Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Dayanand Timi Bhaskar
Front matter
॥ श्रीगणेशाय नमः।
दयानन्दतिमिरभास्कर।
अर्थात्
सनातनधर्मकल्पतरु ।
सरहा
जियो
दयानन्दनिर्मिनसत्यार्थप्रकाशके पटनमें वेद प्राह्मण
शास्त्र म्मृति पुराण घेवादि प्रमाणों से अलंकृत
कर मम्कन और माराटीका महेन।
विपायारिधि महाशपू भारतमा
पण्डित-मालाप्रसाद मिभने निर्माण किया।
पापा
ग्वेमराज श्रीकृष्णदासन
गुम्बई
नित "श्रीपंपटेपर" पीपचालयमें
मुदिनयर मनिस शिपा।
मंपत् १९७१, र. १८१०.
यह एक inीने -A
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प्रथमावृत्तिकी-भूमिका। में यह भारतवर्ष विद्याबुद्धिसम्पन्न सर्व गुणोंकी खान था, निस. शकी कीर्तिपताका भूमण्डलके चारों ओर फहरा रहीथी, उस समय कीर्तियोंको नेत्रोंसे देखने के निमित्त अनेक देशोंके यात्री यहां आते नेत्रोंको सफल कर यहांकी अतुलनीय कीर्तिको अपनी भापाके ग्रथोंमें थे, वे ग्रंथ आजतक इस देशकी गुरुता और कीर्तिका स्मरण कराते समय यह सब विश्व अज्ञानांधकारमें मम था, पृथ्वीके अधिकांशमें वर्ण होरहीथी उस समय यही देश धर्म आस्तिकता और भक्ति तथा पूर्ण प्रकाशसे जगमगा रहाथा, उस समय इस देशमेंही ज्ञान, विज्ञान, त, ज्योतिष, भेषजतत्त्व, काव्य, पुराण, साहित्य, धर्मादि विषयोंने कोथी. कश्यप मरीचि विश्वामिनादि जहाँके ऋषि, व्यास वाल्मीकि. प्रभृति जहांके कवि, पाणिनी पतञ्जलि आदि जहाँके वैयाकरण, सुभुत, चरक आदि जहाँफे वैद्य, कपिल, कणाद और गौतममभृति स्राकार, नारद मनु बृहस्पति आदि जहाँके धर्मोपदेष्टा, वसिष्ठ, आर्य- शरादि जहाँके ज्योतिर्विद्, शंकराचार्य, रामानुन स्वामी, बल्लभाचार्य इकि धर्मप्रचारक, सायनाचार्य, यातदेव, मल्लिनाथप्रभृति जहांके भाष्प. मरासिंह, महेश्वर प्रभृति जिस देशके कोपकार होगये हैं, ऐसा एक देश रतहो है, जिस समय यह सब सामग्री विद्यमान थी, उस समय इस नातन वैदिक धर्म पूर्णरूपसे प्रचलित था, नरपति ऋषि मुनियों के पुण्य क्षेत्र, पञ्च यज्ञसे गृहस्थियोंके घर, और आरण्यक पाठसे फाननमें प्रवाह वहरहाथा, सनातन धर्मकी महिमा और भक्ति सबके अन्तः- खिल रहीथी. न्तु समयकीभी क्या अलौकिक महिमा है कि, सूर्यमंडलको आकाशमें - मध्याह समय महातीक्ष्ण होकर फिर नीचेको टतरना पडता है, ठीक दशा इस देशकी हुई, जो सबका शिरमौर था वह पराधीनताके भारसे महा न होरहा है, भारतके उपरान्त यह देश विदेशी चाइयोंसे ऐसा मारत होकर . हुआ है, कि निस्सार पलहीन होकर आलस्यका भंडार होगया है, विद्या बुदि सब विदेशीय शिक्षामें लय होगई है, धर्म कर्ममें असावधानी है, संस्कृत विद्या जो दिनमात्रका आधार थी, उसके शब्दभी जब शुद्ध नहीं :- - (२) भूमिका। उच्चारण होते, इस प्रकार धर्मविप्लव होनेसे अनेफ मत भेदभी होगये, जिस "पुरुषको कुछ भी सहायता मिली झट उसने अपना नवीन पंथ कल्पना कर शब्द- ब्रह्मकी कल्पना करली, और शिष्योंको उपदेश देना प्रारम्भ किया, इसका फल इस देशमें यह हुआ कि, फूटका वृक्ष उत्पन्न होकर सत् धर्ममें वाधा पड़ने लगी, इन नवीन मतोंसे तो हानि होरही थी, कि, इसी समय दयानन्दसरस्वतीनेभी एक अपना मत चलाकर लोपलीला करनी प्रारम्भ की, इस मतमें भक्ति, भाव, देवपूजा, अवतार, श्राद्ध, पाप दूर होना, तीथ, माहात्म्य आदिका निषेध करके जपतक जाति आचार विचार मेटकर, कर्मसे ब्राह्मणादि वर्ण, नियोग प्रचार, स्त्रीके एकादश पति करनेकी विधि, शुदफे हापका भोजन करनेकी आज्ञा देकर वेदमें रेल, तार, कमेटी आदिका वर्णन कर सब कुछ वेदके नामसेही लिखा गया है इससे संस्कृतके न जाननेवाले सनातन धर्मसे हीन हो उनकी व्याख्या सुन अपनी महान् पुरुपोंकी गति त्याग, इस नाममात्रकी व्याख्या में मम ही जाते हैं, इनके संपट्टका नाम आर्यसमाज है, उक्त संन्यासीजीके बनाये हुए ग्रन्योंमें दूसरी बारका छपाहुआ सत्यार्थप्रकाशही इस मतकी मूल है, स्वामीजीके अनु- यापी इसे पत्थरकी लकीर समझते, तथा इसका पाठ करते और कोई फोइ इसकी कथा भी कहाते हैं, इसका पाठ होता है, शास्त्रार्थमें उसीके प्रमाणभी देते हैं, यहभी गुप्त न रहे कि, सत्यार्थप्रकाश दो हैं, एक पुराना एक नया पुराने सत्यार्थप्रकाशको स्वामीजीने कह दियाथा कि, इस पुस्तकमें मृतक पुरु- पोंका श्राद्ध, और पशुयज्ञ छापेवालोंकी भूलसे छपगया है, इस लिये अब यह 'दूसरा सत्यार्थप्रकाश तैयार किया जाता है, इसमें जो कुछ कहा है, वह बहुत कुछ -समझकर वेदानुसार ही कहा है, और सजनोंको माननीय है, यद्यपि पुराने सत्यार्थप्रकाशमें उक्त दो बात छोडकर और सब स्वामीजीके कयनानुसार ठीक हैं, यह स्पष्ट है तथापि दूसरी वारफे सत्यार्थप्रकाशपर वे और उनके अनुयायी अधिक श्रद्धा रखते हैं, कि जो कुछ इसमें हैं, वह हमारे निमित्त ओपधी है, बस हमको पहले टस ओषधीके गुणदोपकी परीक्षा करनी अवश्य है, कि जो कुछ उसमें लिखा है वह यथार्थ है या नहीं, जहांतक मेरी बुद्धिकी पहुंच है और विचार “पर देखा जाता है तो सत्यार्थप्रकाश घेद शास्त्र प्रतिकूल, परस्पर विरुद्ध बातोसे भरा हुआ दीखता है, वेदके नामसे लाल बाग दिखाया गया है और संस्कृतान- :भिज्ञाको यशीभूत करनेको शंवरकी माया दिखाई गई है इसके अनुवर्ती बहुतसे नवशिक्षितोंको होते देखकर हमको इसकी समीक्षाकी आवश्यकता हुई, कारण कि इसकी समीक्षासेभी देशका उपकार होकर सनातन धर्मकी वृद्धि होगी और, इसको पढकर मनुष्य इस कपोलकल्पित मतसे बचेंगे, यदि स्वामीगी जीवित - भूमिका। होते तो इसका खंडन बनानेकी आवश्यकताः नहीं थी, कदाचित् इसके स्वामीजी बदलकर और छापेवालोंके शिर इसकाभी कलंक डालकर तीर सत्यार्यप्रकाश नवीन तयार करते, * परन्तु यह पुस्तक सम्बत् १९३९ • स्वामीजीने पुनः शोधकर छपवाया, और उन्नीससौ चालीसमें शरीर गया जो कि, यह मत स्वामीजीका स्थापित किया हुआ है, इस कारण : ग्रन्थोंको छोडकर उन्होंके ग्रंथोंकी समालोचना करनी उचित है, सो इस पु फमें स्वामीजीके कपोलकल्पित ग्रंथोंको प्राचीन ग्रंथोसे मिलान कर सजनोंकेसा : प्रगट करताई, इससे बुद्धिमान् सत्यासत्यका निर्णय कर सकेंगे, सत्यार्थभका दो भाग हैं, पूर्वार्द्ध और उत्तरार्ध पूर्वार्धके दश समुल्लासोंमें स्वामीजीने अ मन्तव्य प्रकाशित कर नवीन मतकी नीम डाली है और उत्तरार्द्ध के चार समु समें आर्यावर्तीप मतोंका खंडन किया है, जैन, बौद्ध, चार्वाक और ईसाई यवनोंकाभी खंडन किया है, इनके खंडनसे हमारा प्रयोजन नहीं है, हमको म टन्होंके स्थापित मतकी परीक्षा करनी है जिसको वह वेदानुसार इतटाकर : प्योंको भ्रममें डालते हैं, संडन करनेसे मेरा प्रयोजन देप वा शत्रुता अ- किसीके जी दुखानेसे नहीं है, किन्तु इसके लिखनेसे केवल यही प्रयोजन है मनुप्योंको सत्यासत्यका ज्ञान होकर स्वामीजीके ग्रन्योंका वृत्तान्त विदित हो कि उनके अनुसार वर्तनसे हम यथार्थमें धर्मपथमें स्थित हैं या नहीं। इसमें जो पृष्ट पंक्ति लिखी गई हैं यह दूसरी बारके छपे हुए सत्यार्थमका अनुसार हैं सत्याथपकाश कईबार छपा है उसमें भी चाहै न मिले परन्तु तो मिलहोंगे यदि टस पृष्ठ में न होगा तो अगलेमें मिलेगा। मैंने जो इस ग्रंथमें प्रमाण लिखे हैं वे टन्ही ग्रंथोंके हैं जिनको स्वामी माना और अपने सत्यार्थप्रकाशमें लिखा है और मंत्रोंके अर्थ प्राचीन भान नुसार लिखे हैं सनातन धर्मावलंबियोंको इससे महालाभको संभावना है, क कि, सम्पूर्ण धर्मविषय वेदसे भाष्यसहित प्रतिपादन किये हैं जिससे Eि 'प्रकारकी भ्रान्ति नहीं रहती, धर्मकी प्राप्ति और पाखण्डकी निविही इस ग्रं- उद्देश्य है ।। आपसमानियोंसे विशेष प्रार्थना है कि, जब वे इस पुस्तकको देखने के पक्षपात छोडकर विचार यदि वकरेकी तीन टांगकाही हठ है तो सत्य सर- निर्णय नहीं होसकेगा और फिर किसीके समझाये कुछ फल न होगा क्योंकि * यह बात सामाजीके चेलोंने स्वीकार की है, जो शिन्य लोटर समझ जाते हैं - कहना है, यह बात ममत्र थी।
(१) भूमिका । अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेपज्ञः। ज्ञानलबदुर्विदग्धं ब्रह्मापि तं नरं न रञ्जयति ॥१॥ अयांत् अज्ञानी मुखस और विशेष ज्ञानी महासुखसे समझाया जासक्ता है परन्तु ज्ञानकै लेशसे दुर्विदग्ध मनुष्यको ब्रह्माजीभी नहीं समझा सक्ते ॥ देशोपकारकं निमित्त यह पुस्तक निर्मित्त कर इसका सबप्रकारका सत्व वैश्य- वंशदिवाकर सद्गुणाफर वेदशास्त्रप्रवर्तक परोपकारनिरत "श्रीवेंकटेश्वर" (स्टीम् ) यंत्रालपाधिपति सेठजी खेमराजनी श्रीकृष्णदासको समर्पण करदिया है । पाठक महाशयोंसे निवेदन है कि-यदि इसमें कहीं मूल रहगई हो तो कृपाकर सूचित फर टचित होगी तो पुनरावृत्तिमें बनादी जायगी आपको लाभ होनेसे मेरा परिश्रम सफल होगा। पण्डित ज्वालामसाद मिश्र, ( मोहटा दीनदारपुरा) मुरादाबाद- द्वितीय तृतीय और चतुर्थ भावृत्तिको भूमिका। गौरीपुत्रं गणाधीशं भक्तानामभयप्रदम् । वन्देहं कामदं देवमखिलानन्ददायकम् ।। इस समय यह वार्ता किसीसे छिपी नहीं है कि, सनातनधर्ममें चारों वर्णीव "विशेष ज्ञान प्राप्त करना अति आवश्यक है, इस समय केवल कथाश्रवणसेहीका नहीं सफल होगा, किन्तु अब विशेष परिश्रमकी आवश्यकता है, अपने धर्मके गू अभिप्रायोंकी व्याख्या विना श्रवण किये, विना विचारे, बुद्धिमान संस्कृत विद्वानों की संगति विना किये, धर्मसे साधारण पुरुषों के विश्वासका कुछ शिथि हो जाना कोई आश्चर्य नहीं है. इस समय अनेक पन्थ समाजादि वेद पुस्त हाथमें लिये दट्टीकी ओटमें साधारण पुरुपोंका आखेट करते हैं चौहट हो आदिमें मोरछल लिये वेद २ पुकारते भोलेभाले लोगोंका वेदके नामसे मियर उपदेश देते हैं, जिसे सुनकर संस्कृतानभिज्ञ मनुष्योंके हृदयमें अधर्मका संचा होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है, इसः समय सबसे अधिक सनातनधर्मका श एक नवीन पंथ आर्यसमाज खडा हुआ है जो साधारण मनुष्योंके विचमें अर न्तोषका अंकुर उत्पन्न कर गली बाजारों में वेद २ पुकार करता सनातनधर्म शत्रुतामें कोई यत्न उठा नहीं रखता है, व्यास महर्षि जैमिनि आदि सम्पूर आवायाँके अन्य वेदविरुद्ध बतलाकर श्राद्ध, तर्पण, तीर्थ, पापनाशक मन्त्र स्तु प्रार्थनाफे वाक्योंके अर्थीका उलट पुलट करता, मिथ्या वाक्योंसे सनातन धर्मप बडे २ आक्षेप करता हुआ यत्र तत्र दृष्टिगोचर होता है, इस नवीन पंथके स्पाप फरनेवाले स्वामी दयानंद नामक संन्यासी हुए हैं, इन्होंने लोकोंको भ्रममें डालने एक अन्य सत्पार्थमकाश और वेदभाष्य भूमिका बनाई है तथा यजुर्वेद और कुछ ऋगोदका भाष्य किया है, नशीन आर्य इन्हीं अन्योंके सहारे बडी उछलकूद कर हैं और उन्हीं अन्योंको हाथमें लिये व्याख्यान करते हैं, परन्तु यदि उनके ग्रन विचार के साथ देखनाप तो उनकी पोल और मिथ्या प्रपंच सब सुल जाता है इस कारण उनके अन्योंकी असत्यता सर्व साधारणमें प्रगट होनेसे सनातन धर्मि पोंको बहुत बडा लाभ होगा, इस कारण मैंने यह पुस्तक निर्माण कर सर्व साधार सके दृष्टि गोचर को जिसके दारा बहुत कुछ उपकार हुआ और पुस्तककोदिती -पाति छापनेकी आवश्यकता हुई। - भूमिका। यद्यपि अब समाजी यह भी कहने लगे हैं, कि स्वामीजीका कयन: सर्वथा हमको स्वीकार नहीं, और सत्यार्यमकाशपर श्रद्धा न रखकर कहते हैं, हम वेदकोही मानते हैं, परन्तु समाजी या समाजी चालढालके मनुष्य नई चमकसे चकाचौंधमें आकर जितने ग्रन्थ निर्माण करते हैं या कहीं कुछ प्रमाण का विचार करते हैं तो वही दयानंदनीका किया अर्य करते हैं, इस कारण सत्यार्थप्रकाश और वेदभाष्यके विरुद्ध अर्थ खण्डन करनेसे उन सब नई रोशनीवालोंका लेख खंडन होनायगा इसी कारण इस ग्रन्यको निर्माण कर विद्वानोंके सन्मुख उप- स्थित किया। प्रथमावृत्तिमें जो कहीं पृष्ठ पंक्ति आदिको अशुद्धि रहगई थी वह दूर करके शुद्ध, करदी है और जो कोई विपय संक्षेप लिखाथा आवश्यकतानुसार कोई २ अधिक पदादिका प्रमाण देकर दृढ करदिया गया, जिससे पाठकोंको उन प्रमाणोंको अव.. लोकन कर विशेष सन्तोपकी प्रीति होगी। दयानन्दीय वेद कैसा है उसके अर्थमें फैसा गौरव और क्या अपूर्वता है इस घातके दिखानेको दयानन्दीय वेदका थोडासा नमूना पाठकोंके अवलोकनार्थ इसी अन्यके पीछे लिखदिया है, जिनके देखनेसे पाठकोंको विदित होजायगा कि, दया. नंदीय वेदमें फैसी शिक्षा और फैसा अर्थ है, तथा दयानन्दकृत वेदभाष्यको पोल दिखानेके लिये टसके पृष्ठ पंत्तिभी लिखदिये हैं, पाठक महाशय एक बार उन पार्ताको समानियोंसे पूछ तो देखें कि,आपके वेदमें ऐसी २ निर्लजादि वार्ता भी लिख रखी है। पेदका सत्य अर्थ सब पर प्रकाशित होनाय इसी कारण श्रीवंफटेवर यन्त्रालयमें 'भापाटीका कर यजुर्वेद उपापाहै इसमें पदार्यभावार्य तत्वविचार विधि सब कुछ प्रमाणों सहित लिखी है टिप्पणीम दयानन्दीय मर्यकी पोल भी फहीं २ खोली है. २७००पृष्ठ में अन्य पूर्ण हुआ है सर्वसाधारणके मुभीत के लिये फीमत १२] रक्सीह ।। दयानन्द ति० भा० में १८८१ के सत्यार्यप्रकाशकी पृष्ठ पंक्तिही मुख्य रहनेदी है परन्तु अब सस्पार्यप्रकाशमें बद्भुत कुछ फर फार किपा जाता है - [जिसमें समानियोंका कोई सत्व नहीं है ] टस वातको दिखाने के लिये भी इस चतु(त्तिम टिपनी दी है और सन १८८४ के सत्यार्थ प्रकाश पृ० पं० लिसकर एपे सत्या- '. काशका विषय लिगकर उसके पीछे इस समपसन १९१२ ग्यारहया पारका सत्यापेमारी पृष्ट पनि.भी लिखी है जिससे पाठकोंको विदित होनाय कि xnा सदर रसर हुआ है। -- है - भूमिका। (७) अबके सत्यार्थप्रकाशमें वह विषय कहां है और किस प्रकार फेरफार किया गया परन्तु शास्त्रार्थके लिये १८८४ काही सत्यार्थप्रकाश सन्मुख रखना उचित है ।। हर्षका विषय है कि, समाजी लोग भी अब दयानन्दजीकी मिथ्या उक्तियोंको समझने लगे हैं और शास्त्रार्थके समय सत्यार्थप्रकाश और उनके वेदभाष्य तथा उनकी माप्ततापर शास्त्रार्थ करनेसे सर्वथा नटजाते हैं, और उनकेंभाष्यादिका नाम- भी नहीं लेते । हमारा उद्देश्य भी यही था कि, स्वामीजीके मिथ्यात्वका ज्ञान सर्व साधारणको हो जाय ॥ फूटकी भी अब आर्यसमाजमें कमी नहीं है पास पार्टी मांसपार्टीवालोंकी कटू क्तियोंकी बौछारतो थी ही पर अब गुरुकुलके विरोधमें अनेक पार्टीकी लीलाभी चलरहीहै अबदुलगफूर (धर्मपाल) पोल खोल रहेहैं और परस्पर आक्षेपोंकी कमी नहीं है, सत्य है मपंच खुले विना नहीं रहता। जोकि दितिपुत्र पुरोहितकी समान किसी २ ने विरुद्ध पक्षका अवलम्बन कर इस ग्रंथपर आक्षेप किये, अन्तमें वह आक्षेप उन्हींपर पडे कारण कि, उनलोगोने दयानन्दके सिद्धान्तोंकाभी अतिक्रमण करदिया इससे वह ग्रंथ दयानन्दियोंको मान्य वा प्रमाण कैसे हो सक्त हैं, तोभी उनके उत्तरमें धर्मदिवाकर भास्कराभास- निवारणादि ग्रंथ बनचुके हैं, और उनकी समालोचना टिप्पणी में इस ग्रंथमें भी, अबकी बार कुछ विस्तारसे लिखी है और कहीं ग्रन्थमें वृद्धि भी की है और जब कि इनके महान् पंडित भीमसेनजी सनातनधर्मपर आरूढ होगये और दयानन्दकी पोल खोल रहे हैं तब उनके चेलोंकी स्थिति फवतक रह सकेगी, प्रयोजन समाप्त होते ही रंग बदलेगा इसीसे आधुनिकग्रंथोंके विशेप खंडनकी आवश्यकता नहीं है. इस समय मैं वेदभाष्य भूमिकाकी समीक्षामें लगा हुआ हूं इसके समाप्त होतेही सनातन धर्म प्रचार पाखण्डमतकुठार ग्रंथ प्रकाशित होगा. इस अवसरपर हम धर्मसभाओंके कर्मचारी तथा पंडितमंडलीका ध्यान भी इस ओर आकार्पत करना चाहते हैं कि, अब आपको आलस्य दूर करना चाहिपे जिस प्रकार वार्षिकोत्सवमें उत्साह करते हो इसी प्रकार संवत्सरके मध्य में भी तो कुछ कार्यवाही किया कीजिये यह सभाओंकी कार्यवाही जितनी ययायोग्य कोजायगी, उतनीही अच्छी है नहीं तो विवार लीजिये कि हमारे आपफे देखते नवशिक्षितमण्डली कुसंस्कारके कारण नास्तिक बननायगी अभी सनातन धर्मके उपदेशक बहुत कम हैं, जैसे २ कुतर्फी मायः सर्वत्र प्रभ कर घूमतेहुए भोलेभाले. लोगोंको बहकाते हैं, वैसे उनके उत्तर देनेवाले सर्वत्र नहीं मिलते, माना कि, इस. समय पण्डितजीफी उपाध्यायनीकी यजमान बडी प्रतिष्ठा करते हैं, आपको कुछ आवश्यकता नहीं परंतु यजमानके पुत्रकाआपके चरणों में तथा आपकी सन्तानमें (८) भूमिका। :-शतांश भाव भी नहीं है, इस कारण जैसे प्रतिदिन दूसरे कार्य करते हो इसी प्रकार दशपांच मिनट इस धर्मकार्य में भी तो ध्यप फीनिये, जिससे धर्मकी उन्नति हो, यही कारण है कि, सभास्थापित होफर थोडेही दिनोंमें शिथिल होजाती है, कोई कोई सभा नाममात्रकी हैं अपने कार्यको उद्योगके साथ सफल करना चाहिये और केवल व्याख्यानही देफर कृतार्थ न हनिये, फोई कामभी तो करना चाहिये दिनाति- योंका संस्कार, संध्या पश्च यज्ञका प्रवार, पुस्तकालय, पाठशाला आदि इन श्रेष्ठ देशहितेपी कार्योंका संपादन फरनेसे आप कुछ उन्नति लाभ कर सकेंगे, यह छोटेसे बडे तक सब कोई करसकतेहैं, अब किसीके भरोसे न चैठिये, अपना काम भाप सँभालिये, कारण कि, जिनके किये कुछ होसकता है वह कभी इस ओर झुफफर नहीं पूछते कि, अमुक सभाकी क्या दशा है, क्या कार्यवाही है, किस वातका अभाव है, उच्च श्रेणीके पुरुपोंको उचित है कि, सभाओंका वृत्तान्त पूछकर उनके सुधारका प्रबन्ध करे, तभी कुछ उन्नति होसकती है अहंकार त्यागकर नम्रताके साथ सभाकी उन्नति होसकती है, वह कार्यवाही करो जिसमें दूसरोंके उदाहरण बनो । अभीतक इस हमार पश्चिमोत्तरप्रदेश सभाओंकी बडी शिथिलता और न्यूनता है, महामण्डलसेभी कोई आशा नहीं है पण्डित और महोपदेशक गण फहीं २ .सभाओंमें पधारकर शास्त्रोंके मर्म सुनाकर जगाते रहते हैं, परन्तु सभासद और उन २ नगरोंके विद्वान् जब कटिबद्ध होंगे तब बहुत शीघ्र कार्य सफल होगा । प्रिय पाठकगण धर्मसभाओंकी उन्नतिमें कटिबद्ध हनिय, समाजियोंके उत्तर देनेको यह पुस्तक बहुत है तथा और भी अनेक विद्वानोंके निर्मित किये ग्रन्य हैं, आपके आलस्य त्यागकी देर है, सामग्री जयकी सब प्रस्तुत है, इस ग्रन्थको प्रेमसे अवलोकन कर लाभ उठाइये इतनेमेही मेरा परिश्रम सफल है । आपका-ज्वालाप्रसाद मिश्र, मुरादाबाद. .
। . दयानन्दतिमिरभास्करस्य सूचीपत्रम् । .... .... २७ .... .... .... विषय. पृष्ठांक. | विषय. पृष्ठांक. भूमिका-इसमें ग्रंथ बनानका प्रयो- तृतीयः समुल्लासः। जन वर्णन किया है। अध्ययनअध्यापनप्रकरणम् प्रथमःसमुल्लासः। सावित्रीप्रकरणम्'.... आचमनप्रकरणम् मंगलावरणमकरणम् २ जो कि दयानंदजीने स्त्रियोंकोभी जो स्वामीजीने ग्रंथके प्रथम श्रीग. शादि लिखनेका निषेध फिया है गायचा मंत्र देना लिखा है, और और ईश्वरके १०० नामोंकी व्या. गायत्री मंत्रके अशुद्ध अर्थ करके ख्या करके जो ओंकार और शनो आचमनसे कफकी निवृत्ति मानी मित्रादि मंत्रोंके अशुद्ध अर्थ किये है इसका निराकरण कर स्त्रियोंका हैंउनका निराकरण करके वेदशास्त्रोंके गायत्री मंत्रमें अनधिकार सिद्ध कर प्रमाणासे यथार्थ अर्थ किया है. गायत्रीका यथार्थ अर्थ पनिषदों ॐ कारप्रकरणम्.... और ब्राह्मण प्रयास दिखलाकर द्वितीयः समुल्लासः। आचमनका आशय और विधि - न की है, अमिहोत्र के विधानकाभी शिक्षाप्रकरणम् जो कि स्वामीजीने जन्मपत्री ग्रहा. दे शूदानाधिकारप्रकरणम् दि तथा यक्षराक्षस पिशाचादिका जो कि दयानंदनीने शूद और स्त्रि. निषेध फरके ज्योतिप विद्याका याका वेद पटना लिखा है, उसका फलादेश मिथ्या कथन किया है खिंडन कर वेदमें स्त्री शूद्रका अनधि- और परस्पर नमस्ते-करनेकी परि- कार वेदस प्रतिपादन किया है। पाटी निकाली है इन सबका निरा. सृष्टिक्रमप्रकरणम्- फरण करके सनातन मतानुसार जो बात अपने प्रतिकूल हुई . उसे ज्योतिपके फलित ग्रहादि और स्वामीजी सृष्टिक्रम प्रतिकूल, बता.. अभिवादन प्रणाम करना सिद्ध कर सृष्टिकम जाननेका अभिमान- "किया है। नमस्तेका खंडन २३ करते हैं, इसका खंडन कर परमेश्वरः ९ .... .... .... .... १५ उल्लेख किया है. .... ....
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करी है, .... ..- .... ..-१८६ जीवपरतंत्रप्रकरणम् .... ... अनुक्रमाणका। विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्ठांक. इसमें संन्यासियोंके लक्षण लिखकर सर्व शक्तिमता वेदोंसे प्रतिपादन स्वामीजीका कर्तव्य संन्यासधर्म- के प्रतिकूल संपादन किया है. अघनाशनप्रकरणम् पष्ठः समुल्लासः। दयानंदजी लिखते हैं ईश्वरके नाम राजधर्मप्रकरणम् १८४ लेनेसे पाप दूर नहीं होता, उसका इसमें राजधर्मप्रतिपादान किया है. खंडन कर ईश्वरके नाम लेने पाप कुलीनता. १८६ दूर होना वेदमंत्रोंसे प्रतिपादन सप्तमः समुल्लासः। किया है. पुनः देवतामकरणम् ....२२४ इसमें देवताओंका स्वादिमें रह इसमें जीवको सर्वथा ईश्वराधीन प्रति- ना उनके लक्षण संख्पादिका वर्णन. पादन किया है. किया है. जीवलक्षणप्रकरणम् ईश्वरविषयप्रकरणम् १८८ स्वामीजीने जो जीवोंके मिथ्या ल. स्वामीजीने ईश्वरके दयालु आदि क्षण लिखकर वेदान्तशास्त्रकी रीति नामोंके मिथ्या अर्थ किये हैं। विगाडीहै उसका खंडन कर जीव- उसका खंडन कर यथार्थ वैदिक के यथार्थ लक्षण वेदोंसे प्रतिपादन अर्थाका प्रतिपादन किया है. किये हैं. निराकारसाकारमफरणम् ... ...-१८९ जापविभुत्वप्रकरणम् ..२३७. दयानंदजीने जो निराकार साका. रके मिथ्या अर्थ फर परमेश्वरको इसमें वेदान्तशास्त्रानुसार जीवको परतंत्र बताया है इसका खंडन कर विभुत्व प्रतिपादन किया है. वेदोंसे यथार्थ अपोका प्रतिपादन उपादानकारणप्रकरणम् किया है. स्वामीजीने परमेश्वरको जगतका अवतारप्रकरणम् १९१ निमित्त कारण लिखाहै, इसका खंडन दयानंदजी कहते हैं कि ईश्वरका कर वेदान्तसे जगत्का परमेश्वरको अवतार नहीं होता इसका उत्तर दे अभिन्न निमित्तोपादानकारण प्रति- ईश्वर सब भवतार घेदोंसे प्रतिपा- पादन किया है. दन किये हैं. महावाक्यप्रकरणम् सर्वशक्तिमानमकरणम् . ....२०७ प्रज्ञानं ब्रह्म आदि चार महावाक्पों- स्वामीनीने सर्वशक्तिमानके अर्प का अर्थ स्वामीजीने मिथ्या लिखाहै विगाडकर जो ईश्वरको अल्पशक्ति टसका उत्तर दे दशों उपनिपद् और बताया है, उसका संडन कर ईश्वरमें वेदोंसे -इसका पार्थ अर्थ लिखकर .... .... .... +10 ...
.... .... ... . .... .... .. (१२) अनुक्रमणिका। विषय. पृष्टांक. | विषय पृष्टांक. ग्वेदातशास्त्रका आशय वर्णन कियाहै कर चारों वेद उहाँ शास्त्रोंसे मुक्तिसे वेदमाप्तिमकरणम् २५४ अनावृत्ति सिद्ध करी है. स्वामीजी कहते हैं कि वेद अमि दशमः समुल्लासः। वायु रविक हृदयमें प्रथम आये भक्ष्याभस्यप्रकरणम् ३२८ इसका समाधान फर वेदोंका प्रथम स्वामीजीने शूदके हाथका भोजन ब्रह्मानीको प्राप्त होना प्रतिपादन किया है. करना लिखा है उसका निषेध कि. या है, तथा निजपत्नी वा उच्च मंत्राझणप्रकरणम् ....२६२ वर्णक हायका भोजन करना सिद्ध स्वामीजी ब्राह्मणभागको वेदन मान किया है. फर परतंत्र प्रमाण मानते हैं, यह उत्तराई। उनका पक्ष छेदनकर मंत्रब्राह्मण दोनों का नाम वेद और दोनोंका स्व एकादशः समुल्लासः। तंत्र प्रमाण प्रतिपादन किया है. भूमिका. ३३६ अष्टमः समुल्लासः। मन्त्रमकरणम् चंदान्तकरणम्.... २७४ इसमें मंत्रसिद्धि वर्णन करके पुनः इममें सम्पूर्ण पेदातशाग्रफा आशय वेदान्तशास्त्रका प्रतिपादन किया है. श्रुतिद्वारा निर्णय किया है. कालिदासप्रकरणम् ३४५ आदिसृष्टिको उत्पति प्रकरणम् ....२९१ दयानंदनीने फालिदासको गडरिया स्वामीनीने सृष्टिकी दत्तति तिब्ब लिखाहै, इसका यथार्थ उत्तर दिया है. त मानकर पृथ्वीमा घूमना दामु. रुदासप्रकरणम् पाया मिथ्या अर्थलिस बहुत मं. रुद्राक्ष धारण करनेवालोंपर जो यो अर्थ लौटा दिये हैं उनका आक्षेप कियह उसका उत्तर दिपाद. टरार दे ययार्य अयाका प्रतिदिन नाममाहात्म्पमकरणम् ...३४८ कर प्रयम मृष्टिको उत्पति भारत म्वामीनी कहते हैं कि ईश्वरके नाम वर्षम प्रतिपादन की है। लेने से कुछ नहीं होता टसका खं- तपा भूमिसी पिरतामिट की है ३०१ डन कर नामी महिमा प्रतिपादन नवमः समुहासः। मुनिमकरणम् ३०२/भगवन्मर्तिपूजनमहामकरणम् सामानाने मुक्ती पुनराति मान. स्वामीनी कहते हैं मूर्तिपूना पदोंमें पर अनानिनन्मभरका काग नहीं पह सब क्या है यह उनका घाम पा पामी महाद इमम संहन पक्ष उंदन फर यहॉस देवमूर्तिमनन .... .... .... ....
पृष्ठांक. .... .... .... . ... .... (1३) विषय, पृष्ठांक. । विषय, छादि मतिपादन करी है मूर्ति- ज्योतिपशास्त्रान्तर्गतग्रहणप्रकरणम्४२ नमें युक्तिभी दी है..... ४०० जोकि ग्रहण स्वामीजीने अंगरेजोंकी সিক ४१८ रीतिपर लिखा है उसका उत्तर दे मीजी गंगादिके स्नानसे पुण्य प्राचीनरीति सिद्ध की है. मानते इसका उत्तर दे इनके 'गरुडपुराणप्रकरणम् नसे पुण्य प्राप्त होना प्रतिपादन নকগধু स्वामीजी व्रत रखनेका निषेध करते करणम् ४२३ सीजीने गुरुके अपराधी होनेपर हैं इसका खंडन फर व्रतविधि वेदादि शास्त्रोंसे प्रतिपादन फरी है. विधान किया है, यह निराकरण- ब्रह्माण्डप्रकरणम् गुरु दण्डके योग्य नहीं उसकी १५५ मा प्रतिपादन फरी है. इसमें सब लोकलोकांतरोंका प्रमा- प्रकरणम् ४२४ गविस्तार और उनके वासियों की पर जो अक्षेप किये हैं उनका आयु और जो कुछ इस ब्रह्माण्डान्त- दिया है, शिवपुराणका भी गत है, सबका वर्णन किया गया है, दिया है। स्वामीजीकृत वेदभाष्यका संक्षित तिप्रकरणम् ४२८ नमूना. ४६५ तके विषय में जो स्वामीजीने स्वामीजीके दश नियमोंका संडन १६७ की है उसका उत्तर दिया है वैदिकसिद्धान्तप्रकरणम् मफार और पुराणोंकाभी, इसमें पदिकसिद्धान्तोंका वर्णन है. डेयपुराणमशरणम् - ४४२ विशेष सुचना इति अनुक्रमणिका समाप्ता। .... .... .... .... ... ... ....
जिन २ ग्रन्योंका इसमें वर्णन है उनके नाम.
वेदे
मंत्रभाग
ऋक् यजुः साम अथर्व.
ब्राह्मणभाग
ऐतरेय शतपथ ताण्डय गोपथ.
उपनिषद्
ईश केन कठ प्रश्न मुण्ड माडूक्य तैत्तिरीय बृहदारण्यक छान्दोग्य.
धर्मशास्त्र
याज्ञवल्क्य. मनुस्मृति.
वेदांग
शिक्षा कल्प व्याकरण निरुक्त छन्द ज्योतिप,
दर्शन
न्याय २ योग सांख्य मीमांसा वेदान्त.
इतिहास
महाभारत
पुराण
भागवतादिमष्टादश,
रामायण
वाल्माकि,
वैद्यक
चरक मुश्रुत
2
जैसा गोरा गेहलतान सिंह
1
३
इति
दयानन्दतिमिरभास्करस्य
अनुक्रमणिका समाप्ता।
॥ श्रीः॥ अथ दयानन्दतिमिरभास्करः। ॐ यस्माजातं जगत्सर्वं यस्मिन्नेव विलीयते । येनेदं धार्यते चैव तस्मे ज्ञानात्मने नमः॥१॥ हरिः ॐ शनो मित्रःशं वरुणः शन्नो भवत्वर्यमा । शन इन्द्रो वृहस्पतिः शन्नो विष्णुरुरुक्रमः ।। नमो ब्रह्मणे नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि, त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिप्याभि, ऋतं वदिष्यामि, सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु, तद्वक्तारमवतु, अवतु माम्, अवतु वक्तारम्, ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १ ॥ (तैत्तरी०व० ) अर्थ-प्राणत्ति और दिवसका अभिमानी देवता मित्र हमको मुखकारी हो, अपान वृत्तिका और राधिका अभिमानी देवता वरुण हमको मुखकारी हो, चक्षु . १ यह मित्रादि शब्द पृथक देवताकि पाचक है इसमें प्रमाण- महिाणामयास्तु क्षमित्रस्यायेम्णः ॥ दुराधर्षवरुणम्य ।। यजु• अ० ३ म०३१ (मिमस्य ) प्राणत्ति और दिवतंक अधिष्ठात्री देवता मित्र (अपम्णः ) पशु वा मर्पक अधिष्ठात्री भर्षमा देवता (वरुणस्य) अपना और जली अधिष्ठात्री देवता वरुण (भीणाम् ) इन तानी देवताओंसे सम्बन्ध रखनेवाली ( महि ) पदी (क्षम् ) कान्तिमान मुगादिद्रपाल युक्त (दुराधर्षम् )तिरस्कार पानी अशस्य (भः) पालना मा रक्षा (मस्तु) हमको प्राप्त हो । इससे भगले मन्त्रमें लिखा है। तेहिपुवासो अदितः मनोवमेमत्यांया ज्योतिर्मन्छन्यनसमा य० अ० म०३३ यह तीनों देवता आदति के पुत्र है यजमानको सरग्ड तेज और दीर्घायु देते हैं। दया. नन्दने अपने वेदमाप्यम मिश्रा प्रागायु, सर्यमाका मूर्पयोर, वरुणा नद मर्थ किया है, प्राचीन सयाम इनके अधिष्ठात्री देता लिखे हैं इससे मिवादिस इंघरस मिनाही देता हेभोर यन्त देते हैं यह यापन है इसमें सत्यार्यप्रकाशा नर्थ ने शमानने किया है वह अशुद्धही है।
- दयानन्दतिमिरभास्करः। या सर्यका अभिमानी अपमा हमको मुगकारी ही, बलका अभिमानी इन्द्र और याणी और शुद्धिका अभिमानी बृहस्पति हमको सुखकारी ही, टरुकम-बलिरा- नास तीन पादपी याचनास सर्व राज्य ग्रहणके अर्थ विश्वरूप धारक विस्तीर्ण पादफे क्रमपाले चरणक अभिमानी विष्णु हमको मुखकारी हो, ब्रह्मरूप यायुके अर्थ नमस्कार. हे यायो ! तर निमित्त नमस्कार है, तूही चतु आदिकी अपेक्षा फरिक बाह्य समीप और अन्तरायस रहित प्रत्यक्ष ब्रह्म है, इस कारण मैं तुझेही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहताहूँ और जैसे शामें कहा है और जैसे फरनेको योग्य है, ऐसा शुद्धिमें सम्यक निश्चय किया अर्थ ऋत पहाता है, सा वह तेरे अधीन है इससे तुझे मात कहताहं याणी और शरीरसे सम्पादन हुआ जो सत्य है सोभी तेरे अधीन है, इस कारण तुझं सत्य फहताई, सी सर्वात्मा वायु नाम ईभर मुझसे म्नुतिको प्राप्त हुआ मुझ विद्या (ज्ञान) के अर्थीको विद्यास मुक्त कर रक्षा करा, मुझको रक्षा करो, पकाकी रक्षा करो, दो बार कथन आदरके हनु है, शांति हो शांति हो, शांति हो. तीन बार शांति करना, आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आपिदविक रूप जो विद्याकी प्राप्ति विप विन है तिनको निर्तिके अर्थ है, दया- नंदीने सत्यार्थप्रकाशमें इसका अन्यथा व्याख्यान किया है सो त्याज्य है । शांकर भा० ॥ अय सत्यार्थप्रकाशान्तर्गतप्रथमसमुल्लासस्य खण्डनं प्रारभ्यते मंगलाचरणप्रकरणम् । (सत्याथ० ) भूमिका पृ० १५१ से- ॐ सच्चिदानंदेश्वराय नमो नमः ॥ जिस समय मैंने यह ग्रंथ सत्यार्थप्रकाश बनाया था उस समय और उससे पूर्व संस्कृत भाषण करने पठन पाठनमें संस्कृ- तही बोलने और जन्मभूमिको भाषा गुजराती होनेके कारणसे मुझको इस भापाका विशेष परिज्ञान न था इससे भाषा अशुद्ध वनगई थी अब भापा बोलने और लिखनेका अभ्यास होगया है, इस लिये इस ग्रंथको भाषाभ्याकरणानुसार शुद्ध करकं दूसरी बार छपवाया है, कहीं २ शब्द वाक्यरचानाका भेद हुआ है सो करना उचित था क्यों कि, इसके भेद किये बिना भाषाकी परिपाटी सुधरनी फठिन थी, परन्तु अर्थका भेद नहीं किया गया है प्रत्युत विशेष तो लिखा गया है. हां, जो प्रथम छपनेमें कहीं २ भूल थी वह निकाल शोधकर ठीक ठीक करदी गई है । सन् १९१२ सम्वत् १९६९ पृ० १ समीक्षा-इस लेखसे पहला सत्यार्थप्रकाश गुजराती भापा मिश्रित विदित होता है किन्तु उसमें कोई गुजराती भापाका शब्द पाया नहीं .
जाता, मला वह तो अशुद्ध हो चुका पर अब यह तो आपके लेखानुसार सम्पूर्ण ही शुद्ध है, क्योंकि इसके बनानेके पूर्व न तो आपको लिखनाही आता था, न शुद्ध भापाही बोलनी आती थी, इससे यह भी सिद्ध होता है कि, इस सत्यार्यसे पूर्व रचित वेदभाष्यभूमिका तथा यजुर्वेदादि भाप्योंकी भाषाभी अशुद्ध होगी, क्योंकि शुद्ध भापाका ज्ञान तो आपको इस सत्यार्थप्रकाशके लिखनेके समय हुआ है और इसी कारण आप इसको निर्धान्त सत्य मानते हैं । स०प्र० पृ० ११ पं० ११ स ब्रह्मा सं विष्णुः स रुद्रः स शिवस्सोक्षरस्तपरमः। स्वराट् स इन्द्रस्सकालामिस्सचन्द्रमाः। कैवल्यउपनिपत्। अर्थ-सब जगत्के बनानेसे ब्रह्मा, सर्वत्र होनसे व्यापक विष्णु, दुष्ट्रांको दंड देके रुलानेसे रुद, मंगलमय और कल्याण कर्ता होनेसे शिव, जो सर्वत्र व्याप्त अविनाशी सो अक्षर, जो स्वयंप्रकाशस्वरूप नो स्वराष्ट्र, प्रलपमें सरका काल और कालकाभी काल होनसे उसका नाम कालामि वही चन्द्रमा है। पृ०५५७ फिर पृ० १५ पं० ११ में लिखते हैं कि, इस लिये मनुष्योंको योग्य है कि, परमे- वरहीकी स्तुति प्रार्थना उपासना कर उससे भिनकी कभी न करें. क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, महादेव नामक पूर्वन महाशय विद्वान, दैत्य दानवादि निकृष्ट मनुष्य और अन्य साधारण मनुष्योनभी उसीकी प्रार्थना की है अन्यकी नहीं । पृ. ८ । १७ समीक्षा-धन्य है स्वामीजी आप तो दशही उपनिषद् मानतेथे आज मतलब पड़ा तो फैवल्यमी मान बैठे, और प्रमाणसं ब्रह्मा, विष्णु, शिवको ईश्वर बताया और यहाँ उनको पूर्वज विद्वान् बतलाते होः इसमें कोई प्रमाण दिया होता कि, यह मनुष्य थे यदि प्रमाण नहीं मिलाया तो कोई उलटी सीधी संस्कृतही गढी होती, आपके चेले उसे पत्थरकी लकीर समझलेते, यह आपहीको योग्य है कि, ब्रह्मादिक ईश्वरके नाम बताकर फिर इन्हें एक विद्वान यतादिया, और यह अर्थ भी आपका अशुद्ध है । इसका अर्थ यह है कि वह ब्रह्मारूप होकर जगत्की रचना करता, विष्णुरूप हो पालन करता, रुद्ररूप हो दुष्टोंका कर्मफल भुगाकर * यह पाठ सत्यार्थप्रकाश वपासे अशुद्ध चला आता है वास्तवमें ( स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् स एव विष्णः स प्राणः स कालाग्निः स चन्द्रमाः) ऐसा पाठ है । अर्थ भी अशुद्ध किया है वही कार यही अग्नि है ऐसा अर्थ है आपने मालाग्नि ऐसा एक भर्य किया है। खं० १ श्रु० ८. १ भास्करप्रकाशमें वादी कहता है यह अर्थ कहांसे आया कि वह ब्रह्मारूप हो जगत रचता है ? उ. हमारे अर्थ तो वेदशास्त्रपुराणसे सिद्ध है पर यह पता कि जगदके बनानेसे ब्रह्मादि कहांसे भागया अक्षरार्थम तो वह ब्रह्मा यही विष्णु दिखाई देता है फिर वह विहान मनुष्य थे यह स्वामीजीक रेखका टकोसला कहांका है ?
(४) दयानन्दतिमिरभास्करः। रुलाता, शिव हो मंगल करता है, वही अक्षर स्वराद इन्द्र चन्द्रमा है और काला- मिरूप धारण कर प्रलय करता है, यह सब देवता उसीके रूप हैं नहीं तो आप वताइये कि, यह तीनों विद्वान् किनके पुत्र थे, जो कहो कि, स्वयं उत्पन्न होगये थे, तो आपका सृष्टि क्रम जाता रहेगा कि, माता पिताके विना कोई मनुष्य नहीं उत्पन्न होता, यही तो आपकी भंगकी तरंग है, जो जीवनचरित्र में लिखा है कि- मुझे भंग पानेकी ऐसी आदत थी कि दूसरे दिन होश होता था ।। स० प्र० पृ०४ पं०५ भूरसिभूमिरस्यदितिरसिविश्वधायाविश्वस्यभुवनस्यधर्ती । पृथिवींयच्छपृथिवीह पृथिवीं माहि७सीः। यजु०१३ मं १८ । इन्द्रोमह्नारोदसी पप्रथच्छव इंद्रः सूर्यमरोचयत् इन्द्रेहविश्वाभुवनानियेमिर इन्द्रेस्वानासइन्दवः । सामवेद ७प्र० ३ अ०८ सू० १६ अ० २ खण्ड ३सू०२मंत्र८॥ पृ. ५ पं० २१ में अर्थ जिसमें सब भूतप्राणी होते हैं इसलिये ईश्वरका नाम भूमि है शेषनामोंका अर्थ आगे लिखेंगे । इन्द्रोमहा इस मंत्रमें इन्द्र परमेवरहीका नाम है इसलिये यह प्रमाण लिखा है। समीक्षा-दयानन्दनी इन दोनों मन्त्रों में ईश्वरके नामोंकी संख्या लिखते हैं परन्तु एक २ नाम लिखकर शेपके लिये लिखते हैं कि, आगे व्याख्या करेंगे और व्याख्या कहीं भी नहीं की, भला जब इस मंत्रमें भूमि नाम ईश्वरका है तो (पृथिवी माहिंसीः ) पृथिवी नाम भी ईश्वरका होगा तो फिर दयानन्दनीफे मतानुसार यह अर्थ होगा कि है ईश्वर ईश्वरको मत मार समस्त सत्यार्थप्रकाश ऐसेही गपोडांस भरा पड़ा है हम इनका ययाय व्याख्यान दिखलाते हैं । आभूरसोत्यस्य विशिरा ऋषिः प्रस्तारपंक्तिग्छन्दःस्वयमातृणा देवता, हे स्वयमा. नृणे तुम (भूः) मुसोंकी भावना करनेवाली (भृमिः) भूमिनामसे प्रसिद्ध ( अमि) हो (वियथायाः) विश्वकै पुष्ट करनवाली (अदितिः) देवमाता अमि) ही (विश्रस्य ) सम्पूर्ण ( भुवनम्य ) संसारफी (धर्ती) धारण करन- वाली ( असि ) हो (पृथिवीम) पृथिवाको ( यच्छ)कृपा करकं देखा (पृथिवीम: भूमिभागको (ह) हट फग (पृथिवीम) पृथियोकी (माहि १७ मी. ) मत. पीडा दो । अब बुद्धिमान विचार कि यह मंत्र इभक नामांकी कथन करताह या इसमें दृमग उपदा है १८ । सामवेद मंत्रका अर्थ-(इन्द्रः ) इन्द्र ( महागेदमी पश्यन् ) अपन यलकी महिमाग दालक और पृथियारी पूर्ण करता हुआ (इन्दः) इन्ट (मयम) गहम Jn अयमसमुल्लासखण्डनम ढक सूर्यको (अरोचयत् ) प्रकाशित करता हुआ (इन्द्रे ) इन्द, (:ह) निश्चय (विश्वा ) सब (भुवनानि ) भुवन (यमिरे) ठहरे हुए हैं (स्वनासः) अभिपू- यमाण (इंदवः ) सोम (इंद्रे ) इंदमेंही नियमित होते हैं । उत्तरार्चिक अ०१६ खं१ मंत्र २ अब बुद्धिमान् विचारें कि इस मंत्रमें क्या ईश्वरको नामावलि है वा इंद्रकी महिमा कही है और ऊपरफा पताभी कितना विलक्षण है। स पृ० १६ पं०९ बृहत् शब्दपूर्वक पा रक्षणे धानुसे डतिप्रत्यय बृहत्के तका- रका लोप और सुडागम होनेसेबृहस्पतिशब्द सिद्ध होता है जो बडोंसे भी बड़ा और आकाशादि ब्रह्मांडोका स्वामी है इससे परमेश्वरका नाम बृहस्पति है ॥ ९ । १९ स. पृ० १७५० २८ दिबु क्रीडा, विजिगीपा, व्यवहार, द्युति, स्तुति, मोद, मद, स्वप्न, कान्ति, गतिपु, जो शुद्ध जगत्का क्रीडा फराचे, विजिगीपा धार्मिकोंको जितानकी इच्छा युक्त व्यवहार सब चेष्टाओंके साधनोपसाधनोंका दाता, द्युति स्वयंप्रकाशस्वरूप सरका प्रकाशक, स्तुति प्रशंसांक योग्य, मोद आप आनन्द- स्वरूप दूसरोंका आनंद देनहारा, मद.मदोन्मत्तांको ताडन करनेहारा ( यह अर्थ ती व्याकरणसे सिद्ध नहीं होता कि, मदोन्मतोंको ताडन करै किन्तु आपके प्रसं- गस यह अर्थ बनता है कि, आप मदोन्मत दूसरोंको मद करनेहारा ) कान्ति कामनाके योग्य, गति ज्ञानस्वरूप है इस लिपे परमेश्वरका नाम देव ११११४ "है इसी प्रकार देवोभी १७११७ परमेश्वरका नाम है पृ. २७ । ११ पृ० १९५२० आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः । ता यदस्या- यनं.पूर्व तेन नारायणः स्मृतः ॥ मनु० अ०१ श्लो १० जलनीवोंका नाम नारा है वे अयन अर्थात् वासस्थान हैं जिसका इस लिये सब जीवों में व्यापक परमात्माका नाम नारायण है ( यह अर्थभी अशुद्ध है इसका अर्थ तो यह है कि, जलको नारा इस कारण कहते हैं कि, नर जो परमात्मा उससे उत्पन्न हुआ है वह जल है प्रथमस्थान जिसका इस कारण परमात्माको नारायण कहते हैं ) ॥ १३ ॥ १२ स पृ० २१६० ७गृ शब्द इस धातुसे गुरु शब्द सिद्ध होता है जो सकल धर्मप्रतिपादक सकल विद्यायुक्त सब वदोंका उपदेश करता सत्र ब्रह्मादिककाभी गुरु जिसका नाश कभी नहीं होता इससे उसका नाम गुरु है (इसमें ब्रह्मादिककाभी गुरु यह पद स्वामीजीके परफा है) १५1५॥ स. पृ० १९ पं० २३.चदि आहादे इस धातुसे चन्द्र शब्द सिद्ध होताहै जों आनंदस्वरूप और सबको आनंद देनेहारा है इस कारण परमेश्वरका नाम चन्द्र है .
(६) दयानन्दतिमिरभाकरः। मगि गत्यर्थक धातुसे 'मंगरलच' इस सूत्रसे मंगलसद सिद्ध होताहै जो आप मंगल स्वरूप और सब जीयोंके मंगलका कारण है इस कारण उस परमधरका नाम मंगल है 'बुध अवगमन' इससे बुधशब्द सिद्ध होताहै जो स्वयंवोधवरूप और सर जीयाक बोधका कारण है इस लिये उस परमंथरका नाम सुध है ईशुचिर- प्रतीभाव इस धातुस शुक्रशब्द सिद्ध होता है जो अत्यन्त पवित्र निसकं संगसे जीवभी पवित्र होनात हैं इम लिय परमेश्वरका नाम शुक्र है 'चर गतिभक्षणयोः इस धातुसे शनम अव्यय उपपद हनिम शनैश्वर शब्दसिद्ध हुआ है जोसमें सह- जसे प्राप्त धैर्यवान है इससे उस परमेश्वरका नाम निश्वर है । रह त्यागे इस धातुसे राहु शब्द सिद्ध होताहै जो एकान्तस्वरूप जिसके बरूपमें दूसरा पदार्थ संयुक्त नहीं जो दुष्टोंको छोड़ने और अन्यको छुडानहारा है इससे उस परमेश्वरका नाम राहु है. 'कित निवास' इस धातुसे कनुशन्द सिद्ध होताहै जो सब रोगास रहित सब जगत्का निवासस्थान है और मुमुक्षुओंको मुक्तिसमयमें सब रोगोंसे छुड़ाता है इससे उस परमात्माका नाम केतु है (यह दोनों अर्थ अशुद्ध हैं)॥१४॥६ स० पृ० १४५०२५ 'दो अवखंडन' इस धातुसे अदिति और इससे तड़ित करनेसे आदित्य शब्द सिद्ध होताहै जिसका विनाश कभी नहीं हो इससे ईश्वरकी आदित्य संज्ञा है (यह अर्थभी अशुद्ध है किन्तु यहां दित्यादित्य० ४।११८५ से ण्य प्रत्यय है जो अदितिका अपत्य हो वह आदित्य है ) ॥८॥ स०पृ० २२ पं०२५ 'गण संख्यान' इस धातुसे गण शब्द सिद्ध होता है इसके आगे ईश और पति रखनेस गणेश और गणपति सिद्ध होते हैं जो प्रकृ त्यादि जड और सब जीव प्रख्यात पदार्थोंका स्वामी वह पालन करनेहारा है इससे परमेश्वरका नाम गणेश वा गणपति है ।। १६३२९ स० पृ० २३ पं० ४ शक्ल शक्ती इस धातुसे शक्तिशब्द बनताहै जो सब जगत्के बनाने में समर्थ है इस लिये उस परमेश्वरका नाम शक्ति है, 'भि सेवा- याम्' इस धातुसे श्रीशब्द सिद्ध होताहै जिसका सेवन सब जगत्के विद्वान योगी- जन करते हैं इससे उस परमेश्वरका नाम श्री है लक्ष दर्शनांकनयोः' इस धानुसे लक्ष्मी शब्द सिद्ध होताहै, जो सब चराचरं जगत्को देखता, चिहित अर्थात . दृश्य बनाता जैसे शरीरके नेत्र नासिका वृक्षक पत्र पुष्प फल मूल पृथ्वी जलके 'कृष्ण रक्त वेत मृत्तिका पापाण चंद्र सूर्यादि चित्र बनाता तथा सबको देखता सब शोभाओंकी शोभा और जो वेदादि शास्त्र वा धार्मिक विद्वान् योगियोंका लक्ष अर्थात् देखने योग्य है इससे उस परमभरका नाम लक्ष्मी है ‘स गती' इस धातुसे सरस और उससे मतुप् और डीप्प्रत्यय होनसे सरस्वती शब्द सिद्ध . 1.
. होताहै जिसको विविध ज्ञान अर्थात् शब्द अर्थ संबंध प्रयोगका ज्ञान यथावत् होवे. इससे उस परमेश्वरका नाम सरस्वती है १७ । २९ स० पृ० २५५०१० यः शिष्यते स शेपः जो उत्पत्ति प्रलयसे बच रहाहै इससे उसका नाम शेष है, तथा इसी पृष्ठको २७ पंक्ति में 'शिबु कल्याणे' इस धातुसे शिव शब्द सिद्ध होता है, जो कल्याण स्वरूप और कल्याणकारक है इस लिये उस परमेश्वरका नाम शिव है इस प्रकार परमेश्वरके सौ १०० नामका कथन किया है पुनः आपही फिर प्रश्न संबंधसे लिखते हैं * २० । १२ स. पृ. २६ पं० ८ (प्रभ) जैसे अन्य ग्रन्यकार लोग आदि मध्य और अन्तमें मंगलावरण करते हैं वैसा आपने न कुछ लिखा न किया (उत्तर) ऐसा हमको करना योग्य नहीं क्योंकि जो आदि मध्य और अन्त में मंगलाचरण फरेगा तो उस आदि मध्य अंतके वीचमें जो लेख हांगा वह अमंगलही रहेगा इसलिये मंगलावरण “ शिष्टाचारात् फलदर्शनाच्छुतिश्चेति ” यहभी सांख्यशा- स्त्रका वचन है. अभिप्राय यह है कि, जो न्याय पक्षपातरहित सत्ययेदोक्त ईश्वरका आज्ञा है उसीको यथावत् सर्वत्र और सदा आचरण करना मंगलाचरण फहाताहै ग्रंथके आरंभसे लेक समाप्तिपर्यन्त सत्याचारका करनाही मंगलाचरण फहाताहै न कि, कहीं अमंगल लिखना २० । २२ समीक्षा-धन्य है स्वामीनी आपके अर्थ और अभिप्रायको आप तो मंगलाचरण फरते जॉय और पटनेपर नहीं हैं यदि आप मंगलाचरण नहीं करते तो बताइये कि सत्यार्थप्रकाशभूमिकाक पहले "ओम सच्चिदानन्दश्वराय नमो नमः" और "अथ सत्यार्थप्रकाश" और "शनामिवादि" सत्यार्थप्रसाशंक प्रारम्भमें और अन्तमें५९२ पृष्ठमें फिर “शनामित्र इत्यादि" और यह सौ नाम परमेश्वरके किस आशयस लिखहैं तथा अपने वंदभाप्यंकप्रत्येक अध्यापक प्रारम्भमें "विभानिदेव" इत्यादि क्यों लिखाहै इससे आपके लेखानुसार यह विदित होताहै कि आपके घेदभाष्य तथा सत्यार्थप्रकाशमें धीव में अमंगलाचरणही है और सत्यभी है ऊप- रफे सांख्यसूचक टीकमें सत्यवेदोक्त ईभरकी आजा कहनी मंगलाचरण हैं और आपने पोपादि बहुतसे अपशब्द और दुर्वचन आगे इस पुस्तकम लिखेह जिनके उच्चारणकी आज्ञा वेदमें कहीं नहीं पाई जाती न उन शब्दोंका उच्चारण करना न्याय और निष्पक्षता संपादन करताहै इस लिखनेस जाना जाताहै कि, स्वामीजी प्रगटमें मंगलाचरणमे हितेहैं, और स्वयं घाही परिपारी ग्रहण करते हैं यदि • भा० प्रः पृ०६षादी कहता है कि इनका उत्तरदः ति: मा में नहीं है. (उत्तर) इनका उत्तर अच्छी तरहसे है यह भर्य मशुद्धभी बनाये है तथा पृ. ७ में इसका फल निकाला है इसको देखिये विरल आंख भीपना ठीक नहीं।
(८) दयानन्दतिमिरभास्करः। ऐसा न करते तो यह इनका मत भिन्न फैसे प्रतीत होता और सांख्यवचनका अर्थ यह है कि मंगलाचरणसे मंगल हाताहै यह शिष्टाचार है और इसका फलभी -दीखता है श्रुतिप्रमाण है. सत्या० पृ०२६५० २० इस लिये आधुनिक ग्रंथों में "श्रीगणेशाय नमः, सीता- तारामाभ्यां नमः, श्रीगुरुचरणारविंदाभ्यां नमः, शिवाय नमः, सरस्वत्यै नमः, नारायणाय नमः, श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः" इत्यादि देखनेमें आते हैं इनको बुद्धि- मान् लोग वेद और शास्त्रोंके विरुद्ध होनेसे मिथ्याही समझते हैं क्योंकि वेद और ऋषियोंके ग्रंथों में कहीं ऐसा मंगलाचरण देखने में नहीं आता और आग्रंथों में ती ओम् तथा अथ शब्द देखनमें आता है जैसे " अथ शब्दानुशासनम्" महाभाप्यमें "अथाता धर्मजिज्ञासा" मीमांसामें "अथातो धर्म व्याख्यास्यामः" वैशेषिक दर्शनमें अथ योगानुशासनम् " यांगमें " अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" वेदान्तमें "ओमित्येतदक्षरमुद्रीय उपासीत" छान्दोग्यमें यह वचन है जो ऋषि मुनियोंने ग्रन्थ बनाये हैं २१ । ७ स० पृ० २७ पं० ११ जो वैदिक लोग वेदके आरम्भमें हरिः ओम् लिखते हैं और पढ़ते हैं यह पौराणिक तांत्रिक लोगोंकी मिथ्या कल्पनासे सीखे हैं, वेदादि शान्त्रीको कहीं प्रथम हरि शब्द देखने में नहीं आता २२ । ८ समीक्षा-पिदित होताहै कि स्वामीजीको परमेश्वरके नाम कुछ ती प्रिय हैं और कुछ अमिय है इसमें जो माचीन लोगोंकी परिपाटी है इसका तो मंटना मानो इन्होंने नियमही कर लिया है देखिये प्रथम तो गणेश गुरु शिव सरस्वती नारायण शिव आदि नाम परत्मांक लिख जिनका उल्लेख हम पहले करके हैं, और अब यह कहते हैं कि, इनका विद्वान मिथ्याही समझते हैं, विद्वान तो मि- ध्या नहीं समझते हैं आप उनकी दोप,मत दीजिये यही कह दीनिये में मिप्पा समझताई हरियं नहीं आप तौछिको डरानुके हैं (जीवन) क्या यह आप पर- मगरंक नाम नहीं मानत जी मानते हो तो मिथ्या कस ? जो नहीं मानते तो पर- नभर १०. नामांम यह शब्द क्यों लिप इन्हेंभी बदमेंस निकाल डालो, फरिये क्या यदि आपकी चलनी तो प्राचीन महात्मानि नो मत्य पालना परम धर्म रिसा है आप उमकामी निष्य फरत परन्तु इममें चल नहीं मक्ती, और जैसे भापन धातुओंम परमभक नाम मिद किया है क्या 'गम मीडायाम" इम भातुसे राम और हति दुखानीति हरिः' मवमें रम ग्हाह वह राम है, भतार दुस हरनेमे परमधरका नाम हार है हर हरण मर्यानुभ्यइन् उणापा और "कृषि- जन परेन में लिया है मुत्से रीघ डरकर भागगया।
मयमतमुलासतान भवाचकः शब्दो णश्च नितिवाचकः । तयोरेक्यं परं ब्रह्म कृष्ण-इत्यभिधीयते॥ इस प्रकार कृष्णके अर्थभी तो ईश्वरहीके हैं या परमेश्वरको कोई अपना नाम यारा है कोई नहीं जो आप निषध करते हो, आप तो विद्वत्ताका दम भरते हो ईश्वरको पक्षपाती मत बनाओ कहिय परमेश्वरके यह नाम लेनेसे कौनसी देशोन्नतिम हानि होती है, यदि विचारा जाय तो जैसे प्राचीन ग्रंथों में विष्णु सहसनाम, शिवसहस्रनाम हैं वही आशय उभारकर यह आपनेभी शत नाम लिखे हैं भलानी ग्रंथकी आदिमें १०० नाम ईश्वरकं लिखना यह कौनसे वेदानुल हे प्रत्यक्ष लिख दंत कि, विष्णुसहस्रनामक स्थानम हमार शिष्य शतनामका पाठ किया करें, फिर यह कैसी बात है कि, अपन नामाको आपही मिथ्या करते ही शोक है आपकी बुद्धि पर, आप लिखते हैं कि वेद और ऋपियाक ग्रंथोंमें ऐसा मंगलाचरण देखनमें नहीं आता, इससभी विदित होता कि, ऐसा नहीं तो और प्रकारका तो देखने में आता है, तो आपने लिखाही है कि अथ ओम देखने में आते हैं सा उसी प्रकार आपनेभी अथ और ओम लिखा है तो आपनभी मंगलाचरण किया ( अब आपके ग्रंथके मध्य और अंतमें क्या है ) मुकरते क्यों हो मंगलाचरण करना कोई चोरी नहीं आदिमें ती अमिमीळे० इत्या. अमआयाहि पद प? हुए हैं आप वेदानुकूलही चलते हैं फिर अथ और ओम मंचमंहिताआमसें किसके अनुकूल लिखा है ॥ और हरि शब्दस तो कोई आपका बडा भारी द्वेष है फदाचित् फहीं इसके दूसरे अर्थवालसे भेंट तो नहीं होगई (जीवनचारित्र में तो भालू मिलाथा ) भयरे मार आपको परिमाण पाना कठिन होगया होगा तबसे उस नामसे ऐसा र्ज खट्टा हुआ कि, वह शब्द जिस में आरूढ हो उस उससेही भयभीत हो देव फरनलगे जैसा मार्गचको भय हुआ था (ग अस नाम सुनत दशकंधर, रहत मा नहिं मम उर अंतर ) और इसी कारण आप तांत्रिक पाराणिक लोगों पर डालकर उसे मिथ्या बताते ही ॥ कारप्रकरण। स. पृ. १ पं. १० (ओ३म् ) यह कार शब्द परमेश्ररका सर्वोत्तम नाम है, क्योंकि इसमें जो अ उम तीन अक्षर मिलकर एक (ओ ३ म्) समुः दाय हुआ है इस एक नाममे परमेश्वरके बहुत नाम आते हैं जैसे अकारसे विराष्ट्र १ कृपना =कृष्ण । इसिजिदीप्यविभ्यो नक र ३० पादः । २मास्क प्रापृ.६षादी मंगलाचरण स्वीकार करत हभप गुरुपेला में सच्चा कोन है। है और वेदकी .
1८) दयानन्दतिमिरभास्करः। . ऐसा न करते तो यह इनका मत भिन्न फैस प्रतीत होता और सांख्यवचनका अर्थ यह है कि मंगलाचरणसे मंगल होताह यह शिष्टाचार है और इसका पालभी दीखता है श्रुतिप्रमाण है. सत्या०पू०२६५०२० इस लिये आधुनिक ग्रंथाम "श्रीगणेशाय नमः, सीता- तारामाभ्यां नमः, श्रीगुरुचरणारविंदाभ्यां नमः, शिवाय नमः, सरस्वत्यै नमः, नारायणाय नमः, श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः" इत्यादि देखने में आत हैं इनको बुद्धि- मान लोग घेद और शास्त्रोंके विरुद्ध होनेस मिथ्याही समझते हैं क्योंकि वेद और ऋपियोंके ग्रंथों में कहीं पमा मंगलाचरण देखनमें नहीं आता और आर्पग्रंथों में तो ओम् तथा अथ शब्द देखनमें आता है जैसे " अथ शब्दानुशासनम्" महाभाप्यमें " अथातो धर्मनिज्ञासा" भीमांसामें "अथातो धर्म व्याख्यास्यामः॥ वैशेषिक दर्शनमें अथ योगानुशासनम् " योगमें " अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" चेदान्तमें "ओमित्येतदक्षरमुद्रीय उपासीत" छान्दोग्यमें यह वचन है जो ऋपि मुनियोंने ग्रन्थ बनाये हैं २१ । ७ स० पृ० २७ पं० ११ जो वैदिक लोग वेदके आरम्भमें हरिः आम् लिखते हैं और पढते हैं यह पौराणिक तांत्रिक लोगोंकी मिथ्या कल्पनासे सीखे हैं, वेदादि शानोंको कहीं प्रथम हरि शब्द देखने में नहीं आता २२ । ८ समीक्षा-विदित होताहै कि स्वामीजीको परमेश्वरके नाम कुछ तो प्रिय हैं और कुछ अप्रिय हैं इसमें जो प्राचीन लोगोंकी परिपाटी है इसका तो मेटना मानो इन्होंने नियमही कर लिया है देखिये प्रथम तो गणेश गुरु शिव सरस्वती नारायण शिव आदि नाम परत्माके लिखे जिनका उल्लेख हम पहले करचुके हैं, और अब यह कहते हैं कि, इनको विद्वान् मिथ्याही समझतेहैं, विद्वान तो मि- थ्या नहीं झते हैं आप उनको दोप,मत दीजिये यही कह दीजिये मैं मिथ्या समझताहूं डरिये नहीं आप तौ रीछको डरानुके हैं (जीवन०) क्या यह आप पर- मेघरके नाम नहीं मानते जो मानते हो तो मिथ्या कैसे? जो नहीं मानते तो पर- नेश्वर १०० नामोंमें यह शब्द क्यों लिखे इन्हेंभी वेदमेंसे निकाल डालो, करिये क्या यदि आपकी चलती तो प्राचीन महात्माओंने जो सत्य बोलना परम धर्म .लिखा है आप उसकाभी निषेध करत परन्तु इसमें चल नहीं सक्ती, और जैसे आपनें धातुओंसे परमेश्वरक नाम सिद्ध किय हैं क्या 'रमु क्रीडायाम्" इस धातुसे राम और हरति दुखानीति हरिः सबमें रम रहाहै वह राम है, भक्तोंके दुःख हरनेसे परमेश्वरका नाम हरि है हन्ट हरणे सर्वधातुभ्य इन उणा पा०४ और "कृषि- १ जीवनचरित्र में लिखाहे मुझसे रोडरकर भागगया ।
." प्रयमसमुल्लासखण्डनम् । भूवाचकः शब्दो पश्च नितिवाचकः । तयोरक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते' इस प्रकार कृष्णके अर्थभी तो ईश्वरहीके हैं या परमेश्वरको कोई अपना नाम यारा है कोई नहीं जो आप निषेध करते हो, आप तो विद्वत्ताका दम भरते हो ईश्वरको पक्षपाती मत बनाओ कहिये परमेश्वरके यह नाम लेनेसे कौनसी 'देशोन्नतिमें हानि होती है, यदि विचारा जाय तो जैसे प्राचीन ग्रंथों में विष्णु- सहस्रनाम, शिवसहस्त्रनाम हैं वही आशय उभारकर यह आपनेभी शत नाम लिखे हैं भलानी ग्रंथकी आदिमें १०० नाम ईश्वरके लिखना यह कौनसे वेदानुकूल हैं प्रत्यक्ष लिख देते कि, विष्णुसहस्त्रनामके स्थानम हमार शिष्य शतनामका पाठ किया करें, फिर यह कैसी बात है कि, अपन नामोंको आपही मिथ्या करते हो शोक है आपकी बुद्धि पर, आप लिखते हैं कि वेद और ऋषियाक ग्रंथोंमें ऐसा मंगलाचरण देखने में नहीं आता, इससभी विदित होताह ऐसा नहीं तो और प्रकारका तौ देखने में आता है, सो आपने लिखाही है कि अथ ओम् देखने में आते हैं सो उसी प्रकार आपनेभी अथ और ओम् लिखा है तो आपनेभी मंगलावरण किया (अब आपके ग्रंथके मध्य और अंतमें क्या है) मुकरते क्यों हो मंगलाचरण करना कोई चोरी नहीं है और वेदकी आदिमें तो अमिमीळे० इपेत्वा० अमआयाहि पद पडे हुए हैं आप वेदानुकूलही चलते हैं फिर अथ और ओम मंत्रसंहिताओंमेंसें किसके अनुकूल लिखा है। और हरि शब्दसे तो कोई आपका बड़ा भारी द्वेप है कदाचित् कहीं इसके दूसरे अर्थवालेसे भेंट तो नहीं होगई (जीवनचरित्रमें तो भालू मिलाथा ) भयके मार आपको परित्राण पाना कठिन होगया होगा तबसे उस नामसे ऐसा जी खट्टा हुआ कि, यह शब्द निस २ में आरूढ हो उस उससेही भयभीत. हो देय करनेलगे जैसा मारीचको भय हुआ था ( रा अस नाम सुनत दशकंधर, रहत प्राण नहिं मम उर अंतर ) और इसी कारण आप तांत्रिक पौराणिक लोगोंके ऊपर डालकर उसे मिथ्या बताते हो ॥ अंकारप्रकरण। स० पृ० १ पं० १० (ओ३म् ) यह ॐकार शब्द परमेश्वरका सर्वोत्तम नाम है, क्योंकि इसमें जो अ उम् तीन अक्षर मिलकर एक (ओ ३ म् ) समु- दाय हुआ है इस एक नामस परमेश्वरके बहुत नाम आते हैं जैसे अकारसे विराद १ कृपना-कृष्ण । इसिजिदीडंप्यविभ्यो नक उणा ३० पादः । २ भास्कः प्रापृ.६वादी मंगलाचरण स्वीकार करताह भव गुरुचेलों में सच्चा कोन है।
(१०) दयानन्दतिमिरभास्करः। अमि और विश्वादि, उकारसे हिरण्यगर्भ वायु और तैजसादि, मकार ईश्वर आदित्य और प्राज्ञादि नामोंका वाचक और ग्राहक है उसका ऐसाही वेदादिक सत्य शास्त्रोंमें स्पष्ट व्याख्यान किया है ॥२।१ समीक्षा-स्वामीजीकी वेदज्ञता तो इस ॐकारक अर्थनिरूपणसेही सजन पुरुप जान लेंगे कि, प्रथम ग्रासमेंही मक्षिकापात हुआ, अब देखना चाहिये कि, प्रणवकी व्याख्या अनन्त प्रकारसे वेदादि शास्त्रोंमें प्रसिद्ध है, परन्तु स्वामीजीने अपने अर्थको पुष्टिमें एकभी प्रमाण नहीं लिखा भला यह कौनसा मंत्र है जिसमें स्वामीनकि लिखे उक्त अर्थ लिखे हैं ॐकारके ऐसे अर्थका प्रति- पादक मंत्र न ब्राह्मण न शास्त्र न पुराणमें एकभी नहीं मिलनेका ऋग्वेदमें इस प्रकार कथन है। ऋचोअक्षरेपरमेव्योमन्यस्मिन्देवाआधिविश्वेनिपेदुः। यस्तन्नवेदकिमृचाकरिप्यतियइत्तद्विदुस्तइमेसमासते। ऋ मं० १ सू० १६४ मं० ३९ इति विदुष उपदिशति कतमत्तदेतदक्षरमामित्येण यागिति शाकपाणिची वक्षरे परम व्ययने धीयन्ते नानार्दवतेषु च मययतया एतदक्षरं यत्सा त्रयीं विद्या प्रति प्रतीति च ब्राह्मणम् निरुतः अ. १३ पा० ५ सं० १० परिशिष्टे. प्रभाष्यम् फतमत् तदक्षरं इति ॐ इत्यपा चार इति शाकपूर्णः अभिप्रायः ॐ फारमृतन धर्चयन्ति तस्या अक्षर परमं व्योमन् व्योम विविधमस्मिन्छन्द- जातमातमिति व्याम तस्मिन तिसपु मावामु अकारोकारमकारलक्षणामूपशा. न्तामु पदयारीप्यते तदक्ष परमं व्योम शब्दसामान्यमभिव्यक्तमित्यभिप्रायः ॥ यस्मिन्देवा अधिनिपाणाः सर्य अगादिषु ये देवाःते मंदारणाक्षर निषाणाः तस्य शब्दकारणत्यात् अथवा प्रथमार्या मानायां पृथियरी अमिः ऋग्वेदः पृथिवाटारनिवासिन इत्येवं द्वितीया मायायाम • अन्तरिक्षम यायुः पपि तल्लारनिवामिनो नना इति ततीयायां मानायां धोः आदित्यः मामानि तालो. फनिशामिनी जना इति विज्ञापन हि ॐकार एवं मर्यम इति पस्तन मंद अनाया भिन्याक्षरग किमी ऋचा ऋगादिभिमत्रः फरिष्यति यानवाक्षरान्मना पश्यति।यदिदम्न मंगमासने इति विदुपटपदिशति त हि तपरिज्ञानासाहा. १ भाद्रपदी कहता है यह निरस्त कर मंदार रिसाहे उसको यह भी नहीं दीक्षा शिविर कानक मिलाप इससे पहले भार क्या है यया कमी अक्षर पामे याने पनि देश निकास परत न कि म कदा वरिष्यात य इन दम पर रियरमा है । धन्य पात्रा प्रथमसमुल्लासखण्डनम्। ध्येमुपगताः प्रणवविग्रहमात्मानमनुप्रविश्य समीकृता निर्वान्ति शान्ताविप इवानला इति।। पद-ऋचः अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवाः अधिविश्वे निपेदुः यः तत् न वेद किम् ऋचा कारष्यति ये इत् तत् विदुः ते इमे समासते ॥३॥ भावार्थ-इस मंत्रका व्याख्यान ॐकारपरत्व तथा आदित्यपरत्व तथा आत्म- तत्त्वपरता है, तिसमें प्रथमशाकणि नामक निरुक्तकारके मतसे ॐकार परतां निर्णय करते हैं (प्रभ) जिस परम व्योम संज्ञक अक्षरमें देवादि स्थित है सो अक्षर कौन हैं (उत्तर) ॐ यह वाक् नाम शब्द परम उत्कृष्ट (व्योमन्:) नाम सर्वकी रक्षा करनेवाला जो ॐकार है तिसमेंही सम्पूर्ण ऋग्वेदादि मन्त्र अध्ययन किये जाते हैं और जो अनेक देवता हैं वे सर्व मंत्रों में स्थित हैं और मंत्रों में कारण होनेसे यह अक्षर व्याप्त है, क्योंकि सर्व वेदत्रयी विद्या प्रति यह अक्षर व्याप्त है, ऐसे ब्राह्मण भी प्रतिपादन करता है भाव यह है ओंकार विना ऋगादि मंत्रोंका उच्चारण नहीं होता इससे व्योमसंजक जो अक्षर है तिसमें नानाविध शब्दममूह स्थित हैं (मन ) मंत्र तथा ओंकार शब्दरूप है इससे यह दोनों आकाशमें स्थित हैं पावत् शब्द समूह ओंकारमें स्थित फैसे कहते हो ? ( उत्तर ) ओंकार नाम यह अकारदि मायार शान्त होते जी परिशेप रहता है शब्द सामान्य व्योम, नामक अक्षर उसका है इससे तिस अक्षर शब्द सामान्य नादरुप ऑफारमें यावत् मंत्र स्थित हैं और उसमें सर्व देवता स्थित हैं, क्योंकि मंत्रोंमें देवता स्थित हैं और मंत्र पूर्वोक्त नाद नामक अक्षरमें स्थित है, इससे मंत्र द्वारा मव देवता भी अक्षरमें स्थित है अथवा प्रथम मात्रा में पृथ्वीलोक अमि ऋग्वेद और पृथ्वीलोकनियामी जन स्थित है और द्वितीयभात्रामें अन्तरिक्ष यायु यजुर्मर और अन्तरिक्षलोक निवासी जन स्थित हैं, और नृतीप मात्राम गुलोक आदित्य माम मंत्र और स्वर्गलोकनिवासी नन् स्थित हैं इसी कारण मदृिश्य उपनिषदमें (ओंकार एवेदं सर्वम् ) यह कहा है जो इस विभूतिसहित अक्षरको नहीं जानता मी ऋगादि मंगोसे क्या फैरेंगा ? अर्थात् विना ओंकारक जाने और उमर अर्थ जान से घेदक मय फल नहीं देंगे, और जो पुरुष उक्त रूप नाद विभूतिमहित अक्षरको जानते हैं ये पुरुष (समामते) प्रणव ज्ञानमे अक्षर भारको मान ईये अपने आत्मा- फी प्रणवरुप निश्चय करकं प्रणवमें प्रविष्ट होकर ममताको प्रात ही शान्तन्याल अमिवत् (नियान्ति नाम निवांणपदम मोक्षं प्राप्नुवन्ति ) निरीण मान होते हैं अथवा मुन्नः होते हैं, आदित्य पहमें यह अर्थ है कि, निमव्यांमम्पपाम सम्प (१०) दयानन्दतिमिरभाकरः। अनि और विश्रादि, उकारसे हिरण्यगर्भ वायुऔर तैनसादि, मकार ईश्वर आदित्य और प्राज्ञादि नामोंका याचक और ग्राहक है टसफा ऐसाही वदादिक सत्य शास्त्रों में स्पष्ट ध्याख्यान किया है ॥ समीक्षा-स्वामीजीकी पदज्ञता तो इस कारक अर्थनिरूपणसंही सजन पुरुष जान लेंगे कि, प्रथम ग्रासही मक्षिकापात हुआ, अब देखना चाहिये कि, प्रणवकी व्याख्या अनन्त प्रकारसं वदादि शात्रोंमें प्रसिद्ध है, परन्तु स्वामीजीने अपने अर्थको पुष्टिमें एकभी प्रमाण नहीं लिखा भला वह कौनसा मंत्र है जिसमें स्वामीकि लिखे उक्त अर्थ लिखे हैं *कारक ऐसे अर्थका प्रति- पादक मंत्र न ब्राह्मण न शास्त्र न पुराणमें एकभी नहीं मिलंनका ऋग्वेदमें इस प्रकार कथन है। ऋचोअक्षरेपरमेव्योमन्यस्मिन्देवाधिविश्वनिपेदुः। यस्तन्नवेदकिमृचाकारप्यतियइत्तद्विदुस्तइमेसमासते॥ ऋ०म० १ सू० १६४ मं० ३९ इति विदुप उपदिशति कतमत्तदेतदक्षरमोमिया यागिति शाफपूणिचो ह्यक्षरे परमे व्यवने धीयन्ते नानादैवतेषु च मंत्रप्वेतवा एतदक्षरं यत्सा त्रयों विद्या प्रति प्रतीति च ब्राह्मणम् निरुक्त अ० १३ पा० ५ खं० १० परिशिष्टे. प्र भाप्यम् कतमत् तदक्षरं इति ॐ इत्येया वार इति शाकपूणेः अभिमायः ॐ कारमृतेन ह्यर्चयन्ति तस्या अक्षरे परमं व्योमन् व्योम विविधमस्मिन्छन्द- जातमोतमिति व्योम तस्मिन् तिसृपु मात्रासु अकारोकारमकारलक्षणासूपशा- न्तासु यदवाशिष्यते तदक्षरं परमं व्योम शब्दसामान्यमभिव्यक्तमित्यभिप्रायः ॥ यस्मिन्देवा अधिनिपण्णाः सर्वे ऋगादिषु ये देवाः ते मंत्रद्वारेणाक्षरे निषण्णाः शब्दकारणत्वात् अथवा प्रथमायां मानायां पृथिवी अमिः ऋग्वेदः पृथिवीलोकनिवासिन इत्येवं द्वितीयायां मात्रायाम् . अन्तरिक्षम् वायुः यजूंपि तल्लोकनिवासिनो जना इति नतीयायां मात्रायां द्योः आदित्यः सामानि तल्लो- कनिवासिनो जना इति विज्ञायते हि ॐकार एवेदं सर्वम् इति यस्तन्न वेद अनया विभूत्याक्षरम् किमसौ ऋचा ऋगादिभित्रैः करिष्यति यस्तन्नाक्षरात्मना पश्यति। य इत्तद्विदुस्त इमेसमासते इति विदुप उपदिशति ते हि तत्परिज्ञानातादा- १ मा० प्र. वादी कहता है यह निरुक्त कुछ छोडकर लिखा है उसको यह भी नहीं दीखा कि विवरण करनेके सिवाय इससे पहले और क्या है यथा ऋचो अक्षर परमे व्यवने यास्मन् देवा भाधनिषष्णा सर्वे यस्तं न वेद किं स ऋचा करिष्यति य इत्तदि. इसमें पद. विवरणके सिवाय और क्या है । धन्य पक्षपात । तस्य प्रयमसमुल्लासखण्डनम् । (११) व्यमुपगताः प्रणवविग्रहमात्मानमनुप्राविश्य समीकृता निर्वान्ति शान्तापि इवानला इति ॥ पद-ऋचः अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवाः अधिविश्वे निपेदुः यः तत् न वेद किम् ऋचा कारष्यति ये इत् तत् विदुः ते इमे समासते ॥ २० ॥ भावार्थ-इस मंत्रका व्याख्यान ॐकारपरत्व तथा आदित्यपरत्व तथा आत्म- तत्त्वपरतामें है, तिसमेंसे प्रथमशाकपूणि नामक निरुक्तकारके मतसे ॐकार परतां निर्णय करते हैं (प्रभ ) जिस परम व्योम संज्ञक अक्षरमें देवादिः स्थित हैं सो अक्षर कौन हैं (उत्तर) ॐ यह वार नाम शब्द परम उत्कृष्ट (व्योमन्:) नाम सर्वकी रक्षा करनेवाला जो ॐकार है तिसमेंही सम्पूर्ण ऋग्वेदादि मन्त्र अध्ययन किये जाते हैं और जो अनेक देवता हैं वे सर्व मंत्रों में स्थित हैं और मंत्रोंमें कारण होनेसे यह अक्षर व्याप्त है, क्योंकि सर्व वेदत्रयो विद्याक प्रति यह अक्षर व्याप्त है, ऐसे ब्राह्मण भी प्रतिपादन करता है भाव यह है ओंकार विना ऋगादि मंत्रोंका उच्चारण नहीं होता इससे व्योमसंज्ञक जो अक्षर है तिसमें नानाविध शब्दसमूह स्थित हैं (प्रभ) मंत्र तथा ओंकार शब्दरूप है इससे यह दोनों आकाशमें स्थित हैं यावत् शब्द समूह ओंकारमें स्थित कैसे कहते हो ? (उत्तर ) ओंकार नाम यह अकारदि मावाके शान्त होते जो परिशेष रहता है शब्द सामान्य व्योम, नामक अक्षर उसका है इससे तिस अक्षर शब्द सामान्य नादरूप ओंकारमें यावत् मंत्र स्थित हैं और उसमें सर्व देवता स्थित हैं, क्योंकि मंत्रोंमें देवता स्थित हैं और मंत्र पूर्वोक्त नाद नामक अक्षरमें स्थित हैं, इससे मंत्र द्वारा सर देवता भी अक्षरमें स्थित हैं अथवा प्रथम मात्रामें पृथ्वीलोक अभि ऋग्वेद और पृथ्वीलोकनिवासी जन स्थित हैं और द्वितीयमात्रामें अन्तरिक्ष वायु यजुर्मत्र और अन्तरिक्षलोक निवासी जन स्थित हैं, और नृतीय मात्रामें घुलोक आदित्य साम मंत्र और स्वर्गलोकनिवासी जन स्थित हैं इसी कारण मांडक्य उपनिषदमें (ओंकार एवेदं सर्वम्) यह कहा है जो इस विभूतिसहित अक्षरको नहीं जानता सो अगादि मंत्रोंसे क्या फरैगा ? अर्थात् विना ओंकारक माने और उसके अर्थ जाने उसे घेदके मंत्र फल नहीं देंगे, और जो पुरुष उक्त रूप नाद विभूतिसहित अक्षरको जानते हैं व पुरुष (समासते) प्रणव ज्ञानसे अक्षर भावको पात हुये अपने आत्मा- फो प्रणयरूप निश्चय करके प्रणवमें प्रविष्ट होकर समताको प्राप्त हो शान्तन्वाल अभिवत् ( निर्वान्ति नाम निर्वाणपदम् मोक्ष प्राप्नुवन्ति) . पन मान होते हैं: अथवा मुक्त होते हैं, आदित्य पक्षम,यह अर्थ एम अग्रूप.
दयानन्दतिमिरभास्करः। आदित्यमें सब देवता स्थित हैं मंत्र द्वारा तिस आदित्यको जो नहीं जानतेय ऋगादि मंत्रोंको क्या करेंग ये इत् नाम पय तिस आदित्यको जानते हैं ये पुरुपही विदजन भूमिमें मुखपूर्वक रांगादिरहित भागसम्पन्न चिरकाल जीवते हैं मादृश्य उपनिषदमें इस प्रकार लिखा है ।। ओमित्येतदक्षरमिद ५ सवतस्योपव्याख्यानभूतंभवद्रवि. यदितिसर्वमोङ्कारएव यच्चान्यविकालातीतं तदप्योंका- रएव ॥ मां मं० ॥१॥ अर्थ-ओं इस प्रकारका यह अक्षर यह सर्व है पंस कहते हैं जो यह विषय रूप अर्थका समूह है तिसका नामम अभिन्न हानसे और नामका ओंकारस अभिन्न होनेसे ओंकारही यह सर्व है. और जो परब्रह्म नामक कथनरूप उपायपूर्वकहीं जानने योग्य हैं सो ओंकारही है, तिस इसपर और अपर ब्रह्मरूप ओं इस प्रकारके अक्षरका ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय हानसे ब्रह्मके समीप होनस विस्पष्ट कथनरूप प्रसंगविप प्राप्त जो उपन्याख्यान है सो जाननेका योग्य है, उक्तं न्यायसे भूत भविष्यत् और वर्तमान इन तीनों कालोंसे परिच्छेद करनेको योग्य जो वस्तु है सो भी यह ओंकारही है और अन्य जो तीन कालसे भिन्न कार्यरूप लिंगसे जानने योग्य और कालसे परिच्छेद करनेको अयोग्य अव्याकृत आदिक है सोभी ओंकारही है इहां नाम ( वाचक) और नामी वाच्य की एकताके हुएभी नामकी प्रधानतासे यह निर्देश किया है ।। सोऽयमात्माऽध्यक्षरमोङ्कारोधिमात्रम् पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति ॥२॥ जो वाच्यकी प्रधानतावाला ॐकार चारों पादवाला आत्मा है एसा पूर्व व्याख्यान किया है यथा (सर्व ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोयमात्मा चतुप्पात् ) सर्व ( कारण और कार्य ) ही यह ब्रह्म है, सर्व जा ॐकार मात्र है ऐसे श्रुतिने कहा है सो यह ब्रह्म है, यह आत्मा ब्रह्म है सो यह ॐकारका (वाच्य) और पर (अधिष्ठान ) और अपर (प्रत्यगात्मा) रूप हानेस स्थित हुआ आत्मा चार पावाला है, सो यह आत्मा अध्यक्षर है वाचककी प्रधानतासे अक्षरको आश्रप करके वर्णन किया है। इससे अध्यक्षर कहा है फिर वह अक्षर क्या है इसपर कहते हैं सो अक्षर ॐकार है सो यह ॐकार (पाद) चरणोंसे विभागका पाया हुआ अधिमान है, जिस कारण मात्राको आश्रय करके वर्तता है इससे अधिमात्र कहते हैं (प्रभ) आत्माही पादोंसे विभागको प्राप्त होताहै, और मात्राको प्रथमसमुल्लासखण्डनम् । आश्रय फरके ॐकार स्थित होता है, इस कारण पादसे विभागको प्राप्त हुए ॐकार- का अधिमानपना कैसे है उसपर कहते हैं आत्माके जो पाद हैं वे ॐकारको मावा हैं और ॐकारकी जो मात्रा हैं वे आत्माके पाद हैं, इससे पाद भौर मावाकी एकतासे यह कथन अविरुद्ध है कौनसी चे ॐकारको मात्रा हैं उसपर कहते हैं अकार उकार मकार यह तीन ॐकारकी मात्रा हैं ।। जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारःप्रथमा मात्राऽऽतेरादिमत्त्वादाऽऽ- मोति ह वै सर्वान् कामानादिश्च भवति य एवं वेद ।माइक्य०९॥ जो जागरित स्थानवाला वैश्वानर है सो ॐकारकी अकाररूप प्रथम मात्रा है, किस तुल्यतासे दोनोंकी एकता है इसपर कहते हैं व्याप्तिसे वा आदिवाले होनेसे जैसे अकारसे सर्व प्राणी व्यात हैं तैसे वैश्वानरसे जगत् व्याप्त है “तिस प्रसिद्ध इस वैश्वानरस्प आत्माका मम्तक ही म्वर्ग है" इत्यादि श्रुतियोंके वाक्यसे वाच्य वाचककी एकताको हम कहते हैं जिसकी आदि है सो आदिवाला कहात्ताह तसही आदिवाला अकार नाम अक्षर है तैसही आदिवाला वैभानर है इस कारण तुल्यता होनेसे वैधानरको अकारपना है अब इनकी एकताकं ज्ञाताको फल फहते हैं जो ऐसे उक्त प्रकारकी वैश्वानर और अकारकी एकताको जानताहै, सो निश्चय ही सब भागांको पाता है और वही बडे पुरुक बीच में प्रथम होता है ।। स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीयामाचोत्कदुभयत्वा- द्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्तति समानश्च भवति नास्याब्रह्म- विकुले भवति य एवं वेद ॥ माण्डूक्य० ॥ १० ॥ जो स्वमस्थानकाला तैजस है सो कारकी उकाररूप द्वितीय माना है दोनोंकी एकता फैसे है सो कहते है-उत्रूपसे या उभय (द्वितीय) रूप होनम नम अकारसे उकार पाठ क्रमसे उत्कृष्ट है, तेस स्थल उपाधिवाले विधमे सूक्ष्म उपाधिवाला तेजस उत्कृष्ट है, तिस उत्कर्षसे इनकी एकता है या जैस अकार और मकारके मध्यपि स्थित उकार है तेस विध और माबर मध्यमें तैनम है, इसमे तिनको उभपम्पताको तुल्यता एकता है, अब तिनी एकतारं ज्ञाताको जो फाल होताह सो कहतेहैं जो पैम जानता सा.ज्ञानकी संततिको बहाना है और तुन्य होता है, मियक पलकी नाई शटक पक्षक मध्यम द्वेष करने अयोग्य होता है और इसरं कुलमें अब्रह्मवेत्ता नहीं होते हैं । सुपुप्तस्थानःप्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतर्वा मिनोति हवा इद सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ।।मांडक्य० ॥११॥ जो मुषप्ति स्थानबाटामाज्ञ है सो अंकारी मगररूप तनीय माना है इस दयानन्दतिमिरभाकर नुल्पनासे दानांनी पाता है उसमें यहाँ कि, परिमागरी या पकतामे पहा दानांनी समानता हे प्रम्य (पापपरिमाणी पाय) में गर धान्य परिमाग (माप)नाई जगलप और उपनिमश और निफ्लम प्राजमविभ आरतनम पांग्माग किंगना हाती तग अकार और कार यह दोनों लक्षाकाकी समातिमें और फिर उमाण मिझार प्रग कर निकलते दुपा ममान हान . मग माग पग्मिाग यिनी समान होते हैं इमर्म इन दोनोमी तुल्यताग पाना है अपना गैम का उभारण किंय मझाररूप अंतक असा प्रकार और कार यह दोनों पाप हुी समान होत हैं इमी प्रकार विभ और तेगम मुनिकालमें मात विष पपरप यकी नाई होते हैं इसमे तुल्प होनस प्राज और मकाकी पाना है अब इनकी पकनारे ज्ञाताको फल फहते हैं, जो पंग गाननहि सा निधय पर इम सब जगतको यथार्थ जानना है और जगतका कारणम्प होताई यहां धीचा ( अयानर ) फलका कयन , मुल्यमाधनको म्नुतिके अर्थ ॥ अमानश्चतुथींऽव्यवहार्यःप्रपंचोपशमः शिवोऽदेत एव- मोंकार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद य एवं वेद ॥ माण्डूक्य० ॥१२॥ निसको मात्रा नहीं है एसा जी ॐफार सो अमान है और चतुर्थ अर्थात् . तुरीयरूप हुआ फेवल आत्मा ही है और याच्यवावकरूप वाणी और मनको मृताज्ञान क्षयंस क्षीण होनसे व्यवहार करंनको अपोग्य है और प्रपंचक उपशम- वाला है और शिव ( कल्याणरूप) है और अंत है ऐसे उक्त प्रकारके ज्ञानवाले पुरुपंस उच्चारण किया हुआ कार तीन मानावाला और तीन पादवाला आत्माही हे, जो ऐसे जानता है . जो ऐसे जानताहै सो अपनही आत्मासे अपने परमार्थरूप आत्मामें प्रवेश करताहै, अर्थात् मुधुप्ति नामक तीसरे स्थानरूप चीजभावका दग्ध करके परमार्थदर्शी ब्रह्मवत्ता पुरुषोंकि आत्माके अर्थ प्रवेश पायाहुआ फिर जन्म नहीं पाता, काहेसे कि तुरीयको अवीजरूप होनेसे, जैसे रज्जू और सर्पके विवेकके होनम रस्सीके विप प्रवेशको पाया सर्प फिर तिन विवेकी पुरुषोंको भ्रान्तिज्ञानके संसारसे पूर्वकी समान नहीं होता तैसे यहां भी जानना, साधक भावको प्राप्त हुए और सन्मार्गमें वर्तनेवाले मात्रा और पादोंको निश्चित तुल्यता जाननेवाले संन्यासी जनोंको तो यथार्थ उपासना किया. हुआ ॐकार ब्रह्मकी प्राप्तिके अर्थ आश्रय होताही है, इस प्रकार स्वामी शंकराचार्य- जीने मांडूक्यउपनिषट्पर ॐकारका भाप्य किया है । इसी प्रकार द्वितीयसमुल्लासखण्डनम् । (१५) और भी उपनिषदाम वर्णन है यह केवल दिग्दर्शनमात्र है. परन्तु स्वामी दयानंद- जीका किया अर्थ किसी भी ग्रंयके अनुसार नहीं है, इस कारण सत्यार्थप्रकाशमें यह ओंकारका अर्थ मिथ्या ही जानना बुद्धिमानोंको उचित है कि दयानन्द वा उनके अनुयायियोंके वाग्जालसे सावधान रहें * ॥ इति श्रीदयानंदतिमिरमास्करे मत्यार्यप्रकाशान्तर्गतप्रथमसमुल्लासस्य खंडनं समारम् । समाप्तश्चेदमीश्वरनामप्रकरणम् । श्रीगणेशाय नमः। अथ सत्यार्थप्रकाशान्तर्गतद्वितीयसमुल्लासस्य खण्डनम् । शिक्षामकरणम् । स० ० पृ. २८५० १० धन्य है वोह माता जी गर्भाधानसे लेकर जबतक पूरी विद्या न हो सुशीलताका उपदेश फरै २३ ॥ १०॥ समीक्षा यहाँ ती स्वामीजीको विलक्षगदि होगई जो लिखा कि "गर्भा- पानसे लेकर जबतक पूरी विद्या न हो मुशीलताका उपदेश करे" भला ! गर्भा- भान, मुशीलताका उपदेश किस प्रकार होसक्ताहै हो यदि वालकके पुष्टि होनेको कई औषधी लिखते तो ठीक होता कि, गर्भमें वालककी पुष्टि होना संदेवकाल अच्छा है उपदेश ती 'सत्यं यद धर्म चर इस प्रकार उपनिषदों में कहे हैं क्या दया- नन्दियाको गर्भमें उपदेश दिये जाते हैं क्या रजवार्य मिलतेही उपदेश-समझनेकी शत्ति आजाती है। स० प्र० पृ. २८ पं० १६ जैसा अनुगमनको विधिका समय है कि, रजोदर्शनके पांच दिवससे लेके सोलहवें दिवसतक अनुदान देने का समय है उन दिनों में मयमरे चार दिन त्याज्य ह रहे बारह दिन उनमें एकादर्शी और प्रयोदशी खडके वाकीमें गर्भाधान करना २३ । १६ । समीक्षा-क्यों साहब क्या ? यह आपका लेख जो मनुस्मृतिस टद्धृत किया है ज्योतिष विधासे सम्बन्ध रखता है या नहीं और ज्योतिप किसको कहते हैं यह रावि त्याम्प इसी कारण है कि, इनमें गर्भाधान फरनेसे दुष्ट संतान उत्पन्न होती है और शेष राधियों में श्रेष्ठ संतान उत्पन्न होती है, तथा युग्म रात्रियों में पुत्र अपुग्म पन्पा होना मनुनीने लिखा है, त्याज्यरात्रियोंमें गर्भाधान करनेसे दुष्ट संतान और मशस्त रानियों में श्रेष्ट संतानका होना यह फल नहीं तो और क्या है, आप फल मानते भी नहीं और यहाँ यह गुप्त लिख भी दिया । यदि इन लयापर भाः मा वादीसे कुछ कहते न यना मौन हो वैठा। . .
दयानन्दतिमिरभास्करः। एकादशीको रजोधर्म हो तो यारह दिन निखर्चे बचे । स० पृ२९ पं० २० स्त्र योनिमंकोच शोधन और पुरुप वीर्यस्तम्भन कर-२४।२४ । समीक्षा-शिक्षा तो इसीका नाम है परन्तु इसमें संकोचनको औषधी आपने क्यों नहीं लिखी आपकी शिक्षा माननेहारी स्त्रियें हाथही 'मलती रह जायँगी क्योंकि स्त्रिये संकोचन किस प्रकार करें यह आपने नहीं लिखा यदि आप औषधी लिख देते तो विषयी स्त्रीपुरुष आपसे बहुत प्रसन्न होते. क्योंकि यह आपको अच्छी तरह ज्ञात है कि, विना संकोचन स्त्री पुरुषोंको आनन्द कमती होताहै कामशास्त्र में भी आपका बडा अभ्यास है पर यह तौ कहिये कि, यह शिक्षा स्त्रियोंसे कौन कर आप या उनके माता पिता ॥ स. प्र. पृ० ३० पं० ४ उपस्थेन्द्रियके स्पर्श और मर्दनसे वीर्यकी क्षीणता नपुंसकता होती है तथा हस्तमें दुर्गन्ध भी होती है इससे उसका स्पर्श कभी न करै ।। २५ । १० । - समीक्षा-यह शिक्षा माताको करनी लिखी है माता जब इस शिक्षाको करेगी तव लजा जो स्त्रीजातिका भूषण है कानेमें रख देगी क्योंकि, पृ. २९ पं० २२ में आप लिखते हैं माता इस प्रकार शिक्षा करै आपने सोचा होगा हम कहाँतक समझाते फिरेंगे स्त्रियोंपर ही इस बातका बोझ डालदिया परन्तु आपकी समान औरको इतना अभ्यास न होगा क्योंकि, आपने इमको सुब जांच करली मालूम होती है ।। (१)। स. पृ० ३० पं० १५। गुरोः प्रेतस्य शिव्यस्तु पितृमेधं समाचरन् । प्रेतहारैः समं तत्र दशरात्रण शुद्धयति ।। मनु० ॥५॥६५॥ श्लो। जब गुरुका प्राणान्त हो तब मृतक शरीर जिसका नाम प्रेत है उसका दाह करनेहारा शिष्य प्रेतहार अर्थात् मृतक उठानेवालोंके साथ दश दिन शुद्ध होताहै, और जब उस शरीरका दाह हो चुका तब उसका नाम भूत हाताहै अर्थात वह अमुकनामा पुरुष था जितने उत्पन्न हों वर्तमानमें आके न रहै वे भृतस्थ होनेसे उनका नाम भूत है ऐसे ब्रह्मासे लेकर विद्वानोंका आजतक सिद्धान्त है परन्तु जिसको शंका कुमंग धुसंस्कार होताहै उसको भय और शंका रूप भूत प्रेत शाकिनी डाफिनी आदि अनेक भ्रमनाल दुःखदायक होते हैं (फिर२७पत्ति में लिखा है कि.) अज्ञानी १ भा० प्र. में वादी गएनान्त्याकी बात कहता है सो यहां उसो बाचन्ते शुन्धान पायुते शुन्धामि इस मंत्र दयानन्दीमाप्यका स्मरण करना चाहिये तभी राज रहेगी। गुरुपेला गुरुपानी यह सब मूरके विस्वहीं बटा गया है।
क्या द्वितीयसमुल्लासखण्डनन् । लोग वैदिक शास्त्र वा पदार्थविद्याके पठने सुननेसे और विचारसे रहित होकर सनिपात ज्वरादि शारीरक और उन्मादादी मानस रोगोंका नाम भूत प्रेतादि धरते हैं २५।१९। और २६।५।। समीक्षा-स्वामीनी आप जब कोई बात बनाते हैं तो कोई श्लोक लिखकर टसका अर्थ उलटा कर देते हैं यही लीला इस श्लोकमें फैलाई है कि ( पितृमेध समाचरन ) इस पदके अर्थही खुलासा न लिखे इसका अर्थ यह है कि, जब गुरुका शरीर छूट जाय तो शिष्य गुरुकी अन्त्येष्टि क्रिया पिंडादि विधान करता हुआ मृतक उठानवालोंके साथ दशवें दिन शुद्ध होताहै और प्रेतयोनि एक पृथक है निसको जीव शरीर त्यागने उपरान्त कर्मानुसार प्राप्त होताहै "और जो वर्तमान में आकर न रहे वह भूत कहलाता है" यह स्वामीजीका लेख समयका बोधक है इसका यहाँ कोइभी प्रकरण नहीं है जो आपने यह मनुष्योंपर लगाया तो आपभी अब मरकर भूत संज्ञक हुए, यह शिक्षा आपके शिष्यों को अहण करनी योग्य है चाहिये कि, आपके नामके अन्तमें अब भूतशब्द और लगा देती परमहंसको शोभा बढ जायगी, ब्रह्मादिकाने तो कहीं ऐसा नहीं लिखा, पह आपकि मुखसे निर्गत है, आप अपना मुँह पों छिपाया करते हैं, यहाँभी पितानीका डर है जो वह आकरें पकड़ लेनायेंगे, अपना नाम लिस दिया फीनिये कि, मैं ऐसा मानता हूँ, आप भूत प्रेतादिकोंको नहीं मानते देखिये मनु वेद चरक सुश्रत आदिसे आपको दिखाते हैं । भूतप्रेतके होनमें प्रमाण अथर्य का० ८ सू०५ प्रपाठफ १८ नैनं प्रन्स्यप्सरसो न गवर्या न मत्याः सी दिश विरानति यो विभीमं मणिम् १ मं० १३ यस्था स्वपन्तीत्सरति यस्त्वादिप्सति जामतीम् । छायामिव प्रतान्त्सूर्यः परिकामननीनशत् ८॥ स्त्रीणां आणि प्रतादिन इन्द्र रक्षांसि नाशय १३ येषां पश्चात्मपदानि पुरम्पापीः पुरोमुखाः खलनाशक- धूमना टरुण्डा ये च ममदाः कुंभमुष्का अयाशयः । तमनस्या ब्रह्मणम्पत प्रतिवी. धेन नाशय १५ य आम मांसमदान्त पौरुपेयं च ये ऋविः। गर्भान् खादान्त फेश- वास्तानि नो नाशयामास सु. ६५० १९ मंत्र १३११५॥ २३ ।* अर्प-गर्भवती स्त्रीकी रक्षामें मणिवन्धन यंत्र है चालकोंकी रक्षार्थ मणिबन्धन मन्त्र है जो इसको धारण करते हैं उनकी अप्सरा गंधर्व मनुष्य बाधा नहीं दे सकते १ हे गर्भवती स्त्री ! सोते समप जो गन्धादि तेरे सायं छल फर नो गागतमें बाधा दे उसक नाश यह मंत्रयुक्त माणिवन्ध फर जैसे सूर्य अन्धकार दूर करता है २ जिन पिशाचौके पर पीठको फिर हुए, पट्टी पांवके आगे टलो चरण इस नामसे मसिद्ध हैं, हे ब्रह्मणस्पते ! टन दुष्टोंका नाग करा ३ जो गंधर्य पिशा. मटके मामी यहा मेन हैं। . २ दयानन्दतिमिरभास्करः। चादिक फच्च मांसके सानवाले मनुष्य मांसको खाते गर्भको साते उनका नाश फरोश (यस्त गर्भ प्रति मशानातं यामारयति तेपिगस्तमुग्रधन्वा कृणोतु हृदया। पिपम् । अथर्व०१८)हे खी! जो तेरे गर्भ में प्रवेश कर बालकको मारता है उस पिशाचका नाश हो ॥ बृहदारण्यक अ०३ ब्राह्मण । ३ । श्रु. १ याज्ञवल्लयेति होवाच मद्रेपुचरकाः पर्मतजाम ते पतंजलस्य काप्यस्य गृहानेम तस्यासीढुहिता गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम का- सीति सोऽत्रवीत् सुधन्वांगिरस इति १ याज्ञवल्क्यने कहा-हम मद्रदेशमें फिरते रह वहां पतंजलको कन्पाको गन्धर्वन ग्रहग किया हमने उससे पूँछा तुम कौन हो उसने कहा मैं सुकन्याआंगिरस हूंनव कि, वेद उपनिषद् गंधर्व पिशाच रातसके लक्षग और उनका होना स्वीकार करते हैं उपनिपमें इतिहास विद्यमान है फिर इसको कान खण्डन कर सकता है कि, पिशाचादि नहीं हैं जैसे दर्पगमें छाय प्रवेश करती है ऐसे यह देहमें प्रवेश करतेहैं, भयर्वमें बहुत विस्तार है जिसे देखनाहोदेख ले अंक ऊपर दिये हैं तथा सुश्रुतके उत्तर तंत्र अध्याय साठमें पूरा वर्णन है जब वेदमें है तब वहाँसे उतारकर ग्रन्थका विस्तार फरना वाहुल्यमान है बुद्धिमानोंको यही बहुत है ॥ यक्षरक्षःपिशाचांश्च गन्धर्वाप्सरसोसुरान् । नागान्सपोन्सु- पणीश्च पितॄणां च पृथग्गणान् ॥ मनु अ. १ श्लो० ३७ यक्ष राक्षस पिशाच गन्धर्व अप्सरा नाग सर्प गरुड और पितृगणोंकोभी उत्पन्न किया । प्रजापतिःऋपिः कव्यवाहनानिर्देवता त्रिष्टुप्छन्दः उल्मुकं पुरस्तात्करोतीति कात्या०४।१।९ - ये रूपाणि प्रति मुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति । पुरापुरों निपुगेये भरन्त्यग्निहाँलोकात्मणुदात्यस्मात् ।। यजु० अ०२ मं०३० । अग्निहिरक्षसामपइन्ता । तस्मादेव निदधाति श०२।४।२।१५॥ "अमि ही राक्षसोंका नाशक है इस कारण उल्मुकधारण किया जाता है। • मेरठ के स्वामी यहां चुप लगा गये हैं।
द्वितीयसमुल्लासखण्डनम्। (स्वषया) पितरोंका अन्न श्राइमें भक्षण करनेकी इच्छासे (स्वरूपाणि प्रति मुधमानाः ) अपने रूपोंको पितरोंकी समान करते हुये ( ये ) जो देवविरोधी (अमुराश्चरन्ति ) अमुर पितृस्थानमें फिरते हैं तथा (ये ) जो असुर ( परापुर निपुरः)स्थूल और सूक्ष्म देहांफो अपना अपना अमुरत्व छिपानके लिये (भरन्ति) धारण करते हैं टरमुकरूप (अमिः ) अमि ( तान् ) असुरोंको इस पितृ यज्ञस्थानसे (प्रणुदात् ) हटादे इससे प्रगट है कि, राक्षसादि विनदायक होते हैं और मंत्र पढ़नेसे भाग जातहैं सुश्रुतमें भी इस प्रकार लिखा है:- भूतविद्यानामदेवासुरगन्धर्वयक्षरक्षःपिपिशाचनागग्रहा- धुपसृष्टचेतसां शान्तिकर्मबलिहरणादिग्रहोपशमनार्थम् ॥ सुश्रुत सूत्रस्थान ११ अर्थ-भूतीवया जो आठ प्रकारके आयुर्वेदके विभागमें चतुर्थ है उसकों फहतेहैं कि, देव असुर गंधर्व यक्ष राक्षस पितर पिशाच और नागआदि ग्रहोकरके व्याप्त चित्तवाले पुरुषोंको ग्रहशान्ति करनेसे आरोग्यता होती है, जो शान्ति चलि देना आदि फर्मको भूतविद्या कहतेहैं वे समझे यहां भी यह योनिवर्णन फरी हैं जिनको बलि देनेसे मनुष्यपर जोआच्छादन होताहै सो जाता रहताहै ।। स० पृ. ३१ पं० १९ परन्तु जो कोई बुद्धिमान उनकी भेंट पांच जूता दंड था चपेटा लात मारे इसके हनुमान देवी भागनाते हैं ।। २६ । २७ समीक्षा-चाह क्या आपका यही न्याययुक्त सभ्यताका कथन है इसीका नाम मगलाचरण है निश्चय जानिये उन देवताने ही आपका प्राण शरीरसे निर्गत फरदिया, नहीं तो ब्रह्मचर्यवालोंकी तो आपके कथनानुसार बड़ी उमर होती, आगे भी यह प्रसंग लिखेंगे देवताओंको दुर्वचन कहनेसे आयु क्षीण होती है (निकट फाल जेहि आप गुसाई । तहि भ्रम हाय तुम्हारी नाई 1) स० पृ० ३१५० ३० (प्रभ) तो क्या ज्योतिश्शाम्र झूठा है ( उत्तर ) नहीं जो उसमें अंशवीन रेखागणितविद्या है वह सब सच्ची जो पलसी लीला है घोह सब इंड है यह जन्मपत्र नहीं शोकपत्र है ॥ २७ ॥ ९ समीक्षा-न जाने यह शिक्षा फौनसे बेदकी है जो प्रभोत्तर आप हो गहलिये है ज्योतिशाय फल झूठा है अंक सत्य है इसमें कुछ प्रमाण भी है या जो मॅहमें १मा प्रका० में इस मंत्रालय प्रमाणात संगहीन लिसा और दयानंदरेमाप्यसमी विरुद्ध रिखा इस कारण यह सईया विरुद्ध है भीर मुश्त प्रमाणा समाधान कुछ न होसका भार एकप्रकारसे भूतादि मानहीं बेटे जरा ६ नम्पापपर घटिती दी होती ।।
- (२०) दयानन्दतिमिरभास्करः। आया सो लिख दिया, जरा अपने ही टीका किये कारकीयके पृ० २० पं० १५ में देखा हाता॥ (उत्पातेन ज्ञाप्यमाने) वार्तिक-आकाशसे बिजली चमकने और ओले गिर- नेको उत्पात कहतेहैं, इस उत्पातसे जो बात जानी जावे उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है यथा- वाताय कंपिला विद्युदातपायातिलोहिनो। कृष्णा सर्वविनाशाय दुर्भिक्षाय सिता भवेत् ॥ (महाभाष्यम्) जो पीली बिजली चमके तो अधिक हवा चले, लोहित वर्णकी चमक तो आतप अर्थात् गरमी अधिक हो, जो काली चमके तो सर्वका नाश प्रलय हो, श्वेत चमके तो दुर्भिक्ष हो, कहिये यह फलित नहीं तो और क्या है शुभाशुभ फल भविष्य वार्ता सब कुछ ज्योतिपसे ही जाना जाताहै. धन्य है आपकी बुद्धिको जो शास्त्रकर्ताओंको झूठा बतातेही यदि जन्मपत्री शुभाशुभ फलके ज्ञानमात्रसे शोकपत्र है इस कारणसे उसका बनाना निष्प्रयोजन है तो यावत् शास्त्र विद्यादिक जो मनुष्योंको शुभाशुभका ज्ञान करानेवाले हैं सब ही निष्फल होजॉयगे, और यह तो कहिये यह आपके उत्पन्न होनेका दिन संवत् आपको उत्पन्न होनेसे ही याद है या काई प्रमाण भी है कि, आपका जन्म इसी संवत्में हुआथा वाह लोगोंके जन्म दिनकी तिथि ही आप मेटना चाहते हैं निसमें कि, जन्मदिन, नक्षत्र, मास, संवत्, ग्रह लिखे होते हैं जिससे मनुष्योंको अपने जन्मदिवसका ज्ञान होजाताह और अहाँसे फल और जन्मतिथिका भी ज्ञान होनाताहै वह शोकपत्र और आपके लिसे विवाहके फोटो और जीवनचरित्र क्या है ॥ शोलतरके छपाये नोटिसमें तत्रैका भृगुसंहिता सत्या ' इस वचनसं आप भृगुसंहिता सत्य मानते हैं उसमें पलित नहीं तो और क्या है। पृ० ३१ पं० २७ क्या ये (ग्रह) चेतन है जो क्रोधित हाक दुःख और शान्त होके मुख देसक ॥ २७॥६ समीक्षा-पदि यह दुःख मुख नहीं दे सक्त तो बदामें इनकी शान्ति क्या यथा की है मुनिय॥ .. शनी ग्रहाश्चान्द्रमसाःशमादित्यश्च राहुणा ।। अथर्य वेद । अर्थ-ग्रह चन्द्र तथा राहुसे ग्रस्त हमारे लिये शान्तिकारक. हाँ, यह वेदमें शांति प्रारण क्या यूथा है इसीसे ग्रह दुस मुर देनहार सिद्ध होते हैं विशेष यणं ज्योनिमकरण ११ समुदाममें करेंगे जन्मपत्र ग्रह निस जाते हैं यह बात द्वितीयसमुल्लासखण्डनम्। (२१) वाल्मीकियरामायणमें विदित है: रामचन्द्रजीके जन्मसमय उन्होंने नक्षत्रादि लिखे हैं * ॥ स• प्रकाश पृ० ३३ पं० २ कोई कहता है कि, जो मंत्र पढ़के डारा वा यंत्र बना देवे तो हमारे देवता उस मंत्र यंत्रके प्रतापसे कोई विन नहीं होने देते उनको वही उत्तर देना चाहिये तुम क्या परमेश्वरके नियम और कर्मफलसे भी बचा सकोगे ॥ २८ ॥ १३ समीक्षा-अब गंडे डोरी बांधनेसे जो रक्षा होतीहै सो भी सुनो ।। नतद्रशासिनपिशाचाश्चान्तिदेवानामोजः प्रथमजं ह्येतत् । योविभर्तिदाक्षायणहिरण्यसदेवेषु कृणुतेदीर्घमायुः समनुष्येषुकृणुतेदीर्घमायुः ॥५१॥ यजु० अ०३४ जो सुषणको धारण करते हैं, राक्षस और पिशाच उनको अतिक्रमण नहीं करसत्त यह देवगणका प्रथम उत्लन तेज है, यह दाक्षायण तेज जो धारण करता है वह देवता और मनुष्यलोकमें सर्वत्रही दीर्घायु लाभ करता है ॥ ५१ ॥ यदावनन्दाक्षायणाहिरण्यर्छशतानीकाय सुमनस्यमानाः ॥ तन्मआबध्नामिशतशारदायायुष्माअरदष्टियथासम् ॥ यजु० अ० ३४ मंत्र ५२ श्रेष्ठ ब्राह्मण डोरों में यही सुवर्ण वडी सेनावाले राजोंके वांधते हुए, शरीरमें धारण करनेसे सुमन और सैकडों वर्ष इसके धारण करनेसे मुख साधनमें समर्थ हुँआ जाताहै, संवत्सरजीवी हूं इस कारण मैं भी इस सुवर्णको डोरेमें बांधताहूं॥१२॥ डोरा बांधनेसे और मंत्र पढके रक्षा नहीं होती तो अपाने पंचमहायज्ञविधिमें पृ० ५५० ११ में लिखा है “ इसके अनंतर गायत्री मंत्रसे शिखाको बांधके रक्षा करे, अब कोई स्वामोन से पूछे कि, आप बताइये गायत्री पढकर रक्षा क्या फरे और किससे करे यदि शिखा बांधनेहींसे रक्षा होजाय तो तलवार चंदूक तमंचा किसी कामका नहीं है, यदि दो दयानन्दी संध्योपासनके अनन्तर कुस्ती लडें तो कोई भी न हार क्यों कि, दोनों रक्षा कर चुके हैं और कोई जीते भी नहीं क्यों कि, दोनों रक्षा कर चुके हैं (प्रश्न) तो तुम रक्षा और मंत्रका फल कैसा मानते हो (उत्तर) हम लोग मांत्रिक रक्षाका फल अध्यात्मगत मानतेहें देखिये गायत्री मंत्रका फल ।। पुष्पे जातस्तु भरतो मीनलग्ने प्रसनधीः वा. रा.स. १८ श्लो. १५ सोपे जातो तु सोमिन्त्री कुलोरेऽभ्युदिते खो ५९ .
(२२) दयानन्दतिमिरभास्करः। “सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत्रिकं द्विजः॥ महताप्येन- .. सो मासात्त्वचेवाहिर्विमुच्यते ॥ मनु० अ०२ श्लो०७९ ॥ . संध्या वा प्रातः समयमें इस त्रिक अर्थात् गायत्रीको सहस्रवार ग्रामके बाहर नदीतीर वा अरण्यमें एक मास जपनेसे दिन महान् पापसे छूटताहै क्यों साहन यह मंत्रसे पाप दूरकी विधि लिखी है या नहीं फिर क्या यह मंत्र परमेश्वरके. नियममें है या नहीं ? अवमर्पण मंत्र वह पाप दूर होनेके निमित्त जपा जाताहै या नहीं ? वाल्मीकिरामायणमें लिखा है जब रामचंद वनको चले तो कौशल्याने मंत्र पढकर रक्षा की, सुश्रुतके सूत्रस्थानमें रोगोंकी भूत प्रेतादिसे मंत्र पढकर रक्षा करनी लिखी है, मणिबंधनादि पूर्व लिख चुके हैं, जितने विनोंका विधान है उन सबकी शान्ति मंत्रोंद्वारा होजाती है और उन मंत्रोंके देवता विन नहीं होने देते, यह ईश्वरका नियम ही है कि, देवताओंके मंत्र जपनेसे विन नहीं होता · शौनक कृत ऋग्विधान देखिये कि उसमें अनेक वैदिक मंत्रोंके जपनेसे.रोगशान्ति ग्रहशान्त अरिष्टशान्ति लिखी है, तथा और भी अनेक मंत्र हैं वेदके जो भूत प्रेत पिशाचोंकी शान्ति करतेहैं ग्रहोंकी शान्ति करते हैं । ८1७।१४ रात्रिसूक्तं जपेद्रात्रौ त्रिवारं तु दिने दिने । भूतप्रेतादिचौरादिव्याघादीनी च नाशनम् ॥ १॥ शा२३ कृणुष्वेति जपेत्सूक्तं श्राद्धकाले प्रशस्तकम् । रक्षोनं पितृतुष्टयर्थ पूर्ण भवति सर्वतः ॥२॥ हा२।९ येपामाबाधमंत्रं च जपेञ्चेश्ययुतं जले । वालग्रहा न पीड्यन्ते भूतप्रेतांदयस्तथा ॥३॥ जो रात्रिसूक्तको रात्रिमें प्रति दिन तीन वार जपता रहै तो भूत प्रेत आदि चोर आदि दुष्ट मनुष्य व्यावादि दुष्टजंतुओंका नाश हो १ जो इस कृणुष्वेति सूतको आड़के समयमें जपै तो राक्षसोंका नाश और पितरोंकी तृप्ति होती है २ येपामावाति इस मंत्रको जलमें खडे हो तीस सहस ३०००० जपे तौबालग्रह भूत प्रेत नाश होनाते हैं ३ १ अयोध्याकाण्ट २५ वा सर्ग देखो। • मा० प्र. के कर्ताको वेदमें यह मुक्त और मंग पता लिखा हानेपरभी मही महस्ता तो हम क्या करें " विमूटा नानुपश्यन्ति " यहाँपर के आक्षेपमी मिथ्या है कारण हमारा पाठ उन्होंने अयुद्ध तारा है।
हिना २३)
द्वित्तीयसमुल्लासखण्डनम् जीवित
स० पृ० ३३ पं० २९ नौवर्षके आरंभमें द्विज अपने संतानांका उपनयन करके
आर्यकुलमें अर्थात् जहाँ पूर्ण विद्वान् और पूर्ण विदुषी स्त्री शिक्षा और विद्या-
दान करनेवाली हों वहां लड़के और लड़कियोंको भेज दे, और शूद्रादि वर्ण उप-
नयन किये विना विद्याभ्यासके लिये गुरुकुलमें भेजदें २९ । ११
समीक्षा-इस स्थानमें तौ मति ठिकाने है कि, शूद्रका उपनयन न हो जातिही
सिद्ध रक्खी है, और दिनसे ब्राह्मण क्षत्री वैश्यका ग्रहण किया है यह प्रतिज्ञा
यहाँ छूटगई कि, महामूर्खकोही शूद कहते हैं जिस पठायेसे कुछ न आवे परन्तु
आगे तीसरे समुल्लासमें इस अपने लेखकी बहुतेरी मट्टी ख्वार की है सो इसका
खंडन वहीं होगा।
स० प्र० पृ. ३५ पं० १ वडोंको मान्य दे उनके सामने उठकर जाकर उच्चा.
सनपर बैठा प्रथम नमस्ते करै ३० । १४ पृ० ९६ पं० १७ और दिनरातमें जब
जब प्रथम मिलै वा पृथक् हों तब तब प्रीतिपूर्वक नमस्ते एक दूसरेसे करें ३०।२०
समीक्षा-यह नमस्ते की परिपाटी भी अजय ढंगकी चलाई है, पर परस्पर
नमस्ते करनेका कोई प्रमाण नहीं लिखा, आपने तो सवही ढंग बदल दिये काई
पुरानी बात रहने ही नहीं दी यदि वश चलता तो आप संस्कृतके स्थान मेंभी
कोई औरही विद्या गढते परन्तु उससे कोई कार्य की सिद्धि नहीं होती, जिस
प्रकार यवन लोगोंमें भी यह परिपाटी प्रचलित है कि, स्त्री अपने पतिको मियाँ
कहती हैं और बेटे घेटीभी बापको मियांही कहते हैं उसी प्रकार यह आपका
नमस्ते है कि, वेटा वाप गुरु चेले लुगाई भंगी चमार सब कोई एक दूसरसे
नमस्ते करते हैं और छोटाई बडाई कुछभी नहीं है सच पूझिये तो यही वर्ण-
संकरको जड है, नमस्तेका अर्थ तो यही है कि, मैं तेरेसे नीचा हूं कमताह इसस
बड़े लोगोंका मान तो कुछ नहीं, किन्तु जब वेभी नमस्ते करते हैं तो उनका
गौरव नष्ट हो जाताहै, स्तुतियोंमें यह शब्द आता है पर यह नहीं कि, निस
देवताकी स्तुति करो वहभी नमस्ते करने लगे, और जो वृद्धिको तिलाञ्जलि
देकर यह कहते हैं कि (नमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय व ) यजुः अ० १६ मं० ३२
छोटे बडेको नमस्कार लिखा है वह प्रथम यह तो विचारें कि, यह रुदाभ्यायका
मंत्र है जिसमें ज्येष्ठ कनिष्ठके अर्थ व्यष्टि और समष्टिफे हैं अर्थात् व्यष्टिसमष्टिरूप
शिवके लिये नमस्कार किया है, इसमें युछ बडे छोटे मनुष्यको नमः करनेको
नहीं लिखा है, परन्तु जो प्राचीन विधि व्यवहार की है सो दिखलाते हैं ।
लोकिक वैदिकं वापि तथाध्यात्मिकमेव च ।
आददीत यतो ज्ञानं तं पूर्वमभिवादयेत् ॥ ११७ ॥
(२४) दयानन्दतिमिरभास्कर शय्यासनेऽध्याचरिते श्रेयसा न समाविशेत् । शय्यांसनस्थश्चैवनं प्रत्युत्थायाभियादयेत् ॥ ११९ ॥ ऊर्ध्वं प्राणा द्युत्कामंति यूनः स्थविर आयति । प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान्प्रतिपद्यते ॥ १२० ॥ अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि तस्य वदन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ॥ १२१ ॥ अभिवादात्परं विप्रो ज्यायांसमभिवादयन् । असौ नामाहमस्मीति स्वं नाम परिकीर्तयेत् ॥ १२२ ॥ नामधेयस्य ये केचिदभिवादं न जानते । तान्प्राज्ञोहमिति बयात्स्त्रियः सर्वास्तथैव च ॥ १२३ ।। भोःशब्द कीर्तयेदन्ते स्वस्य नानोभिवादने । नानां स्वरूपभावो हि भोभाव ऋपिभिःस्मृतः ।। १२४ ॥ आयुष्मान्भव सौम्यति वाच्यो विप्रोऽभिवादने । अकारश्चास्य नाम्रोऽन्ते वाच्यः पूर्वाक्षरप्लुतः॥ १२५॥ यो न वेत्त्यभिवादस्य विप्रः प्रत्यभिवादनम् । नाभिवायः स विदुपा यथा शूद्रस्तथैव सः ॥ १२६॥ ब्राह्मणं कुशलं पृच्छेत्सवबन्धुमनामयम् । वैश्यं क्षेमं समागम्य शुद्रमारोग्यमेव च।।१२७॥मनु० अ०२ पर्थ-निससे लौकिक विद्या प? वा वेदविद्या पडै तथा ब्रह्मविद्या पटै उसप्रति- के बीच में बैठे हुएको प्रथम अभिवादन करे ११७ शय्यासन विद्याधिक 5 अधिक वा गुरु इनके स्वीकार किये होनेपरभी उसी समयमें आप घराबर ठे और गुरु आवे तो उठकर प्रणाम करै ११९ थोडी उमरवालेके युद्धके घर में प्राण ऊपरको होते हैं:जब उठकरके प्रणाम करता है तो स्वस्थानको प्राप्त हैं, इस कारण अपनेसे बडोंको नित्य अभिवादन करना १२० जो प्रतिदिन की सेवा और नमस्कार करनेवाला है उसकी आयु, धन, बल, यश यह चार वृद्धिको प्राप्त होती हैं १२१ विम वृद्धजनोंको प्रणाम करता हुआ मैं प्रणाम । हूं इस शब्दके अन्तमें अमुक नामवाला हूं यह फहै १२२ जो कोई नामथे- द्वितीयसमुल्लासखण्डनम् । यके उच्चारणपूर्वक अभिवादन करना नहीं जानते विना संस्कृत पढ़े हुए, उनके प्रति बुद्धिमान ऐसा कहे कि, प्रणाम करता है और वियंभी ऐसाही करें १२३ नाम और अभिवादनके अन्तमें भो शब्दका उच्चारण करें अभिवाद्यके नामके स्वरूपकी जो सत्ता है सो (भोः) इस संबोधनसे होती है यह ऋपियोंने कहाहै १२४ प्रणाम करनेपर आयुष्मान् भव सौम्येति अर्थात् जीते रहो ऐसा ब्राह्मण करे प्रणाम करनेवालेके नामके अन्तके पूर्व अक्षरको प्लुत करै १२५ जो ब्राह्मण अभि- वादनपर क्या कहना चाहिये इसको नहीं जानता यह ब्राह्मण शूद्रवत् है अभिवादन करनेके योग्य नहीं है (समाजी पण्डित जो समाजके नाई धोबी शूदादि सबसे नमस्तेही करतेहैं उन्हें इस श्लोकपर ध्यान रखना चाहिये ) १२६ प्रणामादिके अनन्तर ब्राह्मणसे कुशल क्षत्रियसे अनामय वैश्यसे क्षेम शूदसे आरोग्य पूछे १२७ इस प्रकार मनुस्मृत्तिमें वर्णन है स्वामीजी इस स्थलमें मनुस्मृमि देखते २ ऊंघ गये होंगे दृष्टि उनकी इस स्थानपर न पडी होगी परन्तु समाजियोंको क्या सूझी है कि, सबसे नमस्तेही कहते हैं चाह बेटा हो छोटा भाई हो शूद हो गुरु हो समानका उपदेशक हो सबसे नमस्ते करते हैं, परन्तु विशेष आश्चर्य तो उन समाजी पंडितोंपर है जो आनन्दसे बैठे वैश्य शूद्रोंको नमस्ते कहते हैं ये (यो नवेत्यभि- वादस्य ) इस वाक्यानुसार शूद्धवही हैं महाशयो ! क्या तुम्हारी बुद्धिसमानि- योंने कोई औपधी खिलाकर हर ली है, पैसेका लोभ करो तो तुम्हारे पितादिकभी तो उदर पूर्ण करतेही थे और तुमसे चौगुना व्योपार्जन करते थे, क्यों काठकी पुतलीकी नाई नाचरहे हो सदैव यहांही रहना नहीं होगा, समझो तौ नमस्ते है क्या पदार्थ, जो चिट्ठीभी लिख देते हो कि, हमारी अमुकसे नमस्ते कहदेना, यह कैसे बनसक्ता है जो सामने विद्यमान हाटससे कह सक्ते हैं इससे चिही भी यह वात नहीं बनसक्ती इस कारण नमस्ते कभी नहीं करना चाहियेप्रणामदंडवत् आदि करना योग्य है ॥ स०प्र० पृ० ३६५०३ यही माता पिताका कर्तव्यकर्म परम धर्म और कीर्तिका काम है जो सन्तानोंको उत्तम शिक्षा करना (पुनः) यह बालशिक्षामें थोडासा लिखा है इतनेहींसे बुद्धिमान् लोग बहुत समझ लेंगे ॥३१९२० समीक्षा-वाह बडी सुन्दर शिक्षा लिखो बालकोंके माता पिताको शिक्षा करी माता पिता अपने बालकों और बालकियोंकी करेंगे यह शिक्षा आपकी कौनसे वेदानुसार है कोई वेदका प्रमाण नहीं लिखा इस शिक्षाको स्वतः प्रमाण माने या • स्वामीजी तो भंग पीते थे इससे उंचगपे पर भास्करोंके कर्ताकी एक दृष्टिमी इन श्लोकापर न पडी भोर शिक्षामें आपही वेदमंत्रका कोई प्रमाण न देसके जव गुरुही मठ कते हैं तो चेलोंकी क्या दशा है।
(२६) दयानन्दतिमिरभास्थरः। परतः प्रमाण जिसमें संकोच न करना उपस्थेन्द्रियपर हाथ न रखना नमस्ते परस्पर फरना यही सिखाया पर यह तो आपकी कल्पनाही है यह थोडीसी वालशिक्षा नहीं सत्यानाश करने तथा नास्तिक वर्णसंकर बनानेको यही बहुत है, बुद्धिमान् इसको बहुत ही अच्छी तरह समझतेहैं भीर आपकी वेदविरुद्ध शिक्षाओंसे पृथक ही रहते हैं। इति श्रीदयानंदतिमिरभास्करे सत्यार्थप्रकाशान्तर्गतद्वितीयसमुहास खंडनं समाप्तम् ॥२॥ श्रीगणेशाय नमः । अथ सत्यार्थप्रकाशान्तर्गततृतीयसमुल्लासस्य खंडनम् । अध्ययनाध्यापनप्रकरणम् । स० पृ० ३८५० १२ कन्यानां संप्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम् । मनु० इसका अभिप्राय यह है कि, इसमें राननियम और जातिनियम होना चाहिये कि, पांचवे अथवा आठवें वर्षसे आगे अपने लड़के और लड़कियोंको घरमें न रखसक पाठशालामें अवश्य भेजदेवें, जो न भेजें वे दंडनीयः हों प्रथम लडकेका यज्ञोपवीत घरमें हो और दूसरा पाठशालामें आचार्यकुलमें हो पिता माता वा अध्यापक लडके लडकियोंको अर्थसहित गायत्रीमंत्रका उपदेश करें ३३ ॥१७ समीक्षा-यह इतना लम्बा चौडा अभिप्राय कौनसे अक्षरोंसे सिद्ध होताहै आठ वर्षसे आगे पुत्र पुत्रीको घरमें रखनसे मनुष्य दंडनीय हों, ऐसे ही अभि- प्रायोंने तो नव शिदि की बुद्धिपर परदा डालदियाहै इस श्लोकका यो तात्पर्य है और रानधर्मप्रसंगमेंका है ॥ मध्यन्दिनेऽद्धरात्रे वा विश्रान्तो विगतकमः। चिंतयेद्धर्मकामार्थान्साधैं तैरेक एव वा ॥ १५१ ॥ परस्परविरुद्धानां तेषां च समुपार्जनम् । कन्यानां संप्रदानं च कुमाराणां च रक्षणम्॥ १५२॥ अ०५ राजाको योग्य है, कि, दुपहर आधी रातके समयमें जब विश्राम युक्त हो और शरीर खेदरहित हो उस समय राजा मंत्रियों सहित वा आप ही धर्म काम अथ इनका विचार करे और यह धर्म अर्थ काम जो परस्पर विरुद्ध हैं इनका विरोध दूर करके उनके अर्जनका उपाय अपने कुलकी कन्याओंका दान अर्थात् तृतीयसमुल्लासखण्डनम् । (२७) किस स्थानमें विवाह करना चाहिये, और कुमारोंका रक्षण विनयादिक शिक्षा फरनेका विचार कर इस श्लोकसे स्वामीजीका अर्थ किंचित् मात्र भी सम्बन्ध नहीं रखता, यह एक बड़ी अद्भुत बात है कि, एक यज्ञोपवीत घरमें करे एक पाठशालामें, इसमें कोई अपनी ही संस्कृत बना गढके श्लोकके नामसे लिखी होती, और जब स्त्रियोंके यज्ञोपवीत होता ही नहीं तो भला उन्हें गायत्री पडनेका कब अधिकार है धन्य है आपकी बुद्धि यहां गायत्री पढना लिख दिया तो यज्ञोपवीत भी लिख देते, क्या डरथा समानी तो मान्तेही उन्हें तो आपके बचन पत्थरकी लकीर हैं। स० पृ० ३८ पं० १९ सावित्रीप्रकरणम् । ओं भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम्भगो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ इस मंत्रमें जो प्रथम ओ ३ म है उसका अर्थ प्रथम समुल्लासमें करदिया है वहींसे जानलेना अब तीन महाव्याहृतियोंके अर्थ संक्षेपसे लिखतेहैं "भूरिति वै माणः यःमाणयति चराचरं जगत् सः भू स्वयंभूरीश्वरः” जो सब जगत्क जीवनका आधार माणसे भी मिय और स्वयंभ है उस प्राणवाचक होके भू: परमेश्वरका नाम है, "भुवरित्यपानः यः सर्व दुःखमपानयति सोपान" जो सब दुःखोंसे रहित जिसके संगसे जीव सब दुःखोंसे छूट जातेहैं इस लिये उस परमेश्वरका नाम भुवः है "स्वरिति व्यानः यो विविधं जगत् व्यानयति व्यामोति सः व्यानः" जो नानाविध जगत्में व्यापक होके सबका धारण करता है इस लिये उस परमेश्वरका नाम स्वः है यह तीनों वचन तैतिरीय आरण्यकके हैं (सवितुः) “यः सुनोत्युत्पादयति सर्व जगत् स सविता तस्य" जो सब जग- का उत्पादक और सब ऐश्वर्यका दाता है ( देवस्य )"यो दीव्यति दीव्यते पास देवा जो सर्व सुखोंका देनेहारा और जिसकी माप्तिकी कामना सब करतेहैं उस परमात्माका जो (वरेण्यम् ) "वर्तुमहम्" स्वीकार करने योग्य अतिश्रेष्ठ (भर्गः) “शुद्धस्वरूपम्" शुद्ध स्वरूप और बेतन करनेवाला ब्रह्म स्वरूप है (तत्) सी परमात्माके स्वरूपको हम लोग (धीमहि ) "धरमहि" धारण करें किस प्रयोजनके लिये कि (यः) "जगदीश्वरः" जो सविता देव परमात्मा (नः) “अस्माकम्" हमारी (धियः ) "बुद्धी" बुद्धियोंकों (प्रचोदयात् )"प्रेरयेत्" प्रेरण करे अर्थात् चुरे कामोसे हटाकर अच्छे कामॉर्म मत करे ३४ । २६ समीक्षा-दयानंदजीने महान्याहृतियोंके अर्थमें भी गोलमाल. कराह तैत्तिरीय आरण्यकर्क नामसे स्वयं कल्पना की है अब ये वाक्य लिखे जातेहैं जो तैत्तिरीयमैहैं!
० दयानन्दतिमिरभास्कर। भूर्भुवः सुवरिति वा एतात्तित्रोव्याहृतयः । तासामुह स्मतां चतुर्थीम् माहाचमस्यः प्रवेदयते । मह इति तद्ब्रह्म स आत्मा अंगान्यन्यादेवताः भूरितिवाअयंलोकः भुव इत्पन्तरिक्षम् । सुत्र इत्यसो लोकः १ मह इत्यादित्यः आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते ॥ तैत्तिरी इस उपनिषदमें ब्रह्मका उपदेशःआगे पंचकोशरूप गुहामें करेंगे इस कारण प्रथम श्रद्धापूर्वक गृहीत व्याहृतियोंका त्याग असंभव है इसमें व्याहृति शरीर- वाले हिरण्यगर्भकी उपासना स्वराज्यफलप्राप्ति हेतुका विधान करतेहैं, वोह व्याहतिशरीररूप हिरण्यगर्भ हृदयमें ध्यान करने योग्य है भूः भुवः स्वः यह तीन व्याहृति हैं कहीं तो स्वः ऐसा व्याहृतिका आकार होताहै और कहीं सुवः ऐसा आकार होताहै, अर्थका भेद नहीं, क्यों कि, प्रातिशाख्य नाम बदके व्याकरणमें स्वाके स्थानमें सुवः और स्वर्गके स्थानमें सुवर्ग ऐसा शब्द प्रयोग होताहै, इन तीन व्याहृतियोंके मध्य यह चतुर्थ व्याहति महलोंक है, इसको महाचमसके पुन माहाचामस्य ऋपिने जाना वा देखा, यहां उपदेशसे जो यह माहाचामस्य ऋपिने देखी हुई महर व्याहति है सो ब्रह्म है, अब इनकी तुल्यताको कथन करतेहैं जैसे कि ब्रह्म महत् है और व्याहृति महर है इससे इनकी एकता बनतीहै और वह महर आत्मा (ब्रह्मका रूप) है, क्योंकि, वाह महर व्याप्ति रूपकर्म वाला है, इससे सो आत्मा है और अन्य जो व्याहृतिरूप लोक देव वेद और प्राण हैं ये जिससे कि "महर" ब्रह्म है इस आगे कहनके वाक्यसे कथन किये व्याहतिरूप ब्रह्मक देवलोक आदिक सर्व अवयवरूप हैं, और जिससे वे सूर्य चन्द्र ब्रह्म और अन्न रूपसे व्याप्त होये हैं इससे और देवता (ब्रह्मकं पाद आदिक अवयय) हैं और महाच्याहति अंगी है, भाव यह है कि महान्याहतिरूप जो अंगी है, हिरण्यगर्भ तिसके भूः व्याहृतिको पाद और भुवः व्याहृतिको बाहु और सुयः व्याहृतिको शिररूपसे ध्यान करें, ऐसी उपासनाकी विधि है सो कयन करते, अर्थात् भरादि प्रजापति अंगोंको निम २ रूपसे चिन्तन करताह सो निरूपग करतेहैं । पीलोक प्रनातिक पादरूप भृः व्याहृति है और अन्तरिक्ष लोक प्रगापतिक पाहुरूप भवः व्याहृति है, और स्वर्गलोक मनापतिका शिरोरुप मुरः प्याहति है, और जो प्रकाशमान आदित्य है सो प्रजापतिका मध्यभागरूप महान्याहनि है, भाय यह है कि पृथ्वीलोफमें प्रजापतिक पादकी दृष्टि फरना, और अन्तरिक्षमें पाकी दृष्टि फरना, स्वर्गमें प्रनापतिका शिर दृष्टि करना, और प्रजापतिक शरीर मध्य दृष्टि करना और मध्यभागस अंगॉफी पदि . :
तृतीयसमुल्लासखण्डनम् ! होतीहै, इसी कारण कहतेहैं कि आदित्यसे सब लोकोंकी वृद्धि होतीहै, इसी प्रकारसे आगे अमि आदिमें प्रजापतिक अंगकी दृष्टि जानना ॥ भूरितिवाअग्निः। भुवइति वायुः सुवरित्यादित्यः महात चन्द्रमाः चन्द्रमसावावसर्वाणिज्योती ५ पि महीयन्त । भूरितिया ऋचः भूवइति सामानि सुवरिति यजू ५पि ॥२॥ भूः यह प्रसिद्ध अमि है भुवर यह वायु है स्वर सूर्य है महर यह चन्द्रमा हे चन्द्रमासे प्रसिद्ध सब ज्योति (तारा) वृद्धिको पात, भूः यह प्रसिद्ध ऋचा (ऋग्वेद) है भुवर यह सामदेव है स्वर यह यजुर्वेद है ॥२॥ मह इतिब्रह्म । ब्रह्मणावाव सर्वे वेदामहीयन्ते । भारतिवे प्राणः भुव इत्यपानः । सुपरितिव्यानः महइत्यनम् । अनेनवावसवैप्राणामहीयन्ते। तावाएताश्चतस्रश्चतुर्दाचतस्त्र- श्वतखोव्याहृतयःता यो वेद सवेद ब्रह्म । सर्वेऽस्मै देवाव- लिमावहन्ति अमो लोको यपि वेद द्वेच । तैत्तिरयि- उपनिपदि अनु०५ अर्थ महा यह ब्रह्म ॐकार है क्यों किकारसं हीसद वृद्धिको प्राप्त क्योंकि होते हैं भूः यह प्राण है भुवर यह अपान है स्वः यह ध्यान है महा यह अन्न है अन्नसे ही सब माण पृद्धिको पातेहैं, जो यह उपचार व्याहृति चार प्रकारको हैं इनका पल वर्णन करतहै किण्वा एकव्याहति चार चार प्रकारकी होगई तब प्रकरणानुसार पोडशकला युक्तः पुरुपका ध्यान कहाँ ध्याहतिसं पृथ्वीकला अभिकला ऋग्वदक- ला माणकला ऐसी चतुष्फला ती प्रजापतिक पाद हैं, और अंतरिक्षकला वायुकला सामवेदकलाअपानकला पसी चनुष्कला वाहू है,, स्वर्गलोककला आदित्यकला यनु. चंदकलापानकला, ऐसी चनुष्कला प्रजापतिका शिर है, आदित्यकला चन्द्रकला 30- फारफलाअनक्लासी प्रजापतिकाआत्मशब्दप्रतिपाय मध्यभाग है गमे पाइशरला पुनः पुरुषको हदपमें ध्यान करनेसे जो फल प्राप्त होताह सो कथन करतेहैं, इन व्याहतियाँको पर्व प्रकारसे जो जानता है सी ब्रह्मको जानता है, तिसके अर्थ प्रना- पतिक अंगभूत सब देवता बलिको मात करते हैं, सा यह लोक और यजुर दोनों मानता है और दयानन्दनीन इस पाइशकलायुक्त मनापतिको उपासनाक प्रारणमें भूरिति प्राणः भुवरित्यपाना मुरिति ध्यानः इतने भागको लेकर प्राण अपान और ध्यान पदको परमभरपरता वर्णन करी है परन्तु बुद्धिमान विनारे रि. यह कितनी धृष्टता है कि सगुणोपासना फरक सोप धरनको यह लीला रवी है कि यह फोन प्रकरणक वास्प हैं सो भी नहीं टिसा इस प्रकरणमें यह ध्यानादि (३०) दयानन्दतिमिरभास्करः। ईश्वरवाचक नहीं क्योंकि उसके साथ यह लिखा है कि ( अन्नेन वाय सर्वे मा महीयन्ते ) अन्नसे हो सब प्राण वृद्धिको प्राप्त होतेहैं यदि यहां प्राणादि शब्द ईश्वरका ग्रहण किया जाय तो अन्नसे वृद्धि कहना असंगत हो जाय अब देखना चाहिये कि स्वामीजीने जब ॐकार और व्याहृतियोंके हो अर्थाने अन किया तो और मंत्रोंकी क्या कथा है अब गायत्री अर्थ लिखते हैं कि, माची अन्यों में इसका फैसा व्याख्यान किया है * ॥ तत्सवितुर्वरेण्यमित्यसोवादित्यः सविता सवा प्रवरणीय आत्मकामेनेत्याहुब्रह्मवादिनोऽथभोंदेवस्यधीमहीति सवि तावेदेवस्ततोयोऽस्यभख्यसचिन्तयामीत्याहुब्रह्मवादिनः। प्रथम पादकी प्रतीक धरकर अर्थ करतेहैं सवितृपदका अर्थ असौ या इत्या यह जो प्रत्यक्ष आदित्य है सो सविता है आत्मकामकरके मवरणोप है अर्याद यह जो आत्मातिरिक्त पदार्थकी कामनारहित है तिसको यह सविता ही एफ्तार द्धिकरके प्रार्थनीय है, भाव यह है कि पिण्डसारप्राण और ब्रह्माण्डसार आदि त्यकी एकताभावना करके दोनों उपाधिसे उपलक्षिततत्त्वको आत्मारूपसे भावन करे, यह वेदविद् पुरुष कहते हैं अब द्वितीयपादकी व्याख्या करते देवशब्दयोस्ट सविता ही है तिस कारणसे सविताका जो भाख्यरूप है तिसको चिन्तन करती ऐसे पदविद् कहतेहैं ॥ अथ धियोयोनः प्रचोदयादितिबुद्धयोधियस्तायोऽस्मा- कंप्रचोदयादित्याहुब्रह्मवादिनः ॥ अर्थ-अन्तःकरणको वृत्तियोंको गो परमात्मा मेरणा करताह यह ब्रह्मयादी कहते हैं तब मन्त्रका अर्थ ऐसा जानना “ सवितुदयस्प यत् भाख्यं परेपं तत् धीमहि । तत् किम् योन्माकं पियान्तःकरणातीः प्रयोदयात् प्रापति" सविता देवता जो भर्ग तथा वरण्य है तिस हम ध्यान करतेहैं जो हमारी गुद्धिपति- योमरणा करता है। अथभर्ग यौहवा इति अमुस्मिन्नादित्य निहितस्तारकोड- क्षिणिवपभाख्योभाभिगतिरस्यहीति भगांभयतीतिवे- पभग इति रुद्रोब्रह्मवादिनोऽथ भइति भासयतामान् लोकान् रहति रंजयनीमानिभूतानि ग इति गच्छन्त्यस्मि- मस्स पाई कि यही मामाका भयं भवद्धिमान विचार कपन बालक साप है।
नृतीयसमुल्लासखण्डनम् । (३१) नागच्छन्त्यस्मादिमाः प्रजास्तस्माद्भर्गत्वाद् भर्गः शश्वत् सूयमानात् सूर्य-सवनात् सविताऽऽदानादादित्यः पाव- नात् पवनोऽथापोप्यायनादित्येवंद्याह ॥ इसमें भर्ग और सवितृपदका व्याख्यान है और प्रसंगसे आदित्य सूर्य पावन आप शब्दोंके अर्थकोभी निर्णय करते हैं "योऽमाप्मिन्नादित्य निहितो का यश्चाक्षिणि तारको निहित एष भगाख्यः" यह अन्वय है जो यह आदित्यमंडलमें स्थित है अन्तर्यामी तथा जो नेत्र में कृष्णतारा उपलक्षित अन्तर्यामी स्थित है यह भर्गाल्य पाला देव है (भाभिगमनमस्पेत्तिभर्गः ) किरणरूप प्रकाश वा वृत्तिरूप प्रकाशकरके गमन होताहै तिस अन्तर्यामीका वोह भर्ग है आशय यह कि केवल चेतनमें गमन व्यापक होनेसे बनता नहीं, परन्तु किरणरूप प्रकाश वा वृत्तिरूपप्रकाश उपाधिक गमनसे गमन प्रतीत होताहै, ऐसे एक प्रकारसे भर्गशब्दकी निस फहकर प्रकारान्तरसे निरुक्ति करते हैं (भर्जयतीति वा एप भर्गः ) जो सर्वनगत्का संहार करताहै सो यह भर्ग है ऐसा रुद्ररूप है परमात्माको, ऐसे वेदवित् कहते हैं। अब एफ २ अक्षरके अर्थ करते हैं (भासयतीमान्लोकानितिभः) अपने मंडलके अर्न्तगत प्रकाशसे सर्वजगत्को प्रकाश करताहै इसकारणभ और (रंजयतीमानिभूतानि इति :) अपने आनन्दरूपसे सर्व प्राणिवर्गको आनन्दित फरताह इससे र है (गच्छन्त्यस्मिन् वा आगच्छन्त्यस्मात् सर्वा इमाः: प्रजा इति गः) और सुपुप्ति प्रबोध वा महामलय उत्पत्ति कालमें सर्व प्रजा परमात्मा- में लीन होकर फिर उत्पन्न होती है इससे ग है ऐसे भर्गपना होनेसे भर्ग है और सूयमानात् सूर्यः ) निरन्तर उदय और अस्त होकर मातः कालादिकरनेसे सूर्य है और ( सवनात् सविता) सर्व प्राणिवर्गकी वृष्टि अन्नवीर्यादिद्वारा उत्पत्ति कर्ता होनेसे सविता है और (आदानात् आदित्यः) पृथ्वीका रस तथा माणिवर्गकी आयुको ग्रहण करनेसे आदित्य है और (पवनात् पावनोप्येप एव ) सबको पवित्र करनेसे पावन नाम वायु भी यह परमेश्वर है और आपनाम जल भी यह परमेश्वर ही है क्यों कि सर्व जगत्को (प्यायनात् ) वृद्धि करनेसे वेदार्थवित् कहते हैं, इस प्रकारसे गायत्री मंत्र के दोपा दसे अधिदैवतत्त्वका निश्चय करा, अर्थात् सूर्य वायु जल उपलक्षित सम्पूर्ण देवत- रूप परमात्माको बोधन किया, और सब जगत् उत्पत्तिपालनसंहारकर्तृत्व बोधन किया, तथा जगत् लयाधार और जगत् उपादान कारण भीभर्गपदव्याख्यानसे कहा, इस कहने से जड प्रकृति जगत् उपादान कारण पक्ष दयानन्दजीका गापनी ब्रह्मविद्याविरुद्ध है, इससे सजनाको के अर्थ त्यान्य है, अंब गायत्रकि तृताप ( शश्वत् (३२) दयानन्दतिमिरभास्करः। पादसे अध्यात्म तत्वका निर्णय करते हैं जिसके निर्णयसे स्वामीनी स्वीकृत चे नका वास्तव भेद पक्ष भी खंडित हो क्यों कि औपाधिक भेद तो स्वीकृत है। खल्वात्मनोत्मानेतामृताख्यश्चैतामन्तागन्तोत्सएानन्दायि-. ताकर्ता वक्ता रसयिता प्राता द्रष्टा श्रोता स्पृशति च ।। अर्थ-(अमृताख्यः खलु आत्मनः आत्मा नेता) यह जो अमृताख्य प्राण सो निश्चय ही आत्मा अर्थात् शरीर इन्द्रियसंघातका आत्मा है और नेता अर्थात सर्व संघातका प्रेरक है, यहाँ अमृत कहनेसे प्राणके भी प्रेरक आत्मतत्त्वका ग्रह है, प्राण उपाधिक होकर वह आत्माः नेता और वित्त औपाधिक चेता औ मन औपाधिक मन्ता, पद औपाधिक गन्ता, पायु उपाधिसे उत्स्रष्टा, उपस्ट उपाधिसे आनन्दयिता, हस्त उपाधिसे कर्ता, वागिन्द्रिय उपाधिसे वक्ता, रसन उपाधिसे रसयिता ( रसग्राही) और ग्राण उपाधिसे पाता (सूंघनेहारा)च उपाधिसे दृष्टा देखनेहारा, ओत्र उपाधिसे सुननेहारा, स्वगिन्द्रिय उपाधिस (स्पृशति) छूनेवाला होताहै, चकारसे बुद्धि उपाधिसे अध्यक्सता, अहंकार उपाधिसे अभिमन्ता होताहै यह जानना ॥ विभुर्विग्रहसन्निविष्याइत्येवंह्याह अथ यत्र द्वैतीभूतं विज्ञानं तत्राहि शृणोति पश्यति जिप्रति रसयति चैवस्पर्शयति सर्वमात्माजानीतोति यत्राद्वैतीभृतं विज्ञानं काय्यकारण- कर्मनिर्मुक्तं निर्वचनमनौपम्यं. निरुपाख्यं किंतदवाच्यम् ॥ अर्थ-(प्रश्न) जो पूर्व नेतृत्वादिविशिष्ट वस्तु प्राणादि उपाधि विशिष्ट कहा सो क्या है ( उत्तर) ( विभुर्विग्रहे सन्निविष्ट इति एवं हि आह ) विभु नाम व्यापक परमात्मा ही विग्रह (देह ) में प्रविष्ट होकर अर्थात् लिंगशरीराभिमानी होकर प्राणादि उपाधि भदसे नेतृत्वादिरूपसे कहा जाता है भाव यह है सो एक ही परमात्मा सर्व चुद्धिप्रेरक रूपसे उपास्य है ऐसे वेदज्ञाता कहते हैं इसी प्रकार वृ० टपनिषदमें लेख है कि:- आत्मेत्येवोपासीतात्र ते सर्वएकंभवन्ति ५० उ०अ०१ वा. ४।क०७ द्रष्टा श्रीता आदिको (आत्मा इति एव उपासीत अत्र हि एते सय एवं भवन्ति) आत्मारूप करके परमात्माम अभिन्न जानकर उपासना करे क्योंकि इस आत्मामें ही सर्व एफ होते हैं, अब औपाधिक भेद और यास्तव अद्वैत फको अन्वय व्यतिरकसे दृड करते नहीं देतीभूत विज्ञान होताहै नाप्रदादि • सब पाठ अलग २ लिखा होनेपर भी छोटे, स्वामी मूग बताते है मिस दौतही नहीं टस कोई क्या है। " तृतीयसमुल्लासखण्डनम् । अवस्थामें वहां सुनता है, देखता है, सूंघता है, रस लेता है, 'स्पर्श करता है और उपाधिविशिष्ट होकर एक ही आत्मा सर्वको जानता है, ऐसे उपाधिक सद्भाव कालमें भेद व्यवहार होता है, और जब सुपृप्ति समाधिकालमें अद्वैतीभूत विज्ञान होताहै, तब कार्य अर्थात् विषय, करण अर्थात् करणग्राम, कर्म अर्थात् क्रिया, इससे रहित निर्विशेष उपमारहित अप्रमेय होताहै, सो वस्तु निषेधयोधक शन्दोंसे ही क्यों कहते हो किसी तत् वा इदं आदि शब्दोंसे क्यों नहीं कहते यह (प्रश्न) करते हैं कि तद् इस पदसे अर्थ यह तत् सो वस्तु किं अर्थात् कैसी है (उत्तर) अवाच्यं नाम सर्व इन्द्रियव्यापारके उपराम होते जो सर्व व्यवहारका साक्षी होकर व्यवहारोपरति वा साक्षी है सो अद्वैत विज्ञान स्वाभाविक आत्म- रूप है किसी शब्दका वाच्य नहीं इस प्रकार इस स्थानमें उपाधिके व्यतिरेकमें अद्वैत कहा, यह ब्राह्मणादि ग्रंथोंसे गायत्रीका अर्थ वर्णन किया अब इस स्थानमें यह विचारणीय है कि दयानंदनीने जो सत्यार्थप्रक पृ० ६०१ में लिखा है ११२७ वेदोंकी शाखा जो कि वेदोंके व्याख्यानरूप ब्रह्मादि महर्पियोंक बनाये ग्रंथ हैं ता गायत्री जो वेदों में प्रधान है तिसका अर्थ किसी एक व्याख्यानको रीतिसे तो लिखना दयानंदजीको अवश्य था, और जो ग्यारह सौ सत्ताईसशाखा , लिखी हैं इसमें भी चार कमती लिखी हैं क्यों कि महाभाष्यको रीतिसे ग्यारह सौ इकतीस शाखा होती हैं तो इन मंत्रोंके व्याख्यान होनेपर भी दयानंदनीको एक व्याख्यान भी गायत्री मंत्रके अर्थ निर्णयवास्ते न मिला तो फिर इनके कल्पित अर्थको कौन मानेगा फिर स्वामीजीने सवितृपदका व्याख्यान यह लिखा है जो (सुनीत्युत्पादयति सर्व जगत् स सविता ) दयानंदनी तो अपनेकी निघण्टु निरुक्तका पण्डित मानते हैं फिर यह विरुद्ध अर्थ क्यों लिखा क्यों कि नि. * अ०५ खं० ४ में सवितृपदका भाप्यकार दुर्गाचार्यकृत व्याख्यान यह है कि (सविता पु प्रसवैश्वर्ययोः भू०। प० । तृचि सविता सर्वकर्मणां वृष्टिमदानादिना अभ्यनुज्ञाता) पु धातु प्रसव तथा ऐश्वर्यमें है प्रसव नाम अभ्यनुज्ञानका है. अर्थात् फल देने वास्ते फर्मका स्वीकार करना सो सवितादेव वृष्टिरूप फल देने वास्ते यावत् प्राणिवर्गके कर्मको स्वीकार करता है और ऐश्वर्य नाम प्रेरणाका है। सो सवितादेव सर्व जन्तु मात्रको कर्ममें प्रवृत्त करता है उदय होकर वा ईश्वररूपसे सबका प्रेरक है तब ऐसी व्युत्पत्ति होनी चाहिये जो ( सुवतीति सविता ) और दयानंदीने “सुनोत्युत्पादयति सर्व जगत् स सविता" यह व्युत्पत्ति करी है इससे. 'भाप्यविरुद्ध है तथा पुञ् अभिपवे स्वादिगणीय धातुका प्रयोग सुनाति रखकर उत्पादयति यह अर्थ फरा है सो भी पाणिनि ऋपि लिखित धास्वयंसे विरुद्ध है। यहाँ निघण्टुका पद मा.प्र. कर्ताको निरुक्तता मझी है धन्य दृष्टि धन्य पक्षपाता .
(३४) दयानन्दतिमिरभास्करः । क्यों कि आभिषय नाम कण्डनका है यया सोमवल्लीका रस निकालनेमें सोमव- ल्लीका अभिपय अर्थात् कण्डन होताहै उत्पादन अर्थ पुत्र धातु स्वादिगगीका नहीं इससे पाणिनिक मतसे भी दयानंदनीका यह अर्थ विरुद्ध है और जो देवपदकी व्युत्पत्ति करी है या दीव्यति दीव्यते वा स देवः' इस व्युत्पत्तिसे ती व्याकरणको भी समेट धरा क्यों कि दियु क्रीडा-विनिीपा-व्यवहार-स्तुति-स्तुति-मोद- मद-स्वन-कान्ति-गति, दिवादिगणीय परस्मैपदी इस धातुका प्रयोग लिखा है तो दीव्यति दीव्यत वा स देवः' उस स्थानमें धातु तो केवल परस्मैपदी और प्रयोग आत्मनेपदका भी लिख दिया सो प्रल पहै (प्रश्न) दीन्यते यह प्रयोग कर्ममें प्रत्यय करके लिखा है (उत्तर) जो दयानन्दनी कर्ममें प्रत्यय करते तो इस कर्तृपदमें तृतीया विभक्ति येन ऐसा होना योग्य था, और देवशब्दका वाच्य अर्थ. प्रकाश कियाका कर्म जगत् जड़ वस्तु हो जाता, और जो कर्मकर्तृ अर्थमें प्रयोग कहैं तो भी असंगत है क्यों कि प्रथम परमात्मा प्रकाशक क्रियाका कर्म हो पश्चात् उसी कर्मको कर्तृत्वरूपसे विवक्षा हो तब कर्मकतार प्रयोग हो, सो परमात्मा प्रकाशक्रियाका फर्म होगा तो पर प्रकाश्यत्वरूप जडताकी प्राप्ति होगी और जो स्तुति अर्थमें दिव धातुको मानकर कर्ममें प्रत्यय करें तो देवशब्दका कर्तरि अर्यके प्रकरणमें पचादि गणमें पाठ होनेसे असंगत है, इससे दीव्यते यह प्रयोग सर्वथा अशुद्ध है और अर्थ भाषामें (सब सुखोंका देनेहारा लिखा है ) विचारना चाहिये कि क्रीडा-किसी बाह्य साधनमें विलास, विजिगीपा-जीतनेकी इच्छा, व्यवहार- क्रयविक्रय करना, द्युति-प्रकाश, स्तुति-स्तवनक्रिया, मोद-आनंद होना, मद्- अहंकार करना-स्वम-शयनक्रिया, कान्ति-इच्छा, गति-ज्ञान गमन वा प्राप्ति इतने अर्थ तो पाणिनिनीने इसके स्पष्ट लिख दिये हैं, परन्तु दयानन्दनीने टोटा समझ सुखदान भी इस धातुका अर्थ और वपना करलिया क्या पाणिनि ऋपिके अर्थासे आपका निर्वाह नहीं होता है, परन्तु मनमाना अर्थ तो नहीं निकलता इससे दयानन्दनीने नये अर्थकी कल्पना करी है ॥ गायत्रीप्रकरण पूर्ण हुआ ॥ अथ आचमनप्रकरणम् । स० पृ० ४१ पं०७ आचमनसे कंठस्थ कफ और पित्तकी निवृत्ति थोडीसी होती है, मार्गन अर्थात् मध्यमा और अनामिका अंगुलीके अग्रभागसे नेत्रादि अंगीपर नल छिडकै इससे आलस्य दूर होता है और जलप्राप्ति न हो तो न परे ॥ ३६ । २४ समीक्षा-यदि आचमन फरना कफ पित्तकी शान्तिके लिये है तो क्या सब ही संध्याकालमें फफपित्तग्रसित रहते हैं, और सबको आलस्य और - तृतीयसमुल्लासखण्डनम् । निदा ही दवाये रहती है, यह समय निदाका कदापि नहीं और जलसे कफकी शान्ति नहीं किन्तु वृद्धि होती है, आचमन करना यदि कफ पित्तको शान्ति के लिये है तो हाथमें जल लेकर गायत्री और ब्रह्मतीर्थसे ही आचमन करनेकी क्या आवश्यकता है, क्या कोई आलस्प और कफने प्रतिज्ञापत्र लिख दिया है कि संध्यासमय हम सब संस्कार कत्ती तथा संध्या करनेवालोंके कंदमें फेरा करेंगे, यदि मार्जनका प्रयोजन आलस्प हो दूर करने का होय तो एक चुटकी हुलास न सूंघलिया करें, अथवा चाह व काफी पीलें जो पहरोको काफी हो, नहीं तो सर्वोत्तम उपाय यह कि ऐमोनियाको सोसो सूचलें जिससे मूछतिक भंग होजाय, आलस्पकी तो बात ही क्या है और स्नान करके ही प्रातःकाल संध्या करते हैं फिर स्नान करते ही आलस्य आगया तोमार्जनौ कैसे जासक्ता है, इससे स्वामीजीका यह कयन सर्वथा मिथ्या ही है, मनुजी आचमनकी विधि इस प्रकार लिखते हैं कि आचमन करनेसे आभ्यंतर शुद्धि होती है। तथा हि अध्याय २ ब्राह्मण विप्रस्तीर्थेन नित्यकालमुपस्पृशेत् ॥ कायत्रैदशिकाभ्यां वा न पित्र्येण कदाचन ।। ५८ ॥ अंगुष्टमूलस्प तले ब्राह्मं तीर्थं प्रचक्षते ॥ कायमंगुलिमूलेऽये देव पित्र्यं तयोरधः ॥ ५९॥ त्रिराचामेदप: पूर्व द्विःप्रमृज्यात्ततो मुखम् ।। खानि चैव स्पृशेदाद्भिरात्मानं शिर एव च ॥ ६०॥ अनुष्णाभिरफेनाभिरदिस्तीर्थन धर्मवित् ॥ शोचेप्सुः सर्वदाचामेदेकान्ते प्रागुदङ्मुखः ॥६॥ हद्गाभिः पूर्यते विप्रः कंठगाभिस्तु भूमिपः ।। वैश्योद्भिः प्राशिताभिस्तु शूद्रः स्पृष्टाभिरंततः।। ६२ ।। अर्थ-ब्राह्मण ब्राह्मतीर्थसे सदा आचमन करे अथवा देवतीयसे आचमन करे परन्तु पितृतीर्थसे आचमन न करे ५८ क्यों कि उसकी विधि नहीं है अंगुष्ठमूलके नीचे ब्राह्मतीर्थ कहते हैं और कनिष्ठिका अंगुलोके मूलमें कायतीर्य और उसके अग्रभागमें देवतीर्थ तथा अगुष्ठ प्रदेशिनोके मध्यमें पितृतीर्य कहते हैं ५९ प्रथम जलसे तीन आवमन कर अनन्तर दोचार मुखको जलसे स्पर्श कर ज्ञानेंद्रियको शिरको हृदपको जलसे स्पर्श करे ६० फेलरहित शीतलनलंसे पवित्र होने की इच्छा फरनेवाला एकान्त और पवित्र भूमिमें पूर्व या उत्तरमुख होकर आचमन करे ६१ (३६) दयानन्दतिमिरभास्करः। वह आचमनका जल हृदय में पहुँचनेसे ब्राह्मण पवित्र होता है, उसके कंठमें प्राप्त होनेसे क्षत्री, मुखमें पहुँचनसे वैश्य तया स्पर्शमात्रसे शूद्र पवित्र होते हैं ६२ क्यों स्वामीजी इन शाकोंको मनुमें देखते २ ऊंचगये थे भला जी संध्या करनेको वैठेगा वह दोनों समय नहीं तो एक समय निश्चय ही मान करंगा पर आपके चेले तो कोट पतलून ही पहरकर करेंगे, फिर आपने मनमा परिक्रमा करनी लिखी सो काहेकी परिक्रमा करै ? आपकी या सत्यार्थप्रकाशकी परमेश्वरको तो आप निराकार मानते हो उसकी परिक्रमा कैसी, जब मनने उसकी परिक्रमा करली तो उसका महत्त्व जाता रहा और परमेश्वर निराकारको ही सीमा होगई, फिर जल तो कफनिवृत्तिके अर्थ है आप पं० १४ (अपांसमीप) इस श्लोकसे जलके धोरे बैठकर गायत्रीका जप लिखते हैं परन्तु जिसे फफ्ले घेरा हो वह तो आपके मतानुसार कोटी बंगले या उसरेंम वैठकर जप करे ॥ पृ० ४१ पं० २० अमिहोत्र और संध्या दो ही कालमें कर दो ही.रात दिनको संधिवेला हैं अन्य नहीं ॥ ३७ । १० समीक्षा-यह तो स्वामीजीने खूब ही कही दो कालसे अधिक ईश्वरका नाम लेना क्या कोई पाप है तपस्वी तो वा निरन्तर परमात्माका ध्यान करते रहे हैं इससे दो ही कालमें उसका अर्चन वन्दन करे यह कहना ठीक नहीं परमेश्वरका नाम लेना सर्वदा श्रेयस्कारक है ॥ इससे त्रिकाल संध्या करना किसी प्रकार हानिकारक नहीं किन्तु लाभको ही दायक है, इसमें प्रमाण यह है कि. जहां तैत्तिरीयारण्यकमें प्रभात संध्याके आच- मन आये हैं वहीं मध्याह्रकी संध्याका आचमन लिखा है यथा- ॐ आपः पुनन्तु पृथिवीं पृथिवी पूता पुनातु माम् । पुनन्तु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मपूता पुनातु माम् ।। यदुच्छिष्टमभोज्यं च यदा दुश्चरितं मम । सर्वं पुनन्तु मामापोऽसतां च प्रतिग्रह ५स्वाहा ॥ तैत्ति आ० अनु० २३ अर्थ-जल पृथिवीको पवित्र करें वा मेरे पार्थिव शरीरको पवित्र करें यह पृथिवीनलोंसे पवित्र हुई अपने गुणोंसे मुझे पवित्र करे यही जल ज्ञानके पति * भा.प्र. में वादी कोई एक तो ऐसा प्रमाण लिखता कि आचमनसे कफ दूर करना भोर संध्यामें गलेमें कफ अट्यता है तब दयानन्दजीकी पुष्टि होती पर कपोलकल्पनाम प्रमाण कहाँ होसकता है?
२७) वेदोंके धारण करनसे पति हैं आत्माको पवित्र करेंसबके पवित्र करनेवाले ब्रह्म को पवित्र करें जो मैंने पूँठा निन्दित भोजन किया है जो मेरा बुरा कर्म है असत् अर्थात् जिनका धान्य ग्राह्य नहीं है उनका मैने अन्न ग्रहण किया इन सबसे जलंक अधिष्ठातृदेवता मुझे पवित्र करें विशेष विवरण हमारी बाल संध्यामें देखो। जब राजा युधिष्ठिरसे दुर्वासाजीने दुपहरको भोजन मांगा और उन्होंने स्वीकार । तब दुर्वासानी दुपहरकी संध्या करने गये यथा- ते चावतीर्णा सलिले कृतवन्तोषमर्पणम् ॥ नहाभारत वनपर्व अ० २६३ श्लो० २८ वें नदीमें जाय जलमें अवतीर्ण हो मर्पण जपने लगे। गायत्री नाम पूर्वाहे सावित्री.मध्यमे दिने । सरस्वती च सायाह्ने सैव संध्या त्रिपु स्थिता ॥ व्या० संध्यात्रयं तु कर्तव्यं द्विजेनात्मविदा सदा ॥ त्रिकालसंध्याकणात्तत्सर्वं च विनश्यति ॥ याज्ञ. यासजी कहते हैं प्रभातकी संध्या गायत्री, मध्याह्रकी सावित्री, संध्याकी बती है । याज्ञवल्क्यका वचन है कि ब्राह्मणको तीनों कालकी संध्या करनी ये तथा त्रिकाल संध्यासे सब पाप दूर होते हैं । • ४२ पं० १५ स्वाहा शब्दका अर्थ यह है कि, जैसा ज्ञान आत्मामें हों मी जीभसे बोले ॥३८१७ मीक्षा-यह स्वाहाशब्दका अथ कौनसे निघण्टु निरुक्तसे. निकाला भला जो आपने लिखा है कि, प्राणाय स्वाहा तो इसका यह अर्थ हुआ कि, अर्थात् परमेश्वरके अर्थ जैसा ज्ञान आत्मामें होवे वैसा बोले भला यह क्या हुई इससे हवनकी कौनसी कला सिद्ध होती है, सुनिये स्वाहा अव्यय है, का अर्थ हवित्यागन करनेके हैं जो देवताके उद्देशसे अमिमें हवि दिया जाता है स्वाहा शब्दका प्रयोग होताहे जैसे "प्राणाय स्वाहा" प्राणोंके अर्थ हविं या प्राणों के अर्थ श्रेष्ठ होम हो ( स्वाहाकारञ्च वपद्कारश्च देवा उपनी- ते श्रुतेः)॥ - १२ पं० १९ सब लोक जानते हैं कि, दुर्गधियुक्त वायु और जलसे रोग गसे प्राणियोंको दुःख और सुगंधित वायु तथा जलसे आरोग्य और नष्ट होनेसे सुख प्राप्त होताहै और पृ० ४३ पं० ५में लिखा है कि, मंत्रमें जाख्यान हैं कि, जिनसे होम करनेके लाभ विदित होजायँ और मंत्रोंकी .
(३८) · दयानन्दतिमिरभास्करः। आवृत्ति होनेसे कंठस्थ रहैं पृ० ४२ पं० १४ गायत्रीमंत्रसे आहुति देवे तथा (विश्वानि ) इस मंत्रसे होम करै ।। पृ० ३९ । १० समीक्षा-प्रथम तो अमिहोत्रोंकी विधि ही वेदविरुद्ध लिखी गई है, * दूसरे यज्ञपात्रोंकी आकृतियाँ सब मनःकल्पित लिख दी हैं, वेदमें कहीं इनकी ऐसी रचना नहीं है, तीसरे अमिहोत्रका प्रयोजन जो जलवायुकी शुद्धि होना. सिद्धान्त किया है सो यह भी शास्त्र और युक्ति दोनोंके विरुद्ध है, यदि स्वर्गफल न हाकर अमिहोत्र घी जलाकर जलवायुकी शुद्धिक निमित्त है; तो इन पांच आहुति- योस क्या होगा ? किसी पीके आइतियेकी दूकानमें आग लगादेनी चाहिये, जो सैकडों मन घी जलकर खूब जलवायुकी शुद्धि होकर अनेक अनेक लोको पकार होजायँ, पदार्थविद्याको जाननेवाले पंडित लोग इस वातको जानते हैं, कि जलवायुकी शुद्धि परमेश्वरके प्राकृतिक नियमसे ही होती रहती है। सूर्यकी आकर्षणशक्ति जलकी तरलता और वनमें अनेक सुगन्धित पुष्प औपधियोंका उत्पन्न होना वायुकी प्रसरणशक्ति सुगंधित पुष्पादिकोंके परमाणुओंका वायुमें मिलना ऋतुका परिवर्तन इन सब कारणोंसे जलवायुकी शुद्धि होतीहै और यदि जलवायुकी शुद्धिपरही तात्पर्य हो तो ऐसा उपाय न करै कि, कमखर्च और बालानशीन गंधककी धूनी दिया करें, जिससे डॉक्टरलोग हैजे तककी वायु शुद्ध फरलंत हैं और जलको शुद्धिको दमडीकी फटकरी पा निर्मलीकै बीग. ठीक हैं. और देखो गायत्री में स्वाहा लगाकर होम करना भी लिखा है, भला इसमें कौनसे अमिहाबके लाभका अर्थ है ( अर्थ इसका पूर्व प्रकाश करचुके हैं ) अमिहोत्रका अर्थ तो है नहीं पर घी ये जाइये, प्रथम इससे स्वामीनीने चुटिया वैधयाई फिर रक्षा की फिर जप किया, अब पी पूंका, एक गायत्रीसही कितने फाम लिये हैं, आगे जब और विद्याकी उन्नती होगी तब इसमें इंजन लगाफर रेट चलायेंगे और पंख लगाकर वेटन उद्धांचंग, जब हवनसे वायुकी शुदि मात्र होती है, तो प्रातःसंध्याका नियम वृथा है, फिर तो चाहे जब आगमें पी डालदें और उसके लिय नानादिकफी कुछ आवश्यकता नहीं, चाहं जब गृहे वा भट्टीमें पृत झोंक दें, फिर क्यों इकतालीस ४१ बयालीस १२ पृष्ठम चमचा थाली मोतीपाबादिका विधान लिया ? फेवल पली भर २ के. डाल देना लिसदते और मंत्र पढनेस होमक लाभ विदित होते हैं यहभी आपका क्यन मिथ्या ही है । भला आपने जो गायत्री मंत्र और ( विधानिदेय ) ) इन • यशात्र आदिक बनानेकी विधि परिमाशादि हमारे भाग्य किये यदन देशो यज्ञ मानवन :१ से ७ तक।
हतीयसल्लाह खण्डनम् । दो मंत्रोंसे हवन करना लिखाहै इन मंत्रोंसे कौनसा हवनका लाभ प्रतीत होताहै फिर आप लिखतेहैं कि, इस प्रकार करनेसे मंत्र कंठ रहेंगे ठीक है जब मंत्र कंठ करना ही इष्ट है तो याद करनेवाले विना ही हवनके किये परिश्रम कर कंठ कर- सक्ते हैं और जब मंत्र कंठ करनेका ही लाभ है तो स्वाहा लगानेकी फिर क्या आवश्यकता है चाहे जहाँके मंत्र पढदिये फिर नियतमंत्रसे आहुति देनी यह क्यों लिखा है इससे यह कहना स्वामीजीका ठीक नहीं कि, केवल जलवायुकी शुद्धि होती है, हवनसे स्वर्गलोककी भी प्राप्ति होतीह यया यजुर्वेदे ।। अयनों अग्निवरिवस्कृणोत्वयम्मृधः पुर एंतु प्रभिन्दुन् । अयवाजांचयतु वाजसाता वय ठ शञ्जयतु जईपाणः स्वाहां। अ०५ मंत्र. ३७ यजु० अर्थ-यह अमि हमारे धनको संपादन करो यह अमि संग्रामोंको विदीर्ण करता आगे आओ यह अन्न विभाग निमित्त अन्नोंको हमें देनके लिये शत्रुओंको जीतो उसके लिये श्रेष्ठ होम हो “ अमि ही यह हवि देवताओंके पास पहुंचाता है और यजमानका कल्याण करताहै " यथा ॥ सीद होतः स्वर्ग लोकेचिकित्वान्त्सादयायुज्ञ ७सुकृतस्य योनौ । देवावीदैवान्हविषा यजास्य बृहद्यज॑मानेपर्योधाः ॥ यजु० अ० ११ मं०३५ भावार्थ-हे देवताओंके आह्वान करनेवाले अनिदेवता सब कुछ जाननेवाले तुम अपने लोकमें ठहरौ और और श्रेष्ठकर्म यज्ञके स्थान कृष्णानिन पर ही यज्ञको स्थापन करो, हे अमे ! जिस कारण देवताओंके तृप्ति करनेवाले तुम हव्यसे देवताओंको पूजते हो, इसी कारण यजमानमें वडी आयु और अन्नको धारण फरो (कृष्णाजिनं वै सुकृतस्य योनिरिति ) श० ६, ४, २, ६ । स सौंदस्वमहाँ :२ ॥ ऽसि शोर्चस्व देववीतमः ॥ विधुममने अरुपम्मियेद्धयसृजश तदर्शतम्॥ अ०११०३७ अर्थ-हे यज्ञके योग्य उत्कृष्ट अग्नि देवताओंके अत्यन्त तृप्त करनेवाले तुम .महान् हो पुष्करपर्णपर भले प्रकार बैठो, प्रदीप्त हो, दर्शनयोग्य शान्तरूप धूम्रको (20) दयानन्दतिमिरभास्करः। छोडो ३७ और अमिहोनसे पाप भी दूर होते हैं अपनाशन प्रकरणमें ( यद्मामे ‘यदरण्ये ) श्रुतिका अर्थ देखो। इसी प्रकार सामवेदमें भी अमिको देवताओंका दूत लिखा है इत्यादि वेदोंमें अनेक प्रकारसे अमिकी स्तुति परलोकप्राप्त्यर्थ लिखी है अब जो मनुनी हवनके लाभ कहतेहैं सो श्रवण कीजिये ।। स्वाध्यायेन व्रतहोंमैस्त्रविद्येनेज्ययासुतः ॥ महायज्ञेश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥ मनु० २१ २८ सब विद्या पटने पढाने व्रतोंके करने हवन करने विद्यनामक व्रत करने तथा यज्ञादिके करनेसे यह शरीर ब्रह्मप्राप्तिके योग्य होता है मुक्तिके साधनमें मनुनीने हवन भी लिखा है अब लौकिक लाभ सुनिये ॥ अमो प्रास्ताहतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते । आदित्याजायते वृविष्टेरनं ततःप्रजाः ॥अ०३ श्लो०७६ जपो हुतोहुतो होमः प्रहुतो भौतिको वलिः ॥ बाहयं हुतं द्विजाय्यार्चा पाशितं पितृतर्पणम् ॥ ७४ ॥ स्वाध्याय नित्ययुक्तः स्यादेवे-चैवेह कर्मणि ॥ देवकर्मणि युक्तो हि विभर्तीदं चराचरम् ॥ ७५ ।। यजमान फरके अमिमें डाली आहुति सूर्यको पहुंवर्ताह सूर्यसे अन्धी पृष्टि समपपर होती है पृष्टि से अन्न और अनसे प्रना होती है ७६ आहुत्त अर्थात् नप हुन-हवन, प्रदुत अर्यात भूतबलि, ग्राहय हुत श्रेष्ठ ब्राह्मणकी पूना, माशित श्राद्ध पितृतर्पण ७४ मनुष्य यदाध्ययनमें सर्वदा युक्त होकर अमिहायमें भी सर्वदा पुन, होय तो यह संपूर्ण जगत्को धारण करता है ७२ पूरी संध्यां जपंस्तिष्टनैशमेनो व्यपोहति ॥ पश्चिमा तु समा- मीनो मलं इन्ति दिवाकृतम् ॥ मनु० अ०२ श्लो. १०२ प्रातःकाली मंच्या फानो गत्रिका, मंपाकालकी संध्या परम दिना रिया पाप दूर होता है इसी प्रकार वनसे भी पाप दूर होताद क्योंकि वेदमंत्र पारसपकारक होते हैं और मिनी विधि है याही हगनमें उधारण किय जान है इसमें यह मिट हुआ कि, दयन करनेमे पार निवृत्त होता है और पुन्य होता है। १सयापर्व रेतः नियने धूम सामुमारनपति श्रुतः। ९.कारने मारप्रसारको मानरिया है।
तृतीयसमुल्लासखण्डनम्। वेदे शूद्रानधिकारप्रकरणम् । प्रथम तो वह वार्ता लिखते हैं जो शूदके विषयमें स्वामीजी मान चुके हैं । स० पृ० ४३ पं० २९ शूदमपिकुलगुणसम्पन्न मंत्रवर्नमनुपनीतमध्यापयेदित्येके। सुश्रुत ३९। २० । अर्थ-और जो कुलीन शुभलक्षणयुक्त शूद्र हो तो उसको मंत्रसंहिता छोडके सब शास्त्र पढावै यह मत किन्ही आचार्योंका है ( सुश्रुतका मत यह नहीं है ) और स पृ० ३४ पं० १ शूद्रादिवर्ण उपनयन किये विना विद्याभ्यासके लिये गुरुकुलमें भेनदें। २९ । १३ ॥ स० पृ० ७५ पं० २ और जहाँ कहीं निषध है उसका यह आभिप्राय है कि जिसको पढने पढानेसे कुछ भी न आवै वह निर्बुद्धि और मूर्ख होनेसे शुद्ध कहाता है उसका पढना पढाना व्यर्थ है ।। ७४ । २६ समीक्षा-इतने स्थानों में तो स्वामीजीने यह माना कि शूद्धको यज्ञोपवीत न देना चाहिये और यह भी कहा कि, मंत्रसंहिता छोडकर और सब कुछ पढाना और फिर कहा कि, जो मूर्ख हो जिसे पढायेसे कुछ न आवै वह शुद्ध है उसका पढना पढाना व्यर्थ है जब शूद्र मूर्खको ही कहते हैं जिसे पढायेसे कुछ न मावै तो फिर भला स्वामीजीने कौनसी भंगकी तरंगमें शूद्रको वेद पढनेका अधिकार दे दिया सो आगे लिखते हैं । स०प्र० पृ० ७४ पं० २ क्या स्त्री शूद्रभी वेद पर्दै ? जो यह पहेंगे तो फिर हम क्या करेंगे और फिर इनके पढनेका प्रमाण भी नहीं है जैसा यह निषेध है कि "स्त्रीशूदी नाधीयाताम्" इति श्रुतेः ॥ ७३ । २७ स्त्री और शुद्ध न पै. यह श्रुति है ( उत्तर ) सब स्त्री और मनुष्यमात्रको पढ- नेका अधिकार है तुम कुपमें पड़ी और यह तुम्हारी श्रुति कपोलकल्पनासे हुई है किसी प्रामाणिक ग्रंथकी नहीं और सब मनुष्योंको वेदादि शास्त्र पढने सुननेका अधिकार है यजुर्वेदके २६ वें अध्यायका दूसरा मंत्र है ॥ यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यःब्रह्मराज- न्याभ्या शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च ॥ परमेश्वर कहता है कि ( यथा ) जैसे मैं (जनेभ्यः ) सब मनुष्योंके लिये (इमाम् ) इस (कल्याणीम् ) कल्याण अर्थात् संसार और मुक्ति के मुखको देनेहारी (वावम् ) ऋग्वदादि चारों वेदोंफी वाणीको (आवदानि ) उपदेश करताहूं वैसे तुम भी किया करो ॥ परमेश्वर कहताहै कि, हमने ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र और अपने भृत्य वास्त्रियादि और अतिशूद्रादिकोंको भी वेदोंका दयानन्दतिमिरभास्करः। छाडी ३७ और अमिहानसे पाप भी दूर होते हैं अपनाशन प्रकरणमें ( यद्नामे 'यदरण्य) श्रुतिका अर्थ देखो ॥ इसी प्रकार सामयेदमें भी अमिको देवताओंका दूत लिखा है इत्यादि वदाम अनेक प्रकारसं अभिकी स्तुति परलोकमान्यर्थ लिया है अब जो मनुनी हबनके लाभ कहतेहैं सो श्रवण फोनिये ॥ स्वाध्यायेन ब्रहोंमेस्त्रविद्येनेज्ययासुतैः ।। महायज्ञश्च यज्ञेश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥ मनु०२।२८ मर विद्या पढन पदान प्रतीक करने हवन करने –विद्यनामा व्रत करने तथा यज्ञादिके फरनेसे यह शरीर ब्रह्मप्राप्तिकं योग्य होता है मुक्तिके साधनमें मनुनीने हवन भी लिखा है अब लौकिक लाभ मुनिये ।। अग्नी प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते ।। आदित्याजायते वृविष्टेरनं ततःप्रजाः॥अ०३ श्लो०७६ जपो हुतोहुतो होमः प्रहुतो भौतिको वलिः ।। ब्राहयं हुतं द्विजाम्या, प्राशितं पितृतर्पणम् ॥ ७ ॥ स्वाध्याय नित्ययुक्तः स्यादव चैवेह कर्मणि ॥ देवकर्मणि युक्तो हि बिभर्तीदं चराचरम् ।। ७५ ॥ यजमान करके अनिमें डाली आहुति सूर्यको पहुंचाहे सूर्यसे अच्छी वृष्टि समयपर होती है वृष्टिसे अन्न और अन्नसे प्रजा होती है ७६ आहुत अर्थात् जप 'हुत-हवन, प्रहुत अर्थात् भूतबलि, ब्राहय हुत श्रेष्ठ ब्राह्मणको पूजा, प्राशित श्राद्ध पितृतर्पण ७४ मनुप्य वेदाध्ययनमें सर्वदा युक्त होकर अमिहोत्रमें भी सर्वदा युक्त होय तो यह संपूर्ण जगत्को धारण करता है ७५ पूर्व संध्यां जपंस्तिष्ठनैशमेनो व्यपोहति ॥ पश्चिमा तु समा- सीनो मलं हन्ति दिवाकृतम् ॥ मनु० अ०२ श्लो. १०२ प्रातःकालकी संध्या करनेसे रात्रिका, संध्याकालकी संध्या करनेसे दिनका किया पाप दूर होता है इसी प्रकार हवनसे भी पाप दूर होताहै क्यों कि वेदमंत्र पापक्षयकारक होते हैं और जिनकी विधि है वोही हवनमें उच्चारण किये जाते हैं इससे यह सिद्ध हुआ कि, हवन करनेसे पाप निवृत्त होता है और पुण्य होता है । * १ इत्तो वा अयमूर्ध्व रेतः सिञ्चति धूम र सामुत्रवृष्टिर्भवतीति श्रुतेः । एक प्रकारसे भास्कर प्रकाशने इस प्रकरणको मान लिया है। . .
तृतीयसमुल्लासखण्डनम् । (४१) वेदे शूद्रानाधिकारप्रकरणम् । प्रथम तो वह वार्ता लिखते हैं जो शूदके विषयमें स्वामीजी मान चुके हैं ।। स० पृ० ४३ पं० २९ शूद्रमपिकुलगुणसम्पन्न मंत्रवनमनुपनीतमध्यापयेदित्येके। सुश्रुत ३९। २० ॥ अर्थ-और जो कुलीन शुभलक्षणयुक्त शूद्र हो तो उसको मंत्रसंहिता छोडके सब शास्त्र पहावै यह मत किन्ही आचार्योंका है (सुश्रुतका मत यह नहीं है) और स० पृ० ३४ पं० १ शूद्रादिवर्ण उपनयन किये विना विद्याभ्यासके लिये गुरुकुलमें भेजदें। २९ । १३ । स. पृ० ७५ पं० २ और जहाँ कहीं निषेध है उसका यह अभिमाय है कि जिसको पढने पठानेसे कुछ भी न आवै वह निर्बुद्धि और मूर्ख होनेसे शद कहाता है उसका पढना पढाना व्यर्थ है ॥ ७४ । २६ समीक्षा-इतने स्थानों में तो स्वामीनीने यह माना कि शूद्वको यज्ञोपवीत न देना चाहिये और यह भी कहा कि, मंत्रसंहिता छोडकर और मब कुछ पढाना और फिर कहा कि, जो मूर्ख हो जिसे पहायेसे कुछ न आवै वह शूद्र है उसका पढना पढाना व्यर्थ है जब शूद्र मूर्सको ही कहते हैं जिसे पढायेसे कुछ न भावे तो फिर भला स्वामीजीने कौनसी भंगकी तरंगमें शूद्रको वेद पढनेका अधिकार दे दिया सो आगे लिखते हैं । स.प्र. पृ० ७४ पं० २ क्या स्त्री शूद्रभी वेद पढ़ें ! जो यह पटेंगे तो फिर हम क्या करेंगे और फिर इनके पढनेका प्रमाण भी नहीं है जैसा यह निषेध है कि "स्त्रीशूदी नाधीयाताम्" इति श्रुतेः ॥ ७३ । २७ स्त्री और शूद न पहें यह श्रुति है (उत्तर) सब स्त्री और मनुष्यमात्रको पढ- नेका अधिकार है तुम कुएमें पड़ो और यह तुम्हारी श्रुति कपोलकल्पनासे ईई है किसी मामाणिक ग्रंथको नहीं और सब मनुष्योंको वेदादि शास्त्र पढने सुननेका अधिकार है यजुर्वेदके २६ व अध्यायका दूसरा मंत्र है ॥ यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यःब्रह्मराज- न्याभ्या ५ शूद्वाय चार्याय च स्वाय चारणाय च ॥ परमेश्वर कहता है कि ( यया)जैसे मैं (जनेभ्यः) सब मनुष्योंके लिये (इमाम् ) इस (कल्याणीन् ) कल्याण अर्थात् संसार और मुक्ति के सुखको देनेहारी (वाचम् ) ऋग्वेदादि चारों वेदोंकी वाणीको (आवदानि ) उपदेश करताहूं वैसे तुम भी किया करो ॥ परमेश्वर कहताहै कि, हमने ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र और अपने भृत्य वा नियादि और अतिशूदादिकोंको भी वेदोका दयानन्दतिमिरभास्करः। प्रकाश कियाहै, कहिये अब तुम्हारी बात माने या परमेश्वरको, क्या ईश्वर पक्षपाती है यदि वह पढाना न चाहता तो इनके वाक् और श्रोत्र इन्द्रियोंकी वयों बनाता, वेदमें कन्याओंका पढना लिसाहै पृ० ७५ पं०७ ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् । अथर्व का०११ सु०७मं १८ कुमारी ब्रह्मचर्य सेवनसे वेदादि शास्त्रोंको पड पूर्ण विद्या और उत्तम शिक्षाको प्राप्त युवती होके पूण युवावस्थामें अपने सदृश प्रिय विद्वान् पूर्ण युवावस्थायुक्त पुरुपको प्राप्त होवे (प्रभ) क्या स्त्रीलोग भी वेदोंको प? (उत्तर) अवश्य देखो औतसूत्रादिमें (इमं मंत्रं पत्नी पठेत् ) स्त्री यज्ञमें इस मंत्रको पडै जो वेदादि शास्त्रोंको पढा न हा तौ उच्चारण कैसे करसके । समीक्षा-प्रथम तो स्वामीजी लिख चुके कि, शुद्ध मंत्रभाग न प और अब लिखते हैं कि, प? और तुम कुएमें पड़ो यह दुर्वचन नहीं तो और क्या है, तुम्हारी ही पुस्तक और तुम ही प्रश्रकर्त्ता तुम्हारी ही पढी हुई श्रुति इससे तुम ही कुएमें गिरे, संसाररुपी कूपमें गिरानेको आपके वाक्य निश्चय प्रबल है. जय शुद्ध महामुर्खको ही कहते हैं कि. जिसे पढानसे कुछ न आवै फिर जब पडानेसे कुछ न आये तो उसे वेद पठाना फैसा और जब आप जाति कर्मानुसार मानतेहूँ तोभी वेद पढा हुआ शुद्ध नहीं हो सकता वह तो उच्चवर्ण हो जायगा, फिर भी मूर्ख वेपहा ही शूद्रसंज्ञक रहा इससे आपके वचनसे भी शूद्र वेद पढ़ा नहीं हो सकता और जब इस मंत्रमें ब्रह्मचर्यका अर्थ वेद पढना है तो इस मंत्रका उत्तरार्द्ध (अनवान् ब्रह्मचर्यणाधी घासं जिगीपति) तो क्या बैल और घोडेको भी वेद पढानेके पश्चात् पास खानेकी आज्ञा दीजियेगा । अब व्याससूत्र सुनिये ॥ संस्कारपरामर्शात्तदभावाभिलापाच ॥ अ० १ पा०३ सू० ३६ विद्या पढनके लिये, उपनयनादि संस्कार व मुन से शुद्ध वेदविद्या पहनेका अधिकारी नहीं है ॥ श्रवणाध्ययनार्थप्रतिपेधास्मृतथ ॥ शा० अ० १.पा० ३ सूत्र. ३८ शुद्ध येदका अधिकार नहीं है क्योंकि अयण अध्ययनवाम्त निषेध होनसे स्मृतिमें ऐसा, लिसा है ।। कात्यायन श्रीतसूत्र ।। ११ में लिखा है "अङ्गहीनाओप्रियपण्ड- गृहवनम् १" अगहीन, अश्रोत्रिय, नपुंमा और शुद्रका यनमें अधिकार नहीं है ।। वेदप्रदानादाचार्य पितरं परिचक्षते ।। न झुस्मिन् युज्यते कर्म किंचिदामोनिबंधनात् ॥ १७१॥ नाभिव्याहारयेद्ब्रह्म स्वघानिनयनाहते ॥ शुद्रेण हि समस्तावद्यावदे न जायते १७२ अ०२ तृतीयसमुल्लासखण्डनम् । वेदके प्रदानसे आचार्यको पिता कहते हैं मौजीवन्धनसे पूर्व वेदका कुछ भी अंश उच्चारण न करे, और आदादिकोंमें जो वेदोक्त मंत्र हैं उनको छोड़ कर और मंत्र उच्चारण न करे कारण कि जबतक वेद पढनेका अधिकार नहीं हुआ जब- तक शूद्रके तुल्य है, यहां विना यज्ञोपवीत्त हुए शूद्रकी समान तीनों वर्ण कहे १७१-१७२ अब आगे शूद्रका उपनयन नहीं होता यह दिखाते हैं ।। न शुद्ध पातकं किंचिन्न च संस्कारमहति । .नास्याधिकारो धमेंऽस्ति न धर्मात्प्रतिपेधनम् ॥ १२६ ।। यथा यथा हि-सदृत्तमातिष्ठत्यनसूयकः। तथातथमं चामुं च लोकं प्राप्नोत्यनिदितः ॥ १२८॥ धर्मप्लवस्तु धर्मज्ञाः सतां वृत्तमनुष्ठिताः। मंत्रवर्ज न दुप्यन्ति प्रशंसां प्राप्नुवंति च १२७ अ० १० शूटको कोई पातक नहीं है और न कोई संस्कार योग्य है और न कोई वैदिक्- धर्ममें इसको अधिकार है और कहे हुए धर्म करनेका निषेध नहीं है १२१ निंदाको न करनेवाला शुद्ध जैसा २ अच्छे पुरुषोंके आवरणोंको करता वैसा २ इस लोक तथा परलोकमें उत्कृष्टताको प्राप्त होता है १२८ धमकी इच्छा वाले तथा धर्मको जाननेवाले शूद्र मंबसे रहित होकर भी सत्पुरुषोंके आचरण करते हुए दीपोंको नहीं प्राप्त होते किन्तु प्रशंसाको प्राप्त होते हैं १२७ अब वेद मंत्रका अर्थ सुनिये ( यमां) इसमें प्रसंग देखना योग्य है सो इससे पहल- यह मंत्र है इस मंत्रमें इमाम् इदम् शब्दसे प्रयोग है ।। अग्निश्च पृथिवी चु सन्नतेतेमेसन्नमता मुदोवायुश्चान्तरिक्ष चमन्नतेतेमेसन्त्रमतामद आदित्यश्च द्याश्च सन्नततेमे सनम- तामद आपश्व वरुणश्च सन्नततेमे सन्नमतामढ़ः सुतसई सदोऽअष्टमीभूतसाधनासकामाँ २॥ ऽअर्ध्वनस्कुरुसंतान- मस्तुमेऽमुना॥9॥ ("अमिः) अमि (च) और (पृथिवी ) भूमि (च) भी (सन्नते ) परस्प- अनुकूलतासे संगत हैं (ते) ये दोनों (मे) मेरे (अदः) अमुक्कामनार (सनमताम् ) इसी प्रकार वशवर्ती करो (च) और ( वायुः) वायु (व) और (१२) दयानन्दतिमिरभास्करः। (अन्तरिक्ष ) अन्तरिक्ष (सन्नते) संगत हैं (ते. वे मेरे इत्यादि)() और (आदित्यः) आदित्य (च) और (द्यौः) [लोक (सन्नते) जैसे परस्पर यश- वर्ती हैं (ते वे इत्यादि) (च) और (आपः) जल (च) और (वरुणः) वरुण ( सन्नते) परस्पर संगत हैं (ते. वे) हे देव जिस आपके (सप्त) सात (संसद) अधिष्ठान अमि, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, हलोक, अप, वरुण हैं, (अष्टमी आठवीं भूतसाधनी ) प्राणियोंकी आधारस्वरूप वा उत्पादक भूमि है इन सबके अधिष्ठानरूप तुम (अध्वनः ) हमारे मागोंको (सकामान् ) सफल (कुरु ) करो (मे) मेरी (अमुना ) इस इष्टसे वा सर्वस (संज्ञानं ) संगति (अस्तु ) हो, अर्थात हे देवपयस्वरूप सप्तसंसद और आठवीं भूतसाधनी बुद्धिको हमारे अधीन करो अथवा विज्ञानात्माके प्रति कहते हैं हे देव ! कि सप्तसंसद, पांच ज्ञानेन्द्रिय, मन और बुद्धि यह सात स्थान और आठवीं प्राणियोंको पश करनेवाली वाणी है आप हमारे मागोंको सकाम करो इनके संग मेरी संगति हो विशप अर्थ हमारे वेदभाप्यमें देखो अनन्तर यह मंत्र है ॥ यथेमांवांचंकल्याणीमावदानिजनेभ्यःब्रह्मराजन्याभ्याश- द्राय चा-यचस्वायचारणायचाप्रियोदेवानां दक्षिणायेदातु- रिहभूयासमयमेकामःसमृध्यतामुप मादोनमतु।।य०अ०२६२ पूर्व मंत्रमें स्थित भूतसाधनी वाणीका अध्याहार होता है तब इसका यह अर्थ होता कि यज्ञके अन्तमें यजमान अपने भृत्योंसे कहता है ( दक्षिणायै या भृतसाधनी कल्याणी वाचं जनेभ्यः आवदानि तथा त्वं कुरु इति शेषः) भाव यह है कि (दक्षिणाय ) दान देनेको जनाफै अर्थ ( यथा)जैसे (इमाम) इस भूतसाधना ( फैल्याणी ) शोभना (पाचं) (दीयतां भुन्यताम्) दो भागन ऐसी वाणीको (जनेभ्यः) सम्पूर्ण नोंक निमित्त (आपदानि ) सपकारसे पहताई पैम तुम भी करो और कहा कि जनोंके लिपे (ब्रह्मरानन्यायाग) आह्मक्षत्रियोंक निमित्त (च) और (शुदाय) शूदक निमित (अय्यांप ) येगा निमित्त (स्वाप) अपने भृत्यके निमित तथाः (अरणाय) अति माया 'निमित्त आशप यह कि दान भाननमें किसी नातिका विचार नहीं है सबकी चाहिये ऐसा करनेमे ( देवानाम ) देवताओंका ( दातुः) सर्वक देन परमधाका (प्रियः) प्यारा (भूपासम)हंगा (मे) मेरा (अपम ) पनाम सामरूप पद (कामः) कार्य ( समृप्यताम) समृद्धिको मात हो (अदः) .
तृतीयसमुल्लासखण्डनम् । परलोकमुखादि ( उपनमतु ) प्राप्त हो २ इसमें दक्षिणाये' और 'दातु पद आनसे स्पष्ट ही अन्न और दानकी महिमा विदित होतीहै । यदि दयानंदजीका ही अर्थ माना जाय तो परमेश्वरकी वाणी भी माननी होगी जर वाणी हुई तो शरीर भी होगा और वेदाविर्भाचप्रसंग भी स्वामीजीका स्वामीनीक ही लेखसे भ्रष्ट होनायगा, क्यों कि जब इस मंत्रसे उपदेशवत् अमिआदिको उपदेश कर सक्तथे तो उनके अन्तर्वेदका प्रादुर्भाव होना असंगत है इससे शूदको वेदपठन पाठनका उपदेश करना अशुचिमें शुचिबुद्धिरूप अविद्या है और प्रथम तो यहां स्वामीजीसे यह पूछना है कि यह ब्राह्मणादिशब्द मंत्रमें जातिक बोधक हैं, अथवा जो तुमने पच्चीस वर्षमें परीक्षास नियत करी है उस ब्राह्मणादि जाति बोधक हैं, जैसे आपन ८८ पृष्ठम, माना है यदि प्रथम पक्ष कहोगे तो ब्राह्मणत्वादि जाति सिद्ध होगई तो आपकी स्वकपोलकल्पित वर्णव्यवस्था है सो दत्तजलोजलि होगई, और यह भी विचारना चाहिये कि यह उपदेश आदिमें होना चाहिये वा अन्तमें होना चाहिये मध्यमें फैसे होसक्ता है क्योंकि (इमाम ) यह शब्द प्रयोग समीपवस्तुका बोधक है, सो अभीतक चतुर्वेद विद्या साप है नहीं, वक्ष्यमाणा है और यदि गुणकृत वर्ण व्यवस्थाको मानकर मंत्रमें ब्राह्मणादिशब्द कहेंगे तब ब्राह्मणवादिशून्यमें प्राह्मणादि शब्द प्रयोग करनेसे ईभर भ्रान्त होगा क्योंकि तुम्हारे सिद्धान्तमें पूर्ण तो विद्वान् ब्राह्मण है सो अभीतक हुआ नहीं, और जो पूर्ण विद्वान है तिसको वेदविद्या टपदेशरूप ईश्वरकी आज्ञा निष्फल है, और शूदशब्द तमोगुणविशिष्टका बावा है तिसको भी वेदविद्या उपदेशशी आज्ञा निष्पल है. और अरण शब्दार्यजी अतिशृढ़ है तिसमें तो सर्पया उपदेश निष्फल है. जैसे कारमं बीज बोना तैसे शूद्र और अतिशूद्धमें टपदेश निप्पल है, और जब जाति ही माह्मणादिकोंकी लिप दीता फिर (स्वीप अपने भृत्योंको) यह शब्द प्रयोग निष्फल ही हो जायगा क्या वे भृत्य चार वर्णोसे पृथक है. इस फारण मृद्रको पेदका अधिकार कदापि नहीं और भी मुनिये । शुहरु सिवाय इतनोंका और निषेध है। विद्याहवेत्राह्मणमाजगाम गापाय मा शेवधिरोऽहमस्मि ।। असूय- कायानृजवेऽपतायनमापावीर्यवती तथास्याम् नि अ०२खं०४ अर्थ-विद्या आधिदेवता फामरूपिणी होकर नियमित चेद दाग जाननाले ब्राह्मणके पास आकर बोली (गोपायमाम) मेरी रक्षा कर (अहम् ) मैंरक्षित हुई (शेवधिः) सजाना हूंगी फिनसे रक्षा करनी चाहिये (अस्यकायानुनय- ताय) (असपकाय) परापा अपवाद निन्दा करगंगाले (अनुनये ) जिसकी (४६) दयानन्दतिमिरभाम्बरः। मन वाणी दहकी असमानवृत्तिहा (अयताय ) विपकर्णन्द्रियाय जिसकी इन्द्रियां शुद्ध न हो ऐसे पुरुषसे मुझं मत कहीं ऐसा करनेसे में वीर्यवती हूंगी। -स्वामीनी लिखते हैं कि चाण्डालतकको वेदविद्या पठा दो यह निरुतः भाप्ययुक्त कौनस चूरणके साथ गडापगये इससे नीचको कुटिल शूद्रांको कदापि विद्या नहीं- देनी इसी प्रकार त्रियोंको वेदादि पढनमें अधिकार दिया है और ( ब्रह्मचर्यण कन्या ) इस मंत्रका अर्थ टल्टा लिखा है और इसमें प्रियांको वेद पढ़ना नहीं लिखा और जो बाहिं सो पड़े. फेवल श्रीगद्रको मंत्रभागका पढना मन किया है और वेदवाक्यका अर्थ यह है कि ( ब्रह्मचर्यण युवानं पति कन्या विन्दते ) यह अन्वय हुआ अर्थात् ब्रह्मचर्यसे जवान हुये पतिको कन्या प्राप्त होरे और (इम मंत्रं पत्नी पठेत् ) पहले तो इसका पता ही नहीं लिखा कि कहांका है तो भी इसकी व्यवस्था इस प्रकार है कि- वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः। पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोग्निपरिक्रिया । मनुः अ० २ श्लो० ६७ विवाहमें वेदमंत्रसे संस्कार होताहै यही स्त्रियोंको यज्ञोपवीत है, पतिसेवा करनी यही गुरुकुलका वास है, गृहका कामकान करना अनिकी सेवा है, पतिक सनिधिमें विवाहमें संस्कारके अर्थ तथा कहीं यज्ञमें पत्नीके मंत्र बोलनेकी विधि हैं, सो ऋत्विक कहलादतेहैं कुछ पढनेकी विधि नहीं है, गार्गी आदि खिये मंत्र- भागको छोड और सब कुछ पड़ी थी इससे । स्वी शूदको * वेद न पढाना और भी सुनिये ॥ योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ॥ मनुः ॥ २॥१६८॥ जो ब्राह्मण वेदको छोड और विद्याओंमें परिश्रम करता है वो जोते हुएहीं शूदपनेकू वंशसहित प्राप्त होजाताहे अब विचारनेकी बात है जब कि वेद नहीं पडनेसे शुदपना प्राप्त होता है तो शुद्ध कैसे वेद पढ़ सकते हैं क्योंकि जो ब्राह्मण भी वेद न पड़े तो शूदसरीखा हो जाय जब शूद्र वेद पढे तो वोह शूद्र कैसा, तीन वर्ण तो वेद विना पढे शूदसरीखे होजाते हैं, आप उन्हीं अवैदिक शूद्राको वेदका अधिकार देते हो. धन्य है आपकी बुद्धि, मालूम होता है कि किसी शूदने कुछ झुकादिया हे नहीं तो शूद्रोंकी ऐसी तरफदारी न करते कि पूर्व तोअधिकार नहीं दिया, यहाँ लिखदिया और शूद्रको वेदमें अनधिकार होनेसे ईश्वरमें पक्षपातका दोष नहीं • भास्करप्रकाशक कर्ताको जर कोई युक्ति न सूझी तो अपनी ओरसे एक अधिकार मीमांसा बनाई पर इससे क्या शूद्रको वेदाधिकार सिद्ध हो सकता है ? .
तृतीयसमुल्लासखण्डनम् । (४७) मासक्ता क्योंकि उसके कर्म ही जब अनधिकार और शूद्रपनके थे तब तो उसका कल्याण उस शरीरकही धर्मसे है इससे कर्मानुसार सुख दुःख ब्राह्मगशूद्रादि होनेसे अपने २ कार्य और धर्मके सब पृथक् २ अधिकारी हैं यदि दोप देते हो तो ईश्वर धन संतान भी सबको बराबर देता और जब कर्मसे न्यूनाधिक है तो जातिभी कमसे है इसका विशेष वर्णन जातिप्रकरणमें लिखेंगे । स पृ०५०५०१० अनेन क्रमयोगेन संस्कृतात्मा द्विजःशनैः॥ गुरौ वसन्संचिनुयाद्ब्रह्माधिगमिकं तपः ॥ २॥ १६४ इसी प्रकार कृतोपनयन दिन ब्रह्मचारी कुमार और ब्रह्मचारिणी कन्या धोरे 'धीरे चेदायके ज्ञानरूप उत्तम तपको बढाते जाय ॥ १७ ॥ १६ समीक्षा-इस श्लोकमें स्वामीजीने कुमारी ब्रह्मचारिणी यह अर्थ कौनस पदसे उद्धृत किया है सो नहीं विदित होता और उपनयनका सम्बन्ध भी शायद कन्याके साथ लगाया होगा क्यों कि बिना उपनयनके वेद नहीं पठाया जाता दयानन्दजीके मतमें कन्याका भी उपनयन लिखा है धन्य है (संस्कृतात्मा दिनः शनैः ) इसमें दिनशब्दसे केवल ब्रह्मचारीहीका ग्रहण होताहै कन्याका नहीं और वेदःकन्याको न पठाना यह पूर्वही लिख चुके हैं इति ॥ सृष्टिक्रमप्रकरणम् । स. पृ० ५४ पं० १४ जो जो सृष्टिक्रमसे विरुद्ध है वोह सब असत्य है जैसा विना मातापिताके योगसे पुत्रका होना तया १२ पंक्तिमें जो ईश्वरके गुण कर्म स्वभाव और वेदके अनुकूल हो वोह सब सत्य और उसके विरुद्ध असत्य है५२।२९ समीक्षा-न जाने स्वामीजी स्वप्नावस्थामें कभी महम्मद साहबकी तरह ईश्व- रके.पास हो आयथे जो उसने इन्हैं सारी सृष्टिका क्रम उपदेश कर दिया, जिससे इन्हें यह बात निन्ति मालूम होगई है कि ईश्वरकी सृष्टिका विषय इतना ही है पेदमें तो ऐसा लिखा है कि !! एतावानस्यमहिमातोज्यायाँश्चपूरुपः ॥ पादास्यविश्वभूता- नित्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ यजु० अ० ३१ मं० ३ ईश्वरकी विभूति इतनीही है यह नहीं किन्तु इससे भी अधिक है, यह जो कुछ विश्व जीवों सहित है यह उसको महिमाका एक भाग है, और शेष तीन भागमे प्रकाशमान मोक्षरूप आप हैं और ब्राह्मणवाक्यभी कहते हैं ( नाहं विदाय न विदाथ) हे मैत्रेयी ! मैं कौनई तू नहीं जानती सो कौन है यह भी तू नहीं जानती और गीता में भी लिखा है कि (उद्धः परतस्तु सः) कि वोह परमेश्वर वृद्धिसे परे है .
. (१८) दयानन्दतिमिरभास्करः। जब वोह बुद्धिसे परे है तो उसकी कार्य पूर्णतासे कौन जान सकता है पर स्वामीनी तो शरीर रहते भी सृष्टिका क्रम सब उससे पूछिआये, क्यों जी ॥ तस्मादश्वाऽअजायन्तयेकेचोभयादतः ॥ गावोइजनि- रेतस्मात्तस्माजाताऽअजावयः॥ यजु० अ०३१ मंत्र ८ उस परमेश्वरसे अव और जो कोई दूसरे पशु ऊपर नीचेके दांतवाले हैं उत्पन्न हुए उससे गौ बैल उत्पन्न हुए इससे भेड वकरी उत्पन्न हुई । अब स्वामीनी बता कि आप तो उत्पत्ति स्त्रीपुरुपके योगसे मानते हैं यह घोडे बैल भेड बकरी कैसे उत्पन्न हुए औरभी मुनिये ॥ यो।ब्रह्माणविदधातिपूर्वम् । श्वे जिस परमेश्वरसे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए, जब आप स्त्रीपुरुषके योगसे उत्पति मानते हैं तो आपने ईश्वरकीभी लुगाई बनाई होगी जिससे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए हैं और घोडे आदिके उत्पन्न करनेकोभी स्त्रियें होनी चाहिये फिर वे ईभरकी स्त्रियें कहांस आई यह प्रभ होगा इससे यह आपका कपोलकल्पित सृष्टिकम सब भ्रष्ट हुआ जाता है धन्य है उसकी महिमाको जाननी कहां सामर्थ्य है वोह सब कुछ करता है बिना मातापिताके आपने भी पृ० २३४ पं० १५ में अनेक मनुष्यों की उत्पत्ति मानी है यहां सृष्टिकम कहां उडगया उसे कोई जान नहीं सक्ता क्योंकि ( पराम्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते ) उसकी पराशक्ति. अनेक प्रकारकी मुनी जाती है अब भी कभी २ एसे आश्चर्य प्रतीत होते हैं जो कमी पूर्व नहीं हुए सृष्टिक्रम तो दूर रहे स्वामीजीको अपनी भी खबर नहीं है यदि सबर होती ती आप कहीं कुछ कहीं कुछ यह विरुद्धतासे भराहुआ सत्यार्यप्रकाश' न लिखते, तथा पहला सत्यार्थप्रकाश भी भष्ट होनानेसे आपको घोह अममाण पर नया गहना न पडता, जो कि यहां आपने सृष्टिकममा यहाना कर टट्टीकी ओलटमें शिफार खेला है, जो बात समझम नहीं आई लिख दिया कि मृष्टि: ऋमके विरुद्ध है कहीं तो लिख दिया होता कि सृष्टिक्रम इतना है जो मादम तो होनाता फिर आपको पैसेही प्रमाण देत, वेदानुकूलताफा वर्णन आगे लिग ॥ स. पृ. ५७ पं. १ 'मम्भवति यस्मिन्स सम्भवः' पोई . किमान पहाड टाये मृतफ निलाप समुहमें पन्यर तराप परमेश्वरका अवतार हुआ यह सन बातें एष्टिकमक विरुद्ध होनम असभर हैं ॥ ५५ ॥ १३ समीक्षा-सामोनीका मत तो उनकी बुदि है जो बात इनकी युद्धियः अनु बूल हो यही मत्य नो चुहिक प्रनिकट हो योद मटिकमक भी प्रतिफल होगी आर वेदानुाल और मटिममानकला नाम पाते हो पा रहा रिमारी - तृतीयसमुल्लासखण्डनम् । (१९) बुद्धिके अनुकूल होना चाहिये, यदि किसी योगसे आपकी भेंट होती तो वह मुर्दा भी मिलाकर दिखा देता, और आपकी इस धुद्धिका भी सुधार देता, तथापि जिन ग्रंथोंका आपने सत्यार्थप्रकाशमें प्रमाण लिखा है उसीसे हम यह सब बातें दिखाते हैं महाभारतके अश्वमेध पर्वके ६९ अध्यायमें देखा श्रीकृष्णन परी- क्षितको जो मृतक उत्पन्न हुआ था पुनर्जीवित किया, वाल्मीकिमें लिखा है कि रामचंदफे राज्यमें एक शंबुक नाम शूद तप करता था इस कारण उस अनधिका- किं पापसे एक ब्राह्मणका पुत्र मरगया. रामचंद्रने उस शूदको मार ब्राह्मणकु- मारको जीवित किया और श्रीकृष्णने गोवर्द्धन दठाया, महावीरजी लक्ष्मणनाक मर्थ संजीवन बूंटीवाला पहाड उठा लाये थे, समुद्रपर पुल बांधा हुआ आनतक मौजूद है, आँखें होयें तो देख आओ, यह लंकाकाण्डमें स्पष्ट है, और (आमो- पदेशः शब्दः) शब्द प्रमाण आप मानहीं चुरु हैं सो वाल्मीकिनी पूर्ण आत थे उन्होंने ही नल नीलको लिखा है कि इन्होंने पुल बाँधा, यह पत्थर समुदमें नहीं ता क्या आपके सत्यार्यमकाशपर तरं थे और सम्भव किसे कहते हैं, जो कुछ भी होनाप उसे संभव कहते हैं समय पुरुषांस जो सम्भव है वही असमयाकी असं- भर है अवतार विषय सममसमुल्लासमें लिसंग इससे यह भी विदित होगया कि शूदको तप करने का अधिकार नहीं है पर जो कहीं आन दिन रेल तार न होता तो स्वामीजीको यह भी असंभव विदित होता । पठनपाठनविधिप्रकरणम् । स. पृ० ६८५० १८ आर्पग्रंथांका पदना पंसा है जैसा कि समुद्र में गोता लगाना और बहुमूल्पमोतियोंका पाना अष्टाध्यायी माहाभाष्य पहाना पं० १९ पास्कमुनिकृत निघंटु पं० २१ तदनन्तर पिंगलाचार्यकृत उन्दोग्रन्थ पंड पं० २३ फिर मनुस्मृति पाल्मीकिरामायण और महाभारतरे. अन्तर्गत विटुग्नीति आदि मान्य रीतिसे पदच्छेद आदि प? पृ० ७० पं०५ आयुर्वेद नरक मुश्रत चार वर्ष पद पृ०७०६० १७ नारदसंहिता आदि आग्रंथ प? पृ.७० ६५ ज्योति- श्शारस सूर्यसिद्धान्तादि निसमें बीजगणित अंगविद्या भूगर्भ यथावत् मौसै फिर पृ०७१ पं०४ से पूर्व मीमामा ध्यासकृतभाप्य पेशपिक गौतमान भाज्यमहिन, न्यापस्य पात्स्यायनभाष्यमहित पतवलिकृतयोगपर श्यामन भान्य, कपिल मुनिकृत सांस्यपर भागरिमुनिकृत भाप्य, वंदान्तपर चाम्पापन और चाया- पनमुनिकृत भाप्य वृतिसहित पटाये, इन बॉको कापर. अंगामभी गिना चाहिये, कार-यनु-सामअथर्व चारों वेद मरहन है वम एतरय गाय १ उत्तरकान्ट । सर्ग (५०) दयानन्दतिमिरभास्करः। साम और गोपथ चारों ब्राह्मण, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, निघण्टु, छन्द और ज्योतिप, छः वेदोंक अंग मीमांसादि वदोंके उपांग आयुर्वेद धनुर्वेद गन्धर्व- वेद और अधर्ववेद यह चारवेदीक उपवद, इत्यादि सब ऋषि मुनियों के किये हुए ग्रंथ हैं इनमें जोजो वेदविरुद्ध प्रतीत हो टस उसको छोडदेना क्यों कि वेद ईश्वरकृत होनेसे स्वतः प्रमाण अर्थात् वेदका प्रमाण बदहीसे होताहै, ब्राह्म- पादि सब ग्रंथ परतः प्रमाण वेदाधीन हैं, और पृ० ६९ में, पं० १ ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्टक, माण्डूक्य ऐतरेय तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, इन दश उपनिपदोंको पढना ॥ ६८ । ६ से । समीक्षा-यहां ती स्वामीनीन बडीभारी चाल खेली है जरा आप अपने ऊपर लिखे हुएको तो विचार कीनिये जो, आप सत्यार्थप्रकाश पृ० ७१ पं० १ में लिखते हो कि (ऋपिप्रणीत ग्रंथोंको इस लिये पढना चाहीये कि वे बडे विद्वान् सब शास्त्रवित् और धर्मात्मा थे' ) जब कि ऋषिप्रणीत ग्रंथों में भी आप लिखते हैं कि वेदानुकूल जो बात होगी वह मानी जायगी, तो उन ऋपियोंकी पूर्ण- विद्वत्ता कहां रही, और वे धर्मात्मा किस प्रकार होसक्ते हैं, जो वेदविरुद्ध कोई बात कहे यह आपने पूर्ण विद्वान् ऋषियोंकी निन्दा करी है, तो आपको मनुनीके वाक्यानुसार हम यह श्लोक भेंट करते हैं। योवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद्विजः । स साधुभिर्वहिष्कायों नास्तिको वेदनिन्दकः॥ मनु ०२१९ जो वेद और आप्त पुरुपोंके किये शारोंका तर्कसे अपमान करताहै उस वेद- निन्दक नास्तिकको जाति पंक्ति और देशसे बाहर निकाल देना चाहिये । अब कहिये आप इन्हीं महात्माओंके ग्रंथों में वेदविरुद्धता ठहराते हो तो अब आपकी क्या-दशा की जाय, नव आपको वेदानुकूल ही प्रमाण है तो वृथा और ग्रंथों में भटकते हो क्यों कि आपको तो वही बात प्रमाण होगी जो वेदमें होगी। फिर औरोंके माननेकी आवश्यकता क्या है, पर ऐसा करनेसे आपका काम कैसे चल सकताहै आप तो अपने अनुकूल होनसे सब कुछ मानते हैं. भला यह तो कहिये यह सत्यार्थप्रकाशकी रचना कौनसे वेदके अनुकूल है, आप तो प्राचीन ऋषियोंसे भी अपनेको अधिक मानते हा उन महात्माओंका लेख तो वेदविरुद्ध होगया जो कि पूर्ण विद्वान् थे, और आपका लेख जो स्वार्थपरता और येदवि. १ इसीके आगे लिखते हैं कि और अनापं जिनका आत्मा पक्षपात सहित है उनके बनाये हुये ग्रंथ भी पैसे ही हैं । इस पचनसे आप मनाप एकसे बनाये मार दयानंद के ग्रंय भी पक्षपाती होनसे वैसे ही हैं।
. 1 तृतीयसमुल्लासखण्डनम् । अर्थास पूर्ण है सत्य है, धन्य है यह बढ़ाई ही तो आपका गुण प्रगट करती है. भला यह तो बताओ फि ( अहरहः सन्ध्यामुपासोत, स्वर्गकामा यजेत ) अर्थात् रोज रोज संध्या करो स्वर्गकी इच्छा हो तो यज्ञ करै यह विधिवाक्य यज्ञोपवीत मंत्रोंके ऋषिदेवता और उनके प्रयोग, यह पंचयन आदि यह कौनस मंत्रभागके अनुकूल हैं, और कौनसे मंत्र इनके विधायक हैं बताओ तो सही जब मंत्रभागमें यह वाता नहीं तो आपके मतानुसार यह विधिकर्मकाण्ड सब वेदविरुद्ध हुआ, और यह पठन पाउन शिक्षा कौनसे मंत्रभागके अनुकूल है, और संन्यासी होकर चोगा बूट जूता पहरना, हुक्का पीना कुरसी मेजको ही काममें लाना, विरागी होकर रुपया जमा करना यह कौनसे मंचभागके अनुघाल है महात्माजी जब आप वेदके अर्थ लिखने बैठते हो तो आप उसके अर्थको ब्राह्मण निघण्टु महाभाष्य उपनिषद्से सिद्ध करते हो, कि इस शुब्दका निघग्दुमें यह अर्थ है, शतपयमें इसका आशय इस प्रकार कथन किया है, इस कारण इसका यह अर्थ हुआ जब यह दशा है कि विना ब्राह्मग नियन्टुके आप वेदका अर्थ सिद्ध नहीं कर सक्ते तो वे ब्राह्मण नियन्दु वेदके अर्थका सिद्ध करनेस स्वतः सिद्ध और स्वतःप्रमाण क्यों नहीं क्यों कि मंत्रवर्णनमें तो यह लिखा ही नहीं कि इसका अर्थ इस प्रकार फरना, यह विधि तो ब्राह्मण निघण्टु आदिमें ही कथन करी है कि मंत्रका यह अर्थ है और यह इसके प्रयोगकी विधि है इससे इनका वेदवत् प्रमाण है इन ग्रंथों में अंश भी वेद विरुद्ध नहीं है और इसी कारणसे (मंवबाह्मण्योवेदनामधेयम् ) मंत्र और ब्राह्मणका नाम दोनों मिलकर वेद कहा जाता है अब कहिये इन ग्थों से अर्थ करनेमें वेदानुकूलता आपकी कहां गई और जिन ग्रंथों में थोडा भी असत्य है आप उन्हें त्यागन करने कहते हैं जैसा कि स०प्र० पृ० ७१५० ३० में लिखा है (विपसंपृक्तानवत् त्याच्याः) जैसे अत्युतम अन्नं विपसे संयुक्त होनेसे छोडने योग्य होताहै वैसे ही असत्यतामिभित थत्याज्य है और पृ० ७२ पं० १२ असत्यमिभं सत्यं दूरतस्त्याम्यमिति) असत्यसे युक्त सत्य भी दूरसे छोडन: चाहिये ऐसे ही असत्य मिश्रित ग्रंथ भी त्यागने, क्यों कि जो सत्य है सो वेदादि सत्यशास्त्रींका है मिथ्या उनके घरका है वेदक स्वीकारमें सब सत्यका ग्रहण हो- जाता है और जो इन मिथ्याग्रंथोंसे सत्यका ग्रहण करना चाहे तो असत्य भी उसके गलेमें मडनाताहै यह पृ० ७२ पं० ३ से ७ पंक्तिक कथन है ।। जो यह दशा है तो ब्राह्मणादि ग्रंथामें भी आपके कथनानुसार असत्य है तो विपवत् होनेसे इनका भी त्यागन करना चाहिये, फिर इनको क्यों मानते ही यह आपका वडाभारी अन्याय है कि जिस थाली में सांप उमामद कर.यह आपकी चंडी भारी भान्ति है, कि माझगादि ग्रंथाले विदविरुद्धता मानते है (५२) दयानन्दतिमिरभाकरः। यदि आप इनमें भी असत्य और वेदविरुद्ध बताते हो तो फिर इन्हींका प्रमाण देते आप क्यों नहीं लजाते, आप अपने पूर्वलसका बडी जल्दी भूलगये, विप मिला अमृत भी विष ही होनाताहै बस इसीन मारदिया आपका सत्यार्थप्रकाश और वेदभाष्य भूमिका असत्य होनेसे त्याज्य है । स० पृ० ७१ पं० १७ नीचे लिखे जालग्रन्थ समझने चाहिये ।। ७२ । ६ व्याकरणमें कातंत्र, सारस्वत, चन्द्रिका, शेखर,मुग्धवोध, कौमुदी, मनारमादि कोशमें अमरकोशादि, छन्दोग्रन्थमें वृत्तरत्नाकरादि, शिक्षामें: 'अय शिक्षा प्रव- क्ष्यामि पाणिनीयं मतं यथा ' इत्यादि, ज्यातिपमें शीप्रबोध, मुहूर्तचिन्तामणि आदि, काव्यमें नायिकाभेद, कुवलयानंद, रघुवंश, माय, किरातार्जुनीय आदि, मीमांसामें धर्मसिंधु, व्रतार्कादि, वैशेषिकमें तर्कसंग्रहादि, न्यायमें जागदीशी आदि, योगमें हठप्रदीपिकादि.सांख्यमें सांख्यातत्वकौमुद्यादि, वेदान्तमें योगवासिष्ठ पंचदश्यादि, वैद्यकमें शार्ङ्गधरादि, स्मृतियोंमें एक मनुस्मृति इसमेंभी प्रक्षित श्लोक अन्य सब स्मृति सब तंत्र ग्रंथ सब पुराण सब उपपुराण तुलसीदासकृत भाषा रामायण रुक्मिणीमंगल आदि और सब भापा ग्रन्थ यह सब कपोलकल्पित मिथ्या ग्रन्थ हैं ७१ । १. पृ० ७० पं० २५ परन्तु जितने ग्रह जन्मपत्र राशि मुहूर्त आदि फलके विधायक ग्रन्थ हैं उनको झूठ समझके कभी न पहै ॥७०।१६ समीक्षा--यहां तो कौमुदीकी यह निन्दा और जब आप मरे तो निनवस्तेमें वैयाकरणसर्वस्व और सिद्धान्तकौमुदी यह दो ग्रन्थ निकले, इन व्याकरणोंक ग्रंथों में क्या मिथ्यापना है क्या इन ग्रन्थोंने अष्टाध्यायीका खण्डन किया है, कौमुदी आदिकोंमें तो पाणिनिकृत अष्टाध्यायीके सूत्रोंकी वृत्ति की है यदि वृत्ति करनेहीसे वे जाल ग्रन्थ आपने बताये तो तुम्हारा रचित वेदाङ्गप्रकाश जो अष्टा- ध्यायीकी भापाटीका कौमुदीकी रीतिपर है वोह भी मिथ्या ही होना चाहिये कोशमें यदि निघण्टु जिसमें वैदिक शब्द हैं पई और अमरकोशादि न पड़े तो लौकिक शब्दोंके अर्थ आपके सत्यार्थप्रकाश या वेदभाष्यभूमिकासे करै काव्योंसे आपकी शडता क्यों है, क्या यह भी आजीविकाको ही रचना कियाँ यदि यह काव्य जिनसे व्युत्पत्ति होती है न पड़े तो आपका बनाया संस्कृत वाक्यप्रबोध निसमें सेकड़ों अशुद्धि भरी पड़ी हैं उसे पहैं, जो और भी बुद्धि भ्रष्ट होनाय, . तर्कसंग्रहमें कौनसी बात वैशेषिकके विरुद्ध है, और आपने भी तो ५१ पृष्ठसे ६६ पृष्ठतक तर्कसंग्रह ही लिखी है, यह आपकी बडी भारी चालाकी है, कि कोई हमारा चेला सत्यार्थप्रकाश से निकालकर अलग छपालेगा, तो तसंग्रहरू स्थानमें यही काम आवेगा और हमारा नाम होगा, यह लिखा तो होता, कि तर्कसंग्रहने फौनसी आपकी रोनी छीन ली और उसमें विरुद्ध कौनसी बात है पर नृतीयसमुल्लासखण्डनम् । हटको क्या करिये और जर मनुमें प्रक्षित श्लोक हैं तो यह भी विपमिश्रित अन्नकी नाई आपने त्यागन क्यों नहीं किया, यदि इस भी छोडते तो काम कैसे चलता पुराणोंकी सिद्धि आगे चलकर करेंगे, तुलसीदासनीने क्या बात विरुद्धताकी लिखी है और जब सब भापाके ग्रन्थ कपोलकल्पित हैं तो आपका सत्यार्थप्रकाश वेदाप्य तथा भूमिका आयोद्देश्यरत्नमाला आदि जो कुछ आपकी भाषाको गत है यह भी कपोलकल्पित और त्याज्य हैं, भाषाकी अतिव्याप्ति होनेसे, जो आप अपनी बनाई भाषां माने तो औरोंके बनाये क्यों प्रमाण नहीं ? बीमारी होनेसे आप अँगरेजी दवाई उडाना और. शावरको जाल ग्रन्थ बताना, धन्य है यदि जन्मपत्र मुहूर्त मिथ्या है तो संस्कार विधिमें यज्ञोपवीत विवाहमें पुप्यनक्षत्र शुक्लपक्ष उत्तरायण आदि यह मुहूर्तविधि क्यों लिखी हैं, अब मुश्चतका भी प्रमाण सुनिये जिसके प्रमाण आप सत्यार्थप्रकाशमै बहुधा लिखते हैं। उपनयनीयस्तु ब्राह्मणः प्रशस्तेपु तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रेषु प्रश- स्तायां दिशि शुचो समे देशे चतुर्हस्तं चतुरस्र स्थंडिलमुपलिप्य गोमयेन दर्भः संस्तीर्य पुष्पाजभक्त रत्नश्च देवताः पूजयित्वा विमान भिपजश्वेत्यादि । सुश्रुतसूत्रस्थान अ०२ अर्थ-दीक्षा योग्य तो ब्राह्मण है अच्छी तिथि करण मुहूर्त अच्छी (पुप्य हस्त अवण अश्विनी) नक्षत्र में उत्तर वा पूर्व श्रेष्ठ दिशामें पवित्र समान देशम चौकोन चार विलापंद अथवा चार हाथकी वेदी रचे, उसको गोबरसे लीप उसपर कुशा विछावे पुष्प खोलें रत्नादिसे देवताओंका पूजन कर ब्राह्मण धैयोंका पूजन करे (जब शिष्य हो) पुनः शान ॥ ततो दूतनिमित्तशकुनं मंगलानुलोम्येनातुरगृहमभिगम्योपवि- श्यातुरमभिपश्येत् स्पृशेत् पृच्छेच. सु. सूत्रः अ० १० अर्थ-जब दूतके साथ वैद्य जाय तो निमित्त-सुन्दरगन्धादि शकुन-पक्षियोंकी चेष्टादि मंगल स्वस्तिक पूर्ण घटादि इनको विचारे फिर रोगीके पास जाय देखे कुवै और पछे । इन वाक्योंसे स्पष्ट है कि, मुश्रुत आदि महर्षि भी ज्योतिपशकुन ग्रह नक्षत्रादि अनुसार शुभाशुभ फल मानते थे, जब आपने इन ग्रन्योंको ममाण माना है मुहर्तादि स्वयं सिद्धही है तिससे ग्रहादि पारका न मानना भापकी बड़ी भूल है बेदसे आगे लिखेंगे ॥ * • मा०प्र० से इस प्रसंगमें कुछ करते न बना पुराणोंके विरोध वे पते लिखे हैं जिसका उत्तर धर्मदिवाकर दिया है ! ..
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इसमें इतिहासपुराणादि पांच नाम पृयक २ ग्रहण किये हैं तथा और भी कहते हैं- सहोवाच, ऋग्वेदं भगवोध्योम यजुर्वेद सामवदेमाथर्वणं चतुर्थ- मितिहासपुराणं पंचमं वेदानां वेदं पित्र्य सार्श देवं निधि पाको वाक्यमेकायनं देवविद्या ब्रह्मविद्यां भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या ५सर्पदेवयजनविद्यामेतद्भगवोध्येमि ॥छ ०प्र० ७ खण्ड ! नारद बॉलं ऋग्वेदका स्मरण करताई तथा साम, यजु, भय चदफा स्मरण फरताहूं (इतिहासपुराणपंचमं वेदानां पदं) और इतिहास पुराण पांचवां बेद पढाहै (पियं ) भादकल्प ( राशिं ) गणित (देयम) उत्पातजानम' निससे देवताओके किये हुए उत्पातका मान होताहै (निधि) महाकालादि निधिशाग्र (याकोवाक्य) तवंशाग्य ( एकापन) नीति शाम दियविद्या) निरुतम् (ब्रह्मविद्याम् ) प्रास- मान्धी उपनिपढ़ विधाळू (भूतपिधा) भूततंत्र (क्षत्रविद्या ) धनुदवं ( नक्ष- पविद्या ) ज्योतिष (मर्पदेययननविद्या ) मर्पविद्यागाडिगन्धयुक्त, नृत्यगीतादि पाय शिल्पशान भी मैं स्मरण करताई ॥ दसिंप इस छान्दोग्यरे धास्यमे स्तिनी विद्या मिड होगई और यह भी पुगण इनसे पृषर ही ग्रहण किया है और मुनिये ॥ अरेस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेवैतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोथर्वागिरस इतिहासः पुराण विद्या उपनिपदः श्लोफासूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानीष्ट हुतमाशित पायितगयञ्चलोकः परश्य लोक साणि च भूतान्यस्यैवे- तानि सर्वाणि निश्वसितानि ।। वृह अ०१।११ कंत्रा०५ टम परमपरा नियमित मर्यद, पद, सामवेद. अपवेद, इतिहास पुरा- परिचा, उपनिपत, शोर सय, प्याख्यान, अनुभ्याम्यान निममें कोई कपामसंग होता गनिहाम १ गिममें मगांदि नगती पूर्व अवम्यारा निरुपण होताह मा पुगण : उपासना और आत्मपिधारा प्रतिसादा. वारय है सोगिण ३ पास्य दया रहम्पका नाम उपनिपट जी शोपनामम मंत्र पहेगान वस्र १५ जो मंतित अपंग प्रतिपादक यायि मी सन १६ गिम मारपमें निमरा पिम्नार होताद मोप्पासात और निमारपमें प्रयास्या- नगे भी राहिला नाय मी अनुसामान है। .
.. दयानन्दतिमिरभास्करः। पुनः आश्वलायनसून अ० ३ पंचयज्ञमकरण । अथ स्वाध्यायमधीयीत ऋचो यजू ५ पि सामान्यथा- गिरसो ब्राह्मणानि कल्पान गाथानाराश ५ सीरितिहासः पुराणानीत्यमृताहुतिभिर्यदृचोऽधीतेपयसः कुल्या अस्य पितृन स्वधा उपक्षरन्ति यद्यजू श्पि घृतस्य कुल्या यत्सा- मानि मध्वः कुल्या यदथर्वागिरसः सोमस्य कुल्या यद्वा- झणानि कल्पान् गाथा नाराश : सीरितिहासपुराणानी- त्यमृतस्य कुल्याः स यावन्मन्येत तावदधीत्यतया परि- दधाति नमो ब्रह्मणे नमोस्त्वग्नये नमः पृथिव्यै नम औप- धीभ्यो नमो वाचे नमो वाचस्पतये नमो विष्णवे महते करोमीति ॥ आशय यह है कि जो ऋगादि चारों वदोंके और ब्राह्मणादि ग्रंथाको कल्प गाथादि सहित पढ़ते हैं उनके पितरोंका स्वधासे आभिषेक होता है, मग्येदंश पहनवालीफ पितरां। दूधकी कुल्या, यजुर्वेदके पढनयालोक पितरोंको पृतकी कुल्या, सामवेदके पटनवालोंके पितरामधुकी कुल्पा, अपांगिरस पहनहारफ पितरों सामकी कुल्या, और ब्राह्मण कल्प नाराशंसी इतिहास पुराणके पाठ करनेवालंक पितरों। अमृतको कुल्या प्राप्त होती है इसकारण इनका पाठ करना, ईश्वर अमि पृथ्वी धारपति विष्णु देवको नमस्कार है। और महाभाप्पमें भी १ आहिकमें शब्दमयोगविषयमें पुराणको पृथर गिनाहै। सप्तद्वीपा वसुमती त्रयो लोकाश्चत्वारो वेदाः सांगाः सर.. इस्या बहुधा भिन्ना एकशतमध्वर्युशाखाः सहयवा साम- वेदः एकविंशतिधा बढ़च्यन्नवधाऽथर्वणो वेदा वाकोवाक्य- मितिहासःपुराण वैद्यकमित्येतावाञ्छब्दस्य प्रयोगविपय इति। सातीर मदिन पृयी तीनों लोक शिक्षाफल्यादि अंगमदिन चारों पद (मर. हस्याः) उपनिष्ट एकमा पा. सासा पदकी, महस शामा मामी- इकीम ऋग्वेदी नौ गागा अपवेदकी ( यातायास्यम, ) नर्गदि इनि. हाम पुगन वैद्यक इनमें मदनपांग होनादि, यदि नाराशमीका नाम ६ पुराण दोना नो मांग लिगकर गिर पुन रिमनेकी क्या आपापाता थी, तृतीयसमुल्लासखण्डनम् । ग्रंथोंके वाक्यसे यह बात सिद्ध है कि, ब्राह्मणभाग उपनिषद् सूनादिसे पृथक ही कोई पुराण और इतिहास संज्ञावाले ग्रंथ हैं यदि इतिहासका पुराण विशेषण मानो तो इतिहास पुंल्लिंग और पुराण नपुंसकालंग है, सो पुलिंग और नपुंसक- लिंगका विशेषण हो नहीं सक्ता, इससे यह विदित होताहै कि पुराणसे इतिहास भी कोई पृथक ग्रंथ है, सो न्यायके भाष्यकार महर्षि वात्स्यायनी चतुर्थ अध्याय प्रथम आहिकके ६२ सूत्रपरजो कथन करते हैं सो आपके सामने दिखाया जाताहै जिससे विदित हो जायगा कि ब्राह्मणादि भागसे अतिरिक्त कोई पुराणतिहास संज्ञक ग्रंथ है। समारोपणादात्मन्यप्रातिपेधः । न्या० अ० १ आ. सू० ६२ (भाप्यम् ) तब प्राजात्यामिष्टिं निरूप्य तस्यां सार्ववेदसं हुवात्मन्यमी- न्समारोप्य प्राह्मणः प्रबजेदिति श्रूयते तेन विनानीमः प्रजावित्तलोकपणायाश्चाव्यु- स्थाय भिक्षाचर्य चरन्तीति; एपणाभ्यश्च व्युत्थितस्य पानवयान्तानि कम्माणि नोपपद्यन्ते इति नाविशेषेण कर्तुः प्रयोजकफलं भवतीति चातुराश्रम्यविधानाच्चेति हासपुराणधर्मशास्त्रेप्वकाम्यानुपपत्तिः तदप्रमाणमिातिचेन्न प्रमाणेन खल्लु ब्राह्मणे- नेतिहास पुराणस्य प्रामाण्यमभ्यनुज्ञायते ते वा खल्वेते अथवांगिरस एतदिति- हासपुराणस्य प्रामाण्यमभ्यवदन् 'इतिहासपुराणं पंचमं वेदानां वेद इति' तस्माद- युक्तमतदप्रामाण्यमित्ति, अप्रमाणे च धर्मशास्त्रस्य प्राणभृतां व्यवहारलोपालोको च्छेदप्रसंग दृष्टपतृसामान्यांच्याप्रामाण्यानुपपत्तिः य एव मंत्रब्राह्मणस्य द्रष्टारःप्रव- कारश्च ते खल्वितिहासपुराणस्य धर्मशास्त्रस्य चति विषयव्यवस्थापनाच यथाविपयं भामाण्यम्, अन्योमंत्रमाह्मणस्य विषयोऽन्यश्चेतिहासपुराणधर्मशास्त्राणामीत, यज्ञो मंत्रब्राह्मणस्य लोकवृत्तमितिहासपुराणस्य लोकव्यवहारव्यवस्थापनं धर्मशास्त्रस्य विषयः, तत्रैकेन सर्व व्यवस्थाप्यत इति यथाविषयमेतानिप्रमाणानि इंडियादिवदिति। (भाषा) माजापत्य इष्टिका निरूपण करके उसमें सार्ववेदसनाम याग करनेके अनन्तर आमिको आत्मामें समारोपण करके प्राह्मण संन्यासाश्रमको धारण फरे ऐसी विधि श्रुतियों में लिखी है, इससे जाना जाता है कि प्रजावित्तस्वलोकादिकी इच्छासे निवृत्त हुएको यतिधर्मका आचरण करना उचित है, और इसीकारण संन्यासीको पाय चयान्तादि क्रियायें नहीं होती, इस हेतु यावत् कर्म मानके सभी अधिकारी नहा हो सके, किन्तु भिन्न भिन्न कमौके भिन्न २ अधिकारी होते हैं, और यदि यह कहो कि हम ही कोई आश्रम मानेंग, अनेक आश्रम न मनिंग तब सभीका कर्माधिकार एक ही होगा तो ऐसा नहीं हो सत्ता क्याक इतिहास पुराण और धर्मशास्त्र के ग्रंथों में अनेक आश्रमकी विधि लिखी लिखाई है तब एक ही आश्रम कैसे होसत्ता है, न चेत् एक कही कि इतिहासादि ग्रंथोंका प्रमाण ही नहीं मानते हैं, तो यह भी नहीं हो सकता है क्योंकि प्रमाणभूतमाझण इतिहासादि दयानन्दतिमिरभास्करः। ग्रंथोंके प्रमाणकी आज्ञा करताहै, तथा यह अथर्यागिरसभी इसका प्रमाण कहते हैं कि इतिहासपुराण वेदोंमें पांचवाँ बंद है, इससे इनका प्रमाण नहीं है ऐसा कहना महा अनुचित है और धर्मशास्त्रका प्रमाण न करगो तो माणियोंका व्यवहार लाप हानेसे सृष्टि हो रच्छिन्न हानायगी, और दोनोंके देखने और कथन करनहार भी ता एक ही हैं, जो मंत्रब्राह्मणंक द्रष्टा ,वक्ता हैं वही धर्मशास्त्र पुराण हातहासके कहनेहार हैं, फिर इनका अप्रमाण फैस हांसक्ता है तथा भिन्न भिन्न विषयोंके व्यवस्थापन करनेसे भी तो यथा विषय इनका प्रमाण ह, मंत्र ब्राह्मणका विषय और है और धर्मशास्त्र पुराण इतिहासादिका विषय और है, यज्ञ मन्त्र और ब्राह्मणका और लोक वृत्तान्त इतिहासपुराणका, तथा लोकवृत्तान्त व्यवस्थापन धर्म शास्त्रका विषय है उनमेंस एकसे सवही विषय नहीं व्यवस्थापित होते, इससे यथा विपयमें सब ही प्रमाण हैं इंद्रियोंकी नाई अर्थात् जैसे रूप. रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द इत्यादि सब ही विषय किसी एक ही इद्वियसे नहीं जाने जाते इसकारण इन पांचोंके. क्रमसे नेत्र निह्वा नासिका त्वक कर्ण सभी पृथक् २ प्रमाण माने जाते हैं इत्यादि इससे स्पष्टरूपसे जान पडता है कि यज्ञरूप प्रतिनियत असाधारण विपयों के प्रतिपादक मंत्र ब्राह्मण ग्रंथोंसे अतिरिक्त ही कोई पुराणोतिहास संज्ञक लोकवृत्तरूप असाधारण विपयोंका प्रति- पादूक वाक्यकलापहै, यदि ब्राह्मणभागोंकी इतिहास पुराण पदार्थता ऋपियोंको आभिमत होती तो वह पुराणादिके प्रामाण्य व्यवस्थापन करनकी इच्छासे उनके अप्रामाण्यकी शंका करके (प्रमाणभूत ब्राह्मण इतिहास पुराणोंकी अभ्यनुज्ञा करतेहैं ) इत्यादि पूर्वोक्त बहुतसा कैसे कहते, और प्रयास करते ब्राह्मणको इतिहास पुराणसशंक हानेमें वैसा कहना असंगत होता जिसकी बुद्धि कुछ भी ठिकाने होगी और कैसा भी मूर्ख क्यों न हो पर अपने प्रमाणका साधक अप- नेको कभी न कहेगा और सुनियवेदमें भी इतिहास पुराणका वर्णन है * । सवृहती दिशमनुव्यचलत् तमितिहासश्च पुराणञ्च गाथाश्च नाराश ५ सीश्चानुव्यचलन इतिहाशस्य च वैसपुराणस्य च गाथानां च नाराश ५सीनां च प्रियं धाम भवति य एवं वेदं ॥ अथर्व० का १५ प्र६ अनु ० १ मं० १२ • भास्कर प्रकाशकर्ताके तो यहां तोते उडगये हैं अनाप शनापके सिवाय कुछ कहते न बना। १ वह वडी दिशाको गया और उसके पीछे इतिहास पुराण गाया मोर नाराशंसी चली, जो ऐसा जानता है वह इतिहास गाथा और नाराशंसीयोंका प्यारा घर बनता है। इसमें भी इतिहास पुंल्लिंग पुराण नपुंसकलिंग है इससे विदित होगया कि पुराण भिन्न हैं यही बहुत है।
तृतीयसमुल्लासखण्डनम्। यह बात वेदसे भी स्पष्ट होगई अब इसके गोपथ ब्राह्मणका लेख देखिये। एवामिमे सर्वे वेदा निर्मितास्सकल्पाः सरहस्याः सत्राह्मणाः सोपनिपत्काः सेतिहासाः सान्वाख्याताः सपुराणाः सस्वरा ससंस्काराः सनिरुक्ताः सानुशासनाः सानुमार्जनाः सवाको- वाक्यास्तेषां यज्ञमभिपद्यमानानां छिद्यते नामधेयं यज्ञमित्ये चमाचक्षते (गोपथपूर्वभागः द्वितीयप्रपाठकः) यदि ब्राह्मणग्रंथोहीमें इतिहास पुराणका अन्तर्भाव होता तो गोपथमें इस प्रकार कल्प ब्राह्मण उपनिषद् इतिहास पुराणादि पृथक् पृथक कैसे लिखता इससे भी ब्राह्मणसे अतिरिक्त ही पुराण इतिहास जाना जाताहै, इस कारण जो पुराणको इतिहासका विशेषण कहते हैं सो प्रमादी हैं क्यों कि सेतिहासाः सपुराणाः ऐसा पृथक कहना ही इनमें भेद प्रतीति कराता है जब इतिहाससहित और पुराणसहित ऐसे दो शब्द कहे तो निःसंदेह यह दोनों पृथकही हैं, और सूत्रकारने भी तो अश्वमेधप्रकरणमें आठवें दिन इतिहास और नवमें दिन पुराण पाठ लिखा है अब यह ता निश्चय होगया कि पुराण इतिहास आदि ब्राह्मणोंसे अतिरिक्त ही कोई ग्रंथ हैं, परन्तु अब पुराण किसे कहते हैं और यह कैसे बना टनक सुनने वा पढनेसे क्या लाभ है सो मनुस्मृति और महाभारतादि ग्रथांसे दिखलाते हैं कि महाभारतमें भी पुराण सुननेकी विधि लिखी है इससे भारतसे पृथक पुराण हैं यह सिद्ध होताहै ।। स्वाध्यायं श्रावयत्पिञ्ये धर्मशास्त्राणि चैव हि । आख्यानानीतिहासांश्च पुराणान्यखिलान च ॥ मनु० श्राद्धमें वेद धर्मशास्त्र आख्यान इतिहास पुराण सूत्रादि इन सबको सुनावै, इससे विदित होता है कि, मनुस्मृति पुराण नहीं है किन्तु पुराण किसी और ग्रंथका नाम है और दखिये। पुराणामतिहासश्च तथाख्यानानि यान च । महात्मनांच चरितं श्रोतव्यं नित्यमेव तत् ॥ महाभारते दानधर्म-य च भाष्यविदः केचिद्येच व्याकरणे रतः ॥ अधीयते पुराणानि धर्मशास्त्राण्यथापि च ॥ ९. अ.॥ पुराण इतिहास आख्यान महात्माओंके चरित्र नित्य सुनने योग्य हैं १.कोई महाभाष्य जाननेवाले जो व्याकरणमें प्रीति रखतेहैं तथा जो धर्मशास्त्र और .
(६०) दयानन्दतिमिरभास्करः। पुराण भी पढते हैं फिर वाल्मीकिरामायणबालकाण्डमें राजा दशरथ और मुमन्त्रका संपाद इस प्रकार है कि जिससं पुराण प्राचीन ही प्रतीत होतेहैं । • एतच्छ्रुत्वा रहः सूतो राजानमिदमब्रवीतु श्रूयतां यत्पुरा- वृत्तं पुराणेषु मया श्रुतम् । वाल्मी० बालकाण्ड । यह सुनकर सूतने एकान्तमें रानासे कहा मुनी महारज! यह प्राचीन कथा है जो पुराणोंमें मैंने सुनी है इसके अनन्तर सम्पूर्ण रामजन्मका चरित्र जो भविष्य था सब राजाको सुनाया कि रामचंद्र तुम्हार यहां उत्पन्न होंगे शंगी ऋषिको चुलाइये और वैसा ही हुआ । "एवं वेदे तथा सूत्रे इतिहासेन भारतम् । पुराणेन पुराणानि प्रोच्यन्ते नात्र संशयः॥" इस प्रकार वेदों में सूत्रोंमें इतिहाससे भारतका ग्रहण और पुराणोंसे अष्टादश पुराणोंका ग्रहण होता है यह सिद्धान्त अर्थात् प्रसंगका निष्कर्षह और महाभारतमें लिखा है कि ॥ अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः । पश्चाद्धारतमाख्यानं चके तदुपहितम् ॥ महा अठारह पुराणोंको व्यासजी संकलित करके फिर महाभारतकी रचना करते हुए । अव पुराणोंका लक्षण कथन करते हैं । सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च । वंशानुचरितं चैव पुराणं पंचलक्षणम् ॥ सृष्टिको उत्पत्ति मलय वंशमन्वन्तर वंशानुचरित्र यह पुराणके पांच लक्षण हैं, जिसमें यह पांच लक्षण हों वह पुराण कहाताहै लिंग पुराणके प्रथम अध्यायसे विदित होताहै कि पुराणोंका बड़ा विस्तार था जो ब्रह्माजीने बनाये थे व्यासजीने उन विस्तृत ग्रंथोंको संक्षिप्त करके अठारह विभाग करदिय हैं, क्या यह कथायें व्यासजीसे पूर्व नथी जो यह माना जाय कि पुराण नवीन हैं और स्वामीजीने ३२६ पृष्ठमें (कर्ता) यह शब्द लिखा है जिसके माने बनानानेवालेके हैं सो यह उनकी भूल है वहाँ (कृत्वा ) शब्द है ( जिसके अर्थ संक्षेपसे करके ) के हैं इति- हासोंको महाभारतमें मिला दिया इस कारण इतिहास नाम महाभारतका होगयाहै इससे यह न समझाना चाहिये कि पुराण आधुनिक हैं किन्तु जगत्की पूर्व अवस्था कह से ही इनका पुराण नाम है व्यासनीने इन कथाओंका संग्रह किया तृतीयसमुल्लासखण्डनम् । किया है और उसमें जिस अवतार और निस बातकी प्रधानता रक्सी है उसी नामपर उस पुराणका नाम रखदिया है विना पुराणोंके और ऐसा कौनसा ग्रंथ है जिसमें सब पूर्व राजोंक चरित्र वर्णन हैं इसी कारण लिखाहै कि। पुराणं मानवो धर्मः सांगो वेदश्चिकित्सितम् । आज्ञासिद्धानि चत्वारि न हन्तव्यानि हेतुभिः ॥ १॥ भा० पुराण मनुस्मृति सांगवेद चिकित्सा इन चारोंकी आज्ञा स्वतःसिद्धि है जब ब्राह्मणादि ग्रंथ पुराणों की महिमा कहते हैं तो पुराणोंको क्यों न माने जहाँ सजन पुरुप बैठे हों टनमें कोई किसीकी बडाई करै तो वह बड़ाई किया हुआ बडाई करनेवालेसे अलग होताहै, इसी प्रकार जब पुराणोंकी महिमा ब्राह्मणादि ग्रंथों में है तो ब्राह्मणादिकोस अतिरिक्त कोई पुराण ग्रंथ है यह स्पष्ट विदित होता है और बुद्धिमानोंको मानना उचित है । तिलकप्रकरणम् । स. पृ० ७३ पं० १९ ऊर्ध्वपुण्डू विपुण्डू तिलक कंठी माला धारण एकादशी आदि बत तीर्य नारायण शिव भगवती गणेशादिक स्मरण करनेसे पापनाशक विवास यह विद्या पढने पहानके विन हैं ॥ ७३ । १४ समीक्षा-क्यों जी मस्तकपर तिलक लगानेमें कौनसी हानि है इसके लगाने में कौनसा पाप है तिलक बहुधा चन्दनका लगाते हैं जिससे चित्त प्रसन्न हो शीत- सता आरोग्यता होती है, परन्तु तिलक लगानेमें भेद इस कारण होगये कि जैसे आपने नमस्तकी परिपाटी अपनी समाजमें चलाई है कि जहाँ नमस्ते किया कि १ भास्कर प्राइस प्रकरणका माशयतक नहीं समझा असली यात छिपागये इतिहासका नाम पुराणका नाम कहकर बातें बनाई कथाभाग होनेसे ब्राह्मणका नाम पुराण बताया है। गोपथमें परीक्षितकी कथा पताकर उसे पुराण बताया है हम सर्ववेदर्भ परीक्षितकी कथा दिखाते हैं तब भा०प्र० के कर्ताके गले में उलटी आपडी अब वेदको भी पुराण मानो जनः (स भद्रमेधाति राष्ट्र राज्ञः परीक्षितः भयका २० १० १२७ , १०) राजा परीक्षितके राजमें सब मनुष्य भानन्द करतेथे, मं. १० काहिये अब क्या करोगे मिथ्या बात पनानेसे काम नहीं चलता सदा यहां रहना नहीं है पंडित भीमसेनकी समान तुम भी अपनी आत्मा शुद्धकरो भोर तुम्हारे गुरु नाश दयानंदने भी तो यद अध्या० १२ में वामदेव्यं साम इसका अर्थ वामदेव ऋपिका जाना वा पटाया साम किया है तो षामदेके पीछे यह मंत्र बनाया पहले और आपके मतमें तो यजुर्वेद पुराण ही वहरगां भऔर गुरुपदाटके. मतमें वामदेवके पीछेका इटा भीमसेनके पीछे छोटे मोटे स्वामी आप भी बन पर इतने पर भी दयानन्दो पूर्ण श्रद्धा सापक ग्रंथाम नहीं परत । जन्मेजयो ह परीक्षतो मृगयाचरीष्यन्, जोर प्रपामास प्रमाणस यहाँ भविष्यरूपसे परीक्षित राजाश ही दर्शन है और पुरागाम जो विरोध दिखाते हो या इनसोकांश पता तोटिसा होता ते भेद है।
(६२) दयानन्दतिमिरभास्करः। दयानन्दी मालूम होगये परमात्मा जयति कहते ही इन्द्रमणिके पंथी विदित होने लगे, इसी प्रकार ऊर्वपुण्ड् त्रिपुण्ड आदि तिलकोंसे यह बात स्पष्ट होनाती है कि यह अमुक पुरुपके शिष्य हैं जैसे शरके चिह्नसे गवर्नमेंटकी वस्तु सेना आदि विदित होत, वैसे ही यह चिह्न हैं और देवताके पूजन उपरान्त स्वयं भी तिलक धारण करे जिस देवताके अर्चन पूजनमें तिलकका जो विधान है वैसा ही आप तिलक धारण करे जिससे बिना पूछे उसका उपासना वृत्तान्त विदित होजाय वाल्मीकिरा. अयो० का० सर्ग १६ । ९ रामचन्द्रका तिलक लगाना लिखा है। वराहरुधिराभण शुचिनाच सुंगधिना । अनुलिप्तपरायनचन्दनेन परंतपम्।" अर्थ-महाराज रामचन्द्र मुगंधियुक्त लालचंदन लगाये थे चन्दनके गुण राज- निघण्टुमें इस प्रकार हैं । श्रीखंड कटुतिक्तशीतलगुणं स्वादे कपायं किय- त्पित्तभ्रांतिवमिज्वरक्रिमितृपासंतापशांतिप्रदम् । वृष्यं वक्ररुजापहं प्रतनुते कीर्ति तनोंर्देहिनां लिप्तं सुप्तमनोजसिंधुरमदारंभातिसरंभदम् ॥ १॥ वेदृ चंदनमतीवशीतलं दाहपित्तशमनं ज्वरापहम् । छदिमोहतृपिकुष्ठतमिरोत्कासरक्तशमनं च तिक्तकम् ॥२॥ चन्दनके गुण यह हैं फटु तिक्त शीतल स्वादिष्ठ कसैला है और पिन, भ्रांति, घमन, ज्वर, गरमी, कृमि, नृपा, संताप इनकी शान्ति करनेवाला वृध्य मुखरोग. हारक दहमें लगानसे कान्तिका देनवाला और मुगंधि करनहारा है तथानिकार- पह १ मलयगिरिक निकटक पर्वतोपर जो चन्दन होता है उसे वह कहते हैं याद चन्दन अत्यन्त शीतल है दाह पित्त ज्यरका शान्तिकारक य मनमोहन तृपा कुष्ठ तिमिर काम रतदीपका शमन करनहारा और तित्तभी है आप तिलक लगाना निषेध करते हैं देविंय इस विषय मनुनी लिखते हैं । मंगलाचारयुक्तः स्यात्प्रयतात्मा जतान्द्रयः। जपेच जुहुयाचव नित्यमानमतन्द्रितः ॥ ११५ ॥ मंगलाचाग्युक्तानां नित्यश्च प्रयतात्मनाम् । जपतां जुहतां चव विनिपातो न विद्यते ॥ ११६॥ चन्दन गेली आदिका लगाना मंगल है गुरुमंया प्रातार दे इन दोनोंग गुन. तया बाहरी भानग भौचम युट निन्दिय ? गायत्री अदिशा गर और चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । होमको नित्य आलस्परहित होकर करै ॥ १४५॥ चन्दन आदि लगाने, गुरुसेवा फरन, जितेन्द्रिय रहने, गायत्री जप और हवन करनेस देवी मानुषी उपद्रव नहीं होते हैं ॥ १४६ ॥ मनु-अ०४ व्यायुपं जमदमे इस यजु० अ०३ मं०६२ से यज्ञकी विभूति लगाते हैं। यदि स्वामीजी चन्दन लगाते होते ती बुद्धिको भ्रांति न हाती न मगजको इतनी गरमी चढती पर आपके चेल वार्षिकोत्सवमें खूब चन्दन लगाते हैं यह बडी विपरीत रीति करते हैं परन्तु एक दिन लगानेसे वृद्धि शुद्ध नहीं होती होय कहांसे टस एक दिनमें भी उसमें बहुतेरी फेशर डाल देते हैं जिससे बुद्धि ज्योंकी त्यों रहती है और जब गणेश शिव देवी आदि नाम आप ईश्वरक लिख चुके हैं तो क्या इन नामोंसे पाप दूर न होंगे ईश्वरका नाम ही पाप दूर न करेगा तो क्या आपके फल्पित ग्रन्थ दूर करेंगे इसकी विशेप महिमा नाम तीर्थ और व्रत तथा देव मकर- में लिखेंगे जिस प्रकारस नामादि जपनेसे मनुष्योंके पाप दूर होते हैं । स. पृ०७२ पं१४ तुम्हारा मत क्या है (उत्तर) हमारा मत घेद है, जो जो घेदमें करने और छोडनेकी शिक्षा की है उस उसका हम यथावत् करना छोडना मानते हैं ।।७२।९ समीक्षा-क्या जो कुछ आपने सत्यार्थप्रकाशमें लिखा है उसमें आपने सब घेदक ही मंत्र लिखे हैं जब आपका मत वेद ही है तो पो चरक मुभूत स्मृति उपनिषदादिमें घुसते हो वदक ही मंत्र सब लिखे होते फोर्ड यज्ञ किया होता तो जानते कि तुम्हारा मत वेद है वेदमें आपके यही लिखा होगा कि संन्यासी रुपय जोडे नफेसे पुस्तफै बेचे दुशाला ओहे । इति श्रीदयानंदनिमिरभाकर मत्यार्थप्रकाशान्तर्गतनीयममुलामस्य डनं नमाम् । श्रीगणेशाय नमः। अथ सत्यार्थप्रकाशान्तर्गतचतुर्थसमुष्टासस्य खंडनम् । समावर्तनविवाहमकरणम् । स० पृ०७८५०१८ असपिंडा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः । सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मेथुने ॥ मनु०३१५ जो फन्या माताके उसकी उः पीडियो में न हो और पिनाके गोत्रको न हो उससे विवाह करना योग्य है इममा प्रयोजन यह है कि- . . (६४) दयानन्दतिमिरभास्करः। (परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विपः ) यह निशित बात है कि जैसे परोक्ष पदार्यमें प्रीति होतीहै वैसी प्रत्यक्षमें नहीं जैसे फिसीने मिश्रीके गुण सुने हों और यह खाई न ही उसका मन उसीमें लगा रहताहै जैसे किसी परोक्ष वस्तुकी प्रशंसा सुनकर मिलनकी उत्कट इच्छा होती है धैसे ही दूरस्थ अर्थात् जो अपने गोत्र वा माताके कुलमें निकट सम्बन्धकी न हो उसी कन्यासे वरका विवाह होना चाहिये निकट और दूर विवाह करनेमें यह गुण है १ जो बालक वाल्य अवस्थास निकट रहतेहैं परस्पर क्रीडा लडाई और प्रेम करते एक दूसरंके गुणदोष स्वभाव वा बाल्यावस्थाके विपरीत आचरण जानते और जो नंगे भी एक दूसरेको देखते हैं उनका परस्पर विवाह होनेसे, प्रेम फभी नहीं होसत्ता २ दूसरे जैसे पानी में पानी मिलनेसे विलक्षण गुण नहीं होता वैसे एकगोत्र पितृ या मातृकुलमें विवाह होनेमें धातुओंके अदलबदल नहीं होनेसे उन्नति नहीं होती, ३ तीसरे जैसे दूधमें शुंठ्यादि औषधियोंके योग होनेसे उत्त- मता होतीहै वैसे ही भिन्नगोत्र मातृपितृ कुलसे पृथक वर्तमान स्त्रीपुरुषोंका विवाह उत्तम है ४ जैसे एफदेशमें रोगी हो वह दूसरे देशमें वायु और खानपानके बदलनेस रोगरहित होताहै वैसे ही दूरदेशस्थ विवाह होना उत्तम है ५ निकट संवध करनेसे एक दूसरेके निकट होनेमें सुखदुःखका भान और विरोध होना भी संभव है और दूरदेशकै विवाहमें दूर २ प्रेमकी डोरी लम्बी बढजाती है ६ छठे दूरदूर देशमें वर्तमान और पदाथोंकी प्राप्ती भी दूर संबंध होनेमें सहजतासे हो सक्ती है धोरे होनेमें नहीं इसलिये ( दुहिता दुहिता दूरे हिता भवतीति निरुक्त०) कन्याका नाम दुहिता इस कारणसे है कि इसका विवाह दूर देशमें होनेसे हित- कारी होताहै ७ कन्याके पितूकुलमें दारिद्रय होनेका भी संभव है क्योंकि जबजब कन्या पितृ कुलमें आवैगी तबतब इसको कुछ न कुछ देना ही होगा ८ आठवा कोई निकटसे एक दूसरेको अपने पितृकुलके सहायका घमंड और जब कुछ भी दोनोंमें वैमनस्य होगा तब स्त्री झट ही पिताके कुलमें चली जायगी एक दूसरेकी निन्दा भी आधिक होगी और विरोध क्यों कि प्रायः स्त्रियोंका स्वभाव तीक्ष्ण और मृदु होताहै इत्यादि कारणोंसे पिताके एकगोत्र माताकी छः पीठी और समीप देशमें विवाह करना अच्छा नहीं ॥ ७८ । १ समीक्षा-चाह अच्छा तात्पर्य निकाला गोत्रके अर्थ आपने धोरके किये दूर देशमें विवाह करै दूर वस्तुमें प्रीति होतीहै प्रत्यक्षमें नहीं तो यदि वोह दूर हो और पितृकुल वा मातृकुलकी लड़की हो उससे तो विवाह कर ले, धोरे न होनी चाहिये, तो दूरमें होनेसे आप सम्बन्धी भाई बहनके विवाहमें भी अनुमति दे देंगे 7 चतुर्यसमुल्लासखण्डनम् । जैसा कि यवनों में होता है और दूरवस्तुमें प्रीति होगी धोरमें न होगी तो जब वह दूरकी स्त्री धीरे आई तो फिर वह दूर कहां रही और स्त्रीपुरुपका संग होते ही प्रीति दूर होजानी चाहिये सो ऐसा देखने में नहीं आता, किन्तु निकट रहनेसे तो मीति अधिक बढती है, इस श्लोकमें आप भूल रहे हैं आचा. योने सात पीठीका त्याग किया है आपछः पीठीका त्याग लिखते हैं और जब कि दूर देशका ही अभिप्राय है तो छः पीढीका आपने त्याग क्यों किया आप यहां धर्मशास्त्रकी मर्यादा मेटते हैं सुनिये माताका कुल तो ननसाल होता है और पितृकुलके लड़के लड़कियोंका परस्पर भगिनी भाईका सम्बन्ध होताहै । इस कारण वहां विवाह वर्जित है इसी प्रकार अपने गोत्रमें भी विवाह नहीं होता, क्यों कि जिनका गोत्र एक है वह सब एक ऋषिके सन्तान वा शिष्य होनेसे भाई भगिनीवर हैं, जो अपने सम्बन्धी हैं चाहे सहस्र कोश क्यों न हा धोरे और अपने कहलाते हैं जिनसे संबन्ध नहीं वह धोरे भी दूर ही ह स्वामीजीने तो यहां यवनोंको भी रोक दिया, जो आप गोत्र और माताकुलका अर्थ धोरेका करते हैं आपको तो विवाहकी भी आवश्यकता नहीं और जाति फर्मसे मानते हो फिर क्यों ऐसा अंड वंड कथनकर दिया फिर जो आपने लिखा कि (निकट और दूरके विवाहर्क यह गुण हैं) यह भ्रांतिसे ही कहा है क्यों कि गुण तो आपने दूरके ही लिखे धोरके तो दोष बताये दोनों में आपका गुणशब्द नहीं घट सक्ता दूसरे जो बाल्यावस्थासे एकसाथ रहते हैं उनमें तो मीति अधिक देखी जातीहै, और बाल्यावस्था साथी एक दूसरेका मर्म भी जानते और परस्पर नमते रहते हैं और लडके लडकी ऐसे कम देखनेमें आते हैं जो साथ वालरुपनमें खेले ही, और फिर उनका विवाह हुआ हो, क्यों कि लडकोंके साथ लडकियोंके खेलनेकी रीति नहीं है और फिर भी कन्या शीव युवावस्थाको प्राप्त होती हैं, और बालक अधिक कालमें युवा होते हैं इस कारण चराचरफी अवस्थाका भी ब्याह कम होताहै जहां होता है उसका फारण लोभ है। तीसरे मातृकुलमें वियाह होनेसे धातुओका अदलबदल न होनस टन्नति नहीं होती यह भी आपका फयन भ्रममाव है, क्यों कि धातुओंके तो अदलबदलसे रोग उत्पन्न होता है टन्नति सी. उससे तो हानि होती है, आपके फयनसे भी सब कुलों में बड़ी भारी उन्नति होती सो भी सबमें देखने में नहीं आती और यदि दूसरे कुलसी धानु निकम्मी हुई तो हानि ही हुई, उन्नति कहाँ इस कारण भानुकुल धातुकी उन्नतिके अर्थ त्यागन किया है यह आपका महाभ्रम है ? (चाप रोगी दूर देशमें जानेसे जैसे नर्सिग होनाता है वैसे ही विवाह उत्तम है) . दयानन्दतिमिरभास्करः। धन्य है अच्छा कथन किया मुनिये तो यदि रोगी उस देशमें जाय जहाँकी वार जल शुद्ध हो तो आराम हो जायगा परन्तु जहाँको वायु और जल शुद्ध न है। वहां तो मर ही जायगा क्योंकि अच्छा हृष्ट पुष्ट भी मनुष्य कहीं दूर जाय तो पानी खराब होनसे वह बीमार होजाता है, विवाहमें तो कन्या ही अपने घरसे जाती है क्या यह बीमार होनाती है, जो दूर देशों में जानेसे आराम होजाता है या दूलह और वराती जो बीमार होते यह वरातमें जाते हैं दूर देशसे शायद आपका मतलब इंग्लिस्तानका होगा या और किसी विलायतका, क्योंकि समुद्रकी यात्रासे ही दीर्घ कालका रोगी आरोग्य होता है, धन्य है अच्छी फजूल खची बताई, और यदि पश्चिमोत्तर देशकी कन्याः गंगापार जाएँ तो पानी खारी मिलनेस बहुत दिनोंतक दुःख उठाना पड़ता है, बहुधा बीमार होनाती हैं और बहुत दिनों में उनका स्वभाव समतापर आता है और-बीस पचीस कोशतक तो वायु भी नहीं बदलती आपको यह लिख देना उचित था कि इतनी दूर और अमुक देशमें विवाह करना चाहिये, या यहाँ न हो तो रहो ब्रह्मचारी क्यों कि आपके मतमें विवाह वायुकं अदलबदल के अर्थ है तो रोगी हो वह विवाह करै, जो विषय करनेसे और भी दुर्बल होकर शाम ही जीवनसे हाथ धो बैठे यह आपने पो झगडा उठाया वायुकी शुद्धि तो हवनसे ही होनाती ५ पाच निकट व्याह होनसे दुःख मुखका भान विरोध होना भी संभव है यह भी कहना मिथ्या ही है क्या यहाँ आप तारविद्या मूलगये पांच मिनटेमें तारद्वारा चौह जहाँ मुखदुःसकी खबर भेन दी जाती है मुखदुःखका भान तो परदेशमें भी होसक्तहि किन्तु जो निकट विवाह होगा तो मुखदुःखमें सहायता शीर हो सकी है, दूरमें सर्व भी पडता हे और समयपर महापना भी नहीं प्राप्त होती और विरोध क्या दूर दशक विवाहमें नहीं होता है जो .कुमात्र होगा वह धार दूर दांना विरोध करेगा, किन्तु जो दूर विवाह होता है उसमें बहुधा विरोध रहता है और कारण यह है यह तो कहते हैं कि हम अभी लेनापंग लडकी के माता पिता कहते हैं तोगी वीतं भमंग, कापा भी दूर पर होनस दो चार वर्षमा माता पिता दशे- नसे वंचित रहती है, इस कारण मातापिताका ही ध्यान लगाये रहता है यदि धार घर हुआ तो तकरार ही नहीं चाह जर पुनराली नोट जय सेनानी दूरदसमें कन्याको चाँद निनना दुम हो कोई पछन गालाही नहीं, निकट हनिमे अपने नगरवामियों तथा इकोर तिा आदि संकोनी अधिकाम नहीं देसम तथा यायु नल जाने अनुमार होनी शरिमें पिमता भी नहीं आती ६ रटे दर देशमें विवाद होनेमे पठायोंकी प्राप्ति महगमें चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । हो सती है, यह भी दयानंदनीका कथन मिथ्या ही है क्या बिना पैसे कोई वस्तु प्राप्त हो सक्ती है जिसका व्याह हुआ है उसको भी बिना दाम कुछ वस्तु प्राप्त नहीं हो सक्ती यदि एक दो बार मुफ्तमें आगई तो बारबार कौन भेज सक्ता है. कन्याका पिता मुफ्तमें कुछ मँगा ही नहीं सक्ता और संबंधियोंका सौदा देरमें भी आता है और यदि एक पैसेको पोल्टकार्ड भेज दीजिये छठे दिन कलकत्ते बंबई आदिसे चाहे जो कुछ मंगा लीजिये, अथवा वेल्यूपेविल मँगाकर रुपया भी यहीं जमाकर वस्तुग्रहण कर लीजिये, और दूर ध्याहनेस ही:कन्याको दुहिता नहीं कहते किन्तु यह अर्थ है कि कन्या दूर रहकर भी हित ही करती है पराये घरका ही धन होती है इसी कारण इसे दुहिता कहते हैं अथवा अपने पाससे जो दूर अर्थात् पृथक कर दी जाय वाहै धोरे हो या दूर, दूरही है ७ सप्तम पियूकुलमें कन्या आवेगी तो दरिद्रय करेगी क्यों कि कुछ नकुछ देना ही होगा, यह भी भ्रममान है और इसका आशय भी कुछ अस्तव्यस्तसा विदित होता है फन्याको तो जहां जायगी वहीं कुछ न कुछ देना ही पड़ेगा कोई कन्याको घर तो देही नहीं देगा आपका आशय ऐसा विदित होता है कन्याको बहुत कुछ देना परन्तु फिर पितृकुलवालोंपर दया आगई और कुलोंको कोई लूट ले तो भी जी न दुखे कन्याको तो पिता माता दूर धोरे क्या शक्ति अनुसार सब ही अवस्थामें देते रहते हैं ८ आठवें घमंड हो जायगा लडाई होगी कन्या माके घर चली जायगी स्त्रियोंका स्वभाव तीक्ष्ण मृदु होता है इत्यादि यह भी विरुद्ध ही टेख है भला यह तो 'कहिये कि सहायता पाकर घमंड किसे नहीं होता और जिससे सहायता मिले उससे तो कोई लडतानहीं फिरये परस्पर सहायक रिश्तेदार क्यों लडेंगे सहायता बड़ी चीन है यदि आपको सहायता न मिलती तौ' सत्या- र्थमकाश ही क्यों बनाते और जो मनमें आता वो ही अंडचंड लिख डालते और लडाई वालोंको धोरे दूर सब जगह क्लेशही अच्छा लगता है और जब छोटी उमरकी स्त्री घरसे निकलती है तो जिनके मातापिताके घर १०० या २०० मील पर हैं वे रेलमें बैठकर चलदेती हैं और मार्गमें भ्रष्ट होती हुई पर पहुँचती हैं और उनके दुष्काकी ओर कोई नहीं ध्यान करता यह बात देखी हुई है और एक नगरमें विवाह होनेसे व्यग्रचित्त हो यदि पिताके घर जायें तो थोडी ही देरमें पहुंचनेके कारण दुष्कर्मसे यय सही हैं, तथा अधिक संकोचसे अनिष्टसे बची रहती हैं और स्वभाव तो जिसका जैसा है वोह बदलता ही नहीं चाहे धोरे व्याह हो या दूर मेरा इस कहनसे यह प्रयोजन नहीं कि पर- देशमें विवाह ही मत करो चाहे जहाँ करो किन्तु मातृ पितृ कुल सपिंड होने के फारण धर्मशास्त्रमें वर्जित किये हैं, क्यों कि नो सपिंड हैं उनमें विवाह नहीं हो . (६८) दयानन्दतिमिरभास्करः। सत्ता (निनका एक पिंड हो अर्थात् एक कुल ही उसे सपिंड कहते हैं) पितृ फर्ममें भी इसका वर्णन होगा, इसमें हम. स्वामीजीको भी दोष नहीं क्यों कि ये विचार संन्यासी थे इन बातोंको क्या समझें पर ती भी चलें घहकानेको यही बहुत है स्वामीनीक ती कोई बेटांपटी भी नहीं था फिर विपयमें क्यों हस्ताक्षेप किया ? और (परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विपः ) इसके अर्थमं ती आपने वो मसल की है कि कहींकी ईट यहींका राडाभानमतीनकुनबाजोडाकहाँका प्रसंगक- लिख बैठ यह देवताप्रकरणकी बात है कि देवता परमप्रिय हैं प्रत्यक्षसे है फरते हैं इसी कारण । "तं वा एतं वरणं सन्तं वरुण इत्याचक्षते" 'तं वा एत मुच्यु सन्तं मृत्युरित्याचक्षते' तंबाएतमंगरमंसन्तमंगिराइत्या- चक्षते' गोपथे 'अग्रिह वैतमग्निरित्याचक्षते शतपथे 'तत इन्द्रो मखवानभवन्मखवान्ह वैतं मघवानित्याक्षते परीक्ष परोक्षकामाहि देवाः श०१४।१।१।१३॥ गोपथ ब्राह्मणके प्र० प्रपा० कारि० ७ में लिखा है कि देवता परोक्षप्रिय प्रत्यक्षसे द्वेष करते हैं इस कारण वरण शब्दको वरुण मुच्युको मृत्यु और अंगरसको अंगिरा कहते हैं शतपथमें लिखा है देवता परोक्षकाम हैं इस कारण परोक्षमें अग्रिको अमि अश्रुको अश्व और मखवान्को मघवान् कहतेहैं इत्यादि, दयानंदजीने विवाहमें प्रसंग लगा दिया । स० पृ० ८१ पं० ६ सोलहवें वर्षसे लेकर चौवीस वर्पतक कन्या और पञ्चीस वर्षसे लेकर ४८ वर्षतक पुरुपका विवाह उत्तम है सोलहवें और पच्चीसमें विवाह करै तो निकृष्ट अठारह बीसकी स्त्री तीस पैतीस चालीस वर्षके पुरुपका विवाह मध्यम है. इसमें विद्याभ्यास अधिक हो जाता है (प्रभ)॥ अष्टवर्पा भवेद्वौरी नववर्पा च रोहिणी। दशवर्पा भवेत्कन्या तत ऊर्ध्व रजसला ॥ माता चैव पिता तस्या ज्येष्ठो भ्राता तथैव च । सर्वे ते नरक यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम् ॥ यह श्लोक पाराशरी और शीवबोधमें लिखे हैं अर्थ यह कि कन्याकी आठवें वर्ष गौरी, नवमें वर्ष रोहिणी, दशमें वर्ष कन्या और उसके आगे रजस्वला संज्ञा होनाती है १ दश वर्पतक विवाह न करके रजस्वला कन्याको माता पिता और चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (६९) उसका बडा भाइ देख तो यह तीनों नरकमें गिरते हैं पृ० ८२ पं० १४ आठवें नौमें वर्षमें विवाह करना निष्फल है जैसे आठवें वर्षी कन्याम पुत्र होना असम्भव है चैसेही गौरी रोहिणी आदि नाम देना भी असंभव है गौरी आदि नाम पार्वती रोहिणी वसुदेवकी स्त्रीका है उसे तुम माताकी तरह मानते हो फिर विवाह कैसे संभव है इसलिये इसका प्रमाण छोड वेदोंका प्रमाण किया करो ८० । २३ फिर पृ० ८३ पं०८ में लिखते हैं। त्रीणि वर्पाण्युदीक्षेत कुमार्यतुमती सती।।ऊषं तु काला- देतस्मादिदेत सदृशं पतिम्। अ०९ श्लो० ९० अर्थ-कन्या रजोदर्शन हुए पछि तीन वर्ष पर्यन्त पतिकी खोज करके अपने पतिको प्राप्त होवै जब प्रतिमास रजोदर्शन होता है तो तीन वर्षमें छत्तीस बार रजस्वला हुई पश्चात् विवाह करना योग्य है गुणहीनके साथ न कर चाहै कॉरी ही रहै ८२।८ स० पू० ८२ ॥ पं० २१ सुश्रुतमें भी लिखा है ।। जनपोडशवर्षायामप्राप्तः पंचविंशतिम् । यद्याधत्ते पुमान् * कुक्षिस्थः स विपद्यते ॥ जातो वा न चिरजीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः । तस्मादत्यन्तबाल यांगर्भाधानं नकारयेत् अ० १०१४७१४८ सोलह वर्षसे न्यून अवस्थावाली स्त्रीमें २५ वर्षसे न्यून पुरुष जो गर्भको स्थापन फरे तो वह कुक्षिमें प्राप्त हुवा गर्भ विपत्तिको प्राप्त होता है जो उत्पन्न हो तो विरकालतकन जीवे और जीव तो दुर्बलेन्द्रिय हो इसकारण अति बाल्यावस्था, गर्भस्थापन न करै ( ८१।२७) पुनः पृ० ८३ पं० १९ लड़का लड़कीके अधीन विवाह होना उत्तम है यदि माता पिता करें तो लडका लडकीसे सम्मति करले उनकी प्रसन्नताके बिना न होना चाहिये ॥ ८५११ पृ० ८५५० २२ जबतक ऋषि मुनि राना आर्य लोग ब्रह्मचर्यसे विद्या पटके स्वयंवर विवाह करते थे तबतक इस देशको उन्नती थी जबसे बाल्यावस्थामें पराधीन विवाह अर्थात् माता पिताके अधीन होने लगा तबसे देशकी हानि हुई (८५७)पृ० ९२ पं० २५ कन्या और वरका विवाहके पूर्व एकान्तमें मेल न होना चाहिये क्योंकि युवावस्था में स्त्री पुरुषका एकान्त वास दूपणकारक है परन्तु जब एक वर्ष वा छः महीने विद्या पूर्ण वा ब्रह्मचर्याश्रमके रह जायें तो टन कन्या और कुमारोंके फोटोग्राफ उतारके दोनोंके अध्यापक अध्यापिकाओंके पास भेन देखें जिस २ का रूप मिलनाय उस उसके इतिहास अर्थात् जन्मसे लेके रस दोनाती है सा पर्पतक विवाह न करफ रजस्वला कन्याको माता पिता और. वर्ष गौरी, नवमं वप रोहिणी, दशमें या कन्या और उसके आगे रजनलाश यह शोक पाराशरी और शीप्राधमें लिखे हैं अर्थ यह कि कन्याकी पाहाँ (६८) दयानन्दतिमिरभारकरः। सक्ता (जिनका एक पिंड हो अर्थात् एक कुल हो उसे सपिंड कहते हैं) आर पितृ कर्ममें भी इसका वर्णन होगा, इसमें हम. स्वामीजीको भी दोष नहीं देते क्यों कि वे विचारे संन्यासी थे इन बातोंको क्या समझैं पर तो भी चेलोंके वहकानेको यही बहुत है स्वामीजीके तौ-कोई बेटावेटी भी नहीं था फिर इस विपयमें क्यों हस्ताक्षेप किया ? और (परोक्षमिया इव हि देवाः प्रत्यक्षद्विपः ) इसके अर्थमें तो आपने वो ही- मसल की है कि कहींकी ईंट कहींका रोडाभानमतीने कुनबाजोडा कहांका प्रसंग कहाँ लिख वैठे यह देवताप्रकरणकी बात है कि देवता परोक्षप्रिय हैं प्रत्यक्षसे द्वेष करते हैं इसी कारण । "तं वा एतं वरणं सन्तं वरुण इत्याचक्षते" 'तं वा एतं मुच्यु सन्तं मृत्युरित्याचक्षते' तंवाएतमंगरसंसन्तमंगिराइत्या- चक्षते' गोपथे 'अग्रिह वैतमग्निरित्याचक्षते शतपथे 'तत इन्द्रो मखवानभवन्मखवान्ह वैतें मघवानित्याक्षते परोक्षं परोक्षकामाहि देवाः श० १४।१।१।१३॥ गोपथ ब्राह्मणके प्र० प्रपा० कारि. ७ में लिखा है कि देवता परीक्षप्रिय हैं प्रत्यक्षसे ढेप करते हैं इस कारण वरण शब्दको वरुण मुच्युको मृत्यु और अंगरसको अंगिरा कहते हैं शतपथमें लिखा है देवता परोक्षकाम हैं इस कारण परोक्षमें अग्रिको अमि अश्रुको अन्न और मखवान्को मघवान कहतेहैं इत्यादि, दयानंदजीने विवाहमें प्रसंग लगा दिया । स० पृ० ८१ पं० ६ सोलहवें वर्षसे लेकर चौवीस वर्षतक कन्या और पीस वर्षसे लेकर ४८ वर्षतक पुरुषका विवाह उत्तम है सोलहवें और पचीसमें विवाह फर ता निकृष्ट अठारह वासी स्त्री तीस तास चालीस वर्षके पुरुषका थियाह मध्यम है. इसमें विद्याभ्यास अधिक हो जाता है (मन) अष्टवर्पा भवेगोरी नववर्पा च रोहिणी। दशवर्षा भवेत्कन्या तत उर्ध्व रजसला॥ माता चैव पिता तस्या ज्येष्टो भ्राता तथैव च । सर्वे ते नरक यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम् ।।
चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । उसका बडा भाइ देख तो यह तीनों नरकमें गिरते हैं पृ० ८२ पं०१४ आठवें नौमें वर्षमें विवाह करना निष्फल है जैसे आठवें वर्षकी कन्यामें पुत्र होना असम्भव है चैसेही गौरी रोहिणी आदि नाम देना भी असंभव है गौरी आदि नाम पार्वती रोहिणी वसुदेवकी स्त्रीका है उसे तुम माताकी तरह मानते हो फिर विवाह कैसे संभव है इसलिये इसका प्रमाण छोड वेदों का प्रमाण किया करी ८० । २३ फिर पृ० ८३ पं०८ में लिखते हैं। त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमातुमती सनी ऊध तु काला- देतस्मादिदेत सदृशं पतिम्॥ अ०९ श्लो० ९० अर्थ-कन्या रजोदर्शन हुए पछि तीन वर्ष पर्यन्त पतिकी खोज करके अपने 'पतिको प्राप्त हो जब प्रतिमास रजोदर्शन होता है तो तीन वर्षमै छचीस बार रजस्वला हुई पश्चात् विवाह करना योग्य है गुणहीनके साथ न करै चाहै कॉरी ही रहै ८२।८ स. पृ० ८२ । पं. २१ सुश्रुतमें भी लिखा है ।। उनपोडशवर्षायामप्राप्तः पंचविंशतिम् । यद्याधत्ते पुमान् म कुक्षिस्थः स विपद्यते । जातो वा न चिर जीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः । तस्मादत्यन्तवाल यां गर्भाधानं नकारयेत् अ० १०१४७१४८ 'सोलह वर्षसे न्यून अत्यावाली बीमें २५.वसेन्यून पुरुष जो गर्भको स्थापन फरे तो वह कुक्षिमें प्राप्त हुना गर्भ विपत्तिको प्राप्त होता है जो उत्पन्न हो तो विकालत्तकान जी और जीव तो दुर्बलेन्द्रिय हो इसकारण अति बाल्यावस्थाम. गर्भस्थापन न करै ( ८१।२७) पुनः पृ० ८३ पं० १९ लडका लडकि अधीन विवाह होना उत्तम है यदि माता पिता करें तो लडका लडकीस सम्मति फरले उनकी प्रसन्नताके विना न होना चाहिये ॥ ८५।४ पृ० ८५.पं० २रे जस्तक ऋषि मुनि राना आप लोग ब्रह्मरपसे विद्या पढके स्वयंवर विवाह करते थे तबतक इस देशको उन्नती थी जबसे बाल्यावस्था पराधीन विवाह अर्थात् माता पिताके अधीन होने लगा तबसे देशकी हानि हुई (८५७)पृ. ९२पं० २६ फन्या और वरका विवादले पूर्व एकान्तमें मेल न होना चाहिये क्योंकि युवावस्था म्री पुरुषका एकान्त वास दूपणकारक है परन्तु जब एक वर्ष वा उः महीने विद्या पूर्ण वा ब्रह्मचर्याश्रमके रह जायें तो टन कन्या और कुमारोंके पोटोग्राफ रतारफे दोनॉक अध्यापक अध्यापिकाओक पास भेग देखें जिस २ का रूप मिलनाय उस उसके इतिहास अयात् जन्मसे लेके टस । . (७०) दयानन्दतिमिरभास्करः। दिनपर्यंत जामचरित्रका पुस्तक ही उसको मैंगाफर अध्यापक लोग देखें जर दोनोंके गुंण फर्म स्वभाव सदृश हों तब जिस के साथ जिस जिसका विवाह होना योग्य समझें उस उस पुरुप और कन्याका प्रतिविम्ब और इतिहास कन्या और बरफे हाथमें दें और उनकी भी सम्मति ले दोनों अध्यापकोंक सामने विवाह करना चाहे तो वहीं, नहीं तो कन्याके माता पिता घरमें हो । जब वे सम्मत हों तब उनका अध्यापकों वा माता पितादि भद्र पुरुषोंके सामने उन दोनोंकी आपसमें वातचीत करना शास्त्रार्थ करना और जो कुछ वे गुप्त व्यवहार पूछे सो भी सभामें लिखके एक दूसरके हाथमें देकर प्रभोत्तर करलेवें तथा खानपानका उत्तम प्रबन्ध होना चाहिये जिससे उनका शरीरको विद्याध्ययनादिसे दुर्बल हो रहाहै पुष्ट हानाय पश्चात् जिस दिन कन्या रजस्वला होकर जब शुद्ध हो तब वेदी मंडप रच, अनेक सुगंधित द्रव्य घृतादिका हाम, विद्वान् पुरुष और स्त्रीका यथायोग्य सत्कार करें, फिर जिस दिन ऋतुदान देना होग्य समझें उसी दिन संस्कारविधि पुस्तकस्य विधिक अनुसार सब कर्म करके मध्यरात्रि वा दशबजे अति प्रसन्नतासे संबके सामने पाणिग्रहणपूर्वक विवाहको विधिको पूरी कर एकान्त सेवन करें, पुरुषवीर्य स्थापन* और स्त्री वीर्याकर्षणकी जो विधि है उसीके अनुसार दोनों करें पुनः पृ० ९३ पं० २५ जब वीर्यका गर्भाशयमें गिरनेका समय हो उस समय स्त्री और पुरुप दोनों स्थिर और नासिकाके सामने नासिका नेत्रके सामने नेत्र अर्थात् सूधा शरीर और अत्यन्त प्रसन्न चित्त रहैं डिग नहीं पुरुष अपने शरीरको ढीला छोड़े और स्त्री वीर्य प्राप्तिके समय अपान वायुको ऊपर खींचे, योनिको ऊपर संकोचकर वीर्यका ऊपर आकर्पण करके गभाशयमें स्थित कर, पश्चात् दोनों शुद्ध जलसे स्नान करें सोंठ केशर असगंध छोटी इलायची सालम मिश्री मिला दूध पीकर . अलग २ सी हैं यह बात रहस्यकी है इतनेहीमें समग्र बातें समझ लेनी चाहिये, विशेष लिखना उचित नहीं जब गर्भ स्थित होनाय तब पृ० ९४ पं० १७ गर्भ में दो संस्कार एक चौथे महीनेमें पुंसवन आठवें महीनेमें सीमन्तोन्नयन करै पृ० ९४ पं० २६ ॥ संतानके कानमें पिता (वेदोसीति) अर्थात् तेरा नाम वेद है सुनाफर घृत और शहदको लेकर सोनेकी शलाकासे. जीभपर ॐ अक्षर लिखकर मध और घृतको उसी शलाकासे चटवाव पुनः पृ० ९५ पं० २ पुष्टिके अर्थ स्त्री अनेक प्रकारके उत्तम भोजन करे और योनिसंकोचांदि भी कर संतानके दूध पनिके • * वावाजी तो ध्याहकै घण्टेमर बाद ही गर्भाधान लिखते हैं थेगडी लगानेवाले मेरठके स्वामी मा० प्र० पृ० १०८ में एक वर्ष १२ वा ३ दिनतक व्रत रखाकर इस कामको मने करते हैं (न मियुनमुपेयाताम् ) भव घेले किसे सत्य सम्झंग वर्षदिनतक तरसते रहैं यां आपकी बात न मानकर बावाजीकी शरण रहें।
1 चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (७१) - लिये फाई धाय रक्खै जो बालकको दूध पिलाया करै स्त्री दूध बंद करनेके अर्थ स्तनके अग्रभागपर ऐसा लेप करै जिससे दूध सवित न हो और नामकरणादि संस्कृत विधिकी रीतिसे यथाकाल करता जाय ॥ पृ० ९२ पं० २१ से ९३ पृ० के अन्ततक। समीक्षा-ऊपर लिखी हुइ सत्यार्थप्रकाशकी वार्ताओंका सिद्धान्त यह है कि २५ वर्षमें कन्या और अड़तालीस वर्ष में पति विवाह करें सो विवाह क्या वस्तु है इस वार्ताको लिखकर पश्चात् इसके, स्वामीजीके सब वाक्योंका खंडन करेंगे प्रथम विवाहकी परिभाषा कहते हैं। (भार्यात्वसंपादकमहर्णम् ) जिसके भरण पोषणका भार सदवको शिरपर लिया जाय टसका जो भाव उसका भार्यात्व कहते हैं और, संपादन अर्थात् उक्त भावका उत्पन्न करनेराला ऐसे जो ग्रहण अर्थात् ज्ञान व भार्याका भाव निस ज्ञानसे उत्पन्न होवे उसका नाम विवाह है (तस्य स्वीकाररूपं ज्ञानं विशेषस्य समवायविषयः तयो दात परकन्ययोः विवाहकर्तृत्वकर्मत्वेति ) अर्थात् भार्याका स्वीकार रूप जो विशेष ज्ञान है तिसमें समवाय और विषय दो प्रकारके भेद होनसे विवाहमें वरका कर्तृत्व और कन्याका कर्मत्व स्पष्ट प्रतीत होता है इससे विवाह शब्दके कहनेसे यह बात आती है कि वर और कन्याके विशेष संयोगका भाव मनमें उदय होता है, विशेष संयोग कहनेका भाव यह है कि पुरुष स्त्रीका आत्मा मन शरीरके भरण पोपण रक्षा आदिका भार अपने ऊपर लेना स्वीकार फरता है, इस प्रकारके संयोगको अविच्छेद संबन्ध होताहै अब वह विवाह कितनी अवस्था में होना चाहिये सो निर्णय किया जाता, अंगिरा झापिने भी (:अष्टवाभवेद्गौरीति ) यही श्लोकलिखा है. जो पराशरजोने लिखा है. यह केवल संज्ञामान वांधी है कि आठ वर्षफी जो कन्या हो उसे गौरी, जो नव वर्षकी बालिका हो उसकी संज्ञा रोहिणी, जो दश वर्षकी हो उसका नाम कन्या होता है इससे आगे रजस्वलाका समय है जो बहुधा द्वादश वर्षको अवस्थातक हो जाता है जो स्वामीजीने यह लिखा है कि गौरी पार्वतीका नाम है सो क्या पार्वती सदा आठ ही वर्षकी रहती है और रोहिणी नौही वर्षकी रहती है, और जो नामके अनुसार ही अर्थ करते हो तो चंपा भागवती आदि नामानुसार ही कर्म भी होने चाहिये, तुम्हारा नाम दयानंद था, तुम्हें सदा आनंद रहना चाहिये था, फिर जब मुरादाबादमें आये थे तो मेरे सामने कहा था, कि आजकल शरीर दुःखी है दस्त होते हैं फिर नामानुसार अर्थ माने तो व्याकरणमें जिन शब्दोंकी नदी संज्ञा मानी है तो क्या वे शब्द पानी होकर बहते हैं इससे यह उच्चारणमात्र संज्ञा बांधी (७२) दयानन्दतिमिरभास्करः। है वे बालिका पार्वती वा रोहिणी नहीं होजाती जब हम फहैं कि यह वालिका रोहिणी है तो जानलेना कि इसकी अवस्था नौ वर्षकी है कन्या कहनेसे दश वर्षकी अवस्था प्रतीत होती है और इसी समयमें विवाह भी कर देना योग्य है जबतक रजस्वला न हो क्योंकि रजस्वला होने उपरान्त वह नारी सन्तानोत्पत्तिके योग्य होजाती है इसीसे आठ वर्षसे लेकर १२ वर्ष पर्यंत कन्याका विवाह फाल है जैसा मनुनी लिखते हैं। त्रिंशद्वो वहेकन्यां हृद्यांद्वादशवार्पिकीम् ॥ यष्टवर्पोट- वो वा धर्मे सीदति सत्वरः ॥ मनु० अ० ९ श्लोक ९४ तीस वर्षका पुरुष बारह वर्षकी कन्यासे विवाह कर जो मनोहर हो और चौवीस वर्पवाला आठ वर्षको अवस्थावाली बालिकाके संग विवाह करले इससे शीम करनेमें मर्म पीडा होती है यही मनुनीकी विवाह करनेमें आज्ञा है इसीका आशप ले पराशरजीने श्लोक बनाये हैं जब कि शास्त्रोंमें ऋतुमती स्त्रीके पास न जानेसे महादोष कथन किया है उसका कारण यह है कि यह समय सन्तानोत्पत्तिका होता है और ऋतुदान विना विवाहके कहाँ यदि वियाह हो जाय तो ऋतुसमयमें संयोग होनेसे कदाचित् संतानकी उत्पत्ति हो जाती है इसी कारण ऋतुधर्म निसे होने लगा हो तो उसका विवाह नहीं करनेसे माता पिता पापभागी होते हैं इसीसे पराशरजीने 'माता चैवेति ' यह श्लोक लिखा है कि ऋतुमती होनेमे पहले वियाह कर देना नहीं तो पापभागी होना पडेगा और मुभुतमें भी लिखा है अध्याय १० ॥ अथास्मै पञ्चविंशतिवय द्वादशवपी पत्नीमावदेत् ।। विद्यासम्पन्न पुरुषको जिसकी अवस्था २०. वर्षकी हो उसको चारहपर्णपाली प्पाह करना योग्य है इससे यह सिद्ध होता है कि पुरुषकी अवस्या २५ पर्पसे कम न हो नव विवाह पर और कन्याकी १० अपया यारह वर्षसे कम न हो इस ममय विवाह कर दे तो उसमें बहुत गुण प्राप्त होते हैं क्यों कि पियाहा अभिमाय वर पक अच्छेय संयोगमे कामोपभोगपूर्वक सृष्टिप्रवाह नलाना है संयोगमें वियोग न होने के कारण मयास लमा भप अनुराग और स्नेह यह मय पात्यावस्याभ्यम्त होन नाहिये यह यात मब कोई जानते हैं किनिमका निनना अधिक महवाम होता है उसके दाम और मुखमा टम टनना ही अधिक दुग्य मुग्ध भागी होना पड़ता है और मिपांगी तो अधिक ही होता है, जम कि माना पिनाकी असा यकी अधिक मदमागिनी होती है, इम मशार यारया चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (७३) थाभ्यस्त सहवास स्त्रियोंके अच्छेद्य संयोगका मुख्य कारण है इसी प्रकार ना और भयका जितना अभ्यास बालकपनसे हो उतना ही अच्छा है, विवा- जा लडकी विवाहके दिनसे ही यूँघट काढने लगती है, और कई प्रकारकी सुस- लकी रीति पालन करने लगती है और सास ससुरका भय उसी दिनसे चित्त- आजाताहै, कई प्रकारके पतिसम्बन्धी प्रत नियम पालन करने लगती है, रालके देशके मनुष्योंसे अधिक लना करती है उनसे भाषणतक नहीं करती र गृहस्थीके कामकाज रसोई, सीना, गोटा, किनारी आदि जो कुछ गृहस्थ बन्धी कर्म हैं जो म्बीको अति आवश्यक हैं मन लगाकर सीखती है, जिससे द्विरागमन पर्यन्त गृहकार्यों में चतुर हो जाती है, यदि सोलह वर्ष वा यस वर्षको अवस्थामें विवाह करै तो इसमें स्त्रियों में दुश्चरित्र होनेकी बडी न है क्यों कि- पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोटनम् ॥ स्वप्नोन्यगह वासश्च नारीणां दूपणानि पद ॥ मनु० अ० ९ श्लोक १३ मद्यपान, खोटे पुरुषोंका संग, पतिका वियोग, घूमना, पराये घरका वास, अधिक सोना यह स्त्रियोंके छः दूपण हैं सो सुसरालमें रहने अथवा कन्या स्थामें विवाह होनेसे यह सब दोप वचतेहैं, विवाहिता बालिका बहुत नहीं ती सबेरे उठना पडताहै तथा सुसरालियोंके भयसे लनादिक सब बनी रहती तिसे भी बहुत वियोग नहीं रहता. अब बडी अवस्थाका विवाह सुनिये वे पिताकी प्यारी होनेसे भय नहीं करती, परदा किसीसे नहीं करतीं, यदि माता आदि शिक्षा करें तो ध्यान नहीं देती, और विना व्याही बहुधा तमासे की गुडिये खेलती इधर उधर भ्रमण करती रहती हैं और दुर्जनोंकी गोष्ठीमें उनका संभव है मद्य नहीं तो भंग चाखती ही हैं, यदि बहुत सोना दख नाता कहती है बेटी उठ बहुत मत सोवै तौ यही कहती हैं कि मा तू तो हमैं भी नहीं देती है, यदि मा घरमें बैठनेको कहै तो वह कहती हैं कल हमारे सन्ती और हिरिया भी तो आईथीं, उनकी माने उन्हें नहीं वर्ना, तू हमारे छे पड़ी रहै है, बस यह कह चल दी और मनुनांक उक्त दोषणको सार्थ करने फिर उनका पति के साथ अच्छेद्य संयोग किस प्रकारसे हो, इसी प्रकार और अनुराग जितने बालपनसे अधिक अभ्यस्त होंगे उतने ही अधिक बल- हेंगे, फिर प्रयोदश वर्ष प्रारंभमे कामका संचार होजाताहै किसीपर दृष्टि हो पा किसी धूर्त पुरुपने वशमे करलिया तो वस मभी कट गdिo- .
७४) दयानन्दतिमिरभास्करः। गावस्तृणमिवारण्य प्रार्थयन्ति नवनवम् ।। जैसं गायें वनमें नवीन तृण चाहती हैं इसी प्रकार स्री, नवीन नवीन पुरुषोंकी चाहना करती हैं यह दशा उनकी होती है, जिनका पतिसे अभ्यस्त अनु- राग नहीं है इस कारण थोडी अवस्था १० वा बारहवपमें कन्याका विवाह करना यदि यह कहा कि युवा अवस्थामें स्त्री रुचिअनुसार वर ट्रॅड लेगी तो व्यभिचारिणी न होंगी, तो इसका उत्तर यह हैप्रायशः स्त्री जाति पुरुषों में पतिको अन्यान्यगुणांकी अपेक्षा सुन्दरतायुक्त होना अधिक चाहती हैं, जैसे कि पुरुप सुंदर स्त्री हूँढते हैं और यह भी एक बात है कि पुरुषकों स्त्री और स्त्रीको पुरुप तबतक अच्छा लगता है कि जबतक भोगा न हो, भोग उपरान्त सुन्दर भी रूपरहित लगतेहं, और पतिका प्रेम बालकपनसे अभ्यस्त न होनेस वे दूसरे उससे अधिक सुन्दर पुरुपस प्रीति करसती हैं औ अभ्यस्त प्रेममें यह बात नहीं होती वह तो सांग वस जाताहै, और बाल विवाह मत करो, यह कहना ठीक नहीं किन्तु बाल लडकेका विवाह करना किसी प्रकार उचित नहीं यदि दशवर्षकी लडकीसे विवाह किया तो बीस वर्षका पति होना योग्य है या १५ वर्षका इससे कमती किसी प्रकार नहीं यहांतक महात्माओंन मर्यादा कर दी है, कि इससे कमती अव- स्थाका विवाह न होना चाहिये तो इस समयकी प्रथा अनुसार पांच व तनि वर्षमें द्विरागमन होताहै फिर एक या दो वर्षमें आवाजाई खुलतीहै निसको (रौना) कहतेहें इस समयतक स्त्रीकी अवस्था पन्द्रह वा सोलह वर्षकी होनाती है और वरभी २५ वर्ष वा २६ वर्षकी अवस्थाका होजाताहै और १५ वर्षमें विवाह हुआ तौ २१ वपका होनाताहै, इसी पांच वर्षमन्त्री घरके सब कार्योंमें चतुर होनातीहैं और कार्यमात्र विद्या भी पडसक्ती हैं जिससे अपना और बालक जो हो उसका पालन यथावत् कर सकै, और यही मुश्रुतकार भी कहते है कि १६ वर्षकीनी २५ वर्षका पुरुप यह संयोगके और गर्भधारण स्थापनके योग्य होते हैं कुछ यह इस श्लोकका अर्थ नहीं है कि इतनी अवस्था में विवाह करें यह तो संयोगका समय लिखा है विवाहका नहीं है वाग्भटन १६ और २० वर्षकी आयुमं स्त्री पुरु- पोफा संयोग माना है पर विवाह नहीं, और इसी प्रकार होता ही है, लड़का लड़- फाफे अधीन विवाह होने में यह दोप है कि स्त्री रूपकी प्यासी होती है जाने कौनसे नातिके पुरुषको पसन्द करे क्यों कि "भित्ररुचिहिलोफः' मनकी रुचि सबकी भिन्न होती है तो ऊंच नीव संयोग होनेसे वर्णसंकरकी उत्पत्ति होती है और यह भी देखा जाता है कि बड़ी अवस्थावाली अनन्याही बहुतायतसे रूप ...९. ही माहित होती हैं और हुई भी हैं यह इतिहासों में श्रवण किया है, यह चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । स्वयंवर क्षत्रियों में बद्भुत होता था, जिसमें क्षत्रिय जातिफे राजा एकत्र होते थे, स्वामीजीने जाति वर्ण सब मेट सबके ही वास्ते लिख दिया मानो वर्णसंकरकी उनतिका हार खोल दिया । और जब कि कन्यादान शब्द विवाहमें कहा जाता है.तो कन्या विना पिताको अनुमति स्वयं फैसे पतिवरण कर सती है, जब कि दान दिया जाता है तो देने पालेको अधिकार है चाहे जिस दे दे, परन्तु दाताको पात्रापावका विचार अवश्य कर्तव्य है, आपने तो कन्यादानकी प्रथा ही मेटनी विचारी है मनुनी स्त्रीको स्वा- धीनता नहीं अंगीकार करते हैं मुनिये ॥ बाल्ये पितुर्वशे तिप्रोत्पाणिग्राहस्य यावन ॥ पुत्राणा भरि प्रेते न भजेस्त्री स्वतंत्रताम् ।। १४८ ॥ अ०५. मनु० यस्मै दद्यात्पिता त्वेनां भ्राता चानुमते पितुः॥ तं शुश्रूपेत जीवंतं संस्थितं च न लंघयंत् ।। १५१ ॥ वाल्यावस्थामें पिताके चशमें यौवनमें पतिके चशमें भर्ताक मरनेपर पुत्रों के पशमें स्त्री रहै परन्तु स्वतंत्र कभी न रहै ९ १४८॥ जिसे इसको पिता देवा पिताकी अनुमतिसे भ्राता दद उसकी यावनीवन सेवा करती रहे और मरनेपर भी श्राद्धादि करै कुलके वशीभूत रहै मर्यादाका न लंघन करे, इत्यादि प्रमाणीस स्त्री स्वयं पतिवरण नहीं करसक्ती म्वयंवर राजामं होता है ॥ और आप लोगभी थोड़ी अवस्थामै विवाह करते थे, रामवन्द महाराजका १५ वर्षकी अवस्था में विवाह हुआ था यह चाल्मीकिसे सिद्ध है सोई हम पछि लिख चुके हैं दशरथनी विश्वामित्रनासे क्या कहते हैं । उनपोडशवों में रामो राजविलोचनः। न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसः॥ बाल स०२०श्लो०२, हे विश्वामित्रनी अभी रामचन्द्र सोलह वर्षसे भी कम हैं यह राक्षसांसे युद्ध नहीं कर संत. इसी समय रामचन्द्र उनके संग गये और यज्ञकी रक्षा फर पप तोड नानकी विवाही कहिये यह विवाह फैसा हुआ और अभिमन्युका भी थोडी ही अर्थात् १४ वर्षको अवस्थामें हुआ था और विवाहसे थोडे ही दिन पछि भार- तफे युद्ध में मृतक हुए उस समय उसकी स्त्री उत्तरा गर्भवती थी, और उससे राना परीक्षित् उत्पन्न हुए कहिये जो २९, ३०, ४८ यतक, बेटे रहते तो पाण्ड- १ भा. प्र. कहता है बालकपनमें पिताका कहा माने, धन्यबुद्धि तो क्या वृद्धा भत्र स्था पतिका कहना न माने पुत्रों की ही बात माने धन्य पक्षत।
दयानन्दतिमिरभाकरः। गावस्तृणमिवारण्य प्रांर्थयन्ति नवनवम् ।। जैसे गायें वनमें नवीन तृण चाहती हैं इसी प्रकार म्री नवीन नवीन पुरुषोंकी चाहना करती हैं यह दशा उनकी होती है, जिनका पतिसे अभ्यस्त अनु- राग नहीं है इस कारण थोडी अवस्था १० या बारहवपमें कन्याका विवाह करना यदि यह कहा कि युवा अवस्थामें मी रुचिअनुसार वर देंट लगी ती व्यभिचारिणी न होंगी, तो इसका उत्तर यह हैप्रायशः सी जाति पुरुपॉम पतिको अन्यान्यगुणांकी अपेक्षा सुन्दरतायुक्त होना अधिक चाहती हैं, जैसे कि पुरुष मुंदर स्त्री टूटते हैं और यह भी एक बात है कि पुरुपकों सी और मीका पुरुष तबतक अच्छा लगता है कि जबतक भीगा न हो, भोग उपरान्त मुन्दर भी रूपरहित लगतेहं, और पतिका प्रेम बालकपनसे अभ्यम्त न होनेस वे दूसरे उससे अधिक सुन्दर पुरुषसं प्रीति फरसती हैं औ अभ्यस्त प्रममें यह बात नहीं होती वह तो सागमें वस जाताहै, और बाल विवाह मत करो, यह कहना ठीक नहीं किन्नु बाल लडकेका विवाह करना किसी प्रकार उचित नहीं यदि दशवर्षकी लडकीस विवाह किया तो बीस वर्षका पति होना योग्य है वा १५ वर्षका इससे कमती किसी प्रकार नहीं यहांतक महात्माओंन मर्यादा कर दी है, कि इससे कमती जव- स्थाका विवाह न होना चाहिये तो इस समयकी प्रथा अनुसार पांच व तान वर्षमें द्विरागमन होताहै फिर एक या दो वर्षमें आवानाई मुलताहै जिसको (रौना) कहतेहैं इस समयतक स्त्रीकी अवस्था पन्द्रह वा सोलह वर्षकी होनाती है और वरभी २५ वर्ष वा २६ वर्षकी अवस्थाका होजाताहै और १५ वर्षमें विवाह हुआ तौ २१ वपका होनाताहै, इसी पांच वर्षमैत्री घरके सब कार्योंमें चतुर होजाती हैं और कार्यमात्र विद्या भी पडसक्ती हैं जिससे अपना और बालक जो हो उसका पालन यथावत् कर सकै, और यही सुश्रुतकार भी कहते है कि १६ वर्षकी स्री २५ वर्षका पुरुष यह संयोगके और गर्भधारण स्थापनके योग्य होते हैं कुछ यह इस श्लोकका अर्थ नहीं है कि इतनी अवस्थामें विवाह करें यह तो संयोगका समय लिखा है विवाहका नहीं है वाग्भटने १६ और २० वर्षकी आयुमें स्त्री पुरुः घोंफा संयोग माना है पर विवाह नहीं, और इसी प्रकार होता ही है, लडका लड: कांके अधीन विवाह होने में यह दोप है कि स्त्री रूपकी प्यासी होती है जाने कौनसे जातिके पुरुषको पसन्द करे क्यों कि "भिन्नरुविहिलोकः', मनकी रुचि सबकी भिन्न होती है तो ऊंच नीच संयोग होनेसे वर्णसंकरकी उत्पत्ति होती है और यह भी देखा जाता है कि बडी अवस्थावाली.अनव्याही बहुतायतसे रूपं देखकर ही मोहित होती हैं और हुई भी हैं यह इतिहासोंमें श्रवण किया है, यह चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । स्वपंवर क्षत्रियों में बहुत होता था, जिसमें क्षत्रिय जातिके राजा एकत्र होते थे, स्वामीजीने जाति वर्ण सब मेट सबके ही वास्ते लिख दिया मानो वर्णसंकरकी उतिका द्वार खोल दिया । और जब कि कन्यादान शब्द विवाहमें कहा जाता है तो कन्या विना पिताकी अनुमति स्वयं कैसे पतिवरण कर सक्ती है, जब कि दान दिया जाता है तो देने- वालेको अधिकार है चाहै जिसे दे दे, परन्तु दाताको पावापानका विचार अवश्य कर्तव्य है, आपने तो कन्यादानकी प्रथा ही मेटनी विचारी है मनुनी स्त्रीको स्वा- धीनता नहीं अंगीकार करते हैं सुनिये ।। बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत्पाणिग्राहस्य यावन ॥ पुत्राणा भतरि प्रेते न भजेत्स्त्री स्वतंत्रताम् ॥ १४८॥ अ०५-मनु. यस्मै दद्यात्पिता त्वेनां भ्राता चानुमते पितुः ॥ तं शुश्रूषेत जीवंतं संस्थितं च न लंघयेत् ॥ १५१ ॥ बाल्यावस्था में पिताके वशमें यौवनमें पतिके वशमें भर्ताके मरनेपर पुनोंके पशमें स्त्री रहे परन्तु स्वतंत्र कभी न रहै ९ १४८॥ जिसे इसको पिता दवा पिताकी अनुमतिसे भ्राता दद उसकी यावजीवन सवा करती रहे और मरनेपर भी श्राद्धादि करै कुलके वशीभूत है मर्यादाका न लंघन कर, इत्यादि प्रमाणीस स्त्री स्वयं पतिवरण नहीं करसक्ती स्वयंवर राजामें होता है । और आर्य लोगभी थोडी अवस्था में विवाह करते थे, रामचन्द्र महारानका१५ वर्षकी अवस्थामें विवाह हुआ था यह वाल्मीकिसे सिद्ध है सोई हम पीछे लिख चुके हैं दशरथजी विश्वामित्र से क्या कहते हैं । कनपोडशवों में रामो राजविलोचनः। न युद्धयोग्यतामस्य पश्यामि सह राक्षसः॥ बाल०स०२०श्लो०२ हे विश्वामित्रजी अभी रामचन्द्र सोलह वर्षसे भी कम हैं यह राक्षसोंसे युद्ध नहीं कर सक्त इसी समय रामचन्द्र उनके संग गये और यज्ञकी रक्षा कर धनुष तोड जानकी विवाही कहिये यह विवाह फैसा हुआ और अभिमन्युका भी थोडी ही अर्थात् १४ वर्षको अवस्थामें हुआ था और विवाहसे थोडे ही दिन पछि भार- तके युद्धमें मृतक हुए उससमय उसकी स्त्री उत्तरा गर्भवती थी, और उससे राजा परीक्षित् उत्पन्न हुए कहिये जो २९, ३०, ४८ वर्पतक वैटे रहते तो पाण्ड- १ मा. प्र. कहता है बारकपनमें पिताका कहा माने, धन्यबुद्धि तो क्या वृद्धा अब स्था पतिका कहना न माने पुत्रोंकी ही बात मान धन्य पक्षपति। .
(७६) दयानन्दतिमिरभाम्करः। चाफा वंश समाप्त ही हा चुका था तथा और भी पंचदश वर्षको अवस्थामें वियां हक प्रमाण हैं और इस समय तौ पन्द्रह वीस वर्षकी अवस्थातक विवाह करही' दना चाहिये क्यों कि इस समय सब लोग जो चारों वर्णके हैं बहुधा चालकांको फारसी पढांत हैं और इस फारसीन पसी दुर्दशा कर दी है कि थोडी अवस्था ही चालक फारसीके शर ...गनल दीवान आदि पदकर काम- टामें अधिक मन लगातेहैं और अनुचित प्रीति करके तेल पुलल सुरमा डाटे चिकनिया बन फिरतेहैं जिनक सी दुई यह तो कथंचित् ठीक रहते हैं, जिनके न हुई ये बाजारमें जाकर अथवा शून्य मंदिरमें बैठकर वीर्यको स्वाहा करने लगे उपदंश, मूत्रकृच्छ होगया बस तीस वर्पतक खातमा प्रगटक ब्रह्मचारीबडे भारी भीतर मसाला . कुछ भी नहीं यदि स्त्री हो तो २०, पच्चीस. वर्षमें एक या दा सन्तान होजाती है, जो पिताकी तीस चालीस वर्षकी अवस्थातक पुत्र समर्थ होकर पिताकी सहायताके योग्य होजाताहै क्यों कि इस समय ५० अथवा ६० वर्षकी अवस्थामें ही बहुधा मृत्यु होजातीहै, जब ४८ वर्षमें (जो क्षीण अवस्था होतीहै )जैसा लिखा है कि, " चतस्रावस्याः शरीरस्य वृद्धिपौवनं संपूर्णता किंचित्परिहाणिश्चेति आपोडशाद वृद्धिः आपंचविंशतेयॊवनं, आचत्वा- रिंशतः सम्पूर्णता, ततः किंचित्परिहाणिश्चेति " अर्थ इस शरीरफी चार अवस्था हैं, वृद्धि यौवन सम्पूर्णता और किंचित्परिहाणि जन्मसे लेकर १६ वर्षतक वृद्धि अवस्था कहातीहै अर्थात् बढतीहै और सोलहसे २५ वर्षतक युवावस्था रहताहै २५ से लेकर ४० वर्ष पर्यत सम्पूर्णता अवस्था कहातीहै पुनः ४० वर्षसे टपरांत कुछ कुछ घटने लगतीहै ४८ में व्याह किया तो दो तीन वर्ष उपरा- न्तही पूर्ण जराग्रस्त पुरुष और पूर्ण युवावस्यायुक्त स्त्री होती है तो वंस वृद्धस्य तरुणी विषम् " बुडेको तरुणी विष है उनको तो बहुत प्रसंग भाता ही नहीं, बस वे किसी और नव युवाकी खोज करके धर्मच्युत होतीहैं, और जो यह कहो कि ब्रह्मचर्यसे आयु बढतीहै सो यह भी नहीं देखा जाता क्यों कि स्वामीजीने तो पूर्णतासे ब्रह्मचर्य धारण किया था परन्तु अट्ठावन ५८ वर्षको अवस्थाहीमें शरीर छूट गया यदि स्वामीजीका ४८ वर्ष में किसी बीस वर्षकी अवस्था युक्त स्वासे विवाह होता तो वह विचारी अब शिर पटकती या नहीं हो माणायाम सदाचार तपादि करनेसे निश्चय आयु वृद्धिको प्राप्त होती है फेवल वेद वेद वाणीसे कहने तथा श्रुतियें पढनेहीसे धर्मात्मा नहीं होता क्यों कि ॥ शुश्राव जपतां तत्र मंत्रान् रक्षोगृहे पु वै। स्वाध्यायानरतांश्चैव यातुधानान्ददर्श सः॥ वा० सुन्दर०१३।४ . " चतुर्यसमुल्लासखण्डनम् । (७७) राक्षसोंका परोंमें मंत्रनपंत महावीरजीने सुना तथा कितने ही राक्षसोंको स्वाध्याय (वेद) में निरत देखा दुष्कर्मसे राक्षसत्व न छूटा यदि ब्रह्मचर्य ही आयुकी वृद्धि करनेवाला होता तो स्वामीकी आयु ४०० वर्षकी होती क्योंकि वे अपनेको योगीभी तो मानते थे, अथवा पूरे सौ ही वर्षकी होती जो ब्रह्मचर्य से ही आयु बढती है तो आपका ब्रह्मचर्य ठीक नहीं, और जो ब्रह्मचर्य ठीक था तो आयु क्यों नहीं बढ़ी ब्रह्मचर्यसे तो वीर्यकी अधिकता होती है जिससे शरीर में पूर्ण चल होता है जैसा योगशास्त्रमें लिखा है (ब्रह्मचर्य- प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः पा० २ मू० ३८) अर्थात् ब्रह्मचर्यसे वीर्यका लाभ होता है हां योगाभ्यास प्राणायाम समाधिसे आयुकी वृद्धि होती है अन्यथा आयु पूर्वकर्मानुसार निर्णीत होती है जैसे नीतिमें लिखा है कि ।। आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च । पंचतानीह सृज्यन्ते गर्भस्थस्येव देहिनः॥ आयु फर्म धन विद्या मरण यह पांच वस्तु देहाके गर्भमें ही नियत होजाती हैं, सच ही बात कर्मानुसार होती हैं इसी प्रकार निसके कर्ममें वैधव्य है क्या उसे फाई मेटनेको समर्थ है यदि कर्म मिथ्या होजाय तो जगत्की व्यवस्था ही मिटनाय यह मरण जीवन सब ही कर्मानुसार है यदि बडेहुए विवाह हो तो क्या बडी उमरमें कोई विधवा नहीं होती क्या वडी उमरमें विवाह करके कोई फर्मको मेटसकता है इस समयके वियाह और संपोगकी रीति वाग्भटके अनुसार होनी चाहिये क्योंकि कलियुगके वास्तं यही अधिकांशमें प्रमाण है । अत्रिः कृतयुगे चैव त्रेतायां चरको मतः । द्वापरे सुश्रुतःप्रोक्तः कलौ वाग्भटसंहिता ॥ सतयुगमें अत्रिसंहिता घेतामें चरकसंहिता द्वापरमें सुश्रुत और कलियुगके लिये पाग्भटसंहिता है अब देखना चाहिये कि वाग्भट किस समयमें नीपुरुषका संयोग फथन करता है । पूर्णपीडशव स्त्री पूर्णविशेन संगता। शुद्ध गर्भाशये मागे रक्त शुक्लेऽनिले हदि ॥ १॥ वीर्यवंतं सुत सुते तता न्यूनान्दतः पुनः। रोग्यल्पायुरपन्यो वा गों भवति नेव वा ॥२॥ पूर्ण सोलह वर्षकी स्त्री वीस वर्षको अवस्थाले पुरुषके साथ संग · करनेस शुद्धगर्भाशय और गर्भाशयका मार्ग तथा रुधिर वीर्य और पयन हृदपमें होनसे (७८) दयानन्दतिमिरभास्करः। स्त्री सामर्थ्यवान पुत्रको प्रगट करता है इससे न्यून अवस्थावाले पुरुष और स्त्रीके संयोग होनेसे रोगी और अल्पायु और दुष्टबालक होता है वा गर्भ ही नहीं रहता और- द्वादशावत्सरादूर्धमापंचाशत्समाः स्त्रियाः ॥ मासि मासि भगद्वारात्प्रकृत्यैवार्तवं लवेत् ।। बारह वर्षसे लेकर ५० वर्षको अवस्थापर्यन्त महीने २ स्त्री रजोवती होती है अब इस सब कथनका तात्पर्य यह है कि, दशवर्षसे ऊपर तो कन्याका विवाह करे और सोलह वा वीसवर्षको अवस्थामें पुरुषका विवाह करना इससे कमती कभी न करे यह सिद्धान्त है इसमें भी १६ वर्ष मध्यम और वीस वर्षका विवाह उत्तम है इसमें विद्याभी पूर्ण होजायगी और कठिन रोग जो बालावस्थाके हैं उनसे भी बचजायगा आगे प्रारब्ध तो बलवान् हेही पुनः तीन अथवा पांच वर्षमें द्विरागमनके होनेतक दोनोंकी अवस्था वैद्यकके अनुसार पूर्ण हो जायगी और जो १६ । २० में विवाह हो तो द्विरागमनकी आवश्यकता नहीं अब घर कन्याके फोटोग्राफ ( अर्थात् तसवीर वा प्रतिबिंब ) की लीला सुनिये भला इसमें फोनसी अति प्रमाण है कि वरकी तसवीर कन्याके और कन्याकी घरंक अध्यापकों के पास जाय जब परकी तसवीर कन्या के पास गई तो वाह सूरत के सिवाय और क्या देख मक्ती है और जीवनचरित्र कहांसे आप जबकि दोनों ही अध्यापकोंक पास परत हैं और उस समय चरित्रको आवश्यकता क्या है क्यों कि फेवल विद्या अध्ययनके सिवाय और उनका जीवन जीवनचरित्र क्या होगा यही कि अमुक २ ग्रन्थ पढे हैं या और कुछ यदि और कुछ हो तो वोह क्या हो और उसमें फौनसे चरित्र लिखनायग यही प्रयोजन होगा कि जिस दिनसे जन्म लिया आ3. वर्पतक संला फिर पड़ने लगा इसके सिवाय और क्या होगा, और उस जीयन चरित्रका लेखक और साक्षी कौन होगा आप या आपके चले और यदि अन्या. पर लिसे तो एक २ अध्यापके पास ५० शिष्य हो और योह एक २ का २९ वर्षका जीवन चरित्र बना ती विद्यार्थियों को कौन पटवि, और फिर विना लाम २५ वर्षका इनिहाम लिपने फोन बैठेगा और एक पुस्तक हो तो लिग भी दे जहाँ पनाम या माठ हों यहांको क्या टीक क्यों कि जब अध्यापक पाम विद्यार्थी रहे तो उनकी व्यास्या यही टीक जानते हैं जब ये धन लेकर पुस्तके पनायेंगे तो यह भी हो सका है कि अधिक धन देने वाले अयगुगोंकी छिपाकर गुण ही लिग क्यों कि वे तो यह जानते ही हैं कि यदि अयगुण दिलंगनी विवाह नहीं होने और इमी प्रसार लड़का भी कामना है कि कुछ परंग गर्ग आंव कुछ जीवनचरित्र लिखनेवालेफी भी भेंट करेगी क्यों कि जब १० रुपयतकके नोकर भी बहुधा घूस खातेहैं तो जीवनवारत्र लिखनेवालेकी क्या कर है "जहि मारुत गिरि मेरु उडाही । कहो तूल केहि लेखमाहीं । "यदि कहो कि सब ऐसे नहीं होते हैं तो और सुनिये यदि उन्होंने लड़के लड़कीके अवगुण जीवनचरित्र लिखा तो अब उनसे कौन विवाह करे वे किसकी जानको रोवे विध- पाका तो आपने नियोग भी लिखा और ग्यारह भर्ता फरने लिखे परन्तु वे कारी क्या करें पति करें या नहीं, वा कुछ ग्यारहसे अधिक करें यह कुछ स्वामीजीने लिखा नहीं क्यों कि जो अवगुणयुक्त हैं उनसे विवाह कौन करे और तसवीर देखकर पसन्द करने उपरान्त उस्से अधिक रूपगुण मिलनसे वे स्त्री दूसरंके संग फरनेकी इच्छा करसक्त हैं, इस तसवीर मिलाना ठीक नहीं, शोककी बात है कि जन्मपत्र जिससे रूप रंग स्वभाव विद्या आयु आदि सब कुछ विदित होनाय घह तो निकम्मा और यह तसबीर मिलाना ठीक धन्य है इस युद्धिपर इस कारण यही उत्तम है कि माता पिताको पुत्रका अधिक नह होनेमे व वितलगाकर कुलगु- णसम्पन्न पुरुषको आप ही देखें तथा उसके व्यवहारकी परीक्षा स्वयं अपने संबंधियोंके द्वारा करावं जैसा कि अब भी होताह हां नाइ आदिके भरोस सम्बन्ध फर देना महामूर्खता, है, स्वयं देखना चाहिये और बालकपनसे आठवें या दशवें वर्पतकका इतिहास क्या कार्य दगा, क्या चलिमें लोटना पडे २ मूत्रादि करना भोगनको हप्या पानीको मम्मा कहना यह भारसमं लिखाजायगा, जब कि यज्ञो- पवीत होकर गुरुके विद्यापटने गय तो सिवाय पढने और क्या जीवन चरित्र होगा यह जीवनवृत्तान्त आपने जन्मपत्रके स्थानमें चलाने का विचार कियाह (निस जन्म पत्रसे कुलगाव गन्मदिन आदि सबकुछ विदित होजाताह ) अब म्यामीनीको यह पूछते हैं कि तुम्हारे माता पिता और तुम्हारा जीवनचरित्र ४० वर्पतरूका कहां है यदि कोई चला है कि दयानंददिग्विनया दयानंदनीका जीवनचरित्र है मा यह तो किसी वालपरिश्रमीन उनकी मृत्युके उपरान्त ग्ना है और ना कहो म्वामीनी बनाफर रबगह तो विनामाक्षी स्वयंलिसित प्रमाण नहीं क्यों कि अपना चरित्र आप ही कोई लिखे तो वोह अवगुणनहीं लिखता रहाइको इच्छास इसकारण बह जीवनचरित्र प्रमाण नहीं और पानेशलोक सामने विवाह करनका कहत दो पर घोडीसी ओलटस कहतेही, प्रत्यक्ष ही क्यों नहीं कददैन कि ईसाई होनाओ, क्यों कि ईसाइयमि यह प्रथा प्रचलित है कि पादरी साहब स्टॉम विवाह करा- देतदें, निस गिरजाघर कहते हैं प्राचीनममयमे ते आजतक पिता माता भाई सम्बन्धियों सन्मुख कन्यारे ही पर विवाह होता चलाभाया, फिर आपने यह भी सूर ही लिचौहै (फि फन्पा भौर परसी मम्मनि लेकर पश्चात् पितामे जैसि गरा मैडल तानस (८०) दयानन्दतिमिरभास्करः। अव्यापकलोग फहैं) वाह मुलाकात फराकर पितासे खबर करना यही रीति संशो- धनकी उच्चश्रेणीका नियम है, जब कन्याके सामने बीस पुरुषोंका फोटो आया तो सबमें कोई न कोई लटक अन्दाज निराली होगी पसन्द किसे कर लोका- नुसार-एकको स्वीकार करना पडेगा परन्तु वित्तमं वोह और पुरुषोंका भी कटाक्ष समाया रहेगा और यही. व्यभिचारफा लक्षण है क्यों कि सब अपनेसे उत्तम हीको चाहतेहैं स्वामीजीने गुण कर्म मिलाने लिखा कन्याकी ईच्छा विशेपमें हुई वे अध्यापक गुण मिलाने लगे और कहने लगे कि इसमेंसे कोई · पसन्द फरलो तोअब चाहे लाचारीसे वे अंगीकार करलें पर मनमें तौ और ही पुरुष रहा, और यही दशा पुरुपोंकी है तो अब कहिये वह पतिकी और: परस्परकी सम्मति फहां रही यह तो बडी पराधीनी होगई ओर गुण कर्म क्या मिलविं कर्म तो सबका पढना ही ठहरा फिर मिलावें क्या यही कि जो पुस्तक लइ पढ़ता हो वहीं लडकी, और आपने अध्ययनके सिवाय सीना रसोई आदि सिखाना तो लिखा ही नहीं बस व्याह होनेपर दोनों पुस्तकें आदि पढे गृहस्थीका कार्य आपके शिष्य वर्ग कर आया करेंगे और कदाचित् कोई कन्या रूमाल काढना जान्ती हो तो उसका पति भी रूमाल काढनेवाला होना चाहिये नहीं तो कर्म कैसे मिलेगा और गुण कौनसे मिलाये जाय यदि किसीमें तमोगुण हो तो दूसरा भी तमो- गुणी होना चाहिये जो रातदिन लडाई हो और यह कैसी बात कही गुण कर्म न मिलें तो क्वाँरी रहो विधवाकी तो कामामि बुझानेको यह दया करो कि ११ पति तंक करनेमें दोप नहीं और कुमारीपर यह. कोप कि व्याह ही न करो भला उसकी सन्तान उत्पत्तिकी इच्छा और कामवाधाको कौन पूर्ण करेगा खूब ही भंग पीकर लिखा है और निर्धनसे तो आपकी रीतिसे विवाह धन ही नहीं सक्ते क्यों कि जब पूर्ण विदुपी स्त्री आई तब रसोई कौन करे लाचार किसीको नौकर रखना पड़ेगा उनके पास इतना द्रव्य है नहीं अब लगा केश होने संब पटें अब रसोई कौन करै शायद शूद्र मिलजाय तो आश्चर्य नहीं मेरे कहनेका यह आशय नहीं कि कन्याको मत पढाओ पढाना वेशक चाहिये परन्तु गृहस्थके कार्य भी प्रबलतासे सिखाने चाहिये जिनका प्रतिक्षण प्रयोजन पडता है जिसके जाने विना भी केश होता और स्त्री फूहर कहाती है । और स्वामीजीने वह गुप्त बात न लिखी कि क्या पूछै यही कि उपदंश नपुंसकतादि रोग तो नहीं है वा आकर्षण स्थापन आता है या नहीं सो यह वात विना परीक्षा किये कैसे विदित हो.सक्ती है, जो गुप्तबात है उसे अध्या: • पक कैसे देखें क्या वे भी किसी प्रकार उनसे निर्लजतायुक्त भाषण करें शोक ! गुप्त बातको. खोल ही कर लिखदते कि विवाहसे प्रथम एफवार संयोग भी हो . चतुर्यसमुल्लासखण्डनम् । जाय तो सब भेद खुलजाय पदि पुष्टता आदिक हो तो वरण करें नहीं तो है फिक करें, अन्यथा निन दोष देखने कहनेवाले बहुत थोड़े हैं पर कन्याको कि यह बन्ध्या तो नहीं है किसी अच्छे डाक्टरसे करानी चाहिये - वाझ हुई तो सन्तान कहां अथवा दो चार मास विवाहसे प्रथम संयोग रहे जो गर्भ स्थित हो जाय ता विवाह कर ले नहीं तो त्यागन कर प्रकार करनेस कोई विवाहित पुरुप निवेश न होगा और स्वामीजी सिद्धि भी होगी और जिनके पास धन आदिका प्रवन्ध न होवे के बैठे हुए आपको आशीर्वाद दें. बहुत ऐसे हैं जो रोज लाते और गुजरान हैं वे भली खानपानका प्रबन्ध (इकरारनामा) कैसे लिख सक्ते हैं इस थोडे निर्धन बहुत विवाहित थोडे क्वारे कॉरी अधिक होनेसे कामामिसे हो कुमार्ग में ही पदार्पण करेंगे और अड़तालीस वर्पका कृश शरीर द दिन उत्तम भोजन करनेसे कैसे यथेष्ट पुष्ट हो जायगा वाह स्वामीजीकी तो पूर्ण है और इस जरामुख अवस्थाका फोटो भी मनोहर होगा वि- समय भी फेसा अद्भुत रक्खा है जब रजस्वलासे शुद्ध हो उस दिन करे और आपकी बनाई संस्कारविधिके अनुसार व्याह करावे, यह तो बडी है किक बात कही जब आपकी सरकारविधि नहीं थी, तो कहिके अनुसार होती पा,भलाअबतो आपबहते हो ब्राह्मणों ने ग्रंथ कल्पना कर लिये पूर्व का विवाह किया कौनसे अंधके अनुसार करतेथे क्यों कि यह आपका पुस्त जयतफ बनी ही नहीं थी, तो नफे विवाहादिक भी अशुद्ध ही हुए और जीने उसमें बनाया ही क्या है वेद मंत्र तो पूर्वकालसे ही थे आपने उससे लिख दी है और पटनपाठन विधिमें सब भाषा ग्रंथ त्याज्य माननसे यह भी मिश्रित होनेसे त्याज्य ही है कार्य मंत्रोंद्वारा होता है भापासे कुछ प्रयोग नहीं फिर दयानंदजीने उसमें क्या बनाया मंत्र उलट पुलट कर दिये हैं औ अब भी यह संस्कारविधि नहीं है वहाँके लड़का लड़की क्या करे ही रहे संस्कारविधिकी शिक्षा वैसी उत्तम है “पुरुप स्त्रीकी छातीपर हाथ धर पुरुपके हृदयपर हाथ धरके कहै तुम मेरे मनमें सदा यस्ते रहो" जहां । वृद्ध बैठे हों वहां नारियोंकी यह हीरता, यह आपका कन्याको अधिक अव विवाह और नियोग यह दो लनानाशक व्यभिचारके खंभ हैं, फिर विवाह ही दोनों स्त्री पुरुष एकान्त सेवन करने चले जाय यह कौन धर्म है कि स्वीपुरुष विवाहमें उपस्थित हों और वे दोनों स्त्री पुरुष लान शील छोड । ग्यारह ही बने एकान्त सेवन करने चले जायं और वीर्यस्थापन और. बी ८२) दयानन्दतिमिरभास्करः। कर्षण दोनों स्त्रीपुरुप फरें भला आपने इसकी क्रिया भी तो नहीं लिखें शायद गुप्त किसीको बताई हो जब स्त्रीने वीर्याकर्षणका पहलेसे अभ्यास किया होगा जब ही तो आकर्षण करसती है नहीं. ती नहीं और पुरुपने स्थापनका अभ्यास किया होगा तभी ती आता होगा नहीं तो क्यों कर आसक्ता है और माकर्षण विना आसन योगक्रियाकं आ नहीं सक्ता यह क्रियामें कन्या और पुरुपोंको कौन सिखापै तो यह भी अध्यापक या अध्यापिकाओंके शिर मांगे क्यों हमें लिखते लाज आती है कि नोका जबतक पुरुपसे संयोग न हो तबतक उन्हें स्वयं आकर्षणका अभ्यास कैसे हो सक्ताह इसी प्रकार पुरुपको भी अभ्या- समें सीकी आवश्यकता है तो उनके अभ्यासके अर्थ स्त्रीपुरुष भी नोकर रखने चा- हिये यह विधि स्वामीनीने न जाने कहां सीखी जब यह विधि आती होगी तभी तो लिखा और सास ससुरभी प्रसन्न होते होंगे कि हमारी पुत्री वीर्याकर्षण कर रहीं है और जामाता स्थापन कररहेहैं "पति स्त्रीसे कहे कि मैं अब वीर्य स्थापन कर- ताहूं वह कहती जाय हाँ छोडो मैं आकर्षण करतीहूं" यह रीति तो वेश्याओंकों भी लजित करती है यह बात आपने किस देशकी रीतिके अनुसार लिखी है शायद यह आपके विविष्टपअर्थात् कल्पित तिब्बत नामक स्वर्गकी होगी और बिना कहे स्त्री जान नहीं सक्ती कि कब वीर्यपात होगा तो जब पति कहेगा मैं छोडताहूं तो वह बाला निर्लन हो क्यों कर कहसक्ती है कि छोडो मैं ग्रहण करनेको उपस्थित हूं उधर लडकीके माता पिता भी प्रसन्न होते हैं कि पुत्री गर्भधारण कररही है. खाक पड़े ऐसी रीतिपर जो जंगलियों में भी नहीं होती होगी, यद्यपि स्वामीजीका फामशास्त्रमें अधिक अभ्यास प्रतीत होता है परन्तु मैंने वृद्ध लोगोंसे यह बात सुनी है और वैद्यकके ग्रंथों में देखा भी है कि जबतक स्त्रीका रज और पुरुषका वीर्य नहीं मिलता तबतक गर्भको स्थिति नहीं होती सो जबतक रनवीर्य न. मिलें तो चाहै अपानवायुसे स्त्री खींचे संकोचन करै वा सब अंगसीधे कर आफ- पण करै तौ भी गर्भकी स्थिति कठिन है और जो स्वामीजीका ही कथन सत्य होता तो सत्यार्थमकाश और संस्कारविधिके पूर्व सृष्टि ही न होती बहुत क्या : पदि यह झगडे होते तो दयानंदनीका भी जन्म असंभव था यदि गर्भका तत्काल धारण करना स्त्रियोंके अधीन होता तो क्यों कोई स्त्री वंध्या होती.-और पुत्रा दिकोंके हेतु जपतपका क्यों विधान होता, यह आपकी बात रहस्यकी ती नहीं फिन्तु निर्लनतासे भरी और वर्णव्यवस्थाका सत्यानाश करनेहारी है, यह स्वामीजीके ही लेखका उत्तर है जितने दोप उस असभ्य लेखमें भरे हैं उन्हें सोलकर दिखा दिया जिससे कि मनुष्य इस सभ्यतानाशक अन्धकूपसे सर्वे चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । अपनी ओरसे एक अक्षर भी नहीं लिखा खवरदार दयानंदनीके पंथमें आनेसे यह अनर्थ करन पड़ेंगे इससे विचार कर इधर पैर रखना. चौथे आठवें महीनेके संस्कारसे क्या फायदा विचाराहै " प्राचीन लोगोंमें तो संस्कारों से निर्मल वृद्धि आरोग्यता शुभ कर्म युक्त सन्तान संस्कार करनेसे होताहै ऐसा मानते हैं। और स्वामीनीने हवनमें तो घेद मंत्र कंठ रहनेका लाभ बतायाह यहां संस्कारसे क्या सिद्धि है और क्या जाने कि वह शूद्र ही होजाय तो यह गर्भाधानके दो संस्कार मिथ्या ही होनायगे और संस्कारको स्वामीनीने आवश्यकता काहको लिखी वे तो लिखनुके हैं कि 'अनुपनौतम यापयेत्' चिना यज्ञोपवीत हुए शूद्रको मंत्र सं० छोड सब शास्त्र पदवि ती संस्कारकी क्या आवश्यकताहै जब ४८ वर्ष उपरान्त ब्रह्मचर्य हो जुकैगा तब वोंमें योग्यतासे कर दियानायगा बालको मुवर्णकी शलाकासे घी शहद चटाना ओमजीभपर लिखना चालकके कानमें तेरा नाम चेद है पेसा फहनाइससे क्या प्रयोजन तथा संस्कार विधिके अनुसार बालकसे ऐसी बातें करना जैसे कोई बडौंसे कहै" हे बालक ! मैं तुझे मधु पृतका भोजन देता हूं तुझे मैवेदका दान देता हूं हे बालक ! भूलोक अन्तरिक्षलोक स्वर्गलोकका ऐश्चर्य तुझमें में धारण करता हूं" विचारनेकी बात है क्या यह स्वामीजीका तंत्र नहीं है आप ऐसे कहांके परमेश्वरके दारोगा है कि तीनों लोकका पेश्चर्य चाहे जिसे हाथ उठाय दे दिया, अब और बालक क्या भूख मरेंगे, और जिसे बिलोकीका ऐश्वर्य मिलगया तो वह दारिद्र होना चाहिये और जब सबके संस्कारकी यही विधि है तो कोई भी दरिद्रीन न होना चाहिये, और तेरा नाम वेद है यह कानमें कहें भला वह दस दिनका बालक क्या समझेगा कि वेद किसे कहतेहैं आठ दश वर्षकी लडकी तो वंद मंत्रोंको नहीं समझती यह तत्कालका बालक वेदतक समझताहै क्या खूब और जो कही कि यह कथनमार है तो जन्मते हो बालकको क्यों झूठ में फँसाना इत्यादि. दयानन्दजीने ऐसे मिथ्या संस्कार लिखे हैं जो प्राचीन प्रथाके विरुद्र हैं। अब (बीणि वाणि) इस शोकका आशय सुनिये (यदि स्वामीजीका अर्थ मानें कि रजस्वला हुए पीछे तीन वर्ष पर्यन्त पतिको खोजकर अपने तुल्य पतिको प्राप्त होवे) यह साक्षात् स्त्रीके व्यभिचारिणी बनानेकी विधि महात्माजीने लिखी है माता पिता चैन करें और वीपतिखोजती फिर और आप ही विवाह भी करले गुणकर्ममें पुष्टि आदि भी देखले खूब इस शोकका अर्थ विगाडा है इसका अर्थ यह है कि जिस कन्याके पितामातादि विशेषगुणवाले वरको.न दे सकें तो वह ऋतुमती होनेपर तीन वर्पतक (उदीक्षेत) अपने पिता आदि कुटुम्बियोंकी प्रतीक्षा. करे कि यह विवाह करदें जब यह समय भी बीत जाय तो अपनी जातिके पुरुषः (४) दयानन्दतिमिरभास्करः। फो जो अपने कुलगोत्रके सदृश ही उसे ही वरण कर यह आपदर्भ है अन्यय स्त्रीको स्वयंवरण करनका नृपकुल छोडकर अधिकार नहीं है और फिर पीछेसे आपने लिखा कि योनिसंकोचन कर. स्यामीको इसका बड़ा ध्यान रहता है छिछिः एसी घिनोनी वातास सत्यार्थप्रकाश पूर्ण है आपने औपधी संकोचनकी नहीं लिखी याद होती तो लिखत और बालकको धायका दूध पिलाना लिखाहै यह सर्व साधारणसे नहीं निभ सक्ता जिनके पास इतना द्रव्य नहीं है वे क्यों कर दूध पिलानेवाली स्त्री नौकर रख सक्ते हैं इस कारण एकसा सबको फयन करना वृथाहै, फिर वह धाय कौन वर्णकी हो यह आपने नहीं लिखा उसका दूधपान करते २ बालकके स्वभावमें कुछ न्यूनाधिकता ता नहीं होनायगी धायके लक्षण भी तो लिखे होते ॥ अब इन सबका सिद्धान्त यही है कि वंदशास्त्रानुसार कन्यास वर दूना होना उत्तम है ड्योढा मध्यम है और जो आउसात वर्षके कन्या वरका विवाह करते हैं वेदशास्त्रविरुद्ध करते हैं और इसी कारण वे पछताते और दुःखभागी होते हैं इस अवस्थामें विवाह कभी न करै कभी न करै । एक बात और लिखनी है कि जो ब्रह्मचर्य धारण करना चाहै और बलबुद्धि- युक्त संतान होनेकी इच्छा करै वह अपनी संतानको संस्कृत विद्याहीका उपदेश करावे पढाँव उसीसे ब्रह्मचर्य निभ सक्ता है और प्रथम ही फारसी भूलकर भी न पढावे, कि फारसी पड़ते ही स्वभावमें कामचेष्टा आजाती है थोडी अवस्था में इधर उधर विषय करनेसे गरमी आदिरोगोंसे पीडित हो जाते हैं जिनका फिर जन्मभर ठीक नहीं लगता, और यह रोग प्राणोंके संगही बहिर्गत होते हैं इस कारण प्रथम संस्कृत पढाना जिसमें धर्मनिरूपण है विपयकी निवृत्ति है और जिन्होंने ब्रह्मचर्य नहीं धारण किया व हकीमजीको हाथ दिखलाते और पुष्टिकी दवा पूछते फिरते हैं, स्त्रिये संतानोंके हेतु बाबाजीकी अलग ही सेवा करती हैं यह आचरण बडा ही निषिद्ध है इसीसे देश अधोगतिको प्राप्त होरहा है इसके आगे वर्णव्यवस्थामें लिखा जायगा । वर्णव्यवस्थाप्रकरणम। स० पृ० ८५पं० २१ (प्रश्न ) क्या जिसके माता पिता ब्राह्मणहों वही ब्राह्मणी ब्राह्मण होताहै और जिसके माता पिता अन्य वर्णस्थ हों उनका सन्तान कभी ब्राह्मण होसक्ता है (टत्तर ) हां बहुत होगयेहें होते हैं और होंगे जैसे छान्दो- ग्य उपनिषदमें जावालि ऋपि अज्ञातकुल महाभारतमें विवामित्र क्षत्रिय वर्ण और xभा. प्र. इस प्रकरणपर कुछ नहीं कहा गया केवल हाय पैर पीट हैं। ... u" चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (८५) मातंग ऋषि चांडाल कुलसे ब्राह्मण होगये थे पृ० ८६ पं०३ अब भी जो उत्तम विद्या स्वभाववाला है वही ब्राह्मणके योग्य होताह और मूर्ख शुद्धके योग्य होताहै बजोवीर्यके योगसे ब्राह्मण शरीर नहीं होता ॥ ८५ । १३ समीक्षा अब यहांसे स्वामीजी जन्मसे वर्णछोड गुणसे जाति माननेलगे और यहींसे वर्णसंकर करनेकी नीव डाली कि बहुत शूद ब्राह्मण होगये पहले कथा छान्दोग्यकी सुनिये जिसमें जावालिजीका वर्णन है जिसमें उनकी विद्याध्ययन कराई है यह प्रसंग नहीं है कि वह ब्राह्मण होगये वह तो येही ब्राह्मण जब वह गौतमजीके पास पढने गये तो गौतमजीने पूछा ।। किंगोत्रोनुसौम्यासीति सहोवाचनाइमेतद्धेदभोयगोत्रोहम- स्यपृच्छंमातरसामाप्रत्यत्रवीदद चरंतीपरिचारिणीयो- वने खामलभेसाइमेनन्नवेद पद्गोत्रस्त्वमसि जबालातुना- माहमस्मिसत्यकामोनामत्वमसीतिसोहरसत्यकामोजावा- लोस्मि भोइतित होवाच नैतदब्राह्मणो विवतुमर्हतिसाम- घसौम्याहरति ॥ छान्दोग्ये० प्र० ४ खण्ड ४ कि हे सौम्य! तेरा कसा गोत्र है जावालि बोले यह मैं नहीं जानता मैंने आतासे यह पूछाया उसने कहा मैं परके कामकाजमें फंसीरहोपी युवावस्था तेरा जन्म हुआ पिता परल क सिधारे मुझे गोत्रकी खबर नहीं तुम्हारा नाम सत्यकाम मेरा नाम जवाल है यह बात सुन गौतमजीने जाना कि ब्राह्मण विना सत्ययुक्त छलरहित ऐसे वाक्य और कोई नहीं कहसक्ता क्योंकि “ऋजवो हि ब्राह्मणाः" ब्राह्मणस्वभावले रल होते हैं, इससे उसे निश्चय नाह्मण जानकर कहा कि समिधा लेआ और विधिक उपनपन कराकर विद्या पढाई, केवल जावाटिका गोत्र नहीं विदित था उस हिमाको उसकी याद नहीं थी पदि वह क्षत्रियादि वर्ण होता तो उसकी माता उसे अवश्य बतादेती. उसे तो विद्या अध्ययन करने में ऋपिने ब्राह्मण निश्चय विचार अध्ययन कराया स्वामीनीने यह विवाहप्रकरणमें झगडा उठाया है नारालिके इतिहाससे ब्राह्मण होना सिद्ध है अब भी बडे एल एल वी द्विजातियोंसे गोत्र प्रवर पूछिये तो वे आपका दम भरनेवाले मुख देखते रहनायँगे तो क्या वे शूद हैं। अब विश्वामित्रका चरिवं मुनिये जिनको आजतक कौशिक अर्थात् कुशिकके वंशमें उत्पन्न और गाधिपुत्र सब कोई जानते और कहते हैं, इनकी कथा प्रसिद्ध बहुत है वाल्मीकिसे सार लेकर लिखते हैं कि वशिष्ठजोसे कामधेनुक मांगनेपर न :(८६) दयानन्दतिमिरभास्करः। मिलनेसे क्रोधित हो युद्ध कर हार गये ती ब्रह्म तेनको क्षत्रवलसे अधिक समझ तप करनको चलंगये और कई सहस्त्र वर्ष तप करकं भी ब्रह्मवलकी प्राप्ति न हुई पश्चात् पुनः अत्युग्रतपस्या कर ब्रह्मानाके पर दंन और पशिएंक अंगीकार कर- नेसे ब्रह्म तेनयुक्त हुए यह बात नहीं कि वह ब्राह्मण अपनको कथन करें, आज- तक उन्हें कौशिक कहते हैं और उनकी संतानको क्षत्री कहते हैं ब्रह्मतनको टनको प्राप्ति हुई सो इस कारणसं नहीं यल किया कि उन्न गोत्र ब्राह्मणको कन्यास विवाह करें, किन्तु उन्हें केवल यही इच्छा थी कि जैसे वसिष्टकं ब्रह्मदंडन सब मेर अस निष्फल करदिये ऐसे ही मेर अन्त्रका प्रभाव हो जाय सो भी बहुत तपसे और ब्रह्माजीक वरस तथा वसिष्ठ ऐसे निकालदीके ब्रह्मर्षि कहनेसे विश्वामित्रन अप-. नेको कृतार्थ माना और ब्रह्मर्षि कहाये और यह जो स्वामी ने लिखा कि (उत्तम विद्यावाला ब्राह्मणके योग्य होसक्ताहै मूर्स शूद्र होता है ) तो क्या विधा- मित्रमें उत्तम विद्या न थी क्या वे वेद नहीं पड़े थे व तो बड़े विद्वान थे क्यों बहुतसे मंत्राफ संग उनका नाम उच्चारण किया जाताहै, यदि पढनहींस ब्राह्मण होता तो विश्वामित्रनीका इतना परिश्रम क्यों करना पड़ता, और सभी विद्यावान ब्राह्मण कहलाते हजारों वर्प तप करके ब्रह्मांक वरसे एक राजऋषि ब्रह्मार्प कह लाया, देखिये कलियुगकी महिमा अब सत्यार्थप्रकाशके चार अक्षर पटक नाई गडरिये भी ब्राह्मण बनते हैं, इनको दयानंदका वरदान है और स्वामीजीन दो ही वर्ण प्रधान रक्खे हैं दो वर्ण गडप गय क्षत्रिय वैश्य इनका कुछ न लिखा इनमें भी विद्यावान और मूर्ख होताहै जब विद्यावान् ब्राह्मण और मूर्स शुद्ध कहाते हैं तो दो ही वर्णांकी आवश्यकता है यह चार वर्ण मानने वृथा ही हुए परन्तु विश्वामित्रकी उत्पत्ति भी ब्रह्म तेजसे है जब विवामित्रकी बड़ी भगिनी सत्यवती ऋचीक ऋपिने विवाही उस सत्यवती और उसकी माताकी प्रार्थनासे उन्होंने दो चरु बनाकर कहा एक इसे तुम भक्षण करना और यह अपनी माताको दन दोनोंके पुत्र होंगे, जब पुत्रीने मातासे यह सब वृत्तान्त कहा तब उसने चरु बदल कर खालिया पश्चात् ऋपिने अपनी स्त्रीम क्षत्र तेन देखकर कहा यह क्या कारण है जो तुम्हारा गर्भ क्षत्रतेजयुक्त है तब उसनें वृत्तान्त कहा कि चरु वदल गया ऋपिने कहा कि तुम्हारे पुत्र क्षत्र धर्मयुक्त होगा और उसके ब्रह्मज्ञानी, सीने कहा ऐसा न हो, चाहै पाता होनाप ऋपिने कहा मेरे पोते बटमें भेद नहीं, पोता ही होगा उससे परशुराम हुए सत्यवतीफी माताके ब्रह्मतेन युक्त विश्वामित्र हुए जब कि असलम ही ब्रह्म तेजसे युक्त हैं तब उनके ब्रह्मर्पि हो जाने क्या आश्चर्य है, जो स्वयं ब्रह्मतनसे युक्त और तप भी महा कर चुके हैं इर.से कुछ आश्चर्य नहीं, यह चतुर्यसमुल्लासखण्डनम् । (८७) पाल्मीकि बालकाण्डका सार है और महाभारत अनुशासन पर्वमें भी यह कया इसी प्रकारहै चरु बदलनेपर ऋषि कहतेहैं अ० ४ ॥ मया हि विश्वं यद्ब्रह्म त्वच्चरी संनिवशितम् । क्षत्रवीर्य च सकलं चरो तस्या निवेशितम् ।। मैंने तुम्हारे चरुमें पूरा ब्राह्मणपन रक्खाया और तुम्हारी माताके चरुमें पूरा क्षत्रियपन स्थापन कियाथा जिससे तुम्हारे उत्तम ब्राह्मण और तुम्हारी माताके क्षत्रिय सन्तान हो सो तुमने उलटा किया । तस्मात्सा ब्राह्मणश्रेष्टं माता ते जनयिष्यति । क्षत्रियं तूरकर्माणं त्वं भद्रे जनयिष्यसि ।। इससे तुम्हारी माताके ब्राह्मण श्रेष्ठ होगा और तुम्हारे उग्रकर्मा क्षत्रिय जन्मगा॥ विश्वामित्रं च जनयद्गाधिभार्या यशस्विनी । ऋपेः प्रसादादाजेन्द्र ब्रह्मर्षि ब्रह्मवादिनम् ॥ ऋचीकेनाहितं ब्रह्म परमेतद्युधिष्ठिर । गाधिकी यशस्विनी भायांने हे राजन् ! ऋपिके, प्रसादसे ब्रह्मर्पि ब्रह्मवादी विश्वामित्रको प्रकट किया उनके गर्भमें ही ऋचीक ऋपिने ब्रह्मत्व स्थापन कियाथा यह जन्मसे ही ब्रह्मर्षि ब्रह्मवादी थे और मातासे आये क्षत्रियपनको १५००० वर्ष तप करके निवृत्त किया, विश्वामित्र उत्पत्तिसे ही ब्राह्मण थे इनका कटाक्ष वृथा है. देवसृष्टि और ऋपिसृष्टि अलौकिक होती है देवर्षिाष्टिम मनुष्योंकी मय्यादाका नियम नहीं है मानुषी शास्त्रकी मर्यादा देवताओंपर ऐसा अधिकार नहीं कर सकती जैसा मनुष्योपर, भारतमें देव दैत्याका जन्म अलौकिक हुआ है जैसा यक्षकुण्डसे द्रौपदीका होना इन्द्रादि देवताओंके पांचों पुबोंसे विवाह करना, यह सब कुछ मनुष्योंपर नहीं लगता जब ऐसी सृष्टि होती है तभी कोई घोर संग्राम होताहै पृथ्वीका भार उतारा जाता है यह विचित्र बात मनुष्योंमें नहीं लगती जो शापादिक कारण कभी २ ऐसा हुआ करता है यह शास्त्रका विधान नहीं है ।।. विश्वामित्रने परिश्रम तपका क्यों किया वह तो विद्यावान थे-इससे प्रत्यक्ष यह बात सिद्ध होती है कि केवल विद्या पढनेसे ब्राह्मण नहीं होता (विश्वामित्रने जब त्रिशंकुको यज्ञ कराया था तो ऋपियोंने कहा था कि, जहाँ क्षत्रिय . ३ (८८) दयानन्दतिमिरभास्करः। याजक, चांडाल यजमान, यहां हम नहीं जागे) इससे जन्मसे जाति सिद्ध है यदि कही कि यह अधिक आयु और सहसों वर्ष तप करनेकी बात मिथ्या है फिसीने मिला दी है तो इसमें प्रमाण क्या है दोनों बातें एक ही पुस्तकमें हैं यदि वह किसीने मिला दिया है तो यह टत्तर हो सक्ता है कि यह ब्रह्मर्षि होनेकी बात किसीने मिला दी हो तो क्याआश्चर्य इसीप्रकारमातंगकाभी चाण्डा- लसे ब्राह्मण होना मिथ्या ही लिखा इस झूठका भी कहीं ठिकाना है उसने जब ब्राह्मण होनके निमित्त तप किया तब उससे इन्द्रने कहा- ब्राह्मण्यं प्रार्थयानस्त्वमप्राप्यमकृतात्मभिः । विनशिप्यसि दुर्बुद्धे तदुपारममाचिरम् ॥ १ ॥ देवतासुरमय॑षु यत्पवित्रं परं स्मृतम् । चाण्डालयोनो जातेन न तत्प्राप्यं कथञ्चन ॥२॥ तदुत्सृज्यह दुष्पापं ब्राह्मण्यमकृतात्मभिः । अन्यं वरं वृणीव त्वं दुर्लभोयं हि ते वरः॥ ३॥ महा० अनु० प० अ० २७ जब +मतंगने ब्राह्मण होनेके निमित्त तपकिया तब इन्दने उसके वर मांगनेपर कहा हे दुर्बुद्धि ! तू ब्राह्मण होना चाहताहै जो साधारण मनुष्योंको प्राप्त नहा हो सकता तू नष्ट होजायगा इसकारण इस विचारसे उपराम कर ? देवता असुर मनुष्योंमें ब्राह्मणपन परमपवित्र माना गयाह उस ब्राह्मणपनको चाण्डालयोनिमें उत्पन्न हुआ कभी प्राप्त नहीं होसकता २ फिर भी जब उसने तप किया तो अन्तमें इन्दने कहा अशुद्ध शरीरवालोंको जो प्राप्त नहीं हो सकता ऐसे ब्राह्मण- पनके वरको छोडकर तुम अन्यवर मांगी यह पर दुर्लभ है तुम ब्राह्मग नहीं होसकते ॥ ३ ॥ बाबाजी कहते हैं ऋपि था ब्राह्मण हुआ इस झूठका कहीं ठिकानाहै : मनुनी भी जन्मसे जाति मानते हैं यदि पढे हुएका ही नाम ब्राह्मण होता तो मूर्ख ब्राह्मण होते ही नहीं, परन्तु मनुनी वेपढे भी ब्राह्मणमें ब्राह्मण शब्दप्रयोग करतेहै. यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः।यश्च विप्रोऽन- धीयानत्रयस्ते नाम निभ्रति ॥ अ० २श्लो० १५७ १ वाल्मीकीरामायण या. कां. स. ५९ लो० १३ क्षात्रयो याजको यस्येति । मतंग ऋपिकी बात तो तुलसीदास साफ उडागये मानो मस्तिही नहीं पड़ी ।
चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । ब्राह्मणस्त्वनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति तस्मै हव्यं न दातव्यं नहि भस्मनि हूयते । अ०३ श्लो० १६८ जैसे काठका हाथी चमडेका मृग नाममात्रके होतेहैं, इसी प्रकार पढ़ा ब्राह्मण फेवल नामका प्राह्मण है १५७ बेपटा ब्राह्मण तुनकोंको अमिकी तरहसे शान्त होजाताहै, उसे हव्य कव्य न देनी चाहिये उसे देना राखमें होम करलाई १६९ अब विधारिये यदि वेपदे शूद्र ही होते ती ब्राह्मगको विद्या रहित होनेसे मनुनोने कैसे प्राह्मण माना यदि ब्राह्मणकी कोई पदवी होती तो वपढेका नामही ब्राह्मण न होता जैसे कि वकील तो वही कहावेगा जो पासकर चुका होगा और यदि पेपढेका नाम वकील कह दें तो भ्रान्ति नहीं तो और क्या है इसी प्रकार यदि ब्राह्मण कोई पदवी होती या विद्वानहीका नाम होता तो मनुजी यह न लिखते कि वह नामका प्राह्मण है ब्राह्मण तो है चाहे पढा नहीं है अपने कर्म नहीं करता इससे मूर्ख है इससे सिद्ध है कि वर्ण जन्मसे है कर्मसे अधिकार होताहै, वर्ण नहीं और स्वामीजी,जन्मसे जाति नहीं मानोगे तो यह सामवेदका ब्राह्मण क्या कहता है इसे भी न मानोगे क्या । अङ्गादङ्गात्सम्भवसि हृदयादधिजायसे ॥ आत्मासि पुत्र मामृथाःसजीव शरदः शतम् ॥ १॥ सामवेदस्य ब्राह्मण भागे । किञ्च-आत्मा वे जायते पुत्रः। ब्राह्मणम् ॥२॥ । . यह दयानंदनीने ही सत्यार्थभकाश पृ० १२० पं० ४ में लिखाहै । अर्थ-हे. पुन ! तू अंग २ से उत्पन्न हुए वीर्यसे और हृदयस उत्पन्न होताहे तू मेरा आत्मा है मुझसे पूर्व मत मरै किन्तु सौ वर्षतकनी १ आपही पुत्ररूपसे उत्पन्न होताहै यह प्राह्मणवाक्य हुआ, अब विचारनेकी बात है कि, जब संतान अंगअंगसे उत्पन्न हुए वीर्यसे उत्पन्न होता है और पिताका आत्मा है तो यह असंभव है कि पिताफे गुण उसमें न आई और जिसमें पिताके गुण व माताके गुण न आवे वह संदिग्ध पुत्र है, जो कि पिताफा आत्मा है और जो पिताके प्रत्येक अंग और वीर्यसे उत्पन्न होताहै उसे दयानंदनी झट दूसरेका बनाये देतेहैं भला कभी.वीर्यका प्रभाव छूटता है कभी नहीं आमकी गुठलीसे आम ही उत्पन्न होताहै चाहै आम सट्टे हों परसे चबूर ही उत्पन्न होताहै इसी प्रकार यााणसे उत्पन्न हुआ ब्राह्मण ही होता है चाहे वह विद्याहीन मूर्ख हो, हाँ इतना तो ठीक है कि, मूर्ख १ सन् १८९७ सरयार्यप्रकाश पृ. १२४ यह मंत्र निरु शके पतका लिखा जिसमें सारमा पुधनामासि' ऐसा पाठ लिखाह पहलेमें उपरका पचन सामवेदका लिवाह सब हे पता लगा स्वामीको झुटला ।
दयानन्दतिमिरभास्करः। ब्राह्मणको प्रतिष्ठा नहीं होती अब इस मंत्रसे ही बुद्धिमान् जान लेंगे कि, निस वर्णका पिता है उसी वर्णका पुत्र होगा क्योंकि वह पिताके प्रत्येक अंगसे उत्पन्न होताहै अब सृष्टि उत्पत्ति विषयमें भी जाति जन्मसे ही सिद्ध होतीहै यह लिखा जाताहै दयानन्दनी अङ्गादङ्गादिति यह सामवेदका मंत्र लिखा है परन्तु यह ब्राह्मण है मंत्र नहीं तीसरी स०प्र० में बदला है ।। पृ० ८७ पं० २१ ब्राह्मणोस्युमुखमासीद्धाहूराजन्यः कृतः । कुरूतदस्युयद्वेश्य पझ्या शूद्रोऽअर्जायत । यजु० अ० ३१ मं०११ इसका अर्थ स्वामीनी स० पृ० ८८ पं० ३ में लिखते हैं (अस्य ) पूर्ण व्यापक परमात्माकी सृष्टिमें मुखके सदृश सबमें मुख्य उत्तम हो वह ब्राह्मण, बलवीर्यका नाम बाहू है वह जिसमें अधिक हो वह क्षत्रिय, ऊरु फटिके अधः और जानुके ऊपर भागका नाम है, जो सब पदार्थों और सब देशोंमें ऊरुके वलसे आवे जाये वह वैश्य, और जो पद्यां पग अर्थात् नीच अंगके सदृश मूर्खत्वादि गुणवाला हो वह शूद्र है ।। ८७।८ पृ० ८८ पं० १०. । यस्मादेतेमुख्यास्तस्मान्मुखतोहा- सृज्यन्त इत्यादि० श० जैसा मुस अब अंगों में श्रेष्ठ है येसे पूर्ण विद्या और उतम गुण कर्म स्वभाव युक्त होने से मनुष्य जाति उत्तम ब्राह्मण कहाता है, जब परमेश्वरके निराकार होने से मुखादि अंग नहीं है, तो मुखत उत्पन्न होना असम्भव है और जो मुत्पादि अंगोम ब्राह्मणादि उत्पन्न होते तो उपादान कारणके सदृश ब्राह्मणादि आरति अवश्य होती, जैसा मुसका शरीर गोलमाल है वैसे ही उनर गर्गरका भी गोलमाल मुसाकृतिक समान होना चाहिये, क्षत्री पैश्य शुदोका शरीर बाह्र रु चरणके समान आकारका होना चाहिये, और जो कोई मुममें प्रभ फरेगा जो जो मुवादिसं उत्पन्न दुपये उन ग्राह्मणादि संज्ञा ही मुम्दार्ग नहीं क्यों कि नंमा मर टांग गभाशयम टत्पन्न होते है यमे ही तुम भी हो तुम सपादिम टत्पन्न न होकर ब्राह्मणादि मंज्ञाका अभिमान फरतही इसलिंग मुगा दिसे टम्पन्न होनेका अर्थ अमुद्र और हमारा अर्थ मनाह । ८८ ॥ १ ममीक्षा-स्यामानी कही तो बुद्धिक पीळ लाटी कर दीहत, पुरुपमा मंघमें गष्टि इत्पन्न होनेरा यांन है आप गुणामक गीतगाने लगे मुनिय राम पूर्व यह मंत्र है।
+ चतुर्यसमुल्लासखण्डनम् । यत्पुरुषव्यदधुः कतिधाव्यकल्पयन् । मुखडिमस्यासी- किम्बाहू किमुरूपादोऽउच्यते यजु० अं० ३१ मं० १० (प्रश्न ) जिस परमेश्वरका यनन किया उसकी कितने प्रकारोंसे कल्पना हुई उसका मुख भुजा ऊरु कौन हुए और कौन पाद कहे जाते हैं, इसके उत्तरमें (ब्राह्मणोस्पति) यह मंत्र है जिसका भाष्य दयानंदनी अशुद्ध करते हैं इसका अर्थ यह कि (ब्राह्मणः ) ब्राह्मण (अस्य ) इस परमेश्वरका ( मुखम् ) मुस (आसीत् ) हुआ (राजन्यः ) क्षत्री ( बाहुः कृतः) बाहुरूपसे निष्पादित हुआ (अस्य यत् ऊरू तत् वैश्यः ) इसकी जो ऊरू हैं तद्रूप वैश्य हुआ ( पद्यां ) चरणोंसे (शूदः) शुद्ध (अनायत) उत्पन्न हुआ. इस प्रकारसे इस मंत्रका अर्थ है इस मंत्रमें कोई ब्राह्मण क्षीके लक्षण नहीं पूछताहै किन्तु यह ईश्वरक विपय प्रश्न है इसमें कल्पना और उत्पत्ति दोनों प्रकरण हैतीसवें अध्यायमें पुरुप मेषका वर्णन है उसमें सब वाँक पुरुष बैठनसे विराटरूपसं उनकी कल्पना फरनमें यह ब्राह्मण क्षत्रियरूप वही है ऐसे कल्पना की है सृष्टिमें सब उस्स उत्पन्न हैं इस कारण अन्तमें अनायत पद दियाहै कल्पना शब्दके अर्थमें भी बनानेक हैं जैसे "सूर्याचन्दमसौधातायथापूर्वमकल्पयत्" अर्थात् विधाताने पूर्वकी समान सूत्र और चन्द्रमाको बनाया । उसके मन श्रोत्रादि सबका उल्लख किया है यदि यह अर्थ करें कि, जो ऊरुके बलसे आवे नाव वहवैश्य है तो यह नितने ब्राह्मणक्षत्रिय वैश्य शूद्ध आदि परदेशमें आत जात तथा यात्रा करतेहैं तथा रानाकी सेना आदि यह ऊरुक ही चलस परदेशमें जातेहैं तो यह सब ही वैश्य होने चाहिये और जो रेलके बलसे परदेश जाय उनका क्या नाम है यह आपने नहीं लिखा घेदमें तो आपने रेल तारका वर्णन निकाला है, धन्य है यवन म्लेच्छ सब ही परदेश आने जान बालीको आपने वैश्य बनादिया, परन्तु वे अपने नगरमें काहे वलसे चलते हैं जो और कुछ पल होप तो जान दीजिये और यदि परमें जांघोहीके बलसे आनानाना है तो सब जगत् ही येश्य होगया, सूत्र निवटे उपर आपने ब्राह्मण और शुद्ध दो ही वर्ण र इस तीसरेमें सबकोमेट एक ही • रस्सा (और पढ़या पगके सदृश मूर्खत्वादि गुण होनसे शूट है) यह. स्वामी- जीने एक ही विचित्र वात यही है क्या चरण भी मूर्ख होते हैं क्या चरणोंक भी ज्ञानेन्दिय होती है परमें कौनसी मूसंता है किसीका मालमारा या किमीको दुवाक्य फहा पैरफा मूर्स फहना एसा है जैसे ईट पत्थरसे बात करनी और ( पढ़यां) चरणोंसे यह पंचमी विभक्ति कही खोगई, और जनीमाभावेसे अनायत वनंता दयानन्दतिमिरभास्करः। है, जिसके अर्थ उत्पन्न हानक हैं तब यह अर्थ होताहे कि, चरणोंसे शूद्र उत्पन्न हु, और यही शतपथ ब्राह्मणमं लिखा है कि, जिस कारणमें पूर्व सृष्टिकालसे ब्राह्मण और वोंमें मुग्न्य और उत्तम हैं इसी कारण यह मुखसे ही उत्पन्न किये गये आगे अतिमें भी उत्पन्न होनेका वर्णन है कि. (चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षी सूर्यो अजायत ) अर्थात् मनस चंद्रमा और नाम सूर्य उत्पन्न हुआ है आगे इस सूतमें सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति लिखी है इससे सब उत्पन्न होनेका प्रकरण फहिये क्या इसका भी अर्थ आप कुछ बदलेंगे यदि कहदो कि चन्द्रमाका नाम मन है, चक्षुका सूर्य है, कोई कहे कि, अमुक पुरुषसे दयानंदकी उत्पत्ति हुई तो क्या स्वामीजी उसका यही अर्थ करेंगे कि, वेदमें रलतार निकालने, नियोग ठहराने, ग्यारह पति करान, मृतिखंडन करने, विधवाकी कामामि बुझाने, वर्ण- संकरकी रीति चलानेवालेको दयानंद कहते हैं तो बस फिर क्या है १०८ श्री लिखकर परमहंस सभी बन जायँगे और यह जो लिसा कि (परमेश्वरके निरा- फार होनेसे मुखादि अंग नहीं हैं उसके मुखसे उत्पन्न होना असंभव है ) जब परमेश्वरका आकार ही नहीं है तो यह. साकार सृष्टि क्या स्वामीजीके घरमैसे आगई निराकारसे तो निराकार ही होना चाहिये था परन्तु उससे संसार मूर्तिमान उत्पन्न हुआ है यथा- तस्माद्यज्ञासर्वहुतःऽऋचःसामानिजज्ञिरे । छन्दांसिज- जिरेतस्माद्यजुस्तस्मादजायत १ यजु० अ० ३१ मं• ७ तस्मादश्वाऽअजायन्तु यजु० अ० ३१ मं०८ गावोहनछिरे तस्मात् यजु० अ० ४१ मं०८ चन्द्रमामनसो जातुः अ० ३१ मे १२ मुखादगिरजायत. अ०३१ मं० १२ यदि वह निराकार है कोई अंग उसके नहीं हैं तो उस्से (ऋग्वेद यजुर्वेद साम वेद) उत्पन्न हुए १ उस्से पोडे उत्पन्न हुए २ उस्से गायें उत्पन्न हुई हैं मुखसे अमि उत्पन्न हुआ, यह निराकारसे साकार कैसे उत्पन्न हो गये, यदि कहो कि वेदका अंगिरादिके हृदयमें प्रकाश हुआ तो वे अंगिरा आदि कहाँप्से आगये, और जो कहो कि आप होगये तो स्वयंभू होनेसे वह ईश्वर हैं और जो कहो कि, ईश्वरने मनाये हैं तो क्या ईश्वर मनुष्याकृतिका है और गाय घोडे बकरी कहास उत्पन होगये, क्या इनका भी किसीके हृदयमें प्रकाश कर दिया था और जिनके
चतुर्यसमुल्लासखण्डनम्।
इदपमें किया था वे कहांसे आये, इसीपर स्वामीजी अपनेको तत्त्वज्ञानी मानते हैं,
ईश्वरकी शक्तिको कुछ भी खबर नहीं वह जो वाह सो कर सका है, धन्य है
स्वामीनी परमेश्वरके अंगादि होना असम्भव हैं तो सृष्टि होना भी असंभव है यह
भी याद है जो सत्यार्यप्रकाश १८८ पृष्ठ में लिखा है (अपाणिपादो जवनो ग्रहीता
पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः) विना हाथ सब कुछ ग्रहण करता विना पग चलता,
पिना नेत्र देखता, विना कान सुनता है तो इस आपके ही अर्थानुसार वह मुखादि
न होनस भी मुखक कार्य करता हुआ मुखसे ब्राह्मणको उत्पन्न करसक्ता है क्यों
कि सर्वशक्तिमान है और " स्वाभाविकी ज्ञानवलकिया च " उसमें सर्वोत्तम
शक्ति जिसमें अनन्त बल ज्ञान और अनन्त क्रिया हैं पह टसमें स्वाभाविकी
अर्थात् सहनमें सुनी जाती हैं इसी प्रकार इस श्रुतिका अर्थ मनुनीने लिखा है ।।
'लोकानां तु विवृद्धयर्थं मुखवाहरुपादतः ।
ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत् । मनु० अ०१श्लो०३१
लोककी वृद्धिक अर्थ ईश्वरने मुख वाहु उरू चरणसे ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य
शूदको पनाया, इससे स्वामीजीका अर्थ मिथ्या ही है ( और यह जो लिखा कि
उपादान कारणके सदृश उत्पत्ति होनी चाहिये, तो मुखसे मुखकेसे उत्पन्न होते)
धन्य है इस बुद्धिफो, जब टपादान फारणसे उत्पन्न होते हैं तो जो योनिसे होते
हैं ये सब योनिके आकारयाले होने चाहिये निराकारसे निराकार होना चाहिये,
धन्य है यह गपोडा तो गहरी भंगमें लिखा होगा, यही बुद्धि वेदभाप्य रचना
करती है अच आगे मुनिये ।।
वैदिकः कर्मभिः पुण्यनिपेकादिदिजन्मनाम् ।
कार्यः शरीरसंस्कारः पावनःप्रेत्य चंह च ॥२६॥
गाोमर्जातकर्मचोडमोनीनिवन्धनः ।।
बेजिक गाभिकं चैनो द्विजानामपमृज्यते ॥२७॥
स्वाध्यायेन व्रतहोमस्त्रविद्येनेज्यया सुतैः ॥
महायज्ञेश्च यज्ञेश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः ॥२८॥
प्राइनाभिवर्धनात्पुंसो जातकर्म विधीयते ॥
मंत्रवत्प्राशनं चास्य हिरण्यमधुसर्पिपाम् ॥ २९ ॥
नामधेयं दशम्यां तु द्वादश्यां वास्य कारयेत् ।।
पुण्य तिथी मुहूर्ते वा नक्षत्रे वा गुणान्वित ॥ ३० ॥
दयानन्दतिमिरभास्करः। मंगल्यं ब्राह्मणस्य स्यात्क्षत्रियस्य वलान्वितम् ॥ वैश्यस्य धनसंयुक्तं शूद्रस्य तु जुगुप्सितम् ॥ ३१ ॥ शर्मवद्वाह्मणस्य स्याद्वाज्ञो रक्षासमन्वितम् ।। वैश्यस्य पुष्टिसंयुक्तं शूद्रस्य प्रेष्यसंयुतम् ॥ ३२ ॥मनु० अ० २ शर्मब्राह्मणस्य वर्म क्षात्रयस्य गुप्तेति वैश्यस्य-आश्व० वैदिक जो पुण्य कर्म हैं उनसे ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्योंका गर्भाधानादि संस्कार करना सर्वथा विधि है, क्यों कि वैदिक संस्कार पवित्र और पापनाशक हैं और लोक परलोकमें सुखका हेतु हैं २६ गर्भाधान संस्कार जातकर्म चूडाकरण मौनी चन्धन इनसे वीर्यादि दोपके पाप और गर्भसंबंधी पाप दूर होते हैं २७ अध्यपर्ने व्रत हवन त्रैविद्या ऋगादि वेद, यज्ञ, पुत्रोत्पादन पंचमहायज्ञ इनके सम्पर अनुष्ठान फरनेसे यह शरीर ब्रह्ममाप्ति (मुक्ति ) के योग्य होता है ( दयानन्दनी माझी शब्दका अर्थ यह करतेहैं कि, "ब्राह्मणका " अर्थात् यह शरीर ब्राह्मणका किया जाता है और प्रतके:स्थानमें, जपैहोमः । पाठ लिखा है व्रतसे घबराते हैं यह अशुद्ध है, क्यों कि ब्राह्मणका शरीर तो माता पितासे बनता है)२८ नाभि छेद- नके पूर्व पुरुप जातकर्म संस्कार कर और गृयोक्त मंत्रोंसे सुवर्णकी शलाकासे मधु घृत चटवावै इससे स्वभावमें मधुरता होगी २९ दशवें या बारहवें दिन पुण्य तिथि मुहूर्तमें अच्छे नक्षत्र में नाम धरे ३०ब्राह्मणका शुभ वाचक,क्षत्रियको बलं युक्त, वैश्यका धन पुष्टि युक्त, गूहका जुगुप्सित नाम धरै २१ ब्राह्मणके नामान्तमें शर्मा क्षत्रियके वर्मा वैश्यक गुप्त शुदके नामके अन्तमें दास पद रल्यै ॥ ६२ ॥ अब विचारनेकी बात है जब शर्मा वर्मा आदि चिह्न लगाकर तीन यणों के नामकरण किये तथा पुंसवनादि किये तो जब स्वामीजी गुण कमरे अनुसार जांति मान्ते हैं तो अभी जन्मसे तो सन्तानोंकी दशा विदित ही नहीं कि बडे हुए वे चारों वर्षों में फोन वर्णके होना, फिर यह ब्राह्मणादिका नाम शर्मादि शब्द लगाकर रखना पृथा ही हुआ, यदि वह शुद्ध होगया तो कई संस्कार पृथा होगपे और शुद्ध यदि ब्राह्मण होनाप तो उसमें फई संस्कारोंकी न्यूनता रह गई, यदि गुण कर्मसे जाति होती तो जन्मसे संस्कार नहीं होते, परीक्षाके समय हुआ करते क्यों कि टत्पन्न होने ही पुयका नाम 'वीप' रमना वृया है, जब पहनाप तभी "वीप' होता है अन्यथा नहीं इसी प्रकार यदि ब्राह्मण कोई पदयी होती ती परीक्षाके उपरान्त ब्राह्मण क्षमिप गुदादिकी पदवी दीनाती, जन्ममे मंकार नहीं होते इससे स्वामीनीका गुण कर्मम जाति माना कपन मर्यया मिस्या है, भौर भी प्रमाग है मुनिये.. .
. कारण चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् . अष्टमे वर्षे ब्राह्मणमुपनयेत् गर्भाप्टमे वा, एकादशे क्षत्रियं द्वादशे वैश्यम् आपोडशाद्वाह्मणस्यानतीतःकालः,आदा- विशात्क्षत्रियस्य, भाचतुर्विंशादेश्यस्य, अत उध्वं पतित सावित्रीका भवन्ति आश्व०॥ गर्भाप्टमेव्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्योपनायनम् ॥ गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तु द्वादशे विशः। मनु० अ०२ श्लो० ३६ ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्य विप्रस्य पंचमे ॥ मनु० ब्राझणका यज्ञोपवीत आठवें वर्ष वा पांचवें वर्षमें १६ वर्ष पर्यंत करदे क्षत्रि- यका ग्यारह वर्ष वा छामें २२ वर्पतफ होजाना चाहिये, पैश्पका बारहवें वर्षमें वा आठवें वा वर्ष २४ तक होजाना चाहिये, इसके उपरान्त तीनों वर्ण गायत्री- पतित होते हैं, छोटी उमरमें यज्ञोपवीत विधि विशेष विद्या आनेके मनुनीने लिखी है। यहाँतक भी सब कृत्य जन्मानुसार ही होते चले आये हैं क्यों कि अभीतक वेदविद्यारहित तीनों वर्ण हैं, क्यों कि उपनपन बिना वेदारम्भ नहीं होता और फिर तीनोंके यज्ञोपवीतका काल भी तो पृथक २ ह यथाहि ॥ वसन्ते ब्राह्मणमुपनयेत् ग्रीष्मे राजन्यं शरदि वेश्यम् शतपथे० पसन्त ऋतुमें ब्राह्मणका गरमीमें क्षत्रियका शरद् ऋतुमें वैश्यका यज्ञोपवीत करना और यज्ञोपवीतके समय भोजन भी प्रतमें तीनों वर्णका पृथक् २ है यथा- पयोवतो ब्राह्मणो यवागूवतो राजन्य आंमिक्षावतो वश्यः॥ व्रती ब्राह्मणका पुत्र दुग्ध, क्षत्रियको ययागू अर्थात् यवका मोटा आटा दलके गुडके साथ पतला घोलकर पीना, वश्य आमिक्षा अर्थात् दहीसे चौगुना दूध एकगुनी खोड केशर डालकर पिये और व्रत रहै यहां भी जन्मसे ही जाति चली आती है और सुनो। मोजी त्रिवृत्समा श्लक्ष्णा कार्या विप्रस्य मेखला। क्षत्वियस्य तुमा ज्या वेश्यस्य शणतान्तवी ॥४२॥ अ०२ कापसमुपवीतं स्याद्विपस्योर्धवृतं निवृत् । . शणसूत्रमय राज्ञो वैश्यस्याविकसोत्रिकम् ॥ ४४१ ब्राह्मणो बेल्वपालाशी क्षत्रियों वाटखादिरो।
और 1 दयानन्दतिमिरभास्कर। पेलवोदुम्बरों वैश्यो दंडानइति धर्मतः ॥ ४५ ॥ केशान्तिको ब्राह्मणस्य दंडः कार्यः प्रमाणतः ।. ललाटसमितो राज्ञः स्याच नासांतको विशः॥ १६ ॥ भवत्पूर्वं चरेद्रेक्ष्यमुपनीतो द्विजोत्तमः । भवन्मध्यं तु राजन्यो वैश्यस्तु भवदुत्तरम् ॥४७||मनुम० ब्राह्मणफी मेखला त्रिगुण सुख स्पर्शवाली मुंजफी फरै क्षत्रियकी मूर्यासे घर पफे गुणको समान करै वैश्यकी मेखला सनके डोरेफी करे १२:ब्राह्मणका कपा सफा यज्ञोपवीत उलयत औरत्रिगुण होवे, सनके डोरका क्षत्रियका, श्यका मेपलामानिर्मित बनाये ४४ ब्राह्मणोंका दंड वेल पलाशका, क्षत्रियका पट खदिरका, वैश्यका पीलू वा उदंबरका फरै ४५ ब्राह्मणका दंड शिरके बालत लम्बायमान, क्षत्रियकाललाटतफ और वैश्यका नासिकातर्फ लम्बायमान दंड हो ४६ ब्राह्मण ब्रह्मचारी भिक्षा मांगते समयमं भवत् शब्दको प्रथम उच्चारण करे, जैसे भवति भिक्षी देहि , क्षत्रिय मध्यमें भिक्षा भवति देहि, वैश्य अन्तमें मिक्षा देहि भवति ।। ४७ ॥ यहांतक भी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्योंकी मौंजी, यज्ञापवीत, दंड, भिक्षामांगनेकी विधि पृथक २ वर्णन करी है, जिस्से फि देखते ही चीन्ह लिये जायें कि यह ब्रह्मचारी कौन वर्णका है, अब गुरुके यहां पढनेसे वह कौनसी वांत उनमें प्रवेश करगई कि, वर्ण बदल गये वे मौंजी आदि तो पूर्ण विद्या धारण करने तक धारण करेंगे और इनमें शूट पढने गया नहीं है वह कैसे उच्च वर्ण होगा अच्छा अन और सुना ॥ अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानंप्रतिग्रहंचैवब्राह्मणानामकल्पयामनु०अ०१श्लो०८८से वेद पढना पढाना यज्ञ करना करानादान लेना देना यह छः कर्म ब्राह्मणों के वास्ते नियत किये गये और- शमो दमस्तपःशौचं क्षान्तिराजवमेव च । ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥४॥भागीता मनसे किसीका अनिष्ट चिन्तन न करना. इन्द्रियोंका रोफना पवित्रता शान्ति र मूलर! *भा० प० के कर्ता यह सब प्रमाण हजम करगये मानों एकप्रकारसे जाति. नमसे मानी। । --- चतुर्थसमुल्लासखण्डनम्। सहना आर्जय सीधापन कोमलता ज्ञान विज्ञान आस्तिकता ईश्वरका मानना यह ब्राह्मणों के स्वाभाविक फर्म हैं ॥ १ ॥ प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च । विपयेप्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः ॥ मनु" शौर्य तेजो धृतिक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्वं कर्म स्वभावजम् ॥ भगी०२ मनाका रक्षण दान देना यज्ञ करना विपयों में नहीं फँसना वेद पढना यह कर्मः क्षत्रियके हेतु बनाये १ और शूरता वेन (धृति ) धैर्य चतुरता युद्धसे नहीं भागना दान देना ईश्वरमें भाव करना यह क्षत्रियों के स्वाभाविक कर्म हैं २ उसके अर्थ खामीजीने पृ० ९१५०१ (इज्या ) अमिहोबादि करना कराना ( अध्ययन ) वेद पढना पटाना यह क्षत्रियोंके फर्म लिखे हैं सो हठ धर्मी हैं क्षत्रिय पढा यह आज्ञा मनुजी नहीं देते यथा हि ॥ अधीयीरंस्त्रयो वर्णाः स्वकर्मस्था द्विजातयः॥ प्रब्रूयाद्रा- ह्मणस्त्वेषां नेतराविति निश्चयः ॥ १॥ अ० १० श्लो० १. तीनों वर्ण अपने फर्ममें स्थित होके वेदोंको प₹ इनको ब्राह्मण पढावें क्षत्रिय पैश्य न पढावे यह निश्चय है क्यों कि । बैशेष्यात्प्रकृति श्रेष्ठयात्रियमस्य च धारणात् । संस्कारस्य विशेपाच वर्णानां ब्राह्मणः प्रभुः ॥३॥ जातिकी उत्कर्पता उत्तम अंगसे उत्पन्न होने वेदके. धारण करने तथा संस्का-- रफी अधिकतासे धोका प्राह्मण ही गुरु षा प्रभु है. इस कारण वही पटानेका अधिकारी होताहै ।। पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च । वणिक्पथं कुसीदं च वेश्यस्य कृपिमेव च ।। मनु०९० कृपिगोरक्षवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ॥ भ० गी० पशुओंकी रक्षा करनी दान करना वेद पढ़ना व्यापार करना व्यान लेना खेती करना यह फर्म वैश्योंके अर्थ बनाये १ खेती गोपालन व व्यापार यह वैश्पोंमें स्वभावसे रहता है। .' एकमेव हि शूदस्य प्रभुः कर्म समादिशत् । एतेषामेव वर्णानां शुभ्रपामनसूयया ॥१॥ मनु० ११ -- . ...
। 1 (९८) दयानन्दतिमिरभास्करः। परिचर्यात्मकं कर्म शुद्रस्यापि स्वभावजम् । भ० गी० शूदका एक ही कर्म है निन्दाको छोडकर तीना वोंकी सेवा करना यह में जाने ठहरा दिया है गीतामें लिखाहै शूदका सेवा करना यह स्वाभाविक फर्म इससे यह बात सिद्ध होती है कि ब्राह्मणको ऐसे, क्षत्रिपको ऐसे कर्म कर चाहिये, यह अर्थ नहीं है कि इस कर्मके करनेसे ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र होता किन्तु बारों वर्ण प्रथम उत्पन्न हुए पश्चात् उनको कर्म सौंपे गये, जैसा कोईक कि यज्ञदत्त तुम यह काम किया करो तो क्या इसके यह अर्थ होंगे कि अमुक २ कार्य करै वो ही यज्ञदत्त होताहै, इससे विदित हुआ कि यज्ञदत्त किर पुरुपका नाम पूर्वकालसे है अब उसको कार्य सौंपे गये हैं, पदि फर्म करने ब्राह्मणादि होते तो ऐसे लिखते कि जो अध्ययनादि करै वह ब्राह्मण होता है से यहां यह बात नहीं किन्तु उनको कार्य सौंपे हैं, जैसे कि पहले तो चारो घणों नाम पीछेसे उनके काम और फिर - अतीत्य हि गुणान्सर्वान्स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते । स्वभाव सबसे अधिक बलवान है, जिसके स्वभाव में जो पात है वह कभी नहीं जाती, गुणीसे गुण अलग नहीं होता, और यह भी तो सोचनेकी बात है कि बड़ा होना कौन नहीं चाहते यदि उपरोक्त पद काहीसे ब्राह्मण होता तो घेद तो तीनों वर्ण पडे होतेथे क्या जो पढे हैं सो पढा नहीं सक्ते, निसने यज्ञ किया है यह फरी नहीं सक्ता, फिर तो ब्राह्मणके पफमों सब ही कोई फरसक्ते थे, और सब ही आह्मण होनाते, सो मनुनीने निषेध कर दिया कि और वर्ण वेद विद्या नहीं पठा सत्ते, इससे स्पष्ट है कि ग्राह्मण जाति जन्मसे ही होती है नहीं तो विधामित्रता न फरते, यदि पढेका नाम ब्राह्मण होता तो मूर्स ब्राह्मण ऐसा प्रयोग मानवधर्म शास्र में नहीं होता, और फर्म फरनेसे नाति नहीं बदलती परशुरामने इसीसवार पृथ्वी भरके क्षत्रिय मारहाले, वे भी ब्राह्मण थे उन्हें आगतफ कोई क्षविप नहीं पहता, द्रोणाचार्य अग्नपिण सिखाते थे उन्हें आजतक कोई क्षत्रिय नहीं कहते, यह महाभारत युद्ध भी करतेथे, यह भी क्षविप नहीं कहलाये, माझग ही यह लापे,फिर फर्ग + जर परशुरामो पास विद्या पहने गया तो दूर पोला कि मैं आमग पांडे परशुरामते क्षत्रियनान शाप दिया यदि पउनेहीसे मालग होता तो टसे क्या छिपाना पडना और गुणकमसे ही टय पगं होता तो कर्णम कौनसे गुरु क्षविप नहीं थे मर ही थे या भी अमल क्षविप पर अपनी जातिशी सर xभाको एक भास महामारतार डालकर यह प्रकरण देखना माहिर चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । न होनेसे सूतपुत्र नामसे ख्यात था जिस समय द्रौपदीके स्वयंवरमें धनुप कर्णने उठा लिया उस समय द्रौपदीने कहा हम सूतपुत्रको वरण नहीं करेंगी, क्यों कि यह क्षत्रिय जाति नहीं, यह सुन कर्णने लजित हो धनुप रखदिया कहिये यदि गुण कर्मसे जाति होती तो कर्ण धनुप क्यों धरता और द्रौपदी क्यो आग्रह करती फर्णमें कौन वातको कमताई थी परन्तु सूतके पालन करनेसे सूतनाति प्रसिद्ध होगई, दोणाचार्यने भीलको शूद्र जानकर ही धनुर्वेद न दिया फिर आदि पर्वको कथा सुनिये जब गरुडजी अमृत लेनेको चले क्षुधात हो मातासे पूछने लगे कि, हम क्या खाय, माता वा कश्यपनी बोले कि समुद्रतटमें निपादगण धर्मभ्रष्ट हैं उनका भक्षण करो, परन्तु उनमें जो ब्राह्मण होय उसका भक्षण नहीं ना क्यों कि ब्राह्मण जगद्गुरु हैं गरुड बोले जब सब ही धर्मभ्रष्ट हैं तो मैं से जानूंगा कि यह ब्राह्मण हैं ? उन्होंने कहा जिसके फण्ठ में जानेसे अमि वलने ने उसे जानना कि यह ब्राह्मण है ॥ यस्ते कंठमनुप्राप्तो निगीण बडिशं यथा। दद्देदंगारवत्पुत्र तं विद्याद्वाह्मणपभम् ॥ आदि० अ० २८ श्लोक १० जब गरुडजी वहां जाकर भक्षण करने लगे तब एक ब्राह्मण स्त्रीसहित मुखमें गया, और कण्ठ में दाह होने लगा गरुडनीने उसे ब्राह्मण जान स्त्रीसहित तत्काल गल दिया ॥ ततः स विप्रो निकान्तो निपादीसहितस्तदा ॥ ५॥ अ०२९ (तब वह ब्राह्मण निपादोसहित निकला) इससे प्रत्यक्ष होगया फि ब्राह्मण जाति जन्मसे है कमसे नहीं क्यों कि भील शके प्राह्मणका कर्म न करने से भी ब्राह्मणत्व लोप नहीं हुआ होगाता तो गरु- के फण्ठमें क्यों आग प्रचलित होती, और स्वामीनी तो तीनों वर्णका अडता. स वर्षकी अवस्थामें विवाह करना कहते हैं शूद्वका तो यज्ञोपवीत ही नहीं लि हवेद फैसे पड सक्ता है और शेष तीनो वर्ण अपनी जाति अनुसार विद्या इते ही रहेंगे उधर कन्या भी अपने कुलानुरूप विद्या पडती हँगी, तो जब ये उ चुरुंगी तो इस समयतक तो कुछ न्यूनापि हुआ ही नहीं वैश्य वैश्य, ब्राह्मण मग, क्षत्रिय क्षत्रिय बने हैं, जब व्याह की इच्छा होगी तो अपने ही जातिमें गा जब विवाह ही हो गया तो सारा झगडा ही मिटगया तो विवाहमें भी iमान जन्म व्यवस्था हुई ऊंच नीच जाती रही, यहां तो विवाह जन्म जातिसे मेटोतारामजी (१००) दयानन्दतिमिरभास्करः। नहीं होती यदि शुद्ध महामूर्खको कहते हैं जिसपर पढनेंस कुछ न आवे जा था तो शूद्रको पढनेका उपदेश देना वा उसको उच्च जाति बनाना स्वयं मूर इससे शुद मुखको कहते हैं यह कहना मिथ्या ही है । स० पृ० ८८ पं० २५ शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चेति शुद्रताम् । क्षत्रियाजातमेवं तु विद्यादेश्यात्तथैव च ॥ मनु० शुदकुलमें उत्पन्न होके ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यक समान गुणकर्म स्वभाववाल तो वह शूद ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य होनाय, और जो ब्राह्मणक्षत्रिय और कुलमें उत्पन्न हुआ हो और उसके गुण कर्म स्वभाव शूद्रके सदृश हों तो वह होजाय चारों वर्णमें जिस जिस वर्णके सदृश जो २ पुरुष वा स्त्री हो वह २ वर्णमें गिना जावै ॥८८।१५ स० पृ० ८९५०४ धर्मचर्यया जघन्यो वर्णः पूर्वपूर्व वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्तो ? अधर्मचर्यया पूर्वो वर्णाजघन्यंजघन्यं वर्णमापद्यते जातिपरिवृत्त यह आपस्तंबके सूत्र हैं धर्माचरणसे निकृष्ट वर्ण अपनेसे उत्तम २ वर्णको होता है और वह उसी वर्णमें गिनानावै जिस जिसके योग्य होवै १ वैसे अध चरणसे पूर्व अर्थात् उत्तम वर्णवाला पुरुप अपनेसे नाचे नीचे वर्णको प्राप्त है। है और वह उसमें गिना जावै ।। ८८ ॥ २३ पृ० ८९५० १५ इससे वर्णसंकरता प्राप्त न होगी पुनः पं० १६ (प्रभ )२ किसीका एक ही पुत्र वा पुत्री हो वह दूसरे वर्णमें प्रविष्ट होजाय तो उसके । वापकी सेवा कौन करेगा और वंशोच्छेदन भी हो जायगा इसकी क्या व्यवस होना चाहिये ( उत्तर न किसीकी सेवाका भंग न वंशच्छेदन होगा क्यों। उनको अपने लड़के लड़कियों के बदले स्ववर्णके योग्य दूसरे सन्तान विद्यास और रानको व्यवस्थासे मिलेंगे (७९ । ६) पुनः पृ० ९१ पं० २८ क्यों उत्तम वाँको भय होगा कि जो हमारे सन्तान मूर्खत्वादि दोपयुक्त होंगे तो शुः हो जायंगे, और नीच वर्गाका उत्तम वर्ग होने के लिये उत्साह बढेगा पृ० १ पं०७ शूदको सेवामा विकार इसकारण है कि, यह विद्यासे रहित मूर्स होनेसे विज्ञानसंबंधी काम कुछ भी नहीं करसता ॥ ९१ । २४ से ।। स०.पृ० ८६ पं० २७ येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः।
चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (१०१) तेन यायात्सता मागै तेन गच्छन्न रिष्यते ॥ मनु०४ । १७८ जिस मार्गसे इसके पिता पितामह वले हों उस मार्ग में संतान भी चलै परन्तु ( सताम् ) जो सत्पुरुष पिता पितामह हों उन्हींके मार्ग में चलैं और जो पिता 'पितामह दुष्ट हों तो उनके मार्ग में कभी न चले तथा पृ० ८७५० ८ जिसका पिता निर्धन हो क्या उसका पुत्र धनी हो तो धन फेंक दे, और जिसका पिता अन्धा हो तो क्या उसका पुत्र भी अपनी आंखें फोडलेवै जिसका पिता कुकर्मी हो तो उसका पुत्र भी कुकर्म ही करै? पं० १४ अथवा कोई कृश्चियन या मुस- श्मान होगया हो उसको भी ब्राह्मण क्यों नहीं मानते. (८६ । २५ से) समीक्षा-चप्स इतनी ही स्वामीजीफी दलील है कि शूद्र ब्राह्मण होजाता है (शूद्रो ब्राह्मणतामेति) इसका प्रसंग स्वामीजीने चालाकोसे बिगाडकर लिखा है इस प्रकरणका पहला शोफ यह है ।। शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातःश्रेयसा चेत्प्रजायते । अश्रेया यसी जातिगच्छत्यासप्तमाधुगात्।।अ०१०श्लो०६४ शूदामें ब्राह्मणसे पारशवाख्य वर्ण उत्पन्न होता है, जो स्त्री उत्पन्न हो और चह ब्राह्मणसे विवाही जाय और उससे कन्या हो वह ब्राह्मणको विवाही जाय तो वह पारशवाख्य वर्ण सातवें जन्ममें ब्राह्मणताको प्राप्त होता है, इसीप्रकार आह्मणीमें शुगसे बालक उत्पन्न हो और वह शूदासे विवाहा जाप उससे पुत्र हो पह भी शुदास विवाहा जाय तो सातवें जन्ममें वह पारशववर्ण शुद्धताको प्राप्त होता है ६४ इसीके आगेका यह श्लोक है कि ( शूद्रो ब्राह्मणतामेति ) इसी प्रका- रसे सातवें जन्ममें ब्राह्मणकुलमें शूद्रका विवाह होता रहै तो उसको प्राह्मणता और ब्राह्मणका शुदासे विवाह होता रहे तो वह सातवें जन्ममें : शूदताको भाप्त होजाता है यह पारशवाख्यके विषयमें ही जाना ६५ परन्तु यह भी विचारना योग्य है कि यहाँ (ता) प्रत्यय सदृश भाव अर्थमं है जैसे जो गुड बहुत खरा होता है तो उसको कहदेते हैं कि, पेडेकी जात मिठाई है अपचा खरबूजा मिश्रीसा है यह पुरुष यज्ञदत्तसा है कहिये इससे क्या सिद्ध हुआ यही सिद्ध है गुड पेड़ा नहीं किन्तु खरा अधिक है अपनी जातिमें वह खरा अधिक है किन्तु है गुड ही, इसी प्रकार और भी दृष्टान्त समझ लीनिये इससे शूदताका यह अर्थ है कि (शुद्धसा) परन्तु रहता अपनी जातिहीमें है इसी प्रकार वह शूद भी ब्राह्मणसा सातवें जन्ममें होजाता है किन्तु रहता अपनी जातिहा है स्वामीजी थोडेसे पढ- नहीसे शूद्रको ब्राह्मण बनाये हैं, भाष्यभूमिकामें आपने लिखा है कि कुचर्या, अधर्माचरण, निद्ध, मूर्खता, पराधीनता, परसेवादि दोष दूपित विद्या , ग्रहण (१०२). दयानन्दतिमिरभास्करः। धारणमें असमर्थ हो वही शुद्ध है यथा हि (पत्र शूदो नाध्यापनीयो न श्रावणी यश्वेत्युक्तं तत्रायमभिप्रायः॥शुदस्यप्रज्ञाविरहितत्वाद् विद्यापठनं धारणविचारामम- र्थत्वात्तस्याध्यापनं श्रावण व्यर्थमेवास्ति निष्फलत्वाञ्च) यह स्वामीजीकी संस्कृत है कि शुदमें प्रज्ञा (बुद्धि ) न होनेसे विद्यापठन धारण विचारमें असमर्थ होनसे पढाना सुन्ना निष्फल ही है। इस लेखसे स्पष्ट है कि, शूद उसको कहते हैं निसपर पढायेसे कुछ न आवै और उसका पढाना भी मिथ्या ही है फिर आप ही वेद पढनकी आज्ञा देते हो जैसा लिखा है कि (शुद्धायावदानि-शूद्रकोभी यह वेद पडाव ) तो भला. जो अध्ययनके योग्य ही नहीं वह फैस वेद पढे अब यह मंत्र (ययेमां वाचं) इसमें शूद्रपद कर्मानुसार है, या जन्मसे जाति मानी है यदि कर्मसे जाति मान्ते हो तो शूद कैसे वेद पढ सक्ताहै, जन्मसे जाति मान्ते ही नहीं अब आपके लेखमें कान. वात सत्य मानी जाये, जो शूदको पढाना माने तो जाति जन्मसे दुई जाती है जो कर्मसे मानें तो शुद्धका वेद पढ़ना बनता नहीं ( प्रज्ञाविरहितत्वात् ) क्यों कि जो पहनेके योग्य न हो उसको पढनेकी आज्ञा देनेवाला मूर्ख ही गिना जायगा और शूद्र महामूर्खको मान्ते हो तो (शूदो ब्राह्मण० ) और (अधर्मचर्यादि) मनु और . आपस्तबके वचनोंके आपहीके किये अर्थ मिथ्या हुए जाते हैं क्यों कि जब शूद्र, धारणा ही नहीं तो पढेगा फैसे, और उत्तम वर्णको विना पडे कैसे प्राप्त होगा, इससे शूद्रपद सदा जन्मसे है, आपके आपस्तम्ब सूत्रोंकी वात कहते हैं कि आपस्तम्बीय गृह्य और श्रीतसुत्र तथा यज्ञपरिभाषा इनमें तो यह सूत्रं हमको फहीं नहीं मिले जब यह सूत्र वहां है नहीं तब उत्तर देना निरर्थक है तथापि उत्तर देतेहैं, 'वह उसी २ वर्णमें गिना जावै जिस जिसके योग्य हो, यह इन सूत्रों के किनपदोंका अर्थ है, यदि (जातिपरिवृत्तौ) का अर्थ गोलमालसे किया हो सो भी नहीं होसक्ता क्यों कि, ( जातेजायमानस्य शरीरस्यां परिवर्तनजीति परिवृत्ति- स्तस्यां जातिपरिवृत्ती) जाति नाम उत्पन्न हुए शरीरका परिवर्तन हाने बदल जाने पर अर्थात् मरकर द्वितीय शरीर धारण करनेपर नीचवर्ण धर्माचरणद्वारा अपने २ से पूर्व २ वर्णको माप्त होनाताहै अर्थात् क्षत्रियादि जन्मान्तरमें हो जाताहै,जाति और जन्म दोनों शब्द एक ही जन धातुसे बनते हैं इसलिये एकार्थ हैं जैसे, गति गमनका एक अर्थ है वैसे ही परियत्ति और परिवर्तनका एक अर्थ है, अब टीन अर्थ होनेसे गुण कमसे वर्ण व्यवस्था पाला पावानीका अर्थ कट गया तपा सूत्रोंका अर्थ संक्षेपसे यह हुआ कि जाति शरीरका परिवर्तन होने पर धर्माचरण. द्वारा नीच वर्ण पूर्व २ ऊंचे वर्णस्य माता पिताके घरमें जन्म लेता है ऐसे ही. उच्च वर्ण नीच फर्मसे दूसरे जन्ममें नौच हो जाते हैं । , सडनम् यथा हि रमणीयाचरणा अभ्याशोह यत्ते रमणीयां योनि मापोरन् ब्राह्मगयाोनवा क्षत्रिययोनि वा वैश्ययोनि वाथ यइह कपूयाचरणा अभ्याशोह यत्ते कपूयां योनिमापोरन् श्वयानि वा सूकरयोनि वा चाण्डालयोनि वा छान्दो० वा. उप० प्र०९खण्ड १० अर्थात् अच्छे आचरणवाले ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यकी योनि ( शरीर ) पाते हैं कृष्ट गावरणवाले कुते सूकर और चाण्डालयोनिको प्राप्त होते हैं कहिये अब शंका मिटी या नहीं और सुनो। मोपदेशं देषण विप्राणामस्य कुर्वतः । समासेचयेत्तैलं वके श्रोत्रे च पार्थिवः ॥ मनु० अ०८ श्लो०२७२ जो शून अहंकारसे ब्राह्मणको धर्मोपदेश करै तौ राजा उसके कानमें और में तप्त तेल डलवादे ( शुद्धको वेदविद्या छोडकर और ग्रंथों में अधिकार है ) कि शूर ब्राह्मणको घमंड करके उपदेश देनेमं दंडनीय है तो इसमे शुद्ध वंद नेका अधिकारी नहीं इससे चारों वर्ण जन्मसे ही होते हैं, फर्ममें नहीं और है फर्मसे नाति होती तो चार वर्ण ही होते पारशदिसंकर जाति न होती नका वर्णन मनुनीने १० अन्यायमें किया है समझनेको यही बात बहुत है ॥ 'आचारास्तूत्कापकप विधायका एव चित्रस्थानीया भित्तावितिसिद्धान्तः" अन एव शतपथे मवै न सर्वेण संव- देत देवावा एप उपावर्त्तते यो दीक्षतेसदेवानामेकोभवति नवेदेवाः सर्वेणेवसंवदन्ते त्रामणेनवे राजन्यनवा वेश्येनवा नदियज्ञियास्तस्माद्यज्ञेन शूदेणसंपादो विन्देदेतेपामेवेकंव- यादिमम् ॥ सका यह आशय है वह यज्ञ फर्ता सबसे संवाद न फरे जो दीक्षित होकर करताहै वह देवतेंके काममें होताहै देवता सरस संवाद नहीं करते क्षत्रिय धेश्यसे ही करते हैं कारण कि ब्राह्मण क्षत्रिय पैन्य ही यज्ञके अधि- हैं शूद संस्काररहित होनेसे अधिकारी नहीं है शुद्धमे संवाद न करे इन्हीं एकसे वाले यदी कहो कि, गर्भाधानसे लेकर दर माता पिता इसका संस्कार (१०४) दयानन्दतिमिरभास्करः। - करलें तो यह उत्तर है कि जब अपना ही संस्कार नहीं है तो यह दूसेरका संस्कार फैसे कर सक्ते हैं जब सृष्टिके समयसे ही शूद्र संस्काररहित हैं तो इस मन्वन्तरके २८ वें कलियुगमें उसका संस्कार संभव नहीं है और यह आचार तो निग जातिमें उत्कर्पता (उच्चपन) अपकर्पता (नीचपन ) का विधायक है यह नहीं कि जाति बदलदे जैसे दिवाल तस्वीरों सहित दिवाल ही रहती है परन्तु यह अच्छी कही जाती है । त्रयाणांस्थादग्न्याधेय संबन्धः ऋतुपुत्राह्मणश्रुतिरित्यात्रेयः । पज्ञकर्ममें तीन ही वर्णोंका अधिकार श्रुतिमें देखनेमें आता है यह आयेया मत है ब्राह्मणादि तीन ही वर्णोका अधिकार यज्ञादि प्रकरणमें वर्णन किया है,पया। बाईद्विरंब्राह्मणस्यब्रह्मसामकुर्यात पाथुरस्यंगजन्यस्य रायो वाजीयं वैश्यस्य शुद्रस्य तु सामन आमनन्ति" यह सामवेदके स्थल हैं जो दिनांके अर्थ हैं शूद्राके लिये सामका कोई अधिकार नहीं है इस प्रकार शूदका अधिकार नहीं है (संस्कारे च तत्प्रधानत्यान) मीमांसायाम, बताव्यसंस्कार शूदके सुनने में नहीं आता इस कारण शुद्ध किसी भवस्था में वेद पडनेका अधिकारी नहीं होता संस्कार पुरुषों में प्रधान है (येदे निर्देशात् ) वेदमें तीन ही योका निर्देश है (यसन्ते प्राह्मणादि ) सो फह आये हैं और ॥ पाद वा एतत् श्मशानं यच्छूद्रस्तस्माच्छूद्धनाध्यतव्यमतित्तिरीय शुद्ध एक जंगम श्मशान सदृश है इस फारण शूदफे निकट घेदको उधारण नहीं फरना नव फि, शूदफे सामने उच्चारण भी मना है तो पटाना फैसा, पाणिनितीके मतमें भी गन्मम ही नाति मानी है और शुद्धको अनधिकारता प्रगट , पपा ॥ शूद्राणामनिवमितानाम् २।४।१० प्रत्यभिवादेऽशूद्र ८।२। ८३ शूद्रा चामहत्पू जातिः (यात्तिकम् )३ इमार पतञ्जलि मदागन भायम गगन परत है कि (भाया) ॥ पईने पायं ममारेल गुम्पति त निम्यमिताः पिन, पायं गंगागारिन मुस्पति ते निरयमिनाः (अदिताः) इति व्यायाया। বিনয় মাসৰ বি বখা বাথ সন্নি সামিয়ানা তা আনার পর गुदाको अनियमित करने और निना मानन किया पात्र मागद नहीं पता पर निरवामिन र अयांत त्याम्प दृष्ट पटाने नंगे माना पार भीर .
. चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (१०५) छुपाचे कंजरादि १ शूद्रको छोडकै प्रत्यभिवाद (प्रणामका उत्तर ) जो है उसके टीको प्लुत होजाय और वह उदाच हो २ इससे मूर्खका नाम शूद नहीं है, 'किन्तु जातिसे शूदपना है, क्यों कि वार्तिककार लिखते हैं कि (अमहत्पूर्वाजातिः) इसमें जाति ग्रहणसे जाना जाता है कि, मूर्ख नाम शूद्रका नहीं है किन्तु जन्ममे पूर्वजोंसे जाति है पुनः पाणिनिके इस सूत्रपर भाष्यकार लिखते हैं । तेन तुल्यं किया चेद्धतिः५।१।११५ सर्व एते शब्द्रा गुणसमुदायेपु वर्तन्ते ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्ध इति अतश्च गुणसमुदाये एवं ह्याह ॥ तपः श्रुतं च योनिश्च एतद्राह्मणकारकम् । तप:श्रुताभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव सः ॥१॥. तथा गौरःशुच्याचारः,पिंगलः कपिलकेश इति ।। सब यह शब्द गुण समुदायोंमें वर्तते हैं ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्ध इति, तप करना वेद पटना श्रेष्ठ कुल यह प्राह्मणका (कारकम् ) लक्षण है जो ब्राह्मण इन करके होन है केवल ( योनिः ) ब्राह्मण कुलमें जन्म मात्र है वह जातिसे ब्राह्मण है, लक्षण उसमें नहीं है, क्योंकि गौर. वर्ण पवित्रावरण पिंगल (कपिल ) केश यह भी ब्राह्मणके लक्षण हैं, यदि यह न हों और वह ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न है तो यह जातिसे ब्राह्मण है यह भाष्यकार मानतेहे "जातिहीने सन्देहाद गुरूपदेशाच्च ब्राह्मणशब्दो वर्तते" और जातिहीन गुणहीनमेंभी संदेहसे ब्राह्मण शब्द वर्तता है गुणहीने यथा-"अब्राह्मणोयं यस्तिष्ठन्मूत्रयति" यह अब्राह्मण है जो खड़ा होकर भूत रहाहै सन्देहमें ऐसे कि गारैवर्ण पवित्राचार पिंगल (कपिल) केश पुरुष देख कर वोध होता है कि, यह क्या ब्राह्मण है पीछे जाननेसे यदिवह जातिसे ब्राह्मण हो तो अब्राह्मणोयमिति ऐसा कहाजाता है यदि भाष्यकारको जातिसे शूद्रका मानना इष्ट न होता तो शुचि आचारादि युक्त पुरुषको यह ब्राह्मण है या नहीं ऐसा क्यों लिखते और सन्देह करते और फिर क्षत्रिय वैश्यादिक भी कोई न होते सब विधायुक्त तो ब्राह्मण होते और मूर्ख शूद्र कहलाते हैं अपनी उन्नति सवही चाहते हैं वस सब ही ब्राह्मण बन बैठते यदि स्वामीजीफी बात मानी जाय तो संपूर्ण वर्णसंकरता फैलगाय॥ निपेकादिश्मशानान्तो मन्यस्योदितो विधिः। तस्य शास्त्रे- धिकारोस्मिज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित् ॥ अ०२ श्लो० १६ निकादि जन्म संस्कारसे भरणपर्यन्त जिसका मंत्रोंसे संस्कार करना कहा .
(१०६) दयानन्दतिमिरभास्करः। गया है उसी कुलके संस्कृत पुरुपका इस यज्ञमें अधिकार है अन्यका नहीं शुद्धका किस प्रकार संस्कार होसक्ता है, जब उसको अधिकार ही नहीं है। पुनः गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे ३३ ब्राह्मणम् ॥ सान्तपनाइदंहविरित्यप हवै सान्तपनोऽग्निर्यद्वाह्मणो यस्य गर्भाधानपुंसवनसीमन्तोन्नयनजातकर्मनामकरणनिष्क्रम- णानप्राशनगोदानचूडाकरणोपनयनाप्लवनाग्निहोत्रवतचर्या- दीनिकृतानिभवन्तिमसान्तपनोऽथ योयमनग्निकासकुम्भे- लोप्टः (तद्यथा) कुम्भे लोष्टः प्रक्षिप्तो नैवशौचायकल्पते नेशस्यनिवर्तयति एवमेवायब्राह्मणोऽनग्निकत्तस्यनालण- स्यानमित्य नैवदेवं दद्यान पित्र्यं न चात्य स्वाध्यायात शिपोनयज्ञआशिपः स्वर्गङ्गमाभवन्ति ।। अर्थ-निस ब्राह्मणके जन्मसे गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोनयन, जातफर्म नामकरण, निष्क्रमण (बाहर निकलना ) अन्नमाशन, गोदान, चूडाकरण, उप पोत, अमिहोत्र, प्रतचर्यादि संस्कार हुए हैं वह ब्राह्मण जाति और गुण फर्मसे यथार्थ है उसीको सान्तपन कहते हैं जिस ब्राह्मणके यह संस्कार नहीं हुए यह ऐसा है जैसे घडेमें मट्टीका डेला, क्योंकि वह फंसा हुआ डेला पवित्रता नहीं करता न कुछ शस्य (खेती ) का कार्य बनाताह इसी प्रकारसे अमिरहित और संस्कार रहित ब्राह्मण है ऐसे ब्राह्मणको देवता और पितृसंबंधमें कुछ भीन देनान पैद आशिप न यज्ञ आशिप इसकी स्वर्ग लेनानराली होती हैं ।। ४ यदि मूर्त ही नाम शुटका होता तो यहाँ संस्काररहित मामणको कुछ न देना यह क्यों कहा क्योंकि यह तो शूद होगाता, इगसे यह प्रत्यक्ष है कि संस्कार रहित भी ब्राह्मण जातिमात्र रहता है शुद नहीं होनाता और यह भी इससे विदित है कि, शुद्ध किसी प्रकार से प्राह्मण नहीं होसत्ता क्यों कि जब इसके सन्ममे संसार ही नहीं तो यह ब्राह्मण फैसे हो सक्ता है, और यदि शुद्ध अन्छे फर्मम आयन होनाता और कर्मानुसार वर्गव्यवस्था होती तो रामचंद्र महारान तपस्या करते हुए शरदको क्यों मारते, तथा शुदर तप करने कारण यह ग्राम पुत्र क्यों मरता, निमको श्रीमहारान रामचंदने टस गदको मारकर नियाया। ४ मा के कत्तां वरदरा में बहुत प्यार हो गये हैं यही न बना।
. चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (१०७) शुद्रयोन्यां प्रजातोस्मि तप उग्रं समास्थितः । देवत्वं प्रार्थये राम सशरीरो महायशाः ॥२॥ निष्कृष्य कोशाद्विमलं शिरश्चिच्छेद राघवः ॥ ४॥ वाल्मी० उत्तर सर्ग७६ हे महाराज ! मैं शूद्वयोनिमें स्पन्न हुआ उग्रतप फरनेमें लगाहूं मैं शरीरसहित ही देवत्वको प्रार्थना करताहूं यह सुन रामचंदने उसका शिर काट डाला। शूद्रको तप करनेका अधिकार ही नहीं है, यह वाल्मीकिके उत्तर काण्डमें लेख है इससे शुद्ध ब्राह्मण नहीं होसत्ता तथा विदुरजीने शुद्ध होनेके कारण धृतराष्ट्रस ब्रह्मज्ञान न कहा देखो प्रजागर ॥ और यह तो एक बड़ी बुद्धिमानीकी बात लिखी कि ( जिनके बालक उच्च वा नीच वर्णमें चले जाय उनको विद्यासभा और रागनियमसे उनके घणानुसार और लड़के लडफी मिलेंगे ) धन्य है खूब सबका वर्णसंकर किया और (अङ्गा- दङ्गारसंभवसि ) इस मंत्रको भूल गये, जब कि पुत्र पिताके अंग अंगसे उत्पन्न होता है और इसी कारण पिताके जल देनेका अधिकारी होता है, उसको तो आप दूसरेका पुत्र बनादो और जो कुम्हारका लडका पढा हो तो ब्राह्मणके यहाँ उसे राजनियमसे दिलवाते हो (इस विद्यासभा और राननियमकी कोई श्रुति भी लिखदी होती) यह कौनसे शास्त्रकी व्यवस्था है दायभागमें इसको किस प्रकार हिस्सा होना चाहिये, ऋपि बनने चल और अपने लिखका भी खबर न हुई कोई गरीय चाण्डालका पुत्र विद्या पठा हो और सेठ धनीका पुत्र विद्यावान न हो तो धनवान तो चाण्डालके यहां भेजे गये, और चाण्डाल धनीके आ पडे, जिसके अनुसार न मिला वह तडफते ही रहे, वह अंग अंगसे उत्पनि वह स्वाभाविक कर्म सब सत्यार्थप्रकाशमें प्रवेश कर गये ( इस समय पूर्व पश्चिम देशीय अधिक विद्यावान् हैं आपके अनुयायी अपने कम पढे मूर्ख पुत्रोंको निकालकर अपना मालमत्ता उन्हें सौंपदे वडी कीर्ति यश बढेगा) धनीके पुत्र भेंडें वरावें, चरवाहे ब्राह्मणादि कहलावे, कैसा अनर्थ है कोई नया धर्मशास्त्र दयानन्दजी बनाते तो कभी जंगलियों में यह रीति चलनाती तो चलनाती यदि फहो कि, हम जलदान मानतेही नहीं तो आगे नियोगविषयमें और पुत्रों की पुष संज्ञा नहीं है इस प्रकरणको वहीं लिखेंगे और निरुतसे सिद्ध करेंगे पर यह दाय- भागकी व्यवस्था आप कैसे बदल सक्ते हैं इसका तो घृत्तान्त सुनिये ।। " (१०८) दयानन्दतिमिरभास्करः। ज्येष्ठ एव तु गृहीयात्पिश्यं धनमशेषतः । शेपास्तमुपजीवेयुर्यथैव पितरं तथा ॥ १०॥१०९ ज्येप्टेन जातमात्रेण पुत्री भवति मानवः । पितॄणामनृणश्चैव स नस्मात्सर्वमर्हति॥१०६॥ पिताक सम्पूर्ण धनको ज्येष्ठ ही ग्रहण करे और शेप छोटे भाई जैसे पिताके सामने खाते पहरते खर्च करते थे उसी प्रकार रहे १०५ ज्येष्ठके उत्पन्न मात्रम पिता पुत्रवाला कहलाता है और पितृऋणसे छूट जाता है इसकारण ज्येष्ठपुत्र सब धन लेनके योग्य होता है और भाइयोंका भाग इससे न्यून है जब इस प्रकारकी शास्त्रकी मर्यादा है दयानन्दजी उमका नाश ही किये डालते हैं, बडे बडे पर जो धनवान हैं उन्हें कंगाल बनाना चाहते हैं कमाई करें वैश्य, भोगें चमार, इत्यादि कहांतक कहें यह सत्यार्थप्रकाश असंभव वातोंसे पूर्ण है आगे लिखा है कि (उत्तम वाँको नीचे गिरनेका भय होगा ) यह भी लिखना निर्मूल है नांचे गिरना क्या वैसे ही बहुतेरा भय है जब कि विद्धान् ब्राह्मणोंका ही आदर भेंट दान पूजा यज्ञादिमें वरण दक्षिणादिका विधान किया है और मूर्स ब्राह्मणोंको दानादि देनेका निपध किया है तो उनके लिये स्वयं ही भय है, तिरस्कार तो मरणसे भी अधिक है अव तिरस्कार भी कौन करै दूसरेको तो वह बुरा कहसक्ता है जब आप अच्छा हो, जब यजमान विद्यावान् होगा तो पुरोहित उपाध्याय भी भय मान शीघ्रतासे विद्या सीखेंगे और जब दोनों ही एकसे हैं तो तिरस्कार फैसा; हाँ सब वर्णीको उचित है कि उनके यहाँके जितने पुरोहित हैं सबसे कह दिया जाय फि यदि तुम नहीं पढोगे तो तुम्हें हम विभाग नहीं देंगे और जो कुछ उनके निमित्तका हो वह उनके नामसे किसी मान्य पुरुपके यहां स्थापनकर दिया जाय अथवा पुरोहितोंके बालकोंको विद्याध्ययन करानेमें यह व्यय कियाजाय तो देखिये लाखों क्या करोडों ही विधायुक्त दीखने लगें सब कार्य इसी वन जायेंगे उन्हें यही भय बहुत है कि, हम मूर्ख रहेंगे तो हमें कोई छदाम न देगा, और सर्वत्र निरादर होगा यह नहीं कि, वह शूद होजाय, और स्वाध्यायेन इस श्लोकका जो अर्थस्वामीजीने किया कि, वेद पढने जप करने व्रत करने होम करने पुत्रोत्पादन पंच महायज्ञ करनेसे यह ब्राह्मणका शरीर बनता है, यह भी मिथ्या ही है यद्यपि हम इसका अर्थ पूर्व कर चुके हैं और इस अर्थका खण्डन भी कर चुके हैं, परन्तु इतना यहां औरभी कहना है कि जिन कर्मोंसे आप ब्राह्मणोंका शरीर घनना मानते हैं उतने कर्मोके करनेकी मनुनीने तीनों वर्गोंको आज्ञा दी है, फिर तो इन फाँफे करनेवाले सभी ब्राह्मण हो जाने चाहिये, शेप शूद, वस दो ही .
. चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । वर्ण रहें ब्राह्मण और शूद, इस कारण इसका यही अर्थ ठीक है कि इन कमाके करनेसे यह शरीर मुक्ति प्राप्तिके योग्य वा ब्रह्मविद्या प्राप्तिके योग्य होता है फिर स्वामीजीने लिखा है कि (जिसका पिता निर्धन हो क्या उसका पुत्र धन फेंकदे) यह बात आपकी इस स्थानमें प्रसंगसे विरुद्ध है भला वर्णव्यवस्थासे और इस घातसे क्या सम्बन्ध इसी प्रकार नेवहीन होनाभी कर्मानुसार है जो आप लिखते हैं कि (पिता अन्धा हो तो क्या आप भी आंख फोड डालै) यह बातें आपने इस श्लोककी भूमिकामें लिखी हैं कि ॥ येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः। तेन यायात्सतां मागं तेन गच्छन्न रिष्यते ॥ मनु०४ । १७८ अर्थात् तात्पर्य स्वामीज़ीका यह है कि, यदि वृद्ध अपने कुलवालोंका दुष्टाच- रण हो तो उनके आवरण ग्रहण न करें किन्तु जो सत्पुरुषोंका मार्ग है उसमें चलें, जो काम वे करें सो आप करें तो औरोंका तो आपने दुष्टाचरण बताया, अपने बडोंको निर्धन और नेत्रविकारी ठहरानेसे पूर्व धर्म और धर्मवालोंपर आक्षेप किया है, अर्थात् इस समय आपके आचरणोपर आपके अनुयायियोंको चलना चाहिये कि, सब पर छोड चलदे संन्यासी हो जायें संस्कृत ही पड़ें सो कोई भी नहीं हुए इस प्रकारसे इसका अर्थ होना नहीं बनता इस श्लोकका यह आशय है कि, जिस मार्गमें अर्थात् जिस मतमें पिता और दादा सदासे चले आते हैं वही श्रेष्ठमत अर्थात् सत्पुरुषोंका अनुष्ठान किया हुआहै क्योंकि वे वेदके जाननेवालेथे इसी कारण संध्या अमिहोन श्राद्ध मूर्तिपूजनादि सिद्धान्तोंको निर्धान्त करतेथे, यह नहीं कि पिता तो सनातन धर्म प्रतिपालन करै बेटे मूर्ति पूजन श्रादखंडन करते फिरें, पिता पतिव्रताधर्म प्रचार करें वेटे स्त्रीको एकादश पति फरावें, पिता विधवाको व्रतकरावे, चेटे नियोग करके चारपुत्र ग्यारह पुत्र फरा३, इत्यादि इन आधुनिक मतोंका ही निषेध करते हुए मनुनी कहते हैं कि, पाप दादा जिस मार्गमें चले हों उसी मार्गमें आप चले फर्म और वस्तु है, मत और वस्तु है, इससे यहां मतका ग्रहण है फिर आप लिखते हैं कि (यदि कोई मुसलमान या ईसाई हो जाय तो उसे भी ब्राह्मण क्यों नहीं मानते ) महात्माजी अब क्या आनकलकी नवीन सभ्यमंडली ईसाइयोंके आचरणोंसे कम है, क्या वेदमें कोट पतलून बूट होटल भुरट नेबमें पडी हायमें उडी सोडावाटर रम मिटिंगका भी वर्णनहै पह सब ही कुछ देखनमें आताहै, फिर चुटियातकः नदारद, संस्कृतका एक अक्षर नहीं जानते, वेदका आशय फंठंगत है, अब अपने प्रमका उत्तर मनिये.कि जो कोई ईसाई या मुसलमान होगये और टनके संग भोजन ..
(११०) दयानन्दतिमिरभास्करः। करलिया तो वहभ्रष्टहोने और ईसाको माननेसे ईसाई,महम्मदको माननेसे मुसल्मान कहलाने लगे, परन्तु यह बात सदैव जीमें बनी रहेगी कि मैं जातिका ब्राह्मण क्षत्रिय वा वैश्य हूं, जैसे कि संन्यासी होनेपर भी शिष्यगण आपका ब्राह्मण कहकर पुकारते हैं, परन्तु बुद्धिमानोंको तो आप ब्राह्मण प्रतीत नहीं होते क्यों कि जहां देखो वहां ब्राह्मणसे शूद्र और शूद्धसे ब्राह्मण यही दो बातें देखनेमें आती हैं और शूद्रकी अधिक रिआयत जहाँ तहाँ की है, इससे सन्देह होताहै, ईसाई मुसल्मान होने की व्यवस्था सुनिये कि जो कोई ईसाई या मुसल्मान हो जाताहै वह उन पुरुषोंके संग भोजन पानादि करनेसे सननगोष्ठी वहिप्कृत हो जाताहै उसको हम ब्राह्मणादि वर्ण इसकारण नहीं कहते कि, यह ईसा शब्द कोई जातिवावक नहीं है किन्तु जैसे कवीरके माननेहारे कबीरपंथी दादूके दादूपंथी नानक नानकपंथी तुम्हारे मतके दयानंदी कहलाते हैं तो उनको कोई ब्राह्मणादि नहीं उच्चारण करते चाहे किसी वर्णके हो परन्तु जब अपनी बिरादरीमें आते हैं इनके साथ भोजन खानपानादि करतेहैं और आनन्द करते हैं और जब मुसल्मा- नादि कृश्चीनोंके साथ भोजन करलेते हैं तब विरादरीवाले उनके साथमें भोजन पान व्यवहार विवाहादि छोड़ देते हैं, परन्तु उसकी ब्राह्मण जाति तो भी नहीं जाती जब कोई उसकी सूरत देखते हैं तुरत कहते हैं कि, यह वही ब्राह्मण क्षत्रिय या फैश्य है अब इसाई हो गयौह, यह मतसे नामसंज्ञा सब जातिमें आरूड हो जाती है, परन्तु यह जाति तो जबतक पंचत्वको प्राप्त न हो तबतक उसके सायसे नहीं छुटती, उसको भी यह सदा ध्यान रहताहै कि मैं अमुक जातिका है.' अब ईसाई या मुसल्मान हो. रहाई परन्तु वेटोतको भी यह पीछे रहती है कि, यह उनके बेटे हैं जो क्षत्रियसे या वैश्यसे ईसाई होगपाया इनका पिता अमुक वर्ण था इस कारण यही सिद्ध होता है कि, शूद्र ब्राह्मण नहीं, ब्राह्मण शुद नहीं होसत्ता इस सारी वर्णव्यवस्थाका प्रयोजन यह है कि (ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ) ब्राह्मग क्षत्रियादि उसके मुख भुना जंया चरण हैं तो निस प्रकारसे मुख चरण. कभी नहीं हो सके चरण मुख नहीं होसत्ता इसी प्रकार शूद्र ब्राह्मण और माझण शृद्ध नहीं हो सका वैश्य इस शरीरसे क्षत्रिय नहीं हो सत्ता यहाँ इस श्रुतिका अभिशाप है इसमें और भी जो कोई जाति कर्मस ही मानते हैं टनका भी संडन इससे होगया। निन्दास्नुतिमकरणम् । म० पृ०१७ पं० २३ कमी किमीशी निन्दा न फर (गुणेषु दोषारोपगम- स्पा) अर्याद ( दोषेप गुणारोपणमप्पसूया)(गुणेषगुणारोपगं दीपप दोषारोपण पस्तुतिः) जो गुणोंमें दोष दोपोंमें गुण लगाना यह निन्दा प्रा: गुगाम गुण चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (१११) दोपाम दोपका कथन करना स्तुति कहाता है अर्थात् मिथ्या भाषणका नाम निन्दा और सत्यभापणका नाम स्तुति है ।। ९८ । १२) समीक्षा- यह फैसी विचित्र लोला है कि पहले तो लिखते हैं कि, गुणों में दोप लगाना निन्दा कहाती है और फिर अर्थात् लिखकर उसका मतलब लिखते हैं कि दोपोंमें गुणका लगाना भी निन्दा है गुणोंमें गुण दोण में दो लगानेका नाम स्तुति है यह निन्दा स्तुतिका लक्षण अर्थात् लगाकर जो किया है सो निरर्थक है यदि सत्य वा मिथ्याका विषय होता तो किंचित् संघटित भी होता आप सत्यदोपोंका कथन स्तुति कहते हो सो स्तुति सत्यदीपयुक्त कथन करनी कहीं नहीं लिखी जब कि मनुनी यों लिखते हैं कि- सत्यं यात्प्रियं ध्यान यात्सत्यमप्रियम् । प्रियं च नानृत व्यादेप धर्मः सनातनः ॥ मनु०अ०४११३८ मनुष्पको चाहिये कि सदा सत्य बोले और वह ऐसा सत्य हो कि, दूसरेके मिय लगै और ऐसा सत्य न गेले जो दूसरेको बुरा लगे और वह मिय यात झूठ भी न हो यही सनातन धर्म है.जय कि अप्रिय सत्य घोलना भी बुरा है, और दोप सबको ही अपना सुरा लगता है आप उसीको स्तुति कहते हैं सो अशुद्ध है "अर्थवादो हि स्तुतिः" फेवल सत्पपशका वर्णन करना ही स्तुति कहाती है यह नहीं कि, सत्य दाप भी स्तुति कहा यह भी नहीं कि, मूर्स हो और उससे कहा जाप कि तू पडा मूर्ख है निरक्षरभट्टाचार्य है फानेसे काना फहना पा इसीसे यह मसन होगा कभी नहीं वह तो घडा बुरा मानगा इससे स्तुति नाम टसोका है निसमें फेवल गुणोंका वर्णन हो और वह सुननेवाला मसन्न हो जाय जैसा कि स्तोत्रों में देखा जाताहै और किसीके दोपोंका कहना धुराई या निन्दा है क्यों कि उससे बुरा फल मिलता है मनुनी यह कहते हैं। गुगर्यत्र परीवादा निन्दा वापि प्रवर्तते । कोतवपिधातव्योगन्तव्यवाततोन्यतः मनु० अ०२श्लो२०० जहाँ गुरुका परीवाद(विद्यमानदापाभिधानं परीवादः) जो दाप हो उसका. फयन फरना परीवाद फहाता है ( अविघामानदोणभिधानं निन्दा )जो दोष नहीं हैं उनका कपन करना निन्दा फहाती है यदि इन दोनों पाताओंको कोई करता हो तो शिष्य कानॉपर हायपरके चलानाय इसमें सत्यदोष कपन फरनेका नाम परीवाद लिखा है आप टसे स्तुति बताते हैं इस परीवादरूपी स्तुतिका दयानंदनी फल ती सुने।
दयानन्दतिमिरभाकरः। परीवादात्खरो भवति वा वे भवति निन्दकः ॥ परिभोक्ता कृमिर्भवति कीटो भवति मत्सरी ॥ २०१ ॥ झंठा दोष कहनसे (सुननेस) गदहा होता है निन्दासे कुत्ता होता है दूसरे जन्ममें गुरु अनुचित दम्पका भोक्ता शिष्य कृमि होता है, गुमसे मसर करन-- हारा फीट होता है जिसको आप सत्य दोष कथन करनेसे स्तुति नाम पुकारते' हैं उस स्तुति लक्षण स्तुति करनवाल मनुनाक वचनानुसार दूसर जन्ममें गर्दभराग होंग इसी कारणमें मनुष्यको उचित है कि, अप्रिय सत्य. कभी न बॉल, यह दयानंदनीने अपने अनुयायियोंकी गति सराव करनेको एसा लिख दिया है न जाने इससे क्या लाभ है तुम्हारी जी दशा दुई हांगी सो हुई होगी परन्तु अब चेलोंक हेतु वहाँस कोई चिट्ठी भेन देनी चाहिये थी कि यह निन्दा स्तुति लक्षण छापनेवालोंकी भृलंस लिखा गया है तुम इसे सत्य न मानना और सबरदार कभी किसीका सत्य दोष भी न कहना गुणोंका कथन स्तुति अवगुणोंका कयन निन्दा जानना। अब इसके आगे देवता और श्रादप्रकरण लिखा जायगा. अथ देवतापितृश्राद्धप्रकरणम् । स० पृ० ९८६०९ ऋपियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा । नृयज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत्॥१॥अ०४श्लो० २१ अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् । । होमोदेवोबलिभाँतोनृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥२॥अ०४श्लो०७० स्वाध्यायेनार्चयेतीन्होंमेदेवान्यथाविधि । पितृन् श्राद्धेश्चन्नन्नैर्भूतानिवालिकर्मणा॥३॥मनु अ०३श्लो०८१ पंक्ति १५ में इस प्रकार लिखते हैं,अर्थ-दो यज्ञ ब्रह्मचर्यमें लिख आपे हैं अर्थात् एफ वेदादि शास्त्रका पढना पढाना संध्योपासन योगाभ्यास दूसरा देवयज्ञ विद्वानोंका संग सेवा पवित्रता दिव्य गुणोंका धारण दातृत्व विद्याकी उन्नति यह दोनों यज्ञ सायं प्रातः करने होते हैं । ९८ ॥२५. पृ० ९९ पं० १६ तीसरा पितृयज्ञ अर्थात् जिसमें देवयज्ञ जो विद्वान् ऋषि जो पढने पढानेहारे पितर माता पिता आदि युद्ध ज्ञानी और परम योगियोंकी सेवा करनी॥१००९ समीक्षा-अब यहाँसे स्वामीजी पोप लीला चलाते हैं यहां पितर देवता ऋपि सब एक ही प्रकार और एक ही अर्थमें घटाते हैं इन श्लोकोंमें यह सब पृथक पृथक् हैं इसलिये देव ऋपि पितरोंको एक ही कहना युक्त नहीं है क्यों कि, ऋपियज्ञ देवयज्ञ, भूतयज्ञ, नृयज्ञ, पितृयज्ञ इनको यथाशक्ति न जाने दे, पढना पढाना ब्रह्मयज्ञ, तर्पण श्राद्ध पितृयज्ञ होमादिक देवयज्ञ और भूतबलि भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ अतिथिभोजनादिक यह पांच हैं, वेदाध्ययनसे ऋषियोंका पूजन करे, होमसे देवताओंका श्राद्धसे पितरोंका अन्नसे मनुष्योंका और भूतोंको बलि कर्म कर पूजन करें। कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्यनोदकेन वा । पयोमूलफलेवापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन् । मनु० अ०३ श्लो०८२ एकमप्याशयेद्विप्रं पित्रर्थे पाश्चयज्ञिके । पितरोंसे प्रीति चाहनेवाला तिल यव इन करके और पय मूल फल जल इनसे श्राद्ध कर पितरके अर्थ एक ब्राह्मण भोजन करावै जब कि वेदाध्ययनसे ऋपि, होमसे देवता, आद्धसे पितर, अन्नसे मनुष्योंका पूजन करै, यदि यह सब एक ही होते तो पृथक् पृथक् वस्तुओंसे पृथक् प्रसन्न होनेवाले कैसे होते, यदि देवता विद्वानोंको ही कहते हैं तो क्या वह हवनसे प्रसन्न होते हैं, तो उनकी प्रसन्नताके वास्ते हवन करदेना चाहिये यदि विद्वान् भूखे आवे तो थोडासा होम कर देना घे झट प्रसन्न होजायँगे, इससे विद्वान तृप्त झेते देखे नहीं जाते, इस कारण विद्रा- नोंका ही देवता नाम और कोई पृथक देव जाति नहीं है यह कहना स्वामीजीका झूठ है, वेदोंमें देवजाति पृथक् लिखी है यथाहि ॥ अगिर्दैवता वातौदेवतासूर्योदेवता चन्द्रमादेवता वसवोदे- वता रुद्रोदेवताऽऽदित्यादेवामरुतोदेवताविश्वेदेवादेवता बृहस्पतिर्देवतेन्द्रौदेवतावरुणोदेवता ॥१॥२०अ०-१४-२० यह अर्थ प्रत्यक्ष ही है इसमें देवताओंके अमि वायु सूर्य चन्दमा आदि पृथक पृथक् नाम लिखे हैं इससे देवता मनुष्योंसे पृथक् ही हैं और भी। यो देवा एकादशत्रयस्त्रिशाः सुराधसः बृहस्पर्तिपुरोहि ता देवस्य॑सवितुः सर्वे देवा देवैरैवन्तुमा ११ म० अ०२० श्रष्ठ धनवाले ब्रह्मको ही आगे किये तीनों देवता ग्यारह रुद तेंतीस देवता नारा- यणफी आशामें वर्तमान होते सत्य आदिके साथ मेरी रक्षा करो अथवा तीन .. ८
दयानन्दतिमिरभास्करः।
परीवादात्खरो भवति श्वा वे भवति निन्दकः ॥
परिभोक्ता कृमिर्भवति कीटो भवति मत्सरी ॥ २०१ ॥
झूठा दोष कहनेसे (सुननेसे) गदहा होता है निन्दासे कुत्ता होता है दूसरे
जन्ममें गुरुके अनुचित द्रव्यका भोक्ता शिप्य कृमि होता है, गुरुसे मत्सर करने
हारा कीट होता है जिसको आप सत्य दोष कथन करनसे स्तुति नामसे पुकारते'
हैं उस स्तुति लक्षण स्तुति करनेवाले मनुजीके वचनानुसार दूसरे जन्ममें गर्दभरान
होंग इसी कारणसे मनुष्यको उचित है कि, अप्रिय सत्य. कभी न बोल, यह
दयानंदजीने अपने अनुयायियोंकी गति खराब करनेको ऐसा लिख दिया है न
जाने इससे क्या लाभ है तुम्हारी जी दशा दुई होगी सी हुई होगी परन्तु अब
चेलोंके हेतु वहाँसे कोई चिट्ठी भेज देनी चाहिये थी कि यह निन्दा स्तुति, लक्षण
छापनेवालोंकी भूलसे लिखा गया है तुम इसे सत्य न मानना और खबरदार कभी
किसीका सत्य दोप भी न कहना गुणोंका कथन स्तुति अवगुणोंका कपन
निन्दा जानना ॥
अब इसके आगे देवता और श्राद्धप्रकरण लिखा जायगा.
अथ देवतापितृश्राद्रप्रकरणम् ।
स० पृ० ९८६०९
ऋपियज्ञं देवयज्ञ भूतयज्ञं च सर्वदा ।
रॉयज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत्॥१॥अ०४श्लो०२१
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् । ।
होमौदेवोवलिभाँतोनृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥२॥अ०४श्लो०७०
स्वाध्यायेनार्चयेतीन्होंमेदेवान्यथाविधि
पितॄन् श्राद्धेश्चन्नन्नेर्भूतानिवलिकर्मणा॥३॥मनु० अ०३श्लो०८१
पक्ति १५ में इस प्रकार लिखते हैं,अर्थ-दो यज्ञ ब्रह्मचर्यमें लिस आपे हैं
अर्थात् एफ वेदादि शास्त्रका पढना पढाना संध्योपासन योगाभ्यास दूसरा देशपा
विद्धानोंका संग सेवा पवित्रता दिव्य गुणोंका धारण दातृत्य विद्यापी टवति यह
दोनोपासायं प्रातः करने होते हैं ॥९८१२५
पृ० १९५० १६ तीसरा पितृयज्ञ अर्थात् निसमें देयपक्ष नो पिदान् ऋषि जो
पढने पटानेदारे पितर माता पिता आदि पृद्ध मानी और परम पौगिपारी
सेवा करनी॥१०॥
समीक्षा-अब यहाँसे स्वामीजी पोप लीला चलाते हैं यहां पितर देवता ऋपि सब एक ही प्रकार और एक ही अर्थम घटाते हैं इन श्लोकोंमें यह सब पृथक् पृथक् हैं इसलिये देव ऋपि पितरोंको एक ही फहना युक्त नहीं है क्यों कि, ऋपियज्ञ देवयज्ञ, भूतयज्ञ, नृयज्ञ, पितृयज्ञ इनको यथाशक्ति न जाने दे, पढना पढाना ब्रह्मयज्ञ, तर्पण आद्ध पितृयज्ञ होमादिक देवयज्ञ और भूतबलि भूतयज्ञ और मनुष्यय अतिथिभोजनादिक यह पांच हैं, वेदाध्ययनसे ऋपियोंका पूजन करे, होमसे देवताओंका श्राद्धसे पितरोंका अन्नसे मनुष्योंका और भूतोंको बलि कर्म कर पूजन करे । कुर्यादहरदः श्राद्धमन्नायेनोदकेन वा। पयोमूलफलैयापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन् ॥ मनु० अ०३ श्लो०८२ एकमप्याशयेद्विप्रं पित्रर्थे पाञ्चयज्ञिके। पितरोंसे प्रीति चाहनेवाला तिल यव इन करके और पय मूल फल जल इनसे श्राद्ध करे पितरके अर्थ एक ब्राह्मण भोजन फराव जव कि वेदाध्ययनसे ऋपि, होमसे देवता, श्रादसे पितर, अन्नसे मनुष्योंका पूजन करे, यदि यह सब एक ही होते तो पृथक् पृथक् वस्तुओंसे पृथक् प्रसन्न होनेवाले कैसे होते, पदि देवता विद्वानोंको ही कहते हैं तो क्या यह हवनसे प्रसन्न होते हैं, तो उनकी प्रसन्नताक पास्ते हवन करदेना चाहिये यदि विद्वान् भूखे आयें तो थोडासा होम फर देना घे झट प्रसन्न होजायँगे, इससे विद्वान्तृप्त होते देखे नहीं जाते, इस कारण विदा- नोंका ही देवता नाम और कोई पृथक देव जाति नहीं है यह फहना स्वामीजीका अट है, वेदोम देवनाति पृथक् लिखी है यथाहि ॥ अग्निदेवता वातौदेवतासूर्योदेवता चन्द्रमादेवता वसवोदे- वता रुदोदेवाऽऽदित्यादेवामुरुतौदेवताविश्वेदेवादेवता बृहस्पतिर्देवतेन्द्रौदेवतावरुणोदेवता ॥१॥ य०अ०-१४८-२० यह अर्य प्रत्यक्ष ही है इसमें दवताओंके अमि वायु सूर्य चन्द्रमा आदि पृथा पृषक् नाम लिखे हैं इससे देवता मनुप्पोंसे पृथक ही हैं और भी ।। बुयो देवा एकादशत्रयसुिशाः सुराधसः बृहस्पतिपुरोहि: - ता देवस्यसवितुः सर्वे देवा देवरवन्तुमा ११ म० अ०२० भष्ट धनवाले ब्रह्मको होआगे किये तीनों देवता ग्यारह रद तेंतीस देवता नारा- यणकी आज्ञामें वर्तमान होते सत्य आदिके साथ मेरी रक्षा करो अपवा तीन .
(११४) दयानन्दतिमिरभास्करः। देवता एकादशदेवता वा ग्यारह तेंतीस देवता मुन्दर धनवाले पुरोहित बृहस्पतिको आगे किये सविता देवताकी आभ्यन्तर प्रेरणासे इस महदनुष्ठान में प्रवृत्त दूर हमको अपने देवत्व प्रभावसे रक्षा करो ॥ समिद्ध इन्द्र उपसामनीके पुरोरुचा पूर्वकुंद्रावधानःविभि- वेनिशतावजवाहुर्जघानपुत्रंविदुरौववारराय अ०२०मंत्र ३६ सम्पाप्रकारसे दीप प्रातःकालपर आगे चलनेवाले प्रकाश सूर्यरूप द्वारा पूर्व दिशाको प्रकाश करनेवाले (विशता ) तेंतीस देवताओंके साय वृद्धि पानेवाले वजधारी इन्द्रने मेषरूपी दैत्यको ताडन किया मेपके सोता वा दैत्यपुरके द्वाराको शून्य किया था खोला १२ आदित्य ८ वसु ११ रुद्र १ इन्द्र र प्रजापति यह तेंतीस देवता हैं। त्रीणिशुतानित्रीणिसुहस्राण्युग्मिविशच्चेदुवानवचासर्पयन् । औसन्घृतैस्तृणन्वर्हिरस्माआदिद्योतारन्यसादयन्त ७०भ०३३ अथ ( त्रीणि शतानि त्रीणि सहस्राणि त्रिंशत च नव देवाः ) तीन हजार तीन सौ उन्तालीस देवता अमिकी परिचर्या करते हैं उन्हेंनि घृतसे अमिको सींचा और इस अमिके लिये कुशाको आच्छादन करते हुए होताको होहकर्ममें नियुक्त किया ॥ अथवा (श्रीणि शतानि)३०० तीन सौ (त्रीणि सहस्राणि) ३००० ती सहस्र गुणित अर्थात् ९००००० (त्रिंशत नव च )और उन्तालीस ९०००३ देवता अमिकी परिचर्या करते हैं अथवा "नवैवास्त्रिद्धाः स्युर्देवानां दशकैर्गणैः ते ब्रह्मविष्णुरुदाणां शक्तीनां वर्णभेदतः ॥" इस आगम प्रमाणसे ब्रह्मा विध रुद्रको शक्तिरूपसे ३३३ ३३३ ३३३ इतने देवता होते हैं चाहे तैतीस कोटियों देवता मानो तो भी देवताओंकी संख्या अधिक ही आवेगी कारण कि एक कोटिमें बहुत होंगे इस प्रकार दयानन्दजी और भास्करप्रकाशके कर्ता दोने परास्त होते हैं । * तिखएवदेवता इति नरुक्ता अग्निः पृथिवीस्थानोवायुवेन्द्रोवा न्तरिक्षस्थानः सूर्योद्युस्थानस्तासांमहाभाग्यादेकेकस्याअपि वहूनिनामधेयानिभवन्ति ॥ नि० देवतकां० अ०७खं० । ३०. + ३००० + ३०००० ऐसे नौ जगह जोडनेसे उपर दिख ततीस कोटिकी संख्या पूरी होजायगी। ३० चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । यह तीन देवता हैं अमि पृथ्वीस्थानमें, वायु वा इन्द्र अन्तरिक्ष स्थानमें, और सूर्य द्युस्थानमें इन महाभाग्यों के बहुत नाम होते हैं, तीन स्थानमें देवताओंकी स्थति कहने और इनको महाभाग्य और एक २ के बहुत नाम कहनेसे यहां घेद्वान देव शब्दार्थ नहीं और जब एक २के बहुत नाम हैं तो तेंतीस करोड भी कह सते हैं और यह जो स्वामीजीने लिखाहै (विद्वांसो हि देवाः) यह शतपथ ३।१३।१० को श्रुति है इसमें स्वामीजीने वडा प्रपंच रवाहै इसका यह अर्थ नहीं के विद्वानोंका नाम देवता है किन्तु यजु० अध्या० ६ मन्त्र ७ में 'देवान् देवी- वैशः प्रागुरुशिनो वहितमान्' इसके अर्थ में (दैवीर्वशः) दिव्य गुणयुक्त यह शु (देवान्) अमोपोमादि देवताओंके (उपमायुः) समीप गमन करें, जो देवता उशिनः ) विद्वान् (वहितमान ) अमिद्वारा हविकी इच्छावाले हैं इसपर ही तपथको अति है "विदासो हिदेवास्तस्मादाहोशिनो वह्नितमानिति "३ ॥३॥ १० देवता विद्वान् हैं इस कारण उनको उशिन और वहितमान कहा है, विदा- का नाम देवता है इसका यहां कोई प्रसंग नहीं है ।। :: और दयानन्दनीके अभिप्रायसे देवताओंका निषेध करें तो, वाग्वे ब्रह्म बृह० अ० ६ त्रा०१ यह श्रुति भी शतपथमें पठित है तो ब्रह्मका निषेध कर देना चाहिये क्यों कि वाणी ही ब्रह्म है ब्रह्म तो इस श्रुतिसे वाक् सिद्ध होगई इससे यहाँ भी ब्रह्मको पाक्पान्तरमें प्रसिद्ध होनेसे निषेधका असंभव है इससे इस श्रुतिका यह अर्थ होना चाहिये कि ब्रह्म अद्धि करके वार उपासनीय है जब देवता वाक्यान्तरसे प्रसिद्ध हैं तो उनका निषेध नहीं होसक्ता और यही देवता ॥ इतीमादेवताअनुक्रांताः सूक्तभाजो हविर्भाजभाजश्च भूयिष्ठाः-निरु०७।१३ यह जो देवता कहे हैं इनमें कोई सूक्तोंको भनते हैं कोई हविको कोई ऋगका कोई दोनोंको । देवताओंको सर्वशक्तिसंपन्नत्व भी निरुतमें बोधन कियाहै ।। आत्मैवेपारथोभवत्यात्माश्व आत्मायुध आत्मेपव आत्मा सर्व देवस्यदेवस्य ॥ नि० अ०७ खं०४ देव कां० १५ देवताओंका प्रभाव यह है आत्मा ही देवताओंका अध रथ आयुध इपुरूप' होताह और सही उपकरण देव देवका आत्मरूप है क्यों कि देवता सत्यसंकल्प रूप हैं और भी मंत्र देवताओंका महत्वबोधक है ।
(११६) दयानन्दतिमिरभास्करः। रूपंरूपमघवाबोभवीतिमायाः कृण्यानस्तन्वंपरिस्वाम त्रि यदिवः परिमुहूर्तमागात् स्वमरन्तुपाकतावा ० म० अ०४ सूक्त ५३ मं० ८ इस मंत्र व्याख्यानमें निरुक्ति:- यद्यपंकामयतेतत्तद्देवताभवति रूपंरूपमववावोभवीतीत्य- पिनिगमोभवति ॥ नि० अ० १० खं० १७ ( मपवा ) इन्द (रूपरूपम् ) जिस निस रूपकी इच्छा करताहै उस इ रूपका (बोभवीति ) होता है (मायाः) अनेक रूप ग्रहणकी सामप (कुर्वाणः ) करते हुए (स्वातन्यम् )अपने शरीरको (परि.) अपने शरीरसे नाना विधि शरीर निर्माण करता अथवा अपने शरीरको नानाविधि करता यया "इन्हें मायाभिः पुरुरूपईयते ऋ०" (स्वैः मत्रैः) अपने स्तुतिलक्षणवाले वाक्योंसे आह्वान किया हुआ (अनृतुपा) सोमका निरन्तर पानकर्ता (ऋतावा ) सत्यवान् ( यत् जिस कारण ( दिवः ) स्वर्गलोकसे (परि मुहूर्तमः) एक ही मुहूर्तमें अनेकदेश यज्ञोंमें (त्रिः) तीनों सवनों में (आगात् ) आता है । इस मंत्रमें अनुक्रमणिका आदिके, अनुसार इन्दका ही वर्णन है इससे स्पष्ट विदित है कि देवता मनुष्योंसे पृथक हैं मुहूर्तमात्रमें स्वर्गसे अ मनुष्यों वा विद्वानोंमें संभव नहीं होता इसीसे विदित है कि देवता म विद्वानोंसे पृथक् हैं । पुनः केन उपनिपझें देवताओंका परस्पर संवाद है ।। ब्रह्महदेवेभ्योविजिग्यतस्यह ब्रह्मणोविजयेदेवोअमहीयन्नतऐः नास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायमहिमोति । केनउ० ॥ ईश्वरने देवताओंको जय दी उसकी कृपाकटाक्षसे सब देवता महिमाकोम होते हुए और फिर यह जाना कि यह सब जगत् हमारा ही जय किया है। हमारी ही महिमा है तब ईश्वर यज्ञरूप अवतार ले प्रगट हुए और ये देवता स्पर उनका वृत्तान्त पूछने लगे ( तेनिमब्रुवन् ) इत्यादि वाक्य हैं कि उन्हें अमि वायु आदिसे पूछातुम इनको जानते हो उन्होंने कहा नहीं इसी प्रकार देव अनेकविधि सचित होते हैं और देवताओंका लोक पृथक प्रतीत होताद इन्द्रका स्वर्गसे आना लिखा है। ।
IAS चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (११७) यत्रब्रह्मचात्त्रश्च सम्यञ्चौचरतः सुइ तल्लोकम्पुण्यम्प्रज्ञेप यत्रदेवाः सुहाग्निना ॥ यजु० अ० २० मं० २५ जहां ब्राह्मण जाति और क्षत्रिय जाति संग मिले रहते हैं और जहां देवता साथ वास करते हैं उस पवित्र लोकको मैं देखू यह यजमानका वाक्य है । वेन्द्रश्ववायुश्च सुम्यञ्चौचरतः सुइ तल्लोकम्पुण्यप्रज्ञेपं यत्र सेदिनविद्यते ॥ य० अ० २० मं० २६ जिस लोकमें इन्द्र वायु देवता मिले हुए विचरते हैं, जिस लोकमें दुःख नहीं है उस लोकको में प्राप्त करूं ॥ । इन दोनों मंत्रोंसे यह बात प्रगट है कि, देवतालोक दुःखरहित हैं वहां यजमान 'जाना चाहता है, यदि देवता विद्वानोंका नाम होता तो ब्राह्मण क्षत्रिय जाति क्यों कही, यह जो देवलोकमें विचरते हैं क्या विद्वान् न होंगे और फिर देवता अमिक साथ रहते हैं. ऐसा पृथक् क्यों लिखा और ( यच ) नाम जिस लोकमें यह शब्द लिखनेसे जाना जाता है कि वह कोई दूसरा लोक है यह लोक होता तो अत्र लिखते, इस कारण देवता विद्वानोंका ही नाम है यह असत्य है, देवता पृथक हैं और सुनिये ॥ नित्यं स्नात्वा शुचिः कुयोदेवार्प पितृतर्पणम्। देवताभ्यर्चनं देव समिदाधानमेव च ॥ मनु० नित्य स्नान कर पवित्र हो देवता ऋपि पितरोंका तर्पण करै देवताओंफा पूजन और हवन करै तथा ॥ पूर्वाह्न एव कुति देवतानां च पूजनम् ।। १५२॥ देवताओंका पूजन दुपहरसे पहले कर ।। देवतान्यभिगच्छेत्तु धार्मिकांश्च द्विजोत्तमान् । ईश्वरं चैव रक्षार्थ गुरूनेव च पर्वसुः॥ मनु० अ०४ श्लो० १५६ अपनी रक्षाके वास्ते देवताओंके दर्शन धर्मात्मा ब्राह्मणों के दर्शन करनेको प्रत्येक पर्वमें नाय और गुरुजनोंके भी दर्शन कर ईश्वरका ध्यान करै । ! . * (देवाः दीव्यतिनायों दीप्त्ययों वा पचाद्यन् दातारोभिमता भक्तेभ्यः भा.प्र. के कर्ताने मनुष्योंसे देवता पृथक् मान लिये हैं नहीं क्या करते ।
(११८) दयानन्दतिमिरभास्करः। तेजसत्वादीप्ता वा दिवः सम्बधिनोवा देवाः)जोभक्तीफी कामना इच्छित सुफल करें जो स्वर्गम रह वे देवताफहाते हैं, औरऋपिर्दर्शनात् पश्यत्यसी सूक्ष्मानान्-जिनको तपके प्रभावसे ही विना अध्ययन वेदादिकोंके अर्थ प्राप्त हुए हैं वे ऋपि कहाते हैं। इस स्थानमें देवता ऋपि गुरु आदि सब पृथक कहे, और देवता स्वर्गके रह- नेवाले वर्णन किये गये हैं । स्वामीजीने जो सत्यार्थप्रकाश पृ० ९९ पं० २९ में विद्वांसो हि देवाः यह लिमा है कि जो साङ्गोपांग चारों वेदोंको जाननेवाले हों उनका नाम ब्रह्माऔर जो उनसे न्यून हो उनका भी नाम देव विद्वान है ऐसा लिखा है, यह लेख बुद्धिमान विचा- रेंगे कितना निर्मूल है देवता शब्द और वे किस प्रकारके होके रहते हैं, यह सब कुछ हम पूर्व कथन कर नुके हैं पर यह लक्षण देवताका कहीं नहीं देखा कि चारों घेदोंको उपांगसहित जाननेस ब्रह्मा हातहि, यह तो कहिय कि आप वेदोंके उपांग ऋपिकृत और वेदके पश्चात् बने बताते हो जिस समयतक कि वेदांग नहीं बनेथे संहिता मात्र वेद था तो उस समय ब्रह्मा संज्ञा ही न होनी चाहिये थी फिर अथर्ववेदमें लिखा है ( भूतानांप्रथमाः ब्रह्माहजज्ञ) मृष्टिमें सबसे पहले ब्रह्मानी उत्पन्न हुए विना उपांग इन्हें ब्रह्मा किसने बना दिया जो आपका ही नियम होता तो वेदांग बनानेवालोंका नाम महाब्रह्मा होता, क्यों कि पठनेवालोंसे ग्रंथ फर्ता बडे होते हैं और जो सांग वेद जाननेसे ही ब्रह्मा कहावै तौ रावणको ब्रह्मा या देवता क्यों नहीं कहते, मालूम तौ ऐसा होताहै कि आपने पह ढंग अपनेको ब्रह्मा और देवता कहलानेका निकाला था, परन्तु सिद्ध न हुआ कोई भी ऐसा भक्त चेला न हुआ जो आपको ब्रह्मा नामसे पुकारता, यदि वेदांग जाननेसे ब्रह्मा होते तौ वसिष्ठ गौतम नारदादि सब ही ब्रह्मा हो जाते, परन्तु आजतक एक ही ब्रह्मा सुने हैं ऋपिअध्ययनसे, देवता हवनसे, पितर श्राद और हवनसे, प्रसन्न होते हैं यह तीनों पृथक हैं देवता आहुतिसे तृप्त होते हैं, विद्वान् भोजनसे, देवता- भोंके आफार और मूर्ति तथा निवासस्थानका वर्णन ग्यारहवें समुल्लासमें सिद्ध करेंगे यहां तो केवल उनका होना ही सिद्ध किया है. अब श्राद्धविषय लिखते हैं । स०प्र० पृ० ९९ पं० १८ पितृयज्ञके दो भेद हैं एक श्राद दूसरा तर्पण, भाद अर्थात् श्रत् सत्यका नाम है-श्रत् सत्यं दधाति यया क्रियया सा श्रद्धा श्रद्धया पद कियते तच्छाद्धमनिस क्रियासे सत्यका ग्रहण किया जाय उसको श्रद्धा और जो श्रद्धासे कर्म किया जाय उसका नाम श्राद्ध है और-तृप्यन्ति तर्पयन्ति येन पिन ततर्पणम्-निस २ कर्मसे नृप्त अर्थात् विद्यमान मातापितादि पितर प्रसन्न हो और प्रसन्न किये जाय उसका नाम तर्पण परन्तु वह जीवितोंके लिये हैं मृतकोंक लिये नहीं ॥ १००।१० (११९) चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । ब्रह्मादयो देवास्तृप्यन्ताम् ब्रह्मादिदेवपत्न्यस्तृप्यन्ताम् । ब्रह्मादिदेवसुतास्तृप्यन्ताम् ब्रह्मादिदेवगणास्तृप्यन्ताम् ॥ इति तर्पणम् । जो सांगोपांग यारों घेदोंको जाननेवाले हों उनका नाम ब्रह्मा और जो उन भी न्यून हों उनका नाम देव अर्थात् विद्वान हैं उनके सदृश विदुपी स्त्री उनक ब्राह्मणी और देवी उनके तुल्य पुत्र और शिष्य तथा उनके सदृश उनके ग अर्थात् सेवक हों उनकी सेवा करना उसका नाम श्राद्ध और तर्पण है ।। स० पृ० १०० पं० ३ अर्पितपणम्- ॐमरीच्यादयक्रपयस्तृप्यन्ताम् मरीच्यायपिपल्यस्तृप्यन्ताम मरीच्यावापिसुतास्तृप्यन्ताम् मरीच्यावृषिगणास्तृप्यन्ताम् इति ऋषितर्पणम्। जो प्रमाके मपौत्र मरीचिव विद्वान होके पढावे और जो उनके सदृश विद्य युक्त उनकी सिपो कन्पाओंको विद्या दान देवं उनके तुल्य पुत्र और शिष्यता उनके समान उनके सेवक हों उनका सेवन करना सत्कार करना ऋषितर्पण है अथ पितृतर्पणम् । ॐसामसदापितरस्तृप्यन्ताम् अग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यन्ताम् बर्दिषदः पितरस्तृप्यन्ताम् सोमपाः पितरस्तृप्यन्ताम् हवि- र्भुजः पितरस्तृप्यन्ताम् आज्यपाः पितरस्तृप्यन्ताम् यमादि- भ्यो नमः यमादीस्तर्पयामि पित्रे स्वधा नमः पितरं तर्पयामि पितामहाय स्वधा नमः पितामहं तर्पयामि मात्र स्वधा नमः - मातरं तर्पयामि पितामी स्वधा नमः पितामही तर्पयामिस्त्र पत्न्य स्वधा नमः स्वपत्नी तर्पयामि संबन्धिभ्यः स्वधा नमः सम्बन्धिनस्तर्पयामि सगोवेभ्यः स्वधा नमः सगोत्रांतर्पयामि इति पितृतर्पणम् । "ये सोमे जगदीश्वरे पदार्थविधायर्या च सीदन्ति ते सोमसदः" जो परमात्र मौर पदार्थविद्यामें निपुण होवें वे सोमसद "परमीविद्युतो विद्या गृहीता आसिमानाको सिमानामा (१२०) दयानन्दतिमिरभास्करः। "ये यहिपि उत्तमे व्यवहारे सीदन्ति ते बर्हिपदः"जो उत्तम विद्या वृद्धियुक्त उत्तम व्यवहार में स्थित हों वे बर्हिपद “य समिश्चर्यमौषधीरसं या पान्ति पिबन्ति वा ते सोमपाः" जो ऐश्वर्यके रक्षक और महीपधिका पान करनेसे रोगरहित और अन्यके ऐश्वर्यरक्षक औषधोंको देके रोगनाशक होवें वे सोमपाः "ये हविहातुमत्तुमर्ह भुञ्जते भोजयन्ति वा ते हविर्भुनः" जो मादक और हिंसाकारक द्रव्योंको छोडके भोजन करते हैं वे हविर्भुज " य आन्य ज्ञातुं प्राप्तुं वा योग्य रक्षन्ति वा पिवन्ति ते आज्यपाः" जो जाननेके योग्य वस्तुके रक्षक और घृत दुग्धादि खाने और पीने हारे हौवें वे आज्यपा“शोभनः कालो विद्यते येषां ते मुकालिन" जिनका अच्छा धर्म करनेका सुखरूप समय होवै ये सुकालिन् दुष्टान् यच्छन्ति निगृहन्ति ते यमा न्यायाधीशाः " जो दुष्टोंको दण्ड और श्रेष्ठोंका पालन करनेहारे न्याय कारी हों वे यम "यः पाति स पिता" जो सन्तानोंका अन्न औरसत्कारसे रक्षकवा जनक हो वह पिता"पितुः पिता पितामहः पितामहस्य पिता प्रपितामह या मानयति सा माता" जो अन्न और सत्कारोंसे सन्तानोंका मान्य करै वह माता "या पितुर्माता सा पितामही पितामहस्य माता प्रपितामही" अपनी स्त्री तथा भगिनी सम्बन्धी और एक गोत्रके तथा अन्य कोई भद्र पुरुष वा युद्ध हों उन सबको अत्यन्त श्रद्धासे उत्तम अन्न वस्त्र सुन्दर पान आदि देकर अच्छे प्रकार जो तृप्त करना अर्थात् जिस २ कर्मसे उनका आत्मा तृप्त और शरीर स्वस्थ रहै उस रकमसे प्रीति- पूर्वक उनकी सेवा करनी वह श्राद्ध और तर्पण कहाता है ।। १०० । २६ से । समीक्षा-पहले सत्यार्थप्रकाशमें मरौंका श्राद्ध तर्पण लिखा था इसमें आप किसी पादरीसे हारकर जीतोंका श्राद्ध तर्पण लिखते हैं, इससे पहले हम यह निर्णय किया चाहतेहैं कि श्राद्ध मृतक पुरुषोंका होताहै वा जीवितोंका, देखो यजुर्वेद ॥ ये समानाः समनसः पितरौ युमराज्य । तपाँलोकः स्वधा नो युज्ञोदेवेपुकल्पताम् अ० १९ मं० ४५ अर्थ-अपसव्य और दक्षिणमुख होकर यजमान एकवार लिये हुए घृतके जुहूसे दक्षिणामिमें होमता है उसका मन्त्र । प्रजापति ऋषिः । अनुष्टुप छन्दः । पितरो देवता ॥ भा०-(ये)जो (समानाः) जातिरूपादिसे समान मर्यादापाले (समनसः) एकान्तःकरण वा तुल्य मनवाले हमारे (पितरः) पितर (यमराज्ये) यमलोकमें वर्तमान हैं (तेपाम ) उन पितरोंके (लोकः ) लोकमें (स्वथा ) स्वधा चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (१२१) (नमः) अन्न दृष्टिगोचर हो ( यतः ) यज्ञ तो (देवेषु) देवताओंके तृप्त करनेमें (फल्पताम् ) समर्थ हो । पितृनेष यमे परिददात्ययो पितृलोकमेव जयति श. १२.1८1१1 १९॥ १५॥ ये समानाःसमनसो जीवाजीवऍमामकाः। तेपार श्रीमयिकल्पतामस्मिल्लोकेशतःसाः ४६ (ये)गो (नीवेपु) प्राणियोम (समानाः ) समदशा ( समनसः) मनस्वी (मामकाः ) मेरेसपिण्ड (जीवाः)पितर हैं इस लोकमें रहते हैं (तेपाम्) उनकी (श्रीः ) लक्ष्मी (अस्मिन् ) इस (लोके ) भूलोफमें (शतम् ) सौ (समाः)वर्षों तक (मपि ) मुझमें (कल्पताम् ) आश्रय फरै ॥ ४६॥ दे सुतीअशृणवम्पितॄणामहन्देवानामुतमत्यांनाम् । ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समैतियदन्तरापुिनरम्मातरञ्च १७ प्रजापतिऋपिः त्रिष्टुप् छन्दः देवयानपितृयानमागों देवते (अहम्) मैंन श्रुतिसे (मानाम् ) मरणधर्मा प्राणियोंके ( देवानाम् ) देव- ताओंके गमनपोग्य (टत ) और (पितॄणाम् ) पितरोंके गमनयोग्य (दे) दो (सती) मार्ग(अशणवम् ) मुने हैं (यत्) जो (पितरम् ) धुलोको (च) और (मातरम् ) भूलोकके (अन्तरा) मध्यमें वर्तमान हैं ( इदम्) यह (पजत्) किया- धान् (विश्यम् )जगत् (ताभ्याम)टन देवयान पिट्टयान मागासे (ममंति) प्रात होता है ॥१७॥ उदारतामवरऽउत्परासुऽउन्मध्युमाः पितरः सोम्यासः असु यईयुरघुका तुज्ञास्तेोऽवन्तुपितगुइपु ऋ० मं० १० अ० १सू. १९ मं०११ यजुअ० १९ मं०४९ उदारतामपर रदीरता परउदीरतां मध्यमः पितरः मोम्याः सोमसम्पादिनम्ते. पे माणमनीपुरएका अनमियाः सत्यता पायतज्ञा या तेन आगञ्चन्त पितरोडा. ने माध्यमिको यम इत्याहस्तस्मान्माध्यमिकान् पिवृन्मन्यन्ते-नि० २० ११ सं. १८ को देवतम् ॥ शंखसापिः पितृमेधे विनियोगः। भाप्पम्-पे तापत् अपरे पितरः पृधिय मामिताः ते तारद उदारताम् कार्य " (१२२) दयानन्दतिमिरभास्करः। गच्छन्तु अथ पुनय(परासः ) परेद्युलोकमाश्रिताः तेषुदीरताम् तेपामप्यमच्युति- रस्तु मुच्यन्ताम्षा तदधिकारमक्षये (उन्मध्यमाः)पितरो येपि मध्यमाः मध्यस्मा नाश्रयाः तेप्युदीरताम् उत्तमं लोकमाश्रयताम् (सोम्यासः )सोमसम्पादिनः कर्म- ण्यङ्गभावमुपगच्छन्तो ये सोमंसम्पादयन्ति किं प्रकाराः "असुंपईयुः" प्राणमाय- मूर्तयः अस्थूलविग्रहाः “अकाः " अनमित्राः परंसाम्यमुपगताः ऋतज्ञाः यथावत् सत्यवेदितारः यज्ञस्य वा य एवमादिगुणयुक्ताः पितरः"ते नः अस्मा- कम् नित्यम् “अवन्तु" आगच्छन्तु “हवेपु" आह्वानेषु इत्येतदाशास्महे माध्यमिको यम इत्याहुः नरुक्ताः तस्मात् पितॄन् माध्यमिकान मन्यन्ते स हि तेषां रामेति ॥ वैवस्वतंसंगमनंजनानांयमराजानंहविपादुवस्य . ऋ० मं० १० अ० १ सू० १४ मं० १ इति मंत्रप्रमाणात् यमस्य पितृरानत्वं भवति दुवस्य परिचरेत्यर्थः ॥ भापार्य-जो पितर अवर अर्थात् पृथ्वीमें स्थित हैं.ये ऊपर गमन करो और गो स्वलॊकमें स्थित हैं वेमच्युतिरहित हों,अथवाअधिकारकी क्षीणतासे मुक्त होवें और जो मध्यस्थानमें स्थित हैं वे उत्तम लोकका आश्रय करो, ये पितर सौम्प हैं, अर्याद फर्ममें अंगभावको माप्त होकर सोमको सम्पादन करते हैं, और स्थूलशरीरको त्यागकर माणमात्र मूर्तिवाले हैं (अकाः) अर्थात् शत्रुभावरहित ययावत् सत्य वा यज्ञशाता है वे पितर आवाहन स्थानों में आगमन फरी, माध्यमिक यम है इस कारण पित- रौंको माध्यमिक ही मानते हैं, क्यों कि यमराज मध्यस्थानमें स्थित है और तद नुपी पितर भी मध्यस्थानमें स्थित हैं, यमको पितृराम होनेमें (वैवस्वत ) पर मंत्र प्रमाण है इसका अर्थ यह है कि प्राणिमात्रका यमके प्रति गमन होताहै, तिस यमरानको हविसे परिवरणकर" दयानंदी इन मंत्रोंको विचार' । ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासोऽनुहिरे सौमपीथं वर्मिष्ठाः। तेभिर्युमः सराणीहवीप्युशन्नुशद्रिः प्रतिकाममुत यजु० अ० १९ मं०५१ (शंख अपिः पितरो देवता) (पे) मा ( सोम्यासः ) सोममपादक (पमिष्टाः)वमिष्ठ वंशी (नः) हमाः (पूर्व) पर्व (पितरः)तिरोन (सोमपीया) सोमपानको ( अहिरे) देवगगाको मुलाया (इशन) मामी छापा (यमः) पिटपति (नेमिः )टन (दशादिः) मोमकी इडापापिता सहित मरगमः ) प्रमन्न होने ( प्रतिरामम ) इन्चानुमार हमार्ग दी (लपि) इषियोंको (अनु) भोगो ॥१॥ ।
चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । त्वयाहिनः पितरः सोमपूर्वेकर्माणिचुनुः पवमानधीराः वन्वन्नवांतःपरिधी२॥रपोर्णवीरेभिरश्वैर्मघवाभवानः॥५३ (शंख ऋषिः सोमो देवता) हे (पवमान ) हे शोधक (सोम) सोम (न- हमारे ( धीराः) धीर (पितरः ) पितरोंने ( त्वया ) तुम्हारे द्वारा (फर्माणि यज्ञादि काकी ( चक्रुः ) किया इसकारण (पन्यन्) इस फर्ममें युक्त (अपात वातादिके उपद्रवरहित तुम (परिधान ) उपद्रवकारियोंको (अपोर्णहि)दूरक (वारेभिः)वीर ( अश्वैः ) अश्वों द्वारा ( मघवा ) इन्द्र (नः) हमको धन देनेव (आभव ) सब ओरसे हो ।। ५३ ॥ वहिंपदः पितर ऊत्यागिमाहव्याचक्रमानुषध्वम् तऽआगताऽवसाशन्तमेनानिः शंयोरैरपोर्दधात ५५ (शंख ऋपिः पितरो देवताः)(बर्हिपदः) कुशासन पर बैठनेवाल ( पित हे पितरो (ते) वे तुम (ऊत्या) रक्षाके निमित्त (अवाक ) समीप ( आग भाओ (क) तुम्हारी (इमाः ) यह (हव्या) हवि (चकृम) हमने संस् किये हैं, इसको (आनुपध्वम् ) तुम सेवन करो (अप)फिर ( शन्तमेन) सुखदाता (अवसा ) अन्नसे तृप्त होकर (नः ) हममें (शम ) सुख ( यो भयका पृथक करना (अरपा) पापका अभाव (दधात) स्थापन करो॥५॥ आयन्तुनः पितरस्सोम्यासौग्रिप्वात्ताः पथिभिर्देवयानः अस्मिन्यज्ञेस्वधयामदन्तोपिब्रुवन्तुतेवन्त्वस्मान् ५८ (शंख प्रापिः पितरो देवताः )(सोम्यासः) सोमके योग्य (अमिध्वात्ताः मिद्वारा स्वदिता वा स्मात (नः ) हमारे (पितरः) पितर (देवयानः) देवता गमन योग्य (पथिभिः) मागोसे (आयन्तु) आयें (अस्मिन् ) इस ( यः यज्ञमें ( स्वधया) अनसे (मदन्तः) प्रसन्नहोते (अधिनुपन्तु) मानसिक उपदे- (ते) वे (अस्मान ) हमारी (अवन्तु) रक्षा करें ॥ ५८॥ ये अग्निष्ठात्तायेअनग्निप्वात्तामध्येदिवः स्वधामादयन्ते तेभ्यः स्वराडसुनीतिमेतायथावशन्तुन्वङ्कल्पयाति ६० (ये.) जो पितर (:अमिप्वाताः ) विधिपूर्वक आमिदाहस और्वदेहिक क- प्राप्त हैं (ये )जो पितर (अनमिष्याताः)मशानधर्मको प्राप्त न हुए और ( (१२४). दयानन्दतिमिरभास्करः। झुलोकके ( मध्ये) मध्यमें (स्वधया ) अपने उपार्जित फर्मके भोगरूप अनसे (मादयन्ते ) प्रसन्न रहते हैं (स्वराद ) राजा यम (तेभ्यः) उन पितरोंके निमित्त (यथावशम् ) इच्छानुसार ( एतान् ) इन मनुष्य सम्बन्धवाले ( अमुनीतिम् ) प्राणयुक्त (तन्वम्) शरीरको (कल्पयति) देता है। यानमिरेव दहनः स्वदयति ते. पितरोऽमिष्याताः२।५।५१७ शनिनको अग्नि जलाती है वे पितर अमि- ध्वात्त हैं ॥ ६ ॥ आच्याजानुदक्षिणतोनिपद्यमयज्ञमभिगृणीतविश्व माहिसिष्टपितरः केनचिन्नोयगुआर्गः पुरुपताकराम ६२ (पितरः ) हे पितरो ! (विश्व ) तुम सब (जानु ) वाम जायको (आ)सब 'प्रकार (आच्य ) झुकाकर ( दक्षिणतः ) दक्षिणको मुखकर ( निपद्य ) बैठकर ( इमम् ) इस (यज्ञम् ) यज्ञको (आभगृणीत) अभिनन्दन करो (केनचित्) किसी अपराध होनेसे (नः) हमपर (मा) मत (हिंसिष्ठ) क्रोध करो (यत्) कारण कि (पुरुपता ) चलचित्त होनेसे (वः ) तुम्हारा (आगः ) अपराध ( वयम् ) हम (कराम ) भूलसे कर जाते हैं ६२ ॥ आसीनासोअरुणीनामुपस्थैरयिन्धत्तदाशुपेमाय पुत्रेभ्यः पितरस्तस्युवस्वः प्रयच्छन्तइहोर्जन्दधात ६३ हे पितरो (अरुणीनाम् ) अरुणवर्ग ऊनके आसनो अथवा सूर्यकी किरणोंके (उपस्थे ) ऊपर वा गोदमें ( आसीनासः ) बैठे हुए तुम ( दाशुपे ) हविके दाता .(मत्याय ) यजमानमें ( रयिम् ) धनको ( धत्त) धारण करो ( पुत्रेभ्यः) (तस्य ) उसके पुत्रोंके लिये ( वस्वः) धनको (प्रयच्छत ) दो (ते) ये तुम (इह ) इस यज्ञमें (ऊन) रसको ( दधात ) स्थापन करो ॥ ६३ ॥ पुनन्तुमापितरः सोम्यासः पुनन्तुमापितामहाः पुनन्तुप्र- पितामहाः पवित्रंणशतायुपा पुनन्तुमापितामहाः पुनन्तुष- पितामहाः पवित्रणशतायुपा विश्वमायुर्व्यश्नवै अ०१९ मं०३७ सामके योग्य पितर पूर्णायुके दाता पवित्रासे मुझको शुद्ध करो पितामह मुझको 'पवित्र करो प्रपितामह पवित्र. करो पितामह पूर्ण आयुके दाता पवित्रासे मुझको गुद करो प्रपितामह शुद्ध करो पूर्ण आयुको प्राप्त करो ॥
आधुत्तपितरोग कुमारम्पुष्कास्रजम् ॥ यथेहपुरुपोसत् । यजु० अ०२ मं०३३ पुत्रकी कामनावाली स्त्री वीचके पिण्डको भोजन करै का० ४। ११२ (पितरः) हे पितरो ! (यथा) जैसे (इह) इस ऋतु (पुरुषः) देव पितर मनुष्योंके अर्थका पूर्ण करनेवाला (असत् ) होवे वैसे ( पुष्करसनम् ) पुष्प- मालाधारी गुणवान् (कुमारम् ) पुत्ररूप ( गम् ) गर्भको ( आधत्त ) सम्पा- दन करो ३३ पुरकी कामना करनेवाली स्त्री मध्य पिंडको भोजन करै टस समय इस मंत्रको पै? यह आश्वलायनमें लेख है ।। येचीवायेचमुतायेजातायेच युज्ञियाः ।। तेभ्योघृतस्यकुल्यैतुमधुधाराव्युंदुती अथर्व० १८। ४५७ (च) और (ये)जो (जीवाः ) जीवित हैं (च)और (ये) नो (मृताः) मृतक होगये (ये )जो (जाताः) जन्मे हैं (ये च) और जो ( यज्ञियाः) यज्ञके करानेवाले हैं (तेभ्यः ) उन सबके निमित्त (पृतस्य ) घृतकी (व्युन्दती) टपकती ( मधुधारा ) मधुरधार (कुल्या) सरित् ( एतु ) प्राप्त हा । इसमें मृतकके निमित्त भी घृत मधु कहाहै ॥ प्रेहिप्रेहिपथिभिः पूर्याणैर्यनापूर्वेपितरःपरैताः ॥ कुंभाराजानौस्तुधामदन्तीयमपश्यसिवरुणंचदेवम् । अथर्व०१८1१५४ (येन) जिसमार्गसे (ते ) तेरे ( पूर्व पितरः) पूर्वपितर (परेताः) मरकर गये उन २ (पूणिः ) यमनिर्मित शरीर पानरूप (पथिभिः) भागाँसे मेहि २) जाओ वहाँ ( स्वधया मदन्ती ) स्वधानाम अनसे प्रसन्न होते ( उभा राजानी) दोनों प्रकाशमान राना (देवम् ) देव (यमम ) यमको (च ) और (वरुणम्) वरुणको (पश्यसि) देखेगा ॥ * येनिखातायेपरोप्तायेदुग्धायेचोद्धिताः ।। सर्वास्तानमुआवहपिन्हुविर्षअत्तवे अथर्व का० १८५२मं ३४ * नु रा० यमके अर्थ वायुके करते हैं पर प्रमाण कुछ नहीं. देते और यहां प्रत्यक्ष यमराजा पद है और देखना लिखा है इससे भैरठी स्वामीका अर्थ अशुद्ध है। ..
(१२४) दयानन्दतिमिरभास्करः। लोक ( मध्ये ) मध्यमें (स्वधया)अपने उपार्जित कर्मके भोगरूप अनसे (मादयन्ते ) प्रसन्न रहते हैं (स्वराट् ) राजा यम (तेभ्यः)उन पितरोंके निमित्त (ययावशम् ) इच्छानुसार ( एतान् ) इन मनुष्य सम्बन्धवाले ( असुनीतिम्) प्राणयुक्त (तन्वम्) शरीरको ( कल्पयति) देता है। यानमिरेव दहनः स्वदयति ते पितरोमिवाताः२।५।५।७ श० जिनको अमि जलाती है वे पितर अमि. प्वात्त हैं ।। ६०॥ आच्याजा दक्षिणतोनिपघुमयज्ञमभिगृणीतविश्व माहिः सिष्टपितरः केनचिन्नोयगुआर्गः पुरुपताकराम ६२ (पितरः) हे पितरो ! (विश्व ) तुम सब (जानु ) वाम जायको (आ)सब 'प्रकार ( आन्य ) झुकाकर ( दक्षिणतः ) दक्षिणको मुखफर ( निपय ) बैठकर (इमम् ) इस (यज्ञम् ) यज्ञको (आभिगृणीत) अभिनन्दन करो (फेनचित्) किसी अपराध होनेसे (नः) हमपर (मा) मत (हिंसिष्ठ) क्रोध करो ( यत्) कारण कि ( पुरुषता ) चलचित होनेस (यः ) तुम्हारा (आगः ) अपराध (ययम् ) इम ( पराम) भूलसे कर जाते हैं ६२ ॥ आसीनासोअरुणीनामुपस्थैरयिन्धत्तदाशुपेमाय पुर्वेभ्यः पितुरस्तस्यवस्वः प्रयच्छन्तइहोर्जन्दधात ६३ हे पितरो (अरुणीनाम ) अरुणवर्ग उनके आसनी अथवा सूर्यकी किरणों के (उपस्थे ) ऊपर या गादमें (आसीनामः ) बैठे हुए नुम ( दाशुपे ) हायक दाता (मन्याय ) यजमानम (रपिम् ) धनको ( धत्त) धारण करी ( पुन्या) (तम्य ) उमो पुचोंके लिये ( वयः ) धनको (प्रपच्छत ) दो (ते) में तुम (इह ) इम या (कर्म) रमको (दयात ) स्थापन करी ॥ १३ ॥ पुनन्तुमापितरः सोम्यासः पुनन्तुमापितामहाः पुनन्तुप्र- पितामहाः पवित्रणशतायुपा पुनन्तुमापितामहाः पुनन्तुप्र- पितामहाः पवित्रंणशतायुपा विश्वमायुव्यंभ म० १९८०३७ मामर योग्य पितर मार दाता पश्यिाम मुन्नको गुद का पितामह मुमती पवित्र कर्ण मरितामह पविय कंगे पितामह पूर्ण आपके दाता पश्यिाम मनको मुद करामपितामह गुर करा पूर्ण आयुग प्राप्त की।
आधुत्तपितरोग कुमारम्पुष्करस्रजम् ।। यथेहपुरुपोर्सत् । यजु० अ०२ मं०३३ पुत्रकी कामनावाली स्त्री वीचके पिण्डको भोजन करै का० ४।१।२ (पितरः ) हे पितरो ! ( यथा) जैसे (इह ) इस ऋतु (पुरुषः) देव पितर मनुष्योंके अर्थका पूर्ण करनेवाला ( असत् ) हो वैसे ( पुष्करस्सनम् ) पुष्प- मालाधारी गुणवान् (कुमारम् ) पुत्ररूप (गर्भम् ) गर्भको ( आपत्त ) सम्पा- दन करो ३३ पुत्रकी कामना करनेवाली स्त्री मध्य पिंडको भोजन करै उस समय इस मंत्रकों पढे यह आश्वलायनमें लेख है ।। येचीवायेचमुतायेजातायेच युज्ञियाः ।। तेभ्योघृतस्यकुल्यैतुमधुधाराव्युदती अथर्व० १८॥ ४५७ (च) और (ये ) जो (जीवाः ) जीवित हैं (च)और (ये) जो (मृताः) मृतक होगये (ये) जो (जाताः) जन्मे हैं (ये च) और जो ( यज्ञियाः) यज्ञके करानेवाले हैं (तेभ्यः ) उन सबके निमित्त (घृतस्य ) घृतकी (व्युन्दती) टपकती (मधुधारा ) मधुरधार (कुल्या) सरित् ( एतु ) प्राप्त हा । इसमें मृतकके निमित्त भी घृत मधु कहाहै ।। प्रेडिंप्रेद्दिपुथिभिः पूर्याणेयेनातेपूर्वेपितर-परैताः ॥ उभाराजानोस्खुधामदन्तोयमपश्यसिवरुणंचदेवम् । अथर्व० ०१८।१।५४ (येन) जिसमार्गसे (ते) तेरे ( पूर्व पितरः) पूर्वपितर ( परताः) मरकर गये उन २ (पूर्याणः) यमनिर्मित शरीर यानरूप (पथिभिः) मागोंसे प्रेहि २) जाओ वहां (स्वधया मदन्तौ) स्वधानाम अनसे प्रसन्न होते ( उभा राजानी) दोनों प्रकाशमान राजा (देवम् ) देव ( यमम ) यमको (च ) और (वरुणम्) वरुणको ( पश्यसि) देखेगा ॥ * येनिखातायेपरोप्तायेदुग्धायेचोदिताः ॥ सर्वास्तानमुआवदपितॄन्हविपेअत्तवे अथर्व का०१८।२मं ३४ *नु • रा. यमके मर्य,वायुके करते हैं पर प्रमाण कुछ नहीं. देते और यहाँ प्रत्यक्ष यमराजा पद है और देखना लिखा है इससे मेरठी स्वामीका अर्थ अशुद्ध है।
(१२६) दयानन्दतिमिरभास्कर (ये) जो (निखाता) गाडे गये (ये) जो (पराप्ताः) वनमें छोड दिये गये (ये)जो ( दग्धाः )जलादिये गये (ये च ) और जो ( उद्धताः ) शरीर सहित स्वर्गको गये (अमे) हे अमि ! (तान् सर्वान् ) उन सबको ( हविपे) हवि (अत्तवे ) भोजन करनेको ( आवह ) पितृकर्ममें बुलाओ । इसके अर्थमें भा०प्र० कर्ता सूब परास्त हुआ है ॥ येअग्निदुग्धायेअनभिदग्धामध्यदिवः स्वधामादयन्ते । त्वंता- न्वेत्थयदुितेजातवेदः सुधयायुज्ञस्वषितिजुपन्ताम् । अथर्व ३५ (ये) जो ( अमिदग्धाः ) अनिमें दग्ध हुए हैं (ये) जो ( अनमिदग्धाः) अमिमें दग्ध नहीं हुए (दिवः ) द्युलोकके ( मध्ये) मध्यमें (स्वधया) अमृतरूप अनसे (मादयन्ते ) प्रसन्न हैं ( जातवेदः) हे अमे ! (त्वम् ) तू ( यदि ) को (तात् ) तिनको (वेत्य) जान्ता है तो वे तेरे द्वारा (स्वधया) स्वधासे ( स्वधि- तिम्) पितृसम्बधि ( यज्ञम् ) यज्ञको (जुपन्ताम् ) सेवन करें। ये नः पितुः पितरो ये पितामहां य आविविशुरुर्वन्तरिक्षम् ॥ य आक्षियन्तिपृथिवीमुतधांतेभ्यः पितृभ्योनमसाविधेम अथव०४९ (ये) जो (नः ) हमारे (पितुः)पिताके (पितरः)पितर हैं (ये) जो हमारे ( पितामहाः ) बाबा हैं (ये) जो (उरु) बेडे (अन्तरिक्षम्) पितृलोकमें (आवि- विशुः ) प्रवेश कर गये हैं (ये ) जो (पृथिवीम्) पृथिधीको (उत) और (याम् ) द्यलोकको (आक्षिपन्ति ) व्याप्तकर रहे हैं (तेभ्यः) उन (पितृभ्यः) पितरों के निमित्त (नमसा) अन वा नमस्कार ( विधेम) विधान करते हैं । योमुमारप्रथमोमत्यांनां यः प्रेयाय प्रथमोलोकमेतम् । वैवस्तुतंसंगमनंजनानांयुमंराजानं विपासपर्यत अ०१८।३.१. (यः) जो (मानाम् ) प्राणियों में (प्रथम पहले (ममार) मरता है (प.) जो ( एतम् ) इस (लोकम्) लोकको (प्रथमः) पहले (प्रेयाप) ले जाता है उस सुखके लिये (जनानाम् ) जनोंके (संगमनम् ) संपमन करनेवाले (वैवस्वतम्) सूर्यपुत्र (यमम् ) यम (रानानम् ) रानाको (हविस) हविसे, (सपर्यंत) सत्कार किया जाता है। ५ हि कुम्भान् यांस्तदेवा अधारयन् ते ते सन्तु . मधुमन्तो घृतश्च्युताः १७।३।६८ .
चतुपेसमुल्लासखण्डनम् । (१२७.) हे प्रेत !(ते) तेरे निमित्त (अपपपिहितान)पूओंसे आच्छादित (यान) जिन (कुम्भान ) पी मधु आदिसे पूर्ण घडोंके ( देवाः ) देवता ( अधारयन् ) तेरे भोगके लिये धरते हुए (ते) वे घडे (स्वधावन्तः ) अन्नवाले (मधुमन्तः) मधुसे युक्त (घृतश्च्युताः)धोके टपकानेवाले ( ते ) तेरे निमित्त ( सन्तु ) हों यही सायनका आशय है। यास्तधानाअनुकिरमितिलमिश्राःस्वधावतीः तास्तसन्तुविभ्वी ध्रुभ्वीस्तास्तेयुमोराजानुमन्यताम् अ०१८।३।६९ हे प्रेत ! (तिलमिश्नाः )तिलमिश्रित (स्वधावती) सधायुक्त (याः)जो धाना धान (ते) तेरे निमित्त (अनुकिरामि) छोडता हूं (ताः) (विभ्वीः) अधि- काईसे युक्त (मभ्वी) प्रभावयुक्त (ते) तेरे निमित्त (सन्तु) हों (ताते) उन्हें तेरे निमित्त (यमः) यम (राजा) राजा ( अनुमन्यताम् ) स्वीकार करें। भास्कर प्रकाशकी इन अधोंमें मिट्टी खराव होगई है अमि आदिके सम्बोधनफर बैठे हैं मानना पडा है। आरंभस्वजातवेदस्तेजस्वुद्धरौ अस्तुते । शरीरभस्यसंदहाथैनदिसुकृतामुलोके अथर्व० ७१ (जातवेदः) हे अमे!(आरभस्व) आरंभ कर (तेहरः) तेरी ज्वाला (तेजस्वन) तेजस्वी (अस्तु) हो ( अस्य) इस जीवके (शरीरम् ) शरीरको (सदह) फर (अथ ) और (एनम् ) इसको (सुकृताम् उ ) पुण्यामाओंके ही ( लोके लोफमें ('धेहि ) धारण कर ॥ हे अमे ! प्रचण्ड तेज युक्त अपनी ज्यालासे इस मृतफले शरीरको जला और पुनः पुण्यवानोंके लोकमें लेगा। ये अग्रवः शशमानाः परयुहिवाटेपास्यनपत्यवन्त्यः तेयामुदि त्याविदन्तलोकं नाकस्यपृष्ठे अघिदीध्यानाः १८।२।४७अथर्वक अर्प-जो दोपके त्यागनेवाले निस्सन्तान श्मशान फर्मको माप्त हो स्वर्गादि लोकमें प्राप्त है टनको हवि देते हैं यहाँ पूर्णरूपसे विदित है कि मृतक आद होता है। भस्म । (१२८) दयानन्दतिमिरभास्करः। येतेपूर्वेपुरांगताअपरेपितरश्चये तेभ्यो घृतस्य कुल्यै तुशतधाराव्युदती अथई० १८॥२॥ हे जीव ! (ये ) जो (ते) तेरे (पूर्व) पूर्वले (पितरः) पितर(च) (अपरे ) अन्य बांधवादि (1)जो (परागताः) मृतक होगये (तेभ्यः) = निमित्त (घृतस्य )घृतकी (कुल्या) सरिता (व्युन्दती)क्षरण होती हुई (शतध सौ धारा (एतु) प्राप्त हो ॥ सायनाचार्यने “ परापुरः' इसका अर्थ परापृणन्ति पिण्डान् ददतीति परा पिण्ड देनेवाले पुत्रादि ऐसा अर्थ किया है ॥ भा० प्र• वालेको इतना भी ज्ञान नहीं जो मृतकके पूर्वजोंको जो उससे प ही मरचुके उनके दाहके लिये घृत दिवाते हैं और उपस्थितकी उपेक्षा करते है पर यहां अच्छा करनेवालोंके लोकमें जाना मान लियाहै ॥ स्वधापितृभ्योदिविपद्भ्यः स्वधापितृभ्याअन्तरिक्षसन्धः अथर्व० १८।४।८० । ७९ * स्वर्गमें रहनेवाले पितरोंको स्वधा नाम अन्न प्राप्त हो अन्तरिक्षमें रहनेवाले पि रोको स्वधा नाम अन प्राप्त हो ।। अङ्गिरसोनःपितरोनवग्या अथर्वाणोभृगवः सोम्यास ते वुयसमुतोयज्ञियानामपिभद्रेसौमनसे स्याम य अ१९मर जो नवीन गतिवाले सोम योग्य अंगिरावंशी अथर्ववंशी भृगुवंशी हमारे पित हैं टन यज्ञ योग्य पितरोंकी श्रेष्ठ बुद्धि और कल्याण करनेवाली सुन्दर मनोवृत्ति- भी हम स्थित होवें ५० "दूतौ यमस्य मानुगा अधि जीव पुरा इह अथर्व ५ । प्र- ३०६ " इसमें यमराजके दूत वर्णन किये हैं । यौतेश्वानोयमरक्षिता चतुरक्षोपथिरक्षीनृचक्षसो ताभ्यामेनंपरिधेहिराजन्तस्वस्तिचास्माअनविंचोह क०म०१० अ० १ सू० १५ मं० ११ *मेरठ के स्वामीको मय में यह मंत्र नहीं मिलते हमने पता लिख दिया है न सूझे तो अपना क्या दोप है। पर आकाशमैं पितृशरीर तो आप मानतही हैं । देखो समाध्य भया ! २४२ का १८ चतुर्यसमुल्लासखण्डनम् । (१२९) (यम) हे यम (यो)जो दो (ते.) तेरे (पाना) सारमेय ( रक्षितारी) तुम्हारे परफी रक्षा करनेवाले (चतुरक्षी) चार नेत्रपाले (पथिरक्षी)तुम्हारे मार्ग रक्षक (नृचक्षसी) मनुयोसे ख्याति पापे हुए हैं (राजन ) हे राजन् ! (ताभ्याम् ) उन दोनों कुत्तोंसे (एनम् ) इस मेतको (परिधेहि) रक्षामें नियुक्त कीजिये (प) और (अस्मै ) इसके निमिच ( अनमीषम् ) आरोग्यता (च) और (स्वस्ति)कल्याण (धेहि ) धारण करो ।।* इत्यादि मंत्रोंसे विदित होता है कि, बाद मृतक पितरोंफा ही करना चाहिये पदि कोई यह शंका कर फि, क्या यहाँ डाफ नाती है किजो उन पितरोफे पास मन पहुंचाताहे तो इसमें भी वेदफा ही प्रमाण है (उदीरता) इस मंत्र में प्राण- मात्र मूर्ति पितरोंफी कथन करी है. तथा ( पितरो यमराज्ये )जो पितर यम- लोकमें हैं इस कथनसे यह विदित होता है फि, प्राणमात्र तथा सूक्ष्म शरीर- धारी पितर लोकान्तरमें घास करते हैं उन सबको मंत्र संस्कृत अमि हवि पहुं- खाता है यथा हि॥ यममेकव्यवाह त्वञ्चिन्य सरयिम् । तन्नोगीभिः शृवाय॑न्टेषुधापनयायुजम् ६४ मं• अ० १९यजु. (शख ऋषिः मभिर्देवता) (फव्यपाहन) पितरोंके मन प्राप्त करनेवाले !' (अमे) हे अमि (त्यम् ) तुम (चित्) भी (यम् )निस (रपिम् ) विरूप धनको (मन्यसे) टत्तम जानते हो (नः) हमारे (तम् ) उस ( गीर्भिः)वर नासे ( श्रयाप्यं) श्रवण योग्य (पुनं) हविरूप धनको (देवत्रा ) देवताओंके । मध्य (आपनय ) सब ओरसे दो ॥ ६४ ॥ योऽआनः कैव्युवाईनः पितॄन्यक्षतावृधः ॥ प्रेयाचनिवोचतिदेवेभ्यश्चपितृभ्युआ ॥ ६५॥ (यः) जिस ( कव्यवाहनः ) फव्यपाहन नाम ( अमिः) आमिने (मला- वृधः) सत्य या पाके, वृद्धि देनेवाले ( पिन )पितरोंको (यक्षत् ) यजन किया (उइत ) वही अमि (देवेभ्यः ) देवताओं (च) और (पितृभ्यः ) पितरोंके लिये ( हव्यानि) हवियोंको (आ)सब ओरसे (मवोचति) जतलाताहै ॥ ६५॥ • छोटे स्वामीने ( श्वानी ) का अर्थ सकाम निष्काम कर्म कियाहै जिसमें कोई प्रमाण । नहीं है। ऐसे ही अयोसे सामवेद भरा होगा ! ' '..
(१५०) दयानन्दतिमिरभास्करः । त्वमग्नइंडितः कव्यवाहनावाव्यानिंसुरभीणि त्वी - .. प्रादः पितृभ्यः स्तुपयाते अक्षनद्धि त्वन्टैव प्रयताइविषि६६ (कव्यवाहन ) हे कन्य, हव्य वहन करनेवाले (अमे) अमिदेवता ( ईडितः) ऋत्विजोंसे स्तुति किये (त्यम् ) तुम (हव्यानि) इवियोंको (सुरभीगि) अगंधियुक्त (कृत्वो) करके (अवाद ) वहन करते हो ( स्वधयाः) पितृमंत्रद्वारा .(पितृभ्यः ) पितरोंके निमिच (प्रादाः) दो(ते) उन पिताने (अक्षर भक्षण करी (देव) अमिदेव (त्वम् ) तुम भी (प्रयता) शुद्ध (हषि ) हविपांको (अद्धि) भक्षग करो पितरोंने भाग किया हे आमि देवता तुम भी शुद्ध सवियोंको भक्षण करो।। ६६ ॥ येचहापतगंयेचनेइयांश्चविद्मयाऽचनविद्म। त्वयत्ययातजातवेदः स्वगाभियज्ञ सुकृतिनुपस्न ॥ ७॥ (च) और (ये) जो (पितरः) पितर (इइ) इस लोयमें देहको धारण करके वर्तमान हैं (च ये) और जो (इह) इस लोकम (न) नहीं हैं अर्याद वर्गमें हैं (च) और (यान् ) निन पितरोंको ( विद्म ) हम नान्ते हैं (च) और (पान) निन पितरोंको (न) नहीं (प्रविम) जानते हैं स्मरण न होनेसे (गात पेदः) हे सर्वज्ञ अमे ! (ते)वे पितर (पति) मितने हैं (वम् )तुम(3)ही (पेत्य) उनको जानते हो (स्ववाभिः) पितरोंके मनोंसे (सुकृतं ) शुभ पक्ष (अपस्य) सेपन करो ॥ ६७ ॥ यहां इह शन्दसे जीते पितरोंका ग्रहण नहीं होता किन्तु जिन्होंने मरकर कर्म परा इस लोकमें देह धारण किया है अन्यथा न भविन इसका शन्दाय नहीं पर सत्ता विषका अर्थ यह है कि, निनको मैं अपना पितर जानता है, परन्तु का दें यह नहीं जानता हूं अपवा निनको नानता हूँ (पाप दादे परदादे) मिनार नहीं जानता इक्कीस पीटीता ॥ पह तात्पर्य है। दम्पिनुभ्योनौ अस्वये पूर्वीसोपउपरासईयुः । येपार्थिवाजस्यानिपताये वाहन जनाविध ॥८६॥ (अ) अव (इदम् ) यह (नमः) मन (पिंप) पितलिपे (प्र)को ये)जो (पूखासः)मपि (ये) नो (A) तप(i) परमो मानइए (ये)मो (पापियरनास गादिलोकम (विता ) NE .Y चतुर्पसमुल्लासखण्डनम् । (१३१) मान हैं (था ) अथवा (ये) जो (नूनम् ) निश्चप (सुजनासु) धर्म वल- रूप पलसे युक्त (विधु) प्रजाओं अर्थात् मनुष्य लोकमें देहधारण करके प्मान है ।। ६८॥ अधायानः पितरः परासः पृत्नासोऽममतमाशुपाणाः ॥ शुचीडयन्दीधितिमुक्थशॉप्तःक्षामा भिन्दन्तौ अरुणीरपनन्६९ (अमे) हे अमे. (न) हमारे (परासः ) उत्कृष्ट (प्रलासः) सनातन (ऋत) यज्ञको (आशुपाणाः) मात करनेवाले:( पितरः) पितरोने (यथा) जैसे (अधा) अपोलोकसे (शोच ) पवित्र ( दीधिति) सूर्यमंडलको (इद) ही ( अयन् ) माप्त किया उसी प्रकार ( उक्थशासः) उक्यशास नाम स्तोत्रोंको पढते (क्षामाः) पेदीआदि खोदनेसे भूमिको (भिन्दन्तः) भेदते हम ( अरुगो) सूर्यम्पोतिको (अपवन)माप्त हो । ६९ ॥ उशन्तस्त्वानि महाशन्तुः समिधीमहि । उशन्नुशतआ वह पितॄन्हविपेअत्तवे ॥ ७० ॥ हे अमे ! ( उशन्तः) कामायहम (वा)तुझे (निधीमहि) स्थापन करते हैं (उशन्तः) फामा हम तुझे (समिधीमहि) मानलित करते हैं (उशन)हवि चाहने- पाले नुम (उरांतः ) हवि चाहनेवाले (पिर ) पितरोंको ( हायो अत) इवि मक्षगके लिये (आपद) लाओ। यमायसोमः पवते यमायक्रियतेहविः। यमंद यज्ञोगच्छत्यमिदूतोअरंकृतः अथर्व १८-२-१ यमके अर्थ सोम किया जाता यमके वास्ते हदि किया जाता और मंत्रदारा मणिदूत ही यज्ञसे यमके प्रति इवि ले जाता है । इत्यादि मंत्रोंसे आमेका पादमें हवि लेगाना सिद है अब मदनीका पाक्य देखिये। अपसव्यममो कृत्वा सर्वमावृत्य विक्रमम् । अपसव्येन इत्तेन निर्वपेदुदकं भुवि । अ० ३ श्लो०२१४ अपसव्य होकर अमीकरणादिहोम और महान कमको करके पश्चात् दक्षिण हामसे भूमिपर पानी हाले । २१४॥
(१५०) दयानन्दतिमिरभास्करः। त्वमग्नइंडितः कव्यवाहनावाड्दव्यानिसुरभीणि त्वी॥... प्रादाः पितृभ्यः स्तुपयाते अक्षवद्धि त्वन्दैव प्रयताइविषय (कव्यवाहन ) हे कन्य, हव्य वहन करनेवाले (अमे) अभिदेवता (इंडितः ऋविजोंसे स्तुति किये (त्वम् ) तुम (हव्यानि) हयियोंको (सुरभीणि) अगंधियुक्त (कृत्वी ) करके (अवाट् ) वहन करते हो ( स्वधपाः) पितृमंत्रद्वारा (पितृभ्यः ) पितरोंके निमिच (पादाः) दो(ते) उन पितरोंने (अक्षन )मक्षण करी (देव) अमिदेव (त्वम् ) तुम भी (प्रयता) शुद्ध (हषि ) हवियांको (अधि) भाग करो पितरोंने भाग किया हे अमि देवता तुम भी शुद्ध वियोंको भक्षण करो ॥ ६६ येचेवापतयेचनहयांवावेमयाऽउंचनप्रवद्म। त्वत्ययातजातवेदः स्वगाभियज्ञ सुकृत उपस्व ।। ६७ ॥ (च) और (ये) जो (पितरः) पितर (इह) इस लोकमें देहको धारण करके वर्तमान हैं (च ये) और जो (इह ) इस लोकमें (न) नहीं है अयाद वर्गमें है (च) और (यान् ) जिन पितरोंको(विन ) हम जान्ते हैं (व) और (पान ) जिन पितरोंको (न) नहीं (प्रविम) जानते हैं स्मरण न होनेसे (मात बेदः) हे सर्वज्ञ अमे ! (ते)ये स्तिर (यति )मितने हैं ( त्वम् )तुम(उ)ी (त्य) उनको जानते हो (स्वचाभिः) पितरोंके मत्रोंसे (सुकृतं ) शुभ यज्ञको (जुपस्य) सेवन करो ॥ ६७ ॥ पहां इह शब्दसे जीते पितरोंका ग्रहण नहीं होता किन्तु निन्दनि मरकर फर्म- पश इस लोकमें देह धारण किया है अन्यथा न प्रविन इसका शन्दार्य नहीं पर सतना विद्यका अर्थ यह है कि, मिनको मैं अपना पितर जानता है, परन्तु का है यह नहीं जानता हूं अपया निनको नानता हूँ (पाप दादे परदादे) मिनी नहीं जानता इक्कीस पीटीतक ।। यह तात्पर्य है। दम्पतृभ्योनों अस्त्राये पूर्वी सोयउपरासईयुः । रोपार्थिवेग्जस्यानिपताये वाहन जनावर ॥ ८६ ! (म) अप (इदम् ) यह (नमः) मा (पिपितरों के लिये (भ) हो (क)जो (वांसः) वापि है (ये) जो (उपस) तहाप() सो पामर () नो (पापिवरनाम स्वादिलोकम (निपता) राम
चतुर्पसमाचासखण्डनम् ।
(१३१)
-मान हैं (पा) अथवा (ये) जो (नूनम् ) निश्चय (सुजनाम) धर्म बल.
संप पलसे युक्त (विशु ) प्रजाओं अर्थात् मनुष्य लोकमें देहधारण करके
पर्चमान हैं ॥ ६८॥
अधुयानः पिताः परासः प्रत्नासोऽमग्नतमाशुषणाः ।।
शु/डयदीपितिमुक्थशासुःशामा भिन्दन्तौ अरुणीरपबन्६९
(अ)हे अमे. (नः ) हमारे (परासः ) उत्कृष्ट (प्रलासः) सनातन (ऋत)
यज्ञको (माशुपाणाः) मात करनेवाले:( पितरः) पितरोने (यया)जैसे (अधा)
अधोलोकसे (शुचि ) पविन (दीधिति) सूर्यमंडलको (इद) ही ( अयन)
माप्त किया उसी प्रकार ( उक्थशास:) उक्थशास नाम स्तोत्रोंको पढ़ते (सामाः)
पेदीमादि खोदनेसे भूमिका (भिन्दन्तः) भेदते हम ( अरुगो) सूर्पम्पोतिको
(अपवन )प्राप्त होवें। ६९ ॥
उशन्तस्त्वानि मधुशन्तुः समिधीमाह ।
सुशन्नुशतआ वह पितॄन्दविपेअत्तवे ॥ ७० ॥
हे अमे ! (उशन्तः) कामायौं हम (ला)तुझे (निधीमहि) स्थापन करते हैं
(उशन्तः) कामाथी हम तुझे (समिधीमहि) मलित करते हैं (उशन)दवि चाहने-
पाले तुम (उशंतः) हरि चाहनेवाले (मिट्टर ) पितरोंको ( होतो अतवे) हवि
मागके लिये (आवह) लाओ।
पमायसोमः पवते यमायक्रियतेहविः।
यमंद यज्ञोगच्छत्यमितोअरंकृतः अथर्व १८-२-१
यमके अर्थ सोम किया जाता यमके वास्ते हवि किया जाता और मेवदार
अमिदूत हो यज्ञसे यमके प्रति इवि ले जाता है ।
इत्यादि मंत्रोंसे आपका पादमें इवि लेनाना सिद है अब मनुनीका पाक्य
देखिये।
अपसव्यमनो कृत्वा सर्वमावृत्य विक्रमम् ।
अपसव्येन इस्तेन निवपदुदकं भुवि । अ० ३श्लो० २१४
अपसव्य होकर अमौकरणादिहोम और मदान कमको परके पक्षाद दक्षिण
हामसे भूमिपर पानी डाले ॥ २१॥
. . (१३२) दयानन्दतिमिरभाकरः। प्राचीनावातिना सम्यगपसव्यमतन्द्रिणा। पिच्यमानिधनात्कार्य विधिवदर्भपाणिना ॥२७९ ॥ दहिने कंधेपर यज्ञोपवीत रखके आलस्यरहित होकर दर्भ हायमें ले अपसन्यः यथाशास्त्र सब फर्म पितृसम्बन्धी समाप्ति पर्यन्त करै ।। २७९ ॥ इन बातोंके विचारनेसे विदित होताहै कि, जीवित विद्वान् पुरुषोंका नाम पितर नहीं है किन्तु जो मृतक होगहें श्राद्धतर्पण टन्हींका होताहै यदि देवता और पितर यह दोनों नाम विद्वानोंके होते तो पितृकर्म अपसव्य और देवकर्म सत्य हो. करने क्यों लिखे जाते तया जो सपिंड पितर यमलोकमें हैं टनको यह अन्न प्राप्त. हो इस वेदवाक्यसे यमलोकमें स्थित पितरोंको अन्न मिलना कहाहै यदि विद्वानोंका अर्थ करें तो विदान् तो इसी लोकमें हैं (टनको यह अन्न दृष्टिगोचर हो) ऐसा. फहना नहीं बनसक्ता क्यों कि वे तो इसी लोकमें हैं और सामने बुलाकर अन्न दें सक्ते हैं फिर (समानासमनसः) सपिंड और मनस्वी पितर सपिंड पितर कहनेसे तो पितामहादिकोंका ही वोय होता है यदि विद्वान् अपने सम्बन्धके न हों तो उनके लिये सपिंड शब्दका प्रयोग नहीं होसक्ता ॥ फिर सपिंड मनस्वी पितरोंकी धन सम्पत्ति हमारे पास १०० वर्पतक वास करा यह बात तो पितामहादिकोंमें ही वनसकैगी क्यों कि पुत्र पिता पितामहादिकोंके ही धनका अधिकारी होताहै, और जो विद्वानोंहीका नाम पितर कहते हो तो इस मंत्रके अनुसार जैसे उनको सत्कार पूर्वक बुलावे सो झट उनका मालमता छीनले और कहदे कि स्वामीजी कहगये हैं तुम्हारा धन हमारे यहां सौवर्वतकरहै बस ऐसे अर्योस बहुतसे विद्वान् स्वामीजीकी जानको रोवेगे, क्यों किमंत्रके अर्थ करआज्ञा दे दी है पुनः मनुष्य देवता पितरोंके दो मार्ग कैसे बनेंगे वे मार्ग स्वर्ग और पृथ्वीके मध्यमें वर्तमान हैं यह क्रियावान् विश्व इन्हीं दो मागोंसे जाताहै यह जो पूर्व मंत्रका अर्थ कर आये हैं यदि विद्वानोंका नाम पितर पानलें तो यह दो मार्ग कैसे बनेंगे और क्या विद्वान् पृथ्वी और स्वगके बीचमें लटकतेहैं यह हो नहीं सक्ता केवल पितर हो जो माणमात्र मूर्ति हैं वायुके आधार मध्यमें स्थित रहसक्ते हैं क्यों कि (असुंयईयुः) इसका यही अर्थ है कि पितरमाण- मात्रमूर्तिवाल और सूक्ष्मशरीर हैं और इस लोक मध्यलोक परलोकमें स्थित जो पितर हैं वे ऊर्वलोकको जाओ तो क्या इस मंत्रसे आपके विद्वान्नामरे पितर मध्य लोकमें और परलोकमें कैसे स्थित होसक्ते हैं कभी स्वामीनी ऐसी करामात दिखाते कि दोचार घंटको आकाशमें प्रवेश करनाते तो लाखों ही चेले होगाते और महायोगिरानों में गिनती होती यदि विद्वानों काही नाम पितर है तो जीवित .
(१३३) चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । है तो जिस समयमें वे परमें आवे तो उन्हें ऊर्द्धलोक कैसे भेनें, स्थूलशरीर होने देहसे तो जा नहीं सक्ते यदि उन जीवतोंका माण बहिर्गत कियाजाय तो जाई- लोक गासक्ते हैं तो.वही दशा होय कि जैसे एक नाई किसी बाचाजीकोमार आफ्न तमें पडाया यह दृष्टान्त इस प्रकार है कि एक मनुष्यने तप कर यह परदान पाय- 'कि हजामत बनवाते समय गोमंगता आवे तू उसे मारडालियो सोना होजायगा एक समय हजामत बनवाते समय कोई मंगता आया और उस पुरुपने झट मार गिराया कि वह सोना होगया नाई देखते ही कहने लगा कि यह तो खूबनुखसा हापलगा सोना सहनमें होताह यस पहभी घर जाकर इसी फिलमें बैठा और -मांगनेको आपेहुए किसी साधुको मार गिराया और उसमें कुछ न पापा अन्तमें रागदारम पकडा जाकर दूंडभागी हुआ इससे जीवित विद्वानोंका ऊर्ध्वगमन सर्वथा असंभव होनेसे मृतकोंका ही श्राद्ध करना और (पूर्व पितरः) इस वाक्यमें जो पूर्वशब्द है यह पहले पितामहादिका ही सूचक है और वही हविग्रहण कर -सक्ते हैं, यदि विद्वानोंका अर्थ लगा तो वह उन्हें धैठालदें उनके सामने हवन करर्दै उनका पेटभरजायगा सोयहवात देखनेमे नहीं आती इसकारण पितर ही हैं जो शरीर त्यागन फरगहें बर्हिपदः)कुशासनपर बैठनेवाले पितर आवे हमारे शोक और भयको हटावें और हमें सुख दें जो हमारे पूर्व पितर हैं वोह पापका अभाव स्थापन कर देवयान मार्ग होकर आवे जो अमिमै जलाये हुए हैं जो अमिसंस्का- -रंसे रहित हैं माणमात्रमूर्ति स्वर्गमें रहनेवाले पितर मेरा कल्याण करें। यदि सर्वमीजी विद्वानोंकाही अर्थ हैं तो ऊपरके वाक्यानुसार जलायेहुए विद्वानोंको कहाँसे लाया जायगा जलना तो मृतककाही है हां एक बातसे दयानंदनीका इष्ट सिद्ध होसक्ताहै परन्तु वे इसको मानते नहीं हैं आचारी मतवाले श्रीरामानुजकी सम्पदायवाले दग्ध और अदग्ध होतेहैं तप्त और ठंढी मुद्राके भेदसे यदि इनको दयानंदजी अपना पितर मानतेहों तो कुछ थोडीसी ठीक लगजाय परन्तु आगे चलकर फिर वही दुर्दशा क्यों कि." स्वर्गमें वर्तमान पितर और प्राणमात्रमूर्तिवाले यह वात जीवित विद्वानों में नहीं पट सकती इससे भी जीवित पुरुषोंका माद और विद्वानोंकाही नाम पितर है यह नहीं सिद्ध होता फिर दक्षि- 'णकी ओर दक्षिण जाप झुकाकर पितर बैठे" यह बात भी मृतकपुरुपोंको वता- तीहै श्राद्धादिकार्य दक्षिणदिशामें मुख करके करने लिखे हैं * और "देवकार्य पूर्षकी तरफ मुख.करके इस कारण इन दोनों कार्यों में महान् अन्तर है :. थोडा उपयोग विचार और भी करते हैं। 'अनापति वे भूतान्युपासदिम् देवा यज्ञोपवीतिनो भूत्वा दक्षिणं जान्याच्योपासीदस्तातानन. पियज्ञो वोनममृत व उर्वः मूर्यो पो ज्योतिः श० २।४।२।१- (१५४) दयानन्दतिमिरभास्कर। यदि विद्वान् ही देवता पितर हों तो फिर अन्तर क्या, दक्षिण पूर्व मुख करला क्या फिर उनके आसनपर बैठना यजमानको धन दोयह बात भी जीवितं विज्ञान नहीं करते यजमानको अपना धन नहीं देते पुनः पिता पितामह मपितामह मुझे पूर्ण आयु दो पवित्र करो यह बात भी जीवितोंमें नहीं, कोई आयु नहीं देसका षे स्वर्गके पितर ही भला करनेमें समर्थ है और पितरोंसे पुत्रकी कामना करना स्त्रीका पिण्य भक्षण करना यदि स्वामीजी जीवित विद्वानोंको पितर मानते हैं तो भला यह विदान विना संग किये कैसे पुत्र दे सकेंगे और स्त्री क्या पिण्डफे स्पानमें भक्षम करें कदाचित् यह नियोग आपने इसी कारण चलाया होगा फिर अथर्ववेदके यह वाक्य कि जो मर गये हैं जो अन्तरिक्षमें हैं उन पूर्व पितरोंको यह घृतमधु धारा माप्त हो तथा जो गाड़ दिये गये जो फेंके गये जिनको हम जानते निनको नहीं जानते हैं हे अमे उन्हें बुलाला उनके अर्थ हवि लेना तथा (पूर्व पितरः ) और अयनं पितरः माचीनातिनः सव्यं जान्वाचौपासीदंरताननीन्मासि मासि पोशन स्वपा पो मनोजवश्चन्द्रमा यो ज्योतिरिति श० २२ भयेनं मनुष्य प्रावृत्ता उपस्यं कृस्वोपासीदस्तानप्रवीरसायं मातोशनं प्रजा पो मृत्यु वोग्निज्योति श० शा२।३ पूर्वानो वै देवाना मध्यन्दिनो मनुष्याणामपरातः पिणा तस्मादपराहे पदाति २०२० तिर इव हि पितरो मनुष्येभ्यः श. २०३२।२।१ मर्य-प्रजपातके पास प्राणो गये देवता यज्ञोपवीती होकर दक्षिण जाप एकाकर . प्रजापतिने कहा यज्ञ तुम्हारा मन भमृत तेज और सूर्य ज्योति होगी १ पितर भासाय हो पाई जाय झुकाकर येठे प्रजापतिने कहा महीने २ यज्ञ तुम्हारा मन मनकी समानवेग भोर चन्द्रमा ज्योति होगी ॥२॥ मनुष्य उपस्य करके पेठे प्रजापति बोले सायं प्रातः तुम्हारा मन प्रजा प्रगटता मृापुमाही भोर आमिज्योति होगी पूर्वाद देवता का दुपहर मनुष्योंका भार तीसरा पहर मितराको भोजनका है। मनुष्याप्त पितर अन्नाहित रहते हैं इन प्रमाणोंसे प्रगट है कि देवता मनुष्य पितर.मग पितर मनुष्योंसे अन्तहित रहते तया महीनमें एकबार भोजन करतेह इससे पितर देता मनुष्यसि पृयक हैं और पितरोंका स्थान ! कृतीया हं प्रद्योरिति यस्यां पितर मासते मपर्व १८४८ ये शतंमनुष्याणामानन्दाः स एकः पितृणा तिलोकानामानन्दः .उप.श३३३३ अर्थ-ससे अपर मन्तरिक्षका तीसरा माग मूर्यादिके प्रश्नर प्रकाशवाटा होने से भी पहाता है यहां पितरोंकाचक है जिसमें पितर रहो हेरानो सौ मनुष्यों का मान वह एक पितृलोनितका आनद है इन मंत्र मानक प्रमाणात पितरां रहने को मी म होगय इतना ही द्धिमानीको बात है विशष देखना हो तो हमारा काम माथ्यका १९ अध्याय देखो।
चतुर्थसमुल्लासखण्डनम्। (परेताः)निसके मर्थ पहले पितामहादि मृतक हुए यह शब्द बहुधा वेदोम भाता है जसेहुनाको स्वर्गम अमि हवि पहुँचाथै यह बात जोषितोंमें कदापि नह दोसक्ती और पेदमें लिखा हैनोसन्तानरहित पितर स्वर्गमगपे है(हिवादेपास्प नपत्यपन्तः अपर्व ) और जो पितामहादिक अन्तरिक्षमें प्रवेश कर गये हैं उनका भनदारा सत्कार करते हैं स्वामीनासे जूझना था कि क्या पितामहार्दिक मीवित ही भन्तरिक्षमें प्रवेशकर जाते हैं या वे जीवित विद्वान ही पितामहादिक हैं क्या के भी जीवित अन्तरिक्ष में प्रवेश फरगये हैं सो तो नहीं हुआ परन्तु स्वामीनी मृतक हो भन्तरिक्षमें प्रवेश फरगये, पदि स्वामीजी अंथर्ववेदफा पाठमात्र भी करते तो पेसी भूल न होती तथा जो मृत्युदारा प्राणियोंफा वध करता है जो पितरोंका राना है जिसे यम कहतेहैं उनके अर्थ हम यह तिलमिश्रित धान देते थे.हमसे प्रसन्न हों ( यमरानाके अधीन पितर हैं इस कारण उन्हें भी भाग देते हैं) और फिर अमिफी प्रार्थना फि हे अमि। इसके शरीरको जलाकर इसकी मात्माको पुण्पलोफको सेना जो पूर्वपितर हैं जिन्हें हम नहीं जानते है ममि 1 तू जानता है नो स्वर्ग अन्तरिक्ष लोक में है टनको हषि अमिदार पहुँचे स्वामीनीको पहन सूझी नीपित अन्तरिक्षमें कैसे ठहरसक्ते हैं अथवा यह युक्ति करते कि दो पड़ी गाड एफ उपर हिंडोलेफी तरह बांध देते टसमें किसी विदानके मातापिताको टांगदेते तो (दिविपदयः) आफाशमें रहनेपालेपितर है यह शब्द सिद्ध होजाता मर्थ पदलनेकी आवश्यफता न रहती पर स्वामीजाने तो यह पाक्य ही हनम कर लिपे लिखे ही नहीं पर पद न सोचा कि पुस्तफै तो कहीं लोप नहीं हो गई और (या ते श्यानी ) देखिये आजतफ भादमें कुचेको भाग दिपानाता है यह यमके दूत हैं प्रथम इनको भाग देतेहैं जो कि यह पितरोफे भागसे न लें और भगिरा- पंशी पितर नवीन गतियाले (अपर्वाणः ) अधर्षशार्प मन्द चलनेवाले और भृगु, शी पितर (यह पितृगण हैं) हमारा फल्पान इत्यादि पहनसे पचन चारों संक्तिाओंमें पूर्ण हैं जो पिरतारभपसे नहीं लिसेन्पायी महात्मा जो पक्षपातर हित हैं उन्हें तो पही पद्धत हैं माद मृतफॉपाही माचीन समयसे होता आताहै मो घेदमें सिद्ध है और यह जो कहीं दयानन्दनाने आक्षेप किया है कि, क्या पहो साफ नाती है हापसाना है नो टनके पास भन्न पचता है सो मुनिये पह मन्मसंस्कृत अमि ही पहा से नाता है इसमें पशु और नपर्षमा प्रमाण है, मन्म लिस दिये हैं (यममे) इस मन्ममें नामिसे माना पी है फि पिशी सेना मौर पितरोंपो दे तपा (पोपमामि ) इस मंत्रमें मी पितरोंको मामिषा विले नाना पारकर मगले मन्यमें यह पहा है कि ममि ! तेरे दिये ९ ६दियो पितरोने भाण किपा, भौर नो पितर परलोकमै हनिमपो हम नहीं
(१३६)
दयानन्दतिमिरभासरः।
जानते उन सबको हपिसे तुत कर, तू ही सब पितरोंको जानता है, असे !
हम तुझे प्रबलित करते हैं पितरोंको हविभागको ला, अमि दूत होकर यम-
लोफमें पितरोंके पास जाता है हवि देनेको इत्यादि मन्त्रोंसे ममिका पितरोंके पास
हपि लेगाना सिद्ध है और यही अमि मृतकके आत्माको संस्कृत होनेसे पितृलोक
को ले जाताहै जैसा कि (मेहि ) इस मन्यसे सिद्ध है, जब कि पिता दादा परदादा
इन तीनोंफा श्राद्ध करना यह वेदकी प्रबल आता है जब किसीके पितामह मृतक
हो जायंतो यह आपके मतमें श्राद्ध ही न करे क्योंकि जीवितमें ही श्राद्ध करना
फहते हो वस सारा झगडा ही समाप्त कर दिया, दादा परदादा तो बहुतकि
देखनेमें नहीं आते, पोतेके जन्मतक पृद्ध होने के कारण मृत हो जाते हैं बस
आपने टनका चुल्लू भर जल भी उडादिया ( इस अपराध करनेवालेका
जन्म मारवाड देशके फठिन जंगलमें हुआ होगा जहां पानीका नाम न हो)
जलदानका वर्णन. नियोग प्रकरणम करेंगे कि किस प्रकार पहुँचता है,
इन मंत्रोंसे यह सिद्ध होगया कि बाद मृतक दादा परदादा आदिकोंका होना
चाहिये अब स्वामीजीके कल्पित वाक्योंका उत्तर लिखते हैं “जो सांगोपांग
चारों वेदोंको पढा हा वह ब्रह्मा उससे न्यून देवता उनकी सदृश स्त्री आदिकोंकी
सेवा करनी श्राद्ध और तर्पण फहाता है यह दयानंदजीको महाभ्रांति है ब्रह्मा
नाम उसी स्वयंभूका है जिसे चतुर्मुख कहते हैं, जैसे पूर्व लिन माये. हैं कि प्राणि-
योमें प्रथम ब्रह्मा हुए तथा (यो वै ब्रह्माणं विदधाति पूर्व ) यह उपनिषद् वाक्य
है कि जो ब्रह्माको सबसे प्रथम उत्पन्न करताहै तथा च मनु (तस्मिञ्जज्ञे स्वयं
ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः ) उसमें सर्व लोक पितामह ब्रह्माजी उत्पन्न हुए (हिए.
ण्यगर्भः समवर्तताले) ब्रह्मा सबसे पहले थे यह यजुर्वेदमें लिखाहै तर्पणमें इन्हीं
'ब्रह्मानोका नाम है इन्हींक अर्थ जलदान होताहै, न कि जो चार वेद पढ़ा हो
वह ब्रह्मा कहावै क्यों कि (उदीरतां) इस मंत्रमें जो ( ऋतज्ञा ) शब्द पड़ा
है उसका यह अर्थ है कि जो ययावत् सत्यको जानता (विरूपास इदृपपस्त इन्द्र
म्भावपसः ॥ तेअङ्गिरसः सनमस्ते अमे परिजज्ञिरे ऋग्वे०८ । २ । '१)
इसमें (विरूपासः ) नाना रूपा अनेक प्रकारके रूप रखनेवाले (अप्पः अवि-
तयस्य ब्रह्मणो द्रष्टार न केवलं पश्यन्ति अपिच गम्भीरवपस: अप्रमेयकर्माणः
अप्रमेपबुद्धयो वा ते अङ्गिरसः सूनवः ते अमे परिजज्ञिरेत्यादि )ऋपिलोग गों
अंगिराके पुत्र अमिसे उत्पन्न हुए, वे सम्यक प्रकार ब्रह्मके देखनेवाले थे, और
अप्रमेय बुद्धिमान थे, जिनकी बुद्धि यथावत् वेद शास्त्र में प्रवृत्त होतीथी जब कि
* बहुरूपा ऋषयले गम्भीरकर्माणो वा गम्भीरप्रज्ञा मातोरसः पुत्रास्ते मेरधिनजिरे
नयमिजन्मपितरो व्याख्याता निरू. २१॥ १७॥
चतुर्यसमुल्लासखण्डनम् । (१३७) ऋषि योगी आदि पथावत् वेदको साङ्ग जानतेये, उनका नाम कहीं ब्रह्मा किसान नहीं कहा, तो यह बात कैसे प्रमाण होसक्ती है, कि जो साङ्ग चारों वेदोंको जाने वही ब्रह्मा, दयानंदजी तुम भी तो सृष्टिक्रम आर साङ्ग घेदोंके जाननेका अभि- मान रखते हो अपना नाम ब्रह्मा रख लिया होता और व्यास वसिष्ठादि जोयया- वत् वेदको जाननेवाले थे कहीं ब्रह्मा न कहलाये इससे वेद पढनेवालेको यहां ब्रह्मा कहना सर्वथा झूठ है और “जो ब्रह्माके पोते मरीचिवत् विद्वान् होकर पढावें उनके सदृश विदुपी स्त्री उनको सेवा करनी ऋषितर्पण है (ॐमरीच्यादय ऋषयस्तृप्य- 'न्ताम् ) स्वामीनी इसमेंसे वह आपने कहाँसे निकाला ब्रह्माके पोते मरीचिवत् विदान होकर पढावें, उसकी सेवा ऋषि तर्पण है ऊपर तो आप वेद जाननेवालेका नाम ब्रह्मा लिख आप हैं, अब किसी निश्चित पुरुषका नाम कहकर उनके पोतेका माम मरीचि बताते हो, धन्य है इस बुद्धिको कि बालकोंको भी हँसी आती है यह न लिखा मरीचिमें कितनी विद्या थी, यह कहना आपका सर्वथा असत्य है अपर्व चेदमें ऋपियोंकेनाम लिखे हैं, सो आगे लिखेंगे उनकोजल देना ऋषितर्पण है अब सोमसदादि शन्दोंकी जो दयानंदनीने व्युत्पत्ति लिखी है उससे जिन २ का पोध होता है सो मुनिये जा परमात्मा और पदार्थविद्या में निपुण हों वे सोमसद् कहाते हैं, इससे पह जाना जाताहै कि, जितने मनुष्य पदार्थविद्या जानते हों चाई बेशुद्ध पवन कृश्वीन अंगरेजादि क्यों न हो सब पदार्थविद्या जाननेवाले सोमसद हो गये, साफ ही लिखदिपा होता कि जिस शालामें Physics फिजिक्स पाई 'जातीहै वहाँके अंगरेज अध्यापक और विद्यार्थियोंको बुलाकर सत्कार करना 'ही सोमसद पितर हैं धन्य है अच्छे २ पितर सत्यार्थप्रकाशमें लिखे हैं, लाखों सोमसद मिलजायेंगे, पर अंग्रेज अधिक होंगे और आपको उन्हें पितर कहना मुक्त ही है (जो अभि और विशुदादि पदार्थीको जाननेवाले हों व अमिष्वातं) 'यह विद्या तौ तारबाबू और रेलके गार्ड इंजीनियर आदि महाशयोंको ही आतीहै 'सो हजारों क्या लाखों अमिष्याच स्टेशन पर मिल जायगे, दयानंदनीने, सोचा कि एक दिन ड्राइवर इंजीनियर और तारबाबुओंका भी सत्कार करना चाहिये शायद कभी विना टिकटके प्लेटफार्म पर तौ धूम सकेंगे, सिपाही लोगोंके 'पके तो नसहने पड़ेंगे धन्य है रेलवाले भी पितर हैं और सिपाही लोगों को कौनसे पितरोंमें रक्खा इन्हें भी तो कुछ देना चाहियेथा कोई पितमें मिठादिया होता (जो उत्तम विद्यावृदिन्यवहारमें स्थित हों वे वहिवद् ) उत्तम विद्यादि व्यवहा- शे. आजदिन गौरागोंसे उत्तम-कौन है जहाँ सौमें८८पड़े हुए हैं भारतवर्ष में सौमेंसे १३ ही हैं कैसी २ उत्तम विद्या निकाली हैं, बस वार्ड सद् पितर गौरांग ही हुए आपने सोचा होगा कि इन महाशपोंके भोयमें भी अधिक लाभ होगा कृपादृष्टि . (१५८) दयानन्दतिमिरमांका। होते ही दरिद्र पार हो नापना, पाइ गौरांग भी पितर बनाये सब कुछ आपकी चार इन्होंसे मिटतीह (जो ऐश्वर्य रक्षफ महौषधिपानसे रोगरहित भन्यो ऐश्चर्य रक्षक तथा रोगको औषधी देकर नाश करनेवाले हैं. घे.सोमपाः ) पन्य है डाक्तर भी आगये अव हकीमजी भी पितर होगये आर यह महोपी कौनसी उसका नाम न लिखा हकीमोंकोजरूर आदमें जिमाना कदाचित् पन मान वीमार होजाय ती औषधी तो अच्छी प्रकार करेगा परन्तु डाक्तर भौर हफीमनी ऐश्वर्य रक्षक तो नहीं किन्तु भक्षक हैं यह शन्द फैसे घटेगा क्यों कि १६ रुपये ४) प्रति दिन भेंट चाहिये इन्, निर्धन कैसे पितर बना सते हैं और मनुनी ऐसे पितरोंका निषेध करते हैं। चिकित्सकान्देवलकान्मांसविक्रायणस्तथा । विपणेन च जीवन्तो वास्युइव्यकव्ययोः अ०३श्लो०१५२ वैद्य, पुनारी, मांस घेचनेवाला, पाणिज्य करनेवाला यह सव मादकर्म और . देवकर्ममें वर्णित हैं इस कारण सोमपाका अर्थ ठीक नहीं सोम एफ औषधि है देवता पितरोंफो प्रिय है उसके पानसे ये सोमपा फहातेहैं जो मादक और हिंसा फारफ द्रव्योंफो छोडफे भोजन करते हैं वे हविर्भुग अबफे माव्यर्तयांसी पितर एनाये सरावगी माचारी वैष्णव शैव सब ही पितर होगये परन्तु मादपदम्य भंग तमाख सुलफे अफीम मादि द्रव्यफा सेवन तो बहुत ही करते होगे अन्य देशवारी हिंसा और पान दोनोंसे नहीं बचें इस कारण दयानंदनीको हपि न पितर मिट कठिन हैं (जो जानने योग्य वस्तुके रक्षक और पृतदुग्धादिक खाने और पीनेहा हो वे आज्यपाः ) इसमें तो सप ही पितर होगपे दूध पीनेपाले भी पितर है। पालफ जन्महीसे दूध पीते हैं हलवाई पोसी और इनके यहाँक सब दूधके माहर पहलवान मुसल्मान आदि चारों वर्ण सच जातें एवं संसार ही दूध पीताई तो यह संबके सब आपके पितर हैं अपना नाम नलिसा कि स्वयं कोनसे पितरोंमें हो (गिनका अच्छा धर्म करनेका सुखरूप समय हो पे मुफालिन् ) यह तो ममीर और भक्त पितर बनाये क्यों कि अमीरोंका रूपपैसे भक्तोंका झानसे मला समप पटताहै (गो दुष्टोंको दंड और भेष्ठों पालन करनेहारे न्यापकारी हों में यम) एस इतनी ही कसर पी हाकिमोंकोनारमोन्य देना चाहिये क्यों दंड पही देते? भेष्ठाको यही पाल, इस कारण इनको मुलाफर र निमाना चाहिये रिसी पद मे सहायता करदेंगे परन्तु इनका भोजन अन्य प्रकारका और मदने (पास्तेपाना) समरानको तिरपान देना लिसाद मौर आपके यम इसे स्वीकार करेंगे नहीं तो कसे टीमोमी भौर पप प्रापमें परदेश १
चातुर्षसमुहातखण्डनम्।
अथ परस्तादुल्मुकं निदधाति सयदानधायोल्मु-
कमयतत् पितृभ्यो दद्यात् असुर रक्षसानियामे-
तद्विमथीरंस्तथहितत्पितणामसुररक्षसानिनविमानते
तस्मात्परस्तादुल्मुकं विदधाति २।४।२।१४ श.
अर्प-पितरोंके पिंडदान करनेकी वेदीके आगे उन्मुक धरै, यदि जलती लफडी
अपरफर पितरोंको दे तो असुर राक्षस इनके भागको गडवट कर देते हैं इस
लिये जलती लफडी धरदे यह वैदिक विधि है तो जब पंडित हाकिम विद्वान इनको
महामोन करावै तौमेनपर एक जलता बबूरका लक्कड भी ला रक्खा फरै. क्योंकि
पितृपङ्गकी विधि ही ऐसी है और मनुनीने लिखा कि ॥
पित्र्येराव्यहनी मासः प्रविभागस्तु पक्षयोः ॥ ०१ श्लो०६६
(पितरोंका रातदिन एक मासका है जिसका विभाग दो पक्षों में है कृष्ण पक्षका
दिन शुकपक्षकी रात्रि है तो क्या दयानंदियोंके पंडित और यम पंद्रह दिन सोते)
इसमें तो सारा संसार ही पितृरूप बना दिया अच्छा जीवित भाद निकाला जव
माप पदोंकी सेवाफा नाम भाद बताते हो तो वे वृद्ध जिनके पितामहादि नहीं
हैं किनकी सेवा करें बस बैठ रहैं आपके लेखसे यह सूचित है कि दादा जीवित
हों तो पोता भाद करै पिता दादा कुछ न करें और यदि जीवित पितरोंका, श्राद्ध
'मानते हो तो (भादे शरदः ४-३-१२) पह अष्टाध्यापीका सूत्र है कि, शरद
कामें माद फरे ( तया अमावसको करे यह मनुनी कहतेहैं) तौ ग्यारह महीने
तक पिता, मातादिकोंको उपवास करावे, और माता पिता बालकोंको जन्मसे
सालते हैं, तो क्या यह भी भाद ही हुआ और जिसके पिता दादापै लाखोंकी
सम्पति हो उसका पुत्र क्या सेवा फरैगा, तो वस भाद्ध ही उढगया इससे आपका
कपन ठीक नहीं आदफा समय नियत है. अब तुम्हारे कल्पित अाफी पोल खोल
घोमसदादि भयोफी म्याल्पा लिखते हैं।
मनोहरण्यगर्भस्य ये मरीच्यादयः सुताः।
तेपामृपीणां सर्वेषां पुत्राःपितृगणाः स्मृताः॥१९॥ अ०३
विरासुताः सोमसदःसाध्यानां पितरः स्मृताः।
अनिष्वात्ताश्च देवानां मारीचा लोकविश्रुताः ॥ १९५॥
देत्यदानवयक्षाणां गन्धवारगरक्षसाम् ।
सुपर्णाफिन्नराणां च स्मृतावहिपदोऽविजाः ॥ १९६॥
:: 1 (१५०) दयानन्दतिमिरभास्करः। सोमपा नाम विप्राणां क्षत्रियाणां विर्भुजः । वैश्यानामाज्यपा नाम शद्वाणां तु सुकाठिनः ॥ १९७ ॥ सोमपास्तु कवेः पुत्रा इविष्मतोगिर सुताः। पुलस्त्यस्याज्यपाः पुत्रा वसिष्ठस्य सुकालिनः ॥ १९८॥ अग्निदग्धानग्निदग्धान्काव्यान्वहिपदस्तथा । अग्निष्वात्तांश्च सौम्यांश्च विप्राणामेव निर्दिशेत् ॥ १९९॥ य एते तु गणा मुख्याः पितृणां परिकीर्तिताः । तेपामपीह विज्ञेयं पुत्रपौत्रमनंतकम् ॥ २० ॥ राजते जनेरेपामथो वा राजतान्वितैः । पायपि श्रद्धया दत्तमझयायोपकल्पते ॥२०१॥ कण्वः कक्षीवान्पुरुमीढोअगस्त्यः श्यावाश्वः सौभयर्चना नाः। विश्वामित्रोयंजनदग्निरनिरवन्तुनः कश्यपोवाम- देवः १५ विश्वामित्रजमदग्नेवसिष्टभरद्वाजगौतमवामदेव, शदिनोअविरग्रभीन्नमोभि सुसंशासः पितरोमृडतानः १६ काण्ड १८ अनुवाक ३ मंत्र १५1१६ अथर्व० ‘इन्हफि वंशके पितर हैं यह प्रगट है | यह वैदिक ऋपि हैं। स्वायंभू मनुके जो मरीचि आदि, उन ऋपियों के पुत्रः पितृगणों को मनुनीने कहाहै,१९४ विरादके पुत्र सोमसदनामवाले ये साध्योंके पितर ऐसे फहे मणि प्पाचादि मरीचिके पुत्र ह व लोगों में विरूपात हैं और देयताकि पितर कहा। १९५ दैत्याफे पितर वहिपद नामवाले अधिक पुत्र हैं, दैत्य, दानप, पा, गंधा, उरग, राक्षस, मुपर्ग, किनर इन भदाक हैं १९६ सोमपा माझगौक हविर्भग क्षत्रि- पशि मान्यपी वैश्यों के मुकालिन शूद्रों पितर हैं १९७ भृगुफे पुत्र सोमांति अंगिरा के पुत्र हषिमंत, पुलस्त्य पुत्र आन्पादि और पसिएके पुत्र मुशालिन् है, यह पितर इन अपियोंमे हुए १९८ अमिदग्य अनामिदग्ध और काय तपा रहिंद भी और अमिप्यात तया सौम्प यह सा ग्रामकि रितर "नांतर १९९ यह इतने पितरोंके गम मुम्प की इतो इस जगतमें पुत्र पीय अनन्त । छो मानना २०० बांदीके पार करके या नादी लगे पायमे निकि मोदर दिपा पानी अाप मुखम हेतु होता. २.१ इम प्रहार यह पितराके गर ! मो निम तिरपितामहादिर नो मतादात इन्दी सम्पपिनगंदा को न चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (१५१ कुछ दिया जाता है सो पहुंचताहै दयानंदजीने व्याकरण खर्च कर सारे जगता ही पितर बना दिया, यह नाम इन्हीं पितरोंमें रूढि है और इनके पास जिनक गमन होता है वह भी इसी नामके होजातेहैं और स्वामीजीने वह वात करी कि, जैसे गंगा शब्द केवल भागीरथी नदीमें ही रूटि है यदि कोई कहै कि, गर- तीति गंगा यह नदी नहीं, तो वस हवा आदमी कीट पतंगादि सब गंगा होग ठीक गंगा खोदी, सोई दयानंदनीने पितरोंको हटाय इंजीनियर सरावगी हाकि मादि पधरा दिये, इसी प्रकार वेदोंमें जिस पदको अपने विरुद्ध पाया झट अर्थ बदल दिये, यही श्राद्धमें गडवडी मचाई, मनुनी विरादफे पुत्र सोमसद् लिख- तहैं, दयानंदनी उत्तम व्यवहारमें बैठनेवालोंको सोमसद् कहतेहैं, ऐसा महान अंतर स्वामीजीके अर्थ और प्राचीन वाक्योंमें है इस कारण स्वामीजीका अर्प मिथ्या है और सुनिये ।। ज्ञाननिष्ठा द्विजाः केचित्तपोनिष्ठास्तथापरे । तपास्वाध्यायनिष्टाश्च कर्मनिष्ठास्तथापरे ।। १३४ ॥ ज्ञाननिष्ठेषु कव्यानि प्रतिष्ठाप्यानि यत्नतः। इव्यानि तु यथान्यायं सर्वेष्वेव चर्तुष्वपि।१३५॥मनु० अ० ३ कोई ब्राह्मण आत्मज्ञानपरायण होतेहैं और दूसरे प्राजापत्यादि तपमें तसर होतेहैं और कोई तप अध्ययनरत होतेहैं और कोई यज्ञादि कर्ममें तत्पर रहतेहैं ॥ .१३४॥ इनमें ज्ञाननिष्ठोंको श्राद्धमें यत्न पूर्वक भोजन देना, और यज्ञोंमें क्रमसें सवको भोजन देना ॥ १३५॥ निमंत्रितान्हि पितर उपतिष्ठन्ति तान्द्विजान् । वायुवच्चानुगच्छन्ति तथासीनानुपासते ॥ अ०३ श्लो० १८९ पितर श्रेष्ठ गुणवाले निमंत्रित ब्राह्मणों के पास आजातेहैं, वायुफी समान उनके पाछ चलतेहैं, चैठने पर बैठते हैं इस कारण निमंत्रित ब्राह्मण नियमपूर्वफरहैं ॥१॥ जब कि पितर वायुवत् पीछे चलतेहैं तो निश्चय है कि, पितरोंकी प्राणमात्र मूर्ति है, इसी कारण मृतक पुरुषोंकाही श्राद्ध होताहै, नहीं तौ निमंत्रित ब्राह्मणोंके संग कौन चलतेहैं, उन्हींके अर्थ जल देतेहैं, तथा वाल्मीकि रा० अयोध्याकाण्ड सर्ग १४ श्लोक १६ से॥ रामाभिषेकसंभारेस्तदर्थमुपकल्पितः। . रामः कारयितव्यो मे मृतस्य सलिलक्रियाम् ॥ १६॥ ।
(१२) दफानन्दतिमिरमारका पुनः ७७ सगे . ततो दशाहेतिमते कृतशोचो नृपात्मजः । द्वादशेदनि संप्राप्ते श्राद्धकर्माण्यकारयत् ॥ १॥ त्तिष्ठ पुरुषव्याघ क्रियतामुदकं पितुः। अहं चायं च शत्रुघ्नः पूर्वमेव कृतोदको ॥७॥ प्रियेण किल दत्तं हि पितृलोकेषु राघव । अक्षयं भवतीत्याहुभवांश्च पितुःप्रियः सर्ग:.२अयो शीघ्र स्रोतः समासाद्य तीर्थ शिवमकर्दमम् । सिपिचुस्तूदकं राज्ञे तत एतद्भवाताव ॥ २५ ॥ प्रगृह्य तु महीपालो जलपूरितमंजलिम् । दिशं याम्यामभिमुखो रुदन्वचनमब्रवीत् ॥ २६ ॥ एतत्ते राजशार्दूल विमलं तोयमक्षयम् । पितृलोकगतस्याय महत्तमुपतिष्ठतु ॥२७॥ ततो मंदाकिनीतीरं प्रत्युत्तीरे सरापः॥ पितुश्चकार तेजस्वी निवापं भ्राताभिः सह ॥ २८॥ ऐमुदं वदमिश्र पिण्याकं दर्भसंस्तरे। न्यस्य रामः सुदुःखातों रुदन्ववनमत्रवीत् ॥२९॥ इदं भुंक्ष्व महाराज प्रीतो यदशना वयम् । यदन्नः पुरुपो भवति तदन्नास्तस्य देवताः३०सगं१.३० मर्य-महारान दशायने कहा यह जो रामचन्द्र के अभिनेक कारण सामी माईहै सो रामको अभिोक न होगा किन्तु जब मैं मरनाऊंगातौ रामवंदसे इसी मलादिकसे मेरी जलक्रिया फरानी १६ जब राजाका शरीर छूट गया तो दशाह होनेकेपश्चात् बारहवें दिनभरतनीने श्राद्द किया जब भरतनी चित्रकूटमें गये तो रामचंद्रसे कहा हे पुरुषोचमउठो और पिताकी जलक्रिया करो. में और शबुम पूर्व कर चुके हैं जो प्यारेजन कुछ देते हैं वह पितृलोकमें अक्षप होताह तुम तो पिताके प्यारे हो ८ फिर रामचंद मंदाकिनीके किनारे सुन्दर निर्मळ स्थानमें बैठ जलदान कर कहने लगे कि, यह पिताको पईचे २५ हापमें जरूर चतुर्यसमुल्लासखण्डनम् । दसिंग दिशाको मुख कर रोते हुर यह वचन बोले २६ हे रामशाईल? यह निर्मल जल आपके हेतु अक्षय होय यह मेरा दिया जल पितृलोकमें प्राप्त हुआ तुमको मिलै २७ फिर मंदाकिनी के किनारे आकर तेनस्यो भाइयों सहित राजाकी पिंड- किया करते हुए २८ इंगुदी और मिश्रित पिण्याकके पिंड कुशाओंपर रख राम- चंद्र दुखसे रोते यह पचन बोले २९ महाराज जो वस्तु हम भोजन करते हैं उसका ही आप प्रसन्न हो भोग लगाइये क्यों कि जो अन्न पुरुप खातेहैं वही अब उनके देवता खाते इन पाल्मीकिरामायणके वाक्पोंसे भी मृतकके अर्थ पिंडगल- दानादि सिद्ध होताहै इस प्रकार महाभारतमें युद्ध हो नुकने पश्चात् जलदानपा- प्याय खोपत्रमें है जो मृतकोंको जल दिया गया है सो विस्तार भयसे नहीं लिखते द्धिमानोंको यही बहुत हैं। कृष्णपक्षे दशम्यादी वर्जयित्वा चतुर्दशीम्॥ श्राद्ध प्रशस्तालिथयो यथैतान तथेतराम ३श्लो०२७६ युक्षु कुवन्दिनःषु सवान्कामान्समश्नुते ॥ अयुक्षु तु पितृन्सान्प्रोप्राप्नोति पुष्ककाम् ॥२७॥ कृष्णपक्ष दशमीसे लेकर केवल चतुर्दशी छोड यह तिथि श्रादमें जैसी प्रशस्त वैसी और नहीं २७६ युग्मतियि और युग्म नक्षत्रों में पार करनेवाला पुत्रादि संतति और पयेष्ट द्रव्यको पाता है २७७ । ययद्ददाात विधिवत्सम्यक्दासमन्वितः ॥ तत्तत्पिता भवति परवानंतमक्षयम् ॥२७॥ विविक श्रादमें जो पितरोंको दिपा जाता है वह पितरों की अक्षय तृप्ति के मर्य होता है। वमन्वदन्ति तु पितृवृश्चिव पितामहान् । प्रपितामहांस्तथादित्यान्यतिरेपा सनातनी अ.३श्लो-२८४ पितरोंको वसु पितामहाओंको रुव प्रपितामहाँको आदित्यरूपसे ध्यान करके श्राद्ध कर्म कर्तव्य है, यह सनातन श्रुति कहतीहै इन सब वाक्यों का तात्पर्य यही है कि मृतक पुरुषोंका श्राद्ध होता है श्राद्धकर्ताको भी महाफलकी प्राप्ति होती है । आविरभून्मदिमापोनमेषां विश्वजीवंतमसोनिरमोचि ॥ महिज्योतिः पितृभिर्दत्तमागादुरुः पथा दक्षिणाया अदार्श । म.१० अ०९सू०१०७ म०१ .
(१४४) दयानन्दतिमिरंभास्करः। एषां श्राद्धादिकर्मकारिणों मघवतं इद माघोन महिमादमा आविरभूत् प्रादुर्भूतः किञ्च विश्वजीवं विश्वसंज्ञक जीवं तमसो जन्ममरणप्रबंघरूपतमसोनिरमोचि कृतवतः पि- तृभिः पितृभ्योदत्तमेव महिज्योति अगात् प्राप्त परिणत- मित्यर्थः किञ्च दक्षिणायादिशामार्ग उरुविस्तृतः मशि: दर्शितः पितृदत्तश्राद्धादिभिः॥ अर्थ-श्राद्धादि कर्म करनेवालोंको इन्दतुल्य विभूतिकी प्राप्ति होती है व भाद्धादि कर्म करनेवाले अपने जीवात्माका उद्धार करते हैं और यह पितृदत्त. पादादि दक्षिणायन मार्गको दिखायकर स्वर्गमें फर्ताफा भी कल्याण- करते हैं, प्राझणोंको तपादि होनेसे अभिमुख कहते हैं, इस कारण इनका भोजन कियां भी पितरोंको पहुँचता है, जैसे कि काँका फल सूक्ष्म रीतिसे फर्ताको प्राप्त होता है. जो ब्राह्मणादिको भोजन कराया जाता है उसके दानका फल पितरोंको पहुँचता है जिस प्रकार दूसरी वस्तु दानका फल फर्ताको पहुँचता है वही संकटसे उदार करताहै अब इसके आगे हवन विषयमें लिखा जायगा ॥ सत्या०.पृ० १०१५० २५ धन्वन्तरये स्वाहा अनुमत्यै स्वाहा सहयावापृथिवीभ्यां स्वाहा पृ०१०२ ओंसा: नुगापेन्दाय नमः ओंसानुगाय यमाय नमः सानुगाय घरुणाय नमः सानुगाप सोमाय नमः मरुद्भयो नमः अन्यो नमः घनस्पतिभ्यो नमः श्रियै नमः भद्रकाल्यै नमः ब्रह्मपतये नमः विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः दिवापरेभ्यो भूतेभ्यो नमः नतंचा रिभ्यो भूतेभ्यो नमः इन मन्त्रोंसे भागोंको रखफर जो कोई अतियि हो उसको निमा देव वा अमिमें छोड देवै फिर लवणान दालभात शाक रोटी आदि का खः भाग पृथ्वीमें धरे ॥ १०२ । २३ से ॥ समीक्षा-इन हवन करनेके मन्त्रों में जो धन्यतरि पैद्य तथा पर्णिमा चापापुषिती इनके वास्ते होम हो इससे स्वामीनीने क्या प्रयोजन निकाला तुम तो पिधानोंका नाम देवता बताते हो फिर यह भाग फिसके और क्या यनस्पति और समी भी रोटी खाती हैं या पृथ्वी भी जीमने आतीहै भगयन्मृतिके आगे भोग निवेदन कर नेमें आप यह गड्बडी करतेहैं और आप जहपदापाको माग दिये जाते हैं और अनुवरोंसहित इन्द्र घरग यम मरुत् जल वनस्पति भदकाली लक्ष्मी प्रमाति . विभेदेय दिनके फिरनेवाले प्राणी रात्रिके, फिरनयाले. प्राणी इनो नाममे अर सना यह क्या बात है यह तो आप फिर पुरानी ही कपाटे मेटे या पमा चतुर्थसमुल्लासखण्डनम्। (१४५) नाम यहां भी न्यायकारी हाकिम ही मानोगे तो जब चे अपने अनुचर अर्थात् अमलेवालोसहित आगे तो बस यह काम ठहराः नित्यका गरीब आदमीका तो एक ही दिनमें दिवाला निकल जायगा और भद्रकाली वनस्पति जल मरुत् यह भी कोई आपके चेले विद्वान् परपर फिरते होंगे जो इन्हें आपने पृथक् २ भाग देना लिखा है पन्द्रह सोलहको कहांतक भोजन करावै और फिर इनके गणोंकी क्या ठीक-"तीन बुलाये तेरह आये देखो गांवकी रीत, बाहरवाले खागये घरके गावे गीत " बस इनका रोज न्योता करनेसे निमानेवालेका पटरा ही होजायगा और जो यह कहो कि एक एक पास निकालें तो यह कब एक र प्राससे मानेंगे उलटा दंड देंगे कि हमारी इनत हतक हुई यदि कहो कि, यह ईश्वरके नाम हैं तो एकं भाग निकालना चाहिये फिर( सानुगाय ) गणों सहित ऐसे क्यों लिखा यदि कहो ईश्वरके अनन्त नाम हैं तो अनन्त भाग निकालने चाहिये, इतने ही क्यों और आगे सत्यार्थप्रकाशमें मापने यम नाम वायुका लिखा है ( यमेन वायुना सत्य राजन्' कहीं कुछ कहीं कुछ आपके लेखकी क्या ठीक है ) इससे यह सिद्ध है कि यह नाम न तो ईश्वरके हैं न विद्वानोंके हैं इन्दादिक देवता हैं भद्रकाली आदि देवी हैं इसी कारण स्वामीजीने इनके नाम मात्र लिखे और कुछ अर्थ न लिखा. लिखते तो गडवडी मवती मनुजी तो यों लिखते हैं । मरुध इति तु द्वारि क्षिपेदप्स्वद्भय इत्यपि। वनस्पतिभ्य इत्येवं मुसलोलूखले हरेत् ।। ८८ ॥ उच्छीपके श्रिय कुर्याद्भद्रकाल्यै च पादतः । ब्रह्मवास्तोष्पतिभ्यां तु वास्तुमध्ये वलि हरेत् ॥ ८९॥म०अ०३ मरुद्भयो नमः ऐसा कहकर दारमें बलि देव और जलमें अद्भया ऐसा कहकर घलि दे वनस्पतिभ्यो नमः ऐसा कहकर खलमें मूसलमें डाले इस प्रकार पलिं. हरण करे ८८ वास्तु पुरुपके शिर प्रदेशमें अर्थात् पूर्व उत्तरदिशामें श्रीके अर्थ बलिं देव उसके पैरफी और पश्चिम दक्षिण दिशामें भद्रकालीके अर्थ बलि देव और ब्रह्मा वास्तोपतिके अर्थ परफे चीचमें बलि हरण फरै ८९ स्वामीजीने मनुस्मृति से यह नमः ती निकाला, परन्तु यह क्रिया न लिखी कि जलमें डाले पूर्व दक्षिण पश्चिमादिमें इस प्रकार पलि दे, पर बात छिपती नहीं देखिये फलाई खुलगई ॥ स. पृ०.१०२ पं० २१ हवन करनसे अज्ञात अदृष्ट जीवोंकी जो हत्या होती. है उसका मत्युपकार करना ॥ १०॥ १९॥ .
दयानन्दतिमिरभास्करः। समीक्षा-जव कि एक चीजका बदला देदिया जाताहै तो उस ऋणसे व "मुक्त होताहे, जय कि कोई पाप फर तो उसका धर्मसे प्रत्युपकार करसते हैं, औ -फिर यह उसका अनिष्ट फल नहीं भोगसक्ता जैसे कोई १० रुपपेका कर्जदार और उसकी एवनमें फपडा वर्तन गहना आदि देदे तो वह फर्जसे च्युत होनाता (प्रत्युपकार ) के अर्थ बदलके हैं जब कि जिसका बदला देदिया फिर उसका क्या अहसान जव कि प्रत्युपकार फरदिया तब पापका पल भोगना नहीं पड़ेगा तो पापक्षय हो गया फिरतुम पापक्षय नहीं मानते जैसे आपने १८२ पृ० में लिखा है और यहाँ पापक्षय अच्छीतरहसे मान लिया, जब प्रत्युपकार फरदिया तौफिर फल भोगना नहीं पडेगा || * स० पृ० १०३ पं० २९ विना अतिथियोंके संदेहको निपत्ति नहीं होती ॥ १०५ । ३॥ समीक्षा यह भी कहना मिथ्या ही है अतिथिसे संदेह क्यों कर निवृत्त हो सक्ताहै और जिन्हें अतिथि जिमानेकी समाई न होवे, ये सन्देहमें ही पढेरहै और अतिथिके अर्थ पाहुनेके हैं, जिसके आनेकी कोई तिथि नियंत न हो, यदि कोई अतिथि आजाय तो उसे यदि होसकै तो भोजन दे देना, इसमें पुण्य होताहै प यह नहीं कि, वह तो हारा थका भूखा आया आप उसे पावभर अन देकर छ घंटेतक मगज मारते बैठ गये, और अतियि ता भोजनमात्र लेकर चला जायग यह ठहरता नहीं यदि संदेह हो तो विद्वान् बहुत मौजूद हैं उनसे ही यूझलेन। अतिथियोंके शिरपर संदेह निवृत्त करनेका भार नहीं है, अथवा यदि उससे संदेह निवृत्त न हो तो क्या उसे जो कुछ दिया है वह छीन ले और यह निपम नहीं कि सब ही अतिथि पठे हों, जो किप्ती योग्य होगा वह परसे कुछ लेकर ही चलेगा, तौ वस निरक्षर ही अतिथि ठहरे, वे संदेह निवृत्त क्या करेंगे, यह बात भी लिन दी होती कि बेपटा अतिथि नहीं होसक्ता, वह चाहे भूखों मरता हो पर उसे कुछ ज दना, कारण कि वह संदेह तो दूर कर ही नहीं सका और विद्धानोंको तथा जिन्हें संदेह न हो उन्हें भी अतिथियोंको कुछ देना न चाहिये, क्यों कि उन्हें कुछ संदेह तो है ही नहीं, जिसे संदेह हो वह उन्हें निमा धन्य है अच्छा भतिपि भतापा मनुजी अतिथिके लक्षण लिखते हैं । एकरात्रं तु निवसन्नतिथिब्राह्मणः स्मृतः॥ अनित्यं हि स्थितो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ १॥ एक रात्रिम रहनेवाला ब्राह्मण अतिथि होताहै, क्यों कि नित्य रहना नहीं इस *यहाँ और श्राद्ध प्रकरणमें भास्कर प्रकाशकाले घबराकर रहगये।
चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । ( १४७) कारण अतिथि कहाता है । बस जब संध्या समय अतिथि आया उसकी इच्छा टिकनेको हुई टिकादिया भोजन देदिया सोरहा सबेरे ही उठकर चल दिया इसी प्रकार सब वणों में अतिथि होते हैं उन्हें भोजन निश्चय देना ।। स० पृ० १०६ पं० १७ नामुत्र हि सहायाथै पिता माता च तिष्ठतः ॥ न पुत्रदारं न ज्ञातिधर्मस्तिष्ठति केवलः १ मनु ४।२३९ परलोकमें न माता न पिता न पुत्र न ज्ञाति सहाय करसक्ते हैं किन्तु एक धर्म ही सहाय रहताहै ॥ १०७१२० समीक्षा दयानंदनी तो इससे यह बात सिद्ध करतेहैं, कि परलोकमें जब कोई सहायकारी नहीं होता, तो दूसरेका दिया हुआ भी कुछ माप्त नहीं हो सक्ता, परन्तु इससे यही विदित होताहै कि, सब सहाय कर सक्ते हैं, और कैसे कर सक्ते हैं, सो लिखाहै कि (धर्मस्तिष्ठति केवलः) केवल धर्म ही स्थित रहताहै, धर्म सहाय करताहै तौ धर्मसे जिसकी जो सहाप करेगा वह धर्मम स्थित होगा पैसे माता पिता शरीरसे सहाय नहीं करसक्ते, धर्मानुष्ठानसे कर सत्तेहैं, धर्मसे पिता पुत्र क पुत्र पिताका उद्धार करताहै विश्वामित्रने अपना तप दे त्रिशंकुको स्वर्ग भेज दिया और भी मनुजीने लिखाहै ॥ दशपूर्वान्परान्वंश्यानात्मानं चैकविंशकम् ॥ ब्राह्मीपुत्रः सुकृतकृन्मोचयेदेनसः पितृन् । मनु० १ ब्राझविवाहसे जो पुत्र उत्पन्न होता है वह सत्कोको कर्ता है सो दश पुरुष पूर्वके और दश आगे इक्कीसवां अपनेको पापसे छुटाताहै, यहांतक एक पुरुषका धर्मानुष्ठान सहायक होताहै ॥ स० पृ० १०९५० १८ श्रुतं प्रज्ञानगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा ।। असंभिन्नार्यमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः १ भा० निसको मज्ञा सुनेहुए सत्य धर्मके अनुकूल और निसका श्रवण बाईके अनु- सार हो जो कभी आप अर्थात् श्रेष्ठ धार्मिक पुरुषोंकी मर्यादाका छेदन नकर वह पंडित संज्ञाको प्राप्त होये ॥ १११ । ११ समीक्षा-इस श्लोकके अनुसार तो दपानंदजीमें पंडित शब्द भी नहीं परसता सुने हुए सत्यधर्म के अनुकूल महात्माजीकी बुद्धि ठीक नहीं स्मृति भी ठीक नहीं, कहीं कुछ कहीं कुछ लिख दियाहै, पहले सत्पायप्रकाशमें मृतकमाइ मांसवि- (१५८) दयानन्दतिमिरभास्करः। धान किया फिर कहा मुझे स्मृति नहीं रही भूलसे लिखा गया, जो भूले यह कैस पंडित और श्रेष्ठ पुरुषोंके आचरण भी आपमें नहीं पाये जाते, क्यों कि आपने प्राचीन मूर्तिपूजन श्राद्धादि खंडन करके महाभ्रष्ट नियोग पंथ चलापाहै, इससे आप पंडित नहीं अब नियोगके विषयमें लिखा जायगा। नियोगप्रकरणम् । स० पृ० ११२ पं० १६ या स्त्री त्वक्षतयोनिः स्यादतप्रत्यागतापि वा । पोनर्भवेन भत्रों सा पुनः संस्कारमर्हति।मनु०९ । १७६ निस स्त्री या पुरुषका पाणिग्रहणमात्र संस्कार हुआ हो और संपोग अर्थात् अक्षतयोनि सी और अक्षतवीर्य पुरुष हो उनका अन्य स्त्री या पुरुषके साथ पुन: वियाह न होना चाहिये, किन्नु बाह्मण क्षत्रिय और पैश्य पोंमें सतपोनि सी और क्षतवीर्य पुरुषका पुनर्विवाह न होना चाहिपे ॥ ११४ । ११ समीक्षा-जय स्वामीनी इस शोसका अर्थ करने बैठे थे तो पड़ी भंगकी तर गमें होंगे इसक अमें दोनों जगह यही लिसहैि कि, विवाह न होना चाहिए पान इतना तो माना ही कि प्राह्मणादि तीन पोका पुनर्विवाह न होना चाहिये परन्तु इम शोममें यह बात नहीं आती और इस शोकको मामीनान द्वारा दिपाहै मा लिखते हैं यह यहाँका शोफ है कि, जहाँ मनुगीन धारह मारो पर गिनाह। या पत्या वा परित्यक्ता विधवा या स्वयेच्छया ॥ उत्पादयेत्पुनर्भूत्वा स पानर्भय उच्यते ।। १७५ ।। मा चेदातयोनिः स्यादतप्रत्यागतापि वा ॥ पोनर्भवेन भर्ना सा पुनः संस्कारमईति १७६॥अ० ९ नो मी पनिने त्यागन कर दी हो या पिया हो या अपनी र तोडकर पुत्र उत्पन्न करे, तो टम पुरको पोनर्भय कहत हैं । यह का पाहा पनि यसलाई १७५ पदमा यदि भानयोनि होप नो पारित जीने पर पग्मे निकट गई और या पनि न्यागनका पति ची आई तो कुमार भाग टमको पुनः मार का प्रण काना पनि दोष मा. यह परिपाटीमा मन नहीं है अपवाद निमगाम नाप पर कनर्भर में पर नि: १६ारी Tar चतुर्यसमुल्लाससंण्डनम् । (१४९) ति फिर ग्रीका संस्कार कर ग्रहण करे, परन्तु इसके जो सन्तान होगी यह निर्भप फहलापैगी, जो प्रशंसित नहीं है स्वामीनीने (सा चेत् ) के स्थानमें या) लिखा है जो प्रसंग विरुद्ध है और यह फैसी बात लिखी कि अक्षतषीर्य उरुष विवाह न करे क्या विवाह उस समय फर जिस समय सर्व वीर्य क्षत होजाय पन्य है स्वामीजी * ११६ । ७ पृ० ११२ पं० २१ (मन) पुनर्विवाहमें क्या प है (उत्तर) स्त्री पुरुषों में प्रेम न्यून होना क्यों कि नया चाहे तव पुरुषको स्री और स्त्रीको पुरुष छोडकर दूसरे साप सम्बन्ध फरले, दूसरे जब स्त्री या पुरुप पति श्री मरने के पश्चात् दूसरा विवाह करना चाहे तो प्रथम स्रोफे पूर्व पतिके पदार्थीको डा ले जाना और उनके कुटुम्बयालोका टनसे झगडाफरना, तीसरे बहुतसे भद्र- हलका नाम या चिह भी न रहना और उनके पदायाँका छिन्नभिन्न होजाना पीथा पतिग्रत और स्त्रीवत धर्म नष्ट होना इत्यादिदोपॉके अर्थ दिनों में पुनर्विवाह भी न होना चाहिये ११४११७ ( देखिये इसके विरुद्ध लेख) स०पृ० ११३ १०५ जो ब्रह्मचर्य न रख सके तो नियोग करकै सन्तानोत्पत्ति करलें. ११५२ समीक्षा-यदि सन्तानकेही अर्थ नियोग है तो जो नी विधवा हो और ध्या भी हो तो यह फैसे सन्तान उत्पन्न कर सक्ती है, जो कहो कि, यह गोद डका लेफर कार्य कर सकी है तो (जो फि आपने पृ० ११३ पं०४ में गोद टना लिखाद )फिर इस महा अनर्थ व्यभिचार नियोगकी आवश्यकता क्या है, जमे इच्छा होगी गोद लेलेगी, नियुक्त पुरुषका उत्पन्न किया पुत्र जैसे दूसरेफा है, उसी प्रकार गोद लिया है, परन्तु गोदफा इससे शुद्ध है क्यों कि संस्कारयुक्त ३, नियुक्त पुत्र वैसा शुद्ध नहीं क्यों कि उसमें परपतिसे भोग करना पडताहै, रस कारण गाद ही क्यों न लिया जाय, यदि पुत्रके निमित्त नियोग करते हो तो कुछ लाभ नहीं, यदि कामामि मिटानेके लिये यह वेश्याधर्म प्रवृत्त किया है तो दूसरी बात है। स. पृ० ११३ पं० ५ पुनर्विवाह और नियोगमें क्या भेद है (उत्तर) १ जैसे विवाह करनेमें कन्या अपने पिताका घर छोड पतिके परको प्राप्त होतीहै और पितासे विशेष संबंध नहीं रहता, विधवा म्री उसी विवाहित पतिके परमं रहती है। २ उसी विवाहिता साफ लडके टसी विवाहित नीके पतिके दायभागी होते हैं और विधवा स्त्रीके लड़के वीर्यदाताके न पुत्र कहलाते न उसका गोत्र होता न उसका सत्य उन लडफों पर रहता फिन्तु वे मृतपतिके पुत्र बनते उसीका गोत्र रहता, और उसीके पदायोंके दायभागी होफर उसी घरमें रहते हैं ।। भा० म० दयानन्दकी अशुद्धि छिपा गये हैं क्यों न हाँ दोनों स्वामी ठहरे !
(१५०) : दयानन्दतिमिरभास्करः। ३ विवाहित स्त्रीपुरुषको परस्पर सेवा और पालन करना अवश्य है, और नियुक्त स्त्रीपुरुषका सम्बन्ध कुछ भी नहीं रहता ।। ४ विवाहित स्त्रीपुरुपोंका सम्बन्ध मरणपर्यन्त रहता और नियुक्त स्त्री पुरु पका कार्य पश्चात् ट जाताहै ॥ ५ विवाहित स्त्रीपुरुप आपसमें गृहकार्योंकी सिद्धि करनेमें यत्न किया करते हैं और नियुक्त स्त्रीपुरुष अपने २ गृहका काम किया करते हैं ॥ ११५।३ समीक्षा-दयानंदनीने यह नियोगके पांच नियम फौनसी संहितासे निकाले हैं। क्या यह स्वामीजीकी मिथ्या कल्पना नहीं है, पीछे जो पुनर्विवाहमें चार दोष दिखलाये हैं क्या वे इन पांच नियमोंसे नहीं टूटतेहैं ।। १जब कि स्त्री पतिके पर ही रहती है तो सास ससुरकी लान अधिक होती है और पर पुरुपसे भाषणमें भी संकोच लगताहै, दयानंदनी यह आज्ञा करते हैं कि पतिके घरमेंही परपुरुषको बुलाकर नियोग करै, जब कि स्त्रियोंको पुत्रकी . आधिक इच्छा होतीहै, तो उनका पतिसे भी प्रेम न्यून हो जायगा क्यों कि यह तौ उनको विदित ही है कि यदि पति मरजायगा तो नियोग दूसरेसे कर पुत्र उत्पन्न करलेंगी फिर पुत्रेष्टि व्रत कर्म पुंसवन आदि भी कुछ करनेकी आवश्यकता नहीं, एवं लना आदि सब खो बैठेंगी परन्तु-- एतावानेव पुरुपो यज्जायात्मा प्रजेति ह ॥ विप्राः प्राहुस्तथा चैतद्यो भर्ता सा स्मृतांगना॥मनु०९।४२ पुरुष और स्त्रीका आत्मा मिलके प्रजा होतीहै, इस कारण वेदके जाननेवाले विम कहते हैं, जो पति वह ही भार्या उससे जो भार्या में उत्पन्न होताहै वह पतिका पुत्र कहाताहै, यह मनुनी कहते हैं, तो नियुक्त पुरुषसे संतान उत्पन्न करी हुई चाहै फिसीके घर क्यों न रहै, परंतु उस सन्तानमें नियुक्त पुरुपकेही गुण आगे जैसा वेदमें लिखाहै (अङ्गादङ्गादिति ) पुत्र पिताके अंग २ से उत्पन्न होता है तो उस पुत्रमें नियुक्त पुरुपके लक्षण निश्चय ही आयेंगे, और वह पुत्र है भी. उसीका क्यों कि आम बोनसे आम ही होगा, नियुक्त पुरुपसे उत्पन्न दुए बाल फका मृत पुरुपसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं और दायभाग तो गोदलिये पुत्रका होता है, जिसे सर्व सम्मतिसे स्त्री पुरुष गोद लेते हैं "प्रत्यक्षमें देखा जाता है किकैसा ही गोत्र क्यों न हो परन्तु जाननेवाले तो जो जिससे उत्पन्न होताहै उसी नाममे पुंफारते हैं यथा वायुतनप भीम, इन्दतनय अर्जुन, धर्मपुत्र युधिष्ठिरादि" और. जब कि वह नियुक्त पुरुषसे उत्पन्न पुत्र मृतक धनका अधिकारी हुआ तो भी स्वामीजीका यह कहना फि (यदि पुनर्विवाह होगा तो धन दूसरेकि हाप लग चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (१५१) 'जायगा) मिथ्या ही हुआ क्यों कि अबभी उसमृतकका धन दूसरोंकेही हाथ लगा, अपना पुत्र तौ जभी होगा जब अपनेसे उत्पन्न होगा, वह नियुक्त मृतकके गोबसे संबंधी नहीं होता, देखिये ऋग्वेदमें लिखा है जिसकी व्याख्या :कलकत्तेके छपे हुए निरुक्तके २५४ पृष्ठ में की है ॥ परिपकरणस्यरेक्णो नित्यस्यरायः पतयः स्याम ।। नशेपोअग्नेअन्यजातमस्त्यचेतानस्यमापथोविदुक्षः ॥ ऋ०५।२।६।७ (निरुक्तमाष्यम् ) परिहर्तव्यं हि नोपसर्तव्यमरणस्य रेवणोरणोपा! भवति रेण इति धननाम रिच्यते प्रयतो नित्यस्य रायः पतयः स्याम पित्र्यस्येव धनस्य न शेषो अमे अन्यनातमस्ति शेप इत्यपत्यनाम शिष्यते प्रयतो चेतयमानस्य तत्त-- मतस्य भवति मानः पयोविदूदुप इति तस्योत्तरा भूयसे निर्वचनाय-३१२ निरु० भापार्य-एक समय हतपुर वसिष्ठने अमिकी स्तुति याचना करी कि मुझे पुत्र देतब अमि देव बोले कि क्रीतक दत्तक कृत्रिम आदि पुत्रोंमें कोई एक पुत्र बनालो, यह बात सुन वसिष्ठजी औरसे उत्पन्न हुए पुत्रोंकी निन्दा करते हुए और निन वीर्यसे पुत्र चाहते हुए यह वेद मंत्र बोले ॥ (परिपy ) त्याग देने योग्य है वह पुत्ररूपी धन जो कि ( अरणस्यरेक्णः) पर कुलमें उत्पन्न है, जिसमें उदकसम्बन्ध नहीं है, कि वह परकीय होनेसे पुत्रकार्यमें समर्थ नहीं होता, चाहै उसको पुत्रकार्यमें कल्पना कर लो, इस कारण (नित्यस्य रायः पतयः स्याम ) (पिज्यस्येव धनस्य)जैसे पिताका धन पुत्रत्वमें होता है इससे वह उसके धनका स्वामी होता है, क्यों कि वह स्वयं अपनेसे. उत्पन्न होता है ( अपत्य कहाता है ) इसीसे मुख्य होता है क्षेवन कोतक ऐसे नहीं इसीसे कहते हैं कि जो नित्य आत्मीय अगौण अपनेसे उत्पनजो पुत्ररूपी (रायः). धन तिमीके हम (पतयः) मालिक पालनेवाले हों, परकीयके नहीं जिससे कि. (नशेपोअमेअन्यनातमस्ति ) औरसे उत्पन्न हुआ अपत्य नहीं होता है जो उत्पन्न. करता है वह टसीका होता है दूसरेका नहीं नो ( अचेतयमानस्य ) अचेतयमान. अर्थात् अविद्वान् प्रमादी जो शास्त्रसे रहित हो वह भी धर्मस परितोष मान होता. ही है कि यह मेरा पुत्र है इससे कहते हैं कि ( मापयोपिदुक्षा)कि हमको पितृ पितामह प्रपितामहकी अनुसन्ततिके ( पयः) मार्गसे (विदूदुपः) तू औरस पुत्र दे यह आशय है जो अपने पीसे अपनी सवर्णा स्त्रीमें उत्पन्न हो वह औरस पुन पहाता है । अपत्यं अकस्मात् अपततं भवति नानेन पततीति वा नि०३ार 11 (१५२) दयानन्दतिमिरभास्कररा अर्थ-"अपत्यं कस्मादुच्यते अपतने भवति पितुः सकाशादेत्य पृषगि ततं भयति अथवा अनेन जातेन संता पितरो नरके न पतन्ति । (भाषा) अपत्य नाम पुत्रका क्यों है पितासे उत्पन्न होकर पृथक्की नाई विस्तृत होता है या जिसके उत्पन्न होनसे पितर नरफमें नहीं पड़ते हैं इससे अपत्य कहते हैं। "पुनः पुरु प्रायते पहपि यत् पिया पापं कृतं भवति ततीयंत्रायतीति पुत्रः।।" भाषा-जो कि पिताने पाप किया है उससे पिताकी रक्षा करनेसे इसका नाम "पुत्र है "निपरणादा निपुणाति निददाति सी पिण्डान् पितृभ्यः इति पुत्रः जो कि पितरोंके वास्ते पिण्डोंको देता है वह पुत्र कहाता है । (अरणोऽपाणः ) जिससे जलका सम्बन्ध नहीं है अर्थात् मृतक हुए. पिताको जिसफा दिया हुआ जल न पहुँचै उसे "अरणः कहते हैं इतो लोकादमुं लोक, प्रयतः म्रियमाणस्यत्ययः शंप इत्यपत्यनाम तद्धि शिष्यते " पिताके परलोकमें जानेसे यह यहीं रहता है इस कारण इसे शेष कहते हैं ॥ अण इत्युदकनाम पठितम् निघ० १ । १२ नहियभायारणः सुशेवोऽन्योदयोंमनसामन्तवाउ ॥ अधाचिदोकः पुनरित्सएत्यानोवाज्यभीपालेतुनव्यः॥ ऋ० मं०५।२।६।८ भाष्यम् नहि ग्रहीतव्यो रणः सुमुखतमोप्यन्योदयों मनसापिनमन्तव्यो ममार्य पुत्रमित्यथ स ओकः पुनरेव तदेति यत आगतोभवत्योक इति निवासनामोच्यत एतु नोवाजीवजनवानभिपहमाणःसपलानवजातःस एव पुत्र इत्यर्थता दुहितृदाया -द्य उदाहरन्ति पुत्रदायाद्य इत्येके | नि० ३।३* (नहि प्रभायेति ) नहीं अंगीकार करने योग्य है क्यों कि वह पुत्र नहीं है (अरणः )अपाणः उदक सम्बन्ध अपगत होनेसे अन्य कुलमें उत्पन्न होनेसे यद्यपि (सुशेवः) सुखतमः अर्थात् सुख देनेवाला हो ( अपि अन्योदयः) औरके वीर्यसे उत्पन्न हुआ वह अन्यके उदरसे (जो अपनी विवाहित सवर्णो स्त्री नहीं है) उत्पन्न हैं (अौं हवा एप आत्मनोयजायते विज्ञायते) जो अपने वीर्यसे अपनी जायामें उत्पन्न हो वह उदर संभूत है इस कारण मुझे अन्य जायासे उत्पन्न पुरुष मनसे भी अंगीकार नहीं है क्योंकि (अधि) निससे (ओका) 'अपने वंशको यह बहुत कालमें प्राप्त होता है (अपने वीर्यसे अन्यमें उत्पन्न )(तद्वं श्य एव भवति) इस कारण यह अंपुत्र है (ऐतु )आय वा प्राप्त हों (नः पानी) • भा०प्र० इन मन्त्रों के निरुक विरुद्ध भर्य होनेसे त्याज्य हैं । तुलसीरामजी नियोगसे “पुत्रमाना.जो आप लिखते हों निरुक्तम तो इसका कोई पद भी नहीं है फिर धींगा धांगी • क्यों करते हो।
चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (१५३) वेगवाला शत्रुओंको भयदाता(अभीपा)वरियोंका तिरस्कार करनेवाला (नध्यः) नव जात पुत्र शिशु वह सवर्णासे उत्पन्न पुत्र प्राप्त हो अन्यनात नहीं. अब दया- नंदजीको और उनके शिष्योंको निरुक्तकृत व्याख्यासहित इस मंत्रपर ध्यान देना चाहिये यह वसिष्ठजी क्यास्वामीजीसे कमती विद्वानथे जो चाहते हैं कि अन्यजात पुत्र मैं नहीं चाहता और उससे उदक आदि संबंध कुछ नहीं हो सका और आगे आपने नियोगसे दश सन्तान उत्पन्न करनेकी आज्ञा दे दीहै तो जब वो नियो- गसे १० सन्तान उत्पन्न करे तो फिर उस पुरुषका सम्बन्ध छूट जावै इसका उत्तर यह है यदि दो दो वर्ष बाद भी एक २ सन्तान हो तो वीसवर्षतक जिसका सम्बन्ध रहै फिर वह क्यों कर छूट सक्ता है जो कि स्त्री एक बार परपुरुषगामिनी हो चुकी फिर क्या सन्तानके लालबसे वह प्रीति छूट सक्ती है २० वर्षका अ- भ्यास सहनमें लूट सत्ता है क्या बालक उससे उत्पन्न होंगे उसमें भी नियुक्त पुरुषका असर निश्चय ही आवेगा वीर्यका गुण अवश्यं आवेगा जब कि पिताको उपदंशादिकी बीमारी हो तो पुच में आजातीहै फिर गुण स्वभाव तो अधिक ही सूक्ष्म है वह भी अवश्य आयेंगे और दयानंदनी वह नियम ( कि विवाह पुन: करनेमें भद्र कुलका नाम भी नहीं रहता पदार्थ छिन्न भिन्न हो जायगे ) विगड जायगा क्या कि जब सन्तान दूसरेकी है तो अपने पिताकी ही ओर झुकैगी उस मृतकका मालमत्ता तो औरोंके ही हाथ लगा इस कारण मृतक पुरुपके धनके उसके भ्राता आदि ही अधिकारी हो सक्ते हैं फिर स्वामीजीने लिखा है कि पुनर्विवाहमें स्वीधर्म पतिव्रतधर्म नष्ट हो जाता है (और नियुक्त पुरुप भोग- नेके पश्चात् अपने परका काम करें ) वाहनी बुद्धिमान पुनर्विवाहमें तो पतिव्रत धर्म नष्ट हो जाता है जो एक ही पतिके आश्रित रहै और नियोगमें ११ पुरुषों तक स्त्री संभोग करे तो भी पतिवतधर्म नष्ट न हो देखिये इन परमहंसनीकी बुद्धिमानी वाह ग्यारह पुरुषकि भोगवाली स्त्री पतिव्रता यह तो गृहस्य स्त्रियोंको धेश्या ही बनाया सब थोडे ही इसे मानगे यह कर्म वह ही आपके अनसमझ अनुयायी फरेंगे जो तुम्हारे पापोंको पत्थरफी लफोर मानते हैं जाने टन लो- गोकी मतिपर क्या पत्थर पड़े हैं जो इस व्यभिचार भरी फयाको प्रीतिसे सुनते और उसकी रीति प्रचार करनेका यल करते हैं, और यह एक बात तो विपयो पुरुषोंको लाभकी लिख दोहैं, कि रातको नियुक्त स्त्री पुरुष अपने एक विस्तरपरं, सबेरे अपने २ कामकाज करें (शापद विवाहित स्त्री पुरुप दिनको घरका काम कान नहीं करते होंगे दिनरात एक विस्तरपर रहते होंगे) सो.विषयी पुरुपोंका बहुत द्रव्य ववैगा क्यों कि वेश्याके यहो जानेसे तो दव्य खर्च होताहै तुम्हारे दयानन्दतिमिरभास्करः। नियमानुसार ऐसे मत माननेवालोंकी विधवाओं के यहां रातफा ३ वटके प्रवेश फर गये, सबेरे ही चले आये, नवतक गर्भ न रहै यही कृत्य करते हैं, परन्तु. स्वामीजी ती अमोपवीर्य थे, कुछ सन्तान ती उत्पन्न कर जाते जो पैदिक मंत्रालय और आपके दुशाले घडी चैनके मालिक होते, जव स्रीको सन्तानार्य ग्यारह पुरुषोंकी आज्ञा है तो अच्छे वीर्यवाले पुरुप तो बहुत ही कम सौमें कोई पांच ही होंगे विना, संभोग परीक्षा नहीं होती तो लीजिये अब सैकडौं पति बनाने पड़े औरजो कोई मनोहर मिलगपातोससुर और पतिकी कमाई और अपना सब गहना पाता ले उसके संग हुईजन्म पर्यन्त आपको दुआएं देती रही और पुरुष भी आपको गुण गाते रहे शोक है इस महा मनपर ॥ स० पृ० ११३ पं० २१ जिसको स्त्री वा पुरुप मर जाताहै उन्हींका नियोग होताहै प० २६ वही नियुक्त स्त्री दो तीन वर्ष पर्यन्त उन लडकोंका पालन करके नियुक्त पुरुपको दे दे, ऐसे एक २ विधवा स्त्री दो अपने लिये और दो दो अन्य चार नियुक्त पुरुपोंको सन्तान फर सक्ती और एफ मृतस्त्री पुरुष भी दो अपने लिये दो दो अन्य चार विधवाओंके लिये पुत्र उत्पन्न कर सकता है, ऐसे सब मिलकर दश सन्तानोत्पत्तिकी आज्ञा वेदमें है । ११५ । २३. इमांत्वमिन्द्रमीदः सुपुत्रां सुभगां कृणु ॥ दशास्यां पुत्राना- धेहि पतिमेकादशं कृधि ऋ० म० १० सू० ८५ म० १५ (हे मीढ्व इन्द) वीर्य.सींचनेमें समर्थ ऐश्वर्ययुक्त पुरुष तू इस विवाहिता स्त्री पा विधवा स्त्रियोंको श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर, इस विवाहिता स्त्री दशपुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं सीको मान, हे सी ! तू भी विवाहित पुरुष वा नियुक्त पुरुषोंसे दश सन्तान उत्पन्न कर और ग्यारहवां पतिको मान इस वेदको आवासे प्राह्मणःक्षत्रिय और वैश्य वर्णस्थ स्त्री और पुरुष दश दश सन्तानसे अधिक उत्पन्न न करें, क्यों कि अधिक करनेसे सन्तान निवल निर्बुद्धि और अल्पायु होते हैं और स्त्री तथा पुरुष भी निर्वल अल्पायु औररोगी होफर वृद्धावस्थामें दुःख पाते हैं.॥ ११५ । २८... : समीक्षा-धन्य है। स्वामीजी कलियुग धीरे २ आताथा, आपने उसे शीघ्र प्रवृत्त करनेका टंग निकाला एक स्त्री चार नियुक्त पुरुषों के भर्थ और दो अपने 'लिये उत्पन्न कर ले यह तो घरफी खेती समझ लो जव गये और पुत्र होगपा, कन्याका नाम ही नहीं, सब पुत्र ही पुत्र होय, यदि यह ईश्वरको आता है। 'सत्यसकल्प है, सबके पुत्र ही होने चाहियेये कन्या- एक भी नहीं, बस सारा पही समाप्त हो जाता परन्तु यह देखा नहीं जाता इससे यह घेदमंत्रका चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । अर्थ नहीं है बहुतेरे निस्सन्तान रहते हैं, यह व्यभिचारका प्रचार भारतवासियोंको महाअंधकारमें डालनेहारा है। इसमें वेदमंत्रको क्यों सानलिया अपनी कोई मिथ्या संस्कृत बना ली होती, वेदमें ऐसी बातें कभी नहीं होती यह विवाहमकर- का मंत्र है आशीर्वाद अर्थमें है इसके अर्थ इस प्रकार हैं । विवाहमें प्रार्थना करते हैं (मीदवः ) सब सुखकारी पदायोंकी वर्षा करनेवाले (इन्द्र) हे परमैश्वर्ययुक्त देव इन्द्र (त्वम् ) आप (इमाम् ) इस विवाहिताको (सुपुत्राम् ) अच्छे पुरवाली ( सुभगाम् ) सौभाग्यवती (कृणु ) करो (दश) दश ( अस्याम् ) इसमें ( पुत्रान् ) पुत्रोंको (आधेहि ) धारण कराओ ( पतिम् एकादशम् ) दश पुत्रोंके साथ ग्यारहवां पति चिरंजीव (कृषि) कीजिये मंत्रमें एकादशपद पूरण प्रत्ययान्त है उसका अर्थ ग्यारहवां पति ऐसा होगा दशपुत्र मंत्रमें स्पष्ट पढे हैं उसमें ग्यारहवीं संख्याको, पूर्ण करनेवाला पति है तब पह अर्थ हुआ हे देव ! आपकी कृपासे दश पुत्र और पति यह ग्यारह विद्यमान रहैं सीधा अर्थ छोड स्वामीजीने व्यर्थ लिप कल्पना की है यदि नियोगपर यह प्रार्थना है तो प्रत्येक नियोगमें पढनेसे ग्यारह बारमें १२१९क सौ इक्कीस पतिकी प्रार्थना होनायगी, इसके लिये ईश्वरसे नियोगियोंकी अवस्था बढानेका कानून पास करालो॥ यह स्वामीजीने न सोचा कि, यदि एकादश पति पर्यन्त नियोग करनेकी ईश्वरको आज्ञा है तो ईभर तौ सत्यसंकल्प है तब तो सब स्त्रियोंके दश दश पुत्रसे. कमती होने ही नहीं चाहिपे, पदि दश दशसे कमती होंगे तो परमेश्वरका संकल्प- निष्फल होगा, इससे स्वामीजीका किया अर्थ अशुद्ध है। पुराने अर्थमें सौभाग्यवती होनेकी प्रार्थना, दयानन्दी मतमें ग्यारह खसम करानेकी प्रार्थना है । x अब विचारनेकी बात है कि इसमें नियोगमवारका कौनसाशब्द है, दयानंदनी- ने तो यह समझ लिया कि हमारे अनुयायी हमारे वाक्यको पत्थरको लकीर मानते हैं वेदपर टीका भी हमाराही किया मानते हैं, जो चाहें सो वकवाद किये जाय, आपके, मतमें तो किसीके दशसे कमती पुत्र ही न होने चाहिये जिनके कमती हों वह आपके पाक्यानुसार कुछ फिन करें और दश सन्तानों में समय कितना लगेगा यह आपने न लिखा ॥ (पृ. ११४ से पृ० ११५ तक ) यह वेश्याफे सदृश कर्म दीखता है (उत्तर) नहीं क्यों कि घेश्याक समागममें किसी निश्चित पुरुष वा कोई नियम नहीं है। * मेरठ के स्वामी यह ग्यारहयो पति कर ऐसा भर्य करते हैं उनसे पूछनाह कि ग्यारहवा तो पति कर और देशको क्या बनाये। यहां तो सब गोलगोल ठुकाई है। .
(३५६) दयानन्दतिमिरभास्करः। और नियोगमें विवाहके समान नियम हैं जैसे दूसरेको विवाहमें लड़की देनेसे. लना नहीं आती वैसे ही नियोगमें भी लना नहीं करनी चाहिये, जो नियोगकी वातमें पाप मानते हो तो विवाहमें भी पाप मानो, नियोग रोकनेमें ईश्वरके मृष्टि- क्रमानुकूल स्त्री पुरुषका स्वाभाविक व्यवहार नहीं रुकसत्ता, सिवाय वैराग्यवान् पूर्ण विद्वान् योगियोंके क्यों कि जवान स्त्री पुरुषोंको सन्तानोत्पत्ति विषयको चाहना रुकनेसे महासन्ताप होता है और गुप्त २ वे करते ही हैं, जो नितेन्दिय हैं नियोग न करें तो ठीक है, जो न रुकसके तो उनका विवाह और भापत- कालमें नियोग अवश्य होना चाहिये, ऊंचसे नीचका नीचसे ऊंचका व्यभिचाररूप कुकर्म होनेसे कुलमें कलंक वंशका उच्छेद स्रीपुरुपोंके सन्ताप नियोगसे निवृत्त होते हैं, जैसे प्रसिद्धिसे विवाह करे तैसे ही प्रसिद्धिसे नियोग, जब नियोग करे तब अपने कुटुम्बमें पुरुपस्त्रियोंके सामने कहैं हम दोनों नियोगःसन्तानोत्पत्तिके लिये करते हैं, जब नियोगका नियम पूरा हो जायगा तव संयोग न करेंगे इसमें भी फन्पा और वरकी प्रसन्नता लेनी अपने वर्णमें या अपनेसे उत्तम वर्णसे नियोग करना, वीर्य सम या उत्तम वर्णका. चाहिये अपनेसे नीचका नहीं स्त्री और पुरुषकी मृष्टिका यही प्रयोजन है कि वेदोक्त रीतिसे विवाह वा नियोगसे सन्तानोत्पति फरना, दिनों में स्त्री वा पुरुषका एक बार ही विवाह होना, वेदादिशास्त्रोंमें लिखा है दूसरा नहीं जिसकी खो मरनाय उमके साथ कुमारीका विवाह नहीं करना और विधवाका कुमारके साथ विवाह न करे तो पुरुष और नीको नियोगकी आपश्प फता होगी, यही धर्म है जैसेके साथ सेका ही संबंध होना चाहिये यह दोनों पृष्टॉमसे संक्षेप कर सारांश ले लिया है | पृ० ११६ से पृ० ११७ तक समीक्षा-आप ही प्रश्न करतेहै कि यह कर्म वेश्याफे सदृश दीसता है आप ही उत्तर देते हैं कि नहीं, यदि यह कर्म वेश्याके सदृश न होता तो महात्माजी मुस्खसे ऐसी बात क्यों निकलती जैसी बात होती है वैसी मुंह से निकल ही नाती, है, यह नो लिखा है कि या समागममें किसी निधित पुरुपका नियम नदी नियोगमें विवाहके समान नियम है, मोनियोगम को नियम नहीं, ग्यारह पति बनानेतकी आता है, यस नियम कैसा "और नेप्से विवाहमें समा नहीं वैसे ही निपोगमें लना नहीं करनी चाहिये यहां तो आपने लानको भी तिलोनलि. देदी, इस ग्रंथका नाम निलंगप्रकाश क्यों न रख दिया, पिपाद तो माने अनपोनिका ठहरापा, और विधाका पियाह समान नियोग, तो पतिता पेश्या एक ही घनाई, कर कपर एक ही भाव फर दिये, क्यों न हो आप तो समः सी हैं, नव कि ईभरकी सृष्टिकमावाल मनुष्यका स्वभाष कामष्टाम रही मही सरना नौ मला योगी कम रो मन । यदि योगी गेस्लें तो int - चतुर्यसमुल्लासखण्डनम् । (१५७) 'मुष्टिका क्रम मिथ्या हो जाय, दोनोंमें एक बात लिखी होती या तो ईश्वरकी सृष्टिका क्रम पृथा या वह, और जो योगियोंने सृष्टिकम उल्लंघन करदिया तो वे ईश्वरकी इच्छाके मतिकूल हुए, जब योगियोंको सृष्टिक्रम नहीं व्यापता फिर तो ये सब ही कुछ सृष्टिकम विरुद्ध करसक्ते हैं, यह स्वामीजीकी वात परस्पर विरुद्ध है इससे अपमाण है पीछे तो नियोगसे सन्तानोत्पत्तिका प्रयोजन बताया और अब लिखा कि जवान स्त्रीपुरुष विषयकी चाहना होनेसे सन्तापित होते हैं, नियोगसे उसे शान्त करलेंगे यह बात स्वयं महात्मानीपर बीती है नहीं तो जाके पैरन पटै विवाई, सो क्या जाने पीर पराई " यह सूझती कैसे फिर लिखा है कि, नितेन्द्रिप हैं नियोग न करें तो ठीक है, यह आपने क्या कही, नियोग विषयको महाकष्ट उठाकर वेदसे सिद्ध कर सृष्टिके क्रम और प्रयोजनमें बताया ईश्वरेच्छा ठहराई तो फिर यह सृष्टिक्रम विरुद्ध ईश्वरेच्छाके प्रतिकूल वेदका क्यों निरदार करते हो "नास्तिको वेदनिंदका" वेदाज्ञा न माननेवाला नास्तिक होता है "जो न रुकसके उनका नियोग विवाह करदो" यह क्या ? अभीतक तो विधवाविवा- हका निषेध और अब व्याह करनेकी आज्ञा सुना दी, यदि कहो विवाह कुमार कुमारीका कहा है सो यहां यह प्रसंग नहीं और उनका तो होता ही है, लिखने की क्या आवश्यकता थी या वे भी जितेन्दिय रहैं, तो ईश्वरकी सृष्टि क्यों कर बढ़ेगी, यदि यह पशुधर्म भारतमें चलता तो यह देश रसातलको चला जाता स्वामीजी चलानेको थे सो चलदिये “आप ही नीच ऊँचे वर्णमें. व्यभिचार होनेसे कुलमें कलंक और वंशोच्छेद होना लिखते हैं यहां स्पष्ट जन्मसे जाति मान ली कारण कि वीर्य शरीरसे होता है और आप ही अपनेसे टच्च वर्णक पोर्प निपोगमें ग्रहण करना लिखते हो" यह साक्षात् वर्णसंकरताका हेतु है ऊं नीच तो हो ही गया देखिये मनुस्मृति- ब्राह्मणाद्देश्यकन्यायामम्बष्ठो नाम जायते ॥ निपादः शुद्रकन्यायां यः पारशव उच्यते ॥ क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायांकराचारविहारवान् ।। क्षत्रशूदवपुर्जतुरुयो नाम प्रजायते ॥ सर्ववणेषु तुल्यासु पत्नीप्वक्षतयोनिषु ।। आनुलोम्येन संभूता जात्या ज्ञेयास्त एव ते ॥ अ० १० श्लो० ८, ९, ५. प्राझणसे वैश्यकन्या में अम्बष्ठ नाम जाति उत्पन्न होती है और ब्राह्मण .
। (१५८) दयानन्दतिमिरभास्करः। शूवकन्यामें निपाद जाति जिसे ( पारशव) कहते हैं उत्पन्न होती है १ क्षा यसे शूदकन्या रावार विहारयाला और क्षत्रिय शूद स्वभावयाला उग्र जाति पाला उत्पन्न होता है २ इससे ब्राह्मणादि चारों वर्णोको अपनी समान ना और पुरुपसम्बन्धरहित पेसी कन्यासे यथाशास्त्र विवाहादि व्यवहार करना चाहिन उस स्त्री जो सन्तान उत्पन्न हो उसे उसी जातिका जानना चाहिये शे- वर्णसंकर जानने ॥ स्वामीजीने तो यहां मनुस्मृति भी न देखी इच्छा ती भारतवर्षको वर्णसंकर बनानेकी थी परन्तु यमराजने पूर्ण नहीं होने दी ":पुनः लेख है पृ० ११५९ नियोगसे भी विवाहकी नाई प्रसिद्ध रीतिसे करे उस स्त्रीकीभी प्रसन्नता लेले" प्रसिद्ध करनेको कोई विज्ञापन देदे या डंडोरा पिटवादे या मिठाई बॅटवादे कि, मैं नियोग करूंगा, अब मुझसे रहा नहीं जाता इसी प्रकार वह स्त्री भी अपनी सम्मति प्रकाश करे कितनी निर्लनता भरी बात है क्या कहाजाय "नियोग और विवाहसे ईश्वरकी सृष्टिका प्रयोजन है:" यदि ईश्वरकी यही इच्छा थी कि सृष्टि पटै तो उसने अमि वायु आदिकी नाई करोडों जीव एक संग ही क्यों न उत्पन्न करदिये, अथवा स्त्रियोंको विधवा क्यों किया, जो उनके स्वामी विद्य. मान रहते तो विचारियोंको ऐसी कठिनाज्ञा क्यों दी जाती यदि कहो कि यह सूख दुःख कर्मानुसार ही होता है, कर्मानुसार ही विधवा होती हैं, तो भी आप सृष्टि क्रम प्रतिकूल ही करते हैं, क्यों कि ईश्वर जव कर्मानुसार सुख दुःख देता है, तो जो कर्मानुसार दुःख पानेको विधवा हुई तुम उसका फर्मानुकूल दुःख मेटनेका उपाय करके ईश्वरका नियम तोडना चाहते हो और यह भी ठीक नहीं कि सन्तान जाने कैसो हो ईश्वरकी कर्मानुकूल व्यवस्थामें हस्ताक्षेप करना वृथा है, नियोगसे सृष्टि नहीं बढ सक्ती उसकी सृष्टि अनन्त हैं, कौन पार पा सकताहै इस ब्रह्माण्डमें करोडों लोक उसने रचदिये हैं किसीके बढाये घटायेसे उसकी सृष्टि बढ घट नहीं सक्ती आप पुरुपका दूसरा विवाह नहीं बताते हो । सुनिये- वंध्याष्टमेऽधिवेद्यादे दशमे तु मृतप्रजा ।। एकादशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ॥ ८१ ॥ या रोगिणी स्यात्त दिता संपन्ना चैव शीलतः॥ सानुज्ञाप्याधिवेत्तव्या नावमान्या च कार्दचित्८२मनु०स०९ रजस्वला होनेसे आठ वर्पतक कोई सन्तान नहीं हो तो दूसरा विवाह को और पुत्र होके मर जाते हों तो दशवें वर्ष उपरान्त दूसरा विवाह करले और कन्या ही उत्पन्न हों तो ग्यारहवें वर्ष में विवाह कर और अमिय बोलनेवाली स्री हो ते चतुर्वसमुल्लासखण्डनम् । उसी समय दूसरा विवाह कर ८१ जो बीमार रहे और पतिके अनुकूल हो शील- वाली भी हो तो उसको आज्ञा लेकै दूसरा विवाह करै, उसका अपमान करना उचित नहीं है ॥ ८२॥ स० पृ० ११५ पं० ३१ जैसे विवाहमें वेदादि शास्त्रका प्रमाण है वैसा नियोग प्रमाण है या नहीं ( उत्तर ) इस विषयमें बहुतसे प्रमाण हैं सुनो। कुहास्विद्दोपा कुहवस्तोरश्विनाकुहाभिपित्वंकरतःकुहोपतुः ।। कोवांशयुत्राविधवेवदेवरंमय्यं न योपाकृणुतेसवस्था ॥ ऋ०-मं० १०० ४० म०२ हे (अश्विना ) स्त्री पुरुपो जैसे (देवरं विधवेव ) देवरको विधवा (योपाम- य॑न्न ) विवाहित स्त्री अपने पतिको ( सधस्थे) समान स्थान शय्यामें एकत्र होकर सन्तानोत्पत्तिको (आकृणुते ) सर्व प्रकारसे उत्पन्न करती है वैसे तुम दोनों स्त्री पुरुष (कुहाविदोपा) कहाँ रात्री और (कुहवस्तः) फहां दिनमें बसे थे (कुहाभिपित्त्वम् ) कहाँ पदापोंकी प्राप्ति ( करतः) की और (कुहोपतुः ) फिस समय कहाँ वास करतेपे (कोवाशयुत्रा ) तुम्हारा शयन स्थान कहाँ है, तथा कौन वा किस देशके रहनेवाले हो इससे यह सिद्ध हुआ कि देश विदेशमें स्त्री पुरुष संग ही रहें और विवाहित पतिके समान निपुक्त पतिका ग्रहण करके विधवा स्त्री भी सन्तानोत्पत्ति करले (मश्न ) यदि किसीका छोटा भाई भी न होती विधवा स्त्री नियोग किसके साथ करें (उत्तर) देवरके साथ परन्तु देवर शब्दका अर्थ जैसा तुम समझे हो वैसा नहीं है देखो निरुक्तमें। देवरः कस्माद्वितीयो वर उच्यते ।नि० अ०३ खण्ड १५ ॥ देवर उसको कहते हैं जो विधवाका पति दूसरा होता है. छोटा भाई वा बडा भाई अपया अपने वर्ण वाअपनेसे उत्तम पर्णवाला हो जिससे नियोग परै उसीका नाम देवर है ॥ पृ० १९८४ से । समीक्षा-धन्य है स्वामीजी बड़ा भारी जाल हालाहै, इस मंत्रमें तो नियो- गका कुछ भी आशप नहीं निकलता यह कौन किससे पूछता है, क्या परदेशी लोग सिपासे पूकि तुम रातमें फहांयी कहाँ सन्तानोत्पत्ति कर रहे थे, या ईश्वर स्त्री पुरुपोंसे पूछताहै फि तुम दोनों कहां थे क्या ईश्वर अज्ञान है, जो विधवासे रति करै यह देवर चाहे वहा हो या छोटा, शोक है ऐसी बुद्धिपर नियोग कर- में पता भी जो ज्येष्ठ हो तो सौका देवर होजाय, इस मंत्रमें अधिना इस पदसे • . ५ -- (१६०) दयानन्दतिमिरभाएका स्त्री पुरुपमा ग्रहण करके केवल जाल रचा है मिथ्या अर्थ किये हैं इस मं- अश्विनी यह शब्द देवताफा पाचक है स्वामीनीने इसमें कुछ प्रमाण नहीं लिट है निरुतमें यह लिखा है ।। अथातोयूस्थाना देवतास्तासामश्विनो प्रथमागामिनो । निरुक्तदैवतंकाण्ड अ० १२ खं०.१ अब घूस्थान देवताओंफा व्याख्यान करते हैं सर्व गुस्थान देवताओंके मा अश्विनी यह दो देयता प्रथम यज्ञमें आगमन करते हैं यह निरुक्तकारका मत है अब इससे यह सिद्ध हुआ कि अश्विनी देवता हूँ अब इस मंचका अर्थ लिखते हैं जो निरुक्तके भाष्यकार दुर्गाचार्य ने लिखा है इसका अश्विनी- कुमार देवता जगती उन्द है हे अश्विनी " कुहस्वित् दोषा " नुयुवो" (रात्री ) "भवयः" (कुहवस्तीः) क वा (दिवा) भवयः युवाम् ) येननापि रायी अस्माकं दर्शनमुपगच्च्यः (नापि दिया ) स्विदिति परिदेवनापान ईर्ष्यायो वा (कुह) क च (आभपित्वम्) अभिप्राप्ति स्नानभोजनाद्यर्थ (कुरुयः)- कुह क वा (ऊपतुः) (वसथः ) सर्वथा न विज्ञायते. वामागमनप्रवृत्तिः किञ्च (फोशियुत्रा) कतमो युवा यजमानः शयुत्राशयने किं विधवा इव देवरम् यी विधवा मृतभर्तृका काचित् स्त्री शयने रहस्यतितरां यत्नवती देवरमुपवरति स हिप रफीयत्वात् नार्या दुराराध्यतरो भवति यत्नेनोपचर्यते न तथा निजो भर्ता तस्मात् तेनोपमिमीते अश्विनौ तथा मयं मनुष्यं देवरं सैव मृतभर्तृका ( योषा) आकृणुते आभिमुख्येन कुरुते को वामेवमाभिमुख्येन ( सधस्थे ) सहस्थाने समाने सहं योगिना चात्मना कृत्वा परिचवार येनेह नोपगतवन्तौ स्योऽस्मदर्शनमिति एवमस्यामृचि देवरेण फनीयसा ज्यायांसावश्विनावुपमीयते विधषया व यजमानः॥ भापार्थः- हे अश्विनौ तुम दोनों रात्रिमें कहाँथे और (वस्तोः) नाम दिनमें फहाथे जिससे न रात्रिमें न दिनमें तुम्हारा दर्शन हमें मिला स्नान भोजना- दिकी प्राप्ति कहां की कहां निवास किये सर्वथा तुम्हारी आगमन प्रवृत्ति नहीं जानी जाती (फोवांशयुवा विधवा इव देवरम् ) शयनमें देवरको विधवावत कौन यजमान तुमको परिचरण करता हुआ क्यों कि परकीय पति होनेसे दुरारा देवरको मृतभईका यत्नसे आराधन करती है (इस कर्मको निन्दित जान छिप बडे यत्नसे उससे मिलती है ) तद्वत् तुमको किस यजमानने आराधन किया, यू एकान्तस्थानमें मृतभर्तृका नारी मनुष्यको अपने शरीरके साथ सम्बन्धकर परि रण फुरती है तद्वत् तुम्हारी किसने सेवा की, जो हमें दर्शन नहीं प्राप्त हुए. मन्त्रमें अल्प देवर कर महान्त अश्विनीकुमार उपमेय होते हैं और विधवा शब्द . चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (१६१) जमान उपमेय होता है इस स्थलमें ( स हि परफीयत्वात् नार्या दुराराध्यतरो भवति ) जवकि देवरको परकीयस्थ कहा तो दूसरीका पतित्व हो गया, वामीनी चोरहितका नियोग मानते हैं तो इस मन्त्रमें नियोगका कुछ भी आशय नहीं प्रतीत होता, प्रत्युत मृतभर्तृकाका देवर के पास जाना भी शंकायुक्त स दृष्टान्तसे विदित होता है, आपके नियोगमें निःशंक आज्ञा है जो विधवा सभी देवरसे व्यभिचारमें प्रवृत्त हो तो बड़ी छिपकर मवृत्त होती है क्यों कि अधर्म है इसमें यह दृष्टान्त है आज्ञा नहीं है उस पुरुषको निसके स्त्रीन हो वोह बात इस मन्त्रसे तनकभी नहीं प्रतीत होती यहमन्त्र प्रातःकाल अश्विनीकुमारोंकी स्तुतिका है, अमिष्टोमादि पोंके मातरमुपाक और आश्विन शस्त्र में इसका विनियोग पदार्थः (अश्विनी) हे अश्विनीकुमार देवो (कुहस्वित्) तुम दोनों कहाँ (दापा) पत्रिम होते तया (कुहवस्तोः) कहाँ दिनमें आते हो । कुहाभिपित्वं करतः) कहाँ ष्टकी प्राप्ति करते हो (कुह ऊपतुः) कहाँ वसते हो (कः) कौन यजमान (वाम) तुम दोनोंको (सधस्थे) यज्ञवेदीरूप स्थानमें ( आकृणुते ) सेवा करनेको सन्मुख करताहे जैसे (शयुवा) शय्यापर( विधवेव देवरम् ) वाग्दानके पश्चात् जिसका गति भरगपा हो वह देवरके संग विवाही जाकर जैसे उसे प्रसन्न करती सेवामें तत्पर होतीहै अपया (मपं न पोपा ) सब स्त्री एकान्तमें जैसे अपने पतियोंको प्रसन्न करती हैं ऐसे यह यजमान यज्ञमें आपको प्रसन्न करनेको (आ) सब मोरसे तत्पर होताहै यहाँ विधवासे वह स्त्री लेनी जो (यस्या नियकन्यायाः) इसके अर्थम मनु० अ०९ श्लो० ६९ में मागे चलकर विधान कियागया है इसमें नियोगका नाम भी नहीं है। और (देवरः कस्मा० ) इसके अर्थ भी गडबड लिखेहैं और यह निरुक्तका- रका वाक्य भी नहीं है * निरुक्तान्यके छापनेवालोंने लिखा है कि यह वाक्य मावीन तीन पुस्तकोंमें नहीं है इसी कारण इसको उन्होंने कोष्ठ में बन्द कर दिया है और दुर्गाचार्यने इस पर भाष्य भी नहीं किया इससे यह क्षेपक है यास्कनीने इसका अर्थ यों लिखा है कि देवरो दम्पतिकर्मा भाप्पे सहि भर्तुभ्रातानित्यमेव तया भ्रातृभार्यया देवनार्थ नियत इति देवर इत्युच्यते यह इसका अर्थ है कि भाईकी स्त्रीको शुभूपा करनेसे इसका नामदेवर है यदि वोह पाठ यास्कमुनिकृत होता तो पुनः देवर शब्दका क्यों अर्थ करते इससे वह प्रक्षिप्त ही है सारे ग्रंथों में स्वामीजीको प्रक्षि- सता सझी और यहां लिखी हुईभी न मूझी और प्रक्षिप्तभी नहीं सही इसे मान भी लेंतीभी स्वामीजीका अर्थनहीं बनसक्ता,मनुजाने इसका अर्थ लिखा है (पस्याम्रि०) श्लोक यह आगे लिखेंगे, अर्थ यह है कि वाग्दानके उपरान्त मिस कन्पाका पति * पर तुलसति तथा दूसरे समाजी इसे मक्षिप्त क्यों मानेंगे।
दयानन्दतिमिरभास्करः। 'मरजाय उसे देवर अर्थात् उसके छोटे भाईसे व्याह दे, इसी कारण देवरको दूसरा पर कहते हैं परन्तु नियोग यहां भी सिद्ध नहीं होता और (विधावनात् )भाके मरनेसे स्त्री रोकी जाती है कहीं आने जाने नहीं पाती इस कारण इसे विधवा कहते हैं स्वामीजी उसे ऐसा स्वतन्त्र करते हैं कि कुछ बूझिये मत, आपको बता ही चुके हैं आपने सबही जातवालोंको देवर बनादिया, जो नियोग करै वोह देवर मौर सुनो- स०प्र० पृ० ११६ पं०६ उदर्श्विनायभिजीवलोकं गतासुमेतमुपशेषएहि ॥ हस्तग्राभस्यदि- घिपोस्तवेदंपत्युजनित्वमभिसंबभूथ ऋ० मं० १० सू०१८ म०८ (नारि ) विधवे तू (एतं गतासुं) इस मरे हुए पतिकी आशा छोडके (शेपे चाकी पुरुषों से (अभिजीवलोकम् ) जीते हुए दूसरे पतिको (उपाहे ) प्राप्त । और (उदीर्व) इस बातका विचार और निश्चय रख कि जो ( हस्तनाभस्पति धिपोः) तुझ विधवाको पुनः पाणिग्रहण करनेवाले नियुक्त पतिके सम्बन्ध लि. निपोग होगा तो (इदम् ) यह (जनित्वम् ) जना हुआ बालक उसी नियुक्त (पत्युः) पतिका होगा और जो तू अपने लिये नियोग करेगी तो यह संतान (तव) तेरा होगा ऐसे निश्चययुक्त ('अभिसंघभूय) हो और नियुक्त पुरुष भी इसी नियमका पालन करै ॥ ११८१७ पं० २५ से टीका । समीक्षा-स्वामीजीकी बुद्धि कहां लोट गई, इधर तो पति भरा पड़ा है, नारी जिसका वह पालक पोषक नाथ था, उसके शोकमें विलाप करती है, उसी समय उसको कहने लगे कि इसे छोड औरोंको पति बनाले, क्या उसका पतिसे कुछ भी प्रेम न था सोचनेका स्थान है बुद्धिमानोंको, और जब कि उसके पास पाला मौजूद हैं तो अब उसे नियोगकी आवश्यकता ही क्या है और पूर्व पतिसे उत्पन्न हुआ बालक नियुक्त पुरुपका क्यों फर हो सक्ता है, यह स्वामीगीका महा प्रलाप है जो मायणाचार्यने इस मंत्रका यथार्थ व्याख्यान किया है, सो लिखते हैं । हे नारिमृतस्यपत्निजीवलोकंजीवानांपुत्रपौवादीनांलोक स्थानगृहमभिलक्ष्योदीपर्व अस्मात्स्थानादात्तिष्ठ ईर गतो अदादिक गतासुमपक्रान्तप्राणमेत पतिमुपशेपे तस्य समी- पे स्वपिपि तस्मात्त्वमेहि आगच्छ यस्मात्त्वं दस्ताग्राभस्य पाणियाई कुर्वतो दिधिपोगर्भस्यानिधास्तवास्यपत्युः स- चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (१६३) बंघादागतमिदंजानत्वं जायात्वमभिलक्ष्यसंवभूथ संभूता- स्पसुसरणनिश्चयमकापीस्तस्मादागच्छ अबार्थंकल्पसूत्रम- प्यनुसंधेयम् । तामुत्थापयेद्देवर-पतिस्थानीयोऽन्तेवासी- जरदातोवोदीलनाय॑भिजीवलोकामिति ॥ इस मंत्रका अन्त्येष्टि कर्ममें विनियोग है जब पति मरगयातो श्मशानमें पतिके समीप कुशाओंपर लेटी हुई उसकी स्त्रीको देवर शिष्य वा बहुतकालसे सेवा करते हुए युद्ध हुआ दास उठावै यदि वह गर्भवती हो तो पुंसवनादि संस्कार करनेसे देवर पतिस्थानीय. कहा है उसके अभावमें शिप्य उसके अभावमें दास. है (फर्ता वृषले जपेत् आश्वलायन) यदि पत्नीको उठानेवाला दास है तो दाह करनेवाला ब्राह्मण या क्षत्रिय मंत्र जपे कारण कि शूदको वेदपाठका अधिकार नहीं है। (नारि) हे नारि मृतकी पत्नी ! (जीवलोकम् ) जीवित विद्यमान पुत्रपौत्रादिके निवासस्थान घरको (अभि) देखकर (उदीर्व) इस चितास्थानसे उठ तेरे विना पुनादिका पालन फोन करेगा (एतम ) इस (गतासुम् ) मृतकके (उपशेष) समीप लेटी है यहाँसे (एहि ) आओ कारण कि ( हस्तग्राभस्य) विवाह समयमें हाय ग्रहण करनेवाले ( दिधिपोः ).गर्भाधान करनेवाले ( पत्युः ) इस पतिके सम्बन्धसे प्राप्त हुए (तव ) तुम्हारे (इदम् ) इस (जनित्वम् ) पत्नीपनको (अभि ) देखकर ( सम्बभूय ) पतिके साथ मरनेका निश्चय तने किया है सो निशप छोडकर उठ॥ इसमें नियोग वा विधवाविवाहकी गंध भी नहीं है यहां यौगिकार्थसे धारक वा पोपफ अर्थमें दिधिषु पाणिग्रहीता पतिका ही विशेषण है दिविपो यह हस्वान्त पुंल्लिङ्ग पष्ठीका एकवचन है दीर्य ऊकारन्त स्त्रीलिङ्ग नहीं है, पर दयानंदनीको तो किपाका भी ज्ञान नहीं हुआ 'उपशेपे धोरे सोती है ' के स्थानमें 'शेपे' वालों पुरुषोंसे ऐसा अर्थ करते हैं इस अशुद्धिका भी कहीं ठिकाना है धन्य विद्वत्ता! भा०म० में और ही अर्थ लिखा यहाँ चेला शकर होगये हैं छोटे स्वामी ठीक हैं या पडे ॥ दयनारीपतिलोकं वृणानानिपद्यत उपत्वामत्यंप्रेतम् । धर्म पुगणमनुपालयन्तीतस्येप्रनादविणंचेहदि १ अर्व १८॥ ३।१ अयंतेगोपतिस्तंजुपस्वस्वर्गलोकमापिरोयैनम् १ दाहके समप देवरादिका मृतकको लक्ष्प कर फपन है कि (मर्य)हे मनुष्य।
. (१६४) दयानन्दतिमिरभास्करः। (पतिलोकम् ) जहाँ पतिं गया उस लोकको ( गाना ) इच्छा करती हुई (पुराणम् ) दूसरे जन्ममें भी यही पति मिले इस सनातन (: धर्मम् ) धर्मको (अनुपालयन्ती) पालन करती हुई (इयम् ) यह (नारी) स्त्री (प्रेतम् ( मृतक हुए (त्वा) तुम्हारे ( उपनिपद्यते) समीप निरन्तर प्राप्त होती है अर्थात् संगमें मरणका निश्चय कर चुकी है ( तस्यै ) उसके लिये तुम्हारे समयके विद्यमान (प्रनाम् ) पुत्रादि और (दविणम्) धन (धेहि )धारण करो अर्थात् यह तुम्हारे धन पुत्रादि नष्ट न हों सदा विद्यमान हैं जिससे यह जन्मान्तरमें फिर तुम्हारा दर्शन करसकै ॥ लोकान्तरमें भी पुत्रपौत्रादिधन इसको प्राप्त हो अनुमरणके प्रभावसे जन्मान्तरमें यही पति मिलेगा ॥ १ हे मृतनारि यह तेरा पति है इसको अब अच्छे संस्कारको सेवन करके इसको स्वर्गलोक पहुंचा ४ इस मन्त्रसे अब बुद्धिमान विचारेंगे कि स्वामीनीने कितने मंत्रार्थ बदल दिये हैं। स पृ० ११७ पं.४ आदेबृघ्यपतिनीधि शिवापशुभ्यः सुयमासुवर्चाः प्रजा- वतीवीरसूदकामास्योनेममग्निगाहपत्यसपर्य अर्व का० १४ अ० मं० १८ है (अपतिन्यदेवृमि) पति और देवरको दुःख देनेवाली स्त्रीतू (इइ) इस ग्रहा. श्रममें (पशुभ्यः) पशुओंके लिये ( शिवा) कल्याण फरेनहारी ( मुपमा) अच्छे प्रकार धर्म नियमसे चलने ( सुवः ) रूप और सर्वशास्त्र विद्यायुक्त :(प्रनावती ) टत्तम पुत्रपौत्रादि सहित (वीरसूः) शूरवीर पुत्रोंके गनने (देश- कामा ) देवरकी कामना करनेवाली (स्योना ) और मुख देनहारी पति या देशरफो. (एघि ) प्राप्त होके (इमम् ) इस ( गार्हपत्यम् ) गृहस्थसंबंधी (आमिम् ) अमि होत्रका (सपर्य) सेवन किया करे ।। ११९१७ समीक्षा-प्रथम तो दयानंदनीने इसका पाठ ही अशुद्ध लिया है ( अदेयो स्थानमें मंत्रमें आंद) यह दीर्घ आकार लिखा है और पति और देवरको दुरा न देनेपालीकें स्थानमें ( अपतिन्यदनि ) इसका अब पति देवरको दुःश देने पाली लिया है यह तो मंत्रोंमें उलट फेर है, भला जो दुःग देनेवाली दोगी यह देवरकी कामना कैमे फरमर्केगी और देशकामासे यह अर्थ नहीं गिद्ध होता है घद देयरसे भाग किया चाहती हो पति मौजूद है तो कभी देयर पास नहीं जायगी। १८१८ वलीमें पाठ सुधारगर दुःख न देनेवारी भई ने किया है भाग्य पाठ है। : . . ५ चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । और कामना विद्यमानतामें नहीं होती अविद्यमानतामें होती है यदि वह देवर पति किया चाहती तो देवरि पतिकामा ऐसा प्रयोग होसक्ता है सो मंत्रमें दि नहीं इससे नियोग सिद्ध नहीं होता, किन्तु यह ऐसे स्थानका प्रयोग है, f स्त्रीके देवर नहीं वह चाहती है कि मेरे श्वशुरके बालक हो तो मैं देवरवाल ऐसी स्त्रीको देश्कामा कहते हैं, जैसे भ्रातृरहितः कन्या भ्रातृफामा यह पर बनताहै कि मेरे भाई हो तो मैं बहन कहाऊ, ऐसे ही यह देवृकामा शक नियोग नहीं सिद्ध होता, अब इसके यथार्थ अर्थ सुनिये ( अदेवृध्न्यपतिमि पाले तू पति और देवरकी मुख देनेवाली (एघि ) वृद्धिको प्राप्त हो अर्थात् है आदि कुटुम्बियोंसे विरुद्ध मत करना( इह ) इस गृहाश्रममें (पशुभ्यः ) पशु 'लिये (शिवा) कल्पाणकारी ( सुपमा) अच्छे प्रकार धर्म नियममें चलनेव ( सुवर्याः ) रूपगुणयुक्त ( प्रमावती) उत्तम पुत्र पौत्रादि सहित (वीरसः) पुचोंकी उत्पन्न करनेवालो ( देयकामा ) देवरके होनेको मार्थना करनेवाली आनंद चाहनेहारी (स्पोनः ) सुखिनी (इमम् ) इस (गार्हपत्यम् ) गृह सम्बन्धी (अमिम् ) अमिहोत्रको (सपर्य) सेवन कियाकर ॥ स्वामीनीने यह न जाना कि यह पुस्तकें और भी कोई देखैगा तो कैसी है यह विवाहके मंत्र नियोगमें लगाये हैं, धन्य है आपको बुद्धि और सुनिये- तदारोहतुसुप्रजायाकन्याविन्दतेपतिम् । अथ० ११४२ मं० स्यानाभवश्वशुरेभ्यः स्योनापत्यगृहेभ्यः । स्योनास्यैसर्वस्ये विशे स्योनापुष्टायेषांभव । १४।२।२७ हे नारि श्वशुरोंके पास्ते पतिके वास्ते और घरके कुटुम्बियोंके वास्ते स धर्म सुख देनेवाली हो । यदि आपका नियोग सत्य है तो यहां पति और श्वशुर दोनोंके । (स्पोना) पद आया है अर्थात् सुख देनेवाली हो एवं सब कुटुम्बियोंको देनेहारी कहा है तो क्या जो पतिके संग व्यवहार करै वह ही सबके साथ। यह कभी नहीं होसक्ता पतिको और मकारका सुख, श्वशुरादिफोंको सेवा आ सुखदाता होती है. यह नहीं कि, सुख देनेसे सबके संग भोगके ही अर्थ होज इससे आपके सब अर्थ भ्रष्ट हैं मिथ्या है नियोग एकसे भी नहीं बनता, दयानंदनी मनुस्मृतिपर आते हैं । : पृ० ११७५० १४ तामनेन विधानेन निनो विन्देत देवरः । जो अक्षतयोनि स्त्री विधवा हो जाय तो पतिका निज छोटा भाई भी टन दयानन्दतिमिरभास्करः। समीक्षा-स्वामीनी यहां भी अर्थ बनानेसे न चूके, यदि इस श्लोकको पूरा लिसते तो आपकी फलई खुल जाती. यह आधा श्लोक आपने मतलब सिद्ध फरनको लिसा सो इससे मतलय कुछ भी सिद्ध नहीं होता मुनिये- यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः ।। तामनेन विधानेन निनो विन्देत देवरः ॥ अ०९ो०६९१ जिस कन्याका वाग्दान करनेके अनन्तर पति मरजाय उसका उसके छोटे भाईसे विवाह करदे यह इसका अर्थ है सो. आजतक ऐसा सब कोई करते हैं.' वाग्दान विवाहसे पहले होता है ऐसा होनेपर वह पति मरजाताहै, तो उसका. विवाह औरके संगः कर देते हैं स्वामीजीने अक्षत योनि और विवाह होगई हुई लिखा है यही महाकपट है ॥ पृ० ११७ पं० १६ (प्रश्न ) एक स्त्री या पुरुष कितने नियोग करसक्ते हैं और विवाहित नियुक्त पतियोंका नाम क्या होताहै (उत्तर)॥ सोमः प्रथमो विविदे गन्धवों विविद उत्तरः । तृतीयो अग्निटे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः।ऋ०१०म०८५ मं०४९ हे स्त्री ! जो (तेरा (प्रथमः ) पहिला विवाहित (पतिः) पति तुझको ( विविदे ) प्राप्त होता है उसका नाम ( सोमः ) मुकुमारतादि गुणयुक्त होनेसे सोम, जो दूसरा नियोगू होनेसे ( विविदे ) प्राप्त होता है वह (गंधर्व ) एक स्त्रीसे भोग करनेसे गंधर्व, जो तृतीय (उत्तरः) दोके पश्चात् तीसरा पति होताहै यह ( अमिः) अत्युष्णता होनेसे अमि संज्ञक और जो तेरे (तुरीयः) चौथैसे लेके ग्यारहतक नियोगसे पति होतेहैं वे ( मनुष्यनाः) मनुष्यनामसे कहाते हैं (इमात्वमिन्द्र ) इस मंत्रसे ग्यारहवें पुरुषतक स्त्री नियोग करसक्ती है और पुरुष भी ग्यारहवीं स्त्रीतक नियोग करसक्ता है ।। ११९१९ समीक्षा-स्वामीनीने ऐसी हठ ठानी है कि अाका अनर्थ कर दिया है कि वेदार्थको क्षुदता प्रतीत होती है, हम मंत्रार्थ दिखाते हैं इस मंत्र का विवाहमें विनियोग है ॥ हे कन्ये त्वमुच्यसे सोमः त्वां प्रथमो विविदे विनवान प्राप्तवान् सौम्ये प्रथम कौमारके (गन्धवा विविद उत्तरः )उपजायमानचारुताङ्गमविभागस्वरसाधवामी पदनंगाङ्गसमाहृतहृदयां गंधवौं विश्वावमुस्त्वां विविद विनवान् अय पुनरिदानी यापूर्वपतिवित्त्वाअयान्यविन्दतेपरम् अथर्व ९।५।२७ । मास्करप्रकाशी इस मंत्रको उनको ध्यान रहे कि यह पंचोदन के विधान है वाग्दान होनेपर पति विवाहपरक मंत्र है मनुका श्लोक इसीका टीका है। ".
चतुर्पसमुल्लासखण्डनम् । (१६७) धैवाहिके उपगतापा कर्मणि (नृतीयो अभिष्टे पतिः ) तृतीयस्तचापमणिः । अत उदहनात् परं तुरीयः चतुर्थः (ते) तवायं (मनुष्यनाः) पतिः । इत्येवमनेनाऽपि मंत्रण समवैति जारत्वं पतित्वं चामे। सोमः शौचं ददौ स्त्रीणां गन्धर्वश्च शुभा गिरम् ॥ पावकः सर्वभाक्षित्वं तेन शुद्धा हि योपितः । भापार्य: हे कन्ये (प्रथमः) फौमार सौम्य अवस्थामें तेरेको प्रथम सोम देवताका अधिकार प्राप्त हुआ और जब मुन्दर अंग प्रत्यंग हुए तब (उत्तरः गन्धर्वः) गंधर्षका अधिकार प्राप्त हुआ तुझे लेता है, और विवाह कर्ममें (नृतीयः पतिः ते अमिः ) तृतीय पति तेरा अमि है, विवाहसे उत्तर (तुरीयः) चौथा (मनुप्यनाः) मनुष्य पति है. यहां विचार कर्तव्य है कि मनुष्यनाः यह शब्द तुरीयः इसके साथ समानविभक्तिक समान अर्थवाला विश्वपावत् एक वचनान्त है, इस पास्ते इससे बहुत पति बोधन करना असंगत है, और जब तुरीयको मनुष्यनात्व कहा तो, पूर्व तीनके अर्थ दैवत्व प्राप्त हैं, अमि ही कन्याभावको जीर्णकर्ता होनेसे जार है, चंदमाने स्त्रियोंको पवित्रता, गन्धर्वने सुन्दर वाणी, अभिने सर्व भक्षित्व दिया इस कारणसे स्त्री शुद्ध हुई और मुनिये। सोमोददद्वगन्धर्वाय गन्धवाददग्नये रयिञ्चपुत्रांश्चादादग्निर्मा- • मथो इमाम् ॥ ऋ० मं० १० अ०७ सू० ८५ मं० ४१ विवाहमें इस मन्त्रका विनियोग है सोमः एता प्रथमं कौमारादभ्युह्य गन्ध- पीप ददार अंदात् अप गन्धर्वः अध्येनामभ्युह्य पौचनाधिकारात् अभय दद्गत् अथ अमिः अपि एनाम् अस्मिन् विवाहे संस्कृत्य रयिं च धनं च पुत्रांच महामदात् ददाति अयो, अपि च धनैश्च पुरैश्च सह इमाम मामदात म ददाविति ॥ भापार्थ- सोमः) सोमदेव इसको कौमारसे सर्वथा अवयवसंपत्ति करके (गंध- य) गन्धर्वके अर्थ देता हुआ और वह गन्धर्व भी इसको यौवनाधिकारसे सर्वथा, सम्पन्न कर (अपये) आमिक अर्थ (अददत् ) देता हुआ और अब अनि देय भी (इमाम् ) इस विवाहकर्ममें इसको संस्कारयुक्त करके (मह्यम् ) मेरे अर्थ (रपि च) धनको (पुत्रांच) पुत्रोंको भी देता है, तथा इस स्त्रीको देता हुआ ॥ * * आजकल एक और मंत्रकी चर्चा चलती है कि स्त्रीके दश पति वेदसे प्रतिपादित है वह यह है हम अर्थ लिखते हैं इसीसे उत्तर होजायगा । उत यत्पतयो दश स्त्रियाः पूर्व अबाह्मणाः ब्रह्मा चेद्धस्तमग्रहीत्स एव पतिरेकधा अर्थ ५।४।१७८ (उत) और (निश:)ीके (यत्) जो (पूर्व) पहले (अब्राह्मणाः) ब्राह्मणसे मिन (दश, पतयः) दश पति होते हैं वास्तव में वे उसके पत्ति नहीं किन्तु रक्षक हैं वे सोमादिदेवता शास्त्रमें पति-- मंत्र " (१६८) दपानन्दतिमिरमास्करः। अब विचारनेकी बात है यदि स्वामीनीका अर्थ माने तो सोमनाम विवाहि ताफा पति जीते जी गन्धर्वसंज्ञक नियोगके पतिको कैसे देगा गन्धर्व अमिको फैसे देगा और तृतीय चतुर्थको कैसे दे सक्ताहै, इस कारण यह अर्थ किसी प्रकार नहीं होसत्ता, ऐसा ही हो तो सब किया फर फेवल देवता विवाह होनेतक वय शमसेरक्षा करते हैं, अपना अधिकार समाप्त होनेपर दूसरेको देते हैं क्यों कि जन्म लेफर ही स्त्रीसे नियोगमें कोई समर्थ नहीं होसक्ताइससे यह तीनों देवता विवाहतक रक्षा करते हैं यही अर्थ ठीक है और देखिये- सम्राज्ञीश्वशुरेभवसम्राज्ञीश्वशांभव ॥ ननांदरिसम्राज्ञीभव सम्राज्ञीअधिदेवपु ऋ० १० अ० ७ सू०८५ मं०१६ भशुर श्वभू ननन्द और देवरोंमें (सम्राज्ञी) अधीश्वरी हो भाव यह है कि ससुर सासन नन्द और देवर इन सबकी नियंत्री गृहमें हो, इन मंत्रों में फेवल प्रार्थना है नियोगका प्रसंग ही कौन है, यदि नियोगका विषय हो तो इसमें ससुरमें भी सम्राज्ञी कहनेसे नियोग सिद्ध हो जायगा और महा अनर्थ होगा, इससे जितने यह दयानन्दनीने मंत्रोंके अर्थ लिखे हैं पे सवही अशुद्ध हैं। स. पृ० ११८ पं० २ एकादश शब्दसे दश पुत्र और ग्यारहवें पतिको क्यों न गिने ( (उत्तर) जो ऐसा अर्थ फरोगे तो 'विधवेव देवरम् ' और ( देवरः कस्मा) (मदेव० ) और (गन्धर्वो०) इत्यादि वेद प्रमाणोंसे विरुद्धार्य होगा, क्यों कि तुम्हारे अर्थसे दूसरा भी पति प्राप्त नहीं होसक्ता ॥ १२० । ६ समीक्षा-निश्चय हमारे मतमें क्या किसी प्राचीन आचार्यके मतमें दूसरा पति नहीं माना गया है, वेदके मन्त्रोंके अर्थ कर ही चुके हैं और (पतिमेकादशम् ) यहाँ एकादशम् के अर्य ग्यारहवां और पतिम् पतिको यह द्वितीयविभक्तिका एकवचन पडाहुआ है, ग्यारहपतितफ करनेका अर्थ तो स्वामीजीके कपोलके भंडारसे निकला है। -कह दिये हैं ( चेत् ) जब (ब्रह्मा) ब्राह्मण ( हस्तमग्रहीत् ) मंत्रपूर्वक पाणिग्रहण कर तो (स एव) वहीं ( एकधा) एक (पतिः) पति होताहै यहाँ पतिशब्दसे सोमादि देवता रक्षक तेवदन् प्रथमा ब्रह्मकिल्विषेपारः सलिलो मातरिश्वा । वाडहरास्तपउप्रेमयोभूराणेदेवी- 'प्रथमजाऋतस्य १ सोमो राजा प्रथमो ब्रह्मजाया पुनःप्रायच्छदृणीयमानः अन्वर्तिता वरुणो मित्र आसीदमिहोता हस्तगृह्यानिनाय २ अपर्व ५१४ अनु०१ अर्थात् सोम अपार सलिल मातरिश्वा मयोभू आपः वरण मित्र अमि और पृहस्पति यह दश देवता रंक्षक पति हैं इसीसे विवाहसम्बन्धी मत्रोम (महा त्वादाद् बृहस्पतिः ) ऐसा डिस है चार देवताओं के अन्तरमें यह दशों आते हैं मेरठी स्वामी मी ध्यान दे । । लिये हैं यथा ।
चतुर्थसमवासखण्डनम् । पृ० १९८५०७ देवराद्वा सपिंडाद्वा स्त्रिया सम्पनियुक्तया ॥ प्रनेप्सिताधिगन्तव्या सन्तानस्य परिक्षये ॥ ५९॥ ज्यष्ठो यवीयसो भार्या यवीयान्वाग्रजास्त्रियम् ।। पतितो भवतो गत्वा नियुक्तावप्यनापदि ॥२८॥ औरसः क्षेत्रजश्चैव-मनु० अ०९।१५९॥ इत्यादि मनुनीने लिखा है कि (सपिंड) अर्थात् पतिकी छः पीढियोंमें पतिका छोटा या बड़ा भाई अथवास्वजातीय तथा अपनेसे उत्तम जातिस्थ पुरुपसे विधवा स्त्रीका नियोग होना चाहिये परन्तु जो वह मृतस्त्री और पुरुप और विधवा स्त्री सन्तानोत्पत्तिकी इच्छा करती होय तो नियोग होना उचित है, और जब सन्ता- नका सर्वथा क्षप हो तब नियोग हो, जो आपत्काल अर्थात् सन्तानके होनेकी इच्छा होनेमें बड़े भाईकी स्त्रीसे छोटेका, छोटे भाईकी खोसे बड़े भाईका नियोगहो. फर सन्तानोत्पत्ति होजानेपर भी पुनः वे नियुक्त आपसमें समागम करें तो पतित होजाय, अर्थात् एक नियोगमें दूसरे पुत्रके गर्भ रहनेतक नियोगकी अवधि है, • इसके पश्चात् समागम न करें और जो दोनों के लिये नियोग हुआ होय तौ चौये गर्भतक अर्थात् पूर्वोक्त रोतिसे दश सन्तानतक होसक्तेहैं, अर्थात् विवाह वा नियोग सन्तानोंके ही लिये किये जाते हैं पश्चात् विषयासक्ति गिनी जाती है, इससे वे पतित गिने जाते हैं, और जो विवाही स्त्री पुरुष भी दशवें गर्भसे अधिक समागम करें .तो फामी और निन्दित होते हैं, यह विवाह नियोग सन्तानोंके ही लिये हो जातेहैं पशुवत् कामक्रीडा करनेको नहीं ॥ भा०म० अतोनान्यस्मिन् के अर्थमें अन्यजातिसे नियोग नहीं मानता ॥ समीक्षा-इन श्लोकोंके अर्थ भी मिथ्या ही लिखेहैं. अर्य यह है कि सन्तान सर्वथा न होनेपर गुरुजन वा पतिद्वारा नियुक्त की हुई स्त्री देवरवा सपिण्ड पुरुपके पास सन्तानकी इच्छासे भागे लिखी हुई रीतिके अनुसार गमन करै ५९ आगे अट्ठावन श्लोकपर आगपे बड़ा भाई छोटे भाईफी भार्या गमन करे तो वा पहें माईफी स्त्रीमें छोटा भाई गमन करे तो सन्तानके अभावके विना नियुक्त होकर भी पतित होनातेहैं ५८ आगे औरस क्षेत्रजपर दौड गये हैं। और-यह श्लोक भी दश सन्तान नियोगसे उत्पन्न होना नहीं कहते, क्योंकि इसके आगेके श्लोक, लिखाहै ॥ विधवायां नियुक्तस्तु घृतातो वाग्यतो निशि ॥ एकमुत्पादयत्पुर्व न द्वितीयं कथंचन ॥६. म०९ - (१७०) दयानन्दतिमिरभास्करः। विधवाफे साथ नियुक्त पुरुष शरीरमें घृत लगाकर मौन धारण कर रात्रिमें भोग फरै, इस प्रकार एक पुत्र उत्पन्न करै; दूसरा कभी न करे, अब यह मनुस्मृतिसे भी तुम्हारे ग्यारह पुत्रतक फराने तथा अन्य जातिसे नियोग करनेसे वाक्य मिथ्या होगये, क्यों कि (देवरादा) इस श्लोकसे अन्य जातिसे निपोग करना बुरा जान- तेहैं, उन्होंने राजा वेनके समयका वृत्तान्त लिखाहै. कि ऐसा होताथा उसने पों विधि चलाई, अब वह अपनी सम्मति इसपर प्रकाश करते हैं। नान्यस्मिन्विधवा नारा नियोक्तव्या द्विजातिभिः । अन्यस्मिन्हि नियुंजाना धर्म हन्युः सनातनम् ॥ ६ ॥ नोवाहिकेषु मंत्रेषु नियोगः कीर्त्यते कचित् । न विवाहविधायुक्तं विधवावेदनं पुन ॥ ६ ॥ अयं द्विजैहि विद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः। मनुष्याणामपि प्रोक्तो ने राज्यं प्रशासति ॥६६॥ स महमिखिलां भुंजवाजर्पिप्रवरः पुरा। वर्णानां संकरं चके कामोपहतचेतनः॥ ६७ ॥ ततः प्रभृति यो मोहात्प्रमीतपतिकां स्त्रियम् । नियोजयत्यपत्यार्थ तं विगईन्ति साधवः ॥ ६८॥ : अप-प्राह्मणााद तीनों वर्गोंको विधवा स्त्री देवर आदिके संग नियोग करनेको नहीं मेरणा करनी, वे स्त्री दूसरे पति के प्राप्त होनेसे सनातन एक पतियत धर्ममा नाश करती हैं ६४ विवाहके मत्राम कहीं भी नियोग नहीं दृष्टि पडता और न पिया इविधायक शास्त्रमें विधवाविवाह दीखता है ६५और यह यिदान ब्राह्मणांने पशुधर्म (निपांग ) निन्दित कियाहै, यह पशुधम राना येनने अपने राज्यमें मनुष्यों के वास्ते भी कहा ६६ वोह रानपि सब पृथ्वीको भोगता हुआ (यवती रागा होनसे राजर्षि कहलाया धर्मसे नहीं) कामी होकर भाईक स्त्रीके साथ इस निपो गरूप पर्गरताको प्रवृत्त करता हुआ ६० टस येनके समयसे पद गति चंटी और नो उसकी मति माननेवाले लोगशाम्रो न नाननेपाल निषा का * २०६४ श्री अर्थ जाति मान अंडक जिनको मन र निदान भी मन नहीं रहता । माया प्रशिको दांशा भी करने इसके मित्र और चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (१७१) देवरके साथ योजना करते हैं उस विधिको साधु पुरुष निन्दा करतेहैं ६८ तीन पोंके सिवाय शूदमें अबतक कराव होताहै तीन वर्णोको निषेध है ।। स्वामीजी तुम तो राजा वेनका अवतार मालूम पड़ते हो या पेनकेभी दादा गुरु कहूं तो ठीक होय, क्यों कि उसने तो अपनी जातिमें ही नियोग चलाया और एक ही सन्तान उत्पन्न करने कहा, परन्तु तुम तो सब जातिमें नियोग करने और ग्यारहतक सन्तान उत्पन्न होने कहते हो. यह पशुधर्म आपने चलाया जों कि, वनसे प्रारम्भ हुआ है, आपने मनुस्मृतिके पूर्वापर पर भी ध्यान न दिया जिससे पशुधर्ममें प्रवृत्त न होना पडता मंत्रार्थ न बदलना पडता इससे सिद्ध है कि नियोग न करो॥ स० पृ० ११८५ २५ (प्रश्न) नियोग मरे पीछे होताहै या जीते पतिके भी (उत्तर) जीते भी होता है (अन्यमिच्छस्व सुभगे पति मत् ) ऋ० मं० १० सू० १० जब पति सन्तानोत्पत्तिमें असमर्थ होवे तब अपनी स्त्रीको आज्ञा दे कि हे सुभगे हे सौभाग्यकी इच्छा करनेहारी स्त्री तू (मत्) मुझसे (अन्य ) दूसरे पतिको (इच्छस्व ) इच्छा कर क्यों कि अब मुझसे सन्तानोत्पत्तिकी आशा मत फरै परन्तु उस विवाहित महाशय पतिकी सेवामें रहे इसी प्रकार जब स्त्री रोगादि दोपोंसे ग्रस्त होकर सन्तानोत्पत्तिमें असमर्थ हो तब अपने पतिको आज्ञा देवे कि हे स्वामिन् आप सन्तानोत्पत्तिकी इच्छा मुझसे छोडके किसी दूसरी विधवा स्त्रीसे सन्तानोत्पत्ति कीजिये जैसी पाण्डु राजाकी स्त्री कुन्ती और मादी आदिने फिया ।। १२० १२८ समीक्षा यदि स्वामीजी इस मंत्रको पूरा लिखते तो फलई खुल जाती बस सारा नियोग उड जाता अब वह मंत्र लिखा जाताहै ॥ आपातागच्छानुत्तरायुगानियत्रयजामयः कृणवन्ननामि । उपबडिवृपभायवाहुमन्यमिच्छस्वसुभगेपर्तिमत् । ऋ० मं०.१० अ० १सू० १० मं० २० आगमिष्यन्तितान्युत्तराणि युगानि पत्र जामयः करिष्यन्त्यनामि कर्माणि जाम्यतिरेकनाम बालिशस्य वासमानजातीयस्यवोपजन उपधेहि वृषभायचाईमन्य- मिछस्व सुभगे पति मदिति व्याख्यातम् । निरु० अ० ४ ख. २० जामि, इति एतदनेकार्थम् भगिनी बालिशः पुनरुक्तं चास्याभिधेयानि प्रकरणादेवतेपामन्यतम- स्मिन्नवतिष्ठते यथानेन तावद्भगिन्युच्यते तथेदमुदाहरणम आपाता मत् इति । इयं यमी किल यमं प्रार्थयाञ्चकार, एहि मैथुनाय संगच्छावहा इति तामकाम- •यमानोऽसावनपर्चा प्रत्युवाच आपाता गच्छान्-वा इत्यनर्थक एव आगच्छांन्.
. - (१७२) दयानन्दतिमिरभास्करः। मागभिष्यन्तीत्पर्यः आइ कानि उच्यते ताः तानि उत्तराणि युगानि आगमिष्यन्ति तेऽपि कालानतावत् साम्प्रतं धर्तन्ते इत्यभिप्रायः येषु किम् यत्र येणु जामयः भगिन्यः भ्राणाम् अनामि योग्यानि मैथुनसम्बन्धानि कर्माणि करिष्यन्ति कलि- पुगान्ते हि तादृशः संकरो भवति न चेदं कलियुगं वर्तते इत्यभिप्रायः यतो न तावदद्यापि संकीणों वर्णसंकरधर्मः स्वापारा एय तावत् प्रना अतो ब्रवीमि उपपईहि उपधेहि कस्मै (वृषभाय ) तवोपरि रेतः सेतुमन्यकुलनो योग्यः तस्मै किमुपवईहि इति बाहुम शपनीये सर्वथा प्राय॑मानोऽप्यहं तव पतिः न भविष्या- मीति यतो ब्रवीमि अन्यमिच्छस्व अन्यमन्येपयस्व हे सुभगे (पति) मत् -मत्त इत्यर्थः। : यमयमीसंवादकी यह ऋचा है यमी कहती है यमसे जो कि हम दोनों समा- गम करें तो यम इस मंत्रसे उत्तर देता ह हे यमि वे उत्तर युग:आगे निन युगोंमें (जामयः ) भगिनियां (अनामि कृणवन् ) भगिनोसे भिन्न सम्बन्धित कर्मको फरेंगी भाव यह है कि, फलियुगान्तमें ही यह संकरता होगी जिस कालमें भगिन से भिन्न स्त्रीयोग्य कर्मोको भगिनी करेंगी किन्तु अभी तौ संकर धर्म नहीं अपने २ धर्मम सब वर्ण वर्तमान हैं इस वास्ते हे सुभगे ! मेरेसे अन्य योग्य पतिकी श्च्छा कर और उस ( वृषभाय ) योग्य पतिके वास्ते (बाहुम् उपचहि) अपने पाणिको ग्रहण कराले यह यमी सगोत्रा है इससे सिद्ध है समान गोत्रमें विवाह नहीं होता ॥ अब बुद्धिमान् यह विचारे कि, इसमें कौनसी बात नियोगकी है इसमें स्वामीजीने बडी बनावट की है मंत्रका आशय सम्पूर्णतः बदल दिया ।। कुन्तीमादीका भी दृष्टान्त इसमें घट नहीं सक्ता पाण्डकोशापया उन्होंने अपनी स्वीसे कहा तो वह कठिनतासे सन्तान उत्पन्न करनेमें सम्मत हुई मंत्रबलसे देवता- ओंको आवाहन किया, इन्द्र मरुत् धर्मसे तीन पुत्र उत्पन्न हुए, जो तत्काल ऋतु: दान करते ही उत्पन्न होगये, अश्विनीकुमारसे नकुल संहदेव यह तत्काल ही उत्पन्न होगयेथे मैथुनादिकी बात नहीं है देवताओंकी देवी शक्तिको प्रभाव यदि इस प्रकार मंत्राकर्षणसे पतिकी आज्ञानुसार स्त्रीमें देवताओंके बुलाने की सामर्थ्य हो तो वह कर सती है, इस देवसम्बधी कार्यका यहाँ दृष्टान्त नहीं पर * भा० प्र० ने यह दिनरातका रूपक चलाया पर दयानंदने तो रूपक नहीं मानां यहाँ गुरु और चेले दोनों ही सिद्धान्क्षसे दूर होगये इस सूक्तभरमें यम यमी संवाद है दिनरातका पता नहीं और न बना तो दिनरातका हो लगा बैठे पर प्रमाण मी कुछ है ! यदि दिनरातका रूपक होता तो (पापमाहुर्यः स्वसारं निगष्ठात् ऋ० १०।१०।१२) इसी सूक्तमें बहन के साथ गमनमें पार -माना है तब दिनरातका रूपक कहाँ रहा। किंमातासबदनाथम् १०१०।११यह भाता पाठ है ।
. चतुर्थसमुल्लासखण्डनम्। (१७३) सक्का यदि यहो कि यह मन्त्रकी वात पिसीने महाभारतमें मिलादी है तो हम कह सकते हैं कि इस प्रकार मांदी कुन्तीके पुध उत्पन्न होनेक किसीने मिलादी है, इस कारण यह कहना नहीं बन सक्ता इसीसे यह नियोग तुम्हार- सिद्ध नहीं मानुषीधर्मका दृष्टान्त देवतोंसे नहीं लगता और पृथ्वीका भार दूर फरनेको देव दैत्योंने विचित्ररूपसे जन्म लिया जिससे जगत् क्षय हुआ यह शास्त्रका विधान नहीं है। स० म०पृ० ११९५०९ 'प्रोषितो धर्मकार्यार्थ प्रतीक्ष्योटो नरः समाः। विद्याथै पड्यशाथै वा कामाथै त्रीस्तु वत्सरान् ॥ १॥ पन्ध्याटमेऽधिवेद्यान्दे दशमे तुमृतप्रजा। एकादशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी ॥२॥ विवाहित स्त्री जो विवाहित पति धर्मकार्यके लिये परदेश गया हो तो आउय विद्या और कीर्तिके लिये गया होय तीछः और धनादि कामनाके लिये गया होय तीन वर्पतक पाट देखकै पश्चात् नियोग * फरफे सन्तानोत्पत्ति करले, जव विष -हित पति आवै तब नियुक्त पतिः टूट जावै, वैसे ही पुरुपके लिये भी निय हे ॥१॥वभ्या (निसफो विवाहसे आठ वर्षतक गर्भ न रहै) उसेआठवै, सन्त होकर मरजा. तो दशवें और कन्याही हो पुत्र न हो तो ग्यारहवें वर्पतक और 'अभिप चोलनेवाली हो तो सद्यः उस उस स्त्रीको छोडके सन्तानोत्पत्ति करले।। वैसे ही पुरुष अत्यन्त दुःखदायक होय तो स्त्रीको उचित है कि, उसको । दूसरे पतिसे नियोग कर उससे सन्तानोत्पत्ति कर उसी विवाहित पतिका दापमा सन्तोत्पत्ति कर लेबै ॥ १२१ ।१४ : समीक्षा यहाँ स्वामीजीने यह लीलाही रची है पहिला श्लोक ९ अध्याय ७६ वॉ है और दूसरा श्लोक ८१ वाँ है, इन दोनोंका महात्माजीने एक हीम लगादिया, मनुष्योंके परदेश जानेतकमें बाधा डालदी परन्तु आराम भी हैं प्राणी उधरके इधर इधर उधर आते जाते हैं मनुष्योंको स्त्री और स्त्रिय परदेशी पुरुष बहुत मिल जायँगे परन्तु इतना और लिख देते कि जानेको ता- और कार्यकी तख्ती लिखी हुई बाहर टंगीरहती तख्ती देखकर शयनालपमें कर मनारथ पूर्ण होते अब इस श्लोकका आशय सुनिये कि, यह किस आश- है इससे पहला श्लोक यह है ॥ * छोटे स्वामी भी तो बता कि इन शेकोंमें नियोग करले यह किन पदोका अर्थ है (१७४) दयानन्दतिमिरभास्करः। विधाय वृत्तिम्भार्यायाः प्रवसेकार्यवान्नरः। अवृत्तिकर्शिता हि स्त्री प्रदुप्येत् स्थितिमत्यपि ॥ ७ ॥ विधाय प्रोपिते वृत्ति जीवेनियममास्थिता। प्रोपिते त्वविधायैव जीवेच्छिल्पैरगर्हितः।।७५||प्रोपितोधर्म०७६ जय कोई पुरुषपरदेशको जाय तो प्रथम स्त्रोके खानपानका प्रबंध करता जाय क्यों कि विना प्रबन्ध क्षुधाके कारण कुलीन स्त्री भी दूसरे पुरुपकी इच्छा करेंगी ७४ खान पान करके विदेश जानेके अनन्तर टस पुरुपकी स्त्री नियम मर्याद पतिव्रतसे रहकर अपना समय व्यतीत करे और जब भोजनको न रहै वा पुरुष कुछ बंदोबस्त न फरगया होय तो पतिके परदेश होनेमें शिल्पकर्म जो निन्दित न हो अर्थात् सूत कातना हस्तसे फाढना आदि फाँसे गुजारा करै ७५ यदि वह धर्मकार्यको परदेश गयाहो तो आठवर्ष विद्या पढने गया हो तो छः वर्ष धन यशको वा काम भोगको गया हो तो तीन वर्पतक वाट देखे पश्चात् पतिके पास जहां वह हो वहां चली जावै, जहां कोई क्रिया वा वाक्पति रह जाती है उसकों दूसरी स्मृति आदिसे पूरी करते हैं मनमाना अर्थ नहीं होसकता, दयानंदनीके ‘अर्थमें एक बडी विचित्रता है उनसे पूछा जाय कि, आपके सिद्धान्तमें तो विद्या- 'पढने के पीछे व्याह होताथा यह विद्या पढनेसे पहले व्याह फैसे होगया यही पसिष्ठजी कहते हैं | प्रोपितपत्नी अष्टवण्युपासीत ऊर्य पतिसकाशं गच्छेदिति । आठ वर्पतक स्त्री पतिकी बाट देखे पीछे उसके पास चली जाय (पन्ध्याष्टमें) इसका अर्थ पूर्व ही करचुकेहैं, कि ऐसी दशामें पुरुष विवाह दूसरा करले एक स्वामी के लेखमें बडी हँसीकी बात है कि (पति दुःखदायक हो तो स्त्री उसे छोड किसी दूसरेसे नियोग कर सन्तानोत्पत्ति करले जो उससे दायभाग लेले) धन्य है पहले तो लिखा कि पति आज्ञा दे तो नियोग करै, अब स्त्री ही उसे छोड नियोग करै, जब वे दूसरे पुरुपसे नियोग फरेंगी पतिसे लड़ेंगी तो वह उन्हें घरमें क्यों रहने देगा सास ससुर क्यों रहने देंगे एक नहीं वह चार नियोग फरै, परन्तु वह काहेको उसे घरमें घुसने देगा यह चालक भी निर्बुद्धिको वात मुखसे नहीं निकाल सक्ते जो स्त्री दूसरसे सन्तान उत्पन्न करै पतिसे छोड़ी हुई फिर उसके ओरसे उत्पन्न हुए वालक कौनसे शाखसे दायभागी होंगे सिवाय आपके व्यभिचारमकाशके और तो किसी ग्रन्थमें स्वैरिणी स्त्रियोंके पुत्रोंका दाय, भाग नहीं मिलसक्ता॥ + .
चतुर्थसमुल्लासखण्डनम्। (१७) स०प्र० पृ० ११९ ! पं० २९ जो कोई वीर्य रूप अमूल्य पदार्थ स्त्री वश्या वा दुष्ट पुरुषोंके संगमें खोते हैं, वे महामूर्ख हैं क्योंकि किसान वा माली मूर्ख होकर भी अपने खेत वा वाटिकाके बिना वीज अन्यत्र नहीं बोते (आत्मा जायते पुत्रः) यह ब्राह्मण ग्रंथोंका वचन है और (अंगादंगा० * ) यह सामवेद है ।। १२२।४ समीक्षा-स्वामीजीको यह बात स्वामीपर ही पड़ती है जब कि भाली किसान भी चीज अपनी भूमिमें बोते हैं तो वे पुरुष भी पूर्व हैं जो अन्यत्रोसे नियोग करते और पृथा बीज सोते हैं, एक ही बार जानेसे गर्भ रह नहीं सत्ता और जब आत्मा ही पुत्र है तो मृत पुरुषके वे यालक कहा नहीं सके और अंगा. यह सामवेदफा वचन नहीं अब एक और बात सुनिये जो कि कैसे ही बुद्धि भ्रष्ट क्यों न हो कैसा ही नशेमे चूर क्यों न हो पर ऐसी येशिर पैरकी बात नहीं कह सक्ता ॥ स०पृ० १२० पं० २५ गर्भवती खासे एक वर्ष समागम न फरनेके विप- यमें पुरुष वा स्त्रीसे न रहाजाय तो किसीसे नियोग करके उसके लिये पुषोत्पत्ति करदे ।। * १२३ । १ -समीक्षा-देखिये इस अन्धेरको गर्भवती स्त्रीसे न रहा जाय तो नियोग करके किसीके लिये सन्तानोत्पत्ति कर दे, फहिये अब महात्माजीका सृष्टिकम कहाँ चला गया एक तो वालक तौ उत्पन्न हुआ ही नहीं दूसरा कैसे उत्पन्न हो सकता है पहला बालक ती उदर में मौजूद ही रहै और इधर उधर नियुक्त पुरुपको पैदा करके देद पेटौंफास्वामीजीने ढेर लगादिया है, वेटीका नाम नहीं, कोई परमेश्वरने पवडा- कर परचा लिसदिया था कि, नियुक्त पुरुपके जाते ही सन्तान होंगे, फन्पाका 'नाम भी नहीं, यहां तो सभीको व्यभिचारिणी बनाया, तुम तो हकीम पैद्यक जाननेवाले थे, यह क्या लिख बैठे, यहां तो निईद्धिप्रकाश लिखते २ बुद्धिको सम्पूर्ण ही तिलांजली देदी, यह न सूझी कि जब गर्भवती है तो नियोगकी आवश्यकता क्या है, अब रहा न जाय इस शब्दसे नियोगविपया शक्तिको अर्थ विदित है अब हम आपको क्पा फैह ।। स० पृ० १२१५० ८ और ऐसे लोगोंको न माने ।। १८९७ या सत्यार्थप्रकाशमें यह वचन निरुक्त ३ १ ४ का लिखा है और आत्मा पुत्रनामासि १ इतना पाठ मी यइटा है स्वामीजीको भूले पांच बार चेगुको सूची हैं। * १८९७ स०प्र० पृ. १२५ पं० २ इतना पदला है कि पुरुषले या दीर्घ रोगो पुरको सोसे न रहाजाय इनसे कैफिकरा यह पाट स्वामीजी-मांची बार चोंके कानमें कह गये थे। मेरटो समाने सापेकी अदि माना है तो क्या यहां कोई मात्रा या अक्षर बडगया पा इकारत की इबारत बदल जाती है। .
(१७६) दयानन्दतिमिरभास्करः। पतितोपि द्विजः श्रेष्ठो न च शूद्रो जितेन्द्रियः। निर्दुग्धा चापि गौः पूज्या न च दुग्धवती सरी ॥३॥ अन्वालंभंगवालंभं संन्यासं पलपैतृकम् ॥ देवराच सुतोत्पत्ति कलौ पंच विवर्जयेत् ॥२॥ नष्टे मृते प्रव्रजिते कीवे च पतिते पतौ । पंचस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ॥३॥ यह कपोलकल्पित पाराशरीके श्लोक हैं जो दुष्ट कर्मकारी दिनको श्रेष्ठ श्रेष्ठकर्मकारी शुदको नीच मानें तो इससे परे पक्षपात अन्याय अधर्म दूसराय होगा, क्या दूध देनेवाली व न देनेवाली गाय गोपालकों को पालनीय होती है, फुम्हार मादिकोंफो गधी पालनीय नहीं होती और यह दृष्टान्त भी विषम है कर कि दिज और शुद मनुष्यजातिगाय और गधी भिनजाति हैं, कथंचिव पशुनाति- दृष्टान्तका एक देश दार्टान्तमें मिल भी जावै, तो भी इसका आशय भयुत होनेसे यह श्लोक विद्वानोंको माननीय भी नहीं हो सक्ते, अव अश्वालंभ भर्याद पोडेको मारके होम करना वेदविहित नहीं है, तो उसका कलियुगमें निषेध करता येदविरुद्ध क्यों नहीं, जो कलियुगमें इस नीच फर्मका निषेध माना जाय तो घेता मादिमें विधि आनाय तो इसमें ऐसे दुष्ट फामका श्रेष्ठ में होना सर्वथा असंभर है और संन्यासकी वेदादि शास्त्रों में विधि है उसका निषेध करना सर्वपा निल है, जय मांसका निषेध हो तो सर्वथा निषेध ही है, जब देवरसे पुत्रोत्पति करना वेदोंमें लिखा है तो लोफ करता क्यों भूकता है (नष्टे:) अर्थात् पति किसी देशान्तरको चला गया हो घरमें घी नियोग करलेये तो उसी समय पियाहितपति मानाय तो यह किसकी स्त्री हो फोई फहै फि, विवाहित पतिकी, हमने माना परन्तु ऐसी व्यवस्था पाराशरी में तो नहीं लिखी, क्या स्त्रीके पांच ही भापत्यास है जो रोगी पडा हो या लडाई होगई इत्यादि आपकाल पायसे भी अधिक हैं. इसलिये ऐसे २ श्लोकोंको कभी न मानना चाहिये पृ १२३॥ १५ समीक्षा-स्वामीगीने इन श्लोकोंका भाय नहीं समझा यदि इसके पूर्णमोकोको देखते तो कभी ऐसा न लिखते ब्राह्मण शुदकी तो प्ययस्यालिस ही गुरे हैं यदि शुद अच्छे आचरण करें तो यह अच्छा है परन्तु यह मागील नहीं होसता " अनेकमुक्तानटितं च नु तथापिकाको नयरानमः " पिरती सब एउ जानतेये परन्तु ब्रह्मशान शुद होने के कारण स्वप नहीं कहा गया तमोशे पुलाया, कहिप विदुरनी मर्यगुणालंकारखा या नदी और राधान्त भी - पारा- चतुर्थसमुल्लासखण्डनम् । (१७७) विषम नहीं है, वह मनुष्योंमें हैं न कि पशुओंमें यदि स्वामाजी काव्य जानते तो ऐसा कभी नहीं कहते और संन्यासके लिये यह आज्ञा है कि, ब्राह्मणके अतिरिक्त कलियुगमें और किसी जातिको अधिकार नहीं है और देवरसे पुत्रकी उत्पत्ति राजा चेनने चलाई है और युगकी कौन कहै इसका फलियुगमें भी निषेध है और यह अन्धालभकी गति पाराशरजोन तो निषेध ही करी है, परन्तु आपने तो पुराने १८७५ फे सत्यार्थप्रकाशमें ३०३ पृष्ठमें लिखा है कि, कोई मांस न खाय तो पक्षी जलजन्तु नितने हैं इससे सहस्र गुने हो जायें, फिर मनुष्योंको मारने लगें, फिर पृ० ३९ में लिखा है कि, पशुओंके मारनेसे गोडासा दुःख है, परन्तु चराचरका उपकार होता है फिर अपने ही पुराने सत्यार्थप्रकाशमें पशुओंका यज्ञमें मारना विधिपूर्वक हनन लिखा है, यजु० अ० १९ मंत्र २० में लिखाद वहुत पशुवाला होम करके इतशेपका भोक्ता प्रशंसाको प्राप्त होता है उस समय क्या आपमें कुछ विद्या कमतीथी, या अब किसी गुरुसे पहआये, जो अब खण्डन करने लगे, शारजीने तो मनेही लिखा है आज्ञा तो आपने ही दे दी थी अब तीसरे श्लोकका आशय सुनिये कि, वह ही अर्थका प्रसंग यहां है कि, वाग्दानके अनन्तर यदि पति इन पाच आपदाओंमें पतित होजाय तो उसका विवाह अन्य पुरुपसे करदेना पूर्व पुरुषसे करना नहीं, मनुजीने पतिव्रताधर्मकी और स्त्रीके फालक्षेपकी विधि इस प्रकार लिखी हैं । कलिमें मनुष्योंकी पापप्रवृत्ति तथा लुपता और विषयवा- सनाफी प्रबलता देखफर स्मृतिकारोंने बहुतसी बातें निषेध कर दी हैं और यहाँ पाराशरीके श्लोकमें 'पती' ऐसा पद नहीं है कारण कि 'पतिः समास एव, अष्टा० ११४१८ पतिकी समासमें ही 'वि' संज्ञा है तो यहाँ 'अपती' शब्द है पूर्वरूप हो रहाहै तब यह अर्थ निकसा कि विवाहसे पहले २ यह कन्या हम इसको देचुके इस कहने के पीछे यदि पति नष्ट मृत क्लीव पतित प्रवनित हो जाय तो उस कन्याका विवाह अन्यसे हो सकताहै । दयानन्दनी तो गौ और गयीं एक ही बताते हैं यही तो उनका धर्म है ।। पाणिग्राहस्य साध्वी स्त्री जीवतो वा मृतस्य वा। पतिलोकमभीप्संती नाचरेकिंचिदप्रियम् ॥१५६॥ ज०५ कामं तु क्षपयेद्देहं पुष्पमूलफले शुभैः। नतु नामापि गृहीयात्पत्यो प्रेते परस्य तु ।। १५७॥ आसीतामरणाच्छान्ता.निपता ब्रह्मचारिणी । यो धर्म एकपत्नीनां कांक्षीतमबुत्तमम्।। १५८.॥ १ . (१७८) दयानन्दतिमिरमारकरः। अनेकानि सहस्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम् । दिवं गतानि विप्राणामकृत्वा कुलसंततिम् ।। १५९ ॥ मृत भरि साची स्त्री ब्रह्मचय्ये व्यवस्थिता। स्वगै गच्छत्यपुत्रापि यथा ते ब्रह्मचारिणः ॥ १६० ॥ अपत्यलोभाया तु स्त्री भर्तारमतिवर्तते । सेह निंदामवाप्नोति पतिलोकाच हीयते ॥ १६१ ॥ नान्योत्पन्ना प्रजास्तीह न चाप्यन्यपरिग्रहे। न द्वितीयश्च साध्वीनां वचिद्भतोपदिश्यते ॥ १६२ ॥ पतिलोककी इच्छा करनेवाली साध्वी स्त्री जीवित वा मृतपति के अभिप कोई फर्म न फरै १५६ पवित्र जो पुष्प मूल फल हैं इनके भोजनसे देहको कृश करै परन्तु पतिके मरनेपर पर पुरुपका नाम भी न ले १९७ क्षमा करके युक्त और नियमवाली पवित्र धर्मकी इच्छा करनेवाली मधुमासादिककी नहीं इच्छा करती हुई ब्रह्मचारिणी होकर मरणपर्यंत नियममें रहै १५८ ब्राह्मगोंके कई सहस ब्रमः चारी कुमार स्वर्गमें विना पुत्रोत्पादन किये गये हैं, इस कारण पुत्र उत्पन्न कर नेकी विधवाओंको कोई आवश्यकता नहीं १५९ साध्वो स्त्री पतिके मरनेपर ब्रह्मचर्य से रहै तो अपुत्रिणी भी स्वर्गको जाती है जैसे वे ब्रह्मवारी चले गये १६० पुबके लोभसे जो स्त्री परपुरुषसे सम्बन्ध करती है वह यहाँ निन्दाको प्राप्त होती है और स्वर्गलोक तथा पतिलोकसे भ्रष्ट हो जाती है १६१ दूसरे पुरुपसे उत्पन हुई प्रना शाखसे उसकी है नहीं और न दूसरी वीमें उत्पन्न करनेवालेकी और न साध्वी स्त्रियोंको दूसरा पति कहा है १६२ यह सनातन वैदिक सिद्धान्त है ओर महाभारत में सावित्रीको कथा देखो पुनः अ० ९ श्लो०४७ सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते । सकृदाद ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् ॥४७ अ०९मनु हिस्सा एक ही वार किया जाताहै, कन्यादान एक ही बार किया जाताहै मार देंगे यह भी एक ही वार कहा जाता है, सत्पुरुपको यह तीन बातें एक ही घार होती हैं १७ इयंनारीपतिलोकवृणानानिपद्यतउपत्वमर्त्यप्रेतम् । धर्मपुराणमनुपालयन्तीतस्येप्रजातविणचेहरोहीअथर्व०१८।३।। - पञ्चमसमुल्लासखण्डनम् । यह स्त्री जों, पतिलोक जानेकी इच्छा करे सनातन धर्मको अच्छे प्रकार पालन फर और कन्दमूल फलको भोजन करती हुई उत्तम गतिको प्राप्त होती है और धन पुत्रादिक माप्त करती है इसकी प्रना और धन तेरा है पदार्थ पीले लिस चुके हैं, इन सब बातों का सिद्धान्त यह है कि नियोग कभी नहीं करना और परपुरुषको भूलसे भी अंगीकार नहीं करता, तथा पतिव्रतधर्म पालन करना । इति श्रीमदयानंदसरस्वतीस्वामहतसत्यार्थप्रसाशे समावर्तनविवाहगृहाशमनियोगविषये चतुर्थसमुल्लासस्य खंडनं समाप्तम् ॥ १०१६ । ९० ॥ श्रीः। अथ सत्यार्यप्रकाशान्तर्गतपयमसमुल्लासस्य खण्डनं पारायते । संन्यासमकरणम्। स. पृ० १२६ पं०२ बनेषु च वित्येवं तृतीय भागमायुपः । चतुर्थमायुपो भाग त्यक्त्या संगान्परिवजेत् । मनु अ०६ श्लो०३३ इस प्रकार पनमें आयुका तीसरा भाग अर्थात् २५ * वर्षसे पचहत्तर धर्म- पर्यन्त पानमस्य होके आयु के चौथे भागमें संगोंको छोड़ पारवाद अर्थात् संन्यासो हो जाव (मभ) ग्रहाश्रम और पानमस्य न करके संन्यासाश्रम कर उसको पाप होता है या नहीं (उत्तर) होता है और नहीं भी होता, जो बाल्यावस्थामें विरक्त शेफर विपोंमें फंसे पह महापापी और जोन से यह पुश्पामा पुरुष है ॥१२७१७ समीक्षा-दयानंदगी के ही लेससे हम इनके संन्याससी परीक्षा करते हैं आपने ७५ पसे पूर्व ही संन्यास लेलिया और विरयसंग भी नहीं छोडा, आपको विरः पोंमें फंसे रहनेसे पार ही हुआ आपने लक्षोंकी प्राप्तिका प्रबन्ध किया, निशाइसे पलंगार शयन होता था, वंड बड़े तकिये लगे रहते, रसोई में यदरस भोनन होता, पाप धुलाने को फहार नौकर, चटनी मुर पूरी हरेके बिना भोजन मिय नहीं लगता था, दुशाल आहे आत्तये हुका पिपा जाता, चार पाच जोडे टोंके रिटा- यती पने सन्दूक रहते इत्यादि नहीं ठहरते फोठी बंगलोंमें ही ठहरते फिर भाप इन संगों के फरनेसे पाप ही हुआ है और न फर्मानुसार आर संन्पासा उदर सकते हैं। स० पृ० १२६ पं० १९ नापिरतोदुश्चरितानाशान्तोनासमाहितः। नाशान्तमानसोवापिप्रज्ञानेनेनमाप्नुयात् । कठवल्ली म१०२२३ •१८९मा० .. १२०५६ ८ वीनरें पके स्थान पचानों पर ऐसा र लिए।
(१७८) दयानन्दतिमिरभास्करः। अनेकानि सहस्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम् । दिवं गतानि विप्राणामकृत्या कुलसंततिम् ।। १५९ ॥ मृत भतरि साध्वी स्त्री ब्रह्मचय्ये व्यवस्थिता। स्वगै गच्छत्यपुत्रापि यथा ते ब्रह्मचारिणः॥ १६०॥ अपत्यलोभाया तु स्त्री भर्तारमतिवर्तते । सेह निंदामवाप्नोति पतिलोकाच हीयते ॥ १६१ ॥ नान्योत्पन्ना प्रजास्तीह न चाप्यन्यपरिग्रहे। ' न द्वितीयश्च साध्वीनां कचिद्गोपदिश्यते ॥ १६२ ॥ पतिलोककी इच्छा करनेवाली साध्वी स्त्री जीवित वा मृतपतिके अप्रिय फोई फर्म न करै १५६ पवित्र जो पुष्प मूल फल हैं इनके भोजनसे देहको कृश फरे परन्तु पतिके मरनेपर पर पुरुषका नाम भी न ले १५७ क्षमा करके युक्त और निपमयाली पवित्र धर्मकी इच्छा करनेवाली मधुमासादिककी नहीं इच्छा करती हुई ब्रह्मचारिणी होकर मरणपर्यंत नियममें रहै १५८ ब्राह्मगोंके कई सहय पक्ष चारी कुमार स्वर्गमें विना पुत्रोत्पादन किये गये हैं, इस कारण पुत्र उत्पन फर: नेको विधवाओंको कोई आवश्यकता नहीं १५९ साध्वी सो पतिके मरनार ब्रह्मचर्य से रहै तो अपुत्रिणी भी स्वर्गको जाती है जैसे ये ब्रह्मवारी चले गये १६० पुत्रके लोभसे जो खो परपुरुषसे सम्बन्ध फरती है यह यहाँ निन्दाको मात होती है और स्वर्गलोक तथा पतिलोकसे भ्रष्ट हो जाती है १६१ दूसरे पुरुपसे उत्पन हुई प्रना शास्त्र से उसकी है नहीं और न दूसरी सीमें उत्पन करनेवाली है और न साध्वी स्त्रियोंको दूसरा पति कहा है १६२ यह सनातन वैदिक सिद्धान्त हे और महाभारतमें सावित्रीको क्या देखो पुनः अ० ९शो० ४७ सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते । सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् ॥१७ अ०९मनु हिस्सा एक ही बार किया जाताहै, कन्यादान एक ही पार किया जाता मौर देंगे यह भी एक ही बार कहा जाता है, सत्पुरुपकी यह तीन यात एक ही पार होती है१७ इयनारीपतिलोकंवृणानानिपद्यतउपत्मत्यतम् ।। धर्मपुरागमनुपालपन्तीतस्यैपनांद्रायणनेहपोदामथ०१८।३।। भ पञ्चमसमुल्लासखण्डनम् । यह तो जो पतिलोक जानेकी इच्छा करे सनातन धर्मको अच्छे प्रकार पालन करें और कन्दमूल फरको भोजन करती हुई उतम गति को प्राप्त होती है और धन पुनादिक प्राप्त करती है इसकी प्रना और धन तेरा है पदार्थ पीछे लिख चुके है, इन सब बातों का सिद्धान्त यह है कि नियोग कभी नहीं करना और परपुरुपको भूलसे भी अंगीकार नहीं करना, तथा पतिव्रतधर्म पालन करना । इति श्रीमदयानंदसरस्वतीस्वामिनसत्यार्यप्रकाशे समावर्तनविवाहगृहाश्रमनियोगविषय चतुर्थसमुदायस्य खंदन समाप्तम् ॥ १० १६ । ९० ॥ अथ सत्यार्थपकाशान्तर्गतपञ्चमसमुल्लासस्य खण्डनं पारश्यते । संन्यासमकरणम्। स० पृ० १२६ पं०२ चनेषु च पिहत्येवं तृतीय भागमायुपः । चतुर्थमायुपो भाग त्यक्त्वा संगान्परिव्रजेत् । मनु०अ०६ यो०३३ इस प्रकार पनमें आयुका तीसरा भाग अर्थात् २० * वर्षसे पचहत्तर पर- पर्यन्त पानप्रस्थ होके आयुके चौये भागमें संगों छोड़ परिवाद अर्यात् संन्यासी हो जाये (प्रभ) गृहाश्रम और पानमस्प न करके सम्पाप्ताश्रम फर उसको पाप होता है या नहीं (उत्तर) होता है और नहीं भी होता, जो बाल्यावस्था, विरक्त दोफर विषयांमें फंसे वह महापापी और जोन फंसे वह पुण्यात्मा पुरुष है ।।१२७१७ समीता-दयानंदगी के ही लेखसे हम इनके संन्यासकी परीक्षा करते हैं आपने ७५ पैसे पूर्व ही संन्यास लेलिया और विग्यसंग भी नहीं छोडा, आपको वित पॉमें फंसे रहने से पाप ही हुआ आपने लक्षाफी प्राप्तिका मरन्ध मिया, नियाडके पलंगपर शयन होता था, वई बडे तकिये लगे रहते, रसोई में बदरस भोनन होता, पाप धुलाने को कहार नौकर, चटनी मुरचे पूरी हडोके बिना भोजन मिय नहीं लगता था, दुशाल आहे जतिथे एका पिपा जाता, चार पाच जोडे टोंके रिला- पती पने सन्दूक में रहते इत्यादि नहीं ठहरते कोठी बंगलोंमें ही टहरते फिर आपको इन संगोंके करनेसे पाप ही दुना और न फानुसार मार संन्यासा उदर सकते हैं। स. पृ० १२६५०१९ नाविरतोदुश्चरितानाशान्तोनासमाहितः। नाशान्तमानसोवापिप्रज्ञाननेनमानुपात् । कठयही म० ११०२२३ *१९ मा .. ११.५० पवागरे कोरे स्थान पयानों से ऐसः अनाम संकर जैमिनितार प्रयाम अगुदता यतात तथा कहते हैं प्रामा दाल अपांत्र पामभामनिरादा गंदर्मग्रार अर्थशान और . नमन मन्याम पांगम गुटान्नाकरण संपामीन ममा वाम र मम.रंमें आते हैं, मानर पिना मर्मात्रामा प्राय यहागे बांया शि, मुनि नीता (१८० दयानन्दतिमिरभास्करः जो दुराचारसे पृथर नहीं जिसकी शान्ति नहीं निसका आत्मा योगी नहीं जिसका मन शान्त नहीं वह संन्यास लेके भी प्रज्ञानसे परमात्माको प्राप्त नहीं होता ॥ १२७ १२२ समीक्षा-स्वामीनी आपमें तो शान्ति भी नहीं प्रत्यक्ष देखिये कि, जहाँ कहीं फिसीने आपके विरुद्ध कहा झट उसका उत्तर देनेमें कटिबद्ध हो दुर्वाक्योरी पर्ण फरने लंग, राना शिवमसादपरही आपने फैसे कटु वाक्य लिखे हैं और सत्यापमहा- शमें ११ समुल्लासमें गालियोंकी वर्षा की है मत लिसनेवालेको फसाई कहा। आत्मा भी तुम्हारा योगी नहीं था क्यों कि "योगशिरावृत्तिनिरोधः" विवानि. निरोधका नाम योग है जब कि चित्तकी यति ही शान्त नहीं हुई तो आनारे योग का मन भी तुम्हारा शान्त नहीं कभी कुछ लिगा कभी कुछ लिया हमने आपस गंन्याम लेना या हुआ। स०प्र० पृ० १२७५० १९ भविद्यायामन्तरेवर्तमानाःस्वयंधारा पण्डितमन्यमानाः ॥ जंपन्य- मानापारयन्तिमूढा अन्धेनेवनीयमानायथान्धाः।मु०सं०२०८ जो अधिपार भीतर सेल रहे अपने को धीर और पंडित मानते हैं ये ना गतिको गानहारे मूर ग अंक पीछे अंधे दुर्दशाको मात होते हैं यो दुः। पाते हैं ॥ १७११८ माता-हिनाभिमान भी स्यामागीम थोडा नहीं है, यियाफ पमंडमें अप । भी ना छ शिद्ध यह मुद्दा स्वीकार नहीं, महात्मालोग जो पदार्थको म'. शम जानते थे आग्ने उनका अयं भी गिद्ध यताया, यस यह भूनि ।। पा.पानी है, पी टी दशा दिनाभिमानियोंकी होनी चाहिये । • स... १९.पं. ३ वेदान्तपिज्ञानमुनिश्चितार्थाः मंन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाने ५ पान्तकाले परामृताः परिमुन्यन्ति सो| मुं०३२॥ नही दवा । १.
पञ्चमसमुल्लासखण्डनम् । (.१८१) इस मुक्तिसे लौटनेका खंडन तो मुक्तिविषयमें करेंगे परन्तु अब तो इसका अर्थ लिखते हैं। विचारजन्य विज्ञानसे जिन्होंने वेदान्तके अोंको यथार्थ जाना है और ये यत्नशील सर्वस्वत्यागरूप संन्यासयोगसे शुद्धचित्त हैं वे ब्रह्मलोकमें महाप्रलपमें परामृत ब्रह्मज्ञानजन्य मुक्तिको प्राप्त होके (परिमुच्यन्ति) विदेह कैवल्य अर्थात् अह्मभावको प्राप्त होते हैं इसकी.विशेष व्याख्या मुक्तिविषयमें लिखी जायगी । स० पृ० १२८ पं० ११ पुत्रैपणायाश्च वित्तपणायाश्च लोकैपणायाश्च व्युत्था: 'याथमिक्षाचय्य चरन्ति ॥ शत. १४ । ७।२।२६ लोकमें प्रतिष्ठा वा लाभ धनसे भोग वा मान्य पुत्रादिके मोहसे अलग होके सन्यासीलोग भिक्षुक होकर रात दिन मोक्षके साधनों में तत्पर रहते हैं ॥ १३०१२० समीक्षा-दयानंदगी न मके संन्यासी हैं, * क्यों कि इनमें यह इच्छा भरपूर पाई जाती है, लोकैपणाके अर्थ लोकमें जन निन्दा करै वा स्तुति और अप्रतिष्ठा करें तो भी जिसके चित्तमें कुछ हर्प शोक न होय, तो वह संन्यासी जानना, स्वामीजीकी यदि कोई निन्दा करता है तो कितना शोक होता है. उसी समय . उसके उत्तर देने को पुस्तक बनाई जाती है वितपणाका भी त्याग आपमें नहीं पाया जाता, धनकी इच्छा यहांफ है कि, जिसकी पूर्ति ही नहीं होती, धनकी प्राप्तिम कैसे २ प्रयत्न किये कि, नि यंत्रालय जारी किया गया, पुस्तकोंका मूल्य द्विगुण त्रिगुण नियत हुआ, हमारे पुस्तकोंको और कोई न लापसके इस कारण उनपर रजिष्टरी कराई गई, लोगों। धनके आने और पुस्तक विक्रयके व्यवहारसे धन मिलनेपर भी व्याकरणका पुस्तक छपवानेको धनकी सहायता ली और बहुत पंडित नौकर रखकर वेदायकी पूर्ति शीय होगी इस बहानेसे पृथक् याचना की, 'उपदेशक मंडलीके नामसे एक लक्ष रुपया एकत्रित करनेमें यथाशक्ति प्रपल कियागया, परन्तु वह काम आपके विपरीत उपचहारसे पूर्ण नहीं हुआ. लोभने आपके हृदयमें यहां तक निवास कियाथा कि, धनवानोंसे प्रीतिसमेत घंटों पाता होतीथी, निर्धनोंकी ती बूझ ही नहीं थी, प्रतिष्ठा इतनी चाहते कि, कोठियों पर ठहरते चरटपर ही निकलते रहे, पुत्र तो था ही नहीं परन्तु जो मुख्य सेवकलोग हैं उनमें आप प्रीतिकरते हो और उनके सुख दुःसमें हर्प शोक प्रगट करते हो, क्यों कि आपने पृ० १२८ पं०८ में लिखा है जो देहधारी है वह दुःख मुसको माप्तिसे पृथक नहीं रहसना, निदान आप तीनों एपणाओंसे मुक्त नहीं और * मा० प्र० कर्ताजी दूसरोंको क्यों देखतेहो दूसरे तो आपकी दृष्टिमें पहलेमेही अच्छे नहीं पर एफवारतो हृदयपर हाय धरफे मान्य बोलो कि जैसे सन्यासी लक्षणं चाहिये सामोजी यसे ही मंन्यासी हैं या नामके ! . . - (१८९) दयानन्दतिमिरभास्करः। संन्यासी भी नहीं, तीनों एपणाओंको वही जीतसकेगा जो संसारके माहाराते कुछ संबंध न रक्खेगा। स० पृ० १२८ पं०१५ प्राजापत्यां निरुग्योष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम् । आत्मन्यनीन्समारोप्य ब्राह्मणः प्रबहात ॥ प्रमापति जयात् परमेश्वरको प्राप्तिके अर्थ इष्टि अर्थात् यज्ञ करके उसमें पो. पपीतादि विहाँको छोड आहवनीयादि पांच आमियोंको माग, अपान, ध्यान, टदान और समान इन पाय प्राणों में आरोपग फरके ब्राह्मण ब्रह्मवित भरसे निकलकर संन्यासी हो गावै ॥ १३१ । १ समीक्षा-पहां भी स्वामीजीपी पनायट ही है, सर्ववेदस शब्दमाम पinti- तादिकका नहीं किंतु सस्त है, मनुके टीकाकार मे शातिथि गोविंदराम का भहने इसी शोरके टोकेमें सर्ययेदस शन्दका अर्थ सर्वस्य किया है पहा मागापत्य इष्टिमी सर्ववेदस दक्षिना लिसी है, अब ध्यान करो कि, उन इष्टिमी, दक्षिणा सर्वस्व हो सकती है या यज्ञोपर्यात मिसको युदिका कुछ भी स्पर्श होगा पापही पहेगा कि पसीपीत पाकी दक्षिणा के लिये सर्वथा अरामंगरा है, भौर सहित समंगस है क्यों रियैराग्प पिना संन्यासका ग्रहण करना पृया है और गिराने पनादि सरस्थ पदापोंका त्याग न किया, उसमे पाय पह।। स० पृ. १३१५० १ इन्दियांग अधमांगरणसे रोक राग देतो सो निररहै॥ १११ । १५ समासा-नयामीनी रिया शान येराग्य पूर्ण निन्दिपता भी नहीं थी, IT भोगरी इन्ठा लंदै, विद्या और ज्ञान पापं होता तो पाया विद निकूट पनि रहित रंस क्यों करते, पैराम्पर विराट पनादि पापी गण क्यों होता सिपभोगी इम्का न होती तो उसमौतम गम्रो और मोनको बामांगनमा म.पू. १५१पं.१ मरनतामा निरि॥ १३४।६ मीका-आपसमा समरिया ful परपयन पानापाको मितपत आमंयामीन ११३० ६.१३ कही टांग या गादादिमा और तो पो रवितर मर शेरन को १३॥ पर वन दिन दिपा पनी भी या और कौशादार नाद मन है और - पञ्चमसमुल्लासखण्डनम् । (१८३) की सेवा में रहते थे, उनका हृदयभी आपकी क्रोधामिसेभस्म हो जाताथा जो कोई आपके दोपको दोप करें उसका भी तिरस्कार होताथा, बीसियों दृष्टान्त आपकी नाई शाखायोंकी पुस्तकों में विद्यमान हैं। पृ० १३४६०२० सम्पनियमास्ते यस्मिन्पदा सम्यङ् न्यस्यन्ति दुःसानि कर्माणि येन स संन्यासः स प्रशस्तो विद्यतेस्प स संन्यासी' जो ब्रह्म और जिससे दुष्ट काँका त्याग किया जाय वह उत्तम स्वभाव जिसमें, वह संन्यासी कहाता है ॥ १३७ । १० समीक्षा चाहजी अच्छा अर्थ फिया (जो ब्रा और जिससे दुष्ट काँका त्याग कि गाय ) आपने इससे अर्थ क्या निकाला जो ब्रह्मको और दुष्ट फमाकों छोड देपे क्या वह संन्यासी (बौद्धमतावलम्बी )जो दुष्ट काँको छोडनेका नाम संन्यास है तो सब ही श्रेष्ठाचारवाले गृहत्य पुरुष संन्यासी हो सक्ते हैं फिर तो सब ही संन्यासी हो जायगे, इस कारण ( सम्पन्यासः आत्यन्तिकस्त्यागः संन्यासः) सम्पूर्ण ही वस्तुओं का त्याग शिखा सूत्रसहित इसको संन्यासी कहते हैं स०पृ० १३५ पं० १८ विविधानि च रत्नानि विविक्तपूपपादयेत् ॥ मनु नाना प्रकार के रल सुवर्णादिधन विविक्त अर्थात् संन्यासियोंको देव।।१३।१० समीक्षा-यह और भी द्रव्य लेनेको फपटनाल प्रकट कर मनुके नामसे श्लोक कल्पना किपा है सारी मनुस्मृति देखिये फहीं भी यह श्लोफ नहीं लिखा ह, पतियोंको धन देनेते महापाप होता है, कोई दयानंदी इसके उत्तरमें यह श्लोक देते हैं कि स्वामीजीने इस श्लोकके माशपसे यह श्लोक बनाया है । धनानि तु यथाशक्ति विप्रषु प्रतिपादयेत् । वेदवि- सु विविक्तेषु प्रेत्य स्वर्ग समश्नुते ॥ अ० ११ श्लो०६ सो विद्वान् लोग इसके अर्थ विचारे इसमें संन्यासियोंको द्रव्य देने का काई भी पद नहीं है किन्तु इस श्लोकका यह अर्थ है कि, अनेक प्रकारसे धन यथाशक्ति ब्राह्मणोंको देना चाहिये,जो कि वेद पढे हैं और (विविक्तेषु पुवकलवायवसक्तेषु) कुटुम्बो हैं ऐसे माह्मणों को देनेसे शरीर त्यागने उपरान्त स्वर्ग होता है, संन्यासी फा यहाँ प्रकरण नहीं संन्यासीको तो चाहिये कि- ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयत् । अनपाकृत्य मोशन्तु सेव्यमानो बजत्ययः ॥ ०६ श्लो०३५ देवरुण, पितृमण, ऋपिकण इन तीनों ऋणोंसे उद्धार होके मनको मोक्षमें (१८४) . दयानन्दतिमिरभास्कर लगाय: विना तीनों ऋण मुक्ति किये जो मोक्षसेवन, फरताहै, अर्थात् संन्यासी होताहै सो नरकमें जातहि स्वामीजीने इस श्लोकको न विचारा तभी तो तीनों इच्छा बनी रहीं। एककालं चरेद्रेक्ष्यं न.प्रसजेत विस्तरे। भेक्ष्य प्रसक्तो हि यतिविपयेष्वासनति॥१० श्लो०५५ एक कालमें भोजन कर और भिक्षाके विस्तारको इच्छा न करे, बहुत स्वादुके भनके भोजन करनेसे यतिको विषय गिराय देवेंगे। स्वामीजी आपके तो प्रतिदिन विविध प्रकारके भोजन बनते हैं, संन्यासीको पेडके नीचे रहना एक समय भोजन करना लिखा है. आपमें यह लक्षण एक भी नहीं मिलता है, इस कारण आपका संन्यास ठीक नहीं और तुम संन्यासी भी नहीं । इति श्रीमइयानन्दतिमिरभास्करे सत्यार्थप्रकाशान्तर्गतपंचमसमुल्लासस्य खण्डनं समाप्तम् १०६९० अथ सत्यार्थप्रकाशन्तर्गतपष्ठसमुल्लासस्य खण्डन पारस्यते । राजधर्ममकरणम् । इस समुल्लासमें स्वामीजीने राजधर्मकी व्याख्या की है, इसमें सम्पूर्ण मनुस्मृ तिके श्लोक लिखे हैं, जो कि प्राचीन समयसे आजतक सब मानते चले आते हैं इसमें कोई मतविषयक चर्चा नहीं है परन्तु जो वार्ता स्वामीनीने इसमें मानी है अन्यत्र नहीं मानी वही दिखलाते हैं । स० पृ० १४४ पं० २ इस सभामें चारों वेद न्याय शास्त्र निरुक्त. धर्मशास्त्र आदिके वेत्ता विधान सभासद हों ॥ १४७ । १६ स० प्र० पृ० १६६ पं० ११जो विशेप देखना चाहें वह चारों वेद मनुस्मृति- शुक्रनीति महाभारतादिमें देखकर निश्चय करें प्रजाका व्यवहार मनुके अष्टमनसमा ध्यायसे करै १८४ । १२ समीक्षा यहां स्वामीजीका वह प्रण कहां गया कि, हम वेदानुसार ही मानेंगे जब वेदानुसार ही मानते तो मनुके लिखनेकी क्या आवश्यकता थी, पेदसे ही लिख दिया होता, इससे मालूम होताहै कि मनुष्योंका व्यवहार राजधर्मादि पर धर्मशास्त्रहीसे होताहै, उसका यथावत् मानना ही बनेगा, वेदानुसारफा मानना फहना वन नहीं सकता, यदि वेदानुसार ही है तो वताइये यह रानधर्म कौनसी अतियोंसे निकाला है, अब महाभारत भी मानगये यह.साक्षी पूछना, दण्ड विधान आदि वेदमें कहांके हैं, इससे अपने विषयमें धर्मशास्त्र भी. प्रमाण है॥ स्वतः पाठसमुल्लासखण्डनम्। (१८५) स: पृ० १४७ पं० १४ और कुलीन अच्छे :प्रकार सुपरीक्षित सात घा आठ मंत्री करें १५१ । १२ स० पृ० १४८५०६ जो प्रशंसित कुलमें उत्पन्न पवित्र चतुर हो उसे दूतपनेमें नियुक्त कर १५२ । ३ समीक्षा-यहां स्वामीजी जन्मसे जाति मानना स्वीकार करते हैं क्यों कि यदि शूद संपूर्ण गुणों से युक्त हो तो वह दूत करने के योग्य नहीं, किन्तु निसका कुंल भी श्रेष्ठ हो ऐसे ही मन्त्री और दूत बनावै, कुलीनता तोजन्मसे ही होती है अन्यथा नहीं स०प्र० पृ० १४९ पं० २४ बडे उत्तम कुलमें युक्त सुन्दर लक्षण है अपने क्षत्रिय कुलकी कन्या जो अपने सदृश गुण कर्ममें हो उससे विवाह करना।। १५३ १२४ : समीक्षा--यहाँ भी स्वामीजी जाति ही उत्तम मानते हैं, जो क्षत्रिय कन्या घडे कुलम उत्पन्न हो, उससे विवाह कर, यदि पढ़ी लिखी नीच कुलकी गुणपती भी हो तो उसके साथ विवाह करना नहीं लिखा, किन्तु यहां कुलकी कन्याके साथ विवाह करना लिखा, यहां भी जाति ही प्रधान मानी है, तभी तो शूर वीर उत्पन्न होते थे जो कि, भारतका उद्धार करते थे । स० पृ० १५२ पं० ४ जो उसकी प्रतिष्ठा है जिससे इस लोक और परलोकमें सुख होनेवाला था उसे उसका स्वामी ले लेता है ।। १५८ । १३ पृ० १७० पं० २१ जो साक्षी सत्य बोलताहे वह जन्मान्तरमें उत्तम जन्म और लोकान्तरों में जन्मको प्राप्त के सुख भोगता है ॥ १७७. ॥ १ समीक्षा-इन वाक्योंसे प्रतीत हो . है कि, स्वामीजी जीवका पृथ्वीके सिवाय अन्य लोकोंमें जाना स्वीकार करते है, अब आपने लोकान्तरमें जीवकी गतिमानी फिर जाने आप स्वर्गलोक मानने क्यों हिचकिचाते हो परन्तु स्वर्गलोकमें तो 'पुण्यात्मा प्रवेश करते हैं पक्षपाती वा धर्मत्यागियोंका वहां प्रवेश नहीं हो सकता इस कारण आपने शोचा कि हमतो वहां जायँगे ही नहीं, इस कारण लिख दिया कि स्वर्ग ही नहीं लोकोंकी व्याख्या आगे लिखेंगे । स. पृ० १६७० २७ और जो र नियमशास्त्रोक्तं न पावै और उनके होनेकी आवश्यकता पावें तो उत्तमोत्तम नियम बांधे.१७३ । १६ पृ० १७६ पं.१७ उत्तम नियम बांधे परन्तु जहांतक बने बालविवाह न करनेदे तया युवावस्था में 'प्रसन्नताके विना विवाह न करना न करने देना ॥ १८३ १२५ समीक्षा-यह क्या स्वामोजीको सूझी आपती शास्त्रमें सब कुछ मानतेहैं, और 'जो है वहीं नया बनाओगे तो उसका प्रमाण कैसे होगा और वेदानुसार ही वह क्यों कर होसक्ता है बस जाना जाता है . कि आपने बहुतसे मेल मिलाय हाग . (१८६) दयानन्दतिमिरभास्करः। तो तो आवश्यकता पडनेस आप जाने क्या क्या लिखेंगे, अब इस नियोगकी क्या आवश्यकता थी जो आपने लिया परन्तु अब आपकी वेदानुसारकी प्रतिज्ञा जाती रही पुरातनसिद्ध योग्य समयपर विवाहकी रोक और प्रसनताके विना व्याह न करो यह हठ न छोडो ॥ इति श्रीदयानन्दतिमिरभास्करे सत्यार्यप्रकाशान्तर्गतपष्टसमुल्लासस्य खण्डनं समाप्तम्।।१०।६।९० अथ सप्तमसमुहासस्य खण्डनम् । पुनः देवनाप्रकरणम् । स०पृ० १७९ पं०४ त्रयस्त्रिंशस्त्रिंशता० इत्यादि वेदोंमें प्रमाण है, इसकी व्याख्याःशतपयमें की हैं कि, ततीस देव, पृथ्वी, जल, अमि, वायु आकाश, चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र, सव सृष्टिके निवासस्थान होनेसे आठ वसु प्राणापान, व्यान, समान, नाग, कूर्म,कृकल, देवदत्त, धनंजय और जीवात्मा यह ग्यारह रुद इसलिये कहाते हैं कि शरीरको छोडते हैं तब रोदन करनेवाले होते हैं, संवत्सरके. बारह महीने बारह आदित्य इसलिये कहाते हैं कि यह सबकी आयु लेते जाते हैं, बिनलीका नाम इन्द्र इस हेतुसे है कि, परम ऐश्वर्यका हेतु है, यज्ञको प्रजापति कहनेका कारण यह है कि जिससे वायु वृष्टि जल औषधीको शुद्धि विद्वानों का सत्कार और नानाप्रकारकी शिल्पविद्यासे प्रनाका पालन होता है, यह तैतीस पूर्वोक्त गुणोंके योगसे देष कहाते हैं, इनका स्वामी चौंतीसा उपास्य देव शतपथके १४ काण्डमें पष्ट लिखा है ॥ १८६ । ८ * समीक्षा--यद्यपि देवता पूर्व प्रतिपादन कर आये हैं, परन्तु स्वामीजीने जो यह पुनः लेख किया उससे अब फिर कुछ थोडासा लिखते हैं, कहीं तो स्वामीनीके विद्वान् देवता होनाते हैं, कहीं इन्द ईश्वर होनाते हैं, परन्तु कहीं मिट्टी, पानी, लकडी देवता होजातेहैं, इन्दनी बिजली बन जातेहैं (त्रयस्त्रिंशस्त्रिंशता) निसके अर्थ ३० ३३ देवताओंके हैं, स्वामीनीने तेंतीस ३३ होके किए हैं, वह अर्थ तो बदले ही पर हिसाबमें भी गडबडी, क्या आपको तैतीससे अधिक गिनती नहीं आती जो ३०३३ के ३३ हो रहगये देखिये देवता तो अनेक हैं जिनके नाम जप- नसे पाप दूर होताहै ॥ यजुर्वेद अ० ३९ मं०६ प्रायश्चित्ताहुति० धर्मके भेद होनेमें सविता प्रथमेहन्नुमिदुतीयवायुस्तुतीय आदित्यश्चतुर्थे चुन्द्र * पांचवीं बारम मा यही पाठ है छोटे खामी इसे अशुद बतातेहै देवताओंकी बहुतायतरू' मा य० ३७१ ७ दखो १९७० सम्यत्के मा० प्र० में भी ऐसा ही है !
सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (१८७) भाः पञ्चमऋतुः पृष्ठे मरुतः सप्तुमे वृहस्पतिरष्टमे मित्रो नवमे वरुणो दुशमऽइन्द्र एकादृशे विश्वदेवा द्वादशे ६ प्रथम दिनका सविता देवता है, दूसरे दिनका अभि, तीसरे दिनका वायु, चौथे दिनका आदित्य देव, पांचवेंका चंद्रमा, छठेका ऋतु, सातवेंका मरुत, आठवेंका वृहस्पति, नववेंका मित्र, दशवेंका वरुण, ग्यारहवें दिनका इन्द्र, बारहवेंका विश्वेदेवा देवता है इन देवताओंके निमित्त १२ दिनतक प्रायश्चित्तके अर्थ आहुति दी जाती है, अब स्वामीजी बतायें इसमें यह देवता कहाँले आगये ॥ नृचक्षसोअनिमिपंतो अहणां बृहद्देवासो अमुतत्वमानशुः । ज्योतीत्या अहिमाया अनागसो दिवोवष्माणवसतेस्वस्तये ॥१॥ ऋ० मं० १० सू०६३ अ०५ (नृचक्षसः) कर्मनेता मनुष्योंके देखनेवाले ( अनिमिपंतः सदा जागरणशील जिनके पलक नहीं लगते ( देवासः) देवता ( अर्हणा )लोकके परिचरणार्थ (वृहत् अमृतत्वं) अमरत्वधर्मको (आनशुः)प्राप्त हुए हैं (ज्योतीरथाः)घे दीपमान रथवाले (अहिमायाः) अव्यय बुद्धि ( अनागसः) पापरहित देवता (देवः) स्वर्ग लोकके (वमर्माण ) उछूित देशम ( स्वस्तये ) लोकके पल्याणार्य (वसते) रहते हैं ॥१॥ सुम्राजी येसुवृोयज्ञमाययुरपरिहृतादधिरेदिविक्षयम् ॥ ताँ विवास नमसासुवृक्तिभिमहोभादित्याँअदितिस्वस्तये ॥२॥ (समानः) अपने तेजोंसे अच्छी तरह प्रकाशमान ( मवृधः ) अतिदि. युक्त ये (ये) जो देवता ( यज्ञं) यज्ञको (आयुः) आते हैं ( अपरिद्धृताः) ३. सबसे अनेय (दिवि )स्वर्गलोकमेंः ( क्षयं ) निवास (दधिरे) करते हैं (तान आदित्यान् ) उन अदितिके पुत्रोंको (अदिति ) देवताओंकी माताको (महो). पढे गुणयुक्त (नमसा ) अनकी हवि फरके ( मुक्तिभिः) सुन्दर स्तुतियों फरफे ( स्वस्तये ) कल्याणके अर्थ (आविवास ) पूजो इत्यादि वाक्योंसे विदित होताहै कि, देवता यज्ञमें आते हैं इससे बिजली. आदिका अर्थ जो स्वामीनीने लिखाहै सो मिथ्या होगया, आगे ग्यारहवें समुल्लासमें इसका अधिक वर्णन करेंगे "स्वर्ग लोके न भयं फिञ्चनास्ति" और "शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ।। .
(१८८) दयानन्दतिमिरभास्करः। फठोपनिषत् १११ । १२ स्वर्गलोकमें कुछ भप नहीं स्वर्गलोकम : शोकरहित हों आनंद होता है। ईश्वरविपयप्रकरणम् । स०प्र० पृ० १८१५०५ ( प्रश्न ) परमेश्वर दयालु और न्यायकारी है या नहीं (उत्तर) है पृ० १८१ पं० ९ न्याय और दयाका नाममात्र ही भेद है, क्यों कि जो न्यायसे प्रयोजन सिद्ध होताहै, वह ही दयासे दण्ड देनेका योजन है पुनः पं० १३ निसने जितना पुरा कर्म किया हो उसफो टतना वैसा ही दण्ड देना चाहिये, इसीका नाम न्याय है पं० १७ दया वह ही है कि, डाकूको कारा। गारमें रखकर पापसे बचाना ॥ १८८ । १३ समीक्षा-यहां स्वामीजीने दयाकी खूब ही रेट लगाई ईश्वर क्या है मानों इनका चेला है, जो. सारा सिद्धान्त स्वामीजीसे कथन कर दिया है देखिये (णी मापणेसे पत्र ) इससे न्याय शब्द सिद्ध होता है, जिसके अर्थ यह हैं कि यथावत् न्याय करना, जो दण्डके योग्य हो उसको दण्ड देना और जो दयाके योग्य हो उसपर दया करना और (दय धातुस) अड़ करनेसे दया शब्द सिद्ध होता है, जिसका अर्थ यह है कि किसी भक्त श्रेष्ठाचरणी पुरुपसे अज्ञातमें कोई अपराध हो जाय तो उसको स्तुति करनेपर क्षमा करना. क्यों कि दयाका प्रयोग अपराधीपर ही होता ह, जब कि, किसीका दुःख देखकर उसपर करुणा आती है कि इसका दुःख दूर करें, तो इसीका नाम दया है, ईश्वर अन्तर्यामी है यह सबके मनको जानता है, कि यह अपराध वेसुधीमें बना है, या जानकर यदि वह प्रार्थना करे कि आगे ऐसी भूल न करूंगा और परमेश्वर अपनी सर्वज्ञतासे जानता है कि, यह आगेको ऐसा नहीं करेगा, बस उसके ऊपर दया करता है जैसा यजुर्वेदमें लिखा है ।। सनोवन्धुनितासविधाता धामानिवेदु भुवनानिविश्वा । यदेवा अमृतमानशानास्तृतीयेषामन्नध्यैरैयन्त ॥ १॥ (स) वह परमेश्वर (नः ) हमारा (वन्धुः) विविध प्रकारकी सहायता रक्षा करनेसे बन्धु है (जनिता) उत्पन्न करता है (स.) वह (पिघाता) विधाता मालिक पिता है (स.) वह (.विश्वा) सब ( भुवनानि ) माणी (धामानि) स्थानोंको (वेद) जानता है (देवाः) देवता (पत्र.) निस घरमें (अमृतम्) भोतमापक ज्ञानको (आनशाना:) प्राप्त करते (तृतीये धामन्) स्वर्ग ( भन्यै- . यजु० अ०३२ मं०१० सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (१८९) पन्त ) स्वेच्छानुसार वर्तते हैं आनन्द करते हैं । इस मन्त्रमें बन्धु जनिता आदि शब्दोंसे ईश्वरमें अपार दया जानी जाती है, बन्धुत्वपन यही है कि, आप- दोंमें सहायता करनी (पातीति पिता) जो रक्षा करै वह पिता, जनिता पिता, पुत्रके अपराधोंको क्षमा कर देता है और दया करता है । शंवातुः श ५ हिते पाणिः शन्तै भवन्त्विरकाः। शन्तभवन्त्वमयः पार्थिवा सोमात्वाभिशंशुचनायजु०३५म०८ भावार्थ:-यह कि ईश्वर दया दृष्टिसे कहता है हे पजमान ! भक्त वायु तेरा' सुखरूप हो, सूर्यकिरण तुझे सुखरूप हो, मध्यमें और दिशाओं में स्थापित इष्टिका तेरे लिये सुखस्वरूप हों तुझे तापित नहीं करें ॥ १॥ अब विचारना चाहिये कि, यह वाक्य दयारूप है या नहीं, इस कारण न्याय दया पृथक हैं,. ईश्वरमें सर्व शक्तिमत्ता होनेसे दोनों बातें बनती हैं विशेष अपनाशन प्रकरणमें लिखते हैं। निराकारसाकारप्रकरणम् । स. पृ० १८२६०२ (प्रश्न ) ईश्वर साकार है वा निराकार ? (उत्तर) निराकार, क्यों कि साकार हो तो व्यापक नहीं हो सका, जब व्यापक नहीं हो सक्ता तौ सर्वज्ञादि गुण उसमें घर नहीं सक्ते, क्यों कि परिमित वस्तुमें गुण कर्म स्वभाव भी परिमित होते हैं, तथा शीतोष्ण, क्षुधा, कृपा, राग, द्वेप, छेदन भेदन आदिसे रहित नहीं होसक्ता इससे यही निश्चय है कि, ईश्वर निराकार है, जो साकार हो तो उसके शरीर नाक कान आदि अवयवोंका बनानेहार दूसरा होना चाहिये, क्यों कि, जो संयोगसे उत्पन्न होताहै उसको संयुक्त करनेहारा चेतन अवश्य होना चाहिये जो कोई कहै कि, ईश्वरने अपनी इच्छासे शरीर धारण किया तो भी यही सिद्ध हुआ कि, शरीर बननेके पूर्व निराकार था, इससे यहीं सिद्ध हुआ कि ईश्वर निराकार है ॥ १८९ । १२ समीक्षा-ऐसा विदित होताहै कि दयानन्दजीने ईश्वरको मनुप्यक्त् समझ लिया है यदि वह साकार होजाय तो व्यापक न रहै, उसका कोई बनानेवाला होनाय जब कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है, तो वह आकारवाला होकर. शक्ति वा ज्ञानसे रहित नहीं हो सक्ता जिस समयमलय होता है उस समय वह निराकार, जब उसमें सृष्टिरचनाकी इच्छाहोती है तभी उसकोसगुणवा साकार कहते हैं, यह न्यायी दयालु आदि नाम साफारमें ही पटते हैं, पजुबदकेशतपथ ब्राह्मण सट लिसहि।
दयानन्दतिमिरभास्करः। :: उभयं वा एतत्प्रजापतिनिरुक्तश्चानिरुक्तश्वपरिमितश्चापरि- मितश्वतद्याजुपाकरोति यदेवास्यनिरुक्तं परिमित रूपं तदस्यतेन संस्करोत्यथ यत्तूष्णी यदेवास्यानिरुक्तमपरिमित. रूंपतुदस्यतनसंस्करोतीतिब्राह्मणम्।श.का.१४.१ त्रा.म.१० 'परमेश्वर दो प्रकारका है परिमित. अपरिमित निरुक्त और अनिरुक्त इस कारण जो याउपासनादि कर्म यजुवेंदके मन्त्रोंसे करता है उसके द्वारा परमे- वरफे उस रूपका संस्कार करता है जो निरुक्त और परिमित नाम है और जो कृष्णींभावसम्पन्न है अर्थात् अध्यात्ममन्त्रका ही मनन करता है उससे परमेपरफे उस रूपका संस्कार करताहै जो अनिरुक्त और अपरिमित नाम है इससे प्रत्यक्ष परमेश्वरमें निराकारता साकारता पाई जाती है । स० पृ०२०१६० ७ जोगुणोंसे सहित वह सगुण और गोगुणों से रहित यह निर्गुण पहाताहै अपने २ स्वाभाविकगुणोंसे सहित और दूसरे विरोधीगुणोंसे रहित होनेसे सब पदार्थों में सगुणता और निर्गुणता या फेपल सगुणता हो कि एक हीम सगुणता और निर्गुणता सदा रहती है पैसे ही परमेश्वर अपने अनन्तशालय सादि गुणोंसे सहित होनेरो सगुण और रूपादिगडफे तयादेपादिनीया गुणांस पृपर होनसे निर्गुण फहाताहै ॥ २१० । १९ समीक्षा-इस लेखसे तो स्वामीनीमा ही पक्षविगइताह जय इस प्रकार निरा- फार शब्दा अर्थ माना तब तुम्हारे तात्पर्यशाला निराकार शब्दका अथ नहीं गो गृर्तिमानको न योपन फर किन्तु दिव्य अलौकिपमुर्तिमानफा योधर भी निराकार शब्द होता है जैसा कि, सत्यार्थप्रकाराम लिसाह पिदिश्य मशिगुरुया ऐगा भी निर्गुण शब्द योपर है घोही निराकारशद जय मासारका भी योगा हो गपा तो निगशब्दो दृष्टान्त में कोई विरोध नहीं निराकारता भी मामा, सर्वया आकारशून्यका नाम निराकार कहोगे तो सर्व गुण शुन्या नाग निगुंग दुरमे दयानन्दनीरा मतभंग हो जायगा क्यों कि, सत्यानाश गरगुण शुन्यका नाम निर्गुग नहीं माना इमसे निराकार बाद भी सासारा पाया है। पर इस प्रकार निराकारको अविरोधी साकारता दिशेगावो (माप्यंगात) इम मन्त्र ( आपम् ) म पदक्षा अच्छी तरह समान गया भौतिक महिन कापागारक पनित है और पादारपा टानिदो दिशा बासनलगोरुपमृतचामृतं चौत म. २ बा.३ई. १ . सामसमुल्लासखण्डनम् । ईश्वरको दो रूप हैं एक मूर्तिमान् एक अमूर्तिमान् और (एक रूपं बहुधा यः करोति.) एक रूपको जो बहुत प्रकारका फरताहै इस मंत्रसे तथा औरोंसे ही सर्वकारण बीजस्थापन परमात्मामें साकारता इस प्रकारसे प्रगट है । "प्राह्मणोस्पमुखमासीत् । यजु० आत्मवदमनमासीत्पुरुपविधा " १४ ४।१११ आत्मा पुरुपरूप था इससे अधिक और क्या प्रमाण होगा पुरुष- सूक्त भी देखो। अवतारप्रकरणम् । स०म० १९० पं० २७ ईश्वर अवतार लेताह वा नहीं ( उतर ) नहीं, क्यों कि "अगएकपाद""सपर्यगासक्रमकायम्"ये यजुर्वेदके वचन हैं इत्यादि पचनोंसे परमेश्वर जन्म नहीं लेता, १९१.६०२४ और युक्तिसे भी ईश्वरकाजन्मसिद्ध नहीं होता जैसे कोई अनन्त आकाशको कहै कि, गर्भमें आया वामूठी में घलिया ऐसा फहना कभी सब नहीं हो सका क्यों कि आकाश अनन्त और सर्वव्यापक है इससे न आकाश बाहर आता और न भीतर जाता वैसे ही अनन्त और सर्वव्यापक पर- मात्माके होने में उसका आना जाना कभी सिद्ध नहीं हो सत्ता जाना वा आना वहाँ हो सक्ताह जहां न हो क्या परमेश्वर गर्भमैं व्यापक नहीं था जो कहीरो आया और बाहर नहीं था जो भीतरसे निकला ऐसा ईश्वरके विषयमें कहना और मानना विद्याहीनोंके सिवाय कौन कहै और मानसर्केगा, परमेश्वरका जाना आना जन्म मरण कभी सिद्ध नहीं हो सका है १९९ १ ६ १.२०१६ समीक्षा स्वामीजी ईश्वरको अग अकाय बनाकर ईश्वरके अवतार होने में संदेह फरते हैं तो नोवारमा भी अज और व्यापक श्रवण करा जाता है, उसका भीजन्म न होना चाहिये यथा- न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।। अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणो न हन्यते इन्यमाने शरीरे ॥१८॥ हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चन्मन्यते इतम् ।। उभो तीन विजानीतो नाय हन्ति न हन्यते ।। १९ ।। अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जंतोनिहितो गुहायाम् ॥ तमऋतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः २० कठवल्ली अ० उपनिपवद्वल्ली २ - (विपश्चित् ) सर्वका दशा जीवात्मा जो कि पूर्ववात्स्यायनभाष्यमें लिखा है (सर्वस्व दटा सध्य भोका सर्शनुभवः) इत्यादि वास्पोंसे और (यशेतामात्र --- - दयानन्दतिमिरभास्करः। प्रतिपुरुषःक्षेत्रज्ञः) इत्यादि भञ्युपनिषदसे निर्गीत है सो जन्म मरणसे रहित और यह आप किसीके नहीं उत्पन्न होता और न इससे ( फश्चित्)' कुछ उत्पन्न होता है अन नित्य एकरस पृद्धिरहित है और शरीरके नाशसे इस नाश नहीं होता * १८ यदि कोई हननकर्ता पुरुष ही इननकर्ता आमा वि. फरता हे तैसे यदि कोई हत हुआमात्माको हत चिन्तन करता है वे दोनों आत्म यथावत् स्वरूपको नहीं जानते क्यों कि, यह आत्मा न हनन करता है न ह होता है १९ इस जन्तुको गुहा अर्थात् पंचकोश रूप गुफामें (निहित) स्थित आत्मा अणुसे भी अणुतर है अर्थात् दुर्लक्ष्य है इससे अणुतर कहा परन्तु । आकाशादिसे (महीयान) महत्तर है (धातुः प्रसादात् ) ईश्वरकी . प्रसन्नता (अक्रतुः) विषयभोगसंकल्परहित पुरुष साको देखता है तो आत्माकी मा माको देखकर शोकरहित होताहै और योगशास्त्र के भाप्यमें व्यासनी कहते हैं । योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः । यो० पा० १९०२ चितिशक्तिरपरिणामिन्यपतिसंक्रमादर्शितविपया शुद्धा चानन्ता च व्यासभा अर्थ (चितिशक्तिः) जीवचेतन अपरिणामी है ( अप्रतिसंक्रमा) क्रियारहि है (दर्शितविषया) सर्वविपयोंका द्रष्टा है शुद्ध और अनन्त व्यापक है इसप्रका व्यास तथा कर्णादि ऋपिके मतमें जीव चेतन व्यापक है और जीवका जन्म मानते हैं इससे व्यापकका जन्म नहीं होता यह कथन कैसे होगा, क्यों वि व्यापकका जन्म व्यासादिक मानते हैं, यदि यह कहो कि “हम तौ युक्ति ही मानते हैं जन्म मरण, आना जाना परिच्छिन्नपदार्थमें बनसक्ता है, इस कारण, जीवात्माका स्वरूप व्यापक नहीं मानते " इसका उत्तर । तव तौ यह विचार कर्तव्य है विभु पदार्थसे भिन्न अणुपरिमाणवान् वा मध्यपरिमाणवान होता है आत्मा अणुपरिमाण है अथवा मध्यमपरिमाण है यदि कहो अणुपरिमाणवान है तो सारे शरीर में शीतल जल संयोगसे शीत स्पर्शकी प्रतीति न होनी चाहिये क्यों कि आत्मा अणु है, सो एकदेशमें स्थित होकर शीतका ज्ञान कर सकता है, आत्मा रहित अंगों में शीत स्पर्शका भान कैसा होगा (भ) आत्मा ययपि एक देशमें हे तथापि जैसे फस्तूरीका गंध सर्वत्र विस्तृत होता है तैसे ही आत्माका ज्ञान गुण सर्वत्र विस्तृत है इसमें शीत स्पर्शको सर्वत्र प्रतीति हो सक्ती है अथवा जैसे सर्व प्रभावाला द्रव्य है तैसे ही आत्मा भी प्रभावत् द्रव्य है (उचर )यह नियम है कि, * छोटे स्वामी अर्थ करते हैं कि ज्ञानी जीवात्मान जन्मता न मरता है, यहां ज्ञानां शब्द कहासे लाये यह ज्ञानी जीवात्मा जन्म लेकर हुआ है वा सदासे है यदि जन्म ठेकर ज्ञानी भा तो जना कैसे और आपके यहाँ तो मुक्त मी लौटते हैं फिर नहन्यते हन्यमाने शरीरको क्या संगति होगी।
- . सतमसमुल्लासखण्डनम् । (१९३). गुण अपने आश्रयको त्यागकर अन्यत्र गमन नहीं कर सत्ता, क्यों कि गुणम किया होती नहीं और फस्तूरीके दृष्टान्तमें भी कस्तूरीके सूक्ष्म अवयव विस्तृत होते हैं इसी कारण कस्तूरी फरादि द्रव्य रक्षक तिसको बन्द कर किसी डिब्बे आदिम रखते हैं और जो वोह सुले रखे जायें तो वे उड जाते हैं और ममा गुण नहीं किन्तु चिरल प्रकाशप्रभा है और धनप्रकाश सूर्य है, ऐसे ही आत्माको माननेसे .ज्ञानरूप ही सिद्ध होगा, सो ज्ञान एकरस है, कहीं सघन और कहीं विरल ऐसा कहना बनता नहीं, यदि अनेक रस मानोगे तो अनित्यत्वसनि होगी और सर्वथा अनुवादीके मतमै क्रिया तो जरूर माननी होगी तो (अचलोयं सनातनः) इत्यादि गीताके वचनसे विरोध होगा और "आत्मा विनाशी मियावच्यात् घट- - यत्" इस अनुमानप्रमाणसे विनाशिवप्रसक्ति तो अवश्य होगी और मध्यम परिमाण पक्षमें स्पष्ट ही जन्यत्व विनाशित्वादि दोप हैं "आत्मा जन्यः मध्यम- परिमाणवत्त्वात् आत्मा विनाशी मध्यपरिमाणवत्त्वात् घटवत्' इस कारण अनादि जीवात्माको मानकर मध्यम परिमाण फैसे मानोगे क्यों कि मध्यम परिमाण माननसे जन्मत्वकी प्रसक्ति होगी इससे विना इच्छासे भी व्यासादि महात्माओंके । पंचनानुसार आत्माको व्यापक और अज अवश्य मानना पड़ेगा तो जन्म शंका 'ईश्वरवत् जीवमें भी बनसकती है तो फिर जीवको जन्म कैसे हो सकता है जब जीवका जन्म हो तो ईश्वरका भी अवतार होगा वेदान्तमें लिखा है ।। चराचरव्यपाश्रयत्तस्यात्तव्यपदेशोभाक्तस्तद्भाव- भावित्वात् । शा० अ० २पा०३ सू० १६ उत्पद्यते जीवो मियते चेति तस्य जन्ममरणस्य व्यपदेशः प्रत्ययोभाक्तो गौणः कुध तर्हि मुख्य इत्याशंक्याह वरावरव्यपाश्रयस्तु मुख्यः चरावरशरीराश्रयस्तु जन्ममरणप्रत्ययो मुख्पस्थावरजंगमानि हि भूतानि जायन्ते धियन्ते चाउतस्तद्धि- यो जन्ममरणशब्दो मुख्यौ संतो तत्स्थे जीवात्मन्युपचयेते तदायभावित्वात् शरी- प्रादुर्भावतिरोभाक्योर्हि सतोर्जन्ममरणशब्दौनासतोः नहि देहसंबंधादन्यन जीवो जांतो मृतो वा केनचिल्लक्ष्यत इति सूत्रतात्पर्य्यम् ॥ "एपंच जीवस्यैव जन्ममातीतिकरवे परमेश्वररय जन्मावतारे श्रुतिस्मृतिप्रतिपा- दिते सति परमेश्वरजन्मपातीतिकरवस्वीकारेऽजत्वश्रुतिस्तपानवमीश्वरे जावें या योधयितुं का हानिरिति निर्विवादतया व्यासभगादासपं चुदा निरीक्षणीयं मूत्रसं- फेतं विना श्रुत्पनिर्णपातु वर्षशतेन महता यत्नेनापि न भवतीति बोध्यम् ॥" भाषार्थ-जीव उत्पन्न हुआ और नीव मरता है ऐसे जन्म मरणको प्रतीनि होती है परन्तु यह अनादिसिद्ध जीवमें जन्ममरणप्रतीति गौण है तब मुपाशिमें दयानन्ददिमिरनाकर इस पारते कहत है कि, चर और अवर शरीर नल्ल है, कसे शरोर उत्सव होते हैं और मरते हैं, इससे तिन शायरान जन जलालाने सवार होता है, क्यों कि स्थावर जंगम करके : समाजमारण प्रतोतिका अन्यय व्यतिरेक है, जब स्यार खरगोशमा जन्म मरण प्रतीत होते हैं, स्पार जन हाल गोपालामें जन्म मरण प्रतीत नहीं होते, सॉस सालमें गोर गन्न मरण किसीको प्रतीत होते नहीं. यह मार मामले पर निशाहोर है कि जोवारमा जन्मको नाम खोर पर जन्म तितके, मातोतिक मानने पर सो अशोक की है तो पालव अगत्वको ईभरामा के इति है हमारे भिरा एकस्यान में नहीं रहता। विजय मेहतर हैं, यह स्त्र आशप है, इसी पर सरसो सोको परिधिन मान बैठे हैं,पलम 'T ने होमाननेसे अनादित्य भग को मलन होताना निस पदार्थ किसी RANA PRATर होता है (भ) जीवका तो लिंगो HTHAN RAT स्थावर जंगम शरीर उत्पन मातो असारमा पमाम तो ना, ताप होगा सरीरम मापन हुआ तो गमा समारा मना सत्य है. धर्माधमी in निनाय मो धमाधर्म पानी समसारा शरीर देव परिसर साकार हरा और फल देन राम मीना दिशाराहीसलदेवी या RANIरिपारिक माननी पाहियो मोर मामा गगनती शनि पाटन दर ANTAN जानिमाने तो diet ril, तर म tatreet Tarf पाय ARY सो सो गाrial सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । ईश्वरात्मा माना तो अवतारके माननेमें दुराग्रह क्यों करते झे अब अवतार युक्तिसे सिद्ध कर मंत्र भी लिखते हैं । रूपंरूपंप्रतिरूपोचभूव तदस्परूपंप्रतिचक्षणाय । * इन्द्रोमायाभिः पुरुरूपईयते युक्ताह्यस्यहरयाशतादश ॥ ऋ० मं० ६ अ०४ सू०४७ मं० १८ अर्थ-(इन्दः ) परमैश्वर्यवान् परमेश्वरी ( मायाभिः ( स्वाभितानंतशक्तिभिः (पुरुरूपः) नृसिंहरामकृष्गादिरूपः ( ईयते ) गम्पते कस्मै प्रयोजनाय स्वशक्ति- भिस्तत्तदूपमापिक्रिपते परमेश्वरेणेत्यत आह तदस्परूपंप्रतिचक्षणाप अस्प स्वस्य भक्तवात्सल्यादिविशिष्टरूपस्य प्रतिवक्षणाय सर्वेषां पुरतः प्रख्यापनाय ईदृशगुण- विशिष्टोऽहमिति सपा प्रत्यक्षबोधनाय ॥ ननु मायया रचित रूपैः कथं स्वगुण- प्रख्यापनमित्यत आह रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव यादृशं यादृशं रूपं प्रादुः तत्सदमा पर भवतीति स्वशकिरवितस्प रूपस्य स्थानतिरिक्तत्वात् तनिष्ठभक्तवा- सल्यादिगुणानां स्वनिष्ठत्वादिति भावः । ननु फतिविधानीदशानि रूपाणीत्यत आह युक्ता घस्प हरपः शतादश हि निश्चपेन अस्प परमेश्वरस्प हरयः संसारस्प दुःखस्यासुरैः मापितस्प हरणात् नाशनात् युक्ता जगदक्षणाय नियुक्ता (शता) शतानि नामानंतानि संक्ति तथा दश नृसिंहादयो दश सन्तीत्यर्थः । पदार्थ:-(इन्द्रः) परमेश्वर (मायाभिः) अपनी अनन्तसामयोंसे ( पुरुरूपः) अनेक देहाँके रूपवाला (ईपते) होता है (तत् ) सो (अस्य )इस अपने (रूपम्) रूपसे (प्रतिचक्षणाय) सबभक्तोंपर विख्यात करनेके लिये ( रूपंप्रतिरूपः) जैसे जैसे रूपकी इच्छा हो तैसा २ ( बभूव ) हुआ (हि ) निश्चय (अस्प) इस परमेश्वरके (हरयः) रूप (शत ) सैकडों हैं (दश) दश मुख्य हैं यही मंत्र पर- मात्माके अवतार बोधन करता है ! यह इन्द्रपरत्व भी है और इन्हें मिर० मे. १२० १६४ मं० ४६ के अनुसार ईश्वरपरक भी है ।। प्रतद्विष्णुः स्तवते वीर्येण मृगोनभीमः कुचरोगिरिष्टाः । पस्योरुपुत्रिपु धिकमणेषाधिक्षियति भुवनानिविश्वा ।। ऋ० मं० १ ०२१ सू० १२४ मं० २ पद-मतत, विष्णः, स्तपते, वीपंग, मगः, न, भीमा, कुचरः, गिरिष्ठाः, पस्प, उरुप, निपु, अधिक्षिपति, भुवनानि, विभा ।। * भा०प्र० इन्द्रः इसका अर्थ इन्द्रियावाला ओसरमा करता है अटकल पन्नू भई 'मियम्' बाटा ईश्वप्रतिपादक मन्त्र गया । 'प्रताः ' में वामनावतार सट दयानन्दतिमिरभास्करः। अर्थ-मृगोन मृग इव तद्रिप्युः वीर्यण पराक्रमेण प्रस्तवते सुति प्रामो भीमः भयानकरूपधरः नृसिंहः अत एव मृगे इवेत्युक्तिः संगच्छते कुं पृथ्वी पर हादिरूपेण परतीति कुचरः गिरौ फैलासे शिवभिनेत्ररूपेण तिष्ठतीति गिरिठा यस्य विष्णोः त्रिविक्रमावतारे त्रिषु पादेषु विक्रमणेषु सत्म विश्वासर्वाणि चतुर्दश भुवनानि अधिक्षियंति चलंतीत्यर्थः ॥ भापार्थः-(मृगो न ) मृगकी समान (तत्) सो ( विष्णुः )विशुभगवान (धोयेंण) अपने पराक्रमसे (प्रस्तवते ) स्तुतिको प्राप्त होते हैं (भीमः ) नास- इरूपसं भीम, (कुचरः ) वराहादिरूपसे पृथिवीम विचरनेसे कुचरः(गिरिष्टाः) कैलासादिगिरिमें स्थित रहनेसे गिरिष्ट है ( यस्य ) जिस विष्णुक (ट) T (वियु) तीन (विक्रमपु ) पादविक्षेपमें ( विशाभुवनानि) सम्पूर्ण भुन (अपि- क्षियंति ) कंपित होते या वसते हैं । वज्रनखायविद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि, तेत्तरीयारण्यक १११।३३ त्वंस्त्रीत्वपुमानसि त्वंकुमारउतवाकुमारी। वनीर्णोदंडेनवंचास वंजातोभवसिविश्वतोमुखः । अथर्वकां. १० अनु०१ मं० २७ पदार्थ:-हे भगवन् ( त्यम ) आप (स्त्री) दुर्गाकाली शक्तिरूप ही (स्वम भाप ही (पुमान ) वामन गम कृष्णम्प (असि) हा (न्या ) आपही (मार सनत्कुमारादिरूप (उतया) और (कुमारी) कन्याम्पस पगित हो (एम)भा ही (नाणः) पदमपमे (दण्डेन )दण्ड धारण कर ( यश्चमि ) अमिपा पनि फरते हो (चम)प्रापही ( गानः) मगर होकर (विधतीतः) गमप हो। यहाँ ईभरका ही वर्णन है कारण कि आगे २८ मंत्र में कोहदेवो मनमिः .पिष्टो प्रथमो गायः स ट गर्भ अन्तः" २८ इसमें ईश्वरसा दी मन पटिहार प्रगट होना पड़ा है। इस मंयम ही इनिहाम पुराण प्रतिपाद्य असतारोमी गगना काम शारण यह मंय ही सबका मूट दे अपघामनावतार मुनिष गारद कर इदांविष्णुर्विचकर्म त्रेधानिदधेपदम् । सयुटा पाएर साम° १० १८० २० १ उनाया। imirey:P८मा : अ : ....? 40 सामसमुल्लासखण्डनम् । ( १९७) (विष्णु) निविक्रमावतारधारी (इदम् ) प्रतीयमानं सर्व जगदिश्य (विव- कमे) भिग्य कमते स्म (धा) त्रिभिः प्रकारः (पदं निदधे ) स्वकीयं पादं क्षिप्तवान् ( अस्प) (विष्णोः ) पांसुले पांगरे वा धूलियुत्ते पादस्थाने (समूढम् ) इदं जगत् सम्यगन्तर्भूतम् ( सेयमग यास्कैनैवं व्याख्याता विष्णुर्वि- तेवामोतेवा )* शतपथमें भी वामनावतारका खुलासा वर्णन है ।। यथा “वामनो ह विष्णुरास" श० १।२।२१५ 'वामन साक्षात् विष्णु ही थे पहां वामन अवतारकी पूरी कथा लिखी है। भापार्थ:-अमरेश त्रिविक्रमावतारी वामननी इस विश्वका उल्लंघन करते हैं, तीन पग धरते हैं एक भूमि दूसरा अन्तरिक्ष तीसरा स्वर्गमें इनके घरणमें चतुर्दश वन ब्रह्मांड सम्यक् अन्तर्भूत होताहै । रामावतारमाह सामोदे उत्तरार्चिके १५ अ० २ खं० १ १०३ भद्रोभद्रयासचमानागात् स्वसारजारोअभ्यतिपश्चात् सुप्रकेतैर्युभिरनिर्वितिष्टनुशद्भिवणेरभिराममस्थात् ॥ • पदार्थ:--(भद्रः) रामभद्रः (भद्रया) सीतया सह (सचमानः) सजमानः ( आगात् ) दण्डकारण्यमित्यर्थात् ( स्वसार) अंगुलयः स्वसारः तद्वन्तं सीतायाः पाणि ग्रहीतुं ( जारः) रावणः ( पश्चात् ) रामात्परोक्षे ( अभ्येति ) आगत इति । पूर्वोक्तानुवादः तेन रावणे हते सति जायागाईपत्य इति इति श्रुतेः जायासहचरः ( अमिः द्युभिः ) धुलोकसाधनतयां युशन्दवाच्यः रामदारैः सह ( रामम् ) रामस्याभिमुखम् (अस्थात् ) स्थितवान् (सुप्रकेतैः) शोभनचिह्नरिति दारा- निदोपत्वं सूचितं वितिष्ठन्नस्थादिति सम्बन्धः तिष्ठन्नासीदि- त्यर्थः ( उशाद्भिः ) दीप्यमानैः वर्णेः लोहितादिवर्णज्वाला- भिरुपलक्षितः अयं चार्थः पुनः पत्नीमगिरदादिति मंत्रान्तरे जब सायणाचार्य अवतारपरत्व न्याख्या करते ही हैं तब सायण अवतार माननेवाले थे इसमें संदेह क्या ! चाहें एक जगह लिखें चाहे अनेक जगह भा० ३० बालेको आक्षेपका भवमर कहाँ है ? और वामनोह० यह शतपथमा प्रमाण निगटगये।
(१९८) दयानन्दतिमिरमार। दृष्टः पक्षे भद्रो बोधः भन्या श्रद्धया जारः कामः मनिवार । नीलकण्ठ भा० ॥ भापार्य:-(भद्रः) भजन करने योग्य रामभद्र (भद्रया) सीतासहित (सचमानः) सजित होकर (आगात् ) दण्डकारण्यको आता है तब (स्वसा रम् ) अंगुलीको अर्थात् सीताके हायको पकडनेको (जार) रापण (पश्चात् ) रामके परोक्षमें (अभ्येति ) आता है तब रावणके मारनेके पीछे (मुमकेतैः) अच्छे चिह्नोंसे ( उशद्भिः ) दीप्तिमान् (वर्णः) वासे टपलक्षित ( युभिः) धुलोककी साधनभूत रामकी दारा सहित (अमिः) अमि देवता (रामम् ) रामके सन्मुख (अभ्यस्थात् ) उपस्थित होता है अर्थात् जानकी शुद्ध है. यह कहा फर जानकीको समर्पण करता है इससे रामका प्रति युगमें अवतार सिद्ध होत है नीलकण्ठका यह भाष्प दयानन्दनीसे सैकड़ों वर्ष पहलेका है और भी देखो ब्राह्मणोजज्ञे प्रथमोदशशीपोदशास्यः । ससोमं प्रथमः पपोसचकार रसविपम् । अथवं ४।६।२। (प्रथमः ) पहले एक (ब्राह्मणः ) ब्राह्मण (जज्ञे) प्रगटा ( दशशीर्षः) दः शिर (दशास्यः ) दशमुखवाला (सः)ठसने देवतादिसे लेकर (सोमः ) सो (पपौ) पिया (सः) उसने ही (रसम् ) रसको ( विपम ) विष (चका किया, इसमें रावणका प्रत्यक्ष वर्णन है । कृष्णावतारमाह ऋग्वेदे। कृष्णंतएमरुशतः पुरोभाश्वरिष्वर्विपुपामिदेकम् । यदप्रवीतादधतेहग: सद्यश्चिजातोभवसीदुदूतः। . ऋ० मं० ४ सू०७ अ०१म० ९ पद-कृष्णम, ते, एम, रुशतः, पुरः, भाः, चरिष्णु, अर्चिः, पपुपान, इत, एकम, यद, अप, पीता, दधते, ह, गर्भम, सद्यः, चित, जातः, भवसि, इत, उदूतः । अर्थ:-कृष्णं त एम इति, हे भूमन् ते तव रुद्ररूपेण पुरस्तिस्रो शतो नाशयतः यंदा पुरः स्थूलसूक्ष्मकारणदेहान असतस्तुर्यस्वरूपस्य यकृष्णंभा:सत्यानंदचिन्मानं रूपं तत्तु एम प्रामुयाम, यस्य तव एकमिति एकमेव अचिंबालापदंशमात्रं सम- * यह भाष्य छोटे स्वामीने ठीक नहीं उतारा सायणभाष्यकी दुहाई दी है हमारे यहाँ तो सनातनधर्मके सव माष्य ठीक है यह भी टीक वह मी ठीक परन्तु ० ० सायणको मानते हैं या नहीं जब माने तो बात चले सायणभाष्यमें यही आशय गर्मित है यह न्याख्यान कपरक है।
सतमसमुल्लसण्डनम्। टेनीवं वपुषां देहानामनेकेषु देहेषु चार गु भोक्तरूपेण धर्तते यत्कृष्ण भाः अप्र- ता नास्ति मर्पण पीतं गमनं संचारो यस्याःसा अप्रवीता निरुद्धगातर्निगडे स्ता देवकीत्यर्यः (कृष्णाय देवकीपुत्रापति छांदोग्ये) देवक्या एव कृष्णमातृ; बदर्शनात् सा स्वगर्भे दधते धारयति दध धारणे इत्यस्य रूपं ह प्रसिद्ध सः त्वं रातः गर्भतो बहिराविर्भूतः सन् सद्य इदुसय एव उ निश्चितंदूतः दुनोतीति दूतः आतुःखेदफरोऽतिवियोगदुःखमदोभवसीत्यर्थः एतेन देवकीपतेर्वसुदेवस्य गृहे जन्म तमिति सूचितम् । नीलकण्ठ भाष्य० ॥ भाषार्थः हे भूमन् ! आपकानो सत्यानंद चिन्मान रूप है और रुदरूपसे तीन हरफो नाश करनेवाला पा स्थूल सूक्ष्म कारण देहको ग्रसनेवाला रूप तुरीयात्मा नेस कृष्णभा रूपको हम प्राप्त होवें, जिस आपके स्वरूपकी एक ही अर्चि नर्यात् ज्वालावत् अंशमात्र समष्टि जीव अनेक देहोंमें चरिष्णु अर्थात् भोक्त- पसे वर्तमान हैं और जो कृष्णभाको अप्रवीता अर्थात् निगडग्रस्त देवकी गर्भ- पसे धारण करती भई आन्दोग्यमेंभी कृष्णकी माता देवकी सुनी है हे भूमन् ! आप प्रसिद्ध ही गर्भसे प्रादुर्भूत होकर माताके पाससे पृथर हुए, इससे श्रीकृष्ण- दिका देवकीके गर्भ में जन्म और महेश्वरावतार तथा जीवको पूर्व निरूपित चिदं. व वोधन किया । इस मंत्रमें सब अवतारादि हैं । एतदोर आंगिरसः कृष्णायदेवकीपुत्रायोक्त्वोवाचेति सामवेदीयछान्दोग्य उप० प्र० ३ खण्ड १७ पह उपदेश घोर आंगिरसने देवकीके पुत्र श्रीकृष्गनीले फरके मुझसे कहा यहाँ कृष्णका देवकीपुत्र होना प्रगट है ॥ और भी ऋवपरिशिष्ट देखो। कालिको नाम सपो नवनागसहस्रबलः ॥ यमुनहदे हसो जातो यो नारायणवादनः ॥ (कालिको नाम सर्पः) फाजीनामा नाग (नवनागप्तहस्रबल: ) नौसहस्रहीं- न्येपोंका पलवाला (ह) निश्चय (यमुनहुदै) यमुनाफे कुण्डम (नारायणवाहनः) रापण श्रीकृष्णका घाहन (जातः ) हुआ अर्याद श्रीकृष्णने उससे नाया नौर और भी। सः शुचिपदसुन्तरिशसहोता वेदिपदतिथिदुरोणसत् । पदरसहतसयोमसजागोजाऽऋतजाऽआदिनाऋतंबृहत् ॥ यजु० अ० १० मं०२४ पह भगवान् हंसः अहंकारहारी (शविपत् ) नादिपरूपसे दीप्तिमें रहने ले (प) मनुप्पों के प्रवर्तक (अन्तरितसत् ) वारूपसे आमासमें रहनेवाले (२००) दयनन्दतिमिरभास्करः। (होता ) देवताओंके आह्वान करनेवाले (दिपत्) अनिरूपसे येदीमें पैटनेवाले (अतिथिः) अतिथिरूपसे सबके पूजनीय (दुरोणसत् )आहवनीयसे पझमें बेउने.. वाले (नृपत्) रामकृष्ण या प्राणरूपसे मनुष्यों में होनेवाले (.वरसत् ) उत्कृष्ट स्थानक्षेत्र आदिमें बैठनेवाले (ऋतसत् ) यज्ञ वा सत्यमें स्थित होनेवाले (व्योम- सत् .) मंडलरूपसे आकाशमें स्थित होनेवाले ( अन्नाः) मरस्यादिरूपसे जलमें होनेवाले ( गोगाः) पृथ्वीमें चतुर्विधभूतग्रामरूपसे होनेवाले (ऋतनाः ) सत्यमें होनेवाले (अदिनाः) पापाणमें मूर्ति और अमिरूपसे होनेवाले मेपनलरूप से होनेवाले (बृहत् ) महान् परब्रह्मरूप हो ॥ २४ ॥ इस एक ही मंत्रमें अवतार और मूर्तिमें भगवदाराधन सब कुछ सिद्ध होता है तथा और भी अनेक मंत्र हैं जिनमें रामचंदके चरित्र हैं। चत्वारिंशदशरथस्यशोणाः सहस्रस्याग्रेश्रेणिनयन्ति ऋ०२।१।११ दशरथस्य राज्ञो यज्ञे लब्धाश्चत्वारिंशत्संख्याः शोणाः अरुणाखाः सहस्रस्य सहस्राइववाह्यस्यापि रथस्याग्रे पुरस्ताच्छगिरथनमिपंक्ति नयन्ति प्रापयति ॥ राजा दशरथके यज्ञमें चार सौ लालवर्णके घोडे सहस्रों अश्वाफारके यहा जाय ऐसे रयके आगे चलते हैं ॥१॥ अर्वाचीसुभगेभवसीतेवन्दामहेत्वायथानः सुभगाससियथानः सुफलाससि ॥ऋ०३।८।९ वर्ग । हे सुभगे सीतेस्यति सर्वपरिक्षसामन्तं करोतीति सा सीतात्ता वन्दामहे यथा नोऽस्माकं सुभगा ऐश्वर्यदानेन सुफला गति- पक्षनाशनेन अससि दीप्यसे तथा अर्याची अनुकूला भव ।। हे राक्षसोंका अंत करनेवाली जानकी ! मैं तुमको प्रणाम करता हूँ हमको मुभ ऐश्वर्यको दान करो प्रतिपक्षका नाश करो हमपर अनुकूल हो । इन्द्रः सीतांनिग्रहानुतापूपानुयच्छतु । ३० ३१८१९ राम सीताको प्राप्त होंगना उनकी प्रदान करें यदि और भी अनेक हैं निनमें पूर्व रामाश्तारकी कया विदित होती है विस्तारक कारग नही लिम हैं पतरस अयं इमरा है इम अर्यमें अवतार है। पर अब मंगरामायण पिधमान है।
सप्तमसमुल्लासलेण्डनम् । (२०१) महाऋपिदैवजोदेवजूतोअस्तभात्सिंधुमर्णवंनृचक्षाः । विश्वामित्रोयदवहत्सुदासमपिप्रियायतकुशिकेभिारन्द्रः।।.३२३२२२ इसमें विश्वामित्रका रामचंद्रको बुलाने आना प्रत्यक्ष है पूज्य महामपि नारायण राजाके आविर्भूत हुए ( सुदासम् ) सुदासके गोत्रमें उत्पन्न हुए रामको (विश्वामित्रः) विश्वामित्र अपने यज्ञकी रक्षा करनेको ( यद् ) जिस कारणसे (अवहत् ) यज्ञमें प्राप्त करते हुए इस कर्मसे (इन्द्रः) इंद्र (कुशिकः) कुशिक वंशमें उत्पन्न हुए विश्वामित्र पर ( अपिप्रियायत) निर्विन यज्ञको हवि भोगूंगा इस फारण प्रसन्न हुए वेदफे अर्थ कथाभाग और अध्यात्म दोनों पक्ष पर चलते हैं वेदान्तमें अध्यात्म और दूसरे कथासूचन करते हैं इसी कारण जीव ईश्वर विषयक अनेक गाथा आती हैं। .(प्रभ) वेदोंमें तो परमेश्वरको अकाय लिखा है जैसे (सपर्पगात् ) औरतुम अवतार प्रतिपादन करते हो यह विरोध कैसे मिद ( उत्तर ) इसके अर्थ तुमने नहीं विचारे इससे यह भ्रम पड़ गया सुनो यह मंत्र इस प्रकार है ।। सपथ्यंगाच्छुक्रमकायमवणुमत्राविर शुद्धमपापविद्धम् । कविमनीपीपीरभूः स्वयंभूर्याथातथ्युतोऽर्थान्व्युदधाच्छा झुतीभ्यः समाभ्यः ॥ यजु० अ० ४० म० ८ पद-सा, परि, अगात्, शुक्रम्, अकायम्, अग्रणम्, अनाविरम्, शुद्धा, अपाप- विद्धम्, कविः, मनीपी, परिभूः, स्वयंभूः, याथातथ्यतः,अर्थान, व्यदधात्, शाश्व- तीभ्यः, समा-पः॥ अर्थ-(स.) सो परमेश्वर (पर्यगात्) अर्थात् आकाशवत् सर्वव्यापी है (शुद्ध शुक्रम् ) अर्थात् शुद्ध प्रकाशरूप है, भौतिक प्रकाश पिलक्षण ज्ञानस्वरूप अथवा अलौकिकदीप्तिमान परमात्मा है, (अकापम् ) सूक्ष्मभूतकार्य लिंगशरीर पर्जित है (मवणम् अनाविरम् )स्थूलशरीमें वर्तमान प्रण और नापिर अर्थात् नाडी. समूहकर वर्जित है इन दो विशेषणोंसे भौतिक स्यूल शरीरसे विलक्षण कहा (अपापविद्धम् ) अर्थात् धर्माधर्मरहित है इस विशेषणसे जीवाभिन होनेसमसत्त जो जीवोपाधि लिंगशरीरधर्म धर्माधर्मादि तीनोंका निषेध कियाहै, (कविः)अर्थात् सर्वज्ञ है (मनीपी)मनकामेरक है (परिभूः) सर्वोपरि वर्तमान हैपूर्व उक्त अकायादि विशेषणोंसे भौतिफ प्राकृत शरीरका निषेध कियाहै, इस अभिप्रायको स्वयं ही यह.. मंत्र प्रगट करता है (स्वयंभूः) इस विशेषणसे 'स्वपमेव . प्रादविष्ण्वादिरूपेण . । (२०२) दयानन्दतिमिरमास्करः। भवति प्रादुर्भवतीति स्वयंभूः 'आप ही यह परमात्मा अपनी विचित्र शक्ति प्रमादिरूपसे होताहै इससे स्वयंभू है। यही मर्य गीतामें स्पष्ट है । मजोपि सन्नन्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृति स्वामधिष्टाय संभवाम्यात्ममायया । भ० गी० अ० श्लोक ६ श्रीकृष्ण कहते हैं हे अर्जुन ! मैं मन और अव्ययात्मा और सबस्ताका ईश्वर भी हूं तयापि अपनी प्रकृति स्वाभाविक सामथ्र्यको आश्रय फर (आत्ममायया) अर्थात् अपने संकल्पसे होताई इससे अवतार सिद्ध है और जब परमात्मा ब्रह्मा- दिभावको माप्त हुआ तब (याथातथ्यतः ) अर्थात् ययावत् (मर्यान् ) कर्तव्य पदायोंको (शाश्वतीभ्यः समाभ्यः ) दीर्यवर्ष टपलक्षित प्रजापति मनु आदि हेतु. मोंसे (व्यदधात् ) विभाग फताहुआ, अथवा जब अाय कहा तो 'अनाविरम्' और मवणम् ' कहने की आवश्यकताक्यारहीइससे विदित होताहै भौतिक पापका निषेध है जो कि फायराब्द चिन् धातु (फमाके चयन ) से बनता है दिव्यशरीरका निषेध नहीं इसीसे स्वयम्भू पद यहां दिया है और (यस्य पृथिवी शरीरम् ) यह प्राह्मणवचन है दयानंदनीने इस मंत्रका अर्थ भी मिथ्या ही कियाहै वोह प्रसंग विरुद्ध होनेसे प्रमाण नहीं और "चक्रपाणये स्वाहा" इस मैत्रायणी शाखाकें मंत्रसे भी आकार अवतार दोनों सिद्ध हैं और सुनो यजुर्वेद अ० ११ मंत्र १९ ग्रजापतिश्चरतिग: अन्तरजायमानो वुहुधाविजायते । तस्य योनिम्परिपश्यन्ति धीरास्तास्मिन् हतस्थुर्भुवनानिविश्वा ॥ (प्रजापतिः) परमेश्वर (गर्ने अन्तः) गर्भके मध्यमें (चरति ) प्राप्त होता है (अजायमानः) नहीं जन्म धारण करताहुआ (बहुधा) देवता मनुष्य रामकृष्णा दिरूपोंसे (विनायते) प्रगट होताहैं (धीराः) ज्ञानी महात्मा सत्त्वगुणप्रधान पुरुष (तस्य ) उस परमात्माके ( योनिम् ) स्थान वा कारणको (परिपश्यन्ति) ज्ञानसे सब ओरसे देखते हैं ( अज्ञानियोंको उसका भेद नहीं विदित होता)( यस्मिन्) निस परमेश्वरमें ही (ह विश्वा भुवनानि ) सब ब्रह्माण्ड (तस्युः) स्थित हैं। शतपथब्राह्मणमें मत्स्यावतारका वर्णन है, यया-मनवेह प्रातः अवनेग्यमुक मानहुर्ययेदं पाणिभ्यामवनेननायाहरन्त्येव तस्यावनेनिनानस्यमत्स्पः पाणी आपदे. १ सहास्मै वाचमुवाह विभृहिमा पारयिष्यामित्वेति २ शश्वदझप आस ४ तमेवं भवासमुद्रमभ्यवनहार ६ सहोवाच अपीपर वैत्वाक्षे नावं प्रतिवध्नीप्य इत्यादि शः फा० १ अ०८ मा० १ फन्डिका -६ तक यह संक्षेप कर थोडा लिसाह कि मनुने अवनेजनके लिये नल हायमें लिया उनके हाथमें एकमच्छी आगई उसने सतमसमुल्लासखण्डनम् । (२०३) कदा तुम मुझे पोपण करो मैं तुम्हें प्रलयके जलसे.पार करूंगा फिर वह बड़ा मत्स्य होगया मनुने समुदमें हालदिया तब उसने कहा कि मैं तेरी रक्षा करता हूं नौकाको पृक्षमें बांध (तस्पशृंगेनावः पाशं प्रतिमुमोचतेनेतमुत्तरं गिरिमति दुदाव ५) औरनावकारस्सारानाने उसके शृंगमें बांधा तब यह नौका बैंचते उत्तरपर्वतकी ओर चले इत्यादि यहां विस्तार के साथ मलयका वर्णन है मत्स्यावतारफी कथा है। वाराहअवतार अथर्ववेद काण्ड १२ अनु० १ वराहेणपृथिवीसंविदाना सूकराय विजिहीतेमृगाय १८॥ अर्थात् धाराह सूकररूपधारी प्रजापतिने यह पृथिवी उद्धार की है । इयतीहवाइयमपृथिव्यासप्रादेशमात्री तामेमूप इति वाराह उजपानसोस्यापतिः प्रजापतिरिति । श० १४।१२।११ पहले भूमि मादेश मात्र प्रगट हुई उसको पाराहने उद्धार किया सो इसका पति मगापति है। उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना तैत्ति अ०प्र०१ अनु० मं३० हे भूमि तुमको असंख्य भुनावाले कृष्ण वाराहने उद्धार किया है। (मन) पदि परमेश्वरका अवताररूप जन्म मानोगे तौअनादिसे सादि अन- तसे सान्त और व्यापकसे एकदेशरचि होनेसे एकदेशी होना चाहिये (उत्तर) जव जन्म या शरीर पृच होनेसे यह दोष है तब जीवके जन्मको निर्विवाद होनेसे अनादिसे सादि और अनन्तसे सान्त होना चाहिये और (य आत्मनि तिष्ठन् ) (पस्पात्मा शरीरम)इन श्रुतियोंसे परमाको जीवरूप शरीरमें वृत्ति होनेस और रूपरूपं प्रतिरूपोषभूष' इसमंत्रसे प्रत्येक शरीरमें प्रविष्ट होनेसे ईश्वरको एफदेशी होना चाहिये और घ्यापफत्वका भंग होना चाहिये सो सबके शरीरमें प्रविष्ट होनेसे जिस प्रकार सुम परमात्माको व्यापक पूर्ण सर्वत्र मानतेहो, पैसा ही भव- तारसे भी रहता है, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है और यदि निराकारके अर्थ सम्पूर्ण आकारसे रहित कहो तो प्रसके सत् वित् आनन्दरूप सूक्ष्म आकारफा भी निषेध होनेसे शून्यत्वापति दोष होगा और निपिगमनाविरहसे निर्गुण शन्द भी सम्पूर्ण गुणोंका प्रतिषेधक हो जायगा, तो दयानन्दनीक लिने सिद्धान्त सिद्ध सत्यकामवादि भी ब्रह्ममें नहीं सिद होंगे ध्यान देनेकी बात है जो दिव्य पदार्य दूसरके विरोधी गुणोंसे रहित होनेसे निगुंग कहे जाते हैं, तब तो विरोधी मलिन भाारसे रहित होनसे निराकार कहने में क्या प्रतिवन्य है, परन्तु निर्गुण शब्दसे. .
देवनानासीम्नुनि मुनकर विष्णु भगवान आपेशंग वर गदा पा पारन (२:४) दयानन्दतिमिरभास्करः। या निराकार शब्दसे कहो या न कहो तुम्हारे मतमें वह दिव्य पदार्थ सदा साकार बने रहते हैं, जब यह तुम्हारे सिद्ध हुआ तो वह कौन पदार्य है यदि ईश्वर भिन साकार वस्तु सदा रहनेवाली है तो साकारको नित्यत्व प्राप्त होगा, तो भी, दयानंदनाफे मतका भंग होगा, क्यों कि स्वामीजीने साकार वस्तु नित्य मानी नहीं यदि वह पदार्थ ईश्वरके अन्तर्भूत है, तो ईश्वरको साकारता निषेध करना मसंगत है, इत्यादि सहस्रों वाक्य हैं जो कुछ महाभारतादिमें अवतार विषप हैं सो सब वेदादिकोंसे ही लिया है तथा प्रश्नोपनिषद्में परमेश्वरने यक्षका अव- तार लिया यह प्रत्यक्ष है जिसे इच्छा हो देख ले जो कार्य मनुष्योंसे संपादन नहीं होता और ब्रह्माजीके वरदानसे कोई बलिष्ठ हो जाता है और अधर्म फरता है तो उसके शांत करनेको परमात्माका अवतार होता है, "आयोधर्मणि प्रथमः ससादततोवपूंपिकृणुपेपुरूणि" अथर्व ५, १।१।२ हे परमेश्वरं ! सृष्टिकी आदिमें आपने सब धर्मोको स्थापन किया और बहुतसे वपु नाम शरीर अवतार रूपधारण किये हैं जिसकी मृत्यु मनुष्यसे विधान फीगई है उसे मनुस्य न मार गकता हो तो प्रभु स्वयं मनुष्य होते हैं इसी प्रकार और भी सबमें जानलेना जैसे गीतामें लिखा है | स्वामीजी यह प्रमाण घातोंमें उडाना चाहते हैं परन्तु इनमा ममाण तीनं फालमें भी निवारण नहीं होसकता । देखो गीता । परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥१॥ भगवान कहते हैं महात्माओंकी रक्षा करनेको दुष्टोंके नाश करनेको धर्मके स्थापन करनेकी मैं युगपुगमें अवतार लेता हूं। पुनः वाल्मीकीये वालकाण्डे स०१५५३।०१६ एतस्मिन्नन्तरे विष्णुरुपयातो महाद्युतिः ।। शंखचक्रगदापाणिः पीतवासा जगत्पतिः ॥ १॥ तमबुवन्सुराः सर्वे समभिष्ट्रय संनताः ।। त्वां नियोक्ष्यामहे विष्णो लोकानां हितकाम्यया ॥२॥ राज्ञो दशरयस्य त्वमयोध्याधिपतेविभो । विष्णो पुत्रत्वमागच्छ कृत्वात्मानं चतुर्विधम् ॥ ३॥ तत्र त्वं मानुपो भूत्वा प्रवृद्ध लोककंटकम् ॥ अवध्यं देवतेविष्णो समरे जाहिरावणम् ॥ ४ ॥ २२ . सप्तमसमुल्लासखण्डतम्। (२०५) फिये पीले वस्त्रवाले साक्षात् जगदीश्वरं १ भगवान्से सब देवता बाले हे भगवन् ! 'आपको लोकोंके हितके वास्ते नियुक्त करते हैं कि राजा दशरथके यहाँ माप आत्माका चार प्रकारसे विभाग कर जन्म लो ३ मनुष्परूप धारण कर लोककें कंटक देषोंसे अवध्य महापापी रावणको मनुष्य होके मारो ४ पुनरपि- अथ विष्णुमहातेजा आदित्यां समजायत । वामन रूपमास्थाय वैरोचनिमुपागमत् ॥ १॥ त्रीपदानथ मिशित्वा प्रतिगृह्य च मेदिनीम् ॥ वाल्मी०वी० सर्ग.२९ श्लो० २० विष्णु भगवान् महातेजस्वी अदितिके गर्भसे जन्म ले वामनरूप धारण कर राजा बलिके पास आये १ तीन पग पृथ्वीको याचना करते हुए और पृथ्वी सब लेली इत्यादि वाल्मीकि रामायणमें भी अवतार विषय स्पष्ट है ( प्रश्न ) घेद- मंत्रों में तो कोई इतिहास नहीं होता इतिहास तौ पुराणादि ग्रंथों में है (उत्तर) यह उनको भूल है जो कहते हैं कि वेदमंत्रों में इतिहास नहीं होता बहुतसे मन्च इतिहासमिभित निरुतमें पापान किये है यथा हि- त्रितं कूपेऽवहितमेतत्सूक्तंप्रतिवभौतत्रब्रह्मेतिहाप्तमिश्रमृङ मिश्रंगाथामिश्रभवति । नि० अ०४ खंड०६ कूपमें पड़े हुए त्रित नामक ऋषिको यह अधो लिखित मुक्त प्रतीत हुआ नहीं अझ वेद वाश्य इतिहासमिभित ऋचायुक्त हैं और गाथा मिश्रित हैं। वितकूपेऽवहितोदेवान हवत्त ऊतये तच्छुश्रावबृहस्पति कृण्वनहूरणा दुरुवित्तमे अस्यरोदसी ऋ० मं० १ अ० १५ सू० १०५:मं० १७ (कूपे ) कुर्यमें (अपहितः) गिराहुआ (त्रितः ) नित ऋपि (सतये)रक्षाक लिपे (देवान ) देवताओंको (हवते ) स्तुति करता है (तत्) सो कि.( मे ) मेरे (अन्य ) इस स्तोत्रको वा कूपपतन रूप दुःखको (रोदसी )हे द्यावा पृथ्यांक अधिष्ठातृ देवता जानो यह आह्वान (बृहस्पतिः) देयताओंके बड़े अधिपतिने (शुश्राप ) मुना और (अंहरणात् ) पापरूप इस कूपसे निकालकर (उवित्तमः) बड़ा श्रेष्ठ (कृण्वन् ) करता हुआ !! * इतिहास शांखायन शाखा में प्रसिद्ध है, एकत द्वित और वित नामक मपि थे, ये तीनों एक समयपर मरुभूमिमें प्याससे सन्तप्त हुए एक कृपपर पहुँचे तिन ती- छैट सामान नही मायगमाष्पके लिये सर्वथा नेत्र यद दरदिये।
३३ ३ ३ १ (२०६) दयानन्दतिमिरभास्करः। नॉमसे नित नल पान फरनेको कूमें मवेश कर जल पी उन दोनों के मर्य जल लाया उन्होंने जल पीलिया पीछे फिर तीनों कूपके ढिग पानी पानेके वह गये और वितफो फूपमें टफेल उसके ऊपर स्पचक्र पर सब टसका मालम लेके चल दिये तब त्रितने देवताओंफो स्मरण किया और कूपसे निकले ५ इतिहास इस मंत्रमें गर्मित है इससे जो कहते हैं वेदमें इतिहास नहीं है वे अपक्ष हैं और भी सुनो सामवेदमें भी लिखा है ॥ अपाम्फेनेननमुचे शिर इन्द्रोदवर्तयः ॥ विधायदनयत्पृधः छन्दआर्चिके अ०२ खं० १० म०८ (इन्द्र ) त्वम् ( अपफिलेन ) ववीभूतेन (नमुचेः) असुरस्य (शिरः)(उदप तयः) शरीरादुद्गतमवर्तयः अच्छैन्सारित्यर्थः फदेति चेत् (यत् ) यदा (विश्वा) सर्वाः (स्पृधः ) स्पर्धमाना आसुरीसेना (अजयः) जितवानसि इन्दो बहन्ता मसुरान् परास्य नमुचिमसुरं नालभत इत्यादिकमध्वर्युबाह्मणमनुसंधेयम् ॥ पदार्थ:-( इन्द्र) हे इन्द्र ( अपाम् )जलोंके (फेनेन) फेनसे (नमुचे) नमु. चिका (शिरः ) शिर (उत्अवर्तयः ) शरीरसे पृथक् किया ( यत् ) जब (विश्वाः) सच (स्पृधः) स्पर्धा करती हुई असुरसेनाको (अजयः)जीता। पहले इन्द्र असुरोंको जीतकर नमूचि असुरको ग्रहण करनेको नसमर्थ हुआ और युद्ध में उस राक्षसने इन्दको ग्रहण किया और इन्दके विनय करनेपर यह कहा कि, जो तू मुझे संध्या समप सूखे गीले आयुधसे न मारे तो में छोडदूं इंदने इस बातको मान नव छुटकारा पाया और फिर युद्ध किया तो संध्यासमय इंदने वचमें फेन रुपेटकर उसे मारडाला यह इतिहास इस मंत्रमें गर्भित है ।। इन्द्रोदधीयोअस्थिभित्राण्यप्रतिष्कुतः जघाननवतीनंव सामवेदे२प्र०२।७।५ (अप्रतिष्कृतः ) परैरमति शब्दितः प्रतिकूलशब्दरहितः (इंद्रः) आयर्वणस्य (धीचः) एतत्संज्ञकस्य ऋपेः आस्थगिः पार्थशिरः सम्बन्धिभिरस्थिभिः (नव- तीनव ) नवसंख्याका नवती दशोत्तराअष्टशतसंख्याकाः(८१०) यवाणि आवर फाणि असुरजातानि (जपान) हतवान् । पदार्यः-(अप्रतिष्कुतः ) दूसरास प्रतिकूलशब्दरहित (इन्दः) इन्द्र (दीयः) अपर्वणीचको (अस्थिभिः) पाश्वशिरसम्बंधी अस्थियोंस (नवतीनव)आर सौदश (पत्राणि) पोको (जपान) मारता हुआ यहां भी यह इतिहास है - १ ३ २२ ३१२ १२२ ससमसमुल्लासखण्डनम् । (२०७) मापर्षण कुलके दधीय ऋपिने जोषितसमय देखनहाँसे असुरोंको परास्त किया जब ये स्वर्गको गये, तो पृथ्वी असुरोंसे पूर्ण होगई जब इन्द्र उनके साथ युद्ध •फरनेको प्रवृत्त हुआ तो उन्हें निग्रह करने में समर्थ न हो कपिको ढूंढने लगे वनवा- सियोंने फही महाराज ! वे तो अझलोकको गये, तब इन्द्र बोला उनका शरीर कहो पात हुना और टनका कुछ अंग मिलसका है, ऋषिगण घोले किनिका पाशीर्ष अङ्ग है जिस शिरसे अश्विनीकुमारोंको विद्या सिखाई थी, पर यह कहा है हम नहीं जानते तब इन्द्रने फहा दूंटो तो ऋपिगण खोजने लगे और पाया इन्दने टस शिरकी हड्डियोंसे (आयुध)वनाय ८१० अमरोंको जीता सोइ यह मंत्र कहता है कि "इन्द्रने दधीषिके हाडसे आयुध वनाय असुरोंको नीता "ऋग्वे. दमें भी यही मंत्र है इस प्रकार और भी बहुत इतिहास हैं। "नायापति विपृ. च्छति राष्ट्र राज्ञः परीक्षितः " अपर्व का० २० ११ १२८ । मं० ९ रागापरी- सिके राज्यमें जापा पतिको आनंदसे पोलतीहै इत्यादि और भी अपर्व पद फाण्ड ८ अनु० ५० १०"सोदकामत सामुरानागच्छत् तामसुरा उपाइयन्त माप रहीति १ तस्याः विरोचनः माहादिवस आसीदापस्पात्रं पारम् " ॥२॥ तब पह चलकर अनुरोपर आई अमुरोंने उसे बुलाया मा आओ । महादका पुन विरोचन गोरूप भूमिका वास हुआ लोहपात्र पात्र हुआ इत्यादि इस फाण्डके पाच अनुवाफके अन्ततके मूमि दुहनका वर्णन है जैसा श्रीमद्भागवत, राजा पृयका गोदोहनवर्णन है। (प्रश्न) इन बातोंसे तो यह विदित होता है कि इन इतिहास के पथात् पेदकी रपना हुई है ( उत्तर) वेदमें भूत भविष्य पर्तमान तीनों फालफी वार्ता धर्तमानवत् रहती हैं, ईथरके ज्ञानमें तीनों फाल वर्तमानवत् हैं पया- भूतं भव्यं भविष्यं च सर्व वेदाप्रसिध्यति । मनु । अर्यात भूत भविष्य वर्तमान तीनों फाटके समाचार घेदोंसे जाने जाते हैं परमें भरफा ज्ञान सदा एफरस असंडित धर्तमान रहता है भूत भविष्य जीवोंके लिये ६ यह दयानन्दनीने भी स० ०५० १९१,५०९ में लिखा है फिर इतिहास भयतारादि वेदोंमें दो तो क्या सन्देह है । ॥ समाप्तं दमवतारप्रकरणम् ॥ सर्वशक्तिमत्प्रकरणम् । स.पू. १८२ पं० ११ (भ) सर सर्वशक्तिमान है पा नहीं !(उत्तर) है परन्तु जैसा तुमने सर्पशनिमान्फा अर्थ नानरसा है वैसा नहीं किन्तु सर्वदानिमानफा यही अपशि पर अपने काम भाद उत्पति पासन प्रल- पादि और सब नांपोंके पुण्य पाएकी पपायोग्य स्परस्पा करने, मिपिद मी (२०८) दयानन्दतिमिरभास्करः। किसीफी सहायता नहीं लेता, अर्थात अपने अनन्त सामर्यसे सब काम पूर्ण करता है, फिर पं० १९ में लिखा है और जो तुम कहो कि, सब कुछ चाहता और फर सक्ताहै तो हम पूछते हैं कि, परमेश्वर अपनेको मार अनेक ईश्वर बना स्वयं अविद्वान् पोरी आदि पापकर्म कर दुःखी भी हो सक्ताहै १४९।२२ समीक्षा-ऐसा विदित होताहै कि, ईथरने स्वामीजीसे फर्ज फाहा होगा, और एफ तमस्सुफ लिख दिया होगा, जिसके जरियेसे सत्यार्थप्रकाश वनालिया कि, जिससे सर्वशक्तिमान्का अर्थ अपना ही ठीक रक्खा है और ग्रंथोंका अशुद्ध, जन कि ईश्वर उत्पत्ति पालन लय जीवोंके काममें किसी प्रकारकी सहायता नहीं लेता, तो इसके व्यतिरिक्त तारागणादिकी रचनामें जरूर सहायता, लेता होगा यह स्वामीजीके ही लेखसे खुलसक्ता है, जैसे कि, वेदार्थमें स्वामीजीसे ही सलाह ही होगी तथा अपने भुमिका भी नई गढी क्या घेदका भर्ष आपहीको आताथा और आपने यह भी कोई ईश्वरपर बडी ही कृपा करी जो सर्वशक्तिमान नाम तो रहने दिया, परन्तु, अर्थ ऐसा किया है जैसे कोई बधुएफा नाम स्वतंत्र रसद, या स्वतंत्रका नाम वधुआ रखदे स्वामीजी तुमने तो अपने जान पदभाप्य भूमिकामें ईश्वरको बांध ही लिया है और सत्यार्थप्रकाशरूपी तमस्मुफकी धमकी देतेहो शि, खबरदार अवतार न लेना नहीं तो नालिश करदी जायगी, यह अवतार ही दूर करने वास्ते आपने उसकी अनन्त सामर्थ्यमें धब्बा लगाया है, मगर पा होसता है और यह तो अजय ही बात कही कि "जो चाहे सो फरै तो अपने आपको मारडाले चोरी करै" धन्य दयानंदनी ! इस निवौधानंदफा क्या ठिकानां है। क्या जो जो चाहें सो कर सक्ते है वे चोरी करते हैं आत्मपात करतेहैं यह दोनों फाम करनेको ती निर्बल भी समर्थ है जब चाहै तब प्राण त्यागें और गर बाद तव चोरी फरें तो नितने इस कार्यमें समर्थ हैं सब ही मरजाने चाहिये मोती नहीं होता फिन्तु जो अज्ञानी हैं वोही किसी वरनुकी इच्छा होनी और उसकन मिटनेसे दुःसी हो प्राण खोदेते हैं पर ज्ञानी नहीं, निर्धन दुष्ट चोरी करते हैं रमें पूर्णज्ञान सदा रहताहै, वोह क्यों आत्मपात करेगा ! उसकी इच्यामारमें सब जगत् उत्पन्न होगाताहै फिर योह पूर्णशानी यौनमे कारणसे मरे और निपा नादा नहीं होता, आत्माका कोई भी नाश फरराफताहै ! जय भा अनर अमर है प्रयासस्वरूप है अफाय है तो अपनेको म मारे भामा रक्षण तो मुनी- नैनं छिन्दन्ति शास्त्राणि नेनं ददाति पायकः । ननं हेदयंत्यापो न शोपयति मारुतः॥ भ.गी। - यों कहता है । सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (२०९), न कोई शस्त्र इसको छेदन करसकता, न अमि जला सकती, न पानी गला सकता, न वायु सुखा सकताहै, जब ऐसा आत्मा है जिसका स्वरूप कुछ जाना नहीं जाता फिर फैसे उसका नाश हो सकताहै ? क्या कोई ईश्वरको आपने मूर्ख जाना जो वह सर्वशक्तिमान् होनेसे अपनेको मार डाले, तो वह शब्द ही क्या क्खा, अलग कर दिया होता, इसी विद्यापर वेदभाष्यकी रचना करीथी, सर्वश- क्तिमान्के अर्थ है कि, सब प्रकारकी जिसमें ताकत हो, जो चाहै सो करसके, परन्तु आपसे. कदाचित् ईश्वरने वार्ता करी हो और चतादिपा हो कि, सर्व- शक्तिमानका प्राचीन अर्थ अशुद्ध है, यह अर्थ ठीक है परन्तु दयानंदनी वेद तो नविदाथयइमाजजानान्ययुष्माकुमन्तरम्बभूव ।। नीहारण प्रावृताजल्प्याचासुप उक्थशासश्चरन्ति ॥ यजु० अ० १७ मं. २१ पदार्थ:-(या) जो ईश्वर (इमा ) इस भुवन और सब प्राणियोंको (जमान) उत्पन्न करताहुआ तथा (युप्माकम् ) तुम्हारे सबके ( अन्तरम् ) मध्य (अन्यत्:) अन्तर्यामीरूपसे स्थित (वभूय ) हुआ (तम) उस ईश्वरको ( यूयम्) तुम ( न पिदाथ ) नहीं जानते क्यों कि (नौहारेण ) नीहार सदृश अज्ञान (च) तथा (नरप्या) देवता हूं मनुष्य हूं यह मेरा घर है क्षेत्र है इत्यादि असत्य जल्पनासे ( प्रावृताः ) युक्त और ( असुतपः ) केवल प्राणोंके पोपक होकर ( उक्थशासः ) परलोकमें भोगोंको संपादन करनेको यज्ञमें शास्त्रस्तुति करनेको (चरन्ति ) प्रवृत्त होते हैं । निसको जाननेको वेद कहताहै कि, तुम नहीं जानते दयानंदनी उसके और उसकी सर्वशक्तिको फैसे जानगपे : जो पोगियोंको भी अगम्प है। और देखो- एतावानस्य महिमाऽतोज्यायाँश्च पूरुषः ॥ पादौस्य विश्वाभूतानि विपादस्यामृतंदिवि ॥ यजु० अ० ३१०३ पदार्थ:-( अस्य ) इस परमेश्वरकी (महिमा ) ऐभर्य विभूति (एतावान् ) इतनी ही नहीं (च)किन्तु (पुरुषः)चिदात्मा परमेवर (अतः) इस संसारसे (ज्पायान ) अतिशय अधिक है जिस कारण (विवा)सब.(भृतानि) ब्रह्माण्ड (अस्य ) इस परमात्माका ( पादः) चतुपाश अर्थात् एक चौथाई है (दिति) . (२१.) दयानन्दतिमिरभास्करः। घेकुण्ठलोक अर्थात् निग स्थानमें (अस्प) इस (त्रिपादस्य ) विपादका स्वर .(अमृतं ) विनाशरहित है। इससे विदित होताहे कि, जो कुछ यह आकाश पाताल सम्पूर्ण तारामंड सहित है यह सब तो उसकी महिमाकी चौथाई है, जिसके पदार्यातकका में मभीतक लाखों वरससे भेद नहीं जाना जाता, इससे तिगुनी महिमा उसके निग लोकमें स्थित है फिर टस अनन्त परमात्माकी महिमा और सर्वशक्तिमत्ता दयानंदनीने फैसे जानली और उस अनन्त ऐश्वर्यवाले परमात्माकी सृष्टिका कम आपने कैसे जाना ? जो कह देते हो कि, यह सृष्टिक्रमविरुद्ध है, वोह सब कुछ करसकताहै सारा संसार और. जो कुछ भी है यह सब उसीकी महिमासे उत्पन्न है॥ नासदासीनोसदासीत्तदानीं नासीद्वनोनोयोमापरोयत् । किमारीयुःकुहुकस्यशर्मुन्नम्भुः किमासीद्हनगंभीरम् ॥ ऋ० मं० १० अ ११सू १२९ (तदानी ) महाप्रलयकाल में ( असत् ) अपरा माया (न) नहीं थी (सद) जीव (नो ) नहीं (आसीत् ) था ( रजः ) रजोगुण (न) नहीं (आसीद) था ( यत् ) जो ( व्योम ) आकाश तमोगुण ( अपरः ) सत्त्वगुण ( नो) नहीं था (कुहकस्प ) इन्द्रजाल रूप ( शर्मन् ) ब्रह्माण्डके चारोंओर जो (आवरीवः) तत्वसमूहका आवरण होताहै ( तत् किं) न किमप्यासीत् " वह भी नहीं था (गहनं गंभीरम् ) गहन गंभीर (अम्भः) जल ( किम् आसीत ) क्या या अर्थात् नहीं था ॥ स्वामीजी कान खोलकर सुनो उस समय यह तुम्हारे नित्य माने पदार्थ भी नहीं थे ॥ नुमृत्युरासीदुमृतंनतर्हि नराव्याअह्र आसीत्प्रकतः ॥ आनीवात स्वधातवेंतस्माद्यान्यन्नपुर-किंचनास ॥ ऋ०२ (तर्हि ) तिस समय (मृत्युः) मौत (न) नहीं (आसीत् ) थी ( अमृतम्) जीव (न) नहीं (आसीत् ) था (राज्याः) रात.(अहः) दिनका (प्रकेतः) ज्ञान (न आसीत् ) नहीं था ( अपातं ) प्राणरहित ( स्वधया ) अपनी परा शक्ति से (एकम् ) अभिन्न एक (तत्) ब्रह्म ही (आसीत् ) या (तस्मात् ह ) उससई शक्तिमानसे (अन्यत् ) अन्य (किंव) और कुछ भी (न) नहीं (आस) था। " मव विचारनेकी बात है कि, एक ब्रह्मके सिवाय जब कुछ भी न था और अब सब कुछ करके दिखाया तो वह सर्वशक्तिमान क्यों नहीं और वह कुछ करता स्वयं अवतार भी धारण करता है यया हि ॥ पहमाविश्वामुवनानि जु दृपिहोतान्यसदित्पितानः । आशिषादविणमिच्छमानः प्रथमच्छदव« २ ॥ऽआववेश ॥ यजु अ १७ मं. १७ :-(पः )जो (ऋषि ) अतीन्द्रियदष्टा सर्वज्ञ (होता) संसाररूप 'कर्ता (ना) हम वैदिक मन्त्रोंका (पिता )जनक उत्पन्न करनेहारा पर- (इमा)इस (विश्वा ) इस सम्पूर्ण संसारको (जुहत् ) मलयकालमें करता हुआ (न्यसीदत्) अकेला ही स्थित हुआ (सः) यह ही (प्रथम- प्रथम एक अद्वितीयरूपमें प्रविष्ट होता (आशिपा) फिर सृष्टिकी रच- च्छासे (द्रविणम् ) जंगत् रूप धनको ( इच्छमानः ) इच्छा करता. अवरान् ) मायाविकार व्यष्टि समष्टि देहोंमें ( आविवेश ) अन्तर्यामि- विष्ट हुआ। समझ लीजिये कि, वह क्या क्या करसक्ताहै यह सब कुछ करनेको और देखिये दपानंदजीने स्वयं सत्यार्थप्रकाशमें लिखा है श्रुति भी बदली अर्थ भी बदला है परन्तु इनके यथार्थ अर्थसे उसकी सर्वशक्तिमत्ता प्रगट कि, यह सब कुछ करसक्ता है ।। १० १८८५०२४ पादोजवनोग्रहीतापश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । वनचतस्यास्तिवेत्तातमाहुरयंपुरुपपुराणम् १ अ.३ मं.१९ रके हाथ नहीं परन्तु अपनी शक्तिरूप हायसे सबका रचन ग्रहण करता, रन्तु व्यापरु होनेसे सबसे अधिक वेगवान, चतुफा गोलफनहीं परन्तु वित् देखता, पोर नहीं तथापि सरकी पातें मुनता, अन्तःकरण नहीं जगत्को जानताहै टसको अवधिसहित जाननेराला कोई भी नहीं, तन सबसे श्रेष्ट सबमें पूर्ण होनेसे पुरुष कहते हैं १९६ । २३ वनय तस्याम्तिवेत्तानमारायं पुरर महान्तन् १८१७ के मन्यायसमें यह शुभ है।
(२१२) दयानन्दतिमिरभास्करः। स० पृ० १८९५०७ नतस्यकार्य करणंचविद्यते नतत्समश्चाभ्यधिकश्चदृश्यते । परास्यशक्तिविविधैव श्रूयते स्वाभाविकीज्ञानवलक्रियाच २ श्वे ० अ०६।मं.८ प्रमात्मासे कोई तद्रूप कार्य और उसको करण अर्थात् साधकतम दूसर अपेक्षित नहीं न कोई उसके तुल्य और न अधिक है सर्वोत्तम शक्ति अर्पा तिसमें अनन्त ज्ञान अनन्त बल और अनन्त क्रिया हैं वह स्वाभाविक अर्या सहन उसमें सुनी जाती हैं जो परमेश्वर निष्क्रिय होता तो जगत्को उत्पत्ति स्थिति प्रलय न कर सक्ता इस लिये वह विभु तथापि चेतन होनेसे उसमें क्रिया भी है १९७।६ समीक्षा-ऊपरकी श्रुतिमें स्वामीजीने बहुत पाठभेद किया है (सवेति पेयम्) के स्थानमें 'विश्वंपद लिखा है और (महान्त ) पदके स्थानमें (पुराण) पर (नचतस्यास्ति ) इसमेंसे अस्ति, पदको त्यागकर उपनिषद् वचन लिखकर अर्थ किये हैं यह वचन श्वेताश्चतर उप० अ० ३ मं० १९ के है अर्थ यह है पाणि तय पादसे वर्जित है आस्मा और जवन तथा ग्रहीता अर्थात् ग्रहण करनेवाला है भार यह है कि, हस्त पाद उपाधि सहित होकर वेगवान् तथा ग्रहण करताहै, परन्तु स्वरूपमें हस्त पाद उपाधि रहित है, इसी रीतिसे वास्तव चतुकर्ण रहित है, परंतु चक्षु कर्ण उपाधि सहित होकर देखता तथा सुनता है, सौ आत्मा येय वस्तुको जानता है तिसके जाननेवाला दूसरा नहीं, स्वयंप्रकाश होनेसे तिस महान् पुरा सर्व नाम रूप प्रपंचसे आगे होनेवालको येद वचन कथन करते हैं। अब स्वामीनीके श्रुति अर्थमें दृष्टि देना चाहिये "यह जो कहा कि, परमंघरो हाथ नहीं परन्तु शक्तिरूप हायसे सरका रचन ग्रहण करता है " यहाँ यह पटना है कि, शक्ति परमात्मासे भिन्न है या अभिन्न या भिन्न अभिनसे विलक्षण विचित्र तावाली अनिर्वचनीय है जो भिन्न कही तो अनादि ही मानना होगा तो हम्हा मानेहुए तीन पदार्थ जो नित्य जीव ईशर प्रकृति नहम्प (पृ. २०९) में एक चौथा पदार्य शक्ति भी होगी जो सादि मानी तो सादि शनिरूप शरीर ईश्वर शरारी होनायगा इसमें ईभरका शारीर सादि नहीं है, यह कयन अमंगा होगा और जो इधरने शक्तिको अभिन्न मानो तो शनि नह है और नाना नका अभेद यस्तव में वापित है और भित्र भित्र लिन मानांग तो विमरे भित्र गड प्रकृतिका मानना निमल है क्योंकि सा अन शक्तिमानमा सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (२१३) अहमकृतिकी सहायता नहीं चाहता वह तो मन तथा कामनाद्वारा प्रपंवरचना फरदेता है देखो- ऋ० मं० १० सू० १२९ मंत्र ४ कामस्तद्ग्रेसमवर्तताधिमनसोरेतः प्रथमयदासीत् ॥ सतोबन्धुमसतिनिरविन्दनदिप्रतीप्याकवयोमनीपा ॥ १॥ पदः कामः, तत्, अग्रे, समवर्तत, अधिमनसः, रेतः, प्रथमम्, यत्, आसीत्, -सत्तः, बन्धुम, असति, निरविन्दन, हृदि, प्रतीष्य, आ, कवयः, मनीषा ॥ (मनसो यत् प्रथम रेत आसीत् तत् अग्रेकामः अधिसमवर्तत) अन्वयः ॥ अर्थ-मूल प्रकृतिसे जो जगत् सर्जन इच्छा ईक्षण संकल्पादिका आश्रय प्रथम मन टत्पन्न हुआहे तिस मनको जो प्रथम (रेतः)कार्य होताहुआ सो पूर्वकालमें -कामरूप होकर ( अधि) अधिकता करके ( समवर्तत) होताहुआ इतने मंत्रसे यह जनाया कि, जो प्रथम ईक्षण संकल्पविशिष्ट मन होताहुआ पश्चात् टस मनमें काम इच्छा उत्पन्न होती हुई जैसा तैत्तिरीय श्रुतिमें भी सिद्ध है "सोकामयतबहु- स्यांमनाययेति" वह मनोभावापन मूलप्रकृति कामना करती हुई कि, मैं बहुतरूप हो मजालंपसे अपने स्वरूपको वैसा ही स्थित कर प्रतीत हूँ अब मंत्रके उत्तरा- से परमात्मामें जगस्थिति प्रकार कहते हैं ( कवयोमनीपाहदिपतीष्य असतिसतोचन्धुनिराविन्दन् )जो मेधावी पुरुष हैं वे अपने ( हृदि) हृदयकमलमें (मतीप्य ) विचार करके ( असति) पूर्व उक्त अनभिव्यक्त नाम रूप भूलपक- तिमें ( सतः ) सत्यरूप करके प्रतीयमान जगत्का (बन्धुम् )बन्धन हेतु पूर्व उक्त- फामको (निरविन्दन ) निश्चय करतेहुए । भावार्थ यह है जगत्का वन्धनहेतु काम है जो मनसे उत्पन्न हुआ है तो शक्तिरूप हस्तसे रचना फहना दयानन्दनीका वेद- विरुद्ध है और इस मंत्रमें तो ग्रहीता यह पद है अर्थ इसका पूर्वरचित पदार्थका ग्रहण है कुछ रचना शब्दार्थ नहीं इससे इसका रचना अर्थ करना अशुद्ध है इससे बृहदा० अ०.५० ७ यचक्षु इत्यादि १८ मंत्रके अनुसारः ही इसका अर्थ है सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर, हस्त, पाद, चक्षु, श्रीर, मन आदि हैं वे ही सम्पूर्ण -परमात्माके शरीरादि हैं और पास्तव दृष्टिसे केवल ही स्वरूप है इससे तिस तिस उपाधिसहित होकर क्रिया करता है परन्तु वास्तवमें सर्वक्रियारहित है यह सब श्रुतियोंका अभिप्राय है और व्यापक होनेसे जो दयानन्दने अत्यन्त वेगवान् कही है से भी व्यापक वस्तुमें गमन उपाधि विना प्रतीत नहीं होता तो. (जवनः) अत्यन्त वेगवान् यह शब्दप्रयोग कैसे होसकता है इससे सोपाधिकरव कल्पना विना दूसरा अर्थ वन नहीं सकता और यह जो लिखा है कि तिसको अवधि " दयानन्दतिमिरभास्करः। सहित कोई नहीं जानसकता" इस कहनेका भाव यह स्वामीनीने रक्खा है कि परमधर तो दूसरे करके जाना जाताहै परन्तु तिसकी अवधि न जानकर (नवतस्यास्ति ) यह कहना बन सकताहै परन्तु यह अर्य करेंगे तो परमेश्वरको वेधत्व प्रसक्त होगा और वेद्यत्व प्रसक्तिसे जडत्यादि दोप होंगे, स्वयंप्रकाशत्वबो-- धक श्रुतिका याध होगा, इससे इस श्रुतिमें परमात्माको अवेद्यत्व बोधन कर सर्वका वेत्ता फहनेसे स्वप्रकाश ही वोधन करा है इसी प्रकार दूसरी श्रुति भी कहती है उसे फार्य और फारणकी कुछ आवश्यकता नहीं है वह अपनी इच्छासे जो चाहै सो कर सफता है ॥ अघनाशनप्रकरणम् । पृ० १८२ पं० ३० क्या स्तुति आदि करनेसे ईश्वर अपना नियम छोड स्तुति प्रार्थना करनेवालेका पाप छुटादेगा, ( उत्तर ) नहीं ( प्रश्न ) तो फिर स्तुति मार्यना क्यों करना (उत्तर ) टसका फल अन्य ही है स्तुतिसे ईश्वरमें प्रीति उसके गुण फर्म स्वभावसे अपने गुणकर्म स्वभावका सुधारना प्रार्थनासे निरभिमानता उत्साह और सहायका मिलना टपासनासे परब्रह्मसे मेल और टसका साक्षात्कार होना, पृ०.१८३ पं० १८ और जो फेवल भांडके समान परमेश्वरके गुणकीर्तन करता जाता और अपने चरित्र नहीं सुधारता उसकी स्तुति करना व्यर्थ है, पुनः पृ० १८६ पं० १३ ऐसी प्रार्थना कभी न करनी चाहिये और न ईश्वर उसे स्वीकार करता है जैसे हे परमेश्वर आप मेरे शत्रुओंका नाश, मुझको सबसे बडा, मेरी प्रतिष्ठा और मेरे ही अधीन सब हो जाय पुनः पं० १९ ऐसी मूर्खताको प्रार्थना करते २ कोई ऐसी भी प्रार्थना करेगा कि हे परमेश्वर ! आप हमको रोटी बनाकर खिला- इये मकानमें झाडू लगाइये वस्त्र धो दीजिये खेती वाडीभी कीजिये इस प्रकार जो । परमेश्वरके भरोसे आलसी होकर बैठे रहते हैं वे महामूर्स हैं पुनः पृ० १९२५ ३ ईश्वरं अपने भक्तोंके पाप क्षमा करता है वा नहीं (उत्तर) नहीं क्यों कि पाप क्षमा करें तो उसका न्याय नष्ट होजाय क्यों कि क्षमाकी बात सुनते । उनको पाप करनेमें निर्भयता और उत्साह होजाय, जैसे राजा अपराधको क्षम करदे तो वे उत्साहपूर्वक बडे बडे पाप करें क्यों कि राना उनका अपराध क्षम कर देगा तो उनको भरोसा होजायगा कि राजासे हाथ जोडकर अपराधछुडालेंगे और जो अपराध नहीं करते वे भी अपराध करनेसे न डरकर पाप करनेमें मार होजायँगे ॥ १९० ॥ १० ॥ १९१॥ १।१९४ ॥ ३ ॥२००१ १६१ समीक्षा यहां तौ स्वामीजी सारी उपासना स्तुतिकी चटनी कर गये लो अर ईश्वरकी प्रार्थना भी मत करो क्यों कि वह हमें उसका फल देता नहीं, पाप क्षमा करता नहीं, फिर ईश्वरका अस्तित्व स्वीकार करनेसे क्या लाभ १ टसका भनन सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । -रना वृथा होगा तो “ प्रयोजनं विना मन्दोपि न प्रवर्तते । विना प्रयोजन मन्द रुप भी कोई काम नहीं करते फिर ईश्वरका नामस्मरण भी निरर्थक है, तो सब कमौका फल भी निरर्थक होगा, बस कर्मकांड भी समाप्त करदिया, जब ईश्वर ही जो सबसे श्रेष्ठ है स्तुति प्रार्थनासे पाप दूर नहीं करता तो कौनसा शुभकर्म है सके करनेसे मनुष्य दुःखसे स्टैं, जब कि श्रेष्ठ कर्म करनेसे श्रेष्ठ फल, बुरा कर्म. करनेसे अनिष्ट फलकी प्राप्ति होती है तो उस पवित्रात्माका स्मरण उपासना यान करनेवाला पवित्र क्यों नहीं होगा ? (जो यह कहो कि उसके नामसे अपने गुणकर्मीको सुधार ) तो जब उसका नाम कुछ गुण रखता है तभी तो मनुष्य उसके गुणकर्मसे अपने गुणकर्म सुधार सकता है, नहीं तो किस. बकार सुधार सकता है, यदि स्वयं ही सुधारसकता तो उसके नामस्मरणादिकी आवश्यकता क्या थी ? जब उसके नामसे गुण कर्म स्वभाव सुधरते हैं तो पवित्र क्यों नहीं होसक्त ? जो पाप दूर नहीं होसते ती गुण कर्म स्वभाव भी नहीं सुधरसक्ते और ईश्वर में कर्म ही क्या हैं जिसकी सदृश वह अपने गुण कर्म सुधारे, और गुणकर्म ही सुधारै तो किसी भले आदमीके चरित्र देख अपने कर्म सुधार सक्ता है इससे ईश्वरको आवश्यकता ही नहीं रहती, ईश्वरको निराकार मानते हो तो उसके कर्म क्या होंगे इससे तो आप रामचन्द्रको श्रेष्ठ पुरुष मानते हो उनके सब ही आचार श्रेष्ठ थे उन्होंके नामस्मरण करनेसे मनुष्य अपने चरित्र सुधार सके हैं, फिर आपको ईश्वरको आवश्यकता क्यों, जब आप कहते हैं कि प्रार्थना करनेसे अहंकार दूर होगा, सहायता प्राप्त होगी, तो क्या उसके पाप दूर न हुए साधारण हाकिम जिनकी सहायता करते हैं उनके दुःख दूर होजाते हैं और जब ईश्वरने सहायता करी तो पाप कहो, वस ईश्वरने सहायता करी तो भकोंके मनोरथ पूर्ण होगये, और पापसे छूट सुखके भागी हुए, मुख तब ही होता है जब पाप दूर होते हैं, इस सहायता करनेसे तो दयानंदनीका लेख ही उनके लेखको खंडन करता है और उपासनासे ब्रह्मसे मेल होना भी आपने क्या सोच कर लिखा है जो मेल हुआ तो फिर पृथक होना कठिन है, जो जल गंगाजलमें पड़गया हमार यत्नसे वह फिर अलग नहीं होसक्ता और वहगंगाजल ही होजाता है इसी प्रकार जब उपासना करनेसे ईश्वरसे मेल होगया तो उसकी पवित्रतामें क्या संदेह है पापीसे ईश्वरका मेल ही नहीं होसक्ता है मेल होने उपरान्त फिर मुक्तिसे नहीं लौट सक्ता है, और ईश्वरके प्रत्यक्ष होनेके आपने विशेष अर्थ नहीं खोले क्या वह इन्द्रियों के सामने होजाता है, क्यों कि जो आकारवाला होगा पही इन्द्रियोंके सामने होगा इससे तो सिद्ध होता है कि ईश्वर साकार है, निरा- कार प्रत्यक्ष कैसे होसक्ता है और यह जो लिखा कि (जो भाँडके समान परमे-- वरफी स्तुति करता है और अपने चरित्र नहीं सुधारता उसका स्तुति करना व्यर्य: - (२१६) दयानन्दतिमिरभास्कर है.) यह तो बड़ा ही उलटा लेख है क्यों कि ईश्वरकी प्रार्थना तो सकाम इसीर फरीजाती है कि यह कार्य हमसे नहीं हो सका ईश्वर तू हमारी सहायता कर.जो अपने चरित्र सुधारनेमें असमर्थ हैं वा और किसी कार्पमें वे ही तो प्रार्थना कर सहायता चाहते हैं कि परमेश्वर हमारे चरित्र सुधरे हमारे काम बनें ऐसी कृपा करोजो जिस कामके करनेमें स्वयं समर्थ होता है वह कब दूसरेसे सहायता चाहता है, जो अपने चरित्र सुधारनेमें स्वयं समर्थ है वह ईश्वरकी उसमें सहायता क्यों चाहेंगे पहले तो 'लिखा कि गुणकर्म सुधारनेको ईश्वरकी प्रार्थना करनी यहाँ लिखते हैं अपने कर्म सुधारो .विना सुधारे स्तुति प्रार्थना व्यर्थ है यह परस्पर विरुद्ध लेख कौन बुद्धिमान मान सक्ता है (ऐसी प्रार्थना कभी न करनी मेरे शत्रुओंको मारो मुझे सबसे अधिक करो इत्यादि) और क्या प्रार्थनामें स्वामीजीके यंत्रालयकी वृद्धि मनाई जाय, शतशः वेदमंत्र इसी आशयसे पूर्ण हैं हे ईश्वर ! हमारे पाप दूर करो, हमारे शा. ओंको मारो हमको श्रेष्ठ बनाओ हमारी रक्षा करो क्या यह वेदमें मिथ्या मलाप है, नहीं तो कह दीजिये कि किसीने मिला दिया है बस इतनीही कसर है आपही चलती तो अपने प्रतिकूल मंत्रोंपर जरूर हरताल फेरते पर ती भी अर्थ बदल कर अनर्थ कर ही दिया और ( झाडू लगाइये वस्त्र धो दीजिये, ) यह क्या स्वामी जीने लिखदिया क्या जिस समय यह पुस्तक लिख रहेथे आपका पिस्तर मैला था या कूडा पडा था, या कपड़े मैले थे, भला यह तो सोचा होता कि गिसके भौतिक शरीर नहीं वह फैसे ऐसे काम कर सकेगा, और अपने मालिक उत्पन्न करता संकटमोचनसे कोई भी ऐसा कह सकता है, साधारण मालिफके सामने तो जगार नहीं दिया जाता और उस बई महन्तसे यह टीउता, शायद ऐसी प्रार्थना तुमने ही फी होगी जब आपके कपडे मेले, सामने कुरा पड़ा होगा कि ईभर हा यह दोनों काम कर दे, जब उसने नहीं किये तो क्रोध पर लिख दिया कि उस प्रार्थना मत करो कुछ लाभ नहीं, फिर लिखा है (जो परमेशरफे भरोसे आलसी बने रहते हैं वे मूर्स हैं) देखिये इस नास्तिकताको, कि ईभर भरोसा करना मृखताका काम है जब ईश्वरका भरोसा करना महसता है, निसका भरोसा नहीं उसके गुण गानस क्या लाभ, और नास्तिरता होती है, इसीको अनीश्वरवादी कहते हैं सहमों मपि मुनि अप्पमें वां दवरके भरोसे जप तप परते, थे, और करते हैं और यह ही पामेश्या उन रसा करता है. क्या स्वामीनी तुम्हार भंडारमे सीधा जाया करता था भाजन कर ऋपि सनि तप करत थ, आपको देना शुग लगाया, नो लिस पिचरफ भगेमें रहना यथा है, आप लिसंत हैं कि पापक्षमा भगा। नहीं करता यदि करें तो फिर सब पाप करने सगना, गनिपे ।
सप्तमसमुल्लासखण्डनम । (२१७) दुष्टोंके पाप क्षमा नहीं करता. भत्तोंके अवश्य क्षमा करता, है, क्यों कि वह जानता है कि भत्तसे अनजाने यह पाप नगया है और अंघ प्रतिज्ञा करता है कि आगेकी नहीं करूंगा और करेगा भी नहीं उसका पाप परमेश्वर निश्चय क्षमा फैरेंगा, वोह प्रार्थना ही उसका प्रायश्चित है और जो दुष्ट हैं मनमें पाप और परसे बने भक्तवचक उनका पाप कभी क्षमा नहीं होगा, जो भला आदमी होता है उसके अनजाने अपराधको राजा भी क्षमा कर देताहै और जो दुष्ट हैं उनके पाप क्षमा नहीं करता क्यों कि जानताहै छोड देनेसे अधिक पाप करेंगे मो अन्तःकरणसे शुद्ध हैं और प्रेमसे ईश्वरका स्मरण करते हैं उनके पाप भी क्षमा होते हैं और दुशको यथावत् दंड देता है, इसीका नाम न्याय है जो दुष्ट हैं उन्हें ड और जो दयायोग्य है उनपर दया करना क्षमाके योग्य हैं उनपर क्षमा करना, हि नहीं कि सर धान वाईस पंसेरी ही तोला जाय सुनिये शत्रु निवृत्ति अपनी प्रती आदिको मार्थना भी वेदोंमें है। एमित्रियानुआपुओषधयः सन्तुदुर्मित्रिया- तस्मैसन्तुयोस्मान्द्वेष्टिपञ्चवडेंद्विष्मः । यजु० अ० ३६ मं० २३॥ हे परमेश्वर ! (आपः ) जल (ओपधपः ) औषधी (नः) हमारे लिये उमित्रियाः) मुमित्ररूपा (सन्तु ) हाँ (य:)जो शह (अस्मान् ) हमसे दष्टि ) देप करता है (च) और (वयम् ) हम (पम् )निस शासे (द्विष्मः) फरते हैं (तस्मै ) टसके लिये (दुर्भित्रियाः ) दुर्मिवरूप ( सन्तु ) हो । पापक्षमा मांगना। यह्मामेयदरण्येयत्सभायादिन्छिये । यदेनैश्चकुमाषयमिदुन्न दर्पयजामहेस्वाहा- यजु ० अ० ३ मं० ४५ पपम् ) हमने (ग्रामे) गांवमें (पत् ) जो ( एनः ) मनवाणीशरीरसे पर- रूप पाप किया है (अरण्पे ) वनमें ( यत् ) गो पक्षछेदन, मगध आदि किया है (सभायो ) सभामें ( पत्) जो अनीतिनादि पाप किया ( इन्दिये) पसमूहमें ( यत् )जो धर्मविरुद्ध भोजनपानमैथुनादि पाप (आचम) (तत् ) उस (इदम् ) इस पापको ( अवयनामहे)विनाश करताहूं (म्बाहा) वि पाप नाशर देवताको दिया ॥ १॥ इसमें पापक्षमा चाही अब और मुनिये ।। त (२१८) दयानन्दतिमिरभारकरः। तुनूपाअंग्रेसितुन्वम्मेपाह्यायुर्दाअंग्नेस्यायुमेदेहिबच्चोंदाअंने सिपच्चैौमदेहि अग्ने यन्मेतन्वा ऊनन्तन्मे आर्पण-य० अ० ३ मं१७ ( अमे) हे परमेश्वररूप अमि तुम ( तनूपाः) जाठरामिरूपसे देहांके (असि) हो (मे) मेरे (तन्वम् ) शरीरको (पाहि) रोगादिकोंसे रक्षा करो (अमे) हे परमेश्वर तुम ( आयुर्दा ) आयुके दाता ( असि ) हो (मे) मुझे ( आयुः) दीर्घायु ( देहि ) दीजिये अर्थात् अपमृत्युको दूर कीजिये प्रसिद्ध है कि जबतक जाठरामि रहती है तबतक मनुष्य नहीं मरता है (अमे) हे अमि तुम (वचोंदा) तेनफे दाता ( असि ) हो (मे) मुझ ( वः) तेन ( देहि ) दीजिये ( अमे) हे अमि (मे) मेरे (तन्वा ) शरीरका ( यत् ) जो अंग (उनम् ) ज्ञानके अनुष्ठानमें असमर्थ है (मे)मेरे (तत् उस अंगको ( आपण) समर्थ कीजिपे ॥२॥ नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टयः अमेरमित्रमईय-सामवे. ०प्र० १ खं० २०१ हे ( अमे ) देव (ते) तुभ्यं ( नमोगुणन्ति ) नमस्कारशब्दमुच्चारयन्ति किम- थम् (ओजसे ) वलाय ( कृष्टयः ) मनुष्याः यजमानाः कृष्टिारति मनुष्यनाम निघण्टुत्वं च (अमैः) वलैः (अमित्रं ) शत्रुम् (अर्दय) नाशय ॥ भाषाथ-हे अमिदेव ! मनुष्य यजमान तुमको नमस्कार करते हैं बलवान होनेको, और तुम अपने वलसे हमारे शत्रुओंको नाश करो ॥ अंग्ने रक्षाणो अहसः प्रतिष्मदेव रीपतः । तपिष्टैरजरो दह--साम०प्र० १ । अ ० ३ ०४ हे (अमे) त्वं (नः) अस्मान् ( अंहसः) पापात् (रक्षाणः) पाहि अपि च हे (देव) द्योतमानामे (अजरः) जरारहितस्त्वं (रोपतः) हिंसतः शन् (तपिठ्ठः) अतिशयेनतापकैस्तेजोभिः (प्रतिदहस्म) भस्मीकुरु ।। * भाषार्थ:-हे अमिरूप परमेश्वर ! तुम हमको पापसे रक्षा करो हे दीप्तियुक्त जरारहित अमि तुम शत्रुओंको मारतेहुए बड़े तपानेवाले तेजोंसे शत्रुओंको भस्म करदो, दहका अर्थ भस्म करो प्रत्यक्ष ही है । * छोटे स्वामी मास्करप्रकाशमें यहां चुप हैं ।
सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (२१९) ३ २ आ नो अग्ने वयो वृधरयिम्पावक शयस्यम् । ३ रास्वाचन उपमाते पुरु स्पृह सुनीतीसुयशस्तरम् ॥ साम०प्र०अ० १ खं०४ मं०९ अमे) हे परमेश्वर (पावक ) शुद्ध करनेवाले पापहर्ता पाप दूर करनेसे ही प- (का नाम पावक है ( वयोवृधं) अनके बढानेवाले (शस्पं ) स्तुतिया 4) धन। (नः) हमारेवास्ते दीजिये और लाकर (उपमाते ) हमारे समी करिये हे ईश्वर (नः ) हमको सुनीती अच्छे मार्गसे (पुरुपस्पृह) बडे श्रे पशस्तरम् ) अच्छे यश कीर्तिधनको ( रास्प) दीजिये और देखिये- अग्नेनयसुपाराये अस्मान् विश्वानिदेव वयुनानिविद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमनोभूयिष्ठांतुनम उक्तिविधेम ।। यजु० अ१० मं० १६ देव) हे दिव्य दानादि गुणयुक्त (अमे) अनिदेव (विश्वानि ) सम्पू पुनानि ) हमारे कर्माको (विद्वान् ) जाननेवाले आप (अस्मान ) हम ये) मुक्तिलक्षणवाले धन वा भोगको (सुपथा ) उत्तरायण दक्षिणायन मार्ग 1) माप्त करो (जुहुराणम् ) कुटिलवंचनात्मक (एनः ) पापको (अस्मत् पे (युयोधि) पृथक् करो हम (ते) आपके निमित्त (भूयिष्ठाम् ) अने मडक्तिम् ) नमस्कारोंको ( विधेम) विधान करते हैं । इसके अर्थ सत्यार्थप्रकाश पृ० १८५५०२१ में स्वामीनीने यों लिख हैं. के दाता प्रकाशस्वरूप सबको जाननेहारे परमात्मन आप हमको श्रेष्ठ मार्ग में प्रज्ञानोंको प्राप्त कराइये और जो हममें कुटिल पापाचरण रूप मार्ग से पृथक कीजिये इसीलिये हम लोग नम्रतापूर्वक आपकी स्तुति करते हैं, र हमें पवित्र करें, यह स्वामीजीका अर्थ हो इस बातको सिद्ध करता है। र पाप दूर करता है, इस दयानंदनीके लेखसे स्वयं ही उनका लेख संहि । है हम क्या करेंगे वेदमें सब स्तुति सार्थ हैं स्तुति जिस २ गुणसे करीना को सो गुण और कार्य अवश्य होता है, नहीं तो निराकारताको जलांजलि ठोक्यों विधिनिषेध करते हो और निराकारता निगुर्णता स्तुतिको सार्थ मानों साकारतासाधक स्तुतिने क्या पाप किया है पदि वेदमें स्तुति निरर्थक मानो सापक स्पा रहेगा और सुनो- (२२०) दयनन्दतिमिरमास्करः। एवैवापागपरेसन्तुदूढयोऽश्वायेपांदुर्युजआयुयुत्रे ॥ इत्यायेप्रायु- परेसन्ति दावने पुरूणि यत्रवयुनानिभोजना ॥ऋ०म० १०० १४ पदार्थः-ईश्वर कहताहै हे. मनुष्यो ( एवैव ) इसी प्रकार (दूटयः ) स्तुति) प्रार्थना नहीं करनेवाले दुर्बुद्धि (अपरे) और यज्ञ नहीं करनेवाले (अपाग) -नरक जानेवाले ( सन्तु ) हों ( येथाम् ) जिन स्तुति प्रार्थना और यज्ञ न करने बालोंके ( अश्वाः ) इन्द्रियरूप घोडे ( दुर्युनः) प्रवल जो साधनेमें न आवे ऐसे (आयुयुचे ) रथोंमें युक्त होते हैं, और (इत्या ) इसी प्रकार वे स्वर्गको जाते हैं और उनके सब पाप दूर होजाते हैं (ये उपरे )जो यज्ञ करनेवाले (प्रा)मरणसे पहले ( दावने ) मुझ ईश्वरको हवि देनेको ( सन्ति ) उद्यत होते हैं (पत्र) मिन यज्ञोंके करनेवालों में. ( वयुनानि ) प्रज्ञान (भोजना ) भोग करने योग्य धन (पुरूणि ) बहुतसे मेरे अर्पणके लिये होते हैं । यह परमेश्वरकी आज्ञा है योगी लोग उसके भरोसे योग सांधते हैं कुछ स्वामीजीकीसी गपोड, वा धनके, इकट्ठा करनेके उद्योगमें नहीं लगे रहते हैं जर मनुष्य शुद्ध होताहै तब दूसरेको शुद्ध उपदेश देसक्ताहै अब और देखिये प्रार्थना : यजुः अ०३६ मंत्र ।। २४ ॥ तञ्चक्षुर्देवहितम्पुरस्ताच्छुकमुच्चरत् ॥ पश्येमशरदःशुतजीवे. मशरदःशत शृणुयामशरदः शतम्प्रवामशरदः शतम- दीनाःस्यामशरदःशुतम्भूयश्वशुरदः शुतात् २४ समष्टिमूर्तिव्यापकं परमेश्वरं प्रार्थयति ( तत् )( देवहितम्) देयानां हितं प्रियम (चक्षुः) परमेश्वरस्य चरूपं (शुक्रम्) मूर्यरूपं ब्रह्म श० १, ३, १, २५ (पुरस्तात् ) पूर्वस्यां दिशि (उच्चरत् ) टचरति उदेति तं (शतं )( शरदः) पूर्णायु-पर्यन्तम् (पश्येम)(शतंशरदः) पायःपर्यन्तम् (नीयम) अल्पानां नि: निरस्त्वित्ययः (शतं शरदः ) पूर्णायुःपर्यन्तम् भगवरितानि शृशुपाम ( शन शरदः)पूर्णायुःपर्यन्तम् (प्रनयाम) भगवदयतारचरितानि फयपाम( शतं शरद पूर्णाःपर्यन्तम् (अदीनाः स्याम ) (शनान् शरदः ) पायुःपति ( भूपः) योगशापा पट्टकालं नीयम ॥ २४ ॥ भापाय-परमेभरसे प्रार्थना है यह देषताओंका प्रिप परमेशरा यक्ष गपंच ब्रह्म पूर्व दिशामें उदय होता है, टमको हम पापपर्यन्त दम पूर्वायुष्यन्त की -रहै, अर्थात् अकालमृन्यो निपनि दो, पापुपपन्त भगवरियाको मुत्र पुना- सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । ( २२१) पुपर्यन्त परमेश्वरके अवतारचरित्रोंको कथन करें पूर्णायुपर्यन्त अदीन हैं तथा योगशक्तिसे पूर्णायुसे भी अधिक जियें ॥ २४ ॥ इस मंत्रमें परमात्माका गुण कहना सुनना आदि वर्णन किया है फिर क्या इसमें भरोसा नहीं आया और ( स नो बन्धु०)जब वह हमारा बन्धु उत्पन्न फरता पालन कर्ता है तो हम उसपर क्यों न भरोसा करें और क्यों न हमको फल वह देगा और जो किया जाय सो फर्म ईश्वरकी स्तुति स्वामीजी भाँडके समान करना व्यर्थ बताते हैं स्तुति करना भी फर्म है और जब कर्म है तो. अवश्य उसका कुछ फल होगा स्तुति करना कभी व्यर्थ नहीं वेदोंमें शतशः प्रार्थना विद्यमान हैं। स० पृ० १८८६ ११ (में स्वयं पाप दूर होना मानते हैं यथा )। सार्वज्ञादि गुणों के साथ परमेश्वरकी उपासना करनी सगुण और देपरूप गन्ध पादि गुणोंसे पृथक् मान अति सूक्ष्म आत्माके भीतर बाहर व्यापक परमैं- श्वरमें दृढ स्थित होजाना निर्गुण उपासना कहाती है इसका फल जैसे शीतसे आतुर पुरुपका अभिके पास जानेसे शीत निवृत्त ले जाता है पैसे परमेश्वरके समीप प्राप्त होनेसे सब दोष दुख यूटकर परमेश्वरके गुण कर्म स्वभावके सदृश जीवात्माके गुणकर्म स्वभाव पवित्र हो जाते हैं, इससे उसकी प्रार्थना उपासना अवश्य करनी चाहिये ( १९६९) पुनः पृ० १८७ पं० १४ में लिखा है उपासना शब्दका अर्थ समीप होना है अष्टांगयोगसे परमात्माके समीपस्थ होने और उसको सर्वव्यापी सर्वान्तर्यामी रूपसे प्रत्यक्ष करनेके लिये जो जो काम फरना है यह सब करना ( १९५१७ पुनः पृ० १८७५ २९ नित्य प्रति जप किया करे ( १९५:२४ ) पुनः पृ० १८८ पं० १ अपने आत्माको परमेश्वरकी आज्ञानुकूल समर्पित कर देवे ॥ समीक्षा-स्वामीजीको परस्पर विरुद्धताको कहांतक लिखें और गिनासत्यार्थ- प्रकाश सारा ग्रंथ ही परस्पर विरुद्धतासे भरा पड़ा है, कहीं तो कुछ लिखा है और कहीं कुछ लिखा है सार्वज्ञादि गुण सहित उपासनाको जर सगुण माना है और रूप रस गन्ध स्पर्शसे अलगको निर्गुण उपासना कही है. तो इससे यही सिद होता है कि सगुण उपासना स्पर्श रूप रस गन्ध होते हैं, और यह गन्ध सादि अवतारमें धन सके हैं, स्वामीजीने निर्गुण उपासनामें स्पर्श रूपादिका पृष्ट--१६८ । पं. ७ सन् १८९७ १अथवा पाठ मध्यहाडमें किसीस्थानपर स्थिर कर अपने आत्मा और परमात्माका विवचन फरके परमात्मामें मम होजानेसे संयमी हो । सामोक्षा-धन्य है देवमंदिर आदि छोडकर दया- नंदी उपासना पीटके मध्य हाइमें होती है । .
(२२०) दयनन्दतिमिरमास्करः। एवेवापागपरेसन्तुदूढयोऽश्शायेपांदुर्युजआयुयुजे ॥ इत्थायेप्रांगु. परेसन्ति दावने पुरूणि यनवयुनानिभोजना ॥ऋ०म० १०० ४४ पदार्थः-ईश्वर कहताहै हे मनुष्यो ( एवैव ) इसी प्रकार (दूट्यः) स्तुति) प्रार्थना नहीं करनेवाले दुर्बुद्धि (अपरे) और यज नहीं करनेवाले (अपाग) -नरक जानेवाले ( सन्तु ) हों ( येषाम् ) जिन स्तुति प्रार्थना और यज्ञ न करने • वालोंके ( अश्वाः ) इन्द्रियरूप घोडे ( दुर्युजः) प्रबल जो साधनेमें न आवे ऐसे (आयुयुचे ) रथोंमें युक्त होते हैं.और (इत्या ) इसी प्रकार वे स्वर्गको जाते हैं और उनके सब पाप दूर होजाते हैं (ये टपरे )जो यज्ञ करनेवाले (प्राक्)मरणसे पहले ( दावने ) मुझ ईश्वरको हवि देनेको ( सन्ति ) उद्यत होते हैं (यत्र ) जिन यज्ञोंके करनेवालोंमें. ( वयुनानि ) प्रज्ञान (भोजना) भोग करने योग्य धन (पुरूणि) बहुतसे मेरे अर्पणके लिये होते हैं । यह परमेश्वरकी आज्ञा है योगी लोग उसीके भरोसे योग सांधते हैं कुछ स्वामीजीकीसी गपोड, वा धनके, इकट्ठा करनेके उद्योगमें नहीं लगे रहते हैं जब मनुष्य शुद्ध होताहै तब दूसरेको शुद्ध उपदेश देसक्ताहै अब और देखिये प्रार्थना यजुः अ० ३६ मंत्र॥ २४॥ तञ्चक्षुदेवहितम्पुरस्ताच्छुकमुच्चरत् ॥ पश्यमशुरद शुतनी. मशरदःशुत शृणुयामशरदः शतम्प्रववामशरदः शतम- दीनाःस्यामशरद शतम्भूयश्वशुरदः शुतात् २४ समष्टिमूर्तिव्यापकं परमेश्वरं प्रार्थयति (तत्)(देवहितम्) देवानां हितं मित्र (चक्षुः) परमेश्वरस्य चभूरूपं ( शुक्रम् ) सूर्यरूपं ब्रह्म श० ४, ३, २, (पुरस्तात् ) पूर्वस्यां दिशि (उच्चरत् ) उच्चरति उदेति तं (शतं )(शरद पूर्णायु-पर्यन्तम् (पश्येम)(शतंशरदः) पूर्णायु-पर्यन्तम् (जीवेम) अल्पानां नि त्तिरस्त्वित्यर्थः (शतं शरदः ) पूर्णायुःपर्यन्तम् भगवचरितानि शृणुयाम (३ शरदः )पूर्णायुःपर्यन्तम् (मत्रवाम) भगवदवतारचरितानि कथयाम ( शतं शरद पूर्णायुपर्यन्तम् (अदीनाः स्याम ) (शतात् शरदः ) पूर्णायुःपर्यपि (भूया -योगशक्त्या बहुकालं जीवेम ।। २४ ॥ भापार्य-परमेश्वरसे प्रार्थना है वह देवताओंफा प्रिय परमेश्वरका चक्षु मर्पह प्रम पूर्व दिशामें उदय होता है, उसको हम पूर्णायुपर्यन्त देखें पूर्णायुपर्यन्त जी अर्थात् अकालमृत्युकी निवृत्ति हो, पूर्णायुपर्यन्त भगवचरियोंको मुन पूण -- सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । युपर्यन्त परमेश्वरके अवतारचरित्रोंको कथन करें पूर्णायुपर्यन्त अदीन हैं तथा योगशक्तिसे पूर्णायुसे भी अधिक जियें ॥ २४ ॥ इस मंत्रमें परमात्माका गुण फहना सुनना आदि वर्णन किया है फिर क्या इसमें भरोसा नहीं आया और ( स नो बन्धु०) जब वह हमारा बन्धु उत्पन्न करता पालन कर्ता है तो हम उसपर क्यों न भरोसा करें और क्यों न हमको पल वह देगा और जो किया जाय सो फर्म ईश्वरकी स्तुति स्वामीजी भाँडके समान करना व्यर्थ बताते हैं स्तुति करना भी फर्म है और जब कर्म है तो. अवश्य उसका कुछ फल होगा स्तुति करना कभी व्यर्थ नहीं वेदों में शतश: प्रार्थना विद्यमान है॥ स० पृ० १८८६ ११ (में स्वयं पाप दूर होना मानते हैं यथा ) सार्वज्ञादि गुणोंके साप परमेश्वरकी उपासना करनी सगुण और देषरूप गन्ध स्पर्शादि गुणोंसे पृथक् मान अति सूक्ष्म आत्माके भीतर बाहर व्यापक परमें- श्वरमें दृढ स्थित होजाना निर्गुण उपासना कहाती है इसका फल जैसे शीतसे आतुर पुरुपका अभिके पास जानेसे शीत निवृत्त ले जाता है पैसे परमेश्वरके समीप प्राप्त होनेसे सब दोष दुःख दूष्टकर परमेश्वरके गुण कर्म स्वभावके सदृश जीवात्माके गुणकर्म स्वभाव पविन हो जाते हैं, इससे उसकी प्रार्थना उपासना अवश्य करनी चाहिये ( १९६१९ ) पुनः पृ० १८७ पं० १४ में लिखा है उपासना शब्दका अर्थ समीप होना है अष्टांगयोगसे परमात्माके समीपस्थ होने और उसको सर्वव्यापी सर्यान्तर्यामी रूपसे प्रत्यक्ष करनेके लिये जो जो काम फरना है वह सब करना ( १९५१७ पुनः पृ० १८७ ५२९ नित्य प्रति जप किया फैरे ( १९५।२४ ) पुनः पृ० १८८ पं० १ अपने आत्माको परमेश्वरकी आज्ञानुकूल समर्पित कर देवे ॥ समीक्षा-स्वामीजीको परस्पर विरुद्धताको कहांतक लिखें और गिना सत्यार्य- प्रकाश सारा ग्रंथ ही परस्पर विरुद्धतासे भरा पडा है, कहीं तो कुछ लिखा है और कहीं कुछ लिखा है सार्वज्ञादि गुण सहित उपासनाको जब सगुण माना है और रूप रस गन्ध स्पर्शसे अलगको निर्गुण उपासना कही है. तो इससे यही सिद्ध होता है कि सगुण उपासनामें स्पर्श रूप रस गन्ध होते हैं, और यह गन्ध स्पर्शादि अवतारमें बन सक्ते हैं, स्वामीजीने निर्गुण उपासनामें स्पर्श रूपादिका पृष्ठ--१९८ । पं० ७ सन् १८९७ १अथवा पीठ मन्यहाडमें किसीस्थानार स्थिर कर अपने आत्मा और परमात्माका क्विनन करके परमात्मामें मत होजानेसे संयमी होवे । सानीक्षा-धन्य है देवमंदिर आदि छोडकर दया- नंदी उपासना पोटके मध्य हाइनें होता है । .
दयानन्दतिमिरभास्करः। निषेध किया है, सगुणमें तो सार्वरपादि होनेसे रूपादि सब ही आगये अत एवं 'परमेश्वरका रूप भी स्वामीजीफे कयनसे ही सिद्ध होगया, और उपासनाके अर्थ समीप होनेके लिखेहैं, यह भी सगुणमें ही बन सकता है क्यों कि उसकी कोई मूर्ति बनाकर उसमें अनेक प्रकारके गुण आरोपण कर उसके निकट वा समीप बैठफर स्तुति प्रार्थना करना इसीसे समीप हो सत्ता है, निर्गुणमें यह बात कैसे वन सक्ती है क्यों कि जब उसमें रूपादि नहीं गुण नहीं तो उसके समीप कैसे होसक्ता है, वह ती शून्य होगया यदि कहो सर्व व्यापक होनेसे वह निर्गुण है तो भी नहीं बनसक्ता क्यों कि सर्वव्यापकता भी एक गुण है और जिसमें गुण हो यह सगुण और जो व्यापक मानते हो तो उपासनासे समीपस्थ होना फैसा वह तो सदा सबके ही समीप है समीप क्या वाहर भीतर वर्तमान है इससे दयानं दजी निर्गुण अवस्थामें ईश्वरको शून्यत्वसे युक्त करते हैं जिससे विदित होता है कि उस अवस्थामें ईश्वर नाममात्र है और जिसमें, सार्वयादि गुण स्पर्श रूपादि कुछ भी नहीं वह प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है इससे टपासना सगुणमें बनेगी और मूर्तिपूजन भी इससे सिद्ध होता है 1. अरंदासोनमीढुपेकराण्यहंदेवायभूर्णयेऽनागाः । अचेतयदचितोदेवोऽअयॊगृत्संरायेकवितरोजुनाति ।। ऋ० मं ० ७ अनु०५सू ० ८६ मंत्र । पद । अरम् दास ने मीटुपे कराणि अहंम् देवाय भूर्णये अनागाः अवेतयत अचितः देवः अर्यः गृत्सम राये कवितरः जुनाति ॥ इस स्थानमें न शब्दफे अर्थकी मंत्रों में व्यवस्था करनेवाले निरुत्तको भी समझना चाहिये। प्रतिपेधार्थीयःपुरस्तादुपाचारस्तस्ययत्मतिपेधति ॥ उपमार्थीयउपरिटादुपाचारस्तस्ययेनोपमिमीते ॥ नि० अ ०१ खं०४ यत्प्रतिषेधति तस्य पुरस्तात् प्रतिपेधार्थी यो नशब्दः इत्युपाचारः येनोपमिमीते तस्योपरिष्टात् उपमार्थी यो नशब्द इत्युपचारः यह अन्यय है । भावार्थ यह है कि जिस अर्थमा निषेध करतेहैं तिस वाचकके पदसे यदि पूर्व नकार हो तो प्रतिपेप अर्थवाला होताहै मंत्रमें और जिसकी उपमा दी जाताह तदायक शब्दसे यदि नकार पश्चात् हो तो टपमा अर्थम नकार होता है यह नियम बहुवा मंत्रॉम ही होता है ॥
सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (२२३) मंत्रार्थ:-( अनागा अहं भूर्णपे मीडये पेवाय अरफराणि दासोनदास इष) निषिद्धाचरण वर्जित मैं दासवत् देवके अर्थअलंकार करता हूं (भूर्णये मीडपे )वो देव बहुतसी धनकी वृद्धि करनेवाले हैं, जैसे स्वामीका सेवक सक चन्दन वस्त्रादिसे अलंकार करताहै तद्वत् मैं भी बहुत धन देनेवाले देवको अलंकार करता हूं इस मंत्रमें दासकी उपमा अहंशब्दार्थ कर्ताको दी गई है और दास शब्दसे परे नकार है तिससे उपमार्थमें है इस मंत्रमें देवको अलंकार करना लिखा है, और बिना समीप हुए अलंकार नहीं होसत्ता, समीपस्य होना उपासनासे युक्त है और निरा- कारमें अलंकारादि करना असंभव है इस प्रतिमारूप आधारमें ही देवपरमात्माके अलंकारादि हैं, और उपासना भी तभी हो सुक्ती है(प्रभ )इस मंत्रमें तो आचा. योदि.देवता मानकर उनका अलंकार कहा है कुछ प्रतिमा, अलंकार नहीं कहा (उत्तर) इसका उत्तर यह श्रुति ही देती है (अचेतयदचितो देवोअर्पः ) स्वामी देव अचेतनीको चेतन करता है अपने जीवरूपसे प्रवेश करके (राये गृसं कवित- रो जुनाति ) इस प्रकार धनकी प्राप्तिके अर्थ माणके भी प्राणरूप देवको अत्यन्त बुद्धिमान (जनाति ) आश्रय करता है इस मंत्रमें प्रतिमा परमेश्वर पूजनको काम्य कर्मता प्रतीत होती है, और आचार्य यद्यपि पूजनीय है परन्तु वह अचेत- नोंको चेतन नहीं करसकता जीवरूपसे प्रवेश करनेसे, इससे उपासना सगुणमें बनती है और स्वामीजीने इतना फल तो माना है कि, परमेश्वरके समीप होनेसे सब दुःख दूर होजाते हैं और परमेश्वरके गुण कर्म स्वभावके समान जीव गुण कर्म स्वभाव होनाते हैं उसको समान पवित्र होनाते हैं (और पूर्व लिखाह कि वह स्तुति प्रार्थनासे पाप क्षमा नहीं करता) फैसाअन्धेर है और यहां कहा कि ईश्वरके वरावर गुण कर्म स्वभावजीवके होजाते हैं जीव और इंश्वरके जब गुण कर्म स्वभाव एकसे हुए तो अंतर कैसा जो वस्तु एफसी रंगरूपमें हो उनमें अन्तर फैसा अयोदरमन्तरं कुरुते अथ तस्य भयं भवत्ति द्वितीपद्विभयं भवति । वृ०3० जो ब्रह्म और जीवमें थोडा भी भेद करता है उसको भय प्राप्त होताहै क्यों कि दूसरेसे भय प्राप्त होताहै और इसीसे यजुर्वेदके ४० अ०१०म० " योसावादित्य पुरुषः सोसावहम्" जो यह आदित्यमें पुरुष है सो मैं हूं इत्यादि जीव ईश्वरमें एकता बोधक बहुत मुति है फिर पाप दूर हुरे विनागुण कर्म स्वभाव समान कैसे हो सकते हैं, इससे भी पाप दूर होना स्वयं सिद्ध होता है, फिर लिखाहै नित्यप्रति जप कर, फिर लिखा है ईश्वरके भरोसे रहना मूर्खता है अब यहां लिखा अपने आत्माको समर्पित कर दे. इत्यादि विरुद्ध बातोंसे प्रतीत है कि, .स्वामीजीने गहरी भंग पीकर सत्यार्थ प्रकाश बनाया है, अब सबका सारांश पह है कि जो गीतामें श्रीकृष्णजी कहते हैं । A ( २२४). , दयानन्दतिमिरभास्करः। सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज ॥ अहं त्या सर्वपापेभ्यो मोक्षयिप्यामि मा शुचः॥ भ० गी० श्रीकृष्ण भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि और सब धमाको छोड़ मेरी शरणरूप धर्ममें प्राप्त हो तो मैं तुझे सब पापोंसे छुड़ा दंगा इससे ही सब कुछ समझलेना चाहिये-इति ॥ * जीवपरतंत्रप्रकरणम् । सत्या. पृ० १९२६० १२ (प्रश्र) जीव स्वतन्त्र है वा परतन्त्र उत्तर) अपने फर्तव्य कर्मा स्वतन्त्र और ईश्वरके व्यवस्थामें परतन्त्र है जो स्वतंत्र हो उसको पुण्य पापका फल प्राप्त नहीं होसत्ता पुनः पं० २९ जीवका शरीर और इन्द्रियों के गोलक परमेश्वरके बनाये हैं पुनः पृ० १९४ पं० १० जीवोंके कर्मकी अपेक्षासे त्रिकालज्ञता इश्वरमें है जैसा स्वतन्त्रतासे जीव करता है वैसा ही सर्वज्ञतासे ईश्वर जानता है जैसा ईश्वर जानता है वैसा ही जीव करता है, भूत भविष्यत् वतर्मानका ज्ञान और फल देनेमें ईश्वर स्वतंत्र है और जीव किंचित् वर्तमानऔर कर्म करनमें स्वतंत्र है ॥ २०० । २४ ॥ २० ॥ २५ ईश्वरको त्रिकालदर्शी फहना मूर्खताका काम है पृ. २०२ । २१ सन् १८१२ । समीक्षा-स्वामीजीकी अलौकिक बुद्धिका कहांतक ठिकाना लगाया जाय र लेख कि, कत्तळ कर्मोंके करनेमें स्वतंत्र और ईश्वरको व्यवस्था, जीव परतंत्र फिर लिखा है जो जीव कर्ता है वह ईश्वर सर्वज्ञतासे जानता जब कि जीव कमौके करनेकी त्रिकालज्ञता ईश्वरमें है, तो जीवके कर्म स्वतंत्रता कब हो सक्ते क्यों कि जो जो वह कर्म करेगा सो तौ ईश्वर सर्वज्ञतासे पहले ही जाना वास्तवमें जवि कर्म करनेमें तथा पाप पुण्यके फल भोगनमें सर्वथा परतंत्र अर्था अपने पूर्वकर्मानुकूल ईश्वराधीन ह, जब किः स्वामीजीके लेखानुसार जीव जै फर्म करेंगा ईश्वरने पहले ही अपनी सर्वज्ञतासे जान रक्खा है तो जीव फर्म करने स्वतंत्र कहाँ रहा, क्यों फि जैसा ईश्वरने अपनी सर्वज्ञतास जानाहै उसके विरत कर ही नहीं सक्ता, यदि स्वामीजी कहैं कि, करसक्ता है तो ईश्वरफा ज्ञान अन्यथा हुआ, सो असम्भव है इससे अच्छी तरह सिद्ध हो गया कि, जीव फर्म करनेमें किसी प्रकार स्वतंत्र नहीं किन्तु जैसे ईश्वरने अपने ज्ञानसे जान रक्खा है उसीके अधीन है और जैसा स्वामीजीने पृ० १९२ पं २५ में लिखा है कि, पापपल भोगनेमें परतंत्र है, स्वामीजी यही कहेंगे कि पुण्यका फल भोगनमें स्वतंत्र और इससे यही धुनि निकलती है कि पापकम ता परतंत्रतासे भोगने पड़ेंगे तो पुष्प * मा० ० न इसके अर्थमें दोनों लोक मान लिये हैं।
सतमसमुल्लासखण्डनम् । पालमें स्वतंत्र हुआ चाहै, ग्रहण करे या नहीं, सो इसमें भी जीव स्वतंत्र नहीं हो सक्ता ती दयानंदनी यही कहेंगे कि, पुण्यका फल सुख है और उसका ग्रहण और त्याग जीवके अधीन है अर्थात् देवदत्तको उसके पुण्यादि अनुकूल पनादि- कफी प्राप्ति हुई उसके ग्रहण और त्यागमें वह स्वतंत्र है मैं कहताहूं ग्रहण और त्यागमें भी जीव स्वतंत्र नहीं क्यों कि ग्रहण और त्याग फर्म है और हम अभी स्वामीजीके इस लेखानुसार कि (जैसा स्वतंत्रतासे जीव करता है वैसा ही सर्व- ज्ञतासे ईश्वर जानता है ) सिद्ध कर चुके हैं कि, जीप किसी प्रकार कर्म करने में स्वतंत्र नहीं फिर जब कि, देवदत्तको पुण्यानुकूल ईश्वरने किसी प्रकारका भोग निपत किया है और स्वामीजीके मतानुसार कि, (अपने सामानुकूल काँके फरनेमें स्वतंत्र है ) यह उसको न भोग अर्थात् त्यागकर दे तो जीव ईश्वरसे मचल टहरा, अथवा स्वामीजीके मतमें कोई शैतानका प्रपितामह है जो ईभरके नियमित कार्यको बलात्कार जीवसे विरुद्ध करपि, ध्यान रहे कि, जिसके लिये उसके फर्मा- मुरल ईश्वरने नो भोग नियत किया है वह उसको अवश्य भोगगा, उसके विरुद्ध कदापि किसी प्रकार नहीं हो सकता यदि कहो कि यह वात प्रत्यक्ष है कि, जो पदार्थ हमारे पास है जब चाहँ दूसरेको देसते हैं, वा सफा त्याग कर सके हैं इससे जोषका पुष्पोंके फल भोगनेमें स्वतंत्र होना सष्ट है, तो उत्तर पह है कि, किसी पदार्थका दूसरेफो देना या त्याग करना जीवके अधीन नहीं है, किन्तु जिस फालतक निस पदार्थका परमात्माने निसके पास रहना वा भोग नियत किया है, उस कालतक उसके पासको रहना या भोगना अवश्य होगा और निस फारम टसके द्वारा दूसरोंफो दिया जाना वा त्याग करना निपत किया है, तभी दूसरेको देना पा त्याग करना होगा, प्रत्यक्ष देखा जाता है पापः मनुष्य धनवान् होते हैं, परन्तु उस धनको अपने भोजन वस्त्र में भी ययोचित व्यप नहीं करते और अपने पुत्रादिपोंफो भी दुःखी करते हैं इससे यही जाना जाता है कि, इधरने उनके लिये टस पनका भोगना-निपत नहीं किपा है फेयल रक्षक ही किया है गए कि, यह बात है तो किसी पदार्थका दूसरफो दे दना पा स्याग करदेना जीरो अर्थान पाहा है दूसरेफो कोई पदार्य हम दसी समय दे सत्ते हैं निस समय...परमात्माने उसके प्रारम्प टस पदार्पको मामि निपत की हो सी होगा गया कि हमारे मारव्यमें टमका त्याग होना नियत: प्रकार हैं, रि, टनका फिमीको दे देना जैसे पि, उत्तम पंशने टपन होना, । संततिका होना, तथाच स. । होना, अपने अनुरल.
- भी कोई भी किसी प्रकार स्वतंत्र नहीं अब जीवोंके परतंत्र निषेदादिशात (२२६) दयानन्दतिमिरभास्करः। स्वादिके उत्तम लोकोंका प्राप्त होना, इत्यादि जो पुण्यके फल हैं इन्, न कोई दूसरेको देसक्ता है न पासक्ता है, जबतक, जिसके भोगमें भोगना है भोगेगा और जिस समय दूसरेको देना होगा दे देगा, इससे सिद्ध है पुण्यों के फल भोग: नेमें भी जीव स्वतंत्र नहीं किन्तु अपने फर्मानुकूल ईश्वराधीन ही है और यह तौ स्वामीजी स्वीकार करचुके हैं कि पापोंके भोगनेमें जीव पराधीन है फिर यह लिसा कि, कर्मोके फल भोगने तथा (पुण्योंके ) करनेमें स्वतंत्र है उन्हीक लेखक विरुद्ध है (प्रभ) जब कि, हम कर्म करनेमें परतंत्र हैं तो फिर फोका पल इमको न होना चाहिये किन्तु ईश्वरहीको होना चाहिये (उत्तर) विद्यमान शरी- रसे जो जो कर्म किये जाते तया सुख दुःख भोगे जाते हैं वे सब अपने ही पूर्व- फोके अनुकूल होते हैं जैसे चोरको उसीके कर्मानुकूल रामा बन्दीगृहमें रखता है, और उससे चक्की पीसना आदि.कर्म भी कराता है इसी प्रकार अस्मदादि- फॉके पूर्वकर्मानुकूल ही ईश्वर उन काँको हमसे कराता है और फलोंको भूग- याता है, यद्यपि जीव कर्म करनेमें सर्वथा परतंत्र है परन्तु जब कि ईश्वर उसीके पूर्व कर्मानुकूल क्रियमाण कर्मको कराता है, अर्थात् जो पहले बुरी वासना चित्तमें है तो वही बुरी वासनायें उससे बुरा कर्म कराती हैं, तो इनका फल भी अवश्य पुनः जीवको होना चाहिये ईश्वरपर लेशमात्र भी दोप नहीं आता है जैसे कि कोई किसीको मार डाले तो उसका मारना स्वतंत्रतास नहीं हो सकता किन्तु उसके कर्मोंने उसे मार डालनेकी प्रेरणा कराई और तो जान बूझकर कौन पैरमें कुल्हाडी मारता है, और मरनेवालाभी फ नुसार मरा अथवा जैसा वीन वैसा ही पेड होता है, तदनुसार फूल लगते हैं इसी प्रकार पूर्वकर्मकी वासनानुरूप सब यह जीव कम करता है, पर दोष नहीं आसक्ता (प्रभ) यदि जीव अपने पूर्व कर्मानुकुल फर्म कर परतंत्र है तो उपदेश करना वृथा है, क्यों कि ईश्वरने जिसके लिये जो कर्म कर निपत किया है वह अवश्य वही करेगा इससे विरुद्ध तौ फर नहीं स (उचर) निःसन्देह ईश्वरने जो जिसके लिये उसके पूर्वकर्मानुकूल जो । फरना नियत किया है वह अवश्य ही फरेगा उसके विरुद्ध कदापि कुछ। फरसका बस जिसके लिये उपदेश करना नियत किया है वह उपदेश करता निसके लिये मुनना नियत किया है वह सुनता है जिसके लिये स्वीकार कर निपट किया है वह स्वीकार करता है निदान इसी प्रकार प्रत्येक जीव जो जो फरता है ईश्वराधीन होकर अपने पूर्वकर्मानुकुल ही करता है, किसी कमरे । प्रमाण दिया जाता है।
सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (२२७) तत्सवितुर्वरेण्यम्भगोंदेवस्यधीमहिधियोयोनः प्रचोदयात् । यह मंत्र सर्वमधान है, संक्षेपार्थ यह है कि उस जगत्प्रकाशक सविता देवताके वरणीय प्रकाशको हम ध्यान करते हैं जो हमारी बुद्धियोंको प्रेरणा करता है, किसी कर्मके करने में हम स्वतंत्र नहीं किन्तु अपने कर्मानुकूल सर्वथा ईश्वरा- धीन हैं शंकराचार्य रामानुजाचार्यप्रभृति तथा सायणाचार्य ( प्रचोदयात् ) पदका अर्थ (प्रेरयति) ही करते हैं परन्तु स्वामीजीने 'इसको प्रार्थनापर लगाया है और (प्रचोदयात् ) कृपा करके सब बुरे फासे अलग फरै सदा उत्तम फर्मामें प्रवृत फर यदि स्वामीजीका यह गडबड अर्थ भी मान लें तो भी जीवकी परतंत्रता कही गई है क्यों कि स्वामीजी आप लिखते हैं कि, परमेश्वर हमारी बुदियोंको कृपा करके सब बुरे कर्मोसे अलग फरै सदा उत्तम कमि प्रवृत्त कर यदि कोके करनेमें जीव स्वतंत्र होते तो अपनी बुद्धियोंको बुरेका- मोसे हटाने और उत्तम कामोंमें लगानेकी परमात्मासे प्रार्थना क्यों करते जिस फामको मनुष्प आप नहीं करसक्ता उसीके लिये दूसरेसे प्रार्थना किया करता है और जिस कामके करनमें आप समर्थ होताहै उसके लिये कभी किसी से प्रार्थना नहीं करता अब देखिये यह प्रा० ७ अ० ३ यासवेंपुभूतेषुतिप्टन्सवेभ्योभूतेभ्योऽन्तरोय ५ सर्वा- णिभूतानिनविदुर्यस्यसर्वाणिभूतानिशरीरयःसर्वाणिभू- तान्यन्तरोयमयत्यपतआत्मान्तर्याम्पमृतः॥१॥ याप्राणतिष्ठन्प्राणादन्तरोर्यप्राणोनवेदयस्यप्राणःशरीर यःप्राणमन्तरोयमयत्येपतआत्मान्तर्याम्यमृतः॥२॥ योवाचितिष्ठन्वाचोन्तरोयंवाङ्नवदयस्यवाकशरीरं योवाचमन्तरोयमयत्येपतआत्मान्तर्याम्यमृतः॥३॥ यश्चक्षुपितिष्ठ' अक्षुपोन्तरोयंचक्षुर्न वेदयस्यचक्षुः शरीरयश्चक्षुरन्तरोयमपत्येपतआत्मान्तर्याम्यमृतः १.४६. यः श्रोतिष्ठन्ट्रोवादन्तरोयश्योनवेदयस्यश्रोत्र शरीर यः श्रोत्रमन्तरोयमयत्येपत आत्मान्तर्याम्पमृतः॥५॥ योमनसितिष्ठन्मनसोन्तरोयमनोनवेदयस्यमनः शरीर योमनोन्तरोयमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः॥६॥ ।
टससे जो जो चेष्टाहोतीहै किसी चेतनके द्वारा होती है इसी प्रकार मनुष्यत्तय (२२८) दयानन्दतिमिरभाकरः। यस्त्वचितिष्ट ५ स्त्वचोऽन्तरोयंत्वनवेदयस्यत्वक्शरीर यस्त्वचमन्तरोयमयत्येपतआत्मान्तयाम्यमृतः॥७॥१५-२ यात्मनितिष्टनात्मनोन्तरायम् आत्मानवेदयत्यआत्मा शरीरं यात्मनोन्तरोयमयत्येपतआत्मान्तर्याम्पमृतः। १४६।७।३० अर्थ यह है (यः सर्वेषु भूतेषु ) अर्थात् जो सब भूतों में स्थित होता हुआ स पृथक है जिसको सब भूत नहीं जानते जिसके सब भूत शरीर हैं जो भूतोके अ चर्ती होकर उन्हें नियत करता है वही अमृतस्वरूप परमात्मा तेरा अन्तर्यामी इसी प्रकार शेष श्रुतियोंका अर्थ बुद्धिमान् (प्राण वाक् वः श्रोत्र मन व आत्मा) इनका भी विचार कर सकते हैं इन श्रुतियोंस यहांतक सिद्ध होगया । प्राण वाझ चक्षुः श्रोत्र मन स्वक् और आत्मासे जो जो क्रिया होती है वह स ईश्वराधीन ही होतीहै जीव स्वतंत्रतासे कोई भी क्रिया नहीं करसता । पुनः दारण्यउपनिषदमें ॥ यः प्राणेन प्राणितिसत आत्मा सर्वान्तरोयोऽपानेनापानि- तिसत आत्मा सर्वान्तरो यो व्यानेन व्यानितिसतआत्मा सर्वान्तरो य उदानेनादानिति सत आत्मा सर्वान्तर एपत आत्मा सर्वान्तरः ११० अ०३त्रा०४ इसपर स्वामी शंकराचार्यजी भाष्य करते हैं। यः प्राणने मुखनासिकासंचारिणा प्राणिति प्राणचेष्टां करोति येन प्राणः प्रणीयत इत्यर्थः स तेतव कार्यकारणस्यात्मा वि- ज्ञानमयः समानयन्योऽपानेनापानिति व्यानेन व्यानितीति सर्वाः कार्यकारणसंघातगताःप्राणनादिचेया दारुयंत्रस्येव येन कियन्ते नहि चेतनावदनधिष्ठितविलक्ष गेन दारुयंत्रतत्याण- नादिचेष्टा प्रवर्तते ॥ आशय यह है कि जैसे काठको पुतली आप कुछ भी चेष्टा नहीं करसद सासे कोई चेष्टा नहीं करसक्ता जो जो चेष्टा करता है परमात्माधिष्ठित ही हो करता है पुनः तत्रैव ॥
सप्तमसमुल्लासखण्डनम्। . (२२९) वस्यवशीसर्वस्पेशानः सर्वस्याधिपत्तिः बृहउ अ०४वा०४।२१ नरमात्मा सबको वशमें रखनेवाला है सबका ईशान है सरका अधिपति है पनिपमें लिखाहै ( एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा ) सबको पशमें रखनेवाला भूतोंका अन्तरात्मा है और श्वेताश्वतरोपनिषदमें लिखा है ।। एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवातः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ६।११ अर्थात् एक देवता परमेश्वर सब भूतोंमें छिपा हुआ है, वह सर्वव्यापी है और जीवोंका प्रेरक है कर्मोंका अध्यक्ष है सर्वभूतों में उसका निवास है सर्वदृष्टा है को चेतना देनेवाला है अर्थात् सबकी स्थिति प्रति उसीफे अधीन है पुन: तिकी उपनिषदमें लि ॥ ॥ परातु तच्छुतेः वेदान्त मू० अ० २पा० ३ सू० जीव ईश्वरके अधीन है उस पर पह नचिकी श्रुति प्रमाण है । एपद्येवसाधुककारयतितंयमेभ्योलोकेभ्यनिनी- पतएपउरुषासाधुकर्मकारयतितंयमधोनिनीपते अर्थात् वही मुकर्म कराताहै उससे कि जिसको ऊपर लेजानेकी इच्छा ता है और वहीं पापकर्म कराता है उससे कि जिसको नीचे लेजानेकी इच्छ जा है उसके कर्मानुसार आर गोतामें लिखा है कि ॥ ईश्वरः सर्वभूतानां देशेर्जुन तिष्ठति ।। भ्रामयन्सर्वभूतानि यंशरूढानि मायया ।। भ० गी० १८१६३ हे अर्जुन ! ईश्वर सब भूतोंके हृदयमें विराजमान होकर अपनी मापासे को कर्मानुसार कलकी पुतलीकी तरह धुमाता है । पुनः महाभारते !! धाना तु दिष्टस्य कशे किलेदं सर्व जगवेति न स्वतंत्रम् । अर्थात् निश्चय ईश्वरनियमित प्रारब्धके वशमें स्थित यह संपूर्ण जगत् चेष्टा ताहै स्वतंत्र नहीं है । वनपर्व अ. ३० ॥ अवाप्युदाहरतीममितिहासं पुरातनम् ईश्वरस्य वशे लोकास्तिष्ठन्ते नात्मनो यथा ॥ २१ ॥ धातेव खलु भूतानां सुखदुःखे प्रियाप्रिये ॥ दधाति सर्वमीशानः पुरस्ताच्छुकमुच्चरन् ।॥ २२ ॥ यथा दारुमयी योपा नवीरसमाहिता ॥
-- (२३०) दयानन्दतिमिरभाकरः। ईस्यत्यंगमंगानि तथा राजनिमाः प्रजाः ॥ २३ ॥ भाकाश इव भूतानि व्याप्य सर्वाणि भारत ।। ईश्वरो विदधातीह कल्याणं यच्च पापकम् ।। २४ ॥ शकुनिस्तंतुवद्धो वा नियतोयमनीश्वरः॥ ईश्वरस्य वशे तिष्ठेनान्येषामात्मनः प्रभुः ।। मणिसूत्र इव प्रोतो नस्योत इव गोवृपः ॥ २५॥ धातुरादेशमन्वति तन्मयो हि तदर्पणः ॥ नात्माधीनो मनुष्योऽयं कालं भजति कंचन ॥२६॥ स्रोतसो मध्यमापन्नः कूलाद् वृक्ष इव च्युतः ॥ अज्ञो जंतुरनीशोयमात्मनः सुखदुःखयोः॥ ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्स्वर्ग नरकमेव च ॥ २७ ॥ यथा वायोस्तृणाग्राणि वशं यांति बलीयसः॥ धातुरेव वशं यांति सर्वभूतानि भारत ॥ २८॥ अर्थ-इस विषयमें पुरातन इतिहास कहते हैं जिस प्रकार जीव ईश्वरके वशमें रहते हैं न कि अपने २१ निश्चय सबका स्वामी ईश्वर ही पूर्वकर्म बीमके अनुसार प्राणियोंको सुख दुःख और प्रिय अप्रियको नियत करता है २२ हे नरवीर । निस प्रकार काष्ठकी पुतली सूत्रधारके हाथमें स्थापित की हुई अंगोंको. हिलाती है। उसी प्रकार यह प्रजा ईश्वरसे प्रेरित हस्तपादादि अंगोंको प्रचलित करती है.२३ हे भरतवंशी ! वह ईश्वर आकाशके समान प्राणियोंको व्याप्त करके उनके शुभाशुभ फौंफो इस लोकमें नियत करताहै २४ निश्चय यह असमर्थ जीव तन्तुबद्ध पक्षी की समान ईश्वरके वशमें स्थित है, न दूसरोंकेमें और आप अपने आत्मा स्वामी नहीं है मणिसूत्रकी समान पिरोया हुआ है जैसे वैल नासिकामें सूत्रसे नाया जाता है २५ वह धाताकी आज्ञापर चलता है उसके अधीन और उसके अर्पण है, यह मनुष्य स्वाधीन किसी प्रकार नहीं है, किन्तु काल नाम ईश्वरके अधीन है २६ अपने सुख दुःखका न जाननेवाला असमर्थ यह जीव ईश्वरसे प्रेरित वन अथवा नरकको जाताहै जैसे नदीके तटसे गिरा और उसके मध्य विद्यमान २७ हे भरतवंशी ! जैसे तृणोंके अग्रपलवान घायुके यशको, प्राप्त होते हैं, इसी प्रकार सब प्राणी ईथरके वशको प्राप्त होते हैं २८ पुनः वनपर्यगि ।
सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । अयं पुरुषः किंचित्कुरुते वे शुभाशुभम् ॥ दातृविहितं विद्धि पूर्वकर्मफलोदयम् ॥ अ०३२ श्लोक २२ वनपर्व यह पुरुष निश्चय जो कुछ शुभाशुभ फर्मको करता है उसको पूर्वफर्मके फलका स्य ईश्वरसे कियाहुआ-जानो २२ पुनः वनप० वार्यमाणोऽपि पापेभ्यः पापात्मा पापमिच्छति । चोधमानोपि पापेन शुभात्मा शुभामच्छति ॥ - पापात्मा पुरुष पापोंसे रोकाहुआ भी पाप कर्म करता है शुभात्मा मनुष्य पसे मेरित करनेसे भी शुभकर्म करताहै पुनः उद्योगपर्व० अ० १५९ नोव कर्ता पुरुषः कर्मणोः शुभपापयोः । अस्वतंत्रो हि पुरुषः कार्यते दारुयंत्रवत् ॥ १४ ॥ अर्थात् पुरुष शुभाशुभ फर्मोका फरनेवाला नहीं पुरुप अस्वतंत्र है काष्ठके चॉकी सदृश कोंमें नियुक्त किया जाता है। एतत्प्रधानं च न कामकारो यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि। भूतानि सर्वाणि विधिनियुक्त विधिर्वलीयानिति वित्त सर्वे ॥४८॥ माहा भारत आपद्ध० अ३७ यह बात मुरूप है कि, म इच्छाके अनुसार फर्म करनेवाला नहीं हूं जिस प्रकार नेयुक्त किया गयाहूं उसी प्रकार फरताहूं सम्पूर्ण भूतोंको ईश्वर नियुक्त करता है रमेश्वर बलवान है तुम सब इस प्रकार जानो इसमकार जीव परतंत्र है । फिर दान्तदर्शनं देखो। तपयलापेक्षस्तुविहितप्रतिपिद्धावयादिभ्यः४२ अ० २ पा० ३ किये हुए मपलोंकी अपेक्षायुक्त परमात्मा करता है विहित या प्रतिपिदोंके पान होने आदि हेतुओसे सूर्यायथासर्वलोकस्यचक्षुर्नलिप्यतेचाक्षुपैर्वाह्यदोपः एकस्तथासर्वभूतान्तरात्मा नलिप्यतेलोकदुःखेनवाह्यः कठवल्ली अ०२ वल्ली०५ मं० ११ जैसे सूर्य सम्पूर्ण लोकोंफा वधु है वायदोप चक्षुमें लिप्त नहीं होता है (से ही सर्षभतान्तरात्मा एक है परन्तु लोकदुःससे आप नहीं लिम होता है।
२१२. दयानन्दतिमिरभास्करः। भयादस्यानिस्तपति भयात्तपतिसूर्यः भयादिन्द्रश्चवायुश्च मृत्युर्धावतिपंचमः २ वल्ली ६०३. जिसके भयसे अमि तपता है, जिसके भयसे सूर्य तपता है, जिसके भयसे इन्द और वायु और पांचवीं मृत्यु, दौडती है, तो विचारिये कि, फिर जीव कैसे स्वतंत्र रहसक्ता है और यही आशय वेदान्तशास्त्रके अ० २ पा०३ स० ४० । ४१।' सूत्र में कहा है जैसे कि, (परातु तच्छ्रप्तेः )यहाँसे इसका भाष्य देख लीनिये इस कारण जीव परतंत्र है। जीवलक्षणप्रकरणम् । स० पृ० १९३ पं० १२ ईश्वर और जीव दोनों चेतन स्वरूप स्वभाव दोनों के पवित्र अविनाशी और धार्मिकता आदि हैं परन्तु परमेश्वरके सृष्टि उत्पत्ति मलप स्थिति सबको नियममें रखना, जीवोंको पाप पुण्योंके फल देना आदि धर्मयुक्त , कर्म हैं जीवके सन्तानोत्पत्ति उनका पालन शिल्प विद्या आदि अच्छे बुरे कर्म हैं । पृ० २०११२५ समीक्षा यह क्या स्वामीजी कहने लगे, परस्पर महाविरोध है पहले तो लिखते हैं कि, दोनों ही स्वभावसे पवित्र हैं, फिर स्वभावसे पवित्र जीवमें बुरे फर्म कहाँस प्रवेश कर गये, और जो स्वभावसे पवित्र जीवमें बुरे कर्म प्रवेश करगये तो स्वभा- वसे पवित्र ईश्वर इससे कैसे बच सक्ता है, कहीं आप जीवको पवित्र कहीं पापी बताते हो यह आपकी बात गडबडीकी है. जीव शुद्ध ही है आपको उसका ज्ञान नहीं हुआ इससे ऐसा लिखा है कि जीवके सन्तानोत्पत्ति कर्म हैं इसमें कोई श्रुति तो लिखो कि जीवका सन्तानोत्पत्ति कर्म है ।। स० पृ० १९३ पं० १७ इच्छादेपप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनोलिंगमिति न्या. मू अ० १ आ० १सू० १० प्राणापाननिमेपोन्मेपमनोगतीन्द्रियान्तरविकाराःसुखदुःखेच्छाद्वेप प्रयत्नाश्चात्मनार्लिंगानि वैशेपिक सू० अ०३ भा०२०४ (इच्छा ) पदार्थोकी प्राप्तिकी अभिलाषा (देषः ) दुःखादिको अनिच्छा पैर (प्रयत्न ) पुरुषार्थ वल (मुख) आनन्द (दुःख) विलाप अप्रसन्नता (ज्ञान) विवेक पहचानना यह तुल्य है परन्तु वैशेषिक, (प्राणः) माण यापुका बाहर निकालना (अपान )माणको बाहर भीतर टेना (निमेप) रिसको मांचना (टन्मेप) आंखको खोलना (मन) निश्चय और अहंकार फरना (गति) पलना . सप्तमसमुल्लासखण्डनम्। (२३३ (इन्दिप ) सब इन्द्रियोंका चलाना ( अन्तर्विकार ) भिन्न २ क्षुधा तृपा हर्ष शोकादि युक्त होना ये जीवात्माके गुण हैं परमात्मासे भिन्न हैं, इन्हीं से आत्माकी प्रतीति करनी क्यों कि, वह स्थूल नहीं हैजबतक आत्मा देहमें होता है तभीतक यह गुण देहमें प्रकाशित रहते हैं और जब शरीर छोडकर चला जाता है तब यह गुण शरीरमें नहीं रहते जिसके होनेसे जो हों और न होनेसे न हों वे गुण उसीफे होते हैं, जैसे सूर्य और दीपादिकके न होनेसे प्रकाशादिकका न होना और होनेसे होना है वैसेही जीप और परमात्माका विज्ञान गुण द्वारा होता है ॥ २०२।१ समीक्षा-मूल मन्त्रसे विना सूत्रोंसे जीवके स्वरूपका निरूपण करनेसे स्वामी- नीकी यह प्रतिज्ञा भंग होतीहै कि मैं मन्त्र भागको स्वतः प्रमाण मानता हूँ कोई जीवके स्वरूपको अति लिखी होती और यह सूत्र भी जीवके इच्छादिमान स्वरूपके साधक नहीं किन्तु देहादिभिन्न आत्माफे बोधक है, देहादिसे भिन्न आत्माके अनु- मान करानेके वास्ते हैं, न्यायसूत्र में (आत्मनो लिंगमिति ) यह जो पाक्य है इसका अर्थ यह है इति आत्मनो लिंगम् ऐसा अन्वय फरनेसे यह अर्थ होता है (इति ) इच्छादि पूर्व उक्त आत्माके लिंग अर्थात् देहादि भिन्न आत्माफे अनुमान करानेवाले हैं जैसे धूम पनिका लिंग है और यह नहीं कहा जाता जो धूमयुक्त है यह यहि है क्योंकि वहिविना धूम काष्ठ लोहपिण्डादिमें भी है, ऐसेही इच्छादि सप आत्माके अनुमापक होगये तय इतनेसे यह नहीं हो सत्ता जो इच्छादिमान है सो आत्मा है क्यों कि आत्मा मुपुप्ति समाधिमें भी है और इच्छादि हैं नहीं इससे इस सूत्रमें इच्छादि गुणवाला आत्मा कहना स्वामीजीकी अविद्या है और वैशोपिकमें आत्मा विभु लिखा है। विभवान्महाकाशस्तथाचात्मा वै० अ ७ आ० १ सू० २२ (विभवात् अर्थात् सर्व भूर्त संयोगरूप विभुत्व होनेसे आकाश (महान् ) परम- महत् है (तथा) तैसेही सर्व मूर्तसंयोगित्वरूप विभुत्व होनेसे आत्मा भी परमम- हान है जब आत्मा विभु है तो गति कैसी यदि मात्मामें यह गुण होते ती मुक्ति नहीं होती गौतमनी मुक्ति में इन सबका दाना मानते हैं । दुःखजन्मप्रवृत्तिदोपमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापायतदन्तरापा- पायादपवर्ग:०१ आ० १सू०२ तदत्यन्तविमासोपव- गः गो० मू० २२ अ० १०१ दुःख जन्मकी प्रवृत्ति मिथ्या नान इनका जो अत्यन्त विमोक्ष भात् दृष्ट माना है उसीको अपवर्ग कहते हैं और भी कहा है " नम्वृत्तिःप्रतिसंधानामहानलेशस्य" न. आ१ सू० ६५ अर्यात् निसके केश दूट जाते हैं फिर टसको प्रवृत्ति (२३४) दयानन्दतिमिरभास्करः। नहीं होतीह फिर यदि यह आत्माके गुण हों तो इनका अत्यन्त विमोक्ष- हो सक्ताह और गौतमजी इनका नाश होना मानते हैं गुग गुणीसे पृयरन होता यह यदि आत्माके गुण होते तो अपवर्गमेंभी न कूष्टते, गौतमजी इना छूटजाना मानते हैं और यदि यह आत्माहीफे गुण हों तो शरीर सूटनेपर में अपने कुटुम्बियोंसे प्रीति शत्रुओंसे वैर होना चाहिये, खाने पीनेकी भी भस रोरमें इच्छा होवै आंख खोलकर देख मौवे परन्तु यह तो कुछ नहीं होता इससे यह आत्माके गुण नहीं है, किन्तु देहादिभिन्न आत्माके अनुमान करानेवाले हैं। यह इन्द्रिय मनादिक धर्म हैं. जैसे दीपक वलनेसे परकी सामग्री दृश्य आने लगती है, दीप निर्वाण होनेसे वह सामग्री उसी कोठेमें रहती है दीपफके संगनही जाती, इसी प्रकार जब तक आत्मा इस देहमें प्रकाश करताहै तबतक सब इन्दिप अपने अपने विषयोंका ग्रहण करती हैं,पृथक होनेसे ही लोप हो जाती हैं बालकको देप प्रपत्नादि नहीं होते यह लक्षण आत्माफे नहीं किन्तु देह भिन्न आमाके अनुः मानकराने वाले हैं, इसके अर्थ वात्स्यायन भाष्यमें विस्तारसे लिखे हैं उसमें देम लेना यहां हमने संक्षेपसे लिसे हैं । प्राणापाननिमेपोन्मेपनीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविकारः सेच्छा।पप्रयत्नाश्चात्मनोलिङ्गानि वे० अ०३ आ० २२० । देहमपति यायुफे कार्यगमनयत् रूप प्राण है और अधोगमनात रूपात है, सो यह दोनों प्राणापान यायु चेष्टा चेतनाधीन जडचेष्टापार ( रपचेष्टान) इससे आत्मा देहमाणभिन्न चेतन है यह सिद्ध हुआ ऐसे ही निमेषामेप म्यापर भी निपत है, सो भी चेतनका अनुमापफ है जीवनपदसे पृद्धि होना शरिर तर शरीरमें पाया भरजाना यह दोनोंका ग्रहण है, मो जीवितशरीरमं देगे जाते ! वहभी शरीरभित्र येतन के अनुमापा हैं, अनुमान गार यह है (इदं शरीरं माय पादिमन्यात पत्नैवं तनयं यया मृतशरीरम ) मनोगति भयांत मनमा ग्राही इन्दिपमें प्रवेश करना मो भी आत्माका अनुमाफ है, निसी सावधानता मनको प्रेरणा करती है सो आमा है, अनुमान प्रभारपा (मनो गतिः चेतना ना नहनिष्ठगतित्यात स्पतियत् ) मिस पुरुषन दभी नहर मवार या नीका म्याद पाप है, पुनः विसीक पाम नाय देशका र मम जो पानी भर जाता है निमका नाम टिपातविकार है, पहादिपान्नानि भी आत्मा अनुमापरहै, क्योंदिआगंगानमनी इमी प्रहार सित। इन्द्रिपान्तरविकारात् न्याय. अ.भा.१.१२ :(माय पनि हातमाय मगध या प्रमादित सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (२३५१ गृपमाणे रसनस्येन्दियान्तरस्य विकारः रसानुस्मृतौ रसगाईप्रवर्तितोदन्तोदकसं. प्लवमूतो गृह्यते तस्येन्द्रियचैतन्यानुपपतिः नान्यदृष्टमन्यः स्मरति ॥ अर्थ-किसी अम्ल फलके रूपमें वा गन्धमें निस पुरुषको रसके सहचारका ज्ञान है तिसके रसना इन्द्रियमें रसस्मृतिसे जो रसग्रहणकी इच्छा तिससे प्रस्त होती है तिस जलप्रसवणरूप विकारकी इन्द्रिय वैतन्य स्वामीजीके मतसे अनुप- पति है क्यों कि अन्यदृष्टपदार्थको अन्यको स्मृति नहीं होती, यहाँ.रस दर्शन तो रसना इंद्रियसे हुआ है और रसस्मृति वशु वा प्राणको फलकारूप देख वा गन्ध- ग्रहण करके कैसे होगी, इससे इन्द्रियोंसे सर्व अर्थका ग्रहण करनेवाला आत्मा भिन्न है यह मन्तव्य है और सुख दुःख इच्छा देष प्रयत्न यह पाँचों जैसे अने- फार्थदशी स्थायी आत्माके अनुमापक हैं, सो वात्स्यापनजाने अपने भाष्यमें लिखाद विशेष इच्छा हो तो यहाँ देख लो गौतमनाने यह इन्द्रियोंहीके धर्म लिखे हैं॥ बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानमित्यर्थान्तरम् गौ अ १ आ० १० १५. युगपज्ज्ञानानामुत्पत्तिर्मनसोलिंगम् गो ०१।१।१६ स्मृत्यनुमानागमसंशयप्रतिभास्वप्रज्ञानोहाः सुखादित्य- येच्छादयश्चमनसोलिंगानि गौतमभाष्य.३ ज्ञानायोगपद्यादेकंमनः ४ अ. ३ आ० सू०६१ भापार्थ:-बुद्धिसे ज्ञानकी यथार्थता जानी जाती है, अर्थात् भला बुरा बुद्धिसे ही निर्णय होताहै १ मनमें एकसमय दो धातोंका ग्रहण नहीं होताहै २. स्मृति- अनुमान आगम संशय विचार स्वमज्ञानतर्क सुखादि इच्छा यह मनके लिंग हैं ३ शानका विचार मनसे होता है, क्यों कि जिस धातुसे मन शब्द सिद्ध होता है, पह मन धातु विचारमें वर्तती है, विना मनके मनन नहीं होता ज्ञानलिंगत्वादात्मनोनविरोधः गो० अ०२ आ. १सू२३ अर्थात् आत्माका लिंग ज्ञान है यही मनुनीने सवफा लिंग पृथक् करदिया वल शुद्धज्ञान लिंग आत्माका वर्णन किया परन्तु आत्माका विचार वेदान्तशा- खस होताहै यह शास्र पदार्पविद्याके हैं इस कारण वेदान्तसे ही आत्माका निर्णय करते हैं। न जायते म्रियते वा विपश्चिनायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । मनो नित्यः शाश्वतोयम्पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे कठ० अ१ वल्ली २. १८ ० (२३६) दयानन्दतिमिरभास्करः। अर्थात् यह आत्मा न कभी टत्पन होता न मरता सर्वज्ञ है यह किसांसे हुआ नहीं मग है, नित्य है, शाश्वत अर्थात् पृद्धिक्षयादिसे रहित है शरीरके विनाश होनेसे विनाश नहीं होता। अशरीर शरीरेवनवस्थेष्ववस्थितम् ॥ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २१॥ कठ० अ० १ वल्ली २ मं०२१ यह आत्मा शरीरहित है, शरीरोंमें अवस्थित है, जिसकी स्थिति निधर नहीं होती वह महान विभु है ऐसे अपने आत्माको जानके धीर पुरुष शोव नहीं फरते, विभुमहान् कहनेसे अखडका बोध होताहै, अर्थात् सबसे स्थित होने भी अखंड है विभु होनेसे ॥ नायमात्माप्रवचनेनलभ्यानमधयानबहुनाश्रुतनयमेवैपवृणु- तेतेनलभ्यस्तस्यैपआत्माविवृणुते तस्वाम२२कठ०अ० १६०२ यह आत्मा वहुत पढनेहीसे नहीं प्राप्त होता न बुद्धिसे न बहुत श्रवणसे क्यों कि (इन्द्रियेभ्यः परा द्यर्थी अभ्यध परं मनः ॥ मनसस्तु परा बुद्धिर्बुइगमा महान परः अ० १ १०.३ श्रु० १० ॥) अर्थात् इन्द्रियोंसे परे अर्थ हैं अयामे परे मन मनसे परे बुद्धि और बुद्धिसे परे वह आत्मा है "यमेवेष पृणुते तेन सन्या जिसको यह इच्छा करता है तिसहीसे लभ्य है अर्थात् अपने आप आत्माको यदनो निष्काम सर्वसापनसम्पन्न फेवल आत्माकामी मुमुक्षु है सो जब ब्रह्मनिष्ठ आका यसे आत्मप्रातिके अर्थ प्रार्थना करता है तब तिस आचार्यसे तत्त्वमस्यादि महा। क्योंके श्रवण मननरूप उपाय करके ही प्राम होता है तिसको यह आत्मा अपने तनुको प्रकाशता है ॥ आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु ॥ बुद्धिन्तु सारथि विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ २॥ इन्द्रियाणि हयानाहुपियाँस्तेपु गोचरान् ॥ आत्मेंद्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीपिणः ॥ ४ ॥ कठ० अ०११३८३18 आमाको रयका यामी नानो (अपान अन्तःकरणविशिष्ट सोपाधि पर भोता ममारी नोगामा शरीरको बनाना, पुद्धिको मारयि क्यों कि रका मा पातार बुद्धिपर ही चलता है और मुद्धि रितात नेत्रसमान हनिमे EY ( २३७) इन्दियोंको यथा प्रमाणचलाती हैं मनको रस्सी जानो क्योंकि मनसे ही इन्दियों- का रोकना होता है ३ इन्द्रियोंको अश्व कहते हैं, चक्षुरादि और वागादि ज्ञान और कमोन्द्रियां पह घोडे हैं विषयोंको तिनके मार्ग जानों, अर्थात् शब्द, रुप, रस, गन्ध इन पांच विषयोंको इन्द्रियाँ रूपी घोडोंके चलनेक मार्ग जानो यह इन्दियों- रूपी घोडे शरीररूपा रथको विपयोंकी ओरही खींचते हैं इस कारण विषय मार्ग हैं यह आत्मा है जो वास्तवमें अकर्ता अभोक्ता परम शान्त अवल एकरस शान्त निर्विकार है, परन्तु ( आत्मदिपमनोयुक्तं भोक्ता ) शरीर इन्दिप मनयुक्त आत्माको भोक्ता ऐसा कहते हैं अर्थात् तिस आत्माको, शरीर इन्द्रिय मन आदि उपाधि सहित होनेसे आवागमन . पाला पापपुण्यके फल सुखदु- बादिका भोत्ता भोगनेवाला ऐसा मननशील विवेकी पुरुष कहते हैं अर्थात् फेवल नेरुपाधि शुद्ध अचल आत्माको गमनागमन कर्तृत्वभोक्तृत्वादि कुछ भी हैं नहीं तथापि बुद्धयादि उपाधिके सहित होनेसे बुद्धयादिकोंके कर्तृत्वभोक्तृत्वादि धर्म आत्मामें भासते हैं (बृहदारण्यमें यह मनके धर्म लिखे हैं) परन्तु यह धर्म आत्माके ही क्यों कि (ध्यायतीव लेलायतीव) यह बृहदारण्यकके छठे अध्यायमें है यह को शरीररूपी रथ निरूपण किया है विष्णुपदकी माप्ति इस ही रथद्वारा होती है रन्तु रथके चलानेकी मुख्यसामग्री बुद्धिरूपी सारथि ही है जिस रथीका सारथि (म विवेकी होता है सो राथिको अपने स्थदारा संसारके पार मोक्षास्य विष्णुके दको माप्त करदेता है और जिसका सारथि अविवेकी मूर्ख है सो जन्म मरण पी संसारहीको प्राप्त होताहै, परन्तु आत्माको कुछ दोष नहीं क्यों कि-' सूर्योयथासर्वलोकस्यचक्षुर्नलिप्यतेचाक्षुपेर्बाह्यदोपः। एकस्तथासर्वभूतान्तरात्मानलिप्यतेलोकदुःखेन बाह्यः ।। उपनि० कठ०२।५।११ निस प्रकारसे सूर्य सब लोकोंका प्रकाशक है और स्वयं लोकचक्षुदोपसे लिप्त होताहै इसी प्रकार सबका एक अन्तराल्मा है सो बाह्य दुःखसे लिप्त नहीं ITI आत्मामें कोई विकार नहीं है बुद्धयादिक आवरणसे कर्ता भोक्ता मालूम है परन्तु स्वामीनीने तो आत्माके लक्षण हो विगाडदिये जीवके गुण शि- वेद्या सन्तानोत्पत्ति लिखदिये भला जीव शिल्पी कौनसे शास्त्रसे सिद्ध करा वाक्य तो लिखा होता जीवविभुत्वप्रकरणम् । • पृ० १९४५० १७जीव शरीरमें भिन्न विभु है वा परिच्छिन (दत्तर) २३८) दयानन्दतिमिरभास्करः। परिच्छिन्न जो विभु होता तो जाग्रत मुपुप्ति मरण जन्म संयोग वियोग जाना आना कभी नहीं होसत्ता पं० २७ ॥ जैसे जीय ईश्वरका व्याप्य व्यापक सम्बन्ध है वैसे ही सेग्य सेवक आधाराधेय स्वामी भृत्य राजा प्रना पिता पुत्रादिमें भी सबन्ध है ।। २०३।५॥२०१।१६॥ समीक्षा-स्वामीनी यदि वेदान्तशास्त्रको गुरुस पढ़ते ती ऐसे भ्रम जालौन पडते क्यों कि इस लेखसे नीयका जन्म माना है और (अनामेको ) इसके अर्थन प्रकृति जीव तथा परमात्मा तीनों अन अर्थात् जिनका जन्म नहीं होता इस अपने विरोधयुक्त लेखकी भी स्थानीको किंचित् मात्र सुध न रही. यही तो अनभिज्ञता है परिच्छिन्न जीवको मानना यह जैनमत है, यदि नीच परिच्छिन्न परिमाण है तो कौनसे शरीरके तुल्प मानोगे यदि पुरुष शरीर तुल्य मानी तो इस्ती चींटी आदिफे शरीरमें प्रवेशको व्यवस्था नहीं होगी यदि संकोच विकास स्पभाष मानोगे तो विकारित्यादि प्रसक्तिसे पिनाशी वा जन्म सिद्ध होगा, इससे परिच्छिन्न अनादि सिद्ध नहीं हो सक्ता और जाग्रत् स्वम सुपुप्तिवाला जीवमानो तो तिसमें विचारना चाहिये कि. जाग्रत् क्या पदार्थ है "जाय निद्राक्षये" इस धातुसे निदाके नाशका' नाम जाग्रत् और निदाका नाम सुपिप्ति और मध्य अवम्याका नाम स्वम है निद्राका लक्षण पतंजलिजी लिखते हैं । अभावप्रत्ययालंबनावृत्तिनिद्रा यो० पा० १सू. १० अभावका जो कारण अज्ञान तिसे आलंबन करनेवाली मनकी वृत्तिका नाम निदा है अब विचारिये जाग्रत् तो मनको प्रमाणादिवृत्ति हे और केवल विष. र्यय पृत्ति स्वम है जिसकी वृत्ति है तिसका आश्रय भी वह ही है इससे जाया स्मामें जाग्रत् स्वम सुषुप्ति जाना आना मानना स्वामीनीकी अज्ञता है वेदान्त सूत्र में लिखा है। तद्गुणतारत्वाचतव्यपदेशःप्राज्ञवत् शा० अ०२ पा०३सू०२९ आत्मा अणु नहीं जन्म सुननेसे वह ब्रह्म ही है जोवरूपमें प्रविष्ट सुननेसे और तादात्म्यके कहनेसे ब्रह्म ही जीव कहाथा "ब्रह्माभिन्नत्वात् विभुर्जीः ब्रह्मवत्" फिर यदि ब्रह्म ही जीव है तो जितना नशा है उतना जीव होनेके योग्य है फिर अझ विभू है तो जीव भी विभु है "सवा एप महानन आत्मायोयं विज्ञानमयः प्राणेप्यिति. 1 | २३ " अणुयश्रुति औपाधिक अणुत्वपर है प्रधानति भुत्यके विरोधसे भावशैत्यको असिदिस अध्यस्तावपर यह कथञ्चिदर्थवाद है और अगुजीवको सब देहमें वेदना सिद्ध नहीं है यदि कहो कि, त्वचाके सम्बः न्यते हो सो भी नहीं, फांटा लगनेसे मी सव देहमें वेदना हो त्वचा कटिका सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (२३९) संयोग सब सवामें वर्तता हे और त्वचा सब देहमें व्याप्त है और काटा तो पांव तलेहीमें वेदना देताहै जो फहाया कि, गुणका भी गुणीसे विश्लेष है गन्धवत् "गन्धेनाश्रयाविलिष्ट गुणत्वापवत्" गुणकाभी गुणी देश है गुणी अनाश्रित गुणका गुणत्व ही न हो गन्ध भी गुणत्यसे स्वाश्य ही संचारी है अन्यया गुण- हानि हो इत्यादिशंकरस्वामीके भाष्यमें स्पष्ट है कि, जीव विभु है जिसे देखना हो सो वहाँ देखले, "जीवोऽनित्यः परिच्छिन्नत्वात् घटादिवत्"इस अनुमानसे अनि- यत्वापत्तिदोषसे परिच्शिन्नत्वकथन असंगत है ।। उपादानप्रकरणम् । स० पृ. १९० पं० १७ परमेश्वर जगत्का उपादान कारण नहीं निमित्त कारण है ॥ १९८ । १६॥ समीक्षा-स्वामीनी के इस प्रश्नके उत्तरमें वेदान्तदर्शनके सूत्र लिखते हैं जिससे विदित हो जायगा कि, परमेश्वर जगत्का अभिन्ननिमित उपा- दान कारण है। प्रकृतिश्च प्रतिज्ञा दृष्टान्तानुपरोधात सू० २३ अ० १ पाद । प्रकृति घट रुचकादिक मट्टी और सुवर्ण जैसे कारण हैं वा निमित्तकुलाल हेमकारादि जैसे कारण हैं तैसे ब्रह्मको फैसी कारणता हो यह विचार है, सो ईशापूर्वक कर्तृत्व सुननेसे केवल निमित्त कारण है " स ईक्षावके स माणमसज- दिग्पादि"कुलालादिनिमित्त कारणमें ही ईक्षापूर्वक कर्तृत्व देखा है, लोकमें अनेक कारकपर्विका क्रियाके फलफी सिद्धि देखी है यही न्याय आदि फर्नामें पहुंचानेके योग्य है जैसे राजा वैवस्वतादि ईश्वरोका फेवल निमित्त कारणत्व ही है तैसे ही परमेश्वरको भी केवल निमित्त कारणत्य ही जाननेके लिये युक्त यद्यपि ईक्षासे कर्तृत्व निश्चित है तथापिब्रह्म प्रकृति नहीं कर्ता होनेसे जो जिसका फर्ता है, यह उसकी प्रकृति नहीं जैसे घटफा कर्ता कुलाल जगत्फतास भित्रोपा- दानक है, कार्यसे पटके समान ब्रह्म जगत्का उपादान नहीं, ईश्वर होनेसे, रानाफे समान, जगत् ब्रह्म प्रकृतिफ नहीं अझसे विरक्षण होनेसे,जो इस प्रकारसे है, पह तैसे ही कुलारसे विलक्षण पट समान है नगरसावयष अचेतन अशुद्ध देखते हैं फारण भी उसका पैसा ही होना चाहिपे कार्यकारणका समान रूप देखनेसे ब्रह्म तो ऐसा नहीं है (निष्कलं निष्किपशोतं निरवयं निरंजनमितिश्यता०६।१९) तो अब ब्रह्म कारण नहीं बना प्रधान ही ठीक रहा ब्रह्मको कारण बताती श्रुति निमि- सकारणमें ही सोरही उठ पेठी, प्रधान घोधक स्मृति (इसका टचर )। तुम ती कहने पर इसका उत्तर सुनो प्रकृतिश्च ना ही उपादान यो निमित कारण यथा पृथिव्या- . इस विशेष स्मृतिसे जैसे लोकमै मृत् हेमादि उपादान कारण कुलाल हेमकाः अधिष्ठाताओंको अपेक्षा करके प्रवत हैं तैसे उपादान सत् ब्रह्म कारणको अन्य मयत वहुस्यां मजायेयेति तैत्तिरीय "तदेक्षत बहुस्यो प्रजायेति" अपाद (२४.) दयानन्दतिमिरभास्करः। मानो केवल निमित्त कारण नहीं क्यों कि" प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् " ऐसी प्रतिज्ञा और दृष्टान्त इनकी रोक न होगी प्रतिज्ञा " टततमादशममाक्ष्योपेनाभु श्रतम्भवत्यमतंमतमविज्ञातं ज्ञातमिति" दृष्टान्त एकके जाननेसे अन्य सब जान जाता है वह उपादान फारणके जाननसे सवफा जानना सम्भव है, क्यों कि कार उपादानसे भिन्न नहीं लोकमें निमित्त कारणका कार्यसे भेद है जैसे तक्षा साट भिन्न है दृष्टान्त भी उपादानफे विषयमें यया "सौम्येकेन मृत्पिण्डेन सर्व मृन्मय विज्ञातं स्पादाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यमिति तयैकेन लोह मणिंना सर्व लोहमयं विज्ञातं स्यादेकेन नखनिकृन्तनेन सर्वकार्णायसं विज्ञात स्यादिति"छt० प्रपा० ६ खं० १। हे सौम्य जैसे एक मट्टीके पिण्डसे सब मट्टीके वरतन जानलिये जाते हैं, केवल उनके नाममें वाणीमात्रका ही भेद है, सब मट्टी है इसी प्रकार एक लोहमणिसे सब लोहा जान लिया जाता है इत्यादि और ऐसे मुण्डक भी पढाहै "कस्मिन्न भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति " हे भगवन्! किसके जाननेसे यह सब जाना जाता है यही प्रतिज्ञा कर मोषधयः सम्भवन्ति " जैसे पृथ्वीमें औषधी होती हैं यही दृष्टान्त है और "आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वविदितमिति" निश्चय आमाहीमें देखने सुनने जाननेसे यह सब जाना जाता है यह प्रतिज्ञा बृहदारण्यकमें है सपया दुन्दुभेर्हन्यमानस्यनबाह्याच्छब्दानशक्नुपात् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु प्रहणेन दुन्दुभ्यः घातस्य वाशब्दो गृहीतः "जैसे नगाडेके बजनेमें उसके शब्दोंको ग्रहण कोई समर्थ नहीं होता और दुन्दुभीके ग्रहणसे दुन्दुभीके आपातका शब्द ग्रहन ही होजाता है वही दृष्टान्त है (यतो वा इमानि भूतानि जायन्त) जिस परमा मासे यह प्रजा उत्पन्न होती है इससे भी उपादान ही है "जनिकर्तुःप्रकृतिरिति अधिष्ठाता अपेक्षित नहीं है उत्पत्तिके पहले एक अद्वितीय था इस निश्चपसे अन्य अधिष्ठाताका अभाव भी प्रतिज्ञा वो दष्टान्तके निरोधसे फहाहुआ जानो । अभिध्योपदेशाच्च अ०१ पा०४ सू० २४. चेतनका कार्यके साथ भेद होना सुना है तिससे अवेतन .अणु और प्रयान विश्व निदान नहीं "अभिध्योपदेशश्चात्मनः कर्तृत्वप्रकृतित्वे गमपति प्रवृत्ति है तिसको कर्ता जाना जाता है यह प्रत्यगात्मविषयसे बहुत होनेसे सं- सफा प्रकृति भी जाना जाता है ।।. करनेमें सोश सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (२४१) साक्षाच्चाभयानानात् २५ जन्म और नाश यह दो शब्द ब्राहीसे सुने हैं जिससे निमित्त और उप दान ब्रह्म ही है अथवा ईक्षासे ब्रह्माको केवल निमित्त ही समझा था, जैसे कुम्हां भट्टीका द्रष्टा निमित कर्ता है, जिससे भतोफा जन्म है इस पश्चमी विभक्तिसे उप दानका अपादान नाम धरके ब्रह्मको प्रगट उपादान कहा है यथा हि"आकाशा घसमुत्पद्यन्ते आकाशं प्रत्यक्तं मन्तीति " "सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि इत्यादि अर्थात् यह सब उससे ही उत्पन्न होते हैं और यह सब पाणी सामेल होजाते हैं, इनमें साक्षात् ब्रह्महासे उत्पत्ति और मलय दोनों वेदोंमें कहे हैं, “इत. प्रकृति ब्रह्मपत्कारणं साक्षात् ब्रह्मैव कारणमुपादायोभी प्रभवप्रलपावाम्नायेत" जिससे जन्मता है वह निसमें मिलता है सो ही उसका उपादान प्रसिद्ध है मैं प्रोहियवादिकको पृथ्वी, साक्षादाफाशादेवेति श्रुति उपादानोतरके अभाव दिखाती है। स्वाप्यायात् अ०१ पा० १सू० ९ ब्राहीमें सबका लय कहा है तिससे भी प्रधान विश्व निदान नहीं है सोनाने सब चेतनोंका लय होता जिसमें सो ही चेतन विश्वनिदान है । गतिसामान्यात् १० जैसे नेत्रादि इन्द्रियां रूपादिमें समान गतिसे पत्ते हैं, तैसे सब वेद ब्रह्मको जगत् फारणःकहते हैं न कि, तार्किकोंके समान भिन्न कारण हैं " यथामेचलर सर्या दिशो विस्फुलिंगाविप्रतिहेरन् एवमेवैतस्मादात्मनः सर्व माणे यथा यतनं वि तिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोका इति" " तस्मादा एतस्मादात्मन आकार आत्मन एवेदं सर्वमिति, आत्मन एप पाणो जायत इति जैसे जलती हुई अभिसे विनगारी निकलती हैं, इसीप्रकार आत्मासे प्राण माणों देवता देवताओंसे लोकादि प्रतिष्ठित हैं, उसी परमात्मासे यह आकाशादि उत्प हुआ है, यह सब कुछ मात्मा ही है, आमासे ही प्राण उत्पन्न हुए हैं। श्रुतत्वाच११ वेदसे उपादान कारण कर्ता सब चेतन ही सुना है ययां हि- न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके नरोशिता नैव च तस्प लिंगम् सकारण करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिननिता नचाधिपः। श्वेता० अ०६।९. इस आत्माका लोकमें न कोई पति है न शिक्षक है न उसका लिंग है यह कारण करण है वह ही ईश है उसका कोई उत्पकर्ता वा अधिपति नहीं सम्भूत इति यह परमात्मा नानने योग्य जो यह अत्यन्त मुक्ष्म और इसमामा ओर जीरका आत्माहे पही सत्पस्वरूप और अपना आत्मा मारही • और जब दोनों एक भाकासमें पितोगपे पहरदमनन्द जैगे (२४२) दयानन्दतिमिरभास्करः। अर्थात् सब कुछ वही है इससे सिद्ध है, कि उपादान कारण इस जगदका पद रमा है इसका विशेष विवरण अगले समुल्लासमें करेंगे । महावाक्यप्रकरणम् । स०प्र० पृ० १९४ पं०३० से पृ० १९५ के अन्ततक प्रज्ञानं ब्रह्म, अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमास, अयमात्मा ब्रह्म" वेदोंके इन महा क्योंका अर्थ क्या है (उत्तर ) यह वेदवाक्य नहीं हैं किन्नु बाह्मग मन्थोके पर हैं और इनका नाम महावाक्य कहीं सत्य शास्त्रोंमें नहीं लिखा अर्थात् ( अहम मैं (ब्रह्म ) अर्थात् ब्रह्मस्य (अस्मि ) हूं यहाँ तास्थ्योपाधि है जैसे ( मंचाने शान्ति ) मचान पुकारते हैं मंवान जड हैं उनमें पुकारने सामर्थ नहीं इसति मंचस्य मनुष्य पुकारते हैं इसी प्रकार यहां भी जानना पुनः पृ० १९५ पं. नीवका ब्रह्मके साथ तास्थ्य वा तत्सहचरितोपाधि अर्थात् ब्रह्मका सहचारी जी है इससे जीव और ब्रह्म एक नहीं जैसे कोई किसीसे फहै कि, मैं और यह एको -अर्थात् अविरोधी है वैसे ही जो जीवसमाधिस्थ परमेश्वरके प्रेमबद होकर निमन होता है यह कह सक्ता है कि, मैं और ब्रह्म एक अर्थात् अविरोधी एकत्र कर स्य हैं, * जो जीव परमेश्वरके गुणकर्म स्वभावके अनुशल अपने गुगर्म सभा करताहै, यह साधम्र्यसे ब्रह्मके साथ एकता महसका है (प्रभ) अच्छा तो इसी अर्थ फैसा फरोगे (उत्तर) तुम तत् शन्दसे क्या लेते हो “मझ पदकी अनुशत्ति फहाँसे लाये। सदेवसौम्येदमग्रआसीदेकमेवाद्वितीयंत्रह्म । इस पूर्वयाक्पसे तुमने छान्दोग्यका दर्शन भी नहीं किया जो पादेवी होती तो यहां ब्रह्म शब्दका पाठ ही नहीं है ऐसा झूठ क्यों कहते फितु सादर उपम तौ ।। सदेवसोम्येदमग्रआसीदेकमेवाद्वितीयम् ।प्र० ६सं०२ म ऐसा पाठ है यहां ब्रह्म शब्द नहीं (प्रभ) तो माप तच्छन्दसे क्या लेते हैं स य एपोणिमतदात्म्यमिदछ सवैतत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति छ०प्र० ६सं० १४० केतो मिप पुष और पृ० २०३ पं०१८॥ यह सपने सप्तमसमुल्लासखण्डमम् । (२४३) तदात्मकस्तदन्तर्यामी त्वमसि उस परमात्मा अन्तर्यामीसे तू युक्त है ।। पृ० २०५६०२५ से समीक्षा-इस लेखमें स्वामीजीने दो वार्ता फयत करौं एक तो इन वाक्योंकी महावाक्प संज्ञा प्रमाणिक नहीं दूसरा इनको वेदत्व नहीं सो मंत्र ब्राह्मण नाम वेदका है यह तो आगे इसी समुल्लासमें सिद्ध करेंगे परन्तु. अब महावाक्यकी, व्यवस्था लिखते हैं, यहां महावाक्य संज्ञा अन्वर्य है जैसे तुमने ईश्वरके नाम दयालु न्यायकारी रख लिये हैं उसी प्रकार यह संज्ञा है "महदोषक वाक्यं महावाक्यम् अथवा महन्छ तदाक्पं च महावाक्यम " यह अन्वर्थ संज्ञा है भाव यह है कि महत् जो अखण्ड चेतन वस्तु तिसके बोधक होनेसे महावाक्य हैं और द्वितीय, 'पक्षमें महदाक्य हैं इससे महावाक्य है पहले पक्षमें तौ महत् शब्दकी महदोधक इतने अर्थमें लक्षणावृत्ति है और दूसरे पक्षमें ब्रह्मबोधकत्व ही वाक्योंमें महत्त्व है क्यों कि ब्रह्मा (महत् ) देश काल वस्तु परिच्छे रहित है, ऐसे ब्रह्मके वोधक होनेसे महावाक्य हैं, भाव यह है कि, भेद भ्रम निवारक वाक्यको अद्वतसिद्धान्तमें। अपनी परिभापासे महावाक्य कहतेहैं, जैसे पाणिनि ऋषिके मतसे वृद्धिशब्द पारे- भाषासे.आ ऐ ओ का बोधक होता है वैसे ही व्यास शंकर स्वामी अद्वैतसिद्धा. न्ताचार्योंके मतमें महावाक्य शब्द भी भेदभ्रमनिवारक वाक्योंमें पारिभाषिक हैं, इससे इन वाक्योंका नाम महावाक्य तौ सिद्ध हो गया, अन अहं ब्रह्मास्मि इसकी व्यवस्था सुनिये इसके अर्थ फरके बाबाजीने आप ही अपनी अविदत्ता प्रगट करी है क्यों कि अपनी उक्तिसे आप ही विरुद्ध कथन करा है ( य आत्मनि तिष्ठन् ) इस श्रुतिमें जीवात्माको आधारता और ब्रह्मको आधेपता कही है और इस वाक्पमें ब्रह्मपदकी ब्रह्मस्थ अर्थम लक्षणा करनेसे (ब्रह्मणि तिष्ठत्तीति ब्रह्मस्थः ) इस व्युत्पत्तिसे पुरुषाधार पंचवत् ब्रह्माधार प्रतीत होता है तब एक बृहदारण्य. कमें किसी वाक्यमें तो ब्रह्म आधार और जीव आधेय और किसी वाक्यमें जीव आधार और ब्रह्म आधेय यह प्रतीत होता है, ऐसे विरुद्ध अर्थक स्वीकारसे स्वामीजीकी अविद्या प्रतीत होतीहै जैसे पृष्ट १९६ ५० ३ में लिखाहै ॥ य आत्मनितिष्ठनात्मनान्तरोयमात्मानवेदयस्यात्माशरीरम् । यात्मनोऽन्तरोयमयति एपतआत्मान्तर्याम्पमृतः ।। (यह बृहदारण्यकका वचन है महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी स्त्री मैत्रेयीस कहते हैं फि, हे मैत्रेपि ! जो परमेश्वर आरमामें अर्थात् जीवमें स्थित और जीवात्मासे भित्र है जिसको मूट जीवात्मा नहीं जानता कि, यह परमात्मा मेरेमें व्यापक ह निस परमेश्वरका जीवात्मा शरीर अर्थाद जैसे शरीरमें नीव रहता है पैसे ही सो तो ठीक नहीं क्यों कि मूल प्रमाणसे विना अनुमानाभास होनाता मन सिक फर्मवादी सुख दुःख दाता फर्मको कह सकताहै इससे शब्द ममागसेन्कार (२४४) दयानन्दतिमिरभास्करः। जीवमें परमेश्वर व्यापक है जीवात्मासे भिन्न रहकर जीवके पाप पुण्याका होकर उनके फल मीवॉको देफर नियममें रखताहै वही अविनाशी स्वरूप भी अन्तर्यामी अर्थात् तेरे भीतर व्यापक है ।) यह दयानंदनीका कथन सर्वथा असंगत है इस लेखसे जीवात्माको आधा और ईश्वरात्माको आधेयता और अहं ब्रह्मास्मि इस वाक्यमें ब्रह्मपदबोध्य ईश्व माधारता और जीवमें आधेयता सिद्ध होती है सो ऐसे असंगत अर्थको स्वार जीके सिवाय और फौन लिख सकताहै और एक महा अज्ञानता यह है कि, उस लकयाज्ञवल्क्यके संपादकी श्रुतिको मैत्रेयी याज्ञवल्क्यक संवादको वर्णन की है कि इतनाभीज्ञान नहीं कि, क्या कहरहे हैं औरजो जीवको ब्रह्मके निकटस्य और मुक्ति साक्षात्सम्बधमें रहनेवाला और ब्रह्म सहचारी (अर्यात् ब्रह्मके साथ विचरनेवाला कहा सो तौ सर्वथा झूठ प्रलाप स्वामीजीके मतका विघातक है क्यों कि यदि जी निकटस्थ और दूसरे पदार्थ दूरस्थ और मुक्तिमें साक्षात्संबन्ध और वन्धमें परम्परा सम्बन्ध और जीवके साथ रहनेवाला है तो ब्रह्म एकदेशी परिच्छिन्न क्रियावत् होगा और जो जीवको ब्रह्मका अविरोधी रूप अथवा ब्रह्मको जविका अविरोधीरप कहा तो क्या जीव भिन्न पदार्थ ब्रह्मके विरोधी हैं, वे क्या ब्रह्मसे लड़ाई लड़ते हैं और वह एक अवकाश ब्रह्मसे भिन्न कौन है जिसमें समाधिकालमें ब्रह्म और जीव स्थित है सर्वका आधार ब्रह्म यदि किसी दूसरे अवकाशमें रहैगा तौ परिच्छिन्नत्वादि दोर युक्त होगा इससे अहं ब्रह्मास्मि इस वाक्यका व्याख्यान सर्वथा स्वामीनीकी अना नता प्रकाश करता है और यह जो लिखाहै (जो जीव परमेश्वरके गुण फर्म सभा वके अनुकूल अपने गुणकर्म स्वभाव करता है वही साधर्मायुक्त होताहै गन्ना साथ एकता कहसकता है ) इस स्थानमें यह विचारना चाहिये कि का गुण कर्म स्वभाव कौन है जिनके अनुसार अपने गुण कर्म करने चाहिने यदि सत्यकामत्व, सर्वज्ञत्व, सर्वशक्तित्व, नियंतृत्व धर्मादिफलपदत्व, यह और सृष्टिपालन संहारकर्तृत्वादि कर्म कहो तो इस गुण कर्मके अनुसार मन तत्सदृश गुण कर्म कहोगे तब तो यह गुण कर्म स्वामीजी मतमें मोसमें नहीं होते, तो बंधकालमें कहांसे होंगे यदि न्यायकारित्व कर्म और द६ त्वादि गुण परमेश्वरमें प्रसिद्ध हैं तत्सदृश गुणफर्म अपनेमें करना चाहिये। कहो तो किस प्रमाणसे परमेश्वरको न्यायकारी दपालु जानाहै यदि जीवोंके । दुःखको देखके अनुमान होताहै कि, कोई सुखदुःखदाता न्यापारी दया भारी दयाल निश्चय होगा तब तो परमेभरके अवतार माने विना न्यायकारी इ सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । भी सिद्ध नहीं हो सका सो स्वामीनीने माना नहीं तो परमेश्वरके गुणकम वभावानुकूल अपने गुणकर्म स्वभाव करने चाहिये यह कथन असंगत है हां रमेश्वरके अपतारादिमें गुण कर्म स्वभावके अनुसार आप भी अपने करे पर अव- बार तो माना नहीं हो फैसे अब भेदसाधक श्रुति जो स्वामीजीने लिखी उसे नमन लिखते हैं जिससे अभेद निश्चय होता है । यआत्मनितिष्ठनात्मनोऽन्तरोयमात्मानवेदयस्यात्माशरीरम् । यआत्मनोन्तरोयमयति एफ्तआत्मान्तर्याम्यमृतोऽदृष्टोद्रष्टा- ऽश्रुतःश्रोताऽमतोमन्ताऽविज्ञातोविज्ञातानान्योऽतोऽस्तिद्रष्टा- नान्योतोऽस्तिश्रोतानान्योऽतोस्तिमन्तानान्योऽतोस्तिविज्ञा- तेपतआत्मान्तयाम्यमृतोऽतोऽन्यदार्तम् श० १४६७३१ लोकमसिद्ध भेदका प्रथम श्रुति अनुवाद करके पश्चात् प्रमाणान्तराज्ञात अमे- सो प्रतिपादन करती है जो आत्मा अर्थात् विज्ञानोपाधिक कर्तृत्व भोक्तृत्व. पसे निर्णीत संसारी जीवमें कारणोपाधिक ईश्वर स्थित होकर तिस विज्ञानोपा- का कारण होनेसे तिससे अन्तर है और जिसको वह जीव नहीं जानता जिसका वात्मा शरीर है और वह ईश्वर जीवको अन्तरस्थित ही प्रेरणा करता है इतने तिभागसे औपाधिक भेद कहा अब दत्तर श्रुति भागसे अभेद कहते हैं याज्ञ- लय कहते हैं हे उद्दालक ! जो अन्तर्यामी अमृत तत्पदलक्ष्य अदृष्ट द्रष्टा और श्रुत श्रोता और अमत मन्ता पैसे ही अविज्ञात विज्ञाता है (एप ते आत्मा) ह तेरा स्वरूप है और (एप ते आत्मा) इस वाक्यका दयानंदनीने (वही मधिनाशी स्वरूप तेरा भी अन्तयामी आत्मा अर्थात् तेरे भीतर व्यापक है,) हि अर्थ लिखा है सो असंगत है क्यों कि पूर्व वाक्यसे इसी अर्थको वोधन फेया है इससे यह महावाक्य हैं भेदभ्रमनिवारक होनेसे और हे उद्दालक ! इस बैतन्य ज्योसिसे भिन्न द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता नहीं इस वाक्यसे जीव और श्वरके द्रष्टा श्रोता मन्ताविज्ञाताके भेदका निषेध करा पुनः दृढता करते हैं (एप आत्मा अन्तर्याम्यमृतः) यह अन्तर्यामी अमृत तेरा स्वरूप है इससे जो भिन्न स्तु है सो (आत ) विनाशी है, इस वाक्यके अर्थसे यह जनाया (पत्र ब्रह्म- भेनत्वं तत्र विनाशवत्वं ) जिसको ब्रह्मभिन्नत्व है तिसको विनाशवत्त्व है यदि तीवको ब्रह्मभिन्न मानेंगे तो तिसको विनाशपत्य होगा तब जीवको अनादि अनंतत्व कल्पना असंगत होगी. इससे जीवको ब्रह्मरूप करके ही अनादि अनंतख अब तत्त्वमसि वाक्यकी लीला देखिपे ( सदेव सोम्येति ) यह तत्वमसि .
'(२४६) दयानन्दतिमिरभास्करः। पाक्पका व्याख्यान लिखा है परन्तु इस स्थानमें जिस अद्वैतवादीके साथ प्रमो- तर हुमा है जाने यह पदान्ती भी कोई महामूर्ख है जिसे स्वामीनीके बृहदार- ण्पक बोधकी तरह छांदोग्यका वोध है क्यों कि यदि बृहदारण्यकका बोध होता तो याज्ञवल्क्य उद्दालकके संयादमें मैत्रेयीका संवाद न लिख वेटते और छांदोग्य श्रुतिमें सत् शब्दको प्रकृतिवाचक न लिखते जैसे स्वामीनी हैं वैसा ही कुशाग्र- बुद्धि उन्हें पूर्वपक्षी मिला है जिसने छांदोग्यका दर्शन भी नहीं किया ऐसेहीके मतका खंडन किया होगा यदि शंकराचार्य के सिद्धान्तका खंडन किया तो किसी शंकरमतके ग्रंथका वाक्य लिखते क्यों कि शंकरस्वामीजी के भाष्य प्रसिद्ध हैं खंडन तो क्या दयानंदजी शंकराचार्यके भाष्यकी पंक्ति भी नहीं समझसक्ते उपनिष- दोंका दर्शन भी नहीं किया । स्वामीने जो लिखा है कि, तच्छन्दसे ब्रह्मकी अनुवृत्ति वहाँसे लाये क्या तच्छन्द अनुवृत्तिके वास्ते है यदि अनुवृत्तिका बोधक होता तो असंगत होता क्यों कि अनुवृत्ति प्रकरणके बलसे वैसे ही हो सक्ती किन्तु ( सर्वनाम्नामुत्सर्गतः- प्रधानपरामर्शित्वम्) सर्वनामसंज्ञकशब्दोंको प्रधान अर्थकी परामर्शित्व अर्थात् ज्ञाप फता होती है सो इस प्रकरणमें सत् एक अद्वितीयरूप वस्तु ब्रह्म प्रकरणप्रतिपाय होनेसे प्रधान है तिसका लक्षण तत्पद है किसी पदकी अनुवृत्तिका बोधक नहीं स्वामीजीकी शंका समाधान वृथा है क्यों कि प्रथम एकपदसे एकपदकी अनुप्रति बोधन करनी फिर दूसरे पदसे अर्थको वोधन करना महागौरव है और (तत्सत्वं स आत्मा) इस अतिवाक्यका अर्थ यह फिया (पही सत्यस्वरूप और अपना आत्मा आप ही है) और (तत्त्वमसि ) इस वाक्यका अर्थ स्वामीनीने सह किया है उस परमात्मा अन्तर्यामीसे तू युक्त है इस लेखको असंगत करनेको सम्पूर्ण श्रुति लिखते हैं। अस्य सौम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्पां देवतायां, स य एपोऽणिमा-ऐत- दात्म्यमिदं सर्व तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो। 'छां० उ० प्र०६खण्ड ८ मं०६७ अर्थ-हे सौम्य ! इस म्रियमाण पुरुषके घागुपलसित सम्पूर्ण इन्दियति मन में लीन होजाती हैं और मन किंचित् काल अंतर ही संकल्पादि रहित होकर शा पुरुष लंबे लंचे वास लेता है, तब प्राणमें स्टीन होताहै प्राण भी किंचित् काल देखि ययावत् चल करतेनमें लीन होता है तेन भी किंचित काल रहता है तब उस तेगमे ही निश्चय करते हैं जो जीवता है फिर तेन भी परममूल कारणमें जो सत ब्रह्मा .
. सप्तमसमुल्लासखण्डनम् ! (२४७) तिसमें लीन होता है और दयानंदजी कहते हैं ब्रह्मका पाठ नहीं सो सर्वथा विद्या- हीनताका बोधक है, क्यों कि ब्रह्मशब्दके पाठ न होनेसे भी सत्का प्रकरण तो सम्पूर्ण पठाध्याय है यदि ब्रह्म सत् नहीं तो क्या असत् शून्यरूप है सो तो असं- गत है किन्तु सद्रूप है इससे ब्रह्मका ही प्रकरण है, जो यह पर देवता सदूप. ब्रह्म है सो (अणिमा) अत्यन्त सूक्ष्म है जिसमें मरण समय जीव लीन हुआ है मरण समपमें सब वागादि उपाधिका ब्रह्ममें लय कथनका भाव यह है ब्रह्मको सर्वकी उपादानता बोधन करना क्यों कि उपादानमें हो कार्यका लय होताहै दूसरा भी तात्पर्य यह है वागादिको उपाधिके लीन हुएसे जीवका स्वरूप केवल ब्रह्म है इससे ब्रह्मजीवका भेद केवल उपाधिकृत है क्यों कि उपाधिके अभावकालमें जीयत्वभाव प्रतीत नहीं होता ( इदं सर्वमैतदात्यम् ) ॥ एप सद्रूप आत्मा अन्तरात्मा यस्य सर्वस्य आकाशादिविराट् पिण्डांतस्य वस्तुमात्रस्य स प्रपंचः एतदात्मा एतदात्मनोभाव- सत्तारूपोऽर्थः । इदं सर्व वस्तुमात्रमतदात्म्यम् । एतेन प्रपंचस्य • ब्रह्मतत्तातिरिक्तसत्ताशुन्यत्वमपि वोषितम् । यथागन्धवत्वामित्यत्र' गन्धवच्छन्दोत्तरवृत्तिभावप्रत्ययस्य गन्धरूपार्थबोधकत्वं भाव- प्रत्ययस्य । तथाच सर्ववस्तुमावस्यात्मनः एतदात्मशब्दप्रति- पाद्यस्य ब्रह्मण इदं सर्वमितिपदप्रतिपाद्येन प्रपंचेन सह समानवि-- भक्तिकयोः पदयोरभेदसंसर्गेणान्वये प्रपंचस्य ब्रह्मतत्तातिरिक्तस- त्ताशून्यत्वमेव निश्चितमिति भावः ॥ शंकरभाष्य भावार्थ-सर्व वस्तुका आत्मा वास्तवरूप जो सबस्तु ब्रह्म है ( तत्सत्यं ) सो "नाशरहित है और ( सआत्मा) सोई जीव है यहां सदस्तु ब्रह्मको उद्देश्य करके आत्मा विधेय है और तत्त्वमसि यहाँ भी पुनः तच्छन्द बोध्य सद्राको उद्देश्य करके वंशब्दचोध्य जीवात्मा चेतकेतुसंधोध्य चेतन विधेय है इसका पुनः कयनः फरनेका यह भाव है जो कि पूर्व सआत्मा इस वाक्य आत्मा शन्द जीवात्माका. बाधक है और उत्तर वाक्यमें भी त्वंपदवोध्य आत्मा है अर्थान्तर नहीं इस प्रकार एकता दृढ होती है और केचित् भेद भ्रान्ति युक्त वास्तव भेदवादी यह कहते हैं ( तत्वमसि ) इस पास्यमें तस्य त्वं तत्त्वम् इत्यादि समास करके भेदको सिद्ध. करते हैं तिनके भ्रम दूर करनेवास्ते सआत्मा यह पृथक् अभेद बोधक वाक्यकाः उपदेश करा है क्यों कि इस वाक्यमें समासकी संभावना ही नहीं हो सक्ती और -- .
(२४८) दयानन्दतिमिरभास्करः। उद्देश्य विधेय भाषस्थलमें भिन्न पदजन्य पदायाँपस्थितिकी शाब्दबोधमें कारणता देखी है. यदि समासकर एक पद होगा ती विभिन्नपदजन्य पदार्थोपस्थिति के अभावसे उद्देश्य विधेय भाव ही नहीं होगा और पूर्व वाक्यमें अभेद और उत्तर वाक्यमें भेद यह कथन असंगत होगा और दयानन्दनीन (तत्सत्यं समात्मा ) इसका (पही सत्य स्वरूप अपना आत्मा आप है) यह अर्थ लिखा है आशय स्वामीजीका यह है सशब्द आत्मशब्द दोनों ब्रह्मके बोधक हैं यदि इस वाक्यमें अपना आत्मा आप है यही अर्थ विवक्षित हो तो ( य आत्मनि तिष्ठन् ) इस श्रुति वाक्यमें भी अपने आत्मामें आप ही स्थित है, अपना नियंता आत्मा आप ही है इस अर्थके करनेसे, दयानंदनीका भेद ही रसातलको चला जायगा, यदि इस श्रुतिमें ( आत्मनि) यह पद जीवात्माका बोध है तब (सआत्मा) इस श्रुतिमें भी आत्मशब्द जीवात्माका बोधक है जैसे एकमेंआधाराधेयभाव असंभव है वैसे ही आत्मा आत्मवत्वभी एकमें असंभव है और उत्तर वाक्यसे विपमता होगी, क्यों कि " तत्त्वमसि " का उस परमात्मा अन्तर्यामीसे तू युक्त है यह अयं कर तय फहना चाहिये कैसे युक्त है तो यहीं फहना होगा जो तेरे अन्तर अन्तर्यामी है तो जीवका आत्मा परमेश्वर हुआ तो अपना आत्मा आप कैसे होसका है, यदि अपना आत्मा आप हुआ तो जीव परमात्मासे अभिन्न सिद्ध होगया स्वयं स्वामीजीके मुखसे और यह भी सोचना चाहिये, परमात्मासे कौन वस्तु युक्त नहीं सर्व वन्न परमात्मासे युक्त हैं यदि निकटस्थ जीवको कहोगे तो परमात्मानें व्यापकत्वका भंग होगा और वाक्यमें युक्त अर्थका बोधक पद कौन है और यह भी विचार करना जहाँ अत्यन्त भेद होता है वहाँ समान विभक्तिवाले शब्दोका प्रयोग नहीं होता जैसे घटः पटः इस शब्दप्रयोग कर्ताको भ्रान्त कहते हैं तैसे याद जीवसे परमात्माका अत्यन्त भेद है, तो तत्त्वम्, अहंब्रह्म, प्रज्ञानं ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म यह शब्द प्रयोग कैसे होंगे और जहां अत्यन्त अभेद् होताहै हां भी समान विभक्तिक शब्दप्रयोग होता नहीं, जैसे कटः कलश यह प्रयोग नहीं -होता इसी प्रकार जब सशब्द तयाआत्मा शब्द ब्रह्मके ही बोधक होगये तो (सः) ब्रह्म आत्मा ऐसा शब्दप्रयोग नहीं होना चाहिये, पुनरुक्ति दोष इसमें आता है परन्तु जहाँ औपाधिक भेद और वास्तव अभेद होताहै वहां ऐसा शब्दप्रयोग होताहै जैसे "नीलो घट:"इस वाक्यमें नीलस्वघटत्वधर्मसे भेद है वास्तव नीलरूपवत् व्यक्ति एक वस्तु है तैसे (सआत्मा तत्त्वम् ) इस स्थानमें भी जीवत्व परमेश्वरत्व उपाधिका ही भेद है वास्तव एफव्यक्तिसत् चित् आनन्द है (प्रश्न)जीवत्व और परमेश्वरत्व उपा- विका नाम फैसे होगा यह दोनों तो धर्म है ( उत्तर ) ऐसे समझो श्रुतिमें नर 'वाक मन माण तेग यह कार्यरुप उपाधिके होते जीव कहा और इनफे अभा' -सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । चमें कारणामा ब्रह्मपर देवतारूपता कहा तब यह निश्चय हुआ जो कार्य टपा. धितत्संस्कारविशिष्ट सदंश है,सोतोजीप और कारणोपाधिविशिष्ट सदश परमेश्वर है, इतनेसे यह निश्चय हुना जो उपाधि विशेषण और चित् सत् वस्तु विशेष्य और भाव अर्थमें वप्रत्ययका यह स्वभाव है कि विशेषणीभूत वस्तुका बोधक होता है, जैसे नीलशब्द जब नीलवत् गुणीका बोधक है, तब नीलत्य पद नील गुणमानका बोध होताहै, तैसे जीव विशेषण कार्य उपाधि जीवत्व है और 'परमेश्वर उपाधिकारणत्व संपादक विचित्रशक्ति परमेश्वरत्व है और वास्तव व्यक्ति सच्चिदानन्द वस्तु अखंड है, ऐसे अखंडार्थबोधक होनेसे इनकी महावाक्य- संज्ञा परिभाषिक है और हट छोड यह भी समझना चाहिये कि, इस स्थानमें अस्मिपद और असिपद वर्तमान कालके प्रयोग हैं, यदि समाधिस्थ होकर वा गुणकर्म परमेश्वरके अनुकूल करके पश्चात् कह सत्ता तो वर्तमान कालके प्रयोग न होते इस कारण यहां ऐसा उपदेश है जैसा कि, फर्णको सूर्यभगवानुफा कुंती- पुत्रत्व टपदेश भ्रमसिद्धि राधापुरत्यकी निवृत्तिके वास्ते था:दयानंदजीने जो कहा 'कि (तदात्मकस्तदन्तर्यामी त्वमप्ति )उस परमात्मा अन्तर्यामीसे तू युक्त है, यह असंगतहै क्योंकि एक विज्ञान में सर्व विज्ञान प्रतिज्ञा उद्दालक ऋपिने जो कि उप- देशके प्रारम्भमें प्रथम करी है उसका भंग होगा और इस प्रकारका अर्थप्रकरण- विरुद्ध है क्यों कि मह मकरण अन्तर्यामीका नहीं किन्तु नियमाणं जीवका जो वास्तवरूप है जहाँसे तेग आदि जगद उत्थान होनेसे जीवत्व भाव होता है, और तिनकी लीनतामें जीवत्वभाव निवृत्त होताहै तिसका मकरण है, इस प्रकार मौढ युक्ति और श्रुति प्रमाणसे अहंब्रह्मास्मि औरतत्वमसि इन वाक्योंका अर्थ निरूपण होगया तो "प्रज्ञानं ब्रह्म अयमात्मा ब्रह्म"इत्यादि सर्व महावाक्योंके अर्थका निर्णप होगया, और इतने ही महावाक्य हैं यह नियम नहीं किन्तु भेदभ्रम निवारण यावत् हैं चे महावाक्यही हैं प्रज्ञान शब्द और आत्मा शब्द अवस्थात्रतयसाक्षीका बोधक है और अयं शब्द अखण्ड चैतन्पमें अपरोक्षताका बोधक है इस प्रकार विविध परिच्छेद धर्जित अखण्ड चैतन्यके वोधक सब महावाक्य. होगये और औपाधिक भेद और वास्तव अभेद सिद्ध होगया यदि औपाधिक भेद वास्तव अभेदका बाधक होपः अथवा उपाधिसे दुकडे होवे तो आकाशका वास्तव अभेदको बाध और पटादि उपाधिसे आकाशके टुकडे होगाने चाहिये उससे उपाधिसे चेतनके टुकडे और चेतनमें वास्तव भेद कल्पना स्वामीजीका प्रलाप है । पृ० १९६ पं० १६ अनेनात्मना * जीवनानुप्रविश्य नामरूपे। * अनेन जीवनात्मनानुप्रविन ऐसा पाठ भी है।
(२५०) दयानन्दतिमिरभास्करः। व्याकरवाणि--छां०प्र० ६खं०३मं०२॥ तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्-तैत्तिरी ब्रह्मानं० अनु०६ अर्थ पं० २२ में यहां ऐसा समझो एक प्रवेश और दूसरा अनुप्रवेश अर्थात् पश्चात् प्रवेश कहाता है परमेश्वर शरीरमें प्रविष्ट हुए जीवोंके साथ अनुप्रविष्टकी समान होकर वेदद्वारा सब नामरूपादिकी विद्याको प्रगट करता है और शरीरमें जीवको प्रवेश करा आप जीवके भीतर अनुपविष्ट होरहा ह। २०५ । १४ समीक्षा--स्वामीजी अपनीसी बहुतेरी करतेहैं पर कुछ वसाती नहीं जो निस मार्गहीमें न चलाहो वह उस मागको क्या जाने देखिये व्याकरणशास्त्र भी यहाँ भूल गये ॥ अनुर्लक्षणे अ०१४।८४ यह अष्टाध्यायीका सूत्र है। अर्थ-लक्षण अर्थ में अनु उपसर्ग कर्मप्रवचनीय संज्ञावाला हो ॥ . कर्मप्रवचनीययुक्त द्वितीया २।३।८ पाणिनीय अर्थ-कर्मप्रवचनीय संज्ञक पदसे जो युक्त है दूसरा पद तिसमें द्वितीया विभक्ति हो अब इसपर जो भाष्यकार लिखते हैं सो सुनिये ॥ शाकल्यस्य संहितामनु प्रावपत् शाकल्येन सुकृता संहिता मनुनिशम्य देवः प्रावर्पत महाभाष्य अ० १ पा०४आ०१ अर्थ-शाकल्प ऋपि मुटु कृतकारी संहितानाम सीमाको देखकर देय पान करता हुआ पहले उदाहरणका अर्थ दूसरे यचनसे आपही भाष्यकारने किया? क्योंकि भाष्यकारफी पह शैली है अपनी फठिन उक्तिका आप ही पारपान कर हैं जैसे घेदने संक्षिप्त अर्थमन्योंका माझणभागसे घ्याख्यान किया है जो अपडून मानो महाभाष्पके व्यास्पान पाक्य भी किसी दूसरेके होने चाहिये अप मुनि (तस• ) इस श्रुति पवनमें भी अनु लक्षण अर्थमद तप यह अर्थ सिदामा मगत्को रचफर (नदेवानु निशम्य मायिशत् ) तिस जगतको देसारमश करता हमा (लक्ष्यतेनेनेति सक्षम् )निस कर कुछ भी खानाप मा सक्षम माप्पो टक्त दादरणमें शाकल्पकृत सीमाका देयमे देखना सो वर्षणके दिसा एक्षण है और महत पति रूप टदाहरणमें नो परमेश्वर कर माल नाम: तका अपनेमें देखना है सो प्रवेशका पतानहारा है भाव यह है कि गो उपाधि असे मनुप्पाई हिरपामा विराई एमी प्रतीति होती है माई मां को सप्रीतिम प्रदेश महानाना, पान नहीं में पदापा मुरि सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (२५१) जो अहंकारको अपनेमें देखकर अहनामवाला परमात्मा हुआ अहंकारको जो अपने में देखाना यही प्रवेशका लक्षण है यथाहि- . आत्मवेदमन आसीत् पुरुषविधः सोऽनुवक्ष्यि नान्यदात्म- नोऽपश्यत सोऽहमस्मीत्यग्रे व्याहरत्ततोऽहनामाभवत् । बृ० उ० अ०३त्रा०४ अर्थ- इदं मनुष्यादिशरिजातम् अग्रे-इस उत्पत्तिसे पूर्व आत्माही पुरुषाकार. हुआ, सो पुरुपाकार * आत्मा अनुवीक्ष्य-देखकर अर्थात् आत्मासे पृथक् वस्तुको न देखकर अहमस्मि ऐसा सबसे प्रथम उच्चारण करताहुआ, उच्चारणमात्रसे ही अहंनामवाला होगया, इसी प्रकार जो अपनेमें हिरण्यगर्भादि पिपीलिकातक देहों- का स्फुरण होकर प्रतीति होना है सोई अनुप्रवेश है और अनुशन्दका अर्थ जहाँ पश्चात् होता है वहां भवेश और अनुप्रवेश दोनों मुख्य होते हैं जैसे “राजा प्रासादे प्रविशति अमात्योनुमविशति" राजा मंदिरमें प्रवेश करता है पीछे अमात्य प्रवेश फरता है दयानंदनीके मतमें जब जीवने प्रवेश करा तव परमेश्वर ती व्यापक होनेसे प्रथम ही प्रविष्ट है और यह जो कहा (जीवको प्रवेश कराकर आपजीवके भीतर अनुपविष्ट होरहा है ) सो भी असंगत है अनुप्रविष्ट हो रहा है क्या प्रथम प्रविष्ट न था सो तो पहले भी जीवमें प्रविष्ट था पीछे प्रवेश करना ही कैसे कहस- तेहैं देखो जैसे शरीरके गृहमें प्रवेश होनेसे शरीरांतर्गत अन्न जलादि वा आफा. शादि या मनोबुद्धि आदिक ( अनुपविष्ट ) पश्चात् माविष्ट हैं वा साथ ही प्रविष्ट हैं वस जव साय ही प्रविष्ट हुए तो जीवान्तरवर्ती ईश्वर भी अनुप्रविष्ट नहीं किन्तु सहमाविष्ट है व युगपत् प्रविष्ट है ऐसा कहना चाहिये अनुमविष्ट कहना नहीं बनता और यह भी भूल मत करना जो जन्मादिवत् प्रवेश भी जीवमें आरोपित है(देह- स्थत्वेनोपलब्धिः प्रवेशः ) देहमें स्थित रूपसे प्रतीत ही प्रवेश है जो लक्षण अर्यमें अनुको इस भुतिमें नहीं मानेंगे किन्तु पश्चात् अर्थमें मानेंगे तो प्रवेश और अनु- प्रवेश दोनों मुख्य होने चाहिये तैसे तदेव इसके स्थान में तस्मिन्नेव इस प्रकार सप्तमी विभक्ति होनी चाहिये जैसा" राजा मासादे प्राविशत् अमात्योऽनुपाविशत्" ऐसा प्रयोग होता सो श्रुतिमें नहीं करा इस कारण इसका अर्थ स्वामीजीका किया हुआ मिप्या है यहो पाकरणशास्त्रको भी लपेट धरा ॥ स०प्र०पृ० १९७ पं० १० जीवे शौचविशुद्धचिदिभेदस्तु तयोर्दयोः अविद्यात- * मा० प्र० में पुरुषविधः का अर्थ न्यापक स्तम्प लिखाहै तु. रामसे पूछा जाय आप पुरुष नहीं होन्याक स्वरूप हो वा निराकार हो।
दयानन्दतिमिरभास्करः। च्चितोयोगः पडस्माकमनाय ॥ कार्योपाधिरयं जीवः कारणोपाघिरीश्वरः।कार्यकारणतां हित्वा पूर्णवोधोऽवशिष्यते॥ यह सहेर सारीरक और सारीरक भाष्यमें कारिका है । पृ० २०६ पं० १३ सीता चन्द है स्वानीनीकी सत्यता और विद्याको जो महाझूठ लिखते नहीं लगाते विदित होता है कि कभी संक्षेप शारीरक और शारीरकका दर्शन भी नहीं किपा उक्त दोनों प्रन्योंमें यह कारिका ही नहीं है प्रथम वचन तो वार्तिककार मुरे धराचार्यका है प्रमाणरूपप्रन्योंमें बहुधा लिखा जाताहै दितीय वचन आयर्वणो. पनिषद्का है जो प्रमाण विधि बहुत ग्रन्थों में लिखी जाती है परन्तु उक्त दोनों अन्यों में प्रमान विधि या उपन्यास कुछ भी नहीं करा इससे यह स्वामीजीका प्रमाद है वेदान्तका दर्शन स्वप्नमें भी नहीं किया ॥ * स०३० पृ० १९९६०२१ब्रह्मके सत् चित् आनन्द और जीयफे अस्तिभाति मियरूपसे एकता होतीहै फिर क्यों खण्डन करते हो ( उत्तर ) किंचित् सापम्प मिलनसे एकता नहीं हो सक्ती जैसे पृथ्वी जड दृश्य है वैसे जल और अमि आदि भी जड़ और दृश्य हैं इतनेस एकता नहीं होसक्ती इनमें वैधर्म्य भेदकारक अर्याद विरुद्ध धर्म नैसे गन्य माता काठिन्य आदि गुण पृथ्वी और रसद्वत्यफोमलत्यादि धर्म जल और रूप दाहकत्वादि धर्म अमिके होनेसे एकता नहीं, जैसे मनुष्य और कोडी आंखसे देखते मुखसे खाते पगसे चलते हैं तथापि मनुष्यकी आकृति दो पर और कीडीकी आकृति अनेक पग आदि भिन्न होनेसे एकता नहीं होती पैसे परमेश्वरके अनन्त ज्ञान आनन्द बल क्रिया निर्धान्तित्व और व्यापरता जीयर जौर जीवके अल्पज्ञान अल्पवल अल्पस्वरूप सब भ्रान्तित्व और परिच्छिन्नतानि गुण ब्रह्मसे भिन्न होनेसे जीव और ब्रह्म परमेश्वर एफ नहीं क्यों कि इनका स्वरूप भी परमेश्वर अति सूक्ष्म और जीव उससे कुछ स्थूल होनेसे भिन्न है॥२०८।१० समीक्षा स्वामीजीका यह लेख भी चैतन्यरूप सत्यानन्द आत्मामें भेदश साधक नहीं किन्तु विज्ञानमयकोश और आनन्दमयकोशके भेदका साधा है कया कि इन्हीं दोनोंमें किंचित् स्थलता और सूक्ष्मता वाद्यता अन्तरता वनसकी। जोर पृथ्वीको गन्ध, रूक्षता, काठिन्यरूपसे जलसे भेद फहा है तिममें या पूछना है कि, पृथ्वीका जलसे अत्यन्त भेद है या औपाधिक भेद है यदि आपन सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (२५३) उत्पत्ति नहीं होती इस प्रकार जलसे पृथ्वीको उत्पत्तिके असंभव होनेसे (अन्यः पृथिवी ) यह श्रुति दयानन्दजीके मतमें व्यर्थ होगी इस कारण जल और पृथि- वीका औपाधिक किंचित् भेद है जैसे दुग्धसे दधिका और अमिको दाहकत्वादि धर्मयुक्त होनेसे जलादिसे भिन्न कहा सो भी अशुद्ध है क्यों कि (अमेरापः अद्यः पृथिवी) अमिसे जल उत्पन्न हुआ जलसे पृथिवी तो * यह श्रुति भी व्यर्थ हो जायगी और अनन्त पृथिवी कार्य औपाधि दाहकत्वादि धर्म है तिनको पृथि- पीत्व नहीं होना चाहिये और मनुष्यर्फ.डीका भी भेद किंचित् विकारसे है वास्तव भेद नहीं पदि वास्तव भेद हो तो 'कुष्टी मनुष्यो न ' ऐसी प्रतीति न होनी चाहिये, इस कारण सर्वथा स्वामीजीका वेदान्तसे अनभिज्ञपना सवित होताहै वेदान्त सिद्धान्तमें परमाण्वादि अस्वीकृत हैं । स० पृ. २००५०३ अथोदरमन्तरं कुरुते अथतस्यभयं भवति द्वितीयाद्वेभयंभवति । पंक्ति ७ में अर्थ लिखाहै कि, जो जीव परमेश्वरका निषेध वा किसीएक देश कालमें परिच्छिन्न परमात्माको माने वा उसफी आज्ञागुणफर्म स्वभावसे विरुद्ध होवे अथवा किसी दूसरे मनुष्यसे वैर करै उसको भय माप्त होताहै ॥२०९ । १२ समीक्षा-जब कि स्वामीजीने गुरुमुखसे वेदान्त पठन नहीं किया तो उसके ऊपर लिखना व्यर्थ ही है भला इसमें जीव परमेश्वरका निषेध देशकालपरिच्छिन गुणकर्मस्वभाव यह कहाँसे लिखदिये यह अर्थ सब ही भ्रष्ट है इसका अर्थ यही है कि, जो आत्मासे धर देखताहै उसोको भय होताहै क्यों कि- अभयं जनकप्राप्तोसिअपमहमस्मीति । वृह त्रा०२।४ तत्र को मोहः कःशोक एकत्तमनुपश्यत इति । ईशावास्यमं०७ जब आत्माको जाना तब ही जनानीको अभप मामि हुई "ब्रह्मास्मीति "मैं ही हूं यह सब वही है जो सर्वत्र एक देखता है टसको कुछ भय नहीं होता यह अभय है "आत्मा एवेदं सर्वम् ।" यह सब आत्मा हो है वेदान्तशाखमें ॥ शास्त्रदृष्टयातूपदेशो वामदेववत् ३० प्र० अ० पा० १ जैसे तत्त्वमसि इस पाक्यको देखकर वामदेव ऋपिने कहा है कि, मैं ही मनु सर्प और कक्षीयान् हुआ था तैसा ही इन्द्रने कहा कि, मैं ज्ञानरूप हूं न इसीकी उपासना कर (अहंमनुरभवं सर्पश्चाहं कक्षीषानित्यादि ० म०४ सू०२६ मं०१) * मा०प्र० में इन प्रकरणोंरर कुछ भी लिखते नहीं बना है कहीं हेतु और प्रकरण विल्कुल छोड गये हैं सत्य मो हैं विना पदे वेदान्त क्या समझानाय केवल अतिका मनमाना अर्थ करटेते हैं। * मेरठ के स्वामीने यहाँ निध्या लिखाहै कि वामदेव के प्रति तत्तमासे वास है द. ति० भा०में कहा है दिखाओतो।
(२५४) दयानन्दतिमिरभास्करः। इस प्रकार यदि फोई इस कालमें भी जीपात्माको अझ जानताई जलतरंगपत् इन दोनोंके अभेदको जानताह पही ब्रह्मभाषको प्राप्त हो अभय होताहै ॥ स. पृ० २०१६०२ (म.) ईश्वरमें इच्छा है या नहीं (उत्तर पं०२५)ईश्वरमें इच्छाफा तो संभय नहीं किन्तु इसण अर्थात् सब प्रकारकी विद्याका दर्शन और सब सष्टिका फरना गहताह ॥ २११३६ समीक्षा-अच्छे प्रभोत्तर किये हैं जैसे गुरु वैसे चेले, ईश्वरमें कामना क्यों नहीं यदि कामना नहीं तो यह सृष्टि कहसि आगई, यदि विना इच्छाके सब ही जगद, फी रचना होगई तो ईश्वरफी आवश्यकता क्या है (चौद्धमत ही होनाय ) इस लिये ईश्वरमें इच्छा है । आनन्दमय प्रकरणसे मुनाद कि, एकने बहुतकी इच्छाकी "सोकामपत बहुस्सा प्रजापति" वह परमात्मा कामना करताहुआ कि, मैं बहुतरूप होकर प्रतीत होऊ तैत्ति “एक रूपं बहुधा यः करोति" जो एक रूपको बहुत कर लेताईनिसे विशेष देखनाहो वेदान्तदर्शनमें देखले ।। वेदप्राप्तिप्रकरणम् । स० पृ०२०२६०१७ (वेद) जीवोंको अन्तर्यामीरूपसे उपदेश कियाहै पंक्तिर से किनके आत्मामें कब वेदोका प्रकाश किया (उत्तर) पृ०२०२।२०।२१२१६ ॐ अमेऋिग्वेदो जायते वायोर्यजुर्वेदः सूर्यात् सामवेदः शत० ॥ ११॥४।२।३ इन #पियोंके आत्मामें एक २ वेदका प्रकाश किया (प्रभ) यो वै ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । यह उपनिषद्का वचन है इस पचनसे ब्रह्माजीके हृदय में वेदोंका उपदेश किया है फिर अमि आदि ऋपियोंक आत्मामें क्यों कहा (उत्तर) ब्रह्माके आमामें अमि आदिके द्वारा स्थापित कराया देखो मनुमें क्या लिखाहै ॥ ११२ । १३ पृ० २०३ पं०३ अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम् ॥ दुदोद यज्ञसिद्धयर्थमृग्यजुः सामलक्षणम् ॥ मनु०१।२३ जिस परमात्माने आदि सृष्टिम मनुष्योंको उत्पन्न करके अमिआदि चारों महर्षियोंके द्वारा चारों वेद ब्रह्माको प्राप्त कराये और उस ब्रह्माने अमि वायु आ. * १८९७ के स०प्र० म अमे ऋग्वेदो ऐसा पाठ लिखाह ।
सप्तमसमुल्लासखण्डनम। (२५५) दित्य और अंगिरासे कपः साम और अथर्वका ग्रहण किया क्यों कि वही सबसे अधिक पवित्रात्मा पे पृ० २०१५०५ जो परमात्मा उन आदि मृष्टिक ऋपियोंको वेद विद्या न पढाता और न पढते तो सब लोग अविद्वान रह जाते (पुनः पं० २२) धर्मात्मा योगी महर्षि जब जिसके अर्थ जाननेकी इच्छा करके ध्यानापस्थित हो परमेश्वरके स्वरूप में समाधिस्य हुए तब २ परमात्माने अभीष्टमंत्रोंके अर्थ जनापे जब पडतोंकी आत्मामें पेदार्य प्रकाश हुआ तब ऋषि मुनियोंने यह अर्थ और ऋषि मुनियोंने इतिहासपूर्वक ग्रंथ बनाये उनका नाम प्राह्मण अर्थात् मह जो घेद उसका व्यापान ग्रंथ होनेसे ब्राह्मण नाम हुवा ॥ २१२ । २२ समीक्षा-स्वामीजीने तो अपना मत ही नवीन कल्पित किया है जबतक सब बातें सनातन धर्मसे उलटी न लिखते तब तक उनकी ख्याति कैसे होती जैसे कि, पवन हम लोगोंसे उलटी ही रीति करते हैं हम जिसे रक्षा करें (गो) उसे मारै हम सीधे परदेका अंगरखा पहरे वे वायका हम चौका दें वे भ्रष्टाचार करें इत्यादि विपरीत ही फरते हैं इसी प्रकार स्वामीजी, हम फहें मूर्तिपूजन भाद अब- तार, पतिव्रत घेदमत है वे फहैं यह सब झूठ है और नियोग ( व्यभिचार ) ठीक है, हम फैहैं वेद ब्रह्मापर आये वे फहैं नहीं चार ऋषियोंपर आये, यहां यह विचार कर्तव्य है कि मृष्टिकी आदिमें कौन ऋषि उत्पन्न हुए स्वामीजीने तीन ऋपियोंका मृष्टिकी आदिमें उत्पन्न होना लिखा पर कोई प्रमाण नहीं दिया इस कारण उनका कहना मिथ्या है मृष्टिकी आदिमें ब्रह्माजी उत्पन्न हुर यह वेदमें लिखा है पपा हि- ब्रह्मज्येष्ठासंभृतावीर्याणि ब्रह्माज्येष्ठंदिवमाततान ।। भूतानां ब्रह्माप्रथमोहतजज्ञेतेनाईतिब्रह्मणास्पधितुंकः।। अथर्ववेदे १९।२३ । ३० (ब्रह्म) ब्रह्मने (ज्येष्ठा ) बड़े ( वीर्याणि ) बल ( सम्भृता धारण किये हैं (ब्रह्म)ब्रानेही (अग्रे)मृष्टिके आरम्भमें (ज्येष्ठं दिवम् )बडे द्युलोकको (आतता; न)विस्तार किया है (भूतानाम्) सब प्राणियोंमें (मथममोहत) पहले वही (ब्रह्मा) प्रारूपसे (जज्ञे) प्रगट हुआ है (तेन) उस (ब्रह्मणा) ब्रह्मसे (स्पर्धितुम् ), स्पर्धा करनेको (कः) कौन समर्थ है ( हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे १३ । ४ यजु०) कि हिरण्यगर्भ ब्रह्मा सबसे पहले उत्पन्न हुए मनु भी यही लिखते हैं कि, ब्रह्माजी बसे पूर्व उत्पन्न हुए। .
१ कहीं तो छोटे स्वामी प्रसाद अर्थ ब्रह्माण्ड करत कही मेपानी विद्वानमा परी . (२५६) दयानन्दतिमिरभास्करः। तास्मनज्ञे स्वयं ब्रह्मा. सर्वलोकपितामहः ॥ १॥ ९. उस अण्डरूपब्रह्माण्डसे सबसे प्रथम ब्रह्माजी प्रगटे हुए मुण्डक उपनिष में यही लिखाहै ॥ “ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । ब्रह्माजी सब देवताओंसे प्रथम उत्पन्न हुए जो संसारके रक्षक और विभा बनानेवाले हैं फिर भी- यो देवानांप्रभवश्वोद्भवश्वविश्वाधिपोरदोमहर्षिः । हिरण्यगर्भजनयामासपूर्वसनोबुद्धयाशुभयासंयुनक्तु। इवता० ३४ जो परमात्मा इन्द्रादिक देवताओंके प्रभवका कारण है और विश्वका स्वामी और पापियोंको रुवानेवाला और सर्वज्ञ है जिसने पूर्व अर्थात् सृष्टिकी आदिम श्रीब्रह्मानीको उत्पन्न किया वह परमेश्वर हमको शुभ बुद्धि के साथ संयुक्त को और कपिलदेवजीने भी सांख्य शास्त्रके तीसरे अध्यायमें ब्रह्मानीका. सृष्टि की आदिमें होना माना है । आंब्रह्मस्तंम्बपर्यन्तंतत्कृतेसृष्टिराविवेकात्।कपि०अ०३०४७ 'यहाँ ( ब्रह्मासे लेकर ) इस शब्दसे ही ब्रह्माका सृष्टिकी आदिमें होना सिद्ध है पाराशरजीने भी निज सूत्रोंमें ब्रह्मानीको उत्पत्ति पूर्व ही मानी है। सकलजगतामनादिरादिभूत ऋग्यजुः सामादिमयी भगवद्विष्णुमपस्य ब्रह्मणो मूर्तिरूपं हिरण्यगभों ब्रह्माण्डतो भगवान् ब्रह्मा प्राग्वभूत । सारे जगत्फा कारण हिरण्यगर्भ ब्रह्माण्डसे पहले उत्पन्न हुआ जैसे कि कार लिखे ग्रन्योंसे ब्रह्माजीका सष्टिकी आदिमें उत्पन्न होना स्पष्ट लिसा है इसी प्रकार यदि स्वामीनी किसी वतिसे आन्पादि ऋपियोंका सब देवताओंसे अपम होना और ब्रह्मानीको वेदोंका पटाना सिद्ध करते तो उनकी यह यात सीधार फरने योग्य होती अन्यथा नहीं अब वह दिखाते हैं जो प्रह्मानीपर ही प्रथम थे। प्रगट दुर॥ यो ब्रह्माणविदधातिपूर्वयोववेदांश्वप्रहिणोतितस्मे तहदेवमात्मबुद्धिप्रकाशंमुमुक्षुर्वेशरणमइंप्रपद्योश्वेता म०६८ वेदवेदाका अर्थ करते हैं पर क्या इसमे बालीका आदि होना भामद होगकलहै ! इसी में :विदयानि यादिपका अर्थ मेटेमे नही मिटमकता । " सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (२५७): अर्थ यह है कि, जिस परमात्माने(पूर्व ) अर्थात् सृष्टिंकी आदिमं ब्रह्मानीको उत्पन्न किया और जिस परमात्माने ब्रह्माजीहीके लिये वेदोंको दिया उस ही प्रकाशस्वरूप आत्मज्ञान के प्रकाश करनेवाले परमात्माको मैं मुमुक्षु शरण होताई देखो इस श्रुतिमें (पूर्व) शब्द है जिससे विदित है कि, परमात्माने सृष्टिको आदिमें ब्रह्माजीके हृदयमें वेदोंका प्रकाश किया और शतपथकी श्रुतिमें ऐसा कोई शब्द नहीं जिससे सृष्टिकी आदिमें अग्न्यादिके जन्मका बोधक हो और इस श्रुतिमें (वै) शब्द है जिसका अर्थ अन्ययोगव्यवच्छेद अर्थात् सृष्टिकी आदिमें ब्रह्माजीके ही लिये वेदोंका टपदेश किया दूसरेको नहीं क्यों कि अन्ययोगव्यव- च्छेद दूसरेके योगके पृथक् करनेको अर्थात् दूर करनेको कहते हैं इससे यही विज्ञान होता है कि, सृष्टिकी आदिम परमात्माने केवल एक ब्रह्माजीके हो हृदयमें वेदोंका प्रकाश किया (4) शब्दका अन्वय तत् शब्दके साथ होगा जो कि ब्रह्माका याचक है और जो वै शब्दका अन्वय यत् शब्दके साथ कर जो परमात्माका वावक है तो यह अर्थ होगा कि ब्रह्मानीको वेदोंका उपदेश परमात्माहीने किया, है अब बुद्धिमान विचार करें कि ऐसा कोई शब्द शतपयकी श्रुतिमें निकलता है, इस कारण स्वामीजीका कथन सर्वथा अशुद्ध है फिर ऋग्वेद मंडल १० सू० ९५ मंत्र १४ में लिखा है। यस्मिन्नश्वासऋषभासंजुक्षणावशा मेपाअवसुष्टास आताः ॥ कीलालपेसोमपृष्ठायवेधसैद्धदामुर्तिजनये चारमग्नये ऋ० म० १० अ० ८ सू० ९१ मंत्र १४ यहां (वेधसेहदामतिजनये) इसका पर्य यही है कि, परमात्मा ब्रह्माजकि हृदयमें वेदोंका प्रकाश करता हुआ ॥ फिर स्वामीजीने अभ्यादिकोंको महर्षि कहाहै यह सर्वशास्त्रबाह्य है किसी प्रथमें इनको महर्षि ऋपि नहीं लिखा परन्तु वेदादि शास्त्रों में इन नामके देवता लिखे हैं। अग्निदेवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रमादेवतेत्यादि । यजु० अ० १४ मं०२० अर्थ स्पष्ट हैं स्वामीजी और टनक पंथी पक्षपात छोडकर विचार करें कि, स्वामीजीका यह कथन कि, अध्यादिकने ब्रह्माजीको वद पटाये वेताश्वतरकी श्रुतिसे लेशमात्र भी नहीं पायाजाता यह उनकी कपाल कल्पना है अब यह तो सिद्धान्त होनुका कि, वेद ब्रह्माजीपुर प्रगट हुए और सृष्टिकी आदिमें ब्रह्माजी . .
(२५८) दयानन्दतिमिरमास्करः। उत्पन्न हुए अंब ( अनि ) इस श्रुतिका अर्थ दिखलाते हैं इस श्रुतिक देखनेसे पिदित होता है कि, शतपय फभी स्वामीजी के दृष्टिगोचर भी नहीं हुआ अपवा देखा होतो भूल गपे क्यों कि सत्यार्थप्रकाशमें इस श्रुतिको कई जगह अशुद्ध लिखा है प्रपम अमि शन्दके आगे पे बढाया है और ऋग्वेदेके आगे जायते यह पढापा है यजुदके आगे सूर्यात् यह पद नहीं है किन्तु आदित्यात् यह पाउ है स्वामीनीने भ्रमसे श्रुतिका पाठ अस्तव्यस्त लिखा है प्रसंगसहित पूर्ण पाठ इस प्रकार है॥ प्रजापतिर्वाइदमग्रआसीदेकएव । सोकामयत वहुस्यां प्रजा- येयति सोऽथाम्यत्स तपोतप्यत तस्माच्छ्रान्तात्तेपानात्रयो- लोका असृज्यन्त पृथिव्यन्तरिक्षंद्यौः १ सइमांस्त्रीलोकानभि- तताप तेभ्यस्तप्तेभ्यस्त्रीणिज्योति प्यनायन्तानियोय परते सूर्यः २ स इमानित्रीणि ज्योती ७ प्यभितताप तेभ्यस्तते- भ्यस्त्रयोवेदा अजायन्ताग्वेदो वायोर्यजुर्वेदः सूर्यात्साम- वेदः ३ सइमाँस्त्रीन् वेदानभितताप । तेभ्यस्तप्तेभ्यत्रीणि शुक्राण्यजायन्त भूरित्युग्वेदाद् भुव इति यजुर्वेदात् स्वरिति सामवेदात् ४ श० कां० ११ अ० ५ १८३-४ य-पहले प्रजापति सृष्टिकी आदिमें थे उन्होंने इच्छा की कि मैं बहुत होनाऊं सो तप किया उस तपसे उन्होंने तीन लोक निर्माण किये पृथिवी अन्तरिक्ष और शुलोम फिर इन तीन लोगोंको तपाया तो तीन ज्योति प्रगट हुई अमि वायु और सूर्य २ फिर ब्रह्माजीने इन तीनों ज्योतियोंको तपाया तो उन तपे हुओंसे तीन वेद प्रगट हुए अमिसे ऋग्वेद वायुसे यजुर्वेद सूर्यसे सामवेद ३ तब फिर प्रजापतिने इन तीनों वेदोंको तपाया तब इनसे तीन व्याहृति हुई ऋक्से भूः । यजुर्वेदसे भुगः। सामवेदसे स्वः 1 आशय यह कि, भूमिका सारअमि अमिका सार ऋग्वेद है, इसमें भूसम्बन्धी पदार्थो का विशेषरूपसे कथन है, अन्तरिक्षका सारवायु वायुकासार या पेंद है इसमें अन्तरिक्षके पदार्थीका विशेषरूपसे कथन है, जैसे यज्ञ करनाउस। फल आहुति मेयरूपसे परिवर्तन होना इत्यादि, यलोकका सार आदित्य और मादित्यका सार साम है, सामदारा परमानन्दकी प्राप्ति करना इत्यादि अप मनापतिने ज्ञानरूप तपस प्रथम मनमें ही यह त्रिलोकी और वेदत्रयो देखली पाठे नमको प्रगट किया और मनुनी भी यही कहतेहैं (अभिवायुरविभ्यस्त ) अनि युवा और रविसे यज्ञ सिद्धि के लिये सनातन अक यजुस्सामको ब्रह्मानीने दुस . सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । -यहां पढ़ना नहीं है यह. ऋषि हैं.किन्तु यह .ज्योति हैं.मानसिक विचारसे ब्रह्मा- जीने दुहा है। अब यहां दयानन्द और उनके चेले बल्ली लगा कि, यह अमि, पायु, रवि इस शतपयकी श्रुतिमें ऋषि कहाँ हैं यदि ऋपि सम्पादनकी सामर्थ्य हो. तो लघुस्यामी हो यह प्रसंग सम्हालें, पर सत्यके सामने असत्य कहां ठहर सकता है इसीसे तो कहते हैं स्वामीजीको शायका मर्म नहीं आता था, ब्रह्मासे. पहले, अमि आदि न थे तथा हि: तदण्डमभवमिं सहस्रांशुसमप्रभम् ॥ तस्मिनशे सयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः । अ० १ ० ९ यह जो बीज सुवर्णके सदृश पवित्र और सूर्यके समान प्रशाशित ईश्वरकी इच्छासे अंडके आकार होगया उसमें आप ब्रह्माजी सब लोकके पितामह उत्पत्र हुए जब ईश्वरने ब्रह्मानी सबसे प्रथम उत्पन्न किये अमि आदि सृष्टिके अन्त- गैत हुए इनसे ब्रह्माका घेद पढना असंगत है और देखिये- सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक्पृथक् ।। वेदशन्देभ्य एवादो पृथक्संस्थाश्च निर्ममे १श्यो०२१ ब्रह्माजीने सृष्टिकी आदिमें सबके नाम और सबके कर्म वेदके शब्दोंसे जान- फर भित्र २ बनाय गोजातिका नाम गौ, अश्वजातिका नाम अश्व, मनुप्पजातिका -नाम मनुष्य रक्खा जब सबके नाम और वायुका फर्म घेद शब्दोंसे जानकर बनाये तो निश्चय है फि, अमिका अभि और वायुका वायु आदित्यका आदित्य नाम घेदसे ही ब्रह्मानीने रक्खा है यह कौनसा बंद था, कि, सब एटिकी आदिमें अमिकी अमि संना वायुफी वायु, आदित्यको आदित्यसंज्ञा होनेसे पहले ब्रह्मागीके पास था, जिससे उन्होंने सबके नाम रक्खे इससे यही विदित है कि, सृष्टि के प्रथम ब्रह्मानीपर ही वेद आये यदि इन तीनोंपर ही वेद जाते तो वही -सबके नामको व्यवस्था वेदानुसार करते ॥ . कर्मात्मनां च देवानां सोसृजत्पाणिनां प्रभुः॥ साध्यानां च गणं सूक्ष्मं यतं चैव सनातनम् ॥ अ० १ श्लो० २२ उस प्राणियोंके मनु ब्रह्मानीने फर्मवभाववाले देवताओंका समूह सापोंका ससूद और सनातन पतसरी उत्पन्न किया इस शोकमें प्रभु शब्द ब्रह्मानीका विशेषण है अर्थ उसका जनरु अर्थात् पिता है क्योंकि निराति उसकी यह है कि मकण भवत्यस्मादिति अर्थात् निससे जन्म ही बड़ी स है इससे यही विदित होता है कि, अमि- आदिको गंगनाभी इसी देवगणमें है इससे बाहर . (२६०) दयानन्दतिमिरभास्करः। नहीं है इसके आगे (अभिवायुरविभ्यस्तु ) यह २३ वा श्लोक है ब्रह्माजीने तीनों ज्पोतियोंको देवगणको सृष्टिके संग उत्पन्न किया और वेदानुकूल र नाम रक्खे जब कि. इनकी उत्पत्ति और नाम रखनेहाके पहले ब्रह्माजीके प. घेद विद्यमान थे तो क्यों कर हो सक्ता है कि, अमि सुर्य वायुंने ब्रह्मानीको पढाये अब अंगिरासे वेद पठनेकी वार्ता सुनिये ॥ ब्रह्मादेवानां प्रथमः सम्बभूवविश्वस्य कर्ताभुवनस्यंगोप्ता स ब्रह्मविद्यासर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वायज्येष्टपुत्रायप्राह * अथर्वणेयांप्रवदेतब्रह्माथ तांपुरोवाचाङ्गिरसेब्रह्मविद्यांसभार- द्वाजायसत्यवाहायपाहभरद्वाजोंगरसे परावराम्।मुण्डक०॥२४ विश्वके कर्ता भुवनोंके रक्षक ब्रह्माजी सब देवताओंसे पहले हुए ब्रह्माजीन घह वेदविद्या जिसके सर्व विद्या आश्रय हैं अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्व ऋषिको पढाई. अथर्वने यह ब्रह्मविद्या अंगिरा पिको पहाई, अंगिरा ऋपिने भारद्वाजगोत्र सत्यवाहको पढाई उसने वह परावर विद्या अंगिराको पढाई, धन्य है स्वामीजी निर्णयपर श्रुतिमें तो अंगिराको शिष्यपरम्परा करके ब्रह्मानीका चतुर्थ शिष्य गिना है और स्वामीजी कहते हैं कि, अंगिराने ब्रह्माणीको अथर्ववेद पढाया जाने इस कथनसे स्वामीजीने अपना क्या लाभ समझा है फिर एक बडा आधर्ष पर है कि, परमात्माने अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिराको एफ २ घेदका उपदेश किया और उनके द्वारा ब्रह्मानीको चारों वेदोंकी माप्ति फराई अंगिराता अपा- येद गुप्त हो रहा यदि परमात्माने अग्न्यादिकामसे किसी एफको चारों वेदोंका अधिकारी नहीं समझा और ब्रह्मानीको चारों पदोंका अधिकारी जाना तो ब्रह्माजीको स्वतःचारों वेदोंका उपदेश क्यों न किया निदान स्वामीनी यापा नसे भी यही प्रगट हुआ कि, अग्न्यादिकोंकी अपेक्षा ब्रह्मानी पूर्णविद्वान हैं इसी कारण श्वेताश्रतरमें आया है कि । तद्वेदगुह्योपनिपत्सुगूढंतरावेदते ब्रह्मयोनिम्।। श्वेता००००६ ! सप्तमसमुल्लासखण्डनम् (२६१) है उसको ब्रह्माजी ही जानते हैं जैसे कि, ब्रह्माजीका ब्रह्मज्ञान उपनिषद्से प्रगट है वैसे अमिप्रभृतिके ब्रह्मज्ञानमें कोई प्रमाण नहीं ब्रह्मज्ञान तो एक ओर है अमि तौ देवताओंमें भागप्राप्तिके लिये प्रार्थना करता है । अनिर्वाअकामयत अन्नादादेवानांस्याम् । अमि यहां प्रार्थना करता है कि मैं देवताओंमें अनभाग पानेवाला होऊ और पराशरसूत्र में आदित्यको ब्रह्माजीके पुवका धेवता वर्णन किया है । ब्रह्मणश्चदक्षिणांगुष्ठजन्मादक्षः प्रजापतिः दक्षस्याप्यदितिरदितर्विवस्वानीत. पा. अर्थात्-ब्रह्माजीके दक्षिगांगुष्ठसे दक्षप्रजापति उत्पन्न हुए और दक्षप्रजापतिसे अदितिनामकी कन्या उत्पन्न हुई उससे विवस्वान् अर्थात् आदित्य उत्पन्न हुआ यहाँसे प्रगट है कि, आदित्य ब्रह्माजीक पुत्रका धेवता है और मनुजीके १ अध्यायके ३२ श्लोकका यह आशय है कि, ब्रह्माने एक स्त्री और. एक पुरुप उत्पन्न किया, उनसे विराद विरासे मनु और मनुसे अंगिरा उत्पन्न हुआ तो अंगिरा ब्रह्माजीकी चौथी पीटीमें हुआ, अंगिरा आदित्यके जन्मसे बहुत पहले चारों वेद ब्रह्माजीके पास विद्यमान थे उन्होंने वेदके शब्दोंसे अंगिरा और आदित्यके पितापितामहादिकोंके नाम रक्खे, फिर यह क्योंकर होसकाहै कि अंगिरा और आदित्यने ब्रह्माजीको साम और अथर्ववेद पढाया. यदि ईश्वर मथम इन्हींको वेदका उपदेश करता तो वही सबके नाम और कर्म और लौकिक व्यवस्था घेदानुसार निर्माण करतेन कि, ब्रह्माजी, और अथर्ववेदको बृहदारण्यकादि उपनि- पदोंमें जो आंगिरस कहाहै उसका कारण यह है कि, अंगिरा ऋपिने मुंडकोपनिषद्के पचनानुसार ब्रह्मानांके शिष्पके शिष्पने इस वेदको पढकर अपर्षको ऐसा इस्तामलक किया कि, उसीके नामसे सम्बद्ध होगया यदि स्वामीजीके कथनानुकूल अपर्ववेदका नाम इसलिये आंगिरस होता कि, गिराके हृदयमें ईश्वरने उसका प्रकाश किया तो स्वामीनोके मतानुसार ऋग्वेद अभिके नाम यजुर्वायुके नामके साथ सम्बद्ध होता परन्तु कहीं इसका विह भी नहीं पाया जाता इसलिये इस विषयमें जो कुछ स्वामीजीने लिखाहै वह निर्मूल है फिर स्वामीनीने यह जो लिखाहै कि,(अब भी जो कोई चारों वेदोंको पढताहै वही यज्ञमें ब्रह्मासनको पास और उसीका नाम ब्रह्मा भी होताहै ) इससे भी यही विदित होताह कि, चारों घेदोंकाब्रह्माजीक साप सम्बन्ध विशेष है दूसरेके साथ वैसा नहीं है और वह पही है कि, आदि साष्टिभ ब्रह्माजीको ही वेदोंका उपदेश दियाहै इसी कारण अब भी घेदाभ्यासयुक्त पुरुष ब्रह्माका प्रतिनिधि गिना जाता है यज्ञमें यदि स्वामी- . (२६२, दपानन्दतिमिरभाकरी नीकी नाई दौता ती यंदकं जाननेवाले पक्षमें, अग्न्यादिका प्रतिनिधि होते या सामीनी और उनके शिष्य वेद, शास्त्रको पयार्य विचार करते तो ऐसे धोखें न पडते और (स पूर्वपामपि गुरुः ) इस योगसूत्र में अग्न्यादिकॉक कुछ म वर्णन नहीं है किन्तु पूर्व से व्यासनीने भी योगभाष्यमें ब्रह्मासे आदि ले ऋषि यांका यह गुरु है यही वर्णन किया है इससे स्वामीनीका कथन असत्य है, अब मंत्र ब्राह्मण दोनोंका नाम चेद है इस विषय में लिखा जायगा ॥ स्वामीजीन भी ब्रह्मानीको प्रथम माना है जैसा यजुवेदक प्रयम अंकमें नोटिस छपा है कि ब्रह्मासे लेकर जैमिनितम्के ग्रन्थ साक्षीकी समान प्रमाण मानता हूं इससे भी प्रथम ब्रह्मा हुए यह सिद्ध है ।। मंत्राह्मणप्रकरणम् । स०प्र० पृ० २०५५०६ संहिता पुस्तकके आरम्भ अध्यायकी समाप्तिमें वेद यह सनातनसे शब्द लिखा आताहै और ब्राह्मण पुस्तकके आरम्भ वा अन्यायकी समातिमें कहीं नहीं लिखा और निरुतमें- इत्यापिनिगमोभवति, इति ब्राह्मणम् नि० अ०सं०३।४ छन्दोब्राह्मणानि च तद्विपयाणि अप्टाध्या० ४।२।६६ यह पाणिनीय सूत्र है इससे भी स्पष्ट विदित होताहै कि, वेद मंत्रभाग और आह्मण व्याख्या भाग है इसमें जो विशप देखना चाहैं वे ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकामें देसलें अनेक प्रमाणांसे विरोध होनेसे ॥ मंत्रब्राह्मणयोवेदनामघयम् का सू० यह कात्यायनका वचन नहीं होसक्ता जो ऐसा माने तो वेद सनातन कभी नहीं हो सक्ते क्यों कि ब्राह्मण ग्रंथों में ऋषि मुनि राजादिकोंके इतिहास लिखे हैं और इतिहास जिसका हो उसके जन्म पश्चात लिखा जाता है किसी मनुष्यको संज्ञा घेदमें नहीं है स० पृ० २०६ पं० १७ जो किसीसे कोई: पछै तुम्हारा क्य मत है तो यही उत्तर दे कि, हमारा मत वेद है, जो कुछ वेदोंमें कहा है हर उसको मानते हैं ॥ २१५।२ समीक्षा-स्वामीजीने यहां भी अपनी ही धुनि निकाली भला मंत्र और माझा गंको आप वेद नहीं मानते और कहते हो कि, अनेक प्रमाणोंसे विरोध होनेसे पद कात्यापन वचन नहीं होसकता अब हम यही प्रमाण दिखावंगे कि, सवही आ. चार्योंने यह बात माना है कि, मंत्र और ब्राह्मण मिलकर वेद कहाता है अपम तो आपहीन उपनिषदोंको भी वेद माना है स०प० ११५० २ देखिये घेदोंमे ऐसे .
सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । प्रकरणोंमें भोम् आदि परमेश्वरके नाम हैं ओमित्येतदक्षरमिद. ५ उपासोत छा ‘न्दोग्य, ओमित्येतदक्षरमिद सर्वमित्यादि मांदूक्य, यहाँ उपनिषदोंके प्रमाण दिये और सब वेदके नामसे उच्चारण किये पुनः पृष्ठ १९० पं०-१० श्रुतिरपि 'प्रधानकार्य्यत्वस्प सांख्य सू० इसके अर्थ में स्वामीजी लिखते हैं उपनिषद् भी प्रधानहीको जगत्का उपादान कारण कहता है यहां श्रुतिशब्द देखिये उपनिष- दोतकका नाम सिद्ध होता है और यदि वेद शब्दसे व्यवहार्य वाक्यकलापके दूसरे पदौसे अर्थ करनेको व्याख्यान कहते हैं तो स्वामीजी इसे क्या कहेंगे । प्रजापतेनत्वदेतान्यन्योविश्वारूपाणिपरिताबभूव । यत्कामास्तेजुहुमस्तन्नोऽअस्तु वय स्यामपतयोरयीणाम् ।। यजु० अ० २३ मं० ६५ और-प्रजापतेनत्वदेतान्यन्योविशाजातानिपरिताबभूव । यत्कामास्तेजुहुमस्तनो अस्तु वयंस्यामपतयोरयीणाम् ऋ० मं० १० सू० १२२ मं०४ और-नवोनवोभवसिजायमानोऽह्नांकेतुरुपसामेष्यग्रम् । भागदेवेभ्पोविदधास्यापन्प्रचन्द्रमास्तातेदीर्घमायुःअथर्व७८६।२ नवोनवोभवतिजापमानोऽह्नांकेतुरुपसामेत्ययम् । भागन्देवेभ्योविदधात्यायन्प्रवन्द्रमास्तिरतदीर्घमायुः। ऋक्० मं० १० सू० ८५मं० १९ इनमें पहले मन्त्रमें (विश्वारूपाणि.) ऐसा पद है और दूसरेमें (विश्वामाता- नि) ऐसा पद है तीसरेमें (भवसिनायमान उपसमित्यनम् विदधात्यापन ) ऐसे विलक्षण पद हैं तो इन भिन्न २ मन्त्रोंमें वेदपदोंके पदान्तरसे अर्थ कथनरूप स्वामीजीका पूर्वोक्त) ऋग्वेद मा भूमिका ) वेद व्याख्यानत्व तो स्पष्टतासे प्रतिपन्न होता है तो फिर वेदभी व्याख्यान कहलावैगा ॥ (मन) भरदान अङ्गिरा वसिष्ठादि ऋपियोंके संवाद देखनेसे ऋपिप्रणीतत्व जाह्मण है (उत्तर) अच्छे भ्रममें पडे हो घेदोंका वेदत्व तौ इतनाही है कि, भूत भविष्य पर्वमान सनिकृष्ट विमकृष्ट सर्ववस्तु साधारणसे सबोंको जानते हैं और 'दूसरोंको जनाते हैं (लौकिकानामर्थपूर्वकत्वात् ) ऐसा कात्यायन ऋपिने प्राति- शारूपमें कहा है इसका अर्थ यह है कि, लौकिकाना अर्थात् “गामानप शुशी डेन " इत्यादि लौकिक वाक्योंका प्रयोग अर्यपूर्वक होता है अर्थात् प्रयोग २ (२६४) ' दयानन्दतिमिरभास्करः फरनेवाले लोग उन उन वक्तव्य अयोका लाभ करके वा अनुसन्धान करके लौकिक पाक्योंका प्रयोग करते हैं और वैदिक नित्य वाक्योंका अर्थपूर्वक प्रयोग नहीं घट सक्ता क्यों कि, वैदिक वाक्योंके अर्थ सृष्टि प्रलयादिक नित्य नहीं हैं इससे वस्तु मत्ताको अपेक्षा न करके लोकवृत्तको जनाते हुए वेद यदि याज्ञवल्क्यादि जनका दिके संवादका कथन भी करें तो क्या हानि होती है अन्यथा तो "सूर्याचन्दमसौ धाना यथापूर्वमकल्पयत् ' अर्थात् सूर्य चन्द परमेश्वरने जैसे पहले बनाये थे ऐसेही इस सृष्टिमें बनाये इत्यादि इस संहिता भागकी भी अवेदत्वापत्ति होनायगी जैसे जनकादिसंवादोंके ब्राह्मण ग्रन्थों में देखनसे सनकादिकके उत्पत्तिकालके पश्चात् फालमें उत्पन्न होना ब्राह्मण भागमें उत्प्रेक्षित करते हो वैसे ( सूर्याचन्द्रमसौः) और (त्रितःकूपे० ) इस पूर्व लिखित श्रुतिको भी सूर्यचन्दकी सृष्टि कहने और त्रितऋपिके उत्पत्तिकालके पश्चात् कालमें मन्त्रका भी उत्पन्न होना प्रतीत होने के फारण अनित्यत्वापत्ति होजायगी तब तो वही दुई कि, आप व्यानको मरते मूलभी गंवा बैठे इस आपत्ति के निवारणार्थ आपको यही कहना पड़ेगा कि, सूर्य चन्द्रादिककी उत्पत्तिको कहनेवाले भी वेद कुछ सूर्यादिकी सृष्टिके पश्चात् कालमें उत्पन्न नहीं हुए हैं क्योंकि वेदवाक्यका प्रयोग अर्थपूर्वक देखकर नहीं होता किन्तु उसमें जो कथन है वह अवश्य होगा तो फिर ब्राह्मण भागने क्या बिगाडा है जो इससे आप चिढते हो आपने भी यजुर्वेद अ० १२ म०४ यामदेव्यम् इस पदके अर्थमें वामदेव ऋपिके जाने षा पढाये सामवेद ऐसा लिखाहै तो यह इति. झास पहले आया या पीछे अब यजुर्वेद आपकारहा ही नहीं ब्राह्मण वेदेप अश्या नहीं अब आगे देखिये कि मीमांसाफे प्रथम अध्याय, पादफा ३२ सूत्र मन्त्र एक्षगमें इस प्रकार है ॥ तच्चोदकपु मन्त्राख्या ३२ अ०२ शेपेत्राझणशब्दः ३३ यहां ऐसा आचार्य कहते हैं शेपे ब्राह्मणशब्दः इस दितीय सुप्रीतिसं (ोरे) मन्त्र भागसे अवशिष्ट मन्त्रैकदेशम (प्राह्मणशब्दः)ब्रह्माण शब्दसे प्यवहार होता ऐसा कहतेहें इस फयनसे यह बात स्पष्ट सिद्ध होती है कि,पदफे मन्य और प्रामण दो भेद हैं यदि आचार्य ब्राह्मणको घेदका एक भाग नहीं मानते तो शेष प्रार सन्दः ऐमा फैस कहते प्रकृतिस्य मन रामायण महाभारतका शेप है ऐसा कोई नहीं कदेगा तवशेष शब्दके कयनसे ब्राह्मणको वेदत्य अवश्य अभिमत है ऐसा प्रत होता है अत एप बारपनिरंचनाधिकरणमें आचार्य शरस्यामा पसी प्यारया (प्र.) ब्राह्मणका क्या है ! (टर)मन्त्र और प्रामण दो माग बंद सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (२६५) उसमें मन्त्रभागके लक्षण कहनेहीसे परिशेषतः ब्राह्मणका लक्षण सिद्ध होगया फिर कहनेकी क्या आवश्यकता है और यही समझकर भगवान जैमिनिने भी पूर्व लिखित दो सूत्रोंसे मन्त्र ब्राह्मणात्मक समस्त वेदका लक्षण कहकर वेदके एक देश ऋषका ॥ तेपामृग्यवार्थक्शेनपाव्यवस्था ३५ अ०२ गीतिघुसामाख्या ३६ शेषेयजुःशब्दः ३७ अथर्वणसे पादव्यवस्थावाली ऋक् गीत्तिवाले साम और शेषे मयोंमें यशः शब्दका प्रयोग है इसमें (ऋक् यजु सामका लक्षण कहा है और यजुपके भी एकदेशका) निगदोवाचतुर्थस्याद्धर्मविशेषात् ॥ ३८ ॥ इस सूत्रसे यजुविशेष निगदका भी लक्षण कहा है यदि आचार्य ब्राह्मणको वेद नहीं मानते तब तो (तब्बोदकेषु मंत्राल्पा ) इससे मन्त्र लक्षण कहने के उपरान्त ही ऋगादिका भी लक्षण कहते पर यह तो मन्त्र लक्षणके अनन्तर (शेपे प्राह्मण- शब्दः) इस सूत्रसे ब्राह्मणका लक्षण कहते हैं इससे जैमिनि मन्त्र और ब्राह्मण -दोनोंहीको वेद मानते हैं अब लीजिये श्रीकणादाचार्य ६ अध्यायकी आदिमें लिखते हैं कि ॥ बुद्धिपूर्वावाक्यकृतिवेद-क०६।११ अर्थ यह है कि (वेद) वेदनामक वाक्यकलापमें( वाक्यकृतिः) वाक्यरचना बुद्धिपूर्वा वक्ताका यथार्थ जो वाक्यार्थज्ञान तत्पूर्वक है अर्थात् वेदमें जो जो वाक्य लिखे हैं उन वाक्पोंके अभिप्रेत अाको यथार्थ जान करके वक्ताने भयोग किया है 'वाक्यरचनाका यह नियम हो है कि जबतक मिस अर्थको नहीं जानते तबतक उस अयके वाक्यको रचना नहीं करसक्ता (यथा नृपतिः सेयः) “कांची नगरीम त्रिभुवनतिलक राना हुआ है"इत्यादि अस्मदादिककी रचना ज्ञानपूर्वक होती है इससे विधि निषेध वाश्य अनापत्या अपनी उपपत्ति के लिये वक्ताका यथाथ जो वाक्यार्य ज्ञान तत्पूर्वकत्वका अनुमान करता है हम लोगोंका जो ज्ञान तरपूर्वक- त्वेन अन्यथासिद्धि तो नहीं होसक्ती क्योंकि "स्वर्गकामो पजेत' स्वर्गकी कामना हों तो यज्ञ करै उसीसे हमारा अभीष्ट साधन होसबैगा और इसको करना चाहिये इत्यादि ज्ञान हमलोगोंके ज्ञानसे बाहर है अर्थात् यज्ञ करनेसे स्वर्ग होताह ऐसी बात हमलोगोंको हुदं बुदिमें नहीं बैठ सक्ती अतः ऐसा ज्ञानवान् कोई स्वतंत्र - (२६६) दयानन्दतिमिरभास्करः। 'पुरुष अवश्य पूर्वमें था जोकि, इस विधिनिषेधका रचनेवाला है और ऐसा स्वतंत्र एक घेदपुरुप ही है इससे संहिता आदिका भ्रम प्रमादादि दोपसेशून्य जो स्वतंत्र पुरुप वही रचनेवाला है यह सिद्ध हुआ और प्रकारान्तरसे भी पेदवास्योंग बुद्धिपूर्वकत्व वही कहते हैं कि, "ब्राह्मणे संज्ञाकर्मसिद्धिलिङ्गम्" कणा ॥१॥ अर्थात् ब्राह्मणनामक वेद भागमें नामकरण ( सिद्धि ) अर्याद बुद्धिपूर्वकत्वका अनुमापक है जैसे लोकमें चैत्र मैत्र आदि नाम रखनेवालोंकी घुदिका आक्षेप फरता है ब्राह्मणमें 'उद्भिदायनेत ' 'बलिभिदा यजेत 'अभिनिता यजेत' विध. जिता यजेत' इत्यादि नामकरण हैं इनमें 'उद्भिदा ' इत्यादि नाम किसी स्वतंत्र पुरुपकी बुद्धिका आक्षेप करता है अर्थात् अलौकिक अर्थ तो हम लोगोंकी बुद्धि- गोचर हुआ नहीं है कि 'उद्भिद् ' इत्यादि नाम जो हम लोग रखसकें इससे ऐसे नामहीसे किसी एक स्वतंत्र पुरुपकाबोध होता है और वैसा एक वेदपुरुष भगवान हे और ऐसे ही "बुद्धिपूर्वो ददाति ' ३ यहां भी "स्वर्गकामो गां दद्यात्" अर्पाव स्वर्गकी इच्छासे गोदान करना ऐसा कहने से पत्ताका यथार्य ज्ञान मान पड़त है गोदान करनेसे स्वर्ग होता है ऐसा नि:संशय ज्ञान हम लोगोंको प्रत्यक्ष नहीं। इससे यहां भी वैसा ही ज्ञानवान् स्वतंत्र पुरुष सिद्ध होता है ऐसे ही- तया प्रतिग्रहः--क० सू०६।१।४ इस चौये फणादसूत्रका भी ऐसा ही अर्थ जानना चाहिये पृथ्वोदान ने स्वर्ग होताहै और कृष्णचर्मादि दान लेनेसे नरक होता है ऐसे हम नहीं निधय कर सक्ते इत्यादि रीतिसे वेदोंफे मातोक्तत्व साधनद्वारा उनका प्रामाण्य साधन हरते हुए फणादाचार्य मन्त्र ब्राह्मण दोनोंको वेद स्पष्ट मानते हैं यदि फेयल मंत्रभाग हीको घेद मानते तो पूर्वोक्त मूत्रोंमें दोनोंके उदाहरण दानपूर्वक लेख नहीं करते इससे फणादाचार्य भी ब्राह्मण भागको वेद मानते हैं इससे म्यामीनीया या पाना कि, कात्यायनके विना और किसीने मंत्र बाह्मणको वेद नहीं कहा असन्प प्रतीत होगया अब ब्राह्मगके वेद होने में और प्रमाण मुनिये कि, गौतममाने घेदपमानात रूपणापसर स्थूणानिसननन्यायसे पेदफे प्रमाणहीको कराने दिये आशंका की है। तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोपेभ्यः । न्याय० म०२ आ० १सू०५७ अदि (तदनामाण्यम् ) टस पेदका प्रमाण नहीं हो सका क्यों टि (मा तथ्यापातपुनरुनदोपेम्पा) रसके पाक्यों में असत् पर्यापरविरोध दोषारमा दोपदे अमत्यका ददाहरण पथा" पुकामः पुत्रष्टया पनंद " कि .
- सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । (२९७) पुत्रंकी इच्छा हो पुष्टी यज्ञ करै परन्तु कहीं पुष्टी करनेसे भी पुत्र नहीं होता जब कि, इस प्रत्यक्ष वाक्यका प्रमाण नहीं तो "आग्रिहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः" स्वर्गकी कामनासे अग्निहोत्र करै ऐसा जो वेदमें अदृष्टार्थ वाक्य है उसके (प्रामाण्यं ) सत्यतामें कैसे विश्वास होवे यहाँ ( तदमामाण्यम ) इस सूनमें तत्पदसे घेदहीका परामर्श है इस रीतिसे वेदके अप्रमाणकी आशंका करके ( अमिहोत्रं ) इस ब्राह्मणवाक्यका अप्रमाण दिखलाते हैं यदि ब्राह्मणको वेदन मानते होते तो वेदके अप्रमाण दिखलानेके समय ब्राह्मणका अप्रमाण दिखाना तो कान टूनके समय फंधे लवकाने समान अति हास्यकारक होता इस कारण गौत- मनी ब्राह्मणको वेद अवश्य मानते हैं क्यों कि दृष्टान्त उन्होंने मन्त्र और ब्राह्मण दोनोंहीके दिये हैं सो भाष्यकारने खोलके लिख दिये हैं आगे इस शंकाका सभा धान किया है और देखिये। वाक्यविभागस्यचार्थग्रहणात् अ० २ सू० ६१ विध्यर्थवादानुवादवचनविनियोगात् ६१ न्या० इसपर वात्स्यायनजी लिखतेहैं "विधा खल ब्राह्मणवाक्यानि विनियुक्तानि युत्तानि विधिवचनानि अर्थवादवचनानि अनुवादववनानीति तत्र विधिनियामकर पदाक्यं विधायकं चोदकं स विधिः विधिस्तु विनियोगो अनुज्ञा वा यथा अमि- होत्रं सुहयात्स्वर्गकामः ॥ यहाँ बाह्मणवाक्योंके विभागावसरमें वात्स्यायनजीके " अमिहोनं वाक्यके लिखने से इनकी व्याख्याप्रणालीसे ( अमि) इस प्राह्मण वाक्य सूत्रस्य (तत्) पदसे संग्रह करना अवश्य गौतमजीको अभिमत है इस रीतिसे ब्राह्म- पको वेद सभी ऋपि मानते हैं । जैसे सृष्टिको उत्पत्ति आदि कम वेदोंमें वारंवार कहा है पर उनसे वेद पौरुषेय नहीं होसक्ते इसी प्रकार लौकिक इतिहासीको भी समझिपे चेद सभी विद्याओंका मूल है इससे लौकिक जनोंकी सुगमताके लिये भगवान् परमेश्वरने याज्ञवल्क्य, उशना, अगिरा, जनक इत्यादिफे नामोल्लेखपूर्वक ब्रह्मविद्यादि विद्याओंका उपदेश किया है जैसे कि, सृष्टिको कहनेवाला वेद सृष्टिके पीछे बना है (यह नहीं), किन्तु सृष्टि ही अनादि प्रवाहसिद वेदोंके पश्चात हुई है इससे सृष्टिको वर्णन करनेवाले भी वेद कुछ सृष्टिके अनन्तर बने नहीं कहलाते ऐसे ही ब्राह्मणमें लौकिक इतिहास वर्णन करनेपर भी ऐतिहासिक अाँफी उत्पत्तिके पश्चात् कालमें उत्पन्न वा बनें ब्राह्मण नहीं कहला सकते और "तमितिहासश्च पुराणध गायाच" इस अपर्ष वेदमें इतिहास पुराणके आनेसे क्या घेद इतिहास पुरागके पीछे बना है कभी नहीं . (२६८) दपानन्दतिमिरभास्करः। इस प्रकार वेदमें इतिहास होनेसे भी सादित्व नहीं आता और व्यारूपान वा भाष्य 'फरता अलग अलग हो यह कोई नियम नहीं है क्यों कि शंकरभाष्यमें पश्चादि- भिश्वाधिशेषात् " इस अपने भाष्यकी आप ही व्याख्या शंकराचार्यजीने की है और पातंजल भाप्यमें भी "अय शब्दानुशासनम्" इसका "अयेत्यपं शब्दोऽधि- -फारार्थः' इत्यादि व्याख्यान स्वयं भाष्यकारने किया है फिर जब भाष्यका व्याख्यान भाष्य कहलाता है तो घेदके व्याख्यानको भी वेद कहलाने में क्या संदेह है (प्रभ)॥ ऋग्वेदा० भा० भूमिका पृ० ८६ पं० २८ । द्वितीया ब्राह्मणे २।३।६० अष्टा० चतुर्थ्यथें बहुलं छन्दसि । २।३। ६२ पुराणप्रोक्तेपु ब्राह्मणकल्पेषु । ४।३।१०५ छन्दोब्राह्मणानि च तद्विपयाणि । ४।२।६६ यहां पाणिनि आचार्य वेद और ब्राह्मणको पृथक् २ कहते हैं पुराण अर्यात प्राचीन ब्रह्माआदि ऋपियोंसे प्रोक्त ब्राह्मण और कल्प वेदव्याख्यान हैं इससे इनकी पुराणेतिहास संज्ञा की गई है यदि यहां उन्द और ब्राह्मण दोनॉकी वेदसंज्ञा सूत्र -कारको अभिमत होती तौ (चतुर्थ्य] बहुलं छन्दसि ) इस सूत्रमें छन्दग्रहग न फरते द्वितीया ब्राह्मणे"इस सूत्रमें ब्राह्मणे"इस पदकी अनुवृत्ति प्रकरणतः प्राप्त है इससे जानते हैं कि, ब्राह्मण ग्रंथकी वेद संज्ञा नहीं और यदि उन्द पदसे ब्राह्मण भी ग्रंथ पाणिनिको आभिमत होता तो "छन्दोवा" इस सूत्रमें ब्राह्मण ग्रहण क्यों 'फरते केवल छन्दसि कह देते क्यों कि ब्राह्मणभी छन्द ही हैं (उचर) वाह ! व्याकरणमें भी आपकी बहुत पहुंच है यह फहना सर्वथा आपका अनुचित है देखिये "द्वितीया ब्राह्मणे २६६।६० " इस सूत्रसे ब्राह्मण विषयक प्रयोगमें अपर्वक और पण धातुके समानार्थक दिव धातु कर्ममें द्वितीया विभक्ति होतीहै या "गामस्य तदहः सभायां दीव्येयुः " यहां शतस्य दीव्यति इत्यादिमको नाई "दिवस्तदर्थस्य २ । ३ । ५८" इस सूचसे गोरस ऐसी पष्ठी प्राप्त थी सो यहाँ "गामस्प" ऐसी द्वितीया की जाती है यहां ब्राह्मणरूप देकदेशहीमें द्वितीया इष्ट है न कि मन्त्र ब्राह्मणात्मक श्रुति छन्दः आम्नाय निगम वेद इत्यादि पदसे ध्या हार्य समस्त वेदमात्रमें और "चतुर्य बहुलं छन्दसि २।३ । ६२" इस उतर सबसे मंत्राह्मणरूप छन्दोमात्रके विपयमें चतुर्थीक अर्थमें पष्ठीका विधान किया जाता है "पुरुषमृगश्चंद्रमसः" "पुरुषमृगधन्दमसे" इत्यादि इस सबसे छन्दसि मंत्रनामणरूप समस्त वेदमात्रका संग्रह पाणिनि आचार्यको अभिमत सतमसमुलासखण्हनम् । (२६९) है, अत एष इसके उदाहरणमें (या सर्वेण पिवति तस्ये सों जायते तिसोराची रिति तस्या इति माते, यां मलवद्वाससं संभवंति यस्ततो जायते सोभिसस्तो यामरण्ये तस्यै स्तेनो यो पराची तस्पै हीतमुख्यप्रगल्भा पा स्वाति तस्या अपु. मारुकोपाभ्यते तस्पै दुश्चर्मा या पलिखते तस्यै सलतिरपस्मारी पाते तस्यै काणो यादतो धावते तस्यै श्यावदन् या नखानि निकृन्तते तस्यै कुनखी या कृणति तस्य कोचो या रज्जु सृजति तस्या उदंधुको या पर्णेन पिबति तस्या उन्मा- दुको जायते अहल्यायै जारमनाय्यै तन्तुः ) इत्यादि बहुतसे ब्राह्मणोंहीको प्रमाणमें भाष्यकारने दिया है यदि इस सूत्रमें छन्दोग्रहण न रहैगा तो पूर्व सूत्रसे ब्राह्मणे' इस पदकी अनुवृत्ति लानेपर भी केवल ब्राह्मणहीमें पष्ठी होगी वेदमावसे नहीं इस कारण इस सूनसे (छन्दसि )ग्रहणका विशिष्ट फल हई है और ब्राह्मणको भी छन्दोरूपतामें भाष्यकार सम्मति देतहीहैं फिर इस सूत्रमें छन्दो ग्रहणको व्यर्थ कहते हुए आप निरे स्वच्छन्द नहीं हैं तो और कौन है और नहीं तो (मन्द्र श्वेतवहो- यशस्पुरोडाशोण्विन ३ १२ । ७१ अवेपनः ३ १२ । ७२ पिजुपेछन्दसि ३ । २१ ७३ ) ऐसे ऋमिक सूत्र में पाठसे अन्तिम सूचमें “छन्दसि" ऐसा कहनेसे मंत्रभागमें भी छन्दोरूपतान सिद्ध होने पायेगी देखिये जैसे (ब्राह्मणे) ऐसा कहकर (छन्दसि* ) ऐसा कहनेसे ब्राह्मणका छन्दपदमें व्यवहार पाणिनिको अभिमत नहीं है ऐसी रत्येक्षा आप करते हैं तैसे ही पूर्व सूत्र में मंत्र ऐसा कहकर (विलुपे छन्दसि) ऐसा कहनेवाले पाणिनिको मंत्रभागमें भी छन्दपदसे व्यवहार अभिमत नहीं है ऐसा कहना पड़ेगा तब ती बाह्मणद्वेपी आपके शिरपर भी महाअनिष्ट आपढेगा और भी "अनरूपरवरित्युभयथा छन्दसि ८॥ २१७०" इस सूबमें पाणिनि (छन्दसि) ऐसा कहकर “भुवश्च महाव्याहतेः ८ । २१७१ " इस उत्तर सूत्रमें महाव्याहते ऐसा कहते हैं इससे महाव्याहृतिकी भी छन्दोभावच्युति अवश्य होजायगी क्यों कि "ब्राह्मणे" ऐसा कहकर "छन्दसि" ऐसा कहना ही ब्राह्मणका छन्दोभावका अभाव साधन करेगा और "छन्दसि" ऐसा कहकर "महाव्याहतेः" ऐसा वि. शिष्ट व्याहतिका कहना महान्याहतिका उन्दोभावका नाशक न होगा ऐसी आंखमें धूल तो आप नहीं डाल सकते इस हेतुसे पाणिनि आचार्यप्रयोगसाधुत्वके अप्रसंग और अतिप्रसंग निवारण करने की इच्छासे कहीं सामान्यसे (छन्दसि ) ऐसा फहकर विशेपसे "महाच्याहते"ऐसा कहते हैं और कहीं तो विशेषसे "ब्राह्मणे "मन्वें" ऐसा कहकर सामान्यसे "उन्दास" ऐसा कहते हैं इससे यदि यहां छन्द और ब्राह्मण दोनोंकी वेदसंज्ञा सूत्रकारको इष्ट न होती तौ ( चतुर्थ्यये बहुलं छन्दसि ) इस सूत्रमें छन्दोग्रहण यह क्यों करते क्यों कि (द्वितीया ब्राह्मणे ) इस * व्याकरणज्ञाता समझ सकतेहैं मेरटी स्वामीका यहाँ कैसा विफल प्रयास है। " (२७०) दयानन्दतिमिरभास्करः। सूत्रसे ब्राह्मणे इस पदफी अनुवृत्ति प्रकरणतः सिद्ध थी इससे जानते हैं कि,मंत्र ब्राह्मणका नाम वेद है और आपका कहना-सब मिथ्या है और, (छन्दोब्राह्मगा, नीति ) ब्राह्मणों और मन्त्रांका छन्दीभाव समान होनेसे पृथक् ब्राह्मण व्पर्य है. ऐसा प्राप्त था तथापि ब्राह्मण ग्रहण यहाँ "अधिकमधिकार्यम्" इस न्यायसे ग्राह्मण विशेपके परिग्रहार्थ है इससे ( याजयल्लपेन प्रोक्तानि ब्राह्मणानि याज्ञवल्क्यानि सौलमानि ) इस प्रयोगसे पूर्वोक्त नियम नहीं हुआ वार्तिककार भी ( याज्ञवल्क्या- दिभ्यः प्रतिपेधो वक्तव्यः ) ऐसा कहते हुए इस सूत्रमें ब्राह्मण, ग्रहणको प्रयोजन यही सूचित कराते हैं और "पुराणोक्तेपु ब्राह्मणकल्पेषु ४ । ३ । १०५" इस सूत्र में ब्राह्मणका पुराणप्रोक्त ऐसा विशेषण कहते हुए पाणिनिको यही अर्थ अभिमत हे अन्यथा यदि ब्राह्मण विशेषके परिग्रह करनेकी इच्छा न होती तो (पुरा- गप्रोक्तेपु० ) इसके कहनेसे आचार्यकी प्रवृत्ति व्यर्थ होगाती चाहें स्वामीनी आप कुछ समझें परन्तु भाष्यक श्रम करनेवाले विद्वानोंको यह, बात कुछ परोक्ष नहीं है इस हेतु हम इसमें कुछ और नहीं कहा चाहते, और मंत्रभागको नाई ब्राह्मणभागका भी प्रामाण्य वारंवार सिद्ध कर आये हैं अत एव पुराणप्रामाण्य व्यवस्थापनके प्रसंगसे (:प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेनेतिहासपुराणानां प्रामाण्यमभ्यनुज्ञा यते ) ऐसा वात्स्यायनमहर्पिने कहा है यदि ब्राह्मणोंका स्वतःमामाण्य न हो तो दूसरेकी प्रामाण्यवोधकता कैसे उनमें संभावित होसती है क्यों कि ब्राह्मणभाग स्वयं जबतक प्रमाणपदवीपर व्यवस्थित न होवेगा तबतक इतिहास पुराणके प्रामाण्यका-व्यवस्थापन करनेमें कैसे समर्थ हो सकेगा यह कहावत प्रसिद्ध है कि (स्वयमसिद्धः कथं परान् साधयिष्यति ) इससे श्रुति वेद शब्द आम्नाय, निगम इत्यादि पद मंत्रभागसे लेकर उपनिषद् पर्यंत वेदोंका बोधक है यह शास्त्र मार्मिक विद्वानोंका परामर्श है अत एव (श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः) श्रुतिको वेद कहते हैं धर्मशास्त्रको स्मृति कहते हैं ऐसा आस्तिक जनोंके जीवनौषध भगवान् मनुजीने भी माना है अत एव वेदान्तचतुरध्यायोमें भगवान् व्यास मुनि उपनिषदोंके कहने के इच्छुक होकर ॥ श्रुतेस्तुशन्दुमूलत्वात् अ० २ पा० १सू० २७ परानुतच्छृतेः अ०२ पा०३ सू०४१ भेदश्रुतेः अ०२ पा०४ सू०१८ सूचकश्चहिश्रुतिराचक्षतेचतद्विदः अ०.३ पा० २ सू०४ तावोनाडीपुतच्छुतेरात्मनिच अ०.३पा० २०७ वैद्युतेनैववतस्तच्छुतः स० ४ पा०.३९०६ : सप्तमसमुल्लासखण्डनम् । इत्यादि सूत्रोंमें वारंवार श्रुतिपद शब्दपदका उपादान करते हैं श्रुतिसे उपनिष-. दोको ही ग्रहण किया है और श्रीकणादावार्यने भी दशाध्यायोके अन्तमें (तह- चनादामायस्य मामाण्यम )ऐसा आम्नायपदसे वेदके प्रामाण्यका उपसंहार किया है यहां आम्राय पद संहितासे लेकर उपनिषद् पर्यन्त समस्त वेदका बोधक है क्यों कि इसके समान तन्त्र गौतमीय न्यायदर्शनके ( मन्त्रायुर्वेदवञ्च तत्मामाण्य- माप्तमामापात् ) इस सूत्र में तत्पदसे उपादेय उपनिपदोंके संहितयारपम्लापहीके प्रामाण्यका अवधारण किया है और वहीके तत्पदकी मन्त्राह्मणात्मक घेदमात्रकी वोधकता पूर्वमें निश्चित कर ही नुके हैं और मन्वादि स्मृतियां इसी अर्थके अनु- कूल हैं देखिये- एताश्चान्याश्च सेवेत दीक्षाविप्रो वने वसन् । विविधाश्चौपनिपदीरात्मसंसिद्धये श्रुतीः ॥ अ०६श्लो दीक्षायुक्त ब्राह्मण वनमें पास करता हुआ आत्मज्ञानके अर्थ अनेक उपनिषदोंकी श्रुति विचार यहां (औपनिपदीः श्रुतीः) ऐसा कहनेसे उपनिष- दोका अतिपदवाच्यत्व स्पष्ट सिद्ध होता है और स्वामीनीकी लीला देखो सौवर पृ०७५०७ .. न सुब्रह्मण्यायां स्वरितस्य तदात्तः १।२।२३ जो सुब्रह्मण्या ऋचामें यज्ञकर्ममे पूर्व सूचसे एकश्रुतिस्वर प्राप्त है सो न हो फिन्तु जो उनमें स्वरित वर्ण हो उनके स्थानमें उदात्त होगाय सुब्रह्मण्या एक ऋचाका नाम है उसका व्याख्यान शतप० प्रा० तीसरे काण्ड के तीसरे प्रपा० के प्रथम ब्राह्मणमें सत्रहवीं कण्डिकासे लेकर वीसवीं कण्डिकातक कियाहै। समीक्षा-इसमें स्वामीजीसे पूछना है कि, आप यह तो कहैं कि, मिस ऋचाका व्यापान मौजूद है वह मन्त्र भीअवश्य होगा यदि दयानंदनीकहीं उस ऋचाको दिखादें तो हम भी इस बातको मार्ने कि, हाँ मन्त्र ब्राह्मण मिलम्र वेदनही मन्त्र हीफा नाम पेट है परन्तु पाणिनिजी भी मन्त्र ग्रामग वेद मानते हैं इसी कारण सुब्रह्मण्या शतपथरी श्रुतिमें भी मन्त्रवत् स्वरका विधान किया है पाउस्वर्ग किसी दयानंदोसे यह प्रश्न करे तो देखें क्या उत्तर देते हैं। • स.प्र. पृ० २०२५० २४ प्रथम सृष्टिको आदिमें परमात्माने ममि वायु आदित्य तथा अंगिरा इन कपि- माँके आत्मा एक २ वेदका प्रकाश किया । २१२ ॥ १५ ॥ पों तो दपानंदके मतसे वेदकी उत्पत्ति हुई जब ब्राझगा प्रादुर्भाव मुनिये- (२७२) दयानन्दतिमिरभास्करः। स०. पृ०२०४ पक्ति २१ वेदोंका अर्थ उन्होंने फैसे जाना (उत्तर.) परमेश्वरने जनाया और धर्मात्मा योगी महीप लोग जब जब जिस अर्थके जाननेकी इच्छा फरके ध्यानावस्थित हो परमेश्वरके स्वरूपमें समाधिस्थ हुए तबतब परमात्माने अभीष्ट मन्त्रों के अर्थजनाये जब बहुतोंके आत्मामें वेदार्थका प्रकाश हुआ तब ऋषि मुनियोंने वह अर्थ और ऋषि मुनियों के इतिहासपूर्वक ग्रन्थ बनाये उनका नाम ब्राह्मण वेदका व्याख्यान हुआ ॥ २१४ ॥ समीक्षा-अब इसपर यह विचार करना है कि, जब ईश्वरके प्रकाश सिप मंत्र ईश्वरमोक्त कहे जाय तो परमात्माके प्रकाश किये मन्त्रार्थ ईश्वरप्रोक्त क्यों न कहे जाय स्वामीजीकी अच्छी बुद्धि है जिन दो वस्तुओंका एक ही कर्ता है उनमें एक उसके द्वारा निर्गत तौ उसका वचन माना जाय दूसरा न माना जाप इसमें क्या प्रमाण दोनोंकी उत्पत्ति भी एक ही प्रकार है इससे ईश्वरप्रोक्त दोनों ही हो सक्ते हैं,जैसे अमि वायु रवि मंत्रोंमें अनेक स्थानमें आयेहैं इसी प्रकार व्याख्यान निसको तुम कहते हो, ब्राह्मणोंमें उन १ महर्षियोंफे नाम आये हैं, इत्यादि गा दोनों में एक ही वात है तो दोनों एक ही क्यों न कहे जाय और यहां स्वामी- जीने साक्षात् ईश्वरका स्वरूप भी मान लिया अब आफारमें क्या सन्देह रहा, कहांतफ फहें सत्यार्थप्रकाशका जो पत्रा उठाकर देखो यहाँ ही अशुद्धि है पर दिग्दर्शनमात्र है। बौधायन भा' मंत्रब्राह्मणामित्याहुः' मंत्र और ब्राह्मण दोनोंका नाम पद मानो हैं. मंग्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' मंत्राह्मणका नाम वेद यही आपस्तम्प मानते। 'मंघम्राह्मणात्मकः शब्दराशिदः' यही सायणाचार्य मानते हैं। मंत्राझणपोगा वेदशब्दं महर्षयः' सर्वानुक्रमणीयत्ति भूमिकामें यही सिद्धान्त है और गांडुइन, परीक्षितको फया त्रितत्रामुरवधादि वहुतसी फया अधर्यके मंत्रभागमें विमान ही है वसं ही ब्राह्मणभागमें, इससे दोनों मिलकर घेद पहाते हैं ।। और श्रुतिशद यदना आम्नाय पदका पर्याय शब्द है जैसे कि, मनुनानकद हुँ( श्रुतिम्नु . वदो विज्ञेयः । इत्यादि पूर्व लिस आये हजय मनुनीने पनि दोको श्रुति माना और व्यवहार भी वैसा ही किया तय माह्मणोंको पदभाय भा श्य हुआ, क्यों कि वाहणाही शेषभूत ती उपनिषदाहसी पाल पार नामस सिम्यान है अतः यह कान्यापनयास्यकि, "मनायगादनामधषम" मंत्र मान दोनोंका पद नाम है यह अपेठ मिद्धान्त ह नहीं तो दिया यह पारय नि, यद माना नहीं है और माता आदि अन्तम श्रद देश में राटिसा यह केवल भाग नाननेकी डासं न सा निगम मह मिति d -- सप्तमसमुल्लासखण्डनमः। होता रहै कि, यह मंत्रमाग है यह ब्राह्मण यदि दोनोंहीको एक पद दिया जाता तो मंत्र ब्राझण ऐसे मिश्रित हो जाते जिससे यह निर्धारण करना कठिन होनाता कि, यह श्रुति मंत्री है या ब्राह्मणकी कुछ ब्राझण भागके अन्तमें पुराण शब्द तो लिखा ही नहीं है लिसा तो यही है कि, 'ब्राझण' सो यह भाग निर्धारण कर- नेको लिखा है. इससे मंत्र प्राझणका नाम वेद है, यह सिद्धान्त निश्चित है और जब आप ही मंत्रभाग ब्राह्मणभाग कहते हैं तो भाग मानना तुम्हारे ही वचनसे सिद्ध है इस खंडनमें वेदभाष्य भूमिकाफा भी खंडन आगया है और घेदभाष्य- भूमिका पृ० २७३ पंक्ति में आपने संहिताको मंत्रभाग लिसा ही है । सत्यार्थप्रकाशकी विचित्र लीलादेखियेपृ०२०५५०२० (म०) वेदोंकी कितनी शाखा हैं (उत्तर) एकसौ सत्ताईस । समीक्षा-समझे साहब फहीं तो ग्यारह सौ सचाईस बताई यहाँ एक सहस्त्रकी चटनी कर गये। पांचवीं बारके छपे पृ० २१७६० २५ में ११२७ लिखी हैं पर महाभाष्यके मतसे ११३१ होती हैं। फिर आपने यह भी एक तमाशेकी बात लिख दी है कि, जो कोई पूँ कि, 'तुम्हारा क्या मत है तो कहना कि, वेद मत यदि आपका वेदका मत है तो आपने तो वेदमें रेल तार कमेटी वर्ण संकरता सब एक जाति हो जाओ एक स्त्री ग्यारहतफ पति करले इत्यादि पहतसी बातें लिखी हैं तो आपके मतवाले क्या फरें आपके मतमें ईश्वर पाप क्षमा नहीं करता जैसा करना पैसा भरना फिर ईश्वरका स्मरण क्यों करना फिर जिस मतमें ईश्वरहीसे मेम नहीं वह मत ही क्या है, वेदके नामसे लोगोंको जालमें फँसाना है जैसे पीतलके ऊपर मुलम्मा करके सोना बनाके कोई भोलेभालेको ठग लेता है ऐसी यह स्वामीजीकी चाल है, आपके वेदार्थको दूरहीसे नमस्कार है वेदका तौ नाम है अर्थ ती मनमाने परमें ही किये हैं जो कि, निपंटु निरुक्त प्राचीन भाष्पादिसे संपूर्ण विरुद्ध हैं इस कारण आपका वेदार्य ठीक नहीं और उन अथों के अनुसार वैसा मत भी ठीक नहीं उसके अनुसार नियोगमत आदि सिद्ध होते हैं। इति श्रीदयानंदतिमिरभास्करे सत्यार्थप्रकाशांतर्गतसप्तमसमुल्लासस्य खंटने समाप्तम् ॥३०॥७१९. ।
भय सत्यार्थप्रकाशान्तर्गाष्टमसमुहासस्य खण्डनं पारस्यते । । वेदान्तप्रकरणम्-सूटयुत्पत्तिप्रकरणम् । स०.पृ. २०७ पं०१२ पुरुपऽएवेदसवैयद्भुतंयच्चभाव्यम् । उता तत्वस्येशांनोयदन्ननातिरोइति ।। यजु०३३१०२ इसका अर्थ पृ० २०८ पं० ४ हे मनुष्यो ! जो सबमें पूर्ण पुरुप और जो नाश रहित कारण और जीवका स्वामी जो पृथिव्यादि जड और जीवसे अतिरिक्त है वही पुरुष सब भूत और भविष्यत् और वर्तमानस्थ जगतका. बनानेवाला है । पृ० २२१८ समीक्षा-स्वामीजीके अर्थोकी फैसी विचित्र महिमा है इस मन्त्रमें नीव प्रकृति और ईश्वरका वर्णन फर बैठे हैं वेदांत विषयमें आता तो कुछ भी नहीं परन्तु ढाई चापलझी खिचडी पकाये विना रहा भी नहीं जाता देखिये इसका यह अर्य है। ( इदम् ) यह ( यत् ) जो ( भूतम् ) अतीत ब्रह्मसंकल्प जगत् है (च) और ( यत् ) जो (भाव्यम् ) भविष्य संकल्प जगत् है (उत ) और (यत्) गो (अन्नेन ) वीज वा अन्न परिणाम वीर्यसे (अतिरोहति ) वृक्ष नर पशु आदि रूपसे प्रगट होता है (सर्वम् ) यह सब (अमृतत्वस्य ) मोक्षमा ( ईशानः) स्वामी (पुरुषः) नारायण (एव) ही है उसका अन्य न होनेसे ब्रह्मले उत्तर होनेसे सब जगत् ब्रह्मरूपही है इससे ब्रह्म अनन्त है, स्वामीनी नामो अन्यो- न्यामाप्रतियोगी मानते हैं क्योंकि, जीव जगत् जड प्रकृति में नहा भेद मानते हैं तो यही ऊपरकी श्रुतिसे विरोध पडेगा और (ब्रह्मविकारी भवितुमर्हति अन्योन्पाभावप्रतियोगित्वात् पृथिव्यादिवत् ) इस अनुमानसे प्रनमें पिकारवर सक्ति होगी। स०पू० २०७५०१४॥ यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीन्ति यत्प्रत्य- भिसंविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्मतैत्तिरी भृगुवल्ली अनु." .२२८ में इसका अर्थ लिखा है जिस परमात्माफी रपनासे यह सब परि अष्टमसमुल्लासखण्डनम् । (२७५) , ग्यादि भूत उत्पन्न होते हैं जिससे जीव और जिससे प्रलयको प्राप्त होते हैं वह अझ है उसके जाननेकी इच्छा करो ॥ २१८ । १३ समीक्षा-यह क्या स्वामीजी इतना ही पद लिखकर गडप गपे (निससे नीच) । इससे तो प्रत्यक्ष है कि, जिस परमेश्वरसे जीव उत्पन्न होते हैं और आप आगे इनको नित्य मानते हैं नित्प भी मानना और जन्म भी कहना यह वैदिक विरोध रसातलमें अकताको क्यों न ले जायगा, सूधा अर्थ है कि, जिससे यह माणी उत्पन्न होते और उससे जीते और अन्त में रसीम प्रवेश करते हैं उसे हो प्रस्म भानो अब प्रकृति जीव नित्य और पृथक् न रहे । पृ०२०८ पं० १८ द्वासुपर्णासयुजासखायासमानंवृक्षपरिपस्वजाते । तयोरन्यःपिप्परंस्वादत्यनश्नन्नन्योअभिचाकशीति ॥ ऋ० मं० १सू० १६४ मं० २० शाश्वतीभ्यः समाभ्यः । य० अ० ४० म०८ (दा) जो ब्रह्म और जीव दोनों (सुपर्णा) चेतनता और पालनादि गुणोंसे सदृश (सयुजा ) व्याप्प ध्यापक भावसे संयुक्त (सखापा) परस्पर मित्रतायुक्त सनातन अनादि हैं और (समान) वैसे ही (पृक्षम् ) अनादि भूलरूप कारण और शाखारूप कार्ययुक्त वृक्ष अर्थात् जो स्थल होकर प्रलयमें छिन्न भिन्न होना- ताह यह तीसरा अनादि पदार्थ इन तीनोंके गुणकर्म स्वभाव भी अनादि हैं इन जीव ब्रह्म से एक जो जीय है यह इस पृक्षरूप संसारमें पाप पुण्यरूप फलोंको स्वादत्ति " अच्छे प्रकार भोक्ता है और दूसरा परमात्मा फमाँफे पलोंको (अनभन् ) न भोक्ता हुआ चारों ओर अर्यात् भीतर बाहर सर्वत्र प्रकाशमान ही रहा है जोवसे ईश्वर ईश्वरसे जीव और दोनों में प्रकृति भिन्नरवरूप तीनों अनादि हैं शाधती अर्थात् अनादि सनातन जीवरून मगाफे लिये वेददारा परमात्माने सब विधाओंगा पोध किया है ।। २१८।२३ समीक्षा-जैसे किसीफे हाय हलदीसरी गिरह लग गई और यह पसारीपन पठा ठीक यही दृष्टांत स्वामीजीपर है इस टनके शिष्योरेने और उन्हें देतमा- रणको यह श्रुति सनीवनमूल है परन्तु उनकी बुद्धि तो अमानतिमिरसे आच्छा- दित है उन्हें सूझे फहात पास्तर इसका अर्थ यह है जो प्राय फरते हैं। प्रयम तौइस मंत्रमेंयह प्रभहै कि, यह मंत्र येतनमें भेदसिद करता है या भौता अभोक्ता रूप पक्षियोंके भेद सिद्ध करता है जो वेतनमें भेदसाधा फहो तरस • मा० R० मनमाना शोध तो पानी बार मोम हा मानस सापाप्रकाश बनाये 41 !
1: A दयानन्दतिमिरभास्करः। मंत्रमें ऐसा कोई पद नहीं जो चेतनमें भेद साधन कर इस कारण चेतनमें मेह नहीं फिन्तु दो सुपोंका बोधन करता है सो भी सुपर्ण वेदप्रतिपाय होने चाहिने मन्त्रका अर्थ दोसुपर्ण है (दासुपर्णा) दो सुपर्णा (सयुना) परस्पर सम्बन्धले (सखाया)समान प्रीतिवाले अर्थात् जिनका प्रतीत होना तुल्प है ये दोनों (समान) एक (वृक्ष) वृक्षको (परिपस्वनाते ) आश्रय कर रहे हैं ( तयोः) तिन दोनों (अन्यः) एक (पिपलं) (स्वादत्ति) वृक्षफलको भोक्ता है और दूसरा (अन- इनन् ) न भोक्ता हुआ (अभिचाकशीति ) प्रकाश करता है वही प्रकाटा फरनेवाला सुपर्ण मंत्रप्रतिपाद्य है यथा हि- एक:सुपर्णःससमुद्रमाविवेशसइदंविश्वंभुवनंविचष्टे । . तंपानमनसापश्यमन्तितस्तंमातारहळिसउरेळिमातरम् ऋ० मं० २० मं०४ अर्थ-(एकः ) एक (सुपर्णः) प्राणवायु उपाधिक सुपर्णवत् सुपर्ण है (स) है (समुद्रम् ) समुदवत् विस्तृत अन्तरिक्षको (आविवेश) प्रवेश करता है (स.) सोई प्राणोपाधिक परमात्मा.( इदम् ) इस (विश्वं भुवनम् ) सर्व लोकको (विवष्टे) पश्यति, प्रकाशित करता है ( तम्) तिस प्राणदेवको ( पाकेन मनसा) परिसक मन करके मैं उपासक (अन्तितः) अपने हृदयकमलमें ( अपश्यम् ) देखता हुआ किस प्रकारसे जो ( तम्) तिस प्राणदेवको अध्ययनकालमें (माता) माथी सो (रेळेि ) अपने आपमें लीन फर लेती है और तूष्णीं भोपाल में वा स्वापकालमें वह माणदेव (मातरम् ) धानको अपने आपमें लीनार लेता है एक तौ सुपर्ण इस मंत्रसे प्राणोपाधिक ईश्वर चेतन प्रतिपाद्य है यहां जो 'लीनता कही है सो केवल उपाधिधर्मका व्यवहार विशिष्ट में फराहै और जो माग उपाधिक ईश्वर प्रतिपाद्य इस मंत्रमें न होता तो सर्वनगर प्रकाशकर्ता कैसे कहते निघण्टुके अ० ३ ! सं११ में (विचष्टे) पश्यतिका कहा है इससे केरक जह माण इस मंत्र में प्रतिपाय नहीं और केवल चेतन भी प्रतिपाय नहीं क्योंकि, वाक्में लीनता फही. है. इससे प्राणोपाधिक चित् प्रतिपाय है यह मुपन तो केवल प्रकाशक अभोक्तारूपसे मंत्रप्रतिपाद्य है और भोक्तारूप पदमपारिक 'जीव चित् है तथा हि- तद्यथास्मिनाकाशश्यनोवासुपणोंवाविपारिपत्यश्रान्तःस ५ हत्यपसो सल्लयायैवध्रियतएवमेवायं पुरुपएतस्माअन्तायधावत्तियत्रसुप्तोन कश्चनकामकामयतेनकञ्चनस्वपश्यति बृ.उ०म० प्रा० ३क.
अष्टमसमुहासत्रंण्डनम् । (२७७) भाषाप-जैस इस प्रसिद्ध आफाशमें श्येन पडे शरीरवाला या सुपर्ण शरीर ला पाम है सो अधिक भ्रमण करनेसे भमको प्राप्त होकर पक्षाको (संहत्य ) विस्तार करके (सहयाय) अपने नीडको ( भियते) जनवस्थित हो गमन करता है से यह (पुरुष)जीव बुद्रपाधिक ( अन्तः ) अन्तरस्थान जो हृदयकमल है नाहाको दोडता है जहां सोता हुआ कुछ भी ( फार्म ) विषयको (न कामयते ) नहीं चाहता और कुछ स्वा भी नहीं देखता इस श्रुतिम सुपर्ण दृष्टान्तसे जो . दयुपाधिक नीव सुपर्णयत् गायत्स्वम अप्तिमें गमन करनेवाला द्वितीय सुपण' कर्मफल भोक्ता प्रतिपादन फरा है सो पह दो सुपर्ण वाश्यान्तरप्रतिपाय ही द्वार पर्णा इत्यादि मंत्रसे कहे तिन दोनों का माणयुदि उपाधि भेदसे भेद वेदान्ति- पॉके सिद्धान्तमें स्वीकृत ही है, चेतन ब्रह्म सर्वात्मरूपसे (सोसावहम् ) इस मंत्रम पत्तिपादन फराहे तिसके भेदका साधन फौन है अर्थात् तिसके भेदका साधन फेदि मंत्र नहीं यह भेदं फेवल मोह और उपाधिसे प्रतीत होता है वास्तरमें जीप कुछ और नहीं है वही आत्मा नीवरूपसे मोहके होनेसे प्रतीत होता है पह मंत्र ही चाहता है। समानेवृक्षपुरुषोनिमनोअनीशयाशांचतिमुह्यमानः । जुष्टंयदापश्यत्य यमीशमस्यमाहिमानमितियतिशोकः॥ यह मंत्र सत्ता तरके अ०४ । ७ में आयाहै। (समानेयो) एक शरोरस पीक्षम (पुरुषः) परमात्मा ही (निममः) निगूठ है (अनीशया) अनीशधुद्धिसे (मुह्यमानः)मोहको प्राप्त हुआ(शोचति) में सुखी दुःखी हूं ऐसा शोच करताहै (य: )गय (जन्यम् ) यथार्थ दूसरे (जुष्टम् ) नित्य नृप्त पोकरहित (शिम्)अपने ईधरीय रूपको तथा (अस्य महिमानम्)इस अपने रूपकी महिमाको अनन्पतासे (प.यति ) देखता अर्थात् साक्षात्कार करता है तब (चीत- शोका) शोकरहित हो जाता है यहां महिमाका यही अर्थ है अपने परमेश्वर माप्त होता है इस कारण वास्तपमें यह एक ही है मोहसे भेद तथा दो प्रतीत होते हैं और (शाश्वतीभ्यः समाभ्यः) इसका अर्थ पूर्व फरनुके हैं । सत्या० पृ०,२०९५०४ पजामेकालोदितशुकुकृष्णांबहीः प्रजाः सृजमानांसरूपाः । अजोहोकोजुपमाणोनुशेतेनहात्येनाभुक्तभोगामजोन्यः श्वेता०४५ प्रकृति जीव और परमात्मा तीनों अन अर्थात् जिनका जन्म कभी नहीं होता औरन कभी यह जन्म लेते अर्थात् यह तीन सब जगतके कारण हैं इनका कारण (२७८) दयानन्दतिमिरभास्करः। कोई नहीं इस अनादि प्रकृतिका भोग अनादि जीव करता हुआ फंसता है और उसमें परमात्मा न फंसता है और न उसको भोग करताहै ॥ २१९ ॥ १२ ॥ समीक्षा-दयानंदगीने सत्या० पृ. ६९ में दश उपनिषद् प्रमाण माने हैं पर पवन श्वेताश्वतर उपनिषद्का है जो उनके प्रमाण किये उपनिषदोंमें नहीं है अपने अर्थ सिद्धिको और उपनिषद् भी माने हैं दूसरेके प्रमाणमें कह देते हैं हम यह नहीं मानते. भला इसमें वेदमंत्रका प्रमाण क्यों न लिखा यहां तो लिखा कि, मकृति जी परमात्माका जन्म नहीं होता इससे निश्चय होता है कि, एक अग शब्द नीषा चक है और द्वितीय अन शब्द ईश्वरवाचक है यह स्वामीनीने समझा होगा परन्तु यदि यहां ईश्वरका ग्रहण करोगे तो (जहात्येना भुक्तभोगामगोन्यः)इस अतिभाग की असंगति होगी क्यों कि (भुक्तो भोगा यया सा भुक्तभोगा तो भुक्तभोगामेनी प्रकृति जहाति ) भोग लिया है भोग पूर्वकालमें जिससे तिस प्रकृतिको त्याग देता है ऐसा अर्थ होनेसे परमेश्वरमें सुख दुःख साक्षात्कार रूप भोग मानना असेगा ? इस कारण इसमें अनुत्पन्न साक्षात्कार और उत्पन्न साक्षात्कार जीवापानी स्वामीजी यहां जीवको जन्मरहित कहते हैं और पृ० १९४ जो विभु हो तो गापर स्वम सुपुप्ति मरण जन्म संयोग वियोग आना जाना कभी नहीं होसत्ता यह लिखने हूँ यहाँ उसका परिच्छिन मानकर जन्म मानते हैं इनकी अनभिज्ञताका या ठिकाना है अब इस श्रुतिका यथार्थ अर्थ लिखते हैं। अनावत् अगारूप जो एक लोहितशुमकृष्णरूपयाली प्रकृति है अर्थात रत गुल नरूपयाली तेग नल पृथिवहिप सप ब्रह्म कार्यभूत प्रपा प्राति पारे समान रूपयर बहुतसी प्रनाको उत्पन फरतीको अनुत्पन्न साक्षात्कार एक भर मर्याद गीय सेवन फरताहुनातिसके पश्चात् गमन करता है, अर्थात् अपने एक प्रामसे प्रकृति भोगता है और भुक्तभोग इस प्रकृतिको उत्पन्न सासार शीर दूसरा त्याग देता है अब पहा यह विचार कर्तव्य है गो रक्त शुम कृष्णा प्रकृति है सो अनादि अर्थात् अनन्य है यह किसी दिन भासा (विमता प्रकृतिनन्या रूपात्यात पटयद ) इस अनुमानसे सादि सिद हरी इस कारण इस श्रुति पचनसे अनादि मति नदि हो सकती और इससे पारप देखने ममतादाम्यापन भिन्नाभित्र विनामानिमिडी हे पाहि- तेध्यानयोगानुगताभपश्यन्देवात्मशक्तिस्वनिगूढाम् । वे अनादी मानन योगाभ्यास कर परमामा अनुगन अपात शे० म.मं.. A अष्टमसमुल्लासखण्डनम् । कर देव परमात्मामी आत्मरूप शक्ति तादात्म्य संबंधसे वर्तमान अपने कार्यास गच्छादितको योगंज प्रत्यक्षसे देखते हुए इस कहने से भिन्न २ विलक्षण अचिन्त्य कि सिद्ध होगई । इस श्रुतिमें कल्पना करके अनात्व है अभावत् अना है जैसे कमें कोई अना नाम छागी लोहित कृष्ण शुक्लरूपवाली अपने तुल्य-प्रनाउत्पन रे तिसके पीछे कोई अन गमन करता है कोई अन डाग भुक्तभोगको त्याग ता है तैसे ही यह प्रकृति है और इसी प्रकारकी अजात्व कल्पना व्यासनी अपने में लिखते हैं । कल्पनोपदेशाचमवादिवविरोधः शा० अ०१पा० ४ सू०१० अजावत् अना ऐसी कल्पनाका उपदेश अना मंत्रमें होनेसे अविरोध है जैसे करणान्तरमें अमधु आदित्यको देव मधु कहा है और अवेनुवाकको धेनु कहा है वल कल्पना करके देवताओंका मोदन हेतु होनेसे मधु और सर्व कामना पूरक .. नेसे धेनु आदित्य और वाकका कहा है। और नय कि, सब कुछ ईश्वरहीने उत्पन्न किया है तो प्रकृति नित्य फैसे ॥ तस्मादाएतस्मादात्मन आकाशः संभूतः आकाशादायुः । वायोरग्निः अनेरापः अद्यः पृथिवी प्रायव्या ओपधयः । ओषधीभ्योन्नम् अन्नात्पुरुपःसएवाएपपुरुपोन्नरसमय तैत्तिः १ ब्रह्मा वल्ली अनु०१ इदं सर्वमसृजत् यदिदकिंचेति । तैत्तिरी० २ अनु०६ आत्मावा इदर्भकएवाग्रआतीनान्यत्किंचन ३ ऐतरेय उप." मर्थ-उस आत्मासे आकाश, आकाशसे वायु, घायुसे अमि, अमिसे जल, जलसे थेवी, विधीसे ओपधी, ओपधीसे अत्र, अनसे पुरुप हुआ है इस कारण यह हा अनरसमय है॥१॥ जो कुछ भी यह है सब परमेश्वरने बनाया है ॥२॥ प्रथम एक मात्मा ही था अन्य कुछ नहीं ॥ ३ ॥ और (नासदासीत) इत्यादि वेदमंत्र नो पीछे लिख आये हैं कि प्रलपालमें. इरन तम प्रकृति आदि कुछ भी नहीं था इस कारण प्रकृतिको ईश्वरके समान त्य मानना ठीक नहीं॥ स०पू० २०९६०१ सरत्त्वजस्तमसा साम्यावस्याप्रकृतिः प्रकृतेर्मदान मंदतोऽहं- ܀ २ ८०) दयानन्दतिमिरभास्करः। फारोऽहंकारात् पंचतन्मात्राप्युभयमिन्द्रियपंचतन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पंचविंशतिर्गणः। सांख्य० १६१ (सत्य) शुद्ध (रज) मध्य (तमः) जाध्यः अर्थात् नडता तीन वस्तु मिल फर गो एक संगात दे उसका नाम प्रकृति है उससे महत्तत्त्व बुद्धि उससे अई- कार उससे पंचतन्माना सूक्ष्म मूत और दश इंद्रियां तया ग्यारहवा मन पांच तन्मावानोंसे पृथिव्यादि पाच मूत ये घोपीस और पचीसया पुरुष अर्थात् जीव और परमेश्वर है ।। २१९ । २० समीक्षा-स्वामीनी जो सूवार्य विगाडते हैं कि, पुरुष अर्यात् नीव और पर मेश्वर क्या कपिलदेवनी पर गिनती नहीं माती थी जो जीव पचीस और परमे- वर २६ बा प्रगट न लिखकर पच्चीसहीमें समाप्त कर दिया स्वामीजी जीव ईश्वर दो अर्थ ठीक नहीं यहां पुरुष शब्दसे एक ही चेतन आत्मा ग्रहण किया है। स० पृ० २०९५० २२ से पृ० २११५०१ तक (प्र.) सदेव सोम्येदमग्रआसीत् १ डा०प्र०६सं० असद्वादमग्रआसीत् २ तेत्ति ब्रह्मा० अनु० आत्मैवेदमग्र आसीत् ३ बृह० अ० १ ब्रा०४ मं०१ ब्रह्मवाइदमग्रआसीत् ४ श० ११११११११ पे उपनिषद् वचन हैं हे श्वेतरतो! यह जगत् सृष्टिके पूर्व सत् १ असद आत्मा ३ और ब्रह्मरूप ४ था पश्चात् ॥ तदेवतबहुस्यांप्रजायेयति १ सोकामयत बहुस्यांप्रजायेयेति २ तेत्ति ब्रह्मा० अनु०६ यह तैत्तिरीयोपनिषद्का पचन है पही परमात्मा अपनी इच्छासे बहुरूप हो गया है १।२ सर्वखलिदंब्रह्मनेहनानास्तिकिञ्चन ॥ यह भी उपनिपद्का वचन है जो यह जगत् है वह सब निश्चय करके ब्रह्म उसमें दूसरे नानाप्रकारके पदार्थ कुछ भी नहीं किंतु सब ब्रह्मरूप है (उत्तर) पर्यो इन पचनोंफा अनर्थ करते हो क्यों कि उन उपनिपदोंमें । भन्नेनसोम्पशुंगेनापोमूलमन्विच्छ अद्भिस्सोम्यशुंगेनतेजोमू- उमन्विच्छतेजसासाम्यशुंगेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाःसोम्ये (२८)। अष्टमसमुल्लासखण्डनम् । मासर्या प्रजाःसदायतनाःसत्प्रतिष्ठाः*छा०प्र०६ख०८ म.. छान्दोग्य उपनि हे श्वेतकेतो! अनरूप पृथिवी फार्पस जलरूप मूल कार- 'णको तू जान कार्यरूप जलसे तेजोरूप मूल और तेनोरूप कार्यसे सद्प कारण जो नित्य प्रकृति है उसको जान यही सत्यस्वरूप प्रकृति सब जगत्का मूलघर और स्थितिका स्थान है यह सब जगत् सृष्टिके पूर्व असत्के सदृश और जीवात्मा ब्रह्म और प्रकृतिमें लीन होकर वर्तमान था अभाव न था और जो “सर्व खलु यह पचन सो ऐसा है जैसा कि, "कहींकी ईट कहींका रोडा भान- मतीने कुन्वा जोडा ॥ " ऐसी लीलाका है क्यों कि- सर्वखल्विदंब्रह्मतजलानितिशान्तउपासीत ॥ छान्दोग्य । प्र०३ खं०१४ मं." और नेहनानास्तिकिंचन । कठोपनि अ० २ वल्ली ४०११ यह फठवल्लीका पचन है जैसे शरीरके अंग जबतक शरीरके साथ रहते हैं तब- तक कामके और अलग होनेसे निकम्मे हो जाते हैं वैसे ही प्रकरणस्थ वाक्य सार्थक और प्रकरणसे अलग करने या किसी अन्य के साथ जोडनेसे मनर्थक हो जाते हैं (यह बात स्वामीजीपर ही लगती है आपने ऐसा बहुत ही जगह किया है) सुनो इसका अर्थ यह है हे जीव । तू मझकी उपासना कर जिस अझसे जगत्की उत्पत्ति स्थिति और जीवन होता है जिसके बनाने और पारणसे यह सब जगत् विद्यमान हुआ है पा प्रझसे सहचरित है उसको छोड दूसरेकी उपासना न करनी इस चेतनमात्र अखण्डैकरस ब्रह्मरूपमें नानापस्तुओंका मेल नहीं है किन्तु यह सब पृयक स्वरूपमें परमेश्वर के आधार में स्थिति है ॥ २२३ । २ से। समीक्षा-स्वामीनीकी बाजीगरकीसी लीला है आप ही प्रभ कर्ता हैं और माप ही उत्तरदाता हैं, स्वयं ही कहींकी ईट कहींका रोडा लेकर उपनिषदोंकी श्रुति लिखी हैं जैसा (सर्व) में (नेहनाना )यह श्रुति मिलादी भला यह प्रभ किसने स्वामीनासे कियेयेयह मिथ्या कल्पना इनके परकी है (नेहनाना) इसके अर्थ जो (इस वेतनमात्र) इत्यादि पूर्व लिखित किये हैं इस अक्षरार्य में दृष्टि दौनिपे . तो यह अर्थ होता है कि (इह नाना किंचन नास्ति )अदि इस मामें कुछ भी पृयाभूत वस्तु नहीं है जैसे लोकमें भी कहते हैं (इह दि पटादिकं किंचन नाना नास्ति (अर्थात पृथाभूतं नास्ति किन्तु मृदेव पटादिरूपेण प्रतीयते) इन पडोंमें मिट्टी के सिवाय कुछ नहीं है किन्तु यह मिट्टी ही पढोंके रूपसे प्रतीत * पांचवी बारमें एवमेव खल सोम्यानेन इत्यादि शुद्ध किया है।
२८२) दयानन्दतिमिरभारः। ये है स्वामीनीने जो इसा लम्बा चौहानय किया है वह कौन्ले पदार है (और परमेश्वरके आधारमें स्थित है ) तो क्या कोई परमेशका में मार दूसरा हैसबका आधार तो परमात्मा नाप है टसमें भी आप पात । नापार लगाते हैं और टसमें नानावस्तुओका मेल नहीं यह पाना मी का नसंगत है क्यों कि पंचभूतोंके मेल बिना कोई भी काप्यं मिड होताना कारण विकरन होकर सर्वमार्य सिद्ध होते हैं यह समय अति रिस हैं से स्वामीजीका खग्इन स्वतः हो जाएगा। मनसेवेदमाप्तन्यन्नेहनानास्तिकिचन । समृत्युम मोतियइहनानेवपश्यात कठ.उ.वल्ली.म०३.२ नर्य-ज्ञानयुक्त मनसे ही नखण्ड एकरस ब्रह्म प्राव होसता है इस ब्रह भी परभूत पन्तु नहीं है जो साविष्ठान सर्व मपंचका सारांश ब्रह्म है जिनमें नाई पृयम्भूत वस्तु तुल्य कुछ भी ब्रह्म भिन्न भामागे काम है सो मृत्यूते मलको प्राप्त होता है भाव यह है भेददी ब्रह्म के ज्ञान होने र जन्म मरणको प्रात होते हैं इससे स्तनोनीका भेदप टडगा का खलु ) इसका जो स्वामीनीने अप लिश है सो भी भ्रष्ट है क्योंकि दं सर्व ब्रह्म) यह सम्पूर्ण ब्रह्म है इदंशब्द प्रत्यक्षादि प्रमानसिपमा है, जैसे कोई कई यह सम्पूर्ण कटक कुण्डलादिक मुबह सो म्हामुन देका उपादानोपादेय भाव है (शंका) इसका यह अर्थ नहीं मिला. मझ नदि ब्रह्मने स्थित है) इसी शंकाको निवृत्तिके वास्ते (दान) दोषण है व यह है तिस ब्रह्मसे ही उत्पन्न होकर तिमहोंमें रत होता भीमें चेष्टा करताहै जिसमें कार्यका लय होता है सोई उपादान भारत जैसे किसी निमिचसे मेवा न ओउँ होकर फिर ओठे जातको हैं और जलरूप होते हैं ऐसे ही कटादि मुनमें लीन होकर मर्मती हो कटक बोले आदिशा आदि मध्य अनमें मुयानल ही तत्व है की व संसारका (तनलान्)पह विशेषग कहातोब्रह्मजन्माटमादलमारत होगपा बस पह नगद ब्रह्ममें से पिता से मन कटा रटने ती कारण ब्रह्म और जगदके अभेद सापक (सई ब्रम) या सामान भी प्रतिमें संगत होता है नब सा सान्मा ब्रह्म है तो रेमो में पासना करना योग्य है नवब्रह्मनगदका टपादान भारत है तामा नना और ब्रममें सस्तारित है यह मानना असंगत है भर पर निससे उपादान कारल और उस अयं विदित हो जाना। - अष्टेमसमुल्लासखण्डनम् । (२८३) सर्वखालिदंब्रह्मतनलानितिशान्तउपासतिाथखलुक्रतुः मयापुरुषोयथाक्रतुरस्मिलोकेपुरुषोभवतिततःप्रत्य भवति सकतुकुर्वीत ॥१॥ मनोमयःमाणशरीरोभारूपः सत्यसंकल्पआकाशात्मासर्व- कासर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्य- नादरः ॥ २ ॥ एपमआत्मान्तर्हृदयेऽणीयान्वीही यवा- दासर्पपाहाशमाकाद्वाश्यामाकतण्डुलादाएपमआत्मान्तह- दयेज्यायान् पृथिव्याज्यायान्तरिक्षाध्यायान् दिवोज्या- यानेभ्योलोकेभ्यः ॥ ३ ॥ सर्वकर्मासर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरएपमआत्मान्तर्हृदय एतद्रौतामितःप्रेत्याभिसं भवितास्मीतियस्यस्यादरान विधि- कित्साऽस्तीतिइस्मादशाण्डिल्यः॥४॥छान्दो प्रपा०३ खं० १४ अर्थ-वह उपासना कैसे करनी चाहिये सो लिखते हैं "सकतुं कु/त" सोपाराक मत अर्थात् निश्चयरूप संकल्प करके शान्त ब्रह्मको टपासना फरै मिस हेतुसे कि फतुमय पुरुष है अर्थात संकल्प प्रधान पुरुष होता है जैसे संकल्पयाला पुरण इस लोकमें होता है वैसे ही भावनानुसार प्राणवियोगसे उत्तर कालमें होता है ! निसको शरीर मनोमय अर्थात् प्रधान मन उपाधि. विशिष्ट ( माण- शरीरः) ज्ञान और क्रिया शक्ति विशिष्ट है, ऐसा ब्रह्म उपास्य है (भारूप) प्रकाशस्वरूप और सत्यसंकल्प है, इस विशेषणसे संसारी जीवकी व्यावृत्ति बोधन- की आकाशवत् व्यापक और सर्वकर्मा अर्थात् जिसका सम्पूर्ण विश्व कार्य है दोपरहित और सर्वकामनायुक्त सुखसे सर्व गन्धयुक्त और दिव्य सर्व रसयुक्तः । (सर्वम् इदम् अभिआत्तः) इस सर्वके चारोंओरसे व्याप्त हो रहा है (अवाकी अनादरः) पाय उपलक्षितं सब इन्द्रिय वर्जित अर्थात् आप्तकाम है २ (एष म आत्मा)यह मेरा स्वरूप भूत आत्मा है यह ध्यानका आकार है आशय यह है भपनेमें ईश्वराल्माका आरोप करके उपासना फर इसे अहं ग्रह उपासना कहते हैं जो ऐसी उपासनासे साक्षात्कार होजाय तो शीम मुक्ति होजाती है मनउपाधिक वपास्पका वर्णन करते हैं। हृदयमें । अन्तर सुस्म है और थान पर श्मामाक और श्यामांकतंडुल इन सबसे सूक्ष्म है) परिष्टिनपः.. N अत्यन्त (२८५) दयानन्दतिमिरभास्करः ।. रिमाण पदार्थोसे भी सूक्ष्मतर फहनेसे अनुपरिमाणत्व. शंका भी हत होगई कह मेरा आत्मा पृथिवी अन्तरिक्ष सर्व लोफसे अधिकतर है ऐसे पूर्व मनोमयत्या- दिगुणविशिष्ट ईश्वर ध्येय है सो इसका तीसरे अध्यायमें उपदेश कर ज्ञेय वस्तुका पष्ठ सप्तममें उपदेश करेंगे ३ इस उपासनामें सर्वकर्मा इत्यादि गुणयुक्त ही उपा. स्पद इसी कारण श्रुतिमें सर्वकर्मादिक पद पुनः आये हैं (एतद्ब्रह्मैतमितम्मेत्या- भिसम्भावितास्मीति ) यह उपास्य देव ब्रह्म है इसको इस शरीरसे प्राणको त्यागकर प्राप्त होऊँगा (यस्यस्याददा) जिस उपासकको यह दृढ निश्चय है सो उपासनाके फलको प्राप्त होगा यह शाण्डिल्य ऋपिने फहाहै पुनरुक्ति विद्या समा- प्तिके वास्ते पोधन करी है अब इसे सज्जन पुरुप विचारेंगे कि, इस श्रुतिमें सर्वमप- पका उपादान कारण ब्रह्म सर्वात्मा सर्व कर्मत्वादिविशिष्ट निश्चय होता है ऐसे २ स्वामीजीके असंगत लेखको कहांतक गिना अब और सुनिये- सदेवसोम्येदमग्रआसीदेकमेवाद्वितीयम् तदैकआहुरस देवेदमग्रासीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत ॥ १॥ कुलस्तुखलुसोम्यैव ५ स्यादितिहोवाचकथमसतः सजा-' येतेतिसत्त्वेवसोम्यदमग्रआसीत् । एकमेवाद्वितीयम् ॥ २॥ तदेवतबहुस्यांप्रजायेयेतितत्तेजोसजताछो उप. अप्र.६ सं. २ अर्थ-रद्दालक ऋपि अपने पुत्र श्वेतकेनुसे कहते हैं हे सौम्य ! यह प्रत्यक्षादि । प्रमाणसिद्धि वस्तुमात्र सृष्टिसे पूर्व कालमें सदूप ही होता हुआ अर्थात् सवरूप एस्तु के साथ तादात्म्पापन्न होता हुआ जैसे वृक्ष उत्पत्तिसे प्रथम घीनमावापन या पैसेही सदस्तु जो सर्वका चीन है तद्रूप ही यह प्रथम था, सो सदस्त क्या है (एकमेवं ) अर्थात् कार्यभावापन्नवस्त्वन्तररहित है निश्चय (अदितीय )निमित्त फारणान्तरनित है कोई ऐसा रहते हैं कि, यह नामरूप प्रपंच प्रथम ( अमद्) अभावमात्र था ( एकमेव ) कार्ययस्त्वन्तरवनितनिमित्तादिरहित या तिस असक्से पह सतनाम रूप पस्तु हुना है उनका कहना ठीक नहीं है है सौम्प ! यह कैसे हो सका है ( असतः) अभावमात्रसे संत हो इस कारणसे सत् ही कार्य भाषापन्न पस्त्यन्तरवर्नित निमित्तकारणान्तरवस्तुरहित होता हुआ सो सदस्तुका आलोचन परता हुआ भावी जगत्को अपने देखा और इच्छा परी में बहुतसा होम प्रतीत होऊ प्रगारूपको धारण कर सो तेनका सनन करता हुआ इसी प्रकार मं. ६ स०४७ मं० १८ रूपं रूप प्रतिरूपो पभूव) में कहा है इस जगदफा उपादान कारण है सिद्ध होगपा अब यह या अष्टमसमुल्लासस्त्रण्डनम् । ( २८५) मी विचार है जब सत्में देखना अथवा बहुत होनेकी कामना हुई तो चेतनत्व : सिद्ध होगया इससे इस श्रुतिमें सत् शब्दको जड प्रकृतिका बोधक मानना स्वा. मीनीको वेदान्तानभिज्ञता प्रगट करता है अब दूसरी श्रुतिमें जो अज्ञानता प्रगट फरी है उसे दिखलाते हैं। ततच्छुङ्गामुत्पतित सोम्यविजानीहिनदममूलंभविष्यति ३ तस्यकमूटस्यादन्यवान्नादेवमेवखलुसोम्यानेनशुङ्गेनापोमूल- मन्विच्छाद्भिः सोम्यशुङ्गेनतेजोमूलमन्विच्छतेजसासोम्य- शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छसन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतना सत्प्रतिष्ठाः-छां० प्रपा०६खं० ८ मं०४ अर्थ-जब अन्न रसादिकार्य देह प्रसिद्ध हुआ तब पह जो शुङ्ग देह है सो उत्प. तित, उत्पन्न है जैसे वदधीजसे षटका वृक्ष उत्पन्न होता है तसे यह देह भी मूलशून्य नहीं ऐसे तू जान सो इस देहका अनके विना कौन मूल है किन्तु अन्न ही मूल है इसी प्रकार हे प्रिय श्वेतकेतो ! अन्त्ररूप विकारसे जल और जलसे तेज जान, तेजसे सत् मूल जान, इस प्रकार सत् मूल कारणवाली संपूर्ण प्रना है और सत् वस्त ही आपतन अर्थात् स्थितिस्थान है, और सत् ही प्रतिष्ठा अर्थात् लयाधार है स्यामीजीने खलु पर्यन्त श्रुतिभागको त्यागके शेषश्रुतिका अर्थ भ्रष्ट कर दिया सो पूर्व लिख चुके हैं स्वामीजीने सत् शब्दको प्रकृतिवाचक मानकर सर्व जग. का मूलकारण प्रकृतिको माना है इस स्थानमें सतरूप और नित्य प्रकृति याद घेतनरूप है तौ ब्रह्मरूप ही प्रकृति सिद्ध होगी यदि जडप्रकृति ब्रह्मभिन्न अभि- मत है तब तो स्वामीजीका महामोह है क्यों कि, जह प्रकृतिमें ईक्षण और बहभवन संकल्प कैसे होगा इसी कारण प्रकृतिको जगत् कारणत्वका व्यासनी अपने सूत्र में निषेध करते हैं। ईशते शब्दम्-शा० अ०१ पा० १सू०५ ईक्षतेः न अशन्दम् । अर्थ तव समन्वयात् इस चौये व्याससूत्र में प्रतिपादित सर्व उपनिषदचन तात्पर्य विषय ब्रह्मसे भिन्न जड प्रकृति परमाणु आदि जगत्के कारण नहीं क्यों कि अशब्द अर्थात् वेदसे अप्रतिपाद्य होनेसे और घेद अप्रतिपायमें हेतु(ईक्षतेः) पह दिया है अर्थात् ईक्षणवालेफो कर्तृत्व श्रवण करा जाता है सो ईक्षण चेतनका धर्म है नडका नहीं इससे जड प्रकृतिको यदि मत् शब्द बोध्य मानेंगे तो सत् शब्द वाच्य वस्तु में ईक्षण तथा बहुत होनेकी कामनाका वाघ होगा इस कारण (२८६) दयानन्दतिमिरभास्करः। • छान्दोग्यके ६ अध्यायमें सत् शब्दसे ब्राहीका ग्रहण किया है सोई जगदा उत्सति स्पिति लयाधार है तिससे भिन्न जड प्रकृति नहीं अब दूसरी अति में देखिये जिससे प्रझभिन्न प्रकृतिको उपादानकारणता सिद्धान्तका संडन होता है। सोऽकामयत । बहुस्यांत्रजायेयेति । सतपोऽतप्यत । सतप- स्लप्सा । इद ५ सर्वमसृजत । यादेदचि । तत्सदा । तदेवानुप्राविशत् । तदनुप्रविश्य । सच्चत्यञ्चाभवत् । निरुत- ञ्चानिरुक्तश्च । निलयनचानिलयनञ्च विज्ञानञ्चाविज्ञानश्च । सत्यञ्चानृतञ्चसत्यमभवत् । यदिदं किञ्च । तत्सत्यमित्याच. क्षते । तदप्येपश्लोको भवति । असदाइदमग्रभासीत् । ततोसदजायत । तदात्मानंस्वयमकुरुत । तस्मातत्सुकृत मुच्यत इति । तत्ति ब्रह्मा अनु०६१७ वर्ष सो पूर्व प्रकरणमतिपाय आकाशादि भूतकारण स्वरूप आत्मा शशमा फरता हुआ कि, मैं बहुतरूप होकर प्रतीत होऊ और प्रनारूपको धारण कर (तपोनप्पत) आलोचन करता हुआ आलोचन फरक सब नामरूप प्रयो स्चता लुगा जो कुछ भी पम्नु है । पीछे तिस सम पस्तुको चनाहर सो भार दी तिस सब पस्तुमें गीवरूपकर प्रपिष्ट हुआ तिसमें प्रविष्ट होकर (सर) पुषि प्पादिभूत (त्पत् ! यापु जामशरारूप हुना (निरचानिरक्तानियत कोण और निपनापोग्य (निरपवानिटपनं च) सपापार और सपानाधार (fare विधान २) प्रत्यक्षादि विषय और प्रत्यक्षादिका अपिपप (सवान) प्पारारिक सत्य और प्रातिमासिक (सत्यमभात् ) या सर्व प्रशिक मानिमामि पाणु परत सर्व पग्नु सत्यरूप परमात्माही हुआ अपनी भविष्य पनि सर जो पुर पस्नुमान है तिमन सत्य पर याने भाशयात सत्यसामने मय पदलाता है में पापमान पर शोक भी मना ६॥ पद सच (अमर) अनभिपतनाम का करत कारण तादाकार पाया सिनेमा होहर पीत मा मो आग्मा अपने भागमा फाली भादगिसे काता से कोई योगमिदिया योगानन पानी सविन न कर पारन करता है यमे परमामा महायोगी आने माला नाहा मी प्राण भगद (मान) पंतपते स. २११ पं० २५ (प्रभः) नवीन वेदान्ती लोग केवल परमेश्वरहीको गतका अभिन्न निमित्तोपादान कारण मानते हैं ।। ययोर्णनाभिःसृनतेगृहने च । मुंडक. १ खं० १०७.. आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेपि तत्तथा-माण्डू कारिका ३३ (इसरा उत्तर पृ०-२१२ पं०५ में) जो तुम्हारे कहने अनुसार सप जगतका दान फारण ब्रह्म हो जाये तो यह परिणामी अवस्थान्तर युक्त विकारी होनावे र उपादान कारणके गुण फर्म स्वभाव कार्यमें आते हैं । रणगुणपूर्वक कार्यगुणोदएः- वैशेपिक सू०२४ अ० २ आ०१ उपादान फारणके सदृश कार्यमें गुण होते हैं तो ब्रह्म सचिदानंद स्वरूपनगद रूपसे असत् नड और आनंदरहित ब्रह्म अग और जगत् उत्पन्न हुआ है अदृश्य और गगत् दृश्य है ब्रह्म अन और जगत् खण्डरूप है जो ब्रह्मसे रेप्यादि कार्य उत्पन्न होवे तो पृथिव्यादिमें कार्यके जडादि गुण ब्रह्मभी हो ति जैसे पृथिव्यादि जड हैं पैसा ब्रह्म भी जड होनाय और जैसा परमेश्वर वे- है पैसे पृथिव्यादि कार्य भी चेतन होने चाहिये और जोमारीका दृष्टान्त दिया तुम्हारे मतका साधक नहीं पापक है क्यों कि यह जडरूप शरीर तन्तुका दान और जीवात्मा निमित्त कारण है और यह भी परमात्माकी अद्भुत रच- प्रभाव है क्यों कि अन्य जन्तुके शरीरसे जीव तन्तु नहीं निकाल सका ही ब्राने अपने भीतर व्याप्य प्रकृति और परमाणु कारणसे स्थूल गगतको कर बाहर स्थूलरूप फर आप उसीमें व्यापफ होके आनंदमय होरहा है और २१२५० १४ में लिखा है यह कारिका भ्रममूलक है क्यों कि मलयमें र प्रसिद्ध नहीं था और सृष्टिफे अन्त अर्थात् प्रलपके आरम्भसे जबतक पार राधिन होगी तबतक भी जगत्का कारण सूक्ष्म होकर अप्रसिदरहता तमआसीत्तमसागूढमयेक मं० १० सू० १२९ मं०३ उग्वेदका पचन है- आसीदिदं तमाभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ।। . अप्रतर्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ मनु ११५ ह सब जगत् सृष्टिके पहले प्रलपमें अंधकारसे आहत आच्छादित पा और रम्भके पभाव भी वैसा ही होता है टस समय न किसीके नानने नतमें मादायन्ते प पनास्ति वर्तमानम तत्तया ।
दवानन्दतिमिरमास्करः। लाने और न प्रसिद्ध चिहोंसे युक्त इन्द्रियोंसे जानने योग्य था और न होगा कि वर्तमानमें जाना जाता है, और प्रसिद्ध विहोंसे युक्त जानने योग्य होता है यथावत् उपलब्ध है पुनः उस कारिका फरके वर्तमानमें भी जगत्का अभाव सिर है सो सर्वथा अप्रमाण है क्यों कि जिसको प्रमाता प्रमाणोंसे जानता और मार होता है वह अन्यया कभी नहीं होसक्ता ॥ २२२ । १० से २२३ तक । समीक्षा-यद्यपि हम उपादान कारण आदिकी व्यवस्था पूर्व अच्छी प्रकार फथन फर चुके हैं परन्तु स्वामीजीने इस प्रकरणको वार २ लिखा है इससे हमार इसके उत्तरमें व्यासजीके सूत्र लिखते हैं । दृश्यते तु-अ०२पा०१९०६ यहाँ सुशन्द पूर्वपक्षकी निवृत्तिके वास्ते है (एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः) इसमें चेतनसे जडका जन्म सुना है यस स्वामीजीका वह कथन कारणके साश फार्य होता है खंडित होगया (विज्ञानपन एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्यापति) इस जडसे चेतनका जन्म है लोकमें भी चेतनोंसे) विलक्षण फेशनसादिका जन्म और अचेतन गोमपादिसे चेतन वृश्चिकादिका जन्म देखते हैं ननु अचेतन ही देह अये तन फेशादिका कारण वह अचेतन वृश्चिकादि देह अचेतनगोमपादिका कार्य है इसमें कुछ भी अचेतन चेतनका आयतन भावको पहुँचा-वह कुछ नहीं यही बेड- क्षण्य है यह बडा परिणामिक स्वभावका विप्रकर्ष है पुरुषादिकोंका प शादिः कोंका, क्यों कि स्वरूपभेदसे तैसे गोमयादिका वह पृश्चिकादिका है अत्यन्त साह प्पमें प्रकृति विकृति भान नहीं होसक्ता है, जो पापियादि स्वभाव पुरुषादिरा फेशादिमें यह गोमयादिवृश्चिकादिमें अनुवर्ते है तो अझफा भी सता लक्षण प्रभार आकाशादिमें भी देखते हैं फिर ब्रह्मवादीसे यह नहीं कहसक्ने हो कि जो चेतनमे युक्त नहीं है सो अब्रह्म प्रकृतिक देखा है वह तोसर यस्तुको ग्रामकृतिक मानता है। निष्पन्न ब्रह्ममें रूपादिके अभावसे प्रत्यक्षादि प्रमाण पह लिंगादिके अभायसे अनु मानादिका असम्भव है ब्रह्म ही धर्मके समान फेवल पेदहीसे जाना जाता ! (नेपा तण मतिरापनेपा ) तकी मातसे यह प्राप्त नहीं हो संता पी ताई प्रमाण है जो श्रुतिसे मिली है चेतन शुद्ध शब्दादिहान मका उलटा पाप शन्दादिवत् और नो फेवल तसे ही निर्णय करता है उसका निर्णय ठीक नई प्पासनी सूत्र लिखते हैं। तर्काप्रतिष्टानादप्यन्यथानुमेयमितिचेदेयमप्यनिर्मोक्षप्रमंगः ११ वेदा० अ०२॥ पेदयोधा अपम केवल तसे दोनदीं अगहना चाहिये क्या किवताना पुरा इटिम रचीगई है इस कारण सूर्यमा प्रमाण नहीं क्योंकि उटमा निमार अष्टमसमुल्लासखण्डनम् । किसीने तर्कवलसे उत्प्रेक्षा करी दूसरेने उसको तर्कामास कहा है फिर अन्यने उसको भी तकाभास कहा इससे तर्क ध्रुव मानने योग्य नहीं है यद्यपि कहीं तर्फ प्रतिष्ठित हो तथापि जगत्कारण विषयमें तर्क स्वतंत्र नहीं है यह अति गंभीर परमानन्दमुक्तिनिबंध वेदके विना अन्य प्रमाणोंसे जाननेको शक्य नहीं है यह अर्थ रूपादिके अभावसे प्रत्यक्षादि प्रमाणोंका विषयवा लिंगादिके अभावसे अनुमाना- दिकोंफा भी गोचर नहीं है ॥ स्वामीजी उस सूत्रमें वेदप्रमाण लिखते यह सूत्र यही चरितार्थ नहीं है । यथाचप्राणादि-व्याससूत्र २० अ० २ पा० १ जैसे लोकमें जबतक प्राणपवन हृदयमें रहता है तबतक उससे जीवन मात्र ही सिद्ध है अन्य प्राण मेदोंसे प्रसारणादि कार्य भी सिद्ध होते हैं परन्तु वे सब प्राणादि भेद पवनस्वभाव ही हैं न कि, पवनसे भिन्न हैं. ऐसेही विश्वरूप कार्य कारण ब्रह्मसे भिन नहीं है तिससे सब विश्व ब्रह्मका कार्य और ब्रह्मसे अनन्य है यह श्रीतप्रतिज्ञा सिद्ध हुई है “येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति" जब कि, कार्य कारण सब ब्रह्म ही है तो दृश्य अदृश्य खंड अखंड जड चेतन आदिका सम्बन्ध कैसा, उससे कुछ पृथक् हो तो कल्पना की जा सक्ती है इससे स्वामीजीका कथन भ्रान्तियुक्त है अब आगे कर्णनाभिका प्रसंग भी देखिये ॥ देवादिवदपि लोके २५ अ० २ पा० १ जैसे लोकमें देव पितर ऋपि बडे बडे प्रतापी चेतन विना सामग्रीके ऐश्वर्य योग द्वारा संकल्प ध्यानहोसे जो पूर्व नहीं थे देह पर स्थादि उनको रचते देखते हैं यही मंत्र यह अर्थवाद वृद्धव्यवहारोंसेप्रगट है फिर मकरी भी आप ही डोरोंको सुनती है वकुली भी शुक्रके विना मेधके गर्जनसे ही गर्भको धारण करती है पमिनी भी गमनके साधन विना एक तालसे दूसरे तालमें जमती है ऐसे ही चेतन भी ब्रह्म- बाह्य सामग्री विना आप ही जगत् सजता है ब्रह्म तो सबसे विलक्षण है वह बायसाधन नहीं चाहता, अपनेसे आप ही जगत् बनाता है और आपही लय कर लेता है क्यों कि ब्रह्म देवताओंसे भी पिलक्षण है, इसीमें ऊर्णनाभिका दृष्टान्त है उसे वाद्यवस्तुकी अपेक्षा नहीं होती, अपनेसे ही तन्तुआदि निकालती है और इसी प्रकार ईश्वर भी अपनस ही सब वस्तु निकाल कर जगत् बनाता है, दसे कुम्हारकी नाई वाद्यवस्तुओंकी अपेक्षा नहीं होती। कारिकापर भी आपका मिथ्या ही आक्षेप है क्यों कि फारिफाफा आशय यह है कि जब आदि अन्त में ही ब्रह्मसे व्यतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है तो वर्तमानमें कर हो सक्ती है, अर्थात् आदि अन्त मध्यमें ब्रह्मसे व्यतिरिक्त कोई वस्तु नहीं सब पह , दयानन्दतिमिरमारकरः। ही है (जगत् ) इसका अर्थ बिना माने महात्माजीने गडबडमालिस दिन (आसीदिदं ) इसमें भी दूर ही लिख दिया है कि (मसिद्ध विहांसे जानने पर होता है) अर्थ तो इसका पह है कि, पह जगत् मलपमें अंधार अनुमान शब्द ये तीन प्रमाग हैं, इनसे भी जाननेके अपोग्य पापों और नहीं पड़ता था तथा लक्षगसे रहित अपने कार्यमें असमर्पकी नाई रहा. परमः जीका शोर है और प्रथम ही वेदमंत्र लिखनुके हैं कि, महाभलपमें बमोनिक और कुछ नहीं पा फिर प्रकृति आदि कहाँ २ पे देखो (नासदासीत्) आदि और जो पोलिस आये हैं। स.पृ. २११ पं० ६ म शातिमानका अपं इतना ही है कि परमामा दिए किसीकी महायता मान सब कार्य पूर्ण फरसका है ।। २२४ ॥ २८ समीना सामोनी पिपाउदि बाल कासासी है कहीं लिसने जिला भातिर यह कुछ नहीं पर सना कहीं लिया कि.लिना महाप का काम मांगनिमताताभरकी टरगई। १. २१४५. १८ नय यो प्रकृतिसभी ममम भोर उसमें पाप तभी मो रगदाहार पना देना ॥ २२५।" मापारि भी मागी गानी होगी भर उसो पीछे दौता हो । नाना होगा मानिनाशनी दोगी पर पर नकार बनाती दार नीमकाप भी मार मान गुमा अष्टमसमुल्लासखण्डनम् । (२९१) स. पृ० २१४ पं० २६ कारणके विना ईश्वर कार्यको नहीं करसता (उत्तर) नहीं २२५ । १९ समीक्षा-स्वामीजी पूर्व तो लिख आये हो कि, ( न तस्य कार्य करणं व विद्यते ) कि, उसे कार्य करणादिको कुछ अपेक्षा नहीं अब यहां यह गडबडी वह सब कुछ करनेमें समर्थ है। स० पृ० २१५ पं० २३ सर्वमनित्यमुत्पत्तिविनाशधर्म- त्वात् ।। २२६। १९ २१६५० २५ श्लोकाचैन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रंथकोटिभिः ।। ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ॥ २२७ । २२ से पांचों नास्तिक कहता है कि, सच पदार्थ उत्पत्ति और विनाशवाले हैं इसलिये सब अनित्य हैं, नवीन वेदान्ती लोग पांचवें नास्तिककी कोटीमें हैं क्यों कि वे ऐसा कहते हैं कि, करोडों ग्रंथोंका यह सिद्धान्त है ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या और जीव ब्रह्मसे भिन्न नहीं । समीक्षा-जिसके नेत्रों में जैसी रंगतकी ऐनक लगी होती है उसे जगत् वैसाही दीखता है, नास्तिकशिरोमणि तो आप हैं, जो कि आपका ईश्वर कुछ कर ही नहीं सकता औरोंको नास्तिक बताते हैं, जब कि सब कुछ ब्रह्म है तो जीय कहाँसे है, और जगत् क्या है कुछ नहीं इस प्रकार स्वामीजीकी अनेक गडबडी हैं, बस सिद्धान्त यही है कि, जैसे पटाकाश पटके टूटनेसे आकाशमें मिलता है, इसी प्रकार कर्मबंधन टूटनेसे यह शुद्ध आत्मा सर्वसामर्थ्ययुक्त होता है, यहाँ और जो स्वामीजीने ( नित्यायाः) और ( नासतो विद्यते ) इत्यादि जो वाक्य लिखे हैं उन सबका उत्तर पूर्व प्रसंगमें आगया है इस प्रकारसे बुद्धिमान महाशप जान लेंगे यह टपादानकारणआदिका विषय पूर्ण हुआ यह सब वेदान्तमकरणके अन्तर्गत हैं । आदिसृष्टिस्थानप्रकरणम् । स, पृ० २२३ पं० ७ सृष्टिको आदिमें एक वा अनेक मनुष्य उत्पन्न किये थे वा क्या (उत्तर) अनेक, क्यों कि जिन जीवोंके कर्म ऐश्वरी सृष्टि में उत्पन्न होनेके थे उनका जन्म ईश्वर सृष्टिको आदिमें देता क्यों कि"मनुष्या ऋषयश्च ये, ततो मनुष्या अजायन्त" यह यजुर्वेदमें लिखा है * इससे निश्चय है कि, * ग्यारहवीं बारमें यह यजुर्वेद और उसके ब्राह्मणमें लिखाहै ऐसी थेगडी लगाई है पर यह “मान है कि समस्त दयानन्दी पांडित कितना ही बल क्यों न दगावें पर पद पद पर अशुद्ध सत्यार्थ प्रकाश शुद्ध नहीं होता तभी तो अब शाखायोंके समय सत्यार्थप्रकाश बंद रहता है- सनातन प्रायमगरमभमगधिनासा ९. SET माम प्रयापन या Trt. - (२९२) दयानन्दतिमिरभास्करः। आदिमं अनेक सैकडों सहसों मनुष्य उत्पन्न किपे. ॥ २३५ । .१४ पर (हुए)२१ । २१॥ समीक्षा-स्वामीनीने असत्य बोलनेका पीडा उठा लिया है पदमे । यह वास्प नहीं कि, “ततो मनुभ्या अनायन्त" और दूसरे पदमें er किया है "मनुष्या ऋषपथ ये इसमें 'साध्या ऋषयश्च में ऐसा है यह इस प्रकारसे है ॥ तंयज्ञम्बुहिपि प्रोन्पुरुषातममतः ॥ तेनदेवाऽभयनन्तसाध्याऽक्रयश्चये ॥ यजु०म०३१३०१ (पे) नो ( साध्या देयाः यऋषयः ) साध्य देवता और ऋषि (अतः ) गष्टिी ( गातग ) उत्पा हुए (तग) उस (पाम ! म मापनन ( पुगपग ) निगट पुरुषको (पहिलि ) आत्मा (मोक्ष) are पिया (नन ) टमी पुरुषलारा (अपगत ) या किया तया भोकामना मतिमामायाप ० ११ को इस भूतिम प नाम उसकी मा अपंग प्रतिमाम पनरिया ॥ भर मायामि विपरियटि, दयानंदगीन पद नाम भी शी १० गपंदा राशि प्रपम प्रमाना उगार, मा वर्णन कर प्राणी भर और शया दगिय टिकी आदिम धान मनप नहर ... मनुप्पाही आदिगति गि (ता) e अगर मिम निजात पाने ३१ मनुयनालिया। पाली आप्पांना गांगानाjaafi Ark पन गतिमी तो मर पाराम ममाग नाम का मान बना दिया मामा असदमे भी आगे बरगये मी किन यानि रिती और ना ..... मा श्री ने कर शिप देश प्रविज्ञान प्रसाद में मदाम मारिया पर राय भूatter 11 अष्टमसमुल्लासखण्डनम् । (२९३) इस देशमें बसते थे, क्यों कि आर्यलोग सृष्टिको आदिमें कुछ कोलक 'पश्चात् तिब्बतसे सूधे इसी देशमें आकर बसे थे, और ईरानसे आनेकी बात झूठ है २३६ । ९ समीक्षा अब स्वामीजीसे यह प्रश्न है कि, आपने कौनसे वेदानुसार यह तिब्बतसे आना लिखा है, और त्रिविष्टपको तिब्बत लिखा यह कौनसे कोश मेंसे निकाला है मैं जानता हूं कोई भी ऐसा ग्रंथ नहीं है पूर्वकाल वह नवीन कालका हमारे मतका जिसमें यह बात लिखी हो कि तिब्बतसे आये, स्वामीजी तौ अंग्रेजोंके अनुयायी ही ठहरे उन्होंने ईरान लिखा इन्होंने तिब्बत लिखकर पहले नम्बरका सर्टिफिकट हासिल किया और इससे स्वामीजीके वृद्धोंकी भी मर्खता प्रगट होती है कि तिचत जिसे त्रिविष्टए अर्थात् स्वर्गकी सदृश कहिये -टससे आर्यावर्तको श्रेष्ठ और निवासके योग्य जाना और जब कि आर्यावर्त सब भूगोलमें श्रेष्ठ है तो परमेश्वर प्रथम सृष्टिको उत्पत्ति इसी देशमें करता क्यों कि वे पहले उत्पन्न हुए पुरुप धर्मात्मा थे और यह एक कैसे आश्चर्यकी बात है कि, उत्पत्ति होते ही लड़ाई हुई और विनयी आये ही हारे और आर्योयरत्न माला पृ० ११ में लिखा है कि आप उसको कहते हैं जो श्रेष्ठ स्वभाव धर्मात्मा परोपकारी सत्यविद्यादिगुणयुक्त और आर्यावर्त देशमें सब दिनसे रहनेवाले हों यह पुस्तक भी स्वामीजीकी ही बनाई है इससे दो बातें प्रगट होती हैं एक तो स्वामीजीको अपने लेखका स्मरण न रहा दूसरे यह कि, सृष्टिकी आदिमें दया. नंदसरस्वतीके जितने लोग हुए हैं उनमेंसे कोई आर्य न था तिब्बती थे, क्यों कि सब दिनसे आर्यावर्तमें नहीं रहते थे, किन्तु तिब्बतके रहनेवाले थे, इस देशको उत्तम जान यहां आ वसे, सिद्धान्त यह है कि जो कुछ वेदशास्त्रने आर्यावर्तकी महिमा लिखी है दयानंदजीने उसपर धूल डाल दी, यह कैसे सावित हुआ कि निविष्टपफा नाम तिब्बत है, जब त्रिविष्टपसे तिब्बतको निस्वत ठीक होगी तौ ईरानसे आर्य यह यूरूपवासियोंका कथन क्यों प्रमाण योग्य नहीं, और पह कौनसे ग्रंथमें लिखा है कि, तिब्बतमें * उत्पत्ति हुई पहले सत्यार्थप्रकाशपर मी धूल डाल दी जो लिखा था कि आर्य सदासे यहाँके रहनेवाले थे और यदि आयाफे आनेसे इस देशका नाम आर्यावर्त पड़गया तो यह जिस देशमें रहते थे उसका त्रिविष्टप तिब्बत नाम क्यों उसका नाम भी आर्यावर्त होता और यदि तिब्बतसे ये लोग यहां आते तो तिब्बती कहे जाते जैसे कि कहीं कोई किसी देशको जाता है तो उसको उस देशके नामसे पुकारते हैं, जैसा गुजराती काबुली. युरूपियन, निस द्वीपमें युरुपियन वा और कोई जाति जाकर वास * भा० प्र० में भी तिच्चतमें रहनेका कोई प्रमाण नहीं लिखा लिखते क्या ।
- (२९४ : दयानन्दतिमिरभास्करः। फरती है तो वह उनकी जातिके नामवाला नहीं होता किन्तु उसके नामका उनमें सम्बन्ध आनाता है फिर जब इस देशको कोई नहीं जानता था, तो (तुष्ट बुजुर्ग तिब्बतियोंने कैसे जाना) क्या कोई रेलका मार्ग बनाया या यो पटे थे फलितको तुम मानते नहीं मार्ग महा भयंकर है अनेक प्रकारको दुई हिमालय महापर्वत बीच में पड़ता है 'कदाचित् आप कंधेपर वढाकर लाये होने इससे यह बात कभी वित्तमें नहीं लानी चाहिये कि, आर्यलोग कहीं से भाये हो सदासे इसी देशके रहनेवाले हैं जो कि, प्राचीन कालसे आर्यलोग इस देश में रह चले आते हैं इसीसे इस देशको आर्यावर्त कहते हैं जैसा कि मनुनीने लिखा है। आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् ॥ तयोरेवान्तरं गियोंरा-वतै विदुर्बुधाः ॥ अ० २ श्लो० २२ बंगालके समुद्रसे लेके अरवदेशके समुद्रतक हिमालय और विपायदो वीचमें नितना देश है टसको आर्यावर्त कहते हैं आपोंका यही देश ( आप्पा णामावर्तः आर्यावर्तः ) अर्थात् जन्मभूमि यी आर्यावर्तके कुछ भागा नाम ब्रह्मावर्त है: सरस्वतीपद्वत्योदेवनयोर्यदंतरम् ॥ तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावतै प्रचक्षते ॥मनु० अ० २०१० सरस्वती नदी जो कि गुजरात और पंजाव देशके पधिमभागमें बहती है और पदती नदी जो कि नपपाळके संभागमें बहती है इन दोनों पवित्र नदियों मध्पमें जितना देश है यह आय्यायतकी अपेक्षा पुण्य देश है, और देश ऑफा निर्मित है उसको ब्रह्मावत कहते हैं सबसे प्रथम और उनके द्वारा मनुष्यको उत्सति यहां ही हुई इसी कारण इस देशात ब्रह्मावत राग गया इसके पश्चात् दूसरे देश यस, मादेशक मनुष्याने हम इसमें दिया मीपी जैसा कि मनुनीने लिया है:- एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।। संस्वं चरित्रं शिक्षेरन्पृथिव्यां सर्वमानवाः॥ मनु०२०मार इस देश दतात्र दुर विद्वानोंमे मार्ग पृथ्वार मनुष्य प्राने चरित्र (भारत) और पियामाहा मोरे यहाक मांगाम मन पियारे मोशी, या मालि कि, अमान ही मदरी मुष्टिका मालपान और यहींग और ३३ दिया गई यदि आप लोग तिलता हात तामिलना नीने यही देशमा - . अष्टमसमुल्लासखण्डनम् । (२९५) क्यों कि आपके कथनानुकूल इस देशमें कोइ रहताही नहीं था, तो आर्य लोग विद्या अपने साथही तिब्बतसे लाये थे, तो तिब्बतही सब विद्याओंका स्थान होता इससे यही सिद्ध है कि, आर्य इस देशमें सदाफे हैं और विद्या भी सदासे है और न कभी हिमालयपासियोंने आर्योपर चढाई करी ॥और जब एक मनुष्य जाति थी तो 'ब्राह्मणोस्य मुखमासीत्' इस यजुर्वेदमें चार माति ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य झुंदका वर्णन कैसे आया है ॥ स० पृ० २२५५०२६ *आर्यवाचोम्लेच्छवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः॥ मनु०१०१४५. म्लेच्छदशस्त्वतः परः २ अ० २ श्लो० २३ मनु जो आर्यावर्तदेशसे भिन्न देश हैं वे दस्युदेशऔर म्लेच्छदेश कहलातेहैं॥२३७।९ समीक्षा-क्या स्वामीजीने गपोडा लिखा है जो ऊपरके आधे श्लोकका अर्थ गडपही गये हैं सुनिये यह श्लोक मनुनीने यों लिखा है मुखबाहूरुपजानां या लोके जातयो बहिः॥ म्लेच्छवाचश्चार्यवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः॥ मनु०१०४५ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र इनकी क्रियालोपसे जो अधम जाति उत्पन्न हुई चाहै वे म्लेच्छभाषा करके संयुक्त हों चाहै आर्यभाषा बोलते हों पे सव दस्यु हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि,इससे भिन्न देश दस्युदेश कहाता है इसका यह भाव है कि, आर्यावर्त देशमें भी फर्महीन क्रियाभ्रष्ट लोगोंका नाम दस्यु प्रचलित था, और यदि आधाही पद प्रमाण मानों तौ जितने अपनेको आर्य कहते हैं उन सबकी दस्य संज्ञा हो जायगी दूसरे श्लोकका अर्थ यह है कि इससे आगेम्लेच्छदेश है देवासुरसं. नाम भी स्वामीजीने मिथ्या ही कल्पना की है यह संग्राम वास्तवमें राजा इन्द्रसे मौर दैत्योंसे जो उसकां सिंहासन लेनेकी इच्छा करते थे अनेकवार हुआ है जो बहुत प्रसिद्ध है और "अर्यः स्वामिवैश्ययोः ३ । २ । १०३ " इस अष्टाध्यापी सूत्रके अनुसार वैश्य तो अर्थ होता है आर्य नहीं तो पैश्य भी दस्यु हुए फारण के आपके मतसे जो आर्य न हो वह दस्यु ॥ *पांचवी बारकीमें म्लेच्छाबाचश्चार्यवाचः शुद्धपाठ है।और सत्या० प्र० पृ० २३५५०१७'उत दे उत्त आर्ये' ऐसा अथर्ववेदवचन होनेस शूद्रका नाम भी आर्य नहीं होसक्ता अब अर्यजी वता हां दोवर्ण आयेथे वा चार जब अर्प शूद् और आर्य आये तो फिर यह आर्यावर्त कैसे हुआ आर्या- त होजाता । इससे सिद्ध है कि सनातनसे आर्यावर्त है ब्राह्मणो० इसमें छोटे स्वामी पद्धयांमें. दात्यय माननेको कहते हैं हम कहतेहैं बाहुआदिमें व्यत्ययसे पंचमी क्यों न माने ।
पद्धती नदी जो कि नयपाळके पूर्वभागमें बहती है इन दोनों पवित्र नदियों के ओंका निर्मित है उसको ब्रह्मावर्त कहते हैं सबसे प्रथम ब्रह्माजीने यही देश रवा और उनके द्वारा मनुष्यकी उत्पत्ति यहां ही हुई इसी कारण इस देश नाम ब्रह्मावर्त रक्खा गया इसके पश्चात् दूसरे देश वसे, सब देशके मनुष्योंने इस देशसे विद्या गई यदि आर्य लोग तिब्बती होते तो तिब्बतसे सब विद्या सारखी नासन . हुआ कि, ब्रह्मावत ही सबकी सृष्टिका मूलस्थान है और यहींसे. और रों : दयानन्दतिमिरभास्करः।। फरती है तो वह उनकी जाति के नामवाला नहीं होता किन्तु उसके नीमका .. सम्बन्ध आजाता है फिर जब इस देशको कोई नहीं जानता था, तौ (s. बुजुर्ग तिब्बतियोंने फैसे जाना ) क्या कोई रेलका मार्ग बनाया या न पटे थे फलितको तुम मानते नहीं मार्ग महा भयंकर है अनेक प्रकारको । हिमालय महापर्वत बीचमें पड़ता है 'कदाचित् आपकंधेपर चढाकर लाये होने इससे यह बात कभी वित्तमें नहीं लानी चाहिये कि, आर्यलोग कहींसे आये होकिन सदासे इसी देशके रहनेवाले हैं जो कि, प्राचीन कालसे आर्यलोग इस देशमेटो चले आते हैं इसीसे इस देशको आर्यावर्त कहते हैं जैसा कि मनुनीने लिखा आसमुद्रात्त वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् ॥ तयोरेवान्तरं गियोरा-वत विदुर्बुधाः ॥ अ० २ को २ बंगालके समुद्रसे लेके अरवदेशके समुदतक हिमालय और विपावर चीचमें जितना देश है उसको आर्यावर्त कहते हैं आथ्योंका यही देश (आग्पा णामावर्तः आर्यावर्तः ) अर्थात् जन्मभूमि थी आर्यावर्तके कुछ भागका नान ब्रह्मावर्त है:- सरस्वतीहपद्धत्योदेवनद्योर्यदंतरम् ॥ तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावत प्रचक्षते ॥मनु० अ० २ वो०१७ सरस्वती नदी जो कि गुजरात और पंजाब देशके पश्चिमभागमें बहती है और मध्यमें जितना देश है वह आर्यावर्तकी अपेक्षासे पुण्य देश है, और देवना विद्या सीखी जैसा कि मनुजीने लिखा है। एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ॥ स्वस्वं चरित्रं शिरन्पृथिव्यां सर्वमानवाः ॥ मनु०२०२२ और विद्याओंको सीखें यहां के लोगोंसे सबने विचार साली, यहाँ या कि इस देशके उत्पन्न हुए विद्वानोंसे सारी पृथ्वाके मनुष्य अपने चरित्र (आचार .
अष्टमसमुल्लासखण्डनम् । (२९५) क्यों कि आपके कथनानुकूल इस देशमें कोइ रहताही नहीं था, तो आर्य लोग विद्या अपने साथही तिषतसे लापे थे, तो तिब्बतही सब विद्याओंका स्पान होता इससे यही सिद्ध है फि, आर्य इस देशमें सदाके हैं और विद्या भी सदासे है और न कभी हिमालयपासियोंने आयोपर चढाई करी ॥और जब एक मनुष्य जाति थी तो 'ब्राह्मणोस्प मुखमासीत्' इस पजुर्वेदमें चार जाति ब्राह्मण क्षत्रिय पैश्य शूदका वर्णन फैसे आया है ॥ स० पृ० २२५ पं० २६ आर्यवाचोम्लेच्छवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः। मनु०१०१४५. म्लेच्छदेशस्त्वतः परः २ ० २ इलो० २३ मनु जो आर्यावर्तदेशसे भिन्न देश हैं ये दस्युदेश और म्लेच्छदेश कहलातेहैं।२३७१९ समीक्षा-क्या स्वामीनीने गपोडा लिखा है जो ऊपरके आधे श्लोकका अर्थ गडपही गये हैं मुनिये यह श्लोक मनुनीने यों लिखा है । मुखबाहूरुपजानां या लोके जातयो वहिः॥ म्लेच्छवाचश्चार्यवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः॥ मनु०१०४५ माह्मण क्षत्रिय पैश्य शूद इनकी क्रियालोपसे जो अधम जाति उत्पन्न हुई चाहै घे म्लेच्छभाषा फरफे संयुक्त हों चाहे आर्यभाषा बोलते हों ये सब दस्यु हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि,इससे भिन्न देश दस्युदेश फहाता है इसका यह भाव है कि, आप्पांपर्त देशमें भी कर्महीन क्रियाभ्रष्ट लोगोंफा नाम दस्यु प्रचलित था, और यदि आधाही पद प्रमाण मानोंती नितने अपनेको आर्य कहते हैं टन सबकी दस्य संज्ञा हो जायगी दूसरे श्लोफका अर्थ यह है कि इससे आगेम्लेच्छदेश है देवासुरसं. माम भी स्वामीजीने मिथ्या ही कल्पना की है यह संग्राम पास्तपमें राना इन्दसे और दैत्योंसे जो उसमा सिंहासन लेनेकी इच्छा करते थे अनेकवार हुआ है जो बहुत प्रसिद्ध है और अपः स्वामिवैश्ययोः ३ । २।१०३ " इस अष्टाध्यापी सूयके अनुसार पैश्य तो अर्य होता है आर्य नहीं तो पैश्य भी दस्य हुए कारण फिआपके मतसे जो आर्य न हो वह दस्यु ॥ पिच परक मेजवाबरचार्दशचा गुऔर सायाम. पृ.२१५६०१-'टत दे उत आरेमा भदपचन होनेने नदया नाम मोआर्य नहीं होमना अवमर्पयो बनाने 'यहां दोपर्ण भारपा पार जब बन्द और सोहिर यह आरिमामा आर्या- पर्त रोजाना। इसमे मिद है कि मनातनमे भापति है. इनमें अरेसन पत्पर माननेको कहते हैं हम कहतई बहुभारिमापरले पंचनाम्न नमानें।
(२९६) दयानन्दतिमिरभास्करः। स० पृ०२२३ पं०७ प्र० सृष्टिको आदिमें एक वा अनेक मनुष्य उत्पन्न किये २६७ १२० (३०) "अनेक। समीक्षा--यह स्वामीजीका सृष्टिकम लोप होगया पूर्व तो कहा है वह सृष्टिक 'मको बदल नहीं सक्ता अब उसने बहुत मनुष्य कैसे उत्पन्न करदिये स्वपं विना स्त्रीपुरुप संयोगके मनुष्य उत्पन्न नहीं होसक्ता फिर परमेश्वरने स्त्री कहांसे मार करी स्त्रियोंकी उत्पत्ति सत्यार्थप्रकाशमें इस स्थलपर लिखी नहीं, जो कहो कि उसने प्रयोजन पडनेसे ऐसा किया था, तो हमारा यह कहना फिर सिद्धही है कि आवश्यकता होती है तो वह तुरंत अवतार धारण फरलेता है और आवश्यकतासे सब कुछ फरसक्ता है परन्तु स्वामीजीका सृष्टिक्रम मच दूरतारष्टि नहीं पडेगा भौर आर्यों मेंका तिब्बतमें पहला राजा कौन था यह भी तो कुछ लिखाहोता ॥ २३४ । १४ स०प्र० पृ० २२६ पं०९ ब्रह्माका पुत्र विराट विराटका मनु मनुके मरीच्यादि दश इनके स्वयंभुपादि सात रागा और उनके सन्तान इत्वाकु आदि रामा जोआर्यावर्तके प्रथम रागार जिन्होंने यह आर्यावर्त पसाया है ।। २३७ । २२ समीक्षा-स्वामीनाके लेखसे विदित होता है कि, इभ्याकुरानासे पहले कर तिब्बतीये परन्तु मनुस्मृति जो मनुनीने रची है उन्होंने मनुका राग्य भी इस देश होना लिसा है नव कि, ब्रह्मावर्त देश देयनिर्मित और ब्रह्मानीमा मभिः निर्माण होनेसे आदि निवास है तो बेटे पोते भी सब यहीं हुए, और स्वामी ता अभिवापुआदिम परम्परा लिखते ब्रह्मासे क्यों लिसा क्यों कि मामानाने तो मपम अमियापुको उत्पनि लिखी है और प्रथम एक नाति भी नहीं थी बारोपण सदासे हैं यया हि (ग्रामणीस्य मुसमासीदिति यजुद ) और मनुनी सिखते हैं। लोकानां तु विवृद्धयर्य मुसवाहरुपादतः। ब्राह्मगं क्षत्रियं वैश्यं शूद्य निरखतंयत् ॥ मनु. १६३१ स्टोरी वृदिफे अयं मुख पाहु या गाणी माझग भविषय gi इसन्न किया मृष्टि कानुमार है तो यारों कमानमार ही दल एमा समै कर्म नहीं इमरण पार व टयम हुए और भी नाम पामामा ६ वही पीको धारण करते है, इसमें शेषनीका धाधारण काना दिया। दही पागे धारन करने अब आगे और स्वामीनीती विश्वना देती।
अष्टमसमुल्लासखण्डनम् । उक्षादाधारपृथिवीउतद्याम् ऋ०स०पृ०२२७१२६ स• पृ० २२८ ५०१ से उक्षा वर्षाद्वारा भूगोलके सेवन करनेसे सूर्यका नाम है उसने अपने आकर्पणसे पृथ्वीको धारण कियाहै और पं०२१ में ॥ २३९ ॥१३॥ * सदाचारपृथिवीमुतद्याम् । यह यजुर्वेदका वचन है जो पृथिव्यादि प्रकाशरहित लोकलोकान्तर पदार्थ तया सूर्यादि प्रकाशसहित लोफ और पदार्थोंका रचन धारण परमात्मा कराता है जो सबमें व्यापक हो रहा है यह सब जगत्का कर्ता और धारण करने- वाला है ॥ २० ॥९॥ समीक्षा-वार पांच पंक्तियोंके ही अंतरमें स्वामीनीकी स्मरणशक्ति लोप होगई वहां लिखा कि, सूर्य धारण करता है यहां कहा ईश्वर, कौनसा वाक्प आपका सत्य माना जाये, विना ही पड़े अंग्रेजी विद्याका इतना असर है कि, सारी यूरूपियनोंकी बातें ग्रहण कर। हैं किसी इंग्लेण्डवासी अंगरेजने बहुत सत्य कहा है कि, यदि दयानंदसरस्वती अंग्रेजी पढे होते तो जैसा घेदको ईश्वर वाक्य कहते हैं और भी जो मतविषयक बातें कहते हैं उन सबको तिलांजलि दे देते यह बहुत ही सत्य फहीथी अनुमानसे ही विदित होता है ।। स० पृ० २२८ पं० २५ पृथिव्यादि लोक घूमते हैं वा स्पिर (उत्तर) पमते? (प्रश्न) कितने ही लोग कहते हैं कि, सूर्य घूमता है पृथिवी नहीं घूमती दूसरे कहते है सूर्य नहीं घूमता इसमें कौन सत्य पाप माना जाप ( स्तर ) यह दोनों हैं। आधे झूठे हैं क्यों कि, वेदमें लिखा है:- आयंगो पृश्निरक्रमीदुसदन्मान्तरंपुरः॥पितरश्चप्रयन्तस्व अ.३म. अर्थात् यह भूगोल जलके सहित सूर्यके चारों ओर घूमता जाता है इसलिये भूमि धूमा करती है ॥ २४० । १३ पृ०२२९ पं० २४ सन् १८८४ पृ० २४१६० १५संवत् १९६९ फीछपीमें प्रभासूर्य पृथिवीस लाखगुनावड और करोड़ों फोस दूर है- समीक्षा-फैसा सुन्दर अर्थ है यदि प्रभाके अर्थमें सब अंग्रेजी भूगोल लिख दे। तो भी चेले भानजाते पर उनके मतमें तो तेरहलासगुना वडा लिखाहै । . **मा० प्र० कर्ताजी इस श्लोक, सदासे जाति बत्ताई निबनी मि नहीं लिये हैं तनर- भाग्यको काममें सामओ । १ साधारधिवाचामुतमाम् यजु०:१३१४ पांचवीं बार पाठ शुन किया है।
तफा प्रवेश करता और सब मूर्तिमान् द्रव्योंको दिखलाता हुआ सब लोया सार (२९८) दयानन्दतिमिरभास्करः। स०प्र०पृ० २९२ पं. १८ छापा संम्बत् १९६९ युनन्तिभमरुपंचरन्तंपरितस्थुपारोचन्तेरोचनादिवि। यजु०२३ ॥ इस मंत्रका अर्थ मेक्समूलरने घोडा किया है इससे तो जो सायणाचायने र अर्थ कियाहै वह अच्छा है परन्तु इसका ठीक अर्थ परमात्मा है मेरी बनाई भा. 'भूमिकामें देखो। समीक्षा- यदि कोई न्यायदृष्टिसे सत्यार्थप्रकाश पडै तो उसमें सब ही पूर्वापर विरुद्ध है पीछे पृ० २४१ में अधः के अर्थ सूर्य जमीनसे लाखगुना बडा किया? सायणाचार्यने भी सूर्यके अर्य किये हैं तो यहां दोनों अर्थ मिलते हैं और जब इसके ठीक अर्थ परमात्माके हैं तो फिर आपने अभः के अर्थ सूर्य कैसे किपे और आपके अर्थमें थेगडी लगानेवाले छोटे स्वामी व्रता कि दोनोंमें फौनसा अर्थ ठीक हे या परस्पर विरुद्ध होनेसे दोनों असत्य हैं। स० पृ० २२९ पं०३ आकृष्णेनरजसावर्तमानोनवेशयन्नमृतमत्यच । हिरण्ययनसति तारथेनादेवोयातिभुवनानिपश्यन् ॥ यजु० अ० ३३ मं० ४३ जो सविता अर्थात् सूर्य वर्षादिका फर्ता प्रकाशस्वरूप तेजोमय रमणीय सा पफे साथ वर्तमान सब प्राणी अप्राणियोंमें अमृतस्वरूप पृष्टि या किरणद्वारा अमः आकर्षण गुणसे सहयतमान अपनी परिधिसे घूमता रहता है किन्तु किसी लोक थारों ओर नहीं घूमता वैसे ही एफ र ब्रह्माण्ड में एक सूर्य प्रकाशक और दूसरे सब लोफलोफान्तर प्रकाश्य है पुनः पं० २६ जैसे राईके सामने पहाड में ती बहुत देर लगती है और राईफे घूमनेसे बहुत समय नहीं लगता है पैमे ही पृष्ठ घूमनेसे दिनरात होता है सूर्पके घूमनेसे नहीं और गोस्र्पफी स्पिर कहते हैं ज्योतिर्विद्यावित नहीं क्यों कि यदि सूर्य न घूमता होता तो एक स्पानमे । राशिको प्राप्त न होता और गुरुपदार्प विना पर्म आकाशमें नियमम्पानार क नहीं रहसता ॥ २४०। २१ समीक्षा-स्वामीनीपर पिना ही अंग्रेजी पढे बहुत कुछ अंग्रेजी विद्याता अम सोचनेकी यात है यदि पृथ्वी पमती होती तो निस प्रकार मह घारह राशिष घुमते हैं उसी प्रकार पृथ्वी भी राशियों पूमती और इसमी ग्रहमें मस्या होती, और पदि लोक धूमनेहाँसे स्पिर रहते तो भुषका तारा नहीं पमनाइमा को सभी मानते हैं और इस कारण इसका नाम भव है कि यह पमना नहीं, अष्टमसमुल्लासखण्डनम्। (२९९) ध्रुव तारा भी गिर पडना चाहिये तया और भी तारागण हैं जो नहीं घूमते वे भी गिर पड़ें तो यह आकाश शून्य होजाय इस कारण यह कहना ठीक नहीं कि, जो नहीं घूमते हैं वे गिर पड़ें और जो पृथ्वी सूर्यके चारों भोर घूमती है तो गरमियोंके. दिनों में सूर्यके निकट होनेसे यत्किंचित् सूर्य बडा दृष्टि आना चाहिये, ऐसा अंग्रेजी- वाले मानते हैं सो ऐसा भी नहीं होता और राईकाजो दृष्टान्त दिया है वह भी अशुद्ध है क्यों कि आपने लिखा है कि, राईको पहाडके सामने घूमते देर लगती है यह कहना ही हास्पयुक्त है आपने सूर्यको पृथ्वीसे लास गुना बडा कहा और फरोडों कोस दूर माना है देर तो जब लग जब राईके बराबर घूमना पडे और राईका लाखगुना पहाड नहीं हो सकता यदि आट राईको एक चावलकी वरावरही मानले तो तोला. भर राई में ६१४४* दाने हुए तो १७ ही तोलेमें १०४४४८ लाखसे भी अधिक दाने होजायंगे जिनका बोझ पाव भरकाभी नहीं हो सक्ता, इस कारण राई पर्वतक दृष्टान्त सम्पूर्णतः अशुद्ध है फिर एक पृथिवी ही तो नहीं अनेक ब्रह्माण्डोंमें यही सूर्य प्रकाश करता और दूर होनेसे क्या परमात्माके प्रतापसे अधिक वेगसे गमन करता है क्यों कि, (सूर्य एकाकी चरति ) यजु० २३ । ७ और (हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ) यजु० ३३ । ७९ अर्थात् " सूर्य असहाय चलता है" सुवर्णके रथमें सूर्य देवलोकोंको देखते जाते हैं यह यजुर्वेदके वाक्य हैं जिससे सूर्यका लोकोंके चारों ओर धूमना सिद्ध होता है और जो पृथ्वी चलती होती तो एक मिनट में ५३मील ७'गन पृथ्वी घूमती है पृथ्वीका व्यास अंग रेमि ७९२६ मीलका लिखा है, स्वामीनीने लिखा तो नहीं पर टन्हीं कैसा माना होगा और जो 'अधिक मानेंगे तो अधिक ही चाल होगी इस हिसाबसे जव घंटेभरमें ३३० : मोल पृथ्वी घूमती है तौ जो कबूतर सबेरेको उडते हैं और दुपहरको आते हैं तो वे घरपर न आने चाहिये क्यों कि छः घंटे परमें पृथ्वी १९८१५ मील निकल जाती है कबूतर इतना चल नहीं सकता यदि कहो कि पृथ्वीकी कशिश उसे बैंचल जाती है तो ऐसी वडी पृथ्वीके घूमनेसे हवासा बहुत घडा धक्का लगना चाहिये और उडनेवाले अस्ताव्यस्त हो जाने चाहिये, और सदा आंधी ही चला करनी चाहिये जैसे कि जब रेल घेगसे चलती है तो उसके निकट कितना हवाका वेग होता है और जहां तहां निकटफे नृणादि अस्ताव्यस्त हो जाते हैं, इसी प्रकार पृथ्वीके थलनेसे उड़नेहारे जीवोंकी गति होनी चाहिये. किन्तु जीव सर्व निर्विन उड़ते हैं, फिर पृथ्वीके चलनेके वायुके रुखको जीव चरते * छोटे स्वामीपर क्या गुगा मो नही आता जो तोटके ७६८ चावलोंमें ११४४ राईके दानोंको शंका की है यदि ८ राईका एक चावल माने तो ७६८ +८%D६१४४ ही होते हैं यह. तो बालकोंके निकालनेका गुणा है इसमें भी-घाला ।
(३..) दयानन्दतिमिरभास्करः । परन्तु सो भी नहीं इच्छाचारी उड़ते हैं फशिश होती ती.खींचते मालूम पड़ने सो गुप्यारेपे चढनेपालोंको अनुभव होना चाहिये सो भी नहीं होता और पृथ्वीसे तिगुना जल है पह बिखर जाय क्यों कि, आकर्षण शक्ति अपनेसे न्यूनको आक- पण फरसक्ती है, विशेषको नहीं यदि कहो कि, पुरुएम जल भरफे फिरानेसे वोह नहीं गिरेगा तदत् पृथ्वी मानो सो भी नहीं हो सक्ता क्यों कि पुरुषके भीतर पानी भरा होता है मुख छोटा होता है पृथ्वीके भीतर पानी नहीं ऊपर है, इससे दृष्टान्त ठीक नहीं विना आडके वर्तनमें पानी नहीं ठहरसत्ता, यदि पृथ्वीमें आ पंणशक्ति समवाय संबंधसे रहती है तो एक मिट्टीका गोला बनाकर टसमें तीन युने गड्ढे फरके पानी भरै यदि पानी ठहर जाय तो पृथ्वीम भी ठहर नायगा सो ऐस नहीं होता इस प्रकारसे पृथ्वीका घूमना सिद्ध नहीं होता अब वेदमंत्रोंसे पृथ्वीका स्थिर होना सिद्ध करते हैं, औरको स्वामीजी आधे झूठे बताते हैं परन्तु आप यहाँ सारे ही झूठे हैं मंत्रमें गौ शब्द देखकर पृथ्वीका चलना सिद्ध कर दिया निरुक्तमें इस शब्दका इस प्रकार व्याख्यानः किया है (गौरिति पृयिव्या नामधेयम् य रंगता भवति यच्चास्यां भूतानि गच्छन्ति गातेर्वोकारो नामकरणः ) जो अन्त प्राणियों से दूर होतीहै जिस कारणसे कि इसपर प्राणी चलते हैं इससे पृथ्वीव नाम गौ है वा 'गीपते स्तूयते असाविति' यह स्तुति कीजाती है इससे गौ कह लाती है यथा-गौड़गार यद्ध पृच्छान अ० १०॥३१ । १० निघंटु निरुक्त २ ७ में पृथ्वीका नाम नितिः लिखा है । नितिः निरमणात् ] 'निश्चलत्वेनाव: स्थानानु जिसमें गति नहीं होती अर्थात् जो स्थिर हो उसे निति कहते हैं जैसे ऋग्वेदमें ( बहुमनानिऋतिमाषिवेश ।। १६४ । ३२) उदाहरण है जो पृथ्वी चलती होती तो क्यों निक्रति नाम होता क्यों कि जिसमें गति नहीं वह निति है स्वामीजीने आयंगी इसको तीसरे अध्यायका ९ मंत्र लिखा है परन्तु यह छठा मंत्र है नवमा नहीं* इस मंत्रका सर्पराज्ञी कपिः गायत्रीच्छन्दः अमि देवता है यह भी जान रखने की बात है कि जिस मंत्रका जो देवता होता है उस मंत्रमें उसीका गुण कथन होता है जब इस मंत्रका अभिदेवता है तो आमिके ही गुण इसमें फथन किये हैं यहां गौ नाम अमिका है यथा हि- (आयम्) इस (गो.) यज्ञसिद्धिके अर्थ यजमान पर आने जानेवाले (पृश्नि) श्वेतरक्त आदि बहुप्रकारको ज्वालाओंसे युक्त अमिन (आ) सब ओरस. आहवनीय गार्हपत्य दक्षिणामिके स्थानोंम ( अक्रमीत् अतिक्रमण किया (पुर पूर्वदिशामें (मातरम् ) पृथ्वीको (असदन) माप्त किया (च) और (स्वः) सूर्यरूप होकर (प्रयन् ) स्वर्गमें चलते आमिने (पितरम्) स्वर्गलोकको (असदव, प्राप्त किया ॥६॥ * पांचवीं वारमें शुद्ध है। .
अष्टमसमुल्लासखण्डनम् । सायणाचार्यने "आयंगोः" सर्पराड्यात्मदैवतंसौर्य वेति इस अनुक्रमणिकाके अनुसार सूर्यपरत्व व्याख्यान किया है यया 'गोर्ग- मनशीलः प्राप्तवर्णः प्राप्ततेनाः अयं सूर्यः आक्रान्तवान्' इत्यादि गमनशील तेजसम्पन्न यह सूर्य उदयावलसे गमन करताहै इत्यादि इसमें भी भूमिका गमन नहीं है। इस मंत्रमें कहीं यह बात नहीं निकलती फि, पृथ्वी वलती है अब दूसरे मंत्रका अर्थ सुनिये:- (सविता ) सूर्य ( देवः ) देवता ( हिरण्ययेन ज्योतिर्मय ( रथेन)निज मंडलरूप रथके द्वारा (आवर्तमानः ) मेरुपर्वतको परिक्रमण करता (कृष्णन) अंधकार और ( रजसा ) ज्योतिसे (अमृतम् )देवताआदि (व) और (मर्त्यम् ) मनुष्यादिको (निवेशयन् ) अपने व्यापारमें स्थापन करता (भुवनानि ) भुपनोंका (पश्यन् ) देखता अर्थात् साधु असाधु काँको विचारता ( आयाति ) गति करता है और देखिये यजुर्वेदमें- येनद्यारुयापृथिवीचुदृढायेनस्वस्तभितं येननाकः योऽअन्तरि शेरजसोविमान कस्मैदेवायहुविपाविधेम-यजु अ० ३२ मं० ६ पदार्थः-(येन ) जिसने ( द्यौः ) घुलोक ( उग्रा ) जलपूर्ण अर्थात् पृष्टिदायक कोहै (च) और (पृथिवी) भूमि ( दृढा) निश्चल वृष्टिग्रहण और अन्ननिष्पादन में दृढ कीहै (येन ) निसने (स्वः) स्वलोंक जहां आदित्यमंडल तपताहै सो और (येन ) जिसने ( नाकः ) दुःख रहित स्वर्ग लोक (स्तभितम् ) स्तंभित किया है (यः) जो (अन्तरिक्षे ) अन्तरिक्षमें. ( रजसः) वृष्टिरूप जलका (चिमानः) निर्माताहै (फस्मैदेवाय ) उस प्रजापति देवताके निमित्त ( हविषा आविषम) हवि देतेहैं। सिद्धान्तशिरोमणिगोलाध्याय। यथोष्णतानिलयोश्च शीतता विो द्रुतिः के कठिनत्वमश्मानि । मरुचलो भूरचला स्वभावतो यतो विचित्रा वत वस्तुशक्तयः॥५॥ अर्थ-जैसे सूर्य और अमिमें उष्णता चन्द्रमामें शीतलता जलमें गति पापा- णमें स्वभावसे फठिनता है ऐसे ही स्वभावसे पृथियो अपल है वस्तुओंकी शक्ति विविन है।
(३०२) दयानन्दतिमिरभारकर। भूमेः पिण्डः शशांकज्ञकविरविकुजेज्याकिनक्षत्रकक्षा- वृत्तेर्वृत्तो वृतः सन्मृदुनिलसलिलव्योमतेजोमयोयम् || नान्याधारः स्वशत्येव वियति नियतं तिष्ठतीहास्य पृष्ठे निष्ठं विश्वं च शश्वत्सदनुजमनुनादित्यदेत्यं समन्तात् ॥ भूमि पिण्ड चन्द्र बुध शुक्र रवि मंगल बृहस्पति शनि और नक्षत्रोंकी कतासे आवृत हे मिट्टी अमि जल वायु आफाश तेनसे गठित है यह विना आधारके अपनी परमेश्वरकी ही शक्तिके बलसे सदा शून्यमें स्थित ( अचल ) है असुर मनुष्य देव दैत्य इसपर निवास करते हैं इस प्रकार विश्व इसपर निवास करता है 'ष्ठा गतिनिवृत्ती' धातुसे तिष्ठति रूप बन्ताहै जिसके अर्थ अचलके हैं और भी सिद्धान्तशिरोमणिमें पृथिवी न घूमनेकी कितनी ही युक्तियां हैं देखने वाले देखसफतेहैं अस्तु पृथिवी चल और अचल माननेसे हमारे फल में कोई हानि नहीं आती दोनों प्रकारसे दिन रात आदि होते हैं फिर वेद जो कहै सोई सत्य है। वेदका सिद्धान्त लिखदिया इस विषयमें हमको विशेष विवाद इष्ट नहीं है विकल तौ सिद्ध ही है। इति श्रीदयानन्दतिमिरमास्कर मिश्रज्वालाप्रसादविरचिते सत्यार्थप्रकाशान्तर्गताष्टम- समुल्लासस्य खंडनं समाप्तम् ॥ २२॥८॥९. ' श्रीगणेशायः नमः। अथ सत्यार्थप्रकाशान्तर्गतनवमसमुल्लासस्य खंडनं प्रारम्यते । मुक्तिप्रकरणम् । स्वामीनीने इस समुल्लासमें मुक्तिसे जीवका लौटना लिखा है प्रथम इसके कि मुक्तिके विषयमें कुछ लिखें यह भी दिखा देना अवश्य है कि, स्वामीजीने भाष्य भूमिका पृ० १११, और .११२ आयाभिनय पृ० १६, १२, १५, वेदान्त- ध्वान्तनिवारण पृ० १० । ११ वेदविरुद्धमतखंडन पृ०१४ सत्यधर्मविचार : २५ में यह लिखा है कि मुक्ति कहते हैं टूट जानेको अर्थात् जितने दुःख हैं उनसे टूटकर एक सच्चिदानंद परमेश्वरको प्राप्त होकर सदा आनन्दमें रहना और फिर जन्म मरणादि दुःखसागरमें नहीं गिरना इसीका नाम मुक्ति है फिर न मालूम कौनसे फारणसे मुक्तिसे लौटना मान लिया सोपही विषय लिखा जाता है- स० पृ० २३३ पं०४ (प्रभ) बंधमोक्ष स्वभावसे होता है या निमितसे (उत्तर) निमित्तसे, क्योंकि जो स्वभाव से होता तो बंधमोक्षको निवृत्ति कभी नहीं होती ॥ २४५ । १० नषमसमुल्लासखण्डनम् । (३०३) समीक्षा-स्वामीजीको घरका मार्ग भी विस्मृत होगया जब कि बंध मोक्ष निमित्तकारणसे होता है तो जब निमित्त मोक्ष हुई तो फिर कौनसे निमित्तसे उसे जन्म लेना पड़ेगा इससे तो यही सिद्ध होता है कि उसका जन्म नहीं होता ॥ स० पृ०२३३ पं०६ न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः न मुमुक्षुर्न वेमुक्तिरित्येषा परमार्थता।गोडपा कारि०२५ का०३२ यह माण्डूक्यपर कारिका है पं०,११ में इसका अर्थ किया है यह नवीन वेदान्ति- योका कहना सत्य नहीं क्यों कि जीवस्वरूप अल्प होनेसे आवरणमें आता शरीरके साथ प्रगट होनेरूप जन्म लेता पापरूप काके फल भोगरूप बन्धनमें फंसता उसके छडानेका साधन करता दुःखसे छूटनेकी इच्छा करता है दुःखसे छूटकर परमानन्द परमेश्वरकी प्राप्ति होकर मुक्तिभी भोगता है ॥ २४५ । १९. समीक्षा-स्वामीजी के इस पाक्यको तौ देखिये आप तो प्राचीन वेदान्ती बनते हैं और दूसरोंको नवीन वेदान्ती कहते हैं और सरासर टल्टी ही धोगते हैं यह कारिफाही असत्य बताते हैं इसका आशय यह नहीं जैसा कि, स्वामीजीने कथन किया है अर्थ तो इसका यह है कि, जब अपने स्वरूपका ज्ञान होजाता है तब निरोध उत्पत्ति बन्धसाधक मुमुक्षु मुक्ति कुछ शेष नहीं रहता है केपल स्वयंप- काश लक्षित होने लगता है उपरोक्त बातों से कुछ भी नहीं रहता इसीका नाम परमार्थता है यथा- नतुतद्वितीयमस्तिततोन्यद्विभक्तंयत्पश्येत् बृह० उप०४ ब्रा०३०२३। अत्रपिताऽपिताभवतिमाताऽमातालोकाअलोकादेवाअदेवा वेदाअवेदाः कं० २२ अ. ४ बा० ३ अथयत्र ॥ देवइवराजवाहमवेद ५ सर्वोऽस्मीतिमन्यते सोऽस्यपरमोलोकः वृ० उ० कं० २० अ० ४ वा०३ मोक्षावस्थामें जब अपने स्वरूपका ज्ञान होजाता है तो वहां कोई दूसरा नहीं है जिसको अपनेसे पृथक् देखे स्वयंप्रकाश एक वही है ॥ मुक्तिमें पिता अपिता, माता अमाता, लोक अलोक, देव. अदेव, वेद मवेद होते हैं अर्थात् उसके सिवाय दूसरा है ही नहीं ॥ १ पांचवीं बारम नव मुक्त इत्यंपा० पाठ है। . .
, (३०४) दयानन्दतिमिरभास्करः। जब यह राजाकी नाई यह जानता है यह सब कुछ मैं ही हूँ सोई इसका परम लाफ अर्थात मुक्ति है जब कि सत्य एफ ब्रह्म तव्यतिरिक्त सरअनित्य हें जबरेसा ज्ञान हुआ तो बन्धयुक्त अविद्याज्ञान कुछ नहीं रहता इससे ब्रह्ममें कुछ दोष नहीं। स० पृ० २३६ पं० १८ मुक्ति में जीवका लय होता है या विद्यमान रहता है। (उत्तर) विद्यमान रहताहै (प्रभ) फहां रहताहै (उत्तर) ब्रह्ममें (प्रभ ब्रह्म) कहां है और वह मुक्तजीव एक ठिकाने रहता है या स्वेच्छाचारी होकर सर्वत्र विचरता है (उत्तर )जो ब्रह्म सर्वत्र पूर्ण है उसीम मुक्तजीव अव्याहतगति अर्याद उसको कहीं रुकावट नहीं विज्ञान आनन्दपूर्वक स्वतन्त्र विचरताहै (प्रभ) मुक्तजी. वका स्थूल शरीर होता है या नहीं (उत्तर) नहीं रहता (प्रश्न) फिर वह सुख और आनन्दभोग फैले करता है (उत्तर ) टसके सत्यसंकल्पादि स्वाभाविक गुण सामर्थ्य सब रहते हैं भौतिक संग नहीं रहता जैसे- शृण्वन्छोभवतिस्पर्शयन्त्वगभवतिपश्यंश्चक्षुर्भवतिरसयन रसनाभवतिनिघ्रन्घ्राणंभवतिमन्वानोमनोभवतिवोधयन्बुद्धिर्भ- वतिचेतयंश्चित्तंभवत्यहंकुर्वाणोऽहंकारोभवति शतपथकां० १४* मोक्षमें भौतिक शरीर वाइन्द्रियोंके गोलक जीवात्माके साधन नहीं रहते किन्तु अपने स्वाभाविक शुद्ध गुण रहते हैं जब सुनना चाहताहै तब श्रोत्र, स्पर्श करना चाहता है तब त्वचा, देखनेके संकल्प करनेके समयसे चक्षु, स्वादके अर्थ रस गन्धके लिये प्राण, संकल्प विकल्प निश्चय करनेके लिये बुद्धि, स्मरण करने लिये वित्त और अहंकारके अर्थ अहंकाररूप अपनी शक्ति से जीवात्मा मुक्तिमें। जाता है और संकल्पमात्र शरीर होजाताहै जैसे शरीरके आधार रहकर इन्दियों गोलकद्वारा जीव स्वकार्य करता है पैस अपनी शक्तिसे मुक्तिमें सब आनन्द भो लेता है ५० २४९ पं० २३ तक- समीक्षा-यह स्वामीजीका मिथ्या लेख है इसमें सारार्थ फेवल इतना है। मुक्ति में स्थूलशरीर रहित होता है और अपनी शक्ति से श्रोत्रादि रूप होकर आन न्दको भोगताहै और उसको भौतिक पदार्थका संग नहीं रहता परन्तु जं श्रुतिप्रमाण लिली है सो मोक्षपकरणकी नहीं है और इस अर्थका साधक में नहीं तथा हि- -- * पांचवीं बारके सत्यार्थप्रकाशतक इस श्रुतिका पता न लगा न भास्कर प्रकाशके कर्ता है. पता ठगा यह श्रुति चौदहवें काण्डमें नहीं है दयानन्दी ‘वता कहां है ।
नवमसमुल्लासखण्डनम् । (३०५ सएपइहाविरआनखाग्रेभ्योयथाक्षुरःक्षुरधानेऽवहितःस्याद्धि- श्वभरोवाविश्वभरकुलायेतंनपश्यत्यकृत्स्रोहिसमाणन्नेवप्राणो नामभवतिवदन्वापश्यश्चक्षुःशृण्वोत्रमन्वानोमनस्तान्य- स्यैतानिकर्मनामान्येवसयोऽतएकेकमुपास्तेनसवेदाकृत्स्नो- ोषोऽतएकेकेनभवत्यात्मत्येवोपासीतात्र तेसर्वएकभवन्ति । वृह उप० अ० १त्रा०४६०७ इसी श्रुतिके आशयकी स्वामीजीने श्रुति लिखी है परन्तु स्वामीजीके अर्थकी सिद्धि नहीं होती, इस पूर्ण श्रुतिका अर्थ यह है ( सो यह आत्मा पूर्व जो अव्य- तका अधिष्ठानरूपसे निर्णीत है वह अन्यक्तकार्य शरीरमें नखानपर्यन्त प्रविष्ट हुआ और प्रवेश भी विशेषरूपसे तथा सामान्यरूपसे हुआ)इसमें दृष्टान्त कहते हैं (यथा क्षुरधानेधुरोऽवहितः स्पात् ) जैसे नाईके बरतनमेंभुर प्रविष्ट होता है अर्थात् जैसे नाईके शस्त्रोंके पात्र (किस्वत ) में पुरा आदि एकदेशमें प्रविष्ट होते हैं वैसे ही परमात्मा प्राणादि विशेषस्थानमें प्रविष्ट होकर विदित हुआ अथवा "विश्वंभर- कुलाये" काष्ठोंमें जैसे अनि प्रविष्ट होती है सामान्परूपसे इसी प्रकार सामान्य रूपसे सब देहमें प्रविष्ट हुआ तिस स्पष्टप्रविष्टको भी नहीं जानते (हि) जिस कार. णसे वह आत्माका रूप (अकृल्म ) सम्पूर्ण नहीं क्यों कि, वह आत्मा माण उपाधिक होकर प्राणन क्रियाको करता हुआ प्राणनामवाला होता है और पदन किपाको वायुपाधिक होफर करता हुआ वाङ्नाभवाला होता है और चारपा-- धिक होकर दर्शनक्रियाको करता हुआ चक्षुनामवाला इसी प्रकार मननक्रियाका फर्ता होकरमननामवाला.होता है इसी प्रकार जव शाखान्तरीयपाठ होवै, तोरसना प्राण बुद्धि वित अहंकार नामवाला होता है परन्तु यह सब आत्माके फर्म नाम अर्थात् औपाधिक किपाजनित नाम हैं इस कारण जो एक एकको आत्मरूपसे उपासना करता है सो नहीं जानता क्यों कि इन एक एक करके वह आत्मा असंपूर्ण होता है इस कारण सर्वको आत्मा इस रोतिसे ध्यान कर क्यों कि इस. आत्मामें ही सर्व प्राणादि नामवाले एकताको माप्त होते हैं। अब स्वामीजीकी मिथ्या कल्पना देखनी चाहिये कि मोसमें शरीरभाव अथवा अपनी शक्तिसे मुक्त जीवको श्रोतृत्वादि रचना करना इस श्रुतिमें कहां सिद्ध होसक्ता है क्यों कि आगे- की श्रुति देखनेसे यह प्रसंगके विरुद्ध प्रतीत होतीहै ॥ यद्वैतन्त्रनिप्रतिजिग्रन्चेतननिप्रतिनहिघातुर्मातेविपरिलोपोवि- द्यतेऽविनाशित्वान्नतुतहितीयमस्तिततोन्यद्विभक्तंयज्जिप्रेत् ॥१॥ . .
इममे मनिमें भी आनन्दकी प्रातिमोग करना ॥ ३४९में एकता हो जाती है इच्छादिक फरना वन ही नहीं सत्ता इस कारण सामागीली उसकी शक्ति फैप्रकारकी और कितनी है (उत्तर) मुख्यपक मारतील स्वादन और गंधग्रहा तपासान इन चायाम प्रकार सामयी माना। दयानन्दतिमिरभास्करः। यद्वतन्नरसयतेरसयन्वतन्नरसयते नहिरसयितूरसयतेर्विपारिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वानतुतद्वितीयमस्तिततोन्यद्विभक्तंयंदप्तयेद२॥ यदैतन्त्रवदतिवदन्वतन्नवदति नहिवतुर्वक्तविपरिलोपोविद्यतेऽ- विनाशित्वान्नतुतद्वितीयमस्तियतोन्यद्विभक्तंयद्रदेत् ॥३॥ यद्वैतनशृणोतिशृण्वन्वैतनशृणोतिनहिश्रोतुःश्रुतविपरिलोपोदि. द्यतेऽविनाशित्वान्नतुतद्वितीयमस्तिततोन्याभतंयच्छृणुयात् । यद्वैतन्त्रमनुतेमन्वानोवैतन्त्रमनुतेन हिमन्तुर्मविपरिलोपोव- द्यतेऽविनाशित्वान्नतुतद्वितीयमस्तिततोन्यद्विभक्तंयन्मन्वीत ॥५॥ यतिनस्पृशतिस्पृशन्वैतनस्पृशतिनहिस्पष्टुःस्पृष्टेविपरिलोपोति- द्यतेऽविनाशित्वानतुतद्वितीयमस्तिततोन्यद्विभक्तंयत्स्पृशेत् ॥ यद्वैतत्रविजानातिविनानन्तन्न वजानातिनहिविज्ञातुर्विज्ञाते- विपरिलोपोविद्यते विनाशित्वानतुतद्वितीयमस्तियतान्यदि- भक्तंयद्विजानीयात् ॥७॥वृ०० वा०३०२४ से३०तक भावार्थ-मुक्तिको प्राप्त होकर न वह संपता है या संपता हुआ भी नहीं संघका मूंपनेपालेको सुगंधिसे विपरिलोप "विभक्तता" नहीं है अविनाशी होनेसे गया कोई दूसरा है ही नहीं तो क्या सूपैगा अर्थात् उसके सिवाय दूसरा कुछ नहीं है इसी प्रकार रसन बोलना मनन दूना जानना इत्यादि मुक्त में कुछ भी नहीं है मा कि, दूसरा.फोई है ही नहीं तो उपरोक्त विचार कैसे कर सकता है, इत्यादि सातों श्रुतियोंफा अर्थ इसी प्रकार सरल है इससे सिद्ध हुआ कि, गुक्तिम मन मोती टपरोक्त श्रुति इस विपपमें नहीं है मुक्तिमें जीय अपने शुद घेतन सापको प्राप्त होता है। स०पृ० २३७५०८ है परन्तु पर पराक्रम आकर्षण प्रेरण गति भीषण विचन क्रिया मार मात्र निवप इच्छा प्रेम प पोग विभाग यो पनि दल -- नवमसमुल्लासखण्टमम् । (३०७) समीक्षा-इसमें यह विचार करना चाहिये कि क्रियाशब्दार्थ यदि गमन है तो गतिका पृथक् ग्रहण व्यर्थ है यदि धात्वर्थमात्रका नाम किया है तो जैसे बल 'प्राणने इस धातुका अर्थ बल है वैसे ही परिक्रमादि सर्व ही किसी न किसी धातुके अर्थ हैं इनका पृथक् ग्रहण करना असंगत है और यदि ज्ञानका ग्रहण किया था तब निश्चय स्मरण श्रवण स्पर्शन दर्शन स्वादन गन्धग्रहण इन सप्तका ग्रहण होगया था फिर इनका ग्रहण करना निष्कल है और भी विचारनेकी बात है जो स्वामीजीने पृ० २३६ पं०७ में दुःखसे छूटनेका नाम मुक्ति है यह लिखा है और अब २३७५० १० में भीपण इच्छा प्रेम देप यह गुण तब कहे इनका यही अर्थ होगा किसीसे भयभीत होना अथवा किसीको भय देना इसका नाम भीपण है यह दोनों भी दुःखरूप हैं और इच्छा तृष्णाका नाम है सो महाकेशकारी सर्वथा मसिद्ध है, यद्यपि मुक्त आत्मा अपनी इच्छा निवृत्त करसक्ता है तथापि उसके पीछे दुःख तो लगेई हैं मेम नाम रागका है और द्वेप नाम क्रोधका है सो यह बद्धनी- धमें होसक्ते हैं, मुक्तनीवमें किसी प्रकार हो नहीं सक्ते इससे स्वामीनीको मोतमें बड़ा ही भ्रम है, सो मिथ्या ज्ञानसे यह भ्रम उत्पन्न हुआ है । स० पृ० २३७ पं०१६ अभावंवादरिराहोरम् वेदा० ४।४।१० जो बादरि व्यासजीका पिता है वह मुक्ति में जीपका और उसके साथ मनका भाव मानता है अर्थात् जीय और मनका लय पराशरजी नहीं मानते ॥ २५०१४ समीक्षा-यह भी सूत्रार्थ स्वामीनीने अशुद्ध ही लिखा है सूत्रके अक्षरार्थतकी भी स्वामीजीको खबर नहीं यह स्वामीजीका अर्थ प्रकरण और श्रुतिविरुद्ध है क्यों कि इस सूचके अभावम् वादरिः आह हि एवम् यह पद हैं इसमें वादरिः कर्ता है और अभाव कर्म है मन्यते क्रियाका अध्याहार होताहै तब यह अर्थ होगा कि, बादरि आचार्य अभाव मानते हैं सो किसका अभाव मानते हैं इसका उत्तर इस सूत्रके विषयकी श्रुतिगें है (सो आगे लिखेंगे) (हि) मिस फारणसे कि, (एवम् ) ऐसे (आह) अति कहतीहै इस कारण इस सूत्र में जीव और मनका भाव अर्थ नहीं और आह हि एवम् इन तीनों पदोंके अर्थकी ती स्वामीनी चटनी-कर गये इससे यह अर्थ ठीक नहीं । स० पृ०२३७ पं० २१ भावजैमिनिर्विकल्पामननात् । ४।४1 १२ और जैमिनि आचार्य मुक्तपुरुषका मनके समान सूक्ष्मशरीर इंद्रिय माण आ- दिको भी विद्यमान मानते हैं अभाव नहीं ॥ २५०१७ (३०८) दयानन्दतिमिरभास्करः। समीक्षा-यह भी अर्थ असंगत है क्यों कि इस सूत्र में सूक्ष्मशरीर इन्द्रियमाण आदिका सद्भाव माना इसमें यह असंगत है कि सुक्ष्मसे पृथक् इन्द्रिय प्राणको फहा क्यों कि इन्द्रिय प्राण तो सूक्ष्मान्तर्गत हैं और मन भी सूक्ष्म अन्तर्गत है, पहले सुत्रमें मनका सद्भाव माना है और मन प्राण इन्द्रियसे विना नहीं रहसक्ता तो पहले. मतमें इन्द्रिय और प्राणभी मानने होंगे, तो वादरिके और नैमिनि मतमें अंतर ही क्या रहा तो उनका मतभेद ही क्या रहा जिन्हें सूक्ष्मशरीरकी खबर नहीं सो व्यास सूत्रोंका क्या अर्थ करेंगे इस सूत्र में विकल्पामननादका अर्थ नहीं लिखा है फिर अर्थ कहांसे बने ॥ पं० २४ ॥ द्वादशाहवदुभयविघंवादरायणोऽतः ४।४। १२ व्यासमुंनि मुक्ति में भाव और अभाव इन दोनोंको मानते हैं अर्याद शुद्द साम- र्थ्य युक्त जीव मुक्तिमें बना रहता है अपवित्रता पापाचरण दुःख अज्ञानादिकका अभाव मानते हैं । समीक्षा-इस लेखमें भी सूत्रार्यका पता नहीं द्वादशाहवत् उभयविधं बादरायणः अतः इतने पद इस सूत्रमें हैं स्वामीजीने इसमें आदि अन्तके पद छोडके (उभयविध ) का अर्थ किया है कि शुद्ध सामर्थ्य युक्त हो पापाचरणादि शिशिष्ट न होना यह कथन भी पूर्व दो मतोंका साधक नहीं क्यों कि पूर्वमतोंमें भी पापाचरणादि नहीं माने, शुद्ध सामर्थ्य ही मानेंगे जब पूर्व · मतोंमें भी यह अर्थ हुआ तो तीन मतोंका पृथक् लिखना असंगत है और स्वामीनी तो प्रेम द्वेप इच्छादि केश मानते हैं सो यह अपवित्रता है वा और कुछ है फिर अपवित्रताका मोक्षमें अभाव फथन करना बादरायणके मतमें असंगत है क्यों कि स्वयं स्वामीजी अपवित्र मानचुके हैं और स्वतःप्रमाण संहिताके मन्त्र लिख व्यासस्त्र क्यों लिखे अब हम अच्छी प्रकारसे इन सूत्रोंको पूर्वापर सहित लिखते हैं जिससे सजन पुरुपोंका निर्णय होनायगा कि, स्वामीनीने सूत्रोंका अर्थ बिगाड दियाहै ॥ मुक्ति तीन प्रकारसे शास्त्रमें कथन करी है फैवल्यमुक्ति ब्रह्मलोकप्राति और अझलोकमाप्तिद्धारा क्रममुक्ति प्रथम फैवल्पमुक्तिवर्णन करते हैं। सम्पद्याविर्भावः स्वेनशब्दात्-शारीरक अ०४ पा०४ सू०१ विषयवाक्य अशरीरोवायुर_विद्युत्स्तनयित्नुरशरीराण्येतानि तद्यथेतान्यमुप्मादाकाशात्समुत्यायपरंज्योतिरूपसंपद्यस्वेन रूपे- णाभिनिप्पद्यन्ते, एवमेवेपसम्प्रसादोऽस्माच्छराित्समुत्या.
-n नवमसमुल्लासखण्डनम् । यपरंज्योतिरुपसम्पद्यस्वेनरूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः छां० उ०प्र० ८सं० १२। कं० २।३ सूत्रार्थ-सम्पद्य नाम अविद्यातिरोहितरूपके आविर्भाधका है क्यों कि श्रुति, स्वेन ऐसा शब्द देखा जाता है और स्वरूपनाम पूर्वसिद्ध अपने रूपका है इससे अविद्यातिरोहितरूपका अविद्यानिवृत्तिसे आविर्भाव ही फैवल्य है विषयवाक्य श्रुतिका अर्थ किसी निमित्तसे स्वस्वरूप तिरोधान होकर पश्चात् निमित्तान्तरमें स्वस्वरूपप्राप्तिमं दृष्टान्त कहते हैं, जैसे वायु सूक्ष्म मेघ विद्युत् स्तनयिलु, अर्थात् स्थूलमेघ यह सम्पूर्ण पदार्थ वकालसे भिन्न कालमें शरीर अर्थात् तिरोहित- शरीर होते हैं, आकाशके साथ एकताको प्राप्त होते हैं, वे कालरूप निमित्तसे आकाशमें तिरोहित रहते हैं, और पर्षाभिन्नकाल निमित्तके अभाव होते ही आषाढके ज्योतिरूप तेजको प्राप्त होकर आकाशसे समुत्थित हो अपने पूर्वसिद्ध चातुर्मासिक रूपसे प्राप्त होते हैं तैसे ही यह चैतन्य जीव इस शरीररूप निमित्तसे दहादितादात्म्यभावको प्राप्त होकर अपने स्वतःसिद्ध रूपके भान होते ही झानसे देहतादात्म्यभावको त्याग अपना स्वतः सिद्ध परंज्योतिस्वरूप आत्मा ह तिसको प्राप्त होकर विराजमान होता है और मुक्तात्मा ही उत्तम पुरुष अर्थात् परमात्मरूप है ।। मुक्तः प्रतिज्ञानात्-शा० अ०४ पा० ४ सू०२ श्रुतिमें जो अभिनिष्पद्यते यह कहा है वह सर्वबंधरहित शुद्धस्वरूप करके अवस्थान ज्ञानरूप जो मुक्तावस्था तिसको माप्त होता है। आत्माप्रकरणात्-अ०४ पा० ४ सू० ३ इस श्रुतिमें ज्योतिःशब्द भौतिक ज्योतिका बोधक नहीं आत्माका प्रकरण होनेसे मुक्ति में फैसा स्वरूप हो जाता है परमात्मासे पृथक् हो रहता है अथवा लप हो जाता है इसपर अगला सूत्र है ।। अविभागेनदृष्टत्वात्-अ० १ पा० ४ सू०४ मुक्त ब्रह्मसे अभिन्न स्थित होता है ऐसी श्रुति कहती है मुक्तका ब्रह्मके साथ भेद नहीं है "स उत्तमः पुरुष इति" इस वाक्यमें जो सः शब्द है उसने अभि- निष्पनरूप मुक्तस्वरुपका परामर्श कर मुक्तको ही उत्तमशब्दवाच्य ब्रह्मस्व. -रूप कहा है तिससे मुक्त स्वरूपसे ब्रह्म भित्र नहीं है अविभक्त ही परसे मुक्त - रहता है तथा हि- (३१० दयानन्दतिमिरभास्करः। यवनान्यत्पश्यतिनान्यच्मृणोतिनान्यद्विजानातिसभूमा छां० प्र०७ खं० १४ नतुतद्वितीयमस्तिततोन्यद्विभक्तंयत्पश्यत् । वृह० अ०६त्रा ३६२३ जिस भूमा ब्रह्ममें अन्य किसी वस्तुको अन्य दृष्टा वा.श्रोता देखता या सुनता नहीं तथा अन्य किसी वस्तुको अन्य विज्ञाता जानता नहीं सो भूमा है जो भूमाको माप्त होकर पृथक् रहता तो पृथक् द्रष्टा होकर देखता इससे अभेदरूपसे ही मुक्तिमें स्थिति होती है और जब दूसरा है ही नहीं तो अन्य क्या देखेगा और एकमें भी आधारान्तर निषेधके हेतु स्थिति कही जाती है यथा- सभगवः कस्मिन्प्रतिष्ठितः स्वमहिम्नीतिहोवाच-० प्र०७ सं० २४ नारदजीने सनत्कुमारसे पृछा हे भगवन् ! सो भूमा किसमें स्थित है (उत्तर) अपनी अखण्डेकरसमहिमामें स्थित है रूपान्तरसे स्थितिका निषेध किया है । अब यह प्रभ है कि स्वस्वरूप इसका चेतनमात्र है वा सत्यकामत्वादि धर्मवि. शिष्ट है प्रथम इसमें जैमिनिभाचार्यका मत कथन करते हैं । ब्राह्मणजेमिनिरुपन्यासादिभ्यः-शा० अ०४ पा० ४ सू०५ जो ब्रह्मका सत्यकामत्यादि विशिष्ट रूप है तिसी रूपसे मुक्तिम जैमिनिजी स्पिति मानते हैं चारपके प्रारम्भमें अयमात्मापहतपाप्मा इत्यादि सत्यकामत्व सत्यसंकल्पत्व विशिष्टका उपन्यास नाम कयन करा है || सतवपर्येतिनक्षनक्रीडनममाणः-छां० प्र० ८ खं० १२२३ सो मुक्त मोक्षपदमें वर्तमान हास क्रीडा रमण करता हुआ. सब प्रकारसे जानता है इन प्रमाणोंसे ईश्वर सत्यकाम सत्यसंकल्प है किसी रूपसे मुक्तका आविर्भाव होता है । चितितन्मात्रेणतदात्मकत्वादियोडुलोमिः-शा अ० ४पा०४०६ चैतन्यमात्रस्वरूपसे मुक्तकी स्थिति होती है क्यों कि, (तदात्मकत्वात् चन: न्यस्वरूप है केवल ज्ञानमात्र ही आत्माका स्वरूप है तिसी रूपसे मोक्षमें स्थिति होती है और जो श्रुतिमें सत्यकामत्वादि कथन करा है सो असत्यकामत्वादि जह बंध कालमें प्रसक्त थे तिनका निषेध करा है वृहदारण्यकमेंभी फेवल ज्ञानमात्रय रूप आत्माका निर्णय करा है ।। .
नवमसमुल्लासखण्डनम् । सयथासैन्धवपनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नोरसघनएवेवामरेड- यमात्माऽनन्तगेऽबाह्य कृत्स्नःप्रज्ञानघनएव-वृ० अ०४त्रा० ५६० १३ जैसे सैंधेका दुरुडा अन्तरवाहरसे मैलरहित सम्पूर्ण रस घन है. इसी प्रकार यह सर्वानुभवसिद्ध आत्मा अन्तर बाहररो पदार्थान्तर मैलरहित सम्पूर्ण प्रज्ञान- पन है इस कारण आत्मा चैतन्यरूप है मोक्षावस्थामें चैतन्यमापसे स्थित है यह औडुलौमि आचार्प मानते हैं। एवमप्युपन्यासात्पूर्वभावादविरोधंवादरायणः॥ शा० अ०४ पा. ४ मू०७ पद्यपि श्रुतिममाणसे चैतन्यमात्र स्वरूपका रहे तो भी पूर्ण श्रुतिप्रतिपाय आझ ऐश्वर्यका निषेध न होनेसे भी विरोध नहीं है यह वादरायण ऋपि मानते हैं भाव यह है मुक्त पुरुपमें चैतन्पमात्र स्वरूप है श्रुतिभी ईश्वर धर्मका कहना बद पुरुषों की अपेक्षासे सत्यकाम सत्यसंकल्पादि करती हैं विद्वान् मुक्त पुरुषका रूप चैतन्यमान है तो अखण्ड चैतन्यसे अन्यत्र सत्यकाम सत्यसंकल्प जक्षन् कीडन् रममाणादि नहीं है इससे व्यासजीके मतमें दोनों वाक्योंका अपिरोध है पह सिद्धान्त पक्ष है यह ज्ञानसे फैवल्यमुक्ति कथन फरी अब सगुण उपासनासे ब्रह्मलोस्मातिदारा मुक्तिनिरूपण करते हैं । संकल्पादेवतुतच्छुतेः-शा० अ०४ पा० १ ० ८ सयदा पितृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति तेन पितृलोकेन सम्पन्नो महीपते । अथ यदि मातृलोककामो भवति संकल्पादेवास्य मातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन मातृलोकेन सम्पन्नो महीयते । ०प्र०८सं०२ भावार्थ-जो टपासक उपासनांक प्रभावसे ब्रह्मलोसमें प्राप्त हुआ है उसे सर्व काम भोग्यवर्ग आनन्दके कारण संकलमात्रसे ही प्राप्त होनाते हैं, सो उपासक जब पितृलोफी कामनावाला होता है तब संकलमात्रसे ही इसके पितर सम स्थित होते हैं, उनसे पितृलोकमें मात इना पनित होता है इसी प्रकार मातृलो. फकी इच्छासे वोह भी टपस्थित होता है (प्रभ) उपासाने सत्यसंकल्पताकी उता सम्भव नहीं क्यों कि वोह इमराधीन है (टनर) -रफी श्रुति पूर्वमीमांसा दादशाह यागको सत्रत्व तथा अहीनत्व यह दोनों प्रकार (३१२) दयानन्दतिमिरभास्करः। अतएवचानन्याधिपतिः शा० भ०१ पाः ४०९ सत्यसंकल्स होनेसे ही सगुण ब्रह्म विद्वान उपासक ( अनन्याधिपतिः) परा- धीनतावर्जित है भाव यह है ईश्वरका धर्म सत्यसंकल्प ही उपासक, आविर्भा- 4को प्राप्त हुआ है क्यों कि, कार्यउपाधि नीवमें भी सत्यकामादि तिरोभूत ये उपासनायलसे प्रादुर्भाव होतेहैं, अब यह विचार कर्तव्य है ब्रह्मलोकमें प्राप्त उपा- सफफा श्रुति प्रमाणसे संकल्पका साधन माने तो सिद्ध ही है शरीर या बाह्य इंदिय ऐश्वर्य प्राप्त विद्वान्के होते हैं या नहीं इसमें मतभेद है तया हि- अभाववादरिराहह्येवम्-शा० अ०४ पा०४ सू० १० बादरि आचार्य ब्रह्मलोक प्राप्त विद्वान्के शरीर इन्द्रियोंका अभाव मानते हैं क्योंकि इसमें श्रुति प्रमाण है ॥ मनसैतान्कामानपश्यन्मते; ययतेब्रह्मलोके-छां०प्र०सं०१२ ब्रह्मलोकमें शरीरेन्द्रियसे विना केवल मनसे ही भोग साधन है यह ब्रह्म- लोकमें जो विषय है तिनको मनसे अनुभव करता रमण करता है स्वामीने प्रक रण छोड मनसहित जीवका मोक्षमें होना लिखा है और मोक्षका निर्धारण नहीं करा कि कौनसी मुक्तिमें जीव मन सहित है ।। भावंजैमिनिर्विकल्पामननात्-शा० अ०४ पा० ४ २०११ जैमिनि आचार्य ब्रह्मलोक प्राप्तिरूप मुक्तिमें मनसहित इन्द्रियके शरीरका भाव मानते हैं (विकल्पामननात् ) नानात्वभावका अभ्यास श्रुतिमें देखा जाता है यथाहि- सएकधाभवतिनिधाभवतिपञ्चधासप्तधानवधाचैवपुनश्का- दशस्मृतःशतंचदशकश्चसहस्राणिचविशतिः-छां०७ सं०२६ सो मुक्त पुरुष एक प्रकारका, तीन प्रकारका, पांच सात नव पुनः ग्यारह सौ दश फिर एक फिर सहस्र बीस इत्यादि प्रकारके भावको प्राप्त होता है इस भुति- प्रमाणसे मोक्ष सहित इन्द्रिय शरीरका होना जैमिनि मानते हैं । द्वादशाहवदुभयविधवादरायणोऽतः-शा०म०४पा०४ सू०१२ इन दो प्रकारमें व्यासजी कहते हैं कि, जब सशरीर कल्पना करता है तब तौ सशरीर होता है और नाजशरीरता कल्पना करता है तब अशरीर होता है। यह दोनों प्रकार ही होते हैं क्यों कि ब्रह्मलोक प्राप्त विद्वान् सत्यसंकल है इससे संकल्पकी विचित्रतासे उभयविधभाव होसता है (दादशाहयत् ) जैसे दो प्रका . " नवमसमुल्लासखण्डनम् । मानते हैं तैसेही मुक्त पुरुपको सशरीरय तथा अशरीरत्व दो प्रकारको श्रुतिसे मानते हैं । तन्वभावसंध्यवदुपपत्तेः-शा० अ०४ पा०४ सु०१३ देहके अभावमें जैसे स्वममें मातादिककी उपलब्ध होती है ऐसे ही मोक्षमें मातादि विषयको उपलब्धि सिद्ध है मनसे कपित विषयोंका स्वममें भोग साक्षी भास्प है तब तो सन्ध्यनाम स्वमवत् पित्रादि विपय तथा अपना शरीर भी स्वम- हल्प प्रतीत मात्र जानने ऐसे ही भोगको उपपति होसक्ती है अन्यथा नहीं । भावजागद्वत्-शा० अ०४ पा०४० १४ शरीरके भावमें मुक्तको जामत्के तुल्य भोग होता है ।। प्रदीपदावेशस्तथाहिदर्शयति-शा० अ० १ पा०४ सू १५ एक आत्मा अनन्त शरीरों में कैसे प्रवेश करेगा तहां व्यासनी फहते हैं प्रदीप पत् आपेश होता है जैसे प्रदीप अनेक यत्तियोंमें प्रविष्ट होता है पैसे मुक्त भी विद्यायोग दलसे अनेक शरीरोंमें प्रविष्ट होनाता है क्योंकि उसका लिंगशरीर विद्यावलसे व्यापक होगाता है, एकधा भवति विधा भवति इत्यादि पूर्व दिखा दिया है ॥ जगद्व्यापारवजप्रकरणादसंनिहितत्वाव-शा०अ०४ पा०४ सू०१७ जगतकी उत्पत्ति पालन संहारको छोडकर भुक्त पुरुपफा ऐश्वर्प है महाभलपके अनन्तर सृष्टिम ईश्वरसे विना और किसी पुरुपका संनिधान नहीं होमक्ता ॥ स० पृ० २३९ पं०४ (म) जोष मुक्तिको प्राप्त होकर पुनः जन्ममरण दुसमें फभी माते हैं या नहीं क्योंकि नचपुनरावर्ततेनचपुनरावर्तते-उपनिषदचनम् छान्दो०प्र० सं०१५ अनावृत्तिःशब्दादनावृत्तिःशब्दात्-शारीरिक अ०४ पा० ४ सू०२२ यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ भ० गीॐ इत्यादि पपनोंसे विदित होता है कि, मुक्ति पही है जिससे निवृत्त होकर पुनः संसारमें कभी नहीं आता (उत्तर ) यह यात ठीक नहीं क्योंरियेदमें इस बातका निषेध किया है। *यं प्रायन निरर्तन्ते मा गोल २१ गुमाइस प्रकार पांच सदरमा शुदन होनका। ऐसे सटशन्दोंमें भा०प्र० कहते हैं अनानिसा सम्र और हो है, प्रदीफ मय हो है तब 'कर्ममा कि विषया देवक: हादिमीर निरर्थक होशंग, स्टार किरन मेगा तब प्रमोक्यो प्रसार में अनादिका पक्षमा मां पचनानी कोलंटनेशनमा होलकाता। - वाले थे, उनको सत्यवत्ता मानकर उनकी व्याख्या स्वामीजीने सत्य स्वीकार की (३१४) दयानन्दतिमिरभास्करः। कस्यनूनंकतमस्यामृतानांमनामहेचारुदेवस्यनाम कोनोमयाअदितयेपुनापितरंचहशेयंमातरंच ॥ 1 ॥ अग्नेयंप्रथमस्यामृतानामनामहेचारुदेवस्यनाम सनोमह्याअदितयेपुनर्दात् पितरंचदशेयंमातरं च २ ॐ ऋ० मं० १ सू०२४ मं ११२ इदानीमिवसर्वचनात्यन्तोच्छेदः-सांख्यसूत्रम् अ० १०० १६९ हम लोग किसका नाम पवित्र जानें फोन नाशरहित पदार्थोके मध्यमें वर्तमान देव सदा प्रकाशस्वरूप है हमको मुक्तिका मुख भुगाकर पुनः इस संसारमें जन्म देता और माता तथा पिताका दर्शन कराता है ? (टतर) हम इस स्वप्रकाशरूप अनादि सदा मुक्त परमात्माका नाम पवित्र नाने यह हमको मुक्तिमें आनंद भुगा- कर पृथ्वीमें पुनः माता पिताके सम्बन्धमें जन्म देकर माता पिताका दर्शन कराता है वही परमात्मा मुक्तिको व्यवस्था करता सबका स्वामी है जैसे इस समय बंध मुक्त जीव है वैसे ही सर्वदा रहते हैं अत्यन्त विच्छेद बन्ध मुक्तिका कभी नहीं होता किन्तु बंध और मुक्ति सदा रहती है ॥ २५१ पं० २६ से समीक्षा-धन्य है स्वामीजीकी बुद्धिको कि, उपनिषद् और शारीरकके वचन वेदविरुद्ध कहते हैं यहाँ स्वामीजीने ब्राह्मण और शारीरको अप्रमाग ठहरा और आप परम विद्वान् बने कौन मान सत्ता है कि, ब्राह्मण और शारीरक तो वेदको विरुद्धता हुई उनमें पयार्य न लिखा और दयानंदनी अपने पेदभाग्य वेदके यथार्थ आशयको समझे और उसे ठीक ठीक प्रगट किया स्वामीजीने मित्र यार्थ पृ० ८ पर व्याख्यान छपवाया था कि, यह वेदभाष्य अपूर्व होता है इस कुछ कपोलकल्पित नहीं है शिक्षासे लेकर शाखान्तर पर्यन्त ब्रह्मासे लेकर जैमि नितकके ग्रंथ जो वेदक सत्यार्ययुक्त व्याख्यान हैं ऋषि मुनियोंके किये उन सना तन सत्यग्रंथोंके वचनोंके लेख प्रमाणसे सहित यह वेदभाष्य रचा जाता है । अब.पाठकगण विचारें कि, ब्रह्मासे जैमिनितक जो वेदवचनोंसे यथावत् जानने फिर यह उनका हट दुराग्रह वा अज्ञान नहीं तो और क्या है जो उपनिपके पवन और शारीरकसत्रका निरादर करते हैं यह सांख्य शास्त्रका सूत्र मुक्ति विषयका नहीं * जब छोटे स्वामी यहां इन मंत्रों का अमि और प्रजापनि देवता स्वयं मानते हैं तब यह इतर विषय होना चाहिय तब यह दोनों मंत्र किसी प्रकार मी मुक्तिविषयक नहीं हो सके।
नवमसमुल्लासखण्डनम। ( ३१५) है यह तत्त्वके निर्णयमें है इसका अर्थ आगे फरेंगे मुक्तिविषयमें वो ही सांख्यकर्ता यो लिखते हैं । नमुक्तस्यपुनर्बधयोगोप्यनावृत्तिश्रुतेः-सां० अ० ६ ० १७ मुक्तको फिर बंधका योग नहीं है (अनावृत्ति ) नहीं लौटना यह श्रुति होनेसे यदि कपिलदेवनी मुक्तका जन्म मानते तो ऐसा सूत्र क्यों बनाते क्या वे भी दया- नंदजीके सदृश भ्रमजालमै पडेथे, कि, अपने ग्रंथों में परस्पर ऐसा विरुद्ध लेख फर बैठते जैसा कि, सत्यार्थप्रकाश संन्यासप्रकरणमें लिखा है, कि मुक्तिरूप अक्षय आनंदका देनेवाला संन्यासधर्म है, कहिये यहां अक्षय शब्दका क्या अर्थ है, जिन्हें अपने दो चार पंक्तियोंके लेसमें भी परस्पर विरोधका ज्ञान नहीं वे ब्राह्मण और शारीरिक शास्त्रके लेखको वेदविरुद्ध ठहरावें ।। वेदमंत्रों की व्यवस्था मुनिये प्रथम तौ मूल श्रुतिमें ऐसा कोई पद नहीं है जिससे प्रार्थना करनेवाला मुक्त जीव होना सिद्ध हो, दूसरे यह अर्थ स्वामी- जीका सम्पूर्णतः प्रकरणविरुद्ध है ऐतरेय ब्राह्मणमें इस प्रकारसे इसका निर्णय है। सोऽसिनिःशानरायायाथहशुनःशेपईक्षांचक्रेऽमानुपमिववे माविशतिप्यन्तिहंताहंदेवताउपधावामीतिसप्रजापतिमेवप्र- थमंदेवतानामुपससारकस्पनूनकत्तमस्यामृतानामित्येतय- तिंप्रजापतिरुवाचानिदेवानांनेदिष्ठस्तमेवोपधावेतिसोनि- मुपससार लग्नेर्वयंप्रथमस्यामृतानामित्येतयातमनिरुवाचे- त्यादिऐतरेयत्रा० सप्तमपंचिका खं० १६ इसका अर्थ यह हे अजीगत नाम एक रानपि असि (खगोको तीक्ष्ण करके शुनः' शेपके पास आया तब गुनाशेप विचारनेलगा कि यह पशुकी नाई मुझं मारेगा मैं इस समप देवताओंका आराधन फलं. यह विचार प्रथम हुए भगापतिकी शरण दुआ और कस्य नूनं इत्यादि मंत्रका उच्चारण किया तब प्रजापतिने शुनाशेपको बतायां अमिही देवताओंके मध्यमें समीप हैइस कारण अमिको स्मरण कर, तब वह शुनाशेप अमेर्वये प्रथमस्यामृतानामित्यादि मंबसे अमिको मार्थना करने लगा, तब अमि वाले सविता देवताकी आराधना करो यह राजसूय यज्ञके प्रकरणमें ऐतरेप ब्राह्मणमें वार्णित है मुक्तका संसारबंधनमें आनेका कोई प्रसंग इसमें नहीं है अब मंत्रार्थ दिखाते हैं। .
करते हैं (स.) वह प्रजापति अनि (नः) हमको ( मी अदितये) भूमिरूप 'फि (राना वरुणः) राजा वरुण (पनम् ) इस शुनाशेपको ( अवससम्पाद) दयानन्दतिमिरमास्करः। कस्यनामप्रजापतेःअमृतानादेवानांमध्येकतमस्य श्रेष्ठत्वेनानि- धारितस्यदेवस्यचारुउत्तमनाममनामहे अभ्यस्यामः मझे पृथ्वीरूपायेअदितयेमातृरूपायपुनर्वात्कःप्रजापति तदापि- तरंचमातरंचहशेयंपश्यामि ॥ १॥ पदार्थ:-( अमृतानाम् ) देवताओंके मध्यमें (नूनम् ) निश्चय कर (कस्प) कि (फतमस्य देवस्प ) कोन देवताके (पारनाम) टसमनामको (मनामहे ) अभ्या फरें ( आदितये मौ) भूमिरुप माताके निमित्त (नः) हमको (क.) कौन प्रना पति ( पुनः) फिर (दात् ) दे जहां (पितरञ्च ) पिताको भी (च) और मात रम्) को (दृशेयम् ) देखें । इसमें मुक्तीका वर्णन कहीं नहीं जब संकसमिः मुक्त जीव है तो तुम्हारे मतसे फिर संसारमें क्यों आवेगा. शुनःशेपका आशय यह है कि, पुनर्जन्ममें विलक्षण गुणयुक्त माता पिता प्राप्त हूं जो इन मातापिताकी नाई लोभी न हों। अब दूसरा अमिकी प्रार्थनामें मंत्र है तिससे निरूपण करते हैं ।। पद । अग्नेः वयम् प्रथमस्य अमृतानाम् मनामहे चारु देवस्य नाम सः नः मी अदितये पुनः दात् पितरम् च दशेयम् मात- रम् च ।। ऋ० मण्ड• १ सू० २४ मं० २ पदार्यः-( अमृतानाम ) देवताओं के मध्यमें (प्रथमस्य) पहले ( अमे-देवत्य) अमि देवताके ( चारुनाम) उत्तम नामका (वयम् ) हम ( मनामहे ) स्मरण माताको (पुनः) फिर ( दाद ) देगा (च) और (पितरम् ) पिता (च) और (मातरम ) माताको ( दृशेयम् ) देखेंगे । और भी कुछ आगेके मंत्रमें शुनाशेपका संपाद है ।। शुनःशेपोह्यबद्गुभीतस्त्रिवादित्यंहपद वद्धः । अवेनंराजावरुणः ससृज्यादिदाँअदब्धोविमुमोक्तपाशान् ॥ ऋ० मं० १ सू०२४ मं० १३ भापार्यः-(भीतः ) बांधनेके निमित्त ग्रहण किया हुआ (निपु ) तीन (प. देषु ) काष्ठविशेषोंके मध्यमें (बदः) बंधा हुआ (शुनःशेपः) शुन-शेप ( आदि न्यम् ) अदितिके पुत्र वरुणको (अहत ) आह्वान करता हुआ (हि) कारण नवमसमुल्लासखण्डनम् । पन्धनसे मुक्त कर (विद्वान ) छोडनेका प्रकार जाननेवाला (अदब्धः )किसीस हिंसाको माप्त न होनेवाला (पाशान् ) रन्जुपाशोंको ( विमुमोक्तु) विच्छेद कर इसे मुक्त करो ॥ * और वरुणने प्रसन्न होकर शुनाशेपको मुक्त किया ऐसा इससे अगिले मन्त्रमें सष्ट लेख है इसमें मुक्तजीवोंका बन्धनमें आना नहीं पाया जाता किन्तु बद्ध मुक्ति चाहते हैं। प्रयम तो स्वामीनी भाष्यभूमिकामें लिखनुके हैं कि मुक्तिसे नहीं लौटते अब कहते हैं कि संसारसागरमें मापडते हैं, कहिये परस्पर विरोध है वा नहीं शोक है स्वामीजीकी शुद्धिपर और उनके किये अर्थोपर कि, संसारके तुच्छ जीवभी जानते हैं कि परमेश्वर उपास्य स्मरणीय है और स्वामीजीके विचारानुसार मुक्त जीपोंको भी यह ज्ञान नहीं कि कौनसा देव उपास्प है, और यह भी विचारना चाहिये कि संपूर्ण सुखोंकी सीमा मुक्ति है जिसे परम गति कहते हैं उससे बढकर कोई आनन्द नहीं और संसारबन्धन सदा दुःखकी खान है फिर मुक्तजीवोंपर क्या विपति पी और फैसे अज्ञानी होगये जो सर्वानन्द सर्वोत्तम पदसे दुःखरूप संसा- रमें आनेकी इच्छा करने लगे, सब ही मुखप्राप्ति दुःसनिवृत्तिफी इच्छा करते हैं कोई महामूर्ख भी सुखसे दुःख भोगनेकी इच्छा नहीं करता, क्या कोई धनी पुरुष निर्धन होनेकी इच्छा करता है याराजा होकर नौकर बना चाहता है या हाथीपर चढकर गधेपर बढना चाहता है कदापि नहीं क्या मुक्त पति हमारीसी भी बुद्धि नहीं रखते जो परम पद मुक्तिसे दुःखसागरमें आनेके लिये प्रार्थना करते हैं यह भी ध्यान रहे कि, सब लोग अमाप्त वस्तुको प्राप्तिके लिये यल किया करते हैं प्राप्तवस्तुको प्राप्तिके लिये कोई यत्न नहीं करता, मुक्त जीवोंको कोई पदार्थ अलभ्य नहीं संकल्पमात्रसे हो सब उत्पन्न हो जाता है जैसा पूर्व लिख आये हैं ( एकथा भवति आदि)जब कि सगुण उपासी मुक्तजीव संकल्पमानहीसे अनन्त शरीर धारण करसता है तो उसकी बुद्धिपर क्या अज्ञान छापा है कि जो ऐसे भ्रमजालमें पडे (कि हम देवतोंके मध्यमें जन्में संसारमें जाय)पहले तो स्वामीजीने यह लिखा कि ब्रह्ममें जीव अव्याहत गति अर्थात् बेरुकावट विज्ञान आनन्दपूर्वक स्वतन्त्र विचरता है * फिर पृ० २३८ पं० २४ में लिखा है किजीव * ग्यारहवीं वार पृ० २४९५०६। भा० प्र० के यहाँ जो अर्थ हैं उनके देखनेसे हँसी आतीहै मुक्तिका प्रकरण मी मानते हैं और मुक्तजीवोंको प्रार्थनामें पापाचरणबन्धनोंसे विशेषकर छुड़ावै ऐसा भी लिखते क्यों न हो मुक्तर्जाव भी पापाचरणी दयानन्दक मतमें है एक ही स्थानपर एक ही प्रसंगमें दो अर्थ हैं एक जगह शुनःशेष अपि मन्त्रमें यही विज्ञानवान् पुरुप क्या विचित्र अर्थ है इन बातोंको कौन मानसकता है।
पवित्र जान जो हम मत्त जीयोंको फिर पृथ्वीम जन्म दे जिससे माता पिता करमन है क्योंकि वे पंडित है अब यह भी विचारना है कि, जन्म माना फारण क्या है इस विपपम मा विदानांका यही मत है किजीयार गुमान (३१८) दयानन्दतिमिरभास्करः। जो संकल्प करते हैं वह २ लोक और वह वह काम उनको प्रान होता है । पृ० २५ । १६० १६ पृ०२४९५°सत्यज्ञानमनंतंब्रह्म योवेदनिहितंगुहायां परमेव्योमन सोश्नुतेसर्वान्कामान्सहब्रह्मणाविपश्चितति-तैत्तिरीय० आनं० वल्ली अनु०१ ब्रह्मके साथ सब कामोंको प्राप्त होता है अर्थात् जिस २आनंदकी इच्छा करता है वह २ उसको प्राप्त होता है ( २६६।१७) पुनः पृ० २५० ५० ५ मुकजीव अनंतव्यापक ब्रह्ममें स्वच्छन्द घूमता शुद्ध ज्ञानसे सब सृष्टिको देसता हुआ सत्र लोक लोकान्तरों में घूमता है सब पदार्थाको देखता है मुक्तिम जीवात्मा निर्मल होनेसे पूर्ण ज्ञानी होकर उसको सब सन्निहित और असनिहित पदापाका ज्ञान और (भान) ययावत् होता है इत्यादि ॥ २६७।२ जव कि मुक्त जीपको कहीं कुछ रुकावट नहीं और यह आनंदपूर्वक स्वतन्त्र विवरता है दुखोंसे छूट आनंदमें रहता जो जो संकल्प करता पद यह स्टोर यह वह फाम उसे प्राप्त होता है सब लोकान्तरों में घूमता संसारका मुरा उस स्पर्श नहीं होता सदा आनंदमें रहता के साथ कामोंको प्राप्त होता निर्मल होने से पूर्ण ज्ञानी सनिहित असनिहित पदायाँका भान यथावत् होता है तो दिम प्रकार होसक्ता है कि, मुक्त जीव ऐसी प्रार्थना करें कि हम किस देयतामा नाम फिर देखें ऐसी प्रार्थना मुक्त जीव भी नहीं फरसते क्यों कि पूर्णज्ञानी भीर अयाप्तसमरतकाम हैं किन्तु दुःखी जीय जो संकट में पड़े होते हैं व मी मार्थना कोस जन्म होता है मुक्त नीव शुभाशुभ फीका सयानाश हो जाताद ययाहि- भिद्यते हृदयग्रन्यिश्छिद्यन्तेसवसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणितस्मिन् परावर मुण्ड०२०२८ यदा पश्यः पश्यतेरुक्मवर्णकतारमीशपुरुषत्रमयोनिम् । तदाविद्धानपुण्यपापविधूयनिरंजनःपामसाम्यमुपैति २ मुंडक ३२०१०३ .. नरमसमुल्लासखण्डनम् । तरतिशोकंतरतिपाप्मानगुहाग्रंथिभ्यो विमुक्तोऽमृतोभवति-मुण्डा०३० २०९ यआत्माऽपहतपाप्माविजरोविमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽ- पिपासःसत्यकामःसत्यसंकल्पः ४ छां०प्र० ८ खं० ७ नजरानमृत्युनंशोकोनसुकृतंनदुष्कृतंसपाप्मानोऽतोनि- वर्तन्ते-छां०प्र० ८ खं०४ । अपहतपाप्माऽभयंरूपम् बृहदारण्यके ५ अ०४ वा०३६० २१ ज्ञात्वादेवंमुच्यतेसर्वपाशेः ६ श्वेता० अ० ११८ ज्ञातादेवंसर्वपाशापहानिः श्वेताश्वेतरे ७ अ० १० ११ अर्थ-उस परमेश्वरका पूर्ण ज्ञान होनेसे ज्ञानीके हृदयकी गांठ खुल जाती है सारे संशय निवृत होजाते हैं और पापपुण्य सारे फर्म नष्ट होजाते हैं १ जब यह प्रकाश स्वरूप जगत्कर्ता वेदके कारण ईश्वरको देखताहै तब पुण्य पापको छोड- फर निरंजन होता:हुआ ईश्वरकी परम समताको प्राप्त होताहै अर्थात् तद्रूप होता है २ शोक और पापरूपी नदीको तरकर हृदयकी गांठोंसे वियुक्त होकर अमृत होता है । यह मुक्त पुरुष पापशून्य होता हुआ जरा मृत्यु शोक भोजन पान इच्छासे निवृत्त होता है सत्यकाम सत्यसंकल्पवाला होता है ४ मुक्त जग मृत्यु शोक सुकृत दुष्कृत रहित होता है उसके सारे पाप नष्ट होजाताते हैं । मुक्त हाकर पापशून्य भयरहित होता है ५ ज्ञानी परमात्माको जानकर पाप पुण्यरूप सब बंधनोंसे छूटता है ६ परमात्माको जानकर ज्ञान से पुण्यरूप सारे बंधनोंका नाश होता है ७ इससे सष्ट है कि, मुक्ति होनेपर पापपुण्य शुभाशुभ फाँका नाश । होजाता है जब कि, उनके फर्म ही न रहे तो उनका पुनर्जन्म किस प्रकार होसक्ती है क्पों कि, जन्म मरणका कारण शुभाशुभ कर्म ही है मुक्त होकर फिर जन्म मरणोंसे छूट जाता है यह वेद और टपनिषदोंसे प्रगट है । और भी- वेदाहमेतंपुरुपमहान्तमादित्यवर्णतमसःपरस्तात् । तमेवविदित्वातिमृत्युमोतिनान्यः पन्थाविद्यतेऽयनाय ॥ १ यजु०३१ । १८ यदासर्वेप्रमुच्यन्तेकामायेऽस्यहदिश्रिताः अथमोऽमृतोभवत्यत्रब्रह्मसमश्नुते॥२॥बृ.अ.वा.कं.७ है क्यों कि, वोह तो उसमें प्रवेश कर जाते हैं आश्चर्यकी बात है कि सच्छास्त्रोंमें इन वचनोंसे यह बात सम्यक् सिद्ध होती है कि मुक्तजीवोंको जन्म मरण नहीं (३२०) दपानन्दतिमिरभास्करः। यएतद्विदुरमृतास्तेभवंति- बृह० ३ ०४ वा० १० ११ नपश्योमृत्युपश्यतिनरोगनोतदुःखतांसहपश्यः पश्यतिसर्यमाप्नोतिसर्वशः-छा०प्र०७ सं० २६ धीराःप्रेत्यास्माल्लोकादमृताभवति-तलबकारे ॥४॥ खं०१ मं०२ यएतद्विदुरमृतास्ते भवंति ॥ ५॥ कठ० अ० २५० ६ार यज्ज्ञात्वामुच्यतेजंतुरमृतत्वंचगच्छति ॥ ६॥ कठ० अ० २ वल्ली ६१८ यदासवेप्रभिद्यन्तेहृदयस्येहग्रंथयः । अथमत्योंऽमृतोभवत्येतावदनुशासनम् ॥ कठ० ॥७॥व०६मं. १५ क्षीणे केशैर्जन्ममृत्युप्रहाणि ॥ ८॥ तंज्ञात्वाऽमृताभवांत ॥९॥ अर्थ-मैं इस महान पुरुपको जानताहूं जोप्रकाशरूप अंधकारसे परे है उसीको जानकर यह प्राणी मृत्युको अतिक्रमण करता है अर्थात् जन्म मरणसे छूटता है परमपद प्राप्तिके निमित्त और कोई मार्ग नहीं है ॥ १॥ इस मनुष्यके हृदय में जितनी कामना हैं वे. सब छूट जाती हैं तब वोह अमृत होता है. ॥ २॥ जो कोई इस (परमात्मा ) को जानते हैं वे अमृत होते हैं ॥ ३ ॥ ज्ञानी मृत्यु और रोगको नहीं देखता इसीसे दुःखको नहीं देखता ज्ञानी सवको देखता है और सब प्रकारसे सवको प्राप्त होता है । ज्ञानी इस शरीर त्यागनेके अनंतर अमृत होते हैं ॥ ४॥ जो कोई इस परमात्माको जानते हैं वे अमृत होते हैं ॥५॥ जिसको जानकर मनुष्य संसारबंधन से टूटता है और अमृतत्वको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥ इस मनुष्यक हृदयमें जितनी कामना है ये सब छूट जाती हैं तब पोह अमृत होता है तब वोह अमर होजाता है इतना ही अनुशासन है ॥ ७ ॥ अपि द्यास्मितादि पंचक्लेशोंके नाश होने से मनुष्य जन्ममरणसहित होनाता है ॥ ८॥ परमात्माको जानकर अमृत होते हैं ॥९॥ " . नवमसमुल्लासखण्डनम् । तो सष्ट लिखा है कि मुक्त जीवाका पुनर्जन्म मरण नहीं है दयानंदनी उनका पुन- नन्म सिद्ध करते हैं शास्त्रों में ऐसे वचन हैं कि मुक्तिसे फिर नहीं लौटते ॥ एतस्मानपुनरावर्तन्ते ॥१॥प्रश्नोपनिपदि।१० ब्रह्मलोकमभिसंपद्यतेनचपुनरावर्ततेनचपुनरावर्तते ॥ २॥ छान्दो० प्र०८खं० १९ तेषुब्रह्मलोकेषुपराः पराक्तोवसतितेपानपुनरावृत्तिः ॥३॥ बृहदा० अ०६त्रा०२० १५ नमुक्तस्यपुनर्बधयोगोप्यनावृत्तिश्रुतेः ॥ ४ ॥ सांख्या अ०६सू०१७ तदत्यन्तविमोक्षोपवर्गः न्याय० ॥५॥अ.१ आह्नि०१ सूत्र २२. अनावृत्तिःशब्दादनावृत्तिःशब्दात्॥६॥शा०अ०४पा०४१०२२ भाषा-पहाँसे फिर नहीं लौटते॥ १॥ ब्रह्मको माप्त होकर इस जन्म मरणरूप चक्रमें नहीं लौटते नहीं लौटते ॥ २॥ ब्रह्मलोकको प्राप्त होकर फिर नहीं लौटते फिर नहीं लौटते ॥ ३॥ मुक्तको फिर बन्धका योग नहीं मनावृत्ति अर्थात् नहीं लौटना यह श्रुति होनसे ॥ ४॥ दुःख जन्मप्रभृति दोष मिथ्याज्ञानकी अत्पन्त जो नियति उसको मोक्ष कहते हैं ॥ ५॥ मुक्तका फिर जन्म नहीं होता यह वेदसे सिदान्त है ॥ ६ ॥ इसके उपरान्त व्यासजीने और कुछ नहीं लिसा ।। यदि कोई कुशाग्रबुद्धिसे न आवृत्तिः नातिः मनावृत्तिः अनापत्तिः ऐसे व्युत्पति. फरें तो उनको यह सोचना चाहिये कि उपनिपोंमें जो दक्षिणायन उत्तरा- यण दो मार्ग लिखे हैं जिसमें फर्मकाण्डी दक्षिणायन मार्गसे चन्द्रलोक होते हुए फिर लौटते हैं और ज्ञानी सूर्यलोक होकर फिर नहीं लौटते . ( तघेहधै तदिष्टापतकृतमित्युपास्तेते चन्दमसभेव लोकममि- भायन्ते त एव पुनरापर्तन्ते ) यही पितृपान है इटार्ति आदि फर्मकाण्डी चन्दलोफ जाकर फिर लौटते हैं और ज्ञानी सूर्पलोक मार्गसे जाते, (एत- स्मान पुनरावर्तन्ते ) जहाँसे फिर नहीं लौटते तो कहिये थे इसका अब क्या अर्थ * तुलसी० खेंचातानी बहुत की पर कहीं इतनाभी न दिखासके कि (पुनरावर्तते) परमा. पृ० ३३४ सम्बत् १९७० में टटटा यह सिद्ध किया जैसे दुःखा ममुष्य महामृत्यध्य मन्त्र जपते हैं पैसे यह मन्त्र है तो क्या मुक्तिरूपकारागारमें दयानन्दके सिद्धान्तो जीर 'कस्यन् ०१ यह मन्त्र पढ २ कर दुःखसे चिढाते हैं क्या सुन्दर मुक्ति है। .
जीने किया है कि, विविध प्रकारकी पीडा उसका नाम दुसरे टमीमपन टिपे प्रात होतादै पह स्वामीनी ही सेबसे प्रगट है कि मुतिमेटि '( ३२२) दयानन्दतिमिरभास्करः। करेंगे यदि दोनोंका अर्थ लौटनाही करेंगे तो इन दो मागामें अन्तर ही का रहा इस कारण यह उनका कथन ठोफ नहीं और जीव कभी निश्शेप नहीं होते क्यों कि वे अपार हैं और यह प्रश्न आत्माके प्रकरणसे विरुद्ध है क्योंकि सब कुछ आत्मा ही है । स० पृ०२३९५० २७ प्रश्र- तदत्यन्तविमोक्षोपवर्गः। दुःखजन्मप्रवृत्तिदापमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापायतदन्तरा- पायादपवर्गः-न्या० सू०१ आ०२ सू०२ जो दुःखका अत्यन्त विच्छेद होताहै वही मुक्ति कहाती है क्यों कि, गब मिथ्याज्ञान लोभादि दोप दुष्ट व्यसनों में प्रवृत्त जन्म और दुःखका उत्तरके छूटनेसे पूर्व २ के निवृति होनेसे मोक्ष होता है जो कि सदा बना रहता है (उत्तर) पर आवश्यक नहीं कि अत्यन्त शब्दका अस्पताभावहीका नाम है जैसे ( अत्यन्त दुःखमत्यन्तं सुखं चास्प वर्तते ) बहुत दुःख और बहुत सुख इस मनुष्पको है इससे यही विदित होता है कि इसको बहुत सुख पादुःख है इसी प्रकार या भी अत्यन्त शब्दका अर्थ जानना चाहिये ॥ २९२ पं० २३ - समीक्षा-इस सूवमें अत्यन्त शब्द अत्यन्ताभावहीका वाचक है स्वामीजी को अपना लेख भी स्मरण नहीं रहा ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका पृ० १८४ में इन सूत्रोंका अर्थ लिखा है ( दुःखनन्य )जा मिथ्या ज्ञान अपांत् अपिया नट हो जाती तब जीवके सब दोष नष्ट हो जाते हैं, उसके पीछे (प्रति) अंपाद अब मंका अभ्यास विषयासक्ति आदिकी वासना दूर हो जाती है, उसके नाश हो मे जन्म अर्थात् फिर जन्म नहीं होता दाखौके अभासे पूर्वोक्त परमानंद मोक्ष में सब दिनके लिये परमात्माके साप आनंद ही आनंभोगनेको शाही रह जाता है इसीका नाम मोत है १ ( तदत्यन्त ) फिर उस दुःख अत्यन्त ममात्र और परमात्मा नित्य भोग करनेसे नो सब दिन लिपे परमानन्द प्राप्त होता है इसीका नाम मोक्ष है, और वेदान्तवा निवारणमें इस सबका पही अर्थ स्यामी निवृत्ति होनसे जीपको अपवर्ग नो मोक्ष परक आधारमें अत्यानंद सो मा खोरता॥
नचमसमुल्लासखण्डनम् । (३२३) स पृ० २४० पं०९ ते ब्रह्मलोकेहपरान्तकालेपरामृतात्मारमुच्यन्तिस के यह मुण्डक उपनिषद्का वचन है वे मुक्तिजीव मुक्ति में प्राप्त होके ब्रझमें आनं- दको तबतक भोगके महाकल्पके पश्चात् मुक्ति सुखको छोडके संसारमें आते हैं। समीक्षा-दयानंदजी जब अपनी इच्छानुसार कोई बात प्रचार करना चाहते हैं तो कोई श्रुति लिखकर उसके अर्थमें अपनामयोजन सिद्ध किया करते हैं जिससे अज्ञानी लोग जाने कि यह बात सत्य है परन्तु वह लेख जब बुद्धिमानों दृष्टि गोबर होता है तो भगट होता है कि श्रुतिमें स्वामीजीके अभिप्रायको गन्ध भी नहीं, नहीं जानते स्वामीजीने यह अर्थ कौनसे पदोंमे किया है यद्यपि स्वामीजीने यह श्रुति बदली है तो भी इसका यह अर्थ नहीं बनता जो पे करते हैं इसका यह अर्थ होता है कि- वे सब विधान संन्यासी ब्रह्मलोकमें (है) निश्चय (परान्तकाले ) ग्राम महा- प्रलयम (परामृतात्) परामृत ब्रह्मज्ञान जन्म मुक्तिको माप्त होकर (परिमुच्यन्ति) 'विदेहकैवल्यको प्राप्त होते हैं जैसे (मासादात्प्रेक्षते ) इसका अर्थ यह है कि प्रासादपर आरोहण करके देखता है ऐसे हो "परामृतात्परिमुच्यन्ति" का अर्थ पूर्वोत्त है इसमें लौटना तो किसी भी पदसे नहीं विदित होता । और अब यह भी विचारना है कि यहां जो ब्रह्माका महाकल्प माना है तो वह ब्रह्मा देवता है या मनुष्य है वा ईश्वरका विशेष विग्रह है ईश्वरका विग्रह माननेसे तो स्वामीजीका मतभंग होता है और मनुकी सृष्टिसे वाह्य होनेसे मनुष्प भी नहीं है क्यों कि ब्रह्माजीके मनु पोते हैं तो देवता हैं जिनकी महाक- ल्पतकको आयु है तो अब यह बात यहाँ खंडन होगई कि विद्वानोंहीका नाम देवता है अब श्रुति लिखते हैं। वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाःसंन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः। तेब्रह्मलोकेपुपरान्तकालेपरामृताःपरिमुच्यन्तिप्तवे ॥१॥. गता कला-पंचदशप्रतिष्ठादेवाश्चसर्वेप्रतिदेवतासु । कर्माणिविज्ञानमयश्चात्मापरेऽव्ययेसर्वएकाभवन्ति ॥२॥ यथानद्यः स्पन्दमानाः समुद्रेस्तंगच्छन्तिनामसपेविहाय । * पाची धारमें ते ब्रह्मलोक परान्तकाले परामृताः परिमुष्पन्ति स मुण्डक ३ खं. २०६ ऐसा शुद्ध पार है पृ० २५६ ५० ९ A पृ०२४० पं० २७ मक्तिके स्थानमें बहुतसा भीड भडका होनापगाल पृ० २४० पं०२१ जो मुक्तिमेंसे कोई भी लौटकर जीव इस संसारमेंन आवे तौ संसारका उच्छेद अर्थात् जीव निश्शेष हो जाने चाहिये । पृ० २५३ पं०२२ माना तबसे सान्त कहने लगे टच्छेद इस प्रकार नहीं होसक्ता जैसे कि, अज्ञात । कालके स्रोत नदियोंके चले आते और समुद्र में मिलजाते हैं परन्तु उन सोता उच्छेद नहीं होता इसी प्रकार जीव भी निश्शेष नहीं होसते और पास्तकि विचारमें तो जगत् मिथ्या ही है इसमें सार ही क्या है ज्ञानीकी दृष्टिम संसार. "ही नहीं है जीव आत्मस्वरूप है, फिर आप संसारके उच्छेदसे क्यों डरते हो। (३२४) दयानन्दतिमिरभास्करः। तथाविधानामरूपाद्रिमुक्तः परात्परंपुरुषमुपैतिदिव्यम् ॥ ३॥ मुंड० खं० २ मं०६।७।८ भावार्थ:-जिन्होंने विज्ञानसे वेदान्तके अपोंका निश्चय किया है और वे यत्न शील सर्वस्व त्यागरूप संन्यासयोगसे शुद्ध चित्तवाले होगये हैं वे सम्पूर्ण विदित वेद्य ब्रह्मलोकमें यावनीव वर्तमान परान्तकाल अर्याद विदेहपातकालमें जीन न्मुक्ति दशाहीमें (परामृताः ) परम अमृत मोक्षको प्राप्त हुए मुक्त हो विदेह- फैवल्यको प्राप्त होते हैं, यद्यपि ब्रह्मस्वरूप लोक एक है तथापि महात्माओंको स्थितिकी अपेक्षासे अनेकवत् प्रतीत होताहै इस कारणब्रह्मलोकेषु यह बहुवचनका प्रयोग करा है १ जो कि महात्मा विद्वानोंकी पंचदश कला हैं वे अपने २ कार: गमें लीन हो जाती हैं व कला यह हैं प्राण श्रद्धा आकाश वायु तेन जल पृथ्वी इन्दिय मन मन्न वीर्य तप मंत्र कर्म लोक यह पंचदश कला हैं और धर्माधर्मरूप कर्म तथा विज्ञानोपाधिनिवृत्तिपूर्वक घटोपाधिनिवृत्तिपूर्वक घटाकाशवत् विज्ञानो- पाधिक जीवपर अव्ययमें एकीभावको प्राप्त होते हैं २ अब दृष्टान्त कहते हैं जैसे नदी सम्पूर्ण स्पन्दायमान समुद्रमें लीन होजाती है तैसे मुक्त भी नामरूपको त्यागकर पर जो सूक्ष्म समष्टिहिरण्यगर्भ तिससे भी पर परमात्माको प्राप्त होता है क्यों कि, जो परब्रह्मको जानता है वह परब्रह्म ही होता है । इससे भी मुक्तिसे लौटना सिद्ध नहीं होता ॥ १० १२७ श्रुति यही लिखकर अपना प्रयोजन पड़ने पर श्रुति बदल डाली धन्य है संन्यासीजी ।। समीक्षा-यह वही आक्षेप है जो दयानंदनीपर किसी यवनने कियाया और उसके संमुख निरुत्तर होकर मुक्तिसे पुनरावृत्ति मान बैठे और अर्थ उरटे फर दिये जीवोंको संसारमें न आनेसे उच्छेद कभी नहीं होसक्ता क्यों कि, जोन असंख्य हैं पहले स्वामीजी भी जीवोंको अनन्त मानतेथे जबसे मुक्तिसे लौटना - . . नवमसमुल्लासखण्डनम् । (३२५) 'किवहां आगम अधिक और व्यय कुछ नहीं होगा बटतीका पारावार न -रहेगा ॥ २५३ । २७ * समीक्षा-दयानंदजीके विचारमें मुक्तिका स्थान कितना लंबा चौड़ा है जो आपको जीवोंकी पुनरावृत्ति न होनेसे वहां भीड़ भडका होजानेका भय हुआ सत्यार्थप्रकाश में आपने लिखा है ब्रह्म सर्वत्र पूर्ण है उसीमें मुक्तजीव अव्याहत. गति अर्थात् उसको कहीं रुकावट नहीं फिरते हैं जब कि मुक्तजीव ब्रह्ममें रहते हैं और ब्रह्म सर्वत्र पूर्ण है मुक्ति के स्थानमें भीडभडक्का होनेकी शंका बुद्धिविरुद्ध है आप तो गोलोकादिपर आक्षेप करते थे पर आपने भी यहां कोई मुक्तिका - स्थान माना है जहां कोई चौतरासा होगा ।।* स० पृ० २४१ पं० १ कोई मनुष्य मोठा मधुर ही साता जाय इसको वैसा सुख नहीं होता जैसा सब प्रकारके रसोंके भोगनेवालेको होता है जो ईश्वर अन्त- पाले फर्माका अनन्त फल दे तो उसका न्याय नष्ट हो जाय ॥ २५४५.३ समीक्षा इस दृष्टान्तके लिखनेसे स्वामोजीका अभिप्राय यह है कि, कोई मनुष्य • एक दशामें चाहें वह कैसी ही सुखरूप हो सर्वदा रहना पसन्द नहीं करता, कोई मनुष्य यह नहीं जानता कि सम्पूर्ण रसोंमें मधुर रस ही सर्वोत्तम है, किन्तु पडूस, में उराम और निकृष्ट दोनों प्रकारके पदार्थ होते हैं जो पहरसयुक्त नानाप्रकारके ' उत्तम पदार्थीका भोजन करनेवाला होता है उसकी रुचि निकृष्ट पदार्थोके भोग- -नेकी कभी नहीं होती, अर्थात् पेड़ा कलाकंदफा खानेवाला शीरा, तंदुल और गोहमादिका खानेवाला यवादिकके खानेकी कभी इच्छा नहीं करता, इसी प्रकार जो रेशमके अच्छे वस्र बहुमूल्य पहरता है वह कभी पढे पुराने धोतर गजोक * छोटे स्वामी भीडका नाम एकान्ताभार मानते हैं.आपका प्रयोजन है मुक्तमें एकाध दया- नदी जीय किरता रहे और नही भीडको आप भी संभावना करते हैं तो आपका मुक्त लोक मी दो चार गजका होगा आप भी और क्या करते आरिपर तो गुरुके पीछे ही चलना है। * यदि स्वामीजीको जगत्के उच्छेदका डर है कि मुक्त होनेसे एक दिन मव वहीं पहुँच जायेंगे तो फिर यही बात भावागमनमें मी सम्भव होगी एक दिन सब यही आजायेंगे तो फिर भीडका दोनों जगह स्वामीजीको धका खाना होगा यह यह कि कोई मनुष्य एक घरको पांच मिनट में कोई दश मिनट कोई पन्द्रह मिनट कोई योस मिनटमें घूमता है तो ये धूमनेबारे सब एक समय एक सानमें इकडे होजायेंगे यथा- ६.५११:11५२० १।।३।३। ५+२+१+१+२+२-६० मिनट इसी प्रसार दयानन्दजी जीव मुक्तिमें या कमी मूटोफमें इकट्ठे होगये सब क्या यदतीका पारावार न रहेगा तथा मुक्त होनेरर मा भूटोकके खाटा होजानेको सम्मानी होगी तब क्या फरोगे इससे जाँव मनन्त हैं मुक्ति अपने महरूपको प्रान होजाते हैं पालामें जगन् मापारहित है।
लिपी है और स्टप हानको यहता कौन है यहां तो प्रत्यायस्प होगानकारी (३२६) दयानन्दतिमिरभास्करः। पहरनेकी इच्छा नहीं करता जिसको राज्याधिकार प्राप्त है वह कभी नौकर वन- नेको इच्छा नहीं करता, जो पालकीमें चलता है वह कहार बनकर उठाना नहीं चाहता, जो आरोग्य है वह रोगकी इच्छा नहीं करता, प्रतिष्ठित अप्रतिष्टित होना नहीं चाहता, मुक्त बंदीगृह जानेकी इच्छा नहीं करता, कौन विद्वान् मूर्ख बननेकी इच्छा करता है, कोई मनुष्य पशुपक्षी कीट पतंगादिकी योनिको पसंद करता है। कोई नहीं, उसी प्रकार कोई मुक्तिके आनंदसे दुःखमें आनेकी इच्छा नहीं करता इन दृष्टान्तोंसे यही विदित होता है कि, उत्तम पद छोड़कर कोई बुद्धिमान निकृष्ट पद ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं करता, ऐसी वातको दयानंदनीकी बुद्धि जो उनके शरीरसे भी अति स्थूल है, स्वीकार कर तो आश्चर्य नहीं मुक्त पुरुष निनको पड़े परिश्रमसे सर्वोत्तम पद अर्थात् आत्माकी प्राप्ति होती है जिससे सम्पूर्ण दुःसोंकी निवृत्ति प्राप्त हुई है क्या वह संसाररूप बंधन जन्ममरणादि अनेक दुःशांके स्थानकी वाह फैरेंगे कदापि नहीं करेंगे, परन्तु ईश्वरके न्याय कारण युक्ति लगानी पड़ी। स० पृ० २४१ पं० ४ जो नितना भार उठासकै उतना उसपरधरना बुद्धिमा नोंका काम है जैसे एक मनभर टठानेवाले शिरपर दशमन धरानेसे भारधरने पालेकी निंदा होती वैसे अल्प सामर्थ्याले जीवपर अनन्त मुसका भार धरता ईथरके लिये ठीक नहीं ॥ २५४ । ६ समीक्षा-स्वामीनाको वृद्धिकी कोई कहांतक घडाई फर क्या मुखका भी कोई बोस है जो जीवपर धरानायगा क्या मुखकी गठरी है या बोरा है गाही भी हुई है जो ईभर जायके ऊपर घर देगा बस यह बुद्धिमानी स्वामीनी बुद्धि मानाही के ऊपर छोडे देते हैं । स० पृ० २४१ पं० ११ मुक्तिमं नाना वहांसे आना ही अच्छा है क्या थोरस कारागारसे जन्मकारागार दंडयाले पाणी अथवा फासीको कोई अच्छा मानता है अन्तर इतना ही होगा कि यहां मनूरी नहीं करनी पड़ती महमें लप होना समुदमें दृर मरना है ।। २५१ । १२. ममीक्षा-मुनिये पाठकगण जो कोई मन्तिको कारागार और फासी मकान कहना है उससे अधिक नास्तिक कौन है, स्वामीनी मतमें मुनि कालापानी अपना फामी है इसमें प्रगट है कि, स्यामानीका अभिप्राय गुप्त रातिम वैदिक धर्म नर फरनेका या, और लोगोरे धर्म भ्रष्ट करनेकी इच्छा थी नैमा कि पहले माया माकेटमें सायं प्रातः मॉमसे हवन करना दिया है नियोगादिष्पा * मानाने इनार कुछ दिन भी न बगः ।
नवमसमुल्लासखण्डन (३२७) अब समझे मुक्त जीव पिना मजदूरीके बेमशक्कतकी सनापाले हैं आगेके पदमें इच- नेसे बचें कभी स्वरूपको न प्राप्त हों यही चेलोंको आज्ञा है । स० पृ. २४४५० ३० (प्र.) पौराणिक लोग (सालोक्य) ईश्वरक लोकमें निवास (सारूप्य ) जैसे उपासनीय देवकी आकृति है पैसा बन जाना (सामीप्य) सेवकके समान ईश्वरके समीप रहना (सायुज्य) ईश्वरसे संयुक्त होजाना यह चार प्रकारकी मुक्ति मानते हैं चेदान्तीलोग ब्रह्ममें लय होनेको मोक्ष समझते हैं (उत्तर) पृ० २४५५० ११ पौराणिक लोगोंसे पूउना चाहिये जैसी तुम्हारी मुक्ति पैसी कीटपतंगादिकोंकी भी स्वत:सिद्ध है क्यों कि यह सब जितने लोक हैं वे सब ईश्वरके हैं इन्हीमें सब जीच रहते हैं इसलिये सालोक्य मुक्ति अनापास प्राप्त है सामीप्य ईश्वर सर्वत्र प्राप्त होनेसे सब उसके समीप हैं इसलिये सामीप्य मुक्ति भी स्वतःसिद्ध है सायुज्य जीव ईश्वरसे सब प्रकार छोटा और चेतन होनेसे स्वतः बन्धुवत् है सब जीव परत्मामें व्याप्प होनेसे संयुक्त हैं इससे सायुज्य मुक्ति भी स्वतःतिद है ।। २५८५० ११ से १५ तक फिर पं० २३ से। समीक्षा स्वामीजीको यह खबर नहीं कि, यह आक्षेप हमपर भी आताहै जब आपफा पह लेख है कि जीव मुक्तिमें ईश्वरमें रहकर विवरते हैं तो ईश्वर सर्वत्र व्यापक होनेसे सबकी मुक्ति स्वतः ही सिद्ध है फिर क्यों इतने झगडे डाले परन्तु इसमें यह जानिये कि, उपरोक्त चार प्रकारसे जीवोंकी जो मुक्ति कही है उनमें फिसी प्रकारका दुःस नहीं है वे दुःसादिसे पृथक रहते हैं और सबको इसी तरहसे माने तो सबको दुःख रहताहै मत्तजीवको दुःख नहीं होता यही मुक्ति विशेषता है चारों प्रकारके मुक्तनीयोंकी पुनः आवृत्ति नहीं होती और ज्ञानी लोगोंशा तों कथन है कि- मोक्षस्य नहि निवासोस्ति ग्रामान्तरमेव वा । अज्ञानहृदयग्रंथिमुक्तो मोक्ष इति स्मृतः ॥ मोक्षका कोई स्थान नहीं है अथषा कोई ग्राम नहीं है जब अज्ञानकी ग्रंथि हृदयको दृढ़ गई तभी मोक्ष है ओर सांपशासकताके सूत्रका आशप भी यह नहीं है अर्थ यह है- इदानीमिवसर्वत्रनात्यन्तोच्छेदः-सां० अ० १० १६० पदि सर्पकालमें पन्धमा अत्यन्त नाश नहीं होता वर्तमानालवत् तो पह अनुमान फलित हुआ (सर्वकाला मोक्षशून्यः कालत्वात् वर्तमानकालयत् ) सो यह पार्ता मोक्षवादीको. अनिष्ट है क्यों कि जबतक मो मोहाभार मानता है तबतक शासका फल ही क्या है मुनि तौ शाम्रोंमें प्रतिपादन ही करी है क्योंकि, कपि- .
अन्तर इतना ही होगा कि वहां मनूरी नहीं करनी पड़ती ब्रह्म में लप होना सम्ब समीक्षा-सुनिये पाठकगण जो कोई मुक्तिको कारागार और फांसीके समान कहता है उससे अधिक नास्तिक कौन है, स्वामीजीके मतमें मुक्ति कालापानी अयस फरनेका था, और लोगोंके धर्मभ्रष्ट करनेकी इच्छा थी जैसा कि पहले सपा र्थप्रकाशके ४५ पृष्ठम सायं प्रातः मांससे हवन करना लिखा है नियोगादिन्यवान लिखी है और लय होनेको कहता कौन है वहां तो ब्रह्मस्वरूप होजानेका कपनी (३२६) दयानन्दतिमिरभास्करः। पहरनेकी इच्छा नहीं करता मिसको राज्याधिकार प्राप्त है यह कभी नौकर वन- नेकी इच्छा नहीं करता, जो पालकीमें चलता है वह फहार बनकर रटाना नहीं चाहता, जो आरोग्य है यह रोगकी इच्छा नहीं करता, प्रतिष्ठित अप्रतिष्ठित होना नहीं चाहता, मुक्त बंदीगृह नानेकी इच्छा नहीं करता, फोन विद्वान् मूर्ख बनने की इच्छा करता है, कोई मनुष्य पशुपक्षी कीट पतंगादिकी योनिको पसंद करता है? फोई नहीं, उसी प्रकार कोई मुक्तिके आनंदसे दुःखमें आनेकी इच्छा नहीं करता इन दृष्टान्तोंसे यही विदित होता है कि, उत्तम पद छोडकर कोई बुद्धिमान निकृष्ट पद ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं करता, ऐसी वातको दयानंदनीकी इद्धि जो टन शरीरसे भी अति स्थूल है, स्वीकार करें तो आश्चर्य नहीं मुक्त पुरुष जिनको बड़े परिश्रमसे सर्वोत्तम पद अर्थात् आत्माफी प्राप्ति होती है जिससे सम्पूर्ण दुःखोंकी निवृत्ति प्राप्त हुई है क्या वह संसाररूप बंधन जन्ममरणादि अनेक दुःखोंके स्थानकी चाह करेंगे कदापि नहीं करेंगे, परन्तु ईश्वरके न्यायकं कारण युक्ति लगानी पड़ी। स० पृ० २४१ पं० ४ जो जितना भार उठासकै उतना उसपर धरना बुद्धिमा नोंका काम है जैसे एक मनभर टठानेवालके शिरपर दशमन धरानेसे भारधरने- वालेकी निंदा होती वैसे अल्प सामर्थ्यवाले जीवपर अनन्त सुखका भार पता ईश्वरके लिये ठीक नहीं ॥ २५४ । ६ समीक्षा-स्वामीनीकी बुद्धिकी कोई कहातक वडाई करै क्या मुखका भी को बोझ है जो जीवपर धरानायगा क्या सुखकी गठरी है या बोरी है गाडी भ हुई है जो ईश्वर जीवके ऊपर धर देगा बस यह बुद्धिमानी स्वामीजीकी बुद्धि मानोंहीके ऊपर छाडे देते हैं । स० पृ० २४१ ६०११ मुक्तिमें जाना वहांसे माना ही अच्छा है क्या थोडे कारागारसे जन्मकारागार दंडवाले प्राणी अथवा फांसीको कोई अच्छा मानना डूब मरना है ।। २५ । १२५ फांसी है इससे प्रगट है कि, स्वामानीका अभिप्राय गुप्त रातिसे पैदिक धर्म न * भास्करप्रकाशमें इनपर कुछ लिखते भी न बना ।
नवमसमुल्लासखण्डनम् (१२७) अब समझे मुक्त जीव पिना मजदूर के बेमशक्कतकी सजावाले हैं आगेके पदमें इब- नेसे बचें कभी स्वरूपको न प्राप्त हों यही चेलोंको आज्ञा है ।। स० पृ० २४४ पं० ३० (०) पौराणिक लोग (सालोक्य) ईश्वरके लोकमें निवास (सारूप्य) जैसे-उपासनीय देवकी आकृति है पैसा बन जाना (सामीप्य) सेवफके समान ईश्वरके प्तमीप रहना (सायुज्य) ईश्वरसे संयुक्त होजाना यह चार प्रकारको मुक्ति मानते हैं वेदान्तीलोग ब्रह्ममें लय होनेको मोक्ष समझते हैं (उत्तर) पृ० २४५५० ११ पौराणिक लोगोंसे पूछना चाहिये जैसी तुम्हारी मुक्ति पैसी कीटपतंगादिकोंकी भी स्वतःसिद्ध है क्योंकि यह सब जितने लोक हैं घे सब ईश्वरके हैं इन्हीमें सब जीव रहते हैं इसलिपे सालोक्य मुक्ति अनायास प्राप्त है सामीप्य ईश्वर सर्वत्र माप्त होनेसे सब उसके समीप हैं इसलिये सामीप्प मुक्ति भी स्वतःसिद्ध है सायुज्य जीव ईश्वरसे सब मकार छोटा और चेतन होनेसे स्वतः बन्धुवत् है सब जीव परत्मामें व्याप्य होनेसे संयुक्त हैं इससे सायुज्य मुक्ति भी स्वतःसिद्ध है। २५८५०११ से १५ तक फिर पं० २३ से । समीक्षा-स्वामीनीको यह खबर नहीं कि, यह आक्षेप हमपर भी आताह जब आपका यह लेख है कि जीव मुक्तिमें ईश्वरमें रहकर विचरते हैं तो ईश्वर सर्वत्र व्यापक होनेसे सयकी मुक्ति स्वतः ही सिद्ध है फिर क्यों इतने झगडे डाले परन्तु इसमें यह जानिपे कि, उपरोक्त चार प्रकारसे जीॉफी जो मुक्ति कही है उनमें फिसी प्रकारका दुःख नहीं है वे दुःसादिसे पृथक रहते हैं और सबको इसी तरहसे माने तो सबको दुःख रहताहै मतजीवको दुन्य नहीं होता यही मुन्तिम विशेषता है चारों प्रकारफे मुक्तनीपोंफी पुनः आवृत्ति नहीं होती और ज्ञानी लोगोंका तों फयन है कि- मोक्षस्य नहि निवासोस्ति ग्रामान्तरमेव वा । अज्ञानहृदयग्रंथिमुक्तो मोक्ष इति स्मृतः ।। मोक्षका फोई स्थान नहीं है अथवा कोई ग्राम नहीं है जब अज्ञानकी मंथि हृदयकी टूट गई तभी मोक्ष है और सांख्पशाम्ररुताके सूना आशय. भी यह नहीं है अर्थ यह है- इदानीमिवसर्वत्रनात्यन्ताच्छेदः-सां० अ० १ सू० १६० यदि सर्वकालमें यन्या अत्यन्त नाश नहीं होता पर्तमानमालबत् तो यह अनुमान पलित हुआ (सकाला मोक्षगुन्यः कालत्वात् वर्तमानरालयत् ) सो यह पार्ता मोक्षवादीको. अनिष्ट है क्योंकि जबतक जो मोसाभार मानता है तबतक शासका फल ही क्या है मुक्ति तो शाराम प्रतिपादन हो करी है क्योंकि, फपि.
(२२८) दयानन्दतिमिरभास्करः। लदेवनीने घामदेवकी मुक्ति सा० अ० १० १५७ में मानी है तो इस सत्रर्स मुक्ति न होनी चाहिये सो फपिलदेवमीका यह तात्पर्य नहीं कि, मुक्तिमें बन्ध रहता है यह अनुमान सूत्र लिखा है सिद्धान्त नहीं क्यों कि, योह. पहले ही लिख चुके हैं। -अथत्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः--सां० अ०१ सू०१ तीन प्रकारके दुःखको जो अत्यन्त निवृत्ति नाम स्थूल सूक्ष्मरूपसे सर्वया निवृत्ति सो अत्यन्त पुरुषार्थ अर्थात् मोक्ष है सो देखना चाहिये कौनसे दुःखको निवृत्ति होनी चाहिये वर्तमान तो थोडी देर पीछे अपने आप ही निवृत्त हो जायगा अतीत कालका निवृत्त हो गयाहै परिशेपसे भावी दुःखकी निवृत्ति ही मोक्ष है सो इससे भी मुक्तिसे लौटना सिद्ध नहीं होता ।। स० पृ० २५४ पं० २० जो मध्यम रजोगुणी होते हैं वे राना क्षत्रिय वर्णस्य गजाओंके पुरोहित वादविवाद करनेवाले प्राइविषाक (वकील ) वैरिष्टर युद्ध विभागके अध्यक्षके जन्म पावने हैं ॥ २६८ ३.९८ समीक्षा-खूब स्वामीनीने वकीलोंकी तारीफ करी है अंगरेजी विद्या अंगरेगी शब्द शास्त्रोंमें मिलाये पिना स्वामाजीकी तृप्ति नहीं हुई, मनुनीके ग्रन्थमें भी. वरिष्टर घूसपड़े जो विलायत पास करनेसे होते हैं । राजानःक्षत्रियाश्चैव राज्ञां चैव पुरोहिताः ॥ वादयुद्धप्रधानाश्च मध्यमा राजसी गतिः ।। मनु०अ०१५।४६ अभिपेकको प्राप्तहुए राजा क्षत्रिय राजपुरोहित नो वाणीके युद्धमें प्रधान हैं नसी राजसी गति है स्वामीनीने वकील बैरिस्टर लगादिये ।। इति श्रीमदयानंदतिमिरभास्करे मिश्रज्वालाप्रसादविरचिते सत्यार्थप्रकाशान्तर्गत- नवमसमुल्लासस्प खंडनं समाप्तम् । १२ सि० १८९० श्रीगणेशाय नमः। अथ सत्यार्थप्रकाशान्तर्गतदशमसमुल्लासस्य खण्डनं पारस्पते। भक्ष्याभक्ष्यप्रकरणम् । इस समुल्लासमें दयानन्दजीने भल्याभक्ष्य आचार अनाचारका वर्णन किया परन्तु कुछ विशेष प्रमाण न देकर केवल बुद्धिक ही पोडे दौडापे हैं इस कारण उनका खण्डन फरना अवश्य है और मनुजीने जोकुछ शास्त्र में लिखा है सो ममाण ही है पे लिखते हैं । स०२५७ / १(२७१)५ वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥म० ११२ मनु घेद स्मृति और सत्पुरुपोंका आचरण और जो अपनी आत्माका प्रिय अर्थात् स्वर्गलोकका ले जानेवाला हो यही साक्षात् धर्मके लक्षण हैं इस कारण आचा- रादिकी व्यवस्था मनुजीने की है यह वहां देखलेनी परन्तु अब सत्यार्थप्रकाशका लेख दिसलाते हैं। स०म० २४८ पं० १३ जो अति * उष्णदेश हो तो सब शिसासहित छेदन फरा देना चाहिये क्यों कि शिरमें बाल रहनेसे उष्णता अधिक होती है और उससे बुद्धि कम हो जाती है डाठी मूछ रखने से भोजन पान अच्छे प्रकार नहीं होता और टच्छिष्ट भी बालोंमें रह जाता ॥ २७२ । १९ समीक्षा-चाह स्वामीजी अब आपको कोई वेदनिन्दफ कहै तो उसका पहा अनुचित नहीं होगा अथवा आप संन्यासी होकर शिखा डाढी मूंड नहीं रखते वैसे ही आप चाहते हैं कि, सब पोटमपोट हो जायें और इस आपवित देशमें भी छः महीने अधिक उष्णता होती है प्रत्यक्ष लिख दिया होता कि, छः मही- नेको टियातक मुंडवा देनी चाहिये, विशेष फरके अपने शिष्योको तो नाप यही आज्ञा देरी फि, तुम लोग तो शिक्षासहित शिरफे बाल मुंडया दो, क्यों कि गरमीसे बुद्धि कम हो जायगी परन्तु स्वामीजीने सत्यार्थप्रकाश शिरमें उनी वन यांधकर लिखी होगी तभी बुद्धिहीनताकी बहुत बातें लिखी है, भला डाडी मूंउपालोग तो खानपान अच्छी तरह नहीं होसत्ता, इस कारण डाठी मुंज * तु०रा० मारकरप्रकाश टिग्पतहें गो गृहस्प यहोरातसे पहले मी मब दिवानहित मुण्डन लिखाद टॉक है तो क्या टम माया अदीम भी होती हैं और क्या गरमदेश मी उमी समर होता है कुछ तो मोचा करो।
तुम्हारे प्रकारसे ही करें तो यह अर्थ होगा कि, आपाक यहाँ शुद संहार पर पाहे अपार धुहारीदना चौकायन मानना टहल सेगा आदि संशाधना कार्य पर करतये और अब भी यह काम पहारादि करतही हैं परन्तु मांगन बरसाहा प-२६१५०१० निन्हान गुहाना पृत य पिमानशा पाट सद (३३०) दयानन्दतिमिरभास्कर। न रक्खें परन्तु शिखासे क्या बिगडता है वह तो भोजन पानमें बाधा- नहीं डालती कदाचित् एक बातका भय है कि, लडाईमें कोई चुटिया पकडलेगा. इस कारण चुटिया कतरवानेकी आज्ञा दी, परन्तु इतना और भी लिख देते कि लडाईमें कान भी पकडे जाते हैं तो कान भी कतरवा देनेकी आज्ञा लिस देते फिर शिखा सूत्रका संस्कारविधिमें धारण करना था ही लिखा है और यज्ञोप- वीत भी धारण करना वृथा है तो यह संस्कार उडाकर वेदपर भी हरताल फेरदी होती यह न सूझा कि यदि डाठी मूंछमें जूठन लगजायगी तो क्या पानासे नहीं धुलसक्ती यस यह मनुष्योंको भ्रष्ट फरनेको स्वामीजीने ढंग निकाला था क्योंकि आर्योंके यह दो ही विशेष चिह्न हैं, शिखा और सूत्र सो स्वामीजीने यही दूर करनेका विज्ञापन कर दिया, इस कारण इनकी बात माननी ठीक नहीं संन्यासको छोडकर और किसी समय भी शिखाका त्याग करना नहीं चाहिये यही पेदशी आज्ञा है और स्त्रियोंके बाल मुंडवाने चाहिये या नहीं, गरमियोंमें तो टनकी पुरी दशा होगी नियोगियोंको मुंडा खूब रहेंगी- पृ० २६४ पं०३ आर्याअधिष्ठितावाशूराःसंस्कर्तारःस्युः।प्र०२पटल०२सं०२सूत्र " यह आपस्तंबका सूत्र है आपोंके घरमें शूद अर्थात् मूर्ख स्रीपुरुष पाका सेवाको करें ।। २७९ १७ समीक्षा-स्वामीनीफी बुद्धि जाने फोन उडाकर लेगपा मूर्स स्त्री पुरुष मा रसोई क्या करसकेगा, न किस्पशास्त्र भी ग्रंथ संस्कृतमें विद्यमान है तथा औ भी भोजन बनाने के कितने ही ग्रंथ हैं, विनाउनके जाने धनी पुरुषोंकिपरॉम निधि मफारके व्यंजन बनापे जाते हैं, यह किस प्रकार यनासकेंगे और भोगन बना भी एक वट्टी चतुरताका काम है यहुधा अब तो यह फर्म निपा करती हैं और पूर्वकालमें भी खी बहुधा रसोई बनातीया पटी भी होतीयों और व्यंजन विधि प्रकारकं बनातीयों और पनाती है फेयल बडे र राजाओं और पनियों पर रसोइये होते हैं, आगे भी होतय सो यह फर्म शूद नहीं करते जो प्रामा यदा शान नहीं जानते और सुपशान ही मानते घरमोइका कार्य करते और समाप सानापमा ती दम सूत्र में कोई पाब्द नहीं है।
दशमसमुल्लासखण्डनम् । (३३१) उन्होंने जानो सब जगत्के हाथका साया और उच्छिष्ट खाया ॥ २७९ । १४ समीक्षा-स्वामीजीके इस वचनसे क्या प्रतीत होता है ? यही कि, सब जातिके हाथका भोजन करले सब जगत् एक जाति होजाय पहले जुटिया कटवाई अब सब जाति एक बनाई, यह तो गुप्त अभिप्राय ही था कि, सब जाति एक करदेनी स्वामीजी भी रोज बूरा खाते ही थे इससे एक वरची नौकर रखलेते तो धडा मुभीता होगाता क्यों कि आप तो यवन चमार कुम्हार सबको एक ही बनाना विचारते हैं, क्यो कि गुड चीनी तौः प्रायः सभी खाते हैं तो सब ही भ्रष्ट हुए और आपहीने यह भी लिखाहै पृ० २६४ पं० २कि शूद्रके पान और उसके घरका पका हुआ अन्न आपत्कालके विना न खावै जब सब ही एक होगये चरा घी आदि खानेसे तो शूदफे यहाँका फिर क्या दोप रहा और दुका पीनेकी तन लिखी। स० पृ. २६५ पं० २० और मद्यमांसाहारी म्लेच्छ जिनका शरीर मधमा- सादिकोंके परमाणुओंसे पूरित है उनके हाथका न खायै ॥ २८१ । २ समीक्षा-पीछे लिख आये हैं कि, घी आदि खानेवालेने सबके हाथका खाया अब म्लेच्छके हाथके सानेका निषेध करते हैं, म्लेच्छोंफा शरीर मासके परमाणु- से पूर्ण है और शूद्र भी तो मांस ही खाते हैं उनके हाथका भोजन करनेसे पोह बात जो म्लेच्छोंके हाथके भोजन करने में होती है क्या नहीं होगी शोच है ऐसी बुद्धिपर कहीं कुछ कही कुछ लिखते हैं इसीसे तो कहते है स्वामीनीकी धुदि भी इसी कारण विपरीत होगई है शदके हाथफा बनाया भोजन कभी करना न चाहिये। स. पृ. २६६ पं० २६ यह राजपुरुपोंका काम है कि, जो हानिकारक पशु वा मनुष्य हो उनको दंड देव और प्राण भी वियुक्तः करदे (प्रभ) क्या टनका मांस फेंकदें (उत्तर) चाहें फेंकदे थाई कुत्ते आदि मांसाहारियोंको खिला दे वा जला दे अथवा कोई मांसाहारी खाये तो भी संसारको कुछ हानि नहीं होसती किन्तु उस मनुप्पका स्वभाव मांसाहारी होकर हिंसक हो सकता है ।। २८२१८ समीक्षा-क्या स्वामीजीने मनुष्योंके खानकी भी परिराटी निकाली ? क्या मनुष्य भी खाये जाते हैं ? हिंसा जीव, शेर, भेडिपा चीता आदिका मारता राजाओंका काम है परन्तु इनका मांस तो कोई मनुष्य नहीं पाता फिर मनु. प्पका मांस भी मनुष्य नहीं खाते यह दोनों बातें वृद्धिविरद है, और जय मांस खानेसे मनुष्यका स्वभाव मांसाहारी होफर हिंसक हो सकता है तो दशकी हानि केसे नहीं ? बहुत बड़ी हानि है यह मांस विधि स्वामीने अली- किफ लिखी है।
(३२) दयानन्दतिमिरभास्करः। स० पृ. २६७ पं० ८ (प्रभ) एफ साय खाने में कुछ दोप है या नहीं (उत्तर) दोप है क्यों कि एफके साथ दूसरेका स्वभाव और प्रकृति नहीं मिलती जैसे कुत्री मादिके साप खानेसे मनुष्यका रुधिर विगडता है पैसे दूसरे के साथः सानस में कुछ विगाह होही जाता है ॥ २८२ । २० समीक्षा--जब कि साथ भोजन स्वभाव प्रकृति आदिमें अन्तर पडता है तो मला जो भोजन बनायेगा तो उसके हायसे आटा मोडना आदि होनसे क्या स्वभावमें विकृति नहीं होगी वेशक होगी इस कारण दादिकोंके हाथ भोगन फरना न चाहिये अब मौर देखिये- स०प्र० पृ० २६८ ५० ६ मनुष्यमात्रके हायकी पकी हुई रसोई खानमें क्या दोप है (उत्तर) दोप है क्यों कि निन उत्तम पदार्योंके खाने पीनेसे ब्राह्मण और ब्राह्मणीके शरीरमें दुर्गन्धादि दोपरहित रजवार्य उत्पन्न होता है वैसा चांडाल और चांडालीके शरीरमें नहीं क्योंकि चांडालका शरीर दुर्गन्धयुक्त परमाशुओंसे भरा हुआ होता है वैसा ब्राह्मणादि वर्णोका नहीं इसलिये ब्राह्मणादि उत्तम वर्गों के हाथका खाना और चांडालादि नीचके हाथका नहीं खाना ॥ २८३ । १७ समीक्षा कदाचित् स्वामीनीने यह समुल्लास शूदके हाथका भोजन करके ही लिखा हो तो कुछ आश्चर्य नहीं परस्पर विरुद्धतासे यह समुल्लास पूरित है पूर्व तौ सदके हाथका भोजन करना लिखा कहीं एक जाति होने का आशय झलकाया, कहीं मनुष्यादिकोंका मांस भक्षण करना लिखा, अन्तमें सब बातोंका निचोड सत्य बात ही मुखसे निकली सिद्धान्त यह हुआ कि, नीवके हाथका भोजन करना नहीं चाहिये क्यों कि, नाचके हायका भोजन करनेसे उनके शरीरको दुर्गन्धि आदिसे भोजन हानि और रोगकारफ होकर स्वभावको विगाडता है इसी कारण ब्राह्मणादि वर्णोको शूदके हाथका बनाया भोजन करना नहीं चाहिये और यही फारण है कि, धान्यकुधान्य आदिसे अब भी संतान बद्धिहीन दरिद्री और मूर्ख होती है, मनुजीने लिखा है-- राजानं तेज आदत्ते शूद्रानं ब्रह्मवर्चसम् ॥. आयुः सुवर्णकारानं यशश्चावकर्तिनः ।। २१८॥ कारुकानं प्रजां हन्ति वलं निणेजकस्य च ॥ गणान्नं गणिकान्नं च लोकेभ्यः परिकंतति ॥ २१९ । । नाद्याच्छूद्रस्य पक्वान्नं विद्वानश्रादिनो द्विजः।। आददीताममेवास्मादवृत्तावेकरानिकम्॥२२३॥म० अ०४ । .
दशमसमुल्लासखण्डनम् । ( ३३३) अर्थात् राजाका अन तेनका नाश करता है, शूद्रका अव ब्रह्मसंबन्धी तेजक नाश करता है, सुनारका अन्न आयुका और चमारका अन्न यशका नाश करत है १ वढईका अन्न संततिका नाश करता है, धोवीका बलको, गणिकाका अ स्वर्गादिलोकोंके फलोंको नाश करता है २ विद्वान् ब्राह्मणादि शूद्रके हाथप बनाया हुआ पकान भोजन न करै और जब कहीं आपदा आन पड़े और भोग न मिलता होय तो एक दिनके निर्वाहमाय ( कच्चा सीधा दाल आटादि ) ले लें यहां भी यही विदित है कि, शूद्रके हाथका बना भोजन नहीं करना जब उनम जन भी वर्जित है तो हाथका बना कैसे खाय । स०प्र० पृ० २८४ पं० १ ग्यारहवीं वारका । प्रभ-जो गायके गोवरसे चौका लगाते हो तो अपने गोवरसे चौका ना लगाते (उत्तर) गायके गोवरसे पैसा दुर्गन्ध नहीं होता जैसा कि मनुष्य मलसे गोमय रिकना होनेसे शीन नहीं उखडता न कपडा बिगडता मलीन होता है। समीक्षा-छि:छिः कैसे पिनीने प्रश्नोत्तर हैं मनुष्योंके मलमें दुर्गन्ध न होत तौ दयानन्दगी इसीसे वेलोंके परका चौका लगवाते धन्प है ऐसे प्रश्नोत्तर विना सत्यार्थप्रकाश अधूरा रहनाता ॥ यहां कई ऐसे घृणित प्रश्न हैं * पृ० २८४ पं० २३ जो ब्राह्मणादि वर्णस्य स्त्री पुरुष रसोई बनाने चौका बर्तन भोडे मांगने आदि बखेडेमें पडे हैं तो विद्यादि शुभगुणोंकी वृद्धि कभी होसके । ग्यारहवीं बार। समीक्षा-पाठकगण समझे दयानन्दनीका प्रयोजन क्या है नव रसोई बना योका देना आदि बखेडा है और वर्णाश्रमी इन फर्मोको न करें तो फिर यही पर चीखाना परपरमें करानेका विचार है कि वर्णाश्रमी तो इनको झगडा समझें अ इनको त्यागर्दै जब विद्यादि शुभगुणोंके यह विन है तो फर्मकोड या गायत्रीनप भी विरोधी होंगे, और मनुके 'अन्नदोपाध' इस श्लोकपर भी आपने चौकालगाप इस प्रकार इस दशम समुल्लासके साथ सत्यायप्रकाशके पूर्वादका खंडन कि गया क्यों कि, इन्ही दशमसमल्लासोंमें स्वामीनीन अपना मत स्थापन किया इसको जो कोई मन लगाकर पक्षपातरहित हो विचार करेगा षद दयानंट- लीलासे बचकर परमपदका अधिकारी होगा क्योंकि, इसमें यथास्थानपर दवे * मा० प्र०सो विचार मन ही रहगये के.श्ट यहीं दिखा पात्रानुसार मद मांसाहारी और वेदानुसार कैसे है कोई प्रमाण तो बताया होता।
. (३३२) दयानन्दतिमिरभास्करः। 'स० पृ० २६७ पं० ८ (प्रश्न) एक साथ सानेमें कुछ दोप है वा नहीं (उत्तर) दोप है क्यों कि एकके साथ दूसरेका स्वभाव और प्रकृति नहीं मिलती जैसे कुष्ठी मादिके साथ खानसे मनुष्यका रुधिर विगडता है वैसे दूसरेके साथः सानसे में कुछ विगाड होही जाता है ।। २८२ । २० समीक्षा--जब कि साथ भोजन स्वभाव प्रकृति मादिमें अन्तर पहता है तो भला जो भोजन बनावैगा तो उसके हायसे आटा मीडना आदि होनेसे क्या स्वभावमें विकृति नहीं होगी वेशक होगी इस कारण शूदादिकोंके हाथका भोजन करना न चाहिये अब और देखिये- स०प्र० पृ० २६८ ५० ६ मनुष्यमात्रके हाथकी पकी हुई रसोई खानमें क्या दोप है (उत्तर) दोप है क्यों कि जिन उत्तम पदार्थोके खाने पीनेसे ब्राह्मण और ब्राह्मणीके शरीर में दुर्गन्धादि दोपरहित रजवीर्य उत्पन्न होता है वैसा चांडाल और चांडालीफे शरीरमें नहीं क्योंकि चांडालका शरीर दुर्गन्धयुक्त परमाणुओंसे भरा हुआ होता है वैसा ब्राह्मणादि वर्णोका नहीं इसलिये ब्राह्मणादि इत्तम वर्णों के हाथका खाना और चांडालादि नीचके हाथका नहीं खाना ॥ २८३ ॥ १७ समीक्षा-कदाचित् स्वामीनीने यह समुल्लास शूदके हाथका भोजन करके। लिखा हो तो कुछ आश्चर्य नहीं परस्पर विरुद्धतासे यह समुल्लास पूरित है पूर्व शूदफे हाथका भोजन करना लिखा कहीं एक जाति होनेका आशप झलाप कहीं मनुष्यादिकोका मांस भक्षण करना लिसा, अन्तमें सब बातोंका निचो सत्प बात ही मुखसे निकली सिद्धान्त यह हुआ कि, नीचके हाथका भानन फर नहीं चाहिये क्यों कि, नोचके हाथका भोगन करनेसे उनक शरीरकी दुर्गनि आदिसे भोजन हानि और रोगकारक होकर स्वभावको बिगाडता है इसी कार ब्राह्मणादि वर्णाको शूदफे हाथका बनाया भोजन करना नहीं चाहिये और पई फारण है कि, धान्यकुधान्य आदिसे अब भी संतान बदिहीन दरिद्री और मूर्य होती है, मनुनीने लिया है-- राजानं तेज आदत्ते शद्वान्नं ब्रह्मवर्चसम् ॥ आयुः सुवर्णकारानं यशश्चमविकर्तिनः ॥ २१८॥ कारुकानं प्रजां इन्ति वलं निणेजकस्य च ॥ गणान्नं गणिकान्नं च लोकेभ्यः परिकृतति ।। २१९ ॥ नाद्याच्छूद्रस्य पक्कानं विद्वानथादिनो द्विजः।। आददीताममेवास्मादवृत्तावेकरात्रिकम्।।२२३॥म०म०21 दशमसमुल्लासखण्डनम् । ( ३३३) अर्थात् राजाका अन्न तेजका नाश करता है, शूद्रका अन्न ब्रह्मसंवन्धी तेजका नाश करता है, सुनारका अन्न आयुका और चमारका अन्न यशका नाश करता है १ वढंईका अन्न संततिका नाश करता है, धोबीका बलको, गणिकाका अन्न स्वर्गादिलोकोंके फलोंको नाश करता है २ विद्वान् ब्राह्मणादि शूदके हाथका बनाया हुआ पक्वान भोजन न करे और जब कहीं आपदा आन पडे और भोजन न मिलता होय तो एक दिनफे निर्वाहमात्र ( कच्चा सीधा दाल आदादि ) ले ले यहाँ भी यही विदित है कि, शूदके हाथका बना भोजन नहीं करना जब उनका अन्न भी वर्जित है तो हायका बना कैसे खाय । स.. ० २८४ पं० १ ग्यारहवीं पारका । प्रभ-जो गायके गोवरसे चौका लगाते हो तो अपने गोवरसे चौका नहीं लगाते (उत्तर) गायके गोबरसे पैसा दुर्गन्ध नहीं होता जैसा कि मनुप्पक मलसे गोमप चिकना होनेसे शीव नहीं उखडता न कपडा बिगडतान मलीन होता है ॥ समीक्षा-छिः छिः कैसे घिनौने प्रश्नोत्तर हैं मनुष्योंके मलमें दुर्गन्ध न होती तौ दयानन्दभी इसीसे चेलोंके परका चौका लगवाते धन्य है ऐसे प्रश्नोत्तरके विना सत्यार्थप्रकाश अधूरा रहनाता ॥ यहां कई ऐसे घृणित प्रश्न हैं * पृ० २८४ पं० २३ जो ब्राह्मणादि वर्णस्थ स्त्री पुरुप रसोई बनाने चौका देने बर्तन माडे मांजने आदि बखेडेमें पडे हैं तो विद्यादि शुभगुणोंकी वृद्धि कभी न होसकै । ग्यारहवीं बार । समीक्षा-पाठकगण समझें दयानन्दजीका प्रयोजन क्या है जब रसोई बनाना चौका देना आदि बखेडा है और वर्णाश्रमी इन कोको न करें तो फिर वही स्वर- चीखाना घरपरमै फरानेका विचार है कि वर्णाश्रमी तो इनको झगडा समझें और इनको त्यागर्दै जब विद्यादि शुभगुणोंके यह विन हैं तो कर्मकांड वा गायत्रीजपके भी विरोधी होंगे, और मनुके 'अत्रदोषाच' इस श्लोकपर भी आपने चौका लगाया। इस प्रकार इस दशम समुल्लासके साथ सत्याथपकाशके पूर्वार्टका खंडन किया गया क्यों कि, इन्ही दशमसमुल्लासोंमें स्वामीजीने अपना मत स्थापन किया है इसको जो कोई मन लगाकर पक्षपातरहित हो विचार करेगा यह दयानंदी- लोलासे बचकर परमपदका अधिकारी होगा क्योंकि, इसमें ययास्थानपर वेदवेदा- . * मा. प्र. तो विचार मौन ही रहगये केवल ,यही लिखा शाखानुसार शूद्र मांसाहारी नहीं और वेदानुसार कैसे हैं कोई प्रमाण तो बताया होता।
(३३४) दयानन्दतिमिरभास्करः। न्तोंके व्यारूपान भी किये गये हैं, जिससे ज्ञानकी प्राप्ति होगी मेरा. परिश्रम इस कारण है कि, लोग सत्यासत्यका निर्णय करें मैंने इस ग्रंयम जो कुछ भी लिखा है पद्धत निर्णय और विचारसे लिखा है, और वेदादि वही शास्त्र जो दयानंद- सरस्वतीने माने हैं सिपाय उनके प्रमाणोंके और कोई अक्षर भी अपनी तरफसे • नहीं लिखा, अब इसके आगे ११ समुल्लासमें जो आर्यावर्तके मतोंका स्वामीनीने . -खंडन किया है उसमें स्मार्तमतका मंडन किया जायगा क्यों कि, श्रुति स्मृति प्रतिपादित धर्म ही सनातन धर्म है उसीका अनुष्ठान करना योग्य है उसीका मंडन किया जायगा और धर्मवाले अपना उत्तर आप दे लैंगे॥ इति श्रीदयानन्दतिमिरमारकरे मिश्रन्यालाप्रसादविरचिते सत्यार्थप्रकाशांतर्गतदशम समुदासखण्डनम् ॥ १४ सि०१८९. रविः.'
श्रीगणेशाय नमः। अथ दयानंदतिमिरभास्करस्योत्तराईमारतः । भूमिका. यह वाती सघ पर विदित है कि, महाभारतसे पूर्व इस देशमें वेदमतसे भिन्न और कोई मत नहीं था जब महाभारतके पश्चात् अविद्या फैली तब जहां तहां अनेक मत दृष्टिगोचर होने लगे और जिसके मनमें जो आया सो मत चलाया इसी कारण इस देशकी एकता नष्ट होगई और विविधक्कोशोंसे भारतवर्ष व्याप्त होकर धनहीन हो अधोगतिको प्राप्त हुआ और जब बढतसे मत प्रचलित हुए । इस आधाधुन्धमें स्वामीजी दयानंदनीने भी एक मत अपना नवीन खडा किया जिसमें सम्पूर्णतः वेदविरुद्ध ही प्रचलित की है और वेदमन्त्रोंके अर्थ बदल कर अपने प्रयोजनानुसार कल्पना कर लिये हैं तथा पुराण मूर्तिपूजन तीर्थ श्राद्धा. दिक सपहीको वृथा कथन किया है इस मतका मुख्य अन्य सत्यार्थप्रकाश है जिसके दश समुल्लासोंका खंडन इस प्रन्यके पूर्वार्धमें करचुके हैं यह एकादश समुल्लासका. खंडन इस. ग्रन्थके उत्तरार्द्ध में लिखते हैं ग्यारहवें समुल्लासमें स्वामीजीने पुराण तीर्थ मूर्तिपूजनका खंडन किया है तथा अन्यमतोंका भी खंडन किया है जो इस समय प्रचलित हो रहे हैं परन्तु मेरा तात्पर्य उन मतोंको अच्छा चुरा कहने का नहीं है इस बातको सम्पूर्ण आर्यगण मानते हैं और मुझे भी निर्धान्त स्वीकार है कि, जो कुछ वेदादि शास्त्रों में आता है उसे मानना परम धर्म है और जो उन ग्रन्थोंके विपरीत है वह अधर्म है इस कारण मैं इस स्थानमें केवल उन्हीं बातोंकी चर्चा करूंगा जिनका वेदसे सम्बन्ध है और मतवालोंको यदि अपना मत सत्य सिद्ध करना हो तो वह अपना जवाब देलेंगे मैं उनकी ओरसे उत्तरदाता नहीं क्यों कि मैं तो सनातन वैदिक धर्मको ही श्रेष्ठ मानताह और वास्तवमें यही मत श्रेष्ठ भी है इस पुस्तक लिखनेसे मेरा यह अभिमाय नहीं है कि, किसीका वित्त दुःखी हो किन्तु मेरा आशय यह है कि, इस ग्रन्थको विचारकर सत्यासत्यका निर्णय फरके सत्यका ग्रहण और असत्यका त्याग करें यही इस संसारमें मनुष्पन- न्मका फल है कि श्रेष्ठकों का अनुष्ठान कर मोक्षके भांगी बनें ॥ पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र.
। श्रीगणेशाय नमः I . अथ सत्यार्थप्रकाशान्तर्गतेकादशसमुल्लासस्य खंडनं प्रारभ्यते । . मन्त्रप्रकरणम् । स० पृ० २७५ ५० ३ यह सब बातें जिनसे अस्त्रशस्त्रीको सिद्ध करतेये वेमन्त्र अर्थात् विचारसे सिद्ध करतेथे और चलातेये और जो मन्त्र अर्थात् शब्दमय होता है टससे कोई द्रव्य उत्पन्न नहीं होता और जो कोई कहे कि मन्त्रसे अमि उत्पन्न होती है तो वह मन्त्र जप करनेवालेके हृदय और निहाको भस्म कर दे मारने जाय शडको और मर रहै आप मन्त्र नाम हैं विचारका । २९११९ समीक्षा-धन्य है स्वामीजी खूब मन्त्रोंकी रेट लगाई भला यह तो कहिये महाभारतमें लिखा है जब अश्वत्थामाने नारायणास्त्रका प्रयोग कियापा तो उस समय जिसने अस्त्र नहीं खोले वह अस्त्र उसीके ऊपर टूटकर गिरने लगा अब विचारिये फि विना मन्त्रके जडवस्तुमें क्या सामर्थ्य है कि कुछ समझसकै और अश्वत्थामाने जो पाण्डववंश निवेश करनेको अस्त्र त्यागन कियाथा तो वो उत्तराके गर्भमें भी मारनेको प्रविष्ट हुआ तो क्या वहां उत्तराके गर्भमें विचार षा सलाहसे वाण छोडाथा जो परीक्षित गर्भहामें मृतक होगया पीछे श्रीकृष्णने जिवाया यह मन्त्रहीका तो प्रभाव था, सर्प अबतक मन्त्रोंको मानते हैं मन्त्र पढनेसे बोलू उतरजाता है यदि मन्त्रका प्रभाव न होता तो एक बाण छोड़- नेसे पत्थर वा पानी बरसने लगे और जन्मेजयके यज्ञमें ब्राह्मणोंने मन्त्र पढकै सोका आह्वान कियाथा, और इन्द्रसहित तक्षकका सिंहासन उड आया और जिस मन्चमें अमि उत्पादन करनेकी शक्ति होगी वह उसी स्थानमें अमि उत्पन्न फरैगा, जहां कि प्रेरफकी इच्छा होगी प्राचीनऋषि मन्त्रद्वारा देवताओंको धुलाले. तेथे, और यह नो स्वामीजीने कहा है कि शब्दमय मन्त्र होता है उससे द्रव्य उत्पन्न नहीं होता यह भी असत्य है फिर वेदवाक्य तो कहते हैं 'स्वर्गकामो यजेत' यदि केवल मन्त्र शब्दमय है तो स्वर्ग कैसे होसक्ता है यदि कुछ शब्दसे नहीं होता तो परीक्षित, वेन, सगरपुत्रोंको घाणीमात्रसे ही तौ शाप दियाथा, और यह सत्य हुआ तथा कश्यप के भजेहुए वैद्यने तक्षकके भस्म कियेहए वृक्षको दो घडी पूर्ववत् करदिया इससे मन्त्रको सामर्थ्य न मानना स्वामीजीकी अविद्या है एक जर्मनी कई सहस्रको इस देशके अस्त्रविद्याकी पुस्तक खरीदकर लेगया है मन्त्रका वर्णन मन्त्रशास्त्रों में विशेष है तथा पहले लिखचुके हैं।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । ( ३३७ स.पृ० २७७ 'पं २७ "ब्रह्मवाक्यं जनार्दनः" पाण्डवगीता। अर्थात् जो कुछ ब्राह्मणोंके मुखसे वचन निकलता है वह जानों साक्षात् भग धानके मुससे निकला ।। २९४ । ५ समीक्षा-स्वामीनीने इसका अर्थ नहीं जाना तभी तो उलटा लिख दिया इसका अर्थ यह है कि ब्रह्मवाक्यंजनार्दनः-यह मयाण मुहर्त के विषयमें एक कोई श्लोक है "उपः प्रशंसते गर्गः शकुनं च वृहस्पतिः ।। अंगिरामनउत्साहं ब्रह्मवाक्यं जनार्दनः । इससे गर्ग, बृहस्पति और अगिरा इन्होंके अभिमाय जैसे भिन्न २ फहे वैसे जनादन नामक ज्योतिर्वत्ताका अभिप्राय यह है कि, ब्राह्मणका वचन लेकर प्रयाण करना इससे गिसको जो इष्ट मालूम हुआ उसने अपना २ सिद्धान्त कहा, इसमें स्वामीजीका कहा अर्थ कहां सिद्ध होता है, अशुद्ध अर्थ करके. "स्वयं नष्टः परान्नाशयति" यह स्वामीजीकी लीला उनको ही सोहती है कारण, वाचा. वाक्यं प्रमाणका गपोडा तो तुम्हारा ही है आपकी लकीर पर चेले फकीर हुए फिरते हैं और महात्मा ब्राह्मणोंका वाक्य जनार्दनका वाक्प इस कारण होसकताहै कि वे अपनी ओरसे कुछ नहीं कहते जो वेद आज्ञा देता है सोई कहते हैं जैसे आपके अमि आदिके मुखसे निकले वेद ब्रह्मवाणी ही कहाये ॥ स०प्र० पू० २७८ पं १३ तो हम कौन हैं (उत्तर) तुम पोप हो; (पुनः पं० १४ में) छल कपटसे दूसरोंको ठगकर अपना प्रयोजन साधनेवालेको पोप कहते हैं ॥ २९४ । २१ : समीक्षा-यह स्वामीजीने संस्कृतं छोडअव रूमनभाषाका आश्रय लिया यह पोप शब्द ही रूमनभाषाका स्वामीजीके मतका नाशक हैं क्यों कि, आप ही १४. पंक्तिमें पोपंके अर्थ वडा और पिता लिखते हैं जब रूमनभाषामें तौ. इसके अर्थ पिताके लिखे हैं तो उसी कपटीके अर्थ कौनसी भाषामें हैं किसी नहीं तो स्वयं कल्पना करना धूर्तता है या नहीं और फिर कहते हैं कि हमने कोई शब्द अपनी ओरसे नहीं लिखा क्या स्वामीजीको कोई संस्कृतका शब्द नहीं मिला और वास्तवमें यह पोपशब्दकाफसित अर्थ तुम्हीमें पट सकता है कि, (अन्यमि- च्नुस्व सुभगे पति मत् ) इत्यादिषेदमनोका जहां तहां अर्थ बदल दिया है अपना मत चलाने के लिये वेदभाष्यके नामसे चंदा बटोरना तथा. पुस्तकोंकी कीमत चौगुनी करफे रजिष्टरी फरला इत्यादि यह ठगाई नहीं तो और क्या है तयार तुम्हारे मतके एक आनन्द रुपया गडाप गये, एक आनंदने जाटनीकी फन्पार हरण की गूजर गौऑफा रुपया गडाप गये इससे तुम चलोसहित पोप हो मिस २२ तो सत्य शास्त्रानुसार ही जय पाई बनावट नही किन्न पद यात सामीभीतही की कि, ईसाई यवनोंके दावार्यको अर्थ ही पदल दिये तया गप प्रादतन मूर्तिपूजनमें परनादिकाका आग्रह देखा तो इसे छोडकर पदमें रेल तानिरी. ही मरदी इसमे पट यात दयानंदनीम हीप्रतीत होताह शरावाने मार नहीं की फिर आगे इसके स्वामीनीने अद्वैतवाद लिसानो पनी (३३८) दयानन्दतिमिरभास्करः। मतके आचार्य ही पोप हैं तौ चेलोंकी क्या ठीक वे तौ महापाप कहे जोप तो ठीक है॥ स०प्र० पृ० २८७ पं० १३ शंकराचार्य के पूर्व शैवमत भी थोडासा मवलित पा उसका भी खंडन किया पुनः पं० १९ उन दोनों जैनियोंने अवसर पाकर शंकरा- चार्यको ऐसी विषयुक्त वस्तु खिलाई कि, उनकी धुंधा मन्द होगई पधाव शरीर में फोडे पुनसी होकर छः महीनेके भीतर शरीर छूट गया ।। ३०४ । १५ समीक्षा-शंकराचार्यने शैवमतका खंडन नहीं किया वे स्वयं शिवके उपासक थे उनके बनाये हुए बहुत स्तोत्र विद्यमान हैं शिवापराधभंजन स्तोत्र उन्दीका बनाया हुआ है फिर यह भी कहना असत्य है कि, शंकराचार्यको विपेली पस्त दीगई विपली वस्तुसे क्षुधा मन्द हो गई यह कहाँका लेख है यह सब कुछ असत्य है और यदि विचारा जाय तो यह सब कुछ आपहीके ऊपर हुआहे आपको विष दिया गया शरीरमें फलक पडरपे अतीसार संग्रहणीने भी दुःख दिया स्वामीजी- की ही यह दशा हुई जो उनके लिये किसी स्वार्थाने ऐसा किया जिसका हमको भी दुःख है ॥ स०प्र० पृ० २८७ पं० २९ नो जीव ब्रह्मकी: एकता जगत् मिथ्या शारा चार्यका निज मत पा तो यह अच्छा नहीं और जो जैनियों के संडने के लिये उस मतका स्वीकार किया हो तो कुछ अच्छा हो ( ३०४॥२४) और १०२८० पं० १० अन्तमें युक्ति और प्रमाणसे नौनियोंफा मत खंडित और शंकराचार्या मत अखंडित रहा ॥ [३०३ । २५] समीक्षा-स्वामीनीकी बुद्रिकी कहांतक ठीक लगाई जाय पहले लिगा कि युक्ति और प्रमाणोंसे शंकराचार्यका मत असंहित रहा अब कहते हैं कि जो शंकराचार्यका निज मत था तो अच्छा नहीं, मलानी जो वह सप्रमाण और युक्तियुनः था तो निम मत फैसा और अच्छा क्यों नहीं और नव कि दसिराना यने नैनियोंके जीतनेको यह मत स्वीकार किया तो वह तो छल किया और धुदिक मतमें होनता मागई फारण फि, सत्मतसे तो न जीतसके बनावट गाना तो यह सिद्ध हुआ कि, स्वामी शंकराचार्पन एलसे जीता तो दिकमत कथा प्रतीत होता है फिर शंकराचार्य को आसान भी चलाते हैं जब विद्वान थे ददर टमका पूर्व लिन मुके हैं।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (३ स०पृ० २९४ पं० २० १ नेतरोनुपपत्तेः अ० १ पासू०१६ २ भेदव्यपदेशाच अ० 3131१७ ३ विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यांच नेतरो अ०११।२ ४.अस्मिन्नस्यचत्तद्योगंशास्ति अ० ११३४ १९ ५ अन्तस्तद्धमोपदेश त् अ०१।११२० ६भेदव्यपदेशाच्चान्यः अ०१1११२१ ७ गुहाँप्रविष्टावात्मानोहितद्दर्शनात् १।२।११ ८ अनुपपत्तेस्तुनशारीरः।१२।३ ९अन्तर्याम्यधिदेवादिषुतद्धमेव्यपदेशात् ११२।१० १० शारीरश्चोभयेपिहिभेदैननमधीयते ॥२।२० व्यास ब्रह्मसे इतर जीव सृष्टिकर्ता नहीं है क्यों कि इस अल्पज्ञ अल्प साम जीवमें सृष्टिकर्तृत्व नहीं पटसक्ता इससे जीव ब्रह्म नहीं १ "रसं ह्येवाएं नन्दी भवति" यह उपनिषद्का पवन है जीव और ब्रह्म भिन्न हैं क्यों दोनोंका भेद प्रतिपादन किया है जो ऐसा न होता तो रस अर्थात् आनन ब्रह्मको माप्त होकर जीव आनन्दस्वरूप होता है यह प्राप्ति विषय ब्रह्म और मा वाले जीवका निरूपण नहीं घटसक्ता इस कारण जीव ब्रह्म एक नहीं २ ह्यमूर्त:पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरोह्यजः । अपाणी ह्यमनाः शुभ्रो अक्षरात्परतः मुं० २ खं० १ मं० २ दिव्यशुद्ध मूर्तिमत्वरहित सबमें पूर्ण बाहर भीतर.! व्यापक जन्म मरण शरीर धारणादि रहित श्वासप्रश्वास शरीर मनके स रहित प्रकाशरूप इत्यादि परमात्मामें विशेषण और अक्षर नाशरहित प्रकृति अर्थात् सूक्ष्म जीव उससे भी परमेश्वर परे अपार ब्रह्म सूक्ष्म है प्रक जीपसे ब्रह्मको भेद प्रतिपादनरूप हेतुओंसे प्रकृति और जीपोंसे ब्रह्म भित्र लेख क्या ही स्वामी के पांडित्यका बोधक है ) ३ इसी सर्वपाप जीपका योग वा जीवमें ब्रह्मका योग प्रतिपादन करनेसे जीव और ब्रह्म क्यों कि, योग भिन्न पदार्पोका हुआ करता है ? इस ब्रह्मके अन्तर्यामी धर्म कपन किये हैं और जीवके भीतर व्यापक होनेसे व्याप्प जीव व्यापक भिन्न है क्यों कि च्याप्प व्यापक संबन्ध भी भेदसे संघटित होता है ५जैसे प जीवसे भिन्न स्वरूप पैसे इन्द्रिय अन्तःकरण पृथ्वी आदि भूत दिशा वाय . (३४०. दयानन्दतिमिरभास्करः। दिव्य गुणोंके भोगसे देवतावाच्यविद्वानांस भी परमात्मा भिन्न है ( यहां ती सूत्र ही विद्याका परिचय दिया) ३ “गुहां प्रविष्टौ सुकृतस्य लोके " इत्यादि उपनिष- द्के वचनोंसे जीव और परमात्मा भिन्न है वैसा ही उपनिषदाम बहुत ठिकाने दिखलाया है ७ शरीरे भपः शारीरः शरीरधारी जीव ब्रह्म नहीं है (अशरीरधारी होगा) क्यों कि ब्रह्मके गुण कर्म स्वभाव जीवमें नहीं आते ८ ( अधिदेव) सद दिव्य मन आदि इन्द्रिय पदार्थों ( अधिभूत ) पृथिव्यादिभूत (अध्यात्म ) सब जीवोंमें परमात्मा अन्तर्यामी रूपसे स्थित है क्यों कि उसी परमात्माके व्यापक त्वादि धर्म सर्वत्र उपनिषदोंमें व्याख्यात है ९ शरीरधारी जीव ब्रह्म नहीं है क्यों कि ब्रह्मसे जीवका भेद स्वरूप सिद्ध है १० इत्यादि शारीरिक सूत्रोंसे भी स्वरूपसे ब्रह्म और जीवका भेद सिद्ध है और उपसंहार और आरम्भ भी अशुद्ध है क्यों कि जब कोई दूसरी वस्तु ही नहीं उत्पत्ति प्रलय भी ब्रह्मके धर्म होनातें ह ॥ ३१२ । १ से. 5. समीक्षा यह बात तो प्रगट है कि, स्वामीजीका वेदान्तमें कैसा कुछ अभ्यास है और जीवब्रह्मकी एकता पूर्व प्रतिपादन कर चुके हैं अब इन सूत्रोंके यथार्य अर्थ दिखलाते हैं कि, यह सूत्र कौनसे प्रकरणके हैं और कौनसे स्थलके हैं । आनन्दमयाधिकरण. नेतरोनुपपत्तेः अ०१पा० १सू० १६ आनन्दमयके प्रकरणसे सुना है कि, एकने बहुतको इच्छा की इच्छासे विश्व सुना है सो यह काम जीवका नहीं है तिससे जीव आनंदमय नहीं है अथवा आनं- दमपका मुख्य वर्णन नहीं है क्यों कि ब्रह्मका जाननेवाला ब्रह्मको प्राप्त होता है और जो ब्रह्म असत् जानता सो असत् ऐसे आगे पीछेके संदर्भके विरोधसे संसारी जीव या प्रधान आनन्दमय नहीं है किन्तु ईश्वर ही है "सोमकायत वहुस्यांप्रनाये- येति सतपोऽतप्यत स सपस्तप्त्वा इदं सर्वमसनत यदिदकिचेति" जो कुछ कार्य है सो सब ईश्वरने देसके रचा है ॥ भेदव्यपदेशाच १७ रसो वै सः रसं हवायं लब्ध्वानंदी भवतीति ( अर्थ )जीव ब्रह्मके साभसे आनंद होता है यहां प्राप्य ब्रह्म और मापक जीव है यह भेदका कहना है अपि याकल्पित देह कर्ता भोक्ता विज्ञानात्मासे ईश्वर अन्य है जैसे खड्गधारी माया सूत्रपर चढकर आकाशको जातासा दिखाई देता है और पास्तयों यह मापायी । भूमिपर ही खडा है जैसे व्योम घटादि उपाधिसे भिन्न अनुपाधिक है तैसे ही गोत्र अझफा भेद है वास्तव नहीं ।
। एकादशसमुल्लासखण्डनम् । अस्मिन्नस्य च तद्योग शास्ति १९ इस आनन्दमयके प्रकरणमें जीवका योग आनन्दमय ब्रह्मके साथ वेद उपदेश फरता है उससे उपचारकी इच्छासे भी आनंदमय वाक्यका अर्थ प्रधान या जीव नहीं है ( यया ोवैप एतस्मिन्नदृश्येनात्म्येऽनिरुक्ते निलयेभयं प्रतिष्ठां विंदतेश्य सोभियतो भवति तदा ह्येवप एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुतेथ तस्य भयं भवतीति) अर्थ-तादात्म्पसे ईश्वरको देखै सो देखना परमात्माके ग्रहणसे बनता है न जीव या प्रधानके ग्रहणमें, इससे आनन्दमय परमात्मा है न कि विज्ञानात्मा श्रुति- "सवाएव पुरुषोतरसमयस्तस्माद्वा एतस्मादनरसमयादन्योन्तर आत्मा प्राणमय- स्तस्मादन्योन्तर आत्मा विज्ञानमयः" इति । अर्थ-यहाँपर भी विकारार्थकी परम्परासे आत्मा अईजरतीय है व हेतुमें है जिससे आनन्दमयको आनन्दम- -यका सम्बन्ध वेदने उपदेश किया है तिससे उपासनाके लिये भी आनन्दमय माधान्य नहीं है और मानन्द प्रचुर फहनेसे दुःख अल्प भी मत समझो अद्वितीयसे श्रुतिः रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवतीति ॥" हिरण्यमयाधिकरण. अन्तस्तद्धमोपदेशात् २० 'परमेश्वरस्य धर्मा इहोपदिश्यन्त इति सौत्रोनुवादः' छांदोग्यके प्रथम प्रपाठ- को उद्गीथ उपासनाओंके बीच गौण उपास्योंको उपदेश किया है वह यह कि सूर्यके बीचमें हिरण्यमय पुरुप है और ऋक् साम उक्य यजुः जो ब्रह्म धर्म है और ब्रह्म सब पापोंसे मुक्त अदितीय ईश्वर कहा है यह अर्थ इन श्रुतियोंसे लिया हे "सैवतत्सामतदुक्यन्तयजुस्तद्ब्रह्मेति १ उदेति हवै सर्वेभ्यः पाप्मभ्य इति अप यरपोन्तरादित्य हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते" इत्यादिमें (स इति) संशप है कि विद्या कर्मफी अतिशयसे वहा होके सूर्यादि माप्त उपास्य कहा है या नित्य सिंड ईश्वर है फिर रूपी सुननेसे संसारी है न कि ईश्वर नीरूपसे निरूपका रूप उपा- सनाके लिपे मान लिया है “अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्" इस श्रुतिसे और ईश्वर अपनी सत्तासे ही निराधार ठहरा है "सभगवः कस्मिन्मतिष्ठित इति स्वेमहिनीति" इस वाकोवाक्यरूप श्रुतिसे निर्विकार अनन्त है "आकाशवत्सर्वगतच नित्यः' इस श्रुतिसे कभी २ विकारोंसे भी कहा है सर्वकामः सर्वगन्धः सर्परस इत्यादि, श्रुतिसे 'तात्पर्य यह है कि जो बाहर गंध रसादि देखते हैं सो सब ईश्वरकी सत्ता ही है मार न फि मृदु दुत कठिनादि वस्तु कुछ ही है तिससे ईश्वर ही सूर्य और नेत्रके चीच उपदिष्ट है “सोसापहम् वह मैं हूं ॥
1 और दूसरा अपहतपाप्मादि माना है इस विशेष अर्थात् भेदसे जो सम्बन्धनात्र को भी टक्त पोद्यपरिहार समान है और जो शास्त्र जीवपरकी एकता पहने (३४२) दयानन्दतिमिरभास्कर। भेदव्यपदेशाच्चान्यः २१ जो सूर्यमें है इससे ईश्वर अन्य है इस भेदसे सूर्य आधार और ईश्वर आधेय जानपड़ता है यह अर्थ इस अतिमें लिया है “य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरोय- मादित्यो न वेद यस्पादित्यः शरीरं यआदित्यमन्तरोयमपत्येषत आत्मान्तर्याम्य- मृतः" इति । इससे यह सिद्ध हुआ कि, हिरण्मय ईश्वर ही है न कि, देवतादि इसका अर्थ भी स्वामीजीने गडबहमें लिखा है। मनोमयाधिकरण. अनुपपत्तेस्तु न शारीरः-अ १ पा० २ ०३ मनोमय ब्रह्म है और जीवमें सत्यसंकल्पादि गुणोंका असंभव है तिससे मनो- मयादि धमासे उपास्य नहीं हैं यहां कईएक सूत्र देकर पोछे सिद्धान्तसूत्र लिखा है कि- अर्भकौकस्त्वात्तव्यपदेशाचनेतिचेन्ननिचाय्यत्वादेवव्योमवञ्च ५ भर्भकं वाल्यम् अल्पं वा ओको नीई हत्स्थानं निवाय्यत्वादेव हत्पुण्डरीके द्रष्टव्यः वा उपास्यः व्योमवत् यया सर्वगतमपिसत् व्योम सूची पाशायपेक्षया अर्भकोके अणीयश्च व्यपदिश्यते इति एवमेव ब्रह्मापि ॥ धानयवसे भी छोटा कहा है अणीयान्त्रीहेर्वा यवादेति आराममात्र इति । ईश्वर ही जीव यहां कहा है जैसे सब पृथ्वीका पति अधिपति कहाता है बालकके हृदयसा और धान जैसे छोटा इत्यादि उपाधियोंके भेदसे ब्रह्म उपासना के लिये कहा है न कि, स्वरूपसे जैस' अनन्त व्योम घटाकाश मठाकाशादिकोंसे छोटा कहा है इसीसे एपम आत्मान्तः हृदय इति । इस प्रकार श्रुतिमें कहा है ॥ संभोगप्राप्तिरितिचेन्नवैशष्यात् ८ सर्वगत ब्रह्मका सब प्राणियोंके हृदयमें सम्बन्धसे और चेतनरूपसे और एक बसे और शारीरके अभेदसे सुखदुःखादिकी प्राप्ति सम्यक् हो अन्य संसारीके न होनेसे "नान्यतोस्ति विशतीति" इससे फिर सोपाधिक माननेसे टपाधिधर्म दुःखा- देफी प्राप्ति न होगी क्यों कि, उपाधि विम्बमें नहीं होती है इससे ब्रह्ममें भोगको न्य भी नहीं है जीव ब्रह्मका भेद. मिथ्या ज्ञानसे है और ज्ञानसे अभेद है इसप्ते अनभनन्योअभिचाकशीति ' कर्ताभोक्ताधर्माधर्म साधन सुख दुःखादिमान एक कार्य होता है तो व्योमादिको भी दाहादि होना चाहिये, सर्वगतानेकात्मनः ये एकताके द्वारा संयोगको निवृत्ति भी कहते हैं तैसे "तत्वमसि' “अहं प्रमा एकादशसमुल्लासखण्डनम। (३४३) स्मीति " इत्यादि जैसे किसीने व्योमको मलिन कहा तो क्या वह मलिन हो सत्ता है तिससे वेदमें जीव उपास्य नहीं कहा किन्तु ब्रह्म ही तैसे मिथ्या ज्ञानसे योग्य और सम्यक् ज्ञानसे ऐक्प है यही विशेष है तिससे ईश्वरमें भोगगन्ध भी नहीं कल्प सक्ते हैं इत्यादि यहां मनोमयादिप्रकरण है जीप ईश्वर भिन्न अधि- करण नहीं है । गुहाधिकरण. गुहाँप्रविष्टावात्मानोहितद्दर्शनात् ११ कठवल्लीसे सुना है कि सुकृतका फल नरदेह है और वही परब्रह्मकी प्राप्तिका स्थान है विद्याशमादिके सम्भवसे फिर देहमें या हृदयमें ब्रह्म जीव ठहरे हैं और कर्मफलको पाता है और न कि, अदि जीव है जड और अनडके विरो- धसे जड बुद्धि सुकृतपान नहीं करसक्ती है चेतना क्षेत्रज्ञ फरसता है एक छवी. अन्य अच्छची इनको देख कह सक्ते हैं कि, छबी चलते हैं उपवारसे जैसे, तैसे जीव पाता और ईश अपाता दोनों संगसे पाता कहे हैं जिससे जीव ईश है, या जीव पीता ईश पिवाता है छाया और आतपकी नाई जीव हृदयमें प्रत्यक्षम और ब्रह्म श्रुतिसे दिखाता है "गुहाहितंगहरेष्ठं पुराणं यो वद् निहितं गुहाया परमेव्यो- मन् आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टमिति" जैसे लोकमें इस गौको दूसरा लाओ यह कहनेसे न घोडा न भैसा लाता है किन्तु गौ ही लाता है तैसे चेतन जीव ब्रह्म सम स्वभाववाले हैं और न कि, विषमस्वभाववाले जड चेतन बुद्धि जीव हैं और समान धर्म होनेसे एक हैं केवल उपाधिसे पृथक् भासते हैं (ऋतं पिबन्ती) इस श्रुतिकी व्याख्या पूर्व कर चुके हैं। अन्तर्याम्यधिकरण. अन्तर्याम्पधिदेवादिपुत्तद्धर्मव्यपदेशात् १८ अन्तर्यामी परमात्मा अधिदेवादिपु पृथिव्यादिषु भवितुमर्हति कुत्तः तत् तस्य परमात्मनः धर्माणौ गुणानो व्यपदेशनात् ॥ भापाथः-बृहदारण्यके पांचवें अध्या. यमें याज्ञवल्क्यने उद्दालकसे कहा कि, पृथिव्यादिमें अन्तर्यामी ईश्वर है क्यों कि पृयिवा में रहता है पर उसको पृथ्वी नहीं जानती है फिर ज्ञान और अमृतादि गुणोंका उसी सम्भव है इससे " यइमंचसोकं परंचलोकं सर्वाणि भूतानि योन्तरोयमिति' फिर कहा कि "यापृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्यामन्तरः यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरोयमयरयेपत आत्मान्तर्याम्यमतः" इत्यादि ऐसा वाक्यों में .ह न कि अधिदैवादिफा अभिमानी देवता या योगी पा अपूर्व संज्ञा है किन्तु पर- मात्मा है अन्तर्यामी अमृतत्वगुणसे ।
अधिकारस्तस्मात्परतः पर इति भेदेन व्यपदेशात्परमिह विवक्षितं दर्शप का सिद्धान्तसूत्र भूतपोनिका रुप सब विश्व कहा है तिससे भतपोनिमा १३४४) दयानन्दतिमिरभास्करः। शारीरेश्चोभयेपिहिभेदेनेनमधीयते २० कण्व और माध्यन्दिन ये दोनों जीवसे अलग ईश्वरको पढ़ते हैं तिससे जीव भी अन्तर्यामी नहीं है और न प्रधान है किन्तु अन्तर्यामी ईश्वर है कावः “यो विज्ञाने तिष्ठन्" इति ॥ माध्यन्दिनः “य आत्मनि तिष्ठनात्मानमन्तरो भवति" अणुसे अणु और महानसे महान पृथ्वीव्योमादि सब वस्तुमें अन्तर्यामीको कहनेसे परमात्मा ही सर्वव्यापक है अन्तर्यामी है और विज्ञानमय शारीर है इत्यादि सब कुछ ब्रह्मही है यह अधिकरण ब्रह्महीको कहते नाते हैं जीव अज्ञानतक है जब यथार्थानुभव हुआ तो सब कुछ वही है अब आगेका सूत्र भतयोनिमकरणका है ।। अदृश्यत्वादिगुणकोधमोक्तेः २१ सूत्रमें मुण्डकमें जो भूतोंका. कारण सुना है सो ब्रह्म है सर्वज्ञादिगुणके यहां योनिनिमित्तोपादानकारणका नाम है भूतयोनि प्रधान और जीव है करीसे जाला पृथ्वीसे औषधी और देहसे केशलोमादि होते हैं तैसे ही प्रथा- का जन्म है सो यह ठीक नहीं क्यों कि ईश्वर ही भूतयोनिधर्मयुक्त मुना है। " यासर्वज्ञःसर्व विद्यस्यज्ञानमयंतपस्तस्मादेतद् ब्रह्मनामरूपमन्नंचजायते इति" नाम रूप अन्न उसीसे होता है तिससे अदृश्यादिगुणी ईश्वर ही भूतयोनि है। विशेपणभेदव्यपदेशाभ्यांचनेतरो २२ इतश्चपरेशएवभूतयोनिशारिः प्रधानंचेति । भूतोंका कारण नहीं होसकता है क्यों कि अमूर्तपुरुष बाहर भीतर इत्यति से व्यापक ब्रह्म ही कहा है न कि, परिच्छिन्न जीव इससे "दिव्यो गम् इत्यादि और प्रधान भी भूतीका कारण नहीं हो सकता है क्यों कि प्रथा रोका कारण अलग कहा है, इससे "अक्षरात्परतः पर इति अतरम् अन्या मरूपवीनशक्तिरूपं भूतसूक्ष्ममीश्वराभयं तस्यैकोपाधिभूतं सर्वस्माद विका ' इससे ब्रह्म ही भूतयोनि है ॥ रूपोपन्यासाच ॥२२॥ से "पुरुष एवेदविश्वकर्मति, अपिचिपी चन्द्रसूर्यो दिशः भोये याग्यो एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (३४५) वृताथवेदा, वायुः प्राणो हृदयविश्वमस्यपद्भ्योथिवीोपसर्वभूतान्तरात्मेति " अमि उसका शिर, चन्द्र सूर्य नेत्र, दिशा कान, वेद वाणी, वायु प्राण, विश्व हृदप, पृथिवी पाद सोही सब भूतोंश अन्तरात्मा है, हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे इत्यादि वाक्योंसे यही निश्चित है कि, यह सब कुछ ब्रह्म ही है ब्रह्मसे उत्पन्न होनेसे ।। चेदान्तसूत्रोंका अर्थ स्वामीजीने उलटदियाहै वास्तवमें वे इस ग्रंथको समझे ही "नहीं फि, कौनसा उत्सर्ग शंका सिद्धान्त सूत्र है सो कुछ नहीं लिखा इसमें वेदान्तके -विषयमें स्वामीजीने जो कुछ भी लिखाहै वोह सब असत्य है विशेष देखना हो सो शारीरफमें देखलो ।। समाप्तं चेदं वेदान्तप्रकरणम् ॥ कालिदासप्रकरणम्. स० पृ० २९६ पं० २० जिसके राज्यमें कालिदास बकरी चरानेवाला भी रघु- पंशकाव्यका कर्ता दुआ ॥ ३१४ १४ समीक्षा--यहाँ तो दयानंदजीने निघडक ही लेखनी चलाई है भला कौनसी पुस्तक इतिहास भोजप्रबन्ध आदिम यह लिखाहै कि, कालिदास बफरी चरानेवाला (गडरिया)था स्वामीजाने शत्रुतासे कालिदासको गडरिया बतायाहै क्यों कि इन महाकविके ग्रंथोंको “जिसका नाम इंग्लैंडीय मान्यपुरुष भी गौरवके साथ लेतेहैं" पढनेका निषेध कियाहै और भोजप्रबन्धमें कहीं भी कालिदासको गडरिया नहीं लिखा है, किंतु रानाकी सभामें नवरत्नोंमें यह भी था, और स्वामीजी तो जाति कर्मसे मानतेहैं तो उनके मतानुसार पण्डित होनेसे वोह पकरी चरानेवाला नहीं रहा, और जो पण्डित होकर भी गडरिया जाति-रही तो स्वामीजीके ही ग्रंथोंसे स्वामीजीका खण्डन होगपा । तिब्बतसे मिले बहुत पुराने रघुवंशमें मिश्रकालि- दासकृती पाठ देखनेसे यह ब्राह्मण विदित होतेहैं ॥ तथा फालिदास रामा "विक्रमकी सभामें थे न कि भोजको हमारे टीका किये रघुवंशकी भूमिका तथा. कालिदाससम्बन्धी दूसरे निबन्ध देखिये स्वामीजीफी साहित्यका कुछ भी . ज्ञान न था। स पृ० २९७.पं. १ माक्षप्रकरणम्. धिकाधिक कपालं भस्मरुद्धाशविहीनम् ।। रुद्राक्षान् कण्ठदेशे दशनपरिमितान्मस्तके विंशती द्वे - १ भास्कर म० के कर्ता लिखने हैं, कि स्वामीजीने गटारया नहीं लिखा यदि आंखें हों तो ग्यारहवीं बारके स०प्र० पृ. ३१४ पं० ४ देखो बकरी चरानेगला लिग्वाहै या नहीं बकरी चरानेवाले गडरिये होते हैं या स्वामी या दुरंगे ।
(३४६) दयानन्दतिमिरभास्करः। पट्पट्रकर्णप्रदेशे करयुगलगतान्द्वादशद्वादशेव ।। बाह्वोरिन्दोःकलाभिःपृथगितिगदितमेकमेवं शिखायां ... वक्षस्यप्राधिकं यः कलयति शतकं स स्वयं नीलकण्ठः ॥१॥ जिसके कपालमें भस्म और कण्ठ में रुद्राक्ष नहीं हैं टरको धिक्कार है ।। जो कण्ठमें ३२, शिरमें ४०, छः कः कानोंमें, १२-१२ करोंमें, सोलह सोलह भुजाओंमें, १ शिखा, और हृदयमें १०८ रुद्राक्ष धारण करता है वोह साक्षात् महादेवफे सदृश है ॥ ३१४ । १४ समीक्षा-स्वामीनीसे पूछे कि भस्म लगाने में कौनसी बुराई है यह शिवके भत्तोंका चिह्न है कि, भस्म धारण करना, रुद्राक्ष पहरना, जिस प्रकार आप संन्यासी रंगेहुए वस्त्र पहरते हैं इसी प्रकार यह शिवके. भक्तोंका चिह्न है जो संन्यासी होकर संन्यासके धर्म और चिह्न धारण नहीं करता उसे नामका संन्यासी जैसे शास्त्रोंने लिखा है वैसे ही शिवका धर्म धारण करनेवाला जो उन विशेका धारण नहीं करता उसे धिक्कार है क्यों कि रुदाध्यायमें शिवनीकी महिमा अधिक वर्णन की है 'व्यायुपं जमदमे यह भस्म लगानेका मंत्र है रुद्राक्षधारणं फरनेसे शंकरकी प्रीति के सिवाय शीतलारोगकी विशेप बाधा नहीं होती। स० पृ० २९८ पं० ३ राजा भोजके राज्यमें व्यासनीके नामसे कि मार्कण्डेय और शिवपुराण बनाकर खड़ा कियाथा उसका समाचार राजाको । होनेसे उन पंडितोंको हस्तच्छेदनादि दण्ड दिया और उनसे कहा कि, जो नया ग्रंथ वनावै वोह,अपने नामसे बनावै यह बात राजा भोजके बनाये र वना नामक इतिहासमें लिखी है कि जो ग्वालियरके राज्य भिण्डनामक न तिवारी ब्राह्मणोंके घर में है जिसको लघुनाके रावसाहब और उनके गुमास्ते । दयाल चौवेजीने अपनी आंखसे देखाहै उसमें लिखा है कि, व्यासनीने चार चारसौ और उनके शिष्योंने पांचसहस्र छः सौ श्लोक युक्त अर्थात् सब दशर श्लोकोंके प्रमाण भारत बनाया था वोह महाराजा विक्रमादित्यके समयमें व सहस्र महाराजा भोज कहते हैं कि मेरे पिताके समयमें पच्चीस अब मेरी म उमरमें तीस सहस श्लोकयुक्त महाभारतका पुस्तक मिलता है जो ऐसे ही व चला तो भारतका पुस्तक एक ऊंटका बोझा होजायगा ॥३१५/२० । * यही मेरठी स्वामीने मिश्रबलदेवप्रसादपर आक्षेप कियाहै कि वे तो तंत्रशास्त्रके क्षाचा मद्यमांसका क्या अर्थ करोगे, तु० स० जो जो लोग मांसपार्टीक उनको मांसाहार छुडाने के तंत्रशास्त्रकी प्रवृत्ति है देखो नित्यतंत्र वा महानिर्वाण तंत्र जहां इनके मुख्य मर्थ है।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (३४७) समीक्षा-राजा भोजके बनाये संजीवक ग्रंथका पता और उन मनुष्योंका- वृत्तान्त फहातक लिखें हमने कई रजिस्टरी चिट्ठी भिण्डस्थानको ब्राह्मणोंके पास भेजीथी जिसमें ऊपर लिखा ब्यौरा स्पष्ट लिख दिया था उसमेंसे दो स्थानों से उत्तर आया है कि यह बात सब मिथ्या है यहां कोई ऐसी पुस्तक हमारे पास नहीं जिसमें ऐसी बातें लिखी हों इस कारण स्वामीजीका कहना और चौवेजीका. कहना दोनों अप्रमाण हैं भोजके समय जितने ग्रंथ बने हैं वोह अद्यावधि उन्हींके नामसे विख्यात हैं जो टनके कर्ता हैं सहसों श्लोकोंको व्यासजीके नामसे रचनेसे उन्हें क्या लाभ था पहले स्वयं दयानंदजी कहते थे व्यासजीने २४,००० सहस्र 'श्लोकका महाभारत बनाया अब चार सहनहीका वर्णन किया है फिर व्यासजीने. प्रतिज्ञा की है कि मैं इस ग्रंथमें ८८०० कूट श्लोक कहूंगा " अष्टौ श्लोकसह स्राणि अष्टौ श्लोकशतानि चेति " जिन्हें मैं और शुकदेष जानता हूं संजय अर्थ करसक्ताहै या नहीं जिसके अर्थमें क्षणमात्र गणेशजी विचार करते थे इस अवसरमें व्यासजी बहुत श्लोक बना लेते थे वैशंपायनने इसकी प्रशंसा की है जो इसमें है वोह अन्यस्थानमें मिलसक्ता है जो इसमें नहीं है वोह और कहीं नहीं मिलेगा यह ग्रंथ लक्षशोकसे पूर्ण है स्वर्गारोहणपर्वके अन्तमें लेख है कि इसके पाठसे अष्टादश पुराणके श्रवणका फल होता है तथा अनुक्रमणिकामें प्रत्येक पर्वका वृत्तान्त और उसके अध्याय श्लोकों की संख्या लिखी है चार सहस्रमें तो इसका युद्ध भी नहीं समासक्ता और इसके विना इतिहास कहाँसे आयेंगे क्या सत्यार्यप्रकाशमेंसे निकलेंगे। और देखिये प्रत्येक पुराणों में अष्टादश पुराणोंका वर्णन है और उनके श्लोकोंकी संख्या है इससे स्पष्ट विदित है कि, यह सब एक समयके वने हैं राना भोजके समय पुराण बनना किसी प्रकारसे सम्भव नहीं पुराणप्रकरणमें यह वात पीछे लिख चुके हैं। स० पु० २९९ पं० २ इन लोगोंने जैनियोंके सदृश अवतार और मूर्तियां बनाई ॥ ३१६ । १९ समीक्षा मूर्तिपूजन इस देशमें क्या सनातनसे समस्त भूमण्डलमें चला आता है और हमारे यहांके अवतारोंको देख जैनियोंने २४ सिद्ध माने जैसे आपने तर्कसंग्रहके स्थानमें सत्यार्थप्रकाशमें एक स्त्रावलि बनाई है यवनोंकी पुस्तकॉम दीवायचा " देखकर वेदभाष्यभूमिका गठी · इससे स्वयं तुम्ही नकल बनानेहारे हो॥ स. पृ. २९९ पं० १७ देवीभागवतमें देवीने सब, जगत् बनाया पह टिसा है ।। ३१७ । ६ ५३४८) दयानन्दतिमिरभास्करः। समीक्षा-देवीभागयतमें जो देवीसे जगत्की टत्पत्ति मानी है सो यथार्य है क्यों कि देवी परमेश्वरफी माया अर्थात् शक्ति है जिसे सामर्थ्य भी कहते हैं और यह सब संसार उसकी सामर्थ्य से ही हुआ है वोह माया ही प्रकृतिको प्रगट करके संसारको सूक्ष्मसे स्थूलरूप करदेती है इसीसे देवीसे जगत्की उत्पत्ति हुई है ऐसा लिखा है निस पुराणमें ईभरके जौनसे नामके गुणोंका वर्णन किया है वोह उसी नामसे प्रसिद्ध है और जिस नामसे जिसफो विश्वास है योई उसी देवताका ध्यान उसी पुराणदारा फरै अन्तमें सब ईश्वरहीको प्राप्त होगा जैसे समुद्रमें नदी. और भाप भी इसे माननुके हैं कि यह सब नाम परमात्माके हैं तो भी फिर क्या दोप है यथा- स. पृ० ३०१पं. १३ शिवस्य परमेश्वरस्यायं भक्तः शेवः, विष्णोः परमात्मनोयं भक्तः वैष्णवः, गणपतेः सकलजगत्स्वामिनोयं भक्तः सेवको गाणपतः, भगवत्या वाण्या अयं सेवकः भागवतः, सूर्यस्य चराचरात्मनोयं सेवकः सौरः" यह सब रुद्र शिव गणपति सूर्यादि परमेश्वरफे और भगवती सत्य भाषणयुक्त वाणीका नाम है ॥ ३१९ । ५ इन्हीं वातोंमें यह सिद्धि है कि यह सब ईश्वरके नाम हैं तो इन्हीं नामोंकी -महिमा पुराणोंमें कथन कोहै और उसी नामसे वोह पुराण विख्यात है तो इनमें भेद मानना भूलकी बात है । * नाममाहात्म्यप्रकरणम् । स० प्र० पृ० ३०६ पं० २१ नामस्मरणमात्रसे कुछ भी फल नहीं होता जैसे मिशरी मिशरी कहनेसे मुँह मोठा और नाम २ करनेसे कटुवा नहीं शेता ॥ ३२४ । २६ समीक्षा--धन्य है, स्वामीजी एक नामहीको महिमा शेष थी सो वोह भी भेट दी एक नाम ही पतितपावन तारनतरन है सो आपने इसे भी साफ कर दिया क्या ईश्वरफा नामस्मरण भी निरर्थक नव नामग्रहण करनेसे भी कुछ लाभ नहीं तो क्या सत्यार्थप्रकाश रटनेसे सद्गति होगी ? यजुर्वेदमें नामका माहात्म्प थों लिखा है। .* विशेष विवरण हमारे बनाये अष्टादश पुराण दर्पणमें देखो।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । यस्य नाम महद्यशः-यजुर्वेद । अ० ३२ मं०३ कि जिसके नामका बहुत बडा यश है बस यही वाक्य ऐसा पडा है प्रगट करता है कि, उस परमात्माके नामका ऐसा माहात्म्य है कि बडे २ पाट उस नामके लेनेसे जाते रहते हैं इसीसे उसका बडा यश विख्यात है। - पुनः ऋग्वेदे- कस्पनूनकत्तमस्यामृतानामनामहेचारुदेवस्यनाम मं० १.२४ मं. वह वेदमें लेख है कि, हम किसका नाम ग्रहण करे और हम किसके दा पितामाताका दर्शन करें इत्यादि इस मंत्रका व्याख्या पूर्व भी लिखचुके मुक्तिमकरणमें देख लेना इससे यही सिद्ध होता है कि, नामसे सब कार्य बन है और ऐसे ही शुनाशेपको हुआ था। गीतामें भी लिखा है। ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । मुच्यते सर्व- पापेभ्यो०८।१३ श्रीकृष्णजी कहते हैं जो "ओम्" इस मन्त्रका जप ध्यान करता है के संव पापोंसे छूट जाता है । ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत-छान्दो प्र१०१ मओम् जिसका नाम है जोअविनाशी है उसकी उपासना जप करना चाहिये "यन्मनसानमनुतेयेनाहुमनोमतंतदेवब्रह्मत्वं विद्धिनेदं यदिदमुपासते" केन० उ० ख० १०५ जो मनसे इयत्ता करके मनमें नहीं आता जो मनको जानता है उसी ब्रह्म 'तू जान, टसीको पूजा उपासना नामस्मरण तू कर ॥ फिर मनुस्मृत्तिमें गायत्रीका जप करनेसे पाप दूर होना लिसा सो पूर्व लि आये हैं जैसे विद्यामें अभ्यास करनेसे वोह कण्ठस्थ होजाती है और वोह विध गुणोंसे भूपित होता है उसी रीतिसे परमेश्वरके नामोंको स्मरण करता हु मनुष्य पवित्र होता है और पवित्र होनेसे पापरहित होकर सुख भोगते हैं, कुसंगतमें बैठने या बुरी बातोंके ध्यान करनेसे मनुष्य विषयासक्तिमें फंसकर होजातेहैं अथवा जैसे बुरी बातोंका ध्यान करनेसे मनमें दुर्वासना उत्पन्न होनात पडवी या पृणायुक्त वस्तुके नामसे ही मनमें ग्लानि टत्पन्न होकर भूफ भरि आ है. खट्टी चीनके ध्यानसे जीभपर स्वाद: विदित होने लगता है और यह मुर नहीं आता पर उसका गुण होनाता है मिष्टान्नादि सुन्दर पदायाँसे चित्त प्रसन्न . (३५०) दयानन्दतिमिरमारकरः। जाताहि दुःखके समाचार सुननेसे दुःस, मंगलके समाचार सुननेसे प्रसन्नता होती है, इसी प्रकार परमेश्वरके पवित्र नामस्मरण करनेसे चित्र निर्मल हो जाता है जैसे दुर्गन्धित पयन मुगन्धित स्थानमें नाकर मुगन्धित हो जाती है, और उसमें दुर्गन्ध नहीं रहती इसी प्रकार परमेश्वरके नामस्मरणमात्रसे मनुष्य पवित्र हो जाता है, और परमेश्वरके नामोंका असर अन्तःकरणमें पडकर पवित्र हो जाता है, इत्यादि परमेश्वर नामकी महिमा शाम्रों में विस्तारपूर्वक लिखी मनुजीने फई मन्त्र प्रायश्चित्तके उद्धारमें लिखे हैं जिसमें जप लिखा है अघमर्पण सूक्तका जप, गायत्रीका जप इत्यादि जप करनेका बहुत बड़ा विस्तार है जब परमेश्वरके नाम लेनेहीसे कुछ लाभ नहीं तो परमेश्वर किस अर्थका है, यह बात आपकी यही सिद्ध करती है कि, परमेश्वरका नामग्रहण करना या है. अब इसके आगे मूर्तिपूजनके विषयमें लिखा जायगा । अथ मूर्तिपूजनमहाप्रकरणम् । प्रथमतः उन युक्ति और प्रमाणोंको लिखेंगे जिसको स्वामीनीने आश्रय कर लिखा है कि, मूर्तिपूजन नहीं करना चाहिये फिर क्रमानुसार उनके उत्तर लिखे, जायँगे ॥ स० पृ० ३०५ पं० १ मूर्तिपूजा कहाँसे चली (टचर ) जैनियोंसे और जैनियोंने अपनी मूर्खतासे चलाई ॥ ३२३ । ७ स० पृ० ३०६५० ४ जव परमेश्वर निराकार सर्वव्यापक है तो उसकी मूर्ति ही नहीं बनसक्ती और जो परमेश्वरके दर्शनमात्रसे परमेश्वरका स्मरण होवे तो पर: मेश्वरके बनाये पृथ्वी, जल, अमि, वायु, वनस्पति आदि अनेक पदार्थ जिनमें ईश्वरने अहुत रचना की है क्या ऐसी रचनायुक्त पृथ्वी पहाडादि परमेश्वररंचित मूर्तियां कि जिन पहाड आदिसे मनुष्यकृत मूर्तियां बनती हैं उसको देखकर परमे श्वरका स्मरण नहीं होसक्ता, और जब वह मूर्ति सामने न होगी तो परमेश्वरके स्मरण न होनेसे मनुष्य एकान्त पाकर चोरी जारी आदि कुकर्म करने में प्रवृत्त भी हो सक्ता है, क्यों कि वह यह जानता है कि, इस समय यहां मुझको कोई नहीं देखता इससे अनर्थ करे विना नहीं चूकता ॥ ३२४ । ११ स० पृ० ३०७ पं० १७ जब परमेश्वर सर्वत्र व्यापक है तो किसी एक वस्तुमें परमेश्वरकी भावना करना, अन्पत्र न करना, यह ऐसी बात है कि जैसे चक्रवर्ती राजाको सब राज्यकी सत्तासे छुडाकर एक छोटीसी झोपडीका स्वामी बनाना और जब पापकहै तो वाटिकास पुष्प पत्र तोडके क्यों चढाते, चन्दन पीसके क्यों लगाते, क्यों कि उनमें भी तो व्यापक है हम परमेश्वरको पूजा करतेहैं ऐसा झूठ बोलतेहो हम पापाणादिके पुजारी हैं ऐसा सत्य क्यों नहीं बोलते, अब कहिये माः सचा है या झूठा जो फहो सच्चा है तुम्हारे भावके अधीन है परमेश्वर पद्ध' एकादशसमुल्लासखण्डनम् । जायगा और तुम मृत्तिकामे सुवर्ण रजतादिपाषाणमें हीरा पन्ना आदि समु नमें मोती जलमें घृत दधि आदि और धूलिमें मैदा शक्कर आदिको भावन (वैसा क्यों नहीं बनातेहो, तुम लोग दुःखको भावना कभी नहीं करते है गों होता अधा पुरुष नेत्रकी भावना करकै क्यों नहीं देखता, मरनेकी भाव ही करते क्यों मरजातेहो इसलिये तुम्हारी भावना सछी नहीं क्यों कि जैसे सौ करनेका नाम भावना है जैसे अनिमें अमि, जेल में जल जानना और जल्- मि अमिमें जल समझना अभावना है ।। ३२५।१७ समीक्षा-यह मूर्ति पूजन पडी सूक्ष्मबुद्धिसे ध्यानमें आता है जैसा ईश्वर क्ष्म विचार है ऐसा ही इसका सूक्ष्म व्यवहार है यह ज्ञानवसे ध्यानमें आ • स्वामीजीने जो कुछ इसके खंडनमें युक्ति और प्रमाण लिखेहैं उत्तर कम या जाता है। १ यह पात कहना सर्वथा विरुद्ध है कि, मूर्तिपूजा जैनियोंसे चली जब दोंमें मूर्तिमें पूजन पाया जाताहै तो कैसे होसक्ता है कि यह जैनियोंने चला है वेदोंके प्रमाण आगे लिखेंगें मूर्तिपूजा सनातन नित्य है जैसा कि, कृष जर्वेदके तैत्तिरीयारण्यकके ४ प्रपाठके ५ अनुवाकमें लिखा है माति प्रमाअंति प्रतिमा अप्ति तेत्ति० प्र० ४ अनु०५ हे महावीर तुम ईश्वरकी प्रतिमा हो इत्यादि और- सहस्रस्य प्रतिमा असि यजु० अ० १५ १६५ हे परमेश्वर आप सहस्रोंकी प्रतिमा है। संवत्सरस्यप्रतिमायांत्वारान्युपास्महे ॥ सानआयुष्म- तीपनारायस्पोपेण संसृज-अर्व ३ । सू० १०म० ३ हे राज्याभिमानी देव ईश्वर संवत्सरकी प्रतिमा निस तुझको हम टपास करते हैं वह तुम मायुप्मती संतानको धनपुष्टिसहित दीनिये और ब्राह्मणवा भी देखिये- सु ऐक्षत प्रजापतिःइमं वा आत्मनः प्रतिमामसाक्षियुत्सव समितितस्मादाहुः प्रजापतिः संवत्सर इत्यात्मनोद्यत १ मारकर प्र० प्रतिमाका अर्थ सायणभाष्यसे न करके मा प्रमाका अर्थ कर चुपगये सायणको शरणमें क्यों जातेहा भदोपदार० इन ऋचामें वह स्वयं जगनाथा पूजन मानते भाष महापरिस्थानकी परिधि कहतेहो मला इसमें कोई परिधिशक है।
(३५२) दयानन्दतिमिरभास्करः। प्रतिमामसृजत युद्धवचतुरक्षर संवत्सरश्चुतरक्षरः प्रजापति- स्तनो हैवास्येषप्रतिमा-श० ११ । १।६।१३. भाषार्थः। ईश्वरने अपनी प्रतिमा संवत्सर नामको उत्पन्न किया इसी कारण कहते हैं फि, ईश्वर संवत्सर है देखो संवत्सर चार अक्षर हैं और प्रजापतिमें भी चार अक्षर हैं इसी कारण संवत्सर ईश्वरको प्रतिमा है यह शतपय ब्राह्मणका लेखहुआ। अब यह तो सिद्ध हो चुका कि, वेदमें प्रतिमा शब्द है और जय घेदमें प्रतिमा और उसकी विधि है तो जैनियोंसे मूर्तिपूजा चली यह कहना असंगत है अब दूसरा समाधान करते हैं । २ जव कि आप निराकारकी मूर्ति नहीं मानते तो निराकारसे साफार जगत् कैसे बन गया यदि कहो कि, प्रकृतिसे जगत् हुआ तो प्रकृति जड है कुछ नहीं फरसक्ती, जव ईश्वरने इच्छा फरी तो मन बुद्धि चित्तादि हो गपे ईभर साधार होगया-साकार होनेसे इसमें मूर्तिमी सिद्ध होगई और यदि ईश्वरका पुछ भी कार न हो और आकाशसे भी सूक्ष्म बताते हो तो ईश्वरमें शून्यापत्ति दोष आनायगा क्यों कि जब आकाशही कुछ पदार्य नहीं तो ईश्वर आकाशसे भी सूक्ष्म होनेसे कब कोई पदार्थ ठहर सक्ता है वह तो शून्य हो जायगा इससे ईश्वरको फेवल निराकार मानना और निराकार भी कैसा शून्य अर्थात् कुछ नहीं पड़ी मूल है क्यों कि यह कैसा ही सूक्ष्म क्यों न हो पर कुछ तो है ही.पस यही होना ईश्वरका साकारता युक्त है यदि यह कुछ नहीं है तो तुम्हारे कथनानुमार यह प्रगट होता कि, ईश्वर है ही नहीं (शून्य ) होनेसे मनिये ईश्वर कोइ भागः रपाला भी अवश्य है जिससे संसार प्रगट होता है येद प्रादुर्भाव होते हैं यह शासकारोंने दो प्रकार से कहा है सगुण और निर्गुण नप प्रलपकाष्ट होता है तब टसे कोई नहीं जानता यस यही शेष रहनाता है टस कालमें पदरच नसे टसफो निर्गुण कहते हैं निराकार कहते हैं और जब पह यह गृष्टि रचना करना चाहता है तब आप ही अनेक रूपधारणपरसाकार होता है. पाहि- - ! इसके अपने मा० . दो प्रतिमा शब्दसे कराया रे मी पारदीवरक्षा माना सोनिमा वन म.प्र.प. ३७८1१५ एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (३५३): तदेवाग्निस्तादित्यस्तद्वायुस्तदुचुन्द्रमाः । तदेवशुक्रन्तद्ब्रह्मता आपः सप्रजापतिः-यजुः-अ० ३२ मं०१ वही ईश्वर आमि है वही आदित्यरूप है वायु चन्द संसारका वीन प्रसिद्ध जल प्रजापति आदित्यरूप उसीका है अब निराकारको घेद ही फहता है कि, वही ईश्वर-अग्न्यादिरूपवाला है और आदित्यका आकार भी दीखता है "योसा. वादित्येपुरुपः" "हिरण्यगर्भ इत्येपः" जो सूर्यमंडलमें पुरुष है जो कि, हिरण्य- गर्भ है वह यही ब्रह्मकी मूर्ति है यही उपनिपदोंमें भी लिखा है "दावेव ब्रह्मणो रूपे मूर्तश्चामूर्तञ्चति" ईश्वरके दो रूप हैं, एक :निराकार और एफ मूर्तिमान मौर देखिये- तंयजम्बर्दिपिप्रौशन्पुरुपातमग्रतः। तनदेवा यजन्तसाध्याऽऋषयश्चये-यजु० अ० ३१ मं०९ जो साध्य देवता और ऋषि हैं. उन्होंने सृष्टिके पूर्व उत्पन्न उस यज्ञसाधन- मूत यज्ञपुरुष ईश्वरफो इस लोकमें मोक्षण किया तिसी फरके यज्ञ करतेहुए । इसपर शतपप- अथतमात्मनःप्रतिमामसृजत यद्यज्ञं तस्मादाहुःप्रजापतिर्यज्ञ इत्यात्मनो ह्येतंप्रतिमामसृजत-श० ११।१।८।३ ईथरने अपनी प्रतिमा यज्ञनामको उत्पन्न किया. इस कारण कहते हैं कि, ईश्वर यज्ञस्वरूप है ( यज्ञोवैविष्णुः) अब वेदसे यह वात निश्चप हुई फि, यसरूप ईश्वर है तो जो कुछ यज्ञकी मूर्ति हुई, वह ईश्वरफी मूर्ति हुई अब वेदसे ईश्वरकी प्रतिमा निश्चित हो गई, अव पह विचार फर्तव्य है कि, यज्ञपुरुषकी मूर्ति फैसी. होतीहै । देवाह सनिपेदुः अग्निरिन्द्रः सोमोमखो विष्णुर्विश्वेदेवा अन्यत्रैवाश्विभ्याम्॥१ ॥तपांकुरक्षेत्रंदेवयजनमासतस्मादाहुः कुरुक्षेत्रदेवानांदेवपुजनमितितस्माद्यनकचकुरुक्षेत्रस्यनिगच्छ- तितदेवमन्यतऽइदंदेवयजनमितितदिदेवानांदेवयजनम् ॥२॥ तासतश्रियंगच्छेमयशःस्यामानादाः स्यामेति तथोऽएवमें प्राप्त किया वही सबमें श्रेष्ठ हुए इसी कारण कहते हैं विष्णु सब देवताओर श्रेष्ठ है ५ जो विष्णु है वही यज्ञपुरुप है जो यज्ञपुरुष है वही सूर्प है विधु समर्थ नहीं हुए ६ वह यज्ञाभिमानी देव संकल्पमारसे धनुष धारण कर स्थित (३५४) दयानन्दतिमिरभास्कर। सत्रमासतेश्रियंगच्छेमयशः स्यामानादाः स्यामेति ॥३॥ तेहोचुःयोनःश्रमेण तपसाश्रद्धयायज्ञेनाहुतिनाहुतिभिर्यज्ञस्यो दृचंपूर्वोऽवगच्छात्सनःश्रेष्ठोऽसतदुनःसवैपांसहेतितथोत॥४॥ तद्विष्णुः प्रथमः प्रापसदेवाना श्रेष्ठोऽभवत्तस्मादाहुर्विष्णु- वाना " श्रेष्ठइति ॥५॥ सयासविष्णुर्यज्ञःसःसयः सयज्ञोसौ सआदित्यस्तद्धेदयशोविष्णुर्नशशाकसंयन्तुंतदिदमप्येतहिने- वसर्वइवयशःशक्नोतिसंयन्तुम् ॥६॥ सतिसुधन्वमादायापच- कामसधनुरायाशिरउपस्तभ्यतस्थीतदेवाअनभिधृष्णुवन्तः समन्तपरिण्यविशन्त॥७॥ताहवम्पऊचुःइमावैवम्योयदुपदी- कायोऽस्यज्यामप्यद्याकिमस्मैप्रयच्छेतेत्यन्नाद्यमस्मै प्रयच्छे- मापिधन्वन्नपोधिगच्छेत्तथास्मैसर्वमन्नायं प्रयच्छेमेतितथेति ॥८॥ तस्योपपरामृत्यज्यामपिजास्तस्यांछिन्नायांधनुराल्यौविस्फ- रन्त्यौविष्णोः शिरः प्रचिशिदतुः ॥९ ॥ ततितिपपात तत्पतित्वासावादित्योभवदिति । ब्राह्मणं श०१४।१।११० भापार्थः। अश्विनीकुमारके विना अमि इन्द्र सोम विश्वेदेवादिक देवता विष्णुक संग: करनेमें प्रवृत्त हुए १ उनका देवयजनस्थान कर्मभूमि कुरुक्षेत्र था जहाँ देवयन स्थान निर्मित हो ही कुरुक्षेत्राख्य कर्मभूमि कहाता है २ उन्होंने बैठकर कहा हम श्री और यशको प्राप्त करें अन्नके भोक्ता हो और जो मनष्य यज्ञ करते वे भी ऐसी ही इच्छा रखते हैं ३ उन्होंने कहा कि, हम सबसे जो कोई श्रम त श्रद्धा यज्ञ आहुतिके द्वारा यज्ञसिद्धिको प्राप्त कर वही सबमें श्रेष्ठ और हमार सखा हो इसको सबने अंगीकार किया विष्णुनीने ही सबमें ही मुख्य उस सबर यज्ञाभिमानी देवता इस यज्ञरूपतेन रोकनमें समर्थ न हुए इसी प्रकार दूसरेभी हुए और उसकी अरनी नोकपर शिरको धर स्थिर हुए तब देवता उनके चारों त स्थिर होके उनका कुछ नहीं कर सके (किन्तुक्कैश माना ) ७ उन्होंने उप:
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (३५५) 'निहका अर्थात् दीमकसे कहा कि, इस धनुषको ज्याको काटो उन्होंने कहा कि, हमको क्या लाभ उत्तर दिया कि, जहाँ तुम मट्टो निकालोगे वहां जल स्वयं प्रगट हो जायगा ८ यहां यज्ञाभिमानी देवने विचारा कि, हमको देवता धर्षणा नहीं फरसक्ते यह विचार हँसी आई तो तेन प्रादुर्भूत हुआ वह देवताओंने औप- धियों में नियुक्त किया और हास्यके तेजसे श्यामाक अन्न जिसे समा फहते हैं प्रगट किया उसका वाक्य नीचे लिखा है । (तस्यसिमियाणस्यपानामततदेवाओपधीपुन्यमृजः। तेश्यामाकाअभवन् स्मयाकावनामते-तैत्तिरीय) यह बात उपजिह्वफाओंने अंगीकार करली और धनुपके नोचेको फोटीको काट- लिया उसके कटजानेसे दोनों कोने मूल यज्ञपुरुषाभिमानी देवका तेजरूपी शिर उड़गपा और वह सूर्य हुआ वो सूर्य यही है- सचे यवयत्रयज्ञस्यन्यतंततस्ततःसम्भरति । श० ११३।२।१ पज्ञका शिर छिन्न होगानेसे चैष्णवीतेन मापामें गिरा उसफा रस जहां जहां "गिरा वहांसे लेकर उसी रससे मूर्ति व्यापक ईश्वरको समृद्ध और परिपूर्ण करता है श. आगे ऐसा लेख है जब शिर नहीं रहा तो यनमान स्वर्ग फल और आशिष नहीं माप्त करसके तब सब देवताओंने अश्विनीकुमारोंको यज्ञमें भाग देना निश्चित करके यज्ञपुरुपके शरीरपुर शिर जोड ज्योंका त्यों फरदिपा और यजमानोंने फल पाये इसोको प्रवर्य कहते हैं और शिर फटनेमें धनुपसे जो "प्रो" यह शब्द हुआ इसीको धर्म कहते हैं महान यज्ञपुरुषका सारभूत शिर पतित दुआ इसी कारण महावीर नाम है इन्हीकी मूर्ति यज्ञमें बनाते हैं। प्रभ" देवताओं के आकार कैसे होते हैं (उत्तर) निरुतमें लिखा है पुरुषों- कैसे आकार होते हैं देखिपे- अथाकारचिन्तनंदेवतानापुरुप विधाःस्युरित्येकंचेतनावदिस्तु- तयो भवन्तितथाभिधानान्यथापिपौरुपविधिकरङ्ग संस्तूय- न्ते-निरु. ऋष्वातइन्द्र स्थविरस्य वाहू यत्सगृभ्णामघ-- घन्काशिरित (अथापिपौरुपविधिक व्यसयोगः-) आद्वाभ्यांहरिभ्यामिन्द्रयाहिकल्याणी यासुरणगुहेते । (भ थापिपौरुपविधिक कर्मभिः) अद्धीन्द्रपिबचपस्थितस्याश्रु: कर्णश्रुधीहवम्-निरु० उत्तरपद अ० ११६ + . .पशुओंमें भी होती है तो उसका उत्तर यही है कि, उन्हें ज्ञान नहीं होता संसारमें भी जिस हिताहित जाननेकी सामर्थ्य नहीं होती उसको कहते हैं। (३५६) दयानन्दतिमिरभास्करः। महाभाग्यवाले होनेसे देवताओंके आकारमें नियम नहीं है नियममें एक व्याघात होनेसे देवताओंफा महाभाग्यपन जाता है इस कारणसे अवश्य दे ऑफा आकार है और कृत्रिमताको विना देखे विकरण नाम कोई देवताधर्म हैं इस फारण देवताओंकी प्रकृति और स्वभावका चिन्तन करना अवश्य है फि, ईश्वर और देवता उभय भावी है इस कारण उनका स्वभाव आकार- नेकी इच्छा है ॥ जो आत्मवित् हैं यह सृष्टि के पूर्व परमेश्वरको आकाररहित मानते हैं और सृष्टिको उत्पत्ति पालन करता है तब आकृतिवाला है संहार उपरान्त अना ही होता है इस कारण निराकार कहते हैं । नैरुक्त कहते हैं कि, यही ईश्वर सदैव अनि वायु सूर्यादि नाम धारण करत तो भी प्रत्यक्ष विपय होनेसे इस पक्षमें "आकार " चिन्ता विपयके अभ होती है । याज्ञिकपक्षवाले कहते हैं यह सब देवता पक्षवादी अमि सूर्य इन्दादि यह प्रत्यक्ष अर्थसे सम्बन्ध रखते हैं क्यों कि, लोकमें नाम देखे हुए पदापोंके हो इस कारण यह रुदादि शब्द मनुष्यादिवत् आकारवाले होनेसे अर्थवाले हैं । उन देवताओंका कैसा आकार है अथवा है या नहीं जो है तौ कैसा है आ रके अर्थ यहां दो हैं, अचेतन चेतन, चेतन मनुष्यादि अचेतन पापाणादि अब विचार हुआ कि, इनमें मनुष्यादिवत् चेतना है या पापाणादिवत् अचेतन व्यमात्र है इसपर लिखते हैं कि "पुरुषविधाः स्युः" इति मंत्रोंसे देवताओ होना पाया जाता है ( यत्काम इत्युपक्रम्य तद्देवतः समंत्रो भवतीति)जिसका नावाला देवता हो उसका वैसाही मंत्र होता है अर्थात् वही विषययुक्त होता वह उसीके नामसे प्रसिद्ध होता है जो विषय मंत्रका वही उसका देवता है जब मंत्रोंके साथ देवता देखे जाते हैं तो मंत्रोंमें देवत्व होना निश्चय है यदि ऐ ही आकार हो तो उसका प्रत्यय (विधान ) होना चाहिये और इसी प्रकार पुरु भावसे युक्त मंत्रोंमें देवताओंका संबंध है इसीसे निरुक्तकार कहते हैं कि पुरुष आकारवाले हैं वा पुरुषोंकेसे शरीरवाले हैं इसी हेतुसे " चेतनावदिस्तुत भवन्ति" जिससे कि, चेतनोंके अर्थ स्तुतियें होती हैं वा चेतनोंको ही हा मंत्र कहते हैं इससे पुरुप विग्रह कहा यदि कहो कि, चैतन्यता तो गी आ गृह अचेतन है इसी प्रकार यह पशु है चैतन्यता होने में भी लोक अलोक आदिक N तिसण्डनम् (३५७) न नहीं होता इससे इनकी अचेतनकी नाई उपेक्षा करी है क्यों कि पशु भवि नत्फी पूरी चिन्ता नहीं करते मनुष्य सब कुछ समझते हैं लोक अलोक जानते मर्त्यधर्मसे अमृततत्त्वकी इच्छा करते हैं इस कारण हिताहित जाननेसे (सिपा- यिक्तित्वादनपेक्ष्य सामान्य विशिष्टश्चैतन्यः पुरुपो नियम्पते ) पुरुष ही नियो- न किया जाताहै जैसे विद्वान् पुरुप अर्थयुक्त वाणियोंको सुनते हैं तैसे ही देवता में इस कारण देवताओंके आकार पुरुषोंकेसे हैं और इसी प्रकार पुरुपोंकी नाई रस्पर संवाद सूतोंमें देखा जाता है ।। कयाशुभासवयसः (और) कुतस्त्वमिन्द्रेत्येवमादीनि ऋ० मं०१ अ० २३ मं०१३ इन सब मंत्रोंमें इन्द्र और मरुत्का संवाद है इससे भी देवता पुरुपाकारवाले द हैं और पुरुषसम्बन्धी अंगोंसे स्तुति किये जाते हैं देखिये- जुरुंनो लोकमनुनेपि विद्वान्सर्पज्योतिरभयंस्तुस्ति अष्वात इन्दु स्थविरस्य बाहूउपस्थेयाम शुरणा बुहुन्ता- ऋ० मं०४।७।३२।८ (उ6) विस्तीर्णे (लोकं ) यः त्वम् (नः ) अस्मान् ( अनुने- पि) अनुनयसि स्वेन सुकृतेन कर्मणा गच्छतां गमनानुग्रहे व- तसे (सर्वज्योतः) आदित्यसमान प्रकाशेन लोकं (अभ- यम्) (स्वस्ति ) स्वस्त्ययनाय तस्य (ते) तव वयम् (इन्द्र) (ऋप्पा) ऋवो एतौ रेपो शणाम् ( स्थविरस्य ) महतः (बाहू ) हस्तो (बृहन्ता) बृहन्तो महान्तो (शरणा) शरण आश्रयणीयौ नित्यम् (उपस्थेयाम ) उपतिष्ठेमेत्येतदाशास्महे भापार्थः। वडे लोक जो तू हमारे अर्थ प्राप्त करताहै अपने कर्मसे जाननेवालोंपर अनु से वर्तताहै सूर्यसमान प्रकाश संसारके अभप और कल्याणके वास्ते हे इन्द -शत्रुओंको मारनेवाली बडी दोनों वाहू हमें नित्य आश्रयमें रखें शरण दें * यहां सप्टदेवता प्रकरण है परंतु तु. रा. टिपतहैं यहां राजाको मनुष्यकारदेवता मानक 1 को है, क्या आरके मत राना मनुष्याकार नहीं होते और आरके मतमें मीदेवदा मनुष्यों हैं जो राजाको देवता मानहै म्यूब निरक समझा। 4 (३५८) दयानन्दतिमिरभास्करः। यही हम चाहते हैं ( यत् संगृभ्णाइत्यादि ) इन दोनों मंत्रम वाहु और मु सम्बन्ध दर्शनसे इन्दपुरुष विधिसे स्तुति कियागया है नहीं तो मंत्रोंका अभियान झूठा हो जायगा और भी प्रमाण सुनिये- आवाभ्यांहरिभ्यामिन्द्रयाह्या चतुर्भुिरापार्टियमानः। अष्टाभिर्दुशर्भि-सोमपेयमयंसुतः सुमुख माधुस्कः- ऋ० मं०२।६।२२।४ हे भगवन् (इन्द्र) यदि तावत् तव द्वौ हरी सन्निहितो ततस्तावे- व रथे युक्त्वा ताभ्याम् (हरिभ्याम् ) आयाहि अथ चत्वारः तत- स्तेः (चतुर्भिः) अथ पद ततस्तैः (पतिः) अथाष्टौ ततस्तेः ( अष्टाभिः ) अथ दश ततस्तैः ( दशभिः ) आयाहि इदं (सोमपेयं ) सोमपानकर्म प्रतिकिम् इति एवं बूमहे (अर्यसुतः) सोमोभिपुतः त्वदर्थम् सत्वं हे (सुमुख) सुधन (मा) केनचित् (मृधः) संग्राम (कः) कापी अविलम्बितमागच्छेत्यभिप्रायः ॥ भापार्थः। हे भगवन ! इन्द्र यदि आपके रपमें दो घोडे जुते हो या चार 'अषया छापा आठ वा दश हैं तो उसमें सवार होकर आओ इस सोमपान कर्मके निमित और यह भी हम कहते हैं कि यह सोमरस तुम्हारे वास्ते है सो हे सुधन ! तुम आओ और फिसीसे संग्राम मत करो शीय आओ। अपाःसोममस्तमिन्द्रप्रयाहिकल्याणाियासुरणगृहते यत्रारथस्यबृहतोनिधानं विमोचनंवाजिनोदक्षिणापत्- ऋ० मं०३।३।२०।६ हे भगवन् इन्द्र ( अपाः ) पीतवानसि (सोमम् ) एतास्मन् ... कर्मणि (सत्वं पुनः)(अस्तं) गृह (प्रयाहि ) यस्मात् ता (कल्याणीः जायाः) (तरबृहतः) च रथस्य ( निधानं ) रथ. शाला (विमोचनं) च ( वाजिनः ) निता संग्राममागतस्य (दक्षिणावत् ) अन्यदपि (सुरणं ) यद्यद्रमणीयं तत्सर्व ते सर. गृहे वर्तते तस्मात् पुनरस्तं प्रयाहि ॥ । ।
- एकादशसमुल्लासखण्डनम् । भापार्थः। हे इन्द ! आपने इस फर्ममें सोमपान कर लिया है अब गृहको जाओ जिससे तुम्हारी सुन्दर कल्याणी जाया और बडे रथके रखनेवाली रथ शाला और घुड" शाला संग्रामसे जीत पाकर आयेहुर प्रयोजनकी जो जो रमणीय वस्तु होती हैं वह सब तेरे यहां हैं इन मन्त्रोंसे पुरुषाकारवाले देवता होते हैं इत्यादि और भी मन्त्र हैं जिनसे इन्दको अपने ववन सुनाने और पुरोडाश भोजन करने को बुलाया है विशेष इस पर निरुक्तमें विचार हुआ है अपेक्षा हो देख लीजिये- अब दूसरा पक्ष कहते हैं कि, देवताओंके आकार अपुरुष विधिके भी होते हैं। अपुरुपविधाः स्युरित्यपरमपितुयदृश्यतेऽपुरुपविधं तद्यथानिर्वायुरादित्यः पृथिवीचन्द्रमा इति उभयविधाः स्युरपिवापुरुषविधानामवसतां कमात्मान एतेस्युर्यथायज्ञोयजमानस्येपचाख्यानप्तमयः-निरु० उत्तरप०१।७* देवताओंको विधान अपुरुष विधिकाभी कहते हैं यह देखा जाताहै कि अपुरुपाकार भी देवता हैं जैसे अभि वायु आदित्य पृथ्वी चदमा यह अपुरुषाकारवाले हैं निरुक्त- फार फहते हैं "उभयविधाः स्युः"दोनों प्रकारके होतेहैं क्योंकि, दोनोंमें वेदोंका प्रमाण है यह तीसरा पक्ष है पृथ्वीजलादिक अभिमानी देवताहोते हैं अथवा जैसा यजमानका यज्ञ हो वैसा ही आकार देवताओंके वितन करना क्यों कि आख्या. नोंमें ऐसा है कि, पृथ्वी गौरूप धर ब्रह्मलोकको गई इत्यादि अमि ब्राह्मणरूप घर अर्जुन और श्रीकृष्णके निकट आया था यह देवता महाभाग्यवान् होनेसे मूर्तिमान् पुरुषाफार अपुरुषाकार एकधा द्विधा बहुधा हो जाते हैं देवताओंकी परमशक्तिका वर्णन अवतारविषयमें करचुके हैं इत्यादि विशेष देखना हो तो निरुक्तमें देखिये यहांतक मन्त्रों और युक्तियोंसे आकार सिद्ध हो चुका, अब सुनिये. पृथ्वीके देखनेसे ईश्वरका ऐसा स्मरण नहीं होता जैसा कि, एक विशेष चिह्न मान.. नेसे होता है और तुम तो आकाशादिकोंको नित्य मानते हो जब यह ईश्वरकी. रचना नहीं तो इनसे ईश्वरका क्या सम्बन्ध फिर उनके देखनेसे ईश्वरका स्मरण कैसे हो सकता है सनातन धर्मानुसार यह ईश्वरके बनाये हैं पर इनमें पैसा स्तुतिमापनाका विधान नहीं है कपडेको देखकर यह बोध होता है कि, कोई इसका बनानेवाला है. * इसके अर्थमें मा० प्र० देवता मनुष्याकार नहीं मी होते जैसे आमि वायु आदि अव. वह राजप्रकरण कहां चलागया और अब तो आपके मन में आने वायु आदि भी देवता होगये, और मापने इनकी स्तुतियें मानीं ।
1 ३६०) दयानन्दतिमिरभास्करः। कुछ कपडेसे प्रार्थना स्तुति नहीं होती और न कोई यों कहता है कि, हे पत्थर तू हमें अमुक सुख धन पुत्र दे किन्तु मूर्ति परमेश्वरकी उपासनाका एक प्रधान चिह्न है, जैसे कि ॐकार प्रधान नाम है जैसे मुमुक्षु संन्याससियों ॐफार उपास्य है इसी प्रकार गृहस्योंको प्रतिमामें ईश्वराराधनफर्तव्य है यह एक ऐसा चिह्न है कि,निसके दर्शनमात्रसे ही यह स्मरण हो जाता है कि ईश्वरकी उपासना करणीय है और तुरत ही ईश्वरका नाम दर्शन करनेवाले उच्चारण करते हैं और जब नामस्मरण और प्रार्थना करेगा तो प्रेम होनेसे ईश्वरका ध्यान सदा बना रहेगा और पोह एकांत पाकर चोरी आदि नहीं करसक्ता, क्यों कि मूर्तिविधान होनेसे कुछ यह नहीं कहा है कि, ईश्वर सर्वव्यापी नहीं किन्तु एक विशेष स्मरण प्रतीक शास्त्रमर्पित है जिससे कि, सम्पूर्ण गुण ईश्वरके विदित हो जाते हैं जैसे किसीकी तसवीर देखनेसे यदि उसके गुण पूर्व श्रवण को हों तो वोह सब स्मरण हो आतेहैं इसी प्रकार ईश्वरकी मूर्ति है परन्तु यह एक ऐसी यस्तु है कि एक अनिर्वचनीय भक्ति ईश्वरमें उत्पन्न कर देती है जैसे ऋपि मुनियों के चित्र देखनेसे उनके गुण स्मरण हो आते हैं और उनका चरित्र चित्तमें कई दिनतफ उपस्थित रहता है इसी प्रका रसे जो तीनोंकाल ईश्वरका अर्चन पन्दन करते हैं और स्तोत्र पाठ करके उसो गुणोंका कीर्तन करते हैं तो उनके मन में कभी दुष्कर्मोका प्रादुर्भाय नहीं होता गो ये दुष्कर्म करें, जो उसका पूजन स्मरण प्रतिदिन करता है योद सम्पूर्ण पुराइपोंसे बच जाता है और दयानन्दानुपापियोंमें यह स्वयं ही देखा है कि, ईश्वरका नाम निष्प्रपोजन समझकर नहीं लेते रातदिन निन्दा झूठ मिथ्या वितंडा करते हैं यह स्वामीनीके टपदेश और निर्भक्तिका फल है । अब तीसरे भावका टत्तर मुनिये परमेश्वरकी भायना कोई ऐसी नहीं करता है कि, मृतिमें है अन्यत्र नहीं है किन्तु मतिम भापना करते हुए भी यही करते हैं कि, परमेश्वर सर्वश, सर्पग्यापक होनस इस मूनिमें पा है और विकाररहित होनेसे टसमें विशेष स्मरण होता है जैसे आन दिन महारा- नीकी घीसिपों मूर्तियों बनी है और सपमें उनकी भावना है कुछ मर्ति पनमा नेसे टनशा राज्य नहीं घटगपा फिन्नु भनाभक्ति. अधिक या जातीहै और पह पहना तो स्यामानीका प्रलाप है कि, जब व्यापक तो पूल पते गंदन कमी चढाते हो, पुपादि निवेदन करना विधान और आदरका सयर है प्यापक हनिमे पुपादिन पापे मापे तो आप भी तो व्यापक मानते हैं क्या गटी बाट मान भोजनमें प्यार नहीं है यदि कहो कि है, तो आप भोमन कान समप गरको आरोटी पापक साप मान करानेवाल एम पपरीमा नदीं करने पर एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (३६१) फरते तो पत्थर २ नपते और पुप्पादि चढाने व्यर्य होगाते हम लोग तो उस मूर्तिको विधानसे प्राणादिप्रतिष्ठा करकै उनमें देवता वा ईश्वरको भावनासे पूजा करते हैं स्तुतिपाठादि सब ईभरका नाम ग्रहण फर करते हैं, धूपदीपादि सब ईश्वर- होके उद्देश्यसे करते हैं और स्तुति प्रार्थना करते हैं, आपको वोह पत्थर दीखता होगा क्यों कि, ईश्वरको टसमें व्यापक कदाचित तुम न मानते होंगे भला भावसे ईश्वर कसे बंध जायगा क्या ईश्वर मूर्तिके सिवाय अन्यत्र नहीं योह सब स्थानमें है यदि एक ही स्थानमें हो तो ला करोडौं मूर्तिमें क्यों उसका भाव होसता ध्यापक होनेसे पद सर स्थानमें हैं परन्तु भाप्पभूमिका निपोंमें तो ईश्वरको जापहीने बांधा है, कि, अषतार नहीं लेता सृष्टिक्रमके प्रतिकूल कुछ नहीं करसक्ता शक्तिहीन ईश्वर तुम्हाराही है जो भक्तोंकी प्रार्थना सुनकर तनक पाप भी नहीं क्षमा फरता अन्य धातुमें अन्यधानुफी भावना नहीं होसक्ती भावना ईश्वरकी है जो सर्वशक्तिमान् चेतन व्यापक है (भावे हि विद्यते देवः ) सर्वज्ञ होनेसे वह भावमें विद्यमान है यदि इसकी समान कोई दूसरा हो तो उसकी भावना हो सकती हे दुःखमुखकी भावना नहीं होसक्तीभायना ईश्वरहीफी होती है सुखदुःख फमाका फल है इनमें भाव नहीं पटसक्ता ईश्वरफ भाव सर्वव्यापी होनेसे जिसमें चाहें वनसता है जडपर्दायका भावना नडमें नहीं बनसक्ती रागादिकी निवृत्ति अंधे आदिकी नेत्र लाभकी संभावना नहीं होसक्ती क्यों कि वह कर्मानुसार प्राप्त दूर हैं और समयान्तरमें जाते रहेंगे ईश्वरकी भावना सर्वज्ञ होनेसे सब स्थानमें फरसत्ते हैं और यह सर्वशक्तिमानादि गुण जैसा है वैसा ही जानते हैं इस कारण हमारी भावना ठीक है॥ सत्या० प्र० पृ०३००पं० २८ रुद्राक्ष भस्म नुलसी फमलाक्ष पास चन्दनादिको फंठमें धारण करनाहै वह सब जंगली पशुवत् मनुष्यका काम है ॥ ३१८ । १७ समीक्षा-जब चन्दनादिके धारण करनेसे जंगली होते हैं तो यह तो कहिये कि, वार्षिकोत्सवसे जो समाजी माथेपर चित्तकबुरा चन्द नलगातेहैं वह कौन हुर और आप जो वर्षों गंगारनमें लोटतेरहे और वही शरीरमें लगायेरहै तो आप कौन हुए, कालानिरुदोपमिपझें यह सब प्रमाण लिखे हैं, आप उसे रखोडियेका बनाया कहतेहैं नहीं मानते इसमें प्रमाण क्या जब कि, वह भस्म चन्दनादिके विधान कहनेसे अप्रमाण है तो आपकी पुस्तक उसकी विरोधिनी होनेसे अप्रमाण क्यों नहीं, रामचन्द्र लाल चन्दन लगातेथे कुब्जाने श्रीकृष्णको चन्दनसे चर्चित किया इत्यादि चन्दनके इतिहासादि भी अनेक प्रसिद्ध हैं"व्यायुपं जमदमः" यह विभूतिधारणका मन्त्र है।
(३६०) दयानन्दतिमिरभास्कर कुछ फपडेसे प्रार्थना स्तुति नहीं होती और न कोई यों कहता है कि, हे प नू हमें अमुफ सुरस धन पुत्र दे फिन्तु मूर्ति परमेश्वरकी उपासनाका एक विह है, नेसे कि कार प्रधान नाम है जैसे मुमुक्ष संन्याससियों ॐकार टप इसी प्रकारगृहस्याको प्रतिमामईश्वराराधन फर्तव्य है यह एक ऐसा चिढ़ है कि दर्शनमारसे ही यह स्मरण हो जाता है कि ईश्वरकी टपासना करणीय है तुरत ही ईभरका नाम दर्शन करनेवाले उचारण करते हैं और जब नाम और प्रार्थना फरेगा तो प्रेम होनेसे ईश्वरका ध्यान सदा बना रहेगा और एकांत पाकर चोरी आदि नहीं फरसता. क्यों शिमतिविधान होनसे कुछ 7.
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (३६३) प्रायश्चित्त होता है " इदंविष्णुर्विचक्रमे इति " इस मंत्रसे हवन कर पांच व्याह- तियोंसे होम फर इसमें चक्रपाणि आदिशब्दसे ईश्वर साकारसिद्ध होता है इससे यही सिद्ध है कि, जबतक यह मूर्ति स्थिर रहती है तभीतक शान्ति है चलाय- भान होते ही वैकारिकगुणयुक्त होती है ईश्वरके अवतारोंकी भूर्ति वेदानुसार प्रतिष्ठा करके पूजन करते हैं परन्तु ईश्वरको आने जानेवाला किसीने नहीं कहा ईश्वर सर्वव्यापक होनेसे आतानाता नहीं और मूर्तिप्रतिष्ठा करनेसे क्यों चलाप- मानहो, प्रतिष्ठाके अर्थ हैं सदा स्थित रहनेवाली, प्रतिष्ठा होते ही निरन्तर पून- नीय हो जाती है जैसे कोई मनुष्य घरमें बैठाहै तो क्या वोह पर चलने लगेगाकभी नहीं और 'स्था गतिनिवृत्ती धातुसे प्रतिष्ठा शब्द सिद्ध होता है जो चलापमानन हो अचल रहै वो ही प्रतिष्ठा की जाती है और जो चलै तौ हाला चाला होजाय पह तो एक देवताओंके विग्रह हैं उनम देवता आनकर प्रविष्ट होनाते हैं जैसे एफ स्थान टूट जानेसे मनुष्य और स्थानमें चले जाते हैं इसी प्रकार जब मूर्ति अशुद्ध होजाती है या टूटनाती है तो देवता और मूर्तिमें प्रवेश करनाते हैं महाभाग्य होनेसे एक अनेक होजाते हैं, यवनादिकोंके स्पर्शसे देवता नहीं रहते उनका निवास बडे पवित्रस्थानम हाताहै जैसे घर हलनेसे बडा उत्पात होता है उसी प्रकार मूर्ति आदिम भी विकार होनेसे प्रायश्चित्त है पुत्रादिकोंमें प्राण डालनेका विधान नहीं है उनका आत्मा सर्वज्ञ नहीं, एक अनेक नहीं होसक्ता, मृतक होनेपर कर्मानुसार दूसरे तनुको प्राप्त होताहै जो पितर आदि किसी योनिको प्राप्त होता ही है फिर कैसे प्राण आवें और वोह कैसे रहैं पिता पुत्रकी आत्माको बुलावे और उसको और घुलांचे तो जगत्की व्यवस्था नष्ट होजावै यह सामर्थ्य देवताओंको ही है प्रत्येक मूर्ति में अपना आत्मा प्रवेश करसते हैं। स० प्र० पृ० ३०८ पं० १८ प्रभ प्राणाइहागच्छन्तु सुखंचिरंतिष्ठन्तुस्वाहा आत्महागच्छतु सुखं चिरंतिष्ठतुस्वाहा इन्द्रियागीहागच्छन्तु सुखंचिरंतिष्ठन्तुस्वाहा । इत्यादि वेदमंत्र है क्यों कहतेही नहीं हैं (उत्तर) भाइ बुद्धिको थोडीसी काममें लाओ यह वाममार्गियोंकी वेदविरुद्ध तंवग्रंथोंकी पोपरचित पंक्तियां हैं। (प्रश्न) क्या तंत्र झूठा है ( उत्तर ) हाँ सर्वथा झूठा है जैसे आवाहन प्राणप्रति- ठादि पापाणादि मूर्तिविषयक वेदोंमें एक मंत्र भी नहीं वैसे "स्नानं समर्पयामि" इत्यादि वचन भी नहीं अथात् इतना भी नहीं है कि "पापाणादिमूर्ति रचयित्वा मंदिरेषु स्थाप्य गंधादिभिरर्चपेत् " अर्थात् पापाणादिकी मूर्ति बना मंदिरोमें स्थापन कर वन्दन अक्षतादिसे,पूजै ऐसा लेशमात्र भी नहीं ॥ ३२७ । १ दयानन्दतिमिरभास्करः। स० पृ० ३०८ पं० ११ जो मन्त्र पढकर आवाहन करनेसे देवता आजाती है तौ मूर्ति चेतन क्यों नहीं होजाती और विसर्जन करनेसे चली क्यों नहीं जाती और वह कहांसे आता कहां जाता है परमात्मा न आता है न जाता है जो तुम मन्त्रवलसे परमेश्वरको बुलातेहो तो उन्हीं मन्त्रोंसे अपने मरेहुए पुत्रके शरीरमें जीवको क्यों नहीं बुलालेते हो और शत्रुके शरीरमें जीवात्माका विसर्जन करके क्यों नहीं मारसक्त यह पोपजीकी ठगई है ॥ ३२६ । २९ समीक्षा-देवता और ईश्वरका मंत्रोंसे सम्बंध है वेदविधान होनेसे और देवता सामर्थ्ययुक्त होनसे सहस्रों शरीर धारण करलेते हैं जो कि, हमारे नेत्रपयसे अतीत हैं देवता मन्त्रोंके प्रभावसे उसस्थानमें प्राप्त होजाते हैं परन्तु अलक्ष्य रहतेहैं देवता परोक्षप्रिय हैं देवता क्या पितरोंका भी आवाहन है यथा “आयन्तु नः पितरः" और "अमाआयाहि इत्यादि अनेक मन्त्र देवतापितरोंक आवाहन के हैं और शुदा न्तःकरण मुनिगणोंको यह सामर्थ्य है जैसा कि, जन्मेजयके यज्ञमें तक्षकादिसर्प और इन्द्र आवाहन करते ही उपस्थित होने लगे थे और मन्त्रवलसे सहस्रों सर्प आन २ कर अमिकुंडमें भस्म होगये थेमहाभारतका आदिपर्व देखो ऋग्वेदके बहु तसे मन्त्रॉम देवताओंकाआवाहन हैनो उस विधानको जानते थे बुलालेतेप और जाननेवाले अब भी बुलासक्ते हैं मूर्तिम देवताओंका आवाहन विसर्जन नहीं करते हो प्राणप्रतिष्टा फरते हैं और इसका विधान भी है अब भी निस 'मूर्तिकी प्रतिष्ठा अच्छे प्रकार हो उसमें चमत्कार होता है और लोगोंको इष्टमाप्ति होती है उनके चमकारकी विधि सामवेदके पशि ब्राह्मणमें लिखी है ॥ यदादेवतायतनानिकम्पन्तेदेवतप्रतिमा हसन्तिरुदन्ति नृत्यन्तिस्फुटंतिस्विद्यन्त्युन्मीलन्ति निमीलन्तितदापा यश्चित्तं भवतीदंविष्णुर्विचक्रम इति स्थालीपाकर हुता पञ्चभिराहुतिभिरभिजुहोति विष्णवेस्वाहासर्वभूताधिपत- येस्वाहा चक्रपाणयेस्वाहेश्वरायस्वाहासर्वपापशमनायस्वा- होत व्याहृतिभिर्दुत्वाथ सामगायेत ।।* जय देवताओंके स्थान कापत देवताओंकी प्रतिमा रोती हैं, हँसती हैं नाचन एकदेशसे स्फुटनको प्राप्त होती हैं पसीने युक्त होतीहैं नेत्र सोसती मागलाई तर मा०प्र० को यहाँ यही कहने बनाई कि यह प्राण प्राचीन नहीं यों ही को नही गबाजीकी यापीके भांग कुरा प्रमाण नहीं आ इसका अर्थ करते हैं ददनाओं के बीच की. है पाकर कहिये तो सूर्यादिदेवता जो यहाँ मन ही उनके एक कान है। - -- एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (३६५) अधिक अंधकार अर्थात् महामूर्स चिरकाल घोरदुःखरूप नरकमें गिरके महाक्नेश भोगते हैं ॥ १ ॥ जो सब जगत्में व्यापक है उस निराकार परमात्माकी प्रतिम परिमाणसादृश्य वा मूर्ति नहीं है ॥ २॥ जो वाणीका इयत्ता अर्थात् जल लीजिये वैसा विषय नहीं और जिसके धारण और सत्तासे वाणीकी प्रवृत्ति होती उसको ब्रह्म जान और उपासना कर और जो इससे भिन्न है वे टपासनीय नहीं जो मनसे इयत्ता फरकै मनमें भी नहीं आता जो मनको जानता है उसी ब्रह्मक तू जान और उसीकी उपासना कर और जो उससे भिन्न जीव और अंत:करण है उसकी उपासना ब्रह्मके स्थानमें मत कर २ जो आंखसे नहीं दीख पडताऔ जिससे सब आँखें देखती हैं दुसीको तू ब्रह्म जान और उसीकी उपासना कर औ जो उससे भिन्न सूर्य विद्युत् और अमि आदि जड पदार्थ हैं उसकी उपासन मत कर ॥ ३ ॥ जो श्रोत्रोंसे नहीं सुना जाता और जिससे श्रोन सुनता है उसीफ तूं ब्रह्म जान और उसीकी उपासना कर उससे भिन्न शब्दादिकी उपासना उसके स्थानमें मत कर ॥४॥जो प्राणोसे चलायमान नहीं होता जिससे प्राण गमनक प्राप्त होता है (फिर मूर्ति उसके आगमनसे क्यों कर चलायमान होगी क्यों मूर्ति उसकी है और वह प्राणोंस चलायमान नहीं होता इससे मूर्ति भी नह चलती) उसी ब्रह्मको तू जान उसीकी उपासना कर जो यह उससे भिन्न वायु उसकी उपासना मत कर ॥५॥ ३२७ । १६ समीक्षा-पह संपूर्ण स्वामीजीका लेख असंगत है यहां यह विचार कर्तव्य कि इन यजुवेंदके मंत्रोंकी किसी पूर्व अथवा उत्तरमंत्रसे संगति है अथवा नहीं यह फहैं कि, विना संगत ही कार्यकारण उपासनाका निषेध किया है तो यह कहन चाहिये कि, "ब्रह्मके स्थानमें " यह अर्थ फिस पदका है मंत्रोंके अक्षरोंसे तो अस भूति-उत्पत्तिरहित और संभूति उत्पत्तिमत् वस्तुको जो टपासना करता है से नरफमें पड़ता है यही अर्थ प्रतीत होता है तो यह निर्णय करना चाहिये कि, असंभूति पदार्य है अथवा नहीं जो उत्पत्तिरहित होनेसे ब्रह्म भी असंभृति पदा है तो उसकी उपासना फरनेसे भी नरफ होगा और जो असंभृति पदा अझ नहीं तो संभूति शब्दका अर्थ होगा इसमें दो दोप है ब्रह्मको कार्यत्वापद और ब्रह्मको उपासनासे नरफभी होगा क्यों कि संभूतिफी टपासनामें नरकरू फल मंत्रप्रतिपाय है जब पूर्व उत्तर संगति विना मंत्रके अक्षरोंके यह अर्थ के करेंगे सो "ईशावास्य" इस मंबसे लेकर "अन्धंतमः" इसमंतक कोई ऐसाप नहीं कि जिसका अर्थ यह है फि, 'अझके स्थानमें इसकी संस्कृत 'ब्रह्मणः स्यान अपका 'ईश्वरस्य स्थाने ' यह कहीं भी नहीं समन पुरुष यजुरेदका ४० वा अध्या देखकर विचारलेंगे फि, क्या प्रकरण है कुछ मंत्र पूर्व भी लिख आये हैं इस कार . (३६४) दपानन्दतिमिरभास्कर। समीक्षा-यही स्वामीजीने माणप्रतिष्ठाके मन्य स्वयं ही लिखकर कहदिया कि यह पेवशास्य नहीं मत हो हम आगे मन्यभागहीरे धवन प्राणप्रतिष्ठामें लिखेंग और क्रमानुसार मतिका पनाना लिखा जायगा वहीं प्राणप्रतिष्ठाम लिखेंगे और तन्त्र सब सना है करनेवाला दो विधानसे फर ती निधय सिद्ध होगा निसे पूछना हो हम यतासनते हैं श्रद्धासे करेगा तो बेशक सिद्ध होगा। स०प्र० पृ० ३०९ पं० १ जो वेदाम - विधि नहीं तो संडन भी नहीं और जो खंडन है तो "प्राप्ती सत्यां निपेयः " मर्तिके होनेहीसे खंडन होसक्ता है (उत्तर) विधि तो नहीं परन्तु परमेश्वरके स्थान में किसी अन्पपदार्यको पूजनीय न मानना और सर्वथा निषेध किया है क्या अपूर्वविधि नहीं होती सुनो यह है ।। अन्धंतमःप्रविशन्तियेऽसम्भूतिमुपासते ततोभूयइवतेतमो यसंभूत्यां रताः-यजु० अ०४० मंत्र ९ न तस्यप्रतिमा अस्ति यजु० अ० ३४ मंत्र ४३ यदाचानभ्युदितं येनवागभ्युद्यते ॥ तदेवब्रह्मत्वंविद्धिनेदंयदिदमुपासते ॥ १॥ यन्मनसा न मनुतेयेनाहुर्मनोमतम् ॥ तदेवब्रह्मत्वंविदिनेदयदिदमुपासते ॥२॥ यच्चक्षुपानपश्यतियनचभूपिपश्यन्ति ॥ तदेवब्रह्मत्वविदिनदयदिदमुपासते ॥३॥ यच्शेत्रेणनशृणोतियेन श्रोत्रमिदंश्चतम् ॥ तदेवब्रह्मत्वंविदिनदयदिदमुपासते ॥ ४ ॥ यत्प्राणेननप्राणितियेनप्राण प्रणीयते ॥ तदेवब्रह्मत्वविद्धिनेदयदिदमुपासते ॥ ५॥ केनोपनि भाषार्थः। जो असंभूति अर्थात् अनुत्पन्न अनादि प्रकृति कारणको ब्रह्मके स्थान में उपा सना करते हैं वे अंधकार अर्थात् अज्ञान और दुखसागरमें इनते हैं और संमृति जो कारणसे उत्पन्न हुए कार्यरूप पृथ्वी आदिभूत पाषाण और वृक्षादि अवपत्र और मनुष्पादिकेशरीरकी उपासना ब्रह्मके त्यानमें करते हैं वे उस अधकारसे भी .
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । अधिक अंधकार अर्थात् महामूर्स चिरकाल घोरदुःखरूप नरकमें गिरके महान भोगते हैं ॥ १॥ जो सब जगत्में व्यापक है उस निराकार परमात्माको प्रतिम परिमाणसादृश्य वा मूर्ति नहीं है ॥ २ ॥ जो वाणीका इयत्ता अर्थात् जल लीजिये वैसा विषय नहीं और जिसके धारण और सत्तासे वाणीकी प्रवृत्ति होती उसको ब्रह्म जान और उपासना कर और जो उससे भिन्न है वे उपासनीय नहीं जो मनसे इयत्ता करकै मनमें भी नहीं आता जो मनको जानता है उसी ब्रह्म तू जान और उसीकी उपासना कर और जो उससे भिन्न जीव और अंत:करण है उसकी उपासना ब्रह्मके स्थानमें मत कर २ जो आंखसे नहीं दीख पडता औ जिससे सब आँखें देखती हैं उसीको तु ब्रह्म जान और उसीकी उपासना कर औ जो उससे भिन्न सूर्प विद्युत् और अमि आदि जड पदार्थ हैं उसकी उपासन मत कर ।। ३ ।। जो श्रोत्रोंसे नहीं सुना जाता और जिससे श्रोत्र सुनता है उसीक तूं ब्रह्म जान और उसीकी उपासना कर उससे भिन्न शब्दादिकी उपासना उस स्थानमें मत कर ॥ ४ ॥ जो प्राणोंसे चलापमान नहीं होता जिससे प्राण गमन प्राप्त होता है (फिर मूर्ति उसके आगमनसे क्यों कर चलायमान होगी क्योंकि मूर्ति उसकी है और यह प्राणोंस चलायमान नहीं होता इससे मूर्ति भी नह चलती) उसी ब्रह्मको तू जान उसीकी उपासना कर जो यह उससे भिन्न वायु उसकी उपासना मत कर ॥ ५॥ ३२७ । १६ समीक्षा-यह संपूर्ण स्वामीजीका लेख असंगत है यहां यह विचार कर्तव्य कि इन यजुर्वेदके मंत्रोंकी किसी पूर्व अथवा उत्तरमंत्रसे संगति है अथवा नहीं यह कहैं कि, विना संगत ही कार्यकारण उपासनाका निषेध किया है तो यह कहा चाहिये कि, "ब्रह्मके स्थानमें" यह अर्थ किस पदका है मंत्रोंके अक्षरोंसे तो अर भूति-उत्पतिरहित और संभूति उत्पत्तिमत् वस्तुकी जो उपासना करता है से नरफमें पडता है यही अर्थ प्रतीत होता है तो यह निर्णय करना चाहिये कि, ब्रा असंभूति पदार्थ है अथवा नहीं जो उत्पत्तिरहित होनेसे ब्रह्म भी असंभूति पदा- है तो उसकी उपासना करनेसे भी नरफ होगा और जो असंभूति पदा ब्रह्म नहीं तो संभूति शब्दका अर्थ होगा इसमें दो दोप हैं ब्रह्मको कार्यत्वापान और ब्रह्मको उपासनासे नरकभी होगा क्यों कि संभूतिकी उपासनामें नरफरू पल मंत्रप्रतिपाय है जब पूर्व उत्तर संगति विना मंत्रके अक्षरोंके यह अर्थ के करेंगे सो "ईशावास्य" इस मंत्रसे लेकर "अन्धंतमः" इस मंत्रतक कोई ऐसाप नहीं कि जिसका अर्थ यह है कि, 'ब्रझके स्थानमें इसकी संस्कृत 'ब्रह्मणः स्थान अथवा 'ईश्वरस्य स्थाने ' यह कहीं भी नहीं सजन पुरुष यजुर्वेदका १० वा अध्या देखकर विचारलेंगे फि, क्या प्रकरण है कुछ मंत्र पूर्व भी लिख आये हैं इस कार (३६६) दपानन्दतिमिरभास्करः। -उनका दुवारा लिखना ठीक नहीं ब्रह्मके स्थानमें कारण प्रकृति और कार्य पापा- णादिकी उपासना करता है सो नरफमें गिरता है यह अर्थ प्रकरणविरुद्ध है और यह भी विचारना चाहिये कि, ब्रह्मक स्थानमें इसका भावार्थ क्या है ब्रह्मका स्थान कौन है ब्रह्मकी उपासनाका स्थान वा ब्रह्मका निवास स्थान वा ब्रह्मरूपस्यान यह अर्थ है प्रथम पक्षमें तौ ब्रह्मकी उपासना स्थान कोई दूसरा पदार्थ स्वामीजीके मतमें नहीं है क्यों कि यदिब्रह्मकी उपासनाकास्थान कोई पदार्थ मानेंगे तीमतीको उपासना सिद्ध होगी क्यों कि, ब्रह्मबुद्धिसे किसी पदार्थको उपासना ही प्रतीको पासना है और यदिब्रह्मके निवासस्थानको ब्रह्मस्थान माने तो ब्रह्मको व्यापक होनेसे सर्व ही वस्तुमात्र ब्रह्मका निवासस्थान है तिस स्थानम कारण कार्य उपासना करता ही फौन है, जो नरककोमाप्त होगा क्यों कि, कारण प्रकृति और कार्य पृथिवी आदि भी तो ब्रह्माका निवासस्थान है तिससे कार्य कारण दृष्टि सबको प्राप्त है क्योंकि कारणको कारण और कार्यको कार्य सब ही जानते हैं परिशेषसे ब्रह्मरूप स्या नमें जो कारण प्रकृतिकी और कार्य पृथिवी पापाणादिकी उपासना करता है सो नरकमें पड़ता है यह अर्थ दयानन्दनीको विवक्षित होगा आशय यह है जो कारण प्रकृतिबुद्धिसे और कार्य पापाणादि मूर्तिबुद्धिसे ईश्वरकी उपासना करता सो नरकमें पड़ता है जब यह अर्थ इष्ट हुआ तो विचारिये कि, मूर्तिपूजा आचार्य ब्रह्ममें मूर्तिबुद्धि करके पूजन उपासना करते हैं अथवा मूर्तिमें ब्रह्मबुद्धिकरफे पूजनादि करते हैं प्रथम पक्ष तो कोई विचारशून्य भी ग्रहण न करेगा दूसरा पूर्व आचार्य मार्गरूट पुरुष सर्वव्यापक ब्रह्मको वा भक्तवात्सल्यादि गुणविशिष्ट फैलासयासी वकुण्ठवासी देवको केवल मूर्तिरूप कैसे मानेगा, इस कारण मूर्तिमही महबुदिइ करके पूजन करते हैं स्वामीजीका यह विपरीत ज्ञान है जो कहते हैं कि, प्राके स्थानमें कारण कार्य बुद्धि फर्ताको नरफ होता है ऐसी युद्धि तो इन्हीकी है मतिः मापूजकोंफी नहीं प्रतिमापूजक तो प्रतिरूप अधिष्ठानमें ब्रह्मपुदिकरके ब्रह्मा पूजन करते हैं इसी अर्यको व्यासनी सूत्रसे पथन करते हैं । ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्पात्-शा० अ०४ पा. १०५ इस सूत्र में प्रतीकोपासनाबोधक वाक्पटदाहरण है प्रतीकी दृष्टि ब्रह्म में कर्तः व्य है अथवा ब्रह्मदृष्टि अधिष्ठानमें करनी योग्य है इस संशपकी निषिके यारते व्यासजी कहते हैं ब्रह्मदृष्टि ही प्रतीफर्म कर्तव्य है ब्रह्मको उत्कर्ष होनेसे ऐसे दरष्ट ब्रह्मदृष्टि फरनेसे उत्कृष्ट ब्रह्म ही पश्य होगा, इस सूग्रसे भी स्वामीनारा मत निर्मल प्रतीत होता है अब इस नवम मन्चका अर्थ लिपते हैं इसी संगति दराम और एकादश मन्यके साप है।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (३६७) अन्धंतम प्रविशन्तीति- प्रथम तो कारण कार्य उपासनाके समुच्चयकी इच्छाकर एक एक उपासना निन्दा करते हैं जो कारण जड प्रकृतिकी उपासना करते हैं वे अन्यतममें प्रवे करते हैं और जो कार्यको उपासना करते हैं वे तिससे भी अधिक अन्धकार प्रवेश करते हैं अन्यदेवाहुः संभवादुन्यदा?रसंभुवात् । इतिशुश्रुधीरीणांयेनुस्तद्विवचाक्षिरे-यजुः अ० ४० मं० १ सम्भवात् अर्थात् ब्रह्मदृष्टि से कार्य मृन्मयमूर्ति उपासनासे अन्य ही विद्युल्लो माप्तिरूप फल आचार्य कहते हैं और अन्य ही फल असम्भवात् अर्थात् कार रूप प्रकृति उपासनासे प्रकृतिलयरूप फल कहते हैं ऐसे धीराणाम् दार्थ उप शके आवार्योंका वचन हम लोग सुनते हुए जो आचार्य हमारे प्रति फा फारण उपासनाका व्याख्यान कर चुके हैं । संभूतिञ्चविनाशंचयस्तदेदोभय ७सुद्द । विनाशे मृत्युतीत्या त्यामृतमश्नुते-यजु० अ० ४० म०१ इस मन्त्रमें सम्भूति शब्दकी आदिमें आकारका लुप्त उपारण जानना क्यों । 'विनाश शब्द कार्यका पाचक है और संभूति शब्द भी कार्यका वाचक होने पुनरुक्ति होगी और नवम दशम मन्त्रमें आकारका उच्चारण है इससे इस स्थान अफार है तब यह वाक्यार्थ हुआ जो पुरुष असंभूति कारण और विनाश वत् कार्यकी एककालमें उपासना करता है सो पुरुप कार्य उपासनासे मृत्यु तरकर कारण उपासनासे अमृतको प्राप्त होता है आशय यह है कि, प्रतिमा ब्रह्मदृष्टि पूजन ध्यान करता हुआ स्वभाव प्राप्त निपिद्ध कमाको उत्तीर्ण हो फारण उपासनासे ब्रह्मलोकमाप्तिद्वारा क्रममुक्तिको प्राप्त होता है यह तीन मन्यो एक महावाक्य है निन्दा कुछ निन्दा करनेकी नहीं प्रवृत्त हुई किन्तु विधानयो मर्यको स्तुति करनेके वास्ते प्रत हुई है इस न्यायसे नवम मन्यसे कारण प उपासनाकी निन्दा समुचपके अर्प फो है और दशम मन्यसे एक एकका फल घोधन किया है, क्यों कि निष्फलका समुचप नहीं होता जैसे कृषिफर्म पाणिग्य प्रत्येक सफल हों तो उन दोनोंफा समुचप करके एकपुरुष सेवन फ- है इससे दशम मन्दमें एक एक सफल कहा और एकादशमें समुचप कहा है तिसे तीन मन्योंकी एक वाक्यता होनेसे प्रतीकोपासना सष्ट सिददै ॥
(३६८) दयानन्दतिमिरभास्करः। अब दूसरे “न तस्प प्रतिमा अस्ति" इस वेदवचनका पूरा मन्त्र क्य नहीं लिखा इसका अर्थ तो इतना ही है कि, उसकी प्रतिमा नहीं सो यहां यः विचार फर्तव्य है कि, तत् शब्दार्थ क्या है निराकार है वा साकार सर्व जगदमे व्यापफ है या परिच्छिन्न और प्रतिमाशब्दार्य क्या है सो बात विना प्रकरणके और पूरे मन्त्र निश्चित नहीं होसत्ती और बिना प्रकरणके विचारे जो स्वामीजी व्यापक निराकारफा वाचक ततशब्द कहते हैं तो हम कहते हैं साकार ही तत्- शब्दका अर्थ क्यों न हो और प्रतिमा शब्दका अर्थ सादृश्य मानकर उस साकार विश्वरूप परमात्माका सादृश्य किसी में नहीं ऐसा अर्य करने में क्या हानि इस कारण प्रकरण और पूरे मन्त्रका जानना अत्यावश्यक है इससे पहले ( तदेवामि) इस ३२ । १ मन्त्रमें आयादिरूपसे परमात्माफी स्थिति कही है दूसरा मन्त्र ।। सनिमेपाज्ञिरेविद्युतः पुरुंपादपि ॥ नैनमुर्खनतिर्यञ्चं नमध्यपरिग्रभत् ॥२॥ स्वयंज्योतिःस्वरूप पुरुपमें सब ही निमेषादिरूप खण्डकाल उत्पन्न होता हुआ और इस पूर्ण पुरुषको उर्व वातिर्यञ्च " चारों दिशाओम वा मध्यमें कोई ग्रहण नहीं करसक्ता, सर्वका कारण हानेसे। आशय यह है कि, पूर्वमन्त्रमें अमिआदिभाव कहनेसे ग्राह्यता प्रसक्तिका निवारण कर दिया अवास्तव स्वशक्ति निर्मित अपि- मादिभावसे वास्तव ग्राह्यत्व कारणात्मामें नहीं होसक्ता । नतस्यप्रतिमास्तियस्युनाममुहुद्यशः ॥ हिरण्यगर्भइत्येपः- मौमाहि सीदित्येपायस्मानजात इत्येपः-यजु अ०३२मन्त्र०३ प्रतिमा शब्दके अर्थ दो हैं एफ तौ तुल्यरूपान्तरप्रतिमाशब्दार्थ तिसको तो निषेध करते हैं जिस परमात्माका नाम महत है तथा यज्ञ कीर्त महत् बड़ी है तिसका तुल्यरूपान्तर नहीं है और द्वितीय जो प्रतिमाशब्दार्थ है सो स्वयं मन्त्र अंगीकार करते हैं "हिरण्यगर्भः समवर्तताने" इन चार मन्त्रोंका जो अनुवाफ है सो भी इसीका रूपान्तर न्यूनरूप है तथा "मामाहिंसीः” इत्यादि मन्त्राध्य भी इसीका रूप है इसी रीतिसे हिरण्यगर्भादि परमेश्वर कार्य होनेसे सूर्य प्रतिविम्वको सूर्यमतिमावत् न्पून मणिका अधिकमणिकी प्रतिमावत् उत्तमसुवर्ण मुद्रिकाकी निकृष्ट सुवर्णमुदिकाफी प्रतिमावत् प्रतिमा है और हिरण्यगर्भसे जोस्वामीनीने निराकारके अर्थ लिये हैं सो प्रसंगविरुद्ध है और यहां यह अथ नहीं है कि, दस परमेश्वरकी मूर्ति नहीं है क्यों कि, परमेश्वरको प्रतिमारूप ऋग्वेद कहता है । .
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । कासीत् प्रमा प्रतिमा कि निदानमाज्यंकिमाप्तीपरिधिः कआसीच्छन्दः किमासीत् प्रउगंकिमुक्थ्यदेवादेवमय- जन्तविश्वे-० अ०८ अ०७०१८ मं०३ मर्थ-सबकी यथार्थ ज्ञान युद्धि कौन है, और प्रतिमा मूर्ति कौन है और सब जगत्का कारण कौन है और धृत के समान सार जानने योग्य कौन है और सब दुःखोंका निवृत्तकारक और आनंदयुक्त प्रीतिका पात्र परिधि (सीमा) कौन है और इस जगत्का पृष्ठावरण कौन है और स्वतंत्र वस्तु और स्तुति करने याप फोन है, यहांतक तो इसमें प्रभ हैं अन्तमें सबका उत्तर इसमें है कि, ( यत् देवम् विश्वेदेवाः अयजन्त) जिस परमेश्वरको इंदादिकोंने पूजा पूजते हैं और पूजेंगे वोह परमेश्वर प्रतिमादिसर्प रूपसे जगत्में स्थित है और वो ही सारभूत धृतवत् स्तुति करनेके योग्य है तो ऊपर लिखे मंका यह अर्थ नहीं होसक्ता कि, उसकी मूर्ति नहीं क्यों कि यह ऋग्वेदका मंत्र ही कहता है कि वोह प्रतिमारूप है बस यही अर्थ है कि, उस परमेश्वरकी समान फोई नहीं इससे अगले मंगमें भी प्रजापतिको सर्वरूप कहा है । मामाहि५ सीजानताय पृथिव्यायोवादिव सत्यधर्माव्यानंट । यश्चापश्चन्द्राः ग्रंथमोजजानुकस्मै देवार्यहविपाविधेम- य० अ०१२ मं० १०२ (य) जो प्रजापति (पृथिव्याः) पृथिवीका (जनिता) उत्पन्न करने- वाला (यः) जो ( सत्यधर्मा ) सत्यधारण करनेवाला (दिवम् ) लोफको (न्याना) सननकर व्याप्त है (च) और (प.) जो (प्रथमः ) आदिपुरुष प्रथमशरीर (आपश्चन्दाः) जगत्के आहाद और तृप्तिसाधक जलको (जनान) उत्पन्न करता हुआ पा मनुष्योंका रचनेवाला है वह प्रजापति मा ) मुझे (माहिंसीत् ) मत मारो (फस्म) उस प्रजापतिके निमित्त (हपिपा विधेम) हवि देते हैं। यस्मान्नजातः परौ अन्यो अस्तुि य भावियेशुभुवनानिविश्वा । ग्रुनापतिः प्रजयास ५ गुणस्त्राणज्योती पसन्तसपोडशी- य० स० ८ मं०३६ पदार्यः (पत्मात् ) निस पुरुपसे (अन्यः) दूसरा कोई उत्कृष्ट (न नहीं 1 ( ३७०) दयानन्दतिमिरभास्करः। (जातः) प्रादुर्भूत हुआ ( अस्ति) है (यः) जो (विश्रा) संपूर्ण (भुवनानि) लोकोंमें (आधिवेश ) अन्तर्यामीरूपसे प्रविष्ट है (सः) वह ( पोडशी) पोड- शकलात्मक सब भूतोंफा आश्रप (प्रजापतिः) जगत्का स्वामी (प्रजया ) मना रूपसे (संरराण ) सम्पक रमण करता हुआ प्रनापालनके निमित्त (त्रीणि) अनि घायु सूर्य लक्षणवाली तीन ( ज्योतीपि)ज्योतियोंको अपने तेनसे (सचते) उजीवन करताहै। (न तस्य प्रतिमा०) वादी इसी मंत्रपर बडा बल रखतेहैं परन्तु यह नहीं विचारते कि, न तो कल्पने इस मंत्रको मूर्तिखण्डनमें विनियुक्त करा और न इसके ब्राह्मणसे यह अर्थ सिद्ध होताहै प्रत्युत यह मंत्र मूर्तिमंडनमें युक्त है कारण कि, इस स्थल में प्रतिमा शब्द उपमावाचक है मूर्तिवाचफ नहीं कारण कि उत्तरार्धमें मूर्ति विधेय हैं जिस स्था- नमें उद्देश्य और विधेयकी एकार्थतामें विरोध प्रतीत हो उस स्थानमें विधेयके अनुसारी उद्देश्यका अर्थ होताहै, जैसे किसी पुरुपने कहा इसे दक्षिणा दीजिये और उसके निपोज्य पुरुपने उसको प्रहार किया तो अवश्य प्रतीत होताहै कि नियोक्ताका दक्षिणा उद्देश्य अंगसे प्रहारका ही सूचक है यया उदेश्पविधेययोविरोधे सति विरोधेनोद्देश्यं नेयमिति न्यायात् शा० भा०" अर्थात् उद्देश्य और विधेयको विरो. धता प्रतीति विधेयका विरोधी अर्थ उद्देश्यका होताहै इससे यहां प्रतिमाशब्द मूर्तिका निषेधक नहीं किन्तु उपमाका पाचक है इसी मंत्रके उत्तरार्ध में । "हिरण्य- गर्भ इत्येपोमामाह में सीदित्येपा यस्मान जात इत्येषः" इसमें तीन मंत्रोंकी प्रतीक हैं हिरण्यगर्भः १३३४ इसमें प्रनापतिको सोने की मूर्ति का विधान है, "मा. माहि सीः " यजु० १२।१०२ इसमें प्रजापतिको प्रथम शरीरी कहकर मूर्तिपन दिखायाहै और यस्मान जात ८।३६ यजुमें प्रनापतिको अमिवायुसूर्यरूप कहा है . इसमें विधेय तो मूर्ति है और उद्देश्य प्रतिमा है तो यह मंत्र पूर्वार्धगत प्रतिमा शब्द उत्तरार्धगत विधेयमूर्तिका निषेधसूचक कैसे हो सकता है इससे यहां प्रतिमाका अर्थ उपमा ही है शंकराचार्यने भी शा० २१३ । ७ के भाष्य में न तस्य प्रतिमा स्तीति ब्रह्मणोनुपमानत्वं दर्शयति अर्थात् न तस्य इस मंत्रमें प्रतिमासे परमात्माको अनुपमेयत्व कहाहै "निरुक्त उत्तरप० अ०७ ख०२ त इन्द्रशतं दियः शतं भूमयः प्रतिमानानि स्युन' अर्थात् हे देव यदि अनन्त भूमिय और सूर्य तुम्हारे तपमानार्थ दिखाये जाय तो भी तुम्हारी उपमा नहीं होसकती, अब हिरण्यगर्भ इस मंत्रका कल्प विनियोग और ब्राह्मण देखिये "ब्रह्मज्ञानम्-यजु०१३३३" इसमंत्रसे कमल पत्रके ऊपर वर्तुलाफार और एकविंशति उत्तान विन्दुयुक्त सुवर्ण फलक धरै । अप x . एकादशसमुल्लासखण्डनम् । रुरुममुपदधाति श०७४।१।१० तस्मिन् रुममधःपिण्डं ब्रह्मानज्ञानमितिकात्या -श्री० सू० १७॥४॥२ इसके अनन्तर । हिरण्यगर्भः समवर्तताये भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । सदाधार पृथिवा द्यामुतेमां कस्मे देवाय हविषा विधेम १३१४ अर्थ यह कि हिरण्य पुरुपरूप ब्रह्माण्डमें गर्मरूपसे जो प्रजापति स्थित है यह हिरण्यगर्भ कहलाता है वह प्रजापति सर्व प्राणिजातिकी उत्पत्तिसे प्रथम स्वयं ब्रह्माण्डशरीरी हुआ और सपन्न होनेवाले जगत्का स्वामी हुआ वह प्रजापति अन्तरिक्ष युलोक और भूमिको धारण किये हुएहै, उस प्रनापतिको हम हविसे परिचर्या करते हैं. तात्पर्य यह है कि पृथ्वीको प्रतीक तो पुष्करपत्र है आदित्यको प्रतीक सुवर्ण: फलका है, और आदित्य अन्तर्गत पुरुपको प्रतीक सुवर्ण पुरुष है इसीफानामप्रती- फोपासना है यह सुवर्णका पुरुष स्थापन शतपथ कां०७४४।१ । १५ से चलता है.. अथ पुरुपमुपदधाति स प्रजापतिः सोग्निः स यजमानः स हिरण्मयो भवति, ज्योति हिरण्यं ज्योतिरग्निरमृत हिरण्यममृतमग्निःपुरुषो भवति पुरुपोहि प्रजापतिः १ उत्तानम्माचा हिरण्यपुरुपं तस्मिन् हिरण्यगर्भ इति कात्यायनकल्पसू० ०१७।४।३ रुक्मके ऊपर हिरण्मय पुरुषको स्थापन फरै अर्थात् पूर्वाभिमुख दतिष्ठमान हिरण्यपुरुषको हिरण्पगर्भः इस मन्त्रसे सुवर्णफलकके ऊपर स्थापन कर फास्या. का अर्थ हुआ. स्थूल अपंचाभिमानी विराट् पुरुपदी अमिरूप है और सूक्ष्म प्रपंचाभिमानी हिरण्यगर्भ है यह हिरण्यगर्भरूप ही यनमान है, और चपनको माप्त अमि पुरुष- रूपसे संस्कृत होती है टप्तीका मतिकृतिरूपहिरण्य पुरुष है इस कारण यह पुरुपा- कृतिके योग्य है उभय प्रतीकमें एकध्येयको प्रतिकृति फहते हैं इसका व्याख्यान स्वयं ही ब्राह्मण करता है जो ज्योति हिरण्य है, ज्योति अमि है, वही अमृत है, वही अमि पुरुष विधि होती है और पुरुष ही प्रजापति है "हिरण्यं फरमादू- भियते आपम्यमानमिति पा हिपते जनाननमिति या हितरमणं भवतीतिया हृदयरमणं भवतीति निरु०२।१०।" शिलिपासे विस्तारित होनेसे हिरण्य कहा जाता है दुर्भिक्षादिमें हित है तथा सदा सबको रमग करनेसे हिरण्म सोनेगा नाम है ०२१ सू० ३५ मन्त्र १० हिरण्पहरः स हिरण्पसंहकू मुवर्णमय:
पो स्थापन किया, इसी प्रकार यह यगमान भी इसी मामबरमहम परमं ' (३७२) दयानन्दतिमिरभास्करः। शरोरी और सुवर्णका इन्द्रियवाला है, इससे इस मन्त्रमें प्रतिमा पूजाका निषेध नहीं किन्तु विधान है आगे प्राणप्रतिष्ठामें- नमोस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु । ये अन्तरिक्ष ये दिवि तेभ्यो नमः १३१६ जो लोक पृथिवी और अन्तरिक्षमें हैं जो गुस्थानमें हैं तिनको नमस्कार हे यह प्राणप्रतिष्ठाके मन्त्र हैं प्राणप्रतिष्ठासे मूर्तिमें शक्ति उत्पन्न होती है इस अर्थको ब्राह्मणभाग फहता है। अथ साम गायति एतद्वै देवा एतं पुरुपमुपधाय तमतादृश- मेवापश्यन्यथेतच्छुष्कं फलकम् २२ ते अनुवन् उपतना- नीत यथास्मिन् पुरुषे वीर्यं दधामेति ते अनुवंश्वेतयध्यमिति चितिमिच्छतोत वा व तदववंस्तविच्छत यथास्मिन्पुरुपे वीर्यं दधामेति २३ ते चेतयमाना एतत् सामापश्यस्तद्गा- यस्तदस्मिन्वीर्यमधुस्तथैवास्मिन्नयमेतद्दधाति पुरुपे गायति पुरुपे तद्वीप दधाति चित्रे गायति सर्वाणि हि चित्राण्यग्निस्तमुपाय न पुरस्तात्परीयालेनमायमग्निहि न सदिति २४ । अथ सर्पनामरुपतिष्टत इमे वे लोकाः सर्पाः जब देवताओंने हिरण्मय पुरुपको मुवर्णफलक के यह परामर्श किया कि यह मुवर्ण पुरुप चेतनासे रहित गुप्फ फल की समान ! है॥ २२ ॥ तब फिर सब बोले कि इस हिरण्यपुरुषमें शनिप्रादुर्भापके निमित्त परामर्श करो सब देवताओंने इस बातको अनुमोदन किया कि इसमें वीर्ष स्थापन फरें यह देवता मीमांसा करते हुए तब (नमोस्तु सन्यो या इपणे पाये वामी रोचने ) इन तीन मन्वरूप सामको उपलब्धिको प्राप्त इंप और सतीन मन्त्ररूप सामको गापा तब उस हिरण्मय पुरुषमें पीर्य अर्याय परपदापा शक्ति सामर्थ्यका विधान करता है, तात्पर्य यह कारक तीन मन्त्र पार्नमें इस माम शुरूपमें सामरूपं प्रगट होता है चित्रं देवानाम इत्यादि पशु० ७ ११२ कार पर जो धर्मरूपता पुर्य और अमिका मा प्रतिपादन का यह विप्रपा शम्यगर्म चित्ररूप होता है, इससे पहा हिरव्यागावर हर से शिष्य श०७।४।२२-२१ कार स्थापन किया तर एकादशसमुल्लासखण्डनम्। पुरुषका विधान करके यजमान उनके आगे गमन न करे ऐसा फरनेसे अनिष्ट होता है सर्प नाम तीन मंत्रोंसे यजमान हिरण्य पुरुषका उपतिष्ठमान करै आवा- हनके मंत्र वेदों में अनेक हैं यथा- तान्पूर्वया निविदाहूमहे वयं भगं मित्रमदिति दक्षमस्रिधम् । अर्यमणं वरुणं सोममश्विना सरस्वती नः सुभगामयस्करत् ॥ ऋग्वे० भा० १०६.२०१५मं० ३ हम पूर्वकालीन नित्या पाणीसे भग मित्र अदिति दक्ष अर्यमा वरुण सोम' अश्विनीकुमार सरस्वतीको आवाहन करते हैं हमको सुखकारक हों (आह्रानं घ निविदाम् ) आश्व० श्री. सू. १९ अ०५ ० ९ वेदमंत्रोंकी देवता आवाहनमें सामध्यंता है. और इसी हिरण्मय पुरुपके नैवेद्यार्थ पांच मंत्रोंसे अमिमें पांच आहुति दीनाती हैं, घे मंत्र कृगुप्वपाज० यजु० अ० १३ मं०९।१०।११।१२।१३ तक हैं उनका अर्थ हमारे यजुर्वेद भाप्यम देखो इनका ब्राह्मण- अयनमुपविश्याभिजुहोति आज्येन पंचगृहीतेन तस्योक्तो बंधुः सर्वतः परिसर्व ७ सर्वाभ्य एवैनमेतदिग्भ्योऽनेन प्रीणाति श० ७।४।१ । ३२ इसीका कात्याय० श्री० सू० अ० १७ कं० । सु० ७ उपविश्य पञ्चगृहीतं जुहोति पुरुपे कृणुष्वपाज इति प्रत्यूचं प्रतिदिशमपरिसर्पम् । कृणधपान इत्यादि पांच मंत्रोंसे पंचया गृहीत तसे होम करे चार मंत्री से चार दिशा में पंचम मंबसे अमिमें आहुति दे जिस दिशामें अमिमें आहुति दे स्वयं भी रसी दिशाम चले इन मंत्रोंसे हिरण्मय पुरुपको नैवेद्य लगाया जाता है कारण फि पूर्वमें हिरण्यगर्भ० इसमें 'फस्मै देवाय हविषा विधेम ' ऐसा कहा है कि दम प्रजापतिके आहुतिस हविसे टपासना करते हैं इससे नैवेद्य प्रदान है प्रतीकम अर्थ- नफा मंत्र लिखते हैं ऋ० अष्ट० ६ ० . सू०५८ मं. ८ अर्चत प्रार्चत प्रियमेधासो अर्चत । अर्चन्तु पुत्रका उतपुरं न धृष्णवर्चत ॥८॥ दे मध्यर्यादि तुम परमारमा इन्द्रका (अनत ) पूजन फरो (प्रात ) स्तुति पिशेपसे पूजन करो (प्रियमेधासः) भियमेषस सम्बन्धी या मिपमेयागोववाले (३७४) दयानन्दतिमिरभास्करः। तुम (अर्गत ) पूजन करो (उत ) और (पुत्रकाः) पुत्र भी (अर्चन्तु) विशेष कर इन्द्रको पूर्ण (उत) और (पुरं न) जैसे पुरुषको (धृष्णु ) धर्षणशीलको (अर्चत ) अर्थात् जैसे धर्षणशीलपुरुषको पूजते हैं तैसे तुम पूनो । इससे पूना सिद्ध है। इसीके अनुसार शाकल शाखामें कहा है (प्रियव्रताः पूनयन्तु प्राविति वीप्सितम् । पालकाः पूजयविन्द्रं धीराः सन्त इति श्रुतिः) अर्थ पूर्व कथनानुसार है, रही यह बात कि देवताओं के लिये मन्दिर बनाये जाते ये इसका भी अनुमान प्रमाण दोनों मौजूद हैं ॥ उद्घध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टापूर्त स मृजेथामयञ्च यजु० अ० १५ मं० ५४ हे अमे ! तुम 'उबुध्यस्य ' सावधान हो जागृत हो इस यजमानकी सावधान फरो ( इष्टापत)ीत स्मात मन्दिर कूपादि कर्ममें (अयं च ) इस यजमानसे भी (संयजेथाम् ) संगति प्राप्त करो । इष्टापूर्त फिसको कहते हैं इसमें स्मृति ।। अग्निहोत्रं तपः सत्यं वेदानामुपलम्भनम् । आतिथ्यं वैश्वदेवञ्च इष्टमित्यभिधीयते ॥ १ ॥ वापीकूपतडागादि देवतायतनानि च । अन्नप्रदानमारामः पूर्तमित्यभिधीयते ॥२॥ अमिहोत्र तप सत्य वेदपाठ आतिथ्य वैश्वदेवकर्म इष्ट फहाता है १ वावडी कूप सरोवरं देवमन्दिर निर्माण अन्नदान बगीचा लगाना यह कर्म पूर्त कहाताहै २ जब वेदमें इष्टापूर्त शब्द आता है तब उसीसे यह सब बाते स्वतः सिद्ध होगई फिर और आवश्यक्ता क्या है फिर बारह वर्ष सहस्रों वर्षोंके देवयजन होते थे तब बरावर मन्दिर थे इसमें कहना ही क्या है यह सुवर्णादिमूर्तिके प्रमाण फहे अब दूसरी काष्ठमयी मूर्ति प्रमाण देखिये। अदो यद्दारु प्लवते सिंधोः पारे अपूरुपम् । -तदारभस्व दुर्हणोनेनगच्छपरस्तरम्-ऋ० ८।८।१३।३ (अदः ) विप्रकृष्टदेशमें वर्तमान (अपूरुषम् ) पुरुपनिर्माण रहित (यत्) जो -दारु ) दारुमय पुरुषोत्तम शरीर (सिन्धोः पारे) समुद्के तटमें (प्लवते ) पत. नांन है (तत् ) सो (दारु) शरीरको (आरभस्व ) अवलम्ब वा उपासना करो नो (दुईणः ) किससे भी हनन नहीं होता (तेन) उस दारुमय देवकी उपासना एकादशसमुल्लासखण्डनम् । करनेसे (परस्तरम् ) अतिशय उत्कृष्ट वैष्णवलोकको (गच्छ ) प्राप्त हो ! यही सायणाचार्यका भी आशय है ।। इसी मंत्रमें शाकल शाखाका प्रमाण है ( यद्दार्वमानुषं सिन्धोस्तीरे तीर्ण प्रदृश्यते । तदालभ्याथ परं पदं प्रामोति दुर्लभम् ) शाकलशाखा ८ । ८३१३ ॥३ जो यह अमानुष दारुमय पुरुपोत्तममूर्ति समुद्रके तटमें जगनाथ नामसे दृश्य- मान है उसकी उपासनासे दुर्लभ परंपद अर्थात् क्रममुक्ति प्राप्त होती है। यह प्रमाण बद्भुत है जिसे अधिक देखना हो वह वेद शास्त्रों में अवलोकन करले. और देखो यदि कोई किसीके मस्तकका पूजन करै तो वह यह नहीं मानता कि इसने मेरा मस्तक पूजा किन्तु यह मानता है कि इसने मेरा पूजन किया इसी प्रकार परमात्मा सर्वत्र है जहां उसका विग्रह कल्पना कर पूजोगे वहां वह आपना पूजन मानेगा. और मंत्रार्थ तो कर्माधिष्ठातृ देवताके स्वरूपका प्रकाशक होता है कर्तव्य अर्थको स्वयं नहीं कहता कर्तव्य अर्थका वोधक कल्प और नियो जक ब्राह्मण होताहै और मंत्रार्थरूप लिंगसे नियोजक ब्राह्मणभाग श्रुतिको बलि- पता है यथा-श्रुतिलिंगवाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समयायेपारदर्विल्यमर्थवि- प्रकादिति पूर्वमीमांसा अ० ३।३ । १४ इसमें श्रुतिको लिंगसे बलिष्ठता कथन फरी है जैसे संध्या में प्राणायामके निमित नियक्त मंत्र लिंगसे पूरक कुम्भक रेचकवाले फैसे सिद्ध होते हैं इसी प्रकार सोलह संस्कारवाली क्रिया भी फल्पा. नुसार ही सिद्ध होती हैं इससे मन्त्र ब्राह्मण और कल्पक असाधारण कार्यमें मंत्र ब्राह्मण कल्प ही प्रमाण हैं, दूसरेफा कार्य दूसरेसे लिया जाय तो वही निदर्शन होगा यथा मुखका भोरसे, यद्यपि पुरुपके शरीरमें नव छिद्रोंकी छिदता समान ही है तथापि कार्यानुसारी क्रियाकी निष्पत्तिके अर्थ अपने २ कार्य में वह परोक्ष नहीं है इससे विधि कल्पानुसार ही होतीहै यया बौधायनकल्प परिचा प्रक-सू०२. (स्नात्वा शुचौ गोमयेनोपलिप्य प्रतिकृतिं कृत्वा अक्षतपुष्पैर्यथालाभमर्चयेत् ) अर्थात् स्नान कर पवित्रदेशमें गोवरसे लिपी भूमिमें देवताको प्रतिकृति ( मूर्ति) स्थापन कर गन्धाक्षतसे पूजे इससे भी मूर्तिका अर्चन सिद्ध है इससे फल्पादिके. अनुसार मन्त्रनियोजन करना ही सत्यफल देनेवाला होताहै अन्यथा अर्थमें गह-- वड होगी फर्म बिगडैगा शिक्षा कल्प व्याकरण निरुक्त छन्द ज्योतिष यह वेदांगः हैं प्रकरण अनुसार ही मन्बोंका अर्थ कहना (प्रकरणतो हि प्रवलो विषयी स्या- दिति गोपथपू० भा० १।३ । १६ ) इस कारण वेदमन्वोंके अर्थमें मकरणका भी विचार करना चाहिये । अब सजन पुरुप देखें इस प्रकरणमें केवल निराकार प्रतिपाय नहीं किन्तु सर्व प्रपंचगत पोषत् रूपवाला और वास्तवसे स्वसदृश रूपान्तरवर्जित ब्रह्म प्रतिपायः F (३७६). दयानन्दतिमिरभास्करः। है और स्वामीजीने इसी अध्यायके दो मन्त्र-पूर्व छोडकर और तीसरे मन्त्र में एक टूक काटकर प्रतिमापूजनका निषेध किया है परन्तु इससे क्या उनका मनोरय सिद्ध हो सक्ता है अब केन उपनिषद्के वाक्योंका अर्थ देखिये ॥ : (यदाचा० ) यहां भी यह विचार है कि, यह जल है लीनिये पैसा विषय नहीं यह कौनसे पदका अर्थ है इस अर्थका वाचक श्रुतिमें कोई पद, नहीं, और उपासना फर उससे भिन्न उपासनीय नहीं यह भी किसी पदका अर्थ नहीं, इस प्रकरणमें तौ उपासनाफी विधि वा फिसीकी उपासनाका निषेध नहीं किन्तु जो सर्व प्रमाणोंका अविषय स्वप्रकाश जो · सर्व प्रमाणोंका प्रकाशक है तिसको ब्रह्मरूपता कही है यह तो ज्ञेय वस्तुका विवेचन है सो अक्षरार्थको देखिये ॥ जो वास्करके प्रकाशित नहीं होता वाणीका अविषय वस्तु है आशय यह कि, जो वस्तु शब्दजन्य वृत्तिज्ञानसे प्रकाशित होता है सो वाचाभ्युदितं ऐसे कहा जाता है और ज्ञेय वस्तु ब्रह्म शब्द और शब्दनन्य अन्तःकरणको वृत्ति और वृत्तिविषय जड पदार्थ इन सर्वको प्रकाशता है, जिससे वाणी प्रकाशित होती है हे शिप्य ! तिसे ही तूं ब्रह्म जान जिसे उपासक इदं रूपसे उपासना करते हैं सो मझ नहीं आशय यह है जिसको वृत्तिविषय करके पश्चात् ध्यान करते हैं सो ब्रह्म नहीं फिन्तु वोह दृश्य कोटिम प्रविष्ट है, ऐसे सर्व प्रकाशकको ब्रह्मता फहफर उपास्य मात्रको मुख्य ब्रह्मताका निषेध किया है, एक वस्तुको उपासनीयस्य और दूसरीका अनुपासनीयत्व कहना प्रकरण अनुकूल और श्रुतिके अक्षर अनुकूल श्रुत्पर्य नहीं हो सक्ता, और वेदसिद्धान्तमें दो पदार्थ है हर और दृश्य तिसमें यह विचारणीप है कि, दयानन्दनीने जो यह जल है लीजिये वैसा विषय नहीं यह कहकर उसको उपासनीय कहा सो दृक् पदार्थको अन्तर्गत है, या दृश्यफे, यदि दृक् है तो उपास- नीय नहीं, अधिपय होनसे यदि उपासनीय है तो दृश्य है, तिसको ब्रह्मत्य नहीं, ऐसे ध्येय विलक्षण दृक् यस्तुके प्रकरणको यह श्रुति किसीको उपासनीपत्य और किसीको अनुपासनीयत्व नहीं चोधन करती, किन्तु उपास्पमात्रको ब्रह्मत्वके निरोप दारा मयस्तुको ब्रह्मत्व जनातीहै सो यह अर्थ इस श्रुतिके पूर्व तीन मन्योंमें संपा- दन किया है, विषय मिन होताहै ॥ १ ॥ (पन्मनसा० ) इस मन्त्रका भी अर्थ दयानन्दनीने अशुद्ध ही लिसा है पर जानिये कि, जिस अधिष्ठानमें दूसरी यस्तुको टपासना फरी गाती है सो अधिष्टान प्रत्यक्ष होताहै जैसे विष्णुको मतिम पैकृष्टयासी वियफी उपासना होती है, इस स्थानमें अधिष्टान प्रत्यक्ष है और आरोप्य करने योग्य विष्णु अपक्ष है, और स्वामीमी कहते हैं कि ब्रह्मफे म्यानमें जीय भार अन्तःकरणकी उपासना मत कर और प्रमो कैसा कहा नो मनमें नहीं आता, जय मनमें भी प्रदान नपा सी . . 0 एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (३७७) अप्रत्यक्ष हुआ, तो अप्रत्यक्ष अधिष्ठानमें उपासना फैस होगी जीव और अन्त:- फारणफी, और यह भी विचार करना कि, ब्रह्मके स्थानमें अन्तःकरण और जीवकी उपासनाका फल ही क्या है, और करता ही कौन है क्यों कि, उपास- नाका फल तौ उपास्य साक्षात्कार है ( सो तौ अन्तःकरण और जीवका साक्षा- स्कार पूर्वसिद्ध है) और जो उपासना है तो जीवके स्थानमें प्रत्यक्ष ब्रह्मकी उपा. सना होती है ब्रह्म भी किंचित् उपाधिविशिष्ट हो अथवा साक्षी आत्मामें अब्रह्म वासना निवृत्ति के अर्थ स्वतःसिद्ध ब्रह्मकी उपासना होती है अप्रत्यक्ष ब्रह्मरूप अधिष्ठानमें प्रस्यक्ष सिद्ध किसी पदार्थकी उपासना लोक वेदमें अप्रसिद्धका निषेध करना केवल विद्याहीनताका कारण है । अर्थ यह है कि- मनका अविषय हुआही जो मनका प्रकाशक है तिसको ब्रह्म जान और इदं उपासना करा जाता है सो ब्रह्म नहीं २ (यचक्षुपा० ) एक तो इस श्रुतिका पाठ ही अशुद्ध है क्यों कि येन चढूंपि नश्यति ऐसा शुद्ध पाठ है और स्वामीनीने ( पश्यन्ति ) लिखा है इससे उनका अर्थ ही क्या ठीक होगा; अर्थ यह है-चक्षुजन्य वृत्तिकरके निसचैतन्यज्योतिको वेपय नहीं करता लोक और अन्तःकरण पृत्तिसंयुक्त जिस चैतन्य ज्योतिसे अन्तःकरणपत्तियोंके भेदसे भिन्न चक्षुवृत्तियोंको देखता है तिस चैतन्य ज्योतिको । ब्रह्म जान और इदंरूपसे उपासना किया जाता है सो ब्रह्म नहीं और इस नंबमें सूर्य अमि विद्युत् जड कहा है सो भी बुद्धिहीनता है क्यों कि, इसी उप- नेपदके नृतीय खण्डमें अमि वायु इंदको ब्रह्मके साथ संवाद निरूपणसे देवत्व नहा है, और अमि आदित्य वायुको धर्मस्वरूप मार्ग निरूपणके प्रसंगमें -पास्पता निरूपित है और गायत्रीअर्थनिरूपणके मसंगमें आदित्यको ब्रह्मरूपता नर्णीत है ओर विद्युत् भी ब्रह्म है । विद्युद्ब्रह्मेत्याहुर्विदानात्-वृ० उप० अ० ७ वा०७ विद्युत ब्रह्म है ऐसे वेदविद्या उपदेशका आचार्य कहते हैं । अब सवमोनीका इस मंत्रमें भी अज्ञान प्रगट हो गया जो आदित्यादिको ड कहते हैं ॥ ३ ॥ दिग्देवतानुगृहीत आकाश फार्म्य मनोवृत्तिसंयुक्त भोत्र रके जिस चैतन्य ज्योतिको लोक नहीं जान सकता जिस चैतन्य ज्योतिसे नोवृत्ति सहित श्रोत्रजन्य वृतिको विषय फरा जाता है तिसको तू ब्रह्म जान और जो इदंकर उपासनीय वस्तु है सो मुख्य ज्ञेयकोटिप्रविष्ट अझ नहीं ॥५॥ पंचममत्रमें प्राणशब्दार्थ प्राण है क्यों कि प्राणमें क्रियाशक्ति है. ज्ञानशक्ति इसका अर्थ भी. " (३७८) दयानन्दतिमिरमास्कर। नहीं तब यह अर्थ हुआ फि, पृथ्वीदेवतानुगृहीत मनोवृत्ति.सहित प्राण जन्यवृत्ति फरके जिस चैनन्य ज्योतिको लोक नहीं जानता और जिस चैतन्य ज्योतिसे मनोवृत्तिसहित प्राणजन्य वृत्ति जानी जातीहै तिसको तू ब्रह्म जान जो कि इदं फरके उपास्य वस्तु है सो मुख्य ब्रह्म नहीं ॥ ५॥ अब इस प्रकारसे प्रतीको. पासना तौ सिद्ध होगई और " न तस्य प्रतिमा अस्ति " निर्णीत होगया ॥ स०प्र० पृ० ३११५०१ नास्तिको वेदनिन्दकः मनुनी कहते हैं वेदोंकी निन्दा अर्थात् अपमान त्याग विरुद्धावरण करता है. वोह नास्तिक कहाता है ॥ ३११ । २१ समीक्षा-यह स्वामीजी मानके जो वेदविरुद्धाचरण करता है वोह नास्तिक कुहाता है सो यह बात स्वामीजीपर ही लगी क्यों कि मूर्तिपूजन वेदमें विद्यमान है और यह उसके विपरीत हैं कि, मूर्तिपूजा मत करो तो यह शब्द उन्हींपर लगता है यदि कहो कि वेदमें तो मूर्तिका निपेध है " न तस्य प्रतिमा अस्ति यद्यपि इसका अर्थ पूर्व लिखचुके हैं परन्तु अभी कुछ और फहना है जब वेदूमें हम इस मंत्रका स्वामीजीका किया ही अर्थ मानले तो यह स्पष्ट होता है कि पहले मूर्तिपूजा थी तभी तो इसकी मनाई लिखा "प्राप्ती सत्यां निषेधः" प्राप्ति होनेसे निषेध होता है तो मूर्तिपूजन वेदसे भी पूर्वका सिद्ध हुआ यदि कहो फि कहीं विना प्राप्तिके भी निषेध कियाजाता है जैसा कि पिता पुत्रको समझाता है पुत्र चोरी मत करना, जुआ मत खेलना तौ अभी वालक चोर नहीं हुआ जुम नहीं खेला परन्तु पिता उसे निषेध करता है इससे विना प्राप्तिके भी निषेध होताहै यह तुम्हारा कहना ठीक नहीं यद्यपि बालक अभी चोर जुवारी नहीं हुआ है परन्तु चोरी जुआ यह दोनों विद्यमान हैं पहलेहीसे उनका ग्रहण करना तुरा जान पिताने उसे निषेध किया है, विना कोई वात हुए उसका निषेध नहीं होसक्ता इस कारण जो इस मंत्रमें प्रतिमाशब्द मूर्ति चफ मानो तो वेदसे पूर्व भी मूर्ति पाई जाती है तो वेद भी पीछेफा हुआ सो ऐसा है नहीं पेद सबसे पूर्वका है इस कारण यहाँ "मतिमा " शब्द मूर्तिका पाचक नहीं किन्तु प्रतिमान उपमानका अर्थ है तो अब वेदप्रतिपाद्य वस्तुको न मानना नास्तिकता है या नहीं। १ स० प्र० ३११५० २१ मूर्तिपूजा सीटी नहीं किन्तु एक गहरी साई है जिसमें गिरफर चकनाचूर होजाता है पुनः उस खाईस निकह नहीं सक्ता किन्न उसीमें मरजाताहै मूर्तिपूजा करते २ कोई ज्ञानी ते नहीं हुआ किन्नु मूर्ख होगये ।। ३३० । ११ एकादशसमुल्लासखण्डनम। (३७९) पृ० ३१२ पं ६ साफारमें मन स्थिर कभी नहीं होसक्ता क्यों कि उसको मन झट ग्रहण करके उसके एक एक अवयवमें घूमता और दूसरेमें दौड जाता है और निराकार परमात्माके ग्रहणमें यावत्सामर्थ्य मन अत्यन्त दौडता है तो भी अन्त नहीं पाता निरवपय होनेसे चंचलभी नहीं रहता, किन्तु उसीके गुण कर्म स्वभावका विचार करता आनंदमें मम होफर स्थिर होजाता है, और जो साका- रमें स्थिर हो तो सब जगत्का मन स्थिर होजाता क्यों कि जगत्में मनुष्य स्त्री पुत्र धन मित्र आदि साकारमें फंसा रहता है परन्तु किसीका मन स्थिर नहीं होता जतक निराफारमें न लगाये क्यों कि, निरवयव होनेसे उसमें मन स्थिर होजाता है इसलिये मूर्ति पूजन करना अधर्म है ॥ ३३० । २४ २ दूसरे उसमें करोडों रुपये व्यन करके दरिद्र होते हैं और उसमें प्रमाद होता है ।। ३ तीसरे स्त्रीपुरुषोंका मंदिरोंमें मेला होनेसे व्यभिचार लडाई बखेड़ा और रोगादि उत्पन्न होते हैं । चौथे उसीको धर्म अर्थ फाम और मुक्तिका साधन मानके पुरुषार्थरहित होकर मनुष्य जन्म व्यर्थ गमाता है। ५पाँचवाँ नानाप्रकारको विरुद्धस्वरूप नाम चरिप्रयुक्त मूर्तियोंके पुनारि. योका ऐक्यमत नट होके विरुद्ध मतमें चलकर आपसमें फूट बडाफे देशका नाशं करते हैं। ६ उसीके भरोसे शत्रुका पराजय और अपना विजय मानके बैठे रहते हैं उनका पराजय होकर राज्य स्वातंत्र्य और धनका सुख टनके शवओके स्वाधीन होता है और आप पराधीन भठियारेके टुटू और कुम्हारके गदहेये समान शराफे पशमें होफर अनेकषिधि दुःख पाते हैं । ७ सातवा जब कोई कहै कि, हम तेरे चैठने के आसन का नामपर पत्थर धर तो जैसे वह उसपर क्रोधित होकर मारता था गाली देताह पैसेही जो परमेशरफ उपासनाफे स्थान हृदय और नामपर पापाणादि मूर्तियां घरते हैं उन दुष्टयुदि- वालोंका सत्यानाश परमेश्वर क्यों न करे।। ८ आठयाँ भ्रांत होकर मंदिर देशान्तरॉम घूमते २ दुःख पाते हैं धर्म संसार और परमार्थ फाम नष्ट करते चोरादिकोंसे पीडित हो ठगोंसे ठगाते रहते हैं । नवमा इष्ट पुजारियोंको धन देते हैं ये टस धनको येच्या परस्त्रीगमन मध मांसाहार लड़ाई बखेडामध्पय करते हैं जिससे दाता मुसका मूल नष्ट होकर दुःख होता है। १० माता पिता आदि माननीपोंका अपमान कर पापागादिमतियाँका भान परते है ।
'दयानन्दतिमिरभास्करः। ११ ग्यारहवाँ उन मूर्तियोंको कोई तोड डालता वा चोर ले जाता है तब हाहा कर रोते रहते हैं । १२ वारहवाँ पुजारी परस्त्रियोंके संग और पुजारिन परपुरुपोंके संगसे प्रापः दुखित होकर स्त्री पुरुपके प्रेमके आनन्दको हायसे खो बैठते हैं । १३ स्वामी सेवककी आज्ञाका पालन ययावत् न होनेसे परस्पर विरुदभार होकर नष्ट भ्रष्ट होजाते हैं। १४ जडके ध्यान करनेवालोंका आत्मा भी नडबुद्धि हो जाता है क्यों कि, ध्येयका नहत्व धर्म आत्मामें अन्तःकरणद्वारा अवश्य आता है । १५ पन्द्रहवाँ परमेश्वरने सुगन्धियुक्त पुष्पादि पदार्थ वायु जलके दुर्गन्धि निवारण और आरोग्यताके लिये हैं टनको पुजारीजी-तोड तोडकर न जाने . उन पुप्पोंफी कितने दिनोंतक सुगन्धि आकाशमें चढकर वायु.जलकी शुद्धि पूर्ण सुगंधके समयतक उसका मुगन्ध होता उसका नाश मध्यहीमें फरदेते हैं, पुष्पादि कोचके साथ मिल सडकर उलटी दुर्गन्धिउत्पन्न करते हैं क्या परमात्माने पत्मरपर चदानके लिये पुष्पादि मुगंधियुक्त पदार्थ रचे हैं। १६ सोलहवां पत्थरपर चडे हुए पुष्प चंदन और अक्षत आदि सबका ग़ल और मृत्तिकाके संयोग होनेसे मोरी वा कुंडमें आकर सडके इतना उसप्ते दुर्गन्ध आकाशमें चढता है कि, नितना मनुष्यके मलका और सहस जीव उसमें पड़ते टसमें मरते सहते हैं ऐसे ऐसे अनेक मूर्तिपूजाफे करनेमें दोप आते हैं इस लिप सर्वथा पापाणादि मूर्तिपूना सजन लोगोंको त्यक्तव्य है और निन्होंने पापाणमय मूर्तिकी पूजा की है और फरते हैं या करेंगे ये पूर्वोक्त दोपोंसे न वचे बचते न हैं न चेंगे। समीक्षा-पह सोलह अंक स्वामीनीने मूर्तिपूनाके विरुद्ध घडे बल और कर पचनपुक्त लिखे हैं और गाटिप्रदान करनेमें भी यही सेसी पारी है निमका वर्णन इसीमें है परन्तु यह सोलह वाक्य टन्मत पुरुपसे पचन है निस घोडी भी एदि होगी यह ऐसी बातें न लिखेगा यस यही स्यामीनीकी सभ्यता है अब क्रमा नसार इनके उत्तर लिखते हैं। १ बिना स्यूल देखे सत्मका ज्ञान नहीं होता विना सीटीके महलपर नहीं पर मना विना अक्षराभ्यास किये कोई अन्य नहीं पटसक्ता इसीसे विना माफारकी सासनाके निराशारकी मानि नहीं हो सनी जैस हमको पृथ्वीका स्मृलाप देख: र इस परमाशुरूप मम शरीरका ज्ञान होता है पेस ही साचारको देशर राकारका ज्ञान होता है, इसी कारण पहलं पिराठादि रूपी उपासना कही है। ना आपार आप नहीं टहाना इसी कारण विना साकारमें लगायं मन स्थिर एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (३८१) नहीं हो सक्ता क्यों कि, साकारके किसी एक अंगकी शोभा देखकर मन उसम लग जाताहै और अपना चंचलपना भूल जाताहै, वही ध्यान रहनेसे वही प्रतीत होने लगता है, उसीके भाकारमें मम रहता उसीके गुणकर्म स्वभावको विचारता है, क्यों कि साकार होनेसे अवतारोंकी भी अनिर्वचनीय शोभा है, जैसे श्रीराम- चन्द श्रीकृष्णचन्दादि इनके गुण कर्म स्वभाव और प्रत्येक अंगमें मनका दौडना तो क्या एक ही अंगमें निश्चल होजाताहै, जब सगुण उपासनामें मन निश्चल हुआ तो अभ्यास होते होते निराकारमें भी मन ठहर सकता है, क्यों कि, मन दौडे कहां देखे क्या ? फौन निशाना है, शून्यमें क्या टटोले इस कारण साकारमें ही पहले मन दृढ होकर पीछे निराकारमें स्थिर होसकता है, पहले थोडे जलमें पैरना सीखे तो गहरेमें भी पैर सकता है, जो थोडे जलमें स्थिर नहीं रह सकता वह गहरे जलमें कूदनेसे डूब जायगा और पता भी न लगैगा, ऐसेही साकार निराकारमें. मनकी वृत्ति जानलीजिये, ऐसे ही कुटुम्बादिमें मनुष्यों के मन लगे हैं और स्थिर हो रहे हैं यदि जगत्में कुटुम्बादिकोंमें मन नलगै तो सब ही विरक्त हो जायँ और फकीर हो जगलमें जा रहैं, यह आकारका ही प्रताप है जिसके द्वारा मनुष्य मेममें मनको स्थिर किये हैं, ऐसेही प्रथम साकाररूप परमात्मामें मन लगजाय तब निराकारमें पहुँचकर स्थिर होता है, मूर्तिपूजा बड़ी उपयोगी है इसके करनेसे बडे बडे ऋषि मुनि मुक्तिपदवीके अधिकारी हुए हैं,यह मूर्ति ही परमेश्वरम मनको आकर्पण करती है, युधिष्ठिरादिने मूर्तिपूजन करके ही सिद्धि पाई है यही परमेश्वरमें प्रीति कराती है और यही निराकारतक पहुंचाती है नाम ही नामीको मिला देता है इस कारण मूर्तिपूजन वेदविधान होनेसे धर्म है ।। २ दूसरे मन्दिरों जो रुपया लगता है उसमें बड़ा लाभ होता है हानि नहीं होती परदेशी महात्मा लोग आकर ठहरते हैं और भक्तजन उसमें आकर बैठते और प्रातःसन्ध्या और भगवान्का नामस्मरण करते हैं, तथा उनके गुणकथनसे वित्तमें सत्त्वगुणांगट होता है, और जो कोई उस ओरको निकलते हैं वे नारायणका नाम लेकर दंडवत करते हैं, बद्भुत मंदिरोंमें विचारे परदेशी सदावर्त भी पाते हैं, बनवानेवालेका धर्मके सिवाय नाम भी चिरस्मरणीय होताहै ॥ ३ तीसरे मन्दिरमें सदा मेला नहीं होता वर्षमें एक या दो बार होता है केवल मान्दिरके भीतर ही स्त्रीपुरुप जाते हैं जो कि, व्रत धारणकर पूजन करते हैं, जो सारे दिन प्रत धारण कर भक्तिपूर्वक नाम स्मरण करते हैं वे व्यभिचारमें क्योंकर प्रवृत्त होसक्ते हैं उनका चित्त तो सत्त्वगुणमें प्रवृत्त होताहै और पूजन करनेवालोंको रोग भी बहुत नहीं होते, दोनों समय लान करते धूप, कपूर पृत बालते हैं तथा व्याभिचार एकान्तमें होताहै देवालयमें दो चार महात्मा प्रतिक्षण विद्यमान रहते - (३८२) दयानन्दतिमिरभाकरः। हैं, मलबाल बाहरसे खडे होकर देखते हैं, इससे व्यभिचार उत्पन्न नहीं होता और जिनके मन व्यभिचारमें लगे हैं न घे भक्ति करते हैं और निराकारसाकारका टन्हें विवेक नहीं रहता, घे तो दोनों पक्षमें एकसे हैं और मन्दिरमें दो चार लोग रहते ही हैं और मन्दिरमें ईश्वरफी विशेष सानिध्यता हानसे पापाचरणका भय रहताहै इस कारण मन्दिर अवश्य बनवाये ।। ४ चौये मूर्तिपूजनसे धर्मादिपदायोंकी प्राप्ति होती है और पुरुषार्थ बढताहै जब कि, पूजामें भक्ति होगी ती सत्यभापणादि शुभकर्म करेगा, और ईश्वरके चरित्रोंके स्मरणसे ज्ञानकी प्राप्ति होगी, और ज्ञान होनेसे मुक्तिका अधिकारी होताहै क्या कि ईश्वरके नामसे और ज्ञानसे सम्बन्ध है और यही मनुष्यजन्म लेनेका फल है कि ईश्वरके चरित्र हृदयमें दृढ होना, सो प्रतिदिन मूतिम अर्चन वन्दनसे दृढता आनाती है । ५ पुजारीलोग ती मन्दिरमें सेवा करनेको नौकर होते हैं वे कभी नहीं लडते न आजतक कहीं पुनारियॉफी लडाई होती सुनी बहुधा मन्दिरोंमें श्रीकृष्ण पारघुनाय. जीको मूर्ति होती हैं, सो उनके स्वरूप भी ऐसे मनोहर हैं किदेखते ही मन निश्चल होनाताहै, शिवमूर्ति भी सब मंदिरों में एकसी ही होती हैं कोई यह नहीं कहता कि, इस मंदिरके अतिरिक्त सब मंदिर निकम्मे हैं, जिससे लड़ाई द्रोह है, किन्तु सब मंदिरोंके पुजारी परस्पर मेल रखते हैं और उत्सवोंमें एक दूसरेके मंदिरमें आते जाते रहते हैं और उत्सवोंमें भगवान्की मूर्तिका विशेष शृंगार करनेसे यह लाभ होताहै कि ईश्वरमें मनुष्योंको भावभक्ति अधिक हो जाती है, ईश्वरके भयसे वे कुकर्मके साहसी. नहीं होते इससे देशको भलाई होती है । ६ छठे मूर्तिमें ईश्वर पूजन करनेके वास्ते है न कि हमारे संग टहलुओंकी भांति डंडा लिये फिरे, इस कारण जयपराजयके निमित्त बैठरहना बुद्धिमत्ता नहीं ईश्वरने यह शरीर उद्योग करनेको दिया है इसे पाकर आलसी हो वैठे रहना उचित नहीं है यदि तुम्हारी पूर्ण भक्ति है और सामर्थ्य नहीं है तो वह इच्छानुसार बहुत सहायता फरताहै और आगे भी करै ही गा परन्तु हस्तपादादि पुरुषार्य ही करनेको दिपे हैं, और जो भजनानंदी हैं उन्हें शत्रु मित्रसे क्या काम वे तौजो कुछ करते हैं इसे ईश्वरकी इच्छा और प्रेरणा मानते हैं, फिर कौनसा उनका राज्य बिगडगया है ईश्वरने यह नहीं कहा है कि, तुम अनगरसे एक स्थानपर पडे रहो किन्तु पुरुषार्थ करनेको फहता है जितनी सहायता निराकारं उपासनाम करता है उतनीही सगुण उपासनामें फरताहै, और जो विशेष ज्ञानी हैं उनके कोई शमित्र नहीं हैं टनकी समान दृष्टि होती है इस कारण वे मुक्तिके अधिकारी होते हैं ।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (३८३) ७ सातवें यह बात तो लोकमें भी प्रसिद्ध है कि, जब कोई किसीके नामपर कोई स्थान बनवावै और उसकी मूर्ति बनाकर उसकी मान बडाई प्रतिष्ठा कर तो वोह जिसकी वोह मूर्ति या मंदिर है अधिक प्रसन्न होताहै क्यों कि जब उसके नाम और मूर्तिको इतनी प्रतिष्ठा करते हैं यदि वोह स्वयं उपस्थित हो तो कितनी प्रतिष्ठा हो “यदि उसके नाम वा मूर्तिका तिरस्कार करें तो चाहै बुरा माने, परन्तु मूर्ति परमेश्वरकी उपासना करनेहारे कभी मूर्तिका तिरस्कार नहीं करते, देखने में आताहै कि, आजदिन विक्टोरियामहारानीकी मूर्ति शतशः स्थानोंमें विद्यमान हैं बडे बडे मंदिर ( हाल ) बने हैं तथा जब कोई गवर्नर जनरल वा प्रिन्स ( राजकुमार ) आते हैं तो उनके स्मरणीय चिह्न अबतक बनाते हैं, कहीं २ मूर्ति भी स्थापन करते हैं, उसको आदरसे देखते हैं, परन्तु वोह मनुष्यकी मूर्ति है, इस कारण उसका पूजन नहीं होता काहिये क्या इन मूर्तियों से महारानी और लाट प्रिन्सादि कुछ बुरा मानते हैं प्रत्युत प्रसन्न होते हैं क्या कुछ उनका प्रताप घटता है, नहीं पटता, किन्तु अधिक बढता है सब लोग देखते हैं मनमें अधिक ध्यान करते हैं कि, यह हमारा राना है बुरा काम मत करो दंड देगा, इसी कारण सिक्कोंतकमें मूर्ति रहती है इससे क्या कुछ तिरस्कार होता है इसीसे पहले राजा बादशाह आदि अवत्तक सिक्कोंमें नाम मूर्ति आदि रखते हैं, जिसे देखते ही उनकाझट स्मरण होजाता है, इसी प्रकार यदि कोई किसीकी मूर्ति बनाकर उसकी बडी भक्ति कर पूजामार्थना करै यदि वोह मूर्तिका प्रतिनिधि जीवित हो तो निश्चय अधिक प्रसन्न होता है और जाकर पूछताहै कि, कहो क्या चाहतेहो मैं प्रसन्न हूँ इसी प्रकार व्यापक ईश्वरको प्रार्थना करे तो क्या वोह प्रसन्न न होगा निश्चय प्रसन्न हो अपने भक्तोंका भला फरेगा इस कारण मूर्तिपूजनसे ईश्वर प्रसन्न होता है फिर समाजों में आपकी फोटो लटकाई जाती घडीके साथ चिकती है जीतेजी आपकी तस्वीर खिची उस समय आपने क्रोध क्यों न किया आपकी गाली आपहीपर पडी इस लेखसे तो आपने ईश्वरको क्रोधी भी मनुष्य जैसा मानलिया । ८ आठवाँ जब लोग दूरदेशमें दर्शनोंकी इच्छासे जाते हैं, उनके मनमें ईश्वरकी भक्ति अधिक उत्पन्न होती है, और देशदेशान्तरोंके चरित्र मनुष्यादिकोंकी भेंटसे मनकी यह इच्छा भी निवृत्त होजाती है कि, हमने अमुक स्थान नहीं देखा इससे भी मनमें निश्चलता प्राप्त होती है और वोह पुरुष जो दूर देश दर्शनोंकी इच्छासे जाते हैं ये कोई कार्य धर्मविरुद्ध नहीं करते, क्यों कि वे जानते हैं कि, यदि हम कुछ पाप करेंगे तो यह यात्रा दर्शनोंका फैल द्रव्यादि सब वृथा होजायगा, इससे टनके सब कार्य सधर्म होते हैं और धर्मसे परमार्प बनता है, यानी लोग देशान्तरमें इकडे होकर जाते हैं, इस कारण चारोंका भी विशेष डर नहीं होता, यदि विदेश (३८४) दयानन्दतिमिरभास्करः। जानेम दुःख है तो स्वामीजीके कथनानुसार व्यापार भी बंद होना चाहिये क्य कि व्यापारमें भी चोरादिकका भय है और व्यापार क्या प्रत्येक ही यात्री चोरादिकका भय होता है और जहानकी यात्रामें प्राण जानेका भय और रेलक यात्रामें गाडी लड जानेसे प्राणोंका दान, पैदल जानेमें चोरोंका भय तो बस स्वामीजी एक नोटिस रेल जहाजमार्ग इन सबका सत्यानाश कर देते, तो भी देशका उनकी दृष्टिम उपकार ही होता, परन्तु स्वामीजीने पूर्व में दूर देशमै व्याह करनेकी क्यों अनुमति देदी उसमें भी तो चोरादिकका भय है और भला जब किसीके घर से ही कोई चोरी कर लेजाय तो क्या तुम्हारे सत्यार्थप्रकाशके पत्रों में अपना घर बनाकर बैठ जाय इसी भरोंसे परदेशके हितकारी बनने चले जब परदेशमें जायँगे तो ठगोंको पहचानकर उनसे सब प्रकारकी चतुरता जानः जायँगे और जो कोई घर बैठे ही रसायन बना लेनापतो क्या करो। ९ नवमें बहुधा पुजारी ब्राह्मण होते हैं केवल दो चार रुपयेफे नौकर होते हैं कुटुम्बी होते हैं, उन लोगोंका इतनेमें गुजारा नहीं होता जैसे तैसे गुजरान करते हैं, जो कुछ चहावा चढता है वोह भी कुछ ऐसा बहुत नहीं होता, और रोग नहीं चढता केवल त्योहारोंमें ही आताहै. ऐसे समयमें द्रव्यकी उनको भी आय. श्यकता रहती है, जब कि उदरसे अधिक उनको प्राप्ति ही नहीं होती तो मांस मदिरा वेश्यादिकमें दो रुपये रोग कहांसे आवै, क्या कोई समानका पोपाध्यक्ष उनको द्रव्य दे देता होगा और जहां बडे २ मंदिर हैं अधिक चढाया चढतोहै वोह मंदिरके कोपमें जमा होता है और वोह ठाकुरजीफे भोग वखादिमें पप होता है, पुजारीजोको फेवल येतन मिलता है और कुछ नहीं यदि साधु पुजारी हुर तो तीसरे छठे महीने में भंडारा करते रहते हैं, आये गयेफा सन्मान करते हैं तुम्हारे यहाँ तो एक रात ठहरनेकी भी जुगत नहीं है कोरी याते हैं पुनारियोंपर दोष देना यया है और यदि कोई किसीको कुछ पस्नु प्रदान करें तो दाताग ती फल हो चुका यौह टस व्यका जो चांद सो फर और यदि यही है तो गरीपसाने मोहतानोंको दान पोडीखाना शफाखाना आदि सबमें द्रव्य दिपा हुमा पपा शेगाय, क्यों कि, विषयी समझते हैं कि, कुकर्म करनेसे पदि रोग होगाप तो शफाखाना मोनूद है आराम होगापगा, पास नहीं रदैगा तो मोहतागरमाने में का पडेगे, इत्यादि इन स्थानोंमें दिपाहा ट्रम्प भी यादी हानायगा और मार इन स्थानोंकी पढाई करते हैं इससे यह फयन वृपा है यदि ऐसा हो तो वो पौडी भी न दे, देनेयाला ईश्वरकं नामपर देता है कुछ इसे नहीं देना जैसाका लेकर द्रव्यमा गो पाई सो फर पोद दृश्य दमरी देना ही पड़ेगा पौदीदार- मी पाया है इसमें मूर्तिपूगना निरोप और पगारियापर दोष नहीं होगा।
एकादशसमुल्लासखण्डनम्। १० दशयाँ जो मूर्तिका मान फरते ईश्वरकी आज्ञा मानते हे वे अपने बडोंकाभी मान फरतेहैं माता पिताको विशेष प्रतिष्ठा करते हैं क्यों कि यह किसी धर्मग्रन्थमें नहीं लिखा कि, मूर्तिमें पूजन करनेवाले अपने माता पिताकी आज्ञा मत मानो, किन्तु जो मूर्तिमें ईश्वरको पूजन करतेहैं वे धर्मके भयसे अपने माता पिताफी विशेष प्रतिष्ठा करतेहैं यह स्वामीजीकी भूल है जो कहते हैं मान नहीं करते राम- चन्दकी पूर्ति वा चरित्र श्रवण करतेही माता पिताकी आज्ञा पालन भाई भक्तिका चमत्कार कैसा कुछ हृदय में छा जाता है । ११ पुजारियोंपर तो परस्त्रियोंके संगका दोषारोप करतेहो और आप प्रगट एफ स्त्रीको ग्यारह पति बनानेकी आज्ञा देते हो जो कर्म ठीक वेश्याकी नाई है और मंदिरमें पुजारी व्यभिचार नहीं करसता क्यों कि स्त्रीपुरुष सायंप्रातः मंदि- रमें दर्शन करनेको आतेहैं और दो चार साथही आते हैं इससे व्यभिचार नहीं होसक्ता और जिनके मनमें ईश्वरका प्रेम है वह दर्शन करनेसे अधिक बढता है और भक्ति तीव्र होती है कुमार्गसे बचते हैं और जिनके मन बुरे हैं उन्हें पुनारी पुजारन क्या चाहें नहीं जो चाहै सो करसकतेहैं, जिन्हें परमेश्वरका भप नहीं थे वा सो फरें, और पुजारिन परपुरुषोंका संग क्योंकर. करसकती हैं क्या पुनारी उनके पास नहीं जाते हैं दिनमें भोजन करने परफो जाते, रात्रि में संध्याके उप. रांन्त जो गृहस्पी हैं वे घर पर चले आतेहैं यदि इतनेहीमें घे परपुरुपगामिनी होना तो यह दूकानदार और व्यापारी लोग अपने रोजगार छोड स्त्रियोंकी रखवाली करें और क्या सव स्त्री अकेली रहतीहें तो बस सब ही स्त्री व्यभिचारिणी हो जॉप ती वाहिये फि, सघ लोग त्रिपोंको गांउमें बांधे फिरा करें, यह तो स्यामी- जाने घडी फठिनताईसे विचारी होगी । पहले तो पतिकी अनुपस्थिति, नियोग ठहरायाषा:अब क्या होगया॥ १२ चारहवाँ मूर्तिको कोई चुरा,लेनाय या तोडे सौ रोर्वे नहीं तो क्या हँसे जिसका जव कुछ खो जाता है या टूट जाता है तो वह क्या ! हानि होनानेवाले सब ही दुःखी होते हैं, फिर यह धस्तु जिससे अपने इष्ट देवका स्मरण करत खों 'जाय तो क्यों दुःखी हों, क्यों कि और स्थापन करनेसे दव्यका सर्च होहीगा यदि मति लेगानेके दुःससे मूर्तिपूजन करना धुरा है तो निस पस्तुके जुराले जाने . या टूट जानेका भय हो षह कुछ भी पास न रखनी चाहिये तो यह सारी धनदौलत जो आपके अनुपापियोंके पास हैं यह सव फिम्या देना चाहिये मकानाफे टूटनेका डर है, दम्पका नुरापे जानेका, कपडेके गल जानेका, तो इस आपके वचनके विवासियोंको उचित है कि घरवार छोड यख त्याग दें। .
(३८६) दयानन्दतिमिरभास्करः। 'नगफिरें और आपसे ती स्थिरताफी फदा आशा मुंशी इन्द्रमणिके मुकदमे चपा आपने थोडी हाय २ मचाई थी। १३ स्वामी सेयफकी आज्ञा नहीं पालन होनेमेस्वामीनीने फौनसा हेतु निका लाह पूजन करने में स्वामी सेवफमें क्या विरुद्रता होगी जो विदेशीय जना नीफर हैं ये पूना ऐसे समय करते हैं कि, निससे अपने स्वामीके काममें वापा न पडे, क्यों कि, जानते हैं आज्ञा टल्लंघन करनेसे नौकरी नायगी, और ना पूजारियों पर आक्षेप है तो उनके स्यामीकी आज्ञा ती मंदिरके स्वच्छ रखने और भगवन्मूर्तिके शृंगार फरनेकी होती है, सो यह फरतेही हैं, पदि न करें तो नौकरी कहाँ, इससे भी स्वामी सेवफफा विरोध नहीं होसक्ता, पूजन करनेवालोंको यह माज्ञा नहीं कि, स्यामीसे लडपडो, पदि ईश्वरके स्वामिभावमें न्यूनता आवै सो भी नहीं क्यों कि उसमें तो ईश्वरको स्वामी मानना भक्ति स्तुति करना विधान है. हो एफ बात है कि, यदि कोई यवन अपने यहाँके सनातन धर्मावलम्बी नौक. रसे यह कहै कि, तुम पूजन करना छोडदो इससे तो विरोध होता है परन्तु यह बात इसीमें नहीं यह यह भी फहसक्ता है फि, वेदको मत.मानी, तो इसमें भी वह दोप आसक्ता है, अंग्रेजोंमें यह बात नहीं मुसलमान इन लोगोंको नौकर नहीं रखते हो यह बात आपहीमें है कि जो दयानंदी न हो उसे अपने यहां जगह मत दो ईश्वरके पूजनमें तो यह शिक्षा होती है कि जैसे मेरी भक्ति फरतेहो वैसे ही अपने स्वामी सेवकसे बरतो ॥ १४ मूर्तिमें ईश्वरफा पूजन करनेवाले कभी जडफा ध्यान नहीं करते जो स्तोत्र पठे जाते हैं किसीमें यह नहीं लिखा है हे परमेश्वर! तुम जड हो अशक्त हो पत्पर हो 'परन्तु उन स्तुतियोंमें तो परमेश्वरके सर्वज्ञादि गुण वर्णन किये हैं, इस कारण मनमें फभी जडत्व धर्म नहीं आता परन्तु जैसे शून्यवादी आप हैं ऐसेका ध्यान करनेसे मनमें शून्यता धर्म प्रगट होता है, नाम हारे कल्पित हैं नामी कोई नहीं उपासनाफे अर्थही समीपमें पूजन करनेके हैं फिर शून्यमें क्यों पूजन करै वस शून्यही अन्तःकरण होगा ॥ * १५ पहले तो आपने हवन विषयमें हवनसे वायु शुद्धि मानी है अब फूलोंसे यायु शुद्धि मानी है (पहले तेल पुलेलका निषेध किया था) यदि पुप्पॉफी सुगन्धिसे ही परमात्माको वायुशुद्धि करनी इष्ट थी तो विलापतादि देशोंके पुष्प सुगन्धिहीन क्यों बनाये यहां हवन भी नहीं होता तो वस मना पोररोगप्सि पीडित होना चाहिये पानी नहीं वरसना चाहिये, सो ऐसा नहीं होता, मृतक दाहसे भी वायुमें दुर्गन्धि फैलती है इसका भी निषेध करते जैसे और देशोंमें 'मा प्र० यहाँ चुप लगागये हैं।
, रोग होते तैसे यहां भी होते हैं यहां हवन और सुगन्धियुक्त पुष्प रहनेसे भी रोग शान्त नहीं होता, इस भारतवर्षके वागोंमें सहस्रों भन पुष्प उत्पन्न होते हैं, उन- से थोडेसे पूजनको आते हैं प्रायः माली लोग पुप्पादिकांको वेचते हैं, उनकी रानीवका भी चलती है, और फिर भी जो फूल खिलते हैं वे ही पूजनमें काम गाते हैं जो कि, एक दिनमें ही वृक्षपर रहनेसे सूखकर गिरजाते हैं कुछ मंदिरोंमें गनेसे उनकी सुगन्धि फमती नहीं हो जाती, सुगन्धियुक्त ही चढाये जाते हैं, ससे सुगन्धि ज्योंकी त्यों फैलती रहती है दूसरे दिन वे अलग कर दिये जाते हैं, दि उनका तोडना ही मन है तो यह इतर फुलेल हारादि सब पृथा ही हैं जिनका चार प्राचीन कालसे चलाआता है, और इनके तोडनेसे हानि भी नहीं होती न्तु लाभ होता है बाग बहुधा नगरसे बाहर होते हैं उनकी मुगन्धिसे वाहरकी (वायु पवित्र रहती है यदि यह प्रत्येक मंदिर वा पुरुषोंके स्थानमें आती एघरफी वायु शुद्ध होनाती है आर्यावर्तदेश तौ वन उपधनके पुष्पोंसे परिपूर्ण, जिन्हें कोई तोडनेको नहीं जाता वे सब वायुको शुद्ध सक्ते हैं चंदनके पक्ष शर करादि पह सर सुगन्धित द्रष्य है, इस कारण पुप्पोंसे परमेश्वरकी पूजा (नी श्रेष्ठ है जहां मूर्तिपूजन नहीं होता उस देशकी पृथ्वीमें अधिक मुगान्धत प नहीं होते यह इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण है ।। १६ सोलहवां मंदिर सब पक्के बने हुए होते हैं बड़ी मूर्तियोंको सान नहीं या जाता छोटी मूर्तियोंका कटोरोंमें स्नान कराते हैं, उसमें चंदन तुलसीदल दिक होता है उसीका चरणामृत लेते हैं, वह जल पुण्यदायक और तुलसीदल जानेसे हाजिम भी हो जाता है परन्तु दयानंदनीका यह आक्षेप शिवजीके परपर है क्यों कि, शिवालयके पीछे ही जलहरी होती है सब पूजन करनेहारे नते हैं कि, जलहरीमें जल ही जाता है वेलपत्र पर पुष्पादिक नहींनाते एकाध मानेकी कोई बात नहीं पह वेलपत्र वा पुष्प जो शिवनीपर चढाये जाते पुजारी दूसरे दिन उन्हें लेनाते हैं कहीं नदीमें वहा आते था औरफहीं डाल हैं जलहरी रोज भरनाती हैं कुछ कुआ तो है ही नहीं जो मुइताम भरे सड़े पदि दूसरे दिन पुजारी जलहरीका पानीन निकाले तो पानी सब स्थानमें नेलगे और लोग उस पुजारीको निन्दा फरें इस कारण वह नित्यप्रति जल ल हालताहै मंदिरों में यह बात होती ही नहीं विदित होता है कि, स्वामी- इस प्रसंग लिखने या तो किसी सडे दुर चौवके धोरे बैठे थे या कहीं का स्वप्न देखा होगा सोलह दोष जो उन्होंने मूर्तिपूजनपर किये हैं इसमें भी नहीं पटसकता। ० पृ० ३१४ पं० २६ इस मूर्तिपूजाको लोगोंने इस वास्ते स्वीकार किया है (३८६) दयानन्दतिमिरभास्करः। 'नग फिरें और आपसे तो स्थिरताफी फहां आशा मुंशी, इन्द्रमणिके मुकर क्या आपने थोडी हाय २ मचाई थी। १३ स्वामी सेवककी आज्ञा नहीं पालन होनेमें स्वामीजीने कौनसा हेतु -लाहै पूजन करनेमें स्वामी सेवकमें क्या विरुद्धता होगी जो विदेशीय गा नौकर हैं वे पूजा ऐसे समयमें करते हैं कि, जिससे अपने स्वामीके काममै व न पड़े, क्यों कि, जानते हैं आज्ञा उल्लंघन करनेसे नौकरी नायगी, और 'पूजारियों पर आक्षेप है तो उनके स्वामीकी आज्ञा तो मंदिरके स्वच्छ रखने भावमूर्तिके शृंगार करनेकी होती है, सो वह फरतेही हैं, यदि न करें तो नौ कहां, इससे भी स्वामी सेवकका विरोध नहीं होसक्ता, पूजन करनेशलोंको आज्ञा नहीं कि, स्वामीसे लडपडो, यदि ईश्वरके स्वामिभावमें न्यूनता आय : भी नहीं क्यों कि उसमें तौ ईश्वरको स्वामी मानना भक्ति स्तुति करना विध है. हां एक बात है कि, यदि कोई यवन अपने यहां के सनातन धर्मावलम्बी नौर रसे यह कहै कि, तुम पूजन करना छोडदो इससे तो विरोध होसक्ता है परन्तु म बात इसी में नहीं वह यह भी फहसक्ता है कि, वेदको मत-मानी, तो इसमें - चह दोष आसक्ता है, अंग्रेजोंमें यह बात नहीं मुसलमान इन लोगों नौकर नहीं रखते हो यह बात आपहीमें है कि जो दयानंदी न हो उसे अप यहां जगह मत दो ईश्वरके पूजनमें तो यह शिक्षा होती है कि जैसे मेरी भनि फरतेहो वैसे ही अपने स्वामी सेवकसे बरतो ॥ १४ मूर्तिमें ईश्वरफा पूजन करनेवाले कभी जहफा ध्यान नहीं करते जो स्तो पढे जाते हैं किसीमें यह नहीं लिखा है हे परमेश्वर! तुम जड हो अशक्त हो पत्पर ही 'परन्तु उन स्तुतियोंमें तो परमेश्वरके सर्वज्ञादि गुण वर्णन किये हैं, इस कारण मनमें फभी जडत्व धर्म नहीं आता परन्तु जैसे शून्पवादी आप हैं ऐसेका ध्यान करनेसे मनमें शून्पता धर्म प्रगट होता है, नाम तुम्हारे फल्पित हैं नामी कोई नही उपासनाके अर्थही समीपमें पूजन करनेके हैं फिर शून्यमें क्यों पूजन कर पस शून्पही अन्तःकरण होगा | १५ पहले तो आपने हवन विषयमें हवनसे वायु शुद्धि मानी है अब पूटोसे यायु शुद्धि मानी है (पहले तेल पुलेलमा निषेध किया था ) यदि पुमा सुगन्धिसे ही परमात्माफो पापशुद्धि करनी इष्ट थी तो विलापतादि देशों के पुष मुगन्धिहीन क्यों बनाये यहाँ हपन भी नहीं होता तो यस ममा पोररोगाम पीडित होना चाहिये पानी नहीं परसना चाहिये, सो ऐसा नहीं होता, मृदा दाइसे भी पापुमें दुर्गन्धि फैलती है इसका निप करते जसे और देसी *मा. प्र. यहाँ सुपरगागये हैं।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् .(३८७). रोग होते तैसे यहां भी होते हैं यहां हवन और सुगन्धियुक्त पुष्प रहनेसे भी रोग शान्त नहीं होता, इस भारतवर्ष के बागोंमें सहसों मन पुष्प उत्पन्न होते हैं, उन- मेंसे थोडेसे पूजनको आते हैं प्रायः माली लोग पुष्पादिकोंको बेचते. हैं, उनकी आजीवका भी चलती है, और फिर भी जो फूल खिलते हैं वे ही पूजनमें काम माते हैं जो कि, एक.दिनमें ही वृक्षपर रहनेसे सूखकर गिरजाते हैं कुछ मंदिरोंमें आनेसे उनकी सुगन्धि कमती नहीं हो जाती, सुगन्धियुक्त ही वढाये जाते हैं, इससे सुगान्ध ज्योंकी त्यों फैलती रहती है दूसरे दिन वे अलग कर दिये जाते हैं, यदि उनका तोडना ही मन है तो यह इतर पुलेल हारादि सब वृथा ही हैं जिनका प्रचार प्राचीन कालसे चलाआता है, और इनके तोडनेसे हानि भी नहीं होती किन्तु लाभ होता है बाग बहुधा नगरसे बाहर होते हैं उनकी सुगन्धिसे बाहरकी ही वायु पवित्र रहती है यदि वह प्रत्येक मंदिर वा पुरुषोंके स्थानमें आवे तो घरघरकी वायु शुद्ध होजाती है आर्यावर्तदेश तौ वन उपवनके पुष्पोंसे परिपूर्ण है जिन्हें कोई तोडनेको नहीं जाता वे सब वायुको शुद्ध कर सक्ते हैं चंदनके वृक्ष केशर करादि यह सब सुगन्धित द्रव्य हैं, इस कारण पुप्पोंसे परमेश्वरकी पूजा • करनी श्रेष्ठ है जहां मूर्तिपूजन नहीं होता उस देशकी पृथ्वीमें अधिक मुगन्धित पुष्प नहीं होते यह इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण है ।। १६ सोलहवां मंदिर सब पक्के बने हुए होते हैं बड़ी मूर्तियोंको स्नान नहीं कराया जाता छोटी मूर्तियोंका कटोरोंमें स्नान कराते हैं, उसमें चंदन तुलसीदल आदिक होता है उसीका चरणामृत लेते हैं, वह जल पुण्यदायक और तुलसीदल पड़ जानेसे हाजिम भी हो जाता है परन्तु दयानंदनीका यह आक्षेप शिवजीके मंदिरपर है क्यों कि, शिवालपके पीछे ही जलहरी होती है सब पूजन करनेहारे जानते हैं कि, जलहरीमें जल ही जाता है बेलपत्र वा पुष्पादिक नहीं जाते एकाध चले जानेकी कोई बात नहीं वह बेलपत्र वा पुष्प जो शिवमीपर चढाये जाते हैं वे पुजारी दूसरे दिन उन्हें लेनाते हैं कहीं नदीमें बहा आते षा और कहीं डाल आते हैं जलहरी रोज भरजाती हैं कुछ कुआ तो है ही नहीं जो मुद्दतोंमें भरे और सड़े पदि दूसरे दिन पुनारी जलहरीका पानीन निकाले तो पानी सरस्थानमें फैलनेलगे और लोग उस पुनारीको निन्दा करें इस कारण वह नित्यप्रति जल निकाल डालताहै मंदिरोंमें यह बात होती ही नहीं विदित होता है कि, स्वामी- जी इस मसंगके लिखने या तो किसी सडे हुए चौवच्चेके घोरे बैठे थे या कहीं चौषधेका स्वप्न देखा होगा सोलह दोष जो उन्होंने मूर्तिपूजनपर किये हैं इसमें एक भी नहीं घटसकता। स. पृ० ३१४ पं० २६ इस मूर्तिपूजाको लोगोंने इस वास्ते स्वीकार किया है - (३८८) दयानन्दतिमिरभाएकरः। फिजी माता पिताके सामने नैवेद्य भेट पूना धरैगे तो पे स्वपं खालेंगे हमारे मुह या हायमें कुछ न लगेगा ।। ३३३ । २४ . समीक्षा-गाने स्वामीनीकी त्रुदिपरक्या परदापडगया है जो मनमानी गाते हैं जो भोग ईभरको लगाया जाता है योह सबको बांटानाता है और पूजन कर नेहारे गृहस्थो ईभरको भोग लगाने उपरान्त भोजन करते हैं एक यहभी लाम हे कि, भोग लगीहई मुन्दरयस्तु सबको बाटते हैं और ऐसे तो माता पिता बहुत कम होंगे जो अपने पुत्रों साने पीनेसे दुःखी होते हो और जो अपने मातारि- ताके पालनमें असमर्थ और मातापिताफे दोही हैं उन्हें पूनामें कर भक्ति होगी स्पों फि, योहः जानते हैं कि, यदि हमने भोग लगाया तो प्रत्येक मनुष्य इसके लेनेके अधिकारी हो जायेंगे, इस कारण वे कहीं एकान्तमें। वस्तु खालेतेहैं औ जो भक्तिमान हैं वे भोग लगाते अपने माता पिताको देते हैं । अब मृन्मयमूर्तिपूजनप्रतिष्ठादि घेदमन्त्रोंसे लिखते हैं। यजुस्यशीर्पच्छिन्नुस्यरसाव्यक्षरत्सुइमेद्यावापृथिवीऽअगच्छद्यन्म दियंतद्यदापोऽसौतुन्मृदश्वापांचमहावीराकृताभवन्ति तेनैवेनमे- तद्रसेनसमर्द्धयतिकृत्स्नंकरोतीति-ब्राह्मणम् श. १४३३१२१९ अथ मृत्पिण्डं परिगृहोति श०१४।१।२।८ मृदमादत्ते पिण्डवद्देवी द्यावापृथिवीति का० २६ । ११४ भापार्थः । वैष्णवी तेज मायाम गिरा उस समय कुछ दीप्तिरूपीः रस पृथ्वीस्वर्गमें व्यान हुआ जिसको जल और मिट्टी कहते हैं और इन्ही दोनों पस्तुसे महावीर की मूर्ति बनाते हैं इस कारण मूर्ति बनाने के लिये मृपिण्डको ग्रहण करता है मानो उस पूर्वोक्त ज्योतिरससे ही इसफो समृद्धियुक्त और पूर्ण करता है ।। १।। तस्य मंत्रः। देवीद्यावापृथिवीमुखस्यैवामद्यशिरोराध्यासंदेवयजने * और आपने जो आर्याभिविनयमें ईश्वरके लिये सोमरसपानको तयार किया है उसकी मी सुध है। १ यह सब प्रमाण शतपथ अजमेर के वैदिक मंत्रालयवालेमें भी मौजूद हैं दयानन्दजीको समाज | हमारा काम लौट बदलका नहीं है।
एकादशतमहासस . पृथिव्याः मुखायंस्त्वामुखस्यत्वाशीणे-यजु० अ०३७ मं०३४ हे (देवी) दिव्यगुणयुक्तदेव्यो (द्यावापृथिवी) मृजले (अद्य) अस्मिन् समये ( पृथिव्याः) बसुधायाः ( देवयजने ) देवयजन- स्थाने (वां) युवां मृजले आदाय ( मखस्य) (शिरः) यज्ञस्य, शिरोभूतं महावीरस्य मूर्ति (राध्यास ) साधयेयं (मखाय) यज्ञाय वा ) त्वां गृह्णामि ( मखस्य शीणें ) महावरािय (त्वा बां गृहामि ॥ भापार्थः हे मृदु जलरूप देखियो । अब देवयजनस्थानमें तुम दोनोंको लेकर महावीरको पूर्तिको साधन करूं मैं यज्ञके हेतु ग्रहण करता हूं और महावीरके हेतु तुझे. रहण करताहूं ॥ अथ वल्मीकवपाम् देव्योवम्यइत्येतावाऽएतदकुर्वतयथायथे- तुद्यजुस्यशिरोऽच्छिद्यतताभिरेवेनमेतत्समर्धयतिकृत्स्नंकरो- तीति- -ब्राह्मणम् श०१४।१।२।१० यज्ञपुरुपका तेज पतित होनेसे पल्मीकवपा अर्थात् वमईकी मट्टी हुई इस कारण इसको लेता है और उससे महावीरकी मूर्तिको परिपूर्ण करता है उसका मंत्र ॥ तस्य मंत्रः । देव्यों वमयो भूतस्य प्रथमजा मुखस्यवोऽद्यशिरोरांध्यासन्देव- यननेपृथिव्याः । मुखाय॑त्वामखस्यत्वाशीणे-यजुःम०३०म०४ पदार्थः । हे (भूतस्य ) प्राणिजातस्य ( प्रथमजाः ) प्रथमोत्पन्नाः देव्यः (वयः) उपजिहकाः (वः) युप्मानादाय (पृथिव्याः) *मेरी जी इस मंत्र खिपोंका अर्ष करते हैं तो क्या इस मंत्रका मी देवता है और यदि भार कुछ विद्वत्ता रखते हैं तो जैसे हमने मंत्र प्रापणके प्रमागमाहित यह प्रसरण दिया है ना तो इमस सग बता३ मय तो यह है प्रसगर्ने महापरिको मति कीन हटासरना।
(१९०)
दयानन्दतिमिरभास्करः। .
भूम्यः ( देवयजने ) ( मखस्य ) यज्ञस्य (शिरः) महावीरम्
.( अद्य) (राच्यासम् ) सम्पादयेयम्-शेपं पूर्ववत् । .
भापार्थः।
हे प्राणियोंसे प्रथम उत्पन्न उपजिह्वकाओ तुमको लेकर देवयजन स्थानमें अब
महावीरकी मूर्तिको सम्पादन करूं मैं यज्ञके लिये तुझे ग्रहण करताहूं महावीरफे.
हेतु तुझे ग्रहण करताहूं ॥
अथवराहविहितम् इयतीवाऽइयमग्रेपृथिव्यासप्रादेशमातिा
मेमूपडुतिवराहउज्जघानसोऽस्याः पतिः प्रजापति-
स्तनैवेनमेतन्मिथुनुनाप्रियेणधाना सुमर्धयति
कृत्स्नंकरोतीति--ब्राह्मणम् श०.१४।१।२।११
सृष्टिके आरंभकालमें यह पृथ्वी प्रादेशमात्र थी उसको श्री वाराहनीने ऊंचा
ठाया वोह पाराहजी इस पृथ्वीके पति और प्रजाके स्वामी हैं इस कारण उस
यधाम मिथुनके द्वारा महवीरको समृद्ध और परिपूर्ण करता है अर्थात् मूर्ति
नानेको वाराह विहित मृत्तिका लेता है ।।
तस्य मंत्रः।
इयुत्यप्रेआसीन्मुखस्यतेऽद्यशिरोराध्यासन्देव॒यननेपृथिव्याः ।
मुखापत्वामुखस्यत्वाशीणे-यजु० अ० ३७ मं० ६
पदार्थः।
(अग्रे) आदो वराहोद्धरणसमये पृथिवी (इयती) एतत्प्रमाण
प्रादेशमात्री (आसीत) हे पृथिवि (अद्य ते पृथिव्याः देवयन
ने मखस्य) (शिरः) महावीर (राध्यासम् ) (मसाय त्वा)
त्वां गृहामि (मखस्यशीणे) महावीराय त्वां गृहामि।
भापार्थः।
आदिमें अर्यान् पाराहावतारके समय यह पृथ्वी प्रादेशमारी थी पिता
तेरे देवपनरयानमें महावीरकी मुर्तिश संपादन करूं, है यरादपिहिन
!यन लिये तुझे लेताह महावीरकी मूर्तिक लिप नुझे ऐनाई, घराकी
मट्टी प्रदान करें।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । अथ यत्पूयन्निवाशेत तस्मात्पूतीकास्तस्मादनावाहुतिरिवा- भ्याहिताज्वलन्ति तस्मात् सुरभयोहि यज्ञस्य रसात्संभूता अथ यदेनं सदिन्द्रओजसापर्यगृह्णात् ब्रा० श० १४११।२।२२ तस्य मंत्रः । इन्दुस्योजस्थमुखस्यवोशिरीराध्यासन्देवयजनेपृथिव्याः मुखा- यंत्यामुखस्यत्वाशीणे । यजु० अ० ३७ ० ६ पदार्थः। हे पूतीकाः ! यूयं (इन्द्रस्य ) परमश्वरस्य (ओजः) तेजो- रूपाः (स्थ) (वः) युष्मानादाय (अद्य) अस्मिन्समये (पृथिव्याः देवयजने मखस्य शिरः) महावीर (गध्यासम् ) (मखाय) यज्ञाय (त्वा) त्वां गृह्णामि (मखस्य शीणे) महावीराय (त्या) त्वां गृह्णामि ।। भापार्थः । सुगन्धित पूतीका वैष्णवतेज (यतरस) से उत्पन्न हुई इस कारण यज्ञका शिर महावीर निर्माणके लिये टनको लेता है । श० १४ । २ । १ । १२ मंत्रार्थः। हे पूतिकाओ ! तुम परमेश्वरके तेजरूप हो तुमको लेकर देवयजन- स्थानमें: महावीरको संपादन करताहूं यज्ञके लिये तुझे लेताहूं महावीरके लिये. तुझे लेताहूं ॥ एक समय जब इन्द्र वृत्रासुरके मारनेको जहां जहां पत्र स्थापन करता था वहाँसे वोह स्खलित होजाता था और इसी कारण भागते हुये वृत्रासुरको ग्रहण नहीं कर सके तब इन्द्रने विचारफर पूतीकास्तम्भके निकट वृत्रासुरके पकडनेको वनसे चेष्टा की तब वोह वृत्र पूतीकास्तम्भसे मार्ग रुकजानेके कारण न भागसका तंब इन्दने उसको पकड वनसे मारा और प्रसन्न हो वोला हे प्रतीकास्तंभ तुमने मेरी (ऊति) पराकम रक्षा (धाः) धारण फरी है इसीसे तुम्हारे पराक्रम धारणः -फरनेसे उन पूतीफोंको को पूतीका नाम हुआ इनके ग्रहणसे 'यज्ञरक्षा होती है. तौतिरयि.
रताह॥ दयानन्दतिमिरभास्करस। यज्ञस्यशीपच्छिन्नस्यशुगुदकामत्ततोऽजासमभवत । । तयेवेनमेतच्छुचासमयति कृत्स्नं करोतीति ब्रा० श०१४।१।२।१३ तस्य मंत्रः। मखाय॑त्वामुखस्य॑ त्वाशीप्णे-यजु अ०३७ मं० ७ का अंत. भापार्थः। जव पैष्णवी तेग मायामें गिरा तब उसकी दीप्तिसे मना उत्पन्न हुई इस कारण मजाके दुग्धको लेताहै और उस दीप्तिसे महावीरको समृद्ध और पूर्ण करता हैश. २४।१।२ । १३ मंत्रार्थः। हे अजाके दुग्ध ! यज्ञके लिये तुझे ग्रहण करताहूं महावीरके हेतु तुझे ग्रहण सुर्वानुवास्साऽएतद्देवानभिगोप्न्करोतीति-त्रा श०१४।१।२।१५ तस्य मंत्रः। तुब्रह्मणस्पतिःप्रदेव्येतुसुनृतांअच्छावीरन्नर्यम्पंक्तिरीघसन्दु- यज्ञन्नयन्तुनः-यजु०अ०३७म०७इसका शेप ऊपर लिखा है। पदार्थः। *(ब्रह्मणस्पतिः) मंत्रस्य पालक ईश्वरः (प्रेत) प्रथमतो गच्छतु (सूनृता) यज्ञसम्बधिनीमंत्रगतप्रियवाक्यरूपा (देवी) प्रक- पैंण (एतु) गच्छतु किमर्थं तदुच्यते (नयो नृभ्यो यजमानेभ्यो हितं (पंक्तिराधसं)पांतस्य यज्ञस्यसाधकं (वीर) महावीराख्यं (अच्छ) प्राप्तुं (देवा.) सर्वे (नः ) अस्मदीयं यज्ञं "नयंतु" सब देवताओंको मूर्तिका रक्षक करता है ब्राझ१४ । १ । २ । १५ * ग्रह्मणस्पतिः - ब्रह्मणः पाता पालायिता वेति निरु. १०११२ . एकादशसमुल्लासखण्डनम् । भापार्थः। (ब्रह्मणस्पतिः) वेदके रक्षक परमात्मा (नः) हमारे ( अच्छ) यज्ञके सन्मुख (प्रेतु ) भागमन करो (सन्ता ) त्रयीलक्षणवाली (देवी) दिव्य उनकी वाणी (प्रेतु ) आगमन फरै (देवाः ) देवगण ( वीरम् ) शत्रुओंको विशेष उन्मूलन करनेवाले महावीर (नर्यम् ) मनुष्योंके हितकारी (पंक्तिराधसम् ) यज्ञके साधक महावीरको (यज्ञ ) यज्ञको (नयन्तु ) प्राप्त करें । वीरोवीरयत्यमियानिति निरु० १७ पयआदिसम्भारसमूहं गृह्णाति ॥ तस्य मंत्रः-- दुग्धादि सम्भार समूहको ग्रहण करता है उसका मन ।। मुखाय॑त्वामुखस्य॑त्वाशीणे-यजु० अ० ३७ मं० ८ यज्ञके लिये तुझे लेताहूं महावीरके लिये तुझे लेताहूं ॥ अथमृत्पिण्डमुपादायमहावीकरोति, प्रादेशमात्रुमिवहिशिरोम- 'ध्येसंग्रहीतमथास्योपरिष्टाध्यङ्गुलंमुखमुन्नयतिनासिकामेवास्मि- नेतद्दधातीति-त्रा. श० १४।१।२। १७ तस्य मंत्रः। मुखायैत्वामखस्यत्वाशीण-यजु० अ० ३७ मं० ८ मृत्पिण्ड लेफर महावीरका तीन मूर्ति बनाता है जो कि मादेशमात्र अर्थात् तन- नीतफफा अंतर और मध्यमें संग्रहीत हो फिर टसमें मुख और नासिकाफोधारण करता है प्रा०१४ । १।२।१७॥ म०-हे मूर्तियो यज्ञके लिये तुझे निर्माण करताहं, महावीरके लिये तुझे ग्रहण फरताई ॥ यज्ञस्पशीपैच्छिन्नुस्यरसोत्यक्षरत्तुतएताओषधयोजज्ञिरे तेनैवमेतद्रुसेनसमर्धयतिकृत्स्नंकरोतीति- त्रा० श०१४।१।२।१८ तस्य मंत्रः। मुसायत्वामुखस्यैत्वाशीणे ८ २९४) दयानन्दतिमिरभास्कर जब वैष्णवी तेज मायामें गिरा तब कुछ रसरूप तेन फैलाउससे भापधिप उत्पन्न हुई उसको ग्रहण करता है और उसी रससे महावीरको समृद्ध और परिपूर करता है १४ । १।२ । १९ हे औषधे ! यज्ञके लिये तुझे लेताहूं महावीरके लिय तुझे ग्रहण करताहूं । अथैनान्धूपयतीति-त्रा० १४॥ १।२।२० अश्वस्यत्वा वृष्णःशुनाधूपयामिदेवयजनेपृथिव्याः-अ०३७ ०९ हे महावीर (पृथिव्याः देवयजने वृष्णः ) धर्मार्थकाममाः सेक्तुः (अश्वस्य) परमेश्वरस्य असो वा आदित्य एषोऽश्वः श०६।३।११ २९ सूर्यों वे सर्वे देवाः १३ । ७।१।५ शनाभोगोच्छिप्टेन यथाहाथवः॥ शर्कराः सिकता अश्मान ओपधयो वुरुिधुस्तृणां । अभ्राणि विद्युतौ वर्षमुच्छिष्ठे संश्रिता श्रिता २१ यच्च प्राणिति प्राणे- नु यच्च पश्यतिचक्षुपा ॥ उच्छिष्टाजज्ञिरे सवेदिविदेवादिवि- श्रितः-अथर्व ११।९।२१।२३ (वा) त्वां धूपयामि ॥ महावीरोंफो धूप देता है नाम अब मंत्रार्थ लिखते हैं हे महायार ! देयपगन स्थानमें चारों पदायके दाता इश्वरके पदायोंसे तुझे धूप देताई अथर्ययेदमें लिया है फि शर्फरा बालू पापाण आपधि तण बादल विगली वा यह सब ही उच्छिष्टमें आभित हैं, जो प्राणी पायुसे श्रास लेता है जो नेत्रसे देखता है और जो स्वर्गवासी देवता है ये सब उच्छिप्पमाण ब्रह्मदेयसे उत्पन्न हुए हैं इस्पादि । अथैनाच्ट्रपयंतीति-त्रा० श. १४।१।२।२१ तस्य मंत्रः।. मुखापत्वामुखस्यत्वाशीणे ९ महावीरोंकी मूर्तिको अमिमें पक करता है यह प्राङ्गण याश्य हुमा । मंत्रार्थः। हे मूर्ति ! (मसापन्या) न पाके लिये पक करताई महापारिक रिपन एकादशसमुल्लासखण्डनम् । ( ३९५) उद्वपीति-त्रा० १४ । १।२।२२ तस्य मंत्रः। जेवत्वासाधवैत्त्वासुक्षुित्यैत्वा-य० अ० ३७ मं० १० पदार्थः । (ऋजवे ) स्वर्गाय आदित्याय ( त्वा ) त्यामुद्रपामि (साधव ) वायवे अन्तरिक्षलोकाय च (त्वा ) त्वामुद्ध- पामि (सुक्षित्ये ) पृथिवीलोकायागये च ( त्वा) त्वा- मुद्रपामि त्रैलोक्यप्राप्तये त्वामुद्रपामीत्यर्थः ॥ भाषार्थः। फिर मूर्तिको अमिमेंसे निकालता है-त्रा० १४ । १ । २।२२ हे मूर्ति ! स्वर्ग और सूर्य के लिये तुझे निकालताहूं वायु और अन्तरिक्षके हेतु तुझे निकालताई, पृथ्वी और अनिके हितके लिये तुझे निकालताहूं अर्थात् मूर्तिसे सवफा हित होताहै ॥ अथैनानाच्छृणत्तिअजायसोत-ब्राह्म० १४ । १ ।२ । २५ मुखायत्वामुखस्यत्वाणेि १० मंत्रार्थः। फिर महावीरकी मूर्तियोंको अनाके दुग्धसे सींचता है- हे मूर्ति ! यज्ञके लिये तुझे सींचताहूं महावीरके लिये तुझे सोचताई ॥ प्रोक्षतीति-बा० श०१४।१ । ३।४ तस्य मंत्रः। युमायत्वा मुखायत्वा सूर्यस्य त्वा तपसे-य० अ० ३७ मं०११ पदार्थः। (यमाय ) यमयति-नियच्छति सर्वमिति यमः सूर्यः तस्मे (त्या) त्वां प्रोक्षामि (मखाय ) सर्वप्रेरक ईश्वरस्य (तपसे) सूर्याय ( त्वा) खां पोशामि ११ -ब्राह्म० ॥
दयानन्दातामरभास्करः।
मोक्षण करताहै ब्राह्मण १४।।।३।१
मंत्रार्थः।
हे मति ! सूर्यके हेतु तुझे प्रोक्षण करताहूं यज्ञपुरुष विष्णुफे लिये तुसे मोक्ष
फरताहं, सबके प्रेरक परमेश्वरके तपरूप सूर्य के लिये तुझे प्रोक्षण करताई ॥
महावीरमाज्येनसमनतीति-ब्राह्मणम् ॥ १४।१।३.१३
तस्य मंत्रः।
दे॒वस्वा सविता मध्यान- यजु० अ० ३७ मं० ११
पदार्थ :-(सविता) (देवः) (मघा) मधुना मधुरूपेण
सर्वनगदपेणाज्येन (त्या) त्या (अनक्तु ) लिम्पतु ११
मदारी पृतसे लिल फरताह बाह्मणम् ।। १४ । १।३।।
मंत्रार्थः।
हे महापीरसपिनादेयता से मधुसे मुक्त करो।माणनीति-२०१५
अनिरसिशोचिरंसितपासि-अ० ३७ ० ११
पदार्थः।
दे मदासीर (लं (गः) ज्यालासपः ब्रह्मरूपः असि (शोचिः)
शुचिकपः अमि (ज्योतिः ) प्रकाशरूपः सूर्यनारूपः (आणि)
मंद्यार्थः।
1. रंक स्थापन करना।
৫া ! পয়েন; গাধা কাপ।
सार
भागमेशान्तिदयातीनि-या. १२011३।३.
मसुमधुम-प भ७.१३
देशदेन्यानोतदानयुपमान्मशिनिपनियोमाणा-
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एकादशसमुल्लासखण्डनम् । मूर्ति प्राणोंको स्थापन करता है ब्राह्मण । * हे प्राण ! हे व्यान ! हे उदान ! तुम आत्मामिको प्रज्वलित करो । अथ तीनों प्राण महावीरमें स्थापन करताहूं। यजुस्पशीर्पच्छिन्नुस्यशिरएतद्देवा प्रत्यदधुर्युदातिथ्यनहवास्या पशीर्णाकुनचनयज्ञेनेष्टुंभवतियएवमेतद्धेदु-श० १४ ।।NE जो वैष्णवी तेज मायामें गिरा देवताओंने फिर उसको विष्णुहीम युक्त वि वही आतिथ्य यदि तेजफे विना युक्त करनेके यज्ञ फरै तो उसमें सिद्धि नहीं होस जो इसको जानता है वही सिदिको पाता है ।। यज्ञस्यशीपैच्छिन्नस्यशुगुक्रामत्सेमाँल्लोकानाविशत्तयेवेनमे- तुच्छुचासुमर्धयतिकृत्त्रं करोतीति । ब्राह्मणम् ० १४।३।। तस्य मंत्रः। योतधर्मदिव्याशुग्यागायुयाहविर्धानातुआप्यायतान्नि- छ्यायतान्तस्य तु स्वाहा, यातेपर्मान्तरिक्षेशग्यात्रिष्टुभ्या- मीधे, सातआप्यायताँ तानिष्ठयायतान्तस्यैतेस्वाहा यातें धर्मपृथिव्याशुग्याजगत्या सदस्यांसातआप्यायतानि- ठचायतान्तस्यै ते स्वाहा-यजुः अ० ३८ मं-१८ हे (धर्म) महावीर (या)(ते) तव (शुक्) दीप्तिः (दिव्य दिवि भवा (या) (गायत्र्या) समष्टिप्राणे "प्राणोगायत्री ३ १३।५।१५” (हविर्घाने ) समप्टिस्थूलशरीरे (सा) ( (आप्यायतां) वर्धतां (निष्ठचायतां) दृढा भवतु (ते)(तस् दप्तिये (स्वाहा) हे (धर्म) महावीर (या ते शुक्) दीप्तिः (अ * मेरोस्वामी महावीरशन्दसे एक पात्र लेते हैं पर आपको स्मरण रहै कि आंख कान नाक प्राणादि पात्र में बनाये या स्थापन किये जातेहैं या मूर्ति आपके घरके थाली फटोरे आंख कान = और प्राणवाले हैं क्या याद नहीं हैं तो यह वस्तु मूर्तिमें अब भी होती है इस फारण : महावीर एक प्रकारका यज्ञको मात है ।
(३९८) दयानन्दतिमिरभास्करः। रिक्षे ) (यात्रिष्टुभि ) आत्मान "आत्मा त्रिष्टुप् श० ६४।२।६ ( आनीधे ) हार्दान्तरिक्षे (साते आप्यायतां निष्ठयायतां तस्ये) दीप्तये (स्वाहा) हे धर्म महावीर ( याते सदस्या समष्टयुदरेस्थिता "उदरमेवात्य सदः-श० ३ ९।२।५" (शुक् दीप्तिः ( पृथिव्यां - या जगत्यां ) समष्टयपाने “योऽयमवाड प्राणएपजगती-शत. १०।३।११। "साते आप्यायत निष्ठयायतां ते तस्ये (दीप्तये स्वाहा) भापार्थः। जव वैष्णवी तेज मायामें प्राप्त हुआ तब टसकी दीप्ति इन लोकोंमें प्रवेश हुई टस दीप्तिसे इस महावीरको समृद्ध और परिपूर्ण करता है-माझ श० १२३।१२ मंत्रार्थः। हे महावीर ! जो तेरी दिव्य दीप्ति विराद शरीरमें है और समष्टि प्राणमें है पोह तुझमें वृद्धि पापो, अचल हो, उस दीप्ति के हेतु आहुती दीनाती है, हे महागीर! जो तेरी दीप्ति अन्तरिक्ष हार्दान्तरिक्ष और आत्मा है, वोह तुझमें वृद्धि पायो अयल हो टस तेरी दीप्तिके लिये आहुति दी जाती है, हे महावीर! जो तेरी दीप्ति समष्टि उदर पृथ्वी और समष्टि अपानमें है वोह तुझमें पदि पायो अचल हो उस तेरी दीप्ति के लिये आहुति दीजाती है पक्षान्तरमें गापत्री छन्दादिक गापी छन्द आदि अर्थभी जानने । यह आध्यात्मिक अर्थ लिखा है । सुउपहबुमिडाभक्षयतीति-त्रा० १४ । ३ । १॥३१॥ तस्य मंत्रः। मुयित्यदिन्द्रुिघृहन्मायोमपिनुः ॥ घुमखिशुग्विजाति विराजाज्योतिपासुद्द ब्रह्मणातेजसासुह-यजुः अ० ३८ मं० २७ पदार्थः। (त्रिशुक्) विदीप्तियुक्तः (पर्मः) मृतिमयोदेवः (विरानान्यो- तिपासह) तथा (ब्रह्मगातेजसासद र मयि) मम हृदये विरा- जति (तत्) तस्मात् (यः )समष्टिप्रागः ( वृहत् ) महद एकादशमसमुल्लासखण्डनम् । (३९९) इन्द्रियं)वलं (मयि) आस्ति (ऋतुः) संकल्पः ( दक्षः) संकल्प- "सिद्धिः (मयि) वर्तते २७ भापार्थः। होम फरफै उपहपको भक्षण करता है-पाह्मणम् । तीनों दीप्तिसे युक्त मूर्तिमय देवता विराट्की ज्योतिके साप युक्त होकर मेरे हृदयमें विराजमान हो इस कारण समष्टि माण और महान बुल मुझम ही संकल्प और संकल्पसिद्धि मुझमें वर्तमान हो अर्थात् इस कार्यके प्रभावसे ब्रह्मज्योतिके सहित हमारी ज्योति संगत हो । युस्यधर्मोविदयुते तत्र प्रायश्चित्तिः-श० १४ । ३।२।१ पूर्णाहुति जुहोति सवै वे पूणे सर्वेणैवेतद्भिपज्याति यत्किंच विवृदयज्ञस्येति बा० शत० १४ । ३।२।२ तस्य मन्त्रः। स्वाहापाणेभ्युः साधिपतिकेभ्यः पृथिव्यैस्वाहा अमयेस्वाहा अन्तरिक्षायुस्वाहा वायवेस्वाही दिवेस्वाहा सूर्यायुस्वाहाँ १ दिग्भ्यः स्वाहां चुन्द्रायुस्वाहा नक्षत्रेभ्यु स्याहाँ अन्य स्वाहावर गायुस्वाहो नाभ्यस्वाहा पुतायस्वाहा-अ० ३९ मं० ११२ भापार्थः। निस यज्ञमें महापौरकी मूर्ति फटनाप टसका प्रायश्चित कहते हैं-या आहुतिसे चिकित्सा करताहै जो कुछ मूर्तिका अंगभंग हुआ टसकी चिकित्सा है मा० माण साधिपति, अमि, अन्तरिक्ष, वायु, दिय, सूर्य, दिशा, चन्द्रमा, नक्षत्र, जल, यरुण, नाभि पूत नामक देवतोंके निमित्त श्रेष्ठ होम हो । मुखमेवास्मिन्नेतद्दघातीति-त्रा० १४।३।२।१७ तस्प.मन्त्रः। वाचेलाहा-यजुः १०३९ म०३ नासिकेपुवास्मिन्नेतयातीत-त्रा २०१७
मनुसकामुमाकूर्ति वाचस्सत्यमशीय । पुना रूपमा
अदं (मनसा कामम् ) अभिलापं (आकूर्ति) आकुंचन
(माशीय)प्रांमुयाम् (वाचः) संत्यम् ) प्रामुपाम् (पशूनां
.
दयानन्दतिमिरमारकर
तस्य मन्त्री।
प्राणायस्वाहा ३ प्राणायुस्वाहाँ ३
अक्षिणी एवास्मिन्नेतयातीति-त्रा
तस्य मन्त्रो।
चक्षु स्वाहा ३ चर्युपेस्वाहा ३
कुविवास्मिन्नतधातीति-त्रा. ७
तस्य मन्त्रो।
श्रोत्रीयस्वाहा ३ श्रोत्रायस्वाहा ३
मर्तिमें मुखको धारण करता है-२०१४।३।२।१७
मन्त्रार्थः।
घागभिमानी देवताके अर्थ श्रेष्ठ होम हो-यजुः अ० ३९ मं०३
प्राणेंद्रियको इस मूर्तिमें धारण करता है-श
मं० प्राणकं हेतु होम हो प्राणके अर्थ होम हो-यजुः
इस मूर्तिमें चाइन्द्रियको स्थापन करताहै-श
मं० चक्षुओंके हेतु हाम हो चक्षुआके हेतु होम हो-यजु:
इस मूर्तिमें श्रोत्रइन्द्रियको स्थापन करता है-श०
मं० श्रोत्रके हतु हवन हो श्रोत्रके हेतु हवन हो-यजुः
मुनसावाइदसर्वमाप्तं तन्मनसेवेतद्भिपज्यातियक्किन
विवृढं यज्ञस्योत-ब्राह्मणम् ।४।३।२।१९
तस्यमन्त्रः।
युशःश्रीःश्रयतामायस्वाहा यजुः अ० ३९ मं०
पदार्थः ।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । इन्द्रियाणाम् (रूपं ) गोलकं यद्वा पशूनां शोभा (अन्नस्य रसः) स्वादुत्वं ( यशः) कीतिः (श्रीः ) लक्ष्मीश्च (मयि श्रयताम् ) तिष्ठतु (स्वाहा) भापार्थः। यह सव मनसे पास होता है इस कारण मनके द्वारा ही चिकित्सा करता है जो कुछ यज्ञका अंगभंग हुआश०१४।३।२।१९ मन्त्रार्थः में मनके द्वारा अभिलाप और प्रयत्नको प्राप्त करूं ववनकी सत्यताको प्राप्त करूं इन्द्रियोंके गोलक वा पशुओंकी शोभा अत्रका स्वादुत्व कीर्ति और लक्ष्मी मुझमें वास करो प्रार्थना- द्योतक यह आइति स्वीकृत हो । प्रश्नः। कस्मादेतं मृन्मयेनैवजुहोतीति-श० त्रा० १४।२।२ । ५३ यह ब्राह्मणमें प्रश्न है कि, मट्टीकीही मूर्ति क्यों बनाते और संस्कार करते हैं। उत्तरम् । यजुस्यशीर्पच्छिन्नुस्यरसोत्यक्षरत्सडुमे द्यावापृथिवीऽअगच्छ- धन्मुदियंतचुदापोऽसौतुन्मुश्वापांचमहावीराः कृताभवन्ति५३ सयद्वानस्पत्यःस्यात् गुदातेयुद्धिरण्मयः स्यात्पुलीयते यल्लोहम यःस्यात्प्रसिच्पेत पदयस्ममयः स्यात्प्रदुहेपरीशासावथेपएवेत- स्माऽतिष्ठत तस्मादेतंमृन्मयेनेवजुहोतीति-बाझ ०१४।२।२२५४ भापार्थः । जब वैष्णवी तेम गिरा तो यह दीप्तिरूप रस पृथिवी स्वर्ग में प्रवेश हुआ भो कि मिट्टी जलरूप है इस कारण मिट्टी जलसे महावीरकी मूर्ति बनाते हैं यदि मूर्ति काष्ठफी हो तो (अमिसंस्कारके समय)जलनाय सुवर्गकी हो तो पिघल नाय पापाणफी हो तो फटनाय लोहेकी हो तो परिशासोको भस्म करदे इस कारण यज्ञमें मृन्मय मूर्ति ही बनाते हैं, क्यों कि उसका अमिमें रखना एक प्रकारको यज्ञ- विधि है इस कारण मृन्मय मूर्ति धनाकर होम करते हैं यह तो यज्ञम भर्ति विधान कहा अब मन्दिरमें पूजन विधान कहते हैं देवताका आझान । कुभोदिव्यस्यनोधातुरीशांनोविप्यादृतिम्-१ अथर्य० ७॥ १८१ .. (४०२) दयानन्दतिमिरभास्करः। हे (ऊनः ) रात्रः (दिव्यस्य) दिवसस्य (धातः) ईश्वर (नः) अस्माकम् (ईशानः) ईश्वर त्वं (तिम् ) दृविदारेवघेआदरेच पापाणस्य विदारणानिर्मितां धातूनां ताडनादचितां पूजनीयां च मूर्ति (विष्याः) प्रविश स्वकीयं देहं कुरु ॥ भापार्थः । हे अहोरात्रके धाता हमारे ईश्वर ! तुम इस मूर्तिमें प्रवेश फरौ अर्थात् मूर्तिको अपना शरीर फल्पित फरो॥ एह्यश्मानमातिष्ठाश्मभिवतुते तनुः ॥ कृण्वन्तु विश्वदेवा आयु- ऐशुरदः शतम्-अर्य० २ । १३।४ हे इष्टदेव (अश्मानम्) अश्ममूर्तिम् (आतिष्ठ) (आश्मा) अश्ममूर्तिः (ते) तव (तनुः ) देहः (भवतु ) (विश्वे ) सर्वे ( देवः) (ते) तव शरीरस्य (आयुः) (शरद शतं कृण्वन्तु) हे इष्टदेव ! पापाणमूर्तिमें विराजमान हनिये पाषाणमूर्ति आपका शरीर हो सब देवता इस आपके शरीरकी आयु अनन्त योंकी करो ॥ यह मन्त्र ब्रह्मया रीके अश्मारोहण में भी आताई और मूर्ति प्रतिष्ठा में भी है। दृतु दृईमामित्रस्य माच पा सर्वाणि भूतानि समासन्ताम मित्रस्याइञ्च पा सर्वाणि भूतानि समास मित्रस्युचक्षुपा समीक्षामहे-यजुः० अ० ३६ मं० १८ पदार्यः। (हते ) हे मूर्तिव्यापक परमेश्वर महावीर त्वं (मा) मा दंड (दृढीकुरु) शान्तचित्तं कुरु यथा (सर्वाणि) (भूतानि ) मा पर्यन्तानि (मा) मा(मित्रस्य) (चक्षुपा समीक्षन्ताम् ) मित्रट- या मां पश्यन्तु (महम् ) अपि (सर्वाणि भूतानि समीझे) पश्यामि परमेशरस्य सर्वव्यापकत्वात् ) मित्रस्य चशुपा समी- झामहे ) वयं पठ्यामः पुत्रशिघ्यायभिप्रायेण बहुवचनम् । .
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । भापार्थः। हे मूर्तिव्यापक परमेश्वर ! तुम मुझे एकाग्रचित्त करो जिस प्रकार ब्रह्मापर्यन्त सब माणी मुझे मित्रदृष्टि से देखें मैं भीः सब प्राणियोंको मित्र देवताकी दृष्टिसे देखू हम सबको मित्र देवताकी दृष्टिसे देखते हैं। हुतेट माग्योक्तसुन्दृशिजीव्यासुज्यक्तिसुन्दर्शिनीव्या- सम्--यजु०३६।१९ पदार्थः। ( हृते ) हे मूर्तिध्यापकपरमेश्वर त्वं ( मा )मा (हूंह ) एकाग्रचित्तं कुरु (ते) तव सन्दशि (संदर्शने) ( ज्योक ) 'चिरं (जीवाव्यासम् ) अहं जीवेयम् (ते) सन्दशि ( ज्योकू) जीव्यासम् । पुनरुक्तिरादरार्था । भापार्थः। हे मूर्तिव्यापक परमेश्वर ! तुम मुझको एकाग्रचित्त करो आपका दर्शन करता "दुआ दीर्घ कालतक जीता रहूं आपका दर्शन करता हुआ दीर्घकालतकनीतारहूं । नमस्तेहरसे शोचिपे नमस्ते अस्त्वर्चि ॥ अन्यस्तैिऽअस्मत्तैप- न्तुहुतयः पावकोऽअस्मभ्य छ शिवोभव- म०२०-अ० ३६५० पदार्थः। हे मूर्तिव्यापकपरमेश्वर (ते) तव (हरसे ) हरति सार्हणानि भक्तर्दत्तानि तस्मै हरतेरसुन्प्रत्ययः (शोचिपे ) तेजसे (नमः) (अर्चिपे) स्वमूर्तिप्रकाशकाय तेजसे (ते) तुभ्यं ( नमः) (अस्तु )(ते ) तव ( हेतयः) चक्रत्रिशुलनारायणपाशुपता- द्यत्राणि (अस्मत् ) (अन्यान् ) मूर्तिपूजनविमुखान्नास्ति- कान् (तपन्तु) (पावकः) पापेः शोधकस्त्वम् (अस्मभ्यम्) (शिवः) कल्याणकर्ता (भव)। भाषार्थः। हे मातेन्यापक परमेश्वर ! तुम भत्तोंके चंदनादि दव्य ग्रहण करते हो तुम्हारे (१०) दयानन्दतिमिरभास्फरः। तेगरूपके अर्थ नमस्कार है तुम्हारे मूर्तिव्यापक रूपके अर्थ नमस्कार तुम्हारे शंख. पक्रादि अस्त्रोंफे अर्थ नमस्कार और जो पूजनसे विमुख नास्तिक हैं उनको तपाओ और हमको कल्याणकारी हो ॥ अमिनारयिमभवत् पोपमेवदिवेदिवे ॥ यशसंवीरवत्तमम्- ऋ० अ० १ अ०१मं०३.. (ममिना ) ईभरसे अधिष्ठित (रयिम् )मूर्ति "तस्मान्मृतिस्वरयी- प्रश्नो०५ को पूजन फरनेको (दिवेदिये) प्रतिदिन ( अश्नवत् ) प्राप्त होता है प्रतिदिन. (पापं यशसंवीरत्तमम् ) पुष्ट धन यश तथा वीर पुत्रको प्राप्त होता है ।। अग्नेयत्तेशुक्रयच्चन्द्रंयत्पूतंयच्चयाज्ञियंतद्देवेभ्योभरामसि-यजुः अ० १२ मं० १०४. ( अमे) हे परमात्मन् [ तदेवामि यजुः ] ( यत्तेशुक्र) जो आपका शुक्ररूप ( यचंद) मन ( यत्पूतं ) जो पवित्र गुणकर्म समुदाय आपने ( देवेभ्यः ) देवता आदि ऋषि मुनि महात्माओंके निमित्त ( यज्ञियं ) यज्ञसम्बन्धी प्रतिमामें [ अयै- तमात्मनः प्रतिमामसृजत् यद्यज्ञम् श० ११ । १ । ८ । ३ ] अर्पण किया है (तत् ) उस तुम्हारी प्रतिमाको हम पूजनके निमित्त ( भरामसि ) धारण वा ग्रहण करते हैं ॥ १ ॥ * चन्द्रमा मनसोजातः चक्षोः सूर्योऽजायत-यजु० ३११ १२ इसमें परमात्माके मन नेत्रादि वर्णन किये हैं फिर परमात्माकी मूर्ति बनाय पूजन करें तो क्या अममाण हो सकता है पूजन वेदप्रतिपाद्य है। यौयतःसमीहसे ततौ नोऽअभयंकुरु ॥ शनं कुरु प्रजाभ्योऽभ- यन्नः पुशुभ्यः-२२ मं० अ० ३६ यजु० पदार्थः। हे परमेश्वर (यतः)(यस्माद्यस्मादामकृष्णादिरूपांत्व)(समी- हुसे) चपसे (ततः) रूपात (नः) अस्माकं (अभयंकुरु) किञ्च (नः ) अस्माकं (प्रजाभ्यः) (शं) सुखं (कुरु) * अथवा ( अमे) हे देवपरमात्मन् ( यत् ) जो (ते) आश्या प्रतिम.रु.प अंग ( शुभ.ग.) शुक्र शुद्ध दाहिमान् ( यत् ) जो अंग ( चन्द्रम् ) चन्द्रमाको समान आहाद.परनेवाला (कार) प्रतग) पवित्र यत् ) जो ( यज्ञियम् )यह अर्थात् पूजाके योग्य है (तन ) स सत्र (देण्यः पतामोपी प्रसन्नताको निमित्त (मसमास ) सम्पादन करते हैं।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । भापार्थः। हे परमेश्वर ! तुम निस जिस अवतारादिरूपसे चेष्टा करते हो उस उस रूपसे हमको अभय फरो और मजाको सुख करो। नमस्ते अस्त्वश्मने अथर्व० २१३।१ अश्ममूर्ति में रहनेवाले आपको नमस्कार है ॥ अभयुर्मऽसियोमाप्राच्यादिशोऽपायुरभिदाप्तात् एतत्सन च्छात्-अर्थव०५।१०।१।७ हे इष्टदेव त्वं ( मे ) मम (अश्मवर्म ) मूर्तिव्यापकपरमेश्वररूपं कवचम् अश्म व्याप्तो असि (यः) (अघायुः) पापपुरुपः (मा) मा (प्राच्याः) (दिशः) (अभिदासात् ) अभिहन्ति दास हिंसने (स) ( एतत् ) हिंसनम् (ऋच्छात्) प्राप्नुयात् ऋच्छतिर्गच्छति- कर्मा निपं० १ भापार्थः। हे इष्टदेष ! तुम मूर्तिव्यापफ परमेश्वर मेरे कवच होजो पापपुरुप पूर्व दिशासे -मुझे मारे वह इस बधको प्राप्त करै ।। अमवुमऽसियोमादक्षिणायादिशोऽपायुरभिदासांत् पुतत्स- ऋच्छात् २ अमममेऽसियोमाप्रतीच्यादिशोऽपायुरभिदा- सोत् ए॒तत्सनच्छात् ३ अश्मयुममेऽसियोमोदीच्यादिशोर- घायुभिदासात् एतत्सत्रैच्छात्४अश्मयुमेऽसियोमाधुयायादि- शोऽधायुरभिदासात् एतत्सच्छात् ५ अश्वममेऽसि योमो- ोयादिशोऽधायुभिदासात् एतत्सझेच्छात् ६ अश्मर्वमम ऽसियोमादिशामन्तदेशेभ्योऽघायुरभिदासात्एतत्सरच्छात् ७ अथव०-भापार्थः। हे इष्टदेव ! मूर्तिव्यापक परमेश्वररूप तुम मेरे कवच हो जो पापपुरुप दक्षिण, पमिम, उत्तर नीची, कंची दिशा और अन्तर्दिशाओंसे मुझे मारै यह इस वधको माप्त को इस्पादि बहुत प्रार्थना हैं अब मूर्तिपूजनका फल ॥ - .
" (४०६) दयानन्दतिमिरभास्करः। न सस्ततापुनहिमोजपानुप्रनभतांपृथिवीनारदानुःआपश्चिद स्मैघृतमित्तरन्ति यत्रसाम सदुमित्तत्रभुद्रम् अथर्व०७।१९।२ पदार्थः-(यत्र ) यस्मिन् स्थाने (सोमः) मृतिव्यापको देवः सोमोवे राजायज्ञः प्रजापतिस्तस्यैतास्तन्योयाएतादेवताः श०१२ ६।१" "सर्वहिसोमः श०५।१।४।१० (तत्र) (सदमित्) सदेव (भद्रं ) कल्याणं (नंसः ) दिनकरः सूर्यः (नंस अह इति-- निघं० ) (न) (तपाप) (अवृष्टया हिमः ) उपलवर्षा (न) (जपान) किन्तु (अस्मै) पूजकाय (आपः) (चित्त) अपि (घृतम् ) (इत् ) एवं (शरन्ति ) क्षीरस्य बहुलत्वात् (पृथिवी) (जीरदानुः ) क्षिप्रमन्नानां दात्री भवति हे मूर्तिव्यापकपरमेश्वर (प्रनभताम् ) असुरान् हन्यताम् ॥ भापार्थः। जिस स्थानमें मृर्तिव्यापक देवता है वहां सदैव कल्याण है सूर्यका ताप नहीं तपाता है ओलोंकी वर्षा नहीं मारती है किन्तु इस मूर्तिपूजनके लिये जल भी घृतको ही देते हैं घृतकी बहुलतासे घृत बहुत प्राप्त होता है हे मूर्तिव्यापकपरमेश्वर ! असुरोंको मारो. इत्यादि शतशः मन्त्र मूर्तिपूजनादिके हैं इससे जहां कहीं तीर्थादिकामें मंदि- रोमें पूजन होता है वह सब ठीक है जब वेदमें ही पूजन है तौअब और ग्रन्योंके दिखानेसे क्या है इससे यह पूजन सत्य श्रेष्ठ है ॥ जीषिकायें चापण्ये ५। ३ । ९९ इस सूत्रपर महाभाष्यमें कन् का लोपविधान फरफे (वासुदेवः ) (शिवः ) (स्कन्दः ) यह उदाहरण दिये हैं, आशय यह है- कि, जो मूर्ति जीविकाफे अर्थ हो वेवी न जाय उसमें कन्मत्ययका लोप हो, अन्यथा नहीं जो चिकनेकी मूर्ति होगी वहां शिवकः ऐसा प्रयोग होगा जैसे शिव कृष्ण स्कन्दकी मूर्ति यहां कन्प्रत्ययका लोप हुआ है, अब बुद्धिमान् विचार सकते हैं कि मन्दिरोंमें इन्हीं देवताओंकी मूर्ति हैं उनपर द्रव्यादि चढता है जबकि . मूर्ति देवताओंकी नहीं थी तो स्त्र क्यों बना, दयानन्दनीने इस सूत्रके मेटनेका प्रयत्न तो किया परन्तु अर्कोका फेरफार करके भी कृतकार्य न होसके । स० पृ० ३६८ पं० २४ रामचन्दफे समय उस लिंगके मन्दिरका नाम विह भी न था किन्तु दक्षिण देशस्य रामनाम राजाने मन्दिर वनपा लिंगका नाम रामे.
एकादशमसमुल्लासखण्डनम् । (४०७) श्वर धर दिया है रामचन्द्रजीने तो आकाश मागसे पुष्पक विमानपर बैठे अयो- ध्याको आते सीतासे कहा है कि ॥ अब पूर्व महादेव प्रसादमकरााद्वभुः ।। * सेतुबन्ध इति विख्यातम्-वाल्मीकिरामायणेस.१२५श्लो०२० हे सीते ! तेरे वियोगसे हम व्याकुल हो घूमते थे और इसी स्थानमें चातु में स्प किया था और परमेश्वरकी उपासना ध्यान भी करते थे वह जो सर्वत्र विभु व्यापक देवॉका देव महादेव परमात्मा है उसकी कृपासे हमको सब सामग्री यहाँ प्राप्त हुई और देख यह सेतु हमने बांधकर लंकामें आके उस रावणको मार तुझको ले आये इसके सिवाय वाल्मीकिने अन्य कुछ भी नहीं लिखा ॥ ३३७ । २८ समीक्षा-धन्य है स्वामीजी वाल्मीकिसे रामेश्वर भी अलग किया रामचन्द्र- जीने यह जानकीजीसे परमात्माका स्मरण करना कहा भला इसका कौन प्रसंग था यह तो युद्धभूमि दिखाते थे, चातुमास्य ता प्रवपण पर्वतपर किष्किन्धामें किया था यहां यह फहाँ, जो जो विख्यात वार्ताएं थींसो सोरामचन्दनीने दिखाई इसी प्रकार महादेवजीका स्थापन विख्यात समझके वर्णन किया, परमेश्वरखे ध्यान स्मरण बतानेकी क्या बात थी वाल्मीकिजीने तो सब कुछ लिखा है आपने: पौन श्लोक क्यों लिखा पूरा लिखते तो कलई खुलजाती वाल्मीकिनी तो ऐसा. लिखते हैं कि ॥ एत्तत्तु दृश्यते तीर्थ सागरस्य महात्मनः ॥ सेतुबन्ध इति ख्यातं त्रैलोक्येन च पूजितम् ॥ ३ ॥ एतत्पवित्रं परमं महापातकनाशनम् ॥ अत्र पूर्व महादेवः प्रसादमकरोद्विभुः ॥२॥ युद्धकाण्ड सर्ग १२५ श्लो. २० । २१ हे जानकि, महात्मा सागरका यह सेतुबन्धतीर्थ दीखता है जो त्रिलोकीम पूजित होगा यह परम पवित्र और महापापका दूर करनेवाला ह पूर्वकालमें इसी तीयपर ( मेरे स्थापन फरनेसे )विभु महादेवनीने मुझपर कृपा फीथी, अब: * सेतुबन्ध इति ख्यातम् पांचवीं वारका पाठ है। १ छोटे स्वामीने कहां चातुर्मास्यादिपदोंको ऐसा छिपायाहै कि मानो देखा ही नहीं पक्षपात तो इसीको कहतेहैं आप ही कहिये चौमासा कहां किया और इस श्लोकके आगे (महापातकनाशनम् पद पडाह सो महापातक नाश होना तो वहां शकरके दर्शनने ही है, ये थेगडी तो कई जन्ममें मा. नहीं लगसकती।
(१०८) दयानन्दतिमिरभास्करः। 'विचारनेकी बात है कि, पवित्र और पापनाशक क्या है रामचंद्र कहते हैं कि, मैंने यहीं महादेवजीफा स्थापन कियाथा जिस कारण उन्होंने मेरे ऊपर कृपा कीथी यह मूर्ति ही पवित्र और पापनाशक है और फिर भी उत्तरकाण्डमें लिखा है। यंत्रयत्र स याति स्म रावणो राक्षसेश्वरः॥ जाम्बूनदमयं लिंगं तत्रतत्र स्म नीयते ॥१॥ वालुकादिमध्ये तु तल्लिंग स्थाप्य रावणः ॥ अर्चयामास गन्धेश्च पुष्पश्चामृतगन्धिभिः ॥२॥ उत्तर का• सर्ग० ३१ श्लो०४२-४३ रावण राक्षसेश्वर जहाँ जहाँ जाताथा वहां वहां जाम्बूनदमय लिंग साय ले.. जाताथा ॥ १ ॥ उस लिंगको वाटूकी वेदीके मध्यमें स्थापन फरफै अमृत गन्ध चाले पुष्पोंसे पूजन करताथा ॥२॥ * इत्यादि बहुत स्थानोंमें मूर्तिपूजन दमें विद्यमान है और पुराण शाखों तो सर्व प्रफारसे वर्णन किया है सो सब जानतेही हैं एक- भीलने द्रोणाचार्य मूर्ति बनाफर अर्जनसे अधिक विद्या उसस सीसीथी सो भारतमें विद्यमान है स कोई जानते हैं इस कारण उसके लिखनेकी आवश्यकता नहीं है ।।मूर्तिपूजनमें युक्ति मूर्तिमें अर्चन करनेमें युक्ति । यदि कोई कशाप्रबुदि हैं कि, मूर्तिमें अर्चन करनेसे भगवान् केसे सन्तु होंगे दूसरेफे सन्तुष्ट करनेसे दूसरा फैसे सन्तुष्ट होगा यह प्रभ ही नहीं बनसक्तः कारण कि, हम दूसरे अर्थात् उससे भिनका पूजन नहीं करते प्रमाण "पुरुष रवेदं सर्वम्" यजु० अर्थात् जो है जो होगा यह सबपरमात्मा ही है "समात्मानं (घयमकुरुत सर्व खल्विदं ब्रह्म यह सब कुछ ब्रह्मही है उसने स्वयं अपनेको किया जब कि, सब वही है तो हम किसी दूसरेकी पूना नहीं करते किन्तु मूर्ति आदिम उसीका पूजन करते हैं टस सर्वव्यापकको निराकार समझकर पदि (न्या- यकारिणे नमः ) हैं तो आप अक्षरपुनक फेंगे शिर दुकपि तो आप दिपाना यहंगे, हाथ जोडनेसे भी वही गति होगी, इस कारण उसके प्रतिनिधि मानार १ नहीं कुछ न यमाया यहां छोटे स्वामीने प्रक्षित कादिया, आप ही कहिये टीगर रामने क्या यह श्लोक प्रशिम माने है कदापि नहीं माने हैं तो प्रमाण दिलाये। * मन् १८८४ पृ. ५३१ ६० + २४ में सन् १८९७ पृ. ५७१६. १३ जिनो तुम बुतपरस्त मनशते हो ये मी उन २ मतों को ईश्वर नहीं ममशत रितु उनके मामले परमेश्वरसों मति करने । समझा-जब मुममानोंको दयानंदका यह उत्तर है सव मानि भारायनाका डंडन क्यों करते हैं । पारहवीं बार १६५ ११२ एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (१०९) पूजन करते हैं, आप भी नामको उसका प्रतिनिधि मानते हैं इश्वरनाम भी प्रति- "निधि है, हम नाम और रूप दोनोंको प्रतिनिधि करके पूजन करते हैं दूसरेके पूमनसे दूसरेको सन्तुष्ट नहीं करते और संसारमें कोई भी इस यातसे खाली नहीं है समाजी भी उसीके प्रतिनिधि रूप गायत्री वेदमंत्रोंको ईश्वरादि शब्दोंको उसका प्रतिनिधि मानते हैं नहीं तो अवाङ्मनस गोचरको क्यों ईश्वर २ कर पुका- रते हैं और निराकारका प्रतिनिधि अउमईश्वर जैसा तुमने प्रतिनिधि किया है यदि हम विश्वास के साथ उसका प्रतिनिधि नियत कर उपासना करते हैं तो क्या दोप है। यदि हम पापाणादिपूजा करते तो यों कहते कि, हे पाषाण ! तुम पत्थरफे दुकडे हो कारीगरने तुमको छैनीसे गढा है इत्यादि हम तुम्हारी स्तुति प्रार्थना करते हैं परन्तु हम तो विष्णुके सन्मुख "सहस्त्रशीर्षा'' शिवके सम्मुख “नमः शिवाय" फहकर पूजन करते हैं, इन मंत्रोंमें परमात्माहीका वर्णन है, इस कारण हम परमात्माका ही पूजन करते हैं, जडबुद्धियोंको जडपूजन दीखता है। और हम तो माला पुस्तक गुरुजन भूमि आदि सबहीका सत्कार करते हैं, पृथ्वीपर भी मंत्र पढकर चरण रखते हैं फिर हम मन्दिरोंका जहां प्रधान पून- नस्थान है क्यों न सत्कार करें, यदि कहो कि, पूना होनेपर फिर सस्कारकी पा आवश्यकता तो क्या आप दंपानंदसे उपदेश ले चुकने पर फिर उनका तिरस्कार करते हो, तनक इतना तो कहिये भिन्न २ जातियों के मन्दिरोंमें उनके माननीयोंके चित्र सन्मानके साथ हैं या नहीं आप भी संन्यासी बाबाका चित्र लटकाते हो, भेद इतना है आप थोडे सत्कार करते हो और हम कुछ विशेषता करते हैं, यह सनातन धर्मको शैली ही है, आप नमस्ते आदाब अनमें ही अपनेफो कृतार्थ मानते हो और यहां तो साष्टांग दंडवत् फर गुरुचरण शिरपर रखने विना सन्तोप ही नहीं होता यदि कहो कि, जिसका पूजन है यही प्रति- निधि ही सन्तुष्ट होगा तो महारानीकी जुबिलीमें उनकी मूर्ति के सन्मुख बड़े उप- हार रखकर ध्वजा पताका फहराईगई, फूल माला लटकाईगई, प्रधान सिंहासन 'पर उच्च कर्मचारी वैठाये गये, उनके सामने बड़े २ एड्रेस पढकर महारानीकी जय उच्चारण फीगई, गीत गाये गये, रोशनी कीगई, मूर्तिपूजा करने में तो आत कुल- उला उठती हैं परन्तु यह सब क्यों कियामाताहै, क्या यह गीत लन्दन पहुंचे, यह रोशनी महारानीके मन्दिरमें पहुंची, यह भारतका द्रव्य आपने फिस वेदफे प्रमाणसे मट्टी और अमिमें लगादिया, जब कि, आप राजभक्तिका उद्गार नहीं रोफसक्ते तो उपासक लोग हरिभक्तिका उद्गार कर रोकसते हैं, महारानी सुनकर प्रसन्न हो इसी कारण आपने सब कुछ किया तो "पश्यत्पचक्षुः सशृणोत्पकर्णः" ग्रहीता ' जो प्रार्थना सुनता और देखता पूजादिक ग्रहण करता है क्या यह इमारे प्रेमभावको जानकर प्रसन्न न होगा क्या उसको वह नहीं जानता कि, मेरे
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एकादशसमुल्लासखण्डनम् । जानते हैं, सब विरुद्धःउसमें संभव है यथा "अणोरणीयान् महतो महीयान् " "तद्रेतद्वदन्तिक" वह छोटेसे छोटा बडेसे बड़ा वह धीरे और दूर है उसमें सब कुछ होसकता है और जब कि, तुम एफ तृणके तत्त्वको नहीं जानते तो, गणित पढके २ दोका ठीक ठीक वर्गमूलतक नहीं निकाल सकते तो जिसको जानने में वद भी वकराता है उसे हम आपकी बुद्धिके अनुसार दालरोटी फहदें जो कहो विना समझे कैसे पूजें आपने अनेक कार्य बुद्धि लगा सोचकर 'पहलेसे नहीं किये, माताका दूध पीना खेलना पढना रेलपर चढना तार देना यह सब काम क्या समझकर ही किये हैं, वायुके अंशमें अभीतक कोई पक्का सिद्धांत नहीं तो क्या आप साँस नहीं लेते यदि आप उस ईश्वरका तत्त्व न समझे तोक्या उपासना छोड़ दें आप विना समझे सब कुछ फरें और जिससे हृदयको शांति और अपूर्व आनंद होता है हम उस पूर्वाचार्य वेद सम्मत पूजनको क्यों न करें। यदि असम्भव कहो तो जबतक रेल तार न था तसबीरफा फोटो न था तब तक इस बातका भी क्या आप सम्भव मानते थे परमाणुको आजतक किसीने देखा है। परन्तु इतना कहते हो कि, जिसका खण्ड होते २ फिर न होसके उसे पर- माणु कहते हैं, युक्तिसे यह भी ठीक नहीं रहसक्ता और रेखागणितसे भी यह स्पष्ट हैकि, किसी पदार्थकी ऐसी फोई भी अवस्थाभी नहीं जिसकी और एक छोटी अवस्था न होसफे, यदि हम (अह) रेखाके (उ) बिन्दुसे एक (कख) लम्ब उठा और 4 अ च इसको (ख) की ओर अनन्त दूरतातक खिंची मानकर (ख) को केन्द्र मान (खक) प व्यासाईसे (कचछ ) वृत बनावें और (अइ)रेखाके (अउ) खण्डमें कहीं एक (घ)बिन्दु मानकर (घख ) रेखा करदी. जिये यह रेखा वृत्तकी परिधीको जहां काटे उ) यहाँ (च)विन्दु मानलो अब (कख) रेखाके बडे भागमें (ज) विन्दु मानकर (जक) व्यासाईसे एक और वृत्त करै तौ उसकी भी परिधि अवश्य ही इस (खघ) इ रेखाके (चप) खण्डको काटती जायगी क्यों कि दो वृत्त भीएकही विन्दुपर सर्श - (१२) दयानन्दतिमिरभास्करः। करते हैं तथा परिधि और सरल रेखाभी एकही विन्दुपर स्पर्श करती हैं जो (अइ, और पहिले वृत्तको परिधिके बीचही.वीच इसको जाना पड़ा जहां यह (वय रेखाको काटै वहां ही (च) विन्दु मानो अब विचारो कि, प्रथमके (नय) खण्डसे यह ( चघ ) छोटा होगया यदि योंही (ज) बिन्दुको खिसकाते चलो ती और( जड) व्यासाईसे वृत्त बनाते जाओ तो वह सब फाटते फाटते इस रेखास- ण्डको छोटा करते जायेंगे परन्तु यह तो कहिये कि, यह खण्ड कभी ऐसा छोटा फरते जायँगे परन्तु यह तो कहिये कि, यह खण्ड कभी ऐसा छोटा होगा कि, फिर जिसका छोटा न होसकै यह कितना ही छोटा क्यों न होजाय (ज) बिन्दु खसकाकर वृत्त करनेसे इसके टुकडे हो ही सकेंगे, तब फहिये रेखागणितकी सत्ताके विरुद्ध परमाणुका खण्ड न होना इस असम्भव पदार्थको क्या आपने स्वीकार नहीं किया, फिर एक संख्या २ आदि संख्याओंसे बढाकर भागदेते चले जाने कभी शून्य नहीं होसकता पर छोटा होता चला जायगा इत्यादि सैकड़ों असम्भव तो स्वीकार करले परन्तु सर्वशक्तिमान्की महिमामें कोई असंभव वात जान पड़ें तौ छातीके टुकडे होने लगते हैं । यदि कहो कि, अनन्त पदार्थका आकार नहीं तो रेखागणितके अनुसार कि, आप ( अइ) एकरेखाको परिमित बैंचकर भी उसे अपरिमित मानते हो, अनन्त फहते हो संख्यामें शून्यसे आप भाग देते हो और लम्बे चौंडे चिन्दु रसदेते हो पर परमात्माफा आकार कल्पनासे पेटमें दर्द होता है । यदि फहो कि, सूक्ष्मका आकार नहीं होसकता तो सुनिये बड़े २ एम्, प, थी. ए, इस पातको मान चुके हैं कि, चिन्दुमें लम्बाई चौडाई नहीं रेखामें लम्बाई हैं चौडाई नहीं, परन्तु प्रोफेसर साहेब चोटपर एफ खडिपाका बिन्दु गोलाकार और चौंडी तुलीसी रेखा कर आपको दिखाते हैं क्या यह लक्षण ठीक है क्या बिन्दु जैसा कहा वैसा ही है कभी नहीं पर समझने के लिपे आपको यो हो मानना पडेगा नहीं तो घर पैठो इसी प्रकार यहाँ भी समझलो कि, उस अणोरणीपान् फा यथावत् आकार न भी बनासके तो क्या है उस बिन्दुको समान हमारे प्रपो जनमें कोई बाधा नहीं पहसती यदि अज्ञात पदार्थकी कलाना नहीं होसकती माँ फहो तो वीजगणितपर हरताल गाना होगा, टसमें तो अशात पदार्प माना मी जाताहै गनपर लिखा भी जाताह और शनैः २ अज्ञातसे मान प्राप्त होता है, इसी प्रकार टस पाणी मनसे परेको टपासना करते नामोशात दोगापगा। यदि कहो कि, निराकारका आकार नहीं माना जासकता तो शन्दको सप सपदिन मानते हैं पर यह तो कहिये यह आपने कमाए, बी, सी, डी, अष्टिक, पे, पही पैड पर लटके देखें हैं या घोटतमें आप दाताम उनके टेट वर मार सटकने हैं, या शोलने र मानसे काली धारा निकटती है । । , एकादशसमुल्लासखण्डनम् । यदि आप यों कहदें कि जो पदार्थ कुछ है ही नहीं उसकाआकारक्या होगा तो किसी महाविद्वान्से पूछिये कि, आपके पास हिमियान में सात रुपये हैं एक दिन तीन खर्च किये एकदिन चार तो आप पूछते हैं क्या रहा,आप कहोगे कुछ नहीं परन्तु आप मूलतेहैं उसमें कुछ गोल २ अण्डेसा है,फिसी बडे अंग्रेजीवालेसे पूछिये क्यों साहब क्या रहा तो वह झट ७-(३+४)-आपके सामने गोल अण्डासा लिख देगा, यस आपके शून्यका आकार तो गोल हो सक्ता है परन्तु परमात्माके शालग्राम और नर्मदेश्वरादिके आकार नहीं होसक्ते इस कारण आप जैसा ईश्वरको निराकार कहते हैं पैसा नहीं है, जब सभी पदार्थाका प्रतिनिधि स्वरूप आकार मानते हो तो जिसके माननेसे मुक्तितक प्राप्त होती है उसको क्यों न स्वीकार करेंगे, हमारे -श्रीनारायणाय नमः कहनेसे आपका चित दुखै परन्तु सन्ध्योपासनका लंबा चौडा नमस्कार आपकी निहातक न दुखावै, यदि आप कहो प्रधानहीकी पूना क्यों करतेहो तो आप भी 'मातृदेवो भव पितृदेवो भव' में आप भी मातापिताका सत्कार करतेहो,पर यह तो फहिये आपके पितामें पितृत्व फहाँसे कहांतक है, तब आप कहेंगे कि, सब ठौरतय आप उनके सत्कारके निमित्त चन्दन इतरादि सिरपर ही क्यों लगाते हो और दूसरे अपवित्र अंगों में क्यों नहीं लगाने तब आप शिरको उत्तमानही मानेंगे इसी प्रकार हम भी परमात्माकी श्रेष्ठही पदार्थीमें पूजा करते हैं, पिताके पूजनमें भी तो चेतनका पूजन नहीं करसकतेही 'पिताका चर्मही सत्कार के समय छूसकतेही गले में माला भी चर्मकाही स्पर्श है पर शरी- रफी पूनासे शरीरी प्रसन्न होताहै, ऐसे ही मूर्ति शरीर है परमात्मा शरीरी है यथा ( यस्य पृथिवी शरीरम् यस्य अमिः शरीरम् ) यह अन्तर्यामी ब्राह्मणकी श्रुति पीछे लिख चुके हैं, जब पृथिवी, जल, अमि, वायु, आकाश, आत्मा सब उसका शरीर है तो पञ्चभूतोंकी बनी मूर्ति उसका शरीर कैसे नहीं और शरीरको पूजा फरनेसे शरीरीका पूजन क्यों ठीक नहीं जो विना अपने इष्ट देवकी प्रतिमाके आगे. धरे ध्यान करतेहैं आंख खोलनेपर दूसरी वस्तु जो नेत्रोंके सन्मुख आवै उसीका चित्र अन्तःकरणपर पड़ता है और मय भगवान की मूर्ति सन्मुख होतीहै तब जो ध्यान करतेहैं आंख खोलते ही वह वस्तु सम्मुख होनेसे ध्याता और ध्येयकी ऐसी एकता होतीहै, साक्षात्कार होजाताहै इस कारण भगवन्मातके सन्मुख ही उपा. सनाकी रीति सर्वोत्तम है । जिन लोगोंको भगवन्मूर्ति पापाणरूप दीखती है वे क्या सब कुटुम्बियोंको हाड मांस कहकर पुकारतेहैं,वस्त्रादिका रुई नामसे बोलते सब वर्तनोंको क्या पीतल लोहा बोलते हैं जब सब वस्तुको भिन्न २ नाम लेकर पुकारते हैं, तब भगवन्मूर्तिमें पापाण फैसे दीखताहै,वह तो सर्वत्र ओतमोत हो. रहाहै भक्तजन उसमें परमात्माका दर्शन करते हैं अज्ञानी पापाण देखते हैं। .
- - (४५४) दयानन्दतिमिरभास्करः। निराकारकी पूजा ध्यानादिसे फेवल योगी नन कर मक्ते हैं परन्तु उसमें भी मूर्तिपूजन सहायक है स्वयं परमप्रसिद्ध शंकराचार्य स्वामी वेदान्तके आचार्य होकर भी अनेक स्तव पूननाविषयक कथन कर गये हैं, जो दिनरात इस जगत्नालमें मम रहते हैं उनसे फर यह ध्यान भूला जा सकता है,भला मैं कहता हूं आप तनक दयानदका ही ध्यान कर लो कि नंगे बैठे आंखें मीचे है, दूसरे लोग एक किसी सरोपर बागीचेका ध्यान कीनिये, जिसमें हरतरहके फूल खिले हैं, ध्यान करके आप भूल जाइये क्यों कि, आपका ध्यान नमाया हुआ है, परन्तु जब अब इसको भी आप नहीं भूलसक्ते तो यह अन्तकालके जगत्का अध्यास आपको क्या पांच मिनट आँस मीचनेसे जाता रहेगा, हा यदि आप मंदिरमें बैठ नारा- यणमूर्तिफे सन्मुख बैठकर भजन करें तो अवश्य वित्त एकाग्र होगा, जैसे सितार सारंगी सुनते ही आप चलते २ खडे होते हैं, तो क्या उनमें यदि भगवान्का स्मरण किया जाप (जाके प्रिय न राम पैदेही) तो कहिये कैसा ध्यान बंधता है उनके उत्सव आरती स्तोत्र पढनेसे मन तन्मय हो जाता है, इसपर भी यदि कोई बक हैं कि, मूर्तिपूनासे हानि हुई यह भी उनसे पूछना है, क्या मूर्तिपूजाने किसीका गाय नष्ट किया या स्वतंत्रता हरली या जगत् नष्ट कर दिया कुछ तो कहो जिस बातसे ईश्वरके भजनमें प्राणी मम हो जाता है तो आप स्वयं समझ सक्ते हैं कि, टससे कुछ बिगाड नहीं होसक्ता, किन्तु इतना और भी विशेष लाभ है कि, श्रेष्ठस्थान मंदिरों गंगादि तीयों में विशेषकर भगवत्सम्बन्धी स्मरणहीको जी चाहता है, कुत्सित और चित्तकी वृत्ति नहीं जाती, तथा वह स्थान वेदपाठ मंत्र जप कथा वार्तासे युक्त रहते हैं, जहां जाफर शोकाक्रान्त भी मनुष्य प्रसन्न हो जाय यही एक देश है जहां सहस्रों गज भूमि श्रेष्ठ मंदिरोंसे व्याप्त है, दूसरे देशोंमें कवरस्तानादिसे वीपों पृथ्वी आच्छादित है, जब भिन्न २ पुरुषोंकी भिन्न २ प्रकारकी रुचि है इसी प्रकार अनेक सम्प्रदायोंमें भिन्न २ प्रकारसे पूनन होता है पूजन करनेसे ममत्व भी दूर होता है यदि कोई प्रभ करें तो कह देते हैं कि, यह सब परमात्माकाही है हमारा क्या है, जैसे भारतमें अनेक ऋतु अनेक भाषा हैं इसी प्रकार भिन्न रुचिके कारण अनेक सम्प्रदायें हैं पर हां जिस दिनसे यहां फलिका आगमन हुआ भारतका युद्ध हुआ भाईने भाईको विप दिया, युधिष्ठिरको पनयास द्रौपदीका सभामें केशाकर्षण हुआ उसी दिनसे धर्म और राजलक्ष्मी इस देशसे विदा होगई, जिस दिन श्रीकृष्ण और विदुरका उपदेश न माना गपा, ठी दिनसे भारत उच्खल होगया, निस दिन राजा परीक्षितको सर्पने फाटा उसी दिनसे भारत मूच्छित होगया है विद्याको होनतासे ही देशमें अनेक विन हुए हैं इससे मूर्तिपूजनसे देशकी हानि नहीं हुई ।।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (४१५) "तं यथायथवोपासतेतदेवभवति तद्धनान्भूत्वावति । तस्माद- नमवित् । सर्वरतरुपासीतसर्वहेतदुभवतिसर्वहनमतद्भूत्वावति" श० मंत्रा०२० जो जिस प्रकार जिस रूपमें उपासना करताहै वह वही हो जाता है और उसी रूपसे सेवकोंकी रक्षा करताहै, वेदमें अनेक स्थानों में भिन्न २ उपासना लिखी हैं ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत, वाचंब्रह्मेत्युपासीत, आदित्यं ब्रह्मेत्युपासीत, योऽसावादत्ये पुरुषः" 'नमोस्तुनीलग्रीवाय' इत्यादि अनेक आकारसे उपासना हैं यही सम्प्रदाय भेद है जैसे किसी स्थानको कोई जाय वहां जानेके चार मार्ग हों तो किसीम चलो सब यहीं पहुंचेंगे भूमि आदिसे 'सोसायहम्' तक उपासनाका विधान लिखा है। वेदमें कोई विषय तौ पूर्णोक्त अर्थात् यथावत् लिखा होताहै जैसा अमिवय- नादि, दूसरा संक्षेपोक्त होताहै वह पद्धतिआदिद्वारा संसारमें प्रचलित होता है जैसा उपनयन संस्कारआदि, तीसरा अनुक्त निसके विपय कुछ न कहा हो जैसे मृदंग बजाना वनारको जाना आदि, चौथा निपिद्ध जिसे निपधकिया हो जैसे जुआ हिंसा आदि इनमें पहला तो वेदविरुद्ध हो नहीं सक्ता, और संक्षेपोक्तके विस्तारको वेदविरुद्ध कह ता रात दिनके कार्य पद्धति आदि सब विरुद्ध हो जाय और ऐसा ही हो तो वेदमें रेल तार गणित शास्त्र निकालनेवाले बाबानीकी बहुतेरी भट्टीवार हो, यदि अनुक्त विषय वेदविरुद्ध हो तो यह आपके कपडे अचकन कोट बूट घडी कारखाने यह सब व्यवहार बन्द होनाय ४ वह जिसमें चंदन लिखाहो यह कार्य मत करो सो मूर्तिपूजन मत करो यह बात हमें कोई वेदमें लिखी दिखलाओ, वह रामायण कथा तो वेदविरुद्ध, पर बाबानीका सौंबा हुक्का खडाऊं सब वेदानुकूल हैं कोई यों भी कहते हैं 'प्रतिमास्वल्पबुद्धी- नाम्' यदि उन्हीका कहा मानाजाय तो योगी जीवन्मुक्तिको छोडकर सब स्वल्प बुद्धि ही हैं निषेध तो नहीं आया, बाबाजीको तरुतारके मिलते ही तार विद्या दीखपडी परन्तु (संवत्सरस्य प्रतिमासि ) में प्रतिमा पूजनका विधान न देखातया (सनी बन्धुर्ननिता) में कहीं भक्तिका उद्रेक न मिला, कोई कहेंगे "न तस्प प्रतिमास्ति "यह तो वेदवाक्य आप छोडे जाते हैं। यद्यपि इसपर हम लिख चुके हैं फिर भी सही क्यों कि मसंग आगयाहै अर्थ इसका यही है कि, उसकी प्रतिमा नहीं है तो क्या यह ज्ञेयांशका विशेषणं कुछ उपासनामकारमें बाधा डालेगा हम अप्रतिमकी प्रतिमाद्वारा पूना करते हैं तो क्या यह श्रुति इसका निषेध करेगी ? हम उसको निराकार कह साकार द्वारा . 1 . (४१६) -- दयानन्दतिमिरभास्करः। पूजते हैं प्रतिमाके ती अनेकार्य हैं आपने भी बाट तराजूके अर्थ मनुमें लिखे है हैं, परन्तु प्रतिमा शब्दका अर्थ उपमा हैइसमें विशेष प्रमाणकी आवश्यकत नहीं कारण कि, पहले लिख चुके हैं उपमा अर्थमें वाल्मीकिरामायण महाभारतमें बहुत स्थानपर आताहै यथा "इतो महात्मा वनमेव रामो गतः सुखान्यपति- मानि हित्वा" अतुलनीय अनुपम सुखोंको त्याग रामचन्द्र पनको गये, इसका यह अर्थ नहीं कि जिनकी मूर्ति न बनसकै ऐसे सुखोंको छोड वनको गये । महा- भारतमें नलको 'रूपेणाप्रतिमो भुवि' इसका यही अर्थहै कि, रूपमें नलकी समान कोई भूमिमें नहीं था यह अर्थ नहीं होसकताकि, नलकी मूर्ति न हो टनकी मूर्ति भी थी ( इति स्म सा फारुवरेण लेखितं नलस्य च स्वस्पच सख्यमैक्षत ) तसवीरमें जो अच्छे कारीगरफी बनी थी दमयन्ती उसमें नलके साथ अपना प्रेम देखती थी, और इसी मंत्रफे अगले भागमें लिखा है ' यस्यनाममहद्यशः 'निसका नाम और अधम उधारादि यश बहुत बड़ा है आप विचारिये क्या इससे यों अर्थ यना. ओगे कि, बडे यशस्वीकी मूर्ति नहीं हो सक्ती, यह अवश्य होसकताहै कि, उसकी सदृश कोई नहीं यदि मूर्ति यशस्वीके यशको बाधिका हो तो बडे २ कर्मचारी तथा आपके दयानंदफी ही तस्वीर दुष्कीर्तिका पुतला समझा जापगा, पदि पापाणमयी देवमूर्ति आपको पत्थर दीखती है तो दयानंदको मूर्ति है ऐसा क्यों फहते हो बाबानीफे चित्रको फागद फहा फरो पूर्वसे जो प्रकरण श्रुतियोंफा है उसको हमारे पाठक समझ गपे होंगे कि, फिसफा अर्थ ठीक है, इतनपर भी यह विचारो कि, फौन ऐसा है गो अपने उपास्यपर विभास (ईमान ) नहीं रखता जो नहीं रसता यह उसके पिरुद्ध है" घेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रिपमात्मनः ।" इस मनुके यारपरी सदाचारका भी ग्रहण होता है दयानन्द भी सत्या. म. में कुछ रादाचार लिस गये हैं "यनास्य पितरो याताः" तो येदमें जो प्रसंग संक्षेपसे हो सदाचारमें हो तो यह वरावर प्रमाण है और अनुक्त विषयमें सदाचार वेदकी समान प्रमाग है स्वयं फपिलदेवजी अपने मुत्रम लिखः गये हैं "मंगलाचरणं शिष्टा- चारात्-'" शिष्टाचारस मंगलाचरण करते हैं येदोंकी अनेक शासा है ये इस सगप सब प्राप्त नहीं हो सकती, फिर कौन कद सफता है कि इनमें क्या क्या लिया है और उन्हींक अनुसार अनेक रीति प्रचलित हैं । पदार्थ विद्यासहन दिली तबदेता सिद्ध करने मनुष्या मस्तिष्क. निर्गुण चिन्तनही मामयं मही रखता है इसमें बड़े सायनांस वह शक्ति टत्पन्न होगी हसी कारण अपन मन सभाति परमात्मा चिन्तन हो शरीरमे टमौकी मार दाग फारम पाटमें सपनगन ही मानिए, पा अप भी सब नाविषम सि सम..
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (४१७) दायमें विद्यमान है, फिर शब्द प्रमाण भी कितना दृढ है कि यदि कहीं को मापसे कह उठे सर्प है झट आप चौंकपडेंगे आप्तवाक्पको शब्द कहते हैं इस कारण भारतवर्षके जो आप्तपुरुष इस विषयमें कहगये हैं उसको कौन मेट सकेग फारण कि हमारे आचार्योंमें मिथ्या भाषणकी शंका भी नहीं है उन्हीं आप्तों शब्दोंको शिरपर रखकर पूर्व कालमें चारों वर्ण शाप हो या आशीर्वाद अपने कृतार्थ मानते थे इस कारण वेदशास्त्र प्रतिपाद्य मूर्तिपूनामें किसी प्रकारका सन्दी फरना टचित नहीं है. और जिनके वित्तमें सत्वगुण नहीं जो अपने पद्धोंको मूर समझते हैं उन मूखौंको होटेल विस्कुट चुरट रममें निर्गुण ईश्वर दीखता होगा पाठकवर्ग समझनेको थोडा ही बहुत है मूर्तिपूजनमें कोई सन्देह नहीं है. युक्तिप्रकरण समाप्त । स० पृ० ३२० पं० २० (द्वारका ) जब सम्वत् १९१४ के वर्षमें तोपों मारे मंदिरकी मूर्ति अंगरेजोंने उडादी थी तब मूर्तियां कहां गई थी ।। ३४५।। समीक्षा-स्वामीजीको यह वार्ता सर्वथा मिथ्या है कभी अंगरेजोंने ऐसा नहीं किया मूर्ति नहीं तोडी ॥ स०प्र० पृ० ३३६ पृ० १८ छापा सम्बत् १९६९ जगन्नापमें पाममार्गि भैरवीचक वनापाहै क्यों कि सुभद्रा श्रीकृष्ण और बलदेवकी बहन लगती उसीको दोनों भाइयोंके बीच में स्त्री और माताके स्थानमें पेठाई है ॥ समीक्षा-स्वामीनीका शास्त्रज्ञान कैसा विलक्षण है कि कहीं कुछ कहीं कुछ लिखदेतेहैं भला जहाँ कहीं सुभद्रा शब्द आवेगा घही आप श्रीकृष्ण और बलदे घको पहनका अर्थ फैरेंगे तो यजुर्वेद अ० २३ मं० १८ मुभद्रिका काम्पील वासिनीम् ' यहाँ सुभदाका अर्थ श्रीकृष्णको भगिनीका फरोगे या और कुछ और 'भदा भद्रया सचमान आगाद' यहां भी भदापद विद्यमान है तब आपकं तो वही अर्थ सूझेगा सायणाचार्यने यहाँ भदाफा भयं भगनीया भजनके योग कियाहै अर्थात् जिसका सब भनन फरते हैं तब इस अर्पको सेनेसे सुभदाया जा साक्षात् विष्णुप्रिया लक्ष्मीका होताहै तब यहाँ मुभदा साक्षात् महामाया सक्षम क्यों न समझीजाप, और आप जो कहते हो किमी और माताफे स्थानमें बैठा है ऐसा अनर्थ क्यों करतेदो, किस प्रमाणसे कहतेहो जगमापमाहात्म्यमें ही पई दिखाओ अन्यथा आपका फपन गप्प ही गिना जायगा नगनाथमा० असो ६ घलेन भदया पुक्तः, ऐसा पाठ है और लक्ष्मीका अर्थ है । इसी प्रकार औ- तीयों मन्दिरोंकी आपने मिथ्या समालोचना कोहे बुद्धिमान उन याताकोनिरोग और आपकी कल्पना मानते हैं हमने पृय पद नहीं दिखलाया है परन्तु नः .
(४१८) दयानन्दतिमिरभास्करः। मूर्तिम पूजन वेदमें विद्यमान है तब मूर्तिपूजनके समाधानसे सबका समाधान होगया समज्ञना ॥ स०प्र० पृ० २०४ पं० २३ में स्वामीजी लिखते हैं कि, ईश्वरके स्वरूपमें समाधिस्त हुए । समीक्षा-समझे अब ईश्वरफा स्वरूप हागया | इसके आगे स्वामीनीने प्रसिद्ध २ मन्दिरोंकी निन्दा फोहै मूर्तिमण्डनमें सबका मण्डन आगया । तीर्थप्रकरण। सं० पृ० ३२३ पं० २८ यह तीर्थ भी प्रथम नहीं थे जब जैनियोंने गिरनार आजू आदि नीर्थ बनाये तो उनके अनुकूल इन लोगोंने भी बनालिये कोई इनके 'आरम्भकी परीक्षा करना चाहै तो पण्डोंकी पुरानीसे पुरानी वही और तविक 'पत्र आदि देखें तो निश्चय होजायगा कि, यह सब तीर्य पांच सौ वर्ष अपवा 'एक सहस्र वर्षसे इधर ही बने हैं सहस्र वर्षसे ज्यादेका लेख किप्तीके पास नहीं निकलता इससे आधुनिक हैं ॥ ३४८ । २० पृष्ठ ३२४ पं० ९ गंगागंगोति यो ब्रूयात् योजनानां शतैरपि । मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति ॥ हरिईरतिपापानि इत्यादि यह पोपपुराणके श्लोक हैं पृ० ३४३ ॥ २४ पृ० ३२४ पं० २१ इनके मिथ्या होने में क्या शंका क्यों कि गंगा २ वा हरे २ रामकृष्ण नारायण शिव भगवती नामस्मरण करनेसे पाप नहा छूटता ॥३४४११० पं० २४ मूढोंको विश्वास है कि, हम पाप कर नामस्मरण कर तीर्थयात्रा करेंगे .तो पापोंकी निवृत्ति होजायगी ॥ ३४४ । १२ स० पृ० ३२५ ५० ३ जो जल स्थलमय हैं वे तीर्थकभी नहीं होसकते।पं०२० पं० ६ प्रत्युत नौका आदिक तीथ होसकताहै कि, उससे समुद्र आदिको तरते हैं पं० २२ समानतीर्थेवासी १ अ०४ पा०४ सू० १०७ नमस्तीर्थ्यायच-यजु. ब्रह्मचारी एक आचार्यसे और एक शास्त्रको साथ साथ पढतेहों ये सब सर्व अर्थात् समान तीर्थसेवी होते हैं जो वेदादि शास्त्र और सत्यमापणा - . .
+ एकादशसमुल्लासखण्डनम् । धर्म लक्षणों में साधु हो उसको अन्नादि पदार्थ और उनसे विद्या लेनी इत्यादि तीर्थ कहाते हैं ॥ ३४४ । २४ समीक्षा-स्वामीजी तीर्य भी उडाना चाहते हैं जो लिखाहै कि, ५०० वर्षसे ऊपर १००० वर्षसे नीचेके हैं क्यों कि पंडोंकी वही पुरानीसे पुरानी इतने ही दिनोंकी मिलती है धन्य है तीर्थीके प्रमाणमें पंडोंकी वही तो प्रमाण और वेद. शास्त्र पुराणादि सब अप्रमाण जब कि, महाभारत में पूर्णता ती की महिमा लिखी है जिसको रचे ५००० वर्ष व्यतीत होगये तो आपका कथन यह सर्वथा असत्य है कि तीर्य पांच सौ वर्षके हैं तीर्य तो वेदों में विद्यमान हैं । नमः पायर्यायचावा-युचनमः प्रतरंणाय चोत्तरंणायचुनमः स्तीयायचकूल्यायचनमः शप्प्यायचुफैन्यायच-यजु०१६म. ४२ भापार्थः। हे शिव ! आप सब प्रकारसे सच में श्रेष्ठ सब संसारके तारने पार उतारने- 'हारे हो क्यों कि आप तीर्थरूप हो जैसे गंगा अथवा आप तीर्थों में पर्यटन करतेहो आपके अर्थ नमस्कार और तीथोंके घाट किनारेरूप आपके लिये नम- स्कार शप्प अति गऊरूपी फेनारूपी सिकतारूपी हो आपको वारंवार नमस्कार है यहाँ (नमस्तीर्थ्याय च) यह पद इसी हेतुमें है कि, आप प्रयागादि तीर्थीम विव- रतेहो इसके अर्थ स्वामीनीने कुछ नहीं लिखे और गंगादिका माहाल्य भी मुनिये ऋग्वेदमें इस प्रकार लिखाहै ॥ डुममगंगेयमुने सरस्वतिशुद्विस्तोमसचतापुरुण्या- असिक्न्यामरुद्वधे वितस्तुया कीयेशृणुह्यासुपोमया ऋ० म० १० अ०३० ७५०६ पदार्थः। हे गंगे हे यमुने सरस्वति शुतुद्रि यूयं मे मम स्तोमं सचत आसेवध्वम् परुपण्या सह मरुध माजीकीयेत्तमपि असि- क्न्या वितस्तया सुपोमया च सह आशृणुहि आभिमुख्येन स्थित्वा शृणहि-
(४२०)
दयानन्दतिमिरभारकरः।
भाषार्थः।
हे गंगे यमुने सरस्पति शुतुदि तुम संपूर्ण मेरे यज्ञको सन्मुख होकर सेवं
फरो हे मरुयुधे आर्जीफीये परुष्णी असिक्नी वितस्ता सुपोमाके साथ मे
यज्ञको सेवन करो मेरी स्तुतियोंको सब प्रकारसे सुनो ५ निरु. उत्तरप० अ० ३
२६ में ऊपर लिखे अनुसार व्याख्यान है।
यहाँ यह विचार करना है कि, यदि गंगादि नदियोंकी अधिष्ठात्री देवता न हो
तो उनका आह्वान यह किस प्रकार है और स्तुति श्रवणकी प्रार्थना कैसे की है इस
कारण गंगादितीर्थीको अतीर्थ कहना अज्ञान है और देखो-
सरस्वतीसुरयुः सिंधुमिभिमुंहोमुहीरवसायतुवुझेणीः ।
देवीरापोमातर सूदयित्वोघृतवत्पयोमधुमन्नोअर्चत ॥
ऋ० मं० १० अ० ५ सू०६४ म० ९
पदार्थः।
(महो) महतोपि (महीः) महत्यः (ऊर्मिभिः) सहिता (सरस्वती)
(सरयुः) ( सिन्धुःवक्षणीः ) नद्यः ( अवसा) रक्षणेन हेतुना
(आयतु) अस्मदीयं यज्ञं प्रत्यागच्छन्तु (मातरः) मातृभूताः
(सूदयित्वः) प्रेरयियः (देवीः) (आपाधृतवत् मधुमत् )
(पयः) (नः अर्चत) प्रयच्छत..
भापार्थः।
महानसे भी महान् लहरोंसे युक्त सरस्वती सरयू सिंधुनामा नदी देवियां रक्षा
करनेके लिये हमारे यज्ञमें आओ माताकी समान प्रेरक जलदेवियां घृत मधु युक्त
दुग्धको (वा जलको) हमें दो और देखो-*
आपोभूयिष्ठाइत्येकोअब्रवीदग्निभूयिष्ठइत्यन्योअब्रवीत् ।
वर्धयन्तीवहुभ्य प्रेकोअब्रवीहतापदंतश्चमसांआपिशत ॥
ऋ० मं० १ अ० २२ सू० १६१ मं०९
* जब छोटे स्वामी भी इनसे रक्षा मानते हैं और नदी मानते हैं तब यहमें इनका आहा
रस्ट पुण्यरूप है।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (४२१) हेऋभवःभवतांमध्येएकाकश्चित्तीर्थाश्रयेणैवप्राप्तदेवभावआप एवभूयिष्ठाइत्यत्रीत्वपयन्ती (ते यूयं ) (झता) ऋतानिसत्या- न्येवेतान्यबादीनितीर्थस्नानादीनिदेवताभावप्राप्तिसाधनानिव- दन्तउपदिशन्तियज्ञेषुचमसान्सोमयुक्तान आपिशत व्यभंजत भापार्थ-भव देवतास्तुतिद्वारा सद्गप्तिमातिसाधनोंका इस मंत्रमें उपदेश दियाहै हे ऋभव ! तुममेंसे कोई एक तीर्थ सेवन कर देवभावको प्राप्त हो तीर्थनलकोसों- त्तम साधन कहताहै, कोई अमिहोत्रादि साधन अनुष्टानसे प्राप्त देवभाव तिसको सर्वोत्तम कहता है, इसी प्रकार कोई प्राणीमात्रपर दयाके अनुष्ठानसे देवभाष 'प्राप्त होनेसे दपाको सर्वोत्तम मानताहै, इस प्रकार यथार्थ साधनका उपदेश फरते हुए यज्ञपात्रके विभाग करते हो, अथवा ( ऋतावदन्त ) इसका यह अर्थ है कि जितेन्दी सत्यवादीको तीर्थ फल देते हैं, तीर्थेस्तरन्ति प्रवर्ती मुहीरिति यक्षुकृतः सुकृतो येन युन्ति अत्रा- दधुर्यजमानायलोकंदिशोभूतानियदकल्पयन्त अर्थव० २८।४।७ (तीयः) तीयोंदारा (प्रवतः) प्रकृष्ट ( मही ) बडी आपत्तिको ( इति) इस प्रकार (तरन्ति ) तरजाते हैं अर्थात् तीर्थासे बडे बडे पाप नष्ट होजाते हैं -( यज्ञकृतः) यज्ञोंके करनेवाले (सुकृतः ) पुण्योंके करनेवाले ( येन ) निस मार्गसे ( पन्ति ) जाते हैं वे ( अब ) इस पुण्यलोक प्राप्ति साधनके मार्गमें प्राप्त होते ( यजमानाय ) पनमानके निमित्त ( लोकम् ) पुण्यानितलोकको (नदधुः) विधान फरें (यत् ) जो (दिशः ) दिशा ( भूतानि ) सब माणीवर्ग अर्याद दिशाओंमें स्थित माणी यनमानके निमित्त (अंकल्पयन्त) कल्पना करतेहुए इसम तीयोंसे तरना स्पष्ट है, अजितेन्दी असत्यवादीको नहीं यही बात महाभार- तके पनपर्व तीर्थयात्रापर्वाध्यापमें लिखी है, और देखिये पाल्मीकि बालको सो २२ । २३ सर्ग ३५॥ एते ते शैलराजस्य सुते लोकनमस्कृते ।। गंगा च सरितां श्रेष्ठा उमा देवी च राघव ।। २१ ।। सुरलोकसमारूढा विपापा जलवाहिनी ॥ २२ ॥ विश्वामित्र घोले हे राममी ! गंगानी और पार्वती दोनों हिमावलको कन्या हैं और दोनों श्रेष्ठ पूजनीय हैं २१ गंगानी जलरूप हो पापोंका नाश कर स्वर्गः सोफमें पहुँचाती है ।। २२ । . .
: (५२३) दयानन्दतिमिरभास्करः। पुनः अयोध्याकाडे श्लो० ८२-८७ तक स० ५२ मध्यं तु समनुप्राप्य भागीरथ्यास्त्वनिन्दिता ॥ वैदेही प्रांजलिर्भूत्वा तां नदीमिदमत्रवीत् ॥ १॥ पुचो दशरथस्यायं महाराजस्य धीमतः ॥ निदेशं पालयत्वनं गंगे त्वदभिरक्षितः॥२॥ चतुर्दश हि वाणि समग्राण्युष्य कानने ॥ भ्रात्रा सह:मया चैव पुनःप्रत्यागमिष्यति ॥ ३॥ ततस्त्वां देवि सुभगे क्षेमेण पुनरागता । यक्ष्ये प्रमुदिता गंगे सर्वकामसमृद्धिनि ।। ४ ॥ त्वं हि त्रिपथगे देवि ब्रह्मलोकसमक्षमे ॥ भार्या चोदधिराजस्य लोकेऽस्मिन्संप्रदृश्यते ॥५॥ सा त्वां देवि नमस्यामि प्रशंसामि च शोभने । प्राप्तराज्ये नरव्याघ्र शिवन पुनरागमे ॥६॥ गवां शतसहस्रं च वस्त्राण्यन्नं च पेशलम् ॥ ब्राह्मणेभ्यः प्रदास्यामि तव प्रियाचिकीर्पया ॥७॥ जिस समय वनको जाते समय नौकाम वठ रघुनाथजी गंगापारको चलें और नौका जब बीचमें पहुँची उस समय जानकीजी हाथ जोड इस प्रकारसे प्रार्थना करने लगी १ हे गंगे ! यह महाराज दशरथके पुत्र वनवास करेंगे. तुम इनफी रक्षा करो २ चौदह वर्ष वनमें अपने भाई और मेरे सहित वास' फरेंगे फिर वहांसे घरको पधारेंगे ३ हे गंगादेवी ! तुम इनपर प्रसन्न हो और आनन्दमंगलसे फिर लाओ, तुम सकल मनोरथ सिद्ध करतीहो ४ हे गंगे । तुम बिलोफीका कार्यसाधन करतीहो ब्रह्मलोकका वास देनहारी हो समुद्रफी भार्या हो इस कारण हे देवो ! मैं तुम्हारी प्रार्थना हाथ जोडकर फरती हूं.५जबू रघुनाथजी वनवाससे निवृत्त होके अपनी राजधानी में प्राप्त होंगे तो तुम्हारे अर्थ हजार गौ वस्त्र और अन्न पतिकी प्रीति के अर्थ ब्राह्मणोंको दूंगी । अब सनन पुरुष विचारलेंगे कि गंगादितीर्थ कबसे हैं इनसे पाप दूर होतेहैं तथा मनोरथ पूरे होतेहैं यथा हि- यमो वैवस्वत्तो देवो यस्तवेप हदि स्थितः ॥ तन चेदविवादस्ते मा गंगां मा कुरुंन्गमः-अ०८श्लो० ९२ ।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (४२३) यदि यमराज वैवस्वत देवता तुम्हारे मनमें विराजमान हैं, यदितुम्हारा विवाद यमके साय न हो ो गंगा और कुरुक्षेत्रमें मत जाओ अर्थात् जो तुम मिथ्या भाषण करोगे तोपातक होगा, यमरानसे विवाद होगा पापकी शान्तिके अर्थ गंगा और कुरुक्षेत्रमें जाना होगा, और यदि सच्चे हो तो पापरहित होनेसे तीर्थ जानेकी आवश्यकता नहीं यहां भी प्रत्यक्ष तीर्थोकी महिमा है और यह शोक पुराने सत्यार्थप्रकाशमें भी आपने लिखाथा, और देखिये ऋग्वेद संहितामें ॥ सितासितेसरितेयत्रसंगथेतचाप्लुतासोदिवमुत्पतन्ति । ये वेतन्वं विसृजन्तिधीरास्तेजनासोऽमृतत्वंभजन्ते-ऋ० पारशिष्ट. जहाँ स्वर्गीय गंगा यमुनाका संगम होता है वहां शरीर त्यागन फरनेसे धीरे पुरुष.मुक्त होते हैं जब कि, तीर्थोकी ऐसी महिमा है तो फिर अन्यथा कैसे हों सक्ताह वेद पुराण शास्त्रादिकमें सर्वथा तीर्थोकी महिमा लिखीहै इस थोडेहोंमें. समझ लीजिये। गुरुप्रकरणम्। स० पृ. ३२६ पं. ७ गुरुमाहात्म्प गुरुगीता बडी भारी पोपलीला है ३४५ ॥ २६ पं० ९जो गुरु लोभी कोधी मोही और कामी हो तो अर्घ्य पाद्य गर्थात् ताडना दंड प्राणहरणतक में भी कुछ दोष नहीं ३४६ । १ समीक्षा-स्वामीजीने ती गुरुको बडा भारी दंड लिखा और गुरुमाहात्म्य जिसमें गुरुपाके पास उठने पैठने बोलने चालनेकी विधि है, वोह पोप लीला है तो. आपन शिक्षा क्यों बनाई, और यह दोष तो आपहीमें घट सक्ते हैं, क्यों कि दाखप लोभ यहांतक है कि, अपनी पुस्तकॉपर रजिस्टरी कराकर तिगुना मोल. रखदिया जहो तही चंदा उगाहा जिसके पास गये विना भेट लिये पीछान छोहा. क्रोध ऐसा था कि, मूर्तिपूजनके विषयमें पुराणप्रकरणमें ( ऐसोंका परमेश्वर नाश करै यह मर ही क्यों न गये ) यह शब्द उच्चारण कियेहैं, मोह यहांतक कि अपने लिखेकी आप ही खबर नहीं. कामना ऐसी थी कि अनेक संकल्प विकल्प आपके अन्योंसे ही प्रगद हैं तो फिर अब आपकी किस प्रकार शिष्टाचारी करनी चाहिये। गुरुका गुरुत्व यही है कि फैसी ही भली या बुरी जो कुछ वाह आज्ञा करे सो मानना । अच्छा वचन तो बालकसे लेके मूढतकका मानना योग्य है फिर गुरुमें औरोंमें अन्तर क्या, आरने गुरुका कुछ मान न रक्सा तभी तो कहीं अपने * तु०रा० को तो परिशिष्ट बनावटी दोउने हैं इन परिशिष्ट बहुनसे मन्त्रोंको दूसरी सहिताओंमे दिखासरतेहै। पांचवीं बारमें गुरमाहात्य गुरगांता आदि भी इन्हीं कुसमी लागान वनइ ह पृ० १५१६०२३ (४२४) दयानन्दतिमिरभास्करः। गुरुको नमस्कार न किया न कुछ नाम ही लिया ( आज्ञा गुरूणां हाविवार- णीया) गुरुकी भली बुरी आज्ञा विना विचारे संपादन फरै शुद्ध जानकीजीको रामचंद्रकी आज्ञासे लक्ष्मण वनमें छोड आये पिताकी आज्ञासे परशुरामजीने माता और भाइयोंका वध किया, और देखो महाभारतका पौष्यपर्व तृतीय अध्याय आपोद धौम्य नाम मनिके उपमन्यु शिष्य मो मुनिको गोचारणमें नियुक्त था मुनिने उसको पुष्ट देखकर कहा कि जो तुम भिक्षान लाया करते हो सो हमें दे दिया करो, वोह भिक्षा देने लगा और यत्किंचित् धेनुके दुग्धसे जीवन धारने लगा जब गुरुने उसका भी निषेध किया तो फेनाधार रहा उसके भी निषेध करनेसे क्षुधित हो उपमन्युने अर्कपत्र भक्षण किये तिससे अन्धा हो कूपमें पतित हुआ, फिर गुरुने अन्वेषण कर अश्विनीकुमारकी स्तुति कराई, औ. नेत्र प्राप्त होगये, पश्चात् गुरुने आशीर्वाद दे सब विद्या दान करदी और पोह सवशास्त्रविशारद हो अपने घर गया और इसी प्रकार उनके दो शिष्य और भी थे ऐसे ही कार्य उनसे लिये पश्चात् वे भी परीक्षोत्तीर्ण हो विद्या पाप अपने पर गये मनुनी गुरुमहिमा लिखते हैं कि- गुरोर्यत्र परीवादो निन्दा वापि प्रवर्तते ॥ कों तत्र पिधातव्यो गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः ॥२०॥ परीवादात्सरो भवति श्वा वे भवति निन्दकः ।। परिभोक्ता कृामभवात कीटा भवति मत्सरी ॥ २०११०२मनु जहां गुरुफा परिवाद अर्थात् दोपफयन फरा जाता है और जहाँ निन्दा अपात् झूठ ही दोप लगाफर कोई कहता हो तो यहाँसे फान मदकर चला गाना उरित है ॥ २०० ॥ जो फाई गुरफे दोष कथन करता है घोह गधा होता है गो झूठी निन्दा करता है वोह कुत्ता होता है और जो अनुचित रातिसे गुरुफा भम साताद पोद छोटा कीडा होता है और नोईया करता है योह स्थूलकोट होताद अब विचारने की बात है नव गुरुफा सत्पदोष कयन करना भी पाप है तो गुरुको दह देनसे तो फिर टदार है ही नहीं। पुराणप्रकरणम् । पुराणोश वर्णन तीसरे समुम्लासमें कर चुके हैं परन्तु यहाँ संगसे विरण सिरोंगे पद यात सपही जानते हैं कि अनादिकाल यद एष्टियर पसा आता दे, अनन्तपार प्रटप और सृष्टि हो चुकी है न अनेरयार उत्पनि हुई तो प्रत्येक -गमप पर ही समान उत्पत्ति नहीं हो सत्ती कुछ मंद हो ही जाता है. ही राय आदि पारण परमंथर माना है इसमें कभी कुछ मिटता नहीं है पामेवाणे एकादशसमुल्लासखण्डनम् । प्रकृति उत्पन्न होफर उनसे विविध प्रकारकी प्रजा उत्पन्न होती है इसी कारण पुराणों में सृष्टि कभी किसीसे कभी किसीसे उत्पन्न हुई लिखी है कभी आदिमें कोई हुआ कभी कोई हुआ जिस कल्पमें जो आदिमें हुआ है वोही उसका फर्ता कहा है यह सृष्टि विगुणात्मक है सतरजतमयुक्त तीन ही इसके देव हैं विष्णु ब्रह्मा महेश नव जो प्रधान होता है उसी देवतासे उसकी सृष्टि चलती है कहीं प्रकृतिको प्रधान मानके देवी नामसे संसारफी उत्पति लिखी है जैसा कि वेदसे प्रगट है। अहुमेक्वातइप्रयाम्यारभमाणाभुवनानिविश्वा ॥ पुरोदिवापरए नापृथिव्यैतावतमिहिनासबभूव-ऋ०म० १० सू० १२५ मं० १२ लक्ष्मीमायाका वाक्य है कि, मैं ही सब भुवनोंको उत्पन्न करती वायुके समान चलती हूं स्वर्ग और इस पृथ्वीसे परे जो पुरुष है उतनी ही और उससे युक्त में महिमासे नानारूपवाली हुईहूं। इत्यादि वाक्योंसे सृष्टिको रचना अनेकप्रकारफी है, ईश्वरहीको मायारूप देवी देवता हैं, चाहें मिस देवके गुण गाओ, सब ईश्वरको ही पहुँचतेहैं, जैसे नदी समु- दमें जातीहैं, किसीएक रूपमें विश्वासयुक्त मन लगानेसे सिद्धि प्राप्त होजापगी, अनेकोंमें लगानेसे शान्ति सिद्धि नहीं होती । इसीसे पुराणोंका यह आशय है कि जिस देवताका वर्णन किया है या ईश्वरका नाम वर्णन किया है तो उसमें उसीकी उत्कृष्टता सबसे अधिक वर्णन की है, जो जिसका उपासक है घो उसे ही सर्वश्रेष्ठ जाने और उसका चित्त भटकता न फिरे ब्रह्मादिदेव दशअवतार भगवती गणेशादि देवताओंके सिवाय और किसीका पूजन किसी पुराणमें है नहीं पासनीने पुराण नवीन कल्पना नहीं करें, उन फयाओंका जोलावोंसे है संग्रह करदिया है, इस फारण घे नवीन नहीं हैं फपा पूर्वकालीनकी हैं व्यासनीने उन्हें श्लोपबद्ध करदियाहै बस इसी कारण जो पुराण निस देवताको महिमाका है उसमें सर्वोत्कृष्टतासे उसी देवताफे गुण लिखेहैं सबकी रुचि एफसी नहीं होती,निस देवता जिसकी प्रीति हो वह उसीक पुराणको ग्रहण करै मन लगा तो पार होजाता है और जिस कल्पमें जहाँतक प्रलय हुई है वहाँसे फिररवना आरम्भ होती है इस कारण सृष्टिके मिन २ कारसे उत्पन्न होनेमें कोई विरोध नहीं अब शिवपुराणकी कया जो दयानंदनीने लिखी है उस संक्षेपतः प्रकाश करते हैं ।। स.पू. ३२८५२९ से.पृ. ३३६०७ तक शिवीने इच्छा फी कि, मैं सृष्टि फरूं तो एक नारायण जलाशपको उत्पन्न किया उसकी नाभिकमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुआ टसने देखा कि, सर नटमप है (४२६) दपानन्दतिमिरमास्करः । जलफी अंजली टठा देखफर जलमें पटकदी उससे एक बुदबुदा टठा टस बुदबुद्दे मेंसे एफ पुरुष उत्पन्न हुआ उसने ब्रह्मासे कहा हे पुत्र ! सृष्टि उत्पन्न कर ब्रह्मान उससे कहा तू मेरा पुत्र है और दिव्पसहस्र पर्प जलपर लडतेरहे टन दोनों चीवमें एफ तेजोमय लिंग प्रगट हुआ और आकाशमें चला गया उसकी थाह लेआनेका प्रण फरफे कूर्मका रूप धरके विष्णु नाचेको और ब्रह्मानी हंसका रूप धार ऊपर गये जो पहले आये यह पिता जो पीछे अघि यह पुत्र, यह प्रण कर दिव्यसहस्त्र वर्ष बीते पर भी अन्त न मिला, उस समय एक गाय और केतकीका वृक्ष ऊपरसे उतर आया और ब्रह्मासे कहा हम सहस्रों वर्षसे लिंगके आधार चले आते हैं थाह नहीं मिली ब्रह्माने कहा तुम हमारे साथ चलो यह साक्षी दो कि मैं इस लिंगके ऊपर दूध और फूल बरसाताया ये ब्रह्माके शापके भयसे भीत हो कि, यह भस्म करने कहता है झूठी साक्षी देनेको संमत हुए और नीचेको चले विष्णुनी पहलेहीसे बैठे थे ब्रह्माजीके कहनेपर बोले कि, मुझे लिंगकी थाह नहीं मिली ब्रह्मा- जीने कहा हम लिंगका अन्त देख आये ॥ गौ वृक्षकी गवाही दिषाई उनकी गवाही होतही लिंगमेंसे शब्द निकला और यो शाप दिया कि, तेरा फूल किसी देवतापर न चढेगा और गाय तू झूट बोली इसस विष्ठा खाया करेगी, ब्रह्मासे कहा तेरी पूजा कहीं न होगी विष्णुनीसे कह तुम सर्वत्र पूजागे पुनः दोनोंने स्तुति फरी तो लिंगमेंसे एक जटाजूट मूर्ति निकली और कहा कि मैंने सृष्टि करनेको भेजा तुम झगडेमें पडगये और अपनी जटामेंसे एक भस्म का गोला निकालकर दिया और कहा इससे सब सृष्टिकी रवना करो ॥. भला काई इनपुराणोंके बनानेवालोंसे पूछे कि, जब सृष्टितत्त्व और पंचमहाभूत भी नहीं थे तो ब्रह्माविष्णुमहादेवके शरीर जल कमल लिंग गाय और केतकीका . वृक्ष भस्मका गोला क्या तुम्हारे घरमेंसे आ गिरे ॥ ३४८ । २४ समीक्षा-यह कथा स्वामीजीने अपनी मिलावट और गडबडीसे लिखीहै विदित होताहै कि, स्वामीजीने कभी शिवपुराणका दर्शन भी नहीं किया जो कुछ शिवपु- राणमें चौथैसे आठवें अध्यायतक लिखाहै सो संक्षेपतः कहते हैं । तजी बोले कि, हे शौनक ! जिसके अनन्तनाम और जो सबका स्वामी है उसको वैष्णवमत रखनवाला विष्णु, शाक्त शक्ति, सूर्योपासक रवि, गाणपत्य उसीको विनायक जानते हैं इस निर्गुणपरमात्माको इच्छा हुई कि, हम एकहैं अ. नेक हो जॉय तब आप-शिवरूप होकर 'प्रगट हुए और शक्ति को भी अपने आनन्दफे हेतु उपनाया, निसको महामाया पती कहते हैं यही संसारफी आदि कारण है इन्हीं शिवको पुरुष महा' . . भग- एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (४२७) मायाको प्रकृति कहते हैं शिवजीने विहारके निमित्त एक लोक बनाया जिसको अविमुक्त कहते हैं जो सब जीवोंको आनन्ददायक परम मनोहर है फिर शिवनीकी इच्छा हुई कि एक संसारका पालक पुरुप उत्पन्न फरें ॥ इति ४ अध्यायः ।। यह सुनतेही शक्तिने अवलोकनमानसे सुन्दर स्वरूप विष्णुजीको उत्पन्न किया और शिवनी बोले तुम्हारा नाम विष्णु होगा तुम सृष्टि श्रेष्ठं देवता पालक हो अब तप करो विष्णुजीके महातप करनेसे ऐसा जल उत्पन्न हुआ कि, विष्णुजी उसके अन्तर्गत हो योगविद्या जो शिवनीने वताई थी उसके आश्रित हो शयन करने लगे उस समय नाभिसे कमल उत्पन्न हुआ उसमें शिवजीने ब्रह्माको उत्पन्न किया अब ब्रह्माजी सोचने लगे कि, मुझे किसने उत्पन्न किया यह विचार कम- लको नीचे थाह लेने चले गये और बहुत दिनोंतक उस कमलको भी न देखा तब आकाशवाणी हुई और दो अक्षर प्रगट हुए और एक स्थानके रहनेके हेतु उनमें प्रतिष्ठित हैं फिर विष्णुजी योगनिद्रा त्याग ब्रह्माजाके पास आनकर बोले कि, हम सृष्टिके कर्ता सचितानन्द हैं वेद हमारे उत्पन्न किये हैं तुम हमारे नाभिकमलस उत्पन्न हो इस कारण हमारे पुत्र हो ब्रह्माजी बोले तुम हमें गुरुकी समान उपदेश देते हो तुम नहीं जानते कि, वेद क्या है इस वचनको सुन विष्णुजी विवाद करनेलगे इति पंचमोऽध्यायः॥ उन दोनोंका विवाद देख शिवजी अन्तकालफी जलतीहुई घडवापिके सदृश. प्रगट हुए यह देख ब्रह्मा विष्णुजी विवाद त्याग परस्पर विस्मित हो पूछने लगे कि, यह क्या है जो कोई इसका आदि अन्त देखले वही सष्टिका मालिक हो ब्रह्माजी ऊपर और विष्णुजी श्रतवाराह हो नीचे चले वही यह श्वेतवाराहकल्प फहाता है दिव्यसहस्त्र पर्पतक दोनों हूंढते रहे परन्तु भेद न मिला और दोनों लौटि आये और जब वह अपना पूर्वस्थान भी न पाया तो जाना कि, कोई तीसरा हमसे भी अधिक है यह विचार दोनोंने प्रीति करली तब आकाशवाणी. हुइ कि तुम योग करो यह सुन दोनों योग धार स्तुति कर कहने लगे महाराज! आप, दर्शन दीजिये तब ओंकार प्रगट हुआ जिसको उन दोनोंने सम्यक् नहीं जाना परन्तु फिर उसके चार भाग हुए, अ, उ, म, बिन्दु, पहला लिंगकी ज्योति दूसरी. मध्यभाग आधी मात्रा उस लिंगको ज्योतिका शिर है बिन्दु सर्व लिंग ज्योति है इसीमें चारों वेद प्रतिष्ठित है कोई भी उस प्राणरूप लिंगका अन्त नहीं पाते ब्रह्मासे तृणपयन्त सब उसीमें मिलते हैं प्राण वही शिवजीका स्वरूप है इस प्राणरूपशिव- जीको मूर्ति देख दोनोंने बडी स्तुति की ॥ इति पष्ठोऽध्यायः ॥ तंच शिवजीने शरीरधार दर्शनदिया ॥ इति सप्तमोऽध्यायः ।।
(१२८) दयानन्दतिमिरभास्करः। शिवजी वोले तुम्हारा विवाद देखकर यह प्रणवरूपी लिंग हमने उत्पन्न किया और फिर कहने लगे हमारा कहना मानो, यह कह श्वासके द्वारा वेदोपदेश किया प्रणवंकी शिक्षा दी विष्णुजीको पालन, ब्रह्माजीको उत्पन्न करनेमें नियुक्त किया और कहा कि, जिस क्षेत्र में सब संसार लीन हुआ है उसे लिंग कहते हैं इस लिंगके पूजनसे लोक परलोक वनगा और हम भी रुद नामसे अवतार ले तुम्हारे नगरमें आयेंगे हम चारोंका एक ही स्वरूप है जो पृथक् विचारैगा यह दुःखी होगा और कभी हम कभी ब्रह्मा कभी विष्णुजी सृष्टिकी आदिमें होते हैं मैं सबमें, सब मुझमें हैं. मैं तुम सब एक हैं यह. कह दोनोंको अपनी शक्तिसे शक्ति दे सृष्टिरचनाकी आज्ञा कर शिवजी अन्तर्धान हुए विष्णुजी भी शक्तिसहित अन्तर्धान हुए तब ब्रह्माजीने प्रकृतिसे सृष्टिकी रचना आरम्भ की । इत्यष्टमोऽध्यायः॥ अब सजन पुरुष कथाको विचार लेंगे कि कहीं कोई दोह या वेदविरुद्धताकी. इसमें वात है किन्तु वेद ओंकार ईश्वरहीके तीनों देवता स्वरूप हैं तथा विष्णु और ब्रह्मा उसी सूक्ष्मके स्थूल रूप हैं इत्यादि वस्तुओंका वर्णन किया है । स्वामीजीने जो अपनी बनावट सत्यार्थप्रकाशमें लिखी है उसमें गौकी साक्षी वृक्षका उतरना भस्मका गोला यह सब स्वामीजीके मुखरूपी घरमेंसे निकलकर सत्यार्थप्रकाशमें आनपडे याअपने वाया घरसे लाये होंगे यह कथा शिवपुराणमें नहीं बस ऐसे ही और भी जानलेनी कि यह स्वामीजीने बनावट की है तथा पढे शिवपुराणमें भी गौकी साक्षी भस्मका गोला नहीं है और देवादिकी सृष्टि पहले हो चुकी थी पीछे फर्ताकी वार्ता हुई यह फया बडे अध्यात्मविषयपाली है देखना हो तो हमारे किये शिवपुराणफी भापाटीका देखो ॥ भागवतप्रकरणम् । स०म० पृ० ३३०प० १२ कश्यपसे दितिसे दैत्य दनुसे दानव अदितिसे आदित्य यिनतासे पक्षी कसे सर्प सरमासे कुत्ते स्पाल आदि और अन्य निपोंसे हापी घोडे केट गधा भैंसा पास फूप्त बचूर आदि वृक्ष फटिसहित टत्पन्न होगपे याह रे पाद ! भागयतके बनानेवाले लाल बुझाकड तुझे ऐसी बातें लिखते लाग और शर्म नआई निपटही अन्धा बन गया स्त्रीपुरुपके रनवार्यके संपांगते मनुष्य तो बनतेही परन्तु परमेश्वरकी सृष्टि कमके विरुद्ध पशु पक्षी सर्प आदि कमी उत्पन्न नहीं होसने सिंहादि उत्पन्न होकर अपने मावापको क्यों न सागपे इन ही झूठी पातीको अन्ये पाप बाहर भीतरकी पूंटी आंतोय.ले मुनते ३५०।९और पं० २७ इन भागपतादि पुगगार बनानेदारे जन्मत ही गर्महीमें क्यों न नष्ट होगपे पा गन्मने उमप दी वपान मरगपे । ३९०१२५ एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (५२९) समीक्षा-स्वामीजीने सब सृष्टि कश्यपसे उत्पन्न होनमें वडा आश्चर्य माना है और कहा कि सृष्टिकमके विरुद्ध नहीं होसक्ती यद्यपि हम यह विषय पहले लिख चुके हैं कि प्रथम ती सब जीवोंकी उत्पति कैसे हुई वेदमें लिखा है कि उसमें घोडे चौपाये ढोर ग्रामके पशु आरण्यपशु उत्पन्न हुए (यजुर्वेद पुरुपसूक्त) तो क्य यह सब सृष्टि भी परमेश्वरके रजवीर्यसे हुई है प्रथम ऋषियोंको तप करनेसे बडी सामर्थ्य यी फर्मानुसार जो जिस योग्य थे पैसी ही योनिमें उनका जन्म हुआ निरुक्त लिखाहै "कश्यपः फस्मात् पश्यका भवतीति" जो भ्रान्तिरहित होकर संसारके जीवोंके कर्म यथावत् देखे उसे कश्यप कहते हैं ब्रह्माजीने कश्यपनीको सब प्रकारकी सृष्टि रचनेकी आज्ञा दी जो जैसे शरीर में उत्पन्न होने योग्य थे कश्यपनीने उन्हें वैसा ही ज्ञानसे बनाया और जो जिस योनिसे उत्पन्न हुए वो ही उनकी माता कहलाई यह पनानेसे पिता कहाये ( वे अपने मावापोंको क्यों न खाय ) यह भी कथन स्यामाजीका असत्य है क्यों कि "सिंहादि अपने माता पिताओंको नहीं खाते दूसरा वचन स्वामीजीकी सभ्यता प्रगट करताहै उसमें हम कुछ नहीं कहते क्यों कि "तुलसी बुरा न मानिये जो गँवार कहनाय" यदि स्वामीजीफा जन्म न होता तो यह नवीन भ्रष्ट नियोगादि पंथ क्यों चलते आर मझे यह कष्ट उठाना क्यों पडता. जैसे ईश्वरसे पुरुषसूक्तमें घोडे गौओंकी उत्पत्ति हुई इसी प्रकार कश्यपसे उत्पन्न हुई स्वामीके सत्यार्थ प्रकाशमें तो यह गाली भरी पर्डीहैं और धर्मसभावालोंपर यह आक्षेप कि यह गाली देतेहैं शोक है ऐसी गाली देनेवालेपर। स० पृ० ३३२५०५ ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमान्वतम् । सरहस्यं तदंगे च गृहाण गदितं मया ॥ १॥ भा० स्कन्द० २ अ०९श्लो०३० हे ब्रह्माजी ! तू मेरा परमगुह्य ज्ञान जो विज्ञान और रहस्पयुक्त और अर्थ धर्म काम मोक्षका अंग है उसको मुझसे ग्रहण कर जब विज्ञानयुक्त ज्ञान कहा तो परम अर्थात् ज्ञानका विशेषण रखना व्यर्थ है और गुह्य विशेषणसे रहस्यका भी पुनरुक्त है जब मूल श्लोक ही अनर्थक है तो अन्य अनर्थक क्यो नहीं । ३५२१७ समीक्षा-पह भी स्वामीजीका विवाद निरर्थक है वह श्लोक स्वामीजी समझे नहीं जो आस्तिक बुद्धि होती तो समझमें आता इसमें पुनरुक्ति दोप नही श्रीधरजी लिखते हैं कि- (१३०) दयानन्द तिमिरभाकरः। ज्ञानं शास्त्रोक्तं विज्ञानमनुभवः रहस्यं भक्तिः सुगोप्यमापि वक्ष्यामीत्यादिनिर्देशात् तस्यांगं साधनम् ।। हे ब्रह्मा ! मेरा शास्त्रोक्त ज्ञान अतिगोप्य है अनुभव भक्ति और सब साधन सहित है सो मुन । अब स्वामी बतायें इसमें पुनरुक्तिदोप किधर है ।। स. पृ० ३३२५०१२ भवान्कल्पविकल्पेषु न विमुयति कर्हि चित् ॥ आप फल्प सृष्टि और विकल्प प्रलयमें भी कभी मोहको प्राप्त नहीं होंगे ऐसा लिखके पुनः दशमस्कंधमें मोहित होके वत्सहरण किया इन दोनॉमसे एक बात सधी दूसरी झूठी ऐसा होकर दोनों बातें झूठी ॥ ३५२ । १३ समीक्षा-जब स्वामीनीने भागवतके अयोहीमें गडबडी की है तो वेदोंमें गितनी गडवडी फी हो उतनी ही थोडी इसका अर्थ ही अशुद्ध किया है सुनिये इसका अर्थ- एतन्मतं सम्यगनुतिष्ट समाधिना चित्तेकाग्र्येण कल्पेयु ये विक- ल्पा विविधा सृष्टयस्तेषु विमोहं कर्तृत्वाभिनिवेशं न यास्यतीति परम समाधिसे इस मतमें तुम स्थित रहोगे तो फलोंके विकल्पोंमें जो अनेक प्रकारको सृष्टि है इसके हम फर्ता हैं ऐसे मोहको प्राप्त नहीं होंगे ! भगवान्ने यह वर दिया कि फल्पोंकी अनेक सृष्टि में हम कर्ता हैं ऐसे मोहको प्राप्त नहीं होगे जो समाधिमें स्थित रहोगे, सो वत्सहरणमें कोई सृष्टिका विकल्स नहीं था, होता तो उसमें मोह होना शंकाका स्थान था,किन्तु यहां तो ब्रह्मानीको भगवान्के चरित्रों में मोह होगया था इस कारण यह कहना ठीक नहीं कि, ब्रह्माजी मोहे, और विकल्पके अर्थ यहां प्रलपके भी नहीं हैं विविध सृष्टियोंके हैं। आपभागवतको जव समझ नहीं सके तो चेलोंके लिये तो यह अयाहसमुद्र है। स० पृ० ३३२ पं०१५ से जब वैकुंठ में राग द्वेष इर्ष्या क्रोध दुःख नहीं है तो . सनकादिकोंको वैकुंठके दारमें कोध क्यों हुआ, जय विनय तौ द्वारपाल थे उन्हें स्वामीकी आज्ञा पालन करनी अवश्य थी, उन्होंने सनकादिकोंको रोका तो क्पा अपराध हुआ, जो कहा कि, तुम पृथ्वी में गिरपडो इसके कहनेसे यह सिद्ध होता है कि, वहाँ पृथ्वी न होगी आकाश वायु अमि और जल होगा तो ऐसा द्वार मंदिर और जल किसके आधार थे, पुनः जय विजयके विनय करनेपर उन्होंने कहा जो प्रेमसे नारायणकी भक्ति करोगे तो सातवें जन्म और विरोधसे भक्ति करोगे तो तीसरे जन्ममें वैकुण्ठ मिलेगा। इस पर विचार है जप विजय नारा: १ एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (४३१) यणके नौकर थे उनकी रक्षा करना नारायणका काम था नारायणका टचितया कि, जय विनयकी सहायता कर सनकादिकोंको दंड देते उन्होंने भीतर आनेमें क्यों हट किया और नौकरोंसे क्यों लडे ॥ २५२।१८ समीक्षा-विदित होता है कि, स्वामीनीने भागवतका दर्शन भी नहीं किया जय विजयकी क्या बात है यह कथा यों है कि, जय विजय द्वारपाल थे जव सनकादिक वैकुण्ठमें नारायणके दर्शनको गये तो जय विजयने हँसकर भीतर जानेसे रोका, इसपर सनकादिकोंने कहा कि, हमारे आने जानेकी कहीं रोक- टोक नहीं और थी भी नहीं, तुमको यह अनर्थ कहाँसे उत्पन्न हुआ जो पैकुण्ठमें होनेके योग्य नहीं, इस कारण जैसा तुम्हारे चित्तमें भाव हुआ है ऐसे ही लोकमें तुम जन्म लो॥ लोकानितो व्रजतमंतरभावदृष्ट्या पापीयसस्त्रयईमे रिप- वोऽस्य स्कं. ३ अ० १५ श्लो. ३४ उन लोकोंमें तुम जाओ जहाँ भेदभाव दृष्टिसे काम क्रोध लोभ यह पापी है यही इस जीवके तीनों रिपु हैं । पश्चात् नारायणने दर्शन देकर कहा कि, इन्होंने निश्चय अपराध किया जो मेरी विना आज्ञा तुमको राका, मेरा किसी समय यह वचन नहीं कि, ब्राह्मणोंको रोको, इस कारण यह कुछ दिन इसका फल भोग फिर मेरे पास आवंगे ॥ विचारनेकी बात है कि, स्वर्गमें क्रोधादियुक्त पुरुष कैसे रह सक्ता है सनकादिक कहते हैं । भा० तद्वामनुप्य परमस्य विकुण्ठभर्तुः कर्तुम्प्रकृष्टामिह धीमहि मंदीभ्याम् । ३ । १५ । ३४ इस कारण इन वैकुण्ठनाथ परमश्रेष्ठ ईश्वरके, मंदभागी तुमसरीखे सेवकोंका जेसमें कल्याण हो वह हमने करनेका विचार किया है । यह विचार सनकादिकोंने शाप दिया कि, वैकुण्ठमें ईपीवाला नहीं रहसका सो कारण जप विजय मनुष्पलोफर्मे आये जैसे यह लोक निराधार है उसी कार वैकुण्ठ भी निराधार है वहाँ भी सब कुछ पृथ्वी आदि हैं और "तुम थ्वीमें गिरी बरसे भक्ति फरो सात जन्ममें तरो" यह बातें स्वामीजीने इस फयामें नपनी ओरसे मिलाई हैं स० प्र० पृ. ३३२ २०२४ सनकादिकोंने जय विनयसे कहा जो प्रेमसे भक्ति करोगे तो सातवें जन्म और विरोध भक्ति करोगे तो तीसरे उन्ममें वैकुण्ठको प्राप्त होगे ॥ ३५२ । २७ (४३२) दयानन्दनिमिरभास्करः। समीक्षा-यह प्रेमभक्ति और विरोधादि करनेकी बात भी भागवतमें सन दिकोने नहीं कही स्वामीजीकी गप्पलीला है । स० पृ० ३३३ पं० ५ उनमेंसे हिरण्याक्षको वाराहने मारा उसकी कंथा इन प्रकार है कि, वोह पृथ्वीको चटाईको समान लपेट शिरहाने घर सोगया विष्णु वाराहका रूप धारण करके उसके शिरके नीचेसे पृथ्वीको, मुखमें धर लिया यो उठा दोनोंकी लडाई हुई वाराहने हिरण्याक्षको मारडाला इनसे कोई चूझै पृथ्वं गोल है वा चटाईके समान तो कुछ न कहसकेंगे क्यों कि, पौराणिक लोग तं भूगोलविद्याके शड हैं भला जब लपेटकर ही शिरहाने धरली आप किसपर सोय और वाराहनी किसपर पग धरकै दौडआये पृथ्वी तो वाराहनी के शिरपर भी दोनो लडे किसके ऊपर वहाँ. कोई ठहरनेको जगह नहीं थी किन्तु भागवतादि पुराण बनानेवाले पोपजीकी छातीपर खडे होकर लडे होंगे ॥ ३५३ । ८ समीक्षा-विदित होताहै कि, स्मामीनीने फभी भागवतको तो अवलोकन ही नहीं किया पर कभी बालकोंमें बैठकर कहानी सुना फरतेहोंगे पो ही यहाँ उट. पटांग लिखदी " यह तो हैं ही परमहंस, भागवतसे विचारेको काम ही कब पडाथा " धन्य है :इसी भरोसे भागवतका खंडन करनेलगे यह कथा यों है कि, जब पृथ्वी थोडी हानेके कारण भगवान् (वाराह') " पृथिवीं वरतीति धराहः । "जो पृथ्वीको उद्धार करै वह वराह" पृथ्वीको उद्धार करनेको जलमें कूदे पोडी पृथ्वी थी शेष महाप्रलयके जलमें मम थी पृथ्वीको वाराहनी उठाते निराधार आरहे थे कि, उसी समय- हरोदित्वा गतिमंग नारदादसातलं निर्विविशे त्वरान्वितः । ददर्श तत्राभिजितं धराधरं प्रोन्नीयमानावनिमयदंष्ट्रया ॥ इलो०२स्कं० ३०१८ हिरण्याक्षने नारदनीसे पूछा कि मेरी समान कोई युद्ध फरनेहारावताओ नार: दीने कहा पाराहनी पृथ्वी सेनेगये हैं यह नुमसे युद्ध करेंगे यह सुनकर पह पाताल में प्रवेश कर गया और भगवान्फो पृथ्वी लेआते देख कठोर ययन करने लगा भगवान् टस समय जलसे पृथ्वी निकाल । स गामुदस्तात्सलिलस्य गोचरे विन्यस्य तस्यामुदधात्स्वसत्त्वम् ।। अभिष्टुतो विश्वसृजा प्रसूरापूर्यमाणो विबुधैः पश्यतोऽरेः ॥ ८॥ ब्रह्माजीसे स्तुतिको प्राप्त सब देवताओंसे फूलोकी यरसा स्वीशर करते श्रीपाग- मी पृथ्वीको जसपर घरकर अपनी आधार शक्ति से स्थित रते हुए और पधार।
. . एकादशसमुल्लासखण्डनम् । मर्माण्यभीक्ष्णं प्रतुदंतं दुरुक्त प्रचंडमन्यु ग्रहसंस्तं बभाषे ॥ ९ भाग. फठिन वाक्योंसे वारंवार मर्मस्थानमें पीडा देते हिरण्याक्षसे वाराहनी हसकर बोले और फिर युद्ध कर मारडाला पह युद्द पृथ्वी के स्थापित होने उपरान्त पृथ्वी पर हुआथा तीसरे स्कंधमें यह कथा विस्तारपूर्वक है अब स्वामीजीके छल प्रपंचको देखना चाहिये कि, क्या तौ कथा है और क्या लिखदा है यह भागवतसे विश्वास उठानेको स्वामीनीने गपोडा लिखदिया है यह चटाईकी तरहका लपेटना शिरके नीचेसे निकाल लेनाना इत्यादि स्वामीनीने बनावट लिखी है पौराणिक लोग तौ भूगोल विद्याके शत्रु नहीं हैं किन्तु सब सत्य विद्याओंके आप ही शड हो । स०पृ० ३३३ पं० १७ हिरण्यकशिपुफा लडका प्रह्लाद अपने अध्यापकसे बोला मेरा पट्टीम रामराम लिखदो, उसके पिताने इस वातको मना किया उसने न माना तब उसे बांधके पहाडसे गिराया कूपमें डाला परन्तु उससे कुछ न हुआ तो एक लोहेका खंभा आनिमें तपाके उससे बोला * जो तेरा इष्ट देव राम सच्चा है तौ त इसे पकडनेसे न जलैगा प्रसाद पकडनेको चला मनमें शंका हुई कि, जल- नेसे वचूंगा या नहीं नारायणने उस खंभेपर छोटी छोटी चैंटियोंकी पंक्ति चलाई वसको निश्चय हुआ झट खंभेको जापकडा, वह फटगया और उसमेंरे नृसिंहने निकल उसके बापको मारडाला, प्रवादको प्यारसे चाटने लगा उससे कहा पर मांग उसने पिताको सद्गति मांगी नृसिंहने कहा तेरे इकोस पुरुप सहतिको गये अब यह देखो भागवतके यांचनेवालेको कोई पकड पहाडसे गिरायै तो कोई न वावै चकनाचूर होकर मर ही जावे प्रह्लादको उसका पिता पढनेको भेजताया क्या धुरा काम कियाथा, प्रह्लाद ऐसा मूर्ख था कि पढना छोड वैरागी होना चाहताथा, जो खंभेकी बात सची माने उसे गरम खंभेके साथ लगा देना चाहिये जब वहन जलै तौ जाने और नृसिंह भीन जला तीसरे जन्ममें वैकुंठके मानेका वर सनकादि- फका था क्या उसे नारायण भूलगया, भागवतकी रीतिसे ब्रह्मा प्रजापति काश्यप हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु चौथी पीढिमें होताहै, इकास पाठी प्रहादफी हुई भी नहीं इक्कीस पुरुष सद्गतिको गये यह कहना प्रमाद है और फिर वे रावण कुंभकर्ण शिशुपाल दंतवक हुए तो नींसंहका पर कहाँ उडगया ॥ ३५३ । २२ से समीक्षा-यह कथा भी स्वामीनीने गपोडेसहित लिखी है, जब भागवत देखी * भा० प्रकाशमें यह और प्रसादकी कथा दोनों जवानी दिखी बताई है क्या म्यूब खण्डन भागवत्तका करो और कथा जवानी रिखी स्वामी के इस मन घडन्तता कहीं टिकाना है महा- मिध्या प्रलाप है और छोटे स्वामीका मी घोर प्रला है। २० - दयानन्दतिमिरभास्करः। नहीं थी तो क्यों पिना समझे लिखबैठे यहाँ तो यावानीने खुलमखुल्ला प्रहादसे नास्तिक पिताका जो ईश्वरही नहीं मानता पक्ष लिया है क्यों न हो यह भी तो एक प्रकारके अनीश्वरवादी ठहरे जब प्रहादको ईश्वरकी कृपास पूर्ण ज्ञान होगयाया तो उसे क्या आवश्यकता थी कि, और अधिक पटे, क्या पडके स्वामीजीकी नौकरी करनीथी, और ज्ञानी ऐसे हुए कि पाठशालाके सब विद्यार्थी उनके संगसे ज्ञानी होगये, पिताने सब प्रकारकं दुःख दिये और यह कहताया कि, मेरे सिवाय फोई दूसरा ईश्वर नहीं है, प्रहाद फहताया यह बात नहीं वह सर्वव्यापक है यह सुन हिरण्यकशिपु कोष फरफै बोला- सप्तमस्कंध अ०८ शो० १३, १५ यस्त्वया मन्दभाग्योक्तो मदन्यो जगदीश्वरः ॥ कासो यदि स सर्वत्र कस्मात्स्तंभे न दृश्यते ॥ १ ॥ एवं दुरुक्तर्मुहुरर्दय- नुपा सुतं महाभागवतं महासुरः ॥ खड्गं प्रगृह्योत्पतितो वरा- सनात्स्तंभं तताडातिवलः स्वमुष्टिभिः ॥२॥ जो तू कहताहै कि, तुम ईश्वर नहीं हो वह सर्वज्ञ और तुमसे पृथक है तो वह कहां है और सर्वत्र है तो इस स्तंभमें क्यों नहीं दीखता १, ऐसे पुत्रसे कठोर वचन कह वह राक्षस खड्ग ग्रहण कर आसनसे उठा और एक घूसा स्तंभमें मारा कहां है इसमें होय तो बोले नहीं तो तुझे मार डालूंगा. इतना कहते ही उसमें से नृसिंहजी निकले और उस राक्षसको पकड अपने नसोंसे उसका पेट चीर मार. डाला और प्रहादके वर मांगनेके समय कहा (निःसप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ) हे पापराहत ! पिता पितृ आदि और आगेके इक्कीस पुरुषो. ओंके सहित तेरे पिताको सद्गति होगी यह वात कुलके ऊपर कही है और सद्गति कहने का प्रयोजन यह है कि, नीचयोनिमें जन्म नहीं होगा किन्तु जहां होगा बडे ऐश्वर्यसहित होगा इसी कारण ब्राह्मणोंके वचनानुसार तीनों जन्ममें रावण शिशुपालादि बड़े ऐश्वर्यवान् हुए जिनको दुर्गति नहीं हुई तीसरे जन्ममें उद्धार होगया चौथी पीढी लिखी है सो भी असत्य है क्योंकि ब्रह्मा-प्रजापति मरीचि कश्यप हिरण्यासादि, इस कथामें गर्म संभके ऊपर चीटियोंके फिरना प्रद्वादका डरना आदि यह वात स्वामीनीने गपो. डेकी लिखी हैं जिसकी ईश्वर रक्षा करनी चाहता है उसे सब प्रकार बचाताहै भक्तोंकी बड़ी महिमा है भक्ति करके कोई देखले तो मालूम होनायगी कि भक्तोंकी क्या महिमा है भक्तजन ता उसीके आश्रित रहतेहैं स्वामीजीके ग्रंथों में तो भक्ति और विश्वासका लेश भी नहीं गरमखम्भेकी वात महा झूठ लिखी है क्या किसी समा -- . एकादशसमुल्लासखण्डनम् । जीम दम है जो इस बातको भागवतमें दिखावै छोटे स्वामी कुछ आपमें हिम्म होतो बोलो। स०प्र० पृ० ३३४ पं० १२ रथेन वायुवेगेन जगाम गोकुलं प्रति । कि अरजी फंसके भेजनेसे वायुवेगके समान दौडनेवाले घोडोंपर बैठ सूर्योदयसे चले और चार मील गोकुलमें सूर्यास्तसमय पहुँचे अश्या घोडे भाग बनानेवालेकी परिक्रमा करते रहे होंगे का मार्ग भूलकर भागवत बनानेवाले के घर घोड़े होकनेवाले और अकरजी आकर सोगये होंगे। समीक्षा-यह तीसरा वाक्य भी यही सूचना करता है कि, स्वामीजीने भाग नहीं देखी भंगकी तरंग या दुकेकी गुडगुडाहटमें यह बातें सूझी होंगी भाग तमें कहीं यह श्लोक ही नहीं है स्वामीजी तो अपनी चाल चले कि, इस ग्रंथप लोगोंका विश्वास उठनाय परन्तु औंधे मुंह गिरे यह घोडेस्वामीनीके सत्यार्थप्रक और बुद्धिमे घूमते होंगे सुनिये वहां यों लिखा है ।। अकूरोपि च तां रात्रि मधुपुपी महामतिः ।। उपित्वा रथ- मास्थाय प्रययो नंदगोकुलम् ।। 30 भा० द०अ०३८इलो उस रात्रि में अकरजी मथुरामें रह प्रातःकाल स्थमें बैठ नंदरायके गोकुल चले इसके सिवाय और कुछ नहीं है वायुवेगसे चले यह स्वामीजीकी भंग -गपोडा है और जब अकरजी कृष्णको लेकर चले तो यह श्लोक है । भगवानपि संप्राप्तो रामारयुतो नृप । रथेन वायुवेगेन कालिन्दीमघनाशिनीम् ॥ २ ॥ भा० अ०३९ श्लोक ३८ अर्थात् अरसहित श्रीकृष्ण बलराम थायुवेगयुक्त रथकी चालसे यमुनानी आये बस देखनेकी बात है कि, उपरके श्लोकका आशय स्वामीजीके शोकसे सुलता अब बुद्धिमान विचारें कितनी बडी जालसाजी को है चेलान एक पद १ रथेन वायुवेगेन भाग० सं० १० अ० ३९ ० ३८ जगाम गोकुलं प्रति मा० सं० १० १० १८ श्लो० १४ (पृ० ३५४ । २५) २ समीक्षा-यह जगाम गोकुलं प्रति भी मिथ्या ही लिखा है कहीं भागरतमें ऐसा नहीं। निध्यावादियो धन्य यही सत्यता है अव तुलसीराम क्या कहेंगे। मा०प्र० यहीं पता तुलसी भी उतारा है करमा श्लोक तो लिग्विये कि काहां यह पद आया है जिसमें जगान गाबुलं यह पाट है अन्यथा जैसे बडे स्वामी तैमे छोटे।
(१३६) दयानन्दतिमिरभास्करः। अध्यायके नामसे नया बनाया एक पद ३९ का इन दो पदोंका आधा श्लोक बनाया अर्थ एक निकला क्या यह फहींकी ईंट कहींका रोडा भानमतीने कुनबा जोडा की कहावत चरितार्थ नहीं हुई, अवके छपे सत्यार्थप्रकाशमें पदोंके खण्डके अध्याय श्लोक लिख दिये हैं, परन्तु अर्थ वही रक्खा है तो क्या कोई अर्थसिद्धि हो सक्ती है यदि यों ही पद निकाले जायें तौ सत्यार्थप्रकाशमसे कहींसे दयानंद कहाँस महा, कहींसे मूर्ख, कहींसे धोखेबाज पद निकालकर उनकी बडाई फरसक्ते हैं, बुद्धिमान विचार लेंगे स्वाभीका फैसा ज्ञान था । और अकरजी गोकुलको चले गोकुल मथुरासे कितनी दूर है और प्रेममें मम होनेके कारण उनको घोडे चला. नेकी सुरत न रही इस कारण देरमें पहुंचे और वहांसे शीव चलकर यमुना किनार आये, स्वामीजी सडक कच्ची थी या पक्की वारह मीलका हिसाब लगाओ। स० पृ० ३३४ पं० १८ पृतनाका शरीर छः कोस चौडा और बहुत लम्बा लिखा है मथुरा और गोकुल दवार पोपनीका घर भी दवगया होगा ॥३५४।२१: समीक्षा यह भी कहना असत्य है कि, पृतनाका शरीर छ: कोस चौडा और उससे अधिक लम्बा था भागवतमें तौ यों लिखा है ।। : निशाचरीत्थं व्यथितस्तना व्यसुादाय केशांश्चरणों भुजावापि ॥ प्रसार्य गोप्टे निजरूपमास्थिता वज्राहतो वृत्र इवापतन्नृप । पतमानोपि तद्देहस्निगव्यूत्यन्तरदुमान् ॥ चूर्णयामास राजेन्द्र महदासीत्तदद्भुतम्-भा.द.पू.अ.६श्लो. १३।११ जब श्रीकृष्ण उसके प्राण निकालने लगे तब वह गायके बाहर आई तब यह वडी व्याकुल होके हायपैर फैलाये हुए अपना रूप बढाकर पेस गिरी जैसे वय लगफे वृत्रासुर गिराथा १ उसका देह छः कोसके भीतरी वृक्षोंको पूर्ण करता हुआ गिरा यह अद्भुत बात हुई पृतनाविषयमें भी आप कुछ नहीं समझते हैं शोको अर्थ लगानेना नहीं आते इसमें तो लिसा है कि, हे रागर ! गिर हुए टसके देहने कोश वृक्षोंको चूर्ण करदिया इसका तो यही अवलियर मरते समय अपना बड़ा रूप धारण कर इतनी तहपी शि, सकेसटपटानेस छ फोसके वृक्ष पूर्ण होगये, आशय यह कि, जैसे मतवाला हाथी पनका नाश फार देता है कुछ हापीका शरीर रतना बड़ा नहीं होता इसी प्रकार पृतना पेशी त पतो फिरी फि, छ: कोसके यक्ष नृण होगये, मरनेपर भी शरीरमें धनय पायु रहना है, नास्मात् प्राण जाने तडफडाता है, गरो पालीको छ anी रहता है, हमी प्रकार प्तना यनमें तपती कि उसके आयातसे पक्ष पूर्ण दाग और यही माधयं दुमा ।।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । स० पृ० ३३४ पं० २१ अनामिलको फया उटपटांग लिखी है उसने नारदके कहनेसे पुनका नाम नार न्यण रक्खा मरते समय अपने पुत्रको पुकारा नारायण बीच में कूदपडे, जिन्हें उसके मनका भाव न जाना कि, मुझे पुकारताहै या अपने पुत्रको, ज्योतिश्शास्त्र विरुद्ध सुमेरुका परिमाण लिखा है प्रियव्रत राजाके रथको लीकसे समुद्र होग उनवास कोटि योजन पृथ्वी है अब कोई नारायणका नाम लेकर कैदसे कर न छूट जाता, इत्यादि मिथ्या बातोंका गपोडा भागवतमें लिखा है ॥३५४१२५ समीक्षा-अजामिलको कथा भी असत्य लिखती है नारदजी कभी अजामिल पर नहीं आये न पुनके नाम लेनेसे नारायण आये, यह स्वामीजीने अनपट लोगोंक- धोखा दिया है वहाँ तो ऐसा लिखाहै ॥ निशम्यनियमाणस्यपतोहरिकीर्तनम् ॥ भर्नाममहाराजपार्पदाः सहसापतन् ॥३०॥स्क० ६१० मरते समय नारायणका नाम कीर्तन सुनकर भगवान्के पार्षद उसके समी आये नाम तौ नारायणका मुखसे निकला उसका पुत्र नारायण था तो क्या दु यथार्य में नारायणशब्द वाच्य तो भगवान्ही है स्वामीजीको विदित नहीं (यर नाम महद्यशः)जिसका नाम ही बडा यश है, नामके कारण अनेक तरग भागवत स्वामीजीने देखा नहीं, नारायण आपे नारदके फहनेसे नाम रक्खा य सब झूठ है । यदि स्वामीजीके किसी चले वा छोटे स्वामीम कुछ दम हो । बतायें कहां लिखा है । जो नारायणका नाम लेता है कैदसे टूटना क्या संसा- बन्धनमें भी नहीं पड़ता, अमृत जाने अनजाने पीनेसे अपना गुण फरताही सुमेरु और पृथ्वीका परिमाग जो भागवतमें लिखाहै सत्य है दूर न जाइये अप स्वीकार किये योग सूत्रपर व्यासमाप्यको देखिपे जो इस पुस्तकमें ब्रह्माण्डप्रकर पर हमने लिखौहै उसमें आप सब लोक और भूमिमण्डलको जाननायगे भाग में चन्द्रसूर्यादि नक्षत्र पर्यन्त स्थूल प्रतिबिम्ब भूमिका परिणाम लिखा है य हमारी भागवत भूमिकामें अच्छी प्रकार देखिये जो १९५४ की छपी है जैसे अब आप मानतेहैं यह कदाचित् अग्रेजोंकी बताई मानते होंगे परन्तु जयत अमेरीका देश विदित नहीं हुआ था तबतक पृथ्वी उतनीही समझी थी और यो और देश नये इसी प्रकार मिलेंगे तो क्या उन्हें जलमें ही मन कर दोगे, ब्रह्मा •ण्डका विस्तार भागवतमें व्यासनीने अपने भाष्यके ही अनुप्तार लिखाहै, पिपत्रत रथकी लोकसे:समुद्र नहीं हुए, किन्तु उस समय वह आकाशगामी स्थपर वैक सागर देखनेगया और उसने सब सागर देखकर लोगोंको प्रगट कर बताये समु (१३६) दयानन्दतिभिरमारकरः। अध्यायके नामसे नपा बनाया एक पद ३९ का इन दो पदोंका आधा श्लोक बनाया अर्थ एक निकला क्या यह फहीकी ईंट यहींका रोडा भानमतीने कुनबा जोडा को फहायत चरितार्थ नहीं हुई, अवक छपे सत्यार्यप्रकाशमें पदोंक खण्ड के अध्याय शोफ लिख दिये हैं, परन्तु अर्थ वही रक्खा है तो क्या कोई अर्थसिद्धि हो संक्ती है यदि यों ही पद निकाले जा तो सत्यार्यप्रकाशमसे कहींस दयानंद कहींसः महा, कहींसे मूर्स, कहींसे धोखेबाज पद निकालकर उनकी वढाई करसक्तं हैं, बुद्धिमान विचार लेंगे स्वामीका फैसा ज्ञान था । और अकरनी गोकुलको चले गोकुल मथुरासे कितनी दूर है और प्रेममें मम होनेके कारण टनको घोड़े चला- नकी सुरत न रही इस कारण देरमें पहुंचे और वहाँसे शीय चलकर यमुनाके किनार आपे, स्वामीजी सडक कच्ची थी या पकी पारह मीलका हिसार लगाओ। स० पृ. ३३४ पं० १८ पृतनाका शरीर छः कोस चौडा और बहुत लम्बा लिखा है मथुरा और गोकुल दयार पोपनीला घर भी दवगया होगा ॥३५४।३१ समीक्षा-यह भी कहना असत्य है कि, पूतनाका शरीर छः कोस चौडा औ. टससे अधिक लम्बा था भागवतमें तौ यों लिखा है ।। : निशाचरीत्थं व्यथितस्तना व्यसुादाय केशांश्चरणों भुजावापि प्रसार्य गोप्टे निजरूपमास्थिता वाहतो वृत्र इवापतन्नृप ।।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (२३९) विद्वद्धनेशशिष्येण भिपक्केशवसूनुना। तेन वेदपदस्थेन बोपदेवद्विजेन यः बोपदेवके बनाये धातुपाठ प्रसिद्ध ग्रन्यमें लिखाहै धनेश्वरके शिष्य वैद्यराम केशवजीके पुत्र बोपदेव उपनाम वेदशब्दने धातुपाठ बनाया है अब कहिये कह चंगाली कहां दावडी दोनों के पिताका नाम भिन्न होनेसे यह भाई नहीं हैं यह सिद्ध होगया । १२६३ विक्रममें कुतबुद्दीन दिल्लीका राजा था उसके समय वखतिया खिलर्जाके उपदवसे नदियाशान्तिपुरके राजा लक्ष्मणसेन जगन्नाथ पुरीको व गये उनकी सभामै जयदेव थे (तारीख फारस्ता) यह राजा पंडित भी गीतगोविन्दमें प्रथम सर्गका चौथा श्लोक ( वाचः पल्लवयति) इसी रानाका यह वृत्तान्त गीतगोविन्दकी टीका मानाकी तथा नारायण भट्टीमें है। गीतापर जो विज्ञानेश्वरी टीका है वह दक्षिणदेशस्थ अलंदी ग्रामवास ज्ञानेश्वर महात्माकी है १३४७ संवत्में वह टीका बनी उनसे हेमादि लेगये इनके पास बोपदेव रहते थे यह समप बोपदेवका है दोनों में लग भगः१०० वर्षक जन्तर है ॥ अब इस विवादको इतनेमें ही मिटातेहैं कि, श्रीस्वामी शंकराचार्यको आप सत्यार्थ प्र० २८६ में बाईस सौ वर्ष लिखे हैं उन्होंने वासुदेवसहस नामके भाष 'स आश्रयः परब्रह्म' पचपनको व्याख्या पश्यत्यदोरूप १३७ नामकी व्याख्या 'सत्वरजस्तमः इतिप्रकृतेर्गुणाः' २१५ नामको व्याख्यामें उन्दोमयेग गरुडेन तथा चतुर्दशमतविवेकमें 'परमहंसधर्मो भागवत पुराणे कृष्णेन उवायोपदि इति ' यह भागवतका प्रमाण दियाहै तथा रामानुजीय सारसंग्रहमें तथा शंकर स्वामीके पूज्यगौडपादाचार्यने पंचीकरण व्याख्या 'जगृहे पीरुपं रूपं भगव महदादिभिः' यह भागवतका प्रमाण ग्रहण कियाहै । जब कि बहुत पहलेसे भागवतपर अनेक टीका विद्यमान हैं तब वोपदेवर्ष चनाई कैसे और स्वयं चोपदेवने श्रीमद्भागवतपर परमहंसमिया टीका लिखी उनके बनाये मुक्ताफलको टीका हेमादीने की है उसमें इनके अंपोंकी गणन भी लिखी है। यस्य व्याकरणे वरेण्यघटनाः स्फीताः प्रबन्धा दश * इस निर्णयपर मा० प्रकाशका पाण्डित्य लोप होगया है, तुलसीरामजी शुकदेवजीका शरी सात मारतमें वर्णित नहीं है किन्तु शरीरके सहित ब्रह्मलोककी प्राप्ति है और देवलोकमें, मार भी मुनायाहै।
(४४०) दयानन्दतिमिरभास्करः। प्रख्याता नव वैद्यकेथ तिथिनिर्धारार्थमेकोद्भुतः । साहित्ये त्रय एव भागवततत्त्वोक्तो त्रयस्तस्य भु- व्यन्तर्वाणिशिरोमणरिह गुणाः के के न.लोकोत्तराः ॥ अर्थात् बोपदेवफे व्याकरणमें दश वैद्यफमें तीन तिथिनिर्णयमें एफ साहि- त्यमें तीन भागवततत्त्वनिर्णयमें परमहंसप्रिया मुक्ताफल हरिलीला यह तीन अन्य बनाये हैं यदि भागवत बनाते तो इस ग्रन्भमें भागवत बनाया ऐसा लिखनमें क्या ए.ष्ट पडता परमहंसप्रिया टीकामें भागवतको आप लिखा है इससे व्यासरचित स्पष्ट है उसने हरिलीलामृतमें लिखा है ।। विदुषा वोपदेवेन मंत्रिमादितुष्टये ॥ श्रीमद्भागवतस्कंधाध्यायार्थादि निरूप्यते ॥ तथा हेमाद्रिोपदेवेन मुक्ताफलमचीकरत् ।। बोपदेवने हेमाद्रिकी प्रसन्नताके निमित्त भागवतके स्कंध अध्यायोंकी अनुक- मणिका निरूपण करी है वह हमारे मुरादाबादमें छपी मिलती है जिसकी इच्छा हो देखले तथा हेमादिने मुक्ताफल ग्रंथ बनवायाहै अब इस बातका विचार करना चाहिये कि बहुधा टीकाकार जिस ग्रंथपर टीका करते हैं उसके अध्याप श्लोक और संक्षेप विषय निरूपण करते हैं हेमादिफे कथनसे भागयतका सूची पन यनादिया तो क्या भागवत योपदेवकी बनाई होगई एकश्लोकी रामायण शोक किसीने बनाया तो क्या वाल्मीकि रामायण उस पुरुपका हो गया यह आपहीके मुखसे शोभा पाती है। फिर यह पहले श्लोक ही खोगपे, वाह हेमादिमें भापतको अनुक्रमणिकामा क्या मसंग वहां तो धर्मशास्त्रका निबंध दानखण्ड प्रतखण्ड यर्णित है, विदित होताहै कि स्वामीने हेमादि देखा भी नहीं भागवतके प्रमाण प्रसंग पर मिलेंगे हरिलीला ग्रन्थमें भागवतकी अनुक्रमणिका लिखी है, जिसका प्रथम लोक लिम चुके हैं धन्य पहले शोफ सोगये दोफा आशय पाद रहा, शेर आउ लोक क्यों न याद रहे इस महा अनर्थका क्या ठिकाना है। गो यह श्लोक रखोगपे और नपेश्लोक यनाकर धोखा देने के लिये लिसा कि पह श्रीमद्भागवत मैंने बनाया है ऐसा यहां नहीं है यहाँ तो अनुक्रमणिका लिसंदि हरिली लारीटीका हेमादिन यनाई है इस कारण आपायह कपन है कि उसकी भाभारा नहीं था सस्था अद है टीकाकारोंकी शैली होती है कि अध्यापोः प्रपम को शोफ टसके पिता लिखत तयाटसके पर्याय या मागपतम अपापोती एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (४४१ -सूची भी लिखा करते हैं देखो श्रीमद्भागवतके टीके पर श्रीधरने भी ऐसा ही किर है, इससे इस विषयमें स्वामीजीने जो कुछ लिखा है वहसर मिथ्या धोखा देने कारण लिखा है वह किसी प्रकार प्रमाण नहीं है। पुराणों में इसका माहात्म्य भी लिखा है जिसमें भागवतके सब चरित्र वर्ण होगये हैं सो माहात्म्य भागवतफे साथ लगा हुआ रहता है जो और पुराणों संग्रह किया गया है यदि यह बोपदेवकी बनाई होती तो और पुराणों में इसक -वर्णन क्यों होता यह भागवत भी व्यासजीका बनाया है इसमें प्रमाण यह है ॥ मत्स्यपुराणमें लिखा है। यत्राधिकृत्य गायत्रीं वर्ण्यते धर्मविस्तरः ॥ वृत्रासुरवधापत तद्भागवतमिष्यते ॥१॥ लिखित्वा तच्च यो दद्यादेमसिंहसमन्वितम् ॥ प्रोप्ठपद्यां पौर्णमास्यां स याति परमं पदम् ॥२॥ अष्टादश सहस्राणि पुराणं तत्प्रकीर्तितम् ॥ मत्स्यपुराणे । पुराणान्तरे च- ग्रंथाटादशसाहस्रो द्वादशस्कंथसंमितः ।। हयग्रीवब्रह्मविद्या यत्र वृत्रवधस्तथा ॥१॥ गायन्या च समारम्भस्तद्वै भागवतं विदुः ॥ पद्मपुराणे अम्बरीपं प्रति गोतमोक्तिः। अम्बरीप शुकपोतं नित्यं भागवत्तं शृणु ॥ पठस्व स्वमुखेनापि यदीच्छसि भवक्षयम्॥ १॥ पाझे. भापार्थः। जिसमें गायत्रीको आगे लेकर धर्म वर्णन किया जाता है और नासुरका वध है उसीका नाम भागवत है १ जो कोई इसे लिखाकर सुवर्णके सिंहासन सहित भादोंकी पूर्णमासीको दान करता है वह परम गतिको जाता है इस ग्रंथमें अष्टा- दश सहस शोक हैं और पुराणोंमें लिया है जिस ग्रन्यमें अठारह सहस श्लोक चारह स्कंध हयग्रीष ब्रह्मविद्या वृत्रासुर वध १ गायनोसे प्रारम्भ है सीको भागवत कहते हैं पद्मपुराणमें लिखा है गौतमनी कहते हैं-हे अम्बरीप ! जो संसारसे पार होनेकी इच्छा करता है तो शुकदेवजी कथित भागवतको सदासुन और पाठ फर।। इन श्लोकोंसे यह भली भांति प्रगट होता है कि श्रीमद्भागवत अष्टादशपुराणा- न्तर्गत व्यासकृत यही है और इसमें माखन लीला आदि समाधी भापा है . .
(४४२) दयानन्दतिमिरभास्करः। इसमें रहस्य है और रासलीलामें जो गोपियाँ थीं वोह सब वरदान पाये हुए थी और श्रीकृष्णसे भिन्न न थीं देखो हमारा टीका किया रास पंचाध्यायी और शुकदेवजी योग शरीर धारण किये जीवन्मुक्त यथेच्छाचारी ॥ मार्कण्डेयपुराणप्रकरणम् । स० पृ० ३३१पं० २३ मार्कंडेयपुराणमें रक्तबीजके शरीरसे एक विन्दु भूमिमें पडनेसे उसके सदृश रक्तबीजके उत्पन्न होनेसे सब जगत्में रक्तबीज भरजाना रुधिरकी नदीका वह चलना आदि गपोडे बहुतसे लिखे हैं जब रक्तवीजसे सब जगभरगया तो देवी और देवीका सिंह और उसकी सेना कहां रही, जो कहो कि देवीसे दूर थे तो सब जगत् रक्तवीजसे नहीं भरा था, भरजाता तो पशुपक्षी मनुष्यादि प्राणी वृक्षादि कहाँ रहे थे यहां यही निश्चित जानना कि दुर्गापाठ बनानेवालेके घरमें भागके चले गये होंगे ॥ ३५१ । २२ समीक्षा-रक्तवीजसे जगत्फा भरजाना श्लोकका आशप नहीं है किन्तु यही आशय है कि रक्तबीज बहुतसे उत्पन्न होजानेसे उस संग्राममें जिधर तिधर रक्त बीज ही दृष्टि आने लगे थे जैसे जब नदीमें जल अधिक आ जाता है तो जलके किनारे खडे होनेवालोंको जल ही जल दिखाई देता है तब वह यह कहने लगते हैं कि आज यह जगत् जलमय हो रहा है सिवाय नलके और कुछ दृष्टि नहीं आता यद्यपि सब जगत् जलमम नहीं है परन्तु कहनेमें यही आता है ऐसे ही रक्तबीजकी जगत् भरजानेकी वार्ता कहकर उसकी अधिकता दिखाई है अतिश योक्ति अलंकार है ॥ तुम इस बातको क्या जानो व्याहे न वरात गये। ज्योतिश्शास्त्रप्रकरणम् । स० प्र० पृ० ३३६ पं० २४ देखो ग्रहोंका फैसा चक चलाया है निसने विद्या- होन मनुष्योंको ग्रस लिया है ( ३५७ १ ४) पुनः पृ० ३३७ पं० ७ यजमानो तुम्हारे आज आठवां चन्द्रमा है सूर्यादि कर घरमें आये हैं ढाई पर्पको शनैश्वर पगमें आया है बडा विन होगा पूजा पाठ करोगे तो बचोगे (यह पोपलीला है) पृ० ३३८ पं० ९ सच तो यह है कि सूर्यादिलोक नह हैं न वे किसीको सुख और न वे किसीको दुःख देनेकी चेष्टा कर सकते हैं ३५८ । २२ पृ० ३३९ पं० १ जो धनाध्य दरिद प्रजा राना रंक होते हैं अपने फाँस होते हे ग्रहोंसे नहीं और गणित फरफे विवाह करनेसे फिर विधवा क्यों होजाती है इस .
एकादशमसमुल्लासखण्डनम् । (४४३ लिये कर्मकी गति सच्ची ग्रहोंकी गति दुःख सुख भोगमें कारण नहीं ग्रह आकाश और पृथ्वी भी आकाशसे बहुत दूर है इनका संबन्ध कर्ता और काका साथ साक्षE कार नहीं और जो सच्चे होंतो एक चक्रवर्तीके समान दूसरा क्यों नहीं राजा यह उदर भरनके वास्ते हैं ॥ ३५९ । १७ । समीक्षा-स्वामीजी ग्रहोंका फल नहीं मानते कि, जड पदार्थ किसीको दुर दत नहीं वेद इस बातको कहता है कि, ग्रह दुःख दते हैं यदि ग्रह दुःख नहीं देते तो क्यों उनकी शान्ति वेदमें की है निश्चय यह उपायसे शान्ति करतेहैं जस छत्रसे सूर्यताप निवारण होता है ऐसेही शान्तिसे ग्रहदशा निवारण होती है ग्रहोंफा पृथ्वीसे सम्बन्ध है इससे उनके निवासियोंका भी सम्बन्ध है ।। शंनौमित्रुः शंवरुणः शंविवस्वांछमन्तकः । उत्पाताः पार्थिवान्तरिक्षाः शन्नेदिविचराग्रहाः ॥ १९।९।७ नक्षेत्रमुल्काभिहतुक्षमस्तुनः ॥ १९ । ९ । ९ शन्नोगृहाश्चान्द्रमुसाःशमादित्यश्चराहुणा शंनोमृत्युधूमकेतुः शरुद्रांस्तिग्मतजसः ॥ १९ । ९ । १० आरेवतींचावयुजीभगंमु आमसुर्य भरण्या आवहन्तु। १९ । ७।५ अष्टाविंशानिशिवानिशुम्मानिसुहयोगंभंजन्तुमे योगंप्रपद्येक्षेमचक्षेमंप्रपंधेयागुचनोऽहोरात्राभ्यामस्तु ।१९।८।२ स्वास्वतम प्रातःसंसायं सुदिवं सुमुगं सुशकुन में अस्तु अथर्ववेदे १९ । ९ । ७ से मिन परुण विवस्वान अन्तक अर्थात् काल पृथ्वी अन्तरिक्ष उत्पात और आकाशमें फिरनेहारे ग्रह हमारा कल्याण करें १ नक्षत्र टल्कापातसे हमको फल्याण रहै २ ग्रह चन्द्रमा आदित्य राह मृत्यु ( धूमफत ). (केतु ) और रुद्र हमारा फल्याण करें ३ रेवती अभिनी भरणी आदि हमको ऐश्वर्य और धन दे १ महाईस नक्षत्र योग रात दिन इमको मुखकारक हाँ ५ प्रातःसाप दिनमें अच्छे शकुन मुझको हों ६ (४४२) दयानन्दतिमिरभास्करः। इसमें रहस्य है और रासलीलामें जो गोपियाँ थीं वोह सब वरदान पाये हुए पी और श्रीकृष्णसे भिन्न न थीं देखो हमारा टीका किया रास पंचाध्यापी और शुकदेवनी योग शरीर धारण किये जीवन्मुक्त ययेच्छाचारी थे। मार्कण्डेयपुराणप्रकरणम् । स० पृ० ३३१ पं० २३ मार्कंडेयपुराणमें रक्तबीजके शरीरसे एक बिन्दु भूमिमें पडनेसे उसके सदृश रक्तबीजके उत्पन्न होनेसे सब जगत्में रक्तबीज भरजाना रुधिरफी नदीका यह चलना आदि गपोडे बहुतसे लिखे हैं जब रक्तवीजसे सब जगत् भरगया तो देषी और देवीका सिंह और उसकी सेना कहां रही, जो कहो कि देवीसे दूरपे तो सब जगत् रक्तवीजसे नहीं भरा था, भरजाता तो पशुपक्षी मनुष्यादि माणी पक्षादि कहाँ रहे थे यहाँ यही निश्चित जानना कि दुर्गापाठ बनानेवालेफे परमें भागके चले गये होंगे ॥ ३५१ । २२ समीक्षा-रक्तबीजसे जगत्का भरजाना श्लोकका आशप नहीं है किन्नु यही आशय है कि रक्तबीज बहुतसे टत्पन्न होनानेसे उस संग्राममें गिधर तिधररता वीज ही दृष्टि आने लगे थे जैसे जब नदीम जल अधिक आ जाता है तो गलके फिनारे खडे होनेवालोंको जल ही जल दिखाई देता है तय यह यह कहने लगते हैं कि आज यह जगत् जलमय हो रहा है सियाय नलके और कुछ दृष्टि नहीं आता यद्यपि सब जगत् जलमम नहीं है परन्तु कहने में यही आता है पसे ही रक्तवीमकी जगत् भरजानेकी यातां कहकर उसकी अधिकता दिखाई है अतिर यक्ति अलंकार है ।। तुम इस वातको क्या मानो व्याहे न घरात गये ज्योतिश्शास्त्रप्रकरणम् । स०प्र० पृ० ३३६ पं० २४ देसो ग्रहोंका फैसा चक्र चलाया है निसने विधा हीन मनुष्योंका ग्रस लिया है (३५७।४) पुनः १० ३३७ ६० ७ पनमा तुम्हारे आज आठयां चन्द्रमा है मर्यादि कर परमें आये हैं ढाई वर्षको शनार पगमें आया है वडा विन होगा पूजा पाठ करोगे तो बचोगे (यह पोपटी है १० ३३८ ५० ९ सच तो यह है कि सादिलोक गह है न ये विमीको गुण और न वे किसीको दुःस देनेकी चेष्टा कर सकते हैं ३५८ ॥ २२ 'पृ० ३३९५० १ जोनय दरिद मना राना रंग होते हैं अपने काम है ग्रहोंसे नहीं और गणित कर याद कर कर विधया गया होगातील एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (४४५) कि, जबतक जमीनको छायाकी बात नहीं चलीथी तबतक राहुके सिद्धान्तसे ग्रहण सिद्ध होताथा या नहीं और इस समय भी ज्योतिषी उसी सिद्धान्तसे ग्रहण लगाते हैं और जब इस समय भी उसका समय अंग्रेजीहिसाबके अनुसार ही लगता है अपने सिद्धान्तमें किस बातकी कमी है जो बात २ अंग्रेजों के सिद्धा. न्तके शिष्य बनरहे हैं इसी कारण आपने अपने वेदभाष्यको भी अंग्रेजी लिवास पहरायाहै जिससे अंग्रेजी पढे श्रद्धा करें, राहुकेतु ही छायाग्रह हैं यही भूमिकी छायामें प्रविष्ट होते हैं और उस छायाका भयंकर असर होताहै गर्भवती या उसका पति ग्रहणके समय कुछ काम करै तो गर्भस्थ संततिमें विकृति होजाती है राहुका वर्णन वेदमें है साधारणछायासे बुरा असर नहीं होता यह स्वामीजीने अपना शास्त्र छोड अंग्रेजोंका अनुकरण कियाहै ज्योतिषका मत है जब केतु सूर्प एफ राशिमें हो तो उनकी छाया पडनेसे तीसरे स्थानके पृथ्वीवासियोंको ग्रहण दीखताहै और एसे ही राहु चंद्रमा एक रशिपर होनेसे चन्द्रग्रहण सबको दीखताहै ।। पूर्णिमापतिपत्संधी राहुः संपूर्णमण्डलम् । असते चन्द्रमकै च पर्वप्रतिपदन्तरे ॥ यदि पृथ्वी चलती होती तो इसको राशियोंमें आना जाना पूर्व आचार्य मानत और यदि हमारे यहाँके सिद्धान्त अशुद्ध होते ग्रहणादिकोंकी यह ठीक विधि कैसे मिलती और किसी २ ने गहुको ही पृथ्वी पहाहै और वेद ब्राह्मणों में ही पह राहुकाही आच्छादन करना लिखाहै । देखिपजिस ग्रहलाघवा यह वाक्य है उसका प्रसंग यों है ग्रहणाधिकार संख्या॥ श्लोक २ "एवंपन्तेि विराहकवाहोरिद्वाल्यांशाभवश्चेद्रहस्य । तेशानिनाः शंकरैःशैलभक्ताव्यग्यकौशः स्यात्पृपत्कोंगुलादिः।। अर्थ-इसी प्रकार पर्वान्त अर्थात् तिथ्यन्तमें सूर्यमें राहु कम फर फिर भुजा बनाय देखना १४ असे न हो तौ ग्रहण.का होना समझा जाताहै अंश ग्यार हके संग गुण सातका भाग देकर जो प्राप्त हो राहु आपे हुए सूर्यफी दिशाको तरफ शर होताहै आगे यह वही शोक चतुर्थ है जो कि, स्वामीजी सिद्धान्तशिरीम णिका लिखतेहैं (छादयत्यकीमविभूमिभाइछादकच्छाद्यमानवपखंडं कुरु इति १) इसका अर्थ मूर्यको राहु चादमाके साथ होकर छादन करताहै और चन्द्रमाशे गह भूमिके साथ मिलकर छादन करताहै पुर्व जो दूसरा श्लोक ( एपंप) है इसका अर्थ पूर्व लिखन्हैं राहु मूर्यसे हीन क्यों किया जाताहै यदि (४४४) दयानन्दति मिरमास्करः। शंदेवी शंवृहस्पतिः १९ । ९।११ देवी और बृहस्पति फल्याण फरें ॥ देखिये यदि ग्रह दुःख नहीं देते तो उनकी शान्तिके अर्थ प्रार्थना करनी क्यों है क्या यह अनर्थ प्रलाप है कभी नहीं । वेदमें प्रार्थना इसी कारण है कि शान्त भी होनाते हैं, और जैसे मनुष्योंके कर्म होते हैं तदनुसार ही ग्रह होते हैं, ग्रह और फर्म एकसे ही होते हैं ग्रहोंसे मनुष्योंके फर्म जाने जाते हैं जिनके ग्रह स्पष्ट हैं शुद्ध हैं उसके कर्म प्रत्यक्ष होजाते हैं उनकी जन्मपत्रकी बात कभी एंटी नहीं होती, राशियों में ग्रहोंके आनेसे मनुष्यों के नामोंसे सम्बन्ध होता है, क्यों कि (गृह्यते ते ग्रहाः ) ग्रहण करते हैं इसीसे उनका नाम ग्रह है यह ज्योतिश्शास्त्र ही है कि, जिसके द्वारा भूत भविष्य वर्तमान दशा मनुष्य जानसक्ता है, ज्योतिश्शा. स्त्रका अपेल सिद्धान्त है इसीसे इस देशको उन्नति हुई, जबसे इसका लोप होता चला तबसे नास्तिकता फैलने लगी, जिस समय एक चक्रवर्ती राना होगा उस समय कोई दूसरा नहीं होसकता क्यों कि, टसके फर्म और ग्रह ऐसे ही होत हैं दूसरा उत्पन्न ही नहीं होसकता पतिका विषोग भी ग्रहोंके अनुसार होता है यदि पृथिवीका ग्रहोंसे सम्बन्ध न हो तो होरा माणिक उत्पन्न नहीं होसक्ते भूमि स्थिर न रहै ताप शीत न हो पदार्थविद्यामें तो आप कोरे हैं.।। स० पृ० ३३८६२६ छादयत्यर्कमिन्दुर्विधुभूमिमाः यह सिद्धान्तशिरोमणिका वचन और इसी प्रकार सूर्यसिद्धान्तादिमें भी है जब सूर्य भूमिके मध्यमें चन्द्रमा आताहै तब सूर्यग्रहण और जब सूर्य और चन्दके वीचमें भूमि आती है तब चन्द्रग्रहण होताहै अर्थात् चन्द्रमाकी छाया भूमिपर भूमिकी छाया चन्द्रमापर पड़ती है सूर्य प्रकाशरूप होनेसे उसके सन्मुख छाया किसीकी नहीं पडती किन्तु जैसे प्रकाशमान सूर्य वा दीपसे देहादिकी छाया उलटी जाती है वस ही ग्रहणमें भी समझो ॥ ३५९।१० समीक्षा-वाह स्वामीजी धन्य है ग्रहलायवका वाक्य लिखकर नाम सिद्धान्त शिरोमणिका लेते हैं और ऐसा ही सूर्यसिद्धान्तका लेख बताते हैं क्या ही बहुत बात है कि, जब सूर्य और चन्द्रमाके बीचमें भूमि ओगी तो चंद्रग्रहण होगा वस इतनी बात अप्रेजोंके सिदिन्तकी लेकर घेद शास्त्रपर कुछ भी विचार न करक आपने सनातन सिद्धान्तपर हरताल फेरदी, स्वामीनी या उनके शिष्य बताई * १८९७ वाढेमें ग्रहलाववके अ०.४ लो० ४ लिखाहै ! पर चेलोंने अप्रमाणीकप्रन्य- का वचन रहने क्यों दिया निकालडालना चाहिये। .
एकादशसमुल्लासखण्डनम् (४४७) अर्थ--ग्रहणके समयमें जप दान हवनफामहाफल है यह स्मृति पुराण वेदवेत्ता कहते हैं श्रेष्ठोंके योग्य यह चमत्कार्यरूप सूर्यचन्द्रग्रहण स्फुट कहता है इस लोकके ऊपर स्मृति पुराण वचन भास्कराचार्यने स्वरचित भाष्यमें लिखे हैं सोलिखते हैं। साने स्यादुपरागादौ मध्ये होमसुराने । सर्वस्वेनापि कर्तव्यं श्राद्धं व राहुदर्शने ॥ १ ॥ अकुर्वाणस्तु नास्तिक्यात्पके गौरिव सीदति । स्नानं दानं तपः श्राद्धमनंतं राहुदर्शने ॥२॥ संध्याराभाने कर्तव्यं श्राद्धं खलु विचक्षणः । द्वयोरपि च कर्तव्यं यदि स्यादाहुदर्शनम् ॥ ३॥ उपस्युपति यत्स्वानं संध्यायामुदिते खो। चंद्रसूर्योपरागे च प्राजापत्येन तत्फलम् ॥ ४ ॥ अर्थ--नान ग्रहणादिमें फरे होम देवपूजन मध्यमें करे सर्वस्वसे भी राशदर्शनमें श्राद्ध करै । जो नास्तिकतासे जपादिन करे तो कीचड में फंसी हुई गायकी नाई अत्यन्त दुःखित होता है । स्नान दान जप श्राद राहुके ग्रासमें अनन्त होते हैं २ भाद संध्याराविमें न कर ग्रहणसमपमें सदा करे ३ प्रातःकाल जो स्ला. नका फल है संध्याका जो फल है वह फल प्राजापत्यरूप ग्रहणमें मिलता है। इत्यादि यह सत्ययुगका बना ग्रन्थ है और पुराण उस समय भी थे इसप्त पुराण प्राचीन हैं प्रमाण- अपाविंशाधुगादस्माद्यातमतत्कृतं युगमिति । अर्थात् यह अहाईसा सत्ययुग व्यतीत होता है । जब कि छापा ही पड़ती है तो चन्द्रसूर्पका एक ओरका प्रकाश बना ही रहता है तो तारागण न दीखने चाहिये इससे छादन अर्थ ग्रासका है। गरुडपुराणप्रकरणम् । स० पृ० ३३९ पं० १४ क्या गरुड पुराण झूठा है (उत्तर) हा असत्य है (प्रत्र) जो यमराना चित्रगुप्त मंत्री उनके भयंकर गण पहाडसे शरीरवाले पकड़ लेनाते हैं पापपुण्पके अनुसार स्वर्ग नरकमें डालते हैं उसके लिये दान पुण्य श्राद्ध तर्पण वैतरगी आदि नदीतरने के लिये करते हैं क्या यह वात झूठी है (उत्तर) यह सब पालोला है जो यमलोकके जीव पाप करें तो दूसरा यमलोक मानना . (१४६) दयानन्दतिमिरभास्करः। -राहु छादक नहीं तो राहुफे स्थानमें चन्द्रमा हीन क्यों नहीं किया जाता प्रत्यक्ष लिखा है और सूर्यका अंश १४ के बीच अन्तर दानोंका होगा तो ग्रहण होगा. नहीं तो क्योंकर राहुका अन्तर १५ अंशग्रहणमें छादक चन्द होता तो चन्दुका अन्तर १४ से न्यन होगा तो सर्यग्रहण होगा यह ग्रन्थकारने क्यों नहीं लिखा और जा चन्द्रमाको ही मानो ती प्रत्येक अमावस्या सूर्य चन्द्रका अन्तर १४ से ऊन. होता है किस कारण प्रत्येक अमावस्याको सूर्य ग्रहण नहीं होता इस कारण याव- काल राहु या केतु अन्तर अंश १८ का सूर्य चन्द्रसे न होगा तो ग्रहणकाभीन होगा (प्रभ) फिर छादयत्यर्फमिन्दुः-यह क्योंकर लिखा ( उत्तर.) राहु तो पूर्व शाफम कह चुके हैं चन्द्रमा इस श्लोकमें कहा इससे जाना जाता है कि, दोनों मिलें तो ग्रहण होता है यदि राहु न लिया जाय प्रत्येक अमावस्याको सूर्य चन्दतुल्य होनसे ग्रहण होना चाहिये पुनरुक्तिदोपके कारण चन्दमाके साथ राहु फिर दो वार नहीं लिखा स्वामीजीको सिद्धान्तशिरोमणिका प्रमाण देना था ग्रहलायतका अप्रमाण था इस कारण ग्रहलायवके श्लोकखण्डको सिद्धान्तशिरोमणिके नामसे लिख दिया शोक है इस झूठे जाल और संन्यासपर परन्तु हम सिद्धान्तशिरो- माणके श्लोक लिखते हैं ग्रहणाध्याय श्लो० ८-१० दिग्देशकालावरणांदिभदानच्छादको राहुरिति त्रुवन्ति । यन्मानिनः केवलगोलविद्यास्तत्संहितावेदपुराणवाह्यम् ॥ १॥ राहुः कुभामंडलगः शशांक शशांकगश्छादयतीनविम्बम् । तमोमयः शंभुवरप्रदानात्सर्वागमानामाविरुद्धमेतत् ॥२॥ * अर्थ-दिशा देश काल आवरण भेदसे राहुको छादक जो नहीं मानते वो पुरुष केवल गोलविद्या संहिता वेद पुराणोंसे वाद्य हैं राहु पृथ्वीको छायामें होकर चन्द माको छाँदै हैं चन्द्रमें होकर सूर्यको छादन करता है राहु अंधेरारूप शिवजीक वर होनेसे अदृश्य है सम्पूर्ण वेदसंमत यह वाक्य है, यह सिद्धान्तशिरोमणिका वचन है अब गणिताध्यायमें ग्रहणाध्यायका प्रथम श्लोक-- वहुफलं जपदानहुतादिके स्मृतिपुराणविदः प्रवदंति हि । सदुपयोगि जने सचमत्कृति ग्रहणमिदिनयोः कथयाम्यतः ॥1॥ * क्या चमत्कार है जो प्रमाण सिद्धान्तशिरोमणि ग्रहणप्रकरणमें यह लिखे हैं उन्हें छोटे रगामी प्रक्षिप्त बनाते हैं कि इन श्लोकोंमें पुराणका नाम आयाहै इससे यह पीछे हैं और अपने प्रभाग असली सिद्धान्तशिरोमणिक बताते हैं, जब पुराण शब्द आजानेमे यह लोक प्रक्षित है तर ऋग्वेदमें पुराण और राहु शब्द होनेपर उस प्राचीन मानियेगा या आधुनिक समझकर कहना ।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् (४४७) अर्थ ग्रहणके समयमें जप दान हवनका महाफल है यह स्मृति पुराण वेदवेत्ता कहते हैं श्रेष्ठोंके योग्य यह चमत्कार्यरूप सूर्यचन्द्रग्रहण स्फुट कहता है इस लोकके ऊपर स्मृति पुराण पचन भास्कराचार्य स्वरचित भाष्यमें लिखे हैं सो लिखते हैं। स्नानं स्यादुपरागादो मध्ये होमसुरार्चने । सर्वस्वेनापि कर्तव्यं श्रादं वे राहुदर्शने ॥ १॥ अकुर्वाणस्तु नास्तिक्यात्पके गोरिव सीदति । स्राने दानं तपः थाइमनंतं राहुदर्शने ॥२॥ संध्याराध्याने कर्तव्यं श्राद्धं खलु विचक्षणः । द्वयोरपि च कर्तव्यं यदि स्यादाहुदर्शनम् ।। ३ ॥ उपस्युपसि यत्नानं संध्यायामुदिते खो। चंद्रसूर्योपरागे च प्राजापत्येन तत्फलम् ॥ ४ ॥ अर्थ-नान ग्रहणादिमें फरे होम देवपूजन मध्यमें करे सर्वस्वसे भी राहदर्शनमें श्राद्ध फरै । जो नास्तिकता नपादिन करे तो कीचड़ में फैप्ती हुई गायकी नाई अत्यन्त दुःखित होता है । मान दान जप श्राद्ध राहुके प्रासमें अनन्त होते हैं २ श्राद्ध संध्यागनिमें न फर ग्रहणप्तमपमें सदा को ३ प्रातःकाल जो स्ना. नका फल है संध्याका जो फल है यह फल प्राजापत्परूप ग्रहणमें मिलता है। इत्यादि यह सत्ययुगका बना ग्रन्थ है और पुराण टस समय भी थे इससे पुराण प्राचीन हैं ममाण- अष्टाविंशाणुगादस्माद्यातमेतत्कृतं युगमिति । अर्थात् यह अहाईसा सत्ययुग व्यतीत होता है । जब फि छाया ही पड़ती है तो चन्द्रसूर्य का एक ओरका प्रकाश बना ही रहता है तो तारागण न दीसने चाहिये इससे छादन अर्थ ग्रासका है । गरुडपुराणप्रकरणम् । स०ए० ३३९५० ११ क्या गरुडपुराग इंटा है (टतर)हा असत्य है (पभ) जो यमराना चित्रगुप्त मंत्री टन भयंकर गग पहाइस पारीरयाले पर लेनाते है पापपुरपके अनुसार स्वर्ग नरकमें डालते हैं उसके लिये दान पुण्य पाद तर्पण वैतरगी आदिनदोतरले लिपे करते हैं यह बात इंटी है (उत्तर) पदमब पालोला है जो यमलोको नीव पाप करें तो दूसरा यमलार मानना . (४४८) दयानन्दतिमिरभास्करः। चाहिये यहाँके न्यायाधीश न्याय करें पर्वतकी समान यमके गण हों तो दीखते क्यों नहीं और जिस परमें आ वोह टूटता क्यों नहीं इत्यादि और पिंडदानादि कुछ नहीं पहुंचता ॥ ३६०११ समीक्षा-स्वामीनीने गरुडपुराणकी वृथा निन्दा करी बेशक यमरानके गण पापियोंके प्राण निकालते हैं उनका अत्यन्त सूक्ष्म शरीर हैं और ऐसी शक्ति है कि, वे अपने शरीरको घटा बढासक्तेहैं स्वपमें अन्तःकरणमें हाथी पोडे किधरसे घुस पडते हैं। ये दूत ही प्राण निकालतेहैं और यमलोकमें क्या अपराध करेंगे वह- तो पराधीन होकर कष्ट भोगते हैं, और यदि अपराध भी करें तो दूसरे यमलो ककी क्या आवश्यकता है, यही यमरान दण्ड दे सक्ते हैं जैसे जेलखानेमें कैदी. कोई अपराध करें तो उसकी कैद और वहादी जाती है, वेदमें गोदान यमरान. आदि सबका वर्णन है ॥ परेयिवांसं प्रवतो मुहीरिति वुहुभ्यः पन्थामनुपस्पशानम् । वैवस्वतं संगमनं जनानां यमं राजानं हविषा सपर्यत ॥ १९ ॥ पदार्थः (परेयिवांसम् ) अत्यन्त दूर गये (प्रवतः ) मकर्पवती ( मही) मूर्मिक प्रति अर्थात् समस्तभूमियों को अतिक्रमण करके वर्तमान (बहुभ्यः)बहुतसे पितृलो- कको गये हुए जीयोंके (पन्याम् ) मार्गको (अनुपस्पशानम् ) जाननेवाले (जना- नाम्) मृतक हुए जनोंके (संगमनम् ) प्राप्तिस्थानभूत (यमम् ) यम (राजानम्) राजाको (हविषा ) हविसे ( सपर्यत ) पूजन करो, इसमें यमको हविदानका विधान है। मृत्युर्यमस्यासीद्रुतः प्रचैता असून पितृभ्योगमुयांचकार- अथर्व १८।२।२७ पदार्थः-( मृत्युः ) मारकदेव ( यमस्य ) यमका ( दूतः) कर्म करनेवाला दूत ( आसीत् ) है (प्रचेता) विशेषज्ञानवाला यह नियमाण पुरुपके (असन् ) प्राणोंको ( पितृभ्यः ) पितरों में अनुप्रवेशके निमित्त ( गमांचकार) प्राप्त फरताहै इसमें मृत्युका दूत होना और प्राण लेना स्पष्ट है । यतिधेनुं निपुणामि य तेक्षीरोदनम् । तेनाजनस्यासोभुर्तायोत्रांसुदर्जीवनः १८।२।३० हे प्रेत ( याम् ) जिस (धेनुम् ) गायको (ते ) तेरे उद्देश्यसे (निपूणामि ) देताहूं (उ) तथा (यम् )जो (सोरे) दूधमें पकाहुआ (ओदनम् ) भात (ते) एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (४४९) तेरे निमित्त देताहूं (तेन ) उस धेनु और क्षीरोदनके साथ (जनस्य) इस जनक या जन्म लेनेवालेका (भा) धारक वा पोपक (असः) हो ( यः)जो (अत्र इस चितास्थलमें ( अनोवनः ) मृतक ( असत् ) है इस मंत्रमें स्पष्ट गोदान और क्षीर ओदनका मृतकके निमित्त वर्णन है। एतत्तै दुवः सवितावासौददातिवासौंददातिभुतये । तत्त्वंयुमस्यराज्येवसांनस्तायै चर-अथ० १८॥ ४ । ३१ हे प्रेत ( सविता)सबका प्रेरक (देवः) देव ( एतत् ) यह ( वासः) वह (भर्तवे ) भरण वा आच्छादनके निमित्त (ते ) तेरे निमित्त ( ददाति ) देता (तत् ) उस (ताप्र्यम् ) मोतिकारक वस्त्रको (वसानः)धारण किये हुए ( यमस्य प्रताधिपतिके (राज्ये ) राज्यमें (चर) विचरण कर इसमें प्रेतके निमित्त स्पा वस्त्र दान और परलोकमें उसकी प्राप्ति है । धानाधेनुरभवत् चुत्सोअस्यास्तिलोभवत् । तवियमस्यराज्ये अर्शितामुपजीवति ३२ (धाना) भुने जौ (धेनुः ) प्रोतिकारक गौ ( अभवत् ) हैं ( तिलः ) तिर (अस्याः) इस धानरूपा गौका (वत्सः) बछडा (अभवत् ) है (वै) निश्च (ताम् ) उस (अक्षिताम् )क्षपरहित वत्सरूप तिलवाली धानरूपागायको लेक (यमस्य ) यमके (राज्ये ) राज्यमें (उपजीवत्ति ) यह प्रेत जीवित होताहै, इर मंत्रमें तिल जौ प्रेत के लिये हितकर कहे हैं। एतास्तै असोधेनवः कामदुघा भवन्तु । एनीः श्येनी-सरूपाविरूपास्तुलपत्सा उपतिष्ठन्तुत्वात्र ३३ (असौ ) हे अमुफनाम प्रेत (ते) तेरे निमित्त (एताः ) यह (धेनवः) गारे (कामदुधा ) इष्ट फल देनेवाली ( भवन्तु ) हों ( एनीः) चितकबरी (श्येनी: श्वेतवर्णवाली (सरूपाः) समान रूपवाली ( विरूपाः) अनेकरूपवाली (तिल वत्साः )तिलरूप बछडेवाली धानरूप गौ (अत्र ) इस स्थल वा यमराज्य (वा)हे प्रेत तेरे निमित्त ( उपतिष्ठन्तु) अभिमत फल देने के लिये स्थित हों। एनी|नाहरिणीः श्येनीरस्युकृष्णाधानारोहिणी|नयस्ते । . तिलवत्साऊजमस्मर्दुहानाव॒श्वाहांसन्त्वनपुस्फुरन्तीः ३४ (एनी) विचित्ररंगवाली (धानाः ) धानसम्बन्धी ( हरिणीः ) हरे रंगवाली (४५०) दयानन्दन्निमिरभास्करः। (इयेनीः) श्वेतरंगकी (कृष्णाः) कालेरंगकी (धानाः) धानसम्बन्धी (रोहिणी लालरंगवाली (धेनवः ) जो धेनु. हैं तथा ( तिलवत्साः )तिलरूप बछडेवाली ( अस्मै ) इस (ते ) तुझ प्रेतके निमित्त (ऊर्जम् ) रसको (दुहानाः ) क्षरण फरतीदुई (अनपस्फुरन्तीः) नाशरहित (विश्वाहा ) सब दिन वा निरन्तर हों इस मंत्रमें भी तिल जौ गौ आदिक विधान है। देखिये तप दान श्राद्ध 'यमराज गोदान आदि सब विधान अथर्व वेदमें हैं। यहां दयानन्दने एक कल्पित जाटका इतिहास लिखाहै जिसमें स्पष्ट है कि बावामी डवलपोप है। स० पृ० ३४२५०७ यमेन वायुना सत्यराजन्' इत्यादि वेद वचनोंसे निश्चम है कि, यमनाम वायुका है शरीर छोडके वायुके साथ अन्तरिक्षमें जीव रहते हैं जो सत्यकर्ता पक्षपातरहित परमात्मा धर्मरान है वह सबका न्याय करता है ३६३।१ समीक्षा-धन्य स्वामीजी पश्चयज्ञ महाविधिमें पृ० ५८ पं० १८ में सानुगाय यमायनमः का अर्थ लिखाहै जो सत्य न्याय करनेवाला ईश्वर और उसकी सृष्टिमें सत्य न्याय करनेवाले सभासद वे ( सानुगाय) शब्दार्थसे ग्रहण होते हैं यहाँ तो ईश्वर और हाकिमोंको यम लिखा है पुनः सत्यार्थ पृ० ३०५ २४ मत मेतके 'निपेधमें लिखा है देखो जब कोई प्राणी मरताहै तब उसका भीव पापपुण्यके पश होकर परमेश्वरको व्यवस्थासे सुखदुःखके फल भोगनेके अर्थ जन्मान्तर धारण करता है यहांतक कि दूसरी देहमें होकर जन्मान्तरमें भोग लिखाद गौर यहां ऊपर आफाशम वायुमें रहना लिखते हैं, यहां शरीररहित आत्माकी रिपति यापुढं मानी है, अब विचारिये-कहीं ईश्वर और कहीं हाकिमों को यम लिखाई कहीं तकाल देह धारण माना, कहीं विना देह जीवकी स्थिति नहीं होती यह माना, कहीं पिना देह नीयोंको वायुमें लटकाया है, यह सब ऐसी विरुद्ध यातें हैं जिसे घोडीभी पुद्धि होगी वह स्वामीनीका बुद्धिधम जानलेगा २१ नरक मनुगीने अंवतामिशादि अध्याय में (नरकानेकविंशतिम् ८७) शोक ८७ से ९० तक लिखे हैं इससे गरुड पुराण घेदविरुद्ध नहीं और (यमेन पायुना ) इसको.स्वामीनीने यह नहीं लिया कि, यह फोनसे वेदका मंत्र है इसका अर्थ तो यह है कि, हे रामन् यम यापुरुः रके सत्य है " यह क्या बात हुई भर चित्रगुप्त की पलासकी संतासे लिखते हैं ब्रह्माण्डकी सम्पूर्ण रचनाके संस्कार आकाशमें संचित रहते हैं यह अति सूक्ष्म होनमे हम नहीं देत सत्तेः पान्नु योगीनन इसको ऐसे देखते हैं जैसे हम शूल पदार्प देखते हैं, आकाशके चित्र फभी नष्ट नहीं होते यह सदैव गुमरूपसे आग बामें स्थित रहते हैं इसी कारण इन चित्रों का नाम शाघ पुरागाम चियगुत कहा है यही परागके सेसकों का यही साता है, धर्मराग टेसर सर प्राणिक . एकादशसमुल्लासखण्डनम्। ‘कर्माको आकाशरूपी बहीम चित्रोंदारा लिखते हैं दिव्य चक्षुवाले ही इसको पह सकते हैं जैसे म्यूनिकलानौनका चित्र कपडे पर उत्तरता है. इसी प्रकार इसके अधिष्ठात्री देवताके निकट सब पटवीनकी समान अंकित रहतेहैं इनकी चेष्टा नष्ट नहीं होती सदा सचेष्टरहतेहैं बुद्धिमान् इसका विस्तार करलेंगे या जैसे फोनोग्रा- फमें सब शब्दोंके चित्र चित्रित होते हैं, इसी प्रकार इसके फर्म आकाशमें चित्रित रहते हैं, जैसे हजारों गायोंमें बछडा अपनी माको पहचानताहै ऐसे ही चलते समय सब फर्म इसको चिपटते हैं। व्रतप्रकरणम् । स० पृ० ३४४ पं० ४ ये गरुडपुराणादि और तन्त्र वेदसे टलटे चलते हतन्त्र -भी वैसे ही हैं जैसे कोई मनुष्य एकका मित्र सब संसारका शह पैसाही पुराण और तन्त्रका माननेवाला पुरुष होताहै, क्योंकि एक दूसरेके विरुद्ध फरानेपाले यह अन्य हैं, इनका मानना किसी विद्वान्फा काम नहीं किन्तु इनका मानना अविद्वत्ताहै, देखो शियपुराणमें प्रयोदशी सोमवार आदित्यपुराणमे रवि चन्द्रखण्डमें सोम अहवाले मंगल बुध वृहस्पति शुक्र शनैश्वर राहु फेतुके घेणव एकादशी द्वादशी नृसिंह वा अनन्तकी चतुर्दशी चन्द्रमाको पौर्णमासी दिक्पालोंकी दशमी दुगकी नवमी वसुओंकी अष्टमी मुनियोंकी सप्तमी कार्तिकस्वामीकी पष्ठी नागकी पञ्चमी गणेशकी चतुर्थी, गौरीकी तृतीया,अश्विनीकुमारको द्वितीया आद्यदेवीकी प्रतिपदा पितरोंको अमावस्या पुराण तसे यह दिन टपवास करने के हैं सर्वत्र यही लिखा है जो मनुष्य इन पार और तिथियों में अन्न ग्रहग फरेगा योह नरकगामी होगा निर्णयसिंधु प्रतादि अन्य प्रमादी लोगाने बनाये है ॥ ३६४ । २७ पंक्तिसे- पं० २२ एकादश्यामने पापानि वसति ॥ ३६५ । १६ जितने पाप हे एकादशीके दिन अनमें पसते हैं इन पोपनीसे पूछा जाय कि, किसके पाप उसमें बसते हैं जो सबके सर पाप एकादशीमें जारस तो सिसीको दुःख न होना चाहिये, ऐसा नहीं होता किनु टलटा क्षुधा आदिमे दुःख होता है दुःख पापका फूल है इससे भूखों मरना पाप है पृ. ३४.६० १३ एक पान की वीडी जो स्वर्ग में नहीं एकादशीके फल से भेनना चाहते हैं कोई दे तो पं० २१ महीने के शुफरतमे जिस सनपपडी भर जल न पाय ती मनुस्य व्याकुट होनाता है व्रत करनेवालोको महादुःख हो विशेषकर वंगाले देशमें सब विधवा विपकी प्रतके दिन बड़ी दुर्दशा होती है इस निर्दपी फसाईको लिखते समय कुछभी दपा न आई नहीं तो नि लाम नाम सनला और पाप महीने की शुरु परी एकाद- शोका नाम निर्जला रस देता, गर्भवती पा सघोवियाहितानी लडके या पुरा पुरुषोंको तो फभी उपवास न करना चाहिये, किसीको करना हो तो निम दिन (४५२) दयानन्दतिमिरभास्करः। अजीर्ण हो क्षुधा न लगै उस दिन शर्करा (शर्वत) पीकर रहना शहिये भूक नहीं [ ३६६ । १५ ]. पृ० ३४४ पं०३० ब्रह्मलोककी वेश्या एकादशीके पुण्- स्वर्गको चलीगई इत्यादि ।। ३६५ । २२ समीक्षा-अव स्वामीजी व्रताहीको टडानेके निमित्त वाग्जाल विस्तार करतेहैं यद्य- व्रतोंकी प्रथा सब ही मतोंमें प्रचलित हैं ईसाई यवनादि भी व्रत करते हैं परन्तु स्य मीजीको तो अपना पन्थही पृथक करनाहै वह क्यों व्रत विधान लिखेंगे,वेद पुर णादि सबमें व्रत करनेकी आज्ञा है वैद्यकसे तो यह स्पष्ट है कि, व्रत करनेवाले रोग नहीं रहताजो एक मासमें दोभी व्रत करलेतेहैं वे चिरफालतक सुखी रहते और व्रत करनेकी जो पुराणों में प्रत्येक तिथि लिखी है वे इस कारण हैं किन जिस देवताकी भक्ति उपासना कर वह उसकी प्रसन्नताके निमित्त उसीकी तिथि व्रत करें कुछ वे व्रत यह नहीं कहते कि, इस दिन करो इस दिन मत करो, प्रतिप दासे पूर्णिमातक जिस दिन व्रत करना हो करै, इसमें यह तो हो ही नहीं सत्ता कि, सब ही देवताओंका उपासक हो, सबहीका व्रत करै फेपल जिसकाउपासक हो उसीका व्रत करे, निश्चय पुण्य होगा विष्णुभगवानकी पूजा एकादशीवत न कर नेसे पाप है, उनकी प्रीतिके अर्थ एकादशीबत है, प्रत रसनेसे ब्रह्ममाप्ति होती है जैसे एक मनुका श्लोक पूर्व लिख आये हैं (स्वाध्यायेन तैमि*) ब्रह्मलोकमें घेश्या थी यह स्वामीजीका कथन झूठ है ब्रह्मलोककी वेश्याकी कोई कथा नहीं किन्तु इन्दलोफयी गन्धर्वी तो एकादशीक पुण्यफलसे इन्द्रलोककोगई थी यदि ऐसी ही कोई देयांगना भाजाय तो अब भी जासती है, लोग तो शरीर त्याग वैकुंठको गाते हैं परन्तु विदित होता है स्वामीजी जीवित ही खबर ले आये कि वहां पान नहीं होता, यहां चाय नेको पान न मिला होगा यह क्या संन्यासी होकर अदा ? पानहीके लिये लौट आये और यह तो किसी अन्यमें नहीं लिखा कि, कुछ खाओ ही मत फिन्तु एक समय फलाहार था दुग्धाहार फरना लिखा है दो तीन व्रत निर्जल भी हैं अपने धर्मसिन्ध अन्योंको प्रमाद लिसा है परन्तु यज्ञोपवीत संस्कारमें तीन दिनका प्रत आपने ही फयन कर दिया है धन्य है इस बुद्धिपर ज्येष्ठ महीनेफी निर्मलासे पडे घबड़ाये क्या फभी करनी पड़ी थी येशक अब तो बुरी ही मालूम होती होगी क्योंकि अब तो तोसक तर्किय मखमली पिठोनोंपर शपन, दध सार हालुपा भोगना परण दापनेको नौकर, भला तुमसे यत कैसे होसके इसी कारण ग्रत करना युरा लिग, और जो एक दिनको निर्नलामें बुराई है तो यह तपस्या संपम नियम सर मुछ परे * मनुका यह अंक प्रमाण, दिसा होनेपर मी माका कर्ता को न मानो ? कोई भी प्रभाग न दिया मनु न. ११ सी०९१३ से २६१ मा मत दंगी ३६१ में परा: Sोजन न करता टिका है. और कमाईयाठी यात हरम होगई क्या।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । -ठहरे, विद्या पढना आदि भी क्यों कि इन सब ही कार्यो चित्त और शरीरको फष्ट होता है, जाडोंमें जलमें, गरमीमें पंचामिमें, चौमासेमें मैदान में बैठ तपस्वी तप करते हैं, तो क्या यह सब मिथ्या है ? नहीं कभी नहीं और देखिये ( यह व्रत लिखनेवाले कसाईको दया न आई ) यह पुराणकर्ता भगवान्व्यासको गालिपदान की है, मनुजीने बहुत पापियोंके पाप दूर करनेको अतिकृच्छ आदि महाफठिन -ग्रतोंका विधान किया है यथा हि- एतान्यनांसि सर्वाणि यथोक्तानि पृथक पृथक् । यैवतै- रपोझते तानि सम्यक निबोधत-अ० ११ श्लो० ७१ यह सब ब्रह्महत्यादि पाप जैसे अलग २ कहे गये थे जिन २ व्रतों फरफे नाश- को प्राप्त होते हैं उनको अच्छी तरहसे गुनो ॥ ब्रह्महा द्वादशसमाः कुद्री कृत्वा वने वसेत् । भक्ष्याश्यात्मविशुद्धयर्थं कृत्वाशवशिरोध्वजम् ॥ ७२ ॥ जो ब्राह्मणको मारे वह वनमें कुटीको करके और मुरदेके शिरका चिह्न शिर- पर करके भीख मांगके खाता हुशा अपनी शुद्धिके अर्थ बारह बरस वनमें घोस करे ७२ कणान्या भक्षयेदब्द पिण्याकं वासनिशि । सुरापानापनुत्त्यर्थ वालवासा जटी ध्वनी ॥ ९३ ॥ चावलकी सुट्टी वा खली एक समय रातको वर्षदिनतक भक्षण करै धुरा कपडा - और सिरपर बाल रक्खै सुरापात्र विद्ववाला होवै तौ सुरा पानका पाप दूर हो । चतुर्थकालमश्नीयादवारलवर्ण मितम् । गोमूत्रेणाचरेत्स्नानं द्वौ मासौ नियतेन्द्रियः ॥ १० ॥ इन्द्रियों को वश करता हुआ गोमूत्र से स्नान कर और कृत्रिम लवणवर्जित - इषिप्य अत्रको चौथे कालमें भोजन करे दो मासपर्यंत ऐसा फरे। तेभ्यो लन्धन भेक्ष्येण व्रतयन्नेककालिकम् । उपस्पृशस्त्रिपवणं वन्देन स विशुध्यति ॥ १२ ॥ उस प्राप्त हुए भिक्षासे एक फाल भोजन करता हुआ विकालतानके आचरण करनेवाला एक वर्षमें शुद्ध होता है (इच्छासे शुक्रटरसर्ग करनेसे) अतोऽन्यतमया वृत्त्या जीवंस्तु सातको द्विजः। स्वायुप्ययशस्यानि बतानीमानि धारयेत् ॥१३॥ अ०४.
. (४५४) दयानन्दतिमिरभास्करः। किसी प्रकारसे निर्वाह करता हुआ सातकदिन स्वर्ग आयु यश देनेवाले इना ग्रतोंको धारण कर, इत्यादि व्रत करनेमें बहुत प्रमाण हैं एकादशीके दिन अन्नमें पाप पुसते हैं यह वाक्य भी पुराणोंका नहीं आदित्यपुराण. चंद्रखंड स्वामीजीके सत्यार्यप्रकाशमें ही दीखते हैं, भूखों मरना यह स्वामीजी ने व्रतके अर्थ किये हैं- वेदमें देखो वय ४ सोम व्रतेतव अ० ३ मंत्र ५६ यजु०" तथा "अने बतपते प्रतं चरिष्यामि यजु ० १६५ "हे प्रतपते अमि मैंग्रत धारण करताहूं इत्यादि इन . मंत्रोंमें व्रतका विधान किया है धन्य है व्रतमं ही जब पाप है तो पुण्य क्या चोरी करना होगा।"व्रतमुपैयन् " श०१ । १ ।१।१ । शतपयमे पहले ही, व्रत करना लिखा है। ब्रह्माण्डप्रकरणम्। स०पृ०३४६५० देखो जैमिनिने भीमांसा, सब कर्मकाण्ड पतञ्जलि मुनिने योगशास्त्रमें सब उपासनाकाण्ड और व्यास मुनिने शारीरक सूत्रोम सब ज्ञानकाण्ड वेदानुकूल लिखा है ॥ ३६७ । २५ समीक्षा--इस कथनसे सिद्ध होताहै कि व्यासजीने वेदान्त सब ययार्थ लिखाहै . फिर "अनावृत्तिः शब्दात् । इस व्याससूत्रको यह ठीक नहीं ऐसा लिखते स्वामीजीको लजा न आई अब वही पतंजलिका व्यासभाष्यसहित एक सूत्र लिखते हैं जिसमें ५० कोटि योजन पृथ्वी और स्वर्गादिका सविस्तर वर्णन है .. भुवनज्ञानं सूर्य संयमात्-यो० पा० ३ सू०२४ ततः प्रस्तारः सप्तलोकास्तत्रावीचे प्रभृतिमेरुपृष्ठयावदित्येवं भूलोको मेरुपृष्टादारभ्याधुवात् ग्रहनक्षत्रताराविचित्रोऽन्तरि- क्षलोकस्ततः परः स्वलोकः पंचविधो माहेन्द्रस्तृतीय- लोकश्चतुर्थःप्राजापत्यो महलोंकधिविधो ब्राह्मः तद्यथाज- नलोकस्तपोलोकः सत्यलोक इति । ब्राह्मविभूमिको लोकः प्राजापत्यस्ततो महान् । माहेन्द्रश्च स्वरित्युक्तो दिविताराभु- विग्रजा इति॥ अर्थ-सूर्यमें मुषुम्नानाडीमें संयम अर्थात् ध्यान धारणासमाधिरूप त्रितपसे योगीको भुवनका ज्ञान होताहै, तिस भुवनका विस्तार सप्तलोक हैं अर्वाची नाम उपफाशसे लेकर सुमेरुपर्वतकी पीठतक भूलोक है तिससे प्रारंभ कर ध्रुषपर्यन्त नक्षवादि फरफे विचित्र अन्तरिक्ष लोक है और तिससे परे स्वर्ग चतुर्थ पंचमका फा माहेन्द्रलोकनामा तृतीयलोक है और प्रनापतिका महलोंक है और तीन कारका ब्रह्मलोक है जनलोक तपलोक सत्यलोक ॥
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (४५५), भाष्यम्-तापीचेरुपर्युपरिनिविष्टाः पण्महानरकभूमोघ- नसलिलानलानिलाकाशतम प्रतिष्ठाः महाकालाम्बरीपरोख- महारौरवकालसूत्रान्धतामिस्राः यत्रस्वकोपार्जितदुःखवे- दनाः प्राणिनः करमायुदीर्घमाक्षिप्यजायन्ते ॥ भापार्थ-तिन सप्लोकोंमें अवकाशसे ऊपर २ रचित पदमहानरकस्थान हैं पृथ्वी जल अमि वायु आकाश अन्धकारमें मतिष्ठित हैं तात्पर्य यह है इन पद महानरक स्थानोंके पृथ्वी आदि परिवार हैं कोटवत् जिस नरकस्थानका कोई. परिवार नहीं तिसका आकाश ही परिवारवत् परिवार है इन नरकों के महाकाल अम्बरीप रौरव महारौरव कालसूत्र अन्धतामिस्र ६ नाम हैं जिन स्थानों में अपने फर्मजन्य दुःख वेदनायुक्त प्राणी कष्टरूप दीर्घायुको प्राप्त होकर जन्म लेते हैं इससे यह विदित है कि नरक एक कोई पृथर, स्थान है । भाष्यम्-ततो महातलरसातलातलसुतलवितलतलातलपा. तालाख्यानि सप्त पातालानि भूमिरियमष्टमी सप्तदीपा वसुमती यस्याः सुमेरुमध्ये पर्वतराजः काञ्चनः ।। तिस नरक स्थानसे ऊपर २ महातल रसातल अतल सुतल वितल तलातल पाताल नामवाले सत पाताल हैं और भूमि यह अष्टमी सप्तदीपवाली धनवती है जिस भूमिके मध्यमें सुमेरुनाम पर्वतराज सुवर्णका प्रकाशमान उज्ज्वल दीप्तिवाला पृथ्वीरूप पुष्पके मध्य में कर्णिकावत् शोभायमान अनन्त निवासस्थान युक्त है ।। भाष्यम् । तस्य राजतचैडूर्यस्फटिकममाणमयानि शृंगानि तत्र वैडू- यंप्रभानुरागान्वितोत्पलपनश्यामो नभसोदक्षिणभागः श्वेतः पूवः स्वच्छः पश्चिमः कुरुण्डकाम उत्तरः दक्षिणपा चास्य जम्वू यतोऽयं जम्बूद्वीपतस्तस्य सूर्यप्रचाराद्वात्रिंदिव लग- मिव विवर्तते तस्य नीलश्वेतश्रृंगवन्त उदीचीनास्त्रयः पर्वता द्विसहस्रायामास्तदन्तरेपु त्रीणि वर्षाणि नवनवयोजनसाह- स्राणि रमणकं हिरण्मयमुत्तराः कुरख इति ।। तिस सुमेरु पवतके पूर्व दक्षिण पश्चिम उत्तरको तरफ कमसे रानतमणिमय ६. शृंग बैडर्यमणिमय स्फटिकमणिमय और हेममणिमय शृंग है तिन चार शृंगों- मेंसे दक्षिणकी ओर वैदूर्यमणिमय शृंग है तिसकी प्रभाके अनुरागयुक्त नीलः दयानन्दतिमिरभाकरः। कमलवत् श्याम आकाशका दक्षिणभाग है और ऐसे ही राजतमणिमय शृंगकी प्रभानुराग प्रभावसे पूर्वका आकाश भाग श्वेत है और पश्चिमका स्वच्छ है और उत्तर कुरुण्डकाभ नाम हरेपनसे युक्त है क्यों कि सुवर्णकी छाया हरेपनको लिये होती है, इससे उत्तरभाग आकाशका सुवर्णमणिमय शृंगकी छायायुक्त होनेसे हराहै, और सुमेरुके दक्षिणकी तरफ जम्बूक वृक्ष है इससे प्रथम सुमेरुके चारों ओर नयखण्डयुक्त जम्बूद्वीप है तिस पर्वत सुमेरुफे चारों ओर सूर्पमचारसे रबिदिन लमयत् भ्रमण करते हैं, और तिस. सुमेरुकी उत्तर दिशाम दो दो हनार योजन दीर्घ नीलश्वेत शृंगोवाले तीन पर्वत हैं तिन पर्वतरूप अन्तरायके होत नौनी हजार योगन तीन सण्ड है, रमणक हिरण्यमय उत्तरकुरु नामवाले मुमेरुके समीप जो प्रथम पर्वत है, नील शृंगयुक्त होनेसे नील, और श्वेत भंग पर्वतके मध्यमें रमणकखण्ड है, वर्ष खण्ड दोनों शब्द एकार्थक हैं और भीतशंग पर्वतोंके मध्यमें हिरण्यमय रुण्ड है, और श्वेतशृंग पर्वत तथा लपणोदधि दरार समुद्र के बीच में उत्तर कुरुनामक सण्ड है ।। निपधदमकूटहिमशेलादक्षिणतो दिसाहस्रायामात्तदन्तरेषु त्रीणि वाणि नवनवयोजनसाहस्राणि हरिवपैकिंपुरुष भारत. मिति सुमेरोः प्राचीना भद्राश्वमाल्यवत्सीमानः प्रतीचीनाः केतुमालगन्धमादनसीमानो मध्ये वपमिलावृतम् ॥ अब मुमेरुके दक्षिण दिशा में निपध हेमकूट हिमशैल नामयाले तीन पर्वत हैं दो दो दगार यांगनं विस्तारयाले तिनके अन्तरायो होते तीन एण्ड हैं नौ नौ हगार पोगन हारवर्ष किंपुरुा भारतनामवाले हैं तिनमें मुमेरुफे निकट गो निाय पर्यंत तपा हेमरूट पर्वत है तिन दोनों के मध्पयती हरिया पर है और हेमाट तपा दमौलके मध्ययन किंपुरुष सण्ड है और हिमाल तथा दक्षिण लाण गमुद्र बीच में नारनपाट और मुर्मरके पूर्व भद्राशासंद है माल्या पर्यंत निमकी सीमा है आप यह है कि जैसे डगर दक्षिण तीन पीता है ऐसे गुमेह र पश्चिममें एयरकपर्वत है, पूर्नमें माल्ययान दक्षिण गायमादन तो यह सिद्ध आ कि, पूर्व मद और मात्यपान पर्यन के बीच में भद्रा है, और पभिमः सरफ पश्चिम लवणमन्द्र नया गन्धमादन पर्यन यान नुमायाद है, নতা লালন সালিসা নিধন বা সাবান বা মিম। बन्धमादन पर्वत यह पार पा चारों तरफ रहनेवारे पर और और पर और इमेन की समान पानापन और मध्य में लात है अयान पुमंग तक गिदं भार पर्वतार धीमें इलाइन खण्ड है।
एकादशसमुल्लासखण्डनम् । भाप्यम्। तदेतद्योजनशतसहस्र सुमेरोदिशिदिशि तददैन व्यूढं स खल्वयं शतसाहस्रायामो जम्बूद्वीपस्ततो द्विगुणेन लवणोदधिना वलया- कृतिना वेष्टितः ततश्च द्विगुणाःशाककुशकोञ्चशाल्मलगोमेधपु- करद्दीपाः सप्त समुद्राश्वसर्पपराशिकल्पाः सविचित्रशैलावतंसा लवणेक्षुरससुरासपिदधिमण्डशीरस्वादूदकसप्तसमुद्रवेष्टितावलया- कृतयो लोकालोकपर्वतपरिवारा:पंचाशयोजनकोटिपरिसंख्याताः अर्थ-अब सकल जम्बूद्वीपका परिमाण कहते हैं सो यह सौ हजार योजन सुमे- सब दिशाओमें लंधेपनमें है और तिप्तसे आधे भागकरकै चौडाईमें है सो यह हनार योजन विस्तारवाला जम्बूद्वीप है तिससे द्विगुण लवणसमुद्र करुणाकारसे पटा है और तिससे उत्तर उत्तर द्विगुण, शाक, कुश, क्रौञ्च, शाल्मल, गोमेष, र इन नामवाले दीप हैं सप्तसमुद्र तो सर्पपकी राशितुल्य हैं और दीप संपूर्ण वत्र पर्वतरूप शिरोंवाले हैं और लवण, इक्षुरस, सुरा, सर्पि, दधिमण्ड, क्षीर) दक इन नामवाले सात समुद्रोंसे चारों ओर घेरे हुए हैं कंकणाकार लोका- पर्वत परिवृत है यह सब पचास करोड योजन परिमाणवाले हैं भूमण्डलके दो ग हैं एक स्थूल एक सूक्ष्म सूक्ष्मविभाग यह पृथ्वीका गोला है जिसकी संरूप १६ मील कहीजातीहै स्थूल भूमण्डलका वह आवरण है जिसमें अभिवायु आ- यह सब आवरण हैं जहांतक पृथिवीका सम्बन्ध है और उस अभि वायु आदिके म्बन्ध आवरणको लिये हुए विराट् भूमिका परिमाण ५० कोटि योगन है । भाप्यम् । तदेतत्सर्वं सुप्रतिष्ठितसंस्थानमण्डलमध्येव्यूढम् । थ-सो यह संपूर्ण वसुधामंडल मुमतिष्ठित स्थानोंवाला ब्रह्माण्डके मध्यमें अर्थात् संक्षिप्त हो रहा है ।। भाष्यम् । भण्डञ्चप्रधानस्याणोरवयवो यथाकाशे खद्योत इति तत्र ताले जलधौ पर्वतेप्वतेषु देवनिकायाऽसुरगंधर्व किन्नरकिंपु- पयक्षराक्षसभूतप्रेतपिशाचापस्मारकाऽप्सरोब्रह्मराक्षसकूष्मा- डविनायकाः प्रतिवसति सर्वेपुदीपेषु पुण्यात्मानो देवमनु- पाः सुमेरुस्त्रिदशानामुद्यानभूमिस्तव मिश्रवन नंदनं चैत्ररथ (४५८) दयानंदतिमिरमारकरः। सुमानसमित्युद्यानानि सुधर्मा देवसभा सुदर्शनं पुरं वेज- यंतःप्रासादः ग्रहनक्षत्रतारकास्तु ध्रुवे निवद्धा वायुविक्षेपनि- यमेनोपलक्षितप्रचाराः सुमेरोरुपर्युपरिसंनिविष्टा विपरिख- र्तन्ते माहेन्द्रनिवासिनः पइदेवनिकायात्रिदशा अग्निवा- त्तायाम्यास्तुपिताः ॥ अर्थ-ब्रह्माण्ड अत्यन्त सुक्ष्म प्रधानका एक अवयव है जैसे आकाशम खद्योतः होता है तसे प्रधानमें अण्ड है (अब वोह भुवन वृत्तान्त है जिसके हेतु यह सब लिखा है देवनाति सब मनुष्योंसे भिन्न है सो दिखाते हैं, जिस स्थानमें जो जो रहते हैं सो सो दिखात है ) पाताल, समुद्र, पर्वत, जो पहले निर्णय कर चुके हैं तिनमें देवनिकाय नाम देवजाति असुर, गन्धर्व, किन्नर, किम्पुरुष इतने नामवाले निवास करते हैं और सर्व दीपा पुण्यात्मा देवता तया मनुष्य निवास करते हैं और सुमेरु त्रिदशनामक देवता ऑफी उद्यानभूमि है तिसमें मिश्रवन, नन्दनवन, चैत्ररयवन, सुमानसवन यह वगीचे हैं सुधर्मा देवसभा है सुदर्शन पुर है वैजयन्त . मंदिर है इतने स्थान सुमेरुपर हैं और ग्रह नक्षत्र तारागण, भुवमें बंधे हुए हैं पायुके व्यापार नियमसे उनका प्रचार देखा जाता है सुमेरुके ऊपर ऊपुर संबद्ध ही विचरते हैं माहेन्द्रलोकमें पदेवनाति हैं त्रिदश अभिप्वात, याम्य और तुपित यह छानाति देवतोंकी है माहेन्द्रलोकमें। व्यासभाष्यम्। अपरिनिर्मितवशवर्तिनःपरिनिर्मितवशवर्तिनश्चेति सर्वे संकल्प सिद्धाः अणिमाद्यैश्वर्योपपन्नाःकल्पायुपो वृन्दारकाः कामभो. गिन औपपादिकदेहा उत्तमानुकूलाभिरप्सरोभिःकृतपरिवाराः ॥ . भाषार्थः। और अपरिनिर्मितवशवर्ती परिनिर्मितवशवर्ती संपूर्ण सत्यसंकल्प अणिमादि ऐश्वर्ययुक्त हैं, कल्पपर्यन्त आयुवाले हैं दारक नाम सबसे पूजनयोग्य विषय भोग प्रधानतावाले हैं, और औपपादिकदेह नाम माता पिताके संयोगफे विना ही स्वसंकल्पसे दिव्यदेही सक्ष्मभूतासे उत्पन्न कर व्यवहार करते हैं (इससे यह भी स्वामीजीका कथन असिद्ध होगया कि, सृष्टिक्रमके विरुद्ध विना माता पताके कोई उत्पन्न नहीं होता ) वैशेपिकमें लिखाहै कि- सन्त्ययोनिजा:-वे० अ०४ आ०२ स० १० अयोनिन भी ब्रह्मादिफके शरीर होते हैं और वोह देवता सर्व स्त्रीगुणसंपन्न एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (१५९) अप्सराओंसे युक्त हैं सत्यसंकल्प अयोनिज शरीर अणिमादि सिद्धिके प्रभावसे सम्पन्न होकर यथेष्ट विचरते हैं । व्यासभाष्यम् । महति लोके प्राजापत्ये पंचविधो देवनिकायः कुमुदा ऋभव: प्रतर्दना अञ्जनाभाः प्रचिताभा इत्यते महाभूतवशिनो ध्याना- हाराः कल्पसहस्रायुपःप्रथमे ब्रह्मणो जनलोके चतुर्विधो देवनि- कायो ब्रह्मपुरोहिताःब्रह्मकायिकाःब्रह्ममहाकायिकापरा इति ते भूतेन्द्रियवशिनो द्विगुणद्विगुणोत्तरायुपो द्वितीये तपसि लोके विविधोदेवनिकायः आभास्वरा महाभास्वराःसत्यमहाभास्वरा इति ते भूतेन्द्रिय प्रकृतिवृशिनः द्विगुणद्विगुणोत्तरायुपः सर्वे ध्यानाहारा ऊर्ध्वरेतस ऊर्ध्वमप्रतिहतज्ञाना अधरभूमिप्वनावृ- तज्ञानविपयाः तृतीये ब्रह्मणः सत्यलोके चत्वारो देवनिकाया अच्युताः शुद्धनिवासाः सत्याभाः संज्ञासंज्ञिनश्चेति । प्रजापति के महत् लोकमें पांच देवजाति हैं कुमुद, ऋषभ, प्रतर्दन, अंजनाभ, प्रचिताभ यह संपूर्ण देवता महाभूत चशी हैं ध्यानमान आहारवाले हैं सहस्सकल्पकी उनकी आयु होती है ब्रह्माके:प्रथम जनलोकमें चार प्रकारकी देवजाति है ब्रह्म- पुरोहित, ब्रह्मकायिक, ब्रह्ममहाकायिक और अमर यह सम्पूर्ण देवता भूत इंन्द्रि पयशी हैं आशय यह है कि, पृथिव्यादि पंचभूत और श्रीवादि इन्द्रियगण उन देवताओंकी इच्छासे स्व स्व कार्य में प्रवृत्त होते हैं और उनसे दूनी आयुवाले हैं, और दूसरे तपलोकमें तीन प्रकारकी देवजाति हैं आभास्वर, महाभास्वर और . सत्यमहाभास्वर यह देवता सम्पूर्ण भूत इन्द्रिय प्रकृतिकशी हैं प्रकृतिनाम तम्मा- प्राका है तन्मात्रा तिन देवताओंकी इच्छासे शरीराकार या विषयाकार परिणा- मको प्राप्त होते हैं, और उत्तर २ द्विगुण आयुवाले हैं और ध्यानसे तृप्त रहते हैं ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचर्यसम्पन्न हैं कचलोकमें अप्रतिबद्ध ज्ञानवाले हैं पृथ्वी मूलसे लेकर तपोलोकपर्यन्त सब पदाथोंके सूक्ष्मव्यवहित व्यवहारको जानते हैं तृतीय सत्य- लोकमें देवताओंकी चार जाति हैं अच्युत, शुद्धनिवास, सत्याभ, संज्ञासंजी। व्यासभाप्यम्। अकृतभुवनन्यासाः स्वप्रतिष्ठा उपर्युपरिस्थिताः प्रधानवारी- नो यावत्स्वर्गायुपः तत्राच्युताः सवितर्कध्यानसुखाः शुद्धनि- (१६०) दयानन्दतिमिरभास्करः। वासाः सविचारध्यानसुखाःसत्यभा आनंदमात्रघ्यानसुखाःसं- ज्ञासंज्ञिनश्वास्मितामात्राध्यानसुखास्तेऽपि त्रैलोक्यमध्ये प्रति- तिष्ठन्ति त एते सत्यलोकाःसर्वे एवं ब्रह्मलोका-विदेहप्रकृति- लयास्तु मोक्षपदे वर्तन्ते न लोकमध्ये न्यस्ता इत्येतद्योगिना साक्षात्कर्तव्यं सूर्यद्वारे संयमं कृत्वा ततोन्यत्रापि एवं तावदभ्य- सेद्यावदिदं सर्व दृष्टमिति ॥ भापार्थः। यह चार प्रकारके अच्युतादि संज्ञावाले देवता अकृतभुवनन्यास नाम निवास स्थानसे वर्जित स्वप्रतिष्ठानाम आधारान्तररहित हैं और सबके ऊपर स्थित हैं, और प्रधान वशी हैं अर्थात् इनके संकल्पमें सत्त्वादिगुण परिणामको प्राप्त होते हैं, और ब्रह्मलोककी स्थिति पर्यन्त आयुवाले हैं, इस स्थानमें ब्रह्मलोकका नाम ही स्वर्ग है तीन देवों में अच्युत देवता ती सवितर्फ ध्यानसे तृप्त रहतेहैं और शुद्धनि- वास सविचार ध्यानसे तृप्त है संज्ञासंज्ञि अस्मिताध्यानसे तृप्त हैं वे अस्मिता ध्यान- वाले भी देवता बिलोलीके मध्यमें ही स्थित हैं यह सम्पूर्ण ब्रह्मलोक है गनलोकादि और विदेह तथा प्रकृनिलय योगिजन मोसादमें वर्तमान है, इस कारण लोकाम तिनको प्रवेश नहीं फरा, भाव यह है कि, बुद्धिवृत्तिपरिणामवाले ही लोम्पात्राम पर्तमान है और यदित्तिपरिणाम रहित प्रकृतिम लीन रहते हैं, विदेह और प्रकृतिलय योगीगनों में भेद इतना है कि, विदेह तौ स्थूलशरीर रहित केवल लिंगशरीरमें सावरणब्रह्माण्ड के अन्तर्गत प्रकृतिमें लीन होकर भोगों को भोगते हैं परन्तु प्रकृतिलयोंकी अपेक्षासे मलिन हैं, वह भोग और प्रकृतिलय योगीनन येवल सन्वप्रधान निवारणप्रकृतिमें वर्तमान निर्मल मतितार्य विषयभोग भागते हैं और महारेश्वर्य संपन्न होते हैं, और विदेहाफ नियन्ता होकर वर्तमान है ये ही मतिलय योगीजन महान् कोटिम कहे जातेहैं, यह संम्पर्ण पूर्वयाणित प्रमाण्ड पोगीको साक्षात् कर्तव्य है, इससे यह बात सिद्ध होगई कि, देवना मनुष्य अगु. आदि मर पृषकस्यानाम रहते हैं, देवता विद्वान मनुष्योंका नाम नहीं है,पप्पीका वस्तार जो कुछ पुरानाम लिखा है मो इसीके अनुमार टीक है . ! * मेटफ टोटे मानी यह माना पाकर बटुन पार से इनमें गुरमनपरी Exद्धाया कि पाकिमीन मिटारिया पर जातकपन मपम करने वार किमी भाः EXY अनुभम धारके दम छन्द नौ तातापानीका या पुरोग नगर (- -- ---- एकादशसमुल्लासखण्डनम् । (४६१) इसी प्रकार मोहनादि सब प्रयोग सत्य हैं मंत्र गुप्त हैं उनका विधान गोप्य है इस कारण प्रयोगविधि नहीं लिखी है जो पवित्रदेशमें मंत्र आराधन करै निश्चय सिद्धि होती है और योगसे भी अष्टसिद्धि प्राप्त होती हैं । भस्मासुरके पीछे भागनेसे जो शिवनी भागे थे इस कारण लोग डमरू बनाते बंच शब्द करते हैं यह ३५२.पृष्ठका आक्षेप असत्य है । स०प्र० पृ० ३५० पं० ८ एक मनुष्य वृक्षके नीचे सोता था सोता सोता ही मरगया काकने विष्ठा करदी ललाटपर तिलकाकार होगई (पं० १४) विष्णुके दूत उसे सुखसे वैकुंठ में ले गये इत्यादि ३७३ । १८ समीक्षा-स्वामीजीका यह कथन सपूर्ण ही असत्य है कहीं भक्तमालमें ऐसी कथा नहीं है यह झूठी कथा लिखी है ॥ नामाजीकी या हमारी भक्तमाल पढी। और ३७४ पृ० पं० २० पर ग्यारहवीं धारमें भो लेख छपाहै उसमें तो स्वामाको असलियत ही खुलती है ।। इसके आगे स्वामीजीने कबीर नानक दादूपंथी आदिकोका खंडन किया गो जो बातें इन्होंने लिखी है यद्यपि यह संस्कृतसे बहुत कुछ मिलती हैं परन्तु भापामें हैं वेदानुकूल जो उसमें हैं इस वैदिकधर्मकी पुष्टिसे इनके ग्रंथोंका भी मंडन होगया हमारा आशप चैदिकधर्मोके दिखानेका है वेदमें जो कुछ लिखा है सत्य है जो इसके विरुद्ध है यह असत्य है, सिद्धान्त यह है कि, जो वंदवाक्य हैं उनका मानना सब पणाका परम धर्म है उसके अनुसार जो कुछ भापमि जिसने लिखा है यह माननीय है इसके अतिरिक्त अप्रमाण हे इस कारण कवीरादिफे ग्रयोंके खंडन मंड- नसे हमारा कुछ प्रयोजन नहीं। स०म० पृ. ३७९.५० २३ जो विद्याका चिद यज्ञोपवीत और शिखा है इसको छोड मुसलमान ईसाइयोंके सदृश वनबैठना यह भी व्यर्थ है॥ १.२२ समीक्षा-धन्य है स्वामीजी यह संस्कार विद्याका चिह्न है तो और संस्कार फाहेके चिह हैं भला गर्भाधान फाहेके वास्ते है और इसका चिह्न क्या है पूरी विद्याकी वृदि फरी, यदि यह विद्याके वित होते ती विद्या पढनेफे उपरान्त चोटी और यज्ञोपवीत धारण कराया जाता फिर तीनही वर्णोको शिक्षासूत्रकी कडी आज्ञा क्यों, और जो विद्यान पंढ होते उनके शिखा सूत्र न होते जो तीन वों में हैं उनके भी क्या यज्ञोपवीत तगमा है, जो पढने टपरान्त पहाराया जाता शुटिया रसाई जाती फिर ब्राह्मणको (गर्भाष्टमन्दे कुर्वात प्रामणस्पोपनायनम् ) गर्भके आठवें वर्षमें यज्ञोपवीत करना क्यों लिखा, क्या जवता विधा न होती तब- तक पोटमपोट ही रहते, इससे शिक्षा सूत्रको विद्याकाचिद वताना भूल है शिपाता मुण्डन संस्कारसे ही आरंभ होतहि जव तीसराप होताहै टस समय पालकरपा पढा होताहै फिर पीछे तो गरमदेशको दुहाई देकर टिया कटवाई यहाँ कैसे रखाते दो।
(४६२) दयानन्दतिमिरभास्करः। स० म०पृ०३८९५० १८ कलियुग नाम फालका है कालनिष्क्रय होनेसे कुछ धमाधर्मके करने में साधक बाधक नहीं ॥ ४०९१९ समीक्षा-स्वामीनी कहते हैं कि, काल धर्म साधक बाधक नहीं काल त सब ही कुछ है समयानुसार मनुष्य उत्पन्न होता बढता पुनः. नष्ट होता है समयमं ही धान्य बोयेनाते उत्पन्न होते फटते हैं, कालसे ही सृष्टिको उत्पत्ति पालन प्रलय होती हैं जैसा समय वैसा ही उसका पल होता है जैसा युग होता वैसे ही उसके धर्म होते हैं इसी प्रकार कलियुगमें पापादि अधिक होते हैं और अपने ४३२००० वर्पतफ अवधि भोगेगा, तबतक अनेक अधम पाप ससारमें रहेंगे यह अहाईसवां कलियुग है यदि युगाको अवस्था न मानी जायगी तो यह सृष्टिके दत्पन्न होनेके वर्ष जो आपने लिखे हैं कहांसे मालूम होगये, इससे जैसा समय होगा वैसा ही धर्म होगा, फलियुग खोटा समयह इससे इसमें खोटी ही बात होगी इससे ऊपर लिखो वात कि, समय धर्माधर्मके करनेमें साधक बा- धक नहीं यह कहना ठीक नहीं ॥ स० प्र० पृ. ३८६ पं० १० (प्रभ ) गिरी पुरी भारती आदि गुसाई तौ अच्छे हैं पं० १३ (उत्तर) यह दश नाम पीछेसे कल्पित किये हैं सनातन नहीं किन्तु उनकी मंडलियां केवल भोजनार्थ है ॥ ११०११ समीक्षा-सब महात्मा लोग इस बातको जानतहे कि, दश नाम जो संन्यासि योंके हैं उसीके अन्तर्गत “सरस्वती" भी है यदि यह नवीन कल्पित नाम मिट है तो आपने अपने नामके अन्तम ( सरस्वती ) क्यों लगाया जो संन्यासियों नामांमें पीछे लगा रहताहै, कोई प्राचीन नाम धरा होता और स्वामीजीके शेष भी तो इस उपदेशको नहीं मानते और इस सरस्वती शब्दकी कलंगो लगा ही फिरते हैं, जैसे अक्षयानंद सरस्वती ब्रह्मानंद पूर्णानंद ईश्वरानंदादिस० जो देख नन्द सरस्वती ही बुना फिरताहै “वाहजो थूकै वो ही मुंहमे आवै" आगेसे साव धान रहना कि, कोई दयानंदी संन्यासी आनंदसरस्वती पर नाम न रखने पावै. स० प्र० पृ० ३९० ६०७ स्वायंभू मनुसे लेकर महाराज युधिष्ठिरपर्यन्तक इतिहास महाभारतादिमें लिखा ही है. ११४१६ समीक्षा-जहां अपना मतलब आपा वहीं महाभारत भी मानलिया और यदि और कोई महाभारतका कुछ प्रमाण दें तो झट कह दे कि, प्रमाण नहीं फिर यहाँ स्वायंभू मनुसे महाराज रामचन्द्रतक ५६ पढिोके लगभग होता हे यदि एक पीटी १०० वर्षकी भी मान ले तो ५६०० वर्ष रामचंदनीक समयतक आते हैं राम- चन्दनी वेताकै अन्तमें हर हैं निप्तमे १७२८०००सतयुग बीते और १२८६००१ वेतायुगके चौतगये तो १०० वर्षकी आयु माननेसे यह व्यवस्था कैसे ठीक होगी इस कारण उस समप बहुत बडी आयु होती थी।
. एकादशसमुल्लासखण्डनम् । यथारामायणे. परिवर्पसहस्राणि जातस्य मम कौशिक-वाल्मीकि बा. 'विश्वामित्रजी मुझे ६०००० वर्षकी अवस्था में रामचंद्र प्राप्त हुए हैं यह विश्वा- मित्रनासे दशरथजीने जब वे बुलानेको आपे थे तो कहाया इससे विदित है कि, आयु बड़ी होती थी मनुके समय से रामचंद्रके समय तक तथा अब भी ब्रह्मलो- कमें वसिष्ठनी विद्यमान हैं इत्यादि यदि आयु अधिकन मानी जायगी तो युगोंकी व्यवस्था बिगडजायगी ।। * इसके उपरान्त पृष्ठ ३९४ से ५८४ तक जैनी ईसाई मुसलमानोंका खंडन स्वामीनीने किया है जिसके विषयमें भला बुरा लिखनेसे हमारा कोई भी प्रयोजन नहीं है क्यों कि वह वेदमतके अनुकूल न होनेसे हमको इष्ट नहीं है यदि वे अपनी हानि समझें तो इसका स्वामीको उत्तर दे लेंगे हमें कुछ प्रयोजन नहीं । स०प्र० पृ०५८५ पं० ११ मेरा कोई नवीन फल्पना या मतान्तर चलानेका लेशमात्र भी अभिप्राय नहीं है ॥ ६२३ । १२ समीक्षा-धन्य है नया मत भी सडा करदिया प्राचीन रीति छोड नई ही चलाइ, शास्त्रोंको जडसे खोदडाला मूर्तिपूजन श्राद्ध, तर्पण, मत्र, जप, तप, सब झंडा:बताया, नियोगादि कुकर्म चलापा, आर्य समाज जहाँ तहाँ स्थापित कर ब्राह्मणों को पोप बताया, जाति वर्ग सब मिटाया, शूदको वेद पढनेका ढंग निकाला, अलग घेदभाष्य रवा, प्राचीनरीति के उडानेको कुछ फसर न रक्खी, इसी हेतु सत्यार्थप्रकाश वेदभाष्यभूमिकादि ग्रंथ रचे, वेदमें रेल तार निकाला, ईश्वर पाप दूर नहीं करता, नाम जपने से कुछ नहीं होता, मुनिसे लौटना इत्यादि सब अपना ही मत स्थापित किया है, और कहते हैं मैंने कुछ नया नहीं किया इस झूठ का क्या ठिकाना और मतमें क्या जहात बोलते । इसी प्रकार आजकल राधास्वामी सन्तमति ये घटरामायणीमत चले हैं सो सर्वधा मिथ्या ही हैं। इसीके आगे स्वामीजीने स्वमन्तव्य लिखे हैं वह सत्यार्थप्रकाशके अंतर्गत हो आगये इससे उनका भी खंडन होगया और स्वमन्तव्य तो स्वयं ही खंडनीय है क्यों कि वह वेद और विद्वानोंके तो मन्तव्य नहीं घरमें बेटेका नाम राना घर लिया तो उससे क्या ऐसे ही यह स्वमन्तव्य है सो इनसे क्या लाभ है केवल बुद्धिको भ्रमजाल में डालनेको लिखे हैं । * मेरठ के स्वामीको इस वंशावळीमें कुछ थेगडी लगानी चाहिये जिससे उनकी सृष्टिक ई तो पुरे हो जाय नहीं तो यह मामला अधा ही रहेगा।
. (४६४) दयानन्दतिमिरभास्कर। स० प्र० पृ० ५८९५० २३ आर्यावर्तदेश इस भूमिका नाम इस लिये है कि, इसमें आदि सृष्टिसे आर्य लोग निवास करते हैं ॥ ६२८ १३ समीक्षा-स्वामीजीकी धुद्धिका चमत्कार देखिये पहले लिखा था कि आर्य निविष्टप अर्थात् तिब्बतसे आये हैं अब स्वामीजीने कौनसी भंगकी तरंगमें लिख दिया कि आर्य सदासे यहां रहते हैं धन्य है । इस प्रकार यह ५८९ पृष्ठपर्यन्त सन् १८८४ का छपा हुआ सत्यार्थप्रकाश खण्डन हुआ नवीन उपे हुओंमें कदाचित् पृष्ठ पंक्तिका भेद हो जाय तो पाठकगण उसका विषय आगे पीछे देख लेंगे इस ग्रन्थमें समीक्षा कर सनातन वैदिकमतका स्थापन और दयानन्द कल्पित आधुनिकमतका खण्डन किया है इसमें सम्पूर्ण मन्तव्य वेदसे निर्णीत कर लिखे हैं, और जहां कहीं दूसरे ग्रन्थों का वर्णन किया है वह उन्हींका है जिनका स्वामीजीने अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाशमें माना है, मैंने यह ग्रन्थ द्रोह वा ईर्ष्यासे किसीका मन दुखानेको नहीं बनाया है किन्तु, सत्यासत्यके निर्णयके वास्ते रचना की है, जो पुरुप स्वामीजीके निस्सार युक्तियोंसे अपना सनातन मत झट छोड बैठते हैं वे पहले पक्षात रहित होकर इसे विचारें पीछे जो मनमें आवै सो करें जो जिज्ञासु हैं वे निश्चय इससे लाभ उठावंगे, इसकी भाषा भी यथाशक्ति सरल करी है, इस ग्रन्थके अवलोकनसे आर्यगण सब प्रकारसे धर्मका निर्णय कर चारों पदार्थके अधिकारी होंगे, और महाशय शास्त्रोंका गूढतत्त्व जानेंगे, यदि इसमें कहीं भ्रमवश कोई बात अनुचित लिखीगई हो उसे क्षमा करेंगे और हंसोंकी समान गुणग्राही होंगे, आप महाशयोंके ही आदरसे यह ग्रन्थ प्रकाशित होगा परमेश्वर सच्चिदानन्द श्रोता वक्ताका कल्याण करै । शम्भवतु ।। इति श्रीमद्दयानन्दतिमिरभास्करे मिश्रज्यालाप्रसादविरचिते सत्यार्थप्रकाशान्तर्गतस्य एकादशसमुल्लासस्य खंडनं समाप्तम् । १० सि० १८९०. पं० ज्वालाप्रसाद मिश्र दूसरी पृष्ठ पंक्ति ग्यारहवीं वारफे उपे सत्यार्थप्रकाशकी हैं। विज्ञापन।। इसी प्रकार वेदभाप्य भूमिका खण्डन भी तयार होता है । यजुर्वेद भाषाभाष्य सहित १२ ) सत्पुरुषोंको यह अन्य देखने योग्य है । पुस्तक मिलनेका टिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीकैटश्वर" स्टीम् प्रेम-कल्याण.
. पाठक महाशयोंके अवलोकनार्थ दयानन्दकृत वेदभाष्यका संक्षिप्त नमूना तथा मांसभक्षी दयानन्दीयमहात्माओंका वेदार्थ दिखाया जाता है जैसे एक चावलसे सब खिचडी जान लीजाती है इसी प्रकार थोडेमें सब समझिये-- भावार्थ। १ अध्याय १३ मन्त्र ४९ के भाष्य यजुर्वेदमें जो जंगलमें रहनेवाले नील गाप आदि मनाको हानि करें वे मारने योग्य हैं ।। २ अ० १३ मं०४८ के भावार्थमें जो हानिकारक पशु हों उनको मारे ॥ ३ अ० १४ मं०९ के पदार्थमें वैश्यनिंदा अर्थात् पीठपर बोझ उठानेकाले वैश्य ऊंट आदिफे सदृश हैं। ४ अ० १५ मन्त्र ५३ के भावार्थमें कन्याओंको पुरुष और पुरुषोंकी कन्या परीक्षा कर अत्यन्त प्रीतिके साथ वित्तसे परस्पर आकर्षित होकर विवाह करें । ५ अ० १९ मं० २० इस संसारमें बहुत पशुवाला होम करफै हुतशेषका भोक्ता सत्य क्रियाका कर्ता मनुष्य होवै सो प्रशंसाको माप्त होताहै ।। ६ अ० १७ मं०४४ का भावार्थ सभापतिको चाहिये कि, शूरवीरा स्त्रियोंकी सेना भी स्वीकार करै।। ७ अ०१६मं०५२ के पदार्थमें राजाको निंदा अर्थात् सुअरकी समान सोनेवाले राजन ८ अ० २१० ५२ का पदार्थ शरीरमें स्तनोंकी जो ग्रहण करने योग्य किया है उनको धारण करो। म०२१०६० का पदार्थ परमैश्वर्यफे लिये बैलसे भोग कर सुंदर पशुओंफे मति पचाने योग्य वस्तुओं का ग्रहण फरै(छेरीआदिके दूध आदिसे प्राणापानकी रक्षा करें) १० अ० २४ मन्त्र २३ फे पदार्थ में मुगों तथा उल्लू और नीलकण्ठादि पक्षि- योंकी प्राप्ति और भावार्य में उनके बढानेको अच्छा माना है ।। ११ अ० २४ मं०२४ के पदार्थमें हे मनुष्यो जैसे पक्षियोंके काम जाननेवाला जन ऐश्वर्यके लिये घटेरों विद्वानोंकी स्त्रियों के लिये जोगिओंको मारती हैं उन पखेरिओंको प्राप्त होताहै वैसे तुम भी प्राप्त होओ ॥ १२ अ० २६ मं० २४ के भावार्थमें स्त्री पुरुप उत्कण्ठापूर्वक संयोग फरकै निन सन्तानोंको उत्पन्न करते हैं वे उत्तम गुणपाले होते हैं ।। १३ अ० २७ मन्त्र ३४ के पदार्थम हेजमाईके तुल्य पिदान् ॥ १४ अ० २८ मं० ३२ का भावार्थ हे मनुष्पो जैसे बैल गार्योफो गाभिन करके पशुओंको घटाता है पैसेही गृहस्थलोग खियाको गर्भवती कर प्रजाको बढायें। १५ १० २९ मं० ४० के भावार्थ में माताफे तुल्य सुख देनेवाली पत्नी और विजय सुखको प्राप्त हों ।। १६१०३०म०१६पदायोंमें हे जगदधिरामच्छियोंसे जीनेवालोंको उत्पन्न कीजिये।
(१६६) पं० दयानन्दकृत-ऋग्वेदभाष्यका नमूना । १७१० ३० म०२१ फे पदार्थ में हे परमेश्वर! सांप आदिको: उत्पन्न कीजिये ॥ १८०१९०७६फे पदार्थ औरभावार्यमें अति अनुचित अकथनीय अश्लील लेखहै। १९ अ० १९ मं०८८ फा भावार्य स्त्री पुरुष गर्भाधानके समय परस्पर मिलकर प्रेमसे परित हो मुखके साथ मुख आँखके साथ आंख मनके सायमन शरीरके साथ शरीरका अनुसंधान फरकै गर्भको धारण करें जिससे कुरूप और वक्रांगसन्तान न हो। २० अ० २० मं०९ के पदार्थम अनुचित अकथनीय अश्लील है ॥ २१ अ० २५ मं० १ के पदार्यमें अकथनीय अश्लील है और अण्डबण्ड अर्धसे विद्यार्थियोंकी दुर्दशा फी है ॥ २२१०२५८०७ सर्वथा अश्लील है अर्थात् स्थूल पायु इन्दीसे सर्प पकडनेको कहाहै। २३ अ०३७ मं० ९पदार्थ हे मनुष्य यज्ञ स्थलमें पोडेको लदिसे तुझको पृथिव्यादि ज्ञानके लिये तत्त्वबोधके उत्तम अवयवके लिये यज्ञसिद्धिके लिये सम्यक् पकाताहूँ। २४ अ० ६ मं० १४ में गुरु शिष्यकी गुह्येन्दी पवित्र करै (इसे दयानंदी वेदमें देखना तो ) इत्यादि बुद्धिमान् इतनेमें ही समझ लेंगे कि, दयानंदनीने घेदोंमें कैसी २ बातें लिखी हैं। पं० दयानंदकृत ऋग्वेदभाष्यका नमूना। १०म० २ अ०३ सू० २८ में विद्यार्थियोंको घोडेकी उपमा दी है ॥ २ ऋ० अ० २ अ०४ वा० १३ मं० १ विद्वानोंकी चाल पक्षियोंसी लिखी है ॥ ३ ऋ० में ३ अ० १ सू० १ मन्त्र १० विद्यार्थियोंको भैसके सींगसा कहाहै ॥ इत्यादि ऐसी थोथी वार्ताओंसे दयानंदके वेदुभाष्य पूर्ण हैं जिनकी समालो. चना पृथक् की जायगी पाठक महाशयोंको उचित है कि, इनके पाग्नालसे बचें ॥ आर्यसमाजमें दो दल हैं एक पासपार्टी एक मांसपार्टी दोनों एक दूसरेको विरोधी कहते हैं एक वेदमें पास पात खाना फहते हैं एक बकरे आदि जीवोंको भूनकर खाना अच्छा बताते हैं इसपर पुस्तकें छप चुकी हैं जोधपुरके पंडितों आर्योंकी सराही हुई मांसभोजनविचारनामक पुस्तक बडी विचित्र है उसमें मांस खानेका लम्बा चौडा व्याख्यान मन्त्रों के प्रमाण देकर छापा है जोधपुर राजधानी मवाडसे आर्योंने आर्योंके लिये प्रकाशित कीहै । मां भो० वि० पृ० ८६ अजमनज्मिपयसाघृतेन दिव्यंसुपूर्ण पयसंबृहन्तम् । तेनगेष्मसुकृतस्यलोकंखरारोहन्तोअभिनाक- मुत्तमम् पृ० ८९ भावार्थ ।४।१४।६अथर्व० जल और पीसे पकाया हुआ बकरा सर्वोत्तमखाना है इससे उत्तम मुख प्रकाश और ज्ञानादियुक्त धर्मलोक प्राप्त होते हैं इस मन्त्रमें ज्ञान तथा धर्मादिका साधन भमपाफ भीनन है। अथर्व० ९॥ १९ । ६ 1 ६.स्वा.कृ.नियमखण्डन । (४६७) मा० भो० वि० पृ. ९४ प्रतीच्यांदिशिभसदमस्यद्युत्तरस्यां दिश्युत्तरं घोहिपार्श्वम् ऊवायांदिश्यजस्यानूकंधोहादशिध्रुवायधिहिपाजस्यमन्तार- क्षेमध्यतामध्यमस्य-अथव०।४।१४।८ पृ० ९७ में इसका पदार्प देखिये ( अस्य) इस बकरके (भसदम् ) जपनमास सेद्ध भातको (प्रतीच्याम् ) पश्चिम (दिशि) दिशामें (धेहि ) परो उत्तरस्पाम् ) उत्तर (दिशि ) दिशामें (उत्तरम् ) दक्षिणसे दूसरे बागके मांससे पकाये भातको और (पार्श्वम् ) पार्थ अर्थात् फुक्षिस्य ससे पकापे भातको (धेहि )धरो ( उपिाम् ) उर्व ( दिशि) देशामें (अनस्य ) वफरेके ( अनूकम् ) वक्रीवाले स्यानसे सिद्धभातको (धेहि) रो (धुवायाम् ) ध्रुवपाभूमि जो पादतलस्या है अर्थात् अपने पादफे इधर उधर स्थत यदा नीव स्थान जो उत्तमोके बैठनेको अपेक्षासे है उस तर्फमें (पानस्पम्) लके लिये जो अंग उनके मांससे पकाये भातको (धेहि ) धरो ( मध्यात् ) गवसे ( मध्यम् ) मध्यभागके मांससे पकाये भातफो (अन्तरिक्ष ) अव- शमें (धेहि )धरो॥ अब पाठक महाशय समझ गये होंगे दूपानन्दी कैसी विचित्र लीला है न बहुतसी पिनोनीवातोंसे पाठकोंका चित्त घृणित फरना नहीं चाहते -न्तु इतना कहते हैं २२० पृष्ठकी यह पुस्तक मौसके पकाने पाटने के लिये वर्णन फोहै और अगले मंत्रों में विद्वानों को मांस बाँटनेको आज्ञा सुनाई है। इतनेहोसे हम आपको सूचित करते हैं कि, इन लोगोंकी बाहरी निपमाफी -क पर न जाकर तना भीतरी भेद तो देखिये सब पोल मुल नायगी फहीं सखानेका हड फहीं मांस पर विचार इस दयानन्दी लोलाको पाठफोंके वार ही पर छोडते हैं। पं० ज्वालाप्रसादमिय. स्वामी दयानंदजीकृत दश नियमोंका खण्डन जो कि समाज मूलकारण है. बसत विद्या और जो पदार्प पिचासे जाननाते, टन सबका आदिमूल परमेश्वरहै। समीक्षा-जव सबका आदिमूल परमेश्वर है तो स्वमन्तव्य ६ पृ०५८७ में प्रकृति ना और जीवको नित्प मानना इस नियम विरुद्ध है दोनॉमें कौन बात सच्ची है। २६चर जो सचिदानंदस्वरूप निर्विकार सर्व शक्तिमान् न्यायफारी दयालु न्मा अनंत निर्विकार अनादि अनुपम सर्वाधार सर्वईश्वर सर्वव्यापफ अन्तयामी अमर अभप नित्यपापिय और सृष्टिका फर्ताह टमीको टपासना करनी योग्य है समीक्षा-पह दूसरा नियम सर्वथा अशुद्ध है जब ईभर निर्विचार है तो उसमें रचनाका विकार कैसे है और वह सष्टि क्यों करता है और जो सर्वशक्तिमान -- - (४६८) । दयानन्दतिमिरभास्कर है तो जो चाहे सो क्यों नहीं करसक्ता न्याय करना या करनी यह निर्विकार संभव कहाँ अथवा यह ज्ञान ईश्वरका परोक्ष है वा अपरोक्ष है और संशयकी निया परोक्ष वा अपरोक्ष ज्ञानसे होती है परोक्ष (जो प्रत्यक्ष न हो) ज्ञानसे ती संब पकी निवृत्ति हो नहीं सक्ती क्यों कि जो देखा नहीं उसका होना तथा गुण फार निश्चय नहीं हो सक्ता इस कारण जबतक ईश्वरके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान न होग तबतक उपरोक्त गुण उसमें कैसे सम्भव हो सक्ते हैं और उपासक टपासना किस करे जब फि, ईश्वरफा साक्षात्कार ही नहीं तो यह नाम कैसे कल्पना कर लि- निराकारफे भी और नाम फिसीके ऊपर दया करते देखाजो दयालु नाम रखलिय यह तो नाम जभी सिद्ध होसकेंगे जब ईश्वरका साफार अवतारधारी निश्च फरलोगे निराकारमें यह नाम कल्पनामात्र है । ३ पेद सत्यविद्याओंका पुस्तक है वेदका पढना और सुनना सब आर्योंक परम धर्म है। समीक्षा-जप घेदफा पढना पढाना ही परम धर्म है तो आपने सत्यार्थप्रका शादि अथोंमें महाभारत मनुस्मृति शतपथब्राह्मणवाक्य वेदानुकूल मानकर क्य ग्रहण किये यदि मंत्रभागहीमें सब धर्मोकी प्रति निवृत्ति सब पदार्थाकी उत्पत्ति स्थिति लय और जो कुछ सृष्टि और कल्याणके लिये होना चाहिये लिखा है तो पृथक् पृथक् स्थानपर प्रमाणके लिये केवल मंत्रभागकी ही श्रुति पूर्ण थी मनुः स्मृति महाभारत और २ पुस्तकोंके श्लोकोंके और ब्राह्मणभागके प्रमाण देनेकी फोई आवश्यकता नहीं थी क्यों कि मन्त्रभागको आप स्वतः प्रमाण मानते हैं तो मंत्रोंके ही प्रमाणसे सृष्टिक्रमयुगोंकी व्यवस्था ब्रह्माके दिन वर्षकल्पकी संख्या प्रतिमापूजनका निषेध अवतारोंका न होना दायभाग ब्राह्मणादिलक्षण सब कुछ उसीसे सावित करते परन्तु अपने सत्यार्थप्रकाशादिमें जो और ग्रंथोंके प्रमाणु लिखे हैं इनकी क्या आवश्यकता थी यदि वे वेदानुकूल लिखे हैं तो मंत्र ही क्यों नलिख दिये, यह तो आपने ऐसा किया जैसा कोई आम छोड़ वरपर गिरे, चाहिये था कि केवल मंत्र ही तो अपने ग्रंथों में लिखे रहने देते शेप सब निकाल डालते। ४.सत्यका ग्रहण और असत्के छोडनेमें सदा उद्यत रहना चाहिये। समीक्षा-यह नियम विवेकान्तर्गत है जबतक 'विवेक न होगा तबतक सद असत्को परीक्षा कैसे होगी यदि कोई कहै ईश्वर सत्य है, या जगत् जगत तो नाशवान् होनेसे असत् और ईश्वर नित्य होनेसे सत् है, जव जगत् मिथ्या ईश्वर सत्य है, तो किसका ग्रहण किसका त्याग करे, ग्रहण और त्याग दूसरे पदा 'र्थका होता है जब दूसरा पदार्य असत्य ही है तो त्याग किसका इस नियमका धर्मसे कुछभी संबंध नहीं है यह निपम निश्चयरहित है मिथ्या पदापोंका क्या ग्रहण क्पा त्याग हो सक्ता है। और सत्यार्थप्रकाशके असत्य अप्रमाण और घचनाका आजतक त्याग न हुआ। ५ सप फाम धर्मानुसार अर्थात् सत् और असत्का विचर कर करना चाहिये। समीक्षा-स्वामीनीने ईसाइयोंफे दश नियमों के अनुसार अपने नियम बनाये ६. स्वा. कृ. नियमखंडन । इसमें भी वही वार्ता है जो ४ नियममें है पहले तो यह देखना चाहिये कि, परीरका क्या धर्म है और आत्माका क्या धर्म है शरीर जड और दुःखरूप है सकी उत्पत्ति घटना बढना नष्ट होना प्रत्यक्ष है, आत्मा दृश्य है नित्यकरस तन्प जन्ममरणसे रहित है जो जन्म मरणसे रहित है सोई आनंद है फिर गत्मामें अनात्माभिमान और अनात्मामें आत्माभिमान फैसा फिर कैसे धर्मा- सार सत् असत्का विचार करकै नियम किया और यहभी आश्चर्य है कि, निर. यूव चैतन्य आत्माको माना, और प्रभंजन माना, निरवयव आकाशू जड तो व्यापक और निरवयव चैतन्य आत्मा प्रभंजन तो बताओ यह धर्म अनुसार -पका ग्रहण है या असत्यका त्याग है, जब निरवयव है तो दो या तीनकी था एकही स्वरूपमें कैसे हो सक्ती है ॥ ६ संसारका उपकार करना इस समाजका मुख्य प्रयोजन है अर्थात् शारीरिक त्मिक और सामाजिक उन्नति करना । समीक्षा-इसमें यह बात विचारने योग्य है कि परमेश्वरको सर्वाधार सर्वेश्वर नकर उपासना फीगई है फिर संसारकी उन्नति और उपकारमें भी आपका नाक्षेप करना ये उपास्पकी बराबरी है इसमें तो अपनी और संसारकी उन्न- में परमेश्वरकोही आधष्ठाता और प्रतिनिधि समझना चाहिये यही परमधर्म है जव कर्मानुसार है तो आपसे उन्नति कैसी ॥ 3 सबसे प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य वर्तना चाहिये । समीक्षा-प्रीति अनुकूल पुरुषोंमें होती है यदि धर्मानुसार पर दृष्टि है तो धर्म- धी हठ करनेवाले अभिमानको शत्रुः समझना चाहिये फिर सबसे प्रीतिपूर्वक । कैसा यदि चोर चोरी करे तो उसके साथ प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार कैसे वर्ते नीति करे तो धर्म कहाँ और धर्म करे तो प्रतिसे यथायोग्य पाय कैसे सकता है शडके साथ यथायोग्य होनेमें प्रीति कहाँ ॥ अविद्याका नाश और विद्याकी वृद्धि करनी चाहिये । मोक्षा-विद्या यथार्थज्ञानको कहते हैं विद्ययामृतमश्नुते विद्यासे अमृत अर्थात् होती है जिससे संसारमें जन्म नहीं होता और आपने मुक्तिसे भी लौटना है तो सारी तुम्हारे ग्रंथाम अविद्याही अविद्या है २ परमेश्वर सनाति विजाति हत है जगत् नाशवान होनेसे स्वप्रवत् है जगत्में सत्यबुद्धि परमेश्वरमें भेद ही अविद्या है सो आफ्नै सम्पूर्ण ग्रंथमें ईर्ष्या निन्दा द्रोह यह सब अविद्याही ॥ है वेदान्तरूप ब्रह्मविद्याका नाश किया है फिर अविद्याका नाश फैसा ।। हरेकको अपनी उन्नतिसे सन्तुष्ट न रहना चाहिये किन्तु सबकी उन्नतिमें उन्नति समझनी चाहिये। नीक्षा-जबतक भेदबुद्धि है तबतक यह नियमभी निर्वाह नहीं होसता यह आपकी कथनमात्र है क्यों कि आप भेदवादी हैं और भेदवादियोंमें यह ही कि औरोंकी उन्नतिसे संतुष्ट हो ऐश्वर्यकी तो बात ही रहने दीजिये फिर (४७.) दयानन्दतिमिरभास्कर जव स्वामीजीने अपना नवीन मत ही फरपना फरलिया तो अपनेसे और धर्मा- पलंबिपोंके उन्नति आप फर चाहेंगे मापने सैकड़ों दुर्वाक्य कहे और सनातन- धर्मकी अपनति में सत्यार्थप्रकाश ही बनाया है यह नियम कथनमात्र है यया कि- पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे आवरहिं ते नर न घनेरे । १० सब मनुष्पोंफो सर्वदा द्रोह छोडफर सामाजिक सर्वहितकारी नियम पाल. भेमें परतंत्र रहना चाहिये और पृयक सर्व हितकारी नियमों में सब स्वतंत्र हैं। समीक्षा-जो सर्वहितकारी नियम है सो प्रति २ लेकर सर्व कहलाते हैं फिर पह पडे अचंभेफी बात है कि पृथक हितकारी नियममें स्वतंत्रता और सर्व हितकारीमें परतंत्रता क्या बात यह इनके नियम १० अशुद्ध हैं सर्वाहितकारी और पृषक सर्वहितकारीमें अन्तर ही क्या है सो तो लिखा होता क्या सामाजिक सर्व हित- फारी और पृथक् सर्व हितकारामें केवल समाजको छोडकर और सब मनुष्य नहीं आगये, फिर परतंत्र स्वतन्त्र फैसा सबके लिये एकसा ही करनाया ॥ इति श्रीस्वामिदयानंदकृतनियमखंडनं सम्पूर्णम् । वैदिक सिद्धान्त। जिनका वर्णन इस पुस्तकमें आया है वह प्रकाश करतेहैं । १ ईश्वर, जिसके अनन्त नाम हैं वोह निर्विकार सर्वशक्तिमान् निराकार साफार है अनेकविध अवतार धारण करता है सच्चिदानंदरूप तर्करहित उसकी महिमा वेदादिशास्त्रोंसे जानी जाती है इसका भेद मनुष्य नहीं जान सक्ने ॥ वेद, मंत्र और ब्राह्मण दोनों भागोंका नाम घेद है दोनों अंग अंगी होनेसे निर्धान्त प्रमाण हैं, क्यों कि इन ग्रन्थों में एक अलग कर तो यह भाग कहे जाते हैं, जैसे मंत्रभाग ब्राह्मणभाग इस कारण दोनोंका नाम वेद है दोनों ही स्वतः प्रमाण हैं। ३. धर्म, जिसकी वेदादिशास्त्रों में विधि है वोह धर्म और गिसका निषेध है पोह अधर्म है जो मनुष्योंने अपनी ओरसे फल्पना कर लिया है घोह धर्म नहीं ॥ : ४ जीव, जो फर्मबन्धनसे युक्त है वोह जीव कर्म बंधन टूटनेसे आत्माफी जीवसंज्ञा नहीं रहती ॥ ५ जब यथार्थ ज्ञान होता है तब जीव ईश्वरका भेद मिट जाता है । ६.अनादि एक ईश्वर है उसकी अनन्तसामर्थ्यसे सब जगत् प्रकृतिसहित उत्पन्न होता है। ७ सृष्टि, जो ईश्वर अपनी अनन्तसामर्यसे रवताहे वो ही सृष्टि है उसकी । और घोह सृष्टि विविध प्रकारके दयोंका मेल फर्माका मेल ईश्वरको रचनाका चमत्कार है इन सबका कर्ता ईश्वर है इस कारण यह सृष्टि सफर्तक कही जाती है । वन्धन, फमोंफे विद्यमान रहनेसे होताहै चाहे अच्छे हों या बुरे क्यों कि दोनोंका फल पराधीन हो भोगना पडताहै ॥ मुक्ति, संपूर्ण कर्म और वासनाओंके क्षप होनेसे मुक्ति होतीहै जिसको प्राप्त होफर पुनर्जन्म नहीं होता। .
वैदिकसिद्धान्त ! (५७१) १० मुक्ति के साधन पेदांत विचार उपासना, ध्यान, योगाभ्यासादि ।। ११ अर्थजोधर्मानुष्ठानसे उपार्जन किया जायसो अर्ष इसके विपरीत अनर्थ है। १२ काम, अर्थ और धर्मसे जो माप्त किया जाय सो काम है । १३ वर्ण, जन्मसे होताहै कर्मसे नहीं ॥ १४ देवता, मनुप्यभिन्न देवलोकादिमें रहनेहारे हैं और असुर राक्षस पिशार भी पृथक् जाति है। १५ पूजा, देवता, अतिथि माता, पिता और ईश्वरकी करनी योग्य है ईश्व और देवताओंकी पूजा मूर्तियोंमें करनी योग्य हैं। १६ पुराण, वह अन्य हैं जो ऐतरेय शतपय इतिहास फल्प गाथा आदि भिन्न हैं और प्राचीन हैं जिन्हें व्यासजीने संग्रह कर भागवतादिनामसे प्रसिद्ध कियाहै १७ तीर्थ, गंगादिनदी पुष्करराजादि सरोवर तथा काशीस्थानादि जिन दर्शनसे पाप दूर होते हैं। २८ मारब्ध और पुरुषार्थमें प्रारब्ध मुख्य है प्रारब्ध पुरुपार्थसे सिद्ध होता है। १९ संस्कार, जन्मसे लेके मरण पर्यन्त १६ हैं यह कर्तव्य हैं और मृतकों लिये दानश्राद्धादि करना प्रबल वैदिक सिद्धान्त है ॥ २० पज्ञ, अश्वमेधादि राजोंफो कर्तव्य हैं, ब्रह्मविचारशील ब्राह्मणोंकों नझपा कर्तव्य है जिसकी विधि मीमांसा शास्त्र में लिखी है । २१ आर्य, अर्यावर्तके रहनेवाले तथा श्रेष्ठ पुरुषोंको कहते हैं जो सदासे हर देशमें रहते हैं. इनसे विपरीतोंको दस्यु कहते हैं । २२ आर्यावर्त, इस विध्याचल और हिमालयके बीच में हैं इसमें आये ना ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूदा सदासे रहते हैं । २३ शिष्टाचार वा सदाचार जो वृद्धोंसे चला आताहै वोह वेदानुसार ही है २४ प्रत्यक्षादि आठ प्रमाण हैं ।। २५ आत उसकी कहते हैं जिसके वाक्यमें कभी संदेह न हो सदा निश्चित यया पोले, जिसे अपने वास्पका बदल न करना पड़े। २६ पोच प्रकारकै पाक्योंसे परीक्षा होतीहे मतिता, हेतु, उदाहरण, निगा उपनयन इन्हींसे सब कुछ निश्चय होजाताहै और वोह वाक्य भास विद्यानुसार शाखयुक्त हो। २७ स्वतंत्र, ईश्वर सदासबकालमें स्वतंत्र है विपरीतज्ञानरहित सर्वसामध्ययु है जीव सदा सब कालमें परतंत्र है। २८ स्वर्ग, पृथ्वीके ऊपर लोकविशेष है ।। २९ नरक, स्थानविशेष जिसमें केवल दुःख ही होता है यमरानकी यात भोगनी पड़ती है। ३० विवाह आठ प्रकारके होते हैं, गान्धर्व विवाहको छोडकर और सप विका होमें कन्या पिताके अधीन रहती है, गान्धर्वषिवाह नरेशॉमें पूर्वकालमें होता और जातिमें नहीं।
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