Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Veer Satsahi

Hari,viyoghi · 2011/01

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हिन्दी-गौरव-ग्रन्थमाला--३०वाँ अन्य
वीर-सतसई
रचयिता
वियोगी हरि
प्रकाशक
गाँधी-हिन्दी-पुस्तक-भण्डार
प्रयाग
प्रथम संस्करण
विजया दशमी
संवत् १९८४
मूल्य 10

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उत्तेजन
-७
जाव भलै कुरुराज
पै
धारि दृत-वर वेश।
जइयो भूलि न कहुँ यहाँ,
केशन । द्रौपदि-कग ॥

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विषय-सूची २१ ३-वीर कवि ४-केसरी ५--वीरता ओर कामान्धता ६-चीर-याहु ७-वीर नेस or २२ २ २३ २३ '-खा ४ १ पहला शतक [पृष्ट १ से १५ तक] १-मगलाचरण -धीररस-प्राधान्य ३-वीर रसानन्यता ४-शूरवीर -दयावीर ६.-सत्यवीर ७-धर्मवीर ८--विरह-वीर ९-दान-बीर ओर कादर ११- युद्ध-वीर १२-शूर सुपूत १३-क्षतिय निरूपण २६ ५ २७ ६ २९ ८ ३० ९ १० ३१ १२ -धनुष-बाण १०-शिशु-वीरोक्तियाँ ११-प्रेम और वीरत्व १२-मातृ-शिक्षा १३ –शूर-साधन १४-रण यासा और ज्योतिप १५-अप्रिय ओर प्रिय १६-चिसाङ्कण तीसरा शतक [ पृष्ठ ३३ से ४८ तक] १-शनि-स्तुति २ाघव प्रतिज्ञा ३-सौमिति-पतिज्ञा ४-मारुति प्रतिज्ञा -भीम प्रतिज्ञा ६-अर्जुन प्रतिज्ञा ७-कन्ह प्रतिज्ञा ८- यादल-प्रतिजा ९-पूताप-पतिशा १४-मगल प्रयाण १२ १३ ३४ १४ --पवित तीर्थ १६--शीर्प दान १७---चीर किसान १.--चीर वैश्य ३४ ३५ दूसरा शतक ३० [पृष्ट १७ से ३१ तक] १---विजयराघव ध्यान -कवि-कर्तव्य वीर-पूतिजा पीर-विदा युद्ध-दर्शन ५४ ५४ भारत-पताका ५५ प्रकृत वीर ५५ ११-चामुण्ड राय १२-गरि राय ३९ १३-काहरकठोर ओर चद्रपुण्डीर ३९ १४-सयोगिता १५-जयचट १६-आल्हा और ऊदल १७-गोरा और बादल --पमिनी-जौहर ४२ १९-महाराणा सॉगा ४२ -जयमल और पत्ता स्वदेश-परिचय ५६ ५६ राजस्थान -चित्तौर ५८ -मारवाड -हल्दी घाट २०--- -याधव गद ४३ -महाराणा प्रताप २२--महाराणा राजसि ह २३--चूडावत का प्रेमोपहार २४-छसपति शिवाजी ४३ -भरतपुर दुर्ग -बुन्देलखण्ड --पराधीनता -स्वाधीनता -पराधीन ओर स्वाधीन ६१ ४८ २५-महाराजा छलसाल ६२ ४८ ६४ चौथा शतक ६४ ४९ [पृष्ठ ४९ से ६६ तक] 1--मारति-वन्दना 2-लका युद्ध ३-~-रक्मिणि हरण ४-~-अभिमन्यु -भीम-भीमता ६-द्रौपदी केश-कर्षण २६---गुरु तेगबहादुर २७---गुरु गोविन्दसि है २८-सिह शावक-बलिदान २९-भाई बन्दा ३०-वारसा पाँचवॉ शतक [ पृष्ठ ६७ से ८२ तक] १-शिव-वन्दना २-दुर्गादास राठोर ३-धुरमगद ४-लोकमान्य तिलक ५-देशबन्धु दास ६-आर्य देवियाँ ६७ ७--चाणस्य ६८ ८-चन्द्रगुप्त ५२ ६८ ९-काका कन्ह ५२ .-मास ५३ ७-फर्मादेवी -वीरा ९-पना धाय ८७ ८७ ७१ ८८ ७२ ७३ ७३ ९० १०-दुर्गावती ११-चाद पीवी १२-नील देवी १३-लक्ष्मी याई १४--सिंहयधू १५--सतीत्व-रक्षा १६-सती प्रताप १७-६दता :--शिकारी -वीरता और सुकुमारता २०-वीरता और विलासिता २१-कवि-पतन -व्यर्थ चेष्टा २३-अनहोनी २४-दुर्लभ पदार्थ ७४ ७४ ९२ ५-धिकार ६-आज कहाँ? -परशुराम-स्मरण ८-भावी इतिहास ९--प्यर्थ युद्ध १०-फूट ११-विजयादशमी १२-अब समय कहाँ ? १३-गीतारहस्य -अयोग्य नरेश १५-म्बदेश-विद्रोह १६-गो-नाश १७-क्या में पया? १८- जगत् का अमिथ्यात्व १९-कादर साधु-सत २०-त्याग ओर आत्मानुभूनि अछूत २२-मगला और अमगा २३-बाल विधवा २४- -श्वेत ओर श्याम २५-व्य -व्यर्थ गर्व २६-दीन आर दीनबंधु शरण सातवा शतक [पृष्ठ ९७ से १०९ तक] -विविध ९२ ९३ ९३ ८१ ९४ ८२ ९५ छठा शतक ९५ [पृष्ठ ८३ से ९६ तक] -नाद-वन्दना २-वे और ये। ३-कितना भारी अतर ४-निर्जीव राजपूत ८४ १७

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श्रीहरि
वीर-सतसई
पहला शतक
मगलाचरण
।
जयतु कंस-करि-केहरी । मधु-रिपु । केशी-काल ।
कालिय-मद-मईन । हरे । केशव । कृष्ण कृपाल ॥१॥
गिरिवरु जापै धारिकै राखी ब्रज-जन-लाज ।
ताही छिगुनी को हमैं बल वानो, यदुराज ॥२॥
काटौ कठिन कलेसु मो मोह-मार-मद वक्र ।
मथन-मत्त-शिशुपाल करि केहरि केशव-चक्र ॥ ३ ॥
रह्यौ उरमि रथ-चक्र जो धावत भीषम-ओर ।
कब गहिहाँ रणछोर के वा पटुका कौ छोर ॥ ४ ॥

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श्रीहरि
वीर-सत्तसई
पहला शतक
मगलाचरण
जयतु कंस-करि-केहरी | मधु-रिपु । केशी-काल ।
कालिय-मद-मईन । हरे । केशव । कृपण कृपाल ॥१॥
गिरिवरु जापै धारिकै राखी ब्रज-जन-लाज ।
ताही ठिंगुनी को हमै बल बानो, यदुराज | ॥ २ ॥
काटौ कठिन कलेसु मो मोह-मार-मद वक्र ।
मथन-मत्त-शिशुपाल करि केहरि , केशव-चक्र ॥ ३ ॥
रह्यौ उरझि रथ-चक्र जो धावत भीषम-पोर ।
कब गहिही रणछोर के वा पटुका कौ-छोर ॥ ४ ॥

[वीर-सतसई
वीर रस-प्राधान्य
श्रादि, मध्य, अवसानहूँ जामें उदित उछाह ।
सुरस बीर इकरस सदा सुभग सर्वरम-नाह ॥ ५ ॥
परिनामहुँ जो देतु है लोकोत्तर आनन्द ।
सुरस वीर रस-राजु सो, सहित उछाह अमन्द ॥ ६ ॥
बीर-स्थायी भावसो सरस सर्वरस आहि।
नीकेहूँ फीके सबै विनु जाके जग माहि ॥ ७ ॥
वीररसानन्यता
छाँड़ि वीर रसु अब हमै नहिँ भावतु रस आन ।
ध्यावतु सावन-आँघरो हरो-हरो हि जहान ॥ ८ ॥
री रसना | बस ना कळू, अब तोपै रस-तीर ।
चाखति सरस सिंगारु तजि क्यों नीरस रसुवीर? ||१||
कहा करो माधुर्य लै मृदुल मजु विनु भोज ।
दिपै न ज्योति-विकास बिनु सुंदर नैन-सरोज ॥१०॥
शूर वीर
खंड-खड ह जाय बरु, देतु न पाई पेटु ।
लरत सूरमा खेत की मरत न ठाँडतु मे ॥१९॥

पहला शतक] सहजसूर रण-चूर-उर चाहिय चातक-चाह ।। चाहिय हारिल-हठो वहै, चाहिय सती-उमाह ॥१२॥ खल-खंडन, मडन-सुजन, सरल, सुहृद, सविवेक गुण-गंभीर, रण-सूरमा मिलतु लारव में एक ॥१३॥ खल-चालक, पालक-सुजन, सुहृद, सदय, गंभीर । कहूँ एक सत लाख में 'प्रकृत सूर' रण-धीर ॥१४॥ मुहमाँगे रण-सूरमा देतु दान परहेतु। । सीस-दान हूँ देतु, पै पीठि-दान नहिँ देतु ॥१५॥ कहत महादानी उन्हें चाटुकार मतिकूर । पीठिहुँ को नहिं देत जे कृपण दान रण-सूर ॥१६ ॥ कहतु कौन रणमें तुझ धीर-बीर-सरदार । लखि रिपु बिनुहथयार जो देत डारि हथयार ॥१७॥ अाजु कहूँ तो कल कहूँ , नाहिँ एक विश्राम । करतु सिह-सम सूरमा ठौर-ठौर निज ठाम ॥१८॥ * रटत-रटत रसना ल्टी , तृपा सखि ग अग । 'तुलसी' चातक प्रेम को नितनूरान रुचि रग ॥ 'तुलसी' चातक देत सिग्व, सुतहि बार ही बार । तात, न तन कीजिये पिना वारि घर धार । -तुलसीदास गही टेक छूट नहीं, कोटिन करी उपाय । हारिल धर पग ना धरै, उड़त फिरत मरि जाय ॥ -अजात कवि ।

[ चीर-सत
वीर रस-प्राधान्य
आदि, मध्य, अवसानहूँ जामें उदित उछाह ।
सुरस बीर इकरस सदा सुभग सर्वरस-नाह ॥ ५ ॥
परिनामहुँ जो देतु है लोकोत्तर आनन्द ।
सुरस बीर रस-राजु सो, सहित उछाह अमन्द ॥ ६ ॥
वीर-स्थायी भावसो सरस सर्वरस आहि ।
नीकेहूँ फीके सबै बिनु जाके जग. माहि ॥ ७ ॥
वीररसानन्यता
छाँडि बीर रसु अब हमैं नहिँ भावतु रस पान ।
ध्यावतु सावन-आँधरो हो-हरो हि जहान ॥ ८ ॥
री रसना । बस ना कळू , अब तोपै रस-तीर ।
चाखति सरस सिंगारु तजि क्यों नीरस रसु बीर ? ॥६॥
कहा करौं माधुर्य लै मृदुल मजु बिनु अोज ।
' दिपै न ज्योति-विकास बिनु सुदर नेन-सरोज ॥१०॥
शूर वीर
खंड-खंड ह जाय बरु, देतु न पाछे पेड ।
लरत सूरमा खेत की मरत न छाँड्तु मे ॥११॥

पहला शतक] सहजसूर रण-चूर-उर चाहिय चातक-चाह । चाहिय हारिल-हठ वहै, चाहिय सती-उमाह ॥१२॥ खल-खंडन, मडन-सुजन, सरल, सुहृद, सविवेक । गुण-गंभीर, रण-सूरमा मिलतु लाख में एक ॥१३॥ खल-चालक, पालक-सुजन, सुहृद, सदय, गंभीर । कहूँ एक सत लाख में 'प्रकृत सूर' रण-धीर ॥१४॥ मुहमाँगे रण-सूरमा देतु दान परहेतु । / सीस-दान हूँ देतु, पै पीठि-दान नहिँ देतु ॥१५॥ कहत महादानी उन्हें चाटुकार मतिकूर । पीठिहुँ को नहिँ देत जे कृपण दान रण-सूर ॥१६ ।। कहतु कौन रणमें तुझे धीर-बीर-सरदार । लखि रिपु बिनुहथयार जो देत डारि हथयार ॥१७॥ अाजु कहूँ तो कल कहूँ , नाहिँ एक विश्राम । करतु सिंह-सम सूरमा ठौर-ठोर निज ठाम ॥१८॥ रटन-रटत रसना लटी , तृपा सूखि ग अग । 'तुलसी' चातक प्रेम को नितनूतन रचि रग ॥ 'तुलसी' चातक देत सिख, सुतहि पार ही यार । तात, न तपन कीजिये विना बारि-घर-धार ॥ -तुलसीदास गही टेक छूट नहीं, वोटिन करा उपाय । हारिल घर पग ना धरै, उइत फिरत मरि जाय ॥ -अज्ञात कधि ।

३ [वीर-सतसई तंत न तोरत अंतलौ , बचन निबाहत सूर । कहा प्रतिज्ञा पालिहैं कपटा कादर क्रूर ॥ १६ ॥ बचन-सूर कते मिले, करतब-कोरे कूर । साँचो तो कहुँ लाख में लख्यौ एक रण-सूर ॥ २० ॥ दया-वीर किधौं त्याग-गिरि-शृङ्ग, कै भाव-जान्हवी-कूल । । किधौ करुण-रस-सिंधु यह दया-बीर मुद-मूल ॥२१॥ दया-धर्म जान्यौ तुहीं, सब धर्मनु को सार । ' नृप शिबि । तेरे दान पै बलि हूँ बलि सौ बार ॥२२॥ तूंही या नर-देह कौ, बलि, पारखी अनूप । दया-खड्ग-मरमी तुहीं, दया-सूर शिबि भूप । ॥२३॥ दल्यौ अहिंसा-अस्त्र लै दनुज दुःख करि युद्ध । अजय-मोह-गज-केसरी, जयतु तथागत बुद्ध ॥२४॥ रण-थल मूर्छित स्वामि के लीने प्राण बचाय । | गीधनु निज तनु-माँसु दै, धन्य सजमाराय ॥२५॥ सयमराय महाराज पृथ्वीराज का एक शूर सामरा था। एक बार युद्ध-स्थल पर महाराज पृथ्वीराज घोड़े पर से मूर्छित हो गिर पड़े। पासही सयमराय भी आहत पड़ा था। यह समझ कर कि महाराज मर गये है, गीध उन पर मॅडराने लगे। दो एक ने तो चोच भी चला दी। सयमराय से यह न देगा गया । उठने की चेष्टा की, पर उठ न मका । उधर जरा ही देर करता है, तो गीध महा- राज को साये जाते हैं। सामन्त ने अपने शरीर मे मास काट-काट कर फेकना शुरू किया । गोधों पहला शतक] फैकि-फैकि निज मॉसु लिय सभरि-राय' बचाय। हे तूं शिबि तें घटि कहा, सुभट संजमाराय | ॥२६॥ सत्य-वीर सुदर सत्य-सरोजु सुचि बिगस्यौ धर्म-तडाग । सुरभित चहुँ हरिचंद को जुग-जुग पुन्य-पराग ॥२७॥ मृतरोहिता-पट-दानु लै धार्यो धर्म अमन्द । खड्ग-धार-व्रत-धीर, धनि, सत्य-बीर हरिचन्द ॥२८॥ फूंकन देतु न मृत सुवनु, माँगतु तिय-तनु-चीर । निरखि नृपति-सत-धर्म-धृति धृति हू भई अधीर ॥ २६ ॥ पद्मा-पति-पटपीत क्यों खस्यौ नीर-निधि-तीर ।। पतिहि फारि शैव्या दियौ निज-ग-अाधो चीर ॥ ३० ॥ बैंचि प्रिय, प्रियप्तहूँ भयौ डोम-गृह-दास । सत्यसंध हरिचंद । तूं सहज सुसत्यप्रकास ॥३१॥ । - को और क्या चाहिए । आनन्द से मास खाने लगे। थोड़ी देर बाद महाराज होश आये । आँख खोलते ही स्वामि भक्त सयमराय की यह लीला देखी । पर, वहाँ सामन मरण प्राय हो गया था। महाराज उसकी स्वामि भक्ति देख कर गद्गद हो गये । किमी तरह उठकर गीधों को भगाने गये, पर सामत तो स्वर्ग को सिधार चुका था । महाराज पृथ्वीराज । रोहिताश्व । चि देह दारा सुवन , होय दासह मन्द । रखिहै निज पच सत्य करि अभिमानी हरिचन्द ॥ -भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ।

६ [चीर-सतसई जौ न जन्म हरिचन्द को होतो या जग माह । जुग-जुग रहति असत्य की अमिट अँधेरी छाँह ॥३२॥ इत गाँधी', उत सत्य दोउ मिले परस्पर चाहि । यह छाँड़तु नहिं ताहि, त्यौं वह छाँडतु नहिं याहि ॥३३॥ धनि, तेरी तप-धीरता, धनि, गुण-गण-गंभीर । या कलि में गाँधी । तुही इक सत्याग्रह-बीर ॥३४॥ नहिँ बिचल्यौ सतपंथ तें सहि असह्य दुख-द्वंद । कलि में गाँधी-रूप है प्रगट्यौ पुनि हरिचंद ॥३५॥ धन्य धर्म-वीर ओरछो, जहँ भयौ धर्म-बीर हरदौला । दिये प्राण सत-धर्म पै पालि बीर-व्रत नौल ॥३६॥ * "वर्तमान काल में एकमाल गाधी ही ईश्वर के सामने सत्य के प्रतिनिधि है।" -काउण्ट ल्यू टाल्सटॉय। "गाधीजी के सामने जाने पर मनुष्य यही समझता है कि मैं किसी बड़े महान नैतिक देवता के सामने खडा हूँ, जिसकी आत्मा एक शान्त और स्वच्छ झील के समान है, जिस में सत्य का स्पष्ट प्रतिबिम्न दिखाई पडता है।" -एच० एस० एल० पोलक । "निस्सदेह गाधीजी उन्हीं तत्वो से बने हैं, जिन नत्वो से बडे-बड़े बहादुर और शहीद बनते हैं । बल्कि इससे भी बढ़ कर एक और गुण उनमे यह है कि वे अपने विलक्षण आस्मिक अथवा सत्य-अल में अपने आस पास के साधारण मनुष्यों को भी बहादुर और शहीद बना देते हैं।" -गोपाल कृष्ण गोखले। | बुन्देलखंड में ओडछा एक प्राचीन राज्य है । परमप्रतापी बुन्देलों का सबसे बडा ओर प्रतिष्ठित राज्य यही है । महाराज मधुकर शाह के पुत्र ओडयाधीश जुझारसिहजी प्राय दिल्ली में रहा करते - पहला शतक] धर्मवीर हरदौलजू । अजहुँ तुम्हारे गीत । ह्याँ घर-घर तिय गावती समुझि सनातन रीत ॥३७॥ हँसत-हँसत निज धर्म पै दियौ जु सीसु चढाय । धर्म-समर में मरि भयो अमर हकीकतराय ॥३८॥ दयानद । श्रारज-पथिक । यति-वर श्रद्धानदी । जगिहै तुह्मरे रुधिर ते जुग-जुग धर्म अमद ॥३६ ॥ - थे । राज्य प्रबन्ध का भार, महाराज की अनुपस्थिति मे, उनके भाई कुमार हरदाल के सिर पर रहता था। गज्य के अधिकारी न्यायशील कुमार पर जला करते और उनके हाथ से राज्य प्रबन्ध छीनने की ताक में रहते । राजकुमार पर राजमहिपी का पुसवत् वात्सल्य स्नेह गा । कुमार भी उन्हें मातृवत् मानत थे। देवर-भौजाई का यह पवित सम्बन्ध दुष्ट ईर्ष्यालु कर्मचारियो से न देखा गया। पड़यल रच कर उन्होने महाराज को लिखा कि कुमार आर महारानी के बीच में अश्लील सम्बन्ध है। राजा के शरीर में आग लग गई । अपनी पत्नी के सतीत्व म उन्ह सन्देह हो गया । एक दिन गनी से, महल में जाकर, बोले कि यदि तुम दोनो मे विशुद्ध प्रेम हे तो अपने हाथ से हरदाल को विष दे दो। राज महिपी ने प्राणान्त पीड़ा का अनुभव करते हुए भी धर्मरक्षणार्थ पति-देवता की बात मान ली । कुमार को निमन्तण दिया गया । भोजाई अपने पुतवत् देवर को डबडाती आँखो से निहारती हुई परोसने लगी। पहले नो छिपाया, पर कुमार के बहुत आमह करने पर रानी को सारा रहस्य बोलना ही पड़ा । हरदाल ने हँसकर कहा कि, माता ! आप क्यो दुख करती है ? यदि मेरी हत्या से पितृ-तुष्य पूज्य भ्राता का सन्देह दूर होता है, आपके सतीत्व की परीक्षा और मेरे धर्म की रक्षा होती है तो मेरा मरण धन्य है। यह कहकर रानी के हाथ से विप मिश्रित दूध छीन कर धर्म चीर हरदोर हँसते-हँसते पी गये, और श्रीरामचन्द्रजी के मदिर के सामने एक चौकी पर बैठ कर ध्यान करते हुए उन्होने म्वर्गारोहण किया। कहते हैं, उनकी थारी का जहर मिला हुआ भोजन पा कर उनके कई नोकर, घोड़े ओर हाथी भी उन्हीं के साथ स्वर्गस्थ हुए । हरदोल इस धर्म-बलि के पश्चात् बहुत प्रसिद्ध हुए। समस्त बुन्देलखड में उनके नाम के चोतरे अद्यापि बने हुए है। आज भी प्रत्येक मागलिक अवसर पर चिन्न निवारणार्थ पहले 'हरदौल सला' के ही गीत गाये जाते हैं। आर्य मुसाफिर पडित लेखराम, जिन्हे एक कठोर हृदय मुसलमान ने छुरी घुसेड़ कर मार डाला था। धर्मवीर स्वामी श्रद्धानन्द, जिन्हें हाल ही में दिल्ली के एक धर्मोन्मत अदुर्रसीद नामक [वीरसतसई विरह-वीर तजि सरबसु रस-वसु कियौ गीता-गुरु गोपाल । भाव-भौन-धुज धन्य चै बिरह-बीर व्रज-बाल ॥ ४० ॥ साध्यौ सहज सुप्रेम-व्रत चढ़ि खाँड़े की धार । बिरह-बीर व्रज-बाल ही रसिक-मेंड़-रखवार ॥४१॥ धन्य, बीर व्रज-गोपिका, तजी न रसकी मेंड़ । हेत-खेत ते अंतलौ दियौ न पाछे पेंड ॥ ४२ ॥ दान-वीर किधौ उच्च हिम-शृङ्ग-बर, किधौ जलधि गंभीर । किधौ अटल ध्रुव-धाम, कै दान-बीर मति-धीर ।। ४३ ।। सुरतरु लै कीजै कहा, अरु चिन्तामणि-ढेरु । । इक दधीचि की अस्थि पै वारिय कोटि सुमेरु ॥४४॥ व्यक्ति ने पिस्तौल चला कर मारा है। * साहित्यिको ने इस नाम का वीरो में कोई विभाग नहीं किया है। पर वीररस का स्थायी भाव 'उत्साह' विशुद्ध विरह में, अच्छी माता में, पाया जाता है। इसी से हमने अद्वितीय विरहिणी प्रजागनाओ को 'विरह-वीर' नाम के नये वीर-विभाग में स्थान देने की धृष्टता की है। गोपिन की सरि कोऊ नाहीं। जिन तृन सम कुल-लाज-निगड सर तोन्यो हरिसस माही ॥ जिन निजस कीने नदनदन विहीं दै गलबाहीं। मर सतन के मीस रही उन चरन-छस की छाहीं॥ -~भारतेन्दु हरिश्चन्द्र। --- पहला शतक] चिंतामनि सौ लख कहा, कोटिन कनक-पहाड । त्रिभुवन माहिँ सराहियै ऋपि दधीचि कौ हाड ॥४५॥ और कादर शूर सदय, विवेकी, सत्यव्रत, सुहृद लेखियतु सूर । अविवेकी, क्रोधी, कुटिल, कादर कहियतु क्रूर ॥ ४६ ।। कूकरु उदरु खलायकै, घर-घर चाटतु चून । रँगै रहत सद खून सों नित नाहर-नाखून ।। ४७ ।। सूर-चाह-अनचाहहूँ देखिय अगम अथाह । कहा कूर-कादरनु की चाह और अनचाह ॥४८॥ करि कादर सों मित्रता कहा लाभ है, मीत । सत्ताहु रण-सूर-प्रति मंगल-मूर्ति पुनीत ॥ १६ ॥ कहतु कौन कायर तुम्है, बल-सायर । रण माहि। भभरि भाजिबो पीठि दै सब के बस को नाहिँ॥५०॥ मति मन-मानिक सौंपियौ, कुटिल-कादरनु हाथ । हैं वै ही सतजौहरी, नहिँ जिन धर पै माथ ।। ५१ ।। कादर वीरनु सग मिलि, भले अलापहिं राग । छिपत न अत बसत में, कैसेहुँ कोयल काग ॥ ५२ ।। २ १० [वीर-सतसई वृथा उभय-निरधार में बिनत-उधेरत बेद । खुलि जैहै वा दिन सबै, नकल-असल कौ भेद ॥ ५३ ।। युद्ध वीर केसरिया बागो पहिरि, कर कंकण, उर माल । रण-दूलह । बरि लाइयौ दुलहिन बिजय-सुबाल ॥५४॥ औघट घाट कृपाण कौ, समर-धार बिनु पार । सनमुख जे उतरे, तरे, परे बिमुख मझधार* ॥५५॥ J पैरि पार असि-धार कै, नाखि युद्ध-नद-भीर । भेदि भानु-मंडलहिँ अब, चल्यौ कहाँ रण-धीर? ॥ ५६ ॥ डीठि-विमुख ह ढीठ वै गिनत न ईठ-अनीठ । घालत दै-दै पीठि सर, तानि-तानि सर-पीठ ॥५७॥ धनि धनि, सो सुकृती व्रती, सूर-सूर, सतसंध । खड्ग खोलि खुलि खेत पै खेलतु जासु कबंध ॥५८ ॥ प्रतिपालक निज पैज के, खल-पालक रिपु-जैत । बल-बाँके बानैतहीं होत बिसद बिरुदैत ॥५६॥ लरतु काल सों लाख में कोइ माइ को लाल । कहु, केते करबाल को करत कंठ-कलमाल ॥ ६० ॥ *तसीनाद, कवित्त-रस , सरस राग, रति-रंग । अनपूड़े बड़े तिरे, जे धूड़े सब अग ॥ --विहारी .

पहला शतक]
।
कहाँ सूर समरत्थ, जो समर-दानु बढ़ि लेतु ।
कौन काल-करबालकों किलकि कलेऊ देतु ॥६१॥
धन्य, भीम । रण-धीर तूं, धरि अरि-छाती पाव ।
भरि जुरिनि शोणितु पियौ, इन मूंछनि दै ताव ॥६२ ॥
धन्य, कर्ण । रिपु-रक्त सों दियौ पूरि रण-कुण्ड ।
करि कदुक अति चाव सों, उछरि उछारे मुण्ड ॥६३ ॥
सहज बजावनु गाल त्यौं, सहज फुलावनु गाल ।
काल-गाल में अरि-ढलै कठिन गेरिबो हाल ॥६४॥
प्राण हथेरी पर धरें, किये ओज-मद-पान ।
तबर तीर तरबार लै चले जुझिबे ज्वान ॥६५॥
रण-सुभट्ट वै भुट्ट-लौ गहि असि कट्टत मुण्ड ।
उठि कबध जुट्टत कहूँ , कहुँ लुट्टत रिपु-रुण्ड ॥६६॥
शूर-सुपूत
सीस हथेरी पर धरें, ठोकत भुज मजबूत ।
छिति, छवानी-गर्भ तें, जनमतु सूर सुपूत ॥६॥
कादर भये न सूर-सुत, करि देख्यौ निरधार ।
। नहिँ सिंहिनि के गर्भ तें, उपजे कबहुँ सियार ॥६॥

૨૨
[धीर-सतसई
सूर-सुतहिँ जग जन्म-सँग, सहज जंग-जागीर ।
समर-मरण मंसब मिल्यौ, अरु खिताब रण-धीर ॥६६॥
क्षनिय-निरूपण
'छत्रिय छलिय' कहे तें, छत्रिय होय न कोय ।
सीसु चढाथै खड्ग पै, छत्रिय सोई होय ॥ ७० ॥
लावै बाजी प्राण की, चढ़ि कृपाण की धार ।
सोई छत्रिय-धर्म की मेंड रखावनहार ॥१॥
जोरि नाम सँग 'सिंह' पदु, कियौ सिंह बदनाम ।
है है क्योंकरि सिंह यौं, करि शृगाल के काम ॥७२॥
मंगल प्रयाण
पारथ-सारथि कौ हिये रही खचित वह ध्यान ।
हँसत-हसत बस बीर-लौ करियौ, प्रान । प्रयान ॥ ७३ ॥
वहदिनु,वह छिनु, वह घरी पुनिपुनि श्रावति नाहिँ।
हिलुरि-हिलुरि जब हंस ए समर माहिँ अवगाहिँ ॥ ७४ ।।
दुवन-दर्प दरि, बिदरि अरि, राखि टेक-अभिमान।
निकसत हँसि घमसान में बडभागिनु के प्रान ॥ ७५ ॥
लोहित-लथपथ देखिकैं, खड-खंड तन-बान ।
निकसत हुलसत युद्ध में बडभागिनु के प्रान ॥७६ ॥

पहला शतक] | कादर तौ जीवित मरत दिन में बार हजार । प्रान-पखेरू बीर के उडत एकहीं बार ॥ ७७ ।। श्वान-मीच मरिहै कहूँ, धिक, रण-कादर नीच ।। पुण्य-प्रतापन पाइयतु शुद्ध युद्ध-थल-मीच ॥ ७८॥ पवित्र तीर्थ अरे, फिरत कत, बावरे । भटकत तीरथ भूरि । अजौं न धारत सीस पै सहज सूर-पग-धूरि ॥ ७ ॥ बसत सदा ता भूमि पै तीरथ लाख-करोर । लरत-मरत जहँ बाँकुरे बिरुझि बीर वरजोर ॥२०॥ जगी जोति जहँ. जूझ की, खगी खड्ग खुलि झूमि । रँगी रुधिर सों चूरि, सो धन्य धन्य रण-भूमि ॥ ८१॥ तहँ पुष्कर, तहँ सुरसरी, तहँ तीरथ, तप, याग । उठ्यौ सुबीर-कबंध जहँ, तहँई पुण्य प्रयाग ॥८२॥ सगर-सौहैं मूर जहँ, भये भिरत चकचूरि । बडभागन तें मिलति वा रण-आँगन की वृरि ॥८॥ कै कृपाण की धार, कै अनल-कुंड को ठाट। एही वीर-बधून के, है अन्हान के घाट ॥ ८४ ॥ अनल-कुंड, असि-धार, कै रकत-ग्यौ रण-खेत । त्रय तीरथ तारण-तरण, छिति, छत्रिय-त्रिय हेत ॥५॥ .

१४ [वीर-सतसई रण-बेला सतपर्व-सी अभिमत-फल-दातार । सहस जान्हवी-धार-लौं सुभट हेतु असि-धार ॥८६॥ सुभट-सीस-सोनित-सनी समर-भूमि । धनि-धन्य । नहिँ तो सम तारण-तरण त्रिभुवन तीरथ अन्य ॥८॥ नमो-नमो कुरु-खेत । तुव महिमा अकथ अनूप । कण-कण तेरो लेखियतु सहस-तीर्थ-प्रतिरूप ॥८॥ । शीर्ष-दान जे जन लोभी सीस के, ते अधीन दिन-दीन । सीसु चढ़ाये बिनु भयौ, कहौ, कौन स्वाधीन ?॥८६॥ एक ओर स्वाधीनता, सीसु दूसरी ओर । जो दो में भावै तुम्हें, भरि सो लेहु अकोर ॥ ६ ॥ काटिन जतन करौ चहै, रचि-पचि लाख बरीस । मिली न कहुँ खाधीनता, बिनु सौंपें निज सीस ॥ ६१ ।। चाहौ जो स्वाधीनता, सुनौ मन्त्र मन लाय । बलि-बेदी पै निज करनि, निज सिरु देहु चढ़ाय ॥ १२ ॥ दियौ दानु जिन सीस को, बहुत न ते व्रत-बीर । मुहुँ लगाय केते, कहौ, पियत सिहिनी-छीर ? ||६३ ।।

पहला शतक]
कोटिनु मधि कोऊ कहूँ कुल-दीपक इक होतु ।
नेह-सहित निज सीसु दै दस दिसि करतु उदोतु ॥६४।।
सौंप्यौ स्वामिहिँ कोउजन,कोउधन,हय,गय,ठौरु।
पै वह सहज सौंपि सिरु, भयौ सबनु सिरमौरु ॥१५॥
देत अजा-बलि देव को अधम अधर्मी श्राज ।
धन्य धन्य,जिन सीस निज, दियौ ईस-बलि-काज ॥६६॥
॥
वीर-किसान
लै असि-हलु जोती मही, बोयौ सीस-सुधान ।
करि सुचिखेतीजसुलुन्यौ,धनिरजपूत-किसान ॥१७॥
बोय सीसु सींच्यौ सदा हृदय-रक्त रण-खेत ।
बीर-कृषक कीरति लही, करी मही जस-सेत ॥१८॥
वीर वैश्य
धन्य वैश्य-वर वीर, जे मेलि रुड रण-कुड ।
खड्ग-तुला
पै मत्त है रखि तोले खल-मुड ।। ६६ ।।
धन्य वनिक, जो लै तुला, बैट्यो समर-बजार । ।
अरि-मुंडनु को धर्मसे कियौ बनिज न्यौपार ॥१०॥

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दूसरा शतक विजयराघव-ध्यान मौलि-जटा,धनु-बान कर, मुख प्रसेदु, ग श्रान्त । बसौ बिजयराघव हिये, किये रूप रण-क्रान्त ॥१॥ कलित कध धनु, तून कटि, कर सर, सरजू-तीर । सँग सखानु बानिक यहै, बसौ गनि रघुबीर ॥ २ ॥ *सिर जटा मुकुट प्रसून बिच विच अति मनोहर राजहीं । जनु नीलगिरि पर सड़ित पटल समेत उहुगन भ्राजहीं । भुजदर सर कोदए फेरत रुधिर-कन तन अति बने । जा रायमुनी नमाल पर बैठी विपुए सुस आपने ॥ निम्नलिखित दोहे के साँचे में- सीम मुकुट, कटि काछनी , कर मुरली, उर मार । या बानिक मो मन यसा, मदा बिहारीगर ॥ यह ध्यान तो गोसाई जी से ही अकित करते यना है- बिहरत अवध श्रीथिन राम । मग अनुज अनेक सिसु, नवनीर नीरद स्याम ॥ तरन अरन-सरोज पद अनी कनकमय पद-सान। पीतपट कटि तूनयर, कर ललित रघु धनु-यान ।। लोचननि को एहत फर उघि निरसि पुर-नर-नारि। घमत सुलमीदास उर अवधेम के मुत चारि ॥

१८ [वीर-सतसई जटा-मुकुट सिर, चाप कर, कलित कलेवर स्याम । दसमुख-करि-केहरि रमौ सुगनि राम अभिराम ॥ ३ ॥ रहौ पूरि श्रवननि सदा, त्रिजग-प्रकंपनहार । बंक-लंक-धर-शंक-कर युगल-धनुप-टंकार ॥ ४ ॥ कवि कर्तव्य लै बल-बिक्रम-बीन, कवि ! किन छेड़त वह तान । उठे डोलि जेहि सुनतहीं धरा,मेरु, ससि, भान॥ ५ ॥ लै निज तंत्री छेडिदै, कवि । वह राग अभंग । उठै धरा ते श्रोज की नभ लगि तुंग तरंग ॥ ६ ॥ . *कवि ।। क्या न बीर रसु गावै ? उथल-पुथल करि अखिल लोक में व्यापक गान सुनावै ? जो या मद-विभोर बानी बल विक्रम-सर अन्हवावै । तो तूं अनायासही कोटिन तीरथ को फल पावै ।। कब से या कल कुसुम कुञ्ज मे रमि रमनी-छवि ध्यावै ? ककण किंकिणि झनक सुनत जह, तह प्रमत्त ह्र धावै अजहूँ किन गम्भीर नादु के शक्ति-मूर्ति प्रगटावै ? किन नख-सिख-कुच कटि-वर्नन की कारिख धोय मिटा' सुचि पदावलि मलिन मसी सो काहे, निरज ' नसावै । ओज-जान्हवी-जल ते ताकौ किन अंगरागु करावे? रोक-प्रकपन शब्द-शक्ति सो जो पं जगत जगावै । कवि । तनहीं या वसुधा पे, साँचो सुकवि कहावै ॥ [बीर वाणी दूसरा शतक] वीर कवि हिन्दू-कवि, हिन्दुवान-कवि, हिन्दी-कवि रसकन्द । सुकवि,महाकवि, सिद्धकवि,धन्यधन्य,कवि चन्द॥ ७ ॥ भयौ उदित हिन्दुवान-नभ चारुचन्द कविचन्द । रही बगरि चहुँ जोन्ह-सी रचना रुचिर अमन्द ॥ ८ || रचि रासो रस-रासि,अति उद्भट काव्य सुछन्द । पृथीराजचौहान-जसु अजर अमर किय चन्द ॥ ६ ॥ फिरदौसी' किन जाय दुरि देखतही कविचन्द । " जासु प्रभा लखि परि गयौ कवि होमर' हूँ मन्ट ॥१०॥ अब नख-सिख-सिगार के पढत कवित कमनीय । श्राजु लाल भूषण-सरिस रहे न कवि जातीय ॥११॥ सिवा-सुजस-सरसिज सुरस-मधुकर मत्त अनन्य । रस-भूपण-भूषण, सुकवि-भूषण, भूषण धन्य ॥१२॥ कविभूपण सों सरि, कही, करिहे को मति-अध । जासु पालकी में दियौ छत्रसालु निज कधः ।। १३ ॥ *पृथ्वीराज-नासो। फारसी के सुप्रसिद्ध महाकाय 'शाहनामा' का रचयिता। जगविख्यात 'इलियट' महाकाव्य का प्रणेता । $ एकबार विभूपण शिवाजी के पास माहूजी के यहाँ भलीभाँति सम्मानित हो पन्ना-नरेश छससाल के यहाँ आये । वहाँ भी कवि का यथेष्ट साकार किया गया । कवि की विदाई करते समय महाराज ने उनकी पालकी का सुडा खुद अपने कंधे पर रख लिया । भूपण यह देश गद्गद हो गये। पालकी से कूद कर कहने लगे, यम, महाराज २० [वीर-सतसई रिपुगण सुनि भूषण-कवितु क्यों न होयँ सर-विद्ध । जाकी रसना पै सदा रहति चंडिका सिद्ध ॥१४॥ किधौं इन्द्र कौ बज्र, कै प्रलय-कृसानु अमन्द । किधौं रुद्र-रण-चंड-चखु कविभूषण कौ छन्द ॥१५॥ कविभूषण सिवराज की जिमि थी गुन-माल । तिमिचंपत-सुतकौ चरितु कियचित्रित कविलाल'।।१६ ॥ हेलाहीं कटवाय रिपु, रण-बेला है ढाल । रह्यो बुन्देला बीर सँग अलबेला कविलाल ॥१७॥ नितप्रति छत्र-प्रकाश तें सुकविलाल-कृत छन्द। पढ़ियौ चंपत बंसधर । तुम्हें खडग-सौगन्द ॥ १८ ॥ , राजत असड तेज, छाजत सुजसु, बडो, गाजत गयट दिग्गजन हिय-साल को। जाहि के प्रताप सो मलीन आफताप होत , ताप तजि दुज्जन करत बहु ख्याल को । साज सजि गज तुरी पैदर कतार दीने , भूपन भनत, ऐसो दीन प्रतिपाल को । और राव राजा एक मन म न ल्याऊँ अब साहू को सराही के सराहाँ छलसाल को। (छससाल दशक) * कविवर गोरेलाल । यह एक साथ ही महाराज का रसोइया, सामत और कवि था। +महाराज छससाल। + कविवर गोरेलाल का रचा हुआ एक सुन्दर वीररसात्मक काव्य । खेद है कि यह फाव्य अपूर्णही प्राप्त हुआ है। इसे काशी-नागरी प्रचारिणी सभा ने मशोधित करा के प्रकाशित किया है। हिन्दी साहित्य में वीररस का ऐमा उत्तम ऐतिहासिक कान्य कदाचित् ही कोई ओर हो । S महाराज छससाल के पिता चपतराय। - । दूसरा शतक] । का ब्रज-जाटनु की रण-कथा गाय सुजान-चरित्र । भूषण-लौ, सूदन । तुहूँ रसना कीन पवित्र ॥ १६ ॥ कादरता-सूदन अहैं, कविसूदन । तुव छन्द । फरकत भट-भुजदड, सुनि धरकत कादर मन्द ॥२०॥ . केसरी एकछत्र बन कौ अधिप पचाननहीं एक । गज-शोणित सों आपुहीं कियौ राज-अभिषेक ॥ २१ ॥ काँपतु कोपित केहरी मुहुँ बायें बिकराल । रहे धंधकि अंगार कै प्रलयकाल के लाल ॥ २२ ॥ छिन्न-भिन्न है उडति क्या मद-भौरनु की भीर ? दार्यो कुम करीन्द्र को कहूँ केहरी बीर ॥ २३ ॥ दति-कुभ-शोणित-सनी लसति सिह-दृढ़-डाढ़ । मनु मगल ससि-अग को दिय प्रालिगनु गाढ ॥ २४ ॥ अहे मधुप गज-गड-मदु पीजी सोचि-विचारि । छिनमेंहीं या कुभ को दैहै सिंह विदारि ॥२५॥ भरतपुर राज्य के पीर जाटी मे अभिप्राय ह। सुकवि-सूदन-चित एफ मुन्दर युद्ध-काव्य । इस म भरतपुर के सुप्रसिद्ध पीर-या महाराज सूरजमल, उपनाम सुजानसिंह, की युद्धगाथा ओजम्बी पद्यों म चिसित की गयी है।

२२
[वीर-सतसई
बारबार अंगराय क्यों सिंह जंभाई लेत ?
मद-माते गज-यूथ को पुनि-पुनि करतु सचेत ॥ २६ ॥
भाजि भाजि, गजराय । अब, बारि-बिहार बिहाय ।
गरभ गिराय मृगीन के, गयौ प्राय बनराय ॥२७॥
कमल-केलि करिनीन सँग, करत कहा, करिराज ।
गिरितें गाजत गाज-लौं रह्यौ उतरि मृगराज ॥ २८ ॥
झपटि सिंह गज-कुंभ ज्यौं दपटि बिदार्यो धाय।
रकत-रँगी मुकता-कनी रहीं सुकेसर छाय ॥ २६ ।।
पराधीन सबु देखियतु, बल-बीरज ते हीन ।
या कानन में, केसरी | इक तूही स्वाधीन ॥ ३० ॥
नहिँ पावसु, नहिँ धन-घटा, भई कितै यह घोर ?
करतु मत्त मृगराजु कहुँ, बिसें बीस बन रोर ॥ ३१॥
यौ मति कीजौ रोर अब, घन । केहरि-लौं अाय ।
या गयन्दिनी कौ अरे । गरभु न कहुँ गिरि जाय ॥ ३२ ॥
वीरता और कामान्धता
जहँ नृत्यति नित चंडिका तांडव-नृत्य प्रचंड ।
सुमन-बान तहँ काम के होत आपु सतखंड ॥ ३३ ॥
अट्टहास करि कालिका जित क्रीडति बिनुसक ।
कुसुम-बान किमि बेधिहे तित कुसुमायुध रक ॥ ३४ ॥

दुसरा शतक] जा तनु-बारिधि में सदा खेलति अतनु-तरग । उमगेगी क्योंकरि, कहौ, ता मधि युद्ध-उमग ॥३५॥ वीर-बाहु खल-खंडन, मडन-सुजन, अरि-बिहंड, बरिखंड । सोहत सिंधुर-सुंड-से सुभट-चंड-भुजदंड ॥ ३६ ।। ॥ कटि-कटि जे रण में गिरे, करि कृपाण व्रत-ताण। क्यों न हुलसिकै बारिये तिन भुजानु पै प्राण ॥ ३७॥ बडे-बडे बरबाहु के नहिँ केते बरिबड । दुवन-दर्प पै दलत जे, ते औरै भुज-उड' ॥३८॥ बीर-नेत्र होति लाख में एक कहुँ अनल-बर्न वह आँख । देखतहीं दहि करति जो दुवन दीह-दलु राख ॥ ३ नयन कंज, खंजन, मधुप, मद, मृग, मीन समान । लोहितु और अंगारु पै ? अनुपम उपमान ॥ ४० ॥ सुभट-नयन अगारु, अचरजु एकु लखातु । ज्यौं-ज्यौं परतु उमाह-जलु, त्यौं-त्यौं धधकत जातु ॥४१॥ पै निम्नलिखित दोहे के माँचे म- अनियारे, दीरघ गनु किती न तरनि समान । वह चितवनि आर क्लू, जिहि बस होत सुजान ॥ -विहारी

२४
[वीर-सतह
जाव फूटि रति-रंग-रली, अलसौहीं वह आँख ।
सहज प्रोज-ज्वाला-ज्वलित चिरजीवौ जुगलाख ॥४२॥
सुरत-रंग कहँ दृगनि में, कहँ रण-प्रोज-उदोतु ।
याते उज्ज्वल होतु मुखु, वातें कजल होतु ॥ ४३ ॥
युद्ध-रत्त-दृग-रक्त की कहा रक्त-सँग लाग ।
लागतु यातें दाग, वह मेटतु हियको दाग ॥४४॥
सहज सूर-नैननि लख्यौ सील-भोज-संचार |
एकैरस निबसत तहाँ पानिप और अँगार ॥ ४५ ॥
जदपि रुद्धबल-तेज को कियौ न प्रगटि प्रकासु ।
दिपतु तऊ अँखियानि है अंतर-ओज-उजासु ॥ ४६ ॥
॥
परयौ समुझि नहिँ अाजु लौ या अचरज कौ हेतु ।
फरयौ असित असि-लता तें सुजस-चारु-फलु सेतु ।। ४७ ।।
जदपि इतो पानिप चढ्यौ, अचरजु तदपि महान ।
नितप्रति प्यासीही रही, लही न तृप्ति कृपान ॥४८॥
बसति आपु लघु म्यान में वह कृपान लघुगात ।
त्रिभुवनमें न समातु पै सुजसु तासु अवदात ।। ४६ ॥ ॥

दूसरा शतक] ? प्रलय-कारिनी तुव, छता । लपलपाति तरवार । खात-खात खल-सीस जो लई न अजहुँ डकार ॥ ५० ॥ बसै जहाँ करबाल । तूं, रमै तहाँ किमि बाल ? एकसग निबसति कहूँ ज्वाल मालती-माल ॥५१॥ धारि सील, असि-बालिके । अब भई सयानि । अरी हठीली । कित तजी वह इठलाहट-बानि ॥ ५२ ॥ तडित और तरवार में समता किमि ठहराय । ज्यौंही यह चमकति दमकि, त्यौहीं वह दुरि जाय ॥ ५३ ॥ लहरति, चमकति चाव सां तुव तरवार अनूप । धाय डसति,चौधतिचखनु,नागिनिदामिनिरूप ॥ ५४॥ वह नाँगी तरवारहू बनी लजीली नारि । नहिँ खोल्यौ मुख म्यान तें, है मनु परदावारि ॥ ५५ ॥ करति मरम-तर वार जो, सोइ प्रखर तरवार । जानति कबहुँ कृपा न करि, कहिय कृपान करार ॥५६॥ सुभट लाल ! असि-दूतिका ठाढी सहज-सयानि । मानिनि बसुधा-बाल कौ यही गहावति पानि ।। ५७ ॥ रमति अत नहिँ कत तजि, कुल कामिनि तरवारि कहूँ दुहागिन होति है सती सुहागिन नारि ॥ ५८ ।। . - बुन्देलखड-केसरी महाराज छवसाल । ४ [वीर-सतसई 2 रण-नायक-भामिनि तुहीं, कुल-कामिनि करबाल । अंतहुँ प्रीतम-कंठ तू भई लपटि रति-माल ॥ ५६ ॥ सोभित नील असीन पै रुधिर-बिन्दु-कृत जाल । लसे तमाल-लतान पै मनहुँ बधूटी-माल ॥६० ॥ ॥ धनुष-वाण देखतहीं वह कुटिल धनु कुटिल सरल है जात । त्यौं अरि अथिर थिरात, ज्यौं विषम बान लहरात ॥ ६१ ॥ बिसिख-भुजगतुव फुङ्करत,उड़ि नभ-लगि मँडरात। अरि-अपजसु, तेरो सुजसु सँग लपेटि लै जात ॥६२ ॥ छूटतहीं परचंड सर, मारतंड-लौं धाय । भौननि प्रतिपच्छीनु के तिमिर देत चहुँ छाय ॥६३ ।। इत सर सारँग पै चढतु, चढ़ि रागतु रण-रागु । उत अरि-अंगना-अङ्ग ते उतरतु सहज सुहागु ॥ ६४ ॥ बचतुधनु-गुण कर्ण लगि, कर्ण पार्थ-हिय-साल । स्वर्ण-ज्वाल चिनतु, किधौं गुहतु दामिनी-माल ॥ ६५ ।। शिशु-वीरोक्तियाँ वह शकुन्तला-लाडिलो कवतें माँगतु रोय । "खग-खिलौना खेलिबे अबहिँ लाय दै मोय" ॥६६ ।।

दूसरा शतक] गो-घातक वा बाघ की, जननि । बैंचिहाँ पूँछ । तीखन डा तोरिहौं, अरु उखारिहौं मूंछ ॥६७ ॥ दै तौ, मैया । नेक मेलो' तील-कमान । चदै भूमि गिलाउँगो, मालि' अचूक निछान ॥ ६८ ॥ ॐ ऊँ, मैं तौ लैउँगो श्रोई तील-कमान । मालूगो म्लगलाज मैं, घालि अचूक निछान ॥ ६६ ।। मति दै चकली हूँ हमैं, मति दै गैंद, अजान । अम तो ओई लैयँगे लखन-लाम-धनु-बान ॥ ७० ॥ गहि पटुका बलराम को रह्यौ मचलि नँदलाल । "दाऊ । मोय मँगाय दै छोती-छी११ तलबाल१२" ॥ ७१॥ भावतु मैया । मोय नहिँ फीको चदन भाल । दै लगाय तूं बस वही नीको टीको लाल ॥ २ ॥ मीय-हरनु लखि स्वप्न में उठ्यौ कान्ह अतुराय । धनु मेरो, दाऊ । कितै, दै तौ नेक उठाय ॥७३॥ प्रेम और वीरत्य प्रेम-मरमु जानें कहा विषयी कायर क्रूर । इक साँचो रणसूरही पहिचानतु रसमूर ॥ ७ ॥ १ मेरो।२ तीर।३ गिराउँगो । ४ मारि । ५ निसान।६ मारुगो । मृगराज । ८ चकरी । १ हम । १० राम । ११ छोटी-सी। 10 तलवार ।

२८ [वीर-सना हित-जौहरु जानै कहा यह मनोज-मद-चूर ? परखि पारखीही सकै प्रेम-रत्न रण-सूर ।। ७५ ॥ और बनाये बनत, पै छै न बनत केहुँ बार । मरजीवा मरमी रसिक, अरु सिरु-सौंपनहार ।। ७६ ।। सब तो साँचे में ढरे, ढरे न ए द्वै ढार । प्रेम-मेंड-रखवार, औ सीसु चढ़ावनहार ।। ७७ ।। रे बिषयी । प्रेमी बनत, नैक न लागति लाज | केते कठिन-कपोत-व्रत पालनहारे आज* ? ॥७८ ॥ निर्विकार, निर्लेप, नित, निखिल-ब्रह्म-सुख-सारु । सोइ प्रेम विषयीनु को भयौ आजु खेलवारु ॥७६ ॥ जनि गनियौ खेलवारु यौं, कठिन प्रेम-असि-धार । चातक-मीन-कपोत-व्रत कहँ अब पालनहार ॥८० ॥ मथि-मथि अच्छर-निधि मरे, कढ्यो न कछुवै सार । इक प्रेमी, इक सूरमा भये उतरि भव-पार ॥ ८१॥ सेना-पति सत-सहसहूँ सकै जाहि नहिँ जीति । ताहि स्वबस करि लेति है सहज प्रीति की रीति ॥२॥ "है इत लाल कपोत-व्रत, कठिन प्रेम की चाल । मुख ते आह न भाखही, निज सुख करहि हलाल ॥ गिरि त -ऊँचे रमिक-मन बूड़े जहाँ हजारु । + ॥ -~-हरिश्चन्द्र । वह सदा पसु नरनु को प्रेम पयोधि पगारु॥ -विहारी।

दूसरा शतक]
और अस्त्र केहि काम के, प्रेम-प्रस जो साथ ।
प्रेम-रथी के हाथ है महारथिनु के माथ ॥ ८ ॥
कृष्ण-प्रेम-ग्स-भरित, कै पूरित समर-उछाह ।
सुर-सरिताहूते परम अश्रु प्रवाह ।।८४॥
पावन
.
मातृ-शिक्षा
क्यों न चढ़ावत सिर-चढ्यौ ललन। बान धनु तानि।
किन खेलत खिन खड्ग सों, जासु खिलौहीं बानि ॥८५ ॥
खडखड है जाव, पै धर्म न तजियौ एक ।
सपथ,लाल | या खड्ग की, रहियौ गहि कुल-टेक ॥८६॥
कह्यौ माय, मुख चूमिकै, कर गहाय करबाल ।
"जनि लजाइयौ दूध मो पयोधरनु को लाल ।” ॥८॥
चूर-चूर
है अतलौं रखियौ कुल की लाज ।
जननि-दूध-पितु-खड्ग की अहै परिच्छा अाज ॥८८ ॥
पाठ पढ़ावति मातु नित, लै उछग निज लाल ।
"ललन । बीर-व्रत धारियौ, धरि पछारियौ काल" ॥८६॥
लोटि-लोटि जापै भये धूरि-धूसरित, आज ।
वत्स । तुम्हारे हाथ है ता धरनी की लाज ॥ १० ॥

३० [ धीर सतसई लिखत मिटावत, लाल । क्यों चक्रव्यूह को चित्र ? कबहुँ अघावैही नहीं, सुनि अभिमन्यु-चरित्र । ॥ ६१ ॥ शूर-साधन होत सूर सरनाम करि चूर-चूर निज अङ्ग । पिसत-पिसत ज्यों सिला पे लावति मेंहदी रंग ॥ ४२ ॥ रण-यात्रा और ज्योतिष अब पता देखत कहा, सोधत सुदिनु, गवार । परे कूदि रण कुंड वे, रहे तोरि गढ़-द्वार ॥ ६३ ॥ मिलतु न पला में सुदिनु, भिरत न कादर मंद । नहिँ सोधत रण-बाँकुरे नखत, बार, तिथि, चंद ॥ ६४ || चलत कबहुँ दिन सोधि तुम, कबहूँ छींक बचाय । किन इन थोथे टोटकनु दई अनी बिचलाय ? ॥६५॥ सुदिनु ज्योतिषी तें कहा सोधवावत रण-हेत ? चढि पाये बै दुर्ग पै, तुम इत परे अचेत ॥ १६ ॥ न रसी॥ * ता हमचो हिना खुबह न गरदी तहे सग । हरगिज यकफे पाये निगारे अर्थात् , जस्तक मेहदी की तरह पत्थर के नीचे पिम न जाओ, हरगिज यार के पार के तलुए तक नहीं पहुँच सकते।

दूसरा शतक] ३ अप्रिय और प्रिय गावत गायक बीन लै बिरही राग बिहाग । नाहिँ अलापत, प्राजु क्यों मङ्गल मारू राग ॥१७॥ फ़कत पी पी बाँसुरी, रह्यौ न यामें म्वाद । है त्रिलोक में भरि गयौ सगर-सख-सुनाद || ६८ ॥ लावत रँगि रंगरेज । क्यों पगियाँ रंग-बिरग ? अब तौ, बस, भावतु वहै सुदर रग सुरग ।। ६६ || चिनाङ्कण जियत बाघ की पीठि पै धनु-धारीनु चढ़ाय । चितेरे । चित्र तूं उमॅगि उतारत आय ॥१००|| क्यों न, -

तीसरा शतक
?
शक्ति-स्तुति
शक्ति-शक्ति शिव-शक्तिजय,जगत-ज्योति,जगदम्ब ।
भारत-भारत-आति को क्यों न हरति अबिलम्ब ? ॥१॥
त्रिभुवनेश्वरी । लयनयनि । जय, विशूलिनी अम्ब ।
जन-लिताप-उपशमन में क्यों अब करति बिलम्ब ॥२॥
कर्षतु रवि-रथ-चक्र जो, नित नभ ताण्डव माह ।
रहौ, अम्ब । जन-सीस पै वही वाह की छाहँ ॥ ३ ॥
महिप-शूलिनी । शूलिनी । मौलि-मालिनी । त्राहि ।
जय जगदम्ब, कपालिनी । प्रणत-पालिनी, पाहि ॥ ४ ॥
प्रलय-हासु जब कालिका करति सुभाय स्वछन्द ।
प्रखर-ढत-दुति-दमक ते परतु सूर्यशत मन्द ॥ ५ ॥
या भारत-आरति हरौ सोइ शक्ति द्रुत धाय ।
जासु प्रलय-पगु परतही शवहू शिव है जाय ॥ ६ ॥
कब कौ ठाढ्यो पौरि पै, सुनति नाहिँ कछु, अम्ब !
कहौ, कहाँ तुब अक तजि सिमुहि श्रान अवलम्ब । ॥ ७ ॥

३४ [वीर-सतसई - . ॥ निबलनु को साँसत सबल तुव देखत' बसुयाम । कहा जानि, धारयौ जननि । 'महिष-मर्दिनी' नाम ॥ ८ ॥ कलपि-कलपि भूखन मरति तुव संतति अभिराम । कहा जानि, धारयौ जननि । 'अन्नपूरणा' नाम ? ॥ ६ ॥ अट्टहासु करि, धारि उर मौलि-माल अविलम्ब । आदिनटी शिव सँग नटी प्रलय-नाट्य जग-अम्ब ॥ १०॥ जेहि सर मधु-कैटभ हने, किये त्रिसिर खर खीस । खल । ताही तें काटिहौ भुजाबीस दससीस ॥ ११ ॥ सौमित्रि-प्रतिज्ञा जौ न घालि धननाद को यमपुर अाजु पठाउँ । कह्यौ कोपि सौमिति यो ध्याय राम-युग-पाद । "कै अब मेरो बानहीं, के तेंहीं, घननाद । ॥ १३ ॥ राघव-प्रतिज्ञा । "जो तेहि आजु बधे विनु आवउँ । ती रघुपति-संवक न कहावउँ । जो सत सर करहि सहाई । तदपि हतउँ रघुबीर दुहाई ।। [राम-चरित-मानस] तीसरा शतक] ३५ मारुति-प्रतिज्ञा उठि ठाढो हहै जबै सधनु सुमित्रा-नन्द । तबहिँ पसीना पोंछिहौं पथ-श्रम कौ, रघुचन्द । ॥ १४ ॥ जौलगि मूरि न लाउ मै मारुति तौलगि, तात* ।। करि सुधि मो सिसु-केलि की मुख न खोलियौ प्रात ॥ १५ ॥ भीष्म-प्रतिज्ञा रहिही अस्त्र गहाय हरि । रखि निज प्रण की लाज । कै अब भीषमहीं यहाँ, कै तुमहीं, यदुराज | ॥ १६ ॥ सरनि ढाँपि रवि-मडलहिँ, शोणित-सरित अन्हाय । तेरीही सौं तोहि हरि ! रहिही अस्त्र गहाय ॥ १७ ॥ तेरीही सौ, युह-मधि, तेरेही बल आज । हौ शान्तनु-सुत मेटिहौं प्रण तेरो, यदुराजा ॥ १८ ॥ पारथ-रथ-सारथी, उत भीषम रण-धीर। तिलहुँ नहिँ टारे टरें, दुहूँ बज्र-प्रण-वीर ॥ १६ ।। इत * सूर्य से तात्पर्य है। | आजु जौ हरिहि न शस्त्र गहाऊँ । तौलाजी गगा जननी कों, सान्तनु-सुत न कहाऊँ ॥ स्यदन खडि महारथ खडी, कपिधुज सहित दुलाऊँ। इती न करा सपथ मोहि हरि की, छसिय-गतिहिन पाऊँ। पाडव-दल सनमुख है धाऊँ, शोणित-सरित यहाऊँ । 'सूरदास' रणभूमि रिजय बिन जियत न पीठि दिसाऊँ ।

[वीर-सतसई मुख श्रम-सीकर, अरुण दृग, रण-रज-रंजित केश । फहतु पटु, गहि चक्र हरि धाये सुभट-सुवेश ॥ २० ॥ रज-रंजित कच, रुधिर-मिलि झलकत श्रमकण अंग । फहरतु पटु, गहि चक हरि धाये करि प्रण-भंग ॥ २१ ॥ भक्त-बछल पारथ-सखा, धन्य धन्य, यदुराज । राखी निज प्रण मेंटि जन शान्तनु-सुत की लाज ॥ २२ ॥ प्रण कीनों बहु बीर जग, टेकहुँ गही अनेक । पै भीषम-बत आजुलौं है भीषम-बत एक ॥ २३ ॥ समसरि कासों काजिय, मिल्यौ नाहि उपमान । भीषम-सो भीषम भयौ इक भीषम व्रतवान ॥ २४ ॥ अर्जुन-प्रतिज्ञा भानु-अस्तलौ आजु जौ बच्यौ जयद्रथ-जीव । चित्ता लाय तनु जारिहौ, तोरि-तारि गांडीव ॥ २५ ॥ लै न सक्यौ, हरि । आजु जौ अधम जयद्रथ-जीव । तो पारथ हो क्लीव अब नहिँ लैहौ गांडीव ।। २६ ॥ वा पटपीन की फहान । कर धरि चरु घरन की धावनि, नहिं विसरति यह धान ।। रय ते उतरि अवनि आतुर है, कवरज की रपटान। माना सिंह सैल से निकस्यौ, महामत गज जान ॥ जिन गुपाल मेरो मन राख्यो, मैटि घेद की कान ।

तीसरा शतक] ३७ कन्ह-प्रतिज्ञा 'तो रक्खों ढिल्लिय तखत, भुजन ठिल्ल कनवज ।” बज्ज-पैज असि कन्ह-लौ करनहार कन्ह-लौ करनहार को अज ? ॥ २७ ॥ बादल-प्रतिज्ञा जो न स्वामि निज उद्धरौं, बद्दल नाम लजाउँ । पिऊ न जल मेवाड कौ, जियत न [छ रखाउँ ॥ २८ ॥ इन बाहुन तें बैरि-दल जौ न ठेलि लै जाउँ जीवित मुख न दिखाउँ मैं, बद्दल नाम लजाउँ ॥ २६ ।। । . इन भुजन ठेलि जयचाँद-दल, सुव रक्सी दिल्लय तसत ॥ (पृथिवीराज रासो) 1 बादशाह अलाउद्दीन के कारागार से अपने पति महाराज भीममी (भीमसिह ) को मुक्त कराने के लिये जय महारानी पमिनी अपने चचेरे भाई यादए की सहायता लेने को उसके पाप गई, तन उसने जो वीर-प्रतिज्ञा की उसका वर्णन महाकरि मरिक मुहम्मद जायसी ने कमा फडकता हुआ किया है- उए अगस्त हस्ति जर गाजा । नीर घटे घर आइहि राजा ॥ परपा गये, अगस्त जो दीटिहि । परिहि पलानि तुरगम पोलिहि ।। धौ राहु, छोड़ावहु सूरू । रह न दुस कर मूल अरू ॥ अपनी माता से, युद्ध-यासा करने समय, बादर कहता है- मातु । न जानमि यारक आदी । ही यादला मिघ रनगदी। मुनि गज-जूह अधिक जिउ तपा। सिघ क जाति रहे किमि छपा ॥ तौलगि गाज, न गाज मिला । साँह मार माँ जुरी अकेगा। को मोहि साँस होइ ममता । पारी संद, उग्गरौं देता। तुरी म्यामि मकरे जप दारा । पेला जप, दुरजोधा भारा ।। भंगद फोपि पाय जम रामा ।टको कफ एतीयो साग । हतुर्वत सरिम जब पर जोरी नहीं ममुद, स्वामि यदि छोरी। [पदमा

३८
भेदि भानु-मंडलहि मैं मिलिहौ सुर-पुर माहि ॥ ३६ ॥
[वीर-सतसई
प्रताप-प्रतिज्ञा
मूंछ न तौलौं एठिहौं, हौं प्रताप भुज-हीन ।
करि पायौ जौलौं न मैं गढ़ चितौर स्वाधीन ॥ ३० ॥
महल नाहिँ पगु धारिहौं, रहिहौं कुटी छवाय ।
हौं प्रताप जालौ न ध्वज दई फेरि
फेरि फहराय ॥ ३१॥
वीर-प्रतिज्ञा
हौंहूँ सिंह-कुमार, जो वह खलु गज मदमंत ।
कुंभहिँ नखनु बिदारिहौ, अरु उखारिहौं दंत ॥ ३२ ॥
हौ? आजु अगस्त्य, जो वह अभिमान-समुद्र ।'
ताहि अंचैहौं अंजुरिनु, सहज सोखिहौं छुद्र ॥ ३३ ॥
जो वह खलु भूधर-शृङ्ग ।
दैहौं खेह मिलाय मैं, चूर-चूर करि अंग ॥ ३४ ॥
वीर-विदा
मिलियौ तहँ परखति, प्रिये । मिलिहौं सरबसु बारि ।
बिसिख-हारु हौ पौन्ह, तुम चाल-माल उर धारि ॥ ३५ ॥
रहियौ यौंही मेंटिवे, प्रिये । बढ़ाये बाहि ।
हौंहूँ मघवा-बज्र,
हौ तौ, पिय । प्रथमहि चली, भली भाँति रति लालि ।
आय भेटियौ मोहि उत, बेगि बीर-बत पालि ॥ ३७ ॥

तीसरा शतक]
३९
सजनी । पिउकों मेंटिलै भरि भुज अतिम बार ।
हित-बगिया ते पुहुप लै करि साजन-सिगार ॥ ३८ ॥
युद्ध-दर्शन
सुन्यौ प्रलय-धन-घोर-लौ जब सैनिक रण-सख ।
किलकि-किलकि कूदे समर, भरि उडान बिनु पख ।। ३६ ॥
धौल धौरहर ढाय महि, करि शिव बिधि को ख्याल ।
धूम-धौरहर नौल नभ सृजति तोप विकराल ॥ ४० ॥
चली चमाचम चोप सों चकचौधिनि तरवार ।
पटी लोथ पै लोथ, त्यौ बही रक्त-नद-धार ॥ ४१ ।।
नहि यह झरना गेरु को, नाहि शृङ्ग यह श्याम ।
असि-विदीर्ण-करि-कुभ तें स्रवतु शोण अविराम || ४२ ॥
कूदतु अरि-करि-कुभलगि, छुवतु व्यूह को छोरु ।
बरजोरी बरजेहुँ पै करतु तुरंगु मुहँजोरु ॥ ४३ ॥
तुरंग, तोप, तरवार तहँ निज-निज पूरत काजु ।
धूरि-धूम-लोहित-मयी सृजत सृष्टि नव ग्राजु ॥ ४४ ॥
भारत-पताका
जाहि देखि फहरत गगन गये काँपि जग-राज ।
सो भारत की जय-ध्वजा परी धरातल श्राज ॥ ४५ ॥

४० [वीरसतसई रवि-रथांग सों झगरि जो खेलति ही फहराय । वह भारत की जय-ध्वजा लुठित भूमितल हाय ॥ ४६ ॥ प्रकृत वीर प्रकृतबीर को अंतहूँ परतु मंद नहि तेज । नहि चाहतु चंदन-चिता भीष्म छाँडि सर-सेज ॥ ४७ ॥ औसर आवत प्रान पै खेलि जाय गहि टेक । लाखनु बीच सराहियै प्रकृतबीर सो एक ॥ ४८ ॥ सुमृदु सिरीष-प्रसून ते, कठिन बज्र तें होय । प्रकृत-बीर-बर-हीय कौ चित्र न खींच्यौ कोय ॥ ४६ ।। स्वदेश-परिचय रमा, भारती, कालिका करति कलोल असेस । बिलसति, बोधति, संहरति जहँ, सोई मम देस ॥ ५० ॥ राजस्थान मिली हमै थपिल्ली ठौर-ठौर चहुँपास । लेखिय राजस्थान में लाखनु ल्यूनीडास '।। ५१ ॥ - , "गजला में कोई छोटा सा भी राज्य ऐसा नहीं है, कि जिसमें धर्मापिली जैसी रण- भूमि न हो, और कदाचित् ही कोई ऐसा नगर मिले, जहाँ लियोनिदास-जसा धीरपुरुष पैतान मन् ४८० ई० से पूर्व फारम के बादशाह जर्कसीज ने यही भारी सेना लेकर यूनान पर चढ़ाई हुआ हो।" जेम्स टॉड।

तीसरा शतक] चित्तौर मनु मेरो चित्तौर पै लखि तेरो जस-थम । भ्रमतु, हँसतु, रोवतु अहो । सुभट-मौलि नृप कुभ । ॥ ५२ ।। तपत बात उर लाय, फिरि सेवहु धीर समीर । प्रथम जाहु चित्तौर-गढ, पुनि बिरमहु कसमीर ॥ ५३ ॥ जनि सुपूत बापा' सुभट, साँगा, साँगा, कुभ प्रताप । बीर-जननि चित्तौर । हूँ दल्यौ दुवन-ढल-दाप ॥ ५४ ।। . की। उस समय उस देश म अनेक छोटे-छोटे राज्य थे, जिन्होंने मिल कर अपने में से स्पार्टी के वीर राजा रियोनिहास को धर्मापिली की घाटी म ८००० सैनिको के साथ ईरानियो का सामना करने को भेजा। ईरानियोने कई बार उस घाटी को जीत लेने की चेष्टा की, पर हर बार उन्हें हार कर पीछे लौटना पड़ा । अत में, एक विश्वासघाती की मदद से शत्रु पीछे से पहाड पर चढ़ आये । अपनी फोज में से बहुत से लोगों का ईगनियो की तरफ मिर जाने का शक होने से लियोनिहास ने सिर्फ सैनिको को पाम रख मेना को निकाल बाहर कर दिया आर आप अपूर्व वीरता से रह कर वही माग गया । उसकी मेना में से, कहते हैं, सिर्फ एक ही मनुष्य जीवित बचा था। महाराणा कुम्भाने वि. स. १४९७ मे मालवे के सुल्तान महमूदशाह खिलनी को प्रथम वार परान्त पर उसकी यादगार में अपने इष्टदेव विष्णु के निमित्त यह कीर्ति स्तम बनवाया था। इसकी प्रतिष्टा वि०म० १५०५ माघ बदि १० को हुई थी। xxxxx यह भारतवर्ष म अपने ढग का एक ही स्तम है। वास्तव में, यह हिन्दुओं के पौराणिक देवताओं का एक अमुल्य कोश है। प्राचीन मूनि यो का ज्ञान संपादन करनेवालो के लिये यह एक अपूर्व साधन है। [राजपूताने का इतिहास-पहला खड, ३५५ ] +चित्तौर का एक महाप्रतापी गजा, जिसका राज्याभिषेक, भाटो की रयातो के अनुसार, सवत् १९१ में हुआ था । श्रीयुक्त पडित गौरीशकर हीराचदजी ओझा ने लिखा है कि यापा किसी राजा का नाम नहीं, कितु उपनाम था, ओर पीछे से तो ने यह भी भूल गये कि किस का उपनाम - . बापा था। महाराणा संग्रामसिंह। ६ महाराणा कुम्भकर्ण, जिन्ह राणा कुम्भा भी कहते हैं। द ४२ [वीर सतसं वह जौहर , रण-रङ्ग वह, वह जूझन जुरि जड्ग । अजहुँ चित्र चित्रत वहै गिरिअरावली-शृङ्ग ॥ ५५ ॥ दहलति ही दिल्ली दलित, सुनि चितौर । तुव धाक । क्यों न कहै फिरि तोहि हम आजु हिन्द की नाक ॥ ५६ ॥ लोहागढ त्यौं सिंहगढ़, बांधव, रणथंभौर । औरहुँ गढ़, सिरमौरु पै सब में गढ़ चित्तौर ॥ ५७ ॥ • एक प्रत, जिसमें युद्ध के समय राजपूत वीरागनाएँ सनीत्व-रक्षा के निमित्त प्रधनी मेवाड़ की एक सुप्रसिद्ध घाटी और युद्ध-स्थली, जहाँ पर महाराणा प्रतापसिंह आर मारवाड हुई भमि में अपने प्यारे गालन्यच्ची महित प्रवेश करती थीं । सौर्य-सरित-सिचित जहाँ जूझन-खेत हमेस । मारवाड.अस देस को कहत मूढ़ मरुदेस ॥ ५ ॥ हल्दीघाट अहो सुभट-सोनित-सन्यौ, दृढव्रत हल्दीघाट। अजहूँ हठी प्रताप की जोहत ठाढ़ी बाट ॥ ५६ ॥ साँचेहुँ, हल्दीघाट -। तुव छाती कुलिस-प्रचंड । बिछुरत बीरप्रताप के भई न जो सतखंड ॥ ६० ॥ . मादशाह अपयर की सेना म घोर युद्ध हुमा था।

तीसरा शतक] ४३ बाधवगढ याही बांधव-दुर्ग* बांधव-दुर्ग* पै बिरुझे बाघ बघेल । यहीं गर्जि रण-कालिका करी किलकि रण-कल ।। ६१ ।। भरतपुर-दुर्ग एइ भरतपुर-दुर्ग है, दुजय दीह भयकारि । जहँ जट्टन के छोहरे दिये सुभट्ट पछारि ॥ ६२ ॥ तुम ब्रज-जाटनु-दुर्ग कौ, कहु, को ढाहनहारु ? जासु यापु रखवारु भो श्रीब्रजराज-कुमार ॥ ६३ ॥ ~ बुन्देलखड इतहूँ तो रण-चडिका वैसोइ खेली खेल । राजथान ते घटि कहा हमरो खडबँदेल ॥ ६४ ॥ यह सुभूमि सोनित-सनी, यह पहार, यह धार । हम बुदेल-खंडीनु का यहँई स्वरग-बिहार ॥ ६५ ॥ लोटि-लोटि बज्रांग में जहँ चंदेल बुन्देल । जन्म-जन्म वा भूमि पै, प्रभु । खिलाइयौ खेल्न ॥ ६६ ॥ * रीवा राज्य का सुप्रग्यात 'याँधनगद' नाम का प्राचीन किएा । योमर म इसकी टकर का कोई भी किला नहीं है । इमी की यदालन यघेलो ने अपने प्रपल शमुभा के कई यात सह किये। यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है- भाठ फिरगी, ना गोरा । सदे जाट के दो छोरा ।।

४४ [धीर-सतसई देवि ओरछा-मौन ए विमल बेतवै-तीर । सुनि हरदौल-कथा अजौं मनु है जातु अधीर ॥ ६७ ॥ भूपति मधुकरसाह-से, वीरसिंह से वीर । जहँ बिहरे बिचरे, यहै वही बेतवा-तीर ॥ ६८॥ श्रोही तुंगारण्य यह, यह, वही बेतवागंग। वही ओरछा, ऐ कहाँ यहाँ श्राजु वह रंग ॥ ६६ ॥ झाँसी-दुर्गम-दुर्ग धनि, महिमा अमित अनूप । जहाँ चंचला अवतरी प्रगट चंडिका-रूप ॥ ७० ॥ * देखिये टिप्पणी-पहला शतक, ३६ दोहा । । इनके शासन काल में मुगल-सम्राट अकबरने बुन्देलखड-विजय करने का कई थार प्रयत्न किया, पर उसके सारे उद्योग असफल ही रहे । यह महाराज शूरवीर होने के अतिरिक्त मफल शासक एवं परम भागवत भी थे। महाकवि केशवदासने इनके विषय मे लिखा है- जिनके राज रसा यमे 'केशव' कुशल किमान । सिधु-दिशा, नहिं पारही पार यजाय-निसान ॥ सपल शाह अकबर-अवनि जीति लई दिसि चारि । मधुकरसार नरेश गढ़ तिनके लीने मारि ॥ खान गर्ने सुल्तान को राजा रावत वादि । हारे मधुकरसाह सो आपुन साह मुरादि । + वीरसिह देव महाराज मधुकरशाह के पुत्र थे । इन्होने बादशाह अकबर के इतिहास प्रसिद्ध मली अबुल फजल को मारा था। इनकी युद्धप्रियता बुन्देलखढ में प्रसिद्ध है । 'वीरसिह-देव चरित' मे कविवर केशवदासने इनकी वीर विस्दावली का अच्छा वर्णन किया है। $ महाकवि केशवदास लिखते हैं-. नदी बेतवै-तीर जहं तीरथ तुझारन्न । नगर औरछो बहु बसै धरनीतल मे धन्न । ॥ महारानी लक्ष्मीयाई।

तीसरा शतक] । धनि, .रण-मत्त गठेबरा । गौरव-गरब-निकेत । । हमरे खडबुदेल को साँचेहुँ तू कुरुखेत ॥ ७१ ।। है यह वही गठेवरा, जहाँ जुझि मजबूत । रहे खेत गृह-युद्ध में सवा लाख रजपूत ॥ ७२ ।। है यह वही गठेबरा, जहूँ अखड बलचड । खड-खंड गृह-युद्ध तें तें भयौ बुदेला-खड ॥ ७३ ॥ यहि आल्हा-ऊदल लरे, भिरे मरद मलखान । यही महोबा-भूमि है, उन बीरनु है, उन बीरतु की खान ॥ ७४ ॥ बुन्देलखडान्तर्गत छतपुर राजधानी से ३ मील पूर्व एक सुप्रसिद्ध रणस्थल । नवाब शुजाउद्दौला ने अपन विश्वास-पात आर वीर वर गोसाई अनूपगिरि, उपनाम हिम्मत बहादुर, को सवत् १८३५ के लगभग एक बड़ी सेना देकर त्रुन्देल्पड पर विजय प्राप्त करने को भेजा। हिम्मत बहादुर बुन्देलखड निवासी था, पर था पूरा देश द्रोही । अस्तु, उस समय महाराज गुमानसिह गौदे में राज्य करते थे। नोने अर्जुनसिह पँवार गुमानसिहजी के सेनापति थे। इन्होने हिम्मतबहादुर की फौज को ऐसा हराया कि उम्पके पैर उखड गये । नवान के दूसरे मनापति करामतरताँ को नो यमुना तेर कर किसी तरह अपने प्राण बचाने पड़े । नोने अर्जुनसिह ने बुन्देलपट की राज रख तरी । पर भारत की चिरसहेली फूट उन्देलाबड की स्वाधीनता न देख सकी। महाराज छखसाल के वशधरी ने आपस में लड़ना शुरू कर दिया। नोने अर्जुनसिह पन्नालाले सरनेतसिहजी का पक्ष गृहण कर पा के मती येनी जूरी से, जिसके वशधर अब मैहर म राज्य करते है, लडो को उद्यत हुए। इस युद्ध म ममम्त शुन्देलखंड के बुन्देले एव अन्य राजपूत किसी न किसी की तरफ से सहा को शामिल हुए। गठेरा के मैदान में युद्ध हुआ । इस युद्ध को 'बुन्देलवड का महाभारत' कहते हैं। ये गीहुमूरी इस लडाई में मारा गया आर येत अर्जुनमिद के हाथ रहा . इस अभागे गृह युद्ध में धुन्देलप-अमा आड शक्तिशाली देश भी बडह हो गया। महोने के अधीश घटेर परमाल के यनाफर सामन्त । इन दो वीर भ्राताभी की पिरायली के भोजस्वी गीत आज भी गाँव-गाँव म 'आला' के नाम मे गाये जाते है। भापहामन्य, वास्तव में, अपनी शैली का पकमास वीर काप्य है। महोने का एक महान् माहसी आर वीर योदा । चंदेलो के इतिहास में यह भी अपना एक विशेष स्थान रखता है । महोये की लड़ाई में धारवर मलापान काका पन्ह के हाथ से मारा गया था। - [वीर सनसई सह प्रताप आरावली, सहित सिवा सहयाद्रि । चंद्र-चंद्रिका इत्र सदा, छतमाल बिंध्याद्रि ॥ ७५ ॥ पर-भाव, पराधीनता पराधीनता-दुख-भरी कटति काटें रात । हा । स्वतंत्रता को कबै हैहै पुण्य प्रभात ॥ ७६ । अथयौ बीर्य-प्रताप-रवि भावन भारत माँझ। अब तौ आई दुखमई अधिक अँधेरी साँझ ॥ ७७ । निजता सां तो बैरु अब, है परतासों प्रीति । निज तौ पर, पर निज भये, कहा दई । यह रीति ॥ ७८ | ॥ पर-भाषा, पर-भूषन, पर-परिधान । पराधीन जन की अहै यह पूरी पहिचान || ७६ पतित वहै, नास्तिक वहै, रोगी वहै मलीन । हीन, दीन, दुर्बल वहै, जो जग अहै अधीन || प्र. दभ दिखावत धर्म को यह अधीन मति-अंध । पराधीन अरु धर्म कौ, कही कहा संबध ? ॥ १ जैहै ड्रबि घरीक में भारत-सुकृत-समाज । सुदृढ़ सौर्य-बल-वीर्य को रह्यौ न कत भुल्यौ निज देस, मति भई और तें और । सहज लेत पहिचानि जब पसु-पंछिहुँ निज ठौर ॥ ८३ । ॥ श्राज जहाज ॥ २२ तीसरा शतक] ४७ जरि अपमान-गार तें अजहु जियत ज्यौ छार । क्यों न गर्भ तें गरि गिरयौ, निलज नीच भू-भार । ॥ ८४ ॥ लियौ धारि पर-भेप अरु पर-भाषा, पर-भाव । तुम्हें परायो देखि यौ, क्या न होय हिय घाव ॥ ८५ ॥ दई ठाँडि निज सभ्यता, निज समाज, निज राज । निज भाषाहूँ त्यागि तुम भये पराये आज ।। ८६ ॥ परता में तुम परि गये, नहिँ निजता को लेस । निज न पराये होयँ क्यों, बसौ जाय परदेस ॥ ८७ ॥ है पर अब अपनेनु तें करत कहा तुम आस । रँगे सियारनु पै कहौ करतु कौन विश्वास ? ॥ ८८ ॥ मरनु भलो निज धर्म में, भय-दायक परधर्म । पराधीन जाने कहा, यह निज-पर को मर्म ॥ ६ ॥ चाटत नित प्रभु-पद रहौ, दिन काटत बिन लाज । जूंठ एकही अब तुम्है, हे त्रिलोक को राज ॥ ६० ।। मनु लागत न स्वदेस में, यातें रमत बिदेस । परपितु सों पितु कहत ए, तजि निज कुल निज देस ॥ ११ ॥ आस देस-हित की हमैं नहिँ तुम तें अब लेस । जैसे घर रहे, रहे, तैसे रहे विदस ॥ ६२ ।। कता *स्वधर्म निधन श्रेय परधर्मो भयावह । [भगवगीता] [वीर-सतसई हम अधीन हिन्दून कों, कहौ, कौन अब काज ? पाप-पंक धोवै न क्यों, मिलि रोवै सब आज ॥ ६३ ॥ स्वाधीनता निज भापा, निज भाव, निज असन-बसन, निज चाल । तजि परता, निजता गहूँ, यह लिखियो, बिधि । भाल ॥ ६४ ॥ तुच्छ स्वर्गहूँ गिनतु जो इक स्वतंत्रता-काज | बस, बाही के हाथ है आज हिन्द की लाज ॥ १५ ॥ भीख-सरिस स्वाधीनता कन-कन जाचत सोधि । अरे, मसक की पाँसुरिनु पाट्यौ कौन पयोधि ? ॥ ६६ ॥ वही धर्म, वहि कर्म, बल, वहि विद्या, वहि मन्त्र । जासों निज गौरव-सहित होय स्वदेस स्वतंत्र ॥ ६७ ॥ पराधीन और स्वाधीन पराधीनु केहि कामको, जो सुर-पति-सम होय । सतत सुखी स्वाधीनजनु, धनि, जगतीतल कोय ॥ ६८ ॥ जौ अधीन, तो छाँड़ियै स्वर्गहुँ बिभव-बिलास । जोपै हम स्वाधीन, तो भलो नरक कौ बास' ॥ ६६ ॥ पराधीन जौ जनु, नहीं स्वर्ग नरक ता हेतु । पराधीन जो जनु नहीं, स्वर्ग नरक ता हेतु ॥ १०० ॥ जो न जुति पिय-मिलन की, धृरि मुकुति-मुहँ दीन । जो सहि सँग मजन, तो धरक नरकहूँ कीन ॥ -विहारी [ चौथा शतक मारुति-वन्दना कनक-कोट-कगूर जो किये धौरहर सो भारत-श्रारति हरौ मारुति-लामी-लूम ॥ १॥ लामी लूम घुमायकै कनक-कोट-चहुओर । करतु केलि किलकारि दै कपि केसरी-किसोर ॥ २ ॥ लका-युद्ध मिरे अनल-मुख कपिनु सो तम-मुख राकस-पुञ्ज । भयौ युद्ध-थलु लक को बिनुऋतु किसुक-कुज ॥ ३ ॥ श्रावतु कन्जल-कूट-लौ प्रलय-रूप, सतसंध । कुम्भकर्ण दसकध को विकट बंध रण-अध ॥ ४ ॥ भूलेहुँ याहि न जानियौ वृत्त-सत्रु-पवि-पात । इन्द्रजीत । है यह वही मारुति-मुष्टि-अघात || ५ || ७ ५० [बीर-सनसई मेघनाद महितल गिर्यो सुनि मारुति-हुकार । । कहूँ तून, कहुँ धनु पर्यो, कहुँ कृपान, कहुँ ढार ॥ ६ ॥ सर रुक्मिणि-हरण बरसावतु रिपुन पै रथतें रुकमिनि-रौन । मुख-प्रसेदु पछिति प्रिया, करि अँचरा सो पौन ॥ ७ ॥ गहि मेरो कर रुकमिनी । मति काँपै घबराय । दूँगो प्रतिपच्छीनु के पच्छनु काटि गिराय ॥ ८ ॥ अभिमन्यु जइयौ चितवत चाव सो प्रिया उत्तरा-भोर । ना जानें, कब लौटिहौ, प्यारे पार्थ-किसोर | ॥ ६ ॥ धन्य, उत्तरा-उर-धनी । धन्य, सुभद्रा-नंद । धनि भारत-भट-अपनी । पार्थ-पयोनिधि-चंद । ॥ १० ॥ धन्य, पार्थ-चख-चंद । तूं, धन्य, सुभद्रा-लाल । सातहुँ महारथीनु सेो कियौ युद्ध बिकराल ॥ ११ ॥ सातहुँ महारथीनु सँग संगर जूझनहारु । व्यूह-बिदारनु धनुर्धरु, बलि-बलि, पार्थ-कुमारु ॥ १२ ॥ * कहा लड़ते हग करे, परे राल बेहाल । कहुँ मुरली, कहुँ पीतपटु , कहूँ मुकुटु, अनमार ॥ -विहारी चाथा शतक] भीम-भीमता रही न केते पांडु-सुत बुधि-बल-विक्रम-सीम | द्रौपदि-बेनी-बाँधिबो जानतु इक भीम ॥ १३ ॥ धर्मबीर अगनित रहौ, रहौ, युद्धवीर बन-सीम । पै द्रौपदि-अपमान-हरु, भीमकर्म इक भीम ॥ १४ ॥ 4 . द्रौपदी-केश-कर्षण कृष्णा-कच-कर्षण लखत, धिक, पारथ नतग्रीव । धिक पौरुष, धिक, वाहु-बल, धिक-धिक यह गाडीव ॥ १५ ॥ बँचतु खल तिय-पट, तऊ बँचत नाहिँ कृपान । धर्मराज | धिक धर्म अस, धिक धीरज, धिक ज्ञान ॥ १६ ॥ छाँडि, कहा कृष्णा-कचनु करपत माँडि उमाहु । करिहै यह कौरव-कानन-दाहु ॥ १७ ॥ ॥ धिक, दिल्ली दुरभागिनी । अजहुँ खरी बिनुलाज । कृष्णा-कच-कर्षण लखति, परी न तो सिर गाज ॥ १८ ।। गई न धंसि पाताल तूं, लखि द्रौपदि-पट-हीन । धिक, दिल्ली दुरभागिनी । दिन-दिन टीन अधीन ॥ १६ ॥ केस-कृसानु ५२ [वीर-सतसई चाणक्य दियौ उलटि साम्राज्य तें करि अशक्यहू शक्य । नीति-बीरता में तुहीं कुशल एक चाणक्य ॥ २० ॥ राज-मुकुट नवनंद के, चन्द्रगुप्त सुख-दैन । लखि लुंठित तुव पगनु पै कबै सिरहौं नैन ॥ २१ ॥ चद्रगुप्त जासु समर-हुंकार ते काँपतु विश्व विराट । सेल्यूकस - गज-सिंह सो जयतु गुप्त सम्राट ॥ २२ ॥ काका कन्ह अरि-आँतन की बाँधिकै सुभग सीस पै पाग । चढ़ो अलापतु अश्व पै कन्ह मत्त रण-राग ॥ २३ ।। नव नन्दन को मूलसहित खोद्यौ छन भर में। चन्द्रगुप्त मे श्री राखी, नलिनी जिमि सर में॥ क्रोध प्रीति सो एक नासिक एक बसायो। श मिस को प्रगटि सबनु फलु लै दिसरायौ ॥ [मुद्राराक्षस | महाराज महानन्द और उनके आठ पुत्र । के सिकंदर महान् का यह एक सेनापति था। इसने भारत के पूर्वीय प्रदेशो पर अधिकार कर लिया। और ३०५ ई० पूर्व में सिन्धु नदी को पार किया। परन्तु चन्द्रगुप्तने उमे खदेड़ दिया। दोनो में सधि हो गई । सेल्युकस ५०० हाथी लेकर सतुष्ट हो गया और उसने अपनी कन्या चंद्रगुप्त को व्याह दी और अपना दूत मेगास्थनीज भी चद्रगुप्त के दरबार में भेजा, जिसने तत्कालीन भारत की अपनी आँखों देया एक सुन्दर वृत्तान्त लिगा।

चावा शतक] अंतकहू के अंत-कर खडग-कामिनी-कत । है कह काका कन्ह-से कन्ह-से अाजु सूर-सामन्त ॥ २४ ।। कैमास किते न उडत भूप किय, पृथीराज | नुव दास । हनि ऐसो कैमास अब तुव जीबनु कै मास ? || २५ ।। चामुडराय लियो बाँधि चामुंडरै , हन्यौ सुमति कैमाम संभरीस । साम्राज्य की करत तऊ ते आस ॥ २६ ॥ । . यह पृथ्वीराज का एक विश्वासपात मती 4 । देवशात् महागज की एक फर्नाटकी नाम की वेश्या से इसका प्रेम हो गया। रानी इच्छनकुमारीने महाराज को इस अनुचित मध का पता दे दिया। महाराजने स्वयं भी एक दिन मसी को टिकी के साथ देख लिया और उसे अपने वाण का लक्ष्य कर मार डाला । कमास की इस हत्या से सारे राज्य म अमतोप फैल गया । महाराज पृवीराज खुद अपने कार्य पर बहुत पनाये । कैमाम की मृत्यु से उनका मानो एक हाय ही फट गया। मवि वियोग के दु ख को पृथ्वीराज आमरण नहीं भूले। | पृथ्वीराज के पुल रेणुसिंह और चामुण्डराय म बडी मिलता थी । पंद्रपुण्डीर दरपादि सामत मामा-भाजे की इस मेसी पर जरते थे। ये चाहत थे कि किमी सरह यामुण्डराय को नौण दिखाना चाहिये । सयोगवश एकदित महाराज पृथ्वीगज का रामो छूट गया । क गली में पागुरुः राय और उसका सामना हो गया। हाथी चामुण्डाय पर झपटा । टन यो की भान न था। इसलिये वीर सामने तलवार प्रेमा वार किया कि उसको मद कट गर भार पर पट्टी गिर कर मर गया। बाजा प्रिय था । उधर चामुण्डायरे विरामी पहुंच चुकी थीं। महाराज या सुन र man हो गये, आर गाय यो गिरफर गुलाम आर भाजानुबाहु यो भेजा । परन्तु म्यामिभा यामुरापन मी भने हामी भ! पैरो में येही हाल । चामुण्डाय को गिरफतारी से की पृ-वीराज के भामा HTim राहायुहीन गोरी के कगल अफमण से सामान की रक्षा कमाने के लिये प्रयोग er rime ५४ [वीर-सतह उद्धत भट-आहुतिन सों परि युद्ध-मख-कुण्ड । चल्यौ समर तें स्वर्ग को अमर राय चामुण्ड ॥ २७ ॥ लगरि राय किन तुव है तेरी ही मूछ, औ तेरी ही तरवार । तुहीं पैज-रखवार है, संयमराय'- कुमार ! ॥ २८ ॥ मरन सराहियै, संयमराय-कुमार । जाहि सत्रु जयचंदहू दियौ अश्रु- उपहार ॥ २६ ॥ तुव औरहु, संभरिराय । पै दूजो नहिं कन्ह, नहिँ दूजो लंगरिराय ॥ ३० ॥ अहैं सूर-सामन्त . , कहरकठीर और चद्रपुंडीर दुहूँ मत्त, जयचंद । वै, दुहूँ बीर रण-धीर । यहाँ कहरकंठी, तौ वहाँ चंद्रपुंडीर ॥ ३१ ॥ ममरसिहने विलासमग्न चौहान राज को जब बहुत-कुछ फटकारा और लज्जित किया, तब कहीं उनके कहने पर वीर-शिरोमणि चामुण्डाय की बेडियाँ काटी गयीं। एकमाव वीर सामन चामुण्डराय जिस वीरता और साहस से मुहम्मद गोरी से लड़ा, वह वर्णनातीत है। * देखो टिप्पणी-पहला शतक, २५ दोहा । + कनोज के महाराज जयचदने इसी वीर योद्धा को अपनी कन्या सयोगिता का वाग: दान दिया था। * महारान पृथिवीराज चौहान का एक मुख्य सामत ।

चौथा शतक] सयोगिता पितु-पति-कुल-कूलनु अरे । दैहे वाढ़ि ढहाय । कलह धार संयोगिता-सरिता, सभरिराय । ॥ १२ ॥ पृथीराज । करिहै कहा उर सँयोगिते धारि । अधरामिय-प्यासी न, वह सोनित-प्यासी नारि ॥ ३३ ॥ इत गोरी गर लाय तूं सोवत, सभरिराय । भोगतु राज-सिरीहिँ तुव उत गोरी गर लाय ॥ ३४ ॥ जयचद खोलि विदेसिनु को दियौ देस-द्वार, मतिमन्द । स्वारथ-लगि कीनों कहा, अरे अधम जयचद । ॥ ३५ ॥ स्वर्ग-देस लुटवाय, सठ । कियौ कनक तें छार । फूटबीज इत ब्वै गयौ, जयचंद जाति-कुठार । ॥ ३६ ॥ दियौ बिदेसिनु अरपि धन-धरती, धरमु स्वछद । हमैं फूट अब देत तू, धिक, दानी जयचट । ॥ ३७ ॥ * महारानी संयोगिता । | शहायुही। मुहम्मद गोरी। + काहे तू चाका लगाये, जयच या । अपने स्वारथ भूरि लुभाये काहे चोटीरदय मुलगये, जपचया ।। अपने हाथ से अपने कुर के फाहे ते जड़या कगये, पग। फ्ट के फल मय भारत योये, यरी में गए मुन्यय, गाय ॥ भोरो नामि ते आपालिने निप मुंह सारी पुताये, उपदा ५६ [वीर-सतसई ज्यौं साँचे हथयार, आल्हा और ऊदल आल्हा-ऊदल सत्यही, गही गही साँग तरवार । त्यौं साँचे घालनहार ॥ ३८ ॥ कियौ समर-साको सही जूझि महोबावाल । उमगि प्रोजु श्रावतु अजौ सुनि-सुनि अल्ह-हवाल ।। ३६ ॥ नहिँ आल्हा-ऊदल रहे, नाहिँ मरद मलखान । सुजस-जुन्हाई पै अजौं करति जान्हवी-न्हान ॥ ४० ॥ । गोरा और बादल धनि, गोरा रण-साहसी । धंसी साँग हिय पार । बाँधि आँत, पुनि तेग लै, भयौ तुरंग-असवार ॥ ४१ ॥ बस, गोरा-रण-बीरता लखियो, पदुमिनि । आज । रखिहै सीसु चढ़ाय वह तुव सुहाग की लाज ॥ ४२ ॥ * देखो टिप्पणी-तीसरा शतक, ७४ दोहा । आल्हा साँग और उसका भाई ऊदल करता था । सॉग बाँधनेवारा तो आल्हा के बाद कोई हुआ ही नहीं । इन दोनो वीर भ्राताओने बावन लड़ाइयो में भाग लिया और शलुओं को परास्त किया था । +देसो टिप्पणी-तीसरा शतक, ७४ दोहा । 1 फिरि आगे गोरा तब हॉका । रोलौं, करौं आजु रन-साका ॥ हौं कहिए धौलागिरि गोरा । टरौं न टारे, अग न मोरा ॥ सोहिल जैस गगन उपराही । मेघ घटा मोहि देखि बिलाहीं ॥ तलवार गाँधा x x x गोरै साथ रीन्ह मा साथी । जम मैमत सूद गिनु हाथी । मर मिलि पहिलि उठोनी कीन्ही । भावत आइ हाँक रन दीन्ही ॥ x x x चौथा शतक] ५७ . गोरा, तुब बद्दल बडो नीरसु, निपट वठोर । बिदा होत हेर्यो न जा न जा प्रिया-लोयननु ओर ॥ ४३ ॥ कहतु कौन 'बद्दल तुम्हें, है। तुम समर-समीर । धेरत - निजदल-बद्दलै, रिपु-दल-बद्दल चीर ॥ ४४ ॥ अलादीन-दल दारिबे, बद्दल वीर बलन्द । मेरे मत, मेवाड़ में प्रगट्या प्रगट्यौ पारथ-नन्द ॥ ४५ ॥ भई बगमेल, सेल घन घोरा । भो गज-पेल, अकेल सो गोरा ॥ सहज कुँवर सहसौ सत बाँधा । भार पहार गूझ कर काँधा ॥ लगे मरे गोरा के आगे । बाग न मोर घाव मुस लागे । जैस पतग आगि धेसि लेई । एक मुवै, दूसर जिउ देई ॥ टूटहि सीस, अधर धर मारे। लोटहि कहि कध निरारै ।। घरी एक भारत भा, भा असवारह मेर। जूशि कुँवर सब निबरे, गोरा रहा अकेल ।। कोपि सिघ सामुह रन मरा । लाख ह सो नहि भर अकेरा ।। लेइ हाँकि हस्तिन्ह कै ठटा । जैसे पान यिदार घटा ।। जेहि सिर देइ कोपि कावारू । स्यो घोड़े टूटे अमवारू॥ रोटहि सीस काध निनारे । माठ मजीठ जनहुँ र दारे॥ x x - सर्व कटक मिलि गोरहि छेका । गुजत सिंघ जाइ नहि टेका ॥ जिनि जानहु गोरा सो अकेला । सिघ के मोह हाथ को मेग? सिंघ जियत नहि आपु धरावा । मुए पाठ कोई घिमियाग ॥ कर सिघ मुस सौहहि दीठी जागि जिय देव नदि पीरी ॥ रतनसेन जो बाँधा, मसि गोरा के गान । जौलगि रहिर न घौगे तागि होइ न सा॥ [पदमाग] ५८ [वीर-सतसई ? पद्मिनी-जौहर वह चितौर की पद्मिनी, किमि पैही, सुलतान । कब सिंहिनि-अधरान को किया स्वान मधु-पान ? ॥ ४६ ॥ चंचरीक । चित्तौर में नहिं पैहै रस-जाल । है है चंपक-माल-लौ तोहि पद्मिनी बाल ॥४७॥ भई भस्म जहँ पद्मिनी आरज-धर्म समोय । यज्ञ-अग्निहू तें अधिक पावम पावकु सोय ॥ ४८ ॥ जा दिन जौहर तें जगी ज्वाल-माल अति चंड। जन-हीतल-सीतलकरन प्रगट्यौ जग श्रीखंड ॥ ४६ || ॥ केहि कारन सेवतु सुरुचि नित नवीन समसानु ? जहँ-तह जौहर की भसमु ढूँढतु संभु सुजानु ।। ५० ।। धारियै सीस पै वह जौहर-बत-राख । भव-तनु-भूषन भसम तें जो पुनीत गुन लाख ॥ ५१ ।। लिखे न केते सुमृति में व्रत-विधान सबिबेक । पै जग-जाहिर जंग की व्रत जौहर बस जौहर बस एक ॥ ५२ ॥ महाराणा सॉगा लसति जासु पवि-देह पै असी घाव की छाप । सो साँगा निज साँग तें दलै न काको दाप ॥ ५३ ।। क्यों न * भल्यहीन पिरजी में ताप है। 1 महाराणा प्राममिद । T चौथा शतक] है राणा साँगा । तुहीं रण में मरद सलाह । किते न खाँडे-घाट तें दिय उतारि गुमराह ॥ ५४ ॥ राठौरही तुव सुपूत, चित्तोर । जयमल और पत्ता है जयमल भरत-भरत तुव घाव जो दिये प्रान तिहिं ठौर ॥ ५५ ॥ पत्ता-लौ अकबर-अनी पत्ता दई उडाय । दिये फेरि चित्तौर पै प्रान-प्रसून चढाय || ५६ ॥ लाज श्राज मेवाड की, बस, तुम्हरेही हाथ । जयमल | पत्ता । फूल-लौ हँसि चढाइयौ माथ ॥ ५७ ।। जहँ जयमल, पत्ता तही, एक प्रान द्वै देह । भयौ अमरु मेवाड में, इन दोउनु को नेह ॥ ५८ ॥ . महाराणा प्रताप अणु-अणु पै मेवाड के छपी तिहारी तिहारी छाप । तेरे प्रखर प्रताप तें, राणा प्रबल प्रताप | || ५६ ॥ जगत जाहि खोजत फिर, सो स्वतत्रता प्राप । विकल तोहि हेरति अजौ, राणा निठुर प्रताप । ॥ ६ ॥ * वेदनौर-नरेश जयमल राठौर । 'पसे कहा करते थे। यह कैसवाड़े का राजा था । चन्दावत कुल की जगवत शाखा में उत्पन्न हुआ प्रतापसिष्ठ, जिसे स्पेग 'पता' या [वीर-सतसई ? पद्मिनी-जौहर वह चितार की पद्मिनी, किमि पैही, सुलतान । कब सिंहिनि-अधरान को किया स्वान मधु-पान ? ॥ ४६ ॥ चंचरीक । चित्तौर में नंहिँ पैहै रस-जाल । ह है चंपक-माल-लौं तोहि पद्मिनी बाल ॥४७॥ भई भस्म जहँ पद्मिनी आरज-धर्म समोय । यज्ञ-अग्निहू ते अधिक पावम पावकु, सोय ॥ ४८ ॥ जा दिन जौहर तें जगी ज्वाल-माल अति चंड । जन-हीतल-सीतलकरन प्रगट्यौ जग श्रीखंड ॥ ४६ ।। केहि कारन सेवतु सुरुचि नित नवीन समसानु ? जहँ-तह जौहर की भसमु ढूँढ़तु संभु सुजानु ॥ ५० ।। धारियै सीस पै वह जौहर-व्रत-राख । भव-तनु-भूषन भसम तें जो पुनीत गुन लाख ।। ५१ ।। लिखे न केते सुमृति में व्रत-बिधान सबिबेक | पै जग-जाहिर जंग को व्रत जौहर बस एक ॥ ५२ ॥ महाराणा सांगा लसति जासु पबि-देह पै असी घाव की छाप । सो साँगा निज साँग तें दलै न काको दाप ॥ ५३ ।। क्यों न * भरा सिरजी से तात्पर्य है। * महाराणा प्राममिद ।

चौधा शतक] है राणा साँगा । तुहीं रण में मरद सलाह । किते न खाँडे-घाट ते दिय उतारि गुमराह ॥ ५४ ॥ जयमल और पत्ता है जयमल राठारही तुव सुपूत, चित्तौर । भरत-भरत तुव घाव जो दिये प्रान तिहिं ठौर ॥ ५५ ॥ पत्ता-लौं अकबर-अनी पत्ता दई उडाय । दिये फेरि चित्तौर पै प्रान-प्रसून चढ़ाय।। ५६ ॥ लाज अाज मेवाड की, बस, तुम्हरेही हाथ । जयमल ! पत्ता । फूल-लौ हँसि चढाझ्यौ माथ ॥ ५७ ।। जहँ जयमल, पत्ता तहीं, एक प्रान द्वै देह । भयौ अमरु मेवाड में, इन दोउनु को नेह ॥ ५८ ॥ अणु-अणु तेरे प्रखर महाराणा प्रताप पै मेवाड के छपी तिहारी छाप । प्रताप तें, गणा प्रबल प्रताप । ॥ ५ ॥ जगत जाहि खोजत फिरै, सो स्वतत्रता श्राप । विकल तोहि हेरति अजौं, राणा निठुर प्रताप । । ६० ॥ * वेदनौर-नरेश जयमल राठौर। पत्ते' कहा करने की कला का राजा था। * चन्दावत फुल की अगवा शारा में उत्पन्न हुभा प्रतापसिंह, गि ran ६० [वीर-सप्तसई है, प्रताप । मेवाड में तुही समर्थ सनाथ ! धनि-धनि, तेरे हाथ ए, धनि-धनि, तेरो माथ ॥ ६१ ॥ रजपूतनु की नाक तूं, राणा प्रबल प्रताप । है तेरी ही मूंछ की, रायथान में छाप ॥ ६२ ॥ काँटे-लौं कसकयौ सदा को अकबर-उर माहिँ ? छाँड़ि प्रताप-प्रताप जग दूजो लखियतु नाहिँ ॥ ६३ ॥ ओ, प्रताप मेवाड-पति । यह कैसो तुव काम ? खात खलनु तुव खड्ग, पै होत काल को नाम ॥ ६४ ॥ उमँडि समुद्र-समुद्र-लौ ठिले आपु तं .आपु । करुण-बीररस-लौं मिले सक्ता और प्रतापु ॥ ६५ ॥ . *बुद्ध्यौ राज-समाज, दिल्ली-यवन-समुद्र मे। आरज-गौरव-लाज, इक राखी परताप तुम ॥ अकबर परमप्रवीन, गजपूत दागिल किये। इक मिवार दागी न, तुव प्रताप-बल कारनै ।। क्षत-क्षेल निक्षल, भयौ होत निहचय कबै । जो न धरत सिर छल, परम हठी परताप तूं ॥ लै परताप उर्छग, जननी जन्म सुफल भयो । अकबर काल-भुवंग, कुचले फन जिन पग तरै । -राधाकृष्णदास + महाराणा प्रतापसिह के भ्राता शक्तिसिंहजी, जो घर की किसी अनयन के कारण दिल्ली में 1 भामर के अधीन दोफर रहने लगे थे।

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[वीर-सतसई ६० है, प्रताप । मेवाड में तुही समर्थ सनाथ । धनि-धनि, तेरे हाथ ए, धनि-धनि, तेरो माथ ॥ ६१ ।। रजपूतनु की नाक तूं, राणा प्रबल प्रताप । है तेरी ही मूंछ की, रायथान में छाप ॥ ६२ ॥ काँटे-लौं कसकयौ सदा को अकबर-उर माहिँ ? छाँडि प्रताप-प्रताप जग दूजो लखियतु नाहिँ ॥ ६३ ॥ ओ, प्रताप मेवाड़-पति । यह कैसो तुव काम ? खात खलनु तुव खड्ग, पै होत काल को नाम ॥ ६४ ॥ उमँडि समुद्र-समुद्र-लौ ठिले आपु तं .आपु । करुण-बीररस-लौं मिले सक्ता और प्रतापु ॥६५॥ । युट्यो राज-समाज, दिल्ली-यवन-समुद्र में। आरज गौरव-लाज, इक राखी परताप तुम ॥ अकयर परमप्रवीन, गजपून दागिल किये। इक मिवार दागी न, तुव प्राप-बल कारने ॥ क्षस-क्षेस निक्षस, भयो होत नियय कचै । जो न धरत सिर छस, परम हठी परताप तूं ॥ ले परताप उर्छग, जननी जन्म सुफल भयो । अकार-काल-भुवंग, कुचले फन जिन पग तरें । -राधाकृष्णदास महाराणा प्रतापसिंह के भ्राता शक्तिसिंहजी, जो धर को किसी भनयन के कारण दिल्ली में अम्बर के अधीन दोकर रहने लगे थे।

चूडावत का प्रेमोपहार किधौ रौद्ररस, रुद्र के, किधौ प्रोज-अवतार | साह-सुवन सिवराज । तैं किधौ प्रलय साकार || ६६॥ रखी तुही सरजा सिवा । दलित हिन्द की लाज । निरवलंब हिन्दून को तही भयो जहाज ||१|| एही भीषण भीम है सिवा भौसिना भए || है लोहा तुव सँग, सिवा । लेनहार फिरि कान:113011 चाया शतक महाराणा राजसिह या औरंग-सिसुपाल तें रूपनगर की बाल । हरि-ज्यौं धाय उधारियौ, राजसिंह नरपाल ! ॥ ६६ ॥ प्रान-प्रिया को सीसु लै, परम प्रेम-उपहारु । चल्यौ हुलसि रण-मत्त है चूडावत सरदार ॥ ६७ ।। पायौ प्रनय प्रमान में निज प्यारी-सुठिसीस । चूडावत । उर धारि सो है हौ समर-गिरीस ॥ ६८ ॥ छत्रपति शिवाजी यही ते ताकतु औरंगहू तुव धाक सुभैरव-स्प। रुद्र-अवतार है, यही भामिनि मान । * प्रभावती।

६२ [वीर-सतसई नित प्रति सेवा' खलनु को तोहि कलेवा देत । पेटु खलावत, काल । तें तऊ आय रण-खेत ॥ ७३ ॥ गरब करत कत बावरे, उमंगि उच्च गिरि-शृङ्ग । जस-गौरव सिवराज को सिवराज को इत नभतें हुँ उतङ्ग ॥ ७४ ।। 'करकी क्यों आपहिँ चुरी ' कहति हरम अकुलाय । 'सुन्यौ नाहि, श्रावतु सिवा समर-निसान बजाय 11 ७५ ॥ है हौ विजयी विश्व में, अजित रायगढ-राज । गहि कृपान अरि काटिहौ, राखि हिन्द की लाज ॥ ७६ ॥ किते न तोपन ते सिवा दृढ़ गढ़ दिये ढहाय । केते सुरंग लगायकै दिये न दुर्ग उडाय ॥ ७७ ॥ . महाराजा छत्रसाल छत्रसाल नृप । नामु तुव मङ्गल-मोद-निधान । सुमिरि जाहि अजहूँ बनिक खोलत प्रात दुकान ॥ ७८ ॥ चपत को बच्चा तुहीं, है इक सच्चा शेर । जब्बर बव्बर-बंस के किये न केते जेर ॥ ७६ ॥ रैयत-हित हिय-दानु दिय, हथयारनु-हित हाथ । छत्रसाल, धनि । कृष्ण-हित नैन, धर्म-हित माथ ॥ ८० ॥ *शिवाजी। | "उनसार महाबली, करिई सय भली भली।"-ऐसा कह कर आज भी धुन्देल ग्वाड में निरय प्रात गल दूकानदार दूकान सोलने हैं।

चौथा शतक] गहि कृपान-कुस नृप छता दियौ तोहि नित दानु । तक कृतनी काल । तैं नहि मानत एहसानु ॥ ८१ ॥ ग्रसित ग्राह-अवरङ्ग-मुख खडबु देल-गयन्द। उमँगि उधार्यो धाय, धनि, हरि इव चपत-नन्द ॥ ८२ ।। धनि, छत्ता । तुव खग्ग, धनि, रण-अडग्ग पबि-देह । बहु मूंछनवारेनु को मरदि मिलायौ खेह ॥ ३ ॥ नहि छत्ता | परवाह कछु तोहि शाह के द्वार । है तूं व्रज-दरबार को ऐडदार सरदार ॥ ८ ॥ । "यसपाल' का अपनश, जिसे तत्कालीन कवियाने ही नहाँ, महाराजो स्वर भी अपनी कविता में प्रयुक्त किया है। 1 सवत् १७६५ मे बादशाह बहादुरशाहने महाराज ससार को अपना 'मसयार' बनाना चाहा, पर उन्होंने यह पद स्वीकार नहीं किया। बोले-~कान क्सिका मसयदार होगा है ? जिसका नाम विश्वभर है, जिसका बाँका विरद है, उसी प्रभु के हम मलयदार है- मनसबदार होइ को काका । नाम विमुम्भर सुरी जग बोका ॥ (उप्र) महाराजने इस प्रमग पर स्वय यह कवित्त रचा है- जाको मानि हुकुम सुभानु तम-नाम पर, चद्रमा प्रकासु कर नखत दराज को। कह छससाल, राजनाज है भंडारी जासु, जाकी कृपा-कोर राज रोज सुरनाज पर। जुग्म पर जोरि-जारि हाजिर सिदेव रहे, देव परिचार गई चाके गृह-पास की। नरको उदारता में कान ६ सुधार, में हो ३ मनसबदार (यसपाल-भार) दव [वीर-सतसई छतसालनृप-धाक ते बडे-बड़े थहराएँ। कहुँ 'छकार' के सुनतही छूटि न छक्के जायें ॥ ८५ ॥ असि-सुवंगिनी-अंगना-संग, समर-संयोग । भोगौ भुज-भुजगेन्द्र तो, छता । छत्रपति-भोग ॥ ८६ ॥ कहूँ बिपत, कहुँ भयौ तूं सपत, चंपत-लाल । दुष्टनु-हित करवाल भो, अरु इष्टनु-हित ढाल ॥ ८ ॥ चपत' । खंडवुदेल की ते पत राखनहारु । दृवत हम हिन्दून को तुव कुमार कनधारु ॥ ८ ॥ । गुरु तेगबहादुर तेगबहादुर जो किया, किया कौन मुरशीद ? सर दीना, सार न दिया , साँचा अमर शहीद ॥ ८६ ॥ गुरु गोविन्दसिह जय अकाल-आनन्द-भव नव मकरन्द-मलिन्द । [क्ति-साधना-सिद्धवर, असि-धर गुरुगोविन्द || ६० ॥ i * प्रत्य-पयोधि-उमड मे ज्यो गोकुल जदुराय त्यो वृहत बुन्देल-कुल राग्यौ चपतराय ॥ (छवप्रकाश) + याहं जिन्हादी पकडिए , सिर दीजिए बाहँ न छोड़िए । गुरु तेगबहादुर बोरिया, धर पइये धर्म न छोड़िए ।

चौथा शतक] पराधीनता-सिधु मधि डूबत हिन्द हिन्द । तेरे कर पतबार अब, पतधर गुरुगोविन्द ॥ ११ ॥ धर्म-धुरन्धर, कर्म-धर, बल-धर, बखत-बलन्द । जयतु धनुर्धर, धनुर्धर, तेग-धर, तेगवहादुर-नन्द ॥ १२ ॥ असि-बत धार्यो धर्म पै, उमगि उधार्यो हिन्द । किये सिक्ख ते सिंह सब, धनि-धनि, गुरुगोविन्द ॥ ६३ ॥ दसवें गुरु के राज में रही हिन्द-पत-लाज । औरंगशाही पै गिरी वाहगुरू की गाज ॥१४॥ बेटी राखी आर्य-कुल, चोटी राखी सीस। राखी गुरुगोविन्द के औरंगशाही खीस ॥ १५ ॥ रहती कहँ हिन्दून की ऐड, आन अरु बान । ढाल न होती आनि जो गुरुगोविन्द-कृपान ॥ ६६ ॥ सघ-शक्ति-बत-मित्र, कै वृपगत विप्लव-मिल । के पवित्र बलि-चित्र-पट गुरुगोविन्द-चरित्र ॥ १७ ॥ दिखी न दूजी जाति कहुँ, सिक्खन-सी मजबूत । तेगबहादुर-से पिता, गुरुगोविद से पूत || E८ [ सिष्ठ-शावक-यलिदान "माथ रहो वा ना रहौ, तजैन मत्य अकाल ।" कहत-कहत ही चुनि गये, धनि, गुरुगोविंद-लाल* ॥ ६६ }} * जोरावरसिह भार सहदि, जो प्रमश ना और सात पहे।

[पीर-सतसई भाई बंदा मति सोवै सुख-नींद यौ, अब, सूबा सरहिन्द । गाजत बंदा सीस पै पठयौ गुरु गोविन्द ॥१०॥ करि गुरु गोविद-बंदगी बंदा बंदा बीर महान । ककरी-लौ काटे किते मरद मारि मैदान ॥ १०१ ॥ खालसा से नित गुरु-खालसा, है न लालसा और । वाह गुरू की मेहर सो, फते होय सब ठौर ॥ १०२ ॥ - * इमीने गुरु गोविन्दसिंह के दोनो कुमार जोरावरसिह और फतहसिंह को शहर-पनाह की दीवार में जिन्दा चुनवा दिया था। + खालिस अर्थात् निर्मल । इस पथ की स्थापना गुर गोविन्दसिंहने की। इवीस शिक्षाएँ इस में मुरय मानी गई है। . चाह गुर का खालसा, वाह गुर की फते". अर्थात् , जहाँ वाह गुरु, परमात्मा, पारमा (निर्मल) पथ है, वहाँ फते अर्थात् विजय भी अवश्य है । गीता में लिखा ही है- यतो कृष्णस्ततो धर्म , यतो धर्मस्ततो जय । का पाँचवाँ शतक शिव-यन्दना दलो त्रिशूल विशूल धर । त्रिभुवन-प्रलयंकारि । हर, ल्यम्बक, त्रैलोक्य-पर, विदश-ईश, त्रिपुरारि ॥ १ ॥ . दुर्गादास राठौर तूं अठौर राठौर-कुल, भयौ ठसक को ठौर । दुर्जय दुर्गादास । धनि, धीर-बीर-सिरमौर ॥ २ ॥ धनि, दुर्गा राठौर । तूं दल्यौ मुगल-दल-दाप | । लखियतु मरुथल पै अजौं, तुव निज न्यारी छाप ॥ ३ ॥ ठौर-ठौर ठुकराय अरि, धनि, दुर्गा राठौर । राखी ठकुराई-ठसक, मारवाड-सिरमौर । ॥ ४ ॥ "बादशाह औरगजेबने जब जोधपुर-नरेश महाराज यशवंतसिंह को धोके से मरवा दाग र उनकी रानी एवं नवजात बालक भजितसिंह का कोई रक्षक न रहा, तर वीरपर दुर्गादास राठौरी अपने याहु वल मे राठोर-वा की मान-मर्यादा भक्षुण्ण रखी थी।

[वार-सतसई धुरमंगद साहस-सो साहस कियौ धुरमगद सतसंध । कूदि जरति हथिसार में दिये काटि गज-बंध ॥ ५ ॥ बिकट बाँक बानैत, त्यौं उद्भट निपट निसाँक । धुरमङ्गद की धाक ज्यौं हनुमान की हाँको ॥ ६ ॥ लोकमान्य तिलक ब्रह्मनिष्ठता व्यास की, जामदग्न्य को पोज । दीपत इन दोऊन तें तिलक-सुनैन-सरोज ॥ ७ ॥ जाहि भूलि भटकत फिरे हम कुरंग बन भूरि । धन्य तिलक । बोधित करी जन्मजात कस्तूरि ॥ ८ ॥ *यह भोरछा (बुन्देलरवड) राज्यान्तर्गत 'पलेरा' जागीर के स्वामी थे । यह बड़े धीर और साहसी थे । एकबार दिल्ली में, जब कि यह ओरछा नरेश के साथ वहाँ थे, बादशाह की हथिसार में आग लग गई । हाथी जलने-भुनने लगे । किसकी हिम्मत, जो जलती हुई आग में कूद कर उनके यधन काटे ? राव धुरमगद से कहा गया कि, सिवा आप के कोई यह दुस्साहस का काम नहीं कर सकता । सुनते ही भाप हथिसार में कूद पड़े और बावन हाधियो के बधन अदम्य साहस के साथ काट साले! बिाँके गढ़-कोटन मे, तोपन की चोटन में, गोलन की ओटन में बिकट अटान की। पोर-पोर पन में, बाँक की झपट्टन में, ज्वानन के ठट्टन में कहन है प्रान की । 'एडीराम' लल्पत, बुंदेला अलफक्कड़ है, अरखड़ कहालौं कहीं अकह कहान की। बाफ याक यानीजू की, ताक सीतारामजू की, धाक धुरमंगद की, हाँक हनुमान की ॥ अर्थात् , 'स्वराज्य हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है। -

पाँचवां शतक]
बाल तिलकही में लख्यो ज्ञान-विकास अबाध ।
कारागारहुते कियौ प्रगट रहस्य अगाध ॥ ६ ॥
भावन भारत-माल को तिलक, तिलकही एक ।
व्यक्त भयौ जाते सदा शक्ति-भक्ति-उद्रेक ॥ १० ॥
देशबन्धु दास
देसबन्धु । या सत्य को तुमहीं दियौ प्रमान ।
दीनबन्धुही सों मिलतु दीनबन्धु भगवान ॥ ११ ॥
'भयौ दास बिनुगेह हूँ'- कहतु बावरो कौन ?
किते न निज बन्धून के किये हिये निज भौन ॥ १२ ॥
दृगनु को दियौ न श्रोज-प्रकास ।
कासु न चित-रंजन कियौ तुम, चितरजन दास । ॥ १३ ।।
पुलकि असीसंत नहिँ किते लहि मुहमाँगे दान ।
देसबन्धु-बलि-पौरि पै. नित दरिद्र-भगवान ॥ १४ ॥
किते अँधेरे दृगनु
अपनेही
धनि,
आर्य-देवियाँ
बल श्रापनी रखनहारियाँ लाज।
अारज-कुल-नारियाँ, जग-नारिनु-सिरताज || ५ ॥
जुग जुग अकह-कहानियाँ कहिहे कवि-कुन-गाय ।
धनि, भारत-भट-नारियाँ, रया सुजसु चहुँ टाय ॥ १६ ॥

[वीर-सतसई काय । कर्मादेवी कुतुबुदीन-गज-गंजिनी, गहन-गर्जिनी जय कर्मा रण-सिंहिनी, गृह-गृह जनमी सोय ॥ १७ ॥ वीरा धारि पीउ-भुज-माल तब बिलस्या प्रेम रसाल । अब हौ बीरा' धारिहीं धारिहैं। समर शत्रु-सिर-माल ॥ १८ ।। ॥ हम तो छत्रानी कहैं, कही कोउ बिगरैल । राखी मेवाड़ की वाही महल-रखैल ॥ १६ ॥ पत पन्ना धाय निज प्रिय लाल कटाय जो प्रभु-सिसु लियौ बचाय । क्यों न होय मेवाड में पूजित पन्ना धाय ॥ २० ॥ दुर्गावती सती दुर्गावती, करि करि गढ़मंडल राज । रखी गोडवाने तुही खडग-धरम की लाज ॥ २१ ॥ मेवाड के महाराणा उदयसिह की उपपरनी, जिसने विलास-मन महाराणा को अकबर के के मे छुड़ा कर अपने याहु-यल और अद्भुत पराक्रम मे मुगल-सेना को परास्त किया था । | महाराणा साँगा का छोटा पुस , उदयसिंह, जिसे पन्ना नाम की धायने पृथ्वीराज के दासी पुस वनवीर की तलवार से अपने पुस को कटा कर बचा लिया था। + यह महोये के चंदेल राजा की पुसी और गदमडले के गोड राजा दलपति की रानी थी। दलपति के स्वर्गवासी होते ही अकार के हुक्म से उज्जन के नवाब आसफने गढ़मंडले पर चढाई कर दी। महारानी दुर्गावतीने यदी चीरता से नवाब के साथ युद्ध किया और मुगल सेना को परास्त कर भगा दिया।

पाँचौं शतक] बज-कवच तनु, कध धनु, कर कृपान, कटि ढाल । गढ़मंडल-दुर्गावती रण-दुर्गा बिकराल ॥ २२ ॥ मत्त मुगल-दल दलमल्यौ, गढ़मंडल रण ठानि । धनि, · दुर्गा दुर्गावती । रखी तुहीं कुल-कानि ॥ २३ ॥ चॉदवीबी मुगलनु पै झपटी मनों रणसिंहिनि तजि माँद । अकबर-मद-मईनु कियौ, धनि, सुलताना चाँद ॥ २४ ॥ नीलदेवी या कटारि सुकुमारि को प्रथम चूमि मुख, खान । तब नीला” अधरानु को मधु-रसु कीजौ पान ॥ २५ ॥ कविवर लाला भगवानदीनजी ने अपनी 'धीर क्षवाणी' में दुर्गापनी के मुख से क्या हो ओजस्वी शन्द कहलाये हैं। देखिये- "छतानी हूँ बिन मारे मरे भूमि न दंगी। दम रहते न रण भूमि से पग पीछे धरूंगी। मानोगे मेरी बात तो कुछ में भी करूंगी। अन्याय करोगे तो विकट रूप धरूंगी। चदेल की येटी नहीं तलवार मे डरती। मंडला की महारानी नहीं रण मे पदरती ॥" पजायके नूरपुर नामक एक छोटे राज्य के स्वामी सूरजदेव की औरपनीका सिपहसागर अबदुःशरीफखा सूरने सूरजदेव आर उपके पुस सोमदेव यो गिरस्तर पर शिया भार परमसुन्दरी नीला पर काम-मोहित हो सके माध महाकार करना चाहा। नीलदेवीने भरीमा को खूष शराय पिला दी आरआभा-mer गाने को जारी ARE गया, तब उसकी छाती पर सवार होकर कटार में उसका काम तमाम कर दाम्प । * ७२ [वीर सतसई बोलि चूमिहै फिरि कबौं अधर सिंहिनी केर । सठ । छतानी सों कबौं कहिहै 'जानी' फेर ॥ २६ ॥ प्रथम कटारि-कपोल को लहि चुंबन सरसाय । तब नीला-अधरानु को मधु पीजौ उर लाय ॥ २७ ॥ यह कटारि-प्याली भरी रुधिर-मद्य सों तोर । लै निज जानी हाथ सो, खान स्वान बरजोर । ॥ २८ ॥ लंपट । भेटन चहत तूं जिन भुजान ते धाय । क्यों न उखारौं, सठ । तिन्हें धरि तुव छाती पाय ॥ २६ ॥ लक्ष्मीबाई तजि कमलासनु कर-कमलु, गहि तुरंग तरवार । कुल-कमला' काली भई, झाँसी-दुरग-दुवार ॥ ३० ॥ हौ देख्यौ अचरजु अबै, झाँसी-दुरग-दुवार । दृग-कमलनि अंगार, त्यौ कर-कमलनि तरवार ॥ ३१ ।। भई प्रगटि रण-कालिका झाँसी-गढ़ परतच्छ । सुभट सँहारे लच्छमी, लच्छ-लच्छ करि लच्छ ॥ ३२ ॥ भारतेन्दु हरिश्चन्द्रने इस ऐतिहासिक वीर घटना पर 'नील देवी' नाम का एक सुन्दर गीति रूपक ओर कविवर राला भगवानदीनजी ने एक ओजमयी कविता लिखी है। खींचि कटारी निज चोली से, झपटि शरीफहि दिया पछार । मर के देखत आनन्-फाननू छाती मे धेसि गई कटार ॥ छाती फाई रक्त से रजित मुग्व में दिया कटारहि डाल । गोली, इसका बोसा लेकर ले मन का भरमान निकाल । [वीर क्षत्राणी] पाँचयाँ शतक] जय झाँसी-गढ़ लन्छमी, राजति त्रिबिध अनूप । गति चपला, दुति चद्रिका, समर चडिका-रूप ॥ ३३ ॥ सिह-यधू प्रेमालिंगनु काल सों करिहै सो ततकाल । सिंह-वधू के कंठ जो गैरेंगो भुज-माल ॥ ३४ ॥ अब काहे काँपत, अरे सठ । भेटन में मीच । सिह-प्रिया को लायहे कबहुँ फेरि उर नीच ? ॥ ३५ ॥ है है छार मलेच्छ । तै बै छत्रानी-अग । रमिहै सिह-किसोर ही सिह-किसोरी सग ॥ ३६ ॥ सतीत्व-रक्षा जो खल चाहै करन तुव, भगिनि । सती-व्रत-भग । ता हिय हूलि कटारि यह, रँगियौ हाथ सुरग ॥ ३७ ॥ सती-प्रताप पतनी की पत पालिवे इन्द्रजीत-मृतसीस । हँस्यौ हहरि, "मम प्रिया को परखौ सत, जगदीम ** ॥ ३८ ॥ *महारानी लक्ष्मीबाई

[वीर-सतसई
हृढ़ता
तजिहै मरद न मेंड निज, रहै बकत बदराह ।
करत न कूकर-बृन्द की कछु गयन्द परवाह ॥ ३९ ॥
सूर न चुकत दाँव निज, कूर बजावत गाल ।
दीनों चक्र चलाय हरि, रह्यौ बकत सिसुपाल ॥ ४० ॥
नहिँ यामें अचरजु कछ, नाहिँन नीति-अनीति ।
हँसत सदा खल सुजन पै, नई न कछु यह रीति ॥ ४१ ।।
शिकारी
लुकिछिपि छरछंदन, अरे, खेलत कहा शिकार ।
जियत सिंह की पीठि पै क्यों न होत असवार ॥ ४२ ॥
लुकि-चिपि मारत, नामरद । पसु-पंछिनु चहुँफेर ।
पकरि पूंछ ललकारकै क्यों न जगावत शेर । ॥ ४३ ॥
अहे अहेरी । यह कहा, कादर करत अहेर ।
क्या न लपकि ललकारि हूँ पकरि पछारत शेर ? ॥ ४४ ॥
नेक जीभ के स्वादुलगि दीन मीन मृग मारि ।
नाम लजावत सिह-स्यों, इमि कायरता धारि ॥ ४५ ॥
लुकिछिपि बैठि मचान पै करत मृगनु पै वार ।
जियत सिह की म्छ को क्यों न उखारत बार ? ॥ ४६ ॥

. पाँचया शतक] बनत बहादुर बादिही दीन मीन मृग मारि । क्यों न भरत-नौ बाघ के गिनत दाँत मुख फारि ॥ ४७ ॥ हम विनुपछ पच्छीनु पै कहा उठावत हाथ । अब के आखेटक, अहो । भये तुमहुँ, जगनाथ । ॥ ४८ ॥ ताकत लपट तीय तन, धरे धनुष हाथ। कहूँ आजुलौं है सुन्यौ मसक मरुत को साथ ॥ ४६ ॥ सहत वादि, कामुक । यहाँ कानन ताप निदाघ । बारनारि बैठाय सँग बाघ ॥५०॥ पै कहा मारिहै वीरता और सुकुमारता बस, काढ़ौ मति म्यान ते यह तीछन तरवार । जानत नहि, ठाढे यहाँ रसिक छैल सुकुमार ॥ ५१ ॥ बादि दिखावत खोलि इत तुपक तीर तरवार । सुरमा मीसी के मीसी के जहाँ बसत बिसाहनहार ॥५२॥ कवच कहा ए धारिहै लचकीले मृदुगात । सुमनहार के भार जे तीन-तीन बल खात || ५३ ॥ कै चढिलै असि-धार पै, कै वनिलै सुकुमार । तुरग पै 'एकसँग भयौ कौन असवार ? ॥ ५४ ॥ Thi *शकुन्तला के गर्भ से उत्पन्न महाराज दुप्यन्त का पुस ।

७६ [वीर सतसई किमि कोमल अंग अोदिहैं असहनीय असि-धाय । जिन पै गहब गुलाब की गडि खरोट परि जाय ॥ ५५ ॥ पोंछि-पछि राख्यौ जिन्हें नित रमाय रस-रंग । समर-घाव ते श्रोदिहै किमि किसलय.से अंग ॥ ५६ ॥ क्योंकरि डाइन डाकिनी कडकड हाड चबाति ? इत तौ मिली अँगूर की ओठनु गडि-गडि जाति ॥ ५७ ॥ जहँ गुलाबहू गात पै गडि छाले करि देत । बलिहारी | बखतरनु के तहाँ नाम तुम लेत ॥ ५८ ॥ "झझकत हिमैं गुलाब कै झ्वा मँचैयत पाई।" या बिधि इत सुकुमारता अब न, दई सरसाइ ॥ ५६ ॥ जाव भलै जरि, जरति जो उरध उसाँसनि देहाँ । तनु, रमतु जो प्रलय-अनलु कै गेह ॥ ६ ॥ चिरजीवी तनु, * छाले परिचे के डरनु सके न हाथ छुवाइ । अझकत हिमैं गुलाब के झंवा झंवयत पाई॥ --बिहारी - + आड़े दै आले बसन , जाड़े की गति । साहसु के-के नेह वस , सखी सबै ढिग जाति ॥ नित संसो हसो वचतु , मनौ सु इहि अनुमानु । बिरह-अगिनि-लपटनु सकतु अपटि न मीचु-सचानु ॥ सुनत पथिक-मुहँ माह-निसि, लुएँ चलति उहिगाम। बिनु वृझे बिनुहीं सुनें, जियत बिचारी बाम ।। -- " -बिहारी पाचवां शतक] होउ गलित वह अंग, जेहि लागति कुसुम-खरोट । चिरजीवौ तनु, सहतु जो पुलकि-पुलकि पवि-चोट ॥ ६१ ॥ राज-ताज को भार किमि सधिहै सिर सुकुमार । डगकु डगत-से चलत जो निज तनुही के भार || ६२ ॥ वीरता और विलासिता निय-पाइल-रवही तुम्हें किय घाइल, रति-पात । सुनि धुकार धौ सानु की हहै कौन हवाल }} ६3 || जिनको-जिय-गाहकु बन्यौ अँग-दाहकु रति-नाह । । असि-बाहकु क्योंकरि बहै हैहैं सहित उमाह ।। ६४ १॥ कहा भयौ इक दुर्ग जो ढायौ रिपु रणधीर । तुम तौ मानिनि-मान-गढ नित ढाहत, रति-बीर । । ६५ ॥ करित मसिमुपी सूति गई तत्र ते व्याकुल भई , पालमु घिदेम, पो धरियो जर क्यो। दूध दही श्रीफल रुपैया धरि थारी माहि", माता मुन माल जयै गरि के टीको दयो । साँदुर विसरि गयो, यध सो कहा, भाङ, तन ते पसी।। या मालन शेतयो। नांदुर ल आई तिया, आँगन में शादी रही, वरके पसारि म भाग हाथ में भयो । . . * में परजी के पार त , इत किन लेसि । युरी लग गुलाय की परिद गात परोठ॥ Fridt ७८ [वीर-सतसई ऐहैं, कहु, केहि काम ए कादर काम-अधीर । तिय-मृग-ईछनहीं जिन्हें हैं अति तीछन तीर ।। ६६ ।। छिन मुख देखत पारसी, छिन साजत सिंगार । कहा कटैहैं सीस ए बने-ठने सरदार ॥६७ ॥ अंत न ऐहैं काम ए रसिक छैल सरदार । रहि जैहैं दरपनु लिये करत साज-सिंगार ॥ ६८ ॥ त्यागि सकत नहि नैक जे चटक-मटक-अभिमान । कहा छाँडिहै युद्ध में ते अजान प्रिय प्रान ॥ ६६ ॥ चटक-मटकही ते तुझे नाहि नेक अवकास । अवसर पे कम्हिी कहा तुम बिलासिता-दास ? ॥ ७० ॥ सुमन-सेज सँग बाल तुम पौढ़े करि' सिंगार । को भीपम-सर-सेज की अब पत-राखनहार ॥ ७१ ॥ उत गढ़-फाटक तोरि रिपु दीनी लूट मचाय । इत लंपट । पट तानि तै पस्यौ तीय उर लाय ॥ ७२ ॥ उत रिपु लूटत राज, इत दोउ मत्त रति माहि । उन गर नाही नहि छुटै, इन गर बाही नाहि ।। ७३ ।। लागत कुटिल कटाच्छन्सर, क्यो न होहि बेहाल | कदत जिहियहि दुसाल करि, सऊ रहत नटसाल ॥ -बिहारी पाँचवाँ शतक] ७९ मान छुट्यौ, धन जन छुट्यौ, छुट्यौ राज आज । मद-प्याली नहिँ छुटी, बलि, बिलासि-सिरताज | || ७४ ॥ आवतु आपु बिनासु तहँ, जहँ बिलसत बिलासु । एक प्रान द्वै देह मनु उभय बिलासु बिनासु । ७५ ॥ जित बिनासु श्रावन चहतु, पठवतु पथम बिलासु । मति बिलासु मुहँ लाइयौ, ऐहै नतरु बिनासु ॥ ७६ ।। नयन-बानही बान अब, भ्रु वही बक कमान । समर केलि बिपरीतही मानत आजु प्रमान ॥ ७७॥ निदरि प्रलय बाढ़त जहाँ विप्लव-वाह-बिलास । टापतही रहि जात तहँ टीप-टाप के दास ॥ ७८ ।। कवि-पतन बरपत विषम अँगार चहुँ, भयौ छार बर बाग । कवि-कोकिल कुहकत तऊ नव ढपति-रति-राग || ७६ ॥ सुख-सपति सब लुटि गयौ, भयौ देस-उर घाय । कंकन-किकिनि का अजौ सुनत झनक कविराय । ॥ ८० ॥ रही जाति जठरागि ते भभरि भाजि अकुलाय । तुमैं परी अभिसार की अजहुँ हाय, रसराय । ॥ ८१ ॥ तिय-कटि-कृसता को कविनु नित बखानु नव कीन । वह तौ छीन भई नहीं, पे इनकी मति छीन ॥ ८२ || ७८ [-धीर-सतसई ऐहैं, कहु, केहि काम ए कादर काम-अधीर । तिय-मृग-ईछनहीं जिन्हें है अति तीछन तीर' ।। ६६ ।। छिन मुख देखत आरसी, छिन साजत सिंगार । कहा कटैहैं सीस ए बने-ठने सरदार ॥६७ ।। अंत न ऐहैं काम ए रसिक छैल सरदार । रहि जैहैं दरपनु लिये करत साज-सिंगार ।। ६८ ॥ त्यागि सकत नहि नैक जे चटक-मटक-अभिमान । कहा छाँडिहै युद्ध में ते अजान प्रिय प्रान ॥ ६६ ॥ चटक-मटकही ते तुझे नाहि नेक अवकास । अवसर पै कम्हिी कहा तुम बिलासिता-दास ? ॥ ७० ॥ सुमन-सेज सँग बाल तुम पौढ़े करि सिंगार । को भीषम-सर-सेज की पत राखनहार ॥ ७१ ।। उत गढ़-फाटक तोरि रिपु दीनी लूट मचाय । इत लंपट | पट तानि तै परयौ तीय उर लाय ॥ ७२ ।। उत रिपु लूटत राज, इत दोउ मत्त रति माहि। उन गर नाही नहि छुटै, इन गर बाही नाहि ।। ७३ ॥ अब लागत कुटिल फटाच्छ-सर, क्यों न होहि बेहाल | फरत जिहियहि दुसाल फरि, सऊ रहत नटसाल ॥ -विहारी

पाँचौं शतक]
पै
मान छुट्यौ, धन जन छुट्यौ, छुट्यौ राजहू आज ।
मद-प्याली नहिँ छुटी, बलि, बिलासि-सिरताज । ॥ ७४ ।।
आवतु आपु बिनासु तहँ, जहँ बिलमत बिलासु ।
एक प्रान है देह मनु उभय बिलासु बिनासु ॥ ५ ॥
जित बिनासु श्रावन चहतु, पठवतु प्रथम बिलासु ।
मति विलासु मुहँ लाइयौ, ऐहे नतरु बिनासु ॥ ७६ ॥
नयन-बानही बान अब, भ्रु वही बक कमान ।
समर केलि बिपरीतही मानत
श्राजु प्रमान ।। ७७॥
निदरि प्रलय बादत जहाँ बिप्लव-बाद-बिनास ।
टापतही रहि जात तहँ टीप-टाप के दास ॥ ७८ ।।
कवि-पतन
बरपत विषम अगार चहुँ, भयो छार बर बाग ।
कवि-कोकिल कुहकत तऊ नव
कुहकत तऊ नव दपति-रति-राग ॥ ७९ ॥
सुख-सपति सब लुटि गयौ, भयौ देस-उर धाय ।
कंकन-किकिनि का अजौ सुनत झनक कविराय ।। ८० ॥
रही जाति जठरागि ते भभरि भाजि अकुलाय ।
तुहौं परी अभिसार की अजहुँ हाय, रसराय । ॥ १ ॥
तिय-कटि-कृसता को कविनु नित बखानु नव कीन ।
वह तौ छीन भई नहीं, पै इनकी मति छीन ॥ ८ ॥

[धीर-सतसई ऐहैं, कहु, केहि काम ए कादर काम-अधीर । तिय-मृग-ईछनहीं जिन्हें है अति तीछन तीर ।। ६६ ।। छिन मुख देखत पारसी, छिन साजत सिंगार । कहा कटैहैं सीस ए बने-ठने सरदार ॥ ६७ ॥ अंत न ऐहै काम ए रसिक छैल सरदार । रहि जैहैं दरपनु लिये करत साज-सिंगार ॥ ६८ ॥ त्यागि सकत नहि नैक जे चटक-मटक-अभिमान । कहा छाँडिह युद्ध में ते अजान प्रिय प्रान ॥ ६६ ॥ चटक-मटकही ते तुझै नाहि नैक अवकास । अवसर पै करिहौ कहा तुम बिलासिता-दास ? ॥ ७० ॥ सुमन-सेज सँग बाल तुम पौढ़े करि सिंगार । को भीषम-सर-सेज की पत राखनहार ॥ १ ॥ उत गढ-फाटक तोरि रिपु दीनी लूट मचाय । इत लंपट । पट तानि तै परयौ तीय उर लाय ॥ ७२ ।। उत रिपु लुटत राज, इत दोउ मत्त रति माहि। उन गर नाही नहि छुटै, इन गर बाही नाहि ॥ ७३ ॥ अब * लागत कुटिल कटाच्छ-सर, क्यो न होहि बेहाल | फदत जिहियहि दुसाल करि,सऊ रहत नटसाल ॥ -बिहारी पविना शतक पै मान छुट्यौ, धन जन छुट्यौ, छुट्यौ राजहू अाज । मद-प्याली नहिँ छुटी, बलि, बिलासि-सिरताज । ॥ ७४ ॥ श्रावतु आपु बिनासु तह, जहँ बिलमत बिनासु । एक प्रान है देह मनु उभय विलासु बिनासु ॥ ७५ ।। जित बिनासु श्रावन चहतु, पठवतु पथम बिलासु । मति बिलासु मुहँ लाइयौ, ऐहै नतरु बिनासु ॥ ७६ ।। नयन-बानही बान अब, भ्र वही बक कमान । समर केलि बिपरीतही मानत श्राजु प्रमान ॥ ७७|| निदरि प्रलय बाढ़त जहाँ बिप्लव-वाद-बिलास । टापतही रहि जात तहँ टीप-टाप के दास ।। ७८ ।। कवि-पतन बरपत विषम अँगार चहुँ, भयो छार बर बाग । कवि-कोकिल कुहकत तऊ नव दपति-रति-राग [॥ ७६ ॥ सुख-सपति सब लुटि गयौ, भयौ देस-उर धाय । कंकन-किंकिनि का अजी सुनत झनक कविराय । ॥ ८० ॥ रही जाति जठरागि तें भभरि भाजि अकुलाय । तुहीँ परी अभिसार की अजहुँ हाय, रसराय । ॥ ८१ ॥ तिय-कटि-कृसता को कविनु नित बखानु नव कीन । । यह तौ छीन भई नहीं, पै इनकी मति छीन ॥८२ ।।

[-धीर-सतसई ऐहैं, कहु, केहि काम ए कादर काम-अधीर । तिय-मृग-ईछनहीं जिन्है है अति तीछन तीर ।। ६६ ।। छिन मुख देखत पारसी, छिन साजत सिंगार । कहा कटैहै सीस ए बने-ठने सरदार ॥ ६७ ॥ अंत न ऐहैं काम ए रसिक छैल सरदार । रहि जैहै दरपनु लिये करत साज-सिंगार ।। ६८ ॥ त्यागि सकत नहि नैक जे चटक-मटक-अभिमान । कहा छाँडिहै युद्ध में ते अजान प्रिय प्रान ॥ ६६ ।। चटक-मटकही ते तुझे नाहि नैक अवकास । अवसर पे कम्हिी कहा तुम बिलासिता-दास । ॥ ७० ॥ सुमन-सेज सँग बाल तुम पौढ़े करि सिंगार । को भीषम-सर-सेज की पत राखनहार ।। ७१ ॥ उत गढ-फाटक तोरि रिपु दीनी लूट मचाय । इत लपट | पट तानि तै परयौ तीय उर लाय ।। ७२ ॥ उत रिपु लुटत राज, इत दोउ मत्त रति माहि। उन गर नाही नहि छुटै, इन गर बाही नाहि ॥ ७३ ॥ স্বল্প * लागत कुटिल कटाच्छ सर, क्यों न होहि बेहाल । कवत जिहियहिंदुसाल करि, तऊ रहत नटसाल ॥ -बिहारी पाँचवां शतक] . मान छुट्यौ, धन जन छुट्यौ, छुट्यौ राजहू अाज । पै मद-प्याली नहिँ छुटी, बलि, बिलासि-सिरताज | || ७४ ॥ आवतु आपु बिनासु तहँ, जहँ बिलमंत बिलासु । एक प्रान द्वै देह मनु उभय विलासु देह मनु उभय विलासु बिनासु ॥७५ ॥ जित बिनासु श्रावन चहतु, पठवतु प्रथम बिलासु । मति बिलासु मुहँ लाइयौ, ऐहे नतरु गिनासु ॥ ७६ ॥ नयन-वानही बान अब, भ्रवही बक कमान । समर केलि बिपरीतही मानत ग्राजु प्रमान ॥७७॥ निदरि प्रलय बाढ़त जहाँ बिप्लव-बाद-बिलास । दापनही रहि जात तहँ टीप-टाप के दास ॥ ७८॥ कवि-पतन बरपत बिपम अँगार चहुँ, भयौ छार बर बाग । कवि-कोकिल कुहकत तऊ नत्र दपति-रति-राग ॥ ६ ॥ सुख-सपति सब लुटि गयौ, भयौ देस-उर धाय । किन-किकिनि का अजी सुनत झनक कविराय | || ८० ॥ ही जाति जठरागि ते भभरि भाजि अकुलाय । मैं परी अभिसार की अजहुँ हाय, रसराय । ॥ ८१ ।। य-कटि-कूसता कौ कविनु नित बखानु नव कीन । ह तौ छीन भई नहीं, पे इनकी मति छीन ॥ ८२ ।।

८० [वीर-सतसई कहत अकथ कटि छीन, कै कनक-कूट कुच पीन । छीन-पीन के बीच वै भये आजु मति-हीन ॥८३ ॥ नीति-बिहूनो राज ज्यौं, सिसु ऊनो बिनु प्यार । त्यौ अब कुच-कटि-कवित बिनु सूनो कवि-दरबार ॥ ८४॥ जागत-सोबत, स्वप्नहूँ, चलत-फिरत दिन-रैन । कुच-कटि पै लागे रहैं इन कवीनु के नैन ॥ ५ ॥ आज-कालि के नौल कवि सुठि सुंदर सुकुमार । बूढ़े भूषण पै करै किमि कटाच्छ-मृदु-बार ॥ ८६ ।। वारमुखी में वार अब, युवति-मान में मान । रँग अबीर में बीर त्यौ कहियत कोस प्रमान ॥७॥ कमल-हार, झीने बसन, मधुर बेनु अब छाँडि । मौलि-माल, बजर कवच, तुमुल-सख कवि, माँडि ॥ ८८ ॥ तजि अजहूँ अभिसारिका, रतिगुप्तादिक, मन्द । भजि भद्रा, जयदा सदा शक्ति, छाँडि जग-द्वन्द ॥८६ ।। करन किधौ उपहासु, कै ठकुरसुहाती आज । कहा जानि या भीरु को कहत भीम, कविराज ।। ६० ।। * युधि अनुमान, प्रमान श्रुति किये नीठि ठहराइ । सम्म कटि परग्रा से अल्ख, लस्त्री नहि जाइ । ----बिहारी

पाचवा शतक]
अब नख-सिख-सिङ्गार में, कवि-जन | कछु स्म नाहिँ ।
जूठन चाटत तुम तऊ मिलि कूकर-कुल माहिँ ॥ ६१ ।।
मरदाने के कवित ए कहिहै क्यों मति-मन्द ।
बैठि जनाने पढ़त जे नित नख-सिख के छंट ॥ १२ ॥
व्यर्थ चेष्टा
काहि सुनावत बीररसु, वृथा करत चित खंद ।
हैं ए रसिक सिँगार के, सुनत नायिका-भेद ॥ ६३ ॥
कहा बकत इत मूढ़ ! तू, क्यों न रहत गहि मौन ।
सुनिहै रंस
सरस समाज में निरस युद्ध-रस कौन ? || ६४ ॥
,
अनहोनी
बंधवाये सुत सिंह के बिनु रद-नख करवाय ।
सस-सगाल-हाथनि, अहो । भलो नाथ, यह न्याय ॥ १५ ॥
चूमत चरन सियार के गज-मद-महन शेर ।
झपटत बाजनु पै लवा, अहो । दिननु के फेर ॥ ६६ ||
दई । दिननु के फेर में भई औरही साज !
।
हुते सिलहखाने जहाँ, तहँ मयखाने नाज ॥ ७ ॥
भली, नाथ, लीला रची । भलो अनाप्यो गग ।
नर श्रोही सिर प्रोदनी, नारिन बाँधी पाग ॥ ८ ॥

૮૨
[धीर-सतर्सा
दुर्लभ पदार्थ
किम्मत हिम्मत की नहीं, नहिं बल-बीरज-तोल ।
आँक्यो गयौ न आजुलौं, बीर-मौलि को मोल ॥ ६E !!
फरति न हिम्मत खेत में, बहति न असि-व्रत-धार ।
बल-बिक्रम की बोरियाँ बिकति न हाट-बजार ॥ १० ॥

छठा शतक
नाद-वन्दना
सहस-फनी-फुङ्कार
श्री
काली-असि-झङ्कार ।
बन्दों हनु-हुकार,
त्यौं
राघव-धनु-टङ्कार ।। १ ।।
वे और ये
जिनकी आँखन तें रहे बरसत श्रोज-अंगार ।
तिनके बंसज झेप तें हग झाँपत सुकुमार ॥ २ ॥
रहे रँगत रिपु-रुधिर सों समर केस निरवारि
तिनके कुल अब हीजरे काढत माँग सँवारि ॥ ३ ॥
धारत हे रण-भूमि जे अरि-मुंडनु को हार ।
तिनक कुलके करत अब सरस सुमन-सिंगार ॥ ४ ॥
रह्यौ सदा जिन हाथ की यार एक हथयार ।
लखियतु अब तिन करनु में रमन-बाल-हित हार ॥ ५ ॥
झूमत हे जहँ मत्त है सहजसूर दिनमैन ।
लटकि लजीले छैल तहँ मटकि नचायत नेन ॥ ६ ॥

[चीर-सतसई कितना भारी अंतर! मरत पूत उत दूध बिनु, बिलपत बिकल किसान । इत बैठ्यौ, सठ 1 करत तँ सँग कामिनि मद-पान ॥ ७ ॥ बृष-रबि-त्रातप-तपि कृषक मरत कलपि बिनु नीर । इत लेपत तुम अरगजै, बिरमि उसीर-कुटीर ॥ ८ ॥ उत हाकिम रैयत-रकत करत पान उर चीर । इत पीवत तें मद, अरे नृपति भनोज-अधीर | ॥ ६ ॥ उत आतप अरु तपत भू, इत उसीर घनसार । रैयत राजा में, कहौ, हहै किमि सहकार ॥ १० ॥ उत भूखे ऋदन करत कलपि किसान मजूर । इत मसनद पै मद-छके सुनत अलाप हुजूर ॥ ११ ॥ निर्जीव राजपूत दलित सीस पै बाँधिकै रजपूती की पारा । । कियौ, निलज । नट-लौं तऊ बल-बिक्रम को स्वाँग ॥ १२ ॥ तुम रजपूतनु तें कहा रजपूती की आस ? प्रमदा-मदिरा-माँस के भये आजु तुम दास ।। १३ ।।, कुल में दाग लगाय, धिक । बन्यौ फिरत रजपूत । गरि-गरि गिर्यो न गर्भ तें कादर. ॥ १४ ॥ .

छठा शतक]
मजबूती तौ कहुँ नहीं, है सब काम निकाम ।
कहिबे को बस रहि गयौ रजपूती को नाम ॥ १५ ॥
लखि जिनके मजबूत भुज काँपत ह यम-दूत ।
भारत-भू पै अब कहाँ वै बाँके रजपूत ॥ १६ ॥
कहा तुम्हें तरवार सों, है सब सूखी शान ।
मूठ सुनहरी चाहिए, और मखमली म्यान ॥ १७ ॥
कुल-कलंक कादर कुटिल व्यभिचारी बिनलाज ।
करत दुष्ट दावा तऊ रजपूती को आज ॥ १८ ॥
चाटत जग-पग खान-ज्यौ, फिरत हलावत पूँछ ।
बनत कहा अब मरद तै, यो मरोरिक मूंछ ॥ १६ ॥
धिक्कार
तो देखत तुव भगिनि के बचत पामर केस ।
जानि परत, या बाहु में रह्यौ न बल को लेस ॥ २० ॥
रे निलज्ज । जिनके अछत, अरिहिं झुकायौ माथ ।
अब तिन मूंछनु पै कहा पुनि-पुनि फेरत हाथ ॥ २१ ॥
निज चोटी-बेटीन की सके राखि नहिँ लाज ।
धिक धिक, ठाढ़ी मूंछ ए, धिक धिक, डाड़ी श्राज ॥ २२ ॥
भखत माँसु, मदिरा पियत, ताकत पर-तिय-द्वार ।
धिक, तेरो जीवन-मरन,
लपट चोर लबार । ॥ २३ ॥

-६
[वीर-सतसई
।
मरिहै नहिँ कबहूँ कहा, धंसत न जो रण माँझ ।
उपज्यौ कूख कुपूत तें, रही न क्यों बिधि । बाँझ ॥ २४ ॥
भाज्यौ पीठि दिखाय यौ, धस्यौ न जूझन माँझ ।
तो सम कादर-जनन तें, भलि छतानी बाँझ ॥ २५ ॥
जरति जाति जठरागि तें, जहँ-तहँ हाहाकार ।
देत भोज ते नित तऊ साजि साज-दरबार ॥ २६ ॥
देखि दीन दुर्दलनहूँ उठत न जाकौ बाहु ।
ग्रसतु तासु सरबसु-ससिहिँ पर-प्रताप-बल-राहु ॥ २७ ॥'
निजमुख निज कथनी कथत, नितप्रति सौ-सौ बार ।
भट तें भाट भये भले बिरद-पुकारनहार ॥ २८ ॥
अछत कर्ण, कृप, द्रोण त्यौं भीष्म, पार्थ अरु भीम ।
खिंचि पंचाली-पटु रह्यौ, धिक बल-बीरज-सीम ॥ २६ ॥
आज कहाँ
पराधीनता-जलधि में
वृडत सुकृत-समाज ।
कहाँ उधारक धरम कौ, तारक आज जहाज ॥ ३० ॥
दै हाँके हाँके हठी, रण-थल सुभट अजैत ।
निपट निसाँके अब कहाँ, बल-बाँके बानैत ॥ ३१ ॥
कहँ अब रण-सरि-पैरिबो, कहँ बल-विक्रम-तेज ।
रवि-मंडल-भेदनु कहाँ, कहँ पौदनु सर-सेज ॥ ३२ ॥

छठा शतक]
कह प्रताप, कहँ दाप वह, कहाँ पान कह बान ?
कहाँ ऐंड, कहँ मेंड अब, है सब सूखी शान ॥ ३३ ॥
नहिं बल, नहिँ विक्रम कहूँ, जहँ-तहँ दीन अधीन ।
भई भूमि यह आजु का साँचेहुँ बीर-विहीन ॥ ३४ ॥
अब, कोयल । वह ऋतु कहाँ, कह कृजन तरु-डार ?
वह रसाल-रस-बौर कहँ, वह बन-विहँग-बिहार ॥ ३५ ॥
धीर बीर-बर वै कहाँ, हठ-हमीर जग-बीच ।
अब तौ इत नित बढि रहे निलज नराकृति नीच ॥ ३६ ॥
परशुराम-स्मरण
जित देखौ तित बढि रहे कुल-कुठार भुवि-भार ।
क्यों न होत पुनि श्राजु वह परसुराम-अवतार ॥ ३७ ॥
देखि-देखि मद-चूर ए कादर, कूर कुसाज ।
जामदग्न्य के परम की आवनि सुधि पुनि श्राज ॥ ३८ ॥
भावी इतिहास
देखि दास-ही-दास चहुँ, इमि क्यों होत निरास ।
पढ़िहौ तुम कछु औरही या युग को इतिहास ॥ ३ ॥
हैहै पुनि स्वाधीन तुम, सदा न रहिही दास ।
या युग के बलिदान को लिखियौ तब इतिहास ॥ ४० ॥

८ [वीर-सतसई • व्यर्थ नाहिँ धर्म, नहिँ देस-हित, नाहिँ जाति कौ हेत । निज-निज स्वारथ पै, अहो । रँगत रकत सों खेत ॥ ४१ ॥ करत शक्ति-व्यय व्यर्थ जे बिनु बिबेक, बिनु हेतु | भेटत ते सुख-सान्ति कौ सहज सनातन सेतु ॥ ४२ ॥ परधरती परतीय पै चेतहुँ भये अचेत । कटे न केते सूरमा, रँगे न केते खेत ॥ ४३ ॥ फूट । फूट्यौ, पै टूट्यौ न जो, भयौ कौन अस मर्द । जुग के बिलगेहूँ कहूँ रही खेल में नई ॥ ४४ ॥ राजपूत, सिख, मरहठे नठे बुंदेल, बघेल । अरी फूट ! या देस में रच्यौ कौन यह खेल ॥ ४५ ॥ मेरु-दंड या देस को कुलिस-खंड अति चंड । सहजै, हा । गृह-फूट ते भयौ टूटि सतखंड ॥ ४६ ॥ “जग में घर की फूट खुरी। घर की फुटहि सो बिनसाई सुबरन-लक पुरी॥ फूटहि सौ सय कौरव नासे भारत-युद्ध भयो । जाको घाटो या भारत में भबलौं नहि पुजयौ ॥ फूटहि सो जयचन्द बुलायौ जवनन भारत-धाम । जाको फल भयलों भोगत सन आरज होड गुलाम । फूटहि सो नवनद शिनासे, गयो मगध को राज । चन्द्रगुप्त को नामन घाली भापु नये सहसाज ॥

तिक भयौ बिभीपण-पुंज ते यह भारत-ब्रह्माण्ड । क्यों न होय गृह-भेद ते गृह-गृह लंका-काण्ड ॥ ४७ ॥ है जहँ 'आठ कनौजिया नौ चूल्हें' की रीति । तहाँ परस्पर प्रीति की कहा पढ़ावत नीति ॥ ४८ ॥ हैं ठाढ़े जा डार पै, काटत सोइ मतिमंद । भारत-भाग ते भरे भूरि जयचद ॥ ४६ || घर-घर विजया दशमी जहाँ पराजयही विजय मानत बिजय मानत सभ्य-समाज । कहा जानि आयौ तहाँ फेरि दसहरो आज ॥ ५० ॥ नीलकंठ तन पेखि धरु नीलकठ-सुभध्यान । तुमहूँ परहित-हेतु यौं करौ हलाहल-पान |॥५१॥ अव समय कहाँ? लियौ तोरि दृढ़ गढ़ जवै, कहा सोचि तव जात ? दीप सँजोवत अब कहा, जब है गयौ प्रभात ॥ ५२ ।। आजु-कालि का ते करत, भये न कबहुँ तयार । घलाधली उत है रही, इत माँजत हथयार ॥ ५३॥ ॥ जो जग में धन मानऔर यह आपुन रायनहोय । सो अपने घर में भूलेई पूट को मति कोप ।। --भारतेन्दु हरिधान * विजयादशमी के दिन पीला पनी म दर्शन सुभ भोर मांगलिश माना ITET १२ [वीर-सतसई अब-अब तो कब तें कहत, सध्यौ न अबलौं तंत्र । वह अब कब ऐहै, जबै हहै सिद्ध ह है सिद्ध सुमंत्र ॥ ५४ ॥ गीता-रहस्य अनासक्ति सों जोरिये जोरिये कार्यकर्म-अनुरक्ति । ज्यौं-त्यौं करि आराधिये, सुचित साधिये शक्ति ॥ ५५ ॥ 'अद्वैतामृत-वर्षिणी' विज्ञ-समाज । जानत गीता अज्ञ हम केवल ' राष्ट्र-जहाज ॥ ५६ ॥ मानत अयोग्य नरेश अपनेही तनु की न जौ तुम पै होति सँभार । झूठमूठ फिरि बनत क्यों प्रजा-राज-रखवार ? ॥ ५७ ॥ रैयत-भार सँभारिहैं किमि सुकंध सुकुमार । जीवनहू जब हैरह्यौ नितही भार पहार ॥ ५८ ॥ जिमि आँधर-कर आरसी, जिमि बानर-कर बीन । तिमि रैयत अवरेखिये नृपति-प्रमत्त-अधीन ॥ ५६ ॥ नहि चाहक अपनेनु के, नहि गाहक-रखवार । ए तो मधुप बिदेस के रसिक रिझावनहार ॥ ६ ॥ १ * रास्मादसत. सतत कार्य कर्म समाचर। [गीता] सिनऊ के मुममिव मिस मगर वाभिमसी गभाना mely छठा शतक] चोरभोग्या यमुधरा। या बसुधा को भाग भरि भोगत भुज मजबूत । कहा भोगिहैं भूमि ए कादर कर कुपूत ॥ ६१ ॥ शायर औध-नवाबों की करूं कहा तारीफ । राज काजु को पीठि दै सोचत बैठि रदीफ ॥ ६२ ।। नहि बाँधतु बटपार, जे रैयत करत खराब । बाँधतु बैठ्यौ काफिया, वाजिदयाली नवाच ॥ ६३ ॥ भूलेहुँ कबहुँ मदान्ध को जनि दीजो अधिकार । मतवारे के हाथ कहुँ सोंपत कोउ हथयार ॥ ६४ ॥ स्वदेश-विद्रोह भूलेहु कबहु न जाइये देस-विमुखजन पास । देस-बिरोधी-सग ते भलो नरक को बास ॥६५॥ सुख सो करि लीजै सहन कोटिन कठिन कलेम । विधिना । वैन मिलाइयौ, जे नासत निज देन ॥ ६६ ॥ सिव-बिरंचि-हरि-लोकहूँ विपत सुनावै रोय । पै स्वदेस-बिद्रोहि कों मरनु न देह कोय ।। ६७ ॥ भारतर 'पोथे।

[वीर-सतसई गो-नाश गो-धन, गोवईन-धरन, गोकुलेस, गोपाल । रंगत-गत गो-रकत सों भई भूमि तुव लाल ॥ ६८ ॥ ॥ लाल । तिहारी लाडिली, तुव गोकुल की गाय । कटति आजु गोपाल | हा । क्यों न बचावत धाय ॥ ६६ ॥ चोरि-चोरि चाख्यौ जहाँ माखन, गोकुल-राज । टुक, देखौ गो-रुधिर की बहति धार तहँ अाज ॥ ७० ।। गेरत हे, गोपाल । तुम जहँ केसर घनसार । टुक, देखौ तहँ आजु हरि | बहति गो-रुधिर-धार ।, ७१ ॥ दंडक-बन मुनि-अस्थि लखि दैत्य-दलन-प्रन-कीन । देखत गो-बध नाथ | क्यों आजु मौन गहि लीन ॥ ७२ ॥ क्या से क्या? जहँ कीनों, गोपाल । तुम निज गो-रस-छिरकाव । देखि अाजु मरुभूमि-सो क्यों न होत हिय घाव ? ॥ ७३ ॥ * अस्थि-समूह देखि रघुराया। पूछा मुनिन्ह लागि अति दाया ।। जानतहू पूछिय कस स्वामी। सबदरसी तुम अतरजामी॥ निसिचर-निकर सकल मुनि खाये । सुनि ग्घुनाथ नयन-जल छाये ॥ निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन । सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाय-जाय सुख दीन । [रामचरितमानस] इन सठ मठधारीनु पै तोहू गिरति न गाज ॥ ७७ ।। फुकत जे गाजो, अभख भग्वि, भभूतिया मत। छठा शतक] २३ जहँ लुढ़कायौ, लाल | तुम नित गो-रस, गोपाल । मिलै न जलहू आजु तह, ग्वाल-वाल बेहाल ॥ ७४ ॥ जगत् का अमिथ्यात्व परखतु जीवन-जौहरी प्रान-रत्न जहँ गृढ़ । ता साँचे संसार को कहत असाँचो मूढ़ ।। ७५ ॥ जा जग की रोटीन ते सूझतु अलख श्रनत । मिथ्या ताकों कहत ए निलज निठल्ले संत ॥ ७६ ॥ कादर साधु-सत कनक-कामिनी में पगे, रंगे राग में राग में आज । हैहै रामानदे ॥ ७ ॥ स्वाग्यानन्द। श्रातमानन्द || ७६॥ कथत मथत बेदान्त, पै रचत मंद दर-छद । कहु, किमि कामानट ए कनक-कामिनी-दास साधु रामदास बिरले बिरले कहूँ, श्राजु लोलुप लंपट धूत ते यने फिरत अवश्न म ४ [वीर-सतसई त्याग और आत्मानुभूति 'त्याग-न्याग' कत बकत, रे, राग त्याग अति दूर । त्याग-तागही ते बँधे यती सती अति सूर ॥ ८१ ॥ लेत आत्म-अनुभूति-रस सूर सबल स्वाधीन । सके न करि कबहूँ कहूँ आत्म-लाभु बलहीन ॥ ८२ ॥ अळूत अपनावत अजहूँ न जे अपने अंग अछूत । क्यों करि हहै छूत वै करि कारी करतूत ॥ ८३ ॥ जिन पायनु ते जान्हवी भई प्रगटि जग-पूत । तिनही ते प्रगटे न ए तुम्हरे अनुज अछत ? ॥ ८४ ॥ सुर-सरि ो अत्यज दुहूँ अच्युत-पद-संभूत । भयौ छूत, श्रौ दूजो रहयौ अछूत ? ॥ ८५ ।। जौ दोउनु को एकही कह्यौ जनक जग-बन्द । तौ सुर-सरि ते घटि कहा यह अछूत, द्विज मन्द | ॥ ८६ ॥ महा असिव हू सिव भयौ जाहि सीस पै धारि । छुअत न तासु सहोदरनु, रे द्विज । कहा बिचारि ॥ ८७ ॥ एक क्यों । *नायमामा यलहीन हाय 18 [उपनिषद् ] ।

छठा शतक] मगला और अमगला हाट-बाट नित बैठि निज जोबनु बेचनवारि । कही जाति या देस में श्राजु 'मगला' नारि ॥ ८ ॥ बिधवा तरुन-तपस्विनी असि-व्रत-पालनहारि । कही जाति या जाति में, हा । 'अमगला नारि ॥ ८६ ॥ बाल विधवा जहाँ बाल-विधवा-हियें रहे रहे धंधकि अगार । सुख-सीतलता को तहाँ करिहौ किमि सचार ? ॥ ६ ॥ भलै सुधा सीची तहाँ, फलु न लागिहै कोय । जहाँ बाल-विधवान को अश्रु-पात नित होय ॥ ११ ॥ सुर-तरुहू के फरन की मति कीजो उत आस । जाय बाल-विधवा निकसि जित कै भरति उसाँस ।। ६२ ।। श्वेत और श्याम उन प्यारे गोरेनु को गाहकु सबु ससारु । हम न्यारे कारेनु को कारो कान्ह अधार ।। ६३ ।। * गोरी को गोरे लागत जग अतिही प्यारे। मो कारी को कारे तुम यननु के तारे । उनकों तो संसार है , मो दुखिया को कोन । पहिये कहा विचार है , जो नुम माघी मौन ॥ -सत्यनागयण फविरान , [वीर-सतसई पै तन कारो, कारो कुदिन, कारो कुल, गृह, गोत कुरूप कारेनु को हियो न कारो होत ॥ ६४ ॥ कौन काम के सेत धन, नीरस निपट निसार । कारेही धन स्याम-लौ बरसावत रस-धार ॥ ९५ ॥ व्यर्थ गर्व अहे । गरब कत करत तूं खरब पाइ अधिकार । रहे न जग दसकंध-से दिग-बिजयी जुग चार ॥ ६६ ।। कनक-पुरी जब लंक-सी झुरी अछत दसकंध । तुव झोपरियाँ काँस की कौन पूछिहै, अंध । ॥ १७ ॥ दीन और दीनबधु-शरण चूसि गरीबनु को लुहू किये गुनाह दराज । गहत गरीब-निवाज के कहा जानि पग आज ॥ १८ ॥ दीननु देखि धिनात जे, नहि दीननु से काम । कहा जानि ते लेत हैं दीनबन्धु को नाम ॥ ६ ॥ जाने कहा सेइ राज दरबार । उनकै तौ आधार बस दीनबन्धु को द्वार ॥१०॥ दीन-हीन जाने सातवाँ शतक केसरी-वन्दना गौरी-कर-लालितु सदा, पसुपति-पालितु जोय । दनुज-दमनु दारुन दरौ दुरित केसरी सोय ॥१॥ विविध किये भीष्म पै अनल-लौ क्यों हरि, नैन रिसाय ? जानत हौ, ब्रज-दौ वहै दियौ दृगनि दरसाय' ॥ २ ॥ जाव भलै कुरुराज धारि दुत-वरवेस । जइयो भूलि न कहुँ वहाँ, केसब । द्रौपदि-केस ॥ ३ ॥ व्योम-बान सररात, औ तडकि तोप तररात । सुधिर अथिर थहरात त्यौ दुर्ग दीह अररात ॥ ४ ॥ पै * 'दावानर-पान' के सबंध की महाकी A-- सस्त्रि, मोहति गोपाल ये उर गुज not बाहर रमति ममो पिये दागाल की म ९ ८ [वीर-सतसई । काम न आये श्राजुलौं आजुलौं है अनाथ-रखवार । दिये तोहि भुजदंड ए, कहा जानि करतार ॥ ५ ॥ लेखेंही ऋतु लेखियतु, नितप्रति ग्रीषम साथ । जठर-ज्वालतें जरि रहे हम अनाथ, जगनाथ ॥ ६ ॥ कोरी भोरी भोरी भावना भावना ऐहै काम न आज । बिनु साधै सुचि साधना नहिं सरिहै कछु काज ॥ ७ ॥ बलु साँचो निज बाहु-बलु, सीस-दानु सतदानु । त्यो साँचो सुठि ध्यानु इक पारथ-सारथि-ध्यानु ॥ ८ ॥ बिनामान तजि दीजियौ स्वर्गहुँ सुकृत-समेत । रहौ मान तौ कीजियौ नरकहुँ नित्य निकेत ॥ ६ ॥ अंतहुँ अरिहि न सौंपियौ, करियौ प्रन-प्रतिपाल । निज भावरि की भामिनी, निज कर की करबाल ।। १० ।। बीरबधू । तुव सौत वह बिजय-बधू नवबाल । तासु गरें गेरति तऊ कहा जानि रति-माल ॥ १ ॥ भ्रमित भीत अरि-नारियाँ सगबग भाजति जाहिँ । श्रागे देखति नाहिँ, त्यौ पाई हेरति नाहिँ ॥ १२ ॥ । पताही तिथि पाइयत, वा घर के चपास । नितप्रति पून्योही रहति, आनन ओप उजास ॥ -विहारी सातवाँ शतक] २ ९ दनुज-दलन सौमित्रि-सर, मारुति-मुष्टि-प्रहार । भीष्म-अतुल बिक्रम, तिहूँ ब्रह्मचर्य-व्रत-सार ॥ १३ ॥ दृगनि ओज-लाली नसे, रुधिर-पियाली हाथ । काल-नटी काली-किलकि नटति कपाली साथ ॥ १४ ॥ साधतु साधनु एकही तजि अनेक बुधि-सीम । धनुप-सिद्ध अर्जुन भयौ, अर्जुन भयौ, गदा-सिह भो भीम ॥ १५ ॥ छुद्र वातहू वृहत की हे जग जानन-जोग । बन-सिहन के खाँद' हू खोजत-नापत लोग ॥ १६ ॥ चित्र आर्य-साम्राज्य को सक्यौ न कोउ उतारि ? चीन-ग्रीसहू के गये चतुर चितेगे हारि ॥ १७ ॥ है सबलनु को सूल जो करतु निवल-पतिपाल । बीर-जननि को लाल सो अहै धर्म की ढाल ॥ १८ ॥ करै जाति स्वाधीन जो, साँचो सोइ सुपूत । केते नहीं कायर कूर कुपूत ॥ १६ ॥ होय न, हरि । जा देस में बज्रपानि बलि-सीस । लावनिता ललनान को तहँ न दीजियौ, ईस । ॥२०॥ यौतौ, कहु, बुन्देलखण्डी शब्द, पैरों के चिह। निशॉग फाहियान, इरिस इत्यादि चीन के एव मेगास्थनी। आदि गीम यानी।

१०० [वीर-सतसई . ऐहै याही ठौर हम, कहा फिरे जग होत । जैसे पंछी पोत कौ उडि श्रावतु पुनि पोत ॥ २१ ॥ देस रसातल जाय किन, इत नित नौल बसत । इन कवीनु की कामिनी रही लाय उर कत ।। २२ ॥ जिन समसेरन ते कबौ कटे दुवन-सिर, हाय । तिन ते काटत घासु तुम अब हँसिया गढ़वाय ॥ २३ ॥ को न अनय-मग पगु धर्यो लहि इहि कुमति-कुदानु ? न्याय-भूष्ट मे भीप्महू मखि दुर्योधन-धानु ।। २४ ।। अथयौ सो अथयौ, न पुनि उनयौ भीषम-भान आर्य-शक्ति-जय-पद्मिनी परी तबहि ते म्लान ॥ २५॥ तिथि-संबत पुरखानु के सुनि चौंकत चकराय । मनु गाथा सस-सृङ्ग की तुझै सुनाई आय ॥ २६ ॥ भीरु छिपावतु जीव ज्यौं, कृपनु छिपावतु दामु । सूर छिपावतु शक्ति त्यौं, चतुर छिपावतु नामु ॥ २७ ॥ राम-रावरण-समर वारिद-नाद-विहीन । भारत-युद्ध अपूर्ण त्यौं बिना कर्ण प्रण-पीन ॥ २८ ॥ 'जराधीन, अँगछीन हौं, दीन, दत-नख-हीन ।' नहिं ऐसी चिंता कहूँ कबहुँ केहरी कीन ॥ २६ ॥ कहाँ सपावै। जैसे उडि जहाज को पछी पुनि जहाज पै आवै ।। यथा * मेरो मनु अनत -सूरदास सातमा शतक ] या कलि में बलि-धर्म को कियौ दोड उद्धार । गहिरवार पचम* बली, अरु जगदेव पवार ॥ ३० ॥ रचि-रचि कोरी कल्पना बहुत जल्प ना मूद सहज सती अरु सूर को गति-रहस्य अति गृह ॥ ३१ ॥ निबल, निरुद्यम, निर्धनी, नास्तिक, निपट निरास । जड, कादर करि देतु है नरहिं अधविश्वास ॥ ३२ ॥ रकत-मॉसु सब भखि लियौ, पंजर डार्यो तारि । कहा मिलैगो तोहि अब, निर्दय । हाड चिचोरि ॥ ३३ ॥ भाजत भग्गुल भभरि जहँ, खुलि खेलत तहँ बीर । जरत सुरासुर जाहि लखि, पियत ताहि सिव धीर ॥ ३४ ॥ कठिन राम को काम है, सहज राम को नाम । करत राम को काम जे, परत राम सों काम ॥ ३५ ॥ मतवारे सब है रहे मतवारे मत माहिँ । सिर उतारि सतधर्म पै कोउ चहावत नाहिँ ॥ ३६ ॥ * काशीश्वर वीरभद्र गहिरवार का सबसे छोटा पुस जगदास था। इसे पचम भी रहा हैं । जगदासने अपने भाइयो में अपमानित होकर विध्यवासिनी देवी को अपना सिर या IET, पर देवीो प्रकट हो तलमार पकड़ ली आर इस घरबा दिया कि "जा, नेरी जय होगी और सरे पर मध्यभारत पर राज्य करेगे।' पचमने जो सग अपना सिर काटन के लिये उठाया था, यह उगो सिर पर लगा भोर उससे की थी पर गिर पड़ी। इसी पद के गिरा के पारण पराम के वंशज ' देशा' कहे जाते है। | जगदेव पंवारी अपने स्वामी या प्राण यो के लिये मय अपना Imदेवी योनी दिया था।

१०२ [चीर-सतसई तजि देती जौपै कहूँ, कोइल | काग-कुठौर । तौ होती तें पच्छीनु में साँचेहुँ तैं सिरमौर ॥ ३७ ॥ सिंह-शावकनु के भये शिक्षक श्राजु शृगाल । एइ सिखैहैं अब इन्है गज-मर्डन को ख्याल | ॥ ३८ ॥ हम गंगोदक, हम गगन, हम दीपक, हम भान । यही तुम्हें लै बृडिहै कुल-कोरो-अभिमान ॥ ३६ ।। जदपि रोष दोऊ करति लखि-लखि परढग लाल । तदपि कहाँ खल-खंडिनी, कहाँ खडिता बाल ॥ ४० ॥ चूसि गरीबनु को रकतु करत इन्द्र-सम भोग । तउ 'गरीब परवर' उन्हें कहत अहो, ए लोग । ॥ ४१ ॥ उत ते तौं हाडा* हठी, इत बुदेली बलवान । अरि-अनीक की गेंद कै रच्यो चारु चौगान ॥ ४२ ॥ ५ ७ दो के महाराज हाडा छत्रसाल । कविवर भूपण, मतिराम और लालने इनकी वीरता के कई पद्य लिरो हैं। कविवर मतिगम-ओरगजेब-दारा-युद्ध के अवसर पर-इनकी वीरनाति पर लिखते हैं- ओरँग दारा जुरे दोउ जुट्ठ, भये भट क्रुद्ध विनोद बिलासी। मारू बजै 'मतिराम' बसानै भई अति अस्त्रन की घरखा-सी। नाथ-सनै तिहि ठौर भिरयो, जिय जानिक छलिन को रन कानी । सीस भयौ हर हार-सुमेरु, छना भयो आधु सुमेरु को गसी ॥ चले चदवान धनवान औ कुहूकवान, चलत मान धूम आसमान छ्व रहो। चली जमडाहै बादवारे तरवार जहाँ लोह आँच जेठ के तरनिमान वे रहो। ऐसे समै फौजे बिचलाई छवसारमिह अरि के चलाये पाय बोरग्स च्चै रहो। हय चले हाथी चले संग छोडि माथी चले, ऐसी चलाचली में अचल हाहा है रहो । - -भूषण + बुंदेलखड-केसरी महाराज छत्रसाल। दोनों वीरश्रेष्ट छतसालो के समय में महाकवि भूपण कह गये है- सातवां शतक] बनत क्रोध-जित निबल नर धारि छमा अभिराम । करत कलंकित क्लीव ज्या ब्रह्मचर्यव्रत-नाम ॥ ४३ ॥ उपमा भट-भुजदंड की तो संग जा दिन दीन । तबही ते, गज-सुण्ड । तै थिरता पलहुगही न ॥ १४ ॥ धर्म-निरत सँग द्वेष कै कहाँ वचैहै प्रान ? दुर्वासा-हरि-चक्र को गयो भूलि उपखान । ॥ ४५ ॥ कहँ गूलर-बासी यहै, कहँ वह विश्व-बिहार । कहें यह पोखरि में ढंकी, कहँ वह पारावार । ॥ ४६ ।। बिन सी चे निज हीय ते सद्य रक्त-रस-धार | कह स्वधर्म की लहलही रही डहडही डार ॥ ४७ ।। श्रायो, बलि, रति-युद्ध ते भाजि, भीरु । दै पीठि । अब काहे असि-बाल पै फिरत लगाये डीठि ॥४॥ पावसही में धनुष अब, सरित-तीरही तीर । रोदनही में लाल हग, नोरसही में वीर ॥ ४६॥ टेक-टेक केते कहत, हठहू गहत पै कहँ वह हम्मीर-हठ, कह प्रताप की टेक ॥ ५० ॥ अनेक । इक हादा बूंदी धनी, मरद महेयापाल। मालत नारंगजब का ये दोनो स्तमा । पै देखो उत्ता पता, ये देग सामा। पदिल्ली की दार, ये गिती वाहनयार ॥ म तिरिया तेल हमीर-हर, पई दूनी पर।

१०४ [वीर-सतसई 'सुई-नोक भरि भूमि, हरि । नहिँ दूँगो बिनुयुद्ध । धनि, दुर्योधन-पैज वह, यद्यपि धर्म-विरुद्ध ॥ ५१ ॥ नेननि नित किन राहिये, तिनकी पायन-धूरि । पूरि पैज जे मरद की भये युद्ध मधि चूरि ॥ ५२ ॥ दिन-दूनी लागी बदै बल-बीरज की माँग । छैल-चिकनियाँहू र, धीर बीर के स्वाँग ॥ ५३ ॥ भयौ रक्त नहिँ जिन दृगनि देखि प्रात्म-अपमान । क्यों न बिधे तिन में, बिधे। सूल विषम बिष-बान ॥ ५४ ॥ नभ जिमि बिन ससि सूर के, जिमि पंछी बिनपाँख । बिनाजीव जिमि देह, तिमि बिनारोज यह आँख ॥ ५५ ॥ लखि सतीत्व-अपमानहू भये न जे हग लाल । नीबू-नौन निचोरिये, छेदि फोरिये हाल || ५६ ।। देखि दीन-दुर्दलनहू दहत ता कुचालि को भूलिहूँ कबहुँ न कीजै संग ।। ५७ ॥ केत गाल फुलायकै तमकि तरेरत नैन । लखि प्रचड भुजदंड पै कछुवै करत बने न ॥ ५८ ।। । है स्वदेस मख-बेदिका, अरु आहुति मम प्रान' । कोटि जन्महूँ, नाथ । जनि जावै यह अभिमान ॥ ५६ ॥ न जाके अग। । सूत्यगू नैव दास्यामि यिना 41 orea सातवॉ शतक] - नहिँ चाहत साम्राज्य-सुख, नाहि स्वर्ग, निर्वान । जन्म-जन्म निज धर्म पै हरषि चढ़ावौ प्रान ॥ ६० ॥ गये दिवस अब बिभव के, तजि दै बिषय-बिलास । होय देस स्वाधीन कब, करि वा दिन की आस ।। ६१ ।। इन नैननि किन राखिये दुखित दूबरे दीन । कीजै निज बलि-दान दै दलित देस स्वाधीन ॥ ६२ ॥ काम न ऐहैं अंत ए, बादि बजावत गाल । वैही सीसु चढ़ायहैं, जे गुदरी के लाल ॥ ६३ ।। रण-अगन अरि-अगना अंग-सुहाग सवारि । तनु की ज्वाल सिरावती ज्वाल-माल तनु धारि ॥ ६४ ॥ सहमि तमकि भाजत भजत, तुरत अधीर सुधीर । पीत अरुण परि जात मुख, लखि रण कादर बीर ।। ६५ ॥ कहा मरोरत मूछ उत बाँधि तुबक तरवार । सेवत जा दरबार को नर्तक भाँड लबार ॥ ६६ ॥ छिन छाँडत, छिन गहत क्यों, रहत न एकहु ढंग । पल-पल पलटत नीच ते नित गिरगिट-ज्यौं रग ।। ६७ ॥ जीवन-नवलनिकुंज रमि जो चाही रस-पान । जाय छुडावौ प्रेम सों मृत्यु-मानिनी-मान || ६८ ।। देखतहीं रण-भूमि वै क्यों न जायें छुपि गेह । चित्र-लिखित लखि खड्ग जब थरथर काँपति देह ।। ६६ ॥

[वीर-सतसई * भये न जो पढ़ि सत्यव्रत, सबल, सूर • स्वाधीन । तौ विद्या लगि बादि धन, समय, शक्ति व्यय कीन ॥ ७० ॥ देखि सती-व्रत-मंगहूँ आवत जाहि न रोष । ता कादर के कदन में मानिय नैक न दोप ॥ ७१ ॥ कीजै किन कीरति अचल, दीजै दुकृत बिडारि । क्यों न बीर-सुर-सरित में लीजै अंग पखारि ॥ ७२ ॥ कियौ राज सुर-राज ज्यौ जहाँ यवन-सम्राट । सो वह दिल्ली हाट-लौं लई लूटि व्रज-जाट ॥ ७३ ॥ स्वर्ण-दान-हित कर्ण तूं, केशवराय-अनन्य । अबुलफज़ल-करि केहरी बीरसिंह नृप धन्य ॥ ७४ ॥ नहिँ बद्दलु दल-बलु यहै, तडित न यह किरपान । नहिँ घन गाजत, गहगहे बाजत तुमुल-निसान* ॥ ७५ ॥ * भरतपुराधिप वीर वर सूरजमल के पुत महाराज जवाहरसिंहजी द्वारा की हुई दिल्ली की लूट। + देसो टिप्पणी-तीसरा शतक, ६८ दोहा । निम्नलिखित कवित्त के आधार पर- बद्दल न होहि दल दच्छिन घमह माहि, घटाहून होहि दल सिवाजी हकारी के। दामिनी दमक नाहि खुले खग्ग बीरन के, वीर सिर छाप लखु तीजा असवारी के ॥ देखि देखि मुगलो की हरमै भवन त्यागें, उझकि उनकि उठे वहत बयारी के । दिल्ली मतिभूली कहै यान धन घोर घोर, बाजत नगारे जे सितारे गढ़-धारी के ॥ -भूपण

सातवाँ शतक]
१०७
है पानिप तरवार को कौन उतारनहार
?
कौन उखारनहार है मरद-मूछ कौ बार ? ॥ ७६ ॥
कलपावत कब तें हमैं धारि निठुरता-रूप ।
करुनाधन । तुमहूँ भये श्राजु-कालि के भूप । ॥ ७७ ॥
बिनु अगनु कीनो हमै, बिनुबल, बिनुहथयार ।
क्या, निरदई दई । दई बिपत एकई बार ॥ ७८ ॥
कटत खटाखट मुड, त्यौं पटत रुंड पर एंड ।
जहँ-तहँ हल्दीघाट पै लहरत लोहित-कुड ॥ ७६ ॥
तौलगिही तूं गरजि लै, गो-घातक । बनमाहिँ ।
जौलगि मत्त मृगेन्द्र । यह दबी लबलबी नाहि ।। ८० ॥
पेशकब्ज, दृढ़ गुर्ज त्यौं बरछी, बाँक, कटार ।
हैं आभूषण बीर के तुबक, तीर, तरवार ॥ ८१ ॥
आँजि अोज-आँजनु सुगनि दई अनी बिचलाय ।
क्यों न तोहि, रण-बाँकुरे । मसक गयन्द लखाय ॥ ८२ ॥
आसव एतो भोज को लीजै द्वगनि उडेलि ।
मदि मीजिये मसक-ज्यौं रिपु-गयन्दहूँ • पेलि ॥ ८३ ॥
सरनागत, मद-मत्त, तिय, क्लीब, निरस्त्र, अनाथ ।
इन्हैं घालिबे नहिँ कबौं मरद उठायौ हाथ ॥ ८४ ॥
हृदय-जीत-सी जीत नहिं, भरम-भांति-सी-भीति ।
धर्म-नीति-सी नीति नहिँ, कृष्ण प्रीति-सी प्रीति ॥ ८५ ॥

१०८ [वीर-सतसई. रण-अन्हान सों नहिँ तुलै सहसतीर्थ कौ न्हान । । अभयदान पै वारिये अमित यज्ञ को दान ॥ ६ ॥ लिखे हमारे भाल पै अंक न अर्थ-अधीन । ज्यौं पानीपत पै भये हम पानी-पत-हीन ॥ ८७ ॥ 'आये रण में जूझिक लला लाडिले काम ।' सुनि, छाती फूली, फटी, गई जननि सुर-धाम ॥ ८ ॥ सुमन-सेज सर-सेजही, रण रति-रीति रसाल । सुभट-लाल-हित हित-रंगी रमण-बाल करबाल ॥ ८६ ॥ कारण कहुँ, कारज कहूँ, अचरज कहत बने न । असि तौ पीवति रकत, पै होत रकत तुव नैन ॥ १० ॥ वर्म चर्म असि तून धनु सजे सूर सरदार । वह मब मुख मेचक किये वा दिन बिन हथयार ॥.६१ ॥ मुक्ति-हेतु इक करत तप, अपर दान, मख, ध्यान । पै छिति छत्रिहि छाँडि रण नाहिन साधन आन ॥ ६२ ॥ सुने कवित पजनेस-कृत जिनसों मजुल मन्द । तिन श्रवननु से अब कहा सुनिहौ भूषण-छन्द ? ॥ ६३ ॥ कथनी तौ और कछू, पै करनी कछु और । हम-से कादर कूरहूँ सूर-सिरमौर ॥ १४ ॥ क्षात्र धर्म, यस-कौमुदी, कृष्ण-रूप-रुचि-राग । होउ हो । संगमु सदा यहै सुहाग-प्रयाग ।। ६५ ॥ । बनत +

१ पन्ना नगरी का प्राचीन नाम । परिणामी पय के तापना का प्राश भी 'पमानी' पुरो
सातवां शतक]
२०९
मन-मोहिनि त्रै सतसई हिरनी सी सुकुमारि ।
कहा रिझैहै रसिक-मन यह सिहिनि भयकारि ॥ ६ ॥
नहि रस या सतसई में, नाहि सुपद-लालित्य ।
भूषितहूँ दूषित भयौ परसि याहि साहित्य ॥ १७ ॥
वै कुरगिनी सतसई, सबै रारिवहैं लालि ।
को लैहे सिर विपत मो भूखी बाधिन पालि ॥ ६८ ||
उर-प्रेरक श्रीहरि भये, भई प्रगटि लाहौर ।
सतसइया पूरन
भई पद्मावती सुठौर ॥ ६६ ||
चैत्र-सुदी-सुभ-पचमी, बँदै सिद्धि निधि इन्दु ।
करी समापत सतसई हरी सुमिरि गोविन्दु ॥१०॥

7
मुद्रक-के० पी० दर, इलाहाबाद लॉ जर्नल प्रेस, इलाहाबाद
प्रकाशक-साहित्य भनन लिमिटेड, प्रयाग।

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। माया - ४ -- e 1 साममा भिषक ग ने है। पोर्ट फोई निबन्ध तो बहुत से हदयंगारी और 'चमत्कारपूर्ण 1- पायस पुस्तक को पढ़कर अवश्य होगे ~प्रताप ।, यर पक राय काय । इसके लेबा ई हिन्दी के प्रसिद्ध काव्य-मर्मज्ञ श्रीवियोगी हार * : Tोर हुन निबना है। उनमें अधिकार सम्पती आदि मार्मिक पत्रिकाओं म । के एन ६ रूप में जाने के पहले ही काफी ग्याति प्रा कर चुके हैं। प्रग्या नगद हा एक विचित्र प्रकार के भाव में इये जगता है। लेवन गली मुन्दरं, भार ग्वीर और विचार प्रोड है । हमगरी समझ में हिन्दी गान में यह सर्वोत्तम निचधमाला है।। -~-गृहलक्ष्मी : - साहित्य-विहार नवीन सस्करण) प्रयारा-विश्वविद्यालय को बी० ए० के पाठ्यक्रम में निवत ] श्री वियोगी हरिजी दी लेखनी मे हिन्दी-समार भली भाँति, परिचित है । यह साहित्या, विहार, आप की एक प्रौद कृति । भूमिका-लेखक श्रीमान पंडित जगन्नाथ प्रसादती चाटी का यह लिजना मि, माहि य विकार में बिहार करने से प्रजभापा की बहार आरयों के आगे बाजानी है, अक्षरशः सन्य है। भाव, भापा, आर लेखन-वाली की दृष्टि से गह साहित्य की एक अमुल्य मजूपा है । इसके मगध म अधिक न लिख पर इस पर पायी हुई कुछ मामतियाँ उद्धत की जाती है । सम्मतिया "साहित्य-विहार के ल्पक हिन्दी साहित्य-रमिको के चिपरिमित, सम्मेलन पविका के सपादक श्री दियोगी हरिजी है। जाप हिन्दी साहित्य का मधुर रसास्वादन कराने में कार सिद्धहस्त हैं, पह. हिन्दी साहित्य प्रेमियों में छिपा नहीं है । साप के ही कई विशेष रस लेखों का सगह माहिम-विहार' है। साहित्य प्रेमियों के लिये वियोगी हरिजी का यह "निहार" अवश्य ही विहार करले योग्य है।" [बंकटेश्वर समाचार पन्न । मिरमरो को साहित्य कानन में रमन से नाहि य की अपूर्व चासनी चपने को मिलेगी, इसमे संदेह नहीं। [अभ्युटय.] "शियोनी हरिती । एक पजीर नीयत पाई है। प्रस्तुत, पुस्तक क्या है, हरिजी के दिल की एक धान है। नजभाषा के कविया को आपने इसमें एक अनटे ढंग से पेश किया है। प्राचीन तथा अर्वाचीन कवियों की उत्तियो पर हरीजी की चुभती हुई आलोचना,चित्त को । लुमा लेता है । पुस्तक रिटी माहि य म एक अनोग्यो अस्त हो" [प्रभा] श्री पियोगी परिक्षी का साहित्य-विहार पैनी आलोचनाम्यो कृति ह। पढ़ते पढने तवीरत' पड़क उनी है। परिजीको 'सूर साती है। जिनके दिए हैं वे इस एलक को पढ़ सकमे है।-, [प्रतार . । भ - H १ + - न A . +--

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दोरे लिो गह पूर्व मानेर की वस्तु है। ब्रजभाषा के धुरंधर कवि पं० Mar पाकमेला यहाँ न लिव डाला कि “हरिश्चन्द्रीय चन्द्रायली' की सहोदरा यही जतन, प्रेमिका के लिये अनिर्वचनीय आगन्द-सुधा की सतत-बाहिनी नोमवहा है।" हिन्दी- सनि सिट पापरिसलामो तथा हिन्दी साहित्य-रमिकोने इस पुस्तके की, मुक्तक में 72 कामगिरम पाठकों के समक्ष उपस्थित करते है, जोर माहित्य रसिको से प्रार्थना । 4- इन रोटी-मी पुस्तक का भारद लाम करे । ५८ पेज की पुस्तक का मूल्य केंचल ।। : सम्मतियाँ, इस पला में विशुद्ध साहिय की छदा हैं। यह एक भन-अलाए हैं, इसे समझनेवाल पर पकने , देसने जे देख सकेन है। इसके लिये अधिकारी होने की जरूरत है। ~ । 1- शिक्षा । द - - H यह रोगिनी नाटिको इस युग की चीज नहीं है, किन्तु महत्या के लिये देश काल का बंधने नहीं रह जाता । न तो उड़ान भरते हैं। हरीजी की ग्रह उडान दर्शनीय और पठनीय है। '- [प्रताप]. धीवियोगी हरिजी की यह नाटिका है, विशाल नया ढग है। इसका विषय सामाजिक या प्रतितायिक नहीं, बल्कि श्रीकृष्णजी की, छम-लीला ह । नायक म्वय श्रीकृष्ण हैं जो बायोगिनी बन का नायिका श्रीराधा को जान-मार्ग का उपदेश देते है। पर राधाजी कामे कहती हैं कि इस के पर भी जो आनद है यह 'प्रेम' है । यह सचीद बहुत ही मनोहर है काव्य 'के रसिकों के लिये रदी अ चीज है । वियोगी हरिजी की कवित्व गक्ति इसमें अछी प्रस्फुटित हुई है। उन्होने सूत्रधार और पारिपाक के संवाद में अपना परिचय भी बडे ,अन्छे ढग से दिया है। भारत मित्र ] • इस नाटिका का भापा-सौष्टव और भाव व्यञ्जन बहुत ही सुन्दर है। प्रेम और योग का निपटाग लेखक ने नही चतुरता से किया है । अजमापा की कवितायें भी बड़ी परस है । इस नियमाण: । युग में वियोगीजी की प्रेम-चर्चा समझनेवाले विरले ही मिलेगे । फिर भी जिन्हें भगवान के प्रशां से प्रेम हो । अवश्य ही इस गोप्य रहस्य को पढ़े और समझे ।। [अभ्युदय ] धीयत कन्नोमल एम० ए०, जेज धौलपुर लिखते हैं- श्रीवियोगी हरिणी हिन्दी के एक सुप्रसिद्ध और सिद्धहस्त लेखक है । आप श्रीकृष्ण भगवान के । अनन्य भन ई आर आप के देवों में उच्च भनि-भावों की भरमार होती है। श्रीपयोगिनी में इन भावो को अभिव्यक्त करने का अन्या अवमेर मिला है। इस पुस्तक में प्राकृष्णचन्द्रशी ने नकली योगिनी के घेप में श्रीरात्रिकाली, योग सादेन मिलाने की चेष्टा की है, पर रात्रिकाली के अगाध प्रेम के मामने इन्हें हार माननी पत्नी सुयोग्य लेखक ने यह 'विपय नाटक म्प में दिखाया है और इस कार्य में यह पूर्ण सफल हुए है। यह नाटक पड़ने योग्य । आर श्रीकृष्ण के भन्नों के लिए एक अपू भार असूम बन्नु है श्रीगुन कवियर प० श्रीधर पाठक लिखते हैं- "श्रीशयोगिनी" भनि पय-पथिक, प्रेमनम कि श्रीवियोगी हरि-निचिता, . 1 4 M भ -4 . 1- 1 ।" । - । ग

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1 -- न fri लोगन' कृती, या पलिना राम सुन्दर । हन अमित मानन विजाको मन-म का || कविवर देवीप्रसाइ 'ग्रीनम' लियत --- नाभावी वृत भन्माल परकर भात ही मुग्ध होता था कि हम मर गागर में , सागर मनगर, पान्तु कवि-कीर्तन दंस कर इस गति का दूसरा उदाहरण मिला। औरत २० शुकदेव निहारी मिश्र लिखते हैं। ८७ ठो का घर अन्दा गन्ध है जिसमें २५५ रो द्वारा हिन्दी कवियो वा या 7 दिया गया है। उनमे १२२ गाची कान है आर भारतेन्दु से लेकर शेष कनि चीन है। प्राचीनों पेक्षा नीनो, की सत्या तमा. कथन अधिक है । रचयिता ने प्रारीन नया नवीन, कवियों के चिम में मुख्य-मुरण्य.' असली नाते निष्पक्ष बन्ने रहने का यथामा य.प्रयत्न, क्यिा है और नममें, पत्त-कुछ सफास्ता भी पाई है। राय उपगी है। योगी अरविन्द की दिव्य वाणी.. रविन्द भाग्न माग के उन सुपूतो में में हैं, जिन्होंने भारत की स्वाधीनता के लिये ही जन्म" दिया और उसी के लिये प्राण निकावर, करना अपने जीवन का उद्देश माने रखा है। आप के, टेख भाभ्यालिब और सामाजिक भावो में भरे रहते हैं। यह प्रस्तुत पुस्तक आप के आध्यामिक विचार, योग, राष्ट्र, गोर जाति-मधी निव्य उद्गारों का संग्रह हे । आदि में योगी अनिन्द का मक्षिप्त परिमय भी दिया है। इसमे पुस्तक और भी उपयोगी बन गई है। हिन्दी-मैमार ने इस पुस्तक का, अछ। आर रिया है । इसके परिल सन्करण 'की थोड़ी ही प्रतियाँ शेष है, पाठकों को जल्दी करनी चारिम सानो उन्हें दूल्रे सम्करण, की पतीक्षा करनी पडेगी । प्रस्तक की छपाई, सफाई और कार गल्य "छत्रसोल-ग्रन्थावली बुन्देलखण्ड केमरी महाराज देससाल के म्मरणीय नामे से कान भारतीय परिचित न होगा। यह महाराज अद्युत योग, और पराक्रमी तो थे ही, एक ऊँचे कवि भी मान्य कवि थे, और कत्रियों के आश्रयदाता भी थे । इनकी लटित और भावपूर्ण कचिनाएँ अगाप्य-मी हो रही थीं। हाल में इनके के गन्ध मिले हैं, जिनका श्री वियोगी हरिगो द्वारा सम्पाउन करा, के पन्ना राज्य की श्री खसाल- 'स्मारक समिति ने साल गन्नावली के नाम से प्रकाशन त:किया है। इस पुस्तका का - मोल एजेन्ट साहित्य मग्न हो । पट १२, यागंज-छपाई सुन्दर । मूल्य मैनेजर, साहित्य-भवन, लिमिटेड इलाहाबाद " - । . ।

Veer Satsahi

Author
Hari,viyoghi
Title
Veer Satsahi
File name
Veer Satsahi
Text
OCR done
Citation
1904
Published
2011/01
Publisher
Hindi Pushtak Mala Prayag
Language
Sanskrit
Pages
139
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546559
Barcode
4990010025022.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
F5lo7qmrPBL
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