Kumarappa Institute Of Gram Swaraj, Jaipur

Mudol Rajvans Ka Parachin Itihas

Shri Krishanadass · 2010/04

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श्रीः।
PHARA
मुधोल राजवंश का छाचीन
इतिहास
ANAM
Tim
SWAMI

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Printed by Khemraj Shri Krishnadass at their Shri Venkateshwar
6team Press, 7tb Kletwadi Khambata Lope, Bombay.
Published by Private Eecretary of Mudhol.

ज. or ज. ज. पटरारपटप. (Kalyan Tणयाएजा पुरापा मृ. कल्यानीकी (गजेंद्रगड और सोंडूर- (मशहूर सेनापति (अमीर उल-उमर , १७॥ मृ. १६०५ ई. १६६१ ई. सुभानजीनाबजी -५८ई. १७ राजावाजी राजे घोरपडा बहादुर अंबाजी-लडाईमें१६५७ खानदानका मूलपुरुष) कापशी खानदानका मूलपुरुष) और दत्तवाड खानदानका मूलपुरुष) १८ राजा मालोजीराजे घोरपडा बहादुर (दूसरे) शंकराजी मृ. १६५० इ. १७०० ई. (जयसिंग) तासगांवके लड़ाईमें मरगये १६६६-६७ ई. १९ / राजा अखैजी घोरपडा बहादुर (दूसरे) मृ. १६७४ ई. १७३६ ई. २० | राजा पिराजी बाजी कृष्णा नदी पर मारे गये (Killed on the Krishna) मृ. (By brother in an action fought near Bijapur) १६९० ई. १७३७ ई. बीजापुरके नजदीक हुई चकमकमें बांधवोंने मारा २१ | राजा मालोजी (तीसरे) शंकराजी मृ. १७१० ई. १८०५ ई. रामचंद्र गोविंदराव केदारराव पर्वतराव शंकराजी महाराव बाजीराव राणोजी मृ. (Rakshas bhuwan) १७६३ ई. राक्षसभवनकी लड़ाई में गोविंदराव मृ.१७७९ ई. वडगांवकी लड़ाई में २२ । राजा नारायणराव महाराव मालोजीराव पर्वतराव शंकराजीराव २७१५५ १८१७ ई. हणमतराव ज. । । ज. । op टानीमा २३ TIFIETrn

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मुधोल राजवंशका प्राचीन इतिहासः । प्रथम अध्याय. - लक्ष्मणसिंह, श्रीरामचंद्रजीसे १२८ वीं पीढी के सूर्यवंशी राणा लक्ष्मणसिंहजी वि.१३३१ (हिजरी ६७५) में राजगद्दी पर बैठे । यह कहनेकी आवश्य- कता नहीं कि राणा लक्ष्मणसिंह का समय राजपूत राजाओं के लिये बड़ा संकटमय था। बादशाह अल्लाउद्दीन खिलजी ने थोड़े ही समयमें चित्तोरके किले पर दोबार आक्र- मण किया और अन्ततः उसे, जो कि इतने कालतक मुसल्मानों के हाथों से बचा हुआ था, अपने अधिकार में कर लिया। इस लड़ाई में राजा लक्ष्मणसिंहके एक के बाद एक इस तरह ग्यारह पुत्र मारे गये। अन्त में राणा ने अपने प्यारे पुत्र अजय सिंह को कुछेक चुने हुए राजकर्मचारियोंके साथ किले के बाहिर भेज दिया और किलावाड़ा नामक पश्चिमीय प्रान्तमें रहने के लिये आज्ञा दी। अजयसिंह. अजयसिंहकी बिदाई के समय लक्ष्मणसिंह ने अपनी यह इच्छा प्रकट की कि उसके बाद राजगद्दी पर अजयसिंह के बड़े भाई अििसंह का पुत्र हमीर बैठे। अजयसिंहने किलावाड़ा (२) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । प्रान्तमें पहुँच कर वहां कुछ काल तक राज्य किया । इस कालमें भी उसे किलावाड़ा के आसपास के अनेक छोटे बड़े सरदारोंसे लड़ा- इयाँ लड़नी पड़ी। इन सरदारों में मुझे सबसे अधिक शक्तिशाली था, उससे अजयसिंह का द्वन्द्व संग्राम हुआ । अन्तमें मुञ्ज युद्ध के मैदा- नसे भाग तो गया लेकिन अजयसिंह के सिर में गहरी चोट आई। अजयसिंहने अपनी राज- धानी में आकर अपनी चोट का बदला लेनेके लिये सुजनसिंह और अजबसिंह नामक अपने दो पुत्रों को भेजा । इन दोनों की अवस्था उस समय केवल दस ग्यारह वर्षके लगभग थी। ये दोनों भाई अपने कार्य में सफल न हुए और राना ने अपने भतीजे हमीर को शत्रु से राना हमीर. लड़ने के लिये भेजा। हमीर ने चलते समय मुञ्ज का शिर काटकर लाने की प्रतिज्ञा की। थोड़े समय के बाद ही वह अपनी प्रतिज्ञा के पूरा करने में सफल हुआ और उसने मुञ्जका शिर लाकर अपने चाचाके चरणों में रख दिया और नम्रतापूर्वक पूछा कि यह मुञ्जका शिर है या नहीं ? राणा अजयसिंह ने अपने भतीजे को छाती से लगाते हुए कहा--'प्यारे बच्चे ! तुम्हारे भाग्यमें लिखा दीखता है कि इस संपूर्ण जातिका उत्तरदायित्व तुम्हारे ही कंधों पर रहना चाहिये ।' उसने मुझके शिर से थोड़ा रक्त लेकर हमीरके माथे पर उसका तिलक लगा दिया।

मुधोल पाजवंश का प्राचीन इतिहास । (३) द्वितीय अध्याय. बहमनी राज्य की नौकरी. हमीर के राणा होने की घोषणा के बाद अजबसिंह तथा सुजनसिंह नामक अजय- सिंह के दोनों पुत्रों ने स्वाभाविक तथा राज. गद्दी की आशा छोड़ दी। अजवसिंह ने तो यहाँ तक किया कि अपनी आत्महत्या कर ली और सुजनसिंह किलावाड़ा को छोड़ कर कुछ दूर दक्षिण की ओर चला गया और वहीं वस गया । कुछेक विश्वस्त अनुयायियों के समूह के साथ अपने भाग्य की परीक्षा करनेके लिये सुजनसिंह दक्षिण में मुसल्मानोंकी सेना से जा मिला । मुसल्मान सेनापति जिसके नीचे सुजनसिंह ने नौकरी की,हसनगंगू था जिसे दिल्ली के बादशाहने जाफरखान की पदवी दी थी । जनसिंह के नौकरी करनेके थोड़े दिन बाद ही जाफरखान ने दिल्ली के राज- सिंहासन से अपनी स्वतन्त्रता उद्घोषित कर दी और अपने लिये अलाउद्दीन हसन का खिताव स्वीकार किया । दिल्ली के बादशाह महम्मद तगलक ने जाफरखान के वलवे को दवाने के लिये दक्षिण की ओर प्रयाण किया। जाफरखान ने अपने पुराने स्वामी से लड़ाई लड़ी-और उसकी ओर से सुजनसिंह तथा उसके पुत्र दलीपसिंह ने अपना पराक्रम दिखाया । उन्होंने बादशाह की सेना के

(४)
मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना किया।
जाफरखान के भाग्य से महम्मद तगलक ने
गुजरात के एक दूसरे बलवे का हाल सुना
और उसे जाफरखान के विरुद्ध आक्रमण को
छोड़ देना पड़ा । जाफरखान अपने नवीन
सरदार सुजनसिंह से बहुत प्रसन्न हुआ
और उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट की ।
सुजनसिंह तथा दलीपसिंह दूसरी और
बादशाहके मुख्य सलाहगीर सेफुद्दीनके भी
स्नेहभाजन थे । सुजनसिंह और उसके पुत्र को
देवगिरि प्रदेश के अन्तर्गत मिरत प्रान्त में
कई गांव जागीरमें मिले । यह जागीरके थोड़े
गांव अब भी सुजनसिंह के वंशजों के अधि-
कार में हैं।
अपने को चमकाने के लिये दलीपसिंह को
एक और अवसर मिला । बहमनी बादशाहों
और विजयनगर के राजाओं में अपने राज्य
की सीमाके बारे में झगड़ा उपस्थित था जिसे
त करनेके लिये लड़ाई की आवश्यकता थी।
दलीपसिंह दो हजार भालेवाले योद्धाओं का
नेता बनकर बहमनी राजा की ओर से लड़ा।
यह दलीपसिंह और उसके अनुयायी राजपूतों
की वीरता ही थी कि जिसके कारण लड़ाई
बहमनी राजाओं की विजय तथा विजयनगर
की सेनाओं के पूर्ण पराजयमें समाप्त हुई ।
दलीपसिंह का बहुत आदर किया गया उसने
विजयीराजासे अनेक मूल्यवती.भेट प्राप्त की।

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । दलीपसिंह तेरह सालकी लगातार तथा वटनापूर्ण नौकरी के बाद हिजरी सन् ७६६ के लगभग परलोक को सिधारा। सिद्धजी. अपने पिता की मृत्युके बाद दलीपसिंह का युवा पुत्र सिद्धजी जिसे शिवाजी के नाम से भी पुकारा जाता है,बहमनी राज्य की नौकरी में आया । कुछ ही कालबाद महम्मदशाह बहमनी मर गया और उसके पश्चात् उसका पुत्र मजहिदशाह गद्दीका उत्तराधिकारी हुआ । मजहिदशाह स्वयं पहलवान होने से सुन्दर सुडौल शरीरवाले मतुप्यों को बहुत चाहता था बलवान तथा साहसी सिद्धजीको बादशाह का शरीररक्षक बनाकर सम्मानित किया गया। मजाहिदशाह ने थोड़े दिन राज्य किया, बहमनी उसके शत्रु बढ़ते गये और अन्तमें उसके चाचा घटनाये. दाऊदखाने उसको कत्ल कर दिया । दाऊदखां गद्दीपर बैठ गया किन्तु अपने राज तिलकके सतरहवें दिन ही मजहिदशाह की बहिनके उत्तेजन से धोखा देकर काल कर दिया गया । सिद्धजीका जब किदाऊदखाँ के पुत्र महम्मदसन्जर को सागरका राजसिंहासन पर बैठानेके कपटप्रबन्ध किये होना जा रहे थे, रुखपरवरआगा अलाउद्दिन बहमनी के कनिष्ठ पुत्र सुल्तान महम्मद को बाद- शाह बनाने में सफल हुआ । इस सुल्तान का राज्यकाल शान्ति. और सुख समृद्धि के लिये प्रसिद्ध था। उसके समयमें केवल एक छोटासा बलवा हुआ । वहाउद्दीन (६) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । नामक एक पुरुष सागर के किले का थानेदार था। उसके दो लड़के महम्मद और खाजा राजा के पास रहते थे। उनके शत्रुओं ने उनके विरुद्ध राजा के कान भर दिये परिणाम यह हुआ कि राजा के क्रोध से भयभीत होकर वे दोनों अपने पिता के पास भग गये और पिता तथा पुत्रों ने एक बलवा खडा कर दिया। उनको पूर्णतया शान्त कर दिया गया और सिद्धजी अपनी लम्बी विश्वस्त सेवाओं के कारण सागर के किले का थानेदार बनाया गया । सुल्तान महम्मद के बाद उसका पुत्र गियासुद्दीन गद्दी पर बैठा, परन्तु उसके बैठने के थोड़े दिनके पश्चात् ही धोखा देकर उसकी आंखें निकाल लीगई और उसका भाई शम- सुद्दीन राजा बन गया। सिद्ध जीक । इसके राज्य के दिनों में ही दाऊदखां के पुत्र की फीरोजखां और अहम्मदखां राज्यमें मशहूर होना. होने लगे । शमसुद्दीन की मां के मन में ईया होने लगी और उसने इन दोनों को गिरफतार कराने का प्रयत्न किया । वे सागर किले की ओर भाग गये जहाँपर सिद्धजी ने उनका पक्ष लिया और फीरोजखां को फिरोजशाह बह- मनी के नाम से घोषित कर दिया। उसने स्वयं सरनोबत का खिताव स्वीकार किया और फीरोजशाह को वास्तविक बादशाह बनाने के विचार से राजधानीकी ओर प्रस्थान किया परन्तु बादशाह की असंख्य फौज ने गुलबर्ग .

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (७) के पास मर्तृर की सीमा पर लड़े हुए युद्धसे सिद्धजी की पलटन को भगा दिया। सिद्धजी के पुत्र भैरवजी ने अपने आपको इस असफल सिद्धजीकी युद्ध में प्रसिद्ध किया । सिद्धजी इस लडाई में मृत्यु. काम आये । उन्होंने वाहशाह की इकतीस साल तक आपत्ति और सुख दोनों में एक भाव से सेवा की। इस पराजयसे निर्भय होकर फीरोजशाह ने छल द्वारा अपना मतलब पूरा किया और हि- जरी सन् ८०० में बह्मनी राज्य की गद्दी पर बैठा । गद्दी पर बैठ कर फीरोजशाह ने अपने मित्रों तथा सहायकों के प्रति कृतज्ञता प्रका. शन करने में बड़ी बुद्धिसे काम लिया। सिद्ध- जी ने तो फीरोजशाह के लिये लड़ते हुए भैरवजी या अपने प्राण छोड़ दिये और भैरवजी ने सोलाजीका भी जो कुछ भी कर सकते थे किया ८१ गांवोस- मेत मुधोल था। कृतज्ञता प्रकाशनार्थ फीरोजशाह ने भैर- की जागीर वजी को मुधोलकी जागीर दी। बादशाह ने रबिलावल महीने की २५ वीं तिथि हिजरी सन् ८०० को एक आज्ञापत्र निकाल कर भैर- वजी को मुधोल की जागीर उसके अन्तर्गत ८४ गावों समेत प्रदान की। इन्हीं भोसाजी के पीछे उनके वंशने 'भोसला' उपनाम प्राप्त किया । भैरवजी ने फीरोजशाह बहमनी के राज्यकाल में एक विशेष भाग लिया। जब उसके राज्यान्तर्गत रायभाग प्रदेश के एक हिस्से में कुछेक सरदारोंने झगड़ा खड़ा किया पाना..

(८) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । सब भैरवजी ने देवराज और कर्णसिंह नामक अपने दोनों पुत्रों के साथ उसे शान्त कर अपने राजपूती शौर्य का अच्छा परिचय दिया । कर्णसिंह हिजरी सन्८१५में लड़ाई में मारे गये। बहमनी और विजयनगर के राजाओं के बीच सन्धि कराने के प्रयत्न में भी भैरवजी का भाग था। उनकी मृत्यु अपने स्वामी की ग्यारह साल सेवा करने के बाद हिजरी सन् ८१० में हुई। देवराज. उसके बाद उसका पुत्र देवराज जागीर का स्वामी बना और फीरोजशाह ने भी उसे उस- का निश्चित अधिपति बना दिया। देवराज ने अपने बादशाह की सोलह सालतक नौकरी की और बादशाह फीरोजशाह की मृत्यु के कुछ दिन बाद ही हिजरी सन् ८२५ में परलोक को सिधार गया। फीरोजशाह का उत्तराधिकारी उप्रलेन. उसका भाई अहमदशाह हुआ। गद्दी पर बैठने के कुछ काल के बाद ही अहमदशाह ने पुरानी पराजय का बदला लेने के विचार से विजय- नगर के राज्य के विरुद्ध प्रयाण किया ।विज- यनगर की सेना को भगा देने में उसे सफलता प्राप्त हुई पराजित सेनाने जाकर अपने आप- को किले में बन्द कर लिया। उसके बाद किले के चारों ओर जो घेरा डाला गया उसके बीच में एक छोटे से झुण्ड के साथ बादशाह शिकार खेलने चला गया । वहां पर विजयनगरकी सेना के एक समूह ने उसे धोखे में आ दबाथा मुधोल गजवंश का प्राचीन इतिहास । (२) और वहीं वह शत्रु द्वारा गिरफतार कर लिया जाता, याद देवराज का पुत्र उग्रसेन और उसके अनुयायी उसकी सहायता को न होते। राजा अपने सेनापति उग्रसेन से बहुत प्रसन्न हुआ और हिजरी सन् ८२७ में उसे विशेष सम्मानित किया । कोकण की अलाउद्दीन के राज्यकालमें उग्रसेन और लड़ाइयाँ प्रतापसिंह दोनों भाइयोंने अनेक साहस के कार्य दिखा कर अपने बादशाह के लिये कोंकण प्रदेशमें कई किले जीते । जिसके लिये वाई परगना में उन्हें एक बड़ा भूमिभाग जागीर में मिला । ये लड़ाइयाँ उन प्रसिद्ध मरहटे राजाओं के साथ लड़ी गई थीं जो कि कोंकण या पश्चिमीय घाटों में राज्य करते थे। अनेक बार बहमनी राज्य के शत्रुओं को उग्रसेन की गिरफतारी भी विजय प्राप्त हुई और इसी प्रकार की एक और मुक्ति. दुर्भाग्ययुक्त पराजय के समय उग्रसेन अपने शत्रुओंसे कैद कर लिया गया (हिजरी सन् ८५८ ई० १४५३ ) । प्रतापसिंह और उग्रसेन के पुत्र कर्णसिंह तथा शुभकृष्ण ने दो तीन वर्ष तक लड़ाई जारी रक्खी और शत्रुका किला जीतने और उग्रसेन को छुड़ाने में सफल हुए। उग्रसेन की मृत्युके पश्चात् उसके पुत्रों ने गमकृष्णका बादशाह के यहाँ सेनापतियाके पद पर अपने भाईसे नौकरी की। लेकिन किसी मतभेद के कारण छोटा भाई शुभकृष्ण और उसका चाचा प्रता- अलग होना.

(१०) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । पसिंह चले गये और हि सन् ८६५ ई० १४६० के लगभग देवगिरि के पास जा बसे । कर्णसिंह. इन्हीं दिनों शंकरराव नामके सरदार के साथ अब भी कोंकणमें लड़ाई हो रही थी। इसी,सरदार ने मलीक उत्तेजार को सन् १४५३ में परास्त और उग्रसेन को गिरफ्तार किया था। शंकरराव से लड़ाई लड़ते हुए उग्रसेन के ज्येष्ठ पुत्र कर्णसिंह ने अपने पुत्र भीमसिंह के साथ अपना महान वीरत्व प्रदर्शित किया और अनेक शरताके कामों के बाद शत्रुके किले को ले लिया । बादशाह ने पिता और पुत्रको बड़े सम्मान प्रदान किये । कोकण का सन १४६९ ई० में मुहम्मद गवन फोजका प्रधान सेनानायक था । इससे चौदह साल पूर्व अर्थात् १४५५ ई० में कोंकण प्रदेश में शत्रुओं ने बहमनी बादशाह की फौज पर विजय प्राप्त की थी, जिसके कारण से वे अत्यन्त मदोद्धत हो गये थे । इस बीच में बहमनी राज्य की सेनाओं को मालवे के सूबेदार से लड़ते रहने के कारण १४५. ई० की पराजय का बदला लेने का अवसर न मिला था, और बहमनी राज्य को इस मध्यमें शत्रुओं द्वारा अनेक हानियाँ हो चुकी थीं। कोंकणवासी शत्रुओंन वाई परगने के कुछ भाग को फिर ले लिया था, लेकिन जैसेही आक्रमण करने का उचित . अवसर आया बहमनी बादशाहोंका प्रसिद्ध .तथा अनुभवी आक्रमण. .

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (११) मन्त्री मुहम्मद गवन स्वयं इन बलवाइयों के विरुद्ध भेजा गया। प्रायः ऐसा होता था कि मुसल्मानी सेनायें वर्षाऋतुके बाद कोंकण पर आक्रमण किया करती थीं और शत्रुओं को हराकर उन्हें वशमें कर लेती थीं, किन्तु फिर वर्षाके आरंभ होते ही नदियों में बाढ़ आजा- ने के कारण इन पहाड़ी प्रदेशों में वे बडी २ सेनायें अपने लिये भोजन तथा लड़ाई का सामान नहीं पा सकती थीं। इसके सिवाय वहाँ के निवासियोंके पास भी खाने पीने की सामग्री पर्याप्त नहीं होती थी। ऐसी दशामें इत- नी बड़ी सेना के लिये उन खेती रहित पहाड़ों में भोजनका सामान पाना विल्कुल असम्भव था । इन विशेषताओं के कारण पहाड़ी जातियाँ बादशाही फौज का सामना कर उस से लड़ सकती थीं और फिर वर्षा ऋतु में अपने खेतीके काम में लग जाती थीं। 'घोरपडे पदवी की १४६९ ई. में बादशाही फौजों ने शत्रुकी से- प्राप्ति. ना को अन्तिमवार घेरा था।वर्षाऋतु बिल्कुल पास ही थी । यदिघेरा उठा लिया जाता, तो बादशाही फौज को शुरूसे लेकर सारा काम फिर करना पड़ता, इस लिये कर्णसिंह और भीमसिंह ने निश्चय किया कि किसी न किसी छल या अन्य, उपायसे वर्षाऋतु के आनेसे पूर्व ही शत्रुओं को जीतना और किले को वशमें कर लेना चाहिये । एक रातको उन्होंने एक गोह (एक जानवर जिसे मराठी में घोरपड

(१२) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
कहते हैं ) की कमरसे रस्ती बांधी और कुछेक
चुने हुए आदमियों के साथ उसे किले की
दीवाल को पास ले गये। उन्होंने उस गोह की
गर्दन से एक नली बाँध दी जिससे वह सामने
ही देख सके और सीधीही चढ़ सके इसी प्रकार
उन्होंने तीन चार गोहें लगादी-जिनमें से एक
किले की दीवाल पर कुछ दूरी तक चढ़ गई
और उसकी देह से बँधी हुई रस्सी को पकड़
कर एक आदमी वहाँ तक पहुँच गया । फिर
उसके पीछे दूसरी गोह लगाई गयी, जिसकी
सहायतासे वह आदमी और भी ऊपर पहुँच
गया।इस प्रकार किले की दीवाल का अन्त
पा लिया गया । फिर दीवालके ऊपर से
रस्सी की सीढी बांध दी गई और उसके
सहारे बहुत से आदमी किले की दीवाल पर
पहुंच गये उन्होंने मुख्य द्वार के पहरेवालों
पर आक्रमण कर उन्हें मार दिया और
फाटक खोल दिये । शत्रुओं ने सोचा था
कि किले की सीधी दीवाल पर चढ़ना बि-
ल्कुल असम्भव है, इसलिये वे अचानक ही
पकड़े गये और घेरनेवालों ने अपने आक्रमण
कर्णसिंह की को सफलतापूर्वक पूरा किया। इसी बमसान
मृत्यु. युद्ध में कर्णसिंह बुरीतरह घायल हुआ और
अपने बादशाह की सेवा करते हुए मारा गया।
जैसा कि पहिले तै होचुका था फाटकों के
खुलते ही घेरनेवाली सेना किले में घुस गई
और किले को वश में कर लिया। इस प्रकार

. मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (१३) वीरतापूर्वक किला जीतने के उपलक्ष्य में वाद- शाह ने प्रधान सेनानायक मुहम्मद गवन को अनेक सम्मानों से विभूषित किया और भीम- भीमसिंह सिंह को 'राजा घोरपडेबहादुर' का विशेष प्रथम् घोर- खिताब दिया और साथ ही उसे तीन हजार पड़े. घुडसवारों का नायक बना दिया। जब विजयी सेनापति मुहम्मद गवन और भीमसिंह राजधानी को वापिस आये वाद- शाह न स्वयं उन्हें सम्मान के वस्त्र दिये । उसी स्मरणीय समय से लेकर भीमसिंह के वंश 'राणा' से ने अपने नाम के साथ 'राणा' के स्थान पर 'राजा'होना 'राजा'शब्द जोडना प्रारंभ किया और इस घ- टना के बाद वे 'घोरपडे का उपयोग अपने उप. नाम की भाँति करने लगे । शुभकृष्ण के वंशज अपने को भोसले ही कहते रहे। वे मिरतप्रान्त की अपनी जागीर में रहते थे और बादशाह के सरदारों की तरह उसकी सेवा करते रहे । उस शाखाने अपने आपको सन १४७० ईमें विशेष रूप से चमकाया। कुछेक झगडों को करने के विचार से कुछ बहमनीयों कालतक अपनी जागीर में रहकर भीमसिंह की अवनति. राजधानी को लौट गया तहाँपर एकप्रकार का विक्षोभ सा फैला हुआ था। रियासत में दो मुख्य दल थे-एक परदेशियोंका तथा दुसरा दक्षिणियोंका । इन आन्तरिक झगड़े बखेड़ों के कारण बादशाह को इतना उत्तेजित होना पड़ा कि उसने अपने भक्त राजनीतिज्ञ तथा (१४) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास। योद्धा. मुहम्मदगवन को १४८१ ई. में कल करा दिया । मुहम्मदगवन की मृत्यु से राज्य को केवल एक बहुत बड़ा नुकसान ही नहीं हुआ परन्तु उसके बाद राज्यमें अनेक आन्त- रिक झगड़े खड़े होगये और अन्त में बहमनी राज्य का ही अन्त होगया । यूसुफआदि. इससे पूर्व १४८२--८३ई० में गोआ के विरुद्ध लखां की एक महान आक्रमण किया गया इसी कार्यके उन्नति. लिये यूसुफ आदिलखाँ बेलगांव से भेजा गया और विजयनगर की सेना ने भी इस घटना- पूर्ण अवसर पर गोआके लिये प्रस्थान किया। इस आक्रमण के समय भीमसिंह ने विशेष बहादुरी दिखाई । सारी फौज सन् १४८९ ई० में राजधानी को लौटी पर राजधानी में आन्तरिक मत भेद के कारण दक्षिणी सेना ने, जो कि राजधानी में थी लौटती हुई सेना पर आकमण किया। सारा काम बिगड़ गया होता, यदि लौटी हुई फौज दक्षिणी सेना को परास्त करने में सफल न होती। इसके बाद आदिलखान और उसकी सेना अपने साथियों समेत अपनी २ जागीरोको लौट गये।

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ! (१५) तृतीय अध्याय. बीजापुर के आदिलशाहों की नौकरी. इस घटनापूर्ण अवसर पर अलीयूसुफ आदिलशाह ने अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर बीजापुर में जो कि उसकी जागीर के शहरोंमें एक था स्वतन्त्र राज्य स्थापित किया। रिया- सत के मामलोंके प्रबन्ध के लिये मुहम्मद गवन जैसे नीतिज्ञपुरुषों का पाना बहुत कठिन है किन्तु उसका तो उपरि लिखित अनुसार खून कर दिया गया था और इम प्रकार वह राज्य की सेवा से जाता रहा । यूसुफ आदिलशाहने जिसे मुहम्मद गवन अपने पुत्र सम मानकर प्यार करता था, सोचा कि शायद उसे भी मुहम्मद गवन के मार्ग का अनुसरण करना पड़े और परिणाम स्वरूप उसे एक स्वतन्त्र राज्य स्थापित करना पड़ा घोरपड़ों का खानदान भी जो आदिल- खानसे प्रेम के भाव से जुड़ा हुआ था बहमनी दरवार से अलग होगया और उसके बाद वे लोग बीजापुर के आदिलशाह के सूबेदार हो गये बहमनी दरबार से अलग हो जाने का एक और भी कारण था- घोरपड़ा वंश और मुहम्मद गवन के बीच घनिष्ठ प्रेम का सम्बन्ध था और उसके द्वारा वे आदिलखान से भी सम्बन्धित होगये थे । बेलगाँव और

(१६) मुंधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
गोआ के विरुद्ध आक्रमणों के समय घोरपड़े
भीमसिंह लोग यूसुफ आदिलखान से कन्धे से कन्धा
का पुत्र मिलाकर लड़े थे। अपने सामान्य राजा को
खेलोजी
बचाने के लिये उन दोनों ने रक्त बहाया था ।
यूसुफ आदिलशाह ने इस लम्बी मित्रता को
खूब याद रक्खा और जब वह बीजापुरका
बादशाह होगया उसने भीमसिंह के पुत्र खेलो.
जी को बुलाया। उसने खेलोजी के वंश की
बह्मनी बादशाहों से प्राप्त कर्नाटक और
वाई प्रान्त की जागीरें जारी रक्खीं। जैसा
कि आगे चलकर विदित होगा, इन घोरपड़ों
को आदिलशाह ने आवश्यक कार्य भार सौंपे
और इस प्रकार वे नवीन राज्य में उन्नति
ही करते चले गये।
जब ईसवी १४८५ में यूसुफ आदिलशाह ने
वीजापूरमें अपना राजवंश स्थापित किया,
उस समय उसके
राज्य में कोंकणके
थोड़ेसे भाग को छोड़कर भीमा और घटप्रभा
नदियोंके बीच का सारा भूमिभाग सम्मि-
लित था । गोमान्तक प्रान्त अभी तक
आधा जीता हुआ ही पडा था। अगली शता-
ब्दी में कोंकण और विजय नगर के राज्य
पूर्णतया जीत कर बीजापुर के राज्य में मिला
लिये गये।पीछे जाकर बीजापुर के प्रदेश लंका
तक फैल गये । इस विस्तार में मुख्य हिस्सा
घोरपड़े खानदान का था। भिन्न भिन्न समयों
पर घोरपड़ा वंशकी मिली हुई जागीरें उसके

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (१७) द्वारा भिन्न २ प्रान्तोंके जीते जानेको स्पष्टतया सूचित करती हैं। आगे हम देखेंगे कि घोरपड़ों ने आदिलशाह की किस प्रकार सहायता की। हम देख चुके हैं कि यूसुफ आदिलशाह- ने खेलोजी को बुलाया था और उनसे मित्रता करली थी । गोआके धावे से लौट कर ई० सन् १५१० (हि० सन् ९१६) में यूसुफ आदिल शाह मर गया । उसका नाबालिग लड़का इस्माइल आदिलशाह गद्दीपर बैठा और कमालखां ने राज्य के मामलो को देखना शुरू किया। इसके अनन्तर वीजापुर और अहमदनगर के कुछेक कुटिल नीतिमान पुरुषों ने राज्यों को अपने वशमें करने के लिये उस समय के बादशाहों को उनके सिहासनों से हटानेका प्रयत्न प्रारम्भ किया । अहमद- नगर में अमीर बरीद अपने स्वामी निजाम- शाह को कैद करने में सफल हुआ । यहां वीजापुर में कमालखाँ ने जवान इस्माईल और उसकी माँ को कैद कर एक बड़ी फौज के साथ शोलापुर की ओर प्रस्थान किया । अहमदनगर से समयोपयोगी सहायता न आ सकने के कारण शोलापुर का किला कमालखां के हाथ लग गया और कमालखां विजयी होकर बीजापुर वापिस आया । उसने युवा इस्माईल के नाम से एक शानदार दर- बार किया परन्तु साथ ही बादशाह को मरवाने या राज्यच्युत करनेका प्रयत्न करता २ (१८) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास रहा । पांच हजार मजबूत शरीर रक्षकों को उसने वर्खास्त कर दिया और बीजापुर की नौकरीमें जो विदेशी सेना. थी । उसे भी हमेशा के लिये तोड़ दिया । पर कमालखां एक दास के द्वारा जिसे इस्माईलकी माँ ने इस कामके लिये नियुक्त किया था मारा गया। इस प्रकार कमालखाँकी नीति शुरूमें ही विफल हुई किन्तु फिरभी महल में रहने वाले कमालखांके आदमी बादशाह के खून करनके प्रयत्नमें लगे रहे और उसके बाहिर बादशाह के अनुयायी सैनिकों तथा कमालखाँ के दक्षिणी पुरुषों में लड़ाइयाँ होती रहीं । अन्तमें कमालखां के आदमियों की हार हुई और उन्हें कार्यक्षेत्र छोड़कर भाग जाना पड़ा। इन घटनाओं के पीछे इस्माईल वास्तविक राजा हो गया और उसने अपने उन सब अतु- यायियों को जिन्होंने उसकी. सहायता की थी सम्मानित किया। निजामशाह के मन्त्री अमीरबरीद ने अन्य दक्षिणी मुसल्मान राज- कुलों को मिलाकर १५१४ ई० (हि० सन्९२०) मैं वीजापुर के विरुद्ध प्रयाण किया। इस्माईल ने जो यद्यपि अभी जवान ही था, पहिले शत्रु की सेना को विना किसी रुकावट के बीजापुर तक चला आने दिया और फिर वह बारह हजार चुने हुए घुड़सवारों के साथ शत्रुके विरुद्ध चल पड़ा; शत्रुकी पूरी हार हुई । इस लड़ाई में यह बात ध्यान देने योग्य मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (१९) है कि बीजापुर की सेनामें सब परदेशी सिपाही ही थे क्योंकि कमालखां के वलवे के बाद वाद- शाह ने दक्षिणी या सिद्दी सेनाओं को नौकरी में न रखनेका निश्चय कर लिया था अमीर खेलोजी का वरीद के साथ की इस लड़ाई में खेलोजी मारा जाना. घोरपड़े मारा गया। महलोजी. बादशाहने उनके प्रति जिन्होंने उसकी सहायता की थी-कृतज्ञता प्रकाशित करी और खेलोजी का पुत्र महलोजी अपने वीर पिताके स्थान पर नियुक्त किया गया । ईसवी सन् १५२० (हि. ९२७ ) में बादशाह ने विजय- नगर के विरुद्ध प्रयाण किया । जब कि अभी बीजापुर की सेना का तंबू कृष्णानदीके इसी ओर था बादशाह कुछेक अनुयायिओं के साथ नदी की दूसरी ओर चला गया और वहाँ अपने आपको एक बड़ी शत्रु सेनासे आक्रान्त देख कर अचम्भेमें पड़ गया। उस समय जो साथ थे उन्होंने अन्ततक लड़ाई की किन्तु शत्रुकी महती सेनाके सामने वे कुछ न कर सके । पीछे से सहायता मिलने की भी कोई आशा न थी । इस संकटमें बादशाह कुछ विजयनगर कैसमीपमह- एक आदमियों के साथ लौट आया और ला- लोजी द्वारा टते समय शत्रुओं के साथ लड़ती हुई अपनी सेना से बचा लिया गया । बादशाह का हाथी सुरक्षित दशामें नदी की दूसरी ओर पहुंच गया इस लड़ाई के अवसर पर महलो इस्मायलका वचाया जाना.

(२०) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । जी की वीरता प्रदर्शित हुई । लड़ाई से सुर- क्षित लौट आने पर बादशाह ने अनुग्रह की दृष्टि से महलोजी को बहुत सम्मानित किया। महलोजी ने जो कुछ भी मांगा बादशाह ने उसके देनेमें तत्परता दिखाई और महलोजी ने उसके बदले में घोरपड़े वंशपर अपना प्रेम और अनुग्रह कम न होने देने की बादशाहसे विनम्र प्रार्थना की । महलोजी ने कहा कि इस बातसे कि जो उनके वंश के आदी निश्चित रीति से बादशाह के आगे कुनिसात से सिर नहीं झुकाते, उससे उन्हें सन्देह न करना रिहाई. . चाहिये और साथ ही उन्हें उनकी राजभक्ति में भी शंका न करना चाहिये क्योंकि वह और उसका खानदान अपने स्वामी के लिये अपनी जान देने के लिये हमेशा तयार रहते हैं। इसके पश्चात् बादशाह ने इस वंश के सरदारों को दो मोरचल प्रयोग करने का सम्मान दिया और इसके सिवाय उनको बादशाहके लिये निश्चित प्रथाके अनुसार प्रणाम करने ( कुर्नि- सात ) से मुक्त कर दिया । ईसवी सन् १५३१, ३२ (हि० ९५८, ५९ ) में जब कि बीजापुर के बादशाह निजामशाहों से लड़ रहे थे महलोजी और उसके पुत्र अखय- सिंह ने इस लड़ाई में एक विशेष भाग लिया। यह युद्ध परदेशियों का युद्ध कहाया गया क्योंकि इसमें परदेशी सेनायें बहुत कामकी निकली।इसके पीछे बीजापुर दरबारमें दक्षिणी मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ! और परदेशी शिया और सुन्नी हिन्दू और मुसलमान आदि अनेक दल हो गये । घोर- पड़े वश ने अपने आपको इस दलवन्दी से पृथक रक्खा । अखयसिंह. असतखान के मंत्रित्व काल में अखयसिंह और उसके दोनों लड़के अपनी जागीर में वहां की सुख और शान्ति स्थापनके लिये रहते रहे। असतखान १५४८ ईसवीमें मर गया। करण- सिंह और भीमसिंह को वीजापुर के बादशाह ने १५६५ वाली तालीकोट की मशहूर लड़ाई में काम करने के लिये बुलाया। घोरपड़े लोगों करणसिंह. ने करणसिंह और उसके पुत्र चोलराज तथा भीमसिंहके साथ तालीकोटकी लड़ाई में विशेष भाग लिया।करणसिंह इस लड़ाई में मारागया; चोलराज. परन्तु बादशाह ने उसके पुत्र चोलराज को सात हजार घुडसवारों का सरदार बना दिया और रायचूर के पास दो नदियों के बीच की कुछ भूमिके साथ तोरगल का प्रान्त दिया। उस समय मुधोल की जागीर में रामनगर नाम का एक परगणा(महाल)था बोलराज ने उसका नाम बदल कर चोलराज पत्तन रख दिया । क्योंकि पहिला नाम उसके शत्रुके नाम पर था। बिजयनगर राज्य के नाश के अनन्तर बीजा- पुर की सेनाओं को कर्नाटक जीतने का अच्छा मौका मिला । बीजापुर के बादशाहोंने इस स्थिति से लाभ उठाया और एक के बाद एक प्रान्तको वश में कर लिया। इसके कुछ समय (२३) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । बाद गोआ के विरुद्ध एक धावा भेजा गया और अंकुशखान विजयनगर के आस पास के लुटेरे सरदारों को जीतने के लिये नियुक्त किया गया। अंकुशखान लगातार अपने प्रयत्न में लगा रहा और उसने शत्रुके एक खास स्थान को वशमें कर लिया। उसके बाद बंकापुर पर आक्रमण किया गया और तत्पश्चात् शिराके विरुद्ध भी एक धावा बोल दिया गया। इस धावे में चोलराज और उसका चाचा भीम- सिंह बहुत कामके निकले । बकापुर के घेरेमें हि. ९८२-८३ में भीमसिंह मारा गया। शिराका धावा भी सफल हुआ क्योंकि उस स्थानके लुटेरे सरदार ने संधिके लिये प्रार्थना की । तब बीजापुर की सेनाओं ने दक्षिण के लिये चोलराजको प्रस्थान किया । चोलराज ने इन प्रान्तोंमें विजयनगर और शिरा- शान्ति स्थापन करने में अमूल्य सहायता दी । प्रान्तमें जः- इसके बदले में चोलराज को अपनी सेनाके गीरमिलना. खर्च के लिये विजयनगर प्रान्तमें छब्बीस और शिराके उत्तर में चालीस गांव मिले। सन् १५७८ चोलराजकी ईसवी (हि. ९८६)में चोलराज एक लड़ाई में मृत्यु. मारा गया,जब कि वह विजयनगरके आसपास एक बलवेको शान्त करने में लगा हुआ था। उसके बाद उसका ओहदा तथा पद उसके चोलराजके पुत्रों को मिला। चोलराज सात हजार घुडस- वारोंके ऊपर था।उसके तीनों लड़के पिलाजी, बल्लमसिंह और कनोजी अपनी सेनाओं समेत कर्नाटककी फौजसे जा मिले। कर्नाटक प्रान्त पुत्र.

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास। (२३) के अतिरिक्त और किसी बातमें हमें चोलराज के पुत्रों का वर्णन नहीं मिलता । उन्होंने मंजनखानके आधिपत्य में १५९३ ई. में शिरा और मैसर प्रान्त के थानोंके जीतने में अपनी वीरता सिद्ध की । कीन्हीं कारणों से आक्रमण बीच में ही छोड़ देना पड़ा और बलवाई लु- टेरे सरदार बादशाही पलटन को हराकर भगाने में सफल हुए ( ई० १५९५ हि.१००५) यह देखकर कि सम्पूर्ण बादशाही सेना और प्रान्तोंमें लगी हुई है इन लुटेरों ने अदोनी प्रान्त में वहां के मुख्य थाने को जा घेरा । उस समय घोरपड़ों की अदोनी प्रान्त की सारी जागीर अयति गुत्ती-के पास का सारा भाग शत्रुके हाथ में चला गया था। यह सुनकर कि बादशाही फौजें लौट रही हैं लुटेरोंने घेरा हटा लिया और अपने देशों को भाग गये । पिलाजी, बल्लमसिंह और कनोजी उन्हें भगाने में सबसे आगे थे और इस प्रकार उन्होंने अपनी जागीर को वापिस ले लिया । इसके पश्चात् बीजापुर के प्रदेश केवल दक्षिण की ओर ही बढ़ाये गये । निजामशाही के विरुद्ध लगातार मुगलों के हमले होते रहने के कारण इस राज्यकालमें निजामशाह और आदिल- शाहों के बीच हमेशा होनेवाली लड़ाइयाँ बहुत कम हुई और परिणाम यह हुआ कि जागीरदारों को अपनी जागीरों की ओर ध्यान देने का अवसर मिल गया।

(२४)
मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
चतुर्थ अध्याय।
वनाया
गया.
प्रतापसिंह।
पिलाजी की मृत्युके पश्चात् प्रतापराव को
प्रतापसिंह अपने पिता का सेनापतित्व (मनसव) मिला
अर्थसचिव
वह बहुत शीघ्र राजा का प्रेममात्र बन गया
और इब्राहीम आदिलशाह ने उसे आय विभा-
गमें एक बड़े पद पर प्रतिष्ठित कर दिया। प्रता-
पराव के पुत्रने अपने पिता का औहदा१६४५ई.
में प्राप्त किया और एक लम्बे काल तक आय
विभाग के प्रधान मन्त्री के पद पर काम किया।
मुगलों द्वारा प्रतापसिंह घोरपड़े ने मुगलों से लड़ाई लड़-
काआक- ने में बहुत वीरता दिखाई । मुगलों ने १६३६ई.
में निजामशाही के प्रदेशों को जीत लिया
और बीजापुर के विरुद्ध आक्रमण किया। गोल.
कुण्डे का कुतुबशाह पहिले ही वश कर लिया
गया था परन्तु आदिलशाही प्रदेश मुगल
विजयता के लिये सीधी बात न थी । उसने
देखा कि उसके जीतने के लिये उसे जान और
माल का ख्याल छोड़ कर लड़ाई पर लड़ाई
लड़नी पड़ी । मुगलों ने सेना को तीन भागों में
विभक्त कर बीजापुर को तीन ओर से आक्रान्त
किया। मुगलों के इस आक्रमण के समय प्रता-
पसिंह और उसका पुत्र वाजीराजा बीजापुर
की ओर से लड़ रहे थे।अपने पास केवल थोड़ी
मण.

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (२५.) सी फौज होने से मुगल सेनाओं के साथ उन्हें छिप छिप कर लड़ना पड़ा । मुगल पलटने बीजापुर के पास तक पहुँच गई थीं पर बीजा- पुर की सेना ने नहरें खोद कर उनका आगे बढ़ना रोक दिया। ऐसे संकट के समय पर सन्धि घोषित कर दी गई और दोनों बादशाहों ने लड़ाई रोक दी । सन्धि में यह त हुआ कि बीजापुर की पलटनों को शहाजी की सेना के लुटेरे झुण्डों को गिरफतार करने में मुगल फौज की सहायता करनी होगी । प्रतापसिंह और उसका पुत्र बाजीराजा रणदुल्लाखां के साथ इस कार्य के लिये निश्चय किये गये। इन तीनों सेनानायकों की सेनाओं ने जुन्नर और शिव- नेरी समेत कई किलों को घेरलिया और लुटेरों को सब तरफ से दबा दिया। उन्हें सन्धिकी प्रा- शिवाजी र्थना करने के लिये बाधित होना पड़ा और इस भोसला का बीजापुर में प्रकार निजामशाह मुगल बादशाह को सौंप नौकर दिया गया । शहाजाने बीजापुर के बादशाहों होना. के यहाँ नौकरी कर ली और मुरारपंत के प्रभाव के द्वारा धीरे २ बीजापुर दरवार में बढ़ने लगा। ईसवी सन् १६३७-३८ में शहाजाने रावराजा जागीरका विभक्त प्रतापसिंह घोरपड़े बहादुर के प्रदेशों में हिस्सा होना. लेनेका बीजापुर दरवारमें प्रयत्न आरम्भ किया। उसने प्रतापराव राजा के चचेरे भाई बहिरजी को भी प्रतापसिंह घोरपड़े की जागीरमें हिस्सा लेने को बीजापुर दरवारमें शिकायत करने के

(२६.)
मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
लिये उकसाया। शहाजी भोंसला को इतनी
सफलता हुई कि वह पूना और सुपा प्रान्त
को जो उसे अहमदनगर के निजामशाहों से
जागीरकी तौरपर मिले थे रख सका और
जागीरका एक भाग प्रतापराव राजा के बन्धु-
ओंको दो हजार सिपाहियों के ' खर्चे के
लिये मिल गया।
इन बन्धुओं के बीच में पारस्परिक झगड़ा
शान्त करने के लिये बादशाहने उनके वंशा
गत अधिकारोंमें एक दूसरसे परिवर्तन कराया
किन्तु यह आपसका परिवर्तन मित्रता का
संबन्ध स्थापित करने में कभी सफल न हुआ।
इसी समय की बात है कि दक्षिणके लुटेरे
सरदार और चन्द्रगिरी में राज्य करनेवाले
विजयनगरके राजाओं के वंशज बुरीतरहसे
खदेडे और तंग किये जारहे थे। कुतुबशाह की
फौज इस प्रान्तमें पूर्व तथा दक्षिण की ओर से
बढ़ने का प्रयत्न ही कर रही थी कि बीजापुर
की सेना आगे बढ गई और इस प्रकार बीजापुर
का प्रदेश बढ़ाने में सफल हुई । बीजापुर के
सरदारों की पलटने सारे राज्य में इधर से
उधर तक फैल गई। रणदुल्लाखान प्रधान सेना-
नायक था और बाजाराजा घोरपड़े अपने
सेना-विभाग के साथ उसके नीचे नौकरी कर
रहा था । चन्द्रगिरीके राजाओं के विरुद्ध
इस आक्रमण में श्रीरङ्गरायका बहुत सा प्रान्त
बीजापुर के बादशाहों के हाथ लग गया। इसी

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
(२७)
समय १६४५ ई. में रावराजा प्रतापसिंह वाई
प्रान्त की अपनी जागीरमें परलोक सिधारे।इस
बहादुर घोरपड़े की मृत्युके बारेमें एक कहानी
है-जब वह वाई प्रान्त की अपनी जागीरमें
था, एक बार मृगयाके समय अकेले में कुछ
पुरुषोंसे आक्रान्त किया गया । वह उनके
साथ लड़ा और एकाकी होते हुए भी उसने
अपने कई दुश्मनों को मार दिया, पर एक
गोलीने उसे बुरी तरह घायल कर दिया और
जब कि वह अपने आदमियों द्वारा वाई की
ओर ले जाया रहा था, रास्ते में मर गया।
शिलेवाड़ी में उसकी समाधि बनी हुई है ।
वह नहूजी नाम से भी पुकारा जाता था और
किसी २ जगह उसके लिये नवजी नाम भी
पाया जाता है
पञ्चम अध्याय।
दक्षिण की
लड़ाइयां
बाजीराजा घोरपड़े।
प्रतापसिंह के बाद उसका पुत्र बाजीराजा
अपने पिता की जागीर और नौकरी का काम
करने लगा। उसके चचेरे भाई अम्बाजी और
मानसिंह कर्नाटक में थे । कुछ समय बाद ही
१६४६ ई. में मुस्तफाखान बीजापुर की उन
पलटनों का जो कर्नाटक में अपना राज्य
बढ़ाने गई थी प्रधान सेनापति बनाया गया।
बाजीराजा को इस धावे में विशेष तौर पर

(२८) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । भेजा गया था और शाहजी भौंसला भी अपने तीन हजार सिपाहियों के विभाग के साथ इस धावे के साथ था। अन्तूरमें एक घटनापूर्ण और सनी लड़ाई लड़ी गई जिसमें शत्रुओं की हार हुई । शत्रुओं का प्रधान सेनापति प्रसिद्ध वेलूवर राज था। मलिकरायन ने भी लड़ाई में अपना जोर लगाया। बाजीराजा घोरपड़े की सेनाने लड़ाई में अपना हिस्सा प्रशंसित रीति से पूरा किया । मानसिंहजी ने रणभूमि पर ही अपने प्राण छोड़ दिये । बीजापूर की विजयी सेना ने अपने सामने से शत्रु को भगा दिया और पूर्वीय समुद्रकी ओर उसका पीछा किया। जिंजीका बीजापुरकी सेनाओं ने रास्ते में वेलूर ले किला. लिया और जिंजीकी ओर बढी । और उन्हों ने इस किले को घेर लिया तथा लगातार अपना कार्य करती रही । यद्यपि घेरा डाले हुई कई मास हो गये उसे जीतने के कोई असार न दिखाई दिये । सब सेनापतियों को सन्देह होने लगा कि सम्भवतः घिरी हुई सेनायें बाहिर से सहायता पा रही उन्हों ने बाहिर से शत्रुको सहायता पहुँचाने वाले आदमियों का पता लगाने के लिये गुप्त शाहजीका चर' नियत कर दिये। पीछे से पता चला कि धोखा देना. घिरे हुए शत्रु शाहाजी भौंसले के शिबिर से सामग्री पा रहे थे । बीजापुर के ब्राह्मण राज- नीतिज्ञ शाहुजी राजा भौंसला के द्वारा शत्रुको मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (२९) सहायता देने लगे । जीता हुआ प्रदेश बहुत लम्बा चौड़ा था और बीजापुर की फौजे सारे कर्नाटक में फैली हुई थीं । कार्यक्षेत्र में नई सेना लाने के लिये बहुत देर हो जाने का डर था और दूसरी और यदि घेरा उठा लिया जाता तो शत्रुको सफलता हो जाती । इस स्थिति में प्रधान सेनानायक मुस्तफाखान ने अपने को बड़ी कठिनाइयों में घिरा पाया । उधर शाह- जी राजा भी लापरवा ही दिखाने लगा और स्वतन्त्रता से कार्य करने लगा । जैसे ही उसे पता लगा कि उसपर सन्देह किया जा रहा है और नई सेना बुलाई गई हैं शाहजी विना पूछे ही तथा अपने प्रधान सेनापति की आज्ञा लिये विना ही घेरा छोड़ कर चला गया और यह बहाना किया कि उसकी सेना बहुत दिनों से बरावर काममें लगी हुई है और उसके शिविरमें भोजनादि की बड़ी महंगी होगई है। वाजी राजा यह साफतौर पर पता लग गया कि शाहजी जी की गि- शत्रुओं से मिलने को तैयार था और उपद्रव रफ्तारी. खड़े कर रहा था। प्रधान सेनापति ने युद्ध- समिति की बैठक बुलाई और एकत्रित हुए सेनानायकोंसे शाहजी राजा को पकड़ने का वैयक्तिक उत्तरदायित्व लेने को कहा । उस समय यह प्रथा थी कि सभाके सामने सुपारी और पान रख दिये जाते थे और वह पुरुष द्रारा शाह (३०) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । जो कि खतरनाक कार्य को पूरा करने के लिये तैयार होता था उन्हें उठा लेता था। शाहजी को गिरफतार करने के लिये सभा में कोई भी आदमी आगे न बढ़ा और अन्त में बाजीराजा और उसके चचेरे भाई अम्बाजी राजा ने इस काम को अपने हाथ में लिया । शाहजी की सेना से खाली की गई घेरे की जगह को उन्होंने भर दिया और वे दो हजार चुने हुए घुड़सवारों के साथ शाहजी की सेना को ढूंढ़ ने निकले । प्रातःकाल के समीप उन्होंने शाहजी की सेना को देखा जो कि पीछा करनेवालों की फौज को देखते ही डर गई और भागने लगी। इसी गड़बड़ में शाहजी सुरक्षित ही भग गया । बाजीराजा ने शि- बिर का प्रबन्ध अम्बाजी और यशवन्तराव असदखान को सौंपा और स्वयं कुछेक चुने घुड़सवारों को साथ लेकर शाहजी का पीछा किया। अन्ततः उसने शाहजी को गिरफतार कर मुस्तफाखान को सौंप दिया । इस पीछा करने के बीचमें शाहजी के एक हजार आदमी Busatin मारे गये । बाजीराजा के इस काम से बाद- Persian शाह बहुत प्रसन्न हुआ। विना किसी लूट लाट family के ही शाहजीका सारा सामान बाद: Cletters शाही सेना के हाथ लग गया । इसके बाद शाहजी कैदी की तरह उसके सारे सामान के साथ बीजापुर भेज दिया गया । इस प्रकार भागनेका बहाना कर रातके समय Salatin & मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (३१) बादशाही फौज पर धावा करने की तदवीर को पूरा करने में शाहजी असफल रहा। थोड़ेही काल बाद किला और लम्बी चौड़ी भूमि बीजापुर के बादशाहों के कब्जे में आगई । कर्नाटक का धावा मुहम्मद आदिल. शाह की मृत्यु तक जारी रहा । बादशाह की मृत्यु पर सारे सेनापति कर्नाटक से वापिस लौट आये । इसी बीचमें मुगल बादशाह शाहजहां ने औरंगजेब और मीरजुमलाके नेतृत्व में बीजापुर को जीतने के लिये एक महती सेना भेजी। बीजापुर बीजापुर का दरबार अपने सरदारों के बीच दरवारकी एकता का घमण्ड नहीं कर सकता था।वडे२से- स्थिति. नापति एक दूसरे से वैर रखते थे,प्रत्येक जागी- रदार अपनी जागीर का सुप्रबन्ध करने में लगा हुआ था।जब कि सेनायें दक्षिण में गई हुई थीं तब उन जागीरदारों की जागीरों के झगड़े जो कि लड़ाई को गये हुए थे उन सूबेदारोंसे ते किये जाते थे जिनके कि सूबेमें वे जागीरें स्थित थीं। किन्तु यह देखकर कि सूबेदार लोग मनमाना काम करते थे और जागीरों के नुक- सान का भी ध्यान न रखते थे जागीरदारों ने अपनी आधी २ सेनायें अपनी २ जागीरमें रखने का निश्चय किया परिणाम यह हुआ कि लड़ाई के मैदान में सेना की कमी हो गई। घोरपड़ों की तरह बहुत थोड़े सेनापति थे जो अपनी सेना की पूरी शक्ति के साथ लड़ाई के आक्रमण. (३२) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । मैदान में जाते थे । लुटेरों ने देखा कि फौजें बीजापुर लौट गई हैं और इस स्थिति से अपनी खोई हुई जमीनों को वापिस लेने का फायदा उठाया । शाहाजी भोंसला ऐसे कामोंमें सबसे बढ़कर था । मुगलों का प्रबन्ध की इस कमी के कारण बीजापुर की सेनायें मुगल फौजोंसे पूरी तरह न लड़ सकी। सरदारों की एक बड़ी संख्या गुप्तरीतिसे मुग़लों की सहायता करने लगी और बहुत से तो प्रकट रूप से ही मुग़लों की सेना में जा मिले ।इस छलयुक्त व्यवहार के कारण बीजापूर दरबार स्वाभाविक तथा ही सफल नहीं हो सकता था, मुग़ल सेना ने बेदर को घेरा और जीत लिया लेकिन इस सफलतामें मुगलों के बहुत से आदमी मारे गये । उन्हें किले में अगणित सम्पत्ति और बहुत सा लडाई का सामान मिला । फिर मुगलसेना गुलबर्गे की ओर बढ़ी और उसकी बीजा. पुर की सेनासे मुडभेड़.. हुई । गुलबर्गा कल्यानी के पास कई लड़ाईयां हुईं। मुगलोंने कल्यानी का घेरा, के किले की ओर प्रयाण किया और उसका घेरा डाल दिया । बीजापुर की सेना घिरे हुओंकी सहायता के विचार से धीरे २ कल्या- नीकी ओर बढ़ने लगी। एक दिन प्रातःकाल बाजीराजा और अम्बाजी राजा ने देखा कि एक राजपूत सेनापति मुगलसेनाके लिये अनाज लिये जा रहा था।उन्होंने उस सेनाओं .

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (३३) को भोजनसामग्री पहुँचाने वालों पर आक्र मण किया और सारी सेनाको गिरफदार कर ही लिया था कि औरंगजेब जो कि दक्षिण का सुवेदार था जल्दीसे उनकी सहायता के लिये आ पहुँचा । उसने उस समय के लिये घेरा उठा दिया और सारी फौज के साथ वा. जी राजा की सेना को आक्रान्त किया। उस संकट पूर्ण दिन में बाजी राजा के केवल १५०० घुडसवार वच रहे थे। मुगलों की बड़ी फौज के सामने बाजीराजा के घुड़सवारों की गि- नती कुछ भी नथी फिर भी छोटी सी सेना ने मुगल फौज का वीरतापूर्वक सामना किया और बहुतसे शत्रुओं को मार दिया। उस दिन अफजल खान की सेना ने सबसे अधिक वीरता दिखाई । हत्या-संग्राम सायंकाल तक रहा तब प्रधान सेनापति खान मुहम्मद ने लौटने की आज्ञा दी,इसके पश्चात् ही सन्धि की बातचीत होने लगी और उसके बाद कोई लड़ाई नहीं हुई। कल्यानी के घेरेमें मुगलों की बड़ी हानि हुई। उनके बहुत से प्रसिद्ध सेनापति युद्धक्षेत्रमें मारे गये । मुगल सूबेदार औरंगजेब ने युद्ध रोक दिया और शान्ति की घोषणा कर दी। शिवाजीका- जब कि विजापुरकी सेनायें इस लड़ाई में मुधोलकैबि लगी हुई थीं दक्षिणमें उपद्रव खडे हो गये। और बाजी-हि.१०७० में शिवाजी अफझुलखान के विरुद्ध राजाकावध. अपने उपाय में सफल हुआ और दक्षिणमें उ- रुद्ध प्रयाण ३ (३४) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । सका भाग्य चमक उठा । उसके विरुद्ध भेजा हुआ दूसरा आक्रमण भी शिवाजी ने अस- फल कर दिया और उसने पन्हाले का किला ले लिया । शिवाजी को वश में करने के लिये बाजी राजा नियुक्त किया गया। बाजी राजा एक दिन मुधोल में ठहरनेके विचार से अकेला ही आगे चल दिया और सेनाको पछेि से आने को छोड़ दिया । शिवाजी जो कि बाजीराजा की हरकतों को ध्यान पूर्वक देख रहा था एक सेनाके साथ बीच रात में मुधोल के लिये चल पड़ा । किले के रक्षकोंने समझा कि यह सेना बीजापुर की फौजका अगला हिस्सा है और किले के फाटक खोल दिये । शिवाजी सीधा राजमहलकी ओर दौड़ा चला गया। उसे महल के एक एक कोने का पता था; इस लिये वह अन्दर के उस कमरे तक चला गया जहां बाजीराजा घोरपड़े सो रहा था। उसने एकदम बाजीराजा के विरुद्ध तलवार खींच ली और उसे उसी समय वहीं मार दिया, यद्यपि अस्त्ररहित शत्रु को मारनेके लिये उसकी भर्त्सना की गई (हिजरी सन् १०७२ ) । इसके बाद बाजी- राजा की चारों रानियां और छे पुत्र अन्य सब पुरुष या स्त्री सम्बन्धियोंके साथ मार दिये गये और महलमें आग लगा दी गई । यह कार्य पूरा कर शिवाजी पन्हाले को लौट गया क्योंकि किले की सम्पूर्ण सेनाको भावी आ-

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
पत्ति का कुछ भी ज्ञान न था इस लिये आक्र.
मणकारी शत्रुके मार्ग में कोई विन्न न खडे
किये जा सके।
शिवाजी से लड़ने के लिये दूसरा सेना-
पति भेजने से पूर्व बहुत सा समय व्यर्थ गया।
बाजीराजाके बाद आक्रमण का नेतृत्व खवा-
खान को सौंपा गया । इसप्रकार शिवाजी
यदि पूरी तरह नहीं तो कुछ अंश तक वाजी
घोरपडे के वश को नष्ट करने में सफल हुआ ।
अली आदिलशाह ने वाजीराजा की स्त्री
और दो बच्चोंको जो उत्तरीय भारतमें धीरमें
रह रहे थे बुला भेजा-धीरमें वाजीराजा की
रानी का घर (मका ) था। अलीआदिलशा-
हने उन्हें अपनी रक्षामें ले लिया और उन्होंने
उनके पिता के सारे सम्मान और देश
दे दिये।

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । षष्ठ अध्याय **~ बाजीराजा का पुत्र मालोजी । बाजीराजा के दोनों पुत्र अर्थात् मालोजी तथा जयसिंह दक्षिणके इतिहास में प्रसिद्ध पुरुष हो गये हैं। दोनों भाई बालिग होने तक जब कि वे अपने पिता के मंत्रित्व के कामों को देखने लगे, बादशाह के पास रहे। क्योंकि उन्होंने अपने आपको बीजापुर फौज के सेना- पति की हैसियत में चमकाने में देर न की । वे अपने समय के आदिलशाहकि सरदारोंमें स- बसे प्रमुख समझे जाते थे। दोनों भाई बीजा- पुर की औरसे एकबार तो अकेली मुगलसेना से और फिर मुगल तथा शिवाजी की मिली हुई फौजोंसे लड़े । अली आदिलशाह बा- जीराजा की अनुपम राजभक्ति और उसके पुत्रों की वीरता को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और खुशी में उनकी सारी जागीर घो- रपड़ों के अलग राज्य में परिवर्तित कर देदी (हिजरी सन् १०८२)। फिर भी घोरपडे सात हजार घुड़सवारोंके सेनापति रहे आये जि. नके ज्यय के लिये उन्हें और प्रान्तों में जा- गीरे मिलीं। शिवाजी मिझाराजा जयसिंह द्वारा बीजापुर के से लड़ाई. प्रसिद्ध आक्रमण के समय मालोजी और शकरजी दोनों घोरपड़े भाई अपनी वीरता मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (३७) आक्रमण के कामों के लिये प्रसिद्ध हो गये । जब यह समाप्त हो गया, वीजापुर की फौजोंको शिवाजी जो, कि मुगलों के साथ मिल गया था,से लड़ना था । इस लड़ाई के अवसर पर बीजापुर का बादशाह स्वयं अपनी सेनाओं के आगे बढ़ा । बीजापुर की शङ्करजी फौज के कत्ल से कुछ समय के लिये शिवाजी की मृत्यु. दवा दिया गया । वनप्रान्त की जागीरमें शिवाजी के साथ एक खूनी लड़ाई हुई । तसगांव की लडाई में शङ्कर जी मारा गया इसतरह बीजापुर के विरुद्ध जयसिंह का आक्रमण निरर्थक कर दिया गया और आदि- लशाह राजघराने पर आई हुई आपत्ति दूर कर दी गई। जयसिंह के आक्रमण के बाद द्वितीय अली आदिलशाह के राज्यकाल मैं शिवाजी के प्रदेश बीजापुर सेना द्वारा सफलतापूर्वक आक्रान्त किये गये और वीजापुर के बादशाह के अधिकारमें इस तरह बहुत से विशेष स्थान आगये । अली आदिलशाह ने कर्नूल के शिदीको भी वश में कर लिया और इस प्रकार अपने राज्य को स्थिर.मजबूत तथा शानदार बना दिया । मुख्य मन्त्री अब्दुल अहमदने अपना काम राजभक्ति और ईमान- दारी के साथ किया। इससे यह आशा की जाने लगी कि बीजापुर का राज्य जो कि प्रायः नष्ट कर दिया गया था, फिर अपने पुराने ऐश्वर्य को प्राप्त करेगा।

(३८) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास। यह कहा जा चुका है कि शङ्करजी तसगांव के पास शिवाजी से लड़ते हुए ई० १६६६-६७ में मारे गये थे । मालोजी ने सेना का नेतृत्व अपने हाथ में लिया और राज्य के अनेक मुधोलराज्य कामों के मुख्य कर्ता हो गये। फिर जैसा कि और स्वतन्त्र पूर्व कहा जा चुका है, मालोजी की सेवाओंसे होना. खुश होकर बादशाह ने बहमनी राजाओं द्वारा पहले जागीर की तरह दिये हुए मुधोल के पांच परगनों को घोरपड़ों का स्वतन्त्र और अलग राज्य माने जाने की अनुमति दे दी। इसके बाद मुधोल के घोरपड़े अपने राज्य में सबसे बड़ी शक्ति हो गये और उसके लिये उन्हें और किसी के प्रति राजनिष्ठा रखने की आवश्यकता न रही। द्वितीय अली लेकिन दुर्भाग्य से अली आदिलशाह की की असाम- असामयिक मृत्यु के कारण बीजापुर के ऐश्वर्य के वापिस आने की आशा निर्मूल हो गई। बादशाह को अचानक ही लकवा मार गया, वह खाट में पड़ गया और उसके बचने की कोई आशा न रही । उसने अपने सरदारोंसे उसके बाद उसके युवा पुत्र सिकन्दर को राज गद्दीपर पर बैठाने को कहा । उस की मान- सिक शक्ति कम होने लगी और थोड़े दिन में ही वह मर गया। अली आदिलशाह के मन्त्री अब्दुलअहमद को अली की इच्छाओं को पूरा करना चाहिये था, लेकिन उसने उत्तरदायित्व लेने से मना किमृत्यु.

दरवार में
मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (३९)
बीजापुर कर दिया और इस लिये खवासखान ने
गड़बड़ी
अपना कन्धा लगाया । बहुत समय न बीत
पाया था कि दरवार में आन्तरिक कलहों के
कारण गड़बड़ मच गई । खवासखान ने अली
आदिलशाह के छोटे भृत्यों के साथ सलाह
कर ली और उनके द्वारा दरवार का
प्रवन्ध अपने वश में कर लिया । वडे २
प्रसिद्ध सेनापतियों को भी उनकी जागी.
रोंपर अधिकार न दिया गया । इन भी.
तरी झगड़ों के कारण सब जगह अशान्ति
फैली हुई थी । राज्य के शत्रुओं ने इस स्थिति
से लाभ उठाना चाहा । दिल्ली के बादशाह
आलमगीर ने अपने मुख्य सूबेदार खानजहान
बहादुर को वीजापुर जीतने के लिये भेजा ।
खवासखान ने सिकन्दरशाह की वहिन दिल्ली
के बादशाहके लड़के को व्याह देने की हामी
भरी । उसने शिवाजी से लड़ने के लिये
मुग़ल सेनाओं के साथ वीजापुर की फौज भी
भेजने की प्रतिज्ञा की । क्योंकि ये दोनों ही
प्रतिज्ञायें पूरी न की जा सकी, खानजहान ने
आन्तरिक कलहों से फायदा उठाया और
बीजापुर पर आक्रमण कर दिया । बीजापुर
के सेनापति बहलोलखानने बलपूर्वक आक्रमण
मालोजी को को रोका और मुग़ल सेनाओं को हरा दिया ।
को जागीर मालोजी ने इस आक्रमण के समय अपने को
मिली. विशेष तौर पर दिखाया और मानखेडा परगने
की जागीर प्राप्त की।

(४०) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । मुगलों के इस आक्रमण के बाद बीजापुर दरबार में अनेक घटनायें हो गई। शिवाजी राजा और गोलकुण्डे का बादशाह आबूहुसैन आपस में मिल गये । उन्होंने बीजापुर के प्रदेशों को वशमें करने के लिये मालोजी को अपनी ओर मिलाना चाहा । इस उद्देश्य से उन्होंने मालोजी को उनसे मिलने के लिये प्रोत्साहित किया और यहांतक कि उसे आधा राज्य देनेका वचन दिया । शिवाजी द्वारा लिखित एक पत्र और आबूहुसैन का दूसरा पत्र इस बात की पुष्टि करते हैं। वम्बई सरकार के मन्त्रि-विभागमें सुरक्षित रखे हुए चुने हुए पत्र, सन्देशे तथा अन्य सर- कारी कागजात की मि. जी डब्ल्यू फोरेस्ट की 'मरहट सीरीज' प्रथम जिल्द के पृष्ठ ६६६-६७ पर शिवाजी के पत्र का इस प्रकार वर्णन है- भोंसला घोरपड़े मुधोलके राजा । भोंसला वंश की इस शाखा का प्रथम प्रामाणिक वर्णन मालोजी घोरपड़े को लिखे गये। शिवाजी के पत्रमें है, जबकि वह (शिवा- जी ) गोलकुण्डाके बादशाहके साथ सम्बन्ध कर रहा था। यह लेख्य पत्र अन्य अनेक फारसीके कागजों के साथ गोविंदराव घोरपड़े के पास इसकी प्रामाणिकता के बारे में जब उसको उस समय के अन्य लेख पत्रोंसे मिलाया मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ! (४१) जाता है थोड़ी देर को भी सन्देह नहीं किया जा सकता । यह पत्र शिवाजी की ओर से हैं और उसमें उन सब भिन्न २ कारणों का वर्णन है जिनसे भोंसला और घोरपडोंमें चिरस्थायी वैर हो गया था और साथ ही मालोजीको सदातनी शत्रुता रखने की हानियां तथा बीजापुर के पठानमन्त्री (जिसने कियुवाराजा सिकन्दर को वश में कर रक्खा था,) का साथ छोड देने के लाभ दिखाते हुए उस वैर को शान्त करने पर जोर दिया है । इस समय शिवाजी ने मालोजी को एक वरावर का मानकर सम्बोधित किया है और वह ( मालोजी) अवश्य ही आदिलशाह के दर- बार के बड़े से बड़े सरदारों में से होगा । इस वंशने प्राचीन कालमें राजाका खिताब धारण किया है जो कि सम्भवतः बीजापुरके राजा- ओंने दिया था। साथ ही उसे यह भी अधि- कार प्राप्त थे कि इस वंशका मुखिया केवल मुजरा ( एक निश्चित प्रथासे राजाको प्रणाम करना ) करनेसे ही मुक्त न किया गया था अपितु राज के उत्सवों पर उसे चँवर डुलवाने का अधिकार भी प्राप्त था । वीजापुर लेकिन मालोजी उपरोक्त प्रलोभन का बहलोल- खान पठान शिकार न बना। इस कठिन समय में भी के कब्जे में. उसने अपने स्वामी की भक्तिपूर्वक सेवा करने की अपने वंश की पुरानी प्रथा को जारी रक्खा । इन दिनों में पठान सरदारों के भाग्य (१२) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । और उनकी सेनायें बढ़ी हुई थीं । दक्षिणी, राजपूत और कर्नाटकी सरदारों की कुछ पर- वाह न की जाती थी। पठान के विचित्र आचरण पर प्रायः सभी सरदार बुरा माने हुए थे और वे अत्यन्त शीघ्रता के साथ या तो शिवाजी की या मुगलों की सेना से जा मिले थे। कुछ अपनी २ जागीरों को चले गये और कार्य रहित होगये केवल मालोजी राजा घोर- पड़े मानिकजी और सर्जेराव ही अपने नम- कमें सच्चे निकले और अपने बादशाह की सेवा के लिये हमेशा तत्पर रहे । इस तरह बीजापुर राजवंश का पतन हो रहा था। कुछ समयके बाद अबुलहसन कुतुबशाह के बीच में पडनेपर पठान दबा दिये गये और बहलोलखान तथा उसके पठान अनुयायी अन्तमें बीजापुर के बाहिर भगा दिये गये । सिद्दी मसूद कुतुबशाह की ओर से मदना का भाई अकन्ना का मुख्य म- बीजापुर दरबार में राज्य के कामों में सहा- न्त्री होना. यता करने के लिये नियुक्त किया गया और सिद्दी मसूद ने मुख्य मन्त्री का पद स्वीकार किया । यह कहा जा सकता है कि सिद्दीमसूद बिल्कुल शक्तिहीन था क्योंकि बहलोलखान के अनुयायी पठान अब भी राज्यमें उत्पात मचा रहे थे। इस प्रकार उन्हें राज्यके मामले में विघ्न डालने का अवसर मिल गया। उन्होंने अपनी शत प्रस्तुत की और चाहा कि उनकी सारी पुरानी माँगें पूरी कर दी जाय । स्थिति 3 मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (५३) आक्रमण. के अनिश्चित होनेसे कोई भी कुछ नहीं कर सकता था।सेना कहाने लायक वहाँ कोई चीज न थी और सेना तैयार करने की कोई सम्भा- वना भी न थी। आखिरकार सिकन्दर आदिल- शाह की बहिन बादशाह बीवी औरंगजेब के पुत्रको अपने आपको समर्पित करने के लिये बलात् भेजी गई। मुगलों का मुग़ल फिर भी सन्तुष्ट न हुए और उन्होंने अपना आक्रमण नई तौर पर शुरू किया । मसूद ने शिवाजी से सहायता की याचना की उसने एकदम अपने सेनापति को बीजापुर की सहायता के लिये भेज दिया और स्वयं उसने अपनी बड़ी सेना के साथ लूट मार मचाते हुए मुग़ल प्रदेशों पर आक्रमण किया। इससे मुगल सेनापति दिलेरखान की तदवीर नष्ट हो गई। बीजापुर के घेरे को डाले रखकर उसकी सेना कुछ न कर सकी । आन्तरिक झगड़ों के कारण किले में कोई सेना न थी कुछ सेनायें जो कि सेनायें कही जा सकती घोरपड़ों का थीं मालोजी घोरपड़े की थीं । ये सेनायें जल्दी से बाहिर निकल आई और मुगलसेना पर दो तीन बार आक्रमण कर उसके बहुत से आदमी मार दिये । घोरपड़ा घुड़सवारों ने दिलेरखान का सागर तक पीछा किया और उसकी सेना तथा सहायकों पर आक्रमण किया । आगामी दो साल तक पूर्वापेक्षा अधिक शान्ति हो गई यद्यपि आन्तरिक काम.

(४४) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास। छोटे छोटे झगड़े कभी भी बन्द न हुए। शिवाजी मर चुके थे और उस ओर से कोई उपद्रव न था। कुछ काल बाद ही १६८२ ई, (हि० ) १०९४ में मुगलों का दूसरा आक्रमण शुरू हुआ। राजकुमार अजममुगल फौज का सेनापति था। उसने भूमि के बड़े बड़े भागों नष्ट भ्रष्ट कर दिये परन्तु किसी कारण से बीजापुर राजधानी पर आक्रमण न किया। गत तीन चार वर्षों में राज्य के दोषपूर्ण बुरे प्रबन्ध के कारण सरकार शक्तिहीन होगई थी औरङ्गजेब औरङ्गजेबने अपना आक्रमण १६८५ ई. में शुरू का अक्र- किया उसने लड़ाई का कोई बहाना ढूंढ़ मगं. निकाला और जीजापुर के प्रदेशों के आक्रमण के लिये अपने सेनायें भेज दी। बीजापुर की सेनाने दो तीन बार सफलतापूर्वक मुगल फौजों पर आक्रमण किया। इन हारों के होते हुए भी मुगल फौजें बिना रुकावट के आगे बढ़ती गई और अन्तमें स्वयं शहर के पर. कोटे तक पहुँच गई । यद्यपि किला घेर लिया गया था, फिर भी मालोजी राजा और अन्य सरदार किले को छोड़ और अपनी सेना को साथ ले सके और उन्होंने मुगलों पर आक्र- मण किया। वे दो बार मुगल फौजों की भोजन सामग्री लूट कर उनको तंग करने में सफल हुए । मुगललोग धीरे धीरे पर स्थिर रीति पर बढ रहे थे घिरा भी पूरी सावधानी से डाला गया था। घिरे हुए सरदारों के घोड़े मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (१५) खाद्य पदार्थों की कमी से मरने लगे और कुछ समय बाद एक भी बोड़ा न बचा । बीजापुरका कुछ आदमी बीजापुर को शत्रुओं को सौंप समर्पण. देने को सोचने लगे । सूरजखाँन ने बादशाह को वचन भेजा कि वे सब सरदारों की अनि- च्छा होने पर भी. अपने आपको शत्रुओं के समर्पण कर देंगे। इस प्रकार १६८६ ई. ( हि. १०९८ ) में बीजापुर का राज्य मुगलों के हाथ में चला गया। मुगलों ने उन सब सरदारों को जो कि समर्पण के समय उपस्थित थे अपनी नौकरी में ले लिया। उनके ओहदे उसीप्रकार रक्खे गये मालोजी राजा जब बीजापुर जीत कर घिरे हुए शहर से बाहिर चला गया था-उसे भी मुधोल से बुलाया गया और बड़े सम्मान के साथ उसका स्वागत किया गया । उसका प्रदेश और उसके सम्मान पद पूर्व की नाई प्रतिष्ठित रहे । मालोजी राजा को उन मर- हट्टा और लुटेरे सरदारों के विरुद्ध धावा बोलनेको भेजा गया । जो इस संकट- पूर्ण समय में दक्षिण की और उत्पात मचा रहे थे । उसने अपने पांच सात हजार घुड़सवारों को लेकर मुगल फौज के साथ आक्रमण किया मिली हुई सेनाओं ने प्रथम गोलकुण्डा की ओर प्रयाण किया । गोलकुण्डा के जीत लेने पर फौजों को दक्षिण की ओर बढ़ने की आज्ञा हुई जहाँ कि मरहट्टे लोग लूट मार मचा रहे थे । रुहेलखान ने अदोनी को घर (४६) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । लिया।दक्षिण की और कुर्मकुण्डा में मरहट्टोंकी एक बडी फौज़ ने जुलफिकरखान की सेना पर आक्रमण किया पर उसकी छोटी सेना ने मरहट्टों की बड़ी सेना को हरा दिया । प्रायः सारे ही दक्षिणी सरदार मुगल बादशाह की नौकरी में आगये। मुगल सेनापति जुलफिकर खानद्वारा डाले गये जिञ्जी के घेरे के समय मालोजी ने अपने सेनाभाग के साथ मुगलझण्डे के नीचे काम किया था। जुलफिकरखान के संदिग्ध वर्ताव को देखकर औरङ्गजेब सोचने लगा कि यह काम राजकीय वंश के किसी राजकुमार को सौंपना चाहिये और राजकुमार काम- बखश एक बड़ी सेना के साथ भेजा गया । मालोजी को जो कि जुलफिकरखान के ने- तृत्व में ही अपनी वीरता के कारण प्रसिद्ध हो गया था, रावदलपत बुंदेला, रावगोपाल- सिंह चन्दावत और सिद्दी सलीमखान के साथ यह काम सौंपा गया कि वह खजाने के साथ रहें और मुगल सेनाओं के भोजनादि की रक्षा करें। मुगल फौजों के उनके मुख्य स्थान को लौट जाने पर मुगल सूबेदार की आज्ञानुसार मालोजी मरहट्ठों के झुण्डों से किये जानेवाले नुकसान से मुगल प्रदेशों की रक्षा करने में लगा रहा। कुछ समय बाद मालोजी १७००ई० में मर गया और उसका पुत्र अखयजी उसका मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (४७) उत्तराधिकारी हुआ। बीजापुर राज्य में उसके उन्नतिके दिनों के सबसे बड़े सरदारों में होने से मालोजी का भी मुगलबादशाहों द्वारा वही आदर सत्कार हुआ था। यह बात कि वह मरहट्टा राजसंघ से नहीं मिल गया था। उसकी राजभक्ति का पर्याप्त प्रमाण था । अखयजी. मुगल बादशाह मालोजी के पुत्र अखयजी का और भी अधिक विश्वास करते थे । वह बीजापुर का गवर्नर था । एक सनद इस बातकी साक्षी हैं कि जब अख- यजी गवर्नर था तब उसे पांच हजार घुड़स- वार रखने के लिये भूमिप्रदेश मिला हुआ था और उसके २५०० शरीररक्षक थे जिनका- व्यय बादशाही खजाने से मिलता था । इसके अतिरिक्त गवर्नर को ५०००, वेतन मिलता था । ऐसा प्रतीत होता है कि वीजा- पुरमें रहते समय अखय अथवा उसकी सेनायें नवाब मुस्तफाखानकी बडी सराय में रहती थीं,जोकि इस समय जिला जेल के रूप में परिवर्णित कर दी गई हैं। वह सराय अभी पास के समयतक अखय की सराय के नाम से मशहूर थी । यह अखयजी के समय की बात है कि प्रसिद्ध धनाजी जादव के पुत्र चंद्रसेन ने कर्ना- 'टक में चौथ इकट्टी करने और घोरपडे वंश की भूमि को आक्रान्त कर सन्ताजी घोरपडे के वंश से बदला लेने के लिये-इन दो (४८) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । उद्देश्यों से कर्नाटक के विरुद्ध प्रयाण किया। गजेन्द्रगढ़ और गुटी की अन्य शाखाओं समेत अखयजी तथा सन्ताजी के घोरपड़े वंशों ने अपना एक संघ स्थापित कर चंद्र- सेन का कड़ा मुकाविला किया । अन्त में उसे घोरपड़ों को उनकी जागीर के रखने में तंग किये बगेर और शान्त ही छोड़ना ही पड़ा। उसके बाद दीर्घकाल तक घोरपड़े अपनी मुल्कमें शान्तिपूर्वक रहते रहे । सतारे के शाहू और ताराबाई के पुत्र के पारस्परिक झगड़े के समय वे फिर आगे बढ गये । उस झगड़े में घोरपड़े लोग कोल्हापुर शाखा का पक्ष लेते हुए दीख पडते हैं-जिसका कि मुखिया सम्भाजी था । ग्रान्डडफ निम्नप्रकार से उस स्थिति का वर्णन करता है ( पुस्तक, पृष्ठ ३११) 'क्योंकि निजाम उल्मुल्क कोल्हापुर वालों का पक्ष लेता था, सम्भाजी का प्रभाव बढ़ गया और शाहू का घट गया । प्रसिद्ध संता- जीके भतीजे बाहरजी का लड़का और गुट्टी के प्रथम मुरारराव का कनिष्ठ भाई सिद्धजी घोरपडे को सम्भाजी की ओर होनेके लिये उकसाया गया जिस ( सम्भाजी) ने सेना- पति का पद देकर उसका आदर किया । कपसी तथा मुधोल दोनों जगहों के अन्य भी अनेक घोरपड़े कोल्हापुर दलसे मिल गये।

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ! (४२)
अखयी १७३४ ई. में अपनी मृत्युतक
बीजापुर का गवर्नर रहा । उसका पुत्र
पीरजी उसका उत्तराधिकारी हुआ किन्तु
दुर्भाग्य से पीरजी उसके भाई वाजी द्वारा
मारा गया । तब उसके बाद पीरजी के
युवा पुत्र मालोजी और उसके चाचा वाजी के
बीच झगड़ा चला । बीजापुर तथा जागीरों
के अधिकार और उन पदों के वेतनों का
झगड़ा दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह द्वारा
१७३८ ई. में किया गया। मालोजी के पक्ष
में एक आज्ञा पत्र निकाला गया, जिसके द्वारा
वह बीजापुर का गर्वनर नियत किया और
साथ ही उसे वे सारे वेतनादि जो उससे पूर्व
उसके पिता और पितामह को मिलते थे, मिल
गये। कत्ल करनेवाले वाजी ने मरहट्टों का
आश्रय लिया । मालोजी की पलटनों से
लड़ने में उसका पीछा किया गया और वह
मार डाला गया; जब कि वह मुगल प्रदेशों
को लूटने के उपाय में लगा हुआ था।

(५०) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । सप्तम अध्याय। --- मालोजी.तृतीय। वे दिन जब कि मुगलों के आधिपत्यमें मालोजी बीजापुर का प्रबन्धक बना, दक्षिण में मुगलों के अनुकूल न थे।मरहट्टे पेशवाओं के नेतृत्व में अधिक बलवान होते जा रहे उन्हें दक्षिण में कोई रुकावट न थी । क्योंकि औरङ्गजेब की भ्रमपूर्ण नीति ने मुसल्मानी राज वंशों को नष्ट कर दिया था । बादशाही सेना का मुख्य स्थान उनकी पहुँचसे बहुत दूर था। मरहट्टा-राज्य के सेनापति अपने प्रदे. शोंके बढानेमें उचित अथवा अनुचित सब प्रकार से यत्न कर रहे थे । एकबार सतारा दरंबार ने शाहू के वंश की पुरानी कर्नाटक की जागीर अपने वंशमें करने का प्रयत्न किया अन्य दूसरे भोंसलों को भी जो कर्नाटक जागीरों में रुचि रखते थे और हिस्सेदार थे, पुरानी जागीरों के पाने में सतारा की सरकार को मदद देने के लिये उकसाने की कोशिश की गई; किन्तु इसके लिये वे सतारा सरकार से मिलने को बिल्कुल इच्छुक न थे । उनका यह सोचना ठीक था कि कर्नाटक जैसे सुदूर- वती प्रदेश में जागीर पाना और उसका रखना अधिक कठिन होगा अच्छा है कि लुटेरे धावों मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (५१) से वे अपनी आमदनी बढाते रहे । आदिल- शाही और कुतुबशाही के अन्त हो जाने से बहुतसे सरदार अपनी सेनाओं समेत वेकाम हो गये । ऐसी स्थिति में प्रत्येक साहसिक सर• दार जहां और जब मौका मिला लूट मार करने लगा । केवल दशा के विपरीत होने के कारण कोई भी जागीरदार जो शान्ति से रहना चाहता था; वैसे नहीं रह सकता था । यह स्वाभाविक ही था कि मालोजी इस झगडे में पडे । उसको अपनी जागीर की रक्षा के लिये बहुत से घुड़सवार रखने को विवश होना पड़ा । वह एक स्वतन्त्र राजा था, वह न तो सतारा की सरकार के ही अधीन था और न मुगल साम्राज्य के ही रहा । पिछला साम्राज्य सो तो अब तित्तर वित्तर हो रहा था। पेशवाओं ने पूरी तरह निश्चय कर लिया पेशवाओं से कि वे अधिक समय तक मालोजी को मिलना. बिल्कुल उदासीन न रहने देंगे। एक शत्रुकी नाई वह एक भयंकर प्रतिपक्षी हो सकता था और मित्रता के नाते से एक सहायक मित्र । मालोजी की सहायता और सेवा की पेश- वाओं ने याचना की और उसने भी अपने घुड़सवारों की बड़ी पलटन के लिये नौकरी तलाश करने के विचार से और अपने राज्य को उसी सुरक्षित दशामें रखने के लिये पर्याप्त बल पाने के ख्याल से मरहट्टों को उनके बहुत मालोजीका (५२) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । से आक्रमणों में सहायता दी। मुधोल के घोर- पड़े वंश की कुछ जागीरें मुगल प्रान्तों में भीर्थी जैसे कि:-पथरी, परमिने, बरारमें, नूलदुर्ग, अरेकी, तथा अन्य भाग दोआव में । इन जागीरों के बदले में उन्हें मुगलों की या उनके उत्तराधिकारी निजाम की नौकरी करनी पड़ती थी। और दूसरी ओर तरगल के किले तथा आस पास के गाँव जो कि मालोजी ने पल- टनों के खर्च के लिये रक्खे थे, चारों ओर से मरहट्टों की भूमि से घिरे हुए थे । इन जागीरों के लिये मालोजी को पहिले मुगलों के लिये घोडों का एक भाग देना पड़ता था, पर पीछे से उन्हीं जागीरों के लिये मालोजी को मरहट्टों की नौकरी करनी पड़ती थी । इस लिये मालोजी को या तो मरहट्टों के लिये सेना देनी थी, या तरगल आदि जिलों की जागीर छोड़नी थी । मालोजी ने मरहट्टा राज्य के नीचे अधीन सरदार की भाँति नोकरी करने की अपेक्षा जागीर छोड़ना अच्छा समझा । फिर भी उसने निश्चित सेना के बदले में निजाम के अधीन मुगल प्रदेश को रखना ते किया । मालोजी ने जागीर के प्रबन्ध के लिये और निजाम की नौकरी को सेना तैयार रखने के लिये अपने लड़के गोविंदराव राजा तथा अपने भाई शंकररावजी को नियुक्त किया। यद्यपि जागरोिं का कुछ तुकसान हुआ, राक्षसभुवन का युद्ध, परन्तु फिर भी सब बातें ठीक रहीं पर मालो. L

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (५३)
जीने अधिक समय तक मरहट्टों के सम्पर्क से
वाहिर रहना आत्मघात समझा । पेशवा तो
मालोजी की सहायता स्वीकार करने को
अत्यन्त:उत्सुक थे ही । उन्होंने घुड़सवारों के
विभाग से उसका खर्च मिलने पर पेशवाओंकी
सहायता करनेका संकल्प किया।मित्र की हैसि
यतमें मालोजी पेशवाओंके साथ उनके गुजरात
के आक्रमण में,गया। जबतक पेशवाओं की
निज़ाम से लड़ाई न छिडी थी, तबतक सब
काम ठीक होता गया । १७६३ ई. के लगभग
मालोजी ने रघुनाथराव का एक आक्रमण में
साथ दिया। इसी बीचमें मरहट्टों को निजाम
के विरुद्ध युद्ध घोषणा करनी पड़ी। निःसन्देह
मालोजी और उसके पुत्र गोविंदराव के लिये
यह स्थिति बड़ी भद्दी थी। यद्यपि कुछेक इति-
हासकार यह बताने का प्रयत्न करते और
कहते भी है कि गोविंदराव का उसके पिता से
झगड़ा था और वह पिता के इच्छा के विरुद्ध
निजामसे जामिला था,फिर भी पिता और पुत्र
बहुत अच्छी तरह से मिले हुए थे । इतिहास
बताता है कि गोविंदराव अपने पिता की
अनुमति और आज्ञासे निजाम प्रदेश की
जागीरों के बदले में निजाम की नौकरी करता
रहा था। निजाम के नौकर की हैसियत से
गोविंदरांव को निजाम की ओर से लड़ाना
पड़ा था । और एक मित्र के नाते से मालोजी
पेशवाओं के साथ था । इस प्रकार हम पिता

(२४) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । और पुत्र को प्रतिपक्षी दलों में पाते हैं । एक क्षीणशक्तिहृदय कदाचित् इस स्थिति को देख- कर डर जाता। उस युद्ध के जो राक्षसभुवन पर पेशवाओं और निज़ाम के बीच लड़ा गया था आरंभ होनेसे पूर्व ही प्यारे पुत्र ने अपने पितासे पूंछा कि युद्धक्षेत्र में वह (पिता) और उसकी सेनायें किस स्थिति में रहेंगी कि जिससे वह ( पुत्र ) अपने गतयौवन पिता से मुडभेड़ करने से बच सके । पिता कुछ अधिक कड़े चित्तका आदमी था-उसने अपने पुत्र को साफ साफ लिखा मेरे पुत्र ! कल बड़ी सेनायें मुड़- भेड़ खायेंगी और विजय सर्व-शक्तिमान् के हाथ होगी। यह सम्भव है कि हम पहिले से प्रबन्ध करके एक दूसरे के सामने आने से बच सकें किन्तु ऐसा करनेसे हम केवल अपने कर्त- व्य सही न गिरेंगे वरन अपने वश के नाम को भी कलंकित करेंगे। हम दोनों एक दूसरे से बचने का यत्न कर घोरपड़े खानदान को कलंक लगावेंगे। गोविंदराव ने अपने पिताके पत्र से शिक्षा ग्रहण की और ईमानदारी से अपना कर्तव्य पूरा करने का निश्चय कर युद्ध के लिये चल दिया।भाग्य में वदा था कि युद्धके भीषण प्रहारों के बीच मालोजी और उसका लड़का आमने सामने आये । एक बार के लिये गोविन्दराव के हृदय में पिता के लिये छिपा हुआ प्रेम मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास। (५.) उमड़ पड़ा। उसके पिताने देखा कि पुत्र पिता के विरुद्ध तलवार चलाने से पीछे हट रहा है। मालोजी को अपने कर्तव्य और वंश के मान के अतिरिक्त किसी का ध्यान न था उसने पुत्रसे उसके स्वामी के प्रति अपना कर्तव्य पूर्ण करने के लिये कहा । इस प्रकार राक्षसभुवन में उस स्मरणीय दिनमें सेनाओं ने पिता और पुत्र के बीच लडाई का अद्भुत और अभूतपूर्व दृश्य देखा । दैव दुर्नियोग से मालोजी को अपने पुत्र को घायल करने का गौरव मिला और वह उन घावों से मरगया अपने पुत्रकी मृत्यु के शोक में मालोजी अवश्य रोया होगा, परन्तु हर्षमें भी क्यों कि वह और उसका पुत्र अपने स्वामी के प्रति अपना कर्त. व्य पूरा कर सके । कुछ ऐतिहासिकों का कहना है कि पिता और पुत्रके बीच यह युद्ध १७९५ई०में खर्दा पर हुआ।परन्तु राक्षसभुवन के युद्ध के पछि १७७०. ई० में निज़ाम ने जो सनद दी थी उसमें गोविन्दराव के पुत्र नारायण राव का नाम है,सनद में गोविंदरावकी मृत्युका जिक्र है और इस प्रकार इसमें कोई सन्देह का स्थान नहीं रहता कि मालोजी और गोविंद- राव राक्षसभुवन के युद्ध में लड़े थे। राक्षसभुवन में निजाम के विरुद्ध लड़ कर मालोजी ने उसे कुछ असन्तुष्ट कर दिया था। पेशवाओं ने देखा कि मालोजी को निजामकी सहायता नहीं मिल रही थी और उसे उसकी मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास। राक्षसभुवन की सेनाओं का पारितोषिक देने के बजाय उलटा चौथ (प्रचलित चतुर्थांश जिस के इकट्ठा करने का अधिकार मरहट्टों को मुगल वादशाहों से मिला हुआ था ) देने को दबाने लगे। कुछ समय तक मालोजी दृढ रहा अर्थात् न तो वह निज़ाम से मिला और न उसने पेश- वाओं को चौथ ही दी। इस समय मालोजी को अपने घर के मनभेदों ने बहुत तंग किया अन्तमें पेशवा लोग मालोजी से चौथ रुपये की शक्ल में नहीं वरन् उसकी वैयक्तिक सैनिक सेनाओं के रूपमें जिनका वे सब व्यय देत थे लेने को तैयार हो गये । इसके पश्चात् हम मालोजी को सदा पेशवाओं की ओर से लडने पाते हैं। अनेक अवसरों पर पेशवाओं ने, जो मालोजी को निजाम की ओरजाने से रोकना चाहते थे, उसे जागीरें देने की प्रतिज्ञा की थी। इन्दी, तम्बा और अल. मेला के परगने मालोजी को १७७८ई० में सेना के व्यय के लिये दिये गये किन्तु उसकी मृत्युके बाद ही ये वापिस लेकर वापुजी गोखले को दे दिये गये। वदगांव का मालोजी के एकबार पेशवाओं के स्वामी युन्द्र. हो जाने पर हम उसे पेशवाओं के आक्रमणों के प्रायः सभी मैदानों में पाते हैं । १७७९ ई० की. मरहट्टों और अंग्रेजों के बीच हुई वद. गाँव की लडाई में भी. घोरपड़े वंश ने अपना भाग लिया था। मालोजी स्वयं बुरी

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
(५७)
तरह घायल होगया था। उसका पुत्र राणोजी
तलगांवके पास लड़ाई में मारा गया ।
मालोजी का भाई शङ्करजी पेशवाओं की
ओर से लड़ा । रानोजी के पुत्र बहिरजी
राव को पदसलगे का इनाम मिला और
शङ्करजी ने बिठगी, विद्री और तिकोटा के
जिले पाये । मालोजी ने पेशवाओं के हाथ
से कुछ भेंट लेने को स्वयं मना कर दिया
उसने नन्दगाँव और कमथा नाम के दो गांव
जोकि उन हिस्सों के देशमुख वतन जागीर
के भाग थे मांगे यह उस वंशकी बहुत पुरानी
वतन ( जागीर ) थी और मालोजी को
जो कि उसमें अपने भाग का दावा करता था
इस अवसर पर सतारा के राजाओं से वह
जागीर मिल गई । यह पुराने क्षत्रियवंशों
का एक गुण है कि वे एक पुराने अधिकार
को चाहे वह कितना भी तुच्छ क्यों न हो
कभी नहीं छोड़ना चाहते । घोरपड़े को वंश
के इस छोटेसे राज्यके लिये प्रसिद्ध शिवाजी
के खानदान से अनेक झगड़े करने पड़े थे।
मालोजी जो कि अपने खून का सच्चा था,
इन छोटे गाँवों को उस वडे प्रदेश से जो
उसे पेशवाओं से मिल सकता था, अधिक
मूल्यवान समझता था।
खाकी
मालोजी यद्यपि काफ़ी बूढा हो चुकाथा
लड़ाई फिर भी निजाम और पेशवाओं के बीच लड़े
गये । १७९५ ई. के खर्दाके युद्ध में लड़ा ।

(५८)
मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
उसके साथ गोविंदराव का पुत्र उसका नाती
नारायणराव भी था । मालोजी होलकर के
विरुद्ध लड़ी गई एक लड़ाई में १८०२ ई.में
घायल होगया। उसके दीर्घकालीन अनु-
भव, निर्भय साहस, शुद्ध सम्मान, और
यथार्थवादित्व के कारण मालोजी पेशवाओं
के दरबार में बड़े आदर तथा प्रभाव के साथ
देखा जाता था। मालोजी ने पूना को ही,
जहाँपर एक बजार अब भी घोरपड़ों के नामपर
है, अपना स्थायी निवास स्थान बना लिया
था। वह मुधोल की जागीर का प्रबन्ध अपने
पुत्र महरराव के हाथोंमें छोडकर अपने पौत्र
महरराव नारायणराव के साथ रहता था । जब महरराव
कुछेक लुटेरों से आय एकत्रित करने में रोका
गया, तब उसने चाहा कि उन(लुटेरों)को डरा
दिया जाय।उसने सौ आदमियों को एक लम्बी
कतारमें खड़ा किया और उनके शिर काट
दिये । महरराव की इस तथा अन्य निर्दयता-
ओंके कारण मुधोल के मुख्य २ निवासियोंने
नारायणराव से रियासत अपने हाथ में
लेनेकी प्रार्थना की । नारायणराव आया
और बहुत से मुख्य पुरुष उससे मिल गये ।
कुछेक तो महररावके आदमी भी नारायणराव
की और चले गये । महाराव स्थिति देखकर
कोल्हापुर को भाग गया। उसने मुधोल को
फिर पाने की सहायता के बदले में राजा को
बहुत सा रुपया देने की प्रतिज्ञा की । कोल्हा-

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
(५)
पुर के कुछ आदमी महरराव के साथ भेजे गये ।
मुधोल की सेनाओं से रायवाग के युद्ध में हराया
गया और महरराव पहिले तो नागपुर को
भगगया और वहाँ से ग्वालियर को जहांपर
सिन्धिया ने उसका स्वागत किया।
वृद्ध और बहादुर मालोजी-जो कि-पेशवा
के दरबार का 'भीम' कहलाता था-अपनी
मृत्युके पास जा रहा था । उसका सारा जीवन
ही मुगल या पेशवाओं की लड़ाईयाँ लडनेमें
बीता था । मरहट्टा-राज्यसे मिलने के बाद
टीपूके विरुद्ध भेजे गये प्रत्येक आक्रमण में
वह उपस्थित था। धारवाड़ को जीतने के समय
और शिरामें टीपू की फौजके विरुद्ध उसने
अपने आपको विशेष रूप से चमकाया था,
मालोजी उन कुछेक गिने चुने आदमियों में से
था,जिन्होंने राघोबादादाको उसके मुखपर(सा-
मने) उसे नारायणराव पेशवा के खून का दोषी
कहा था। पेशवा के दरबार में मालोजी के
प्रभाव से ही बरौदा का गायकवाड़ पेशवाओं
के साथ कुछ मतभेद निपटाने में समर्थ हुआ।
यह बात ध्यान देने योग्य है कि पेशवा और
उसके सेनापति गायकवाड़ के बीच मतभेद
को त करने के लिये एक बाहिर व्यक्ति होतेहुए
भी मालोजी की आवश्यकता हुई गायकवाड़ने
कृतज्ञता पूर्वक मालोजी को एक लाख पचास
हजार रुपयोंकी वार्षिक आयवाली का प्रदेश
दिया । फिर जव किन्हीं आन्तरिक झगडों

(६०) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । - के कारण परशुरामभाऊ पटवर्धन ने सतारा पर आक्रमण किया, तब मालोजी ने पटवर्धन से सतारे को बचाया । मालोजी को पेश- वाओं की ओर से कोल्हापुर के विरुद्ध प्रयाण करना पड़ा था, उसने उसे लूटा । यह सम्भव नहीं कि थोडी सी जगह में मालो जी की घट नापूर्ण जीवनी की पूरी प्रशंसा की. जा सके। उनकी मृत्यु १८०५ ई० में हुई । मालोजी के चार स्त्रियाँ थीं। जिनमें से एक पोलकी तथा एक काठियाबाड की राजपूत थी और शेष दो दक्षिण के परमार और महाराष्ट्र सोलंकियों के वश की थीं । उसकी प्रथम स्त्री से गोविंद- राव और महरराव दो पुत्र थे. । बाजीराव जो कि बरोदा रियासत का प्रबन्ध करता था, दूसरी स्त्री का लडका था । तीसरी स्त्री का लड़का रानोजी, जैसा पहिले कहा जा चुका है, अंग्रेजों के साथ लडाई में मारा गया था । मुधोल के कर्नाटक में मुधोल के घुड़सवारों का बड़ा घुड़सवार. प्रभाव था । वे ऐसी जगह काम आते थे जहाँ पर अन्य सेनायें काम न देती थीं जैसे धार- वाड, शिरा तथा अन्य स्थानों में । बहुत से अवसरों पर तो केवल मात्र उनकी उपस्थिति ही शत्रुको सन्धि के लिये विवश कर देती थी। सर चार्ल्स मुनरो कहता है:-"मुधोल के घुड़- सवार यद्यपि थोड़े थे, तथापि कर्नाटकमें सबसे अच्छे समझे जाते थे।

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । (६१)
अनेक बसमझ ऐतिहासिक मालोजी को
निर्दयी पिता बताते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं
कि उसने राक्षसभुवन की लडाई में अपने पुत्र
गोविंदराव से लडाई की और उसे भगा दिया
था। जैसा पूर्व ही कहा जा चुका है कि युद्ध के
प्रारम्भका पत्रव्यवहार तथा अन्य स्थितियाँ
सिद्ध करती हैं कि वे दोनों आपस में अच्छे से
अच्छे सम्बन्धसे जुड़े हुएथे और यह तो केवल
कर्तव्य तथा मान था कि वे एक दूसरे से भिड़े।
उन योद्धाओंका जो कि विश्वास और मानको
सबसे बढकर समझते थे आज कलकी अपनी
स्वार्थमयी बुद्धि से निर्णय करना भूल है।
यह बात कि गोविंदरावका पुत्र नारायणराव
अपने बाबा का प्यारा था और सदा मालोजी
के साथ रहता था इन समस्त ऐतिहासिकों
की बात को झूठा सिद्ध करती है।
मालोजी राजाका उत्तराधिकारी उसका
पात्र नारायणराव हुआ । मालोजी के जीवन
काल में भी राज्य का प्रवन्ध और उसकी
निगरानी नारायणराव को सौंप दी गयी थी।
निजाम ने १७७० ई में एक विशेष सनद द्वारा
नारायणराव के लिये उसके खानदान की पुरा-
नी रियासतें जिनका पुराना नाम मिरीत था
और जो बरारमें थीं जारी रक्खी थीं। ये रिया-
सतें अब पथरी तथा परभनी प्रान्तों के नाम
से विख्यात हैं। नारायणरावं के दो स्त्रियाँ थीं
बड़ी रानी (पटरानी) सोलंकी वंशकी और
नारायणराव

(६२) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । छोटी परमार वंश की थी। बड़ी रानी के दो लड़के थे, जिनके नाम वेंकटराव और लक्ष्मण- राव थे। छोटी रानीने गोविंदराव को जन्म दिया जो कि तीनों लडकों में सबसे बडा था । नारायणराव की मृत्युके बाद जागीर की गद्दी के लिये झगड़ा उठा । गोविंदराव ने उसकी सहायता के बदले की इच्छासे पेशवा की नौकरी कर ली। इस समय पेशवा स्वयं अपनी गद्दीपर हास को प्राप्त हो रहा था । छोटे भाई बैंकटराव ने जागीरपर अधिकार कर लिया और गोविंदराव के प्रयत्न को निष्फल करने के लिये सेना सम्बन्धी तैयारी करने लगा । गोविंदराव बैंकटराव के विरुद्ध प्रयाण करने को अभी समर्थ न हुआ किन्तु उसने पेशवाओं की तरहसे लड़ते हुए कोर गाँवकी लड़ाई में विशेष काम किया। उसने लड़ाइयों में भाग लिया;१८१८ के लगभग अंग्रेजों के साथ लड़ा परन्तु अन्तमें आष्टी की लड़ाई ( १८१८ ई.) में मारा गया । घुडसवारों का समूह जिसका नेता गोविंदराव था उसकी मृत्यु के बाद टूट. गया। बैंकटराव. बैंकटराव ने शान्ति पूर्वक अपनी मृत्यु तक मुधोलका राज्य किया। वह अपनी प्रजा में और मरहट्टा राज्य के सरदारों में भी बहुत लोकप्रिय था । वह और उसका भाई लक्ष्मण- राव अच्छे घुड़सवार थे और बैंकटराव तो अपने समय का महाराष्ट्रमें सबसे अच्छा घुड़-

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
(६३)
सवार था । ब्रिटिश सरकार के आगमन
के समय बैंकटराव मुधोलकी गद्दी पर था
और सन्धिका कार्य उसी के नाम से हुआ था।
दुर्भाग्य से मुधोल के राजा बैंकटराव के
समय तक अधिक काल के लिये अपने राज्य
से अलग रहने के लिये लाचार थे। वे या तो
दिल्ली और बीजापूर के बादशाहों की लड़ाई
में लडते रहे या पूना के पेशवाओं की ओर
से राज्य की बिलकुल परवाह न की गई।
अपने अड़तीस वर्ष के लम्बे राज्यकाल में
वैकटराव को जागीर में शान्ति और उपयुक्त
सरकार स्थापित करने का पर्याप्त समय मिल
गया । अपने सरदारोंकी सहायता से उसने
जागरिमें नियमपूर्वक सरकार स्थापित कर
दी और राज्य नैतिक अंग्रेज अधिकारियों की
प्रशंसा प्राप्त की।
बलवंतराव.
१८५४ ई० में उसके मृत्युके बाद उसका
इकलौता और नाबालिग लड़का बलवंतराव
गद्दी पर बिठाया गया परन्तु वह अठारह वर्ष
की आयुमें एक ग्यारह महीने का बच्चा छोड़
कर मर गया १८६१ ई० में । बलवंतरावके
लड़के का नाम बैंकटराव रक्खा गया। उसने
रियासत का अधिकार १८८१ ई० में लिया
और अठारह साल तक राज्य किया । उस
की मृत्यु १९०० ई० में हुई। उसका एक मात्र
जीवित पुत्र मालोजी उसका उत्तराधिकारी
हुआ और उन्नीस वर्ष की आयु में १९०४ ई.

(६४) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । में उसे रियासत के सब अधिकार दिये गये। उसका विवाह धार के राजा के बहिन से कराया गया । जिससे उसके तीन बच्चे हुए । ज्येष्ठ पुत्र और अकेली लड़की युवावस्था में ही मर गये और छोटा पुत्र जो कि अब युव- राज है. सोलह वर्ष का है। अपनी पहिली स्त्री की मृत्यु के बाद मालोजीरावने दूसरी बार विवाह किया और वर्तमान रानी साहिबा काठियावाड़की जाड़ेजा गिराजवंशकी पुत्री हैं। गत महायुद्ध के अवसर पर मालोजी राजा ने अपनी सेवायें ब्रिटिश सरकार को दी और वे ब्रिटिश पलटनों के लेफ्टिनेन्ट की हैसियत से इजिप्त में लड़ाईके मैदान में गये थे । मुधोल के राजा को अपनी प्रजाके जीवन तथा मरण पर अधिकार हैं और उसे द्वितीय श्रेणी के राजाके सब अधिकार प्राप्त हैं। उसकी वंशातुगत नौ तोपों की सलामी है और वह इस एजेन्सी में सम्मानकी दृष्टि से प्रथम राजा है। मुधोल रियासत का क्षेत्रफल ३६८ वर्ग- माल है और वार्षिक आय लगभग पाँच लाख के है। राज्य की राजधानी मुधोल घट- प्रभा नदी पर स्थित है, जोकि रियासत के बीच से उसके ३७ गांवों के पास होकर बहती है । भूमि प्रायः उपजाऊ काले रंग की है और यह नदी रियासत की खेती को स्वाभा- विक लाभ पहुँचाती है।

गुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहाल। (६५) उपसंहार । चौदहवीं सदी के प्रथम चतुर्थांश में हम सुजनसिंह को अपनी जन्मभूमि छोड़ कर भाग्यकी तलास में निकलते देखते हैं । इति- हास ने पूर्णतया सिद्ध कर दिया है कि उसका भाग्य दक्षिणमें चेता। मुसल्मान भारतवर्षके स्थायी निवासी होगये थे और यहाँ तक कि राजपूत लोग भी मुसल्मान राजाओं के सेना- पति होकर काम करने को तैयार थे । बहमनी राज्यकी कथायें इस बात का पर्याप्त प्रमाण देती हैं कि मुसल्मानों ने इतरों को अपनी जातिके कारण किसी उत्तरदायित्व पूर्ण तथा मानके पद दिये जाने से कभी नहीं रोका गया। सुजनसिंहके वंशजोंको वहमनी और आदिल- शाही के राज्यों में हम बड़े बड़े ओहदों पर देखते हैं । दक्षिण में मरहट्टाराज्य के कायम करनेवाले शिवाजी के समय तक हम सुजन- सिंहके वंशके प्रत्येक पुरुष को मुसल्मान स्वा. मियों की भक्ति तथा श्रद्धापूर्ण नौकरी करते देखते हैं। शिवाजी के समयमें भी हम अनेक हिन्दू वंशोंको मुसल्मानोंकी भक्ति-पूर्ण नौकरी में लगा पाते हैं। सुजनसिंह की छठी पीढ़ी के उग्रसेन या इन्दुसेन के कर्णसिंह और शुभकृष्ण दो पुत्र थे। प्रसिद्ध शिवाजीकी शाखा का निकास शुभ कृष्ण से है और मुधोल के राजा उग्रसेन के

(६६)
वे
मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
ज्येष्ठ पुत्र कर्णसिंह के वंशज हैं। कर्णसिंह की
शाखा ने बीजापुर में आदिलशाही के स्थापन
तक बहमनी राजाओंकी सेवा की । सुजनसिंह
का तीसरा वंशज भोसाजी कहाया गया-यह
वंश' भोसलाओंका वंश' के नामसे इन्हीं
भोसाजी के पीछे कहा गया। कोई कहते
कि वे भोसला इस लिये कहाये जाने लगे कि
बहुत दिन तक इस नाम के एक किले में
रहे थे । कुछ भी हो वंशका यह उपनाम चला
आता है।
किन्तु कर्णसिंह की शाखाने उतने साहस
और शूरताके प्रभाव से बहुत शीघ्र एक दूसरा
उपनाम प्राप्त किया । कर्णसिंह और उसके पुत्र
भीमसिंहने शत्रुके दुर्भेद्य किले पर पहुँचने के
लिये गोह ( जिसे मराठी में घोरपड़ कहते
हैं ) से काम लिया था । कर्णसिंह लड़ाई
किलेमें मारा गया, किन्तु उसके पुत्र
भीमसिंह ने ' राजा घोरपड़े बहादूर 'का
खिताब पाया । वह और उसके वंशज अपने
नामों के पछि राना के स्थान पर राजा का
और घोरपडे का उपनाम की तरह प्रयोग
करनेलगे । नामों तथा उनके अन्तिम भागों
के इस परिवर्तन से कभी कभी लेखक गण
भोंसला और घोरपडों का चित्तौर के सिसौ-
दिया राजपूतों से उनके सम्बन्ध को भूलने
का धोखा खागये हैं । वंशकी वह शाखा
जिसने घोरपडे का नाम प्राप्त किया, अंग्रेजी

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
(६७)
ऐतिहासिको द्वारा 'भोंसला-घोरपडे 'के मिले
हुए नाम से वर्णन की गई है।
यदि हम बहमनी और आदिलशाही
राज्यों का इतिहास आधिक ध्यानपूर्वक पढ़ें
तो हमको पता चलताहै कि दक्षिणी सेना-
पति तथा उनकी सेनाओं और परदेशी
सेनापति तथा उनकी सेनाओं में उन्नति के
लिये सदा झगड़ा रहता था। उत्तरीय भारत
के सेनापति तथा उनकी सेनायें परदेशी
समझे जाते थे। तुजनसिंह से दो शताब्दी
पीछे तक इस्माइल आदिलशाह के समय
तक हम देखते हैं कि घोरपडे और उनकी
सेना परदेशियों में समझी जाती थी।
हमको इतिहाससे पता चलता है कि
शिवाजी के पिता और चाचा क्योंकर
शाहजी और सरीफजी कह लाये
परन्तु विठूजी, बैंकोजी, गोविंदराव आदि
नाम जोकि दक्षिणमें देवताओंके नाम
किसी को विश्वास करा सकते हैं कि भोंसला
तथा घोरपड़े दक्षिण के वासी हैं । यदि हम
इस बात पर ध्यान दें कि उनकी जागीरें
और सरंजाम कर्नाटक प्रान्त और महाराष्ट्र
के भी कुछ भाग में थी तो हम को उनके नाम
उन स्थानों के देवताओं के नामों के पीछे
देखकर आश्चर्य न होगा । यदि कोई ऐति-
हासिक राजाओंके नामों के आधार पर ही
उनके आदि निवास स्थान का पता लगाना

(६८) मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास । चाहता है, तो चोलाजी घोरपड़े का नाम उसे भारत के अत्यन्त दक्षिणीभाग में ले जायगा यद्यपि. उस वंश के अधिक नाम स्पष्टतया राजपूत निकास.के हैं। विश्वस्त ऐतिहासिक प्रमाण के होते हुए उपर्युक्त शब्दों के लिखने की कोई आवश्यकता न थी पर उनको यहाँ यह दिखाने के लिये लिखा गया है कि साधारण तया किस प्रकार ऐतिहासिक लोग भूल कर बैठते हैं। सुजनसिंह का घोरपड़े वंश सारे महाराष्ट्र में फैल गया है किन्तु उसमें केवल तीन या चार शाखायें रहती हैं जो कि काफी मशहूर हैं। पिछले पृष्ठों चोलराज के लिये कहा गया है कि उसके तीन लड़के थे। ज्येष्ठ पुत्र पिला- जी से मुधोलकर वंश निकला । राजाराम का प्रसिद्ध सेनापति मशहूर सन्ताजी घोरपड़े चोलराज के दूसरे पुत्र वल्लभसिंह का वंशज था । कापसी तथा गजेन्द्रगढ़ और सोंडूर राज घराने वल्लभसिंह से चले हैं। सुजनसिंह के खानदानी भोंसला और घोरपड़े दोनों ने दक्षिण के एक या दूसरे मुस- ल्मानी राज्यमें बहादुर सेनापति की तरह अपने को चमकाया । वे अपने स्वामी के लिये भक्ति तथा ईमानदारी से लड़े यद्यपि कभी कभी उन्हें अपने खास बन्धुओं से सामना करना पड़ता था । फिरभी शाहजी भोंसला मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ! (६०.) के आदिलशाही राजा के यहाँ नौकरी कर लेने पर एक दुर्घटना होगई । कर्नाटक के घर के समय शाहजी पर धोखा देने का सन्देह किया गया और उसे गिरफ्तार करने का हुक्म दे दिया गया। शाहजी का पीछा करने और खुली लडाई में उसे गिरफ्तार करने का काम वाजीराजा के भाग्य में आया, जो कि उसका एक सम्बन्धी था । कई ऐतिहासिक गलती से लिखते हैं कि जो कि शाहजी पर उसके पुत्र शिवाजी को छिपी सहायता देने का सन्देह किया गया था, इससे बाजीराजा ने धोखा देकर शाहजी को एक दावत में गिर- फ्तार किया था। किन्तु घटना का विश्वस- नीय हाल पहिले पृष्ठोंमें दिया गया है। बाजी- राजा धोखा देने का दोषी नहीं वरन अपने स्वामी के नमक हलाल होने का । घोरपड़े वंश का अब नक का इतिहास सैनिक कार्यों और भक्तिपूर्ण सेवाओं की लम्बी कहानी हैं। अधिकांश घोरपडों ने अपने प्राण युद्ध क्षेत्रमें छोड़े हैं वे दृश्य भी देखने लायक होंगे, जबकि बोरपड़े वंश के पुरुष मिलते होंगे। शत्रु की तलवार और वीं के घावों से चिहित सूर्य से झुलसाये हुए प्रवल वीरों के चेहरे देखकर डर और राव पैदा होता होगा । युद्ध क्षेत्र उनकी क्रीडाभूमि और शय्या थी और घोरपड़े दोनों का सामना एक उत्सुकता तथा साहस के साथ करते थे।

(७०)
मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
घोरपड़े लोग राज्यक प्रबन्ध में पूर्णदक्ष थे
इस बात का ज्ञान इससे होता है कि सत्रहवीं
सदी के मध्य तथा अन्तमें प्रतापसिंह तथा
उसके दो उत्तराधिकारी बीजापुर के आदिल
शाहों के आय विभाग के मन्त्री थे। बीजापुर
राजघरके नष्ट होजाने के बाद भी हम देखते
हैं कि अठारहवीं शताब्दी के प्रथम भाग में
अखयजी तथा उसका पात्र मालोजी बीजा-
पुरके गवर्नर के उत्तरदायी पद पर थे ।
घोरपड़ों की राजभक्ति में तो कोई सन्देह
ही नहीं कर सकता । अनेक अवसरों पर अपने
स्वामी का जीवन बचाने के लिये उन्होंने
अपने प्राण छोड़ दिये हैं । इसके अतिरिक्त वे
प्रलोभनों के शिकार कभी नहीं बने । जब कि
अन्तिम बादशाह सिकन्दर आदिलशाह के
राज्य में बीजापुर का राज्य छिन्न भिन्न हो रहा
था मालोजी द्वितीयको अच्छा अवसर था
और शिवाजी ने उसके प्रदेश बढ़ाने का वचन
भी दिया था परन्तु यह वह केवल अपने स्वामी
को छोड़कर कर सकताथा,उसने राजभक्त रहना
स्वीकार किया चाहें गरीब ही क्यों न रहे।
आगे चलकर पेशवाओं द्वारा दक्षिण में
मुगल प्रदेश जीत लिये जाने पर भी मालोजी
तृतीय अन्ततक मुगलों का वफादार रहा।
वह बहुत काल मरहट्टा राजसंघसे अलग रहा
और अन्त में एक मित्रकी तरह उसमें मिला।
मालोजी यश की हद्द तक पहुँच जाता है,जब

मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास ।
(७१)
कि यह अपने पुत्र गोविंदराव से आमने सामने
लड़ता है और उसका पुत्र भी अपनी वारीसे
अपने निजाम के प्रति कर्त्तव्य पूरा करता
पूनामें पेशवा के दरबार में मालोजी तृतीय से
वहांके कामचोर और धोखेबाज खुशामदी डरते
थे। पुराना योधा९२वर्ष की आगुमें नमक हराम
होल्कर से लड़ने गया और घायल हो गया ।
मुधोल की राज्यजागीर बहमनी राजा
फीरोजशाह ने हि.स. ८०० में भैरवजी अथवा
भोसाजी जिनसे कि भोसला उपनाम चला है ।
को दी थी । आदिलशाहों ने भी इसे उसी
वंशमें प्रचलित रक्खा । इस्माईलआदिलशाह
के राज्य के समय महलोजी या मालोजी
प्रथम को मुजरा कुर्नीसत ( निश्चित प्रथातु-
सार राजाको प्रणाम करना ) से छुटकारा
और मोरचल ढुलवाने का अधिकार मिला।
राजा का खिताब इससे पूर्वही १४६९ ई० में
भीमसिंह द्वारा प्राप्त किया गया था । उसके
बाद १६७० ई० में अलीआदिलशाह के राज्य
काल में मालोजी द्वितीय को अपनी मुधोल
की जांगीर पर सर्वोच्च अधिकार प्राप्त हुए ।
और इसके बाद उसके वंशने आदिलशाहों
की जो सेनायें की वे उन अतिरिक्त प्रदेशों के
बदले में कीगई जो कि उन्हें सेनाके व्यय के
लिये मिलते थे।
इसके बाद यह वंश अपने स्वतन्त्रता के
अधिकार की बुद्धिमत्तासे रक्षा करता है और

'मुधोल राजवंश का प्राचीन इतिहास। जब कभी आवश्यकता होती है उस पर बल देता है। मालोजी तृतीय ने अन्त तक पेशवा के चौथ के अधिकार का प्रतिवाद किया और चौथ देने की अपेक्षा उसके खर्च मिलने पर एक बराबर के मित्र की तरह नौकरी करना स्वी- कार किया। वशके इसी अभिमान और स्व. तन्त्रता के प्रेम के कारण मालोजी तृतीय ने पेशवाओं से कोई जागीर लेने को मना कर दिया । १७७९ ई० के नंदगाँव के युद्ध के बाद जब पेशवा जागीरदेनके लिये तैयार थे, मालो- जीने उनसे अपने अन्य सम्बन्धियों को जागीर देनेके लिये कह दिया। उसको स्वयं जागीर लेने में अपनी स्वतन्त्रता खो देने का डर था। वह बहमनी राजाओं से दिये गये देशमूखी वतन के हिस्से से ही सन्तुष्ट था । अत्यन्त संकट में भी वंशके अभिमान और ईमानदारी ने उसका साथ नहीं छोड़ा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिमभाग में घोर- पड़ों के राजपूती रक्त ने अपने आपको दिखा ने का कोई अवसर नहीं पाया है। फिर भी वर्तमान समय का घोरपड़ा अपने पूर्वजों के सैनिक विश्वास और अभिमान से भरी हुडी कहानियों को पढ़कर अपने जीवनको भी उच्चविनाने का विचार कर सकता है। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।

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Mudol Rajvans Ka Parachin Itihas

Author
Shri Krishanadass
Title
Mudol Rajvans Ka Parachin Itihas
File name
Mudol Rajvans Ka Parachin Itihas
Text
OCR done
Published
2010/04
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
82
Library
Kumarappa Institute Of Gram Swaraj, Jaipur
Classification
History
DLI number
406202
Barcode
99999990065531.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
F1yvGWwRnDx
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