्ण पाठ के आधार पर ही क्यिा जा सकता है । आकृतिगण शब्द के स्थान पर यदि 'अपठितगण शब्द का प्रयोग किया जाए तो अर्थ अधिक स्पष्ट हो जाता है। पतञ्जलि की श्रेण्यादय पश्यन्ते, कृतादिराकृतिगण ' साधिकार उक्ति से हमारे पूर्व कथन की सर्वात्मना पुष्टि होती है । पतञ्जलि ने उक्त वाक्य मे श्रेण्यादि को पठितगण कहा है और कृतादि को उसके विपरीत अपठित न कह कर उसके पर्याय अतिगण का नाम दिया है। आकृतिगणों में व्याख्याकारों द्वारा प्राक्षय यत पाणिनि ने आक्रति गणो मे सार शब्दो का पाठ नहीं किया था, अत वृत्तिकारा और व्याख्याकारो द्वारा इनमे समय समय पर यथेष्ट शब्दो का प्रक्षेप होता रहा । इसका सप्ट सकेत केयट' और हरदत्त के कृतादिगण १ अविहितलक्षणो मूर्धन्य सुधामादिपु । महा०८।३।६८।। अविहित लक्षणो णत्वप्रतिषेध तुम्नादिपु । महा०८।४ । ३६ ।। र महा०२।१1 ५६ ।। ३ तादिरित्यनादिशब्द प्रकारवाची प्रयोगदर्शनाचोदाहरणम्यानीया कतिपय वृत्तिकारै प्रदशिता । महा. प्रदीप ४ प्राकृतिगणऽप्युटाहरणरूपण कतिपयान् पठति । प०म० भाग १ पृष्ठ २।१।२६॥

आचार्य पाणिनि और उन या गणपाठ की आकृनिगणता स्वीकार करते ए दिया है। यही कारण है नि आज उपनय गणपाठो मे आकृतिगणो मे शब्दो का विस्तृत परिगणन प्राप्त होता है। श्रयस्मयादि (१।४।२०) तया स्नात्व्यादि (७११६४९) जैप गण, जिनमे छान्दम होने के कारण सुगमता से शब्द नहीं भरे जा सकते थे, उपर्युक्त धारणा यी सत्यता की प्रतीर रूप मे देखे जासक्ने है । हा, ब्राह्मणादि (३१।१२४) तथा पचादि (३।१।१३४) जमे पतिपय आकृतिगरण एसे अवश्य है, जिनमे कुछ गदो का पाठ स्वय गणकार ने रिया होगा, ऐसी सम्भावना की जा मस्ती है। क्योकि उन रिगिप्ट शदो के पाठ यो व्याख्याकारो ने याधकाधनार्थ आदि विगेप प्रयोजन उपस्थित करते हए प्राय अनिवार्य बनाया है और गण फार द्वारा ही इन गन्दा का पाठ किया गया है, एमा स्वीकार किया है । अन्यथा इन्हे वह प्रामाणिकता न दी जाती जो दी गई है। वही कही मूत्रा से अनुपपन किसी शब्द विगेप की सिद्धि के लिए कात्यायन तथा पतञ्जलि ने उस शद का, उसकी स्थिति के अनुसार किसी आकृतिगण म अन्तर्भार माना है । ऐसे स्थलो मे पाठ करिप्यते' का अभिप्राय 'पाट दिया जायगा' न होवर समावेश अथवा अन्तर्भावमान समझना चाहिए। आतिगणो का उपर्युक्त अतीव व्यापर स्वरूप स्वीकार कर लेने पर पाणिनि के अनेक आकृतिगणो से, तत्प्रकरणस्य अनेक सूत्रो वा कार्य अथवा प्रयोजन पूरा हो जाता है । इमलिए परिणनि के अनेक सूनो के विषय मे यह पूछा जा सकता है नि उन्ह अष्टाध्यायी मे स्थान क्या दिया गया । यथा- १-इन्द्रजननादि (१३९८८ ) आकृतिगण होन स उममे शिशुनद और यमसभ शब्दों का समावेश हो सकता था फिर सून मे इन गदा को क्या स्थान दिया गया १२ २-देवपयादिगण (२३३१००)की आकृतिगणता म ही लुम्मनुष्ये (५।३। १८) तथा जीविका चापण्ये (५।३।९९) सूना का प्रयाजन पूर्ण होजाने पर भी सूत्ररूप मे इन्हे क्या पढ़ा गया ? ३-पारस्करादि ( ६१४१५७ ) और तुम्नादि (८४३९) गणा को आकृतिगण मानने के कारण इन प्रकरणो के वटुत स सूनो के कार्य पूर्ण हों जान पर भी वे वे सूत्र क्या बनाए गए । १ द्र० महा०८।२।१२।। २. शिशुकद्यमसभव द्वेन्द्रजननादिभ्यश्छ । पा० ४ । ३1८८॥

६० सं० व्या० म गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि इन प्रश्नो का तथा इस प्रकार के अन्य प्रश्नो का उत्तर व्याख्याकारों ने प्रपन्चार्थ अथवा दूसर शब्दो मे स्पष्टीकरणार्थ ही दिया है।' हमारा मन्तव्य हमारा विचार है कि आकृतिगणा में मूलत प्राय एस ही निष्पन्न शदा का पाठ किया गया था जिनकी सिद्धि व्याकरण के सूत्रा द्वारा नहीं हो सक्ती थीं। कात्यायन ने क्सिी किसी आकृतिगण के विषय म अविहित लक्षणो णत्वप्रतिषेध तुभ्नादिपु जैसी वातिका द्वारा इस स्वभाव का अभिव्यक्त किया है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इन आकृति गणो मे प्रकृति प्रत्यय क विभाग को प्रधानता न देते हुए कथमपि उनके साधुत्व का प्रतिपादन किया गया है। इसीलिए आचार्य पाणिनि ने शब्दा के प्रकृति प्रत्यय विभाग को प्रधानता देते हुए यथासम्भव उपरिनिर्दिष्ट अनेक स्थलो पर तत्तत्प्रकरणस्थ आकृतिगणो मे उन उन शब्दो का समावेश करना नहीं चाहा और प्रकृति प्रत्यय विभाग के स्पष्टीवरण के लिए उन उन प्रकरणा मे अनेक सूत्रो की रचना को सादर अपनाया । प्राकृतिगण तथा उत्तरवता वेयाकरण पाणिनि के पश्चात् आनेवाली वैयाकरणो की परम्परा ने उत्तरोत्तर इन आकृति गणा मे शब्दा की सस्या तो बढाई ही साथ ही पाणिनि के वत से पठित गणा को भी आकृतिगण ही मान लिया। हेमचन्द्र और वर्तमान ने तो जहा तक सभव हो सका, शब्दो के विस्तृत समूह को तत्सबद्ध आकृतिगणा म उपस्थित करक अन्य अपठित शब्दो की सिद्धि के लिए उन-उन गरणा की आकृतिगरणता स्वीकार की। ऐसे आकृतिगणा के उदाह रण क लिए वर्वमान क तारकादि तथा पृपोदयदि जैसे गणो को उपस्थित किया जा सकता है जिनम विशाल शब्द समूह उपसरयात है। १ महाभाष्यकार न एस स्थलों के विषय में लिखा है- उदाहरणभूयस्वात् घे सल्यपि विधय सुपरिग्रहीता भवति । या लक्षण प्रावश्च । केवल लक्षण क्वल प्राञ्चो धारा तथा कारक भाति । सवपद पारिषद हीद शास्त्रम् । तन नैक पथा शक्य प्रास्थातुन् । महा०६।३ । १४ ॥ तथा द्रब्य दृष्य हि विदुष लारे समास-यासधारणम् । महाभारत श्रादि० १ ४६ ।। २ मह०८।४।६॥ ३ ४० अण्यादिगण हमरहबत्ति २ १।१०३।। रणरत्नमहो धि पृष्ट ८५ । ।

आचार्य पाणिनि और उनका गणपाठ प्राकृतिगणता के द्योतक शब्द आकृतिगणो की आकृतिगणना के द्योतन के लिए वैयाकरणो ने अनेक प्रकार वर्ते है । यथा- १-चकार निर्देश-पाणिनि ने कही कही आइतिगणता के द्योतन के तिए सूत्रपाठ मे आदि पद के साथ साथ अनुक्त समुच्चयार्थ च शब्द का प्रयोग किया है । यथा-- प्रवृद्धादीनां च (६।२।१४७ )। सुपामादिषु च ( ८३९८)। प्रथम सूत्र पर न्यासकार लिखता है- श्राकृतिगणश्च प्रवृद्धादिष्टन्य ! कुत एतत् ? प्राकृतिगणतां तस्य सूचयितु अनुफ्तसमुच्चयार्थस्य चकारस्य इह एतत्वात् ।' इसी प्रकार हरदत्त दूसरे सूत्र पर लिखता है- चकारोऽनुक्नसमुच्चयार्थ प्राकृतिगणता तस्य सूचयति । २-वृत्करण का अभाव-पाणिनीय सम्प्रदाय म सर्वत्र पठितगणा के अन्त म समाप्त्यर्थक पारिभाषिक वृत् शब्द पढने की व्यवस्था थी । अत जिन गणो के अन्त मे वृत् शब्द का पाठ नहीं है, उन्ह आकृतिगण माना जाता है। इसीलिए पात्र समितादि गण की आकृतिगणता को द्योतित करते हुए काशिकाकार ने स्पष्ट लिखा है-- अवृत्करणाद् आकृतिगणोऽयम् ।। २।१।४८ ॥ इस वाक्य का दूसरा पाठ अन्यस्तत्याद् प्राकृतिगणोऽयम् मिलता परन्तु यह पाठ निरर्थक तथा अमगत होने से सर्वथा अनुपयुक्त है। -यहुयबन निर्देश-शाकटायन तथा हैमव्याकरण के जिन जिन सूना मे गरणनिर्देश के लिए बहुवचन का प्रयोग किया है, उन उन स्थाना पर शाक- टायनच्यावरण की अमोघावृत्ति तथा हैमव्यावरण की बृहबृत्ति मे बहुवचन निर्देश को आकृतिगगता का सूचक माना है। इसलिए एसे स्थानो पर- १ न्य स ६।२।१४७ पृष्ठ ४०३ ॥ २५०म० भाग । पृष्ठ १०१०।। ३. तुलन्ग क्रोन्याय्यरिकरणास्तु म्यादयाऽपरिसमाप्ता एव अतकरणात् । धातुप्रदीप, पृष्ठ ७५। ४ इन व्याकरणा में बहुवचन क साथ आदि पद का प्रयाग भी किया गया है। - है २ म० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि बहुवचनमस्याऽऽकृतिगणत्व द्योतयति।' यहुवचनमाकृतिगरणार्थम् । वचन प्राय मिलते हैं। ४-श्रीभोज के सरस्वतीकण्ठाभरण मे पठितगणो के सभी शब्दो का पाठ सूत्रो मे ही कर दिया है, इसलिए उसमे आकृतिगणो की आकृतिगणता के द्योतन के लिए गण अन्त मे 'आदि' शब्द का ही निर्देश किया गया है । आकृतिगण शैली की प्रथम अाविष्कृति व्याकरण मनीपी सूत्रकारो के मस्तिष्क मे गणशेली पहले पहल सम्भवत. आकृतिगरणता के रूप मे ही प्रादुर्भूत हुई थी। इसके संकेत पाणिनि से पूर्ववर्ती व्यावरण के विभिन्न ग्रन्थो मे मिलने वाली आकृतिगणो की प्रचुरता से प्राप्त किए जा सकते है । भाषा के भयकर प्रवाह मे पडे हुए शब्दो के नित्य परिवर्तमान, विविध एव अज्ञेय रूपो की सिद्धि के लिए व्याकुल एर असमर्थ वैयाकरणो के मस्तिष मे पठित गण-पद्धति की अपेक्षा आकृतिगण पद्धति रूप एकमात्र उपाय का प्रथम प्रादुर्भाव होना स्वाभाविक ही था। पाणिनीय-तन्त्र में प्राकृतिगणता का उपयोग आकृतिगणो की इम व्यापन पद्धति का ही सहारा लेकर पाणिनि ने अनेक प्रकरणो मे अनन्त शब्दो को सकतित करने का प्रयत्न किया है। यथा- -अन्ययों तथा निपातों का निर्देश-वैदिक एव लौकिक संस्कृत पाइमय मे विखरे हुए अनन्त अव्ययो और निपातो को स्वरादि तथा चादि गणो की आकृतिगणता के आधार पर स्वरादिनिपातमन्ययम् ( १११।३७) तथा चादयोऽसत्त्वे (११४१५७ ) जैसे दो छोटे छोटे सूनो द्वारा प्रदर्शित दिया गया। २-समासों का निर्देश-व्याकरण के सूत्रो से सिद्ध न हो मकने वाले ममामयुक्त गन्दो यो परम्परा को पात्रेसमितादि, मयूरव्यसकादि तथा गजदन्तादि गणो के साहाय्य से पानेसमितादयश्च (२।१।४८ ) १. अमोघा वृत्ति १।।८० इत्यादि । २ "त्ति ।।१।१ । ३० ३५ इत्यादि।

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ मयूख्यसकादयश्च (२२११७२) तया राजदन्तादिपु परम् (२२२।३१) सूनो मे साधु स्वीकार किया गया । ३-लिङ्गों का निर्देश-अर्थ वैशिष्टय के आधार पर पुल्लिङ्ग नपु सक- लिङ्ग में प्रयुक्त होनेवाली गन्दो की सुविस्तृतत परम्परा को अर्धर्चादि गण की सहायता से वेवल अर्धाः पुसि च (२।४।३१) इस एक छोटे से सून द्वारा अनुशामित किया गया। ४-तद्धितान्तों का निर्देश-अनन्त गब्दो के तद्धित प्रत्ययान्त स्वरूपो को शिादि तथा शुभ्रादि गणो की कल्पना कसे शिनादिभ्योऽए (४१११११२) तथा शुभ्रादिभ्यश्च ( १।१।१२३ ) सूत्रो द्वारा दर्शाया गया। ५-स्वरों का निर्देश-असम्य शब्दो मे व्याकरण की दृष्टि से अप्राप्त, परन्तु अभीष्ट आधुदात्त तथा अन्तोदात्त स्वर की स्थिति को क्रमश उञ्छादि तथा वृयादि गणो की आकृतिगणता का आश्रय लेकर उन्छादीना च (६।१।१५६ ) तथा वृपादीनां च (६।१।१९९) इन दो सूनो द्वारा निदर्शित किया गया। ६-पत्यसिद्धि, णत्यामारका निदेश-जिन शब्दो मे किमी पाणिनीय सूत्र द्वारा पत्व की सिद्धि अथवा णत्व का अभाव व्यान नहीं होता था, उन शब्दो की प्री सृष्टि को क्रमश सुपामादि तथा नुभ्नादि गणो का सहारा लेकर सुपामादिषु च (८।३।१८ ) तथा तुम्नादिषु च (८।४।३९) इन दो सूत्रो द्वारा माथु शब्दो की श्रेणी में उपस्थित किया गया। ७-सर्वथा अन्याकृत शब्दो का निदेश-अष्टाध्यायो के सभी सूत्रा से सिद्ध न हो सकने वाले शिष्टप्रयुक्त साधु शब्दो के महान प्रवाह को पृपोदरादि गण की प्रकल्पना करखे पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम् (६।३।१०८) इस एक सूत्र से ही प्रदर्शित एवं माधु प्रमाणित कर सकने मे आचार्य पाणिनि समर्थ हो सके। आकृतिगणात्मकशैली पर आक्षेप कुछ आलोचको ने आकृतिगरणात्मक शैली को अपनाने वाले वैयाकरण के शब्दानुशासना पर आक्षेप करते हुए ' भाषा पर पूरा अधिकार न होन क कारण अभिप्रेत शब्दो की पूरी सूची उपस्थित न कर सकने वाले वैयाकरण ही आकृतिगणा की शरण लेने है" कह कर दोपपूर्ण बताया है।

६४ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि वास्तविक्ता इस से सर्वथा विपरीत है, व्याकरण चाहे कितना ही विस्तृत क्यो न हो वह प्रतिपद निर्देश द्वारा शब्दो के अन्वाख्यान मे सर्वथा असमर्थ होता है । इसलिए व्याकरण की अपूर्णता को दूर करने अथवा दूसरे शब्दो मे सक्षिप्त सूनो के आधार पर एक सजीव तथा अतिविशाल वाडमय वाली भाषा के ममूर्ण क्षेत्र को स्वायत्त कर सकने अथवा अध्ययन कर सकने का, गणपाठ की आकृतिगरणात्मक शैली को अपनाने के अतिरिक्त अन्य कोई मरल, व्यापक एवं उपादेय मार्ग ही नहीं हो सकता। इतना ही नही, जैसा कि ऊपर दिखाया जा चुका है कि पाणिनि ने तो ययासभव आकृतिगणो के क्षेत्र से शब्दा को दूर रख कर उनके प्रकृति प्रत्यय विभाग के प्रदर्शन का पूरा पूरा प्रयास किया है । इसलिए पाणिनि के व्याकरण मे यन तन स्वीकृत आकृतिगणता के लिए उपयुक्त आलोचना का कोई मूल्य नही है। हा, हेमचन्द्र और वर्वमान की आकृतिगणात्मक पद्धति के लिए जिनमे अधिक से अधिक गणो को आक्रतिगणता का रूप दिया गया है, उक्त आलोचना क्थचित् ठीक हो सकती है। पठितगण आकृतिगणो के विपरीत पठितगण उन सून सकतित शब्दसमूहो को कहा जाता है, जिनमे शब्दो की परिपूर्ण सूची स्वय गणकार द्वारा उपस्थित कर दी जाती है । यथा-सादि, स्वस्रादि तथा कथादि आदि गण । इम प्रकार पठितगणो मे स्वय गणकार अथवा सूरकार द्वारा अपेक्षित शब्दो को व्यवस्थित कर देने के कारण इन मे अन्य शब्दो का समावेश नही किया जा माना। इसी कारण इन पठितगणो को नियतगण भी कहा जाता है । इन पठितगणो का निर्देश भी आकृतिगणो के समान गण के प्रथम गद क साथ आदि अथवा प्रभृति गन्दो का अथवा वहुवचन का प्रयोग कर दिया जाता है। समाप्तिबोधार्य 'वृत्'करण पटिनगणो की समाप्ति की सूचना के लिए पाणिनीय सम्प्रदाय के गण. पाठ मे उन उन गणो के अन्तिम शब्द के पश्चात् समाप्त्यर्थक परिभापिर द्रव्य ६०॥

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ ६५ . वृत् शब्द का प्रयोग किया गया था। इम 'वृत्' गन्द का अर्थ व्याख्यागारो ने वृत्त समाप्त 'आदि किया है । इस पारिभापिर 'वृत्' शब्द का पाणिनीय धातुपाठ मे पठितगणो की समाप्ति का द्योतन कराने के लिए उपयोग किया गया है। भ्वादिगण की समाप्ति पर मिलने वाले वृनुकरण को यजादि अवान्तर गण से सबद्ध परखे उसे पठितगण माना जाता है तथा भ्वादि' गण से उसका सबन्ध न होने के कारण मादि को आवृतिगण कहा जाता है। दुर्भाग्य की बात है कि गणपाठ मे पठितगणत्व के सूचक वृत्करण की प्रक्रिया सम्प्रति पठिनगणो मे सर्वत्र दिखाई नहीं देती । कागिकाकार ने केवल सफलादि, सुवास्त्वादि जैस दो चार गणो म तथा गणपाठ के हस्तलेख सख्या २ मे निकादि तथा यौधेयादि गणा म वृत्' शब्द का प्रयोग मिलता है । नागेश ने लघगन्देन्दुशखर मे कुछ गणो के अन्त मे वृत्' करण की प्रक्रिया को दशाने का प्रयास किया है । इसकी सूचना हमने यथास्थान गणपाठ की आलोचनात्मक टिप्पणी मे दी है। व्याकरण सिद्धान्त सुधानिधिकार ने सर्वादि गण मे 'वृत्' की सत्ता का निर्देश करके उसके पठितगणत्व की घोषणा की है। काशिवापार ने पानेसमितादि गण म वृत्वरण के न होने के कारण ही उमको आकृतिगण माना है। इससे यह १.२० व्या०सि० सुधानिधि १ । १ । २५, धानुत्ति, पृष्ठ ३५४ । २ पाणिनि से प्राचीन काशल व्यावरण की कनहरीका म वृत्करण नहीं मिलता। उत्तरवता वैयाकरणों के धातुपाठों में भी वृत् का प्रयाग स्वल्प ही मिलता है। चद्रगोमी के मुद्रित धातुपाठ म केवल म्यादि क अन्त म यजादि की समाप्ति के लिए वृत्करण उपलब्ध होता है । जैनन्द्र व्याकरण क शब्दागाव ( दाक्षिण त्य) शासा के धातुपाठ में केवल नवा तर गणो की समाप्ति के लिए वृत्' शब्द का निदश पाया जाता है। यही अवस्था कातन तथा हेमधातुपाठ की भी है । क्वल शाक्ययन धातुपाठ में प्रधान गणा के अन्त म उत्करण उपलब्ध होता है। ३ दिति यजादिपरिसमाप्ति । न्यायधिकरणान्तु म्यादयोऽपरिसमाता एव, अमृत्करण पात् । धातुप्रदीप पृष्ठ ७५ । ४ हमारे द्वारा गणपाठ क पाटश सस्करण के सम्पादनार्थ सहीत हस्तलेखों म रिशिध हस्तनस। ५ द्र० हमारे गणपाठ के अादशसस्करण ने यत म । ६ अगत्वरणालाकृतिगणोऽयन् । काशिमा २।१ । v६ || इस के पाठन्तर क लिए देसो इसी ग्रथ का पृष्ठ ६१ पटित १६ । ९ - . मं० व्या० मे गणपाठ की परमरा और आचार्य पाणिनि स्पष्ट है कि 'वृत्' शब्द का निर्देश ही किसी गण को पठितगण बनाता है और उसका अभाव ही आकृतिगण बना देता है। पानि के उत्तरवर्ती सूनकारो की पीढी ने सम्भवतः पठितगणत्व के द्योतक वृत्वरण की प्रक्रिया को उपेक्षित कर दिया, क्योकि उत्तरवर्ती क्मिी वैयाकरण के गणपाठ मे कही पर भी वृत्करण उपलब्ध नहीं होता। गणपाठ का द्विविध पाठ महाभाष्यकार पतञ्जलि ने गौरादिगण के विषय मे लिखा है- एव तर्हि गौरादिषु पाठादीकारो भविष्यति । गौरादिपु न पठ्यते । नहि किञ्चित् तुन्नन्तं गौरादिपु पठ्यते । ७।२।९६ ॥ अर्थात्-[कोष्ट शब्द के ] गौरादि गण मे पाठ होने से ईकार हो जाएगा। गौरादि गण मे नही पढा जाता । कोई भी तुन्नन्त गौरादि गण मे नही पढा जाता। पतञ्जलि के इस परस्पर विरुद्ध वाक्य की सगति दर्शाते हुए फैयट ने लिखा है- गोरादिपाठादिति-पृथिवी, क्रोष्ट, पिप्पल्यादयश्चेति छेदाध्यायिनः पठन्ति । नहि किञ्चिदिति-संहिताध्यायिनो न पठन्ति । महा० प्रदीप ७।२। ९६ ।। अर्थात्-गौरादि गण मे पृथिवी क्रोट पिप्पल्यादयश्च ऐसा छेदाध्यायी पढ़ते है और संहिताध्यायी नही पढते । बयट ने इस व्यारया मे गणपाठ के संहिताध्यायी और छेदाध्यायी द्विविध आचार्यों का निर्देश क्यिा है । इससे स्पष्ट है कि कैयट के समय तक गणपाठ के छेदात्मक और सहितात्मक अर्थात् बृहत् दीर्घवृद्ध तथा लघु दो प्रकार के पाठ विद्यमान थे । इन द्विविध पाठो के विषय मे कैयट के उक्त निर्देश के अतिरिक्त और कोई सवेत उपलब्ध नहीं होता। हा, सस्कृत वाड्मय मे अनेक ऐसे ग्रन्थ है जिनके वृद्ध और लघु दो प्रकार के पाठ मिलते है । यथा-निघण्टु निरुक्त, भरत नाट्यशास्त्र, सुश्रुत, चाणक्य नीति आदि । पाणिनि अष्टाध्यायी क भी वृद्ध और लघु दो पाठ है । काशिकावृत्ति वृद्ध पाठ पर है और कात्यायन के वार्तिक तथा महाभाप्य लघुपाठ का आश्रयण करते है।' द्र० स० शास्त्र का दतिहास, भाग १, पृष्ट १५१ (प्र० स०)। " । आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ कतिपय गणों में निष्पन्न शब्दों का पाठ पाणिनि तथा अन्य सभी व्याकरणो के कतिपय गणो मे निप्पन शब्दो का पाठ मिलता है। यह निप्पन शब्दो का पाठ भी दो प्रकार का है। एक सूत्रो मे प्रकृतिमान का पाठ करके गणपाठ मे निप्पन्न शब्दो का पाठ करना। यथा-न -नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः ( ३११।१३४) सूत्रनबद्ध नन्द्यादि ग्रहयादि और पचादि आदि गणो मे नन्दनः ग्राही पचः आदि प्रकृतिप्रत्यय निष्पन्न शब्दो का पाठ । दूसरा सूनो मे ही निष्पन्न शब्दो का निर्देश करके गणपाठ मे भी निष्पन्न शब्दो का ही पाठ करना यथा।-तिष्ठद्गु- प्रभृतीनि च (२११ । १७) पात्र समितादयश्च (२।१।।८ ) मयूरव्यंस- कादयश्च (२।१ । ७२) आदि सून सबद्ध गणो मे तिप्ठद्गु, पात्र समितः, मयूरख्यसकः आदि समस्त निष्पन्न शब्दो का पाठ । द्वितीय प्रकार के निप्पन्न शब्दो के पाठ की शैली का निपातन शब्द से भी व्यवहार होता है । निपातन का अभिप्राय भी यही होता है कि जो शब्द जिस रूप मे वर्नमान हो उसको उसी रूप मे पढकर साधु मान लेना । यह निपातन की शैली गणपाठ के अतिरिक्त अष्टाध्यायी के अनेक सूनो मे भी प्रतिष्ठितहे ।' निपातन शैली पर आक्षेप और उसका समाधान यहा यह प्रश्न किया जासकता है कि सम्भवतः वैयाकरणो मे प्रथम इन्द्र, जिसने पतञ्जलि के कथनानुसार शब्दो का प्रतिपद पाठ किया था तथा अन्वेपको की धारणानुमार इन्द्र के अनुयायी प्रातिशाख्यकारो ने भले ही शब्दो की प्रकृति-प्रत्यय विभाग की ओर विशेष ध्यान न देते हुए उनके निप्पन रूपो को ही अपने व्याकरण मे स्थान दिया हो, परन्तु लक्ष्यलक्षणे व्याक- रणम् के अपूर्व आदर्श पर चलने वाले महान सूक्ष्मेतिक पाणिनि जैसे सूनशैली के निष्णात आचार्य के व्याकरण मे निपातन शैली ने क्यो स्थान प्राप्त किया। १ 'छन्दसि निश्क्यदेवहूय (३। ११ १२३) इत्यादि वैदिक, 'मृस्विग्दधृक्नग' (३।२१ ५६ ) इत्यादि लौकिक पद साधु पनिदर्शक सूत्र । २ महा० नगापूर ५०। 3 द्र० ग्रान टी एन्द्रम्मल ग्राफ समन ग्रामरियन्स, पृष्ठ १२ तथा उसमे ४ मा० नवा० पृष्ट ७ । यागे।

६८ सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए हमे उन शब्दों के स्वरूप पर ध्यान देना होगा, जिनके लिए निपातन शैली का आश्रयण किया गया है। सुपामादि तथा क्षुम्नादि गणो के विषय मे कात्यायन का अविहितलक्षणो मूर्धन्यः सुपामा- दिपु' तथा अविहितलक्षणो णत्वप्रतिषेधः क्षुभ्नादिपु कथन, इसी प्रकार पृपोदरादीनि यथोपदिष्टम् (६ । ३ । १०८) सूत्र की व्याख्या मे पृषोदर आदि निपातित शब्दो के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए पतञ्जलि का येषु लोपागमवर्णविकाराः श्रूयन्ते न चोच्यन्ते वक्तव्य निपातित शब्दों के स्व. रूप को भली भाति स्पष्ट कर देता है। इसी बात को काशिकाकार के शब्दों मे अधिक स्पष्ट करके यों भी कहा जासकता है-- यदिह लक्षणेनानुपन्नं तत्सर्व निपातनात् सिद्धम् ।' इस लक्षण के अनुसार जिन कतिपय शब्दो मे लोप, आगम, वर्णविकार आदि कुछ ऐसे कार्य दिखाई पडते है, जिनकी प्राप्ति सूत्रकार के किसी सूत्र द्वारा नही होती, परन्तु होते है वे शिप्ट-प्रयुक्त । ऐसे शब्दों की साधुता को प्रमाणित करने के लिए उन्हें उनके स्वरूप मे ही उपस्थित किया जाता है । निपातन शैली के मर्मज्ञ किसी विद्वान् ने निपातन की तीन विशेषताओ को निम्न श्लोक मे उपस्थित क्यिा हे--- अप्राप्त प्रापणं चापि प्राप्तेवारणमेव वा। अधिकार्थ विवक्षा च त्रयमेतन्निपातनम् ॥ अर्थात्-अप्राप्त कार्य की प्राप्ति, प्राप्ति का प्रतिपेध और अधिक अर्थ (विशेषार्थ ) को विवक्षा इन तीन कार्यों के लिए निपातन किया जाता है । भर्तृहरि ने निपातन का स्वरूप इस प्रकार व्यक्त किया है-- धातुसाधनकालानां प्राप्त्यर्थं नियमत्स्य च । अनुवन्धविकाराणां रूढयर्थे च निपातनम् ॥ वाक्यपदीय । सक्षेप मे यह कहा जासकता है कि उन रूढि शब्दो के लिए, जिनमे प्रकृति और प्रत्यय को देखकर अर्म की कल्पना नही की जासकती, अपितु उनके अर्थ को जान कर ही प्रकृति प्रत्यय की प्रकल्पना की जाती है, तथा जिनकी प्रारम्भिक उत्पत्ति कब, कैसे,तथा किस रूप में हुई, एवं भाषा-प्रवाह के ५, महा०८।३।६८।। ३.महा०६।६।१०८ ॥ २ मा०८1४1३६ ।। ४. काशिका ५। ११५६॥

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ प्रचण्ड थपेडो ने उनके प्रारम्भिक रूप में कितना परिवर्तन कर दिया, यह सब कुछ ज्ञात नही, निपातन की पद्धति के अतिरिक्त दूसरी कोई सम्भव पद्धति ही नहीं थी, जिसे पाणिनि आदि वैयाकरण अपनाते। गणों में शब्दों का निर्विभक्तिक पाठ जिम प्रकार धातुपाठ मे धातुओ को उनके वास्तविक स्वरूप के निदर्शन के लिए निविभक्तिक पढा गया है, उसी प्रकार गणपाठ मे भी गब्दो के मूल स्वरूप के ज्ञापन के लिए उनका निर्विभक्तिक मूलरूप अर्थात् प्रातिपदिक अवस्था मे वर्तमान स्वरूप को ही अपनाया गया । इस कारण गणपाठ का दूसरा नाम प्रातिपदिक पाठ भी है।' इस प्रातिपदिक अवस्या को ही ध्यान मे रखकर पत्तञ्जलि ने प्रातिपदिकान्यपि शुद्धानि पठचन्ते शब्दो द्वारा गणपाठ मे प्रातिपदिक पाठ का सकेत किया है। कचित् सविभक्तिक पाठ गणपाठ मे कही कही किन्ही शब्दो का सविभक्तिक पाठ भी उपलब्ध होता है । यया उर.प्रभृति ( ५।४।१४१ ) गण मे पुमान् अनड्यान्, पय., नौ , लक्ष्मी: इन शब्दों का एक वचनान्त रूप मे पाठ मिलता है । इस पाठ वैशम्य ने व्यास्यावारो को सविभक्तिकनिर्देश का प्रयोजन बताने के लिए विवशकर दिया । काशिकाकार ने उक्त शब्दो के सविभक्तिक पाठ का प्रयोजन इस प्रकार दर्शाया है- पुमान् अनड्वान् पयो नौलक्ष्मीरिति विभक्त्यन्ताः, न प्रातिपदि- कानि । तत्रेद प्रयोजनम्, एकवचनान्तानामेव ग्रहणमिह विज्ञायेत, द्विवचन बहुवचनान्तानांमा भूदिति । तत्र शेषाद विभाषा (५।४।२५४) इति विकल्प एव भवति-द्विपुमान्, द्विपुस्कः; बहुपुमान्, वहुपु स्कः । कशिका ५ । १ । १५१॥ अर्थात्-पुमान् आदि शब्दो के एकवचनान्त पाठ का यह प्रयोजन है कि इस सूत्र मे इन शब्दो के एकवचनान्त से निष्पन्न बहुव्रीहि समास मे ही नित्य कप हो । द्विवचनान्त तथा बहुवचनान्त से निप्पन्न बहुव्रीहि मे शेषाद १ खिलपाठो धातुपाठ चकारात् प्रातिपदिकपाठश्च । न्यास १२३॥२॥ २ महा० नवा०, पृष्ठ ७६ ।

७० स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि विभाषा (५॥ १। १५४ ) सूत्र से विकल्प स कर हो। यथा-द्विपुमान्, द्विपु स्क, बहुपुमान, बहुपु स्क । पुमान आदि शब्दो के सविभक्तिक पाठ का यही प्रयोजन चन्द्रगोमी तथा वर्धमान प्रभृति व्याख्याकारो ने भी दर्शाया है।' क्वचिद् वाक्य-प्रयोग पाणिनीय गणपाठ के प्रवृद्धादि गण ( ६ । २ । १५७) म- प्रवृद्ध यानम् । प्रवृद्धो वृषल ।प्रयुत्ता सक्तय । श्राकऽवहित । अपहितो भोगेषु । आदि वाक्यो का पाठ दृष्टिगोचर होता है । ये विशिष्ट प्रयोग भी व्याख्याकारोको उनक विशिष्ट प्रयोजन को व्यक्त करने के लिए विवश करत है। याशिकाकार ने इन वाक्य प्रयोगा का प्रयोजन इस प्रकार दशाया है- यानादीनामत्र गणे पाठ प्रायोवृत्तिप्रदर्शनार्थी न विषयनियमार्थ । यानादिभ्योऽन्यत्रापि तपामन्तोदात्तत्व भवत्येव । विषयनियमार्थ एवे अथात् यानम् आदि का इस गण मे पाठ उन उन शब्दो की प्रायिक वृत्ति के निदर्शन के लिए है, विषय के नियमन के लिए नही क्योकि यानादि विपया से अन्यत्र भी प्रवृद्ध आदि शब्दो का अन्तोदात्तत्व देखा जाता है । विषयनिमार्थ ही [यानादि का पाठ है ऐसा कई व्याख्याकारो का मत है । भट्ट यज्ञेश्वर ने अपनी गणरत्नावली के मूल पाठ (श्लोक) मे केवल प्रवृद्ध प्रयुक्त आदि शब्दो का ही निर्देश करके व्याख्या मे काशिकाकार के मत से प्रवृद्ध यानम् इत्यादि का पाठ माना है और उसका काशिकाकारोक्त प्रयोजन ही निखा है। १ चान्द्र पात्त ४ । ४ ११३६ गणरत्नमहोदधि पृष्ठ ६६ । २ काशिकाकार क द्वारा दो विभिन प्रयाननों का उल्लस हाने से तथा प्राद्ध और अरहित शन्दों का द्विधापाठ उपलब्ध होने से इस बात की समवना हाती है कि प्राद्ध यानम्' श्रादि वाक्य मूल गणपाठ के नहीं है अपितु रतिकारा व उदाह रण कथंचित् गणपाट में प्रवि' हा गए हैं । प्राचान हम्तनयो पर काम करन वान विद्वान् जानत है कि किसी हस्तनप पर उसके प्रात में (माजन पर ) दिए गए पिरणामक पाठ उत्तर प्रतिलिपि करने वाल की अशानता अथवा प्रमार से मूल पाट में सनिविष हा नात हैं। त्येके ।

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ ७१ गण में शब्द विशेष के प्रथम पाठ का कारण गणों के आरम्भ में जिन शब्दों को स्थान दिया गया है अथवा जिन शब्दों के आधार पर उन उन गणों के नाम-करण हुए है, यथा सर्वादि चादि आदि, उन उन शब्दों को प्रथम स्थान क्यों दिया गया, इस पर भी कुछ विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है। यद्यपि गण निर्देश करते समय किसी न किसी शब्द को प्रथम पढना ही पडता और जिस शब्द को भी प्रथम स्थान दिया जाता, उमके लिए भी यह पूछा जा सकता है कि इस शब्द को प्रथम स्थान क्यों दिया गया । इम- लिए सर्वत्र इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर भी नहीं दिया जा माता । तथापि इतना अवश्य है कि कतिपय गणों मे इस प्रश्न पर विचार किया जा सकता है और उसका उत्तर भी मिल सकता है। हमारे विचार मे सामान्यतया किमी भी शब्द को प्रथम स्थान देने के लिए यह वाञ्छनीय है कि उस शब्द मे अपने गण के अन्य शब्दो की अपेक्षा लायव, प्राचीन-परम्परा, प्रसिद्धि अथवा किसी अन्य प्रकार की विशेषता विद्यमान हो ।हमारी इस धारणा मे यह कारण है कि गण के प्राथमिक शब्द को ही अष्टाध्यायी के तद्गण सबन्धी सूत्र मे रखकर उसी एक शब्द से सूत्रकार पाणिनि को पूरे गण का प्रतिनि- वित्व करवाना इष्ट था । अतः सूत्र यथासंभव सक्षिप्त, सरल एवं सुबोध बन मके, इसलिए उपर्युक्त गुणों की सत्ता गण के आरम्भ मे प्रस्तुत शब्द मे सर्वथा वाञ्छनीय है। लाघव-सूत्रकार पाणिनि ने लाघव की दृष्टि से कई प्राचीन गणो के प्रारम्भिक बडे शब्द के स्थान पर लघु शब्द का निर्देश दिया है । यथा ऋक्तन्न मे प्राप्त होने वाले कोतस्कुतादि (सून १२८ ) गण के प्रथम कौतस्कृत शब्द के स्थान पर पाणिनि ने अति लघु कस्क शब्द को इस गण के आरम्भ मे पहा। एक मात्र शब्द-लाधव को ही अपने व्याकरण का आदर्श मानने वाले अर्वाचीन चन्द्रगोमी, पाल्यकीति हेमचन्द्र भोज तथा वर्षमान प्रभृति वैया- करणो ने पाणिनि के द्वारा स्वीकृत अनेक गण-नामों के स्थान पर छोटा नाम रखने के लिए पाणिनीय गण के प्रारम्भिक शब्द को हटाकर उनके १ द्र० कस्कादिषु च । पा० ८३४८ ॥

७२ स० व्या० मे गणपाठ की परभरा और आचार्य पाणिनि स्थान पर अन्य अपेक्षाकृत छोटे शब्दो को रखने का प्रयास किया है । इन का निर्देश उन उन वैयाकरणा के प्रकरण म य पास्थान रिया जाएगा। अनेक साम्प्रतिक विद्वान अर्वाचीन गन्दानुशासना मे इस प्रकार का गब्द लाघव देखकर उन्हे पाणिनीय तन्त्र की अपेक्षा अधिक विकसित और प्रौढ मानते हैं परन्तु वास्तविक्ता इससे विपरीत है । पाणिनि प्रभृति प्राचीन वैयाकरण एक मात्र शब्द लाधव को ही अपना आदर्श नही मानते थे। वे अर्थ-लाघव का भी उतना ही ध्यान रखते थे। इसलिए पाणिनि ने सर्वनाम स्थान' जैसी महती प्राचीन अन्वर्थ सज्ञाओ को भी अपने शास्त्र मे स्थान दिया । ये सज्ञाए शाब्दिक रूप मे महती होती हुई भी परम्परा से लोक विज्ञात होने के कारण अर्थरूप मे लघुभूत । अर्वाचीन शब्दानुशासना मे सर्वथा नवीन सज्ञाओ के होने के कारण वे शाब्दिक दृष्टि से लधु होते हुए भी अर्थ की दुरूहता के कारण गुरु बन गए। प्राचीन परम्परा-आचार्य पाणिनि ने लाघव के साथ साथ प्राचीन परम्परा का भी ध्यान रखते हुए लघुभूत शब्द के स्थान पर परम्परा प्राप्त बडे शब्द को आदि मे रखना उचित समझा । यथा-सर्वादिगण मे त्यत् तद्र त्व आदि अनेक शब्द ऐसे पठित है जो सर्व' की अपेक्षा लघु है परन्तु पाणिनि ने उन्हे प्रथम स्थान न देकर प्राचीन परम्परा को ध्यान में रखते हुए स' शब्द को ही प्रथम रखा। सर्व शब्द की महत्ता इससे भी प्रक्ट है कि प्राचीन आचार्यों ने सर्वादिगण की जो अन्वर्थ सज्ञा (सर्वनाम) रखी उसमे भी सर्व शब्द को ही स्थान दिया है । इसलिए पाणिनि ने इस गण के आरम्भ मे पठित शब्द तथा सर्वनाम सज्ञा का निर्देश प्राचीन परम्परा के अनुरोध स क्यिा है । इसमे यद्यपि शब्द गौरव तो हुआ परन्तु अर्थकृत नाघव हो गया । शब्द-लाधर और अर्थ-लाघव म अर्थ-लाधव ही प्रधान होता है। इसी प्रकार पाने समितादि पारस्करादि तथा पृपोदरादि जैसे गणो + बडे बडे प्रारम्भिव शब्द भी सभवत वैयाकरणो की प्राचीन परम्परा के अनुकरण पर ही गणो म प्राथमिक्ता प्राप्त कर सके ह । इन मे पृपोदरादि गण के लिए पाणिनि के पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम् ( ६ । ३ । १०८) के यथोपदिष्टम् -पोदरादि गन्दा का जिस रूप मे उपदेश किया गया की दृष्टि म प्राचीन आचार्यों द्वारा इतने अंश का अध्याहार करते हुए यह अनुमान वरना सरन है कि यह गण पाणिनि स प्राचीन रहा होगा। पाणिनि स आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ प्राचीन परम्परा के अनुगामी ऋक्तन्त्र मे यह गण उपलब्ध भी होता है। देखो मृक्नन्न सूत्र सम्या १६६ । प्रसिद्धि-इसी प्रकार गोनविषयक गणो मे तथा मयूरच्यसकादि, याजकादि, तक्षशिलादि एव ब्राह्मणादि गणो मे बडे बडे गन्दो को प्रथम स्थान देने मे उन उन नन्दो की तात्कालिक पयाप्त प्रसिद्धि को ही कारण मानना होगा, जिसकी स्पष्ट छाप तत्कालीन साहित्य मे हम पा सकते है । लोहितादि गण के प्रारम्भिक 'लोहित' गन्द के क्यपन्त होने से उभयपद के प्रयोग न केवल पाणिनि के समय ही प्रसिद्ध थे, अपितु कात्यायन और पत-जलि के ममय मे भी विद्यमान थे, जब कि इस गण के अन्य सभी शब्द परस्मैपद के प्रयोगो से हाथ धो बैठे, केवल आत्मनेपद मे ही उन के प्रयोग सीमित रह गए । यही कारण है कि लोहित' शब्द को छोड कर इस गण के गेप सभी शब्दो को लोहितादिगण मे हटाकर मुशादिगण मे ( जिससे क्य होकर केवल आत्मनेपद के प्रयोग होते है ) पढने का प्रस्ताव कात्यायन द्वाग रखा गया और पतजलि द्वारा अनुमोदित हुआ।' अथवा दूसर गन्दो मे लोहितादि गण को समाप्त करके लोहि तडारभ्य क्यप, जैमी सूत्ररचना करने का सुझाव दिया। इसमे विदित होता है कि पाणिनि के समय ही लोहितादि गण के लोहित' के अतिरिक्त दोप शब्दो के उभयदपद के प्रयोग उतने प्रसिद्ध नही थे जितने लोहित के । सम्भवत इसी कारण पाणिनि ने लोहित गन्द को ही प्रथम स्थान देना उचित समझा होगा। वैशिष्टय-पाणिनीय गणपाठ मे कतिपय एमे भीगण उपलब्ध होते है, जिनमे किमी गन्द को उमकी रिमी विशेषता अथवा महत्ता को देखते हुए ही प्रथम स्थान दिया गया है । इसके उदाहरण के रूप में भी सर्वादि गण को उपस्थित कर सकते है। प्राचीन आचार्यों द्वारा रखी गई सर्वादि गब्दो की सर्पनाम मजा मे सर्व गब्द का प्रयोग होने से 'सर्व' गब्द का महत्त्व अतिशय बढ़ गया । इसलिए प्राचीन अन्वर्य मर्वनाम सज्ञा को अपनाते हुए पाणिनि यो सवादिगण मे पठित नयु गन्दो की उपक्षा करके 'पर्व' गन्द को ही प्रथम स्थान देना पड़ा। मर्व शब्द के इमी वैशिष्टय ने पाणिनि के पश्चात् आनेवाली वैयाकरणा की तम्बो पीडी को भी जिसने यथावमर केवन लपता , लोहितडाभ्य क्ययना भूशानिवितराणि । महा० ३ 11।१३ ॥ १० स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि को ही प्रधानता देते हुए बहुत से पाणिनीय गणो के प्रथम शब्दो को हटाकर अन्य लघुभूत शब्दा को स्थान दिया, सर्व शब्दो के स्थान पर अन्य किमी छोटे शब्द को रखने का दुस्साहस करने से रोक दिया । इसी प्रकार कराड्यादि गण के द्विविध अर्थात् प्रातिपदिक और धातु रूप स्वभाव के द्योतन मे सहायक होने के कारण' ही गण के अन्य शब्दो की अपक्षा कराडू को ही प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। गणपाठ में अवान्तर गण पाणिनि ने केवल गणो क आदि शब्द के निर्धारण मे ही विशेष ध्यान रखा हो एसी बात नहीं है । उसने प्राय सम्पूर्ण शब्दो के पौर्वापर्यरूप क्रम के निर्धारण मे भी विशेष प्रयत्न किया था। इस प्रयत्न की सूचना जहा सवादिगण के शब्दो के पाणिनीय क्रम की आपिशलक्म की तुलना से १ श्राह चायमिम दीर्घ मन्य धातुावभाषित । महा०३।१ । १२७ ।। कण्ड्यादि गण क शब्दों को केवल धातु मानन पर 'क्ण्डू' में दीर्घ ऊकार का पाठ व्यर्य होता है क्योंकि ह्रस्वान्त 'कण्डु' पाठ होन पर भी यक् परे रहन पर 'अकृतसार्वधातुकयोदीर्घ ' (७। ४ । २५ ) से दीर्घ होकर कण्डूयति रूप निष्पन्न हो ही जाता । पुन दीघ पाठ व्यर्थ होकर ज्ञापन करता है कि क्ण्ड्वादि शब्द देरल धातु ही नहीं हैं, प्रातिपदिक भी है। २. इस विषय पर पर प्राग ( पृष्ठ ७७८१ ) विस्तार से लिखा जाएगा। ३. पाणिनि के सर्वादिगण का पाठ प्रम है- पूर्वपरावरदक्षिणा त्यद्, तद् यद् इदम्, अदस्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद, भवतु, किम् ।' प्रापिशलि के गण में इसका पाठ इस क्रम से था-'किम्, त्यद्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस, एक, द्वि, युष्मद, अस्मद् पूर्वपराधर... भरतु' (द्रष्टव्य-इह त्यदादिन्यापिशलै क्मिादीन्यस्मत्पयन्तानि तत पूर्वपराधरेति" । भर्तृहरि महा०ीका पृष्ठ २८७)। श्रापिशल क्रम के अनुसार 'क्सिानामबहुभ्योऽद्वयादिभ्य' (पा० ५ । ३१२) स्ट में यादि के अन्तर्गत न होने से 'किम्' क ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं थी परन्तु पाणिनि ने 'त्यदादीना मियो यद्यत् पर तच्छिप्यत' (काशिका २।२।६२) नियम को ध्यान में रखत हुए 'यश्व कश्च की, भवाश्च कश्च को' श्रादि एकशेष में 'किम्' शब्द का शेष द्योतनार्य प्रापिशलि द्वारा स्यदादि से पूर्व पढे गए 'किम्' शन्द का प्रान्त में पढ़ा । आपिशलि का एक शेष का नियम शत है।

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ प्राप्त होती है, वहा अवान्तर गणो के निर्देश अथवा व्यवहार' से इसकी अतिस्पष्ट प्रतीति होती है। पाणिनि ने गणो के गब्दो के क्रमनिवारण मे उन गणो से माक्षात् सवन्ध रखने वाले प्रमुख सूत्रो के अतिरिक्त किन अन्य सूत्रो मे तद्गणस्थ कतिपय शब्दो का उपयोग हो सकता है, इस बात का भी मूक्ष्म ध्यान रखकर कतिपय गणो मे किन्ही विशिष्ट शब्दो को एक साथ रखने का प्रयास किया है । तथा उन शब्दो मे प्रथम पठित शब्द के साथ आदि शब्द का प्रयोग करके सूनो को सरत तथा सक्षिप्त करने का लाभ उठाया है । इस प्रकार के अन्य सूनो के कार्य मे उपयोगी गन्द समूहो को अवान्तरगण कहा जाता है । ये शब्द एक ओर मुख्य गण मे विद्यमान रह कर मुख्य गण सम्वन्धी सूत्र द्वारा निर्दिष्ट होकर उसे महती शक्ति प्रदान करते है और तद्विहित कार्य को प्राप्त होते हैं, तथा दूसरी ओर अपनी छोटीसी शब्द मण्डली के रूप मे अन्य सूत्रो द्वारा निर्दिष्ट होकर उनकी सन्तिप्तता मे महायक वनते है और तद्विहित विशिष्ट कार्य को भी प्राप्त होते है । अब कतिपय अवान्तर गणो का निदर्शन कराते ह- –सद्यन्तर्गत-गणपाठ के प्रयम मर्वादिगण मे डतरादि, पूर्वादि, त्यदादि तथा द्वयादि ये चार अवान्तर गण हैं। इन मे से त्यदादि का निर्देश पाणिनि ने चार सूना मे डतरादि, पूर्वादि तथा द्वयादि का एक एक सून' में निर्देश किया है। २-गर्गाद्यन्तर्गत-चतुर्थ अध्याय के गगादि गण मे लोहितादि तथा करमादि ये दो अवान्तर गण पाए जाते है। लोहितादि का निर्देश १ द्रश्व्य-सर्वत्र लोहितादिकतन्नेभ्य' (४।१ । १८) सूत्र में श्राद्यन्त शब्दों का उपादान । २ द्रव्य-त्यदादीनि च (१।१।७४ ), स्यदादीनि मनित्यम् (१।२।७२), त्यदादिपु दृशोऽनालोचने कञ् च (३ । २।६० ) त्यदादीनाम. (१२।१०२)। ३. द्रव्य-अदड्डतरादिभ्य पञ्चभ्य (७.१ । २५), पृर्वादिभ्यो नयम्यो या (७।१।१६) किंसनामबहुभ्योऽदयादिभ्य (५।३।२)। ४. लोहितादिहाउभ्य क्या (३।१।१३) स्त्र निर्दिन लोहितादिगण इस से भिन्न है।

७६ म० व्या० म गणपाठ की परमरा और आचार्य पाणिनि सर्वन लोहितादिकतन्तेभ्य (४११।१८ ) तथा कण्वादि का करावादि भ्यो गोत्र (४ । २ | १११ ) म किया है। ३-नडाद्यन्तर्गत-नडादिगण मे पठिन विल्ब आदि शन्दा का नडादीना कुक् च ( ।।२।९१ ) सून विहित कुगागम से युक्त कर के 'बिल्लकादिश्छस्य लुक (६।११५३ ) इस सूत्र मे उपयोग हुआ है । इसलिए इन्ह भी अवान्तरगण क रुप म ही मानना होगा। ट-विदाधन्तर्गत-विदादिगण म गोपवनादि आर हरितादि ये दो अवान्तर गण मिलते है । सूत्रकार ने इनका निर्देश न गोपवनादिभ्य (२ । । १ ६७ ) तथा हरितादिभ्योऽत्र (४।१ । १००) सूत्रो मे क्यिा है। एमा प्रतीत होता है कि यह गापवनादि गण उत्तर काल मे अवान्तर गण न रहकर स्वतन्त्र गण क रूम म पठित अथवा व्यवहत होने लगा और उम स्वतन्त्र गोपवनादि गण म इसके मूल अथवा प्रवान विदादिगण में गोपवन आदि शब्दा के पश्चात् पढे गए हरित आदि शब्द भी प्रमादवश पढे जाने लगे । सम्भवत इमी अव्यवथा को कात्यायन ने गोपवनादिभ्य प्रतिपेध प्रार परितादिभ्य इस' वार्तिक की रचना द्वारा प्राग हरितादि हरितादि शब्दा स पहल पहले-के रुप म दूर करने का प्रयत्न किया। इसी कात्यायनीय वार्तिक के आधार पर आचार्य चन्द्रगोमी न न गोपननादिभ्यो 'टभ्य २ सूत्र द्वारा अष्टभ्य कवल गापवनादि आठ गन्दा से-के रूप मे गापवनादि गण को नियमित अथवा व्यवस्थित करना चाहा । काशिकाकार न न गोपयनादिभ्य (२। ८ । ६७ ) इस पाणिनीय सूत्र की व्याख्या करत हुए कात्यायन की उपर्युक्त वार्तिक तथा चन्द्रगोमी व पूर्व निर्दिष्ट सूत्र की पृभूमि में यह स्पष्ट कह दिया- एतायन्त एबाप्टो गोपरनादय , परिशिष्टाना हरितादीना प्रमाद २ । . अथात्-गोपन आदि पाठ शब्द ही इस गण में अभीष्ट हैं दोष हरित' आदि शब्द जा इम गण म पठिन मिनते ह व प्रमाद पठिन है। यापिकासार क इस क्यन रा उपर्युक्त धारणा गापवनादि स्वतन्त्र गण २ चान्द्र।४।१६॥ महा०२१४१६७।। ३ काशिकार।४।६७ ।।

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ ७७ के रूप मे पढा जाने लगा था' का सष्ट सकेत मिलता है । अतएव पदमन रोकार ने स्पष्ट लिखा है कि वृत्तिकार यहा पर स्वतन्त्र पाठ मानता है- वृत्तिकारस्तु चतुर्थे अत्र च पृथक पाठ मन्यते । भाग १, पृष्ठ ४९० । ५-गौराद्यन्तर्गत-गौरादि गण के अन्त मे मिलने वाले तथा उसके अवान्तरगण के रूप मे प्रतीत होने वाले पिप्पली आदि शब्द समूह का अष्टाध्यायी मे कही भी किसी सूत्र मे निर्देश न होन के कारण उसे अपाणि नीय ही मानना होगा। इसका प्रतिपादन हम पूर्व (पृष्ठ ३४,३५) कर चुके है। इन अवान्तर गणो के प्रसङ्ग मे एक और बात ध्यान देने योग्य है कि ये अवान्तर गण पठिनगणा मे ही अपना स्वरूप निवारित कर मके है, तथा जिन सूनो मे इनका उपयोग हआ हे वहा भी ये पठितगण के रूप मे ही उपस्थित हुए है । दूसर शब्दो मे इस बात को इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है कि न तो आकृतिगणो से कही कोई अवान्तर गण लिया गया है और नाही ये स्वय कही आकृतिगण के रुप मे स्वीकृत हुए है । यह तथ्य भी इस बात का पोपक है कि आकृतिगणो वा पाठ अथवा उनके शब्दो का निर्धारण सूनकार द्वारा नहीं किया गया था, जब कि पठितगणो के प्रत्येक शब्द का निर्धारण स्वय सूत्रकार ने ही किया था। गणपाठ में शब्दों का क्रम गणपाठ मे निर्दिष्ट गणो मे जो शब्द पढे गए है, उनमे गणकार को कोई विशिष्ट सम अभिप्रेत था अथवा नहीं, यदि था तो क्या वही क्रम आज भी गणपाठ मे विद्यमान है अथवा नहीं, इस विषय पर भी विचार करना अत्याव श्यक है। जहा तक आवृतिगणो का सवन्ध है, उनमे शब्दो के क्रम का कोई प्रश्न ही उत्पन नहीं होता, क्योकि आकृतिगणो मे अभिप्रेत समस्त शब्दो का पाठ सूत्रकार (क्योकि वही गणकार भी है) ने नहीं किया था । उपलतरण रूप मे भले ही दो चार शब्दो का पाठ उस ने किया हा अथवा किसी विशेष प्रयोजन को दृष्टि मे रखते हुए कतिपय गदा को स्वत आकृतिगण मे स्थान दिया हा यह दूसरी बात है। इसलिए उक्त विचार पठिनगणा से ही मम्बन्ध रखता है अत उन्ही के विषय म विचार करते है। उपर्युक्त प्रश्न अथवा जिज्ञासा का मन्तापजनक समावान स्वय पाणिनि * पतिपय सूत्रा में ही प्राप्त हो जाता है । यथा- से० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि १-सर्वादि गण के शब्दो के अभिप्रेत क्रम विशप के लिए अष्टाध्यायी के कतिपय सूत्र उपस्थित किए जा मकते हैं । वे सूत्र है- अदड्डतरादिभ्य पञ्चभ्य 1७।१॥ २५ ॥ पूर्वादिभ्यो नरभ्यो ना। ७।१।१६ ॥ त्यदादीनि सनित्यम् । १ । २ । ७२ ॥ किंसर्वनामसहभ्योऽद्वयादिभ्य । ५। ३ । २॥ अब एक एक सूत्र की मीमासा करते हैं- श्रदडुतरादिभ्य पञ्चभ्य (७।१।२५ ) सून सर्वादि गण पठित नपु सक लिङ्ग मे वर्तमान उतर आदि पाच शन्दा को प्रथमा और द्वितीया विभनि रे एक वचन 'मु' तथा अम्' के परे रहने पर 'अदड्' आदेश का विधान करता है । मर्वादि गण मे डतर आदि शब्दो का जो क्रम है तथा उस प्रम के अनुमार जो उतर डतम इतर अन्य अन्यतर पाच शब्द गृहीत होते हैं केवन उनम ही मु तथा अम् के पर अद' आदेश लोक मे दखा जाता है । यदि गणपाठ म कोई निश्चित बम अभिप्रेत न होता तो सूत्रकार का पञ्चभ्य क्थन क्यचिद् भी उपपन न होता । प्रमादिभ्यो नरभ्यो वा (७।१।१६ ) सूत्र सवादि गण पटित पूर्व आदि नौ गदा से पन्चमी तथा सप्तमी विभक्ति के एक वचन मे प्रमश स्मात्' 'स्मिन आटा सा विकल्प से विधान करता । यहा भी यह निर्विवाद सत्य है कि जिस प्रम म पूर्व आदि गन्दा का सवादिगण म पाठ उपलब्ध होता है उमी नम के अनुसार जो पूर्व पर आदि नी शब्द गृहीत होते हैं उनमे ही सिर स्मात् स्मिन आदेश भाषा मे पाए जात है । यदि गणकार का मादि गण म गदा का कोई निश्चित कम अभिप्रेत न होता तो यहा भी नरभ्य निर्देश कचिदपि उपपन न होता । दाना सूत्रा म निश्चित मग्न्या-द्योतन पन्चभ्य और नरभ्य गदा का प्रयोग करन में सूत्रधार तभी समर्थ हो सकते थे जव नि गणनार 7 रूप में उन्हाने गणपाठ माना का कोई निश्चित प्रम अपनाया हो। त्यदादीनि सनित्यम् ( १९२७२ ) सूत्र बताता है कि यदि पिसी या पिन्ही गला क माय न्यद आदि गदा या प्रयोग अभिप्रेत हा तो वहा क्वन त्या आदि पद ही एप द्वरा अनिष्ट ग्हत हैं अयात् प्रयुक्त हाने है। पया-मच ट्यदनश्च ती इयादि । जव त्यदादि गण म पठित गदा आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ ७९ का ही एक साथ प्रयोग अभिप्रेत होता है तब उनमे जो जो शब्द पर होता है, वही अवशिष्ट रहता है । इस बात का द्योतक वैयाकरणो का एक नियम है-त्यदादीनां मिथ सहोक्ती यद्यत्पर तच्छिप्यते । प्रस्तुत प्रसग मे यह नियम वडे महत्त्व का है । इसका अभिप्राय यह है कि त्यद्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस् एक द्वि, युप्मद, अस्मद् भवतु किम्ये शब्दआपस मे ही सहोक्ति के रूप मे प्रयुज्यमान हो तो इनमे जो जो पर हे उसी का एक शेष के रूप मे प्रयोग होगा । यथा-स च यश्च यो, यश्च कश्च को। इस प्रकार पाणिनि का सूत्र और वैयाकरणो द्वारा आश्रित नियम, इन दोनो से यह स्पष्ट है कि एकशेप विषयक भापागत विभिन्न प्रयोगो को देखकर ही गणकार ने त्यद् आदि गब्दो के क्रम अथवा पौर्वापर्य का निर्धारण किया था। किंसर्वनामबहुभ्योऽद्वयादिभ्य'-इस सून मे 'किम्' शब्द की विद्यमानता यह स्पष्ट घोपित कर रही है कि सवादिगण मे किम् शब्द को द्वि इत्यादि शब्दो के अनन्तर पढा था । अन्यथा यदि द्वि शब्द से पूर्व किम् को रखा गया होता, जैसा कि आपिशलि ने सर्वादिगण मे रखा था', तो सूत्र के अद्वयादि पद से उसका निषेध नहीं होता । उस अवस्था मे 'किम्' पद को सून मे पढना सर्वथा अनावश्यक था। पत जलि, कैयट, तथा भर्तृहरि के प्रामाणिक साक्ष्य से हम यह भी जानते है कि कुछ वैयाकरणो ने अपने सवादिगण मे त्यद आदि शब्दो के पश्चात् पूर्वपराधर आदि सूत्रो अथवा शब्दो को रखा था। इनमे आपिशलि भी एक है। इस से सष्ट है कि इन प्राचीन वैया करणो के सर्वादिगण के शब्दक्रम को पाणिनि ने अपने गणपाठ मे नही अपनाया। इस प्रकरण मे गर्गादि गण से सवन्ध रखन वाले एक रोचक एव अयावश्यक प्रसग की ओर भी विद्वानो का ध्यान आकृष्ट करना उचित है। १ द्रण्थ्य पृर्व पृष्ठ ७४ की रिप्पणी ३ । २. इस विचार से यह भी व्यक्त होता है कि प्रापिशलि के स्त्रपाठ में 'किम्' शब्द का पाठ नहीं रहा होगा । तदनुसार उसका सूत्रपाठ सभवत' 'सर्वनामबहुभ्यो ऽस्यादिभ्य ' रहा होगा। ३. ट्रपव्य पूर्व पृष्ठ २६ रिप्पणी ५ ६ ।

८० - ...... सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि गर्गादि प्रवान गण मे दो अवान्तर गण हे लोहितादि तथा कण्वादि । इनको चर्चा पूर्व की जा चुकी है।' वार्तिककार के अनुसार जिस शब्द पर लोहि- तादि गण ममाप्त होता है, ठीक उसी के अनन्तर शकल शब्द का पाठ करके और कण्वादि शब्द मे पष्टी समास का भी निर्देश मानकर कण्वादि गण का आरम्भ माना जाता है। परन्तु गर्गादि गण मे पाठक्रम इस प्रकार है- लोहित, संशित, कपि, कत, कुरुकत, अनहुह, करव, शकल । इस रूप मे लोहितादिगण लोहित शब्द से लेकर कत पर्यन्त माना जाता है और कराव से लेकर अन्त तक कण्वादि गण। इस क्रम और व्यवस्था के अनुसार शकल शब्द केवल कण्यादि के अन्तर्गत आसकता हे, लोहितादि गण के अन्तर्गत नहीं । इसलिए यत्रन्त शकल शब्द से स्त्रीलिङ्ग मे प्फ प्रत्यय की प्राप्ति नही होती, परन्तु प्फ प्रत्यय का प्रयोग उपलब्ध होने से इष्ट है । इसी प्रकार गोनप्रत्ययान्त शकल गव्द से शैपिक अण भी इप्ट है। इसलिए शाकल्यायनी तथा शाकल्यस्य छात्रा. शाकला. दोनो प्रकार के प्रयोगो की सिद्धि के लिए आवश्यकता इम वाल है कि कल शब्द का लोहितादि तथा करावादि दोनो अवान्तर गणो में सग्रह हो । इस ममस्या के समाधान के लिए श्लोकवातिरकार ने एक उपाय सुझाया है कि शकल शब्द को अपने मूल स्थान से हटाकर कण्व से पूर्व तथा कत शब्द के पश्चात् रखना चाहिए (और मध्यवर्ती कुरकत अनडुङ् शब्दो को लोहित से पूर्व पढ देना चाहिए)। इस परिवर्तित अवस्था मे शब्दो का कम होगा -कत, शकल, कण्व । इस प्रकार शक्ल शब्द के कत शब्द के पश्चात् होने पर लोहितादिकतन्तेभ्यः मे कतस्य अन्तः कतन्तः पष्ठी समाम मानने पर सूत्रगत कतन्त शब्द से गकल का ग्रहण भी लोहितादि गण मे हो जाएगा और उसमे स्त्रीलिङ्ग मे प्फ प्रत्यय हो जाएगा। इसी प्रकार करपादिभ्य मे कण्वस्य आदि करावादि , करवादिरादिउँपां ते १ द्रष्टव्य पूर्ण पृष्ठ ७५, ७६ । २. कपात्तु शकल पूर्व क्तादुत्तर इप्यते । पूर्वोत्तरी तदन्तादि प्फाणी तर प्रयोजनम् । महा०४।११८॥ ३. द्रश्य-सर्वत्र लोहितादिक्तन्तेभ्य । पा० ४ १११८ ।। ४. कोष्ठन्तर्गत निर्देश अर्थापत्ति से शापित होता है ।

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ करवादय (मध्यपदलोपी समाय) विग्रह मान कर शकल का कप्वादि मे भी अन्तर्भाव हो जाएगा और उसमे शेपिक अण प्रत्यय की प्राप्ति भी हो जाएगी। इस प्रकार देहलीदीप न्याय मे शकल का उभय गणो मे अन्तर्भाव हो जाता है। उपर्युक्त मीमांसा से दो वाते स्पष्ट है-एक तो पाणिनि ने लोहितादिक तन्तेभ्य. स्त्र निर्दिष्ट गण के आद्यन्त-दोनो ओर के गब्दो का निर्देश करके यह ज्ञापित कर दिया कि उसके गणपाठ में शब्दो का विप क्रम अपक्षित है। दूसरा श्लोक्वानिरकार का उपरिनिर्दिष्ट समाधान इस बात की घोपणा कर रहा है कि उस के समय मे गर्गादि गण मे लोहितादि गब्दो का वही बम था जो गणकार पाणिनिने निर्धारित किया था। मौभाग्य की बात है कि गणपाठ के उसरि निर्दिष्ट सभी स्थलो मे गन्दो रे पौर्वापर्य क्रम मे आजतक भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ । इसलिए यह कहा जा सकता है कि जिम गण मे यदो के क्रम पिप का कोई महत्त्व नहीं है, उस गण के शब्दो के म निधारण का भी कोई विप प्रयोजन नही । परन्तु जिन गणो के गब्द विन्यामक्रम का गब्द-मावन मे थोडा सा भी प्रभाव पड सक्ता था, उसका गणकार पाणिनि ने पूग पूरा ध्यान रखा था। इस को दूसरे शब्दा में इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि गणपाठ मे स्वीकृत शन्दो के नम का पूरा पूरा ध्यान रखते हुए ही मूत्र कार पाणिनि ने अपनी सूत्ररचना को साकार किया था। पाणिनीय गणपाठ में अपाणिनीय गण पणिनीय गणपाठ क हस्तलेखा एव पाणिनीय अष्टाध्यायी के काशिका आदि व्याख्या ग्रन्यो मे परिमुखादि तथा काप्ठादि ये दो गण भी पठित मिलते है। इन मे परिमुखादि गण का मवय जिस अन्ययीभावाच्च (४।३।५९ ) सून से स्थापित किया जाता है, उस म पाणिनि न 'आदि' पद का प्रयोग नहीं किया है । अन्य सभी गण-मम्बद्ध मूनो मे चाहे वे धानुगण मे सबद हो चाहे प्रातिपदिक गण में मूत्रमार ने मर्वत्र अनिवार्य तया गणनिर्देशक आदि' अथवा प्रभृति' अथवा ववचनन्न शब्द का प्रयोग किया है। इसलिए परिमुवादि को क्यमपि पाणिनीय नही माना १. कण्यात्त शकल पूर्व कतादुत्तर इप्यते । पूर्वोत्तरी तदन्तादी फायौ तन प्रयोजनम् ॥ महा०४।१।१८॥

८२ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि जा सकता। हा, पाणिनि के उपर्युक्त सूत्र से सवद्व कात्यायन के त्र्यप्रक- रणे परिमुखादिभ्य उपसख्यानम्' वार्तिक मे पठित 'परिमुखादिभ्य से इस गण का सवन्ध मानना होगा । पतञ्जलि न इस वार्तिक की जो व्यारया प्रस्तुत की है और जिस का अनुगमन कैयन तथा नागेश ने किया है उससे यह वात सर्वथा स्पष्ट हो जाती है कि परिमुखादि गण का निर्धारण पाणिनि द्वारा नहीं हुआ है । धानुवृत्तिकार ने स्पष्ट ही कहा है-परिमुखादिभ्य उप सख्यानमिति वार्तिकम् । प्रतीत होता है उत्तरवर्ती वैयाकरणो ने उक्त वातिक का अनुमरण करके इस गण को पाणिनीय गणपाठ में स्थान दे दिया और शनै शनै पाणिनीय गणपाठ का अङ्गही बन गया । सम्भवत इसी कारण न्यासकार जिनन्द्रबुद्धि', हरदत्त तथा भट्टोजी दीक्षित प्रभृति ने दिगादिगण के अनन्तर इस परिमुखादि गण का पाठ देख कर पाणिनीय समझ लिया और इस के पाणिनीयत्व के प्रतिपादन मे अनक युक्तिया उपस्थित की, जो उपयुक्त स्थिति मे सर्वथा हेय एव उपक्ष्य है । इसी प्रकार काष्ठादिगण भी पूजनात् पूजितमनुदात्तम् (८।१ । ६७) इम पाणिनीय सून स मवद्ध कात्यायन क पूजितस्यानुदात्तत्वे काष्ठादि ग्रहण कर्त्त-यम् वार्तिक से सबन्ध रखता है न कि पाणिनीय सूत्र से । इसलिए इस गण को भी पाणिनीय गणपाठ मे वृत्तिकारो के प्रमादवश स्थान मिला है। वास्तविकता यह है कि पात्यायन तथा पतजलि के उत्तरवर्ती वैयाकरण चन्द्रगोमी ने पाणिनीय स्त्रो के विषय मे इन दोनो मनीपियो द्वारा प्रस्तुत प्राय सभी सशोवनो, परिवर्तना तथा परिवर्धनो को अपनी सूपरचना में सर्वा शत स्वीकृत कर लिया। इसलिए कात्यायन की अनेक वार्तिके चान्द्र व्याकरण के सूत्रो में प्रतिष्ठित दिखाई देती है । प्रो० कील हार्न की निश्चित धारणा है कि काशिकाकार ने चन्द्रगोमी की सारी मामग्री का आनी वृत्ति रचना मे पर्याप्त उपयोग किया है। इसलिए १. महा०४।३१५६।। २ द्र०४।३।५६ का भाष्य, प्रदीप तथा उद्योत नथ । ३.न्यास ४३1 ५६ ।। ४ ५० म. भाग २ पृष्ठ १७४ । ५. श० को० ४ । ३ । ५६, ४ १६६ ॥ ६.महा०८1११६७१ आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ कात्यायन भी वार्तिको के आधार पर रचित चन्द्रगोमी के कुछ सूत्रो को भी कागिकाकार ने पाणिनि के मौलिक सूत्रों के स्थान पर प्रतिष्ठित कर दिया है। संभवतः इसी प्रवृत्ति नै प्रभावित होकर यहां भी काशिकाकार ने पाणिनि के 'पूजनात् पूजितमनुदात्तम् (८1१ । ६७) सूत्र के स्थान पर पूजनात् पूजितमनुदात्तं काष्ठादिभ्यः (का० ८1१।६७) इम प्रकार की सूत्ररचना को प्रश्रय दिया, और इसी कारण वार्तिक मे सवद्ध काटादि गण पाणिनीय गणपाठ मे प्रविष्ट हो गया । पाणिनीय गणपाठ में औणादिक गण पाणिनि के गणपाठ मे गम्यादि (३।३।३) तथा भीमादि (३।४।७४ ) ये दो गण भी प्राप्त होते है। इन गणों मे पठित शब्दों की सिद्धि अष्टाध्यायी के सूत्रो से न होने के कारण इन गणो का विशेप सबन्ध अष्टाध्यायी से न होकर उणादि सूत्रों से है। इन गणों की सत्ता से भी विद्वानों की इस मभावना को बल मिल मकता है कि उणादि सूत्रों की रचना पाणिनि की सूत्र-रचना से पूर्व ही हो चुकी थी।' पाणिनि के न्यङक्यादि (७ । ३ । ५३ ) गण मे भी कुछ औरणादिक गब्दो का पाठ है। उसे देख कर नागेश भट्ट ने लिखा है कि गणपाठ मे इन गब्दो का पाठ व्युत्पत्तिवादी किन्ही अन्य वैयाकरणो के अभिप्रायानुसार है।' गणनिर्धारण में शब्दों की इयत्ता पाणिनीय गणपाठ मे कुछ ऐसे भी गण है जिन का निर्धारण केवल चार पांच शब्दों के लिए ही किया गया है। उदाहरण के लिए क्रमादि अथवा फोटरादि गण द्रष्टव्य है । इसके विपरीत अष्टाध्यायी मे इन्द्रवरुणभवशर्व (४।१।१२) अथवा जानपटकुण्डगोण ( ८1१।१२) अनेक ऐसे बडे बडे मूत्र मिलते है जिन मे दस दस वीम वीम शब्द विद्यमान हैं, जिन के लिए गणशैली का उपयोग लाघव की दृष्टि मे विनेप लाभकारी हो सकता था। इसलिए ऐमा नहीं कहा जासकता कि पाणिनि की गणशैली अथवा गण निर्धारण गब्दो की किसी निश्चित मन्या पर आश्रित थी। १. द्राव्य-वं पृट २८। २. एषु उग्णादिपाठो न्युयत्तियादिचैयाकरणान्तराभिप्रायेण । लशन्देन्दु. उत्तरार्थ, पृ ४७.1 ८४ म० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि उपर्युक्त दोनो प्रकार के स्थलो मे उत्तरवर्ती वैयाकरणो ने पर्याप्त परिवर्तन किया है। उन्हो ने क्रमादि जैसे गणो को, जिन मे शब्दो की सरया बहुत स्वल्प थी, उन्हे गणरूप मे न रख कर सूत्रो मे ही उन शब्दो का साक्षात् पाठ कर दिया। इसी प्रकार जिन सूनो मे अधिक शब्दो का निर्देश : करना आवश्यक था जैसे इन्द्रवरणभवशर्व (४।१ । ४९ ) अथवा जानपदकुण्डगोण ( ४ । १ । ४२) इत्यादि सून, उन्हे इन्द्रादि तथा जानपदादि' अथवा कुण्डादि जैसे गणो मे परिवर्तित कर दिया। इस प्रकार पाणिनि के वे वे सूत्र पर्याप्त लघु हो गए। प्रश्न हो सकता है कि गणशेली को अपनाते ए भी पाणिनि ने उसका आश्रय लेकर बडे बडे सूत्रो को लघुरूप क्यो नहीं दिया ? हमारे विचार मे इसका प्रधान कारण यह है कि सर्वत्र ही गणशैली का आश्रय लेकर प्रथमा. तिरिक्त शब्दो को दृष्टि से ओझल कर देने से जहा व्याकरण के वास्तविक कार्य ( शब्दमाधुत्व वोधन ) मे वादा होती है, वहा शास्त्र की सरलता और साक्षात् उपदेशता भी समाप्त हो जाती है। ममादि जैसे गणो को, जिनमे शब्दो की संरया बहुत स्वल्प है, पाणिनि ने गणपाठ मे स्थान क्यो दिया ? इस का उत्तर यह है कि इन गणो को पाणिनि ने अपने से पूर्व वैयाकरणो द्वारा प्राप्त किया था, दूसरे शब्दो मे वैयारणो की प्राचीन परम्परा के अनुमार इन्हे पढा था। गणपाठ में उपलभ्यमान गणसूत्रों की समस्या पाणिनीय गणपाठ के विभिन्न गणो मे अनेक वाक्य उपलब्ध होते है, जिन्हे गणवाक्य अथवा गणसून कहा जाता है । अष्टाध्यायी के सूत्रो के समान इन गणमूनों को भी पारिनीय ही माना जाता है । इन गणमूनो के विषय मे अभी तक कोई सष्ट अथवा अस्पष्ट सकेत अथवा सूचना प्राप्त नहीं हुई, इसलिए इन का प्रारम्भिक अथवा मौलिक स्वरूप क्या था, इस विषय में कुछ भी कह सक्ना पयाप्त कठिन है । हा इतना अवश्य है कि * द्र० शाक्ययन २।४ । १८० ॥ हम २१३ । ७६ ॥ ३. सारस्वत १५। ४२ ।। ४. गणरनमहोदधि, पृष्ठ ४६ । २.द्र सारम्वत १५। २६ ।।

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ
अष्टाध्यायी के अनेक सूत्रो तथा कात्यायन की वार्तिको के साथ गणसूत्रो
के विभिन्न प्रसगो क तुलनात्मक अध्ययन से इस बात की प्रतीति होती है
कि मम्भवत इन गणपूनो के कर्ता आचार्य पाणिनि नहीं है।
गणसूत्रों के अपाणिनीयत्व में हेतु
हम अपनी उपर्यक्त धारणा की पुष्टि के लिए विद्वानो के समक्ष कतिपय
हेत उपस्थित करते है-
प्रथम हेतु-आचार्य पाणिनि न सूत्रपाठ धातुपाठ तथा गणपाठ इन
तीना का पृथक् पृथक् प्रवचन किया है । वस्तुत सूत्रपाठ के परिशिष्ट रूप
गणपाठ तथा वातुपाठ शब्दानुशासन के पूरक मान जाते है । परिशिष्ट होने के
नात ही इन्हे खिलपाठ भी कहा जाता है । जव पाणिनि ने सूत्रों की रचना
अष्टाध्यायी म की ही है तब इन तथाकथित गणसूत्रो को भी सूत्रपाठ मे ही
स्थान मिलना चाहिए था न कि उसके परिशिष्ट रूप मे स्वीकृत गणपाठ मे-
यदि इन दोनो प्रकार के
सूना
के कत्ता आचार्य पाणिनि माने जाए । गण
पाठ मे भी सूनो को सत्ता स्वीकार कर लेने पर सूत्रपाठ वातुपाठ तथा
गणपाठ इन तीन प्रकार के वर्गीकरण मे अस्वारस्य उत्पन्न होता है ।
पाणिनि इस प्रकार क अस्वारस्य या अव्यवस्था को क्या उत्पन करना
चाहते, यह बात समझ में नहीं आती।
द्वितीय हेतु-अष्टाध्यायी क सूत्रा तथा गणसूत्रा की रचना शैली की
पारसरिक तुलना करने से यह वात सर्वथा स्पष्ट हो जाती है कि इन दोनो
प्रकार के सूना की शैली म महान् अन्तर है । अष्टाध्यायी की सूत्ररचना
गम्भीर, सक्षिप्त तथा व्यापक होती हुई आचार्य पाणिनि के सूत्ररचना मे
निष्णातत्व का द्योतन करती है परन्तु गणपाठ मे मिलन वाली सूत्ररचना
विस्तृत व्यापक एव पाणिनि की प्रत्याहार-शेती स सर्वथा अपरिचय प्रकट
करती हुई इस बात का सफत करती है कि इन गणसूत्रा की रचना उम
कान की है जव पाणिनि जैस किसी कुगन सूत्र शिल्पी की तूलिका क
संस्पर्श स सूनशैली अछूती थी।
उदाहरण क रूप में पृन्मकारसन्ध्यक्षरान्त ,' तसिलादयस्तद्धिता
एधाचपर्य-ना' गणसूत्रा का उपस्थित किया जा सकता है । इनकी तुलना
१. गणपाठ स्वरादिगण १४१॥३७॥

अष्टाध्यायी के सून ८६ मं० व्या० मे गणपाठ की परमरा और आचार्य पाणिनि मे पाणिनि के सन्मेजन्तः (११११३९) तद्धितश्चासर्वविभक्तिः (१।११३८) सून अतिसक्षिप्त तथा व्यापक है। इनमे प्रथम उदाहरण विशेष महत्त्व का है । यहा गणसूत्र मे मकार तथा सन्ध्यक्षर का प्रयोग किया गया है, परन्तु उसी अर्थ के निर्देशक मे म तथा एच् प्रत्याहार का प्रयोग करके सूत्रकार ने उमे पर्याप्त लघुरूप दिया है । यदि लावव की दृष्टि से थोड़ा बहुत महत्त्व रखने वाले मकार तथा म के भेद की उपेक्षा भी कर दी जाए तो भी सन्ध्यक्षर तथा एच् नै प्रयोग भेद को किसी भी दृष्टि मे ओझन नही किया जा साता। यह लगभग पूरे निश्चय से कहा जा सकता है कि ए ऐ ओ श्री इन चार अक्षरो की सन्ध्यनर सज्ञा पाणिनि से प्राचीन परम्परा वाले प्राति- शाग्यो' तथा उसमी पारिभाषिक शब्दावली से प्रभावित कात्यायन की वातियो मे प्राप्त होती है । अष्टाध्यायी के सूत्रो मे जहा कही भी इन चार अक्षरो का एक साथ निर्देश करने की आवश्यकता पडी, पाणिनि ने सर्वत्र पच प्रत्याहार का ही प्रयोग क्रिया है।' यो तो पारिणनि मे पूर्व भी किन्ही वैयाकरणो ने इन सन्ध्यतरो के लिए एच के स्थान मे एप का प्रयोग क्यिा था और माथ ही पाणिनि के अन- नरभावी वात्यायन ने अपनी वातिको मे प्रायः मर्वत्र एच प्रत्याहार का प्रयोग न करके मध्यतर का ही प्रयोग किया है। इसलिए केवल सन्ध्यक्षर अयना एच प्रन्याहार के प्रयोग करने अथवा न करने के आधार पर हम पिभी मूत्र पीप्रामातीनताअथवा अवान्तरवानीनताको एक मात्र कारण नहीं मान सरते । परन्तु इतना अवश्य कहेंगे कि एर ही सूप्रसार जव कि अष्टा- ध्यायी मे वह मय एच् प्रत्याहार का व्यवहार कर रहा है, तो गणपाठ में आर सूपरचना के अवसर पत्र प्रत्याहार के प्रयोग को भूल जाएगा, १ अरमा० १११, २, या० प्रा० १०४, ४५, ते० प्रा० १२, चतुरध्यायिका १४० ॥ २.महा.या० पृष्ठ ५८, ११, पृ.५६, इत्यादि, २. यथा-पनोऽयमायार' । ६।११७८ ॥ ४.०५ प्रत्याहारः पथ्यावरणति स्थित प्य । श्रय त विशेष:--'एन्नो' इति यहा। तद् 'पोन्' इति कृतम् । तथाहि लगायत योश्न पो गुरुः, मृणधान्यानो मायनशी पटपत । मान्द्राति देनागरी सं• माग :, ६ आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ ८७ १ जो उसके व्याकरण शास्त्र को प्रमुख विशेषता है और अपने शास्त्र मे सर्वथा अप्रसिद्ध सन्ध्यक्षर जैसे पारिभाषिक शब्दो का प्रयोग करके सूत्र के कलेवर को अनावश्यक रूप से बढाना चाहेगा, यह कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसी प्रकार गणसूत्रो मे राजाऽसे' हृदयाऽसे' तथा पुरुषाऽसे ये तीन सूत्र ऐसे मिलते है, जिनमे गणसूत्रकार ने असमासे के अर्थ मे असे का प्रयोग किया है । यदि ये सूत्र भी आचार्य पाणिनि के माने जाए तो यह प्रश्न उपस्थित होता है कि एक ही सूत्रकार गणसूत्रो मे असे का और अष्टाध्यायी के सूत्रो मे असमासे का प्रयोग क्यो करता है । जव कि असमासे की अपेक्षा असे का प्रयोग निश्चित ही लघु हे और लावव के कारण ग्राहय हो सकता है। वैदिक व्याकरण की किसी परम्परा के अनुयायी ऋक्तन्त्र मे असमासे के अर्थ मे असे प्रयोग की उपलब्धि से यह कहा जा सकता है कि यह किमी प्राचीन वैयाकरण द्वारा स्वीकृत सज्ञा है । सम्भवतः असष्ट होने के कारण लघु होने पर भी आचार्य पाणिनि ने इसका प्रयोग अपने शब्दानुशामन मे नही करना चाहा । तृतीय हेतु-यदि गणो मे सूत्र रचना को स्थान देने की शैली आचार्य पाणिनि की होती तो ऐसे बहुत से सून अष्टाध्यायी मे है, जिन्हे गणपाठ के उन उन प्रकरणो के गणो मे गणसूत्र के रूप मे रखकर अष्टाध्यायी के कलेवर को पर्याप्त सक्षिप्त किया जा सकता था, फिर पाणिनि ने ऐसा क्यो नही किया ? उदाहरण के लिए कार्तकोजपादि गण मे आचार्योपसर्जनश्चान्तेवासी, (६।२६३६) कल्याणादिगण मे कुलटायाचा(११।१२७), याह्वादिगण मे सुधा- तुरकङ्च (१९७) तथा गवादि गण मे कम्बलाच्च संज्ञायाम् (५१०३) सूत्रों को बडी सुगमता से ठीक उसी प्रकार उपन्यस्त किया जा सकता था, जिस प्रकार अन्य अनेक गणसून विभिन्न गणो मे दृष्टिगोचर होते है । इस कारण हमे ऐसा प्रतीत होता है कि गणपाठ मे सूत्ररचना की पद्धति आचार्य पाणिनि की नहीं है। चतुर्थ हेतु-यदि तथाकथित गणसूत्रो और अष्टाध्यायी के सूत्रो का १. गणपाठ ५। १ । १२८ ॥ २. गणपाठ५।१।१३०॥ ३ यथा-असमासे निष्कादिभ्य ५१ ११२० ॥ युजेरसमासे ७॥१॥१॥ उपसर्गादसमासेऽपि० -1४1 १४ ॥

म० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि प्रवक्ता एक ही व्यक्ति आचार्य पाणिनि है, ऐसा मान लिया जाए तो अष्टाध्यायी के अनेक सूत्र पुनरुक्ति दोष से दूषित होते हुए सर्वथा अनावश्यक सिद्ध होंगे, जिनका समाधान प्रपञ्चार्थम् कह देने मान से कथमपि सम्भव नहीं हो सकेगा। उस अवस्था में जब कि अष्टाध्यायी के सूनो की रचना के पूर्व ही गणपाठ की पूरी पूरी व्यवस्था अथवा निपारणा हो चुकी थी, अनाव- श्यकता का दोप अष्टाध्यायी के तत्तत् सूनो के सिर पर ही पडेगा । उदाहरण के लिए सर्वादि गण मे गणसूनो के रूप में पूर्वपरावर- दक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थाया सज्ञायाम्, स्मशातिधनाख्यायाम् तथा अन्तर बहिर्योगोपसयानयो इन तीन वाक्यो के विद्यमान होते हुए अष्टाध्यायी के इमी प्रकरण मे तथा इमी शब्दावली के साथ पाणिनि ने इन्हे तीन सूत्रो' के रूप मे क्यो स्थान दिया, यह प्रश्न सर्वथा अनुत्तरणीय है । ठीक इसी प्रकार स्वरादि गण मे उन्मकारसन्ध्यक्षरान्तोऽन्ययीभावश्च पत्यातोसुन्कमुन तथा तसिलादयस्तद्धिता एधाचपर्यन्ता. इन गणसूनो के रहते हुए अष्टाध्यायी के इसी प्रकरण में सर्वथा इसी अभिप्राय वाले ममा न्मेजन्त (१।१।३९), क्त्वातोसुन्कसुन. (१।१।1०) तद्धितश्चास- विभक्ति. (१ । १ । ३८) तथा अन्ययीभावश्च (१।१ । १) सूनो की स्थिति भी सर्वथा अनावश्यक सिद्ध हो जाती । इसके लिए दू ढने पर भी कोई समाधान उपलब्ध न हो सकेगा। यही पुनरुक्तियो रे प्रसङ्ग मे एपू और गणमूत्र को प्रस्तुत करना उचित होगा, परन्तु उसकी पुनरुक्ति पूर्वनिष्टि पुनरुक्ति बाते स्थलो की अपेक्षा कुच विलक्षण है, तथा कुछ गम्भीर विचार करने पर ही सप्ट हो पाती है। परिणनि का सूत्र है-पिद्गीरादिभ्यश्च ( 1१।१)। इस सून द्वारा पित्प्रत्ययान्त गन्दो तथा गोरादि गण मे पठिन शब्दो रो स्त्रीलिङ्ग को व्यक्त करने के लिए डीए प्रत्यय का विधान पिया जाता है । यह गौरादि गण आरुनिगण है । अत आकृतिगणना के आधार पर मभी अभिप्रेत गब्दो मे मीनिगम डीप् प्रत्यय का विधान किया जा माता है । इस प्रकाश में गांगरिंगण में उपलर हान पाना पिपल्यादयश्च गणमूत्र और उमरे उदाहरणभूत पिपली, दुर्गनी, कोशातकी इत्यादि गण में पठिन राद्ध १.पा. १।१।३४, ३५, ३६ ॥

आचार्य पाणिनि जार उन का गणपाठ ८९ विचारणीय है। यह सष्ट है कि पिरल्यादि गण की सत्ता तथा तदाश्रय भूत पिप्पल्यादयश्च गणसूत्र वे रहन हुए पाणिनि द्वारा गौरादि गण का निर्धारण तथा पिगौरादिभ्यश्च ( 1१।१ ) का गौरादि पद पुन रक्त होने मे अनावश्यक हो जाता है । पिपल्यादयश्च गणम्त्र तथा तदा थित पिप्पल्यादि गण का प्रवचन पाणिनि से प्राचीन किसी अन्य आचार्य द्वारा किया गया था, इमका हम पूर्व प्रतिपादन कर चुक है।' अनेक ऐसे गणमून भी उपल चहाते ह जिनके रहते हुए उसी गण मे पठित अनेक गन्दो को अनावश्या मानना पडता है। यथा-नन्द्यादि (३।१।१३)गण मे नन्दिवाशिमदिदृषिमाधिपधिशोभिरोपिभ्यो एयन्तेभ्य संज्ञायाम् तथा सहितपिटमे. समायाम् ये दो स्त्र मिलते होते हैं । इनके साथ ही उदाहरणभूत नन्दन वाशन मदन इत्यादि तथा सहन पतन दमन गद्धोकापाठ भीगणपाठ मे दृशिणाचर होता है। ग्रह्यादि (३।१।१३८) गण मे याचिन्याहृसन्याहव्रजवदवसा प्रतिषिद्धानाम् तथा अचामचित्तकर्तृ- काणाम् इन दो गणसूनो के साथ मान अयाची अन्याहारी तथा अकारी अहारी इत्यादि उदाहरणो का पाठ भी देखा जाता है। ठीक इसी प्रकार अपूपादि (५।१14) गण मे अधिकारेभ्यश्च इस गरणमून के रहते हुए अपप तण्डल पृथुक इत्यादि गदा का पाठ मर्वथा अनावश्यक सिद्ध होता है। पाणिनीय गणपाठ के पूर्व निादछ स्थाना मे गणसूनो के रहते हुए उदाहरणभूत गद्धो का पाठ धीर - करने पर गणसून अनावश्यक सिद्ध हांगे। गणपाठ की शैली को देखन ए गणा मे शब्दो का पाठ ही स्वाभाविक कहा जामाता है, सूनो का पाठ का स-साभाविक ही होगा । शब्दा का पाठ होने पर तत्तद् गणमूनो की कोर्ट मावश्यकता नहीं रहती। वस्तुन इस प्रकार की पुनाकिया स जहा यह प्रमाणित होता है कि ये गणसूत्र अष्टाध्यायी के प्रवक्ता नाप पाणिनि द्वारा रचित नहीं है, वहा यह मम्भावना भी उपस्थित होती जिगणशेली का विशप उपयाग न करन वाने पाणिनि से प्राचीन किमी आताप के व्यापण के य विभिन सूत्र र जिनो उदाहरणो मे पाणिनि न जाने गरणपाट रे उन उन प्रारणो मे समाविष्ट किया था। १.द्रव्य पूर्य पृष्ट ३३-३४ । १२ ९० सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि पुनरुक्ति की यह समस्या यही समाप्त नहीं होती। गणपाठ मे अनेक ऐसे भी गणमूत्र उपलब्ध होते है, जिन की उपस्थिति मे कात्यायन की अनेक वातिके भी निरर्थक हो जाती है । यथा-पिद्भिदादिभ्योऽङ् (३ । ३ । १०४) सून की व्याख्या में वार्तिक रूप से तथा भिदादिगण मे गणसून के रूप से भिदा विदारणे, छिदा द्वैधीकरणे, पारा शस्त्र्याम् आदि वाक्य पठित है। शुदा चामहत्पूर्वा जातिः' प्राचार्यादणत्वं च अहतो नुम् च ये कात्यायन की वातिके क्रमश प्रजादि ( ८1१। ) सभ्नादि (८ । । ३९) तथा ब्राह्मणादि (५। १ । १२३ ) गण मे गणमूत्र के रूप मे भी पठित मिलती है । सदचूकाण्डप्रान्तशतैकेभ्य. पुष्पात् प्रतिषेधः, संभस्त्राजिनशणपि- एडेभ्य. फलात् प्रतिषेध" तथा मूलान्ना ये कात्यायन की तीनो वातिके अजादि (४११ । ४) गण मे गणसूत्र के रूप में उपलब्ध होती है । चरणसम्बन्धेन निवासलक्षणोऽण' वातिक गहादि (४।२।१३७ ) गण मे चाण चरणे इस गणसूनाश के रूप मे देखी जा सकती है। सेनायां नियमार्थ वा वार्तिक स्खण्डिकादि (४ । २ । ४४ ) गण मे, तुद्रमालवात् सेनासायाम् गणसूत्र के रूप में भी उपलब्ध है । इसी प्रकार की नृनरा- भ्यामम् वचनम् वार्तिक भी शाईरवादि (११।७३)गण मेननरयोईद्धिश्च इस गणसूत्र के रूप मे द्रष्टव्य है । गणत्रों के विषय में इमारा मत पुनरुक्तियो को उपर्युक्त लम्बी सूची हमारी उपर्युक्त धारणा को पुष्ट करती है कि पाणिनीय गणपाठ मे उपलब्ध होने वाले गणसूत्र अपाणिनीय हैं। हम इस बात पर बल देना नहीं चाहते कि ये सभी गणसूत्र पाणिनि से प्राचीन किसी या विन्ही आचार्यों के है, अथवा सभी अर्वाचीन किसी या विन्ही आचार्यों द्वारा कात्यायन आदि वैयाकरणो के वचनो के अनुकरण पर स्वरूा निमिति में समर्थ हुए है। संभवत दोनो प्रकार की स्थितियो वा सम्यन्य गणसूत्रो से स्थापित किया जा सकता है। अर्थात् कुछ गणमूत्र १.महा०४॥१॥४॥ ३. महा०५।१।१२४ ।। ५.महा०४।२।१३८॥ ७महा.४|४|४६ ।। २.महा०४।१।४६ ।। ४.महा०४।१।६४।। ६ महा.४|२|५|| आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ प्राचीन आचार्यों के व्याकरणो के सूत्र रहे हो । उन के उदाहरणो का उन उन गणो मे समावेश कर देने पर वृतिकागे के प्रमाद से वे सूत्र भी पाणिनीय गणराठ मे उल्लिखित होते चले आ रहे हो। यया नन्द्यादि अथवा गौरादि गण मे आए हुए गणसूत्र । साथ ही कत से एमे भी गणसून है जो कात्यायन की विभिन्न वार्तिको से प्रभावित हैं, अथवा दूसरे शब्दो मे कात्यायन के तत्तत् प्रकरणो से मम्वद्ध वार्तिको के अनुकरण पर विभिन गणतो की रचना हुई है। आचार्य चन्द्रगोमी के अनुकरण पर जिस प्रकार काशिकाकार जैसे वृत्तिकारो ने पाणिनि के अनेक सूत्रो मे कात्यायन की वार्तिको का सम्मिश्रण उन उन की न्यूनता को पूर्ण करने के लिए किया', उसी प्रकार कात्यायन की कुछ वार्तिको को गणसूत्र का रूप देकर पाणिनीय गणपाठ मे यदि वृत्तिकारो द्वारा आदृत किया गया हो तो इसमे आश्चर्य की क्या बात हो सकती है । इस प्रकार के गणसूत्रो को पाणिनि से अर्वाचीन माना जा सकता है। नागेश भट्ट का साच्य-पाणिनीय व्याकरण के मर्मज्ञ विद्वान् नागेश भट्ट ने अनेक स्थानो पर गणसूत्रो की अपाणिनीयता, अनार्पता एव अप्रामाणिकता की स्पष्ट सूचना दी है।' धातुगणसूत्र--गणसूत्रो की अपाणिनीयता के प्रसग मे धातुपाठ मे मिलने वाले प्रातिपदिकाद् धात्वर्थे बहुलमिष्ठाच' तया तत्करोति तदाचष्टे जैसे गणसूत्रो की ओर भी हम विद्वानो का ध्यान आकृष्ट करना आवश्यक समझते हैं। इन गणसूत्रो को भी नागेश भट्ट न इस कारण प्रक्षिप्त माना है कि ये गणमूत्र कात्यायन की वार्तिको के रूप मे भी महाभाष्य मे मिलते है और इस रूप मे इन्हे प्रक्षिप्त एवं अप्रामाणिक मानते हुए सत्यापपाश (३ । १ । २५ ) इस पाणिनीय सूत्र मे पाश आदि शब्दो के ग्रहण की सार्थकता दर्शाई है। १ द्राव्य पूर्व पृष्ठ ४१ । २ महा० उद्योतीका ४ । २ । ४५, १३८, ४।४। ४६ । ३. क्षीरतरङ्गिणी १० । २६६ ॥ ४ क्षीरतरङ्गिणी १० । २६७, २६८॥ ५ महा०३।१।२६।। ६ प्रातिपदिकाद्धात्वर्थ इति हेतुमति चेत्यवातिकादिद गणम्तमप्रामाणिकम्।

सं० व्या० मे गणपाठ को गरमाग और आचार्य पाणिनि कात्यायन तथा पतञ्जलि की दृष्टि में पाणिनीय गणपाठ अपनी पुस्तक सिम्टम्म आफ मन ग्रामर मे एम० के० बेल्वालकर महोदय ने कात्यायन की वानिको । विषय में कहा है- कात्यायन की कृति वातिको का प्रयाजन था पाणिनि के उन सूत्रो मे परिवर्तन, परिवर्धन तथा सशोधन प्रस्तुत करना, जो ( कात्यायन के समय मे ) आशिक्रूप म या सवागन अप्रयाजनीय हो गए थे।" वल्वाल्वर महादय 4 उपगत पिन से काई भी व्याकरण का विद्वान् असहमत नही हो सकता । पाणिनि निम जिस सूत्र म आलोचना के लिये थोडा सा भी अवकाश या वहा या मर्वन कात्यायन ने अपनी वार्तिको द्वाग सशोधन परिवर्धन और यावश्यक परिवर्तन करने के लिये, अपन विचार प्रस्तुत क्यि ह । य- सरी बात है कि अनक स्थलो पर कात्यायन के द्वारा प्रस्तुत क्यि गय विचारो की अनावश्यकता या निस्सा- रता का सयुक्तिक प्रतिपादन करत । महाभाप्यकार पतजलि ने पाणिनि के सूनो की महत्ता को पुन प्रतितापित किया है। वास्तविक्ता तो यह है कि तत्कालीन संस्कृत भाषा की प्रत्यर गतिविधि की विवेचनात्मक क्सौटी पर अष्टाध्यायी के लगभग प्रत्येक सून ती सच्चे आलोचक के समान खरी परीक्षा करते हुए पाणिनि के इन दाना उत्तराधिकारियो ने महान् आचार्य पाणिनि के वास्तविक महत्त्व की विद्वानो , सम्मुख उपस्थित करने का स्तुत्य प्रयास किया है। अष्टाध्यायी के सूत्रों पर विचा पित हुए इन दोनो मनीषियो ने गण सम्बची सूत्रो तया कही कही क्सिी पिरी गण गण के विशिष्ट शब्दो के उस श्रत एष सयापपारोति स्प्रे पाशादि । चरितार्थम् । महा० उद्योत टीका ३।१२। इसी प्रकार ३।१।२६ की उद्योत टीका में भी लिखा है। ? TR4147 work the 2017 > were tricot to coirect, inolify or supplement zlu sults of qima' wherecer they were or unal income a ntually or totally imapplio cable. पृष्ट २९ ।

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ उम गण मे पढे जाने के प्रयोजन अयवा उन के साथ किसी उपाधि वा नियमन (गर्त) के सयोजन की आवश्यकता, अथवा किसी गण के स्वरूप आदि विषयो पर अपने उपादेय विचार प्रस्तुत किये हैं । इन विचारो का मकलन एव अध्ययन हमने अपने आलोचनात्मक अध्ययन मे यथावसर विस्तार से किया है।' यहाँ इनके गणपाठ-सम्बन्धी प्रमुख विचारो को ही विहगम दृष्टया प्रसृत किया जाता है- १-सादि गण मे पठित पूर्वपरामरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायाम- संज्ञायाम्' इत्यादि गणसूत्रो को पुन अष्टाध्यायी के इसी प्रकरण के सूत्रो मे इसी शब्दावली के साथ स्थान देने की आवश्यकता पर विचार । २-प्रादिगण मे, इसके पठिन गण होने के कारण, 'मरुत' तथा 'श्रत्' शब्दो का उपसम्यान । ३-तिष्ठदग्यादि गण के प्रारम्भिक शब्द तिप्ठद्गु का काल विशेप मै निर्धारण, तथा इसी गण के खलेयर आदि कुछ शब्दो का अन्यपदार्थ मे निश्चितीकरण। -साक्षात्मभृति शब्दो अथवा साक्षादादि गण के शब्दो तथा श्रेण्यादि गण के शब्दो के साथ ज्ययं वचन की उपाधि का सयोजन ! अर्थात् जव वे शब्द च्न्ययेअभूततदभाव के वाचक हो तभी उन्हे इस गण मे पठित मान कर निपात तथा गति सज्ञा का नियमन ।' ५-गयाश्वप्रभृति शब्दो के यथोचारित स्वरुप मे ही द्वन्द्ववृत्त की स्थिति का प्रकारान १. यह अश गणपाठ के श्रादशं सस्करण के अन्त में छपेगा। २. अवरादीना पुनः सूत्रपाट ग्रहणानर्यक्यम् गण पठितत्वात् । महा० नवा. १1१1३३ ॥ ३. मरुन्छन्दस्योपसख्यानम् । अच्छब्दस्योपसख्यानम् । महा० १।४।५८॥ ४ तिष्ठद्गु कालविरोधे । सनेयवादीनि प्रथमान्तान्यन्यपदार्य । महा० २।१।१७॥ ५ साक्षाप्रभृतिषु व्यर्थवचनम् । महा० १।४।७४ ॥ श्रेण्यादिषु व्यर्थ वचनम् । महा०२।१।५६ ।। ६. गवारप्रभृतिषु यथोन्चारितं ददत्तम् । महा० २ ॥ ४ ॥११॥ .

९४ - स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि ६–विदादिगण के अवान्तर गण-गोपवनादि के लिये प्रागहरितादिभ्य 'हरित' आदि शब्दो से पहले पहले गोपवनादिगण की स्थिति स्वीकर रणीय है, इस बात की घोषणा ।' ७-लोहितादि गण के केवल प्रारम्भिक लोहित शब्द को छोड कर अन्य सभी गन्दो को भृशादि गण मे पढ देने का प्रस्ताव ।' ८-पचादि गण ( आकृतिगण ) में पठित गन्दो के प्रयोजन पर विचार । ९-भिदादि गण के कुछ शब्दो के अर्थो का नियमन ।' १०-अजादि के शूटा शब्द के साथ अमहत्पूवा नियमन की सयोजना।" ११-गर्गादिगण के अवान्तर गण करावादि मे पठित शकल शब्द के, गर्गादि के दूसरे अवान्तर गण लोहितादि मे भी उपसख्यान करने का प्रस्ताव ।। १२-शोकवार्तिककार द्वारा 'शक्ल' शब्द के लोहितादि गण मे भी प्रकारान्तर से-पाठ विपर्यय द्वारा प्रवेश करा कर, उपर्युक्त प्रस्ताव का समाधान।' १३-ौड्यादि गण मे ही गोत्रापयवात् इस पाणिनि सूत्र के उदाहरणभूत सभी शब्दो का समावेश कर देने तथा इस प्रकार गोत्रावयवात् सूत्र की अनावश्यकता का प्रतिपादन। १४-कुर्यादि गण मे पठित वामरथ शब्द के लिये, स्वर सम्बन्धी कार्यों के अतिरिक्त करपादियभाव का विधान ।' १. गोपवनादिप्रतिषेध प्राग् हरितादिभ्य । महा० २ । ४ । ६७ ॥ २. लोहितहाउभ्य क्यपश्चन भृशादिपितराणि । महा० ३।१।१३ ॥ ३. पचाउनुक्रमणमनुबधास जनार्यम् । अपवादगाधनार्थ च । महा० ३।१। १३४॥ ४ भिदा विदारण | छिदा वैधीकरण । श्रारा शरन्याम् । धारा भपात | गुहा गिर्योपध्यो । महा० ३ । ३ । १०४ ।। ५शदाचामहत्त्वामहा०1"|४|| ६. लोहितादिषु शाकल्यस्योपसंख्यातम् । महा० ४ । १ । १८ । ७. कपात शकल परं कतादुत्तर इष्यते । प्रतिरो तन्तातीप्पाणी तत्र प्रयोजनम् ।। महा० ४।१।८॥ - सिद्ध तु रोटयादिपसंख्यानात् । महा० ४।१1 ७६ ॥ ६. यामरयस्य करपादिवत् स्वरवर्जम् । महा० ४।। १५१ ।।

१५-भिक्षादिगण में पठित युवति शब्द की अनर्थकता का प्रतिपादन ।' १६-खण्डिकादि गण में पठित मुद्रकमालय शब्द से गणकार आचार्य पाणिनि के विभिन्न अभिप्रायों का श्लोकवार्तिककार द्वारा ज्ञापन ।' १७-कच्छादि गण में पठित साल्व शब्द के पाठ की अनर्थकता का प्रतिपादन । १८-गहादि गए मे पठित मध्य शब्द के अर्थ का नियमन । १९-विल्यादि गण मे पठित गवीधुका शब्द के इस गण मे पाठ किये जाने के प्रयोजन का प्रतिपादन ।' २०-गयादि गण में उपन्यस्त नाभि नभं च इस गणसूत्र पर वैयाकरण दृष्टिकोण से विचार । २१-व्युष्टादि गण में अग्निपद आदि कुछ शब्दों के उपसंस्यान का प्रस्ताव ।' २२-नीहादि गण के शब्दों का विभिन्न कार्यों की दृष्टि से ब्रीह्यादि, शिखादि तथा यवखदादि तीन गणों मे विभाजन ।' २३-स्थूलादि गण मे चञ्चद् तथा बृहत् शब्दों के उपसंख्यान का प्रस्ताव ।' २४-युक्तारोह्यादि गण मे पठित एकशितिपात् शब्द से गणकार पाणिनि १. भिक्षादिषु युवतिग्रहणान र्थक्यं पुवावस्य सिद्धत्वात् प्रत्ययविधौ । महा. ४।२।३८।। २. शापकं स्यादन्तत्वे तथा चापिशलेविधिः । सेनायां नियमार्थ वा यया माध्यते वा घुा । महा० ४ । २१४५ ॥ ३. साल्वानां कच्छादिषु पाठोऽण विधानार्गः, नवाऽपदातिगोयवागूमहणमवधा- रणार्गम् । महा० ४ । २ । १३३ ।। ४. गहादिपु पृथिवीमध्यस्य मध्यमभावः । महा० ४।२।१३८।। ५. बिल्वादिषु गवीधुकामहणं मयट प्रतिषेधार्गम् । महा० ४।१।१३४ ॥ ६. नामेभभावे प्रत्ययानुपपत्तिः प्रकृत्यमावात् .........."सिद्धं तु शाखादिषु यचनात् ह्रस्वत्वं च । महा०५) १२॥ ७. श्रणप्रकरण अमिपदादिभ्यः उपसंख्यानम् । महा० ५। १।१७। ८. शिखादिम्य इनिर्वाच्य इकन्यवस्खदादिषु । महा० ५। २ । ११६ ॥ ६. कन्प्रकरण चंचहतोरुपसंख्यानम् । महा० ५।४।३ ॥

सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचाय पाणिनि
को विशिष्ट प्रवृत्ति का ज्ञापन।
२५-पृषोदरादि गण मे समन्वित हो सकने वाले कुछ गन्दो के प्रकृति प्रत्यय
की कल्पना।
२६-द्वारादि गण मे स्वाध्याय शब्द को गणकार ने निश्चित रूप से
व्यवस्थित नहीं किया था, ऐसी घोषणा।
२७-कस्कादि गण मे भ्रातुप्पुत्र गब्द के पाठ से गणप्रवक्ता पाणिनि के
विशिष्ट अभिप्राय का ज्ञापन ।'
२८-सुपामादि तथा तुभ्नादि गणो की आकृतिगणता का प्रतिपादन ।'
इन विभिन्न विचारो के अतिरिक्त पाणिनि के सूनो के आशय को सर्वथा
स्पष्ट करने तथा किन्ही सूत्रो की न्यूनता की पूर्ति के लिये वार्तिककार तथा
श्लोस्वातिकार ने, पाणिनि-निर्धारित गणो से अतिरिक्त, अनेक गणो का
निर्धारण किया है । इनकी सूची नीचे दी जाती है-
१-शाकपार्थिवादि गण ( महा० २ । १ । ६८)।
२-प्रत्यादि गण ( महा० २।३ । १८)।
३-मूलयिभुजादि गण ( महा० ३।२।५)।
४-पाश्यादि गण ( महा० ३।२।१५)।
५-सम्पदादि गण ( ३। ३ । १०८ )।
६-पलादि गण ( महार ।।२। ५१ )।
७-परिमुखादिगण ( महा० ४।३१५८ )।
--अध्यात्मादिगण ( महा०४।३।६०)।
-प्रभूतादि गण ( महा० ८।४।१)।
१०-माशन्दादिगण ( महा० ।।४।१०)।
१. एकशितिपात स्वरवचनं तु शाप निमित्तस्वरयनीयस्यस्य ।
महा.
२. टिकूशन्टेभ्यम्तीरस्य तारमानो या, इत्यादि । द्र० महा०६।३ | १०८॥
३.क पुनरहति स्वाध्यायशवं द्वारादिपु परिनुम । महा०७।३।४॥
४. भानुप्रमहणं शाप कटेशनिमित्तात् पत्यप्रतिरोधस्य । महा० ८।३।४।।
५. अपिहिनलसणो मूर्धन्य मुगामादिषु । महा• ८३६८ ।।
अपिदितलक्षणो एसप्रतिय. सुम्नाटिगु । महा• ८।४।६ ॥

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ ९७ २०- ११-परदारादि गण ( महा० ४।४।१)। १२-सुस्नातादि गण ( महा० ४।४।१ )। १३-अवान्तरदीक्षादि गण ( महा० ५।१।९४)। १४-महानाम्न्यादि गण ( महा० ५१११९४ ) । १५-अग्निपदादि गण ( महा०५।११९७ )। -पुण्याहवाचनादि गण ( महा० ५।१।१११ )। १७-चातुर्वर्णादि गण (महा० ५।१।१२४ ) । १८-ज्योत्स्नादि गण ( महा० ५।२।१०३ ) । १६-भवदादि गण ( महा० ५।३।१)। -श्राद्यादि गण ( महा० ५।४।०४)। २१-शकन्ध्यादि गण ( महा० ६।१।९३ )। २२-निचक्रादि गण ( महा० ६।२।१९९ ) । २३-कुक्कुटादि गण ( महा० ६।३।४१)। २४-अण्डादि गण ( महा० ६।३।०१)। २५-पीरवादि गण ( महा० ६३३१२१ ) । २६-क्षिपकादि गण ( महा० ७.५१४५ )। २७-अहरादि गण ( महा० ८२।७० )। २८-पत्यादि गण ( महा० ८।२।७० ) । २६-इरिकादि गण ( महा० ८।४।६)। ३०-गिरिनद्यादि गण ( महा० ८।४।१०)। कात्यायन द्वारा निर्धारित इन गणो का पाणिनि के बाद के चन्द्रगोमी प्रभृति वैयाकरणा ने, विशेषत किसी अज्ञात व्याकरण से सम्बन्ध रखने वाली गणरत्नमहोदधि के रचियता एवं विशिष्ट विद्वान वर्धमान ने अपने गणपाठ मे अधिकाधिक स्प मे अपनाया है और इन गणो का अपने सूत्रपाठ मे उपयोग भी किया है। कात्यायन की कुछ वार्तिको तथा पतजलि के द्वारा किये गये, उनकी व्याख्याओ के अधार पर अष्टाध्यायी के उत्तरवर्ती व्याख्याताओ तथा वृत्ति कारो ने पाणिनीय गणपाठ मे अनेक गणसूत्रो तथा शब्दो को ठीक उसी प्रकार मिला दिया है, जिस प्रकार कात्यायन की कुछ वातिको तथा वाति काशो को अष्टाध्यायी के सूत्रो मे । इस दृष्टि से गणपाठ के संशोधन मे १३ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि कात्यायन की इस प्रकार की वार्तिके विशेष महत्त्व की है । इनका निर्देश यथावसर दिया जाएगा। जयादित्य-वामन और पाणिनीय गणपाठ/ पाणिनीय व्याकरण सम्प्रदाय मे काशिका को बहुत ही प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त है । इसका कारण है-उपलब्ध अन्य वृतियो की अपेक्षा इसकी प्राची- नता, व्याकरण-शास्त्र की परिनिष्ठता तथा प्राचीन मतो की सरक्षणता। कात्यायन के उपसख्यानो ( वार्तिको ) तथा पतञ्जलि की इष्टियो से पूर्णतया सुसम्पन्न तथा व्याकरण के साक्षात् शरीर के रुप मे प्रकट होती हुई पाणिनीय सूत्रो के गूढ अर्थो की सुप्रकाशिका काशिका पाणिनीय तन्त्र के अध्ययन के लिए निश्चित ही नितान्त उपादेय ग्रन्थ है। प्रो० कीथ ने भी लिखा है- "पाणिनीय अष्टाध्यायी की एक टीका जयादित्य वामन कृत काशिका वृत्ति अपनी सूचना-बहुलता, तुलनात्मक शुद्धता, तथा पाणिनीय ग्रन्थ मे किये गए परिवर्तनो की साक्ष्यता के कारण प्रशसा का पान है।' न केवल इतना ही, अपितु अपने समय मे उपलब्ध व्याकरण विषयक सभी कृतियो का आलोडन एव आलोचन करके अनेकत्र विप्रकीर्ण सामग्री मे से उपादेय सारभूत विषयो का अल्प शब्दो मे सकलन करना, काशिका की अपनी ऐसी महती विशेषता है जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं होती। काशिका के आधारभूत पाणिनीय सप्रदाय के ग्रन्थ थे—उस समय प्रचलित कतिपय १ गणपाठ के थालोचनात्मक अश में । यह गणपाठ के श्रादर्श सस्करण अन्त में छपेगा। २ इण्युपमख्यानवती शुद्धगणा विवृतगूढसूनार्या । व्युत्पन्नस्पसिद्धिवृत्तिरिय काशिका नाम ॥२॥ व्याकरणस्य शरीर परिनिष्ठितशास्त्रकार्यमेतावत् । शिष्टः परिकरबन्ध क्रियतेऽस्य ग्रन्थकारेण ॥ ३ ॥ प्रारम्भ के श्लोक । 3. One commentary of qrajā deserves praise for its extent of information, its comparative clearness and uts evidence of changes in पाणिनि's text, the काशिकावृत्ति of जयादित्य and वामन ५ हिमरी श्राफ सस्कृत लिटरेचर, पृष्ठ ४२६ ।

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ ९९ वृत्तियां, महाभाप्य, धातुओं के संग्रह के व्याख्यानभूत धातुपारायण, और प्रातिपदिकों के समूह, दूसरे शब्दों में गणपाठ के व्याख्यानभूत नामपारायण।' लगभग ६५० ईस्वी में लिखी गई यह काशिका वृत्ति, अष्टाध्यायी को सम्प्रति उपलभ्यमान सभी वृत्तियों में प्राचीन है। हरदत्त इस बात को सूचना देता है कि काशिका से प्राचीन वृत्तियों में गणपाठ का संग्रह नहीं था।' काशिका में पाणिनीय गणपाठ न केवल पूर्णरूप में अपितु अपेक्षा कृत शुद्धरूप में मिलता है । इस की घोषणा स्वयं कामिकाकार ने शुद्धगणा विशेषण द्वारा दी है। काशिकाकार द्वारा की गई शुद्धगणा की घोपरणा का एक अभिप्राय "कात्यायन तथा पतञ्जलि द्वारा उपस्थित किए गए तथा आचार्य चन्द्रगोमी द्वारा अपने व्याकरण में स्वीकार किए गए पाणिनीय गणपाठ विषयक संशो- धनों के अनुसार विशुद्ध अथवा अपनी दृष्टि से पूर्ण गणपाठ का संपादन करना" भी सम्भव है । तुलनात्मक अध्ययन से इस बात की पुष्टि होती है। इस प्रकार यह सर्वथा सत्य है कि काशिकाकार को इस संकलन मे पर्याप्त सफलता प्राप्त हुई है। परन्तु इसका परिणाम यह हुआ कि पाणिनीय गणपाठ में कात्यायन की अनेक वार्तिकों एवं उपसंख्यानों तथा पतञ्जलि के वचनों और यहां तक कि चन्द्रगोमी के भी एक सूत्र को गणपाठ मे स्थान प्राप्त होगया।" इससे निश्चित ही पाणिनीय गणपाठ की मौलिकता को धक्का लगा। कागिकाकार की यह नीति न केवल पाणिनीय गणपाठ के विषय में ही रहो, अपितु पंणिनि के सूत्रपाठ को भी उन्होने पर्याप्त परिवर्तन के साथ उपस्थित किया है । इस तथ्य की पुष्टि कीलहान ने भी इस प्रकार की है- "काशिका में मिलने वाला अष्टाध्यायी-ग्रन्थ कात्यायन तथा पतजलि को - १. वृत्तौ भाष्ये तथा नामधातुपारायणादिषु । विप्रकीर्णस्य तन्त्रस्य क्रियते सारसंग्रहः ॥१॥ काशिका, श्राद्य श्लोक । २.द्र० सिस्टम्स आफ संस्कृत ग्रामर, पृष्ठ ३५ । ३ वृत्यन्तरेषु त गणपाठ एव नास्ति । प० म० भाग १, पृष्ठ ४ । ४. काशिका श्राद्यश्लोक । ५. वेणुकादिभ्यश्छण् (चा० सूत्र ३ । २१६१ ) को काशिका ४१२११३८ के गण में।

१०० से० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि ज्ञात ( अष्टाध्यायी ) ग्रन्थ से ५८ सूत्रो के विषय मे भिन्न है ।' प्रो० बेल्वा- ल्कर ने भी यह सष्टरूप से स्वीकार किया है कि चन्द्रगोमी द्वारा प्रस्तुत किए गए सम्पूर्ण सशोधनो को पाणिनीय सम्प्रदाय मे अन्तर्भूत करके उप स्थित करना ही काशिकाकार का उद्देश्य था। अपने इस स्वभाव के परिणामस्वरूप काशिकाकार ने पाणिनीय गण पाठ म कहा कहा क्या क्या परिवर्तन किया है, यह हम आगे चलकर दिख लायेंगे । परन्तु सभी स्थला पर काशिकाकार ने आख मू दकर उपर्युक्त तीनो आचार्यों की बाते मान ली हो ऐसा नही कहा जा सकता। लोहितादि गण के स्वरूप तथा भिक्षादि गण मे युपति शब्द के पाठ की अनर्यकता जैसे कुछ एक स्थल ऐसे भी उपस्थित किए जा सकते है जहा काशिकाकार ने कात्यायन तथा पतञ्जलि के विचारो को कोई महत्त्व नही दिया । युक्ता- रोह्यादि गण मे पठित एकशितिपात् शब्द के विषय मे पत अलि के द्वारा की गई घोपणा का काशिकाकार ने स्पष्ट विरोध किया है। साथ ही कस्कादि गण मे सर्पिकुण्डिका आदि शब्दो के पाठ के विषय मे पारायणिक विद्व नो का विरोध करने वाला भी काशिकाकार ही है। इस प्रकार जहा अष्टाध्यायो के सूत्रा के गूढतम रहस्यो को कुछ ही पदिक्तयो मे प्रस्तुत करने, कात्यायन पतञ्जलि और चन्द्रगोमी के द्वारा प्रस्तावित विचारा का समुचित समन्वय करके विद्वानो के समक्ष रखते हुए भी यथावसर अपने स्वतन्य विचारो को निर्भीकतापूर्वक उपस्थित करने का पुनीत श्रेय सस्कृत व्याकरण के क्षेत्र मे काशिकाकार को ही प्राप्त हुआ है वहा १. The text of the अाध्यायी as given in the काशिका differs in case of58 rules from the textlinown toकास्यायन and पतञ्जलि सिएम्स श्राफ संस्कृत ग्रामर, पृष्ठ ३७ ॥ 2. The object of the 4741 was to embody in the पाणिनीय system all the improvements that were made by चन्द्रगोमिन् । वही, पृष्ठ वही। ३ द्र०काशिका ३।१।१३ ॥ ४.शशिका ४।२।४५ ॥ ५ महा०२।१।१॥ तथा काशिका ६।२१॥ ३ द्र. काशिका ८।३। ४३ ॥

आचार्य पाणिनि और उन को भरणपठिर ARY पाणिनीय गणपाठ की यथोचित सुरक्षा का भी । गणपाठ के सशोधन मे काशिका के महत्त्व की परीक्षा यथावसर आगे की जाएगी। पाणिनीय गणपाठ के व्याख्याकार' डा० वेल्वाल्कर का यह कथन सर्वाश मे ठीक है कि टीकाकारो का ध्यान पाणिनीय गणपाठ की ओर उतना नहीं गया, जितना जाना चाहिए था। यही कारण है कि आज भी जहा धातुपाठ की अनेको वृत्तिया-मैत्रेय रक्षित की धातुप्रदीप, क्षीरस्वामी की तीरतरङ्गिणी, तथा माधव की धातुवृत्ति आदि उपलब्ध है, वहा गणपाठ की केवल एक ही नगण्य वृत्ति भट्ट यज्ञेश्वर की गणरत्नावली मिलती है। यह भी विक्रम की वीसवी शती (स० १९३१, शाके १७९६) की रचना है। सव से अधिक दुख की बात तो यह है कि जिन दो एक गणपाठ विषयक ग्रन्यो का उल्लेख कही कचित् मिलता भी है तो उनमें से एक का भी दर्शन सम्प्रति दुर्लभ है। १-पाणिनीय-व्याख्यान-पाणिनीय गणपाठ के व्याख्या ग्रन्था की दृष्टि से यदि अन्वेपण किया जाए तो यह स्वीकार करना होगा कि स्वत पाणिनि ने ही अपने गणपाठ का व्याख्यानात्मक प्रवचन किया था । इस धारणा की पुष्टि मे नद्यादि गण मे पठित पूर्वनगरी शब्द के विषय मे काशिकाकार की उक्ति-- केचित्तु पूर्वनगिरि इति पठन्ति विच्छिद्य (पूर-यन गिरि) च प्रत्यय पुर्नन्ति-पोरेयम्, वानेयम्, गैरेयम् । तदुभयमपि दर्शन प्रमाणम् । ४।२।९७॥ तथा न्यासकार जिनेन्द्रबुद्धि और पदमभरीकार हरदत की व्यास्या- भूत पडिक्त- उभयथाप्याचायण शिष्याणा प्रतिपादितत्वात् । उपस्थित की जा सकती है। इसी प्रकार क्रोड्यादि गण मे पठित १. इस श्रगल प्रकरण के लिए स० व्या शास्त्र का इतिहास भाग र अ. २३ भी द्राव्य है । २ सिएम्स आफ सस्कृत ग्रामर, पृष्ट ५३ ॥ ३. शाके रसामुनिभूमित अन्दे ! गणरत्नावली, पत्रा १२३ । ४ न्यास ४।२।६७ भाग १ पृष्ठ ६५६, प. म.।२।६७॥

१०२ सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि चैतयत शब्द के विषय मे वर्धमान का कथन- पाणिनिस्तु चित संवेदने इत्यस्य चैतयत इत्याह ( गण० महो० पृष्ठ ३७) भी उपर्युक्त धारणा की पुष्टि करता है। २-निपाताव्ययोपसर्ग वृत्ति गणपाठ में आए निपातो, एव उपसर्गो की व्याख्या कुछ विद्वानो ने की थी। इस नाम का एक वृत्ति ग्रन्थ क्षीरस्वामी ने भी लिखा था । इस ग्रन्थ का तिलक कृत व्याख्या सहित एक हस्तलेख अडियार ( मद्रास) के पुस्त- कालय मे सुरक्षित है। ३-गण वृत्ति-पाणिनीय गणपाठ की व्याख्या के रूप मे कुछ विद्वानो ने गणवृत्ति नाम के कतिपय ग्रन्थो की रचना की थी। गणवृत्ति नाम का एक ग्रन्थ तीरस्वामी ने भी लिखा था। कई विद्वानो के मतानुसार क्षीरस्वामी कृत अमरकोश तथा क्षीरतरहिणी के आरम्भ मे समानरूप से पठित श्लोक के पड्वृत्तयः कल्पिताः अश मे गणवृत्ति का भी सकेत विद्यमान है। धातुवृत्तिकार माधव ने भी किसी गणवृत्ति के अनेको उद्धरण उपस्थित किये हैं। पुरुषोत्तमदेव विरचित भाषावृत्ति के सपादक श्रीशचन्द्र चक्रवर्तीने उक्त ग्रन्थ की भूमिका (पृष्ठ १ ) मे पुरुषोत्तमदेव विरचित गणवृत्ति की सूचना भी दी है। ४-गण-व्याख्यान-मल्लिनाथ ने रघुवश' किरातार्जुनीय तथा शिशुपा- लवर की टीका में कई स्थानो पर गणन्याख्यान नाम के किसी ग्रन्थ के ऐसे उद्धरण प्रस्तुत किए है, जिनसे यह स्पष्ट हो जाता है कि उक्त ग्रन्थ मे १ सिस्टम्स श्राफ संस्कृत ग्रामर, पृ: ५३ । २. भट्टक्षीरस्वाम्युयेक्षितनिपाताव्ययापसगाय तिलकहता वृत्तिः सम्पृाति भद्र पश्यम भद्रं प्रचरेम । व्याकरण सूनीपत्र, संरया ४८७ । ३ सिएमस ग्राफ सस्कृत ग्रामर, पृष्ठ ५३ ॥ ४ धानुत्ति, पृष्ठ २६२, ४१६, ४१७ । ५ रघुरश-1४८१२।१६।। ६.किरात ०1३०॥ ७.शिशुपाल राय १।२६॥

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ १०३ गणपाठ के शब्दो के विषय मे, उनके अर्थ आदि की दृष्टि से विचार किया गया था। श्लोकगणकार लोकगणकार के मतो का उल्लेख धातुवृत्तिकार माधव,' भट्टोजी दीक्षित तया नागेश भट्ट आदि ने अनेक स्थानो पर किया है । सम्भवतः किसी विद्वान् ने गणपाठ की श्लोकवद्ध रचना की हो । इस कारण उस की प्रसिद्धि श्लोकगणकार के रूप मे होगई हो । पाणिनीय व्यापरण से इतर किसी अज्ञात व्याकरणसप्रदाय से संबद्ध गणरत्नमहोदधि के मूल रूप श्लोकबद्ध गणपाठ के रचियता वर्षमान को उक्त स्थानो मे श्लोकगणवार के रूप मे स्मरण नहीं किया गया है, क्योकि नागेश ने लघुशब्देन्दुशेखर मे श्लोकगणकार का मत उपस्थित करके गणरत्नकार वर्धमान के मत का पृथक् उल्लेख किया है । सम्भव है श्लोक- गणकार ने वर्वमान के समान ही गणपाठ के शब्दो की व्याख्या भी की हो, परन्तु प्रमाणविशेष की अनुपस्थिति मे कुछ कहना कठिन है। नामपारायण सस्कृत व्याकरण-शास्न से सवद्ध अनेक पुस्तको मे नामपरायण और धातुपारायण नाम के ग्रन्थो का अनेकधा उल्लेख मिलता है । काशिकाकार तथा धातुप्रदीपकार दोनो ने ही अपने ग्रन्थो के प्रारम्भिक श्लोको मे इन दोनो पुसको का उल्लेख किया है । काशिका के धातुनामपारायणादिपु की व्याख्या करते हुए हरदत्त ने इन दोनो ग्रन्थो का स्वरूप इस प्रकार अभि- व्यक्त किया है-"जहा धातुओ की प्रक्रिया वर्णित हो वह धातुपारायण तथा जहा गणपाठ के शब्दो का निर्वचन किया जाए वह ग्रन्य नामपारायण है। "५ तोल्बल्यादि गण के कतिपय शब्दो का निर्वचन करने के उपरान्त हरदत्त का शिष्टाः पारायणे द्रष्टव्याः कथन भी इस बात की सूचना देता १ धा० ३० पृष्ठ ४१६, ५१८ । २ शब्दकौस्तुभ ३।१।१८।। ३ लघुशब्देन्दुः० उत्तरार्ष, पृष्ठ ५६४ । ४ द्र० लघुशन्देन्दु० उत्तरार्ध, पृष्ठ ५६४ । ५ यत्र धानुप्रक्रिया तद् घातुपारायणम्, यत्र गणशब्दाना निर्वचनं तन्नामपा- रायणम् । १०म० भाग १, पृष्ठ ४ । ६ ५० म० भाग १, पृष्ठ ४८६ ।

१०४ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि है कि उसके समय मे नामपारायण नाम का कोई ग्रन्थ विद्यमान था । सम्भव है काशिका तथा धातुप्रदीप द्वारा निर्दिष्ट धातुपारायण और नामपारायण दोनो ग्रन्थ पाणिनीय सम्प्रदाय के न होकर चान्द्र सम्प्रदाय के हो, क्योकि नामपारायण के अब तक जो दो उद्धरण मिले हैं, वे दोनो पाणिनि-अभिमत स्थिति के विरोध के रूप में उपस्थित किए गए है। इन मे प्रथम उद्धरण काशिकाकार द्वारा प्रस्तुत किया गया है । इस उद्धरण से सूचना मिलती है कि नामपारायण के रचयिता ने कस्कादि गण मे सर्पिप्कुण्डिका, धनुष्कपालम्, वहिप्पूलम्, यजुष्पात्रम् इन चार शब्दो का भी पाठ किया था,' परन्तु पतञ्जलि तथा किमी प्राचीन वृत्तिकार द्वारा नित्य समासेऽनुत्तरपदस्थस्य (८१३१४५ ) इस पाणिनीय सूत्र के अनुत्तरपदस्थस्य अश के प्रत्युदाहरण रूप मे परमसर्पि.कुरिज शब्द के प्रस्तुत किए जाने के कारण यह अनुमान होता है कि सर्पिप्कुण्डिका आदि शब्दो का कस्कादिगण पाठ पाणिनि तथा पतञ्जलि को अभीष्ट नहीं था और इस रूप मे पाणिनीय सम्प्रदाय का विरोधी होने के कारण काशिका कार ने पारायणिको के मत की उपेक्षा कर दी। दूसरा उद्धरण न्यादि गणपठित निदाय शब्द की व्युत्पत्ति विषयक धातुवृत्तिकार ने सुधाकर के शब्दो मे उपस्थित करके उसे अपाणिनीय कहा है।' उपर्युक्त सम्भावना को और भी बल मिलता है। डा० लिबिश को नेपाल, कश्मीर तथा लड्डा मे प्राप्त चान्द्रव्याकरण- विषयक सामग्री मे पूर्णचन्द्र का धातुपारायण ग्रन्थ भी प्राप्त हुआ था। इस चान्द्र धातुपारायण का स्मरण सर्वानन्द ने नामलिङ्गानुशासन की टीका मे ऋभुक्षो वन इति धातुपारायणे पूर्णवन्द्र शब्दो मे किया है। इससे १ सपिप्युण्डिका धनुष्कपालम् हिप्पलम्, यजुष्पात्रमित्येषा पाठ उत्तरपदस्थ स्यापि पत्य यथा स्यादिति पारायणिका ग्राहु । काशिका ८१३ । ४८ । २ भाष्य वृत्तौ च नि यं समासेऽनुत्तरपदस्थत्यत्र परमसर्वि मुण्डिका इत्येतदेव प्रत्युदाहरणम् । काशिका ८३४८॥ ३ अन दध घातन इति स्वादि ततो निदध्यतऽननेति कृत्वा निदाघशब्द साधुरिति पारायणिका इति सुधाकर तदपाणिनीयम | धा० २० पृष्ट ३२२ । ४ इण्डियन एण्टिकरी, अप्रेल १८१६, पृष्ठ १०३ तथा उससे अागे । ५ अमर कासव भाग १ पृष्ट ४ ।

आचार्य पाणिनि और उन का गणपाठ १०५ गणरत्नावली शक सवत् १७१६ ( विमम सं० १९३१ ) में भट्ट यशेश्वर ने पाणिनीय गणपाठ की छन्दोबद्ध रचना तथा अति सक्षिप्त व्याख्या गणरत्नापली नाम से प्रस्तुत की है। यह पुस्तक वर्षमान कृत गणरत्नमहोदधि के अनुकरण पर लिखी गई है। अनेक स्थलो पर पाणिनीय मत की दृष्टि से वर्धमान के विचारो का प्रत्याख्यान भी किया है । कही कही वातिको मे पठित गणो को भी स्थान दिया गया है। विशेप स्थलो पर जैन शाकटायन आदि व्यावरणो से सवद्ध गणपाठो के विभिन पाठभेदो का भी उल्लेख किया है। मम्भव है यह उल्लेख गणरत्नमहोदधि के आधार पर किया हो । किं बहुना, पाणिनीय गणपाठ के व्याख्या ग्रन्यो में एक मान यही ऐसा ग्रन्य है जो आज प्राचीन संस्कृत वाङ्मय के संग्रहालयो मे प्राय उपलब्ध होता है।' १ शारे रसाकमुनिभूमित मासि तपाऽभिधे । गणरत्नावली, पत्रा १२३ स। २ इसका प्रकशन 'भारतीय प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान अगमेर' से शीघ्र होगा।

चतुर्थ अध्याय पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ पाणिनि से उत्तरकालीन वैयाकरणो की परम्परा मे आचार्य चन्द्रगोमी, देवनन्दी, पाल्यकीर्ति, भोज हेमचन्द्र तथा वर्षमान का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । अत पाणिनीय गणपाठ का इन आचार्यों के शब्दानुशासनो से सबद्ध गणपाठो के साथ तुलनात्मक अध्ययन अत्यावश्यक है। इस तुलनात्मक अध्ययन से अर्वाचीन वैयाकरणो के गणपाठो के सबन्ध मे कुछ ऐसे आधारभूत सिद्धान्त स्थिर किए जा सकते हे जो सामान्यतया सभी अर्वाचीन गणपाठो मे प्राय अपनाए गए है । ये सिद्धान्त इस प्रकार है १-भोज को छोडकर सभी अर्वाचीन वैयाकरणो ने अपने गणपाठो मे पाणिनि के स्वरप्रक्रिया तथा वैदिक भाषा से सबन्ध रखने वाले गणो को स्थान नहीं दिया है।' २-कात्यायन की बार्तिको को अर्वाचीन वैयाकरणो ने अपने तन्त्रो मे प्राय स्वतन्त्र सूत्र का रूप देकर सन्निविष्ट कर लिया है। इसलिए वातिको मे निर्दिष्ट गणो को भी इन्होने अपने गणपाठो मे अन्य गणो के समान स्थान दिया है। ३-कही कही पाणिनि के एक गण को अनेक गणो मे विभक्त किया है। ४-कही कही पाणिनि के अनेक गणो को एक गण मे समाविष्ट किया है। ५-कुछ गणो के आरम्भ मे पाणिनि निर्दिष्ट शब्द के स्थान पर किसी लघु शब्द को रखकर गण का नया नामकरण किया गया है । १ चान्द्र व्याकरण का स्वर वैदिक भाग चिरकाल से लुप्त है । ( देसो यही अध्याय, पृर ११२ ११३) अत उस गणपाठ में भी स्वर वैदिक प्रकरण के गणो क समावेश की सम्भावना है।

(द्र० महाभारत सभापर्व ४६ । २६)। प्राचार्य चन्द्र न १ किम लिरिश २ सस्करण में भी यही पाठ छपा है । 'जत' एक प्राचीनद्ररि पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ १०७ ६-पाणिनि के कतिपय गणो के शब्दो को मूत्रो मे पढार उन गणा का परित्याग पिया है। ७-अपने से पूर्व पूर्व के आचार्यों के गणपाठो मे मिलने वाले एप गम के अनेक पाठभेदो को स्वतन्य शब्द मानकर उन सभी या तत्तद् गणों में निर्देश दिया है। ८-आतिगणो मे उत्तरोत्तर यथासम्भव गब्दा की अधिकाधिक वृद्धि की गई है। ९-पाणिनीय गणपाठ मे आकृतिगण के रूप मे स्वीटन कुछ गणो यो पठितगण का रूप दिया है। १०-पाणिनीय गणपाठ में पठितगण के रूप मे स्वीहत अनर गणो को आकृतिगरण का प दिया है। ११-पाणिनि के गणपाठा मे मिलने वाले गणसूत्रा को अपने गण पाठो मे स्यान न देकर उन्हे स्वतन्त्र सूत्र का रूप प्रदान करके सूमपाठ म स्थान दिया है। १२-वही कही पाणिनि के एक गण में उपतव्य होने वाले कई गण- सूत्रो को एक सूत्र का रूप दिया है । १३-पाणिनि के सूत्रपाठ मे विद्यमान कई बडे बडे सूना को गणमैत्री का आश्रय लेकर उन के लिए नए गणो का निर्धारण किया है। ये उपर्युक्त वाते इन अर्वाचीन वैयाकरणो के तन्नो मे उनगा अधिकाधिक मात्रा में उपलब्ध होती है। अब हम कालक्रम मे - वैयाकरण के गणपाठ मे व्यवहत उपर्युक्त विषयो का सोदाहरण Eि करते हैं- चन्द्रगोमी तथा उस का गणपाठ आचार्य चन्द्र अथवा चन्द्रगोमी, जिस के नाम पर चान्द्र प्रसिद्ध हुआ, का समय उसकी स्वोपज्ञ वृत्ति मे उदाहत अजय राधान १ चान्द्रवृत्ति १ । २ । ८१ का पाठ अजयजर्ता दूणान् ' an. -- पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ १०९ १-फम्योजादि गण (२।४।१०४) । २-पैङ्गाक्षीपुत्रादि गण ( ३ । १ । १२४ ) ३-देवासुरादि तथा स्वर्गादि गण ( ४ । १ । १३३ )। -पुण्याहवाचनादि गण (४।१ । १३४ ) । ५-ज्योत्स्नादि गण (४।२।१०७) । ६-नवयज्ञादि गण (४ । २ । १२४) । पाणिनि के सूत्रों तथा तत्संबद्ध वार्तिक-निर्दिष्ट शब्दों के आधार पर निर्धारित गण-अष्टाध्यायी के सूत्रो तथा तत्संबद्ध कात्यायन के वातिको मे उपसख्यात शब्दों की दृष्टि से भी आचार्य चन्द्रगोमी ने अनेक नए गणो का निर्धारण किया है । यथा- १-उपादि गण' यह गण पाणिनि के ऊपसुपिमुष्कमधो रः सूत्र तथा कात्यायन के रप्रकरणे खमुखकुञ्जभ्य उपसंख्यानम् वार्तिक के आधार पर। २-कृप्यादि गण -पाणिनि के रजःकृप्यासुतिपरिषदो वलचू तथा दन्तशिखात् संज्ञायाम् सूत्रो और कात्यायन के घलप्रकरणेऽन्येभ्योऽपि दृश्यते वार्तिक के उदाहरणभूत शब्दो के आधार पर । ३-केशादि गण -पाणिनि के केशाद्वोऽन्यतरस्याम्' सूत्र तथा कात्या- यन के वप्रकरणे मणिहिरण्याभ्यामुपसंख्यानम्" वार्तिक के आधार पर । ४-कलाप्यादि गण"-पाणिनि के नस्तद्धिते" सूत्र पर विरचित नान्तस्य टिलोपे सब्रह्मचारि०" इत्यादि वार्तिक मे उपसख्यात शब्दो के आधार पर। १ चा०प०४।२।१२७ ॥ ३ महा०५२।१०७ ।। ५ पा०५।२।११२ ।। ७ महा०५।।११२ ।। ६ पा०५।२। १०६॥ ११ चा० ० ५। ३ । १४० ॥ १३ महा०६।४।१४४ ।। २ पा०५।२।१०७ ॥ ४ चा वृ० ४।२। ११६ ॥ ६ पा०५।२।११३|| ८चा० ३०४।२ । ११३ ॥ १० महा० ५।२।१०६ १२.पा.६।४।१४४ ।।

स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि ४ ५-व्यासादि गण'-पाणिनि के सुधारतुरकड च सून पर कात्या- यन से भिन वैयाकरण द्वारा विरचित सुधातृभ्यासपरडनिषादचाण्डाल विम्यानामिति वक्तव्यम् वार्तिक के आधार पर । इसी प्रकार कात्यायन के गोपवनादिप्रतिपेध प्राग्यरितादिभ्य वार्तिक को दृष्टि में रखते हुए ही चन्द्रगोमी ने गोपवनादि गण के साथ अष्टभ्य' का निर्देश आवश्यक समझा। नए गण-आचार्य चन्द्रगोमी ने अपने गणपाठ मे कुछ ऐसे नए गणो का भी निर्धारण किया है, जिनका पाणिनीय गणपाठ मे अभाव है। इस प्रसङ्ग मे मृत्वादि हिमादि तथा वेणुकादिगण द्रष्टव्य है । कई विद्वानो की धारणा है कि काशिकाकार ने चान्द्र व्याकरण के अनुकरण पर ही गहादि गण मे वणुकादिभ्यश्छण को गणसून के रूप मे समाविष्ट किया है।' कई गणो का एकीकरण-पाणिनि के गणपाठ को अपनाते हुए भी उसमे स्थान स्थान पर लाघव की दृष्टि से पाणिनि के अनेक दो दो गणो को मिलाकर चान्द्र गणपाठ मे एक कर दिया गया है । इन गणो का एकीकरण करके भी स्वरविषयक विभिन स्थितियो की सुरक्षा इस व्याकरण मे कैमे की जा सकी थी यह समझ मे नही आता ( इस व्याकरण मे स्वरप्रकरण निश्चित ही था, यद्यपि आज वह उपलब्ध नहीं है ) 1 इस एकीकरण के प्रसग मे सिम्पादि" मे तक्षशिलादि का तथा कथादि मे गुडादि का समावेश द्रष्टव्य है। कुछ गणों का परित्याग-चन्द्रगोमी ने पाणिनि द्वारा निर्धारित कुछ गणो का परित्याग भी किया है। १ चा०1०२।४।२१ ॥ २ पा०४।१।६७ ॥ ३ मग.४।१।६७ ॥ ४ महा०२।४।६७ ॥ ५ न गापपनादिभ्याडम्य । चा• मू०२।४।१.६ ।। ६ ना००४।१।१२४॥ ७. चा०१०४।२।१३६ ।। ८०.३11६१ ॥ ६.मिसम्म श्राफ उम्त प्रामर, पृट ३८, पिणी । १०. संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास, भाग १, पृष्ट ३७६३.८। ना००३।३।६१॥ २ ना.१.३।४।०४॥

पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ १११ . ६ NE इस दृष्टि से पाणिनि के शौण्डादि से लेकर राजदन्तादि तक के गणो का, तथा पलाशादि, प्लक्षादि, रसादि तथा देवपथादि जैसे कुछ अन्य गणो का इम व्याकरण मे अभाव उल्लेखनीय है। कुछ गणों का नाम परिवर्तन-पाणिनि द्वारा निर्धारित अनेक गणो के प्रारम्भिक शब्द को प्राय लायव की दृष्टि से बदल कर उन गणो का नाम भी इस व्याकरण मे बदल दिया गया है। यथा अपूपादि' का यूपादि,' इन्द्रजननादि' का शिशुक्रन्दादि, अनुप्रवचनादि का उत्थापनादि, किंशुलकादि का प्रक्षनादि, सपत्न्यादि का समानादि," यह्वादि" का शोणादि,२ तथा सन्धवेलादि" का सन्ध्यादि" नाम द्रष्टव्य है । पाणिनि के ब्रीद्यादि गण वो, कात्यायन की शिखादिभ्य इनिर्वाच्य इकन् यवरादादिपु," इस वार्तिक के अनुमार चन्द्रगोमी ने व्रीह्यादि शिखादितया, यसरदादि ये स्थान पर छोटे नाम नावादि" के रूप मे तीन गणो मे विभक्त कर दिया है, तथा यहां के शिखादि गण मे ही पाणिनि के पलादि गण का भी समावेश किया है। अन्य विभिन्नतायें इनके अतिरिक्त चन्द्रगोमी ने अपने गणपाठ के क- स्कादि गण" मे सर्पिकुण्डिका, धनुष्कपाल, यहिप्पूल तथा यजुप्पात्र शब्दो का भी पाठ किया है, जो सम्भवत पाणिनि को और निश्चित रूप से पतजलि२२ को इस गण मे अभिप्रेत नहीं था। १.पा०५।१।४।। २ चा००४।१ । ३ ।। ३. पा०४।३८८।। ४ चा००३ |३| ५६ ॥ ५ पा०५।१।१११ ।। ६ चा वृ०४।१।१३२॥ ७ पा०६।३।११६ ॥ ८ चा० १०५।२।१३२ ।। ६ पा०४।१ । ३५॥ १० चा०६०२।३।२३ ॥ ११ पा०४।१।४५।। १२ चा०६०।३।४१॥ १३ पा०४।।१६ ।। १४ चा० वृ० ३ । २ । ७६ ॥ १५ महा०५।२।११६ ।। १६ चा० ० ४ १२ । ११६ ।। १७ चा वृ०४।२।२३४ ।। १८ द्र० 'इकन् यवसदादिषु'- '-कात्यायन की वार्तिक । महा०५।२।११६ ॥ १६ बा० ० ४ । २ । ११८ ।। २. द्र० चा वृ०४।२।१३४ ।। २१ चा० ० ६ । ४ । ४५ ।। २२ द्र० का०८।३।४८॥

११२ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि पाणिनि के अर्धर्चादि गण का अपने सूत्र मे सष्ट निर्देश करके भी चन्द्रगोमी ने इस गण मे पाणिनि-निर्धारित 'गोमय' आदि शब्दो का पाठ अनावश्यक समझा' । इसी तरह पाणिनि के गणपाठ मे आये अरीहणादि आदि १७ गणो की दृष्टि से विभिन्न प्रत्ययो का विधान करके भी इन गणो के लिये शब्दो का निर्धारण करना तो दूर रहा, सूत्र मे इन गणो का निर्देश भी चन्द्रगोमी ने नहीं किया। शरादि गण जो पाणिनीय-सम्प्रदाय मे पठितगण के रूप मे स्वीकृत है, चन्द्रगोमी के गणपाठ मे आकृतिगण के रूप मे प्रस्तुत किया गया है। इसका अनुकरण भोज तथा वर्षमान ने भी किया है। चान्द्र व्याकरण के वेद तथा स्वरविषयक गण-डा० बेल्वाल्कर तथा एस० के० डे का यह मत है कि चन्द्रगोमी ने अन्य अपरकालिक वैयाक- रण के समान, बौद्ध होने के कारण पाणिनि के स्वर तथा वेदविषयक सूत्रो को अपने व्याकरण मे स्थान नहीं दिया था । डा० लिबिश द्वारा सम्पादित चान्द्र वृत्ति मे भी केवल ६ अध्याय ही मिलते है जिनमे स्वर तथा वेद का प्रकरण नही है । साथ ही इसके अन्त मे यह स्पष्ट लिखा मिलता है- समाप्तं चेदं चान्द्रव्याकरणं शुभम् । इस पक्ति से उपरोक्त धारणा को पर्याप्त पुष्टि हो जाती है । परन्तु 'संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास' के यशस्वी लेखक श्री प० युधिष्ठिरजी मीमासक का यह निश्चित मत है कि चान्द्र व्याकरण मे स्वर वैदिक दोनो प्रकरण अवश्य विद्यमान थे। पहले यह चान्द्र व्याकरण र अध्यायो मे विभक्त न होकर आठ अध्यायो मे विभक्त था। चिरकाल से वेद १ स्मासलिंगाख्याने गोमयादयो न वक्तव्याः । तदेय वा स्त्रीपुल्लिंगा." ग्रीनपुंसकलिंगा "सलिगा एकलिंगा "लिगा ""सर्व एव वाच्या स्यु । अप नेपा लोक्तो लिंगानुशासनतो ना सिद्धिरिश तद्वदेव या गोमयादीनामपि मविध्यति । चा०३०२0१८३ ॥ २. देशनालो ययादर्शनमास्थातात् अनर्यकोsi गणपाठः । चा० ५० ३ द्र० चा०प०५।२।१३४ ।। ३ ८० सिस्टम्म श्राफ संस्कृत ग्रामर, पृ० ५६ । ४.२० इपिडयन हिम्पारिकन हार्टला जून १८ पृ. २५८ तथा उसमे - ३।१।६८॥ श्रांगे।

पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ और स्वर विषयक अध्यायों के उत्सन्न हो जाने से ये सम्प्रति अनुपलब्ध हैं। अपने मत की पुष्टि में आपने चान्द्रवृत्ति के तव्यस्य या स्वरितत्वं वक्ष्यामः,' जनिवध्योरिगुपधान्तानां च स्वरं यत्याम.' तथा स्वरविशेषमष्टमे चच्यामः जैसे अकाट्य प्रमाणों को उपस्थित दिया है, जिनमे उनके मत की सन्दिग्यता समाप्त हो जाती है । उपर्युक्त दोनों प्रकरणों के अनुपलब्ध होने के कारण तत्सम्बद्ध गणपाठ का भी मम्प्रति इस व्याकरण में अभाव है। जैनेन्द्र व्याकरण तथा उसका गणपाठ धनंजयकोपकार, हेमचन्द्र तथा वोपदेव जैसे विद्वानों के साक्ष्य से यह पता लगता है कि जैनेन्द्र व्याकरण के रचयिता का नाम देवनन्दी है । इसका दूसरा नाम पूज्यपाद भी है। प्रो० पाठक ने अपने निबन्ध में यह सिद्ध करना चाहा है कि इस व्याकरण की रचना ईसा की पांचवी शताब्दी के अन्त में जैनेन्द्र व्याकरण के दाक्षिणात्य तथा औदीच्य दो संस्करण मिलते है। इनमे सूत्रों के क्रमश. अधिक तथा न्यून होने के कारण पहले को वड़ा तथा दूसरे को छोटा संस्करण माना जाता है । इनमें औदीच्य संस्करण पर लिखी गयो अभयनन्दो की महावृत्ति मे ही इस व्याकरण का गणपाठ मिलता है। इस महावृत्ति की रचना संभवत. ७५० ईस्वी मे हुई थी।" डा० वेल्वाल्कर के विचारानुसार इस व्याकरण की अपनी कोई मौलि- कता नहीं है। पाणिनि के सूत्रों तथा कात्यायन को वार्तिकों को ही यथा- सम्भव संक्षिप्तरूप मे प्रस्तुत करने का प्रयास इस व्याकरण मे किया गया है। इसलिये इस व्याकरण के गणपाठ मे भी किसी प्रकार को अपनी मौलि- १. चा० ३०१।१।१०५ ।। २. चा०व०१।१।१०८।। ३. चा० ० १ । १ । १४५ ।। ४. द्र० संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहाम, भाग १, पृष्ठ ४१६-४१७ ॥ ५. द्र० सिस्टम्स याफ संस्कृत ग्रामर, पृष्ठ ६३ । ६. द्र० इण्डियन एण्टिकरी, अक्तबर १६१४ । ७.द्र सिस्टम्स श्राफ संस्कृत ग्रामर, पृष्ठ ६७। ८.द्र० सिस्टम्स श्राफ संस्कृत ग्रामर, पृष्ठ ६५।

- ११४ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि कता का न होना स्वाभाविक ही है । पुनरपि इस गणपाठ मे निम्न बाते द्रष्टव्य हैं- १-स्वर तथा वैदिक प्रकरण के सूत्रो के न होने के कारण तत्सम्बद्ध गणो का अभाव। २-गणसूनो की प्राय स्वतत्र सूनो के रूप मे प्रतिष्ठा । ३-पिच्छादि तथा तुन्दादि का एकीकरण । ४-आकृतिगणा मे कुछ शब्दो की वृद्धि । ५-चान्द्रवृति तथा काशिका के गणपाठ मे मिलने वाले, एक शब्द के दो विभिन्न पाठो को स्वतंत्र रूप मे दो पृथक् पृथक् शब्द मानकर पढ़ा गया है । यथा-कुर्वादि गण मे काशिका का पाठ अभ्र' हे चान्द्रवृत्ति मे 'शुभ्र' है परन्तु जैनेन्द्र मे अभ्र' और 'शुभ्र' दोनो ही पठित है। ६-इस गणपाठ मे एक वात और द्रष्टव्य है । प्राय सर्वत्र श के स्थान मे स का प्रयोग मिलता है। जैसे शकुलादि के स्थान पर सकुलादि अथवा सर्वकेश के स्थान पर सर्वकेस इत्यादि । ७-कही कही इसके विपरीत स्थिति भी मिलती है अर्थात् स के स्थान पर श का प्रयोग। व्याकरण सम्बन्धी किसी उपयुक्त कारण के अभाव मे ऐसी भयकर अशुद्धिया का कारण सभवत निखन वालो की अनभिज्ञता ही हो सकती है। (जैन) शाकटायन व्याकरण तथा उसका गणपाठ जैनेन्द्र व्याकरण के लगभग दो शताब्दी पश्चात् पाल्यकीति ने अपने व्याकरण की रचना की।' इस व्याकरण को 'शाकटायन-शब्दानुशासन' भी कहा जाता है । इसी पाल्यकीति ने अपने शब्दानुशासन पर ८१७-८७७ ईस्वी मे होने वाले राष्ट्रकूट के राजा अमोववर्ष के समय मे 'अमोघा' नामक वृत्ति की रचना की। शाकटायन व्याकरण के टीकाकार यतवर्मा ने अपनी चिन्ता मणि टीका क मगलाचरण वाले प्रारम्भिक श्लोको मे इस व्याकरण की विशपता बताते हुए यह घोषणा की है कि पाल्यकीति के इस व्याकरण मे १-द्र० स० व्याकरण शास्त्र का इतिहास भाग १, पृष्ट ४३५ । २-द्र० सिस्टम्स श्राफ सस्कृत प्रामर पृट ६५-६६ ।

पाणिनि से उतरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ ११५ पाणिनीय व्याकरण के ममान वातियो, इष्टिया तया उपसम्यानो की कोई आवश्यक्ता नहीं है।' इन्द्र, चन्द्र आदि शादियो ने शद का जो लक्षण वहा है वह सब इस गब्दानुशासन में विद्यमान है, तथा जो यहां नहीं है वह अन्यत्र कही नहीं है। वेवल लौकिक संस्कृत की गन्दावली को देखते हुए जैन शाक्टायन-व्याकरण को यह श्रेय दिया जा सकता है। इस व्याकरण मे इस प्रकार की विशेषता या होना स्वाभाविक भी था, क्योकि इस व्यारण के प्रवक्ता आचार्य पाल्यनीति के समक्ष पाणिनि कात्यायन, पतजलि, चन्द्र गोमी तथा पूज्यपाद (देवनन्दी) आदि अनेकानेक वैयाकरणो की उत्तरोतर परिवर्वित तथा परिशोधित विपुल व्यावरण-सामग्री विद्यमान थी। सम्भवत इस सम्पूर्ण सामग्री वा पूरा पूरा उपयोग इस व्याकरण म किया गया है। शाकटायन नाम का कारण-ए सो वर्नेल ने इस व्याररण के विषय में विचार करते हुए यह मत प्रक्ट किया है कि जैनेन्द्र-व्यानरण से भी अर्वाचीन होने के कारण इस व्याकरण का पाणिनि से प्राचीन वैयाकरण शाक्टायन द्वारा विरचित होना सर्वथा असम्भव एवं असगत है । परन्तु इस विचार के साथ साथ उनकी यह भी धारणा है कि भल ही इस व्याकरण की रचना प्राचीन आचार्य गाकटायन द्वारा साक्षात् न हई हो परन्त अप्रत्यक्ष रूप मे, किसी तरह इसका सम्बन्ध प्राचीन शाक्टायन के साथ अवश्य है अथात् आचार्य शाक्टायन विरचित या उससे सम्बद्ध किसी व्याकरण के आधार पर पाल्यकोति ने इस व्याकरण की रचना की है। अपनी इस धारणा की पुष्टि मे उन्होंने यह हेतु प्रस्तुत किया है कि पाणिनि अष्टाध्यायी मे आचार्य शाक्टायन का नाम लेकर जितने भी मत सकलित है वे सारे मत इस व्याकरण मे शाक्टायन का नाम लिये विना ही सूत्रो मे उल्लिखित है। १ इष्टिना न वक्ष्य वरच्य सूत्रत पृथक । । सख्यात नोपसख्यातं यस्य शगनुशासने । श्लोकसख्या ४ । २ इद्ध द्रादिभि शाब्दै यदुक्त शब्दलक्षणम् । तदिहारित समस्तं च यन्नहास्ति न तत् क्वचित् ॥ श्लोक्सख्या ६ । ३ द्र० सिस्टम्स श्राफ सस्कृत प्रामर ६६ तथा उसस भागे।

सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि पाणिनि पाल्यकीर्ति लङः शाकटायनस्यैव । अद्विषो मेर्जुस्वा । न्योलघुप्रयत्नतरः शाकटायनस्यैव। व्योऽध्याघोभोभगोः।' अच्यस्पष्टश्च । त्रिप्रभृतिषु शाकटायनस्य श्रचो होहचः।" श्रदीर्घात् । न संयोग। पाणिनि के सूत्रों के विपरीत पाल्यकीर्ति के शब्दानुशासन मे मिलने वाले उपर्युक्त सूत्रों मे शाकटायन का नाम न मिलने से इन सूत्रों के प्राचीन आचार्य शाकटायन द्वारा विरचित होने की सम्भावना की जा सकती है । इस रूप मे इन सूत्रों के आधार पर ही पाल्यकीर्ति के शब्दानुशासन के विषय मे वर्नेल ने कहा है कि 'प्राचीन ( शाकटायन के ) ग्रन्थ का जैन प्रभाव से युक्त सापेक्षतः आधुनिक संस्करण है। परन्तु बर्नेल की यह धारणा, पर्याप्त युक्तियों के अभाव मे बहुत प्रवल एवं साधार नही कही जा सकती । क्योकि इन सूत्रों की उपर्युक्त स्थिति सर्वथा इसी रूप मे-शाकटायन का नाम लिये विना ही-केवल सामान्य शब्दवैभिन्न्य के साथ चान्द्र व्याकरण तथा जैनेन्द्र व्याकरण मे भी प्राप्त होती है । साथ ही एक बात और विशेष ध्यान देने योग्य है कि यदि इन सूत्रों का सम्बन्ध प्राचीन शाकटायन से होता तो इन मे 'या' इत्यादि पदों के द्वारा अन्य मतों का प्रदर्शन नहीं होता। अतः केवल पूर्वनिर्दिष्ट आधार पर जैन शाकटायन व्याकरण को प्राचीन शाकटायन से सम्बद्ध नही माना जा सकता। १.पा.३।४।१११ ।। २. शा० १।४।१०६॥ ३. पा०८।३ । १८॥ ४.शा.१।१ । १५३ ।। ५.शा०१।१।१५४ ।। ६.पा०८।४।५०॥ ७.शा०११११७ ।। ८.शा०१।१।११८।। ६.शा.१।१।११६॥ १०. It is comparatively moder reduction of an old treatise effected under Jain influences. सिस्टम्स श्राफ संस्कृत प्रामर पृष्ठ ६६1

पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ
११७
शाकटायन-गणपाठ का एक विशेष स्थल-रूढादिगण -उक्न धारणा
से क्यमपि सहमत न होना चाहते हुए भी, इस प्रसग मे गणपाठ से सम्बद्ध,
इम व्यावरण का एक और स्थल उपस्थित किया जाता है। कात्यायन'
तथा पतञ्जलि' के प्रामाणिव वचनो के अनुसार पाणिनि के क्रोडयादि गण
का प्राचीन नाम रोढ-यादि गण था, परन्तु पाणिनि के गणपाठ मे 'गैदि
शब्द के इस गण के आदि में होने की संभावना तो दूर रही, यह शब्द ही
उस मे पठित नही है । पाणिनि तथा अन्य सभी वैयाकरणा के विपरीत
शाक्टायनव्याकरण के गणपाठ में क्रोडयादि गण का नाम रूढादिगण
मिलता है जो कि निश्चित ही रोढयादि' का भ्रष्टाप है।
इसलिय प्रो० वर्नेन की उपर्युक्त धारणा यदि किमी अन्य आधार पर
प्रामाणिकता की कोटि में आसके, तो यह कहा जा सकता है कि इस
'रूढादि' नाम को आचार्य पाल्यकोति ने पाणिनि के कोडयादिगण क
पूर्वरूप तथा प्राचीन आचार्य शाक्टायन निर्धारित गणपाठ में विद्यमान
'रौढयादि' नाम अनुकरण पर ही अपने गन्दानुशासन सम्बन्धी गणपाठ
मे अपनाया होगा। तब हमे इस बात का भी उत्तर मिल जाता है कि
पाल्यकीति द्वारा विरचित तथा जैनेन्द्रव्याकरण से भी अर्वाचीन शब्दानु
शासन क साथ पाणिनि तया यास्क से भी प्राचीन आचार्य शाकटायन का
नाम कैमे सयुक्त हो सका।
शाकटायनच्याकरण का गणपाठ-इस व्याकरण का
पाल्यकीर्ति की स्वोपज्ञ अमोघवृत्ति मे मिलता है तथा उसके अतिरिक्त इम
व्याकरण की लघुवृत्ति के अन्त मे भी प्रकाशित है। शाकटायनशब्दानु
शासन के समान ही इस के तथा इस के अनुगामी हैमव्याकरण के गणपाठ
को भी पाणिनीय गणपाठ का सुविस्तृत यत्र तत्र परिवर्तित तथा परिवर्तित
रूप कहा जा सकता है। इस गणपाठ मे चान्द्रव्याकरण की उपरिनिर्दिष्ट
पद्धति को अधिकाधिक अपनाने का प्रयास किया गया है।
गणपाठ
१ सिद्धन्तु रौढयादिषूपसख्यानात् के पुना रौढ्यादय १ ये गौड्यादय ।
कैया यौड्यादय इति पूर्वाचार्यसश्याएवममिहितमित्यर्थ । महा० प्रदीप ४१११७६।।
२ रूढादिभ्य । शा० १॥३॥ ४॥

. स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि नामपरिवर्तन-उक्त प्रयाम के अनुरूप पाणिनीय गणपाठ मे स्वीकृत अनेक गणो के नाम प्राय लाघव की दृष्टि से वदल दिये गये है। पाणिनि पाल्यकीर्ति श्राहिताग्न्यादि भार्योढादि लोहितादि निद्रादि पचादि लिहादि अश्वपत्यादि धनादि उक्थादि न्यायादि संकाशादि सुपथ्यादि पक्षादि पथ्यादि सन्धिवेलादि सन्ध्यादि ऋगयनादि शिक्षादि महिष्यादि नरादि. अनुप्रवचनादि उत्थापनादि" ब्राह्मणादि राजादि मनोज्ञादि चौरादि १ शा० २ । १ । ११५, है० ३ । १ । १५३ ।। २ शा०४।१।२७ है० ३ | ४।३०॥ ३ शा०४।३८५, है० ५ । । । ५०।। ४ शा०२।४।५ ५ शा०२ । ४ । १७४ है०६।२।११८ ॥ ६ शा० २ । ४ । २०२, है० ६ । २ । ८४ ॥ ७ शा०२।। २० ॥ ८ शा०३।१।१७६ है०६।३।८६|| है शा०३।१।१३६ है०६।३।१४८।। १० शा०४।२ । ४६ है०६ । ४ । ५१ ॥ ११ शा०३।२। १२१ है०६।४ । १२१ ॥ १२ शा०३1३।१० है. ७।१।६० ।। १३ शा०३ । ३।। २० है०७।१ । ७३ ॥ १२ पाणिनि से उतरवती वैयाकरण और उन के गणपाठ ५ ८ - पाणिनि पाल्यकीर्ति आकर्यादि अश्मादि' पामादि अगादि ঋছবি अभ्रादि गादि युगादि अगुल्यादि गोण्यादि स्थूलादि एवादि पारस्करादि अवस्कगदि" किंशुलझादि अञ्जनादि स्वागतादि स्याङ्गादि यादि ऊर्यादि. सुपामादि भीरष्टानादि" इन सभी स्थानो मे पाल्यकोति का अभिन्न अनुकरण हेमचन्द्र ने किया है। केवल एक स्थान पर भिनता है-पाणिनि के पक्षादि का पाल्यकोति ने पथ्यादि नाम रखा है, परन्तु हेमचन्द्र ने पन्थ्यादि रखा है । परित्यक्त गण-पाणिनि का तक्षशिलादि गण यहा नहीं मिलता। केवल इस गण के काण्ड, वरक, तथा ग्रामणी शब्द सिन्ध्यादि गण मे १ शा० ३।१।८७, है०६ । ३।६७ ॥ २ शा० ३ । ३ । १२६, है० ७ १२ १२६ ।। ३. शा० ३ ३ । १४१ है० ७।२। ४६ ॥ ४ शा०३।२।२१०, है० ७ १ १ ॥ ३० ॥ ५. शा० ३।३।४५, है०७।१।१२१ ॥ ६. शा० ३।३। १८० है०७।२१ ७६ ।। ७.शा०२।२।३६ है।३।२।४८ ॥ ८ शा०२३१६५ ६ शा० २।३.६० है. ७।४।। १० शा०१।२।१०१, है०२।१ । १६ ।। ११.शा०२।२।१५० है०२३ । ३३ ।। १२ हे०६।२८६ ।।

१२० स० व्या० मे गणपाठ की परमरा और आचार्य पाणिनि पठित मिनते हैं। इसी प्रकार तालादि गण का केवल श्यामाक शब्द रजतादि गण मे मिलता है। तालादि गण यहा अनुपलब्ध है। हरीतस्यादि गण भी यहा नही दिखाई दता। पाणिनि के उन गणो को भी जिनमे दो चार ही शब्द पठित थे को पाल्यकीर्ति ने गणपाठ मे स्थान नही दिया क्योकि इस प्रकरण के शब्दो का उमने तत्सम्बद्ध सूत्रो मे ही प्रतिपद पाठ कर दिया गया है । यथा-क्रमादि' अथवा कोटरादि गण । यहा भी हेमचन्द्र ने पाल्यकीति का ही अनुगमन क्यिा है। कात्यायन-सम्मत गणों को अपनाना--पाल्यकीति तथा हेमचन्द्र दोनो ने ही कात्यायन की वार्तिको मे उल्लिखित गणो को अपने अपने व्याकरण के स्वतन्त्र सूत्रो से सम्बद्ध करके अपने अपने गणपाठ मे स्थान दिया है । उदाहरण के रूप मे- १ पारदारादिगण। ५ शकादि गण। २-सुस्तातादिगण। ५-गड्मादिगण । ३-माशब्दादिगण ।' ७-परिमुखादिगण ।" ४-गिरिनद्यादिगण इत्यादि गणो को देखा जा सकता है। १ द्र०-शा० अ० ३। १ । २०१ है. वृ० ६ । २ । २१६ ॥ २ द्र०-शा० अ० २ । ४ । ६१ है० वृ० ६ । २ । ४५ ॥ ३ द्र०-शा० अ० २।४ । १८० है० ० ४ । २ । १२७ ।। ४ द्र० शा० अ० २ । २ । १६० है• वृ० ३ । २ । ७६ ॥ ५ शा०३।२। ३७ है०६।४ । ३८॥ ६ शा०३।२। ४४ है०६।४। ४२ ।। ७ शा०३।२।४६ है०६ । ४ । ४४॥ ८ शा०२।२ । १६३ है० २।३।६८॥ ९ शा०२।४ । १०४ है०६।१।१२०॥ १० शा०२।१४ है०३।१।१५६ ।। ११ शा०३।१।१२४ है.६।३।१३६ ।।

पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ १२१ नए गण-गणिनि के बडे बडे सूत्रो को भी गणशैली द्वारा छोटा करने की दृष्टि से, स्त्री तथा नत्सम्बद्ध वार्तिको मे निर्दिष्ट शब्दो के लिए विभिन गणो का निर्धारण गरना चाहते हुए पाल्यकीति तथा हेमचन्द्र दोनो ने अनेक नए गणो की कल्पना अपने अपने गणपाठो मे की है। यथा- पाणिनि के पञ्चमी भयेन' तथा अपेतापोढमुक्तपतितापत्रस्तैग्ल्पश' इन सूत्रो मे आये शब्दो को अन्तर्भावित करते हुए भयादि गण का निर्धारण किया गया है । समानस्य च्छन्दम्यमूर्द्धप्रभृत्युदर्केपु इससून के समानस्य पद का 'योगविभाग' करके मिद्ध किए जाने वाले सपक्ष सधर्म जैसे शब्दो तथा ज्योतिर्जनपद०५ सूत्र के शब्दो के लिए धर्मादिगण की कल्पना की है। इसी प्रकार देवमनुष्यपुरुषपुर. इस पाणिनीय सूत्र के लिये देवादिगण की व्यवस्था तथा द्वितीया श्रितातीतपतितगतात्यम्त- प्राप्तापन्नै सूत्र की दृष्टि से श्रितादि" गण की कल्पना द्रष्टव्य है । सन्देह निवारण का प्रयास-पाल्यकीर्ति तथा हेमचन्द्र दोनो ने ही पाणिनि के गणपाठ मे मिलने वाले कुमुदादि नाम के दो गणो मे स पहले का कुमुदादि" तथा दूसरे का अश्वत्थादि नाम रखा है । पाणिनि के व्रीहयादिभ्यश्च सूत्र से सम्बद्ध कात्यायन की वानिक शिखादिभ्य इनिर्वाच्य इकन यरसदादिपु के आधार पर चन्द्रगोमी ने १ पा०२।१1३७॥ २ पा०२।।८।। ३ शा०२।१। ३३, है० ३ । १ । ७३ ॥ ४ पा०६।३।८४॥ ५ पा०६।३1८५॥ ६ शा०२।२।१०६, ह०३।२।१४६ ।। ७ पा०५४।५६ ॥ ८ शा०३।४।६३ है० ३।२।१४६ ॥ ६ पा००११।२४॥ १० शा०२।१।३३ है०३।१ । ६२ ।। ११ शा० २।४ । २०२, है०६।२।६६ ॥ १० शा० २। ४ । २०२ है०६।२।६७ ॥ १३ महा०५।२१११६॥ १८ १२२ सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि पाणिनि के नीहयादिगण के तीन विभाग-बीयादि शिखादि तथा नावादि' किए थे इसका निर्देश पर किया जा चुका है । पाल्यकीर्ति तथा हेमचन्द्र दोना ने इन तीन विभागो को अपनाते हुए यहा के शिखादि गण मे ही पाणिनि के वलादि गण का भी समावेश कर दिया है । ये दोनो ही आचार्य इम शिखादिगण को आकृतिगण मानते हे । कई गणों का एकीकरण-चन्द्रगोमी द्वारा प्रर्दाशत पाणिनि के कई गणा के एकीकरण की पद्धति को भी इन दोनो मे अधिकाधिक अपनाया है। भिक्षादि गण तथा खण्डिकादि गण का,५ कथादि और गुडादि का ब्राह्मणादि और पुरोहितादि का तथा संकाशादि और प्रगदिन्नादि का एकीकरण द्रष्टव्य है । पाणिनि के अनेक गणो के एवविध एकीकरण मे इन अर्वाचीन वैयाकरणो की स्वरशास्त्रनिरपेतिता पयाप्त प्रेरक रही, जव कि पाणिनि के व्याकरण मे स्वरप्रक्रिया को महत्वपूर्ण स्थान देने के कारण उन्हे पृथक् पृथक् स्वर की दृष्टि से पृथक् पृथक् प्रत्यय करने के लिए पृथक् पृथक् गण पढने पडे । चन्द्रगोमी तथा शाकटायन और हेमचन्द्र चन्द्रगोमी के मृत्वादि तथा वेणुकादि गणो को पाल्यकीर्ति तथा हेमचन्द्र दोना ने उसी रूप मे स्वीकार कर लिया है । परन्तु चन्द्रगोमी द्वारा निर्धारित कुछ गणो के नामो मे इन दोनो ने परिवर्तन कर दिया है । १ शा०३।३।१५. है०७।२।५॥ २ शा०३।३।१५१ है. ७१४॥ शा० ।।१५. ४ शा००।३।१५१ है० वृ०७१२॥ ४ ॥ ५ शा० अ० २।४ । १२८, है. वृ०६।११०॥ ६ द्र० शा० अ०२।२।२०२ है. वृ०७१।२१ । ७ 5. शा. श्र० ३।३।१०; है• १०७।१।६।। ८ द्र० शा० अ० २ ॥ ४ । २०२ है० ० ६ १२ १८४॥ ९ शा०३।२।१४, है. व०६।४।१२५॥ १. शा०३।११५६ है०६।३। ६६ ।।

पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाट १२३ यथा -हिमादि का नाम गुणादि' और कलाप्यादिना मौदादि ।' कई गणसूत्रों का एकीकरण-पाल्यकीति तथा हेमचन्द्र दोनो ने ही कही कही पाणिनि के गणपाठ में पाए जाने वाले कई गणसूत्रो को, यदि वे एक ही गण मे पठिन हैं तो उन्ह, एक बडे स्वतन सूत्र का रूप देदिया है। उदाहरण के लिये स्थूलादि तथा प्रज्ञादि गण के अनेक गणमूनो के लिये इन दोनो वैयाकरणो द्वारा परिवर्तित बडे बडे सूत्र देखे जासकते है । पाणिनि के पठितगण आकृतिगण के रूप में-पाणिनि के गणपाठ मे पठिनगण के रूप में मिलने वाले गोण्डादि तथा कडारादि गणो को पाल्यकीति तथा हेमचन्द्र दोनो ने ही आकृति गण के रूप में माना है। पाणिनि ने जिन गणो को आकृतिगण माना था, उनमे गे अनेक गणो मे इन दोनो ने शब्दो को पर्याप्त परिवृद्धि की है । स्वर तथा वैदिक प्रक्रिया से संबद्ध गणों का अभार-अपने से पूर्वभावी जैनेन्द्र के समान पाल्यकीति तथा हेमचन्द्र ने भी स्वर तथा वेद विषयक प्रकरणो से अपने व्याकरण को अदूता रखने के कारण तत्सम्बद्ध गणो को भी अपने गणपाठ मे स्वभावत ही नहीं स्थान दिया है । / हेमचन्द्र तथा उसका गणपाठ फालक्रम को दृष्टि से हेमचन्द्र का स्थान श्रीभोज के अनन्तर है, परन्तु पाल्यकोति विरचित शाकटायन-शब्दानुशासन के अधिकाधिक अनुयायी और समीप होने के कारण इस अध्ययन मे पाल्यकोति के पश्चात हेमचन्द्र को स्थान देना अनुचित नही कहा जायगा। जैन मतानुयायी हेमचन्द्र सूरि रचित या निर्धारित व्याकरण का पूरा नाम सिद्धहेमचन्द्राभिधस्योपज्ञ शब्दानुशासन हे । हेमचन्द्र का जन्मकाल १ शा०३।३।१५८ है. ७।२।३॥ २ शा०३।१।७० ह०६।३। १८२॥ ३.द्र० शा०३।३ । १८१ इ०७३,३७॥ ४. द्र० शा०३ । ४ । १३३ है।७।२।१६६ ॥ ५. द्र० शा० ०२।१।५० है० व०३।१।१८॥ ६ द्र० शा २०।१।१७, है। व०३।१ । १५८ ।।

१२४ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि १०८८ अथवा १०८९ तथा मृत्युकाल ११४३ ईस्वी माना जाता है। चन्द्रगोमी तथा पाल्यकीति के समान हेमचन्द्र ने भी अपने शब्दानुशासन पर स्त्रोपज वृत्ति लिखी है । वह दो प्रकार की है। एक लधुवृत्ति और दूसरी बृहवृत्ति । इस बृहद्वृत्ति मे ही इस व्याकरण का गणपाठ उपलब्ध होता है । हेमचन्द्र ने अपने व्याकरण मे पाल्यकीति क शब्दानुशासन तथा उसकी अमोघवृत्ति का कितना अधिक अनुकरण किया है इसका परिज्ञान प्रो० वेल्वा के इम कथन स किया जा सकता है-- विशपत शाकटायन के शब्दानुशासन तथा अमोघवृत्ति के सम्बन्ध म उसका (हेमचन्द्र का) आश्रित होना इतना निकट का है कि वह सर्वथा अन्धानुकरण की स्थिति तक जा पहुचता है।' इस प्रसंग में एक और विद्वान का यह वक्तव्य भी ध्यान देने योग्य है-- वस्तुत उन परिस्थितियो को छोडकर जिनके कारण हेमचन्द्र ने कात त्र के अनक पारिभाषिक शब्दो का स्वीकार किया उसका (हेमचन्द्र का ) व्याकरण शाक्टायन शब्दानुशासन के सशोधित तथा सभवत बहुत कुछ परिवर्धित सस्करण के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इस प्रकार के अनुकरण स उत्पन हाने वाली हैमव्याकरण के गणपाठ की पाल्यकीर्ति के व्याकरण के गणपाठ से एकात्मकता का पयाप्त निदर्शन हो जाता है। इतना होन पर भी हैम गण गाठ मे अपनी कुछ विशेषताये है । उन्ह हम यहा उपस्थित करते हैं। नए गण-अपन प्राचीन वैयाकरणा की पद्धति को आगे बढाते हए हेमचन्द्र न भी कुछ नए गणा की उद्भावना की है। यथा-पाणिनि व सायचिरप्राह' सूत्र का दृष्टि में रख कर सायावादि चतुर्थी १ द्र० सिएम्स श्राफ सस्कृत ग्रामर 3७३ | २ Lspecially in regard to शाकायनशब्दानुशासन and the अमोघवृत्ति his dependence is so close as to sin ount to nimoot sasudh instation सिटम्स ग्राफ सस्कृत ग्रामर पृ०७६ । ३ पा०४।३।२३।। ४ है० ३ | १ | ५३ ॥

पाणिनि के उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ १२५ तदर्थार्थ' सूत्र के लिये पाल्यकीति निर्धारित अर्थादि गण के स्थान पर उसका नाम बदल कर हितादि तथा 'अतन्तावसथ" सूत्र के लिये भेषजादि गण का निर्धारण द्रष्टव्य है। एक गण के दो गण-पाणिनि के पुष्करादि तथा अजादि इन दो गों मे तथा इसी प्रकार कस्कादिगण को भ्रातुष्पुत्रादि तथा कस्कादि' इन दो गणों मे विभाजन करना भी हेमचन्द्र की अपनी सूझ है । गणपाठ में अन्य मत प्रदर्शन हेमचन्द्र ने सूत्रपाठ के समान गणपाठ मे भी अपने से प्राचीन वैयाकरणों के मतो को अपरः, परः, इति कश्चित्, तथा एके जैसे शब्दो से उपस्थित किया है। पाठान्तरों का संकलन-अपने से प्राचीन आचार्यों के गणपाठो मे मिलने वाले एक ही शब्द के विभिन्न पाठभेदो को, प्राय सर्वत्र पृथक् स्वतन्त्र शब्द के रूप मे हेमचन्द्र ने अपने गणपाठ मे स्थान दिया है । यह प्रवृत्ति जैनेन्द्र, शाकटायन तथा भोज द्वारा निर्धारित गणमाठों मे भी पायी जाती है। इस प्रक्रिया के कारण इनके गणपाठ का कलेवर वक्त कुछ वडा हो गया है। इस स्थिति के उदाहरण के रूप मे कुछ स्थल उपस्थित किये जा रहे हैं। कुर्वादि गण मे वामन स्वीकृत पाठ मति है तथा पाल्यकति का पाठ मतिमत है । परन्तु हैम गणपाठ मे ये दोनो शब्द मिलते हैं । पक्षादिगण मे काशिका सम्मत पाठ चित्र है । जैनेन्द्र व्याकरण के गणपाठ मे चित्रा है। पाल्यकीर्ति के गणपाठ मे पाकचित्र पाठ है, परन्तु हेमचन्द्र ने अपने गणपाठ मे 'चित्रा' तथा 'पाकचित्र' दोनों ही शब्दो को सग्रहात्मक ढग से स्थान दिया है। इसी तरह मध्वादि गण मे काशिका का पाठ तक्षशिला है, तथा पाल्यकीर्ति का अक्षशिला पाठ है । परन्तु हेमचन्द्र के गणपाठ मे तक्षशिला, अक्षशिला तथा अक्षशिली ये तीन शब्द पठित मिलते है । संगृहीत विगृहीत पाठ-इसके अतिरिक्त हैम गणपाठ मे एक शब्द के संगृहीत (=समुदायरूप ) तथा दो तीन खण्डो मे विगृहीत ( =विभक्त) २.शा०२।१।३६ ।। ४. पा० ५।४।२३॥ १.पा०२।१।३६ ॥ ३. हे०३।१।७१ ॥ ५.हे. ७।२।१६४।।

पाणिनि के उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपठ १२७ नवीन गणों का निर्देश-भोज के गणपाठ विषयक पाठभेदो को तो वर्धमान अपनी गणरत्नमहोदधि मे अन्य वैयाकरणो के साथ साथ अत्यधिक सम्मानपूर्वक उपस्थित करता ही है, साथ ही है भोज द्वारा निर्धारित नवीन गणो-किंशुकादि, वृन्दारकादि, मतल्लिकादि तथा ससूच्यादि की व्याख्या करते हुए उनकी ओर हमारा ध्यान भी आकृष्ट करता है ।' सम्भवतः भोज के द्वारा आविष्कृत नये जयादिगण का अनुकरण हेमचन्द्र ने अपने गणपाठ मे किया है, जिसका प्रदर्शन क्षीरस्वामी ने अपने अमर कोशोद्घाटन' टीका मे अनेकधा किया है। वार्तिक गणों का पाठ-चन्द्रगोमी के अनुकरण पर भोज ने पाणिनि के गणपाठ को पर्याप्त परिवर्तित तथा परिवर्धित रूप मे स्वीकार किया है। कात्यायन द्वारा वार्तिको मे निर्दिष्ट गणो का पाठ भी भोज के सूत्रो मे मिल जाता है। गणों के नामान्तर–चन्द्रगोमी प्रदत्त बह्वादि का शोणादि तथा अपू. पादि का यूपादि नाम देखते हुए भोज ने भी क्रमश शोण तथा यूप को तत्सम्बद्ध सूत्रों मे प्रथम स्थान दिया है । स्वतन्त्र मार्ग का अनुसरण कही कही भोज ने चन्द्रगोमी के मार्ग को छोड कर किसी नये मार्ग का भी आविष्करण किया है। यथा -बीयादि- गण के, कात्यायन के अनुकरण पर, चन्द्रगोमी द्वारा प्रदर्शित निवा विभाग को भोज ने नही अपनाया उसने ब्रीयादिगण मे पठित शिखा आदि शब्दो को पुष्करादि गण मे तथा कर्म और चर्म शब्द को बलादि गण मे पढ कर सक्षेप का अपना एक अलग मार्ग प्रदर्शित किया है। पाठान्तरों का स्वीकरण-कहीं कही प्राचीन विभिन्न आचार्यों द्वारा स्वीकृत एक शब्द के विभिन्न पाठभेदो को पृथक् पृथक् स्वतन्त्र शब्दो के रूप मे स्वीकार कर लेने की प्रवृत्ति भोज मे भी पायी जाती है। जैसे कुर्धादि ५ द्र० गणरत्नमहोदधि, पृष्ठ ८३-८६ । २. मो० ७ । ३ । ६२ ॥ ३ है.२।३ । १०५॥ ४. अम० पृष्ठ०७७ ८७, १२७॥ ५. द्र० भो०३ । ४ । ७५, ४ । ४ । १८८ ।। ६ द्र० भो० ५। २।१६०-१६२।। ७ द्र० भो०५।२।१६३-१६४॥

स० व्याकरण मे गणपाठ की परम्परा आर उन गणपाठ गण मे काशिका-स्वीकृत पाठ मुर है। चान्द्र व्याकरण मे इसके स्थान में पुर पाया जाता है । परन्तु भोज के इस गण' मे मुर तथा पुर दोनो ही गब्द पाये जाते हैं। आकृतिगणों में श दवृद्धि-भोज के गणपाठ मे भी अन्य अर्वाचीन वैयाकरणो क समान आकृतिगणो मे शब्दा की पर्याप्त परिवद्धि पाई जाती है। उदाहरण के लिये स्वरादि चादि मयूरव्यसकादि जैसे गणमम्बन्धी सूना को देखा जा सकता है गणसूत्रो का स्वतन्त्र सूत्रीकरण-पाणिनीय गणपाठ मे मिलने वाले गणमूना को स्वतन्त्र सूनो के रूप मे प्रतिप्रित करने की प्रवृत्ति भोज के व्याकरण मे भी पाई जाती है । वैयाकरण वामन तथा उसका गणपाठ आचार्य वामन ने जिस व्याकरण की रचना की थी, उसका नाम विथा न्तविद्याधर था। इस आचार्य वामन का उल्लेख हमचन्द्र' तथा वर्धमान ने अपने अपने ग्रन्था में किया है । इस विश्रान्तविद्यावर' व्याकरण की एक व्याख्या मल्लवादी ने की थी जिसका नाम न्यास' या । यह व्याकरण सम्प्रति अनुपलव्य है परन्तु इस व्याकरण के गणपाठ की उपादेयता का निश्चय वर्षमान द्वारा अनेक स्थलो पर समम्मान उद्धृत किये गये वामन के गणपाठ के विभिन्न पाठभेदो तथा मतो से हो जाता है । वामन द्वारा निवा रित नये येदारादि गण के शब्दो का उपसंख्य'न तथा व्याख्या करते हुए क्दारादो यामनाचार्यदृष्टे इस प्रकार के प्रतिष्ठासूचक वाक्य से वर्धमान ने उस गण की समाप्ति की है। इसस आचार्य वामन के वैशिष्ट्य का भले प्रकार परिचय मिलता है। १ द्र० मो० ४।४।१४४-१५३॥ २ भो० ॥१।१७६-१७८।। ३ भा..।।१८-१२६ ।। ४ मा०३।२।१०६-१२१ ।। ५ द्र..-सम्मृत व्याकरणशास्त्र का इतिहास भाग १, पृष्ठ ४३७ । ६ १०-- वामना विश्रातविद्याधरव्याकरणक्त्ता । गणरत्नमहो-घि पृष्ठ २ । ७ द्र०-शम्शाने प विद्यान्तयिाधरवराभिधे। न्यासचक्रऽल्पधीचन्दाधनाय पुगर्थकम् ॥ संस्कृत व्याकरण शस्त्र का इतिहास भाग', पृ० ४३१ । ८ ग्गरनमहोदधि पृष्ठ १६५, श्लोक २५८ ।

पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ १२९ इसी प्रकार पाणिनि के शरिडकादि गण के प्रथम शब्द के स्वरूप के विषय मे वर्वमान के शुण्डिका ग्रामः अभिजनोऽस्य शौरिडक्यः । अयं वामनमताभिप्रायः । पाणिन्यादयस्तु शण्डिकस्य ग्रामजनपदवाचिनः शा- खिडक्य इत्युदाहरन्ति कथन' से पाणिनि तथा वामन के दो परसर विरोधी विचारो का भी पता लगता है। इससे अधिक वामन के गणपाठ के विषय हमे कुछ भी परिचय नही है। भद्रेश्वर तथा उसका गणपाठ वर्षमान के प्रवरदीपककर्तृयुक्ता श्लोक की उमी के द्वारा की गयी दीपककर्ता भद्रेश्वरसूरिः । प्रवरश्चासी दीपककर्ता च प्रवरदीपक- कर्ता । प्राधान्यं चास्याधुनिकवैयाकरणापेक्षया व्याख्या से जहा हमे यह पता लगता है कि भद्रेश्वर सूरि ने 'दीपक' नामक किसी व्याकरण की रचना की थी, वहाँ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि यह भद्रेश्वर सूरि वर्वमान की दृष्टि मे आधुनिक होता हुआ भी तत्कालीन वैयाकरणो में अत्यधिक प्रतिष्ठित था। अत एव उसके लिये 'प्रवर' विशेषण लगाना वर्धमान को आवश्यक जान पडा । माधवीय धातुवृत्ति मे 'श्रीभद्र' के नाम से उद्भवृत व्याकरण-विषयक अनेक मतो के श्रीभद्रेश्वर सूरि के व्याकरण से सम्बद्ध होने की सम्भावना श्री प० युधिष्ठिरजी मीमासक ने उपस्थित की है। इसे भद्रेश्वर सूरि के गणपाठ के विषय मे इतना ही पता लगा सका है कि इस गणपाठ मे पाणिनि के प्रियादि गण का नाम लाघव की दृष्टि से स्वादि गण रखा गया था, तथा गण के प्रारम्भ मे प्रिया शब्द के स्थान पर स्था गब्द को स्थान दिया गया था। इसकी सूचना हमे वर्षमान की गणरत्न- महोदधि तथा पाणिनीय गणपाठ के हस्तलेख न० ३ मे मिलने वाले प्रियादि गण विषयक उल्लेख- भद्रेश्वराचार्यस्तु- किंच स्ना दुर्भगा कान्ता रक्षान्तनिचितासमाः। सचिवा चपला भक्तिर्याल्येति स्वादयो दश । १ गणरत्नमहोदधि पृष्ठ २०४ । • गणग्नमहोदधि पृष्ठ २ । ३ गणरत्नमहोदधि, पृट २। ८ सस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहाम भाग १ पृष्ठ ४४८ । ५. गणरत्नमहोदधि, ६८!

१३० स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि स मिलती है । पाणिनि के प्रियादि' नाम के स्थान पर मिलने वाला यह स्वादि नाम सम्भवत भद्रेश्वराचार्य द्वारा ही निर्धारित किया गया होगा क्योति सम्प्रति उपलब्ध किसी भी वैयाकरण के गणपाठ मे प्रियादि गरण का यह नाम हमे कही उपलब्ध नहीं हुआ। इममे अधिक इस वैयाकरण के व्याकरण तथा तत्सम्बद्ध गणपाठ के विषय मे अव तक हम कुछ नही जान सके । अरुणदत्त का गणपाठ अरुणदत्त क अभिप्रायानुसार वर्धमान ने अपने अर्धचादि गण मे शब्दो की एक विस्तृत सूची उपस्थित की है।' अत यह सभावना की जासकती है कि अरुणदत ने भी किसी गणपाठ का निर्धारण किया था। यह गणपाठ सम्प्रति अनुपलब्ध है । अष्टागहृदय' का व्यारयाता सम्भवत यही अरुणदत्त है। वर्धमान तथा उसकी गणरत्नमहोदधि ११४० ईस्वी मे विसी अज्ञात व्याकरण से सम्बन्ध रखन वाले गणपाठ क गन्दा का छन्दोबद्ध संकलन एवं उसकी विस्तृत व्याख्या के रुप मे वर्ध मान ने अपने महान एवं अनुपम गणरतमहोदधि नामक ग्रन्थ की रचना की। वर्षमान ने इस ग्रय के मूल श्लोको तथा विशेष कर व्याख्या में अपने से प्राचीन सभी वैयाकरणा वे उन उन शब्द विषयक विभिन्न सभी पाठदा तया मता को यथावसर प्रस्तुत किया है । इनमे- -वृद्ध वैयाकरण ६-अभयनन्दी २-द्रमि(वि) चैयाकरण ७-शकटाइज (पाल्यकीर्ति) ३-पाणिनि -वामन ए-चन्द्रगोमी १-श्रीभोज ५-पारायणिक विद्वान् 10-हेमचन्द्र १ अरुणदत्त भिमा शैत दशिता । गणर नमहोदधि, पृष्ठ ६४ श्लान ७७ को ध्याग्न्या अन्त में। २ सप्तनायधिवकारामु शतप्यतीते। पा विक्रमी गगरामहोदधिरहित ॥ गणरनमहादघि पृ २५१ ।

पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ १३१ १९-रत्नमति १३-भद्रेश्वर २-अरुणदत्त - इन वैयाकरणो के नामोल्लेख पूर्वक सष्ट निर्देश विशेष महत्त्व के है । इनके अतिरिक्त वहुत से अन्य वैयाकरणो को एके, कश्चित् आदि सर्वनामो से स्मरण किया गया है। इसकी टीका मे वर्धमान ने स्वसवद्ध व्याकरण के अनुमार उन उन गणसम्बन्धी सूत्रो का निर्देश, शब्दो के विस्तृत अर्थ, उनके लिये विभिन ग्रन्थो के तथा कही स्वरचित प्रयोग, विशिष्ट शब्दो के तत्तद् गणो म पढे जाने के प्रयोजन पर विचार तथा गणसूत्रो की व्याख्या आदि आदि प्रसग अत्यन्त विद्वत्ता के साथ उपस्थित किये है । वास्तविकता तो यह है कि सस्कृत व्याकरण के क्षेत्र मे गणपाठ के साथ की गयी अत्यधिक उपेक्षा का सर्वथा सन्तोषप्रद उत्तर अपने इस अनुपम ग्रन्थ द्वारा वर्धमान ने दिया है। कात्यायन द्वारा निर्धारित गणों का स्वीकरण-पाणिनीय गणपाठ मे पठित गणो के साथ साथ कात्यायन की वातिवो मे सतिविष्ट निम्न गणो को वर्धमान ने सर्वथा अभिन्न रूप मे अपनाया है । यह दूसरी बात है कि वर्धमान ने इन गणो की शब्दसम्पत्ति मे यथेष्ट परिवृद्धि की है । वे गण ये है- १-अहरादि पत्यादि' ७-अध्यात्मादि २-कुक्कुटाण्डादि -देवासुरादि ३-गिरिनद्यादि १-स्वर्गादि ४-श्राद्यादि १०-सुस्नातादि" ५-कम्बोजादि ११-पारदारादिगण" ६-खलादि १२-प्रभूतादिगण १२ , गणरत्नमहोदधि पृष्ठ २६ । ३ वही पृ४१०६। ५ वही, पृ४१३५ ७ वही पृ १८६, १८७ । ६ वही, पृष्ठ २०६। ११ वही, पृष्ठ २१२॥ २ वही, पृष्ठ ६७,६८। ४ वही, पृष्ठ १२२, १२३ । ६ वही, पृष्ठ १६६ । ८ वही पृठ २०३। १० वही, पृ०११, २१२ । १२ रही, पृट २१२।

स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचाय पाणिनि १३-सम्पादादि १४-मूल विभुजादि कात्यायन के कुछ गणों का नाम परिवर्तन कात्यायन द्वारा निर्वा- रित एव अपने वातिको मे सनिवेशित, कुछ गणो के नामो को वर्षमान ने बदला भी है । यथा-क्षिपकादि के स्थान पर यढादिगण तथा पुण्याह- याचनादि के स्थान पर स्वस्तिवाचनादि । कात्यायन की वार्तिकों की दृष्टि से नय गणो का निर्धारण -- इसके अतिरिक्त कात्यायन की कुछ वार्तिको की दृष्टि गे नये गणो का भी निर्धारण वर्षमान ने किया है। यथा-पाहतप्रकरणे वारिजगल०५ तथा अजप थशकु०" इन दो बातिको की दृष्टि से नये अजादि गण का निर्धारण | पाणिनि के दीर्घकाय सूत्रो की दृष्टि से नये गणो की कल्पना- पाणिनि के कुछ दीर्घकाय सूत्रो की दृष्टि से भी कुछ नये गणो की कल्पना वर्धमान की गणरत्नमहोदधि मे साकार हुई है । यथा--जानपदकुण्डगोण०" इम बढे सूत्र के लिये कुण्डादि पात्रादि का निर्धारण, ज्योतिर्जनपद० के लिये शारटायन निर्धारित धर्मादिगण के स्थान पर पक्षादि गण तथा इसी प्रभार पाणिनि के असदीयदप्ठीवत्" तथा उदन्यानुदधीच वे स्थान पर उदन्वादिगण की कल्पना द्रएव्य है। चन्द्रगोभी निर्धारित गणों का म्बीकरण-आचार्य चन्द्रगोमी के गरणपाठ या भी वर्धमान ने पर्याप्त अनुकरण किया है। चान्द्र गणपाठ के द्वारा निर्धारित जिन गणो वो वर्धमान ने अभिन्न रूप में अपना लिया है, वे निम्न प्रकार है.- ९ , गएरलमहोदधि, पृष्ठ २४६, २४८ । २ वही पृट २५ । ३ रही, ५। ४ घडी, पृट २०६२१०। पू महा०५ 11 ६ गणरममहोदधि, १४ २०७। ७ पा०४।।४२ ।। ८ गगममहोदधि पूर ४६, ५.। ६ पा०६।३।५॥ १० गम्परत्नमहोदधि १०६ । ११.दा.८.२१॥३॥ १२ पा०८।२.३" १३ गणरनमाधि, पृट २३ ।

पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ १ १-नभ्राडादि गण।' ५-ज्योत्स्नादि गण ।" २-रूपादि गण । ६-कृप्यादि गण। ३-ऋत्यादि गण। ७-ऊपादि गण । ४-चूडादिगण । चन्द्रगोमी के कुछ गणों का नाम परिवर्तन-परन्तु इसके साथ ही चन्द्रगोमी के कल्पादि को ब्रह्मादि नाम देकर, तथा केशादि को, सभवत हेमचन्द्र के अनुकरण पर मण्यादि नाम देकर वर्षमान ने अपनी गणरत्र महोदधि मे प्रतिम्ति किया है। शाकटायन तथा हेमचन्द्र के गणों का स्त्रीकरण- इसी प्रकार शाक टायन तथा हेमचन्द्र द्वारा निर्धारित भेषजादि" गण को अनन्तादिगण के रूप मे तथा सशयादि और निकटादि गणो को अभिन रूप मे ही वर्धमान ने अपना लिया है। वामन तथा भोज के गणों का स्वीकरण-उक्त वैयाकरणो के उपरिनिर्दिष्ट गणो के साथ वामन के केदारादि श्रीभोज के किंशुकादि,१६ वृन्दारकादि, मतल्लिकादि तथा खसूच्यादि गणो" को भी वर्धमान ने अपनी गणरत्रमहोदधि मे प्रतिमित किया है । अष्टाङ्गगहृदय के व्याख्याता अरुणदत्त के अभिप्रायानुमार भी वर्धमान ने अर्थ दिगण मे शब्दो की एक १ श्रय गणश्चन्द्रदुर्गाद्यभिप्रारण । गणरत्नमहोदधि पृष्ठ १०५, १०६ । २ चन्द्रादिमन तु म्यादौ । वही पृष्ठ १०७ । ३ वही, पृष्ठ २०७, २०८ । ४ वही, पृष्ट २०६। ५ वही, पृष्ठ २२१, २२२ । ६ वही, पृष्ठ २३७, २३८ । ७ वही पृष्ठ २३८, २२६ । ८. वही, पृष्ठ १११। ६० है०७।२।४४ ।। १. गणरत्नमहोदधि पृष्ठ २३५ २३६ । ११ द्र. शा३ । ४ । १२७ है०७।२। १६४ । १२ गणरत्नमहोदधि, पृष्ठ १२० १२१ । १३ वही, पृष्ठ २०७। १४ वही, पृष्ठ २१४, २१५ । १५ वही, पृठ १६५ । १६ वही, पृष्ठ ८३ । १७ वही, पृ८५ १८ वही, पृष्ठ ८५,८६ । २६. यही पृ४८६॥

१३४ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि का का अच्छी विस्तृत सूची दी है।' कस्कादि गण मे सर्पिष्कुण्डिका आदि शब्दो को; पारायणिक विद्वानो के मतानुसार उपस्थित करके भी वर्धमान ने उनसे अपनी असहमति दिखाई है। "पाणिनि के अनेक गणों का नाम परिवर्तन-अपने से पूर्वाचार्य चन्द्र- गोमी आदि की पद्धति का अनुकरण करते हुए वर्धमान ने भी पाणिनिस्वी- कृत, अनेक गणो के नामो को परिवर्तित कर दिया है। जिनमे ये द्रष्टव्य हैं- पाणिनि वर्धमान बबादि शोणादि' अश्वपत्यादि धनादि सन्धिवेलादि सन्ध्यादि इन्द्रजननादि शिशुमान्दादि अनुप्रवचनादि उत्थापनादि देवपथादि अर्चादि किंशुल कादि अंजनादि पाणिनि के अनेक गणों का एक गण में समावेश-इसी प्रकार पाणिनि के अनेक गणो का एक गण मे समावेश करने की प्रक्रिया भी वर्धमान की गणरत्नमहोदपि मे पर्याप्त रूप मे पाई जाती है । यया-- -सिम्यादि मे तक्षशिलादि काममावेश, तालादि" मे पलाशादि, बिल्वादि तथा रजतादि का, कथादि मे गुडादि का, ब्राह्मणादि" मे पुरोहितादि का, युगादि" का का . का का का १.गणरममहोदधि ४५३-६४ । अक्षणदतामिप्रापणेते दर्शिता । पृट ६४ । २ यही, पृष्ठ ४७-४८। ३ वही, पृष्ठ २४, २६ । ४ वही, पृष्ट १६१, १६२ । ५ वही, पृष्ट १६६, १६७। ६ यही, २०३३ ७ वही, पृ. २०६1 ८.यही, पृष्ठ १२७, १२८। ६. वही, पृ४ ६८,६६. १०. दही, २०३, २०४। १.६० घड़ी, १६६-१६८ । १६८1 १३.द्र यही पृष्ठ २२१-२२५ ॥ .२२६-२२८॥ + पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण उन के गणपाठ १३५ त्स० मे उद्गात्रादि का, (जैनेन्द्र' के विपरीत ) पिच्छादि मे तुन्दादि का तथा यलादि गण मे धीहयादि गण तथा उसमे कात्यायन द्वारा प्रदर्शित शि खादि आदि अवान्तरगण का समावेश द्रष्टव्य है। पाणिनीय सूत्र निर्दिष्ट शब्दों का गणों में समावेश-इसके अतिरिक्त वर्षमान ने पाणिनि के सूत्रो मे निर्दिष्ट अनेक शब्दो का भी उस उम प्रसग के गणो मे, ममावेश करने का प्रयास किया है। यथा-पाणिनि के अत्रिभृगुकु. सूत्र मे पठित शब्दो का यस्कादिगण मे समावेश तथा दामन्यादि गण मे विगतपष्ट शब्द मे निर्दिष्ट शन्दो का अन्तर्भाव । पाणिनि के कुछ गणों का परित्याग-वर्धमान ने पाणिनि के कतिपय गरणा का परित्याग भी किया है । यथा- -सपल्यादि, प्तक्षादि, हरीत फ्यादि, रसादि । अन्य अर्वाचीन वैयाकरणो समान वर्धमान ने भी स्वर तथा वेदविपयक गणो को छोड़ दिया है पठितगणों का आकृतिगण में परिवर्तन वर्षमान ने पाणिनीय सम्प्रदाय मे पठिनगणो वे रूप मे स्वीकृत किये गये अनेक गणो कोआकृतिगण के रूप मे अपनाया है। इनमे शौनकादि', अक्षयूनादि, दण्डादि", भरी. दणादि" आदि १८ गण विशपरूण द्रष्टय है । साथ ही चन्द्रगामी पाल्य पोति, वामन तथा भोज आदि वे अनेक गणो यो तथास्वनिधारित फुण्डादि पायादि तथा धारादि" जैसे अनेक गणो कोआतिगण ये रूप में प्रतिष्टिन परर व्याकरण ये सुबत नियमो को पर्याप्त व्यापकता प्रदान की है। १ द० जे० ४।१।४३ ।। २ ६. गरगरलमहादपि पृष्ठ २३२ । ३.द्र०पही, पृष्ठ २३५ । ४.पा०२।४।६५ ।। ५ द्र० ग्रामहादधि, पृष्ठ ३०, ३१ । ६. द्र० रही पष्ठ १३४ १३५ । ७.द्र.पा.५।३।११६ ॥ ८.१० रनमाधि १ष्ठ १८२ । ६ द्र• यही पृष्ट २१४ । १...यही पष्ठ २११ । ११. 07 दश प्रातिगग्या यदिराया । अन्यग्नु नेपालमा प्रतिदितम् । १२ ही वृष १-५.। १५. यही पृ०४७।

स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पारिणति इसके अतिरिक्त पाणिनि सम्प्रदाय मे आकृतिगण के रूप में स्वीकृत मयूरव्यंसकादि' अथवा पृपोदरादि जैसे गणो मे ढू ढ ढू ढ कर शब्दो के महान् समूह को उपस्थित कसे अपने ग्रन्थ के 'गणरत्नमहोदवि' नाम को चारितार्य करने का सफल प्रयास वर्धमान ने किया है। कातंत्र व्याकरण में प्राप्त गण कालक्रम की दृष्टि से कलाप अथवा कातन्त्र व्याकरण का समय लगभग ईसा की प्रथम शताब्दी होने के कारण इस व्याकरण को पाणिनि के पश्चात् ही स्थान दिया जाना चाहिये था, परन्तु इसकी पर्याप्त सक्षिप्तता तथा इसमे विद्यमान गणो की न्यूनता के कारण इस के विषय मे यहा कुछ कहना अधिक उचित जान पड़ा। डा० बर्नेल ने पाणिनि के सात सूत्रो का सम्बन्ध जिन मे प्राचाम् शब्द का प्रयोग किया गया है (जिसका अर्थ प्राकालीन वैयाकरण है, न कि प्राची दिशा के वैयाकरण) ऐन्द्र व्याकरण से स्थापित किया है। साथ ही कातन्त्र व्याकरण मे 'प्राचाम्' पदरहित इन सात सूत्रो की सत्ता दिखाकर कातन्त्र व्याकरण को ऐन्द्र व्याकरण का अनुयायी सिद्ध किया है। प्रसिद्ध ऐतिहासिक तारानाथ का कथन' भी इस बात की पुष्टि करता हुआ प्रतीत १ गणरत्नमहोदधि पृष्ठ ८६-६१ । २. द्र० यही पृष्ठ १००-१०४ । ३. अलसल्यो प्रतिषेधयो प्राचा क्त्वा । पा०३ । ४ । १८॥ शोणात् प्राचाम् । पा० ४।१। ४३ ॥ प्राचामवृद्धास्फिन् बहुलम् 1 पा० ४ । १ । १६० ॥ प्राचामुपादेरडज बुचौ । पा० ५ । ३1८०॥ एकाचप्राचाम् । पा० ५।३।६४ ।। सार्या प्राचाम् । पा०५।४।१०१ ॥ गुरोरनृतोऽनन्यस्याप्येकैकस्य प्राचाम् । पा०८।२।८६ ॥ ४ द्र० श्रान दी ऐन्द्रस्कुल ग्राफ स त अमेरियन्स, पृष्ठ २४, तथा उसने श्रागे। ५. द्र० दी इण्डियन एन्टिकरी, अप्रैल १८७५, पृष्ठ १.२, तथा उससे श्रागे।

पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ १३७ होता है। बर्नेल की यह भी धारणा है कि ऐन्द्र व्याकरण मे गणशैली का प्रयोग नहीं किया गया था ।' परन्तु कातन्नव्याकरण मे सम्भवत पाणिनि से प्रभावित होने के कारण कुछ गणो के दर्शन हो जाते है, जिन्हे कातन्न-व्याकरण की सक्षिप्तता को देखते हुए पर्याप्त कहा जा सक्ता है। यह कात नव्याकरण तीन भागो मे विभक्त है। प्रथम भाग प्रारम्भ से लेकर आरयात पर्यन्त, द्वितीय भाग कृदन्त तथा तृतीय भाग छन्दोविषयक है । इन मे प्रथम भाग ही प्राचीन तथा मूलग्रन्थकार द्वारा रचित माना जाता है। कृदन्त भाग के रचयिता कात्यायन माने जाते हैं। कातन्त्रवृत्तिकार दुर्गसिंह ने कृदन्त क प्रारम्भ मे ही- वृक्षादियदमी रूढा. न कृतिना कृता त । कात्यायनेन ते शिष्णा विधप्रतिपत्तये ॥ इस श्लोक को लिखकर यह स्पष्ट स्वीकार किया है कि इम अश को कात्यायन ने वाद मे जोडा । जहा तक इस व्याकरण के वैदिक प्रकरण का सम्बन्ध है, ऐतिहासिको की यह स्वीकरणीय धारणा है कि यह भाग १६ वी शतान्दी में इस व्याकरण मे जोडा गया। जो कुछ भी हो, इस व्याकरण के प्रथम भाग मे पाणिनि के स्पस्रादि, गर्गादि, यस्कादि, विदादि, कुनादि, वाह्वादि, गनादि तथा शरत्- प्रभृति" गण सर्वथा अभिन रूप मे स्वीकृत हए है । पाणिनि का सवादि गण भी अपने अवान्तर गण त्यदादि के साथ यहा दृष्टिगोचर होता है । यद्यपि यहा शब्दपाठ का क्रम पाणिनीय क्रम से थोडा सा भिंत है। क्योकि किम् शब्द को एक, द्वि आदि शब्दो मे पूर्व ही यहा रखा गया है जवकि पाणिनि ने जान बूझ कर सर्वादि गण मे उसे सब से अन्त मे रखा था और इसके कारण ही पाणिनि को अपने किंसर्वनाम यहुभ्योऽद्वयादिभ्य सूत्र मे 'किम्' शब्द को स्थान देना आवश्यक हो गया था । यदि फिम् को द्वि आदि से पहले ही १. द्र० श्रान दी एन्द्रम्पल ग्राफ संस्कृत ग्रामेरियन्स, पृथ २४ । २ २. कात०२।१।६६। ४ कात०२।६।३। ६ कात००६।११। ८ पा०५१३१२ ३.कात०1४।६। ५ कात०२।६।६। ७ कान०२॥ ।६।४०-४२1 सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि 3 स्थान देदिया होता तो उपरोक्त मूत्र मे 'किम्' शब्द को न रखते हुए इस सूत्र को लघु किया जा सकता था । इन गणों के साथ ही इसी भाग मे पाणिनि का गौरादि गण भी मिलता है परन्तु उसका नाम यहा गौरादि न हो कर नदादि' है। इस व्याकरण के दूसरे-कृदन्त-भाग मे पाणिनि के नन्द्यादि, ग्रहादि, पचादि, गभ्यादि,५ भिदादि, भीमादि" तथा न्यङक्वादि गण भी अपरिवर्तित रूप मे ही मिलते है। इस व्याकरण के तृतीय भाग 'कातत्रछन्दाप्रक्रिया मे पाणिनि के कुछ छन्दोविषयक सूत्रो की दृष्टि से कुछ नये गणो का निर्धारण किया गया है । पाणिनि के केवलमामकभागधेय० सूत्र की दृष्टि से केवलादि," कद्रकमा एडल्योश्छन्दसि" की दृष्टि से कद्रवादि, छन्दोगौक्थिक० की दृष्टि से छन्दोगादि" तथा मंत्रै सोमाश्वेन्द्रय०५ की दृष्टि से सोमादि गण का निर्धारण द्रष्टव्य है। उपरि निर्दिष्ट गणो मे नदादि, गर्गादि कुजादि तथा वाहादि को इस व्याकरण मे आकृतिगण के रूप मे माना गया है। शेष प्रतिपदपाठ या पठित गण के रूप मे देखे जाते है। सारस्वत व्याकरण में प्राप्त गण १२५० ईस्वी के लगभग सम्भवतः आचार्य नरेन्द्र ने सारस्वत सूत्रों की रचना की । जिनके आधार पर अनुभूतिस्वरूपने अपनी सारस्वत प्रक्रिया का निर्माण किया। मक्षिप्तता एवं लघुता की प्रतियोगिता मे इस १ कातं०२४३५०॥ २. कात०४।२।४६॥ ३ कात०४।२५०॥ ४. क तं०४।२।४८।। ५ कातं०४।४।६८॥ ६. कातं.४।५।८२ ।। ७. कातं०४।६।५१॥ ८.क्त०४।६।५७ ६.पा०४।१1३० । १०. का० छ०प्र० पृष्ठ १००॥ ११ पा०४।१।७१ । १२. का. छ. प्र. पृष्ट १०२ ।। १३ पा०।३।१२६ ।। १४ का.छ० प्र०पृष्ठ ११६ ।। १५ पा०६।३।१३१ ।। १६. का० छ० प्र० पृष्ठ १४८॥ १७. द्र० सिम्टम्स श्राफ सस्कृत ग्रामर, पृ४६१-६२ ॥ १८-वही, पृष्ठ ६५ ।

पाणिनि स उत्तरवर्ती वैयाकरण आर उन के गणपाठ व्याकरण ने जैनेन्द्र कातन्त्र तथा मुग्धबोध जैसे व्याकरणो को भी जिनकी रचना का एकमात्र उद्देश्य ही पाणिनि की अष्टाध्यायी को यथासम्भव मक्षिप्त एव मशोषित रूप से उपस्थित करना था पीछे रख दिया। ऐसा इसलिये कहना पड़ रहा है कि अपनी सारी बुद्धि तथा उपायो को प्रयोग मे लाने के उपरान्त भी इन व्याकरणो के प्रवक्ता विद्वानो का क्रमश ३००० १४०० तथा १२०० सूत्रो से कम मे कार्य न चल सका जब कि सारस्वत व्याकरण के प्रतिपक ने कवल ७०० सूत्रो के आधार पर ही अपने व्या करण का पूरा ढ चा तैयार कर लिया। पाणिनि क ४००० सूत्रा स तुलना करने पर तो यह सक्षिप्तता एक आश्चर्य का रूप धारण कर लेती है । डा० बेल्वाल्कर ने सारस्वत सूत्रा की इस न्यूनता को देखते हए कातन व्याकरण के समान सारस्वत व्याकरण की रचना को भी तत्कालीन एक निश्चित आवश्यकता का परिणाम माना है।' अपनी इस विशिष्ट मक्षिप्त शैली की दृष्टि से यह स्वाभाविक ही था कि पाणिनि के बहुत से गण इस व्याकरण क गणपाठ मे स्थान न पा सकते । पुनरपि यहा सवादि गण' एक गण मे समाविष्ट होकर स्वरादि तथा चादि गण, कात्यायन द्वारा उपसरयात' श्रत् और अन्तर् शब्द तथा आविस' शब्द से युक्त प्रादि गण तथा कात्यायन के सम्भस्त्राजिनशण पिण्डेभ्य फलात्' इत्यादि वातिको के उदाहरणभूत शब्दा क मान अजादि गण द्रष्टब्ध है। इनके अतिरिक्त पाणिनि के व गण जो सर्वथा अभिन रूप मे ही अपना लिये गये है वे ये ह -क्रोड्यादि गण २-पात्रेसमितादि गण" १० सिटम्स श्राफ सस्कृत ग्रामर पृष्ठ ६२-६३ | २ सि०५०७।२२ । ३ यही ४।१। ४ वही .४।२। ५ द्र० महा०१।४।५। ६ सि०५०१४।३। ७ महा०४।।६४। ८ सि.१० १५ । २२। ६ वही, १५। ५५। १. वही १७।२ ।

१४० स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि २ . ३-शरादि गण' १०-पील्लादिगण ४-अजिरादि गण १९-कर्णादि गण" ५-अर्धर्चादि गण १२-यवादि गण ६-शिवादि गण १३-लोभादि गण ७-चाहादि गण १४-पामादि गण ८-गर्गादि गण १५-पिच्छादि गण ६-नादिगण १६-द्वारादि गण" पाणिनि के कुछ गण अपने परिवर्तित नाम के साथ यहाँ भी देखे जास कते है। यथा गौरादि को नदादि, "वाहादि को पद्धत्यादि,२ सपत्न्यादि को पत्न्यादि शुभ्रादि को अत्र्यादि" तथा बीहृयादि को तडिदादि के रूप मे यहा के गणपाठ मे प्रस्तुत किया गया है। सारस्वतव्याकरणकार ने भी पाणिनि के कुछ सूत्रो के आधार पर, नये गणो का निर्धारण किया है । यया इन्द्रवरुणभवशर्व० की दृष्टि से इन्द्रादि, जानपदकुण्ड०" के लिये जानपदादिगण द्रष्टव्य है। ये दो गण सारस्वतकार से पूर्व के आचार्यो के व्याकरण मे भी मिल जाते है, परन्तु मनोरी इन सूत्री की दृष्टि से ૨૨ तथा वा पूतक्रतोरै च," वृषाकप्यग्नि १ सि०५० १७१८६ ३ वही १७।१०२। ५ वी, १८॥७॥ चही ८५० ६ वही, १८।१०५॥ १ वी, १५ ॥ २० ॥ २ यही १७।६। ८ वही १८।५। ६ वही ५८ ६ ८ वही १८ । १०३ । १. वही, १८ । १६७। १२ वही, १५। ६२॥ १४. वही, १८।६॥ १६.पा०४।१।४० ॥ १८ पा०४।१।४२ ।। २० पा०४।१।३६।। २२ पा०४।।३८ ॥

पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ मन्यादि' (आकृतिगण) तथा पितृष्षसुश्छण और मातृष्वसुश्च की दृष्टि से पितृष्षस्रादि गण की कल्पना सारस्वतकार की अपनी नई सूझ है। पाणिनि के ज्योत्स्नातमिस्रा०५ के लिये चन्द्रगोमी द्वारा निर्धारित ज्योत्स्नादि गण भी यहां मिल जाता है। परन्तु पाणिनि के ऊपशुपि मुष्कमधो र " इस सून तथा कात्यायन की वार्तिक रप्रकरणे खमुखकुञ्ज भ्य उपसख्यानम् को दृष्टि मे रख कर चन्द्रोमी द्वारा निर्धारित ऊपादि- गण की कल्पना को यहा नही स्वीकार किया गया । पाणिनि के उपराक्त सूत्र तथा कात्यायन की वार्तिक दोना का सम्मिश्रण कर एक वडे सूत्र- ऊपशुपिमुष्कमधुखमुखकुञ्जनगपाशुपाण्डुभ्य ' को प्रस्तुत किया गया है । मुग्धबोध व्याकरण में प्राप्त गण ईसा की लगभग १३ वी शताब्दी के अन्त मे पाणिनि तथा कातत्र क वीच का मार्ग अपना मक्षिप्तता तथा सरनता दोनो को प्रधानता देते हुए बोपदेव न मुग्धवोव व्याकरण की रचना की । इस व्याकरण में पाणिनि के निम्न गण अपने अपरिवर्तित रूप मे ही मिलते है २ १-स्पस्त्रादि गण" २-अजादि गण" ३-बबादि गण ४-गगादि गण ५-नडादि गण२ ६-रेवत्यादि गण ७-शिमादि गण --कुजादि गण ६-न्यडक्वादि गण" १ सि.च०१५। ६३ ।। २ पा०४।१।१३२।। ३ पा०४।१।१३४ ।। ४ सि०५०१८॥१८॥ ५ पा०५।२।११४ ।। ६ सि० च० १८.८॥ ७ पा०५।२।१०७॥ ८ महा०५।२।१०७॥ ६ सि० च०८।१२६॥ १. द्र. सिएम्स श्राफ सम्बत प्रमर पृ० १०४-१०६ । मु. गो० सूत्र ७६ । १२ वही, स्व ४१५ । १३ वही स्त्र ४२01 १४ वर्ग सूत्र ७६1 " १४२ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि इनके अतिरिक्त कल्याण्यादि' शरत्प्रभृति तथा द्वारादि गणो का सूना मे ही प्रतिपदपाठ यहा मिलता है । पाणिनि के स्वागतादि तथा प्रियादि गण भी यहा सूत्रो मे ही प्रतिपदपाठ के रूप मे उपस्थित किये गये हैं परन्तु उनके प्रारम्भ मे क्रमश स्वग तथा पूरणी' आदि शब्दो को रख कर इनका नाम स्वगादि तथा पूरण्यादि स्वीकार किया गया है। पाणिनि के कुछ और भी गणा का नाम यहा वदला हुआ मिलता है । गोरादि का नदादि यहयादि का शीणादि नथा कुम्भपद्यादि का कुम्भादि नाम इस प्रसग मे द्रष्टव्य है। पाणिनि के सून सुधातुरकरच तथा तत्सम्बद्ध कात्यायन की वार्तिक सुधातृव्यासपर डनिपादचाण्डालरिम्यानाम्" के आधार पर चन्द्रगोमी द्वारा निरारित व्यासादि गण" यहा भी विद्यमान है। इसी प्रकार पाणिनि के शभ्रादि गण के स्थान पर सारस्वतकार द्वारा निर्धारित नया नाम अन्यादि भी यहा देखा जा सकता है। साथ ही सारस्वतकार द्वारा स्वय कल्पित पितृष्वनादि भी यहा स्थित है।" मम्भवत मुग्धवोवकार द्वारा ही निर्धारित तन्वादि गण इस व्याररण का एप विशिष्ट गण है। यहा यह कह देना अनुचित न होगा वि मुग्धबोध व्याकरण के टीकाकार दुर्गादास तथा रामत वागीश न अपनी टीका मे पाणिनि के सारे गणा को अतिविस्तार म प्रगित किया है। मु.पा. गा४१। ३ यही मूय ४१८। ५ यही मत्र ३२६। . यही, म्प -६५ ६ पा०11६७॥ ११ चा०२।४।२१ ॥ " मि. २०१८॥६॥ ५ सि.१०-१.८॥ १७ यदी, ग्ध - ६ २ वही गय ३७८-३८१ । ४. यही, नत्र ४१७॥ ६ मु० वा० सूख २५७ । ८ यही, सून ३४९। ० महा०४,181 १२ मु००, सूत्र ४.६ । १८.मु.बा. सूय ४९५ ।। ६ मु०० गुर४१५ ।

पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयावरण और उन के गणपाठ जौमर सम्प्रदाय में गणपाठ क्रमदीश्वर के सक्षिप्तसार नामक व्याकरण के जिसे इसके नाम के अनुसार पाणिनीय व्याकरण का अति संक्षिप्त रूप माना जाता है, सूत्रो मे भी अनेक गणो का निर्देश मिलता है । इस सम्प्रदाय के श्री न्यायपञ्चानन नामक किसी वैयाकरण विद्वान् ने गणप्रकाश नामक ग्रन्थ की रचना भी की थी।' सौपद्म सम्प्रदाय में गणपाठ डा० वेल्वाल्कर के क्थन से यह पता लगता है कि सोपद्म सम्प्रदाय में श्रीकाशीश्वर नामक विद्वान् ने तत्सम्बद्ध गणपाठ का निवारण किया था, तथा थीरमाकान्त ने इस गणपाठ पर एक वृत्ति की रचना की थी। इसी सम्प्रद य की दृष्टि से श्री गणेश्वर के सुपुत्र श्री पद्मनाभदत्त ने 'पृषोदरादि वृत्ति' नामक किसी विशिष्ट ग्रन्य की रचना १३७५ ईस्वी मे की थी।' प्राकृत तथा पालि व्याकरणों में गणपाठ सस्कृत व्याकरण के क्षेत्र की असीम दूरी नापने वाली गणशैली ने प्राकृत तथा पालि भाषा के व्याकरण को भी इतना अधिक प्रभावित किया कि इनके व्याकरणो के विभिन सूत्रो मे स्थान स्थन पर गणशैली का उपयोग उपलब्ध होता है। प्राकृत-सूत्रों में गणपाठ वररुचि के प्राकृत-सूत्रो मे निम्न गण उपलब्ध होते हैं- १-समृद्धयादिगण ५-पानीयादि गण" २-शय्यादि गण ६-मुकुटादि गण ३-यथादि गण" ७-ऋष्यादि गण -सदादि गण -ऋत्वादि गण" १ द्रसिएम्स ग्राफ सस्कृत गामर पृष्ठ १११ । • द्र० रही, पृष्ठ वहीं। ३ प्रा० ... It ४. वही,१५॥ ५ वही ११.॥ ७ वही, १॥ १८॥ ८ वही,'। २२॥ ६ यही,१८॥ "री।६।

स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि २ १-दैत्यादि गण' १५-अक्षादि गण १०-पौरादि गण १६-नीडादिगण ११-सौन्दर्यादि गण १७-सेवादि गण १२-हरिद्रादि गण १८-यादादि गण" १३-दशादि गण १६-चक्रादि गण" १४-धूर्तादि गण २०-मासादि गण२ इन गणो मे निर्दिष्ट शब्दो का उल्लेख इन सूत्रो की भामहकृत प्राकृत. प्रकाश नाम्नी वृत्ति मे मिलता है । इन गणो मे न केवल पठित गण है, अपित पौरादि तथा मांसादि जैसे आकृति गण भी है । इनके लिये सूत्रकार ने शब्दो का निर्धारण नही किया था। इसीलिये मांसादि गण की आकृतिगणता को स्त्रीकार करते हुए भामह ने स्पष्ट शब्दो मे यह कहा है- तदयमपठितोऽपि मासादिर्गणः। यत्र क्वचिद् वृत्तिभगभयात् त्यज्यमान. क्रियमाणश्च विन्दुर्भपति स मांसादिपु द्रष्टव्य' 13 मोग्गलान के पालि व्याकरण गणपाठ वररचि के समान पालि व्याकरण के सर्वश्रेष्ठ रचयिता मोग्गलान महा- थेर ने भी अपने व्याकरण मे, जिसके सूत्र तथा वृत्ति दोनो की रचना स्वय मोग्गलान ने ही आज से लगभग ७५० वर्ष पूर्व की थी।" गणशैली का पर्याप्त उपयोग किया है। इनमे बहुत से गण तो पाणिनि तथा उनके पश्चाद्भावी सस्कृत-वैयाकरणो द्वारा ही निर्धारित है । अन्तर केवल इतना है कि उन्होंने पालि भाषा का चोगा पहन लिया है। गण ये है :- में १.प्रा००१।३६ । २ वही, १ । ४२1 ३ चही।४। ४ यही, २।३01 ५ यही, २। ६ रही, ३ | २४ । ७ सी, ३ |३० ८ रही, ३ । ५२ । ६ वही,३५८। १० यड़ी, ४।५ " यही, ४५. ०पी, ४।६. १३.६० प्रा००४। १६ । १४ 5. पालि महाव्याकरण, भूमिका पृष्ठ ५०-११।

पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ १४५ द- १२ १-समादि गण' (सर्वादि) ५-तारकादि गण" २-तिष्ठग्यादि गण (तिष्ठदावादि) ६-कथादि गण ३-पादि गण (प्रादि) ७-पिच्छादि गण" ४-अंगुल्यादि गण -भिदादि गण इनमे तिष्ठम्यादि तारकादि तथा भिदादि गणो को पाणिनि के समान यहा भी आकृतिगण ही माना गया है। इनके अतिरिक्त पाणिनि के 'अप्तन्तृच्छ सून के आधार पर पितादि गण, इन्द्रवरुण के आधार मातुलादि गण, नभ्रागनपात्० आधार पर नखादिगण,१४ समानस्यच्छन्दस्यमूर्द्धप्रभृत्युदपु सूत्र के योगविभाग द्वारा सिद्ध किये जाने वाले शब्दो तथा ज्योतिर्जनपद सूत्र मे गिनाये गये शब्दो के लिये चन्द्रगोमी प्रभृति पूर्वाचार्यों द्वारा निर्धारित पक्षादि गण के अनुकरण पर पक्खादि गण, ग्रामजनबन्धुसहायेभ्य- स्तल के आधार पर जनादि गण," ऊपशुषिमुष्कमधो २:२° पाणिनि के सूत्र तथा इससे सम्बद्ध कात्यायन को वार्तिक रप्रकरणे समुखकुजेभ्य ऊपसंख्यानम्" की दृष्टि से चन्द्रगोमी आदि वैयाकरणो द्वारा निर्धारित ऊपादि गण के स्थान पर मुसादि गण२२ तथा पाणिनि के शब्दवैरकलहा- भ्रकण्वमेघेभ्यः करणे सूत्र के आधार पर सद्दादि गण का निर्धारण १ मो० ग०२1१०१। ३ वही, ३ । १३ । ५ रही, ४ । ४५ ७ वही, ४१८७॥ ६ पा०६।४। ११ । ११ पा०४।१।४०। १३ पा०६१३६७५ । ५ पा०६।३1८४ | १७ मो. ग. ३1८३ । १६ मो० ग०४। ६६ । २१ महा०५।२।०७। २३ १०३।१।१७॥ २ वही, ३ । ७॥ ४ यही, ४ । ३५ । ६ वही, ४१ ७४। ८ रही, ५ । १५०1 १० मो० ग०२। ४६ । १२ मो. ग. ३ । ३३ । १४ मो० ग०३1७६ । १६ पा०६।८५1 १८ पा०४।२।४३ । २० पा०५।२।१०७॥ २० मो० ग०४।३५,८२ । २. मोग० ५। १०॥

१४६
से० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि
पालि भाषा के इस वैयाकरण ने किया है। कातन्त्र व्याकरण के अनुकरण
पर पाणिनि के गौरादि गण को यहा भी नदादि' नाम देकर अपनाया
गया है।
इन गणो के अतिरिक्त मोग्गलान ने अन्य तदिभिनादि, भज्जादि,
हरादि जैसे ३४ गणे का निर्धारण, पालि भाषा के नवीन तथा विभिन
शब्दा के साधुत्व की दष्टि स किया है।
3
१ मो० ग०,३।७1
३ यदी ।।१५।
२ वही ११४७॥
४ रही २।५।

पंचम अध्याय पाणिनीय गणपाठ का महत्व आचार्य पाणिनि से पूर्ववर्ती विभिन्न वैयाकरणो के पूर्व प्रदर्शित गणपाठ विषयक विभिन्न निर्देशो तथा सूचनाओ से यह भले ही प्रमाणित हो जाय कि पाणिनि से पूर्व ही गणशेली से सस्कृत-व्याकरण सनाथित हो चुका था, परन्तु पाणिनि के गणपाठ के समान पूर्ण विकसित, मुव्यवस्थित तथा क्रम- चंद्र गणपाठ का निर्धारण पाणिनि से पूर्ववर्ती किमी अन्य वैयाकरण ने किया था, एसा सभवत नही कहा जा सकता । न्यूनातिन्यून आज की इस परिस्थिति मे जब कि पाणिनि से प्राचीन व्याकरण-सामग्री का सर्वथा अभाव है। इस रूप मे हमे यह कहने मे कोई सकोच नही है कि पाणिनि ही वह सर्वप्रथम वैयाकरण है जिसने लौकिक तथा वैदिक दोनो प्रकार क शब्दा के यथासभव सुव्यवस्थित अन्वाख्यान, एव स्वरविषयक सूक्ष्म दृष्टि से विशाल गणपाठ का निर्धारण कर उसका अपने सूनो म प्रचुर प्रयोग करते हुए सूत्र शैली मे अपूर्व निष्णातता दिखाई । पाणिनि के पश्चात् आने वाली वैयाकरण परम्परा ने, जैसा कि पूर्व दिखाया जा चुका है, पाणिनीय-गणपाठ के ही मूल गणो मे सामान्यतया न्यूनाधिक परिवर्तन करके ( जिसके लिये उन्ह कोई विशप श्रेय नही दिया जा सकता, ) अपने अपने गणपाठ की साम्प्रदायिक भित्तिया खडी की है। जिनके लघु एवं अतीव सीमित प्राङ्गण मे, पाणिनीय-गणपाठ के स्वर तथा वैदिव शब्दा के अन्वाख्यान सम्बन्धी गणा को स्थान न मिल सका । कातन सारस्वत तथा मुग्धवोध जैसे व्याकरण सम्प्रदायो द्वारा स्वीकृत गणपाठ तो पाणिनीय गणपाठ के महानद के ममत साधारण नाने प्रतीत होते हैं। जिनमे उमी नद की साधारण जल धारा प्रवाहित हो रही है। मोग्गलान के पालि तथा कमायन (कात्यायन) के प्राकृत व्याररणा के अध्ययन से पता लगता है कि पालि प्राकृत जैसी भाषाओके व्यापरणपादपो को भी, पाणिनि द्वारा प्रवाहित गणपाठ रुप इस महानद से ही सीचा जाता रहा है।

सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि इस प्रकार प्राचीन तथा अर्वाचीन सभी व्याकरणों को अपनी विशालता, व्यापकता एव यथासम्भव मौलिकता की अपूर्व प्रतिभा आक्रान्त करने वाला पाणिनि का यह गणपाठ, उसकी महती कृति अष्टाध्यायी मे एक और वैशिष्टय जोड देता है। व्याकरण विषयक महत्त्व अमुक शब्दो से ही अमुक कार्य होगा, अन्यो से नही, इस प्रकार की साहसपूर्ण घोषणा से अनुप्राणित, आचार्य पाणिनि के सर्वादि अथवा प्रादि जैसे पठित गण यदि इस महान् वैयाकरण का, सस्कृत वाङ्मय के सम्पूर्ण प्रदेशो से परिचय प्रस्तुत करते है, तो स्थयदि, तारकादि अथवा ब्राह्मणादि जैसे आक्रति गण, जिनके द्वारा शब्दों की अनन्तानन्त परम्परा को सूत्रों मे वाधने का सफल प्रयास किया गया है, उमी आचार्य के भाषा वैज्ञानिक व्यापक दृष्टिकोण को उपस्थित करते है । शब्दों के साधुत्व की दृष्टि से अष्टाध्यायी के सूत्रो का जो मूल है अथवा उन्हे जो प्रामाणिकता दी जाती है, ठीक वही मूल्य, तथा वही प्रामाणिकता पाणिनीयच्याकरण के व्याख्याताओं ने अनेकन' गणपाठ को भी दी है । इस रुप मे गणपाठ अष्टाध्यायी का परिशिष्ट होते हुए भी कही कही सूनस्थानीय होकर अपने गौरव को और भी बढा लेता है । साथ ही, कुछ सूत्रों में किसी या पिन्ही विशिष्ट पद या पदो को स्थान देकर अपने विशेष अभिप्राय का जापन कराने वाली रहस्यमयी, पर साथ ही विशिष्ट प्रवृत्ति पाणिनि के गणपाठ मे भी पायी जाती है। यथा-खण्डि- कादि गण मे मुद्रफमालय' शब्द, गौरादिगण मे श्वन' शब्द, शरत्प्रभृति मे . - १. द्रष्टग-मृति भिदादिपाठाद | गणपाटादेव मृदयभायश्च । धा. ० २६१ । चुरति छयादि पाठात् श्रमारप्रत्ययो गुणामावश्च । वही, पृ० ३७६ ! श्रारा धारा कारा भिदादिलाददि निपातना वृद्धि. 1 स. मि. २०, पृ. १४६ । दागीदारान गवाश्यप्रभृति यात् एकरभार एक रोपाभावश्च । धा० ३०, पृ० ३८७ । २.६.,महा०,४।२५॥ ३.२०, यही १।४।२६।४।२२।।

पाणिनीय गणपाठ का महत्त्व १४९ विपाट्' शब्द, युक्तारोह्यादिगण मे एकशितिपात् शब्द, अश्वादिगण मे राजन् शब्द, कस्कादिगण मे भ्रातुप्पुत्र शब्द, सवनादिगण मे 'अश्यसनि शब्द तथा शुभ्नादिगण मे 'नृनमन्" शब्द अथवा 'तृप्नु' शब्द के पाठ से कात्यायन तथा पतजलि ने आचार्य के विभिन्न उपादेय रहस्यो का उद्बोधन कराया है। इसके साथ ही, गणपाठ का निर्धारण अथवा सकलन विशुद्ध सस्कृत- व्याकरण की दृष्टि से किया जाने पर भी, उसमे वैदिक तथा लोक्कि सस्कृत साहित्य के विभिन्न विषयो तथा ग्रन्थो के नाम तथा तत्सम्बन्धी विविध सूचनाये, पाणिनि से प्राचीन विभिन्न वैयाकरणो के नाम तथा उनके मत, तत्कालीन प्रचलित गोन नामो का विशाल सग्रह तत्कालीन जनपदो, सघो, नगरो तथा ग्रामो के नाम तथा प्रसिद्ध जगलो, पहाडो तथा नदियो के नाम मिलने के कारण गणपाठ को, प्राचीन भारत के ऐतिहासिक एव सास्कृतिक दृष्टि से भी एक विशेप गौरव देना होगा। इस सम्बन्ध मे कुछ सामान्य निर्देश यहाँ दिये जाते है। प्राचीन वैयाकरणों के नाम तौल्वल्यादि गण मे पौष्करसादि उपकादि मे कशकृत्स्न, अरीहणादि मे काशकृत्स्न, उत्सादिमे माध्यन्दिन के पिता मध्यन्दिन तया क्रौड्यादिगण मे आपिशलि तथा व्याडि का नाम देखा जाता है । आचार्य आपिशलि की पाठशाला का निर्देश भी छन्यादिगण मे उपलब्ध होता है । तत्कालीन वैदिक तथा लौकिक साहित्य का परिचय पाणिनीय गणपाठ के शौनकादि गण मे शौनक, श्राभि, कठ आदि तथा कार्तकोजपादि गण मे पठित लगभग ३० शब्दो द्वारा वैदिक शाखा १ द्र०, महा०।७।२२ ॥ २.द्र०, वही २।१।१, पृ०६१ ।। ३ द्र०, परि०, पृष्ठ १७६, प्रौदमनोरमा पूर्वाध ॥ ४ =०, महा०,८1३1४१ ।। ५ द्र०, वही ८।३।१०१॥ ६ द्र०, वहीं नवा० पृष्ठ १०८॥

१५० स० व्या० मे गणपाठ की परमरा और आचार्य पाणिनि ग्रन्थो का तथा विभिन चरणो का निर्देश मिलता है।' उक्यादि तथा जमा- दिगण मे आये पद तथा क्रम शब्द से ब्रमश वेदो के पदपाठ तथा क्रमपाठ अभिप्रेत है । ऋगयानादि गण मे शिक्षा, निरक्त, व्याकरण, छन्द, ज्योतिष, उपनिषद्, वास्तुविद्या क्षनविद्या तथा अगविद्या जैसे विषयो तथा इनक व्याख्यानभूत ग्रन्यो का निर्देश पाया जाता है । ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से इसी गण मे पठित उत्पात संवत्सर मुहर्त तथा निमित्त शब्द और छन्द शास्त्र की दृष्टि से छन्दोभाषा तथा छन्दो विचिति शब्द द्रष्टव्य है । व्याक रणशास्त्र की दृष्टि स उक्थादि तथा कथादि गण मे पठित गण शब्द से गण पाठ अभिप्रेत है । इन दोना गणो मे पठित क्रमश गुण तथा गण शब्द के स्थान पर काशिका के गुणागुण' पाठ को शुद्ध मानकर डा० वासुदेवशरण अग्रवाल ने अगुण' शब्द से वृद्धि' का तात्पर्य निकाला है, परन्तु वह सर्वथा निराधार एव निष्प्रमाण होन के कारण अस्वीकार्य है। उक्थादि तथा कथा दिगणो मे आयुर्वेद तथा क्रमादि गण मे मीमासा शब्द का भी पाठ मिलता है जिससे इन विपयो के तत्कालीन पठन पाठन मे प्रचलित होने का वोर होता है। गोत्रनाम पाणिनीय गणपाठ के यस्कादि तिकक्तिवादि, उपकादि कुजादि, नडादि विदादि गगादि तथा अश्वादि गणो मे अनेक गोत्र वाचक शब्दो का पाठ मिलता है । एक नाम वाले अनेक व्यक्तियो मे से यदि किसी एक व्यक्ति के निर्देश करने का अवसर प्राप्त होता है तो उसका तन्नामा अन्य व्यक्ति से अन्तर करने के लिये गोत्र नामो से निर्देश किया जाता है। ऐसा निर्देश ब्राह्मण ग्रन्थो आरण्यको उपनिषदो तथा महाभारत आदि मे अनेकन पाया जाता है । वौधायन आश्वलायन तथा आपस्तम्ब श्रौतसूनो तथा कात्यायन, १ विशष विस्तार के लिय द्रव्य-इण्डिया, एज नोन टु पाणिनि पृष्ठ ३४८ । २-इण्डिया एज नोन टु पाणिनि पृष्ठ ३४८ । ३-द्र० पृव पृष्ठ ३२-३३ । ४ इस प्रकरण क विस्तार के लिये देसिए प० युधिष्ठिर जी मीमासक कृत प्राचार्य पाणिनि क समय विद्यमान संस्कृत वाड मय पुस्तिका तथा स० व्या० शान का इतिहास, भाग १ पृष्ठ १६६-१६३ ।

१५१ पाणिनीय गणपाठ का महत्त्व - लौगाति के प्रवराध्यायो तथा शुक्ल यजुर्वेद परिशिष्ट, मानव प्रवराध्याय तथा मत्स्यपुराण मे इन गोत्रनामो की विस्तृत सूचियो का सकलन किया गया है। इनमे से अनेक प्रवराध्यायो के आधार पर अर्वाचीन काल मे गोत्र प्रवरमजरी नामक ग्रन्थ की रचना की गयी। गरणपाठ मे पठित बहुत से गोत्रनाम इन प्रवराध्यायो मे मौलिक रूप मे तथा बहुत से नाम, उन उन गणो द्वारा विहित विभिन्न प्रत्ययो से युक्त होकर निप्पत रूप मे मिलते है । बहुत थोडे नाम ऐसे है, जो इन सूचियो मे उपलब्ध नही होते । पाणिनीय-गणपाठ के समान इन गोत्र-सूत्रियो मे भी अनेक पाठभेद पाये जाते है । परन्तु सव के तुलनात्मक अध्ययन से शुद्ध पाठ का ठीक ठीक अनुमान प्राय सर्वत्र किया जा सकता है। अपने गणपाठ मे गोन विषयक गणो का निर्धारण करके, अन्य महा- प्रवर काण्डो के समान गोत्र नाम की अतिविस्तृत सूची उपस्थिन करने वाले वैयाकरण पाणिनि के समक्ष कौनसी गोनसूचि विद्यमान थी, यह ठीक ठीक कह सकना तो कठिन है, पर इतना निश्चित है कि जो भी सूची थी, वह सम्प्रति उपलब्ध गोन विषयक उपरोक्त सूचियो से बहुत मिलती जुलती ही थी। इस धारणा की पुष्टि प्रो० जान ब्रफ' न पाणिनि के शरदच्छुनकद र्भाद् भृगुवत्साग्रायणेपु तथा कपियोधादागिरसे जैसे सूत्रो तथा आत्रेय भरद्वाजे एव भरद्वाज आने ये जैसे गणसूत्रो की विशिष्ट उपाधियो से युक्त उन उन प्रत्ययो से युक्त शब्दो को उपरोक्त सूचियो मे लगभग उन्ही उपाधिया तथा उन्ही उन्ही प्रत्ययो के साथ विद्यमान दिखलाकर की है। ऐतिहासिक तथा भौगोलिक नाम पाणिनीय गणपाठ के राजन्यादि, भौरिक्यादि तथा ऐपुकार्यादि गणो मे विभिन विषयो अर्थात् ग्रामो के समुदायो के नाम उल्लिखित हैं । दामन्यादि, पार्वादि तथा यौधेयादिगणो मे तत्कालीन विभिन गानोपजीवी सघो के , द्र० जरनैल ग्राफ रायल एशियारिक सासाइरी १६४६, पृष्ठ ४४, ४५ । तथा-५. दारनशन श्राफ गोत्र प्रपरमजरी भूमिका पृष्ठ ५१ तथा उससे अागे। ० पा०४।१।१००1 ३ पा०४।१।०७। ४. अश्वादिगण ४।। ११० ।

१५२ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि नाम पाये जाते हैं । कच्छादि, भर्गादि, सिन्ध्यादि तथा तक्षशिलादि जैसे गणो मे विभिन्न जनपद नामो का उल्लेख मिलता है । अरीहणादि आदि १७ तथा उत्करादि, नडादि, वारणादि, मध्वादि, सकलादि, मुवास्त्वादि, कठ्यादि, काश्यादि, गहादि, धूमादि, नद्यादि तथा पलद्यादि गो से तत्कालीन नगरो तथा ग्रामो की पर्याप्त विस्तृत सूची प्राप्त की जासकती है । इसी प्रकार कादि तथा भालादि गणो मे प्रस्थान्त तथा चिहणादिगण मे कन्थान्त स्थाननामो का दिग्दर्शन हो जाता है । अजिरादि तथा शरादिगणो मे तत्कालीन कुछ नदियो के नामो का उल्लेख है । इनमे से अजिरवती तथा शरावती से आज के ऐतिहासिक विद्वान परिचित हो चुके है । किशुलकादि नया कोटरादि गणो मे प्रमश पर्वतो तथा अरण्यो के कुछ नामो का पाठ मिलता है। इसके अतिरिक्त पाणिनिकालीन राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक स्थितियो के अध्ययन मे भी अष्टाध्यायी से प्राप्त प्रचुर सामग्री के साथ साथ पाणिनीय गणपाठ से भी विद्वानो को पर्याप्त उपादेय सहायता प्राप्त होती रही है। इस प्रसग मे ख्यातिलब्ध डा. वासुदेवशरण अग्रवाल की अनुपम पुस्तक 'पाणिनि कालीन भारत' का नाम लिया जासकता है, जिसमे मनस्वी सूक्ष्मदर्शी तथा मुश्वेिचक लेखक ने इन विभिन विषयो पर अद्भुत प्रकाश डाला है।

षष्ठ अध्याय पाणिनीय गणपाठ के संशोधन की समस्या तथा उसका समाधान पूर्व अध्यायो मे यह सष्ट कियाजाचा है कि सम्प्रति पूर्णरूप मे जितने भी गणपाठ उपलब्ध है, उनमे आचार्य पाणिनि का ही गणपाठ प्राचीनतम है । न केवल इतना ही अपितु पाणिनि के गणपाठ के आधार पर ही अर्वा- चीन संस्कृत व्याकरणो के गणपाठो की भित्तियाँ खडी हो सकी हे अथवा दूसरे शब्दो मे पाणिनीय गणपाठ ही कुछ परिवर्तन परिवर्धन तथा न्यूनाधिक्य के साथ सस्कृत व्याकरण के अन्य सम्प्रदायो ने अपनाया है। परन्तु इतना महत्त्वपूर्ण होते हुए भी यह गणपाठ सम्प्रति दुर्भाग्यवश पाठभेदो की प्रचुरता तथा विभिन्न अपभ्रष्टताओ से नितान्त दूपित रूप में हमारे समक्ष उपस्थित होता है । इसका एक मात्र कारण है उसके साथ की गयी उपेक्षा। इमलिये गणपाठ के सशोधन की समस्या भी एक बहुत महत्त्वपूर्ण ममस्या है। गणपाठ के सशुद्ध न रहने पर पाणिनीयसस्कृत व्याकरण का एम बहुत बडा भाग, जो अष्टाध्यायी के सूनो मे तो परोक्ष रूप मे है, पर गणपाठ मे जिसे प्रत्यक्ष देखा जासका है अपरिष्कृत तथा दूपित ही रह जाता है पाणिनीय गणपाठ के साथ एक और भी समस्या सम्बद्ध है, और वह है इसमे पठित असष्टार्थक तथा प्राय , आज के उपलव्य वारमय की दृष्टि से अप्रयुक्त अनेक गन्दा के अर्थो का निश्चितीकरण तथा इसमे आय एतिहामिक भौगो- लिक अयवा किसी अन्य प्रकार के नाम वाले गन्दा की ठीक ठीक पहचान । परन्तु इस समस्या का समाधान बहुत अधिक ममय तथा निरन्तर परिश्रम की अपेक्षा रखता हे इसलिय अभी म इस कार्य को करने का साहस नही कर रहा हू, पर भविष्य मे करन का विचार अश्य है। साथ ही यह ममस्या गणपाठ के ववन कुछ भाग र साय मम्बद्ध है, जबरि सगोपन यी ममस्या पुर गणपाठ से सम्बद्ध है इतना ही नही गदा साद रूप में उपस्थित हो जाने पर ही उपर्युक्त दूमरी ममस्या के समाधान का अवसर २० सं० व्याकरण मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि प्राप्त हो सकता है । यद्यपि अनेक अवसरो पर यह भी हो सकता है कि शब्दो के अर्थ तथा ऐतिहासिक स्थानो के ठीक ठीक पहचाने जाने पर ही शब्दो के ठीक ठीक स्वरूप का भी निश्चय किया जासके, तथापि इस स्थिति के सर्वथा अल्प होने के कारण प्रायिकता पहली वाली स्थिति को ही दी जा सकती है । इसलिये पहले गणपाठ के सशोधन की आवश्यकता है। प्रक्षेपों तथा पाठ भेदों का प्राचुर्य पारिणनीय-गणपाठ की कोई भी मुद्रित तथा लिखित पुस्तक सम्प्रति उपलब्ध नहीं है, जिस पर पूरा पूरा विश्वास किया जा सके तथा जिसके शब्दो की दूसरी पुस्तको से तुलना करने पर पच्चीस प्रतिशत शब्दो के विभिन्न पाठभेद न मिल जाए । इतना ही नही,-पाणिनीय गणपाठ का, व्याकरण के अन्य सम्प्रदायो मे मिलने वाले गणपाठो से तुलना करने पर पाठभेदो की जो भयकर स्थिति सामने आती है, उसे देखकर तो पाणिनीय गणपाठ के अनेक शब्दो के स्वरूप के विषय मे ही चित्त शकित हो उठता है । वैसे सस्कृत की प्रायः प्रत्येक प्राचीन पुस्तक मे पाठभेदो तथा प्रक्षेपो की स्थिति किसी न किसी रूप मे पाई जाती है, परन्तु गणपाठ मे मिलने वाले पाठभेदो की आश्चर्यजनक अविकता, विषमता तथा भयकरता अन्यत्र कही भी उपलब्ध नहीं होती। काशिकाकार के द्वारादिगण के विषय मे, स्वाध्याय इति केचित्पठन्ति' इस कथन तथा पतजलि के स्वाध्याय शब्दो द्वारादिषु पठ्यते ।...""क: पुनरर्हति स्वाध्याय शब्दं द्वारादिपु पठितुम् इन कथनो को मिला कर विचार करने से इस बात की सम्भावना की जासकती है कि लगभग पतजलि के समय मे ही गणपाठ मे प्रक्षेपो तथा पाठभेदो का प्रारम्भ हो चुका था। कात्यायन तथा पतजलि द्वारा महाभाप्य मे कही कही गणपाठ के कुछ शब्दो की गम्भीर परीक्षा को देखते हुए उपर्युक्त सम्भावना और भी बढ़ जाती है। काशिकाकार के काल तक तो गणपाठ मे प्रक्षेपो तथा पाठभेदो की सख्या ने एक विचारणीय समस्या का रूप धारण कर लिया जिसके उदाहरण के लिए वाशिका में विद्यमान--सर्वादिगण मे 'त्व' तथा 'त्यत्' का विवाद, अनुशकादि गण मे 'अस्यहत्य' तथा 'अस्यहेति' का मतभेद, न्यादि १ का ७।३।४।। २ महा०७।३।४।।

पाणिनीय गणपाठ के संशोधन की समस्या तथा उसका समाधान गण में क्षणेपाक इत्यादि शब्दों के अकारान्त, आकारान्त, तथा उका. रान्त-तीन प्रकार के पाठ भेद, जो विभिन्न विद्वानों द्वारा स्वीकृत थे, की ओर आलोचक विद्वानों का ध्यान आकृष्ट किया जा सकता है। इतना ही नहीं, काशिकाकार के अपने समय में विद्यमान गोपवनादि गण के प्रमाद- पाठ का निर्देश स्वयं ग्रन्थकार ने बड़े सष्ट रूप मे किया है। इसी प्रकार पूरे सपनादि गण का विविध पाठभेद भी काशिका मे ही मिल जाता है, जो सम्भवतः दो प्रकार के विद्वानों द्वारा स्वीकृत रहा होगा। इसके अतिरिक्त, चन्द्रगोमी के अनुकरण पर कात्यायान की वार्तिकों को, अष्टाध्यायी के सूत्रपाठ में मिलाने के प्रयत्नों के साथ साथ गणपाठ में भी मिश्रित करने की प्रवृत्ति काशिकाकार जैसे विद्वानों में स्पष्ट देखी जा सकती है । इस प्रवृत्ति के फलस्वरूप पाककर्ण पर्ण इस पाणिनीय सूत्र पर संभवतः कात्यायन द्वारा रचित 'सम्भस्त्राजिनशणपिण्डेभ्यः फलात्" आदि तीन चार वातिकों को पाणिनि के अजादिगण मे स्थान मिला। योपधप्रतिषेधे हयगवयमुकयमत्स्यमनुष्यानां अप्रतिषेध.' अनुकरण पर गौरादि गण में गयय, मुकय, मत्स्य तथा मनुष्य शब्द दिखाई देने लगे। नृनराभ्यामवचनम्" इस वार्तिक के आधार पर शारियादि गण मे 'नृनरयो द्धिश्च' गणसूत्र की रचना की गयी। गहादिपु पृथिवीम- ध्यस्य मध्यमभाव.' तथा चरणसम्बन्धेन निवास लक्षणोऽण' इन वार्तिकों की दृष्टि से गणपाठ के गहादि.गण में मध्योमध्यम चाण चरणे" यह गण- सूत्र प्रतष्ठित हुआ। चुद्रकमालवात् सेनासंज्ञायाम्" इस वार्तिक को देखकर 'इस वार्तिक के १. परिशिष्टानां हरितादीनां प्रमादपाठः । का०२।४।६७ ।। २. द्र० क्वचिदेव गणपाठ । का.८।३।११०॥ ३.पा०४।१।६४॥ ४.द्र. महा०४।१।६४ ।। ५. महा०४।१।६३ ।। ६. द्र० गौरादिग्विदानीन्तनै. गवयादयः प्रक्षिता इति वातिकारम्माद् विशायने । केयट महा०४।१।६३ ।। ७. महा०४।४।४६ ।। ८. द्र. नागेश अनेनैव उभयो. नार्या मिद्धाया मृनरयोतिश्चेति गणग्यम- नाम् । ६.महा०४।२११३८।। १०. द्र. नागेश-अन् 'तु गणमूत्रमनाम्, पृथिवीमध्यशन्दरीव मध्यमादेश इल्याहु: । महा०४।२।१३८॥ ११.महा०४।२।४५।।

से० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचाय पाणिनि खण्डिकादि गण मे चुद्रकमालव शब्दा क साथ सेनासझायाम् की उपाधि जोडकर उसे गणसूत्र मान लिया गया।' छ प्रकरणे विशिपूरिपदिरुहि प्रकृतरनात सपूर्वपदात्" इस वार्तिक क आधार पर अनुप्रवचनादि गण मै सवशन प्रवेशन अनुप्रवेशन अनुवशन तथा अन्धारोहण जैसे शब्दा को साम्मलित किया गया। इसी प्रकार ग्रामान्य इस उपसरयान को दखकर कर यादि गण मे ग्राम शब्द को प्रतिप्रित कर लिया गया। इस प्रकार के अन्य अनेक परिवर्वन तथा परिवर्तन हए । न कवल इतना ही अपितु पाणिनि से अवाचीन वैयाकारण चन्द्रगामिन् के अपने सून वेणुकादिभ्यश्छण को पाणिनि क गणपाठ मे गणसून के रूप म स्थान दिये जान के तथ्य का उद्घाटन विद्वानो ने किया है।" काशिकाकार के बाद आने वाली पाणिनीय व्याकरण के व्यारयाताआ तथा टोकाकारो की पीढी ने भने ही अखि मीच कर इन मिश्रणो को स्वी कार कर लिया हो परन्तु जागरूर व्यारयाता नगेशभट्ट ने उपरोक्त अनेक स्थला पर महाभाप्य मे इन मिश्रणा की अप्रामाणिकता तथा अाणिनीयता की ओर विद्वानो का ध्यान आकृष्ट किया है। पाणिनि से इतर व्याकरण सम्प्रदाय के प्रतिष्ठापको ने तो चन्द्रगोमी तथा काशिकासार की उपरि निर्दिष्ट पद्धति को अधिकाधिक अपनाया है। इसी कारण पाल्यकीर्ति ( शाक टायन ) श्रीभोज हेमचद्र और वर्षमान के गणपाठो मे उत्तरोत्तर अधिका थिक वृद्धि होती गयी है। इस रूप मे पाणिनीय तथा अपाणिनीय सम्प्र दायो के गणपाठो का आपम मे इतना अधिक घोलमाल हुआ है कि पाणिनीय गणपाठ की कोई भी प्रामाणिक पुस्तक आज दृष्टिगोचर नही होती । इस घोलमाल का ही यह परिणाम है कि पतञ्जनि की इच्छा क विपरीत और काशिकाकार क स्पष्ट विराव हान पर भी पारायणिक विद्वाना द्वारा स्वादि १ नागरा गण क्षुद्रकमालव इयर पाठो पातिवलात् इति साम्प्रदायिका । महा०४।२।४।। २ महा० ५।। ३ महा०४।२।६५।। ४ चा०३।२।६१ ।। ५ द्र० सिम्म्स श्राफ सस्कृत ग्रामर पृष्ठ ३८ पाट रियण सख्या १ । ६ द्र० सपिपुषिटका धनुष्कपालम् बहिष्पलम् यनुष्यामि यता पाठ उत्तर पाणिनीय गणपाठ के सशोधन की समस्या तथा उसका समाधान १५७ मै पठित सर्पिकुण्डिका आदि चार शब्द आज तक भी गणपाठ की पुस्तको तथा हसलेखो मे स्थान पाते आरहे है। गणपाठ की दुरवस्था का कारण ? पाणिनीय गणपाठ मे इस प्रकार के भयकर पाठभेदो तथा प्रक्षेपो मे उत्पन दुरवस्था का कारण सम्भवत यह जान पडता है कि प्रत्येक गण मे कितने शब्द गणकार को अभिप्रेत थे, इसके परिज्ञान के लिय उसने कोई सष्ट निर्देश नही किया। जैसा कि पूर्व बताया गया है पठित गणो मे समाप्ति वाचक पारिभाषिक वृत्' शब्द क सयोजन की प्रक्रिया गणकार द्वारा अपनायी गयी परन्तु यह वृत्करण भी उन गणो की सुरक्षा करन म सर्वथा असमर्थ रहा, क्योकि उत्तरकाल मे वृत्करण के प्राय उत्सन हो जाने से उत्तर- वर्ती विद्वानो के पास यह जानने का कोई सावन नही रहा कि गणकार ने क्सि शब्द के पश्चात् वृत् शब्द को रख कर उम पठित गण का द्वार वन्द किया था। इतना ही नहीं मिलाने वाल यथेष्ट गन्दो को मिलाकर नी अन्तिम शब्द के वाद 'वृत्' को स्थान दे सकते थे । सम्भवत यही कारण है कि वृत्करण की प्रक्रिया पठिनगणो मे भी सर्वत्र नही पायी जाती। इसके अतिरिक्त एक बहुत स्पष्ट तथा प्रमुख कारण यह जान पडता है कि गणपाठ के प्रति पाणिनीय सम्प्रदाय के अध्यापना व्याख्याताओ तथा टीकाकारो का, सम्भवत सदा से ही पर्याप्त उपेक्षित दृष्टिकोण रहा है । हरदत्त के लेख से यह पता लगता है कि काशिका मे प्राचीन वृत्तिया मे गणपाठ को स्थान नहीं दिया जाता था। कुछ विद्व नो ने इधर थोडा बहुत ध्यान देकर गणपाठ की वृत्ति अथवा व्याख्या की रचना की भी तो, विद्व नो की दृष्टि स उपक्षित रहन के कारण आज उनका अस्तित्व भी इतस्तत प्राप्त दो एवं उद्धरणा के रूप मे उपलब्ध हो पाता है । इस विषय मे यथा स्थान पयाप्त सूचनाये दी जा चुकी है। पदस्थस्यापि पर यया न्यादिति, परमसर्पि फ्लमित्यमादिप्रयुदाहरगादि पारायणिका श्राः । भाष्प वृत्तौ च नियममासेऽनुत्तरपदस्थ येत्यत्र परमसरि कुष्टिा तर मन्युदाहरणम् । का (८।३ | ४८) १ नृत्यन्तरेणु तु गणपाठ एप नास्ति । ५०म० मा० । पृ०४ ।

१५८ सं० व्या० मे गणपाठ की परमरा और आचार्य पाणिन इन विशिष्ट कारणो के अतिरिक्त कुछ सामान्य कारण भी उपस्थित किये जा सकते है जो प्राय सभी सस्कृत वाङ्मय की प्राचीन पुस्तकों मे मिलने वाले पाठभेदो के कारण के रूप मे अनुमानित होते है । इन मे दो कारण ऐसे है जो बहुत ही स्वाभाविक जान पड़ते है। एक तो यह कि समय क्रम से लिपियो मे पर्याप्त परिवर्तन होते रहे इस से प्राचीन काल मे लिखी गई पुस्तको की प्रतिलिपि करते समय उत्तरकालीन लेखको के द्वारा ठीक ठीक न पढा जा सकने पर व लोग अपने अनुमान तथा कल्पना द्वारा अपठित अश की पूर्ति कर लेते थे । इस रूप मे विभिन लेखका द्वारा विभिन्न पाठ स्वीकार कर लिये जाने के कारण अनेक पाठभेदो का उत्पत हो जाना अत्यन्त स्वाभाविक है। दूसरा इसी से मिलता जुलता कारण भाषा के उच्चारण की विभिन्नता है। प को ख य को ज व को ब, प को श तथा स के रूप मे, अथवा इस से विपरीत दूसरे के स्थान मे दूसरे का उच्चारण आदि, मे उपस्थित किये जा सकते है। इस उच्चारण दोप के कारण जिस रूप मे उच्चारण होने लगा, उसी रूप मे वह लिखा भी जाने लगा । इस कारण भी शब्दो के पाठभेदो की वृद्धि न केवल स्वाभाविक अपितु अनिवार्य है। इन सामान्य और विशेष कारणो का मिला जुला परिणाम, जो कि अत्यन्त स्वाभाविक था आज गणपाठ की उपरोक्त दुरवस्था के रूप मे विद्यमान है । कही कही स्थिति यहा तक पहुच गयी है कि अनेक पाठभेदो के मध्य शुद्ध पाठ का निर्धारण कर सकना कठिन ही नहीं अपितु किसी ठोस आधार के अभाव मे सर्वथा असभव प्रतीत होता है । गणपाठ के संशोधन में पाणिनि कात्यायन तथा पतंजलि उदाहरण रूप की सहायता यो तो पाणिनीय गणपाठ के सशोधन के प्रसग में ऐसी कोई कसौटी नही उपस्थित की जा सकती जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि गणपाठ मे इतने ही शब्द पाणिनीय है इतने नही ! फिर भी गण के प्रथम शब्दो तथा कुछ ऐसे शब्दो को जिनका निर्देश स्वय पाणिनि ने अपने सूत्रो मे किया है को सर्वथा पाणिनि प्रोक्त ही मानना होगा। जैसे सर्वादिगण पाणिनीय गणपाठ के सशोधन की समस्या तथा उसका समाधान १५९ के डतर आदि पाच शब्द' पूर्व आदि नव' शब्द तथा कोटरादिगण ।' इसी प्रकार गणपाठ के जिन जिन शब्दो के उन गणो मे रखे जाने के प्रयोजन आदि पर कात्यायन ने अपने विचार प्रस्तुत किये है उन्हे भी विशुद्ध रूप से पाणिनीय ही मानता होगा। यथा-सर्वादिगण मे उभ तथा भवत्' शब्द भिक्षादिगण मे भुपति शब्द कच्छादिगण मे साल्व' शब्द विल्वादिगण मे गवीधुका शब्द तथा युक्तारोहयादिगण मे एकशितिपात् शब्द । इसी तरह गणपाठ के जिन जिन शब्दो के साथ कात्यायन ने किसी विशिष्ट उपाधि का सयोजन करना चाहा है उन्हे भी पाणिनीय ही मानना -निष्टदग्वादिगण क तिष्ठद्गु अथवा खलेयवादि" शब्द अजादिगण का शुद्धा शब्द अथवा कुवादिगण का वामरथ शब्द । कात्यायन के समान पतजलि ने भी गणपाठ के कुछ शब्दो को आचार्य पाणिनि की विभिन्न प्रवृत्तियो का ज्ञापक बताया है।" यथा- होगा। यथा- १ द्र० अदड् डतरादिभ्य पचभ्य । पा० ७ । १ । २५ ।। २ द्र० पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा । पा०७।१ । १६ ॥ द्र० वन पुरगामिश्रकासिघशारिक कारराग्रभ्य । पा० ८।४। ४ ॥ ४ उभभ्य मवनाम जर्थ । नवा० पृष्ठ ३० । ५ भवतो अकच्छषात्वानि । वरी पृष्ठ ३० । ६ भिक्षादिषु युवतिग्रगानर्थक्यं पुवद्भावम्य सिद्धत्वात् प्रययविधौ । महा० ४।२।८॥ ७ साल्वाना कच्छादिष पाठो अण विधानार्थ । मग० ४ । २ । १३३ । ८ विल्वादिषु गर धुकाग्रहण मयर प्रतिपेध र्थन् । महा० ४ । ३। १३४ ॥ ६ एकशितिपात् स्वरवचन तु शापक निमित्तस्परपलीयस्वस्य । महा०२।१।१ ०६१ ॥ १० तिष्ठगु कालविशपे । महा० २।१।१७॥ ११ सलयवादीनि प्रथमान्तानि अय पदार्थ 1 महा०२।१।७॥ १२ शूद्रा चामहत्यूवा महा०४।१।४। १३ वामरथस्य करावादिवत् स्वरवर्जम् । महा० ४।१।१५१ । १४ द्र० पूर्व पृष्ठ २४६ ।

सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि गौरादि मे श्वन् गब्द, शरत्प्रभृति मे विपाट शब्द, अश्वादि मे राजन् शब्द सवनादि मे अश्वसनि शब्द तथा शुभ्नादि मे 'नृनमन्' और तृप्नु शब्द इन शब्दों को भी पतजलि के प्रामाणिक वचनों के आधार पर पाणिनीय 'ही मानना होगा। इस के साथ ही हम यह भी कहना चाहेंगे कि कात्यायन की विभिन्न वार्तिकों का अनुकरण करते हुए चन्द्रगोमी तथा काशिकाकार इत्यादि ने जिन शब्दों या गणसूत्रों को पाणिनीय गणपाठ में मिला दिया है, तथा जिन्हें गणपाठ मे प्रतिष्ठित मानते हए तत्सम्बद्ध वार्तिकें मर्वथा निष्प्रयोजन हो जाती हैं, जिनका यथावसर ऊपर निर्देश किया जा चुका है, उन्हें कात्यायन की प्रतिष्ठित प्रामाणिकता के आधार पर निश्चित रूप से अपाणिनीय मानना होगा। इसी प्रकार उन शब्दों को जिन्हें किसी प्रसंग मे पतजलि ने तत्सम्बद्ध गणों में पढ़ने मे निषेध किया है उन्हें पाणिनीय नही माना जा सकता। यथा-द्वारादिगण का स्वाध्याय शब्द ।' परन्तु पाणिनि, कात्यायन तथा पतंजलि द्वारा उभय प्रकार के निर्दिष्ट शब्दों की संख्या अंगुलियों पर गिनने लायक होने के कारण गणपाठ के अन्य अनिर्दिष्ट गब्दों के महार समूह के संशोधन की समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है। गणपाठ के संशोधन में काशिका का स्थान इममे कोई सन्देह नही कि काशिकाकार द्वारा, अपने गणपाठ के विषय में, की गई शुद्धगणों की घोषणा बहुत कुछ सत्य है, क्योंकि काशिका मे विद्यमान गणपाठ की अन्य पाणिनीय एवं अपाणिनीय गणपाठों के साथ पारस्परिक तुलना करने पर काशिका में मिलने वाले शब्द ही प्रायः अधिक शुद्ध निकलते हैं। परन्तु केवल काशिका के गणपाठ को ही एकमात्र प्रामाणिक मान कर उसके आधार पर पाणिनीयता और अपाणिनीयता का निर्णय कर देना उचित नहीं कहा जायगा। क्योंकि एक तो काशिकाकार की गणपाठ विषयक नीति, जिमका ऊपर निर्देश किया जा चुका है, कुछ ऐमी घोलमाल या सम्मिश्रण की रही है, जिसे गणपाठ की पाणिनीयता की १.द्र०पूर्व ६६ २. पूर्व पृष्ठ ६६,१०० पाणिनीय गणपाठ के सशोधन की समस्या तया उमका ममावान १६१ - सुरक्षा की दृष्टि से कथमपि उपादेय नहीं माना जा सकता। दूसरे अाज से शताब्दियो पूर्व विरचित काशिकावृत्ति तया उसमे पाया जाने वाला गणपाठ किस रूप मे उपलब्ध है, लेखको या लिपिकारो के प्रमादजन्य दोषो से उसके स्वरूप मे कितना परिवर्तन हो गया है इन मव बानो पर भी तो ध्यान देना ही होगा। काशिका के हस्तलेख तथा प्रकागित सस्करण की पारस्परिक तुलना करने पर अनेक विषम स्थल सामने आते है। गणपाठ के अनेक स्थला पर वहुत से ऐसे गन्द मिल जाते ह जिनका प्रकाशित मस्करण म अभाव पाया जाता है । जैसे—सख्यादिगण मे सुरस शब्द अथवा प्रेक्षादिगण मे सकटसुक आदि । इस के विपरीत कुछ ऐसे भी स्थल उपस्थित किये जा सकते है जो कागिका के प्रमाणित सस्करण के उन उन गणो म तो मिल जाते है पर हस्तलेख मे नही मिलते। जैसे-अश्वादिगण मे प्राच्य, कित, काण चुम्प, श्रविष्ठा इत्यादि गब्द । इसके अतिरिक्त एक वात और ध्यान दने योग्य है कि कामिका के व्याख्याकार जिनेन्द्रबुद्धि ने अपनी कामिकाविवरण पजिका मे, कुछ स्थलो पर गणपाठ के कुछ शब्दो को प्रमादजन्य दोप के कारण स्थान प्राप्त आ है, एसा माना है।' इमलिये ऐसे स्थलोका अस्तित्व एव काशिकाकार की सूनपाठतथा गणपाठ दोनो मे, चन्द्रगोमी के अनुकरण पर, कात्यायन 7 वातिको के सम्मिश्रण की नीति काशिका के गणपाठ की पाणिनीयताविषयक प्रामाणिकता को पूर्ण सन्दिग्ध बना देते हैं। /प्रक्रियाकौमुदी में प्राप्त गणपाठ का उपयोग काशिकावृत्ति मे दृष्टिगोचर होने वाले गणपाठ के पश्चात् पाणिनीय गणपाठ का दर्शन इमा की १५वी शताब्दी के विद्यमान रामचन्द्र की रचना प्रक्रियाकौमुदी मे होता है । यद्यपि रामचन्द्र ने पाणिनीयगणपाठ के सभी गणो का पाठ नही किया है, तयापि उसो पोन विट्टलकृत टोमा मे प्राय सार गण मिल जाते है। यहा मिलने वाला गणपाठ काशिकास्थित गणपाठ काअनु- करण मात्र है। वही कही कुछ विभिनताये तथा पाठभद अवश्य प्राप्त हो जाते , द्र० न्याम !२1३५१०६६ । ० द्र०मिमाम श्राप सम्गत ग्रामर, पृ ४५ २१ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि - है। अत गणपाठ के संशोधन मे इस पुस्तक से भी थोडी बहुत सहायता मिल सकती है। परन्तु इसे काशिका की अपेक्षा अधिक प्रामणिकता देना अनुचित होगा। गणरत्नावली का उपयोग यज्ञेश्वर भट्ट ने पाणिनीय गणपाठ का, वर्धमान की गणरत्नमहोदधि की पद्धति के अनुकरण पर, श्लोकबद्ध सग्रह करके उस पर अपनी अति सक्षिप्त व्याख्या प्रस्तुत की है। पाणिनीय गणपाठ की यही एक व्याख्या है जो आज भी किसी प्रकार उपलब्ध है । परन्तु इसवी रचना का समय शक मवत् १७९६ हे ।' इस कारण समय की दृष्टि से यह विशेष प्राचीन नही है। यज्ञेश्वर भट्ट न गणरत्नावली मे अनेक स्थलो पर पाणिनि के उन उन गणो मे वर्धमान के द्वारा गणरत्नमहोदधि मे बढाये गये शब्दो की निष्प्रयो जनता का प्रतिपादन वरन का प्रयास किया है। यथा-सर्वादिगण' मे अन्योन्य परस्पर तथा इतरेतर शब्दो के विषय मे अथवा स्थूलादि गण मे समिश्रित अनेक शब्दो की अनावश्यक स्थिति के विषय मे यज्ञेश्वर भट्ट का क्थन द्रष्टव्य है । इसलिये इस दृष्टि से इस वृत्ति की सहायता अपेक्षित है, पर वत्त अधिक मात्रा मे इस वृत्ति से सहायता की आशा करना दुराशा मात्र होगी क्योकि काशिका के गणपाठ तथा गणरभावली के गणपाठ की पारस्परिक तराना करने पर कुछ पाठभेद अवश्य प्राप्त होते है, पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इसमे प्राय काशिका का ही अनुवरण किया गया है । विपत उन स्थलो पर जहाँ काशिकाकार ने उपरिनिर्दिष्ट नीति के अनुसार पाणिनीय गणपाठ मे कात्यायन की वातिवो के आधार पर शब्दों तथा विविध गणसूत्रो का समावेश किया है । इसके अतिरिक्त कही कही वर्धमान की अनुकृति की भी स्पष्ट छाप गणरत्नावली पर विद्यमान है। इसलिये गणपाठक सशोधन मे इस पुस्तक का उपयाग तो किया जा सकता है, पर इस पर ही आवृत नही रहा जा सकता। ' द्र०-शा रसाकमनिभूमितऽ । ग० २० । पत्रा० १२३ ॥ द्र. ग. र०पना । २ द्र.पही पत्रा १११ ।

पाणिनीय गणपाठ के संगोधन की समस्या तथा उसका समाधान १६३ गणपाठ के विविध हस्तलेख पाणिनीय गणपाठ के विविध हस्तलेख, जो हमे मिल सके है, पर्याप्त आधुनिक है । तथा- यादृशं पुस्तकं दृष्टं तादृशं लिख्यते मया । यदि शुद्धमशुद्धं या मम दोपो न विद्यते ॥' और मक्षिकास्थाने मक्षिकापातः की नीति पर चलने वाले, संस्कृत भाषा से भी संभवतः अनभिज्ञ लिपिकारों द्वारा लिखित होने के कारण बहुत अधिक अशुद्ध है । पाणिनीय तथा अपाणिनीय सम्प्रदाय मे मिलने वाले गणपाठ के अन्य स्रोतों से इन हस्तलेखों की तुलना करने पर यह भी पता लगा है कि कही कही इनमे भी पाठभेदों को स्वतंत्र शब्द मान कर गण में उनका पाठ करने की जैनेन्द्र भोज तथा हेमचन्द्र के व्याकरण मे पाई जाने वाली प्रवृत्ति विद्यमान है । इसी कारण पक्षादि गण मे तुष तथा तुक्ष इन दोनों शब्दों का पाठ किया गया है, जब कि तुक्ष वामन स्वीकृत पाठ है तथा तुप वर्षमान आदि का । इसी गण का दूसरा शब्द कम्बलिक है, जिसके स्थान पर पाल्यकीति का पीलिक तथा हेमचन्द्र के गणपाठ मे बलिक पाठ है । हस्तलेख संख्या २, ३, ४ मे कम्यलिक तथा बलिक दोनों शब्दों का पाठ मिलता है । इसी तरह कुमुदादि गण के मुचकर्ण के स्थान पर जैनेन्द्र तथा हैमव्याकरण के गणपाठ मे शुचिकर्ण पाठ मिलता है, पर ये दोनों ही गन्द हस्तलेख संख्या दो यथा तीन मे उपर्युक्त गण मे पठित है इसके अतिरिक्त इन हसलेखों मे कुछ ऐसे भी शब्द मिल जाते है, जिन्हें क्सिी विशिष्ट वैयाकरण के मत के रूप मे वर्धमान ने अपनी गणरत्नमहोदधि प्रस्तुत किया है। यथा-काश्यादि गण मे अरित्र शब्द के पाठ को वर्षमान केवल भोज सम्मत पाठ मानता है, परन्तु गणपाठ के विभिन्न हस्तलेखों में यह शब्द पठित है । गणपाठ का हस्तलेख संख्या तीन यद्यपि पर्याप्त स्पष्ट तथा शुद्ध है, परन्तु स्थल स्थल पर इममे वर्धमान के गणरत्नमहोदधि का अनुकरण किया गया है। इनके बीच मे चान्द्र, शाकटायन (जैन) के पाठभेद भी दिये गये है तथा वही कही शब्दों की वृद्धि भी उन उन गणों में की गई है। पाठभेदो को स्वतंत्र गब्द मान लेने की प्रवृत्ति तो इस हस्तलेख मे पर्याप्त मात्रा में मिलती है।

स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि अत हस्तलेखो की सहायता भी थोडी बहुत तभी उपादेय हो सकती है, यदि इन के प्रति पूरा पूरा जागरूक रहा जाए। अपाणिनीय सम्प्रदायों के विभिन्न गणपाठों का उपयोग अपाणिनीय सम्प्रदायो के गणपाठो मे, जिनके स्वरूप इत्यादि के विषय मे ऊपर विस्तार से विचार किया जा चुका है, मुख्यत चन्द्रगोमी, जैनेन्द्र, पाल्यकीति, भोज, हेमचन्द्र तथा वर्धमान के गणपाठो से काशिका मे मिलने वाले गणपाठ की तुलना करते स्वरविषयक गणो के अतिरिक्त गणो के सशोधन मे, बहत कुछ सहायता प्राप्त की जा सकती है। क्योकि, इन वैयाकरणो ने सामान्य परिवर्तन तथा परिवर्धन, एव थोडे बहुत पाठभेदो के साथ, पाणिनीय गणपाठ पर ही अपने अपने साम्प्रदायिक नामपट्ट लगा कर, अपने अपने व्याकरणो मे प्रतिष्ठापित कर लिया है । यद्यपि जैनेन्द्र तथा शाकटायन के गणपाठो मे अपभ्रष्टता अधिक माना मे पाई जाती है जिसके कारण कही कही शब्दो का स्वरूप ही बदल गया है, फिर भी भोज, हेमचन्द्र तथा वर्षमान के साथ तुलना करने पर शब्दो के शुद्ध स्वरूप का थोडा बहत पता लगाया जा सकता है । भोज का गणपाठ सूत्रो मे ही प्रतिष्ठित होने के कारण औरो की अपेक्षा कही अधिक, शुद्ध और अपने रूप मे प्रामाणिक है। वर्षमान की गणरत्नमहोदछिका व्याख्येय गणपाठ भी अपने अज्ञात नामा व्याकरण सम्प्रदाय की दृष्टि से, पर्याप्त शुद्ध जान पडता है क्योकि इसमे साथ ही साथ वृत्ति अथवा व्यान्या होने के कारण शब्दो की स्वस्थता अधिक स्वाभाविक है । विशेष कर एगलिंग महोदय द्वारा सम्पादित गणग्न- महोदवि अत्यधिक उपादेय है । हेमचन्द्र तथा वर्धमान के गणपाठो से तथा विशेषत वर्धमान की गण- रत्नमहोदधि स हमे विभिन्न आचार्यो तथा टीकाकारो के विभिन्न मतो तथा पाठभेदो वो जानने मे पर्याप्त सहायता मिल सकती है। अोटो वोथलिंक सम्पादित गणपाठ ओटो बोलिक महोदय ने सन् १८४० मे अष्टाध्यायी के सूत्रो की जर्मन- व्याख्या के प्रसग मे पाणिनीय गणपाठ को यथासंभव शुद्ध रूप मे रखने का स्तुत्य प्रयास किया है । परन्तु जैसा कि गणपाठ के अन्य स्रोतो से उसकी तुलना करने पर पता लगता है, इनका सशोधन अधिकतर यज्ञेश्वर भट्ट की - पाणिनीय गणपाठ के संशोवन की समस्या तथा उसका समाधान १६५ गणरत्नावली तथा हमारे गणपाठ के हस्तलेख (नं०३ के साथ मिलते जुलते पाठ वाले अन्य हस्तलेख) को ही संभवतः एकमात्र आधार मानकर सम्पन्न हो सका है । इसलिये गणरत्नावली तथा हस्तलेखो की स्थिति के, जैसा कि ऊपर दिखाया गया है, वहत अधिक विश्वसनीय न होने के कारण ओटो वोलिक का यह गणपाठ भी अत्यधिक प्रामाणिक नही माना जा सकता। गणपाठ के संशोधन का संभव प्रकार पाणिनि, कात्यायन तथा पतजलि के प्रामाणिक वचनो द्वारा निर्दिष्ट गणपाठ के शब्दो से अतिरिक्त शब्दो की पाणिनीयता के प्रतिपादन की अथवा दूसरे शब्दो मे पाणिनीय गणपाठ मे स्थान देने की, किसी भी प्रामाणिक क्सौटी के अनुपलब्ध होने के कारण कुछ सभव उपायो का निर्धारण करना अत्यावश्यक है। इस दृष्टि से निम्न उपाय प्रस्तुत किये जा रहे है । १-काशिका, काशिका के हस्तलेख, प्रक्रियाकौमुदी, गुणरत्नावली, पाणिनि गणपाठ के हस्तलेख तथा ओटो बोलिक द्वारा सशोधत गणपाठ इत्यादि, पाणिनीय सम्प्रदाय से सम्बद्ध सभी स्रोतो मे प्राप्त होने वाले गणपाठ के शब्दो का एक ओर तो परसर तथा दूसरी ओर पाणिनि से इतर-चन्द्रगोमी, जैनेन्द्र, जैनशाकटायन, भोज, हेमचन्द्र तथा वर्षमान इन विभिन्न-सम्प्रदायो के गणपाठो के शब्दो के साथ तुलना करने पर जो शब्द एक साथ सभी स्रोतो मे मिल गए है, उन्हे पाणिनीय गणपाठ के मूलभाग मे स्थान दिया जा सकता है। २-जो शब्द पाणिनीय सम्प्रदाय के सभी ग्रन्यो मे न मिल कर केवल एक दो मे मिलते है, परन्तु वाद के चान्द्र इत्यादि के गणपाठो मे मिलते हैं, उन्हे भी मूलभाग मे स्थान दिया जा सकता है । ३--जो शब्द केवल पाणिनीय गणपाठ के हस्तलेखो तथा काशिका अथवा काशिका के हललेखो मे प्राप्त होते हैं उन्हे भी प्रवानता देते हुए, अन्यन सर्वत्र अप्राप्त होते हुए भी मूलभाग मे स्थान दिया जाना चाहिए । ४-इसके अतिरिक्त पाणिनीय सम्प्रदाय की, गणपाठ के शब्दो से थोडा सा भी सम्बन्ध रखने वाली उपलब्ध सभी पुसको मे उन उन शब्दो के विषय मे मिलने वाली विकीर्ण सम्पूर्ण सामग्री के विवेचनात्मक आधार पर ठीक स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि जंचने वाले शब्दो को भी मूलभाग मे प्रतिप्रित किया जा सकता है । भने ही वे शब्द पाणिनीय सम्प्रदाय के सभी ग्रन्थो मे न मिलते हा ! ५---इसी तरह लौकिक तथा वैदिक कोपो और सस्कृत वाडमय के प्रसिद्ध ग्रन्थो के अवलोकन से जिन शब्दो के उन उन गणो मे रहने स निष्पन्न होने वाले प्रयोगो की साधुता प्रमाणित होती है, उन्हे पाणिनीय गणपाठ विषयक किसी एक भी ग्रन्थ मे पाठ मिल जाने पर स्थान दिया जाना चाहिए। ६–आकृतिगणो के विषय मे यद्यपि विशेष विवेचन की आवश्यकता तो नही प्रतीत होती पुनरपि यह उचित प्रतीत होता है कि उन शब्दो को भी मूल भाग मे स्थान दिया जाए जिन्ह उन उन गणो मे पढे जाने के लिये बाधकबाधनार्थ ( वावक रूप मे प्राप्त होने वाले प्रत्यय को बाधने के लिये ) जैसे विशिष्ट प्रयोजन काशिकाकार आदि ने उपस्थित किऐ है । इसके साथ ही काशिका, अयवा काशिका के हस्तलेख तथा गणपाठ के हस्तलेखो मे मिलन वाले प्राय सभी शब्दा को थोडी बहुत विवेचना के आधार पर, यदि उनकी स्थिति आवश्यक प्रतीत हो, तो मूल भाग मे स्थान मिलना ही चाहिये । क्योकि यह कह सकना तो सर्वथा असभव है कि आचार्य पाणिनि ने कितने शब्द अ'कृतिगणो मे पढे थे। हम पूर्व आकृतिगणो के प्रमग मे प्रतिपादन कर चुके है कि आकृतिगणो मे भले ही कुछ शब्द उपलक्षणार्थ रस दिये हो, पर आजकल मिलने वाले सारे शब्दो का पाठ तो पाणिनि ने नही ही किया था।" उपलक्षणर्थ भी क्तिने शब्दो का पाठ पाणिनि ने किया था, यह भी आज ठीक ठीक जानना सर्वथा असंभव ही है। साथ ही यह भी नहीं कहा जा सकता कि आकृतिगणो मे काशिकाकार आदि द्वारा पठित शब्दो की लम्बी सूची वहा असगत या असाधु है । इसलिये पाणिनीय सम्प्रदाय से सम्बद्ध होने के कारण अरोक्त प्रोता मे पाये जाने वाले आकृतिगण विषयक गब्दा को पाणिनि द्वारा उनके पठित होने की स्थिति को अस्वीकार करते हुए भी उन उन आकृतिगणो मे स्थान दना आवश्यक तो नही पर उपादेय अवश्य है। ७-पूर्व गणसूत्रो की समस्या पर विचार करते हुए विस्तार स हमने यह सिद्ध किया है कि गणसूत्रा के र यता आचार्य पाणिनि नही है। कही यही अनावश्यक अमगत तथा पुनरक्ति दोप मे ये गणसूत्र पूर्णतया दूपित है तथा कही कही कात्यायन की विभिन वातिका के आधार पर इनकी रचना पाणिनीय गणपाठ के सशोधन की समस्या तथा उसका ममाधान १६७ माकार हो सकी है। जो भी हो, हमे ये गणसूत्र, कथमपि, पाणिनि विरचित नही प्रतीत होते । तथा इसी प्रकार कात्ययान के वार्तिको के आधार पर, चन्द्रगोमी का अनुकरण करते हुए प्रमुख एव प्राचीन वृत्तिकार जयादित्य तथा वामन ने अपनी काशिकावृत्ति मे अनेक गणो मे अनेक शब्दो को समाविष्ट कर दिया है । इनकी चर्चा पूर्व की जा चुकी है । कात्यायन की वार्तिको के होते हुए इस प्रकार के शब्द उन उन गणो मे अनावश्यक प्रतीत होते हैं अथवा उनके उन उन गणो मे रहते हुए, उमी दृष्टि से रची गई कात्यायन की वे वार्तिके अनावश्यक प्रतीत होती है । इसलिये कात्यायन को अधिक प्रामा- णिकता देते हुए, हम इस प्रकार के शब्दो का उन उन गणो मे पाठ अपारिण- नीय समझते है। पर इन दोनो प्रकार के गणसूत्रो तथा इस प्रकार के शब्दो को पाणिनीय गणपाठ के मूलभाग से हटा देना भी हम इसलिये ठीक नही समझते वि उप- युक्त दोनो ही धारणाये अभी पूर्णत निश्चय का रूप नहीं प्राप्त कर सकी हैं। यह तो हुई पूरे पाणिनीय गणपाठ को ध्यान मे रख कर उसके सशोचन की मामान्य स्थिति । इसके अतिरिक्त कुछ विशिष्ट गणो के सशोपन या परीक्षण के लिये कुछ विशेष आधार अपनाये जा सकते है । १-पाणिनीय गणपाठ क स्वरादि, चादि उर्यादि तया साक्षात्प्रभृति गणो मे पठित शब्दो की परीक्षा के लिये अमरसिह आदि के कोषो के अन्यय प्रकरण से यथा सम्भव सहायता ली जा सकती है। २-अर्धर्चादि गण मे पढे गये शब्दो की विस्तृत समीक्षा के लिये इन शब्दो की तुलना पाणिनि के नाम से प्रसिद्ध लिंगानुशासन के पुनपु सक प्रकरण के गन्दो, तथा जिन शब्दो के पुन्नपु सक्त्व की स्वीकृति पुनपु सक प्रकरण के अतिरिक्त सूत्रो मे विद्यमान है, उन दान्दो के साथ की जा सकती है। काशिया आदि मे कुछ ऐसे भी शन्द अवश्य मिल सकते हैं जो लिगानु शासन के इन प्रकरणो मे मम्भवत न मिल सके । परन्तु अन्य स्रोतो के आधार पर उन्हे पाणिनीय गणपाठ में स्थान दिया जा सकता है। ३-पलादि, यस्यादि, तिककितयादि, उपकादि, कुञादि, गगांदि, नडादि, तया विदादि गणो की जिनमे गोत्रवाची शब्दो का पाठ मिलता है, तथा उन अन्य गोषवाचक शब्दो की जो इतस्तत अन्य किमी गण में १६८ पाणिनि से उत्तरवर्ती वैयाकरण और उन के गणपाठ अलग अलग पढे गये हैं, परीक्षा या संशोधन के लिये प्रो० जान अफ द्वारा अनूदित गोत्र प्रवरमजरी मे मिलने वाले वौधायन आपस्तम्ब आश्वलायन श्रौतसूनो तथा कात्यायन लौगाक्षि, शुक्लयजुर्वेद परिशिष्ट, मानव प्रवराध्याय तथा मत्स्य पुराण के गोत्र विषयक सूचिया मे विद्यमान शब्दो के साथ शब्दश तुलना की जा सकती है। कुछ थोटे से ऐसे शब्द भी उपर्युक्त गणो मे स्थान प्राप्त किये हुए मिल सकते है जो गोनप्रवरमजरी मे निर्दिष्ट उपर्युक्त पुस्तको मे नही मिलते । पर अन्य स्रोतो मे मिलने के कारण उन्हे भी उन उन गणो मे स्थान देना आवश्यक प्रतीत होता है । ४-पष्टाध्याय के प्रथम पाद के उच्छादि गण से लेकर द्वितीय पाद के गौरादि गण तक के शब्दो की तुलना के लिये भोज के सरस्वती कण्ठाभरण को छोड कर, अन्य सम्प्रदाय के वैयाकरणा अथवा उनकी व्याकरण विषयक मामग्री स कोई सहायता नही मिल सकती । इसलिये पाणिनीय सम्प्रदाय के ही विभिन्न, उपरिनिर्दिष्ट स्रोतो तथा भोज के सरस्वती कण्ठाभरण मे मिलने वाले स्वरविषयक गणो के शब्दो की पारस्परिक तुलना से ही सन्तोप करना पटेगा । हा स्वरविषयक तथा पाणिनीय सम्प्रदाय से सम्बद्ध अतिविश्वसनीय पुस्तक स्वरसिद्धान्तचन्द्रिका मे उपन्यस्त गणो स काशिका के उन उन गणो की तुलना की जा सकती है, तथा अनेक शब्दो के विषय मे विभिन्न उपाय विवाद तथा वैदिकसाहित्य से विविध उदाहरणो के सग्रह मे पर्याप्त सहायता प्राप्त की जा सकती है। इत्यलमतिविस्तरेण उद्धृत प्राक्पाणिनीय गण उपलब्धि स्रोत वा विशेष वक्तव्य पृष्ठ १७ २८ २१ २८ " २१ १७ २१ २९ गणनाम निर्धारक आचार्य अक्षरसंहितादि ते० प्रा० अघ्न्यादि उणादिकोष अजिरादि अ० प्रा० अब्दादि उणादिकोप अलीकादि अविरादि ऋक्तत्र अश्वादि अ० प्रा० उत्तम्भनादि वा० प्रा० एनाअहादि अ० प्रा० एवादि फिटसूत्र कर्दमादि कृतादि भागुरि कृततूस्तेभ्य० ( ३।१।२१) पाणिनि कौतस्कुतादि ऋक्तत्र कस्कादि-पाणिनि आदि क्षिप्नादि कागकृत्स्न तम्नादि-पाणिनि- आदि ग्रामादि फिटसूत्र वृपादि-पाणिनि उञ्छादि-पाणिनि चूर्णादि अष्टाध्यायी (६।२।१३४) पाणिनि को स्वीकृत तोल्वल्यादि पदमंजरी (भा० पृ० ४८९) २२ २४ १९, ५५, ७१ २५, ४८,५९ इत्यादि २९ २९ घृतादि " २९, ३० ३०,३१ १७० सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि उपलन्धि स्रोत वा विशेष वक्तव्य गणनाम निर्धारक आचार्य पृष्ठ दीर्घायुत्वादि अ० प्रा० २१ पटादि अक्तत्र पादादि अ० प्रा० २१ पिप्पल्यादि गौणादिगण (द्र० गौरादि पाणिनि ३३, ३४, ६६, काशिका ४११४१) ७७, ८८,८९ पुच्छादि भागरि पुच्छभाण्ड० (३।११२०) पाणिनि पृपोदरादि ऋक्तत्र पाणिनि आदि १९, ६३, ६८ को स्वीकृत इत्यादि वृहस्पत्यादि अ० प्रा० 'उभे वनस्पत्यादिषु युगपत्' तथा 'देवता द्वन्द्वे च' (६।२।१४०- १४१)-पाणिनि २१, २२, ५५ भूतादि अ० प्रा० २१ मन्द्रादि १७ मुण्डादि भागुरि मुण्डमिश्रश्लक्षण पाणिनि (३।११२१ मेण्यादि भारद्वाज शिक्षा २३ येत्यादि ऋ० प्रा० १७ रोयादि महा० ( ४११७९ ) क्रोड्यादि-पाणिनि आदि रूढादि ३६, ३७,५५, शा० है। ११७ वत्सतरादि ऋक्तत्र १९ व्याघ्रादि अ०प्रा० शकन्धुपादि अक्तंत्र शकवादि-यात्या- यन (६।१।९४) १९,९७ शतादि अ० प्रा० शावल्येप्यादि अ० प्रा० २१ ते० प्रा० उद्धृत प्राक्पाणिनीय गण उपलब्धि स्रोत वा विशेष वक्तव्य पृष्ठ गगनाम निर्धारक आचार्य भारद्वाज शिक्षा २३ १७ शीभादि शेत्यायनादि श्लोकादि ते० प्रा० सत्यादि २१ सत्रसाहादि सर्वादि भागुरि श्लोकसेना० (३।१। २५) पाणिनि भागुरि सत्यापपाश० पाणिनि (३।१। २५) अ० प्रा० आपिशलि तथा पाणिनि आदि के चाक्रवर्मण भागुरि पाणिनि आदि को स्वीकृत यहाँ क्रम विपर्यय २६, २७ २४, ६४, १३७, १४१ . स्वस्रादि उद्धृत पाणिनीय गण गणनाम अक्षयूतादि अगुल्यादि अजादि अजिरादि अनुप्रवचनादि अपूपादि अयस्मयादि अरीहणादि अर्धर्चादि अर्शआदि अश्वपत्यादि अश्वादि आकर्षादि आहिताग्न्यादि इन्द्रजननादि उक्यादि उञ्छादि उत्करादि उत्सादि उद्गात्रादि उपकादि उर प्रभृति ऊर्यादि गयनादि ऐपुकार्यादि गणपाठस्थ स्थल पृष्ठ संख्या ४।१ । १९ १३५ ५।३।१०८ ११९, १४५ ४।४।१ ९०, ९४, १३९, १४१, १५५, १५९ ६। ३ । ११८ १४०, १५२ ५।१।१११ १११, ११८, १३४, १५६ ५।१।४ ८९, १११ १।४। २० ४।२८० ११२, १३५, १४९, १५२ २१४ । ३१ ४७, ६३, ११२, १३०, १३३, १४०, १६७ ५।२।१२७ ११९ ।१।८४ ११८,१३४ ४।१।११० १४९, १५०, १६०, १६१ ५।२। ६४ ११९ २।२1 ३७ ११८ 61३1८८ ५९, १११, १३४ ४।२।६० ११८, १५० ६।१ । १५ ६३,१६८ ४।२।९० १२६, १५२ ४५.१४९ ५।१।१२९ १३५ २।४। ६९ १४९, १५०, १६७ ५1८।१५१ १।४।६१ १६७ ४१३।७३ ११८, १२५ ४।२। ५४ उद्धृत पाणिनीय गण १७३ गणनाम क्च्छादि कडारादि कण्ड्वादि कण्वादि कल्यादि कथादि क्यादि वर्णादि क्ल्याण्यादि कस्कादि गणपाठस्थ स्थल पृष्ठ संख्या ।२।१३३ ९५, १५२, १५९ २।२। ३८ १२३ ३।१।२७ ४।२।१११ ४५, ७५, ८०, ९४ ४।२।९५ १५२, १५६, ४१४११०२ १३, ६४, ११०, १२२, १३४, १४५, १५० ६ । २ । ८७ १५२ ५।२।२४ १४०, ४।१।१२६ ८७, १४२ ५५, ९६, १००, १०४, १११, १२५, १३४, १४९, १५६ ६। २। ३७ ६७ ४।२।८० १५२, १६३ ६।३।११६ १११, ११९, १३४, १५२ 61१1९८ १३७, १३८, १४१, १५०, १६७ ४।२।८० १६३ ५।४।१३९ १४२, 1१ । १५१ ९४, ११४, १२५, १२७, १५९ ५३, १२०, १५२ ।२।६१ ८३, १२०, १५० ४।१।८० ३६, ३७,५६,९४,१०१,११७, कार्तकोजपादि काश्यादि किंशुलकादि कुजादि कुमुदादि कुम्भपद्यादि कुवादि वोटरादि ममादि मौढ्यादि तुम्नादि सण्डिकादि गम्पादि गर्गादि ४।२।४५ ३।३।३ ४।१।१०५ ४८, ५९, ६०, ६३,६८,९०, ९६, १४९, १६० ९५, १२२, १४८, १५६ ५३, १३८ ४५,४९,७९,९४,१३७,१३८, १४०, १४१,१५०, १६७ १७४ सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि गणनाम गवादि गवाश्वप्रभृति गहादि गुडादि गोपवनादि गौरादि गौरादि ग्रह्यादि चादि चिहणादि छयादि डतरादि तक्षशिलादि तारकादि तालादि तिककितवादि तिकादि तिष्ठद्ग्वादि तुन्दादि तौल्वल्यादि त्यदादि गणपाठस्थ स्थल पृष्ठ संख्या ५।१।२ ९७, ९५, ११९, १३७ २।४।११ ४।२।१३८ ९०, ९५, ११०, १५२, १५५ ४४] ०३ ११०, १२२, १३४ २।४।६७ ३१,४५,७६,९४, ११० १५५ ३३, ३४, ४८, ६६, ७७, ८५, १८९, १३८, १४०, १४२, १४६, १४८, १५५, १६० ६।२। १९४ १६८ ३ । १ । १३४ ३५, ६७, ८९,१३८ १।४। ५७ ६२, १२८, १३९, १६७ ६ । २।१२५ १५२ ४।४। ६२ ७।१ । २५ ७५, ७८ ४।३। ९३ ७२, ११०, ११९, १३४, १५२ ५।२।३३ ६०, १४५, १४८ ४।३। १५० १२०, १३४ २।४।६८ १५०, १६७ ४।१। १५४ ६५, १२६ २।१।१७ ९३, १५९ ५।२।११७ ११४, १३५ २।४।६२ ३१,१०३, १४९ १।११७४ ४८, ५१, ७५, ७८ १।२। ७२ दएडादि दामन्यादि देवपयादि द्वारादि व्यादि ५।३ । ११६ ५।३।१०० ७।३।४ ५।३।२ १३५, १५१ ५९, १११, १३४ ९६, १४०, १४२, १५४, १६० ४८, ७५ १७५ उद्धृत पाणिनीय गण गणनाम धूमादि नडादि नडादि नद्यादि नन्द्यादि न्यडक्वादि पक्षादि पचादि पर्धादि पलद्यादि पलाशादि पात्रेसमितादि पामादि पारस्करादि पिच्छादि पोल्वादि पुरोहितादि पुष्करादि पूर्वादि पृपोदरादि पैलादि प्रगदिनादि प्रज्ञादि प्रवृद्धादि प्रादि प्रियादि प्रेतादि प्लक्षादि गणपाठस्थ स्थल पृष्ठ संख्या ४।२।१२७ ४५, १५२ ४।१।९९ १४०, १४१, १५०, १६७ ४।२।९१ ७६, १५२ ४।२। ९७ १०१, १५२ ३।१।१३४ ३५, ६७, ८९, ९२, १३८ ७।३।५३ ८३, १०४, १३८, १४१, २५४ ४।२।८० ११८, ११९, १२५, १६१ ३।२।१३४ ३५, ५९, ६७,९४,११८, १३८ ५।३ । ११७ ४।२।११० १५२ ४।३ । १३९ १२१, १३४ २।१।४८ ६१, ६२, ६५, ७२, १३९ ५।२।१०० १२९, १४० ६।१।१५३ ५२, ५९, ७२, ११९ ५।२।१०० १९४, १३५, १४०, १४५ ५।२।२४ ५।१।१२८ १२२, १३४ ५।२। १३५ १२५, १२७ ७।१।१६ ८७, ७५, ७८ ६।३।१०८ ६०, ६३, ६८, ७२, ९६, १३६ २।८1५९ १६७ ४।२।८० १२२ ५।४।३८ १२३ ६।२।१४७ ६१, ७० १।४।५८ ९३, १३९, १४८ १२९, १३०, १४२ ४।२१८० ४।३।१६२ १७६ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि गणनाम बलादि गणपाठस्थ स्थल ५।२।१३६ पृष्ठ संख्या बह्वादि बाह्वादि बिदादि बिल्वकादि बिल्वादि ब्राह्मणादि ४।९। ९६ ४।१।१०४ ६।४। १५३ ४।३ । १३४ ५।१।१२४ १२२, १२७, १३५ ८७, १११, १३४, १४०, १४२ १३७, १३८, १४० ४५, ९४, १५०, १६७ ४४,७६ ४६, ९५, १३४, १५९ ५९, ९०, ११८, १२२, १३४, १४८ १५२ ४६, ९५, १००, १२०, १५९ ९०,९४, १३८, १४५ ८३, १३८ ११११७६ ।।२। ३८ ३।३।१०४ ३।४।७४ ३।१ । १२ ४।२। ५४ ८।२१८६ १२५, १५२ भर्गादि भिक्षादि भिदादि भीमादि भृशादि भौरिक्यादि मध्वादि मनोज्ञादि मयूरव्यंसकादि महिष्यादि मालादि यजादि यवादि यस्कादि याजकादि युक्तारोह्यादि युवादि यौधेयादि रजतादि रसादि राजदन्तादि २।१।७२ ६२, ७३, १२८, १३५ ४।४।४८ ६ । २।८८ १५२ (धातुगण) ८।२।९ ११९, १४० २।४।६३ ३१, १३५, १३७, १५०, १६७ रा२।९॥६।२।१५१ ७३ ६।२।८१ ९५, १००, १४९, १५९ ५।१।१३० १३४ ४।१ । १७६ ४९,५१, ६५, १५१ ४।३। १५२ १२०, १३४ ५।२।९५ १११, १३५ २।२।३१ ६२, १११ उद्वृत पणिनीय गण गणनाम गणपाठस्थ स्थल पृष्ठ संख्या राउन्यादि ४।२।५३ रेवत्यादि ४।३।१३ तोमादि ५।।१०० लोहितादि (१) ७३, ९, १००,"८ लोहितादि (२) ४।१।१८ 12, ७५, ८०,९ वादि ६ । २। १३१ वारणादि ४।२।८२ ११२ वृषादि व्युष्टादि ५।१।९७ ९५ जीह्यादि ५।२।१६ ९५, १२७ ११,१४० दाण्डिादि कारत्प्रभृनि ५।८।१०७ ४८, १२७,२४२ ३४८,१६० दारादि ६ । ३ । १२९ ११२,१४०, १५२ मारवादि ४।१ । ७३ ९०, १५५ पिवादि ।।१।११२ गुण्डिादि ४।३।७६ गुवादि ।।१२३ सीएडादि २।१। ४० गौनसादि १३५, १४९ मायादि 11८० मलादि ।।२।७५ गादि ४।२।८० १८, २२ मन्त्रिनादि मपन्यादि 1।।३५ ३५, १.१,३२,१० र्यादि ।।७ १३ ४३, ४९,६८, ६५, ७८, ८८, ९. १:९,२८, ५. १ या पे मार पणन र मत में 'शुरुमादि' (४१३ । ७६ ) गण में शुटि मा में राति' ठहै।

सं० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि
गणनाम
सवनादि
साक्षात्प्रभृति
सिन्ध्वादि
सुवास्त्वादि
सुषामादि
स्थूलादि
स्नात्व्यादि
स्वरादि
गणपाठस्थ स्थल पृष्ठ सख्या
८।३।१०८ ४८, १४९, १५५, १६०
१। ४।७४ ४३, ९३, १६७
४।३।९३ ११०, ११९, १३४, १५२
४।२। ७७ ६५, १५२
८।३।९८ ६३ ६८,९६, ११९
५।४१३ ९५, १२३
७।१ । ४९
१।१। ३७ ६२, ८८, १२८, १३९ १४८,
१६७
४।१।१० ६४, १३७, १४१
७।३ । ७
११९, १४२
४।१।१०० ४५,७६, ९४
१२०, १३५
स्वस्नादि
स्वागतादि
हरितादि
हरीतक्यादि

उद्धृत कात्यायनीय गण नग्नाम स्थल निर्देश अग्निपदादि ५।१।६७ अण्डादि ६।३। ४१ अध्यात्मादि ४।३।६० अवान्तरदीक्षादि ५।१।६४ अहरादि ८।२।७० आद्यादि ५।४।४४ इरिकादि ८।४।६ कम्बोजादि ४।१।१७५ काष्ठादि बुक्कुटवादि क्षिपकादि खलादि खलेयवादि गड्दादि गिरिनद्यादि चातुर्वर्यादि ज्योत्स्नादि त्रिचकादि देवासुरादि नवयज्ञादि' पत्यादि परदारादि परिमुखादि ८।१।६७ ६।३ । ४१ ७.३।४५ ४।२। ५१ २।१।१७ २।२। ३५ ८।४।१० ५।१।१२४ ५।२।१०३ ६।२।१६६ ४।३।८८ अनुकता पृष्ठ ६७ ६७,१३१ व० ६६, १३१ ९७ व० ६७,१३१ व० ६७,५३१ ६७ चन्द्र०, शा०,ह, व० १०६ १२० १३१ ८१,८२,८३ व० ६७,१३१ ६७ व० ६६,१३१ १५६ शा० हे. १२० हे०, ० ६७, १२०, १३१ ६७ चन्द्र० ६७ १०६ ६७ चन्द्र०, व. १०६, १३१ चन्द्र० १०६ व० ६७,१३१ शा० हे० व० ६७,१२० १३१ शा० हे. ८१८२६६, शा, ८।२।७० ४।४।१ ४।३।५८ १द्र महा०४।३।६६ ।

१८० स० व्या० मे गरणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि गणनाम स्थल निर्देश अनुकर्ता पृष्ठ पादि ३।२।१५ ६६ पीत्वादि ६ । ३ । १२१ ६७ पुण्याहवाचनादि ५ । १ । १११ चन्द्र०व० ६७ १०६, १३२ पैजाक्षीपुनादि ४ । २ । २८ चन्द्र० १४६ प्रकृत्यादि २।३ । १८ प्रभूतादि ४।४।१ व० भवदादि ५। ३ । १४ ६७ महानाम्न्यादि ५।१।६४ ६७ मान्दादि ४।४।१ ६६,१२० मूलनिभुजादि व० ६६,१३२ यवखदादि ५।२। ११६ नावादि चन्द्र० शा० हे. ६५, १११, १२२ दशक्तवादि ६।१।६३ व० ६७ शकादि द्र०६ । १।६३ शा० है. १२० शाकमाथिवादि २ । १ । ६६ ६६ দিদি ५।२।११६ चन्द्र. शा. हे. ६५ १११, ११२, व० मम्पदादि ३।६।१०८ व० ६६, १३२ सुम्नातादि शा० हे. व० ६७, १२०, १३१ म्पग दि चन्द्र० व० १०६, १३१ शा०१० उद्धृत प्रत्यक्पानिणीय गण शशा, गगनाम निर्धारक प्राचार्य वा अनुकर्ता पृष्ट अत्तादि वररुचि अजादि (१) हे १२५ अजादि (२) व० १३२ अर्थादि हितादि है. १२५ इन्द्रादि १४० उदन्वादि व० १३२ उणादि चन्द्र०,व०, मुखादि मोग्गलान १०६, १३३, १४१, महाथेर १४५ मृत्वादि शा०, हे०, व. ११०, १२२, १३३ ऋत्वादि वरचि १४३ मृप्यादि वररुचि १४३ कवादि कातन्त्रकार क्लाप्यादि चन्द्र०, मौदादि-शा०, हे, ब्रह्मादि व १०६, १२३, १३३ किंशुकादि भो०, व. १२७, १३३ कुण्डादि व०, जानादादि नरेन्द्र १३२, १३५, १४० कृप्यादि चन्द्र०,व० १०६, १३३ केदारादि वामन, व. १२८, १३३ केवलादि कातन्त्रकार केशादि चन्द्र०, मण्यादि हे., व०, १०६, १३३ खपच्यादि भो०, व. १२७, १३३ चूडादि चन्द्र०,व० छन्दोगादि कातन्त्रकार जनादि मोग्गल.न महाथेर जपादि भो०, हे. . १२८ १८२ उद्घृत प्रत्याणिनीय गण चन्द्र०, व० नरेन्द्र शा० o शा, गणनाम निर्धारक प्राचार्य वा अनुकर्ता पृष्ठ ज्योत्स्नादि तदिमिनादि मोगलान महाथेर १४५ तन्वादि वोपदेव १४२ दशादि वररुचि देवादि १२१ दैत्यादि वररुचि धर्मादि हे०, पक्षादि-व. १२१, १३२ धूर्तादि वररुचि नखादि मोग्गलान महाथेर १४५ नभ्राडादि चन्द्र०, व. १३३ निकटादि शा०, हे., व. १३३ नीडादि वररुचि पक्षादि पक्खादि मोग्गलान १४५ पात्रादि व० १३२, १३५ पानीय दि वररुचि १४३ पितादि मोग्गलान महाथेर १४५ पौरादि वररुचि भन्नादि मोग्गलान महाथेर १४५ भयादि शा०, हे. १२१ भेपजादि शा०, हे०, अनन्तादि व० भ्रातुप्पुत्रादि १२५ मतल्लिकादि भो०,व० १२७,१३३ मन्वादि नरेन्द्र १४१ मातुलादि मोग्गलान महाथेर मायादि वररचि मुकुटादि वररचि १४३ यथादि वररचि चन्द्र, १८३ सं० व्या मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि चन्द्र, व० o चन्द्र, शा०, चन्द्र०, वोपदेव शा०, हे. गणनाम निर्धारक प्राचार्य वा अनुकर्ता पृष्ठ यादादि वररुचि १४४ रूपादि वक्रादि वररुचि १४४ वारादि व० १३५ वृन्दारकादि भो०, व. १२७, १३३ वेणुकादि ११०, १२२ व्यासादि ११०, १४२ शय्यादि वररुचि १४३ श्रितादि १२१ सदादि वररुचि सद्दादि मोग्गलान महाथेर १४५ समृध्यादि वररुचि १४३ साय हादि सेवादि वररुचि सोमादि कातन्त्रकार सौन्दर्यादि वररुचि सशयादि शा०, हे, व. १३३ हरादि मोग्गलान महाथेर १४६ हरिद्रादि वररुचि १४४ हिमादि चन्द्र०, गुणादि शा०, विशेष-केवल प्राकृत सूत्रो मे पाये जाने वाले गणो को छोडकर, जिनकी रचना वररुचि ने प्रकृतभाषा के शब्दो की ही दृष्टि से किया था, अन्य सभी अर्वाचीन आचार्यों द्वारा निर्धारित यह तक कि पालिभाषा के वैय्यारण मोग्गलान महाथेर द्वारा निर्धारित प्राय सभी उपरि निर्दिष्ट गण पाणिनि के उन २ प्रमगो के सूत्रो तथा तत्सम्बद्ध कात्यायन की वार्तिको के ही संक्षिप्त रूप हैं-यह निर्दिष्ट पृष्टो के देखने से सर्वथा सुस्पष्ट हो जाता है। १२४ १४४ .

पाणिनीय गण जिनका नाम अर्वाचीन वैयाकरणों ने बदल दिया पाणिनीय गण परिवर्तित नाम अडगुल्यादि गोण्यादि अनुप्रवचनादि उत्थापनादि परिवर्तक आचार्य पृष्ठ शा०, हे. ११६ चन्द्र०, शा०, हे०, व. १११, १२७ चन्द्र० मो० O हे०, व. अपूपादि अर्शादि अश्वपत्यादि आकदि आहितग्न्यादि इन्द्रजननादि उक्यादि ऋगयन दि किशुनगादि यूप दि अभ्रादि धनादि अश्मादि भार्योढादि शिशुजन्दादि शा०, शा०, शा० शा, ११८, १३४ ११६ चन्द्र०, व० न्याय दि शा, शिक्षादि अञ्जनादि दा०, हे. चन्द्र०, शा०, हे०, २० शा, हे. बोपदेव १११,११६, १३४ ११६ १४२ कुमुदादि कुम्भपद्यादि गवादि गौरादि अश्वास्थदि कुम्भादि युगादि नदादि शा०, हे. तिदग्पादि देवपयादि पक्षादि पचादि प.मादि निठ्ठपादि अर्चादि पथ्यादि लिहादि अनादि कातन्नमार, ५३८, १४०, नरेन्द्र, बोपदेव १४२ मोग्गलान महाथेर १४५ व० शा०, पय्न्यादि-हे० ११८, ११६ शा०, हे. शा०, हे. ११६ दा, ० पाणिनीय गण जिनका नाम परिवर्तित हुआ पाणिनीय गण परिवर्तित नाम परिवर्तक आचार्य पृष्ट पारस्करादि अवस्करादि शा०,हे. ११६ पुरण्यादि प्रियादि बोपदेव १४२ प्रादि पादि मोग्गलान महायेर १४५ प्रिय दि स्वादि भद्रेश्वर १२६ बह्वादि शोणादि चन्द्र०, भो०, व०, ११५, १२७, वोपदेव, पद्वत्यादि १३४, १४०, नरेन्द्र ब्राह्मणादि राजादि शा०, हे. ब्रीह्यादि तडिदादि नरेन्द्र मनोज्ञादि चौरादि ११८ महिण्यादि नरादि शा., हे. ११८ यवादि ऊर्यादि शा, हे. ११६ लोहितादि निद्रादि शा०, हे. शुभ्रादि अन्यादि नरेन्द्र १४० सकाशादि सुपथ्यादि सन्धिवेलादि सन्ध्यादि चन्द्र०, श० ह०, व० १३४ सपत्न्यादि समानादि नरेन्द्र १११, १४० सर्वादि स्ब्यादि मोग्गल न महाथेर १४५ सुपामादि भीरुअनादि शा, हे. ११६ स्थूलादि अण्वादि ११६ स्वागतादि स्वङ्गादि शा, हे०, बोपदेव ११६, १४२ शा, चन्द्र०, पल्यादि- शा०, हे.

उद्धृत ग्रन्थकार १ अथर्वप्रातिशाख्यकार २१ १५४, १५५, १५-, १५६, २ अनुभूतिस्वरूप १३८ १६०, १६२, १६५, १६७ ३ अभयनन्दो ११३, १३० १६ काशकृत्स्न ८, १५, १६, २५, ४ अमोघवर्ष ११४ १४६ ५ अरुणदन १३.,१३१, १३३ २० काशिकाकार २६, ४८, ५४, ६१, ६ आपिशलि १३, १५, १६, २५, ६५, ६८, ६६, ७०, ७६,८२, २६, ५२, ५६, ७४, ७६, १४६ ८३,६१,६८-१००, १०३, ७ आइ एम पावते ५३ १०४, ११०, १५४, १५६, १६० ८ इत्सिग १०८ १६२,१६६ ६ इन्द्र ४,७,१६,६७, ११५ २१ काशीश्वर १४३ १० ऋक्तवार २० २२ वीथ ह८ ११ ए मी बर्नेत १६, १७, ३७, २३ कोलहान ८२, ६६ ११५, ११६, ११७,१३६,१३७ २४ सैय्यद १, १६, २६, ४८, ५८, १२ एम के.डे ११२ ६६, ७६,८२ १३ एस के वेल्वाल्कर ६२, १००, २५ क्रमदीश्वर १४३ १०१, १०८, ११२, ११३, १२४, २६ क्षितीशचन्द्र चटर्जी १५, १०८ १३६, १४३ २७ क्षीरस्वामी ३६, १०१, १०२, १४ ओटो वोयलिंक १६४, १६५ ५५ औरजि०० २८ गणेश्वर १४३ १६ रचायन १६, १४७ । २६ गोल्डस्टकर २७, २६ १७ वमत्स्न १४६ ३० चन्द्र या चन्द्रगोपी ४०, ४१, १८ कात्यायन १, १६-२१, ३६, ७६, ८२,८३,६१,६७,६६, ४६, ४७, ५६ ६०, ७३, ७६, १००, १०६-११२, ११५, ८०,८२,८३,८६,६०-६२, १२१, १२२, १२४, १२६, ६६-१००,१०६,१०८,१०६, १२७,१३०, १३२-१३५, १४१,१४२, १५, १५५, १५६, १६.१६१, १६४, १६५,१६७ उद्धृत ग्रन्यकार ३१ चन्नवीरकवि १५, २५ | ५३ पतञ्जलि वा महाभाष्यकार १, ३, ३२ चाक्रवर्मण ३७, ३८ १०, १७ २३, २६, ३१, ३६ ३३ चारायण ४७, ४८ ५४,५७-५६,६६- ३४ छेदाध्यायी ६६ ६६ ७३, ७६,८२,६२,६७- ३५ जगदीश तलिंकार २४ १०० १०४, १११, ११५, ११७, ३६ जयादित्य वामन १६७ १४६ १५४,१५६,१५८-१५६, ३७ जननक १५१, १६८ १६०, १६५ ३८ जिनेन्द्रबुद्धि वा न्यासकार १२, ५४ पद्मनाभदत्त १४३ २६, ३२, ४८-५३, ६१,८२, ५५ पाल्यकीर्ति ७४०,७,१०६, ५१४, ११६,११७, ११६-१२४, ३६ जैनशाक्टायन ६१, १०५, १२५, १३०, १३५ १५६, १६४ १३० १३३, १५६, १६४, १६५ ५६ पारायणिक विद्वान १००, १३०, ४० तारानाथ६ १६ १३६ १३४ १५६ ४१ थेडोर आफेस्ट -७, २८ | ५७ पुरुषोतमदेव १०२ ४२ दुर्गसिंह १३७ ५८ पूर्णचन्द्र १०४ ४३ दुर्गादास १४२ ५६ पौष्करसादि १४६ ४४ देवनन्दी वा जैनेन्द्र ४०, १०६ ६० प्राचीन शाकटायन २० २१,२७, ११३ ११५ १२३, १२५, ३७, ०१५-११७ १६३, १६५ ६१ प्राचीन वृत्तिकार १०४ ४५ मिड वैयाकरण ३६, १३० ६२ बालमनोरमाकार ५८ ४६ वनञ्जय कोपकार ११३ ६३ बूहतर ३७ ४७ धातुवृत्तिकार ८२ ६४ बृहस्पति ४ ४८ नरसिम्मैया २५ ६५ बावदेव वा मुग्धबाबकार ११३ ४६ नरेन्द्र वा सारस्वतव्याकरणकार १४५ १४२ ४०, १३८ १४०, १४२ ६६ भट्टयज्ञेश्वर या यज्ञेश्वरभट्ट ७०, ५० नागेशभट्ट २७ २८ ४८ ६५, } १०,१०५ १६२१६४ ८२,८३,६१,१०३ १५६ ६७ भट्टोजी दीक्षित २६, ४८ ८२, ५१ नागेश्वरभट्ट २३ १०३ ५२ न्यायपश्चानन १४३ ६८ भद्रेश्वर वा भद्रसूरि १५६-१३१ १८८ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि ६६ भर्तृहरि २, २६, ६८, ७६, १०८ । १०५, १०६, १२७, १२८१३०, ७० भागुरि २३, २४ १३२, १३४-१३६, १५६, ७१ भामह १४४ १६२-१६५ ७२ भारद्वाज २३ ६४ वसुरात १०८ ७३ भापावृत्तिकार २४ ६५ वामन १२८, १२६, १३०, ७४ भोज ४०,६२,७१,१०६, १२३, १३३, १३५ १२५-१२८, १३०, १३३, १३५, ६६ वासुदेवशरण अग्रवाल ३०, ३३, १५६, १६३-१६५ ४१, १५०, १५२ ७५ मध्यन्दिन १४६ ६७ वृद्ध वैयाकरण ३८, १३० ७६ मल्लवादी १२८ ६८ व्याकरणसिद्धान्तसुधानिधिकार ७७ महिनाय १०२ ७८ मावव वा धातुवृत्तिकार ६६ व्याडि १४६ १०१-१०४ १०० शवर स्वामी ६ ७६ माध्यन्दिन १४६ १०१ शान्तनव १३, २८ ८० मैक्डानल १०२ श्रीभद्र १२६ ८१ मैरममूलर २, २७-२६ १०३ श्रीशचन्द्र चक्रवर्ती १०२ ८२ मैत्रेय रक्षित १०१, १०३ १०४ श्लोकगणकार १०३ ८३ मोग्गलान महाथेर १४४, १४६, १०५ श्लोक्वाधिक्कार ८०, ८१,६४, ६६ ८४ यक्षवर्मा ११४ १०६ सुधाकर १०४ ८५ यास्ट १६ १०७ सूर्यकान्त २० ८६ युधिष्ठिर मीमामय ८, २५, २८, १०८ सहिताध्यायी ६६ १०६ स्वन्दस्वामी २६ ८७ रत्नमति ३० ११० हरदत्त वा पदम अरीकार २५, म रमासान्त १४३ ३२,५४, ५७, ५८,६,७७, ६ रामचन्द्र १६१ ८२,६८,१०१, १५७ ६. रमन वागीश १४२ १११५ हेमचन्द्र ४०, ६०,६४, ७१, ६५ लीविग १०४, १०८, ११२ १.६, ११३, ११६-१२५, १२७ ६२ वराचि १४ १२८, १३०, १३३, १५६, ६३ वर्षमान ३८, ३६, ५७ ६०, १६३, १६४,१६५ ६४,७१,६७,१०२,१०३, ११२ हेलाराज १६

प्रमुख सहायक तथा उद्धृत पुस्तकें.
पात्रेकायें तथा हस्तलेख
अथ प्रातिशाख्य डा० स्यका त शास्त्री सम्पादित ।
अथर्व प्रातिशाख्य ५० विश्वप्रधु शास्त्री सम्पादित, पजाब यूनिवासी १६५३ ।
अध्यायी श्रीधर शास्त्री पाठक सम्णदित, पृना १६३२ ।
पान दीपेन्द्र स्कूल गार सस्त अमेरियन्स ए. सी० बर्नल मगलोर
१८७५1
इण्डियन एरिटवरी अप्रल १८१६ अप्रैल १८७५ तथा जनवरी १८८७ ।
इण्डियन हिस्टारिकल पार्टी जून १६३८ ।
इण्डिया एज नोन टु पाणिनि डा. वासुत्रेवशरण अग्रवाल, लखनऊ
१६५३॥
इण्डियाज पास्ट
ए०ए० मैक्डानल।
उणादिसून श्रीधर शास्त्री पाठक सम्पादित पूना-१६३५ ।
उणादिसूत्र उज्वलदत्तवृत्ति धेडोर श्राप कर सम्पदित, यान-१८५६ ।
मातन्त्र डा० सूयका त शास्त्री सम्पादित, लाहार-१६३३ ।
सरप्रातिशारय उन्बर ८ का-डा० मगलव शास्त्री सम्पादित-१६३१ ।
ए हिस्टरी आफ एशियेण्ट सस्कृत लिटरेचर मैक्समूलर अलाहाबाद ।
कातन्त्र छन्द प्रक्रिया चन्द्रकान्त तर्कालकार सम्पादित, शरपुर-१८६६ ।
कातन्त्र व्याकरण त्रिलोचन टीका कलकत्ता
काशिकावृत्ति (१) प० बालशास्त्री सम्पादित, बनारस-१६२८)
काशिकावृत्ति (२) हस्तलख-सरस्वती भान, वाराणसी ।
काशिकाविवरणपञ्जिका श्रीशच द्र चक्रवर्ता सम्पादित राजशाही गाल
१६१६ ।
काश स्न व्याकरण और उसके उपलब्ध सूत्र ५० युधिष्ठिर मीमासक।
किरातार्जुनीय मल्लिनाथ टीका श्रार० सी० पी० शास्त्री सम्पादित बाम्ये
१६३६ ।

स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि गणरत्न हस्तलेख-सरस्वती भवन, वाराणसी । गणरमहोदधि जूलियस एगलिंग सम्पादित, लन्दन १८७६ 1 गणरत्नमहोदधि (१) ५० भीमसेन शर्मा सम्पादित, इराना । गणरत्नारली भट्ट यशश्वर । चान्द्रवृत्ति (१) (१-३ अध्याय) क्षितीशचन्द्र चग्जा सम्पादित । चान्द्रवृत्ति (२) डा. ब्रुनो लीबिश सम्पादित । जैनेन्द्र व्याकरण महानन्दी टीका ( हस्त नस सरस्वती भवन वाराणसी)। जरनैल आफ रायल ऐशियाटिक सोसाइटी (अली हिस्रा श्राफ गोत्र-जानबफ) १६४६ । टेक्निकल टर्स एण्ड टेक्नीक आफ संस्कृत ग्रामर प्रथम भाग नितीश- चद्रचीं। तन्नार्तिक कुमारिल भद्र । तैत्तिरीय प्रातिशाख्य (१) माहिपेय टीका, वी० वेंकरराम शर्मा सम्पादित । तैत्तिरीय-प्रातिशाख्य (२) निभाप्यरत्नीका । मैसूर सस्करण । तैत्तिरीय-संहिता भद्रभास्कर मिन की व्याख्या, महादेव शास्त्री सम्पादित, मैसूर-१८६४। दी अली ब्राह्मणिकल सिस्टम श्राफ गोत्र एण्ड प्रमर जानत्रफ, कैम्प्रज १६५३ । दी क्रिटिकल स्टडीज आफ कात्यायनज शुक्ल यजुर्वेद प्रातिशाख्य वी० कटराम शर्मा, मद्रास-१६३५ । दी वेदाज इन पाणिनि पालथीमे । दी स्ट्रक्चर श्राफ अष्टाध्यायी श्राइ० एस० पारते, गम्म यूनिवर्सिटी। दुर्घटवृत्ति शरणदेव-टी. गणपति शास्त्री सम्पादित, प्रिपेद्रम-१६०४ । धातुमदीप मैश्य-श्रीशचन्द्र चक्रवर्ती सम्पादित, राजशाही-१६१६ । धातुवृत्ति माधय-ग्रान्त शास्त्री पदये सम्पादित, ननारम-१६३४ | नाहिक (महामाध्य, प्रथम अध्याय, प्रथम पाद )-प्रदीप तथा उद्योत पीका-निणयसागर प्रस, आम्बे । " प्रकाशन करते समय एगलिग का संस्करण उपलब्ध न हो कारण भीमसे-ऐमरण मे ही पृष्ठों का दरलप दिया गया।

सहायक पुस्तके नामलिंगानुशासन (.) वन्द्यधरीय सानन्द की टोकासस्व साथ- गएपति शास्त्री-सम्पादित, विरेन्द्रम-१६१४ । नामलिंगानुशासन (3) मा क्षीरस्वामी की 'अमरकाशोद्घाटन' टीका के साथ, डा. हरदस शर्मा तथा डा० एन० जी० सर दसाई सम्पादित, पृना-१६४१ । निरक्तवृत्ति दुर्गाचाय-एच० एम० भडकमकर सम्पादित, बाम्मे-१८१८ । निरत्तटीया स्कन्ट महश्वर-हा. लक्ष्मणरारूप सम्पादित । पदमारी हरदत्तमिश्र-भरद्वाज दामोदर शान्त्री सम्पादित, काश-१८६५ । परिभाषेन्दुशेखर नागेशभट-राजनारायण शास्त्री सम्पादित । पाणिनिज अमेटिचर रजलिन डा. योगे भोटलिंक मान-१८४० । पाणिनि-हिज प्लेस इन सस्त लिटरेचर टा० गोल्डस्टूकर । पाणिनीय गण13 (.) गोयधन पाणिनीय गणपाठ (२ रामायण हस्तनस, पाणिनीय गणपाठ (३) महादव सरस्वती भरन, पाणिनीय गणपाठ (8) मोरश्वर लल ' वाराणसी। पाली महायाकरण भिन्नु जगदीश काश्यप ! प्रनि या कौमुदी रामचन्द्र-विठल को प्रसाद टीका के साथ। प्रक्रिया संग्रह (जैन शाकायन सम्प्रदाय ) श्राचार्य चन्द्र । प्राकतसूत्र वररुचि-मामह की टीका के साथ । प्रैक्टिकल संस्कृत इग्लिश डिक्शनरी वी० एस० पाथे । प्रोढमनोरमा मद्रोजी दीक्षित-लघुशन्दरन टीका के साथ । फ्टिसूत्र-शान्तनर श्रीधर शास्त्री पाठक सम्पादित, पूना-१६.३५ । भागवृत्ति संकलनम् ५० युधिष्ठिर मीमासक भारद्वाज शिक्षा नागेश्वर गेका रामचद्र दीक्षितार तथा पी० एस० सु दरन् अय्यर-सम्पादित पृना-१६३८ । भाषावृत्ति पुरुषोत्तमदेव-श्रीशचन्द्र चक्रवर्ती सम्पादित राजशाही-१६१८ ! महाभाप्य ( सम्पूर्ण) गुरुप्रसाद सस्करण । मुग्धोध व्याकरण ओपरेव -दुगादास तथा रामतर्क वागीश की टीका के साथ जोवानन्द विद्यासागर सम्पादित कलकत्ता १६०२ । रघुवंश मल्लिनाय टीका । लघुशब्देन्दुशेसर नागेश-(पूर्वार्ध ) नित्यानन्द पपतीय की टीका, सदा शिव शास्त्री जोशी तथा रमचद्र शास्त्री सम्पादित, बनारस १८६५।

१६२ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि लघुश रेन्दुशेखर नागेशभद्र-( उत्तरार्ध ) रामशास्त्री नारायण शास्त्री सम्पादित, बनारस-१८५७ । चर्ड इण्डैक्स टु पाणिनिज सूनपाठ एण्ड परिशिष्टज श्रीधरशास्त्री पाठक तथा सिद्धेश्वर शास्त्री द्वारा समाम्नात, पृना-१६३६ । वास्यपदीय भर्तृहरि-प्रथम काएट-रामलाल कपूर ट्रस्ट लाहौर, द्वितीय तृतीय काण्ड-काशी। माजसनेय-प्रातिशारय वी० काराम शर्मा सम्पादित, मद्रास । घायु पुराण अानन्दाश्रम पृा। व्याकरण दर्शनेर इतिहास गुरुपाद हाल्दार, कलकत्ता । व्याकरणसिद्धान्तसुधानिधि विश्वश्वर शास्त्री, माधव शास्त्री भण्डारी सम्पादित, बनारस-१६२४ । शब्दार्णव व्याकरण गुणनदी-सोमन्य की 'चद्रिका टीका के साथ । शब्दकीस्तुम भद्रोजी दीक्षित,-५० गोपाल शास्त्री नने सम्पादित । शब्दकौस्तुभ भट्टोजी दीक्षित -40 विध्यवासिनीप्रसाद द्विवदी सम्पादित, बनारस १६१७। शाकटायन शब्दानुशासन (.) यक्षवर्मा की 'चितामणि' टीका क साथ । लाजरस प्रस बनारस शाकटायन व्याकरण (२) अमोघा वृत्ति हस्तनेस भारती ज्ञानपीठ काशी । शिशुपालवध मल्लिनाथ का, दुर्गाप्रसाद तथा शिवदत्त सम्पादत, बाम्ब १६१७ सरस्वतीकराठाभरण भोजनेवरी० श्रार० चि तामणि सम्पादित मद्रास यूनिवसिटी-१९३७ । सरस्वतीकण्ठाभरण-हृदयहारिणी वृत्ति ट्रिपण्ड्रम सस्कृत सीरित। सस्कृत व्याकरण-शास्त्र का इतिहास ५० युधिष्ठिर मीमासक । सारस्वत व्याकरण (पृवाध )-चन्द्रकीति टीका, वेंकरश्वर प्रेस, वाम्ने । सिद्धहेमचन्द्राभिधस्वोपज्ञ शब्दानुशासन स्वकीयवृहद् वृत्ति के साथ । सिद्धान्तकौमुदी भटोजी दीक्षित 'बालमनोरमा' तथा 'तत्त्वबोधिनी' टीका क साथ सिस्टम्स आफ सस्कृत ग्रामर एस० के० रेल्वाल्कर पृना-१६०४ । स्वरसिद्धान्तचन्द्रिका श्री निवासयज्वा, शिवरामकृष्ण सम्पादित मद्रास १६३६ हिस्टरी श्राफ सस्कृत लिटरेचर ए० बी० कीय, लदन-१६३० ।

संशोधन-पत्र पृष्ठ पक्ति अशुद्ध शुद्ध ६ १५ प्रस्तुत की है। इस पर टिप्पण शब्दरचना के पूर्व पाणिनि ततद्गणसम्बद्ध दी इण्डियन एण्टीकरी अप्रेल १८७४ पृष्ठ १०२, तथा उससे अगे। शब्दरचना के विषय मे पाणिनि के तत्तद्गरण सम्बद्ध शेत्यायनादि वत्सतरादि शैत्यादि वत्सरादि १६ ६ ५ उद्भवृत है।' ३ टि०५ टि०१ ४३ गणमीपयानो इस मे प्रसन्न मर्वनामताम्भुपमात् अस्ति ह पाठो प्रथम सून मे लोहिता दिगण का और द्वितीय तृतीय पठित क्ण्वादि गोरवनादि सूत्रपाठ पाठ से पूर्व स्त्रो' आपिगलि प्राय दोषपूर्ण वत या है। गणमधीयानो इस प्रसङ्ग मे सर्वनामताभ्युपगमात् अस्ति च पाठो प्रथम और द्वितीय सूत्र मे लोहितादिगण और करबादि का तथा तृतीय पठिन गोपवनादि २२ २३ ५३ ५६ मूत्रपाठ से पूर्व ७ ५८ २१ स्त्रो तथा आपिशति प्रक्षेप इस पर टिप्पण-यच्च ૨૬ व्याप्तिमिद्धौ सरलमुपाय मपश्यतानाकृतिगणवर्ण म् सुतरामपरिगृद्धि मनुशासनम्य दर्शयति । टेक्निकल टर्म एण्ड २५ ७० ३० टि०१ " १६४ स० व्या० मे गणपाठ की परम्परा और आचार्य पाणिनि पृष्ठ पङ्क्ति अशुद्ध शुद्ध टेक्नीक आफ सस्कृत ग्रामर, पृष्ठ २६४ । हो जाते हैं। हो जाते है । सम्पा। ७६ १५ प्राग्यरितादिभ्यः इम' प्राधरितादिभ्यः' इम ६६ ( महा० ४ । ३ 1५८) ( महा० ४ । ३ । ५६) ६७ कुक्कुटादि कुक्कुटयादि ६६ नामवातुपारायणादिषु वातुनामपारायणादिषु किया है। किया है । सम्मा० । टि. ४.द्र० ४.द्र० टि० १० शा०२।१।१४४ शा०२।१।११४ १२५ २ तथा 'अनन्तावसथ.' इम अश को पृष्ठ १२१, सूत्र के लिए भेषजादिगण पं० १२ पर 'श्रितादिगण' के आगे पढ़े। पाणिनि के पुष्करादि पाणिनि के पुष्करादिगण तथा अजादि को पुष्करादि तथा अब्जादि १२७ ६ जयादिगण जपादिगण १२८ टि.७ विद्यान्तविधायराभित्रे विधान्तविद्यागभिये कल्यादि कलाप्यादि लोभादिगण लोमादिगण स्वन स्वाङ्ग स्वशादि स्वाङ्गादि की थी। की यो। तदिभिनादि तदिमिनादि पारवादि पश्यादि ग्रामाच्य ग्रामात परमपि पुण्डिोत्येतदेव परमर्पिः कुण्डिोत्येतदेव ६ मेम्यादि गम्यादि मुचवर्ण मुनुपर्ण ४ ६ ४ ५ १२ ४

निम्न ग्रन्थ शीघ्र प्रकाशित होंगे
नया प्रकाशन
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५. पाणिनीय गणपाठ का आदर्श संस्करण
६. बृहदेवता का हिन्दी अनुनाद
नवीन संस्करण
१. संस्कृत व्याकरण-शास्त्र का इतिहास, प्रथम भाग
२. वैदिक-स्वर-मीमांसा
३. भागवृत्ति-सकलनम्
४. निरुक्त-समुच्चय ( वररुचि-कृत)
५. शिता-सूत्राणि (पाणिनीय-आपिशल-चन्द्र)
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२ . " " - " " . " " 1) - " प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान विक्रय विभाग प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशित तथा प्रसारित वाडमय १ सस्त व्याकरण शास्त्र का इतिहास (युधिष्ठिर मीमासक) (भाग १) १०) " (भाग २)१०) ३ वदिक स्वर मीमासा ३) ४ वैदिक छन्दोमीमासा ४॥) ५ ऋग्वेद की ऋक्सख्या ॥) ६. मन्त्रब्राह्मणयोरेटनामधेयम् पर विचार ७ दुष्कृताय चरकाचार्यम् मन्त्र पर विचार " ८ मुग्वेद की कतिपय दानस्तुतियों पर विचार 1) है आचार्य पाणिनि के समय विद्यमान सस्कृत नाड्मय । ॥) २. नरपि दयानन्द के ग्रन्थों का इतिहास ११ ऋषि दयानन्द की पद प्रयोग शैली १२ यजुदभाप्य-सग्रह (पाय शास्त्री परीक्षा मे नियत ) स. यु० मो ४) १३ शिता सूनाणि (श्रापिशलि पाणिनि चद्रगोमी) 1) १४ वीरतरहिणी ( धातुप ठ की क्षीरस्वामी कृत व्यारया ) " १२) १५ सस्थत व्यारण में गणपाठ की परम्परा और प्राचार्य पाणिनि (श्री पं० कपिल व एम० ए०) १६ ऋषि दयानन्द के पन और विज्ञापन १७ यजुपदभाप्य विसरण (प्रथम भाग) (श्री ५० ब्रह्मादत्तजी शिसु ) १६) १८ पदविद्या निदर्शन श्रीप. भगवदत्तजी)१२) १६. भारतयर्प का वृद्ध इतिहास (प्रथम भाग) (द्वितीय भाग) ०) २१. भाषा का इतिहास २२ श्रायुर्वेद का इतिहास ( श्री ५० एमच द कविराज बी. ए.) २३. अाध्यायी प्रशाशिका (श्री. देवप्रकारा पातगल ) " " " " , . " " VETरामगज } प्राप्ति स्थान परोन वाग नई दिल्ली ५ ।

Sanskrit Vyakaran Me Ganpath Ki Parampara Aur Acharya Panini

Author
Shastri,kapildev
Title
Sanskrit Vyakaran Me Ganpath Ki Parampara Aur Acharya Panini
File name
Sanskrit Vyakaran Me Ganpath Ki Parampara Aur Acharya Panini
Text
OCR done
Citation
1958
Published
2012/08
Publisher
Ajmer.,bharatiya Prachyavidya Pratisthan
Language
Sanskrit
Pages
215
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313360
Barcode
99999990322056.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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