University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
बालसंस्कृतप्रभाकरः
Front matter
॥ श्रीः॥
प्र.
3-५-६
अर्थ
..
बालसंस्कृतप्रभाकरः।
गार्यकुलोत्पन्नेन केशवमहात्मजेन
प्रभाकरशास्त्री-
तिसमारख्येन मूणि कविता 1973
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श्रीकृष्णदासात्मज-गंगाविष्णुना
लक्ष्मीवेंकटेश्वर " मुद्रणालये
संमुद्य प्रकाशितः।
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-
नजे
तृतीयावृत्तिः।
कल्याण-मुंबई.
संवत् १९६३, शके १८२८.
इस पुस्तकका रजिष्टरी सब हक्क १८६७ के अॅक्ट
२५ के बमुजब प्रकाशकने अपने स्वाधीन रक्खा है,
Registered for copy-Right under
Act XXV of 1867.
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प्रस्तावना. विद्यार्थी और पाठकगण ! आज कल संस्कृत सीखनेवाले विद्यार्थियोंके उपयोगी परंतु बहुतही श्रमदायक जो ग्रंथ प्रसिद्ध हुए हैं, उनके पढनेसे बहुतही श्रम होता है, परंतु ताक् फल नहीं होता, यह सोच यह बालसंस्कृतप्रभाकर पुस्तक तैयार हुआ है. इसके पढनेते श्रम तो बहुत नहीं और फल तो बहुतही होगा तथा नये निकले हुए संस्कृत सीखनेके उपयोगो ग्रंथ गतार्य होंगे ऐसा विद्वानोंका मत है । इस ग्रंथमैं प्रथमतः व्याकरणकी सबहो उपयुक्त बातें लिखकर आगे व्यवहारके उपयोगी गंभीर २ संस्कृत शब्द और ज्योतिष धर्मशास्त्र सुभाषित आदि बहुत उपयुक्त विषयोंसे परिपूर्ण संस्कृत वाक्यावलि और उसके सामने शुद्ध हिंदीवाक्योंसे अर्थ लिखा गया है । जिनसे उपयुक्त सबही विषयों में संस्कृत बोलनेमें तथा भाषांतर करनेमें नैपुण्य प्राप्त होगा, सो विद्यार्थयों ने अनुभवसे निश्चय करना । औरभी विद्वानों के पास प्रार्थना है कि, इसमें जो कुछ अशुद्ध होय वह कृपा करके कहना, चतुर्यावृत्तिमें सुधारा जायगा, सुगमताके अर्थ सब संधि नहीं किये गये इति शम्। प्रकाशक:-गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास. संमतिः। अन्वर्थसंज्ञकं बालसंस्कृतप्रभाकराभिधमिदं पुस्तकं हिंदीभाषापरिचि- तेभ्यः संस्कृतभाषाजिज्ञासुभ्यो बालेभ्यो गीर्वाणवाग्देवीद्वारमार्गदर्शनं त्वरितमेवाल्पायासेन दास्यतीति मे भाति. शम्. हरिपुरन्यायपाठशालाध्यापकस्तैलंगान्वयो- बाळशास्त्री. मैं जानता हूं कि यह “बालसंस्कृतप्रभाकर ” नामक पुस्तक संस्कृत सीखनेवालोंको बडाही लाभदायक होगा. गणेश काशीनाथ काळे. I have gone through this book (Balsanskritprabhakar) carefully and I think it will be a valuable assistance to the beginners of Sanskrit. July 1/7/95. N. V. SOHONI.
अथ बाल संस्कृतप्रभाकरस्थविषयाणामनुक्रमणिका. पृष्ठ. १ .... " .३५ .... .Una ..४४ विषय. पृष्ठ । विषय. मंगलाचरण स्थानप्रयत्नविचार शिक्षाविचार स्वरसंधिका अपवाद विभक्तिविचार २ स्वरसंधिचक्र उदाहरणाथ रामशब्द उपदेशविचार .... तच्छन्द ४ नित्यकर्मोपदेश युष्मच्छब्द ५ स्वभावौंपदेश .... अस्मच्छन्द विद्यार्थिसंवादोपदेश विभत्त्यर्थभाषाव्यवहार दिगुपदेश शब्दभेदविचार... कालोपदेश तिप्रत्यय गृहवृत्तोपदेश भू धातु-कर्तृप्रधानरूप १० अवतारोपदेश भू धातु-भावप्रधानरूप तरण्यवतारोपदेश अस् धातु-कर्तृप्रधानरूप.... १४ १४ । स्वर्गोपदेश कृ धातु-कर्तरिरूप सुभाषितोपदेश.... कृ धातु-कर्मप्रधानरूप १८ । कयोपदेश कालपुरुषविचार १९ । षट्शास्त्रोपदेश.. कारकविचार २० पुस्तकोपदेश विभक्त्यर्थविचार .... २१ । मुद्रणागारोपदेश कृदंतविचार २६ | शब्दसंग्रहोपदेश तद्धितविचार .... २९ । परीक्षोपदेश स्त्रीप्रत्ययविचार ३१ । समाप्ति इति अनुक्रमणिका समाप्ता, ... ५१ ५४ .... .... .... १७ .. ....६८ ७२ ७६ ७८ ....८१ ९४ पुस्तक मिलनेका ठिकाना-गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, लक्ष्मीवेंकटेश्वर" छाणखाना. कल्याण-मुंबई..
: ॥ श्रीगणेशाय नमः॥ अथ बालसंस्कृतप्रभाकरः। eaxea>- ध्यायाम्यहं परब्रह्म महो हरिहरात्मकम् । यत्कृपालवतो धीराः प्रख्याति यान्त्यहनिशम् ॥ वेंकटाख्यं ज्ञानगुरुं यशोदां जननीं तथा। केशवं पितरं रामं भ्रातरं प्रणमाम्यहम् ॥ तनोति गर्गान्वयजःप्रभाकरसमाभिवः। बालबोधाय सुगम संस्कृतस्य प्रभाकरम् ॥ शिक्षाविचार. बालसंस्कृतप्रभाकर नामक यह ग्रंथ पढनेवालोंको प्रथ- म शब्दरूपावलि, धातुरूपावलि और समासचक्र ये तीनों छोटेसे ग्रंथ अवश्य पढना चाहिये। ये तीनों ग्रंथ मुखसे तैयार कर उनमें जो शब्द और धातु चलाकर दिखाये हैं उनके सरीखे औरभी शब्द तथा धातुओंके रूप चलानेका प्रयत्न करे। इस प्रकार समासचक्र में जो समास कहे हैं उनका लक्षण भेद आदिका अर्थ गुरुसे अच्छी तरह जानकर औरभी समास छुडानेका प्रयत्न करे। जहां संशय होवे तहां गुरुको पूछे। अध्यापककोचाहिये कि प्रथम ऊपरके तीनों ग्रंथ शुद्धता- पूर्वक विद्यार्थियोंको पढावे और पढानेमें शब्दोंके अंवर्ण, २ - बालसंस्कृतप्रभाकरे लिंग, वचन, विभक्ति तथा क्रियापदोंका लकार, काल, पुरुष, वचन और समासोंके भेद, उदाहरण आदि समझा देवे; और पूंछे । इसी तरह अन्य शब्द, धातु चला लेवे । तथा अन्य समासभी पूंछे । जिससे पढनेवालोंका अयास दृढ हो जाय । इस ग्रंथमें कहे हुए नियम और वाक्य उक्तरीतिसे समझा देकर मुखसे तैयार करा लेवे । कारक-कर्ता, कर्म आदि और प्रयोग-अकर्मक, सकर्मक, द्विकर्मक कतरि, कर्मणि, भावे तथा नाम, सर्वनाम आदि सब वारंवार पूंछे और कहे । संस्क- तका पाकत वाक्य और प्राकतका संस्कृत वाक्य बना लेवे । जिससे विद्यार्थी संस्कृत बोलनेमें चतुर हो जाय । विभक्तिविचार. संस्कतमें विमक्तियां सात (७) हैं। और प्रत्येक विभक्ति- के प्रत्यय तीन तीन हैं। उन प्रत्ययोंकी संज्ञानी तीन हैं। यथा- संस्कृत. हिंदी. विभक्ति. एकव० दिव० एक० द्वि० बहु० स् औ अस् द्वितीया अम् अस् तृतीया भ्याम् भिस् से. चतुर्थी भ्याम् भ्यस् को. पंचमी अस् भ्याम् भ्यस् से. षष्ठी আপু सप्तमी मोस् १ यह विशेष ध्यान रखना चाहिये कि, हिंदीमें तीनों वचनोंका एकही प्रत्यय है। परंतु द्विवचन या बहुवचनकी विवासे प्रत्य- बहुव० प्रथम . अम् औ को. अस् ओस् का, के, की. . इ में, पै, पर.
३ - शिक्षाविचारः ।। ये सात (७) विभक्तियां कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, अधिकरण ये छः कारक और संबंध तथा संबो- धन इन अर्थों में होती हैं । यथा- कर्ता प्रथमा, तृतीया, षष्ठी. संप्रदान चतुर्थी. संबोधन प्रथमा. अपादान पंचमी. कर्म प्रथमा, द्वितीया, षष्ठी. संबंध षष्ठी. करण तृतीया. अधिकरण सप्तमी. उदाहरणार्थ अकारांत पुल्लिंगी रामशब्द. संस्कृत. विभक्ति. एकव० द्विवचन. बहुवचन. रामः रामो रामाः सं०प्र० हे ) राम (हे ) रामौ (हे ) रामाः द्वितीया रामम् रामा रामान् तृतीया रामेण रामाभ्याम् रामैः चतुर्थी रामाय रामाभ्याम् रामेभ्यः पंचमी रामात् रामाभ्याम् रामेभ्यः षष्ठी रामस्य रामयोः रामाणाम् सप्तमी रामे रामयोः रामेषु प्रथमा y विभक्ति. प्रथमा एकवचन. द्विवचन-बहुवचन. राम, (वा) रामने, राम (वा) रामोंने यका प्रयोग करनेपर प्रायः प्रकृतिके अंतमें विकार हो जाता है। और प्रथमाके 'ने' प्रत्ययका संबंध भूतकालके सकर्मक क्रियाप- दपरही हो सकता है अन्यत्र नहीं । यथा-पंडितने पोथी लिखी । १ हिंदीमें द्विवचन बहुवचनका रूप एकही है।
४ रामका केकी बालसंस्कृतप्रभाकरे सं०प्र०. (हे ) राम (हे ) रामो द्वितीया रामको रामोंको तृतीया रामसे रामोसे चतुर्थी रामको रामोंको पंचमी रामसे रामोंसे षष्ठी रामोंका केकी सप्तमी रामम-पै-पर रामों में-पै-पर इस प्रकार और शब्दोंकामी अर्थ जानना। जिस शब्दका अर्थ और लिंग समझमें न आवे, तिस शब्दका अर्थ, लिंग कोष आदि साधनोंसे तथा गुरुसेभी जान लेना । दकारांत पुल्लिंगी तंद्' (वह ) शब्द. (प्रथमपुरुष) संस्कृत. विभक्ति. एकवचन. द्विवचन. बहुवचन. तौ ते द्वितीया तौ तान् तृतीया तेन ताभ्याम् तैः चतुर्थी तस्मै ताभ्याम् तेभ्यः पंचमी तस्मात् ताभ्याम् तेभ्यः षष्ठी तस्य तयोः तेषाम् ससमी तस्मिन् तयोः प्रथमा सः तम् तेषु १ जहां ' यद्' शब्दका संबंधी — तद् ' शब्द आता है, तहां तद् शब्दका अर्थ प्रायः ' सो ऐसा होता है । यथा- 'जो आया सो गया' । अन्यत्र ‘वह ' ऐसा अर्थ जानना। और यह विशेष है कि, ' तद् ' ( वह ) आदि कई सर्वनामोंका संबोधनमें प्रयोग नहीं होता।
वह, उसने , शिक्षाविचारः। हिंदी. विभक्ति. एकाचन. द्विवचन-बहुवचन. प्रथमा वे, उनने, उन्होंने द्वितीया उसको, उसे उनको, उन्हें, उन्होंको तृतीया उससे उनसे. उन्होंसे चतुर्थी उसको, उसे उनको, उन्हें, उन्होंको पंचमी उससे उनसे, उन्होंसे षष्ठी उसका केकी उनका-के-की, उन्होंका केकी सप्तमी उसमें पै-पर उनमें पै-पर वा उन्होंमें पै-पर दकारांत त्रिलिंग युष्मद् (तू) शब्द.(मध्यमपुरुष) संस्कृत. विभाक्ति. एकवचन. द्विवचन. बहुवचन. प्रथमा त्वम् युवाम् यूयम् द्वितीया त्वाम् , त्वा युवाम् , वाम् तृतीया त्वया युवाभ्याम् युष्माभिः चतुर्थी तुभ्यम् , ते युवाभ्याम, वाम् युष्मभ्यम् , व: पंचमी त्वत् युवाभ्याम् युष्मत् षष्ठी तव, युवयोः, वाम् युष्माकम् वः सप्तमी त्वयि युवयोः युष्मासु हिंदी. विभक्ति. एकवचन. द्विवचन-बहुवचन. प्रथमा तू , तूने तुम, तुमने, तुम्होंने द्वितीया तुझको, तुझे तुमको, तुम्हें, तुम्होंको तृतीया तुझसे तुमसे, तुम्होंसे चतुर्थी तुझको, तुझे तुमको, तुम्हें, तुम्होंको पंचमी तुझसे तुमसे, तुम्होंसे युष्मान्, व: ते w प्रथमा मया मह्यम् , मे मम, मे बालसंस्कृतप्रभाकरे षष्ठी तेरा-रे-री तुम्हारा-रे-री ससमी तुझमें-पै-पर तुममें-पै-पर, तुम्होंमें-पै-पर दकारांत त्रिलिंग अस्मद् '(मैं)शब्द.(उत्तमपुरुष) संस्कृत. विभक्ति. एकवचन. द्विवचन. बहुवचन. अहम् आवाम् वयम् द्वितीया माम्, मा आवाम् , नौ अस्मान्, नः तृतीया आवाभ्याम् अस्माभिः चतुर्थी आवाभ्यां, नौ अस्मभ्यं, नः पंचमी मत् आवाभ्याम् अस्मत् षष्ठी आवयोः, नौ अस्माकं, न: सप्तमी माय आवयोः अस्मासु हिंदी. विभक्ति. एकवचन. द्विवचन-बहुवचन. मैं, मैंने हम, हमने, हमोंने द्वितीया मुझको, मुझे हमको, हमोंको, हमें तृतीया मुझसे हमसे, हमोंसे चतुर्थी मुझको, मुझे हमको, हमोंको, हमें पंचमी मुझसे हमसे, हमोंसे षष्ठी मेरा-रे-री हमारा-रे-री सप्तमी मुझमें-पै-पर हममें-पै-पर विभक्त्यर्थभाषाव्यवहार. संस्कृत विभक्तियोंके अर्थका सामान्य व्यवहार भाषामें किस प्रकार होता है यह प्रथम सीखनेवालोंको संक्षेपसे और अत्यंत सुगमतासे समझनेके लिये 'वह' शब्दसे दिखाया जाता है. प्रथमा . शिक्षाविचारः। विभक्ति. एकवचन. द्विवचन. बहुवचन. प्रथमा-वह. वे. द्वितीया-उसे, उसको, उस- उन्हें, उनको, उनतक. तक. तृतीया-उससे, उसकरके, उस उनसे, उन करके, उन हेतुसे, हेतुसे, उसके हेतुसे, उस उनके हेतुसे, उन कारण, कारण, उसके कारण, उस उनके कारण, उन द्वारा, दारा, उसके द्वारा, उसके उनके द्वारा, उनके जरिये. जरिये. चतुर्थी-उसको, उसके वास्ते, उन्हें, उनके वास्ते, उनके लिये, उसके लिये, उसके अर्थ, उनके अर्थ, उनके निमित्त, उसके निमित्त, उसके खा उनके खातिर, तिर. पंचमी-उससे, उसकी अपेक्षा, उनसे, उनकी अपेक्षा, उन उस हेतुसे, उसके हेतुसे, हेतुसे, उनके हेतुसे, उ. उसकी बनिस्वत, उसतक, नकी बनिस्वत, उनतक, उसके पाससे. उनके पाससे. षष्ठी-उसका, उसकी, उसके. उनका, उनकी, उनके. सप्तमी-उसमें, उसके विषय, उनमें, उनके विषय, उनपर, उसपर, उसपै, उसके अंदर, उनपै, उनके अंदर, उनके उसके भीतर, उसके मध्य. भीतर, उनके मध्य. संबोधन-हे, अरे इत्यादि. अहो, हे, मो इत्यादि. इस प्रकार बहुत अर्थ भाषामें होते हैं । उनमेंसे जिस अर्थका यथायोग्य संभव हो, उस अर्थको ले संस्कृत वास्यका भाषामें अर्थ करे। इससे विशेष विभक्त्यर्थविचारमें देखना। इति विभक्त्यर्थभाषाव्यवहारः।
~ बालसंस्कृतप्रभाकरे शब्दभेदविचार. नाम (राम, कृष्ण इत्यादि), सर्वनाम ( सर्व, यद, तव इत्यादि), विशेषण (सुंदर, कुशल इत्यादि), अव्यय (अपि, च, एवम् इत्यादि), क्रियापद ( अस्ति, भवति इत्यादि ) ऐसे शब्दके पांच भेद हैं । इनमें नाम, सर्वनाम, विशेषण और अव्यय इनको 'प्रातिपदिक' कहते हैं। और प्रातिपदिको परे विभक्तियां (प्रथमा आदि) होती हैं। परंतु अव्ययसे परे होनेवाले विभक्तिका लोप होता है। अर्थात् अव्यय ज्योंका त्यौही रह जाता है । धातुपाठमें कहे हुए क्रियावाचक शब्दोंको 'धातु ' कहते हैं, इन धातुओंसे परे कर्ता, कर्म और भाव अर्थ में नीचे १ विशेषण दो प्रकारका है, 'शुद्ध विशेषण ' जिससे विशे- ष्यगत सिद्ध धर्मका बोध होता है । और दूसरा ' विधिविशेषण' जिससे विशेष्यगत अपूर्व धर्मका बोध होता है । उनमेंसे शुद्ध विशेषणका अर्थ विशेष्यके पहिले कहना और विधिविशेषणका अर्थ विशेष्यसे परे कहना। शुद्ध विशेषणका उदाहरण-देवदत्तेन सुंदरं पुस्तकमग्राहि-( देवदत्तने अच्छा पुस्तक लिया), देवदत्तो ग्रामं गच्छन् तृणं स्पृशति-( देवदत्त गांवको जाते थासको छूता है ) । विधिविशेषणका उदाहरण-देवदत्तः स्वपुत्रं कुशलम् अकार्षीत्-( देवदत्त अपने पुत्रको चतुर करता भया), देवदत्तः विद्यया सर्वदिक्षु आस्मानं प्रसिद्धं कृतवान्-( देवदत्त विद्यासे सर्व दिशाओंमें अपनेको प्रसिद्ध करता भया । २ यह संस्कृत ग्रन्थ पाणिनीका बनाया हुआ है । इसमें अर्थसहित धातु लिखे हैं।
शिक्षाविचारः। लिखे हुए तिप्रत्यय होनेसे जो रूप सिद्ध हो जाता है, उस- को क्रियापद कहते हैं । आर क्रियापदकोही 'तिङत' कहते हैं । संस्कृतभाषामें क्रियापदपर वाक्यकी समाप्ति होती है। क्वचित् कई कदंत शब्दपरभी वाक्यकी समाप्ति होती है । यथा-कृष्णेन कंसवधः कृतः, (वा) गोर- क्षणं कृतम् (कृष्णने कंसवध किया, (या) गौओंका रक्षण किया) इसमें कृत शब्द कदंत है। तिङ्प्रत्यय. परस्मैपद-प्रत्यय. वस. त झ एकवचन. द्विवचन. बहुवचन. प्रथमपुरुष तिप् तस् झि मध्यमपुरुष सिप थस् थ उत्तमपुरुष मिप् मस् आत्मनेपद-प्रत्यय. प्रथमपुरुष আনানু मध्यमपुरुष थास् आथाम् ध्वम् उत्तमपुरुष इट वहि महि लट्, लिट्, लुट, लट्, लोट्, लङ्, लि, लु, लुङ् इन नव लकारोंके स्थानमें तिङ्प्रत्यय आदेश होते हैं । उनको संस्कृत व्याकरणशास्त्रके अनुसार अनेक विकार होनेसे प्रत्ये- कलकारके भिन्न भिन्न तरहके रूप होते हैं। इनके उदाहरणार्थ और प्रायः कृ, भू, असु इन धातुओंकाही प्रयोग बहुत कि- या जाता है, इसीसे उक्त धातुओंके रूप लिखे जाते हैं। १ तिङ्प्रत्ययोंमें दो भेद हैं, एक परस्मैपद' दूसरा 'आत्मनेपद। , (प्र० भवति १० बालसंस्कृतप्रभाकरे परस्मैपदी अकर्मक'भू' (होना) धातु-कर्तृप्रधानरूप. संस्कृत. पुरुष. एकवचनः द्विवचन. बहुवचन. भवतः भवन्ति लंद म० भवास भवयः भवथ (उ० भवामि भवाव: भवामः (प्र० बभूव बभूवतुः बभूवुः लिट् म० बभूविथ बभूवथुः बभूव (उ० बभूव बभूविष बभूविम भवितारौ भवितारः भवितास्थः भवितास्थ उ० भवितास्मि भवितास्वः भवितास्मः भविष्यतः भविष्यति भविष्यथ: भविष्यथ (उ० भविष्यामि भविष्याव: भविष्यामः प्र० भवतु, मवतात् भवताम् भवन्तु लोदर म० भव, भवतात् भवतम् भवत भवाव भवाम (प्र० भाविता लुट २ म० भवितासि (प्र० भविष्यति लट् २म० भविष्यसि उ० भवानि १ लट्-वर्तमान काल, लिट्र-अनद्यतन ( गई मध्यरातसे आ- नेवाली मध्यराततक कालको । अद्यतन' कहते हैं, उससे भिन्न कालको ' अनद्यतन' कहते हैं), परोक्ष भूतकाल, लुट्-अनद्यतन मविष्यकाल, लट्-सामान्य भविष्यकाल, लोट्-विधि-आज्ञा-नि- मंत्रण-आमंत्रण-प्रश्न-प्रार्थना आदि, लङ्-अनद्यतन भूतकाल, विधिलिङ्-विधि-आज्ञा आदि, आशीर्लिङ्-आशीर्वाद, लुङ्ग-सा- मान्य भूतकाल, लङ्-जिसमें हेतुहेतुमद्भावापन्न क्रियाकी अनि- पत्ति प्रतीत होय ऐसा भविष्यकाल ।
शिक्षाविचारः। म० भवः भवेम (प्र० भूयात् २म० भूयाः (उ० अभूवम् 'प्र० अमवत् अभवताम् अभवन् म० अभवः अभवतम् अभवत उ० अभवम् अभवाव अभवाम विधि- प्र० भवेत् भवेताम् भवेयुः भवेतम् भवेत लिङ्ग उ० भवेयम् भवेव आशी- भूयास्ताम् भूयासुः लिङ्ग भूयास्तम् भूयास्त (उ० भूयासम् भूयास्व भूयास्म (प्र० अभूत् अभूताम् अभूवन् लुङ् २म० अभू: अभूतम् अभूत अभूव अभूम (प्र० अभविष्यत् अभविष्यताम् अभविष्यन् म० अभाविष्यः अभविष्यतम् अभविष्यत (उ० अभविष्यं अभविष्याव अभविष्याम हिंदी. पुरुष. एकवचन. द्विवचन. बहुवचन. प्र० (वह ) होता है (वे ) होते हैं लट् २म० (तू) ( तुम) होते हो (उ० ( मैं ) होता हूं (हम) होते हैं (प्र प्र० ( वह ) हुआ (वे) हुए लिट् म० (तू) (तुम) (उ० (मैं) (हम) (प्र० ( वह ) होवेगा (वे) होवेंगे लुद ( तुम) होओगे उ० (मैं) होऊंगा १ इस (हुआ) के बदले कोई कोई 'भया' भी कहते हैं। " " म० (तू) हम ) होवेंगे होओगे होवेंगे होवें होओ होवें हुए १२ बालसंस्कृतप्रमाकरे प्र० ( वह ) होवेगा (वे) लट् २म० (तू (तुम) (उ० ( मैं ) होऊंगा (हम) (प्र० ( वह ) होवे (वे) लोट म० (तू ) हो ( तुम) उ० (मैं ) होऊ (हम) (प्र० प्र० (वह) हुआ (वे) ल म० (तू) ( तुम ) उ० (मैं) (हम) विधि-(० प्र० (वह) होवे (वे) म० (तू) हो लिङ (तुम) (उ० ( मैं ) होऊ (हम) आशि- (प्र० ( वह ) होवे (वे) २म० (तू) हो (तुम) उ० ( मैं ) होऊ (हम) (प्र० ( वह ) हुआ (वे) लुङ२म० (तू) ( तुम) (उ० (मैं ) होऊंगा ( हम ) (प्र० (वह ) हुआ (वे) म० (तु) (तुम) ० (मैं) होऊंगा (हम) होवें होओ होवें होवें लिङ्ग होओ होवें हुए " (उ० हुए होओगे होवेंगे शिक्षाविचारः। अकर्मक 'भू' धातु भावप्रधानरूप, आत्मनेपदी. संस्कृत. हिंदी. लट् लिट्र लुट पुरुष. एकवचन. प्र० भूयते प्र० बभूवे प्र० भविता प्र० भविष्यते लोट प्र० भूयताम् हिंदीभाषामें — होना' धातुकी भावप्रधानक्रिया प्रायः व्यवहारमें नहीं आती, इसीसे इन संस्कृतभा- वप्रधान रूपोंका अर्थ 'भू' धातूके कर्तृप्रधान रूपोंके समान तथा अपनी भाषाव्यवहारसे समझना । - प्र० विधिलिङ् प्र. आशीलिङ् प्र० लुङ् अभूयत भूयेत भविषीष्ट अभावि अभविष्यत प्र० प्र० १ अकर्मक धातुके कर्तृप्रधान और भावप्रधान क्रियापद हो सकते हैं, तथा सकर्मक धातुके कर्तृप्रधान और कर्मप्रधान क्रियापद हो सकते हैं । उनमेंसे भावप्रधान और कर्मप्रधान क्रियापद आत्मने- पदीही होते हैं । २ भावप्रधान क्रियापद कर्ता कर्मके अनुसार न रहनेसे उसके प्रथम पुरुषके एकवचनकाही प्रयोग होता है । दूसरे पुरुष या वचनोंका नहीं । ३ लिट्, लुट्, लट्, आशीर्लिङ्, लङ् इन लकारोंके भावप्रधानरूप और तरहकेभी होते हैं वे धातु- रूपावलि आदिसे समझ लेवे ।
[प्र०अस्ति लट् २म०असि अर्थ उ०असानि [प्र०आसीत् लम०आसीः १४ बालसंस्कृतप्रभाकरे अकर्मक परस्मैपदी अस्' (होना) धातु-कर्तरिरूप. संस्कृत. हिंदी. पु०एकवचन. द्विव० बहुवचन.एकवचन.द्वि०बहुवचन. स्तः सन्ति ( वह ) है (वे ) हैं स्थः स्थ (तू ) ,, (तुम) हो उ०अस्मि स्वः स्मः (मैं )हूं ( हम ) हैं प्र०अस्तु, स्तात् स्ताम् सन्तु लोट् २ म०एधि, स्तात् स्तम् स्त असाव असाम आस्ताम् आसन् आस्तम् आस्त (उ०आसम् आस्व यास्म स्याताम् स्युः म०स्याः स्यातम् स्यात लिङ् (उ०स्याम् स्याव स्याम* सकर्मक परस्मैपदी 'कृ' (करना) धातु-कर्तृप्रधानरूप. संस्कृत पु०एकवचन. द्विवचन. बहुवचन. कुरुतः कुर्वन्ति म० करोषि कुरुथः कुरुथ कुर्वः कुर्मः * लिट् लुट्, लट्, आशीर्लिङ्, लुङ्, लङ् इन लकारों में अस्' धातुका प्रयोग नहीं होता । तहां 'भू' धातुका प्रयोग करे । एवं इसके भावप्रधान क्रियापदमी नहीं होते । तहां 'भ' धातुके मावप्रधान क्रियापदोंका प्रयोग किया जाता है। यहां अवशिष्ट क्रियापदोंका अर्थ 'भू' धातुके कर्तृप्रधान रूपोंके स. मान जानना। विधि- [प्र०स्यात् प्र० करोति Lor उ० करोमि शिक्षाविचारः। १५ [प्र. कर्ता hulle करिष्यथ: लोटू प्र० चकार चक्रतुः चक्रुः लिट् म० चकर्थ चक्रतुः चक उ०चकार, चकर चकृत चकृम कर्तारौ कारः म० कासि कर्तास्थः कर्तास्थ उ. कर्तास्मि कर्तास्वः कर्तास्मः प्र. करिष्यति करिष्यतः करिष्यन्ति म० करिष्यसि करिष्यथ उ० करिष्यामि करिष्याव: करिष्यामः प्र० करोतु,कुरुतात् कुरुताम् कुर्वन्तु म० कुरु, कुरुतात् कुरुतम् कुरुत उ० करवाणि करवाव करवाम प्र० अकरोत् अकुरुतम् अकुर्वन् म० अकरोः अकुरुतम् अकुरुत उ० अकरवम् अकुर्व अकुर्म विधि- प्र० कुर्यात् कुर्याताम् कुर्युः म० कुर्याः कुर्यातम् कुर्यात लिङ् । ( उ० कुर्याम् कुर्याव कुर्याम क्रियासुः म० क्रियाः क्रियास्त लिङ् उ० क्रियासम् क्रियास्म (प्र० अकार्षीत् म० अकार्षीः अकार्टम् अकार्ट ( उ० अकार्षम् अकार्य अकार्म प्र० अकरिष्यत् अकरिष्यताम् अकरिष्यन् म. अकरिष्यः अकरिष्यतम् अकरिष्यत उ. अकरिष्यम् अकरिग्याव জাম आशी-(प्र० क्रियात् क्रियास्ताम् क्रियास्तम् क्रियास्व अकार्टाम् अकार्षः लुङ् द्विवचन-बहुवचन- (वे) करते हैं (तुम ) करते हो ( हम ) करते हैं (वे) करते हुए tur १६ बालसंस्कृतप्रभाकरे हिंदी. पु० एकवचन. प्र० (वह) करता लट् म० (तू) करता है उ० (मैं) करता हूं (प्र०(वह)करता हुआ लिटू म० (तू) उ० (मैं) प्र० (वह) करेगा म० (तू) उ० ( मैं ) करूंगा [प्र. ( वह ) करेगा म० (तू ) ( उ० ( मैं ) कलंगा प्र० ( वह ) करे लोट्र म० (तू) कर उ० (मैं ) करूं (प्र० ( वह ) करता हुआ लङ् र म० (तू) उ० (मैं) विधि- (प्र० ( वह ) करे म० (तू) कर लिङ्ग । उ० (मैं ) करूं आशी- प्र० ( वह ) करे २ म० (तू ) कर लिङ उ० ( मैं ) करूं प्र० (कह ) करता हुआ म० (तू) उ० (मैं). ( तुम) (हम) (वे ) करेंगे ( तुम ) करोगे (हम ) करेंगे (वे) करेंगे ( तुम ) करोगे (हम ) करेंगे (वे ) करें ( तुम ) करो ( हम ) करें (वे ) करते हुए ( तुम ) (हम) (वे) करें (तुम ) करो (हम ) करें (d) करें ( तुम ) करो ( हम ) करें (वे) करते हुए ( तुम), (हम), ( प्र० kuc म० उ० लिटू । म० शिक्षाविचारः। प्र० (वह ) करेगा (वे ) करेंगे म० (तू) करेगा (तुम) करोगे उ० (मैं) करूंगा (हम) करेंगे सकर्मक आत्मनेपदी 'कृ'(करना) धातु-कताररूप. सस्कृत. पुरुष. एकवचन. दिवचन. बहुवचन. कुरुते कुर्वाते कुर्वते कुरुषे कुर्वाथे कुरुध्ये कुर्वे कुर्वहे कुर्महे प्र० चके चक्राते चक्रिरे चकृषे चक्राथे चकृट्वे चके चकृवहे चकृमह प्र० कर्ता कर्तारौ कर्तारः म० कर्तासे कर्तासाथे कर्ताध्ये उ० कर्ताहे कर्तास्वहे कर्तास्महे . करिष्यते करिष्येते कारष्यन्ते करिष्यसे करिष्येथे करिष्यध्वे उ० करिष्ये करिष्यावहे करिष्यामहे कुरुताम् कुर्वाताम् कुर्वताम लोट्रे कुरुष्व कुर्वाथाम् कुरुध्वम् कर करवावहै करवामहै अकुरुत अकुर्वाताम् अकुर्वत अकुरुथाः अकुर्वाथाम् अकुरुध्वम् अकुर्वि अकुर्वहि अकुहि १ जिन धातुओंके आत्मनेपदी और परस्मैपदी प्रधान रूप बनते हैं उनको उभयपदी धातु कहते हैं । २ परस्मैपदी ‘कृ (करना) धातुके क्रियापदोंका हिंदी अर्थ यथानुक्रम यहांपरभी प्र० म० प्र० म० उ० । प्र० म० उ० जान लेना। २ बा. सं.प्र.
११८ . विधि- म० कुर्वीत अकृथाः विध उ० कुर्वीय बालसंस्कृतप्रमाकरे। कुर्वीयाताम् कुर्वीरन् म० कुर्वीथाः कुर्वीयाथाम् कुर्मध्वम् लिङ् कुर्वीवहि कुर्वीमहि (प्र० कृषीष्ट कृषीयास्ताम् आशी- कृषीरन् म० कृषीष्ठाः कृषीयास्थाम् कृषीध्वम् लिङ्ग उ० कृषीय कृषीवहि कृषीमहि प्र० अकृत अकृषाताम् अकृषत अकृषाथाम् अकृतम् उ० अकृषि अकृष्वहि अकृष्महि प्र. अकरिष्यत अयरिष्येताम् अकरिष्यन्त म० अकरिष्यथाः अकरिष्येथाम् अकरिष्यध्वम् ( उ० अकरिष्ये अकरिष्यावहि अकरिष्यामहि सकर्मक आत्मनेपदी'कृ' (करना) धातु-कर्मणिरूप. संस्कृत. पु० एकवचन. द्विवचन. बहुवचन. क्रियेते क्रियन्ते लंद क्रियेथे क्रियध्वे क्रियावहे क्रियामहे १ लिट्, लुट्,लट्. आशीर्लिङ्, लुङ् और लङ् इन अवशिष्ट छः लकारोंके कर्मप्रधानरूप और आत्मनेपदी 'कृ' धातुके इसी लकारोंके कर्तृप्रधानरूप एकही हैं उनमेंसे केवल लुङ् प्रथमपुरुष एकवचन' ' अकारि 'ऐसा कर्मप्रधानरूप और — अकृत' ऐसा कर्वप्रधानरूप होता है, इन अतिदिष्ट ( न लिखे हुए ) कर्मप्रधान- रूपोंका अर्थ लट् लोट् आदि लकारोंके लिखे हुए कर्मप्रधानरूपोंके अर्थानुसार यथायोग्य जान लेवे । 'कृ' धातुके लिट् आदि छ: लकारोंके कर्मप्रधानरूप औरभी बहुत प्रकारके होते हैं वे धातुरूपा- बलि आदिसे समझ लेवे प्रक्रियते म० कियसे ( उ० क्रिये प्र० क्रियताम लोट् र म० क्रियस्व (उ० क्रिय प्र० अक्रियत लङ् रम० अक्रियथाः (उ० अक्रिये प्र० कियेत लिङ्गम० कियेथाः शिक्षाविचारः। क्रियेताम् क्रियन्ताम् क्रियेथाम् क्रियध्वम् क्रियावहै क्रियामहै अक्रियेताम् अक्रियन्त अक्रियेथाम् अक्रियधम् अक्रियावहि अक्रियामहि विधि- क्रियेयाताम् क्रियेरन् क्रियेयाथाम् क्रियेध्वम् (उ० क्रियेय क्रियेवहि क्रियेमहि हिंदी एकवचन. द्विवचन बहुवचन. प्र. (वह ) किया जाता है (वे ) किये जाते हैं म० (तू) ( तुम ) किये जाते हो ( उ० ( मैं ) किया जाता हूं (हम ) किये जाते हैं प्र० (वह) किया जावे (वे ) किये जायें लोद म० (तू) किया जा (तुम) किये जाओ उ० (मैं) किया जाऊं (हम) किये जावें प्र० ( वह ) किया गया (वे ) किये गये म० (तू) ( तुम) उ० (मैं) (हम) विधि- (प्र० ( वह ) किया यावे (वे) किये जावे म० (तू ) किया जा (तुम) किये जाओ लिङ् (मैं) किया जाऊं उ० (मैं) किया जाऊं . ( हम ) किये जावें कालपुरुषविचार. जिस क्रियाका कर्ता वा कर्म जब प्रथमा विभक्त्यंत 'अस्मत् (अहं) शब्दसे पोधित हो जाय तब उस कि- यावाचक धातुसे उत्तम पुरुषका प्रयोग करे, और प्रथमा- " बालसंस्कृतप्रमाकरे । विभक्त्यंत 'युष्मत् ' (त्वम् ) शब्दसे बोधित हो तो मध्यम पुरुषका प्रयोग करे, अन्यत्र अर्थात् 'तत् (सः) भवत् ' आदि शब्दोंसे बोषित होवे तो प्रथम पुरुषका प्रयोग करे । कदाचित् इन (अस्मत्, युष्मत् और तद आदि) शब्दोंका वाक्यमें साक्षात् प्रयोग न होवे तौभी अध्याहार आदि संभवमात्रसे उक्त व्यवस्था जाननी। लट् आदि उक्त लकारोंके विषयमें कालका सामान्य नियम ऐसा है कि- लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ्ललिटस्तथा । विध्याशिषाश्च लिङ्लोटो लुट् लट् लङ् च भविष्यति। वर्तमानकालमें लट्, वेदमें लेटका प्रयोग होता है (लोक व्यवहारमें नहीं), भूतकालमें लङ्लुङ् और लिट्र तथा विधि आशीर्वाद आदि अर्थोंमें लिङ्ग लोट् और भविष्य- कालमें लुट् लट् लङ् होते हैं। इससे विशेष विस्तार धातुरूपावली आदिसे मालूम होगा। कारकविचार. जो कोई क्रियाका जनक होवे उसको कारक कहते हैं। वे छः हैं यथा-१ कर्ता, २ कर्म,३ करण, ४ संप्रदान, ५ अपादान और ६ अधिकरण इति । १ कर्ताकारक-जो कोई मुख्यतासे क्रिया करे, वह कर्ता कहाता है।
शिक्षाविचारः। .. २ कर्मकारक-जो किया जावे, जो देखा जावे, जो पिया जावे, जो खाया जावे, जो दान किया जावे या जो स्पर्श किया जावे अर्थात् कर्ताके व्यापारसे उत्पन्न हुए फलका जो आश्रय होवे, उसको कर्म कहते हैं। ३ करणकारक-विशेषतः जिस साधनसे कर्ताकी क्रिया सिद्ध हो जावे, उसको करण कहते हैं। ४ संप्रदानकारक-जिसको वस्तु दान की जावे अर्थात् त्याग क्रियाका जो उद्देश्य होवे, वह संप्रदान कहा जाता है। ५ अपादानकारक-जिससे कोई पदार्थ डरे,चले,उत्पन्न होवे या ग्रहण करे अर्थात् जिससे किसी वस्तुका विश्लेष (विभाग ) उत्पन्न होवे, उसको अपादान कहते हैं। ६ अधिकरणकारक-जिसमें क्रिया होवे अर्थात् क- के द्वारा या कर्मके द्वारा जो क्रियाका आधार होवे, उसको अधिकरण कहते हैं। विभत्त्यर्थविचार. १ प्रथमा विभक्ति-करि क्रियापद रहे तो कर्ता अर्थमें होती है । यथा-रामो गच्छति-( राम जाता है ), कर्मणि क्रियापद रहे तो कर्म अर्थमें होती है। यथा-रामः भक्तेन १ कर्मणि क्रियापदके दो कर्म हों तो उनमेंसे कर्मणि क्रियापद- द्वारा जिस कर्मका बोध होवे उस एकही कर्मअर्थमें प्रथमा विभक्ति होती है अर्थात् दूसरे कर्मअर्थमें द्वितीयाविभक्ति होती है । यथा- देवदत्तन ग्रामम् अजा नीयते-( देवदत्तसे भेडी गांवको ली जाती है)। इससे विशेष विचार अन्यत्र देखो।
- १२ बालसंस्कृतप्रभाकरे दृश्यते-(राम भक्तसे देखा जाता है ), संबोधन अर्थमें होती है। यथा-हे राम, कृपां कुरु-(हे राम! कृपा कर) और जहां किसीही विभक्तिकी प्राप्ति नहीं वहांसी होती है। यथा-भवितव्यम्, स्थातव्यम्, जलम्-( होना, रहना, जल) इत्यादि। २ द्वितीया विभक्ति-कर्म अर्थमें होती है। यथा- रामं भक्तः पश्यति-(रामको भक्त देखता है), क्रियाके विशेषणमें द्वितीया विभक्तिका एकवचनहीं होता है और नपुंसकलिंगके समान रूप रहता है। यथा-सत्वरंधावति- (शीघ दौडता है), धिक आदि शब्दोंके योगमें होती है। यथा-पापिनं धिक्-(पापीको धिक् ), लङ्का निकषा तिष्ठति-(लंकाके पास रहता है), अत्यंत संयोगकी वि- वक्षा करनेपर कालवाचक तथा देशवाचक शब्दोंसे होती है। यथा-मासं सुखदा-( महीनेतक सुख देनेवाली ), क्रोश कुटिला नदी-(कोशतक टेढी नदी)। ३ तृतीया विभक्ति-करण अर्थमें होती है। यथा- जलेन अग्निं निर्वापयति-(जलसे अमिको बुझाता है), १ संबोधन उसे कहते हैं जिससे कोई किसीको चिताकर या पुकारकर अपने संमुख करता है । २ धिक्, उभयतः, सर्वतः, उप- युपरि, अध्याधि, अधोधस्, अभितः, परितः, समया, निकषा, हा, प्रति, अन्तरा, अन्तरेण, अनु, पृथक्, नाना, विना, ऋते इत्यादि औरभी शब्द जानना । शब्दके योगमें जो विभक्ति होती है उस- को ' उपपदावमाक्त' कहते हैं।
शिक्षाविचारः। कर्ता अर्थमें होती है। यथा-कृष्णेन कंसो इन्यते-(क- ष्णसे कंस मारा जाता है ), हेतुं अर्थमें होती है । यथा- गुरुसेवया विद्वान् भवति-(गुरुकी सेवा (हेतु) से विद्वान होता है), सह ( साथ ) शब्दके अर्थ के योगमें होती है। यथा-लक्ष्मणेन सह रामो गतः-(लक्ष्मणके साथ राम गया) या, सीतया साक गतः-(सीवाजीके साथ गया), पृथक् भादि शब्दोंके योगमें होती है। यथा-रामण पृथक तिष्ठति (रामसे जुदा रहता है)। ४ चतुर्थी विभक्ति-संप्रदान अर्थमें होती है। यथा- दरिद्राय द्रव्यं देहि-( दरिद्रको द्रव्य दे), निमित्त अर्थमें होती है । यथा-ज्ञानाय अध्ययनम्-( ज्ञान के निमित्त (वास्ते ) पढना), मोक्षाय शिवं स्मरति-(मोक्षके वास्ते शिवजीको स्मरता है), नमः आदि शब्दोंके योगमें होती है। यथा-कृषणाय नमः-(कृष्णको प्रणाम)। पंचमी विभक्ति-अपादान अर्थमें होती है । यथा- सिंहातू बिभेति-(सिंहसे डरता है), ग्रामात् आयाति- (गांवसे आता है), हेतु अर्थमें होती है । यथा-पापात् दुःखं भवति-(पापसे दुःख होता है ), अपेक्षा अर्थमें होती १ हेतु अर्थमें पंचमी विभक्तिभी होती है, यह आगे (पंचमी- विभक्तिमें ) स्पष्ट हो जावेगा । २ पृथक्, विना. नाना, सदृश, सहक्ष, तुल्य, सम, समान, सदृक् इत्यादि औरभी शब्द जानना । ३ नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम्, वषद इत्यादि औरभी शब्द जानना। ४ हेतु अर्थमें तृतीयामी होती है, ऐसा तृतीया- विभक्तिमें कहा है।
२४. बालसंस्कृतप्रमाकरे है। यथा-धनात् विद्या गरीयसी-(द्रव्यकी अपेक्षा विद्या श्रेष्ठ है ), देवदत्तात् यज्ञदत्तः कुशलः-(देवदत्तसे यज्ञदत्त चतुर ), अन्य आदि शब्दोंके योगमें होती है। यथा-कृ- ष्णात् अन्योऽस्ति-( कृष्णसे भिन्न ( जुदा ) है), पु- ण्यात् विना न सुखम्-(विना पुण्य सुख नहीं)। षष्ठी विभक्ति-संबंध अर्थमें होती है । यथा-राज्ञः पुरुषः-( राजाका पुरुष ), कई धातुसाधित ( कदंत )श- ब्दोंके योगमें कर्ता तथा कर्म इन अर्थोंमें होती है । यथा- कृष्णस्य गमनम्-( कृष्णका गमन), इस उदाहरणमें गमन- क्रियाका कर्ता कृष्ण है। भुवनस्य रक्षिता-( जगत्का रक्षक), इस उदाहरणमें रक्षण क्रियाका कर्म जगत है। यदि धातुसाधित ( रुदंत) शब्दोंके योगमें कर्ता और कर्म इन दोनोंकासी प्रयोग साथ किया जावे तो प्रायः कर्म अर्थमेंही (पठी ) होती है, अर्थात् कर्ता अर्थमें तृतीया हो जाती है। यथा-ईश्वरेण जगतः कृतिः-(ईश्वरसे जगत्की रचना), संबंधकी विवक्षा करनेपर सब कर्ता आदि कारक अर्थमें (षष्ठी होती है । यथा-मातुः स्मरति-( माताको स्मरता है) इत्यादि । जिससे निर्धारण हो जाये उससे षष्ठी होती है। १ अन्य, इतर, भिन्न, आरात्, ऋते, पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, प्राक्, अर्वाक्, प्रत्यक्, सम्यक्, प्रभृति, बहिः, पृथक्, विना, नाना, दूर, निकट इत्यादि औरभी शब्द. जानना।२ समुदायसे जाति, गुण या क्रियासे वस्तु जुदी करना, उसको निर्धारण कहते हैं और इस अर्थमें सप्तमीभी होती है, यह आगे स्पष्ट हो जावेगा।
शिक्षाविचारः। २५ यथा-नृणां विप्रः श्रेष्ठः-(मनुष्योंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ ), सदृश आदि शब्दोंके योगमें होती है । यथा-शिवस्य सदृशः शिवभक्तः-(शिवजीके समान शिवभक्त है)। ७ सप्तमी विभक्ति-अधिकरण अर्थमें होती है। यथा- आसने आस्ते-(आसनपर बैठता है), गृहे तिष्ठति-(घरमें रहता है), मोक्षे इच्छा अस्ति-(मोक्षके विषे आशा है), जिससे निर्धारण होवे उससे होती है । यथा-कविषु वाल्मी- किःश्रेष्ठः-(कवियोंमें वाल्मीकि श्रेष्ठ), जिसकी क्रियासे दूस- रेकी क्रिया बोधित हो जाय उससे होती है। यथा-गोषु टु. ह्यमानासु गतः-( गौओंको दुहते समय गया), उस सप्तमी- को' सतिसप्तमी' भी कहते हैं । अर्थात इस उक्त उदाहरणमें सतीषु ' ऐसा प्रयोगभी करते हैं, किसी उदाहरणमें प्रयोग न होवे तो अध्याहारसी करते हैं। स्वामी आदि शब्दोंका योग होवे तो संबंध अर्थमें विकल्पसे ( सप्तमी ) होती है । यथा- १ सदृश, सदृक्ष, तुल्य, सम, समान, सदृक्, दक्षिणतः, पुरः, पुरस्तात्, उपरि, उपरिष्टात, दूर, निकट, समीप इत्यादि औरभी शब्द जानना । २ षष्ठीभी होती है, उसका उदाहरण षष्ठी विभ- क्तिमें लिखा है । ३ उसही अर्थमें अनादर अर्थभी बोधित हो तो षष्ठी, सप्तमी' होती हैं । यथा-पुत्रस्य रुदतः प्रावाजीत्, (वा) पुत्रे रुदति सति प्राब्राजीत्-( पुत्रके रोते समय उसका अनादर कर ] जाता भया)। ४ स्वामी, ईश्वर, अधिप- ति, दायाद, साक्षी, प्रतिभूः, प्रसूत इत्यादि औरभी शब्द जानना। ५ सप्तमी न की जावे तो षष्ठीही होती है । यथा-गवां स्वामी- (गौओंका स्वामी)।
२६ बालसंस्कृतप्रभाकरे गोषु स्वामी- गौओंका मालिक)। * यदि एकशब्दसे कारक अर्थमें होनेवाली विभक्ति तथा उपपदविभक्ति इन दोनों विभक्तियोंकी साथही प्राप्ति होय तो कारक-विभक्तिही करनी । यथा-कृष्णं नमस्करोति-(क- ष्णको नमस्कार करता है ) यहां नमस्कारक्रियाका कर्म कृष्ण है, इसीसे कृष्णशब्दसे कर्मअर्थमें द्वितीया प्राप्त हुई और नम- स्शब्दका योग होनेसे चतुर्थी प्राप्त हुई, परंतु द्वितीयाही हुई। औरभी सामान्य नियम है कि, विवक्षातः कारकाणि भवंति-(प्रयोगकर्ताके विवक्षासे कारक अदलबदल हो जाते हैं ), परंतु प्राचीन प्रयोगोंके अनुसारही वह विवक्षा उचित है । विशेष्य-विशेषणोंका वचन-विभक्ति प्रायः समानही रहती हैं । तथा उपमान-उपमेयकी विभक्ति समान रहती है। यथा-देवम् इव विप्रं पूजति-( देवताके समान ब्राह्मणको पूजता है)। इति सामान्यविभक्त्यर्थविचारः । कृदंतविचार. धातुसे परे तव्य, अनीय आदिक जो प्रत्यय होते हैं, उनको कृत् ऐसा कहते हैं। और कत्प्रत्ययोंसे जो शब्द बनते * अनेक गणोंमें एकही शब्द लिखनेसे अनेक विभक्तियां आवें वो वक्ताने अपनी इच्छानुसार चाहिये सो विभक्ति करनी। यथा- विनाशब्द ' धिक् आदि ' शब्दोंमें 'पृथक् आदि' शब्दोंमें तथा ' अन्य आदि' शब्दोंमें लिखनेसे द्वितीया तृतीया और पंचमी ये तीनोंभी विभक्तियां एकत्र प्राप्त हुई उनमेंसे चाहिये सो होती है। अन्य शब्दोंके विषेभी ऐसा जानना । यह बात सिद्धही है। 1 २७ . शिक्षाविचार। हैं उनको 'कृदंत ' कहते हैं। कृत्प्रत्यय बहुत प्रकारके हैं, वे करनेसे धातुसाधित शब्द बहुत प्रकारके हो जाते हैं। उनमें- से प्रायः कधातुसाधित कई शब्द लिखे जाते हैं। सकर्मक धातुसे कर्मअर्थमें और अकर्मक धातुसे भाव अर्थमें तव्य, अनीय, य ये प्रत्यय होते हैं । उन प्रत्ययांत सकर्मक धातुके रूपोंका लिंग वचन कर्मवाचकशब्द (विशेष्य) के समान हो जाते हैं और उन प्रत्ययांत अकर्मक धातुके रूप नपुंसकमें प्रथमा एकवचनांतही रहते हैं। यथा-कृ-तव्य- कर्तव्यं, अनीय-करणीयः, य-कार्या ( करने योग्य या करना) भू-तव्य-भवितव्यम् ( होना) इत्यादि । ये शब्द क्रियापदकानी काम कर सकते हैं, इतना उक्त प्रत्ययोंमें विशेष है। कर्ताअथमें तृ-कर्ता, अक-कारकः, अ-करः (कर- नेवाला)। भूतकालके कर्ता अर्थमें तवत्-कृतवान् । वर्तमान कालके कर्ता अर्थमें शत-कुर्वन्, शॉन-कुर्वाणः । अवि- ध्यकालके कर्ताअर्थमें शत-करिष्यन,शान-करिष्यमाणः वर्तमानकालके कर्मअर्थमें शान-क्रियमाणः। भविष्यकालके कर्मअर्थमें शान-करिष्यमाणः । कर्म उपपद रहे तो कर्ता- १ धातुसे परे प्रत्यय करनेपर बीचमें प्रायः बहुत प्रकारके विकार होकर सिद्धरूप बनते हैं, यह लिखनेसे बहुतही विस्तार होगा इसीसे नहीं लिखा गया । २ चाहे तो यहभी क्रियापदका काम करता है, नहीं तो विशेषण होके रहता है । ३ आत्मनेपदी धातुसे यह ( शान ) प्रत्यय होता है, और (शत ) प्रत्यय पर- स्मैपदी धातुसे होता है, उभयपदी धातुसे दोनोंभी होते हैं।
- बालसंस्कृतप्रमाकरे। अर्थमें अण्-कुंभकारः (घडा करनेवाला 'कुमार' ) सा- मान्य दूसरा उपपद रहे तो कर्ताअर्थमें इन्-उपकारी। यथा कर्मअर्थ अ-सुकरः (सुखसे करने योग्य ), सकर्मकधातुसे भूतकालके कर्मअर्थमें तै-कृतः ( किया हुआ)। अकर्मक, गत्यर्थक आदि धातुसे भूतकालके कर्ताअर्थमें त-भूतः, गतः। सकर्मक और अकर्मक इन दोनोसेनी भावअर्थमें कृतं, भूतं, क्रिया, कृतिः, कृत्यम्, प्रकारः, प्रभावः, करणम् इत्यादि । निमित्तअर्थमें तुम्-कर्तुम् (करनेके वास्ते )। अनंतर अर्थमें त्वा-कृत्वा,भूत्वा (करनेके अनंतर, होके )। यदि उपसर्गका संबंध होवे तो त्वाके जगह 'ये आदेश होता है । यथा-संस्कृत्य ( संस्कार करके ),प्रभूय ( सम- र्थ होनेके अनंतर)। उपसर्ग ये हैं। प्र,परा,अप,सम्,अनु, अव, निम्, निर, दुस्, दुर्, वि, आङ्, नि, अधि, आपि, अति, सु, उद्, अभि, प्रति, परि, उप इति । उपसर्गका संबंध होनेसे धातुओंके अर्थ और और हो जाते हैं। यथा-प्र-कार, उप-कार, अनु-कृति, सं-स्कार, अप- कार, वि-कार, आ-कार, इस प्रकार प्र-भाव, सं-भव, विभूति, अनु-भव इत्यादि । इति कदंतदिशाप्रदर्शन । १ कई धातुओंसे वर्तमानमेंभी यह (त) प्रत्यय होता है, यथा-मतः ( मान्य ) आदि । २ तुम्, त्वा, य इन कहे हुए प्रत्ययांत शब्द अव्ययसंज्ञक होते हैं । ३ 'य' आदेश होनेपर ह्रस्वांत धातुके परे ' त्' होता है । .
शिक्षाविचारः। तद्धितविचार. तद्धित संज्ञक कई प्रत्यय हैं । वे योग्यतानुसार प्रातिपदि- कसे अपत्य आदि अर्थोंमें होते हैं, और बहुताई आदि स्व- रको वृद्धि होती है। और तद्धितप्रत्ययांत शब्दको तद्धित- ति' कहते हैं । अपत्यअर्थमें अ, इ, य, एय, ईय आदि बहुत प्रत्यय होते हैं। यथा-वसुदेव-अ-चासुदेव (कृष्ण) दशरथ-इ-दाशराथ ( राम ), गर्ग-य-गार्ग्य ( गर्गका लडका), भगिनी-एय-भागिनेय ( बहिनका लडका), स्वस-ईय-स्वस्त्रीय (बहिनका लडका), भ्रातृ-व्य-भ्रा- तृव्य ( भाईका लडका ) ऐसे बहुत प्रकारके उदाहरण जान लेवे । अ, इय आदि प्रत्यय संबंध आदि बहुतही अर्थों में होते । यथा-पृथा-अ-पार्थ (कुंतीका संबंधी 'पांडव') स्रुघ्न-अ-स्रौन (ग्रुघ्न देशसे आया हुआ, या जुन्नमें होने- वाला ), तद्-ईय-तदीय ( तेरे संबंधी), शाला-ईय- शालीय ( शालामें होनेवाला ), मृत्तिका-अ-मार्तिकः (मिट्टीका विकार 'घडा'), असि-इक-आसिक (खड्ग जिसका हथियार है वह), धर्म-इक-धार्मिक (धर्म करने- वाला), प्रस्थ-इक-प्रास्थिक (सेरसे खरीद लिया हुआ) इत्यादि बहुत तरह तरह के हैं, वे प्रयोगानुसार जान लेना । तुल्य अर्थमें वत् प्रत्यय होता है । यथा-ब्राह्मणवत् अधीते १ प्रातिपदिक किसको कहते हैं यह पांचवें सफेपर शब्दमे- दविचारमें देख लो । २ यहांभी प्रत्यय करनेपर बहुत विकार होके सिद्धरूप बनते हैं। हैं - ३० बालसंस्कृतप्रमाकरे (ब्राह्मणके समान पढता है), एवं घटवत् शूद्रवत् आदि । नांत संख्यावाचक शब्दोंसे पूरण अर्थमें म होता है । यथा- पंचन-म-पंचम (पांचवां)। एकादश आदि शब्दोंसे अ प्रत्यय होता है। यथा-एकादशन-अ-एकादश (ग्या- रहवां )। विंशति आदि शब्दोंसे तम या अप्रत्यय होता है। यथा-विंशति-तम-विंशतितम, अ-विंश ( वीसवां)। शत सहस्र आदि शब्दोंसे तमही होता है। यथा-सहस्रतम (हजारवां)। प्रकार अर्थमें संख्यावाचक शब्दोंसे धा, भवतश- ब्दके विना सर्वनामसंज्ञक शब्दोंसे था प्रत्यय होता है । यथा- द्विधा, विंशतिधा, शतधा (दो प्रकारसे, वीस प्रकारसे, सौ प्रकारसे), सर्वथा (सब प्रकारोंसे), अन्यथा (अन्य प्रकारसे) यथा(जिस प्रकारसे), तथा (उस प्रकारसे) इत्यादि। वार अ- थमें संख्यावाचक शब्दोंसे शम् प्रत्यय होता है। यथा-बहुशः, एकशः, शतशः (बहुतबार, एकवार, सौवार ) इत्यादि । भाव (पन ) अर्थमें त्व, ता, अ, य ये प्रत्यय होते हैं । य- था-कुशल-त्व-कुशलत्व,ता-कुशलता,अ-कौशल, य-कौशल्य (चतुरपन ) इस प्रकार गोत्व, ब्राह्मणत्व, मूर्खत्व, मूर्खता, मधुरता, लघुता, लाघव, सौहृद, कौमार,सौकुमार्य,दास्य,चातुर्य, औदार्य, धैर्य, सांख्य, वीर्य, कार्य, गांभीर्य इत्यादि । 'भाव' अर्थमें इमन् प्रत्य- यभी होता है । यथा-लघु-इमन्-लघिमन् ( छोटापन) इस प्रकार गरिमन्, अणिमन्, कालिमन्, ऋजिमन् - - . - शिक्षाविचारः। ३१ इत्यादि । ' अतिशय ' अर्थमें तर, तम, इष्ठ, ईयसू प्रत्यय होते हैं। यथा-लघु-तर-लघुतर, तम-लघुतम, इष्ट- लपिष्ठ, ईयस-लघीयम (अत्यंत छोटा ), एवं गरिष्ठ, गरीयस, कनिष्ठ, कनीयस, स्थविष्ठ, स्थवीयस, पा- पिष्ठ, पापीयस, हसिष्ठ, ह्रसीयस, द्रापिष्ठ, दापीयस इत्यादि । 'प्रमाण' अर्थमें मात्र, दन्न, द्वयम्, प्रत्यय होते हैं। यथा-हस्त-मात्र-हस्तमात्र, (हाथप्रमाण)(खंभ), इस प्रकार जानुमात्र, जानुदन, जानुद्वयस इत्यादि । वाला' अर्थमें मत्, इन् आदि प्रत्यय होते हैं। यथा- श्री-मत्-श्रीमत्, गुण-इन-गुणिन् (लक्ष्मीवाला, गुण- वाला) इत्यादि । इति तद्धितदिशाप्रदर्शन. स्त्रीप्रत्ययविचार। कई शब्दोंका स्त्रीलिंगमें प्रयोग होवे तो उनसे स्त्रीप्रत्यय होता है। कई अकारांत शब्दोंसे स्त्रीलिंगमें प्रयोग करनेके लिये आ प्रत्यय और कईसे ई प्रत्यय होता है। यथा-सर्व-सर्वा, अज-अजा, शूद्र-शूद्रा, दृढ-दृढा इत्यादि । ब्राह्मण- ब्राह्मणी,नद-नदी,सुंदर-सुदंरी,कुमार-कुमारी,गौर- गौरी इत्यादि । जिन शब्दोंके अंतमें 'मत् ' या 'वत् ' रहे तिन्होंसे स्त्रीलिंगमें ई प्रत्यय होता है। यथा-श्रीमत-श्रीमती, गुणवत्-गुणवती इत्यादि। जिस शब्दके अंतमें शतृप्रत्ययका अत् रहे, उससे स्त्रीलिंगमें ई प्रत्यय होता है । यथा-विभ्रत्- १ कई उदाहरणों में इस 'म' के जगह 'व' आदेश होता । यथा-धनवत् । .
३२ बालसंस्कृतप्रभाकरे। . विभ्रती, जुह्वत्-जुह्वती इत्यादि । तथा ऐसे कई शब्दोंके 'त' के पीछे न भी लग जाता है। यथा-दीव्यत्-दी- व्यन्ती, पचत्-पचन्ती इत्यादि । जिस शब्दके अन्तमें न् रहे इससे स्त्रीलिंगमें ई प्रत्यय होता है । यथा-मनोहारिन्- मनोहारिणी,मानिन्-मानिनी,राजन्-राज्ञी, सुनाम- न्-सुनानी इत्यादि । स्वस आदि शब्दोंको छोड ऋकारांत शब्दोंसे ई प्रत्यय होता है । यथा-कर्तृ-कर्वी, पक्त- पत्री इत्यादि । गुणवाचक उकारांत शब्दोंसे विकल्पकरके स्त्रीलिंगमें ई प्रत्यय होता है । यथा-पटु-पट्टी, पटुः मृदु-मृद्धी, मृदुः इत्यादि । जिसके अंतमें ईयस रहे उस- सेभी स्त्रीलिंगमें ई प्रत्यय होता है। यथा गरीयस-गरीय- सी, लघीयम-लघीयसी इत्यादि। इति साधारणस्त्रीप्रत्ययविचारः। स्थानप्रयत्नविचार. अ, इ, उ, ऋ, ल, ए, ए, ओ, औ इन नव वर्गों को मूलस्वर कहते हैं । क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, भ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म,य, र, ल, व, श, ष, स, है, इन तेतीस वर्गों को व्यंजन कहते हैं। १ स्वस, तिस, चतसृ, ननान्ड, दुहित, यात. मात्र, इति । २ कृदन्त, तद्धित और स्त्रीप्रत्यय इनके विचारमें प्रायः मूल- शब्द (प्रातिपादक ) ही लिखे हैं, उनको लिंगविचारपूर्वक शब्द- रूपावलीके अनुसार चला लेवे ।
, र ( शिक्षाविचारः । ३३ १ अ, ह, विसर्ग (:), क, ख, ग, घ, ङ-कंठ-स्थान । इ,य, श, च, छ, ज, झ, भ-तालु-स्थान । ऋ, र, ष, ट, ठ, ड, ढ, ण-मूर्धा-स्थान । ल, ल, स, त, थ, द, धन-दंत-स्थान । उ,उपध्मानीय (प. फ),प,फ,ब,भ,म-ओष्ठ-स्थान। व-दंतोष्ठ-स्थान । ङ,अ,ण, न, म, अनुस्वार )-नासिका-स्थान। जिह्वामूलीय ( क ख )-जिह्वामूल-स्थान । २क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, भाट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म (स्पर्श)- स्पृष्ट-प्रयन। य, र, ल, व (अंतःस्थ ) ईषत्पृष्ट प्रयत्न । श, ष, स, ह (ऊष्म) ईषद्विवृत प्रयन । अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋ, ल, ए, ऐ, ओ, औ-विवृत-प्रयन । : अ-संवृत-प्रयत्न । इनमें जिन जिन वर्णोंका स्थान और प्रयत्न एक होवे, उनको परस्पर सवर्ण' कहते हैं । इति स्थानपयनविचार । स्वरसंधिका अपवाद. ओकारांत निपातका परस्वरसे संधि नहीं होता यथा- अहो ईशाः इत्यादि । द्विवचनांत शब्दके दीर्घ 'ई, ऊ, ए' इन स्वरों पर ( आगेके ) स्वरसे संधि नहीं होता। पूर्व और १ स्वरसंधिचक्र अगले सफेपर लिखा है। ... . , -- . ३ बा. सं.प्र.
cho उ blatur यु यू य ऊ व ote वा वे रे ह ला न पूर्व और पर स्वरोंके संधिका चक्र. पूर्व स्वर आ ३ जा ए ऐ ओ आ अआ आ आ ए औ यै यो य । ये यौ या वा वि वी दृ वै वो ऋ३ रि र री रै रो रु रौ लि. ली लु लू ले लैलो ए अया आय अयी अयु अयू अयू अयू अय अल्ल | अयें अयै अयो अयो ए अआ। अइ अइ अई अउ अऊोअन अ अल | अए अऐ अओ अऔ आय आया आयि आयी आयु आयू आय आया आये आयै आअ आआ आइ आई | आउ आऊ आऋ आ आल आए आऐ आओ आऔ ओऽ अवा, अवि अवी अवु अबू अवृ अव अवृ अव | अल अवे अवै अवो अवौ ओ अआ अइ अई अउ अऊ अऋ अऋ अल. अए अऐ आव आवा आवि आवी आवु आवू| आवृ आवृ आवे आवै आ आअ आआ आइ. आई आउ आज आऋ आत्र आल आए आऐ आओ आओ । शिक्षाविचारः समाप्तः ॥ ३४ है। यथा-राम ३ अत्र, रामाऽत्र इत्यादि। स्वर लंबा होता है उस स्वरका परस्वरसे संधि विकल्पसे होता भानू अत्र, गंगे अमू इत्यादि। पुकारनेमें शब्दका जो अंत्य पर दोनोंभी स्वर ज्योंके त्यौही रहते हैं। यथा-हरी एतो, बालसंस्कृतप्रमाकरे मर आहे. आयो आयो ऐ अओ अऔ आवो आवौ आल उपदेशपिचार।। ३५ उपदेशविचार. ध्यानमें रखना चाहिये कि, इस उपदेशविचारमें संस्कृत पाक्यका हिंदी भाषांतर प्रायः संस्कतके अनुसार (शब्दशः) ही किया गया है। इसका कारण विद्यार्थियोंको संस्कृत शब्दविभक्ति आदिका पूरा पूरा ज्ञान होना, यही है। तौभी हिन्दी जाननेवाले हिन्दी वाक्यकी सरणी कैसी होनी चाहिये सो जानतेही हैं। नित्यकर्मोपदेशः १. संस्कृत. हिंदी. १ प्रतिदिवसं ब्राह्म मुहूर्ते उ १ प्रति दिन ब्राह्म मुहूर्तमें तिष्ठेत् । उठे। २ गुरुदेवतादीन स्मृत्वा नम २ गुरु देवता आदिकोंका स्म- स्कारं कुर्यात् । रण कर प्रणाम करे। ३ पश्चात् यज्ञोपवीतं दक्षिण- ३ पीछे दहिने कानपर जने- कर्णे निधाय जलपूर्णकुम्भ ऊको रख जलसे मरे हुए गृहीत्वा दक्षिणस्यां दिशि लोटेको ले दक्षिणदिशाकी विविक्तदेशं गन्तव्यम् । ओर निर्जनस्थानको जावे। ४ तत्र उपविश्य अधोमुखः ४ तहां बैठके अधोमुख हो सन् तृणाच्छादितायां भूमौ तिनोंसे ढांपी हुई पृथ्वीपर इदेत । झाडा ( शौच ) करे। ५ ततः मृत्तिकया विलिप्य ५ पीछे मिट्टीसे लेपन कर अ- अपानद्वारं जलेन प्रमृज्यात। पानदारको जलसे धोवे। ६ अनन्तरं इस्तौ पारी प्रक्षाः ६ पीछे हाथों [ और ] पैरोंको स्य दन्तधावनमाचरेत् । धोकर दंतशुद्धि करे।
बालसंस्कृतप्रभाकरे ७ एवं मुखशोधनं गण्डूषैः कु ७ इस प्रकार कुल्लोंसे मुखशुद्धि वति। करे। ब्रूयात् । ८ यावत् मुखशोधनं न भवति ८ जबतक मुँहकी शुद्धि नहीं तावत् केनापि समं न हो तबतक किसीके साथ नहीं बोले । ९ तदनन्तरं नद्यां तटाके कूपे ९ तिसके पीछे नदीपर [या] ' वा शीतजलेन नायात् । तालावपर या कुएंपर ठंढे जलसे स्नान करे। १० अशक्तौ तु उष्णोदकेन १० शक्ति न हो तो गरम पा- स्नातव्यम् । नीसे स्नान करे । ११ ततः परं धौतवस्त्रं परिद-|११ उसके पीछे धोये हुए कप- धीत । डेको पहिरे। १२ पश्चात् ललाटे भस्म गोपी- १२ पीछे भालपर भस्म या गो- चन्दनं वा धरेत् । पीचंदनको लगावे। १३ प्रातःसंध्यां च उपासीत । १३ और प्रातःसंध्याकी उपा- सना करे। १४ षोडशोपचौरैः देवपूजां कु- १४ सोलह उपचारोंसे देवतापू- वति । १५ ततः देवतर्पणं ऋषितर्पणं | १५ पीछे देवताओंका तर्पण और च कार्यम् । ऋषियोंका तर्पण करना. १६ पितृमरणानन्तरं पितृतर्प- १६ पिता मरनेपर पितरोंकाभी णमपि करणीयम्। १७ पाके निष्पन्ने वैश्वदेवं विद- १७ रसोई सिद्ध होनेपर वैश्वदेव करे। १८ आगतान अतिथीन् सम- | १८ आये हुए अतिथियोंका पू- यत् । १९ समनन्तरं देवताभ्यः पक्का- १९ पीछे देवताओंको पके हुए नसमर्पणं कुर्यात् । अन्नका समर्पण करे। जन करें। तर्पण करना। ध्यात् । जन करे।
उपदेशविचारः। ३७ २० ततः स्वपरिवारेण सहितः | २० अनंतर अपने परिवारके चतुर्विधम् अन्नं भुञ्जीत । सहित चार प्रकारके अन्नको खावे । २१ भोजनामन्तरं पाणी मुखं २१ भोजन होनेके पीछे हाथों, पादौ च प्रक्षाल्य आ मुख और पांवोंको धोकर चामेत् । आचमन करे। २२ अतिथिभ्यः ताम्बूलं दत्त्वा २२ अतिथियोंको तांबूल दे स्वयं भक्षयेत् । आप भक्षण करे। २३ एवं सायमपि सन्ध्यां दे-२३ इस प्रकार सांझमेंभी संध्या वस्य पंचोपचारपूजां च और देवकी पंचोपचार पूजा विधाय भुज्यात् । कर भोजन करे। २४ दिवा द्विवारं न अभ्यव- २४ दिनमें दो बार भोजन नहीं हरेत् । करे । २५ दिवा स्त्रीसङ्गः शास्त्रे नि- २५ दिनमें स्त्रीका संग शास्त्रमें षिद्धः। निषिद्ध है। २६ इति शिष्टानां प्रक्रिया प्रच- २६ ऐसी शिष्टोंकी रीति चलती लति । २७ एवं सामान्यकृत्यस्य उप-२७ ऐसा साधारण कर्मोंका उ- देशः समाप्तः। पदेश समाप्त हुआ। स्वभावोपदेशः २. संस्कृत. हिंदी. १ गुरुः शिष्यान् पाठयति । १ गुरु शिष्योंको पढाता है। २ छात्राः अभ्यस्यन्ति। २ विद्यार्थी अभ्यास करते हैं। ३ पान्थो याति । ३ बटोही जाता है। ४ वेत्रधरांः स्तेनं गवेषयन्ति । ४ पोलीस सिपाही चोरको खोजते हैं। २ वादी अभ्यर्थनां करोति । ५ वादी अर्ज करता है। gho ताम्। ३८ बालसंस्कृतप्रभाकरे ६ प्रतिवादी ब्रूते मतसमर्थकम्।। ६ प्रतिवादी वकीलको बोलता है। ७ अधिकरणं प्रति यात । ७ कचहरीको चलो। ८ मम पक्षः अवश्यं समर्थ्य- ८ मेरा पक्ष जरूर प्रतिपादन करना। ९ अभ्यर्थनायाः इयं प्रतिच्छा. ९ अरजकी यह नकल है। यास्ति । १० न्यायाधीशःन्यायं करोति। १० इनसाफ करनेवाला इन- साफ करता है। ११ साक्षिणः पृच्छति । ११ गवाही देनेवालोंको प्रश्न करता है। १२ निर्णयं कथयति । १२ फैसला कहता है। १३ स्तेनं बध्नन्ति । १३ चोरको बांधते हैं। १४ तं च कारागृहे स्थापयन्ति । १४ उसको कैदखानेमें रखते हैं। १५ साधवः उपकुर्वते । १५ साधु [ लोग ] उपकार करते हैं। १६ दुष्टाः प्राणिनः हिंसन्ति । १६ दुष्ट [ लोग ] प्राणियोंको घायल करते हैं। १७ नर्मकथाभिः तुष्यति राजा। १७ ठटाकी बातोंसे राजा खुश होता है। १८ पादाभ्यां गच्छति । १८ पैरोंसे जाता है। १९ वाचा वदति । १९ वाणीसे बोलता है। २० हस्तेन भुंक्ते। २० हाथसे जेमता है। २१ नेत्राभ्यां पश्यति । २१ आखोंसे देखता है। २२ कर्णाभ्यां शृणोति। २२ कानोंसे सुनता है। २३ त्वचा स्पृशति । २३ त्वचासे स्पर्श करता है। २४ नासिकया जिघ्रति । २४ नाकसे सूंघता है। २५ जिया लेदि। २५ जीमसे चाटता है।
उपदेशविचारः। २६ धीरो धैर्य न मुञ्चति । २६ विद्वान् धैर्यको नहीं छोडता। २७ धनिकः व्यापारं कुरुते । २७ द्रव्यवान (सेठ ) व्यापार करता है। २८ व्यापारेण लक्ष्मीः वर्धते । २८ व्यापारसे लक्ष्मी बढती है। २९ मृत्यः वेतनं गृह्णाति । २९ टहलुआ ( नौकर ) पगार ( मजूरी) लेता है। ३० विद्यया विनय उत्पद्यते । ३० विद्यासे विनय उत्पन्न होता है। ३१ विनयेन महत्वं जायते । ३१ विनयसे बडापन होता है। ३२ महत्त्वेन धनं लभते । ३२ बडेपनसे द्रव्यको प्राप्त होता है। ३३ धनेन सर्व सिद्धयति । ३३ धनसे सब सिद्ध होता है ३४ सुवर्णकारः अलंकारानिर्मिः | ३४ सुनार गहनोंको बनाता है। मीते। ३५ उद्योगिनः यतन्ते । ३५ धंधेवाले ( लोग ) प्रयत्न करते हैं। ३६ प्रतिदिनं भुंक्ते । ३६ दिन दिन जेमता है। ३७ वृक्षान् सिञ्चति मालाकारः। ३७ पेडोंको माली सींचता है। ३८ रथकारः गेहं रचयति । ३८ बढई घरको बनाता है। ३९ चित्रकारः भित्तौ आलेख्या-/३९ चितेरा भीतपर तसबीरोंको नि अलिखत् । लिखता ( खींचता) मया। ४० कुम्भकारो मृत्तिकां मर्दयति। ४० कुमार मिट्टीको कूटता है। ४१ आदित्यः उदयति । ४१ सूर्य उगता है। ४२ प्रकाशेन तमः ध्वंसते । ४२ रौशनी (तेज) से अंधेरा नष्ठ होता है। ४३ शुक्लपक्षे निशाकरः विवर्द्धते। ४३ शुक्लपक्षमें चांद बढता है। ४४ कृष्णपक्षे क्षिणोति । ४४ कृष्णपक्षमें क्षीण ( कम ) है ।
बालसंस्कृतप्रभाकरे ४५ मेघो वर्षति । ४५ बादल बरसता है। ४६ वातो वहाते। ४६ वायु वहता है। ४७ जलं नीचैः गच्छति । ४७ जल नीचे जाता है। ४८ राजानो युध्यन्ते । ४८ राजा [ लोग ] लडते हैं। ४९ कुविन्दः अंशुकानि वयते । ४९ जुलाहा कपडोंको बुनता है। ५० चन्द्रमसः उदयकाले अस्त-५० चांदके उगनेके समय और काले च समुद्रो विवर्धते । अस्तके समय दर्या बढता है। ५१ तुन्दिलः स्वपिति । ५१ वेदार ( बड़े पेटवाला) सोता है। ५२ खगाः उड्डीय अटन्ति । ५२ पच्छी उडके फिरते हैं। ५३ गोपालाः गाः रक्षन्ति । ५३ अहीर गौओंका रक्षण करते हैं। ५४ अर्मकाः रुदन्ति । ५४ लडके रोते हैं। ५५ शुकः फलम् अत्ति । ५५ नोता फलको खाता है । ५६ द्विजाः संध्याम् उपासते । ५६ ब्राह्मण संध्याको उपासते ( करते ) हैं। ५७ हस्ती अङ्गानि कण्डूयते । ५७ हाथी अंगोंको खुजाता है। ५८ पश्य मृगो धावति । ५८ देख, हरिण दौडता है। ५९ कथिकाः कथाम् उप- | ५९ कहानी कहनेवाले कहानी दिशन्ति । कहते हैं। ६० शस्त्रेण च्छिनत्ति । ६० हथियारसे काटता है। ६१ नागदन्तकोपर्युष्णीष निद- ६१ खूटापर पगडीको रखता है। धाति । ६२ आदर्श प्रतिबिम्बं दृश्यते । ६२ ऐने में प्रतिबिंब दीखता है। ६३ मार्जारो मूषकेण सह स्प ६३ बिल्ली चूहेके साथ स्पर्धा र्धते । करती है। [समाप्त । ६४ इति स्वभावोपदेशः समाप्तः। ६४ इस प्रकार स्वभावका उपदेश उपदेशविचारः। ४१ विद्यार्थिसंवादोपदेशः ३. संस्कृत. हिंदी. एतावत्कालं गृहे एव त्वं किं १ इतने कालतक घरमेंही तू करोषि ? क्या करता है २ दश वादिताः केरलाः। २ दस घंटे बजे। ३ झटिति बहिः निर्गच्छ । ३ झट बाहिर निकल। ४ अद्य विलम्बो भविष्यति । ४ आज देर होगी। ५ अहं तु गच्छामि। ५ मैं तो जाता हूं। ६ अहमपि आगच्छामि । ६ मैंभी आता हूं। ७ भोजनादिकं मम सर्व कर्म ७ भोजन आदिक मेरा सब संवृत्तमस्ति । काम हुआ है। ८ सर्वम् उपकरणं गृहीत्वा ८ सब सामग्री लेके मैं आया, आगतोऽहं, संप्रति शीघ्र अब जलदी चल। गच्छ। ९ चतुष्पथे कोऽयं स्थितः ? ९ चौहटेपर यह कौन रहा है ? १० अरे भानुदत्त, तवापि अद्य | १० अरे भानुदत्त ! तुझेभी आज कुतः विलम्बोऽभूत् ? क्यों देर हुई ? ११ अद्य गुरुः अस्मान् ताड- ११ आज गुरु हमको मारेगा। यिष्यति । १२ मया अभ्यासोऽपि न अ-| १२ मैंने अभ्यासभी नहीं किया कारि । १३ त्वया अभ्यासः कृतः क- १३ तूने अभ्यास किया क्या ? चित् ?. १४ मम पाठस्तु दृढः समभवत् । १४ मेरा पाठ तो दृढ हुआ है। १५ अद्य भवन्तम् उपदिशामि । १५ आज तुझे उपदेश करता हूं। १६ प्रतिदिनं अभ्यासः कार्यः । १६ दर रोज अभ्यास करना चाहिये।
४२ बालसंस्कृतप्रभाकरे १७ तेन ते विद्या सजा भवि- १७ तिससे तेरी विद्या तैयार ष्यति । १८ गुरुसेवां विना विद्या सम्यक् | १८ गुरुकी सेवाके विना उत्तम न सिध्यति । रीतिसे विद्या सिद्ध नहीं होगी। होती। १९ तस्मात् भत्त्यावश्यं गुरुं| १९ इससे भक्ति करके अवश्य सेवेत । गुरुको सेवे। २० विद्ययापि विद्या मवति । २० विद्यासेभी विद्या होती है। २१ पुष्कलेन धनेन वा। २१ किंवा बहुत द्रव्यसे। २२ वयं तु अकिंचनाः स्मः । २२ हम तो दरिद्री हैं। २३ पाठादानकाले निरर्यकं न | २३ पाठ लेनेके समय व्यर्थ वदेत् । नहीं बोले । २४ गुरोः भाषणं सावधानं शृ-|२४ गुरुका बोलना अवधान- गुयात् । सहित सुने । २५ गुरुं न निन्देत् । २५ गुरुकी निंदा न करे। २६ गुरौ प्रसन्ने न किमपि दुर्ल- २६ गुरु संतुष्ट होनेपर कुछमी भम् । दुर्लभ नहीं। २७ विद्वांसं राजापि मानयति । २७ विद्वान्को राजाभी मान देता है। २८ मत्संनिधौ मषीपात्रं वर्तते २८ मेरे पास दावात तो है पर परंतु लेखनी न विद्यते । कलम नहीं है। २९ तव पंचमं पुस्तकं क वर्तते ? | २९ तेरी पांचवीं पुस्तक कहां है ? ३० देहि मह्यं क्षुरमिकां कर्तरी ३० मुझे चक्कू और कतरनी दे। च। ३१ परश्वः त्वद्गृहम् आगन्ताऽ- ३१ परसोंके दिन तेरे घरको मैं आऊंगा। ३२ अग्रिमे वाराष्टके परीक्षा ३२ आइंदे हफ्तेमें परीक्षा भवेत् । होगी।
उपदेशविचारः। ३३ परीक्षायां दक्षतया स्थात-|३३ परीक्षामें चतुरपनसे रहना। व्यम् । - ३४ कदापि न मेतव्यम् । ३४ कमी नहीं डरना। ३५ विचारं कृत्वा, प्रश्नोत्तरं लेख- | ३५ विचार करके प्रश्रका उत्तर नीयम् । लिखना। ३६ त्वं परीक्षायामुत्तीर्णो भवि-३६ तू परीक्षामें पास होगा। ज्यसि। ३७ पञ्चमकक्षायां काठिन्यं न | ३७ पांचवीं इयत्तामें कुछभी क- किमपि । ठिनपन नहीं। ३८ शालाव्यवस्थापकः स्वयमेव | ३८ शालाकी व्यवस्था करनेवाला परीक्षायै आगमिष्यति, इति (इन्स्पेक्टर ) आपही परी- मया श्रुतम् । क्षाके लिये आवेगा, ऐसा मैंने सुना [है । ३९ अयं यष्टिधरः कुत आग-|३९ यह सिपाही कहांसे आता च्छति ? है ? ४० किमरे, उद्घाटिता शाला ?/४० क्यों रे, शाला खोली ? ४१ केनचित् कारणेन अद्य अ-४१ किसी कारणसे आज अधि- धिकारिणा विरामः अदायि। कारीने रजा दी है। ४२ अतः उद्घाट्य पुनः मया ४२ इसीसे खोलकर फिर मैंने पिहिता। मूंदी। ४३ तस्मात् निवर्तध्वं यूयम् । ४३ इस कारण तुम लौटो। ४४ इयं मदीया उपानत् छिन्ना ४४ यह मेरा जूता ( जोडा) वर्तते । ४५ कदा अन्या क्रेतव्या ? ४५ कब दूसरा खरीदना? ४६ अद्यतनः एव दिवसोयोग्यः। ४६ आजकाही दिन योग्य है । ४७ चर्मकारगृहं समीपमेव अ.४७ चमारका घर पासही है। स्ति। फटा है।
बालसंस्कृतप्रमाकरे ४८ इदं मम पुस्तकं पटमञ्जू-/४८ यह मेरा पुस्तक पाकिटमें षिकायां निधेहि । रख। ४९ सायं गणितोदाहरणाचन्त- ४९ सायंकालमें गणितके उदा- नाय अवश्यम् आयाहि । हरणके सोचनके अर्थ अ. वश्य आ। ५० इति विद्यार्थिसंवादोपदेशः ५० इस प्रकार विद्यार्थियोंके संवा- समाप्तः। दका उपदेश समाप्त हुआ। दिगुपदेशः ४. संस्कृत. हिंदी. १ उदयाचलसंनिहिता या दिक् १ उदयपर्वतके पास होनेवाली सा पूर्वा इति उच्यते । जो दिशा सो पूर्व ऐसा कहा जाता है। २ तस्याः अधिपः इन्द्रः। २ उसका मालिक इंद्र [है ] । ३ तत्रैव ऐरावतो नाम गजः ३ तहांही ऐरावत नामका तिष्ठति । हाथी रहाता है। ४ अस्ताचलसंनिहिता या ४ अस्ताचलके पास होनेवाली दिशा सा पश्चिमा। जो दिशा सो पश्चिम । ५ तस्याः राजा वरुणः । ५ उसका राजा वरुण [है] । ६ तस्याम् अञ्जननामा हस्ती ६ तहां अंजन नामका हाथी वसति । ७ मेरोः समीपस्था काष्ठा ७ मेरुके पास होनेवाली दिशा उत्तरा। उत्तर। ८ तस्याः राजा धनदः । ८ उसका मालिक कुबेर [ है। ९ तस्यां सार्वभौमाभिधेयः ९ तहां सार्वभौम नामवाला दन्ती वर्तते । हाथी रहता है। रहता है।
उपदेशविचारः । ४५ १० मेरो व्यवहिता या आशा | १० मेरुसे व्यवहित ( व्यवधा- सा दक्षिणा। । नसहित, दूर ) जो दिशा सो दक्षिण । ११ तस्यां धर्मराजः राज्यं ११ तहां यम राज्य करता है। । करोति । १२ तत्रैव वामननामकः: करी १२ तहांही वामन नामवाला निवसति । हाथी रहता है। १३ दक्षिणपूर्वयोः . मध्यगता १३ दक्षिण पूर्वके बीचमें होने- ककुप् आग्नेयी इति अभि- वाली दिशा. आग्नेयी, इस दधते। प्रकार कहते हैं। १४ तस्याः राजा अग्निः। १४ उसका मालिक अग्नि [है] १५ पुण्डरीकेण हस्तिना सा १५ पुण्डरीक हाथीने वह दिशा दिक् अधिष्ठिता। अधिष्ठित ( स्थान की) है। १६ दक्षिणपश्चिमयोमध्ये वर्त-| १६ दक्षिण पश्चिमके बीच में माना दिक नैर्ऋती। रहनेवाली दिशा नैर्ऋतीहै)। १७ तां नितिनामा निशाचरः | १७ उसको निक्रति नामका पालयति। राक्षस पालता है। १८ कुमुदनामा हस्ती तत्र प्रति-/१८ कुमुद नामक हाथी तहां वसति । रहता है। १९ पश्चिमोत्तरयोः मध्यस्थायाः १९ पश्चिम उत्तरके बीच होने- दिशः नाम वायवी इति वाली दिशाका नाम वायवी अस्ति । ऐसा है। २० तस्याः आधिपत्यं वायुना २० उसका मालिकपन वायुने स्वीकृतम्। स्वाधीन रखा है। २१ पुष्पदन्तः तत्र स्थितः । २१ तहां पुष्पदंत(हाथी)रहा है। २२ पूर्वोत्तरयोः मध्ये भवा दिक् | २२ पूर्व-उत्तरके बीचमें होने- ऐशानी इति अभिधीयते । वाली दिशा ऐशानी ऐसी कहलाती है।
४६ बालसंस्कृतप्रभाकरे हैं। २३ तस्याः अधिपस्य नाम | २३ उसके मालिकका नाम ईशान ईशानः इति प्रसिद्धम् अस्ति। ऐसा प्रसिद्ध है। २४ तस्यां वर्तमानस्य गजस्य २४ तहां रहनेवाले हाथीका नाम नाम मुमतीकः । सुप्रतीक (है)। २५ एते एव अष्टौ दिग्गजाः | २५ येही आठ दिशामोंके हाथी सन्ति । २६ उपरिभवा दिक् ऊर्ध्व दिशा २६ ऊपर होनेवाली दिशा ऊर्ध्व- इति कथ्यते । दिशा ऐसा कहा जाता है। २७ तस्याः अधिपतिः ब्रह्मा २७ उसका राजा ब्रह्मदेव । २८. अधोभूतायाः दिशः नाम | २८ नीचे होनेवाली दिशाका नाम अधरदिशा इति । अधरदिशा ऐसा [है]। २९ ताम् अनन्तः रक्षति। २९ उसको शेष पालता है। ३० एता एव दश दिशाःसन्ति। ३० येही दश दिशायें हैं। ३१ द्विजाः सन्ध्याकाले दश | ३१ ब्राह्मण संध्याके समय दश दिशः नमस्कुर्वन्ति । दिशाओंको नमस्कार करते हैं ३२ पूर्वामिमुखः अथवोत्तराभि-३२ पूर्वके संमुख या उत्तरके मुखः पूजादि पूजादि शुभकृत्यं संमुख [ हो ] पूजा आदि कुर्यात् । मंगल कार्य करे। ३३ अस्य यदि असंभवः स्या-|३३ इसका यदि संमव न होवे तदेशान्यमिमुखः शुभकर्म तो ऐशानीदिशाके संमुख समाचरेत् । [ होके ] सत्कर्म करे। ३४ इतराः सर्वदिशाः निन्द्याः | ३४ अन्य सब दिशायें निय कथिताः। कही गई हैं। ३५ विशेषतः दक्षिणा पश्चिमा च | ३५ विशेष करके दक्षिण और मङ्गलकर्माण निन्दिते स्तः। पश्चिम शुभकार्यके विषे निंदित हैं।
उपदेशविचारः। ३६ दक्षिणस्यां दीपस्य मुखं न | ३६ दक्षिण दिशाकी ओर दीया कार्यम् । का मुंह नहीं करना। ३० दक्षिणस्यां पादौ कृत्वा न ३७ दक्षिणकी ओर पैरोंको कर शयीत । नहीं सोवे । ३८ एवं दिशामुपदेशः समाप्तः | ३८ इस प्रकार दिशाओंका उप- অশ্বন देश समाप्त हुआ। कालोपदेशः५. संस्कृत. हिंदी. १ अष्टादशमिः निमेषैः एका १ अठारह निमेषों ( पलक काष्ठा भवति । मारने ) से एक काष्ठा होती है। है। २ त्रिंशत्काष्ठामिः कला जायते। २ तीस काष्ठाओंसे कला होती है। ३ त्रिंशत्कलामिः क्षणः संप- ३ तीस कलाओंसे क्षण होता यते । ४ द्वादशमिः क्षणैः एको| ४ बारह क्षणोंसे एक मुहूर्त मुहूर्तः। [ होता है। ५ एवं षष्ट्या पलैः एका ५ इस प्रकार साठ पलोंसे एक घटिका निष्पद्यते। घटिका होती है। ६ दाभ्यां घटिकाभ्याम् एको ६ दो घटिकाओंसे एक मुहूर्त । मुहर्तः। ७ त्रिंश-मुहूर्तेः एकः अहो ७ तीस मुहूर्तोसे एक अहोरात्र । रात्रः। ८ भष्टमिः अहोरात्रैः एक ८ आठ अहोरात्रोंसे एक वाराष्टकम् । हफ्ता। ९दाभ्यां वाराष्टकाभ्यामे: ९ दो हफ्तोंसे एक पखवाडा। पक्षः।
बालसंस्कृतप्रभाकरे १० द्वाभ्यां पक्षाभ्याम् एको । १० दो पखवाडोंसे एक महीना। मासः । ११ द्वाभ्यां मासाभ्याम् एकः | ११ दो महीनोंसे एक ऋतु । ऋतुः। १२ त्रिभिः ऋतुभिः एकमयनम्। १२ तीन ऋतुओंसे एक अयन [ होता है । १३ द्वाभ्यामयनाभ्यां वर्ष जा-१३ दो अयनोंसे बरस होता यते । हैं १४ मासाः द्वादश सन्ति । १४ महीने बारह हैं। १५ चैत्रः १, वैशाखः २, ज्येष्ठः | १५ चैत्र १, वैशाख २, ज्येष्ठ ३, ३, आषाढः ४, श्रावणः ५, आषाढ४, श्रावण ५,भाद्र- भाद्रपदः ६, आश्विनः ७, पद ६, आश्विन ७, कार्तिक कार्तिकः ८, मार्गशीर्षः ९, ८, मार्गशीर्ष ९, पौष १०, पौषः १०, माघः ११, फा माघ ११, फाल्गुन १२, ल्गुनः१२,इति तु तेषांक्रमः। ऐसा तो उनका क्रम [है]। १६ ऋतवः षट् विद्यन्ते । १६ ऋतु छः १७ चैत्रवैशाखौ वसन्तर्तुः १, १७ चैत्र वैशाख-वसंतऋतु १, ज्येष्ठाषाढौ ग्रीष्मः २, श्राव- ज्येष्ठ आषाढ-ग्रीष्म २, णभाद्रपदौ वर्षा ३, आश्वि श्रावण भाद्रपद-वर्षा ३, नकार्तिको शरत् ४, मार्ग आश्विन कार्तिक-शरत् ४, शीर्षपौषौ हेमंतः ५, माघ- मार्गशीर्ष पौष-हेमंत ५, फाल्गुनौ शिशिरऋतुः ६। माघ फाल्गुन-शिशिरऋतु। १८ काराः सप्त सन्ति । १८ वार.सात हैं। १९ रविः १, सोमः २ भौमः ३, १९ रवि १, सोम २ भौम ३, बुध बुधः ४, गुरुः ५, शुक्रः ६, ४, बृहस्पति ५, शुक्र ६ और शनिश्च ७॥ शनि (वार)७। २० शुक्लपक्षः, कृष्णपक्षः च २० शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष इति द्विविधः पक्षः। ऐसे दो प्रकारका पक्ष है।
उपदेशविचारः । ४९ २१ उत्तरायणं दक्षिणायनं चेति | २१ उत्तरायण और दक्षिणायन द्विप्रकारकम् अयनम् । ऐसादो प्रकारका अयन है। २२ मनुष्याणाम् एको मास एव | २२मनुष्योंका एक मासही पित- पितृणाम् अहोरात्रः । रोका अहोरात्र (होता है)। २३ तत्र कृष्णपक्षः दिवसः, २३ तिसमें कृष्णपक्ष दिन और शुक्लपक्षो रात्रिश्वास्ति । शुक्लपक्ष रात है। २४ एवमेव मनुष्याणाम् एकं २४ इस प्रकारही मनुष्योंका एक वर्ष देवानाम् एकः अहो वर्ष देवताओंका एक अहो. रात्रः भवति । रात्र होता है। २५ तत्र उत्तरायणं दिनं, दक्षि-२५ तिसमें उत्तरायण दिन और णायनं च रात्रिरस्ति । दक्षिणायन रात है। २६ तिथयः पञ्चदश सन्ति । २६ तिथियां पंद्रह है। २७ योगाः सप्तविंशतिः । २७ योग सत्ताईस ( हैं )। २८ करणानि सप्त। २८ करण सात ( हैं)। २९ संक्रान्तयः द्वादश सन्ति, २९ संक्रांति बारह हैं, तिसमें तत्र मकरसंक्रान्तिः कर्कसं मकरसंक्रांति और कर्कसं- क्रान्तिश्च एते द्वे अयनसंक्रा क्रांति ये दो अयनसंक्राति न्ती। ( हैं )। ३० कर्कसंक्रान्तिमारभ्य आम- ३० कर्कसंक्रांतिसे आरंभ कर करसंक्रांति दक्षि गायनम्, मकरसंक्रांतितक दक्षिणायन एवं मकरसंक्रान्तिमारभ्य ( है ), इस प्रकार मकरसं- क संक्रमणपर्यन्तम् उत्तरा- क्रातिसे आरंभ कर कर्क- यणम् । संक्रातितक उत्तरायण(है)। ३१ राशयः द्वादश त, ते च | ३१ राशि बारह हैं, वे ऐसे, मेष इतन, मेषः १, ५ मः १, वृष २, मिथुन ३, कर्क मिथुनं ३, कर्कः ४ बिहः ५, ४, सिंह ५, कन्या ६, तुला कन्या ६, तुला वृश्चिकः ७,वृश्चिक ८, धन ९, मकर -- . बा. सं.
ये दो। और शुक्र बालसंस्कृतप्रभाकर ८. धनुः ९, मकरः १०, १०, कुंभ ११ और मीन .', कुम्भः ११, मीनश्च १२ । १२ ऐसा इनका क्रम है। ३२ ग्रहाः नव सन्ति, ते च ३२ ग्रह नौ हैं, वे तो सूर्य 'रव्यादयः सप्त, राहुः केतुश्च आदि सात और राहु केतु एतौ छौ। ३३ तत्र रविः बुधः शुक्रश्चैते त्रयः | ३३ तिसमें सूर्य, बुध एकैकेन मासेन एकैकं राशि ये तीन एक एक महीने में एक भुञ्जन्ति । एक राशिको भोगते हैं। ३४ गुरुः एकान्देन एक राशि ३४ बृहस्पति एक बरसमें एक : मुंक्त। राशिको भोगता है। ३५ भोमः सार्धमान एकं राशिं | ३५ मंगल डेढ महीनेमें एक भुक्त। गशिको भोगता है। ३६ इन्दुः सपाददिवसयेन एकं | ३६ चांद सग दो दिव नों(अठा- राशिं भुनक्ति। रह पहरों) में एक राशिको भोगता है। ३७ शनैश्चरः सार्धवर्षदयेन एकै. | ३७ शनि अढाई बरसोंमें एक के राशिम् उपझुंके । एक राशिको भोगता है। ३८ राहुकेतू सार्धाब्देन एकैकं | ३८ राहु (और केतु डेढ बरसमें राशिं भुंक्तः । एक एक राशिको भोगते हैं। ३९ काचेत्तु विंशतिमालन उप. | ३९ कहीं बीस महीनोंमें भोगते भुंजाते इति लिखितम् । हैं ऐसा लिखा है। ४० रविभौमशनिवाराः पास्वागः ५० रवि, मंगल (और) शनिवार उक्ताः। पाप वार को है। ४१ सोमबुधगुरुशुक्रवाराः एते ४१ सोम.बुध,बृहस्पति (और) शुक्र ये वार शुभ हैं। ४२ रविशनिभामवारेषु ३पश्रुक- | ४२ रवि शनि और मंगलवारके मणा निषेधोऽस्ति । दिन हनामतका निषेध है। शुभाः सन्ति ।
| उपदेशविचारः। ४३ श्मश्रुकर्मणि चतुर्थी, षष्ठीं, | ४३ हजामतके विर्षे चतुर्थी, षष्ठी, अष्टमी, नवमी, एकादशी, अष्टमी, नवमी, एकादशी, चतुर्दशी, पूर्णिमाम् अमा चतुर्दशी, पूर्णिमा और अ. वास्यां च वर्जयेत् । मावास्याको वर्ज करे। ४४ शनिवारे अभ्यङ्गस्नानकर्म | ४४ शनिवारके दिन मालिस लक्ष्मी वर्धयति । करके स्नान करना लक्ष्मीको वढाता है। ४५ इति कालोपदेशः समाप्तः । ४५ इस प्रकार कालका उपदेश समाप्त हुआ। गृहवृत्तोपदेशः ६. संस्कृत. हिंदी. १ श्रीमन्तो जनाः गृहे सुखेन १ श्रीमान लोग घरमें सुखसे तिष्ठन्ति । २ अद्य मम भृत्यः कं ग्राम २ आज मेरा चाकर किस गां- गतः ? वको गया ? ३ आस्मिन्नारामे तरूगां पक्कानि ३ इस वागमें वृक्षोंके पके हुए पनि पतन्ति । पत्ते गिरते हैं। ४ आलवालान्यपि शुष्काणि ४ थावलेभी सूखे हैं। सन्ति । ५ परवाहे जलस्य बिंदुरपि न ५ नहरमें पानीकी बूंदभी नहीं दृश्यते । देखी जाती। ६ घटीयन्त्रं कः पर्यावर्तयेत ? ६ पुरवटको कौन चलावेगा? ७ अद्य मित्रं समागतम् अतः ७ आज मित्र आया है, इसीसे कारखेल्लान् पटोलानि च गृ. कौला और परवलाको ले हीत्वा महानसे स्थापय । रमाइघग्म रख। ८ बल्लवः संनिहितो वते ८ रसाईदार नजदीक है किम् ? क्या?
५२ बालसंस्कृतप्रभाकरे चुल्लीसकाशे अंगारधानिका ९ चूल्हीके नजदीक अंगठी ९ वर्तते । नया १० सोपाने संदंशं गृहीत्वा की. १० संडसीको लेकर बालक पै- डति बालः। डीपर खेलता है। ११ गवाक्षात् मञ्चके कङ्कतं पति- ११ झरोखेसे पलंगपर कंघी गिर तम्। गई। १२ शय्यायाम् उपधानं वर्तते, १२ बिछौने पर तकिया है तहां तत्र कंदुकं दर्पणं च निधेहि। गेंद और सीसा रख । १३ संपुटकं प्रतिग्राहं चात्र आ-|१३ चौघडे और पीकदानीको यहां ला। १४ व्यजनवायुना पटवासकः | १४ पंखेकी वायुसे बुकवा इधर इतस्ततः उद्गतः। उधर उड गया। १५ चत्वरे मण्डपो न निर्मितः | १५ अंगनमें मंडप नहीं बनाया, यतः पङ्को वर्तते। इसी कारण कीच(हुआ)है। १६ दीपः आसनं चैते दे अप्य- १६ दीया और आसन ये दो- नोंभी यहां हैं। १७ अस्य वस्त्रस्य दशाः दीर्घाः | १७ इस कपडेकी दशियां लंबी हैं। १८ अस्मिन् दृष्ये जवनिका १८ इस तंबूमें परदे और चंद- वितानं च पश्यतु भवान् । वेको तू देख । १९ अयमलंकारः कस्यास्ति ? १९ यह गहना किसा है ? २० ग्रैवेयकेण इयं रमणी शोमते.० कंठीसे यह स्त्री शोभती है। २१ तरुण्याः पाणौ अङ्गुलीयकं | २१ तरुण स्त्रीके हाथमें अंगूठी कङ्कणानि च शामन्त । आर कंकण शोमते हैं। २२ पादयोः नूपुरी शोभे। २२ पैरामें पायजेब शोभते हैं। २३ इयं काश्ची केन पाहता ? २३ यह करधनी किसने भेजी है? २४ अयम् उलूावले. मुसलेन | २४ यह ओखली में मूसलसे तण्डुलान् अवहांत। सन्ति । चांवलोंको कूटता है।
रखता है ? कर। उपदेशविचारः। २५ भ्राष्ट्रे भर्जिताः चणकाः | २५ खपरीमें भूजे हुए चने मीठे स्वादिष्ठाः भवन्ति । होते हैं। २६ शरावोपरि ऋजीर्ष किमिति २६ सरवेके ऊपर तावेको क्यों निदधासि ? २७ कटाहं दा उत्तारय । २७ कढाईको कर्छलीसे उतार दे। २८ सर्वाणि पात्राणि अत्रैव २८ सब वर्तन यहांही हैं। सन्ति । २९ चालन्या धान्यं तुषरहितं २९ चालनीसे धान भूसीसे गहित भवति । होता है। ३० यत्र अधिरोहिणी वर्तते तत्रैव | ३० जहां सीढी है तहांही को- कोणे संमार्जन्या संकरं पु नेमें बढनीसे कूडेकी राशि श्रीकुरु । ३१ अपि च तं शूर्पे निधाय दूर ३१ और उसको सुपके बीच ले क्षिप । ३२ अन्तद्वारे पत्रिका केन स्था-| ३२ खिडकीमें चिही किसने रखी पिता? ३३ अस्मिन् वर्षे पटलं दृढं वर्तते। ३३ इस बरसमें छावना दृढ है। ३४ चन्द्रशालायां बह्वयः वस्त्रा-|३४ माडीपर बहुत कपडे सुका- धान्यो दृश्यन्ते । नेकी लाठियां दीखती हैं। ३५ द्वारस्य देहल्यां कपाटम् | ३५ दरवाजेके देहलपर केवाडका अवलंब्य तिष्ठति। आलंबन कर रहता है। ३६ इयं वेदिका सुखावहास्ति, अ-३६ यह चौतरासुखकारक है,यहां त्रागम्यताम् उपविश्यतांच। आइये और बैठिये। ३७ सूदः ओदनं सूपं शाकं च | ३७ रसोईदार भात दाल और तरकारीको सिझाता है। ३८ इति गृहवृत्तोपदेशः समाप्तः। ३८ इस प्रकार गृहवृत्तोपदेश समाप्त हुआ। दूर फेंक। पचति ।
बालसंस्कृतप्रभाकरे अवतारोपदेशः ७. संस्कृत. हिंदी. १ चैत्रशुक्लतृतीयायाम् अपरा चैत्रशुक्लतृतीयाके दिन अप- हे भगवान् नारायणः म राह्नकालमें भगवान् विष्णु त्स्यरूपेण अवातरत् । मछलीके रूपसे अवतारता भया। २ ततः सुरदोषणं शंखासुरं, २ पीछे देवोंके शत्रु शंखासु- हत्वा सरित्पतेः वेदान रको मार समुद्रसे वेदोंका उद्धार करता भया। ३ वैशाखपूर्णिमायां सायं कू ३ वैशाखपूर्णिमाके दिन सायं-- वितारो बभूव । कालमें कूर्मावतार मया। ४ सच देवदैत्यानां सागरम ४ वह ( कछवा ) देवदैत्योंका न्थने प्रवृत्ते अधोधो गच्छन्तं समुद्रमंथन प्रवृत्त होनेपर मन्दराचलं मन्थानं स्वपृष्ठे नीचे नीचे जाते हुए मंदरा- चलरूपी रईको अपने पृष्ट- पर धरता भया। ५ भाद्रपदस्य शुक्लतृतीयायाम् ५ भाद्रपदकी शुक्लतीयाके अपराहे वराहरूपोऽभूत् । दिन अपराह्नकालमें सूकर- उद्धृतवान् । दधार। रूपी हुआ। ६ तेन हिरण्याक्षनामानं दैत्यं ६ उस( सूकर ) ने हिरण्याक्ष मारयित्वा जले निमनायाः नाम दैत्यको मार जलमें मेदिन्याः स्वदंष्ट्रया उद्धारो डूबी हुई पृथ्वीका अपने कारि। डाढसे उद्धार किया। ७ वैशाखशुक्लचतुर्दश्यां सायं ७ वैशाखशुक्लचतुर्दशीके दिन नृसिंहः स्तम्भात् प्रादुर- संध्याकालमें नारसिंह खं- भसे प्रकट भया। ८ सतु तत्काल एवं स्वनखैः ८ वह तो तत्कालही अपने चत। उपदेशविचारः। हिरण्यकशिपुं विदार्य आ नखोंसे हिरण्यकशिपुको स्मभक्तस्य प्रहादस्य रक्ष. फाडकर अपने भक्त प्रह्ला- णमकार्षीत् । दका रक्षण करता भया । ९ भाद्रपदशुक्लद्वादश्यां मध्याह्ने ९ भाद्रपद शुक्लद्धादशीके दिन कश्यपात् अदित्यां वामनः मध्याह्नसमय कश्यप [ऋषि] प्रकटीबभूव । से अदितिमें वामन प्रकट मया। १० सच इन्द्ररक्षायै बलिसन्निधि | १० वह इंद्रके रक्षणके वास्ते ब- गत्वा त्रिपदां भूमिम् अया. लिके पास जा तीन पांव भूमिको मांगता भया। ११ पश्चात् द्वाभ्यां पादाभ्यां ११ पीछे दो पैरों से सब लोकोंको सर्वान लोकान्व्याप्य तृतीयं व्यापकर तीसरे पैरको बलि. पदं बलेः शिरसि निधाय तं के शिरपर रखके उसको सु- सुतले प्रेषयामास । तल[लोक] में भेजताया। १२ वैशाखशुक्लतृतीयायां मध्याह्न १२ वैशाखशुक्लतृतीयाके दिन जमदग्निपुत्रः परशुरामः रेणु मध्याह्नसमय जमदग्निऋ- कायाम् उदपद्यत । षिका पुत्र परशुराम रेणु- कामें उत्पन्न भया। १३ सतु पितृहिंसाकारिणं हैह- १३ वह तो पिताकी हिंसा कर- याधिपम् अहन् । नेवाले सहस्रार्जुनको मारता भया । १४ तेन च क्रोधवशात एक-|१४ और उसने क्रोधके आधीन विंशतिवारं धरणिः निःक्ष होनेसे इक्कीस वार पृथिवी त्रिया कृता। क्षत्रियरहित की। १५ चैत्रशकुनवम्यां मध्याह्ने | १५ चैत्रशुक्लनवमी के दिन मध्या- दशरथात् कौशल्यायां श्री समय दशरथसे कौशल्या रामचंद्रः आविर्षभूव । श्रीरामचंद्र प्रकट भया ।
भरतः बभूवुः। बालसंस्कृतमभाकरे १६ तस्य . लक्ष्मणः १६ उस ( राम ) के मरत, शत्रुनः इति त्रयोऽनुजाः लक्ष्मण, शत्रुघ्न ऐसे तीन छोटे भाई हुए। २७ सच पितुगज्ञया सीतालक्ष्म- १७ वह (राम) पिताकी आ- णाभ्यां साकं वनमयात् । ज्ञासे सीता और लक्ष्मणके सहित अरण्यको गया। १८ तत्र रावणः सीतां जहारः । १८ तहां राण सीताजीको हरता भया। १९ अथ रामवन्द्रस्य सुग्रीवः | १९ अनंतर सुग्रीव रामचंद्रजीव मित्रम् अभूत् । मित्र भया। २० ततः वालिनं निहत्य वान-२० पीछे वालिको मार वानरोंके रराज्ये सुग्रीवम् अभ्यषि राज्यमें सुग्रीवको अभिषेक करता भया। २१ तदनन्तरं हनुमता सीता-२१ इसके पीछे हनुमानसे सी- शुद्धिं कारयित्वा वानरसै ताका शोध कराके वानरसे- न्येन साधु लङ्कां गत्वा नाके साथ लंकाको जारा- रावणकुम्भकर्णी अवधीत्, वण और कुंभकर्णको मा- लक्ष्मणस्त्विन्द्रजितं मारया- रता भया और लक्ष्मण मास। इंद्रजितको मारता भया । २२ समनन्तरं सीतया सह २२ अनंतर सीताजीके सहित अयोध्यामागत्य दशसह- अयोध्याको आकर दश स्राणि वर्षाणि धर्मेण प्रजा हजार वर्षातक धर्मसे प्रजा- पालनं कृतवान् । २३ श्रावणकृष्णाष्टम्यां निशीथे २३ श्रावणकृष्ण अष्टमीके दिन वसुदेवाद्देवक्यां श्रीकृष्णः आधी गतमें वसुदेवसे देव- प्रादुर्भूतः। कीमें श्रीकृष्ण प्रकट हुआ। २४ श्रावणकृष्णपक्षमेव भाद्र २४ श्रावणकृष्णपक्षकोही भाद्र- श्चत् । पालन किया।
उपदेशविचारः। पदकृष्णपक्ष इत्युत्तरदेश- पदकृष्णपक्ष ऐसा उत्तरदे- स्थाः वदन्ति। शमें रहनेवाले कहते हैं। २५ तेन च कंसं हत्वा कारागृहात् २५ उस (कृष्ण ) ने कंसको देवकीवसुदेवी मौचितौ। मारकर बंदीखानेसे देवकी और वसुदेव मुक्त किये। २६ एवं बहून् दुष्टान् हत्वा सा- २६ इस प्रकार बहुत दुष्टों को मार धुपालनम् व्यरचि । साधुओंका पालन किया। २७ आश्विन शुक्लदशम्यां सायं | २७ आश्विन शुक्ल दशमीके दिन बुद्धावतारोऽभूत् । सायंकालमें बुद्धावतार भया। २८ सच असुरान् अधर्मम् उप- २८ वह असुरोंको अधर्मका उ- दिश्य नरके पातयामास । पदेश कर नरकमें पटकता भया। २९ कलियुगान्ते आश्विन शुक्ल- २९ कलियुगके अंतमें आश्विन- षष्ठयां सायं कल्किः भवि. शुक्लषष्ठीके दिन सायंकालमें कल्कि होगा। ३० स च अधार्मिकान् हत्वा ३० वह अधर्म करनेवालोंको कृतयुग स्थापयिष्यति । मार कृतयुगकी स्थापना ष्यति । करेगा। ३१ रामसाहाय्याय रुद्रावतारः ३१ रामजीकी सहायताके अर्थ मारुतिरभूत् । रुद्रका अवतार हनुमान भया। ३२ एतासु तिथिषु कल्याणे-|३२ इन तिथियोंमें कल्याण चा- च्छुभिः उपोषणं कार्यम् । हनेवालोंने उपवास करना। ३३ यस्मिन् काले अवतारः| ३३ जिस कालमें अवतार भया অখুন तत्कालव्यापिनी उस कालको व्यापनेवाली तिथिर्वताय ग्राह्या। तिथि व्रतके लिये लेनी चाहिये।
बालसंस्कृतप्रभाकरे ३४ एकादश रुद्राः श्रीशिवस्य | ३४ ग्यारह रुद्र श्रीशिवजीके. अवताराः सन्ति । अवतार हैं। ३५ इत्यवतारोपदेशः समाप्तः । ३५ इस प्रकार अवतारोपदेश समाप्त। करता है ? तरण्यवतारोपदेशः ८. संस्कृत. हिंदी. १ सुहृदा सार्धम् अनलतरणिं १ मित्रके साथ अगिनबोटको प्रेक्षितुं गच्छामि । देखनेके लिये जाता हूं। २ अस्यां तरण्यां नौकादण्डं २ इस नावपर डांडको ले प- गृहीत्वा कर्णधारः किं क तवार पकडनेवाला. क्या राति ? ३ अरित्रं विना नौका आयत्ता ३ पतवारके विना नाव आधीन न भवति । नहीं होती। ४ अस्यां सांयात्रिकः पोत ४ इसमें जहाजी खेवैयोंके साथ वाहैः सह किमपि करोति । कुछभी करता है। ५ आवर्ते प्राप्तः प्लवः प्रायः ५ भंवरमें प्राप्त हुआ बेडा ब- तत्रैव निमजति । हुताई तहांही डूब जाता है। ६ अये अनलनौकायां गुणवृ ६ अरे ! अगिनबोटमें मस्तू- क्षकस्य कि प्रयोजनम् ? लका क्या कारण [है ] ? ७ अयमत्र धीवरः जालेन झ. ७ यह मलाह यहां जालसे पान निगृह्णाति । मछलियों को पकडता है। ८ वर्षाकाले लध्वी नौकां सा ८ वर्षाके समय छोटी नावको गरे न संचारयान्ति । समुद्रमें नहीं चलाते। तस्मिन् काले अतीव बृहती ९ तिस कालमें बहुतही बडी. लहरी उद्गच्छति। लहर उछलती है।
उपदेशविचारः। ५९ १० अनलतराणिस्तु सर्वदा सं-|१० अगिनबोट तो सब काल चरति, आंग्लदेशमपि ग चलती है, इग्लंडकोमी च्छति । जाती है। ११ तस्याः आतरस्तु महान ११ उसका खेवा तो बडा है। वर्तते । यते। १२ अग्निरथावतारोपि अत्र व. १२ स्टेशनभी ( रेलगड्डीका तेते। ठाना) यहां है। १३ तन्त्रीयन्त्रेण वार्ता द्रुतं ज्ञा-१३ तारायंत्रसे वार्ता शीघ्र जानी जाती है। १४ अग्निरथस्येदं बाष्पयन्त्र. १४ यह रेलगड्डीका इंजन (द- मस्ति। मकल) है। १५ किम् आपणे जिगमिषास्ति? १५ क्यों बजारमें जानेकी इच्छा अयं संनिहित एव विद्यते । है ? यह नजदीकही है। १६ समन्ततः पण्यवीथिकाः | १६ चारों ओर दूकानोंकी पांति- प्रेक्षस्व । योंको देख। १७ इयं पात्राणां पण्यशाला १७ यह बर्तनोंका दुकान है। अस्ति। १८ ऋय्याधानिकायां महाव्या- १८ वखारमें थोक व्यापार (ले- पारो भवति । न-देन ) होता है। १९ अत्र पणं कलां पादम् अ. | १९ यहां पैसा, आना, चौमन्त्री र्धरूप्यं रूप्यं वा गृहीत्वा अठन्नी या रुपैयाको ले न किमपि विक्रीणन्ति । कुछभी नहीं बेचते हैं। २० तर्हि अत्र कुडवः, प्रस्थः, २० तो यहां पावसेर, सेर, आढकः इत्यादीनि परिमा यली इत्यादिक माप किस णानि किमर्थ स्थापितानि कारण रक्खे हैं ? २१ स्यात् किमपि अन्यत् का-२१ कुछमी दूसरा कारण होगा। रणम् ।
- ६० बालसंस्कृतप्रभाकरे २२ इदं पत्रिकालयं नवीनं नि- १२२ यह डांकघर (पोस्ट) नया बद्धम्। बांधा है। २३ श्वोपि अत्र व्यायामाय २३ कलभी यहां व्यायामके आगमिष्यामि । वास्ते आऊंगा। २४ इति तरण्यवतारोपदेशः स. २४ इस प्रकार बंदरका उपदेश माप्तः अभूत्। समाप्त हुआ। स्वर्गोपदेशः ९. संस्कृत. हिंदी. १ स्वर्गे देवाः वसन्ति । १ देव स्वर्गमें रहते हैं। २ तेषां राजा इन्द्रः अस्ति । २ उनका राजा इंद्र है। ३ पुण्यवंतो जनाः स्वर्ग ग- ३ पुण्यवान् लोग स्वर्गकोजाते च्छन्ति, तत्र पुण्यबलात् है, तहां पुण्यके बलसे बहुत नानाविधं सुखम् उपभुअंते, प्रकारके सुखको भोगते हैं, पुण्यक्षयानन्तरं पुनः मर्त्य पुण्यका नाश होनेपर फिर लोकं प्राप्नुवन्ति । मृत्युलोकको प्राप्त होते हैं। ४ स्वर्गप्रदायकं मुख्यं साधनं ४ स्वर्ग देनेवाला प्रधान (बडा) साधन यज्ञ है। ५ सत्यलोके चतुराननः तिष्ठति, ५ सत्यलोकमें ब्रह्मदेव रहता है, सच इदं सर्वं जगत् सृजति, वह इस सब जगत्को रच- तं रजोगुणिनं विद्वांसः व. ता है, उसको विद्वान लोग दन्ति, तस्य भार्या सावित्री, रजोगुणी कहते हैं, उसकी पुत्रास्तु नारदाद्याः बहवः भार्या सावित्री [है), नार- सन्ति । द आदि पुत्र तो बहुत हैं। ६ वैकुण्ठपुरे नारायणः निव- ६ वैकुंठनामक पुरमें विष्णु सति, सच सर्वं जगत् रक्ष रहता है, वह सब जगत्का ति, तं सत्त्वगुणिनं पण्डिताः पालन करता है, पंडित यज्ञः अस्ति ।
उपदेशविचारः। ६१ कथयन्ति, तस्य भार्या लोग उसको सत्वगुणी कहते लक्ष्मीः, पुत्रस्तु ब्रह्मा प्रसि हैं, उसकी भार्या लक्ष्मी दोऽस्ति, तं विष्णुः स्वस्य [ है ], पुत्र तो ब्रह्मदेव नाभिकमले उत्पादयामास । विख्यात है, उस [ब्रह्मा] को विष्णु अपने नामिक- मलमें उत्पन्न करता मया। ७ शंकरः कैलासम् अध्यास्ते, ७ महादेव कैलासपर रहता है, सच प्रलयसमये सर्वान् वह प्रलयकालमें सब लोगों- लोकान् संहरति, सः तमो. को मारता है, वह तमोगुणी गुणी इति ज्ञानिनःब्रुवन्ति, इस प्रकार ज्ञानी कहते हैं, तस्य भार्या भवानी, गणेशः उसकी भार्या पार्वती [है], स्कंदश्च एतौ तस्य पुत्रौ। गणपति और कार्तिकस्वामी ये ( दो ) उसके पुत्र (हैं)। ८गजाननः अन्तरायान् ना. ८ गणपति विघ्नोंको नाशता है, शयति, अत एव सर्वकार्या इसीसे सब कर्मोके आरंभ- रम्भे तं स्मरन्ति पूजयन्ति में उसको स्मरते हैं और पूजते हैं। ९ गुहः देवानां सेनानायकः ९ कार्तिकस्वामी देवोंका अस्ति, सः तारकासुरं जित. सेनापति है, वह तारकासु- रको जीतता भया। १० वाचस्पतिः अमराणां पुरो- १० बृहस्पति देवोंका उपाध्याय हितः। (है)। ११ विबुधाः अमृतं पिबन्ति । ११ देव अमृतको पीते हैं। १२ निर्जगः अप्सरोभिः साकं १२ देव अप्सराओंके साथ नंदन नन्दने क्रीडन्ति । ( वन ) में क्रीडा करते हैं। १३ सुरा अभीष्टं कल्पतरोः १३ दव इच्छित (वस्तु)को कल्प- प्रामुवन्ति, यतः सः इच्छि वृक्षस पाते हैं. क्योंकि वह तपदार्थानां दाता वर्तते । इच्छित वस्तुओंका दाताहै। वान् ।
बालसंस्कृतप्रभाकरे १४ यदा देवाः क्षीराम्बुधिं म-1 १४ जब देव क्षीरसमुद्रको मंथन मन्थुः तदा तस्मादहनि करते भये, तब उससे ब. रत्नान्युदपयन्त । हुत रत्नें उत्पन्न भई। १५ मन्थनकाले मन्दराचलः | १५ मन्थनके समय मन्दर पर्वत मन्थानः अभूत् । रई हुआ। १६ वासुकिः रज्जुः बभूव । १६ वासुकी (नाग) रस्सी भया। १७ असुराः अपि मन्थनकमणि| १७ दैत्यभी मंथनकर्ममें सहाय सहायाः अभूवन् । होते भये। १८ देवाः एव असुरान् मोहयित्वा | १८ देवही दैत्योंको मोहित कर सर्वाणि रत्नानि अगृह्णन् । सब रत्नोंको लेते भये। १९ दैत्यास्तु सुराम् एव लेभिरे। १९ दैत्य तो मदिराकोही प्राप्त होते भये । २० प्राप्तव्यमर्थं लभने मनुष्यो २० अवश्य मिलनेवाले द्रव्यको देवो न जानाति कुतो मनुष्य प्राप्त होता है.( उस- को) देव ( भी) नहीं जा- नता, मनुष्य कहांसे ? २१प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षयः २१ किये हुए कर्मोका नाश संपद्यते। भागसंही होता है। २२ अग्रिहोत्रं जुहुयात् स्वर्ग | २२ स्वर्गेच्छावाला अग्निहोत्रको कामः । २३ पातकी निरयं गच्छति । २३ पापी नरकको जाता है । २४ वैष्णवाः विष्णुलोकं यान्तिः | २४ विष्णुभक्त विष्णुके लोकको जाने हैं। २५ शैवाः शिवलोकं प्राप्नुवन्ति । २५ शिवभक्त शिवके लोकको प्राप्त होते हैं। २६ गाणपत्याः गणपतिपुरम-२६ गणेशभक्त गणेशके नगरमें ध्यासते । मनुष्यः ? हवन करे। -- पीछे सुख । उपदेशविचारः। ६३ २७ सौराः सूर्यपुरीम् अधिति- | २७ सूर्यमक्त सूर्यके पुरमें रहते कृन्ति । २८ शाक्ताः देवीसंनिधिमधि-२८ देवीभक्त देवीके पास जाते गच्छन्ति । २९ सुखस्याऽनन्तरं दुःखं, दुःख. २९ सुखके पीछे दुःख, दुःखके । स्याऽनन्तरं सुखम् । ३० परब्रह्मोपासकाः तु संसार- ३० परब्रह्मकी उपासना करने- बन्धं छित्त्वा मोक्षं लभन्ते । वाले तो संसाररूपी बन्धन- को तोड मुक्तिको पाते हैं। ३१ आत्मज्ञानं विना ब्रह्मोपासना ३१ आत्माका ज्ञान न होनेसे न भवति । ब्रह्मकी उपासना नहीं होती। ३२ मोक्षं प्राप्य पुनः संसारस-३२ मुक्तिको प्राप्त होके फिर मुद्रं न च आगच्छति । संसाररूपी समुद्रमें नहीं आता। ३३ इदम् अन्यञ्च सर्व पुराण | ३३ यह और दूसरा सब पुराणके श्रवणेन ज्ञायते । सुननेसे जाना जाता है। ३४ विष्णुः मधुकैटभौ जघान । ३४ विष्णु मधुकैटभोंको मारता भया। ३५ महादेवः त्रिपुरापुरम् अज-३५ शिव त्रिपुरासुरको जीतता यत् । भया। दयत् । ३६ इन्द्रेण वृत्रासुरः अहन्यत । ३६ इंद्रने वृत्रासुर मारा । ३७ शक्तिः महिषासुरम् अम-३७ देवी महिषासुरको मारती भई। ३८ एवं देवैः दुष्टाः असुराः अ. ३८ इस प्रकार देवोंसे दुष्ट दैत्य भिहन्यन्ते । मारे जाते हैं। ३९ इति स्वर्गोपदेशः संपूर्णः ३९ ऐसा स्वर्गका उपदेश समान अभूत् । हुआ।
बालसंस्कृतप्रमाकरे सुभाषितोपदेशः १० संस्कृत. हिंदी. १ अजरामरवत् प्राज्ञो विद्यामर्थे| १ अजर-अमरकी नाईं विद्वान् च साधयेत् । गृहीत इव विद्या और द्रव्यको विचारे। केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् । [व] मृत्युने बालोंमें पकड लिये हुएकी नाई धर्मको आचरे। २ विद्या शस्त्रस्य शास्त्रस्य दे २ प्रतिष्ठाके लिये शस्त्रकी विद्ये प्रतिपत्तये । आया [ और] शास्त्रकी विद्या[ये] हास्याय वृद्धत्वे द्वितीया दो विद्यायें हैं । पहिली बूढे- द्रियते सदा। पनमें हास्यके लिये [होती है ] दूसरी निरंतर [ आद- मीका ] आदर करती है। ३ अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षा ३ बहुत संदेहोंका नाशनेवाला, र्थस्य दर्शकम् । सर्वस्य लो अदृश्य पदार्थका दिखाने- चनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध वाला, सबका नेत्र [ऐसा] शास्त्र जिसके नहीं, सो अंधही [ है ]। ४ अर्थागमो नित्यमरोगिताच ४ हे राजन् ! धनप्राप्ति, सदा प्रिया च भार्या प्रियवादिनी अरोगिपन, मुन्दर और च । वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी हित बोलनेवाली स्त्री, आ- च विद्या षड् जीवलोकस्य धीन पुत्र और धन पैदा मुखानि राजन् । करनेवाली विद्या (ये) मनुष्यलोकके छः मुख हैं। ५ ऋणकर्ता पिता शत्रुर्माता ५ कर्ज करनेवाल। पिता वैरी च व्यभिचारिणी । भार्या [ ], अन्य पुरुषका संग एव सः।
उपदेशविचारः। रूपवती शत्रुः पुत्रः शत्रुर- करनेवाली माता वैरी (है), पण्डितः ।। रूपवाली स्त्री वैरी (है) और मूर्ख पुत्र वैरी (है) ६ अनभ्यासे विषं विद्या अ. ६ अभ्यास न करनेपर विद्या जीर्णे मोजनं विषम् । विषं विष ( जहर है ), अजीर्ण समा दरिद्रस्य वृद्धस्य त होनेपर भोजन विष (है)। रुणी विषम् । दरिद्रको सभा विष (है, तथा ) बूढेको तरुण स्त्री विष (है)। ७ गुणवान पूज्यते नरः। ७ गुणवान आदमी पूजा जाता चेन्न तदन्यथा। ८ निर्गुणः किं करिष्यति ? ८ निर्गुणी क्या करेगा? ९ धर्मेण हीनाः पशुभिः स. ९ धर्मसे रहित (पुरुष) प- मानाः। शुके समान ( हैं )। १० अवश्यंभाविनोभावा भवन्ति | १० अवश्य होनेवाली चेष्टायें महतामपि । बडोंकीमी होती हैं। ११ यदभाषि न तद्भावि, भावि ११ जो न होनेवाला वह नहीं होता, ( जो) होनेवाला हो सो विपरीत नहीं (होता)। १२ न दैवमपि संचिन्त्य त्यजे- | १२ प्रारब्धको सोच अपने उ- दुद्योगमात्मनः । अनुयोगेन द्योगको न छोडे । (क्यों- तैलानि तिलेभ्यो नाप्तुम- कि ), विना यत्नके तिलोंसे तेलको पानेके लिये समर्थ नहीं होता। १३ उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति १३ उद्योगी सिंहसमान परा- लक्ष्मीः । क्रमी पुरुषको लक्ष्मी प्राप्त इति । है ५ बा. सं.प्र.
IAN ६६ बालसंस्कृतप्रमाकरे १४ यत्ने कृते यदि न सिध्यति । १४ यत्न करनेपर जो सिद्ध न कोत्र दोषः ? हो (तो)इसमें क्या दोष? १५ उद्यमेन हि सिध्यन्ति का- १५ उद्योगसेही काम सिद्ध होते योणि न मनोरथैः । न हि हैं, इच्छाओंसे नहीं । सोये सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति हुए सिंहके मुँहमें हरिण मुखे मृगाः। नहीं घुसते। १६ अनिष्टादिष्टलाभेऽपि न गति-१६ खोटेसे इच्छित (वस्तु) र्जायते शुभा । यत्रास्ते मिलनेपरभी अच्छी दशा विषसंसर्गोऽमृतं तदपि मृ नहीं होती। जहां विषका त्यवे। संबंध है वह अमृतभी मृ- त्युके लिये (है)। १७ नदीनां शस्त्रपाणीनां| १७ नदियोंका, जिनके हाथमें नाखनां शृङ्गिणां तथा । शस्त्र है उनका, नखवालों- विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु का, सींगवालोंका, तैसा राजकुलेषु च। त्रियोंका और राजकुलका विश्वास करना योग्य नहीं। १८ लोभः पापस्य कारणम् । १८ लोम पापका कारण (है)। १९ अल्पानामपि वस्तूनां संह- १९ तुच्छ वस्तुओंका समूहभी तिः कार्यसाधिका । तृणैर्गु कार्य सिद्ध करनेवाला णत्वमापन्नैध्यन्ते मत्तद- ( होता है ) । रस्तीपनको न्तिनः। प्राप्त हुए तिनकोंसे मतवाले हाथी बांधे जाते हैं। २० आपदर्थे धनं रक्षेत् दारान २० आपत्तिके लिये धनकी रक्षा रक्षेद्धनैरपि । आत्मानं स करे, धनसेभी स्त्रियोंकी रक्षा ततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि । करे, स्त्रियोंसेभी (और) धनोंसेभी सदा अपनी रक्षा करे ।
उपदेशविधा। ६७ २१ धनानि जीवितं चैव परार्थे । २१ ज्ञानी पुरुष पराये अर्थ धन प्राज्ञ उत्सृजेत् । और जीवन छोडे । २२ विधिरहो बलवानिति मे २२ अहो, भाग्य बलवान है), मतिः । ऐसी मेरी बुद्धि है। २३ अज्ञातकुलशीलस्य वासो | २३ जिसका कुल, स्वभाव न देयो न कस्यचित् । जाना (ऐसे) किसीकोभी स्थान देना योग्य नहीं। २४ यस्यास्ति वित्तं स नरः कु. २४ जिसके द्रव्य है सो मनुष्य लीनः स पण्डितः स श्रुत कुलीन, सो पंडित, सो वान् गुणज्ञः। स एव वक्ता शास्त्री, गुणोंका परीक्षक, स च दर्शनीयः सर्वे गुणाः सोही वाक्चतुर और सो काञ्चनमाश्रयन्ते । देखने योग्य (है, क्योंकि) सब ( अच्छे ) गुण सुव- र्णको आश्रयते हैं। २५ हनुमानब्धिमतरत्, दुष्करं | २५ हनुमानजी समुद्रको तरता किं महात्मनाम् ? भया, महात्माओंको क्या दुष्कर (है)? २६ बहुरत्ना वसुंधरा। २६ बहुत रत्नोंवाली पृथ्वी(है)। २७ गजा यत्र न गण्यन्ते मश-२७ जहां हाथी नहीं गिने जाते, कानां तु का कथा ? ( वहां ) झींगरोंकी क्या बात ? २८ विद्वानेव हि जानाति विद- २८ विद्वानही विद्वज्जनोंके श्रमको जनपरिश्रमम् । नहि वन्ध्या जानता है । वांझ बडे प्रसू- विजानाति गुर्वी प्रसववेद तिदुःखको नहीं जानती। नाम् । २९ अन्येषु काणो राजा हि । २९ अंधों में कानाही राजा । ३० यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा ३० जिसके स्वयं बुद्धि नहीं है, शास्त्रं तस्य करोति किम् । उसे शास्त्र क्या करेगा?
६८ बालसंस्कृतममाकरे लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पण आंखोंसे रहित (आदमी). किं करिष्यति । को दर्पण क्या करेगा? ३१ प्रक्षालनादि पकस्य दूराद-|३१ कीचके धोनेकी अपेक्षा दूरसे स्पर्शनं वरम् । न छूनाही श्रेष्ठ है। ३२ इति सुभाषितोपदेशः समा- ३२ इस प्रकार सुभाषितका उ- प्तोऽभूत् । पदेश समाप्त हुआ। कथोपदेशः ११. संस्कृत. हिंदी. १ उपायेन हि यच्छक्यं न १ जो उपायसे हो सक्ता है सो तच्छक्यं पराक्रमैः । शृगा- पराक्रमोंसे नहीं हो सकता। लेन हतो हस्ती गच्छता कीचके मार्गसे जाते हुए पकचर्त्मना। गीदडने हाथी मारा । २ कथमेतत् ? २ यह कैसा? ३ अस्ति ब्रह्मारण्ये कर्पूरति- ३ ब्रह्मारण्यमें कर्पूरतिलक ना- लको नाम हस्ती। मक हाथी था। ४ तमवलोक्य सर्वे शृगाला: ४ उसे देखकर सब गीदड चिन्तयन्ति स्म । सोचने (विचारने) लगे। ५ यद्ययं केनाप्युपायेन म्रियेत ५ यदि यह किसी उपायसे तदाऽस्माकमेतदेहेन मास मरे, तो हमारा चार महीनों- चतुष्टयस्य भोजनं भवि का भोजन (खाना) होगा। ष्यति । ६ तत्रैकेन वृद्धशृगालेन प्रति- ६ तहां एक बूढे गीदडने प्रति- ज्ञातम् । ज्ञा की। ७ मया बुद्धिप्रभावादस्य मरणं ७ मेरी बुद्धिके प्रभावसे इसका साधयितव्यम् । मरण अवश्य सिद्ध होगा। ८ अनन्तरं स वञ्चकः कर्पूर-1 ८ पीछे वह ठग.कर्पूरतिलकके क उपदेशविचारः। तिलकसमीपं गत्वा साष्टाङ्ग. पास जा आगे अंगोंसे गिर पातं प्रणम्योवाच । (दंडवत् ) प्रणाम कर बोला। ९ देव, दृष्टिप्रसादं कुरु । ९ (हे) देव, दयादृष्टि कीजिये। १० हस्ती ब्रूते, कस्त्वं, कुतः | १० हाथी बोला, तू कौन (है), समायातः? कहांसे आया? ११ सोऽवदत्. जम्बुकोऽहं, सर्वैः | ११ वह बोला, मैं गीदड हूं, सब वनवासिमिः पशुभिमिलित्वा बनके रहनेवाले पशुओंने मि- भवत्सकाशं प्रस्थापितः। लकर आपके पास भेजा है। १२ यदिना राज्ञाऽवस्थातुं न १२ जिस कारण विना राजाके युक्तं, तदत्राटवीराज्येऽभि रहना योग्य नहीं, तिस षेक्तुं भवान् सर्वस्वामिगु कारण यहां बनके राज्यों णेपेतो निरूपितः। अभिषेककेलिये सब स्वामी- के गुणोंसे युक्त आप नियत किये गये हैं। १३ तद्यथा लग्नवेला न विच-१३ इससे जिस प्रकार लग्नका लति, तथा कृत्वा सत्वरम् समय न टले, तैसा करके आगम्यतां देवेन । शीघ्र आप आइये। १४ इत्युक्तोत्थाय चलितः। १४ ऐसा कह उठकर चला। १५ ततोऽसौ राज्यलोभाकृष्टः | १५ पीछे राज्यके लोभसे आकृष्ट कपूरतिलकः शृगालवर्त्मना हुआ यह कर्पूरतिलक(हाथी) धावन महापळे निमनः। गीदडके मार्गसे दौडने बडी कीचमें डुबा। १६ ततस्तेन हस्तिनोक्तम्, सखे | १६ अनंवर उस हाथीने कहा, शृगाल, किमधुना विधेयम् ? मित्र गीदड, अब क्या क- पर निपतितोऽहं म्रिये, रना? कीचमें दुषा हुमा परावृत्य पश्य। मरता हूं, लोटकर देख। १७.शृगालेन विहस्योता, देव, १७ गीदड (सकर बोला, (३) मैं . , बालसंस्कृतप्रभाकरे मम पुच्छकावलम्बनं कृत्वो- देव, मेरी, पूंछका सहारा तिष्ठ। लेकर उठ। १८ यन्मद्विधस्य वचसि त्वया १८ जिससे मुझ सरीखेके वचन- प्रत्ययः कृतः, तदनुभूयता. पर तूने विश्वास किया, मशरणं दुखम् । तिससे अशरण दुःख भो- गना चाहिये। १९ ततो महापङ्के निमग्नो हस्ती १९ फिर बडी कीचमें डुबा हाथी शृगालैर्मक्षितः। गीदडोंसे खाया गया। २० अतः' उपायेन हि यच्छ-२० इसीसे ' उपायसे जो शक्य क्यं न तच्छक्यं पराक्रमः है सो पराक्रमोंसे शक्य नहीं इति सिद्धमभूत् । ऐसा सिद्ध मया। २१ विद्वानेवोपदेष्टव्यो नाऽविद्वां- २१ विद्वानही उपदेश करनेको स्तु कदाचन । वानरानुप. योग्य (है), मूर्ख कभी दिश्याथ स्थानभ्रष्टा ययुः नहीं। वानरोंको उपदेश खगाः। करके पक्षी स्थानसे भ्रष्ट हो गये। २२ कथमिदम् ? २२ यह कैसा? २३ आस्ति नर्मदातीरे विशालः | २३ नर्मदाके किनारेपर बडा शाल्मलीतरुः। सेमरका वृक्ष है। २४ तत्र निर्मितनीडकोडे पक्षि-२४ उसपर बनाये हुए घोंसलोंके जो निवसन्ति । मंदर पक्षी मुखसे रहते थे। २५ अथैकदा वर्षा नीलपटलै- | २५ तदनंतर एक समय बरसा- राहत नमस्तले धारासारैम तमें आकाश नीले बादलोंसे हती वृष्टिरमूख । आच्छादित होनेपर धारा- ओंके सैंपति से वंही वर्षा २६ तती वानरश्चि तरतलेख-२६ पछि वृक्षक नीचे स्थित शी- उपदेशविचारः। ७१ स्थितान शीताकुलान् कम्प तसे पीडित ( और) कंपा- मानानवलोक्य कृपया पक्षि यमान वानरों को देख कृपासे भिरुक्तम्, मो भो वानराः, पक्षियोंने कहा, अहो अहो शृणुत। वानरो! सुनो। २७ अस्मामिनिर्मिता नीडाश्व-२७ हमने केवल चोंचसे लाये अमात्राहतैस्तृणैः । हस्त हुए तृणोंसे घोंसले बनाये पादादिसंयुक्ता यूयं कि ( फिर ) हाथ पैर आदिसे मिति सीदथ। युक्त तुम क्यों दुःखी हो रहे हैं? २८ तच्छुत्वा वानरैर्जातामरा- २८ वह सुन क्रोधिष्ठ हुए वान- लोचतम् । रोंने सोचा। २९ अहो, निर्वातनीडगर्भाव-/२९ अरे ! वायुरहित घोंसलोंके स्थिताः सुखिनः पक्षिणोऽ अंदर स्थित, सुखी पक्षी हम- स्मानिन्दन्ति, भवतु तावद- को नींदते हैं। तो (पहले) ष्टरुपशमः। वृष्टिकी शांति हो। ३० अनन्तरं शांते पानीयवर्षे | ३० इसके पीछे जलवृष्टि शांत तैर्वानरैर्वृक्षमारुह्य सर्वे नीडा होनेपर उन वानरोंने वृक्षों- भनाः, तेषाम् अण्डानि पर चढ सब घोंसले तोड चाऽधः पातितानि । डाले, और उनके अंडे नीचे गिरा दिये। विद्वानेकोपदेष्ट- ३१ इसीसे 'विदानही उपदेश व्यो नाविदांस्तु कदाचन करनेको योग्य (है) मूर्ख एवं निप्पचममक्त। कभी नहीं,ऐसा सिद्ध हुआ। ३२ इति कथोपदेशः समाप्ति ३२ इस प्रकार कथाओंका उप- जगाम। देश समाप्तिको जातामया। ३१ अस्मात् बालसंस्कृतप्रमाकरे षट्शास्त्रोपदेशः १२. संस्कृत. हिंदी. षट् शास्त्राणि जगति प्रसि. १छः शास्त्र जगत् ( दुनिया) दानि सन्ति । में प्रसिद्ध हैं। २ तत्र व्याकरणं पाणिनिः प्र २ उनमेंसे व्याकरण (शास्त्र) णिनाय। को पाणिनि बनाता भया। ३ अन्यानि अपि व्याकरणानि ३ दूसरेभी (अन्योंके बनाये) बहूनि सन्ति । व्याकरण बहुत हैं। ४ परंतु पाणिनीयव्याकरण ४ तौभी पाणिनिके बनाये व्या- स्यैव सर्वत्र प्रचारः। करणकाही सब जगह फै- लाव (है)। ५ शुद्धः शब्दः कः अशुद्धश्च ५ शुद्ध शब्द कौन और अशुद्ध कः इदं व्याकरणेन ज्ञायते। शब्द कौन, यह व्याकरणसे जाना जाता है। ६ शब्दो नित्यः, इति व्याक. ६ शब्द नित्य,ऐसाव्याकरण- रणशास्त्रस्य सिद्धान्तः म शास्त्रका सिद्धान्त पातंजल हाभाष्ये प्रतिपादितः। भाष्यमें प्रतिपादन किया है। ७ न्यायशास्त्रं गौतमः अका ७ न्यायशास्त्रको गौतम करता पीत् । मया। ८ तत्र सम्यक्तया पदार्थवि. ८ उसमें अच्छी तरहसे पदा चारो निरूपितः। यौँका विवेचन वर्णित है। ९ तच्छास्त्रस्य अर्थशास्त्रं तर्क- ९ उस शास्त्रके अर्थशास्त्र और शास्त्रं च इत्यपि दे संज्ञे तर्कशास्त्र ऐसेमी दोनाम हैं। स्तः। १० अर्थशास्त्र कणादेनाऽपि अर्थशास्त्र कणाद (मुनि) न्यरूप्यता नेमी बनाया है। .
उपदेशविचारः। ११ कणादप्रणीतशास्त्रस्य वैशे- | ११ कणादने बनाये हुए शा. षिकशास्त्रम् इति नाम वर्तते। खका वैशेषिकशास्त्र ऐसा नाम है। १२ कणादः सप्तैव पदार्थाः ' | १२' सातही पदार्थ' इस प्रकार इति प्रत्यपादयत्, सप्तभ्यः कणाद प्रतिपादन करता पदार्थेभ्यः अन्यत् किमीप भया, सात पदार्थोंसे भिन्न नास्ति इति तस्य मतं वर्तते। कुछभी नहीं है, ऐसा उ- सका मत है। १३. दावेव पदार्थो' इति गौत-| १३ 'दोही पदार्थ' इस प्रकार मोऽभिहितवान्, द्वाभ्यां प. गौतम कहता भया, दो दार्थाभ्याम् इतरत् किमपि पदार्थोसे और कुछभी नहीं नास्ति, इति तस्य राद्धान्तः। है, ऐसा उसका सिद्धांत १४ तर्कशास्त्रे जीवेश्वरयोः अ -१४ तर्कशास्त्रमें जीव ईश्वरका न्योन्यं भेदः अखण्डः इति परस्पर मेद अव्याहत(है) अमिधीयते । ऐसा कहाता है। १५ ईश्वर जगतः कर्ता, इत्यपि १५ जगत्का कर्ता ईश्वर, ऐ. तत्र निरूपितम् । साभी उसमें प्रतिपादित है। १६ जैमिनिः मीमांसासूत्राणि १६ जैमिनि मीमांसाके सूत्रोंको निवबन्ध । रचता भया। १७ वाक्यार्थः कथं कर्तव्यः, १७ वाक्यका अर्थ कैसा करने अयं विषयस्तत्र साङ्गोपाङ्गं योग्य (है), यह विषय प्रत्यपाद्यत । उसमें अंगउपांगोंके सहित प्रतिपादन किया है। १८ कर्मकाण्डविवरणं तु अती-१८ कर्मकांडका विवेचन तो ब- वोत्कृष्टमस्ति । १९ कर्मणैव मुक्तिः भवति, एवं | १९ कर्मसेही मोक्ष होता है,ऐसा तत्र सिद्धान्ततम् ? उसमें सिद्धांत किया है। हुत अच्छा है।
मस्ति । कृतः। . ७४ बालसंस्कृतप्रभाकरे २० सर्वत्र वाक्यार्थकरणे मीमां-२० सब जगह वाक्यका अर्थ सायाः महान् उपयोगः करनेके विषे मीमांसाका अस्ति । बडा उपयोग है। २१ जैमिनिप्रणीतशास्त्रस्य पूर्व- २१ जैमिनिने बनाये हुए शा- मीमांसा इत्यपि नामान्तर स्त्रका पूर्वमीमांसा ऐसामी दूसरा नाम है। २२ वेदान्तसूत्राणि व्यासः न्य-|२२ वेदांतके सूत्रोंको व्यास बन्नात् । रचता भया। २३ ब्रह्म सत्यं, जगत् मिथ्या, २३ ब्रह्म सत्य (है), जगत् झूठा एवं वेदान्तशास्त्रे सिद्धान्तः (है), ऐसा वेदांतशास्त्रमें सिद्धांत किया है। २४ यथा तमसि रजौ — अयं २४ जैसा अंधकारमें रस्सीपर भुजंगः' एवं भ्रमो जायते, यह साप' ऐसी भ्रांति तद्वत् ब्रह्मणि 'इदं जगत् होती है इस माफिक ब्रह्म- इति भ्रमो जायते । पर यह जगत् इस प्रकार भ्रांति होती है। २५ नमः इव जले स्थले काष्ठे २५ आकाशसमान जलमें स्थल- पाषाणे सर्वत्र ब्रह्म व्याप- में काष्ठमें पत्थरमें सबमें कम्। व्यापनेवाला ब्रह्म (है)। २६ वेदान्तशास्त्रे इतरशास्त्राणां २६ वेदांतशास्त्रमें अन्य शास्त्रोंके सिदान्ताः खण्डिताः। सिद्धांत खंडन किये हैं। २७ जीवेश्वरयोः अन्योन्यं भेदो २७ जीव और ईश्वरका परस्पर नास्ति । भेद नहीं है। २८ ब्रह्म आनन्दात्मक वर्तते । २८ ब्रह्म आनंदरूपी है। २९ वेदान्तो नाम उपनिषत्मति- २९ वेदांत याने उपनिषदोंने पाचोर्थः । प्रतिपादन किया हुआ अर्थ। ३. वेदान्तशास्त्राध्ययन मोक्षप्र-३० दतिशास्त्रका पढ़ना मुक्ति दम्, इति प्रसिद्धम् । देनेवाला है, ऐसा प्रसिद्ध है।
उपदेशविचारः। ७५ ३१ सांख्यशास्त्रस्य कर्ता कपि-|३१ सांख्यशास्त्रका बनानेवाला लमुनिः अस्ति। कपिल ऋषि है। ३२ प्रकृतिः एव अस्य जगतः | ३२ मायाही इस जगत्की कर- की, पुरुषस्तु कमलपत्रवत् नेवाली, पुरुष तो कमलप- निर्लेपः। प्रके नाई अलिप्त है। ३५ अन्यशास्त्रवत् सांख्यशास्त्र-|३३ इतर शास्त्रोंके समान सां- स्य लोके अध्ययनप्रचारो ख्यशास्त्रके पढनेका फैलाव नास्ति । लोकमें नहीं है। ३४ योगशास्त्रप्रणेता पतञ्जलिः। ३४ योगशास्त्रका कर्ता पतंजलि। ३५ प्राणायामः इंद्रियनिग्रहः | ३५ प्राणका निरोध इंद्रियोंका समाधिः इत्यादयः कथं रोकना समाधि इत्यादि कैसे कर्तव्याः, तत् योगशास्त्रे करने योग्य हैं, वह योग- निरूपितम् । शास्त्र में कहा है। ३६. सर्वथा ब्रह्मचिन्तनोपयोग | ३६ सब प्रकारसे ब्रह्मावेचारके योगशास्त्रम् । उपयोगी योगशास्त्र (है)। ३७ शाखाध्ययनेन बुद्धिः ती-|३७ शास्त्रके पढनेसे बुद्धि तीक्ष्ण (सूक्ष्म ) होती है। ३८ पण्डिताः शास्त्रचक्षुषा प-/३८ विद्वान् शास्त्ररूपी नेत्रसे श्यन्ति । देखते हैं। ३९ शास्त्रम् अध्यापनेन दृढीभ- ३९ शास्त्र पढानेसे तैयार होता क्षणा मवति। वति । है। ४० अवश्यं शास्त्रम् अध्येत-४० शास्त्र अवश्य पढने योग्य है। व्यम् । ४१ इति शाखोपदेशः संपूर्णः। ४१ इस प्रकार शास्त्रोका उप- देश पूर्ण हुआ।
बालसंस्कृतप्रमाकरे पुस्तकोपदेशः १३. संस्कृत. हिंदी. १ कालिदासनामा कविः रघु. १ कालिदास नामक कवि रघु. वंशकाव्यं निर्मितवान् । वंश काव्यको निर्माण करता मया। २ भवभूतिना उत्तररामचरितं २ भवभूतिने उत्तररामचरित नाम नाटकं प्रणीतम् । नामक नाटक बनाया है। ३ दण्डिना दशकुमारचरितं ३ दंडि (कवि) ने दशकुमार चरित बनाया। ४ मल्लिनाथविपश्चिता पश्चम ४ मल्लिनाथपंडितने पंच महा- हाकाव्योपरि व्याख्या नि- काव्योंके ऊपर टीका नि. रमायि। र्माण की। ५ प्रभाकरशास्त्रिणा विष्णुना- ५ प्रभाकरशास्त्रीजीने विष्णुना- मसहस्रोपरि सरलार्थप्रभाक मसहस्रके ऊपर सरलार्थ- रीसमाभिधा व्याख्या अनु- प्रभाकरी नाम टीका अनुष्टुप् ष्टुप्श्लोकः विरचिता। श्लोकोंसे बनाई। ६ इयं शंकराचार्यमतानुकूला ६ यह शंकराचार्यके मतानु- व्यरचि। वर्तते । है ७ रम्भाशुकसंवादस्य चित्म ७ और रंभाशुकसंवादकी वि- माकरीनामिका टीका च त्प्रभाकरी नामक टीका निर्मिता। बनाई है। ८ इयं बालबोधार्थ सरला ८ यह बालबोधके अर्थ सरल अति विस्तृता चास्ति । और बहुत विस्तारवाली है। ९ अयं बालसंस्कृतप्रभाकरो- ९ यह बालसंस्कृतप्रभाकरभी पि तेनैव शात्रिणा बालोप तिसी शास्त्रीजीने बालोपर कारार्थ निरमायि। उपकार करनेके लिये बना- या है।
७७ उपदेशविचारः। १० संप्रति शिवनामसहस्रस्य | १० हालमें शिवनामसहस्रकी व्याख्या कर्तुमिच्छति । टीका करनेके वास्ते चाहता है। दूसरा नाम है। ११ सर्वसाहित्यलामे चम्पूरा-११ सब सामग्रीका लाभ होनेपर मायणव्याख्यामपि करि- चंपूरामायणकी 'टीकाभी ष्यति । करेगा। १२ बालसंस्कृतप्रभाकरस्य सं- १२ बालसंस्कृतप्रभाकरका सं- स्कृतान्तःप्रवेशिका इत्यपि स्कृतांतःप्रवेशिका ऐसामी नामान्तरं वर्तते । १३ प्रभाकरशास्त्रिणा स्तोत्रार्ति-|१३ प्रभाकरशास्त्रीने स्तोत्र आर्ति- क्यादिग्रन्थाः बहवो नि क्य आदि बहुत ग्रंथ निर्माण मिताः। किये हैं। १४ एतदध्ययनेन विद्यार्थिनः | १४ इसके पढनेसे विद्यार्थी लोग संस्कृतपटवः भवेयुः। संस्कृत भाषामें चतुर होवें। १५ साधारणसंस्कृतज्ञाः अपि|१५ साधारण संस्कृत भाषाको व्यवहारोपयुक्तान् शब्दान् जाननेवालेभी व्यवहारोप- जानीयुः। योगी शब्दोंको जानेंगे। १६ किंच बहूनां विषयाणां ज्ञा- | १६ और बहुत विषयोंका ज्ञान- नमपि भवेत् । भी होवे। १७ अस्मिन् ग्रन्थे बहुविधा वि- १७ इस ग्रंथमें बहुत प्रकारके षयाः प्रतिपादिताः सन्ति। विषय प्रतिपादन किये हैं। १८ यदा छात्राणाम् इदं पुस्तकं | १८ जब यह पुस्तक विद्यार्थी प्रियं भवेत् तदा ग्रन्थकृत् लोगोंको प्यारा होवे, तब आत्मपरिश्रमं सफलं जानी. ग्रंथकार अपने श्रमको सफल समझेगा। १९ अयं बालसंस्कृतप्रभाकरः | १९ यह बालसंस्कृतप्रभाकर विद्यार्थिभिः अवश्यं संग्रही विद्यार्थी लोगोंको अवश्य यात् ।
बालसंस्कृतमभाकरे तव्योऽस्ति, इति विद्वांसः संग्रह करने योग्य है, इस कथयन्ति । प्रकार विद्वान् लोग कहते हैं। २० गीर्वाणभाषामिज्ञैरपि अवश्यं २० संस्कृत जाननेवालोंकोभी संग्रहणीयः, इति पण्डितानां अवश्य संग्रह करना चाहिये, मतं वर्तते। ऐसा पंडितोंका मत है। २१ एवं पुस्तकोपदेशः समाप्तः | २१ इस प्रकार ग्रंथोंका उपदेश समाप्त हुआ। मुद्रणागारोपदेशः १४. संस्कृत. हिंदी. १ मुम्बापुर्याः निकटे कल्या १ मुंबई शहरके नजदीक णाभिधा नगरी प्रसिद्धा कल्याण नामक शहर प्रास- अभूत् । वर्तते । २ तत्र श्रीकृष्णदासात्मजो २ तहां श्रीकृष्णदासका पुत्र गङ्गाविष्णुः लक्ष्मीवेङ्कटेश्व गङ्गाविष्णु लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर राख्यं मुद्राणागारं प्रतिष्ठापिः नामक छापेखानेको प्रतिष्ठित तवान् । करता भया। ३ स्वकीयं श्रीवेङ्कटेश्वरमुद्रणा-/ ३ अपना श्रीवेङ्कटेश्वर छापा- लयं स्वानुजाय प्रदत्तम् । खाना अपने भाईको दिया। ४ अस्मिल्लँक्ष्मीग्रेङ्कटेश्वराख्यमु. ४ इस लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर छापेखा- द्रणागारे प्राचीनतराः ग्रन्थाः नेमें बहुत प्राचीन ग्रन्थ छपे मुद्रिताः। गये हैं। ५ संस्कृतटीकासहिताः भाषा ५ संस्कृतटीकासहित और भा- टीकासहिताश्च ग्रन्थाः स- पाटीकासहित ग्रंथ अभी. म्प्रति संमुद्रयन्ते । छपे जाते हैं। ६ नानाविधानि बहूनि पुस्तका ६ अनेक तरहकी बहुत पुस्तकें निविक्रयाय सज्जानि सन्ति। बेचनेके लिये तैयार हैं। ७ सर्वेषां पुस्तकानां मूल्यमपि ७ सब पुस्तकोंकी कीमतभी उचितं स्थापितम् । योग्य रक्खी है।
. . उपदेशविचारः। ७९ ८ यदि कश्चित् अस्मिन् मुद्रणा ८ यदि इस छापेखानेमें कोई गारे पुस्तकाथै मूल्येन साकं पुस्तकोंके वास्ते कीमतके पत्रिका प्रेषयेत् तर्हि स्व साथ चिट्ठीको भेजेगा तो स्थाने एव झटिति पुस्तकानि अपने स्थानपरही शीघ्र प्रामुयात् । पुस्तकोंको पा सकेगा। पुस्तकप्रेषणे कथमपि विल ९ पुस्तक भेजनेके विषे किस म्बो न भवति । तरहसेभी देर नहीं होती। १० कश्चिदपि ग्रन्थो भवतु स| १० कोईभी ग्रंथ हो वह यहां चाऽत्र प्राप्यते । मिल जाता है। ११ काव्यवम्पूनाटककोशादिग्र-|११ काव्य, चंपू, नाटक, कोश न्थाः तथा सर्वे शास्त्रग्रन्था आदि ग्रन्थ और सब शास्त्रोंके श्व प्राप्यन्ते । ग्रंथ मिल जाते हैं। १२ भाषाग्रन्थास्तु बहुतराः वि- | १२ भाषाके ग्रंथ तो अति बहुत हैं। १३ अत्र मुद्रितानां पुस्तकानां १३ यहां छपे हुए पुस्तकोंकी शुद्धिविषये सर्वत्र प्रसिद्धिः शुद्धिके विषे सब जगह प्र- वर्तते सिद्धि है। १४ संस्कृतपुस्तकानि शास्त्रिणः | १४ संस्कृत पुस्तकोंको शास्त्री शोधयन्ति, भाषापुस्तकानि लोग शुद्ध करते हैं,भागपु- तु भाषापण्डिताः शोध स्तकोंको तो भाषापण्डित यन्ति । १५ अक्षरयोजनशालायाम् अक्ष. १५ अक्षरजोडनेकी शाला ( के- रयोजका, मुद्राक्षराणि सं पाजिटरखाते) में अक्षर ज- योजयन्ति, एतत् निरीक्ष. मानेवाले ( कम्पाजिटर ) ताम् भवान् । छापेके अक्षरों ( टाईप ) को जमाते (कम्पोज करते) हैं, उसे तू देख। यन्ते । शुद्ध करते हैं।
न) में एक घडीमें बालसंस्कृतप्रभाकरे १६ पृष्ठगुच्छाः बहुविधाः सन्ति। । १६ सफोंके गुच्छे (फार्म )बहुत प्रकारके हैं। १७ कश्चित् षट्पृष्ठात्मकः, काश्च-१७ कोई छ. सफोंका, कोई आठ त् अष्टपृष्ठात्मकः, कश्चित् सफोंका, कोई बारह सफों- द्वादशपृष्ठात्मकः इत्यनेक- वाला ऐसे अनेक प्रकारवाले प्रकाराः पृष्ठगुच्छाः भवन्ति। सफोंके गुच्छ होते हैं। १८ मुद्रणयन्त्रे एकस्यां घटिका- | १८ छापेके यंत्र (प्रेस या मशी- यां बद्दयः प्रतिकृतयः नि- बहुत पद्यन्ते। कापियां निष्पन्न होती हैं। १९ अक्षरयोजनाय अक्षराधानि- १९ अक्षर जमाने (कम्पोज क- कायां मुद्राक्षराणि स्थाप रने) के वास्ते केसमें छापेके यन्ति । अक्षरोंको रखते हैं। २० पुस्तकबन्धकाः पुस्तकानि २० पुस्तक बांधनेवाले (बुकबा- बध्नन्ति । इंडर ) पुस्तक बांधते हैं। २१ अक्षरोत्पादकयन्त्रे बहूनि २१ अक्षर करनेके यंत्रमें प्रतिदिन अक्षराणि प्रतिदिनं संभवन्ति। बहुत अक्षर उत्पन्न होते हैं। २२ अस्य मुद्रणागारस्य विशाल- | २२ इस छापेखानेका पुस्तकालय तरं पुस्तकालयं वर्तते । २३ पुस्तकग्राहकैः " श्रीकृष्ण-२३ पुस्तक लेनेवाले लोगोंने दासात्म जो गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, विष्णुः, लक्ष्मीवङ्कटेश्वरमुद्र लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर छापाखाना, णयंत्र,कल्याण-मुंबई." कल्याण-मुम्बई." इतना इति स्थलं विलिख्य पत्रं ठिकाना लिखकर चिट्ठी भेज- प्रेष्यम् । नी चाहिये। २४ इति मुद्रणागारोपदेशः २४ ऐसा छापेखानेका उपदेश संपूर्णः । पूर्ण हुआ। बहुत बड़ा है। गङ्गा- ८१ उपदेशविचारः। शब्दसंग्रहोपदेशः १५. मानव-पु. मनुष्य. रमणी-स्त्री. खेलने या खेलाने- पुरुष-पु. आदमी. वाली. स्त्री-स्त्री. औरत. जातापत्या-स्त्री. सौरीहि. ललना-स्त्री. दुलारी. नग्निका-स्त्री. नगी. महिषी-स्त्री. पटरानी. सैरंध्री-स्त्री. लौंडी, सेवकिन. अध्यूढा-स्त्री. सवति. वारस्त्री-स्त्री. पतुरिया. कुलस्त्री-स्त्री. कुलवंती. कुटनी-स्त्री. कुटणी, कुमारी-स्त्री. कुँवरी. गर्भिणी-स्त्री. गाभिणी. तरुणी-स्त्री. जवानि. पुनर्भू-स्त्री. उढरी. पत्नी-स्त्री. व्याही स्त्री. दिधिषु-पु. उढरीपति. स्नुषा-स्त्री. पतोहू, पुत्रबहू. पैतृष्वसेय-पु. बूआ वा फूफीका असती-स्त्री. छिनारि. बेटा. विधुर-पु.रंडुआ. मातृष्वसेय-पु. मासी वा मौसी. विधवा-स्त्री, रांड, बेवा. सखी-स्त्री.सहली. वैमात्रेय-पु. सौतेली माका बेटा. पतिवत्नी-स्त्री. सोहागिन, अहि- भिक्षुकी-स्त्री. भिखारिनी. वातिन. वृद्धा-स्त्री. बूढी. कन्या-स्त्री.बेटी. आमीरी-स्त्री. अहीरिन. अर्याणी-स्त्री. बनियाइन. मातृ-स्त्री. मा. क्षत्रिया-स्त्री. क्षत्रियाइन. भगिनी-स्त्री. बहिन. उपाध्याया-स्त्री. पढानेवाली. ननांड-स्त्री. ननद. १ इन संस्कृत शब्दोंका सामान्य लिंगनिर्देश किया है, उसकी परिभाषा-पु.-पुंलिंग, स्त्री.-स्त्रीलिंग, न.-नपुंसकलिंग, त्रि.-त्रि- लिंग, ऐसी समझनी चाहिये । और विद्यार्थियोंको ये अर्थसहित संस्कृत शब्द कंठगत करने चाहिये। ६ बा. सं.प्र. का बेटा. पुत्र-पु. बेटा, पितृ-पु. बाप.
बालसंस्कृतप्रभाकरे पौत्री-स्त्री. पोती, नातिनि. यौवन-न. जवानी. यात-स्त्री. देवरानी, जेठानी. वृद्धत्व-न. बुढापा. भ्रातृजाया-स्त्री. भौजाई. पलित-पु. न. अतिबुढापा. मातुली-स्त्री. मामी. जरा-स्त्री. बुढाई. श्वश्रु-स्त्री. सासु. डिंभा-स्त्री. दूध पीनेवाला बच्चा. श्वशुर-पु. ससुर. बाल-पु. बच्चा. पितृव्य-पु. काका, चाचा. युवन-पु. जवान पुरुष. मातुल-पु. मामा. वृद्ध-पु. बूढा पुरुष. श्याल-पु. शाला, सार. वर्षीयस्-पु. अतिबूढा पुरुष. देव-पु. देवर. अग्रज-पु. ज्येष्ठ भाई. भागिनेय-पु. भैने, मांजा. अनुज-पु. छोटा भाई. जामात-पु. दामाद. दुर्बल-पु. दुबला. पितामह-पु. आजा. मांसल-पु. बलगर. प्रपितामह-पु. परआजा. तुंदिल-पु. त्वदार, बड़े पेटवाला. मातामह-पु. नाना. अवटीट-पु. नकचपटा. सपिंड-पु. भाई बंधु, जाति. | केशव-पु. अच्छे केशवाला. सोदर्य-पु. सगा भाई. वलिभ-पु. सिमटे चामवाला. सगोत्र-पु. गोती माई. पोगंड-पु. विकल अंगवाला. पति-पु. दुलहा. खर्व-पु. वामन. भ्रात्रीय-पु. भतीजा. खरणस-पु. तीखी नाकवाला. भ्रातरौ-पु. द्विव. बहिन भाई. | विग्रह-पु. नकटा. मातापितरौ-पु. द्विव. मा-बाप. खुरणस-पु. लंबी या चिपटी श्वश्रूश्वशुरौ-पु. द्विव. सासु-ससुर. नाकवाला. जायापती-पु. दिव. स्त्री-पुरुष. प्रशु-पु. दूर दूर जांघवाला. जरायु-पु. झरी, खेढी, जेर. ऊर्ध्वजु-पु. ऊंची जांघवाला. वैजनन-पु. जन्ममास. संजु-पु. मिली जांघवाला. पंढ-पु. हिजरा. बधिर-पु. बहिरा. बाल्य-न. लड़कपन, कुन्ज-पु. कुबडा.
उपदेशविचारः। कुणि-पु. टूटा. प्रवाहिका-स्त्री. संग्रहणी. पृश्नि-पु. छोटे अंगवाला. वमथु-पु. उच्छार, उलटी. श्रोण-पु. पंगुला. विद्रधि-स्त्री. व्यरथिआ. मुंड-पु. मुडुआ. मेह-पु. प्रमेह. केकर-पु. कं (कुं) जा. भगन्दर-पु. इस नामका रोग. खोड-पु. लंगडा. अश्मरी-स्त्री. मूत्रकृच्छ्र, कर्क. कालक-पु. लहसना. चिकित्सक-पु. वैद्य, हकीम. तिलकालक-पु. तिलवाला. पादवल्मीक-पु. हाडारोग. अनामय-न. अरोगीपन. केशन-पु. चांईई. चिकित्सा-स्त्री. इलाज. निरामय-त्रि. रोगरहित.. भेषज-न. ओषध. ग्लान-त्रि. रोगसे दुःखी. गद-पु. रोग, व्याधि. व्याधित-त्रि. रोगी. पामन-त्रि. खसरावाला. प्रतिश्याय-पु. पीनस, नाकरोग. दगुण-त्रि. दादवाला. क्षुत्-स्त्री. छींक. अर्शस-त्रि. बवासीरवाला. वातरोगिन्-त्रि. बाईवाला. शोथ-पु. सूजन. अतिसारकिन्-त्रि. सितरसी. विपादिका-स्त्री. व्यवाई. पिल्ल-त्रि. चोंधरी. किलास-न. सेहुंआं. उन्मत्त-त्रि. पागल. पामा-स्त्री. खाजु. श्लेष्मल-त्रि. कफी. कण्डूया-स्त्री. खजुआना. न्युब्ज-त्रि. कुबडा. विस्फोट-पु. फोडा. तुण्डिभ-त्रि. तुंदला. व्रण-पु.न. घाव. सिध्मल-त्रि. सेहुंअहां नाडीव्रण-पु. नसूर. अन्ध-त्रि, अंधा. कोठ-पु. कोढ. मूच्छित-त्रि. मूर्छित. कुष्ठ-न. श्वेतकुष्ठ. रेतस्-न. वीर्य. मर्शस्-न.बवासीर विबंध-पु. कबुज. इलेष्मन्--पु. कफ. क्षय-पु. क्षयरोग. कास-पु. खांसी. मायु-पु. पित्त.
. ऊरु-पु. निरोह. बालसंस्कृतप्रभाकरे त्वचा-स्त्री. चाम, खाल. प्रपद-न. पैरकी अगाडी. पिशित-न. मांस. अंघि-पु. पांव, पैर. उत्तप्त-न. सूखा मांस. गुल्फ-पु.न. टकना. रुधिर-न. रक्त. पाणि-पु. एडी. अग्रमांस-न. कलेजा. जंघा-स्त्री. जांघ. हृदय-न. हृदय. जानु-पु.न. घुटुनू. मेदस्-न. चर्बी. मन्या-स्त्री. गलेकी पिछली नस. वंक्षण-पु. घुटुनू, टेहुनी. नाडी-स्त्री. नाडी. अपान-न.गुदा. तिलक-न. तिल. बस्ति-पु. स्त्री. मूत्रस्थान. मस्तिष्क-न. गूदा. कटि-स्त्री. कमर. किट्ट-न. कान आदिका मल. नितंब-पु. स्त्रीका चूतर. अन्त्र-न. आंत. जघन-न. पेडू. गुल्म-पु. पिलही. कुकुन्दर-न. नितंबका गडहा. स्नायु-स्त्री. नस. स्फिच-स्त्री. कुल्ला. कालखंड-न. कलेजा विशेष. उपस्थ-पु. भग या लिंग. लार, थूक. भग-न. योनि. दूषिका-स्त्री. कींचर. मेद्र-पु. लिंग. मूत्र-न. मूत वृषण-पु. अंड, पेल्हर. उच्चार-पु. गुह. त्रिक-न. मेंकड. कर्पर-पु. कपार. अस्थि-न. हाड. स्तन-पु. कुच, चूंची. ककाल-पु. पिंजरा, पांजर. चूचुक-पु. न. चूंचीकी ढेपुनी. कशेरुका-स्त्री. रीर, रीढ. क्रोड-न. स्त्री. कोरां, गोद. करोटी-स्त्री. खोपडी. वक्षस्-न. छाती. पशुका-स्त्री. पंशुडी. पृष्ठ-न. पीठ. प्रतीक-पु. अंग. स्कंध-पु. कंधा. गात्र-न. देह. जत्रु-न. हंसुली लाला-स्त्री. उदर-न. पेट. 4.
कक्ष-पु. कांख. उपदेशविचारः। व्याम-पु. फैला हाथ. पार्श्व-पु. न. बगल. कंठ-पु. कंठ, नई, गटई. मध्यम-पु. न. मध्यशरीर,कमर. ग्रीवा-स्त्री. गला. भुज-पु. बांह. घाटा-स्त्री. घांटी. कूपर-पु. गांठि; कोहनी, केहुनी. वदन-न. मुख, मुंह. प्रगंड-पु. गांठिके ऊपरका भाग. नासिका-स्त्री. नाक. प्रकोष्ठ-पु.गांठिके नीचेका भाग. ओष्ठ-पु. होंठ. मणिबंध-पु.प्रकोष्ठ और हाथकी चिबुक-न. दाढी. संधि. कपोल-पु. गाल. करम-पु. करम. हनु-पु. स्त्री. कनपटी. पाणि-पु. हाथ. रदन-पु. दांत. तर्जनी-स्त्री. अंगूठेके पासकी तालु-न. तालू. अंगुली. रसना-स्त्री. जीभ. अंगुष्ठ-पु. सृकि-न. होठका किनारा. प्रदेशिनी-स्त्री. अंगूठा आदि ललाट-पु. भाल. मध्यमा-खा. क्रमसे अंगुरि-भू-स्त्री. भौंह. अनामिका-स्त्री. योंके ये नाम कूर्च-पु. न. भौंहोंका बीच. कनिष्ठा-स्त्री. तारका-स्त्री. आंखका तिल. कररुह-पु. नख, नह. लोचन-न. आंख. वितस्ति-पु.स्त्री.बित्ता, बिलस्त. अनु-न. आंसु. प्रहस्त-पु. खुला हाथ,चटकना. | अपांग-पु. आंखका किनारा. संहतल-पु. दुहत्था चटकना. कटाक्ष-पु. आंखके किनारेसे अंजलि-पु. अंजुरी. देखना. हस्त-पु. हाथ. श्रोत्र-न. कान. मुष्टि-स्त्री. भूठी. उत्तमांग-न. शिर. सरनि-पु. स्त्री. मुंडा हाथ. कच-पु. बाल. अरलि-पु. न. कांनी अंगुलीको कैशिक-न. बालोंका झुंड. छोड मुठीसहित हाथ. अलक-पु. टेढे बाल.
कंठी. ८६ बालसंस्कृतप्रभाकरे भ्रमरक-पु. ललाटपर झुके बाल: | प्रालंपिका-स्त्री. सोनेकी लंबी काकपक्ष-पु. जुलुफी. कबरी-स्त्री. पठिया. उरसूत्रिका-स्त्री. मोतियोंसे गु- धम्मिल्ल-पु. जूरा. थी कंठी. शिखा-स्त्री. चोटी. मुक्तावली-स्त्री. मोतियोंका हार. जटा-स्त्री. जटा. शतयष्टिक-पु. मोतियोंके सौ वेणी-स्त्री.लुटुरी. लरका हार. शीर्षण्य-पु. निर्मल सुंदर केश. वलय-पु. न. गहुँची. तनूरुह-पु. न. रोम. केयूर-पु. न. बाजूबंद. ऊर्मिका-स्त्री. अंगूठी. श्मश्रु-न. मोछ. नेपथ्य-न. अलंकारकी शोभा. | अंगुलिमुद्रा-स्त्री. मोहर करनेकी अलंकरिष्णु-त्रि. अलंकार कर. अंगूठी. नेवाला. कंकण-पु. न. कंकण, कडा. मंडित-त्रि. अलंकारयुत. मेखला-स्त्री. स्त्रियोंकी करधनी. भूषा-स्त्री. शृंगार. शृंखल-त्रि. पुरुषोंकी करधनी. मंजीर-पु. न. पायजेब. आमरण-न.गहना. किंकिणी-स्त्री. धुंघुरू. किरीट-पु. न. मुकुट. वाल्क-त्रि. अलसी आदिसे बने चूडामणि-पु. चोटीकी मणि. वस्त्र. तरल-पु. हारके बीचकी बड़ी कार्पास-त्रि. कपाससे बने वस्त्र. मणि. कौशेय-त्रि. रेशमसे बने वस्त्र. पारितथ्या-स्त्री. चोटीकी सोने-रांकव-त्रि. पशुरोमसे बने वस्त्र. की पट्टी. तंत्रक-त्रि. कोरा वस्त्र. ललाटिका-स्त्री. बंदी, टीका. उद्गमनीय-न. धोये वस्त्र. कर्णिका-स्त्री. कर्णभूषण, ती. पत्रोर्ण-न. धोये रेशमी वस्त्र. कुंडल-न. कुंडल. दशा-स्त्री. दशी. कण्ठा. आयाम-पु. लंबाई. ललंतिका-स्त्री. लंबी काठी. रिणाह-पु. चौडाई. : ग्रैवेयक-न. कण्ठी, उपदेशविचारः। प्रावार-पृ. अंगौछा. पटञ्चर-न. पुराना कपडा. यक्षधूप-पु. राल. कर्पट-पु. फटा या चिथडा वस्त्र. वृकधूप-पु. धूप. वसन-न. वस्त्रमात्र. पिंडक-पु. लोहबान. पट-पु. न. अच्छे वस्त्र. मृगमद-पु. कस्तूरी. वराशि-पु. न. मोटे वस्त्र. ककोलक-न. कबाबचीनी. निचोल-त्रि. ओहार. घनसार-पु. कपूर, कपूर. अंतरीय-त्रि. देहके अधोभागमें चन्दन-पु. न. चन्दन. पहरनेका वस्त्र धोती आदि. रक्तचंदन-न. रक्तचन्दन. जातिफल-न. जायफल. चोल-पु. स्त्री. अंगिया, चोली. विलेपन-न. सुगंधद्रव्यका उबटन. भावित-त्रि. वासित ( वस्तु ). नीशार-पु. रजाई, ओढना. चंडातक-पु. न. लहंगा. स्रज्-स्त्री. माला. आप्रपदीन-त्रि. लंबा लहंगा. शेखर-पु. चोटीकी पहिरी माला. उल्लोच-पु. चंदवा. उपबई-पु. तकिया. दूष्य-न, तंबू. शय्या-स्त्री. बिछौना. जवनिका-स्त्री. कनात. पर्यक-पु. पलंग. परिकर्मन्-न.रोलीआदिसे अंग- कंदुक-पु. गेंद. संस्कार. दीप-पु. दीया. मार्जना-स्त्री. पोंछना. पीठ-न.पीढा. उद्वर्तन-न. उबटन. संपुटक-पु. डब्बा. स्नान-न. नहाना. पतद्ग्रह-पु. पीकदान. चर्चा-स्त्री.चंदन आदिका लेपन. कंकतिका-स्त्री. कंघी. विशेषक-पु. न. तिलक. पिष्टात-पु. बुकवा. अग्निशिख-न. कुंकुम. आदर्श-पु. दर्पन, सीसा. लाक्षा-स्त्री.लाख. व्यजन-नं. पंखा, बेना. देवकुसुम-न. लवंग. पशु-पु. पशु. जायक-न. पीतचन्दन. मृगेंद्र-पु. सिंह. अगुरु-पु.न, अगुरु. शार्दूल-पु. बाध, चौघडा.
८५ बालसंस्कृतप्रभाकरे तरक्षु-पु. चीता. खंजन-पु. खंडरिच. वराह-पु. सूअर. कंक-पु. उजली चील्ह. प्लवग-पु. बंदर. चाप-पु. नीलकंठ. भल्छुक-पु. भालू, रीछ. कलिंग-पु. भुजंगा. गंडक-पु. गैंडा. शतपत्रक-पु.कठफोरवा. महिष-पु. भैंसा. चातक-पु.चातक. शिवा-स्त्री. भेडिया, सिआर. | कुक्कुट-पु. मुर्गा. बिडाल-पु. बिलार. चटक-पु. गंवरैया, गंवरा. गौधेर-पु. गोहका बच्चा. चटका-स्त्री. गंवरी. श्वावित्-पु. साही. कर्करेटु-पु. कौडिला. वातमृग-पु. जलदी चलनेवाला कृकण-पु. मुआचिडी. एक जातिका हरिण. पिक-पु. कोयल. कुरंग-पु. हरिण. कटर-पु. कौआ. शरम-पु. लडीसरा. द्रोणकाक-पु. डोम कौआ. गवय-पु. नीलगाह. दात्यूह-पु. काला कौआ. शश-पु. शसा, खरहा. पिल्ल-पु. चील्ह. आखु-पु. चूहा. गृध्र-पु. गीध. सरट-पु. गिरगिट, शुक-पु. सुग्गा, तोता. मुसली-स्त्री. छिपकली. कोच-पु. कराकुल. लूता-स्त्री. मकरी, मकडी. बक-पु. बगला. नीलंगु-पु. छोटे कीडे.. सारस-पु. सहरस. शतपदी-स्त्री. कनखजूरा,गोजर. कोक-पु. चकवा. शूककीट-पु. केंचुआ. कलहंस-पु. बत्तक. अलि-पु. बी. कुरर-पु. कुररी. पारावत-पु. कबूतर. हंस-पु. हंस. शशादन-पु. बाज. राजहंस-पु. राजहंस. उलूक-पु. उल्लू. वरटा-स्त्री. हंसकी स्त्री. भरद्वाज-पु. भरदूल, लवा, लक्ष्मणा-स्त्रीः सहरसकी स्त्री उपदेशविचार। जतुका-स्त्री. चमगुदरी. डिम-पु. पा. तैलपायिका-स्त्री. गीदड. मिथुन-न. जोडा. वर्वणा-स्त्री. मक्खी. युगल-न. दो. सरघा-स्त्री. मधुमक्खी. निवह-पु. समूह, झुंड. वनमक्षिका-स्त्री. डांस, मच्छर. | मतंगज-पु. हाथी. दंशी-स्त्री. मसा. शुंडा-स्त्री. सूंड. गंधोली-स्त्री. बरै (मिरे ). श्वन-पु. कुत्ता. झिलिका-स्त्री. झींगूर. अश्व-पु. घोडा. शलम-पु. फनिगा. मेष-पु. भेंडा. खद्योत-पु. सोनकीडा. वृषभ-पु. बैल. मधुकर-पु. भंवरा. उष्ट्र-पु. ऊंट. मयूर-पु. मोर, मुरैला. अज-पु. बकरा. केका-स्त्री. मोरकी बोली. रासम-पु. गदहा. मेचक-पु. मोरपंखके चिह्न. भक्त-पु. न. भात. शिखंड-पु. मोरका पंख. सूप-न. दाल. खग-पु. चिडिया. कृशरा-स्त्री. खिचडी. हारीत-पु. हारिल. तापहरी-स्त्री. ताहरी. तित्तिरि-पु. तीतर. पायस-न. खीर. कुक्कुम-पु. वनमुर्गा. समिता-स्त्री. सैंमई. लाव-पु. लवा. मंडक-पु. मंडा. कोयष्टिक-पु.टिटहरी. पोलिका-खी. पुरी, लुसी. वर्तक-पु. बटेर. रोटिका-स्त्री. रोटी. पक्ष-पु. पंख. लप्सिका-स्त्री. सीरा. पक्षति-स्त्री. पंखकी जड. अंगारकर्कटी-स्त्री.अंगाकर, लिट्टी. चंचु-स्त्री. चोंच. पिष्टिका-स्त्री. पिठी. प्रडीन-न. उडना. वेढमिका-स्त्री. वेढई. अंड-न. अंडा. पर्पट-पु. पापड. कुलाय-पु, घोंसला, पूरिका-बी, क्योडी बालसंस्कृतप्रभाकरे वटक-पु. बडा,,मगोरा. फेन-न. झाग. कथिता-स्त्री..कढी. दधि-न. दही. वटिका-स्त्री. पकोरी. नवनीत-न. मक्खन. संयाव-पु. गूझा. वृत-न. पी. फेनिका-स्त्री. फैनी. तक-न. छाछ. मोदक-पु. लड्डू धान्य-न. धान. कुंडलिनी-स्त्री. जलेबी. व्रीहि-पु.साठी, सामान्य धान्य. विदुमोदक-पु. बुंदीके लड्डू. शालि-पु. शालि (चावल ). रसाला-स्त्री. सिखरन, श्रीखंड. गोधूम-पु. गेहूं. शर्करोदक-न. सरबत. यव-पु. जव. झर्झर-पु. झंझरी. शिंबा-स्त्री. शेंगरी, कलाई. प्रपानक-न. पना. मुग-पु. मूंग. कांजीक-न. कांजी. माष-पु. उडद. जालि-स्त्री. जाली. राजमाष-पु. राना उडद. शक्त-पु. सत्तु. चणक-पु.चना. धाना-स्त्री. बहुरी. मसूरिका-स्त्री. मसूर. निष्पाव-पु. मोठ. पृथुक-पु. चिउरा, चिरमुरा. सतीनक-पु. मटर. होलक-पु. होला. कुलत्थ-पु. कुल्थी. उंबी-स्त्री. उंबी. तिल-पु. तिल. कुल्माष-पु. धूंधनी. तुवरी-स्त्री. अरहर. पलल-न. तिलकुट, अतसी-स्त्री. अलसी. पिण्याक-न. पीना. वरटा-स्त्री. कर, करड. दुग्ध-न. दूध. सर्षप-पु. सरस. पीयूष-न. फेरुस. शण-पु. शण. किलाटक-पु. खोवा. श्यामाक-पु. श्यामक. क्षीरशाक-न. खिरिसा. कोद्रव-पु. कोदव. मोरट-न. फटे दूधका जल. नीवार-पु. तीनी. संतानिका-श्री, मलाई. यावनाल-पु. ज्वार, लाज-पु. खील.
उपदेशविचारः। गवेधुका-स्त्री. स्यंहआ, चेना. विद्रुम-पु. मूंगा. कणिशं-पु. न. बालि. मौक्तिक-न. मोती. सुवर्ण-न. सोना. माणिक्य-न. लाल. रजत-न. चांदी. सूर्यमणि-पु. सूर्यकांत. ताम्र-न. तांबा. चन्द्रमणि-पु. चंद्रकांत. कांस्य-न. कांसी. गोमेद-न. पन्ना. पीतलोह-न. पीतल. हीरक-पु. हीरा. रंग-न. रांगा. नीलमणि-पु. लसणिया. जसद-न. जसद. सीस-न. सीसा. मारकत-न. मरकतमणि. शुक्ति-स्त्री. सीप. लोह-न. लोहा. अयस्कांत-पु. लोहचुंबक. पारद-पु. पारा. काच-पु. कांच. अभ्रक-न. भोडर, रस-पु. रस. गंधक-पु. गंधक. कषाय-पु. तुवर, कषैला. माक्षिक-न. सोनामक्खी. हरिताल-त. हरताल. गरिक-न. गेरु. लवण-पु. नमकीन. तुत्थ-न. नीलाथोथा. तिक्त-पु. कडुआ. कासीस-न. हीराकसीस. अम्ल-पु. खट्टा. हिंगुल-न. सिंगरफ. शाक-न. साग. सिंदूर-न. सिंदूर. वास्तुक-न. वंथुआ. सौवीरांजन-न. सुरमा. पोतकी-स्त्री. पोई. रसांजन-न. रसौत. मारिष-पु. मरसा. शिलाजतु-न. शिलाजीत. भंडीर-पु. चौलाई. काक्षी-स्त्री. फिटकडी. छुरिका-स्त्री. पालक. फेन-पु. झाग. नाडिक-न. नाडीका साग. १ कषाय आदि छः (६) रस रसमात्रमें वर्तमान पुलिंग है। और जब रसवानों में वर्तमान हैं तब तीनोंमें हैं ! मधुर-पु. मीठा कटु-पु. चर्चरा.
बालसंस्कृतप्रभाकरे पट्टशाक-पु. पटुआ. पारिश-पु. पारसपीपल. कलंबी-स्त्री. कलंषी. उदुंबर-पु. गूलर. लोणी-स्त्री. नोनिया. काकोदुंबरिका-स्त्री. कटुंपर. घोटिका-स्त्री. बडी नोनिया. प्लक्ष-पु. पिलखन. चांगेरी-स्त्री.चांगेरी, अंबिलोना. कदंव-पु. कदंब. चुक्रिका-स्त्री. चूका. अर्जुन-पु. कौह. चंचुकी-स्त्री. चंचु. शिरिष-पु. शिरस. ब्राह्मी-स्त्री. हुलहुल. वंजुल-पु. वेतस. शितिवार-पु. शिरिआरी. निचुल-पु. जलवेतस. द्रोणपुष्पी-स्त्री. गोमा. श्लेष्मातक-पु. ल्हेशवा. यवानी-स्त्री. अजमायन. पील-पु. पीलु. ददुघ्न-पु. चकबड, पमाड. शाक-पु. शाकवनु. सेहुंड-पु. थूहर. सर्जरस-पु. शाल. गोजिह्वा-स्त्री. गोभी. तमाल-पु. तमाल. पटोल-पु. परवल. खदिर-पु. खैर. गुडूची-स्त्री. गिलोय. किंकराल-पु. बबूल. वृंताक-न. बैंगन, भंटा. बीजक-पु. विजयसार. पिंडगर-न. पिंडार. तिनस-पु. तिनस. कर्कोटकी-स्त्री.खेखसा, ककोडा. बहुपुट-पु. भोजपत्र. डिंडिश-पु. लैंडस, टिंडे. पलाश-पु. ढाक. डोडिका-स्त्री. करेरुआ. धव-पु. धव. कंटकारी-स्त्री. कटेरी. धन्वन-पु. धामणि. सूरण-पु. सूरन. सर्ज-पु. शोजा. आलुक-न. आलू. शाखोट-पु. शाकोट. पलांडु-पु. प्याज. वरुण-पु. वरना. मूलक-न. मूली. जिंगिणी-स्त्री. जीवण. गुंजन-न. गाजर. शल्लकी-पु. शालक. वट-पु. बड. तापसहम-पु. हिंगोट. पिप्पल-पु. पीपल. कटंभर-पु. कटाहा.
चिराय-बहुकाल. उपदेशविचारः। मुष्कक-पु. मोषा. क्रमुक-न. सुपारी. पारिभद्र-पु. पहाडी नीव. तांबूलवल्ली-स्त्री. नागरपान. शाल्मलि-पु. स्त्री. सेमर. अव्ययानि. तुणि-पु. तुनि. सप्तपर्ण-पु. सातला. मुहुर-बारंबार. हारिद्रक-पु. हरिदु. | झटिति-जलदी. नक्तमाल-पु. करंज. ऋते-विना ( वर्जन ). तिरिच्छि-पु. तिरुगिछी. शमी-स्त्री. जांठी. जातु-कदाचित् (किसी काल). सार्धम्-साथ. टिंठिणी-पु. झिंझिणी. मुधा-व्यर्थ. अरिष्टक-पु. रीठा. उत-या (वा). शिंशपा-स्त्री. शीसम. तिरस्-टेढा. मुनिगुम-पु. अगस्त. समया-समीप. कदली-स्त्री. केला. सहसा-अकस्मात्. दाडिमी-स्त्री. अनार. बदरी-स्त्री. बडवेरी. ईषत्-किंचित् ( अल्प.). द्राक्षा-स्त्री. दाख. इव-तुल्य. आम्र-पु. आम. तूष्णीम्-चुपचाप. नारिकेल-पु. नारियल. सपदि-तत्काल. पनस-पु. कटहल. अंतरा-बीच. ताल-पु. ताड. दिष्टया-बहुत अच्छा(आनंद). एला-स्त्री. इलायची. प्रसह्य-हठसे. बीजपूर-पु. बिजौरा. साम्प्रतम्-योग्य. नागरंग-पु. नारंगी. शश्वत्-निरंतर. निंबुक-न. नींबू. नहि-नहीं. चिंचा-स्त्री. इमली. न-नहीं. कपित्थक-पु. कैथ. अलम-बस. पुरस्-आगे.
९५ परश्वस-परसों. एव-ही. बालसंस्कृतप्रभाकरे ओम्-हां ( अंगीकार ). परेद्यवि-परदिन. समन्ततस्-चारों ओर. ह्यम्-गतदिन (कल). यथायथम्-यथायोग्य. श्वस्-आनेवाला दिन (कल). मृषा-झूठ. वै-निश्चयसे. तदा-तब. प्राक्-पहले (भूतकाल ). एकदा-एक समय. अर्वाक्-पीछे. नीचैम्-नीचे. सदा-सब दिन, उचैम्-ऊंचे. यदा-जब. प्रायस्-बहुताई. अधुना-अब. शनैस्-धीरे धीरे. मा-मत. बहिस्-बाहर. अपि-भी. अन्तर-अंदर. तथापि-तीभी. अद्य-आज. यथा-जैसा ( जिस प्रकार ), पूर्वेयुस-पूर्वदिन. तथा-तैसा (तिस प्रकार ). उमयेयुस-दोनों दिन. एवम्-ऐसा ( इस प्रकार ) परीक्षोपदेशः १६. १ विपदाऽभिभूतोऽपि नाहं धर्म | १ अपना वक्त खराब न करो। त्यजेयम् । २ आत्मोत्कर्ष तथा परेषां निंदां २ क्या वह यह काम कर धीरः परिवर्जयेत् सकेगा? ३ परमादरेण महात्मनां यशां-/. ३ हमारे पास छहारा अंगूर सि दिक्षु प्रतन्वंति कवयः। और अनार है। ४ प्रत्यहं प्रातरुत्थायोपवनं च ४ अगर यह सहीभी हो तो गत्वा पुष्पाण्यवविनोमि । इससे हमें क्या मतलब ? १इन संस्कृतवाक्योंका हिंदी और हिंदीवाक्योंका संस्कृत माषांतर परीक्षार्थ विद्यार्थियोंसे कराना. पुनर-फिर.
उपदेशविचारः। ९५ ५ दुःखपीडितामपि मां हृदय-| ५ प्रेमके आगे न्याय अन्याय मच्छिद्भिर्वचनैः किं पुन कुछ थोडेही ठहर सकता दुनोषि । है। ६ हे जगन्नायक, न वयं चर्म-| ६ जिस आदमीको हम किताब चक्षुषा तव विभूतिमुपवीक्षि दी थी, वह गैर हाजिर है। तुं शक्नुमः । ७ हे संजय, कुरुक्षेत्रे मामकाः ७ जिसका हाल अच्छा है, पाण्डवाश्च किमकुर्वत तत्क वह जो चाहे सो कर सकता थय। तुम मानते हो? ८ उद्यम कुर्वन्नपि फलं नैवा ८ भंवर और बगूलेके पास जो मवं, तस्माद्भवितव्यतैवात्रो जाते हैं उनका नाश होता पालभ्या। ९ अस्मिन्दुर्भिक्षे धान्यं न ल ९ ऐसी बीमारियोंके इलाजमें भ्यते, ततः किमनाम क जो उनकी राय है उनको थं च जीवितं धारयाम। १० शृणुत रे पौराः । अयं वस- १० हम लोग तरह तरहकी न्तसेनाघातकश्चारुदत्तो वध चीजें पसंद करते हैं, अर्थात् स्तंभं नीयते, तद्यदीशं एक चीजसे तृप्ति नहीं कर्म केऽपि कुर्वीरन्दण्डम- प्येतादृशं प्राप्नुयुः। ११ जाडयं धियो हरति, सिञ्च- ११ आपने मेरे संबंधमें जो ति वाचि सत्यं, मानोन्नति कुछ बात कही है, सो सच दिशति, पापमपाकरोति । । पर मैं क्या करूं मेरे चेतः प्रसादयति, दिक्षु त मनमें किसी तरहसे निष्ठुरता नोति कीर्ति, सत्संगतिःक नहीं होती है। थय किं न करोति पुंसाम् ॥ होती। है बालसंस्कृतप्रमाकरे संस्कृतहिंदीमापानिपुणाः समदृष्टयोऽनसूयास्ते । विदांसीस्याः सुकृतेः शुद्धिं कुर्वतु केवलं कृपया ॥ शकाब्दे षड्घराजेंदु [१८१६] मिते मासे तु कार्तिके । पूर्णेयमीशकृपया संस्कृतांतःप्रवेशिका ।। अस्मान्सुवर्णरहितानवहेलयन्ति चित्ते निवेश्य किमपि ध्रुवमत्र के चित् । पृथ्वीतले खलु भवेद्रसिकस्तु कश्चिदित्याशया प्रचलिता वयमत्र यत्ने ॥ इति श्रीमश्चित्तपावनजातीयगर्गान्वयजकेशवभट्टात्मजयशोदा- गर्मज-प्रभाकर-विरचितकृतिषु संस्कृतान्तःप्रवेशि- काऽपरपर्यायो बालसंस्कृतप्रभाकरः संपूर्ण- तामगात् ॥ शिवम् ॥ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना, कल्याण-मुंबई. 42 ป 9