Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Shakuntala(rajasthani Khand Kavya)

Barahath Karnidan · 2011/03

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श कु
न्त ला
[ राजस्थानी खण्ड काव्य ]
जग जाण है नारी कोरी, आंसू री बनी पोटली है,
पण जग न हू जतला देस्यू , आ मोटी शकत जोत री है।

प्रकाशकः
देवानंद बारह
बारहठ प्रकाशन
फेफाना (श्रीगंगानगर)
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान स्यू कक्षा १० सारू
स्वीकृत संस्करण
पैलो संस्करण 1974
मूल्य : 2-00
सुगका
रामस्वरूप कुमावत
अनुपम प्रिण्टस

मंगळ कर
तू जुग नारी जुग री सोभा,
जुग री आभा जुग धरम सार ।
जुग जुग स्यू जागी अटल जोत,
मां, बहन, नार रो अमर प्यार ।
तू सुरसत काली, करणी है,
तू सकति भकति रो भाव अमर !
मेरो जगती री भावी रो,
तू मंगल कर, तू मगल
कर ।

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. জুথি शकुन्तला री वात घरणी जूनी है पैली पोत शकुन्तला री कथा मा' भारत रे आदि पर्व में मिले है। इयै रो नाम 'शकुन्तलोपाख्यान' है। पण या पुराण और इतिहास री बात है, मीधी सादी, खरी खरी । न इयै में रस है और न कोई आदर्श । राजा दुष्यन्त आश्रम में आव । कण्व हाजर कोनी । शकुन्तला स्यू राजा रो प्रेम होवे पण शकुन्तला गर्त राखे- 'म्हारे जायोर्ड ने राजा वरणावे तो थारै सागै ब्याह करूं।' राजा शर्त मान लेवे । व्याह पाछै वो आपरी राजधानी हस्तिनापुर चल्यो ज्यावै । शकुन्तला रै लडको हो । ६ बरस के बेटे नै सागै ले'र जद बा दुप्यन्त री सभा में पूचै तो राजा विर्य नै पिछाण तो लेवै पण लोक निन्दा स्यू डर'र नट ज्यावै-'मैं तो तनै जाणू कोनी ।' शकुन्तलर गुस्सै होवै। राजा ने श्राप देणे री सोचे। वी टेम आकाशवाणी होवै- 'शकुन्तला साच बोल है। वेटो थारो ही है। इयै नै पाल ।' सभा में सगला इयै अाकाश- वारणी नै सुणे । राजा शकुन्तला नै आपरी राणी वणा लेवै। मा' भारत री ई काणी में ज्यान कोनी । अब सफा फीकी लागै है।

२ इयै रो नायक देवता या ऊँचे कुल रो, धीरोदात्त
गुणां स्यूं सम्पन्न होवे । 'शकुन्तला' गे नायक
दुप्यन्त
ऊँच
कुल
रो क्षत्रिय राजा है और धीरो-
दात्त भी है।
३. शृगार, वीर और गांत रसां में स्यू कोई एक रस
प्रधान होवे । 'शकुन्तला' में 7 गार रस री प्रधानता
है ।
४. इयै री कथा या तो इतिहास प्रसिद्ध होवै या
सजनाश्रित । 'शकुन्तला' री कथा रो अाधार मा
भारत और अभिज्ञान शाकुन्तल' है। या इतिहास
प्रसिद्ध बात है।
५. इयै रै प्रारम्भ मे मंगलाचरगा पौर वस्तु-निर्दग
होवै है। 'शकुन्तला' रै प्रारम्भ मे पुराण तरीके
स्यूं तो कोई देवी-देवता री विणती कोनी पण नये
जमानै सारू कवि नारी-सगति की वन्दना जरूर
करी है।
६. एक सर्ग में एक ही छन्द रवै । और कम स्यूँ कम
आठ सर्ग होणा जरूरी है। 'शकुन्तला' रै हरेक
सर्ग मे न्यारा छन्द है। तीसरे सर्ग मे
स्वच्छन्द छन्द है पण अाज रा कवि इयै रो भी
प्रयोग करण लागग्या है। हिन्दी में श्री सरल
आपरै महा काव्य "सरदार भगतसिंह" रै बाइसवे
सर्ग मे स्वच्छन्द छन्द रो ही प्रयोग करचो है।
'शकुन्तला' रै आठवे सर्ग में 'साकेत' रै नवें सर्ग
-

दायी गीत-शैली
इये मे दस है।
अपरणायों गयीं है । सर्गा री संख्या
जंगल,
७. महाकाव्य
में सांझ, सूरज, चाँद, रात, दिन, पहाड़,
चाइजै तु, शिकार और युद्ध रो वर्णन होणो
। 'इ.कुन्तला' में इयाँ सगलां रो वर्णन है ।
श्य भांत स्यू नियमां रै मुतावक तो ओ महाकाव्य
साफ दीखै है । जकालोग 'प्रियप्रवास' साकेत, कामायनी
और आज रै जमानै री दूजी कई रचनावां नै महाकाव्य
कोनी माने और वाँ में कोई न कोई कसर काड देव,
वै 'शकुन्तला' रै वास्तै भी कह सके है के इयै रो
प्राकार छोटो है, इयै में महाकाव्य जिसी गंभीरता और
व्यापकता कोनी और गीतां रै कारण कथा विखरचोडी
सी है पण त्रै सारी बांता कता बखत इयै बात रो भी
ध्यान राखणो चाइजै कै 'शकुन्तला' नये जमाने रो
नयो महाकाव्य है । जे इये में कोई पुराणी शर्त पूरी न
भी हौवै तो भी इयं रो काव्य-सदेश देख'र इय ने
महाकाव्यत्वरी संज्ञा दी जा सके है ।
काव्यत्व री दृष्टि स्यू 'शकुन्तला' एक सुन्दर और
प्रौढ रचना है । कवि इयै में शृगार, वीर, शांत आदि
कई रसां रो वर्णन करयो है पण खास रस शृंगार है।
प्रेम रै वारे में जकी वातां कैयी गयी है, बी' में व्यापक्ता
और निरालोपण है :

झन-झनन घुघरा बाज्या,
छन-छनन पायल्पां घरगफी ।
तपवन मघुवन
सो वरणग्यो,
टरगका री टाला भएको ।
राजस्थानी प्रभाव
• शकुन्तला री कथा रो राजस्थान स्यू चाये कोई
सम्बन्ध ना होवो पण कवि र देश काल रो असर तो
जरूरी है । शकुन्तला कुरजा र माग ग्रापरी संदेशो
भेजे । काव्य रिसी पासीस देवे
'दूधा नाहियो पूना
फलियो' । सिर पर पाग व दाढी रो वर्णन भी
राजस्थान रो याद दिवाव । कवि प्रकृति रो वर्णन
करतां थकां अठ के ऊँध्याल नै कोनी भूल । अलग
अलग पात्रां री बातचीत, वारी पोशाक, आदि कई
बातां में राजस्थानी जीवण रो प्रभाव देख्यो जा सके
है।
सन्देश
'शकुन्तला' महाकाव्य लिखण रो कवि रो एक खास
मतलब है । बो प्रा बताणो चावै है के लोग नारी न
अबला कैबै पण असल मे वा सकति रो रूप है।ई
बात री घोपणा कवि- शुरु में ही करी है:-
जग जारण है नारी कोरी,
आँसू री वणी पोटली है।
पण जग न हूं जतला देस्यू,
आ नोटो शकत जोत री है।
--
--

आज रै जमाने में नारी री महानता रा गुण च्यारू
कानी गाया जारया है । शकुन्तला रो रूप भी नयो
पण लियोड़ो है । कवि नारी नै 'धरम टिकाणी' 'गीता
री वाणी सत्य, शिव, सुन्दर और मागस री छेकड़
मंजिल मान है । जे अाज री नारी साच्यांई इसी बरण
ज्यावै तो मिनख रो भाग जाग ज्यावै और घर घर में
सुख, शांति व समृद्धि रो वासो हो ज्यावै । फेर तो
सारो समाज, देश और संसार भी इस्यो ही वरण
ज्यावै ।
अन्त में मैं प्रो विश्वास राखू हूं के कवि री कल्पना
नै अब खुलै मैदान मे खेलण को मोको मिलग्यो है सो
आगै और भी बढिया वढिया रचनावा स्यू राजस्थानी
रौ भडार भर सी।
चन्द्रदान चारण
दिनांक २७ मई, १९६५ एम.ए, साहित्यरत्न
प्रिंसिपल,
भारतीय विद्या मन्दिर रात्रि महाविद्यालय,
बीकानेर (राजस्थान)
(ऊपर री भूमिका सम्पूर्ण काव्य स्यू है । पाठ्यक्रम में ई रो
संक्षिप्त रूप राख्यो है )

दो पाखर घणां दिनां स्यू'शकुन्तला' पर महाकाव्य लिखण री सोच राखी ही। धोरां री धरती रो मिनख जे शकुन्तला र सागै पाड़ा, नदियां, नाला में घूमै तो इचरज री बात ही होसी, पण मां सुरसती री घणी घणी किरपां स्चू म्हारी या मनस्या पूरी हुई है । 'शकुन्तला' रो कथानक महाकवि कालिदास री 'अभिज्ञान शकुन्तलम्' रै नाटक स्यू मोटै रूप स्यूलियो है । कहाणी कालिदासजी री है, भाव पर भासा कवि रा अपणा घरू है । 'शकुन्तला' रो विकास स्यात् म्हारै जिसै छोट माथे गे मिनख स्यू पार नहीं पड़ी हुवै, पण हूँ तो म्हारै कानी ॐ पूरी चेष्टा करी है। कालिदासजी री शकुन्तला रै कथानक मे हूं थोडी भोत हेर फेर करी है, पण ओ फरक म्हारै विचार मे इत्तौ अखरण पालो कोनी, पण ई॰ अदला बदली स्यूशकुन्तला रै चरित मे म्हारी निजरां में ज्यादा निखार ही आयो है । बकत रै साथ संस्कृति, सिद्धात पर धारणावां में समय सारू अन्तर आही ज्यावै है, पण मिनखां री प्रकृति जुगां जुगा स्यू एकसी रयी है अर एक सी ही रहसी। अतीत री 'शकुन्तला' में ई जुग री शकुन्तला बरणाणे रो पूरो जतन कर यो है । आज री नारी ने भी दुरवासा रै शाप बरगा झटका झेलणा पड़े है। ई वास्तै ई जुग में भी अणहोणी बातां कोनी । ई जतन में जे हूँ सफल हो सक्यो हूं तो म्हारै सौभाग री बात ही होसी । जे जुग जुग री शकुन्तला बण सकी तो मां राजस्थानी रो ही भाग मोटो मानू ।

भासा सारू म्हारी अरणी धारणा है । राजस्थानी भासा रै खातर प्रापां एक निरणय पर नहीं पूच सक्या, ओ आपणो दुरभाग है । भाषा जित्ती सोरी पर लोक रुचि रो ध्यान राखसी वित्ती ही जन समूह रै नेई पूचसी। राजस्थानी रै काव्य रै प्रति आखै भारत मे घणो सम्मान अर कोड है । राजस्थानी नै अपणो मैदान त्यार करणो है । ई वास्ते हूँ तो जन रुचि रो ध्यान राख'र भासा रो ध्यान राख्यो है । हिन्दी राबै शब्द जका जी सौरै स्यू ने. आया, अर राजस्थानी रं मूल रूप स्यू छेड़कानी नही करी, वान हूँ अपणाणे स्यू हिचक्यो नही । म्हारी निजर में राजस्थानी रो सलोनो भविष रै निरमाण में सहायक होसीः राजस्थानी भोत ही धनवान भामा है । हरेक भाव नै परकट करणं री पूरी क्षमता है। जे कठ ही कमी अखरे तो वा भामा में नही, भासा लिखरण आलारी है। ई कमी खातर हूं हाथ जोड़'र माफी मागू हूं। जगत मानीज्ये कवि रै नाटक स्यू कयानक ले'र मौलिक रूप स्यू लिखण रो हूं दुस्साहस ही कर यो है । पण प्रातो मनपसन्द री बात है। जग पसन्द होसी के नहीं, आ तो विद्वानां अर पाठका सारू है । पण म्हारी तो आ मनोकामना रही है के मां राजस्थानी री की सेवा कर सकू। अन्त में हूं श्री चन्द्रदानजी चारण रो घणो आभारी हूँ जकां म्हारी पोथी री भूमिका लिखी। साग राजस्थानी रं मोटै विद्वानां रो भी घणो एहसान म्हारे सिर माथे है जकां मनै लिखगरी प्रेरणा देता रवै है । म्हारै साथी संगलियां रै तो गुगण भूल ही नहीं सकू जकां मनं दिन रात लिखणे रो होसलो देता रवै । भूल चूक री माफी मांगू हूँ। करणीदान बारह

लेखक री दूजी पोथ्यां
জাতী-
(१) भिडियो (बाल -काव्य)
(२) झर झर कथा (कविता-संग्रह)
(३) अादमी रो सीग (कहानी-संग्रह)
हिन्दी
(१) बड़वानल (कविता-संग्रह)
(२) कलाई का धागा (उपन्यास)
(३) प्रेमलता (उपन्यास)
(४) चाय के धब्बे (उपन्यास)
(५) कुहरा और किरणे (उपन्यास)
(६) औरत और जहर (कहानी संग्रह )

पैलो सर्ग
पेड़ों री छायां बैठ्यो,
हो विश्वमित्र तप ज्ञानी
चिन्तन में घणो मगन हो,
हो परम लोक रो ध्यानी ।
झड़ झड़ पत्ता झड़ता हा,
ही पतझड़ री रीतु आई ।
बै एक एक पड़ता हा,
हूँणी री मनस्या आही।
दरखत रा गात हा हा,
सांपड़दै प्राण भग्या हा ।
सूका ढूंठां सा. होग्या,
की खातर अबै खड्या हा ।
जद पून चली प्रायूगी,
पत्ता साग सै हाल्या ।
की अटक्या बीच मगां में,
की दूर दूर तक चाल्या ।

सोची मन में प्रा जोगी,
प्रो कूड़ो जग रो वासो।
पड़स्यां पत्ता ज्यू जग में,
श्रो झूठो सुख रो सांसो।
पा ममता घणी घनौरणी,
हाँ एक एक स्यू दूजा ।
माया रो झूठो पड़पच,
अ कूड़ा बावां बूजा ।
बस केवळ नाम सही है,
बो मोटो राम सही है
जित्तो तप में म्हे तपस्यां,
वित्तो ही काम सही है।
जा जंगल में बै' जम्या,
अन्तर जगती में रम्या ।
इकलंग के खड़या रह या हा,
बी रामनाम में गम्या ।
थर थर इन्द्रासण धूज्यो,
मन रो अनुशासगा काप्यो ।
बो काया काट उतारै,
माया रो शासण कांप्यो
painted
[ शकुन्तला

।
देवां री सभा जुड़ाई,
सगळी आ बात बताई।
चिन्ता में डूब्या सगळा,
इन्दर कायाः अळसाई ।
इन्दरः बोल्यो, हे देवी,
धरती पर तापै जोगी
है इन्द्रासण रो भूखो,
राजपाट से रहेगी।
तप भंग हुबै के बिध है,
सोचो स्याणां भेळा हो।
औसर खोयां रोवाला;
माथरे भूवै सगळा रो।
नारद बोल्यो 'हूं कहy.
नर री दुरबलता नारी
धन- मन नै खींच लिया,
आ मोहक रूप सुंवारी ।
अब तुरत वुलादो सेजो,
पा परी मेनका मनहर ।
नाचरण में जड़ ने हर ले,
चेतन झूमै हर ग पर ]
ह
शकुन्तला ।

मन झनन चूंघग बाज्या
छन-छनन पायल्यां छगकी।
तपवन मधुवन सो बरणग्यो,
टणकारी टाळा भरणकी।
चट-चटक फूलड़ा महक्या,
कू-कुहू कोयल्यां बोली।
घू-Jहूँ भंवरिया आया,
हॅसाः री
री. आई
साई टोळी ।
हा कमल खिल्या सरवरियः
रूंखां रो पतझड़ भाज्यो ।
जौबन री काया भूमी
लाजारों हिवड़ो लाज्यो ।
झुक-झूम मेनका नाची:
ही हार जीत री बाजी।
धरती रो मारणसः जीती,
तो इन्द्रपुरी सा लाजी।
-
पण जोगी हणे अडिग हो,
बो अन्तर जगत रमै हो ।
इकलँग नरतन रमणी रो,
पग पग कहि न थमै हो।
४ ]
[ शकुन्तला

जे इन्ने काम पर बल हो,
तो बिन्ने राम सबळ हो।
ई काम राम रै जुध में,
की प्रेम-भाव से बळ हो।
"पण अन्त
मेनका हारी,
बोली हूँ' कारी माड़ी
तु जोगी जग रो जीत्यो,
आ काया चरण डाळी
है जोग जगत में मोटो,
के प्रेम भाव है छोटो।
जोग प्रेम में रमज्या,
है प्रेम जोग स्यूं मोटो
हिवड़े री कळियां खिलगी,
काया नै ममता मिलगी
मनमधु री सरस हिलोरां,
बै इकरस में हिल मिलगी।
अब फूल खिल्यो ई रज में
मां बोली, "धरती' पांजी
'जावरण री वेळा
हूँ करम घरम् स्यू बांधी
प्राई,
.
'शाकुन्तला

ओ फूल मात सम्हाळी,
बेटो री विपदा टाळी ।
प्रो सुरग धरा रो एको,
तू पूरै मन स्यू पाळी ।।
सरवर रे पाळ पड़ी ही,
जाग ज्यू लाल जड़ी ही।
'रुखा री ऊपर छाया,
ही खड़ी शकुन्त रुखाळी।
चूचा स्यू पाणी ल्याव,
इमरत सी धार पिलावै ।
एहड़ी घड़िया में फिरता,
इन कण्व रीसीजी प्रावै।
गीगी ने गोदी लेली,
पंछी शकुन्त नै देख्यो।
लाड कोड स्यू" बीं रो,
सुनाम 'शकुन्तला' राख्यो ।
"
-
2.]
[ शकुन्तला

दूजो सर्ग
मधु री मतवाळी मारुत रो
हण राज सांतरो छायो हो।
जौबन लजवन्ती नैणा में
अब पुळक पुळक मुळकायो हो।
झर झर झरणा झरता हा,
निरमळ रूप सो रूप लिया।
धरती काया नै कंवळी कर,
चाल हा रंग सरूप कां ।
सूणी . लाये ही धरा . घरणी,
सा हरी हरी ही करणी. करणी।
जोवै नैणा ही “जगी जणी,
जाणे मूगा री मणी घणी ।
भंवरा घूमै हा कळी कळी,
सूघे हा सूरणी भली - भली :
झाला दे हा से झूम झूम,
सौरभ बंटे ही घणी घणी।

अम्बर रो रंग सुरंगो हो,
चन्दै री आभा सूरणी हो ।
आभै २ सुमनां स्यू साची,
धरती री दुनियाँ दूणी ही।
मधु प्यार पगलिया ले लीन्या,
पायलियां झणक जगां जगां।
नैण मंगलिया झुबळक झुबळक,
हा हेत खिंडावै मगां मगां।
ई उभरै रूप बसन्ती में,
ही फिरै सकुन्तला बरणी ठणी।
कानां में फूल झुमरिया हा,
छाती पर प्रांगी तरणी तणी।
बा गौरी बरण गौरज्यासी,
ही आंख कटारा सी तिरछी ।
ज्यू नाक नुकीली सून री,
ही कमर कमारणी-सी पतळी ।
सखियां रै साथ इसी सोकै,
ज्यू चिरम्यां में मोती अनूप ।
होठां पर हास इसो मोहै,
ज्यू तारा री जोती सरूप ।
६ ]
[ शकुन्तला

बो लाज प्यार रो मूर्त रूप,
अल्हड़ जौबन झुक झूम फिरै ।
पळक मुळकै कर निरत थिरक,
कम्पन धड़कन नव नूर झरे ।
'हा, हा,' री हँसी बिखरे ही,
जाणे मस्ती रो रंग उड़े ।
जगळ री हिंसा थमगी ही,
ओ हेत-भाव विखर्यो सगळे ।
बा फटिक शिला पर जा बैठी,
जल जठे किलोळां हो चढ़र्यो।
बीं जळ रै निरमळ दरपरण में,
मुखड़े रो रूप सरूप बण्यो।
आ धरा धरी या नीर परी
या नभस्यूं उतरी देवनार ।
पळकां में सदा रखरण जोगी,
के सूरणापो लाग्यो अपार ।
हड़बड़ाट उठयो तपोवन में,
भभड़क्या सगळा खड्या हिरण।
रोही मे मचगी धुआधार,
अंधड़ स्यूढ़कगी लाल किरण।
शकुन्तला ]

रूखा स्यूपंछी भाज खड़या,
बरणाट ऊपड़यो सखियां रो।
मिळग्यो घणकरोर भेळापो,
रंग बदळयो छण में अंखिया रो।
बिलबिल करता बचिया रहग्या,
मां भिड़क भाजगी दूर कठे ।
परधुरी बड़ी ही कई नार,
ब पूछो 'थे हो अठ कठ ।'
'के बात हुई, के बात हुई ?
करण विकळ करी प्रा तपोभूम ?
प्रो कण्व रीसी रो आश्रम है,
आ प्रेम भूम प्रा शान्त भूम'
घुड़लां री टापां 'खटट, खटट,
नेड़े सी सुणनं में आई
इक ठौड़ शकुन्तला खड़ी रही,
प्रा ठहर्यो रथ इक सामै ही।
रथ में बैठ्यो हो वीर पुरुष,
मुखड़े पर मूछयां मुग्ळांती ।
भुजदंड वीर रा
नैण मरदानगी मदमाती।
.
.
बब्बर-सा,
१० ]
[ शकुन्तला

सिर मुकुट हाथ में धनस लियां,
हो कवच तण्यो हो कजराळो ।
सोनै रै रथ में इसो जचे,
ज्यू कामदेव हो मतवाळो ।
बा खड़ी धरा ज्यू मांडयोड़ी,
ही छुई मुई सी लजवन्ती।
मूरत ज्यू मूक तपस्या री,
जोगरण सी चिर थिर जड़वन्ती।
टक गड़गी ही बीरें ऊपर,
बा गड़गी ज्यू भू रै भीतर।
टक हिली नहीं बा डुली नहीं,
ज्यूद्वेत पर अद्वैत अमर ।
जद अलक उठा की पलक उठा,
नैणा स्यू जोई शकुन्तला
चपल तार जुड़ग्या 'चपला रा,
हिवड़ा रा जगमगग्या दिवला।
धड़कन कम्पन
होगी. 'तन में,
हिय में भावां रो ज्वार उठयो।
अांधी सी आई मस्तक में
सो हलचल रो संसार बण्यो ।
-
। शकुन्तला

--
पग हाल्या सा धरती हाली,
लागै अम्बर हलचल मचगी
डोलण लाग्या सै दिग दिगन्त,
नैणा नै राह नहीं सूझी
ऊँच पंचूल चाली शकुन्त,
नैणा में छायो अंधियारो ।
की डाळ पकड़ की आप सम्हळ,
आखर अांचल नै उळझायो।
-
लेरै झांकी, ओ होग्यो के ?'
बो पट सुळझावै खड़यो खड्यो।
झट झांक मुंह नै फेर लियो,
बो इकटक जोवै गड़ यो गड़यो।
बोल्यो 'कुरण है ? कूकर आई ?
कूकर तू पूठी चाल पड़ी ?
नैणा में नेह उड़ेल दियो,
हिय रो थाह
उखाड़ चली।
ओ रूपकळा, लावण्यमयी,
तेरी सी धरा नहीं जामी ।
नाम
ठाम तो नहीं जाणू,
जाणू तू मेरी जिन्दगानी !
१२ ]
डाकुन्तला

री प्रेम न पूछे जात पात,
श्रो प्रेम न जाण नाम ठाम ।
री प्रेम पूर्ण परमेशर है,
प्रो सकल धरम रो सकल धाम।
त्
घट घट में बैठयो प्रेम देव,
हर हिय में ईरी ढाणी है ।
आ नात किंयां समझाऊँ,
मेरै हिवड़े री राणी है।
फूटी बाणी बां बोझा स्यू,
'जोड़ी तो इसी बरण कोनी।
मत चूक शकुन्तला औसर है,
ओ औसर भळे मिल कोनी।'
दोनां रे गळ बन माळा हो,
दोना री आंख्या प्रांख्या में
दोनां रा
रा सपना साची हा,
की भाव बण्या की भासा में ।
अब तुरत बुलाऊँला, तन्न,
अव रथ सजीलो सज ग्रासी ।
प्रा लेव मूदड़ी सैनाणी,
मिलग री वेळा फिर प्रासी।
शकुन्तला ]

तीजो सर्ग
बायरियो सूत्यो नींदड़ली,
ढळती रजनी रो ढ़ले चांद ।
टिमटिम तारा हा कठे कठे,
लंगस में हा विन जात पांत ।
रूखा रा पत्ता सोया हा,
पाखी जगती ज्यू मौन खड़ी,
जळ जप्यो ऐन ही जोगी सो,
ज्यू धाप्योड़ी सी रैन पड़ी।
से चिड़ा चिड़कल्यां पालरिणय,
जप्या हा सोरी नींदड़ल्यां।
जाणं सूती मां . बसुन्धरा,
ले अपरणर आखा टाबरिया।
.
.
सुध अोढ़ी सूती शकुन्तला,
नींदड़ली बैरण उचटी ही।
फोरै
बार-बार,
प्रावण आगी इक हिचकी ही ।
पसवाडो

उठावै ही।
पण अोल्यू मीठी पीड़ लियां,
हिवड़े में झोळ
सोयो नैणा में कन्त जरणां,
बा नींद ' भळे क्यू पावै ही।
प्राभा फूटी अब पूरब में,
चंदै रो' मुखड़ो फीको हो।
तीतर बीतर होग्या तारा,
अम्बर रो आंचळ नीको हो ।
घड़ियाल बज्या अब मिन्दर रा,
धन-धनन नगारा गूज उठया ।
झन-झनन झांझ झकार उठी,
से पख पखेरू' कूज, उठ्या ।
बरण परमेशर नै याद कर्यो,
'हे जगत पिता हे जगदीशर ।
तू अग जग भाग विधाता है,
तू ही बाहर तू ही भीतर !
म्हे अबळ सकळ जगती प्राणी,
तू सबळ सरब है शक्तिवाणं
म्हे दास सदा तेरा स्यामी,
आखै जग रो है तू विधान ।
--
शकुन्तला ]
مسا

म्हे करम करा तेरै सिर पर,
नेम धरम स्यूं सही मान ।
आगे भविप तेरे सिर पर,
म्हानै तू भोळा मिनख जाण ।
म्हे प्रांधा, लूला, लंगड़ा हां,
तू राखी रथ री डोर साम ।
आछी या माड़ी तू करसी,
सो तेरो ही है काम धाम ।
म्हे तेरा हां
हां तू म्हारो है,
प्रो सकल मोह रो डेरो है ।
पण जीव जगत में भेज्योड़ा,
राखां हा तेरो
मेरो है ।
सुख दुख है म्हारै करमा स्यूँ ।
पण तेरी महर सदा ऊँची ।
तू दीन हीन रो साथी है,
तू करम भाग री है कूची।
के मांगू तुच्छ भिखारण हूँ,
तू मोटो धणी महादानी ।
म्हारै तू भाग-विधाता रो,
सौभाग सदा ऊँचो मानी ।
m
१६ ]
{ शकुन्तला

- । पल दूर ८ अब याद करयो.बरण परणीज्यो, बा मेल . मूदड़ी दड़ी मूरत-सी भरतार, कऊ करतार कऊँ, होने सूरतड़ी। छण छा गे घणी अडीक मन, ऊभी हो. जोऊँ बाटड़ली नित लीक भीत. पर. खीचू हूँ, मारग देखू घड़ी घड़ी। इक पल बीत ज्यू जुग बीत, .. क्यू आगे विरह री सुलंगाग्यो। मेलो घड़ियां रो इसो. बण्यो, हिवड़ होळी कर भाग्यो। नारी के है ? इक कुसमलता, झूठो देही से गरब कर नर रुख चढं तो हरी रवै, नीचे नाव सा निस्ट “कर आ सुरजमुखी, सूरज सामै, सौदै है सूरणी खिली खिली । आ मीन बापड़ी जळ जीवी, जळ में है रहदै हिली मिली। शकुन्तला ] द श 15, 5

चपला बिन मेघ कियां सोद,
मोती बिन आभा भाटो है।
मारास बिना मनस्था गति हीरा,
जोगण सो जीणो काठो है।
के इस काम में जा फंस्या,
भोळी नै जार भुला दीनी ।
दो घड़ी मोह रै बसोभूत,
जी'वरण भर मनै सजा दीनी।
कन्त में उलझी माय शकुन्त,
बारै दुरवासा प्राय खड्यो ।
हैल्यो मारो बरण 'भीख घाल,
रिसीयां में मोटो भोत बड़ो।
.
अन्तर जगती में रम्मेड़ी,
मीठां.
मुटका
में गम्मेड़ी।
बा बहिरजगत री कियां सुण,
जद कन्त सन्त स्यूं बिलमेड़ी।
हाका कर धाप्यो दुरवासा,
कूटो शकुन्त रो नहीं खुल्यो ।
अांख्यां री तोरी चढ़गी ही,
और रोम रोम में रोष भर यो।
[ शकुन्तला

1
"
मोडै गाड्यो लठ रीसा में,
बारै शकुन्तला झट प्राई ।
"भैरव सो ऊभो देख मोड,
कवळी नारी हण कुवळाई ।।
बोल्यो साचू, “ शकुन्तला,
अपमान न सबै दुरवासा ।
“भरतार
तने जा
भूललो,
जंगळ में करसी घरबासो
बिजली-सी कड़की आ बाणी,
अड़गी शकुन्तला रे माथे में
जड़सी होगी सा देह तुरंत,
ज्यू ज्यान गई सर्राट में
खोली बा
आखर धीरधार,
“बाबाजी प्राछो नेह कर्यो ।
बेटी री ऊभी खेती पर,
श्रो चोखो मीठो मेह कर्यो।
थे मोटा मोहढ़ा माणस हो,
तपस्यूं तापी है देह सकल ।
पाखी जगती नै ताप्योड़ी,
थारी है सुळझी धणी अकरा !
-
शकुन्तला ]

अछी
,
म्हें टाबर छोटी वृद्धि.. रा.. ,
होटा रो दूध नहीं सूक्यो ।
के.
जागा
मंदी नै:
के धरम अर अधरम करो। -
मोटा', माणस जे रीस कर;
छोटै री ओंछी अक्कल. पर।
सागर, जे. धीरज वो देव,
धरती री माड़ी हलचल पर ।-
माड़ी' चिन्त.. जे. - मोटापो, हो
ओछी सोच. जे अच्छाई
तपस्यू. क्यू तपसी, धरा इयां, :
कंवली होसी क्यू करड़ाई :
जे दोष, बिना हो. दड़ मिलैः-
जे पापा बिना ही नरक धाम ।
तो परम धरा पर क्यू रहसी,
क्यूटिकसी जग में भलो काम ।
मान्या.तान्या जें रीसी लोग
कोड़ी दाणा पर.बिक ज्यासी ।
तो भगवां, . गावा बाबाजी,
दाणा जोगा ही रह. ज्यासी।
शकुन्तला ]
--
8
-
7

ये तपाई ३ + - U S बळ रो 'तरणवट, भली बुसे तो नहीं सोच्यो मोटा माइत हो पूच्योड़ा, बेटी काली तो नालोज्यो । मैं मान तीन थारो करती, पाछी करती हूँ अगवाणी । जे - म्हारै खातर थे कहता, सौभागवती हो' कल्याणी। हो पति र ध्यान मगल' ईसी, हूँ सुरण न सकी थारी बाणी . ओ शाप बताओ कियां मिले, या बात गुरुजी नहीं जरणी । भटकू भूई आटां रोऊँ रोही में रुळी रुळी माइत हे हिवड़ो हरसाद, प्रा बात जगत में नहीं सुंणी । ' गळगळी शकुन्तल होगी ही, बसबसिया पाटयो हियो सबळ ! बरसणं लाग्या हा नरण कमल, नारी 'रों असली को संजळ । ६ हूं १. - Ja AM

I.
साधू रो बाद रूप' छिप्यों,
अब मुनि रोमाइत जाग उठ्यो।
प्रख्या गीली सी होगी ही,
अन्तर में दाव्यो नेह जग्यो ।
बोल्यो बो, 'बेटी शकुन्तला,
साधू, तो' मिनख अधूरी है ।
योथो भांडो विन पाणी रो;
₹ ₹ बोलै बस कूड़ो है ।
तप पर करडावरण करां जकी..
हूं जाणी
साची रुड़ी है।
हाँ करमहीण काळस जगरा,.
आ साची तपस्या तूड़ी है !,
माया में रैती,
ममता री अकल सकल प्रांती।
जग में रहगः स्यू जीवण री,
परिभाषा सही समझ पाती ।
ई जगस्यू लैर छुडाणों ही,
जोगी सो असली धरम नहीं ।
जे भोगी हो जोगीः रहले,
बो जीवण रो है मरम सही।
--
जे काया
२२ ]
-
। शकुन्तला

बेटी प्रा मेरी सूल जारण,
मिन सोचे भाखी वात जण ।
कोई सैनाणी
देख फेर,
भरतार करेलो याद तनै ।
बेटी रे सिर पर हाथ फेर,
मुडरो दुरवासा दूर गयो ।
मनहार शकुन्तला माय बड़ी,
अणचित्यो मन में सोच हुयो।
नै काया तेरै करमां में,
के के भावी रा जाळ बिछया।
अरै विधाता ई पोथी में,
काळा पीळा के लेख लिख्या ।
के दिन ही के अब बीले,
ओ मोडो कठऊँ पाय मर् यो ।
मेरे सपनै री दुनियां में,
भूई माथै से प्राय खड़यो।
चिन्ता में डूबी शकुन्तला,
जा पड़ी ईश ₹ चरणों में,
मैं सुरगी इयां थे दीनबन्धु,
करुणा सागर हो करुणामय ।
-
।
.
शकुन्तला ]

। . फट हो खड़ी बंगाली सम्माळ, मुंदड़ी री, गांचो मैनामी झट चूम हिये म 'निपकोई 'मेरै भावी ने सुलझाणी हिवड़े में चालो लूयामी, खूख करती यांची आई। तप्पंण लाग्यो हो ऊंच्याळो, कूपण खा री कुम्हलाई । अम्बर में तक सूरजड़ा, हिय में तप्प ही बिरह आग । इन्नै नैणा रों नीर जले, बीन्न धरती म बळे बाग। झड़ झड़ पत्ता हा झड़े घणा धरती रो आंचळ पोळो हो। काया - शकुन्त री छोण हुवे, पलकां रो प्रांगण गीलो हो । जे धरा जळे तो सागर हिवड़े में ऊँची मिलणै री बेळा इसी हुदै, दोनां रा हिवड़ा झूल 'उठे। र , हल उठ . F] शाकुन्तला ] २४

दिवले रो प्रेम पतंग में,
दोनां ग सनडा जले. घणा ।
घण रो है मोह पपीहै स्यू,
भाज्यो आवै है दूर जणां!
बा कैद रूख ₹ ऊपेर चड,
जोवे बांदळ री टोखों में ।
टप टप री कूड़ों टीपी में, '६
आवै बाजेद कद धोखामें।
बा कदे नदी 'तीर फिर,
रूखा रै अोल 'जाय धुळे ।
घिर घिर पूछ बो पंछचान,
जे थानें घुड़ला टॉप 'सुरण
बा-फिरै बावळी केश खिडा,
होटों पर फेफी आली ही
बा लता कुज
जरी इसी बरणी,
ज्यू अळसाई बिन 'माळी ही।
||ܟ
-
--
रा
-
3.5. ८..
ITL
।
7.
15
Cond
शकुन्तला ]

चटक
ਬਣਨੂੰ
पूठी 'चाली,
पूची बाई री 'कुटिया में।
ब :गुंफा छोड़'र पाया हा,
रम्मेडा माळा 'मिगिया में ।
बा' बोली, मोटो मुनीदेव,
अन्तरध्यानी हो अलखलखी।
मुकती रों मारग अपरायो,
जोगी री जुगतां ने परखी
स
.
रीधी सीधी स्यू 'ऊपर थे,
पूंच्योड़ा ग्यांनी ध्यानी हो ।
है 'तेज तपस्या. रो पूरों,
थे परमधाम रा मानी हो
थे परमारथ' रो पुण्य घणों
भेळो कर राख्यो झोळी में।
गयां सांकड़ सच्चिदानंद,
पूच्या परमेशर 'पोळी 'में।
पण अन्तर 'नणा "खुली रव,
हो भौतिक जगस्यूं पलक बंद
ई 'मन री 'मुकती खातर ही
जे 'मुनि रो होवै मोक्ष मंत्र ।
Ý
१८
'शकुन्नता

ग्राम अलख : अटाडी में कुटिया जे - सन्त- बगान लेवे है धरती स्यू अपणो धर्म तोड़ धूणी जे गगनु, रमा- लेवे । पर री-पीड़ा, स्यू परै हो र परलोकी : भाळ. निस्कामी : कर निरो नेह नरायण स्यू नर स्यूं भाग हो निस्पापी..११ गुफा बड़े जे ग्यान ध्यान । जंगळं जोवे जे जोगी. जण है क भगवो, भाग जे. भाटा में. पत्थर में परमानंद FIR तो भोळापै नै फेर, भळे, कुण भलो राह बतावैलो । रोही में.. रुळता मिनखां ने, कुण जीवण मरम सुझावैलो.। अब कण्व कयो, 'क्यूआ.ज इयां, दरशन री मोटो बात करो। क्यू परमेशर, री, बेला में मन ने यू सन्ताप करो : १ ।" . शकुन्तला २६

-
थे बात इयां क्यू भाखी श्रा,
म्हाने थे बात बता देयो ।
माणस तो अाखर माणस है,
के भूल हुई जतळा देयो
मां बोली, 'थे तो दुनियां स्यू,
अपणो ओ मुखड़ो मोड्यो है।
सागरण स्यू नेह लगा लीन्यो,
आपण स्यू' नातो तोड्यो है।
देसी ।
थांरी लाडेसर डावड़ली,
जंगळा में भट के भूडी सी।
रूँखां स्यू बैठी बात करें,
दाह में ऐन दब्योड़ी सी ।
जे भोळी नारी जीवण नै,
दुरवासा इयां रुळा
तो धरती री माता अपणो,
गरबीलो रूप गळा देसी।
के काम साधना आई प्रा,
के तोल तुलैलो तापस अो।
माइत भूल जे
माइतपण,
तो मोल घटेलो माइत रो।
३० ]
[. शकुन्तला

-
१
माइत री मोटी मरजादा,
माइत है मोटो तपधारी।
माइत रो धरम निभाले तो,
माइत है पूरो अवतारी ।
अब कण्व कयो, 'हूँ मूल्यो हो,
मनै न शकुन्त रो ध्यान रयो।
जोगी जाण के जगती रो,
थे कयो हरणे तो ग्यान हुयो ।
जाम्रो सगळा नै कहलायो,
शाकुन्त
सासर
जावेली ।
भेजरंग री करल्यो तैयारी,
हरण देर न होवण पावैली ।
बी कण्व रिसी री आ वाणी,
पूची पाश्रम री हर कूटां।
रूँ रू शकुन्तला हर्या हुया,
खिलग्या नारी रा सै बूटा ।
सखियां सारी भाजी आई,
फुटरापो और सजावरण नै ।
पोरै रो पूरो झाड़,
हण सासरलो सिणगारण नै ।
रूप
शकुन्तला ]

ग - • . अब कण्व संदेशो- ग्रां पूच्यो, वाई बेगो .भीर करा मां संग.: गौतमी, , जावली,... साग, रखवाळा दोय करां ।। सोळा:- सिणगारी शकुन्तला, हगा , त्यार सासर जावा. न. इक नैरण हँस... इक नेण रुदन, .. श्रा जी न. कर की खादश नं. ग्रागै चाल ही शकुन्तला, लार सखियाँ री, लड़ालूम बा हाल हो पग थाम थाम, धरती री. रज ने चूम चूम . Trmaish FA5 पलकां. नीची हा, होठ , बन्द कर कोमल पट मे नणा, जोवे, ही धरती नै, ज्यू लज्जा रो सागण संरूप । सखियाँ, लैर, हळवा हळवां, बाई रा बस्तर, साम, ही। निजर न., लागै,ई काया नै प्रोटे थामै ना क मे ढक्याम E पर नैणा प्रोटे- प ही ३४. ] शकुन्तला

₹
ने
३
बारे ऊभा हा कष्व मुनि,
नाई ले भीर करावण है,
सारै ऊभी ही माताजी,
सागै बाई रे जावण.
ने ।
बाई नै प्राती देख सुनि,
दो कदम और आगे चाल्या ।
आ गिरी शकुन्तल चरणां में,
बाबै बाई रा कर झाल्या ।
बाई प्रा
कहणो चावै ही,
'प्राशीश देनो थे बाबाजी।'
पण गळो गळगळो होग्यो हो,
बोली बर केवल 'बाबाजी'।
बोल्यो बाबो, बेटी शकुन्त,
तेरे बिछोह री बेळा है।
बाई जावै तूं सासरलै,
अ तो जीवण रा खेला है।
बाबै रो घर तेरो कोनी,
ओ आज तलक ही तेरो हो ।
बेटी रा माइत सास ससुर,
माइत रो घर तो डेरी है।
[ शकुन्त
।

बाप साथ बेटी हूँ. Theo तेरै साग, बाबों बोल्यों की .धीर धार, हूँ जाण्यो हूँ तो जोगी हूँ । रो हूँ जाण्यो हण निरभागी हूँ ई दुख नै कोई के जाणे, केवल जालो बाप सदा । औसर समझलो बाप अाप, जद करसी बेटी बाप. बिदा बेटी, तू के ई घर रो मोहक रूप गयो। लागलो आश्रम सुनो सो मेरी भूमिः रो री, मैं के प्रो मेरै साग, प्रो खड़यो हिवाळो रोवै है। धरती रोक, अम्बर गेवैः आश्रम मे करण कण रोवै है। सखियां माता' रोवैः अ पंख पखेरू ा पूच्या । गायां हिरण्या सै आश्रम री, गळगळा गळा पाखो रूंध्या । भूप गयो। रोवे, कुन्तला [ ३६.

तू
जी गळियां घूम्या करती हो,
बै गळियां सूनी लागली
पाया जाया करती हो,
प्रो डोढ़यां खावरण प्रावेली '
तू गायां दूया करती ही,
ग्रे गायां नहीं दुहावं ली।
साग जावरण नै चेटी,
औ खूटा घणी तुड़ावैली ।
मै हिरण्णा तेरी साथण है,
अ रोज हियं में रोव ली।
तेरै खोजां नै सूघ सूघ,
कोसां रोजीना जावली
गायां रो दूध सूक ज्यागो,
कोयलड़यां सुमसुम हो ज्यासी।
सै फूल बढ़ पा बागां रा.,
सूखा री कृपलं झड़ ज्यासी ।
पंछी माला बाग छोड़,
सरवर से पाणी सूकैलो
बेटी तेरै बिन साबी कू,
ओ आश्रम कोजो लागलो ।

गायो' थे क्यू भांकों हो
बाई ने अठ
भिनायूंना
हिरण्या थे अब क्यू रोत्रो हो,
बाई नै बेगि बुलाल्यू ला ।
गळो बाप रों भरि प्रायो.
बेटी री आंख्यां बरस पड़ी।
माता री प्रांख्यां गीली ही,.
रोव ही सखियां खड़ी खड़ी।
सखियां स्यू बोली अब शकुन्त
मन में की थोड़ी धीर धार ।
थे बाबाजी री सुध' लीज्यो,.
म्हारो बापू स्यू घणो ण्यार ।
बेलां में पागी दे दोज्यो,
गाया री सुधियां ले” लोज्यो ।
करज्यो हिरण्यां स्यूप्यार घणो,.
बेटी नै बाफर नेह दीज्यो ।
सखियां बोली, म्हारी साथण,,
कुरण म्हारी सुध बुध लेवलो ।
ऐड़ो तू नेह जुड़ा चाली,
ऐं नैणा कौंण धुप्रावैलो ।
।
३८ ।
ENन्तला

।
श्री प्यार भरेड़ा प्याला सू,
उफरणे हा नेह रा प्रांसूड़ा ।
कुण धीर धरावं ई औसर,
सारां रा हिवड़ा एक जुड़या !
हळवां हळवां सै चाल पड्या,
ज्यू परवा रा बादल चाले ।
सें नए वरसता चाले हा,
सै संग सहेल्यां बै हालै ।
मागै हिरण्या सागै गायां,
से पंख पंखेरू साग हा।
सागै जारण री बात करै,
पग हालै सारा आग हा
बादोजी बोल्या हण बेटी,
तेगे सुख उपवन लहराव ।
दूधा नाहो, पूतां फाळयो,
पति रे सुख में सरसाव ।
पूठो सो अाश्रम चाल पड़यो,
आँसूड़ा प्रांख्यां न्हावं ही।
मुंदड़ी सम्हाळ, चाली शकुन्त,
दो रीसीकुवर, मां सागै ही।
शकुन्तला

पांचवो सर्ग
दरबार लागर् यो मोटोड़ो,
सामंत सांतरा बिराजमान ।
मसनद पर बैठ्या हा वजीर,
सिरदार सांकड़ा घणमान ।
प्रांख्या सगळां री - लाल लाल,
मूछयां ही भँवरा खायेड़ी।
तप तेज तप हो माथे पर,
सगळी री दाड़यां बाहेड़ी ।
सिर पर पाग संभाळेड़ी,
तरवार हाथ में थाम्योड़ी।
रण रा बाँकड़ला बीर जियाँ,
काया पोरस में
धाप्योड़ी।
सोनै री कुरस्यां सिणगारी,
भींतां पर चित्र बरगड़ा हा।
बै एक एक स्यू सूणा हा,
मोत्यां स्यू घणा जड़ेडा हा ।

" जूझ हा, - - कीमै तो जोधा कीमै पुळकै हो पुळक प्यार । कठेही मुळकै हा फूल घणा, कठेही मटकावै नैरण नार । कठही हिवाळो ऊभो हो, माथै पर धोळी पाग बांध । कठेही किलोळां करै सलिल, बिच में न्हावै हो मधुर चांद । कठेही माता री धरती पर, लहरावै श्यामल सरस धान । कठेही प्रात री बेळा में ऊभो हो मां रो धन किसान । कठेही देवता मांडयोड़ा, मोटा मारणस हा छांटयोड़ा। ध्यानी मानी हा कठेही कठ, वेदां रा पाखर विन मोल्या ! मूक जीव ई भूमि रो, सो ऊँडो भेद बतावै हा। प्रो संगम इसो बण्येडो हो, जन मानस रै मन भावे हा । . भा ४१ ] [ श

-
इत्तौ में इक हलचल मचगी,
बेळा होगी निरप प्रावण री।
'घणी खम्मा अन्नदाता' री
बाणी फूटी जम ज्यावरण री ।
हण देशघणी
हो पा पूच्यो,
जचग्या हा प्रा सिंहासरण पर
सौने रो ताज सांतरो हो,
ज्यू संयम होवै शासण पर ।
ऊपर मन मौज किलंगी ही,
ज्यू अहमभाव पर अंकुश हो ।
ई निरपभेस में सिणग्यारी,
ज्यू धरती फैल्यो सूजस हो ।
राजा बोल्यो हण 'सामन्तो,
है आज काम मोटो करणो ।
राजनीत में लोकनोत रो,
इक सुन्दर सो संगम करणो ।
शासक शासित री एक लड़ी,
जे प्रारज भू पर बण ज्यावै ।
शामक रो घट ज्या काज भार,
शासित रो मन बळ बढ़ ज्यावै।
४२ ]

हर गांव वगैलो इक शासणं,
शासगा में सगळा सोर करै ।
भेळा हो सगळा चाल पड़ा,
सै मिल ज्या जे की भीड़ पड़े।
-
दूर भगाणे
--
संबळ स्यू शासरण नहीं जमै,
बुद्धि नै दूर
भगारण स्यू
राजा रो पासण नहीं रवै,
जनमत नै परै हटाणे स्यूं ।
जद गिरह वजीर उठ्यो बोल्यो,
'जनमत रो कोरो छिछळापो !
गैला जाम है गळिया में,
रैसी शासरण में नित स्यापो।'
राजा बोल्यो, 'या बात नहीं,
थे जन विवेक नै प्यार करो।
मानस बदळो थे माणस रो,
पाखी धरती में प्यार भरो।
--
1
4
गौरव है राज कराण में,
निरबळता नैण डराग में ।
या भूमी सारी भायां री.
के डर है बात बताण में ,
शाकुन्तला 1
।

बोल्यो बो, 'म्हार अन्नदाता ।
जे हुकम हुवै तो अरज करू',
बोल्यो राजा, 'हां बात बता ।'
बारे ऊमा दो रीसी कुवर,
सागै दो नार सुहागण है ।
है कण्व रीसी रा भेज्योड़ा,
कुहायो 'काम राजशरण है ।'
राजा पारणे रो हुकम दियो,
सै हाजर रामशरण पाया ।
सो देख हुया सै चकाचौंध,
पण मन में धीर थमा पाया ,
राजा बोल्यो-हण हुकम करो,
क्यू कण्व रीसी तो राजी है ?
बै महामुनीशर बड़ा घणा,
म्हारै पर पूरा राजी है ?
है तपोभूम में कुशल खेम,
क्यू जप तप से निरबाध चले ।
कांई सन्देशो
सन्त कयो,
की करण जोग हूं अाज भळे ।
सकुन्तला ]
AL
]

माता बोली, हो घणी खमा,
पूरा तपधारी आप धणी ।
हो आप सबळ शकतिधारी,
किरपा धणियां री घणी घणी।
आश्रम में मालिक घणो चैन,
बाबाजी जप तप - मगन रवै।
आशीश कुहायो आप धण्यां,
थाने रोजीनां याद करै ।
सन्त,
हाजिर होई ले
हुकम
शरण हजूर- रै ल्याई हूँ।
थे राज काज में इसा रम्या,
ल्याई
हजूर भुलाई है।
प्रा परणी थारी राज धण्या,
है नाम भलो सो शकुन्तला ।
आ हुई बावळी बीजोगण,
थारी अळसाई प्रेमलता।
अ
'म्हारी परणी है शकुन्तला' ?
सुरण गुमसुम होग्यो हो दुषन्त ।
मुखड़े रो आब उतरग्यो हो,
सर्राट मच्यो तन में तुरन्त ।
४५ ]
[ शकुन्तला

1
धरती अम्बर हिलतो दीख्यो,
डगमग डोल्यो ज्यूदिग दिगन्त ।
उलटी दीखे से भीत मुरत,
श्रांख्या प्रागै अंधड़ अरगन्त ।
माथो गोडा मरे लगा लियो,
हाथां स्यूसिर नै साम लियो ।
चट नाड़ हिली ज्यू इयां कवै,
'ना मैं शकुन्त स्यू ब्याव कर्यो।
देख ही सोक्यू शकुन्तला,
फूटी ज्यू मार्थ पर हांडी।
गोडा ज्यू पारगी पड़ग्यो हो,
लड़गी ज्यू काया' नै बांडी।
घूघट रै प्रोट
दीखै हो,
भरतार सांतरो
साची है।
कोई कसर नहीं,
पण काया या निरभागी है।
गुमसुम देख्यो जद राजताज,
माता नै चिन्ता जाग उठी।
प्रोजू बोली की धीर धार,
की भावभार स्यू दबीदबी ।
अट्ठः तो
काकुन्ती

थे की की स्यात् भूलग्या हो,
पीछाण हुई ना परणी री ।
घूघट उनहूँ जद जागोला,
सागण मूरत है धरणी री ।
उलट्यो घूघट ज्यौं दीप जग्या,
मावस री घोर अँधेरी मे ।
पूनम मुळकी की दूर हटा,
बादळ री काळी ढ़ेरी नै ।
दो नैण नेण स्य घणा जुड़या,
इक जोवै मोती डूबेड़ा ।
दूजी नै मोती लागै ज्यू,
जळ रा है थोथा जाळ पड़या
इक रो विश्वास जमेड़ो हो,
दूजो विश्वास गमेड़ो हो,
इक में दीखै हो दूर दूर,
दूजी में दोखै नेड़ो हो ।
पूनम चावं ही सागर में,
भावां री ऊँचो ज्वार उठे ।
पण सागर जम पाषाण बण्यो,
जड़ सो होग्यो हो जठ कठे।
[ ४७
शकुन्तला ]

इक बोली-'इक है
अहं त्वं,'
दूजी बोली-'है त्वं त्वम्,
पा 'मम' री ममता कियां जुड़े,
जद संशय हो विश्वास स्वय ।
बोल्यो राजा, 'क्यू मात इयां,
प्रो कूड़ो काळस लागै है ।
क्यू मेरी पावन काया नै,
परलोक तलक तू दागै है ।
ई आरज भू रो धरम नहीं,
पर री नारी नै जोवण रो।
ओ पाठ नहीं म्हानै दीन्यो,
अपनी मरजादा खोवरण रो।
आ धरा पिघळ जे मोम बरण,
सागर जे परबत बण ज्यावै ।
पण वेद भूम री मरजादा,
ना डिग कठे ना डिग' पाव ।
कूड़ी बोळे
।
क्यू
डोकरड़ी,
ना कण्व रिसी रो कहलायो।
कोई
बैरी म्हारै' ऊपर
ओ जाळ जोगणी बिछवायो।
शकुन्तला ]
४८

रै
अंबरा
शकुन्त
इसा अड़या,
ज्यू तीर गड्या आ छाती में ।
हो खून काळजे इया बळे,
ज्यू तेल बळे है बाती में ।
बा बोली, 'कन्त इयां भूल्या,
सकै कोई
अपणी नै परकर चाल पड़या,
कर कांट कंटीला पग पग मे ।
के भूल
जग में।
प्रोजू बा रज है पड़ी बठे,
जी रज में हियो लगायो हो ।
बै रूख खड्या है सागरण ही,
जी रूखा मनै छिपायो हो।
बै पत्ता प्रोजू झड़ या नहीं,
जिगा सामै आपां कलि करया ।
बै बूटा प्रोजूं बल्या नहीं,
जिश सामं मारणस मोल का ।
प्रोजूं तक घर पर बोह चांद,
जिण सामै प्रापा एक हुया ।
तारा सागी, अम्बर सागी,
सागरण बै सारा देव खड़या ।
४६
[ शकुन्तला

अ-93
श्री खरतरगच्छीय जान मन्दिर, जयपुर
आ भूल कियां लागी थान,
बीं जगा चाल'र बतळाल्यां।
जे जाण बूझ' र भूलो हो,
थारै हिवड़े नै समझाल्यो ।
नारी रोई नर रै आग,
पण नर रा भाव नहीं फूटया ।
आखोपाभो ही बरस पड़यो,
धरती रा बाग नहीं ऊम्या ।
नारी बोली 'हे राजपुरुष,
धरती पर प्रोजूधरम खड़यो।
सूरज ओजू, चेंदा प्रोजू,
प्रोजें धरती रो धान खड़यो ।
राजा स्यू धोखो करल्यो तो,
यो धोखो धरम कुहावै है।
परजा स्यू धोखो करल्यो तो,
बो राज काज कहलावै है।
ई मिनख मिनखरे धोख ने,
प्रो राजनेम सुळझाव है।
परजा धोखो जे राजा स्यू
बै कारा में फंस ज्यावै है।

श्रा नाग नर स्यू धोखो कर,
बा बस न सके ईधरती पर ।
दो बूंद नहीं गेरै माणस,
ई मार्योड़ी री माटी पर !
'पण नर से नारी स्यू धोखो,
सगळाऊँ सरेटो पाप कन्त
यो पाप जगत में नहीं छिप,
कितो हो करल्यो जाप कन्त ।
'धोखो करले जे घन घर स्यूं,
'धरती पर धान नहीं दीखै ।
रुळज्या आखा से 'मिनखजाम,
"धरती पर जीव नहीं दीखें।
.
1
क्यूं सूरज पाणी ल्याबैलो,
'क्यू चंदा धरा सजावैलो।
क्यूरजकरण अपरणो हियो फाड़,
धरती पर धान उगाबैलो।
'क्यू सागर रहसी मरजादा,
क्यूहिम हिवाळो पिघळावै ।
क्यू नदियां चालै धरती पर,
क्यू दिवस उगेड़ो छिपज्यान ।
शकुन्तला ।
--

कित्ती निरभागरण तू भोळी,
मुंदड़ी बा कठः गमा दीनी ।
मारग में पारणी पीयो हो;
नदियां में स्यात् बहा दीनी ।
ओ दोष नहीं' है राजाः रो
प्रो दुरवासा रो शाप शकुन्त ।
चालों हण घर नै चाल. पड़ा,
प्रो सगळां रो- दुरभाग शकुन्त ।
बोली शकुन्त, 'माता मेरी,
माइत रै घर स्यू भीर हुई।
माइत तो फरज निभा' दीन्यो,
माइत घर लागू घणी बुरी ।
जे नारी साी हूँ माता,
तो नारी धरम निभाऊँली।
मैं
दुरवासा नै
हूँ. अमर जोतः जगाऊँली ।
जग जाणं है नारी कोरी,
आँसू री बरणी पोटली हैं ।
पण जग नै हूँ जतळा देस्यू,
श्रा मोटी शकत जोत. री, है ।
देखूली
५४
शकुन्तला

छठो सर्ग
श्रामै साम हो उजाड़
चली शकुन्त हियो जमार ।
आगे पाछै लियो रामनै,
काया नै कूट में बाड़।
डरावै हा,
तीखा हा ।
डूंगर
घरगा
दरखत आँख दिखावै हा।
हूँगी गाज
गाजै गाज शेर री,
गादड़िया घरड़ावै
हा।
मारग
कठे न दीखै हो,
कांट कटीला
बोझ बोझां फिरै बधेरा,
पग पग दीखै खीखा हा ।
कठे न माणस बाणी ही,
जाणी ही न पिछारणी ही।
धुक धुक होवै घणो काळजो,
आखर नार सुहारणी ही ।

खूबै हा करे । पग में दग्गड़ गई हा, पैरा ॐडा चूभै हा पगां उभागी फिर बिचारी, कांटा तीखा तर पैरां खून झरे, भाटलिया नै नै लाल फाड़ चुनड़ी पाटी बाधे, नीर नण स्यू गाल पड़े । आंचल दूध सम्हालै ही, नैणा नीर सुकावै ही । प्रासै पासै देख मिरगल्यां, डूंगी याद दिरादै ही, रातां घरणी डराण्यां ही, सोती गाबा ताण्यां ही । नींद न आवै हियो कंपावै, सारी खाण्यां री। कूटा लिया, कांटा कपड़ा फाड़ प्राछा बैर् यां लाड कर या । गात बिचारा दीखण लाग्या, बोल्या मन में लाज मर या । शकुन्तला ] [4 बांटा पड़ा फाड़ लिया, प्राछा बैर यां लाड कर या । गात विचारा दीखण लाग्या, बोल्या मन में लाज मर् या । जी काया पर भंवर डुलै, लाज कमलन्यां देख छिपै । चांद शरमस्यूं बड़े बादळी, बा काया श्रा इयां रुळ । मिनख बावळो गरब करी, ऊँचो माधो लियां फिरै । झूठी काया, झूठी माया, होवे ज्यू करतार करै। X परवत स्यू पाणी झर ग्राभो झर अथाह । अरै जमाना देख नारी झुरै धराह । जे न पिछारिणयो, कन्ता देतो कूण ठोड़ । प्रांती जांती करती दरशन कोड X X ले , जोवती, -- शकुन्तला ] ।

हिये में देह दे ह है , X X घाव हा घणा, घावां अरणंत । च्यारु कानी बीजगी, होगी ऐन जड़त मनड़ा जैड़ो बगत बड़ो देय टिपाय । थमसी बैतो बायरो, पासी मेह घणाय। X शकुन्तल थकेड़ी थमगी ही, टीलं पर । जायर जमगी ही । मन में सोच ही घणी घणी, आसे पास ही बरणी घणी। कीनं जास्यू की घर जास्यू, की घर जायर पूत सुवास्यू। एक नार, दूजो पग भारी, कूकर पड़सी पार बात री। इत्त . में उठी बादळियां, बरसणलागीघण सावणियां । घनघटा औसरी महाजाळ, ज्यू फोडण चाली ही पताळ । शकुन्तला ] ५८

आंधी रो-इक सूसाट उठ्यो,
च्यारूँ कूटा अरड़ाट उठयो ।
डूंगै अम्मर धरड़ाट उठ्यो,
रुखांमें झट जरड़ाट उठयो।
हण उठी शकुन्तल कूट तक,
इत्ती ताकत ही बढ़ कठे।
कंप कंपी चढी काया धूजी,
बचरण री राह नहीं सूझी
अांख्या में घोर अंधेरो हो,
इक दरखत दीख्यो नेडो हो ।
दरखत रै पे. जाय अड़ी,
सूनी होगी ही पड़ी पड़ी ।
जागी जद कुटिया में सूती,
देखी बण नार यां दो ऊभी।
सारै बै प्राग
जगावै ही,
तन
च्यारूँ मेर तपावै ही,
ऊँडी पेडू में पीड़ उठी,
दोनां मन में सा बात पढ़ी।
सगळां रो दुख हो हिल्यो मिल्यो,
पळ में अांचल मैं फूल खिल्यो।
.
। शकुन्तला
1
रह

*4
name
मान जनक मानने वाला बयो,
मन मनन नकुन्न रे नाल बिल्यो ।
गल में नगन गान घिदो.
दुनो नो हो बाल अड्यो ।
वन्ये,
माध्यो
धरती गडो
ना हृयो,
ऐडो कई चरिन
---
६० 1
hand
शकुन्तला

सातवों सर्ग दरबार दुषन्त कांप ही थर, J रै चाल कलम प्रा चाला, दुषन्त जठे हो । गळचट में फंसर्यो राजा, करण के आज अठै हो मछवो सामै इक ऊभो, काया थर राजा हाथ अंगूठी, निरखै हो बीने तर तर। भाव बरण हा, मडे मिट हा । अं कुण सै पाखर बांचे, के के औ औ बात कवै हा। ईनै ओ कवच तणायो, तरकस पर धनस समायो। मातल आयो लेवण ने. इनै प्रो गूठी ल्यायो। माथे पर हा फेर में होसी, माताल इन्दर रो भेज्यो, मोटो मंत्री मानीज्यो । हो सुर असुर रो झगड़ो, दानव हो तेज हो तेज भरीज्यो। दानन जे जग मानव के सुख स्यू रैसी। सावळ समझायां दानव, कावळ ही कावळ करसी । कांटो कांट स्य निकळे, नीं कांटो घाव दुणीजै । जग में ओ राद भरै है, जे कांटो प्यार पुजीजै। . खेती। श्र सूरवीर बांकड़ला काट कांटे री मिनखां रो धान हिराळी, पाव सिट्टा में छेती । पण बीनै याद करायी, गूठी हिवड़े री राणी । मंडी शकुन्तल, ऊभी ही हिय पिछारणी । मूरत सी ६२ . [ शकुन्तला

दुई च. हो नको.
अगर को
नान दुषन्त हो,
श्रा कोई चार तुली हो ।
ईन तो खलो शकुन्तला
में खड़ी बुलाद!
बीन हो करम मिनल रो,
दो हण
तोल करावै।
प्रेम नेम
तोलए लाग्यो हो सूरो !
प्रेम मिनख रो
पण नेम सकल समूह रो।
तराजू,
अपणो,
स्वारथ डोव जगती नै.
एकल रो प्ररथ सकल में ।
जे सुरग धरा पर ल्यायो,
रखणी या बात अकल में ।
कल्पना कोरी ?
माणस री अक्कल थोड़ी।
जे
असुर
मरै ई मन रो,
तो सुर स्वयं ही प्रोही !
के सुरंग
शकुन्तला ]
[ ६३
-

ने इन्दर रो सुरग बचाणो, दानव सार भगारगो। दुषन्त लियो हो मानव रो धरम टिकाणो । निरगाय, । तरकस पर तीर सम्हाल्या, चट चढ़ विमारण पर चाल्या । पल पल हो इन्दर डीकै, अगवाणी करर सम्हाल्या । अब दारु रे - सूर समर में जूझ्यो, असुरां री सेना लांबी। मद मे झूम, बिकराळ खड़या हा सामी । सै धनस ताण हा खींच्या, हाथ्यां पर घणा तणीज्या । लांबी लांबी ही ही मूछ रा प्रोख्यां में रोस भरीज्या । हा काळ नेम रा बंशी, दुरजय हा नाम धरीज्या । इन्दर रो राज छुटावरण, दानव हा जुध में जूझ्या । ६. ] शकुन्तला

इन्दर री फौजां रथ में,
न्ही खड़ी सांतरी जच्ची।
जोवां री बड़ी कतारां,
जुध है रंगत में रच्ची।
ललकार कयो र राजा,
दानव हण नहीं बैलो।
हूँ एक एक में नस्यू..
प्रारज से पालो ।
यो सुरग ती परती, ..
दानव रो १ लो।
अो सूरपणो ६६ तक,.
सुर र गिरथलों।
बाजी मारी,
जोधा में नगरीयो ।
से बागा रामग्या,
दानव' को रियो ।
तर-तरमा मीरा पाल्या,
सूसाट ऊपर सगळ ।
V धुपाचोर सी मचग्यो,
या अब जादा रगड़े।
है
-
६५ ]

ज्यू ज्यूब वीर बढे हा.,
लाशां पर आप चढे हा ।
हण हुयो होसलो ऐडो..
तीरां पर तीर कडै हा।
असुरां रो असर न प्रोत:
चौगड़दै हीरण हुयो हो।
कोत्यू तो मार गिराया,
लूठा में रोस वड़यो हो ।
सामी प्रा. छाती अडग्या,
बै. वार करै अगहूँता ।
सूरां री छाती फड़की,
आवै जूयां पर जूथां ।
अगनी रा बाण चलाया,
बरसै. ही आग धधकती।
देवां री काया कांपी..
लख भोभर घण बरसती।
प्राभो हण अगरणी बरसै,
पैरां में आग पड़ी ही।
घोड़ां रो हिवड़ो हाल्यो,
अोड़ी प्राइसी पड़ी ही।
-
सकुन्तला
[ ६८

दुषन्त हण हुँकार्यो,
मेरी "धरती रा नीरोन
ना कायर पूत
कुहायो,
ना दुशमरप पीठ दिखायो।
'मरणो है
है या जीणो,
ई जीर्ण खातर मरणो
'ओ धरम नहीं सूरां रो,
मररण खातर के डरणो।
.
बण मेघ वारण सम्हाल्या,
कानां तक ल्याय चलाया।
ग्राभै में विरखा फूटी,
खाळां पर 'खाळ चलाया ।
अगनी री भोभर बूझी,
दानव तरी काया धूजी।
'हण अगनी वाण अफळ हा,
अब और न माया सूझी।
बै गेर तीरड़ा भाज्या,
लैरै स्यू मार पड़ीज्या ।
दुशमण रो बीज न रैवे,
दया
पसीज्या
नौला
1 शकुन्तला
६६ ]

प्रा आसा चिमी शकुन्त हिया,
मनरें री वेलां लहराई ।
जीवण रा पाखा फूल खिल्या,
हिवड़े रो पांख्यां फैलाई ।
सूती शकुन्तला कुटिया में,
पसवाई गीगो सोयो हो ।
निधड़क हा दोनू नींदा में,
अम्बार चंदे ले धोयो हो।
उचटी शकुन्तला चाणचकै,
सपने में दीख्यो परणीज्यो।
भळक्यां अांख्यां में आंसूड़ा,
पूंछण में आंचलियो भोज्यो ।
फेर यो पसवाड़ो चूम लिया,
गीगै रे गोरा गाला नै
हिवड़ो हिमजळ सो होग्यो हो,
मोती मिलग्या हा माळा नै ।
दिनड़ा यू घटता जावै हा,
नव बूटा बढ़ता जावै हा।
पल ज्यू ज्यू प्राकै जावे हा ।
ऊपर रा टुकड़ा खादै हा।
-
माकुन्तला
७२
।

।
,
नानड़िया छरण छण बढ़ता हा,
जौबन रा चलपल घटता हा।
बूढ़ा . बोदै रो बास छोड़,
प्रागै री प्राशा करता हा ।
पलड़ा बीत्या, दिनड़ा वीत्या
मीना बीत पर बरस बीत्या ।
दुख सुख री मिलवां घड़ियां में,
जिन्दगी रा छ वरस रीत्या ।
सरदी री शीतळ वेळा ही,
हिम स्यू भी जेड़ी पून चले ।
गाबां में तीखी लागै ही,
आभै स्यूजाण बरफ झरै।
परबत री टोख्यां धोळी ही,
ज्यू सीयाळे से ताज हुवै ।
घोळ बरणो सो पासमान,
ज्यूहिम रो आखो राज हुवै ।
से जीव जम्या हा कूरणा मैं,
र? प्रोसर् यो भैड़ो हो
कै मिनख बाळगे आग तपै,
ने. तेड़े हो।
श्रो र?
कै बैठ्या
७३ ]
[ हाकुन्तला

माची पर,
गाबा हण प्यारा लागै हा,
अांख्यां में सारा जाग हा ।
सी-सी करता डरता सगळा,
सै अन्त काम में लागै हा।
बेटो सूत्यो हो
माता जाग्योड़ी बैठी ही।
जागरण री बेळा होगी ही,
माताजी घणी अडीकै ही।
बोली माता हण बेटे ने,
सूरज री आभा जागी है।
तू जाग जाग रे जाग जाग,
जागणं री बेळा अागी है।
-
ओ प्रारज भूमि रा सपूत,
आंचल रै दूध रा दुलार ।
मां रा लाड़ेसर लाल बाल,
प्राशा में पाल्यो एक प्यार ।
शेर रा बाळ अडीकै है,
सागै खेलण नै गायड़मल ।
बाधां रा
लाल अडीकै
सागै रम्मण नै फूटरमल ।
aro
७४ ].
[ शकुन्तला

भूमी रो भार अडीकै है,
धरती पर धरम उतारण नै ।
दुखिया रा .प्रांसू डीकै है,
सुख री सुरसर ल्यावरण नै ।
च्यारूँ कूटा में चिड़कोल्या,
निरमाण जगावरण अागी है।
तू जाग जाग रे जाग जाग,
जागण री वेळा आगी है।
बेटा प्रो देश घणो मोटो,
मरजादा ईरी
मोटी है ।
पा धरा धरम नै पालण में,
धारी बस एक लंगोटी है ।
मोटी है मां रो नाम घणो,
मोटो है मां रा घणा काम ।
दुनियां में मोटा कामां स्यू,
मां रो है मोटो घणो नाम
मां रो नित
मीटो नाम रवै,
मीटी मायड़ आ सबळा है ।
मां रो भो नाम नहीं लाजै।
एहड़ा
सै कारज करणा है ।
.
पाकुन्तला ]
[ ७५

रा नेम
से करम धरम थाम
मायड़ री मरजादा जागी है ।
तू जाग जाग रे जाग जाग,
जागरण री बेळा अागी है।
प्रांचळ रो दूध लजाई ना,
कूमाता पूत कुहाई ना।
ई मां रो
जायो बेटो तूं,
माता रो नाम डुबाई ना।
दुखिया ने कदै दुखाई ना,
थाके नै कये थकाई ना ।
अपणी सीमा नै पार लांघ,
संत्यै नै कदे सताई ना।
पर री पीड़ा नै खोरण में,
देखी
तू मजा घणा पासी !
पर री व्याधी नै ढोरण में
मारगस रो धरम समझ आसी।
जीवण रो मरम बतावरण नै,
फूलां री कळियां जागी है।
तू जाग
जाग रे जाग जाग,
जागरण री बेळा आगी है।
शकुन्तला ]
[ ७६

भरत उठयो ज्यौं भूप उठ्यो,
माता रो सागण रूप उठ्यो।
हो लोल लटा री लटखाई,
ओ मंजुल रूप अनूप उठयो ।
ज्यू कमल खिल्यो सरवरियै में,
आभै मैं जाणे चांद खिल्यो।
ज्यू दिवलो जोयो अंधियारे,
ज्य खोयै यि नै प्यार मिल्यो।
गालां री लाली लालफूल,
नैणा ज्यं ऊपर दीप जगे।
कोरां में काजळ घाल्योड़ो,
ज्यू फूलां ऊपर भंवर रमै ।
ले बाघ
हण भरत कलेवो ले खायो,
तिरक बाणां ली बरण सम्हाळ ।
बघेरा बचिया नै.
रूखां पर मांड्या हण निशान ।
ऊपड़े बारणां रो,
धड़ धडंद रुखड़ा जाय पड़े।
गरणाट ऊपड़े गहवर में,
बब्बर डूगर में जाय बड़े ।
सूसाट
७७ ]
[ शकुन्तला

बै चढे शेर री पीठयां पर,
गादड़ सो डांगर गरळावै ।
बो पकड़ जबाड़ी जकड़जंत,
जंगळ रो राजा अरड़ाव ।
लख माता मन में हरखाव
थापी दे कुटिया बड़ ज्याव ।
प्राग री स्याणी बात बता,
कारज में प्रोजूं जम ज्याव।
इत्त में घुड़ला टाप सुरणी,
ने आ घुड़लो थाम लियो।
बण देख भरत नै यू रमन्ता,
अचरज में एडो बैण कयो ।
'कुण है तू, के है नाम बता ?
की रो तू बेटो पोतो है।
है किसो धाम ? है गांव कठे,
के जात पांत के गोतो है ?'
बो ठहर कयो, 'हे राजभेष,
हूँ जंगळवासी है भरत नाम ।
वेटो हूं अपणी माता रो,
है राजकरण रो काम धाम ।'
-
1
शकुन्तला
७८ ]

राजा ने थोड़ो बहम हुयो,
बोल्यो बो 'तेरी मात कठे ?'
इत्त में बारै
आ शकुन्त,
जड़सी होगी ही जठे कठ
दोनां री नैणा ही एक तार,
होगी ज्यू घणी पिछाणी सी।
समझ्यो दुषन्त 'पा सागरण है,
परणीजी सहज सुहाणी सी।'
बोल्यो बो राणी शकुन्तला,
बस खमा करो बड़ भूल हुई ।
अक्कल में जाणै के वड़ग्यो,
आ ऐन जकड़'र मूळ हुई।
हूं नहीं पिछाण्यो के जाणू,
आ भावी इसी बितागी ही।
पछताओ इसो बड़यो मार्थ,
आ बरणी इसी कहाणी ही।
आयो मछवो आ गूठी ले,
मछली रे पेट मिली बीनै ।
सा याद पुराणी जद आई,
सा धरा छारण आयो ईन ।
शकुन्तला
[ ७६

--
थान देऊ,
आ भूल माफ रे जोग नहीं,
यो जोग इसो थाने दीज्यो।
रण बासा रहा जोगा हा,
जंगळ में बासो कर दीन्यो ।
राणी बोली, हे कन्त सुजन,
भागण हूँ आज घणी मोटी
यो दोष किया
तकदीर मेरली ही खोटी।
औ दुख है मागस खातर ही,
दुख में फिर रोगो धोगो के ।
हूँ झेल लिया की पासा में
दुख में है पापो खोगो के
प्रो म्हारो तप. पूरो होग्यो,.
दुरवासा शाप उतरग्यो है।
म्हारो जीवण रो सूरजड़ो,
डूव्योड़ो आज निसरग्यो है।
यो बेटो थारो है भरत नाम,
शेरां रै साथ रमायो है।
आछी हूँ सिकस्या दीनी है,
आछो हूँ काम बतायो है
ला ]
5

-
बोल्यो राजा राणी मेरी,
तप में तय्योड़ो भरत कुंवर ।
प्रारज भूमि पर राज करै,
माता री भावी बरणं सुघड़ ।
हूँ आज ढिढोरो पिटवाघू,
माता रो 'भारत' नाम धरां।
राणी स्यू जामी मोटी है,
आ बात जगत सरनाम करां ।
'राणी बोली, म्हारा स्वामी,
हूँ कलपी भूली आज सकल ।
दे सकी भरत सो पूत प्राज,
मेरी काया रो नाम सफल ।
के नार? नार री कूख बड़ी,
के नारी नूर रूप स्यू है।
पत्तां स्यू काई फुटरापो,
बूट रो मोल फूल स्यू है ।
इत्त में कश्यपजी आ पूच्या,
मोटा तप में हा तप्या रिसी।
जोड़ी नै देख हरख होयो,
अं घड़ियां ही अणमोल इसी ।
शकुन्तला ]
[ ८१

प्रभ्यास सारू सवाल
पैलो सर्ग
१ विश्वामित्र तप क्यू सरू कर्यो-
(क) बो धन रो भूखो हो।
(ख) अपणी काया रो काट उतारै हो ।
(ग) मेनका स्यू व्याव करणो च वै हो
(घ) इन्द्रासण री कामना ही।
(ड) बो भगवान् रो दरशण करणो चावै हो।
२ मेनका नै धरती पर वयू रेवणो पड़यो -
(क) बीरै मनै सुरग पूचणे रो साधन कोनी हो।
ख) बा सुरग स्यू ऊबगी ही।
(ग) इन्द्र स्यूँ प्राण री मंजूरी कोनी ही।
(घ) बण विश्वमित्र स्यू व्याव कर लियो हो !
(ड) बा धरती पर घूमणो चावै ही।
३ मेनका नै धरती पर क्यूँ भेजी ?
४ इन्द्र कठ रो शासक हो ?
५ बा पगत लिखो जकी में तप भग सारू नरतकी ने भेजण र
भावना मिले है।
६ इन्द्र सभा क्यों बुलाई ही ?
७ इन्द्र रा सभासद् काई निरणय लियो ?
१

८ शकुन्तला रो नाम 'शकुन्तला' क्यूं पड़यो ?
६ शकुन्तला कण्य रीसह रै आश्रम में कयां पूची ?
दूजो सर्ग
१ कण्व रै आश्रम में भगदड मची, क्यू के
(क) कई लुटेरा तपोवन नै लूटण आग्या हा:
(ख) एक जगां गोलयां चालगी ही।
(ग) जोर रो चोरी कांड होग्यो हरे ।
(घ) मोटा मेहमान प्राग्या हा ।
(ड) दुषन्त र घोड़वं रै टरपरं स्यूं हल चल मचीही ।।
२ दुषन्त पर शकुन्तला से व्याव आजकल री सरियाँ क्यूँ
कोनी हुयो ?
(क) शकुन्तला ई विध रै पख में कोनी ही
(ख) व्याव री पा विध वा दिनां ही कोनी ।
(ग) दुषन्त कनै टेम कोनी हो ।
(घ) कण्न रीसी ई ब्याव रै पख में कोनी हो ।
(ड) ब्याव री पा विध बा दिनां ही।
ܕܝܝܚܕܝܢ
]
३ झर झर झरणा झरता हा
ई पंगत में कुणसो अलकार है
(क) उपमा (ख) रूपक (ग) वृत्यानुप्रास
(घ) छेकानुप्रास (ड) यमक
।
२

प्रां पंगत्यां में कीरी महत्ता बढ़ी ?
(क) दुरवासा (ख) दुष्यन्त (ग) मूदड़ी
(घ) भावी (ड) शकुन्तला
[ ]
५ औ काया तेरै करमां में,
के के भावी रा जाळ बीछ्या।
अरै विधाताई पोथी में,
काळा पीळा के लेख लिख्या।
ई पद्यांश रै पढ़णै स्यू पाठक रै मन में कोई बिचार उठे ?
(क) भविष में अधेरो ही अंधेरो है।
(ख) जीवण पीड़ स्यू भर्यो है ।
(ग) प्रांगूच निरणय लेणो फालतू है।
(घ) जिन्दगानी में निराशा पर कुठा भरी पड़ी है।
(ड) प्रागै रो अनुमान कोनी लगायो जा सके। [
ہا
31
६ कवि साधु सारु 'मोडो' शब्द क्यू काम में लियो ?
७ शकुन्तला दुरवासा रैशाप रे बाद मूदड़ी तुरत क्यू संभाळी ?
दुरवासा आपरै शाप में संशोधन क्यू कर्यो ?
६ बां पंगल्यां नै छांटो जकै रै मांय कवि ऊँध्याळे रो बरणन
कर्र्यो है, ई बरणन में कांई खासियत है ।
१० ई सर्ग में दो बार शकुन्तला भगवान् नै याद करयो, दोनू
बारां रो मंतव्य री तुलना करो।
4
५.

चौथो सर्ग
१. जे फिरै विराइ बेटी यू,
के दुख न उठै ई माता नै
श्रा पंगत्या में बेटी (शकुन्तला) "विराई' कीया बताई गई।
(क) शकुन्तला रै तन में पीड़ ही।
(ख) बींनै बीरो मिनख लेवण कोनी आयो।
(ग ) बा सासरै जाणो कोनी चावै ही।
(घ) वा माइतां स्यू नाराज हो
(ड) मौसम उदास हो।
[ ]
२ माँ बोली 'थे तो दुनियाँ स्यू"
अपणो अो मुखड़ो मोड़यो है'।
प्रां पंगत्यां में गौतमी कांई कैणो चावै है ?
(क) कण्व प्रापरी व्यवस्था सारू जागरूक कोनी हो।
(ख) रीसी नै अाश्रम छोड़'र नी जाणो चाहिजै ।
(ग) बीनै आपरो मूडो सीधो राखणो चाहिजै ।
(घ) बीरी उपेक्षा री नीति ठीक कोनी ।
(ड) शकुन्तला नै सासरै भिजवाणी चाहिजै ।
[
]
३ जे भोळी नारी जीवण नै,
दुरवासा इयां रुळा देसी ।
६

(ख) बादळा स्यू पाणी बरस्यो, पण बाग कोनी ऊग्या।
(ग) पाणी बरसणै स्यू वाग कोनी ऊग्या ।
(घ) घणी बिरखां स्यू वाग मुरझाग्या।
(ड) शकुन्तला घणी रोई पण दुषन्त रो हिवड़ो कोनी पिघल्यो
५ दुषन्त शकुन्तला नै कोनी पिछाण सक्यो, क्यूके,
(क) शकुन्तला रै डीलडोल में फरक हो।
(ख) दुर्वासा रै शाप रो परभाव हो।
(ग) शकुन्तला स्यूमिल्यां भोत दिन होग्या ।
(घ) शकुन्तला री मूदड़ी गमगी ही।
(इ) शकुन्तला रै मूडै घूघटो हो।
[ ]
६ गृहमंत्री लोकराज रै विरोध में कांई दलील दी ?
७ शकुन्तला रै घूघटो उतारणै रो काई अरथ हो ।
८ 'म्हारी परणी है शकुन्तला ?' में कुणसो भाव छिप्योड़ो है ।
६ शकुन्तला आपरै पख में कोई कोई तर्क दिया।
१० श्राप कियां कह सको हो के ई सर्ग में संवादां रो बरणन
सांगोपांग हुयो है।
११ शकुन्तला गौतमी रै साथै पूठी जाण सारु नकारगी, क्यू ?
छठो सर्ग
१ डूगर घणा डरावै हा,
दरखत अांख दिखावै हा।
६

لا
'गी गाजै गाज शेर री,
गादडिया अरड़ावै हा।
आ पंगत्यां में कुणसै परिवेश रो चितराम है ?
(क! भय (ख) विषाद (ग) निराशा (घ) वेदना
ड़) प्रलाप
२ 'ऊँचो माथो लिया फिरै'
ई पंगत में मिनख रै मन री कुणसी स्थिति रो वरणन है ?
(क) अहं (ख) लज्जा (ग) सन्तोष (घ) द्वेष (5) कायरता
]
३ थमसी बैंतो बायरो
आसी मेह घणाय ।
प्रां पगत्यां स्यू कुणसो अर्थ निकले है ?
(क) हवा रै ठहरण स्यू बिरखा थमै है।
(ख) दुख रै पाछै सुख प्रावै है।
(ग) हवा प्रावै है अर बिरखा सरू हुवै है ।
(घ) हवा रै चालणै स्यू बिरखा आवै है।
(ड) जित्ती हवा चाल है बित्ती बिरखा आवै। [ ]
४ इत्ती में उड्डी
'जरडाट उठ्यो है।
ग्रां पंगत्या में काव्य सौष्ठव रो बरणन करो।
५ डूगर घणा डरावै हा,
दरखत आँख दिखावै हा।
आं पगत्यां में प्रकृति रो मानवीकरण है. कियाँ ?
६ डरावणै जंगळ में शकुन्तला री जकी मन री हालत बणी, आप
री भाषा में लिखो।
७ शकुन्तला रै भाग खुलणे रो बरणन कुणसी पंगत्यां में मिले,
लिखो।
१०

(क) छेकानुप्रास (
(ख) लाटानुप्रास (ग) वृत्यानुप्रास
(घ) यमक (ड) श्लेप
سه
३. सूसार ऊपड़े
जंगल अरड़ावै।
प्रां पंगत्यां में भाव है-
(क) वेदना (ख) हास्य (ग) व्यंग्य (घ) विनोद (ड) उत्माह
४. म्हारो जीवण रो सूरजड़ो डूब्योड़ो ग्राज निसरग्यो हो-
ई पगत में शकुन्तला कांई कैवणो चावै है ?
क) सूरज नाम रो आदमी डूबग्यो हो, आज निसरग्यो हो
(ख) डूब्योड़ो सूरज निसर पायो।
(ग) निरभागण रो भाग जागग्यो ।
(घ) सूरज रो भाग जागग्यो।
(ड) डूबेड़ी किरण बांरै निसरगी।
[ ]
५. 'टूट' अर टोटो स्यू काई अरथ समझो हो ?
(क) पीड़ (ख) कुठा (ग) घुटण (घ) प्रभाव (ड) टूटणो
[
]
६. भरत प्रापरो परिचय किया दियो।
दुषन्त शकुन्तला नै कयां पीछाणी ?
बा पंगत्यां नै छांटो जक्यां में भरत री निशानी बाजी रो
७
चितराम है।
है.
जागरण गोत रो बरण न राजस्थानी में १०० शब्दों में लिखो।
१०. शकुन्तला रै आशावाद री समीक्षा करो।
११. कश्यप रीसी री भावनावां रो अपणे शब्दाँ में लिखो।

छठो सर्ग . सीयाळे - मर्दी प्रारज - प्रार्य गायड़मल - लाडला बच्चा फूटरमल - सुन्दर बच्चा संत्यै सताया हुआ कलेवो नाश्ता ग्रामै सामै आमने सामने गर - पहाड़ अरडाव जोर से रोना दग्गड़ पत्थर उभाणी बिना जूतों के दू.0 - कोना ऊभी - खड़ी हुई - डांगर - पशु - दिढोरा टूट टोट - ऐलान अभाव - - अभाव सातवों सर्ग गळचट - दुविधा सावळ - उचित कावळ उलटा लोयां - लाशे चौगड़ दै - चारों ओर अणहूंता - अनजाने भोभर प्राग प्रोडी - संकट भीखो संकट हणन्त - हनन करनेवाला पाठवों सर्ग मान्स - अमावस्या चाणचकै . अचानक नानडियो - छोटा बच्चा

पूरै खण्ड काव्य स्यू
6अ-93
अपणे गुरुजी स्यू जाणकारी करो के खण्ड काव्य अर महाकाव्य
में काई फरक है ?
२ प्रबन्ध काव्य दूजे काव्यां स्यू कियां अलग है ।
३ ई काव्य में आपनै कुणसो सर्ग सगळाऊँ बढिया लाग्यो अर
किया?
४ नीचे लिख्या पात्रां रा काव्य रै अाधार पर चरित्र चित्रण करो:-
(क) शकुन्तला (ख) दुषन्त (ग) कण्व (घ) दुरवासा
(इ) कश्यप
५ ई काव्य में कुणसी रीतुवां रा बरणन मिलै है, प्रकृति बरणन
में कवि कठै ताई सफल हुयो है, अपणो विचार लिखो।
शकुन्तला रा कवि करणीदान बारहठ रो पूरो परिचय दयो।
७ शकुन्तला रै बिना राजस्थानी रा और खण्ड काव्यां री
जाणकारी देनो।
६ नुई राजस्थानी साहित्य रै दूजे कवियां रो परिचय दयो ।
६ खण्ड काव्य री निजर स्यूँ आप हिन्दी अर राजस्थानी री
तुलना करो।
r
१० 'मातर भासा रै माध्यम स्यू शिक्षा' पर एक लेख लिखो।

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Shakuntala(rajasthani Khand Kavya)

Author
Barahath Karnidan
Title
Shakuntala(rajasthani Khand Kavya)
File name
Shakuntala(rajasthani Khand Kavya)
Text
OCR done
Citation
1974
Published
2011/03
Publisher
Fhefhana, Devanand Barahath Prakashan(shriganganagar)
Language
Sanskrit
Pages
94
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
550736
Barcode
4990010031547.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
FBQ3KrhkJs1
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