Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Mayur Chitrakam (jyotish Granth)
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(२) मयूरचित्रक आदि अनेक ग्रन्थ रचना किये जिससे पाका गण थोडेही परिश्रमसे बहुत आचार्योंकी संमतिमें अमित हो जायें. ये ग्रन्थ संस्कृतमें हैं परन्तु हालमें वर्तमान समय- की ऐसी दशा हो गई कि, संस्कृतमें अल्प बोध होनेके कारण साधारण श्रेणीके पण्डितोंकी समझमें आना दुर्लभ जानकर आधुनिक पण्डितोंने ग्रन्थोंका भाषान्तर करना प्रारम्भ किया है और वे माषान्तर यत्र तत्र मुद्रित होते चले जाते हैं. वराहमिहिराचार्यकत अन्थोमसे बृह- त्संहिता, बृहज्जातक, लघुजातक इन यन्थोंका भाषान्तर हो चुका है अब इस मयूरचित्रक नामक पुस्तकका भाषा- न्तर हमने श्रीसेठ गंगाविष्णु श्रीकृष्णदासजी जो प्राचीन नवीन पुस्तकोंके प्रकाश करने में कटिबद हैं उनकी प्रेरणासे सरल भाषामें किया है और इसका सब हक उक्त सेठनी- को दिया है. इस अन्धमें प्रत्येक वस्तुके समर्ष ( सस्ते । मध ( महेंगे ) का विचार व प्रत्येक मासमें वर्षा आदि- का सम्पूर्ण वृत्तान्न जाना जाता है, किन्तु इस छोटेसेही मन्थके आरसे सम्बतार (वर्ष पर्यन्त ) का सब हाल सहजहीमें पंडितजन कह सक्ता है, ऐसा यह परमोत्तम अन्य सवहीं पंडितोंको एक प्रति अपने पाम अवश्य रखना चाहिये. गमवाणानिधीन्द माघे मामि मित दले। दायां भृगारे च भापारम्मः तो मरा१॥ ममम्नपरिनका निपी पण्डिन- नागपणमाद मुकुन्दरामनी मरतपुरतका. टयापा-यांमबरेली और रसीमपुर ( अवध) अथ मयूरचित्रकस्य विषयानुक्रमणिका। .... .... .... MR 8 .... २ .... .... १ अन्यारम्भः २ तत्रादौ त्रिविधोत्पाता ३ भाषाकारकृतमंगलाचरणम् . ४ तेषामप्यनेकमेदाः ५ अथ केतुवारफल्म ६ अथ केतुस्वरूपकथनं फलसहितं च ७ अय धूम्रकेतृदयफलम् ८ अथ प्रतिमासे केतूदयफलम् ९ अथ ग्रहाणां योगफलम् १० अथ संक्रान्तिप्रति उत्पातफलम् ११ अथ विधा वृष्टियोगः १२ अथ कर्कमकरसंक्रांती वारफलम् १३ अथ अगस्त्योदयफलम् १४ अथ तिथिवृद्धिस्तथा क्षयफलम् १५ अथ त्रयोदशदिनपक्षफलम् .... .... १ .... ४० ४ .... .... ... " .... .... ४२ ... m H .... 40. .. .... .... .... विषयानुक्रमणिका। १५अब चैत्रादिमासेषु विध्यादियोगाला १७वत्रादौ चैत्रमासफलम् १८ वय वैसाखमासफलम् १९ अथ ज्येष्ठमासफलम् २.अपाषाडमासफलम २१ अथामवेशफलम् २२मय रोहिणीनक्षत्रविचारः २३ अथ स्वातिनक्षत्रविचारः २४ अथ मेघलक्षणम् २५ अचापाढपूर्णिमायां पवनपरीक्षा २६ अथ श्रावणमासफलम् २७ अथ माद्रमासफलम् २८ अथ आश्विनमासफलम् २९ अथ कार्तिकमासफलम ३० वष मार्गशीर्षमासफलम ३१ अथ पौषमासफलम् ३२ अमाघमासकलम् ३३ अथ फाल्गुनमासफलम ३४ अथात्पवृष्टिलक्षणम् ३५ अथ दुर्मिभलक्षणम् .... .... .. .... ... ८१ 4040 .... ९७ ... .." १०० ++ ....
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विषयानुक्रमणिका।
३६ पथ जललग्नम्
३७ अथ मेघनक्षत्रमाह
३८ अथ पुंखीनपुंसकनक्षत्राणि
३९ अथ सूर्य तथा चन्द्रनक्षत्रसंज्ञा
४० अथ सूर्यचन्द्रपरिवेषलाष्यम्
४१ अथ सम्वत्सरलग्नफलम्
४२ अथ दुर्भिक्षलक्षणम्
४३ अथ दृष्टिलक्षणम्
४४ अय सद्योवृष्टिलक्षणम्
४५ अथ ग्रहचारफलम
४६ अथ संक्रांतिवशेन शुभाशुभफलम्
४७ अथ तिथिवारपरत्वेन शुभाशुभफलम्
४८ अन्यसमाप्तिः
...१०१
.१.६
.१०॥
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११२,
-
...
....१२५
पुस्तक मिलनेका ठिकाना-
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,
लक्ष्मीवेंकटेश्वर " छापाखाना,
कल्याण-मुंबई.
॥ श्रीः ॥
भापाटीकासहित
मयूरचित्रकम्।
तत्रादौ त्रिविधोत्पाताः।
अध्यास्तमनं केतोगणितेन प्रहास्यते ॥
विष्यभौमान्तरिक्षाश्च उत्पातास्त्रिविधा मताः ॥१॥
भापाकास्कृतमंगलाचरणम् ।
प्रणम्य मास्करं देवं श्रीनागयणशर्मणा ॥
भाषा मयूरचित्रस्म ग्रन्थस्य प्रवितन्यते ॥
श्रीसर्यनारायण जो प्रत्यक्ष देव तिसको प्रणाम करके श्रीना-
रायणप्रसादशर्मा करके मयूरचित्रकनामक ज्योतिष ग्रन्थको
मापा सरल गैतिस की जाती है।
केतुका उदय और अस्त गणित करके जाना जाता है
'और दिव्य, भौम, अन्तरिक्ष यह भेद करके उत्पात तीन
प्रकारके हैं, ऐसा अनेक आचाप्यों का मत है ॥ ३॥
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(२) मयूरचित्रकम् ।
तेषामप्यनेकोदाः।
एकोत्तरशतं त्वेके सहस्रमपरे विदुः ।।
एकोपि बहुधा भाति प्राह वे नारदो मुनिः॥२॥
तहां इन तीनोंके कोई एक सौ एक भेद कहते हैं और
दूसरे आचार्य एक हजार द वर्णन करते हैं, एकमी
बहुत प्रकारका होता है ऐसा नारदमुनिने कहाहै ॥२॥
अथ केतुचारफलम् ।
यावन्त्यहानि दृश्यन्ते तावन्मासैः फलं भवेत् ॥
मासे मासे च विज्ञेयमित्यूचर्मुनयोपरे ॥३॥
केतुका तारा जितने दिनोंतक आकाशमें दीख पडे
उतने महीनोंतक केतुका फल होता है, अन्यमुनि कहते
है. किमहीने महीनेमें फल जानना अर्थात जिस महीने में
उदय होय उसी में उसका फल जानना ॥३॥
अथ केतुस्वरूपकथनं फलमहितं च ।
'सुस्निग्धो रुचिरः सूक्ष्मो ऋजुः शुक्लः शुभप्रदः ॥
विपरीतोऽशुभः केतुनिशिखेन्द्रधनु-प्रभः ॥४॥
भाषाटीकासहितम् । सुन्दर चिकना, मनोहर, छोटा, सोश, श्वेतवर्ण ऐसा केतु शुभ देनेवाला होता है, इससे विपरीत तीन शिखा- वाला इन्द्रधनुष के आकार केतु अशुभ जानना ॥ ४ ॥ मुक्ताकनकसंकाशाः पंचविंशतिसंख्यकाः ।। प्राक्पास्यांचते दृष्टाः सूर्यपुत्रा भयप्रदाः॥५॥ मोती और मोतीकीसी कान्तिवाले पचीस तारे चाटी- वाले सूर्यके पुत्र है, ये पूर्व तथा पश्चिममें दीख पड़ें तो अपदायक जानने ॥ ५॥ बहुवर्णानिसंकाशा सशिखा पंचविंशतिः ॥ आमेय्यां दिशि संदृष्टा वहिपुत्राभयप्रदाः॥६॥ अनेक रंगके अग्रिसमान कांतिवाले चोटीदार पचीस तारे अनिके पुत्र हैं, वे भनिदिशामें दीख पडे तो आपके देनवाले होते हैं ॥ ६॥ याम्याशासंस्थिताः कृष्णा ऋक्षा चक्रशिखास्तथा। वाषन्तो वे मृत्युसुताः प्रजाक्षयकराः स्मृताः ॥७॥ दक्षिणपिशामें स्थित कृष्णवर्ण (काले रंग) के तथा मयूरचित्रकम् । टेडी चोटीवाले पचीस नक्षत्र यमके पुत्र हैं वे प्रजाके क्षय करनेवाले होते हैं ॥ ७ ॥ वृत्ताकाराश्च विशिखा जलतेलसमप्रभाः॥ द्वाविंशद्भुमिपुत्राश्च दुर्भिक्षायेशदिग्गताः ॥८॥ गोल आकार और जलमें डाले अये तेलके समान कान्तिवाले चोटीदार बाईस तारे पृथिवीके पुत्र है वे ईशान् दिशामें दीख पड़े तो दुर्भिक्ष करनेवाले मानने ॥ ८॥ हिमरश्मिहिरण्याभास्त्रयश्चंद्रसुताः स्मृताः॥ उत्तरस्यां यदा दृष्टास्तदा शुभफलप्रदाः ॥ ९॥ चन्द्रमा और सुवर्णकीसी कान्तिवाले तीन नक्षत्र चन्द्रमाके पुत्र हैं जो वे उत्तरदिशामें दीख परें तो शुभ फल देनेपाले जानने ॥ ९ ॥ क्रूरस्त्रिवर्णनिशिख एको ब्रह्मसुतः स्मृतः ॥ सांस्षाशासु संदृष्टो ब्रह्मदण्डक्षयावहः ॥ १० ॥ क्रूर ( बहुत चमकीला) भोर तीन रंगवाला तथा तीनही शिखा (चोटी) हैं जिसके ऐमा एक तारा ब्रह्मांका
+
भाषाटीकासहितम् । (५)
पुत्र है वह सब दिशाओमेसे किसी दिशामें दीख पडे तो
ब्रह्मदंडसे क्षयकारी होता है ऐसा जानना ॥ १०॥
विसाख्याः शुक्रसुताः सुनिग्धाः श्वेततारकाः ॥
चतुरशीतिसंख्याकाः पुरी दृष्टा भयप्रदाः ॥ ११॥
सुन्दर चिकने श्वेत ( सपेद ) वर्णवाले, विसई नामके
चौरासी नक्षत्र पूर्वदिशामें दीख पडें तो भयके देनेवाले
जानने ॥ ११॥
सुस्निग्धा द्विशिखाश्चैव पटिश्च कनकाह्वयाः॥
शनैश्चरसुता घोरा दुःखदाः केतुतारकाः ॥ १२॥
बहुत चिकने और दो चोर्टीवाले, सुवर्णकी कान्ति-
समान कनकनामके साठ तारे शनैश्वर के पुत्र हैं, वे केतु-
तारे.घोर और दुःखके देनेवाले हैं ॥ १२ ॥
एकतारा महास्वल्पाः शेपाः श्वेता महाप्रभाः।।
सशिखाश्च गुरोः पुत्राः प्रायशा दक्षिणाश्रयाः॥१३॥
नामतोऽधिकचा घोरा पाष्टिपंचाधिकाः स्मृताः ।।
सौम्यपुत्रास्तारकाख्याः सदिक्प्रभवाश्च ते ॥१४॥
(६) मयूरचित्रकम् ।
नाऽतिव्यक्ताश्च रूक्षाश्च श्वेतरूपा भयावहाः ।।
एकाधिकाश्च पंचाशरकेतवः परिकीर्तिताः॥ १५॥
एक तारा बहुत छोटा जिनका श्वेतवर्ण बहुत चमकीले
और चोटीवाले बहस्पतिके पुत्र दक्षिण दिशामें रहनेवा-
ले ॥ १३ ॥ अधिकचनामके पैसठ तारे घोर भयकारी
हैं और वुधके पुत्र तारकनामके सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाश
होनेवाले ॥ १४ ॥ मन्दप्रकाशक और रूखे श्वेत वर्ण
भयके नेहारे इक्यावन केतुके तारे पूर्वाचार्योंने कहहें।
षष्टिः कुजात्मना रक्ता कौंकुमाः सौम्यदिग्गजाः ॥
विशिखाश्च त्रिताराश्च महापापफलपदाः ॥ १६॥
रक्तवर्ण तथा केसरके रंगके साठ नक्षत्र मंगलके पुत्र
है, वे तीन शिखावाले एक एकके तीन तीन दीख पडते
हैं ऐसे तारे उत्तर दिशामें दीखे हुए महा अशुन फलके
देनेवाले जानने ॥ १६ ॥
राहुपुत्रास्त्रयस्त्रिंशत्ख्यातास्तमसकीलकाः॥
चन्द्राऽर्व मण्डलस्थेत लोकानां कष्टदायकाः ॥१७॥
" भाषाटीकासहितम् । तेंतीस केतुतार राहुके पुत्र तमसकीलक नामके चन्द्र- मंडल और सूर्यमण्डलमें निवास करते हैं, यह दीखे दुए तारे लोकको कष्ट देनेवाले होते हैं ॥ १७ ॥ नानावर्णाग्निपुत्राश्च किरन्तोऽग्निद्विवाडिनः ।। विंशोत्तरशतं विश्वरूपा वह्निभयप्रदाः ॥ १८ ॥ अनेक रंगके अनिको वर्षानेवाले दो दो चाटीदार, विश्वरूपनामके एक सौ वीस तारे अग्निके पुत्र हैं ऐसे देखे प्रये तारे भयके देनेवाले होते हैं ॥ १८ ॥ अरुणाख्या वायुपुत्रा वर्णतः श्यामलोहिताः ।। वितारानामरप्रख्या भयदाः सप्तसप्ततिः ॥ १२॥ अहणनामके श्यामलोहितवर्ण अर्थात काले और लाल रंगके, चमरके आकार सतहनर तारे वायुके पुत्र हैं 'सो दीख पडें तो भयके देनेवाले जानने ॥१॥ प्रजापतिसुताश्चाष्टौ तारामंडलवर्तिनः ॥ तारापुंजप्रतीकाशा गणका भयदायिनः ॥२०॥ तारा ( नक्षत्र ) मंडलमें रहनेवाले, नक्षत्रोंके गुच्छा.
(८) मयूरचित्रकम् ।
के समान गणकनाम आठ तोर पनापतिके पुत्र हैं वे जय.
दायक जानने ॥ २० ॥
द्वे शते चैव चत्वारः सशिखाः श्वेतरश्मयः ॥
चतुरस्त्राब्रह्मपुत्रा महाभयकरामताः॥ २१ ॥
दो सौ चार तार चोटीवाले श्वेत किरण जि और
चौकोन वे ब्रह्माके पुत्र महामय करनेवाले हैं ॥ २१ ॥
वंशगुल्मसमाः प्रोक्ता द्वाविंशदरुणात्मजाः ॥
शशिप्रभाश्च काकाख्याः केतवः कष्टदा मताः ॥२२
वांसोंके गुच्छोके सरश बाईस तारे चन्द्रमाकोसी
कान्तिवाले काकनामके वरुणके पुत्र हैं सो आकाशमें
दीख पडें तो यह केतुतारे कटके देनेवाले जानने ॥२२॥
कालपुत्राः कबन्धाख्याः कबन्धसदृशारुणाः ।।
पण्णवतिश्च भयदा हिमरश्मिसमप्रभाः ॥ २३ ॥
कबन्धनामके विना शिरवाले नराकार रक्तपर्ण चन्द्र-
माकीसी कांतिवाले छ्यानव तारे कालके पुत्र हैं दील
पड़ें तो भपके देनेवाले होते हैं ॥ २३ ॥
भाषाटीकासहितम् । (९)
चिदिवपुत्रास्त्वेकतारा विदिक्षु च समाश्रिताः ॥
नवसंख्याश्च विपुला.महाभयनिवेदनाः ।। २४ ॥
एकही समान विदिशाओमें रहनेवाले बडे बडे नव
नक्षत्र विदिशाके पुत्र हैं वे महाभयके देनेवाले होते, २४॥
अथ धूम्रकेतूदयफलम् ।
उत्तरस्यां महास्थूलो निर्मलश्चापरोदयी ।।
दृष्टः करोति मरणं पश्चादन्नसमृद्धिकृत् ॥ २५ ॥
उत्तरदिशामें बडा मोटा निर्मल कांतिवाला एक तारा
उदय होनेसे लोको मृत्यु करनेवाला होता है, पश्वावं
अन्नकी वृद्धि करता है ॥ २५॥
अस्ति केतुः श्वेतचिह्नः कर्वशः क्षुधयावहः ॥
दृष्टः प्राच्यां च शस्त्रास्यस्ताक् स्निग्धश्च पापदः ।।
श्वेत (सपेद) चिहका चाटीवाला शखनाम जो केतु
तारा है सो पूर्वदिशामें दीख पडे तो सुधासे भय देनेवाला
होता है, यदि वही स्निग्ध ( चिकना) होवे तो पापका
देनेवाला जानना ॥ २६ ॥
, (१०) मयूरचित्रकम् ।। कपालाख्यो धूम्रशिखो दृष्टः सर्वजलापहः । प्राग्व्योमाईविहारी स्यात्तथा शुन्मृत्युकारकः॥२७॥ कपालनामक तारा जोधुआंके समान चोटीवाला पूर्व- दिशामें आधे आकाशतक फैला हुआ होता है, वह दीख पडे तो सम्पूर्ण जलको नाश करनेवाला अर्थात् अवर्षण करनेवाला तथा क्षुधा और मृत्युका करनेवाला होता है, बडा भारी काल पडे ऐसा जानना ॥ २७ ॥ प्रागनिमार्गः स्थूलाया दृष्टः स्यादरुणप्रभः ।। व्योमविभागगामी च रोद्रः क्षुद्भयकारकः ॥ २८॥ पूर्व और अनिदिशामें फैला हुआ लाल रंगका आगेसे मोटा एक भयानक तारा-दीख पडे तो वह क्षुधासे भयका करनेवाला अर्थात महादुर्भिक्ष करनेवाला होताहै ॥२८॥ पश्चिमाशास्थिनो यस्तच्छिखायाम्यायसंस्थितः ।। यथा यथोदयं गच्छेत्तथा देय प्रयात्यसो ॥ २९ ॥ संस्पृशन्वे मुनीन्सप्त ध्रुवं चाभिजितं तथा ।। व्योमाईमा भित्त्वावे याम्येनास्तं प्रयाति च ३०॥
भाषाटीकासहितम्। पश्चिमदिशाम स्थित जो चोटीवाला दक्षिणकी ओरके अग्रभाग जिसका सो जैसे जैसे उदय होता जावे तैसे तैसे उसकी चोटी बढ़ती जाती है ॥ २९ ॥ और सप्त- ऋषि, ध्रुव तथा अभिजित इन नक्षत्रोंको स्पर्श करता हुआ आधे आकाशतक फैलकर दक्षिणदिशाम अस्त हो जाता आप्रयागादवन्ति च पुष्करारण्यमेव च ॥ मध्यदेशमुदग्भाग देषकाख्यं तथैव च ॥ ३१ ॥ धवलाख्यो निहन्त्याशु केतुर्दुःखभयप्रदः ॥ देशेष्यन्येषु दुर्भिक्षं दशमासावधि स्मृतम् ॥ ३२॥ यह देवक तथा धवल नामका तारा प्रयागसे लेके पुक- रवन तथा मध्यदेशके उत्तरमागसे दक्षिण उज्जैन नगरीतक- के अन्तर्गत जो देश हैं ॥ ३३ ॥ उनको यह केतुतारा शीष नाश करता और दुःख भयको देनेवाला है, अन्यदे- मॉम दस महीनेपर्यन्त दुनिसको करनेवाला जानना३२॥ धूम्राकारा शिखा यस्य कृत्तिकायां समाश्रिता ॥
(३२) मयूरचित्रकम् । दृश्यते रश्मिकेतुः स्यारसप्ताहानि शुभप्रदः ॥३३॥ धुआके आकार चोटी जिसकी कृत्तिकानक्षत्रसे लगी हुई ऐसा रश्मिकेतुनाम तारा होताहै तो सात दिनतक आ- काराम दीख पडे तो शुn फलका देनेवाला जानना ॥ ३३॥ त्रयोदशर्के याम्यादौ दृष्टो धूम्राह्वयः शिखी ॥ महाभयकरः प्रोक्ता ज्येष्ठाया वा समाश्रितः॥३४॥ सप्ताहाभ्यधिको दृष्टो दशवर्षाणि दुःखदः ॥ गृहपर्वतवृक्षेषु सेनागोपुष्करेषु च ॥ ३५॥ दिव्यान्तरिक्षभामाख्यो धूम्रकेतुःप्रदृश्यते ॥ यदा तदा विनाशाय प्राणिनां भवति ध्रुवम् ॥३६॥ जो धूम्रकेतु ताराकी शिखा (चोटी) हस्तनक्षत्रमें वा परणीमें अथवा ज्येष्ठानक्षत्रमें लगी हुई होवे तो यह ताग महाभयकारी कहा है ॥ ३४ ॥ रश्मिकेतु तारा जो सात दिनसे अधिक दिन दीख पडे तो दशवर्षतक दुःख देनेवाला होताहै नया घर, पर्वत, वृक्ष, सेना, गो- शाका, पुष्पवाटिका इन स्थानोंके विषे ॥ ३५ ॥ दिव्य झापाटीकासहितम। (१३) अन्तरिक्ष, भौम नाम धूम्रकेतुका जो तारा है सो दीख पडे तो निश्चयकरके प्राणियोंका नाश करनेवाला होताहै ३६ सकृयामेकदृष्टश्च मण्याख्यः सूक्ष्मतारकः ॥ शिखास्यसूक्ष्माऋग्वीच पंचमासान्सुभिक्षकृत् ३७ धूम्रकेतुका छोटा तारा मणिनामका जिसकी छोटीसी चोटी सीधी होती है, ऐसा तारा एक वार एक पहरतक दीख पडे तो पांच मासतक समिक्षका करनेवाला होता जलकेतुर्महास्निग्धा शिखा यस्यापरोन्नता॥ दृष्टः करोति शान्ति च नव मासान्सुभिक्षकृत् ३८॥ बहुत चिकना पश्चिमकी ओर ऊँची चोटीवाला जल- केतुनामका तारा दीखे तो नव मासतक सुभिक्ष और शा- न्तिको करता है ॥ ३८॥ भवेत्केतोश्च सुस्निग्धा हरिपुच्छोपमा शिखा ॥ सूक्ष्मकतारा प्राग्दष्टा लोकानां शुभदा मता॥३९॥ एक सुन्दर चिकना घोडेकी पुच्छसरीखी चोटीवाला (१४) मयूरचित्रकम् । छोटा केतु तारा पूर्वदिशामें दीख पडे तो लोकोंको शुभ देनेवाला होताहै ऐसा जानना ॥ ३९ ॥ पद्मकेतुर्गुणालाभः पश्चिमायां प्रहश्यते ॥ निशमेकां तदा सप्त वर्षाणि च सुभिक्षकृत् ॥ ४०॥ परतुनामक तारा कमलनालके समान पतली चोटी वाला पश्विमदिशामें दीख पडे तो सात वर्षतक सुभिक्षका करनेवाला जानना ॥ १० ॥ आवर्तकः सव्यशिखो निशाई संप्रदृश्यते ।। यावन्मुहूर्तान रक्ताभस्तावन्मासान्सुभिक्षकृत्॥४१॥ जिसके बायें और चोटी होय ऐमा आवतंकनामका तारा लाल रंगका अर्थरात्रिसमय जितने मुहूर्ततक दीख पडे उतनेही भासतक सुनिक्ष करनेवाला जानना ॥४१॥ सन्ध्याकाले पश्चिमायां शूलाकारोरुणप्रभः ॥ विययशं समाक्रम्य स्थितो यः संग्रहश्यते ।। यावन्मुहूर्तास्तावन्ति वर्पाण्यशुभदः स्मृतः ॥४२॥ जो संध्यासमय पश्चिमदिशामें शुलके आकार लाल भाषाटीकासहितम् । (१५) रंगका तारा आकाशके तिहाई मागमें फैला हुआ दीख पडे जितने मुहूर्तपर्यन्त दिखाई देवे उतने वर्ष शुमका देनेवासा कहा है यहां दो घडीका मुहूर्त जानना ॥ ४२ ॥ यस्मिन् ऋक्षे स्थितः केतुराकाशे संप्रदृश्यते ॥ तद्दिश्यूहान्समाहन्ति ऋशदेशान् वदामि तत्॥४३ जिस नक्षत्रपर स्थित भया केतु आकाशमें दीख पडे तो उस नक्षत्रकी दिशाके देशोंको नाश करे है अब कौनसे नक्षत्रपर कोन देशका नाश करे है सो कहता हूं ॥४३॥ अश्विन्यामश्वकं हंति याम्ये केतुः किरातकान् ।। वह्नो कलिंगनृपतीन् रोहिण्यां शूरसेमकान् ॥४४॥. अश्विनीनक्षत्र में जो केतुका उदय हो तो अश्वकदेश. को नाश करता है, भरणीनक्षत्रमें केतु उदय होनेसे किरात- देशको, कत्तिकाम कलिंगके राजाको, रोहिणी में शूरसेन- देशको नाश करे है ॥ ४४ ॥ मोशीनरं मृगे रौद्रे जलनीवाधिपे तथा ॥, अदितोश्मकनाथं च पुप्ये च मगधाधिपम् ॥ १५॥ १ मयूरचित्रकम् । अशिकेशं च भौजंगे मघायां चागनायकम् ॥ भगभे पाण्डुनायं च अर्य्यम्णे चोजयिन्यकम् ४६॥ मृगशिरा और आदपिर केतुका उदय हो तो औशी- नर तथा जलजीवोंके स्वामीको हानि पहुंचावे और पुन- वसुपर अश्मकदेशके राजाका, पुष्यमें मगधदेशके राजाका ॥ ४५ ॥ और आश्लेषामें अशिकेशदेशका, मघापर अंगदेशके राजाका, पूर्वाफाल्गुनीमें पाण्डुदेशके राजाका, उत्तराफाल्गुनीमें उज्जैनका नाश करे ॥ ४६॥ कुरुक्षेत्राधिपं त्वाप्टे हस्ते दंडकनायकम् ॥ वाते कांबोजकाश्मीरो द्विदेवे कोशलाधिपम्॥४७॥ मैत्रे पोडाधिनाथं च सार्वभौमं पुरन्दरे ॥ मूले भद्राधिनाथं च जलदेवे च काशिपम् ॥४८॥ चित्रामें केतृदय हो तोकुरुक्षेत्रके राजाका, हस्तपर हो तो दण्डकदेशके राजाका, स्वाति काबोज और काश्मी- रका, विशाखापर हो तो कोशलदेशके राजाकर १४७ ॥ अनुराधापर पौंड्रदेशके राजाका, ज्येष्ठापर सब देशों के मापाटीकासहितम् । (१७). राजाओंका, मृटमें भद्रदेशके राजाका, पूर्वापाढापर हो तो काशीके राजाका नाश करे ॥४८॥ योधे चार्जुनद्यांश्च वैश्वदेवे विधि तथा ॥ श्रवणे केकयाधीशं पांचालं वासवे तथा ॥४९॥ वारुणे सिंहलपति पूर्वाभाद्रे च बंगपम् ॥ अहिर्बुध्न्ये नैमिपपं रेवत्या केरलाधिपम् ॥ ५० ॥ उत्तराषाढापर तथा अभिजित् नक्षत्रपर केतुका उदय हो तो योधदेश अर्जुनदेश और चंदेलीके राजाका, श्रवण- पर केकयदेशके राजाका तथा धनिष्टामें पांचाल (पंजाब) देशके राजाका ॥ १९ ॥ शतभिपानक्षत्रमें सिंहलदेशके राजाका, पूर्वाभाद्रपदापर बंगालदेशके राजाका, उचरा- भाद्रपदापर नैमिषपतिका, रेवतीपर केरलटेशके स्वामीका केतु नाश करे है ॥ ५० ॥ यस्यां दिइयुदयं याति केतुस्तामभियोजयेत् ॥ यतो यतः शिखा याति राजा गच्छेत्ततस्ततः५१॥ जिस दिशामें केतृदय होता है उस दिशाको नाश क.
(१८) मयूरचित्रकम् । रनेवाली जानना और जिस दिशामें केतुकी चोटी तक फैलती है, वहांही राजाको नाश करनेवाला जानना ॥ ५ ॥ पंचोत्तरशतं त्वं केतुनां प्रवदन्ति च ॥ चतुर्दश रखेः पुत्रा वरुणस्य दशैव तु ॥ ५२॥ आग्निपुत्राश्चतुस्त्रिंशद्यमस्य : नव कीर्तिताः ॥ अष्टादश कुबेरस्य · वायोविंशतिरीरिताः॥ ५३॥ कोई एक आचार्य एक सौ पांच केतु वर्णन करते हैं, उनमें चौदह सूर्य के पुत्र हैं, दश केतु वरुणके पुत्र हैं ॥ ५० ॥ और चौतीस अभिके पुत्र हैं, नव यमके पुत्र कहे हैं, अठारह कुबरके पुत्र हैं, वीस केतु... वायुके पुत्र कहे हैं यहा सब १०५ केतु कहे हैं ॥ ५३॥ अथ प्रतिमासे केतूदयफलम् । आश्विने र कातिक सूर्यपुत्राणामुदयं - यदि ॥ मेघा जलं न मुंचन्ति दुर्भिक्षं च तदादिशेत् ॥ ५४॥ चतुष्पदा विनश्यन्ति - राजानः कलहप्रियाः ॥
भापाटीकासहितम् ।
पारायणेन लिखितं मिहिरेण च भाषितम् ॥ ५५ ॥
आश्विन (कुंचार ) और कार्तिक मासमें सूर्यके पुत्र
को १४ केतु हैं उनका उदय होवे तो मेघ जल नहीं वर्ष
और दुर्भिक्ष ( अकाल ) पडे ॥ ५४ ॥ तथा चौपायोंका
नाश होणे, राजाऑमें कलह होवे यह नारायणन लिखा
मौर वराहमिहिराचाप्यने वर्णन किया है ॥ ५५ ॥
वारुणा उदयं याति श्रावणे च नभस्यके ।
स्यात्पृथ्वी जलसस्याट्यालोकाश्वानन्दसंयुताः५६
वरुण के पुत्र जो दश केतु सो भावण और भाद्रमासंभ
उदय होय तो पृथिवी जल और धान्यसे युक्त होवे और
सम्पूर्ण मनुष्य आनन्दसे संयुक्त होवें ॥ ५६ ॥
मार्ग मासि तथा पोपे दृश्यन्त वातपुत्रकाः ।।
अग्निचोरभयं तत्र प्रजा नाशं प्रयान्त च ॥५७॥
मार्गमास तथा पौषमासमें अनिके पुत्र ३४ केतु दीख
पर्द तो अग्नि चौरसे जय होते, और 'प्रजाका नाश
हो ॥ ५७॥
(२०) मयूरचित्रकम् ।
पृथिवी भयसंयुक्ता प्राणिनां व्याधिमादिशेत् ॥
चैत्रमाधवमासे तु कुबेरस्यात्मजः किल ॥१८॥
यात्युद्गमं तदा मघा बहुवारिप्रदा मताः ॥
धनधान्ययुता पृथ्वी प्रजाश्वानन्दसंयुताः ॥१९॥
और पृथिवीपर भय होवे तथा प्राणियों में रोग
उत्पन्न होवे चैत्र और वैशाखमासमें कुबेरके पुत्र जो
१८ केतु हैं ॥ ५८ ॥ वे जो उदय हो तो मेघ,बहुत
जल वर्षे, और पृथिवी धनधान्यसे परिपूर्ण होते, तथा
प्रजा सुखी होवे ॥ ५९॥
यमजाश्चोदयं यान्ति माधफाल्गुनयोः किल ॥
पृथिवी भयसंयुक्ता दुर्भिक्षं च समादिशेत् ॥६० ॥
यमके पुत्र जो केतु ९ हैं सोमाव या फाल्गुनमें उदय
होवे तो पृथिवीपर भय हो तथा दुर्भिक्ष (अकाल)
पडे ॥ ६० ॥
वायुपुत्राः प्रदृश्यन्ते ज्येष्ठमासे शुचौ - तथा ॥
उद्धता वांति वाता वैदिशश्चरजसा वृताः ॥ ६ ॥
भाषाटीकासहितम् । (२१) पतन्ति गिरिशृंगाणि निपतन्ति महीरुहाः ॥ चौराग्निजानता पीडा राजानः कलहप्रियाः॥६२॥ वायुके पुत्र (00 केतु के तारे ज्येष्ठमास तथा भाषाढमासमें दीख पडें तो निश्चय प्रचंड पवन चले और दिशायें शुलमे ढक जावें ॥ ६१ ॥ पर्वतोंके शिखर गिर जांया वृक्ष उखड जाय, चोरांसे तथा अग्निसे पीडा होवे राजाऑमें कलह ( लडाई) होये ॥ १२ ॥ अथ ग्रहाणां योगफलम। रोदनक्षत्रगावेतो यदि सूर्यमहीसुतौ ॥ मास महर्षतां यान्ति धान्यानि स्वस्थता पुनः॥६॥ अब आगं ग्रहोंके योगोंके फल वर्णन करते हैं, जो आननक्षत्रपर सूर्य मंगल होये तो एकमासपर्यन्त अन्न महंगा रहे, उपरांत भाव सस्ता हो जावे । ६३ ॥ भानुकेतू च भरणी मृगं वा यदि चास्थितो॥ लवर्ण महर्घतां याति सिधुदेशोद्भवं विडम् ॥६॥ सूर्य और केतु जो भरणी वा मृगशिरानक्षत्रपर स्थित (२२) मपूरचित्रकम् । होवे तो सिंधुदेशमें उत्पन्न लवण (सेंधानमक ) और विड ( साँचर ) लवण महंगा होवे ॥६४ ॥ बुधशुक्रमहीपुत्रा भुजंगः समाश्रिताः ।। नन्दन्ति का सुखिनः सुभिक्षं जनयन्ति च ६५ जो बुध, शुक और मंगल यह तीनों आश्लेषा नक्षत्रपर स्थित हो तो लोकमें मनुष्यादि सुखी होवें और सुभिक्ष (सस्ता) भाव होवे, सम्वत्सर अच्छा होवे ॥६५॥ स्वाति याति यदा भीमो खती यदि भास्करः ।। चलचित्ता महीपालाः प्रजा नाशं प्रयाति च ॥६६॥ जोखातिका मंगल हो और रेवतीका सूर्य होवे तो राजाओंका चित्त चलायमान हो प्रजाका नाश होवे॥६६ अनुराधां गतः शोरिज्येष्ठायां च बृहस्पतिः ॥ पश्चिमायां तदा युद्धं प्रजा नाशं प्रयाति च ॥६७॥ जो अनुराधानक्षत्रपर शनैश्चर और ज्येष्ठापर बृहसति होवे तो पश्चिममें युद्ध और प्रजाका नाश होवे ॥६७ ॥ मूले मन्दो बुधः स्वात्यां मघायां चन्द्रमा यदि ।।
भापाटीकासहितम् । (२३) संग्रहे संवैधान्यानांलाभो भवति नान्यथा ॥ ६८॥ जो मूलनक्षत्रका शनेश्वर और स्वातिका बुध मधाका चन्द्रमा होवे, तब सब अन्नोंको संग्रह करनेसे लाभ होता है इसमें संशय नहीं जानना ॥ ६८ ॥ विश्वेशभे भगे मन्दाः सप्तमः यदा रविः ॥ तदा जलविनाशः स्यात्प्रजानां कदनं महत् ॥६९॥ उत्तरापाढा नक्षत्रपर या पूर्वाफाल्गुनीनक्षत्रपर शनैश्वर होवे और पुनर्वसमें सूर्य हो तो जलका विनाश (अवर्षण) और प्रजाको पीडा बहुत होये ॥ ६९ ।। श्रवणक्षे यदा करो ग्रहः कश्चित्समाश्रितः॥ अन्नं मरतां याति गोधूमाश्च विशेषतः ॥ ७० ॥ जय श्रवणनक्षत्रपर कोई कृर ग्रह स्थित होने तो अन्न महँगा होता है, विशेषकरके गेहूं महंगा हो जाता है ॥७. वासवः यदा शोरिभूमिपुत्रण संयुतः ॥ न वर्षति जलं मेघाः सस्यहानिश्च जायते ॥ ७१॥ जो मंगलके साथ शनैश्वर धनिष्ठानक्षत्रपर होवे तो (२४) मयूरचित्रकम । मेघ जल नहीं वर्षे अर्थात वृष्टि नहीं होये और धान्यकी हानि होवे ॥ ७१ ॥ वारुणे च यदा जीवश्चित्रायां धरणीसुतः ॥ तदा नश्यांत गोधूमाः सस्यदानिमहर्षता ॥ ७२ ।। जो शतभिषाका बृहस्पति और चित्राका मंगल हो तो गेहूं नहीं होवे और सस्यकी हानि होवे तथा अन्न महंगा होवे ॥ ७२॥ भानुभौमो भृगुश्चैव शनिक्षेत्रे समाश्रिताः ॥ यदा निशापतिस्तत्र तदा दुर्भिक्षतो भयम् ।।७३।। जो सूर्य मंगल और शुक्र यह तीनों शनैश्वरकी राशि (मकर कुंभ) में स्थित हो चन्द्रमामी साथमें हो तो दुर्भिक्षसे भय होवे अर्थात् अकाल पडे ॥ ७३ ॥ वृपे राहुर्यदा भौमः पठेमासि महाभयम् ॥ भवत्यत्र न सन्देहस्तदा दुर्भिक्षपीडनम् ।।७४ ॥ जो वृपराशिका राहु और मंगल हो तो छठे भाषाटीकासहितम् । (२५) महीनेमें महाभय और दुर्भिक्ष पीडा होवे इसमें संदेह नहीं करना ॥ ७४॥ मिथुनः सूर्यपुत्री राहुर्वा यदि संस्थितः ॥ दुर्भिक्षं जायते तत्र पश्चिमायां नृपक्षयः ॥ ७५ ।। जो मिथुन राशिका शनि हो अथवा राहु हो तो दुर्भिक्ष होवे और पश्चिममें राजाओंका क्षयहोवे ।। ७५ ॥ रविराहुमहीपुत्राः शशिशुक्रशनैश्चराः ॥ एकराशिं गता ह्येते तदा पृथ्वी भयाकुला ॥ ७६॥ जो सूर्य, राहु, मंगल, चंद्रमा, शुक, शनैश्वर ये ग्रह एक राशिमें स्थित हों तो पृथिषी अयसे आकुल होय अर्थात पृथिवीपर सब मनुष्य भयसे युक्त होय ॥ ७६ ॥ पूर्वदेशे महापीडा नृपाणां संक्षयो भवेत् ॥ प्रजानाशो व्याधिभयं तस्मिन्काले न संशयः॥७॥ और पूर्वके देशों में महापीडा व राजाओंका क्षय होवे तथा प्रजाका नाश और व्याधिसे भय होवे उस समय में ऐसा हो इसमें कुछ सन्देह नहीं ॥७७ ।।
(२६) मयूरचित्रकम् । सूर्यारचन्द्रमन्दाश्च राहुचन्द्रसुता यादि । एकराशि गता होते दक्षिणस्यां भयप्रदाः ॥७८॥ सूर्य, मंगल, चन्द्र, शनि, राहु, बुध ये ग्रह एकराशिम स्थित हो तो दक्षिण दिशामें मय देवे ॥ ७८ ॥ एकराशिं गता होते कुजाऽकंशानिराहवः ।। शुको गुरुश्च तत्रैव तदा भयविवर्धनः ॥ ७९ ॥ एकराशिम मंगल, सूर्य, शनि, राहु, शुक्र, गुरु होवें तो जगत में भयकी वृद्धि होवे ॥ ७९ ॥ उत्तो क्षत्रभंगः स्यानाऽत्र कार्या विचारणा ॥ रविचन्द्रकुजा जीवमन्दचन्द्रसुता यदि ॥ ८० ॥ समाश्रिता ोकराशिं तदा पृथ्वी भयाकुला॥ मज्ञां नाशो व्याधिभयं प्रजानां संक्षया भवेत्।।८१॥ और उत्तर दिशामें किसी राजाका छत्रभंग हो जो सूर्य, चन्द्र, मंगल, गुरु, शनि, बुध ॥ ८०॥ एक राशिपर स्थित हों तो पृथिवीपर तय हो, और राजाओंका नाश, रोग भय व प्रजाका क्षय होवे ॥ ८॥ - r - भापाटीकासहितम् । (२७) कुजार्कजीव शुक्राश्च यदेकर समाश्रिताः ॥ भयं व्याधि प्रकुर्वन्ति सर्वधान्यमहर्षता ॥ ८२ ॥ जो मंगल, सूर्य, गुरु, शुक एकराशिपर स्थित हो तो भय और व्याधिको करें व सम्पूर्ण अन्न महंगे हो।। ८२॥ कुजाकेंन्दुज्ञजीवाश्च सिंहराशिं समाश्रिताः॥ . छबभंगः प्रजानाशो भयभीता च मेदिनी-11८३॥ मंगल, सूर्य, चंद्र, बुध, गुरु ये ५ ग्रह सिंहराशिपर स्थित हों तो राजाका छत्रांग, प्रजाका नाश हो और पृथिवी भयसे पीडित होवे ॥ ८३ ॥ एकराशिं गता ह्येते सोम्यशुक्रदिनाधिपाः ।। सर्वधान्यमहर्घत्वं मेघाः स्वल्पजलपदाः ।। एकनक्षत्रगाद्यते तदा भयविवर्द्धनाः॥ ८४॥ एकराशिपर बुध, शुक्र, सूर्य ये ग्रह होवे तो सब अन्न महंगे हों और दृष्टि थोडी होवे, यदि एक नक्षत्रपर यह ग्रह हों तो भय अधिक बढे ॥ ८४ ॥ बड़ा जीवयुतो मन्दो नीवादा सतम स्थितः ॥ .
(२८) मयूरचित्रकम्
तदा प्रजा विनश्यन्ति भूयश्चानपरिक्षयः ॥ ८५ ॥
जो बृहस्पति शनि एकराशिपर हों अथवा बृहस्पतिसे
सप्तम शनि हो तो प्रजाका विनाश और अन्नका नाश
होवे ॥ ८५॥
कर्कमीनमृगस्त्रीषु शनि मो यदा स्थितौ ॥
तदायुद्धाकुला पृथ्वी धनधान्यविवर्जिता ।। ८६ ॥
जो कर्क, मीन, मकर, कन्या इन राशियोंपर शनि
और मंगल होवे तो पृथिवीपर युद्ध बहुत होवे और प्रजा
धनधान्यसे रहित होवे ॥ ८६ ॥
मिथुनस्त्रीधनुर्मीनराशो मन्दो यदा भवेत् ॥
तदा भूपा विनश्यन्ति पृथ्वी शोणितपूरिता ।। ८७ ।।
जो शनैश्चर मिथुन, कन्या, धन, मीन इन राशियोंपर
हो तोराजाओंका विनाश हो और पृथिवी रुधिरसे पूरित
होवे ॥ ८७ ॥
रविशुक्रराचार्या यदेकत्र समाश्रिताः ।।
राजभ्रंशः प्रजानाशः सर्वसस्यमहर्घता ॥ ८८॥
भाषाटीकासहितम् । (२९)
सूर्य, शुक्र, गुरु यह ग्रह जो एकराशिपर हो तो
राज्यका बिगाड, प्रमाका नाश और सब तृणसंज्ञक धान्य
महंगा होये ॥ ८८॥
रविभार्गवभौमाश्च राशिमेकं समाश्रिताः ॥
घृततेलमसूरानं महर्षति महाभयम् ॥ ८९ ॥
सूर्य, शुक्र, मंगल यह एकराशिपर हो तो घी, तेल,
मसूर यह अन्न महंगे हों और महाभय होवे ॥ ८९ ।
सुरेज्यकविमन्दाश्च राहुरेकत्र संस्थिताः ॥
मेघा जलं प्रभुचन्ति सर्वधान्यमहर्षता ।। ९० ॥
गुरु, शुक्र, शनि, राहु यह चारों यह एकराशिपर स्थित
हो तो वृष्टि बहुत होवे तोभी सब अन्न महंगे हो ॥ ९ ॥
रविझगुरुमन्दाश्च राहयुक्ता यदा स्थिताः॥
सुभिक्षं क्षेममारोग्यं तस्मिन्काले न संशयः॥९१ ॥
सूर्य, बुध, गुरु, शनि और राहु यह ग्रह जो एकरा-
शिपर हो तो उस समयमें अन्न सस्ता हो, भौर प्रणामें
क्षेम तथा आरोग्यता होवे ॥ ९ ॥
(३०) मयूरचित्रकम् ।
एकराशिं गता ह्येते भीमभार्गवसूर्यजाः ॥
तदा भूपा विनश्यन्ति प्रनानां संक्षयो भवेत्॥१२॥
जो मंगल, शुक, शनि यह एकराशिपर स्थित हों ।'
राजाओंका नाश और प्रजाका क्षय होवे ॥ ९२ ॥
शुक्रमन्दारनीवाश्च यदेका समाश्रिताः ॥
मेघा जलं न मुंचंति दुर्भिक्षं जायते तदा ॥ ९३ ॥
शुक्र, शनि, मंगल, गुरु, यह ४ ग्रह जो एकराशिपर
स्थित हों तो वर्षा नहीं हो और दुर्भिक्ष हो अर्थात
अकाल पडे ॥ ९३ ॥
. (३२) मयूरचित्रकम् । बृहस्पति, सूर्य, शुक्र, शनि यह जो मंगलके एक राशिपर स्थित हो तो राजाओंको पीडा, अन्न महँगा होवे और लोको कोलाहल होवे जिससे प्रमा: व्याकुल होवे । ९८॥ शनिराहू यदेका भवेता सहितो यदा ॥ संवैधान्यमहर्षत्वं राजानो भयविह्वलाः ॥ ९९ ॥ जो शनि, राहु एक राशिपर हो तो सब अन्न महंगे हों और राजाओंको भयसे व्याकुलता हो ॥ ९९ ॥ एकराशिगतावेतो धरापुत्रांगिरासुतौ ॥ तदा मेघान वर्षन्ति वर्षाकाले न संशयः ॥१०॥ मंगल गुरु यह दोनों यह एकराशिपर स्थित हों तो वर्षासमयमें मेघ नहीं वर्षा कर इसमें सन्देह नहीं॥१०॥ महीसुतो देत्यपुरोहितो गुरुयंदेकनक्षत्रसमा. श्रिता ग्रहाः ॥ तदा सुभिक्षं च यवानसंग्रहे मासे चतुर्थे विपुलो हि लाभः ॥ १॥ जो मंगल, शुक्र, बृहस्पति यह तीनों ग्रह एक नज्ञत्रपर -- मापाटीकासहितम् । स्थित हों तो मुक्षि ( सस्ता) हो और जब अन्नसंग्रह करनेसे चौथे महीने में बहुतही लान हो ॥ ३ ॥ सप्त ग्रहा थदैकस्था गोलयोगस्तदा भवेत् ॥ दुर्भिक्ष राष्ट्रपीडा च तस्मिन् योगे न संशयः॥२॥ जो सात ग्रह एक राशिपर स्थित हो तो गोलयोग होता है, इस योगसे निस्सन्देह देशमें दुर्मिक्ष और राज- पीडा तथा प्रजामें क्लेश होवै ॥ २ ॥ अग्रे याति दिवानाथः पृष्टे च भृगुनन्दनः ॥ मध्ये सोमसुतो याति भवत्यन्नमहर्षता ॥ ३ ॥ आगेको राशिपर सूर्य और पीछेकी राशिपर शुक्र होवे और दोनोंके मध्यमें बुध हो तो अन्नका भाव तेज हो जाता है ॥ ३ ॥ गच्छतोऽये शुक्रशनी बुधः पृष्ठं समाश्रितः ॥ धनधान्याकुला पृथ्वी प्रजा नन्दन्ति सर्वशः ॥४॥ भागे शुक्र, शनि हो और बुध इन दोनोंसे पीछे राशि- पर स्थित हो तो पृथिवी धन और धापसे परिपूर्ण .
(३४) मयूरचित्रकम् । होवै और प्रजा सब प्रकारसे सुखी होवे ॥ ४ ॥ भोमस्य पृष्टतो याति भानुश्चेजलशोपकः ॥ भवत्यत्र न संदेहो विपरीतो जलप्रदः ॥५॥ जो मंगलके पीछेकी राशि वा अंशपर सूर्य होय तो जल सूख जावै अर्थात वर्षा नहीं हो, इससे विपरीत अ. र्थात् सूर्यके पीछे मंगल हो तो वर्षा होवे इसमें सन्देह नहीं ॥ ५ ॥ मेपे समाश्रितो भानुर्वषे च धरणीसुतः ॥ भयव्याधियता लोका नृपाणां विग्रहो महान् ॥ ६॥ मेषराशिका सूर्य और वृपराशिका मंगल होवै तो लोकमें प्रजा भय और रोगसे युक्त हेरि, तथा राजाओंमें बहुत विग्रह (बिगाड) होवै ॥ ६ ॥ वृषराशिं यदा प्राप्ताः शनिभार्गवभूमिजाः॥ दुर्भिक्ष राष्ट्रभंगं च लोकानां भयमादिशेत् ॥७॥ जो वृषराशिपर शनि, शुक्र, मंगल यह ३ ग्रह हो तो दुर्भिक्ष हो और राज्यभंग तथा लोकोंमें भय होवे ॥७॥ प
मापाटीकासहितम् ।
(३५)
मेपे शनैश्चरो भानुर्भार्गवो भूमिजस्तथा ॥
दुभिज्ञ लोकपीडा च भवेत्पृथ्वी भयाकुला ॥ ८॥
भेषपर शनैश्वर, सूर्य, शुक्र, मंगल यह ग्रह हो तो
दुर्मिक्ष ( तेजी) और लोकमें पीडा, तथा पृथ्वीपर मय
होवै ॥ ८॥
,
कृपे भानुः कुजः शोरिस्तदा युद्धं समादिशेत् ।।
नवर्षन्ति जलं मेघा दुर्भिक्षं लोकपीडनम् ॥९॥
जो वृपराशिपर सूर्य, मंगल, शनि हो तो राजाऑमें
युद्ध हो, मेघ जल नहीं वर्षे, और दुर्भिक्ष तथा लोकमें
पीडा हो ॥ ९॥
मीनराशिगते मन्दे कर्कटस्थे बृहस्पती ॥
तुलाराशिगते भौमे तदा दुर्भिक्षमादिशेत् ॥११॥
भीनराशिपर शनि, कर्कके वृहसति, तुलाराशिपर
मंगल हो तो दुर्भिक्ष हो अर्थात् अकाल प? ॥ ११०॥
शुकार्किभूमिपुत्रा हि तुलाराशिं समाश्रिताः ।।
तदा मुद मदापोर राज्ञां चैव परस्परम् ॥३३॥
मयूरचित्रकम् ।
शुक्र, शनि, मंगल यह तीनों ग्रह तुलाराशिके हों तो
राजाओंमें परस्पर महायुद भयका देनेवाला होवै॥१३॥
चन्द्रभागंवधरामुता यदा मीनराशिमुपवाति वे
तदा ॥ दुर्लभं भवति सर्वधान्यकं वारि-
दश्च न जलं प्रमुंचति ॥ १२॥
चंद्रमा, शुक्र, मंगल यह ग्रह जो मीनराशिपर हों तो
सब अन्न महंगा हो जाय और मेघोंसे जल नहीं वः॥ १२
गुरुयुक्तः शनिवकं करोति च यदा तदा ॥
नवमे मासि गोधूमतिलतैलमहर्षता ॥ १३ ॥
जब बृहस्पतिसे युक्त शनैश्वर वक्री होय तब नववे
मासमें गेहूँ, तिल, तेल यह महंगे हो जावै ॥ १३ ॥
गुरुशुक्रावेकराार्श गौ दुर्भिक्षदुःखदो।
युद्धदो शनिमाहेयो तदा दुर्भिक्षकारको ॥ १४ ॥
बृहस्पति, शुक्र यह दोनों जो एक राशिपर हों तो
दुशिक्षसे पीडा हो और दुःख हो, शनि, मंगल यह एक
राशिार हों तो युद्ध तथा दुर्तिक्ष ( तेजी) होते॥१४॥
-
भाषाटीकासहितम् । (३७)
यदा शुभग्रहः कश्चिदतिचारं करोति च ॥
तदा नृपाः क्षयं यान्ति दुर्भिक्षं तत्र दारुणम् ॥१५॥
जो कोई शुभयह अतिचारगत होवे तो राजाओंका
नाश और दारुण दुर्भिक्ष हो अर्थात् महाकाल
पैडै ॥ १५॥
अतिचारं यदा क्रूरो ग्रहः कश्चित्करोति च ॥
तदा नन्दन्ति राजानो धनधान्याकुला घरा ॥ १६॥
जब कोई क्रूर ग्रह अतिचारी हो तो राजालोग सुखी
हों और पृथिवी धनधान्यसे परिपूर्ण हेचि ॥ १६ ॥
यदातिचारगो मन्दो वक्री भूतोंगिरः सुतः ॥
तदा नन्दन्ति राजानो धनधान्याकुला धरा ॥ १७
जो शनैश्चर अतिचारी हो, वृहस्पति वक्री होवै तो
राजालोग सुखी होवें, और पृथिवी धनधान्यसे पूरित
होवै ॥ १७ ॥
यदा क्रूरग्रहो वक्री शुभश्चैवातिचारगः ॥
तदा भवति दुर्भिक्ष राज्ञां युद्ध परस्परम् ॥१८॥
मयूरचित्रका
जब क्रूरग्रह वक्री और शुभग्रह अतिचारी हो, तब
दुर्मिक्ष (तेजी ) हो, और राजाओंका परस्पर युद्ध
होवे ॥१८॥
यस्मिन्मासे पूर्णिमायां यदा वर्षति वारिदः॥
गोधूमघृतधान्यानां तस्मिन्मासे महर्षता ॥ १९ ॥
जिस महीनेमें पूर्णिमाके दिन वर्षा होवे तो तिस मही-
नेमें गेहूँ, घी, अन्न महँगा हो जावै ॥ १९ ॥
यदा मलिम्लुचे मासि भोमो राश्यन्तरे व्रजेत् ॥
गुरुवा महती वृष्टिरथ वा लोकसंक्षयः ॥ १२० ॥
जो मलमासमें मंगल वा बृहस्पति दूसरी राशिपर जावै
तो वो बहुत हो अथवा लोकका क्षय होवै ॥१२० ॥
कार्तिके मार्गशीर्षे च संक्रांतो वारिवर्षणम् ।।
तदा महर्षता पोपे सस्यबुद्धिश्च मध्यमा ॥ २१॥
कार्तिक और मार्गशिरमासमें संक्रांतिके दिन जो मेघ
वर्ष तो पौषमें अन्न महँगा होवे और सस्य मध्यम
होवे ॥ २३ ॥
,
नापाटीकासहितम् ।
गुरुशुक्रमर्कशशिजा यदेकत्र समाश्रिताः ।।
घातयोगं विजानीयात्पांसुवृष्टिस्तदा भवेत् ॥२२॥
बृहस्पति, शुक्र, सूर्य, बुध यह जो एक राशिपर होतो
घात योग जानिये, यह योग होनेसे धूलिकी वर्षा होती
है ॥ २२ ॥
सूर्यादिधुः पंचमसप्तमः स्यात्क्षाणासुतो याति
तयारिगेहे ॥ दिग्दाहयोगो मुनिना प्रदिष्टः स जात
उल्कापतनादिकारी ॥२३॥
सूर्यसे चन्द्रमा पाचवे या सातवें हो और मंगल छठे
हो तो यह दिग्दाहयोग उल्कापात मुनियोंने कहाहै २३
उपप्पवात्सप्तमगो महीजो महीसुतात्पंधमगो
बुधश्च ।। बुधाच्च केन्द्रे हिमगो.यदा स्यात् भूक-
पयोगः कथितो मुनीन्द्रेः ॥ २४ ॥
राहुसे सप्तमस्थान में मंगल हो और मंगलसे पंचम घ-
रमे बुध हो, बुधसे केन्द्र (११४१७१०)स्थानमें चन्द्र-
मा होवे तो मुनिजनाने भूकप मोम कहा है ॥ २४ ॥
(४०) मयूरचित्रकम् । अथ संक्रान्तिप्रतिउत्पातफलम् । मेपे वृपे कुलीराक यदोत्पाता भवन्ति हि ॥ दक्षिणस्यां तदा युद्धे प्रजा दुर्भिक्षपीडिताः ॥२५॥ मिथुनेऽऽननाशः स्वाद्विन्ध्ये सिंहलके हरो।। कान्यकुब्जे महापीडा कन्यकायां स्थिते वो ॥२६॥ जो मेष, वृष, कर्कके सूर्यमें उत्पात हो तो दक्षिण दिशामें युद्ध होवे और प्रजा दुर्भिक्षसे पीडिव होवे ॥२५॥ मिथुनके सूर्यमें उत्पात होनेसे अन्नका नाश हो, विन्ध्याच- लके मध्यमें और सिंहके सूर्यमें उत्पात हो तो सिंहलदेशमें अन्नकी हानि हो तथा कन्याके सूर्यमें उत्पात होनेसे कनौजदेशमें बहुत पीडा होवे ॥ २६ ॥ तोलिन्य च दुर्भिक्षं देशभंगोथ पिंगले ॥ वृश्चिके च मृगे सूर्ये दुर्भिक्षं नर्मदातटे ॥ २७॥ धनुष्यकें विनश्यन्ति देशाः कालिंजरादयः ।। भद्रदेशस्य नाशः स्यात्कुम्भेऽके सस्यपीडनम् २८ तुलाके सूर्यमें हो तोदुर्भिक्ष (तेजी) हो, मीनमें हो तो देशभंग हो वृश्चिकके सूर्यमें हो तो और मकरके सूर्यमें हो भाषाटीकासहितम् । (४३) तो नर्मदा के निकटदेशोंमें दुर्भिक्ष होवै ॥ २७ ॥ धनुके सूर्यमें उत्पात हो तो कालिंजर आदि देश नाश हवि तथा कुंभके सूर्यमें उत्पात हो तो भइदेशका नाश हो और सत्य (तृणधान्य ) कमती होवे ॥ २८॥ अथ विधा वृष्टियोगः। शुक्रस्यास्तमये वाष्टरिज्ये चोदयमागते ॥ संचरत्यवनीमूनो मन्दे वृष्टिस्त्रिधा मता ॥ २९ ॥ शुक्रके अस्तमें और बृहस्पतिके उदयमें तथा मंगल व शनैश्चरके संचारमें वृष्टि होती है यह तीन प्रकारकी वृष्टी कही है ॥ २९॥ अथ कर्कमकरसंक्रान्ती वारफलम् । यदा कर्कस्य संक्रान्तिरथ चा मकरस्य सा !! भवत्यकांकिभीमानां वारे दुःखप्रदा मता ॥ १३०॥ जो कर्क अथवा मकरका संक्रान्ति सूर्य, शनि, मंगल इन वारोंमें हो तो प्रजाको दुःख देनेवाली जानना १३० , (४२) मयूरचित्रकम् । अथ अगस्त्युदयकलम् । दिवोदितो यदागस्त्यस्तदा भयकरः स्मृतः ॥ दुर्भिक्षव्याधिजनको लोकानां नात्र संशयः॥३१॥ जोअगस्त्यमुनिका तारा दिनमें उदय होवै तो प्रजाको भयकारी कहा है और लोकमें दुर्भिक्ष ( अकाल ) व रोग उत्पन्न हो इसमें संदेह नहीं ॥३३॥ अथ तिथिवृद्धिस्तथा क्षयफलम् । यदा याति वृद्धि सिताख्यश्च पास्तदा यान्ति वृद्धि नृपा लोकसंघाः ॥ समा सौख्यदा हानिकारी तु हीना तथा कृष्णपक्षे फलं व्यत्ययेन ॥३२॥ जो शुक्लपक्षमें कोई तिथि बढे तो राजा और प्रजागण वृद्धिको प्राप्त होवे, और समा अर्थार कोई तिथि घटै न बढे तो सुख होवे, तथा कोई तिथि घरै तो हानिकारी जानना, और कृष्णपक्षमें इससे विपरीत फल जानना ३२॥ , - मापाटीकासहितम्। (४३) अथ त्रयोदशदिनपक्षफलम् । यदाच जायते पक्षत्रयोदशदिनात्मकः ।। भवेलोकशयो घोरो मुण्डमालायुत्ता मही ॥ ३३ ॥ जो तेरह दिनका पक्ष होचे तो लोकका नाश हो और पृथिवीपर युद्ध होने से रुंडमुंडासे युक्त पृथिवी होवे॥३३॥ अथ चैत्रादिमासमु तिथ्यादियोगफलम् । तत्रादौ चैत्रमासफलम् । अथान्यसंप्रवक्ष्यामि फलं योगसमुद्भवम् ॥ मासवारतिथीनां च सम्यक् ज्ञानप्रकाशनम् ॥३॥ अब आगे अन्यप्रकारसे मास, वार, तिथियोंके योगसे जिससे सव हाल जाना जाता है सो कहताहूँ ॥ ३४ ॥ प्रतिपदि रविवारश्चैत्रमासे यदि स्यान भवति बहुवृष्टिर्दुःखिता लोकसंघाः ॥ अमृतकिरण- पारे ज्ञास्फुजिद्वाक्पतीनां भवति ननु धरित्री सस्यतोयाभिपूर्णा ॥ ३५॥ उत्पन्न जो फल, (४४) मयूरचित्रकम् । जो चैत्रमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदाके दिन रविवार होवै तो वृष्टि बहुत नहीं होवै और प्रजालोग दुखी होवे, तथा चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र यह वार हों तो निश्चय सम्पूर्ण पृथ्वी तृण, अन्न, जलसे परिपूर्ण होवै ॥ ३५ ॥ वारः स्यान्मन्दकुजयोस्तदा वृष्टिर्न जायते ॥ सस्यानि न प्ररोहन्ति विग्रहं यान्ति भूमिपाः॥३६॥ शनि, मंगल वार होवे तो वर्षा नहीं होने और तृण- धान्य नहीं उत्पन्न हो, तथा राजाओंमें विग्रह होवै॥३६॥ चैत्रस्य कृष्णपक्षे वा पंचम्यां बुधवासरे ॥ भोमो वक्रगतिर्याति घृततेलमहर्षता ॥ ३७॥ शाल्यन्नं चैव गोधूमास्तदा यान्ति महर्षताम् ३८॥ चैत्रमासके कृष्णपक्षमें पंचमी वुधवारको जो मंगल वक्री होवे तो घी और तेल महंगा हो जावे ॥ ३७ ॥ और चांवल तथा गेहूँ महंगे हो ॥ ३८ ॥ सुरुशुको यदेकत्र चैत्रमासे व्यवस्थितौ ॥ ३९ ॥ तेलान्यतिलसूत्राणां संग्रहे च कृते सति ।।
, मापार्टीकासहितम् । (४५) मासद्धये व्यतीते तु विक्रये लाभमादिशेत् ।।१४०॥ जो चैत्रमासमें बृहस्पति, शुक्र एक राशिपर होवें ॥ ३९ ॥ तो तेल, थी, तिल, सूत्र इन वस्तुओंके संग्रह करनेसे दो महीने उपरान्त बेचनेमें बहुत लान होवे ॥ १४ ॥ चैत्रमासस्य शुक्लायां पंचम्यां यदि वर्षणम् ॥ वर्षाकाले तदा मेघा न वर्षन्ति जलं बहु ॥ ११ ॥ चैत्रमासके शुक्लपक्षमें पंचमीके दिन जो दृष्टि हो तो वर्षासमयमें जल बहुत नहीं वरपै ॥ ४ ॥ मधुमासे कृष्णपक्षे तिथिवृद्धियंदा भवेत् ॥ शुक्लपक्षस्य हानिःस्यादन्नहींना तदा मही ॥४२॥ चैत्रमासके कृष्णपक्ष जोतिथिवृद्धि होय, और शुक्ल- पक्षमें तिथिहानि हो तो पृथिवी अन्नसे हीन होवै॥४२॥ चत्रमासेऽर्कसंक्रान्तो यदि वर्पति वासवः ॥ वैशाखे मासि वा ज्येष्ठे तदा सस्यमहर्षता ॥ १३ ॥ चैत्रमासमें संक्रांतिके दिन जो मेघ वर्षे तो वैशाख वा (४६) मयूरचित्रकम् । ज्येष्ठमासमें सस्प (तृणधान्य ) महँगा हो जावै ॥४३॥ चैत्रमासस्य शुक्लायां सप्तम्यां दृश्यते धनः॥ उद्धता वांति वातावे अथवा निर्मला दिशः॥४४॥ तदा संग्रहणं काय्य गोधूमस्य विपश्चिता ॥ विक्रीते श्रावणे मासे लाभश्च त्रिगुणो भवेत् ॥४५॥ पंचम्यामपि योगोयं चिन्तनीयो विचक्षणः ।। वर्षणं च त्रयोदश्यां तदा भिक्षतो भयम् ॥ ४६॥ चैत्रमासके शुक्लपक्षमें सप्तमीके दिन जो मेघमंडल होने तो वर्षाकालमें पवन बहुत चलै, अथवा आकाश निर्मल हो जावे ॥ ४४ ॥ तब ऐसा योग देख चैत्रहीसे गेहूँका संग्रह करै फिर सावनमहीने में बेचनेसे तिगुना लाम होवे ॥ १५॥ यह योग पंचमीतिथिमेंमी होनेसे पंडितजन ऐसाही फल जाने चैत्रशुदी तेरसको जो वर्षा होय तो दुर्मिक्षसे प्रजामें भयकाल होवे ॥ ४६॥ पंचमी रोहिणीयुक्ता सप्तमी रौद्रसंयुता ॥ नवमी पुष्पसंयुक्ता स्वातियुक्ता च पूर्णिमा
भाषाटीकासहितम् । (४७)
भवत्यत्र यदा वृष्टिस्तदा प्रावृष्यवर्पणम् ॥४७||
जो चैत्रमासके शुक्लपक्षकी पंचमीको जो रोहिणी नक्षत्र
होवे, सप्तमीको आर्दी, नवमीको पुष्य और पूर्णिमाके
दिन स्वाति नक्षत्र होवे। इन दिनोंमें जो वर्षा हो तो
वर्षासमयमें वृष्टि नहीं हो ॥ ४७ ॥
चैत्रेमासि तृतीयायां पंचम्यां फाल्गुने तथा ॥४८॥
सप्तम्यां माघमासे च माधवे प्रथमेऽहनि ।।
वाता वान्ति तदा वृष्टिर्वपीकाले न संशयः ॥४९॥
चैत्रमासमें तीजके दिन, तथा फाल्गुनमासमें पंचमीके
दिन ॥ ४८ ॥ और माघमासमें सतमीको, वैशाखमें
प्रतिपदाके दिन, इन तिथियोंमें जो वायु चले तो वर्षासम-
यमें वृष्टि बहुत होवे इसमें संशय नहीं ॥ ४९ ॥
चैत्रे वा श्रावणे मासि यदा पंचारवासराः ।।
राजानश्च क्षयं यान्ति मन्दा दुभिक्षकारकाः।।१५०
नाशयन्ति प्रजाः शुका रविसौम्या विनाशकाः ॥
चन्द्राः कल्याणजनका गुरवो जलपातकाः ॥ ॥
(४८) मयूरचित्रकम् । चैत्र वा श्रावणमासमें जो पाँच मंगलवार होवें तो राजाओंका क्षय होवे, पांच शनि हो तो दुर्मिक्ष (अकाल) पैडै ॥ १५० ॥ और पांच शुक्र प्रजाका नाश करते हैं, पांच सूर्य व बुधनी, विनाशकारक हैं, पांच सोमवार कल्याणकारी हैं, पांच गुरुवार जलके पातक हैं अर्थात वृष्टिनाशक नानने यह चैत्रमासका विचार कहा ॥५१॥ अथ वैशाखमासफलम् । माधवस्य सिते पक्षे पंचम्बां शनिवासरे।। भरण्यादिचतुप्केषु हस्ते भौमस्य वासरे ॥१२॥ पिप्पलीनारिकेरंच तानं कांस्यं च पूगकम् ॥ रक्तवस्त्रं च सर्वाणि महर्षन्ति न संशयः ॥५३॥ वैशाखमासके शुकृपक्षमें पंचमीके दिन वा शनिवारमें भरणी आदि चार नक्षत्र (रोमृ.) हो और मंगलवारमें हस्त नक्षत्र हो ॥५२॥ तो पीपरी, नारियल, तांबा, कांसा, सुपारी, लालवन यह सब वस्तु महंगी हो जो ॥ ५३॥ .
E भापाटीकासहितम् । (४९) वैशाखे शुलप्रतिपदशमी चाभ्रसंयुता ।। भवत्यत्र न सन्देहः प्रावृट्काले वर्षणम् ॥५४ ।। वैशाखमें शुक्लपक्षकी प्रतिपदा वा दशमीके दिन जो बादल दीख पड़े तो निस्सन्देह वर्षाकालमें वृष्टि नहीं होवे ॥ ५४ ॥ वैशाखे च त्रयोदश्यां यदा भौमाऽर्कवासरौ ॥ कृष्णा च शर्करा नागवल्ली दुर्लभतां व्रजेत् ।। तथा महर्षतां याति सैन्धवं रक्तचन्दनम् ॥५५॥ वैशाखमासकी त्रयोदशी जो मंगल वा रविवारको हो तो पीपरी, शक्कर, पान यह तेज हो जावें । तथा सेंधा- वण व लालचन्दन महगे होवे ॥ ५५ ॥ वैशाख शुक्लपंचम्यां पनेराच्छादितं नमः ॥५६॥ गर्जनं वारिवृष्टिवी तदा सस्यस्य संग्रहः ॥ कर्तव्यो भाद्रमासे तु विक्रीते लाभमादिशेत् ॥१७॥ वैशाखमासमें शुपक्षकी पंचमीके दिन जो आकाश मेषोंसे आच्छदित होवै ॥ ५६॥ और गरजै अथवा . मयूरचित्रकम् । वृष्टि होवै तो सस्य (तृणधान्य ) संग्रह करे, फिर भाइ. मासेम बेचनेसे लाभ होवै ॥ ५७ ॥ अथ ज्येष्ठमासफलम् । ज्येष्ठकृष्णप्रतिपदि भोमाऽर्कबुधवासराः ॥ यदा भवन्ति लोकानां तदा व्याधिभयं भवेत्॥१८॥ जो ज्येष्ठमासके कृष्णपक्षको प्रतिपदाके दिन मंगल, रवि, बुध इन वारों से कोई वार होवे तो लोकमें रोम भय होवे ।। ५८॥ ज्येष्ठशुक्लप्रतिपदि यदि स्यान्मन्दवासरः ॥ क्षत्रभंगःप्रजापीडा दुर्भिक्षं च तदादिशेत् ॥ १९ ॥ ज्येष्ठशुदी प्रतिपदाको जो शनिवार हो तो क्षत्रभंग हो, प्रजाको पीडा हो और दुर्भिक्ष (तेजी) पडै ॥ ५९ ॥ ज्येष्ठाये बुधवारश्चेदप॑ त्वागामके भयम् ॥ तत्र चेत् सूर्यवार: स्यात्तदा युद्धाकुला घरा॥१६॥ जो ज्येष्ठशुक्ल प्रतिपदाको बुधवार होवे तो आगामी 1 भाषाटीकासहितम् । (आगे ) वर्षमें भय होवै, तहां जो रविवार होवे तो पृ. थेवीपर युद्ध होवै ॥१६॥ ज्येष्ठमासे दतियो रात्रौ मेघः प्रहश्यते ॥ दिवसे वाप्यनावृष्टिर्जायते नात्र संशयः ॥ ६ ॥ जोज्येष्ठमासकी अमावास्याके दिन रात्रिमें मेघ दीख पडै अथवा दिनमें मेघ दीखै तो वीऋतुमें वर्षा नहीं होने इसमें सन्देह नहीं जानना ॥ ६१ ॥ ज्येष्टस्य कृष्ण प्रतिपयुक्ता स्याद्भानुना यदि ॥ वान्ति वातास्तदोगा वे भोमेन व्याधिमादिशेत ६२ ज्येष्ठमासके कृष्णपक्षकी प्रतिपदाके दिन जो रविवार होवे तो प्रबल पवन चले, मंगलबार हो तो रोग होवे ॥६२ चन्दपुत्रेण दुर्भिक्षं गुरुणा सस्यसम्पदः भाग्येण सुवृष्टिः स्याच्छाशनानाकुलाधर ॥ ६३॥ शनिनाच प्रजानाशश्वभंगो पर्पणम् ॥ जायते नात्र सन्देहः कर्तव्यो देवचिन्तकः॥ ६४ ॥ ज्येष्ठलष्ण प्रतिपदाको जो बुधवार हो तो दुर्भिक्ष हो (५२) मयूरचित्रकम् । बृहस्पति हो तो तृणधान्य बहुत उपजै, शुक्र हो तो अच्छी वर्षा होवे, चंद्रवार हो तो पृथिवीपर अन्न बहुत होवे ॥ ६३ ॥ शनिवार हो तो प्रजाका नाश हो तथा छत्रांग और अवर्षण ( वृष्टि नहीं ) होवे, दैवज्ञोंको इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ६४ ॥ ज्येष्ठमासे नवक्षाणि रोद्रादीने विलोकयेत् ॥ निरभ्रेजलसम्पत्तिः साभ्रे यमवर्षणम् ॥ ६ ॥ ज्येष्ठमासमें आद्री आदि नव नक्षत्रोंतक जो आकाश निर्मल रहे तो वर्पा बहुत होवै, और बादल होवे तो वृष्टि नहीं होये अर्थात् जिस दिन बादल हो वही नक्षत्र नहीं वर्षे ॥६५॥ ज्यष्ठस्य शुक्सप्तम्यां श्रूयते धनगर्जितम् ॥ मेघश्छन्ननभो वापि वायुर्वहति दक्षिणः॥ तिलस्य सँग्रह कार्यों विक्रीते कार्तिकेयनम् ॥६६॥ ज्येष्ठशुदी सप्तमीको जो मेघ गरनै अथवा मेघ भाका.
भापाटीकासहितम् । (५३) समें आच्छादित रहे, दक्षिणकी पवन चलै तो तिलोंका संग्रह करके कार्तिकमें बेचनेसे लाभ होवे ॥ ६६ ॥ अवणः धनिष्ठायां यदा मेघः प्रतिष्टितः ।। प्राबृहकाले तदा वृष्टिमघो वृष्टिनिरोधकः ॥ ६७॥ ज्येष्ठ श्रवणनक्षत्र, तथा पनिठानक्षत्र में जो मेघडंबर रहे तो वर्षाकालमें वृष्टि होवे और जो पूर्वोक्त नक्षत्रों में वर्षा होवे तो वर्षासमयमें अनावृष्टि होवे ॥ ६७ ॥ पूर्णिमायाममायाँ चा ज्येष्टे व्योमान्वितं घनेः ।। दिवा वा यदि वा रात्री तदा ज्ञेयमवर्षणम् ॥ ६८॥ जो ज्येष्टमासमें पूर्णमासी चा अमावास्याके दिन आ- काशमें बादल रहे दिनमें ना रात्रि में नो अनावृटि जानना ॥२८॥ अथापाढमासफलम् । आपाढमासे सितपंचमीतियो ख्यादिवारेषु यथाक्रमेण ॥ स्यादल्पवृष्टिविपुला च दृष्टि- युदं शुभं क्षेमसुखे च नाशः॥ ६९ ॥ -
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(५४) मयूरचित्रकम् ।
आपामासके शुरूपक्षकी पंचमीको रविवार आदिवा-
रॉका फल क्रमसे यह है, रविवार हो तो वर्षा थोडी हो,
चंद्रनार हो तो बहुत वर्षा हो, मंगल हो तो युद्ध हो,
बुध हो तो शुभ है, गुरुवार हो तो क्षेम हो, शुक्रसे सुख,
शनिवार होनेसे हानि होवे ॥ ६९ ॥
आषाढे शुक्कुपंचम्यां शुभवारे शुभेक्षिते ॥
सम्पूर्णनिखिला धात्री धनधान्याकुला घरा॥१७॥
आषाढमाससे शुक्लपक्षकी पंचमीके दिन शुभ वार हो
और उसपर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो सम्पूर्ण पृथिवी धन
और धान्यसे परिपूर्ण होवै ॥ १७० ॥
क्रूरग्रहयुते वारे लग्ने करेक्षिते तथा ॥
दुर्भिक्षं मरणं व्याधिश्चौरबाधा सतां सदा ॥ ७१॥
आषाढशुदीपंचमीको जो क्रूर वार हो तथा लापर
क्रूर ग्रहको दृष्टि हो तो दुर्भिक्ष, मरण रोग और
सज्जनोंको चोरोंसे भय हो, यहाँ वारप्रवृत्तिसमयकी लम
लेना ॥ ७॥
भाषाटीकासहितम् । (५५) भाषा कृष्णपक्षे चेदएम्यां रजनीपतिः ॥ मेघमध्ये च संयाति तदा पृथ्वी जलाकुला॥ ७२॥ आषाढमासकृष्णपक्षकी अष्टमीको जो चन्द्रमा बाद- लके बीच आच्छादित रहे तो पृथिवीपर वर्षी बहुत होवै ॥ ७२॥ तस्यामेव यदा रात्रो निर्मल शशिलांछनः॥ दृश्यत छिद्रसंयुक्तस्तदा वाच्यमवर्षणम् ॥ ७३ ॥ उसी आपाढकृष्णाष्टमीको जो रात्रिमें चंद्रमा निर्मल हो और चन्द्रमा छिद् दीख पडे तो वर्षा नहीं हेवि ऐसा कहना ॥ ७३॥ आपाठयां पूर्णिमायां च यदा वृष्टिस्तु जायते ।। मासमेकं महर्घ स्यात्ततः पश्चात्सुभिक्षकृत् ॥७॥ आपाढीपूर्णमासीके दिन जो वर्षा होवे तो एक मास- तक महँगा होवे, उपरान्त सस्ता भाव होय ॥ ७४ ॥ आपाढे कृष्णपक्षे तु निरभ्र रविमण्डले ॥ नच वारि प्रवन्ति प्रावृट्काले तदा घनाः ।। ७५ ॥
५६) मयूरचित्रकम् ।
आपाहमासके कृष्णपक्षमें जो सूर्यमण्डल निर्मल रहे.
और बादल नहीं होवै तो वर्षाक्तुमें मेघ जल
वर ॥ ७५॥
आपाढे शुकृपंचम्यां पश्चिमो यदि मारुतः ।।
यदि वा दृश्यते चापमेन्द्र स्याद्वारिवर्पणम् ।। ७६॥
तदा संग्रहण कार्य सस्यानां लाभामिच्छता॥
विक्रीते कार्तिके मासि निश्चितं लाभमादिशेत् ७७॥
आषाढशुकृपंचमीके दिन जो पश्चिमकी वायु चलै, अ-
थवा इन्द्रधनुष दीख पडै और वर्षा होवै ॥ ७६॥ तो तु-
णधान्यका संग्रह लाभकी इच्छासे करै और कार्तिकमा-
समें बेचनेसे निश्चय लान होवै ॥ ७७ ॥
आषाढे स्वातिनक्षत्रे सविधुदुपवर्पणम् ॥
तदा स्यादन्ननिष्पत्तिस्तोयपूर्णा वसुन्धरा ॥ ७८॥
आपाढमासमें स्वातिनक्षत्र जिस दिन हो उस दिन वि.।
जली चमक और वर्षा हो तो अन्न बहुत उपजै और
पृथिवी जलसे पूर्ण होवै अर्थात वृधि अच्छी होवै॥७॥
मापाटीकासहितम् ये वाऽथ मध्याह्ने सन्ध्यायां सूर्यमंडलम् ॥ मेघच्छन्नं न शुभदं नवम्यां च शुचो सिते ॥ ७९॥ आषाढमासके शुक्लपक्षकी नवमीको सूर्यके उदयसमय का मध्याह्नसमय वा संध्यासमयमें सूर्यको मेव आच्छादित कर तो शुभ नहीं होपै, समय अच्छा नहीं हो ॥७९॥ अथ आप्रवेशफलम् । हिवेदाएनन्देन्द्र एतत्संख्यासु भास्करः॥ तेथिष्वाद्री यदा याति कष्टदः शेपके शुभः१८०॥ तृतीया, चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी इन तिथि- याम जो आद्रीका सूर्य हो तो कष्टदायी जानना शेप- तिथियों में शुभ जानना ॥ १८० ॥ खो भौमे तथा मन्दे रोद्रों याति भास्करः।। तदान शुभदः प्रोक्तः शुभदः शेपवासरे ॥ ८१ ॥ रवि, मंगल, शनि इन वारोंमें जो आदनिक्षत्रपर सूर्य हो तो शुभ नहीं जानना, शेप वारोमै शुभ नहीं कहाहै८१ यमानीशाहिमूलेन्द्रपितृवारिभके रविः ॥
(५८) मयूरचित्रकम् ।
यांत्यामशुभः प्रोक्तः शेष शुभदः स्मृतः॥८२।।
भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, मघा, पूर्वा-
पाढा इन नक्षत्रोंमें जो आद्रा नक्षत्रपर सूर्य प्रवेश होवै तो'
अशुम कहिये, शेपनक्षत्रों में प्रवेश हो तो शुन्न देनेवाले.
जानना ॥ ८२॥
शूले गण्डे व्यतीपाते व्याघाते परिधे शिवे ॥
वैधृतो चातिगण्डे च आद्री यात्यशुभो रविः।।३।।
शूल, गण्ड, व्यतीपात, व्याघात, परिघ, शिव, वैधृति,
अतिमंड इन योगोंमें भाद्रीपर सूर्यप्रवेश हो तो अशुभ है
शेषयोगों में शुभ जानना ॥ ८३॥
आप्रवेशे वृष्टिश्चेत्सार्धमासमवर्पणम् ।
निर्मलं वृष्टिभूयः स्यात्सस्यपूर्णा वसुन्धरा ॥८॥
आनक्षत्रके सूर्यप्रवेश होतेही जो वृष्टि होय तो डेढ
महीनेतक वर्षा नहीं हो और जो उस ...।
निर्मल रहे तो वां बहुत हो और सस्य ( तृणधान्य)
पृथिवीपर बहुत होवै ॥ ८४॥
(६०) मयूरचित्रकम् । करी तथैव शबली मध्या फले कीर्तिता ॥ ८७॥ सन्ध्याकालमें वनमेंसे आये जो पशु उनमें प्रथम काले रंगका पशु अथवा वृष (बैल नगरमें प्रवेश करे तो पूर्ण वर्षा हो, और काली गौ प्रवेश करै तो प्राणियोंको मुख हो, श्रेत गौ प्रवेश करै तो वर्षाका नाश हो, कपिला गौ प्रवेश करै तो पवन बहुत चलै, रक्त श्वेत वर्णकी गौ जो प्रवेश करे तो सस्य ( खरीफ) का नाश करे, चितकबरी गौ प्रवेथ करे तो मध्यम फल जानना ॥ ८७॥ रोहिण्यः यदापाढे विद्युद्वारिप्रवर्षणम् ।। रोचवं च धनेव्योम तदा सर्वं शुभं भवेत् ॥ ८८॥ जो आषाढमासमें रोहिणीनक्षत्रके दिन जो विजली चमकै जल वर अथवा आकाश मेघसे रहित हो तो सब ऋतुओंमें शुभ फल होते है ॥ ८८॥ न तत्र वारिपतनं न च पूर्वोत्तरानिलो ।। तदा कालोऽतिघोरः स्यात्प्राणिनां नात्र संशयः८९ १ भाषाटीकासहितम् । जो रोहिणीनक्षत्र में वृष्टि नहीं होवे और पूर्व तथा तिरकी वायु चले तो अतिकठिन समय हो जिसमें गणियोंको क्लेश हो इसमें संशय नहीं जानना ॥ ८९ ॥ नाजापत्यसंगे चन्द्रे पूर्वाह्ने वाति मारुतः॥ शुभदौपि तदास्याद्वै दृष्टिः श्रावणभाद्रयोः।।१९०॥ आपाढमें रोहिणीनक्षत्र सोमवारको हो और पूर्वाह्न- समय चले तो समय अच्छा होवै श्रावण माइमासमें वर्षा बहुत होवे ॥ १९॥ अह्नस्तु पश्चिमे भागे पश्चिमा दो प्रवर्पतः ॥ मध्याह्न वाति वायुश्चेन्मन्यो मासो जलपदो ॥११॥ रोक्षिणीनक्षत्र के दिन दिनके पिछले प्रहरोंमें वर्षा हो और मध्याह्नमें जो पवन चले तो श्रावण भाद्रमासमें वृष्टि अच्छी होवे ॥ ९१ ॥ मस्तं दिवसं वाति यदा वायुः शुभप्रदः ॥ श्रावणादिषु मासेषु तदा सम्पत्तिरुत्तमा ।। ९२ ॥ जो उसलि समस्त दिन पवन चले तो समय अच्छा हो, (६२) मयूरचित्रकम् । और श्रावणादि महीनों में उत्तम संपत्ति होवे ॥ ९२॥ वाति चेदशुभो वायुर्व्यत्ययेन फलं वदेत् ॥ तत्र यो बलवान्वायुस्तस्मात् ज्ञेयं शुभाशुभम्९३॥ तथा जो अशुभ पवन चले तो विपरीत फल जानना, तहां जो अनेक और बलवान पवन चलें उसीके अनुसार शुभाशुभ फल जानना ॥ ९३ ॥ प्रजेशनक्षत्रगते सुधानिधो शुभास्तु वाता गगनं च निर्मलम् ।। मृगाः खगाः शान्तदि- गानना यदा नन्दति लोकाः सुखिनस्तदा भृशम् ॥ ९॥ रोहिणीनक्षत्र चंद्रवारके दिन शुभ वायु चले और आकाश निर्मल रहे तथा पशु, पक्षी शांत दिशाको मुख करें तो लोकमें आनंद और सुखकी वृद्धि हो ॥ ९४ ॥ दक्षिणेन यदा याति रोहिण्यां रोहिणीपतिः ॥ दूरस्थो निकटस्थो या जगत्कष्टप्रदायकः ॥९॥ तरस्यां यदा याति रोहिण्यां रोदिणापतिः ।।
भाषाटीकासहितम् । सोपसर्गात्तदा वृष्टिरस्पृशन सुखिनो जनाः ॥९६॥ रोहिणीनक्षत्रके दिन जो चन्द्रमा रोहिणीके दहिनी ओर दूर वा निकट स्थित हो तो संसारको कष्टदायक जानना ॥ ९५ ॥ और जो उत्तर और समीप विचरै अरु रोहिणीको स्पर्श नहीं करे तो लोकमें मनुष्य सुखी रहें ॥ ९६ ॥ रोहिणीशकटमध्यगः शशी शोकरोगभयदुः खदः स्मृतः ॥ शीतरश्मिमनुयाति रोहिणी कामिनो दि वागास्तदांगनाः ॥९७ ॥ शकट ( गाडी) के आकार जो रोहिणी तिसके मध्य जो चंद्रमा गमन करै तो शोक, रोग, भय, दुःख देनेवाला कहिये और जो चंद्रमाके पीछे रोहिणी होवे तो स्त्रियां कामीजनोंके चशमें हो ॥ ९७ ॥ रोहिण्याः पृष्टतो याति यदा कुमुदिनीपतिः॥ ., कामिनीनां वशं यांति नराः कामप्रपीडिताः॥९८॥ जोगहिणीनक्षत्रके पीछे चन्द्रमा हो तो कामसे पीडित (६४) मयूरचित्रकम् । मनुष्य कामिनियों (त्रियों ) के वशमें हो जावें ॥ ९८॥ वह्नर्दिशि भयमतुलं नैर्ऋत्यां दुःखसंयुता लोकाः ॥ ईशानस्थे चन्द्रे सुखबाहुल्यं च मध्यमं वाते ॥९९॥ जो रोहिणीसे अमिकोणमें चंद्रमा हो तो भय बहुत होवे, नैर्ऋत्यमें हो तो लोकमें दुःख होये, ईशानमें हो तो सुख बहुत होवे वायव्यदिशामें चन्द्रमा हो तो मध्यम फल जानना ॥ ९९ ॥ धरणीसुतो मन्दरहितः कांतियुतश्चन्द्रमा वि- नोत्पातः ॥ शुभश्च सर्वजगतो यदि सूर्य- स्तीक्ष्णरश्मिः स्यात् ॥२००॥ यत्फलं रो. हिणीयोगे तत्स्वात्यामपिचिंतयेत् ॥ नारा- यणेन लिखितं वराहेण च भापितम् ॥२०॥ रोहिणीनक्षत्रके दिन जो मंगल और शनिवारसे रहित विना उत्पातके निर्मल रहे और दिनमें सूर्य प्रचंड तपै तो सब जगदको शुभदायक होते है ॥ २०० ॥ जो फल रोहिणीके योगका कहा वह स्वातिनक्षत्रके दिनमी विचा-
भाषाटीकासहितम् । (६५)
(ना ऐसा वराहमिहिराचार्यजीने वर्णन किया और
नारायणप्रसादने लिखा ॥१॥
अथ स्वातिनक्षत्रविचारः।
सप्तम्यां माघमासे यदि पतति हिमं स्वाति-
नक्षत्रयोगे चन्द्रार्को रश्मिहीनो जलधरस-
हितो वाति वातः प्रचण्डः ॥ विद्युद्युक्तं नभो
वा यदि भवति तदा सर्वसस्यैरुपेता पृथ्वी
स्याद्वारिपूर्णा मुदितजनपदा हटलोकैश्च यु.
ता॥ २॥ श्रावणे फाल्गुने मासे चेत्रवे-
शाखयोरपि ॥ आपाढे स्वातियोगोऽयं
विचार्यों देवचिन्तकः ॥३॥
माधवदी सप्तमीको स्वातिनक्षत्रमें जो हिम (पाला )
पढे, बादल होघे और चन्द्रमा सूर्य कुहरसे ढक जायें,
पवन प्रचंड चले, वा बिजली चमकै, सजल मेघ होवे तो
पृथ्वीपर सब धान्य उपज वर्षा बहुत अच्छी हो भौर
मनुम्पजन लोकमें आनन्दपूर्वक सुखी होवे ॥ २ ॥
(६६) 'मयूरचित्रकम् । यह विचार श्रायण, फाल्गुन, चैत्र, वैशासमेसी तथा आ. पादमासमें यह स्वातियोग देवज्ञपंडिता करके विचारना गाहिये ॥ ३ ॥ अथ मेवलक्षणम्। मोतुप्रेतवादिकाकाऽनुरूपाच्छिन्ना भिन्ना वामिहीनातिरूक्षाः ॥ उदाकारा वानराका- रदेहा मेघाः प्रोक्ताः दुःखदा वै प्रजानाम् ॥ ४ ॥ मंजिष्टा शुक्लकाशेयस्वर्णक्रौंचस- मप्रभाः॥ मच्छिन्नमूलाः सुस्निग्धाः शुसदाः सजला घनाः॥५॥ अब मेघोंका लक्षण कहते हैं। आपाढमासमें जोबादल बिलाव, प्रेत, कुत्ता और कौआ इनके आकार छिन्न मिन्न विना पिजलीके रुखे आये अथवा ऊँट तथा वानर- की देहके आकार हो तो ऐसे लक्षणयाले मेघ प्रजाको दुःख देनेवाले कहे हैं ॥ ४ ॥ तथा मजीठ, सपेद रेशमी, सुवर्ण, क्रौंच पक्षी इनके समान कांतिवाले हों और नहीं कटी है मूल (जड) जिनकी ऐसे विचित्ररंगके सुन्दर चि- भाषाटीकासहितम् । केने जल भरे हुये बादल हों तो शुभ देनेवाले होते हैं ॥५ शाकोद्भुतेमारुतेारिवष्टिः पृथ्वी सस्यव्या- वृतानन्दंयुक्ताः ॥ वह्नयुद्धतर्वह्निकोपोन नाशो याम्यरनं क्षीयते राक्षसोत्यः॥६॥ पवाजातारिवृष्टिः समग्रा वातोद्धत्तियु- का हि वृष्टिः ।। वृष्टिः सत्यं सोम्यकाष्टासमु. त्थरीशोद्भवातिशोका जनाः स्युः ॥७॥ जो आपाढमासमें पूर्ववायु चले और वर्षा हो तो पृथिवीपर सस्य बहुत उपजे और मजा आनन्दयुक्त होवे। अग्निकोणकी पवन चले तो अमिका कोप हो, दक्षिण तथा नैऋत्यकी चले तो अनिका नाश होवे ॥६॥ पश्चिमको पर्वन चले तो वर्षा अच्छी होवे, पापम्पकी पवन चलै तो वायुसहित वर्षा होवे, उत्तरकी पवन चले तो वृष्टि बहुत हो, सस्य (खरीफ) अच्छी होवे, ईशान- की वायु वह तो मनुष्योंका शोरु दूर होवे ॥ ७ ॥ उल्कानिर्यातमुकम्मदिग्दाहाशनिविद्युतः ॥
, (६८) मयूरचित्रकम् । नादा मृगाणां संग्राह्यास्तथैवाम्बुधरास्तदा ॥ ८॥ उल्कापात, वजका शब्द, भकंप (भूचाल ), दिग्दाह, गर्जना, बिजली, मृगोंका शब्द तथा मेघोंका स्वरूप इसका विचार करे । ८॥ अथाषाहपूर्णिमायां पवनपरीक्षा । आषाढमासस्य च पूर्णिमायां सूर्यास्तकाले यदि वाति वातः॥ पूर्वस्तदा सस्ययुता ध- स्त्रिी नन्दन्ति लोकाः सजला घनाः स्युः ॥ ॥९॥ कृशानुवाते मरणं प्रजानामन्न स्य नाशः खलु वृष्टिनाशः ॥ याम्ये मही सस्यविवर्जिता स्यात् परस्परं यान्ति नृपा विनाशम् ।। २१०॥ आषाढमासकी पूर्णिमाके दिन सूर्यास्तसमय में जो पूर्वकी पवन चले तो पृथिवीपर तृण बहुत उपजै लोकमें आनन्द होवे, वो अच्छी हो ॥९॥ अनिदिशाकी पवन चले तो प्रजाका मरण, अन्नका नाश व वर्षाका
जापाटीकासहितम् ।
विनाश होवे, दक्षिणकी वायु वह तो पृथिवीपर तृण नहीं
उपजे और राजालोग परस्पर युद्ध करके नाशको मात
होये ॥ २१०॥
नेशाचरो वाति यदात्र वातो न वारिदो वर्ष-
ति भूरि वारि ॥ प्रत्यक्समीरे सुखिनो मनु.
ष्या जलानपूर्णा च वसुंधरा स्यात् ॥११॥
वायव्यवाते जलदागमे स्याभ्रस्य नाशः प.
वनः प्रचंडेः ॥ सौम्येऽमिले धान्यजलाकुला
घरा नन्दन्ति लोका भयदुःखवर्जिताः ।। १२ ।।
जो नैऋत्यकी वायु बहे तो बहुत जल नहीं वर्ष,
पश्चिमकी पवन चले तो मनुष्य सुखी हो और पृथिवी
मल भन्नसे पूर्ण होवे ॥ ११ ॥ यायन्यकी वायु वहै
बो मेघोंके आनेसे प्रवल वायु चले जिससे बादल उडजावे,
उत्तरकी पवन चले तो पृथिवीपर अन्न जल बहुन होव
और लोक्में प्रजागण आनन्दयुक्त हो तथा भय और
दुःखरहित हो जावें ॥ १२॥
(७०) मयूरचित्रकम् । ऐशेऽनवृद्धिवारिपूरिता धरा च गावो बहु- दुग्धसंयुताः ॥ भवंति वृक्षाः फलपुष्पदायि- नो मन्दन्ति भूपाश्च परस्परं तदा ॥ १३ ॥ इंशानकी वायु वहै तो भन्नकी वृद्धि हो और जस बहुत बर्ष, गौएं बहुत दूधसे युक्त होवें और वृक्षोंमें फल फूल अच्छे हों, तथा उस समयमें राजालोग परस्पर मानार करें ॥ १३ ॥ अथ श्रावणमासफलम् । श्रावणे शुक्लसप्तम्यां यदि मेघः प्रवति ॥ तदा प्रजाश्च नन्दन्ति धनधान्याकुलाधरा ॥ १४ ॥ सप्तम्यां श्रावणे मासि स्वातियोगे च वति ॥ निष्पत्तिः सर्वसस्यानो भवन्ति सुखिनो मनाः १५ अव श्रावणमासका फल कहते हैं। श्रावणशुदी सप्तमीके रिम जो मेघवर्ष तो मजागण सुखी होवे और पृथिवीपर जन भान्प बहुत हो ॥ ११॥ तथा श्रावणशुदी सप्तमी- नापारीकासहितम् । (७१) के दिन स्वातिनक्षत्र में जो वर्षा हो तो सब तृणधल्य उ. पन और मनुष्य सुखी हो ॥ १५ ॥ श्रावणेऽस्तंगते भानो सप्तम्यां शुक्लपक्षके ॥ दश्यते न च पर्जन्यस्तदा मेघो न वर्षति ॥१६॥ चित्रास्वातिविशाखासु यदि मेघोन वर्षति ॥ श्रावणे च तदा पृथ्वी वारिसस्यविवर्जिता ॥१७॥ श्रावणशुदी सममीके दिन सूर्यास्तसमय पीछे जो मेश् नहीं दीख पडें तो वर्षा नहीं होवे ।। १६ ॥ तथा श्रावणमास चित्रा, स्वाति, विशाखा इन नक्षत्रोंमें यदि मेष नहीं वर्षे तो पृथिवीपर जल नहीं वर्ष और तृण नहीं उपजै ॥ १७॥ श्रावणे कृत्तिकायां च यदि मेघः प्रवति ॥ तदा त्वेकार्णवा पृथ्वी धनधान्याकुला प्रना ॥१८॥ श्रावणस्य सिते पक्षे पूर्वाभाद्रपदासु च ॥ चतुथ्यो जलपातश्चेत्पृथ्वी स्यादन्नसकुला ॥ १९॥ श्रवण पूर्णिमायां यदि मेघः प्रवति ॥ तस्मिन्काले सुभिक्षं स्यादरित्री चान्नसंकुला२२।।
(७२) मयूरचित्रकम् । भावणमासमें कृत्तिकानक्षत्रके दिन जो मेघ वर्षे तो पृथिवी जलमयी हो जाये और प्रजा धनधान्यसे युक्त होवे ॥ १८ ॥ आषणके शुक्लपक्षमें पूर्वाभाद्रपदानक्षत्र अथवा चतुर्थीतिथिमें जो जल मिरै तो पृथिवीपर अम बहुत हौवै ॥ १९ ॥ श्रावणीपूर्णमासीको श्रवणनक्षत्र में जो मेव मर्प तो सुभिक्ष ( सस्ता) हो और पृथिवीपर मन बहुब होवै ॥ २२० ॥ यह श्रावणमासका फल कहा ॥ अथ भाद्रपदमासफलम् । नभस्यसप्तमी कृष्णा रोहिणीमन्दसंयुता ॥ गुरुशुक्रार्कयुक्ता वा यवगोधूमशालयः ॥२१ ॥ हरिद्रा जीरकं सीसं पारदं हिंगुमेक्षवम् ॥ तिलं कस्तूरिका चैव महर्षति न संशयः॥ गते मासे तृतीये तु विक्रीये लाभमादिशेत् ॥२२॥ जारकष्णसप्तमाको रोहिणी नक्षत्र हो और शनिवार वा गुरु, शुक्र, रवि यह वार हों तो जौ, गेहूं, चावला ॥ २१॥ हल्दी, जीरा, सीसा, पारा, हींग, सहत, तिल, मातादीकासहितम् । (७३) कस्तूरी यह वस्तु महँगा हो, इसमें सन्देह नहीं । इसका संग्रह करे तीसरे महीने में बेचनेसे विशेष लाभ हो॥२२॥ नभस्यस्य तृतीयायां प्रहरे च तृतीयके ॥ २३ ।। उत्तरस्यां धना दृष्टास्तदा स्युः सुखिने जनाः ।। अन्नसंग्रहणं काय्य षष्ठे मासि महर्षता ॥२४॥ माइक्रष्णतृतीयाको तीसरे पहरमें ॥ २३॥ जो उचरविशाकी ओर बादल दीख पड़ें तो मनुष्य सुखी हाँव अन्नका संग्रह करै छठे महीने में महँगा होवे ॥२१ भाद्रे मास्पष्मी शुक्ला मूलचन्द्रार्कसंयुत्त ।। तदार पंचमे मास झणसुत्रमहर्षता ॥ २५॥ यदा भाद्रपदे मासि संक्रान्ती जलवर्षणम् ।। तदा भवन्ति रोगाश्च प्राणिनां चाश्विने भयम्॥२६॥ भाद्रशुदी अष्टमीको मूलनक्षत्र हो भौर चन्द्रवार अथवा रविवार हो तो पांचवें महीनेमें सन और सूत महगा हो ॥ २५॥ जो भाद्रमासमें संक्रांतिके दिन जल
(७४) मयूराचित्रकम् ।
वर्षे तो प्राणियोंको अनेक रोम हो और आश्विन
(कुँवार ) के महीने में जीवॉको मय होवै ॥ २६ ॥
अमावास्या भाद्रपदे युक्ता स्याद्भानुना यदि ॥
तदा महर्षता ज्ञेया सस्यानां देवचिन्तकेः ॥ २७ ॥
जो नाश अमावास्याके दिन रविवार होवै तो तृण
पाल्य महँगा हाँव ऐसा देवज्ञों करके जानना ॥ २७ ॥
अथ आश्विनभासफलम् ।
आश्विनस्य त्रयोदश्यां शनिवारो यदा भवेत् ॥
यदि संक्रमणं तत्र वः सस्याकुला मही ॥२८॥
आश्विने शनिवकं स्यादुधो राश्यंतरं व्रजेत् ॥
शुकश्चास्तमचं याति तदानप्लाषिता धरा ॥ २९ ॥
जो आश्विनमासमें त्रयोदशीको शनिवार होवे और
संक्रान्तिनी उस दिन लगे तो पृथिवीपर सस्य बहुत हो
॥ २८ ॥ तथा जो भान्विनमासमें शनि वक्री होते और
बुध दूसरी राशि जावे, शुक्रका अस्त होवै तो अनसे
पृथिवा पूरित होवै अर्थात् अन्नादिक बहुत ही ॥२९॥
,
भाषाटोकासहितम् । (७५)
शनिमदोश्च तत्रैव संचारो जायते यदि ॥
तेलसूत्रशणादीनां तदा वाच्या महर्षता ॥ २३० ॥
आश्विने शुकसप्तम्यामष्टम्यां वारियर्षणम् ॥
तदा सुभिक्षमादेश्यं राजानः शांतिषिग्रहाः ॥ ३३॥
आसोजमासमें शनि, राहुकाभी जो संचार हो अर्थात
दूसरी राशिपर जाय तो तेल, सूत, सन यह वस्तु महंगी
हाँ । २३० ॥ आसौजशुदी सप्तमी वा अष्टमीके दिन
वर्षा हो तो सुनिक्ष ( सस्ता ) होवे राजाओंका विग्रह
शांत (र ) होये ॥ ३१ ॥
यदा चाश्चियुजे मासि दशम्यां प्रतिपत्तियो ।
अष्टम्यामाचरेन्मेषः सत्वरं वृटिकारकः ॥ ३२॥
मादित्यास्तमये मेघाः पर्वताकारसनिभाः ॥
दृश्यन्ते जलपातः स्यात्तस्मिन्नेव दिने तदा॥३३॥
जो भासौममासम दशगी, प्रतिपदा, अष्टमीको वादल
हो तो शीपही वर्षा होवे ॥ ३२॥ जो कुँवार मृयी-
स्तसमय मेप पताकार होय तो उसी दिन वर्षा हारे॥३३॥
(७६) मयूरचित्रकम् । अथ कार्तिकमासफलम्। कार्तिके मार्गशीर्षे वा संक्रान्तौ वारिवर्षणम् ॥ तदा समघेता पोषे सस्यवृद्धिस्तु मध्यमा ॥३४ ॥ कार्तिकस्य त्वमावास्या रविवारण संयुता ॥ शनिमोमयुता वापि सर्वलोकभयावहा ॥ ३५ ।। कार्तिक वा मार्गशिरमासमें संक्रान्तिके दिन जो वृष्टि हो तो पौषमासमें अन्न सस्ता हो और सस्यकी मध्यम वृद्धि होवे ॥ ३४ ॥ कार्तिककी अमवास्याको रविवार हो वा शनि, भौमवार हो तो सब लोकोंमें भय हावै॥ ३५॥ तब चेद्रविसंक्रान्तिस्तत्समीपेऽथ वा भवेत् ॥ तदा सुखयुता लोकाः सर्वसस्यमहर्षता ॥ ३६॥ यदा कार्तिकमासे तु वारिदस्य च गर्जनम् ॥ भवत्यन्नमहर्घत्वं सस्यसम्पत्तिरुत्तमा॥ ३७॥ तहाँ जो मूर्यकी संक्रांति हो अथवा उस दिनके समीप संक्रांति हो तो लोकमें सब सुखी रहें और सब सस्य (तृणधान्य ) मँहगे हों ॥ ३६ ॥ तथा जो कार्तिकमा- भाषाटीकासहितम्। (७७) समें मेवं गरने तो अन्न महँगा हो और सस्य बहुत उत्तम ॥ ३७॥ उनस्य शुक्कदादश्यां रजनी निर्मला यदि ॥ पूर्णिमा कृत्तिकायुक्ता तदा लोकाः सुखान्विताः ३८ भय वा भरणी सर्वा कार्तिक्यां भवति ध्रुवम् ॥ दुर्भिक्षं जायते घोर तथा रोगा भवंति हि ॥ ३९ ॥ कार्तिक शुक्लद्वादशीको जोरात्रि निर्मल रहे और पूर्णि- माके दिन रुक्तिका नक्षत्र हो तो लोकोंमें सुख होवे॥३८॥ अथवा पूर्णिमाको भरणी नक्षत्र होवै तो निश्चय दक्षि ( अकाल ) घोर हो तथा रोग हेवि ॥ ३९ ॥ तस्यामेवाश्विनीयोगे सस्यसम्पच्च मध्यमा । यदिचेद्रोहिणीयोगे जन्तवः केशभागिनः॥२४॥ तथा जो पूर्णमासीको अश्विनी नक्षत्र हो तो सरप ( तृण) मध्यम हो और जो रोहिणी हो तो पाणि- योको क्लेश होवे ॥ २४॥ यदा कार्तिकमाते तु ग्रहणं चन्द्रसूर्ययोः ।। V (७८) मयूरचित्रकम् । निर्घातो भूमिकंपश्च तारकापतनं तथा ॥११॥ उल्कापातो रजःपातो झनभ्रे जलवर्षणम् ॥ एते चान्ये तथोत्पाताःप्रभवंति पुरोदिताः ॥४२॥ संग्रहः सर्वधान्यानां कर्तव्यो धनकांक्षिभिः ॥ विक्रीते पंचमे मासि लाभश्च द्विगुणो भवेत् ॥१३॥ जो कार्तिकमासमें चन्द्र सूर्य ग्रहण होवे, बिजली गिरें, भूकंप हो तथा तारे टू॥४१॥उल्कापात हों, धूल- की वर्षा हो, विना वादलके वर्षा हो, यह उत्पात हों, इनसे अन्यत्री उत्पात हो ॥ ४२ ॥ तो धनलाभकी इच्छावाला मनुप सब धान्योंका संग्रह करै पाँचवें महीने में बेचनेसे दूना लाम होवे ॥ ४३ ॥ अथ मार्गशीर्षमासफलम् । मार्गशीर्ष चतुर्दश्यां दर्शे वा दृश्यते यदा ॥ घनराच्छादितो भानुस्तदा सस्यमहर्षता ॥४४॥ मार्गशुद्वितीयायां शनिवारोऽथ दक्षिणः ॥ वातो वदति चोकानां तदा कष्टप्रदायकः ॥१५॥ --- भाषाटीकासहितम् । (७९) मार्गवदी चर्तुदशी चाममावास्याके दिन जो बादलोस डका या सूर्य दीख पडे तो तृण महगा होवे ॥ ४४ ॥ मार्गशुदीद्वितीया शनिवारको दक्षिणदिशाकी वायु वह तो लोकमै प्राणियोंको कष्ट देनेवाली जानना ॥ १५ ॥ मार्गशीषादिमासेषु शुक्लपक्षे तिथिक्षयः ॥ छत्रभंग प्रजापीता दुर्भिक्षं च समादिशेत् ॥४६॥ मार्गशी कृष्णपक्षे तिथिवृद्धिश्व जायते ॥ तदा युद्धाकुला पृथ्वी प्रजाः क्रन्दन्ति नित्यशः४७॥ जो मार्गशीर्ष आदि महीनों में शुक्लपक्षमें तिथिक्षय होव तो छत्रनंग प्रजाको पीडा और दुर्भिक्ष ( महँगा ) हो । ॥ १६ ॥ मार्गशीर्ष कृष्णमें तिथिकी वृद्धि हो तो पृथिवीपर युद्ध हो और प्रजा नित्य रुदन करै ॥ ४७ ॥ मागशीर्षस्य सप्तम्यां नवम्यामीशदिग्यदि ॥ दृश्यते मेघसंडन्ना स्तोकं वर्पति वारिदः ॥ १८॥ मार्गकृष्णचतुर्थ्यां च पित्रः मेघदर्शनम् ॥ अथवा जलपातः स्यात्तदाषाढ च वर्षणम् ।।
(८०) मयूरचित्रकम् ।
समर्षता च सस्यानामादेश्या गणकोसमः ॥ १९॥
मार्गशीर्षकी सप्तमी तथा नवमीको जो ईशानदिशामें
बादल होयें तो वर्षा थोडी होवै ॥४८॥ मार्गवदीचतु-
र्थीको.और मघानक्षत्रमें जो मेघ दीख पडे अथवा जल
गिरे तो आषाढमें वर्षा होवै ॥ और तृणधान्य सस्ता
हो ऐसा उत्तम ज्योतिषियोंकरके कहना चाहिये ॥४९॥
चतुर्थी सार्पसंयुक्ता पंचमी पितृसंयुता ॥ २५० ॥
पष्ठी च भगसंयुक्ता मार्गे मासि यदा भवेत् ॥
त्रिरात्रं महती वृष्टिराषाढे शुक्लपक्षके ॥ ५१ ॥
मार्गवी चतुर्थीको आश्लेषा नक्षत्र हो, पंचमीको मघा
हो ॥ ५५० ॥ और पष्ठीको पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र हो तो
आषाढके शुक्लपक्षमें तीन रात बहुत वर्षा होवै ॥ ५१ ॥
मार्गकृष्णाष्टमी स्वातिचित्रायुक्ता भवेद्यदि ॥
मेघाक्रांत नभस्तस्यां दृश्यते सर्वदा यदि ॥ ५२ ।।
सस्मिन्नु तदापाढे जायते वृष्टिरुत्तमा ।
सर्वसस्ययुता पृथ्वी प्रजा नन्दन्ति नित्यशः ॥५३॥
भाषाटीकासहितम् । जो मार्गशीर्षपदी अष्टमीको स्वाति वा चित्रा नक्षत्र हो और सप दिनभर बादल रहे ॥ ५२ ॥ तो आषाढमासमें चित्रा साति नक्षत्रके दोनों दिन बहुत वर्षा होवे, पृथिवी- पर सत्य सब उत्पन्न होप्रजामें नित्य आनंद होव॥५३॥ अष्टमी चापि नवमी चित्रयुक्ता यदा भवेत् ॥ वायुभे च तदापाढे मेघा वन्ति नित्यशः ॥५॥ मार्गदी अटमी वा नवमीको चित्रा नक्षत्र हो तो मापाटमें स्वातिनक्षत्रके दिन बहुत वर्षा होवे ॥ ५४ ॥ अथ पोपमासफलम् । पोपस्य च तथा कृष्णा पंचमी भीमसंयुता ।। तस्यां मेवाः प्रपंन्ति तदा धान्याकुटामही ।। अतसीघृतमंजिष्ठा वर्षे यांति महताम् ॥५५॥ अब पोपमासका फल कहते हैं, पीपके कृष्णपक्षकी पंचमी मंगलके दिन जो मेघ वृष्टि करे तो पृथिवीपर मन बढ़त उपने। और असमी, घी, मेंगोठ यह वस्तु रस वर्गमं महंगी हो जा ।। ५५ ।। 1 (८२) मयूरचित्रकम् । पूर्वाभाद्रपक्ष पोप निशेपेण निरीक्षयेत् ॥५६॥ परिवेपो गर्जनं च विद्युद्वारिप्रवर्पणम् ॥ यदि तत्र प्रजायन्ते तदा वृष्टिरथोत्तमा ॥५७ ॥ पोपमासमें पूर्वाभाइपदानक्षत्र के दिन सावधानतापूर्वक देखे ॥ ५६ ॥ तहां जो सूर्यचन्द्रमंडलमें परिवेप हो मेव गरज वा बिजली कडक तथा जल वर्षे तो पर्याकालमें दृष्टि उत्तम होवे । ५७ ॥ एकादश्यां नवम्यां च पोपमा घना यदि ।। पूर्वस्यां दिशि गति तदा सल्यविनाशकः ॥५८॥ पोपकृष्णस्य सप्तम्यां वारिवाहा महानिशि ।। यदा वन्ति गर्जन्ति सदा स्यादृष्टिरुत्तमा ।। ५९ ॥ पोपयदी एकादशी और नवमीको जो पूर्वदिशामें मेष गरजें तो तृणका विनाशक होवै ॥ ५८ ॥ जो पौषपदी सप्तमीको अर्धरात्रिसमय मेव वपां करें तथा गरौं वर्षासमयमें वृष्टि उत्तम हो ॥ ५९ ॥ पोपस्प यद्यशावास्या ज्येष्ठानक्षत्रसंयुता!!
भापाटीकासहितम् । (८३) दा सस्यमहत्त्वं मूलयुक्ताल्पमूल्यता ॥२६॥ शुक्का त्रयोदशी पोपे मन्दशुक्रकुर्युता॥ यदि वर्पति जीमूतः कार्यो गोधूगसंग्रहः॥६॥ जो पौषकी अमावास्याको ज्येष्ठानक्षत्र हो तो तृण धान्य महंगे हों मूलनक्षत्र हो तो सस्ते हो ॥ २६० ॥ जो पोपमासको त्रयोदशीको शनि, शुक्र वा मंगलवार होवे और मेघ व तो गेहूँका संग्रह करनेसे विशेष लान होवे ॥ ६ ॥ पोपशुकचतुथ्यी तु विद्युदर्शनमुत्तमम् ।। तदा विद्युदनच्छन्नं दृष्टमिन्द्रधनुस्तया ॥ १२ ॥ धनुर्विधुदनो वापि यद्ययामपि नो भवेत् ।। पोपमा तमा वाच्यं पाकाले पर्पणम् ।।६३ ।। जो पौपशुधी चतुर्थीको बिजली दीख पड़े तो उत्तम फल होये तथा बिजली तडपे, बादल होवे, इन्द्रधनुप दीस पडे ॥६२॥ अथवा पीपगामम पूर्वामारपदानक्षत्रके दिन बिजली चमके, धनुप उगे तो वपीकालमें अवर्षण होव६३ - (८४) मयूरचित्रकम् । पोपे मासे शुक्लपक्षे पंचम्यां हिमवर्पणम् ।। तदास्यान्महती वृष्टिः प्रावृट्काले न संशयः॥६॥ पौषस्य सप्तमी शुक्ला रेवतीसंयुता यदा।। मष्टम्यामश्विनीयोगो नवम्यां भरणी यदा ॥६५॥ एवंविधेषु योगेषु सविद्युदनदर्शनम् ॥ तदा स्यान्महती वृष्टिर्वकाले न संशयः ॥६६॥ पोपमासशुक्लपक्षमें पंचमीको जो हिम ( कुहर ) पढे तो निःसन्देह वर्षाकालमें बहुत दृष्टि होवै ॥ ६४ ॥ तथा पौषशुदी सप्तमीको रेवती नक्षत्र हो, अधमीको अश्विनी नक्षत्र हो, नवमीमें भरणी नक्षत्र हो ॥ ६५ ॥ इस प्रकारके योगमें बिजली चमके, बादल हो तो वर्षा- कालमें बहुत वृष्टि होवे; इसमें संशय नहीं करना॥६६॥ एकादश्यां यदा विद्युद्रोहिण्यां जलदर्शनम् ॥ पोपे यदा तदा वृष्टिःप्रावृषि स्यात्समर्थता ॥६॥ पूर्णिमायां द्वितीयायां पोपे विद्युत्प्रदर्शनम् ।। तदास्यादनसम्पत्तिमेघच्छन्ने तपांबरे।। ६८॥
भाषाटीकासहितम् ।
पौषशुदी एकादशीको बादल दो, बिजली कडके, रोहि-
णी नक्षत्रमें जल होवे तो वर्षाकालमें वृष्टि हो और अन्न
सस्ता होवै ॥६७ ॥ तथा पोपमें पूर्णमासी तथा दिती-
याको बादल व बिजली दीस पडे तो अन्न बहुत उपणे
वांनी अच्छी होवे ॥ ६८ ॥
पोपमासेऽर्कसंकांतो रविवारो यदा भवेत् ॥
धान्यमूल्यं द्विगुणितं तदाभवानि नान्यथा ॥ १९ ॥
शनिवारे त्रिणितं भूमिपुत्रे चतुर्गुणम् ॥
बुधभृग्वोः समत्वं च तुल्यादै शशिजीवयोः२७०।।
पोपमासमें संक्रान्तिके दिन जो रविवार हो तो -
मान मूल्पसे दूना मोल हो जावे इसमें अन्यथा नही
शनिवार हो तो तिगुना, मंगलवार हो तो चौगुना, अ,
शुक्र हों तो समान भाव रहे, चन्द, गुरुवार हो तो यतमान
मौल्यसे आधा मात्य रहै अर्थात् सस्ता हेरे ।। २५० ।।
अत्र मासेऽर्कसंक्रान्तिः शनिभानुकुजेऽहनि ।
तदा भवति दुर्भिक्ष तथा स्याद्राजविग्रहः ॥ ७॥
(८६) मयूरचित्रकम् । मूलमारभ्य याम्यति नभो भवति साधकम् ॥ रोद्रमारभ्य वातांदं तदा वर्षति वासवः ॥ ७२ ॥ पौषमासमें तथा यहाँ किसी मासमें सूर्यकी संक्रान्ति शनि, सूर्य, मंगलवारको हो तो दुर्मिक्ष (भकाल) तथा राजाभामें विग्रह होवे ॥ ७१ ॥ पोपमासमें जो मूलन- क्षत्रसे लेके भरणीनक्षत्रतक जो-बादल हो तो वर्षाका- लमें आ से लेके स्वाति नक्षत्रके सूर्यतक वर्षा होवे ७२॥ धनराशिगते भानौ मूलमारभ्य चिंतयेत् ।। गर्भाधामं ततो वृष्टिः पप्टे मासे हि साधके ।। ७३॥ मूला हि यदा गर्भो भवत्याद्री च वर्षति ॥ पूर्वापाढे तथादित्यमुत्तरायां तथा गुरुः ॥७४॥ धनराशिकी संक्रान्तिमें मूलनक्षत्रको भादि लेके गर्मा- धान अर्थात् सजलमेवोंका विचार करै जिससे साढे छः महीनोंमें अर्थात् आपाहरूप्णपक्षमें वृष्टिको विचारे सो क्रम आगेके टोकॉमें वर्णन करते हैं ॥ ७३ ॥ पोपमा- समें जो मूलनक्षत्र के दिन गर्न अर्थात् मेव वर्षे तो वर्मा.
भाषादीकासहितम् । (८७) कालमै भाइनिक्षत्र वृष्टि कर तथा पूर्वापाढाम मेव हो तो पुनर्वसुके सूर्यमें वर्षा होवे, उत्तरापाडामें मेव हो तो पुष्पम मच्छी वृष्टि होवै ॥ ७४ ॥ श्रवण सापंभे चेव वासवे पितृभं तथा ।। वारुणे भाग्यभं चैव पूर्वाभाद्रार्यमाधिपे ॥ ७ ॥ इस्तो वर्पत्युत्तरायां खत्यां वाकिस्तथा । एतद्भ समावेन मयोक्तं चिन्तयत्सुधीः ॥ ७६ ॥ श्रवणनक्षवमें जो मेघ हो तो आटेपाके सूर्य में वर्षा होष, पनिष्ठामें गर्म हो तो मघा वर्ष तथा शतसिपा मेघ होनेसे पूर्वा वर्षा होवे, पूर्वाभाद्रपदामें गर्म हो तो उत्तराफाल्गु- नीके सूर्यमें अच्छी यी हवि॥ ७५॥ उत्तराभापदाम मेघ हो तो हस्तके सूर्यमें वपी होव, रेवतीमें गर्म हो तो चि. वास्थातिके सूर्यमें दृष्टि होवे, यह मैने नक्षेप करके कहा को गर्भविचार मो बुद्धिमान पंडित विचार लें ॥ ७ ॥ 'तुरगः गते भानो यदि मेघः प्रचपति ।। मूलोद्भवं सदा गर्भ नादेश्यं देवचिन्तकः ।। ७७ ॥
(८८) मयूरचित्रकम्। भरण्यादिस्थिते भानो यस्मिन्मेषः प्रवर्षति ॥ तस्मिन् तस्मिन् गर्भऋक्षेगर्भनाशं वदेहुधः ७८ ॥ आश्विनीनक्षत्रके सूर्य प्रवेश समय वर्षा हो तो मूल नक्षत्रमें कहा गया गर्भ फल नहीं होवै ऐसे दैवज्ञों, करके मानना ॥७७ ॥ एवं भरणी आदिके सूर्यमें जिस नक्षत्रके सूर्यमें वर्षा होवे उस उस नक्षत्रानुसार गर्भ फल नाश होवे ऐसा पंडित जन विचार कर कहे, जैसे भरणाके सूर्य- में मेघ वर्षे तो पूर्वाषाढाका गर्भ फल न हो, ऐसेही आगे यथाक्रमसे विचारै ॥ ७८ ॥ पोषस्य पंचदश्यां च विधोर्याम्योत्तरा तडित् ॥ दृश्यते वियदाच्छन्नं धवृष्टिस्तदा भवेत् ॥ ७९ ॥ पोषे स्वात्यां च सप्तम्यां यदा स्याद्वारिवर्पणम् ॥ मेघच्छन्नं नभोवापि तदा सस्याकुलाधरा ।।२८०।। पौषमासकी पौर्णमासीके दिन जो चन्द्रमाके दक्षिण उत्तरमें बिजली चमक और सजल मेघ पिर आवे तो
माचाटीकासहितम् । (८९)
उस दिन जो नक्षत्र हो सो नक्षत्र वर्षाकालमें वृष्टि करे
॥ ७९ ॥ पोपमासमें सप्तमी तिथि वा स्वातिनक्षत्रके दिन
वर्षा होवे तो तृण धान्य बहुत उपजे ॥ २८० ॥
कुहन्तासु त्रितिषिषु पोपे गर्भः प्रजायते ।।
तदा सुभिक्षमारोग्यं श्रावण्यां वारिवर्पणम्॥ ८॥
अमावास्या सहस्यस्य शनिसूर्यारवासरे ॥
यदि स्याद्रयमादेश्यं तदा सस्यमहर्षता ॥ ८२ ॥
पोपमासमें अमावास्यातक तीन तिथियाम अर्थात
१३ । १४१३० इन तिथियोंमें जो गर्म हो तो समिक्ष
और आरोग्यता हो तथा श्रावणीके दिन वर्षा होव
॥ ८ ॥ पौषकी अमावास्याको जो शनि, सूर्य, मंगल
वार होतो भय उपजे और तृण महँगा होवे ॥ ८२ ॥
पोपमारास्य कहां वा सप्तम्यां यदि वर्षणम् ।।
पादकाले तदा तत्र समर्थ वारियर्पणम् ।। ८३ ॥
शुक्लायां यदि सप्तम्यां पनेरान्छदित नभः ।।
तदा स्याच्छापणे मासि सप्तम्यां वृष्टिरुत्तमा ॥८॥
(९०) मयूरचित्रकम् ।
पोपमासकी अमावास्या वा सप्तमी के दिन जो वृष्टि हो
तो वर्षाकालमै सस्ता होव और जल बहुत ! ॥ ८३ ॥
तथा पौषशुदी सप्तमीके दिन जो बादल हवि तो भाषण
शुदी सप्तमीको उत्तम वृष्टि होवै ॥ ८४ ॥
पोपस्य कृष्णपंचम्यां नमो विमलतारकम् ॥
- स्वात्यां सुपारपातः स्याच्छावणे तत्र वर्पणम् ।।८५||
प्रजा भवन्ति मुदिताः सर्वसस्यसमर्थता ॥
एवं संचिन्त्य देवज्ञः पोपमासफलं वदेत् ।। ८६॥
पोपक्रष्ण पंचमीको जो आकाश निर्मल रहे और
स्वातिनक्षत्रमें तुपार ( कुहर) पडे तो आवणमासमें वषर्मा
विरोप होवे ॥८५॥ और प्रजागण प्रसन्न होवें, सब तृण
सस्ते हों, इस प्रकार विचार कर दैवज्ञ पोपमासका फल
कहे ॥ ८६ ॥
अथ मावमासफलम्
माघशुक्लद्वितीया च तृतीया शुक्रसंयुता ॥
यदा स्यान्मंदसंयुक्ता तदा युदाकुला घरा ॥८॥
भापार्टीकासहितम् । यदि स्याद्रुसंयुक्ता तदा सम्याकुला धरा ॥ रागानस्तत्र सुखिनः प्रजा नन्दान्त नित्यशः॥८८॥ माघशुदी द्वितीया या तृतीयाको शुक्रवार हो तो समय अच्छा हो और जो शनिवार हो तो पृथिवीपर युद होवे ॥ ८७ ॥ यदि वृहस्पति हो तो तृण बहुत उपने और राजा लोग सुनी होये, प्रनामें नित्यही आनन्दता होये ॥ ८८॥ पष्टी च पंचमी चैव कृष्णा मावस्य सप्तमी ।। शुक्राकिरविसंयुक्ता तदा युद्धाकुला घरा ॥ ८९ ॥ एत यांगा यदा मात्र न भवन्ति कदाचन ॥ भावमासे व गोधूममुद्रयान्वनयंता ॥ २९० ॥ मापरणपटी पंचमी और मममीको शुगर, शनि, रविवार होना पृथिवीपर गुर बहुत होरे । ८॥ो भाषमागमें ना लोग नहीं होने नो मापदमागे, मग अन्न वस्न मना ॥ २९ ॥ मापमाम प्रयोदश्यां यदान्यादिमवपनन् ।
(९२) मयूरचित्रकम् ।
पृर्था तदानबहुला प्रजाः सुखसमन्विताः ॥ ९१
हिमं न पतितं मासे ज्येष्ठे मूले च वर्षति ॥
नायां पातेत वारि कालो दुष्टस्तदा मतः॥९२॥
जो माघमासको त्रयोदशी के दिन कुहर पडै तो
वीपर अन्न बहुत उपजै और प्रजा सुखी रहे ॥ ९१ ॥
जो माघमें हिम न गिरे तो ज्येष्ठमासमें मूल नक्षत्रके दिन
वर्षा होये तो आनिक्षत्रके सूर्यमें जल नहीं गिरे और
समय अच्छा नहीं होवे ॥ ९२ ॥
माघमासे च संक्रांतो यदि वर्षति वारिदः ।। ९३ ॥
माघशुकप्रतिपदि बुधवारो यदा भवेत् ॥
अन्नं महर्षतां याति व वागामिके भवेत् ॥ ९४ ॥
माघमासमें संक्रांतिके दिन जो वपी होवे तो पृथिवी.
पर तृण बहुत उपजै, गौएं दूध बहुतसा दे३ ॥ ९३ १
माघशुदीप्रतिपदाको जो बुधवार हो तो आगे वर्षमें भय,
हो और अन्न महँगा होये ॥ १४ ॥
পাল্কাধাবিপ্ন। (९३). पंचाः पंच षा मोमाः पंच या मंदवासराः ॥ दार्भिक्षं भयमादेश्यं तदा शेषाः शुभावहाः ।। ९५ ॥ येषु येषु च मासेपु तस्य वृद्धिः प्रजायते ।। सुभिक्षं क्षेममारोग्यं तेपु नेयं विचक्षणः ॥ ९६ ॥ माघमासमें पांच रविवार या पांच सोमवार वा पांच शनिवार हों तो दुर्भिक्ष और भय होवे, शेप पार पांच हो तो शुम जानना ॥९५॥ जिस महीने में पांच शुभ वार हाँ तो मुभिक्ष क्षेम भारोग्यता होये, ऐसा परिनीकरके जानना ॥ ९६॥ माघमासस्य प्रतिपत्सवाता मेघवार्जिता ॥ यदा याति महत्वं तेलद्रव्यं सुगन्धकम् ॥ ९७ ॥ द्वितीया मेघसंयुक्ता धनधान्यविन्दिा ॥ मामासि तृतीमायांगजनच जलं विना ॥ ९८॥ संपास्तव कर्तव्यो गोधूमस्य यवस्य च ॥ चतुर्थी जटसंयुक्ता नालियरोयंदो मतः ॥ ९९ ॥ माघमास प्रतिपदाको जोवाय यह और मेवर्ष तो (९४) मयूरचित्रकम् । तेल और सुगंधवस्तु महँगी हो ॥ ९॥ तथा जो द्विती याको बादल हो तो धन्यधान्यकी वृद्धि हो, तृतीयाको ने विना वर्षा होनेके गरजै ॥ ९८ ॥ तो गेहूँ और यवका संग्रह करनेसे लाभ होये तथा चतुर्थीको मेघ बरसे तो नारियलसे द्रव्यका लाभ होवै ॥ ९९ ॥ पंचमी मेघसंयुक्ता यदा जलविवर्जिता ॥ तदा भाद्रपद मासि स्वल्पवृष्टिश्च जायते ॥३०० ॥ पष्टयां निरभं गगनं दिशश्च विमला यदा ॥ संग्रहस्तब कर्तव्यः कार्यासस्य हितैपिणा ॥१॥ माघमें पंचमीको जो बादल हो और जल न वर्षे तो भाद्रमासमें थोडी वृष्टि होवै ॥ ३०० ॥ तथा छठिको जो बादल न हो और दिशा आकाश निर्मल रहे तो अपने लाजकी इच्छावाला कपासका संग्रह करै ॥ १॥ सप्तमी सोमसंयुक्ता राजविग्रहकारिका ॥ मासे धवलपक्षस्य नहादुर्भिशदापिता ॥२॥ आदित्योदयवेलांयां यदा स्यादृष्टमी तिथिः ।।
आपाटीयामहितम् ।
(९५)
दारोगते सूर्य प्रावण नहि वर्षति ॥३॥
माववीततमीले जो सोगवार हो तो राजाओंका
गार हो, तथा शुदी सप्तमीको जो सोमवार हो तो बडा
अकाल पडे ॥ २॥ माघमें सूर्यादयसमय बाटमी तिथि
i, जितनी हो उतनीही तिथि आपाटमें अश्वी हो और
आइपिर सूर्य हो तो भाषणों वर्षा नहीं हो ॥ ३ ॥
नगम्यां चन्द्रनिवस्य परिषश्च जायते ॥
तदापाट महावाष्टिः पूर्व धान्यगदर्वता ॥४॥
माघमास तपल्ये वा चैत्रापाटं च माधये ॥
सप्तम्यां म्यातियुक्तापांक्षणं च सुभप्रदम् ॥५॥
माघशुदर्शन यगी दिन को चन्द्रमाके पिन जो चन्द्र.
गोरे आमपास मंडल गये तो प्रथम अन्न महंगा हारे,
पाव सस्ता हो और भापाटगे यपी अच्ची और
॥४॥माघ, फाल्गुन, क. आपाइ, वैशाम इन महीनाम
ममीको भ्यालितो शुभ लक्षण और शुभहो
गाना ॥ ५॥
मयूरचित्रकम् । शुक्लपक्षस्य सप्तम्यांमाघे व्योमान्वितं धनः ।। पुरो वातोय कोबेरो वारुण्यां चंचला यदि॥६॥ हिमं पतति वा तत्र वांति वातास्तदोद्धताः॥ तदा सुभिक्षमादेश्यं तस्मिन्देश विचक्षणः ॥७॥ मायके शुक्लसप्तमीको जो बादल होवे और पूर्वकी और उत्तरकी पवन चलै तथा जो पश्चिममें बिजली चम. कै ॥६॥ अथवा पाला पटै वा प्रबल परन चले तो उस देशमें पंडितॉकरके सुभिक्ष हो ऐसा कहना ॥ ७ ॥ माघमासस्य नवमी दशम्येकाक्शी तथा ॥ विद्युदातसमायुक्ता तदा बहुजष्प्रदा ॥८॥ पंचमी कृष्णपक्षस्य माघमासस्य पष्टिका ॥ सप्तमी शुक्रमन्देन्दुयुक्ता सस्यादिदा मता ॥९॥ माघशुदीनवमी, दशमी तथा एकादशीको विमली चमके और पवन चले तो बहुत जल हो ॥ ८॥ माघ कृष्णपंचमी, पष्ठी, सप्तमीको जो शुक्र, शनि, सोमबार हो तो खेतीकी वृद्धि हो ॥ ९॥ - आपाटीकासहितम् (९७) एत योगा यदा माघे न भवन्ति तदा खलु ।। गोधूमाः शालयो मुद्दाः भाद्रे यांति महर्षताम् ३१० यह पूर्वोक्त योग जो माघमें नहीं हो तो गेहूँ, चावल, गि यह वस्तु भाद्रमासमें महंगी हो जाये ॥ ३१० ॥ साघमासे त्रयोदश्यां हिमाच्छादितं नमः ।। पदा तदा महर्षन्ति बीहयो नात्र संशयः ॥ ११ ॥ माघमासमें त्रयोदशीको जो कुहरसे आकाश ढक नावे तो अन्न सस्ता होवे इसमें संशय नहीं ॥ ११ ॥ अमावास्था यदा छन्ना तदा भाद्रे जलं भवेत् ।। पूर्णमासी घनछन्ना पप्टे मासि महर्घता ॥ १२ ॥ जो माघमासमें अमावास्याको बादल होवे तो भाग- मासमें जल बहुत होये, तथा जो पूर्णमासीके दिन बादल हो तो छठे महीने में सब वस्तु महंगी होवे यह माघमा. सका फल कहा ॥ १२ ॥ अथ फाल्गुनमासफलम् । यदा वक्रगती स्यातां शनिभौमौ तपस्यके ।।
"
(९८) मयूरचित्रकम् ।
माघे चाद्यातु तिथिषु त्रिपु सत्यस्य संग्रहः ॥१३॥
कार्यों विपश्चिता तत्र पक्षांते स्थाचतुर्गुणम् ॥
फाल्गुने च गुरोरस्तं वक्र वा यदि जायते ॥
तदा सस्यमहर्घत्वं शनि वक्रतांत्रजेत् ॥ १४ ॥
जो फाल्गुनमासमें शनि, मंगल वक्री होवें, अथवा
मात्र प्रतिपक्षा, द्वितीया, तृतीया इन तिथियोंमें त्री
हो तो तृणधान्यका संग्रह करे ॥ १३ ॥ . फिर पंद्रह
दिन उपरान्त वेचै तो चौगुना लाभ होये, तथा फाल्गुनमा-
समें बृहस्पतिका अस्त हो वा वक्री होष वा शनि वक्री हो
तो तृण महँगा हो ॥ १४॥
यदा फाल्गुनके मासे प्रयात्यस्तं भृगोः सुतः।।१५॥
धान्यादिसर्वसस्यानां तदा वाच्या महर्षता ॥
तदा दुर्भिक्षनादेश्य पण्मासं देवचिन्तकः ।। १६ ।।
जो फाल्गुनमें शुक्र अस्त होवे ॥ १५ ॥ तो अन्न
और तृण सब महँगा हो, और छः मासतक दैवज्ञ जनाको
अन्न महँगा हो ऐसा कहना चाहिये ॥ १६ ॥
भाषाटीकासहितम् । (९९) सप्तमी कृत्तिकायुक्ता फाल्गुनस्य सिता यदा ॥ तदा भाद्रपदे माते कुह्वां मेघः प्रवपंति ॥ १७॥ विना वातं घनेनं वियत्तस्यां तिथो यदा ॥ विद्युद्धा जायते तत्र तदा सस्यावृता मही ॥ १८॥ फाल्गुनशुक्ल सप्तमीको जो कृत्तिका नक्षत्र हो तो भाद- मासमें अमावास्याके दिन मेघ वर्षे ॥ १७ ॥ तथा उसी दिन जो बिना पवन चले बादल होवे और विजली चमके जो पृथिवीपर तृण बहुत उपनै ॥ १८ ॥ फाल्गुनस्य त्रयोदश्यामप्टम्यां वृष्टिरुत्तमा॥ पदि स्याच सित्तायां वे तदा लोका निरामयाः॥१९॥ प्रतिपच्छुकृपक्षस्य वृद्धि याति तदा शुभम् ।। तृतीया दुःखदा प्रोक्ता चतुर्दश्यष्टमी तथा।।३२०॥ फाल्गुनशुदी त्रयोदशी और अष्टमी के दिन जो वर्षा हो तो लोकमें मनुष्य आरोग्य रहे ॥ १९ ॥ फाल्गुन शुक्लमें जो प्रतिपदाकी वृद्धि हो तो शुस जानना, तृतीयाकी (१००) मयूरचित्रकम् । वृद्धि हो तो दुःखदायक जानना, तथा चतुर्दशी वा अष्ट- मीकी वृद्धिसेनी यही फल जानना ॥ ३२० ॥ फाल्गुने मीनसंक्रान्तो भानुवारे तिथिक्षयः ॥ भौमशन्योश्च दुर्भिक्षं सितेज्येन्दो सुभिक्षकम्॥२१॥ फाल्गुनमास मीनकी संक्रान्तिमें रवि, भौम, शनि इन वारोंमें तिथिका क्षय होवै तो दुर्मिक्ष ( महँगा ) होय, और शुक्र, बृहस्पति, चन्द्र इन वारोंमें तिथिक्षय होनेसे सुभिक्ष होवे ॥ २१ ॥ अथाऽल्पवृष्टिलक्षणम् । माघे हिमं न पतितं वातो वाति न फाल्गुने ॥ न च व्योमान्वितं चत्रे घनेन पतनं यदि ॥ २२ ॥ करकाणां च वैशाखे ज्येष्टे चण्डातपो न चेत् ॥ तदाऽतितुच्छवृष्टिः स्यात्यावृट्काले न संशयः२३॥ जो माघमें पाला न गिरे, फाल्गुनमें पवन नहीं चले,-- चैत्रमें बादल नहीं हो ॥२२॥ और जो वैशासमें ओला नहीं गिरे, ज्येदमें सूर्य नहीं तुपै अर्थात् अधिक गर्मी -- जापाटीकासहितम् । (१०१) ' नहीं होवे तो वर्षासमयमें बहुत थोडी वृष्टि होवे इसमें संशय नहीं ॥ २३ ॥ अथ दुर्मिक्षलक्षणम् । आपाढस्यासिते पक्षे दशम्यादिदिनत्रये ।। रोहिणीकालमाख्याति सुखदुर्भिक्षलक्षणम् ॥२४॥ रात्राक्व निरभ्रं स्यात्प्रभाते मेघडंबरम् ॥ मध्याह्न जलविदुः स्यात्तदा दुर्भिक्षकारणम् ॥२५॥ आपाढमासके कृष्णपक्षको दशमी, एकादशी, द्वादशी इन तीनों तिथियों में जो रोहिणी नक्षत्र आवे तो सुनिक्ष, मध्यम दुर्भिक्ष यह फल तिथिक्रमसे जानना ॥ २४ ॥ और रात्रि मेघरहित हो प्रातःकाल मेघ गरजै, मध्याह्न समय बूदें पडें तो दुक्षिका कारण कहिये अर्थात् अन्न महँगा होवे ऐसे लक्षणसे विचारना ॥ २५ ॥ अथ जललगम् । कुंभः कर्कवृषो मीनमकरौ वृश्चिकस्तुला ॥ जलपानि नोक्तानि लोवतेषु सूर्यभम् ।।
(१०२) मयूरचित्रकम् ।, लभत्येव सदा वृष्टिातव्या गणकोत्तमैः ॥२६॥ कुंभ, कर्क, वृष, मीन, मकर, वृश्चिक, तुला यह ७ जललग्न हैं इनमें जो सूर्यनक्षन मिले तो वर्षा होवे ऐसा पंडितों करके जानना ॥ २६ ॥ अथ मेवनक्षत्रमाह। अश्विनीमृगपुष्येषु पूपविष्णुमघासु च ॥ स्वात्यां प्रविशते भानुवर्षते नात्र संशयः ॥२७॥ अश्विनी, मृगशिरा, पुष्य, रेवती, श्रवण, मघा, स्वाति ये जलनक्षत्र हैं, इन नक्षत्रोंमें सूर्य प्रवेश करे तो वर्षा अच्छी होवे इममें संशय नहीं करना ॥ २७ ॥ अथ पुंस्त्रीनपुंसकनक्षत्राणि । आद्रादिदशकं स्त्रीणां विशाखाचिनपुंसकम् ॥ मूलाचतुर्दशं पुंसं नक्षत्राणि कमाइधैः ॥ २८ ॥ वायुनपुंसके भे च स्त्रीणां भे चाभ्रदर्शनम् ॥ स्त्रीणां परुपसंयोगे वृष्टिभवति निश्चितम् ।। २९ ॥
झापाटीकामहितम् । (१०३) अब पुरुष, स्त्री, नपुंसक नक्षत्र कहते हैं आदीसे लेकर स्वातिपर्यन्त दस नक्षत्र स्त्रीसंज्ञक हैं, विशाखासे ज्येष्ठातक तीन नक्षत्र नपुंसक हैं और मूलसे आापर्यन्त चौदह नक्षत्र पुरुषसंज्ञक हैं ॥ २८ ॥ नपुंसकनक्षत्रमें जो वर्षाका नक्षत्र प्रवेश हो तो वायु चले, स्त्रीनक्षत्रमें सूर्यनक्षत्र लगे तो मेघदर्शन रहे अर्थात् बादल बेरे रहें वर्ष नहीं, तथा मीपुरुषका योग हो तो निश्चय वृष्टि होवे ॥ २१ ॥ अथ सूर्य तथा चन्दनक्षत्रसंज्ञा । अश्विन्यादिवयं चैव मादेः पंचकं तथा ।। पूर्वाषाढादि चत्वारि चोत्तरारेवतीद्रयम् ॥ ३३० ॥ उक्तानि शशिभान्यत्र मोच्यन्ते सूर्यभान्यथ ।। रोहिणी च मृगश्चैव पूर्वाफाल्गुनिका तथा ॥ ३१ ॥ सूर्ये सूर्ये भवेद्वायुश्चन्द्र चन्द्रे न वति ॥ सूर्यचन्द्रसमायोगस्तदा वर्पति मेघराटू ॥ ३२ ॥ अधिनी आदि तीन मक्षत्र, आदी आदि पाँच नक्षत्र पूर्वीपाद्वासे चार नक्षत्र अर्थात् अधिनी, भरणी, कत्तिका, (१०४) मयूरचित्रकम् । आदी,पुनर्वसु,पुष्य, आश्लेपा,मया, पूर्वापाटा, उत्तराषाढा, श्रवण, धनिष्ठा और उत्तरा, रेवती ॥ ३३० ॥ यह नक्षत्र चंद्रमाके हैं, अब सूर्यके नक्षत्र कहते हैं, रोहिणी, मृग- शिरा तथा पूर्वाफाल्गुनी आदि सब शेष नक्षत्र सूर्यके हैं ॥३१॥ सूर्यसूर्यके योगमें वायु वहै, चन्द्रचन्द्रके योग वर्षे और सूर्यचन्द्रमाका योग हो तो वर्षा बहुत हो। ३२ अथ चन्द्रसूर्यपरिवेपलक्षणम् । यदि भवति शशांक मंडले चंद्ररश्मा रविशनिकुजवारे पोपमासे त्युमायाम् ।। द्विगुणदहनवेदस्तुल्यते रत्नमौल्यं बुधगुरुभृगुसोमे स्वल्पमोल्यं हि धान्यम्॥३३॥ जो पौष कृष्ण अमावास्याको रवि, शनि, मंगल बारमें सूर्यचन्द्र मंडल हो तो अन्नका मौल्य द्विगुण, त्रिगुण, चौगुण हो जावै, किन्तु रत्नोंके समान मूल्यकी तुलना करे और बुध गुरु शुक्रधार हो तो थोडा मोल अन्नका हो जाय अर्थात् अन्न सस्ता विके ॥ ३३ ॥ "" * भाषाटीकासहितम् । (१०५) रविशशिपरिवेष पूर्वयामे च पीडा रविशशिपरिवेपे मध्यमे चाल्पवृष्टिः ॥ रविशशिपरिवषे धान्यनाशस्तृतीये रविशशिपरिवषे राज्यभंगश्चतुर्थे ॥ ३४॥ जो सूर्यचंद्रका मंडल पहले प्रहरमें हो तो मनुष्या- दिको पीडा हो, और दूसरे प्रहरमें सूर्यचन्द्रमंडल होनेसे योडी दृष्टि होवे, तीसरे प्रहरमें सूर्यचन्द्रमंडल हो तो धान्य- का नाश हो, चौथे प्रहरमें सूर्यचन्द्रमण्डल हो तो राज्य- भंग होवे ॥ ३४ ॥ अथ संवत्सरलग्नफलम। यस्मिन्वपेंच लग्ने शशिनि तनुगते सोम्य- राशिस्थिते वा केन्द्रे याते प्रचुरमुदकं सौम्य- योगोपदृष्टे | पापर्दष्टे न च बहुजलं प्रश्र- कालपि तद्भवाच्यं सर्व फलमविकलं च- न्द्रवद्भार्गवोपि ॥ ३५ ॥ जिरा संवत्सरकी लग्नमें अथवा केन्द्रमें जो चन्द्रमा (१०६) मराचित्रकम् । होय शुभग्रहके घरमें हो या शुममहकी दृष्टि हो तो बहुत वृष्टि होवे और जो चन्द्रमा पापग्रहकी राशिम हो पाप- ग्रहकी दृष्टि हो तो बहुत जल नहीं वर्ष, यह चन्द्रमाके तहत शुक्रकामी विचार करना और वृष्टिप्रश्नसमयमेनी यही विचारना ऐसा कहा है ॥ ३५ ॥ अथ दुर्मिक्षलक्षणम् । उल्कापातो बज्रपातः परिधिः शशिसूर्ययोः ॥३६॥ धूगकेतुः शकचापो ग्रहणं बहुधा यदा ॥ तदा सकलवस्तूनां जायते च महर्षता ॥ ३७॥ उल्कापात (तारे टूटना) वज्रपात ( बिजली गिरना) सूर्यचन्द्रमंडल होना, धूम्रकेतु (पुच्छवाले नक्षत्र ) का उदय, इन्द्रधनुषका निकलना, बहुतसे ग्रहण ऐसे योग हों तो सब वस्तु महंगी होवे ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ । अथ वृष्टिलक्षणम् । प्रष्टा पृच्छन्स्पृशति सलिलं वारिकार्योन्मु- सो वा पृच्छाकाले सलिलामति वा श्रूयते सापाटीकासहितम् । (१०७) सन्मुख वा ॥ दृष्टः कूपो विमलसलिलं चेद्दे- द्वारिवृष्टिमन्तःसर्व भवति च फलं व्यत्यये व्यत्ययेन ॥३८॥ जो वृष्टिप्रश्नकर्ता प्रश्नसमग्र जलका स्पर्श करे अथ- वा उस समय जलशब्द सुनने आचे, वा गलकी बनी हुई वस्तु तथा कुवाँ, बावडी, तालाव इन पर दृष्टि जाय . तो जलकी वृष्टि अच्छी होवे इससे विपरीत लक्षण होने तो विपरीत फल हो अर्थात् वर्षा नहीं हो ॥ ३८ ॥ प्रातःकाले पीतरश्मि निरीक्ष्यो भचंद्रविः ॥ स्निग्धवेडूर्यकांतिश्चेन्मेघा वृष्टिप्रदः स्मृतः॥३९॥ प्रातःकाले यदा सूर्योमध्याह्न दुःसहो भवेत् ॥ तदिने वृष्टिदः प्रोक्तो घृतस्त्वर्णसमप्रभः ॥३४०॥ जो प्रातःसमय सूर्यमें तेज अधिक हो, घाम पीली हो और मेघ चिकने श्यामवर्ण हाय तो वे मेघ वा करनेवा- ले कहे हैं ॥ ३९ ॥ तथा जो प्रातः सूर्योदयसमयमें वा (१०८) मयूरचित्रकम् । मध्याह्नसमय में सूर्यका तेज अधिक हो और मेघ गलाये हुये सुवर्णकांतिके समान हो तो उसी दिन वृष्टि करने- वाले मेघ कहिये ॥ ३४० ॥ यदा जलं वे पिरसं जलदा गोत्रसनिभाः ॥ दिशश्च विमलाः सर्वाः काकांडाभंनभस्तलम्४१ न यदा वाति पवनश्छन्नं यान्ति झपादयः॥ शब्दं कुर्वन्ति मंडूकास्तदा वृष्टिरनुत्तमा ।। ४२॥ जो जल विरस हो, बादल पर्वतसदृश हों, दिशायें नि मल हों, कौएक अंडेके समान आकाश होय ॥ ४३ ॥ तथा पवन न चले, मछली आदि जलजन्तु पृथिवीमें जा लगे, मेंडक शब्द करने लगे तो उत्तम वृष्टि होवे और शीव वर्षा होवे ॥४२॥ नखेलिसन्ति मार्जाराः पृथिवीं च यदा भृशम्॥ लोहानां मलनिचयो विस्रगंधो यदा भवेत्॥४३॥ सेतुं कुर्वन्ति रथ्यायां शिशवो मिलिता यदा ।। शुद्धांजनाभा गिरयो बाष्पमुद्रितकन्दराः॥४४॥ - आपाटीकासहितम् । विल्टी, कुत्ता आदि अपने पंजोंसे पृथिवीको खोद लो- हेके मैल में दुर्गन्धि आवे ॥ ४३ ॥ मार्गमें बालक सब मिलकर सेतु बाध और अंजनके समान पर्वत हो जॉय, पर्वतोंकी गुफा पमीजने लगे ॥ ४४ ॥ पिपीलिका यदांडानि गृहीत्वोच्चं प्रयांति च ॥ सपा वृक्षं समायान्ति तदा वृष्टिरभूत्किल ॥१५॥ गावः सूर्य निरीक्षन्ते कृकलासमणास्तथा ।। गृहानेच्छति पशवो निर्गमकुमुरास्तथा ॥४६॥ तथा जो चिउँटी अपने अंडाको लेलेकर ऊपरको चहें, संप वृक्षपर चंदं तो निश्चय वृष्टि होये ॥ ४५ ॥ तथा गौ सूर्यकी और देस गिरगिटमी सूर्यको देखें पशु घरसे जाने. की इच्छा नहीं करे तथाकुत्तेगी घरसे बाहर निकलना नहीं चाहि ॥ ४६॥ लताभोर्चमुसाः सर्वाः स्नानं कुर्वन्ति पक्षिणः । पांसुभिश्च तृणापाणि संयंते गा सरीसृपाः॥४७॥ विपत्तित्तिरपक्षाभमलिपक्षनिभं तथा ।
(110) मयूरचित्रकम् । तदा वृष्टिः समादेश्या निश्चितं देवचिन्तकः ॥४८॥ वृक्षोंकी शाखायें ऊंची खड़ी हो जाय और जीवजन्तु पक्षी आदि धूलमें स्नान करें तथा वृक्षोंकी शाखाओंके अग्रभागमें कीडे झूलें ॥ ४७ ॥ और तीतरके पंख समान बादल होय तो दैवज्ञों करके निश्चय वृष्टि कहना चाहिये यह दृष्टिके लक्षण वर्णन किये ॥ ४८॥ अथ सद्योवृष्टिलक्षणम् । । प्रावृहकाले शीतरश्मिर्षदा स्याच्छुकानय्ये सौम्यदृष्टो यदा स्यात् ॥ बुद्धिस्थाने सप्तमे च त्रिकोणे वृष्टिाच्या देवविद्भिः पुराणैः॥४९॥ वर्षाकालमें जो शुकसे चौथे घरमें शुनदृष्ट चन्द्रमा हो तथा पांचवें सातवें और त्रिकोण ९.५ में जो चंद्रमा हो शुभ ग्रहोंकी दृष्टि हो तो शीघ्रवृष्टि कहिये यह प्राचीन आचार्यों करके कहा गया है ॥ ४९ ॥ शुभाश्च जलराशिस्था केन्द्रगाः स्वीयगेहगाः॥ जलप्रदा सिते पक्षे विधी चोदयगे जले ।। ३५० ॥
भाषाटीकासहितम् । (१११) सप्तममो रविचंद्रो सितरविजो रसातले लग्नात् ॥ प्रावृट्काले जलदो भवतो वा द्वितीयतहजस्था५१॥ जो शुभ ग्रह जलराशिमें हो और केन्दमें यह स्वगृही होय तथा जो चन्द्रमाका उदय जलराशियोंमें हो और शुक्लपक्ष होय तो वर्षा शीघ्र होवे ॥ ३५० ॥ वपीकालमें लग्नसे जो सातवें मृर्य चन्द्रमा हों और चौथे शुक्र शनि हों अथवा दूसरे तीसरे हों तोमी वर्षा शीघ होवे ॥५१॥ प्रश्नलनात्तोयगाशयदि वित्तस्तृतीयके ॥ तोयसंज्ञो ग्रहस्तव भवत्यभ्रं जलप्रदम् ॥५२॥ संयोगे सितबुधयोस्तथा च गुरुशक्रयोः॥ तथैव जीवबुधयोवृष्टिः स्यानात्र संशयः ॥५३॥ प्रश्नलमसे दूसरे वा तीसरे जलराशि हो और वहां पल ग्रह बैठा होय तो शीघ्र वर्षा होये ॥५२॥ तथा जो शुक्र बुध एकराशिम हो बृहस्पति, शुक्र एक घरमें हो अथवा बुध गुरु एक राशिमें हो तो निस्सन्देह शीव वपी होय ५३ यदा भवंति सूर्यस्य ग्रहाः पृष्टावलवनः ॥ -- (११२) मयूरचित्रकम् । पुरता वा यदा यांति तदा त्वेकार्णवा मही५४॥ बुधभृग्वोर्मध्यगतः सूर्यश्चेजलशोपकः ॥ तयोर्यदि समीपस्थस्तदा बहुजलप्रदः ॥ ५५ ॥ जो सूर्यके आगे वा पोछे ग्रह होंय तो जलमयी पृथ्वी हो जावे ॥ ५४ ॥ तथा जो बुध और शुक्रके मध्यगत सूर्य्य हो तो जलको शोपे और जो पासही होय तो शीघ्र बहुत जल बरसे ॥ ५५॥ अग्रे याति यदा भोमः पश्चाञ्चलति भास्करः ।। तदा वृष्टिनं विपुला जायते नात्र संशयः॥५६॥ जो आगे मंगल होय और पीछे मूर्य होय तो वर्पा बहुत नहीं होवे अन्यथा वृष्टि होवे इसमें संशय नहीं ५६ अतिचारगते मन्द भौमे मन्दे च वक्रिणि ।। हाहाभूतं जगत्सर्वं विशेपादक्षिणापथे ॥२७॥ बृहस्पति अतिचार हो और मंगल शनि वक्री होय तो जगत्में हाहाकार हो विशेषकरके दक्षिणमें पीडा हो ५७ 1 भापाटीकासहितम् । (११३) दशों वे पोपमासे भवति यदि बलारातिनक्ष- जयुक्तो देशे सस्य महर्षं भवति च तदा मृ. लयुक्तोऽधमील्यम् ॥ पूर्वापाढायुतश्चद्विगु- णमपयुतो वैश्वदेवन कुर्यात् दुर्भिक्ष राष्ट्रभंग जनपदमरणं नर्तयत्को पिशाचान् ॥ ५८ ॥ जो पोपमासको अमावास्याको ज्येष्ठा नक्षत्र हो तो देशीम तृण महंमा होवे, मूलनक्षत्र हो तो आधा गोल विके, पूर्वीपाढा नक्षत्र हो तो दुनामोल होये, उत्तरापादा नक्षत्र होवे तो दुर्भिक्ष पडे और मनुष्यादि प्राणी बहुत मरे तथा भूत पिशाच नांचं ॥ ५८ ॥ माहेयवार रविजे कुजे वा भवदमा शीतक- रप्रिया पा॥ लोकः सशोकः क्षितिपारलो- कः परम्परं युद्धयति शस्त्रसंघः ॥ १९ ॥ जो माघी पौर्णमासी तथा अमावास्याको शनि मंगल व गर्यवार हो तो मन लोकमें शोक व रानाआग परसर हथियारांसे युन कर ॥ ५९ ॥ - (११४) मयूरचित्रकम् । छत्रस्य भंगः सलिलस्य नाशा लोकेषु पीडा पशुवित्तहानिः ॥ स्याच्छीविहीनो यदि चक्र- वर्ती वक्रे च शोरे पितृसंस्थिते च ॥ ३६० ।। जो मघानक्षत्रपर स्थित शनैश्वर वक्री होवे तो छत्रभंग हो, जल, पशु तथा द्रव्यका विनाश हो और पशुओंमें पीडा व चक्रवर्ती राजानी लक्ष्मी करके हीन होये ॥ ३६० ॥ यदा धनुनिवृषालिसंस्थिते धरासुते सूर्य- सुते च वक्रिणि ॥ हयैश्च नागेश्च नरेश्च गो- कुलेत्रिभागशेषां कुरुते वसुन्धराम् ॥ ६१ ॥ जो धन मीन बृप वृश्चिक इन राशियोंपर स्थित मंगल और शनैश्चर वक्री हो तो घोडा हाथी और मनुथ्य गोंयें ये सब जीव पृथ्वीपर तिहाई शेष रहें ॥ ६ ॥ यदारशोरी सुरराजमंत्री यदेकराशौ समस- तके वा ॥ अयोध्यलंकापुरमध्यदेशे क्षुधा- भयं शस्त्रभयं करोति ॥ ६२॥ जो मंगल शनैश्चर बृहस्पति यह ग्रह एक राशिपर हों Tv
भाषाटीकासहितम् ।
(११५)
अथवा परस्पर सातवे हों तो अयोध्या लंका इनके मध्यके
देशोंमें दुक्षि और शखका भय होवे ॥ ६२ ॥
वकं गतो रविसुतोऽथ धरासुतोवा इस्ते त-
थेव पितृदेवतरोद्रभेषु ॥ क्षत्रस्य भंगपतनं
भुवि सैनिकानां सर्वत्र लोकमरणं खलु शस्त्र-
संचेः ॥ ६३॥
शनि अथवा मंगल हस्त मया आर्द्रा इन नक्षत्रोंपर
स्थित होके वक्री हो तो क्षत्रभंग हो और सेना कटकर
पृथ्वीपर गिरे, तथा निश्चय करके लोकमें मनुष्योंका मरण
हथियारोंके समूहसे होवे ॥ ६३ ॥
कन्यायां मीनसिंह वृपधनुपि यदा वक्रगो
भीममन्दो पृथ्वीशाररूपा वहुरिपुदलिता
विग्रहश्चैव पीडा । दुर्भिक्षं सस्यनाशो ग्रह-
गतिभयदाः पित्तरोगाः प्रजानां पीडयंते
चात्रिगोत्रा नृपमहिपगजास्तन्निवृत्तौ तु या-
वत् ॥१४॥
(११६) मयूरचित्रकम् ।
जो कन्या, मीन, सिंह, वृष, धनु इन राशियोपर
स्थित मंगल शनैश्वर वक्री होय तो राजाओंको दुष्टरूप
शत्रुओंसे बहुत पीडा तथा बिगाड होवे, और दुर्तिक्ष,
तृणका नाश होवे, प्रजामें भय पित्तकी बाधा हो तथा
अत्रिगोत्रवाले अर्थात् चन्द्रवंशी राजाओंको, पशुओंको
पीडा हो, जब मार्गी हो तब यह फल निवृत्त
होये ॥ ६४॥
शुक्रसोर्यो योरस्तमेकराशो यदा भवेत् ॥
अन्नपीडा महायुद्धं देशे देशेच विग्रहः ॥६५॥
चत्वारः पंचगाः खेटा बलिनस्त्वेकराशिगाः॥
राज्ञां बहुभयं दद्युररिभिर्दुःखदा मताः ॥ ६६ ॥
शुक्र, शनि यह दोनों ग्रह जो एक राशिपर होवे और
अस्त हो जाये तो अन्नपीडा, महायुद्ध, देशदेशों में विग्रह
होये ॥ ६५ ॥ तथा जो चार ग्रह एक राशिके होके
वर्ष (सम्वत्सर) लग्रसे पंचम स्थानमें हो तो राजाओको
बहुत भय और दुःखके देनेवाले जानिये ॥ ६६ ॥
मापाटीकासहितम् । (११७) यदा प्रतिपगो खेटौ नृपं क्षोभयतस्तदा ॥ प्रतीपगात्रयः खेटा युद्धदृष्टिभयप्रदाः ॥ ६७॥ राज्यभंग हि कुर्वन्ति चत्वारो यदि पक्रिणः ।। प्रतीपगाः पंच खेटाभंगदा राज्यराष्ट्रयोः॥६८॥ जो दो ग्रह वक्री हो तो राजाको चलायमान करे हैं, तीन ग्रह वक्री हों तो देखने में भयदायक युद्धको करें हैं ॥६७ ॥ तथा जो चार ग्रह वक्री होय तो राज्यभंग करे हैं पांच ग्रह वक्री होय तो देशको भंग करनेवाले जानने ६८ अर्कशोरी भोमशौरी तमःसारेज्यमंगलौ ॥ गुरुसोरी महायोगो महीनाशाय कल्प्यते ॥ ६९ ॥ पंच ग्रहा नन्ति चतुष्पदांश्च पट् वे ग्रहा नंति समस्तभूपान् ॥ सप्त ग्रहा नन्ति स- मस्तदेशान् अप्टग्रहःस्यात् खलु कूटयोगः॥३७०॥ रवि शनि, मंगल शनि,व राहु शनि वा गुरु मंगल, तथा बृहस्पति शनैश्वर उन दो दो ग्रहोंका योग हो तो पृथिवीका नाश हो । ६९ ॥ पांच ग्रह जो एक राशिपर हों तो पशु-
(११८) मयूरचित्रकम् ।
ओंका नाश होछ: ग्रह एक राशिपर हों तो सब राजाओंका
नाश करें, सात ग्रह एक राशिपर हों तो सब देशोंका नाश
होय, आठ ग्रह एक राशिपर हों तो कालकूट योग होता है
जिसमें पृथिवीमरमें कोलाहल हाहाकार हो जावे ३७०॥
अथ संक्रान्तिक्शेन शुभाशुभकलम् ।
संक्रांतिर्जायते यत्र भास्करे भूसुते शनो ॥
तस्मिन्मासि भयं घोरं दुर्भिक्ष दृष्टितो भयम् ॥७॥
संक्रांतिसमये भानोभवेत्सप्तमगः शशी ।।
तदाकाले महर्षं स्यात्सर्वधान्यं सुनिश्चितम् ॥७२॥
जिस महीने में सूर्यकी संक्रान्ति मंगल, शनिबारमें
प्रवेश हो, उस महीनेमें घोर दुर्भिक्ष और मय होवे
॥ ७१ ॥ जो संक्रान्तिके दिन सूर्यकी राशिसे सातवें
घर चन्द्रमा हो तो उस महीने में निश्चय करके सब अन्ना-
दिक पदार्थ महंगे होवें ॥ ७२ ॥
मीने मेषे द्विमासं स्यात्तथा सिंहोदये त्रिषु ॥
मासं मिथुनगे सूर्ये द्विमासं वृपकुंभयोः॥ ७३ ॥
मापाटीकासहितम् । (११९) कर्के मृगे च पण्मासं मासं शेपे महर्षता ॥ पूर्वसंक्रातिनक्षत्रात्परसंक्रमणं यदि ॥ ७४ ॥ द्विविकाक्षे सुभिक्षं स्थाढर्भिक्षं तुर्यपंचमे ॥ पष्टे लोकाभ्रमंत्याशु गृहीत्वा खपरं करे ॥७२॥ पीन मेपकी सक्रान्तिमें जो सबसे सातवें चंद्रमा हो तो दो महीनेतक महँगा हो, सिंहको संक्रांतिमें हो तो तीन महीनेतक, मिथुनमें एक मासतक, वृप, कुकी संक्रान्तिमें हो तो दो महीने तक ॥ ७३ ॥ कर्दगारकी संक्रान्तिमें हो तो छः मासतक, शेप राशियोंकी संक्रांतिम हो तो एक मासतक दुर्मिक्ष जानना, पहली संक्रान्तिके नक्षत्रसे दूसरी संक्रान्ति जो ॥७४॥ दूसरे तीसरे नक्षत्रपर प्रवेश हो तो सुनिश (सस्ता) अन्न हो और चौथे, पाच नक्षत्रपर होये तो दुर्भिक्ष हो, तथा छठे नक्षत्रपर हो तो शीघ्र लोक खप्पर हाथ में लिये मांगते फिरे ॥ ७५ ॥ अथ तिथिवारपरत्वेन शुनाशुमफलम् ॥ प्रतिपदुधसंयुक्ता सदा दुर्भिक्षकारका ॥
(१२०) मयूरचित्रकम् । ज्येष्टमासे विशेषेण वर्षे त्यागामिके भयम् ॥७६॥ मासात्पूर्णिमा हीना समानाथाधिवार्धिका ॥ समय च समत्वं च महर्षे च भवेत्कमात्॥७७॥ सब महीनोंमें यह विचारना जो बुधवारकी प्रतिपदा हो तो दुर्भिक्षकारक जानना विशेष करके ज्येष्ठमासमें जो प्रतिपदा बुधवारकी हो तो आगे सालमें भयकारक दुर्मि- क्ष जानना ॥७६॥ महीनेके नक्षत्रसे जो पूर्णमासी तिथि कमती हो तो सस्ता भार हो बराबर हो तो भाव समान हो अधिक हो तो महँगा होवे ॥ ७७ ॥ ज्येष्ठल्यागमने प्रार्या तिथिः प्रथमा भवेत् ॥ केन वारेण संयुक्ता विज्ञया सा विशेपतः॥७८॥ भालुना पवनो वाति कुजेन व्याधिमादिशेत् ॥ चन्द्रपुत्रेण दुर्भिक्षं भवतीह न संशयः ॥ ७९ ॥ ज्येष्ठमासके लगतेही बुद्धिवान् जन विचार करे, कि मातिपदाके दिन कौन वार है जिससे फलकी विशेपता जानना ॥ ७८॥ जो प्रतिपदाको रविवार हो तो पयन मापाटीकासहितम् । (१२१) बहुत चले मंगलबार हो तो रोग होवे बुध हो तो दुर्भिक्ष हो इसमें संशय नहीं ॥ ७९ ॥ गुरुभार्गवसोमानामेकोपि यदि जायते ॥ वावधि भवेत्पृथ्वीसस्यधान्यधनाकुला३८०॥ अथवा देवयोगेन शनिवारस्तदा भवेत् ॥ जलशोपप्रजानाशः ध्यभंगस्तदा भवेत्॥॥८१ तथा जो गुरु, शुक्र, चंद्र इन वारोमेंसे कोई एक वार हो तो वर्षपर्यन्त पृथिवी तृण, अन्न, धनरो परिपूर्ण रहे ॥ ३८० ॥ अथवा देवयोगसे शनिवार होवे तो जलको शोपजाय अर्थात वर्षा नहीं होवे, और प्रजाका नाथ तथा क्षत्रांग होये ॥ ८ ॥ चन्द्रोदयं निरीक्षत द्वितीया लब्धजन्मनः ।। ज्येष्टोत्तर ह्यमायां च भानारस्तं विलोकरीत्॥८२ यद्युत्तरे शशी मध्योत्यायाति दक्षिणे वः ॥ उत्तमोमध्यमो नीचः कालः संपद्यते तदा।।८३॥ द्वितीयाके चन्द्रमाका उदय, और ज्येडमासमें अमा- . (१२२) मयूरचित्रकम् । वास्याके दिन सूर्यका अस्त देखे ॥ ८२॥ जो सूर्यसे उ. तरमें चन्द्रमा होवे तो समय उत्तम हो और जो मध्यमें होवे तो मध्यम समय होवे, तथा दक्षिणमें हो तो समय अपग जानना ।। ८३ ॥ आपाढे श्रावणे पोपे रविभौमशनैश्चराः ।। वासरा यत्र जायते तत्फलं यच्णुष्व तत् ।।८४॥ पंचाकवारे दुर्भिक्षं पंचभोमे महद्भयम् ॥ पचमन्दे च रोगः स्यात् शेषावाराःशुभावहाः८५ आपाड, श्रावण, पोप इन महीनों में जो रवि मंगल शनि यह वार होवे तिनका फल श्रवण करो ॥ ८४ ॥ जो पाँच रविवार हों तो दुर्लक्ष हो, पाँच मगंलवार हाँ तो महाभय हो, और पाँच शनिवार हों तो रोग हो, शेष- यार हों तो शुभ फल जानना ॥ ८५ ॥ आपाढे श्रावणे पौषे वैशाख भृगुदर्शनम् ॥ गया मृत्युः प्रजापीडा दुर्भिक्षराजविग्रहः॥८६॥ समाना ऋतयः सर्वे बांति वाताः शुभाः यदि ॥ -
मापाटीकासहित । (१२३)
लक्षणानि शुभानि स्युः सर्वदेव शुभं तदा ॥८७॥
आषाढ, श्रावण, पोप, वैशाख इन महीनों में जो शुक्रो-
दय होवे तो गौवोंकी मृत्यु हो, प्रजाको पीडा हो, तथा
दुर्भिक्ष हो, राजामें विग्रह होवे ॥ ८६ ॥ जो सब ऋतु-
ये समान हो अर्थात् ऋतुओंका विपर्यय नहीं हो, पवन
उत्तमतासे मन्द मन्द वह अर्थात कठोर पवन नहीं होय,
और लक्षण शुभ हो तो समय अच्छा जानना ।। ८७ ॥
संक्षेपेण मया प्रोक्तं तिथिवारांद्भवं फलम् ॥
ज्ञातव्यं च प्रयत्नेन ग्रन्थेस्मिन् बुद्धिमत्तरः३८८
इति श्रीमदवन्तिकाचार्य्यवराहमिहिरविर-
चितं मयूरचित्रकं समाप्तम् ।
श्रीमत् अवन्तिकाचार्य वराहमिहिरजी कहते हैं कि
यह तिथिवारसे उत्पन्न फल मने संक्षेपसे वर्णन किया इस
ग्रंथ सम्पूर्ण कहा गया शुभाशुभ फल बुदिवान् जनों-
करके यत्नपूर्वक जानना चाहिये ॥ ३८८ ॥
(१२४) मयूरचित्रकम् । लक्ष्मीपुरे बरेल्यांच नारायणमुकुन्दयोः ।। ताभ्यां ज्योतिषग्रन्थोऽयं गंगाविष्णोः समर्पितम्॥ लखीमपुर और बांसबरेलीमें संस्कृत व मापापुस्तका. लयके स्वामी पंडित नारायणप्रसाद मुकुन्दराम तिन दोनोने यह मयूरचित्रक नाम ज्योतिषग्रन्थ भापाटीका सहित सेठ गंगाविष्णु श्रीकृष्णदासजीको समपर्ण किया ॥ १ ॥ रामबाणनिधीन्द्वन्दे चैत्रे मास्यसिते दले ॥ . पंचम्यां सोमवारेच भापा संपूर्णतामगात् ॥२॥ श्रीमन्महाराजा विक्रमादित्यजीके संवत् १९५३ चैत्र कृष्णपक्ष पंचमी भौमवारको यह मयूरचित्रककी भापा सम्पूर्ण भई ॥ २॥ वापयं रचिता प्रेम्णा श्रीनारायणशर्मणा ॥ . अब कुवाप्यशुद्धं चेत्क्षन्तव्यं पूर्णसज्जनः ॥३॥ यह मामा भेमपूर्वक श्रीनारायणप्रसादजीने रचना भाषाटीकासहितम् । (१२५) करी, इसमें कहीं भी कुछ अशुद्धता हो गई हो सो पूर्ण सज्जन पंडितों करके क्षमा करनी योग्य है ॥ ३ ॥ इति श्रीमत्पण्डितनारायणप्रसादमुकुन्दरामरुतभा- पाटीकान्वितं मयूरचित्रकं समाप्तम् ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवेंकटेश्वर " छापाखाना, कल्याण-मुंबई.
(१२४) मयूरचित्रकम् । लक्ष्मीपुरे बरेल्यांच नारायणमुकुन्दयोः ।। ताभ्यां ज्योतिषग्रन्थोऽयं गंगाविष्णोः समर्पितम् ॥ लखीमपुर और बांसबरेलीमें संस्कृत व भाषापुस्तका. लयके स्वामी पंडित नारायणप्रसाद मुकुन्दराम तिन दोनोंने यह मयूरचित्रक नाम ज्योतिषग्रन्थ जापाटीका सहित सेठ गंगाविष्णु श्रीकृष्णदासजीको समपर्ण किया ॥ १॥ रामवाणनिधीन्द्वन्दे चैत्रे मास्यसिते दले ।। पंचम्यां भौमवारेच भापा संपूर्णतामगात् ॥२॥ श्रीमन्महाराजा विक्रमादित्यजीके संवत् १९५३ चैत्र कृष्णपक्ष पंचमी भौमवारको यह मयूरचित्रककी भापा सम्पूर्ण भई ॥ २॥ वापयं रचिता प्रेम्णा श्रीनारायणशर्मणा ॥ . अब कुत्रायशुद्धं चेत्क्षन्तव्यं पूर्णसजनः ॥३॥ यह भाषा प्रेमपूर्वक श्रीनारायणप्रसादजीने रचना भापारीकासहितम् । (१२५) करी, इसमें कहींमी कुछ अशुद्धता हो गई हो सो पूर्ण सज्जन पंडितों करके क्षमा करनी योग्य है ॥ ३ ॥ इति श्रीमत्तण्डितनारायणप्रमादमुकुन्दरामरुतमा- पाटीकान्वितं मयूरचित्रकं समाप्तम् ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः। पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवेंकटेश्वर" छापाखाना, कल्याण-मुंबई.
नाम. ज्योतिष-ग्रन्थाः। की.रु.आ. अयोध्याजातक-भाषाटीकासमेत. अर्घप्रकाश-भाषाटीकासमेत । इसमें तेजी-मन्दी वस्तु देखनेका विचार भलीभाँति लिखागया है. आनन्दप्रकाश-भापाटीकासमेत । यह ग्रन्थ ज्योतिपियोंको अतीव उपयोगी है। इसमें-शंगकी स्थिति, असाध्य- रोग किस प्रकार शान्त होगा तथा रोगमुक्ति, स्नानदानादि कितनेही उत्तम विपय लिखेगये हैं. आर्यभटीय-(ज्योतिषशास्त्र ) संस्कृत तटीकाभापाटीकासमेत... १-० कर्णकुतूहल-सटीक तथा उदाहरणस- हित । ब्रह्मपक्षीय गणित ग्रन्थ ०-१२ " २ . की.इ.आ. नाम, करणन्दुशेखर इसमें रव्यादि ग्रहोंकी सारणी भलीगाँति दीगई है । तथा सिद्धान्तोक्त सब विषय संक्षेपसे इसमें आगय.. कीर्तिपञ्चांग-संवत् १९७८ का पं० महीधरशमीकृत । हिमालयादि देशों में यही पंचांग प्रचलित है .... केरलतत्त्वप्रश्नसंग्रह-भापाटीकासमेत । प्रश्न कहने में यह अन्य तात्कालिक है. ०-६ केशवीजातक-सान्वय सोदाहरण जगदीश- त्रिपाठीकृत भापाटीकासहित । इस ग्रन्थका गणित जन्मपत्रिका वनानम अपूर्व है । ग्लेज २-० " तथा रफ.
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की.रु.आ.
केतकीपञ्चांग-शके १८४३ का । इस
पञ्चांगका गणित बहुत ठीक है और
ग्रहण इत्यादिक बराबर मिलते हैं.
खेटकौतुक भापाटीकासमेत । इसमें
नव्वाव खानखानेने चमत्कारिक
फलादेश कहाहे.
गर्गमनोरमा-संस्कृतटीका तथा भापाटी-
कासहित । इसमें प्रश्नसे गर्गस्थ पुत्रक
न्यादिका ज्ञान, मौष्टिकादि वस्तुज्ञान
तथा द्रव्योत्पाटनादि प्रकार सुगम
रीतिसे वर्णित हैं.
पुस्तकें मिलनेका ठिकाना-
गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास,
" रक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" छापखाना
कल्याण-मुंबई.