Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Mahakavi Shuturmurga

Tara Dutt · 2011/03

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महाकवि शुतुरमुर्ग

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महाकवि शुतुरमुर्ग
(सामाजिक विद्रुपत्तामों पर लिखे गये व्यंग्य )
तारादत्त निविरोध
देवनागर प्रकाशन, जयपुर

नागर
प्रकाशक : देवनागर प्रकाशन, जयपुर
प्रथम संस्करण: 1988
:
मूल्य : 30/-
मुद्रक : एलोरा प्रिण्टस, जयपुर
:

यशस्वी हिन्दी साहित्यकार एवं
उदारमना
डॉ. मनोहर प्रभाकर
को
सादर
-तारादत्त निविरोध

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कुत्त ने काटा.
"
नामधारी निरीह प्राणी सड़क की बाई पटरी पर
*गलाया कुत्ता पटरी पर पाया और उसने उसकी
शी चोखा-चिल्लाया-किन्तु सड़क पर माते-
नही की। सबने उसे पागल समझा । विवश हो
के अस्पताल में गया जहां कुछ डॉक्टर नसों
पी ने उसकी पिंडली से गिरते हुए खून की
• यह फिर चीखा-चिल्लाया तो एक डॉक्टर ने
ने हुए चौदह इंजेक्शन लगवाने की बात
१, भ्रष्टाचार, भूख, कर्ज, बेकारी, छल,
त्तिा की भूख, वेईमानी, गफलत, बोतल और
र वह अपनी पहले सी स्थिति में नहीं पाया
चार से बहुत घूमा-फिरा, पर उसे वह कुत्ता

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74
77
उनके हाप लगा साहित्य का खजाना
दुर्वासाजी का अभिनन्दन
हिटलर झूठों का सरताज निकला
कुत्तों को जमात
कहवाघरों में कुण्ठा पिएं
यशः प्रार्थो महाकवि शुतुरमुगं
फटीचर कलमकार की वसीयत
चेहरे
दामादों की मर्दुमशुमारी
फुरसती भक्तों के भगवान
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DOD

लोकतन्त को कुत्ते ने काटा. एक दिन लोकतन्त्र नामधारी निरीह प्राणी सड़क को बाई पटरी पर चल रहा था। तभी एक पगलाया कुता पटरी पर पाया और उसने उसकी पिंडली में काट लिया । प्राणी चीखा-चिल्लाया-किन्तु सड़क पर माते- जाते लोगों ने उसकी मदद नहीं की । सबने उसे पागल समझा । विवश हो लगडाता-सम्भलता वह समीप के अस्पताल में गया जहां कुछ डॉक्टर नसों से प्रेमालाप कर रहे थे। किसी ने उसको पिडली से गिरते हुए खून की मोर ध्यान नहीं दिया। जब वह फिर चीखा-चिल्लाया तो एक डॉक्टर ने उसकी दयनीय हालत समझते हुए चौदह इंजेक्शन लगवाने की बात सुझाई। चौदह दिनों तक रिश्वत, भ्रष्टाचार, भूख, कर्ज, वेकारी, छल, नाइन्साफी, जुल्म, मक्कारी, सत्ता की भूख, बेईमानी, गफलत, बोतल और नारी जमे इजेक्शन लगवा कर वह अपनी पहले सो स्थिति में नहीं पाया तो उस कुत्ते को मारने के विचार से बहुत घूमा-फिरा, पर उसे वह कुत्ता दिखाई नहीं दिया। बाद में मालूम हुप्रा कि कुत्ता पूंजी नाम की शहरी और गैर सरकारी औरत को नाजायज औलाद है। वह सोकतत्रात्मक भाव-धारा के ध्यक्तियों के बगलों पर बेधड़क माता-जाता है । उसका संबंध-सम्पर्क भले ही जन साधारण की मूल समस्यामों एवं मार्षिक विषमतामो से नहीं हो लेकिन बड़े बगले वालों से अधिक और नियमित है। यह भी पता चला कि कुत्ते के काटने पर उसके पेट में इंजेक्शन लगाने वाले वे समझौतापरस्त लोग हैं, जो पूजी के साए में पलकर अपने समाजवादी होने का स्वांग रचते हैं। हमने तय क्यिा कि जब सक उसे पकड़कर मार नहीं देंगे सब तक घर नहीं लौटेंगे। हमने लोकतन्त्र से भी कहा कि यह अपने घर लौट कर माराम करे। जैसे ही हम कुत्ते को देसंग, नगरपालिका वालों की मदद से उसे पकड़वा कर उसका काम तमाम करा देंगे। पर हमारा दुर्भाग्य, दिन के ग्यारह बजे हमें वह कुत्ता दिखाई दिया और उसने एक बंगले में शरण लेली। हमने बगले के भीतर जाना उचित नहीं समझा और दरवाजे पर ही जम गए। कोई साढ़ तीन घण्टे बाद भी नहीं निकला तो हम बोर होकर कुढने लगे। कुत्ते को खोज मे मन और पेट दोनो की घंटियां बजने लगी। हमने वगले मे घुस कर एक कक्ष के बाहरी शीशे में से भीतर झांका । देखा, कुत्ता मेम साहब के पाप्त बैठा कुछ खा रहा है और मेम साहब बड़े प्यार से उसके शरीर पर हाथ फेर रही है । वह कुत्ते को अपने से दूर करना नहीं चाहती थीं। हमने बाहर आकर सिर पीट लिया। कुत्ता और मेम साहब । हमे वहा एक क्षण भी ठहरना अच्छा नहीं लगा, पर कुत्ते को पकड़ने की बलवती इच्छा ने हमे घर भी नही लौटने दिया। तभी बाले में से एक कार निकली । मेम साहब कार चला रही थीं और कुत्ता पीछे की सीट पर अधलेटा बैठा था। कार तेजी से निकल गई। हम कुत्ते को नही पकड़ सके और अपनी हिन्द साईकिल के पंडिल मारते हुए किसी रेस्टोरेट पहुचे। मुना, हमारे पहुचने से पहले वे दोनो कॉफी ले चुके थे और कही चले गए थे। हमने गाडी को फिर मोड़ा और पंडिल मारते हुए कचहरी आ गए। गेट पर कुछ लोगो ने कार का घेराव कर रखा था। मेम साहब की कार से हुए एक्सीडेंट पर कोसते हुए लोग कुत्ते को भी पीटने पर आमादा थे, लेकिन मेम साहब अपनी गलती नहीं मान रही थी। कुत्ता भीड़ देखकर कार से कूदा और किसी खंदक मे घुस गया, पर वह कहां और किसके पास गया, कोई नहीं जान सका। हम कचहरी के गेट पर खड़े रहे, यह सोचकर कि कुत्ता निकले और हम उसे चाप लें। पाच बज गए । सब कर्मचारी बाहर आ गए। पर कुत्ता नहीं पाया । हमने पूछताछ की, कुछ पता नहीं चला । कुछ देर बाद एक सज्जन बोले- 'कुत्ता चितकबरा था ?' 'जी हा, कुछ कलियाया और मोटा-सा भी।' 'उसके गले में पट्टा था ?' 'जी हाँ!' 'भई हमने उसे राजस्व विभाग से निकलकर अल्प बचत की पोर जाते देता था। फिर वह कहा चला गया, हमे पता नहीं।' 61 महाकवि शुतुरमुर्ग एक अन्य सज्जन बोले-'मैंने उसे शाम साढ़े चार बजे के करीब एक छोटे द्वार निकल कर पंचायत एवं विकास में घुसते देखा था और उसके साथ कोई महिला भी थी।' तीसरे सज्जन जो बाद मे वाहर निकले थे, बहने लगे-'पाप जिस कुत्ते की खोज में हैं, यह कमी का यहां से जा चुका है। पब तो वह आपको रात में ही मिल सकता है।' हमने उत्सुकता से पूछा-~'कहा ?' 'कहीं भी।' हम लौटे तो गांधी नगर मोड़ पर वह कुत्ता खड़ा था । हमारी खुशी का ठिकाना नही रहा, पर वहां न कोई नगरपालिका का पादमी या न कुत्ते को पकड़ने की गाड़ी थी और न ही कोई शस्त्र था । शिकार को पाकर भी हम असहाय हो गए थे। हमने चाय की दुकान पाले से कहा-'भाई, यह कुता पागल है, उधर के किसी गांव का रहने वाला है और इसने एक आदमी को काट लिया है। प्राप मदद करें तो हम इसे पकह कर मार सकते है । दूकानदार कहने लगा, 'प्रापको गलतफहमी हुई है । मैंने इस कुत्ते को इसी सड़क पर रोज देखा है । यह पागल नही है । यह तो प्रिंसिपल के साथ घूमता है । यह पालतू है।' हमने युत्ते को सम्बोधित किया- 'हे श्वानदेव ! हम बड़ी देर से मापका पीछा कर रहे हैं । प्रापको मारने पर आमादा है। अब माप ही बताइए, हम नापको कैसे मारे?' कुत्ते ने हंसते हुए कहा-'प्रापकी योजना गलत है । मुझे मारकर पाप कुछ नहीं पा सकेंगे। बेहतर है जिसे मैंने काटा है वह भी किसी को काटले और कुत्तों की जमात मे शामिल हो जाए। ऐसा नही करें तो किसी डॉक्टर से अच्छे होने.का प्रमाण-पत्र दिलवा दीजिए, उसे । मैं तो ब्लैकमेलिंग के लिए काटता हूँ और मेरे काटने से कोई मरता भी नहीं।' लगा, कुत्ता प्रादमी से बहुत नाराज है और कुत्तो को जमात बढ़ाने का इच्छुक है । उसे कुत्ते ही पसन्द है, भादमी तो किसी भी स्थिति मे नहीं। लोकतन्य को कुत्ते ने काटा/7 नहीं बर्दाश्त करना जानवर का प्रादमी को एक हडकाया हुमा कुत्ता सड़क पर उछलकूद मचा रहा था। वह जब भी किसी आदमी को देखता, काटने की कोशिश करता । भों-भों करके उसको पोर लपलपाता, किन्तु प्रादमी के पत्थर उठाते ही प्रांखें तरेरता और दुम हिलाता सामने की भाड़ी की खंदक में जा घुसता । योडी देर बाद फिर बाहर प्राता और हर किसी को काटने की कोशिश करता । सड़क की एक प्रोर को दुकानों पर बैठे चाय पीते लोग कहते-'साले की मौत मण्डरा रही है, दब चल गया तो जान से हाथ धो बैठेगा । प्रादमी प्राते-जाते, सटक से गुजर जाते और सड़क कटी हुई पांखों से उस कुत्तं की हरकतें देखती रहती।' कुत्ता भागकर एक शिक्षा शास्त्री को कोठी में जा घुसता और उसके साथ कॉफी पीता। कभी रिरियाकर उससे दया की भीख मांगता और कभी पाखें चढ़ाकर ब्लैकमेलिंग की कोशिश करता । वेचारा शिक्षा शास्त्री उससे पीछा छुडवाने के लिए उसके सामने रोटी के टुण्डे डाल देता पौर कुत्ता आधी रोटी के टुकड़ों को मुंह में दबाये, दुम उठाए चुपके से कालोनी के पिछवाड़े से दूसरी ओर निकल जाता। शिक्षा शास्त्री खिसियाया-सा जोर से प्रावाज लगाता, 'अरे कोई सुनता है, दूसरी कॉफी बनाकर लामो । वह काफी तो कुत्ते को भी नकाफी रही, वह गटागट पी गया ।' फिर नाक सिकोड कर मन ही मन झुंझलाता, मैंने भी किस बला को पाल लिया, साला रोज चला पाता है । ऐसे ही किसी दिन कुत्ता कचहरी में घुम प्राया। जब सबने भगा दिया तो प्रॉफीसर्स में पहुंचा, लेकिन जब किसी ने पास नही डाली तो पपना-सा मुह लिये बाहर बैठे वकीलों की कुसियों के नीचे से घुसता. निकलता सामने रखे खाली स्टूल पर बैठा । बोला-'प्रादमियों की जमात मे मैं अकेला कुत्ता हूं इसलिए हुगूर मुझे भी थोड़ी सी जगह दोजाए।' लेकिन लोगों ने उसकी एक नही सुनी और उसे एक कोने में खदेड़ दिया। फिर क्या था, कुत्ते ने प्याऊ के पास अपनी जगह बनाली। एक शाम वह रेलवे के पास देखा गया जहां उसके चारों ओर काले, भूरे, चितकावरे, लाल भोर सफेद कुत्ते घेराबन्दी किए हुए खड़े थे, किन्तु कोई भी उस पर झपट नहीं रहा था। उन कुत्तों में कोई बड़े व्यापारी का, कोई चिकित्सक, वकील, नेता मा शिक्षाविद् का कुत्ता था तो कोई किसी अधिकारी या इन्जीनियर का। पालतू कुत्ते उसे कैसे मारते । कुत्ते ने मौका देखा और वहां से खिसक लिया। प्रादमियों ने सोचा दूसरे मोहल्ले के कुत्ते तीसरे मोहल्ले के कुत्ते को चर्दाश्त नहीं करते, लेकिन पालतू कुत्ते पालतू कुत्ते को कभी नहीं मारते । पालतू कुत्तों में बडा संगठन है, भाई चारा है । वे अलग होकर भी हर मायने में साथ हैं । भला वे आपस मे क्यों मार-काट करने लगे ? कुत्ते को तो प्रादमी को ही मारना होगा। प्रादमियों को कुत्ता काट सकता है, लेकिन वे कुत्ते से बचे रहना ही श्रेयस्कर समझते हैं। वे जानते हैं कि यदि वे प्रागे पाए और कुत्ते से सामना हुप्रा तो वह उन्हें भी काटेगा। इस आफत में कौन फंसे ? कुत्ता किसी को काटता है तो काटे, उन्हें क्या ? स्वार्थ से उनकी प्रांखें बन्द रहीं। प्रादमी नजर बवाने लगे तो कुत्ता नये प्रादमियों को काटने लगा । शिक्षा शास्त्री बोले-'भई, मैंने तो जिंदगी में सभी का भला किया है, प्रादमियों का भी, जानवरों का भी। अब जब प्रादमी मुझे भूल गए हैं तो अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए जानवरों के सथ हूं। प्रादमियों मे न सही, जानवरों में तो इज्जत रहे ।' अभियन्ता कहने लगे-'यार, कुत्ता है । रोटी का टुकडा डालो और पिंड छुडायो । जानवर से कब तक लड़ोगे ?' वकील साहब ने सुझाव दिया-'हमारी तो सारी वकालत मादमी मोर मादमी के लिए है । कुत्ते पर मुकदमा चलायोगे तो वकालत किससे नही बर्दास्त करना जानवर का मादमी को/9 करवायोगे ? और जानवर पर कुछ हुप्रा भी सो मिलेगा क्या? भूबा है, सारी जिंदगी मन को भूब लिये दरवाजे के सामने सहा रहेगा।' चिरित्सक ने परामर्श दिया-'कुत्ता काटेगा तो चौदह इन्जेक्शन साने पडेंगे या उसे मारना पड़ेगा। बेहनर है उपके गले में पट्टा हालदो । घर के बाहर पड़ा रहेगा।' समाजसेवी दूरदशिता प्रकट करने लगे-'प्रादमी की बात होती तो हम समस्या का निदान खोजते । जानवर के लिये तो हमारी समाजसेवा कारगर नहीं है । और यह कुत्ता तो वर्षों से मे ही सभी को काटता रहा है । हमें भी काट चुका है । यह मूर्ख भी है और चालाक भी । प्रापको ऐसा सामंजस्य शायद ही कहीं देखने को मिला हो । अच्छा है इसे सोचा ही न जाए । हार-थक कर सो जायेगा एक दिन वाहन के नीचे ।' हम विकल्पहीन होकर घर लौट प्राए । दूसरे दिन मालूम हुमा रात किसी वाहन से कुचलकर कुत्ता मर गया । तब लगा, जानवर पाहे मादमी को बर्दाश्त नहीं करे, लेकिन जानवर को प्रादमो जरूर बर्दाश्त करता है। यह बात सडक से गुजरने वाले वाहन नही जानते । वे अपनी तेज गति में न पादमी को बर्दाश्त करते हैं और न ही जानवर को । कुत्ता वाहन की चपेट मे प्राकर मर गया, लेकिन प्रादमी के भीतर का जमीर मरा हुआ है । हो सकता है कल कोई दूसरा कुत्ता हड़काने लगे, प्रादमी को बर्दाश्त नहीं करे मोर आदमी की नियति जानवर मे भी बदतर बन जाए। 10/महाकवि शुतुरमुर्ग बिकाऊ है एक समाजसेवी पान के बीड़' में प्राज वे फिर किसी पिटे हुए मोहरे की तरह मुंह लटकाए, अग्यिो में भूख और अधरों पं प्यास लिये एक उदामी जीते हुए सामने आ बैठे। देखा, एक प्रादमीनुमा कोई चीज पचास रुपये के जुगाड़ के लिए धरना दिये हुए बैठी है । लिजलिजी गिजगिजी-फुसफुसी फफू द-सी। ऊपर से औरताना चेहरा और नीचे से सठियायी मुद्धि के साठसाला बूढ़े की मरी हुई देह तिस पर समाजसेवी होने का स्वांग, दावा, अखवारबाजी करने का शौक, उलैकमेलिंग का अभ्यास और अपने में चुगलियों के शब्दकोश । प्रादतन बदतमीज, वेमुस्वत मौर जाहिल । कहने लगे 'मेरी जीविका तीस वर्षों से मिक्षावृत्ति पर ही टिकी है और मांगताग कर पेट भरना हमारा पुश्तैनी काम रहा है । जो मांगने पर भी नही देता उसके विरुद्ध अनापशनाप लिखना, अधिकारियों को धमकियां देना और उनकी शिकायतें करवाना ही मेरे कमाने का जरिया है । प्राप देखते नहीं, मैंने कुछ लिखा नहीं और लेखक, कुछ पढ़ा नहीं और पत्रकार एव कुछ किया नहीं पोर समाजसेवी हूं मैं तथा मैंने विना काम कमाना सीखा है।' वड़ा बुरा लगा, लेकिन क्या किया जाए ऐसी घटिया चीज के मुकाबले इमारी जनसम्पर्की नौकरी ने यही सिखाया है कि मनचाहे से अनचाही और अनचाहे के साथ मनचाही बातें करो। भले-बुरे सभी को प्रादर दो अन्यथा हमारा ऐसे लोगों से क्या वास्ता, क्या सरोकार ? उन्होंने सुद चताया कि ये अन्तःपुरों में प्रोरताना लिबास में जाया करते थे और उनका सम्पर्क कई जिलों की नादिर सभामों से भी रहा । वे बिना काम- काज किए खाने और चन्दा-चिट्ठा करने के मादो रहे । उन्होंने चौवन कोमों के कस्बे में रहकर चौवन तरह की चुगलियां सीखी जिन्हें ये , वारम्बार मुनाते रहे । दो बड़ी हवेलियों के बावजूद वे बेघर और सब तरफ से धन बटोरने के बाद भी निधन कहलाने में ही सुख अनुभव करते रहे। गोया साम, दाम, दण्ड, और भेद से लोगों से कुछ प्राप्त करना ही उनके जीवन का मकसद रहा। प्रथम परिचय में उन्होंने अपना नाम वर्णशंकर बताया था किन्तु कुछ वर्षों बाद वे बेणेश्वर और फिर भक्त श्वर लिखने लगे। लेकिन लोग उन्हें भूखेश्वर के रूप में जानते हैं । यों वे काफी सम्पन्न हैं । लाखों के बारे-न्यारे किये हैं उन्होंने और येनकेन-प्रकारेण उनकी घुसपैठ यहाँ-वहाँ भो रही है। लेकिन मन की भूख अभी मिटी नहीं । प्रभी भी वे गोंद के लड्डू पाने के शौकीन हैं, किसी साजिश से जुड़े रहने के मोहरे भी। एक मौन को तोड़ते हुए बोले-'हमें कोई कुछ दे देता है तो हम उसे 'बड़ा' घोपित करते हुए सकुचाते नहीं हैं और कोई टाल देता है तो हम उसकी खिलाफत करते हुए अघाते भी नही । प्रापके पास भी इसीलिए पाए हैं कहीं से कुछ दिलवाइये । पाप अच्छे पद पर हैं और प्रापकी गलती भी है। हमें हंसी भी प्राई और स्थिति का योध भी हुा । फिर उनके प्राने का मकसद समझ में पाया तो लगा, हम गलत जगह प्रा बैठे। पुलिस के महकमे में होते तो उनकी पूरी मेवा करते पोर किप्ती निर्माण महकमे में होते तो प्रयत्न करते उन्हें कुछ मिल जाए तथा उनकी भूख पीढ़ी दर-पीढी बनी रहे ताकि जो गलत तरीके से अजित किया गया है वह सब चौपट हो जाये । किन्तु हम ठहरे साहित्योपासक, हमारे पास तो सहानुभूति और दया ही है देने के लिए । हमने उनके प्रांसू पौधे मोर उन्हें दशहरे के मेले में रावण का पार्ट दिलवाकर एक सौ रुपये से उपकृत किया, किंतु क्या देखतं हैं वे कुछ दिन बाद ही कवि रूप में अवतरित हो गये। वोले-'अनाथ माधम की सहायतार्थ कवि सम्मेलन हो रहा मापिक सहायता दिलवाइये । हमने समाज कल्याण अधिकारी से कहा कि गरीबों को दिए जाने वाले मनाज में से कुछ समाजसेवीजी को भी दें ताकि वे भूखे पेट नहीं रहें । 12 | महाकवि शुतुरमुग । हम प्रनाय हैं । हपे भी . समय गुजरा पोर एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम में गरीबों का चयन होने लगा तो देखा पंक्तिबद्ध प्रादमियों में भक्त श्वरजी भी खड़े हैं। कहने लगे. "पिछड़े वर्गों में ही क्या, गरीब तो किसी भी जाति में हो मकता है। संतानविहीन हो तो करोड़पति भी गरीब है और असमय की संतानें हों तो हम जैसा बाह्मण भी।' देखा, एक भूख राजतन्त्र में पलकर जनतन्त्र के रास्तों से चलकर 'तन्त्र' और 'जन' के बीच दुर्वासा की भूख की तरह रग बदल रही है । शोध भी पाया और ऐसी विडम्बना पर दुःख भी हुमा । भूख ने प्रादमी को किस कदर जानवर बना दिया, यह देखकर मन व्यथित हो उठा । हम शिविर से लौट पाए । भक्तेश्वर के कारनामों की चर्चा पूरे जिले में बेतार के तार की तरह फैली हुई थी। लोग उन्हें देखकर वैसे ही मुंह मोड़ लिया करते थे जैसे कोई अपशकुन को देखकर । लोग सोचते थे कि मिलेंगे तो कुछ मांगेंगे समाज सेवा के नाम पर और नही देंगे तो गालियां बकेंगे किसी दूकान पर बैठकर । इज्जतदार लोग उन्हें वैसे ही ताडते रहे जैसे पुलिस कमियों को। कोई भी नजर मिलाने को तैयार नहीं हुआ, तो भक्त श्वरजी देश भ्रमण के लिए निकले और बम्बई, कलकता, डिबलगढ़ और हैदराबाद के उद्योग- पतियों से धर्मशाला, कुएं जातजडूले, व्याह और मृत्यु संस्कार के लिए दान-दक्षिणा ले पाए। समय बदला तो उनका परिवार भी वहचहाने लगा और गाठ में दाम गिरे तो 'चेहरा बड़ा हो गया । ठग विद्या उन्हें विरासत में मिली थी मौर उसी दमखम पर वे सरकारी महकमा के लोग टटोलने लगे । पांच रुपये की टिकट मे पचास रुपए का खेल और पचास रुपए में दुनिया धूमने पाले भक्तेश्वर के पौ बारह पच्चीस हो गए। वे समझ गए कि सुखी वे हैं जो निठल्ले रहकर दूसरों की जेबें काटते हैं तथा मूर्ख वे हैं जो कामकाजी जिंदगी में पिसते हैं। शहर में कव्वाली का कार्यक्रम था। मशहूर कव्वाल पाए थे मोर हाल खचाखच भरा था। मंचस्प कलाकारो की और दृष्टि फैकी बिकाऊ है एक समाजसेवी पान के बीड़े मे/13 तो भक्तेश्वर जी भी दिपाई दिये । हमने संयोजा मे पूछा, 'भाई इस कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति के माने ? वे कोई कव्वाल नहीं।' मयोजक ने बताया, 'बीस रुपये पर तालियां बजाने के लिए रिठलाया गया है उन्हें ।' 'माई वाह, ऐसी समाज सेवा तो शायद पहली ही हो।' देखा, भक्तेश्वरजी ताली पटके के साथ नाच भी रहे हैं और वरूपिये-सा अभिनय भी कर रहे हैं । संयोजक ने बताया कि इस सबके लिए उन्हें कुछ और दिया जाएगा। कमाल है, एक प्रादमी कभी समाजसेवी होता है, कभी कवि- कलाकार और कभी पत्रकार साहित्यकार और बस चले तो ताती पटकेदार भी । गरज यह कि रुपया बटोरना है चाहे जरिया कुछ भी और कैसा भी हो । वे रोने के पैसे भी कमा सकते हैं और कचहरी में गलत गवाहियो देकर भी पेट भर सकते है। एक ज्योतिपी ने घोषणा की कि वे छह माह बाद नहीं रहेगे तो बलि के बकरे जैसी शाल बनाकर बोले-'प्रब तो कुछ दिलवा दीजिए सौ-पचास ही सही । कल नहीं रहा तो कोई दूसरा मांगने नहीं पाएगा पापके पास ।' हमने कहा, 'भाई आप इतना रपया जमा करके क्या करेंगे? बस करो, भूग्व की भी कोई मीमा है । प्रादमी के साथ लाज-गरम भी तो है।' बोले, 'प्रच्छा तो एक पान ही खिलवा दीजिए, जर्दे का । कुछ तो कीजिए हमारे लिए ।' हमने झट से एक अठन्नी फेंक कर चपरासी से कहा- 'मुह भर दो समाजसेवीजी का पान से, और पिण्ड छुड़वायो।' D 141 महाकवि शुतुरमुर्ग J. गधों का मेला : प्रादमी अाज भी अकेला जयपुर जिले की सांगानेर सहमील की लूणियों ग्राम पंचायत के भावगढ़ बंध्या ग्राम में वर्षों से प्रतिवर्ष दशहरे पर प्रासोज बदी सप्तमी से ग्यारस तक गधों का मेला प्रायोजित किया जाता है । एशिया में गधों के सबसे बड़े इस मेले मे गधों, घोड़ों एव खच्चरों के सिवा कोई दूसरा पशु नहीं लाया जाता और गधो की खरीद-फरोख्त करने वाले कश्मीर, लद्दाख तथा कन्याकुमारी तक से यहां आते हैं। यो सो देश के उज्जैन, अलीगढ़ एवं भरसपुर प्रादि स्थलों पर छोटे पशु मेलों में भी गधे-धोड़े लाए जाते हैं, लेकिन इस मेले जैसी बात उनमें फहा ? यहां तो एक दो हजार मिलते है और हजारों में भी कोई मारवाड़ी गधा, कोई काश्मीरी, तो कोई लद्दाखी तथा प्रासपास दढ़ो तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उड़ीसा, प्रासाम, राजस्थान और अन्य इलाकों के गधे भी मिल जायेंगे। गधों के इस मेले में उनके बेचान से अधिक महत्त्वपूर्ण बात है उनकी पहचान की। पहले मेले में ढाई हजार रुपये तक के गधे बिकते थे लेकिन गधों के भाव बढ़ जाने से अब महगे दामों मैं बेचे जाने लगे हैं । अच्छी किस्म के इतने गधे एशिया महाद्वीप के किसी भी मेले में एकत्रित नहीं किए जाते । इन गधों की तुलना में जयपुर के प्रासपास के इलाकों के गधे कमजोर देखे गए हैं, लेकिन गधों का क्या, घे स्वस्थ और अस्वस्थ दोनो स्थितियों मे गधे है और उन्हे प्रादमी कभी नहीं कहा गया, हालांकि वे अनुशासनबद्ध, प्राज्ञाकारी और वर्तव्यनिष्ठ रहे हैं। गधा बनाम प्रादमी गों को सूरत ही कुछ ऐसी है कि प्रादमी उन पर तरस खाकर भी उन्हें किसी बोझ से मुक्त नहीं करते पोर ऐसे निरीह प्राणी के नाम से , घोकते हैं, कोई एक भी गधे की संज्ञा में रहना पसन्द नहीं करता। और तो और, निरे मूखं, उद्देश्यहीन और निठल्ले-मसखरे व्यक्ति भी पौर सब पाहाना पसन्द करते हैं, गधा नहीं। अपने लिए गधे का विशेषण सुनकर धे अपने को 'हीन' अनुभव करते हैं । भले ही गधे से भी बदतर हों, पाप किसी ध्यक्ति को गधा कहिये, वह बुरा मान जाएगा और सौ मन का मुंह बनाकर मन में कोई गांठ बांध लेगा । यह तो बेचारे गधे ही हैं कि पादमी के साथ जोड़े जाने पर भी मौन हैं, उन्हें भी आदमी से सस्त नफरत है किन्तु में उसे जाहिर नहीं करते मोर प्रादमी कहे जाने वाले निर्लज्ज तथा निर्मम प्राणी का बोझा चुपचाप ढो लेते हैं । प्रादमी इतना चतुर है कि गधे की जिन्दगी जीने के बावजूद अपने को आदमी ही कहता है, गधा नहीं। असलियत यह है कि गधों की जमात में मादमी खोज निकालना पड़ा कठिन कार्य है और प्रादमी नामधारी प्राणियों मे गधों को खोज पाना मत्यन्त सरल । फिर भी, पादमी पादमी ही है, गधा गधा हो । गधों का मेला उस समय पूरे उभार पर होता है जब गधा दौड़ के क्रम में घुड़दौड़े होती हैं । रेंकने वालों में ढेंचू ढेंचू की बजाय पायों की टापों की ध्वनियों के बीच धूल में बिम्ब उभरते हैं, प्रतिस्पर्धा पौर विजय की माय मुद्रायें गधों के चेहरे पर भी देखी जाती हैं । लो, दूसरे गधे भी सजसंवर कर मा गए हैं मैदान में । तभी गधों का एक व्यापारी कहता है, 'इस मेले के उद्घाटन के लिए कोई मन्त्री नहीं माया । इसलिए जनतन्त्र का हामी मेरा गधा बुढ़ा गया । प्रगली बार कोई जवान गधा लाऊंगा जिसके तौर-तरीके भी माधुनिक हों। मिनिस्टर गाड़ियां शेखावाटी में तो गधा गाड़ी को लोक भाषा में मिनिस्टर गाड़ी कहा जाता है और यहां प्रादमी का साग बोझा मिनिस्टर गाड़ियां ही दोती हैं । यों भी जीवन और साहित्य में गधो को बखूबी लिखा गया है। प्रख्यात कथाकार कृशनचन्दर की 'गधे की मात्मकथा' मोर 'गधे की वापसी' जैसी कृतियो का कोई सानी नहीं । हास्य-व्यंग्य कवियों ने भी गधे को 16/ महाकवि गुतुरमुर्ग कविता का विषय बनाना बेयस्कर समझा । एक कवि ने लिखा है : 'तेरी ही सरकार गधे, तुझ पर तनमन बलिहार गधे, तू कर ले मुझसे प्यार गधे ।' गधों के सम्बन्ध में अनेक किस्सै यहां-वहां प्रचलित हैं जो सुने-पुनाये जाते हैं और चुटकियों के साथ व्यापारी मेले का मजा लूटते हैं । गधे भी नाम के हो गधे हैं, मादमी की तरह निठल्ले मोर कामचोर नहीं। यह उनकी शराफत ही है कि वे बोझा ढोकर भी गधे हैं और प्रादमी की सरासर बेईमानी या हिमाकत कि वह बोझा ढोकर भी गधा नहीं अथवा गधा कहाने को तैयार नहीं। दिस लगा" मेले में ग्रामीणों की भीड से घिरे गधों को देखकर मानस में कई बातें कौंधती हैं । इन गधों की क्या जमात, मादमी तो इनसे भी बड़ा गधा है और इनके कैसे धर्म, जाति, वरणं या सम्प्रदाय, यह सब बातें तो मादमियों तक हैं। गधे तो धर्म निरपेक्ष राज्य के ऐसे सयाने पशु हैं जो दूसरे पशुपों और मादमियों की तरह अपने मालिकों को धोखा नही देते पौर मालिक के बताए पथ का अनुसरण करते है । मादमी के प्यार में छल हो सकता है, गधे का गधी के प्यार में नहीं । रेप-रैक कर ही सही, वे जिसे प्यार करते हैं, मन से चाहते हैं । कहावत भी है कि दिल लगा गधी से तो परी भी क्या चीज है ? गने की प्रतीक्षा मेले में पाये एक व्यापारी ने बताया कि दो गधे अन्तरंग मित्र पे। एक गधा घोगी के यहाँ था दूसरा कुम्हार के यहा । एक दिन कहीं मिले तो यतियाने लगे । धोबी के गधे ने मौज-मस्ती में कहा-'बड़े मजे की छन रही है यार । हर सुबह कपड़े लादकर नदी पर चला जाता हूं पौर पिकनिक स्पॉट देखता हूं। मेरे यहां ड्यूटी को पावन्दी जरूर है मगर किसी तरह की जालसाजी नही । देखते नहीं कितना मोटा हो गया हूं और एक तुम हो कि जैसे थे, वैसे भी नही । प्ररे भाई कोई दिक्कत हो तो मेरे यही ट्रांसफर करवा लो।' गधों का मेला मादमी माज भी प्रकला/17 फम्हार के गधे ने जवाब दिया, 'मैं अपने मालिक के कारण 'पजल्ड" हूं। सारा बोझा लादकर भी वह पूरा साना नहीं देता पौर सारा बजट अकेला ही डकार जाता है।' 'छोड़ क्यों नहीं देते वह नौकरी ? हमारे यहां चले मापो, पोस्ट भी वेकेन्ट है मौर....।' 'नही यार, यह जब कभी अपनी लड़की से नाराज होता है तो उसे कहता है कि यदि तूने फिर वैसा नहीं किया तो मैं तेरी शादी इस गधे से कर दूगा । बस, मैं इसी विश्वास और प्रतीक्षा में यहां टिका हूं कि वह कभी अपनी बात पर अमल करे और.....।' गधों के दर्शन को ग्रामवासी बड़ा शुभ मानते हैं। कहते हैं यदि कोई गधा बाई पोर से निकल जाए तो समझो किस्मत ही सुल गयी और कोई गधा सामने खड़ा हो तो बिगड़ा काम बन जाता है । एक अधिकारी ने गधो के मेले का उद्घाटन किया और वह दूसरे ही दिन बड़ा अधिकारी बन गया । एक प्रत्याशी ने गधे के पाव कर इन्टरव्यू दिया और सलेक्ट हो गया। पिछले दिनो बीजापुर में प्रायोजित गधों की शादी में सैकड़ों प्रादमी बाराती थे और शादी इस मान्यता पर की गई थी कि इससे सूखा पीड़ित बीजापुर पर दया होगी। गधे युगल वर-वधू की तरह सजाए गए थे और इससे पहले उन्हें नगर की मुख्य बस्तियों मे घुमाया गया था। कहते हैं 'गर्दभराज की जय' की ध्वनि के साथ ही वर्षा की झड़ी लग गयो। गधे की वापसी गधो के वश-विस्तार और विकास के फलस्वरूप देश में उनकी संख्या काफी बढ़ गयी है । प्रादमी प्रादमियो को जमात में भी प्रकेला था, मकेला है । गधे संगठित होकर ढेंचू ढेचू करके अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए मनचाहा कर रहे हैं और आदमियों के संगठन टूट रहे हैं या प्रादमी गधेपन के कारण गधों के साथ रहने मे ही सुख अनुभव कर रहे हैं। 18 | महाकवि शुतुरमुर्ग - एक गधा जो पहले कभी येन-केन-प्रकारेण आदमियों को जमात में घुस प्राया था और बाद में किसी कारणवश जमात से निष्कासित कर दिया गया था, फिर लौट पाया है । लेकिन यह गधा नहीं है । मादमीनुमा गधा है और प्रादतन गधा है । ताज्जुब यह कि न इसे प्रादमी पसंद करते न गधे । गधा भी ऐसा है कि सस्कारविहीन, फूहड़ और जटिल । कल एक गधा कहने लगा 'अच्छा हुप्रा नगर में एक गधा तो और बढ़ा । लेकिन जब बताया गया कि वह निरीह प्राणी नहीं है तो दूसरे गधों ने विरोध किया-'हमें गधा चाहिए असली-नकली नहीं।' C गधा का मेला माघमी माज भी अकेला 119 बाणभट्ट की औरताना प्रात्मा सातवीं शताब्दी के बाणभट्ट के सम्बन्ध में यह बात विशेष रूप से प्रचारित की गयो कि वह अब्बलदर्जे का गप्पी, घुमक्कड पोर प्राधारा कहे जाने वाला ऐसा प्राणी था जो पौरताना लिवास में अन्त पुर में पहुंच कर महिलाओं को बाहर निकाल लाया करता था। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी विरचित 'बाणभट्ट की प्रात्मकथा' उपन्यास का नायक 'बाण' निम्न जाति की निउनिया उर्फ निपुणिका से उतना ही प्रेम करता था जितना राजसी ठाठबाट में पली भट्टिनी से । वह भट्टिनी के प्रति श्रद्धावनत होकर और निपुरिणका की प्रेम-शक्ति को समझत हुए भी दोनों के बीच का कोई रास्ता नहीं निकाल पाया । उमे दोनों प्रेमिकामों के अनुराग की प्राग में जलते हुए एक विछोह के साथ अलग-थलग-सा रह जाना पड़ा और जब बाण नही रहा तो उसकी प्रात्मा औरताना लिवास में यहां-वहाँ और न जाने कहा कहा भटकती रही। एक दिन वह अनायास ही दूसरे विश्वयुद्ध के हामी और अनायक की इमेज कायम करने वाले नामी गिरामी हिटलर से सम्पकित हुई और उसने नाजियों के बीच पुरुष का बाना पहना। यह वान सन् 1939 ई. की किसी तारीख की रही होगी, हिटलर ने बाण की प्रौरताना पात्मा को इस तरह ग्रहण किया कि दुनिया मे झूठ मोर फरेब की बातें लोग पसन्द करने लगे। जब युद्ध के दौरान हिटलर मचानक गायब हो गया तो उससे बिछुडी हुई उसकी प्रारमा जर्मनी की सड़कों पर अपनी जैसी कोई दूसरी मारमा तलाशने लगी। संसार में झूठ का कोई सरपरस्त नहीं रहा । तब मृष्टि में एक ऐसे प्राणी का प्रादुर्भाव हा जिसके ढाई फुटी घड़, एक फुट टार्गे मोर एक फुट में सिर या गर्दन थी। इस विचित्र प्राणी को देखने के लिए सुदूर देशों के निवासी भी माए थे और वह वनमानुप की तरह उछलकूद कर रहा था।

काफी दिनों बाद वह ऐसे पद पर मासीन हुमा जहां से कुछेक ना मझ किन्तु अवसरवादी, पदलोलुप, अयोग्य और नपुंसकों को पत्नोन्मुख करने के लिए सक्षम था । वह काफिर हो गया । तभी हिटलर की मात्मा ने उसके शरीर में प्रवेश किया और वह समय की नब्ज पकडते हुए दूसरी- तीसरी किस्म के लोगों की पत्नियों को कलाइयां टटोलने लगा। देखते ही देखते वह अन्तःपुर से नहीं, पासपास के स्थानों से प्रारतें उठाने लगा। वह घिनौने व्यक्तित्व का किन्तु स्वय द्वारा सम्मानित व्यक्ति जीवन जीने की नाटकीयता से जुड़कर चमचे बनाने वाली फैक्ट्री का प्रधान प्रबन्धक क्या बना, उमने निहायत बेहूदे लोगों को फोरमेन जैसे पदो पर लगा दिया। जब वह अमुक-अमुक व्यक्ति के घर पहुचता, वहा से फैक्ट्री में फोन करके वर्णशंकर को बताता मैं यहां बैठा हू और उसकी वह नाजायज सतान बात को प्रचारित कर देती। बाद में कानाफूसी की बात बेतार के तार की तरह सर्वत्र फैल जाती और सम्बन्धित व्यक्ति कसमसाकर रह जाता । दूसरे दिन ऐसा ही कुछ दूसरे किसो व्यक्ति के साय होता । विचित्र प्राणी उस व्यक्ति को अनुपस्थिति में उसके घर पहुंचता मोर उसकी पत्नी से कहता 'इधर से गुजरा था, चला भाया । पाप कॉफी नहीं पिलायेंगी?' या 'पाप अच्छा खाना बनाती हैं, भूख लगी तो चला प्राया।' अथवा 'मापको देखे काफी दिन हो गये थे । सोचा, कुशल-क्षेम ही पूछता चलू।' और शॉल की तरह शालीनता प्रोढे हुए बेजुबान-सी वह शिष्ट महिला नहीं चाहते हुए भी उसको मादर देती और तभी वह वहीं से वर्ण- पांकर को फोनाता-पान मैं यहाँ हूँ और तत्काल फैक्ट्री में कार्यरत चमचे उस महिला के साथ विचित्र प्राणी का नाम जोड़कर फिर कोई मनगढन्त कथा प्रचारित कर देते । उन दिनों फैक्ट्री में चमचों के साथ गासिप भो तैयार किए जाते थे। यह कार्य वर्णशंकर की पत्नी बेगम सुरशीद किया करती थी। एक दिन हमने उम विचित्र प्राणी को भीड़ से घिरे और किसी महिला को पापों से पिटते देखा । लोगों ने भी उसकी ऐसी मरम्मत की कि कई दिनों तक मस्पताल की तारीखें गिनता रहा । बात कपर पहुंची बागमट्ट को मौरताना प्रात्मा ।

तो वह पदच्युत भी कर दिया गया। फिर सुना गया कि जब वह किसी कोठी से निकल रहा था, किसी कुत्ते की प्रात्मा ने उसके शरीर में प्रवेश किमा भौर वह हड़किया गया। कुछ दिन गुजरे, दिल्ली में कनाट प्लेस के निकट किसी कार की चपेट में पाकर वह जिंदगी से हाथ धो बैठा और उसकी मारमा यहां-वहाँ चक्कर लगाती रहो । सुना यह भी गया कि वह मरने से पूर्व अपनी मात्मा को किसी कवि के सुपुर्द कर गया जो सब्जी के थैले में मात्मा को भरकर कभी चांदनी चौक में, कभी पटेल नगर में और कमी शाहदरा में देखा गया । वह प्रात्मा अपाहिजों की शक्ल में भी दिल्ली जंक्शन पर मुसाफिरों से पूछती देखी गयी 'मेरा क्या होगा ?' 'अब मेरा क्या होगा ?' एक मुसाफिर गलती से उस आत्मा को साथ ले पाया और तब से वह मन की भूख लिए सरकारी दफ्तरों में चक्कर काट रही है । एक दिन वह एक फूहड़ प्रादमी के शरीर में प्रवेश कर गई और वह प्रादमी सभी को काटने लगा है । काटने की प्रक्रिया में वह कुत्तेनुमा प्रादमी रह गया । लोग जब भी पूछते हैं, 'याण भट्ट की वह मात्मा कहां गयो ?' और नगरवासी बताते हैं-'वह कुत्ते की शक्ल में बाजारों की सड़को पर घूम 22 | महाकवि शुतुरमग ये घुसपैठिए साहित्यकार तब साहित्य के नाम पर कुछ और ही लिखा जाता था, अब कुछ मौर हो लिखा जाता है । मगर जब कुछ नहीं लिखा जाएगा, उस समय अव और तब सी बातें नहीं होंगी। कहते हैं. साहित्यकार पैदा होते है, उनमें लेखन-सृजन की प्रतिमा ईश्वर प्रदत्त होती है और वे जो लिखते हैं, उसका सम्बन्ध देशकाल पौर एक समाज विशेष से सीधा होता है। तभी तो साहित्य को 'समाज का दर्पण' और 'देश का मानचित्र' कहा गया है। मगर इन तथ्यों को अब नहीं स्वीकारा जा सकता। हम जानते हैं साहित्यकार पैदा नहीं होते, पैदा किए जाते है। हम जानते हैं, साहित्य लिखा नहीं जाता, लिखवाया जाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो साहित्य की विधानों में, कथा रूप मे गल्प, माख्यायिकानों और कहानी के बाद मकहानी, मनरही मोर अनलिखी कहानी नही होती। कविता के क्षेत्र में छन्दवद्ध काव्य रचना के बाद मुक्त छन्द, नई, प्रयोगवादी, ताजी, भकविता और माग रगों रेसानों की गूगी कविताएं नहीं होती, गीत के बाद प्रगीत, नवगीत, माज का गीत मौर प्रगीत जैसी गीत विधाएं नहीं होती, निबन्ध, लेख मोर गद्य-गीत के बाद परिचय, टिप्पणियो, सम्मतिया जैसी खानापूर्तियां नहीं होती। मगर समय की बात, याज संगड़ी-बहानी भोर-संगड़ी कविता पत्र-पत्रिकामों में बसी ही पल पड़ी है जैसे गणित में लंगड़ी भिन्त । स्थिति यह है कि माप जो लिराते हैं, उसे ही साहित्य मान लिया जाता है और अच्छे-बुरे साहित्य के मापदण्ड नारों मान्दोलनों पौर घेरों से मपंग हो गए हैं। प्राज लिपने में जोर नहीं माal, जोर तो साहित्यकार बनने व पहलाने में माता है और जब पाप साहित्यिक रूप में येनकेन प्रकारेप पुन जाते हैं, स्वीकार लिए जाते हैं, तय मापने क्या लिसा है, यह कोई नहीं देखता । और तो और, पाठक वर्ग प्रापके साहित्य को पढ़े बिना ही प्रापको स्तरीय, श्रेष्ठ, सृजनशील और प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार घोषित कर देता है। और यह सत्य है, आजकल पाठक लेखकों के नामों को पढ़ते हैं, रचनात्रों को नहीं। श्रोता ऐसे गीतकारों के कंठों पर रोझते हैं, जो कविता से बहुत दूर होते हैं। मैं एक ऐसे कवि से परिचित हूं जिसकी एक ही कविता देश के कवि- सम्मेलन से लेकर व्याह शादियों तक में सुनी-सुनाई जाती रही है मौर कवि को उसी एक भाषा विशेप की कविता पर मनचाहा सम्मान मिला है । यो सरकार में पदाधिकारी होना एक वात है, लिखना-पढ़ना दूसरी और प्रकाशित-प्रसारित या प्रचारित होना मलग-सी बात । और यह एक कटु सत्य है कि किसी को प्रक्षर काले करते, अर्थहीन बात कहने और निरर्थक पढने-सुनने से कोई रोक भी नहीं सकता, बशर्ते वह 'साहित्य' व हर लिखा जाए। प्राज के लेखक बड़े प्रगतिशील, श्रमजीवी और अध्यवसायी हैं जो तीस दिन मे शोध-संदर्भ की नई से नई पुस्तकें तैयार कर लेते हैं, कवि लालकिले से काव्य पाठ करते हुए लम्बी- लम्बी कविताओं को सिने-घुनों पर गा लेते हैं। पढ़ने वाले एक बैठक में तीन-तीन जासूसी उपन्यास पढ़ लेते हैं, पुस्तकों से दृष्टि नहीं फेरते मोर श्रोता हास्य की हल्की-फुलकी और छिछली कविताम्रो का रसास्वादन करते नही प्रघाते। प्राप कहेगे 'मालोचकों को चाहिए, ऐसे साहित्य-गृजन पर रोक लगायें।' हमारा गत है : 'माज के प्रालोचक मालोचना नही, कवितायें लखते हैं। प्राप फिर कहेगे : 'मालोचकों का पथ-निर्देश कवियों को करना चाहिए।' हम व हेगे : 'कवि प्रव कविताएं नहीं लिखते, वे मालोचनायें लिखते हैं।' और यदि मापने इस बहस में क्सिी कहानीकार को निर्णय का 24 / महाकवि शुतुरमुर्ग ।

अधिकार दे दिया तो हमारा दावा होगा, 'माज के अधिकांश बड़े मोर मोरप्रिय कहानीकार कहानिया नहीं. लेख लिखते हैं।' तो प्रश्न यह नहीं होगा कि कौन क्या लिखता है? प्रश्न होगा, कौन क्या है तथा किस विषय को छोडार दूसरे किस विषय पर लिखता है मौर क्यों? ऐसी स्थिति में पाप किसी विषय के पचड़े में पड़ना हरगिज नहीं पाहेंगे मोर जो प्राप्य है, उससे ही सन्तुष्ट होगे । सब, हमें विवश होकार कहना पड़ेगा किन कोई साहित्यकार है मौर न किसी का कोई साहिग । मोर जो है वह है नाम, जिसके लिए न किसी प्रतिभा का होना पावश्यक है. न किसी स्वाध्याय-चिन्तन मोर लेसन का। मावश्पकता तो साहित्यकार बनने कहाने के उस प्रमाण-पत्र की है जो कतिपय नामधारी साहित्यकारों द्वारा दिया जाता है और यह भी फिसी ऐप्रोम या तिकड़म के मारही। हमने साहित्यकार कहे जाने वाले कछत मोगों को मंगुलियो पद कर कुछ नये साहित्याधिकारी बनने और बहाने वालों की एक लम्बी. चौड़ी सूची देखी है जिसमें हमारे पड़ोसी, संग-संगाती, रास्ते गुहल्ले के पौर कुछ राजनीति के मंच से शियस्त साए लोगों के नाम शीर्षस्य पतियों हमने उन्हें साहित्यकार नही, पुमपंठिए साहित्यकार महा है । गगर इनका कहना है, हमें उन्हें समझने के लिए कम से कम तीन पागला योजनामों के वर्ष मोर अधिक से अधिक पाच दशक मोर जीना होगा । उन साहित्यकारों को भी हमरो प्रधिक नहीं जीना है। मगर ये मग मीकर भी साहित्य में उतना सब देने का दावा करते है, जितना गम पद पागा, हमारे जैसे साहित्य प्रेमियों के लिए सम्भव नहीं जान पड़ा। पोर पाप शब्द में हमारी कतई रुचि नहीं होने से हमें यह सब पढ़ना होगा, जो हमारे जीवनकाल में ऐसे घुसपैठिए साहित्यकारों द्वारा पृजित होगा। मारण कि हमें पोर हमारे जंसों को 'यूड़ा' और 'साहित्य' दोनों में गिन। तो माइए रारसे पहले हम पापमा परिपग पागाजीगरपाते मे गुरापदिने माहिरपमार / हैं । पाप प्रांत की ही नहीं, समूचे देश को किसी पत्र-पत्रिका के लिए नहीं लिखते, प्रापकी कोई पुस्तक भी प्रकाशित नहीं है और किसी लेखक की कोई कृति पढना तो दूर अापने उमे देया तक नहीं है । मगर प्राप सदेय अपने स्वाध्याय का दावा करते हैं और प्रान्त के वरिष्ठ व वियों में जाने जाते हैं । पाप लेखक भी हैं, और पत्रकार भी। कमी-कभार मापका अस्वस्थ स्वर प्राकाशवाणी से भी प्रसारित होता है मौर माप कवि सम्मेलनों को अध्यक्षता भी करते देखे गए हैं। मगर अापको प्रान्त के बाहर, हमारा तात्पर्य है दूमरे प्रान्तों के साहित्यकारों में कोई नहीं जानता । थाप कहेंगे : 'भई ये कैसे ?' तो सुनिए साहस, पापको भले ही कोई न जाने, कोई कुछ नहीं माने, मगर पाज की प्रान्तीय सरकार के सारे मिनिस्टर, सब दफ्तरों के संचालक और कर्मचारियों से लेकर बाजारों-गलियो मे पान को और दूध-दही को दूकानों वाले तक अच्छी तरह जानते हैं । और मात्र यही कारण है कि चन्द दिनों पूर्व शहर के हलवाइयों के चन्दे से प्रापका सार्वजनिक अभिनन्दन बड़ी धूमधाम से मम्पन्न हुमा था। उससे कुछ दिन पूर्व प्रापको 'नये पौर माने वाले कल के' साहित्यकारो को किसी सस्था ने सैकड़ों की राशि मेंट की थी। प्राप कहेगे-'इतना सब कैसे हुप्रा ?' और हमारा उत्तर है- 'पाप में दम हो तो ग्राप भी करके देखिए।' दूसरे साहित्यकार हैं शर्माजी । प्राप पिछले पांच वर्षों से लिख रहे हैं । कवियों के लिए आप कवि हैं, कहानीकारों के लिए कहानीकार, मगर न पाप कवि हैं, न कहानीकार । यदि कुछ हैं तो छविकारों के लिए छवि- कार और चित्रकारों के लिए चित्रकार | प्राप जानना चाहेंगे-"फिर पाप साहित्यकार कैसे ?" 'ठीक वैसे ही जैसे लोग पत्र छापकर पत्रकार और पाठ्यक्रम की पुस्तके तैयार कर किताबकार बन जाते है ।' दूमरा प्रश्न होगा, फिर कवि और लेखक कसे?' उत्तर है, 'जैसे लोग ऐसे भी हैं जो सुद न लिखकर दूसरों से लिखवाते 26 / महाकवि शुतुरमुर्ग हम कहेंगे है और रचना का पारिश्रमिक चाहते हैं. नाम नहीं, ठीक वैसे ही। और अाजकल कवि और कयाकार तो नामधारी होते हैं, कार्यकारी दूसरे लोग। तीसरे साहित्यकार हैं पण्डित मूलीराम 'सुधाकर'। अनेक काव्य ग्रन्थों के प्रणेता, कई एक साहित्यिक संकलनों के सम्पादक, शोध- सन्दर्भ की पुस्तकों के प्रकाशक और सरकार के पदाधिकारी हैं । पहले कभी प्राप लिखते थे, अाजकल तो दूसरों से लिखवाकर अपने नाम में प्रकाशित करवाते हैं। कल सूचना केन्द्र में मिले तो अलग बुलाकर बोले- 'कोई मदद कर सकेंगे।' मैंने पूछा-'कसी मदद ।' बोले-लिखने-पढ़ने में ।' "मैं समझा नहीं, मैंने जानकारी चाही-'आखिर माप कैसी मदद चाहते हैं ? क्या कोई पत्रिका निकालने की सोच रहे हैं ?' 'नही', वे धीरे बोले-'मुझे तो तुमसे कुछ पुस्तिकायें लिखवानी हैं अमुक विपय सम्बन्धी।' 'मैं तो ऐसी पुस्तक नही लिख सकता,' मैंने विवशता प्रकट को-'और मुझे वो आजकल समय ही नहीं मिल पाता।' किसी सोच में डूब गए । फिर अपनत्व दिखाते हुए बोले-'भई बात यह है, मैं चाहता हूं तुम्हें कुछ पैसा मिल जाए और मुझे नाम ।' 'क्या मतलब? 'मतलब यह कि तुम जो पुस्तकें लिखोगे वह मेरे नाम से छपेंगी और लिखने का जो पंसा मुझे मिलेगा उसमें हम दोनो का फिफ्टी-फिफ्टी।' मुझे यह समझौता स्वीकार नहीं था, इसलिए मैंने उन साहित्यकार के नाम से नहीं लिखा । मगर कुछ मासों बाद ही उनके नाम से किसी पुस्तक माला में कुछेक नई पुस्तकें और छी मेलों, त्योहारों, दुर्गों, मन्दिरों और शहरों जैसे विषयों को लेकर । स्यात् जिस साहित्यकार को वे तलाश रहे थे, उन्हें मिल गया था । ये घुसपैठिये स चौये साहित्यकार हैं पालीवक प्रवर 'क्षण-भंगुर जी । पाठ्य-पुस्तकों को कुजिया लिखते-लिखते यूढे हो चले है और अब घिसेपिटे चेहरों की जीवनियां लिख-लिख कर कवि-लेखक बनते-बनते मालोचक बन गए हैं। मापको पालोचना शक्ति कैसी है और प्रापका अध्ययन कैसा है -इससे पूर्व हम दो बातों पर ध्यान माकृष्ट कराना चाहेंगे-पहली, क्षण भंगुरजी अपना नाम और पता तक सही नहीं लिख पाते और दूसरे साहित्यिकों की कृतियों को पालोचना सही लिख लेखे हैं -हम इस ममं से परिचित नहीं । दूसरी, प्रापको लिपि का ज्ञान कतई नहीं है और क, का, कि, की कु, कू तक माप सही नहीं लिख सकते मगर कहते हैं आप एक वंठक में सौ पृष्ठ काले करते हैं. जिन्हें प्रापके विद्यार्थी संशोधित करते हैं । मगर मापकी ख्याति प्रालोचक के रूप में बाहर की गली-गली में बंट रही है और पाश्चर्य है कि आपको आपके पडोसी तक नहीं जानते । आपके लिए एक वात मौर भी देखी सुनी जाती है कि पाप नई कविता का घोर विरोध करते हैं और स्वयं नई कविता लिखने का यत्न करते हैं । दूसरी पोर पाप गीतों के प्रबल समर्थक हैं, मगर गीत-काव्य से माप नितान्त अनभिज्ञ हैं । और सच, यह है कि माप लिखते-पढ़ते भी कुछ नहीं हैं, किसी प्राइमरी के अध्यापक हैं और हिन्दी पढ़ाते हैं । पौर भी ऐसे साहित्यकार हैं जो लोकप्रियता के कितने ही सोपान पार कर चुके हैं पर उनके बारे मे अभी कहने और सुनने वाले दोनों दुर्लभ है। 28 | मदार वि मुरमुर्ग कतरनः साहित्य प्राज 'साहित्य' कहकर जो लिखा जा रहा है, उससे लेखक सन्तुष्ट हो सकते हैं मगर समाज नहीं । समाज जिस लिखे को पढ़ना चाहता है या जसा लिखा हुमा पढ़ कर लाभान्वित और गौरवान्वित होना चाहता है, उसका पुस्तक पत्रिकाओं में सर्वथा अभाव-सा है । लोग साहित्य में नहीं, नारों में, पान्दोलनों में, वाद-विवादों में तथा दूसरों की 'गुड विल' पर जोमा चाहते है । और ऐसा कर वे जो अनुभव करते हैं, उसे ही लिखकर पुजना चाहते है । मगर हर भोगो हुआ यथार्थ लेखन नही हो सकता और हर थोपा या उधार लिया अथवा चुराया गया साहित्य 'साहित्य' की संज्ञा मे नहीं आता। यों अाजकल कहीं से भी और किसी भी तरह वटोर कर अपने नाम से कुछ भी छपवाया जा सकता है, प्रवारित-प्रसारित कराया जा सकता है । किन्तु सही मायने में साहित्य लिखकर, सही प्रयों में उसे जीकर साहित्यकार कहाना सभी के लिए सभव नहीं होता। जो लिखते है, उन्हें साहित्य पठित जनता नहीं स्वीकारतो मोर जो लिखते नही और फिर भी पूजे जाते हैं, उनकी चर्चाएं पाए दिन सामयिक-समाचारो जैसी होती हैं । यह एक निविवाद सत्य है कि लोग अपने कतरन साहित्य से पुस्तक- पत्रिकामों भोर आकाशवाणी के माध्यम से धनोपार्जन करते है, जबकि ऐसे साहित्य कर्मियों की न्यूनता नहीं है, जो अनवरत रूप से साधना में रत होकर भी भर्याभाव में, विषम परिस्थितियो में तपा रुग्णावस्था में जीते है, फिर भी यश प्रौर नाम से वचित रहते है। पिछले कई वर्षों में अनेक साहित्यकार मेरे सम्पर्क में पाए हैं जिनमें अधिकाग 'माहित्य व्यवसायी' थे. साहित्यकार नहीं । उनकी न साहित्य में कोई विशेष गरि यो, न वे साहित्य को साहित्य की संप्ट से देखते थे और न ही उनका साहित्य से कोई सम्बन्ध था। ये वो साहित्य के माध्यम .

से धनोत्पत्ति करना चाहते थे, उन्होंने ऐसा किया भी। मगर वे मान क्या बन गये है, यह देखकर मैं स्वयं प्राश्चर्यान्वित हूँ। साहित्य द्वारा प्रजित धन से मैंने लोगों को बंगले बनवाते भी देखा है, ऐशो-आराम करते और अधियारे-कोनों में सांस लेते भी। कहानी मजरंगाजी की पिछले दिनों एक साहित्यकार साहित्य क्षेत्र में पौर जन्मे । पहले वे किसी नृत्य मण्डली में तवलची थे, फिर लड़कियों को कत्थक नृत्य का रिहर्सल कराते और कुछेक दिनों बाद ही नाटको में अभिनय करते और निर्देशन देते भी देखे गये। कुछ दिन हुए, मिले तो मुस्कराते हुए बोले 'इन दिनों मैंने साहित्य भी लिखा है -'कहानी, कविता, लेख सय ।' मैंने जिज्ञासापूर्वक पूछा- 'पाप कबसे लिखने लगे ? आपने तो कभी कुछ पढ़ा तक नहीं क्या प्रवाना सरस्वती की कृपा हो गई?' वे गर्दन को दार्य-बायें करते हुए कहने लगे-'भई, मेरा साहित्य से क्या लेना-देना, मैं तो धनोत्पत्ति के लिये लिखता हूं। मुझे साहित्यकार नहीं बनाना, मुझे तो टेरेलिन को शर्ट और पैट सिलवानी है।' मैंने एक जानकारी पोर चाहो-'भाई यह सब कैसे ? क्या टेरेलिन के कपड़े भी साहित्य से सम्बन्धित है ? 'पाप समझे नहीं', नवोदत साहित्यकार बजरंगा जी (नाम शायद कुछ और था) ने धीरे से शब्दों को रोक-मेक कर कहा-'मेरे पास कुछ लोक-कथायें संकलित की हुई थी, कुछ नृत्य-नाटक और कलानों पर प्रकाशित सामग्री को कटिंग्स थी और कुछ सामग्री मैंने यहां-वहाँ से मार लीपी-और इस सबको मैंने अपने नाम से पत्रिकामों में छपा लिया है।' मुझे सब समझते देर न लगी और मैं ऐसे कतरन-साहित्यकार से सदा-सदा के लिए अभिवादन करके घर लौट पाया। वर्मा जी को मूल्यांकन योजना न जाने कसे मेरी मुलाकात काशी से पधारे और जयपुर बस गए 30/महाकवि शुतुरमुर्ग वर्मा जी से हो गई। वे प्रादमी एकदम लचर थे मगर उनके कारनामों की चर्चाएं पाये दिन सचिवालय के साहित्यकारों और काफी हाउस के गजमेबाजों में होती थीं। एक दिन अचानक ही रहीं से टपके 'घरे सुनो भाई, मेरी राजधानी के साहित्यकारों के मूल्यांकन की एक योजना है और उसके लिए तुम्हारा सहयोग चाहता हूं।' मैंने चौंकते हुए पूछा-'कैसी योजना और कैसा मूल्यांकन ?' वे अपने मुंह को ऊंचा नीचा करते हुए भाषण देने लगे-'मैंने नए-पुराने सब साहित्यकारों के सही मूल्यांकन के लिए हर माह के हर सप्ताह में एक-एक साहित्यकार का साहित्य सुनने की योजना बनाई है। इस योजना के अन्तर्गत हर साहित्यकार प्रपना लिखा हुप्रा ढेर सारा साहित्य एक साथ प्रस्तुत करेगा, श्रोतामों मे बैठे दो मालोचक उसके साहित्य का मूल्यांकन करेंगे और मूल्यांकन के रूप में जो लिसा जाएगा, वह स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित होगा। इस तरह जो साहित्यकार साहित्य-क्षेत्र में उपेक्षित रह गए हैं उन्हें सम्मान मिलेगा। 'और इस सबसे आपको क्या मिलेगा ?' मैंने नहीं चाहते हुए भी पूछ ही लिया । 'मुझे कुछ नही.' वे बोले-'मेरा कार्य तो साहित्यकारों की सेवा करना है। बाद में अधिक जानकारी चाहने पर वर्माजी ने मुझे मूल्यांकन किये जाने वालों की सूची दिखाई जिसमे मेरा एक भी परिचित साहित्यकार नही पा, सब कतरन साहित्य के प्रणेता थे। ऐसे और अनेक साहित्यकारों से भी मेरा परिचय रहा । साहित्य के यदलते मापदण्ड हिन्दी के प्रधुनातन लेखन और साहित्य के बदलते मापदण्डों को देखते हुए लगता है माज साहित्य कह कर जो लिखा जा रहा है, उसमें प्रयोगशील मोर सांकेतिक भाषा में नई नई विधाए हमारे सामने आई हैं मगर नये के प्रयत्न-साध्य लेखन में कचरा भी कम मात्रा में नहीं लिखा गया है । कहीं ऐसा न हो कि हम नये कहे जाने वाले साहित्य में अपना कतरन साहित्य/31 : पुरानापन जो शाश्वत है, वह भी खो बैठे। हमें नए और पुराने दोनों ही साहित्य में मोती तलाशने होंगे । प्रच्छे साहित्य का भले ही वह साहित्य की पुरानी विधानों में लिखा हो, अनुकरण करना उतना गलत नहीं है जितना 'नया' कहकर कुछ नही देना है । हमारा उद्देश्य तो सही मायने में 'साहित्य' कहे जाने वाले लेखन मे होना चाहिए, पोपे गए मोर थोपे जा रहे साहित्यिक कचरे में नहीं। ये पालोचक: ये पत्रिकायें प्राजकल पत्रिकामों के समीक्षा स्तम्भों में अच्छी कृतियों के लिए बहुत ही कम और वह भी पूर्वाग्रह के साथ तथा हल्की सस्ते स्तर की कृतियो के लिए सविस्तार और बढ़ा-चढ़ा कर कहा जा रहा है। यह कोई स्वस्थ बात नहीं। इससे हिन्दी पठित जगत को साहित्य पढ़ने-समझने में जो असुविधा या प्रांति हो सकती है-इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। 'कल्पना' जैसी साहित्यिक पत्रिका में एक पुस्तक को लेकर लिखा गया-'ये सात कथायें हैं और इन्हें कहानियां न कहकर कुछ भी कहा जा सकता है ।' मगर स्थिति इसके विपरीत है । पुस्तक की कहानियों को कहानियों के अतिरिक्त मौर कुछ नहीं कहा जा सकता। नये मुखौटों के भटकाय माज जीवन के दूसरे क्षेत्रों में स्यात् उतना संघर्ष नहीं है, जितना साहित्य के क्षेत्र में । कारण कुछ भी रहे हों, एक सत्य यह है कि 'लोग' साहित्यकार बनकर स्याति अर्जित करने के लिये नये-नये मुखौटों के साथ इस क्षेत्र में प्राये है, पा रहे हैं और इनमें अधिकांश दे लोग हैं जो कला- राजनीति मौर सांस्कृतिक प्रवृत्तियों से सम्पृक्त रहे हैं । इससे सही व्यक्ति के चयन मे तो असुविधा होती हैं. साथ ही 'गलत व्यक्ति' को अनावश्यक रूप से दिये जाने वाले सम्मान से क्षेत्र के कार्यस्थ रचनाकारों में कुटाए, मनास्था, विषमताए और रिक्तताएं भी बढ़ रही हैं। 32 / महाकवि शुतुरमुर्ग प्रकाशन का मोह : प्रयंहीन लेखन आज हर व्यक्ति येनकेन-प्रकारेण पत्रिकामों में प्रकाशित होकर धनोपार्जन के लिये वह सब लिख रहा है, जिसे पत्रिकायें छाप सकती हैं । किन्तु वह साहित्य नहीं है, साहित्य के लिये जुटाई गई रचनामों की वे कतरनें है जिन्हें जोड़कर सम्पादकों को पाखो के मागे मकड़ी के नाल बुने जा रहे हैं । इस सबसे अधिक दुख है प्रकाशित लेखकों के मानसिक भटकावों पौर शारीरिक बिखरावों का । वे साहित्यकार तो बन रहे हैं, पादमी नहीं रह पा रहे । ऐसे लेखक जिनका विश्वास कतरन साहित्य में है या जो साहित्य लिखने की अपेक्षा साहित्यकार कहाने में ज्यादा रुचि रखते हैं, उनका अर्थहीन लेखन कभी जीवन को प्रर्थहीन भी कर सकता है । उन्हें यह कभी नहीं भूलना चाहिए। कसरन साहिर 133 पान की प्रात्मकथा स्थायी ग्राहक है जी हां ,मेरा नाम पान है और लोग मुझे इसी नाम से जानते है. याद करते हैं । वे चाहे रसपान करें, चाहे सुरापान, उन्हें मेरी तलब जरूर होती है। भाजकल चायपान में भी मेरी अावश्यकता अनुभव की जाती है । कुछेक शौकीन तो पान भी शौकिया ही खाते है, लेकिन ऐसे भी अनेक महानुभाव है जो पान जमाए रखने के निरे प्रादी है और जिनकी डिबिया पानों से भरी रहती है । कुछेक जर्दिया लोग पान को अच्छी दूकानों के वर्षों मे पान खाने के लिए पंजीकृत है । खुदा उनकी उम्र दराज करे। दर असल मेरे विना मान-सम्मान और रख-रखाव के सारे तौर- तरीके माधे-अधूरे है । यह और बात है कि लोग कृपणतावश छालियां फांककर या सोंफ खाकर अथवा चूना-जर्दा फटफटाकर अपना मुंह अच्छा कर लेते है, किन्तु जहां तक मुह के जायके का प्रश्न है, इस जायके को पान खाने वाले ही समझते है । और साहब, विना पान सम्मान भी क्या ? जैसे जल इज्जत का पर्याय है और उसका होना जरूरी है, वैसे ही पान इज्जत अफजाही की जान है और यह माज के प्रादमी की बेहद मजबूरी है । पत्रकार कृष्णावतार गौड़ होते तो पान भी जमाते मोर दस पांच सिगरेट फूककर कहते 'यार फंक्शन की कवरेज बिना पान सिगरेट कहाँ होती है ? धुमा निकले, मुंह चले तो कवरेज के लिए कलम भी चले।' सच भी है, पुराने जमाने के लोग मूर्ख नही थे । वे एक पान के बीड़े में दुनिया को इधर-उधर करवा देते थे। मसलन पान का बीड़ा खाया पौर बहादुर युद्धोन्मुख हो गया या पान का रंग देखा कि जवानी प रंग पा गया। और 'जाकी विटिया सुन्दर देखी ता पर जाप घरी तरवारी।' बच्चों ने 'सायके पान बनारस वाला' क्या सुना वे अमिताभ बच्चन को श्रेष्ठ सिने क्लाफार घोषित करने लगे। पान के शोकीन मोर कद्रदां हर समय में हुए हैं। पान का रिवाज पहले भी काफी था और यह हमारे मांगलिक पर्वो से अतिथि सम्मान तक पेश किया जाता रहा । हर हाल में हर प्रकार की परिस्थिति और परिवेश में पान सेवा की प्रथा रही । हमारे देश, धर्म और रीति-रिवाजों में पान 'पानजान' तरह 'बेगमे फातमा रहा। मुझे ठीक से याद नहीं पा रहा, लेकिन इतना सही है कि मेरा जन्म किसी तबोली के यहां नहीं हुमा । मैं किसी एक स्थान पर नहीं जन्मा और कई स्थानों के साथ मेरे अनेक नाम हो गए, अलबत्ता सरनेम पान ही रहा। मीठा, माचर, मदरासी, मोरा, मघी, मेवाड़ी, लाखेरी, कलकत्ती, बंगाली जैसे नामों से मुझे सम्बोधित किया गया । में मपने शौकीनों की क्या तारीफ करूं, ऐसे सत्ताधारी भी मिले कि मुझे देखते ही झपटे, उठाया और मुंह में जमा लिया। कुछेक देर तक चबाते रहे और बहुतों ने गाल के एक कोने में ऐसे दवा लिया जैसे किसी का माल हथिया लिया हो । मादमी का भोजन करने वाले भो मेरा भोजन करना नहीं भूले । शायरों का तो जवाय ही नहीं। उन्होंने मेरे टुकड़े कर हाले और सबसे मैं 'पान के टुकड़े' के रूप में खाया जाने लगा। ये पान वालियां कहते हैं, सातवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्द्धन के राज्य में निउ- निया' उर्फ 'निपुरिणका' पान की दूकान किया करती थी और वह बाणभट्ट को दूसरी बार वहीं मिली थी। पान वालियां सभी समय में हुयीं, उन्होंने महे गुल खिलाये और उनके पान के किस्से हवा में तैरते रहे । लेकिन उनके नखरे राजा-महाराजा और नवाब ही नहीं, पान के कद्रदां भी उठाते रहे । इस तरह पानवालियों में गुलाब बाई गुलाव की तरह मोर घमेली बाई घमेली की तरह पहचानी गयी।. चिलमभरो अभियान में भी पान का विशेष महत्त्व प्रतिपादित किया पान को प्रात्मकथा/35 गया । लोग मुश्की, जर्दा, किमाम, तबका, कोकीन, खूशबूदार सुपारी और चिकनी सुपारी के पान खिलाने मे ही न जाने क्या से क्या हो गये। पान की बदौलत वे सिर चढ़ गए और पान जान पेशकर तावेदार से सरकार हो गये । कत्था खाफर लोग जितने लिजलिजे रहे, उससे भी कहीं अधिक चूना लगाने में उन्होंने कमाल हासिल किए कि वे महमद खां से मोहब्बत खा और सोहबत खां से हुकूमत खां हो गये। यह कहते मुझे कतई संकोच नहीं है कि जितना मेरा उपयोग संस्कारों के निमित्त या लोकव्यवहार के लिये किया जाता है, माज उसमें कई गुना दुरुपयोग लोगों को बनाए रखने के लिए किया जाता है। लेकिन पान ने बड़े गुल खिलाये हैं और वह इसीलिए अपनी पहचान रखता है। पहला पान बात उस समय की है जब मैं छोटा रहा हूंगा, लखनऊ की बेगमें मुझं काफी पसन्द किया करती थीं और उनके मुंह कत्थे चुने की लार से भरे रहा करते थे। एक दिन बेगम अख्तरको पान की बड़ी तलब हुई मौर उसने निश्चय किया कि जो उसे दिन का पहला पान खिलाएगा, रात को उसी की वेगम रहेगी । इत्तफाक से उसे पहला पान एक फकीर ने पेश किया मौर वह फकीरन हो गयी । मियां रहमत को भी पान खाने की लत थी। वे एक साथ दो-तीन पान जमाकर जब अपनी बेगम से मिला तो बेगम ने उन्हें अपने से मलग करते हुए कहा-'मला मुह भरे पान के साथ किसी के पास कोई जाता है ?' और उस रात मियां रहमत को कमरे में सोने की इजाजत नहीं दी गई मौर वे रातभर करवट बदलते रहे। काशी के सूवालाल भी पानों की दलाली करते हुए गलती से जर्दै का पान बजाय परितानी के प्रपनी साली को सिला पाये। फिर क्या था, सारी पण्डिताई धुल गयी एक पान के बाड़े में । कहते हैं मांग को गोती पर 36 / महाकवि शुपुरमुर्ग डेढ़ किलो मिठाई पोर पचपन पूड़ियो खाने के बाद जर्दै के हाथ लगे पान को खाने से सांगड़ी बलवीर प्रसाद के होश भी लापता हो गए थे। पान के पौर भी किस्से मेरी माखों देखे हैं । मेरी शुरू जवानी में पान खिलाकर यार लोग मौरतों को रिझाया करते थे। वे पान खाने वाली औरतें अब तक प्राधी दर्जन से अधिक बच्चों की माएं बन चुकी होंगी। उन दिनों पान के गीत और लोग गालियों के भी बडे रंग थे और एक पान के बीड़े में लोगों के चरित्र मांक लिए जाते थे, फिर भी, लोगो मे हया. शरम थी। पहले कभी पान तश्नरियों में सजाकर मीर बड़े ही पदव के साथ खाये और खिलाये जाते थे किन्तु बुरा हो इन नये पान साने-खिलाने वालों का, उन्होंने मेरी बनी बनाई इज्जत को मिट्टी कर दिया । पान वाले हैं कि हाथ से पान दे रहे हैं और लोग हैं कि खड़े-खड़े ही पान खा रहे हैं पौर कुछेक ऐसे भी हैं कि पान की पहचान भी छोड़ रहे हैं । मैंने यह जमाना भी देखा है जब प्रेमी प्रपनी प्रेमिकामों को 'पान- जान' मोर पति अपनी पत्नी को 'नागरपान' समझा करते थे। तब औरतें भी ऐसी ही थी कि पान की तरह प्रादमियों के होठों पर रच जाया करती थीं । वे महंदी लगाते समय हाच पर पान मंडवाती थीं और उनमें ऐसी भी यो जिनके तकिए के नीचे सुबह पान मिला करते थे । सब समय का फेर है । समय समय की बात है। मेरे पिता 'पान- दान' में बैठकर हाकिमों के साथ सैर को जाया करते थे और जब हाकिम उन्हें याद करते तो एक अदब के साथ पेश किए जाते थे। वह शान-शौकत और तौर-तरीका गलत नहीं था और उसमे बधकर ही लोग पान खाना बेहतर समझते थे। तब पान को पेशगी मामूली बात नहीं थी और पाज, माज तो लोग पान खाना और खिलाना भी नही जानते । अब न वैसे पन- वाड़ी रहे न पान खाने वाले । पान की मार ने और उधार ने अनेक गृह- स्थिया उजाड़ दी हैं । इसमे प्रत्युक्ति नहीं कि पान का व्यय गेहूं के व्यय तक पहुंचने लगा है। लेकिन फिर भी, यांव-गली-गलियारों से शहरों मोर महानगरों वक सिने गीत गूजने लगा है-'खोपके पान बनारस वाला....।' पान की प्रात्मकथा 137 D इन्टरव्यू एक प्रालोचक के रिक्त पद का पिछले दिनों हिन्दी पठित जगत के प्रजाने-अनसुने मगर-'चोटी के मालोचक', प्रल्पनातों की जमात के 'पाठ्यक्रमी पुस्तकों के दो रुपये पेजी लेखक' 'हिन्दी व्याकरण एवं लिपि के घोर विरोधी', कॉफी हाउस के सिर• कटे मगर बहसी-साहित्यकारों के धर्मगुरु मौर जनतावाणी द्वारा प्रसा. रित नाटकों के 'छटंकीलाल' तथा रंगमच के 'प्रतिरिक्त कलाकार' श्री भजनलाल सुपुत्र सर्वयाचन्दजी साहित्य में नहीं रहे । उनका बिना किसी पूर्व सूचना के साहित्य के एक मुहल्ले से किसी बाजार में चले जाना, सृजनशील और ख्यातिनामा लेखकों के लिए कम, मगर उनके परम शिष्यों तथा मस्तिष्कविहीन लोगों के लिए अधिक कष्ट का कारण रहा । न तो वे बिना किसी 'भजनानन्दी मालोचक' की सहायता से साहित्य में चलने की स्थिति में रहे और न उन्हें किसी साहित्यकार ने साहित्यिक रूप में स्वीकारा । विवश हो, वे स्थानीय 'साहित्य के दफ्तर' में पहुंचे और उन्होंने दफ्तर के संचालकजी से अचानक हुए मालोचक के रिक्त पद के स्थान की पूर्ति हेतु प्रार्थना की। संचालकजी उदारमना थे, वे तुरन्त उनकी स्थिति से अवगत हो गये और दूसरे ही दिन एक स्थानीय समाचार-पत्र मे 'माव- श्यकता के कॉलम में मालोचक की प्रावश्यकता का विज्ञापन छप गया । विज्ञापन के छपते ही संचालकजी की मेज पर प्रावेदन-पत्रो का ढेर लग गया । स्थानीय साहित्यकारो में कुछेक दूकानदार साहित्यकार मालोचक वहाने के इच्छुक थे और उन्हें अपने साहित्यकार बने रहने का विश्वास नही रह गया था। प्रतः ऐसे सभी लोगों ने उक्त पद के लिए प्रावेदन-पत्र दिए थे।

किन्तु काफी खोजबीन एवं जांच के बाद भी ढेर सारे प्रायेदन-पत्रों, में से चार ही भावेदन-पत्रों पर विचार किया जा सका और चार व्यक्ति साक्षात्कार के लिए बुलाये गए । साक्षात्कार के समय पूछे गये प्रश्न और उनके लिए दिए गये उत्तर कसे, क्या थे, माप स्वयं देखें । विवरण यहां प्रस्तुत है- प्रार्थी का नाम~-मुफ्तीलाल सुपुत्र सारवीलाल, निवासी चौमू। प्रायु- 37 वर्ष। शिक्षा-मैट्रिक फेल, पांच साला योजनोपरान्त भी सफल नहीं। पूर्व व्यवसाय-चाय की दूकान, वर्तमान में सट्टे के कार्य से संबद्ध । साहित्यिक सेवाएं -स्वयं कभी नहीं लिखा, दूसरी से लिखवाकर अपने नाम से साहित्य प्रकाशित करवाता रहा । मगर साहित्य के लिए साहित्य का प्रणेता। दो-चार कवि सम्मेलनो में श्रोता के रूप में भाग लिया। कभी-कभी प्राकाशवाणी के कार्यक्रम भी सुने । समीक्षाएं लिखीं, मगर पत्रिकानों का दुर्भाग्य कि उन्हें कहीं भी स्थान नहीं मिला । अनुभव-तीन सम्मानित लेखकों को अपमानित किया, उन्हें कालभ्रमित पीढ़ी द्वारा हूट भी करवाया । एकाध कवि गोष्ठियों में संयोजन किया मगर कवि न्यून संख्या में मा पाए । कोई अन्य कार्य--हिन्दी के अध्ययन के लिए प्रयत्नशील, लेखक नहीं बन पाने के बाद मालोचक बनने को लालायित और इसी दिशा में कार्यशील। प्रश्न 1-~प्राप मालोचक बनकर साहित्य को किस रूप में देखने के इच्छुक हैं और पयो? उत्तर--मेरा साहित्य से कोई ताल्लुक नहीं है । मैं तो साहित्य का प्रासोचक बनकर कुछेक प्रतिभागों को नकारने के लिए भामादा हूं। साहित्य जाए भाड़ में, उसका रूप कुछ मो और कैसा भो रहे-मेरा कुछ बनने बिगड़ने वाला नहीं है । मैं तो चाहता हूं, साहित्य की हर प्रतिभा मेरा 'अस्तित्व स्वीकार करे ।'मैं जिसे साहित्यकार वाहू वह साहित्य में इन्टरव्यू, एक पालोचक के रिक्त पद का 139 ।

रहै और जिसे साहित्यकार नहीं होने की बात कहूं, वह साहित्य क्षेत्र से सन्यास ले ले। प्रश्न 2-क्या आप हिन्दी के कुछ वाक्य सही बोल सकते हैं ? यदि हां, तो जरा बोलकर दिखाइए । उत्तर-मैं हिन्दी भासा (भाषा) का परबल (प्रबल) समर्थक हूं और हिरदय (हृदय) से चाहता हूं कि सब हिन्दी भासा (भाषा) में ही लिखे- पर पढें) मैं यह भी चाहता हूँ कि हिन्दी के साहितकार (साहित्यकार) कबि (कवि) लेखक और अालोचक एक दूसरे के कार (कार्य) में हाय बटाए। प्रश्न 3---प्रापने हिन्दी साहित्य को कौनसी पुस्तक को माद्यत पढ़ा है और उसमें आपको क्या रुचा है ? उत्तर--मैंने पुस्तके तो बहुत पढ़ी हैं, मगर पूरी तो एक भी पुस्तक नहीं पढ़ी । इसलिए मुझे किसी भी पुस्तक में कुछ नहीं रुचा । प्रश्न 4--फिर मापने क्या पढ़ा है ? किस लेखक को पढ़ा है ? उत्तर--मैंने तो दो-तीन मित्रों की कविताएं स्थानीय-पत्रों में पढ़ी हैं और उन्हें ही लेखक मानता हूं। प्रश्न 5-आपने ऐसे लेखकों की भी रचनाएं पढ़ी हैं जो न मापके मित्र है, न परिचित? उत्तर--नहीं पढ़ी । मैं पत्रिकाएं नहीं, समाचारपत्र ही पढ़ता हूं और समाचारपत्रों में भी प्रांकड़े का कॉलम देखता हूं। प्रश्न 6--प्राप ऐसे लेखकों का नाम बता सकते हैं जो मापको मालोचक रूप में स्वीकार कर सकेंगे ? उत्तर--ऐसे तो तीन ही नाम हैं। प्रश्न 7- क्या प्रापके तीन नामों से साहित्य जगत किसी रूप में परिचित है ? उत्तर--नहीं है । प्रभो तो मेरे तीन नामों से पूरा शहर भी परि- चित नहीं है। मादेश--माप जा सकते हैं। इस बार तो नहीं मार फिर कभी किसी मालोचक की पावश्यकता हुई तो हम भापको मामन्त्रित करेंगे। 40/ महाकवि शुतुरमुर्ग (2) प्रार्थी का नाम- स्वयंवरनाथ उर्फ दिगम्बरनाथ निवासी सनसला माय- 40 वर्ष। शिक्षा- एम. ए. हिन्दी, 'कविता में प्रकविता' विषय पर 'विद्वान' की उपाधि से मलकृत । व्यवसाप-~-कॉफीपर के सिरफिरों का निर्देशक । साहित्य सेवायें-मुफ्तिया पत्रिकामों के समीक्षा स्तम्भों का नियमित लेखक; कुछेक विवादास्पद लेख यहां-वहां की पत्रिकामों में प्रकाशित; तीन पुस्तके शिष्य-प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित विषय 'मक्के की खेती', 'उधार का लेखन' और 'विद्यालयों में कैसे पढ़ें ?' अनुभव--साहित्य क्षेत्र में पिछले दस वर्षों से सृजनशील, मगर पाठकों का सर्वपा प्रभाव । कोई अन्य कार्य-सीन नवोदित लेखकों की पुस्तकों पर अभिमत दिए, दो ग्रन्थ विमोचन समारोहों में सम्बन्धित ग्रन्थों को प्राद्योपान्त पढ़े बिना ही अपनी प्रवचन क्षमता से बीस मिनट तक विचार प्रकट किए। प्रश्न 1-मापने अपना नाम दिगम्बरनाथ कैसे रखा? क्या भाप उत्तर-जी नहीं, न तो में जंन हूँ। और न मैंने अपना नाम दिगम्बरनाथ रखा। दिगम्बरनाथ तो मुझे 'स्थानीय-साहित्यकार कहते है । मेरा मतलब "पिछड़े हुए' या 'चुके हुए' अथवा 'प्रसाहित्यिकों' से है। प्रश्न 2-माप स्थानीय साहित्यिकारों को पिछड़े हुए, चुके हुए और प्रसाहित्यिक कैसे मानते हैं ? उत्तर-मैं नहीं मानता और उनकी साहित्यिक प्रतिभाओं को मन में स्वीकारता भी हूं। मगर कही वे मेरी लेखन-क्षमता को नकार नहीं दें, इसलिए मैं उनके लिए कुछ भी कह लिख देता हूँ। प्रश्न 3-मापने किस साहित्यकार की किस कृति को विशेष रूप से सराहा है ? इन्टरव्पू, एक मालोचक के रिक्त पद का./41 उत्तर-मैंने तो किसी भी कृति की सराहना नहीं की और न किसी कृति की मत्संना । मैं तो बिना पढ़े ही हर कृति पर बोलता हूं और पुस्तक हाथ में प्राने से पूर्व ही उसकी समीक्षा लिख देता हूँ। प्रश्न 5-यह सब कैसे ? उत्तर-मेरे पास एक रजिस्टर है जिसमें कुछ लेखों की कटिंग्ज चिपकाई हुई हैं । मैं उन लेखों के ग्रंशों का भिन्न-भिन्न ममीक्षानों में उप- योग करता हूं । जैसे, जो समीक्षा मैंने किसी कविता-पुस्तक के लिए लिखी थी, वही समीक्षा कहानी पुस्तक के लिए भी छपी है । प्रश्न 6-बहुत अच्छा । हिन्दी अालोचना में यह प्रयोग प्राप ही कर सकते थे । मगर राजस्थान के साहित्य और यहां के साहित्यकारों के लिए मापने क्या किया, जरा यह भी बताइए? उत्तर-राजस्थानी साहित्य में मेरी प्रास्ण नहीं है और यहां के साहित्यकारों को मैंने कई-कई दलों में विभक्त करने का सदा यत्न किया है । मैंने गीतकारों को कवियों के विरुद्ध और वहानीकारों को निबन्धकारों के विरुद्ध रखने में कोई कसर नहीं रखी है। प्रश्न 7-मालोचक पद के लिए पाप क्यों इच्छुरु है ? उत्तर-बिना पालोचक पद प्राप्ति के मेरा साहित्य में रहना संभव नहीं है । मैं मौलिक लेखक तो हूं नहीं. संकलित साहित्य के प्राधार पर समीक्षायें लिख लेता हूं। मगर साहित्य में रहने के लिए यह सब बहुत कम प्रादेश एवं प्रमिमत-पाप जा सकते हैं। हमारी राय मे पाप प्राथमिक विद्य लय में ही बने रहें, साहित्य में पाप किसी भी रूप में नहीं चल सकते । साहित्यकारों में साहित्यकार मोर मालोचकों में मालोचक रह पाना पापके बूते की बात नहीं। (3) प्रार्थी का नाम- प्राचार्य रामचरण सुपुत्र शास्त्रीण फिरणा प्रायु- कोई 35-362 प्रासपास 421वि में शिक्षा- उर्दू साहित्य में एम. ए, फुटपाथी साहित्य में पढ़ाकू' की उपाधि से अलंकृत । व्यवसाय 7-रंगमंच के राजस्थली कार्यक्रम से सम्बद्ध (सम- झोतों पर लिखने वाला लेखक) साहित्यिक सेवाएं --दूसरे रचनाकारों की मूल रचनामी की अनु- कृतियां लिखने का अभ्यास होने से कविताएं, लोक कहानियां, गीत, लोक- गीत सभी लिखे जो मेरे कंठों द्वारा सिने-गीतों की तरह बार-बार प्रसारित होते रहे। 2-लोक कयामों के एक संग्रह पर पाठक अकादमी द्वारा पुरस्कृत हुप्रा । 3-स्थानीय समाचारपत्रों मे कभी-कभार रचनामों फा प्रकाशन। अनुभव-हिन्दी नहीं जानता, मगर फिर भी हिन्दी भाषा में संकडों गीत लिखे; राजस्थानी नहीं, मगर राजस्थानी लिख सकता हूं। कवि- सम्मेलनों में कम, मुशायरों में ज्यादा जाता रहा हूँ। शब्दों का शुरु उच्चारण कर सकता हूं । मालोचना-साहित्य मे अनभिज्ञ हूँ, मंगर पत्रि- कानों मे समीक्षा स्तम्भ पढ़ता रहा है। कोई अन्य कार्य-पतला-दुबला नहीं हूं। साहित्य में रहकर प्रादमी का स्वस्थ रहना जरूर मानता हूं और ढाई सेर नमकीन और एक बोतल गुलाब पीने की क्षमता रखता हूँ। सबकी बातों में नुक्ताचीनी करते करते मैंने मालोचक बन पाने की कुछ रीति-नीतियां समझली है और गत तीन वर्षों से अच्छी रचनाओं तथा मान्यता प्राप्त कृतियों में कमियां तलाशता (खेद है एक दावत में चले जाने के कारण प्रार्थी साक्षात्कार के लिए नहीं पा सका। (4) प्रार्थों का नाम- एल. त्रिवेदी सुपुत्र एस. त्रिवेदी । निवासी- जानकारी नहीं। शिक्षा- इन्टर विज्ञान में, बी. ए. हिन्दी में और एम ए. अंग्रेजी में। इन्टरव्यू, एक मालोचक के रिक्त पदं का/43 ।

पूर्व-व्यवसाय-सबसे पहले मागरा में लड़कियों की प्राइमरी में अध्यापक रहा, फिर प्रलवर में कुछ वर्ष एक टेलर के साथ कार्य किया जहाँ कपड़ों की कतरब्योंन करते-करते साहित्य की कतरनें तैयार करने का शोक हुप्रा और अन्त में जब कोई अच्छी नौकरी नहीं मिली तो पत्रिका का सम्पादक हो गया। इस समय पत्रिका प्रेस में है, किन्तु धनाभाव के कारण पत्रिका प्रेस से उठाई नहीं जा सकी है। साहित्यिक सेवायें-साहित्य में रहकर साहित्य के द्वारा साहित्य के लिए सब तरह से गलत कार्य किये है ताकि साहित्य कुछ व्यक्तियो तक सीमित रह सके। -नये साहित्यकारों के पथ को हर बार अवरुद्ध किया है । न तो उन्हें अपनी पत्रिका में कभी छापा है और न ही उनकी रचनामों को कहीं छपने दिया है। -साहित्य में कनकन्ये लड़ाना विषय पर दो बार सेमिनार मायोजित कर चुका हूं जिसमें राजस्थान के साहित्यकारों को छोड़कर अन्य प्रान्तों के साहित्यकार भाग ले चुके है । -पाठक अकादमी में हरबार घुसपैठ की है और हर बार निकाला गया हू । मगर माज भी पाठक अकादमी के कार्यों से सम्बद्ध हूँ। -मौलिक साहित्य फम भोर प्रमौलिक साहित्य अधिक लिखा है जो पत्रिकामो के समीक्षा-स्तम्भों में छपा है। पाठ्यक्रम की पुस्तकों की सहायक पुस्तकें लिखी है जो हरबार काफी तादाद में पढ़ी जाती हैं। -दस कवितामों के बल पर तीस वर्ष से कवि सम्मेलनों में भाग लेता --गुरु-शिष्य परम्परा का समर्थक हूं और मेरे साहित्यकार-शिष्य राजस्थान के सभी शहरों में है। मनुभय-पाठन अकादमी को लेकर पन्द्रह वार याक्युद्ध कर चुका हूँ. तीन बार हाथापाई भी हुई है और दो साहित्यकारों में पिराव में 44 / महाकवि शुतुरमुर्ग -सम्मेलनों में हूट होने पर भी मुस्कुराते रहने का अनुभव है। ---जी-हूजूर से लेकर तेरे-मेरे तक की व्यावहारिकता से परिचित रहा हूं और इसी अनुभव के आधार पर उदयपुर से अपमानित, जयपुर से बहिष्कृत, अलवर से सम्मानित और अजमेर से तिरस्कृत होता रहा हूं। -पत्रिका का सम्पादन कार्य मित्रों से करवाता हूं ताकि मित्रता के अनुभव का हर क्षण परिचय रहे । -'साहित्य में फुटबाल', 'कविता में क्रिकेट', 'कहानी में सौ गजी-दौड़' और आलोचना में 'कलम घिसाई' जैसे सभी विषयों का पूरा-पूरा अनुभव मुझे है। -गीतकारों में कविता की, कथाकारों में कवियों और कवियों में पालोचना की चर्चायें करने का मुझे अतिरिक्त अभ्यास है। -नये पुराने साहित्यकारों में नया-पुराना बनकर रहने का तीस वर्षों का अनुभव है। कोई अन्य कार्य-फिलहाल देकार हूं और कार्य की तलाश में हूं। मालोचक के पद की प्राप्ति पर ही अन्य कार्य पूरे किए जा सकेंगे। इन्टरग्यू, एक पालोचक के रिक्त पद का / 45 शब्दों का संग्रहालय उर्फ एक कविता नगर नये और यहा-यहां बसे उस नगर में पहुंच कर हमने सबसे पहले यह महसूसा कि अन्य सभी चीजों की निरन्तर हुई बढ़ोत्तरी के बावजूद अच्छी कवितामों का कोटा कम हो गया है और काफी खोजबीन के बाद कवि तो मिले, कवितायें नहीं मिली। फिर मन में यह विचार जन्मा कि यदि यही हाल रहा तो कुछ दिनों के बाद सब्जी मण्डी के पासपास किसी कोने में ताजी कवितामों का एक सहकारी मण्डार खुलवाना पड़ेगा जहां से परिचय-कार्ड के माधार पर मावश्यकतानुसार कविताएं खरीदी जा सकेंगी। वहाँ के निवासी पाठ-दस दिनों पूर्व की पौर सस्ती सब्जियों की तरह घटिया. लचर तथा बेतुकी कविताएं खरीदकर काम चलाने लगे थे, मगर कवि होने का प्रमाण-पत्र सभी के पास था । इस दिशा में बड़े बाजार के कवि मग्रगामी नहीं हो सके और छोटे बाजार के कवियों की पहल रही। घटिया दर्जे की कविताएं प्राखिरीपोल और जंक्शन के पास भी कम नहीं लिखी गई। स्थिति यह कि कई मकान मालिकों के सिर पर दो-चार मुकदमों का बोझ रहा और उसके पास हर ऊंची गाली में एक ताजी या अकविता गुपी रही । शब्द कोई हो, चाहे उसकी मात्मा से कवि का परिचय हो, न हो मगर उसे लेकर कैसी भी, किसी भी विचार मौर स्तर की कवितानुमा कोई चीज लिखने तथा बोलने में उस नगर का हर निवासी माहिर था। कवि वही कोई भी हो सकता या । मदिरा पीकर तेरी मेरी बकने वाला भी कवि था, नकलें उतारने वाला भी, होटल के बाहर बैठकर नौकरी का रोना रोने वाला, गली का डॉक्टर और अस्पताल में सुई लगाने वाला पम्पाउण्डर भी। लोग हिन्दी साहित्य का इतिहास पढ़ाते-पढ़ाते कवि हो गए थे, पुस्तकालयाध्यक्ष पुस्तकों की मूचियां तैयार करते-करते नई कवितायें लिग्यने लगे थे और अन्धे-सूले, काने-लंगड़े तथा बहरे शक्ति विहीन होकर भी सुकोमल अंग प्रत्यंगों वाली पांवदार कविताएं लिखाने लगे थे, जो लिख नहीं पा रहे थे। तात्पर्य यह कि पानवाला भी कवि, चाय-नमकीन वाला भी, बस चले तो परचूनी की दूकान वाला और साइकिल वम वाला भी। अधिकारी भी कवि, चपरासी भी, थानेदार कवि, कांस्टेबिल भी। अर्थात सारा नगर कवि और हर कदि की अपनी अलग कविता । कहा जाता है कि सारा नगर कवितामय था और वहां के सभी छोटे- बड़े काम कपि ही किया करते थे। कवियों पर बड़े-बड़े दायित्व थे। उनकी यहां पलती भी खूब थी और वे अपने में पत्रकार, साहित्यकार, राजनयिक और न जाने कितनी-कितनी सूचियां बताते थे, मगर वे पूर्णरूपेण कवि ही थे । उनका पत्रकार होना संयोग पा, राजनयिक होना सौभाग्य और कवि के अतिरिक्त कुछ नहीं होना पहला और विशेष गुण । उनका विश्वास ईश्वर-प्रदत्त प्रतिभा में नहीं था। वे तो कविता को शब्दों के हेरफेर तक स्वीकारते थे और इसीलिए किसी के पास तुकों का संग्रह पा तो किसी के पास शब्द-कोश तथा किसी के पास चुराई हुई काय. पंक्तियों का रजिस्टर । लगता था, सदा नीरा कालिन्दी अपने असली रूप कमाते-पाते कविता फी शरल में बदल गई और उसकी नदी घाटी विकास योजना के समानान्तर वहाँ एक योजना मोर क्रियाशील रही कविता पाटी शिकास योजना । पोजना ने काफी विकास-विस्तार पा लिया था मोर कवियों की संख्या इस कदर बढ़ी थी कि उस नगर में कवियों को घटाने पर कुछ नहीं वन रह जाता पा. कहीं कवि सम्मेलन होता हो एक लम्बी-चौड़ी सूची हाय में मा जाती पीकवियों की। एक नगर, हर मादमी कवि। मसली कवि दो-चार दस-पन्द्रह मायातित और शेप कहलाने वाले कवि । शब्दों का संग्रहालय उर्फ एक कविता नगर/47 अधिकांश कवि शराब की बोतलों की गिनती करते पाये जाते थे, कुछ कवि नदी के किनारे शौचादि से निवृत्त होकर पढाई गई भांग की गोली पर परिचर्चा करते और एकाध किसी माधुनिक गाली का रिहर्सल करते। यद्यपि वहाँ के कवि न किसी प्रच्छी कविता पर दाद देना जानते थे और न किसी स्थानीय कवि को प्रोत्साहित करना तथापि पाए दिन कविता- प्रायोजन होते थे । कवि गोष्ठियां तो हर तिथि विशेष पर होती थी। एक मोर कोई बूढ़े और बच्चे साहित्यकार को लेकर गुरुडम चला रहे थे तो दूसरी ओर कोई प्रदेश की साहित्य अकादमी के नाटक का पर्दा खीचते हुए उसका नाम कविता प्रकादमी रखने के इच्छुक थे । मुख्य बात यह कि सब कवि ही रहना चाहते थे और कवि बने रहने के लिए प्रयत्न साध्य । मगर कोई भी एक अच्छी कविता लिखना नहीं चाहता था। वहां कवियों के मनेक मठ थे, नगर के मध्यस्थ और परकोटे के बाहर । यथा, आयातित कवियों का मठ, रामनाम मठ, गुमनाम एवं छदमनाम लेखक मठ और श्रीराम का प्रतिभा मठ । कुछ कवि कवितामों की पड़ियां लगाये थे, कुछ कविता की चाट के खोमचे । वास्तविक्ता यह कि सभी पर शब्द ही शब्द थे, प्रथों में जीने वाला कोई नहीं था। कविता मन्चों का तो कहना ही क्या, वहा साप-नेवलों, छिपकलियों, बिच्छुत्रों मोर कुत्तों से लेकर परदे की हर चीज पर लिखी कविताएं सुनने को मिलती थीं । कवि गोष्ठियों में जो कविताएं पढ़ी जाती थी, वे कुछ इस प्रकार की होती थीं- 'मेरे शरीर में से 'एक नगर छोटी बड़ी प्रांतों में होकर मलमूत्र के साथ बाहर निकल जाता है पौर यह रोज का क्रम है।' (रोज का क्रम) x X .48 / महारुवि शुतुरमुर्ग है

'मेरे पिता, हे मेरे पिता।
तुमने मेरी जैसी नकली पोलाद (बिना इरादे को पोलाद)
क्यों पंदा को?
तुमने रेपन धागा क्यों नहीं बनाया ?'
(नये कवि का दर्द)
मेरे पिता विरोधाभास
मेरी मां जिजीविषा
मेरे भाई संत्रास
और बहनें विसंगतियां
और मैं, बस मैं ।' (परिवार)
कवियों का रवैया सबसे हटकर था। जो कवि छपास के विरोध में
थे, उनके परों पर 'सम्पादक के अभिवादन व खेद सहित' की सलिपें तलाशी
जा सकती थी, और जो कविता छपाने के पक्षपाती थे, वे 'धर्मयुग' के पते में
बम्बई के स्थान पर दिल्ली तथा 'कादम्बिनी' का पता टाइम्स माफ
इण्डिया प्रेस, बम्बई-1 लिखते थे।
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सब्दों का संग्रहालय उर्फ एक कविता नगर) 49

1 कवि बनने के लिए माजकल कवि बनने, कवि कहाने, भोर मंच की वाहवाही लूटने के लिए कौन उत्सुक नहीं ? हर पढ़ा-लिखा पोर जीवन का हारा-यका बटोही कुछ नहीं बन पाने के बाद कवि बनने में ही अपने को सौभाग्यशाली समझता है, लेकिन कविता मानसिक दिवालिएपन को द्योतक नही है, उसमें कितनी और कैसी-कैसी स्थितियों से गुजरना होता है, यह कोई उस कवि से पूछे जो जीवन का एकएक क्षण जी कर लिखता है। भला कोई बनाने या कहने से भी कवि हुप्रा है ? कवि वह है जो जीवन विषयक पहलुगों को चिन्तन, मनुभूति और कल्पना के साथ प्रस्तुत करता है. हर मनुभूति को वारणी देता है, पर अब यह सब कहो की एक पद्धति भर है। एक साहब कह रहे थे कि जब प्रकाल पड़ता है या विषम परिस्थिति अथवा विशेष परिवर्तन होते हैं, तब देश के युगीन कवि काव्य-पाठ द्वारा जन जागरण को स्थायित्व देते हैं, जनता को कवितामों के माध्यम से दिशा- बोध कराया जाता है या जब खाने-पीने को दाना-पानी नहीं होता है, तब कवि पैदा होते हैं और वे कवितामो द्वारा जीविकोपार्जन के लिए धनोत्पत्ति करते है। माज वह सब कहां ? माज तो हर स्थिति को विपरीत स्थिति में काम्प का बाना पहनाया जाता है, बेमौसम भी मौसम पर कविता लिखी जाती है, और तो मोर, कवि सम्मेलनों में कवि नाटकीय ढंग से काम्य-पाठ करते हैं और उनके समकालीन अथवा निर्देशित कवि वाहवाही पाठ करते है, कविगोष्ठियों में नये तथा उदीयमान कवि, पुराने, श्रद्धेय और 'ज्ञान- राशि के सचित कोषों' पर कीचड़ उछालते है, उन्हें अपमानित कर येनकेन प्रकारेए उन के सर में साभीदार बनना चाहते है।

कवियों की तो कुछ लीला ही विचित्र है, मैंने कई एक कवि सम्मेलनों में कवियों पर जूते उछलते, शराब के नशे में धुत होने के कारण उन्हें मंच पर लड़खड़ाते और यहां तक कि कवियों को परस्पर हाथापाई फरते भी देखा है। अब सूर, तुलसी, बिहारी, भूषण और देव जैसे जन्मजात कवि वहां रहे । कवि पैदा नहीं होते --बनाए या कहलाए जाते हैं, और सच यह भी है कि कवि होने का कहीं से कोई प्रमाण-पत्र तो मिलता नहीं, न ही मचो से काव्य-पाठ करते हुए कोई रोक सकता है। आज के कवि आमन्त्रित न होने के बाद भी मन्चों से कविता पढ़ना बुरा नहीं समझते । मैंने एक कवि सम्मेलन में तीन सौ से भी अधिक संख्या में कवियों को एकत्र देखा है । यही कारण है कि प्रब कवि सम्मेलनों में न तो कवि नजर माते हैं और न हो कोई अच्छी कविता सुनने को मिलती है । स्थिति यह है कि काव्य की मालोचना करने वाले मो कविता करते हैं, और जब वे अपनी कविता में कोई अच्छी बात नहीं दे सकते तब दूसरी कवितामों की वे समुचित परख कर सकेंगे, हमें समझ नहीं पाता। एक नए कवि ने नई पीढ़ी के सदर्भ में कहा था, "कविता किसी को रुचे न रुचे, उसका प्रकाशन-प्रसारण हो न हो, वह कोई अर्थ रखती हो या अर्थरहित हो, नई कविता हो अथवा परम्परागत, इस सब से कवि को क्या? कवि का कर्म था लिखना मौर यदि कविता लिखकर भी न लिखी गई तो इसमें उसका दोष नहीं, कविता के भाग्य को ही कोमा जा सकता है।' एक दूसरे कवि ने एक मूल्यांकन-गोष्ठी में कहा--'यह नई कविता क्या है और इस की पूछ कहा है ? हमें तो लगता है नई-पुरानी कविता का विवाद बेमानी है। जिसको कवि ही न समझे, वह कविता कैसी ?' और जब उन्हीं कवि महोदय ने 'भाव' शीर्षक की कई एक कविताएं सुनाई तो श्रोतामों को कविजी का कथन अपने में पूर्ण लगा। ऐसी गोष्ठी में किसी लोकप्रिय कवि ने मुक्तक को रुवाई कह कर पढ़ा और जब मुक्तक और रुबाई के मौलिक अन्तर पर बहस चली तो कवि ने कहा-'मुक्तक , हिन्दी में लिखे जाते है, रुबाई उर्दू में लिखी जाती है, पर हिन्दी-उर्दू तो कवि बनने के लिए:/5I rawan एक ही भाषा है ।' सुन कर विस्मय हुमा, लेकिन किसी को कविता लिखते. सुनाते और छपवाते कोई रोकटोक भी तो नहीं सकता । अब हिन्दी साहित्य में छन्दबद्ध, मुक्त छंद, नई कविता, तानी कविता, भाव, अकविता, जैसे अनेक नामों से कवितायें लिखी जा रही हैं। ऐसी अंधी दौड़ में किसी को रोकना तो दूर, पावों के काटे निकालना भी संभव नहीं । आज कविता लिखना, किसी को गुरु मानकर कवि सम्मेलनों तक पहुंचना या किसी सम्पादक के चरणस्पर्श से पत्र-पत्रिका में प्रकाशित होना अथवा प्राकाशवाणी के किसी केन्द्र विशेष से कविता प्रसारित कराना कोई बड़ी बात नहीं समझी जाती। . 52/महाकवि शुतुरमुर्ग प्राप भी लेखक बन सकते हैं ! आजकल जिसे देखो वही लेखक बनने, कहाने और इस रूप में पूजे जाने की एक प्रबल नाकाक्षा रखता है, चाहे कोई दो जमात ही पढ़ा हो या मैट्रिकुलेशन की सनद प्राप्त हो अथवा नौकरी की तलाश करता. करता बेकार रह गया हो, वह लेखक बनने में ही अपना सौभाग्य समझता कल ही की तो बात है । मुहल्ले में कुछ लोग जमा थे और वहां ज्ञान दर्जी का बेटा किशन बड़े जोरो से अपनी शान बघार रहा था, 'अजी, पढाई में क्या खाक रखा है ! दिनरात पढो, फिर नौकरी का जोड़तोड़ बैठायो । इस पर भी हाथ तंग का तंग । नौकरी करते हुए भी बेकार, इससे तो अच्छा है लेखक बन जाएं, धार इधर की लें, चार उधर की और एक अच्छा खासा लेख तैयार करलें। इमसे यश भी मिले और पारिश्रमिक भी, इसे कहते हैं-आम के प्राम, गुठलियों के दाम ।' तभी समीप खड़े लच्छू महाराज के खलीफे गोवर्धन ने कहा, 'ठीक कहते हो, भाई ! अरे, देखो न कछावा को, बोलते वक्त पान का पीक उछाला करता था । प्राज कवियों और लेखकों की सोहबत में रहता है।' "लिखता क्या है-खाक कतरन कवि है, पूरा कतरन कवि । कभी किसी की लाइन मारली, कभी किसी की, वह तो चोरी की कला में माहिर है, किसी पढ़ेलिखे समझदार युवक ने कहा । उस की बात के समर्थन में एक बुजुर्ग बोले, 'हो, अब पहले जैसे लेखक रहे ही कहाँ ! प्रव तो दस किताबो को खोलकर एक नई किताब लिखी जाती है। देखो न, कल तक लखिया का बेटा गिरिजाशकर पान की दुकान लगाता पा, फिर रेवड़ियां बेचने लगा, धंधा नहीं चला तो किताबों की एक दूकान पर सेल्समैन हो गया और प्राज....प्राज तो साहब कहना ही क्या ! कवि भी है, लेखक भी है और फोटोग्राफर है।' 'ठीक कहते हो, भाई ! आज तो लेखन एक व्यवसाय जैसा हो गया है, किसी ने कहा और बात पाई गई हो गई। मगर में उसी बात को फिर दोहरा रहा हूं और जोर देकर कह रहा हूँ कि प्राज सिखना कोई सिद्धि पाना नही है, न ही लिखने से किसी का कोई हित होने वाला है । अाज लेखन सौ फीसदी एक व्यवसाय है, और यह व्यवसाय पाप भी कर सकते है । माप भी लेसक बन सकते हैं, यणर्ते कि आप कुछ नुस्से प्रपनालें। प्राप पूछेगे, 'ऐसे कौन से नुस्से हैं ?' तो सुनिए और अपनी डायरी मे नोट कर लीजिए। पहला नुस्खा है: कतरन पद्धति का प्रयोग, यह पद्धति नौसिखिए लेखकों द्वारा चलाई या प्रचलित की गई हो, ऐसी बात नहीं है । प्राज के मूर्धन्य और लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार भी इस पद्धति का प्रयोग करते है । यह पद्धति है-कुछ चुनी हुई पुस्तकों और पत्रों से कुछ सारगमित पक्तियों को अलग से नोट करके अपनी रचनाप्रो में जोड़ना, इससे जिन पुस्तकों से पंक्तियां उद्धृत की जाएगी उनके लेखक तो कृतकृत्य होगे ही, साथ ही आपके स्वाध्याय की भी मुक्त कंठ से सराहना होगी । और कुछ न भी बना तो कम से कम आपकी विद्वता को धाक तो जम ही जाएगी। कहिए, कैसी है यह पद्धति ? सकुचाइए नही, याज के बहुत से जाने माने साहित्यिकों को इस पद्धति ने कुछ से बहुत कुछ बना दिया है। दूसरा नुस्खा है : लोक गीतो और लोक कथानो के नाम पर खानापूरी की पद्धति । यह बात प्रव प्रापके लिए नई नहीं है, चन्द लोक गीतों की पंक्तियों को लेकर लोग लोक साहित्य के नाम पर कचरा प्रस्तुत कर रहे है, लेकिन सत्य यह भी है कि इसी कचरे से उनका जीविकोपार्जन हो । फिर भला माप क्यो चूकें ! कही इससे भी सरल पद्धति है लेसन की? 54/महाकवि शुतुरमुर्ग - आप किसी भी विषय पर कुछ पंक्तियां लिख लीजिए और बीच-बीच में उसी विषय से सम्बन्धित कुछ गीतों की पंक्तियों उद्धृत कर दीजिए । मगर ध्यान रहे, गीतों की पंक्तियां जोड़ते वक्त लेख का तारतम्य नहीं टूटना चाहिए, और इसके लिये कुछ शब्द और अधूरे वाक्य हम बताते है, जैसे, 'गीतों का सौन्दर्य अवलोकिए,' 'एक बानगी देखिए,' "कितना सटीक बैठा है.' 'श्लाघनीय है, 'देखते ही बनता है,' 'लोकधारा का अजस्र रूप' यादि । है न सरल पद्धति ? तीसरा नुस्खा भी सुनिए : यह है सामयिका रचनामों के लेखन की पद्धति । यह पद्धति भी अपने में अनूठी है, सामयिक रचनामों के लेखन में इस पद्धति के प्रयोग से असुविधा नहीं होती। जैसे आपको कोई योजना विषयक रचना लिखनी है तो कुछ शब्द है जिन्हे पाप रचना में गूथ लीजिए, रचना पूर्ण हो जाएगी। शब्द है-खेत, खलिहान, फसलें, कुदाली, फावड़े, रहट, स्वेद, श्रम, पौरुष और विकास । कहिए कितनी सरल पद्धति है ! कोई भी इन शब्दों को पंक्तियों में कैसे भी जड़ ले, सरकारी पत्रिकामो में तो उसकी रचना छपेगी ही। प्रब पाइए, चौथी और अन्तिम पद्धति पर | यह है लेखन-प्रकाशन की सहकारी पद्धति । यह पद्धति आज के युग की माग हो गई है । जीवन के प्रोर क्षेत्रो में जैसे सहकारिता का महत्त्व है ठीक वैसे ही लेखन और प्रकाशन में भी है। आप किसी भी लेखक पर कुछ शाब्दिक विशेषणों द्वारा उस के व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर कुछ भी और कैसा भी लिख दीजिए, आपकी रचना भी प्रकाशित होगी और पारिश्रमिक के साथ-साथ अापको एक साहित्यकार भित्र भी मिल जाएगा। कभी वह भाप पर कुछ लिख देगा, कमी पाप उसके लिखे पर अपना अभिमत देंगे और यह परम्परा अनवरत रूप से चलती रहेगी। इस तरह मापको लेखक बनाने का श्रेय आपके मित्र को होगा और मित्र को पुजाने का श्रेय प्रापको । प्राज यह वात नए से नए लेखकों से लेकर मान्यता और नामधारी लेखकों तक में माप देख सकते हैं और अगर मापका कोई मित्र, सगा सम्बन्धी या कोई सुपरिचित किसी पत्रिका दा प्राप भी लेखक बन सकते हैं !155

理事
A:
多
主
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मक्खन की प्राधुनिक परम्परा मक्खन के बारे में ऐसा है कि प्राप इसमें चीनी मिलाकर खाइए, स्वादिष्ट भी लगेगा और स्वास्थ्यवर्द्धक भी रहेगा । मगर मक्खन खाने वाली बात कृष्णयुगीन थी जो पिछली कई पीढ़ियों तक चली और विरानी हो गयी । अब लोग मक्खन नहीं खाते, दूसरो के मक्खन लगाते हैं । यानी घे अपने को प्रति साधारण और अल्पज्ञात-सा प्रस्तुत कर दूसरों को सुविज्ञ, कार्य कुशल तथा सक्षम घोपित करके अपना उल्लू सीधा करते हैं । माजवल मक्खन का उपयोग प्रायमी को बनाने और बनाये रखने की दिशा में अधिक हो रहा है । दूसरी ओर दूसरी-तीसरी तरह के लोग मक्खन लगवाने के प्रादि होते जा रहे हैं। मक्खन लगाना प्राज का एक शानदार मुहावरा है, जिसे लोग शान के साथ अपनाए हुए हैं । उनका कहना है कि माखन वाले लोग अपल दर्जे के मूर्ख थे । जो सुख और प्रानन्द मक्खन लगाने में है, उससे भी कहीं अधिक सुख मक्खन लगवाने में है। लोग मक्खन लगाते-लगाते जाने क्या से क्या हो गए हैं। उन्हें हम किसी भी रष्टि से देखें, मगर वे अपने में इतने प्रवीण हैं कि उन्हें प्रवीण चन्द्र छायादार कहना चाहिए अर्थात् चतुर नन्द्र छज्जे वाले । मक्खन की माधुनिक परम्परा का निर्वाह हर प्रादमी के धूते की धात नहीं । ज्ञानी-मानी ध्यानी तो इस परम्परा से अनुकूलन तक नहीं कर पाए । सज्जन, शिक्षित और सुसंस्कृत व्यक्ति इस परम्परा का विरोध करके अष्टगस्त हैं। अपने मह का ढिंढोरा पीटने वाले साहित्यकार इस परम्परा से कटकर अज्ञात होते जा रहे है। नयी कविता का नया कवि किसी के मक्खन नहीं लगा सकता और न ही नई वहानी का कोई लेखक । गीत के लोग जन सामान्य से लेकर घडे-बड़े शिक्षा शास्त्रियों, अधिकारियों तथा मन्त्रियों के मक्खन लगाने में सफल हो सकते हैं, बशर्ते वे अच्छे गायक भी हों। प्रतिमा सम्पष्ट व्यक्ति के लिए मक्वन लगाना बड़ा कठिन कार्य है और जो कुछेक लोग ऐसे है भी तो उनकी सत्या न्यून ही रही है । प्रतिभा- हीन प्रतिभावान ही मक्खन की प्राधुनिक परम्परा का किसी हद तक निर्वाह कर सके हैं । इस कार्य मे उन्हें भी अधिक सफलता नहीं मिली है । कोई भी सामतशाही का अवशेष या ब्राह्मणत्व का सही अर्थ समझने वाला अपवा हर किसी के पागे मिमियाने वाला व्यक्ति अच्छा मक्खनवाज हो सकता है। कभी मक्खन लगाने में कायस्थों की अपनी पहल थी। तब पढी. लिसी और चतुर कोम ही अच्छा मक्खन लगा सकती थी । मगर ब्राह्मणों ने बाद में ऐसी प्रगति की कि कायस्थों को यह क्षेत्र छोड़ना पड़ा। वैश्यो ने इसकी अपेक्षा मक्खन लगवाना उचित समझा । स्थिति यह रही किन तो कायस्थ, न ब्राह्मण न वैश्य और न राजपूत । एक अलग ही कोम इस क्षत्र मे बाजी मार ले गई। मगर मक्खन की परम्परा का विकास और विस्तार अाधुनिक युग के चार महान व्यक्तियों से मिला । यह है-श्रीयुत सर्वगुण सम्पन्न भडारी, श्रीमान् चमचेलाल मंत्रणाधिकारी, श्री रामबिहारी कारगर और चौथे मिस्टर चुन्नीलाल चूने के ठेकेदार । भण्डारी जी का सेन्ट्रल स्टोर भण्डारी जी सेन्ट्रल स्टोर के मालिक हैं । शहर की सारी यावश्यक वस्तुए मापके यहां स्टोर की हुई हैं । दूदने से ग्रापके स्टोर मे मादमी का पादिम भी कहीं गुप्तावस्था में मिल सकता है । सेन्ट्रल स्टोर का दायित्व मापको क्या मिला, पाप तो उसके मालिक बन बैठे । शुरू शुरू मे यापने एक नेता को खर-सुशहाली के लिए थोड़े से प्रयत्न किए थे । नेता ने प्रसन्न होकर प्रापको मक्खन लगाने का गुर सिखा दिया, फिर क्या था माप दमड़ीलाल से चमड़ीलाल और अन्त में नगर सेठ वन बैठे। 581महाकवि शुतुरमगं सुना है, अाजकाल माप मापन परम्परा का इतिहास लिख रहे हैं, जिसमें प्रापने अपने निजी सस्मरगो तक का उल्लेख किया है । चमचेलालजी की विदेश यात्रा मक्खन परम्परा के समर्थको में लाला चमचेलालजी का विशेष हाथ रहा है । आप बड़े ही व्यवहार कुशल, मृदुभाषी, साम्प्रदायिकता के कट्टर विरोधी मगर परिवार कल्याण कार्य के प्रवल समर्थक रहे हैं । आप शुरू बचपन से ही मक्खन के ही मक्खन लगाते रहे हैं । जब आप पढ़ते थे तब अध्यापकों के आपने ऐसा मक्खन लगाया कि एक के बाद एक कक्षा में पढ़ते ही चले गए। दस जमात पढ़ने के बाद आप राजनीति में प्रा गए जहां प्रापका प्रथम परिचय अखिल भारतीय स्तर के मक्खन बाज जगतपाल शिरोमणि से हुग्रा और तभी से प्रापने मक्खन लगाना शुरू किया । सबसे पहिल आपने अपने प्रादिगुरु शिरोमणि जी के ही मक्खन लगाया । फलतः प्राप जन-नेता घोषित कर दिए गए । सभा सोसाइटियों में उठते बैठते प्रवचन देते और सम्पर्क करते-करते अापने मटन की कला मे इतना सब जान लिया कि आपको विदेश यात्रा तक का अवसर मिल गया । एक इण्टरव्यू में आपने बताया कि जीवन में यदि कुछ बनना है तो मक्खन लगाने की कला सीखनी बड़ी अनिवार्य है और ऐसी कला की जानकारी के अभाव मे आदमी कुछ भी नहीं है । मापने यह भी बताया कि जरा सा मखन बड़े से बड़े कार्य को तुरन्त करवाने में काफी होता है । प्राजकरा प्रापने मखन प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना की है जहां से प्रतिवर्ष कम पढे लिखे लोग मक्खन लगाने का पाठ्यक्रम पूरा करके डिप्लोगा प्राप्त कर रहे हैं । आप केन्द्र के प्राचार्य हैं और सम्पर्क में भाने वाले लोगों को मसन के विषय में मंत्रणा देते हैं । कारगर साहब के गये कारनामे तीसरे व्यक्ति हैं श्री बिहारीलाल कारगर । आप हर कार्य को करने में इतने कारगर हैं कि हर नये कारनामे से पाप सम्बद्ध होते हैं । मक्खन की प्राधुनिक परम्परा/59 नगर में चाहे कैसी भी तब्दिली हो, पाप सदाबहार रहते हैं । उखाड़ पछाड़ में प्रापका मन इतना कारगर है कि बिगड़ा हुमा काम भी आप सुधार लेते हैं। आप कवि भी हैं, लेखक भी और कभी-कभी अध्यापक भी। मगर प्राप कभी कुछ नहीं लिखते । आप इतने मधुर है कि जिस कवि की कविता चुराते हैं, वह मापसे झाड़ता तक नहीं । लेखक ऐसे हैं कि पहिले कभी छपे, किसी लेख को अपने नाम से छपवा लेते हैं और उस पर अपना मालिकाना हश बताते हैं । दुनिया भर की विसगतियों और सारे विरोधाभासों के प्राप धनी हैं । मगर मक्खन बाज ऐसे हैं कि सब चलता है। यानी आपने कविताएं नही लिखी और आपके नाम से कविता संग्रह छपा । अापने गद्य नही लिसा और पुराने छपे लेखो के सग्रह पर मापका नाम छप गया। साहित्य की चोरी करके साहित्यकार कहाने को प्राप सदैव लालायित रहते हैं। मला हो उस नेता का जिसने पापको जरा से गवन लगाने पर आपके लिए सुख-समृद्धि के द्वार खोल दिथे । चूने को टेकेदारी मिस्टर चुन्नीलाल मुन्नीलाल चूने के ठेकेदार को प्रतिष्ठा नगर का प्रौद्योगिक वस्ती में काफी चचित रही है। पाप अपने कारोबार से अधिक काय लयी कर्मचारियो और अधिकारियों की सोचते हैं। आपने मस्सन लगवाने में मदैव अपने को सौभाग्यशाली मनुभव किया है । माप चूने के ठेकेदार हैं, मगर लोग मापके चूना लगाने मे कोई कोर कसर नहीं रखते। माप हैं कि कारोबार के अधिकारियों को पदोन्नतिया उनकी पत्नियों की सुन्दरता के माधार पर करते रहे है । माम यही कारण है कि कुदेक लोग पदोन्नतियो के लिए मापके मसन लगात प्रपाते नहीं है । पाप जव नगर से बाहर आते हैं या बाहर से नगर में माते हैं, al कारोबार के सभी अधिकारी सपत्नीक स्वागत में उपस्थित होते हैं । विरा की पत्नी पाई या नही भयया कौन पौरठ प्रधिक सुन्दर है, माप इस सवका पूरा-पूरा ध्यान रमते हैं। 60/महाफधि शुतुरमुर्ग झूठे लोग झूठ बोलने में भारतीय बड़े माहिर हैं। उनकी झूठ का कोई जवाब भी नहीं । उन्हें झूठ बोलने की बेशकीमती आदत से बड़े लाभ मिले हैं । सामाजिक प्रतिष्ठा के अभाव में झूठ बोलना सम्मान एवं सुखानुभूति का कारण बन जाता है । प्रायः देखा गया है कि झूठ सच से महगे भावों में विक जाती है तथा सरे आम उसके भाव लग जाते हैं । झूठा प्रादमी भादतन ढाई सौ झूठ रोज बोलता है । झूठ का कोई धर्म, वर्ण, जाति पा रूप नहीं होता बरिक भूठ चल गई तो मकसद पूरे हो जाते हैं अन्यथा सब चलता है । झूठ ही है कि लोगों के नजरिए बदल जाते हैं, ठाले मस- खरों की रोटी का जुगाड़ बैठ जाता है और नाचीज बहुत कुछ बन जाते हैं । पिछले दिनों अमरीका की ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी मे झूठ और गप्प मारने की प्रतियोगिता हुई जिसमे बम्बई के प्रफुल्ल मिश्र ने 'महानतम गप्पी' का खिताब जीत। । उन्होने हजारों मील दूर जाकर एक झूठा किस्सा सुनाया, गप्प सम्राट की उपाधि प्राप्त की और एक नही, दो सिताब जीते जिससे प्रतियोगिता में भारतीयो का सिर ऊंचा हात मिश्र को झूठ घोलने के सुले मुकाबले मे प्रथम रहने पर वडी प्रशसा मिली । उन्होने मुकाबले में हिस्सा लेते हुए एक किस्सा सुनाया कि किस तरह से उनकी प्रारमा ने एक पक्षी का रूप धारण किया । फिर उसे क्या-क्या अनुभव हुए । इसी प्रकार रोमांचक झूठे किस्से तथा शिकार करने और मछलियों को पकड़ने के किस्सों के दो खिताब अमेरिकियों ने भी जीते । एक प्रात के पुलिस प्रमुख ने भी प्रतियोगिता में भाग लिया, लेशिन वे इनाम नहीं जीत सके। लगता है पुलिस झूठ पकड़ सकती है, वोल नही सकती और बोले भी तो झूठ ग्राम मादमी तक पहुंचते-पहुंचते खुल जाती है । । MPI-M

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जरा अासपास नगर फोकिए, पापको ऐसे घिनौने पात्र और मिल जाएंगे। जन्म के झूठे, उमर के दोझे और प्रोछी हरकतों के वेवजह जिन्दगी जीने वाले लोग । प्राप उनकी झूठ पर विचारेंगे तो खुद भूड़े हो जाएगे। दरमसल देश में झूठ बोलने वालों की संख्या अभी भी काफी बड़ी है, झूठे लोग सब कही दूकान जमाए बैठे है। वे बाजार को भी गलत करते हैं, शहर की बस्तियों को भी । शायद यही कारण है कि भच्छे लोगों का विश्वास बाजार से उठ रहा है। समय का फेर है सत्यवादी हरिश्चन्द्र और महात्मा गांधी के देश में लोग सत्य सुनना या कहना पसन्द नहीं करते और जो झूठे हैं उनकी घुसपैठ सब तरफ है। यदि झूठ या गप्प से कोई सम्मान मिलता है तो भारतीय इस दिशा मे भी पीधे क्यों रहें । एक झूठ ही है जो बार-बार बोलने से सच हो जाती है जैसे खिताब जीतना एक सच है । झूठे लोग/63 उनके हाथ लगा साहित्य का खजाना उस जमाने में कलकत्ता प्राज जसा महानगर नहीं था और वहां गरीब-अमीर सभी का गुजर बसर था। बड़ा बाजार की संकरी गली को एक खन्दक मे प्रिंटिंग प्रेस का पुराना-सा बोर्ड लटक रहा था जहां हमारे गांव के मुफ्तीलाल कम्पोजीटर हुआ परते थे। शरीर से पतले दुबले मरियल और मन से खोटे खटियल । चोरी करना उनकी प्रादतों में शुमार था और वे मब्बल दर्जे के बेईमान, झूठे और घटियल थे। छपनिया मकाल ने जब खेतों की फसलें चौपट कर दो, गांव में कोई ध्यापार-व्यवसाय नहीं रहा और देनदारी वढ गई तो वे लोटा डोरी लेकर वाहर निकल गये । पालकत्ता पहुचे तो गोकुल सुनार की मदद से प्रस मे जुगाड़ बैठ गया । तब बडा बाजार में कोई दूसरा प्रेस भी नहीं था और जॉब धर्क के साथ साहित्यिक कृतिया उन्ही की प्रेस मे मुद्रित होती थी। उन्ही दिनों विलक्षण काध्य प्रतिभा के धनी एक कवि की कुछेक कृतियों की पाण्डुलिपिया मुद्रणार्थ प्रेस में दी गयीं और कुछ दिनो बाद ही यह कवि ज्वर से पीडित होकर मर गया । सभी गाय के मुफ्तीलाल को धर्मपत्नी मांगी देवी की अस्वस्थता का फर्जी तार मिला और वे गांव लौट प्राए । पाते समय प्रेस को पाण्डुलिपिया भी चुरा लाए । प्रेस मैनेजर ने कई तार भेजे, पाण्डुलिपिया लौटाने की बात भी लिखी, किन्तु सम्पर्क सूत्रों ने मुफ्तोलाल को मृत घोषित कर दिया और इस तरह साहित्य का वह खजाना जिपमे प्रबन्ध काव्य, खण्ड काव्य, फुटकर काव्य मोर कवितामों की डायरियां थी, गाव में हो रह गया । मुपतीलाल के पुत्र गश्तीलाल दस जमान भी नहीं पड़े थे किन्तु साहित्य का खजाना उनके हाय क्या लगा, वे साहित्य के प्रध्येतामों को ज्ञान पढ़ाने लगे, वे महाकवि हो गर । ज्ञान राशि के संचित कोष ने उनका जीवन ही बदल दिया । उनका दिमाग चौथे आसमान मौर दिल नानी बाई पानवालो की दुकान से जुड़ गया । जर्दियापान से मुंह फुलाए वे पहले तो साहित्य लेखक होने की नाटकीयता को जीने लगे और फिर उन्होंने फुटकर कवितामों को यहा वहा को पत्रिकामों में बिखेर दिया। पहले उनकी कविताएं छपी, फिर उनके नाम से खण्डकाव्य पौर महाकाव्य भी छपे और वे विना पढ़े ही ज्ञानी समझे जाने लगे। उनके लेखक होने का भी ढिढोरा पिटवाया गया। उन्हे अमिनन्दित होने का शौक भी चर्राया । वे साहि- त्याना लहजे मे बतियाने लगे और उन्होंने सूरत शक्ल भी पुराने करियों जैसी ही बनाली । उनकी कारगुजारी से नावाकिफ लोग और हिन्दीसेवी संस्थायें उनके सम्मान प्रायोजन में माध्यम बनी । गरज यह कि वे प्रतिभा- विहीन होने के बावजूद प्रतिभा सम्पन्न हो गए और उनके साहित्यकार होगे का सिक्का सरकारों एवं अकादमियो और विद्यालयों, विश्वविद्यालयों तक चल गया, किन्तु गाव में वे मुफ्तिया हो कर रहे और उनकी कोई साख नही रही। जब इस सबका पता कलकत्ता प्रेस के मालिक को लगा तो उसने लिखत-पढ़त की और गश्तीलाल के नाम से प्रकाशित सभी कृतियां बाजार से उठाली गई। फिर वे कृतियो से नहीं, अपने कुछ होने के प्रचार से चंदा जुटाने लगे। गश्तीलाल के नहीं रहने के बाद उनका ज्येष्ठ पुत्र भिश्तीलाल साहित्यकार बनने के लिए घटपटाया और गाव में खबरों की तरह बासी होकर रह गया लेकिन साहित्यकार का चोला पहनकर देशाटन करता रहा। खजाने को शेष कृतिया उसके नाम से बाजार में पाई और वह भगुम- तमुक व्यक्तियों तथा संस्थानों द्वारा अभिनन्दित किया गया । समूने साfter जगत को धोखा देकर वह याचक मुद्रा लिए सेठ साहूकारों में अपने पनि होने को प्रचारित करता रहा , वह काजल टीकी (काला), मीना पागार (कला संग्रह) चौक को ककड़ी (सस्मरण) हवेलीराम का पयूसरा (पा. कथा) के लेखक रूप में फिर उभरा और उसने दाम भी भिश्तीलाल के परिवार में खैरातीलाल एव उनकी HI11 साहिश्य .

उनकी पुत्री भी साहित्यकार कहलाने की परम्परा में क्यू में रहे । चुराए हुए साहित्य के खजाने से सारा परिवार साहित्यकार मय हो गया । पतली दुबली टोयों और होलडौल से पेट तथा काने घड़े जैसा चेहरा लिए गिश्तीलाल विधवा की सूरत लिए घूमता रहा । लोग उसे भुतहा महाराज कहा करते थे। वह वाहर से कपटी एवं मसखरा और भीतर से कुठित लुठित ईर्ष्यालू था। गांव वालों को उससे बड़ी एलर्जी थी और वह था कि गाव में गन्दगी फैला रहा था । एक पुलिस अधिकारी ने उसे जिंदा या मृत पकड़ने के लिए इनाम घोपित किया है। सुना है वह अण्डमान निकोबार द्वीप चला गया है और वापस नहीं लौटा है । समझदार लोगों का कहना है कि वह कुछ दिन पहले खाड़ी देशों में देखा गया है । यदि आपको उसका कोई सुराग मिले तो कृपया सूचित करें, साहित्यकारों ने उसकी गिरफ्तारी के लिए दस हजार रुपये का पुरस्कार घोषित किया है। यह भी हो सकता है कि वह रुपयों के मोह में खुद ब खुद गिरफ्तार हो जाए। महाकपि शुतुरमुर्ग rampie दुर्वासाजी का अभिनन्दन वुगली नगर निवासी एवं भूखे सन्यासी बाबा मांगीलाल 'दुर्वासा' को अभिनंदन करवाने का बड़ा शौक था और अभिनदित नहीं होने की स्थिति में वे भीतर ही भीतर छटपटाते रहते । विवश होकर वे समाचारों मे अभिनन्दित हो जाते, अपने बारे में स्वयं समाचार लिखकर छपवाते । हम उनकी कमजोरी समझ गए तो उन पर तरस भी पाया और हमने कुछ अनायास कुछ सप्रयास पक्तियां लिखकर एक अभिनंदनपत्र तैयार किया है । इसे अभी सार्वजनिक स्थलों पर चस्पा करवाया जायेगा । यदि कोई स्वयंमेवी संस्था पसद करेगी तो मुद्रित कराकर दुर्वासाजी को अभिनंदित कर सकेगी अन्यथा उनका नाम ही गली-कूचों में चर्चित होगा। मन को भूखे, बुठित-लुठित, ईष्यालु पूर्वाग्रही-दुराग्रही फटीचर एवं गर्दभराज नामधारी साहित्यकार दुर्वासाजी की सेवा में सादर समर्पित अभिनंदनपत्र- हे भूखे वंशजः- माप जब जन्मे थे तब आपके परिवार में भूख का बड़ा बोलबाला था और आपके पितामह पितामही माता-पिता तथा सबंधी भूखे थे इसलिमे आपको विरासत मे भूख हो मिली । अापकी संतानें भी भूखी ही रहेंगी। आपके मन को भूप भिक्षावृत्ति से भी नहीं मिटी तो भूखमय जीवन जीना प्रापको नियति बन गई है। आप भुसे ही जन्मे थे और भूसे ही मरेंगे। चालीस वर्षों से प्रापने कोई कामकाज नहीं किया, न कुछ लिसा न कुछ पढ़ा किन्तु साहित्यकार बने रहने का स्वांग रचते रहे।

आपने माग-माग कर घर तो भर लिया किन्तु पांव में टूटी चप्पल पहनना प्रापकी प्रादत शुमार रहा। हे भूख के प्रतीक ! प्रापने अपने को अन्त्योदयी भी घोषित किया है । ईश्वर करे पाप जैसे हैं वैसे ही बने रहें । प्रापका अभिनंदन करते हुए हम गौरवान्वित तो नहीं हैं किंतु सुखी जरूर हैं । यह सोच कर कि पापमो दूसरा कोई अभिनदित नहीं करेगा और जब देश में मरणोपरांत भी सम्मानित करने की परपरा है तो प्रापको मरी हुई अस्मिता का प्रादमी मानकर भी सम्मानित किया जाए तो गलत नहीं होगा। छलियाजी मानवीय दुगुणों के साथ आप मे छल की मात्रा अधिक है । आप सत्कारों और अकादमियों को लेकर संपादकों, पत्रकारों तथा ग्राम प्रादमी को छलते रहे ! लोग तो मूरों को छलते हैं, मापने शिक्षितों-विद्वानों को छलने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। इनके लिए आप बधाई के पात्र है। कपटी करोड़पति दुर्वासाजी अपने कपटी कामों से करोड़ों की संपत्ति बनाई है और मापके नाम से चुगली नगर में दो मदिर, एक समाधि स्थल तथा तीन जमीनो के टुकड़े, दो मकान और दो प्रेसें हैं । प्रापको समाज ने या देश मे करोड़पति तो नहीं कहा किंतु प्रासपास के क्षेत्रों में आपको कपटी करोड़पति नाम से जाना जाता है । सुना है 'ग्राप अरबपति बनने की नयो योजना के निर्माता हैं और नगर मे अगली पीढ़ियो के लिए कोई "मिक्षालय बनवाना चाहते हैं।' बूढ़े चुगलखोर बाबाजी आप उम्र से जरूर सठिया गए, किंतु आपकी बच्चों सी चुगलियां करने की प्रादत और औरतों को पथ विचलित करने के शौक से लगता है पाप किसी की नाजायज सतान हैं, आप सस्कारित नहीं। सुबह से शाम और माठों याम किसी न किसी को चुगलिया करना प्रापके स्वभाव मे है इसलिए अच्छे लोग आपको पास भी नहीं फटकने देते । माप 68/महाकवि शुतुरमुर्ग, तो लिखना जानते नहीं । किसी और से अपनी चुलियों का इतिहास जरूर लिखवाएं इससे प्रापकी प्रसिद्धि बढ़ेगी। मसखरे-सिरफिरे आप पैदाइशी ममखरे एवं सिरफरे हैं इसलिए प्रापका संबध बाजारू लोगों से अधिक है । कोई एक साहित्यकार भी प्रापका मित्र नहीं है । घटिया किस्म के बदनमीज, बदजुबान और समाज से बहिष्कृत लोग आपको सम्मान दें तो कोई नई बात नहीं होगी। जैसे आप हैं वैसे ही लोगों का पापको सहयोग मिलेगा । हम ईश्वर से कामना करते हैं कि इश्वर भापको ऐसा ही बनाया रखे और आपका सुख भी इसी में है । पौरताना प्रादमी जिस तरह सातवीं शताब्दी मे बाणभट्ट पोरताना लिबास में प्रतःपुर में चला गया था और उसने भट्टिनी को मुक्त कराया था आप भी कुछ परिचित परिवारों में पहुंच कर वहां की औरतों को प्रचार के रास्ते दिखलाते हैं, उन्हें मुक्त कराते हैं । इस माने में प्रापको बाणभट्ट का भवतार कहा जा सकता है। श्वान देवता प्रापको नगर में काले चितकबरे पीले और सफेद कुत्ते अपना देवता समझते हैं, आपको पूजते हैं। प्राखिर मापने इस मृत्युलोक में पाकर देवता रूप तो गृहण किया अन्यथा हमें मापमें मौर श्वानों में कोई अतर नजर नहीं आता। B दृर्षासाजी का अभिनन्दन | 69 हिटलर झूठों का सरताज निकला , हिटलर का विश्वास था कि अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए कोई प्रासान झूठ नहीं, सफंद झूठ बोलना चाहिए और उसने ऐसा ही किया । उसने हर झूठ को वारम्बार दोहराया । उसका कहना था कि जनता की बुद्धि मोटी होती है और वह निरी मुलक्कड होती है । शासन को निस्सकोच एवं निर्भय होकर झूठ बोलना चाहिए और तब तक झूठ बोलना चाहिए जब तक जनता को विश्वास न हो जाए। उसने अपने इस सिद्धान्त का अक्षरशः पालन किया । प्ररनी बातें बधारने, मनगढन्त पायें सुनाने, गलत प्रचार करने और जनता को मूर्ख बनाये रखने के कारण वह "झूठों का बादशाह' कहलाया। उसे वेसिर पर की बातें करने और दोहराने मे कभी हिचकिचाहट नही हुई जिनका झूठा- पन सिद्ध हो गया था । वह अच्छी तरह जानता था कि जब तक ब्रिटिश नौ सेना को पगु नही बना दिया जाएगा, उसका संसार पर प्रभुत्व स्थापित करने का स्वप्न सत्य नहीं होगा। इसलिए जबसे लड़ाई मारम्भ हुई, वह बढान्चढा कर ग्रिटिश जहाजो के डूबने की खबरें छापता रहा, प्रचारित करता रहा। सफेद झूठ युद्ध के दौरान 27 सितम्बर, 1939 ई. की एक जर्मन विज्ञप्ति में कहा गया था कि उत्तरी सागर मे जर्मनी वायुषानों ने ग्रिटिश के वायुयान वाहक जहाज 'माकंरायस' को टुबो दिया और एक जंगी जहाज 'टारपीडो' को निशाना बनाया, परन्तु मच यह था कि जिन 20 जर्मन वायुयानों ने प्राकरायल पर हमला किया उनमे एक भी प्राकरायल को नुकसान नहीं पघा सका था। इसके विपरीत वायुयानों को समुद्र में गिरा दिया गया । माक रायत के वन की खबरे भी उड़ाते रहे । मन्ठ में सिर हो । गया कि प्रार्करायल डूबा नहीं और मुद्र में दुश्मन की टोह में गश्त लगा रहा है । तब जर्मन विज्ञप्ति में कहा गया कि हमने यह कब कहा था कि हमने पार्फरायन डुबो दिया । हम तो यह जानना चाहते थे कि उसका क्या हुमा ? हमें पता नहीं था कि उस पर हमारा निशाना ठीक बैठा या नहीं। इसी प्रकार 22 अप्रैल 1910 ई. को नार्य के युद्ध के सम्बन्ध में भी एक जर्मन समाचार पत्र में यह दावा किया गया था कि पिछले 18 दिनों में ब्रिटिश जल सेना के 4 जंगी जहाज, 2 जंगी गश्ती जहान, एक वायु- यानवाहक जहाज, 4 भारी गश्ती जहाज, 10 गश्ती जहाज, 12 विध्वंसक जहाज, 13 पनडुब्बियां और 15 सामान ढोने वाले जहाज डुबो दिए गये, परन्तु बात उल्टी ही निकली। पालियामेट 2 मई को बताया गया कि पिछले तीन सप्ताह में जर्मनी के दो जहाजों को सस्त नुकसान पहुंचाया गया पोर तीन अथवा चार गश्ती जहाज, 11 विध्वसक जहाज, 5 पनडुब्बियां तथा 30 अथवा 40 सामान ढोने के जहाज डुबोए गये। बाद में 8 मई को पालियामेंट में चचिल ने जर्मनों के झूठे दावों पर प्रकाश डाला और युद्ध को वास्तविकता से अवगत कराया। एक सच यह भी है कि उस समय जर्मन जंगी बेड़ा नाकाम हो चुका था और ब्रिटेन सातों समुद्रों का स्वामी था । ऐसी स्थिति में जर्मनो के लिए गलत दावे करना ही विकल्प रह गया था। व्यापारिक जहाजों को डुबोए जाने के सम्बन्ध में जर्मनों ने समय-समय पर जो दावे किए वे और भी हास्यास्पद रहे। दरमसल हिटलर का मुख्य प्रस्त्र या झूठ का प्रचार और उसने ऐसा ही किया । जब 3 नवम्बर 1940 ई. की उत्तरो एटलान्टिक समुद्र में व्यापारिक जहाजों के एक झुण्ड पर जो एक विध्वसक जहाज के संरक्षण में जा जर्मनों द्वारा प्राक्रमण किया गया और 8 मवम्बर को अफवाह फैलायी गई कि जर्मन जगी वेड़े ने उत्तरी एटलांटिक समुद्र में ब्रिटिश व्यापारिक जहाजों के समूचे झण्ड का नाश कर दिया । स्थिति यह थी कि बड़े से बड़े झूठ को सत्य की तरह प्रचारित कराने में हिटलर और जर्मन बड़े दस पे । झूठी पबरो में जहाजो के डूबने, बारूद की सुरगों एवं समुद्र हिटलर भूठों पा सरताज निकला/71 रहा था, सट पर लगी तोपों के उठाए जागे पोर जान-मास के नुसान की बातें प्रमुख थी। 10 नवम्बर तक जमनों ने शत्रु राष्ट्रों के जिसने ध्यापारिक जहाज हुबोये उनका कुल वजन 29,23,322 टन था, जबकि जर्मन विज्ञप्ति में यह दावा किया गया था कि इसके तिगुने वजन के जहाज डुबोए गये । प्रसफस प्रयास हिटलर ब्रिटेन की सामुद्रिक शक्ति को नष्ट करने में सफल नहीं हो सका और उसने ब्रिटेन पर हवाई हमले प्रारम्भ किए परन्तु इसमें भी उसे मुंह की खानी पड़ी । जर्मन वायुयानों ने ब्रिटिश वायु सेना के हवाई मड्डों पर भी अनेक हमले किये और मसफलता की स्थिति में उन्हें यह खर्चीला प्रयोग बन्द कर देना पड़ा। ब्रिटेन ने जर्मन वायुयानों की हवा बिगाड़ दी, लेकिन हिटलर ने फिर भी बुद्धिमत्ता से काम लिया और उसने फिर झूठे प्रचार के मन्त्र को फूका । जर्मनो ने अपने और ब्रिटिश वायुयानो के नष्ट होने की सख्या पलट कर बतानी शुरू कर दी। 7 सितम्बर को ब्रिटेन पर होने वाले हवाई हमले में एक सौ तीन जर्मन और 22 ब्रिटिश विमान नष्ट हुए किन्तु जर्मनों ने दावा किया कि हमारे 26 तथा ब्रिटेन के 94 वायुयान नष्ट हुए । इसी प्रकार 15 सितम्बर को हवाई युद्ध मे जर्मनी के 185 एव मग्रेजों के 25 वायुयान नष्ट हुए और जर्मनों द्वारा दावा किया गया कि हमारे 46 तथा ब्रिटेन के 79 वायुयान नष्ट हुए । शत्रु के नुकसान को दुगुना-तिगुना करके बताना भा शत्रु को परास्त करने के निमित्त हिटलर की फौजी चाल थी। हिटलर जितना भविष्यदर्शी था, उतना और उससे भी अधिक जमता को गुमराह करने वाला पौर फर्जीपन को जीने वाला प्रचार की विजय का हिमायती था। उसने यूरोप में नई व्यवस्था कायम करने के वो बार-बार दोहराया, जबकि उसकी व्यवस्था मध्ययुग की गुलामी की व्यव. स्था ही थी। उसने अपनी पुस्तक 'मेरा युद्ध' में जमन जाति के अतिरिक्त यूरोप की अन्य जातियों के प्रति घृणा व्यक्त की है मौर उसके अनुसार 721 हिटलर झूठों का सरताज निकला जर्मन जाति ही अपनी श्रेष्ठता के कारण शासन करने की अधिकारिणी थो । वह यूरोप पर ही नहीं, विश्व पर जर्मनी का प्रमुख चाहता था मौर उसने अपनी दूसरी पुस्तक 'मेरा सघर्ष' में इस स्वप्न और शासन की ध्यवस्था पर विचार प्रकट किए हैं जो पयाली पुलाव ही थे। झूठ के प्रचार-प्रसार के लिए हिटलर ने एक विभाग स्थापित किया पा। डा. गोसेल्स उस जर्मन प्रचार विभाग के प्रधान थे। वे स्वयं अव्वल एज के गप्पी एवं हसोड़ थे मोर झूठ पर सच्चाई का रंग चढ़ाना वे बखूबी जानते थे । उन्होंने झूठ के व्यापक विस्तार के लिये विभिन्न देशों में अपनी समितियां कायम की थीं। हिटलर की एक मानसिक मृत पोलाद शेखावाटी के एक शहर की पाली कोठी के पीले चेहरे और पीले पर्चे के रूप में प्राज भी भटक रही है । वह भी अपनी जाति के सिदा दूसरी जातियों को अच्छा नही मानती। पिछले दिनों एक सठियायी बुद्धि का शायर उस 'मरी हुई प्रास्मा' की चपेट में मा गया था जो इन दिनों हिटलर, डा. गोबेल्स या पीले चेहरे के पर्याय के रूप में खादकों मे चीखना सुनाई देता है । पीले चेहरे का वित्तीय सरक्षक एफ शिक्षा शास्त्री भी पागलाया-सा अपने समाजसेवी होने का स्वांग रच रहा है और शहर में ऐसे समाज कटकों की सख्या बढ़ती जा रही है । शहर के शरीफ लोगों का कहना है कि पीला धुत कभी हिटलर की जर्मन सेना में था और हिटलर के युमनाम होने के साथ वह भी वर्षों गुमनामी के मधेरों में भटकता रहा और एक दिन पागलखाने के प्रभारी किसी चिकित्सक के साथ शेखावाटी पा गया। यह अपने वंश परिवार को भी भूल बैठा पा इसलिए उसे निःसहाय गरीब भोर निठल्ला घोषित कर दिया गया। बाद में उसमें एक कुत्ते की मारमा प्रवेश कर गई और यह पालतू कुत्तों के साथ पालतू-फालतू लोगों के बीच 'स्वान सिंह कहलाने हिटलर झूठों का सरताज निकला/73 कुत्तों की जमात कुत्ते भौंकते हैं, आपकी नींद उचट जाती है और फिर अखि नहीं लगती । दूसरे दिन भी ऐसा ही कुछ होता है, पाप कुत्तों को दुकारते हुए भगाने की कोशिश करते है। यह सोचकर कि उनकी नियति मे भौकने- काटने के सिवा कुछ नहीं है, सो जाते हैं । बाद में कुत्तो के भौंकने की स्थिति मे भी सुख की नीद निकालने के आप अभ्यस्त हो जाते है तो कुत्ते जगह छोड देते है । वे सोच लते है भोकने और काटने का प्रब कोई असर नहीं रहा । वे दूसरे किसी सादगी की तरफ भौफना शुरू कर देते है । उनकी फितरत में भौकना ही है इसलिए मुर-भुर, भी-भी करेंगे ही। हम सब्जी मंडो से गुजर रहे थे कि हमारे वाहन से एक कुत्त की दुम दब गयी। वह गुर्राया और उसने पाटी हुई प्रोखों स हमारी पोर देखा जैस 'कह रहा हो देखकर चलिए, रास्ते मे कुत्ता भी है ।' सम्जी खरीदते समय एक साहब कहने लगे, 'यह कुत्ता कई सालो से गाड़ियो की चपेट में माता रहा है । पांच वर्ष पहले किसी दुर्घटना मे इसकी एक टांग टूटते-टूटते बन गयी थी, किन्तु इसने जगह नहीं छोडी और बाद मे टाग टूट जाने के यावजूद यहीं पड़ा है । इसे तो नगरपालिका की गाड़ी से पकड़ना पडेगा।' दूसरे दिन रेल्वे के पास एक काला कुत्ता भागता हृमा पाया और उसने एक यात्री की पिंडली मे काट लिया जैस कोई सरे बाजार किसी का चेन उतारले या जेब काटले । एक मित्र कहने लगे-प्राजादी का सबसे बड़ा लाम .तो इन कुत्तों को मिला है। वे चाहे उस शरीफ प्रादमी के पीछे दौड़े और फाटलें। कोई बोलने वाला भी नहीं, जैसे सबके जमीर मर गये हो । कुत्तों के खिलाफ तो फोनदारी का मामला भी कहीं दर्ज नहीं हो सकता । पुलिस कुत्तों को नहीं पकड़ती और मोहरलेदार-गलीदार उनके मसले में चुप रहना बेहतर समझते हैं । कुत्ते आजाद हैं और उनका भाषा विज्ञान कोई नहीं जानता। कुत्तों का कोई क्या बिगाड़े ? ऐसी नाजायज संतानों को तो धमकाया-डराया भी नहीं जा सकता और उन्हें प्रादमी जाति का कोई भय नहीं । कुसे निडर है, जन्म से भूपे हैं, टुकड़ा डालोगे तव भी काटेंगे, घेहतर है कुत्तों से बचाव का पुख्ता इन्तजाम कर लिया जाये। कुत्तो के साप प्रादमी तो कुत्ता नहीं बन सकता । सब रगों के फुत्ते कुत्तों की जमात ही कुछ ऐसी है कि कोई बचे तो कहां तक बचे ? जमात में काले, भूरे, लाल, चितववरे, सफेद और पीले मोटे मरियल मभी सरह के कुत्ते हैं जो गलियों और मोहल्लो, चौक-चौराहों और सर्वत्र आबाद हैं। हालाकि एक कुत्ता दूसरे की सरहद में नहीं घुसता और कोई घुसपैठ करता है तो दूमरे कुत्ते भिर-भिर, भौं-भी और कू-कू करके उसे भगा देते हैं किन्तु प्रादमी का सामना हो तो सारे कुत्ते एक है, एक रूप पीर एकता के प्रतीक हैं। कुत्तों के अपने धर्म, वर्ण, रूप है गौर उनको अपनी जातियां प्रजातियां होती हैं। उनमें भी मूल निवासी और प्रायतित होते हैं और ये भी मुहल्लेदार, गलीदार तथा शहरदार होते हैं । कुत्तों में दोस्ती और 'दुश्मनी दोनों के लक्षण होते हैं । कुत्ते पालतू भी होते हैं, भूसे हड़काये भी। एक हड़काया कुत्ता बीस वर्षों मे नवागंतुकों को काटता रहा और एक रात वाहन की चपेट में आकर मर गया । तदसे सड़कों पर बड़ी शांति है, लोग निहरता पूर्वक घर लौटते हैं । एक दूसरा कुत्ता चालीस वर्षों से देशाटन करता रहा और गांव लौटा तो उसकी शक्ल बदरंग हो चुकी थी। यह रोगीला भी था । उस पर मक्खियां भिन-भिनाया करती थी और वह कान खुजाया करता था । उसने गांव में कुत्तों को एक बड़ी जमात तैयार की और भादमियों की और लपकता-लपकता एक ट्रक से प्यार कर बैठा । सहक पर उसको टांगें, घड़ और मुह ऐसे बिखरे पड़े थे जैसे दिल के टुकड़े हजार हुए कोई यहां गिरा, कोई वहाँ गिरा। कुत्तों को जमात/75 बौराया कुत्ता वागार का एक साल फुत्ता काले कुत्तों में क्या बैठा, साले का दिमाग ही चौपट हो गया मोर सहक पार करते हुए टेम्पो से कुचल गया । फिर बाजार में वसा कुत्ता नहीं देखा गया । सड़क दुर्घटनामों में पादमी के बाद दूसरी पड़ी संख्या कुत्तों की है । फुत्तो के घर नहीं होते और ये कहीं भी पोड़ी-सी बेवफाई के साथ जबदस्ती जगह बना लेते हैं । उन्हें गन्दे पानी मे रहना ज्यादा पसन्द है । कुत्ते दया की मांख फैलाये, किसी उम्मीद में मुह मटकाये और किसी वस्तु की गंध से बौराये हुए मादमियों के पीछे भागते हैं । कुत्ते पिछलग्गू होते हैं, पीछा करते हैं तब तक, जब तक उन्हें पादमी के दूर निकल जाने का विश्वास नहीं हो जाता । कुत्तं पास स्थिति में ही भले हैं भन्यथा वे शहरों में रहकर भी जगली, निरीह होकर मूर्ख और चालाक हैं । पेट भर जाने के बाद भी वे भूखे और नगे हैं । कुत्ते व्यूह रचना के बाद भी माक्रमण करते हैं और वह भी सामूहिक रूप से । भकेला कुत्ता तो भीरू है, कमजोर है। कुत्तों की योजना मादमी की जगह हथियाने की है और इस प्रयास में वे निरन्तर सक्रिय हैं । वे मादमी जात को बर्दाश्त नहीं कर सकते । उनका सबसे पड़ा सुख यह है कि प्रादमी पातकित है पोर प्रादमी का दुःख यह है कि यह प्राद- मियों को जमात में भी सुरक्षित नही । कुत्ते किसी के गुलाम नहीं है और प्रादमी गुलामों जैसी जिन्दगी बसर करने का प्रादी है । वह तो किस्मत है कि शादमी सत्तारूढ़ है भोर निरुपाय भी। कुत्ते सत्तारूढ़ होते तो जमीन पर मादमी जाति ही नहीं मिलती। 761 कुत्तों की जमात कहवाघरों में कुण्ठा पिएं भाजकल बड़े-बड़े शहरों में काफी पर साहित्यिक पर्चानों के केन्द्र धनते जा रहे हैं । जो साहित्यकार कॉफी घरो तक नहीं पहुंचते, उन्हें प्राण का बुद्धिजीवी वर्ग 'साहित्यिक' गही स्वीकारता और काफी घरों में फॉफी के साथ जीवन की विषमतामो, भीतरी कुण्ठानों, सम्मान और पालोचनामों से भरे हुए प्यालों को गले में उतारने वाले 'नामधारी साहित्यकार' ही घेष्ठ, स्तरीय माने जाते हैं। किन्तु वहाँ बैठकर एक साथ कई कई किट सिगरेट फूकने वालों को धुनों मे न जाने कितनों के दम घुट जाते होगे । इस बात को न कभी सोचा जाता है और न ही वहाँ प्रेरणा, संगठन और सहयोग जैसी बातों को कोई स्थान दिया जाता है । दफ्तरों से छूटते ही लोग अपने-अपने घरों को और महीं, कॉफी घरों की मोर दौड़ते हैं, और कॉफी घरों से घर लौटते रात का कौन-सा पहर हो जाता है, यह बताना उचित नहीं । उस दिन एक मित्र ने मुझ कॉफी घर मे ग्रामत्रित किया । मित्र साहित्यकार भी थे और प्रकाशक भी । मैं उम का प्राग्रह नहीं डाल सका। फॉफी घर मे घुसा तो ऐसा लगा, जैसे घर में आग लग गई है और उस फा घुमा एक कोने से दूसरे कोने तक फैल रहा है । मगर यह धुंपा किसी प्राग का नहीं, लोगो के दिलों में सुलगती हुई माग का था, जो कॉफी के धुनों के साथ-साथ उन के मुखो से निकल कर बाहर फैल रहा था ! जैसे ही कुर्सी पर बैठा कि दृष्टि सामने साहित्यिकों पर पड़ी। ये 'हवाई साहित्यकार' थे। शायद प्राकाशवाणी पर प्रसारित होमे वाले कार्यक्रमों की चर्चा करते हुए ठहाका मार कर हस रहे थे । वाहिनी मोर थाली मेज पर कोई सम्पादक महोदय अपने 'चोटीकट चेलों के साथ किसी पुस्तक पर हीका-टिप्पणी कर रहे थे । बाई पोर की मेज पर कुछ मैंने कहा, . कहानीकार प्रा जमे थे, जो उठने का नाम ही नहीं ले रहे थे । मैंने देखा, कॉफी पी रहे थे और न ही किसी प्रार्डर के साथ जुड़े थे । किन्तु उनकी बातों के ढंग से उन को शिक्षा और सभ्यता का अनुमान लगाया जा सकता था। तभी किसी ने मेरा कन्धा छुप्रा, देखा तुइया जी खड़े मुस्करा रहे थे । 'माइए, तुझ्यागी बैठिए ।' और वे भा बैठे। 'यह कौन-सी पुस्तक है ?' मैंने उनके हाथ से पुस्तक लेते हुए पूछा। 'कविताएं हैं,' उन्होने बड़े ही बनावटी ढंग से कहा, 'मई कविताए।' 'मापने पढ़ा है इन्हें ? वंसी है ?' 'बकवास,'-इन्होने मुह सिकोड़ा और बिखरे बालों को संवारते हुए कहा, 'कूड़ा है, कूड़ा।' मैंने कहा, 'परम्परागत कविता के बारे में मापके क्या विचार हैं ?' 'पुरानी कविता के बारे मे ?'-वे मुंह को ऊचा-नीचा करके बोले, 'मुझे पुराने से लगाव नहीं।' 'फिर भी........।' 'एकदम चकवास........।' 'पौर गीत ?' 'गीत,' वे झझलाए, 'गीतो का तो युग ही समाप्त हो गया। अब तो 'नवगीत' भी मर रहे हैं।' मैंने साहस करके पूछा, "फिर काव्य की कौनसी विधा में भापका विश्वास है ? क्या नई कविता मे ?' 'जी नही-ताजी कविता ।' 'ताजी, जैसे गोभी का फूल ।' 'जी नही। 'तो ताजी मिठाई ?' 'अरे साहय, ताजी कविता,-वे मोर सुले, 'जसे मान को कविता, अभी बिल्कुल अभी की कविता ।' - 78 / महाकवि शुतुरमुर्ग 'भाई ये क्या होती है ?' 'मैंने बात के एड़ लगाई, 'जरा मुझे भी तो समझाइए ?' 'ये मुझे मालूम नहीं, मैं तो कविता लिखता हूं और वे कॉफी पिये बिना हो उठ कर चल दिए । मैं और मेरे मित्र जब उठने लगे तो सामने बैठे एक बुजुर्ग साहित्यकार ने पुकारा 'अरे भाई, कहां चले ? प्रानो, प्रायो, देखो आपको, 'भादुड़ के शिष्य बटुकनाथ जी से परिचय कराते है ।' मैंने देखा 'गुल कद' के सम्पादक विजेन्द्र जी "निरूपाय' बैठे थे। नजदीक पहुचा तो बोले, 'ये रत ही दिल्ली से पाए हैं। पत्र-पत्रिकाओं मे आपने पढ़ा ही होगा कि आज कथा साहित्य में ले देकर सिर्फ तीन नाम हैं, जिन्हे त्रिगुट कहा जाता है ! उन्हीं के शिष्य हैं बटुकनाथजी !' 'तो पाप भी 'नई कहानिया' लिखते हैं, मैंने अन्वेषक की दृष्टि से उन्हे देखते हुए पूछा। ये अभी कुछ उसर दें कि चोच मे निरूपाय जो टपक पड़े ! 'नही भाई, अब तो इन के गुरुषों ने लिख दिया । उसे क्या लिखें ! यह तो आने वाले कल की कहानी लिखते हैं ?........इसी खुशी में दिल्ली के एक चौराहे पर पाठकों ने अभी कल ही इन का अभिनन्दन किया है।' मैंने जिज्ञासा प्रकट की, 'यहा कसे पाना हुमा ? किसी समारोह का उद्घाटन है या किसी व्यक्तिगत कार्य से ?' 'नहीं' - बटुकनाथ जी बोले, 'ये तो भाई निरुपाय जी की मेहरबानी है जो इन्होने 'गुलकन्द' द्वारा प्रायोजित कथा-गोष्ठी के लिए बुलवा लिपा, वरना दिल्ली में गोष्ठियो की अध्यक्षता करने का अवसर कहां मिल पाता है । वहा तो अभी तक पूछकटे लोग' ही अध्यक्षता करते हैं।' 'पूछकटे लोग'-क्या यह भी कोई 'कटी हुई कहानी' को तरह की चीज है ?' 'जी हां, जी हां, बटुकनाथ जी ने सिगरेट से सिगरेट जलाते हुए कहवाघरों में कुण्ठा पिए179 मैंने पुनः अभिवादन करते हुए कहा, 'भब मैं चलू ।। घटुकमाथ जी मे बड़े ही विनम्र शब्दों में कहा, 'तो सुनो, भाई, भैरी कहीं कोई कहानी पढ़ो, तो सम्पादक को भी पत्र लिख दिया करो।' मैंने कहा, 'अवश्य लिख गा !' उन्होंने उठते हुए कहा, और हो, अपने मित्रों से भी ऐसा लिखवायो। मैं कॉफी घर से प्राने लगा तो बाहर कुछ साहित्यकार खड़े-खड़े किसी चर्चा में हाथ बंटा रहे थे। एक ने कहा, 'हम उसे मन्च पर कविता नहीं पढ़ने देंगे। वह कवि नहीं कव्वाल है।' दूसरा बोला, 'मगर वह मंचीय कवि है और उसके बिना मन्च कभी सफल नही हो सकता। तीसरे साहब बौखलाए, 'हमारा विश्वास कवि सम्मेलन में नहीं, हम तो गोष्ठी करेंगे और वह भी चुगे हुए लोगो की ।' चौथे महोदय ने निर्णय दिया, 'मगर तुम जिन्हें कवि समझो हो । घे कवि कहां है । कवि तो वे हैं जो तुम्हे मुह नही लगाते।' मैंने देखा-कॉफी घर का घुप्रा वाहर भा गया था और वह बिना सिगरेट के भी साहित्यकारों के मुखों से बाहर निकल रहा था। मुझे लगा जैसे मेरा दम उस माहौल मे घुट रहा है । मैं चुपचाप उठा और भारी कदमों से घर की ओर लौट पड़ा। 80/महाकवि शुतुरम याः प्रार्थी महाकवि शुतुरमुर्ग जयपुर : महाकवि शुतुरमुर्ग साहित्यकार कभी नहीं रहे और इस रूप मैं सब कहीं विख्यात रहने के लिए यशः प्रार्थी रहना उन्होंने पसन्द किया। वे महाकवि कहाने के प्रादी थे जैसे कोई 'महापुरुष' या महाब्राह्मण रूप में बने रहने का प्रबल इच्छुक होता हो । उन्होंने अपने को महाकवि की शक्ल में जीया और जब उनका प्रत. रंग बहिरग की सड़क पर चलने लगा तो लोगों ने उनको कई रूपों में देखा ममलन भिक्षुक, भक्षक या भगेड़ी । वे दुत्कारे भी गये और बाजारूपन में चरे-बसे भी किन्तु किसी ने उनके किसी रूप को स्वीकारा नहीं, अलबत्ता वे अपने शुतुरमुर्गाने लहजे में अपना होना दर्शाते रहे। वे इस बात के लिए आमादा रहे कि किसी भी तरह पीले पन्ने वाले साहित्य के इतिहास में उनका नाम या उन पर लिखी कुछ पक्तियां आती रहे, मिथ्या ही सही, उनके सम्बन्ध मे खबरें छपती रहें और वे बिना कुछ किए महाकवे रूप में पुजते रहें। वे कामकाजी जिंदगी के खिलाफ मलवारबाजी भी करते रहे, चन्दे पर पलते रहे किन्तु जब मन को भूव नहीं मिटी तो सठियायी बुद्धि लिए प्राहरों की परिक्रमा लगाते रहे। साहित्य जगत में उनकी वनमानुषी हरकतों के कारण 'महाकवि' शब्द घृणास्पद होता रहा और लोगों ने चिढ़कर उन्हें महाकवे कहना उपयुक्त समझा। उनके खिलाफ प्रायोजित एक बैठक मे हमने विषयान्तर करते हुए कहा, 'बेचारे को जो चुगने दो । कुछ साहित्यजीवी होते हैं, कुछेक पेटिया भोर यह भसगति मन्यत्र भी अनुभव की जा सकती है । व्यक्ति होता कुछ भौर है, दिखाता कुछ भोर । चादा चाटू बैठको लोगों का कहना था कि वह कदि हरगिज नहीं है, चन्दा . चाटू है, भिक्षावृत्ति का कीड़ा है या गन्दी नाली का मच्छर । उन्हें सम्मान देना, साहित्य को और साहित्याकार शब्द को गलत प्रयं देना होगा । कुछेक दिनों बाद महाकवे शुतुरमुर्ग अवतरित हुए और बोले, 'दिल्ली से लौट रहा हूं। सोचा, जयपुर में प्रापसे मिलता चलू। पास मे लौटने का किराया नहीं है । कुछ व्यवस्था करादें तो भला होगा । मैं तो आप जैसे साहित्यकारों का दरोगा हूं। कृपया मदद करें।' हमने असमर्थता जाहिर की तो फूट पड़ेः 'पाप नहीं करेंगे तो कौन मदद करेगा ? देखिए या तो कुछ रुपयों की व्यवस्था करादें अन्यथा मैं आपके खिलाफ पत्रकारों को भड़काऊँगा, पापके खिलाफ अखवारबाजी करवाऊंगा।' हमने कहा, 'हमारे पाम तो साहित्य है, पंमा नहीं । प्राप चाहे जो लिखें लिखाए, हमें इसकी कोई चिन्ता भी नहीं।' वर्षों बाद उदयपुर में मिले तो कहने लगे मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें कवि मान लिया है और केरल सरकार नाटककार मान चुकी है लेकिन उन्हें कवि से कोई सरोकार नही । वे तो इस बहाने बड़े लोगों के बीच बैठकर ब्लैकमेलिंग करने के इच्छुक रहे हैं और उन्होंने बताया कि गुजर- बसर के लिए इससे अच्छा कोई जरिया नही है । वोले, 'सरकारी मुलाजमत में क्या मिलता है-~-दो ढाई हजार और इतना तो मैं किसी एक मुलाकात में खींच लेता हूं।' एक समारोह में महाकवि शुतुरमुर्ग ने किसी नेता से कहा ! 'कुछ तो हमारे लिए भी करवाइये । क्या हम भूसे ही मर जायेंगे? हम निरीह प्राणी तो पापको प्रोर ही देखते है, प्रापका दिया हुप्रा खाते हैं । आप ही हमारे माई-बाप हैं।' हम शर्म से गड़ गये ! महाकवे का घृणित रूप देखकर बुरा भी लगा, मोघ भी माया किन्तु क्या करते । गलती से मिसारियो की जमात मे जा बैठे और अपनी प्राबरू बचाकर लौट आये। महाकवे शुतुरमुर्ग का जन्म दक्षिणाचल के किसी इलाके के दुर्भागिया गांव में हुमा था और वे बचपन से ही भूसे रहे । उनकी माता हैदराबाद के स्टेशन पर कटोरा लिये भिक्षा मागती थी और उसी दौरान उसको . महाकपि शुतुरमुर्ग महाकवे के पिता प्रासाम ले पाये जहां दान-दक्षिणा पर उनकी गृहस्थी चलती रही। अभी कुछ दिन हुए कलकत्ता से एक मित्र का पत्र प्राया : 'महाकवे शुतुरमुर्ग नहीं रहे । आपमे कहीं मिले हो तो उन पर कुछ लिखिए।' सोचा, जिसने कभी कुछ नहीं लिखा हो उसके सम्बन्ध मे क्या लिखा जाये? अनचाहे के सम्बन्ध में मनचाही बातें कैसे लिखी जाये ? जमात के मसीहा शोक संतप्त परिवार के प्रति हार्दिक सवेदना प्रकटाते हुए हमने लिखा : "वे साहित्यकार के रूप में नही, 'महाकवे शुतुरमुर्ग' नाम से प्रसिद्ध हुए और उनके नहीं रहने से चन्दा जुटाने वालों को परम्परा प्रभावित होगी। वह चदाजीवी लोगो की जमात के मसीहा थे।' सम्मति के छपते-छपते महाकवे शुतुरमुर्ग अजमेर बस स्टेण्ड पर दिखायी दिए । नजर मिली तो सकुचा गये मोर धीरे से बोले, 'मरने की खबर तो मैंने ही निकाल वायी यो चन्दे के लिए। देखते नहीं, बम्बई से लौटा हू, पचास हजार खीचकर । वहा मुझे अपने को शुतुरमुर्ग का ज्येष्ठ पुत्र बताना पडा और लोग मेरी गौरवाना शक्ल देखकर पसीज गये।' पशः प्रार्थी महाकवि भुतुरमुर्ग / 83 फटीचर कलमकार की वसीयत प्रिय, उपनाम दार्शनाभिलापी, छद्मनाम सूत्रकार, देश भारत, राज्य राजस्थान, ग्राम बनाम जाति सत्यासी वर्तमान में अनदेखी पनजानी गली में निवासित, अपना यह मृत्यु लेख एवं वसीयतनामा स्वैच्छा मौर निर्भीकता से वनाकार सूचित करता हूँ। मैं शर्मा लाल एवं वेतालचन्द खुरताल पत्थर को इस मृत्यु लेख के उत्तर साधक नियुक्त करता हूं। मैं अन्य सम्पत्ति के प्रतिरिक्त निम्नलिखित सम्पतियों का पधिकारी हूं और मैं प्रत्येक सामने लिखे अनुसार इस सम्पत्ति को मृत्यु के बाद देना चाहता हूँ। एक (क) पाण्डुलिपि नं. 114 जो अभी तक सजिल्द नहीं है और जिसके प्रकाशन की कोई उम्मीद नहीं रह गई है। (ख) ये तीनों शब्दकोश जिनकी सहायता से मैं कभी-कभी कविताएं लिस लिया करता था और वे पुरानी पुस्तकें प्रकाशित कथामों को पढ़कर मैंने वैसी ही रचनाएं लिखी हैं । मित्रों से पढ़ने के लिए प्राप्त करके न लोटाई गयी सभी पत्रिकाएं जो कि सहकारिता लेखन समिति के कार्यालय को लीज पर दी हुई है उनके मेरे हिस्से के अधिकार स्वस्थ मधिकार व विशेषाधिकार । (1) पहा वहा से उलित किए बतरन साहित्य के माधार पर लिखित रचनापो के पारिश्रमिक के विवादित पसे में मेरे दावे व मधिकार। ऊपर लिली में पीजे पोर ऐसी ही बकाया सामग्री के सारे शिकार बेतानमन्द गुरास परपरकार को दिए जायेंगे कि ये कुछ न बन पाए हो रहीकार हो रह सके।

दो पुस्तक नं. 14, कविताओं का अनबिका प्रकाशन | इस पुस्तक की सभी कवितायें इससे पूर्व किसी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित नहीं हुई है और जो कविता प्रकाशनार्थ भेजी वह सम्पादक के अभिवादन व खेद सहित की स्लिप लेकर लौटी है, पुस्तक में हास्य कविताएं संग्रहीत हैं किन्तु प्रूफ की मशुद्धियो और लिपि ज्ञान के प्रभाव के कारण वे स्वयं व्यंग्य कवितायें हो गयी । लेकिन छन्द मात्र और भाव की दृष्टि से इन्हें विशुद्ध कवितायें माना गया है। यह पुस्तक किसी भी उस नये कवि को दी जाए जो वेकारी की स्थिति में कवि बना हो और जिसे तालिया पिटवाने की कोई रुचि रही हो । पुस्तक को पढकर वह मई कविताएं लिख सकेगा और चाहेगा तो कवि सम्मेलनों के मन्च भी लूट सकेगा उसको पुस्तक का सम्पूर्ण मालिकाना अधिकार होगा और वह पुस्तक के नए संस्करण पर लेखक के स्थान पर अपना नाम भी छपवा सकेगा लेकिन पुस्तक के सभी दोषों के लिए वह पूर्णरूपेण जिम्मेदार होगा । यदि उसकी मृत्यु मुझसे पहले हो गयी तो उक्त पुस्तक इस मृत्यु लेख के किसी भी प्राईटम में नहीं जोड़ी जायेगी। तीन (क) लेखक एवं नई कथानों की फाइलें, प्राधे-अधूरे और कुछेक पूरे लिखें लेखों की टक्ति प्रतियां, नाटक, प्रन्यास मोर रिपोतार्ज के वस्ते तपा धर्मयुग-पत्रिका के पचास पुराने यकों का सेट । (स) कवि सम्मेलनों के दौरान प्रायोजकों से प्राप्त पत्र तार एवं पारिश्रमिक सम्बन्धी कागजात । (ग) बैंक में नियत समय के लिए प्रौर करेण्ट सातों में जमा पूजी। (घ) प्राकाशवाणी के सभी केन्द्रों पर रिकार्ड की गयी रचनाओं पर हक की राशि यदि अनुबन्ध फिर हुआ तो। (5) मेरी पुस्तक या मेरे सम्बन्ध में लिखे गये परिहास अथवा संस्मरण में मेरा हक और प्रधिकार । फटीचर फलमकार की वसीयत 185 ऊपर लिखी पांवों मेरी पांच पाठिकानों या प्रेमिकामों को जो मेरी होने का दावा करें और मेरे प्रेम पत्र प्रस्तुत करें अथवा जिनके पाप्त मेरे द्वारा सहवास किये जाने का प्रमाण हो उनमें बराबर-बराबर बांटी जायेंगी । संभव यह भी है कि मैं इन चीजों के लिए अपने जीवनकाल में ही कुछ महिलामों को नामाकित करूं और यदि ऐसा नहीं किया गया तो जिसे मेरे उत्तर सापक नामांकित करें। चार (क) मेरे कमरे में बिछी दरियां, कुसियां, मेजें और कलमदान । (ख) महिलामों के यौन सम्बन्धी सुले चित्र एवं रंगीन पारदशियां । (ग) विभिन्न सरकारी एवं गैर सरकारी विभागों और सस्थानो से निःशुल्क प्राप्त प्रकाशन । ये सभी चीजों के किसी पत्रकार को जिसका नाम मेरे उत्तर माधक सुझाए', दी जायेंगी लेकिन वह पत्रकार जाति से ब्राह्मण, बनियां या कायस्थ नहीं होगा। विभिन्न पत्रिकामों से प्राप्त किये जाने वाले पारिश्रमिक की बकाया राशि । यदि कही से कोई पारिश्रमिक की राशि प्रा जाये तो उसे कॉफी हाउस या टी स्टाल जैसी जगह भिजवा दिया जावे ताकि मेरे नाम लिखा उधार चुकता हो सके। इसके प्रमाण में मैं नारंगी लाल उर्फ कुमार प्रिय माज की तारीख को दस्तखत करता हूं। 86/ महाकवि शुतुरमुर्ग चेहरे कमाल है साहब, चेहरा देखकर तिलक निकाल रहे हैं तिकुने चेहरे पर विदिया भी नहीं । कल तो भाप अपना चेहरा खोज रहे थे, चेहरों की भीड़ में और ग्राज चेहरा याद नही पा रहा तो दूसरे चेहरे में झांकने लगे । ग्राप भूल गए कोई भी चेहरा एक नहीं होता, चेहरों में कई-कई चेहरे और उनमे भी मालतू-फालतू, अमुक-तमुक अतुल बतूल चेहरे या बिच्छु सर्प अथवा बबूल चेहरे घुसपैठ किए गए हैं । देखते नहीं, यहा-वहां सब कहीं कितने चेहरे विसरे पड़े हैं-फटी हुई पाखों के वेतरतीब चेहरे, खडित शसों से उदास चेहरे, मखमली-मलमली चेहरे, भरे हुए, किन्तु खोखले चेहरे, ईाल कुठित-लुठित वेमजा चेहरे पोर प्राधे अधूरे कटे किनारों से चेहरे हैं दुसों-प्रभावों तथा बनावटी सुशियों के आसपास । कुछेक चेहरों जैसे भी नहीं हैं फिर भी चेहरे तो चेहरे हैं मुखौटे भी हैं घड़ियाल और चौकोर भी, गोलाकार ग्लोब जैसे भी। इनमें कहा तलाश पानोगे अपना चेहरा, बीते हुए कल जैसा या वर्तमानी अथवा पाने वाले कल का प्रपका भागामी मतीत का चेहरा। चेहरे खुले हुए वालों के भी हैं, वन्द मुड़े हुए कागजों जैसे भी, झरियोंदार बुढ़ियाए-ठियाए मिमियाए हुए भी। चेहरों के भीतर-बाहर भी चेहरे हैं. भागे पीछे भी पौर ऊपर-नीचे भी । चेहरों की गिना नहीं जा सकता। किसी संस्था से प्रारम्भ होंगे तो चेहरे बहुगुणित होकर लाखों- करोड़ों में बनते-संवरते भोर बिगड़ते-उजड़ते रहेंगे। घेहरे का अपना व्याकरण है, भाषा विभाग और कार्यक्षेत्र है। उन्हें माप किसी एक शीशे में उतारना चाहें तो यह दूसरी मूल होगी। पहली भूल तो अपना चेहरा नहीं पहचान पाना होगा । मासिर चेहरे हैं, कोई साग-सम्जो तो नहीं, भाव जो भोर तालवा लिया उसे, रस लिया किसी ले में या भर लिया कागज की पेली में । लोग तो चेहरों से बाहर नहीं निकल पाए पोर चेहरे हैं कि चेहरों को दीवारों मे ही दुबके पड़े हैं । जमाने के तेज तर्रार लोगों ने प्राइनों के साथ चेहरे भी बेच दिये और जो मंधों के शहर में प्राईनेल बेचे गए वे इतने कुशल भी रहे कि उन्होंने उजलाए चेहरे खरीदने में कोई कोर-कपर नहीं छोड़ी । वे चेहरों के बहाने दिल और दिमाग ही उठा ले गए कोड़ियों के भाव । मुगलों के दौर की यह खूबी रही कि उसके नसशिख वाले चेहरे तलाशे गए मोर परिवर्तित धर्म-जाति-वर्ग के माथ चेहरे भी बदल लिए गए। राजपूती शासन में चेहरों की किमत राजप्रासादो तक रही और गाधीवादी युग में तो चेहरों से पावरण उठ गए और सब चेहरे एक जैसे गिने गए । मानव चेहरों के साथ पशु चेहरे भी पहचाने गए तो परस्पर चेहरों का बदलाव भी देखा गया। चेहरों का क्या ! नौटंकी से रामलीलाप्रों और राजतंत्र से लोकतन्त्र तक चेहरे ही रहे, असली चेहरों के नकली लोग चेहरा पढकर लोगों का मूल्यांकन करने लगे या अभिनन्दित चेहरों में प्रतिभा नहीं देवी गई अथवा चेहरे ही माल्यापित होते रहे चेहरों के रूपों में । कई हजार चेहरे, कई लाख चेहरे, कई करोड़ों की संख्या तो बने अंततः अपने चेहरे तक रह गए । विकास युवा में चेहरे का भी विकास हुमा एक चेहरे मे कई चेहरे बने रहे, जैसे रावण के सिरपर दस चेहरों का कभी बोझ रहा। चेहरो की करामात के कई किस्से प्रचलित हैं और सुनाने की प्रब प्रावश्यक्ता नही रही । इतना जरूर हम बताए देते हैं कि वे चेहरे जमाने के अलग लहजे और अन्दाज थे । यथा, नवाबो की वीबियों के चेहरे, चित्र वृतियों के चेहरे, युद्धकालीन चेहरे, दार्शनिक और धार्मिक चेहरे, देवी- देवताप्रो के अधिकृत-स्वीकृत चेहरे तथा सौन्दर्य को दुनियां में गन्ध विसेरते-सिमेटते चेहरे । किन्तु चेहरों में अब वैसी कोई बात नहीं । प्राज तो राजनीति की शतरंजी चालो से पिटे-उभरे नुमाइशी चेहरे, पानूनी बेसुरे एव वेबुनियादी चेहरे और ज्ञान वधारते हुए दिढोरचियों की 88/महाकवि शुतुरमुर्ग जमात के चेहरे तथा निहित स्वार्थी और भूख से कराहते चेहरे ही सवन हैं । पाप खोजें और कोई सा अच्छा चेहरा खोज निकालें तो पापकी खूबी होगी अन्यथा सभी चेहरे एक रग एक सूरत जैसे विन्तु प्रलोने-अनगढ़ हैं । चेहरे घड़े जैसे भी हैं, दरवाजे पोर चौक गलियों से भी। चेहरों की पहचान के दावेदार भी भब नही रहे और खिले चेहरों के लोग भी पलायन कर गए । यहा तो सिर्फ थोपे हुए चेहरे हैं । उन्हें काले- कलूटे भी कहा जा सकता है । अन्यथा लोग तो विगई चेहरों को भी सुघर- सलोना ही कहते हैं। उनकी बात मलग है वे चेहरे हैं और चेहरे में खोये रहना उनके चेहरे की कोई मजबूरी हो सकती है । इतना जरूर है कि चेहरेदार लोग अपना ही चेहरा नही पहचानते और दूसरे के चेहरे को देखकर कहते हैं कि पह मेरा ही चेहरा है। यह महसूसा गया कि कभी लोग आपस मे मिल बैठते थे और सुख सुना लिया करते थे किन्तु प्राज की व्यस्तता इस कदर बढ़ी कि कोई किसी से नहीं मिलता-सिर्फ चेहरे चेहरो तक गए और लोट पाए । बनावटी पोर बनावटी चहरी के रूप रग-रास सभी भिन्न रहे उनमे एकरूपता नहीं देखी गई, गो, वे चेहरे ही न हो, कोई चेहरा नुमाचीच हों। छोटे-बड़े चेहरो का अनुमान खामियों और अच्छाइयों की कसौटी पर किया गया किन्तु बाद में पता लगा खामियोदार चेहरे बड़े महगे और अच्छे चेहरे बड़े सस्ते तथा विकाऊ थे । कुछेक चेहरे हमारे भास पास भी है । भाप इन्हे भी देखें शायद कोई प्रापका हमशकल हो। चेहरे / 89 दामादों की मर्दुमशुमारी एक बार संयुक्त परिवार के दामादो की मर्दुमशुमारी हुई । दो दामाद अपनी ही किस्म के निकले । एक थे शहंशाही शान शौकत की नुमा- इन्दगी करने वाले मगर दिलोदिमाग से खारिज मिस्टर खैराती लाल और दूमरे भौतिकवादी विचारधारा के प्रबल समर्थक मगर शक्ल सूरत से बदकार माशाअल्ला बिगड़े दिल नवाब जनाब बरसातीलाल तखल्लुस फिसड्डी' । गजव यह कि दोनो ही मैट्रिकुलेशन को सनद प्राप्त और थे दस नम्बरी । जिक उस दिन का काबिले-गोर है, जब मिस्टर खैराती लाल शबे चांदनी के दूसरी पहर मे दर-मन्जिल-दर कूच करते हुए ससुराल मा धमके । दरवाजे का खटखटाना क्या हुमा, लगा मुगलकालीन इंसाफ के प्रदले-जहांगीर को किसी फरियादी ने बजाया हो । तभी 'घर होटल' के बुजुर्गवार ने दरवाजा खोलते हुए देखा-सामने, दामाद खैराती लाल कुछ अनमने से मुंह बिचकाये खड़े हैं। बुजुर्गवार का तरहद मे पड़ जाना स्वाभाविक था। फिर भी एक आसान साहस बटोर कर उन्होने भघर हिलाये- 'मोह पाप-और इस वक्त ?' बुजुर्गवार ने कुछ जानकारी चाही 'कसे पाना हुमा प्रापका संरातीलालजी, कुशल तो हैं ?' 'प्रजी क्या खाक कुशल हैं, तबियत तो पहले से ही साफ है ।' 'क्यो ? क्या कोई नया वाकया हो गया ?" 'मजी होमा जाना क्या था, मिस्टर खंरातीलाल ने बिल्कुल देवाकाना लहजे में कहा 'दौरे से लौटकर बस स्टैह से घर जा रहा था। साचा, शायद 'वे' यही होंगी, क्यों न साय लिया ले चलूमोर यही स्याल मुझ यहां खींच लाया। 'स्याल तो प्रापका बहुत दुरुस्त है', बुजुर्गवार ने अपने तजुरपे की तुरप का पता लगाते हुए कहा-'मह तो प्रापकी जर-नवाजी है जो मापने - हमारी तरफ निहायत मसरूफ होते हुए भी नजरेइनायत की। फिर भी साहब दामादों का दिमाग भी काबिले तारीफ है। वक्त का ख्याल तो उनके दिलों-दिमाग से कूच कर गया है । दामाद जो ठहरे, न दिन का ध्यान और न रात का । ससुराल के चक्कर काटना तो उनको 'हाँ' सी बन पड़ी है । उन्होंने ससुराल के बैक मे लोकलाज का सेविंग्स बैंक सोल रखा है जिसमें से वे जरूरत के मुसाफिक शर्मसारी जमा कराते और निकालते रहते हैं।' मिस्टर खैरातीलाल उबल पड़े । पाखिर वे भी टहरे 'अनुभवी'। उन्होंने शादी से पहले ही कई ससुरालों की खाक छान लो थी। सर्प की तरह फुफकार मारते हुए बोले-'श्रीमानजी, मैं प्रापकी लम्बी चौड़ी, पोयी पौर बेबुनियाद तकरीर सुनने नहीं पाया हूं । मुख्तसर यह है कि मापको अगर उन्हें भेजना है तो मैं यही खड़ा हूँ मौर अगर नहीं भेजना है तो मैं चला।' 'सुनिये तो"वात दरअसल यह है"।' 'में वात-बात सुनने का मादि नही ।' फिर भी हमारी गुजारिश यह है मापसे कि 'बहरहाल बच्ची को हमें भेजना तो है ही, लेकिन बेहतर यह होगा कि माप भी अभी यही माराम - फरमाए । कल सुबह चाय-नाश्ते के बाद साथ लिवा ले जाइये । लड़की तो मुसराल पाती जाती ही अच्छी लगती है।' मिस्टर खरातीलाल का महरा बातचीत को तहजीबी शतरज में फिर पिट गया । फिर भी बात वधारते हुए बोले- 'मजी प्राप लोग भी बड़े मनीव हैं, मापकी वकालत तस्म ही नहीं होती। मेरा वक्त जाया मत कीजिए-जो उन्हें भेजना है तो भेजिए, वरना मुझे रुखसत दीजिए ।' फिर क्या पा-सेर को सदा सेर जो मिल गया मोर छिड़ गया महाभारत । एक पोर मिस्टर संरातीलाल 'स्मफूल' और 'नानसेंस' से 'फर-बगर' जैसे प्रल्फाओं तक पा पहुये थे और दूसरी मोर दरवाजे के ऊपर से ससुराल की पोरतें देशी-परदेशी गालियों के सुगन्धमय फूल बरसा रही थी दामाद फे स्वागत में । दामादोंकी चुजुगंवार की हालत मजीबोगरीय थी। वे सवालिया जुमला की सरह जडवत खड़े थे पोर इस हकीकत के तमाशबीन थे मास-पड़ोस में रहने पाले। गजं यह है कि जमाईलाल वेरुखी सो दिखाते हुए चले गए। इसके बाद क्या हुमा, इसे अनकहा हो रहने दीजिए। लोगों का ऐसा कहना है कि ऐसे तमाशे और मो.हुए जिनमे मिस्टर संरातीलाल ने नायक का अभिनय सफलता एवं कुशलतापूर्वक किया और हमारा ख्याल है कि बहुत जल्द ही वे ससुराल के दामादों की प्रतियोगिता में कोई शील्ड या तगमा जीत लेंगे और विजयी का सेहरा उन्हो के माथे पर सुशोभित होगा। माइये, प्रब जनाव बरसातीलाल तखल्लुस 'फिसड्डी' की कारगुजारी पर भी थोड़ा गौर फरमाइये । ये मिस्टर खरातीलाल से बहुत मागे बड़े- चढ़े हैं । ससुराल तो इनकी लगोटी के साथ बंधा हुआ है और ये बधे हुए हैं पत्नी के लहगे के फीते से.। पापकी तारीफ के लिए नये लफ्जों के लिए तलाश कमेटी बैठानी पड़ेगी क्योकि आप फैशन की कठपुतली, शक्लसूरत से इंजिन के ड्राइवर और नाजो-नखरो में अनार कली के खिदमतगार तथा बूटपालिश करने वालो की सोसायटी के चेयरमैन हैं । सुना है अापकी ससुराल मे बड़ी धाक जमी हुई है। मजाल है आपकी इज्जत-अफजाही मे कोई कमी रह जाये। तो साहब बरसातीलाल जी की कारगुजारी को लेकर एक घटना याद हो पाई । एक दिन वे तीन घण्टे तक मोटर में परेशान होकर माखिर ससुराल जा ही पहुंचे । जंवाई लाल को पाया देखकर ससुराल के बच्चे 'इधर-उधर भागने लगे और घर मे कुछ क्षण के लिए चिड़ी-चुप हो गई। जब जवाईलाल सास के कमरे मे पहुंचे तो इज्जत प्रावरू की प्रोढनो से अपने को ढोढी हुई सास ने मुस्करा कर खुशी प्रकट की। लेकिन जवाई लाल तो जवाई थे । साले और सालियो की पेशियां होने लगी और जिस तरह रोग छिपाय नही छिपते, धन छिपाये नहीं छिपता, कमजोरियां छिपाने से नहीं छिपती, उसी तरह मिस्टर परसातीलाल ससुराल में किसी के 92 / दामादों को मुर्दुमशुमारी छिपाये नहीं छिप सके । जिस तरह दलाल माल विकाने के लिए, शराबी पीने-पिलाने के लिए हर कीमत पर तैयार हो जाता है उसी प्रकार बरसाती लाल भी पास-पडोस के दस नम्बरियों को बुलाने के लिए दो चार ठल्ले मारने के लिए और बातों को एड लगाने के लिए किसी मित्र को ससुराल की छत से अावाज लगाने के लिए तैयार हो गए। तभी साल-सालियो की पलटन खिसियाती हुई, भय खाती हुई, बाजोट और भोजन का थाल लिये प्रा पहुची । ज्यों ही जवाईलाल ने नजर' फैकी कि उनकी भौंह तन गई। खाने के साथ शराब और कबाब नदारद थे। बरसातीलाल को बिना शराब के हर दावत सूनी-सूनी और फीकी-फीको सी लगती थी। इसलिए उन्होंने वर्तनों से खेलना शुरू किया। सब्जी की कटोरियां इधर-उधर बिखर गयौं । ससुर साहब ने देखा--भोजन का पाल उल्टा पड़ा था। उन्हें लगा, जैसे किसी ने लड़की तो देख ली, मगर शादी से इन्कार भी कर दिया। .."और सुबह सौ गालियों का बोरा बिस्तर समेटै जनाव बरसाती लाल वापस अपने शहर लौट गये। इस तरह दोनों हजरत खैरातीलाल और जमाव बरसातीलाल एक ही सिक्के के दो पहलू निकले । दोनों ही तजुर्बेकार, जरूरत से ज्यादा अक्लमन्द और छोटी उम्र में ही बुजुर्गवार हो चले थे। दामादों की मर्दुनगुमारी/93 फुरसती भक्तों के भगवान प्रातः सूर्योदय के साथ या गोधूली बेला के बाद देश के मन्दिरों में भगवान के दर्शन भव्य झांकियों के साथ भवत जन करते रहे हैं, वे भी जो अपने क्रिया-कलापों की ऊंच-नीच मोर घटत-बढ़त में मशगुल रहते हैं या फिर आठों याम किसी न किसी उधेड़बुन में हारे थके से अथवा चक्र-कुचक्र को जीते हैं । मसलन भगवान के दर्शन करना उनके लिए जीवन में नियम-सा है, किन्तु वे उसे फुर्सत के साथ ही करना पसन्द करते हैं । जैसे सुबह आठ बजे की झांकी नहीं कर सके तो कोई बात नही झांकी ही तो करनी है रात पौने नौ की ही सही। और जूते के फीते खोलने कोई दिक्कत है तो भगवान की प्रतिमा से दूर खड़े होकर दर्शन करना भी वे उचित समझते हैं । उनको पृष्टि में भगवान तो उनके हैं चाहे देहरी छकर पूजो, चाहे घटियां बजाकर, चाहे गा-वजाकर या भाल पर चिन्दी लगाकर अथवा प्रसाद पाकर वे अपनी सुविधानुमार चाहे-मनचाहे प्रातिर भगवान के दर्शन तो करते ही हैं । यह और बात है कि वे पट बन्द होने की दशा में भी दर्शन कर लेते हैं और पट खुलने पर आंख मूद कर भी। महिलामों का तो अपना ही तौर-तरीका है । वे भगवान के दर्शन करते वक्त मान-मनौतियों, जात-जड़लों, गुणगान प्रौर भजन गाती-गाती मी प्रपने साथ बैठी महिलामों मे बतिया कर बच्चों की शादिया भी तय करा लेती हैं । लेकिन यह सब भगवान की झांकी के समय ही होता है- यह बोलते हुए कि भगवान को ऐसी ही मंशा है या कृपा है। पुरुष झांकी की भीड़ में भी ताक-झांक का समय निकाल लेते हैं अर्थात मगवान को मुखाति से पूर्व पोई दूसरी प्राकृति उनकी प्रांखों में रची-बसी होती है और वे भगवान के जयकार के साथ अभिसार से भी जुड़ जाते हैं । उनकी देखा-देखी भगवान कहां देखते हैं और भगर देख भी लें तो बहा पकहते हैं। मन्दिरों में धार्मिक मास्पा मोर माध्यात्मिक परिवेश में नया नहीं होना और जो होता है वही तो भगवान की झांकी है । और साहव झांकी तो झांकी है, भगवान की तरफ झांक लिए तो झांकी हो गई और नहीं झांक पाए तो मन्दिर तो हो पाए । हमारे सामाजिक और धार्मिक जीवन में मन्दिरों को स्वगिक अनुभूतियो का तीर्थ स्थल जैसा महत्त्व दिया गया है और कहा तो यहां तक गया है कि जहां मन्दिर नहीं वहां कुछ नहीं । भगवान का मन्दिर पावनता की कसौटी है । भगवान के दर्शन डूबते जीवन से उबरने का मार्ग है और विश्व में कहीं कोई सन्मानं है तो मन्दिरों का मार्ग ही है । सैकड़ों दर्शनार्थी हर दिन बड़े मन्दिरों में और पचासों छोटे मन्दिरों में जाने में मास्था रखते हैं । यदि उनका जाना मन्दिरों तक नहीं हो पाए तो वे किसी भी बाजार-गली के नुक्कड़ और मोहल्ले में खड़े हो मांख बन्द कर भी भगवान के दर्शन कर सकते हैं भला इससे बड़ी सुविधा भक्तजनों के लिए क्या होगी ? उन्हें मन्दिर तक भी न जाना पड़े और भगवान अधीनस्थ कर्मचारी की तरह सामने आ खड़े हों। यदि भगवान पर कोई पाबन्दी नहीं है और किसी के बुलाने पर भी उपस्थित हो सकते हैं, बशर्ते कोई उन्हें याद करे। माजकल मन्दिर जूतियों की चोरी के भी बड़े केन्द्र हैं, जहां से पुरानी जूतियों छोड़कर नई उठाई जा सकती है और इस सबको भगवान नहीं देखता। भगवान तो आस्था का प्रतीक रह गया है और इसीलिए भगवान के दर्शन करते वक्त भक्त जनों को अपनी प्रास्था से अधिक जूतियां खो जाने का डर रहता है । शायद इसीलिए वे जूतियां खोलना पसन्द नही करते। अाजकल भक्तजन मित्रों और परिचितो की तरह रास्ते में स्थित छोटे मन्दिरों को स्कूटर अथवा साइकिलों पर चलते हुए नमन कर लेते हैं जैसे तो भगवान को भी वे मित्रों व परिचितो की तरह 'गुड बाई' करते हो । कहते हैं मन्दिरों में जाने से प्रात्मा का शुद्धिकरण हो जाता है और व्यक्ति ब्रह्म को भोर उन्मुख हो जाता है लेकिन देखा यह जाता है कि चुने जाने के सारे कार्य मन्दिर क्षेत्र में ही होते हैं । न व्यक्ति ब्रह्मा से . फुरसती भत्तों के भगवान / 95 -- मिलता है और न ही ब्रह्मा व्यक्ति को भक्ति पर विचारता है । दरग्रमल व्यक्ति का कलर इस कदर फीका पड़ गया है कि भगवान का कलर उस पर चढ़ता ही नहीं योर भान जैसा चाहता है उसी कलर में भगवान को रखता है । पूजा भी एक औपचारिकता रह गई है और भगवान पर पुष्प चढ़ाने जितने पैसे भक्त की जेब मे हर रोज नहीं रहते । वह तो पैमो से नही हाड-मांस के श्रम से भगवान पूजने का आदी है। उधर भगवान के पुजारी मिठाई का द्रोना लाने वाले भक्त को ही श्रद्धालु मानते हैं । फोक- दिया भक्तों के प्रति उनमें सहानुभूति नहीं है। यह बात और है कि मन्दिरों में चढ़ाई जाने वाली मिठाई पुजारियो द्वारा बाजार मे पहुंचाई जाकर बिकवा दी जाती है । कोई अन्य भक्त विकी हुई मिठाई को फिर भगवान के चढ़ा देता है । यानि एक ही मिठाई कई भक्तों द्वारा कई झांकियों में भगवान तक पहुंचती है और पुजारियो द्वारा मिठाई का बेचान बरकरार मन्दिर में पुजारी रच-बस गए हैं और ठाकुर जी की प्रतिमा के लिए बहुत कम स्थान रह गया है जबकि सारे मन्दिर क्षेत्र में पुजारी परिवार निवास करते हैं और उन्हें भी मन्दिर क्षेत्र ना काफी होता है। भक्तजन और पुजारी भगवान का प्रसाद और विक्री, पुजारी को भामद और भक्तों की श्रद्धा-इस सबके बीच मुगालतो को इतनी बड़ी दुनिया है जहां भक्ति की वास्तविकता बहुत छोटी नजर आती है। भगवान के मन्दिरो में कीर्तन अब सांस्कृतिक समारोहों से म.धेक नहीं रह गए हैं . 'मेरे तो गिरधर गोपाल' कह कर कोई भी नृत्य किया जा सकता है और भगवान का मुकुट सिर पर बांध कर कोई भी व्यक्ति हजारों भक्तों से पाव छुपा सकता है । भगवान के दर्शनो के समय भक्तजनों द्वारा चढ़ावे के रूप में पैसे या रुपये फेकने अथवा गुप्तदान का भी प्रजीर रिवाज पुजारियों द्वारा बनाया हुपा है यदि यह मान लिया जाए कि इस राशि का उपयोग मन्दिर के विकास या विस्तार के रूप में हो सकता है फिर फैक कर क्यो? भगवान तो स्वयं दाता हैं उन्हें क्या दिया जाए। 961 फुरसती भत्तो के भगवान भक्तों की भी लीला प्रपरम्पार है कि वे भिखारी की तरह भगवान के द्वारे पड़े हैं और इस प्राशा से कि कोई भक्तजन उनके पेट का पालन करेगा, यह नहीं कि वे कोई कामकाज करें। स्थिति यह है कि बैठे ठाले पौर निठल्ले लोगों ने भगवान के मन्दिर को पचायत घर समझ रखा है या फिर धर्मशाला । जो जब से टिका हुआ है, कही जाता ही नहीं है और भिखारियों की एक बड़ी जमात मन्दिरों मे ऐसे मण्डराती है जैसे बड़े खाने के लिए प्राकाश में पीलें और यह चील झपट्टा भक्त और भक्तो के बीच वों से चला मा रहा है । मन्दिर में घुसे कि किसी ने हाथ पसारा, प्रसाद लेकर मुड़े कि सैकड़ो हाथ चारों तरफ हो गए। यह भिक्षावृत्ति मन्दिरों मे बड़े विकास पर है । यदि भिखारियों का बस चले तो वे भक्तों के वस्न ही उतरवा लें। अब तो यह भगवान पर ही है कि वह भक्तजनो की मनमानी और फरसती वृत्ति पर कोई प्रतिबन्ध लगाए मोर दर्शन के समय ही दर्शन दे। फुरसतो मक्तों के भगवान / 97

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Mahakavi Shuturmurga

Author
Tara Dutt
Title
Mahakavi Shuturmurga
File name
Mahakavi Shuturmurga
Text
OCR done
Citation
1959
Published
2011/03
Publisher
Devnagar Prakashan Jaipur
Language
Sanskrit
Pages
104
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551094
Barcode
4990010031869.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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