Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Ekla Chalo Re
Front matter
मूल्य : पन्द्रह रुपये (15.00)
प्रथम संस्करण 1980, डा० भगवतीशरण मिथ
EKLA CHALO RE (Novel) by Dr-Bhagwati Sharan Mishra
एकला चलो रे
डा० भगवतोशरण मिश्र
जन्मशिद समालोचना के लिए
पारको यो सहर
राजपाल एण्ड सज़, कश्मीरी गेट, दिल्ली
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दार्जिलिंग की हिममंडित चोटियों पर सुबह को धूप सीधी पड़ने मे ये सफेद से सहसा अंगूरी हो माई थी। तीन मंजिले होटल की खिड़की से अपलक इन शिखरों पर दृष्टि गड़ाए विशाल, जैसे समाधिस्थ हो पाया था। सुबह के ये ही कुछ क्षण हैं जो उसे बांध पाते हैं वरना अक्सर तो वह इस पर्वतीय प्रदेश में रहकर भी नहीं रह पाता । दाजिलिंग को रंगीनियों और मनोरम प्राकृतिक दृश्यों के आकर्षण को चुनौती देता हुमा उसका मन, अव भी लगातार कलकत्ते की भीड़-भरी गलियो की खाक छानने दौड़ जाता है। "गुड मॉर्निंग!" सुधीर ने बगल के विस्तर में करवट ली है । उसकी यही आदत उसे पसन्द नही । स्वयं तो आठ-नौ तक विस्तर में करवटें बदलता रहेगा और दूसरे का एक क्षण का एकान्त भी उससे सह्य नहीं होगा । अव क्या खाक बंधेगा उसका मन? "गुड मॉर्निंग !" विशाल ने खिड़की से हटकर जवाब दिया और धीरे-से जोड़ दिया, "वाहर चोटियां लाल हो पाई है।" "मेरी वला से !" सुधीर ने दूसरी करवट ली, "पर प्रोफेसर विशाल के मन के रंग का क्या हाल है ? चढ़ पाया दार्जिलिंग का रंग अथवा 'सूरदास प्रभु काली कामरी'..." "चुप भी रहो।"विशाल ने एक ऊंह के साथ सुधीर के मुह पर अपनी दाहिनी हथेली रख दी और उसकी रजाई एक तरफ सरका उसीके पलंग पर बैठ गया। "एक बात बोलूं ?" विशाल ने प्रारम्भ किया। "शौक से बोलो।" "ये दूर तक विस्तृत पहाड़ियां, इनपर फैला हरियाली का यह मोहक साम्राज्य और फिर खुले आकाश में सफेद बादलों को यह भाग-दौड़ । वह देखो तो सुधीर, वहां, वहां; अपनी मौज में भागता-गिरता, नीचे की ओर बह रहा वह फैनिल जल-* प्रपात । किसी शोख मन की सारी अल्हड़ता को समेट भागा जा रहा है न !
सुधीर, हवा के हल्के झोंकों पर ही वादलों के टुकड़ों का टुक टुक हो बिखर जाना मानव-मन की प्राकांक्षाओं और अभिलापात्रों की निस्सारता का ही तो.....!" "मैं सोचता हूं विशाल, कि दाजिलिंग को इन पहाड़ियों पर पाकर भी तुम्हारी दार्शनिकता तुमसे दूर नहीं हुई। वादलों का टूटना-मिटना, तुम्हें मानवीय सपनों की असहायता और क्षणभंगुरता का चाहे जो सूचक लगे, मुझे तो हवा और बादलों की छेड़खानी मे किसीके साथ खेली, लड़कपन की पाख-मिचौनी याद भा रही है । मैं पूछता हूं कलकत्ता की व्यस्तता और ऊब से भाग निकलने का हमारा लक्ष्य यह तो नही था कि यादो के बोझ को हम दार्जिलिंग की उन चोटियों पर पहुंचा दें ?" "खूब ! खूब !!" विशाल ने प्रासमान में वनते-मिटते बादलों से अपनी दृष्टि हटा, सुधीर के चेहरे पर गड़ाते हुए कहा, "अपने दिल के अरमानों के पूरे होने पर चारो ओर बहार ही बहार तो दिखती है सुधीर । क्यों न तुम्हें जंगली वांसों की यह चरमर भी शहनाई की गूंज की तरह मोहक लगे, पर कही तुम्हें भी मेरी तरह विवशतामों की वेड़ियो की कठोर जकड़न का अनुभव होता, तो पत्थर के ये टुकड़े तुम्हे भी कोपले के दहकते अंगारे लगते और तुम भी सदा इस भय से भयभीत रहते कि न जाने कब इन चोटियों पर फैले ये अंगारे तुम्हारे अन्दर के अधूरे सपनों की होली जलादें...।" "सुधीर !" सुधीर को चुप देख विशाल ने ही टोका। "चाय का प्रॉर्डर दू?" सुधीर कॉल-बेल को तरफ हाथ बढाते हुए बोला। "दे सकते हो, पर मैं एक गंभीर बात कर रहा था।" "कितने दिनों तक गम्भीर ही बने रहेगे आप? कल दाजिलिंगपाए हुए तीस दिन हो जाएंगे।" "यही तो मैं कह रहा था, यहां पाने से कोई बात बनती नही दिखती। कलकत्ता मुझे छोड़ नहीं पाता। दार्जिलिंग मुझे बांध नही पाता । त्रिशंकु की हालत में लटका हूँ । प्राखिर कब तक अपने से भागता रहूं ?" "बात अपने से भागने की नहीं विशाल, अपनों से भागने की है । वे अपने जिन्हे आप अपना समझते हैं, पर जो प्रापको स्वीकारने को तैयार नही । अपने से भागने के लिए तो योगियों को ध्यान-मुद्रा ही पर्याप्त थी, अपनों से भागने के लिए पहाड़ियों की चोटियां चढनी पड़ी हैं !" "भाषण तो अच्छा दे लेते हो!" विशाल के होंठों पर एक हल्की मुस्कराहट उभरी। 6/एकला चलो रे "करता भी तो यही रहा हूं। आपकी तरह दर्शनशास्त्र का व्यारयाता तो नही जो प्रात्मा-परमात्मा के विवेचन में ही समय कट जाता हो । यहां तो बाबर- हुमायूं की कहानी कहनी पड़ती है । पानीपत, पलासी की पूरी लड़ाई को पचास मिनटों में ही लेक्चर-प्लेटफार्म पर उतारना पड़ता है। फिर मेरे क्लास में कोई रेखा, मीना....." "सुधीर!" विशाल ने बीच में टोका। "प्रादेश, हुजूर?" "सोचता हूं तुम्हारे साथ पाकर मैंने भारी गलती को। तुम कभी सीरियस हो ही नहीं सकते।" "तो जनाब को यहा किसी सीरियस व्यक्ति को आवश्यकता थी? डाक्टर सुधांशु की सिफारिश थी कि आपके साथ कोई निहायत ही नॉन-सीरियस टाइप प्रादमी पाए । यानी प्रोफेसर सुधीर, आपका क्लासमेट और कलीग, साथ-साथ प्रापका चमचा भी, वह भी स्टेनलेस स्टील का, जो आपकी हा में हां और ना में ना मिलाता रहे । समझे ? तो हो जाए एक-एक कप चाय इसी बात पर और इसके बाद बताइए कि कब तक रेखा देवी विदा ले रही हैं आपके मन- मन्दिर से, क्योंकि डाक्टर मुधांशु का कहना है कि जब तक रेखा रानी आपके भीतर बसी रहेगी तब तक आपके दिमाग की गाडी की पटरी से उतरने की भी पूरी संभावना बनी रहेगी।" "पर तुमने तो रेखा को मेरे अन्दर बनाए रखने की जैसे कसम ही खा रखी है।" विशाल मुधीर के कप में चीनी का चम्मच डालते हुए बोला। "यह कैसे ?" "यह ऐसे कि रेखा मेरे मन में जितना रहती हो, तुम्हारी जीभ पर वह उससे कहीं अधिक रहने लगी है। यह भी कोई ढंग है किसीको भूलने देने का ? तुम उसे भूलने में मदद दे रहे हो या याद करने में ?" "एक बात बोलू बॉस ?" सुधीर अपने कप को होठों से लगाकर बोला। "बोलो।" विशाल ने भी अपना कप उठाया । "जादू वह जो सिर चढकर बोले । कम्बख्त, लगता है मुझपर भी चढ़ने लगी है। अगर ऐसा हुआ तो गजव हो जाएगा। फिर हम एक साथ यहां नहीं रह पाएंगे। एक पहाड़ी की चोटी पर होगा और दूसरा हजारो फीट नीचे, खाई "तो अपने बॉस की प्रेयसी पर भी तुम्हारी नजर है ?" एकला चलो रे/7 "प्रेयसी की ऐसी-तैसी । तुम्हारी तो छाया से ही वह भागती है। मैं उसे फांस सका तो उस शरद के जाल से तो वह छूट पाएगी वरना" सुधीर एक अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ बोला। "तो शरद का नाम भी तुम्हें लेना ही है ?" विशाल अपने प्याले को सहसा ट्रे में वापस रखते हुए बोला। "सॉरी बॉस ! मैं तो भूल ही गया था कि शरद का नाम लेते ही आपके ब्लड प्रेशर का काउंट बढ़ जाएगा, पर मुझे पता नहीं कि हम किस-किससे भागते रहेंगे ? रेखा से, शरद से, वीणा से..।" "यही तो मैं कहना चाहता था। आखिर इस तरह हम कब तक और कहां तक भागते रहेगे ? गलती की हमने कलकत्ता छोड़कर। जिनसे हम भागते रहे वे लगातार हमारे प्रागे दौड़ते रहे।" "एक सुझाव मैं दे सकता हूं?" "क्या ?" विशाल सुधीर के चेहरे पर दृष्टि गड़ाते हुए बोला। "हम दोनो एक प्रतिज्ञा करें। आज से कभी भी रेसा हमारे बीच नही माए, न मैं कभी भूल से उसका नाम लूं, न तुम । ठीक ?" "सुधीर, तुम्हारे भोलेपन पर ईर्ष्या होती है। मन में रहने वाला जीभ पर प्राने से रहेगा ? मन और जीभ के बीच कोई अर्गला तो है नहीं ! लौट चलो फलकत्ता । हो चुका डाक्टर की राय का पालन । मेरा स्वास्थ्य सुधरने के बदले पौर बिगड़ता जा रहा है । मन से जिसे निकालना था वह और गहरे पुसती गई "विशाल, माइडिया!" सुधीर चहका । "क्या?" "फाटे से काटा निकलता है, सुना है तुमने?" "सुना है, मतलब ?" "मतलय, पुमने दो भौर प्रषियः मन्दर इम फाटे को, दूसरे वाट से इस काटे को..." "गधीर, तुम मुझे अच्छी तरह जानकर भी ऐमी मूर्षतापूर्ण बातें करते हो। बन्द करो यह पपड़ा। बोलो कर नौटते हो सकता?" "एक माह याद।" "पो?" "रास्टरमा स्त्रिान है!" 3/एएमा पमोरे "हम प्रेस्क्रिप्पान, ऐंड हम देंट डाक्टर मुधांशु । मै अपना डाक्टर, स्वयं - 'हुजूर डाक्टर नही मरीज हैं और मैं मरीज़ का फेदफुल पटेंडेंट। मैं डाक्टर के प्रेस्क्रिप्शन का प्रक्षरशः पालन कराऊंगा।" "तो इसका मतलब कि तुम एक महीने के पूर्व यहा से नहीं चलते ?" "अवश्य चलता हू, यदि इस बीच रेमा देवी स्वयं कलकत्ते से कही और चल दें।" "हम यू : यू रिफ्यूज टू इम्प्रूव ।" विशाल विस्तर से उठते हुए बोला । "सो माई डू।" मुधीर ने दूसरी करवट लेकर प्रांखें मूद ली। - दो "प्रामि किछु जानि ना!" और झटक दिया रेसा ने वीणा के हाथ को कलकत्ता के एक कॉलेज का कॉमन रूम । लड़कियों के इस कॉमन हम का वार्षिकोत्सव । रेखा और वीणा द्वारा इस उत्सव पर प्रायोजित नाटक में अभिनय । नाटक समाप्त होते ही वीणा द्वारा रेखा को छेड़ बैठना। "मामि बोललाम, पामि किछु जानि ना।"{मैंने कहा, मैं कुछ नही जानती) मौर रेखा ने वीणा के हाथ को दूसरी बार झटका । "मैं कहती हूं रेखा, तुम्हें बोलना ही पड़ेगा। तुम यों किसीको तबाह नही कर सकती । भगवान ने यदि तुम्हें रूप और गुण दिए है, तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि तुम किसीकी वरवादी और विनाश का कारण बनो । माना तुम आकर्षक और प्रत्हड़ हो, पर तुम्हारी यह अल्हड़ता किसीकी जान पर आ जाए यह कहां की बात हुई ? तुम्हें सोचना पड़ेगा रेखा, सारी चंचलता और शोखी को छोड- कर सोचना पड़ेगा। तुम्हारी यह उदासीनता और अल्हडता किसीके विनाश का कारण तो बन ही रही है, अगर यही हालत रही तो याद रखो, एक दिन मह तुम्हारी सारी संभावनाओं को भी स्वाहा किए बिना नहीं रहेगी। तो तुम्हे बोलना पडेगा, रेखा, अभी बोलना पड़ेगा।" और वीणा ने छिटककर निकलना चाहती रेखा की राह रोक ली। एकला चलो रे/9 "आमि किछु जानि ना।" और तीसरी बार वीणा का हाथ झटककर रेखा कॉमन रूम के अन्दर घुस गई। "आज का तुम्हारा अभिनय बड़ा अच्छा रहा।" रेखा को देखते ही उसकी तीन-चार सहेलिया एक साथ चिल्ला पड़ी। "हां री । शकुन्तला के रोल मे तो तुम एकदम ऋषि कण्व की लड़की, वनवासिनी शकुन्तला ही लग रही थी। हा भई, भगवान ने बनाया भी तो तुम्हें अपने ही हाथो से है । लता-विटपों के मध्य अपनी सखियों मे बैठी तुम तारों के मध्य चाद की तरह खिल रही थी।" "हा री," एक दूसरी लड़की चिल्ला पड़ी, "जानती हो अभिज्ञान शाकुन्तलम् मे कालिदास ने शकुन्तला के लिए क्या लिखा है ? सुनो- अनाघ्रातं पुष्पं किसलयमलून कररुहै, रनाविधं रत्नम् मधुनवमनास्वादित रसम् । अखण्ड पुण्याना फलमिव चतद्रुपमनघं, न जाने भोक्तारम् कमिह समुपस्थास्यति विधि । 'इसका अर्थ क्या हुआ री?" तीसरी बोली। "अर्थ तो खूब है री- यह विना सूधे हुए फूल के समान है , नख से बिना तोडे किसलय के सदृश बिना छेदे हुए रत्न की तरह और बिना चखे हुए मधु के समान । अखंड पुण्यो का फल है यह । इसके इस पाप-हीन सौन्दर्य को भोगने के लिए भगवान ने न जाने किसे बनाया है।" "मैं बताऊ री, किसे बनाया है...?" चौथी लड़की बोली। "हा, हा, बड़ी आई बताने वाली।" रेखा उखड पड़ी। "जव अंगूठी के सो जाने से गला दुष्यन्त उसे नही पहचान पा रहे थे, उस समय की इमकी मुखाकृति भी देखने योग्य थी। सचमुच रेखा, रेखा है।" एक अन्य लड़की ने जोड़ा। "रेखा, रेखा है और तुम लोग क्या हो ? स्वामवाह किसीको बनाने पर तुल जाती हो । मेरा अभिनय अच्छा हुआ या बुरा मेरी बला मे, तुम्हारा क्या ?" कहती हुई वह बाहर निकल गई। . 10/एकला चलो रे । कॉमन रूम से बाहर निकलते ही रेखा पुनः वीणा से टकरा गई। वीणा, अपनी गाड़ी मे घर जा रही थी। वीणा के साथ जाने का उसका कोई विचार नहीं था, पर फिर कॉमन रूम लौट वह उन उद्धत लड़कियो के व्यंग्य-बाणों का शिकार भी नहीं होना चाहती थी। लाचार, वह वीणा की गाड़ी में बैठ गई । उसे पूरी तरह अपने अधिकार में पा वीणा ने उसे फिर छेड़ा-"तुम नहीं बोलती रेखा?" "मामि किछु जानि ना।" रेखा का वही उत्तर था। "पहली बात तो यह कि तुम मुझसे बंगला नहीं बोलो । बंगला बोलना ही है तो अपने उनको सिखाकर खूब शोक से आजीवन वंगला बोलना । दूसरी यह कि तुम्हें आज बताना ही पड़ेगा कि मैं जो कुछ कह रही हूं वह ठीक है या नही?" "नही, नही, सौ बार नहीं । लो अब हिन्दी ही वोलती हूं और यह भी बोलती हूं कि इस हृदय में अब तक न कोई आया है न कभी आएगा।" रेखा अपनी स्वाभाविक शेखी के साथ बोल गई। "हृदय मे कोई आए न पाए, किसीको बुलाना तो पड़ता ही है रेखा," वीणा ने प्रारम्भ किया, "अाखिर यह आकर्षण, यह उम्र और यह रंगीनी दुबारा तो नही आती। जो केवल अपना ही बना रहा, वह जिन्दगी का आनन्द क्या जाने ? त्याग और वलिदान का प्रानन्द कुछ और है । पाने से कुछ कम आनन्द खोने में नहीं। अपना सब कुछ किसीको सौंपकर, मनुष्य जिस आन्तरिक तुष्टि और निवृत्ति का अनुभव करता है वह तो अनुभव की ही बात हो सकती 1 "वस-बस," रेखा ने वीणा का हाथ पकड लिया, "मुझे यह सब अच्छा नही लगता-लुटाना, सौंपना, बलिदान होना नही "नही "मुझे तुम्हारा यह दर्शन नहीं चाहिए।" "तुमने मुझे गलत समझा रेखा!" वीणा रेखा के प्रतिवाद की चिन्ता किए बिना बोलने लगी, "सब कुछ सौंपने और लुटाने से मेरा मतलब वह नहीं जो तुम समझ रही हो । मेरा मतलब हादिक तथा मानसिक पक्ष से है, शारीरिक से नही। शारीरिक त्याग तो आसान है रेखा, मानसिक या हार्दिक कठिन । शारीरिक त्याग में तो आदमी सव कुछ देकर भी कुछ नही देता, हादिक त्याग मे कुछ नही देकर भी सब कुछ दे देता है। पारीर तो ऐसा है कि यह सब का होकर भी किसीका नहीं हो सकता। पर, मन जहां किमीका एक बार हुमा, वह फिर किसी और का होने से रहा । शारीरिक समर्पण तो रेखा, क्षणिक और अाकस्मिक है-मानसिक सम्बन्ध तो स्थायी और शाश्वत । शारीरिक त्याग एकला चलो रे द्वारा भले ही किसी क्षणिक दायित्व से मुक्ति मिल जाए, पर जहा किसीके हो जाने का प्रश्न है वहा तो शरीर का महत्त्व अत्यन्त ही गौण है।" "तो तुम्हारा मतलब है कि प्यार में वासना का कोई स्थान नही?" रेखा कुछ अाश्चर्य से बोली। "बहुत अच्छा प्रश्न है रेखा और साथ ही स्वाभाविक भी। पर, अव तुम्हारा घर भी आ पहुंचा है, शेप बातें हम वही करेंगे।" इम समय रात के दस बज रहे थे। रेखा ने खाना भेजने को कहा और खाने के टेवुत पर बैठते ही वीणा ने प्रारम्भ कर दिया, "हां रेखा, तो तुम प्यार मे वासना की बातें कर रही थी। मेरे ख्याल से प्यार वासना से सर्वथा पृथक है। यह दो व्यक्तियों के मध्य शारीरिक नहीं बल्कि पात्मिक तथा हार्दिक सम्बन्ध का द्योतक है। प्यार अथवा प्रेम को स्थिति में मनुष्य किसी पराये या सर्वथा अपरिचित को भी नितान्त अपना मान लेता है और अपनत्व की यह भावना हार्दिक है। यह शारीरिक हो नहीं सकती, क्योकि, शरीर का भावना से क्या मतलब ? अव रही बात यह कि आखिर प्यार में शरीर का कोई स्थान है या नहीं ? तो मुझे इस सम्बन्ध में केवल यह कहना है कि शारीरिक मिलन की स्थिति सच्चे प्यार मे तभी आती है जब हार्दिक मिलन पूर्णता को प्राप्त कर जाता है।" "अाखिर तुमने प्यार में वासना का महत्त्व माना तो?" “महत्त्व कैसा? मैंने केवल इतना कहा कि सच्चे प्यार में वामना का स्थान न तो प्रारम्भ मे है न मध्य मे। सच्चे प्यार की परिणति सदा वैवाहिक सम्बन्ध मे होती है और वासना का प्रागमन तव प्यार की पराकाष्ठा के रूप में होता है । न तो प्यार और वासना एक है और न प्यार वासना पर आधारित ही। प्यार अपने में पूर्ण है, इमे वासना के सहारे की आवश्यकता नहीं। उसी तरह वासना भी अपने में पर्याप्त है, प्यार की भूमिका इसके लिए आवश्यक नहीं । वासना तो बाजारों में विकती है रेखा, पर प्यार? मनुष्य के द्वारा प्रावियत इस मुद्रा ने मनुष्य तक की भी कीमत लगा दी, पर प्यार ही एक वस्तु है जिसके समक्ष मुद्रा को क्रयशक्ति ने भी घुटने टेक दिए। प्यार कितनी महंगी चीज है रेखा, साथ ही फितनी मस्ती भी। इसके लिए कोई कीमत नही, पर साथ ही यह इतनी कीमती है कि दुनिया की सारी क्रयशक्ति भी इसके ममक्ष व्यर्थ है।" "पर वीणा, तुम्हारी ही वात ठीक है तो लोग वागना को ही प्यार में 12/एकला चलो रे श्यादा महत्व क्यों देते हैं और प्यार में जहा दो-चार कदम व नहीं कि वामना पर ही" रेसा ने टोका। "जो लोग प्यार में वासना को महत्त्व देते हैं मोर तुम्हारे शब्दों में प्यार में दो-चार कदम चलने के बाद ही वासना पर उतर पाते हैं वे वस्तुतः प्यार नहीं करते । उनका ध्येय मात्र वासना-पूति होता है। ये जाने या अनजाने बासना के पूर्व, प्यार की भूमिका मात्र मंदा करते हैं। मौर जैसा मैंने पहले बताया वासना मे प्यार की यह भूमिका व्यमं ही है। अधिकांश स्थितियों में यही होता है कि यह भूमिका बहुत संक्षिप्त होती है जो उद्देश्य पूर्ति के साथ ही समाप्त भी हो जाती है। इसलिए मुझे यह कहना है कि अच्छा हो कि वासना की परिभाषा को थोड़ा विस्तृत कर झूठे प्यार की इस संक्षिप्त भूमिका को भी वासना के अन्दर हो समेट लिया जाए।" "पर क्या तुम यह स्वीकार नहीं करोगी कि अधिकाश स्थितियों में माजकल का प्यार, तुम्हारी बताई संक्षिप्त भूमिका ही है ?" "निस्सन्देह," वीणा ने साने के टेबुल से उठते हुए प्रारम्भ किया, "पर, मुझे कहना यह है कि प्यार और प्यार की भूमिका बहुत कुछ व्यक्तियों के संस्कार, वातावरण तथा उनके पारिवारिक परिवैग पर निर्भर करती है। अच्छे संस्कार के लोग प्यार की भूमिका नही अदा करते, वे प्यार ही करते हैं।" यह कहकर वीणा धीरे से हंस दी। वीणा जाने के लिए उठ खड़ी हुई और रेखा को माह में एक चिकोटी काटते हुए बोली, "मैंने तो तुम्हारे सभी प्रश्नों के उत्तर दे दिए, पर तुमने मेरे एक ही प्रश्न का अभी तक जवाब नहीं दिया। खैर, देखो कब तक यह राज, राज बना रहता है"" कहकर वीणा अपनी गाड़ी में बैठ गई। "वाई !" रेखा ने गाड़ी का फाटक बन्द करते हुए कहा। "बाई!" धीणा ने कहा और उसकी गाडी बढ़ गई। तीन वीणा के जाते ही रेखा उद्विग्न हो उठी। प्यार और प्यार की भूमिका, इन दोन एकला चलो रे /15 के मध्य वीणा ने जो अन्तर दिखाया था उससे रेखा के मन में एक भयानक अशान्ति घर कर गई। वह समझ नहीं पा रही थी कि अपने सन्दर्भ मे इस अन्तर को वह कैसे स्पष्ट करे । इन दोनों के मध्य एक विभाजक रेखा खीचना उसे कठिन लग रहा था। वह सुन्दर थी, आकर्षक और गुणवतो भी । उससे प्यार की भीख मांगने वालों की कमी कभी नही रही थी। वीणा मे वह झूठ बोल गई थी कि मव तक कोई भी उसके दिल में नही पा सका था। पर जब उसने भीतर टटोलकर देखा तो पाया कि वास्तविकता कुछ और ही है" । उसे लग रहा था कि अब तक जिसे वह प्यार समझ रही थी वह सब मात्र प्यार की भूमिका ही तो नहीं रहे ? पर, रेखा ने सोचा, 'इसमे उसका दोप ही कितना है ? यह उसके रूप और गुणो का दोष है जिन्होंने कभी उसकी वास्तविक स्थिति को उसके समक्ष उभरने ही नहीं दिया। वह झूठी और हल्की प्रशंसाओं पर फिसलती गई। इन झूठी और स्वार्थी प्रशंसानो ने उसे शोख, अल्हड़ और चंचल बना दिया और वह प्यार की भूमिकाओं में बंधती गई।' 'प्यार की भूमिका "शारीरिक समर्पण, मानसिक सम्बन्ध की शारीरिक परिणति,' वीणा की ये सारी बातें रेखा के मस्तिष्क में गूजने लगी। 'तो-~तो क्या वह मात्र भूमिका के लिए ही बनी है ? उसे सच्चा प्यार नसीव नही ?' रेखा सोच रही थी और कई एक भूली-बिसरी वातें उसके मस्तिष्क मे प्राती जा रही थी। दिलीप...। हां, उसका नाम दिलीप ही था। उस समय वह देहरादून मे पढती थी। वही से उसने इन्टर किया था। प्रथम वर्ष की कक्षा मे पहले-पहले आई थी। हर क्लास मे लड़के और लडकियो के बैठने का अलग-अलग प्रबन्ध था। उसके सामने की बेंच लड़कों की थी। अग्नेजी का क्लास था। प्रोफेसर मुखर्जी ने पढाने के बीच पूछ लिया था, 'व्हाट डू यू मीन वाई पोयेट्री ?' सभी लड़के और लड़किया एक-दूसरे का मुंह देखने लगे थे। पर थोड़ी ही देर में उसके सामने की बेंच के बीच से एक लड़का खडा हुआ और एक रटी-रटाई परिभाषा धड़ल्ले से बोल गया- -'पोयेट्री इज दी स्पान्टेनियस प्रोवरफ्लो प्रॉफ पावरफुल...' वह यही पर रुक गया । रेखा ने देखा लड़के की आखें उसीके चेहरे पर मा गड़ी। उसे यह बहुत अच्छा लगा और वह भी उसकी तरफ तब तक देखती रही जब तक प्रो. मुखर्जी ने उसे बैठा नही दिया और परिभाषा को शेष पंक्तियों को स्वयं नही दुहरा दिया। उसके बाद की कहानी बहुत छोटी थी और वीणा 14/ एकला चलो रे के शब्दों को सच माना जाए तो वह मात्र भूमिका ही थी। दो-तीन बार वे बस में साथ-साथ आए थे 1 फिर दिलीप ने उसे एक बार अपने घर बुलाया था। घर में उसकी मा के सिवा और कोई नहीं था। वह रेखा को अपने कमरे में ले गया था। कुछ देर तक वे वर्डस्वर्थ की पोयेद्री पर बहस करते रहे थे और फिर दिलीप ने एकाएक उठकर किवाड़ बन्द कर दिया था। रेखा इसका कोई प्रतिवाद नहीं कर सकी थी। वह समझ रही थी कि यह उनके मध्य प्यार का प्रारम्भ था पर उसे दूसरे ही दिन मालूम हुआ कि जिसे वह प्यार का प्रारम्भ समझ रही थी वह उसका अन्त था। उस दिन दिलीप के यहां से आने के बाद वह अपने मे ही खोई-खोई रही थी। रात को वह उसी- के सपने देखती रही। दूसरे दिन जय क्लास में गई तो दिलीप मे उसकी मुलाकात फाटक पर ही हो गई। वह उसे एक किनारे ले गई और शरमाते-शरमाते बिना किसी भूमिका के कह डाला। "प्रामि तोमाय भालो बासि ।" (मैं तुम्हें प्यार करती हूं।) "ता प्रामि जानि।" (वह मैं जानता हूं।) "तो तुमि आमार संगे बिए कोरवे ?"(तो, तुम मेरे साथ विवाह करोगे?) "केनो?" (क्यों ?) "तो तुमि मामाय भालो बासो ना कि ?" (तो तुम मुझे प्यार नहीं करते क्या?) "के बोलछे ?" (कौन कहता है ) "तुमि तो बोलछो जे विए केनो कोरवे?" (तुम्ही तो कहते हो कि विवाह क्यों करूंगा?) "ता तो सत्यि, किन्तु बिए केनो कोरव ? भालोवासार अर्थ विए तो नय ?" (यह तो ठीक, किन्तु विवाह क्यों करूंगा? प्यार का अर्थ विवाह तो नहीं होता?) इस संक्षिप्त वार्तालाप के बाद दिलीप विना कुछ बोले चला गया था। इसके बाद वह फिर उससे कभी नहीं मिला। पर, इसके बाद एक बात अवश्य हुई। रेखा के मन मे प्यार (प्यार की भूमिका) की एक अतृप्त लालसा अवश्य जग गई और फिर इसके बाद वह फिसली तो फिसलती ही गई। इसी समय रेखा के कमरे की घड़ी ने एक बजाया और रेखा ने देखा उसके मन में भीषण अशान्ति है। उसका मस्तिष्क फटा जा रहा है और उसके लिए सोना असम्भव हो गया है। एकला चलो रे / 15 'प्यार की भूमिका पर भूमिका, रेखा फिर सोचने लगी । 'दिलीप से सम्बन्ध के आज चार साल गुज़र गए है। उस समय वह प्रथम वर्ष में थी, आज चतुर्थ वर्ष में है। इस चार साल की अवधि में उमै छोटी भूमिकाओं की संख्या तो याद नही, पर उसने चार स्पष्ट भूमिकाएं अवश्य अदा की हैं । हर भूमिका आज के पहले उसे प्यार ही लग रही थी पर आज सब भूमिका ही निकली। प्रोह, वे नाम जिन्हे वह कभी होंठो पर गिनकर अधाती नही थी आज कितने घिनौने लग रहे थे ! रेखा को लगा वह बहुत नीच है, गिरी हुई है, वह नाले के पिल्लू से भी वदतर है । वह प्यार की भूमिकाएं अदा करती रही है। उसे सच्चा प्यार प्रब तक नही मिला और अब जब उसने सच्चे प्यार का रूप समझा तो वह प्यार करने योग्य नहीं रही।' रेखा का सिर फटा जा रहा था। चिन्ता के मारे उसका बुरा हाल था। उसने टेबुल लैम्प का 'स्वीच' दबाया और एक बंगला उपन्यास लेकर उसमे मन लगाने की चेष्टा करने लगी। चार दूसरे दिन रेखा कॉलेज नही गई तो वीणा को चिन्ता हुई । वह कभी भी जान- यूझकर अनुपस्थित नहीं होती थी। कॉलेज से छुट्टी होते ही वीणा रेखा के घर पहुंची । शाम के कोई साड़े चार बजे थे और रेखा प्रब भी विस्तर मे थी। उसे देखने मे स्पष्ट था कि न तो उसने स्नान ही किया था न खाना ही खाया था। बेतरतीय केश, उतरे मुख और मूणे होंठों में उसकी हुलिपा अजीब लग रही थी। "क्या बात है रेषा ? तुम कलिज नहीं गई?"-वीणा पास बैठते हुए बोली। "मेरी तबीयत ठीक नहीं है।" "कल रात ग्यारह बजे तक तो सुम एकदम ठीक थी।" "हां, उसके बाद ही मैं भस्वस्य हो गई।" "कोई बात नहीं, पार भी तुम्हारे 'वे' कलिज नहीं माए।मुना दालिसिंग को 16/एकना पमोरे . - छुट्टी पर गए सो अभी तक नहीं लौटे।" "भगवान के लिए चुप करो वीणा । मैं ऐसा कोई शब्द नहीं सुनना चाहती।" रेखा उठकर एक-ब-एक पलंग पर बैठ गई और उसने लगभग चिल्लाते हुए अपने हाथों से वीणा का मुंह ढंक दिया। वीणा के ग्राश्चर्य का कोई ठिकाना न था। उसने रेखा को गोद में खीच लिया और ललाट पर की बिखरी लटो को ठीक करते हुए बड़े प्यार से बोली, "क्या बात है रेखा, तुम्हें हुआ क्या है?" वह चीणा की गोद में सिर छिपाकर फफक पड़ी और थोड़ी देर के बाद सिसकियों के बीच ही बोली- "वीणा, मैं नीच हूं। मैं गिरी हुई हूं!" "पर कैसे ?" वीणा ने धीरे-धीरे रेखा के केशों में उंगलियां फिराते हुए कहा। "कुछ नहीं वीणा, कुछ नही, मै कुछ नहीं बोल सकती। इतना ही जानती हूं कि मैं गिरी हुई हूं। मैं नकं के कीड़े से भी बदतर हूं। मैं वेश्या हूं वीणा। मैं पापिनी हूं। मैं तुम्हारे पास बैठने योग्य भी नही।" उसने छिटककर वीणा से दूर होना चाहा, पर उसके पंजे से वह मुक्त नहीं हो सकी। "मैं सब कुछ समझती हूं रेखा, सब कुछ जानती । पर, इसमें दुःखित होने की क्या बात है ?" "तुम मब कुछ समझती हो वीणा ? क्या कहा तुमने, तुम मव कुछ समझती हो, तुम सब कुछ जानती हो ?" रेखा ने एक झटके से अपना सिर वीणा की गोद से निकाल लिया था और उसकी लाल-लाल अध्रु-पूर्ण प्रोसें, दो बड़े प्रश्न चिह्न बनकर वीणा के चेहरे पर टिक गई थी। "हां रेवा, तुम्हारे साथ रहते हुए मुझे दो वर्ष हो गए। इस वीच तुम्हारे वारे में बहुत कुछ समझ लेना, बहुत कुछ जान लेना मेरे लिए कठिन नहीं था। फिर भी, कुछ कारणवश मैंने तुमसे कुछ नहीं कहा और कारण यही था कि मुझे पूरी उम्मीद थी कि तुम रास्ते पर आ जामोगी, क्योकि प्रो० विशाल का तुम्हारे प्रति आकृष्ट होना और तुम्हारा भी उनके प्रति कुछ खिचा-सिंचा-सा रहना--- इससे मेरे मन को विश्वास हो गया था कि तुम सही रास्ते पर पा रही हो । इसी कारण में बार-बार प्रो० विशाल का नाम लेकर तुम्ह छेड़ती प्राई हूं। पर, जब भी मैंने इस सम्बन्ध में कुछ जानना चाहा तुमने 'मामि किछु जानि ना' महकर मुझने पिंड छुड़ाने की चेप्टा की। मब कल ही की बात लो। कल, एमाला चलो रे /17 अभिनय के समय तुम्हारी आखें बार-बार किसीको खोज .रही थी। मैंने समझा तुम अवश्य ही प्रो० विशाल को खोज रही हो। इसी कारण मैंने अभिनय के अन्त में तुम्हे पकड़ा था। पर तुम फिर वही घिसी-पिटी 'प्रामि किछु जानि ना' ले बैठी।" "मैंने तो ठीक ही कहा था वीणा।" "तो क्या तुम प्रो० विशाल से प्यार नहीं करती ?" वीणा ने आश्चर्य से कहा। "यह में बाद में बतलाऊंगी वीणा। पहले तुम यह बतायो कि इतना सव समझने के बाद भी तुम मुझे किसीके प्यार के योग्य समझती हो ?" रेखा की मिसकियां थम गई थी। आंखें अव भी गीली थीं। "हां रेखा अब भी समझती हूं और हमेशा समझंगी। तुम में रूप है, गुण तुम एक सम्भ्रान्त पिता की इकलौती लड़की हो । तुममें क्या कमी है जो तुम किसीके प्यार के योग्य नही...?" "पर मेरा चरित्र ? मेरा कैरेक्टर ? वीणा, तुमने शायद मुझे ठीक से नहीं समझा ?" रेखा फिर लगभग चिल्ला पड़ी। "मैं तुम्हें बहुत ठीक से समझती हूं रेखा। इतना जितना शायद तुम स्वयं को भी नहीं समझती।" वीणा ने धीरे से कहा । "मैं कहती हूं वीणा, मैं गिरी हुई हूं, इतनी गिरी जितनी की तुम कल्पना भी नहीं कर सकती। मैंने तुम्हारे शब्दों में प्यार की भूमिकाएं प्रदा की हैं। मैंने 'मैंने वीणा । मैंने क्षणिक मानसिक सम्बन्धों को तुम्हारे शब्दो मे शारी- रिक, हा "हा, शारीरिक परिणति दी है, एक बार नहीं दो बार नहीं।" "हा-हां, चार-चार वार।" वीणा बीच में बोल उठी। "वीणा!!" "रेखा।" वीणा गम्भीर हो गई, "यह तो मैं थोड़ी देर पहले ही कह चुकी हूं कि मैं सब कुछ जानती हूं। पर उस समय शायद तुमने ठीक से नहीं समझा। मुझे सब कुछ शरद के द्वारा मालूम हो गया है।" "शरद !! उसने तुमसे सब कुछ कह दिया है ! मेरा पूरा इतिहास !! हे भगवान !!" और लगा रेखा पागल हो जाएगी। वीणा ने रेखा का दाहिना हाथ अपने हाथ में लिया और सात्वनापूर्ण पाब्दों में बोली, "धवराने की बात नहीं रेखा, पर मुझे अव दूसरा ही भय है । जहाँ तक मुझे पता है तुम अभी गरद के साथ बहुत आगे नहीं बढ़ी हो । पर, धान 18/एकला चलो रे रखो, तुम एक बार फिर प्यार की भूमिका को ही प्यार समझने की गलती कर रही हो। रेखा, तुम पांचवीं बार गिरने जा रही हो और इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि जिसको अपना समझ तुमने अपना पूरा इतिहास उसके समक्ष रख दिया, जिसके सामने अपने सारे पापों को खोल तुमने प्रायश्चित करना चाहा, उसीने मुझे सब कुछ बता दिया।" "झूठ ! एकदम झूठ !! यह हो ही नहीं सकता वीणा ! शरद, मुझसे प्यार करता है । अवश्य ही तुम कोई कहानी गढ़ रही हो । मुझे तुम शरद से अलग करना चाहती हो।" "तुम इस समय भावनाओं को बाढ़ में बह रही हो और मैं तुम्हें बहुत उत्तेजित करना नहीं चाहती। पर विश्वास दिलाने के लिए इतना ही कहती हूं कि तुम्हें याद होगा तुमने एक दिन प्रो० विशाल के क्लास में शरद के 'रोल नम्बर' पर ही अटेंडेंस बोल दिया था । यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण था कि तुम उस समय शरद के बारे में ही सोच रही थी। मुझे उसी समय मंदेह हुआ था और इसके बाद की छोटी-छोटी घटनाओं से मेरी शंका जव पुष्ट होती गई तो मैंने एक दिन शरद से सीधे तुम्हारे बारे में पूछ लिया। वह अक्सर मेरे घर पाता है और हम लोगों में भाई-बह्न के नाते खूब धुलमितकर बातें होती है । उस दिन मुझे जितना इस बात का आश्चर्य नहीं हुआ कि तुम शरद के साथ बहुत आगे बढ़ गई हो उतना इससे हुआ कि तुम्हारे साथ प्यार का ढोंग रचने के बाद भी उसने तुम्हारी सारी बातें मुझे आदि से अन्त तक बता दी।" रेखा अब तक सब कुछ सुन रही थी। बात समाप्त होते ही जाने या अन- जाने में उसके मुंह से निकला, "यह झूठ है । शरद मुझे प्यार करता है ।" रेखा को लगा जैसे उसके सामने की सभी चीजें तीव्र गति से घूम रही है। दीवार, दीवार के चित्र, पलंग, वीणा, सभी जैसे पृथ्वी की गति से धूम रहे हैं । दूसरे ही क्षण मूछित हो वह वीणा की गोद में गिर गई। वीणा को जैसे ज्ञात था कि यह स्थिति आएगी। विना किमी घबराहट के दौड़ी-दौड़ी वह रेखा की मां के पास गई। उसे रेखा की मूर्य की बात बताई और फिर उसी कमरे में रखे टेलीफोन से उनके फैमली डॉक्टर को फोन कर दिया। डॉक्टर के पाने में कोई दस मिनट लगे। तब तक रेखा की मां के साथ मिलकर वह रेखा को होश में लाने का प्रयत्न करती रही। डॉक्टर के आने के बाद जब उसके उपचारों से रेखा शीघ्र ही होश में आ गई तो वीणा एकला बलो रे / 19 बिना किसीसे कुछ वोले धीरे से खिसक गई। होश में आते ही रेखा चिरला पड़ी, "मुझे मरने दो। मैं ज़िन्दा नहीं रहना चाहती। सभी मेरे पास से चले जायो। मैं किसीकी शक्ल नहीं देखना चाहती।" डॉक्टर ने आसानी से समझ लिया कि उसे क्या करना चाहिए । उसने सिरिंज मे एक दवा भरी और रेखा के लाख प्रतिवाद बाद भी उसके बाएं बाजू में एक इन्जेक्शन दे दिया। इन्जेक्शन से रेखा सुस्त पड़ने लगी और दो मिनटों के अन्दर ही वह जैसे गहन निद्रा मे सो गई। डॉक्टर ने उसकी मां से कहा, "चिन्ता की कोई बात नहीं। अब सुवह तक ये शान्ति से सोएंगी। सवेरे उठने पर स्वयं ही सब कुछ ठीक हो जाना चाहिए।" पांच दूसरे दिन सवेरे उठते ही रेखा ने देखा वह पहले से ज्यादा प्रफुल्लित है । उसके सिर में दर्द भी नहीं था और जी हत्का-हरका लग रहा था। स्नान करने क पश्चात सिर के केशो को पोछ-झाड़कर उसने उन्हें खुला छोड दिया । एक हल्की गुलाबी साडी पह्नकर, नारता के बाद वह ड्राइंगरूम मे आ बैठी और रेडियो प्रॉन कर लेटे-लेटे एक फिल्म-मैग्जीन के पन्ने उलटने लगी। रेडियो में कोई हिन्दी गीत चल रहा था- "गुजरिया जल्दी कर सिंगार नगरिया दूर नहीं" न जाने क्यों यह गीत उसे बहुत प्रिय था और जब कभी यह रेडियो पर पाता वह जैसे झूम उठती। इसी समय दरवाजे को कॉलवेल बज उठी। उटकर दरवाजे पर माई । किवाद सोला तो सामने शरद खड़ा था । वह युछ देर तक चित्र-सचित-सी दरवाजे के बीच खड़ी रही। उसका चेहरा भाव-शून्य था और उसकी समझ में नहीं पा रहा था कि वह क्या करे, क्या न करे । तभी उसके दाएं कन्धं पर हाथ रस शरद बोल पड़ा, "कैसी हो?" उसने एक झटके में शरद के हाय को अपने कंधे से अलग किया और 20/एकला चलो रे दरवाजा छोड़कर खड़ी हो गई। शरद अन्दर पाया और रेखा के पास पड़ी आरामकुर्सी पर बैठ गया। रेखा पाकर एक कुर्सी पर बैठ गई और हाय मे पड़ी मैग्जीन के पन्ने अन्यमनस्कन्मी उलटने लगी। गरद ने एक सिगरेट मुलगाई और हया मे वादल बनाते हुए बोला- "रेखा डियर।" "रेखा !!" "बोलो।" "मैं एक बात पूछना चाहता हूं!" "शोक से पूछो।" "प्रो० विगाल दाजिलिंग जाने के पूर्व यहां पाए थे क्या ?" "हां, पाए थे !" "तुम्हें उन्होंने कुछ पुस्तकें भी दी थी ?" "हा, तो फिर?" "तुमने वै पुस्तकें स्वीकार कर ली?" "हां, पर तुम्हे इमसे मतलय ?" "मैं पूछता हू रेखा, तुमने अाखिर वे पुस्तक स्वीकार की तो, क्यों ?" "मैं पूछती हूं मिस्टर परद, पापको क्या अधिकार है कि आप ऐसे प्रश्न पूछे ?" रेखा अब तक हाथ को मैग्जीन रख चुकी थी और उसको पाखें सीधे शरद के चेहरे पर गड़ी थी। शरद सिगरेट का एक पुरा करा खीचते हुए लगभग चिल्लाकर बोला- "रेखा, तुम प्रो० विगाल से प्यार करती हो।" "करती हूं तो अपनी बला से । इसमे आपकी राय तो मैं नहीं चाहती ?" "रेखा!!!" शरद उत्तेजित हो पाया था। सिगरेट के प्राधे जले टुकट्टे को उसने खिडकी से बाहर फेंक दिया और कुर्मी पर सीधा बैठ गया। "रेखा !!!" शरद दूसरी बार चिल्लाया। "पर, इसमे चिल्लाने की क्या बात है ? जो कुछ कहना हो शान्ति से कहिए।" "मैं कहता हूं रेखा, तुमको किसी दूसरे से प्यार करने का कोई अधिकार नहीं।" "क्यों ?" "इसलिए कि तुम मुझपे कह चुकी हो कि तुम मुझे प्यार करती हो और एकला चलो रे /21 एक व्यक्ति एक समय किसी एक ही व्यक्ति से प्यार कर सकता है।" "ठीक है, पर मैं यह कहूं कि मैं इस समय केवल एक ही व्यक्ति मे प्यार करती हूं और वह कम से कम आप नही है तब ?" "तब यह कि तुम प्रो० विशाल से प्यार करती हो।" "हां, तब ?" "तब यह कि तुम गिरी हुई हो, तुम नीच हो, पाखंडिनी हो, तुम एक साथ अनेक को धोखा दे रही हो।" शरद पापे से बाहर हो रहा था। "यह तो आपको उसी दिन मालूम हो गया था जिस दिन मैंने अपना पूरा इतिहास आपके समक्ष रख दिया था। मैं आपकी तरह गालियां तो नही बक सकती, पर मैं इतना अवश्य कहूंगी कि यदि मैं नीच और गिरी हुई हूं तो आप मुझसे भी ज्यादा पतित है।" रेखा संयत स्वर में बोल रही थी। "रेखा ! तुम अपने घर मे मेरा अपमान कर रही हो। तुम्हें मुझे पतित कहने का कोई अधिकार नहीं।" शरद गुस्से में था। "अवश्य ही मुझे आपको पतित कहने का कोई अधिकार नही, पर आपको भी मुझपर प्यार जताने का कोई अधिकार नहीं। आज से मैं 'रेखा डियर' नही-'रेखा जी,' हूँ।" रेखा का चेहरा दृढ़ था। "रेखा।" शरद जैसे पहाड़ से गिरा। "रेखा, तुमने यह क्या कह डाला ? मैं मर जाऊंगा। मैं तुम्हारे बिना जिन्दा नहीं रह सकता। रेखा! लौटा लो अपनी बात 1 लौटा लो रेखा।" शरद गिड़- गिड़ा रहा था। "बात लौटाने की नही शरद, बात बस इतनी है कि मैं अब किसीसे प्यार-व्यार नही करती । मुझे दुनिया में किसी पुरुष पर विश्वास नहीं रहा।" "रेखा, पर अभी कितने रोज हुए जब तुमने मुझे अपना पूर्ण विश्वास दिया था ? तुम्हारा विश्वास इतना शीघ्र, इस तरह अविश्वास मे कैसे बदल गया?" "अगर अाप सुनना ही चाहते हैं तो सुनिए । वह इसलिए कि दुनिया के मौर लोगो की तरह आपने भी विश्वासघात किया।" रेखा ने मपे-तुले शब्दो मे "प्रसम्भव ! रेखा, तुम मुझसे ऐसी प्राशा नहीं कर सकती । मैं अविश्वास का पात्र नहीं।" 22/एकला चलो रे "क्या आपने मेरी बातें किसीसे नही कहीं ?" "नहीं।" "सोचकर वोलिए।" "नही, और सो वार नहीं।" "शरद।" रेखा!" "तुम झूठे हो, विश्वासघाती, मक्कार और गिरे हुए हो । तुम्हारी शक्त बतलाती है, तुम्हारे लक्षण बोलते हैं कि तुमने अब तक मेरे समान अनेक लड़कियों को छला है, उन्हें सब्जबाग दिखलाकर उनका सत्यानाश किया है । शरद ! मैं तो अनजाने मे, परिस्थितियों के वश होकर गिरी हूं। फिर भी, मुझे अपने गिरने का पश्चात्ताप है; पर तुम्हें अपनी गिरावट पर, अपने पतन पर भी नाज है। तुम अकड़कर अपने पतन की प्रतिरक्षा कर सकते हो !मोह ! तुम स्वयं तो गिरे हुए हो ही, तुमने न जाने मेरे समान कितनों को गिराया भी है।" "रेखा।" शरद मुंह फाड़कर रेखा के चेहरे की ओर एकटक देखे जा रहा था। "हां मिस्टर शरद, मुझे वीणा से सब कुछ ज्ञात हो गया है।" "वीणा ?" शरद का मुंह खुला का खुला ही रह गया। "हां, घबरामी नही, उसने तुम्हारे पुराने पापों का पर्दाफाश नहीं किया है, यद्यपि वे इतने स्पष्ट है कि कॉलेज की प्रायः सभी लड़कियों की जुबान पर हैं। मैं ही एक ऐसी मूर्खा भी जिसने सुने हुए को भी अनसुना कर दिया।" "वीणाने माखिर तुमसे क्या कहा ?" शरद भीगी बिल्ली बन पाया था। "यही कि में गिरी हुई हूं। मैंने अब तक अनेक पाप किए हैं। और यही कि ये सब बातें उसे शरद के द्वारा मालूम हुई।" रेखा धाराप्रवाह बोल गई। रेखा, मैंने गलती को है।" शरद गिड़गिड़ा रहा था। "मैं जानती हूं शरद, कि तुम्हारे समान लोग गलती. स्वीकार भी बहुत शीघ्र करते हैं । प्राखिर तुम्हारा अस्त्र भी तो यही है. "शरद, मैं जानती हूं कि तुम मेरे प्यार के पात्र नहीं हो। तुम किसीके प्यार के भी पात्र नही, फिर भी जब मुझे तुमसे प्यार हो ही गया तो-तमको प्यार नही करना भी अब मेरे वंश की बात नही। काश ! हमारा परिचय ही नहीं हुआ होता । काश मैं मात्र तुम्हारे बाहरी आशो पर नहीं फिसली होती, एकला चलो रे 23 फारा, तुम्हारे सारे अवगुण मुझे गुण ही नहीं लगे होते ! प्रोह ! तुम नहीं जानते शरद, प्यार करने वाला कितना मजबूर।" "रेखा, तुम नही जानती मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूं!" शरद के चेहरे पर चमक आ गई थी। "यह झूठ है और अव में ऐसी बातें सुनकर अपने दिल को झूठी सात्वना देना भी व्यर्थ समझती हूं । यह मैं खूब जानती हूं कि तुम मुझे प्यार नहीं करते या सच पूछो तो तुम प्यार कर भी नहीं सकते। तुम केवल मुझे धोखा देते हो और साथ-साथ अपने को भी।" रेखा दृढ थी। उसका चेहरा अव भी भाव- विहीन था। "पर रेखा, मैं सच कहता हूं। मैं कसम खाकर कहता हूं कि मैं केवल तुम्हें और तुम्हें प्यार करता हूं। मेरा भूत चाहे जितना घिनौना रहा हो, पर वर्तमान पूर्णतया तुम्हारा है । तुम मुझे ठुकरा दोगी तो मैं कही का न रहूंगा।" "कसम खाने की आवश्यकता नही । मैं मान लेती हूं कि तुम अपने रूप में मुझे प्यार भी करते हो, पर जिसे तुम प्यार समझने की भूल करते हो वह वस्तुत: प्यार नही, कुछ और है।" "तो वह क्या है ?" शरद आश्चर्य से रेखा की तरफ देख रहा था। "वह चाहे जो हो, पर प्यार नही है।" "रेखा, मुझे सशय में नही रखो। तुम मेरी स्थिति को समझती हो। मैं तुम्हारे बिना रह नहीं सकता। मैं तुममे शादी करना चाहता हूं।" शरद एक सास मे बोल गया। रेखा शरद की बात सुनकर धीरे से मुस्कराई, पर वोली कुछ नही। "रेखा !!" शरद रेखा का हाथ पकड़कर झकझोरते हुए बोला। रेखा अपना हाथ छुड़ाते हुए बोली, "शरद, इतना याद रखो कि रेखा, वह रेखा नही, जिसे तुम अब तक जानते आए हो । मुझे तुम्हारे प्रति सहानु भूति अवश्य है, पर मैं तुम्हें उसका नाजायज फायदा नहीं उठाने दूंगी। मुझे इसकी खुशी है कि मैं पाचवी बार नहीं गिरी और भगवान ने चाहा तो अब गिरूंगी भी नहीं । पर, तुम इतना ध्यान रपो कि जाने या अनजाने अब तुम मेरे शरीर का कोई भाग नहीं छूने जा रहे । रही बात तुममे गादी की तो मैं तुमने कुछ प्रश्न करना चाहती हूं। क्या तुम उसका सही-मही उत्तर दे सकोगे?" रेला का स्वर दृढ़ हो पाया था। "एकदम, सही-सही।" शरद का उतावलापन उसके चेहरे पर स्पष्ट था 24 / एकला चलो.रे "कसम सानो।" "खाता हूं।" "तुमने इसके पहले कितनी लड़कियों से प्यार किया है ?" "ठीक याद नहीं।" "हूं।" रेखा ने एक दीर्घ सांस खोची, उसका चेहरा कुछ उतर पाया था। ...."लगारद "कोई बात नही," रेखा अपने को नियंत्रित कर चुकी थी, "यह तो बतायो, तुमने यह प्रस्ताव अब तक कितनी लड़कियों के समक्ष रखा है ?" "कौन-सा प्रस्ताव ?" "यही शादी का।" "कोई सात के पास।" "तो फिर उनमे शादी क्यों नहीं हुई ?" "क्योंकि.. क्योकि.." "क्योंकि क्या?" मुह में आवाज ही नहीं थी। मैं समझ गई, क्योकि तुम्हारे शादी के प्रस्ताव के सब्जबाग में पाकर वन्होने अपना सब कुछ तुमपर लुटा दिया और फिर तुमने उन्हें दूध की मक्सी की तरह अपने जीवन से निकाल फेंका।" "रेखा।" लगा शरद किसी भारी बोझ के नीचे दवा जा रहा था। "और हां, तुम इतना ध्यान रखो कि एक ममय था जव में इस प्रस्ताव पर फिमल भी जाती, पर मैंने तुम्हें बता दिया मैं अब बह रेखा नहीं हूं।" "पर, तुम थोड़ी देर पहले ही कह चुकी हो कि तुम मुझे प्यार करती हो।" "वह तो मैं कह हो चुकी हूँ, मेरी मजबूरी है । पर मैं स्वयं नहीं जानती इस प्यार में कितनी गहराई है।" "पौर प्रो० विशाल से?" "यह तो तुम जानते ही हो कि व्यक्ति एषा वार किसी एक में हो पार कर सकता है।" "रेखा ! तुम कितनी ग्ररही हो।" दारद का चेहरा बहुत देर के बाद चमका था। "मैं नहीं जानती कि भविष्य के गर्ने में बरा है। मैं न प्ररने को समझ पाती हंन दूसरों को । अब तुम जा मकर हो ।" इतना कहकर रेखा जो और एपला चलो ₹125
अन्दर के दरवाजे से दूसरे कमरे में चली गई।
.
शरद के जाने के थोड़ी देर बाद ही रेखा के ड्राइंगरूम की बेल फिर बज पड़ी
रेखा ने दरवाजा खोला। वीणा खड़ी थी।
"कसी हो रेखा ?" वीणा ने उसे देखते ही पूछा।
"एकदम अच्छी।" रेखा ने जवाब दिया और वीणा को खींचकर अन्दर
गई।
तुम्हारे
"कल तो तुम्हारी हालत बहुत खराब थी ?"
"कल की बात छोड़ो, आज मैं दूसरी ही रेखा हूं। एकदम परिवर्तित । अब
यह प्यार की भूमिकाएं अदा करने वाली रेखा नही है।"
वीणा ने यह सुनते ही रेखा को भुजाओं में बांध लिया और बोल पड़ी-
"वाह रेखा! तब तो तुम अब एकदम विशाल के योग्य बन गई।"
रेखा अपने को वीणा के बन्धन से मुक्त करती हुई एक कुर्सी पर बैठ गई।
वीणा उसके सामने की कुर्सी पर बैठती हुई बोली-“वीणा ! तुम विशाल का
नाम इस तरह क्यों बार-बार लेती हो?"
"क्योंकि वह तुमसे प्यार करते है और तुम ठीक उन्हीके योग्य हो।
समान लड़की के लिए विशाल के समान व्यक्ति तो मिलना ही चाहिए।"
"वीणा!"
"बोलो।"
"काश, में विशाल को प्यार कर पाती!" रेखा का गला भर पाया था।
"पर, क्यों?"
"मैं मजबूर हूं।"
"मैं समझ गई। तुमपर शरद के प्यार का भूत सवार है। पर यही बात
थी तो तुमने विशाल को क्यों भागे बढाया? यह तो तुम मानोगी ही कि तुम्ही ने
उन्हें यहा तक सीचा है। जिस दिन से उन्होंने पहले-पहल तुम्हारा क्लास लिया
तुम उसी दिन से बहाने बनाकर उनके डिपार्टमेंट में दौड़ने लगी। उनका अपने
|एकला चलो रे
पिताजी से परिचय कराया, उन्हें अपने घर वुत्ताया और अब यह क्या बात है जो तुम इस तरह उनसे खिंची-खिची रह रही हो?" "यह सब ठीक है वीणा और उस समय मैं शायद विशाल से प्यार भी करती थी पर इसी बीच शरद मेरे और उनके बीच मा गया। लगातार उसने अपने प्यार की दुहाइयां देनी प्रारम्भ की और मैं धीरे-धीरे उसकी बातों मे पाती गई। फिर बात यहां तक पहुंची कि शरद को खुश करने के लिए मैंने विशाल से मिलना और उनकी तरफ देखना भी छोड़ दिया। और तो और मैंने शरद के कहने पर ही विशाल के क्लासों से भी कन्नी काटी और उनके क्लासों के काफी महत्वपूर्ण होने के बाद भी मैं उन्हें छोड़ने को बाध्य हुई।" "और तुम्हे यह भी मालूम है कि तुम्हारे उन व्यवहारों का विशाल पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा और उनका स्वास्थ्य दिनोदिन गिरने लगा था ?" "तो तुम्हें यह भी अन्दाज होगा कि तुम्हारी चिन्ता से अपना पिंड छुडाने के लिए ही पिछली छुट्टियों मे वे दार्जिलिंग चले गए और अभी तक नहीं लौटे।" "तब तुम कितनी निष्ठुर हो रेखा?" "निष्ठुर नही, वीणा। मैं मजबूर हूं। मुझे विशाल से पूरी सहानुभूति है । में कभी उनसे प्यार भी करती थी और मेरा यह सौभाग्य होता कि मैं उनके चरणों में स्थान प्राप्त करती, पर मुझपर भारद का जादू चल गया है और मैं उससे अपना पिंड नहीं छुड़ा पा रही।" "पर, एक बात बतामो, दार्जिलिंग जाने के पहले विशाल यहां पाए थे?" "हो।" "कब ?" "जाने की सुबह । कोई सात बजे।" "उन्होंने क्या कहा?" "तुम तो जानती ही हो माज तक उनसे मेरी कोई विशेष वातें नहीं हुई हैं। फिर भी मुझे यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि विशाल जितना मुझसे प्यार करते हैं उतना शायद ही कोई व्यक्ति किसी दूसरे से कर सकता है। उन्होंने आते ही पूछा था, "पिताजी कहां है ?' मैंने कहा, 'कार्यालय गए हैं।" उन्होंने फिर कहा, 'उनसे कह देना मैं दार्जिलिंग जा रहा हूं। शायद दो महीने बादा पाऊं।" एकला चलो रे / 27 "और किता?" "हां उनके हाथ में किताबो का एक पकेट था। उसे उन्होंने मेरी तरफ बढाकर कहा, 'ये तुम्हारे काम की हैं, मेरे पास बेकार पड़ी थी, सोचा तुम्हारे काम आ जाएंगी।" "तो तुमने उन्हें लिया क्यों ?" "क्योकि मैं उनका मन नहीं तोड़ना चाहती थी और दूसरी वात कि मुझे उनकी आवश्यकता भी थी।" "रेखा ! !" "बोलो।" "मैं कहती हूं तुम विशाल को बचा लो । माना तुम उन्हें प्यार नहीं करती 'पर हो सकता है प्रयत्न करने में धीरे-धीरे तुम उन्हें चाहने भी लगो। दूसर बात यह कि तुम झूठी सहानुभूति और खिचाव भी उनकी तरफ दिखायोगी तो उनका मन भरा रहेगा और वे इसे तुम्हारा प्यार ही समझेंगे। रेखा, तुम विशाल की बरबादी का कारण न बनो।" "मैं मजबूर हूं वीणा ! मैं अपने रूप मे ही सही, शरद को प्यार करने लगी हूं। मैं उसकी सभी बुराइयों से परिचित हूं। मैंने आज उसे ग्युले दाब्दो मे दुत्कारा भी है, फिर भी मैं उसकी नाराजगी मोल लेने की हिम्मत नहीं कर सकती।" रेखा की बातें सुनकर वीणा कुछ देर चुप रहकर बोली- "रेखा, मुझे लगता है तुममें सुधार अब भी नहीं हुआ। तुमने अपने को मिथ्या सात्वना दे रखी है कि तुम वदल गई हो। अब भी तुम वही हो जहा तुम पहले थी । अगर तुम्हारी यातो को सत्य भी मान नू तो तुम ध्यान में सुन लो कि तुम एक बार फिर गिरने जा रही हो और प्रवकी वार का यह पतन तुम्हें कही का न छोडेगा।" "यह तो नही होगा तुम निश्चिन्त रहो।" रेखा ने दृढता में कहा । "वर । यह तो भविष्य ही बतलाएगा । अच्छा, में चली।" "क्यों, रुकोगी नहीं ?" "नहीं।" वीणा के जाने के बाद रेसा ने दरवाजा बन्द कर लिया। घडी पर दृष्टि डाली तो ग्यारह बज रहे थे। उसी गमय मा नै चाफे में मायाज दी- । .28/एकला चलो रे रेसा !" "कलो?" (क्यों ?) "ए दिक् एसो।" (यहां आनो) "आदिच मा" (भा रही हूं मां) भीतर गई तो देखा, मां के हाथ में एक लिफाफा है । लिफाफा बढ़ाते हुए मां ने कहा- "तोमार चिट्ठी । कालि के एसेलो । मामि तोमा के दिते पारलाम ना।" (तुम्हारी चिट्ठी है। कल ही आई थी। मैं तुम्हें दे नहीं पाई।) "कोथाय थेके पाश्चे मां ?" (कहां से पा रही है मा?y" "चूमने पारि ना । डाकखानार मुहर दा स्पष्ट नेई। किन्तु नूमि खाबार कोरो, तारपोरे पोदो।" (समझ नहीं पा रही हूं। डाकखाना की मुहर भी स्पष्ट नहीं है, पर तुम खाना खा लो, इसके बाद पढ़ना।) रेजा की मां खाने के टेबुल पर खाना लगा चुकी थी। रेखा खाने बैठी ती उसके दिमाग में अब भी वीणा की ये बात गूंज रही थी~ रेखा, तुम विगाल को ववालो, तुम उनकी वरवादी का कारण न बनो। रेसा सोच रही थी, उसमें ऐसा क्या कुछ हैं जो विगारा उसपर न्योछार है। कॉलेज में पचासो लड़कियां तो है, एक से एक खूबसूरत । हर लड़की उनकी एक दृष्टि के लिए तड़पती है। दे क्यो नहीं किसी और को चुन लेते । वह तो किसी प्रकार उनके योग्य नहीं हैं। पर, जो हो, विशाल उसे प्यार कितना करते हैं । काश, वह उनके प्यार का उपभोग कर पाती । कभी यह कह पाती कि वह उनकी है, केवल उनको । और यह सोचते ही उसके शरीर में एक विचित्र सिहरन-सी दौड़ गई। विशाल के होने की भावना के न जाने किस अपूर्व प्रानन्द ने उसे एक क्षण के लिए अभि- भूत कर दिया। "मि कि भावछौ ?" (तुम क्या सोच रही हो रेखा ? ) चौके से मां की आवाजमाई। "किछु तो नेई मा।" (कुछ तो नही मा) रेसा ने अपनी तन्द्रा के बीच से ही जनर दिया। मधु ना केनो? तोमार सावार तो होच्छे ना ?" (कुछ नहीं क्यों ? तुम सा तो नहीं रही हो?) और रेसा ने देसा सचमुच वह तो सोचने में खाना ही भूल गई थी। रोटी या एक टुकड़ा उसने मुंह मे डाल रखा था पर मुंह का टुकड़ा मुंह मे गौर हाय 1 एकला चलो रे129 का हाथ में पड़ा था। "कार चिट्ठी?" (फिसकी चिट्ठी है ?) मां ने शायद चुटकी ली। "कि कोरे जानयो, एतो खन सूलि नेई !" (कैसे जानूंगी। अभी तो खोली तक नही।) रेखा ने कहा और फिर तेजी से खाने लगी। साना खाने के बाद अपने कमरे में आई। पलंग पर नई धुली चादर विछी थी। आज रविवार था, कॉलेज जाना नहीं था। इत्मीनान से पलंग पर लेटकर उसने लिफाफा खोला। एक छोटा-सा कागज का टुकड़ा अंदर मुड़ा पड़ा था। अंग्रेजी मे लिखी एक छोटी चिट्ठी थी- कानपुर प्रिय रेखा, कोई दो साल पूर्व से ही हमारा सम्बन्ध चला आ रहा है, पर अब तक हम संशय और अविश्वास की स्थिति में ही पलते रहे हैं। अगर तुम चाहती हो कि हमारा सम्बन्ध स्थिर रहे, और संशय और अविश्वास की यह दु.स्थिति समाप्त हो तो मुझे कुछ लिखो । मेरा पता तुम्हें कॉलेज से मिल जायगा। तुम्हारी- रेणु 'रेणु ! कानपुर !!' रेखा सोचने लगी। इधर तो वह तीन साल से कानपुर गई नहीं । रेणु नाम की किसी लड़की को तो वह जानती भी नही । फिर यह चिट्ठी इतनी छोटी क्यों ? कुछ तो लिखती, कहां मेंट हुई, क्या बातें हुईं ? हे राम, ऐसे लोग भी होते है । लिख दिया, कॉलेज में पता मिल जाएगा । अरे कॉलेज का कुछ पता भी हो। किस क्लास में पढ़ती है ? किस कॉलेज में पढ़ती है ? लाट साहिबा बनी है । कम से कम नीचे पता तो लिख देती। और रेखा ने भल्लाकर चिट्ठी को वापस लिफाफे में डाल दिया। लिफाफे को वह तकिये के नीचे रखने ही जा रही थी कि उसकी दृष्टि लिफाफे के पीछे, कलम से लगाए एक चिह्न पर पड़ी। "माई गॉड !" वह जैसे प्रसन्नता से चीख पड़ी। यह नो वही चिह्न है जिसे विशाल ने उसके और अपने नाम के पहले अक्षरों को मिलाकर बनाया था और जो उनके द्वारा दी प्राय: हर पुस्तक पर बना था । वह पलंग से उठी, दौड़कर पालमारी से विशाल की दी हुई एक पुस्तक उठा लाई । पुस्तक के दूसरे ही पृष्ठ पर ठीक वैसा ही चिह्न बना हुआ था। 'तो यह 30/एकला चलो रे चिट्ठी विशाल को भेजी हुई है ! पर विशाल ने इस रूप में इसे क्यों भेजा? कहाँ दार्जिलिंग और कहां कानपुर ? और फिर पत्र के नीचे रेणु का नाम । यह वात तो विशाल के सम्मान को शोभा नहीं देती। तभी मा कमरे में आ गई। तिफाफा अव भी रेखा के हाथों में था। भाते ही वह बोल पड़ी- "कार चिट्ठी रे? (किसकी चिट्ठी है रे ?) रेखा एक क्षण के लिए हतप्रभ हो गई। फिर थोड़ी ही देर में अपने को संयत कर लिया- "रेणुर !" (रेणु की) "रेणु के ?" (रेणु कौन ?) "प्रामार एक-टी बन्धु।" (मेरी एक दोस्त) "ओ।" और मां चली गई। रेखा को समझ में अब ना गया कि विशाल को इस तरह क्यों चिट्ठी लिखनी पड़ी। उसने सोचा उसे बदनामी से बचाने के लिए ही विशाल को इस हद तक उतरना पड़ा। वह सोच रही थी, 'अाखिर शरद में ऐसा क्या कुछ है जो उसे विशाल का नहीं बनने देता । माना शरद विशाल से दो-चार वर्ष छोटा है और उसका सहपाठी भी है । पर, इससे क्या होता है ? विशाल भी तो उससे केवल दो. चार साल बड़े है । माना शरद एक अच्छा गायक है और एक स्पोर्ट समंन भी। पर इसके अलावा विशाल से उसकी कोई तुलना है ? पासमान, जमीन का 'अन्तर है कि नहीं ? लड़कियों को न जाने क्या होता है ? कभी, किसीके चेहरे पर फिसलती हैं, तो कभी किसीके पसं पर । कभी वांसुरी पर खिची किसी- की एक तान पर तो कभी किसी और हल्की करामात पर । काग, हम लडकियां, पुरुषों के इन हल्ले प्राकर्षणों पर न जाकर उनके गुणों की पूजा करना प्रारम्भ भरतीं। पर हममें शायद भगवान ने अक्ल की मात्रा ही कुछ कम दी है। वह जो किसी अंग्रेजी उपन्यास में पढ़ा था न, एक लड़की ही तो कह रही है- "ऐज इफ एनी गलं है। एवर लण्ड फोर वर्चुज".।" (जैसे किसी लड़की ने भाज सक किसीके गुणों के चलते प्यार किया हो।) भला लड़कियों का मूल्यांकन सदायियों से अच्छा दूसरा कौन कर सकता है !पर धीणा, रेखा ने पागे सोचा, यह तो लगता है हम लड़कियों में सर्वथा भिन्न है। कितनी गम्भीर है और कैसी बड़ी-बड़ी बातें करती है ? भाज तक किसीने किसी लड़के की तरफ उसे पाखें उठाते भी नहीं देसा। फिर पढ़ने में भी वह उतनी ही तेज है। इनके मलाया उसमें और गुण भी क्या गम है ! सभी क्षेत्रों में तो वह उममे मागे ही रही है। एकला चलो रे 11 उस दिन मंगीत में उमे द्वितीय पुरस्कार मिला तो उसे प्रथम । नृत्य में भी वही प्रथम पाई।' रेखा को लगा वह वीणा के सामने कुछ भी नहीं है। वीणा ही सर्वया विशाल के योग्य है और शायद मन ही मन वह उनसे प्यार भी करती है। 'छोडो भी इन बातो को, उसने आगे सोचा, 'पर वह तो अच्छे धर्म-संकट में पड़ी है, इधर शरद, उधर विशाल।' सात उस दिन रेसा के यहां से लौटी तो वीणा का मन खिन्न था । रेखा से उसकी मित्रता बहुत पुरानी थी, परन्तु रेखा का इधर का व्यवहार उसे एकदम अच्छा नहीं लग रहा था। वीणा के ख्याल में रेखा एक ऐसी लड़की थी जिसके विचारों में उम्र के साथ-साथ परिपक्वता नही आई थी। प्रतिकूल वातावरण में रहने के कारण वह अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख पाई थी और गलत रास्तो पर चली गई थी। यही वह अवसर था जब उसमे सुधार लाया जा सकता था। यह तो तय था कि उस दिन की उसकी बातो ने रेखा पर कुछ प्रभाव डाला था और यदि रेखा ने ठीक कहा था तो अब वह अपने को सुधार भी रही थी। पर, जब तक शरद, रेखा और विशाल के बीच में है तब तक रेखा के उद्धार की कोई आया नहीं। वीणा को एक ही साथ विशाल और रेखा दोनो पर तरस पाया था। विगाल, वीणा ने सोचा, व्यर्थ ही रेखा के चक्कर मे पड अपने को बरबाद कर रहे हैं। दो साल बीत गए और इस वीच कभी उसने ठीक से बातें तक नहीं की। कभी उनका क्लास छोडा, कभी उनकी राह से कतराई, तो कभी उन्हे अपने यहा आया देख घर में छिपी, तो फिर उनके जाने तक बाहर आने का नाम नहीं लिया। और तो और उसने इस शरद को खुश करने के लिए अपने साथियों से खुले ग्राम कहा-"और लोगों को चाहे विशाल की पढाई अच्छी लगती हो, मैं तो उनके क्लास मे बोर हो जाती हूं।" ये बातें विशाल के कानों में पहुची होगी तो उनपर क्या बीती होगी? रेखा, वीणा ने सोचा, फिर भी बुरी लडकी नहीं है। गलती किससे नहीं हो जाती है। पर, वह अब भी सुधर जाए तो कोई वात वने । वीणा इन्ही विचारों में लीन हाथ में एक पत्रिका लिए बैठी थी - 32/एकला चलो रे कि दरवाजे पर आवाज हुई। "कौन ?" उसने बैठे-बैठे ही आवाज़ दो। "क्या पढ़ रही हो दीदी ? ऐसी लीन हो जैसे समाधि लगाई हो।" वीणा ने मैग्जीन से अपनी दृष्टि हटाई और शरद की ओर देखते हुए कहा, "मैं एक कहानी पढ़ने लगी थी।" "कैसी है दीदी ?" "बहुत-बहुत अच्छी।" "तब तो ज़रूर ही किसी बहुत पुराने लेखक की होगी।" "नही, है तो नये लेखक की ही, पर अच्छे लेखक की है।" "किमकी है ?" "विशाल की।" "कौन ? अपने विशाल ?" "तो वे कहानी भी लिखते हैं । मुझे नहीं पता कि विशाल लेखक भी हैं।" "तुम्हें लड़कियों से फुसंत भी हो जो तुम किसीका पता रखो। विशाल एक अच्छे साहित्यकार हैं।" "क्या शीर्षक है दीदी ?" शरद पत्रिका की ओर अपनी गरदन झुकाते हुए बोला। "तीन-तेरह।" “मतलब?" "मतलब तुम्हें नहीं समझ पाएगा।" "भारो गोली दीदी । अपने दिमाग में तो क्रिकेट और फुटबॉल तिकड़म घुस जाते हैं वही बहुत है । कहानी और कविता नहीं। तुम एक काम करो, इस कहानी को रेखा के पागनxITRAL पढ़कर प्रसन्न हो।" "वह पढ़ चुकी है।" पारद अपनी कुर्सी पर चौंक पड़ा। "हां, पर इसमें चौकने को क्या दार?" "कय पढ़ी, कैमे पढ़ी ?" "विद्याल ने ही उसके पागी" "मंभव । दीदी, तुम मुंद " हाथ से पत्रिका छीन ली और उसे उलटने-पुलटने के बाद वह चिल्ला पडा-- "कहा न दीदी, तुम झूठ बोलती हो । यह पत्रिका तो आज से सात ही रोज पहले निकली है और विशाल दो महीने से बाहर है।" "मैं व्यर्थ झूठ नहीं बोलतो, पर यह कहानी विशाल ने ही रेखा को पढ़ाई है।" "पर कसे?" "यह कहानी दाजिलिंग जाने के पहले ही लिखी गई थी।" "हां, तो ?" "तो यह कि रेखा ने कहानी की पांडुलिपि पढ़ी है।" "कैसे?" "उन्होंने रेखा के पास पांडुलिपि को साफ-साफ लिख देने को भेजा था और उसने यह कहकर लौटा दिया था कि उसे समय नहीं है।" "वेचारा विशाल !" शरद धीरे से बोला। "वेचारा क्यो ? तुम्हे तो प्रसन्न होना चाहिए। तुम तो रेखा से प्यार करते हो !" "प्यार और मेरी तो पुश्तैनी दुश्मनी है दीदी। तुम भी मुझे नही समझ सकी, यह आश्चर्य ही है।" गरद मुस्कराते हुए वोला। "पर तुम्हीने तो रेखा को विशाल से अलग किया। तुम्हीने तो उससे उनका क्लास तक छुड़वाया ?" "हा, यह सब ठीक है, पर इसके पीछे मेरा ध्येय कुछ और है।" "शरद!" वीणा चीसी। "दीदी!" शरद ने धीरे से कहा । "तुम इतने गिरे हुए ही मुझे पता नहीं था।" "और तुम्हारी रेखा कौन भली है दीदी ? जैसे को तमा मिला।" और शरद खीसे निपोरकर, हो-हो करके हंस पडा। "शरद, तुम भूलते हो कि रेखा तुमसे बहुत अच्छी है। रेखा तुम्हारे जैसे लोगों के चक्कर में पडकर ही भ्रष्ट हुई थी और उसने अब अपने को सुधार भी लिया है। तुम उसे जैसी समझते रहे हो वह वैसी नहीं है । दो साल तक वह मेरे साथ रही है । मैं कहती हूं शरद, रेखा दिल से बहुत ही सरल है । वह एक बहुत भली लड़की है।" "होगी । अपने को भली-बुरी से क्या मतलब दीदी ? अपने लिए तो भले- चुरे सव बराबर ।" इतना कहकर शरद ने सिगरेट का अपना डिब्बा निकाला, 34/ एकला चलो रे.
। पर वीणा पर दृष्टि पड़ते ही उसे फिर अन्दर रख लिया। "शरद !" "खोलो, दीदी।" "तुम रेखा के सामने भी सिगरेट पीते हो ?" "याद नहीं, कभी पी कि नहीं, पर भरसक नहीं ही पीने का प्रयत्न करता हूं। आज्ञा हो तो एक पीऊं?" "नहीं, पर हो तुम बहुत चालाक !" "यही तो अपनी सफलता का राज है दीदी। सबके समक्ष अपने असली रूप में ही प्राऊं तव तो हो चुका मेरा काम।" "खैर, छोड़ी इन बातों को। मुझे तुमसे एक आवश्यक बात करनी है।" वीणा हाथ में पड़ी हुई पत्रिका को टेवुल पर रखते हुए बोली। "नही दीदी। पहले मुझे अपनी बात कहने दो।" "अच्छा भाई, पहले तुम ही अपनी बात कही।" वीणापर मोड़कर, निश्चिन्त हो बैठ गई। "दीदी, रेसा तुम्हारी दोस्त है न ?" शरद ने प्रारम्भ किया । "हा, पर यह कुछ नई बात तो नहीं हुई।" "दीदी, प्राजकल उसका कुछ अन्दाज़ नही लग रहा । कुछ दिन पहले तक तो उसने मुझपर खूब प्यार जताया। यहां तक कि जैसा तुम जानती हो उसने अपना पूरा इतिहास तक मुझपर खोल दिया। पर, इधर वह पकड़ मे नही पा रही। क्या सोचती है, श्या वोलती है कुछ समझ में नहीं पाता । कभी तो कहती है वह मुझे छोड़ नहीं सकती, मुझे प्यार करने को मजबूर है, कभी कहती है मेरे शरीर के किसी अंग का स्पर्श तक नहीं करो, कि मैं 'रेखा डियर' नहीं 'रेखा जी हूं।" शरद एक ही सांस में सारी बातें बोल गया। "तव ?" वीणा ने एक छोटा-सा प्रश्न किया। "तब दीदी, यह कि तुम मेरी कुछ सहायता करो। मुझे लगता है उसे किसी- ने मेरे बारे में उल्टा-सीधा समझा दिया है। दीदी, बड़ी मेहनत से मैंने इरा चिड़िया को फंसाया है, कही देखते ही देखते यह फुर्र हो गई तो." "भारद !" वीणा चीखी। दीदी!"शरद जैसे आसमान से गिरा। "तुम भूलते हो तुम किसके सामने वातें कर रहे हो और तुम यह भी भूलते हो कि मैंने अभी-अभी रेखा के बारे में बरा कहा । अगर तुम ये बातें करने के .." एकता चलो रे /35 लिए ही यहां आए हो तो मुझे अफसोस है मैं तुम्हारी कोई बात नहीं सुन सकती। यह मेरा दुर्भाग्य है कि तुम दूर के ही सही, मेरे भाई होते हो।" इतना कहकर वीणा उठ खड़ी हुई। उसके उठते ही शरद भी अपनी कुर्सी से उठ गया और वीणा का हाथ पकड़कर उसे अनुनयपूर्वक बैठाते हुए बोला, "मुझे क्षमा कर दो दीदी । तुम तो जानती ही हो तुम्हारे सामने मैं बच्चे के समान हू । लो मैंने अपनी बात लौटाई, तुम अपनी बात करो।" "मुझे अब कोई बात नहीं करनी। अब मुझे तुमसे कोई आशा नही ।" कुर्सी पर बैठते हुए वीणा उतरे चेहरे से बोली। "नहीं दीदी, तुम्हें कहना ही पड़ेगा, तुम नहीं कहोगी तो मैं फिर कभी तुम्हारे यहां नहीं आऊंगा।" "अच्छा तो सुनो, पर अब मुझे किसी अच्छे परिणाम की प्राशा नहीं। पहले यह बतलानो कि तुम जो कुछ वोलोगे ठीक बोलोगे ?" "ठीक ही बोलूगा दीदी, तुम्हारी कसम । यह तो तुम जानती ही हो कि दुनिया मे अगर मैं किसीसे डरता हूं तो केवल तुमसे।" शरद अपने पैरों को मोड़कर एक आज्ञाकारी शिष्य की मुद्रा में बैठ गया था। "अच्छा पहले यह बतानो, तुम रेखा से कितना प्यार करते हो?" "जीरो।" “मतलब?" "मतलब, शून्य।" "देखो, गरद, परिहास न करो। तुम भूल से ही सही, पर मेरी कसम खाए बैठे हो।" "ठीक ही तो कह रहा हूं दीदी । अब झूठ कैसे बोलू ? मेरा मतलब है मैं उसे ज़रा भी प्यार नहीं करता।" "पर, क्यों? रेखा सुन्दर है, गुणवती है।" "पर क्यों का जवाब क्या दू ? प्यार अपने पल्ले पड़ा ही नही । माज तक किमीमे हुना ही नही तो उसमे मेरा क्या दोप?" "कैसे जानते हो कि तुम्हें किसीसे प्यार नहीं हुप्रा ?" "वाह दीदी ! यह कौन बड़ी बात है ? कितनी बार पढा है, पार में दर्द होता है, जलन होती है, तड़पन होती है । पर यह सब तो प्राज तक मुझे कभी हुआ ही नही । यहा तो चट मंगनी, पट विवाह।" "मतलब?" 367/ एकला चलो रे "मतलब छोड़ो दीदी। जिस तरह मेरे दिमाग में कहानी, कविता का मतलब नहीं घुसता, उसी तरह तुम्हारी खोपड़ी में भी इसका मतलब नहीं घुसेगा। खैर, मगला प्रश्न पूछो।" "हां, तो तुम रेखा से प्यार नहीं करते?" "नही दीदी, यह तो मैं स्पष्ट कर चुका हूं।" "तव एक काम करो।" "क्या काम दीदी? पर इतना याद रखना, मैंने केवल सच बोलने की कसम खाई है । किसी काम के करने या नहीं करने की नहीं।" "खैर तुम्हारी मर्जी, पर मुझे इतना ही कहना है कि तुम जब रेखासे प्यार ही नहीं करते, तव रेखा की राह से अलग हो जानो।" "असंभव दीदी।" "शरद !" "दीदी!" "यह तुम भूलते हो कि हमारे विचारों में चाहे जो विभिन्नता हो, पर हम एक-दूसरे के बहुत नजदीक है और मैं उम्र मे तुमसे बड़ी भी हूं। इस नाते तुम्हें मेरी बातों को इपजत करनी चाहिए।" "यह ठीक है दीदी, पर तुम्हें यह भी सोचना चाहिए कि यह मेरी ज़िन्दगी का सवाल है । मैं रेखा को छोड़ दूंगा तो फिर करूंगा क्या ?" "जिन्दगी का सवाल ? अभी तो तुमने कहा कि तुम रेखा से प्यार नहीं करते ।" वीणा प्रारचर्य से बोली। "हां दीदी, पर मेरी ज़िन्दगी भी तो इन्ही सब सहारों पर चलती है। अगर मैं इसी तरह लडकियों को छोड़ता रहूं तो मैं ज़िन्दा कैसे रहूंगा?" "शरद, तो क्या तुम्हारी जिन्दगी लड़कियों की भावनाओं से खिलवाड और अन्ततः उनकी लूट और बरबादी पर ही पलती है ?" वीणा का आश्चर्य बढ़ता जा रहा था। "जैसा समझो दीदी।" शरद ने छोटा-सा उत्तर दिया। "ग्रोह, मुझे आज ही मालूम हुआ कि तुम कितना गिरे हुए हो। बुरा न मानो शरद तो तुमसे बुरा शायद ही कोई व्यक्ति इस संसार में होगा।" वीणा ने उदास स्वर मे कहा। "नही दीदी ! मेरे भाई-बन्धु बहुत हैं । तुम्हारे और विशाल के समान तो चुछ ही लोग यहां मिलते है। बाकी दुनिया तो मेरे भाई-बन्धुओं मे ही भरी एकला चलो रे / 37 पड़ी है।" "सर, तो तुम भी विशाल की इरजत करते हो !" वीणा ने एक चैन की सासनी। "मैं ही क्या, कॉलेज का हर छात्र उनकी इज्जत करता है।" "तब भी तुम्हें विशाल पर तरस नहीं पाता?" "प्राता है दीदी, पर तरस आता है उनके भोलेपन पर । जानती हो दीदी, वे ममझते हैं कि रेसा उनमे प्यार करती है और यह नहीं जानते कि रेखा मेरे जाल में आ गई है और मेरे रहते वह उनकी तरफ प्रांख उठाकर भी नही देख सकती।" फिर प्रागे बोला--"एक मजेदार बात बताऊं दीदी ?" "बतायो।" "तुम तो जानती हो कि रेखा की अंग्रेजी कुछ कमजोर है और उसकी क्या, अंग्रेजी तो हमारी भी चौपट है । उस दिन विशाल ने राधाकृष्णन् पर एक लम्बा- चौड़ा भाषण दे दिया तो अपने पल्ले कुछ पड़ा ही नहीं।" "हा, हा, वात तो कहो।" "हा, तो मैं कह रहा था कि रेखा के पिताजी ने उसे सलाह दी कि वह ट्यूशन पढे । रेखा के पिता ने विशाल से बातें की थी और विशाल ने उसे प्रो० शर्मा में पढ़ाने की सलाह दी थी। रेसा के पिता ने विशाल से उस शाम प्रो० शर्मा के यहा चलने के लिए श्राने की भी प्रार्थना की थी। इसी बीच कॉलेज में रेखा से मेरी बातें हुई। रेखा के द्वारा सब बातें मालूम होने पर मैंने उसे प्रो० मुखर्जी से पढने की सलाह दे दी। जानती हो क्यों ? इस तरह मैं विशाल को नीचा दिखाना चाहता था।" "तब क्या हुआ ?" "तब हुआ यह कि शाम को विशाल रेखा के घर गए तो उसके पिताजी ने कहा कि रेखा कहती है कि वह प्रो० मुखर्जी से पढ़ेगी। विशाल तो समझ रहे थे कि रेखा उनसे प्यार करती है, वस बड़ी शान से वोले-नही, प्रोफसर शर्मा ही ठीक रहेगे । इसपर जानती हो क्या हुआ दीदी ?" "क्या हुआ?" "रेखा अपने कमरे के अन्दर से ही खीझकर बोली-'पापनि जान न बाबा । पापनि अन्योदर कथा कि सुनछेन ?' (आप जाइए न पिताजी, माप दूसरों की बात क्यों सुनते है ?) बोलो तो दीदी, इस बात से विशाल पर क्या बीती होगी?" । २०/ एकला चलो रे
"उनपर क्या बीती होगी वह वे ही जानते होगे या मैं ही समझ सकती हूं,
तुम उसका जरा भी अन्दाज़ नहीं लगा सकते। सर, यह सब छोड़ो, यह वतामो
मेरी बात पर क्या सोच रहे हो?"
"दीदी मैंने कहा न यह असंभव है।"
"तो तुम रेखा को नहीं छोड़ रहे हो?"
"नहीं दीदी, यहां तो मुझे माफ करना होगा।"
"तो एक काम क्यों नही करते ? रेखा से तुम्हें प्यार तो है नहीं, तो किसी
दूसरी लड़की को पकड़ लो।"
"नही दीदी, यही तो तुम नहीं समझती। मेरे लिए एक खेल को बीच में
छोड़कर दूसरा प्रारम्भ करना उतना ही कठिन है जितना विशाल का रेखा को
छोड़कर दूसरी लड़की से प्यार करना ।"
"ग्रोह !" वीणा ने दीर्घ श्वास खींचा।
"पर चिन्ता न करो दीदी । यदि तुम इतना कहती ही हो तो मैं एक प्रतिज्ञा.
करता हूं।"
"क्या?"
"रेखा पर मैं कोई ज़ोर-जबर्दस्ती नहीं करूंगा । यदि वह स्वयं नहीं गिरी
तो मैं उसे गिराने का प्रयल भी नहीं करूंगा।"
"खैर, मुझे इतने ही से बहुत खुशी होगी । और मुझे विश्वास है कि तब रेखा
गिरेगी भी नहीं।"
"जो हो, यह तो तुम्ही कह सकती हो। पर मैं अपनी बात रखने का प्रयल
करूंगा। अच्छा अब देर हुई, मैं चलूगा।" शरद कुर्सी से उठते हुए बोला।
"ठीक है जानो।" वीणा भी खड़ी हो गई।
वीणा के घर से निकलने के बाद शरद ने सोचा, अब वीणा से उसका काम
नहीं हो सकता। उसे समझते देर न लगी कि वीणा भी रेखा को विशाल के करीब
पहुंचाना चाहती है। रास्ते में एक पोस्ट ऑफिस मिला तो उसके दिमाग में एक
बात आई । डाकखाने की बेंच पर बैठकर उसने एक चिट्ठी लिखी और एक
लिफाफे में डाल उसे लेटर बॉक्स में छोड़ दिया।
एकला चलो रे /39
- पाठ दार्जिलिंग की धूप में आज चमक थी। आसमान साफ था और मौसम बहुत सुहावना लग रहा था। शाम के चार बज रहे थे। सुधीर और विशाल अपने होटल से घूमने के लिए निकल पड़े थे। 'जू' होते हुए वे माउन्टनीरिंग ट्रेनिंग कॉलेज पहुंचे, फिर वहां से गेस्ट हाउस होते हुए राजभवन को बगल से होकर माल रोड के चौराहे की एक बेंच पर बैठ गए। अगल-बगल की बेंचो पर बहुत से 'अप-टू-डेट' जोड़े जमे थे। कुछ लोग बगल के अस्तबल से घोड़े ले, गाइडो के साथ टहलने निकल रहे थे। एक घोड़े वाली प्रारत, अपने दो-दो घोड़ों को एक छोकरे के हाथ में पकड़ा, स्वेटर बुनती हुई घूम रही थी। पीछे की तरफ, नीचे की ओर तिब्बती रिफ्यूजी सेन्टर था, जहा के घरों के बाहर तिव्वती वच्चे जोर-जोर से चिल्ला-चिल्लाकर कवड्डी का सेल सेल रहे थे। विशाल और सुधीर को बैंच पर उन दोनो के सिवा कोई और नहीं था। विशाल को उदास देख सुधीर ने प्रारम्भ किया- "दार्जिलिंग तुम्हें कैसा लग रहा है विशाल ?" "अच्छा ही लग रहा है, पर सोचता हूं यह अकेले पाने की जगह नहीं है।" "अकेले ! क्या कहते हो, मैं जो तुम्हारे साथ हूं।" सुधीर को पाश्चर्य हुग्रा। "पुरुष का अकेलापन पुरुष ही दूर करता तो औरत की क्या आवश्यकता थी सुधीर? अकेले पाने से मेरा मतलब..." "तो औरतो की यहां क्या कमी है."देखो न सामने भी एक झुंड घूम रहा है, टके सेर तो विकती हैं...।" सुधीर ने मजाक में कहा। "फिर तुमने वही वात उठा ली न?" विशाल बीच ही में बोल पड़ा, 'तुम नहीं जानते कि...।" "जानता हूं वावा, सब कुछ जानता हूं। नता हूं कि मिस रेखा के अलावा कोई भी प्रापकी पार्श्वगामिनी नहीं बन सकती। अब तो खुश हो...।" सुधीर हवड़ाकर बोला। "कितने बजे हैं सुधीर ?" थोड़ी देर चुप रहने के बाद विशाल बोला। 40/एकला चलो रे .
"पांच वजे हैं," सुधीर ने कहा, "और तुम्हारी घड़ी मे?" "इसमें तो बारह बज रहे है ।" "बारह ?" । "हां, चावी देना भूल गया था।" विशाल कलाई से घडी खोलकर उसमें चाबी देते हुए बोला। "तुम सचमुच पूरे दार्शनिक हो।" "दार्शनिक कोई दर्शनशास्त्र पढने से नहीं होता सुधीर । मैं दार्शनिक बना दिया गया है । भगवान न करे मेरी किस्मत किसी और को भी मिले।" "विशाल, कहो तो एक बात पूछू ?" "पूछो, तुमसे कोई पर्दा तो है नहीं।" "तुम ज़रा यह तो बताओ कि क्या तुम रेखा से सचमुच प्यार करते हो?" "तुम्हारे बचपने पर मुझे कभी-कभी बहुत खीझ होती है सुधीर। तुम तो यह जानते ही हो कि गत दो साल के अन्तर्गत शायद ही किसी क्षण रेखा का स्याल मेरे मन से गया हो। तुम यह भी जानते हो कि यह इस चिन्ता का प्रभाव है कि मुझे दाजिलिंग मे पाकर शरण लेनी पड़ी है और तुमसे यह भी छिपा नहीं कि यहां आकर भी मैं उसे भूल नही पाया।" विशाल के चेहरे पर मुझलाहट के भाव स्पष्ट थे। "माफ करो विशाल । मेरा मतलब ऐसा कुछ नहीं था, मैं सिर्फ यह जानना चाहता था कि तुम रेखा से कितना प्यार करते हो?" "यह भी प्रश्न बडा बेढंगा है सुधीर । मेरे ख्याल से प्यार की कोई माप-तौल नहीं होती और न यह मात्रा मे कम या ज्यादा होता है। अधकचरे या कृत्रिम प्यार की मात्राएं ही भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। सच्चे प्यार को एक ही स्थिर मात्रा है और वह अमाप्य है। सच्चा प्यार कोई कुएं का जल नहीं जिसे चुल्लुग्रो में माप लो, यह तो सागर की वह विशालता है जो अथाह और अमाप्य है।" "मुश्किल है।" सुधीर धीरे से बोला। "क्या मुश्किल है ?" विशाल ने प्रश्नसूचक दृष्टि उठाई। "प्याले की गहराई में सागर की विशालता को उंडेल देना।" "मतलब ?" "मतलब रेखा और तुम । तुम्हारा दिल सागर की तरह विशाल और उसका प्याले के समान लघु । मेरे ख्याल मे सारी शठिनाइयों के मूल में यही है।" "गलत बात है सुधीर । जिम तरह मच्चा प्पार मात्रा मे स्थिर होता है, उसी एकला चलो रे/41 - तरह सभी दिलों मे भावनाएं जब उमड़ती है तो वे एक ही स्वरूप पकड़ लेती है वे एक ही गहराई और एक ही उद्दामता रखती है। दिल बड़े और छोटे तभी तक है जब तक उनमें प्यार का संचार नहीं हुआ। सच्चे प्यार के ज्वार में सुधीर, सभी दिल सागर बन जाते है, प्यार की बाढ़ को अपने में समेट लेना प्याले के वश की वात नहीं।" "तब रेखा का दिल तुम्हारे दिल की तरह ही विशाल क्यों नही हो गया विशाल ?" "क्योकि रेखा के दिल में अभी तक प्यार का ज्वार जगा ही नहीं, क्योकि रेखा ने अभी तक प्यार किया ही नहीं।" "शरद से?" "हो हो हो..." विशाल हंस पड़ा, "तुम क्या समझते हो सुधीर कि रेखा दारद से प्यार करती है ? रेखा का शरद के लिए आकर्षण सुधीर, शरद के किसी आन्तरिक गुण पर आधारित नही । वह तो उसके सस्ते रूप, हाव-भाव और हल्फी करामातों पर फिसली है। सच्चे प्यार का मूल बाह्य आकर्षण के छिछले जल में नहीं जम सकता। उसके लिए तो आन्तरिक विशेषतामो की अनन्त जल-राशि की आवश्यकता है। औरतुम तो जानते हो शरद का अन्तर सड़ा हुआ है। दलदल और मरुभूमि में कोई विरवा पैदा भले हो जाए पनप तो यह सकता नहीं । दूसरी वात यह कि रेखा तो मुझसे ज्यादा संकट की स्थिति में है। तुम क्या समझते हो कि रेखा के दिल मे मैं कही नही हूं ? किसीको चाहकर उसे सदा के लिए मुला दिया जाए, यह तो हो ही नहीं सकता। दूसरी बात यह कि रेखा यदि शरद के जादू पर मोहित है तो मेरा मोह भी उसे कम नही । इसे प्रात्म-प्रशंसा नहीं मानो तो शरद की तुलना में मेरा पलडा तो अवश्य ही भारी है और फिर यह कमे सम्भव है कि रेखा को मेरा ध्यान ही नही हो।" "छोडो विशाल, शरद के साथ तुम्हारी तुलना ठीक नहीं जंचती । रेखा के लिए गरद भले ही देवता स्वरूप हो, हम लोगो के मध्य उसका उल्लेप अच्छा नही लगता।" "यह तो मैं भी जानता हूं सुधीर। पर, मुझे कहना केवल इतना था कि रेसा इन दिनों दुविधा को स्थिति में है। शरद और मेरे बीच यह झूल रही है। उसने ऊपर-ऊपर तो मुझे निकाल फेंका है, पर भीतर-भीतर वह मुझसे बच नहीं पा रही। उसको स्थिति मुझमे कुछ कम दयनीय नहीं भौर यह तो भविष्य ही वताएगा कि इस स्थिति का किसके लिए क्या परिणाम होगा।" 42/एम.सा चलो रे यहां पर आकर विशाल और सुधीर कुछ देर के लिए चुपहो गए। उनके सामने एक दम्पति गुजर रहे थे। पति और पत्नी एक दूसरे के हाथ में हाथ डाले बड़े भानन्द से बात करते चले जा रहे थे। उनके गुजरते ही विशाल ने एक लम्बी माह सोची। "तुम्हारे ख्याल से विशाल, जीवन मे पली बहुत प्रावश्यक है क्या?" सुधीर एकाएक पूछ बैठा। "नहीं, मेरे स्थाल में वह अनिवार्य है।" "अच्छा।" "इसमे आश्चर्य की क्या बात है?" "पाश्चर्य नहीं, पर मेरे ख्याल से विवाह की संस्था ही अनावश्यक है !" "मैं ऐसे लोगों में से नहीं जो नित्य नये प्रयोग करते हैं और हर प्रयोग के बाद पुराने परिणाम पर ही आ पहुंचते है । सर, छोड़ो इन बातों को, कम से कम इतना तो जानते हो कि मुझे पत्नी का सुख नहीं वदा है।" "लगता तो मुझे भी ऐसा ही है, अगर तुम्हारी प्रादर्शवादिता का रूप यही रहा तो रेखा हाथ पाने से रही और अन्य कोई लड़की भी तुम्हे चारा नहीं डालेगी।" "दूसरी का कोई प्रश्न ही नहीं । रेसा नही तो फिर कोई नही ।" "हे भगवान !" सुधीर ने एक लम्बी सांस खीची। "क्यों?" "क्योकि तुम्हारा मर्ज ला-इलाज है !" "वह तो है ही। तुम क्या समझते हो कि दाजिलिंग की ये पहाडियां मेरे' दिल से रेखा की याद निकाल देंगी? खैर चलो, अब होटल चलें, मुझे लंड लग' रही है।" कहते-कहते विशाल उठ खड़ा हुआ। सुधीर भी उठ गया और दोनों धीरे-धीरे अपने होटल की ओर बढे । होटल मे प्राकर नाइते-पानी से निश्चिन्त होने के बाद सुधीर विधात के कमरे मे मा बैठा। सुधीर के प्राने पर विशाल अपनी चारपाई पर स्थिर होते हुए बोला--"हम लोग थोड़ी देर पूर्व पत्नी और विवाह की बात कर रहे थेन ? मुझे इस सम्बन्ध मे एक घटना याद आ रही है.- मे - जव मै बी० पढ रहा था, एक बार अपनी धुमा के महां गया। वहा एमासा पलो - पड़ोस में एक लड़की रहती थी। मैं एक दिन याना साने बैठा ही था कि वह प्रा गई। मेरी बुप्रा ने उगे मेरे लिए पंसा झलने को कहा, क्योकि साना गर्म था। वह पंखा झलने बैठ गई। उसका पंसा झलकर मुझे मिलाना मुझे बहुत अच्छा लगा और मैंने एक अभूतपूर्व प्रानन्द का अनुभव किया । मुझे पहले-पहल उसी समय जिन्दगी में पत्नी के महत्व का भान हुप्रा।" "फिर?" "फिर क्या?" "मेरा मतलव पंखा रुकने के बाद क्या हुअा ?" "फिर क्या होता ? मेरा खाना समाप्त हुअा, मैं उठकर वाहर पा गया।" "और कोई बात नहीं ? तो, तुम पुराने बुद्ध हो।" "क्यों ?" "अरे, क्यों यह कि साने के बाद कुछ प्यार-पार की बातें करते, नाम-पता 'पूछते और क्या ?" "प्रो, तो तुम यह समझते हो कि मैं तुम्हारे समान दिल हथेली पर लिए फिरता हूं।" "प्रोह, यह बात है ! खर देखें यह प्रादर्शवादिता तुमको कौन-सा स्वर्ग देती है !" सुधीर मज़ाक के लहजे में बोला और फिर गम्भीर हो गया। इसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई और विशाल बोला-"देखो तो कौन है ?" मुधीर ने पर्दा उठाकर देखा तो होटल का ब्वॉय एक बन्द लिफाफा लिए खड़ा था। सुधीर ने उसे हाथ में ले लिया और अन्दर आ गया । "किसकी चिट्ठी है सुधीर ?" विशाल ने प्रश्न किया । "तुम्हारी और किसकी ?" "कहां से पाई है ?" "यह तो नही लिखा, पर मुहर कलकत्ते की है।" "कलकत्ते की?" विशाल चौंककर चारपाई पर उठ बैठा । "पर तुम इस तरह उतावले क्यों हो गए ?" मुधीर ने पूछा । "क्योकि यह वही चिट्ठी होगी जिसकी मैं प्रतीक्षा कर रहा था। खैर, तुम शीघ्र खोलो।" सुधीर ने पत्र खोलकर कहा, "यह तो शरद की चिट्ठी है, तुम इसीकी प्रतीक्षा कर रहे थे ?" 'ऐं।" विशाल लगभग चिल्ला पड़ा। ./ एकला चलो रे ५ ?" "वैर, पदो, पर मरद ने क्यों यहां चिट्ठी भेजी ?" विशाल धीरे-से बोला। सुधीर ने पत्र पढ़ना प्रारम्भ किया- कलकत्ता-6 मान्यवर, मप्रेम प्रणाम। पाप गायद मुझे नहीं पहचनाते हों, या पहचानते भी हों । मेरा नाम शरद है और मैं रेखा का सहपाठी हूं। आप बुरान मानें तो मैं कहूं कि मुझे यह पता है कि ग्राप रेखा से प्यार करते है। मैं माप ही के हित के लिए यह सब लिप रहा हूं। ग्रापको जानकर आश्चर्य होगा कि माप जिस रेसा को स्वर्ग को देवी समझ रहे हैं वह एक बहुत ही गिरी हुई, पतित लड़की है। उसके इतिहास पर प्रकाग डालकर में आपका दिल नहीं तोड़ना चाहता पर मैं कमम खाकर कह रहा हूं कि वह अापके सदृश व्यक्ति के मर्वथा योग्य नहीं है। प्रापका ही "चिट्ठी को फाड़कर फेंक दो मुधीर ।" "तुम अब भी रेखा से प्यार करते हो विशाल ?" "मुधीर, तुम विचित्र हो या फिर बहुत निरीह । या तुम सब कुछ समझ- कर भी नही समझने का नाटक करते हो। अगर तुम्हें किमीसे सच्चा प्यार होता तो तुम यह प्रश्न नहीं पूछते । प्यार कोई अपने वश की बात नहीं, जो कल किया बाज नहीं किया। मैं अब भी क्या अनन्तकाल तक रेखा को प्यार करता रहूंगा।" "विगाल, यह तो मुझे भी लगता रहा है कि रेखा कुछ अच्छी लड़की नहीं है। उसके चाल-ढाल मुझे अाज तक जंचे नहीं। पर, तुम्हारे डर से मैंने कभी ऐसी बात नही कही।" "मुधीर, तुम्हारे कहने या नहीं कहने से कुछ अन्तर नहीं पड़ता। मैं कभी भी मनुष्य को पूर्ण नहीं मानता। मैं यह मानकर चलता हूं कि मनुष्य कमजोर है और वह गलती कर सकता है । हम या तुम या हममें से कुछ लोग वाता- वरण या पारिवारिक संस्कार या परिस्थितियों की अनुकूलता के चलते अच्छे हो सकते हैं, पर सभी लोग अच्छे हों इसकी हम प्राशर कैसे कर सकते है ? और एकला चलो रे/45 सुधीर, बुरा कौन नहीं है ? तुम्हारे देवता और तुम्हारे अवतार भी तो दूध के घुले नही हैं । हा-हां वे ही देवता जिनको आदर्श मानकर तुम अपने आदर्शों का 'निर्माण करते हो।" "पर विशाल, मेरी समझ में नहीं आता कि तुम एक बुरी लडकी को अपनाकर करोगे क्या ? इससे तुम्हारा जीवन सुखी रहेगा क्या?" "सुधीर, तुम्हारी समझ में नही आता तो मैं तुम्हें समझा भी नहीं सकता। 'पर तुम इतना जान लो कि बुरा हमेशा के लिए ही बुरा नहीं हो जाता । इस शरीर के अन्दर प्रात्मा एक ऐसी वस्तु है जिसपर संसार की कोई बुराई अपना 'रंग नहीं चढा पाती । तुम्हें यह पता नहीं कि दिल से बुराई की राह पर चलना कोई भी नहीं चाहता । संसार का बड़े से बड़ा पापी भी अपने दिल के अन्दर यह समझता है कि वह जो कुछ कर रहा है, वह गलत है और उसकी जिन्दगी के बहुत सारे एकाकी क्षण ऐसे आते है जिनमें वह अपने कृत्यों के लिए पश्चाताप करता है । सद्गुण सभी को प्रिय होते हैं सुधीर, और दुर्गुणी भी गुणियो के समक्ष सिर झुकाने में अपना सौभाग्य समझते हैं। महात्माओं, योगियो और संतों को देखते ही हमारा सिर क्यों श्रद्धा से झुक जाता है ? क्या, इसलिए नहीं कि हम समझते हैं कि हम जिस मलिनता से, जिन बुराइयो से अपने को पृथका नहीं कर पाए उनसे ये ऊपर उठ गए है ? हम अपनी सभी धरोहरों से प्यार कर सकते है, अपने गलित और विकृत अंगों से भी हमे मोह होता है पर अपने दुर्गुणों से कभी हमे आन्तरिक सहानुभूति नहीं होती । मनुष्य परिस्थिति- वश बुरा बन जाता है। पर वह हमेशा ऐसे अवसर की तलाश में रहता है, हमेशा जाने या अनजाने एक ऐसी शक्ति का इच्छुक रहता है जिसके द्वाग वह अपने दुर्गुणो को निकाल फेंके।" "पर तुम्हारे इस व्याख्यान का लक्ष्य क्या है ?" सुधीर ने बीच ही मे रोका। " लक्ष्य तुम्हें यह बताना है कि रेखा चाहे बुरी हो, चाहे जितनी पतित हो, पर मुझे विश्वास है कि मैं अपने सच्चे प्यार द्वारा उसका हृदय परिवर्तित कर दूगा। मेरे पास आने के साथ ही रेखा, रेखा नही रहेगी, यह एक ऐसा रत्न -न जाएगी जिसके प्रकाश मे मेरा सारा व्यक्तित्व जगमगा उठेगा, वह नये रूप -निखर पाएगा सुधीर।" "विशाल ।" सुधीर को प्राश्चर्य हो रहा था। "हां, सुधीर, तुम प्यार की प्रेरक शक्ति मे परिचित नही । प्यार प्रेरणा दूसरा रूप है । मैं ऐसे व्यक्तियों में से हूं जिन्हें यदि मन चाहा प्यार मिल जाए 5/एकला चलो रे तो वे तारों को अंगुलियों मे भर लें, सागर को प्यालों में कैद कर लें और सूर्य और चांद को गले में लटका लें।" "विशाल तुम होश में तो हो ?" सुधीर ने फिर टोका । "होरा में हूं सुधीर । एकदम होश में हूं। तुम मेरी बातों को कल्पना की कोरी उड़ान नहीं समझो। तुम्हे तो यह पता ही होगा कि संसार के जितने महान् व्यक्ति हुए हैं, उनमें अधिकांश को उपलब्धियों के पीछे या कहो सभी के पीछे नारी की प्रेरणा किसी न किसी रूप में रही है । यह प्रेरणा चाहे चुम्बन के रूप में रही हो या चांटे के रूप मे, पर नारी सभी निर्माणों के मूल मे है । उसके महत्व की उपेक्षा हम कभी नहीं कर सकते ।" "तब तुम चांटे को ही क्यों नहीं अपना लेते ?" "बहुत ठीक है सुधीर । पर चांटे में एक खतरा है । अगर उसकी चोट को तुम झेल गए तव तो सोने की तरह निखर पायोगे, पर कहीं पहली ही चोट में टूट गए तो फिर कही के न रहोगे।" "तो तुम अपने को इतना कमज़ोर क्यो समझते हो?" "मैं कमजोर नहीं सुधीर, मुझपर पड़ने वाला चाटा ही ज्यादा तगडा है, क्योंकि जो एक तरफ मुझे चाटा देने को प्रस्तुत है वही दूसरी तरफ किसी दुसरे के लिए चुम्बन की मेंट लेकर भी तैयार है । यह दोहरी मार मैं क्या कोई भी बर्दाश्त नहीं कर सकता।" विशाल यहीं पर आकर रुक गया और सुधीर से चाय का ऑर्डर देने को वोला। चाय आते ही सुधीर ने टोका-"रेखा की याद फिर आ गई विशाल ?" विशाल ने चाय की चुस्की लेते हुए कुछ उदास होकर कहा- "उसकी याद जाती ही कहा है सुधीर जो पाने का प्रश्न उठता है ? खैर, तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो?" "तुम्हारे बारे मे, मतलब ?" "मतलब मेरे भविष्य के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है ?" "तुम्हारा भविष्य मुझे अन्धकारमय दीखता है और सच पूछो तो मुझे लगता है अब तुम्हारा कोई भविष्य ही नहीं है । वर्तमान तो तुम्हारा पहले से ही चौपट है । अब अपने भूत पर ही सन्न करो।" "मजाक की बात नहीं सुधीर । मैं बहुत गम्भीर हूं।" विशाल ने चाय के खाली प्याले को होठों से हटा टेबुल पर रखते हुए कहा । एकला चलो रे/47 ... .
-- "गम्भीर तो मैं भी हूं, पर तुम्हारा भविष्य में स्पष्ट देख रहा हूं। रेखा को तुम छोड़ोगे नही । वह अनेक बार तुम्हें दुत्कार चुकी है पर तुम्हें लगता है यह सय प्यार का ही नसरा है । दूसरी तरफ रेसा शरद को छोड़ेगी नही और अन्त में जब तुम देखोगे कि रेसा तुम्हारी नहीं रही तो बस तुम्ही समझो क्या होगा।" "तब तो मैं सदा के लिए टूट जाऊंगा सुधीर ।" विशाल ने गहरी सांस खीची और बाकी बची चाय को एक घूट मे साफ कर गया। "पर, मुधीर," विगाल प्रागे बोला, "क्या तुम यह समझते हो कि रेखा मुझे इतना बड़ा दंड देगी ? उसे में कितना प्यार करता हूं, वह यह जानती है। मैं मानता हूं कि मैंने खुले गन्दी में अपने प्यार की दुहाई उसके सामने नही दी है। पर, प्यार की बात तो केवल मुंह से ही नही कही जाती, अगर दुनिया मे प्यार की और भापाएं ठीक बतलाई गई है, तो रेखा अब चाहे जो करे पर हम दोनो अपने प्यार को पूरी तरह एक-दूमरे तक पहुंचा है। रेखा में सुधार होगा सुधीर, मुझे विश्वास है । वह मुझे धोखा नहीं देगी। यदि वह मेरी नहीं होगी तो किसी दूसरे की भी नही होगी। रेखा मुझे तोड़ेगी नही सुधीर । रेखा कृतघ्न नहीं है।" "रेखा क्या करेगी यह तो तुम्हारी किस्मत जाने, पर मैं पूछना चाहता था कि तुम आज किसको चिट्ठी की इतनी वेसवी के साथ प्रतीक्षा कर रहे थे?" "रेखा की।" विशाल ने कहा। "रेखा की !" सुधीर ने पाश्चर्य से मुंह फाड़ दिया। "हां, मैंने उसे एक चिट्ठी लिखी थी, सोपा उसका जवाब पाएगा।" विशाल ने धीरे से कहा । "अो, तो यह अक्ल जनाव की अब खुली है। खैर, देर अाए दुरस्त "देर पाए दुरुस्त पाए नही सुधीर, मैंने रेखा से अन्तिम रूप में यह जानना चाहा है कि उसे मेरी कुछ भी चिन्ता है या नहीं। यदि वह चाहती है कि हम लोगो का सम्बन्ध बना रहे तो पत्र लिखेगी।" "यदि उसने पत्र नही लिखा तो?" "नही लिखा तो फिर मतलब साफ है।" और विशाल उदास हो गया। "खैर छोड़ो, पत्र प्राने न पाने से क्या होता है। एक बात बतलानो, माज- आए।" 48/एकला चलो रे ए-3 कल तुमने फिर अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना छोड़ दिया है।" "क्यों ?" "पता है रात के दस बज गए ?" "अच्छा उठी।" और दोनों सोने चले गए। नौ उस दिन के बाद वीणा की मुलाकात रेषा से कोई दो दिनों तक नहीं हुई। वीणा का मन रेखा से अब भी कुछ खिन्न था और उसके यहां यह जानबूझकर नहीं गई भी। तीसरे दिन सवेरे, कोणा नाश्ते के बाद बैठी ही थी कि रेखा पहुंच गई। बीणा ने उसे सामने की कुर्सी पर बैठाकर मारने के लिए पूछा, पर उमने मना कर दिया। रेखा का मन उदास था। वीणा ने समझा उसके इधर दो रोज़ तक उसके यहां नहीं जाने से रेखा का मन घिर गया है । वीणा ने रेखा का हाथ पकड़कर उससे उसकी उदासी का कारण पूछा तो लगा रेखा रो पड़ेगी। "क्या बात है रेखा ? आखिर कुछ बोलो तो।" दीया जिदद की। "श्रीणा, प्रथमेरा उद्धार सम्भव नहीं। में जिन्दगी भर कलंकिनी ही रहूंगी। इस तरह जीने से मर जाना ज्यादा अच्छा समझती हूं।" इतना कहते ही रेखा फूट पड़ी। "पर, इसमें अधीर होने की क्या बात है? पहले वात तो बताओ?" वीणा ने रेखा को भकझोरते हुए कहा । "नहीं वीणा, मैं अब तुम्हारे साथ रहने योग्य नहीं । मुझे सारा संसार बुरा समझता है। मेरे साथ तुम भी बदनाम हो जानोगी।" रेखा अपना सिर अपने घुटनो में छुपाकर मिसमियां लेती जा रही थी। "मैं कहती हूं रेखा, तुम पागल क्यों बन रही हो? तुम जानती नहीं यह दुनिया डरने वालों के लिए नहीं है। मुझे किसी भी वदनामी और वेजती का डर नहीं। यदि हम अच्छे रहने तो दुनिया की रठी हुई उंगली खुद एक दिन गिर जाएगी। पर पहले बात तो बताओ।" एकला चलो रे/49 "लो देखो, और रेखा ने एक पत्र वीणा की ओर बढा दिया। वीणा ने उसे खोलकर पढ़ा- स्थानीय, रेखा रानी, सचमुच तुम बहुत खूबसूरत हो। सच कहूं, तुम्हें देखकर तो मैं दिल थाम- कर रह जाता है । तुम्हे पता नहीं मैं कितने दिनों से तुम्हारे प्यार में पागल हूं। पर मेरे दिल की रानी, यह तो बतायो उस शरद में ही क्या भरा हुआ है जो तुम उसके पीछे पागल हो रही हो। अगर तुम मेरे दिल मे उतरकर देखती तो तुम्हे मालूम होता कि मैं सौ शरद से भी अधिक तुम्हे प्यार दे सकता हूं। आशा है तुम अवश्य ही पत्र का जवाव दोगी, नहीं तो मुझे दूसरा पत्र देना पड़ेगा। ---तुम्हारा केशव "हूं।" वीणा का मुंह गुस्से से लाल हो गया और उसने चिट्ठी फाडकर फेंक दी। "कौन है यह केशव ?" वीणा कड़की। "मेरे मुहल्ले का है, उसने शरद को मेरे यहां आते-जाते देखा है।" "मुहल्ले का है ! काजल की कोठरी मे रहोगी तो धब्बों का डर तो छोड़ना ही पडेगा। शरद के साथ रहकर क्या तुम अपनी प्रशंसा खोज रही थी ? तुम्हें क्या पता कि शरद कितना गिरा है, और दूसरों का उसके बारे में क्या स्याल है ? अभी दो रोज़ पहले शरद मेरे यहां आया था। उसकी बातों से तो लगा कि मैं उसके मुह पर थूक दू, पर मुझे अफसोस है कि वह मेरा भाई लगता है। अभी तो मुहल्ले वाले लिखते है, कल से पूरा शहर तुम्हें प्रेम-पत्र लिखेगा ।" वीणा जैसे गुस्से में लाल हो रही थी। "वीणा, मेरी अच्छी वीणा मुझे बचा लो। मैं अब पहले वाली रेखा नहीं। मैंने अपने को सुधार लिया है वीणा, अब फिर मेरा मुह काला न होने दो।" कहकर रेखा वीणा को गोद मे गिर पड़ी। वीणा की आखों में आंसू आ गए और उसने रेखा के वालो पर हाथ फेरते हुए कहा- "धवरानो नहीं रेखा, अभी कुछ नही बिगड़ा है। मब कुछ ठीक हो जाएगा।" "वीणा मेरी अच्छी वीणा !!" और रेखा ने वीणा की गोद से अपना 50/एकला चलो रे अश्रुपूर्ण मुख निकालकर भरी भरी प्रांखों से उसकी ओर देखा। "हां, रेखा, सब ठीक हो जाएगा । तुम्हें केवल एक काम करना है।" "क्या ?" रेखा सीधी होकर अपनी कुर्सी पर बैठ गई । उसको प्रांखें अब भी भीगी और लाल थी। "तुम शरद को सदा के लिए छोड़ दो । अाज की तारीख से ही तुम्हारा उससे मिलना-जुलना बंद।" "वीणा । पर मेरा प्यार !" रेखा लगभग चिल्ला पड़ी। "प्यार-व्यार कुछ कहीं। मैं जानती हूं तुम शरद मे प्यार नहीं करती। उससे कोई प्यार नहीं कर सकता । तुम्हें उससे प्यार का मात्र भ्रम हो गया है । तुम चाहो तो उसे शीघ भूल जानोगी।" “वीणा । मैं विना प्यार के मर जाऊंगी। मुझे इतना बड़ा दण्ड नहीं दो।" रेखा की सिसकियां फिर प्रारम्भ हो गई थी। "तुम नहीं मरोगी। अभी तुमको प्यार मिला ही कहा है ? तुम्हें प्यार ही करना है तो विशाल को अपना लो। उस वेचारे का भी उद्धार हो जाएगा।" "पर वीणा, केवल चाहने से कोई किसीको प्यार करने लगेगा? मेरी स्थिति पर ध्यान दो। तुम मुझसे मजाक न करो।" प्रांसुनो से भरा रेसा का मुख प्रश्नचिह्न बना हुआ था। "चाहने और न चाहने की बात नहीं रेखा। तुम अपने दिल के अन्दर विशाल से ही प्यार करती हो, शरद से नहीं । शरद के लिए तुम्हारे दिल में केवल मोह हो गया है। तुम शरद के मोह को अपने दिल से निकाल फेंको। उससे मिलना-जुलना बन्द कर दो। विशाल के लिए तुम्हारा प्यार स्वयं उमड़ श्राएगा।" वीणा एक सास में सभी बातें बोल गई। वीणा!" रेखा का स्वर कुछ आश्चर्य और कुछ दुःख मिश्रित था। "हा रेखा, फूल के रहते कोई काटे को नही अपना लेना । विशाल, विशाल है उनके साथ शरद की कोई तुलना नहीं।" "वीणा, तुम्हारी बातें कुछ ठीक राग रही है। मैंने भी यह कई बार अनु भव किया है कि विशाल मेरे दिल के किसी कोने में हमेशा बैठे रहे है । लाख चाहकर भी मैं उन्हें अपने दिल से निकाल नहीं पाई हूं।" रेखा ने धीरे से कहा। "और यही कारण है कि तुम बच भी जानोगी। मारो गोली शरद को। चलो विशाल को पत्र लिखें और बेचारे का दाजिलिंग प्रवास समाप्त हो।" "अभी नही वीणा, इतनी जल्दी नहीं । तुम दोपहर को मेरे घर आयो ती एकला चलो रे 51 मैं तुम्हें एक चीज दिसाऊं ।" और रेसा उठ सड़ी हुई। "ठीक है । तो क्या तुम अभी चली जानोगी? इतनी जल्दी ?" "हा वीणा, मैं जल्दी में मां के बिना कहे चली आई हूं।" और रेखा दर- वाजे मे बाहर प्रा गई।" रेसा वीणा के यहा से लोटी तो मा दरवाजे पर ही खड़ी थी। रेखा को देखते ही पूछ बैठी-"कोथाय गिरिले ?" (कहा गई थी?) "वीणादेर वाड़ी।" (वीणा के घर) और कहते-उठते रेखा दरवाजे के अन्दर घुस गई। "सुनो।" मा ने पीछे से आवाज दी । "केनो?" (क्यो ?) "तूमि केशव के जानो ?" (तुम केशव को जानती हो ?) केगव का नाम सुनकर रेखा का दिल काप गया। पर वह अपने को संयत कर बोली- "केनो मां?" (क्यो मा?) "तूमि प्रोके ठेके छिलो ?" (तुमने उसको बुलाया था ? ) "नेई तो मा !" (नहीं तो मां) "जाव ।" (जाग्रो) रेखा जाने लगी फिर जाते-जाते रुक गई और मुड़कर बोली, "कि होलो मा?" (क्या हुअा मा?) "किछु नेई । प्रो एसे छिलो। विथलोजे आमिरेखा संगे दाखा कोरबो । मामि जानि जे ओर 'करेक्टर' भालो नेई। से ग्रामि ओके भालो करे बोक्लाम, प्रावार पो पलाई गेलो ।” (कुछ नही, वह आया था। बोला कि मैं रेखा से मेंट करूंगा। मैं जानती हूं कि उसका कैरेक्टर' अच्छा नही सो मैंने उसको डांटा और वह भाग गया।) रेखा इसके बाद अन्दर आ गई। वह समझ गई कि यह शरद के साथ का ही प्रभाव है कि केशव जैसे लोग इतना आगे बढ़ गए हैं। उसने मन ही मन वीणा की समझदारी पर उमे लाख-लाख बधाइयां दी। अपने कमरे मे पाकर उसने अन्दर मे दरवाजा बन्द कर लिया और कपडे बदलकर पलंग पर लेट गई। उसके मामने दीवार मे आदम-कद ग्राइना जहा था जिसमें उसका पूरा शारीर दिखाई पड़ रहा था। यह एक सफेद साड़ी और सफेद ब्लाउज पहने हुए 52/ एकला चलो रे थी और उसके बड़े-बड़े केश खुरो पड़े थे। पलंग के नीचे पड़ी विशाल की चिट्ठी उमने खीच ली और उसे दोनो हाथों से अपने कलेजे से लगा लिया और एक मोठे प्रानन्द का अनुभव कर बुदबुदाने लगी-'वि' ......शा..... ल ।' इसके बाद उसने चिट्ठी को उठा होंठों से लगा लिया और कोई दो मिनटों तक उमे वही रखे रही । इसके बाद उसने चिट्ठी को खोला और उसे शुरू से अन्त तक पढ़ गई। चिट्ठी को पढ़ने के बाद रेखा ने उसे फिर तकिये के नीचे रख दिया और सोचने लगी। दो वर्ष की ही तो बात है । ठीक ही लिखा विशाल ने । कोई दो वर्ष हुए जव पहले-पहले वह इस कॉलिज में गई। पहली ही घंटी थी। दर्शनशास्त्र का कलाम लड़के और लड़कियों से खचाखच भरा था। सब पापम मे फुस-फुस कर रहे थे-विशाल का क्लास, विशाल का क्लास। उसे यह उतावलापन अच्छा नहीं लगा और उमने बीणा मे धीरे से पूछा, "कोन है यह विशाल ? कोन है यह जो मभी लोगों में ऐसी व्यग्रता मची है ?" "अव तो पा ही रहे हैं, देख ही लेना । जैसे तुम इस कॉलेज मे नई पाई हो वैसे ही वे भी नये है।" वीणा ने चुटकी ली और तभी विशाल ने कमरे मैं प्रवेश किया। सभी लोग यंत्र-चालित मे पड़े हो गए और फिर पूरे कमरे में ऐमी शान्ति छा गई मानो वहां मनुप्पों का नहीं मुदों का जमघट हो । इसके याद जो विशाल ने बोलना प्रारम्भ किया तो सबके-सब मुह बाए चित्र-विचित में उनकी पोर टकटकी लगाए बैठे रहे। 'माई गॉड !' रेखा ने सोचा था, 'क्या तरीका है बोलने का, कैमे मुन्दर-सुन्दर गन्द, वाक्यों का कसा मुन्दर विन्यास और उसके ऊपर से लगता कि हॉट जमे सटते ही नहीं, जैसे जीभ नहीं हुई टेप रेकॉर्डर हो गई। शब्द पर गध्द, वाक्य पर वाक्य जैसे एक पर एक अन्दर में फिसले चले मा रहे थे । न सोचने की आवश्यकता, न समझने की। इसके भार, चेहरे पर वह चमक, प्रांखों में वह ज्योति कि तबीयत परे देखते ही रह जाएं। और पूरे घंटे भर नो वह उनके चेहरे की ओर टकटकी ही बांधे रह गई। मया पड़ा, क्या मुना, यह तो पता नहीं, पर जब वनाग ममाप्त हुमा तो उसे नगा यह मागमान में जमीन पर प्रा गई। विगाल ने रजिस्टर उटाया पौर एक मिनट मे पलास से बाहर हो गए, जैसे कोई विजनी वादलों के पीछे गे नमकी मोर फिर उन्हीके पीछे छिप गई। कभी एक बार भी जो उरानी नरफ एकला नतो देखा होता या किसी दूसरी ही लड़की की तरफ । पूरे घंटे-भर उसका जी करता ही रह गया कि एक बार भी वे अपनी बड़ी-बड़ी आंखें इधर फेरते, पर वे क्यों फेरने लगे? ..."एक दो और तीन ।' रेखा सोचती जा रही थी, 'इस तरह तीन दिन गुजर गए और तीनो दिन विशाल का क्लास हुआ, पर तीन दिनो के अन्दर उन्होंने एक बार भी उसकी तरफ नही देखा। विशाल की ख्याति दिनोदिन बढती जा रही थी। लड़के और लडकियो को जीभ पर उनका नाम नाचने लगा था। पर चौथे दिन, हा चौथे ही दिन रेखा से नहीं रहा गया। उसने सौ बहाने- ढूंढे उनसे बातें करने को और अन्त में एक उपाय सूझ ही गया। उस समय वे अपने विभाग में अकेले बैठे थे । जब वह वहा पहुंची, उसका कलेजा जोरो से धड़क रहा था । उसका सिर जैसे चक्कर खा रहा था। दरवाजे पर खड़ी हो गई तो विशाल ने एक उड़ती निगाह उसपर डाली और बोले-- 'पाइए।' अन्दर गई और कांपते हाथों एक दरखास्त उनके सामने बढ़ा दिया, बिना कुछ बोले।' "क्या है ?" विशाल ने पूछा था और बड़ी मुश्किल से वह कह पाई थी-- "रिकमेन्ड कर दीजिए।" "आप किस इयर में पढ़ती है ?' दरखास्त लेते हुए विशाल ने कहा था और उसे लगा था वह उल्टे पर भाग आए। चार रोज इनको मेरे क्लास में पढ़ाते हुए हो गए और आज तक कभी जैसे भूल से भी मेरा चेहरा नहीं देखा ! "तीसरे वर्ष मे।" उमने किसी तरह अपने को संयत कर उत्तर दिया था। "दर्शन-शास्त्र भी आपका विषय है क्या?" यह दूसरी करारी चोट "और रेखा ने मुश्किल से 'हा' कहा था। इसके बाद ।' रेखा ने सोचा, 'हा इसके बाद फिर एक हफ्ते तक रेप, विशाल के पास नहीं गई थी। और विशाल ने अब भी क्लास में एक बार भी उसकी तरफ नही देखा था। वह परे हफ्ते-भर हमेशा उन्हीके बारे में सोचती रही थी-कैसा आदमी है, एक बार भी पाखें उठाकर नहीं देखता जैसे इसके लिए औरत का कोई अस्तित्व ही नही ! दूसरे हफ्ते वह उनके यहां फिर एक बहाना बनाकर गई और फिर लगातार चार दिनो तक जाती रही। पाचवें दिन जय दरखास्त लेकर गई तो उन्होने पूछा-"पाप क्या रोज एक दर- रुवाम्ल देती हैं ?" उमे इम प्रश्न की उम्मीद नही थी क्योकि लगातार चार रोड तक वे 54/एकला चलो रे ...
दरवास्तवाउनने बिना देगहीHिTTART17 तो उसने देखा रिकन्डमन में होxfe या Ah Pr काटकर हर बनाया गपादUNRHI हवाम दोन लगे हैं। उनमाज,for चुपचाप दरखास्त, रिकमेन्ड' करके लौटा दिया करते थे। वह हड़बड़ा गई और बड़ी मुश्किल से बोली- "जी, जी यह मेरी सहेली का है।" "यो अच्छा!" और उन्होंने दरखास्त पर एक दृष्टिदालकर कहा-"बढ़ा अच्छा नाम है आपकी सहेली का 'रेखा' । आप ही की क्लाम में है वह ?" ..."जी. मेरा मतलब है"इसके पहले वाले दरखास्त मेरी महेली' और वह उनके हाथों से दरखास्त सोनकर भाग आई थी। वह जब भागी- भागी कॉमन-रुम मे लौटी तो उसके ललाट पर पसीने की बूंदें चमक पाई. थी और लगता था उसका कलेजा अन्दर से उछलकर बाहर या जाएगा। पर दूसरे दिन रेखा कॉलेज गई तो उसने विशाल में प्राकस्मिक परिवर्तन पाया। विदाल, जिमने आज तक बनाम में कभी लड़कियों की वैचों की तरफ निगाह नहीं उठाई थी, उस दिन एक घंटे में दनों बार रेखा की नरफ देख चुके थे । वीणा रह-रहकर चुटकी ले रही थी और रेखा को लग रहा या उसी मुंह-मांगी मुराद पूरी हो गई थी। लाल खत्म होते ही वह फिर एक दर- खास्त लेकर दर्शन विभाग में दौड़ गई थी। उस दिन कमरे में गुम ही विधान ने पूछा था-"तो आपका नाम रेखा है?" "प्रन्टा, पाप रहनी कहां है?" "रेलवे कोलोनी में।" "माप इंटर में कहां थी ?" "देहरादून में।" और इसके बाद उन्होंने दरवालविलकरमाटर रियाया पर मा जैसे ही कॉमन-स्म में लौटी दिनार का पत' निहिनामा प्राया। "अपनी दरख्वास्त दीजिए तो," प्रादही दाना। "नों?" "जिए न, विमार मांग रहे।" सुगी मिलो पानी प्रान 04/ - * ."
"दूसरे दिन वह कॉलेज गई तो उसकी हुलिया ही बदली हुई थी। रेखा ने सोचा और उसके होंठों पर एक हंसी खेल गई। उस दिन वह गाड़े गुलाबी रंग की साड़ी और उसी रंग का नाउज पहने हुए थी। सिर के केश खूब करीने ने काढकर उसने जूड़ा बनाया था और उसमें गुलाब का एक लाल फूत सोम लिया था। उस दिन विशाल ने उसे देखा तो कुछ क्षण देखते ही रह गए। दोनो ने दोनों की बातें समझ ली। रेखा ने सोचा और फिर, फिर तो दोनों तरफ वाकर्षण बढ़ता ही चला गया। अब वह दिन मे प्रायः दो बार, तीन बार दर्शन विभाग के सामने से गुजरने लगी। और, और रेखा ने सोचा और उसे हंसी मा गई। विगाल भी खूब थे, विना गलती की गलती निकालकर उसको कॉपी के पन्ने रंगने लगे और जितना रेखा का जवाब नहीं रहता था उससे ज्यादा उनके रिमार्फ ही होने लगे। "बड़े पाए प्रोफेसर कही के, हूं ! रेखा ने सोचा और सकिए के नीचे से चिट्ठी निकालकर फिर होठो से लगा ली। "इस तरह पूरा एक साल गुजर गया। हां एक साल, रेसा ने सोचा और इस एक साल की अवधि में रेखा बहुत खुश रही। इसी बीच उसने विशाल का परिचय अपने पिताजी से कराया । उनको उसने कई बार अपने घर पर निमंत्रित किया। उनको अपने हाथ से बनाई मिठाइया खिलाई। ''पर, पर रेखा ने सोचा-ऐसा आदमी नहीं देखा । हज़रत ने एक साल की इस अवधि में दुनिया भर की बातें की, पर कभी एक बार भी जुबान खोल- कर नही कहा कि -"मैं तुझे प्यार करता हूं।" एक बार चाय लेने के बहाने भी हाथ नहीं छुपा । उंगली नहीं दबाई । हूं, भला ऐसे भी कही प्यार किया जाता है, और रेखा ने होंठ विचका दिए। इसी समय सामने प्राइने पर उसकी दृष्टि पड़ी तो उमे हसी मा गई और उसे याद आया एक बार उसने इमी तरह विशाल को मुह चिढाया था। ये कुछ नहीं करें, तो क्या वह भी उनके समान बुद्ध थी जो चुपचाप रहे । एक बार जब कॉलेज की छुट्टी हुई तो वह रिक्शे पर चढकर घर की ओर जा रही थी। धूप तेज थी और उसने अपना काला चश्मा प्रोखों पर चढ़ा लिया। पीवे मुडकर देखा विशाल अपने विभाग से निकले पा रहे थे। उसे देखा तो देखते ही रह गए । वम क्या था, उनको ऐमे एकटक देखते देख उसने अपने होंठ विचका दिए और वे अपना-सा मह लिए रह गए। ...और कोई युद्ध हो तो ऐमा, रेसा ने मागे मोचा । एक शाम यो वे उसके यहां पाए। पिताजी, वह और विगाल तीनों चाय पर बैठे । उमें एक यात मूभी। 56/एकला चोरे बोली- "मर !" "कहो।" "पाप कलकत्ते में मकान नहीं बनाइएगा?" "मकान का क्या होगा?" उन्होंने जवाब दिया। बुद्ध कही के । कुछ तो अक्ल होती कि कोई अविवाहिता लडकी किसी अविवाहित व्यक्ति मे मकान को बात क्यों पूछती है । 'मकान क्या होगा तो रहिए दार्जिलिंग के होटल में । यूब आनन्द पाता होगा वहा पर ।' "और हा, ऐसा प्रादमी नही देखा । एक बार बड़े खुश हुए तो कालेज से उसका 'प्रोग्रेस रिपोर्ट' निकालते लाए । अभी सुवह ठीक से उठी भी नहीं थी कि पहुंचे- "लो यह अपना प्रोग्रेम रिपोर्ट ।" भला इसका भी कोई जवाब है ? प्रोग्रेस रिपोर्ट तो मेरे पास कलिज से आ ही जाता, न जाने इसमें कोन से प्यार का प्रदर्शन निहित था ? सोचते-सोचते रेसा को नींद आ गई । विशाल का पत्र एक हाथ में कोजे पर दवाए, पता नहीं वह कितनी देर मौनी रही कि माथे पर फिमीकासगं पा जग पड़ी। सामने वीणा खड़ी थी। "यह किसके पत्र के साथ प्यार हो रहा है री?" वीणा ने टोका तो रंगा मेंप गई। बोली। "और किसका हो सकता है। उन्होंगा है, मैंने तुममें कहा था न कि पानी तो एक चीज़ दिखाऊ।" "देसू," और वीणा ने रेखा के हाथ मे पत्र ले लिया। "हां, यह तो बिगाल का ही पत्र है।" वीणा मुखद पाञ्चयं मे भाकर. "तुम्हें कैसे मालूम, यह तो गेषु ने कानपुर मे मना है?" मा में मडाक "मैं विशाल का हस्ताक्षर पहचानती हूं, वह तो मेरे यमे में दो मान ने कंद पड़ा है।" बीमा यह तो मई, पर कहने हो गई और फिर बात बदलकर कहा, "तुमने दनका जवाब दिया ?" "नहीं तो !"रेखा ने की हमाली दात को प्रागे न बढ़ाना ही मा में रहा।
"तो आयो जवाब लिखें।" वीणा ने कहा ।
"तुम्हीं लिख दो।" रेखा ने कहा।
"नहीं तुम ।" वीणा ने दृढ़ता से कहा और रेखा को पत्र लिखाना प्रारम्भ
किया-
आदरणीय विशाल जी,
आपका पत्र मिला । सचमुच आपने मेरे लिए जितना कुछ किया, उस योग्य
मैं नहीं हूं। यह मेरा सौभाग्य है कि अापके सदृश शुभचिन्तक मुझे प्राप्त हुमा
है । पर, कब तक रहेंगे आप दार्जिलिंग मे ही। हम सब आपको देखने को व्यन
हैं । अच्छा हो पाप पत्र देखते ही आ जाएं-
अापकी ही
रेखा।
"इस पत्र को तुम्ही ले जाकर छोड़ दो।" रेखा ने वीणा को पत्र देते हुए
कहा।
"ठीक है, पर मैं अभी चलू गी। तुमने कहा था कि दोपहर मे माना, इसी-
लिए चली आई।"
"कुछ तो रुको । सुबह भी आई तो चली गई।" रेखा ने जिद की।
"हा, पर अभी नहीं रुक सकती। पर पर एक मेहमान छोड़कर पाई हूं।
हो, सुनहरी चिट्टी आज भी छुड़वा दूगी।"
दस
वीणा जय रेखा के यहां से लौटी तो शरद बैठा ही हुआ था । उसे देखते ही
बोला-
"बहुत शीघ्र मा गई दीदी !"
"तुम जो यहा बैठे थे। नहीं पाती तो वही पहुंच जाते । रेखा से कह दिया,
मरे एक मेहमान पाए हैं।"
"काफी दिनों मे तो मैं उपर गया ही नहीं दीदी, पर यह तुम्हारे हाय में
क्या है ?" और भारद ने वीणा के हाथ से लिफाफा छीन लिया।
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58 / एकला चलो रे
"अरे मैं तो भूल ही गई । इसे रास्ते में ही छोड़ना था। तुम्हारी चिन्ता मे चिट्ठी की चिन्ता जाती रही।" वीणा ने इसके बाद नौकर को आवाज़ दी, और उसे चिट्ठी छोड़ने को दे दी। "विशाल को जानी है।" वीणा के मुंह से निकला और उसने दातों तले उंगली दबा ली। "तो दीदी अब तुम...?" शरद ने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा । "शरद, तुम्हारा मतलब ?" वीणा कुछ समझी नहीं । "मतलब क्या दीदी ! पर चलो अच्छा ही हुआ, अव देखें ऊंट किस करवट. वैठता है ।" शरद एक विचित्र मुद्रा में मुस्कराते हुए बोल रहा था। "शरद तुम क्या बक रहे हो ?" वीणा की आवाज़ कुछ तेज थी। "वकना-वकना क्या दीदी, दिल तो सबका होता है और यह कब क्या रंग लाए, यह तो यही जाने ! खैर, चलो इस वार जोड़ी अच्छी वैठी है।" "शरद, तुम मुझे दीदी भी कहते हो और मुझे परेशान भी करते हो । तुम्हें शरम नहीं आती।" "शरम तो मुझमे ही शरमाती है, वह मेरे पास क्या प्राएगी दीदी, पर, हा, अपनी किस्मत के प्राकाश से अब बादल छंटते नजर आते हैं।" शरद की तीखी मुस्कान वीणा का कलेजा छेद रही थी। "शरद, तुम्हारा दिमाग तो ठीक से काम कर रहा है ?" वीणा की आवाज एकाएक बहुत तेज़ हो गई। "दीदी, वह मेरे पाम है ही कहा जो उसके ठीक या गलत काम करने की वात उठे । पर मेरी समझ में एक बात पा रही है। तुम तो जानती हो कि मैं एन० सी० सी० मे भी रहा हूं।" "रहे होगे, पर तुम्हारे समान लोग जहीं रहेगे वही गंदगी फैलाएंगे।" वीणा ने खीझकर कहा। "यह तो तुमने मेरे मुंह की बात छीन ली दीदी, पर मेरे कहने का अर्थ था कि कही मैंने सीखा था कि 'ज्वायंट-फन्ट' का वडा महत्व होता है।" "दारद !!!" वीणा कड़की, "तुम नीच हो, मैं तुम्हारा चेहरा भी नहीं देखना चाहती। तुम निकल जानो मेरे घर से । मैं कहती हूं यह चिट्ठी मैंने नहीं रेखा ने विशाल को लिखी है । तुम मुझे गलत समझ रहे हो।" "सही तो मैंने आज तक सिवा अपने किसी और को समझा नहीं। पर हा, एका वात कहे जाता हूं दीदी, अगर तुम मेरे और रेखा के रास्ते से अलग नहीं हुई तो मैं क्या, तुम देखोगी एक दिन सारी दुनिया तुम्हें गलत समझेगी।" एकला चलो रे / 59 शारद अपनी कुर्सी से उठने हुए बोला। "मरद तुम हद दर्जे के नीच हो।" वीणा ते जी मे वोलती हुई उठ सटी हुई । "नही दीदी, मेरी नीचता के बारे में अभी अपना अन्तिम अन्दाज नहीं लगायो। गायद भविष्य में उसमे कुछ और सुधार की अावश्यकता पड़े।" और इतना कहकर शरद दरवाजे मे बाहर आ गया। शरद के जाने के बाद वीणा अपने सोने के कमरे में चली गई। क्रोध के मारे उसका चेहरा लाल हो गया था। पाखें चढ़ गई थी और उसकी सासें तेजी से चल रही थी। सामने शीशे में उसने अपना चेहरा देखा तो उसे लगा आज तक इस रूप में उसने अपने को कभी नहीं देखा था। वीणा के घर से निकलकर शरद रेखा के यहा पहुंचा। रेखा अभी साना खाकर तोटी ही थी और अपने पलंग पर फैलकर विशाल की उस छोटी चिट्ठी को पढ रही थी। चिट्ठी को एक बार पढकर उसने उसे खोलकर अपने पतंग पर फैला दिया और फिर प्रोधी होकर उसीपर सो गई। इसी समय 'काल-बेल' बजी। वह हडवड़ाकर उठी और दरवाजा खोल दिया। देखा तो भरद दरवाजे पर खडा था। शरद को देखकर एकाएक घवरा-मी गई और भीतर घुसकर उसने तेजी से दरवाजा बन्द कर लिया। "रेखा डियर ।" शरद ने धीरे से आवाज दी। "मैं कहती हूं मि० शरद आप जैसे पाए हैं धमे ही चले जाइए। मैं ऐमी बातें सुनना नहीं चाहती हूं।" रेखा कमरे के अन्दर से ऊंचे स्वर में बोली। शरद थोडी देर तक चुप रहा फिर वोला-~"ठीक है, मैं चला जाता हूं, 'पर इसमें तुम्हारा ही नुकसान है।" "मेरा नुकसान हो या लाभ, पर आप मेहरबानी कर चले जाइए।" रेखा ने कुछ तेजी से कहा। "पर, मुझे वीणा ने भेजा है।" शरद ने जवाब दिया । "हो नहीं सकता। वीणा प्रापको मेरे पास किमी हालत में नहीं भेज सकती।" "पर, तुम्हें विश्वास नहीं हो तो मैं क्या करूं । वीणा के एक महमान आए थे। उनके माय अभी-दो रोज़ के लिए वह कलकते मे बाहर चली गई। तुमने उसे जो एक चिट्ठी छोडने के लिए दी थी वह गलती में अपनी एक महेली के यहां भूल भाई है। उसने कहा है कि तुम उसे जाकर ले लो।" 60/ एकला चलो रे "यह क्या किया वीणा ने ? किसके यहां छोड़ दी उसने चिट्ठी ?" रेखा ने यह कहते हुए हड़बड़ाकर दरवाजा खोल दिया। "रेसा डियर ! मभी पर अांखें मूंदकर विश्वास कर लेने का परिणाम यही होता है । खैर, छोड़ो इन बातो को । मुझे एक गिलास पानी पिलानो।" गरद अथ तक अन्दर आकर कुर्सी पर बैठ गया था। रेखा लाचार होकर पानी का गिलास लाने अन्दर चली गई। "हां, तो मि० शरद, मैं आज आपसे बातें करने के मूड में नहीं हूं? आप कृपया मोघ्र वतलाइए कि वीणा ने वह चिट्ठी कहा छोड़ी है !" रेखा ने पानी का गिलान लाकर मेज पर रखते हुए कहा । "रेवा, तुम तो यह समझ ही रही हो कि अब मैं अपनी मर्जी से ही यहा से उगा, क्योंकि जब तक मैं तुम्हें चिट्ठी का पता नही बताऊगा तब तक तुम भी मेरा जाना पसन्द नहीं करोगी और जव में आ गया हूं तो अपनी बात भी कहकर ही जाऊंगा।" भरद ने गिलास का प्राधा पानी पीकर प्राधे खाली गिलास फो टेवुल पर रखते हुए कहा । "वताइए, क्या कहना है आपको?" रेखा खीझकर एक कुर्सी पर बैठ गई। "सबमे पहले तो मुझे यह कहना है कि तुमने गिरगिट देखा है ?" "क्या मतलव ?" रेखा खीझकर बोली। "मतलब यह कि गिरगिट रंग बदलता है।" "चदलता होगा।" "बदलता होगा सो नहीं, मेरा मतलब है तुम भी गिरगिट से कुछ कम नहीं।" "देखिए शरद बाबू, व्यर्थ के वकवास के लिए मेरे पास समय नहीं । प्राप जल्दी में काम की बात कहिए।" रेखा कुर्सी पर छटपटा रही थी। उसके चेहरे पर वेचनी के भाव स्पष्ट थे । "वेकाम की बात करने को तो मेरी आदत नहीं रेसा । रही समय की बात सो मेरे लिए बहुत लोगों को समय निकालना पड़ता है। यह बात दूसरी है कि तुम भौरों ने पादा सवमूरत हो और मुझे तुमने जिन्दगी में पहली बार प्यार भी हो गया है । तो मुझे पूछना यह था अभी उस रोज तफ तो तुम मेरे प्पार मी दुहाई दे रही थी और प्राज यह क्या बात है कि मैं तुम्हें फूटी मांखों भी नही गुहा रहा ?" "यह मेरी मर्जी है मिस्टर शरद । और भाप यह भी स्पष्ट नुन लीजिए एपला मलो रे/61 कि आज के बाद मैं फिर प्रापसे कभी भी मिलने की इच्छा नहीं रखती हूं।" "मिलना और न मिलना तो तुम्हारी इच्छा पर नहीं मेरी इच्छा पर है । संर, मैं यह पूछ रहा था कि क्या विशाल का भूत फिर सवार हो गया ?" "विशाल का भूत सवार हुअा हो या किसी और का, आपको मेरे व्यक्ति- गत मामले में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं।" रेखा की दृष्टि वार- चार घड़ी पर जा रही थी। "यह तुम्हारे व्यक्तिगत मामले में हस्तक्षेप नही मेरे व्यक्तिगत मामले में हस्तक्षेप की बात है।" शरद ने बहुत गम्भीरता से कहा । "कमे ?" रेखा अपनी कुर्सी पर तनफर बैठ गई । "यह ऐसे कि मैं तुम्हें प्यार करता हूं और ऐसी स्थिति में तुम्हें किसी दूसरे व्यक्ति से प्यार करने का कोई अधिकार नहीं।" "बड़े पाए प्यार करने वाले । मुझे आपके प्यार से कोई मतलब नहीं।" रेखा ने दृढता से कहा। "अब तुम्हारे मतलब होने या न होने से क्या होता है ? यह कोई बात हुई कि आज तुम मुझे प्यार के जाल में बाघोगी, कल दूसरे को और परसों तीसरे को। मैं तुमसे प्यार करता हूं और तुमने भी मुझे प्यार का वचन दिया है। तुम्हे मुझमे मतलव हो या नही पर मुझे तो तुमसे मतलब है ही। अच्छा पहले यह बतलामो कि वह चिट्ठी कहा जाने को है जिसके लिए तुम इतना व्यग्र हो?" "यह जानने के पहले आप कृपया यह बता दीजिए कि वह चिट्ठी है कहा ?" "नहीं, पहले तुम बतायो।" "तो लीजिए, वह चिट्ठी विशाल को लिखी गई है ।" रेखा ने गम्भीर होकर कहा। "यह तो खैर, मैं तुम्हारे बिना कहे ही समझता हूं और सच पूछो तो मैं यह भी जानता हूं कि वह चिट्ठी तुमने नहीं वीणा ने लिखी है।" शरद कुछ गम्भीर होकर बोला। "आप कुछ नही जानते । वह चिट्ठी मैंने लिखी है ।" रेखा का स्वर कठोर या। "हो सकता है मैं कुछ नहीं जानता। पर मैं इतना तो अवश्य जानता हूं के विशाल को बुलाने की जितनी उत्सुकता आपको है उससे कम वीणा को ही है।" यह कहकर शरद एक अर्थ-भरे रूप मे मुस्करा दिया। "मिस्टर शरद !" रेखा को लगा कोई तेज तीर उसके दिल के आर-पार 52/ एकला चलो रे हो गया है। "चौंकिए नही मिस रेखा। दिल तो सवका होता है और फिर वीणा तो आपसे सब तरह से बेहतर है। विशाल को प्यार ही करना होगा तो वह वीणा से ही क्यों नहीं करेंगे? और सच पूछो तो विशाल को वीणा से बहुत पहले से प्यार है।" "मिस्टर शरद ।" रेखा ने शरद को बीच ही में टोककर कहा, "यह आपकी कोई नई चाल है। मैं विशाल को जानती हूं। देवता हैं।" "विशाल देवता हैं तो वीणा देवी है रेखा । और एक देवता देवी से ही प्यार क्यों नहीं करेगा। क्यों वह तुम्हारे समान पतिता को उठाने के लिए नीचे गिरेगा ?" शरद ने कहा और फिर उसके होंठों पर एक तिरछी मुस्कराहट खेल गई। "मिस्टर शरद ! आपको मुझे गाली देने का कोई अधिकार नहीं।" रेखा का चेहरा लाल हो गया था और उसकी आंखें छलछला आई थी। "यदि आपको हमसे प्यार जताकर मुझे ठुकराने का अधिकार है तो मुझे आपको गाली देने का भी अधिकार है। लीजिए मैं चला । पर इतना जान लीजिए कि न तो वीणा कही बाहर गई है और न वह आपकी चिट्ठी ही भूली है। वह तो मेरा आपसे मिलने का बहाना मात्र था।" यह कहकर शरद उठ खड़ा हुमा। "शरद तुम नीच हो। पतित हो । झूठे हो।" रेखा दात पीसते हुए उठ खड़ी हुई। "मैं सब कुछ हूं रेखा, पर यह सब तुम्हारे प्यार के चलते हूं।" शरद गम्भीर होकर कह रहा था। एक प्यार करने वाले दिल की मजबूरी तुम नहीं जानती हो । दूसरी बात यह है कि तुम अपनी भलाई के लिए ही आज की घटना का उल्लेख वीणा से नहीं करोगी। नहीं तो मैं तुम्हारा पूरा इतिहास विशाल के सामने रख दूगा। और अन्तिम वात यह रेखा डियर की धरती पर रहकर आकाश के फूल की इच्छा नहीं करते। जो जिसके लिए बना है वह उसीको मिलेगा। वीणा के लिए विशाल है और रेखा के लिए शरद । यह एक भीषण सत्य है जिसे तुम्हें बाज नही तो कल मानना ही पड़ेगा।" इतना कहकर शरद तेजी से रेखा के घर से बाहर निकल गया। शरद के जाने के बाद रेखा कोई दो मिनटों तक अपनी जगह पर खड़ी रही। विभिन्न भावनाओं के आकस्मिक उद्रेक से उसका मस्तिष्क कुछ देर तक जैसे एकला चलो रे 163 प्रमंतुलित-मा हो गया । वह एक ही साथ क्रोध, ईयर्या और प्यार की बाढ़ में वह-मी गई थी और युछ देर के लिए उमे अपनी स्थिति का कुछ भी ज्ञान नही रहा था। उमके बाद दौड़ी-दौड़ी यह अपने पलंग के पास गई जिमपर विगाल को निट्टी अव भी सुनी पड़ी थी। चिट्टी को देखते ही वह अपने को रोक न सकी और पलंग पर गिरफर फफरु-फफफफर रो पड़ी। विशाल की चिट्ठी उसके चेहरे के नीचे आ गई थी और यह रेसा की पाखों में लगातार बह रहे प्रामुग्नों में नहाती जा रही थी। सिमकियों के बीच रेया बोलती जा रही थी. "बिगाल ! मेरे अच्छे विनाल ! मुझे बचा लो । मुझे तुमपर विश्वास है, तुम मेरे गिया किसी दूसरे के नहीं हो सकते । मुझे शरद के लिए नहीं छोड़ो विशाल, मेरी गलतियों को माफ करो। मैंने अपने को सुधार लिया है । मैं पतिता नहीं हूं । मेरी प्रात्मा शुद्ध है विगाल ! मैं तुम्हारी हूं केवल तुम्हारी । मैं अब शरद के पोये में नहीं पा सकती। मुझे केवल तुमसे प्यार है विशाल ! केवल तुमसे ! मुझे बचा लो विशाल, मुझे बचा लो। मैं नीच नहीं हूं विशाल, मैं पतिता नहीं हूं। मेरे देवता, मुझे बचा लो।" और रेखा देर तक इसी तरह सिसकियां भरती रोती रही। । ग्यारह और विशाल का कहीं पता न चला। सुधीर आज दिन के तीन बजे से ही विशाल को खोज रहा था । दिन में कोई डेढ बजे साना खाने के बाद वह सो गया था। इसके बाद उठकर विशाल के कमरे में गया तो वह वहां नहीं था। घटे पर घंटे बीतते गए और विशाल का पता नहीं चला। इस तरह इसके पहले तो वह कभी गायव नहीं हुआ था । सुधीर के बिना तो एक क्षण भी वह रह नहीं पाता। सुधीर की चिन्ता बढती जा रही थी। अन्त में शाम के पाच धजे वह अपने होटल से निकल गया अगल-बगल की पहाड़ियों की तरफ, जिधर वे कई बार घूमने गए थे। सुधीर ने आवाज दी- "विशाल! विशाल !" "विशाल ! विशाल !!" और पहाड़ियों ने प्रतिध्वनि के रूप में उसकी 64/ एकला चलो रे ए-4 आवाज़ उसीको वापस कर दी। चारों ओर ढूंढकर सुधीर रात के आठ बजे होटल लोटा पर विशाल का अब भी पता नहीं था। सुधीर की चिन्ता और बढ़ गई। विशाल की बुद्धि पर उसे कोई भरोसा नहीं था। वह जानता था कि उसने दर्शनशास्त्र के मिद्धातों का चाहे जो मनन कर लिया हो और बड़ी-बड़ी पाण्डित्यपूर्ण वातें वह चाहे जितनी भी कर ले, पर जहा प्यार का प्रश्न आता था, उनका सारा ज्ञान समाप्त हो जाता था। कब कौन-सी वात अथवा कौन- सी भावना उसके अन्दर किस प्रतिक्रिया का सृजन करेगी वह नहीं जानता था। सुधीर को पूध याद था कि उधर के दिनों में जब शरद का जादू रेखा पर चल गया था, एक शाम को जब रेया ने घर के अन्दर रहकर भी अपनी छोटी बहन से कहलवा दिया था कि वह अन्दर नहीं है तो विभाल पर क्या बीती थी। विगात उन दिन सुधीर के पास आकर बच्चों की तरह रोने लगा था और वोला था--"मुधीर, मेरी मारी बुद्धि व्यर्थ है, मैंने अपने अमूल्य प्यार के खजाने को ऐमे व्यक्ति पर न्योछावर कर दिया है जिसके अन्दर दिल ही नहीं है। वह पत्थर है मुधीर, वह कृतघ्न है। उसने घर पर रहकर भी कहलवा दिया है कि वह नहीं है।" सुधीर को उसकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ था, क्योंकि वह सोच नहीं सकता था कि रेखा, जिगके लिए विशात ने इतना कुछ किया है, वह अपने घर पर विशाल के साथ ऐसा व्यवहार करेगी। पर विशाल ने प्रामुग्रों के बीच यहा था-~"मैंने अपने कानों में सुना है सुधीर, उसकी प्रावाज को तो मैं हजार व्यक्तियों की आवाजों में भी अलग से पहचान सकता है। वह अपनी छोटी बहन से कह रही थी-'तुमि बोल दे, जे दीदी बाड़ी नेई।" और इसके बाद विधान ने न तो उस गाभ साना ही साया था और न वह रात-भर सो ही समामा। इन सब बातों को सोचकर मुधीर का मन चबड़ा गया और उसने पिकाल के पूरे कमरे को छान डाला । उसके मभी मामान दुरुस्त थे। कोई चिट्ठी या ऐसा कोई कागज़ भी नहीं दिखाई पड़ा जिसके माधार पर उसके गायब होने का कोई अन्दाज लगाया जा सकता। केवल एक पंट और एक कमीज जिन प्राज यह पहने हुए पा, यहां नहीं भी । सुधौर को यह तो विश्वाम हो गया कि विशाल दाजिसिंग से बाहर यही नहीं गया है, पर प्रापिर वह प्रव तक है महाँ ? हो सकता है यिमी झरने में किनारे अथवा किमी पहाड़ी की चोटी पर यह रेसावे. ध्यान में हवा हो मोर उम तक गुधार की प्रावास नहीं पहुंची हो । यह सोच. कर मुधौर ने फिर एक बार बाहर जाकर सौजने की बात सोची पर दरवाजा एफसा चलो रे/65 खोलते ही उसने देखा कि बाहर एक-व-एक वादल घिर पाए है और थोडी. थोड़ी बूंदा-बादी हो रही है । सुधीर ने सोचा अब जाना बेकार है क्योकि विशाल अगर बाहर कही होगा तो इस पानी में अवश्य ही लौट आएगा । वह फिर कमरे के अन्दर लौट पाया और अपनी चारपाई पर लेटकर सवेरे की डाक से आए अखवारों में अपना ध्यान लगाने का प्रयत्न करने लगा। पर उसका मन अखबारों में लगता ही नहीं था और ध्यान रह-रहकर टेवुल पर रखी टाइम- पीस पर चला जाता था जिसमे अब रात के दस वज रहे थे। वाहर बूंदा-वादी तेज हो गई थी और सुधीर का मन अब बहुत ज्यादा व्यग्र हो गया था । "दस बज गए ?" विशाल ने कहा । "हां बाबू दस बज गए, पर इसमें अपना क्या अधिकार है, आज तक तो ऐसा नहीं हुअा।" "पर मैं अब कय तक प्रतीक्षा करूं ? तीन बजे से यहां बैठे-बैठे तो मेरी हालत खराब हो गई। मुझे पता भी नहीं था कि इतनी देर तक यहा व्हरना पड़ेगा वरना मैं कपड़े बदलकर पाता । अव तो ठंड के मारे मेरा बुरा हाल है।" "तो जाइए न बाबू, आपके यहां रहने से तो कोई अन्तर नही पडेगा।" "नही, जय अब तक ठहर गया तो अव अन्त मे ही जाऊंगा।" और विशाल कुर्सी के ऊपर दोनों घुटने चढाकर उकड़ बैठ गया। ठंड बढती जा रही थी और उसका सारा गरीर कांप रहा था। "मेरे पास तो यहा कुछ है भी नहीं जो आपको प्रोदने के लिए दू । मेरे ख्याल से आप चले जाइए, नही तो आप बीमार हो जाइएगा।" विशाल यहा रेखा को चिट्ठी की प्राशा मे पाया था । साढे तीन बजे की डाक वह देख चुका था। छ: बजे की डाक अन्तिम थी और उमीकी प्रतीक्षा वह कर रहा था । डाकखाने के सभी कर्मचारी लौट गए थे और केवल एक बूढा किरानी वहां रह गया था जिसे शाम को डाक छांटनी थी। विशाल डाकखाने की एक लकड़ी की कुर्सी पर तीन बजे से ही बैठा हुआ था । छ: बजे के बाद तो वह अपनी कुर्सी से हिला भी नही था, अत: इधर भूख और प्यास मे उसका बुरा हाल था और उधर ठंड के चलते वह कापे जा रहा था। "देखिए तो कौन है ?" किसीका पदचाप सुन विशाल कापते हुए बोला। "कोई होगा वायू । यहा तो कितो प्राते-जाते रहते हैं। डाकराने के प्राने 66/एकला चलो रे - में तोपहले डाक के झोले को टन-टन की आवाज होती है।" डाकखाने के किरानी ने कहा और पॉकेट से एक सस्ता-सा सिगरेट निकालकर सुलगाने लगा। -"दार्जिलिंग भी खूब है वायू ! कभी-कभी तो इस तरह ठंडी हो जाती है कि इसकी नब्ज का भी पता नहीं चलता । आज देखिए न दिन कितना गर्म था! जरा-सी बूदा-बांदी हुई और ठंड पड़ने लगी । मैं तो बूढा हुआ, जरा-मी छुडब भी नहीं वदरित होती । सिगरेट पीने से कुछ गर्मी आती हैं । लीजिए न एक आप भी।" और उस बूढ़े किरानी ने खांसते हुए विशाल की तरफ एक सिगरेट बढ़ा दी। "धन्यवाद ! मैं पीता नहीं हूं।" विशाल ने हाथ जोड़ दिए। "नहीं पीते बाबू तो अच्छा ही करते हैं। मेरे ख्याल से पीना सब कुछ अच्छा है सिवा गम के । और जो दूसरी चीजें पीना सीख लेता है वह गम पीना भूल जाता है, इसीलिए तो बाबू मैंने सिगरेट पीना प्रारम्भ किया।" बूढा किरानी रह-रहकर सिगरेट के कश खीचता जा रहा था और सिगरेट के तम्बाकू से काले और पीले पड़े उसके दात जव-तब बाहर झांक पड़ते थे।" "तो पापको भी गम है ?" विशाल ने अनायास टोक दिया। "है नही बाबू, हुआ था । गम तो हुआ और चला भी गया ! पर सिगरेट को लत जो पड़ी यह अब तक बनी हुई है।" "तो कैसा गम था सापको?" विशाल ने कांपते हुए कहा । "छोडिए बाबू, 4 जवानी की बातें हैं, अव तो कहते भी शर्म आती है। दरअसल बात यह है कि एक लड़की थी, नाम था उसका पा। मेरे ही भुहल्ले में रहती थी। बहुत ही शोख और चंचल थी वह । हम दोनों के बीच मुहब्बत हो गई, पर वह वैवफा निकली और एक मेना वाले के साथ भाग गई। सच कहिए वायू तो लडकी जाति ही वेवफा होती है। आपको भी लगता है किमी लड़की-पोड़की का ही चक्कर है।" "क्यों ?" विशाल ने टोका। • वह तो साफ ही है। सिवा मुहब्बत के और किसमे ताकत है बाबू कि इन्सान का खाना-पीना हराम करा उसे शैतान धनने पर मजबूर करे ! खैर, अब डाक प्रा गई। देखें भापकी रूपा का क्या हाल है।" "रूपा नहीं, रेखा।" विशाल के मुह से अनायास निकल गया, पर, अब तो बात बाहर पा ही गई थी। उभी समय डाकिया कमरे में हाजिर हुमा । - एकला चलो रे / बूटे फिरानी में दार का भोला काटकर उसट दिया । मन्तिम डाक में कोई पाग गिट्टियां नहीं थीं । विनाल ने अपने ही हाथों सबको उसट डाला, पर पोई चिटठी नहीं मिली। विशाल चलने को हुआ तो यूटे किरानी ने कहा- "यहं न यायु, यह 'रकार' ही बहुत प्रमुभ है-रेया, रीता, रूपा, रमा इन मामी की सभी लड़कियां वेवफा होती हैं । अपने तो केश सफेद हो गए । प्रव तक लामो पत्र भेज भिजवाए पर, ये 'र' वाली ! ना याचा ना, इनका कोई भरोगा नही ।" मोर बूटा किरानी अपने काले-पीले दातों को निकालकर हम पटा। "पागल है।" विभास ने घोरे मे पहा और डाकखाने के बाहर पा गया। पानी कुछ कम हो गया था। पर दंटक काफी बढ़ गई थी। वह तेजी से अपने होटल की ओर चल पड़ा। विशाल होटल के कमरे में घुसा, तो देसा सुधीर उनके विस्तर पर लेटा हुआ है। मुबह का प्रथयार उसके मुह पर ढंका पड़ा था और लगता था वह असवार पढ़ते-पढते ही मो गया है । विगाल की आहट मिलने ही सुधीर की नीद टूट गई और यह हड़बडाकर उठ बैठा। विगाल की हालत देखने योग्य थी। उसके कपडे भीगकर उसके शरीर से चिपक गए थे और वह जाड़े से कांप रहा था । अांखें खुलते ही सुधीर चिल्ला पडा--"अरे तुम ?" "तो तुम क्या समझते हो मेरा भूत पाया है ?" विशाल ने कांपते हुए कहा और फिर कपडे बदलने लगा। "समझता क्या था, अभी भी समझता हूं?" और सुधीर, सामने की घड़ी पर दृष्टि डालकर बोला, "रात के बारह बजे प्रादमी का भूत नही तो क्या मादमी लोटता है ?" "तो तुमने समभा, में दाजिलिंग की पहाड़ियों में आत्महत्या कर गया?" विशाल अपने भीगे कपडे खोलकर सफेद पायजामा और कुर्ता पहन चुका था और एक ऊनी चादर लपेटकर वह सुधीर की बगल में चारपाई पर बैठ गया। "तो हजरत अब तक थे कहा? क्या किसी नई मुहब्बत का भूत सवार हो गया ?" सुधीर ने मुस्कराते हुए कहा । "पहले अपनी बात वापस लो। इसके बाद जवाव दूंगा।" विशाल ने मुस्कराते हुए कहा। "क्या मतलब ?" "मतलब यही कि अपनी वात वापस लो।" 68/एकला चलो रे "ली भाई, लो, अपनी बात वापग ! यह तो मैं जानता हूं कि हुजूर के मामने सिवा रेखा के किसी दूसरी लड़की को वात चलाना भी पाा है। अच्छा अव वताइए अब तक आप कहा थे?" "डाकखाने मे था।" विमाल ने गम्भीरता से कहा । "रात के बारह बजे डाकखाने में ?" मुधीर को ग्राश्चर्य हुआ। "डाक गाड़ी लेट थी।" "पर आखिर तुम्हे ग्राज डाकखाने में डेरा डालने की जरूरत ही कमें पड़ गई ?" "माज रेखा की चिट्ठी पाने वाली थी।" "यह तुम्हे कैसे मालूम ?" "क्योंकि मैंने उसे चिट्ठी भेजी थी और उसका जवाब तो पाना ही था।" "पर इतने दिनों से तो तुम डाकखाने गर नहीं। आज ही क्या बात हुई ?" "वात यह हुई कि मैंने रात को सपना देखा कि रेखा ने मुझे चिट्ठी लिखी है।" "प्रो, तो बात यह है कि हुजूर का पागलपन अनेक प्रायाम रसता है । इन अन्धविश्वासों के चक्कर मे तुम कर में पड़ गए ?" "देखो सुधीर, मैं किमी वहम में नहीं पड़ना चाहता । पर तुम्हे यह जानना चाहिए कि इस संसार में जिन बहुत-सी चीजों को हम अन्धविश्वास और आकस्मिक कहकर उडा देते हैं उनके पीछे अक्सर सत्य की उपस्थिति होती है। मैं अन्धविश्वासी नहीं हू, पर साथ ही में प्राधुनिया, अधकचरे विज्ञान का अन्धा उपासक भी नही जिसमे हर असमान्य घटना को अवैज्ञानिक करार कर उसके महत्त्व को समाप्त कर दिया जाता है। अब यही वात लो, भूत और प्रेत के अस्तित्व को प्राज के युग में बहुत लोग नहीं मानते, पर, आए दिन ऐमी घट- नाएं घट जाती है जिनके चलते उनके अस्तित्व में विश्वास करने को हमे बाध्य होना पडता है । बन्द कमरों में कंकड़-पत्थरों की वर्या, वस्तुओं का देखते देखते गायय हो जाना, प्रेत-सिद्ध व्यक्तियों द्वारा तुम्हारे भूत-वर्तमान की मारी घट- नाग्रो को सच-सच बता देना, ये मारी वातें यह सिद्ध करती है कि प्रेत या भूत भी कोई चीत्र है। इस तरह हम में में बहुत पुनर्जन्म में भी विश्वास नहीं करते, पर आए दिन ऐसी घटनाएं अांखों के मामने घटी हैं जिनमे पुनर्जन्म में भी विश्वास करना पड़ता है । तुमने ऐमी वहुत-सी बातें विश्वस्त-मूत्रो से जानी होंगी जिसमे कोई चार-पांच माल का लड़का अपने पहले जन्म का पूरा हुलिया, एकला चलो रे/69 ? बाप-मां का नाम, गांव का अता-पता बता देता है और यही क्या उसके पहले वाले गाव में ले जाकर छोड़ देने पर वह अपना पहला घर और पहले के माता- पिता को भी पहचान लेता है। ऐसी घटनाओं से जिनका सामना नहीं हुमा, वे तो पुनर्जन्म और भूत-प्रेत मे विश्वास करने वाले को अन्धविश्वासी ही कहेगे । मेरा मतलब है कि सुधीर कि हम अपनी आधुनिकता और वैज्ञानिकता की वाढ में इस तरह यह नहीं जाएं कि अति प्रत्यक्ष वास्तविकता की ओर से भी अपनी पाखें मूद लें । ज्ञानी वनना अच्छा है सुधीर पर ज्ञान अगर यथार्थ और वास्त- विक्ता की छाती पर सवार हो पाए तो वह कहा तक मान्य होगा?" "तो तुम भूत-प्रेत मे भी विश्वास करते हो ?" सुधीर कुछ आश्चर्य और कुछ कौतूहल से विशाल की तरफ देख रहा था। "विश्वास करता क्या हूं ? विश्वास करना पडता है। तुमको विश्वास हो चाहे न हो पर सुना तो तुमने भी होगा कि हमारी आत्मा अमर है। प्रात्मा की यह अमरता ही प्रेत-योनि के अस्तित्व का कारण है । मुझे अपने धर्म-ग्रन्थो की इस उक्ति मे कि प्रशान्त आत्माएं प्रेत बन जाती हैं पूरा विश्वास है । मैं इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण नहीं ढु ढ़ता और न मैं इसे आवश्यक ही समझता हूं।" "विशाल, प्रात्मा की अमरता की तुम्हारी बात मुझे एक व्यक्ति की याद दिलाती है जो मृत व्यक्तियों की प्रात्मानो को बुलाता था।" सुधीर ने विशाल को बीच ही में टोककर कहा, "क्या तुम इसमे भी विश्वास करते हो ?" "उसके बारे में मैं बहुत नही जानता। पर मुझे इस सम्बन्ध मे एक घटना याद आ रही है । मेरे एक परिचित है जिन्हें हम चाचा कहकर बुलाते है। वे एक वार जोरों से बीमार पडे । उन्हीके घर मे एक व्यक्ति हैं जो मृत प्रारमानों को बुलाते है । रोगी की हालत नाजुक हो गई थी और यह वात ठहरी कि रोगी के पिता की मृत आत्मा को बुलाकर यह जाना जाए कि रोगी का क्या होगा। जो व्यक्ति मृत व्यक्तियो को आत्मानो को बुलाते थे उन्होंने समाधि लगाई । सुना है आत्माओं को बुलाने के लिए बहुत एकाग्रता की आवश्यकता होती है । कमरे मे हम तीन-चार व्यक्ति बैठे हुए थे। रोगी का पलंग बीच में था। थोड़ी ही देर में ऐसा हुआ कि कमरे के अन्दर जोरो से पत्थरों की वर्षा होने लगी। पर, एक पत्थर भी किसीको लगा नहीं । सभी रोगी की शय्या के इर्द-गिर्द ही गिरे। जो व्यक्ति प्रात्मा का आह्वान कर रहे थे वे बोले कि किसी कारण प्रात्मा क्रोधित हो गई है और यह इस बात का भी संकेत हो सकता है कि रोगी की जान नहीं यचेगी। वह घटना चाहे जिस बात का सकेत हो, पर वह रोगी हम लोगों की 70/एकला चलो रे .
- उपस्थिति में आधे घंटे के अन्दर ही मर गया ।" "विशाल, तुम्हारे सोने मे तो बहुत दिलम्ब हो गया, पर तुम्हारी इन बातों से मेरी उत्सुकता बढ गई है। कहो तो एक प्रश्न और पूछ ?" सुधीर बोला। "शौक से पूछो। मैं तो आज यों भी नहीं सो सकता था। सात घंटे तक पोस्ट प्रॉफिस में रेखा के पत्र की प्रतीक्षा के बाद मेरी मानसिक स्थिति ऐसी हो गई है कि मुझे अाज नीद पाने से रही। यह तो अच्छा हुअा तुमने बातें निकाल दी वरना याज मैं पूरी रात उसीके ध्यान में बिता देता । हो तो पूछो।" "विमाल, क्या सभी मृत व्यक्तियों की आत्माएं बुलाई जा सकती है ?" "मुझे तुम प्रेत-विद्या का विशारद ही नहीं समझ लो । पर मैंने इतना सुना है कि जिन आत्माओं का पुनर्जन्न नही होता वे ही आ सकती है और यह बात ठीक भी जंचती है। तुम अात्मा बुलाने की ही बात कहते हो तो मुझे एक बूढे डॉक्टर की कहानी याद आ रही है। इस घटना को मैंने कलकत्ते के एका प्रसिद्ध अखवार में सच्ची कहानी के रूप मे पढ़ा था । उस कहानी का सारांग यह है कि उस डॉक्टर को अपनी जवानी में किसी लड़की से प्यार हुमा । दोनों की शादी होने वाली थी, पर उसी बीच डॉक्टर कॉलरा का शिकार हुआ और किसी- ने उस लड़की के पास गलती से यह खवर पहुंचा दी कि डॉक्टर मर गया । लडकी अपने मकान के छत पर खड़ी थी। उसने यह सुनते ही छत से कूदकर अपनी जान दे दी। डॉक्टर तो बच गया पर लड़की के बिना उसका रहना मुश्कित हो गया। इसके बाद डॉक्टर ने बहुत प्रयत्न किया और अन्त में उसे इस बात में सफलता मिल गई कि साल में एक बार, एक निश्चित समय पर लड़की की आत्मा आकर उससे बातें करें, ठीक उसी तरह जिम तरह कोई जिन्दा व्यक्ति पास में बैठकर बातें करता है । और कोई साठ साल का बूढ़ा डाक्टर, आज भी वर्ष की एक रात में अपनी जवानी की प्रेयसी से दिल खोलकर वातें करता है ।" "विगाल. तुम इस कहानी में विश्वास करते हो ?" सुधीर ने पाश्चर्य से टोका। "हो सुधीर, जब मैं पारमा के अमरत्व में और प्यार की शक्ति में विश्वास करता हूं तो इस कहानी में भी विश्वास करना ही पड़ता है।" "तो तुम्हारे कहने का तात्यं शायद यह भी है कि यदि रेखा इस जन्म में तुम्हारी नहीं हुई तो मरने के बाद तुम दोनों मिलोग अवश्य ?" "सुधीर, तुम्हारा प्रश्न भले ही मजाक में पूछा गया हो पर है बहुत महत्त्व- पूर्ण । दो प्यार करने वाली मारमाएं, अगर उन्हें इस जन्म में नहीं मिलने दिया एकला चलो रे/11 जाता और उनका प्यार सच्चा है तो मरने के बाद मेरे ख्याल से अवश्य मिल सकती हैं। पर, जहां तक मेरे और रेखा का प्रश्न है, मुझे इम मिलन में सन्देह लगता है क्योकि रेसा के प्रति मेरे प्यार में तो मुझे कोई मन्देह नहीं, पर रेखा को मेरे प्रति कितना प्यार है यह तो वहीं जाने । दूमरी बात यह कि यदि जान- बूझकर वह गरद या किसी और से शादी कर लेती है तो फिर यह स्पष्ट हो ही जाएगा कि वह मुझसे प्यार नहीं करती। ऐमी स्थिति में हमारे अलौकिक मिलन का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। पर सबसे बड़ी बात यह कि यदि रेखा मुझे इस जन्म में नहीं मिलती है और मेरे देखते-देखते वह किसी और की हो जाती है तो इसका मुझपर क्या प्रभाव पड़ेगा यह मैं नहीं जानता।" "पर विगाल, तुम्हारे सपने के बारे में पूछना तो मैं भूल ही गया था। क्या तुम सपनो पर भी विश्वास करते हो?" "हां मुधीर ! भविष्य की बहुत सारी घटनाएं ऐमी होती है जिनका प्राभाम यदि हम सजग रहे तो सपनो तथा अन्य माध्यमों द्वारा पहले ही मिल जाता है। तुमने 'टेलीपंथी' का नाम भी मुना होगा। मुझे उममें बहुन विश्वास है और मैंने इस क्षेत्र में कुछ प्रयोग भी किए है। मुझको इन प्रयोगो मे काफी प्रोत्साहन मिला है।" "तो फिर, तुम्हारा पत्र पाया क्यों नही ?" जानू "और तुम्हारा सपना ?" "सपने मे तो केवल मैंने रेखा को पत्र लिखते देखा था।" "तो वह छोड़ना भूल गई।" "यह तो वही जाने।" विगाल ने छोटा-सा उत्तर दिया। "विशाल, मेरे समझ में यह प्यार-व्यार का चक्कर बहुत बुरा है। तुम तो जानते ही हो मेरी क्या हालत थी जब मुझे लीला से प्यार हुआ था। वह तो कहो वह तुम्हारी रेखा की तरह वेवफा नही निकली, नहीं तो मच कहूं मुझे तो लगता था में..." "फासी लगा जाऊंगा यही न?" विशाल बीच ही में बोल पडा। "हां यार, तुमने तो मेरी मुंह की बात छीन ली।" मुधीर ने प्रमन्न होते हुए "जानते हो सुधीर, तुम्हारी मफलता का राज क्या है ?" विशाल मुस्कराते हुए बोला। ?" "यह मैं कैसे 72/ एकला चलो रे "नहीं यार।" "तुम्हारी प्रयसी 'रकार' वाली नहीं थी।" कहकर विशाल जोरों से हंग पड़ा। "मतलब ?" सुधीर को आश्चर्य हुआ। "मतलब यह कि रूपा, रेखा, रीता, रोमा, रम्भा इनका कोई टिकाना नहीं।" विगाल की हंसी अब भी जारी थी। "यह तो तुम्हारी कोई नई सोज मालूम पड़ती है।" सुधीर ने भी हंमते हुए कहा। "खोज नहीं यार ! मैं तो 'सेकेन्ड हेन्ड' वात वोल रहा हूं।" "नहीं समझा।" "समझोगे क्या ? अन्दर की बात तुम्हें जरा देर मे समझ मे पाती है। वह जो डाक वावू है न, जिसके यहां से मैं पा रहा हूं, उसको एक रकार वाली से प्यार हो गया और वह उसे धत्ता बताकर एक मिलिट्री वाले के साथ भाग गई । यह 'खोज' उसीकी है। जब मैं खाली हाथ अपना-सा मुंह लिए लोटने लगा तो वह बोला--'वावू, ये 'र' वाली! ना वावा! ना ! उनका कोई भरोमा नहीं।" इस बात पर विशाल और सुधीर दोनों जोरों से हंस पडे और फिर विशाल अपनी चारपाई पर लेटते हुए बोला-"सुधीर अब जाकर सो जायो। अभी रात कुछ वाकी है । और हां, कल दो बजे यहा से चलने का प्रबंध करो। अब मुझने दार्जिलिंग में रहा नहीं जाता।" "सच ?" सुधीर उठते हुए बोला। "हां, एकदम मच । जिस ध्येय से हम दाजिलिंग पाए वह तो पूरा होने से रहा । रेखा की याद तो तुम जानते ही हो, यहा भी मेरा पिंड नही छोड रही। इससे अच्छा है हम लौट ही चलें।" वारह रेसा तीन दिन तक कॉलेज नही गई तो वीणा तीसरे रोज शाम को उसके यहां पहुंची । रेखा उस समय अपने ड्राइंगरूम में एक सोफे पर लेटी कुछ पढ़ रही एकला चलो '-.- थी। उसका चेहरा उतरा हुअा था और लगता था इधर दो-तीन रोज से उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहा है। वीणा ने पाते ही कहा रेखा, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?" "हा," रेखा ने छोटा-सा उत्तर दिया। "तुम, तीन रोज़ तक कॉलेज नहीं गई ?" "और मै अव कॉलेज जाऊगी भी नहीं।" रेखा ने लेटे ही लेटे उत्तर दिया। "समझ गई, कॉलेज मे तुम्हारी तबीयत नही लग रही है । पर, अब चिन्ता की बात नहीं, वे आ गए।" "कौन?" रेखा ने हाथ की किताव फेंकते हुए उत्सुकता से पूछा। "विशाल।" वीणा ने छोटा-सा उत्तर दिया। उसके मुख पर एक मन्द मुस्कान गेल रही थी। "वीणा ! ! !" और रेखा उठकर वीणा से लिपट गई। "अरे बैठ तो रेखा । खुशी मे इतना पागल नहीं होने । मुझमे इस तरह लिपट गई जमे मेरी जगह""" “धत् !" रेखा ने वीणा के मुख पर हाथ रख दिया और फिर उसे खींच- कर सोफे पर अपनी बगल में बैठाती हुई बोली--"अच्छा वीणा, वोल तो वे कैसे लगते है ?" "बहुत सुन्दर ।" वीणा ने कहा। "भा ! तुम तो मजाक कर रही हो, मै पूछती हूं उनका स्वास्थ्य कैसा है?" रेखा वीणा के और पाम सरक आई थी और उसने अपना चेहरा उसके कन्धे पर रख दिया था। "वड़ी आई स्वास्थ्य पूछने वाली !" वीणा ने चुटकी ली, "पहले तो उनकी उपेक्षा कर उनका स्वास्थ्य चौपट किया, अब पूछती है उनका स्वास्थ्य कैसा है। जा मैं नहीं बताती।" "अच्छा नही बताती। मेरा क्या, मैं अभी दौड़ी-दौड़ी कॉलेज चली जाती हूं। वहां जाकर प्रास भर देख सूगी।" रेखा ने कहा और उठने को हुई। "जा, जैसे वे अब तक तुम्हारे लिए बैठे हुए है ! पता है पाच बज रहे हैं।" "तो मैं उनके घर पर चली जाऊंगी।" रेखा ने शीघ्रता से कहा। "वाह री घर जाने वाली ! घर तो दुल्हन बनकर जाना। अभी जाने से क्या लाभ ?" वीणा ने रेखा को ठुड्डो उठाते हुए कहा। "वीणा!"रेसा ने गरमाकर कहा प्रौरतभी उमे शरद की बात याद पाई। 74/एकला चलो रे 'विशाल देवता है तो वीणा देवी है, एक देवता एक देवी को ही प्यार क्यों नहीं करेगा जो तुम्हारे समान पतिता को उठाने के लिए नीचे गिरेगा?' यह सोचकर रेसा का मन उदास हो गया और वह बोली-"मीणा, मैं एक बात पूछू ?" "पूछो !" "मैं विशाल के लायक नहीं हूं न ?" "क्यों ? तुम ऐसी बातें क्यों करती हो?" "तुम तो मुझे जानती हो मैं विशाल के समान विशुद्ध नहीं हूं।" रेखा ने उदास होते हुए कहा। “धत् पगली, ऐसी बात नहीं करते। पादमी कोई बुरा नही होता री ! परिस्थितियां उसे बुरा बना देती है और आदमी को जब अपनी बुराई के लिए पश्चात्ताप होता है और बुराई की राह छोड़ जव वह भलाई की राह अपना लेता है तो उसका सारा पाप समाप्त हो जाता है । तुम तो अब एकदम स्वच्छ हो रेखा । और विशाल को मैं जानती हूँ, यदि तुम उनको दिल में प्यार करोगी तो वह तुम्हारी सारी गलतियो को माफ कर देंगे। विशाल के समान व्यक्ति के लिए सच्चे प्यार की बहुत आवश्यकता है। तुम्हारा प्यार पाकर वे और निसर जाएगे।" इन बातो सुनकर रेखा को बहुत प्रसन्नता हुई और उसे शरद के द्वारा कही बातें कोरी मनगढन्त लगी और उसने वीणा को झकझोरते हुए कहा- "वीणा, मैं आज बहुत खुश हूं।" "मैं भी बहुत खुश हू रेखा ।" बीणा ने रेखा का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा। "पयों ?" रेसा के मुख से अनायास निकल गया। "इसलिए कि आज का दिन तुम्हारी खुशी का दिन है और प्राज तुम बहुत दिनों के बाद सीधी राह पर प्रा गई हो।" वीणा ने बिना किसी बनावट के कहा। "वीणा!" रेया ने वीणा के कंधे पर अपना चेहरा टिकाते हुए कहा, "मैं कितनी भाग्यमालिनी हूं जो मुझे तुम्हारे समान मित्र मिली है।" "भाग्यशामिनी तुम इमलिए नहीं हो रेगा कि तुम्हें मेरे समान मित्र मिली है, बल्कि इसलिए हो कि तुम्हें विभाल के समान जीवनसाथी मिला है।" पीपा ने कहा मौर वह उठने को हुई। "नयों?"रोगा ने कहा। एकला चलो रे/75 "मैं घर पर बिना किमीमे कहे यहां दौड़ी चली प्राई । अव चकना चाहिए। तुम्हे चलना हो तो चलो मेरे माथ ।" रेगा जाने को तैयार हो गई पर पुछ सोचकर बोली, "नहीं वीना, मुझे छोड दो।" 'अच्छा भाई, तुम ठहो और अपने विशाल के बारे में सोचो, पर रात भर सोचते ही मत रह जाना। कल तो कलिज में उन्हें भर पाव दिखोगी ही।" यह कहकर वीणा चली गई। दूसरे दिन रेखा कॉलेज गई तो वह सबसे आगे की बेंच पर बैठी। यह अाज नीचे से ऊपर तक पीली थी। पीले रंग की साड़ी, पीले रंग का ब्लाउज और फिर केशो में पीला रिवन । 'दर्शनशास्त्र-प्रतिष्ठा' का पहला क्लास विद्याल का ही था । विशाल ने कमरे में प्रवेश किया। सभी लडके यत्र-चालित से सोधे खड़े हो गए। उनके बैठने का इशारा करने पर सभी लडके बैठ गए पर रेसा अपनी जगह पर खडी की खड़ी रह गई। विशाल के स्वास्थ्य मे पहा मे ज्यादा मुधार हो गया था और उसके चेहरे की चमक और बट गई थी। नीचे से ऊपर तक सफेद मूट मे लेक्चर टेबुल के पास खडे विशाल का व्यक्तित्व आज बडा ही आकर्षक लग रहा था। कोई दो मिनटो तक रेखा विशाल की तरफ टकटकी लगाए रही और विशाल रेखा की तरफ । उन दोनों के अलावा क्लाम मे और लोग भी है इसका भान ही उन्हे नही था। रेखा की बगल में बैठी वीणा ने रेखा की साडी के पल्ले को जोर से खीच दिया और तब रेखा को अपनी स्थिति का भान हुआ और वह बिजली की गति से बैठ गई। बैठने के चाद वह कुछ देर तक अपी-सी रही पर विशाल ने भाषण प्रारम्भ किया तो रेखा ने अपनी प्रांखें फिर उठाई और पूरे घटे तक वह उन्हे देखती रही। क्लाम समाप्त होते ही विशाल क्लास से निकले और अपने विभाग में चले गए। विशाल को अपने विभाग मे वैठे कोई दस मिनट ही हुए थे कि रेया और वीणा एक साथ वहा पहुंच गई । विशात ने उन्हें देखते ही पूछा- "कहिए पाप लोग कैसी है ?" "सब पापकी कृपा है।" वीणा ने जवाब दिया । "यो ! आप ?" विशाल रेखा की ओर मुडकर बोले । रेया ने सिर झुका लिया और उमके मुख मे कोई आवाज नही निकली। "यह मापसे शरमा रही है।" वीणा ने कहा । 76/एकला चलो रे "इममें शरमाने की क्या बात है? हां, यह कहिए कि अभी तक मेरी पढाई में कुछ सुधार हुआ है या नहीं। सुना था कि अापको मेरी पढाई अच्छी ही नहीं उगती।" दिशाल की यह बात सुनकर रेखा का मुख शर्म एकदम लाल हो गया। वह बडी मुश्कित से बोली- "नहीं, यह झूठी बात है। आपमे अच्छा कौन है !" विद्याल को यह आपमे अच्छा कौन है' वाक्य बडा अच्छा लगा। उन्हे लगा रेखा ने जान-बूझकर इस वाक्य का इस तरह प्रयोग किया है। "इसका मतलब कि मैं आपको पसन्द पा गया ?" विशाल के मुख से अनायाम यह वाक्य निकल गया और उन्हें स्वयं अपने धाक-चातुर्य पर पाश्चर्य हुमा । रेखा ने फिर मिर झुका लिया। पर वीणा ने उसी समय कहा-- "हमकी तरफ से मैं हा कहे देती हूँ," इसपर विशाल और वीणा दोनो टठा- कर हम पडे और रेखा का मुप एक बार फिर लाल हो गया। "अच्छा अब हम चलें, नहीं तो रेखा की हालत और नाजुक हो जाएगी।" वीणा ने कहा और ग्रागे-मागे रेखा और पीछे मै वीणा विभाग के बाहर चली गई। कॉमन-रूम में लौटते ही रेषा ने वीणा पर बनावटी रोप दिखाया-"तुम वडी प्रो हो, वीणा, मैं तुम्हारे साथ अब कभी नही जाऊगी।" "हा री, अव मेरे साथ क्यो जाएगी, अब तो थोडे दिनो मे तुम विशाल का घर बमानोगी और मैं फिर दाल-भात मे मुसलनन्द मालूम पडने लगूंगी।" वीणा ने चुटकी ली। “धत् !" रेखा ने कहा और वह वीणा के पास से भागकर दूसरे कमरे में चली गई। तेरह रेखा के पिता श्री सुशान्त बन्योपाध्याय अपने बरामदे में बैठे हुए थे। उनके सामने एक छोटा-सा टेवुल और उसके प्रासपास दो-तीन कुसियां पड़ी हुई थी । मुगान्त वन्द्योपाध्याय अपने ऑफिस की किसी फाइल में अपना ध्यान एकला चलो रे/77 लगाए हुए थे। कोई साढ़े पांच बज रहे थे । गाम का घुघलका धीरे-धीरे गाड़ होने लगा था । सुशान्त अपनी फाइल समेटने ही वाले थे कि मामने से विशाल प्रा गए। "नमस्कार।" विशाल ने नज़दीक आकर कहा । "नमस्कार, प्रो पापनि ? सॉरि, पाप ? कव पाए ?" यह कहते-कहते सुशान्त अपनी कुर्सी से उठ सड़े हुए। 'मैं कल सुबह ही पाया ! बैठिए न ।" यह कहकर विशाल कुर्सी पर बैठ गए। उनके साथ सुशान्त भी अपनी कुर्सी पर बैठ गए और बोले "केमन ? मेरा मतलब आप अच्छी तरह तो हैं ? देखिए न अपनी ऐसी आदत हो गई कि मैं तो तंग आ गया हूं। लाख कोशिश करता हू हिन्दी बोलते-बोलते वंगला बाहर आ ही जाती है।" "कोई बात नहीं, आप मुझसे वंगला में ही बातें कर सकते है । वंसे मेरा स्वास्थ्य इस समय अच्छा है । आगे देखें कैसा रहता है । आप कैसे है ?" "चोल छ केनो रकम । वात है कि हम लोगों का काम ही ऐसा है कि कभी यहा कभी वहां । टूर ड्यूटी तो। एई पाश्चि पाच दिन परे।" (टूर "ड्यूटी है न, अभी तो पांच दिन बाद पाया) इतना कहकर रेखा के पिता ने घर की तरफ आवाज़ दी-"रेखी, पो रेखी।" और फिर विशाल की तरफ मुडकर बोले-"रेखी, हम लोग इसे प्यार से बोलते हैं। बहुत पोढती है, न जाने क्लास में कैसा करती है।" "बहुत तेज़ है। युनिवसिटी में दर्शनशास्त्र मे हाइएस्ट अंक लाएगी।" विशाल ने कहा और उसका ध्यान दरवाजे की तरफ चला गया जहा से रेखा निकली पा रही थी। अभी उसने कॉलेज के कपडे बदले भी नहीं थे, उसी पीले पोशाक में वह अब भी नीचे से ऊपर तक सजी हुई थी जमे उसे मालूम था कि अाज विशाल अवश्य पाएंगे । "नमस्कार।" रेखा ने समीप ग्राफर कहा । "नमस्कार," विशाल ने जवाब दिया और रेखा की ओर पूरी नजर देख- कर फिर वे उसके पिता की तरफ देखने लगे। "वोसो" (वैठो) उसके पिता ने कहा इसके बाद फिर वे विशाल की तरफ घूमकर बोले-"प्रामि पाश्चि । (मैं प्राता हूं) प्राप तब तक कुछ पूछिए, देखिए कि रकम कोर छ।" (देखिए कैसा करती है) यह कहकर उसके पिता अन्दर चले गए। 78/एकला चलो रे "कसी हैं आप ?" विशाल ने पूछा। "अच्छी हूं," रेखा ने धीरे से कहा और फिर सिर झुकाकर वोली, "और आप ?" - विशाल को लगा जैसे वे मानन्द के समुद्र मे गोता लगा गए हों ! आज तक रैना ने कभी उनमे ऐसा प्रश्न नहीं पूछा था । आनन्द से भरते हुए बोले- 'मेरा क्या ? मेरी खुशी तो आपकी खुशी पर निर्भर है।" "यह क्या कहते हैं आप ? मैं तो आपके पैरो की धूल के समान हूँ," रेखा ने सिर झुकाए ही कहा। "पर, मैं तो दिल के अन्दर ही अन्दर आपकी पूजा करता हूं। पाप मानें या न माने पर, आप ही मेरी सब कुछ है ।" विशाल ने रेखा की तरफ सीधे देवते हुए कहा। "यह मेरा सौभाग्य है," रेखा ने छोटा-सा उत्तर दिया और उसकी आखें उठकर विशाल की आंखो मे मिल गई। "रेखा," विशाल ने धीरे परन्तु गम्भीरता से कहा, "क्या मैं मान लू कि मेरी तपस्या पूरी हुई ?" रेखा को लगा कि उसके हृदय पर किसीने जलता अगारा रख दिया हो। विशाल से ऐमें प्रश्न की उसे उम्मीद नहीं थी। साथ ही उनकी बातो से उसे लगा कि उन्होने मचमुच उसके चलते बहुत कष्ट उठाया है। उसकी आखें छलछला आई और उसका गला भर गया। बड़ी मुश्किल से उसने कहा, "मुझे माफ कीजिए। पर मैं सच कहू तो मैं आपके योग्य नहीं हूं।" "योग्य और अयोग्य की बात तुम नही समझ सकती रेखा । रल पहचानना जौहरी का काम है, मैंने तुम्हें पहचान लिया है और तुम चाहे मेरी वनो या न बनो, पर मैं तो सदा के लिए तुम्हारा हो चुका हूं।" विशाल एक सांस में ही सारी बातें बोल गए। "अब सोच लीजिए। मैं फिर कहती हूं, मैं आपके समान विशुद्ध नहीं हूं। मैं प्रापको धोखा नहीं देना चाहती। मेरा भूत.." "भूत, वर्तमान की बात छोडो रेखा," विशाल के बीच में टोककर कहा, "हीरा जव धूल में रहता है यह गन्दगी में सना ही रहता है । तुम एक बार हा कही और फिर देखो तुम्हारे प्रकाश से तुम्हारे साथ-साथ मेरा व्यक्तित्व भी किस तरह निखर माता है।" "प्रो. विशाल !" रेखा ने धीरे में कहा और उसकी प्रांर एक बार एकला चलो रे/79 विशाल की प्रांगों में मिलकर फिर झुक गई। "प्रो० यिगाल नहीं केवल विशाल ।" "वि......."गा........ ल !"रेला की मां फिर एक बार उठी और भुग गई। "रेगा, तुम मेरी प्रेरणा हो,” विगाल में धीमी आवाज में कहा। "नोर पाप मेरे देवता," रेपा ने भी भुके सिर में प्रावाज दी। इमी ममय रेगा के पिता नौकर के माथ चाय को ट्रे लेकर यहा पहुंच गए। रेया ने दो कप चाय बनाकर विशाल और अपने पिता को दिया और उठकर भीतर नली गई । चाय पीने के बाद विभाल ने रेखा के पिता में एकाध बातें की और फिर उठकर चलने को हुए। "क्यों इतनी जल्दी क्यो?" रेसा के पिता ने टोका । "चलूगा, अभी तो कल ही पाया हूं, कुछ लोगों में मिलना है।" "अच्छा तो फिर पाइएगा।" "अच्छा।" विगाल ने जवाब दिया और रेसा के पिता को नमस्कार कर चले गए। रेसा के घर से प्राकर विगाल सीधे मुधीर यहा पहुंचे। रेसा और सुधीर घर के बीच की दूरी कोई एक मील की होगी। इस दूरी को उन्होने पैदल ही पार किया। प्रसन्नता के मारे उनके पैर जमीन पर नहीं पड रहे थे और इम दूरी को उन्होने कितनी देर में पार किया, रास्ते में कौन-कौन लोग मिले तथा कितने लोगों में ये आमने-सामने टकरा गए इसका उन्हें ध्यान नहीं था। मुधीर अपने कमरे में पुस्तको को झाड़-पोछ रहा था। उसकी पीठ दरवाजे की तरफ थी। विगात ने कमरे में घुमते ही सुधीर को पीछे में पकड़ लिया और चित्ला पडे--"मुधीर, सुधीर !! सुधीर तो एक क्षण के लिए विशाल के इस असामान्य व्यवहार पर भौचक्क रह गया, पर उसने किसी तरह विशाल से अपने को अलग किया । फिर उसने विशाल पर अपनी दृष्टि डाली तो देखा खुशी के मारे उसका चेहरा एकदम लाल हो गया है और उसकी सासें तेज चल रही है। “विगाल !!" "सुधीर !! सुधीर !!" और विशाल ने फिर एक बार सुधीर को गोद में उठा लेना चाहा । सुधीर छिटककर अलग हो गया और बोला-- 80/एकला चलो रे ए-5 समान नहीं।" कहते हुए सुधीर किवाड़ मोलकर अन्दरमा गया और वंटते "पूछो क्या नहीं हुमा?" विशाल मुधीर,केपाम वंहागि। "मैं कहता हूँ यार, कुछ कहीं भी।" मुर्धारण मममकर बोला। "तो मुनो।" और विधाल ने रेखा के माय हुई पूरी बात मुना दी। "बस " विशाल की बात ममानहानेही गधीर ने कहा। "मैं पूछता हूँ कि उसके बाद भी कि कहानी यहीं पर टॉप-टोर- "इसके बाद क्या? यही कृषकम?" धिमाल ने पहले से दूने मारप "मैं पूछता हूं प्रोफेसर, तुम्हारे होश-हवाम तो ठीक है ?" "नही सुधीर, मैं होरा-हवास खो बैठा हूँ। मैं माने में नहीं हूं। माह ! मैं कितना खुश हूं। सुधीर ! सुधीर !!" मौर मुधीर को नगा विशाल की मानसिक स्थिति असंतुलित हो गई है। "विशाल, क्या तुम पागल हो गए ?" मुधीर ने कुछ मारवयं, कुछ नप और कुछ दुःख मिश्रित शब्दों में कहा "एकदम पागल सुधीर ! एकदम पागन ! और मैं चाहता हूं इतना ही पागल बना रहूं।" और विशाल फिर एक वार मुधीर को गोद में उठा लेने के लिए लपके । सुधीर वेतहागा दरवाजे की तरफ भागा और उसने बाहर पाकर मांकन चढ़ा दी। दरवाजे के बाहर खड़ा वह स्थिति पर विचार कर ही रहा था और यह सोच रहा था कि कॉलेज में तो विशाल टीकही ये,दननी जल्दी उन्हें क्या हो गया कि तभी दरवाजे की वगन की मुली मिटकी पर विशाल की आवाज सुनाई पड़ी, "अरे यह क्या किया तूने मुधीर ? तुम ममनः कि मैं सचमुच पागल हो गया ! हे भगवान, मैं तो सभी में पागल हुमा जा रहा हूं।" और विशाल जोर से हंस पडा। सुधीर ने खिड़की के पास पाकर तमलों के लिए पूछा, "तुम गया के यहां गए थे क्या?" "हां यार, अन्दर तो प्रानो. तुम तो ऐसे माग रहे होम में प्रादीन होकर कोई पागल कुत्ता होऊ । कितनी अच्छी-अच्छी दालें कहती हैं तुमग ।" विशाल खिड़की के पास से ही बोला। "क्या बातें करनी है ? बहुत प्यार करने वालों को देना लेकिन तुम्हारे हुए बोला, "वोलो क्या हुआ ?" "वस क्या?" विमाल ने प्रानी अनि कादकर, कहा। फिस हो जाता है ?" एकता पतो।
में कहा। "तो इसीपर जनाब इतना उछल-कूद मचा रहे थे ! मैंने तो समझा कुछ हुआ।" सुधीर अपनी कुर्सी पर फैलकर बैठते हुए बोला। "मैं कहता हूं सुधीर, तुम इतने दिनों के बाद भी मुझे नहीं समझ सके।" विशाल कुछ खिन्न होकर बोला। "मैं तुम्हे इतने दिनों तक ठीक से नही समझ सका था, पर आज तुम्हें ठीक समझ गया। पर सुनो, मेरे एकाध प्रश्न का जवाब दो।" "पूछो।" "क्या रेखा तुम्हारे पास अकेली थी ?" "क्या तुम लोगों की कुर्सियां बहुत पास थी।" वहां प्रकाश था या अन्धकार?" "कुछ-कुछ अन्धकार । शाम का धुंधलका गाढा हो गया था, पर बरामदे मे बत्ती जली थी।" "तो तुम क्या केवल अपनी प्रियतमा का चेहरा ही देखे जा रहे थे ?" "क्या मतलब ?" विशाल के चेहरे पर क्रोध का भाव स्पष्ट था । "मतलब यह जनाब कि जरा उसके हाथ को अपने हाथ में लेते, उसे दबाते, सहलाते । उसे...।" "सुधीर !" विशाल लगभग चीख पडा, "तुम्हारा मेरे साथ इतने दिनों तक रहना व्यर्थ हुमा । तुम प्यार को सेक्स से मिला रहे हो।" "मैं प्यार को सेक्स के साथ तो नहीं मिला रहा और मैं भी तुम्हारे इस सिद्धान्त मे विश्वास करने लगा हूं कि सेक्स को प्यार मे विवाह के बाद ही जाना चाहिए। पर, मेरा मतलब यह है कि जब रेखा और तुम्हारा प्यार यहां तक पहुंच ही गया और जब वह तुम्हारी प्रेरणा और तुम उसका पाराध्य बन ही गए तो जो कुछ मैं कह रहा हूँ, वह वहां प्रावश्यक ही नहीं अनिवार्य ख्याल से प्यार केवल मानसिक वस्तु ही नहीं उसका शारीरिक पक्ष भी है।" "मैं मादर्श प्यार में उसकी कोई प्रावश्यकता नहीं समझता। यदि मेरा भौर रेसा का पार सच्चा है तो वह शारीरिक स्पर्श के विना भी जिन्दा रहेगा।" 82/एकला चलो रे "तुम जानो और तुम्हारा काम, पर मुझे तो ऐसा लगता है कि चाहे प्यार हो पा मैत्री या कोई भी अन्य सम्बन्ध, ध्यान दोनों पक्षो की आवश्यक- तामों पर देना होता है। तुम भले ही भावनाओं द्वारा ही अपनी भूख मिटा लो, पर इसका क्या प्रमाण है कि रेसा भी भावनाओं की खुराक पर ही जिन्दा रह पाएगी? यदि तुम मेरी सलाह लेना चाहो तो मैं कहूंगा कि अवसर बड़ा अच्छा आया है और यदि तुम इसका ठीक से प्रयोग करो तो रेखा तुम्हारी हो जाएगी।" "तो तुम्हें क्या अब भी रेखा को मेरी होने में सन्देह है ?" विशाल ने पाश्चर्य से कहा। "सन्देह कुछ कम नहीं, बहुत है। प्यार में केवल 'प्रेरणा' और पाराध्य बन जाना ही पर्याप्त नहीं। हर मानसिक भावना की एक स्वाभाविक शारीरिक प्रतिक्रिया होती है और इस प्रतिक्रिया को जबरदस्ती रोके रखना स्वाभा- विकता का हनन है । छोटा-सा उदाहरण लो, तुम कोई सुन्दर फूल देखते हो तो तुम उसे केवल दूर से देखकर ही प्रसन्न नहीं हो जाते, तुम उसे छूना भी चाहते हो, दो क्षण उसके नजदीक गुनगुनाना भी चाहते हो। यही बात प्यार के साथ भी है। प्रियपात्र के अंग का एक हल्का स्पर्श, लाखों और करोड़ों आकाशी उड़ानों को एक पोर रखवा देता है। इसीलिए मैं कहता हूं कि रेखा को अपना बनाना है तो थोड़ा व्यावहारिक बनो, थोडा उसके और नजदीक जायो।" "मैं तुम्हारे बहकावे में अपने आदर्शों की हत्या नही कर सकता। मैने तुमसे बहुत पहले ही कहा था कि में सच्चे प्यार में स्वार्थ का कोई अंश नहीं देखना चाहता । प्यार मे किसी भी शारीरिक इच्छा की पूर्ति स्वार्थ के अलावा कुछ नही है ।" विशाल ने एकदम गम्भीर होते हुए कहा । "मैं तुम्हारे आदर्श को ऊंचाई का अन्दाज़ तो प्रयत्न करके भी नही लगा सकता पर मुझे एक बात अवश्य खटक रही है। तुमने 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' की बात तो सुनी ही होगी । मैं भी मध्यम मार्ग में विश्वास करता हूं । भरसक दोनो सीमान्तों से अलग ही रहना चाहता हूं। मैं प्यार में सेक्स को नहीं लाना चाहता और यहां तक तुम्हारे और मेरे विचारों में साम्य भी है, पर मैं तुम्हारी तरह थोथी भावनाओं की उड़ान में भी विश्वास नहीं करता। तुम तो आज शाम की घटना पर खुशी मे पागल हुए जा रहे हो और मुझे पूरा विश्वास है तुम अाज रात-भर प्रकाश के तारे नही तो छत की कड़ियां अवश्य गिनते. रहोगे, पर, मैं नहीं समझता कि कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया रेखा पर भी हुई एकला चलो रे/83 होगी, बल्कि मेरा ख्याल है कि वह तुम्हारे नाम को नहीं तो अपने भाग्य को अवश्य रोती होगी। भावनाओं पर पलने के लिए विशाल तुम्हारी तरह कुछ लोग ही पैदा होते हैं, अपनी खुराक सभी की जुबान पर रास पाएगी, यह तुम कैसे समझ गए ? मैं मानता हूं आदर्श बड़ी चीज है पर जीवन के व्यावहारिक पक्ष की तरफ से भी तो हम पाखें नही मूद सकते ! सच पूछो तो विशाल, सफल जिन्दगी प्रादर्शवादियों की नहीं, बल्कि व्यवहार-निपुण व्यक्तियों की होती है। मैं एक बार फिर कहता हूं कि रेखा को पाने के लिए तुम अपने आदर्श के प्राकाम से व्यवहार की भूमि पर उतरो, वरना मुझे भय है कि तुम्हारा प्रादर्श तुम्हीको खा जाएगा । तुम्हारे पाज के पागलपन ने मेरे मन में एक महान भय का संचार कर दिया है ।" सुधीर एक अनुभवी व्यक्ति को मुद्रा में बोल गया। "मुधीर, तुम मेरे मित्र हो और मेरे प्रति निकट भी, इसलिए मैं तुम्हें केवल एक बात कहता हूं और वह यह कि प्यार और व्यावहारिकता ये दोनो दो पृथक चीजें है । प्यार, एक ऐसी मानसिक प्रतिक्रिया, एक ऐसा मानसिक सम्मोहन है जिसमें व्यावहारिकता सदा लुप्त हो जाती है। व्यावहारिकता का सम्बन्ध कृत्रिमता में है और प्यार बनावट से कोसों दूर है।" विशाल की बात सुनकर सुधीर थोड़ा हंसा और बोला, "विशाल, तुम शायद मेरी बातो को ठीक से नहीं समझ सके । व्यावहारिकता का अर्थ तुमने कृत्रिमता से लगा लिया। पर मेरा मतलब तो यहां सिर्फ इतना था कि हमें दूसरों की प्रावश्यकताओं का भी ख्याल रखना चाहिए।" "तुम यह कहना चाहते हो न कि रेखा एक पतिता लड़की है और उसे भावनात्मक सुराक के साथ मारीरिक सम्पर्क भी चाहिए ?" "नहीं, मेरे कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि रेखा और लड़कियों की तरह एक लड़की है और जिस तरह हर प्यार में पड़ी लड़की के कुछ न कुछ अरमान होते हैं वैसे ही उसके भी कुछ अरमान होगे और उन्हें पूरा होना चाहिए।" "मुधीर, तुम भूलते ही फि प्यार का अरमान एक ही है और वह है प्रिय- पात्र को सदा-सदा के लिए अपना बना लेना और इस तरह विवाह के सिवा न तो गरने प्यार का कोई भरमान है न कोई मंजिल ।" "मान लिया विवाह ही गच्चे प्यार की मंजिल है पर इस मंजिल के पहले मील के पत्थर भी तो हैं ?" "मैं मंजिल का इच्छुक हूं मौर मील के परयरों पर रखना नहीं पाता 84/एससा पसोरे धीर ।" विशाल की आवाज दृढ़ थी। "तो विशाल, मेरे ख्याल से यह यथार्थ की तरफ से प्रांखें मूंदना होगा और वह स्थिति किसीके लिए भी खतरनाक हो सकती है।" सुधीर ने उसी दृढ़ता ने जवाब दिया। "हो सकती हो तो हो, पर मैं स्वार्थ की वेदी पर प्रादर्श की हत्या के लिए प्रस्तुत नहीं।" "तब, तुमको प्यार की हत्या करनी पड़ सकती है।" "मैं ऐसा नहीं मानता।" कहकर विशाल उठने को हुआ। विशाल को उठते देख मुधीर को लगा शायद उसे उसकी बात चुभ गई है और वह नाराज होकर जा रहा है। विशाल के उठते ही वह भी उठ गया और उसका हाथ पकड़ते हुए बोला, "क्यों तुम नाराज हो गए क्या ?" "इसमे नाराज होने की क्या बात है ? मुझे तो खुशी है कि तुमने इतने दिनों के बाद ही सही अपने विचारों को दृढ़ता से मेरे समक्ष रखा । यह तो अपने सिद्धान्तों और अपनी मान्यताओं की बात है। हर व्यक्ति अपने रूप से सोचने को स्वतन्त्र है । मैं तो प्यार में हूं और तुम जानते ही हो प्यार करने वाला जो कुछ करता है, जो कुछ सोचता है, सब ठीक ही समझता है। हो सकता है मुझे ही कुछ दिनों के बाद अपने विचार बदलने पड़ें पर मुझे तो अब तक यही लगता है कि मैं ठीक रास्ते पर हूं। अच्छा, मैं चलूं प्राज साढ़े आठ बजे मैंने वीणा के पिता को मिलने का वचन दिया है। वे मेरे घर पर प्रतीक्षा करते होगे।" इतना कहकर विशाल सुधीर के कमरे से बाहर आ गया। चौदह रेषा और विगाल की उस गाम की मुलाकात के दो दिन बाद की घटना है। मुबह के पाठ बजे थे। रेखा अपने बरामदे में बैठी थी। उसके पिता कहीं बाहर गए हुए थे और मां अन्दर काम में लगी थी। रेखा किसी पत्रिका में ध्यान सगाए बैठी थी कि उसे सुनाई पड़ा, "नमस्कार मिम रेखा।" रेया ने पाखें उठाई तो देखा शरद सामने खड़ा है। रेखा का जी जलकर साक हो गया और वह कहने ही वाली थी कि चले जाइए पर गारद बिना उमे एकला चलो ₹/85 । मौका दिए सामने की कुर्सी पर बैठ गया । रेखा ने शरद की ओर देखा भी नहीं और पत्रिका में ध्यान लगाने का बहाना करने लगी। "मिरा रेसा, मुझे प्रापसे एक जरूरी बात करनी है।" शरद ने दो मिनटों के बाद मौन तोड़ा। "पर मुझे प्रापकी कोई बात सुनने का समय नहीं है ।" रेखा ने शरद की तरफ देसे बिना ही कहा । "मैं प्रापसे इसके लिए अलग से कोई समय नहीं मांगता। अपनी बात कह देता हूं, पाप सुनिए या न सुनिए । पापको शायद यह जानकर आश्चर्य हो कि वीणा और विशाल का प्यार बहुत आगे बढ़ गया है और मेरी यह भविष्यवाणी कि देवता देवी को ही अपनाएगा सही होने जा रही है।" इतना कहकर वह चुप हो गया और रेखा के मुंह की ओर देखने लगा। रेखा क्रोध मे भरकर बोली, "देखिए मिस्टर शरद, अगर अपनी नासमझी मे मैंने प्रापपर अपना प्यार प्रकट कर दिया और आपको कुछ राज़ की बातें बता दी तो इसका यह मतलब नहीं कि आप स्वामखाह उनका नाजायज फायदा उठाने का प्रयत्न करें और आप यह भी कान खोलकर सुन लीजिए कि मुझे उन बातों से कोई डर नही और आप चाहें तो उनका सरेआम विज्ञापन कर सकते है।" "मिस रेखा, अगर आप यह समझती हैं कि आपकी बातो का जानकार होने के नाते मैं उनका नाजायज लाभ उठा रहा हूं, तो यह आपका भ्रम है। वात केवल इतनी है कि जिस तरह अापको मुझसे प्यार हो गया था उसी तरह मुझे भी प्रापसे प्यार हो गया है। आपको मेरी बातों पर विश्वास नहीं हो तो मैं कैसे बताऊं पर जिस तरह आप बदलकर एक नई रेखा हो गई हैं उसी तरह मैं भी बदलकर अव एक नया शरद बन गया हूं । इस स्थिति मे मुझे इतना ही कहना है कि जब वीणा और विशाल एक होने जा रहे हैं तो फिर इसमे क्या हर्ज है कि हम, जो कभी एक साथ मिलकर चलने का स्वप्न देखते थे, अव सदा के लिए एक हो जाएं।" शरद इतना कहकर चुप हो गया और रेखा अपना ध्यान पत्रिका में ही जमाए रही और बिना अपनी आंखों को उठाए मुस्कराकर बोली, "तो यह शतरंज की नई चाल है।" "चाल के लिए तो मैं तुम्हारे समक्ष वदनाम हो ही गया हूं पर यह मुस्कान मासुप्रो मे बदल जाय अगर तुम इस समय वीणा के यहां जाकर वहां की चाल को देग्य लो।" 16/ एकला चलो रे दीवार से चिपक गई और क्रिमी तरह वहां बड़ा रहने की ताकत बटोरने लगी कि उसे वीणा की प्रावात स्पष्ट मनाई पडी--"तो इसका मतलब यह हुमा कि आपका प्यार प्रव भी पहले की ही तरह है और उसमें रनी-भर भी कमी नहीं पाई?" और रेखा की सगा उसके सामने की सभी चीजें तेजी से पूमने लगी हैं। वह दोनों हायों में अपने मिरको दवा गिरने से बचने का प्रपल "क्या मतलब?" "मतलव तो अब अपनी आंखों से देख लो और कानों में सुन लो।" अच्छा -तो मैं चला और कभी आवश्यकता पड़ी तो कॉलेज में मुझे बुता लेना।" इतना कहकर धारद उठकर चला गया। शरद चला गया पर अपनी बातों में रेखा के मन में एक भारी हलचल जगा गया। साथ ही, शरद का आकर इतनी प्रासानी में चला जाना, रेखा को प्राश्चर्यजनक लगा और उसने सोचा शायद शरद की बात सही हो। वह वीणा के यहां जाने के लिए तैयार हो गई। वीणा के पिता उसी कॉलेज में जीवविज्ञान के विभागाध्यक्ष थे जिनमें वीणा और रेखा पढती थी । डा० सुवर्णो, वीणा के पिता, काफी पैसे वाले व्यक्ति थे और उनकी उम्र पचास साल की रही होगी। पचीस साल की नौकरी में उन्होंने काफी पैसे जोड़े थे और अपनी एक बहुत सुन्दर कोटी बना ली यो। कोठी के फाटक पर पहुंचते ही रेमा को विगाल की आवाज सुनाई पड़ी और वह जहा की तहा खड़ी हो गई। विशाल के, इसके पहले वीणा के यहां मुझे जाने की बात उसने सुनी भी नहीं थी और उनके यहां पाने का उसे कोई कारण भी नहीं समझ में आ रहा था। रेखा ने ध्यान में सुना तो प्रावाज वीणा के कमरे से पा रही थी और वह वीणा और विशाल की मिली-जुली अावाज थी। रेखा जहा सड़ी थी वहां उसके दोनों तरफ बाएं-दाएं दो-दो कमरे थे। दाई तरफ का कमरा वीणा के पढ़ने का था और पापात्र मी पोर से पा रही थी। बरामदे से नीचे उतरकर वह कमरे के पीछे चली गई और दीवार से सट- कर खड़ी हो गई। उसके मिर के टीक कार ही कमरे की खिड़की खुलती थी, जिसपर लाल रंग का पदा टंगा हुआ था। यहां महा होते ही रेखा को पूर्ण विश्वास हो गया कि आवाज वीणा और दिशात की ही है । एक क्षण तो उसे लगा कि उसके शरीर का मारा रक्त मूब गया और उसकी कमर तथा टांगे बेकार होकर उसके बोम को संभालने में असमर्थ हो गई। वह और जोर से एकला चलो रे/57 करने लगी कि विशाल की आवाज़ उसके कानों में पड़ी,-"धीणा, तुझे मुझ पर इस तरह अविश्वास नहीं करना चाहिए । मेरा प्यार पहले जैसा था, आज उससे जरा भी कम नहीं है।" यह सुनते ही रेखा को लगा आगे कुछ भी सुन- कर वह पागल हो जाएगी। वह उसी क्षण वहां से हटकर फाटक के बाहर हो गई। 1 पन्द्रह आज रविवार था। वीणा रेखा के यहां दिन के कोई ग्यारह बजे पहुंची। रेखा के कमरे का दरवाजा अन्दर से बन्द था। वीणा ने रेखा को आवाज़ दी पर अन्दर मे कोई जवाब नहीं मिला। वीणा की आवाज सुनते ही रेखा की मां दौड़ी-दौड़ी आई और वीणा से बोली, "देखो न, उसे क्या हो गया है। नौ बजे से ही कमरे मे बन्द है, कितनी आवाज़ दी पर नहीं खोलती, तुम किसी तरह से दरवाजा खुलवानो। अभी उसने खाना आदि भी नहीं खाया वीणा ने अनेक बार आवाज़ दी और फिर लौट जाने और कभी न पाने की धमकी दी तो रेखा ने दरवाजा खोला। रेखा की प्रांखें एकदम लाल थीं और उसका पूरा चेहरा मांसुनों से सना था। वीणा रेखा को सीचकर पलंग पर ले गई और उसके रोने का कारण पूछा । रेखा ने वीणा के लाख प्रयल वाद भी कारण बताने से इनकार कर दिया। "क्या तुम्हें विशाल के प्यार पर सन्देह है ?" वीणा ने स्वयं प्रारम्भ किया। इस बात पर रेखा एकदम फफककर रो पड़ी। रेखा को चुप न होते देख वीणा ने आगे कहा, "देखो अगर तुम विशाल के प्यार पर सन्देह करने के कारण दुःखी हो तो उसकी कोई प्रावश्यकता नहीं है । मैं प्राज तुम्हें एक प्रत्यन्त महत्त्वपूर्ण यात बताने पाई हूँ, जिमको सुनकर तुम्हारा सारा सन्देह दूर हो जाएगा।" "मैं कुछ भी सुनना नही चाहती। मेरी तबीयत ठीक नहीं है । तुम मेहर- वानी करके मुझे तंग न करो और मुझे मेरे हाल पर छोड दो।" रेपा मिस- कियो के बीच वोली। 88/ एकला चलो रे "तुम कुछ सुनो या नही पर मैं तुझे विना सुनाए रह भी नहीं सकती। जानती हो विशाल की थीसिस छप गई ?" वीणा ने रेखा के विरोध की चिन्ता न करते हुए कहा। "छप गई तो उसमें मुझे क्या लेना है ?" रेखा झंझलाकर बोली। "लेने-देने की बात नहीं, मैं केवल इतना कहना चाहती थी कि इस थी सिस के पीछे किसीकी जबरदस्त प्रेरणा है। तुम तो जानती ही हो कि विशाल को इस कॉलेज मे पाने के कोई डेढ़ साल बाद ही डी० लिट० की डिग्री मिली। यहां पाने के कोई एक साल पहले ही वे अपना नाम डी० लिट० के लिए रजिस्टर्ड करा चुके थे, पर थीसिस के नाम पर एक अक्षर भी नहीं लिखा गया था। यहां आने के कुछ ही दिनों बाद उन्हें एक लड़की से प्यार हुअा। फिर क्या था उन्हें थीसिस लिखने की धुन सवार हुई और जानती हो दो महीने में पूरी थीसिस लिखकर तैयार हो गई। विशाल का कहना है कि इस 'थीसिस' के हर पन्ने क्या हर पंक्ति और हर प्रक्षर उस लड़की के नाम से सना हुआ है। लिखते हुए हर समय उस लड़की की मूति उनके समक्ष नाचती रही है। उन्होंने पांडुलिपि के हर पृष्ठ पर कई जगह उस लड़की का नाम काटा और लिखा है।" वीणा यहां आकर चुप हो गई और रेखा की तरफ देखा। पर रेखा ने कुछ जवाब नही दिया। वह अपने चेहरे को दोनों हाथो से छिपाए प्रौधी पड़ी थी। "विशाल का कहना है कि" वीणा ने प्रारम्भ किया, "वे इतनी तेजी से काम उस लड़की को प्रसन्न करने के लिए ही कर रहे थे और शीघ्र ही डी० लिट० की डिग्री लेकर, थोसिस छपवाकर उस पारचर्यचकित कर देना चाहते थे। अब थीसिस छप गई है। वह शायद प्राज शाम तक आ भी जाएगी और विशाल की प्रतिज्ञा है कि यौसिम की पहली प्रति उसो व्यक्ति के हाथ जाएगी जिसकी प्रेरणा उगके लिखने के पीछे है और जानती हो उस खूबसूरत- सी लड़की का क्या नाम है ? उसका नाम है रेखा !" "यह सब झूठ है, सफेद झूठ । वीणा, मैं कहती हूं मुझे अकेली छोड दो। मैं तुम्हारी बातों से पागल हो जाऊंगी।" रेसा अपनी भरी-भरी प्रा लिए पलंग पर बैठी थी और वीणा की मोर अभ्यर्थना-भरी प्रांखो से देख रही थी। "यह सब झूठ नहीं है रेखा। यह एकदम सच है और प्यार के ऐने मादक दुनिया में मुश्किल से मिलते हैं। किमी खूबसूरत चेहरे को देनपर मार तो सबके मुंह से टपक जाती है और सब अपनी वफादारी को दुहाई देते हा मार में एकला चलो का दाल लिए खड़े हो जाते हैं पर ऐसा प्यार जिसमें प्रिय पात्र का नाम भगवान के नाम की तरह चौवीसों घण्टे जीभ पर रहे और उसकी मूर्ति भगवान की मूर्ति की तरह अन्तर् में प्रतिष्ठित हो जाए, कहां मिलता है ? हमारे साहित्य में ऐमे ही प्यार को परमेश्वर का रूप माना गया है न कि राह चलते की आख- मिचौनी और बसों और ट्रेन के डिब्बों की छेड़खानी को। मुझे तुम्हारे भाग्य से ईर्ष्या होती है।" और रेखा ने सोचा यह कह दे कि मुझे तुम्हारे भाग्य से ईर्ष्या हो रही है और यह भी कि जिस लड़की का नाम लेकर विशाल की थीसिस लिखी गई है, वह रेखा नहीं वीणा है, पर वह अपने पर किसी प्रकार नियन्त्रण कर चुप रही। वीणा की बात समाप्त होते ही वह उठी और अन्दर के दरवाजे से चौके में चली गई। रेखा का इस तरह चला जाना वीणा को बुरा लगा, पर यह सोचकर कि शायद रेखा किसी कारण से आज बहुत दु.खी है वह भी चुपचाप अपने घर चली आई। । सोलह शरद का मन पाज खिन्न था। रेखा को वीणा के यहां भेजे आज करीब एक सप्ताह हो रहा था और उसे इसका कुछ परिणाम नहीं दिखाई पड़ रहा था। अपने कमरे के दरवाजे को अन्दर से बन्द कर वह उदास लेटा हुआ था कि दर- वाजे पर दस्तक हुई और जव उठकर उसने दरवाजा खोला तो वह पाश्चर्यचकित हो गया। दरवाजे पर रेखा सड़ी थी। "प्राइए रेखा जी, मेरा इतना बड़ा सौभाग्य कि पाप भाज चौखट पर ही आ गई।" शरद ने दरवाजे से अपने को किनारे करते हुए कहा । रेखा का मन एक क्षण के लिए शरद की इस बात को सुनकर घृणा से भर गया, फिर भी वह अपने को नियन्त्रित कर बोली, "मैं पाऊंगी पर पाप प्रतिमा कीजिए कि मेरे साथ किसी प्रकार का प्रन्यया व्यवहार नहीं करेंगे।" "मैं इतना नीच नहीं हूं रेसा, पाप वैफिक्र होकर प्राइए । मुझे ऐसी कुछ नीम्रता नहीं है।" शरद की वात से वीणा कुछ प्राश्वस्त हुई और अन्दर माकर एक पुरी 90/एकला चलो रे - पर बैठ गई । बैठते ही उसने प्रारम्भ किया- "मिस्टर शरद ! मुझे पाप यहां, इस समय देखकर आश्चर्य कर रहे होगे पर मैं आज बहुत दुःखी हूं और जब मेरा दुःख मुझमे बर्दाश्त नहीं हुआ त- यहां तक आई हूं।" रेखा, यहा रुकी तो शरद ने अपने चेहरे पर कृत्रिम दुःख और गम्भीरता लाते हुए कहा, "कहते जाइए, मैं सब समझ रहा है।" "मुझ वीणा की बातो से कई बार ऐसा लगा था कि वीणा और विशाल मे ज़रूर प्यार है पर उसे मैं अपना भ्रम समझती थी। पर जब मैंने अपने कानों से विशाल और वीणा का प्रेमालाप सुना तो मुझे मालूम पड़ा कि मैं एक वार फिर छली गई।" इतना कहते-कहते रेखा की पाखें भर आईं और अपने घुटनों पर सिर टेककर वह सिसकने लगी। रेखा को रोते देख शरद अपनी जगह से उठा। उसने रेखा के सिर को उसके घुटनो से उठा दिया और इसके पहले कि वह कुछ बोले अपने रूमाल से उसके प्रांसुप्रो को पोछ अपनी जगह पर आ बैठा। रेखा एक क्षण के लिए सन हो गई, पर फिर उसे लगा कि शरद के उस व्यवहार से उसे भीतर-भीतर सुशी ही हुई । उसे लगा कि विशाल के विश्वासघात के फलस्वरूप उसके दिल पर जो एक धाव-सा हो गया है उसपर शरद के व्यवहार ने हल्का मलहम लग दिया है। अपने सिर पर शरद के हाथो के स्पर्श और फिर आसू पोछते वक्त उसके मुह पर उसकी अंगुलियो के स्पर्श मे रेखा को न जाने क्यों एक अपनत्व की भावना का अनुभव हुआ। थोड़ी देर के बाद वह अपने को संयत कर बोली- मैं आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहती हूं। क्या आप उनका ठीक-ठीक जवाब दीजिएगा ?" "एकदम ठीक, प्रापको विश्वास नहीं हो तो कहिए मैं कौन-सी कसम साऊं?" दारद तपाक से बोला। "नहीं, कसम साने की प्रावश्यकता नहीं, पहले पाप यह बतलाइए कि विशाल मुझे क्यों नही प्यार करते ?" "मैं प्रापकी मजदूरी समझ रहा हूं मिम रेखा । हर प्यार करने वाले दिल की यही हालत होती है। इसका तो सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि यद्यपि मापने स्वयं ही विशाल और वीणा का प्रेमालाप सुना है, तब भी पाप एक सप्ताह तक अपने को जब्त किए रही और अब भी आपकी प्रासा नहीं टूटती। मैं कहता हूं प्राप पहले यह बतलाइए, क्या वीणा आपमे हर तरह से अच्छी नहीं है ?" "मिस्टर शरद, एकला चलो रे / "क्या वह प्रापसे ज्यादा खूबसूरत नही है ?" "क्या वह आपसे पढ़ने में तेज नहीं है ?" "क्या जिस नाच-गान की प्रतियोगिता में भाप सेकंड-थर्ड रहती हैं उन्हीं में वह फर्स्ट नहीं रहती ?" "रहती है।" "तो क्या, ऐसी लडकी के रहते अगर विशाल जैसे व्यक्ति आपको प्यार करेंगे तो वे गलती नहीं करेंगे ?" रेखा शरद के इस प्रश्न पर थोड़ी देर तक चुप रही फिर बोली- "मिस्टर शरद ! तो क्या प्यार मात्र खरीद-विक्री ही है ? यह तो ऐसा ही हुआ न कि यदि एक ही दाम पर अच्छी और बुरी दोनो चीजें मिलती हैं तो अच्छी को ही न लेकर बुरी क्यों ली जाय ।" "यह किसीके लिए हो चाहे न हो पर विशाल के लिए तो है।" "क्यों?" "क्योकि वे भावुक है और भावुक व्यक्ति एक से दूसरे पर और दूसरे मे तीसरे पर फिसलता ही रहता है। और यह तो स्पष्ट ही हो गया कि वे कभी आपपर पाए और जब आपसे भी अच्छी मिल गई तो उसपर चले गए।" "पर मेरी समझ में यह नहीं पाता कि विशाल जव वीणा को चाहते है तो फिर मुझपर भी अपना प्यार क्यों दर्शाते है। और फिर मेरे पास उनके पत्र लिखने का क्या प्रयोजन ?" "वह इसलिए कि विशाल अपनी ही तरह वीणा को भी समझते हैं और उन्हें डर है कि कही उन्हीकी तरह वह एक से दूसरे पर माने याली निकली तो वैसी स्थिति में वे पापका सहारा लेंगे। और जहां तक उनके पत्र भेजने का प्रश्न है, आप तो एक ही पत्र पर फूली नही समाती है, वीणा को तो ऐसे अनेक पत्र उनसे मिले हैं।" "शरद !" रेसा चौंकी और तभी रेखा को एक बार वीणा का विशाल के हस्ताक्षर का पत्र देखते-देखते पहचान लेना और उसका कहना कि विगाल का हस्ताक्षर दो साल से उसके बक्से में कैद है, याद पाया । उसको भागों में मामू फिर भर पाए मोर उसका दिल बैठने-बैठने सा लगा। बड़ी मुश्किल से अपने को नियंत्रित कर वह बोली- 92/एकला चलो रे "पर शरद ! मेरी समझ में यह नही पाता कि वीणा क्यों बार-बार मुझसे मेरे प्रति विगाल के प्यार की ही दुहाई देती है।" "क्योकि यह तुम्हें उल्लू बनाना चाहती है। क्योकि, वह तुम्हारा ध्यान और साथ-साथ और लोगों का ध्यान भी अपने और विशाल के प्यार से खीचना चाहती है।" दारद की यह बात रेखा को एकदम ठीक लगी और तभी उसे वीणा के द्वारा विशाल की थीसिस और लड़की की कही गई कहानी भी याद आई और उसने सोचा कि विशाल की थीसिस के पीछे निश्चय ही वीणा को ही प्रेरणा है । थीसिस की भूमिका आदि में किसीकी प्रेरणा प्रादि का उल्लेख होगा और अपनी बद- नामी से बचने के लिए वीणा रेखा के नाम पर कहानी गढ रही है । रेखा यही सोच रही थी कि शरद पागे बोला, "अच्छा रेखा एक बात पूछू ?" "पूछिए।" "विशाल ने कभी खुले दिल से तुमपर अपना प्यार प्रकट किया है ? मतलक उन्होने कभी तुम्हें 'डालिग', 'प्रिये' प्रादि नामो से पुकारा है ?" "नहीं।" रेखा ने धीरे पर अत्यंत उदास रूप मे कहा। "सच ?" शरद को जैसे आश्चर्य हुआ। ? "हा।" "इतने दिनों के प्यार मे उन्होंने कभी तुम्हारे हाथों को सहलाया या सिर थपथपाया या तुम्हारे एकाध लटों को अपनी उंगलियों मे सहेजा ?" "नहीं।" और रेखा को लगा वह रो देगी। "तो इसका मतलब तुमने समझा, रेखा ?" "नही।" अबकी बार शरद की तरफ प्रश्न-मुद्रा में देखते हुए रेखा ने कहा ।। "इसका मतलब यह है कि ये मब वे वीणा के साथ करते पाए है।" "शरद !" रेखा को लगा उसका दिल बैठा जा रहा है। "हां । रेखा, अपनी बुद्धि तो छोटी है और साथ ही अपने पास न तो डी० लिट० की डिग्री है न हमने कोई बहुत बड़ी थीसिस ही लिखी है, पर इतना तो कोई भी समझ सकता है कि प्यार केवल जवानी जमा-खर्च का नाम नहीं।" शरद ! मुझे भी यह बात सटकती रही है। मैंने एकाध बार अनजान बनकर अपना हाथ उनकी तरफ बढाया भी, पर उन्होंने उसे छुआ तक नहीं। मैंने सममा उनका प्यार आदर्शवादी है।" रेखा रोने-रोने को हो पाई। "खाक प्रादर्शवादी है ।" शरद ने कहा । एकला चलो रे /93 "तुम जानती हो विशाल दाजिलिंग से क्यों लोटे ?" उसने मागे कहा। "हो, मेरी चिट्ठी पाकर।" रेखा ने कहा । "इसी मूर्खता पर तो मारी गई हो। वह तुम्हारी चिट्ठी पाकर नही, वीणा की चिट्ठी पाकर पाए हैं।" "मिस्टर शरद ! ऐसा नहीं कहिए, मैं मर जाऊंगी।" रेखा इतने के लिए तैयार होकर नही पाई थी और न उमे वीणा और विशाल के प्यार के इस हद तक जाने की प्राशा ही थी। उसने फिर भी साहस कर कहा- "पर क्या इसका सबूत भी आपके पास है ? अाप अाखिर इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे ?" "सबूत चाहती है आप ?" शरद थोड़ा मुसकराया, "पर उस सबूत को शायद आप सह नहीं सकेंगी। अच्छा ठहरिए।" इतना कहकर शरद उठा और उसने अपने बक्से से कागज़ का एक मुड़ा हुआ टुकड़ा निकाला और उसे रेखा की ओर बढ़ा दिया। "माई गॉड !" कागज को खोलते ही रेखा चीख पड़ी, "यह तो वहीं चिट्ठी है जिसे मैंने विशाल को लिखी थी । यापने कहां पाया इसको ?" "हां, यह वहीं चिट्टी है जो आपने विशाल को लिखी थी और जिसे वीणा ने मेरे सामने लिफाफे से निकालकर उसमें अपनी चिट्ठी भर दी थी और इसे रद्दी की टोकरी मे डाल दिया था। आप तो जानती ही हैं, वह मेरी बहन लगती है, उसने मुझे अपने सिर की कसम दे दी और इसीलिए मैं आज तक इस घटना को छुपाए रहा।" रेखा इस बात को सुनकर अपने को रोक न सकी और दोनों हाथो से अपने सीने को दबाकर घुटनो मे अपना सिर दे सिसकने लगी। पर शरद बोलता गया, "आप समझती हैं मैं ही सबसे बुरा हूं। आप यह नही समझी कि आप तो धोसेवाज़ो और छल करने वालों से घिरी हैं जो व्यर्थ ही मेरी शिकायत मापसे करते आ रहे हैं । मैं चाहे जितना बुरा रहा हूं, पर आपसे प्यार होने के बाद मैं एकदम बदल गया हूं। यही कारण है कि आपके वार-बार ठुकराए जाने के बाद भी मैं आज तक दौड़ता रहा । अगर मैं अब भी पुरा ही रहता तो कभी का पापको ठुकराकर किसी और के पास चला गया होता। " रेखा, प्यार के बिना कोई नहीं रह सकता। न विशाल, न वीणा, न प्राप और न मैं । पर सबसे ज्यादा प्यार की आवश्यकता है आपको, क्योंकि माप टूटी ई हैं और आपको लगातार धोखे पर धोखा मिला है। ऐसी हालत में मुझे भय -4/एकला चलो रे है कि यदि हम एक-दूसरे का सहारा नहीं बन जाते तो मैं फिसलूं या न फिसलूं आप जरूर फिसल जाइएगा।" इतना कहकर शरद उठा और रेखा के पास जाकर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोला- "रेखा डियर, तुम्हें इस तरह अधीर होने की आवश्यकता नहीं। हमने एक- दूसरे को एक बार प्यार किया है और हम एक-दूसरे के होने का स्वप्न भी देख चुके हैं। क्यों नही, अब हमेशा के लिए हम एक-दूसरे के हो जाएं और आप भी इस बार-बार की धमकी, धोखाधड़ी और छल-कपट से सदा के लिए मुक्ति पा जाएं ?" रेखा के मन मे इस समय हाहाकार मचा हुआ था। शरद का प्रस्ताव उसे बहुत ही अच्छा लगा और उसने तय किया कि अब सदा के लिए इस छल से छुट्टी पा जाने मे ही कल्याण है। रेखा ने यह सोचकर आंसुओ से भीगी अपनी लाल-लाल पाखों को उठाया और शरद की आखों में देखते हुए बोली-- 'शरद डियर ! मुझे वचा लो।" शरद जैसे इसी मौके की तलाश में था। उसने रेखा के सिर को अपनी "भुजाओं मे बांध लिया और धीरे से बोला, "रेखा, मैं तुम्हारा हूं, केवल तुम्हारा।" रेखा ने इस समय कुछ सोचा और वह तेजी से शरद से छिटककर कोई दो हाथ की दूरी पर खड़ी हो गई । शरद एक क्षण के लिए भौचक्का हो, जहा का तहां बैठा रह गया। "मिस्टर शरद ! मैं अव लड़को के खेल मे विश्वास नहीं करती। मैंने ऐसे बहुत खेल देखे और उनका पूरा फल भी भोगा है, यदि हम एक-दूसरे का बनना ही चाहते हैं तो हमे यह खेल बन्द कर कोई ठोस कदम उठाना चाहिए।" रेखा अपनी जगह से बोली। "तुम्हारा मतलब ?" शरद अपनी जगह पर उठ खड़ा हुन्ना और वह रेखा की तरफ प्यार-भरी आंखों से देखते हुए बोला। "मतलव कि हम विवाह कर लें।" रेखा ने जवाब दिया। "वि... "ह !" शरद के मुख से नही चाहते हुए भी अनायास निकल गया। "तुम्हें पाश्चर्य हो रहा है ?" रेखा शायद शरद के चेहरे को पढ़ चुकी थी। शरद अपने को संभालकर वोला, "नही, माश्चर्य की बात नहीं, मैं यह सोच रहा था कि यह कैसे होगा, पाप बंगाली और मैं विहारी । पाप ब्राह्मण और मैं कायस्थ । एकला चसो रे/95 "तो पया मेरे प्रति प्यार जताते वक्त और सदा के लिए एक होने के बात करते वक्त विवाह की बात आपके मन में नहीं थी ?" "थी, थी क्यों नहीं पर मैं उसके इतने गीघ्र होने की संभावना पर नहीं सोच सफा था।" शरद अपने चेहरे के भावों पर यथासाध्य नियंत्रण रखकर बोल गया। "तो इसका मतलब यह कि प्राप विवाह के लिए प्रस्तुत नहीं है ।" रेखा का स्वर गिर गया था। गरद उमे परख गया और बोला, "नहीं, ऐसी बात नही । मैं आपसे विवाह के लिए एकदम प्रस्तुत हूं, पर, मैं चाहता हूं कि आप रास्ता बतलाइए कि इसमे कैसे क्या हो सकता है ?" "इसमें करना क्या है ? हम दोनों बालिग हैं और अपनी मर्जी से एक- दूसरे से शादी कर सकते हैं ।" रेखा ने उत्तर दिया । "पर मुझे भय लगता है ।" शरद ने कहा "डर किस बात का?" "आपके पिताजी का । वे बड़े प्रादमी है । मेरे पीछे पड़ गए तो मैं कही का न रहूंगा।" "तो ऐसा कीजिए। हम लोग घर छोड़कर बाहर भाग जाएं और वही शादी कर लें।" रेखा की बात सुनकर शरद का चेहरा चमक गया मौर वह बोला, "बहुत ठीक । यह प्रस्ताव बहुत अच्छा है, पर हमें इसमें शीघ्रता करनी चाहिए।" "देखिए, मेरे पिताजी सोलह तारीख को सुबह एक महीने के लिए बाहर जा रहे है, अाज तेरह तारीख है। 16 की रात के बारह बजे हम लोग कलकता छोड दें, बाकी कार्यक्रम रास्ते में बनाएंगे । वोलो मंजूर?" "मंजूर," शरद ने कहा और थोड़ा पास सरककर उसने रेखा का हाथ पकड- कर दवा दिया। रेखा हाथ छुड़ाकर अलग हुई और बोली, “तो हमें फिर मिलने को आवश्यकता नही, हम दोनों 16 को बारह बजे प्लेटफार्म नम्बर चार पर मिल रहे है।" "हा, मेरा विश्वास रखिए," शरद ने कहा, "मुझे आप ही से भय है।" "लडकियां गायद ही किसीको धोखा देती हैं मिस्टर शरद । धोखा देना लड़कों के ही पल्ले है। अच्छा तो मैं चली।" कहकर रेखा कमरे से बाहर हो गई। शरद ने रेखा के जाते ही अन्दर से दरवाजा बंद किया और खिलसिला- 96/एक्ला चलो रे 26 कर हंसा। उमने सोचा यह सारी करामात उस चिट्ठी की है। यदि उस दिन डाकखाने में वीणा के नौकर द्वारा चिट्ठी छोड़ने के बाद वह डाक बाबू से चिट्ठी का पता वताकर, यह नहीं कहता कि वह चिट्ठी उसीकी छोडी हुई है और जिसके लिए यह चिट्ठी जा रही थी, वह लौट आया है और इस तरह वह लेटर वॉक्स से इमे निकलवा नहीं लेता तो आज वात नहीं बनती। उसने सोचा, उस समय तो उसने चिट्ठी निकालकर केवल विशाल को आने से रोकना चाहा था, पर उनका आना चाहे भले न रुका, पर संभालकर रखी इस चिट्ठी ने आज गजब कर दिया। सत्तरह विशाल जिम दिन सुधीर के यहां से यह कहकर लौटे थे कि वीणा के पिता उसका इन्तजार करते होगे, उस दिन ठीक ही वीणा के पिता सुवर्णो, विशाल के ड्राइंगरूम मे बैठे हुए थे। जाते ही विशाल ने डा० सुवर्णो को नमस्कार किया और उनके कष्ट करने का कारण पूछा। "मैं आपके पास एक प्रार्थना करने आया हूं।" डा० सुवर्णों ने कहा । डा० सुवर्णो की यह बात सुनकर विशाल को कुछ शर्म अनुभव हुई और उसने कहा, "भला पापको मुझसे प्रार्थना क्या करनी है, आप तो प्राज्ञा दीजिए।" "खर, जो समझिए मुझे कहना यह है कि वीणा को तो आप जानते ही होगे। उनका यह अन्तिम वर्ष है और उसने आपके ही विषय मे ऑनर्स ले रखा है । वह पढ़ने में अच्छी है और मैं चाहता हूं कि आप उसे कुछ सहायता कर देते तो उसको ऑनर्स में अच्छा क्लास ना जाता।" डा० सुवर्णो की बात सुन विशाल को लगा कि वह बहुत बड़े धर्म-संकट में पड़ गए। वह लड़कियों की प्रकृति से परिचित थे तथा साथ ही यह भी जानते थे कि रेखा को वीणा के प्रति सन्देह है। ऐसी स्थिति मे उन्हे वीणा को पढाने के लिए स्वीकृति देना खतरे से खाली नहीं नजर पाया। साथ ही डा० सुवर्णो के लिए उनके दिल मे काफी श्रद्धा थी और एक बुजुर्ग का दिल तोड़ना विशाल के समान व्यक्ति के लिए कठिन था। वह बड़े पसोपेश मे पड़े और उनसे न हां एकला चलो " ट्यूशन की कहते बना न ना। उन्हें असमंजस में पड़े देस डा० सुवर्णो आगे बोले, "मैं जानता हूं कि आप अध्ययनशील व्यक्ति हैं और आपके पास समय का प्रभाव है फिर भी मैं आपसे वीणा के लिए नियमित रूप से केवल एक घंटा समय मागता हूं। मेरी गाड़ी रोज आपको लेने के लिए आ जाएगी। इस सेवा के बदले में आपको दे क्या सकता हूं, फिर भी आप मुझसे बहुत छोटे है और मेरे लडके के समान है, अतः मैं जो कुछ प्राशीर्वाद के रूप में देना चाहूं आपको स्वीकार करना पड़ेगा।" विशाल को डा० सुवर्णों की यह बात सुनकर कुछ मौका मिला और उन्होने कहा, "डाक्टर साहब, वैसे तो आपकी आज्ञा सिर माथे पर, पर मैं ट्यूशन नहीं करता और अच्छा हो आप मेरे विभाग के किसी दूसरे व्यक्ति को पकड लें !" "आपने शायद मुझे गलत समझा, डा० सुवर्णो ने कहा, वात नही करता । मैं तो किसी शर्त पर मापसे वीणा के लिए कुछ समय लेना चाहता हूं और समय तो हर किसीका कीमती होता है, इसलिए मैं आपको कुछ देना चाहता था, दूसरे मेरी तनख्वाह भी आपसे ज्यादा है, अत. आपको कुछ दे देना मेरा फर्ज ही होगा। रही बात दूसरे की, तो स्पष्ट बात यह है कि वीणा किसी दूसरे से पढ़ना ही नही चाहती। वह कहती है कि सिवा आपके कोई उसकी सहायता नहीं कर सकता।" डा० सुवर्णो को वात सुन विशाल बहुत असमंजस में पड़े और फिर कुछ सोचकर बोले, "अच्छा, मुझे सोचने के लिए थोड़ा समय दीजिए। मैं आपको कल बतलाऊंगा।" "ठीक है, इस समय जाता हूं, पर सुबह मैं फिर पाऊंगा और आशा है श्राप कल मुझे निराश नहीं करेंगे। वीणा तो आपकी स्टूडेन्ट ही है, यदि आपके रहते उसको कुछ लाभ हो जाए तो क्या बुरा हो !" इतना कहकर डा० सुवर्णो चले गए थे और विशाल दौड़ा-दौडा सुधीर के यहां गया था। "सुधीर गजब हो गया।" सुधीर के पास पहुंचते ही वह बोला था ! "क्या हुआ ? रेखा तुम्हारे यहाँ डेरा-डंडा लेकर आ गई क्या?" सुधीर विशाल की परेशानी को जान-बूझकर उपेक्षित कर बोला। "नही यार, तुमको तो मजाक ही सूझता है । मैं कहता हूं कि डा० सुवर्णो आए थे।" "तो इसमें परेशान होने की क्या बात है ? डा० सुवर्णो ही तो पाए थे कोई . 98/एकला चलो रे पहाड़ तो नही टूट पड़ा था !" "तुम तो यार कभी किसी बात को सीरियसली लेते नहीं । मैं कहता हूं, आगे भी तो सुनो।" "सुनायो भी तो। तुम तो डा० सुवर्णों के आने से परेशान हो गए । कहीं रेखा के पिता सुशान्त वन्द्योपाध्याय पहुंचते तव तो तुम्हारी सिटी-पिटी ही बन्द हो जाती।" "फिर वही मजाक । यहां तो मैं मुसीवत में फंसा हूं और तुम्हें हंसी भूझ रही है। जानते हो वह वीणा को पढ़ाने की बात कह रहे थे।" विशाल परेशान मुद्रा में बोला। "मो यह बात है । तव तो यार दोनों हाथों में लड्डू है । हा यार, किस्मत वाले हो । भगवान देता है तो छप्पर फाड़कर ।" कहकर सुधीर हंसने लगा। "सुधीर ! मैं तुम्हारे सामने मजाक की बातें सुनने नहीं आया। मैं तुमसे अपनी समस्या के समाधान में सहायता के लिए आया हूं।" विशाल के चेहरे पर खीझ उभर पाई थी। "अच्छा वोलो, मैं तुम्हारी क्या सहायता कर सकता हूं?" सुधीर अव गम्भीर होकर बोला। "मैं वीणा को पढाने जाना नही चाहता।" "यह तो मैं जानता हूं । हुजूर तो भीगी बिल्ली हैं। डर है कि वीणा के पढ़ाने से कही रेखा धता न बता दे।" "तुम चाहे जो मतलब निकालो, पर यह बात सही है कि मैं रेखा के दिल को जरा भी ठेस पहुंचाना नहीं चाहता।" "मैं समझ गया ।" सुधीर ने कहा, "पर मैं तुमसे एकाध प्रश्न पूछता हूं।" "पूछो।" "डा० सुवर्णों तुम्हें क्या देंगे?" "उन्होंने कुछ खोलकर तो कहा नहीं, पर चार सौ से कम क्या देंगे?" "कितने घटे पढ़ाने की बात है ?" "एक घटा।" "कॉलेज में तुम्हें क्या मिलता है ?" "सात सौ।" "कितने घंटे तुम पढ़ाते हो?" "कोई तीन घंटे।" एपला चलो रे/99 - "तो वोलो डा० सुयों का सौदा महंगा है या सस्ता?" "पर तुम प्यार को मुद्रा के मापदंड से क्यो मापते हो?" विशाल ने कहा, "मैं चार सौ क्या चार हजार रुपये के लिए भी अपने प्यार का सौदा नही कर सकता।" "पर इससे तुम्हारे प्यार पर कौन-सा वचपात हो रहा है ?" सुधीर ने कुछ सीभकर कहा। "अगर रेखा जान गई तो?" "जान जाएगी तो कौन-सा आसमान टूट पड़ेगा। उसके तो जानने की ही वात है । और तुम लाख मिर पटकते रह गए और वह तुम्हारे कहने के अनु- सार प्रो० शर्मा से न पढकर प्रो० मुखर्जी से अंग्रेजी पढने लगी, तो तुमने क्या उसे प्यार करना छोड़ दिया ?" "मेरी तो दूसरी बात है । मैं उससे ज्यादा समझदार हूं।" "वह भी समझदार है । इक्कीस साल की लड़की पच्चीस साल के लडके से ज्यादा खोपड़ी रखती है। उसको इतनी-सी बात समझ में आ जाएगी कि जव विगाल ने उसके प्रो० मुखर्जी से पढने का बुरा नहीं माना तो उसे भी उनका वीणा को पढ़ाना बुरा नही लगना चाहिए।" "तुम्हारी बात तो कुछ हद तक ठीक मालूम पड़ती है।" विशाल ने कुछ सोचकर कहा। "कुछ हद तक ठीक नहीं बिल्कुल ठीक है।" मुधीर ने जवाब दिया, "और दूसरी बात यह कि तुम्हे डा० सुवर्णो का भी तो मुह देखना है, ये वृद्ध प्रादमी है। साथ ही तुम्हारे पिता में उनकी पुरानी जान-पहचान है।" "यह तो ठीक कहते हो, कुछ रोज पहले जब मेरे पिताजी कलकत्ते पाए थे तो उनसे शायद डा० सुवर्णो कुछ इस तरह की वात धोले भी थे। पिताजी ने मुझे कुछ इशारा किया था पर मैने इनकार कर दिया था। डा० सुवर्णों शायद उन्हीके कहने पर अब तक चुप थे। पर वीणा ने शायद फिर जोर लगाया होगा और तब डा० सुवर्णो को लाचार हो मेरे पास आना पड़ा।" "इसीलिए तो कहता हूं कि तुम आखें मूदकर वीणा को पढ़ानो। इसमें खतरे की कोई बात नही।" सुधीर ने हामी भरी। दूसरे दिन जब डा. सुवर्णों मिलने आए तो विशाल ने उन्हें स्वीकृति दे दी। उस दिन रविवार या और विशाल खाली थे, इसलिए डा० सुवर्णों ने दिन के 100/एकला चलो रे कोई साढ़ आठ बजे उनके लिए गाड़ी भिजवा दी और विशाल वीणा के घर चल दिए। विशाल को लेकर गाड़ी जैसे ही वीणा के फाटक पर रुकी और विशाल जमे ही गाड़ी मे निकले, शरद ने, जो उसी समय उस सड़क से गुजर रहा था विशाल को देख लिया । वह अपनी जगह पर खड़ा हो गया और जब विद्याल अन्दर चले गए तो उसने ड्राइवर के पास जाकर पूछा "तुम जानते हो प्रोफेसर साहब यहां क्यों आए हैं ?" "हा, विटिया रानी को पढ़ाने के लिए डाक्टर माहब ने उन्हें बुलाया है।" "श्री !" शरद के मुख से पानन्द की एक चीख निकल गई और वह रेखा के घर की ओर दौड़ गया। विशाल गाड़ी से उतरकर जय डा० मुवर्णो के मकान के अन्दर गए तव डा० सुवर्णो उन्हें अपने ड्राइंगरूम में ही मिले। वे कही जाने के लिए तैयार बैठे थे। विशाल को देखते वे बोले, "अाप वीणा की 'स्टडी' मे ही चले जाइए। मैं एक आवश्यक काम से बाहर जा रहा हूं और मैं समझता हूँ आपकी पढ़ाई ममाप्त होते-होते लौट पाऊगा। मेरे पाने पर मेरा ड्राइवर आपको छोड़ आएगा।" इसके बाद डा० सुवर्णो ने एक नौकर से विशाल को वीणा की स्टडी में भेज दिया। वीणा पहले से ही अपनी स्टडी मे बैठी थी। विशाल को देखकर बह वहुत प्रसन्न हुई और देखते ही उठ खड़ी हुई। उन्हें हाथ जोडकर नमस्कार किया और जब वे वैठ गए तो टैवल की दूसरी तरफ को कुर्सी पर बैठते हुए बोली- "मुना है सर, आप मुझे पढाने को प्रस्तुत नही हो रहे थे ?" "हो ।" विशाल ने कहा, "पोर उसके कई एक कारण थे और इनमे जो प्रमुख है उसे या तो केवल तुम जानती हो या मैं ।" "अोह ! तो यह बात थी सर! पर वह बात तो बहुत पुरानी हुई और मुझे उम्मीद थी उस दिन के बाद से मुझमें हुए आकस्मिक परिवर्तन को देखकर आपको मुझपर कोई सन्देह नहीं रहा होगा।" "सन्देह तो नहीं था फिर भी भय था कर पुराना पाव फिर हरा हो जाय," विशाल ने टेवुल पर पडी एक पुस्तक के पन्ने उलटते हुए कहा, "नौर हाँ, मेरी यह प्रतिज्ञा है कि मैं अपने जानते किसी गर लड़की का हाथ भी नहीं मांग और न कोई ऐसी बात करूंगा जिसका सम्बन्ध प्यार या ऐशीही किसी भी -- गमगा गो । हो । मुझे माशा है मुझसे पढ़ते समय पाप मेरी प्रतिमा पर ध्यान रखेंगी।" विशाल की बात सुन यीणा की प्रांतों में अनायास प्रांस छलक पाए जिन्हें यह लाग चाहने पर भी रोक न सकी और फिर उसने बड़े संयत स्वर में पहा, "जहां तक घाव या प्रश्न है मर ! वह चाहे भरा हो या नहीं, पर आपकी लिसी चिट्ठी अज भी मेरे वयसे में सुरक्षित है और जब कभी मेरा मन डिगने को होता है, मैं उसे एक बार पढ लेती हूं और फिर ? फिर मैं चट्टान बन जाती हूं. नीरस और सस्त । रही बात आपकी प्रतिज्ञा की, तो आप यह भी विश्वास मानिए कि मैं ऐसी कोई भी हरकत नहीं करूंगा जिससे आपकी प्रतिज्ञा भंग हो। बीच मे पडा यह टेवुल हमेशा आपके और मेरे बीच दीवार बनकर रहेगा और कम से कम इस टेवुल भर की दूरी आपके और मेरे बीच जिन्दगी- भर बनी होगी। "आप औरत के दिल को नही जानते सर ! यदि वह मोम के समान कोमल है तो पत्थर के समान कठोर भी। एक बार जब वह किसीके दरवाजे से दुत्कार दी जाती है तो वह फिर पर जाती है पर उसके यहा अपना अांचल पसारने नहीं जाती। यदि औरत के दिल में भावनाओं और अरमानों की प्रथाह वाढ होती है तो औरत अवसर पड़ने पर इस बाढ को अपने दिल में ही कैद कर स्वयं ही उसे पी जाना भी जानती है । औरत को आप कमजोर मत मानिए सर ! वह आप लोगों की भाषा मे अवला हो सकती है पर उसमें इतना वल अवश्य है कि अनावश्यक जज्दातों की वह अपने दिल के अन्दर ही होली जला दे और उफ तक न करे।" वीणा की इन बातों को सुनकर विशाल को लगा वे रो देंगे। उनका दिल एकदम मुह को पा गया। वे सोच रहे ये अपने कानों में अंगुली डाल लें या उठकर वहां से भाग जाएं । पर दोनों में वह कुछ न कर सके और सिर झुकाए अपनी जगह पर बैठे रहे । "प्रतिज्ञा की बात आपने खूब याद दिलाई सर!" वीणा आगे बोलती गई, "अापके पत्र को प्राप्त करने के बाद मैंने भी एक प्रतिज्ञा की है, जो समय माने पर शायद आपको भी मालूम हो जाय ! पर मैं एक बात और कहूंगी। रेखा, मेरी दोस्त है और मैं उसे छोटी बहन की तरह मानती हूं। जैसे ही मुझे मालूम हो गया कि पापको रेसा से प्यार है, वैसे ही मैं रेखा के दिल मे आपके प्रति श्यादा से ज्यादा प्यार जगाने की कोशिश करने लगी। कई बार उसने मुझसे कहा कि मैं ही विशाल से प्यार क्यो नहीं करती, पर मैंने असली वातं छिपा ली 102/एकला चलो रे और उसे कुछ उलटा-सीधा समझा दिया। और हमेशा यह प्रयल करती रही कि वह सभी को भूलकर आपकी पूर्णतया अपना ले ।" "वीणा, तुम देवी हो !" विशाल के मुह से अनायास ये शब्द निकल पड़े और उनकी आखो से दो बूंदें निकल सामने के टेवुल पर टप-टप गिर पड़ी। पर वीणा ने उधर ध्यान नहीं दिया और बोलती गई, "पर मुझे एक बात और कहनी है । मेरे प्रयत्नो के फलस्वरूप रेखा के दिल में आपके प्रति अव पर्याप्त प्यार जग पाया है और मैं अब यह जानना चाहती हूं कि क्या दार्जिलिंग से लौटने के बाद भी आप रेखा से उतना ही प्यार करते है ?" "हा," विशाल ने बहुत कठिनाई से अपने को नियंत्रित कर उत्तर दिया था। इसके बाद वीणा एक क्षण के लिए चुप हो गई थी और ठीक उसी समय शरद के द्वारा भेजी गई रेसा वीणा के कमरे के पीछे की खिड़की के नीचे आकर खड़ी हो गई थी। शरद ने तो उसे यह सोचकर भेजा था कि विशाल को वीणा के यहा देखते मात्र ही रेखा भागवता होकर लौट पाएगी और उसका कार्य बढ जाएगा। पर रेखा के द्वारा खिड़की के नीचे पहुंचकर वीणा मौर विशात की बात सुन लेने से शरद को लाभ ही हुआ । रेखा के, खिड़की के नीचे खडी होने के एक क्षण वाद की वीणा ने आगे पूछा था, "तो इसका मततव यह कि प्रापका प्यार आज भी पहले ही के तरह है। इसमें रत्ती मात्र भी कमी नहीं आई है। "वीणा, तुम्हे मुझपर सन्देह नहीं होना चाहिए। मेरा प्यार पहले जितना पा उससे आज जरा भी कम नहीं है।" विशाल ने जवाब दिया था और रेखा इसके बाद वहां नही ठहर सकी थी। "मुझे प्रापसे एक प्रार्थना करनी है," वीणा ने, आगे कहा था, "रेखा एक बहुत ही भावुक लड़की है। मैं नहीं समझती उसका दिल इतना कोमल क्यो है । जारा-जरा-सी बात उसकी लग जाती है । उसकी आंखों में आंसू पाते तो देर नहीं लगती। चोट लगने पर वह खाना तक नहीं खा पाती और रोती रहती है । दार्जिलिंग जाने से पूर्व आपने एक बार एक एकस्ट्रा क्लास लिया था और उसमे वह नहीं पाई थी, दूसरे दिन किसीने उससे कहा कि विशाल कह रहे थे कि रेखा को मेरा नोट नहीं देना क्योकि वह क्लास नहीं करती और पढ़ाई पर ध्यान नही देती। इतना सुनकर ही वह रोने लगी थी और उस दिन पहले घंटे के बाद ही पूरे दिन का क्लास छोड़कर भाग गई थी। इसीलिए, मुझे कहना है कि आप उसकी भावनाओं का ध्यान रखिएगा और कोई ऐसी बात नहीं कीजिएगा एकला चलो रे / 103 जिमगे में तकलीफ हो। येचारी का अब तक का जीवन तो प्रायः गेते ही बीता है।" "मेरी तरफ से निश्चित रहो योणा । यह तो तुम्हें बताने की प्रावस्यकता नहीं कि मैं रेता को मपा पूरे दिल से पाहता हूं, मैं कभी भी जान-बूझकर उसे तकलीफ नहीं दे सकता। पर तुम एक काम करना । तुम रेषा मे यह न यतलाना कि मैं तुम्हें पड़ा रहा हूं। अगर, उमे अपने ही पता लग गया देगा तो जाएगा। यद्यपि रेसा मुम्हारी दोस्त है, पर हो सकता है मेरा तुममें मिलना उगे युरा मगे।" "ठीक है, मैं नहीं यहूंगी।" विशाल ने आगे यीणा को अपनी थीसिस की बात बताई थी और वे मारी बातें जो वीणा ने रेसा में कही थी। विशाल के मना करने के कारण उमने उस समय उनका नाम नहीं लिया था और न रेया ने अपने क्रोध में पूछा ही था किवीणा को ये बातें कैसे ज्ञात हुई। अठारह रेखा शरद के यहां से लौटी तो देखा विशाल बरामदे में एक कुर्सी पर बैठे हैं । विशाल को देखते ही उसके मन में घृणा का ज्वार उमड़ा और उसने न तो उनकी तरफ मुड़कर देखा ही और न उन्हे नमस्कार ही किया । वह सीधे अपने मकान के अन्दर घुस गई। उसे लगा कि यदि उस समय विगाल कुछ बोलते तो वह सारे अनुशासन को भूलकर उन्हें जली-कटी मुना देती। अन्दर जाने पर रेखा के पिताजी, शायद अभी-अभी बरामदे से लौटे थे, एक किताव देते हुए बोले- "कतो सुन्दर वोई" (देख तो कसी सुन्दर किनाव है।) रेखा ने जल्दी में कुछ समझा नहीं और किताव को हाथ में लेते ही जब उसकी नजर, उसके मुख-पृष्ठ पर गई तो देखा लेखक की जगह लिखा था--विगाल एम० ए०, डी० लिट् । उसका मन झल्ला गया और उसके दिल में आया कि किताव को उठाकर दरवाजे के रास्ते सीधे वाहर फेंक दे। वह शायद अपने विचार को कार्य-रूप में परिणत भी कर देती, पर तभी उमे एक बात 104 / एकला चलो रे रेखा के हाथ याद आई। उसने किताव को खोला और उसकी भूमिका पढने लगी । भूमिका के बीच मे उसे एक जगह मिला, "मेरे अनुसन्धान का विषय प्राकस्मिक रूप में नहीं निश्चित किया गया। एक बार मैं अपने एक अत्यन्त प्रिय व्यक्ति के साथ अरविन्द के सिद्धान्तों पर चर्चा कर रहा था । वातचीत के सम्बन्ध में उसने सुझाव दिया कि आत्मा-परमात्मा सम्वन्धी अरविन्द के कुछ सिद्धान्त अनुसन्धान के अच्छे विषय हो सकते है और मैंने निश्चित कर लिया कि मेरे अनुसन्धान का आधार कुछ ऐसा ही होगा......" भूमिका के इस अंश को पढकर रेखा को लगा कि कभी अरविन्द के बारे मे विशाल ने उससे बातें चलाई थी और उसने यह उनसे कहा भी था कि यह अनुसंधान का अच्छा विषय हो सकता है, पर इससे ज्यादा उसे कुछ याद नहीं आया। उसे यह भी समझ में नही आया कि उसके चलते उन्हे अनु- संधान के शीघ्र और आसानी से समाप्त होने मे क्या सहायता मिली होगी। सभी उसे वीणा की यह वात याद पाई कि विशाल को थीसिस की हर पक्ति और हर अक्षर में किसी लड़की का नाम सना है । रेखा ने एक मिनट के लिए सोचा कि हो सकता है वही (रेखा) इस पुस्तक की प्रेरणा के मूल में हो और इस तरह वह विशाल की थीसिस की शीघ्र समाप्ति में सहायक हो । पर, तभी उसे लगा कि अगर यह बात है तो वीणा को ही यह वात पहले कैसे मालूम हुई। इसका मतलब स्पष्ट है कि वीणा ही इस थीसिस की प्रेरणा रही है और उसी- का नाम इस थीसिस के हर अक्षर के साथ सना है। मस्तिष्क में यह विचार पाते ही रेखा का मन घृणा और क्रोध से भर गया और उसने किताब को उठाकर कमरे में रखे एक टेवुल पर फेंक दिया। उसके पिताजी उने पुस्तक उलटते देख अभी वही खड़े थे। रेखा को पुस्तक फेंकते देस पूछ बैठे, "बोई भालो नई कि ?" (किताव अच्छी नहीं है क्या ?) "अभी वूझते पारिना।” (मेरी समझ में नहीं पा रहा है) और नया के अन्दर जाते ही उसके पिता भी उसके पीछे-पीछे चले गए और उसके नजदीक जाकर पूछा, "प्रोफेसर साह्य एसेछेन, तुमि दाता नेई कोरवे कि?" (प्रोफैमर माह्न पाए हैं तुम मेंट नहीं करोगी क्या ?) "नेई, दाखा कोरयो, ना।" (नहीं भेंट नही करूगी) रेखा ने जवाब दिया । रेगा का जवाब सुनकर उमफे पिता बाहर चले पाए और विशाल के पाग वेटने हुए बोले, "यापनि,मेरा मतलव माप उमेर दोका?" "नही तो! क्यों ?" विगाल ने पाश्चयं से पूछा। एपला पलो रे।
"कुछ नहीं ! और मनवोघा भालो नेई।" (उसकी तबीयत शायद अच्छी नहीं है) "पर हुग्रा क्या ?" विशाल कुछ समझ नही पा रहे थे। "कुछ हुआ नहीं। आपकी किताव उसने फेंक दी। पार, आमि बोललाम जे दाखा कोरो तो बोली कि मैं मेंट नहीं करूंगी।" विशाल को रेखा के पिता की बात सुनकर बहुत आश्चर्य हुमा । वे बहुत अरमान से अपनी थीसिस की पहली प्रति रेसा के यहां लाए थे। उनका यह प्रबंध था कि किताब की एक कापी जव रेखा के यहां पहुंच जाए उसके बाद ही वह किसी दूसरे को मिले अथवा विक्री के लिए दुकान में जाय । रेखा के पिता का यह कहना कि रेखा ने किताब फेंक दी, विशाल का दिल तोड़ गया और उनकी आखो मे आंसू छलक आए, जिन्हें अंधकार के कारण रेखा के पिता नहीं देख सके । विशाल के लिए वहा अब एक क्षण भी रुकना कठिन हो गया और वे रेखा के पिता से विदा ले वहां से चल दिए। . उन्नीस वीणा अपने स्टडी-टेबुल पर बैठकर एक पुस्तक सोलकर उसकी एकाप पंक्ति ही देख पाई थी कि कॉल-बेल बज उठी। इतना सवेरे कौन ? उसने सोचा और फिर उठकर दरवाजा खोल दिया। "आप ? इतनी सवेरे?" वीणा ने पाश्चर्य से पूछा। "हा, मैं बहुत तकलीफ में हूं वीणा!" विशाल ने जवाब दिया । "यह तो पापके चेहरे मे ही लगता है । मालूम होता है कि प्राप रात-भर सोए नहीं।" वीणा ने विशाल को बंटने के लिए एक कुर्सी देते हुए कहा । "हा वीणा, मैं रात-भर सोया नही और जिन्दगी की सारी रातें शायद अव ऐमे ही बीतेंगी।" विशाल ने एक लम्बी सांस खीचते हुए यहा प्रौर उराके बाद उन्होंने रेखा के यहां की पूरी घटना बता दी। "डा० साहय, में एक बात पूछू ?" वीणा ने गम्भीर होकर पहा । "पूछो, पर यह समझ लो कि मेरी मानसिक स्थिति कुछ ऐमी नहीं है कि में किमी गम्भीर समस्या पर अपनी राय दे सकू।" 106/ एक्ला चलो रे ? "कोई गम्भीर समस्या नहीं, यह आपसे ही सम्बन्धित एक बात है, मैं यह पूछना चाहती थी कि क्या यह उचित है कि हम अपनी भावनाओं को इतनी स्वतन्त्रता प्रदान कर दें कि वे हमारी सभी सम्भावनाओं को ही स्वाह कर जाएं ? क्या भावुकता को व्यक्ति की कर्तव्य-बुद्धि पर इस तरह हावी होने की छूट होनी चाहिए कि व्यक्ति सदा के लिए समाप्त हो जाए डाक्टर साहब, में पूछना चाहती हूं कि मनुप्य, जो विश्व के ढेर सारे ज्ञान पर अधिकार रखने की हामी भरता है, जो प्रकृति की अनेक प्रवल शक्तियो पर नियन्त्रण प्राप्त कर अपने को सृष्टि का सर्वोत्तम प्राणी सिद्ध कर चुका है, वह जहा अपने ऊपर अधिकार की बात आती है, जहा निजी भावनाग्रो को नियन्त्रित करने की आवश्यकता होती है, वहां इस तरह लाचार और दीन है ?" "वस करो वीणा, बस," विशाल ने उसे बीच में ही टोका, “मैं तुम्हारी बातों को समझ गया । रेखा के प्रति मेरे प्यार के पीछे तुम्हें मेरे विनाश की सम्भावना दीसती है और तुम्हे लगता है कि यह प्यार-भावना मुझे कर्तव्यच्युत और अंततः अकर्मण्य भी बना सकती है । तुम्हारा मंतव्य यह भी है कि मनुष्य को अपनी भावनानी को उच्छृखल नहीं होने देना चाहिए और अपनी भावुकता पर पर्याप्त नियन्त्रण रखना चाहिए । मैं तुम्हारी सारी बातों से सहमत हूं वीणा, पर मुझे इस सम्बन्ध में केवल एकाध वातें ही स्पष्ट करनी है। पहली बात तो यह है कि जहां तक प्यार के विनाशकारी पक्ष का सम्बन्ध है, मैं यह मानता हूं कि वह इस बात पर आश्रित है कि हम प्यार का प्रयोग कैसे करते हैं। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि अपने प्रिय-पात्र के के प्रति हमारे अन्तर् मे जो स्निग्ध भावना पैदा होती है आखिर उसका लक्ष्य क्या है । मोछे उद्देश्यों की उपलब्धि, अथवा कुत्सित इच्छाओं की पूर्ति मात्र से सम्बन्धित प्यार निश्चित रूप से पतन की राह का प्रतीक है, पर जहां सृजन और उत्थान ही प्यार-भावना का लक्ष्य है वहा विनाग का प्रश्न ही नहीं उठता। मैं समझता हूं कि तुम्हारा भ्रम मेरी यदा-कदा की असंतुलित मानसिक स्थिति को लेकर है । मैं इसे स्वीकार करता हूं कि गत एक साल से मैंने कर्तव्य को प्राय: किनारे कर दिया है और भावनामो की याद ने मुझे इस तरह बहाया है कि मैं अगर अकर्मण्य नहीं रहा तो मैंने अपने निर्माण की राह में भी इधर कोई टोन कदम नहीं उठाया है । पर इसका कारण भी तुम जानती हो, यह सब प्यार के उस पक्ष के फलस्वरूप हुअा है जिसे तुम उसका सबसे अंधकार- युक्त पक्ष कह सकती हो । विशुद्ध और सच्चा प्यार तो वीणा, सदा ही मंगल- एकला चलो रे / 107 फारी और शुभ है, पर जहां प्यार के प्रमृत को, उपेक्षा के हलाहल का सामना करना पड़ता है यहां प्यार की सर्जक शक्तियों का तो दम घुट जाता है और उसकी विनाशकारी शक्तियां प्रबल हो जाती है। मैं ऐसी ही स्थिति में गुजर रहा हूं वीणा। "जय तक रेता का निश्छल और सच्चा प्यार मिलता रहा तब तक तो में निर्माण को सीटी पर सीढी नित्य, नवस्फूति और नये उल्लास में चढ़ता गया । परन्तु जब से रेसा शरद के चक्कर में पाकर मेरी उपेक्षा कर रही है, तब से ही मुझे प्यार के अनिष्टकर पक्ष का सामना करना पड़ रहा है। मह तो तुममे मैं बतला ही चुका हूं कि किम तरह मेगे इधर की सारी उपलब्धियों के पीछे रेखा का प्यार ही था । अतः मेरे कहने का तात्पर्य है वीणा कि विमी- को प्यार करना कभी भी भावनामों को वह उन्मुक्तता और स्वतन्त्रता प्रदान करना नहीं है जो व्यक्ति की संभावनायी की ही हत्या कर दें। 'तुम्हारा दूसरा प्रश्न मानवीय भावनाओं के नियंत्रण से सम्बन्धित है। तुम्हारे कहने का मतलब शायद यही है कि हम मे क्या इतनी शक्ति नहीं है कि हम प्यार और भावनामो के चक्कर मे न पड़, अपने कर्तव्यों को यों ही निभाते चलें । तो यहाँ मुझे तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देने में कठिनाई हो रही है । पहली बात तो यह है मेरे कि ख्याल से प्यार की प्रेरणा के अभाव मे जो कर्तब होगा, वह मात्र कर्तव्य निर्वाह ही होगा। तात्पर्य यह कि ऐसी स्थिति में, हम, जो कुछ सीधे साधे रूप में हमारा उत्तरदायित्य रहता है-उसे ही निभाकर अपनी कतंन्य-बुद्धि को संतुष्ट कर लेते है । ऐसी स्थिति महत्त्वाकाक्षा के अभाव की होती है और हम अपने लिए किसी महान् कर्तव्य को नही चुन पाते । न हम अपना लक्ष्य किसी ऊंची जगह पर प्रतिष्ठित कर पाते हैं। तो मेरे ग्याल से प्यार को पीड़ामों के भय से महत्वाकाक्षा-विहीन हो समान मनुष्यों को जिदगी जीना कोई बुद्धिमानी नही ।" "तो अापके अनुसार प्यार विना प्रगति असंभव है।" "हां, पर प्यार से मेरा मतलव फिर सच्चे और प्रादर्श प्यार से है, आज- कल की सस्ती भावुकता और कृत्रिम प्रदर्शन से नहीं।" "ठीक है सर, भगवान मापकी मदद करे।" "धीक है वीणा, मैं अभी चलुगा । मैं अगांत हूं, जरा सुधीर से भी मिल ल ।" 108/एकला चलो रे - बीस "यह क्या शक्ल बना रखी है तूने ?" विशाल वीणा के यहां से लौटे तो सुधीर बैटा प्रतीक्षा कर रहा था। "मतलब?" विमाल ने चेहरे पर बनावटी गम्भीरता लाते हुए कहा। "मतलब कि शीशा देखा है।" "वह तो सवेरे ही देखा है।" "हां तो उस समय सात बजे होंगे, अभी तो पूरे बारह वग रहे है।" "क्या बकते हो ? अभी तो साढ़े दस बजे हैं।" विशाल ने अनजान बनते हुए कहा। "अरे यार घड़ी मे तो माढ़े दस बज रहे हैं । मेरा मतलब तो तुम्हारे चेहरे से है ।" मुधीर ने थोड़ा मुस्कराते हुए कहा । "नेहरे को वात बोलते हो," विशाल वैठते हुए बोले, "यहा पता है, पेट में चूहे कूद रहे हैं।" "यो ?" "रात कुछ खाया नहीं।" "पर क्यों ?" "यह तो बतलाऊंगा ही, पर पहले यह बतलानो कि खाना तो खाया भी जा सकता है, पर नीद प्रोखो में कैसे जबरदस्ती बुलाई जाए ?" "तो जनाब रात-भर तारे ही गिनते रहे हैं ?" "नहीं यार, तारे क्या गिनूगा? हा लाख प्रयल किया पर सो न सका।" "इसपर तो मुझे, किसीका एक भला-सा शेर याद आ रहा है-- 'नीद भी न आई, गिने भी न तारे, गिनती भी भूल गए बिरहा के मारे।" "तो यार, तुम कवि हो गए ?" विशाल ने होंठो पर एक फीकी मुस्कान - लातेहए कहा। "कवि क्या बनूंगा यह तो किसीसे सुन लिया था, हां पर तुम रातों-रात एक प्रसिद्ध लेखक अवश्य बन गए।" "यह क्या?" विशाल ने प्रारचर्य से कहा। "यह, यह कि तुम्हारी थीसिस तुम्हारे कहे अनुसार कल शाम को ही 'सेल' के लिए रिलीज हुई और आज अभी-अभी दस बजे तक की खबर है कि कोई एकला चलो रे / 109 सात सौ प्रतियां बिक गई। उसके छपने को तो पहले ही से खबर थी ही, 'सेल' के लिए "रिलीज़' होते ही प्रकाराक के यहां पाठको और दुकानदारों का ताता लग गया । क्यों न हो, पुस्तक के पीछे प्रेरणा तो सुश्री रेखा की है।" सुधीर की बात सुनफर विशाल का, अपनी तकलीफ को भूलने का प्रयत्न ध्ययं हो गया और वे फिर पूर्ववत् सिन्न हो पाए। उन्होंने आगे कहा, "मैंने एक बात का निश्चय किया है सुधीर।" "क्या?" "मैं अपने प्रकादाक को अभी टेलीफोन से मूचित कर देता हूं कि वह मेरी "पुस्तक की विक्री रोक दे।" विशाल ने निश्चयपूर्ण शब्दों में कहा। "पर, क्यों?" "वह इसलिए कि मैं थीसिस को सभी प्रतियो को खरीद लूंगा और उन सभी को जलाकर उनकी राख रेखा के यहां भेज दूगा।" "विचार तो सर्वथा मौलिक है, पर रेखा देवी को राख की ऐसी क्या आवश्यकता पड गई, वह भी जब वह आपको इतनी महंगी पड़ रही है ?" "बात मजाक की नहीं सुधीर, मैं पूरी रात बेचन रहा । किसी तरह हंसी- मजाक में मैं अपनी पीड़ा को भूलने का प्रयत्न कर रहा हूं पर मुझे लगता है कि यह चोट कुछ ऐसी लगी है जिसका घाव शायद ही भरे ।" "पर आखिर कुछ बतानो भी तो।" सुधीर ने कहा । विशाल ने इसके बाद रेखा के उसके प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार और उसके पिता द्वारा सुनी उसकी पुस्तक के प्रति प्रदर्शित अनादर की बात बता दी। "वस !" सुधीर ने सारी बातें सुनने के बाद एक मुस्कराहट के साथ कहा। "वस नही तो क्या ? तुम्हें तो हर बात छोटी ही लगती है ।" विशाल ने खिन्न होकर कहा। "मुझे हर वात छोटी नहीं, तुम्हे हर छोटी बात बड़ी लगती है।" "तो तुम्हारे लिए यह बड़ी बात नही ?" "एकदम नही, और कम से कम इतनी बड़ी तो नही कि इसके लिए खाना और सोना हराम हो जाए।" "तो तुम्हारे लिए इस बात का कोई महत्त्व नहीं कि जिस लड़की को प्रेरणा बनाकर, जिसे प्रसन्न करने के लिए मैंने पूरी थीसिस लिखी, जिसे मैं अपना सब कुछ समझता आया, वह मेरी पुस्तक को देखकर जरा भी प्रसन्न नहीं 110/एकला चलो रे हो और उसके प्रति अनादर प्रकट करे । मैं पूछता हूं कि क्या यह बात इस बात का द्योतक नहीं कि उस लड़की को मेरी खुशी मे खुशी नही और मेरे दुःख मे दु.ख नहीं ? तो क्या इसका मतलब यह नहीं हुआ कि उमे मुझमे कोई प्यार नहीं और अभी दो रोज पहले जो उसने अपने प्यार की स्वीकृति दी थी वह मात्र धोखा था।" विशाल एषा सांस में ये सारी बातें बोल गया। "इसका मतलब कुछ और हो या न हो, इसका मतलब बाल का खाल निकालना अवश्य है । मुझे यह पूछना है कि जब तक वह अपने मुह से यह बात नही कहती या लिखकर नहीं देती कि वह तुमको नहीं चाहती या उसे किसी दूसरे से प्यार है तव तक तो तुम उसके 'अराध्य' और वह तुम्हारी 'प्रेरणा' है ही। एक छोटी-सी घटना को लेकर एक बहुत बड़ा अनुमान निकालना तो मेरी समझ में कोई बुद्धिमानी नहीं है।" "तो तुम्हारा क्या विचार है ?" विशाल ने पूछा । उसके मुख पर प्रसन्नता की रेखाएं स्पष्ट हो पाई थी।" "मेरा मतलब है कि तुम आज ऐसे समय रेखा के यहा जायो जव उसके पिता प्रॉफिस गए हों। तुम रेखा से कुछ बातें करने का समय निकालो । जो तथ्य होगा स्वयं स्पष्ट हो जाएगा।" विशाल को सुधीर की यह सलाह जंच गई और उन्होने निश्चय किया कि वे शाम को कॉलेज के बाद रेखा से मिलेंगे। इक्कीस विशाल के अपने यहां से जाने के बाद वीणा ने परिस्थिति के आकस्मिक परिवर्तन पर गौर किया, पर उमे रेखा के अन्दर अपने और विशाल के प्रति उत्पन्न विरक्ति का कोई कारण नहीं दिखाई पड़ा। उसने सोचा, हो सकता है रेखा के घर में किसीने डांट-डपट की हो दुःख का कोई अन्य कारण हुआ हो, जिसके फलस्वरूप वह तकलीफ में हो। अत: उसने तय किया कि वह कॉलेज में उससे एकान्त में वातें करेगी। पर, वीणा को कॉलेज में रेखा कही नहीं मिली। बारह बजे विशाल का बलास था। उन्होंने क्लास लिया, पर वीणा ने देखा उनका मन उचटा-सा था एकला चलो रे / 111 और पढाने में उनकी जरा भी रचि नहीं थी। घंटी बजने में अभी 15 मिनट देर थी कि वे क्लास छोड़कर चले गए। वीणा, विगाल की यह स्थिति बर्दाश्त नहीं कर सकी। वह जानती थी कि विशाल की इस उद्विग्नता का कारण कल की किताब वाली घटना है और आज रेखा के क्लास न आने से विगाल को विदवान हो गया है कि उसने फिर उनकी उपेक्षा प्रारम्भ कर दी है। वीणा ने क्लास छोड़कर रेसा के यहा जाने का निश्चय किया। वीणा जब रेखा के यहा पहुंची तो रेसा का दरवाजा अन्दर से बन्द था। उसने एक हल्का धक्का दिया तो दरवाजा खुल गया। पर दरवाजा खुलते ही यह देसकर उसके पाश्चयं का कोई ठिकाना न रहा कि रेखा और शरद ग्रामने- सामने अत्यन्त करीव वैठे हैं । दरवाजा सुलने की आवाज़ सुनते ही दोनों वीणा की तरफ पाश्चर्य से देखने लगे। वीणा कुछ मिनट तक किंकर्तव्यविमूढ हो दरवाजे पर खड़ी रही, फिर उसके आगे बढ़ते ही गरद अपनी कुर्सी गे उठ खड़ा हुअा और बोला- "प्राइए वीणा दीदी, आज पहली बार मेरे दिमाग में यह बात माई कि दुनिया गोल है । मैंने आपके यहा जाना छोड़ दिया भौर मापने मेरे यहां, फिर भी हम मिल ही गए।" इसके बाद फिर पड़ी पर दृष्टि डालकर वह कुछ आश्चर्य से बोला, "अरे अभी तो साडे बारह बजे हैं, आप कॉलेज से अभी ही चली आई ? प्रो समझ गया।" "क्या समझ गए ?" वीणा जो शरद के इस व्यवहार पर कुछ प्राश्चर्य और कुछ ग्लानि से भरी सड़ी थी, क्रोध मे भरकर बोली। "समझ गया विशाल, आज कॉलेज नहीं गए होगे।" शरद ने मुस्कराते हुए कहा और फिर एक दृष्टि रेखा पर डाली जो अब भी अपनी कुर्सी पर चुप बैठी थी। हारद की बात सुनकर वीणा को लगा जैसे कोई जलता हुमा तीर उसके दिल के बीच मे लगा और उसका सारा गरीर एक ज्वाला में दग्ध हो उठा। वह कभी रेखा की तरफ देखती और कभी गरद की तरफ। रेखा तटस्थ मुद्रा मे अपनी कुर्सी पर बैठी थी। शरद अपने होठों पर एक मुस्कराहट के साथ अपनी जगह पर सडा था। वीणा को यह अपमान असह्य लगा और उसे समझते देर न लगी कि शरद, रेखा को विशाल और उसके बारे मे कुछ उल्टा-सीधा समझा चुका है और जो कुछ हो रहा है वह उसी सबका परिणाम है। पर रेसा की तरफ में वीणा को इस अपमान की ज़रा भी उम्मीद नहीं थी। उसे लगा कि 112/एकला चलो रे परिस्थिति अव अनुमान से ज्यादा कठिन है। बड़ी मुश्किल से उसने रेखा की तरफ मुंह करके कहा- "रेवा, मुझे तुमसे एक अावश्यक बात करनी है।" "पर मुझे अफसोस है कि रेखा के पास आपकी बात सुनने का शायद समय नहीं है ।" इसके पहले कि रेखा कुछ बोले, शरद बोल उठा। "मिस्टर शरद ! मैं आपसे नही, रेखा से बोत रही हूं।"वीणा की आवाज में घृणा, क्रोध तथा दु.ख के भाव स्पष्ट थे । "इतना समझने की तो मुझे भी अक्ल है वीणा जी, कि आप किसमे बोल रही हैं । पर आपको शायद अब तक यह बात समझ में नहीं पाई कि मिस रेखा आपसे बोलना नहीं चाहती।" शरद इतनी-सी बात कहकर अपनी जगह पर बैठ गया। "रेखा !" वीणा अब भी खड़ी थी। "मुझे अफसोस है, हम लोग अभी एक आवश्यक बात कर रहे थे । तुम... पाप बाद में मिलिए।" रेखा ने वीणा की तरफ देखते हुए कहा । "रेखा, मैं फिर कभी नहीं मिलूंगी। मुझे केवल पाच मिनट का समय दो। मैं देखती हूं तुम अपना सत्यानाश कर रही हो।" वीणा ने कुछ व्यग्रता मे कहा। "सत्यानाश तो मेरा हो गया। हां, आपने जो कसर छोड़ी उसे पूरी कर रही हूं। बेहतर हो आप चली जाइए वरना हो सकता है, मैं जो नहीं चाहती वह भी कहना पड़े।" यह कहकर रेखा उठकर अन्दर चली गई। वीणा की आखें एकाएक छलछला आई और वह दरवाजे को ओर मुड़ गई। वीणा के जाते ही रेखा फिर कमरे में पाई और शरद को लगभग डाटते हुए बोली- "मैंने तो कहा था कि अब सत्तरह तारीख के पहले हम नहीं मिल रहे हैं तो फिर तुम आज क्यों आए ? व्यथं, लोगों में संदेह पैदा करने से क्या लाभ ?" "मैं तो नहीं पाता, पर आज सुबह जो विशाल की किताव देसी और उसकी भूमिका पढी तो मुझे भय हुआ कि तुम्हारा निर्णय कही बदल नही जाए।" "लड़की जब अन्तिम निर्णय ले लेती है तो उसे रोकना और बदलना आसान नहीं, मिस्टर दारद ! और किताव और उसकी भूमिका को मुझमे क्या लेना-देना है ?" एकला चलो रे 1:
"हो, यह तो मैं भी जानता हूं कि यह सव वीणा से सम्बद्ध है ।" शरद भूट बोला। "यह कसे ?" रेसा ने धीरे से कहा। "कैसे क्या ? यह तो मेरे सामने की बात है । जब विशाल को प्राए यहां केवल चार-पाच दिन हुए थे, डा० सुवर्णों ने उन्हें अपने यहा चाय पर बुलाया। मैं वीणा के यहा पहले से ही उपस्थित था। पीते-पीते विशाल की चाय विसर गई तो डा० सुवर्णों ने कहा, 'अापको अपनी पत्नी याद कर रही है।' इसपर विशाल बोले, 'पर मेरी पत्नी है ही कहाँ ?' " इसपर वीणा ने कहा-'तो आपको कोई और'.. वह शरमाकर चुप हो गई। इसपर विशाल ने कहा कि क्या इस तरह के विश्वास ठीक हैं तो डा० सुवर्णों ने उन्हें बताया कि वे इधर अरविन्द को पढ रहे थे और ऐसी बातों मे वे बहुत विश्वास करने लगे हैं। इस पर वीणा ने भी हामी भरी थी और फिर उसके और विशाल के बीच लगभग घंटे-भर तक अरविन्द पर वहस होती रही थी और अन्त में विशाल ने कहा था कि उन्हें इस सवसे अपनी थीसिम में बहुत सहायता मिलेगी।" "हूं।" रेखा ने कहा और एक लम्बी सास खीची। "अच्छा शरद, अब तुम जानो । परसों हम अपने निर्णय के अनुसार मिल रहे है। इस बीच किसी प्रकार का सन्देह पैदा करना ठीक नहीं।" रेखा भागे वोली। "अच्छा," शरद ने कहा और पास सडी रेखा के हाथ को पकड उसकी उंगलियों को अपने होठो तक ले जाना चाहा । रेखा ने हल्के झटके से हाथ को सीच लिया और बोली, "ऐसी शीघ्रता नहीं शरद, अभी तो सारी जिन्दगी पड़ी है।" और इसके बाद हाथ उठाकर उसने शरद को विदा किया । वाईस कॉलेज में प्रो० विशाल का मन नही लगा। उन्हें रह-रहकर कल शाम की घटना याद आती रही और उनका मन उखड़ा-उखड़ा रहा। रेखा को जब उन्होंने नही पाया तो उनका मन और उद्विग्न हो गया और उन्हें लगा कि रेखा 114/ एकला चलो रे ने जान-बूझकर उनका क्लास छोड़ा है। सुधीर के समझाने से उन्हें सवेरे तो कुछ तमल्ली हो गई थी, पर रेसा गव क्सास में नहीं मिली तो उनका धंयं समाप्त हो गया और उन्हें लगा जहर ही रेसा का वह व्यवहार प्राकस्मिक नहीं था। विशाल ने किसी तरह चार बजे तक का समय कॉलेज में बिताया और साढ़े चार बजते-बजते अपने घर वापस आ गए । इसके बाद मुंह-हाथ धोकर रेसा के यहां जाने के लिए प्रस्तुत हो गए। वे रेखा के यहा पहुंचे तो रेखा बाहर के बरामदे मे खुलने वाले कमरे के दरवाजे के बीच सड़ी थी। उसके साथ उसके घर की बगल की एक लड़की थी और दोनों किसी बात पर गौर से बातचीत कर रही थी । विगाल को उस लड़की के चरित्र के विरुद्ध बहुत सारी बातें सुनने को मिली थी और उन्हें यह देखकर बहुत दुःख हुमा कि रेखा की उसके साथ इतनी घनिष्ठता है, पर उनके स्वयं का दुःख इतना बड़ा था कि इस बात पर ध्यान देने का उनको अवकाश ही नहीं था। "रेसा !" विशाल ने बरामदे में खड़े होकर आवाज दी। "पिताजी घर में नहीं हैं।" रेखा ने विशाल की तरफ विना देखे ही उत्तर दे दिया और न उन्हें प्रणाम किया न बैठने को ही कहा। "तुम तो हो, मुझे पिताजी से नहीं तुमसे काम है।" विशाल का स्वर मा था। पर उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला। "रेखा!"विशाल ने आवाज मे अपने अन्तर का सारा प्यार उड़ेलकर फिर पुकारा। "कह तो दिया, पिताजी घर में नहीं है।" पोर रेखा उस लड़की को सोचते हुए किवाड की प्रोट में चली गई। परेखा, मुझे तुममे केवल एक बात कहनी है, केवल एक बात ।" विशाल ने इसके पहले कभी अपने को इतनी लाचार, वेवस और दीन नहीं पाया था। "पूछिए।" एक सूखा-सा उत्तर था । "तुमने मेरी थीसिस देसी?" "हा सूव देखी।" "कैसी लगी?" विशात का हाल उस विद्यार्थी की तरह था जो परीक्षा- फल सुनने के लिए अपने स्कूल के अध्यापक के समक्ष खड़ा हो और एक-एक एकला चलो रे / 115 ।
सेवेण्ड का विलम्ब उसे एक-एक युग के समान लग रहा हो। "कैमी लगी, रेखा ?" रेखा की ओर से उत्तर में देरी होते देख विशाल फिर वोल पड़े। "कैसी लगी यह मैं क्या जानू ? आप जाने, आपकी थीसिस जाने।" रेखा ने टका-सा जवाब दिया ! विशाल ने सोचा उस आवाज़ मे कुछ घमंड था, कुछ शेखी थी, कुछ उदंडता, कुछ तिरस्कार, पर प्यार ? वह नाम मात्र भी नहीं था । "आप जाने आपकी थीसिस जाने," ये पांच शब्द जैसे किसी रायफल की गोलियों की तरह उनके कलेजे में पांच स्थानों में छेद कर गए। वे वहीं बैठ गए और उन्हें लगा इन पाच छिद्रों से उनके शरीर का सारा खून एक क्षण के अन्दर ही बाहर आकर उन्हें सुन्न कर गया। उन्होंने बरामदे की दीवार पकड़ ली और फिर कोई दो मिनटों के बाद वे अपनी आवाज को यथासाध्य नियंत्रित कर बोले । पर आवाज फिर भी कांप गई-रे"खा।" "रेखा नहीं, मिस रेखा ।" रेखा ने जवाब दिया। विशाल के घायल शरीर पर यह दोहरा प्रहार था 'रेखा नही, मिस रेखा रेसा नही मिस रेखा रेखा नही.. ।' उन्हें लगा उनका मस्तिष्क शुन्य हो गया है और उसमे केवल एक ही आवाज गूंजती रही... रेखा नहीं मिस रेखा 'रेसा नहीं मिस रेखा.. रेखा नहीं...। "रेखा, क्या तुमने मेरी थीसिस की भूमिका पढ़ी है ?" विशाल को लगा जैसे वे सपने मे बोल गए। "नही, नहीं पढी और पढ़गी भी नहीं।" रेखा की यह आवाज़ पहले की सभी आवाजो से तेज़ थी और विशाल को लगा कि दूर घाटी से कोई हल्की- पतली आवाज आई, 'नही नही पढी है...' और इसके बाद ही उन्हें एक धड़ाके की आवाज सुनाई पड़ी और उन्होंने देखा सामने का खुला दरवाजा बन्द हो गया। दरवाजे के बाहर का लाल पर्दा कांप-कांपकर जैसे भीतर वाले की निष्ठुरता पर पाश्चर्य कर रहा था। विशाल धीरे-धीरे फाटक की ओर बढ़े। उनके पैर कांप रहे थे । रेखा के फाटक मे सड़क कोई वीस कदम ही थी। सड़क पर पाते ही सुधीर ने जो कॉलेज से लौट रहा था, विशाल को देख लिया और रिक्शा रोक- कर पावाज दी-"विशाल !" विशाल ने आंखें फाड़कर सुधीर की तरफ देखा, फिर जैसे पहचानते हुए वोले-"सुधीर'।" सुधीर ने विशाल को रिक्शे पर खीच लिया और उनके बगल में बैठते ही पूछा--"क्या हुआ विशाल ?" 116/एकला चलो रे "सारे सपने "टूट गए सुधीर ।" विशाल बडबडाए और फिर चुप हो गए । रास्ते-भर विशाल और सुधीर में कोई बात नहीं हुई। सुधीर को परिस्थिति को गंभीरता का अन्दाज़ लग गया था और उसने विशाल को छेड़ना उचित नहीं समझा। रिक्शे मे सुधीर और विशाल, विशाल के निवास पर पहुंचे । अपने सोने के कमरे में जाकर विशाल बिना कुछ बोले अपने विस्तर पर पड़ गए । सुधीर चारपाई की बगल में एक कुर्सी खीचकर बैठ गया। "विशाल!" सुधीर ने धीरे से आवाज दी। "सुधीर मैं अब जिन्दा नही रहना चाहता।" विशाल डूबे स्वर में बोले। "विशाल, तुम पागल हो गए हो क्या ? तुम्हारे जैसा व्यक्ति अगर ऐसी नादानी करेगा तो फिर दूसरे लोगों का क्या होगा ?" "तुम इसे नादानी मानते हो सुधीर? काश, तुम समझ पाते कि कृतघ्नता की जहर कैसी तेज होती है । मेरे रग-रग में यह जहर प्रवेश कर गई है सुधीर, मैं चाहकर भी जिन्दा नहीं रह सकता, जिन्दा रहकर भी मैं मुर्दा से बढकर रहूंगा । प्रोह, यह दुनिया क्या सचमुच इस तरह कृतघ्न और कपटी है सुधीर ! ग्रोह !" 'सुधीर, तुम समझ पाते अागाओं का लुटना कैसा असह्य होता है । मैंने क्या-क्या सोचा था सुधीर ! मैंने सोचा था मेरे हाथ मे चांद और सितारे झूलेंगे। मैं संसार का एक महान दार्शनिक, एक महान चिन्तक बन्गा । मैंने अपनी कल्पना मे रेखा के साथ पूरे संसार की सैर की है, हर जगह अपनी विजय के झंडे गाडे हैं। रेला के साथ प्राकार की ऊंचाई और समुद्र की गहराइयां मापी हैं । रेखा के साथ मैंने अपने आदशों को, अपने सपनो को फलते-फूलते देखा है। पर आज, सुधीर, आज सारी दुनिया व्यर्थ दिख रही है, मुझे अपना भविष्य अंधकारमय लग रहा है।" "तुम्हारा भविष्य बहुत उज्ज्वल है विशाल, पर तुम जिसे महत्त्व नही देना चाहिए उसे ही महत्त्व देकर अपने भविष्य की हत्या कर रहे हो । क्या रखा है इस रेखा मे ? है तुम्हारे पासंग में भी वह ? वह नहीं चाहती है तो न चाहे तुम्हे । उससे लाख गुना प्रच्छी चाहने वाली मिलेंगी कि नहीं ?" "ग्रोह ! सुधीर, मुझे ये सब बातें व्यर्थ लगती है। मेरी समझ मेरा साथ नहीं दे रही ! तुम मुझे अकेले छोड़ दो। बहस से मैं पागत हो जाऊंगा।" विशाल ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा । एकला चलो रे /117 "पर मैं तुम्हें ऐसी स्थिति में अकेले नहीं छोड़ सकता।" "सुधीर, तुम मुझे पागल कर दोगे, तुम्हारे यहां रहने से मेरा मस्तिष्क पसंतुलित ही बना रहेगा मौर लास प्रयत्न करके भी मैं अपने को बहला न सयूगा । पर तुम विश्वास रमो मैं प्रात्महत्या नहीं करूंगा। मुझे अब भी रेसा से पागा है, में अन्तिम प्रयत्न करता हूं और अगर वह भी सफल नहीं हुमा तब भगवान जाने।" "पर तुम्हारा विश्वास से हो?" "विश्वास तो होगा ही। मैं एक पत्र लिखता हूं और उसमें में उसने अन्तिम रूप से पूछता हूं कि मुझमे उसका कोई सम्बन्ध है या नहीं। अभी तक तो उसने मेरा केवल मूक अपमान ही किया है। जब तक वह स्पष्ट रूप से अपने को मुझगे अतग नहीं कर लेती तब तक तुम्हारी कल को वात के अनुसार मैं किसी बड़े परिणाम पर कैसे पहुंच सकता हूं।" "यह वात ठीक है विशाल मोर मुझे उम्मीद है, इसमें तुम्हें सफलता भी मिलेगी । मैं नही समझता कि रेखा तुम्हें छोड़ने की गलती करेगी।" यह कह- फर सुधीर उठ खडा हुप्रा और चलते हुए बोला-"तो अभी में जाता हूं विगाल । कल सुवह मिलूगा।" तेईस आज सत्तरह तारीख की सुबह थी। सुधीर, कोई पाठ बजे अपने डाइंगरूम मे बैठा सुबह का प्रसवार पढ रहा था। सामने की छोटी मेज़ पर नौकर चाय का प्याला रस गया था। वह चाय का प्याला उठाकर अपने होठो से लगाना ही चाहता था कि बीच के दरवाजे से उसकी पत्नी प्रा पहुंची और आते ही बोली-"सुना तुमने ?" "क्या ?" सुधीर के बाएं हाथ में अखबार था और दाहिने में चाय का प्याला जो उसके होंठो से कोई दो इंच की दूरी पर आकर रुक गया था। "वह जो है न सुशान्त वन्द्योपाध्याय-अरे वही रेलवे कॉलोनी वाले, उनकी लड़की, कॉलेज के किसी लड़के के साथ भाग गई।" वह सामने के सोफा पर बैठते बडे इत्मीनान से बोली। 118/एकला चलो रे "क्या रेखा भाग गई ? कय ? कहां? किसके साथ?" सुधीर जो सोफे पर बैठा था, हड वडाकर उठ गया। उसके हाथ का प्याला फर्श पर गिरकर टूट गया । उसकी पैट की टांगें नीचे से चाय के छीटो से भीग गई । पर इस सव पर विना ध्यान दिए, वह दरवाजे की तरफ भागा। उसकी पत्नी लीला की आंखें आश्चर्य से फटी जा रही थी और वह अपनी जगह पर यंत्रचालित-सी खड़ी होकर सडक पर बेतहाशा भागते जा रहे सुधीर की ओर देख रही थी। लीला को मालूम था कि सुशान्त वन्द्योपाध्याय की लड़की से सुधीर के अन्तरंग मित्र विशाल को प्यार था, पर रेखा के भाग जाने की ऐसी प्रतिक्रिया सुधीर पर होगी इसकी प्राशा उसे नहीं थी। सुधीर के घर से विशाल का मकान कोई आधा मील पड़ता था । इस दूरी को उसने दौड़ते हुए तय किया और रास्ते-भर सोचता रहा कि वह विशाल को कैसे संभालेगा। उमे विश्वास था कि यह खबर अभी उन तक नहीं पहुंची होगी, क्योंकि विशाल बिना आवश्यक कार्य से बाहर नहीं निकलते थे और फिर उनके यहां आने वालो की संख्या भी बहुत ज्यादा नहीं थी जिससे उन तक इस समा- चार को इतना शीघ्र पहुंचने की उम्मीद हो ! यद्यपि सुधीर ने रेखा के भागने के बारे में विस्तार से कुछ नहीं पूछा था, फिर भी उमे विश्वास था कि वह भागी होगी तो शरद के साथ ही। सुधीर की समझ में नहीं आ रहा था कि वह विशाल को किस रूप में यह समाचार देगा । समाचार देना भी आवश्यक था, क्योकि अगर अब तक विशाल तक बात नहीं भी पहुंची होगी तब भी कॉलेज जाने पर यह बात उनसे छिपी नहीं रहेगी और फिर रेखा के शरद के साथ भाग जाने की बात सुनकर विशाल पर क्या प्रतिक्रिया होगी यह सोच- कर ही उसका जी येतरह धवड़ाने लगा। 'हे भगवान, अाखिर यह दिन भी आ ही गया।' मुधीर ने सोचा और एक क्षण के लिए उसे लगा उसके पैर जमीन चिपक गए है और वह आगे नहीं बढ सकते । पर किसी तरह उसने अपने मन को ढाढस दिया और फिर अपनी राह पर बढ़ चला । "मोहन ! मोहन !" विशाल के फाटक पर पहुंचकर सुधीर ने नौकर को अावाज दी, मोहन ने दरवाजा खोला और सुधीर ने देखा कि उसकी आंखों से मांमू बह रहे हैं। "क्या हुमा रे?" सुधीर ने मोहना के दोनों हाथों को आगे से पकड़कर झकझोर दिया। पर जवाब देने के बदले वह फफककर रो पड़ा। सुधीर को लगा उसका मस्तिष्क उड़ा जा रहा है । उसके परों के नीचे की घरती जोरों से काप एकला चलो रे/119 रही जंगे मोई बहुत बड़ा भूगान मा गया हो। यह .. उमे.मगार प्रागे या मोर उगने देगा विमान में रहने के मा पाले मिगीपी पटी-फटी भागों की सरह गले पड़े हैं। कमर उनकी शिवाय, कमरे को गराह पर जहां-तहां विगरी पड़ी येतरतीय पुछ पनंग पर और कुछ फर्म पर फैने पड़े थे शिय मोर मासी की सरवीर जमीन पर पूर-पूर होकर बिग "विमान 555!"गुपीर कमरे में पीसा पोर फमरे की के रूप में उसमें भी पादा तेल माया में चोर पड़ीं- गुधीर दोनों हायों से अपना गिर दपागर यही बैठ गया। या में उमे समझते देर न सगी कि विशाल एक प्रत्यन्त ही विक्षिप्त, से गुजर चुके हैं मोर पता नहीं ये मय कहां है-जिन्दा भी है, "विशाल !" मुपीर के मुख से मनायास एका दर्द-भरी माय उसकी मांगों में मामू यह चले । सुधीर ने आज के पहले अपने जोर कभी भी अनुभव नहीं किया था और उसे लगा अब उस कोई अर्थ नहीं रहा। "मालिक भाग गए, सुधीर बाबू ।" मोहन जो रोते-रोते का पर मा खडा हुमा था, अपने कंधे पर रसी मैली चादर मे में कोरों को पोंछते हुए बोला। "कहां ?" सुधीर ने डूबती अावाज में पूछा । उमकी दोनोई प्रश्न चिह्न बनकर मोहन की प्रांसों में घुस जाना चाहती थी। "कमे जानू बाबू ? मैंने रास्ता रोकना चाहा तो मुझे घर फर दिया। वे आधी रात तक अपने कमरे का दरवाज़ा बन्द, करते रहे । मालिक पागल हो गए यावू ।" और मोहन सिसककई "पागल ! नहीं-नही ऐसा नही हो सकता । विशाल पागल ना विशाल पागल नही हो सकते 1 मोहन ! बोलो तो विशाल कब कब गए प्रो० विशाल कय गए मोहन ?" "आधी रात को वायू । ठीक आधी रात को। घंटाघर ने और मालिक निकल गए।" मोहन सिसकियों के बीच बोला। "इसके पहले कुछ हुआ? कोई आया था? विशाल कई 'सुधीर एक ही सास मे कई प्रश्न पूछ गया । "कही नही गए थे बाबू । पर हा एक प्रादमी पाया था। '120/ एकला चलो रे । था याबू । उसके हाथ में एक कागज़ था।" "कागज ? कहां, कहां है कागज ?" सुधीर चोखा और फिर पागलों की तरह टूट पड़ा । बिखरी हुई किताबों और सभी सामानों को उलट-पुलट दिया और अन्त मे जब उसे कुछ भी नहीं मिला तो उसने विशाल के विछावन और चादर को पलंग से उतारकर मोहन की तरफ फेंक दिया। "यह रहा बाबू ।" एक छोटा-सा कागज का टुकड़ा जो मुड-सिमटकर और छोटा हो गया था, मोहन के हाथ में था । सुधीर ने पागलों की तरह झाटकर वह कागज, मोहन के हाथों से छीन लिया। बह रेखा के हाथों का लिखा एक अत्यन्त छोटा पत्र था--- "विशाल, मुझे प्रापसे कोई मतलब नहीं। मुझे बहुत प्रसन्नता होगी यदि आप मुझे, फिर कोई पत्र न लिखें या मुझसे या मेरे परिवार के किसी सदस्य से मिलने का प्रयत्न न करें-रेसा।" सुधीर पत्र को वही फेंककर दरवाजे के वाहर लपका। दरवाजे के बाहर आते ही उसे डा० सुवर्णो मिल गए। उनके मुख का रंग उड़ा हुआ था। सुधीर को देखते ही डा० मुवर्णो चिल्ला पड़े-"गजब हो गया सुधीर, गजब हो गया । बेटी वीणा को बेहोशी के दौरे पर दौरे पा रहे हैं । सवेरे से ही दो-दो डाक्टर लगे हैं, पर अब तक कोई विशेष लाभ नहीं । कैसी मनहूस मुवह है यह । सवेरे, किसीने प्राकर वीणा को खबर कर दी कि रेखा रात को शरद के माथ भाग गई और आधी रात को विशाल पागलों की तरह सडक पर भागते देखे गए और फिर न जाने कहा गायव हो गए। इस खबर को मुनते ही वीणा विटिया बेहोश हो गई और तभी से उसे दौरे पर दौरे पड़ रहे है । मैं तुम्हें सोजते-खोजते तुम्हारे घर गया, शायद कुछ सहायता कर सको।" "मुझे अफसोस है, डा० सुवर्णो, मैं इस समय आपकी कोई सहायता करने भोग्य नहीं हूं।" और यह कहकर सुधीर बिना किसी तरफ देखे अपनी राह पर बढ़ गया। सुधीर घर पहुंचा तो उसकी पत्नी कमरे में ही बैठी थी। सुधीर का चेहरा देखते ही लीला के मुख से एक चीख निकल गई.---"क्या हुआ? ऐसा क्यों लग रहे हो ? लगता है तुम्हारे चेहरे पर सुन ही नहीं।" - सुधीर कटे हुए पेड़ की तरह सोफे पर धम से बैठ गया और बोला- "सब समाप्त हो गया लोला । रेखा शरद के साथ भाग गई । विशाल लापता हो एकला चलो रे ... गए । वीणा को मूर्टी के दौरे पर दौरे पड़ने लगे और सुधीर का सब कुछ," हो."हां"सब कुछ जाता रहा।" लीला सुधीर की बगल में घंठ गई और कुछ घबराहट-भरे शब्दों में बोली, "डा० गुवर्णो पाए थे। कह रहे थे शायद विशाल पागल हो गए।" "भगवान के लिए ऐसा न कहो । डा० विशाल पागल नहीं हो सकते। मेरा विशाल पागल नहीं हो सकता लीला, मैं उसे खूब जानता हूं। तुम उसे नही जानती । उसमें प्रान्तरिक बल है, लीला । विशाल हा, हां। मेरा विशाल, इम मंकट को झेल जाएगा। वह पागल नही होगा । वह आत्महत्या नहीं करेगा। नहीं-नहीं ऐसा कभी नहीं हो सकता। पर, रेखा ने अच्छा नहीं किया लीला।" यह कहकर सुधीर ने लीला के कंधे पर अपना सिर टिका दिया और अपने को नियन्त्रित करने का प्रयास करने लगा। चौवीस उस मनहूस सुबह को बीते आज पूरे नौ साल हो गए। विशाल का आज तक कोई पता न चला । कलकत्ते के एक विमेन्स कॉलेज को पोटिको में एक बड़ी- सी कार रुकी। चपरासी ने दौड़कर दरवाजा खोला और 'लेडी प्रिंसिपल के हाथो मे फाइल ले ली। "डाइरेक्टर पा गए ?" लेडी प्रिंसिपल ने छोटा-सा सवाल किया और उत्तर में चपरासी ने तनकर एक सतामी दी-"यस मैडम ।" "तुम उम्मीदवारों को प्रतीक्षा-गृह में बैठने को बोलो और कहो इन्टरव्यू ठीक माढ़े दस बजे प्रारम्भ हो जाएगा।" लेडी प्रिंसिपल ने चपरासी को आदेश दिया और अपने ऑफिम का पर्दा हटा अन्दर चली गई। "हलो प्रिसिपल ।" अन्दर बैठे डाइरेक्टर ने उठकर प्रिंसिपल का स्वागत किया और फिर दोनों एक बड़े-से टेबुल के किनारे, दो कुसियों पर बैठ गए। "कितनी जगहे रिक्त हैं प्रिंसिपल ?" डाइरेक्टर ने सवाल किया । "केवल एक ।" प्रिसिपल ने जवाब दिया और फिर फाइल खोलकर कुछ देखने लगी। "उम्मीदवारों में सबसे अच्छी योग्यता किसकी है ?" डाइरेक्टर ने दूसरा प्रश्न किया। 122/ एकला चलो रे "देख रही हूं।" लेडी प्रिंसिपल ने जवाब दिया। उसकी आंखें एक क्षण के लिए चमक गई। "क्या बात है प्रिंसिपल ?" डाइरेक्टर ने प्रश्न किया और जवाब में प्रिंसिपल ने सबसे अच्छी योग्यता वाली लड़की का नाम लाल स्याही से मार्क कर फाइल डाइरेक्टर की ओर बढा दी। डाइरेक्टर की पाखें भी एक क्षण को चमकी और लेडी प्रिसिपल की आखों से जा मिली। जवाब मे दाहिने हाथ के पास लगे विजली का बटन दबाया और घटी बजते ही बाहर दरवान पर्दाः हटाकर अन्दर आ खड़ा हो गया। "उम्मीदवार नं० चार को ग्रावाज़ दो।" प्रिंसिपल ने आज्ञा दी और दूसरे ही क्षण दरवाजे के बाहर दरबान की आवाज सुनाई पडी-रेखा बन्द्योपाध्याय एम० ए० !" "प्रिसिपल और डाइरेक्टर की पाखें फिर एक बार टकराई पर दोनों की प्रांखो मे प्रश्न ही था, जवाब किसीमे नही । उम्मीदवार नं० चार ने पर्दा हटाकर दरवाजे के अन्दर कदम रखा और डाइरेक्टर और प्रिंसिपल की आखें कुछ अाश्चर्य, कुछ आनन्द और अविश्वास के साथ एक साथ फट गई। उम्मीदवार ने दुसरा कदम बढाया ही था कि प्रिंसिपल और डाइरेक्टर यंत्रचालित से एक साथ अपनी कुसियों से उठ गए और दोनों के मुख से एक साथ निकल गया -"रेखा !!" "वीणा !!!" उम्मीदवार के मुख से पाश्चर्य-भरी आवाज़ निकली और वह अपने हाथ की फाइल फेंककर लेडी प्रिंसिपल के गले से जा लगी। डाइरेक्टर डा० सुधीर अपनी कुर्सी के पास ज्यों के त्यों खड़े रहे । उनकी दोनो पासे पानी से भर पाई थी। "इन्टरव्यू आज नही होगा। उम्मीदवारो को कल आने को बोलो।" प्रिसिपल वीणा ने चपरासी को आदेश दिया और फिर रेखा को लेकर, अपनी आखो को रूमाल से पोछते हुए अपनी गाड़ी में जा बैठी। "हां तो रेखा, यह बताओ तुम नो साल तक कहा रही ?" जैसे ही तुधीर, वीणा और रेखा वीणा के ड्राइंगरूम में पहुंचे, वीणा ने बिना किसी भूमिका के प्रारम्भ कर दिया। "मेरी कहानी बहुत छोटी है वीणा। "रेखा ने कुछ झिझक के साथ प्रारम्भ किया, "शरद के साथ जाने के बाद कोई दस रोज़ मैं उसके साथ रही। इस बीच एकला चलो रे / 123.
मैं यार-बार उसमे विवाह करने का प्रस्ताव करती रही, पर वह हमेगा कोई न कोई बहाना बनाता रहा। उसपर संदेह तो मुझे पहले ही से था और इसी. लिए प्रारम्भ से ही मैं सजग भी थी। मैंने कभी भी उसे अपने बहुत समीप नहीं पाने दिया। दस दिनों के बाद मैं शरद से अलग हो गई और अपने लिए नौकरी ढूढ़ने लगी?" "पोर शरद का क्या हुआ?" मुधीर और वीणा ने लगभग एक साथ पूछा। "उस समय वह कहा गया, पता नही । अब इधर मुना है, वह सेना में है।" रेखा ने जवाब दिया और फिर अपनी कहानी प्रागे बढाई - "मुझे दो-चार दिनो के प्रयल से बम्बई के एक प्राइवेट फर्म में काम मिल गया और मैं अब भी उसी फर्म मे हूं। मैंने प्राइवेट रूप से वी० ए० किया, फिर गत साल एम०ए० भी पास किया। भगवान की कृपा कहो, द्वितीय श्रेणी में अच्छा स्थान प्रा गया। कोई 8-9 रोज पहले पेपर मे तुम्हारे कॉलेज के लिए एक लेक्चरर की आवश्यकता का विज्ञापन पढा । पर मालूम रहता कि तुम्ही इसकी प्रिंसिपल हो 'और प्रो० सुधीर इसके डाइरेक्टर तो मैं शायद नही पाती।" "प्रो० सुधीर नही, डा. सुधीर कहो," वीणा ने टोका, "हमारे प्रोफेसर साहब ने बहुत परिश्रम से हतिहास में पी-एच० डी० की डिग्री ली है। कहते थे डा० विशाल की बड़ी इच्छा थी कि मैं डाक्टर बन जाता और जव वे न रहे तो उनकी इच्छा तो रहनी ही चाहिए।" "क्या कहा विशाल नहीं रहे?" रेखा चीख पड़ी। "जब नौ साल तक उनका कोई पता नही चला तो अब क्या कहा जाए ?" चीणा ने कहा और उसकी माखें छलछता पाई।" "कहा गए विशाल ?" रेखा ने फिर लगभग चीखकर प्रश्न किया । "डा० विशाल का पता लग गया है, वे अच्छी तरह हैं। मुझे प्राज ही ज्ञात हुआ है, पर मैं इस बात को अकस्मात् ही प्रकट करना चाहता था ।" डा० सुधीर ने जैसे बम विस्फोट किया। 'क्या ?" वीणा और रेखा दोनों समान प्राश्चर्य से लगभग अपनी कुमियों से उठती हुई चिल्ला पड़ी। "हा, पर मैं अभी तब तक उस बात को विस्तार से नहीं बताऊंगा जब तक लेडी प्रिंसिपल वीणा, अपनी सफलता के राज़ को रेखा पर नही खोलती।" विशाल ने गम्भीरता से कहा । "पर भाप इतनी महत्त्वपूर्ण बात को इतनी देर तक रोक कैसे सकते हैं, 124/एकला चलो रे यह तो बहुत बडा अन्याय है।" वीणा ने ज़िद्द की। "यह अन्याय हो अथवा न्याय, पर यदि आप चाहती हैं कि आपको यह भेद मालूम हो जाए तो पाप जितनी शीघ्रता करेंगी उतना ही अच्छा और, इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जब तक आप रेखा पर अपना राज खोलती नही तब तक मेरे रहस्योद्घाटन का एक बहुत बड़ा लक्ष्य पूरा ही नहीं होगा।" सुधीर ने गंभीर होकर कहा । "अायो रेखा, शीघ्रता करो।" वीणा ने लाचार होकर रेखा का हाथ खीचा, जो न जाने फटी-फटी पाखो से कहा देख रही थी। वीणा रेखा को खीचते हुए अपने सोने के कमरे में ले गई और एक सूट- केस खोल, कपडो के बीच से एक लिफाफा निकालकर रेखा को देते हुए बोली. -"लो रेखा यही है मेरी सफलता का रहस्य ।" "वीणा !!" लिफाफा खोलते ही रेखा के मुख से एक चीख निकल पड़ी और उसके हाथ से छूटकर लिफाफा फर्श पर गिर गया। "हां रेखा, मेरी सफलता का रहस्य-विशाल का यह चित्र है। इस चित्र को मैंने एक पत्रिका से फाड़ कर रख लिया था। चित्र के बल पर ही बी०ए० की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। एम० ए० में प्रथम श्रेणी लाई। हां, हां, यही वह प्रेरणा है जिसके सहारे मैं लगातार अपने कर्त्तय-पथ पर बढती रही और प्राज मैं उसी कालेज में प्रिंसिपल हूं, जिसमें आज से केवल चार साल पहले मैं लेक्चरर वनकर आई थी।" "वीणा, मैं पागल हो जाऊंगी। मुझसे यह सव बर्दाश्त नहीं हो रहा, तुमने मुझे धोखा दिया वीणा ।" रेखा जो अपने सिर को दोनों हाथो से पकडकर बिछावन पर बैठ चुकी थी, बोली । "धोखा मैंने तुम्हे नहीं दिया रेखा ! धोखा मैंने किसीको नहीं दिया," वीणा ने आरम्भ किया, "धोखा तुम स्वयं अपने आपको देती रही। रेखा, मैंने सदा तुम्हारे हित की बात की । तुम्हे अच्छा रास्ता दिखाने का प्रयास किया । पर तुम अन्त तक नहीं संभली।" "तुम विशाल से प्यार करती थी वीणा । तुमने...।" रेखा सिसकियो के वीच बोली और फिर गला रुंध जाने से आगे नहीं बोल सकी। "प्यार ? हां रेखा, मैं विशाल से प्यार करती थी और वह मैं अाज भी करती हूं । पर, मेरा प्यार वैसा नहीं था जैसा तुम समझती हो । रेखा, मैंने अपने प्यार की वात विशाल के सामने कभी अपनी जीभ पर नहीं लाई। एकला चलो रे / 125 मैं जानती थी कि विशाल को तुमसे प्यार है और मैंने सदा यह प्रयत्न किया कि तुम विशाल के समीप पा सको । मैं विशाल को सही अर्थ में प्यार करती थी रेखा, उनके सुख मे ही मेरा सुख था और जब वे तुम्हें प्यार करते थे तो मेरा यह कर्तव्य था कि मैं तुम्हें उनके समीप लाकर उन्हे सुखी बना सफू।" "यह झूठ है बीणा । यह झूठ है। मैंने अपने कानों से तुम्हें विशाल से प्यार की बातें करते सुना था । वे तुमसे कह रहे थे कि उनका प्यार वैसा ही है जैसा पहले था।" रेखा की सिसकियां बन्द नही हो पा रही थी। "यही न, तुम स्वयं अपने को धोखा देती रही हो रेखा ! जो बात तुम कह रही हो वह मुझे आज भी याद है । विशाल यह बात मेरे प्यार के संबंध मे नहीं, तुम्हारे प्यार के सम्बन्ध मे कह रहे थे। काश रेखा, तुमने कभी मुझसे यह बात बताई होती तो आज यह वात न होती।" "पर विशाल तुमको प्यार करते थे वीणा । तुम अपने प्यार को भले ही जुवान पर न ला सकी हो, पर विशाल तुम्हें दिल से चाहते थे।" रेखा की सिसकिया कुछ कम हो गई थी और वह अपनी आंसू-भरी लाल यांखों से वीणा की तरफ टकटकी वांधकर देख रही थी। "भगवान के लिए ऐसा नही कहो रेसा !" वीणा ने प्रारम्भ किया, "विशाल देवता थे। उनके मन में एक साथ दो लडकियों का ख्याल पा ही नहीं सकता था। उनके दिल में केवल तुम ही थी रेखा । काश, उस विशाल हृदय का एक कोना भी कही किसी और के लिए रिक्त होता !" "वीगा!!" रेखा ने कुछ हर्ष, कुछ आश्चर्य और कुछ पीड़ा मिथित शब्दों में कहा। "हां रेखा, विशाल महान् थे । तुम्हारे सिवा किसी और का ख्याल उनके लिए कठिन था। कहां मिलता है इतना प्यार रेखा ? कहा मिलती है ऐसी तन्मयता ? केवल एक बार, हा केवल एक बार मैंने उनपर एक पत्र के द्वारा अपनी भावनाप्रो को प्रकट किया था और उनके उत्तर ने मेरे मुख को सदा के लिए बन्द कर दिया।" "वीणा !" रेखा दूसरी बार उसी आवाज मे बोली । उसकी सिसकियां पूर्णतः रक गई थी, पर आंखें अभी भी गीली थीं। "हा रेखा, यह पत्र अाज भी मेरे पास सुरक्षित है । तुम्हें शायद याद होगा एक बार मैंने तुमसे कहा था विशाल का हस्ताक्षर तो मेरे वसे में दो साल में 126/एकला चलो रे । कैद है । यह वही हस्ताक्षर था रेखा, और लो देखो वह, यह रहा । इतना कह - कर वीणा ने एक दूसरा लिफाफा निकालकर रेखा को दे दिया। एक छोटा-सा पत्र था जिसे वीणा के हाथ से छीनकर रेखा एक क्षण मे पढ़ गई... "मुझे माफ करना । तुमने गलत व्यक्ति को चुन लिया। मैं एक जगह दो व्यक्तियों के लिए स्थान नहीं बना सकता। मैं रेखा को प्यार करता हूँ। आशा है तुम भविष्य में ऐसी कोई कमजोरी नहीं दिखलायोगी । --विशाल चिट्ठी पढ़कर रेखा वीणा के गले जा लगी । "मैं मूर्खा हूं वीणा, मैं नीच हूं।" रेखा की आवाज़ फिर भर आई थी। पाखें पूरी तौर से छलछला पाई थीं और उसे लगा कोई उसका दिल दोनों हाथों से पकडकर दबा रहा है। "तुम देवी हो वीणा, और विशाल देवता ।" रेखा ने किसी तरह कहा और ठीक इसी बीच सुधीर जो बाहर दरवाजे पर खडा था अन्दर आ गया । "मैंने सब कुछ सुन लिया है," सुधीर ने प्रारम्भ किया, "अब वह समय आ गया है, कि मैं विशाल के पत्र को आप लोगों के समक्ष रख । इसीसे सभी बातें स्पष्ट हो जाएंगी।" इतना कहकर सुधीर ने एक लिफाफा रेखा की ओर चढ़ा दिया। "तुम्ही पढ़कर सुनायो वीगा, मैं शापद पढ़ नहीं सक् ।" रेखा के यह कहने पर वीणा ने पत्र को ऊंचे स्वर में पढ़ना प्रारम्भ किया- सागर-पार मेरी अच्छी रेखा, मुझे प्रसन्नता है कि मेरे इस प्रकार के सम्बोधन पर आपत्ति करने के लिए तुम यहां नही हो । मुझे इस बात की भी प्रसन्नता है कि मैंने सुधीर और वीणा दोनो के सामने यह बात सिद्ध कर दी कि सच्चे प्यार से बढ़कर कोई प्रेरणा नहीं है और सच्चे प्यार का वासना से कोई सम्बन्ध नहीं। प्राज मैं तुमसे हजारो मील दूर, लन्दन की एक बड़ी लायब्ररी में बैठा तुम्हें यह पत्र लिख रहा हूं। मैंने इस बीच तुम्हें कोई पत्र नहीं लिखा, पर तुम्हारी प्रेरणा से मैंने आज तक प्रगति की अनेक ऊंचाइयों को पार कर अपने लिए बहुत बड़ा स्थान बना लिया है । मैंने यहां आकर अपना नाम बदल लिया है, इसीलिए, तुम लोग मुझे नहीं जानते, पर मैं आज विश्व का एक बहुत बडा दार्शनिक हूं और मेरे सिद्धान्तों पर दूसरे दार्शनिकों ने बड़े-बड़े अनु- सन्धान किए है। एकला चलो रे / 127~ यह सब तुम्हारी प्रेरणा है, रेखा ! हां, यह सब एक सच्चे और विशुद्ध प्यार की प्रेरणा है, वह प्यार जो बासना के दलदल से मुक्त रहा। मुझे उम्मीद है, तुम मेरे इस अन्तिम पत्र के लिए मुझे क्षमा करोगी । भारत के किसी अखबार में सुधीर के कॉलेज के किसी "कशन' का समाचार पढ़ा था । वही से पता लेकर में यह पत्र उसके माध्यम से तुम्हारे पास भेज रहा हूं। "पाशा है यह पत्र तुम तक पहुच जाएगा और मुझे यह भी उम्मीद है कि मुझे जिन्दा समझ तुम्हें बहुत तकलीफ नहीं होगी। अब भी तुम्हारा ही- विशाल पत्र समाप्ति के बाद रेखा ज़ोर में फफककर रो पड़ी और सुधीर ने उसके सिर पर अपना हाथ फेरते हुए कहा, "मैंने कभी कहा था न रेखा, भगवान की झोली में सौभाग्य के कुछ ही कण तो थे, जिनमें कुछ को उन्होने विशाल को झोली में डाल दिया और बाकी को वीणा की। अब चलो, हम, इस जिन्दगी को भगवान जिस रूप में चाहता है, उसी रूप में ढोएं ।" A मुर: मिन्ट, रोहवास नगर, शाहदरा-दिस्ती-110032 211080
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