Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Markandaya Purana(saral Hindi Bhshya) Khand-ii

Sharma,pt.shriram · 2012/08

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- मार्कराडेय पुराण के द्वितीय खराड की विषय-सूची ५१. भद्राश्वादिवर्प वर्णन-भद्राश्चवर्ण, केतुमाल वर्ष, कुरदेश प्रादि का भौगोलिक वर्णन ५२. किम्पुरुषादि वर्णन-किम्पुरुष वर्ष, हरिवर्ष, मेरुवर्ष, इलावृत्त रम्यक वर्प, हिरण्यमय वर्ष आदि के निवासियो का परिचय १३ ५३ स्वरोचिष मन्वन्तरारम्भ (२) ~मरुणासद नगर निवासी ब्राह्मण पौर वरूथिनी प्रप्सरा की कया ५४. कलि वरूपिनी समागम-कलि नामक गन्धर्व का छावेश धारण करके वरूथिनी को अपने प्राधीन करना २७ ५५. स्वरोचि का जन्म और विवाह-मनोरमा के साथ स्वरोचि का विवाह मोर उसको दो सखियो को रोगमुक्त करना ५६. स्वरोचि के अन्य विवाह-विभावरी मोर कलावती के साथ स्वरोचि का विवाह ५७. चक्रवाक और मृग का तिरस्कार-स्वरोधि की कामुकता देखकर चक्रवाको पोर मृग द्वारा उसका तिरस्कार ५८. स्वारोचिप मनु को उत्पत्ति-वन की अधिष्ठात्री देवी के साथ स्वरोचि का समागम और स्वारोचि मनु का जन्म ५६. स्वारोचिष मन्वन्तर कयन १०. निधि निर्णय-प्रष्ट निधियो का विवरण और उनका प्रभाव ६१. प्रौत्तम मन्वन्तर प्रारम्भ ( ३)-उत्तम राजा द्वारा रानी का परित्याग-ब्राह्मण-पत्नी का हरण-प नी त्याग के कारण उत्तम राजा की अवमानना । ६२. द्विजभार्या को पति के घर भैजना-राक्षम के बधन से द्विजपत्नी ७३ ६३ ऋपि से उत्तम का कयोरक्यन ७६ ६४ प्रोत्तम मनु की उत्पत्ति-उत्तम राजा का अपनी रानी को पुनः प्राप्त करना और ग्रौत्तम का जन्म ८३ ४८ को मुक्ति ६२ ६५. पौत्तम मन्वन्तर पथन ६० ६६. तामस मन्वन्तर--स्वराष्ट्र राजा का राज्यच्युत होना नदी मे मृगी से भेंट-तामस का जन्म पोर दात्रुप्रो पर उसकी विजय ६७. रेवत मन्वन्तर-रेवती नक्षत्र के गिरने से एक बन्या का जन्म मोर महाराज दुर्गम से उसका विवाह और रैवत मनु को उत्पत्ति १०१ ६८. चाक्षुप मन्वन्तर-भद्रा के गर्भ से ग्रानन्द का जन्म मोर तपस्या ब्रह्माजी द्वारा उसका मनु बनाया जाना ६६. वैवस्वत मन्वन्तर पारम्भ-सूर्य के पुत्र रूप से वैवस्वत मनु का जन्म और उनकी माता सज्ञा का गृह-त्याग १२० ७०. सूर्य स्तव और मश्विनी कुमारी की उत्पत्ति-देवतानो द्वारा मूर्य नारायण को स्तुति थौर घोड़ी के रूप मे संज्ञा से अश्विनी कुमारो का जन्म १२६ ७१. वैवस्वत मन्वन्तर कथन १३१ ७२. सावरियक मन्वन्तर ७३. देवी माहात्म्य-मधु कैटभ बध-राजा सुरथ और समाधि वैश्य का मेघा ऋपि से प्रश्न-मेधा ऋषि का देवी उपाख्यान सुनना-- मधुकैटभ का देवी द्वारा बध ७४. महिपासुर सैन्य वष-देवतापो के सम्मिलित तेज से देवी का माविर्भाव मोर उसका महिषासुर की सेना से भयकर संग्राम १४६ ७५. महिषासुर वध-महिषासुर के प्रमुख सेनाध्यक्षों और स्वय उसका देवी द्वारा मारा जाना ७६. शक्रादिकृत देवी-स्तुति ७७. देवी से शमुटूत का कथन-शंभु और निशभु का अलोक्य पर मधिकार पौर देवठामो को सहायतार्थ देवी को उन पर चढ़ाई, रामु का विवाह प्रस्ताव लेकर दूत भेजना १७७ ७९. धूम्रलोचन बघ ७६. चएह-मुण्ड बध १८३ ८०. रक्तबीज बध १८७ ८१. निगुम्म बध ८२ शुम्भ बध २०१ ८३ देवी-स्तोत्र-समस्त दानवो के मारे जाने पर देवतानो द्वारा देवी की स्तुति २०६ ८४ देवतामो का देवी का वरदान देवी के चरित्र श्रवण करने और देवी उपासना का महान माहात्म्य ८५ सुरथ और वश्य को देवी का वरदान २१९ ९६ पांच मन्वन्तर कथन-चार सावरिण और पांचवे रोच्य नामक मन्वन्तरो के देवता मुनि और राजा २२२ ८७ रुचि को पितरों का गार्हस्थ उपदेश-प्रजापति रुचि का वैराग्य धारण और पितरो का उनको गृहस्थ का उपदेश । २२६ ८८ रुचिकृत पुत्रस्तव-पली को प्राप्ति के लिये रुचि का तप करना ब्रह्मा जी की सम्मति से पितरो की स्तुति करना २३० ८६ रुचि को पितरो का वरदान-पितरो का प्रकट होकर रुचि को पत्नी पौर रोच्य नामक मनु के जन्म का वरदान देना और इस स्तोत्र की महिमा कथन करना। २३७ ६० रोच्य मनु का जन्म-प्रम्लोचना की कन्या मालिनी से रुचि का विवाह और रोच्य की उत्पत्ति २४२ ६१ भौत्य मन्वन्तर पारम्भ-भूति मुनि की पुत्र के लिए तपस्या- शान्ति मुनि द्वारा अग्नि की स्तुति २४४ ६२ सर्व मन्वन्तर श्रवण फल कथन-अग्नि का प्रकट होकर शाति को वरदान देना और भूति मुनि से भौत्य नामक मनु की उत्पत्ति 1 २५५ ६३ राज वंशानुकीतन-सृष्टि का प्रारम्भ और ब्रह्माजी द्वारा रचना कार्य प्रारम्भ २६२ १४ वेदमय मार्तण्ड की उत्पत्ति २६६ ६५ ब्रह्मकृत रवि स्तव २६६ ६६ कश्यप प्रजापति की सृष्टि-देवासुर संग्राम का प्रारम्भ और अदिति द्वारा भगवान भास्कर की स्तुति २७१ ६७ अदिति ये गर्भ रोमादिश्य वा जाम २७७ ६८. भानुनि लेखनमायाा भार पे प्रगहए तेत्र के पारण उनकी पत्नी का गृह त्याग-भार वा विश्वशर्मा को अपना तेज बम बरने का पादेश २८१ १९ विश्वकर्मा द्वारा सूर्य स्तवन २६१ १०० रवि महात्म्य वर्णन २६३ १०० (क) राज्यवद्धन की प्रायुवृद्धि-महाराज राज्यवर्टन के गुशा. सन के फल स्वरूप उनकी प्रजा का प्रेम और मूर्य भगवान को पाराधना द्वारा उनको घायुवृद्धि कराना । १०० (ख) राजा मोर प्रजा की मायुवृद्धि १०० (ग) सूर्य वशानुक्रम १००. (घ) पृपध्रोपाख्यान १०१ नाभागोपाख्यान (१)--द्विए राजा के पुत्र नामाग वा वंश्य- कन्या से विवाह करना और राज्याधिकार से वंचित होना । १०२ माभागोराख्यान (२) १२६ १०३ कृपावती उपाख्यान १०३ (क) भलनन्दन वत्सप्रीति चरित्र-वत्मप्रीति द्वारा जम्भ राक्षस के बध का वर्णन १०४ खनित्र चरित (१) ३४५। १०५ खनिन चरित (२) ३५३ १०६, विविंश चरित्र ३५६ । १०७, खनित्र चरित्र (३) ३५६ । १०८, करन्धम चरित्र ३६४ । १०६, प्रवीक्षित चरित्र (१)३६८ । ११०, अवीक्षित चरित्र (२)३७२ । १११. अधीक्षित चरित्र (३) ३७५ । ११२, प्रवीक्षित चरित्र (४) ३८५। ११३, मवीक्षित परिन (५) ३६०१ ११४, मस्त जन्म वर्णन ३६७ । ११४, मस्त चरित्र (१)४०२१ ११६, मरुत्त-चरित्र (२)४०८1 ११७, मरुत्त-चरित्र (३) ४१४ । ११८ मरुत्त चरित्र (४) ४१७ । ११६, नरिष्यन्त चरित्र ४२५ । १२०, दम चरित्र (१) ४३० । १२१, दम चरित्र (२) ४३६ । १२२, दम चरित्र (३) ४४४ । १२३, वपुष्मान बर ४४७ । १२४, पुराण श्रवण- पन फर ४५२ । १२५, मार्क डेराय पुराण एक-प्रध्ययन ४५८--५०४ दो शब्द भारतीय धार्मिक साहित्य का क्षेत्र बहुत विस्तृत है । उसमे अध्यात्म, नीति, चरित्र से लेकर इतिहास, भूगोल, उद्योग-धन्धे, कला-कौशल सब विषयो का समावेश किया गया है। इसका तात्पर्य यह है कि भारतीय मनीषियों ने जीवन की प्रत्येक गति-विधि का सम्बन्ध धर्म से माना है और अपने अनुयाइयो को सदैव यही शिक्षा दी है कि वे कभी धर्मविमुख आचरण न करें । शास्त्रो मे मानव जन्म के जो चार बडे पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष गिनाये गये हैं, उनमे भी धर्म को प्रथम स्थान इसी उद्देश्य से दिया गया है कि मनुष्य जीवन निर्वाह और सासारिक सुख प्राप्त करने के लिये अवश्य ही अथ का उपार्जन करे मोर उसके द्वारा भोगो का भी उपभोग करे पर उसकी कर्म- पद्धति सदैव धर्म द्वारा नियनित होनी आवश्यक है तभी वे जीवन के अन्तिम लक्ष्य-मोक्ष तक पहुंचने में समर्थ हो सकेंगे। पुराणो की सबसे बडी विशेषता यही है कि वे इन सिद्धातो को नित्य प्रति को साधारण पोर असाधारण घटनाओं के रूप मे ऐसे ढङ्ग से हमको सुनाते है जिससे हम जान सकें कि ससार के छोटे बडे सामान्य असामान्य और आकस्मिक कर्तव्यो का पालन किस प्रकार धार्मिक आदेशो की रक्षा करते हुए किया जा सकता है। इस विवेचन को हर श्रेणी का -बिल्कुल साधारण बुद्धि का और अनपढ व्यक्ति भी सुन और समझ सके, इसके लिये उन्होने उमे मनोरजक क्यानो का रूप दिया है और बहुत ही सरल वर्णन शैली का प्रयोग किया गया है। ऐसी दशा मे जो बालोचक प्रवृत्ति के सज्जन पुराणो को एक एक वात को इतिहास, तक और तथ्यो की कसौटी पर कसने का प्रयत्न करते हैं, उनका समय और श्रम प्राय व्यर्थ हो जाता है। वे अपनी समझ से पौराणिक क्थानो का खण्डन करके कोई बड़ा काम करते हैं। पर पुराणो के वास्तविक स्वरूप के ज्ञाता विद्वान् लोग तो इस प्रकार की लम्बी-चौडी पालोच- नामो को निरर्थक समभते हैं, और वेवल श्रद्धाभाव से क्या सुनने वाली मनपढ जनता पर भी उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे प्राचीन ऋपि महपियो - फे नाम पर लिरो धर्म ग्रन्थो के विपद वोई यात गुनना ही नहीं चाहते और ऐसे लेखों को 'नास्तिक' या 'प्रधामिर' की पदवी देकर छाप देते हैं। माण्डेयपुराण ये इस खण्ड मे जो कथायें आई हैं, उनमें से अधिनम राज्यवशो के कुछ विशिष्ट राजानों की कार्यवाहियों से सम्बन्ध रखती हैं। हो सक्ता है उनमे से कुछ राजानो के नाम यथार्थ हो-पौर पिन्ही युती की घटना भी न्यूनाधिक परिमाण मे विसी समय घटी हो, पर उनका वर्तमान रूप एक धार्मिक कहानी के समान हो मानना चाहिए । अनेक ऐतिहासिक, उपन्यासो और कहानियो के पात्रो तथा स्थानो के नाम सच्चे होते हैं और कुछ घटनाये भी मूल रूप मे ठीक होती हैं, पर पूरा कथानक लेखक की कल्पना- शक्ति से प्रसूत होता है । कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि यह पात्रो का जो कथोपकथन दे रहा है या उनके मनोभावो का जो चित्रण कर रहा है, वह किसी प्रत्यक्षदर्शी के बयान के ग्राधार पर ज्यो का त्यों लिखा गया है। इसके विपरीत लेखक उस कहानी के माध्यम स पाठकों को जो कुछ लाभकारी शिक्षा देना चाहता है उसी के अनुसार कथानक को डाल दिया जाता है । पुराणों के विषय में भी यही बात ठीक समझनी चाहिये । - एक बात और भी है ! अनेक पौराणिक कथाओ मे अनीति, अनुचित कर्म, दुराचरण का भी खुलकर वर्णन किया है जिसकी कुछ लोग निदा क्यिा करते हैं। पर उसका उद्देश्य भी यही है कि पाठको को जीवन के उत्तम पौर निकृष्ट, प्रशसनीय और निन्दनीय दोनो पहलू दिखा दिये जायें, जिससे भले की अच्छाई और बुरे की दुराई की शिक्षा उनके मन पर अङ्कित हो जाय । फिर अन्त म मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुसार तो भलाई अथवा दुराई की पोर तो झुक्ता ही है । यदि पुराणो से भी कोई निन्दनीय कर्मों को ही पसन्द करके उन्ही को ग्रहण करना चाहता है तो यह उसका अपना ही दोप माना जायगा। पुराण तो जन-समूह को सद्मा और परोपकारमय जीवन का ही उपदेश देते माये हैं मोर देठे रहगे। --सम्पादक

मार्कण्डेय पुराण
(द्वितीय खंड)
५१–भद्रासादिवर्ष वर्णन
एवतुभारतवर्पयथावत्कथितमुने।
कृतत्रेताद्वापरचनथातिप्यचतुष्टयम् ।।१
अवता गानान्तुचातुर्वण्यंचव द्विज ।
चत्वारितीणि चैवकर्यकक्शरच्यतम् ।।२
जीवन्त्यवनराब्रह्मन्कृतत्रेतादिपुक्रमात् ।
देवकूटस्यपूर्वस्यशलेन्द्रम्यमहात्मन ॥३
पूर्वेणयस्थितवर्षभद्राश्व तन्निवोधमे ।
श्वेतपर्णश्चनीलशवालश्वाचलोत्तम ॥४
कौरञ्च पर्णशालाग्र पचैतेहिकुलाचला ।
तेपाप्रसूतिरन्ययेवहव क्षुद्रपवता ।।५
तविशिष्टाजनपदानानास्पा महस्रश ।
तत कुमुदसकाशा शुद्धसानुसुमङ्गला ॥६
इत्येवमादयोऽन्येऽपिगतशोऽथसहनश ।
मीताशवावतीभद्राचनावादिकास्तथा ।
नद्योऽयवह्वयाविस्तीर्ण शीततायौघवाहिका ।
प्रत्रवनरा गड्वगुदमसमप्रभा ।।

१०] [ माण्डेय पुगगा मार्कण्डेयजी ने कहा-भारतवर्ष का यह वास्तविक वागंन किया गया. इसी भारतवर्ष में सत्ययुग, त्रेता, द्वापर पोर वलियुग यह चारो युग विद्यमान है ॥१॥ इसी स्थान में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र के भेद से चार वरा है, यहीं सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग के भेद से मनुष्यगण क्रमश चार सौ, तीन सौ, दो सौ और एक सो की आयु पाते है, पूर्व दिशा देववूट नामक विशाल पर्वत के ॥२-३॥ पूर्व की और जो वर्ष अवस्थित हैं, उसे भद्राश्ववर्ष कहते हैं, अब उसके विषय में कहता हूँ, श्वेतपणं, नील शैवाल ॥४ कोरञ्च, पर्यशालान यह पांच कुलाचल इस वर्ष में स्थित हैं तथा इसी वर्ष में इन सब पर्वती से उत्पन्न हुए अनेक छोटे पर्वत भी स्थित हैं ॥५॥ कुमुद, सकाश, शुद्धसानु, सुम- गल प्रादि अन्यान्य सहस्रो जनपद विभिन्न प्रकार से इस वर्ष में ही स्थित हैं, सोता, शखावती, भद्रा और चक्रावत आदि ॥६-७11 बहुत:सी अत्यन्त शीतल जल वाली नदियां इस मे प्रवहमान हैं, इस वर्ष मे उत्पन्न होने वाले सभी मनुष्य शख तथा स्वच्छ स्वर्ण के समान प्रभा सम्पन्न हैं ।।८।। दिव्यसमिन पुण्यादशवर्षशतायुष । अधमोत्तमनतेष्वस्तिसतसमदर्शना 6 तितिक्षादिभिरष्टाभि प्रकृत्यात्मगुणयुता । तथाप्यश्वशिरादेवश्चतुर्वाहुर्जनार्दन ॥१० शिरोहृदयमेढाड्विहस्तश्चाक्षित्रयान्वित. । तस्याप्यर्थवविपयाविज्ञ याजगत प्रभो ॥११ केतुमालमतोवर्पनिबोधममपश्चिमम् । विशाल.कम्बल कृष्णोजयन्तोहरिपर्वत ॥१२ विशोकोवर्द्ध मानश्चसप्त तेकुलपर्वता । अन्येसहस्रश शंलायेपुलोकगणःस्थित ॥१३ मौलयस्तेमहाकाया साकपोतकरम्भका । प्रज्वुलप्रमुखाश्चापिवसन्तिशतशोजना ॥१४ वे सत्सा सहित पवित्रता पूर्वक निवास करते हुए सहस्र वर्ष पर्यंत जीवित रहते हैं उनम कोई श्रेष्ठ अपवा अधम नहीं है ॥६॥ वहाँ के सब

भद्रामवादिवर्ष वर्णन ]
मनुष्य सभी प्रकार के गुणवान होते हैं, इस वर्ष में चतुर्भुजी भगवान् हयग्रीव
स्वरूप मे।१०। शिर,हृदय,मे, चरण हाथ और अक्षित्रयान्वित होकर अवस्थित
है, उन जगदीश्वर का सम्पूर्ण विषय इसी प्रकार समभो ॥११॥ अब सुमेरु के
पश्चिम में स्थित केतुमालवर्ष का वर्णन सुनो-इस वर्ष में जो सात कुलाचल
है वे विशाल, कम्बल, कृष्ण, जयन्त, हरि पर्वत ॥१२॥ विशोक और वर्तमान
नामक हैं, इनके अतिरिक्त और भी हजारो विशाल पर्वत हैं, जिनमे अनेक
प्राणी निवास करते हैं ।।१३।। उनमे शाक, पोत, करम्भक और अच्चुलारयादि
अनेक प्रकार के लोगो का निवास है ॥१४।।
येपिवन्तिमहानद्योवक्षुश्यामास्वकम्बलाम् ।
अमोघावामिनीश्यामातथैवान्या.सहस्रश ॥१५
अत्राप्यायु.समपूर्वरनापिभगवान्हरिः ।
वराहरूपीपादोस्यहृत्यू पावतस्तथा ॥१६
(मुखेनासादतश्च वकण्ठत पुच्छतस्तथा )।
जिनक्षत्रयुतेदेशेनक्षनारिणयुतानिच ।
इत्येतत्केतुमालतेकथितमुनिसत्तम ।।१७
अत परकुरुन्वक्ष्येनिवोधेहममोत्तरान् ।
तत्रवृक्षामधुफलानित्यपुष्पफलोपगा ॥१८
दस्त्राणिचप्रसूयन्तेफलेष्वाभरणानिच ।
सर्वकामप्रदास्तेहिसर्वकालफलप्रदाः ।।१६
भूमिमणिमयीवायु सुगध सर्वदासुख. ।
जायन्तेमानवास्तत्रदवलोकपरिच्युताः ॥२०
मिथुनानिप्रसूयन्तेसमकालस्थितानि ।
अन्योन्यमनुरक्तानिचक्रवाकोपमानिच ॥२१
जिन महानदियो के जल का यह लोग पान करते हैं, वे वक्षु, श्यामा,
कम्बला, ममोघा, कामिनी सुमेघा नाम की महानदी हैं, इनके अतिरिक्त अन्य
सहस्रो नदियां वहाँ प्रवाहित हैं ।।१५।। मनुष्यो की प्रायु वहाँ भी पूर्वोक्त ही
है, उस देश मे भगवान् श्रीहरि का निवास वाराह रूप से है, उनके चरण,

१२ ] [ मार्कण्डेय पुराण हृदय, मुख, पृष्ठ देश तया पावं मे मुख, नासिका, कण्ठ, दांत मौन पूछ सहित तीन नक्षत्रो रो पूर्ण हो कर सम्पूर्ण देश अवस्थित है, वहां भी नक्षत्र मुभा मुभ को मूचित करते रहते है ॥१६॥ हे मुने ! इस प्रकार वेतुमाल वर्ष का वर्णन भी कर दिया गया ॥१७॥ अब उत्तर कुरुदेश का वर्णन करता हूँ, उसे सुनो- इस देश मे सब तुओ के फल, पुष्प प्रादि से युक्त सर्व कामना एव सर्व फल के देने वाले वृक्ष ॥१८॥ वस्त्र उत्पन्न करते है तथा उनके सब फलो से पाभरण उत्पन्न होते हैं ॥१६॥ वहां की भूमि मरिणयुक्त, सुन्दर सुगधित वायु से सम्पन्न तथा सुख के देने वाली है स्वर्गलोक से भ्रष्ट हुए व्यक्ति ही वहाँ मनुष्य रूप में जन्म लेते हैं ॥२०॥ उनमे चक्रवाक के समान पारस्परिक प्रेम रहता है तथा समकाल मे बालको को उत्पन्न करते है ॥२१॥ चतुर्दशसहस्राणितेपासा निवंस्थिति. । चन्द्रकान्तश्चशैलेन्द्र सूर्यकान्तस्तथापर. ।।२२ तस्मिन्कुलाचलेवपेतन्मध्येचमहानदी। भद्रसोमाप्रियात्युापुण्यामलजलौघिनी ।।२३ सहस्रशस्तथ वान्यानद्योवर्षेऽपिचोत्तरे । तथान्या.क्षीरवाहिन्योघृतवाहिन्यएवच ।।२४ दघ्नोहदास्तथाततथान्येचानुपवता । अमृतास्वादकल्पानिफलानिविविधानिच ॥२५ बनेपुतेपुरम्याणिशतशोऽयसहस्रश.। तत्रापिभगवान्विष्णु प्राविछरामत्स्यरूपवान् ।।२६ विभक्तोनवधाविप्रनक्षत्राणानयत्रयम् । देशास्तत्रापिनवघाविभक्तामुनिसत्तम ।।२७ चन्द्रद्वीप समुद्र चभद्रद्वीपतस्थापरः। तत्रापिपुण्योविख्यात समुद्रान्तर्महामुने ।।२८ इत्येतत्वथितब्रह्मन्बुरुवर्षमयोतरम् । शृणुकिंपुरुपादीनिवाणिगदतोमम ॥२६ विपुग्पादि वर्णन ] वह माढ़े चौदह हजार वर्ष तक जीवित रहते हैं, इस वर्ष में चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त नामा दो कुलाचल स्थित है ।।२२।। उस पदंत में भद्रसोमा नाम की स्वच्छ जल वाली महानदी प्रवाहित है ।।२३।। इसके अतिरिक्त मन्य सहस्रों छोटी छोटी नदियां वहा हैं, अन्य नदियों में कोई दुग्य वाहिनी पौर कोई घृत वाहिनी है ॥२४॥ तया कोई दही के तान से युक्त है, सान कुलाचलों के प्रति- रिक्त अन्य क्षुद्र पर्वत बहुत से हैं, उत्तर कुरु में स्थित शन सहन वनों के मध्य स्थित सभी वृक्षो में विभिन्न प्रकार के सुस्वादु फल लगते हैं, इसी स्थान में पूर्व की भोर मस्तक करने मत्स्यरूप से घीनारायण भगवान् का वास है ॥२५- २६।। इस उत्तर कुरु मे नक्षत्र नो भागों में बंट कर तीन-नीन के क्रम से रहते हैं, इसी प्रकार सब देश नौ भागों में विभाजित है ॥२॥ इम वर्ष मे चन्द्रीप पौर भद्रद्वीप नामव दो पवित्र द्वीप हैं, जो ममुद्र के मध्य में स्थित हैं ॥२८॥ है ब्रह्मन् यह उत्तर कुरु वर्ष का यर्णन हुमा, अब रिम्पुरुषादि के विषय में कहना हैं ॥२॥ ५२-किम्पुरुषादि वर्णन यत किम्युरुपवर्पतत्प्रवक्ष्याम्यहद्विज । तत्रायुर्दशमाहव पुरपाणावपुप्मताम् ॥१ अनामयाद्यगोकाश्चनारायत्रतयास्त्रिय । प्लक्ष खण्डनयत्रोक्त मुमहानन्दनोपम 2 तस्यतेवं फलरसपिवन्तःपुरुषामदा । स्थिरयौवननिष्पनास्त्रियश्चोत्पलगन्धिका ॥३ अनःपरविपुम्पाद्धरिहर्पप्रचक्षते । महारजतमागाजायतेतनमानवा Im देवलोकच्युताम देवत्पात्रमश । हरिस्परमामपिपान्तनुस्ममुग्नम् १४ ॥ [ माकण्डेय पुराण नजराबाधतेतत्रनजीयन्तेर कहिचित् । तावन्तमेवतेकालजीवन्त्यनिरामया ॥६ मेरुवर्षमयाप्रोक्त मध्यमांदलावृतम् । नतत्रसूर्यस्तपतिनतेजीयन्तिमानवाः ॥७ मार्कण्डेय जी ने कहा-हे द्विजश्रेष्ट । अब क्म्पुिरुष नामक वर्ष का वृत्तान्त वहता हूँ, सुनो-वहां देहधारी मनुष्यो की प्रायु दश हजार वर्ष की हैं ।।१।। वहा के सभी स्त्री पुरुष नीरोग तथा शोक रहित होते हैं वहीं नन्दन वन के समान एक महान् प्लक्ष खण्ड स्थित है ॥२॥ उन वृक्षो के रस का पान करके ही मनुष्य स्थिर यौवन वाले एव नारिया पगन्धा होती हैं ।।३।। इस वर्ष के पृष्ठ भाग मे हरि वर्ष नामक एक अन्य वर्ष है ॥४॥ देव लोक से पतित हुए प्राणी हरि वर्ष में मनुष्य रूप में उत्पन्न होते हैं तथा वहा श्रेष्ठ ईख का रस पान करते हैं ॥५॥ वृद्धावस्था उनको पीडित नही करती, इसलिये जीर्गता को काई भी प्राप्त नहीं होता, वे जब तक जीवित रहते हैं तब तक यौवनावस्था गित रहती है तथा वे मदा नीरोग रहत हैं ॥६॥ मरवर्ष नामर मध्यम वर्ष को इलावृत्त भी कहते हैं, वहां का म्यं ताप रहित है और मनुष्य वहाँ भी वृद्धावस्था मे जोगणं नहीं होते ॥७॥ लभन्तनात्मनामचरश्मयश्चन्द्रसूर्ययो । ननवारणाग्रहारणाचमेरोस्तअपराध ति । पयप्रभा पद्यगन्धाजम्बूभलरसाशिन । पनपनायताक्षास्तुजायन्तेतत्रमानवा HE वर्षाणान्नुमद्यारिणतत्राप्यायुस्त्रयोदश । सारावावारगम्तारोमेग्मध्येइलावृते ।।१० मेएम्तत्रमहागलस्तदास्यातमिलापृतम् । रम्यय वर्षमस्माचरथमिप्यनियोधतम् ।।११ वृक्षरतत्रापियोतुगोन्यग्रोधाग्तिच्छदः । घरपापितफसरगपियन्तोवतंयन्तिये ॥१२ स्वारोचिप मन्वन्तरारम्भ (२) ] वर्षायुतायुपस्तननराम्नत्फलभोगिन । रतिप्रधानविमलाजरादौर्गन्ध्यवर्जिना १३ तस्मादयोत्तरवपनाम्नाल्यात हिरण्मयम् । हिरण्वतीनदोयनप्रभूनकमलोज्ज्वला ॥१४ महावला सतेजम्काजायन्तेतनमानवा । महाकायामहामत्वाधनिन प्रियदर्गना ॥१५ चप्रमा, सूर्य ग्रह मौर सव नक्षत्रो की किरणें वहाँ उज्ज्वलना को प्राप्त नहीं हो पाती, क्यो कि वहा मुमेरु का तीव्र प्रकाश रहता है । जो मनुष्य उम मेरु वर्ष मे उत्सन्न होते हैं, वह सभी कमल के ममान प्रमान युन, पचगन्ध और पद्म पत्र के समान विम्नीरणं नेत्र वाले तथा जामुन के फ्लो का रस पान करने वाले होते हैं । वे मनुष्य तेरह मह्म वर्ष को प्रायु वाले होते हैं, उस इलावृत्त के बीच में जो मेरु पर्वत स्थित है उसका मानार सोरे के समान है ॥१०॥ उग वर्ष में वह महापवत मैर ही प्रसिद्ध हैं, अब तुम्हें रम्यक दर्प के विषय में मुनाता हू, मे श्रदरण कगे ॥११॥ वन रम्यक वर्ष में एक अत्यन्त ऊँचा न्यग्रोध नामक वृक्ष है, उमरे ममस्त पत्र हा रस वे हैं, उन वृक्ष के रम पान द्वारा हो वहाँ वे मनुष्य जीवन धारण करन हैं ॥१२॥ उनके फलों के रम का पान बग्न वालो को प्रायु दम मन वर्ष होती है, वह रवि क्रिया में चतुर, मुन्दर नया दुर्गघि और जगदम्या में हित होते हैं ॥१३॥ उमरे उत्तर मे हिरण्यमय वयं स्थित है इसमें अनेक कमन पुष्पों से मुसोभित हिरण्य- वती नदी हिरप्ययुक्त उल मे परिपूर्ण प्रवाहित है ॥१४॥ वहीं उत्पन्न होने बाते मनुष्य अत्यन्न बली, तेजस्वी, मत्व सम्पन्न, प्रिम दर्शन, विमाल कार तथा धनवान होते हैं ॥१५॥ ५१-म्यागेचिप मन्वन्तगरम्भ (२) वपिनभवनाममग्यत्पृष्टोऽमिमहामुने । भूममुद्रादिमस्थानप्रमाग्गानिनयापहा ॥१

| मार्कण्डेय पुराण
तैपाचवप्रमाणयन्नक्षनाणाचसस्थिति ।
भूरादयस्तथालोका पातालान्यखिलान्यपि २
स्वायम्भुव तथाख्यातमुनेमन्वन्तरमम।
तदन्तराण्य हश्रोतुमिच्छेमन्वन्तराणिवे।
मन्वन्तराधिपान्देवानृपीस्तत्तनयान्नृपान् ॥३
मन्वन्तरमयाख्याततवस्वायम्भुवचयत् ।
स्वारोचिपाख्यमन्यत्त श्वणुतस्मादनन्तरम् ॥४
कश्चिद्विजातिप्रवरःपुरेऽभूदरुणास्पदे ।
वरुणायास्तटेविनोरूपेरणात्यश्विनावपि ॥५
मृदुस्वभाव सद्वृत्तीवेदवेदागपारग ।
सदातिथिप्रियोरानावागतानासमाश्रय ॥६
तस्यबुद्धिरियत्वासीदहपश्येवसुन्धराम् ।
अतिरम्यवनोद्यानानानानगरशोभिताम् ॥७
क्रौष्टुकि बोले-हेमहामुने । आपने मेरे समस्त प्रश्न का भले प्रकार
समाधान क्यिा पृथिवी और समुद्रादि की स्थिति, विस्तार एव ग्रह का परिमाण
॥१॥ नक्षत्रादि की स्थिति और परिमाण, भूरादि ससलोक, सप्त पाताल ॥२॥
तथा स्वायमुव नामद प्रख्यात मन्वन्तर आदि का भी वृत्तान्त कहा है, अब उक्त
मन्वन्तर के पश्चात् अन्य सब मन्वन्तर, उनके अधिपति, उनके वशीय राजा
गण देवता एव ऋपियो की कथा सुनने की मुझे उत्कट इच्छा है ॥३॥ मार्क-
एडेयजी ने कहा-जिस स्वायभुव मनु का विषय तुम्हारे प्रति कहा है, अब
उसके पश्चात् स्वारोचिप मन्वन्तर का वृत्तान्त सुनो ॥४॥ दोनो प्रश्विनिकुमारी
से भी अधिक रूपवान् शान्त स्वभाव वाला, चरित्रवान, वेद वेदाङ्ग का ज्ञाता
एष ब्राह्मण वरुणा नदी के तट पर स्थित मरुणास्पद नामव नगर में रहता
पा, वह मतिथि के भागम पर प्रत्यन्त प्रसन्न होता था तथा रात्रि के समय
पाने वाले व्यक्तियों के लिये वह माश्रय स्वरूप था ॥५-६|| उसके मन मे एक
एच्या बलवती थी कि मैं अत्यन्त मुरम्य वनो मोर उपवनो से सम्पन्न पौर
भनेर नगरी से मृगोभित इस पृथिवी को सम्पूर्ण रूप से देखू ॥७॥

स्वारोचिप मन्वन्तरारम्भ (२) ] [ १७ प्रयागतोऽतिथिःकश्चित्कदाचित्तस्यवेश्मनि । नानोपधिप्रभावज्ञोमन्त्रविद्याविशारदः । अभ्यथितस्तुतेनासोश्रद्धापूतेनचेतसा । तस्याचख्योसदेशाश्वरम्याणिनगरारिणच ॥ नदीवनानिशैलाश्चपुण्यान्यायतनानिच । सततोविस्मयाविष्ट प्राहत द्विजसत्तमम् ।।१० अनेकदेशदर्शित्वेनातिश्रमसमन्वितः । त्वनातिवृद्धोवयसानातिवृत्तश्चयौवनात् । कथमल्पेनकालेनपृथिवीमटसिद्विज ॥११ मन्त्रीपधिप्रभावेण विप्राप्रतिहतागतिः । योजनानासहस्र हिदिनाद्ध नव्रजाम्यहम् ।।१२ तत.सविप्रस्तंभूय.प्रत्युवाचेदमादरात् । श्रद्धधानोवचस्तस्यव्राह्मणस्यविपश्चित ॥१३ ममप्रसाद भगन्कुरुमन्त्रप्रभावजम् । द्रष्टुमेतामममहीमतीवेच्छाप्रवर्तते ॥१४ एक दिन उमके घर में सब पौषधियों के प्रभाव का ज्ञाता तथा मन्त्र विद्या में विद्वान् एक प्रतिथि का प्रागमन हुमा ॥८॥ ब्राह्मण द्वारा श्रद्धायुक्त मन से प्रश्न करने पर उमके अतिथि ने उमे अनेक देश, रमणीन नगर ॥६॥ वन, नदी, पवंत और मभी पवित्र स्थानो का वर्णन सुनाया तब उससे वह परणास्पद नगर निवासी ब्राह्मण माश्चर्य मे कहने लगा ॥१०॥ हे द्विज । आपने अनेक देशो को देखा है, तो भी आप श्रमाकान्त प्रतीत नहीं होते, भाप न तो वृद्ध है और न अधिक तरण ही हैं, मापकी मायु भी अधिर प्रतीन नहीं होती. तो मापने इम प्रत्य प्रवम्या मे ही मब पृथिवी में वैसे भ्रमण कर लिया ॥११॥ ब्राह्मण ने रहा-है ब्रह्मन् मन्त्रों और मौषधियों के प्रभाव मे मुझे पनिब गति की प्राप्ति हुई है और इस कारण मैं प्राधे दिन में सहन पोजन पल सकता हूँ ॥१२॥ मार्वएडेयजी ने कहा-तब उम ब्राह्मण विद्वान् प्रतिषि रे यनन में घमा पुन मन हो पर उमसे मादर निवेदन दिया ॥१३॥ हे १८ । [ मावंण्डेय पुराण भगवन् । आप मुझे भी औषधि प्रदान करने की कृपा परिये, क्यो कि इस पृथिवी को देखने के लिये में अत्यन्त उपठित है ॥१४॥ प्रादात्सब्राह्मणश्चास्मैपादलेपमुदारधी । अभिसन्त्रयामासदिशतेनाख्याताचयत्नतः ।।१५ तेनानुलिप्तपादोऽथसद्विजोद्विसत्तम । हिमवन्तमगाद्रष्टु नानाप्रस्रवणान्वितम् ॥१६ सहस्र योजनाना हिदिनार्धनवजामियत् । पायास्यामीतिसचिन्त्यतदद्ध नापरेणहि ।।१७ सप्राप्तोहिमवत्पृष्ठ नातिधान्ततनुद्विज । विचचारततम्तमतुहिनावलभूनले ॥१८ पादाबान्तेनतस्याथतुहिनेनविलीयता। प्रक्षालित पादले परमौषधिसभव ।।१६ ततोजडगतिःमोऽथ इतश्चेतश्चपर्यटन् । ददातिमनोज्ञानिसानूनिहिमभूभृत ॥२० सिद्धगन्धवंजुष्टानिकिन्नगभिरतानिच । श्रीडाविहाररम्यारिणदेवादीनामितस्तत ।।२१ यह सुन कर उस उदार चेता अतिथि न उस ब्राह्मण के पांव मे पौषधि का लप कर दिया और अभिमन्त्रण पूर्वक उसे दिशादि का ज्ञान दिया ॥१५॥ जब अनियि ने ब्राह्मण के पाव मे लेप लगादिया नब वह सोचने लगा जि 'पब मैं दिन के पूर्वाद्ध में एक हजार योजन गमन करगा तथा अपराई में वहाँ से लौट पाऊंगा, ऐसे विचार कर वह अनेक झरनो वाले हिमालय पर्वत को देवन की इच्छा मे चला ॥१६-१७॥ वह सहज मे ही हिमालय के पृट दम पर पहुंच कर उम हिमभूमि में भ्रमण करने लगा ॥१८॥ वहां घूमते. घूमने म पवि में प्रत्यन्त गौतनता के लगने में प्रोपषियुक्त लप धुल गया ॥१६॥ और उस ब्राह्मण वी जड गनि हो गई, फिर वह इधर-उधर घूमता हमा यहाँ में मोहर मानुश वा भाग देगने लगा ॥२०॥ उमने देखा मिड,

स्वारोचिष मन्वन्तरारम्भ (२) ]
[ १६
गन्धर्व, किन्नर वहां विहार कर रहे है तना पवंत के किनारे ही देवताओं के
क्रीडा और विहार करने के लिये अत्यन्त मनोहर स्थान निर्मित हैं ॥२१।।
दिव्याप्सरोगणशतैराकीर्णान्यवलोकयन् ।
नातृप्यतद्विजश्रेष्ठ प्रोद्भूतपुलकोमुने ।।२२
क्वचित्प्रस्रवणाभ्रष्टजलपातमनोरमम् ।
प्रनृत्यच्छिखिकेकाभिरन्यतश्चनिनादितम् ॥२३
दात्यूहकोयष्टिकाद्य क्वचिच्चातिमनोहरः ।
पुस्कोकिलकलापैश्च तिहारिभिरन्वितम् ॥२४
प्रफुल्लतगुरुगन्धेनवासितानिलवीजितम् ।
मुदायुक्त सददृशेहिमवन्तमहागिरिम् ।।२५
दृष्ट्वाचतद्विजसुतोहिमवन्तमहाचलम् ।
श्वोद्रक्ष्यामीतिसचिन्त्यमतिचक्रे गृहप्रति ।।२६
विभ्रष्टपादलेपोऽयचिरगेजडितक्रम ।
चिन्तयामासकिमिदमयाज्ञानादनुष्ठितम् ।।२७
यदिप्रलेपोनप्टोमेविलीनोहिमवारिणा !
शलोऽतिदुर्गमश्चायदूरचाहमिहागतः ।।२८
उसने उस स्थान को मैक्डो अप्सरानो से भरा हुमा देवा जिससे
उसका गरीर पुलक्ति हो गया और वह अपने मन की क्मिी प्रकार भी सृप्ति
नही कर पाया ॥२२|| उसने देखा कि यह पर्वत कही तो पर्वनो मे गिरती हुई
जलगशि से सुशोभित है, कही नृत्य करते हुए मयूरो के रव से शब्दायमान है)
तथा कही विभिन्न प्रकार के पक्षी मन को लुभाने वाली बोलो बोल रहे है
॥२३॥ कही पपीहा कोयष्टि, टिटोहरी आदि में वह पर्वत व्यात है और कही
दोपल के समान मधुर ध्वनि से प्रतिध्वनित है ।।२४॥ कही वृक्षो के प्रफुल्लित
पुप्पो को गन्ध से सुगन्धित हुई वायु से सुगन्धित है इस प्रकार वह उस पर्वत
की शोभा देख कर अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥२॥ फिर वह हिमाचल को देख कर
सोचने लगा कि कल प्रात काल पाकर पुन: देखू गा और फिर उमने चलने
रा विचार विया ॥२६॥ परन्तु पांवो का लेप छूग्न से जडगति हुपा वह

२. ] [ मार्कण्डेय पुराण बाह्मग मोचने लगा वि मैंने मज्ञान के वशीभूत होकर यह क्या कार्य कर हाला ॥२७॥ जब मेरा पद लेप घुल चुका है, तब यहाँ से जाना पश्यन्त दुषर है, कगें कि यह पर्वत मत्यन्त दुर्गम है पोर मरा घर भी बहुत दूर है ॥२॥ प्रयाम्यामिक्रियाहानिमग्निमुधू पणादिकम् । वयमत्रपरिप्यामिमवटमहदागतम् ।।२६ इदम्परमिदरभ्यमित्यस्मिन्वरपर्वते । मतदृष्टिरहंतृनियास्येऽन्दसतरपि ॥३. विमराणालालापा:ममन्ताच्छोवहारिणः । प्रपुनरगन्याभधारणमत्यन्तमृच्छति ।३१ मुपम्पर्मम्तयावायु फलानिग्मयन्ति । हरनियमनतोमनोजानिमरासिव ॥३२ एवगतनुपश्येयपदिकचित्तपोनिधिम् । मममोपदिमागंगमनायगृहप्रति ॥३३ गएपचिन्नमन्त्रिाय प्राममहिमानले। भाटापधिवनापरव पगमगत ३ मामलपमुनियवाधिनी। पराणायामोशापाविनी ॥५ म्वारोचिष मन्वन्तरारम्भ (२) ] [ २१ चिंता पूर्वक हिमालय में घूमने लगा ॥३४॥ उस समय उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को वहा घूमते हुए वरूथिनी नाम की मौलेया रूपवती अप्सरा ने देखा ॥३५॥ तस्मिन्दृष्टेतत.साभूद्विजवर्येवरूथिनी। मदनाकृष्टहृदयासानुरागाहितरक्षणात् ॥३६ चिन्तयामासकोन्वेपरमरणीयतमाकृतिः । सफलमेभवेज्जन्मयदिमांनावमन्यते ॥३७ अहोऽस्यरुपमाघुर्यमहोस्यललितागतिः । अहोगम्भीरतादृष्ट:कुतोऽस्यसदृशोभुवि ॥३८ दृष्टादेवास्तथाद त्या:सिद्धगन्धर्व पन्नगाः। कथमेकोऽपिनास्त्यस्यतुल्यरूपोमहात्मनः ॥३६ यथाहमस्मिन्मय्येपसानुरागस्तयायदि । भवेदनमयाकार्यस्तत्कृत.पुण्यसचयः ॥४० यद्यपायसुस्रिग्वादृष्टिमद्यनिपातयेत् । कृतपुण्यानमत्तोऽन्यात्रैलोक्येवनिताततः ।।४१ वह उसे देखते ही काम बाण से जर्जरित हो उठी और उसके प्रति तुरन्त ही अनुरागबती होगई ॥३६॥ उसने सोचा कि यह सुन्दर आकृति वाला पुरुप कोन है ? यदि यह मेरा आदर करे तो मैं कृतकृत्य हो जाऊँ ॥३७॥ इसकी कैसी अपूर्व माधुरी है, कमी मनोहर चाल, इसको गम्भीर दृष्टि में कैसा चमत्कार है, पृथिवी पर इसके तुल्य अन्य पुरुप कौन-सा है ? ॥३८॥ देवता, दैत्य, सिद्ध, गन्यवं, पन्नग इन सबको मैंने देसा है, परतु उनमे इसके समान स्पवान् कोई भी दिखाई न दिया ॥३६॥ मैं इसके प्रति जैसी प्रीतिवती हुई हूं, वैसी ही प्रीति यह भी मेरे प्रति करे तो मेरे पूर्व जन्म के कर्म का ही फल उदय हुमा समझो ॥४०॥ यदि यह मुझ पर अपनी स्निग्य दृष्टि डालें, तो तीनो लोक में मेरे समान मौर कौन-सी नारी होगी ॥४१॥ एव संचिन्तयन्तीसादिव्ययोपित्स्मरातुरा। प्रात्मानंदर्शयामासकमनीयतराकृतिम् ।।४२ २० ] [ मार्कण्डेय पुराण ब्राह्मण सोचने लगा कि मैंने अज्ञान के वशीभूत हो कर यह क्या कार्य कर डाला ॥२७॥ जब मेरा पद लेप धुल चुका है, तब यहाँ से जाना प्रत्यन्त दुष्कर है, क्योकि यह पर्वत अत्यन्त दुर्गम है और मेरा घर भी बहुत दूर है ॥२८॥ प्रयास्यामिक्रियाहानिमग्निशुश्रू पणादिकम् । कथमत्रकरिष्यामिसकटमहदागतम् ॥२६ इदम्परमिदरम्यमित्यस्मिन्वरपर्वते । सक्तदृष्टिरहतृप्तिनयास्येऽन्दशतैरपि ।।३० किन्नराणाकलालापाःसमन्ताच्छ्रोत्रहारिणः । प्रफुल्लतरुगन्धाश्चघ्राणमत्यन्तमृच्छति ।३१ सुखस्पर्गस्तथावायु फलानिरसवन्ति । हरन्तिप्रसभचेतोमनोज्ञानिसरासिच ।।३२ एवगतेतुपश्येययदिकचित्तपोनिधिम् । मममोपदिगेन्मार्गगमनायगृहप्रति ॥३३ मएवचिन्तयन्विप्रोबभ्रामचहिमाचले। भ्रष्टपादोपधिवलोवैवलव परमगत ॥३४ तददशंभ्रमन्तचमुनिष्ट वरूथिनी । घराप्मारामहाभागामौलेयाम्पशालिनी ॥३५ अब तो महान् संकट पागया है, यहा पग्नि सेवादि का वायं पंगे पगा? इस प्रकार तो नित्य कर्म भी नष्ट हो गया ॥२९॥ 'यह भी मनोहर है. यह भी' इरयादि मोचता हुमा पर्वत के देखने की इच्छा को सौ वर्ष में भी पूर्ण नहीं पर माता ॥३०॥ मव भोर मे विनरो का वर्ण-मुग्नप्रद मधुरालाप मुनाई पड गा है और पुष्पित पृशो मे पाती हुई मुगधि मे नासिका भी तृप्त हो गई है ॥३१॥ यह मुग-पग पवन चल रहा है, मभी प्रकार के फलो में ग. पौर मुरम्य मर्गवा में मन विषा जा रहा है ।।३२॥ मय इस प्रकार अप गमय पतीत होने पर या विमो तरोपनपा ददन पर तो उन पर जाने पा उपाय पूर्ण ॥५॥ मापंगडेयजी ने मा-गाय पगे मेप के पुल जान चौपभियान का क्षय हुमा मानना प्रत्पन्न दुषित हुपा ग्राह्यण म्वारोचिप मन्वन्तरारम्भ (२) ] २१ चिंता पूर्वक हिमालय मे घूमने लगा ॥३४॥ उस समय उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को वहा घूमते हुए वरुथिनी नाम की मलिया रूपवती अप्सरा ने देखा ॥३॥ तस्मिन्दृष्टे तत.साभूद्विजवर्येवरूथिनी। मदनाकृष्टहृदयासानुरागाहितत्क्षणात् ॥३६ चिन्तयामासकोन्वेपरमरणीयतमाकृतिः । सफलमेभवेज्जन्मयदिमांनावमन्यते ॥३७ अहोऽस्यरूपमाघुर्यमहोस्यललितागतिः । अहोगम्भीरतादृष्ट:कुतोऽस्यसदृशोभुवि ॥३८ दृष्टादेवास्तथाद त्या:सिद्धगन्धर्व पन्नगाः। कथमेकोऽपिनास्त्यस्यतुल्यरूपोमहात्मनः ॥३६ यथाहमस्मिन्मय्येपसानुरागस्तथायदि । भवेदत्रमयाकार्यस्तत्कृत.पुण्यसचयः ।।४० यद्य पर्मायसुस्रिग्धादृष्टिमद्यनिपातयेत् । कृतपुण्यानमत्तोऽन्यात्रैलोक्येवनितातत. ॥४१ वह उसे देखते ही काम वाण से जर्जरित हो उठी और उसके प्रति तुरन्त ही अनुरागवती होगई ॥३६॥ उसने सोचा कि यह सुन्दर आकृति वाला पुरुष कौन है ? यदि यह मेरा आदर करे तो मैं कृतकृत्य हो जाऊँ ॥३७॥ इसकी कैसी अपूर्व माधुरी है, कैमी मनोहर चाल, इसको गम्भीर दृष्टि में कसा चमत्कार है, पृथिवी पर इसके तुल्य अन्य पुरुष कौन-सा है ? ॥३८।। देवता, दत्य, सिद्ध, गन्धर्व, पन्नग इन सबको मैंने देखा है, परतु उनमे इसके समान स्पवान् कोई भी दिखाई न दिया ॥३६मैं इसके प्रति जैसी प्रीतिवती हुई हूं, वैसी ही प्रीति यह भी मेरे प्रति करे तो मेरे पूर्व जन्म के कर्म का ही फ्ल उदय हुमा समझो ॥४०॥ यदि यह मुझ पर अपनी स्निग्ध दृष्टि डालें, तो तोनो लोक में मेरे समान और कौन-सी नारी होगी ।।४१॥ एवं संचिन्तयन्तीसादिव्ययोपित्स्मरातुरा। प्रात्मानंदर्शयामासुकमनीयतराकृतिम् ॥४२ [ माण्डेय पुराण २२ ॥ तानुदृष्ट्वाद्विजसुतश्वारूपावरूथिनीम् । मोपचारसमागम्यवाक्यमेतदुवाचह ।।४३ कात्व कमलगर्भाभेकस्यकिवानुतिष्टसि । ब्राह्मणोऽहमिहायातोनगरादरुणास्पदात् ॥४४ पादलेपोऽनमेध्वस्तोविलीनोहिमवारिणा । यस्यानुभावादत्राहमागतोमदिरेक्षणे ॥४५ मोलेयाहमहाभागानाम्नास्याता वरुथिनी। विचरामिसदवाब रमणायमहाचले ॥४६ साहत्वदर्शनाद्विप्रकामवैक्लव्यतागता । प्रशाधियन्मयाकायंत्वदधीनास्मिसाप्रतम् ॥४७ येनोपायेनगच्छेयनिजगेहशुचिस्मिते । तन्ममाचक्ष्वपल्यारिणहानिर्नोऽखिल कर्मणाम् ॥४८ नित्यनमित्तिकानातुमहाहानिद्विजन्मन । भवत्यतस्त्वहेभद्रमामुद्धरहिमालयात् ।।४६ माण्डेयजी न बहा~-दिव्यबाला वरूथिनी कामातुर हुई इसी प्रकार विचार भरती-मरती उग माह्मण को मपने मन प्रत्यङ्ग दिवाने लगी ॥४२॥ उम रूपवती का उस ब्राह्मण न जसे हो देखा वैसे ही विधि पूर्वक पाद्यादि उपचार के महिन उमरे पास जा कर बोला ॥४३॥ हे मुन्दरे । तुम्हारा वर्ण पद्म-गर्भ जैसा मनोहर है, तुम मोन, किरायी पत्नी हो? यहाँ क्या कर रही हो ? माहाग है और यही अपारपद नगर में प्रा पहुंचा ह ।।४४।। मैं जिस पौषधिमय पर लेप द्वारा यहा प्राया था, वह पीतल जल में धुल गया है पौर में पब इगम विलीन हो गया हूँ ॥४५॥ वरूपिनी ने पहा-हे महाभाग का नाम यदिनी है, मैं यह हम मुरम्य पर्वत पर गदा भ्रमण करती रहती । तुम्हें दैप पर मैं शाम के पदा में हुई हूँ, मैं भापरे अधीन है. मुझे बाजा कीप्रिय मिना प्रिय ॥४७॥ बाह्यगा नार- मिम्मिने त्रिग प्रसार पाने पर पोट शबू', यह उपाय को, पादागने में यह मेरे निष्प नमिसिर मष्ट हो रहे हैं 11 प्राधा - २४ ] [ मार्कण्डेय पुराण तुम्हारे समक्ष उपस्थित करूंगी, क्यो कि मैं काम से पराजित हो कर तुम्हारे अधीन हो गई हूँ ॥५६॥ वीणावेरगुस्वनगीतविन्नराणामनोरमम् । अङ्गालादकरोवायुरुष्णान्नमुदकशुचि ।।५७ मनोभिलषिताशय्यासुगधमनुलेपनम् । इहासतोमहाभागगृहेकिंतेनिजेऽधिकम् ॥५८ इहासतोनवजराकदाचित्तेभविष्यति । निदशानामियभूमियौवनोपचयप्रदा ॥५६ इत्युक्त्वासानुरागासासहसाकमलेक्षणा। आलिलिङ्गप्रसोदेतिवदन्तीकलमुन्मना. ॥६० मामास्प्राक्षी जान्यत्रदुष्टेय सशस्तव । मयान्यथायाचितात्वमन्यथैवाभ्युपैषिमाम् ॥६१ सायप्रातहुं तहव्यलोकान्यच्छतिशाश्वतान् । त्रैलोक्यमेतदखिलमूढेहव्येप्रतिष्ठितम् ॥६२ तमुपायसमाचधयेनयामिस्वमालयम् । कितेनाहप्रियाविप्ररमणीयोनकिगिरिः। गन्धर्वाकिन्नरादीश्चत्यक्त्वा भिष्टोहिकस्तव ॥६३ इस स्थान मे रहन से वीणा और वेणु का शब्द, किन्नरो का सुमधुर सगीत, प्रसन्नता देने वाली समीर, उष्ण भोजन और शीतल जल ॥५७॥ मन- घाही शय्या, सुगन्धित अनुलेप तुम्हे उपलब्ध होग, इससे अधिक तुम्हारे गृह म भोर क्या होगा ? ॥५८॥ यहाँ रहकर तुम कभी वृद्धावस्या को प्राप्त नहीं होंगे, क्योकि यह देवभूमि यौवन के बढाने वाली है ॥५६।। इतना कहकर पद्मनयना घरूथिनी व्याकुलता पूर्वक 'प्रसन्न होओ' कहती हुई सहसा ब्राह्मण से प्रालिंगित हुई ॥६०॥ तव ब्राह्मण वोला-परी दुष्टे । मेरा स्पर्श न कर, तू अपने योग्य के ही निकट जा, तू मेरी प्रार्थना के कारण ऐसा विपरीत विचार एव चेष्टा कर रही है ।।११॥ प्रात साय होम करन से सभी शाश्वत लोको की प्राप्ति होती है यह तीनो लोक होम के प्रभाव से ही प्रतिदिन हैं ॥६२।। इमलिये उसके [ मार्कण्डेय पुराण है तो मैं जिस प्रकार घर पहुंच सकू वही मुझे बता ॥६८ वरूथिनी ने कहा- तुम अवश्य ही यहाँ से अपने घर जा सकोगे, परन्तु अभी कुछ समय के लिये मेरे साथ दुर्लभ सुख भोग करो ॥६६) ब्राह्मण बोला-हे वरूधिनी ? ब्राह्मण को सुख भोग को आज्ञा शास्त्र नहीं देता क्यो कि स्त्री की चेष्टा से ब्राह्मण इहलोक मे क्लेश और परलोक मे भी विपरीत फल पाता है ॥७॥ सन्ताराम्रियमाणायाममकृत्वापरत्रते । पुण्यस्यैवफलभाविभोगाश्चान्यत्रजन्मनि ॥७१ एवचद्वयमप्यत्रतवोपचयकारणम् । प्रत्याख्यानादहमृत्यु त्वचपापमवाप्स्यसि ।।७२ परस्त्रियनाभिलपेदित्यूचुर्गुरवोमम । तेनत्वानाभिवाञ्छामिकामविशुलपष्यवा ।।७३ इत्युक्त्वासमहाभाग स्पृष्ट्वाप प्रयत शुचि । प्राहेदप्रणिपत्याग्निगार्हपत्यमुपाशुना ।।७४ भगवन्गाहपत्याग्नेयोनिस्त्वसर्वकर्मणाम् । त्वत्तग्राहवनीयोऽग्निदक्षिणाग्निश्चनान्यतः ।।७५ युष्मदाप्यायनाद्देवावृष्टिमस्यादिहेतवः । भवन्तिसस्यादखिलजगद्भवतिनान्यत ७६ एवत्वत्तोभवत्येतद्य नसत्येनवजगत् । तयाह्मद्यस्वगेपश्येयसतिभास्करे ॥६७ यथाववैदिवकर्मस्वकालेनोज्झितमया। तेसत्येनपश्येयगृहस्थोऽद्यदिवाकरम् ।।७८ यथाचनपरद्रव्यपरदारेचममतिः। पदाचिरमालिपाभूत्तथतत्मिदिमेतुमे 194 एयतुबदतस्तस्य द्विजपुत्रस्यपायर । वरूपिनी ने पहा~में मृतक के समान हो रही है, मेरी प्राण रक्षा परने पाण परलो मे तुम्हें उगी के ममान पुएम फप मिलेगा परि पार जम में नुपएँ उगी के भनेर भोगों की प्राप्ति होगी ॥७॥ परसोरमे

२६ ]
[ मारंडेय पुराण
है तो मैं जिस प्रकार घर पहुंच सकू वही मुझे चता ॥६८ वरूथिनी ने कहा-
तुम अवश्य ही यहाँ से अपने घर जा सकोगे, परन्तु अभी कुछ समय के लिये
मेरे साथ दुर्लभ सुख भोग करो ॥६६॥ ब्राह्मण बोला-हे वरूथिनी ? ब्राहारा
को सुख भोग की आज्ञा शास्त्र नहीं देता क्यो कि स्त्री को चेष्टा से ब्राह्मण
इहलोक मे क्लेश और परलोक मे भी विपरीत फर पाता है 11७०॥
सन्त्रागनियमाणायाममकृत्वापरत्रते।
पुण्यस्यैवफलभाविभोगाश्चान्यत्रजन्मनि ।७१
एक्चद्वयमप्यत्रतवोपचयकारएम् ।
प्रत्याख्यानादहमृत्यु त्वचपापमवाप्स्यसि ।।७२
परस्त्रियनाभिलषेदित्यूचुगु रवोमम ।
सेनत्वामाभिवाञ्छामिकामविशुलपष्यवा ।।७३
इत्युक्त्वासमहाभाग स्पृष्ट्वाप प्रयत शुचि ।
प्राहेदप्रणिपत्याग्निगार्हपत्यमुपाशुना [७४
भगवन्गाहपत्याग्नेयोनिस्त्वसर्वकर्मणाम् ।
त्वत्तग्राहवनीयोऽग्निदक्षिणाग्निश्चनान्यत १७५
युष्मदाप्यायना वावृष्टिमस्यादिहेतव ।
भवन्तिसस्याखिलजगद्भवतिनान्यत ७६
एवत्वत्तोभवत्येतद्य नसत्येनवैजगत् ।
तथाहमद्यस्वगेहपश्येयसतिभास्करे ॥६७
पथाववैदिकर्मस्वकालेनोज्झितमया ।
तेसत्येनपश्येयगृहस्थोऽद्यदिवाकरम् ॥७८
यथाचनपरद्रव्येपरदारेचमेमति.।
कदाचित्सालिषाभूत्तथतत्सिद्धिमेतुमे ।।७६
एवतुवदतस्तस्य द्विजपुत्रस्यपावर ।
वरूथिनी ने कहा- मैं मृतक के समान हो रही हूँ, मेरी प्राण रक्षा
करने के कारण परलोर मे तुम्हें उसी के समान पुण्य फल मिलेगा परि
अपर जाम में तुम्हे उमी के अनेक भोगों की प्राप्ति होगी ॥७११ परलोक में

२८ ] [ मावण्डेय पुराण तत.क्षरणेनवतदानिजमेहमवाप्यसः । यथाप्रोक्तद्विजश्रोष्टकारसवला:क्रियाः ॥६ प्रथसाचारसर्वा गीतवासत्तात्ममानसा । निश्वासपरमानिन्येदिनशेपतथानिशाम् ॥७ मार्कण्डेयजी ने कहा-इस प्रकार निवेदन करते हुए ब्राह्मण पुत्र के गार्हपत्याग्नि अधिष्ठित हुई ॥१॥ उसको प्रभा के मध्य में स्थित हो कर वह ब्राह्मण साक्षात् अग्नि समान तेजस्वी हो कर उस स्थान को प्रकाशित करने लगा ॥२॥ हे ब्रह्मन् ! वरूथिनी ने जब उस ब्राह्मण का ऐसा स्वरूप देखा तब वह अत्यन्त अनुराग से और भी मोह युक्त हुई ॥३॥ जब उस ब्राह्मण में अग्नि ने अधिष्ठान क्यिा तब वह पहिले के समान शक्ति युक्त हो कर गमन मे प्रवृत्त हुमा उस समय वहथिनी खडी हुई देख रही थी कि तभी यह ब्राह्मण द्रुतगति से चल दिया, जब वह अदृश्य हो गया, तब वरूथिनी वीर्घ श्वास लेती हुई कापने लगी ।।५।। यह श्रेष्ठ ब्राह्मण क्षण भर मे ही अपने घर पहुच गया और वहा पपनी नित्य नैमित्तिक क्रिया के करने में लगा ॥६॥ इधर उस सर्वाङ्ग सुन्दरी वरूथिनी ने उस ब्राह्मरण में अनुरागवती रह कर दीर्घ श्वास छोडते हुए उम दिन का शेष भाग एव रात्रि काल व्यतीत किया ।।७।। निश्वरान्त्यनवद्याङ्गीहाहेतिरदतीमुहु. । मन्दभाग्ये तिचारमाननिनिन्दमदिरेक्षणा ॥८ नविहारेनचाहारेरमणीयेनवावने । नकन्दरपुरम्येपुसाववधतदारतिम् ॥6 कलिवरूथिनी समागम ] [ २६ रमणीयमभूद्यत्तत्पु स्कोक्लिनिनादितम् । तेनहीनतदेवतद्दहतीवाद्यमामलम् ॥१३ इत्थमामदानाविष्टाजगाममुनिसत्तमम् । ववृधेचतदारागस्तस्यास्तस्मिन्प्रतिक्षणम् ॥१४ वह अप्सरा घोर रुदन करती हुई दीर्घश्वास छोडने लगी और अपने को मन्द भाग समझ कर अपनी निन्दा करने लगी ।।८।। आहार, विहार, सुरम्य धन, मनोहर गिरि कन्दर। किसी से भी उसकी तृप्ति न हो रही थी ॥६ चक्रवाको का विहार देख कर रति कर्म मे उसे स्पृहा हुई, वह ब्राह्मण द्वारा त्यागी जाने के कारण अपनी युवावस्था को दोसने लगी ॥१०॥ मैं दुष्ट देव के वश से ही इस पर्वत में आई थी अन्यथा वह सर्वाङ्ग सुन्दर पुरुष जो मुझे दिखाई दिया था, उसका देखा जाना क्या कभी सभव था। मैं उसे क्या जानती यो॥११॥ यदि वह महाभाग इस समय मुझे न मिलेगा, तो दु सह सामाग्नि मे दग्य होकर मुझे अपने जीवन का परित्याग करना पडेगा ॥१२॥ जो कोकिला का शब्द मेरे कानों को मनोरजक प्रतीत होता था, वह माज अग्नि के समान हो मुझे भस्म कर रहा है ।।१३।। मर्कण्डेयजी ने कहा-इस प्रकार कामासक्त हुई वरूथिनी ने उस मुनि श्रेष्ठ को मन से देखा तो उसका अनुराग क्षण क्षण में उसके प्रति वृद्धि को प्राप्त होता रहा ॥१४॥ कलिनाम्नातुगन्धर्व सानुरागोनिराकृत । तयापूर्वमभूत्सोऽयतदवस्थाददर्शताम् ॥१५ सचिन्तयामासतदाकिन्वेपागजगामिनी । निश्वासपवनम्लानागिराववरूथिनी ॥१६ मुनिशापक्षताविनुकेनचित्किविमानिता । बाप्पवारिपरिक्लिन्नमियधत्तेयतोमुखम् ॥१७ तत सदध्यौसुचिरतमर्थकौतुकात्कलि । ज्ञातवाश्चप्रभावेणसमाधे सयथातथम् ।।१८ पुन सचिन्तयामासतद्विज्ञायमुने कलि । ममोपलादितसाधुभाग्यरतत्पुरावृतः ।।१६ ३० ] [ माण्डेय पुराण मयपासानुरागेणयहुश प्राथितासती । निराकृतवतीसे यमद्यप्राप्याभविष्यति ॥२० मानुपेसानुरागेयतत्रतद्र पधारिणि । रस्यतेमय्यसन्दिग्धकिकाले नकरोमितत् ॥२१ इस अप्सरा के प्रति पहिले एक कलि नामक गन्धर्व प्रासक्त था, परन्तु इसने उसका निरादर क्यिा था, उसने इस अप्सरा को ऐसी दशा मे देखा तो ॥१५॥ सोचने लगा कि यह गजगामिनी इस पर्वत मे दीर्घ श्वास छोटती हुई प्रतिक्षण म्लान होती जा रही है, क्या यह वरूथिनी ही है ? ॥१६॥ क्या यह किसी मुनि के शाप ग्रस्त हुई है अथवा किसी ने इसका निरादर दिया है, क्यो कि इसके मुख पर अश्र बिन्दु दिखाई दे रहे है ।।१७।। फिर उस गन्धर्व ने कुतूहल पूर्वक बहुत समय तक ध्यान किया और उसके द्वारा सव वृत्तान्त उसे ज्ञात होगया ॥१८।। वृत्तान्त ज्ञात होने पर उसने सोचा कि मेरे पूर्वकृत पुण्य के फल स्वरूप मेरी यह इच्छा पूर्ण हुई है ।।१६। जिसने मेरी अनुराग- मयी विनय को ठुकरा दिया था, यह वही वरूथिनी अब मुझे सहज से प्राप्त हो जायगी ॥२०॥ अब यह जिस मनुष्य के प्रति प्रीतिमती हुई है, मैं उसी 'मुनि का रूप धारण करू' तो यह मुझ से भी प्रीति करेगी, इस लिये अब देर यो करूं ॥२१॥ ग्रात्मप्रभावेणततस्तस्यरूपद्विजन्मनः। कृत्वाचचारयत्रास्तेनिघण्णासावरूथिनी ।।२२ सातदृष्ट्वावरारोहाकिचिदुत्फुल्ललोचना । समेत्यपाहतन्वंगीप्रसीदेतिपुन पुनः ॥२३ त्वयात्यक्तानसन्देह परित्यक्ष्यामिजीवितम् । तत्राधर्म कष्टतरःक्रियालोपोभविष्यति ॥२४ मयासमेत्यरम्येऽस्मिन्महात्मन्वनकन्दरे । मत्परिवागजधर्ममवश्यप्रतिपत्स्यसे ।२५ पायुपःसावशेपमेनूनमस्तिमहामते । निवृत्तस्तेननूनहिहृदयालादकारकः ॥२६ पनि वम्यिनी समागम ] [ ३१ माईएडेयजी ने वहा-इसरे पश्चात् उमने बात्म प्रभाव से उन बाहाण का रूप धारण किया और जहां वरूथिनी बैठी थी, दहां जाकर घूमने लगा ।।२२॥ वधिनी ने बम ही उस मुनि पेशयारो पनि को देखा तभी आज़ादयुक्त नेत्रों से उसे देख और निकट पहुंचकर उससे बारम्बार प्रमन होगो कन लगी ॥२३॥ और बोली कि यदि तुम मेरा त्याग करोगे तो में अपना जीवन ममाप्त कर लगी, जिससे अधर्म होगा और तुम्हारी सम्पूर्ण क्रिया का भी लोप हो जायगा ॥२४॥ यदि इस हिमालय को मुरम्ब फन्दरा म मेरे साय विहार करोग तो उसने मेरी रक्षा होगी और उसका धर्म फल तुम्हें प्राप्त होगा ॥२॥ ह महामने । मेगे आयु अभी तक मेप नहीं हुई है, इसीलिए तुम निवृत्त होकर मेर हृदय में प्रानन्द का प्रचार कर मके हो ॥२६॥ किरोमिनियाहानिर्भवत्यनसतोमम । त्वमप्येव विधवाक्यद्रवीपितनुमव्यमे २७ तदहसक्टप्राप्तोपद्रवीमिकरापितत् । यदिस्यात्सगमोमेद्यभवत्वामह्नान्यथा ।।२८ प्रमोदयद्वीपित्वनकरोमिनतेमृपा । ब्रवीम्येतदनारास यद्यत्वार्यमयाधुना ॥२६ नाद्यमभागममयेद्रष्टव्योहत्वयावने । निमोलिनाध्या ससर्गस्तवसुभ्र मयासह ॥३० एवमवतुभद्र तेयथेच्छसितथास्तुतत् । मयासर्वप्रकारहिवोस्थेयतवाधुना ॥३१ पलि बोला-है सुन्दरी समझ म नहीं माना कि क्या ? यहाँ रहने में मेरे कर्म का लोर हो जायगा, परन्तु नुम भी इस प्रकार से अनुरोध कर रही हो। ऐसे मट में पहारही मुझे तुम्हारी बातों में यव महमत होना पड़ा है, परन्तु मैं जो कहता हूँ, वह बात तुम्ह स्वीकार हो नभी तुम्हारे साप समोर हो सकता है, अथग नहीं हो साता ॥२॥ चापिनी ने कहा-मार को, जो यहाग वही मैं करेंगी इनमे ममर [ माण्डेय पुराण नहीं है जो रहते हो वह मभी वरंगी ॥२॥ पनि बोला- तुम विहार रेममय मुझे न देखना, मंमग कान में तुम्हें नेत्र बन्द किये रहना होगा ॥३०॥ पपिनी ने कहा--ही होगा, ना तुम चाहते हो, वैसा ही होगा, मैं सब प्रभार से तुम्हारे धोन. तुम्हारा मगन हो ॥३१॥ ५५--स्वरोचि का जन्म और विवाह ततःगनपानोपररामगिरिमानुपु । पुलवाननदयपुमनोमपुमरम्मुन ॥१ पन्दरपुरगम्येनिम्नगासिनेपुर । मनोपनपाएगेपमुदितीदिन र वहिनाधिनियामोद्र पतम्यतेजसा । पिनपद्रोगालेनिमोनितवितांचना ॥३ जापाननागर्भमवापमुनिमसम । माधभपातोपाचननादिजन्मनः ॥४ सागधारिणीमध्यमारपियायापिनीम् । विनाअम्मानीयापिमधिन. ॥

स्वरोचि का जन्म और विवाह ] [ ३३ तेजोजमय स्वरूप का चिनन करने के कारण, उमी ब्राह्मण के समान उसके पुत्र उत्पन्न हुआ ॥४॥ ब्राह्मण रूप धारी वह गधर्व वरूथिनी को समझाकर वहां से चला गया ॥५॥ जिस प्रकार सूर्य की किरणो से सभी दिशाएं प्रकाशित होती है, वैसे ही शरीर के तेज से चारो दिशामो को प्रकाशित करते हुए उस बालक ने समय पाकर जन्म लिया ॥६॥ अपने शरीर की प्रभा से भास्कर जैसी दीति प्राप्त करने के कारण उस बालक का नाम स्वरोचि हुप्रा ॥७॥ ववृधेचमहाभागोवयसानुदिनतथा । गुणौघश्चयथावाल कलाभि शशलाञ्छन । सजग्राहधनुर्वेदवेदाश्च वयथाक्रमम् । विद्याश्चैवमहाभागस्तदायौवनगोचर ॥ मन्दराद्रौकदाचित्सविचरश्चारुचेष्टित । ददर्शकातदाकन्यागिरिप्रस्थेभयातुराम् ॥१० पायस्वेतिनिरीक्ष्यंनसातदावाक्यमब्रवीत् । माभैषीरितिसप्राहभयवि'लुतलोचनाम् ॥११ किमेतदितितेनोक्त वीरवाक्येमहात्मना । तत साकथयामासश्वासाक्षेपप्लुताक्षरम् ।।१२ अहमिन्दीवराज्यस्यसुताविद्याधरस्यवै। नाम्नामनोरमाजातासुतायामरुधन्वन ॥१३ मन्दारविद्याधरजासखीममविभावरी। कलावतीचाप्यपरासुतापारस्यवेमुने ।।१४ हे महाभाग 1 जैसे शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की कला प्रति दिन वृद्धि को प्राप्त होती है, वैसे ही उस वालक के गुणो मे प्रतिदिन वृद्धि होने लगी ॥८॥ इस स्वरोचि ने चारो वेद, सभी शास्त्र और धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त करके युवावस्था मे प्रवेश किया ।।६॥ उस सुन्दर गति वाले स्वरोचि को किसी एक समय मदराचल पर भ्रमण करते हुए एक भयातुरा कन्या दिवाई दी ॥१०॥ उसने इसे देखकर 'रक्षा करो' कहा और इमने भी कन्या ४ ] [ मार्कण्डेय पुराण को भयातुरा देवार भय नहीं' कह कर प्राश्वस्त किया ॥१॥ फिर उसने दोगेचित शब्दों मे 'तुम्हे का भय हुमा है।' यह पूड़ा, इस पर श्वास छोडनी हुई उम वन्य न प्रस्फुट शो में उत्तर दिया ॥१२॥ वह बोली- मैं इन्दीवर नामक विद्याधर वो मायदा-मुता ये गर्भ मे उत्पन्न पुत्री हू, मेरा नाम मनोरमा है ॥१२॥ मेरी दो सखी विभावरी धौर वलावती नाम की हैं, इन में प्रथम मन्दार विद्यालय की और द्वितीय पार मुनि की कन्या है ॥१४॥ तान्यासहमयायातक्लासतमुत्तमम् । तपदृष्टोमुनि रश्चित्तपमातिनाति ॥१५ धुत्सामाण्टोनिस्तेजादूग्पाताक्षितारक.। मपावहमित रद्ध मतदामाशापह ।।१६ सामक्षासम्बर विचित पिनाघरपल्लव. । स्थयारह मितोयम्मादनारदुष्टातापमि ॥१७ सम्मायामचिरेगांवराक्षसोभिभविष्यति । दन वाममयीभ्यामतुनिमितोमुनिः॥१८ विवनेगाह्मण्यमक्षान्याहतते निमितप । ममयंगपिनामितपमानातिवगित ॥१६ भागमा दयाह्यम्पोषनयमनतर. । पागदापतयोरप्पागायरि ॥२० पाम्या पसभापनास्पास्तवाय. ।

स्परोधि का जन्म और विवाह ] [ ३५ - की ॥१८॥ तुम्हारे जैसे क्षमाहीन बालग को धिक्कार है और सम्पूर्ण तप निरर्थक है, तुम्हारा शरीर तप के कारण दुबला हुआ प्रनीन नहीं होता, कोष से ही हुआ होगा ॥१६॥ ब्राह्मण तो क्षमा के आश्रा रूप और क्रोध पर नियत्र ही उनका तप है, तुम तप में परिपक्व नहीं हो पाये, क्योकि क्रोव ने तुम्ह क्षीण कर दिया है, उनकी ऐसी बात सुनकर उस मुनि न उन्हें भी शाप दे दिया ॥२०॥ एक मे कहा 'तू सर्वाङ्ग मे कु४ मे पोहित होगी' दूसरी से कहा-'तू भय रोग से पीटिन होगी' मुनि द्वारा शाप देने ही उन दोनों के वे रोग तत्काल उत्पन्न हो गये ॥२१॥ ममाप्येवमहद्रक्ष ममुपैतिपदानुगम् । नशृणोपिमहानादतस्यादूरेऽपिगर्जतः ॥२२ तृतीयमद्यादिवमयन्मेपृष्ठनमु चति । अस्त्रग्रामस्यसर्वस्यहृदयज्ञामद्यते ।।२३ तप्रयच्छापिमारक्षरक्षमोऽस्मान्महामते । प्रादात्म्वायम्भुवस्वयरुद्र. साक्षात् पिनाकधृक् ।।२४ स्वायम्भुवोवसि रायसिद्धवर्यायदत्तवान् । तेनापिदत्तमन्मातुःपित्रेचित्रायुधायवै ॥२५ प्रादादौद्वाहिकसोऽपिमत्पिश्वसुर स्वयम् । मापिगिक्षितवीरसकाशाद्वालयापितु ॥२६ हृदयसकलास्त्राणामशेषरिपुनाशनम् । तदिदगृह्यताशीघ्रमशेपास्त्रपरायणम् ॥२७ ततोजहिदुरात्मानमेनराक्षसमागतम् ॥२८ तभी एवं महाराशम प्रकट होकर मेरे पीछे भी दौड पडा, वह तीन दिन से मेरे पीछे लगा है, देखो समीप में ही गरज रहा है, क्या आप उम सद को नहीं सुन रहे हैं ? मैं अब सभी मस्त्रो का सार र यह प्रत्यात प्रस्त्र ।।२२-२३॥ प्रापको दे रही हूँ, इमी से प्रार मेरी रक्षा करे, पुराकाल मे यह प्रम्य स्वायम्भुव मनु को स्वयं रद्र ने प्रदान दिया था ०४॥ यह परमोत्तम मिड सम्र स्वायम्मुर ने वमिर को प्रदान किया और घमिर से दमे मेरे नाना

[ मार्कण्डेय पुराण
चित्रायुध ने प्राप्त किया ॥२५|| और उन्होने विवाह के दहेज में मेरे पिता को
दिया, सव अस्त्रो के सारभूत इस अस्त्र को शिक्षा मैंने बाल्यावस्था मे अपने
पिता से प्राप्त की थी ।।२६॥ यह प्रस्त्र सभी प्रस्त्रो का हृदय एवं शत्रु नाशक
है, इसे शीघ्र ग्रहण करिये, इसके द्वारा सभी अस्त्रो से होने वाले कार्य सिद्ध हो
जाते हैं ।।२७। इसके ग्रहण पूर्वक इस राक्षस का वध करिये, जो कि विप्र
दाप से मेरा पीछा कर रहा है ।।२८॥
तथेत्युक्तेततस्तेनवायु पस्पृश्यतस्यतत् ।
अस्त्राणाहृदयप्रादात्सरहस्यनिवर्तनम् ।।३६
एतस्मिन्नन्तरेरक्षस्तत्तदाभीपणाकृति ।
नदंमानमहानादमाजगामत्वरान्वितम् ॥३०
मयाभिभूतादित्राणमुपैतिद्रुतमेहिमे ।
भक्षाकिचिरेगोतिववागतद्ददर्शसः ॥३१
स्वरोचिचिन्तयामास दृष्ट्वातसमुपागतम् ।
गृहात्येषवच मत्यतस्यास्त्वितिमहामुने, ॥३२
जग्राहममुपेत्यंनात्वरयासोऽपिराक्षसः ।
त्राहिमाहीतिकरण विलपन्तीसुमध्यमाम् ।।३२
तताम्बरोनि संक्रुद्धचण्डास्त्रमतिभैरवम् ।
दृष्ट्वानिवेश्यनद्रोदद निमिपेक्षरणः ॥३४
तदाभिभून मतदातामुस्मृज्यनिशाचर ।
प्रसीदशाम्यतामस्थ यताचेत्यभापत ।।३५

स्वरोचि का जन्म और विवाह ] [ ३७ मुनि का शाप सत्य हो सकता है ॥३२॥ स्वरोचि के ऐसा विचार करते ही राक्षस ने तुरन्त उम विद्याधरी को पकड लिया, इस पर वह त्राहि-त्राहि करती हुई रोने लगी ॥३३॥ तब स्वरोचि ने क्रोध में भर कर उस प्रचण्डास्त्र को धनुष पर चढाया और उस राक्षस की और देखा ॥३४॥ उन्हें इस प्रकार उद्यत देखकर राक्षस भय-विह्वल हो गया और कन्या को छोडकर स्वरोचि से वोला- आप प्रस्त्र का परित्याग करिये, मुझ पर प्रसन्न होकर मेरा वृत्तान्न सुनिये, उसे मैं आपसे कहता हूं ॥३५॥ मोक्षितोऽहत्वयाशापादतिघोरान्महाद्य ते । प्रदत्तादतितीनेणब्रह्ममित्रेणधीमता ॥३६ उपकारोनमत्वत्तं महाभागाधिकोपरः। येनाहसुमहाकष्टान्महाशापाद्विमोक्षितः ॥३७ ब्रह्ममिणमुनिनाकिन्निमित्तंमहात्मना। शप्तस्त्वकीदृशश्चैवशापोदत्तोऽभवत्पुरा ॥३८ ब्रह्ममित्रोऽष्टधाभिन्नमायुर्वेदमधीतवान् । त्रयोदशाधिकार चप्रगृह्याथर्वणोद्विज ॥३६ अहचेन्दीवराक्षेतिख्यातोऽस्याजनकोऽभवम् । विद्याधरपते.पुत्रोनलनाभस्यखाङ्गिन ॥४० मयाचयाचित पूर्वब्रह्ममित्रोऽभवन्मुनिः। आयुर्वेदमशेपमेभगवन्दातुमर्हसि ॥४१ यदातुबहुशोवीरप्रश्रयावनतस्यमे । नप्रादाद्याचितोविद्यामायुर्वेदात्मिकामम ।।४२ हे तेजस्विन् ! अत्यन्त तेज सम्पन्न ब्रह्ममिन मुनि ने मुझे एक बार घोर माप दिया था, मापने मुझे शाप से मुक्त कर दिया है ॥३६।। हे महामाग' मेरा ऐसा उपकार करने वाला कोई उपकारी आपके ममान नहीं है, क्योकि माप ही ने मुझे घोर क्लेशप्रद ब्रह्म पाप से मुक्त किया है ॥३७॥ स्वरोनि बोले-मुनियर ब्रह्ममित्र ने तुम्हें जो शाप दिया था, वह कमा तथा विसलिये दिया था ? १३८६ रास बोला-उन मुनिवर ब्रह्ममित्र ने अपवं वे तेरह

३८ ]
[ मार्कण्डेय पुराण
अधिकार मे ज्ञान प्राप्त किया था तथा पाठ भाग वाले सम्पूर्ण आयुर्वेद को पढा
था ॥३६॥ मेरा नाम इन्दीवर है, मैं खजीनल नाभ नामक विद्याधर का पुत्र
तथा इस कन्या का पिता हूँ ॥४०॥ मैंने उन ब्रह्ममित्र से निवेदन किया था कि
मुझे सम्पूर्ण आयुर्वेद का ज्ञान दीजिये ।।४१।। परन्तु बारम्बार विनय पूर्वक
निवेदन करने पर भी मुनि ने मुझे आयुर्वेद का ज्ञान नहीं दिया ।।४२।।
शिष्येभ्योददतस्तस्यमयान्तर्धानगेनहि।
आयुर्वेदात्मिकाविद्यागृहीताभूत्तदानघ ॥४३
गृहीतायातुविद्यायामासैरष्टाभिरन्तरात् ।
ममातिहदभवद्धासोऽतीवपुनःपुन ।।४४
प्रत्यभिज्ञायमाहासान्मुनिःकोपसमन्वित ।
विकम्पिकन्धर प्राहमामिदपरुपाक्षरम् ।।४५
राक्षसेनेवयस्मान्मत्वयाऽदृश्येनदुर्मते ।
हृताविद्यावहासश्चमामवज्ञायवकृत ॥४४
तस्मात्त्वराक्षस पापमच्छापेननिराकृत ।
भविासनसन्देह सप्तराणदारुण ।।४७
इत्युक्तेप्रणिपाताद्य रुपचार प्रसादित.।
समामाहपुनर्विप्रस्तत्क्षणान्मृदुमानस ॥४८
जब वे अपने शिष्य को प्रायुर्वेद का ज्ञान दे रहे थे, उस समय
छिप कर मैंने उस विद्या को प्राप्त किया ॥४३॥ जब आठ महीने में मुझे सपूर्ण
मायुर्वेद का ज्ञान होगपा, तब मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई और मैं वारम्बार हंसने
लगा ।।४४।। मुनि ने जब मेरा इस प्रकार हसना जाना तो उन्होने क्रोध से
पम्पित बराट होरर यह कठोर वचन कहे ॥४५॥ है दुर्मते । तून राक्षस फे
गमान धिए पर विद्या को पुराया है और अपना पूर्वक मेरी हंसी उडाई है
॥४६॥ इनिये नू मेरे पाप म अधिकार च्युत होकर सात रात्रि में ही धोर
राक्षम हो जायगा ॥४७॥ इस प्रकार का शाप मुनकर मैंने मुनि को विनग्रता
" उपचागे से प्रमान दिया तो वह तुम्न प्रसन्न होगये और बोले ।।४।।
तव,
।

स्वरोचि का जन्म और विवाह ] यन्मयोक्तमवश्यतद्भाविगन्धर्वनान्यया । क्न्तुित्वराक्षनोभूत्वापुन स्वप्राम्यसेवपु ॥४६ नष्टम्मृतियंदाक्रुद्ध स्वमपत्यचिवादिषु । निगाचरत्वेगन्तामितदत्रानलतापित. ॥५० पुन मज्ञामबाप्यस्वामवाप्स्यमिनिजवपु । तथवम्दमधिष्ठानलोकेगन्धर्वनजिते ॥५१ सोऽहत्वयामहाभागमोक्षितोऽस्मान्महाभवाद । निमाचरत्वाधीरतेनमेप्रार्थनाकुर ॥५२ इमातेतनयाभार्याप्रयच्छामिप्रतीच्छताम् । आयुर्वेदश्नसक्लरत्वष्टानोयोमयातत । मुने मातालप्राप्तस्तगृहीप्वमहामते ।।५३ इत्युक्त्वाप्रददोविद्यामचदिश्याम्बरोज्ज्वल । नग्भूपरणघरोदिव्यपौराणवपुराम्थित ॥५४ दत्त्वाविद्यानत कन्यासदातुमुपचक्रमे । तमासातदारन्याजनितारस्वरूपिणम् ॥१५ है गन्धर्व । मेरा कहा हुआ तो मिथ्या नहीं होगा, परन्तु न राक्षस होन दे पश्चान् पुन अपने गरीर को प्राप्त होगा ॥४६॥ उद तू राक्षम होकर पुरानी बात नूनता हुमा कोरवा अपनी ही पुत्री का नभग करन को सत्सर होगा, तनी मसानल से सनप्त होकर ॥५०॥ पुन: स्मृति लान बरंगा मौर अपने उमी दारीर, गन्धर्वलोक् और अधिकार का पूर्ववन प्राप्त करेगा ॥५१॥ है महामान । मापने मुझे इस पोर राशत्व से मुक्त किया है, इसलिम मुनी वर मांगो ॥५२॥ हे महामने । इस कन्या को मैं आपको प्रदान करता है, इने पत्नी म्प में स्वीकार गे तथा मुनि ने मुन्ने रिम माग मापुर्वेद को प्रनि हुई है, उमे भी मुन्ने बहा करो ॥५३॥ मारडेपनी ने कहा-दिब्द वमन, दिव्य भूपन्ग एवं माना तथा पूर्ववद दिव्य देह को धारण कि हुए उम मापाई ने ऐमा बहार स्वरोचि को॥५४॥ उम्पूरी पारद विदा प्रदान की तपा ४. [ मार्कण्डेय पुराण उसने अब कन्यादान वा उद्यम क्यिा तभी उस कन्या ने अपने स्वरूप को प्राप्त हुए रिता से वहा ॥५॥ अनुरागोममाऽप्यत्रतातातीवमहात्मनि । दमनादेवसजातोदिशेपेणोपकारिणी ॥५६ विन्त्वेषामेमसीसाचमत्तेदु सपीडिते । अतोनामिलपभोगाम्भोक्तुमतेनौसमम् ॥५७ पुरपरपिनोशवयापर्तुमित्यनृश सता । ग्वभावरचिरंथियोपित रिप्यति ॥५८ माययातदु मातमत्ततेवन्य पित । तथास्यास्यामि गानांतच्छोवानलतापिता ॥५६ मायुर्वेदप्रमादेनतेवरिष्येपुननंय । मग्यौतयमहाक्गिमुरमजमुमध्यमे ॥६० तन.पिताम्वयातानापन्यागविधानतः । गिmarrinaatraचना .

स्वरोचि के अन्य विवाह ] [ ४१ सचापियहितस्तन्त्र्यातदुग्रानतदाययो । कन्यकायुगलयनतच्छापात्यगदातुरम् ॥ तनस्तयो मतत्त्वज्ञोरोगघ्नरोपधैरसः। चकारनीरजेदेहेन्वरोचिरपिराजित. ॥६४ ततोऽतिशोभनेकन्येविमुक्तेव्याधित शुने। स्त्रवान्त्योज्ज्योतिदिग्भागचक्रातेतन्महीधरम् ।।३५ कन्यादान करके गन्धर्व उस हर प्रकार में सममा कर दिव्य विमान पर चट कर अपने लोक को गया ॥६गा इधर स्वरोचि अपनी पत्नी के सहिन वहाँ गर, जहाँ मनोरमा की दोनो मवियाँ रोगावान हुई उद्यान में रह रही थी ॥६३॥ और बायुर्वेद के तत्वज्ञाता स्वरोचि ने रोग नाश मोपरियों के ग्मों से उन दोनों के शरीर को राग रहित किया ॥६४॥ तव उन अत्यन्त स्प- वनी कन्याओ की दह कात्ति से पवत की सभी दिशाएं प्रकाशित होन लगी 1६५ ५६ • स्वराचि के अन्य विवाह एवविमुक्तगेगातुकन्यकातमुदान्दिता। स्वरोचिपमुवाचेदशृणुप्वाचनप्रभो ॥१ मन्दारविद्याप जानाम्नास्याताविभावरी। उपकारिम्बमात्मानप्रयच्छामिप्रतीच्छमान र विद्याचतुभ्यदाम्यामिनर्वभूतम्नानिते । ययाभिव्यक्तिमध्यन्तिप्रनादप्रवरगोभव ॥३ एवमस्त्वितितेनोवतेधर्मनस्वरोचिपा । द्वितीयातुनदारन्याइदवचनमब्रवीत् ॥४ कुमारब्रह्मचार्यामीत्पारानामपितामम। ब्रह्मपि नुमहाभागोवेदेवेदामपारग ॥५ ४२ ] [ मार्कण्डेय पुराण तस्यपु स्कोकिलालापरमणीयेमधौपुरा । प्राजगामाप्सरोभ्याशप्रख्यातापुञ्जिक्स्थला ॥६ कामवैक्लव्यतानीत मतदामुनिपुङ्गव । तत्सयोगेऽहमुत्पन्नातस्यामत्रमहाचले ५७ मार्कण्डेयजी ने कहा-मनोरमा की दोनो सखियो में से एक ने रोग- मुक्ति की प्रसन्नता से स्वरोचि के प्रति कहा कि मेरी बात सुनिये ।।१।। मैं मन्दार नामक विद्याधर की कन्या विभावरी हूँ, अापने मेरा महान् उपकार किया है, उसके बदले मे आपको अपना प्रात्मा ही अर्पित करती हूँ ॥२।। तथा जिस विद्या के द्वारा सब प्राणियो के स्वर का ज्ञान होता है, वह भी आपको देती हूँ, उसे पाप ग्रहण करिये ।।३।। मार्कण्डेयजी ने कहा-धर्मज्ञाता स्वरोचि ने विभावरी की बात को स्वीकार कर लिया, इसके पश्चात् दूसरी कन्या ने उनसे कहा ॥४॥ मेरे पिता कुमारावस्था से ही ब्रह्मचर्य का पालम्बन करने वाले, वेद वेदाग के ज्ञाता ब्रह्मपि पार हैं ॥५॥ एक समय जब बसत ऋतु प्राप्त हुई तब कामीजनो के मन को हरण करने वाले पुस्कोकिल के मधुर स्वर से तपोवन गूंज रहा था तभी एक पुञ्जिकस्थला नामक अप्सरा ने उनके निकट प्रागमन किया ॥६॥ इससे वह मुनिवर काम के वश मे होगये और तब उस अप्सरा के गर्भ से में इसी महापर्वत मे उत्पन हुई ।।७।। विहायमागतासाचमातास्मिन्निर्जनेवने । वालामेकामहीपृष्ठेव्यालश्वापदसकुले 11८ तत कलाभि सोमस्यवर्द्धन्तीभिरह क्षये । प्राप्यायमानाहरहोवृद्धियातास्मिसत्तम ।। तत वलावतीत्येतन्ममनाममहात्मना । गृहीताया कृतपिवागन्धर्वेणशुभात्मना ॥१० नदत्ताहतदातेनयाचितेनमहात्मना । देवारिणानिमासुप्तम्ततोमेधातित पिता ॥११ ततोहमतिनिवेदादात्मव्यापादनोद्यता। निवारिताशम्भुपन्यासत्यासत्यप्रतिश्रवा ॥१२ स्वगेचि के अन्य विवाह J [ ४३ मागुचःसुभ्र भत्ततिमहाभागीभविपनि । स्वरोचिर्नागपुत्रश्चमनुग्नस्यभविष्यति ॥१३ आजाचनिघय मकरिप्यतितवाहताः । यथाभिलपितवित्तप्रदास्यन्निवतेगुभे ॥१४ फिर मेरी माता मुझे इन हिंनक बन्नुयो से परिपूर्ण निर्जन दन में एकाकी पडी छोड कर चली गयी ॥८॥ तव एक महात्मा गन्धर्व ने मग पालन किया, वहाँ शुक्ल पक्ष में वृद्धि को प्राप्त होनी हुई शशिकला से परिपुष्ट होती हुई मैं वटने लगी, परन्तु कृपा पक्ष में चन्द्रकला के क्षय होने पर भी मेरा क्षय न होता हुप्रा देखकर सस गन्धवं ने मेरा नाम कन्नावती रखा ॥४-१०॥ कुछ काल के पश्चात् अलि नामक एक साक्षम मेरे पिना के पास आपर मुझे मांगने लगा और जब मरे पिता ने उसकी याचना स्वीकार न की तो उसने रात्रि में मरन इन्ते हुए मेरे पिता का वय वर दिया १११॥ मैं दम टुप से सतप्त होकर आत्मघात को उनत हु, नद भगवान् शिव की भार्ग सती ने मुझे गेका ॥१२॥ उन्होंने कहा-तुम मोर को छोड दो, महान गम्बरोचि तुम्हारे पति होंगे और उनका पुन मनु होगा ॥१॥ सभी निधियां तुम्हारी माता का सदैव पालन करेंगी और तुम्हारे लिए इन्छिन धन देंगी ॥१४॥ ययावत्सेप्रभावरणविद्यायास्तागृहागमे । पमिनीनामविद्ययमहापनाभिपूजिता ॥१५ इत्यामादक्षनुनासतीमत्यपरायणा । स्वगेचिन्त्वध्र वदेवीनान्यथामावदिप्यनि ॥१६ साप्राणप्रदायाचनाविद्यावतयारपु । प्रयच्चामिप्रतीच्छन्वप्रनादयुमुवोभव ।।१७ एवमस्सिनिनामाह्मनुमन्यालादनीम् । विभावर्या कलावत्या निग्यदृष्ट्यानुमोदितः ॥१८ जग्राहपतन पारगीसनयोन्मपशु ति । नमन्मृदेवतूर्यपुन्न्यन्नीत्वप्सर मुच १

४४ ]
[ मार्पण्डेय पुराग
सत्य परायणा दक्ष सुता का वचन मिच्या नहीं हो सकता,इसलिये ग्रा'
अवश्य ही वह स्वरोचि हैं ॥१६॥ मैं प्रापको अपना शरीर, प्राण और विद्य
समर्पित करती हूं, पाप प्रगन्नता पूर्वक ग्रहण करिये ॥१७॥ मार्कण्डेयजी ।
कहा-इस पर स्वरोचि ने 'ऐसा ही हो' कहा और विभावरी एव क्लादतं
दोनो की अनुमति से ॥१८॥(स्वरोचि ने उस कन्या का भी पाणिग्रहण क
लिया, उस समय दिव्य वाद्य वजने लगे और अप्सरायें नाचने लगी ॥१६)
५७ -- चक्रवाक और मृग का तिरस्कार
तत सताभि.सहितःपत्नी भिरमरा ति.।
ररामतस्मिञ्छैलन्द्र रम्य कानननिहरे ॥१
सर्वोपभोगरत्नानिमधूनिमधुरारिणच ।
निधय समुपाजग्मु पद्मिन्यावशवर्तिनः ॥२
स्रजोवस्त्राण्यलङ्कारान्गधाढ्यमनुलेपनम् ।
पासनान्यतिशुभ्राणिकाचनानियथेच्छया ॥३
सौवर्णानिमहाभागकरकान्भाजनानिच ।
तथाशय्याश्चविविधादिव्यै रास्तरणयुताः ।।४
एवसताभिःसहितोदिव्यगन्धाधिवासिते ।
ररामस्वरचिर्भाभि सितेवरपर्वते ॥५
ताश्चापिसहतेनेतिले भिरेमुदमुत्तमाम् ।
रममाणायथास्वर्गतथातशिलोच्चये ॥६
क्लहसोजगादेकाचक्रवाकीजलेसतीम् ।
तस्यतासाचललितेसम्वन्धेचस्पृहावती ॥७
मार्कण्डेयजी ने कहा-फिर अमर दीप्ति वाले स्वरोचि अपनी तीनो
पत्नियो के साथ मलपाचल के उस सुरम्य वन एवं निझर स्थानो में विहार
परने लगे ॥१॥ पमिनी विद्या के वश में हुई निधियाँ उपभोगाय नाना प्रकार

पक्रवाक मौर मृग का तिरस्कार ] [ ४५ पे रल एवं मपुर मद्य ।।२।। माला, वस्त्राभूपरण, सुगन्धित लेप, प्रामन, चांदी एव स्वर्ण ।।३।। तया स्वयं के विभिन्न पात्र, दिव्य विछौनी से युक्त शय्या एप अन्य द्रव्य उन्हें प्रदान करने लगो ॥४॥ इस प्रकार यह स्वरोचि दिव्य गधादि से सुवासित और रस्नादि से सुशोभित पर्वतीय प्रदेश मे तीनो पत्नियो के साथ विहार-रत हुए ॥५॥ उस स्वर्ग तुन्य रमणीक घेठ पर्वत में विहार करती हुई सोनो भार्या भी अत्यन्त सुगी हुई ॥६॥ उस समय उनको इस प्रकार प्रणय युक्त विहार करते देखकर एक वलहमी ने जल में स्थित मन्य चक्रवाको के प्रति पहा ॥७॥ धन्योऽयमतिपुण्योऽययोऽयंयौवनगोचर । दयिताभि महताभिभुक्त भोगानभीप्सितान् । सन्तियौवनिन ग्लाघ्यास्तत्पन्योनातियोभना । जगत्यामल्पका.पल्य पतयश्चातियोभनाः ॥ अभीक्षाकस्यचित्कान्तावान्तःकस्याश्चिदीप्मितः । परस्परानुरागाढ्य दाम्पत्यमतिदुर्लभम् ॥१० घन्योऽयदयिताभीष्टोह्य ताश्चास्यातिवल्लभाः। परस्परानुरागोहिधन्यानामेवजायते ॥११ एतनिशम्यवचनकलहसोसमीरितम् । उवाचचक्रवाकीतातातिविस्मितमानसा ॥१२ नायधन्योयतोलन्जानान्यस्नीसन्निकर्पतः । अन्यास्त्रियमयभुक्तेनसस्विस्यमानसम् ॥१३ चितानुगगएकस्मिन्नविष्ठानेयतःसरिख । ततोतिप्रीतिमानेवभार्यासुभविताकथम् ॥१४ इन स्त्रियो के साथ समस्त इच्छिन भोगो दो भोगने वाला यह युवक ही घन्य है 11८! ससार मे रूप और यौवन से सम्पन्न ऐसे अनेक पुस्प है, जिनकी मार्या प्रसुन्दर हैं, ऐसे दम्पत्ति कोई विरले ही हैं, जो पति-पत्नी दोनो ही सौन्दर्य से शोभायमान हो ॥६कोई पति अपनी पल्ली में और कोई परली पपने पनि में अनुरक्त है, परन्तु ममान प्रासक्ति वाले स्त्री-पुरुष कठिनता से ही ४६ ] [ मार्कण्डेय पुराण मिलते हैं ॥१०॥ इसलिये अपनी पत्नियो के यह प्रियतम और इनकी प्रियतमा पलियां भी धन्य है क्योकि कृतकृत्य प्राणियो म ही परस्पर अनुग की उत्पत्ति होती है ।।११॥ क्लहसी की बात से चक्रवाकी अधिक विस्मित नहीं हुई, उसने कहा ।।१२। यह स्वरोचि थय नही हो सकते क्याकि एक स्त्री क सामने ही दूसरी से विहार करते है,इसलिय इहे किंचित् भी लज्जा नही पानी, सब पलिया के प्रति इनकी समान रुचि भी नही है ।।१३।। जब चित्त का अनुराग एक ही म अवस्थान करता है, तब यह स्वरोचि सव पत्निया में समान अनुराग से रख सकते हैं ॥१४॥ एतानदयिता पत्यु तासादयित पति । विनोदमात्रमेवतायथापरिजनोपर ॥१५ एतासाचयदीष्टोऽयतत्किप्राणान्नमुञ्चति । प्रालिङ्गत्यपराकान्ताध्यातोवैकान्तयान्यया । १६ विद्याप्रदानमूल्येनक्रीतोह्मपसुभृत्यवत् । प्रवर्ततोनहिप्रेमममवह्वीपुतिष्ठति ।।१७ पलहसिपतिर्धन्योममधन्याहमेवच । यस्यैक्स्याचिरचित्तयस्यारकत्रसस्थितम् ॥१८ बहुपत्नीपतिलौर शरणपुण्यपापयोः । गृहासनामनाय श्वभूपरणश्चसहागर्म ॥१६ विपमै क्रियमारोहियुज्यतेमहदेनसा । ज्येष्टारनीयभावेनव निष्ठाज्येष्ठतानयेत् ।।२० गुरवेनुवरदत्वाहुत्वान्याममिधयथा । ऊढयासहवतंव्यानित्यनैमित्तिको निया ॥२१ इनका यह सब पत्नियो प्रियतमा नहीं है और न उन सबको ही यह समान रूप में प्रिय हैं, जम रित्त को विनोद प्राप्त हो सब उसी विनोदवी सामी यह पनियां भी है ।।१५।। यदि यह राव म समान प्रीति वार हात तो मयारो गब गमय गन्तुष्ट परन म गमर्य होर क्या इतन पाल पयंत जीवित एगात, मम पर या अनुगा पौर समा प्रेम वहाँ महो माता चागार मोर मृग वा तिरमार ] है ? ॥१६ । यह सगेषि विद्या प्राति के मूल्य में विक कर पत्निपो के समक्ष वृष गगान ही हैं, मनी पन्नियों में प्रेम का समान भाव में रहना सम्भव नही है ॥ा है नयी ! धन्य तो मैं हूँ और मेरे पनि हैं, क्योति में ही उनकी एषमात्र भार्या हूँ, उन चित्त का अनुराग मेरे ही पनि है और में भी उन्हीं में मनुरन हूँ॥१॥ अनेक भामों या पति पुग्य और पाप का कारण है, यह निवामिनी के गन्दापमान पाभूपरणोगो और विपम गानों द्वारा हुए निश्चय मे ।१९।। युक्त मनुष्य विषमता वारण महापापो होता है, तया वटी को छोटी मोर छोटी को बडी मानन से ॥२०॥ तथा गुरु को दक्षिणा रूप में वर देकर नमिधामो में द्वारा हवन करने गैगा है, विवाहिता पत्नी के सहित निन्ध नैमित्तिव बमों को करे ॥२१॥ जगादायान्यभावेनपापीयाजायतेनर.। मर्वसत्त्वरतज्ञोऽमाम्बरोचिरपराजित ॥२२ निगम्यलनितोदध्यासत्यमेवहिनामृतम् । ततोवपंगतेयातेरममारगोमहागिरी। रममाण ममन्नाभिदंदपुरतोमृगम् ॥२३ सुस्निग्धपीनावयवमृगौयूथविहारिणम् । वामिताभिःम्वन्पाभिमुंगीभि.परिवारितम् ॥२४ माष्टप्राणपुटकाजिवन्तीम्ताम्नतोमृगी। उवाचममृगोऽनवोलज्जात्यागेनगम्यताम् ।।२५ नाहम्वरोचिन्नन्दीलोनचंदाह्सुलोचना । निलंग्जाबह्व मन्तितादृशान्तप्रगच्चन ॥२६ एकात्वनेशानुगतायथाहासापदजने । अनेकाभिस्तयेवकोभोगदृष्ट्यानिरीक्षित ॥२५ तस्यधर्म क्रियाहानिरहन्यहनिजायते । सत्तोऽन्यभायंयाचान्यसमामक्त मदेवम ॥२८ यस्नादृशोऽन्यस्तब्दील परलोरपराइमुन्न. । तबामपतभद्रं बोनातुल्य स्वरोचिपा ॥२९ ४८ [ मार्यपडेय पुराण अन्य प्रकार से करने वाला पापी यहा जाता है, माण्डेयजी ने कहा- सब जीवो की वार्ता को समझने वाले पराजय रहित स्वरोपि ॥२२।। उनकी बात सुनकर लज्जित हुए और विचारने लगे कि इसका वचन मत्य है, इसमें अनृत कुछ भी नहीं है, फिर भी उस महाचल में पत्नियो के सग विहार परत हुए उन्हे सौ वर्ष व्यतीत होगये, तदनन्तर एक दिन जब पलियो के साथ विहार रत थे तभी उन्होने सामने स्थित ।।२३॥ एष स्यूलयाय, सर्वाङ्ग पुष्ट भृगो-यूथ के साथ विहार करने वाले एक मृग को देखा, यह चारो से अपनी समान आयु वाली मृगियो से घिरा हुआ था ।।२४॥ तब नासिका सिकोड पर मृग के शरीर को घती हुई मृगियो को देखकर मृग ने उनसे कहा-परी मृगियो । तुमने लज्जा छोड दी है, इसलिये अब और कही जाम्रो ।।२५॥ हे सुन्दर नयन वालियो ! मैं स्वरोचि नहीं हूं और न मेरा स्वभाव ही उनके जैसा है, उनके समान अनेक लज्जाहीन पुस्प मिल सकते हैं, तुम उन्ही के पास जाम्रो जैसे एक स्त्री अनेक पुरुषो की अनुगामिनी होने पर समाज मे हंसी के योग्य होती है, वैसे ही अनेक स्त्रियो से विहार करने वाला पुरुप भी हास्यास्पद होता है ॥२७॥ उसकी नित्यक्रिया नष्ट हो जाती है, वह पत्नी के साथ रहकर भी अन्य स्त्रियो की सदा इच्छा करता रहता है ।।२८। इसलिये परलोक से विमुख स्वभाव वाले स्वरोचि जैसा कोई अन्य पुरप हो तुम उसी के पास जाओ, मैं वसा नहीं हूं ॥२६॥ । ५८-स्तारोचिप मनु की उत्पत्ति एवनिरस्यमानास्ता हरिणोनमृगाङ्गना । थ त्वास्वरुचिरात्मानमेनेसपतितयथा ॥१ त्यागेचवारचमन सतासामुनिसत्तम । चक्रवावीमृगप्रोक्तो मृगचर्याजुगुप्सित ॥२ समेत्यताभिभूयश्चवर्द्धमानमनोभव । प्राक्षिप्तनिर्वेदवथोरेमेवपंगतानिपट ॥३

स्वरोचिप मनु को उसत्ति]
[ ४६
किन्तुधर्माविरोयेनकुर्वन्धर्माश्रिता क्रियाः ।
भुड क्नेस्वरोचिविषयान्सहताभिन्दारधी ॥४
ततश्चजजिरेतस्यत्रय पुना स्वरोचिपः ।
विजयो मेरुनन्दश्वप्रमावश्वमहाबल ।।५
मनोरमाचविजयप्रामूतेन्दीवरात्मजा।
विभावरीमेरुनन्दप्रभावचक्लावती ॥६
पदिमनीनामयाविद्यासवंभोगोपपादिका।
सतेपानत्प्रभावणपिताचक्र पुरत्रयम् ॥७
माएडेयजी ने कहा-इस प्रकार उस मृग के द्वारा वे हरिरिणयाँ
निराश हुई और इस वार्ता को सुनकर स्वरोचि ने स्वय को पतित समझा ।।
हे मुनिवर । चक्रवाकी और मृग द्वारा ऐसी निन्दा को पाकर तथा मृग
पाचरण को देखकर अपने को निन्दित समझा और पलियो को त्यागने का
विचार किया ॥२॥ परन्तु पत्नियो मे मिलते ही पुन. काम की प्रवृत्ति के सबल
होन से उनका विरक्त भाव नष्ट होगया और इसके पश्चात् उन्होन छ सो वर्ष
तर पत्नियो के साथ विहार किया ॥१॥ परन्तु जब वे विषय-रत होते तब वे
अपने घम-मार्गानुमार सभी क्रिया यथा विधि सम्पन्न करत थे ॥४॥ फिर
उन विजय, मरनन्द और प्रभाव नाम तीन अयन्त बलवान पुत्र उत्पन हुए
॥५॥ इन्दीवर की पुत्री मनोगमा ने विजय, विभावरी म मेरनन्द और कला-
वनी से प्रभाव की उत्पत्ति हुई यी ॥६॥ सर्व भोगो का सम्पादन करने वाली
पद्मिनी विद्या के प्रभाव से स्वरोचि न तीन पुरो की रचना की ||७)
प्राच्यातुविजयनामकामरूपेनगोत्तमे ।
विजयायसुतायादोमददीपुरमुत्तमम् ।।
उद्दीच्यामेरुनदस्यपुरीनन्दवतीमिति ।
स्थाताचकारपत्तुङ्गवप्रप्राकारमालिनीम् IME
कलावतोसुनम्यापिप्रभावस्यनिवेशितम् ।
पुरतालमितिस्यातदक्षिणापथमाधिनम् ।।१०

५० ] [ मारंडेय पुराण एवनिवेश्यपुत्रान्सपुरेपुपुरपर्पभः । रेमेताभि.समविप्रमनोजास्वद्रिभूमिपु॥११ एव दातुगतोऽरण्येविहरन्सधनुद्धं र. । चक्पंधनुरालोक्यवराहमतिदूरगम् ॥१२ प्रथाहयाचिदम्येत्यततदाहरिणागना । मय्येवपात्यतावारण प्रसीदेतिपुन पुन. ॥१३॥ विमनेनहतेनाथमामाशुविनिपातय । त्वयानिपातितोवारणोदु खान्मामोक्षयिष्यति ।।१४ पूर्व दिशा में कामरूप पर्वत पर विजय नामक पुर बनाकर विजय को ॥८॥ उत्तर दिशा में अत्यन्त ऊँची प्राचीरो वाला नन्दवती नामक पुर मेरु- नन्द को दिया । और दक्षिण में ताल नामक पुर वनावर प्रभाव को प्रदान किया ॥ १०॥ इस प्रकार पुरुष श्रेष्ठ स्वरोचि ने नीनो पुत्रो उन तीनो पुरी मे बसा कर पत्नियो सहित अत्यन्त सुरम्य प्रदेश मे विहार किया ॥११॥ एक दिन धनुष ग्रहण करक विहार करते हुए वहा दूर पर उन्होंने एर वाराह को देखकर शर सधान रिया ॥१२॥ तभी एक हरिणी व्हां पाई और वह वारदार प्रार्थना करने लगी- 'मुझ पर प्रसन्न होकर इस वाण को मुझ पर चलायो. ॥१३॥ इम वाराह का वध किया जाना ब्यर्थ होगा, इमलिये पाप मुझ पर अपना बाण चला कर, मुझे दुख से छुडाइये ॥१४॥ नतेशरीरसरुजमस्माभिरुपलक्ष्यते । किन्नुतत्कारणयेनत्वप्राणान्हातुमिच्छसि ।।१५ अन्यास्वासक्तहृदयेयस्मिश्चत कृतास्पदम् । ममतेन विनामृत्युरोपधकिमिहापरम् ।।१६ क्स्स्वानाभिलपेद्भोरुसानुरागासिकुत्रवा । यदप्राप्तौनिजान्प्राणान्परित्यक्तु व्यवस्यमि ॥१७ त्वामेवेच्छामिभद्र तेत्वयामेऽपहृतमन । दृणोम्यहमतोमृत्यु मयिवाणोनिपात्यताम् ॥१८ स्वारोचिप मनु की उत्पत्ति ] [ ५१ त्वमृगीचचलापागीनरूपधरावयम् । स्थत्वयासमयोगोमस्यिस्यभविष्यति ॥१६ दिसापेक्षितचित्तमयितेमापरिप्पज । यदिवासाधुचित्ततेकरिप्यामियथेप्मितम् ॥२० एतावताहभवताभविष्याम्यनिमानिता। प्रालिलिंगततम्तासस्वरोचिहरिणागनाम् ॥२१ स्वरोचि वोले--तेरा देह किसी प्रकार भी रोग ग्रस्न प्रतीत नहीं होता फिर तू क्यो अपना देह त्यागना चाह्नी है ॥१५॥ मृगी ने कहा--मेरा चित्त उसके प्रति आग्रक्त है, जिसका चित्त किसी अन्य नागे मे अनुरक्त हुआ है, इस लिये उमे प्राप्त न करने रूप रोग की एक मात्र औषधि आपके वाण से प्रारण त्याग करना ही है ।।१६।। स्वरोचि बोले-~-तुझे कौन नहीं चाहता ? तू विस के प्रति असक्ति वाली हुई है ? जिमके प्राप्त न होने से तू प्राण त्याग करने को हेढ निश्चय है ॥१७॥ मृगी ने कहा-मापने मेरा चित्त चुरा लिया है मैं प्रापकी ही अभिलापा करती हू, इमी लिये प्राण त्याग के लिये तत्पर हुई हूँ, आप शीघ्र ही मुझ पर वारण चलाइये ।।१८।। स्वरोचि बोले-तू चपल अङ्ग वाली मृगी है और मैं मनुष्य शरीर में हूं, इम लिये मेरा तुम्हारा संग किन प्रकार मभव है। ॥१६॥ मृगी न कहा-यदि मेरे प्रति अापक चित्त में भी अनुराग है तो मुझे प्रालिंगन प्रदान बरिये यदि आप साधु वित्त वाल हैं तो मैं आपके इछिन कार्य को सम्पादित करुंगी ॥२०॥ इस प्रकार मैं आपके द्वारा अन्यन्त सम्मान को प्राप्त हूँगी, मार्कण्डेयजी ने कहा-यह सुन कर स्वरोचि न उम मृगी का आलिंगन क्यिा ॥२१॥ तेनचालिगितासद्य माभूद्दिव्यवपुर्धरा। ततःमविस्मयादिष्ट कात्वमित्यभ्यभापत ।।२२ साचास्मैक्थयामासप्रेमलज्जाजडाक्षरम् । अहमभ्यथितादेवै काननस्यास्यदेवता ।।२३ उत्पादनोयोहिमनुस्त्वयामयिमहामते । प्रोतिमत्यामयिसुतभूलोकपरिपालकम् ।।२४ [ मारण्डेय पुराण तमुत्पादयदेवानात्वामहरचनाइदे । तत सतस्यातनामसर्वलक्षणलक्षितम् ॥२५ तेजस्विनमिवारमानजनयामासतत्क्षणात् । जातमानस्यतस्याथदेववाद्यानिसस्वनु । जगुर्गन्धर्वपतयोननृतश्चाप्सरोगणा ॥२६ सिपिचु शीकरमघामपयश्चतपोधना ॥२७ देवाश्चपुष्पवर्षचमुमुचश्चसमन्तत । तस्यतेज समालोक्यनामचने पितास्वयम् ।।२८ धतिमानितियेनास्यतेजसाभासितादिश । सवालोद्य तिमानामहावलपराक्रम ॥२६ उका प्रालिंगन प्राप्त करते ही वह मृगी उसी समय दिव्य शरीर धारण करके एक सुन्दर नारी हो गई, इस पर स्वरोपि ने अत्यन्त विस्मय पूर्वक उससे कहा 'तुम कौन हो? ॥२२॥ तव उस मृगो ने लज्जा और प्रेम गद्गद हो पर कहा कि मैं इस वन की अधिष्ठात्री देवी हैं और देवताना से प्रार्थित हो कर तुम्हारे निकट आई हूँ ॥२३॥ हे महामते ? मैं तुम पर अनुरक्ती हुई हू मुझ से तो मनु को उत्पन करना तुम्हारे लिय तय है, इस लिये उस भूलॊक परिपातक पुत्र को मुझ म उत्सन करिये ।।२४। यह बात मैंने देवतामो के वचन के अनुसार ही वही है, मार्कण्डेयजी ने कहा कर स्वरोचि ने उस वन देवी के गर्भ से अपने ही समान तेजस्वी पुन उत्पन्न किया, उसक उत्पन होते ही सम्पूर्ण वाद्य वजने लगे, गवर्वपति गायन करने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगी ॥२५-२६।।) दिशामो से हायी जल सीच लगे और तपोधन ऋपि ॥२७॥ तथा देवता सब ओर पुष्प बरमाने लगे उस बालक के तेज से सभी दिशाएं प्रकाशित हो उठी, ऐसी अग दीप्ति देस पर स्वरोचि ने अपने पुत्र का ।।२८11 नाम छ तिमान् रखा , यह बालक प्रत्यत बली प्रौर पराक्रमी हुप्रा ॥२६॥ स्वरोचिप सुतोयस्मात्तस्मात्स्वारोचिपोऽभवत् । सचापिविचरणम्येक्दादिगिरिनिझरे ।।३० स्वारोचिप मनु की उत्पत्ति । [ ५३ स्वरोचिर्दनिजपन्नीनमन्वितम् । उवाचमतदामीनाभिलापापुन पुन ॥३१ उपनह्रियतामात्माचिरतकीडितमया। स्मिर्वकालभोगन्तेयासन्न चरमवय ॥३२ परित्यागम्यकालोमेतवचापिजलेचरि। अकालःकोहिभोगानापर्वभागात्मकजगत् ।।३३ यज्ञा नियन्तेभोगावाह्मणं सयतात्मभि । दृष्टादृष्टाम्नथाभोगान्वान्दमानाविवेकिन ॥३४ दानानिचप्रयन्टन्निपूतान्धर्मा नकुर्वते । सत्वनेच्छसिकिंभोगान्भोगश्चेष्टफलनृणाम् ।।३५ स्वरोचि का पुत्र हान ३ कारण उस स्वारोचिप भी कहा जाने लगा, फिर किमी एक समय सुरम्प पर्वत और निर्भर म भ्रमण करत हुए ॥३॥ उन स्वरोचि न अपनी भार्या व सहित एक हम को दवा, वह काम्मा हमी स कह रहा था ॥३१॥ है हमी । अपन मन को अब निवृत्त कर, मैन तेरे साय बहुत समय तक विहार क्यिा है, अब मदेव ही भोग-रत रह्न स क्या लाभ है, क्या मि वृद्धावस्था आ गई है ॥३२॥ यह हमारे द्वारा दिपय भोगों के त्यागे जान वा समय उपस्थित है, इस पर हो न कहा-माग का समय-प्रम मय क्या है, देखो यह मम्पूर्रा विश्व भोगमय ही है ॥३॥ त्या कि सयतात्मा ब्राह्मण भाग की इच्छा न ही यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं तथा जानीजन भी दृष्ट- अष्ट भोगो को अभिलाषा करत हुए ॥३४॥ दान और पूर्व के धर्म मे लगे रहत हैं, जब ऐम व्यक्तिया का भी कर्म फल भोग ही है ता तिर्वक योनि वालो के विषय म पहा ही क्या जार ? ||३|| विवेक्निातिरवाचर्तिपुन सयतात्मनाम् । भोगप्वासक्तचित्तानापरमार्यान्वितामति । भविष्यतिक्दानगमुपेतानाचवन्धुपु ॥६ पुनमिनकलनेसत्ता सोदनिजनवः । सर पङ्कारर्णदेमग्नाजीवनगजाइव ॥३७

५४ )
[ मावण्डेय , राण
किनपश्यसिवाभन्दजातसङ्गम्वरोचिपम् ।
ग्रावाल्याकाममसक्त मग्नस्नेहाम्रर्दमे ॥३८
यौवनेनीवभार्यामुसाम्प्रतपुजनप्तृयु ।
स्वरोचिपोमनोमग्नमुद्धारप्राप्स्यतेकुन ॥३६
नाहस्वरोचिपतुल्य स्त्रीवस्योवाजलेचरि ।
विवेकवाश्चभोगानानिवृत्तोऽस्मिचसाम्प्रतम् ॥४०
स्वरोचिरेतदारय॑जातोढग खगेरितम् ।
प्रादायभार्यास्तपसेययावन्यत्तपोवनम् ॥४१
तत्रतप्त्वातपोधोरसहताभिरुदारधी ।
जगामलोकानमलानिवृत्ताखिलवल्मप ॥४२
इस लिय तुम उस भोग को क्यो नहीं चाहते ? हस दोला-भोगो में
जिनकी चित वृत्ति नहीं, उनको मति परमात्मा की अनुगामिनी है, बांधवो के
नमर्ग वाले मनुष्य की बुद्धि क्या व भी इस प्रकार की हो सकती है 10-६॥
पुष, मित्र और कला में ग्रासक्ति वाले जीव सरोवर के प म फसे
সালী
हाथी के ममान सदा दुखिन रहते हैं ॥३७॥ है भने। क्या तुमने बाल्यावस्था
से कामागत एव स्नेह पन म पमे हुए स्वरोचि को नहीं देखा है ? ॥३८॥
योधनवती पत्नियो,पुरो और पोत्रो में ये हुए उम स्वरोचि का मन किस प्रकार
उद्धार को प्राप्त हो सकेगा? ॥३६।। उस स्वरोचि समान मैं स्त्रियों के
अधीन नही हूं और अव भोगो का परित्याग करता हूँ 11४०॥ मार्कण्डेयजी
कहा-हम
वे
यह वचन मुन वर स्वरोचि अपनी तीनो पलियो को साथ
लेवर तप करने के उद्देश्य से तपावन को प्राप्त हुए ।।४१॥ बहाँ उन्होन पलियो
दे सहित पोर तप रिया और सभी पापों से मुक्त हो कर मल-रहित लोक
हो गये ॥४॥

प्यारोचिप मन्वन्तर क्थन ] ५४-स्वारोचिप मन्वन्तर कयन तत स्वारोविपनाम्नाद्य तिमन्तप्रजापतिम् । मनु चकारभगवास्तस्यमन्वन्तरशृणु ॥१ तनान्तरेतुयेदेवा मुनयस्तत्सुताश्रये। भूपाला क्रौप्टुकैयेतान्गतम्त्व निमामय ॥२ देवा पारावतास्तत्रतर्थवतुषिताद्विन । स्वारोचिपेऽन्तरेचेन्द्रोदिपश्चिदिनिविथत ॥३ ऊर्जस्तम्बस्तथाप्राणोदत्तोलि पभस्तथा । निश्चरश्चार्ववीरावतसप्तर्पयोऽभवन् ।।४ दिपुरुपाद्यश्चमुतास्तस्यमहात्मन । सप्तासन्सुमहावीर्या पृथिवीपरिपालका. ॥५ तस्यमन्वन्तरयावत्तावत्तद्व सविस्तरे। भक्त यमवनि सर्वाद्वितीय तदन्नरम् ॥६ स्वरोचिपम्नुचरितजन्मम्वारोचिपम्यच । निराम्यमुच्यतेपापैःश्रद्दानोहिमानव ॥७॥ माण्डेयजी ने कहा--इसके पश्चात् भगवान् न स्वारोचिप अर्थात् धतिमान नामक प्रभापनि को मनु धनाया अब उनके मन्वन्तर का वर्णन मुगो ॥१॥ हे क्रौटुके । उप स्वारोचिप मन्वनर में जो देवता, मुनि, मनु पुत्र राजा पादि हुए, उन विषय म कहा हूँ, उस मुनो ॥२॥ हे द्विज । उन बारोचिप मन्वन्तर म देवतानो को पारावत और तुपिन तथा इन्द्र को विपश्चित् कहा जाता था ॥३॥ ऊर्ज, स्तम्व, प्रारा, दत्तोलि, कृपभ, निश्चर और प्रवरी नामक यह सप्तर्षि थे ॥४॥ उन स्वाचिष मनु वे चैत्र और किम्पुरष नादि नाम वाले सात पुत्र पराक्रमी एव पृथिवी का पालन करने वाले ये ॥शा उन का मवन्नर जितने दिन का था, तब तक उनके व राघरों ने पृथिवी का नार भोगा, मन्वन्तरो में स्वारोचिष मन्वन्तर द्वितीय है || स्वराचि का चरित्र

[ मावं एडेय पुराण
और स्वारोचिप मनु की उत्पत्ति को जो कोई श्रद्धा पूर्वय श्रवण करता है।
वह पापो से मुक्त होता है ।।७।।
६०-निधि-निर्णय
भगवन्कथितसर्वविस्तरेणत्ययामम ।
स्वरोचिषस्तुचरितजन्मस्वारोचिपस्यतु॥१
यातुसापद्मिनीनामविद्याभोगोपपादिका ।
तत्सश्रयायेनिधयस्तान्मे विस्तरतोवद ।।२
अष्टोयेनिधयस्तेषास्वरूपद्रव्यसस्थिति ।
भवताभिहितसम्यक्ट्रोतुमिच्छाम्यहगुरो ।।३
पद्मिनीनामयाविद्यालक्ष्मीस्तस्याश्चदेवता।
तदाधाराश्चनिधयस्तन्मेनिगदत शृणु।५
तत्रपद्ममहापौतथामकरकच्छपौ।
मुकुन्दोनन्दकश्च वनील शङ्खोऽष्टमोनिधि ।।५
सत्यामृद्धौभवन्त्येते मिद्धिस्तैपाहिजायते ।
एतेह्यष्टौसमारयातानिधयस्तवक्रौप्टके ।।६
देवतानाप्रसादेनसाधुससेवनेनच ।
एभिरालोक्तिवित्त मानुपस्यसदामुने ।।७
नौटुकि बोले-हे भगवन् । प्रापने स्वगेचि का चरित्र और स्वारो.
निप मनु की उत्पत्ति का वर्णन विस्तार पूर्वक मुभमे किया है ।।१॥ परन्तु
सर्व भोगो का सम्पादन करन पाली पग्रिमी विद्या की प्राश्रित निधियो वा
धान भी विस्तार सहित करिये ॥२॥ हे गुरो । अष्ट निधियो का स्वरूप और
ध्य में स्थित को भी सम्यक् प्रकार से प्रापये मुख से सुनने की इच्छा है ।३।।
माण्डेयजी ने कहा- पदमिनी विद्या की अधिष्ठात्री लक्ष्मीजी हैं, यह विद्या
पष्ट निधियो को प्रापय स्वरपिणी है, इस विषय में बहता हूँ, तुम भवरण

निधि-निर्णय ] [ ६१ हुई सात पीढी तक रहती है ॥३३॥ और जिसमे अधिष्ठित होती है, उसकी दीर्घ आयु करती है, वह मनुष्य वाधवो और प्रागत मनुष्यो का परिपालक होता है ॥३४॥ परन्तु यह परलोक के लिए कोई यल नहीं करता पौर न नगर निवासियो से ही प्रोति रखता है ॥१५॥ पूर्व मित्रेपुशैथिल्यप्रीतिमन्यः करोतिच । तथैवसत्त्वरजसोयोवितिमहानिधि.॥३६ सनीलसंज्ञस्तत्सगीनरस्तच्छीलवान्भवेत् । वस्वकार्पासधान्यादिफलपुष्पपरिग्रहम् ॥३७ मुक्ताविद् मशङ्खानांशुक्त्यादीनांतथामुने । काष्ठादोनाकरोत्येपयच्चान्यज्जलसम्भवम् ॥३८ यविक्रयमन्येपानान्यत्ररभिजायते । तडागान्पुष्करिण्याऽथतथारामान्करोतिच ॥३६ वन्धंचसरितांवृक्षांस्पथारोपयतेनरः । अनुलेपनपुष्पादिभोगभुग्वाभिजायते ॥४० त्रिपौरुपश्चापिनिधिर्नीलोनामपजायते । रजस्तमोमयश्चान्य शङ्खसज्ञोहियोनिधिः ।।४१ तेनापिनीयतेविप्रतद्गुरिणत्वनिधीश्वरः । एकस्यैवभवत्येपनम्नान्यमुपैतिच ।।४२ पहिले मित्र से मैत्रि भाव में शिथिलता और नयो से प्रोति स्थापित करता है, इसी प्रकार जो सत्व और रजोगुण से युक्त महानिधि है ॥३६॥ वह नोलनिधि नाम वाली अपने अधिष्ठान रूप पुरुष को सतोगुण और रजोगुण से पुक्त करती है, इसकी दृष्टि जिस पर पडती है, वह वस्त्र, कपास, धान्यादि अन्न, फल एव पुष्प ॥३६॥ तथा मोती, मूगा, शंख, सीपादि तथा जल मे उत्पन्न अन्य वस्तुग्रो और काष्ठादि का संचय करता है ॥३८॥ पोर इन पदार्थों का स्वयं उपभोग करता हुआ, क्रय-विक्रय भी करता है, इसके अति. रिक्त अन्य किसी विषय में वह प्रोतिमान् नही होता ॥३९॥ यह मनुष्य तडाग, पोखर, उपवन, बनवाता, नदी पर पुल वैधवाता नथा वृक्षारोपण

६२ ]
[ मार्कण्डेय पुराण
करता है और अनुलेप और पुष्पादि का अनुलेप करता हुआ प्रसिद्धि को प्राप्त
हाता है ।॥४०॥ यह नील निधि तीन पीढी तक स्थिति रखती है तथा गह
नाम की निघि रजोगुण और तमोगुण के मिश्रण से युक्त है ॥४१।। इसक
अधिष्ठान से पुरप उक्त दोनो गुणो से युक्त होता है यह एक ही पुग्प की
अनुगामिनी होती है किसी अ य पुरुप तया अय पोढी म स्थिति नहीं
रहती ॥४२॥
यस्यशङ्खोनिधिस्तस्यस्वरूपक्रोष्टुकेशृणु।
एकवात्मनासृष्टमन भुडक्त तथाम्बरम् ।।४३
क्दनभुपरिजनोनचशोभनवस्नक ।
मददातिसुहृद्भा-भ्रातृपुनस्नुपादिपु ॥४४
स्वपोपणपर शौनरोभवतिसर्वदा ।
इत्येतेनिधय रयातानराणामयदेवता ॥४५
मिश्रावलोकनामिश्रा स्वभावफलदायिन ।
यथाख्यातस्वभावस्तुभवत्येववितोक्नात् ।
सर्वेपामाधिपत्येवधीरेपाद्विजपद्मिनी ॥४६
है कौटुक । जो पुरप शखनिधि को अपने वश म कर लेता है, उसका
रूप मुना, वह स्वापा जन श्रष्ठ अन्न वा भोजन करता और सर्वोत्कृट वरन
पहनना है ।।४३॥ परनु उसके फुटुम्बियो का निष्कृष्ट भोजन वस्त्र उपलब्ध
होत और जिनका जीवन कष्ट से व्यतीत होता है मोर राह्य निधि युक्त पुरप
अपन मुहृद भाना, पत्नी, पुत्र मादि व भरण पोपण को भी कुछ नहीं देता
॥ क्वस अपना ही मरण रोपण करने म गा रहता है मनुष्य के वित्त
की दवना बहार यह निधि विस्शत है ॥४५।। इसम देखने स मनुष्य उपयुक्त
स्वभाव वामा होता है. परन्तु यह निधियों मिलकर देखन मे सयुक्त पल थे
देन पाती है तथा स्वतन प म देखें तो स्वस्थ पसनद हैं । यह थी स्वरूपिणी
पपिनो विधा आ पप्ट निधियो । पाश्रय म अपिटिन है ॥४६॥

मौतर मन्वन्तर प्रारम्भ ३ ]
६१-श्रोत्तर मन्वन्तर प्रारम्भ (३)
विस्तरात्कथितब्रह्मन्ममस्वारोचिपत्वया।
मन्वन्तरतथैवाष्टीयेपृष्टानिधयोमया ॥१
स्वायम्भुवपूर्वमेवमन्वन्तरमुदाहृतम् ।
मन्वन्तरतृतीयमेकथयौत्तमसज्ञितम् ॥२
उत्तानपादपुत्रोऽभूदुत्तमोनामनामत. ।
सुरुच्यास्तनयःस्यातोमहावलपराक्रमः ॥३
धर्मात्माचमहात्माचपराक्रमयनोनृप ।
अतीत्यसर्वभूनानिबभौभानुपराक्रम ॥४
सम.दानौचमिनेचपरेपुत्रेचघर्मवित् ।
दुष्टे चयमवत्साधौसोमवच्चमहामुने ॥५
वाभ्रव्यावहूलानामउपयेमेसधर्मविद् ।
उत्तानपादतनय.शचीमिन्द्रइवोत्तम ॥६
तस्यामनीवतस्यासीद्दिजवर्यमन सदा ।
स्नेहवच्चशिनोयद्वद्रोहिण्यानिहितास्पदम् ॥७
कोप्टुकि बोले-हे ब्रह्मन् । स्वारोचिप मन्वन्तर का विषय आपने
विस्तार पूर्वक वर्णन किया है, अब पाठ मन्वन्तर और मेरे द्वारा पूछी गई
निधि के विषय मे कहिये ॥१॥ पाप स्वायभुव मन्वन्तर का पहिले वर्णन कर
चुके हैं, अब प्रीतम नामक तृतीय मन्वन्तर का वर्णन करिये ॥२॥ मार्कण्डेयजी
ने कहा-राजा उत्तानपाद के एक अत्यन्त पराक्रमी उत्तम नामक पुत्र रानी
सुरुचि के गर्भ से उत्पन्न हुअा ॥३॥ वह धर्मवान् और पराक्रमी उत्तम राज्य
को प्राप्त होकर अपने पराक्रम से प्रत्यन्त तेजस्वी हुए ॥४॥ वह धर्मज्ञ राजा
शत्रु, मित्र तथा प्रजा और पुत्र मे समान दृष्टि रखने वाले थे, वह दुष्टों के
लिए सदा यम तुल्य और शिष्ट व्यक्तियो के लिए चन्द्रमा के समान शीतल
थे । जिम प्रकार इन्द्र ने सभी लोको में प्रसिद्ध शची का पाणिग्रहण
किया, उसी प्रकार उत्तम ने वभ्र मुता बहला नाम को विख्यात कन्या का

निधि-निगय ]
[ ५७
करो ॥४॥ पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, मुकुन्द, नन्दर, नील और शङ्ख
यह पाठों निधि उन विद्या की आश्रिता हैं ॥१॥ समृद्धि होन से ही इन
निधियो की सिद्धि प्राप्त होती है. ह क्रौप्टुरे तुम्हें यह आठ प्रकार की निधियां
दताई गद हैं ॥६॥ ह मुने । दव प्रसाद और साधु सवा के फल स मनुष्य का
वित्त इन निधिया के द्वारा सदैव पालाक्ति होता है ।।
यादृवम्वस्पभवतितन्मेनिगदत शृणु।
पद्मानामनिधि पूर्वसयस्यभवतिद्विज ।।८
मतस्यतत्सुतानाचतत्पीनारणाच नित्यश ।
दाक्षिण्यसार पुरुपस्तेनचाविष्टितोभवेत् ।।
सत्त्वाधारोमहाभागोयतोऽमौसात्त्विकोनिधि ।
सुवर्णरुप्यताम्रादिधातूनाचपरिग्रहम् ।।१०
करात्यतितरासाऽयतेपाचक्रयविश्यम् ।
करोतिचतथायज्ञान्दक्षिणाचप्रयच्छति ॥११
(मपादयतिकामाश्चमनिवयथाक्रमम् ॥)
सभादवनिवेताश्चसकारयतितन्मना ।
सत्त्वाधागेनिधिश्चान्योमहापद्माइतिश्रु त ॥१२
मत्त्वप्रधानाभवतितेनचाधिष्ठिनोनर ।
क्रोतिपद्मरागादिरत्नानाचपरिग्रहम् ।।१३
मौक्तिकानाप्रवालानातेपाचव्यविम्यान् ।
ददातियोगशीलेग्यम्तेपामावमयाम्तथा ।।१४
मकारयनितच्छील स्वयमेवचजायते ।
तत्प्रमूतास्तथाशीला.पुत्रपौरक्रमेणच ॥१५
इनका का स्वम्प है, वह बनाता हूं -पद्म नाम निषि सदा ही मय
दानव के पास थी | रि उमर पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र के पास रही, इम
निधि के अधिशन स पुस्प बातृय एव II सत्वगुण समग्न और अत्यन
भागवान होता है क्याकि यह निधि मनागुण म युक्त हैं, इस निधि से सम्पन्न
पुरुप सुवर्ण, रजत, ताम्रादि सब घातों का परिग्रह ॥१०॥ तथा क्रय विक्रय

५८ ] [ मायएडेय पुराण करता है तथा यहुत से विपुन दक्षिणा वाले यज्ञो वा अनुष्ठान करता है ।।१।। ( क्रम पूर्वक सब अभिलापामो को पूर्ण करने में समर्थ होता है ) तथा एकाग्र चित्त से सभा भवन प्रोर देव मन्दिर निर्मित कराता है, महापा नामक निधि सलाधार के नाम से विख्यात है ॥१२॥ उमसे प्रविष्टित मनुष्य भी सतोगुण प्रधान होता है तथा पराग आदि रत्नो को संचित करने वाला होता है ॥१३॥ और मुक्ता आदि का क्रय-विक्रय करता है एवं योगियों को उनका स्थान देता ॥१४॥ तथा साधारण व्यक्तियों को योगाभ्यास के लिए उत्साहिल करता है और स्वय भी योग मे तत्पर रहता है, उसके पुत्र, पौत्रादि वापर भी उसी के समान होते हैं ॥१५॥ पूर्वद्विमात्र सप्तासौपुरुषाश्चनपुंचति । तामसोमकरोनामनिधिस्तेननावलोकित ॥१६ पुरुषोऽथतमःप्राय सुशीलोऽपिहिजायते । वाणखष्टिधनुषाचर्मणाचपरिग्रहम् ॥१७ दशनानाचकुरुतेयोतिमंत्रीचराजभिः । ददातिशौर्यवृत्तीनाभूभुजायेचतत्प्रिया. ॥१८ क्रयविक्रयेचशस्त्राणानान्यनप्रीतिमेतिच । एकस्यैवभवत्येपनरस्यनसुतानुग ॥१६ द्रव्यार्थदस्युतोनाशसग्रामेवापिसव्रजेत् । कच्छपश्चनिधिर्योऽसोनरस्तेनाभिवीक्षित. ॥२० तम प्रधानोभवतियतोऽसौतामसोनिधि । व्यवहारानशेपास्तुपुण्यजात करोतिच ।।२१ कर्मस्थानधिलाश्चैवनविश्वसितिकस्यचित् । समस्तानियथाङ्गानिसहरत्येवकच्छप. ॥२२ यह महापय नाम निधि पूर्व के अपेक्षा उत्तरोत्तर प्रायो-माधी गति से घटनी हुई मान पीढियो तक रहती है तथा जो मकर नाम की तमोगुणी निधि है, उममे अधिटिन पुरष ॥१६॥ तमोगुण प्रधान और शीलवन होता है, वह घनुप-वाण, सङ्ग, दाल तया प्रायुधो के धारण करने वाला होता है

निधि-निर्णय ]
[ ५६
॥१७॥ भोज्य पदार्थ का स्वाद ग्रहण करने में समर्थ होता है, राजाओं के
साथ सख्यभाव स्थापित करता है तथा शौर्य वृति वाले चीरों को दान देकर
सतुष्ट होता है ।।१८॥ शत्रों का क्रय-विक्रय क्येि विना नुष्ट नहीं होना परन्तु
धनके लोभ से तम्बरो द्वारा अथवा रणक्षेत्र में मृत्यु को प्राप्त होता है यह
निधि एक पीटी तक ही रहती है, फिर नहीं रहती, इसे ताममी कहा गया है,
इसकी दृष्टि जिम पर पडती है ।।१६-२०।। वह पुरप तमोगुण प्रधान, पुण्यमय
एव आचार व्यवहार तथा कर्म के दश मे होकर सव भोगों को भोगता हुमा,
क्मिी पर विश्वास नहीं करता और जन क्या अपने अङ्गो को समेट कर
छिपा लेता है ॥२१-२२।।
तथाविष्टम्यरत्नानितिष्ठत्याकुलमानस ।
नददातिनबाभुक्ततद्विनाराभयाकुलः ।।२३
निधानमुाकुरुतेनिधिःसोप्येकपूप ।
रजागुणमयश्चान्योमुकु दोनामयोनिधि ॥२४
नरोऽवलोकितस्तेनतद्गुणोभवतिद्विज ।
वीणावेणुमृदगानामाताद्यस्यपरिग्रहम् ॥२५
करोतिगायतावित्तनृत्यताचप्रयच्छति ।
वन्दिमागधम्तानाविटानालास्यपाठिनाम् ॥२६
ददात्यहनिशभोगान्भुडुक्त तंत्रसमद्विज ।
कुलटासुरतिश्चाम्यभवत्यन्यश्चतद्विषं ॥२७
प्रयातिमगनेकचयनिधिभंजतेनरम् ।
रजस्तमोमयश्चान्योनन्दोनाममहानिधि ॥२८
वैस ही अपने अभिप्राय को गुप्त रखता और चित्त को समित
बनाता है तथा नष्ट होन क भय मे धन का सभोग स्वय नहीं करता और न
मिली दूसरे को ही प्रदान करता है ।।२३। यह निधि पृथिवी में एक पोटी ता
रहती है और मुकुन्द नाम की जो अन्य रजामुशी निधि है ॥२४॥ उसकी
हरि जिम मनुष्य पर पड़ती है, वह रजोगुणी होता है नथा उनसे अदलदित
मनुष्य वीरमर, देशु मृग मादि सातोट दायो का सग्रह करता है ॥२५॥ गायको

५८ ॥ [ मार्कण्डेय पुराण करता है तथा बहुत से विपुन दक्षिणा वाले यज्ञो का अनुष्ठान करता है ।।१॥ ( क्रम पूर्वक सब अभिलापानो को पूर्ण करने में समर्थ होता है ) तथा एकाग्र चित्त से सभा भवन प्रौर देव मन्दिर निर्मित कराता है, महापद्म नामक निधि सत्वाधार के नाम से विख्यात है ॥१२॥ उससे अधिष्ठित मनुष्य भी सतोगुण प्रधान होता है तया पद्मराग आदि रत्तो को सचित करने वाला होता है ॥१३|| और मुक्ता आदि का क्रय-विक्रय करता है एवं योगियो को उनका = स्थान देता ॥१४॥ तथा साधारण व्यक्तियो को योगाभ्यास के लिए उत्साहित करता है और स्वय भी योग मे तत्पर रहता है, उसके पुत्र, पौत्रादि वशघर भी उसी के समान होते हैं ॥१५॥ पूर्वद्विमात्र सप्तासौपुरुषाश्चनमु चति । सामसोमकरोनामनिधिस्तेननावलोकित. ॥१६ पुरपोऽयतमानाय सुशीलोऽपिहिजायते । वाणखगष्टिधनुपाचर्मणाचपरिग्रहम् ॥१७ दशनानाचगुरुतेयोतिमंत्रीचराजभिः । ददातिशौर्यवृत्तीनाभूभुजायेचतत्प्रियाः ॥१८ क्रयविक्रयेचशस्त्राणानान्य प्रीतिमेतिच । एकस्यैवभवत्येपनरस्यनसुतानुग ॥१६ द्रव्यार्थदस्युतोनाशसग्रामेवापिसव्रजेत् । कच्छपश्चनिधिर्योऽसौनरस्तेनाभिवीक्षित. ॥२० तम प्रधानोभवतियतोऽसौतामसोनिधि.। व्यवहारानशेपास्तुपुण्यजाते करोतिच ॥२१ कर्मस्थानधिलारचंवनविश्वसितिकस्यचित् । समस्तानिययाङ्गानिसहरत्येवकच्छप: ।।२२ यह महापा नाम निधि पूर्व पे अपेक्षा उत्तरोत्तर भाषी-पाधी माक्ति घटती हुई मान पीदियो तरसती है तथा जो मकर नाम की तमोगुणी निषि है, उगम अधिटिन पुग्ण॥१६॥ तमोगुण प्रधान पौर शीलवन होता है, या अनुपमाण, पद्ग, दाल तपा प्रायुधो ये धारण करने वाला होता है

निधि-निर्णय ]
[ ५६
।।१७।। भोज्य पदार्थ का स्वाद ग्रहण करने में समर्थ होता है, राजाओ के
साथ सख्यभाव स्थापित करता है तथा शौर्य वृत्ति वाले वीरो को दान देकर
सतुष्ट होता है ॥१८॥ शस्त्रो का क्रय-विक्रय किये बिना तुष्ट नहीं होता परन्तु
धनके लोभ से तस्करो द्वारा अथवा रणक्षेत्र मे मृत्यु को प्राप्त होता है, यह
निधि एक पीढी तक ही रहती है, फिर नहीं रहती, इसे तामसी कहा गया है,
इसकी दृष्टि जिस पर पडती है ।।१६-२०।। वह पुरुप तमोगुण प्रधान, पुण्यमय
एव आचार व्यवहार तथा कर्म के वश में होकर सब भोगो को भोगता हुआ,
क्सिी पर विश्वास नहीं करता और जैसे कट्टप्रा अपने अङ्गो को समेट कर
छिपा लेता है ॥२१-२२॥
तथाविष्टभ्यरत्नानितिष्ठत्याकुलमानसः ।
नददातिनबाभुडूक्ततद्विना भयाकुलः ।।२३
निधानमुाकुरुतेनिधिःसोप्येकपूरुषः ।
रजोगुणमयश्चान्योमुकु दोनामयोनिधि ॥२४
नरोऽवलोकितस्तेनतद्गुणोभवतिद्विज ।
वीणावेणुमृदंगानामातोद्यस्यपरिग्रहम् ।।२५
करोतिगायता वित्तनृत्यताचप्रयच्छति ।
वन्दिमागधमूतानाविटानालास्यपाठिनाम् ॥२६
ददात्यहनिशभोगान्भुड्क्त तैश्वसम द्विज ।
कुलटासुरतिश्चास्यभवत्यन्यैश्चतद्विधै ॥२७
प्रयातिसगनेकंचयनिधिर्भजतेनरम् ।
रजस्तमोमयश्चान्योनन्दोनाममहानिधिः ।।२८
वैसे ही अपने अभिप्राय को गुप्त रखता और चित्त को सयमित
बनाता है तथा नष्ट होने के भय से धन का उपभोग स्वयं नहीं करता और न
किसी दूसरे को ही प्रदान करता है ।।२३।। यह निधि पृथिवी मे एक पीढी तक
रहती है और मुकुन्द नाम की जो अन्य रजोगुणी निधि है ॥२४॥ उमको
हरि जिस मनुष्य पर पड़नी है, वह रजोगुणी होता है तथा उससे प्रवल वित
मनुष्य वीणा देणु मृदङ्ग प्रादि कालोद्य वादो का समह करता है॥२५गायकों

[ मार्कण्डेय पुराण
और नतंको को बहुत घन देने वाला, बन्दी, मूत, मागध, विट पौर लास्यपारी
नृत्य-गान की विशेषता वालो को ॥२६॥ दिन रात्रि इच्छित भोग देता है
तथा उनके साथ भोजन करता है, इसकी प्रीति अपने समान एव कुलटा
मनुष्यो मे रहती है ।।२७।। यह नित्य जिसे चाहती है, उमी की अनुगामिनी
रहती है, उसके वाधरो के पास नहीं रहती, नन्द नाम की निधि रजोगुग्ण
मोर तमोगुण दोनो से युक्त है ॥२८॥)
उपतिस्तम्भमधिन नरस्तेनावलोक्ति ।
समस्तधातुरत्नानापुण्यधान्यादिक् स्यच ॥२६
परिग्रहकरोत्येषतथैवक्रयविक्यम् ।
आधार स्वजनानाचमागताभ्यागतस्यच ॥३०
सहतेनापमानोक्तिस्वल्पामपिमहामुने ।
स्तूयमानश्चमहतोप्रीतिवध्नातियच्छति ॥३१
ययमिच्छतिवैकाममृदुत्वमुपयातिच ।
वह्योभाय्याभवन्त्यस्यसूतिमत्योऽतिशोभना ॥३२
भजतेसप्तचनरान्निधिर्नन्दोऽनुवर्तते ।
प्रवर्द्धमानोऽथनरमष्टभागेनसत्तम ॥३३
दीर्घायुष्ट चसर्वपापुरुषाणाप्रयच्छति ।
वन्धूनामेवभरणयेचदूरादुपागता ॥३४
तेपाकरोतिवनन्द परलोकेनचाहत ।
भवत्यस्यनचस्नेह सहवासिपुजायते ॥३५
इसको दृष्टि जिस पर पडती है, अत्यन्त स्तभित रहता है, इससे
अधिष्ठित मनुष्य सब धातु रत्न, धान्य प्रादि पुण्य द्रव्यो का ||२६|| सग्रह
और क्रय विक्रय करता है तथा वह स्वजनो, अतिथियों और अभ्यागतो को
मात्रय रूप होता है ॥३०॥ वह निरादर सहन नहीं करता और प्रासा
सुनवर प्रसन्न होता है ॥३१॥ यावको की अभिलाषा के अनुमार वस्तुएं
प्रदान करता है तथा मृदु स्वभाव वा होता है, उससे अत्यन्त सुदरी
पुत्रवती अनेव पलियां प्रेम करती हैं ॥३२॥ यह निधि क्रमश अप्टमाश होती

प्रोत्तर मन्वन्तर प्रारम्भ (३) ]
[ ६६
क्रिया फल रहित होती है, जो शुभ अग्नि की साक्षी में अपने गृह पर लायी
गयी है ॥४१॥ वह प्रयम ही धर्म के ग्रहण में प्रशसनीय है तथा उम दुष्टा
त्याग से वर्णसकर की उत्पत्ति सभव है ।।४।।
धर्महानिश्चानुदिनममार्यस्यभवेन्मम ।
नित्यक्यिाणाविभ्रमात्सचापिपतनायमे ।।४३
तस्याचपृथिवीपालभवित्रीममसन्तति ।
तवपड्भागदात्रीसाभविनोधर्महेतुको ॥४४
तदेतत्त मयाख्यातापलीयामेहताप्रभो।
तासमानयरक्षायाभवानधिकृतोयत १४५
सतस्यैववच श्रुत्वाविमृप्यचनरेश्वर.!
सर्वोपकरणयुक्तमारुरोहमहारथम् ।।४६
इतश्चेतश्चतेनासौपरिबभ्राममेदिनीम् ।
ददर्शचमहारण्येतापसाश्रममुत्तमम् ।।४७
अवतीर्यचतनासोप्रविश्यददृशेमुनिम् ।
कौश्यावृष्यासमासीनज्वलन्तमिवतेजसा ।।४८
सदृष्ट्वानृपतिप्राप्त समुत्थायत्वरान्वित ।
समान्यस्वागतेनैवशिष्यमाहाय॑मानय ।।४६
पत्नी के न होने से घम की दिन-दिन हानि होती है तथा इस प्रकार
नित्य क्रिया के नष्ट होने पर तुझे भी पतित भाव की प्राप्ति होगी ॥४३॥ हे
राजन् । मेरी उस पत्नी के गम से जो सन्तान होगी, वह आपको धर्म पूर्वक
अपनी आय का छटवां भाग देगी ।।४४|| इन्ही कारणो से मैं निवेदन कर रहा
हूँ कि माप मेरी उसी पत्नी को लाकर दीजिये, क्यो कि हमारी रक्षा के
निमित्त आप ही नियुक्त हैं ॥४५।। माकण्डेयजी ने कहा-ब्राह्मण के ऐसे
वचन सुन कर महाराज उत्तम कुछ समय तक साच विचार करक सर्व सामग्री
सम्पन्न रथ पर चढे ।।४६।। और रथ के द्वारा विचरण करते हुए एक महावन
में श्रेष्ठ तपस्या मय आश्रम देसा ॥४७॥ तव रथ से उतर कर उन्होंने आश्रम
में प्रवेश किया जहाँ कुशा के आसन पर अपने तेज से प्रकाशित एक श्रेष्ठ मुनि

७० ।
[ मावंण्डेय पुराण
को बैठे हुआ देसा ॥४८॥ राजा वा आगमन देख कर शीघ्रता पूर्वक उठते हुए
मुनि ने उसका म्यागत-सत्कार किया और अपन शिष्य को प्रध्यं लाने की
माज्ञा दी ।।४६11
तमाहशिष्य शनकतव्योऽयॊऽस्यकिमुने ।
तदाज्ञापयसचिन्त्य याज्ञाहिक रोम्यहम् ।।
ततोऽवगतवृत्तान्तोभूपतेस्तस्यसटिज ।
सम्भाषासनदानेनचक्र सम्मानमात्मवान् ।।५०
किनिमित्तमिहायातोभवान्कितेचिकीर्पितम् ।
उत्तानपादतनयवेनित्वामुत्तमनृप ॥५१
ब्राह्मणस्यगृहाद्भाव्केनाप्यपहृतामुने ।
अविज्ञातस्वरूपेणतामन्वेष्टुमिहागत ॥५२
पृच्छामियत्त तन्मेत्वप्रणतस्यानुकम्पया।
अभ्यागतस्याथगृहभगवन्वक्त मर्हसि ॥५३
पृच्छमामवनीपालयत्प्रष्टव्यमशङ्कितः।
वक्तव्यचेत्तवमयाकथयिष्यामितत्त्वत ॥५४
गृहागताययोमह्य प्रथमेदशेनेमुने ।
त्वयासमुद्यतोदातु कथसोऽॉनिवर्तित ॥५५
इस पर शिष्य ने कहा-कि इन महाराज को अर्घ्यदान उचित होगा
या नहीं, इसका विचार करके ही प्राना दीजिये, मैं आपकी आज्ञा का तत्काल
पालन करूगा, तब प्रात्मवान् मुनि ने सब वृत्तान्त जान लिया और आसन
दे कर सभापरण द्वारा ही उन्होंने राजा का सम्मान किया ॥५०॥ पि बोले-
है राजन् ! आप उत्तानपाद-तनय उत्तम हैं, यह मुझे विदित है, परन्तु प्राप
यहाँ क्यो माये हैं ? पापका इच्छित विषय क्या है, यह बताइये ॥५१॥ राजा
ने कहा-हे मुने । एक ब्राहाण के घर से कोई अज्ञात व्यक्ति उसकी पत्नी को
ले गया है. मैं उमी ग्राह्मणो की खोज के निये यह पाया हूँ ।।५२।। है
भगवन् । मैं पापसे जो विनम्र निवेदन करता हूँ और प्राप भी अनुग्रह पूर्वर
मझे क्या योग्य समभ कर उम रहने की प्राज्ञा दीमिये ॥५३।। ऋषि बोले-

प्रोत्तर मन्वन्तर आरम्भ (1) ] [ ७१ 1॥५५॥ हे राजन् । आप जो पूछना चाहे, गका रहित हो कर पूर्छ, कयन योग्य वात को मैं यथार्थ रूप मे ही कहूंगा ॥५४॥ राजा ने कहा-मैं जब यहाँ पाया था तब पहिले आप मुझे अघ्य देने की इच्छा करते थे, फिर माप उससे निवृत्त क्यों हो गये? त्वद्दर्शनेनरभसादाशतोऽयमयानृप । यदातदाहमेतेनशिप्येणप्रतिवोधित ॥५६ एपवेत्तिजगत्यतमत्प्रसादादनागतम् । यथासमतीत ववर्तमानचसर्वत ॥५७ आलोच्याज्ञापयेन्युक्त ततोज्ञातमयापितत् । ततोनदत्तवानय॑महतुभ्यविधानत ॥५८ सत्यराजस्त्वमाह कुलस्वायम्भुवस्यच । तथापिनाय॑योग्यत्वामन्यामोवयमुत्तमम् ॥५६ किंकृतहिमयाब्रह्मज्ञानादज्ञानतोऽपिवा। येनत्वत्तोऽय॑मर्दामिनाहमभ्यागतश्चिरात् ॥६० किविस्मृततेयत्पत्नीत्वयात्यक्ताचकानने । परित्यक्तम्तयासाद्ध त्वयाधर्मोनृपाखिल ॥६१ पक्षेणकर्मग्गोहान्याप्रयात्यस्पृश्यतानर । किमत्रवापिकीयस्यहानिस्तनित्यकर्मण ॥६२ पल्यानुकूलयाभाव्ययथाशीलेऽपिभर्तरि । दु शीलापितथाभार्यापोषणीयानरेश्वर ॥६३ मृपि बोले-है गजन् । आपको दखते ही, जैसे ही मैंने अर्घ्य लाने की आज्ञा दी, वैसे ही इम शिष्य ने शका व्यक्त की ॥५६॥ स मैं अतीत, दत्तमान और भविष्य के सभी गुप्त या प्रक्ट वृत्तान्त को भले प्रकार जानता है, वैसे ही मरा यह शिष्य भी मेरे प्रसाद से भूत, भविष्य, वर्तमान का ज्ञाता है ।।५७॥ इस शिष्य ने विचार कर ग्राज्ञा दन का अनुराध क्यिा, तब मैंने सब वात जान कर आपको विधिवत् अर्घ्य नही दिया ॥५८। ह राजन स्वायम्भुव मनु के वशात्पन्न हैं, इस निये अभ्यं के योग्य हो कर में मेरे विचार माप [ मापंण्डेय पुराण मे अध्यं के योग्य नहीं हैं ।१५६। राजा ने यहा-है भगवन् ! मैंने जाने प्रा. जाने में ऐसा कौन सा कार्य किया है, जिससे प्रथम बार प्रापर भी मैं मध्य के योग्य नहीं रहा ? ॥६०11 ऋपि यौले-है राजन् । प्रापने अपनी पत्नी को त्याग पर वन मे भेज दिया है, क्या यह स्मरण नहीं रहा ? उस परनी के त्याग के साथ ही प्रापने धर्म का भी त्याग कर दिया समभो ॥३१॥ धर्म- कर्म की हानि व एक पक्ष तक होने से मनुष्य सार्श के योग्य भी नहीं रहता, तुम्हारी तो वर्षों ही यम-हानि हुई है, इमलिये अपनी प्रध्यं विषयक योग्यता पर पर पाप स्वय ही विचार कीजिये ।।६२।। हे राजन् ! जैसे पति के विप• रीत चरित्र वाला होने पर भी पत्नी को पति को अनुगामिनी होना क्त्तव्य है, वैसे ही पत्नी के शील-रहित होने पर भी उसका भरण-पोषण पति का कर्तव्य है ।।६३।। प्रतिकूला हिसापत्नीतस्यविप्रस्ययाहृता । तथापिधर्मकामोऽसौत्वामुद्दयोतितवान्नृप ॥६॥ चलत स्थापयस्यन्यान्स्वधर्मपुमहापते। त्गस्वधर्माद्विचलितकोऽपर स्थापयिष्यति ॥६५ (द्वीपेकड गरीयेवाराशिचान्यायवर्तिनि । पापकृत्सुचविद्वत्सुनियताजतुरत्रक ।। विलक्ष्य समहीपाल इत्युक्तस्तेनधीमता। तथेत्युक्त्वाचपप्रच्छहृतापत्नीद्विजन्मन ॥६६ भगवन्केननीतासापत्नीविप्रस्यकुत्रवा। अतीतानागतवेत्तिजगत्यवितथभवान् ।।६७ ताजहारादितनयोवलाकोनामराक्षस । द्रक्ष्यतेचाद्यताभूपउत्पलावतकेवने ॥६८ च्छिमयोजयाशुत्व भार्ययाहि द्विजोत्तमम् । मापापास्पदतायातुत्वमिवासोदिनेदिने ॥६६ हे गजन् | उस ब्राह्मण को हरण की गई पत्नी उसके प्रतिकूल है, ता भी वह उसकी इतनी इतनी खोज कर रहा है ॥६४॥ हे राजन् । धर्म भ्रष्ट

प्रोत्तर मन्वन्तर प्रारम्भ (३) ]
[ ६५
राजा अपनी प्रिया के प्रति अत्यधिर अनुराग प्रकट करते थे ॥१३॥ एक समय
जब श्रेष्ठ वागंगनाएं मधुर स्वर से राजा के निकट गा रही थी तभी राजा
ने सुर पान की इच्छा करके अपने सभासदो के समक्ष ही निकट बैठी बहुला
को मद्य से परिपूर्ण पात्र दिया ॥१४-१५।।
सातुनेच्छतितत्पानमादातु तत्पराड मुसी।
समक्षमवनीशानातत ऋद्ध सपार्थिवः ।।१६
उवाचद्वाःस्थमाहूगनि.श्वसन्नुरगोयथा।
निराकृतस्तयादेव्याप्रिययापतिरप्रिय ॥१७
द्वाःस्थनादुष्टहृदयामादायविजनेवने ।
परित्यज्याशुनैतत्ते विचार्यवचनमम ।।१८
ततोनृपस्यवचनमविचार्यमवेक्ष्यस ।
द्वा स्थस्तत्याजतासुभ्र मारोप्यस्यन्दनेवने ॥१६
साचतविपिनेत्यागनीतातेनमहीभृता ।
अपश्यमानातमेनेपरकृतमनुग्रहम् ।।२०
सोऽपितत्रानुरागातिदह्यमानात्ममानस ।
प्रौत्तानपादिभू पालोनान्याभार्यामविन्दत ।।२१
परन्तु रानी ने उनसे विमुख होकर मद्य पान को ग्रहण नहीं किया, तो
राजा को अत्यन्त क्रोध हुआ ॥१६॥ और सर्प के समान नि श्याम को त्यागते
हुए उन्होंने द्वारपाल को बुलाया और उससे बोले कि इस मेरी प्रियतमा बहुला
ने मुझे अप्रिय मान कर मेरा निरादर किया है ।।१७। इस लिये इस दुष्ट हृदय
वाली को शीघ्र ही यहां से ले जाकर वन में छोड पामो मेरी इस प्राज्ञा का
तुरन्त पालन करो ॥१८|| मार्कण्डेयजी ने कहा-द्वारपाल ने राजा की प्राज्ञा
को प्राप्त कर रानी को रथ मे चढाया और उसे वन मे छोड आया ॥१६॥
राजा द्वारा रानी को वन मे छोडे जाने पर, अब राजा को न देखना होगा,
ऐसा सोच कर रानी ने राजा का अनुग्रह ही माना ।।२०।। इधर राजा उत्तम
ने रानी के प्रति अत्यन्त अनुराग होने के कारण दुवित हृदय होते हुए अन्य
पत्नी को ग्रहण नहीं दिया ॥२॥

ܚ In T" सम्मारनागलागीमानामनिन । पापनिजगमाधान २ प्रजा पालनामपितु वानियोगान् । धागपवाराणभिदिमागमागम महागजमाताःमि पागनीमा। मृणापानिपरित्राणगापमाननगाधिपाद ।।२८ मगभायांप्रगुमायपेनाप्पाहतानिति। गृहद्वारगनुदास्यांगमागममि ५ नवेगिनापहनायवयानीनानुगादिल । यतामिविग्रहपस्यपुसावाप्पानयामिताम् ॥२६ तवम्यागोडारिप्रमुमस्यगृहमम । हताहिभारियनरत हिमायनेभयात् ॥२॥ स्वरक्षिानोनृपतेपहभागादानवेतन । धर्मग्यतेनोनिधिन्तास्वन्तिमनुगानित २८ वह दुबिर चित्त गे उनी पोभनाली रामगुपने ममा धोरण अवस्था में भी धर्म-पूर्व प्रजा पासन परत हा गग्य कार्य में सगे रहे ॥२२ वह राजा अपनी प्रजा का पालन पोरग पुत्र में समान परते थे, एक दिन एक माहारण उनपे निकट माया और दुखित हाय मे बोगरा ॥२३॥ है रागन' में प्रत्यन वश में है, मेरी यात मुनो, पयो कि मनुष्यों के रोगों को गया ही दूर कर मक्ता है ॥२४॥ मैं रात्रि में समय जव गायन कर रहा था, तभी घर व द्वार खोल बिना ही रिमो ने मेरी पत्नी वा हरण कर लिया है, प्रब पाप मेरी उस पत्नी को लाकर मुझे दीजिये ॥२५॥ राजा ने पहा-है ब्रह्मन् । पापकी पत्नी का हरण किसने दिया है और कहाँ रखा है जब यह न जान खू', तब तर उसे वहां से प्राप्त पर।२६।। ब्राह्मण बोला हे राजन् । मेरे दायन करने में घर का द्वार खोले बिना ही मेरी पत्नी का हरण किस प्रकार हुअा, यह तो पाप ही जान सकते हैं ॥२७॥ क्यो कि पाप तक मैं

प्रोत्तर मन्वन्तर प्रारम्भ (३) ]
राजा हैं, धर्म का पष्ठास वेनन म्वन्प लेकर रक्षा के लिये नियुक्त , इसी लिये
मनुध्य रात्रि काल में निश्चित शयन करते हैं ॥२८॥
नतेदृष्टामयाभार्यायाहग्रुपाचदेहतः ।
वयश्च वक्षमास्याहिकिंशीलाब्राह्मणोचते ॥२६
कठोरनेनासात्युच्चाह्रस्ववाहु कृशानना।
( लबोदरीह्रस्वस्फिजतथाह्रस्वस्तनीनृप ) ।
विरुपरूपाभूपालननिन्दामितथवताम् ॥३०
वाचिभूपातिपरुपानसौम्यासाचशीलतः ।
इत्याख्यातामयाभार्यासकरालनिरीक्षणा ॥३१
मनागतीतभूपालतस्याश्चप्रथमवयः ।
ताररूपाहिमेभार्यामत्यमेतन्मयोदितम् ॥३२
अलतेव्राह्मणतयाभार्यामन्याददामिते ।
सुखायभार्याकल्याणीदु खहेतुहितादृशी ॥३३
अल्पाकुरूपताविप्रकारणगील मुत्तमम् ।
स्पशीलविहीनायात्याज्यातेन्येनसाहृता ॥३४
राजा बोले--पापकी पली को मैन कभी भी नहीं देखा, इस निये
आप उसकी प्राकृति, आयु और स्वभाव का भले प्रकार वर्णन करिये ॥२६॥
ब्राह्मण बोला-है राजन् ! मेरी पत्नी कठोर नयन, दीर्घ आकार, छोटी भुजा,
दश मुख (लम्बा उदर और सूक्ष्म हाथ वाली अत्यन्त कुस्प है, फिर भी मैं
उमे निन्दनीय नही मानता ॥३०॥ वह वाणी और स्वभाव से अत्यन्त
वश है उमकी प्रथमावस्था कुछ-कुछ ढल चुकी है. इस प्रकार उसका सभी
वर्णन सत्य-सत्य आपसे क्यिा है ॥३१-३२॥ राजा ने कहा है विप्र ! ऐमी
कुलक्षणा पत्नी का माप क्या करेंगे? मैं आपको एक अन्य पन्नी प्रदान
मक्ता हूं, क्यो कि सुलक्षणा पत्नी से सुख और कुलक्षणा से दुख ही प्राप्त
होना है ॥३३॥ हे ब्रह्मन् ! सौन्दर्य और शील स्वभाव से ही मंगल होता है,
इस लिये कुरूप तथा शील रहित पत्नी का तो परित्याग ही ठीक है ॥३४॥

६८ ]
[ मारपडेय पुराण
रक्ष्याभार्यामहीपालइतिचथ तिरुत्तमा ।
भार्यायारक्ष्यमारणायाप्रजाभवतिरक्षिता ।।३५
पारमाहिजायतेतस्यसा रक्ष्यातोतरेश्वर ।
प्रजायारक्ष्यमाणायामात्माभवतिरक्षित ॥३६
तस्यामरथ्यमारणायाभवितावरर्णमहर ।
सपातयेन्महीपालपूर्वान्स्वर्गादध पितृन ॥३७
(अनुज्ञायगुरु राजन्दत्वान्याजातवेदसे ॥३८
समिध तुमयाभार्यातयकर्ष शायत ।
क्थमेताविहायान्यभार्ययासमपरे ॥३६
गृह्यधर्मोयतोग्रह्मप्राप्यतेशाश्वतनरं ।
पूर्वोढयातुधर्मेणगृहीकुर्वन्नसीदति ॥४०
त्यक्त्वाताच क्रियाकुर्वन्नधर्मफललभेत् ।
अग्निनासहयानूनसा जगामगृहशुभा ॥४१
धर्मस्यग्रहणेसातुपूर्वोढेवप्रशस्यते ।
शठायाचारणात्तस्याजायतेवर्णसङ्कर १४२
श्राह्मण बोला-हे राजन् । पत्नी सदैव रक्षा के योग्य होती है, मुझे
यह थुति विदित है कि पत्नी को सम्यक् रक्षा से ही सन्तान की रक्षा हो
सकती है ॥३५॥ हे राजन् । पत्नी के गर्भ से अपने प्रात्मा की हो उत्पत्ति
होती है, इसी लिये सन्तान वो रक्षा करने से अपने प्रात्मा की ही रक्षा होना
माना गया है ।।३६।। इसलिये पलो को भले प्रकार रक्षा करे, उसी रक्षा
न करने से वर्णसकर दी उसत्ति होती है, जिसके कारण पूर्व पितरो का
स्वर्ग से पतन होता है ॥३७॥ ( हे राजन् । गुरुजनो की अनुमति से अनि
वो मामी परके ) ॥३८॥ इस पर्वश पनी का मेरे साथ वरण हुआ है इस
लिय इसका त्याग करके अन्य नारी के साथ किस प्रकार सह आमरण करू
१३६ जब ऐसे पाचरण से गृहस्थ धर्म के साथ ही मनुष्य को शाश्वत ब्रह्म
यी प्राप्ति होती है, और जिस स्त्री के साथ धर्म कार्य करता हुया गृही दुख को
गाप्त नहीं होता ॥४०॥ उस यी को त्याग वर जो क्रिया वह करता है वह

द्विजभार्या को पनि के घर भेजना ] [ ७३ को धर्म में स्थापित करने वाले प्राप ही हैं, परन्तु जब भाप स्वयं ही धर्म को छाडे गे तब आपनो उममे कौन प्रवृत्त करेगा? ॥३५॥ वन का गेंडा सेन के घान्य का भक्षरा करके अपना निर्वाह करे, राजा अन्यायी हो या विद्वान् पुरुष पाप कर्म करे तो फिर शिक्षा दन वाला कौन होगा?) मार्कण्डेयजी ने कहा-ऋषि के ऐस वचन सुन कर राजा लज्जित हो गये और सब दोप स्वीकार कर, विप्र पत्नी का वृत्तान्न उन्होंने पूछा ॥६६॥ ह मगवन् । प्राप विश्व सभी भूत, भविष्य, वत्तं मान के नाता हैं, मव उस विप्र पनी को किसने हरण किया और कहां रखा है, यह बतान की कृपा करिये ॥६॥ पि वोले-हे राजन् उम ब्राह्मणी का हरण मद्रि के पुत्र बलाक नामक राक्षस न किया है, उस पाप इस समय उत्पलादन नाम के वन म देखेंगे ॥६८|| अब आप जाइये और ब्राह्मण को उसकी पत्नी को मिलाइये, जिससे उस ब्राह्मण को प्रापके समान पाप भागी न होना पडे ॥६६॥ ६२-द्विजभार्या को पति के घर भेजना अथारुरोहम्वरथरिणपत्यमहामुनिम् । तेनास्यातवनतच्चप्रययावुत्पलावतम् ॥१ यथाख्यानम्वरूपाचभार्थ्यांभोंद्विजस्यताम् । भक्षयन्तीददथिश्रीफ्लानिनरेश्वर २ पप्रच्छचकथभद्रत्वमेतद्वनमागता। स्फुटब्रवीहिवंशालेरपिभा-सुगमरण ३॥ मुताहमतिरात्रम्यद्विजस्यवनवामिन । पत्नीविशालपुत्रस्ययस्यनामत्वयोदितम् ।।४ साहहताबलाकेनराक्षसेनदुरात्मना । प्रमुप्ताभवनम्यान्तर्घातृमातृवियोजिना ॥५ भस्मीभवतुनद्रक्षोयेनास्म्येववियोजिता। मानाभ्रातृभिरन्यश्चतिष्ठाम्यनमुद सिना ॥

{ माण्डेय पुराण -- अस्मिन्वनेऽतिगहनेयेनानीयाहमुस्मिता। नवेमिका रणतिनोपभुक्त नसादति ॥७ मानण्डेयजी ने कहा-राजा उन महपि को प्रणाम करके रपमे चढ़े पार महपि द्वारा बताये हुए उत्पलावत बन में पहुंचे। यहां देखा कि पति पे बताये हुए रूप वाली वह ब्राह्मणी श्रीपल सा रही है ॥२॥ उम देसार उन्होंने पूछा-हे भद्रे । तुम वन मे किस प्रकार भागयी ? तुम विशाल पुत्र मुशर्मा नामक ग्राह्मण को ही पत्नी हो न? यह स्पष्ट बताओ | ग्राह्मणी बोली- मैं प्रतिराव नामक बनवासी ब्राह्मण की पुत्री और जिन विशाल पुत्र का मापने नाम लिया है, उनकी ही भार्या हू ॥४॥ मैं घर में शयन करती थी, नभी पापी राक्षस मुझे भाई और माता से वियोग करके यहाँ ले पाया है ॥५॥ अब मैं सब आत्मीयजनो से पृथक् होकर अत्यन्त दु ख पूर्वक यहां रह रही हूँ, जिस राक्षस ने मेरी यह दशा की है, वह भस्म होजाय ॥६॥ उस राक्षस ने इस निर्जन वन मे मुझे ला रखा है, मुझे ज्ञात नहीं कि वह मेरा भक्षण या उपभोग क्यो नही करता है ॥७॥ अपितज्ज्ञायतेरक्षस्त्वामुत्सृज्यक्ववंगतम् । अहमतिबंवानप्रेपितोद्विजनन्दिनि । अस्यैवकाननस्यान्त सतिष्ठतिनिशाचर । प्रविश्यपश्यतुभवान्नबिभेतिततोयदि 16 प्रविवेशतत सोथतयावत्म निशिते । दहशेपरिवारणसमवेतचराक्षसम ॥१० दृष्टमात्रेततस्तस्मिस्त्वरमाण सराक्षसः। दूरादेवमहीमूर्नास्पृशन्पादान्तिकययौ ॥११ ममात्रागच्छतागेहप्रसादस्तेमहान्कृतः । प्रशाधिकिंकरोम्येषवसामिविपयेतव ॥१२ अध्यंचेमप्रतीच्छत्वस्थीयताचेदमासनम् । दयभृत्याभवान्स्वामीदमाज्ञापयस्वमाम् ।।१३ द्विजनार्या को पति के घर भेजना ] ७५ कृतमेवत्वयामवंसवमिपचिति कृता । किमयंब्राह्मणवधूम्त्वयानोतानिशाचर ॥१४ राजा ने कहा-तुम्हारे पनि ने ही मुझे यहाँ नेवा है, क्या तुम्हें विदित है कि दह राक्षम इस समय कहां गया होगा? ॥८द्राहरणी बोली-दली वन-पान में रहीं होगा, यदि उससे डर न हो तो, वन में प्रवेश करो तो वह दिखाई पड जायगा Men मारडेवजी ने कहा-ब्राह्मी द्वारा माग प्रदर्शित करने पर राजा ने वन मे धुन पर अपन परिवारी बनो ने घिरे हुए उन राधन को देन्दा ॥१०॥ वह राजा को देखते ही तुरन्त उठा और मम्वर से पृथिवी को स्पर्म करता हुमा राजा के चरणों के समीप पावर बोला ॥११॥ राशन ने कहा-महाराज की मुझे का प्राज्ञा है, जिन लिए मेरे घर पर पधारे हैं, में प्रापरे राज्य में निवास करता हूं, आप मुझे याज्ञा करिये ॥१२॥ यह मध्य ग्रहरा करिये, इन आनन पर विराजमान होइये, माप स्वामी है और में मेवर हूँ, आप मुझे नि.सोच माना दीविच ॥१३॥ राजा ने कहा--तुमने अपन कतंब्य का पालन और अतिथि सत्कार भी उचित रीति ने किया है, परन्तु यह बवानो कि तुम उस विपी को पिनरिये हरए पर नार हो ? ॥१४॥ नेयमुब्धामन्त्यन्याभार्यार्थ चेद्धृतात्वया । भक्ष्यार्थचेत्स्थनात्तात्ववैततथ्यतामम ॥१५ नवयमानुपाहाराप्रन्येनेनृपराक्षमा । मुकृतस्यपन्नयत्तुतददनीमोवयनृप ॥१६ (मुनस्यफ्लयत्तुतत्तवध्यान्यनुप । राक्षमीयोनिमापन्न रालोक्भयपरीन् ।) म्वभावचमनुप्पाणायोषितावपिमानिता । नामिपचननदनीमोनवयजन्तुखादका ॥१७ यदम्मानिनुंगामानि तान्नतितेतदा। भुक्तेदुष्टेम्बभावेचमुग्णवन्तोभवन्निच ॥१८ मन्निन प्रमदानूपगाप्परनाममा. । रामन्यातामुनिष्ठमुमानुगोपुरनि वयम् ॥१९ मनुष्य का भक्षण करने [ मावं एडेय पुराण यद्यपानोपभोगायनाहारायनिशाचर । गृहप्रविश्यविप्नस्यतत्विमेपाहृतात्वया ॥२० पत्नी बनाने को लाय हैं, यह भी नहीं कह सकता, क्योकि वह कुम्प है, यदि भक्षणार्थ लाये हैं तो भक्षण क्यो नहीं करते? यह सब मुझे ययायं रूप से बतायो ॥१५॥ राक्षस दोला-हे राजन वाला नहीं हूं, मनुष्य भक्षी राक्षस अन्य होते हैं, मैं तो पुष्यफल पा ही भोजन करता हूँ ।।१६॥ ( हे नृप । अब मैं पुण्य का फ्ल बताता हूं, क्रूर प्रौर भय- दायक राक्षस योनि को प्राप्त हुना मैं ) सम्मान युक्त अथवा असम्मानित स्त्री. पुरुषो के स्वभाव का ही सदा भोजन करता हूँ, मैं जतुभोजी राक्षस नहीं हूँ ॥१७।। इस प्रकार क्षमागुण वाले स्वभाव का भोजन करने से प्रोध उत्पन्न होता है और दुष्ट स्वभाव का भोजन करने पर वह गुण युक्त होते हैं ॥१८॥ हे राजन् । मेरे पास अप्सरायो के समान रुपवती अनेक राक्षसी पत्नियां हैं। उनके होते हुए मैं मनुष्य स्त्री की कामना क्या करता ? ॥१६राजा ने कहा- यदि यह ब्राह्मणी तुम्हारे लिये भोग्य अथवा भक्ष्य नहीं थी तो तुमने इसका ब्राह्मण के घर से हरण क्यो किया ॥२०॥ मन्त्रवित्स द्विजश्रीष्ठोयज्ञ यज्ञगतस्यमे । रक्षोघ्नमन्त्रपठनाल रोत्युच्चाटननृप ॥२१ वयवुभुक्षितास्तस्यमन्त्रोच्चाटनकर्मणा । क्वयाम सर्वयज्ञ पुमऋत्विग्भवतिद्विज ॥२२ ततोऽस्माभिरिदतस्यकल्यमुपपादितम् । पल्ल्याविनापुमानिज्याकर्मयोग्योनजायते ॥२३ वैकल्योच्चारणात्तस्यव्राह्मणस्यमहामते । तत सराजातिभृश विपण समजायत ॥२४ वैकल्यमेपवित्रस्यवदन्मामेव निन्दति। अनहमस्यचगासाऽप्याहमुनिसत्तम. ॥२५ वैवरयतम्यविप्रस्पराक्षसोप्याहमेयथा । अपनीयतयासोऽहसङ्कटमदास्थित ॥२६ द्विवभार्या को पति के घर भेजना ] [ . एवंचिन्तयतस्तन्यपुनरप्पाहावन । प्रणामनम्रोराजानवद्धाजलिपुटोमुने ।।२७ नरेन्द्राज्ञाप्रदानेनप्रसादः क्रियतामम । भृत्यम्यप्रणतयेत्ययुप्मद्विपयवामिन IRE राक्षम दोला-है राजन् ! वह द्रालण मन्त्रवेत्ता है और सभी पक्षों में जाकर रक्षोघ्न मन्त्र का पाठ करने मेरा उच्चाटन करते हैं ॥२१॥ जब वह मन्त्र पाठ द्वारा मेग उम्चाटन करते हैं, तब मैं क्षुधा से पीडित होकर कहाँ जाऊ कादि वह सभी पदों में त्विर वन है ।।२२।। इनोनिये मैंने उनके चित्त को उद्विग्न किया है, क्योंकि भार्या के दिना पति कभी पिसी यज-कर्म में समय नीं होता ॥२३॥ मार्कण्डेरजी ने कहा-राक्षस द्वारा ब्राह्मरा के चित्त का उद्विग्न किया जाना सुनकर राजा अत्यन्त क्षुभित हुए ॥२४॥ और उन्होंने सोचा कि ब्राह्मण को द्विग्न क्यिा कह कर यह राक्षम मेरी ही निन्दा करता है, इसी कारण उन पिवर ने मुझे अयं के प्रमोन्य दवापा या ॥२॥ मोर पब यह राक्षम भी मुन पली-विहीन के समान ही द्राह्मरा की पन्नी का हरा परके उनको उद्विग्न क्यिा कहता है, इसलिये मैं भी पनी-हीन होने ने सङ्कट प्रस्त हो रहा हूँ॥६॥ माण्डेयत्री ने कहा-इस प्रकार राजा विचार कर हो रहे थे, वनी उन राम ने पुन. विनम्रता पूर्वक प्ररान करने, करवद्ध निवेदन दिया ॥२७॥ हे गजन् मैं भी भार राग्य का ही एक प्रजाउन हूँ, इन पारा इस सेवा को मासा देकर कृवार्य करिव ॥२८॥ स्वभाववयमस्नीमन्त्वयोक्तं यन्निगार। सदयिनोवययेनवार्येणगृगुनान्मम ||२६ अन्याम्वयाचनाह्मवादी गोल्यनुपभुज्यताम् । येनत्वयातदोभील्यातद्विनीतामवेदियम् ॥३० नीपनायायभायेंयतम्यवेश्मनिशाचर। अम्मिन्वृते तनर्वगृहमन्यागतस्यमे ॥१ तन मुसक्षमुम्नस्था.प्रविश्यान्तःम्दमायया । मायामामदो मोल्यनिजगत्यानृपानया ॥३२ ७८ ] 1 मार्चण्डेय पुराण दो शील्येनातिरौद्रगपत्नीतस्यद्विजन्मन । सेनसासम्परित्यक्तासमाहजगतीपतिम् ।।३३ स्वकर्मफलपाकेनभर्तुस्तस्यमहात्मनः । वियोजिताहतद्धतुरयमासीनिशाचर ॥३४ नास्यदोपोनवातस्यममभतु महात्मन । ममेवदोषोनान्यस्यस्वकृतह्य पभुज्यने ।।३५ गजा बोले-है निशाचर । तुमने स्वभाव भक्षण करने की बात कही है, अब मैं जिस कार्य के लिये आया हूँ, उसे सुनो ॥६६॥ तुम इस ब्राह्मणी के खोटे स्वभाव का भक्षण करो, क्योकि ऐसा होने से इसके स्वभाव मे विनम्रता आ जायगी ॥३०॥ ऐसा करने क पश्चात् तुम इसे उसी के घर में पहुचा दो, जिसकी यह पली है, ऐसा करने से तुम्हारे द्वारा मेरे प्रातिथ्य सत्कार की भी पूर्ति होगी ।।३१।। मार्कण्डेयजी ने कहा-तब अपनी माता के प्रभाव से उस राक्षस ने ब्राह्मणी के हृदय मे प्रवेश किया और उसके दुष्ट स्वभाव का भक्षण कर लिया ॥३२॥ तदनन्तर अपने अत्यन्त दुष्ट स्वभाव से मुक्त हुई वह ब्राहाणी राजा से बोली ॥३३।। मैं अपने कर्म से ही अपने महात्मा स्वामी के वियोग को प्राप्त हुई हूं, यह राक्षस उसका एकमात्र कारण है ॥३०॥ परन्तु इस राक्षस या मेरे उन महात्मा पति का इसमे कुछ भी दोप नहीं है, दोप तो मेरा ही है, क्योंकि स्ववृत कर्म का फल अवश्य भोगना पडता है ॥३५॥ अन्यजन्मनिकस्यापिविप्रयोग कृतोमया । सोऽयमयाप्युपगत कोदोपोऽस्यमहात्मन ॥३६ प्रापयामितवादेशादिमाभर्तु गृहप्रभो। यदन्यत्वरणीयतेतदाज्ञापयपार्थिव ॥३७ अस्मिन्कृतकृतसवत्वयामेरजनीघर । मागन्तव्यचतेवीरकायंकालेस्मृतेनमे ॥३८ तथेत्युक्त्वातुतद्रक्षस्तामादाय द्विजाङ्गनाम् । निन्येभ गृहशुद्धादौ शील्यापगमात्तदा ॥३६ ऋषि से उत्तम का क्योषाधन । [७९ प्रतीत होता है कि पूर्व किमी जन्म में मैंने किसी का विशेग कराया पा, इमी से मेरा भी अपने पति से वियोग हमा, इनमें इस रासन का क्या पोप है ? ॥२६॥ राक्षस न कहा है महाराज आपको माला से मैं इसे अभी इस पति-गृह में पहुंचाता हू, मुझे माता दीजिये कि मापका और क्या कार्य मैं हं॥३७॥ राजा बाले-है रासन } इस कार्य को कर तुमने मेरे सभी कार्य कर दिये हैं, फिर भी है वीर ! मेर द्वारा स्मररा करने पर तुम मेरे पास उपस्थित होमो, यह स्वीकार करा ॥३८॥ मार्कण्डेयजी ने कहा- राक्षस ने राजा की बात स्वीकार कर दुष्ट स्वभाव से मुक्त हुई उस ब्राह्मणी को उसरे पति-गृह मे बा पहुंचाया ॥३६॥ ६३-पि से उत्तम का कयोपकथन दायित्वाराजापिस्वभई गृहमगनाम् । चिन्तयामासनि श्वपक्मित्रनुकृतभवेद ॥१ प्रनयोग्यताक्प्टममामाहमहामना.। वैकल्य विप्रमुद्दिश्यतयाहाय निगाचरः॥२ सोहकयकरिप्यामित्यक्तापत्नीमवाहिता। अथवाज्ञानदृष्टिलच्छामिमुनिसत्तमम् ।।३ सचिन्त्येत्यसभूपाल समारुह्यचतरथम् । ययौयत्रसधर्मात्मात्रिवालनोमहामुनि. ४ प्रवनहरथात्मोऽयतसमेत्यप्रणम्यच । यथावृत्तममावस्यौराक्षनेनसमागमम् ॥५ ब्राह्मण्यादर्शनचवदो शील्यापगमनया । प्रेपणभढे गेहेचकार्यमागमनेचयत ।।६ ज्ञातमेतन्मयापूर्वयत्ततेनराधिप । सामागमनेचवमत्समीपेनवापिलम् its -- ८० [ माण्डेय पुराण माण्डेयजी ने कहा-उस ब्राह्मणी वो उसके पति के घर भेजवर राजा दीर्घ श्वास लेते हुए सोचने लगे कि अब पिस यम के द्वारा मेरी भलाई हो ॥१॥ उन महपि ने मुझे पत्नी त्याग के कारण अर्घ्य के अयोग्य बताया और इस राक्षस ने भी ब्राह्मण के प्रति पत्नी-वियोग से उत्पन्न वर्म-हानि का विषय कहा ॥२॥ मैंने अपनी पत्नी का परित्याग रिया है, अब मुझे क्या करना चाहिये, इस विषय में उन्ही ज्ञान दृष्टि वाल महपि से प्रश्न करू ||३|| ऐसा विचार करके राजा रथारूढ हुए और उन त्रिकालज्ञ मुनि के आश्रम में पहुचे ।।४॥ रथ से उत्तर कर उनके निकट उपस्थित हुए और प्रणाम करके ब्राह्मणी से मिलना, राक्षस से समागम होना, ब्राह्मणी के दुष्ट स्वभाव का नष्ट होना और उसे उसके पति-गृह भेजकर पुन उनके पाम आने का उद्देश्य भी प्रादि से अन्त तक कहा ॥५-६॥ मपि से कहा-हे राजन् | आपके द्वारा किया गया कार्य और प्रापके पुनरागमन का उद्देश्य यह सब मैं पहिले ही जान चुका हूँ॥७॥ प्रष्टु मामिहकिकार्यमयेत्युद्विग्नमानस । त्वमागतोमहीपालशृणुकायंचयत्त्वया ॥ पत्नीधर्मार्थकामानाकारणप्रबलनृणाम् । विशेषतश्चधर्मस्यसक्तस्त्यजताहिताम् | अपत्नीकनरोभूपनयोग्योनिजकर्मणाम् । ब्राह्मण क्षत्रियोवापिवैश्य शूद्रोऽपिवानृप ।।१० त्यजताभवतापत्नीनशोभनमनुतिम् । अत्याज्योहियथाभस्त्रिीणाभार्यातथानृणाम् ॥११ भगवकिकरोम्येपविपाकोममकर्मणाम् । नानुकूलानुकूलस्ययस्मात्यक्ताततोमता ॥१२ यद्यत्करोतितत्क्षान्तदह्यमानेनचेतसा । भगवस्तद्वियोगातिविभीतेनान्तरात्मना ॥१३ साम्प्रततुवनेत्यक्ता नवेषिक्वनुसागता । भक्षितावापिथिपिनेसिव्याघ्रनिशाचर ॥१४ ऋषि से उत्तम का क्थोपकथन । [ ८१ फिर भी आप स्वयं ही मुभने प्रश्न करें, इमी को प्रतीक्षा मे था. है राजन् ! अब आप अपने कर्तव्य के विषय में सुनिये ॥॥ मनुष्यो के धर्म, मर्थ और काम के साधन का प्रवल कारण भार्या ही है, जो भार्या का त्याग कर देते हैं, वह धर्म का भी त्याग करते हैं । हे राजन् ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र ही क्यो न हो, पत्नी को त्याग करके अपने कर्म के भनुष्ठान में समर्थ नहीं होते ॥१८॥ हे राजन् ! मापने पली का त्याग करके उचित कार्य नहीं किया है, जैसे स्त्री के लिये पति का त्याग अनुचित है, वैसे ही पति के लिये पत्नी का त्याग भी उचित नहीं है ॥११॥ राजा बोले-हे भगवन् ! मैं तो पत्नी का त्याग कर ही बैठा, यब मुझे क्या करना चाहिये ? ॥१२॥ उसके वियोग के कारण मेग अन्तरात्मा क्षोभ से भरा हुआ है और चित्त दग्ध हो रहा है, इसीलिये उस पत्नी द्वारा किये सव अप्रिय पाचरण भूल गया हूँ ॥१३॥ परन्तु, वन मे त्यागी हुई मेरी पत्नी न जाने कहाँ चली गई होगी ? अथवा उसे सिंह, व्याघ्र या राक्षसो ने भक्षण कर लिया होगा, यह मुझे ज्ञात नहीं है ।१४। नभक्षितासाभूपालसिंहव्याघ्रनिशाचरं । मात्वविप्लुतचरित्रासाम्प्रततुरसातले ॥१५ सानीताकेनपातालमास्तेसाऽपिताकथम् । प्रत्युद्भुतमिदब्रह्मन्यथावदक्तुमर्हसि ॥१६ पातालेनागराजोऽस्तिप्रख्यातश्वकपोतकः । तेनदृष्टात्वयात्यक्ताभ्रममाणामहावने ॥१७ सारूपशालिनीतेनसातुरागेणपार्थिव । वेदितार्थेनपातालनीतासायुवतीतदा ॥१८ ततस्तस्यसुतासुभ्र नन्दानाममहीपते । भार्यामनोरमाचास्यनागराजस्यधीमतः ॥१६ तयामातु.सपलीयसावित्रीतिशोभना । दृष्टास्वगेहंमानीतागुप्ताचान्त पुरेशुभा ॥२० यदातुयाचितानन्दानददातिनृपोत्तरम् । मूकामविष्यसोत्याहनदातातनमामिता ॥२१ १२ ] [ मापण्डेय पुराण अपि ने पहा-हे राजन् ! गिह, ध्यान अथवा राक्षग विगी ने भी उसका भक्षण नहीं दिया है, वह हम गमय विगुट परित्र गुम होर रमातन मे रह रही है ।।१५।। राजा पोले- ग्रामन् ! मेरी पत्नी रसानप में गि द्वारा गई और पिस प्रकार विशुद्ध होकर रहती है, यह पदभुत बात मुझे यथा. यत् बताने की कृपा करिये ॥१६॥ पिग पहा हे गजा! पोता नाम के एक नागराज रसातल में रहते हैं, उन्होंने बापरे द्वारा परित्यक्त उम रूपवती नारी को महावन में भ्रमण करते हुए देखा तो वह उम पर अनुरात होगये और पपना प्रयोजन बता पर वह उसे रसातल में से गये ॥१७.१८॥ उन नागराज की पत्नी का नाम मनोरमा तथा कन्या का नाम नादा है ।।१६। उस पन्या ने इस सुन्दरी को अपनी माता को होने वाली सपत्नी जानवर उसे अन्त पुर में छिपा लिया ॥२०॥ जब नागराज इस सुन्दरी के विषय में अपनी पुत्री से पहते नव वह उन्हे कुछ उत्तर न देती थी, इस पर नागराज ने अपनी पुत्री नन्दा को गूगी होने का शाप दे दिया ॥२१॥ एवशप्तासुतातेनसाचास्यैतत्रभूपते । नीतातेनोरगेन्द्ररेणधृतातत्सुतयासतो ॥२२ ततोराजापरहर्षमवाप्यतमपृच्छन । द्विजवर्यस्वदौर्भाग्यकारणदयिताप्रति ॥२३ भगवन्सर्वलोकस्यमयिप्रीतिरमुत्तमा । किन्नुतत्कारणयेनस्वपल्लीनातिवत्सला ।।२४ ममचासायतीवेशाप्राणेभ्योऽपिमहामुने। साचमाप्रतिदु शीलावहितत्कारण द्विज ॥२५ पाणिग्रहणकालेवसूर्यभौमशनैश्वरः । शुक्रवाचस्पतिभ्याचतवभार्यावलोकिता ।।२६ तन्मुहूर्तेऽभवञ्चन्द्रस्तस्या सोमसुतस्तथा। परस्परविपक्षोतोततःपार्थिवतेभृशम् ।।२७ तद्गच्छत्वस्वधर्मेणपरिपालयमेदिनीम् । पत्नीसहायासश्चिकुरुधर्मवती प्रियाः ॥२८ गौतम मनु की उत्पत्ति ] है राजन | सभी मनुष्य इत्युक्तेप्रणिपत्यनमारुह्यस्यन्दनतत । उत्तम पृथिवीपालमाजगामनिजपुरम् ॥२६ वह नागकन्या इस प्रकार अपने पिता के द्वारा शापित हुई है, फिर भी उसने इम सुन्दरी को पकड रखा है ।।२२।। मार्कण्डेयजी ने कहा-- इस पर राजा अत्यन्त हर्षित हुए और उन्होने अपनी पत्नी के अपने प्रति अप्रिय भाव का कारण ऋपि स पूछा ।।२३।। राजा वोले हे भगवन् मुझमे अत्यन्त प्रेम करते हैं, परन्तु मेरी अपनी ही पली मुझ मे अनुरागिणी नही है, इसका कारण क्या है ? ॥२४॥ हे महामुने । मेरे प्राणो से अधिक प्रिय होने पर भी वह पत्नी मेरे प्रति कुव्यवहार करती है, उसका कारण मुझे बता- इये ॥२५॥ ऋषि ने कहा--जिस समय आपका विवाह हुआ था, उस समय आप पर भूयं, मगल और शनिश्चर की तथा आपकी पत्नी पर शुक्र और वृहस्पति की दृष्टि थी ॥२६॥ उसी मुहूत्त में आपके बुध और पापको पत्नी के चन्द्रमा परस्पर में घोर विपक्षी थे॥२७॥ अब जाकर अपनी पत्नी से मिलो और सब प्रकार धम कार्यों का अनुपान और पृथिवी का पालन करो ॥२८॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-महर्षि के ऐसा कहने पर महाराज उत्तम ने उन्हें प्रणाम दिया और रथारूढ होकर अपने नगर मे पाये ॥२६॥ ६४--गौतम मनु की उत्पत्ति ततःस्वनगरप्राप्यतददर्श द्विजनृप । समेतभार्ययावशीलवत्यामुदान्वितम् ॥१ राजवर्यकृतार्थोऽस्मियतोधम्मोहिरक्षित । धर्मज्ञेनेहभवताभायमानयतामम ॥२ कृतार्थस्त्व द्विजश्रेनिजधर्मानुपालनात् । वयसङ्कटिनोविप्रयेपापत्नीनवेश्मनि ॥३ नरेन्द्र साहिविपिनेमक्षिताश्वापदयादि । कोषस्यवशमागम्यधर्मोनावेक्षितस्त्वया ।

८४ -- [ माईण्डेय पुराण अलनयाक्मिन्यस्यानपारिणगू ह्यतेत्वया । सतिराशागृहेकन्या गोभनानृपनन्दन ।।४ नभक्षितामेदयिताश्वापदःसाहिजीवति । अविदूपितचारित्राकथमेतत्करोम्यहम् ॥५ यदिजीवतितेभार्यानचैवव्यभिचारिणी। अपत्नीकत्वतोजन्मकिपापनियतेत्वया ॥६ आनीतापिहिताविप्रप्रतिकूलासदेवमे । दुखायनसुलायालतस्यामैत्रीनवैमयि । ययातेब्राह्मणीविप्रवशगातवसु दरी। तथात्वकुरुयत्नमेयथासावशगामिनी ।।७ माकण्डेयजी ने कहा-महाराज उत्तम ने अपने नगर में पहुंचकर उस ब्राह्मण को अपनी दीलवती पत्नी के साथ हर्ष सहित स्थिन देखा ॥१॥ ब्राह्मण ने राजा से कहा- नृपश्रे | आपने धर्म के ज्ञातः होने के कारण मेरी पत्नी को लाकर धर्म की रक्षा की है, इससे मैं धन्य हुआ हूँ ॥२॥ राजा ने कहा-हे द्विजवर । पाप अपने धर्म पालन के कारण कृतकृत्य हुए हैं, परतु मेरे घर में भार्या नहीं है, इसलिए मैं घोर विपत्ति में पड़ा हूँ ॥३॥ ब्राह्मण बोला-हे राजन् । प्रापने क्रोधवश उम समय धर्म को नहीं देखा, मय उसे कही हिंसक जीवों ने भक्षण कर लिया हो या किसी और प्रकार से नष्ट हो गई हो तो उपके मिलने की मासा न करके किसी अन्य कन्या से विवाह क्यो नहीं कर लेन, है राजन् । राजामो के घर अनेक कन्याएं होगी ॥४॥ राजा ने कहा-मेरी पत्नी का किसी ने भक्षण नहीं किया, वह अभी भी विशुद चरित्र से जीवितावस्था मे है. फिर से अन्य स्त्री का ग्रहण करूं? १५॥ ब्राह्मण बोगा--पदि पापकी पत्नी प्रभी तक श्रेष्ठ चरित्र वाली होकर जीवित है तो उस छोडकर पाप क्यो करते हैं ? राजा ने कहा-हे ब्रह्मन् ! मैं उमे ले भी पाऊँगा तो वह मेरे मनुकून नहीं होगी, पोषि उसकी प्रीति मुममे नही है, इसमें मुझे दुम ही होगा, पब माप वह पाय करियै जिममे वह मेरे या में होमो

गौतम मनु की उत्पत्ति ]
[ ८५
त्वयिसप्रीतयेतम्यावरेटिल्पकारिणी ।
क्रियतेमिनकामर्यामिनविन्दाक्रामिताम् ।
अप्रीतयो प्रोनिक्रीसाहिमजननीपरम् ।
भार्यापत्योमनुष्येन्द्रतानवष्टिंक्राम्यहम् ।।
यतिष्ठतिसासुभ्रूम्नवभार्यामहीपत ।
तस्मादानीयतासातपराप्रीतिमुपंप्यति ॥१०
(तस्यास्तवहितार्थायवर्गोयत्रनमीदति )
इत्युक्त मतुनिखिलमम्भारानननीपति
आनिनायचकारेष्टिमचताद्विनमत्तम ॥११
सप्तकृत्व मतुतदाकारपुिन पुन ।
तस्राज्ञाद्विजयष्टोभार्यासम्पादनायवै ॥१२
यदारापितमंत्राताममन्यतमहामुनि. ।
स्वभतरितदाविप्रस्तमुवाचन राधिपम् ॥१३
आनीयतानरश्रेष्ठयातवेष्टात्मनोऽन्तिकम् ।
भुवभागास्तामार्द्ध यजयज्ञाम्नयात ॥१४
ब्राह्मण वोना-मित्रता की कामना वा7 उपकारी पुरप जिस यन को
करत हैं, उसी मित्रविन्दा नामक यज्ञ को मैं तुम्हारी पत्नी . लिए क्रू गा
॥८॥ हे राजन् ! वह यज्ञ असन्तुष्ट स्त्री पुस्प म प्रीति करान वाला और
शक्ति का दने वाला है, मैं उनी का प्रापक निमित्त अनुशन करुंगा ॥६
मापकी वह पत्नी जहां रहती है वहाँ स उस ले आइय, वह अवश्य ही प्राप
के प्रति परम तय करन वाली हो जायगी ॥१०॥ (तुम्हार हित के लिए
एम अवसर म घम की हानि नहीं होती ) मारडेयजी ने कहा-ब्राह्मण का
वचन मुनगर महाराज उत्तम न सम्पूर्ण यन सामग्री उपस्थित की और उन
ब्राह्मण ने भी यन का अनुष्ठान किया ॥१२॥ जब उमन म राजमहिनी को
वरन मामो व प्रति अनुरक्त मनझा तब वह राजा स वाला ॥१३॥ है
राजन् अब अपनी उम पली वो लाार मांगारिक मुनों का मागिय, और
पल पूक यन कार्यों का सम्पन्न करिव ॥१४॥

[ मार्कण्डेय पुरा
इत्युक्तम्तेन विप्रेणभूपालोविस्मितस्तदा ।
सस्मारतमहावीर्यसत्यसन्धनिशाचरम् ।।१५
स्मृतस्तेनतदासद्य समुपेत्यनराधिपम् ।
किकरोमोतिसोऽप्याहपरिणपत्यमहामुने ॥१६
ततस्तेननरेन्द्ररण विस्तरेण निवेदिते।
गत्वापातालमादाय राजपत्नीमुपाययौ ।।१७
आनीताचातिहानसाददर्शतदापतिम् ।
उवाचच प्रसीदेतिभूयोभूयोमुदान्विता ॥१८
तत सगजारभसापरिष्वज्यामानिनीम् ।
प्रियेप्रसन्नएवाहभूयोऽप्येवब्रवीपिकिम् ॥१६
यदिप्रसाद प्रवरानरेन्द्रमयितेमन. ।
तदेतदभियाचेत्वातत्कुरुप्वममाहणम् ॥२०
नि.शकेहिमत्तोयद्भवत्याकिंचिदीप्सितम् ।
तदलम्यनतेभीरतवायतोऽस्मिनान्यथा ॥२१
गाएडेयजी ने कहा-ब्राह्मए की यह बात सुनकर राजा अत्यन्त
विस्मय को प्राप्त हुए घोर उन्होने उसी समय उ8 महान् पराक्रमी राक्षस का
स्मरण किया ॥१५॥ स्मरण करते ही वह राक्षस उमी समय उपस्थित हुमा
पौर उनको प्रणाम करता हुमा योला-मुझे क्या प्राजा है ? ॥१६॥ तर
राजा ने मव बाल उगे विस्तारपूर्वक बतायी पौर तव यह पाताल में जाकर
रानी को पीघ्र ही मेर पा गया ।।१७।। रानी ने वही पाकर हारिक प्रीति
गहित पाने पनि पो देखा पोर 'प्रमन्न होपो' हग प्रभार वारम्गर विनय

[ ८७
गौतम मनु की उत्पत्ति ]
मदर्थतेननागेनसुताशप्तासखीमम ।
मूकाभविध्यसीत्याहसाचमूकत्वमागता ।।२२
तस्या प्रतिक्रियाप्रीत्याममशक्रोतिद्भवान् ।
वाग्विघातप्रशान्त्यर्थतत किनकृतमम ॥२३
तत सराजातविप्रमाहास्मिन्कीदृशीक्रिया।
तन्मूकतापनोदायसचतप्राहपार्थिवम् ।।२४
भूपसारस्वती मिष्टिकरोमिवचनात्तव ।
पत्नीतवेयमानृण्ययातुतद्वाक्प्रवर्तनात् ।।२५
इष्टिमारस्वतीचक्रेतदर्थसद्विजोत्तम ।
सारस्वतानिसूक्तानिजजापचसमाहित ॥२६
तत प्रवृत्तवाक्यातागर्ग प्राहरसातल ।
उपकारःसग्वीभर्नाकृतोऽयमतिदुष्कर ॥२७
इत्थज्ञानसमासाद्यनन्दाशीघ्रगति पुरम् ।
ततोराज्ञीपरिष्वज्यस्वसखोमुरगात्मजा ।।२८
तचसस्तूयभूपालकल्याणोक्त्यापुन पुन ।
उवाचमधुरनागीकृतासनपरिग्रहा ।।२६
रानी ने कहा-नागराज की कन्या मेरी सखी है और वह नागराज
के शापवश गूगी हो गई है ॥२२॥ यदि आप मुझ पर प्रीति करते हैं पौर
उसके गूगेपन को दूर करने में समर्थ हैं तो आपने अवश्य ही मेरा सब कुछ
कार्य क्यिा समझो ॥२३॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-तब राजा ने उस ब्राह्मण
से नागकन्या के गूगेपन को दूर करने का उपाय पू ॥२४॥ ब्राह्मण ने कहा-
है राजन् । मापने वचन मानकर मैं सरस्वती वो इष्टि करेगा, क्योकि प्रापकी
यह पत्नी उसकी मूाना दूर हो। पर हो ऋण से टूटेगी ॥२॥ मार्कण्डेयजी
ने पहा-तव उम ब्राह्मण ने मरस्वती की इष्टि का प्रारम्भ किया और यत्न
पूर्व सारस्वन सूक को जपने लगा ॥२६।। तदनन्तर गर्ग ऋषि ने पाताल में
वाशक्ति को प्राप्त हुई उस नागान्या से कहा कि तुम्हारी सखी ने तुम्हारा

८८ ]
[ मागडेय पुगण
यह अत्यन्त कठिन उपकार दिया है ।।२७।। तब यह नागराया नन्दा अपनी
सखी के लिए उम नगर में पाई और उसने रानी को आलिंगन रिया ॥२८॥
और वह राजा के भी गुण गाती हुई आसन पर बैठकर मगलमय वचना
द्वारा कहने लगी ॥२६॥
उपकार कृतोवीरभवतायोममाधुना ।
तेनास्म्याकृष्टहृदयायद्वीमिशृणुष्वतत् ॥३०
तवपुनोमहावीर्यो भविष्यतिनराधिप ।
तस्याप्रतिहतचक्र मस्याभुविभविष्यति ।।३१
सार्थशास्त्रतत्वज्ञोधर्मानुष्ठानतत्पर ।
मन्वन्तरेश्वरोधीमान्भविष्यतिसवैमनुः ।।३२
इतिदत्वावरतस्मंनागराजसुतातत ।
सखीतासपरिष्वज्यपातालमगमन्मुने ॥३३
तत्रतस्यतयासाद्ध रमत पृथिवीपते ।
जगामकाल सुमहान्प्रजा पालयतस्तथा ॥३४
तत सरस्यातनयाज्ज्ञ राज्ञोमहात्मन ।
पौर्णमास्यायथाकान्तश्चन्द्र सपूर्णमण्डल ॥३५
हे वीर । आपने जो मेरा जो उपकार किया है, उससे मेरा हृदय
प्रत्यन्त प्राकर्पित हुप्रा है । अब मैं जो कुछ कहती हू, उसे श्रवण करी ॥३०॥
हे राजन् ! प्रापको अत्यन्त पराक्रमी पुत्र की प्रति होगी और इस भूमण्डन
पर उसका अखण्ड राज्य होगा ॥३१॥ प्रापका स्वार्थ साधक, शास्त्र म
तत्वज्ञानी, धर्मानुष्ठान मे सदैव तत्पर वह मेधावी पुत्र मन्वन्तर का स्वामी
मनु होगा ॥३२॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-इस प्रकार राजा को बारम्बार घर
देती हुई नागकन्या अपनी सखी का प्रगाढ आलिंगन करके अपन लोक को
गई ॥३३॥ इधर पत्नी के साथ विहार करते हुए और प्रजा का पालन करते
हा राजा को बहुत समय व्यतीत हो गया ॥३४॥ फिर रानी के गर्भ मे
पूणिमा चद्र मण्डल के समान श्रेष्ठ वाति वाले पुत्र को उनके उत्पत्ति
हुई ॥३॥

श्रोत्तम मनु की उत्पत्ति ] तम्मिञ्जातेमुदप्रापु.प्रजा सर्वाःमहामन। देवदुन्दुभयोनेदु पृष्पवृष्टि पपातच ॥३६॥ तम्यदृष्ट्वावपुकान्तमविष्यशीलमेवच । ओतमश्चेतिमुनयोनामचक्र समागताः ॥३७॥ जातोऽयमुत्तमेवशेवाल कालेतयोत्तमे । उत्तमावयवस्तेनप्रोत्तमोऽयभविष्यति ॥३८॥ उत्तमम्यसुत सोऽयनाम्नारयातस्तोत्तम । मानुरामी तत्प्रभावोभागुरेथ यतामम 3el उत्तमारानमखिलजन्मचैवात्तमस्यय । नित्यशृणोतिविद्वपसक्दाचिन्नगच्छति ॥४०॥ इष्टरिस्तयापुर्वन्धुभिर्वाकदाचन । वियोगोनास्यभविताशृण्वत पठनोऽपिवा ।।४।। तत्यमन्वन्तरब्रह्मन्वदतोममविस्तरात् । श्रू यतातनयश्चन्द्रोयेचदेवास्तयर्पय ॥४२॥ उन जन्म लेने पर समस्त प्रजा प्रानन्द में मग्न होगई, देवतानो द्वारा वाद्य वादन और पुष्प वृष्टि की गई ॥३६॥ मागत मुनियों न उसके स्वभावादि को देखकर उसका 'मौत्तम' नाम रखा ॥३७॥ मुनिगण बोले कि इसने उत्तम पुल, उत्तम काल मोर उत्तम अङ्ग सहित जन्म प्रहण पिया है. इनलिये यह 'बोत्तम' नान में प्रसिद्ध होगा ॥३८॥ मारडेयजी न रहा है मुन पुष हान में यह 'मौत्तम' नाम में प्रमिद होकर मनु होम, अब उसका प्रभाव पहता हूं. उम मुनो ॥३६॥ जो मनुष्य राजा उत्तम के मान्धान पोर पौत्तम मनु के जन्म का वृत्ताल श्रवण करन हैं, वे कभी विप को प्राप्त नहीं होते ॥४०॥ तया इमा मुनन या पढ़ने वालों को भी इट, मित्र, पुत्र, स्रो भौर व युमो का वियोग नहन नहीं करना पडता ॥४अब वो मन्वन्तर घृताल वा चिन्तार पूर्वर वरांन वरता हूँ, उस श्रवण करो, ह बसन् । उस ममय के देवनाग्रो मोर भूपिको पिर मोदना ॥४॥ उत्तम [ मापण्डेय पुराण ६५-ग्रौत्तम मन्वन्तर कथन मन्वन्तरेतृतीयेऽस्मिन्नौत्तमस्यप्रजापते । देवानिन्द्रमृपीभूपान्निबोधगदतोमम ॥१॥ स्वधामानस्तथादेवायथानामानुकारिण । मत्याख्यश्चद्वितीयोऽन्य स्त्रिदशानातथागण १२॥ तृतीयेतुगणदेवा शिगव्यामुनिसत्तम । शिवास्वरूपतस्तेतुश्रु ता पापप्रणाशना ॥३॥ प्रतर्दनाख्यश्चगरणोदेवानामुनिसत्तम । चतुर्थ स्तरकथितऔत्तमस्यान्तरेमनो ॥४॥ वशवतिन पचमेऽपिदेवास्तत्रगणद्विज । यथाख्यातस्वरूपास्तुसर्वएवमहामुने ॥५॥ एते देवगणापवस्मृतपशजस्तथा । मन्वन्तरेमनुश्रेष्ठ सर्वेद्वादशवागणा ॥६ तेपामिन्द्रोमहाभागस्नैलोक्यस्येश्वरोऽभवत् । शतक्रतूनामाहृत्यसुशान्ति मनामत ||७ यस्योपसर्गनाशायनामाक्षरविभूपिता। अद्यापिमानवर्गाथागीयतेतुमहीतले ॥८ मार्कण्डेयजी ने कहा-हे मुने । अब प्रोत्तम प्रजापति के तृतीय मन्वन्तर के देवता, इन्द्र और पियो के विषय मे कहता हू, श्रवण करो ॥१॥ पहना 'स्वधामा' नामर' गण देवताओं के नाम के अनुरूप हो वज्योति से प्रकाशित है और द्वितीय गण का नाम 'सत्य' है ।।२॥ तृतीय गण 'शिव' नाम से प्रसिद्ध है तथा इसके नाम का स्मरण करते ही वह पाप को पष्ट करके शि' नाम को सार्थक करता है ।॥३॥ हे मुले | प्रोत्तम मन्वन्तर के देवतायो का चतुर्थगण 'प्रतर्दन' नाम वाला है ॥४॥ पचम गण 'यशवर्ती' मायक देवता स्थित हैं। दे सब नाम से ही अनुरूप यायं करने वाले हैं, हे द्विजवर । इस मन्वन्तर मा भोगी देवतानो में पांच प्रकार के गण तथा प्रत्येक गण में दादा देवता मे

पौत्तम मव तर कथन
-
--
हैं ।।५-६।। उन देवतामा ३ इद्र सुशान्ति नामक हैं जो सो अश्वमय या
करके तीनो लोक ये गुरु हात है ॥७॥ उन देवेद्र सुगाति का यह नाम और
अक्षर स विभूषित वृत्तात भूतल म अव भी कहा जाता है ॥८॥
सुशान्तिर्देवराटकान्त सुशान्तिमप्रयच्छति ।
सहित शिवसत्याद्य स्तथैववशवतिभि
अज परशुचिदिव्योमहाबलपराक्रम ।
पुनास्तस्यमनोरासन्विरयातास्तिदशोपमा ॥१०
तत्सूतिसम्भवभूति पालिताभूनरेश्वर ।
यावन्मन्वन्तरतस्यमनारुत्तमतेजस ॥११
चतुर्युगानासत्यातासाधिवाह्य कसप्तति ।
कृतरतादिसज्ञानिया युक्तानिपुरामया ॥१२
म्वतजमाहितपसोवरिउम्यमहात्मन ।
तनयाश्चान्तरतस्मिन्मप्तमप्तर्पयाभवन् ॥१३
तृतीयमतत्वयिततवमन्वन्तरमया ।
तामसम्यचतुर्थतुमनोरन्तरमुच्यत ।।१४
वियानिजन्मनायस्ययशसाद्यातितजगत् ।
जन्मतस्यमनार्य ह्मन्छ यतागदतामम ॥१५
प्रतीद्रियमशेपारणामनूनाचरिततथा ।
तथाजन्मापिविज्ञ यप्रभावश्चमहात्मनाम् ।।१६
वह तजस्वी दवद्र मुशाति शिवादि देवतामा क सहित सुख शानिय
देन वाल हैं तथा उनके वश म रहने वाल देवता भी इसी प्रकार व स्वभाव
बाल हैं 11 इन पौत्तम मनु य तान पुत्र देवनामा क ममान प्रत्यन्न पराक्रमी
हुए थ, जिनके नाम प्रज, परशुचि और दिव्य ध ॥१०॥ उनका मवन्तर जितन
निो तक रहा, उनन काल तक उनके वाधर इस पृथिवा पर राज्य कत
रह ॥११॥ इस मन्तर में सतयुग पता, द्वापर और पलि यह चारों युग हुए
है उक प्रकार की कुछ अधिर चतुयु गिया का म बार कहा गया है ॥१२॥
इस म तर प महातपा नामर महात्मा सात पुत्र हो मरि हुए ॥१३॥

१२ ] [ मागंण्डेय पुराण यह तृतीय मन्यन्तर का वृत्तान्त हुआ, अब चतुर्थ मन्वन्तर के विषय में कहत हूँ॥१४॥ विभिन्न योनि जन्मा जिन मनु के सुयश से सम्पूर्ण विश्व प्रकाशमा हुआ उन मनु को उत्पत्ति कहता हूँ, उसे तुम अयण करो ॥१५॥ इन सई महात्मा मनुनो का चरित्र और उनके जन्म के प्रभाव को अवश्य जानन चाहिए ॥१६॥ ६६-~-तामस मन्वन्तर राजाभूद्भुविविख्यात स्वराष्ट्रोनामवीर्यवान् । अनेकयज्ञकृत्प्राज्ञ सग्रामेष्वपराजित ॥१ तस्यायु सुमहद्दत्तसूर्येणसुमहाधु ते । (पुराभगवतादिप्रमविणाराधितेनवै ।) पत्नीनाचशततस्यधन्यानामभवद्विज ॥२ तस्यदोर्घायुपःपन्योनातिदीर्घायुपोमुने । कालेनजग्मुनिधनभृत्यमधिजनास्तथा ॥३ सभार्याभिस्तथामुक्तोभृत्यश्चसहजन्मभि । उद्विग्नचेता सप्रापवीयंहानिमहनिशम् ।।४ तवीर्यहीन निभृतं त्यस्त्यक्त सुदु सितम् । अनन्तरो विमस्यिोराज्याच्च्यावितवास्तदा ॥५ राज्याच्च्युत सोऽपिवनगत्वानिविण्णमानस. । तपरतेपेमहाभागोवितस्तापुलिनेस्थित ॥६ ग्रीष्मेपचतपाभूखावस्विभावकाशकः । जलशायीचशिशिरेनिराहारोयसयतः ॥७ मागडेय जी ने पहा-स्वराष्ट्र नामय पप राजा भनेक पो वा परने वारे, युद्ध में महा बीतने वाले, परयन्त परावमी पौर जानी थे ॥१॥हे त्रि! र मस्त्रियों की आराधना में प्रमन्न हुए भगवान भास्पर ने उनको दोर्या.

तामम मन्वन्तर ] [ ६३ युप्य बनाया था, उन राजा को 'धन्या' नाम की एक अत्यन्त सुन्दर भार्या थी ॥२॥ परन्तु, उन राजा की भाएं दीघायु वाली नहीं थी, इसलिय वे शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हुई और मन्त्रिगरण तथा भृत्यगण भी काल के वशी- भूत होगये ॥३॥ राजा अपन सुहृदो, भृत्यो और भार्यानों के वियोग में उद्विग्न रहते हुए दिनोदिन पराक्रम-हीन हान लगे ॥४॥ अवसर प्राप्त कर एक निकटस्थ विमदं नाम के गजा ने इस वोर्यहीन मौर विश्वासो भृत्यो से रहित दुखित हृदय राजा को राज्य से प्रष्ट कर डाला ॥५॥ वह राजा अपने राज्य स हटने के कारण दुख पूर्ण हृदय मे वितस्तानदी के तट पर वन में रहते हुए तप करने लगे ।।६।। वह ग्रीष्म काल में पञ्चाग्नि से तपन, वर्षा के समय खुले में बैठ कर भीगते और शीतकाल मे जल मे शयन करते माहार त्याग र सयम पूर्वर तप करते थे ॥७॥ ततस्तपस्यतस्तस्यप्रावृट्कालेमहान्प्लव । बभ्वानुदिनमेपर्वद्भिरनुसन्ततम् ।। नदिग्विज्ञायतेपूर्वादक्षिणाबानपश्चिमा । नोत्तरातमसासर्वमनुलिप्तमिवाभवत् । ततोऽतिपूरेगनृप मनद्याप्रेरितस्तटम् । प्रार्थयन्नपिनावापहियमारणोऽतिवेगिना ||१० प्रथदूरेजलौघेनहियमागोमहोपति । मासमादजलेरोहीसपुच्छेजगृहेचताम् ।।११ तेनप्लवेनमययाबूह्यामनोमहीतले । इतने तश्चान्धकारेपासमादतटतत ॥१२ विस्तारिपङमत्त्यर्थदुस्तरसनृपस्तरम् । तथैरकृध्यमारणोऽन्यदम्यवनमवापस ॥ तान्धकारमारोहोचकर्षवसुधाधिपम् । पुच्छेनग्नमहाभागकृशधमनिसन्ततम् ॥७४ फिर एक दिन, जब राजा तपस्या में रन थे, नर घोर वृधि होने में दपियो सवंत्र जनमयो होगई यो ॥६॥ दिशा मन्धकार से दर गई थी, इस- ६४ ] [ माण्डय पुराण लिए दक्षिणादि किसी भी दिशा का ज्ञान नहीं हो रहा था तब वह राजा जल के वेग से नदी तट स प्रवाहित होते हुए उस नदी व तट को नहीं पा सफे ॥१०॥ फिर वह जल प्रवाह मे बहने लगे, तभी उन्हे एक रोही दिसाइ दी, ता उन्होंने उसकी पूंछ पकड ली ॥११॥ फिर उम विशान जल समूह से खिचे हुए पृथिवी के तल म पहुंचे और अंधरे मे इधर-उधर टटोल कर किनार को प्राप्त हुए ॥१२॥ मृगो के द्वारा खिचते हुए राजा उस विस्तृत और कठिनता से पार की जाने वाली कीचड से पार होकर एक सुरम्य वन मे पहुच गये ॥१३॥ वह मृगी पूछ को पकडे हुए उन महाभाग राजा को अन्धकार मे खीचन लगी ॥१४॥ तस्याश्चस्पर्शसभूतामवापमुदमुत्तमाम् । सोऽन्धकारेभ्रमन्भूपोमदनाकृष्टमानस ॥१५ विज्ञायसानुरागतपृष्ठस्पर्शनतत्परम् । नरेन्द्र तवृपस्यतसामृगौतमुदाचह ॥१६ किंपृष्ठ वेपथुमताफरेणस्पृशसेमम । अन्यथैवास्यकार्यस्यसञ्जातानृपतेगति ॥१७ नास्थानेवामनोयातनागम्याहतवेश्वर । किंतुत्वत्सङ्गमेविघ्नमेपलाले करोतिमे ॥१८ इतिथ त्वचस्तस्यामृग्याश्चजगतोपति । जातकोतूहलोरोहीमिदवचनमब्रवीत् ॥१६ वात्वव हिमृगीवाक्यकथमानुषवद्वदेव । वश्वलोलोयाविघ्नत्वत्पङ्ग कुरुतेमम ॥२० प्रहन्तेदयिताभूपप्रागाममुत्पलावती। भाशितायमहिषीदुहितादृढधन्वन ॥२१ वह महाराज ग्घराष्ट्र मधेरे म विचरण करते हुए मृगी के स्पर्श में मामागत चित्त वाले हारर प्रत्य त प्रानन्दित हुए ॥१५॥ जब उन्होंने उस मृगी रे पृट भाग पा उम वन प्रदेश म जार स्पर्श विया, तब उन्हें अनुरा निकर वह मृगी यानी ॥१६॥ दे गन् । अपने कम्पित हाथो से मेरी पीठ सामम मन्वन्तर । [१ का इस प्रकार स्पर्म क्यों कर रहे हो। इम स्पर्श का अन्य भाव प्रतीत हो रहा है ॥१७॥ हे राजन् । अापकी इच्छा अयोग्य के प्रति नहीं, गमन योग्य के प्रति ही हुई है परन्तु यह लोग आपके समर्ग पे वापर हैं ॥१८॥ मायंडेयजी ने कहा-मृगी को यह बात सुनकर राजा ने विस्मय पर उनमें कहा ॥१६॥ तुम कौन हा मृगो होकर भी मानवी के ममान किस प्रकार बोल रही हो तथा तुम्हारे ममर्ग मे बाधा देने वाले कौन है, यह मद मुझे बनायो ।।२०।। मृगी बोली-हे राजन् । में आपको प्रियतमा राजमहिपी तथा सभी गनियो मे श्रेष्ठ एव दृधन्वा की पुत्री उसलावती हूँ ॥२१॥ किन्तुयावत्कृतमयेनेमायोनिमागता। पतिव्रताधमपगमाचेत्यक्थमोशी २० प्रहपितृगृहेबालामखोभि महितावनम् । ग्न्नु गताददर्शमृगमृग्याममागतम् ॥२३ तत ममीपवतिन्यामयामाताडितानृगी। मयात्रम्नागतान्यत्रक्रुद्ध पाहततोमृगः ॥२४ मूटेविमेवमनामिधिक्तेदोःगोल्यमोहनम् । प्राधानकालोयेनायत्वयामेचिपलोत ॥२५ वाचध त्वातत्तस्तम्बमानुपम्येवभापत. । भीनातम वकोऽमीत्येतायोनिमुपागतः ॥ तन मप्राहपुयोऽहमृनिवृतिचक्षुपः । मुतपानाममृग्यान्नुमाभिलापोमृगोऽभवम् 11२७ इमानानुगत प्रेम्णावाच्छितवानयात्रने । स्वयावियोजितादृष्ट तम्माच्छापददामिते ॥२८ गदा न यहा-नुमने ऐगा कौन-मा फर्म दिया है. चिरा पाररा सुम्हें इस योनि को प्राप्त होना पड़ा है ? मेरी वह भार्या तो पहिरना पौर धर्म-परायण पी फिर उपत्री ऐमी दशा क्यों हुई? ॥२२॥ भृगो ने कहा- में अपने पितृगृह मे, वाचाल म पानी सदियों के मार बोडारे लिये रन ये गई थी. वह एक मृग में युत मृगी को मैंने ऐसा ॥२३॥ फिर उनके पाग [ माएडेय पुराण 7 जाकर मैंने उस पर प्रहार किया तो वह मृगी भय के कारण वहाँ में चली गई, तब क्रोधित होकर वह मृग मुझमे बोला ॥२४॥ हे मू । तेरी इस दुशीलता को धिक्कार है, तू ऐसी मत्त क्यो हो रही है ? तुन मेरे गर्भाधान काल को विफल कर दिया है ॥२५॥ उम मृग को मनुष्य के समान बोलते देखकर मुझे मत्यन्त भय हुआ और मैंने उससे पूछा-पापको इम मृगयोनि की प्राप्ति क्यों हुई है ? ॥२६।। मृग ने कहा-मैं निवृत्तिचक्षु मुनि का पुत्र सुतपा हूँ, मैंन मृगी की इच्छा से मृग रूप धारण किया है ॥२७॥ इस मृगी की अभिलाषा से, इसकी प्रीतिवश ही मैं इसका अनुगामी हुआ हू, परन्तु तूने उससे मेरा वियोग करा दिया, इमलिये तुझे शाप दूंगा ॥२८॥ । मयाचोक्त तवाज्ञानादपराध कृतोमुने । प्रसादकुरुशापमेनभवान्दातुमर्हति ॥२६ इत्युक्त प्राहमासोऽपिमुनिरिथमहीपते । नप्रयच्छामिशापतेयद्यात्मानददासिते ॥३० मयाचोक्त मृगोनाहमृगरूपधरावने । लप्स्यसेऽन्यामृगीतावन्मयिभावोनिवर्यताम् ।।३१ इत्युक्त कोपरक्ताक्ष सप्राहस्फुरिताघर । नाहमृगीत्वयेत्युक्त मृगीमूढेभविष्यसि ॥३२ ततोभृशप्रव्यथिताप्रणम्यमुनिमव्र वम् । स्वरूपस्थमतिक्रुद्ध प्रसीदेतिपुन पुन ॥३३ बालानभिज्ञावाक्यानातत प्रोक्तमिदमया। पितर्यसतिनारीभित्रियतेहिपति स्वयम् ॥३४ सपितातेकथचाहणोमिमुनिसत्तम । सापराधाथवापादौप्रसीदेपानमाम्यहम् ॥३५, मैंने कहा-हे मुनि श्रेष्ठ } मुझम यह अपराध अजान के कारण ही हमा है, पाप मुझ पर प्रसन्न होकर मुझे शापित न करे ॥२६॥ हे महाराज । मेरी बात सुनकर वे मुझसे बोले-यदि में तुझम पात्मदान कर सकू तो तुझे शापिन नहीं करमा ॥३०॥ मैं मृगी नही ह वन मापको दूसरी मृगी प्राप्त - तामम मन्वन्तर ] हो जायगी, इसलिये मेरे प्रति अपनी इम इच्छा की शात कीजिये ॥३१॥ ऐमा सुनते ही उन नेत्र क्रोध से लाल होगये और उन्होंने कम्पित होठो में कहा-तूने 'मैं मृगी नहीं हूं' यह कहा है, इसलिये तू मृगी होगी ॥३२॥ तब मैंने व्यथित चित्त से मंग रूप धारी उन मुनि को प्रणाम पूर्वर कहा-मैं याना हू, बात कहना भी नहीं जानती, इमीसे ऐमा वह ठो, पाप मेरे प्रति प्रसन्न हो, यदि पिता न हो तो कन्या अपने पनि का वरण स्वय करती है ॥३३-३४।। परन्तु, मैं अपने पिता के होते हुए मापका दररण कैसे कर सकती हूह प्रभो । मेरे अपराध को क्षमा करिये, मैं आपके चरणा मे वन्दन करती है, पाप प्रमन्न हो ॥३५॥ प्रसीदेतिप्रसीदेतिप्रणतायामहामने । इत्यलाल प्यमानाया मप्राहमुनिपुङ्गव ॥३६ नभवत्यन्यथाप्रोक्त ममवाक्यकदाचन । मृगीभविष्यसिमृतावनेऽस्मि वजन्मनि ॥३७ मृगत्वेचमहावाहुम्तवगर्भमपंष्यति । लोलोनाममुने.पुत्र सिद्धवायम्यमाविनि ॥३८ जानिस्मराभवित्रीत्वतस्मिनगमुपागते । स्मृतिप्राप्यतथावाचमानुपशेमोरयिष्यमि IIBE तस्मिातेमृगत्वास्वविमुक्तापनिनायिता । लोकानवाप्स्यसिप्राप्यापनातकर्मभि ॥४० मोऽपिलोलोमहावीर्य पितृगग्निपात्यवं । जित्वावमुन्धराकृत्स्नाभविष्यतिततोमनुः ॥४१ एवनापमहलब्धावामृतानिय्यंक्त्वमागता । स्वत्सम्पर्शाचगर्भोऽमोमभूतोजठरेमम ॥४२ मुझे बारम्बार प्रपन हो, प्रमन्न हो' कहत देपर उन भनियंने पहा ॥३६॥ मेरा पनन भी निम्या नही होता नो मरन के बाद पर जन्म में इमी वन में मगो दरोगी ॥३॥ जब तुम मगी होजायोगी तब विमी मिट भी मुनि का पुत्र सोन तुम्हार गर्भ में पल होगा ॥३॥ अब वह सोम इस प्रकार शापित [ माण्डेय पुराण तुम्हारे गर्भ मे स्थित होगा, तब तुम पूर्व जन्म का स्मरण पाने पाली पोर मनुष्यो जैमी पाली बोलने वाली होगी ॥३६|| उस महावाहु लोल के उत्पात होने पर तुम शाप मुक्त होकर पति के द्वारा सम्मानित होगी और जिस लोक को पापी मनुष्य प्राप्त नहीं कर पाते, उसी लोक पो तुम प्राप्त होगी ||४०॥ फिर वह अत्यन्त पराक्रमी लोल ही पिता के शत्रुओं का सहार करेगा तथा समस्त पृथिवी का विजेता मनु होगा ॥४१॥ हे राजन् । होर मै तिर्यक् योनि को प्राप्त हू, तुम्हारे स्पर्श से मेरे जठर में बह गर्म उत्पन्न हुआ है ॥४२॥ अतोनवीमिनास्थानेतवयातमनोमयि । नचाप्यगम्यागर्भस्थोलोलोविघ्नकरोत्यसो ॥४३ एवमुक्तस्तत सोऽपिराजाप्राप्यपरामुदम् । पुत्रोममारी जित्येतिपृथिव्याभवितामनु ॥४४ ततस्तसुपुवेपुत्रसामृगीलक्षणान्वितम् । तस्मिातेचभूतानिसारिणप्रययुमुदम् ।।४५ विशेषतश्वराजासौपुनेजाते महावने । साविमुक्तामृगीशापात्प्रपलोकाननुत्तमान् ।।४६ ततस्तस्यर्षय सर्वसमेत्यमुनिसत्तम । अवेक्ष्यभाविनीमुद्धिनामचक्र महात्मन. ॥४० तामसीभजमानायायोनिमातर्यजायत । तमसाचावृतेलोकेतामसोध्यभविष्यति ॥४८ ततःसतामसस्तेनपित्रासद्धितोवने । जातबुद्धिरवाचेदपितर मुनिसत्तम ॥४६ इमीलिए मैंने कहा था कि आपकी मेरे प्रति अभिलापा गम्य के प्रति भिन्नु यह गर्भ में स्यिन लोन इम कार्य में बाधक है ॥४३॥ मार्कण्डेय जी ने पहा-यह जुत्र शत्रुमो पर विजय प्राप्त करके मनु हागा, यह बात सुनकर गजा प्रत्यन्त हपित हुए ॥४४॥ फिर उम मृगी के श्रेष्ठ लक्षण वाले पुत्र को उत्पत्ति हुई उस ममय सभी जीव मानन्द में मग्न हो गये ।।४५|| इस महा- तामम मन्दर (४) ] [१६ पराक्रमी पुन के उसन्न हान मे राजा को परम हर्ष हुप्रा और मृी भी गाप में मुक्त होकर प्रत्युत्कृष्ट लोर में गई ॥४६॥ है मुनिवर फिर पिया न वहां ग्रावर उमका भविष्य देखते हुए नामकरण रिया ॥४७॥ दे बोले--- विश्व के मधवार द्वारा ट जान पर तामसी यानि वा प्राप्त हुई माता के गर्भ में इस वाला न जन्म लिया, इमलिय इसका नाम 'तामम' हा ॥४८॥ है मुन । वह 'तामस' पिला के द्वारा उसी वन म वृद्धि का प्राप्ता और समय पारर बुद्धि के उदित होन पर वह पिता स बोला " कम्त्वतातकथवाहपुत्रोमाताचकामम । विमर्थमागनश्चवमेनन्मत्य प्रवीहिमे ॥५० तत पितायथावृत्तम्वगज्यच्यावनादिकम् । तम्याची महावाहु,पुत्रस्य जगतीपति ॥५१ अत्यातत्मक्लमाऽपिसमाराध्यचभास्करम् । प्रवादिव्यान्यस्त्रारिणममहारागण्यरत ॥५२ कृताम्बस्नानगेजितापितुगनोपचालिम् । अनुनानान्मुमोचाथमचम्वधर्ममास्थित. ॥५३ पिनापितस्यस्वाल्लोकापायनपमाजितान् । विमृष्टदेह मप्राप्तादृष्ट्वापुरमुरमुत्रम् ।।५४ जिलाममस्तापृथिवीताममाग्य माथिव । तामसार योमनुग्भूतम्यमन्वन्तरण ।।५५ हे तान [ माप दौत हैमैं मापा पुत्र हुमा मरी मात्रा सेन है? माप यहाँ किन निचे प्राय है यह सब मर प्रतिपय स्मे परिया५01 तब उन महाबाद राजा न पपन पुत्र को प्रपन गर म सुन हात दि का मम्मूग वृन' पहा 11५11 म नानम ने पह सन मुनर भागद भाना की उपासना की पौर निवान मत्र व महित विभिप प्रगार र गर दिमाग्न मन्त्र पूरी प्राप्त किए ॥१२॥ व पस प्रयाा म निपुण हार "तुना हा मनु को पपन पिता र पाम लापर उनी आमा में ग्रा पर nि प्रकार व पाने धम की हार ? || पिर ना पिता २ ६८ तुम्हारे गर्भ में स्थित होगा, तब तुम पूर्व जन्म का स्मरण पग्न मनुष्यो जैमी वालो बोलने वाली होगी ॥३६॥ उस महाबाहु यो होने पर तुम शाप मुक्त होर पति के द्वारा सम्मानित होगी और को पापी मनुष्य प्राप्त नही कर पाते, उसी लोक को तुम प्राप्त हो. फिर वह अत्यन्त पराक्रमी लोल ही पिता के शनुमो का सहार क समस्त पृथिवी का विजेता मनु होगा ॥४१।। हे राजन् ! इस प्रका होकर मै तिर्यक् योनि को प्राप्त हूँ, तुम्हारे स्पर्श से मेरे जठर में उम्पन्न हुआ है ॥४२॥ प्रतोद्रवोमिनास्थाने तवयात मनोमयि । नचाप्यगम्यागर्भस्थोलोलोबिघ्नकरोत्यसौ ॥४३ एवमुक्तस्तत सोऽपिराजाप्राप्यपरामुदम् । पुत्रोममारीजित्वैतिपृथिव्याभवितामनु. १।४४ ततस्तसुषुवेपुत्रसामृगीलक्षणान्वितम् । तस्मिञ्जातेचभूतानिसर्वाणिप्रययुमुदम् ।।४५ विशेषलश्चराजासौपुत्रेजाते पहावने । साविमुक्तामृगीशापात्प्रपलोकाननुत्तमान् ॥४६ ततस्तस्यर्पय सर्वेसमेत्य मुनिसत्तम । अवेक्ष्यभाविनी मृद्धिनामचक्र महात्मन ॥४॥ तामसीभजमानायायोनिमातर्यजायत । तमसाचावृतेलोकेतामसोऽयभविष्यति ।।४८ ततःसतामसस्तेनापियासद्धितोवने । जातबुद्धिरुवाचेदपितर मुनिसत्तम ॥४६ इमीलिए मैंने कहा था कि आपकी मेरे प्रति अभिलापा गम्य के प्रति है। जिन्तु यह गर्भ में स्थित लो। इस कार्य में बाधक है ॥४३॥ मार्कण्डेय जी ने कहा-~-यह पुत्र शत्रुमो पर विजय प्राप्त करके मनु हागा, यह बात सुनकर राजा अत्यन्त हपित हुए ॥४४॥ फिर उन मृगी के श्रेष्ठ लक्षण वाले पुत्र की उत्पत्ति हुई उस ममय सभी जीव मानन्द में मग्न हो गये ॥४॥ इम महा.

रेवत मन्वन्तर
[ १०१
६७-रैवत मन्वन्तर
पचमोपिमनुयायतोनामविथ त ।
तस्योत्पत्तिविस्तरश शृणुष्वकथयामिते
रासीन्महाभागऋतवागितिविश्रु त ।
तस्यापुत्रस्यपुनोऽभूद्र वत्यन्तमहात्मन ॥२
सतस्यविधिवञ्चक जातकर्मादिका क्रिया
तयोपनयनादीश्नसचाशीलोऽभवन्मुने ॥३
यत प्रभृतिजातोऽसौततःप्रभृतिसोप्यपि ।
दोघरोगपरामर्शमवापमुनिपुङ्गव ॥४
मातातस्यपरामातिकुष्ठरोगादिपोडिना ॥३
जगामसपिताचास्यचिन्तयामासदु खित १५
किमेतदितिसोऽप्यस्यपुत्रोऽप्यत्यन्तदुर्मति ।
जग्राहभामिन्यस्यमुनिपुनस्यसमुखीम् ॥६
ततोविपण्णमनसातवागिदमुलवान् ।
अपुत्रतामनुष्याणार्थ यसेनकुपुत्रता ॥७
मार्कण्डेयजी ने कहा-हे ब्रह्मन् । अब रेवत नाम के प्रसिद्ध पांचवें मनु
का जन्म तुमसे कहता हू, उसे श्रदरण करो ॥१॥ तवाक् नामक एक प्रसिद्ध
ऋपि थे, वह प्रथम तो पुनहीन थे, फिर रेवती नक्षत्र के शेप में उनको एक
पुत्र की प्राप्ति हुई ।।२।। उन ऋषि ने अपने उस का विधिवत् जातकर्म,
उपनयन प्रादि सस्कार किया, परतु वह पुत्र शीलवान् नही था ॥३॥ हे मुने ।
उस बालक का जन्म होने के समय स ही वह अपि दीर्घ काल व्यापी रहने
वाले रोग से ग्रमित होगये ।।४॥ उसकी माता भी कष्ट दे कारण अत्यन्त कष्ट
भोगने लगी, तब उसके पिता ने दुखित चित से विचार किया ॥'ऐमा
किस कारण हुग्रा?' इसके पश्चात् उनके उस विपरीत मत वाले पुत्र ने एक
मुनि के सामने ही, उनकी पत्नी का हरण कर लिया ॥६॥ इसमें प्रतवाक् ।

१०० ]
[ मारंडेय पुराण
भी अपने पुत्र का गुर देणार गुगपूर्वक श्याम पिया air anादिमाग
गरित पुण्य में प्रभाव से उच्च योगों को प्राप्त ए ||५|| गापूर्ण पृथिवी
विजेता होवर सागग प्रपन नामानुगार मनु हप, अव उनां भवता विषय
में अवगा बरो॥५५॥
येदेवास्तत्पतियंश्चदेवेन्द्रीयेतथयः ।
येपुवाश्चमनास्तस्यपृथिवीपरिपालकाः ॥५६
मत्यास्तथान्येसुधियःसुम्पाहर यम्तया ।
एतेदेवगणास्त त्रसप्तविंशतिकामुने ।।५७
महाबलोमहावीय्यं शतयज्ञोपलक्षित ।
शिखिरिन्द्रस्तथापादेवानामभवद्विभु ॥५८
ज्योतिधर्मापृथु काव्यश्चत्रोऽग्निवलकस्तया।
पीवरश्वतथाब्रह्मान्मममप्तपंयोऽभवन् ॥५६
नर शान्ति शान्तदान्तजानुजवादपम्पया।
पुषास्तुताममायामयाजान सुमहायला ॥६०
इत्येततामसविप्रमन्वन्तरमुदाहृतम् ।
य पठेच्छणुयाद्वापितमसानबाध्यते ॥६१
उम मन्वन्तर के देवता, इन्द, ऋषि और मनु के बिन पुत्रो ने पृथियो
की रक्षा को उनका वृत्तान्त सुनो ॥५६॥ हे मुने । इस मन्वन्तर में मत्य, मुधी,
सुरूप और हरि यह घर प्रकार के देवता गण हुए प्रौर प्रत्येक गण मे सत्ता
ईस देवता हुए ॥५७) महाबली पौर पराक्रमी 'शिखी' नामक इन्द्र हुए, जो
मो यज्ञ करके उन देवताओं के स्वामी बने ।।५८|| उस मन्वन्तर में प्रो सप्तपि
हुए उनके नाम ज्योतिर्धामा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वलर और पीवर हुए
॥५६॥ उन मनु के नर, शान्ति, शान्त, दान, जानु, जघा इत्यादि महाबली एवं
पराक्रमी पुत्र हुए ॥६०॥ इस प्रकार तामस मन्वन्तर का वृत्तान्त यथार्थ रूप से
प्रापये प्रति कहा है, इसको पढने या सुनने वालो को प्रज्ञानानकार बामा नहीं
देता ॥६॥

रबन मम्वन्तर ]
६७-रेवत मन्वन्तर
पचमोपिमनुहान वतीनामविश्रु त ।
तम्योत्पत्तिविस्तरम शृणुप्वाथयामिते ॥१
गमीन्महाभागनवागितिस्थित ।
तस्यापुत्रम्यपुत्राभूद्र वत्यन्तमहात्मन ॥२
मतस्यविधिवचन जातकांदिया क्रिया ।
तथोपनयनादीश्वसवासीलोऽभवन्मुने ॥३
यत प्रभृतिजातोऽमौतत प्रभृतिसोप्यपि ।
दीर्घरोगपरामर्शमवापमुनिपुगर ॥४
मातातस्पपरामातियुष्ठरोगादिपोडिना ।।
जगामसपिताचाम्यचिन्तयामास पित ॥५
विमेतदितिमोऽप्यस्यपुत्रोऽप्यत्यन्तदुर्मति ।
जग्राहभामिन्यस्यमुनिपुत्रस्यसमुसीम् ॥६
तनोविपण्णमनसातवागिदमुक्तवान् ।
अपुषतामनुष्याणाश्रेयसेनयुपुत्रता ।।७
मार्कण्डेय जी ने कहा-ह ब्रह्मान् । भर वन नाम के प्रसिद्ध पाँचवें मनु
का जन्म तुमसे कहता हूँ, उस श्रवण करो ॥१॥ प्रहनवा नामक एक प्रसिद्ध
ऋषि थे, वह प्रथम तो पुत्रहीन थे, फिर रेवती नक्षत्र व प्रेप मे उनसे एक
पुत्र की प्राप्ति हुई ।।२।। उन ऋषि ने अपने उम पुत्र का विधिवत जातकम,
उपनयन प्रादि सम्बार किया, परतु वह पुत्र शीलवान नही पा ॥३॥ हे मुने ।
उस दानव का जन्म होने के समय से ही वह पि दीर्घ काल व्यापी रहने
वाले रोग से ग्रमित होगये ।।४।। उसी माता भी कष्ट के वारण प्रत्यत कष्ट
भोगने लगी, तव उसके पिता ने दुसित चित्त से विचार दिया ऐसा
विस कारण हुप्रा " इसके पश्चात् उनके उस विपरीत मत वाले पुन ने एक
मुनि के सामन हो, उनकी पत्नी का हरण कर लिया ॥६॥ इसमे ऋतवाक्

--
मानगडय पुगण
ऋशि या प्रत्यन्त दु य हुअा और वे युपुत्र में तो पुत्रहीन रमना ही ठीक है,
ऐसा सोचा लगे ||
कुपुत्राहृदयायामसर्वदापुरतेपितु ।
मातुश्वस्वर्गसस्थाश्वस्वपितृत्पातयत्यधः ।।८
सुहृदानोपकारायपितृणाचनतृप्तये ।
पित्रोर्दु खायधिग्जन्मतस्यदुतव मरण ME
धन्यास्तेतनयायेपासर्वलोकाभिसमता ।
परोपकारिण शान्ता साधुवर्मण्यनुव्रता ॥१०
अनिवृततथामन्दपरलोकपराडमुसम् ।
नरकायनसद्गत्यकुपुत्रालम्बिजन्मन ॥११
करोतिसुहृदादैन्यमहितानातथामुदम् ।
प्रकालेचजरापित्रो कुसुत कुरुतेभ्र वम् ॥१२
एवसत्यन्तदृष्टस्यपुनस्यचरितम नि ।
दह्यमानमनोवृत्तिवृत्तगर्गमपृच्छत ॥१३
सुव्रतेनपुरावेदागृहीताविधिवन्मया ।
समाप्यवेदान्विधिवत्कृतादारपरिग्रह ।।१४
सदारेणक्रिया कार्या श्रीताःस्माविषदिया ।
नमेन्यूना कृता काश्चिद्यावदद्यमहामुने ॥१५
क्योंकि बुयुत्र सदा ही माता पिता के हृदय को पोडित करता रहता
है और स्वर्गवासी पितरो को भी वहां से पतित करता है ॥८॥ उसके द्वारा
सुदो को भी कोई उपकार नहीं हो पाता और न पितरो की ही तृति होती
है, माता-पिता के लिये
ख के कारण रूप ऐसे पुत्र को धिक्कार है ।।६।।
जिसकी सतति सब के द्वारा सरकारित, परोपकार रत, सत्यकर्म वाली और
पशान प्रकृति की है, वही कृतकृत्य हैं ॥१०॥ हमारा जन्म परलार से विमुख,
कुपुत्र का प्राथयो और नरस के निमित्त ही हुआ है, श्रेष्ठ गति के लिये नहीं
हुप्रा ॥११॥ कुपुत्र सदा सुहृदो को दीन, अपकार करने वालो को प्रसन्न और
माता पिता को वृद्धावस्था प्राप्त कराने वाला है ||१२|| मा एडेयजी ने कहा-

वित मावन्तर [ १०३ इस प्रकार दुश्चरिच पुत्र थे विपरीत पाचरण मे मन में दग्ध होते हुए उन ऋपि ने गांऋषि से सम्पूर्ण वृतान कह कर उनसे पूछा ॥१३॥ ऋनवार बोले- मैंने श्रेष्ट ती या पनुष्टान करते हुए विधि महित वशं का अध्ययन क्या है पोर इमो पात् विधि पूर्वर मी वा पाणिग्रहण किया है ॥११॥ श्रोत, स्मानं पोर वपट्यार भए जो कम पत्नी ६ महित करन का निर्देश है, मह मच मैंन पिये है और उन व्रतो ये अनुटान में त्रुटि नहीं होन दी है ॥१५॥ गर्भाधान विधानेननवाममनुरुध्यता। पुत्रार्यजनितध्वायपुन्नाम्नाविन्यतामुन ।।१६ मोपिमात्मदोपेगममदोपेरणवामुने । अम्मदु.गावहोजातोदो शोत्याद्वन्धुशायद ॥१७ रेवत्यन्तमुनिश्रेष्ठजातोन्यतनयस्तव । तेनदु जायतेदुष्ट कालेयम्मादजायत ॥१८॥ नतेऽपचागे वाम्यमातुायपुलम्यते । तम्यदो.गोल्यहेतुत्वरेवत्यन्तमुपागतम् ॥१६ यम्मान्ममरपुत्रस्यरेवत्यन्तसमुद्भवम् । दौःशील्यमेतत्मातस्मात्पततामागुरेवती ॥२० तेनैवव्याहृतेशापरेवत्यक्ष पपातह । पश्यत.मवंलोरम्यविम्मयाविष्टचेतम. ॥२१ पुग्नाम नरक से हर पर पौर उमसे मुक्त होने के निमित्त मैंने विधिवत् गर्भाधान द्वारा इस पुत्र को जन्म दिया है, कामायक्त होकर इन पुत्र की उत्पत्ति नही की है ॥१६॥ हे मुने ! फिर भी यह बालक हमारे लिय दुमदायी, बन्धुपी को शोर प्रदान करने वाला तया बुरे स्वभाव का स्तन हुमा है. ऐमा मात्मदीप मे या मेरे दीप स हुमा है ॥१७॥ गर्गजी ने कहा-ह मुनिवर ! तुम्हारा पुष रेवती के मन में उत्पन्न हुआ है, उस दुष्ट काल म जन्म लने के कारण हो, यह तुम्हारे लिये दुपदायो हुप्रा है ।।१८॥ यह तुम्हारे, तुम्हारी पली के या तुम्हारे वरा के धर्म के व्यतिक्रम से इस प्रकार का नहीं हुआ, इसके दुष्ट स्वभाव का कारण रेवती का प्रतिम काल ही है ॥१६॥ ऋतवाक् १०४ ] [ मार्कण्डेय पुगण बोले--जिस रेवती के अन्त मे उत्पन्न होन के कारण मेरा एकमात्र पुत्र ऐसे बुरे स्वभाव का हुआ है, उस रेवती का शीघ्र ही पतन हो ।॥२०॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-ऋतवाक् ऋषि ने जब ऐसा शाप दिया, तब सबके सामने उस रेवती नक्षत्र को गिरता हुआ देखकर सभी प्राश्चयचकित होगये ॥२१॥ रेवत्यक्ष चपतितकुमुदाद्रौसमन्तत । भासयामाससहसावनकन्दरनिरान् ॥२२॥ कुमुनाद्रिश्चतत्पाताल्ल्यातोरवतकोऽभवत् । अनीवरम्य सर्वस्यापृथिव्यापृथिवीधरः ।।२३ तस्यक्षस्यतुयाकान्तिर्जातापद्धजिनोसर । ततोजतदारन्यारूपेरणातीवशोभना ।।२४ रेवतीकान्तिसम्भूतातादृष्ट्वाप्रमुचोमुनि । तस्यानामचकारेत्यरेवतीनामभागुरे ॥२५ पोपयामामचंतास्वाश्रमाभ्यासम्भवाम् । प्रमुच ममहाभागस्तस्मिन्मेवमहाचले ॥२६ तातुयौवनिनीदृष्ट्वाकन्यकारूपशालिनीम् । समुनिश्चिन्तयामामकोऽस्याभभिवेदिति ।।२७ एवचिन्तगतस्तस्यययौवालोपहान्मुने । नचामसादसदृश वरतस्यामहामुनिः ॥२८ कुमुद पर्वन : महमा गिरकर उस रेवती नक्षत्र ने उसकी सभी दिशाएं पन, पन्दग पाक्षिको प्रासित पर दिया ॥२२॥ पृथिवी भर मे अत्यन्त रमणीर वह दुमुदं पवत भी रक्ती व गिरन मे रवता बनाम से हा ॥२३॥ उमयी वाति म बमन युक्त मरावा प्रा धौर उग शेषर सब अत्यन्त की बन्या उत्पन्न हु ॥२॥। उपन्या का रेवती । उपम हुई देशात मन मुनि न उगमा नाम तो ना ॥२५॥ वह महाभाग ऋपि स्वताप पवन पान पाश्रम पिट समवया का पालन करने लग ॥२६॥ वापसी पन्नास वाया म गमन कार मुरि मोचन गरिसक रंदत मन्वनर (५) J [ १०१ पति कौन होगा ||२७| इस प्रकार चिन्ना करते हुए उन्हें बहुत दिन व्यतीत होगरे, परन्तु उमर योग्य कोई भी वर दिपाई न दिया ॥२८॥ ततस्तस्यायग्द्रप्टमग्निमप्रमुचोमुनि. । विवेशवह्निगालावपृष्टस्तप्राहहव्यभुय ।।२६ महाबलीमहावीर्य प्रियवाग्धर्मवत्सल । दुर्गमोनामभवितामाह्यभ्यामहीपतिः ॥३० अनन्तरश्नमृगयाप्रस नागतोमुने । तम्याश्रमपद धीमान्दुर्गम मनराधिप ॥३१ प्रियग्रतान्वयभवामहावलपराक्रमः । पुरोविक्रमशीलम्यकान्निन्दीजठरोद्भवः ।।३२ मप्रविश्याश्रमपदंतातन्वीजगतीपतिः । अपश्यमानम्तमृपिप्रियेत्यामन्त्र्यपृष्टवान् ॥३३ क्वगतोभगवानस्मादाश्रमान्मुनिपुङ्गव । तप्रणेतुमिहेच्चमितत्त्वप्रन हिशोभने ।।३४ अग्निकालागतोविप्रस्तच्छुपातम्यभापितम् । प्रियेत्यामन्त्रणचंवनिश्वक्रामत्वरान्वितः ॥३५ सददर्शमहात्मानराजानदुर्गममुनि । नरेन्द्रचिह्नमहितप्रथयावनतपुरः ॥३६॥ तय अग्नि में पूछने के लिये प्रग्निगाला में गये, इम पर पग्नि ने उनसे पहा ।।२६॥ इम कन्या के पनि महाबली, पराक्रमी, प्रियवक्ता, धर्मवत्मन दुर्गम नामर महीपाल होगे ॥३०॥ माकण्डेयजी ने कहा-हे मुने ! इसके पश्चात् स्वायम्भुव मनु के ज्येष्ट पुत्र प्रियव्रत २ वग में उत्पन्न हुए विक्रमगील नरेश को कालिन्दी नाम की गनी से उत्पन्न हुए प्रत्यन्त पराक्रमी वह राजेन्द्र दुर्गम मृगया के पीछे मुनि के उस आश्रम में पहुचे ॥३१.३२॥ उन्होंने प्राश्रम में ऋषि को न देखकर उस कृशागी काया से ही उनके विषय में प्रिय' कहार पूछा ।।३३॥ हे मुन्दरी । वह मुनिवर कहाँ गये हैं मुझे यह बताओ, क्योकि उन्हें प्रणाम करने की इच्छा स उपस्थित हुमा हूं ॥३४॥ श्री मार्कण्डेयजी ने 1

| माण्डेय पुराण
कहा-वह विप्र पग्निशाला गे गये हुए थे, वह राजा का वचन और
'प्रिये' सम्बोधन मुनवर अग्निशाला से बाहर निकले ॥३॥ मौर उन्होंने राज.
लक्षणा से विभूषित और विनयनत महाराज दुर्गम को देखा ॥३६.
तस्मिन्दृष्टतत शिष्यमुवाचमतुगौतमम् ।
गौतमानीयताशीघ्रम?ऽस्यजगतापते ॥३७
एकस्तावदयभूपश्चिरकालादुपागत ।
जामाताचविशेपेरणयोग्योऽघस्यमतोमम ॥३८
तत सचिन्तयामास राजाजामातृकारणम् ।
विवेदचनतन्मोनोजगृहे पंचतन्नृप. ॥३६
तमासनगत विप्रोगृहीताघमहामुनि ।
स्वागतप्राहराजेन्द्रमपितेकुशलगृहे 11४०
कोशेवलेऽमित्रेषुभृत्यामात्येनरेश्वर ।
तथात्मनिमहाबाहोयत्रसर्वप्नतिष्ठितम् ॥४१
पत्नीचतेकुशलिनीयतएवानुतिष्ठति ।
पृच्छाम्यस्यास्ततोनाहकुशलिन्योऽपरास्तव ।।४२
उन्हे देखकर ऋषि ने अपने गौतम नामक शिष्य को अर्घ्य लाने की
पाज्ञा दी ॥३७। उन्होंने कहा कि एक तो बहुत समय के पश्चात् यहाँ इनका
आगमन हुआ है, दूसरे यह जामाता भी हैं, इसलिये यह अर्घ्यदान के उचित
पात्र हैं ॥३८॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-पि द्वारा जामाता कहे जाने पर
राजा सोचने लगे कि क्यो यह शब्द कहा, परन्तु वह कुछ समझ न पाये और
मौन रह कर अर्घ्य ग्रहण किया ॥३६॥ अर्घ्य
ग्रहण
के
पश्चात्
वे श्रेष्ठ प्रासन
पर बैठे तव उनसे महामुनि ने कहा-हे राजन् । पाप यहाँ सुख पूर्वक तो
मा सके ? प्रापका कोशागार तो ठीक है ? आपकी सेना, मित्र, सेवक और
मन्त्रिगण तो कुशल पूर्वक हैं ? आप सबके आश्रय स्थान भी सकुशल तो हैं ?
11४०-४१।। प्रापकी पत्नी यहाँ कुशल पूर्वक रह रही है, इसीलिये मैंने उस
विषयक कुशल प्रश्न नहीं किया, इसके अतिरिक्त प्रापकेपुर को अन्य ललनाएं
तो कुशल से है ? ॥४२॥

रेवत मन्वन्तर ]
[ १०७
त्वत्प्रमादादकुशलनक्वचिन्ममनुव्रत ।
जातकौतूहलश्चाम्मिममभायायकामुने ।।४३
रेवतीसुमहाभागात्रलोक्यम्यापिसुन्दरी ।
तवमाविगरोहातात्वराजमवेत्मिपिम् ।।४४
सुभद्राशान्ततनयाकावेरीतनयाविभाम् ।
मुराष्ट्रजामुजातांचक्दम्बाचवस्थजाम् ।।४५
विपाठानन्दिनीचवधिभार्यागृहेद्विज ।
तिटन्तमेनभगवयवतीवेधिकान्वियम् ॥४६
प्रियेतिमा प्रतयेयत्वयोक्तावरिंगनो।
विविस्मृततेभूपाललाध्येयगृहिणीनव ।।४७
मत्यमुन मयाक्न्नुिभावोदुष्टोनमेमुने ।
नात्रकोपभवान्वतुमर्हत्य-मानुयाचित ॥४%
यत्त्वप्रयोपिभूपालनभावस्नयदूषितः ।
व्याजहारभवानेनतद्वह्निनानृपचोदितः 166
राजा ने कहा-हे मुरत ! महामुने । पापपी कृपा में मेरी पर प्रकार
सुगन है, परन्तु, यह मेरी पत्नी कौन-मी है, इमे जानने के लिये मुझे कुतू.
हम हमा है ।।४।। ऋपि बोले- गजन् । रेवती नाम को तीनो नो में
मन्तिीय मुन्दरी पायी पन्नी है, करामाप उम नही जानते ॥ राजा
न पहा- भगवन्
मुभद्रा, पालनाया, पावैगेतनया, मुगष्टमा, गुजाना,
परम्बा, पायजा ॥४॥ विपाटा पोर नन्दिनी यह मर्ग पलिया है. इन्हं में
भने प्रकार जानता हूँ, योनि वह मर ही घर में रहती हैं, पग्नु में अपनी
रेवती नाम पीनी पो नहीं जानता नि वह कौन-मो है ? ॥४६॥ मिने
मा-परमो दरमा परने के निदे सत्पर जिस पन्या नो पारने 'प्रिया,
यही पारसीतापनीय पानी है,हे गरन् । बया तुम मे भून गय हो ।
रामा ने पह-हे मुनि यंत्र! मा पन म प है, परन्तु मेरे द्वारा रिये
यदि सम्बोपन में मेगपी: भार नही पा, इसरि पाप मुम पर
मन परे नि रहा है परन् । सारा मा नी पा.

१०६ ] । मार्कण्डेय पुराण यह सत्य ही है, परन्तु, पाप द्वारा यह सम्वोधन अग्नि को ही प्रेरणा स हुपा है ।।४६ मयापृष्टोहुतवह कोऽप्याभतेतिपार्थिव । भवितातेनचाप्युक्तोभवानेवाद्यवैवर ।।५० तद्गृह्यतामयादत्तातुम्यकन्यानराधिप । प्रियेत्यामन्त्रिताचेयविचारकुरुपेकथम् ।।५१ ततोऽसावभवन्मौनीतेनोक्त पृथिवीपतिः । ऋपिस्तथोद्यत कर्तुतस्यावैवाहिक विधिम् ॥५२ तमुद्यतसापितरविवाहायमहामुने । उवाचकन्यायत्किचित्प्रश्रयावनतानना ।।५३ यदिमेप्रीतिमास्तातप्रसादकतुमर्हसि । रेवत्यक्षेविवाहमेतत्करोतुप्रसादित. ॥५४ रेवत्यक्षनर्वभद्र चन्द्रयोगिव्यवस्थितम् । अन्यानिसन्तिऋक्षारिणसुभ्र वैवाहिकानिते १५५ ताततेन विनाकालोविफल प्रतिभातिमे । विवाहोविफलेकालेमद्विधाया कथभवेत् ॥५६ हे भूपते । मैंने अग्नि से इसके पति के विषय में पूछा था तब प्रति ने पापके ही इसके पति होने की बात कही थी ॥५०॥ इसलिये, हे राजन् मापने जिसके प्रति 'प्रिय' कहा है, वह कन्या मैं आपको प्रदान करता भाप इससे विचार क्यो करते हैं, इसे ग्रहण करिये ॥५१॥ मार्कण्डेयजी दहा-ऋषि के वचन सुनकर राजा मौन हो गये मोर पि भी विवाह सस्कार के कार्य सम्पादन मे तत्पर हुए । ५२। जब कन्या ने मुनि को विवाः करने में तत्पर देखा, तब उसने विनय पूर्वक निवेदन किया ।।५३।। है तात प्रापको मुझ मे प्रीति है भोर यदि पाप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरा विवाह- मस्कार रेवती नक्षत्र में सम्पन्न करें ॥५४॥ पि ने कहा- रेवती नक्षत्र व माग मे अवस्थित नहीं है, परन्तु, विवाह-कार्य मे श्रेष्ठ अन्य सभी नक्षत्र विद्य मान हैं।॥५५॥ कन्या ने कहा- तात । रेवती नक्षत्र में वर्जित समय में गत मन्वन्तर ] [ १०६ दिपय में विश्ल जान पडता है, मेरे जैमी कन्या रा विचार विमल ममर मे में होगा। ॥५६॥ अनवागितिविख्यातस्तपस्वीरेवतीप्रति । चकारकोप द्धनतेनविनिपातितम् ॥५७ मयाचास्मंप्रतिनातामातिमदिरेक्षगा। नचेच्छमिविवाहत्वमरटन ममागतम् ॥५६ प्रतवाक्ममुनिम्तातक्मेिवततवान्तए । नत्वयाममतातेनब्रह्मबन्धो.मुताम्मिकिम् ॥५६ ब्रह्मवन्धो सुतानत्ववाले वनपम्चिन । मुतात्यममयोदेवान्बत्तुं मन्यान्ममुत्महे ॥३० तपम्पीयदिमेतानम्नत्विमृशमिददिदि । ममागेप्यविवाहोमेनहक्षेत्रियनेनतु ॥६१ एवभवतुभद्रन्नभद्र प्रीनिमनाभव । प्रागेपयामीन्दुमार्गवत्यक्षतेनव ।।३२ नस्लप प्रभावेगवत्यक्षमहामनिः ।

[ मारंण्डेय पुराण नक्षत्र को मैं चन्द्रमार्ग में स्थित किये देगा हूं ॥६२॥ मागडेयजी ने कहा- है द्विजष्ट ! तदन्तर उन मपि न अपने नप वे बल से रेवनी नक्षत्र को पहिल के ही समान चन्द्रमा में स्थित पर दिया ॥६॥ यथापूर्वन्तथाचक्रेसोमयोगिद्विजोत्तम ॥६३ विवाहचवदुहितुविधिवन्मन्त्रयोगिनम् । निष्पायप्रीतिमान्भूयोजामातरमथाब्रवीत् ।।६४ प्रोद्वाहिकतेभूपालकथ्यताक्दिदाम्यहम् । दुर्लम्यमपिदास्यामिममाप्रतिहततप १६५ मनो स्वायम्भुवस्याहमुत्पन्न मन्ततौमुने । मन्वन्तराधिपतुत्र त्वत्प्रसादावृणोम्यहम् ॥६६ भविष्पत्येपतेवामोमनुस्त्वत्तनयोमहीम् । सकलाभोक्ष्यतेभूपधम विचभविष्यति ।।६७ तामादायतताभूप स्वमेवनगर ययौ। तस्मादजायतसुतारेवत्यारंवतोमनु ॥६८ समेत सकलधर्मनिरपराजित । विज्ञाताखिल शास्त्रार्थोवेदविद्यार्थशास्त्रवित् ॥६६ तस्यमन्वन्तरेदेवान्मुनिदेवेन्द्रपार्थिवान् । क्थ्यमानान्मयाब्रह्मन्निवोवसुसमाहित ॥७० और वैवाहिक मन्त्रो से अपनी पुत्री का विवाह सस्कार सम्पन्न करके अत्यन्त प्रसन्न मन से अपने जामाता के प्रति कहा ॥६४।। ऋपि बोले- राजन् । विवाह मे दात स्वरूप तुम्ह क्या प्रदान करू', यह मुझे बतानो, तुम यदि कोई दुर्लभ वस्तु भी मांगोगे तो मै अपनी तपस्या के प्रभाव उसे दूंगा ॥६५॥ राजा ने कहा-हे मुने । मैं स्वायभुवमनु के वश मे उत्पन्न हुमा हू मैं आपकी कृपा से मन्वन्तराधिपति पुत्र का प्राप्त करू, यही चाहता हूँ ॥६६॥ ऋपि ने कहा-हे राजन् तुम्हारी अभिलापा पूण होगी, तुम्हारा पुरा धमन तथा मनु होकर सम्पूर्ण पृथिवी का भोग करने वाला होगा ।।६७॥ मार्कण्डेयजी ने कहा- तदनन्तर वह राजा अपनी पत्नी को साथ लेकर अपने नगर को गये .

रंवन मन्वनर ]
और ममय पार 3म रेवती के गर्भ में वन मनु मन ह || यह
प्रमंबाना, पप, मामा में पाग्गामा तपा वेद विद्या मोर मयं मर में भी
पारगत है ब्रह्मन् मद उना मन्वन्नर र देवता, ऋषि, इन्द्र
पौर राजापों का नगान करता है, उन मुनी ।।
सुमेधसम्ममदेवाम्नयाभूननयाद्विज ।
चकुष्ठवामितानाचचतुर्दगचतुदम ॥१
तपादेवगणानातुबनुमपिचेश्वर ।
नाम्नाविनुग्भूदिन्द्र गनयनोपनक्षर ॥२
हिरण्यलोमावेदश्रीमध्यबाम्नथापर ।
वेदवाह मुघामाचपर्जन्यमहामुनि ॥७३
चमिनिहाभागोवेदवेदागपाग !
एनेममर्पयत्रामवन-मान्नन्मनो ७४
चनबन्धुमहावीर्य मुयष्टव्यम्नेधापर ।
मन्ययायाम्नयंकामन वनन्यमनो मुता ॥
रेवनान्नान्नुमनर कथितापमपातद ।
म्वायम्भुधाश्रयायतबागेविषमृतमनुम् ।।७६
(पाएपाशृणुपाग्नित्यपटेदाम्यानमुनमन् ।
विमक मवपापन्यांनारप्राप्नोन्यामिनमा

११२ ] [ मायंण्डेय पुराण ६८--चाक्षुप मन्यन्तर इत्येतत्यथिततुभ्यपञ्चममन्वन्तरमया । चाक्षुपस्यमनो षष्ठ श्रूयतामिदमन्तरम् ।।१ अन्यजन्मनिजातोऽमौचक्षुप परमेष्टिन । चाक्षुपत्वमतस्तस्यजन्मन्यस्मिन्नपिद्विज ॥२ (अनमित्रस्य राजभद्राभार्यामहात्मन । जज्ञ सुतसुविद्वासशुचिजातिस्मर विभुम् ॥३) जातमातानिजोत्सङ्गस्थितमुल्लाप्यतपुन । परिष्वजतिहार्दनपुनरुल्लापयत्यथ ।।४ जातिस्मर सजातोवैमातुरुत्पङ्गमास्थित । जहासततदामातासक्रुद्धावाक्यमब्रवीत् ॥५ भीतास्मिकिमिद वल्महासोयद्वदनेतव । अकालवोध सञ्जात कच्चित्पश्यसिशोभनम् ॥६ (तन्मातुर्वचनश्रु त्वाप्रहम्येदमथाब्रवीद) । मामत्तमिच्छतिपुरोमार्जारोकिनपश्यसि । अन्तर्दानगताचेहितीयाजातहारिणी ॥७ मार्कण्डेयजी ने कहा-हे द्विज श्रेष्ठ । मैंने तुम्हारे प्रति इन पांच मन्व- स्तरो का वर्णन किया, अब छटवें चाक्षुप मनु के मन्वन्तर के विषय में कहता हू, श्रवण करी ॥१।। अन्य जन्म में परमेष्ठी ब्रह्माजी के कारण इनका नाम इस जन्म से भी चाक्षुष हुअा था ॥२॥ महात्मा अनमित्र की भन्दा नामक पत्नी के गर्भ से विद्वान्, पवित्र, जातिस्मर और विभु गुण से सम्पन्न एक पुत्र को उत्पत्ति हुई )॥३॥ माता ने आनन्द मे भर कर उस उत्पन्न हुए पुत्र का लाड पूवक आलिंगन किया और फिर वह उसका मादर करने लगी ।।४। इस पर माता को गोदी म स्थित हुए बह जातिस्मर पुत्र हम पडा तो माता ने उससे क्रोध पूर्वक कहा ।।५।। हे वत्स । तुम्हारे मुख पी इस हमी को देखकर मैं डर गई , तुम्ह इस शिशुकाल में ज्ञान को प्राप्त होकर चक्षु उत्पन्न होने के

पाप मन्वन्तर ।
का कुछ शुभ दिवाई देता है ? ॥ (माता को यात मुन पर पुत्र हैन र
बोना) पुत्र ने कहा- यह जा माजांगे मुझे माग वग्न की इच्छा में सामने
यही है, वमे क्या तुम नहीं देग मक्ती ? गुप्त भर मे यह जान हागिनो यहाँ
स्थित है, में क्या तुम नही जान माती'l
पुषप्रीत्यात्रभवतीनहाइमामवेक्षनी ।
उन्नाप्योन्लान्यवहुग परिष्वजनिमायन ।
उतपुलवाम्नेह्मम्भवाम्राफ्लिक्षगा।
ननोममागतोहाम.शृणुचाप्ययकारणम् HE
म्वायप्रसक्तामागिप्रमत्त मामवेधने ।
तयान्तर्दानगाचवद्वितीयाजातहाग्गिणी ॥१०
वार्थायम्निग्यहृदयेयरममोपरि।
प्रवृत्तम्पार्थमात्यायनशैवप्रतिभामिम ।।११
चिन्नुमदुपभोगायमा गजानहारिणी।
त्वन्नु मेसोपभोग्यमन ममीममि ॥१२
नमाजानामियोप्येपनचंगापटनमया ।
नगतनानिरागीनपचममदिनामयम् ।।१३
नयापिग्नित्यनेमालापगिरजमिवाप्यति ।
नातेनिलमद्रनिनियंत्रोक्योपिनाम ४

! मार्कण्डेय पुराण पांच या मात दिन माता-पुत्र रूप में ही मिलन हुअा है ।।१३।। फिर भी तुम अधुर्ण नेत्रो मे मेरे प्रति स्नेह प्रकट करती हो, प्रालिंगन करती हो और क्पट-रहित हृदय से तात, वत्स, भद्र आदि कह कर पुचकारती हो ॥१४॥ नत्वाहमुपकारार्थवत्सप्रोत्यापरिष्वजे । नचेदेतद्भवत्प्रीत्यैपरित्यक्तास्म्यहत्वया ॥१५ स्वार्थोमयापरित्यक्तोयस्त्वत्तोमेभविष्यति । इत्युक्त्वामातमुत्सृज्यनिरकान्तासूतिकागृहात् ॥१६॥ जड़ागबाह्यकरणशुद्धान्त करणात्मकम् । जहारतपत्यिक्त सातदाजातहारिणी ।।१७ माहित्वाततदावालविक्रान्तस्यमहीभृत. । प्रसूतपत्नीशयनेन्यम्यस्यतस्याददेसुतम् ॥१८ तमप्यन्यगृहेनीत्वागृहीत्वातस्यचात्मजम् । तृतीयभक्षयामाससाक्रमाज्जातहारिणी ॥१६ हृत्वाहृत्वातृतीयतुभक्षयत्यतिनिघृणा । कगेत्यनुदिनसातुपरिवर्ततथान्ययो ॥२० विकान्तोऽपिततस्तस्यसुतस्यैवमहीपति । वारयामाससस्वाराचाजन्यस्यभवन्तिये ॥२१ माता ने कहा- हे वत्स । रिमी उपकार की भाशा से मै तुम्हारा मालिङ्गन नहीं करती यदि तुम मेरे पालिङ्गन पाने आदि से प्रमन्नता को प्राप्त नहीं होते तो मुझे छोड दो ॥१५॥ तुमसे जिस स्वार्थ सिद्धि की माना है, मैंने उसे छोडा, ऐगा कहकर प्रमूति गृह मे माता उस जहदत पुल का परित्याग पर बाहर निकली, तब माता द्वारा परित्यक्त उस पुत्र मा जातहारिणी ने हरणावर विया ॥१६-१७॥ उमा हरण पर उमन विज्ञान नामक राजा की प्रमूना परनी को पाया मे राग कर उमरे नात्पन्न शिशु का हरण दिया ।।१८।। और उम भी किमी दूसरे में घर म सब पर उम पुत्र या युग पर पन्त में उस तृताय निशु का भाग पर मिया ॥१६॥ वह मत्पन्न निर्भय जाम हारिणी नव प्रमूर्ति शिशुमा का निस्य प्रति इमो प्रकार हरण पानी और पहिले दो का

११६ ]
[ माण्डेय पुराण
जातोऽहमनमिनस्यक्षत्रियम्यगृहेद्विज ।
तत्पन्यागिरिभद्रायामाददेजातहारिणी ॥२८
तयात्रमुत्तोहैमिन्यागृहीत्वाचसुतचसा ।
बोधस्यद्विजमुख्यस्यगृहेनीतबतीपुन ||२६
भक्षयामासचमुततस्यबोधद्विजन्मनः ।
सप्तद्विजसस्कार सस्कृतोहैमिनीसुत ॥३०
वयमत्रमहाभागसस्कृतागुरुणात्वया ।
भयातववच कार्यमुपैमिक्तमागुरो १३१
अतीवगहनवत्ससकटमहदागतम् ।
मवेभिकिचिन्मोहेनभ्रमन्तीवहिवुद्धय ।।३२
माहस्यावसर कोऽत्रजगत्येवव्यवस्थिते ।
क कस्यपुनोविप्रकोवावस्यनबान्धव ॥३३
प्रारभ्यजन्मनोनृणासस्वन्धित्वमुपैतियः ।
ग्मन्यमवधिनोविनमृत्युनासनिवर्तिता ॥३४
अनापिजातस्यसुत सम्वधोयोऽस्यवान्यवै ।
सोप्यस्तमन्तदेहम्यनयात्येपोऽखिलक्रम ॥३५
प्रानन्द बोला-राजा अनमित्र की पत्नी गिरिभद्दा के गर्म से मैं उत्पन्न
ह और जातारिणी मेरा हरण करके यहाँ रख गई ।।२।। और हैमिनी के
पुत्र का हरण करके उसे ब्राह्मण वर बोध के यहाँ ले जाकर ॥२६॥ उस
। वोघ के पुत्र को खा गई, हैमिनी के उस पुन का विशाल ग्राम मे द्विज सस्कार
दिया गया है ॥३०॥ और मेरा सस्कार यहाँ आपके द्वारा हुआ है, हे महा-
भाग 1 साप मेरे गुरु हैं, मुझे पापकी माता पूर्ण रूपेण स्वीकार है, अत आज्ञा
मौजिय कि मैं विम माता को प्रणाम करू ॥३१॥ गुरुजी ने कहा-हे वत्म ।
यह तो प्रत्यन्त पार मङ्ट पा गया है, मै कुछ भी नहीं समझ पाता जम मेरी
बुद्धि मोह मे भ्रमित होगई है ॥३२॥ ग्रानन्द बोला-हे ब्रह्मप॑ ।
मम्मवस्पिन ग ममार में माह का विराम क्या है ? इसलिय कौन विमा
पुत्र है ? अन्म सन के पश्चात् जीव विभिन्न जीयो म गम्बन्ध युक्त होता है, तब
इस प्रकार

[ मार्कण्डेय पुराण
तपस्यन्तततस्तचप्रादेव प्रजापतिः ।
किमर्थतप्यसेवत्सतपस्तीत वदस्वतत् ।।४२
आत्मन शुद्धि कामोऽहकरोमिभगवस्तप ।
बधायममकर्माणियानितत्क्षपणोन्मुखः ॥४३
क्षीणाधिकारोभवतिमुक्तियाग्योनकर्मवान् ।
सत्वाधिकारवान्मुक्तिमवाप्स्यतिततोभवान् ॥४४
भवतामनुनाभाव्यषष्ठ नबजतत्कुरु ।
अलतेतरसातस्मिन्कृतेमुक्तिमवाप्स्यसि ॥४५
इत्युक्तोब्रह्मरणासाऽपितथेत्युक्त्वामहामति ।
तत्कर्माभिमुखोयस्तुतपसोविररामह ।।४६
चाभुपेत्याहन ब्रह्मातपसोविनिवर्तयन् ।
पूर्वनाम्नावभूवाथप्रस्यातश्चाक्षुपोमनु ॥४७
उपयमविदर्भाससुतामुग्रस्यभूभृत ।
तस्याचोत्पादयामासपुत्रान्प्रख्यात विक्रमान् ।।४८
तस्यमन्वन्तरेशस्ययेऽन्तरेमिदशाद्विज ।
यंचर्पयस्तथैवेन्द्रीयेसुताश्चास्यतान्छृणु ४६
जब यह इस प्रकार तप मे प्रवृत्त हुमा, तब प्रजापति ब्रह्माजी ने उससे
वहा है क्त्म ! ऐगा घोर तप किसलिये कर रहे हो ? ॥४२॥ मानन्द
बोला-हे भगवन् । ममार के बन्धन प कर्मों को नष्ट करन की अभिलापा
में ही में यह सर पर रहा ह ॥४३॥ ब्रह्माजी ने यहा-क्षीणाधिकार वाले
मनुष्य ही मोस ये अविवारी होते हैं, क्योकि दे कमवान नहीं होते, सुम गोवं
पर पारिपत्य करने वाले होरर मोक्ष की से प्राप्त हो सकोगे ? ॥४४॥ जापा
तुम घटवं मनु होगे. उसी प्रकार के कार्य से मोक्ष को प्राप्त हो जानोगे, मद
तु, तर पाना भावना नहीं है ।।४५मार्यरडेपनी ने यहाब्रह्माजी
प्रामा पाार एमाही हो' पहले हम आउन्द ने तपस्या पा परित्याग निय
॥४॥पौर मामी ने उन्हें नप में निवृत पाप पूर्ववत् 'पाशुप' नाम दिया
लिए यही पाथर मनु रे नाम में भगिन हुए || फिर उन्होंन राणा उर

१२० ] | मार्कण्डेय पुराण मधु, प्रति और सहिष्णु यह सप्तर्षि हुए तथा अरू. पुरु, शतयुम्न इत्यादि राजा उन चाक्षुष मनु के अत्यन्त बलवान पुत्र हुए ॥५५-५६।। ऐतत्तेकथितपष्ठ मयामन्वन्तर द्विज । चाक्षुपम्यतथाजन्मचरितच महात्मनः ॥५७ साम्प्रतवत्तंतेयोऽयनाम्नावैवस्वतोमनुः । सप्तमोयेन्तरेतस्यदेवाद्यास्ताञ्छणुष्वमे ॥५८ (यइद कीर्तयेद्धीमाश्चाक्षुषस्यातरभुवि । शृणुतेचलभेत्पुवानारोग्यसुखसपदम् ) ॥५६ यह इस पष्ठ मन्वन्तर और महात्मा चाक्षुष मनु का जीवन चरित्र मैंने तुममे कह दिया ।।५७)। अब जो वैवस्वत नामक सातवें मनु वतमान है, उनके मन्वन्तर के देवतादि का वर्णन धवरण करो ॥५६॥ जो मनुष्य इस चाक्षुष मन्वन्तर को कहेंगे या श्रवण करेंगे उन्हे पुत्र, प्रारोग्यता, सुख, सम्पत्ति की प्राप्ति होगी ॥५६॥ ६६-चैवस्वत मन्वन्तर प्रारम्भ मार्तण्टस्यरवेार्यातनयाविश्वकर्मण। सज्ञानाममहाभागतस्याभानुरजीजनत् ।।१ मनु प्रत्यातयशसमनेकज्ञानपारगम् । विवस्वत सुतोयस्मात्तस्माद वस्वतस्तुस २ मनाचरविणादृष्टानिमालयतिलोधने। यतस्तत सरोपोऽर्क सम्मानिष्ठुरमन्नयोत् ॥३ मयिदृष्ट सदायस्मात्कुरपेनेत्रसयमम् । तस्माज्जनिप्यसेमूटेप्रनारायमनयमम् ।।४ सत साचपलाष्टिदेवीचक भयाकुला। विलोलित दृश दृष्ट्वापुनराहचतारविः ॥५ वैवस्वत मन्वन्तर प्रारम्भ ] [ १२१ यस्माद्विलोलितादृष्टिर्म यिदृष्टत्वयाधुना । तस्माद्विलोलातनयानदीत्वप्रसविष्यसि ॥६ त सज्ञातुसजज्ञभर्तृशापेनतेन । यमश्चयमुनाचेयप्रख्यातासुमहानदी 19 माकण्डेयजो न कहा-ह महाभाग । विश्वकर्मा को पुत्री सज्ञा मार्त्त- एडदेव की भार्या थी, उसके गर्भ से ॥१॥ यश म यिरयात एव अत्यन्न ज्ञानवान् मनु उत्पन्न हुए, वह विवस्वान् के पुत्र होने से 'वैवस्वत' नाम से प्रसिद्ध हुए ॥२॥ रूप को देखते ही वह सज्ञा अपने नेत्र वन्द कर लेती थी, इसलिए एक दिन सूर्य ने उसक प्रति यह कठोर वचन कहा ॥३॥ तू मुझे देख कर सदैव नेत्रा का सयम कर लेती है इसलिये तेरे प्रजा का सयम करन वाले यम की उत्पत्ति होगी ॥४॥ माकण्डेयजी न कहा-तभी स सज्ञा से भय स व्याकुल होकर सूर्य को चञ्चल दृष्टि से दखन लगी, तब उसे चश्वल नेत्र वाली देख कर सूर्य ने उससे कहा ।।५।। तू मुझे देखकर चञ्चल दृष्टि कर लेती है, इसलिये अब तू चञ्चल नदी रूप वाली कन्या को उत्पन्न करेगी ॥६॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-पति के द्वारा इस प्रकार दापित हुई सश्रा के गर्भ से यम उत्पन्न हुमर और फिर यमुना नाम की वित्यात नदी भी उत्पन्न हुई ॥७॥ सापिसज्ञारवेस्तेज सेहेदु वेनभाविनी । असहन्तीचमातेजश्चिन्तयामासवैतदा ॥८ किंकरोमिक्वगच्छामिक्वगतायाश्चनिति । भवेन्ममकथमाकोपमर्कश्चनेष्यति 18 इतिसचिन्त्यबहुधाप्रजापतिसुतातदा । बहुमेनेमहाभागापितृसश्रयमेवसा ॥१० तत पित्तगृहेगन्तु कृतवुद्धिर्यशस्विनी। खायामयीमात्मतनु निर्ममेदयितारव ।। ११ ताचावाचत्वयावश्मन्यत्रमानोर्यथामया। तथासम्यगपत्येपुतितव्ययथारवौ ॥१२ १२२ ] { मादय पुराण पृष्टयापिनवाच्यतेतद्भागमनमम । रोवास्मिनापराशेतिवाच्यमेतत्सदायरः ॥१३ प्राकेशग्रहणाद्दे वियागापाधवचस्तक । परिष्येपथविध्यामिवृत्ततुगापय यंगात् ॥१४ उस सगा ने उतने समय तक प्रत्यार वट पूर्वर गूयं 4 सेज पो महन दिया था, परन्तु अब अधिक सहन न करने के कारण यह विचार करने लगी का क्या कह पिधर जाऊ? किस प्रकार भय से य? किस उपाय अपने पति को क्रोध से निवृत करू ? तब उस प्रजापति-मुता सज्ञा ने पितृ गृह के आश्रय मे जाने का ही विचार स्थिर किया ॥१०॥ ऐसा निश्चय करके उसने अपनी छाया स्वरूप एक देह वनावर ॥११॥ उस धाया से यहा-- जिस प्रकार मैं इन सूर्य देव के गृह में निवास करती है, उसी भाव से यहाँ रहती हुई मेरे पुत्र और पति के प्रति मेरे हो समान माचरण करना ॥१२॥ मूर्य पूछे तो भी मेरे चले जाने की वार्ता उन्हे मत बताना, 'मैं ही सना हूँ उन्हे ऐसे ही समभाये रहना ॥१३॥ छाया ने कहा-हे देवि । जब तक वे मेरे केश नहीं पकड गे और शाप नहीं देंगे, तब तक मैं तुम्हारे वचनों के अनु- सार कार्य करूगी और केश पकडने या शाप देने पर सव वृतान्त बता दूगी ॥१४॥ इत्युक्तासातदादेवीजगामभवनपितुः । ददर्शतत्रत्वष्टारतपसाधूतकल्मषम् ॥१५ बहुमानाचतेनापिपूजिताविश्वक्मणा । स्थिौपितृगृहेसातुकचित्कालमनिन्दिता ॥१६ इतस्ताप्राहचार्वङ्गी पितानातिचिरोपिताम् । तुवाचतनयाप्रेमबहुमानपुर सरम् ॥१७ वातुमेपश्यतोवत्सेदिनानिसुबहून्यपि । मुहूर्ताद्धं समानिस्यु किन्तुधर्मोविलुप्यते ।।१८ वान्धवेपुचिर वासोनारीणानयशस्कर । मनोरथोवान्धवानानाभितृ गृहेस्थिति ॥१६ वैवम्वत मन्वन्तर प्रारम्भ ] [ १२३ सात्वंत्रलोक्यनाथेनभासूय्यरणसङ्गता। पितृगेहेचिर कालवस्तु नार्हसिपुत्रिके ॥२० सात्वंभर्तृगृहगच्छतुष्टोऽहपूजितासिमे । पुनरागमनकार्यदर्शनायशुभेमम ॥२१ यह वात सुनकर सज्ञा अपने पिता के घर चली गई और वहां उसने तप के द्वारा पाप रहित हुए विश्वकर्मा के दर्शन किये ॥१५॥ विश्वकर्मा ने सज्ञा का स्वागत सत्कार किया और फिर आनन्द युक्त हुई सज्ञा ने कुछ काल तक अपने पिता के गृह में निवास किया ॥१६॥ फिर कुछ कालोपरान्त उसके पिता ने अत्यन्त मान के सहित उससे कहा ॥१७॥ है वत्से ! तुमको देखते हुए वहुत समय व्यतीत हाने पर भी वह मुझे आधे मुहूर्त के समान ही समय व्यतीत हुप्रा प्रतीत होता है, परन्तु इससे धर्म का लोप हो जाता है ॥१८॥ स्त्रियो के लिये बाधवों के साथ सदा निवास करना यश देने वाला कार्य नहीं है, उनका निवास तो पतिगृह मे ही उचित है ॥१६॥ तीनो लोको के स्वामी सूर्य तुम्हारे पति हैं, तुम उनके साय विवाह सूत्र मे बँधी हो, तुम्हारा पितृगृह मे रहना उचित नही हो सकता ॥२०॥ इसलिए अब तुम अपने पति के घर चली जानो, तुम्हारे प्रागमन से मैं सन्तुष्ट हुआ और तुम भी मेरे द्वारा सत्कारित हुई , अब फिर देखने के लिये यहाँ प्राजाना ॥२१॥ इत्युक्तासातदापित्रातथेत्युक्ताचसामुने । सपूजयित्वापितर जगामाथोत्तरान्कुरुन् । २२ सूयतापमनिच्छन्तीतेजसस्तस्यविभ्यती। तपश्चचारतत्रापिवडवास्पधारिणी ।।२३ मज्ञेयमितिमन्वानोद्वितीयायामहस्पति । जनयामासतनयौकन्याकामनोरमाम् ।।२४ छायासज्ञात्वपत्येप्यथास्वेष्वतिक्त्सला । तयानसज्ञाकन्यायापुत्रयोश्चान्ववर्तत ॥२५ लालनाद्य पभोगेपविक्षेपमनुवासरम् । मनुस्तक्षान्तवानस्यायमस्तस्यानचक्षमे ॥२६ १२४ ) [ मारय पुराण ताडनायचयोपापापस्तेनसमुत्त त । तस्या पुन क्षातिमतानतुदेहेनिपातित ॥२७ तत शशापतयोपाच्छायासज्ञायमद्विज । विचित्प्रस्फुरमापौधोविचलत्पाणिपरलया ।।२८ पितु पत्नीममय्यादयन्मातर्जयसेपदा। भुक्तिस्मादयपादस्तवाद्य यातिप्यति ॥२६ मार्कण्डेयजी ने कहा-अपने पिता विश्वकर्मा के एगा वहने पर मा उनकी आज्ञा मान कर और उनका पूजन कर उत्तरवुरुदेश मै गई ॥२२॥ मूय के तेज से भयभीत सज्ञा सूर्य के तेज को न चाहने को इच्छा से वहीं घोडी का रूप रख कर तप करने लगी ॥२३।। उधर सूर्य न उस छाया को ही राज्ञा मानते हुए उसके गभ से दो और एक पुत्री को जन्म दिया ॥२४॥ परन्तु वह छाया जितनी प्रीतिवतो अपनी सन्तान के प्रति थी, उतनो सक्षा की सन्तान के प्रति स्नेहवती नहीं थी ॥२शा वह लालन पालन के समय सन्तानों में भेद भाव दिखाती थी, इसके लिये मनु ने तो उससे कुछ नहीं कहा, परन्तु यम ने उसे क्षमा नहीं किया ॥२६।। उन्होने क्रोधवश प्रहार करने को अपना चरए उठाया, परन्तु क्रोध को रोक कर चरण प्रहार नहीं किया ॥२७॥ परन्तु उस छामा सज्ञा ने कोष के वशीभूत होकर होठ कम्पित करते हुए हाथ उठा कर शाप दिया ।२६।। मैं तेरे पिता की पत्नी है, फिर भी तू मरी मर्यादा न रख कर चरण दिखाकर डराता है, इसलिये तेरा यह चरण तत्काल पृथिवी म गिर जाय ॥२६॥ इत्याकर्ययम शापमात्रादत्त भयातुर । अभ्येत्यपितर प्रारणिपातपुर सरम् ।।३० ताततन्महदाश्चर्यानदृष्टमितिकेनचित् । मातावात्सल्यमुत्सृज्यशापपुप्रयच्छति ॥३१ यथामनुर्ममाचष्टे नेयमातातथामम । विगु रोष्वपिपुनेपुनमाताविगुणाभवेत् ॥३२ वैवस्वत मन्वन्तर प्रारम्भ ] । १२५ यमस्यैतद्वच श्रु त्वामगवांस्तिमिरापहः । छायासंज्ञासमाहूयपप्रच्छक्वगतेतिसा ॥३३ साचाहतनयात्वष्टुरहंसंज्ञाविभावसो । पत्नीतवत्वयापत्यान्येतानिजनितानिमे ॥३४ इत्यं विवस्वत सातुवहुश पृच्छतोयदा । नाचचक्षेततःऋद्धोभास्वास्ताशप्तुमुद्यतः ॥३५ मार्कण्डेयजी ने कहा-माता द्वारा ऐसा शाप सुनकर भय से प्रातुर हए यम ने अपने पिता सूर्य के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया और बोले ॥३०॥ यम ने कहा-माता अपने ही पुत्र को शाप दे, यह अत्यन्त विस्मयजनक है, ऐसो वात तो कभी कही नही देखी गई ॥३१॥ मनु ने मुझसे जैसा कहा था, वंसी यह माता नहीं है, पुत्र के असद्गुणी होने पर भी माता उसके प्रमंगल की बात नही कहती ॥३२॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-यम का वचन सुनकर भगवान सूर्य ने छाया को अपने पास प्रादर सहित बुला कर पूछा-सज्ञा कहाँ गई ? ॥३३॥ छाया ने कहा है भगवन् ! विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा मैं ही हू, मैं ही तुम्हारी भार्या हू, मेरे हो गर्भ से इस सन्तान की उत्पत्ति हुई है ॥३४॥ सूर्य के बारम्बार प्रश्न करने पर भी उमने वही उत्तर दिया तब सूर्य क्रोधित होगये और शाप देने के लिये तत्पर हुए ॥३॥ तत साकथयामासयथावृत्तविवस्वतः । विदिताश्वभगवाअगामत्वष्ट्र रालयम् ॥३६ तत सपूजयामासतदात्रलोक्यपूजितम् । भास्वन्तंपरयाभक्तयानिजगेहमुपागतम् ॥३७ सज्ञापृष्टस्तदातस्मैकथयामासविश्वकृत् । प्रागतवेहमेवेश्मभवत.प्रेपितेति ॥३८ दिवाकर:समाधिस्थोबडवास्पधारिणीम् । तपश्चरन्तीददृशेउत्तरेषुकुरप्वथ ॥३६ सौम्यमूर्ति शुभाकारोममभभिवेदिति । अभिसन्धिश्चतपसोवुवुधेम्यादिवाकर. ॥४० !

१२६ ] [ माग्डेय पुराण शातनतेजसोमेऽद्यक्रियतामितिभास्करः । मचाहविश्वकर्मापसज्ञाया:पितरद्विज ॥ मवत्सरभ्रमेस्तस्यविश्वकर्मारवेस्तत.। तेजस शातनचक्र स्तूयमानश्चदैवत ॥४२ तब जो वृत्तान्त था वह सभी उसने सूर्य से वह दिया, जिसे जानकर वह विश्वकर्मा के घर पहुंचे ॥३६॥ अपने घर पर आगत भगवान सूर्य का विश्व- कर्मा ने अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूजन किया ॥३७॥ इसके पश्चात् जब सूर्य ने सज्ञा का वृत्तान्त पूछा, तो उन्होने बताया कि सज्ञा यहाँ आई थी और फिर मैंने उसे आपके ही यहां भेज दिया था ॥३॥ तब सूर्य ने ध्यान मे अवस्थित होकर सज्ञा को घोडी का रूप धारण किये उत्तर कुरु वष में तप करते हुए देखा ॥३६।। उन्होने जान लिया कि उसके तप वा उद्देश्य मेरी सुन्दराकृति मौर सौम्य मूर्ति होने की कामना ही है ॥४०॥ तब भगवान् सूर्य ने सज्ञा के पिता विश्वकर्मा से कहा कि मेरे तेज को क्षीण कर दीजिए ॥४१॥ देवताओ के द्वारा प्रार्थना करने पर उन विश्वकर्मा ने सूर्य के तेज को क्षीण कर दिया ।।४२॥ -सूर्य-स्तर एवं अश्विनी कुमारों की उत्पत्ति ततस्ततुष्टुवु वास्तथादेवर्पयोरविम् । वाग्भिरीड्यमशेषस्यत्रलोकचस्यमागता ॥१॥ नमस्तेसस्वरूपायसामरूपायतेनमः । यजु स्वरूपस्पायसाम्नामधामयतेनम १२॥ ज्ञानं कधामभूतायनिततमसेनम । शुद्धज्योति स्वरूपाविशुखायामलात्मने ।।३।। (चकिरणेशखिनेधाम्नेगागिरणेपद्मिनेनमः ) वरिायवरेण्यायपरस्मैपरमात्मने । नमोऽनिल जगव्यापिस्वस्पायाममूर्तये ।।४।।

सूर्य-स्तव एवं अश्विनीकुमारो की उत्पत्ति ] [ १२७ सर्वकारणभूतायनिष्ठायैज्ञानचेतसाम् ॥५॥ नम सूर्यस्वरूपायप्रकाशात्मस्वरूपिणे । भास्करायनमस्तुभ्यतथादिनकृतेनम ।।६।। शर्वरीहेतवेचैवसन्ध्याज्योत्स्नाकृतेनम । त्वसवमेतद्भगवञ्जगदुद्भ्रमतात्वया ॥७॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-तव देवता और ऋपि वहाँ आकर त्रैलोक्य पूज्य भगवान भास्कर की स्तुति करने लगे ॥ १॥ देवताओं ने कहा-हे देव । प्राप ऋक् स्वरूप है, आपको नमस्कार है, आप साम स्वरूप को नमस्कार हैं, आप ही यजुःस्वरूप एवं साम के धृतिमान है, आपको नमस्कार है ॥ २ ॥ पाप ही ज्ञान के एकमात्र आश्रय स्वरूप, अन्धकार के नाशक, ज्योति स्वरूप विशुद्ध एव विमलात्मा है, आपको नमस्कार हैं, ॥ ३ ॥ आप शङ्ख, चक्र, पद्म और शाङ्ग धारण करने वाले को नमस्कार, आप वरिष्ठ, वरेण्य, पर, परमात्मा, प्रात्म स्वरूप एव जगद्व्यापी स्वरूप को नमस्कार है ।। ४॥ प्राप ही ज्ञान चित्त वाले पुरुषो के लिये निष्ठा स्वरूप तथा सर्वभूतो के कारण रूप ॥ ५॥ आप ही सूर्यरूपी प्रकाश और आत्मरूपी भास्कर हैं, आप दिनकर को नमस्कार है 10 रात्रि के कारण, सध्या एव ज्योत्स्ना को प्रकट करने वाले प्राप भगवान् के लिये नमस्कार है, आपके ही द्वारा यह विश्व जाग्रति प्रोर सुषुप्ति में पड़ता है ॥७॥ भ्रमत्याविद्धमखिलब्रह्माण्डसचराचरम् । त्वदशुभिरिदस्पृष्ट सर्वसजायतेशुचि ॥८ क्रियतत्वत्कर स्पर्शाज्जलादीनापवित्रता । होमदानादिकोधर्मोनोपकारायजायते ॥ तावद्यावन्नसयोगिजगदेवत्वद शुभि । ऋचस्तेसकलाह्य तायजू प्येतानिचान्यत ॥१० सक्लानिचसामानिनिपतन्तित्वदङ्गतः । ऋड मयस्त्वजगन्नाथत्वमेवचयजुर्मय ॥११ १२८ ] । मार्कर डेय पुराण यत साममयश्चैवततोनायत्रयीमयः । खमेवब्रह्मपोरूपपर चापरमेवच ।।११ मूर्तामुतस्तथासूक्ष्म स्थूलरूपस्तथास्थितः । निमेपकाष्ठादिमय:कालरूप क्षयात्मक । प्रसीदस्वेच्छयारूपस्वतेज शमनकुरु ॥१३ इद स्तोत्रवररम्यश्रोतव्यश्रद्धयानरे । शिष्योभूत्वासमाधिस्थोदत्त्वादेयगुरोरपि ।।१४ आपके द्वारा ही यह सचराचर ब्रह्माण्ड गति करता है और सभी स्पर्शनीय द्रव्य मापको रश्मियो का स्पर्श प्राप्त करके ही पवित्र होते हैं 10 भापकी रश्मियो से ही जलादि पवित्र होते हैं तथा जव उपकारार्थ होम, दान मादि धर्म नहीं होते ॥६॥ तब तक यह विश्व प्रापको रश्मियों के सयोग को प्राप्त नहीं होता, मापके मंग से उद्भूत रश्मियो भूक, यजु, पौर माम ही हैं, इसलिये प्राप ही ऋषमय, यजुर्मय ॥१०-११॥ और साममय है, पाप हो त्रयीमय ब्रह्मस्वरूप तथा प्रधान और प्रधान भी हो।। १२ ।। पाप मूर्तिधारी हो, तथा पाप हो पावृति होन हो, स्यूल एव सूक्ष्मरूप से प्राप ही निमेप का मादि एवं क्षयात्मक बाल हो, पाप प्रसन्न हो और स्वेन्या- पूर्वक ही रूप चौर तेज को क्षीण करें ॥१३॥ (इस सुरम्य स्तोत्र को श्रमा पुर्वष मुने घोर गुरु भी अपने शिष्य को समाधि में स्थित होकर प्रदान करें ॥१४ एवसस्तूयमानस्तुदेवदेवषिभिस्तथा । मुमोचस्वतदातेजस्तेजमाराशिव्ययः ॥१५॥ यत्तस्यह मयतेजोमवितातेनमेदिनी। यजुर्मयनापिदिवग्वर्ग:माममयरवैः ॥१६॥ मातिनास्तेजमोभागायेरवदादापचय । स्वष्ट्रयतनगवस्ययनमूनमहात्मना ॥१७॥ पक विष्णोवंगूना याक्वोपगुदाणा: । पाववम्यनयासक्तिसिविधापनदम्य Met

सूर्य-स्तव एवं प्रश्विनाकुमारा को उत्पत्ति J
अन्येषामसुरारीणामस्मापुमारिणयानिवै ।
यक्षविद्याधराणाञ्चतानिचक्रेसविश्वकृत् ।।१६।।
ततश्चपोडशभागविभतिभगवान्विभु ।
तत्तेजःपचदशधाशातितविश्वकर्मणा ॥२०॥
ततोऽश्वरूपधृग्भानुरुत्तरानगमत्कुरुन् ।
ददृशेतत्रसज्ञाचवडवारूपधारिणीम् ।।२१॥
मार्कण्डेयजी ने कहा--देवतानो और ऋपियो द्वारा इस प्रकार स्तुत
होकर तेजोराशि भगवान सूर्य ने अपने तेज को क्षीण किया ॥१४॥ उनके
भूकमय तेज से पृथिवी हुई, यजुर्मय तेज से आकाश और साममय तेज से
स्वर्ग हुआ ॥१६॥ त्वष्टा ने मूर्य तेज के जिस पचदश भाग को छोड़ दिया था,
उसी भाग से शिवजी का शूल ॥१७॥ विष्णु चक्र तथा वसुगरण, शकर और
अग्नि की दारुण शक्ति का निर्माण किया तथा उसी मे कुवेर को पालकी ॥१८॥
तथा अन्यान्य देवता, यक्ष, विद्याधर आदि के जो तीक्ष्ण अस्त्र हैं वह सब
वनाय ।।१६। फिर भगवान सूर्य ने अपने तेज का पोडशाश मात्र धारण
किया, उसे भी विश्वकर्मा ने पन्द्रह वार छोला ॥२०॥ तदनन्तर सूर्य ने अश्व
का रूप धारण किया और उत्तर कुरुवर्ष में पहुंच कर अश्वी रूप मे अवस्थित
सज्ञा को दखा ॥२१॥
साच्चदृष्ट्वातमायान्तपरपु सोविशङ्कया ।
जगामसमुसतस्यपृष्ठरक्षणतत्परा ।।२२।।
ततश्चनासिकायोगतयोस्तत्रसमतयो ।
नासत्यनौतनयावश्वीवक्त्रविनिर्गतौ ॥२६॥
रेतसोऽन्तेवरेवन्लङ्गीखीचमीतनुत्रधृक् ।
अश्वारूढ समुद्भ तोबाणतूममन्वित ॥२४॥
तत स्वरूपमनुलदर्शयामाममानुमान् ।
तस्यपाचसमालोक्यस्वरूपमुमा दे ॥२५॥
स्वरूपधारिणीचेमामानिनायनिजाश्रमम् ।
सज्ञाभार्याप्रीतिमीभास्करोवारितस्करः ॥२६॥

[ मार्कंडेय पुराण
तन पूर्वसुतीयोऽस्या सोऽभूद्व वस्वतोमनुः ।
द्वितीयश्चयम.शापाद्धमदृष्टिरभूत्सुतः ।।२७।।
कृमयोमासमादायपादतोऽस्यमहीतले ।
पतिष्यन्तीतिशापान्ततस्यचक्रे पितास्वयम् ।।२।।
धर्मदृष्टियंतश्वासोसमोमितथाहिते।
ततोनियोगतयाम्येचकारतिमिरापह ॥२९॥
उन्हें आता देख कर पर-पुरुप की आशका से संज्ञा अपनी पीठ की
रक्षा करती हुई उनके सामने पहुंची ॥२२॥
फिर उन दोनो की नासिका
मिलने के कारण अश्वी के मुख से नासत्य और दस्र नामक दो पुत्र तत्काल बाहर
निकले ॥२३॥ तथा वीर्य के शेष भाग से ढाल, कवच, खड्ग, वाण तूण धारी
अश्वारूढ़ के एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम रेवत हुया ॥२४।। फिर
सूर्य ने उम घोडी को अपना प्रतुलित स्वरूप दिखाया, उस स्वरूप को देख कर
बदबा रूपिणी सज्ञा ने प्रसन्न हो कर अपना यथार्थ रूप धारण कर लिया
॥२५।। तब जल का शोषण करने वाले भगवान सूर्य उस सज्ञा नाम की अपनी
पत्नी को घर ले गये ॥२६॥। इसी का ज्येष्ठ पुत्र वैवस्वत मनु हुन्ना और
दूसरा पुत्र यम शाप के कारण धर्मदृष्टि हुअा ॥२७॥ उनको दिये गये शाप
का निवारण उनके पिता सूय ने स्वय कर दिया ॥२८॥ तथा धर्म दृष्टि और
शत्रु-मित्र मे मम दृष्टि देख कर सूर्य ने उनको यमरव के कार्य में नियुक्त
किया ॥२६॥
यमुनाचनदीजज्ञलिन्दान्तरवाहिनी ।
अश्विनौदेवभिपजीकृतीपियामहात्मना ॥३०॥
गुह्यकाधिपतित्वेचरेवन्तोऽपिनियोजित ।
छायासज्ञासुतानांच नियोग थ यतामम ॥३१।।
पूर्वजम्यमनोस्तुल्यश्छायासज्ञासुनोऽग्रज ।
तत मारिणवीसज्ञामवापतनयोरवेः ॥३२॥
भविष्यतिमनु.सोपिवनिरिन्द्रीयदातदा।
निश्चगेनहाणांचमध्येपिनानियोजितः ॥३॥

वैवस्वत मन्वन्तर क्यान 1 [ १३१ तयोस्तृतीयाकन्यातुतपतीनामसाकुरुम् । नृपासवरणात्पुत्रमवापमनुजेश्वरम् ॥३॥ तस्यवैवस्वतस्यामनो सप्तममन्तरम् । कथयामिसुतान्भूपानृपीन्देवान्सुराधिपम् ||३|| उनकी कन्या यमुना नदी रूप से कलिंद देश के मन्य मे बहने लगी और घोडी के दोनो पुत्र (अश्विनीकुमार) पिता के द्वारा स्वर्ग के वैद्य नियुक्त हुये ॥३०॥ तथा रेवत गुह्यकाधिपति हुए, अब छाया के पुत्रो की नियुक्ति कहता हूँ ॥३१॥ वैवस्वत मनु के समान छाया के गर्भ से उत्पन्न हुए ज्यष्ठ पुत्र का नाम सावरिंणक हुआ ||३२|| जब बलि इन्द्र हो जायेंगे तब यह मनु होगे तथा पिता के द्वारा शनैश्वर को ग्रह मे अवस्थित किया गया। से छोटी कन्या का नाम तपती हुना, उसे सवरण नामक नरेश से एक पुत्र की प्राप्ति हुई ॥३४॥ अब उन सप्तम मनु बैंगस्वत के अनन्तर सब पि, देवता, इन्द्र और उनके जो पुत्र राजा हुए उनके विषय में वणन करता हूँ ॥३५॥ सब ७१ वैवस्वत मन्वन्तर कथन आदित्यावसवारुद्रा साध्याविश्वेमरुद्गणा । भृगवोऽङ्गिग्यश्चाष्टीयनदेवगरणा स्मृता ११ प्रादित्यावसवोरुद्राविज्ञेया कश्यपात्मजा । साध्याश्चवसवोविश्वेधमपुत्रगणास्त्रय ॥२ भृगोस्तुभृगवोदेवा पुत्राह्यगिरम सुता । एपसर्गश्चमारीचोविज्ञेय माम्प्रताधिप ॥३ ऊर्जस्वीनामचैवेन्द्रोमहात्मायज्ञभागभुक् । प्रतीतानागतायेचवर्तन्तेसाम्प्रतत्रये ॥४ सर्वतेत्रिदशेन्द्रास्तुविज्ञ यास्तुल्यलक्षणा । सहस्राक्षा कुलिशिन सर्वएवपरन्दरा ॥५ १३४ ] [ मानण्डेय पुराण क्रोष्टुप बोले--प्रापने स्वायभुवादि सात मनु उनके मन्वन्तर, देवता, भूपि मोर राजाओ का वर्णन मरे प्रति किया ॥१॥ यय, इस कला में जो सात मनु होंगे उनका मौर उस समय में होने वाले देवादि का वर्णन मेरे प्रति कीजिये ॥२॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-सज्ञा की छाया के गर्भ से उत्पन जिन ज्येष्ठ पुत्र सावणि के विषय मे तुम से कहा गया, वही सावणि आठवें मनु सावणिक मन्वन्तर J [ १३३ अस्मितेनर:सद्य:पठितेचवसत्तम । मुच्यतेपातक:सर्व पुण्यंचमहदरनुते ॥१३ इस पृथिवी को भूर्लोक, अन्तरिक्ष को दिव और स्वर्ग को दिव्य कहते हैं, यही त्रैलोक्य कहे जाते हैं । ८॥ अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम भरद्वाज, विश्वामित्र II और भगवान् ऋचीक के पुत्र जमदग्नि यह इस मन्वन्तर में सप्तपि हैं ॥१०॥ इक्ष्वाकु, नाभग, घृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, दिष्ट ॥११॥ करप और पृपन यह नो उन देवस्वत मनु के प्रसिद्ध पुत्र हुए ॥१२॥ हे विष ! वैवस्वत मन्वन्तर का वर्णन तुम्हारे प्रति किया गया, इसके सुनने और पाठ करने से शीघ्र ही सब पापो से मुक्त होकर मनुष्य पुण्य फल को प्राप्त होते हैं ॥१३॥ ७२-सावर्णिक मन्वन्तर स्वायम्भुवाद्या:कथिता.सप्ततेमनवोमम । तदन्तरेषुयेदेवाराजानोमुनयस्तथा ॥१ अस्मिन्कल्पेसप्तयेऽन्येभविष्यन्तिमहामुने । मनवस्तान्समाचक्ष्वतथादेवादयश्चये ॥२ कथितस्तवसारिणश्छायासज्ञासुतश्चय.। पूर्वजस्यमनोस्तुल्यःसमनुभविताष्टम ॥३ रामोव्यासोगालवश्चदीप्तिमान्कृपएवच । ऋष्यशृङ्गस्वथाद्रोणस्तत्रसप्तर्पयोऽभवन् १४ सुतापाश्चामिताभाश्चमुस्याश्च वविधासुराः । विशक क्वथिताश्वं पात्रयारणात्रिगुणोगरणः ।। तपस्तपश्वशक्रश्वधतिज्योति प्रभाकरः । प्रभासोदयितीधर्मस्तेजोरश्मिश्नवक्रतुः ॥६ इत्यादिकस्तुसुतपादेवानाविंशकोगरण । प्रभुविभुविभासाद्यस्तयान्योविंशकोगण 11७ [ मार्कण्डेय पुराण मघवन्तोवृपा सर्वे गिणोगजगामिनः । तेशतक्रतव सर्वेभूताभिभवतेजस. ॥६ धमा कारणःशुद्ध राधिपत्यगुणान्दिताः । भूतभव्यभवनाथा शृणुचतत्त्रय द्विज ।।७ मार्कण्डेयजी ने कहा-इस मन्वन्तर मे आदित्य, वसु, रद, साध्य, विश्व, मरद्गण, भृगु पोर अगिरा यह पाठ देवता है ॥१॥ उनमे प्रादित्य, घम् भौर रुद्र कश्यपजी से उत्पन्न हुए हैं तथा साध्य, वसु और विश्वेदेया धर्म को सन्तान हैं ॥२॥ भृगुगण भृगु के पुत्र तया अङ्गिरागण मङ्गिरा के पुत्र हैं, इम सर्ग को मारीच सगं कहा गया है ॥३|| इस मन्वन्तर मे महात्मा ऊर्जस्वी यज्ञ भाग के भोगने वाले इन्द्र हुए हैं, पहिले जो इन्द्र हुए, अब जो इन्द्र हैं या जो भविष्य में इन्द्र होगे ॥४॥ वह सब देवेन्द्र कह कर ही प्रसिद्ध हैं, सभी सहस्राक्ष, वचधर और पुरदर हैं ॥५॥ सभी मधवा, वृष, शृङ्गधारी पौर गज पर गमन करने वाले हैं, सभी सो यज्ञ करने वाले, भूतो को जीतने वाले तथा तेजोमय है ॥६॥ वह सब इन्द्र पवित्र, धर्मादि के कारण, वाले और भूत, भविष्यत्, वर्तमान के अधीश्वर हैं, प्रब तीनो लोक या विभाग श्रवण माधिपत्य गुण भरो ॥७॥ भूलोकोऽयस्मृताभूमिग्न्तरिक्ष दिविस्मृतम् । दिव्याख्यश्चतयास्वर्गस्लोक्य मितिगद्यते ॥ अविश्व वसिष्टश्वकश्यपश्चमहानृपि । गौतमश्वभरद्वाजाविश्वामित्रोऽयकौशिक ॥ तयं वपुत्राभगवानृचीपस्यमहात्मन । जमदग्निस्तुमर्म तेमुनपोलतथान्तरे ।।१० इक्ष्वाकु भव वधृष्ट शतिरेवच । नरियनश्चविण्यातोनाभागांदिष्टएवच ॥११ पापापधचवमुमाब्लोपविधन । मार्यवम्यनस्यतेनदपुत्रा प्रीतिता ॥१२ संवादतमिदनार तिनमयान्नम् ।

सावणिक मन्वन्तर ] [ १३३ अस्मिञ्छु तेनर:सद्य:पठितेचैवसत्तम । मुच्यतेपातक:सर्व पुण्यंचमहदश्नुते ॥१३ इस पृथिवी को भूलॊक, अन्तरिक्ष को दिव और स्वर्ग को दिव्य कहते हैं, यही त्रैलोक्य कहे जाते हैं 11८10 अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम. भरद्वाज, विश्वामित्र ।।९।। और भगवान् ऋचीक के पुत्र जमदग्नि यह इम मन्वन्तर मे सप्तपि हैं ॥१०॥ इक्ष्वाकु, नाभग, घृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, दिष्ट ॥११॥ कस्प और पृपन यह नो उन वैवस्वत मनु के प्रसिद्ध पुत्र हुए ॥१२॥ है विप्र ! वैवस्वत मन्वन्तर का वर्णन तुम्हारे प्रति किया गया, इसके सुनने और पाठ करने से शीघ्र ही सब पापो से मुक्त होकर मनुष्य पुण्य फल को प्राप्त होते हैं ॥१३॥ ७२-सावर्णिक मन्यन्तर स्वायम्भुवाद्या:कथिता सप्ततेमनवोमम । तदन्तरेषुयेदेवाराजानोमुनयस्तथा ॥१ अस्मिन्कल्पेसप्तयेऽन्येभविष्यन्तिमहामुने। मनवस्तान्समाचक्ष्वतथादेवादयश्चये ॥२ कथितस्तवसारिणश्छायासज्ञामुतश्चय. । पूर्वजस्यमनोस्तुल्यःसमनुभविताष्टमः ॥३ रामोव्यासोगालवश्चदीप्तिमान्कृपएवच । प्यशृङ्गस्वथाद्रोणस्तत्रसप्तर्षयोऽभवन् ॥४ सुतापाश्चामिताभाश्चमुस्याश्च वविधासुराः । विशक क्वाथताश्च पात्रयाणात्रिगुरणोगणः ।।५ तपस्तपश्वशक्रश्चद्य तिर्योति प्रभाकरः । प्रभासोदयितोधर्मस्तेजोरश्मिश्चवक्रतुः ॥६ इत्यादिकस्तुसुतपादेवानावशकोगरण । प्रभुवि विभासाद्यस्तयान्योविंशकोगण. 11७

१३४ ]
[ मारंएडेय पुराण
क्रौष्टुकि बोले--अापने स्वायभुवादि सात मनु, उनके मन्वन्तर, देवता,
ऋपि और राजाओ का वर्णन मेरे प्रति किया ॥१॥ अब, इस कल में
जो सात मनु होंगे उनका और उस समय मे होने वाले देवादि का वर्णन मेरे
प्रति कीजिये ॥२॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-सना की छाया के गर्भ से उत्पन्न
जिन ज्येष्ठ पुत्र सावणि के विषय मे तुम से कहा गया, वही सावणि आठवें मनु
होगे ॥३॥ इस मन्वन्तर मे राम, व्यास, गालव, दीप्तिमान, कृप, ऋष्य शृङ्ग
और द्रौणि यह सात सप्तपि होगे ॥४॥ सुतपा, मभिताभ और मुख्य यह तीन
गरण और प्रत्येक गण में बीस देवता हैं, इस प्रकार यह साठ हैं ॥५।। उनमे
तपस्तप, शक्र, धुति, ज्योति, प्रभावर, प्रभास, दयित, धर्म, तेज, रश्मि और
वक्रतु ।।६॥ आदि सभी देवता उन बीस गणो के अन्तर्गत हैं, प्रभु, विभु मोर
विभासादि देवता प्रमिताभ देवतामो के बीस गण हैं ॥७॥
सुराणाममितानाँतुतृतीयमपिमेशृणु ।
दमोदानलत सोसौविन्ताद्याश्च वविंशति ॥८
मुस्याह्ये तेसमाख्यातादेवामन्वन्तराधिपा ।
मारीचस्यैवतेपुत्रा काश्यपस्यप्रजापते ॥
भविष्याश्चभविष्यन्तिसावरणस्तान्तरेमनो ।
तेपामिन्द्रोभविष्यस्तुबलिरोचनिमुने ॥१.
पावालग्रास्तेयोऽद्यापिदत्य समयवन्धन ।
विरजाचार्यवीरश्ननिर्मोह सत्यवाक्कृति ।
विधावाद्याश्च वतनया सावर्णस्यमनोनृपाः ॥११
पब तृतीय गण वा विगन कहता हूँ-दम, दाम, “सत्, मोम और
विन्त मादि देवतागण मुख्य नाम पे तृतीय विद्यर के मन्नगंन है ॥८॥ यह
मी मन्दनगपिपति भौर मभी मरीचि पुत्र प्रजापति पश्यपजी के ही पुत्र
है ! गाणि मन्वलर मे यह देवता मार विरोचन पुत्र वलि इन्द्र होगे
॥१॥ जो दंप राम प्रतिमा पाश में बंधे होने से अब भी पाताल में रहते है,
यह विमा, पवी, निर्मोह, मस्पवास, कृति, विष्णु नामक पद मावपि पुत्र
उस काम माग ॥११॥

देवी माहात्म्य मधुकैटभ वष ]
[ १३५
७३-देवी माहात्म्य-मधुकैटभ पध
सावणि सूर्यतनयोयोमनु कथ्यतेष्टम ।
निशामयतदुत्पत्तिविस्तराद्गदतोमम ॥१
महामायानुभावेनयथामन्वन्तराधिप ।
सबभूवमहाभाग सावरिणस्तनयोरवे ॥२
स्वारोचियेंतरेपूर्वचैत्रवशसमुद्भव ।
सुरथोनामराजाभूत्समस्तेक्षितिमडले ।।३
तस्यपालयत सम्यक्प्रजा पुनानिवौरसान् ।
वभूवु शत्रवोभूपा कोलाविध्वसिनस्तदा ॥४
तस्यतैरभवद्य द्धमतिप्रवलद डिन ।
न्यूनरपिसतयुद्ध कोलाविध्वसिभिजित ॥५
तत म्वपुरमायासोनिजदेशाधिपोभवत् ।
आनन्ति समहाभागस्तैस्तदाप्रबलारिभि ॥६
अमात्यंबंलिभिष्टबलम्यदुरात्मभि ।
कोशोवलचापहृततत्रापिस्वपुरतत ७
मार्कण्डेयजी बोले-~-जिस सूर्य पुत्र सावरिण को माठवां मनु कहा गया
है, उसका विस्तार पूर्वक जन्म कहता हूँ, तुम श्रवण क्गे ॥१॥ जिस प्रकार
वह महामाया भगवती की कृपा से सभो ऐश्वर्यों से सम्पन्न होकर मन्वन्तरा
विपति हुअा, उसे सुनो ||२|| स्वारोचिष मनु के राज्याधिकार से पूर्व चैत्र.
वशोत्पन्न सुरथ नामक समस्त पृथिवो का राजा हुआ ॥३॥ जब वह सुरथ
मपनी प्रजा का पालन पुत्रवत् करने लगा उसी अवसर पर कोला विध्वम
नामर राजा उममे शत्रुता करने लगे ॥४॥ और प्रवल दण्ड देने म समर्थ
साथ उनका युद्ध हुआ, यद्यपि शत्रु अल्प थे, फिर भी उन्होने
सुरथ को परास्त कर दिया ॥५॥ तब अपने प्रबल शत्रुनो से वशीभूत हुआ
राजा सुरथ अपने नगर मे प्रापर राज्य करन लगा ॥६॥ उस नगर में भी
राजा सुग्थ

{ मार्कण्डेय पुराण
प्रबल और दुष्ट अमात्यो ने उस राजा का कोपागार तथा सेना नष्ट कर
डाली ।1911
ततोमृगयाव्याजेनहृतस्वाम्य सभूपति ।
एकाकीयमारुह्यजगामगहनवनम् ।।
सतत्राश्रममद्राक्षीविद्वजवर्यःसुमेघस ।
प्रशातश्वापदाकीर्ण मुनिशिष्योपशोभितम् IIE
तस्थौकचित्सकालचमुनिनातेनसत्कृत ।
इतश्चेतश्चविचरस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे ॥१०
सोचितयत्तदातत्रममत्वाकृष्टमानस ।
मत्पूर्व पालितपूर्वमयाहीनपुरहितत् ।
मभृत्यस्तं रसद्वृत्तंर्धर्मत पाल्यतेनवा ॥११
नजानेसुप्रधानोमेशूरोहस्तीसदामद ।
ममवैरिवशयात कान्भोगानुपलप्स्यते ॥१२
येममानुगतानित्यप्रसादधनभोजनं ।
अनुवृत्तिभ्र वनेद्यकुर्वन्त्यन्यमहीभृताम् ॥१३
असम्यग्व्ययगोलस्तै कुर्वद्भि सततव्ययम् ।
सचित सोतिदु खेनक्षयकोशोगमिष्यति ।।१४
इस प्रकार राज्य के दिन जाने पर राजा सुरष प्रश्वारूढ होवर मृगया
2 मिम मे एकात्री ही निर्जन वन म चले गये ।।८॥ वहाँ उनको पहिंसा से
निवृत हुए पशुमी से परिपूर्ण एक पाश्रम देखा जो कि मेया मामक महपि का
था, वह पपन गिप्यो क महिन वहां निवास करते थे। उन महर्षि ने राजा
मा प्रायन्न सवार रिया पोर तय बढ़ राजा कुछ काल ता महपि भाथम
में टहर पर इधर उधर विचरण परत रहे ॥१०॥ फिर उनका मन ममता
पूर्वक उन्हें चिन्नन परान मगार मेरे पूर्व पुरुषो द्वारा पालिस गज्य प्रद
मुभमे विहीन हागया है, मेरे दुराचारी भृत्य उसरा पर्म पूर्वक पालन करते
होग या नही || गा मम रहने वाला यह मेरा प्रधान हाथी पब
पो रे भून होपर में रह रहा होगा ॥१२॥ जो नित्य प्रति प्रमाद,
7

देवी मह रम्य मधुकैटभ वध ] धन, भोजनादि देने के कारण मेरे अनुगामी रहते थे, अब वह अवश्य ही अन्य राजाप्रो की सेवा में लगे होंगे ॥१३॥ तथा अन्यान्य प्रकार से धन व्यय करते हुए भी अत्यन्त कष्ट पूर्वक सचित कोप उन सेवका के द्वारा नष्ट कर दिया जायगा ॥१४॥ एतच्चान्यच्चसततचितयामासपार्थिव । तनविप्राश्रमाम्याशेवैश्यमेकददर्शस १५ सपृष्टस्तेनकस्त्वभोहेतुश्चागमनेत्रक । सशोकइवकस्मात्वदुर्मनाइवलक्ष्यसे ।।१६ इत्याकर्ण्यवचस्तस्यभूपते प्रणयोदितम् । प्रत्युवाचसतवैश्य प्रश्रयावनतोनृपम् ॥१७ समाधिर्नामवंश्योहमुत्पन्नोपनिनाकुले । पुत्रदारनिरस्तश्चधनलोभादसाधुभि ११८ विहीन स्वजनदरपुत्ररादायमेधनम् । वनमभ्यागतोदु खोनिरस्तश्चाप्तबधुभि ॥१६ सोहनवेद्मिपुत्राणाकुशलाकुशलात्मिकाम् । प्रवृत्तिस्वजनानाचदाराणाचात्रसस्थित ॥२० किनुतेपागृहेक्षेममक्षेमकिनुसाप्रतम् । कथतेकिंनुसद्वृत्तादुत्ता किनुमेसुता ॥२१ राजा सुरथ इस प्रकार की अनेक चिन्ताएँ करने लगे, तभी उहोंने मात्रम के समीप एक वैश्य को देखा ॥१शा तो उन्होंने उसमे पूछा कि तुम कौन हो? यहां किसलिये पाये हो ? तुम शोक सन्तप्त से क्यो दिखाई दे रहे हो? ॥१६॥ राजा के ऐसे विनम्र वचन सुनकर वैश्य ने भी उन्हें मत्यन्त नम्रता पूर्वक उत्तर दिया ॥१७॥ वैश्य ने कहा-मैं पनिक कुल मे उत्पन्न हुमा समाधि नामक एक वैश्य हूँ, धन के लालच म मेरी स्त्री और पुत्रों ने ॥१८॥ मेरा सम्पूण धन छीन कर मुझे घर से बाहर कर दिया है और इस अवस्था म मुझे मेरे बांधवो और मित्रों ने भी त्याग दिया है, इसीलिये दुखित हृदय में इस वन में पाया हू ॥१॥ तथा इस वन में माकर मैं अपने स्त्री- १३८ । 1 मार्कण्डेय पुराण पुत्रादि के कुशल या प्रमङ्गल की बात से अनभिज्ञ हूँ ॥२०॥घर मे कुशल है गा नही तथा उन पुत्रादि का प्राचरण सुधरा है अथवा नहीं, यही चिन्ता है ॥२१॥ यनिरस्तोभवाल्लुब्धैःपुत्रदारादिभिर्धन । तेपुकिभवत.स्नेहमनुबध्नातिमानसम् ।।२२ एवमेतद्यथाप्राहभवानस्मद्गतवच । किकरोमिनबध्नातिममनिष्ठुरतामन. ॥२३ ये सत्यज्यपितृस्नेहधनलुब्धनिराकृतः । पतिस्वजनहादचहाहितेष्वेवमेमन ॥२४ किमतन्नाभिजानामिजाननापिमहामते । यत्प्रेमप्रवणचित्त विगुणेष्वपिबधूप ॥२५ तेपाकृतेमेनि श्वासोदोर्मनस्यचजायते । करोमिक्रियन्नमनस्तेष्वप्रीतिषुनिष्ठुरम् ॥२६ ततस्तोसहिताविप्रतमुनिसमुपस्थितौ । समाधिर्नामवैश्योसोसचपार्थिवसत्तम ॥२७ कृत्वातुतीयथान्याययथाहतेनस विदम् । उपविष्टोकथा काश्चिच्चक्रतुगेश्यपार्थिवो ॥२८ राजा बोले-- जिन धन के लालची स्त्री पुत्रादि ने तुम्हे घर से निकाल बाहर दिया. उनके प्रति भी तुम्हारा चित्त स्नेहवान् क्यो है ? ॥२२॥ वैश्य बोला-आपका क्यन यथार्थ है, परन्तु मैं क्या करूं, मेरा मन किसी प्रकार भी उतना कठोर नहीं हो पा रहा है ॥२३॥ जिन पुत्रो ने पितृ स्नेह को त्याग पर, जिन पलियों ने पति-प्रेम को छोडकर भोर जिन बन्धुमो ने बाधवाय का परित्याग कर धन के लालच से मुझे घर से बाहर कर दिया, उन्ही दुष्ट स्त्री, पुत्र पौर बन्धुमो मे मेरा मन फंसा हुमा है, हे महामते ! उनमें मेरा चित्त इतना प्रारषित क्यो है, यह मेरी समझ में नहीं पाता ॥२४-२५॥ उन्हीं के प्रति सिन हुमा मेरा चित्त दीपं निश्वास छोड़ता हुमा इतना प्रीतिमान है और पटोरता को पास नहीं हो पाता ॥२६॥ मारंएउपजी ने कहा-हे मुनिवर ! गये परवान राजा गुरप मोर वैश्य दोनों ही मिलकर महपि मेधा वे पारा देवी माहात्म्य मधु कैटभ बध । पहुचे ॥२७॥ और दोनों ने मुनि का यथोचित सम्मान करके उनके साथ वार्तालाप प्रारम्भ किया ॥२८॥ भगवंस्त्वामहप्रष्टुमिच्छाम्येकवदस्वतत् । दुःखाययन्मेमनसः स्वचित्तायत्तताविना ॥२६॥ ममत्वंगतराज्यस्यराज्यागेवखिलेष्वपि । जानतोपियथाज्ञस्यकिमेतन्मुनिसत्तम ॥३॥ प्रयनिकृत पुत्र दारंभृत्यस्तथोज्झितः। स्वजनेनचसत्यक्तस्तेषुहार्दीतथाप्यति ॥३१॥ एवमेपतथाहचद्वावप्यत्यतदुःखितौ । दृष्टदोषेपिविपयेममत्वाकृष्टमानसी ॥३२॥ तकिमेतन्महाभागयन्मोहोज्ञानिनोरपि । ममास्यचभवत्येपाविवेकाघस्यमूढता ॥३॥ ज्ञानमस्तिसमस्तम्यजंतीविषयगोचरे । विपयाश्चमहाभागयातिचंवपृथक्पृथक् ॥३४॥ दिवाधाः प्रणिन केचिद्रात्रावधास्तथापरे । केचिद्दिवातथारात्रौप्राणिनस्तुल्यदृष्टयः ।।३।। राजा बोले-हे भगवन् ! जिस विषय को न समझने के कारण मेरा मन दुखित है, उस विषय को पाप से पूछा चाहता हूँ. उसे मुझे समझाने की कृपा करें ॥२६॥ हे प्रभो ! यद्यपि यह भ्रम है, फिर भी राज्यादि के प्रति मेरी इतनी ममता है, ऐसा क्यो है ? ॥३०॥ इस वैश्य को भी इसके पुत्र, स्त्री भृत्य, बाधवादि ने अपमानित करके त्याग दिया है, फिर भी यह उन्ही के प्रति अनुराग युक्त है ॥३१॥ इस प्रकार मैं और यह वश्य दोनो ही इस दिखाई पड़ते हुए दूषित विषय मे ममतावान होकर अत्यन्त दुखित हो रहे हैं ॥३२॥ हम ज्ञानी होकर भी विवेकाध के समान विमूढ हो रहे हैं ऐसा क्यो है ॥३३॥ ऋषि ने कहा---सभी जीवो को विषय के दिधाई पडने पर ज्ञान है, परन्तु विषयो के प्रति पृथक-पृथक् ज्ञान की प्राप्ति होती है ॥३४॥ देखो कोई १४० । । मारडेय पुराण जोव दिन में नहीं देख सकता, योई रात्रि में नहीं देख पाता और किसी को दिन और रात्रि में समान रूप से दिखाई देता है ॥३॥ ज्ञानिनोमनुजा सत्यकिनुनेनहिकेवलम् । यनोहिज्ञानिन सर्वेपशुपक्षिमृगादय ॥३६॥ ज्ञ ननतन्मनुष्याणायत्तेपामृगपक्षिणाम् । मनुष्यणाचयत्तपातुल्यमन्यत्तयोभयोः ॥३७॥ ज्ञानेपिसतिपश्यतापतगाञ्छावचचुषु । कणमोक्षादृतान्मोहात्पीड्यमानानपिक्षुधा ॥३॥ मानुषामनुजव्याघ्रसाभिलापा सुतान्प्रति । लोभाप्रत्युपकारायनन्वेलन्किनपश्यसि ||३|| तथापिममतावत्त मोहगर्जेनिपातिताः । महामायाप्रमाणससारस्थितिकारिणा ॥४०॥ तन्नानविस्मय कार्योयोगनिद्राजगत्पते । महामायाहरेश्च पातयासमोह्यतेजगत् ॥४१॥ ज्ञानिनामपिचेतासिदेवीभगवतीहिसा । बलादाकृष्यमोहायमहामायाप्रयच्छति ॥४२॥ भाप जिस प्रकार ज्ञानवार्ता करते हैं, ऐसा शान मनुष्यो को है, इसमे सन्देह नहीं, परन्तु केवल मनुष्य ही ऐसे ज्ञान के अधिकारी नहीं हैं पशु, पक्षी तथा मृगादि को भी ऐसा ज्ञान प्राप्त है ॥३६॥ दिखाई पडने वाले विषय का शान पशु, पक्षो पोर मनुष्यो का समान ही है, उसमें कुछ भेद नहीं है ॥३७॥ परन्तु ऐसा शान होने पर भी पारस्परिक विषय में कितनी विभिन्नता है, देखो यह पक्षी स्वय क्षुधातुर होकर भी अपने बालको की चोच मे मोह के वशीभूत होकर ही धान्यादि के डालते हैं ॥३८॥ मौर मनुष्य भी अपनी सन्तान के प्रति प्रीतिमान होकर उनका भरण-पोषण करते हैं, परन्तु मनुष्य का यह कार्य प्रत्युपगार के लोभ से ही है, क्या तुम्हे यह दिखाई नहीं देता ? ॥३६॥ इस प्रकार उपकार प्रादि की आशा से रहित होकर भी सभी जीव महामाया के प्रभाव से वासना स्प भ्रमर से युक्त मोह रूप गर्त में पतित होते हैं ॥४०॥ इस १४२J [ मार्कण्डेय पुरार योगनिद्रायदाविष्णुर्जगत्येकार्णवीकृते । प्रास्तीय शेषमभजत्कल्पांतेभगवान्प्रभु ॥४६॥ तदाद्वावसुरोपोरोविख्यातीमधुकैटभो । विष्णुकर्णमलोद्ध तोहतु ब्रह्माणमुद्यतो ॥५०॥ सनाभिकमले विष्णो स्थितोब्रह्माप्रजापति । दृष्ट्वातावसुराँचोग्रौप्रसुप्तचजनार्दनम् ॥५१॥ तुष्टावयोगनिद्रांतामेकाग्रत्हदयस्थित । प्रबोधनार्थायहरेहरिनेत्रकृतालयाम् ।।५२॥ विश्वेश्वरीजगद्धात्रीस्थितिसहारकारिणीम् । स्तौमिनिद्राभगवतीविष्णोरतुलतेजस ॥५३॥ स्वस्वाहात्वस्वधात्वहिवपट्कार स्वरात्मिका। सुधात्वमक्षरेनित्येत्रिधामावात्मिकास्थिता ॥५४॥ अर्धमात्रास्थितानित्यायानुच्चार्याविशेषतः । त्वमेवसध्यासाविनित्वदेविजननीपरा॥५॥ त्वयैतद्धार्यतेविश्व त्वयंतत्सृज्यतेजगत् । त्वमेवसत्पाल्यतेदवित्वमत्स्यतेचसर्वदा ॥५६॥ तथा जर कल्पान्त में यह विश्व जल मग्न हो गया था, तब भगवान विष्णु शम्या पर शयन करके योग निद्रा में निमग्न हो गये ॥४॥l तभी मधु बटभ नामक दो अत्यन्त भयकर एव प्रसिद्ध असुर भगवान् विष्णु के कान में मैल से उत्पन्न हुए और पह्मा जी का वध करने मे तत्पर हुए ॥विष्ण, के ना कमल में अवस्थित अत्यत तेजवान् प्रजापति ब्रह्माजी ने उन दोनो भयका प्रमुरा को देखा और भगवान विष्णु को निद्रा में निमग्न देख कर ॥५१॥ उन्हें जगाने के लिये एकाप्न वित्त से विष्णु के नेत्रो मे स्थित निद्रा स्वरूपिण विश्वेश्वरी, विश्व की स्थिति और लप करने वाली एव भगवान की तेजमूर्ति उन भगवती निद्रा की स्तुति करने लगे ॥५२-५३॥ ब्रह्माजी ने कहा-हे ब्रह्म स्वरूपे । है निरये ! तुम हवि दान पे मत्र स्वाहा स्वरूप वाली हो, पितरों ३ बाद में तुम ही सवारूपिणी हो, वपदार इद्र के हविर्शन मी हा देवी माहारम्य मधु कैटभ वध ] स्वरूपा भी तुम ही हो तुम ही सुधा तथा तुम ही प्रमों म, हम्द, द पोर प्लुत स्वरूप त्रिमात्रा हो ॥५४॥ जिस गायत्री में मद मात्रा का उच्चारग्म विशेष रूप में स्थित हो, वह तुम हो हो और तुम ही सर्वश्रेष्ठ जगज्जननी एव प्रकृति स्वरूपा हो ॥५५॥ हे देवि । इस विश्व को उत्पन्न करने वाली तुम ही हो तुम ही इसका पारण, पालन एव प्रलयकाल में ग्रास करन वाली हो ॥५६॥ विसृष्टौसृष्टिरूपात्व स्थितिरूपाचपालने । तथामतिरूपांतेजगतोस्यजगन्मये ॥५॥ महाविद्यामहामायामहामेधामहास्मृति । महामोहा मगवतीमहादेवी महेश्वरी ॥८॥ प्रकृतिस्त्वचसर्वस्यगुणत्रयविभाविनी। शालरात्रिर्महाराशिमोहरामिनदारुणा १५६u स्वश्रीस्त्वमीश्वरीत्वहीस्त्व वुद्धिाधलक्षणा । लज्जापुष्टिम्नथातुष्टिम्त्वशान्ति क्षतिरेवच ॥६०॥ ग्वाङ्गिनीशूलिनीघोरागदिनीचक्रिणीतया। शसिनीचापिनोवाणाभुशु दीपरिघायुधा ॥६॥ मौम्यासौम्यतराशेषमोम्पेभ्यस्त्वतिसुन्दरी। परापरागापरमा त्वमेवपरमेश्वरी ॥६२।। पचविचित्लवचिद्वस्तुमदमदाखिलारमके । तम्पसवंस्यपाराक्तिःसावनिम्नूयसेमया ॥३॥ ममी काम में गृहि पौर स्थितिम्प हो और विश्व विनय ते समय तुम हो महार स्यम्मा हो ॥१७॥ तुम हो मह विधा, महामेधा, महामार, महारपति, महामोहा, महादेवी पोर महेश्वगे हो ॥८॥ तुर ही मन, रज. तम स्थाप म मर जीवोंगरी झाति हो, तुम ही बानरात्रि, महाराषि प्रनय स्वाय हो, तुम ही नदार मोहरात्रि हो तुम हो भी, तुम हो भिगे, बरि तपा रिम्ममान कोरमा सशणा हो, नुम हो मम्बा, पुष्टि, १४४ । [ मा एडेय पुराण - तुष्टि, शान्ति तथा शान्ति हो ॥१०॥ तुम ही पङ्गिनी, शूलिनी, भयकर स्वरूपा, गदिनी, चक्रिणी, शखिनी पोर चापिनी हो, बाण, भुशुण्डी पोर परिघ इन मस्त्रो के भी धारण करने वाली हो ॥११॥ तुम ही मोम्या, सोम्यतरा तथा विश्व के सब सुन्दर पदार्थों में सर्वश्रेष्ट सौन्दयं याली हो, श्रेष्ठ, श्रेष्ठतर तथा श्रेष्ठतरों की भी ईश्वरी हो ॥६२॥ सत्, असत् वस्तु पोर उनकी जो शक्ति है वह तुम ही हो, इसलिये तुम्हारी स्तुति मैं जिस प्रकार कर्क ११॥६३३॥ ययात्वयाजगत्स्रष्टाजगत्पात्यत्तियोजगत् । सोपिनिद्रावशनीत कस्त्वांस्तोतुमिहेश्वर ॥६४॥ विष्णु शरीर ग्रहणमहमीशानएवच । कारितास्तेयतोऽस्तस्त्वांकस्तोतु शक्तिमाम्मवेत ॥६॥ सात्वमित्थ प्रभाव स्वरुदारविसस्तुता । मोहमयेतीदुराधर्षावसुरीमधुकैटभो ॥६६॥ प्रबोधवजगत्स्वामीनीयतामच्युतोलघु । बोधश्चक्रियतामस्यहतुमेतीमहासुरी।।६।। एवस्तुतातदादेवीतामसीतत्रवेधसा। विष्णो प्रबोधनार्थाय निहतु मधुकैटभौ ।।६८।। नेत्रास्यनासिकाबाहुत्हदयेभ्यस्यथोरसः। निर्गम्यदर्शनेतस्थोब्रह्मरणोव्यक्तजन्मन ॥६॥ उत्तस्थीवजगन्नाथस्तयामुक्तोजनार्दन । एकावेहिशयनात्तत सददृशेचतौ ॥७०॥ हे देवि । जब तुमने विश्व के सृष्टा, पालक और प्रलया" भगवान को ही निद्राभिभूव किया हुमा है तब तुम्हारी स्तुति करने की सामर्थ्य और किस मे होगी? ॥६४॥ है देवि ! जब तुमने विष्णु ईशान और मुझे देह प्राप्त करायी है तब अन्य कौन पुरुप तुम्हारे स्तोत्र में समर्थ है ? ॥६॥ हे देवि । तुम प्ररने उदार स्वभाव के इस वर्णन से प्रसन्न होकर इन मधु कैटभ नामक दोनों दुर्घपं असुरो को मोहित कर दो ॥६६॥ तथा विश्वेश्वर विष्णु को [ १४५ देवी माहात्म्यम क्टभ वध ] शीघ्र जगारर इन असुरों के सहार के लिये प्रेरित करो ॥६॥ ऋषि ने कहा-- ब्रह्माजी ने उन दोनो का सहार करने के लिये जब इस प्रकार उन तमोगुणो निद्रादेवी की स्तुति की ॥६८|| तब उसके देखते-देखते भावान् विष्ण के नेत्र, नामिका, नाह प्रौर हृदय मे निकल कर भगवती प्रवस्यिन हुई ॥६॥ पिर निद्रा स्वरुपिणी देवी से मुक हार भगवान् विष्णु ने एकाणीव में स्थित हुई शाम्या उठ कर देवा ॥७॥ मधुक्टमौदुरात्मानावतिवीर्यपराक्रमी । क्रोधरक्त क्षणोहतु ब्रह्माणजनितोद्यमौ ॥७॥ समुत्यायततस्ताभ्याययुधेभगवान्हरि. । पचवर्षसहस्रारिणबाहुप्रहरगोविभु ॥७२॥ तावप्यतिबलोन्मत्तोमहामायाविमोहितो। रक्तवतोवरोम्मतोवियतामितिकेशवम् ॥७३॥ भवेतामद्यमेतुष्टीममवध्यावुभावपि । पिमन्येनवरेणात्रएतावद्धिवृतमया ॥७४|| वचिताभ्यामितितदासर्वमापोमयञ्जगत् । विलोक्यताभ्यागदितोभगवान्कमलेक्षणः ॥७५!! प्रीतीस्वस्तवयुद्ध नइलाध्यम्त्वमृत्युरावयो । भावाजहिनयत्रोवोसलिलेनपरिप्लुता ॥७॥ तयेत्युक्त्वाभगतासखचक्रगदाभृता । पृत्वाचन एवैच्छिन्नेजघनैशिरसीतयो ॥७॥ एवमेपास मुत्पन्नाग्रह्मरणामस्तुतास्वयम् । प्रभावमस्यादेव्याम्तभूय.शृणुवदामिते !! पोप से मान ने स्वि हुए वे मधुरंटभ नामक दोनों दुरामा अगुर मामी व सरना चाहते हैं ॥१॥ मासान् विगुने र उन दोना मसुरों के माप पान महावना बाहो मे ही पुगिरि न मे उमत हुए उन दोनों पमुगे ने महामाया के द्वारा मो है। होहर मान् मेरहा-हम मे वर मांगो | नगरा ने कहा-परि तुम मुझ पर १४६ ] [ माकण्डेय पुराण असल हुए हो तो मेरे द्वारा मारे जानो, यही वर चाहता हूँ, मन्य नर से क्या प्रयोजन है 11७४॥ ऋषि ने कहा-भगवान द्वारा ऐसा छल करने पर उन मसुरो ने सम्पूर्ण विश्व को बलमय देख कर उनसे कहा ॥७॥ हम तुम्हारे साथ युद्ध करके प्रसन्न हुए हैं इसलिये तुम्हारे हाय से मरना हमे इलाघनीय है, परन्तु जो स्थान जलमग्न न हो, हमारा वध वहीं करना ॥७६॥ ऋषि ने कहा--"ऐमा हो हो' कहकर भगवान विष्णु ने शख चक और गदा को धारण करके उन मसुरो के मस्तको को अपनी जघा पर रख कर चक्र से काट डाला १७७५ स्वय ब्रह्माजी द्वारा स्तुति करने पर यह मायादेवी इस प्रकार से पवतीर्ण हुई, अब इन देवी का प्रभाव तुम्हारे प्रति कहता हूँ, उसे श्रवण करो ॥७॥ ७४- महिषासुर सैन्य यध देवासुरमभूद्य द पूर्णमब्दशतपुरा । महिपैसुराणामधिपेदेवानाचपुर दरे ।।१ तत्रासुरमहावीगर्दैवसंन्यपराजितम् । जित्वाचसक्लान्देवानिद्रोभून्महिषासुरः ॥२ तत पराजितादेवा पायोनिप्रजापतिम् । पुरस्कृत्यगतास्तत्रयग्रेशगरुडध्वजो ॥३ यथावृत्त तयोस्वदन्महिषासुरचेष्टितम् । विदशा कथयामासुदेवाभिभवविस्तरम् ।।४ मूर्येन्द्राग्न्यनिलेंदूनायमस्यवरुणस्यच । मन्येपाचाधिकारान्सस्वयमेवाधितिष्ठति ॥५ स्वर्गानिराकृता सर्वसनदेवगणाभुधि । विपरतियपामरामहिपेरणदुरात्मना ॥६ एतद वपिन मधमगरारिवियेष्टितम् । दारण प्रपना स्मोवघरतस्यविचिस्यताम् ॥७

महिषासुर अन्य वध ]
मुनि महा-मादिकान मे दर देवाधिपति इन्द्र में मोर माहित
दानवों का प्रधिपति था, उस राल मे एर सो वर्ष तक निरन्तर देवता और
दानवों का युद्ध हुमा ॥१॥ उस युद्ध में महापराक्रमी दानवों ने देव सेनाओ पर
विजय प्राप्त की एवं सभी देवगण को जोतकर मनुराधिपति महिए स्वर इन्द्र
बन गया ॥२॥ तदुपरान्त पराजित देवगण प्रजापति दहाजी के पास पाये
और शिवजी व विष्णु के निकट भी पहुंचे ।।३।। देवगण ने शिजी व भगवान
विष्णु को मम्पूर्ण युद्ध वृत्तान्त कह सुनाया और महिषासुर की विजय व उसके
इन्द्रामन पर अधिकार की रात विस्तार से कही ॥४॥ देवतामो ने कहा कि,
महिवासुर ने सूर्य, इन्द्र, पग्नि, वायु, पन्द्र, पम, वरुण व अन्य दूसरे देवताओं
के कार्यों पर मधिकार कर लिया है ॥५॥ महिष द्वारा स्वर्ग से निष्कासित
देवठा मत्यलोक के मनुष्यों के तुल्य पृथ्वी पर विचरण कर रहे हैं ॥६॥ हमने
प्रापसे उन दानवों के अत्याचार का वर्णन किया । हम आपकी सारणागत है
पाप महिषासुर के विनाश के लिए विचार करिये ।।७।।
इत्यनिशम्यदेवानाववासिमधुसूदनः ।
चकारकोपशभुश्चभ्र कुटीकुटिलाननौ ॥८
ततोतिकोपपूर्णस्यचक्रिणोवदनातत ।
निश्चक्राममहत्त जोब्रह्मण शकरस्पच HE
अन्येपाचवदेवानाशकादीनाशरीरत ।
निर्गतसुमहत्तजस्तच्चक्यसमगन्छत ॥१०
अतीवतेजस कूटज्वलतमिवपर्वतम् ।
दहशुस्तेसुरास्तत्रज्वालाव्याप्तदिगतरम् ।।११
प्रतुलतत्रतत्तज सर्वदेवशरीरजम् ।
एकस्यतदभूनारीव्याप्तलोकत्रयविपा ॥१२
यदभूच्छाभवतेजस्तेनाजायततन्मुखम् ।
याम्येनचाभवन्केशावाहवोविष्णुतेजसा ॥१३
सौम्येनस्तनयोयुग्ममध्यमद्रणचाभवत् ।
वारुणेनचजघोरूनितवस्तेजसाभुवः ।।१४

महिपामुर सैन्य बच १४६ - ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से चरणो की अगुलियां, वसुगणो के तेज से हाथों को मगुलियां कुबेर के तेज मे नासिका ॥१५॥ प्रजापति के तेज से दतावलि, अग्नि के तेज से त्रिनेत्र ॥१६॥ दोनो सत्याग्रो के तेज से भ्रकुटि, पवन के तेज से दो कान बन गये एव अन्य दूसरे देवनाओ विश्वकर्मा भादि के तेज से भी उसके मग सम्पूर्ण होकर उस मङ्गनकारी देवी ने जन्म लिया ॥१७॥ उसके पश्चात् सम्पूर्ण देवताओ के तेज पुञ्ज से उत्पन्न उन देवी को देखकर महिपासुर से अमित वह देवगण अत्यन्त हर्पित हुए ॥१७॥ फिर सभी देवताओं ने उन्हें अपने-अपने युद्धास्त्र प्रदान किये और विजय के आकाक्षी वह देवता जयन्ती देवी की जय-जयकार करने लगे ॥१६॥ इसके पश्चात् शिवजी ने अपने मूल से शूल उत्पन करके उन्हें प्रदान किया। विष्णु भगवान् ने अपने चक्र से चक्र उत्पन्न करके दिया ॥२८॥ वरुण ने उन्हे शख, हुताशन ने शक्ति एव पवन ने उन्हें घनुप व बाण प्रदान किये ॥२१॥ वज्रमिन्द्र समुत्पाट्यकुलिशादमराधिपः । ददौतस्यसहस्राक्षोघटामरावताद्गजात् ॥२२ कालाद डाद्यमोद ड पाशचावुपतिर्द दो। प्रजापतिश्चाक्षमालाददौब्रह्माकमडलुम् ॥२३ समस्तरोमकूपपुनिजरश्मीन्दिवाकर । कालश्चदत्तवान्खङ्ग तस्यचर्मचनिर्मलम् ॥२४ क्षोरोदश्चामलहारमजरेचतथावरे । चूडामरिणतथादिथ्यकु डलैकटकानिच ॥२५ अर्द्ध चद्र तथाशुभ्र केयूरान्सर्वबाहुपु । नूपुगैविमलौतद्वद्ग्रं वेयकमनुत्तमम् । अ गुलीयकरत्नानिसमस्तास्वगुलीपुच ।।२६ विश्वकर्माददातस्यपरशु चातिनिर्मलम् । अस्त्राण्यनेकरूपाणितथाभेद्य चदशनम् ।।२७ अम्लानपकजामालांशिरस्युरसिचापराम् । अददाज्जलधिस्तस्यपकजचातिशोभनम् ॥२८ १४८ ] [ माडेय पुराण मुख । मुनि ने कहा-देवगण ये ऐसे बचन मुनते हो शिवजी और विष्णु भगवान् प्रत्यन्त कुपित हुए, और प्रोध से उन दोनों में मुख पेया शुटी बुटिन होगई ।।८।। तदुपरान्त क्रोध से युक्त विष्णु भगवान्, शिवनी एव ब्रह्माजी में मुखों से एक विस्तृत तेज प्रकट हवा 11 इमी प्रकार इन्द्र एव अन्य दूसरे देवताओं के मुखो से भी तेज निकला । अन्तत निकला हुमा समस्न तेज मिलकर एक होगया ॥१०॥ इसके पश्चात् मिलकर एक हए उम अत्यन्त तेज पुञ्ज को, जिसकी ज्वालाएँ सम्पूर्ण दिशा में पल गई', सुल्य जरते देखा ॥११॥ फिर वह एकत्रित विभुनन को अपनी आभा से प्रकाशित करने वाला तेज पुन श्री रूप में परिवर्तित होने लगा ॥१२॥ शिवजी के प्रकट हुए तेज स उसका मुख, यम के तेज से देश तथा विष्णु के तेज से उसकी दो भुजाऐ बन गई ॥१३॥ चन्द्र क तेज से दोनो स्तन, इन्द्र के तेज से मध्य प्रदेश, वरुण के तेज से जघा मौर ऊरु, पृथ्वी के तेज से नितम्ब ॥१४॥ ब्रह्मास्तेजसापानौजदगुल्यतेजसा । वसूनाचकरागुल्यःकौवेरेणचनासिका ॥१५ तस्यास्तुद ता सभूता:प्राजापत्येनतेजसा। नयनत्रितयजज्ञतथापावक्तेजसा ।।१६ भ्र वौचसध्ययोस्तेज श्रवरणावनिलस्यच । भन्येपाचवदेवानासभवस्तेजसाशिवा ।।१७ तुत समस्तदेवानातेजोराशिसमुद्भवाम् । ताविलोक्यमुद प्रापुरमरामहिषादिना ॥१८ ततोदेवाददुस्तस्यैस्वानिस्वान्यायुधानिच । ऊर्जयजयेत्युच्च जंयतीतेजय पिण ॥१६ मूलङ्लाद्विनिप्कृष्यददौतस्य पिनाक्भृत् । चक्रचदत्तवान्कृण समुत्पाट्यस्वचत ।।२० शखचवरुण शक्तिददौतस्यहुताशन । मारुतोदत्तवाश्चापवारण पूर्णतयेपुधी ।।२१ - महिषासुर सैन्य क्य 1 १४६ ब्रह्मा के तेज से चरए, सूर्य के तेज से चरणो की अगुलियो, वसुगणो के तेज से हाथों की अगुलियां कुबेर के तेज मे नासिका ॥१५॥ प्रजापति के तेज से दतावलि, अग्नि के तेज से बिनेर ॥१६॥ दोनो सयानो के तेज से भ्रकुटि, पवन के तेज से दो कान बन गये एव अन्य दूसरे देवनाओ विश्वकर्मा मादि के तेज से भी उसके प्रग सम्पूर्ण होकर उस मङ्गलकारी देवी ने जन्म लिया ॥१७॥ उसके पश्चात् सम्पूर्ण देवताओ के तेज पुञ्ज से उत्पन्न उन देवी को देखकर महिषासुर से त्रसित वह देवगण अत्यन्त हर्षित हुए ॥१७॥ फिर सभी देवताओं ने उन्हें अपने-अपने युद्धास्त्र प्रदान किये और विजय के आकाक्षी वह देवता जयन्ती देवी की जय-जयकार करने लगे ।।१६। इसके पश्चात् शिवजी ने अपने शूल से शूल उत्पन्न करके उन्हे प्रदान किया । विष्णु भगवान् ने अपने चक्र से चक्र उत्पन्न करके दिया ॥२८॥ वरुण ने उन्हे शख, हुताशन ने शक्ति एव पवन ने उन्हे धनुप व बाण प्रदान किये ॥२१॥ वज्रमिन्द्र समुत्पाट्यकुलिशादमराधिपः । ददौतस्यसहस्राक्षोघटामरावताद्गजात् ॥२२ कालाद डाद्यमोद ड पाशचाबुपतिर्द दी। प्रजापतिश्चाक्षमालाददौब्रह्माकमडलुम् ॥२३ समस्तरोमकूपेषुनिजरश्मोन्दिवाकर । कालश्चदत्तवान्खङ्गतस्य चर्मचनिर्मलम् ॥२४ क्षोरोदश्चामलहारमजरेचतथावरे । चूडामरिंगतथा दिव्यकुडलेकटकानिच ॥२५ अर्द्ध चद्र तयाशुभ्र केयूरान्सर्ववाहुपु । नूपुगैविमलौतद्वद्य वेयकमनुत्तमम् । अगुलीयकरलानिसमस्तास्वगुलीपुच ॥२६ विश्वकर्माददौतस्यपरशु चातिनिर्मलम् । अस्त्राण्यनेकरूपाणितथाभेद्य चदशनम् ।।२७ अम्लानपकजामाला शिरस्युरसिचापराम् । अददाज्जलघिस्तस्यैपकजचातिशोभनम् ॥२८ -- [ पाहडेय पुराण सहस्राक्ष अमरेश्वर इन्द्र ने अपने वज से वज उत्पन्न करके दिया और ऐरावत हाथी का घण्टा खोलकर दिया ।।२२।। यमराज ने कालदएड से एक दएड उत्पन्न कर उन्हें प्रदान किया । वरुण ने पाश, दक्ष प्रजापति ने भक्षमाला एव ब्रह्माजी ने उन्हे कमण्डलु प्रदान किया ||२३|| दिनकर मे उन ल्यायो देवी के समस्त रोम-रोम को अपनी किरणें प्रदान की, काल ने उन्हे स्वच्छ तलवार और ढाल दी ॥२४॥ क्षीरोद समुद्र ने भी पूर्ण उज्ज्वल मोतियों का हार, दो स्वस्थ बस्न, सुन्दर चूडामणि, दिग्य कुण्डल मोर कंगन प्रदान किये ॥२५॥ अद्धं चन्द्र ने भी सुन्दर पायल, दोनो बाहुप्रो मे बाजूबन्द, कठ के लिए सुन्दर प्राभूपण एवं समस्त अगुलियो मे अनुपम अगूठियां दी ॥२६॥ विश्व- कर्माजी ने अनुपम परशु मोर अकाट्य कवच उन्हे प्रदान किया ॥२७॥ समुद्र ने खिले हुए कमल पुष्पो की शोभायमान मालाएँ कठ एव सिर पर धारण करने के लिय दी ॥२८॥ हिमवान्वाहनसिंहरत्ना निविविधानिय । ददावशून्यसुरयापानपानधनाधिप ।।२६ शेपश्वसर्वनागेशोमहामरिणविभूषितम् । नागहारददौतस्यपत्तय पृथिवीमिमाम् ॥३० अन्यरपिसुरंदैवीभूपण रायुधस्तथा। समानिताननादोच्च साट्टहासमुहुमुह ।।३१ तस्यानादेनघोरेरणकृत्स्नमापूरितनभ । अमायतातिमहताप्रतिशब्दोमहानभूत् ॥३२ चुक्षुभु सकलालोका समुद्राश्चचकपिरे। चचालवसुधालु सकलाश्चमहीधरा ॥३३ जयेतिदेवाश्चमुदातामू सिंहवाहिनीम् । तुष्ट युमुनयश्चनाभक्तिनम्रात्ममूतंय. ॥३४ दृष्ट्वासमस्तसक्षुब्धप्रैलोक्यममरारय । सन्नदाखिलसैन्यास्तेसमुतस्थुरुदायुधा ३५ हिमालय न देवी को सवारी के लिए सिंह मौर विभिन्न रत्न प्रदान महिषासुर सैन्य पथ ] [ १५१ किये । धनपति कुवेर ने उन्हें सुरा युक्त सुरा-पान पात्र दिया ॥२६॥ पृथ्वी के प्राधार मनन्त नागेश ने देवीजी को महामणि युक्त नागहार प्रदान किया ॥३०॥ मन्य दूसरे देवतानो ने भी उन्हे विभिन्न प्रकार के प्रस्त्र एव आभूषण प्रदान किये । इस प्रकार देवताओं द्वारा सम्मानित वह देवी अट्टहास के साथ भोपण गर्जना करने लगी ॥३१॥ उस भयङ्कर गर्जना से समस्त प्राकाश पूर्ण होगया फिर आकाश से एक अचानक घोर प्रति शब्द भी हुप्रा [३२।। जिससे तीनों लोक हिल गये समुद्र काप गये, पृथ्वी डगमगाने लगी मोर सभी पर्वत कम्पायमान होने लगे ।।३३।। तब सुरगण सिंह पर सवार उन भगवती की प्रसन्नता से जय-जय करने लगे । ऋषिगण भी नम्रता पूर्वक उनका गुण गान करने लगे ॥३४॥ तीनो लोको को इस प्रकार क्रियाशील देखकर दानवगए सम्पूर्ण सेना को सज्जित कर शस्त्रास्त्र धारण कर तैयार होगए ॥३५॥ आ.किमेतदितिक्रोधादाभाध्यमहिषासुरः । अभ्यधावततशब्दमशेरसुरवृत. ॥३६ सददर्शततोदेवीव्याप्तलोकत्रयांत्विषा । पादाक्रांत्यानतभुवकिरीटोल्लिखितांवराम् ॥३७ क्षोभिताशेपपातालाधनानि स्वेनेनताम् । दिशोभुजसहस्र गसमतान्याप्यसस्थिताम् ॥३८ तत प्रववृतेयुद्ध तयादेव्यासुरद्विपाम् । शस्त्रास्गर्वहुधामुक्तरादीपितदिगंतरम् ॥३६ महिपासुरसेनानीश्चिक्षुराख्योमहासुरः। युयुधेचामरश्चान्यश्चतुरगवलान्वितः॥४० रथानामयुतं षड्भिरुदग्राख्योमहासुरः। अयुध्यतायुतानांचसहलेणमहाहनु ॥४१ पंचाद्भिश्चनियुतैरसिलोमामहासुरः । अयुतानांशतःपभिर्बाष्कलोयुयुधैरणे ।।४२ "महा । यह क्या होता है" कुपित महिषासुर ऐसा कहकर समस्त प्रसु सेना सहित उस मोर दौड पहा ॥३६॥ तो महिषासुर ने देसाकि वह १५२ ] [ मार्कण्डेय पुराण देवो अपनी प्राभा विखेरती हुई लोक्य में व्याप्त विद्यमान हैं। एष जिनके चरण पृथ्वी पर हैं और उनका मुकुट प्राकाश को चूम रहा है ॥३७॥ जिनके धनुष की प्रत्यचा के शब्द से समस्त भू-गर्भ भी कम्पित हो रहा था और वह कल्याणी देवी अपनी सहस्त्र भुजाओ से सम्पूर्ण दिशानी के प्राच्छादित करते हुए शोभायमान थी ।।३८॥ तत्पश्चात् देवी के साथ दानवो का युद्ध प्रारम्भ होगया, जिसमें प्रयोग हुए विभिन्न प्रकार के युद्धास्त्रो से माकाश भी प्रकाशित होगया ॥३६॥ महिषासुर का सेनाध्यक्ष चिक्षुर घोर दानवी युद्ध करने लगा। चतुरगिनी सेना से सज्जित चामर नाम का प्रसुर अन्य सेना के साथ मिलकर युद्ध करने लगा ||Yo! विकराल मसुर उदग्र साठ हजार रयो सहित युद्ध करने लगा एव महाहनु नाम का मसुर भी एक करोड रयो को लेकर रण- क्षेत्र मे उतर मापा ।।४१॥ प्रसुलोम नाम का महाप्रसुर पाँच करोड रथ लेकर मोर महादानव वाप्पल साठ हजार रथो को लेकर युद्ध करने लगा ॥४२॥ गजवाजिसहस्रोधेरेनेकरप्रदर्शनः । वृतोरथानाकोट्याचयुद्ध तस्मिन्नयुध्यत ।।४३ विडालाख्योमहादत्य पाशद्भिरथायुत । युयुधेसयुगेतमरथानापरिवारित ॥४४ वृत वालोरथानाचरणेपचाशतायुतं । युयुधेसयुगेतत्रतावद्भि.परिवारित १४५ अन्येचतत्रायुसशोरयानागयता । युयुधु सयुगेर्दय्यासहतत्रमहासुरा IE कोटिकोटिगा स्तुरपानादतिनातथा। यानारतोयुद्ध तत्राभून्महिषासुर ॥४७ सोमरंभिदिपालनशक्तिभिमुसलैस्तथा । युयुपु मयुगदेव्यागापरसुपट्टिगं ॥४८ पचिच्चचिशिपुशक्ती ये वित्पागांस्तथापरे । देवीगाहारंग्तुतताह प्रपप्रमुः IIE महारय परिचारित पनर गहरा हापी व घोड़ा युक्त एप ररोज रो

महिषासुर सैन्य बघ ।
[ १५३
सहित उनमे मिलकर युद्ध करने लगा ॥४३॥ महाअसुर विडाल पांच लाख
रयो को लेकर युद्ध क्षेत्र मे युद्ध-रत होगया ||४४।। एव इतने ही रथो सहित
काल नाम का महादत्य विशाल सेना सहित युद्ध मे रत होगया ॥४५॥ साथ
ही अन्य दूसरे अनेक घोर असुर करोडो रथ हाथी और घोडो से युक्त उस देवी
के साथ युद्ध करने लगे ॥४६।। करोडो हजारो रथ हाथी और घोडो से सज्जित
होकर वह महिपासुर उस युद्ध मे पाया ||| इस प्रकार असुरगण तोमर,
भिन्दिपाल, शक्ति, मूसल, तलवार, फरसा व पट्टिश द्वारा देवी के साथ युद्ध
करने लगे ॥४८॥ किसी ने शक्ति किसी ने पारा और किसी ने खड्न चलाकर
देवी पर वार करने के प्रयास किये ||४||
सापिदेवीततस्तानिशस्लाण्यस्नारिणचडिका ।
लीलयवप्रचिच्छेदनिजशस्त्रास्त्रवपिणी ॥५०
अनायस्ताननादेवीस्तूयमानासुरपिभि. ।
मुमोचासुरदेहेपुशस्त्राण्यस्त्राणिचेश्वरी ॥५१'
सोपिक द्धोधुतसटोदेव्यावाहनकेसरी।
चचारासुरसैन्येषुवनेविवहुताशन ॥५२
निश्वासान्मुमुचेयाश्चयुध्यमानारणेम्विका ।
तएवसद्य सभूतागा शतसहस्रश ॥५३
युयधुस्तेपरशुभिभिदिपालासिपट्टिी ।
नाशयतोसुरगणान्देवीशक्त्युपवृहिता ॥५४
अवादयतपटहान्गरणा शखास्तथापरे ।
मृदगाश्चत्तथैवान्येतस्मिन्यद्धमहोत्सवे ॥५५
ततोदेवीत्रिशूलेनगदयाशरवृष्टिभि. ।
खङ्गदिभिश्चशतशोनिजघानमहासुरान् ॥५६
फिर उन देवी ने भी अपने शस्त्रास्त्रो की वर्षा करने लीलापूर्वक उन
दानवो के सभी अस्त्र-शस्त्र नष्ट कर डाले ॥५०॥ उम समय प्रसन्नतापूर्ण उन
देवी का समस्त देवता और मुनिगण गुण-गान करने लगे। इसके पश्चात् देवी
असुरो पर शस्त्रास्त्रो की वर्षा करने लगी ।।५१॥ देवी-वाहन सिंह भी केसर

१५२ ] 1 मार्कण्डेय पुराण देवी अपनी प्राभा विखेरती हुई त्रैलोक्य मे व्याप्त विद्यमान हैं। एष जिनके चरण पृथ्वी पर हैं और उनका मुकुट प्राकाश को चूम रहा है ॥३७॥ जिनके धनुष की प्रत्यवा के शब्द से समस्त भू-गर्म भी पम्पित हो रहा था और वह कल्याणी देवी मपनी सहस्त्र भुजाओ से सम्पूर्ण दिशामो के माच्छादित करते हए शोभायमान थी ।।३८।। तत्पश्चात् देवी के साथ दानवो का युद्ध प्रारम्भ होगया, जिसमे प्रयोग हुए विभिन्न प्रकार के युद्धास्त्रो से माकाश भी प्रकाशित होगया ॥३६॥ महिषासुर का सेनाध्यक्ष चिक्षुर भोर दानवी युद्ध करने लगा। चतुरगिनी सेना से सज्जित चामर नाम का मसुर मन्य सेना के साथ मिलकर युट परने लगा ॥४०॥ विकराल मसुर उदग्न साठ हजार रथो सहित युद्ध परने लगा एव महाहनु नाम का मसुर भी एक करोड रपो को लेकर रण- क्षेत्र मे उतर माया ।।४१॥ प्रसुलोम नाम का महामसुर पाँच करोड रप लेकर पौर महादानव बापल साठ हजार रपो को लेकर युद्ध करने लगा ॥४२॥ गजवाजिसहस्रोधरेनेकरगदर्शनः । वृतीरयानाकोट्याचयुद्ध तस्मिन्नयुध्यत ॥४३ विडालाख्योमहादत्य पराशद्भिरयायुतं । युयुधेरायुगेत भरधानापरिवारित ।।४४ वृत वालोरयानाचरणेपचाशतायुते । युयुधेसयुगेत त्रतादि-परिवारित ॥४५ अन्येचतत्रायुतशोरथानागहयेता। युयुधु सयुगदेय्यासहतत्रमहामुरा ॥६ वोटिकोटिसा स्तुरथानादतिनातया। यानांचवृतायुद्धसत्राभूमहिपामुर ॥४७ सोमभिदिपालभरातिभिर्मुसलैस्तथा । युयुपु मयुगेदेश्यागनं परमपट्टियं ॥४८ नियनिमित शक्ती पे चिरपाशांस्तथापरे। देवीगङ्गाहारन्तुनंतातु प्रपत्रमुः । माय परियलिना महरा हामी प पोr ruषों

महिषासुर सैन्य वध }
[ १५३
सहित उनमे मिलकर युद्ध करने लगा ॥४३॥ महाअसुर विडाल पांच लाख
रयो को लेकर युद्ध क्षेत्र मे युद्ध-रत होगया ॥४४॥ एव इतने ही रथो सहित
काल नाम का महादैत्य विशाल सेना सहित युद्ध मे रत होगया ॥४॥ साथ
ही अन्य दूसरे अनेक घोर असुर करोडो रथ हाथी और घोडो से युक्त उस देवी
के साथ युद्ध करने लगे ॥४६॥ करोडो हजारो रथ हाथी और घोडों से सज्जित
होकर वह महिषासुर उस युद्ध मे आया | इस प्रकार असुरगण तोमर,
भिन्दिपाल, शक्ति, मूसल, तलवार, फरसा व पट्टिश द्वारा देवी के साथ युद्ध
करने लगे ॥४८॥ किसी ने शक्ति किसी ने पाश और किसी ने खङ्ग चलाकर
देवी पर वार करने के प्रयास किये ||४९]]
सापिदेवीततस्तानिशस्त्राण्यस्त्रारिणचडिका ।
लीलयवप्रचिच्छेदनिजशस्त्रास्त्रवपिणी ॥५०
अनायस्ताननादेवीस्तूयमानासुरपिभि. ।
मुमोचासुरदेहेपुशस्नाण्यस्त्राणिचेश्वरी ॥५१
सोपिक द्धोधुतसटोदेव्यावाहनकेसरी।
चचारासुरसैन्येषुवनेप्विवहुताशन ॥५२
निश्वासान्मुमुचेयाश्वयुध्यमानारगेम्बिका ।
तएक्सद्य सभूतागरणा शतसहस्रश ॥५३
युयधुस्तेपरशुभिभिदिपालासिपट्टिश ।
नाशयतोसुरगणान्देवीशक्त्युपवृहिता ॥५४
अवादयतपटहान्गरणा शसास्तथापरे ।
मृदगाश्चतथैवान्येतस्मिन्युद्धमहोत्सवे ॥५५
ततोदेवीनिशूलेनगदयाशरवृष्टिभि. ।
खङ्गदिभिश्चशतशोनिजघानमहासुरान् ॥५६
फिर उन देवी ने भी अपने शस्त्रास्त्रो की वर्षा करके लीलापूर्वक उन
दानवो के सभी अस्त्र शस्त्र नष्ट कर डाले ॥५०॥ उम समय प्रसनतापूर्ण उन
देवी का समस्त देवता और मुनिगण गुण-गान करने लगे। इसके पश्चात् देवी
असुरो पर शास्त्रास्त्रो की वर्षा करने लगी ।।५१॥ देवीवाहन सिंह भी केसर

[ मार्कण्डेय पुराण
कम्पित वर अग्नि के समान दैत्य सेनाओ में विचरण करने लगा ॥५२॥ युद्ध
में रत देवी के निश्यासो से ही शत सहस गण तुरन्त उत्पन्न होगये मोर असुर
सेनामो से युद्ध करने लगे ॥५३॥ देवी के प्रभाव से बलशाली वह गए फरसा,
भिदिपाल, असि और पटिदश से दानवो को नष्ट करने लगे ॥५४॥ गए युद्ध
क्षेत्र मे शखनाद भी करते थे और मृदङ्ग भी बजाते थे 11५५। इसके पश्चात्
देवी ने में त्रिशूल, गदा, शकि, वृष्टि, खड्ग वगैरह से शत शत घोर दानवो का
शमन किया ।।५६॥
पातयामासचैवान्यान्घटास्वन विमोहितान् ।
असुरान्भुविपाशेनबद्धाचान्यानकर्षयत् ॥५७
केचिद्विधाकृतास्तीक्ष्ण खगपातैस्तथापरे।
विपोथितानिपातेनगदयाभुविशेरते ॥५८
वेमुश्चकेचिद् धिरमुसलेनभृशहता ।
केविनिपतिताभूमौभिन्ना.शूलेनवक्षसि ।।५६
तिर तरशरोघेणकृत्ता केचिद्रशाजिरे।
शलानुकारिण प्राणान्मुमुचुस्त्रिदशाई ना. ६.
केपाचिराव श्छिन्नाछिन्नग्रीवास्तथापरे ।
शिरासिपेतुरन्येमषामन्येमध्येविदारिता. ॥६१
विच्छिन्नजघास्त्वपरेपेतुरुमिहासुराः ।
एकबाह्वक्षिरणा केचिद्देव्याद्विधाकृता ||६२
छिन्नेपिचान्येशिरसिपतिता पुनरुत्थिता ।
स्वधायुयुधुर्देव्यागृहीतपरमायुधाः ॥६३
कई को घटे शब्द से मोहित कर पारा और दूसरे बहुत से राक्षसो को
पाश में बांधकर घरातल पर खीचा ॥५७॥ कई को अपनी तलवार की तीव्र
पार से दो टुकडे कर डाला और कई को गदा के प्रहारो से चूर्ण कर डाला
॥८॥ पोई-कोई मूसल के प्रहार से निरन्तर रक्त-वमन करने लगा और कई
मसुर हृदय में त्रिशूल भेदन से पीडित होकर पृथ्वी पर लुढक गये ॥५६॥ युद्ध
भूमि में देवी के वाणी के प्रहारो से निरन्तर असुरो को सेनामो को सहायता

महिपासुर संन्य वध [ १५५ करने वाले देवतानो के शत्रु इस प्रकार मरते जाते थे ।।६०॥ किसी असुर की भुजाएं क्टी, किसी की गदन, अन्य दूसरो के मस्तक घड से अलग होगये और किसी के मध्य से दो टुक्डे होगये ॥६१॥ किसी भयमर असुर की जाघ स्टकर घरती पर गिरी और देवी ने किसी-क्सिी के एक वाहु, एक प्रांख और एक चरण नष्ट कर दिया व क्सिी के बीच से दो खड कर दिये ।।६२॥ कोई. कोई प्रसुर मस्तक क्ट जाने से भी पृथ्वी से गिरकर पुनः उठकर कई कदन्य या घड पुन प्रस्त्र लेकर देवी से युद्ध करने लगे ॥६३॥ ननृतुश्चापरेतपयुद्ध तूर्यलयाथिताः। कवधाश्छिशिरस खङ्गशक्त्यष्टिपाणयः ॥६४ तिष्ठतिष्ठेतिभापतोदेवीमन्येमहासुरा । रुधिरोपविलुप्तागा सग्रामोलोमहर्पणे ॥६५ पातितरथनागाव रसुरैश्ववसुधरा। अगम्यासाऽभवत्तत्रयत्राभूत्समहारण. ॥३६ शोणितौघामहानद्य सद्यस्तत्रविसुस्र वुः । मध्येचासुरसन्यस्यवारणासुरवाजिनाम् ।।६७ क्षणेनतन्महासन्यमसुराणातथाविका । निन्येक्षययथावह्निस्तृणदारुमहाचयम् ।।६८ सचसिहोमहानादमुत्सृजन्धुतकेसर । शरीरेभ्योमरारीणामसूनिवविचिन्वति ॥६९ देव्यागणश्चतस्तरकृतयुद्ध महासुरै । यर्थनातुष्ट दुर्देवा पुष्पवृष्टिमुचोदिवि ७० अनेक कवन्ध या घड नृत्य करने लगे और उस महायुद्ध में अनेक भयङ्कर महादैत्य मस्तक क्ट जाने पर केवल क्बन्ध ही रह गये थे। जो कि हाथों में तलवार, शक्ति और दोनो और धार वाली तलवार पुन लेकर ॥६४॥ 'ठहरो, ठहो । देवी से कहते थे। जिस क्षेत्र में यह विदारक महा युद्ध हुआ गिरे हुए हाथी, घोडो, दानवो और उनके रथो से वह पट सा गया था और ऐसा होगया कि पैर रखने को भी स्थान नहीं था ॥६५-६६।। तत्काल ही उस

[ मार्कण्डेय पुराण
स्थान पर युद्ध में असुर सेनानो के हाथियो, घोड़ो व सैनिको के रक्त-समूह से
रक्त की नदियां बहने लगी ॥६७॥ सूखे हुए कण्ठ को अग्नि जिस प्रकार पल.
भर मे गख कर देती है, उसी प्रकार उन अम्बिका देवी ने राक्षसो की महा
सेनानो को पल मात्र मे नष्ट किया ॥६८॥ देवी-वाहन सिंह ने भी महानाद
करते हुए, अपने बालो को कम्पित करता हुप्रा अत्यन्न क्रोध पूर्वक सभी दानवो
के प्राणों को हरने लगा ॥६६॥ एवं धूम-घूमकर असुरो के शरीशे से ही जैसे
वह प्राणो को ही खोजने लगा । देवी के सम्पूर्ण गणो ने उन भयङ्कर असुरो
से पराक्रम पूर्वक युद्ध किया, जिससे देवता प्रसन्न होकर स्वर्ग से उन पर पुष्पा
वर्षा करन लगे ||७०॥
७५-~-महिपासुर वध
निहन्यमानतत्संन्यमवलोक्यामहासुर. ।
सेनानीश्चिक्षर कोपाद्ययोयोद्धृमथाबिकाम् ॥१
सदेवीशरवरणववर्षसमरेऽसुरः ।
यथामेरुगिरे.शृ गतोयवरणतोयद ॥२
तस्यच्छित्त्वातदेवीलीलयवशरोत्करान् ।
जधानतुरगान्वाणयंतारचैववाजिनाम् ॥३
चिच्छेदचधनु सद्योध्वजचातिसमुच्छ्रितम् ।
विव्याधचनगानेपुच्छिन्नधन्वानमाशुगः ॥४
सच्छिनधन्याविरथोहताश्वोहतसारथिः ।
अभ्यधावतादेवीखगचर्मघरोसुर. ॥५
सिंहमाहत्यखगनतीक्षणधारेण मूर्धनि ।
प्राजधानभुजे सव्येदेवीमप्यतिवेगवान् ॥६
उग सब भगुर सेनानी को नष्ट हुप्रा देखकर महिषासुर वा सेनाध्यक्ष
पिर पर निमिरा अम्बिका देवी के समीप माया ॥१॥ सुमेर पर्वत के सिर

महिषासुर वय 1 पर वादलो की वर्षा के समान वह महा असुर देवी पर मर-वर्ग करने लगा ॥२॥ देवी ने उसके ममी वाग्गो को काटकर लोला पूर्वक उमके रथ के घोड़ों और मारयो को अपने वालों से नष्ट कर डाला ॥३॥ देवी ने नसाल उन चिक्षुर का धनुप और अत्पल उच्च वजा को काट कर उनका गरीर वाण वर्षा मे वैध हाला ॥४॥ उसका जब घनुप नष्ट होगया, रय नष्ट होगया नया घोडे व सारथी सभी समाप्त होगरे, तो वह देश्य सेनापति तीन तलवार व दाल लेकर देवी की ओर दौडा ॥२॥ ौर घोर गति से अपनी तीपण घार की तलवार मे सिंह के माथे पर प्रहार करके देवी के नो बचि हाय पर प्रहार क्यिा ॥६॥ तस्या.खगोमुजंप्राप्यपफालनृपनदन । ततोजग्राहगलमकोपादारुणलोचन ॥७ चिक्षेपचततस्तत्तुभद्रकाल्यांमहासुरः । जाज्वल्यमानतेजोभीरविविवमिवांवरान् ।। दृष्ट्वातदापतन्छूल देवीशूलममुचत । तेनतच्छनधानीतंमूल मचमहानुर.IE हतेतस्मिन्महावीर्यमहिपस्यचमूपतो। प्राजगामगजारूटनामरस्त्रिदशाईनः ॥१० मोपिशक्तिमुमोचायदेव्यास्तामम्बिकाद्रुतम् । हुकराभिहतांनमोपातयामासनिप्प्रभाम् ॥११ भग्नाशक्तिनिपतितां दृष्ट्वाकोघसमन्वितः । चिोपचामर मूलवास्तदपिसाच्छिनत् ॥१२ तन सिंह समुत्पत्यगजकु भांतरेस्थितः । वायुद्ध नययुघेतेनोस्त्रिदशारिणा ॥१३ युध्यमानीततम्तीनुतस्नानागान्महीगतौ । युयुधातेनिमरख्यांप्रहार रतिदारणं ॥१४ हे ना ! उस दैत्यराज का सङ्ग देवी के हाथ के सर्ग मात्र ने हो । गया । फिर क्रोषपूरी रक्तिम नत्री वाले उन महादानव ने विभून लेकर ।

[ मानण्डेय पुराण भद्रकाली पर वार किया तो देवी ने तेज से प्रशशमान एव शाश से गिरते हुए सूर्य मण्डल के तुल्य ।।८। उस त्रिशूल को देखकर अपना मूल ग्रहण किया देवी द्वारा वार किये गये विशूल से उस असुर के त्रिशूल के सो टुबडे होगये एवं दैत्य सेनाधिपति चिक्ष र के भी सौ टुकडे होगये ||६) महिषासुर का सेना- पति महापराक्रमी चिक्षुर के समाप्त होने पर सुरगणों का शत्रु महादानव चामर हाथी पर सवार होकर युद्ध करने के लिए देवी के सामने पाया ॥१०॥ उस महादानव ने देवी पर लक्ष्य करवे शक्ति छोड दी, परन्तु वह शक्ति देवी की हुकार के घोर शब्द ले अभिहत व प्रभाहीन होकर घरातल पर गिर पड़ी। शक्ति को इस प्रकार नष्ट हुआ देख असुर चामर ने क्रोधित होकर विशूल चलाया परन्तु देवी ने अपने शरी से उस त्रिशूल को भी भेद दिया ॥१२॥ इसके पश्चात् देवी-वाहन सिंह छलाग लगाकर हापो के मस्तक पर चढ़ गया एव हाथी की पीठ पर बैठे उस महा असुर से याहु युद्ध करने लगा ॥१३॥ सिंह एव असुर चामर दोनो ही युद्ध करते हुए उस गज से नीचे गिरे व प्रत्यत क्रोधपूर्वक प्रापस मे भीषण प्रहार करने लगे ॥१४॥ ततोगारखमुत्पत्यनिपत्यचमृगारिणा । करप्रहारेणशिरश्नामरस्यपृथक्कृतम् ॥१५ उग्रश्चरणेदेव्याशिलावृक्षादिभिर्हत । द तमुष्टितलाश्चैवकरालश्चनिपातित ॥१६ देवीक दागदापातश्चूर्णयामासचोद्धतम् । वाकल भिन्दिपालेनबाणस्ताभ्र तथाधकम् ॥१७ उपास्यमुग्रवीर्यचतर्थवचमहाहनुम् । त्रिनेत्राचत्रिशूलेनजधानपरमेश्वरी ॥१८ विडालस्यासिनाकापात्पातयामासवैशिर । दुर्घरदुमुखचोभौशरैनिन्येयमक्षयम् । कालचकालदडेनकालरात्रिरपातयत् ।।१६ "उम्रदर्शनमत्युग्मं खङ्गपात रताइयत् ।

महिषासुर वध ] "- १५६ असिनवासिलोमानमच्छिदत्मारणोत्मवे । गरण सिंहेनदेव्याचजयश्चेडाकृतोत्सवः" ।।२० एवंसक्षीयमाणेतुस्वसैन्येमहिपासुरः । माहिपेरणम्वरूपेणत्रासयामासतान्गणान् ।।२१ इसके बाद कुछ समय मे ही सिंह ने एक्दम भावाश में लोग लगाई और फिर पृथ्वी पर गिर कर प्रधानक पजी से माघान करते हुए अमुर चामर का मस्तक उमको देह से अलग कर दिया ।।१५।। उदग्र नाम अमुर को देवी ने पत्यर और वृक्षो की वर्षा करके और प्रमुर क्रान की दांत व मुटिका प्रहारों से ममात कर डाला ॥१६॥ अत्यन्त कुपित उम देवी ने गदा के मापात से उद्धत नाम दे दानव को पीस डाला। फिर भिदिपाल से मसुर बाल एव ताम्र व अन्धर नामक दो मसुरों को शरो से ममार कर दिया ॥१७॥ त्रिनेत्रा परमेश्वरी देवी ने त्रिशूल द्वारा उग्राम्य, उग्रवीयं व महाहनु नामक दानवो को नष्ट कर दिया १ तलवार द्वारा अमुर विहाल के मम्मा काटकर गिरा दिया । वागो के प्रहार से दुद्धर व दुर्मुम नाम के दो दानवो का यमलोक भेज दिया । कालरात्रि ने काल प्रमुर को काल दगड से मार दिया ॥१६॥ उप सङ्ग मापात से उम्रदर्शन, प्रमि में प्रसिलामा को समाप्त कर दिया तो मिह य देवी के गणों ने जय-नाद रिया ॥२०॥ इस प्रकार भानो ममम्त मैना को नष्ट होता हुमा विलोक राक्षसराज महिषासुर मपना महिारूप धारण पर देवी के गणों को भयभीत करने लगा ॥२१॥ काश्चित्तुंडप्रहारेणभुरक्षेपस्तथापरान् । लागूलताडितानान्यान्छ गाम्याचविदारितान् ॥२२ वेगेनकाश्चिदपरानादेनभ्रमरणेनच । निश्वासपवनेनान्यान्पातयामासभूनले ॥२३ निपात्यप्रमयानीवमन्यधावतसोमुर । सिंहहतु महादेव्या.कोपचके तनोम्बिका ॥२४ मोरिकोपान्महावीर्य सुरक्षुण्णमहीतल.। गाश्यापवंतानुचश्तिक्षेपचननादच ॥२५ १६. J | मारय पुराण वेगभ्रमणविक्षुण्णमहीतस्यव्यगीयंत । लागूलेनाहतश्चाधि प्लावयामाससर्वत ॥२६ घुत गविभिन्नानखड सड ययुषंना । श्वासानिलास्ता शतशोनिपेतुनंभसोऽचला २७ इतिमोघसमाध्मातमापततमहासुरम् । दृष्ट्वासाचडिकाकोपतद्वधायतदाकरोत् ॥२८ विसी गण को मुख प्रहार से, विसी पर पुर से प्रापात पर, किमी को पूछ के आघात से त्रसित करने लगा ॥२२॥ तिमी को तीव्र गति द्वारा, किसी को घोर गर्जन द्वारा, विसी को भ्रमण द्वारा और किसी को श्वास की वायु से विदारण कर डाला ॥२३॥ इस प्रकार दैत्य-गणों को गिराकर वह दैत्यराज महा देवी के वाह्न सिंह को समाप्त करने की प्रकिाक्षा से दोडा, तो देवी एकदम क्रोधित हुई ।।२४।। महापराक्रमी महिषासुर भी क्राधपूण होकर खुरो से धरती को कुरेदता हुमा और दोनो तीक्ष्ण सोगा द्वारा उच्चदर पर्वत मालानों को उखाडता हुए गर्जने लगा ॥२५॥ उसके वेग से इस प्रकार घूमने पर पृथ्वी कोमल होगई और गडढे होगये तथा पूंछसे ताडित समुद्र भी सभी और फैलने लगा ॥२६॥ कैंपा देने वाले सीगो से घिरे हुए बादल खण्ड खण्ड होगये मौर उसके श्वास की तीव्र वायु से भनेको पर्वत गिर पडे ॥२७॥ ऐसे क्रोध पूर्ण उस दैत्यराज को समाप आया देख चएिका देवी भी क्रोधित हो उसे मारने को उद्यत हो गई ॥२॥ साक्षिप्त्वातस्यवपाशतववधमहासुरम् । तत्याजमाहिपरूयसोपिबद्धोमहामृधे ॥२९ तत सिंहोभवत्सद्योयावत्तस्यांबिकाशिर । छिनत्तितावत्पुरुष खङ्गपारिगरदृश्यत ।।३० ततएवाशुपुरुषदेवीचिच्छेदसायकै । तखङ्गचर्मरणासातत सोभून्महागज- ॥३१ करेणचमहासिंहतचषजगर्जच । वर्षतस्तुकरदेवीषङ्ग ननिरकृतत ॥३२ १६२ । [ मारंडेय पुगण प्रद निष्कातएवासोयुध्यमानोमहासुरः । तयामहासिनादेव्याशिरश्छित्वानिपातित ॥४० एवसमहिपोनामससैन्य समुहृद्गण । प्रैलोक्यमोहयित्वातुतयादेव्याविनाशित ॥४१ श्रलोक्यस्थस्तदाभूतम हिपेविनिपातिते । जयेत्युक्त तत सर्व सदेवासुरमानवै ।।४२ ततोहाहाकृतसद त्यसंन्यननाशयत् । प्रहपंचपरजग्मु सकलादेवतागणा ॥४३ तुष्ट वुस्ताँसुरादेवीसहदिव्यमपिभि । जगुर्गधर्वपतयोन नृतुश्चाप्सरोगणा ॥४४ देवी भी अपनी वारण-वर्षा द्वारा उन समस्त पर्वतो को चूर्ण करके युद्ध करने लग । उस समय चूकि मद्य-पान देवी का शरीर रक्त वर्ण होगया था एव सभी शब्दो का स्पष्ट उच्चारण नही हुआ ॥३६॥ देवी ने कहा-अरे मूर्ख ! जब तक मैं मद्य पोतो हूँ, तभी तक तु गर्जना करले फिर मेरे द्वारा तुझे निहत हुप्रा देख देवतागण यहाँ तेरे स्थान पर गर्जना करेंगे ।।३७॥ ऋषि ने कहा-देवी ऐसा कहकर छलाग लगाकर उस महादानव पर सवार होगई तथा उसे पपने चरणो से दबाकर उस असुर के कठ मे त्रिशुल से प्रहार करने लगी ॥३८॥ इसके पश्चात् उप महादानव की आभा प्राय समाप्त होगई और देवी के पये से दबा होने से अस्त-सा होगया ॥३६॥ उसके बाद सघर्ष करते हुए उस महादानव का महामसि से सिर कलम कर उसे समाप्त कर दिया ॥४०॥ इस प्रकार से वह महिपासुर अपनी सेना और मसुरगणों के समेत त्रैलोक्य को असित कर अन्त में देवी द्वारा विनाश कर दिया गया ॥४१॥ उस समय महि- पासुर के निहत होने पर तीनो लोगो के देवता, मनुष्य और भू-पाताल निवासी बलि मादि सभी ने देवी का जयघोष किया ॥४२॥ उसके पश्चात् देवी ने हाहाकार परती शेप देय सेना को भी नष्ट कर दिया, जिससे कि सुरगण पत्यन्त थानन्दित हुए ॥४३ । देवता व ऋषि-मुनिगए। देवी का गुणगान करने समे (गन्धर्व पति गायन करने सगे एव अप्सराये नृत्य करने लगी ॥४४) शक्रादिकृत देवीस्तव ] [ १६३ ७६~-शनादिकृत देवीस्तर तत सुरगणा सर्वे देव्याइ द्रपुरोगमा । स्तुतिमारेभिरेकत्तुं निहतेमहिपासुरे ॥१ शक्रादय सुरगणानिहतेतिवीर्येतस्मिन्दुरात्मनिसुरारिवलेचदेव्या। तातुष्टुवु प्रणतिनम्रशिरोधरासावाग्भि प्रहपंपुलकाद्गमचारुदेहा ॥२ दव्याययाततमिद जगदात्मशक्त्यानि शेपदेवगणशक्तिममूहगूर्त्या । तामविकामखिलदेवमर्पिपूज्याभक्त्यानता स्मविदधातुशुभानिसान ।। ३ यस्या प्रभावमतुल भगवाननतोब्रह्माहरश्चन हिवक्तुमलवलच । साचडिकाखिलजगत्परिपालनायनाशायचाशुभभयस्यमतिकरोतु ॥४ याधी स्वयसुकृतिनाभवनेष्वलक्ष्मी पापात्मनाकृतधियाहृदयेपुवुद्धि । थदासताकुलजनप्रभवस्यलज्जातात्वानता स्मपरिपालयदेविविश्वम् ॥५ किंवर्णयामतवरूपचित्यमेतत्किचातिवीर्यमसुरक्षयकारिभूरि । किंचाहवेपुचरितानितवाद्भुता नसर्वेपुदव्यसुरदेवगणादिकेषु ॥६ हेतु समस्तजगतात्रिगुणापिदेवनंज्ञायसेहरिहरादिभिरप्यपारा। सर्वाथयाखिलमिद जगद शभूतमव्याकृताहिपरमाप्रकृतिस्त्वमाद्या ॥७ ऋषि ने कहा--उस काल इद्र सहित समस्त सुरगण देवी द्वारा महिषासुर का वध किया जाने से मानन्दित होकर देवी का गुण गान करने लगे ।।१।। भगवती देवी ने सुरगणों के पोर शत्रु महापराक्रमी दैत्यराज महिण सुर का वध पर दिया तो इन्द्र सहित सम्पूर्ण सुरगणो के सुगोमित वन इस आनद से मोर प्रधिन पुलस्ति हो उठे, वे प्रश्ने मिर व कन्धो का नवाकर विभिन्न प्रकार से गुण गान करते हुए दुर्गा की स्तुति करने लगे ॥२॥ देवतामा ने कहा-इम प्राणि जगन् को अपने प्रभाव से विस्तार करने वानी, समस्त देवगणो की एकत्रित शक्ति से उताप्न होकर साकार प म परिणत हुई है एव जो समस्त मुरगणा एव महामुनिया की पूज्या है हम भक्तिपूर्वक उन पम्बिका देवी को प्रणाम करते हैं, वह हम सबका कल्याण करे ॥३॥ मनन भगवान, प्रया एव महेश भी जिनकी शक्ति और प्रभाव का वर्णन करने में परामर्थ हैं, [ मार एडेय पुराण वह देवी चरिडका समस्त विश्व का पोषण परन के लिए और उमरे अहित व भय के नाश के लिए आकाक्षित हो ।।४।। पुनीत पायं करन वाले प्राणिया के में लक्ष्मी स्वरूप, पाप-कर्म करने वालो के गृह मे दरिद्र स्वरूप, स्वच्छ हृदय से अध्ययन करने वाले के मस्तिष्क मे बुद्धि स्वरूप, समाचरण वालों के लिये श्रद्धा स्वरूप और पवित्र कुल पे उत्पन्न प्राणियो को लज्जास्वरूप है, उन देवी को नमस्कार करते हैं । हे देवि ! आप जगत् का पोषण करे ॥२॥ प्रापका मचिन्त्य स्वरूप वर्णन करने मे हम मममर्थ हैं। हे देवि । प्रापका दानवो का विनाश करने वाला अपरिमित बीर्य एव दानवो व देवगणो के प्रति रण-क्षेत्र मे आपका अनुपम आचरण हम किस प्रकार वर्णन परे ॥६॥ हे देवि । प्राप विकारहीन आद्याप्रकृति हैं अथ च साव, रज एव तमोगुण वानी होने पर भी प्राप विश्व के लिए कल्याणकारी हो । राग द्वेष प्रादि से युक्त विष्णु व महेश आदि भी प्रापका प्रकृत तत्व नहीं जानते, हे देवि । आप अपार हैं और सभी जगत् पदार्थों की माप प्राधय-स्वरूप है यह विश्व प्रापका ही प्रश स्वरूप है ॥७॥ यस्या समस्तसुरता समुदोरणेनतृप्तिप्रयातिसकलेपुमखेषु देवी । स्वाहा सिर्वपितृगणस्यचतृप्तिहेतुरुच्चार्य सेत्वमतएवजनै स्वधाच ॥८ पामुक्ति हेतुरविचित्यमहाव्रतात्वमम्यस्यसे सुनियतेंद्रियतत्त्वसार । मोक्षाभिमुनिभिप्रस्तसमस्तदोपविद्यासिसाभगवतीपरमाहिदेवि ॥ शब्दात्मिकासुविमलयंजुपानिधानमुद्गीथरम्यपदपाठवताचसाम्नाम् । देवीत्रयोभगवतीभवभावनायवार्तासिसर्वजगतापरमात्तिहनी ॥१० मेधामिदेयि विदिताखिलशास्त्रसारादुर्गासिदुर्गभवसागरनौरसगा। श्री.फैटभारिहृदयकृताधिवासागौरीत्वमेवशशिमौलिकृतप्रतिष्ठा ।।११ ईपरसहासममलपरिपूणचद्रबिंबानुवारिक्नकोत्तमकान्तिकातम् । अत्यद्भुतमहतमात्तरपातथापिवक्नविलाक्यसहसामहिषासुरेए ॥१२ दृष्ट्वातुदेविकुपितभृकुटीकरालमुद्यच्छशाकभशाछवियनसद्य । प्राणान्मुमोचमहिपस्तदतीवचित्र जीव्यतेहिकु पितांतरदर्शनेन ।। १३ गादिकृत देवोस्तव ] [ १६५ देविप्रसीदपरमाभवतीभवायसद्योविनाशयसिकोपवतीकुलानि । विज्ञातमतदधुनवयदस्तमेतन्नीतवलमुविपुलमहिषासुरस्य ॥१४ है देवि ! आपके नाम उच्चारण मे ही सम्पूर्ण यज्ञो मे देवतागण तृप्ति प्राप्त करते हैं, चू कि आप ही पिगण एवं सुरगण को तृप्त करने वाले स्वाहा एव स्वघा स्वरूप उच्चारण की जाती हो ।।८॥ हे देवि ! आपको महान् पारा- धना का विषय अचिन्त्य हैं और जितेन्द्रिय तत्त्वसार तथा दोप-विहीन, मोक्ष के माकाक्षी ऋषिगण धापको मुक्ति का कारण मानते हैं । हे देवि ! इमलिये माप हो भगवती सर्वश्रेष्ठ मोक्ष विद्या हैं ॥६॥ हे देवि ! आप शब्द युक्त तीन वेद स्वरूप हैं और प्रणव युक्त, अनुपम पद वाले ऋक्, यजु व साम वेदो का माश्रय स्वरूप हैं, माप हो सम्पूर्ण ऐश्वर्य पूर्ण हैं, आप ही विश्व का जीवन- रक्षक कृषि-स्वस्प हैं, हे देवि ! समस्त विश्व को घोर विपत्ति को शमन करने वाली माप ही हैं ॥१०॥ हे देवि ! माप ही बुद्धि स्वरूप हैं, कठिन भव-सागर से निस्तार करने वाली अनुपम नौका स्वरूप हैं वटभ शत्रु के वध कर्ता भग- वान् विपशु के हृदय में निवास करने वाली लक्ष्मी थाप ही हैं मौर महादेवजी के बाप मन पर प्रतिधित गौरी पाप ही हैं ॥१९॥ इस पर भी प्रापरा मन्द हास्य पूर्ण, स्वच्छ, पूर्णचन्द्र तुल्य, सुन्दर वर्ण, काति युक्त, अनुपम मुस देवार भी महिपामुर ने कुपित होकर पाप पर गस्त्रापात किया, यह पाश्चयंपूर्ण है अन् समस्त त्रिभुवन को मोहित करने वाली मापकी मुग-वाति से भी वह दुष्ट मोहित नही हुमा ॥१२॥ है देवि ! अत्यन्त प्रोषपूर्ण, तनी हुई भ्रकुटि सहित दिन पूर्ण चन्द्र के समान मापने मुस को देखकर भी तुरन्त ही महिपा- गुर ने प्राण त्याग नहीं लिया, यह पाश्वयंपूर्ण है, क्योकि मोघ युक्त यमराज को देसपर भी कोई जीवित रह मरता है ? ॥१३॥ है भगवती ! माप प्रसन्न हों, विश्व का कल्याण करने वाली सहमी भाप ही है, है देवि ! क्रोधित होने पर पाप ममम्त कुन नाम पर देती है, यह हम जान गये हैं क्योरि मापने महिषासुर मौर उगको विशाल प्रमुर मेना को नष्ट पिया है । तेसमताजनपदेषुधनानितेपायामिनचसीदतिवघुवर्गः । एन्यास्तएपनिभृतात्मजमृत्यदारागांसदाभ्युदयदागवतीप्राना ॥१५ { माण्डेय पुराण धारिणदेविसकलानिसदेवकर्माण्यत्याहत प्रतिदिनसुकृतीकरोति । स्वर्गप्रयातिचततोभवतीप्रसादाल्लोकत्रयेपिफलदाननुदेवितेना। १६ दुर्गस्मृताहरसिभीतिमशेपजतो स्वस्थ स्मृतामतिमतीवाभाददासि । दारिद्यदुखभयहारिणिकात्वदन्यासर्वोपकारकरणायसदाचित्ता ॥१५ एभिर्हतजंगदुपैतिमुखतथैतेकुवंतुनामनरकाय चिरायपापम् । संग्राममृत्युमधिगम्य दिवप्रयातुमत्वेतिनूनमहितान्विनिहसिदेवि ॥१८ दृष्टय वकिनभवतीप्रकरोतिभस्मसर्वासुरातरिषुयत्प्रहिणोपिशस्त्रम् । लोकान्प्रयातुरिपकोपिहिशस्त्रपूताइस्थमतिर्भवतितेष्वहितेषुसाध्वी ॥१६ खङ्गप्रभानिकर विस्फुरणस्तथो शूलाप्रकातिनिवहेनदृशोसुराणाम् । यन्नागताविलयमशुभदिदुखडनीग्याननतवविलोक्यतांतदेतत् ॥२० दुर्वत्तवृत्तशमनतवदेविशीलरूपतयेतदविचित्यमतुल्यमन्यः । वीर्यचहतृहृतदेवपराक्रमाणावैरिज्वपिप्रकटितहृदयात्वयेत्थम् ॥२१ हे दुर्गे | आप सन्तुष्ट होकर जिनको कल्याण देती हैं, वही राष्ट्र में पूज्य होते हैं, उन्ही को धन और प्रसिद्धि प्राप्त होती है, उनका धर्म भक्षय रहता है और उनके पुत्र, स्त्री व सेवक सबमी व गम्भीर होते हैं ॥१५॥ हे देवि । भापके ही प्रसाद से पुण्य कर्म करने वाले ध्यक्ति नित्यप्रति पूर्ण मादर सहित धर्मानु रक्त कार्य करते हैं तथा मृत्यूपरात आपकी ही कृपा से स्वर्ग प्राप्त करते हैं, इसलिए हे अम्बिका । आप ही त्रैलोक्य को फलदायक हो ॥१६॥ हे देवि । असित मनुष्य जब भापका नाम स्मरण करते हैं हैं और स्वस्थ हृदय प्राणि जब पापका स्मरण करते हैं तो आप उन्हें कल्याण- दाता युद्धि प्रदान करती हैं, हे दरिद्रो का दुख व भय हरण करने वाली ! मापके अतिरिक्त अन्य किस का हृदय सभी के हितार्थ कृपालु अथवा दयापूर्ण रहता है । ॥१७॥ "समस्त मसुरो के निहत होने से विश्व सुखी होवे गौर नरक प्राप्ति के लिये बहुत अवधि तक पाप कर्म करके इस रण-क्षेत्र में निहत होकर स्वर्ग को प्राप्त करे" ऐसा सोचकर माप देव शत्रुओं का शमन करतो ॥१८॥ प्रापयी तो दृष्टि मात्र से हो शत्रुगण भस्म हो सकते हैं, हिन्दु पत्रों को अपने शस्त्र से पवित्र पर स्वर्ग में पहुंचाने के लिये मापने भावी पाप उन्हें भयहीन बनाती शक्रादिकृत देवीस्तव ] पर शस्त्र चलाया निस्सदेह आपकी प्रसुरो का हित करने वाली मति सर्व श्रेष्ठ है ॥१६॥ ह देवि । प्रापके खङ्ग की तीव्र आभा और त्रिशूल के अग्रभाग की काति से भी उन सभी दैत्यो की दृष्टि समाप्त नहीं हुई, इसका केवल कारण यही है कि पापक शोभायुक्त मुख चन्द्र को प्राभापूर्ण किरणो से उनके नत्र अत्यन्त शीतल होगये थे ।।२०॥ हे दुर्गे । आपका स्वभाव दुराचारी मनुष्यो के दुराचार का विनाश करने वाला एव प्रापका रूप अतुलनीय व अचिन्त्य है । हे देवि ! आपका वीयं देवगण के बल को हरने वाले दत्यो का विनाश करता है, प्रतएव शत्रुप्रो पर भी प्रापकी कृपा पूर्ण स्पष्ट है ॥२१॥ केनोपमाभवतुतेस्यपराक्रममस्यरूपचशनुभयकार्यतिहारिकुत्र । चित्तकृपाममरनिष्ठुरताचदष्टात्वय्येवदेविवरदेभुवनत्रयेपि ॥२२ त्रैलोक्यमेतदखिलरिपुनाशनेन नातत्वयासमरमूर्द्ध नितेपिहत्वा । नीतादिवरिपुगणाभयमप्यपास्तमस्माकमुन्मदसुरारिभवनमस्ते २३ शूलेनपाहिनोदेविपाहिखङ्ग नचाबिके । घटास्वनेनन पाहिचापज्यानि स्वनेनच ॥२४ प्राच्यारक्षप्रतीच्याचचडिकेरक्षदक्षिणे। भ्रामणेनात्मशूलस्यउत्तरस्यातयेश्वरि ॥२५ सौम्यानिया निरूपाणि लोक्येविचरतिते । यानिचात्यतघोरारिणतरक्षास्मास्तथाभुवम् ॥२६ सङ्गमूलगदादीनियानिचास्त्राणिम्बिके । करपल्लवसगीनितरस्माक्षसवंत ॥२७ एवस्तुतासुरंदिव्य कुसुमनंदनोद्भव. । अचिंताजगताघात्रीतयागधानुलेपनं ॥२८ हे देवि ! प्रापका पराक्रम विसी मन्य के साथ तुलना नहीं किया जा सकता । मापका रूप रात्र मो को भयदाता एव अत्य त अनुपम है । एसा मनु पम स्वरूप स्वर्ग, पृथ्वी व पाताल में अन्य किसी का नहीं है । हे अम्बिके । पापका हृदय दयापूर्ण तो है ही, साथ ही रणक्षेत्र में निष्ठुरता पूर्ण भी है ऐमी समस्त तीनों लोगों में माप ही हैं ॥२२॥ हे देवि ! पापने गमों का विना १६० । { Rडेय पुण परखे तीनो लोगों की रक्षा की है. युद्ध क्षेत्र में उन्ही पात्रों को निधन पाये स्वयं प्रदान रिया एव उ ही मद-मत्त यो पारण हमारा भय भी प्रभात होगया है देदि । आपको नमस्कार है ॥२३॥ हे दुई ! भूप नाग हमारी रक्षा परे । हे मम्बिके । सङ्ग द्वारा हगारी या परे । हे देवि 1 घण्टा एव धनुष प्रत्यचा वे पान द्वारा हमारी रक्षा बरे ॥२४॥ हे पण्डिरे ! जूम धुमार पाप हमारी पूर्व, पश्चिम, उत्तर व दक्षिण में रक्षा रे ॥२॥ तीनो लोगों में विचरने वाले पापो जितने सौम्य स एव भयर र है, उनके द्वारा हमारी व मत्पलोक वी रक्षा कीजिये ॥२६॥ हे अम्बिका देवि भएने पर. कमलो मे सुशोभित खङ्गा सूर, गदा प्रादि अस्त्रा दाग चारों ओर हमारी रक्षा करे ॥२७॥ ऋषि ने कहा-सुरगणो मे इम प्रभार उन देवी का गुण- गान किया और नन्दन कानन म उत्पन्न हुए पुष्प, दिव्य गन्ध पोर धूपादि के द्वारा भक्ति पूर्वक उन जगज्जननी की पूजा की ॥२८॥ भक्त्यासमस्तै स्त्रिदर्शदिव्यधूपं.सुपूपिता । प्राहप्रसादसुमुखासमस्तान्प्रणतान्सुरान् ।।२९ वियताश्रिदशा सर्वेयदस्मत्तोभिवाचितम् । ददाम्यहमतिप्रोत्यास्तवैरेमि सुपूजिता ॥३० कर्तव्यमपर यच्चदुष्क रतनविद्महे । त्याकर्ण्यवचोदेव्या प्रत्यूचुस्तेदिवौकस ॥३१ गवत्याकृतसवनकिचिदवशिष्यते । दिय निहत शत्रुरस्माकमहिषासुर ॥३२ पदिचापिवरोदेयस्त्वयास्माकमहेश्वरि । स्मृतासस्मृतात्वनोहिसोथा परमापद ॥३३ पश्चमय॑स्तवरेभिस्वास्तोष्यत्यमलानने । (स्पवित्तद्धिविभवर्धनदारादिसपदाम् । वृद्धयेस्मत्प्रपन्नात्वभवेया सर्वदाबिके ॥३४ इतिप्रसादितादेवैर्जगतो/तथारमन । तथेत्युक्त्वाभद्रकालीवभूवातहितानृप ॥३५

शक्रादिकृत देवीस्तव ]
[ १६६
इत्येतत्कथितभूपसंभतामायथापुरा ।
देवीदेवशरीरेभ्योजगत्रयहितपिणी ॥३६
पुनश्चगौरीदेहात्सासमुद्भूतायथाभवत् ।
वधायदुष्टदैत्यानांतथागु भनिशु भयोः ॥३७
रक्षणायचलोकानादेवानामुपकारिणी ।
तच्छ गुष्वमयाख्यात यथावत्कथयामिते ॥३८
उस समय वर प्रदान करने की इच्छा से उनका मुख मण्डल अत्यन्त
शोभायमान होगया और उन्होंने सभी विनीत देवतामो के प्रति क्हा ॥२६॥
देवी ने कहा-हे त्रिदशगण ! अपना इच्छित वर मुझसे मागो, तुम्हारे स्तवन
से मैं परम सन्तुष्ट हुई हू, इमलिये प्रीति सहित वर प्रदान करूंगी ॥३०।। इस
महिषासुर का वध करने के पश्चात् क्या करना है, यह मैं नहीं जानती, अब
तुम्हें जो कुछ दु साध्य हो, वही मुझे बतायो, देवी के ऐसे वचन सुनकर देवगण
बोले ॥३१॥ देवनानी ने कहा-हे भगवती ! मापने हमारे हितार्थ इस प्रवल
दात्रु महिषासुर को मार डाला, इससे हमारा सम्पूर्ण कार्य सिद्ध होगया है, अव
कुछ कार्य शेप नहीं रहा ॥३२॥ फिर भी यदि माप वर देने की इच्चा ही
करती हो तो हमे यही वर दीजिये कि जब कभी हम मापका स्मरण करे,
तभी पाप हमारे सङ्कट को दूर करें ॥३३॥ जो मनुष्य हमारे इस स्तोत्र द्वारा
मापकी स्तुति करें, उनकी माप प्रसन्न होकर ज्ञानाधिक्य, ऐश्वर्य युक्त धन,
पत्नी मादि को वृद्धि करना, क्योकि भाप मब कुछ देने में समर्थ हैं ॥३४॥
भूपि ने कहा है राजन् ! देवतापो द्वारा विश्व के हितायं प्रसन्न की हुई
भद्रकाली 'ऐमा ही होगा वहार अन्तर्धान होगई ॥३॥ देवनामों के देह से
जिस प्रकार विश्व का हित करने वाली वह देवी पूर्वकाल मे भाविभूति हुई,
यह तुममे वरांन किया ॥३६॥ मव जिस प्रकार भगवती गोरी के शरीर से
उत्पन्न होरर गुम्भ निशुम्भ मौर अन्य ममुरो का नाश ॥३७॥ लोकरक्षार्य
और देवोपारायं दिया,उसे यथावत् तुम्हारे प्रति कहता हूँ.प्रवण करो॥३८॥

१७० ॥
[ मण्डेय पुराण
७७-देवी से शंभु के दृत का कथन
पुगशु भनिशु भाभ्यामसुराम्याशचीपते ।
लाक्ययज्ञभागाश्चत्तामदवलाथयात् ॥१
तावेवसूर्यतातद्वदविकारतथैन्दवम् ।
कौबेरमथयाम्यचचक्रातेवरुणस्यच २
तावेवपवनद्धिचचक्रतुर्वह्निकमंच ।
अन्येपाचाधिकारान्स स्वयमेवाधितिष्ठति ।
ततादेवाविनिताभ्रष्टराज्या पराजिता ॥३
ताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यासर्वे निराकृता ।
महासुरम्यातादेवीसस्मरत्यपराजिताम् ।।४
तयास्माकवरोदत्तोयथापत्सुस्मृताखिला. ।
भवतानाशयिष्यामितत्क्षणात्परमापद ॥५
इतिकृत्वामतिदेवाहिमवतनगेश्वरम् ।
जग्मुस्तत्रततोदेवीविष्णुमायाप्रतुष्टवु ॥६
ऋपि ने कहा--पुराकाल की बात है, शु भनिशु भ नामक दो असुरी
ने अपने अहंबल से चिपति देवेन्द्र के लोक्य का राज्य और सम्पूर्ण यज्ञ
भाग को छीन लिया ॥१) उन शुभ, निशु भ ने चन्द्र, सूर्य, कुबेर, वरुण के
अधिकार को अपने हाथ में लिया और पवन तथा अग्नि का कार्य भी स्वय
करने लगे तथा सभी देवतानो के पदो पर उन्होने अधिकार कर लिया ॥२॥
फिर उन दोनो घोर असुरो के द्वारा अधिकार से भ्रष्ट और तिरस्कार को प्राप्त
हुए, राज्य से हीन एवं पराजित ॥३॥ देवगण उन अपराजिता भगवती का
स्मरण करने लगे ॥४॥ देवी ने उन्हे विपद्काल मे स्मरण करते ही विपत्ति
नष्ट करने का वर दिया था, अब घोर विपत्ति पा गई इसलिये उन्ही की
शरण मे जाना उचित है ॥॥ इस प्रकार विचार करके देवतागण पर्वत
अंध हिमालय म जाकर विष्णु की उन माया का स्तव करने लगे ॥६॥

देवी से शानू में दूत का चयन ]
[ १७१
नमोदेव्यमहादेव्यंशिवायमततंनमः ।
नम प्रकृत्यभद्राय नियता.प्रणताःस्मताम् ।
रौद्रायनमोनित्यायगौर्यधात्र्यनमोनमः ।
नमोजगत्प्रतिष्ठायदेव्यैकृत्यनमोनमः ।।
ज्योत्स्रायचंद्ररूपिण्यसुखायसततंनमः ।
कल्याण्यं प्रणतामध्ये सिद्धचं कूम्यैनमोनमः ।।
नैऋत्यभूभृतालक्ष्म्यैराण्यतेनमोनमः ।
दुर्गायदुर्गपारायसारायसर्वकारिणि ।
ख्यात्यतथैवकृष्णायधूम्रार्यसततनमः ॥१०
प्रतिसौम्यातिरौद्राय नमस्तस्यै नमोनमः ।
नमोजत्प्रतिष्ठायदेव्यंकृत्यनमोनमः ॥११
यादेवीसर्वभूतेपुविप्रणुमायेतिराब्दिता।
नमस्तस्यनमस्तस्यनमस्तस्यनमोनमः ॥१३
यादेवीसर्वभूतेपुवुद्धिस्पेगमंस्थिता ।
नमस्तस्यैनमस्तस्यनमस्तस्यैनमोनमः ॥१४
देवतामों ने कहा-देवी को नमस्कार है, महादेवी, शिवा, प्रकृति और
भद्रा को वारम्वार नमस्कार है, हम विनीठ होकर उन भगवती को वारम्बार
नमस्कार करते हैं 15 रोदा नित्या, गौरी, पात्री, जगत्-प्रतिष्टा और हत्या
को हमारा बारम्बार नमस्कार है ॥६॥ हम उन प्रयास स्वम्पा, चन्द्रमा
तथा परमानन्द स्वरूपिणी देवी को नमस्कार करते है, उन पत्याराि, बुद्धि
*पिणी एव साक्षात् मिद्धि को नमस्कार करते हैं un नेवि स्वरूपा पोर
रारामारी गृह लक्ष्मी स्वरूपा देवी वो नरसार है, गणि, दुर्गा, दुर्गपारा,
सारा, सर्वकारितो, म्याति, कृष्णा भौर धूम्रा स्दरूपिणी भगवती को हम
नमकार पर है ॥१०॥ जो पति सौम्म तपा प्रत्यन्त रोट हैं, उनको हम
विनय पूर्वर नमस्कार करते हैं, जग-अनिता पिणी एप कृति स्वस्ता देवी
नमसार करते हैं ॥११॥ जो मव प्राणियों में विष्णुमाया नाम से प्रमिट
। उनको बारम्बार नमस्कार है | सब प्राणियों में चेतना पानी

१७२ । । माण्डेय पुराण देवो को हम नमस्कार करते हैं ॥१३॥ सब प्राणियों में बुद्धि रूप से स्थित रहने वाली भगवती को बारम्बार नमस्कार है ॥१४॥ यादेवीसर्वभूतेषुनिद्रारूपेणसस्थिता । नमस्तम्यनमस्तस्यनमस्तस्यै नमोनमः ॥१५ यादेवोसवभूतेषुक्षुधारूपेरणसस्थिता । नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्य नमोनम ॥१६ यादेवीसवभूतेषुच्छायारूपेरणसस्थिता । नमस्तस्यौनमस्तस्यैनमतस्यौनमोनम ॥१७ यादेवीसर्वभूतेपुशक्तिरूपेरणसस्थिता । नमस्तस्यैनमस्तस्गनमस्तस्यैतमोनम ॥१८ यादेवीसर्वभूतेपुतृष्णारूपेरणसस्थिता । नमस्तस्यैनमस्तस्यौनमस्तस्यैनमोनम. ॥१६ यादेवीसर्वभूतेषुक्षाँतिरूपेणसस्थिता । नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यौनमोनम ॥२०॥ यादेवीसर्वभूतेपुजातिरूपेणसस्थिता। नमस्तस्टोनमस्तस्टोनमस्तस्यै नमोनम ॥२१ सब प्राणियो मे निद्रारूप से स्थित देवी को बारम्बार नमस्कार है ॥१५॥ राब जीवो में क्षुधा रूप से स्थित रहने वाली देवी को बारम्बार नम- स्कार है ॥१॥ जो देवी सब भूतों मे छाया रूप से अवस्थित रहती हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार है ॥१७॥ सब प्राणियो मे शक्ति रूप से विराज- मान देवी को अनेक बार नमस्कार ॥१८॥ सब प्राणियो मे तृष्णा रूप से प्रतिष्ठिन भगवती को वारम्बार नमस्कार १९॥ सब प्राणियों में क्षान्ति रूप से अवस्थित देवी को नमस्कार ॥२०॥ सब जीवो मे जाति रूप से निवास करने वाली देवी को नमस्कार ।।२।। यादेवीसर्वभूतैपुलज्जारूपेणारा स्थिता । नमस्तस्य नमस्तस्यै नमरतस्यै नमोनमः ॥२२ देवी से शभु के दूत का कथन ) [ १७३ यादेवीसर्वभूतेषुशाँतिरूपेणस स्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः ॥२३ यादेवीसर्वभूतेपुश्रद्धारूपेणसंस्थिता । नगस्तस्यै नमस्तस्यौतमस्तस्यैनमोनमः ॥२४ यादेवीसभतेपुकान्तिरूपेणसंस्थिता । नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ॥२५ यादेवीसर्वभूतेषुलक्ष्मीरूपेणसस्थिता । नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ॥२६ यादेवीसर्वभूतेपुतिरूपेणसस्थिता। नमस्तस्यैनमस्तस्यैनमस्तस्यैनमोनमः ॥२७ यादेवीसनभूतेपुवृत्तिरूपेणसस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्य नमोनमः ॥२८ जो सब प्राणियो मे लज्जा रूप से रहती हैं, उन देवी को बारम्बार नमस्कार ।।२२।। सब प्राणियों में शान्तिरूप से प्रस्थान करने वाली देवी को नमस्कार ।।२३।। सब जीवो मे श्रद्धारूप से स्थित भगवती को नमस्कार ॥२४॥ सब पाणियो मे कातिरूप से विराजमान देवी को नमस्कार ॥२५॥ सब जीवो में लक्ष्मीरूप से प्रतिष्ठित देवी को नमस्कार ॥२६॥ सब जीवो मे धृति रूप से अवस्थान करने वाली महामाया वो नमस्कार ।।२७॥ सब प्राणियो मे वृत्ति रूप से अवस्थित देवी को नमस्कार ।।२८।। यादेवीसनभूतेपुस्मृतिरूपेरणसस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यनमस्तस्यै नमोनमः ॥२६ यादेवीभनभूतेषुदयारूपेणसंस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः ॥३० यादेवीसर्वभूतेषुतुष्टिरूपेणसस्थिता । नमस्तस्य नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः ॥३॥ यादेवीसर्वभूतेषपुष्टिरूपेण सस्थिता। नमस्तस्य नमस्तस्यै नमस्तस्य नमानमः ।।३ॐ १७९ [ मार्कण्डेयपुराण यादेवीसर्वभूतेपमातृरूपेणस स्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्य नमस्तस्य नमोनम ॥३३ यादेवीसर्वभूतेषुभ्रांतिरूपेरणसस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्य नमस्तस्य नमोनम ॥३y सब प्राणियो मे स्मृति रूप से प्रवस्थित देवी को नमस्कार ॥२६॥ सब प्राणियों मे दया रूप से अधिष्ठित देव को नमस्कार ॥३०॥ सब प्राणियों मे नीति रूप से स्थित देवी को नमस्कार ॥३१॥ सब जीवो मे तुष्टि रूप से स्थित भगवती को नमस्कार ॥३२॥ सब जीवो मे पुष्टि रूप से निवास करने वाली देवी को नमस्कार ॥३३॥ सब प्राणियो में मातृ रूप से स्थित देवी के नमस्कार ॥३४॥ सब प्राणियो मे भ्रान्ति रूप से अवस्थित देवी को नमस्कार ॥३॥ इन्द्रियाणामधिष्टात्रीभूतान खिलेप्या । भूतेषसततव्याप्त्येतस्यै देव्यै नमोनम ॥३६ चितिरूपेणयाकृत्स्नमेतान्याप्यस्थिताजगत् । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनम ॥३७ स्मृतासुरै पूर्वमभीष्टसश्रयात्तथासुरेन्द्र णदिनेशसेविता। करोतुसान शुभहेतुरीश्वरीशुभानिभद्रायभिहतुचापदः ॥३८ यासांप्रतचोद्धतदत्यतापितरस्माभिरीशाचसुरनमस्यते । याचस्मृतातत्क्षरणमेवहं तिन सर्वापदोभक्तिविनम्रमूतिभिः ॥३ एवस्तवाभियुक्तानादेवानातत्रपार्वती। स्नातुमण्याययोतोयेजाह्नव्यानृपनदन ।।४० साऽब्रवीत्तान्सुरान्सुम्रर्भवद्भि स्तूयतेत्रका । शरीरकोशतश्चास्या समुद्भ ताब्रवीच्छिवा ॥४१ स्तोत्रममतक्रियतेशु भदैत्यनिराकृतं । देव समस्तै समरेनिशु भेनपराजिते ॥४२ सब इन्द्रियो और जीवो की अधिष्ठात्री पौर सब प्राणियों में व्यक्ति र से विद्यमान देवी को नमस्कार ॥३६॥ चैतन्य रूप से सम्पूर्ण विश्व मे व्या देवी से गनु के दा का क्यन ] [ १७५ तुम दिन- रह कर अधिष्ठान करने वाली भगवती पो बारम्बार नमस्कार है ॥३॥ पुराकाल में अपने इन्दित को प्राप्त कर हमने जिन देवी की स्तुति की मौर षो मगलो के करने वाली हैं, उन्ही भगवती को, प्रचण्ड मसुरों से पीडित हए हन नमस्कार करते हैं, भक्ति में मुरते हुए देह दाने हम जब पारा स्मररा करते हैं तब वो तुरन्त ही हमारी विपत्ति को दूर करती हैं, दह दवी हमारी विपत्ति को नष्ट करके सब प्रकार मे हमारा मगन करें ।।३८-३६॥ अपि ने कहा है नृपपुत्र ! देवगण इस प्रकार में स्तुति कर हो रह थे, तभी भग- चनी पार्वती गगा स्नान गे जाने के लिए उनरे सम्मुम हुई ॥४०॥ शामित 'म्रकुटि वाली वह पार्वतीजी देवतामो से पूछने लगी-हे देवगरण । की स्तुति कर रहे हो, इतनी वार्ता के साथ ही पावतीजी के देह वोरा से भगवती शिवा उत्पन्न होकर बोनी ॥४१॥ युद्ध में निगम द्वारा पराजित चौर शुभ दाग निष्कामित यह देवगरा मेरी म्नुति कर रह हैं ॥४२॥ गरीरकोशाधत्तम्या पार्वत्यानिःमृताविका । कौशिकीतिसमन्ने ततोलोकेपुगीयते ॥४३ तस्याविनिगंतायानुकृष्णाभूत्नापिपार्वती। कालिकेनिसमाख्यानाहिमाचलकृताश्रया ।।४४ ततोबिकापररूपविम्राणासुमनोहरम् । ददर्शचडोमु डचमृत्यौगु भनिगु भयोः ४५ ताभ्यांगु भायचात्यातायतीवमुमनोहरा । काप्यास्तेस्त्रीमहाराभासवतीहिमाचलम् ।।४६ नवताहक्कचिद्रू पदृप्टकेनचिदुत्तमम् । ज्ञायताकापसौदवीगृह्यताचानुरेश्वर ॥४७ स्त्रीरत्नमतिचावंगीद्योतयतीदिगस्त्विपा। मातितिदैत्येन्द्रताभवान्द्रष्टुमर्हति ।।४८ यानिरत्नानिमण्योगजारवादीनिवप्रभो । प्रैलोक्येतुसमस्नानिमाप्रतनानितगृहे ॥४६ पार्वती जी के देहकोश से उत्पन होने के कारण वह शिवा 'कौशिकी' १७६ ] । माईण्डेय पुराण नाम से प्रसिद्ध हुइ ॥४३॥ जव पार्वती जो के देह से वह कोशिकी देवी निकल गई तब उहाने कृष्ण वर्ण धारण करने वालिका नाम से प्रसिद्ध होकर हिमाचल मे निवास किया ॥४४॥ तदुपरान्त अम्विका ने प्रत्यत मनोहर रूप धारण किया और शुभ निशुम असुरो के भृत्य चण्ड मुण्ड ने उस स्वरूप को देखा ॥४५॥ तब चण्ड मुण्ड शुम्भासुर के पास गये और उनसे बोले हे महाराज ! एक अत्यत रूपवती स्त्री हिमाचल को सुशोभित करती हुई वहाँ रह रही है ॥४६॥ ऐसा धेष्ठ स्वरूप किसी ने भी न देखा होगा, इसलिये यह स्त्री कौन है, इसका पता करके, उसे ग्रहण कर लीजिये ॥४७॥ वह सुन्दरागी स्त्रियो मे रत्नरूप है हे असुरेन्द्र । वह स्त्री अपने शरीर को कान्ति से सब दिशामो का प्रकाशित कर रही है, आपको उसे अवश्य देखना चाहिये ।।४८॥ हे प्रभो । तीना लोको मे हाथी, घोडे, रत्नादिक जो सर्वश्रेष्ट धन हैं, वह सभी आपके घर मे सुशाभित हैं ॥४६॥ ऐरावत समानीतोगजरत्नपुरदराद । पारिजातरुश्चायतथैवोच्च श्रवाहय ५० विमानहससयुक्तमेतत्तिष्टतितगणे। रत्नभूतमिहानीतयदासी घसोद्भुतम् ॥५.१ निधिरेपमहापद्म समानीतोधनेश्वराद । किंजल्विनींददौचाब्धिर्मालामम्लानपकजाम् ॥५२ छत्र तेवारणगेहेबांचनस्रावितिष्टति । तथायस्यदनवरोय पुरासीत्प्रजापते ॥५३ मृत्योरक्रान्तिदानामशक्तिरीशत्वयाहता। पाश सलिलराजस्यभ्रातुस्तवपरिग्रहे ॥५४ निशु भस्याधिजाताश्वसमस्तारलजातयः । वह्निश्चापिददौतुभ्यमग्नि शौचेचवाससी ॥५५ एवंदैत्येंद्ररत्ननिसमस्तान्याहतानिने। स्त्रीरत्नमेपारल्यापीत्वयावस्मानगृह्यते ॥५६ देवो म ग के दूत का क्यन ] [ १७ गजरत्न एगवत, मुरम्य पारिजातन, मोर उच्चपदव, इद्र यहाँ में लिया गया ॥५०॥ विधाता वा हमयुक रन र विमान को यहाँ मारा मन मस्पित किया गया ॥५१॥ महापम नाम की यह निधि कुरेर म और थिमिनि नामर कभी भी न मुरकान वानी पप्रमाला भी समुद्र ने प्राप्त की गई ॥५२॥ द का बनिन वारि घर और प्रजापति का यह प्रेट रय भी यहां विद्यमान है ॥५॥यम का मररावापिनी शक्ति को मापन घोन मी पौर मा माई नितुम यहाँ वारा पा पार ॥५४॥ मोर समुद्र में प्राप्त दर सय रन्न विद्यमान है पनि ने उनको पवित्र करके वस्त्र एव दप्तरीय दिया है ॥५५॥ हे प्रमुरेन्द्र । इउ प्रसार यह सभी रन मारने प्रहग पिव है तो हम भी रहल को ही माया नगै परत ॥५६॥ निशम्युनिश्म गुन मतदाचण्डमुण्डयो । प्रेषयामासमुप्रोवदूत देव्यामहामुर ॥५॥ इतिचतिववत्तयामागत्वापचनान्मम । क्याचान्येतिमप्रीत्यातयातायंत्वयालघु ॥५८ मनप्रगनापमानशेतीदेगेतिगोभने । तांचदेवींतन प्राहलारामघुग्यामिरा ॥५६ देवियच मात्रलोक्सपरमेघर । दूनोहपितस्तेनत्वमामिहागत ॥६० प्रत्यारान गर्वानुय महादेवयोनिषु । निम्तिापिता त्यारि मयदाहगुवत् ॥६१ ममोरोस्परिलममदेवायगानु । परमागानमयानुसारनामियरकृया ॥६२ प्रोवरत्नानिममयान्यांत सौगजरनाहत देवेन्द्रवादनम् ॥६३ १७८ ] [ मावण्डेय पुराण ऐसी बात करना जिससे यह अत्यन्त प्रसन्न होकर शीघ्र ही यहाँ प्रावर उपस्थित हो जाय ॥५८॥ जिस अत्यन्त सुशोभित पर्वत-प्रान्त मे पार्वती जी निवास वर रही थी, उस स्थान मे पहुच कर वह दून उनसे बोला ॥५६॥ दून ने कहा- हे देवि । दैत्येन्द्र शुम्भ तीनो लोको के ईश्वर हैं, उन्होंने मुझे अपने दूत रूप से तुम्हारे पास भेजा है, इसीलिये मैं यहां आया हूँ ॥६॥ उनको प्राज्ञा सब देवताओ को अटल रूप से मान्य है, क्योंकि उन्होंने देवताओं को परास्त कर दिया है. अब उन्होने जो कहा है उसे मुझमे श्रवण करो ॥६१॥ उन्होंने कहा है-तीनो लोक मेरे हैं, सभी देवता मेरे वश मे और मेरे अनुगत हैं, समस्त के यज्ञ भाग को भी मैं ही भोगता हूँ ॥६२॥ तीनो लोकों के सम्पूर्ण रत्न मेरे वशीभूत हैं, सभी श्रेष्ठ हाथो तथा गजरत्न ऐरावत भी मैंने ले लिया है १६३।। क्षोरोदमथनोद्भूतमश्वरत्नममामरं । उच्च श्रवससज्ञ तुपरिणपत्यसमर्पितम् ॥६४ यानिचान्यानिदेवेषुगन्धर्वेपूरगेपुच । रत्नभूतानिभूतानितानिमय्येवशोभने ।६५ स्त्रीरत्नभूतत्त्वाँदेविलोकेमन्यामहेवयम् । सात्वमस्मानुपागच्छयतोरत्नभुजोवयम् ॥६६ मावाममानुजवापिनिशु भमुरुविक्रमम् । भजत्वचचलापांगिरत्नभूतासियत ॥६७ परमैश्वर्यमतुलप्राप्स्यसेमपरिग्रहात् । एतद्बुद्धधासमालोच्यमत्परिग्रहतांब्रज ॥६८ समुद्र मथन से निकला हुमा उच्चंथवा घोडा भी देवताओ ने विनय पूर्वक मुझे भेंट किया है ॥६४॥ देवतामो, गन्धवों और नागो के सभी रन इस समय मेरे ही हैं ॥६५॥ हे देवी ! लोक में तुम्हे हम स्त्री रत्न मानते हैं हम सभी रनो के भोगने वाले होने से, तुम रत्न स्वरूपा को हमारे घर माना चाहिये ॥६६॥ हे चश्रलक्टाक्ष वाली । तुम मुझे या मै अत्यन्त पराक्रमी माता निशुम्भ को स्वीकार परो, क्योकि तुम रत्न रूप हो ॥६७। मेरी देवी से सम्भु के दूत का क्यन ] क मना करने से तुम्हें अतुलनीय परमैश्वयों की प्राप्ति होगी, इस बात को बुद्धि से विचार कर मेरा ही चिन्तन करो ॥६८।। इत्युक्तासातदादेवीगंभीरातःस्मिताजगौ। दुर्गाभगवतोभद्राययेदं धार्यतेजगत् ॥६६ सत्यमुक्त त्वयानात्रमिथ्याकिचित्त्वयोदितम् । लोक्याधिपति शुभोनिशुभश्चापितादृशः ।।७० कित्यत्रयत्प्रतिज्ञातमिथ्यातक्रियतेकपम् । श्रूयतामल्पबुद्धित्वात्प्रतिज्ञायाकृतापुरा ॥७१ योमाजयतिसग्रामेयोमेदर्पव्यपोहति । योमेप्रतिवलोलोकेसमेभर्ताभविष्यति ॥७२ तदागच्छतुगुभोत्रनिशु भोवामहासुरः । मांजित्वाकिचिरेणाप्रपाणिगृहातुमेलघु ।।७३ अवलिप्तासिमैवत्वदेविन हिममाग्रतः । लोक्येक पुमास्तिष्ठे दग्रेशु भनिगुभयोः ।।७४ ऋषि ने कहा-दून की वान मुनकर विश्व को धारण करने वाली भगवती दुर्गा ने गम्भीर भाव पूर्वर कुछ हम पर पहा ॥६६॥ देवी बोली- है दून ! तुम्हारा कपन यथार्थ है, शुम्भ तोनो लोको के स्वामी हैं पौर निशुम्भ भी उन्ही के तुल्य हैं ॥७०॥ किन्तु मैंने एक प्रतिमा की हुई है, उमे हिम प्रकार तोड़ दूं? पम्प बुद्धि के वश में होरर जो प्रतिज्ञा में की है, उमे प्रवर करो 11७१।। जो पुरष युद्ध में मुझे परान परेगा, जो मेरा पं गमिष्टत परेगा और जो मेरे ममान बनवान् होगा, वही पुरुष मेरा पनि होगा ॥७२॥ पर वह गुम्भ या निगुम्म यही मारर उनमें जो समयं हो, वह मुझे परान पर प्रहग बरसे, विलम्ब न करें ॥७३॥ दून ने कहा-हे देवि ! तुम्हें मापन गयं है, मुझमे ऐमा न रहो, गुम्भ निशुम्भ का मामना सीनो सोरों में कौन पर सरता है ? ॥४॥ मन्येपामपिदत्यानांमवें देयानयंयुधि । शिन्तिममुपादेविपुिन प्रीत्वमेषिया ॥५

१६० ॥
। मार्कण्डेय पुराण
इ द्राद्या सकलादेवास्तस्थुर्येपानसयगे।
शुभादोनाकथतेपास्त्रीप्रयास्यसिसमुखम् ।।७६
सात्वगच्छमगैवोक्तापार्श्वशुम्भनिशुम्भयो ।
केशाकर्षणनिधूतगौरवामागमिष्यसि ।।७७
एवमेतद्वलीशुम्भोनिशुम्भश्चातिवीर्यवान् ।
किंकरोमिप्रतिज्ञामेयदनालोचितापुरा ।।७८
सत्वगच्छमयवोक्त यदेतत्सर्वमाहृत ।
तदाचमासुरेन्द्रायसनयुक्त करोतुतत् ॥७६
शुभ निशुभ का तो कहना ही क्या है, उनके अनुचर दैत्यो के साम
हो सय देवता मिलकर भी नहीं ठहर सकते तो तुम स्त्री होकर उनसे
प्रकार समाम करोगी॥७६।। इसलिये तुम मेरी बात मानकर शुभ-निर"
के पास चलो, अन्यथा में ही तुम्हारे पेश पकड कर घसीट ले चलूगा, नि
तुम्हारा सब गव पूर्ण हो जायगा |७७॥ देवी ने कहा-है दूत !
निशुभ दोनो ही नि सदेह ऐसे महा घलवान हैं, परन्तु क्या वर, पहिले
धात को न जानकर अप बुद्धि से ऐसी प्रतिज्ञा कर बैठी ॥७८|| इसलि
वहाँ जाकर मैंने जो कहा है, वह धादर पूर्वक उनसे कहो, इसके पश्चा
जो पुछ उचित समझे , वह करेंगे ॥७६।।
- धूम्रलोचन वध
इत्याच यंयचोदेव्या सदूतोमर्पपूरित ।
मामचष्ट समागम्यदत्यराजायविरतरात् ।।१
तस्यदूतस्यताषयमावण्यासुरगटतत ।
समोघ प्रादैत्यानामधिपधूम्रलोचनम् ॥२
हे प्रलोरणात्वस्वसंन्यपरिवारितः ।
तामानय यलाददुष्टावेशायणविहताम् ॥३

पाचन वध सकहा-गुन निसभ के पाम चलो ॥६॥ यदि तुम स्वेच्छा से उनके पास १८१ तत्परिनारणद कश्चिद्यदिवोत्तिष्ठतेपर । सहतव्योमरोवापियक्षोगन्धर्वएवदा ।।४ तेनाज्ञप्तस्तत शीघ्र सदं त्योधूम्रलोचन । वृत षष्टयासहस्राणाममुरारणाद्रुतययौ ॥५ सदृष्ट्वातातनोदेवीतुहिनाचलमस्थिताम् । जगादोच्चे प्रयाहीतिमूलशुम्भनिशुम्भयो ॥६ नचेत्प्रोत्याद्यभवतीमद्भारमुपैयसि । ततोबलान्नयाम्येपकेशाकर्षणविह्वलाम् ।। ऋषि ने कहा-देवी के यह वचन सुनकर दून को अत्यन्त क्रोधित हुमा और उसन दैत्येश्वर के पास जाकर सव वृत्तान्त उन्हे सुनाया ॥१॥ दून की दान मुनकर दैत्यराज शुभ ने क्रोध पूर्वक दैत्यो के अधिपति धूम्रलोचन स कहा ॥२॥ हे धूम्र लोचन | तुम सेना सहित वहां जाकर उन दृष्टा के केश पकड वह यहां घसीट लामो ॥ यदि कोई उसकी रक्षा में तत्पर हो, तो वह देवता, यम, गधर्व कोई भी हो, उसे मार डालो ॥४॥ अपि ने कहा-शुभ को माना सुनकर धूम्रलोचन साठ हजार दैत्या को साथ लेकर शीघ्र ही वही पला ॥५॥ और हिमाचल में बैठी हुई देवी से उस धूम्रलोचन ने उच्च स्वर न चनौती तो मैं तुम्हारे केश पकड कर बलपूर्वक वहाँ ले चलूगा ॥७॥ दैत्यश्वरेणप्रहितोवलवान्वलसदृत. । क्लान्नयसिमामेवतत क्तेिश्रोम्यहम् ।। युक्त सोम्यधावत्तामसुरोधूम्रलोचन । हुकारेणेवतभस्मसाकाराविकातत IE अमल महासन्यमसुराणांतांविका । वर्षायकस्तोरणस्तथालिपरश्वधे ॥१० ततावसट कोपाकृत्वानाद मुभैरवम् । मातासुरसेनायॉसिहोदेव्यास्तुवाह्न ११ १८२ ] { मार्कण्डेय पुराण कश्चित्करप्रहारेणदत्यानास्येनचापरान् । अाक्रम्यचरणेनान्यान्निजघानमहासुरान् ।।१२ केपाचित्पाटयामासनले कोष्ठानिकेसरी । तथातलप्रहारेणशिरांसिकृतवान्पृथक् ।।१३ विच्छिन्नवाहुशिरस कृतास्तेनतथापरे । पपीचरुधिरकोष्ठादन्येषाधुत केसरः॥१४ देवी ने कहा--तुम्हे दैत्यो के अधिपति शुभ ने यही भेजा है, तुम स्वय बलशाली और सेना के सहित यहां प्राये हो, यदि तुम बलपूर्वक ले जाना चाहोगे तो भी मैं तुम्हारा क्या कर सकू गो। ऋषि ने कहा- देवी की बात सुनते ही धूम्रलोचन उनकी ओर दौडा, परन्तु देवी के हुकार से ही भस्म होगया • तब उसकी सेना ने क्रोध करके देवी के ऊपर तीक्ष्ण बाण, परशु और दाक्ति की वर्षा की ॥१०।। यह देखकर देवी के वाहन सिंह ने क्रोध से पायमान होकर भयङ्कर गर्जन किया और असुर-सेना पर टूट पडा ॥११॥ उसने किसी यो पजे से, किसी को मुख से, विसी को होठ से आक्रमण पूर्वक मारा ॥१२॥ विसो का हृदय नप से चीर दिया, किसी का मस्तक हथेली के प्रहार से, पारीर से अलग क्यिा ।।१३।। अनेक मसुरो के बाहु मोर मस्तक छिन्न-भिन्न कर डाले मौर बहुतो का रक्न-पान कर लिया ॥१४॥ क्षणेनतद्वलसवंक्षयनीतमहात्मना । तेनकेसरिणादेव्यावाहनेनातिकोपिना ॥१५ शुखातमसुर देव्यानिहतधूम्रलोचनम् । वलपक्षयितकृत्स्नदेवीकेसरिणातत ॥१६ चुगोपद त्याधिपति शुम्भ'प्रस्कुरिताधर । प्राज्ञापयामासचतीचण्डमुण्डौमहासुरौ ॥१७ हेचएर हेमुण्डबलबहुभि परिवारितो। गच्छनत गत्वाचमासमानीयतालघु ॥१८ पदोश्वाप्यरतावादिय सशयोयुधि । रादारीपायुधे सर्वर मुरविनिहन्यताम् ॥१६

चण्डमुण्ड वध ]
[ १८३
तस्य हतायांदुष्टायाँसिंहेचविनिपातिते ।
शीघ्रगम्यताबद्धागृहीत्वातामथाम्बिकाम् ॥२०
क्षण भर मे हो उस सिंह ने असुरो को उस विशाल सेना को नष्ट कर
हाला ॥१५॥ पूम्रलोचन का देवी के द्वारा और सम्पूर्ण सेना का उनके वाहन
सिंह द्वारा मारा जाना सुनकर ॥१६॥ दैत्येश्वर शुभ अत्यन्त कोघ मे भर गया,
उसके होठ फडक्ने लगे और उसने चण्ड-मुएड को इस प्रकार आज्ञा दी ।।१७।।
हे चण्ड ! हे मुण्ड | तुम बहुत-सी सेना लेकर वहाँ जागो और स्त्री को तुरन्त
पकड लाओ ॥१८॥ उसके केश पकड कर खीच लामो या उसे बांध कर ले
प्रानो, यदि ऐसा न कर सको तो पूर्ण बल लगाकर उसका वध कर देना
॥१६॥ उसको और उसके सिंह को मार कर उसी दशा में यहाँ ले आनो १२०॥
७६-चण्डमुण्ड वध
प्राज्ञप्तास्तेततोद त्याच डमुण्डपुरोगमा. ।
चतुरंगवलोपेताययुरम्युद्यतायुया ॥१
ददृशुस्तेततोदेवीमीपद्धासाव्यवस्थिताम् ।
सिंहस्योपरिशैलेन्द्रशृ गेमहतिकाचने ॥२
तेदृष्ट्वातासमादातुमुद्यमचक्रुरुद्यता ।
माकृष्टचापासिघरास्तथान्येतत्समीपगाः ॥३
तत कोपचकारोच्चौर विकातानरीन्प्रति ।
कोपेनचास्यावदनमपीवरणंमभूत्तदा ।।४
भृकुटीकुटिलात्तस्याललाटफनकाद्रुतम् ।
पालीकरालवदनाविनिजावासिपाणिनी ।।५
विचित्रपटवागधरानरमालाविभूपरगा।
द्वीपिचर्मपरीधानाशुष्पमासातिमेरया ॥६

१८४ ) [ मार्कण्डेय पुराण - अतिविस्तारवदनाजिह्वाललनभीपणा। निमग्नारक्तनयनानादापूरितदिङ्मुखा १७ ऋषि ने कहा-शुम की ऐसी आज्ञा प्राप्त होते ही घएडमुण्ड अपने साथ चतुरगिणी सशस्त्र सेना लेकर वहाँ गये और उन्होंने देखा कि हिमालय के स्वणिम शिखर पर सिंहारूढ़ देवी मन्द-मन्द मुसकरा रही हैं ॥१-२॥ वह असुर और उनके साथी देवी को इस प्रकार स्थित देख, धनुप खंच कर और तलवार उठाकर उनको पकड़ने का प्रयत्न करने लगे ||३॥ तब देवी ने उन सबके प्रति अत्यन्त क्रोध किया, इस कारण देवी का मुख कृष्ण वर्ण का हो गया ॥४॥ फिर देवी ने जैसे ही भृकुटी चढाई, वैसे ही उनके ललाट से खङ्ग- पाश धारिणी कराल वदना भयङ्कर काली उत्पन्न हुई ॥५॥ वह विचित्र खट्- वाग युक्त, मुण्डमाल से सुशोभित, बाघम्वर धारण किये अत्यन्त शुष्क माम वाली जिह्वा को लपलपाती हुई भीतर की ओर पुसे हुए लाल नेत्र वालो उत्पन्न होती अपने घोर शब्द से दिशानो को परिपूर्ण करने लगी ।।६-७॥ सावेगेनाभिपतिताघातयतीमहासुरान् । सैन्येतत्रसुरारीणामभक्षयततद्बलम् ॥ पाणिग्राहाकुशनायोधघटासमन्वितान् । समादागैकहस्तेनमुखेचिक्षेपवारणान् । तथैवयोधतुरगैरथसारथिनासह । निक्षिप्यवक्त्रेदशौचर्वयत्यतिभैरवम् ॥१० एकजनाङ्कशेपुग्रीवायामथचापरम् । पादेनाक्रम्यवान्य मुरसान्यमपोथयत ॥११ तमुक्तानिदशस्त्राणिमहास्त्राणितथासुरै । मुखेनजग्राहरुपादशनमथितान्यपि ।।१ बलिनातवलसर्वमसुराणांदुरात्मनाम् । ममर्दाभक्षयच्चान्यानत्याश्चाताडयत्तथा ॥१३ असिनानिहता केचित्केचित्खट्वागताडिताः । जग्मुविनारामसुरादतानाभिहतारणे ।।१४ चण्डमुण्ड वध ] ( १८५ तदुपरान्त वह देवी दैत्य-सेना के ऊपर वेग सहित टूट पडी और सब असुरो को नष्ट करती हुई उनके भक्षण मे तत्पर हुई ॥८तथा पार्श्व रक्षक, अकुश हाथ मे लिये हुए योद्धा और घटानो के सहित ही हाथियो को पकड. पकड कर मुख में डालने लगी || तथा अश्व, रथ और सारथी सहित सबको मुग्व में डाल कर भयङ्कर रूप से चबाने लगी ॥१०॥ उस काली ने किसी के केश पकडे, किसी का कण्ठ दवाया और किसी की छाती पर चढ कर पैर की ठोकर से उसे मार डाला ॥११॥ उन असुरो के शस्त्रास्त्री को भी क्रोषपूर्वक मुव में लेकर दांतो से चवाने लगी ॥१२॥ वह काली उन महाबली एक विशाल शरीर वाले असुरो के दल को मसलते-मसलते किसी को भक्षण कर रही थी और किसी को मार कर भगाती थी ॥१३।। कोई असुर खड्ग के प्रहार से, कोई खट्वाग के द्वारा ताडित होने से और कोई दाँतो के अग्रभाग द्वारा चबाये जाने से नष्ट होगये ।।१४।। क्षणेनतन्महान्यमसुराणानिपातितम् । दृष्ट्वाचडोभिदुद्रावताकालीमतिभीपणाम् ॥१५ शरवर्महाभीमैीमाक्षीतामहासुर । छादयामासचक्रेश्चमु डक्षिप्त सहस्रश ॥१६ तानिचक्राण्यनेकानिविशमानानितन्मुखम् । वभुयथार्कविवानिसुवहूनिघनोदरम् ।।१७ ततोजहासातिरुपाभीमगैरवनादिनी। वालीकरालवनातदुर्दर्शदशनोज्ज्वला ॥१८ उत्यायचमहासिंहदेवीचडमघावत । गृहीत्वाचास्यकेशेपुशिरस्तेनासिनाच्छिनत् ।।१९ छिन्नेशिरसिदत्येंद्रश्चनादसुभैरवम् ॥२० उस असुर-संन्य के इस प्रकार क्षमणर मे नष्ट हो जाने से क्रोधिन हुमा चएड अत्यन्त वेग पूर्वक काली को प्रोर दौडा ॥१३॥ और उसने उन भीमाक्षी देवी पर भीपण वारण-वर्षा की तया सहस्रो चक्रो को घुमा कर उन्हें मान्छादित कर दिया ॥१६॥ वह सभी चक्र देवी के मुख में घुसने लगे और १८६ ] [ मागडेय पुगण मेघमण्डल में प्रविष्ट अनेक सूर्यमण्डलो के समान सुशोभित हुए ॥१७॥ फिर घोर निनाद करती हुई काली ने भीषण अट्टहास दिया, उस समय वह अपनी दुदर्श दन्त-प्रभा से दमकने लगी ॥१८॥ तदनन्तर वह देवो अपने महा वाहन सिंह पर खडी होकर चएड की पोर वेग से दौडी और उसके बाल पकड कर अपने खङ्ग से उसका शिर काट डाला ||१६॥ शीश कटते समय चण्डासुर ने घार गर्जना की, जिससे तीन लोक यसित होगये ॥२०॥ अथमुण्डोम्यधावत्तादृष्ट्वाचड़ निपातितम् । तमप्यपातयद्भूमौखट्वागाभिहतरुपा ॥२१ हतशेषततःसौन्यदृष्ट्वाचड निपातितम् । मु ड चसुमहावीर्यदिशोभेजेभयातुरम् ।।२२ शिरचण्डस्यकालीसागृहीत्वामौंडमेवच । प्राहप्रचण्डाट्टहासमिश्रमभ्येत्यचिण्डकाम् ॥२३ मयातवात्रोपहृतोचण्डमुडोमहापशू । युद्धयज्ञेस्वयशुम्भनिशुम्भवहनिष्यसि ।।२४ तवानीतीततोदृष्ट्वाचण्डमुण्डौमहासुरी। उवाचकालीकल्याणीललितचिण्डकावच ॥२५ यस्माच्च ड चमुण्ड चगृहीत्वात्वमुपागता । चामुण्डे तिततोलोकेख्यातादेवीभविष्यसि ॥२६ चण्ड को मरा हुमा देखकर मुण्ड काली की ओर दौडा, तब देवी ने उसे भी खट्वाग से काट कर गिरा दिया ॥२१॥ फिर बची हुई सेना भी चण्ड- मुएड का वध देखकर भयातुर हुई इधर-उधर भाग चली ॥२२॥ फिर वह कालो चण्ड-मुण्ड के पटे हुए मस्तक उठाकर चडिका के पास गई और प्रचण्ड अट्टहास पूर्वक बोली ॥२३॥ महा पशु चण्ड-मुण्ड नामक दो असुरो को मार पर यह उपहार प्रस्तुत है, प्रद शुभ निशुभ का वध आप स्वयं ही करना ॥२४॥ ऋषि ने कहा--उन चण्ड-मुण्ड नामक असुरो को उस दशा मे वहाँ देखर चंडिका देवी ने बालो मे पहा-२॥ देवी बोली- तुम बण्ड-मुण्ड रक्त वीज वध ] [ १८७ को लेकर यहां आई हो, इमलिये लोक में तुम्हारी 'चामुण्डा' नाम प्रसिद्ध होगा ॥२६॥ -रक्त बीज वध चडेचनिहतेद त्येमु डैचविनिपातिते । बहुलेपुचसन्येषुक्षयितेप्वसुरेश्वरः ॥१ तत वोपपराधीनता शुम्भ प्रतापवान् । उद्योगसर्वसन्यानाद त्यानामादिदेशह ॥२ मद्यसर्ववलत्या पडशीतिरदायुधा । क्बूनाचतुराशीनिर्यान्तुस्ववलेता ॥३ कोटिवीर्याणिपचाशदसुराणाकुलानिन । शतकुलानिघूम्राणानिर्गच्छतुममाज्ञया ।।४ कालकादौहदामौर्या कालकेयास्तथासुरा. । युद्धायसन्जानिर्यान्तुप्राज्ञयात्वरितामम ॥५ इत्गज्ञाप्यासुरपति शुम्भोभेरवशासन । निजंगाममहासन्यसहस्र बहुभिवृतः॥६ प्रायातडिकादृष्ट्वातत्सैन्यमतिभीपणम् । ज्यास्वनै पूरयामासधरणीगगनातरम् ॥७ ऋषि ने कहा--चएड-मुएड के साथ ही समस्त सेना के नष्ट होने के कारण मसुरेश्वर ॥१॥ प्रतापी शुम ने अत्यन्त क्रोधपूर्वक सम्पूर्ण मसुर सेना को एक साथ वहाँ जाकर युद्ध करने को माज्ञा दो ॥२॥ सम्भूरां एक साथ ही लेकर उदायुध नामर छिपासी भोर कम्बु नामक चौरासी दैत्य वहाँ जाय ।।। कोटिवीर्य नामक पचास वुल के घूम्रवरा नामर एक सौ कुन के मसुर मेरी भामा से निकले ॥४॥ पाल, दोहद मौर्य और कालरेय वश के प्रमुर भी गीन सर पर मयाम में पहुंचे ॥१॥ ममुरेश्वर गुम इस प्रकार माना देवर सहसों को राह में महासेना को लेकर स्य भी सग्राम के लिये रता॥

१८८ ]
| माण्डेय पुरा
उस अत्यन्त भयङ्कर संन्य-समूह को माता देखकर चडिका ने प्रत्यचा की घो
टड्कार से पृथिवी-माश को भर दिया 11७18
ससिंहोमहानादमतीवकृतवान्नृप ।
घटास्वनेनतन्नादमविवाचाप्यवृहयत् । ८
धनुाासहघटानानादापूरितदिङ्मुल।।
निनादर्भापरणाली जग्येविस्तारितानना [18
तन्निनादमुपथ त्यद त्यसैन्याश्चतुर्दिशम् ।
देवीसिंहस्तथाकालीशरो परिवारिता ॥१०
एतस्मिन्न तरेभूपविनाशायसुरद्विपाम् ।
भवायामरसिंहानामतिवीयंवलान्विता ॥११
ब्रह्म शगुहविष्णूनातथेद्रस्यचशक्तय ।
शरीरेभ्योविनिप्तम्यत पैश्व डिकांययु ॥१२
यस्यदेवस्ययद् पयथाभूपणवाहनम् ।
तद्वदेवहितच्छक्तिरसुरान्योद्धमाययौ ॥१३
हसयुक्तविमानस्थासाक्षसूक्मडलु ।
प्रायाताब्रह्मण शक्तिव ह्माणीसाभिधीयते ॥१४
हे राजन । फिर देवी के वाहन सिंह ने घोर गर्जन रिया और देवी ने
सपने घटा दे शब्द से उस नाद को द्विगुरण पर दिया ॥८॥ प्रत्यचा यो टयार
से पौर सिंह तथा घटा के नाद मे दिशाएँ परिपूर्ण होगई धौर तब कालो ने
भी घोर नाद पूर्वक प्रय-जयकर पिया ॥६॥ उस नाद को गुनकर देत्य-मेना ने
पटिका, पाली भोर सिंह को धागे से प्रोषपूर्वक घेर लिया ॥१०॥ हे राजन् ।
तभी पगुरो ये नाश पौर दवतामों के हित के त्रिय अत्यन्त यत, पराक्रम से
पुक्त ॥११॥ ब्रह्मा, शिव, विष्णु, शतिरेर और इन्द्र की शक्तिया उनो देह
प्रारही होकर उन्ही दवसापो को रूप पहाण पर पण्डिया के पिट पाई
॥१२॥ त्रिम दना बा को स्वरूप पोर पाहन पा, को हो पोर पान
पादिम गति ईक्तिको प्रमुगे ऐ राधाम परल को उधत १६ ॥१६॥

रक्तबीज वध ]
[ १८६
ब्रह्माजी को शक्ति हाथ मे पक्ष माला और कमण्डलु धारण रिये हा का
विमान पर प्रारद होकर वहाँ पाई, उस शक्ति का नाम ब्रह्माणी हपा ॥१॥
माहेश्वरीबृपारूढात्रिशूलवरधारिणी।
महाहिवलयाप्राप्ताचन्द्रलेखाविभूपणा ॥१५
कौमारीशक्तिहस्ताचमयूग्वरवाहना ।
यो मम्याययौदैत्यान विवागुहरूपिणी ॥१६
तथैवोटरावीशक्तिर्गरुडोपरिसस्थिता।
शखचक्रगदाशाङ्गखङ्गहस्ताभ्युपाययौ ॥१७
जने वाराहमतुलस्पयाविभ्रतीहरे. ।
शक्ति साप्याययौनप्रवाराहोविभ्रतीतनुम् ।।१८
नारसिंहीनृमिहस्य विभ्रतीसदृशवपुः ।
प्राप्तासिटाक्षेपक्षिप्तनक्षनमहतिः ॥१६
वचहस्नातथैवेद्रोगजराजोपरिस्थिता।
महस्रनयनाप्राप्तायथाशक्रस्तथैवसा ॥२०
तर परिवृतस्ताभिरीशानोदेवशक्तिभि ।
हन्यतामसुरा शीघ्र ममप्रीत्याहचडि काम् ॥२१
शिवजी की शक्ति निगून को धारण क्येि, चन्द्ररेस से सुशोभित,
ना के प्राभूपण धारण करके और बल पर चढ कर पाई, वह माहेश्वरी
नाम से प्रमिद हुई ॥१५॥ कौमार्ग शक्ति हाय में शक्ति धारए पिये, मुन्दर
मोर पर चढ कर माई ॥१६॥ विष्णु की शक्ति बाणवी संख, चक्र, गदा,
शाङ्गघनु पोर खड्ग धारण करके युद्ध के लिये आई ॥१७॥ यज्ञ वाराह
रूपधारी भगवान् विष्णु को शक्ति भी वाराहम्म मे वहाँ माई ॥१६॥
नारसिंही शक्ति नृसिंह रूप मे वहाँ आई, उनके सटाक्षेप से नक्षत्रों की पक्ति
घनायमान होगई ॥१९॥ इन्द्र की शक्ति हाय में बच घ रणव', हाथी पर
पढी हुई मुर क्षेत्र में माई, उसका नाम ऐन्द्रीशक्ति हमा॥२०॥ फिर उन मर
देव-शक्तियों के सहित चएिडकामे भगवान् शकर ने कहा-मेी प्रसन्नता के
निये इन सब प्रमुगेका गोत्र ही वध कर डाला ॥१॥

१९० ] [ माण्डेय पुराण ततोद वीशरीरात्त विनिप्कांतातिभीपणा । चंडिकाशक्तिरत्युग्नाशिवाशतनिनादिनी ॥२२ साचाहधूम्रजटिलमीशानमपराजिता। दूतत्वगच्छभगवन्पाश्वंशुम्भनिशु भयो ।॥२३ अहिशुम्भनिशुम्भचदानवावतिगवितो। येचान्येदानवास्तत्रयुद्धायसमुपस्थिता ॥२४ लोक्यमिन्द्रोलभतादेवा सतुहविर्भुज.। यूयंप्रयातपातालयदिजीवितुमिच्छथ ।।२५ बलावलेपादथचेद्भवतो युद्धकॉक्षिण। तदागच्छततृप्यतुमच्छिवा पिशितेनव. ॥२६ यतोनियुक्तोदूत्येनतयादेव्याशिवःस्वयम् । शिवदूतीतिलोकेस्मिस्तत साख्यातिमागता ॥२७॥ फिर देवो के देह से अत्यन्त भयंकर सो शिवानो के सम्मिलित नाद करने के समान भीषरण नाद करती हुई चण्डिका शक्ति प्रकट हुई ॥२२॥ तब उन अपराजिता चण्डिका देवी ने भगवान् शकर से बहा-हे भगवन माप शुभ निशुभ के पास जाकर दौत्य कर्म कीजिये ॥२३॥ वहां पहुंचकर शुभ निशुभ सहित सब युद्धाभिलाषी दैत्यो से कहिये ॥२४।। है दैत्यो ! इन्द्र तीनों लोको के पावें, देवता पुन: यज्ञ भाग को भोगने वाले हो और तुम यदि जीवन की इच्छा करते हो तो पाताल लोक मे जा कर रहो ॥२५॥ अथवा बल से गवित हुये तुम यदि युद्ध करना चाहते हो तो मानो, मेरी शिवाएं तुम्हारे रक्त पान से तृप्त होगी ॥२६॥ देवी ने शिवजी को दौत्य कर्म में स्वय नियुक्त किया, इसलिए उन्हे 'शिवदूती' कहा गया ॥२७॥ तेपिशु स्वावचोदेव्याः शख्यिात महासुराः । अमापूरिताजग्मुर्यत्रकात्यायनीस्थिता ॥२८ ततःप्रथममेवाग्नेशरश्चशक्त्यष्टिभिः । ववरुद्धतामस्तिदेवीममरारय. ॥२६ रक्तवीज वध ] साचतत्प्रहितान्वारणाञ्छूलशक्तिपरश्वधान् । चिच्छेदलोलयाध्मात धनुर्मुक्तर्महेभि ॥३० तस्थाग्रतस्तथाकालीमूलपाशविदारितान् । खट्वांगपोयितांश्चारीन्कुवंतीव्यचरत्तदा ॥३१ कमडलुजलाक्षेपहत वीर्यान्हतौजस । ब्रह्माणी वाकगच्छत न्येन पेनस्मघावति ॥३२ माहेश्वरीत्रिशूलेनतयाचक्रे गोष्णवो। दत्याजघानकौमारीतथाशक्त्यातिकोपना ॥ ३ ऐन्द्रीकुलिशपातेनशनशोद त्यदानवा । पेतुर्विदारिता पृथ्व्यारुधिरोधप्रवर्षिण ॥३४ तु डप्रहारविध्वस्तादंष्ट्राग्रक्षतवक्षस । वाराहमूान्यपतश्चक्रे गचविदारिताः ॥६५ शिवजी के द्वारा सन्देश प्राप्त करके वह घोर प्रमुर क्रोध पूर्वर उन देवी कात्यायनी के समीप पहुंचे ।।२८।। फिर वे उन देवी के समक्ष बाण, शक्ति पौर ऋपि आदि की भयकर वर्षा करने लगे ॥२६॥ मसुगे द्वारा चलाये गय सभी शस्त्रास्त्रो को चण्डिका देवी ने अपने बडे-बडे वाणो से लीला पूवर काट सला ॥३०॥ तभी उन चण्डिवा देवी के सामने वाली देवी रिमी पमुर को पूल से विदीर्ण वरती पोर खट्वाग से मारती हुई धूम रही थी ॥३१॥ जिस जिस भोर शत्रुगए दौड रहे थे, उसी-उसी मोर जाकर ब्रह्माणी शक्ति उन पर जल छिड़क पर उन्हें वीर्य और तेज से होन करन लगी ॥३२॥ माहेश्वरी विभून से, वैष्णवी चक्र में प्रौर कौमारी शक्ति पे द्वारा ही बहुत से दैत्या को मार रही थीं ॥३३॥ ऐन्द्री शक्ति रे वय प्रहार म ताडित हुए संबडो दस्य रक्त वमन परते-करते धगयी होने लगे ॥३४॥ वाराह शक्ति के मुख प्रहार पौर दष्ट्रा ने अप्रभाग से ताडिन ममुरगण हृदय विगने के कारण पृथिवी पर गिरने लगे ॥३॥ नसंविदारिताधान्यान्भक्षयतीमहामुगन् । नारसिंहीचचाराजीनादापूरणदिगतरा ॥३६

१९२ ]
[ माण्डेय पुगण
चडाट्टहासरसुरा शियदूत्यभिदूपिता ।
पेतु पृथिल्यापतितास्ताश्वखादाथसातदा ॥३७
इतिमातृगणक्रुद्ध मई यतमहासुरान् ।
दृष्ट्वाम्युपायैवि विपनशुर्देवारिसनिका ३८
पलायनपरान्दृष्ट्वादेत्यान्मातृगणाद्दितान् ।
योधुमभ्यायोक्खोरक्तबीजोमहासुरः ॥३६
रक्तबिंदुर्यदाभूमौपतत्यस्यशरीरत ।
समुत्पततिमेदिन्यास्तत्प्रमाणोमहासुर ॥४०
युयुधेसगदापारिपरिंद्रशक्त्यामहासुर.।
ततश्च न्द्रीस्ववजे गरक्तबीजमताडयत् ।।४१
कुलिशेनाहतस्याशुबहुसुस्रावशोणितम् ।
समुत्तस्थुस्ततोयोधास्तद्रूपास्तत्पराकमा ४२
यावत पतितास्तस्यशरीराद्रक्तविदव ।
तावत पुरुषाजातास्तद्वीर्यबलविक्मा ॥४३
नारसिंही शक्ति अपने गर्जन से दिशानी और प्राकाश को परिपूर्ण
करके दैत्यो को नख से विदारण कर भक्षण करते करते, इस प्रकार वह युद्ध
भूमि मे घूम रही थी ॥३६॥ शिवदूती के प्रचण्ड अट्टहास से अभिभूत होकर
राक्षसगण धराशायी होने लगे और फिर उन गिरे हुये असुरो का वह शिवदूती
भी भक्षण करने लगी ॥३७॥ इस प्रकार उन्हें क्रोध पूर्वक मर्दन करते देख
कर दैत्य-सेना भाग पडी ॥३८॥ उनको भागता हुआ देख कर रक्त बीज
नामक दैत्य कोरपूर्वक युद्ध के लिये प्राश ॥३६।। जैसे ही उस असुर के शरीर
से रक्त की एक दूंद पृथिवी पर टपकती वैसे ही उसी के समान एक दस्य
उत्पन्न हो जाता ॥४०॥ गदा ग्रहण पूर्वक वह असुर ऐन्द्री शक्ति के साथ युद्ध
करने लगा तब ऐन्द्रो शक्ति ने उस पर बच-प्रहार किया ॥३१॥ बज प्रहार
के कारण रक्तवीज वे देह से टपरे हुए रक्त से उसी के समान रूप और
पराक्रम वाले पनेक वीर उदान्न हो गय ॥४२॥ रक्त की जितनी बूदें टपगी

रतबीज बध ]
[ १६३
-
उतने ही योद्धा उत्पन्न हुए, वे सब योद्धा वल, वीर्य, पराक्रमादि में रक्तबीज
के ही समान थे ।।४३॥
तेचापियुधुस्तमपुरुषारक्तमम्भवा ।
सममातृभिरत्युग्र शस्नपातातिभीपणम् ।।४४
पुनश्चवज्रपातेनक्षतमम्यशिरोयदा।
ववाहरक्त पुरुपास्ततोजाता सहस्रश ॥४५
वैष्णवोसमरेचनचक्रे गाभिजधानह ।
गदयाताडयामासऐन्द्रोतमसुरेश्वरम् ।।४६
वैष्णवीचक्रभिन्नस्यरुधिरनावसम्भवः ।
सहस्रशोजगद्व्याप्त तत्प्रमाणेमहासुरं ॥४७
शक्त्याजधानकौमारीवाराहीचतथासिना।
माहेश्वरीमिमूलेनरक्तबीजमहासुरम् ॥४८
सचापिगदयादत्य सर्वाएवाहनपृथक् ।
मातृ कोपसमाविष्टोरक्त जोमहासुरम् ॥४६
रक्त की बूदो से उत्पन्न हुए योद्धागण उन मातृगणो के साथ प्रत्यल
तीक्षण शस्त्रो द्वारा घोर सग्राम करने लगे ॥४४॥ जब ऐन्द्री शक्ति ने उसके
मस्तर वो पुनरि दिन्न पिया, तब क्षत स्यान से प्रवाहित हुए रक्त ने सहस्रो
प्रमुर उत्पन्न हो गये ॥४५॥ वैष्णवी शक्ति ने उसे चक्र में तथा ऐन्द्री शक्ति
ने बच से मारा ।।४।। वैष्णवी शक्ति के चक्र से क्ट पर उस दैत्य के देह
में जो रक्त प्रवाहित हुआ, उनसे उमी के समान उत्पन्न हुए सह्या विकरात
अमुगें से यह ममार व्याप्त हो गया ।।४७॥ तव उस रक्तगेलासुर को कौमारी
अपनी शनि से, वाराही सङ्ग से प्रौर माहेश्वरी त्रिशून से मारने लगी।
तब यह पोर राम रतीज भी सब मातृगणो पर गदा द्वारा प्रहार पग्न
सगा ॥४il
तस्याहतस्यपहुधागक्तिगूलादिभिभुवि ।
पपातयोऔरतोषस्नेनासन्तसोमुरा ॥५०

[ मावंण्डेय पुराण तंश्वासुरसृक्स भूतैरसुरै मकल जगन् । व्याप्तमासीत्ततोदेवाभयमाजग्मुरत्तमम् ।।५१ तान्विपणान्सुरान्दृष्ट्वाचडिकाप्राहमन्वरा । उवाचकालीचामु डेविस्तीर्ण वदनकुरु ॥५२ मच्छम्त्रपातसम्भूतानक्तविदून्महासुरान् । रक्तवीजात्प्रतीच्छत्ववाणानेनवेगिना ।।५३ भक्षयतीचररणेतदुत्पन्नान्महासुरान् । एवमेपक्षयदत्यःक्षीणरत्तोगमिष्यति । भक्ष्यमारणास्त्वयाचोग्रानैवोत्पत्स्यतिचापरे ।।५४ इत्युक्त्वाताततोदेवीशूलेनाभिजधानतम् । मुखेनकालीजगृहेरक्तवीजस्यशोरिणतम् ॥५५ शक्ति, शूर आदि विभिन्न प्रकार के अस्त्री से पाहत हुए उस रक्तबीज के देह से पृथिवी पर पतित हुए रक्त बिंदुप्रो द्वारा सैकडो प्रसुरो की उत्पत्ति हुई ॥५०॥ उसके रक्त स उत्पन्न हुए असुगे से सम्पूर्ण विश्व व्याप्त होगया, इससे देवगण अत्यन्त भयभीत हुए ॥५१॥ तव देवतायो को भयभीत देख कर चण्डिका ने काली से कहा है चामुण्डै ! तुम अपना मुख फाडो ॥५२॥ और मेरे द्वारा शस्त्र मारने से गिरती हुई रक्त की दूं दो या उससे उत्पन्न होने वाले असुरो को वेग पूर्वक अपने मुख मे लेती जाम्रो ॥५३।। तथा उससे उत्पन्न हुए राक्षसो का भक्षण करती हुई युद्ध भूमि मे घूमती रही, इस प्रकार रक्त के क्षीण होने पर ही यह नष्ट हो सकेगा ॥५४॥ इस प्रकार तुम उसका भक्षण प्रारम्भ करोगी तो उसका पुन उत्पन्न होना हक जायगा, ऋषि ने कहा- वाली के प्रति ऐमा कह कर चण्डिका देवी ने उस असुर को त्रिशूल ग पाहत किया और उससे गिरे हुए रक्त को कालो ने अपने मुख म ग्रहण कर लिया ॥१५॥ ततोसावाजघानाथगदयातप्रचडिकाम् । नचास्यावेदनाचक्रेगदापातोल्पिकामपि ।।५६ रक्तवीज बघ ] । १६५ तस्याहतस्यदेहात्तुबहुसुस्रावशोणितम् । यतस्तत स्वक्त्रं गचामुण्डासप्रतीच्छती ॥५७ मुखेसमुद्गतायेस्यारक्तपातान्महासुरा । ताचखादाथचामुण्डापपौतस्यचशोणितम् ।।५८ देगेशूलेनचक्र रणवाणैरसिभिरिप्टिभिः । जघानरक्तबीजतचामुण्डापीतशोरिणतम् ।।५६ सपपातमहीपृष्ठेशस्त्रसहतितोहतः। नीरक्तश्चमहीपालरक्तबीजोमहासुर ।।६० ततस्तेहर्पमतुलमवापुस्त्रिदशानृप ।। तेपामातृगणोमत्तोनन सृड मदोद्धत ॥६१ फिर उस रक्तबीज ने देवी पर गदा का प्रहार किया, परन्तु उमसे देवी को किंचित् भी वेदना नहीं हुई ॥५६॥ इधर रक्तबीज के देह से गिरते हुए चामुण्डा अपने मे निये जा रही थी 1॥५७॥ काली के मुख में गिरे हुए रक्त से जो असुर उत्पन्न हुए उनका भी उसने भक्षण कर लिया ॥५८।। जय इस प्रकार चामुण्डा ने रक्तबीज का रक्त पान रिया तव चण्डिका ने उसे शूल, चक्र, वारण, खङ्ग पौर ऋषि से मारा ||५|| फिर वह घोर असुर शास्त्रो द्वारा क्षत-विक्षत तया रक्त-हीन होकर पृथिवी में गिर पहा ॥६॥ (हे राजन् ! इस पर देवताओं को महान् हर्ष हुमा और वे मातगा जन असुरो का रक्त पान करके मदोन्मत हुई नाचने लगी ॥६१॥ रक्तको मुख ८१-निशुम्भ वध विचित्रमिदमास्यातभगवन्भवतामम। देव्याचरितमाहात्म्यरक्तबीजवधाश्रितम् ।।१ भूयश्वेच्छाम्यहथोतु रक्तबीजेनिपातिते । चकारगुम्भोयत्कर्मनिशुम्भश्चातिलोपन २॥

[ मार्कण्डेय पुराण धकारकोवमतुलरक्तबीजेनिपातिते । शुम्भासुरोनिशुम्भश्नहतेष्वन्येषुचाहवे ॥३ हन्यमानमहामन्य विलोक्यामपंमुद्वहन् । अम्यधावन्निशुम्भोथमुख्ययासुरसेनया ॥४ तस्याग्रतस्तथापृष्ट पाश्र्वयोश्चमहासुरा । सदृष्टौष्टपुटा ऋद्धाहतु देवीमुपाययु ॥५ आजगाममहावीर्य शु भोपिस्ववलत । निहतु चडिकांकोपात्कृत्वायुद्ध तुमातृभि ।।६ ततोयुद्धमतीवासीद्देव्या शु भनिशुम्भयो । शरवर्पमतीवोन मेघयोरिववर्षतो ॥७ राजा ने कहा-है भगवन् अापने मुझ से रक्तबीज के वध के विषय मे देवी चरित्र के अद्भुत माहात्म्य का वर्णन किया ||शा प्रयन्त क्रोधित सभु ने रक्तबीज के मारे जाने पर जो कार्य किया, मैं अब उसे सुनना चाहता हूँ ॥२॥ ऋपि बोले-युद्ध मे रक्तबीज के समाप्त होने पर एक विभिन्न सेनामो के मारे जाने पर दोनो राक्षस शुभ और निशुभ बहुत क्रोधित हुए ॥३।। इम प्रकार उम सभी सेना को मरता देखार निशु भासुर अत्यन्त क्रोध सहित राक्षसों को मुख्य सेना को साथ लेकर दवो के सामने दौड। ॥४॥ तथा उस पोर मम्मुख, पृष्ठ भाग में एव अगल-बगल बडे बडे राक्षस अपने पोठो को भीचते हुए क्रोध सहित देवी को समाप्त करने के लिए माये ॥५।। सत्पश्चात् महायलशाली ममुर शुभ अपनी सेना को साथ लेकर देवी के गणो पे साथ युद्ध करत हुए देवी को मारने के निमित्त कोयपूर्व पाया ॥६॥ स्व दो मेयो के गमान अत्यन्त प्रवाह वारण-वर्षा करते हुए मुभ व निशुभ पा देवी व साप भयबर युद्ध होने लगा । चिच्छेदास्ताम्मदरास्ताम्याचडिस्कारोवरः। तायामास चागेपुरास्त्रीवरसुरैश्वरौ ।। के निशुम्भ वध ] [ १६७ निशुम्भोनिशितंखड्गचर्मचादायसुप्रभम् । ग्रताडयन्मूनिमिहदेव्यावाहनमुत्तमम् ।। ताडितेवाहनेदेवोक्षुरप्रेणासिमुत्तमम् । निगुम्नस्याशुचिच्छेदचर्मचाप्यप्टचद्रकम् ॥१० छिनचरिणयङ्ग चक्तिचिक्षेपसोमुरः । तामप्यस्यद्विधाचक्रे चक्र णाभिमुग्वागताम् ॥११ कोपाध्मातोनिशुम्भोयनजग्राहदानव. । आयातमुष्टिपातेनदेवीतचाप्यचूर्णयत् ॥१२ अथादायगदामोपिचिक्षेपचडिकांप्रति । सापिदेव्यानिशूलेनभिन्नाभस्मत्नमागता ॥१३ तन परशुहस्ततमायांतदत्यपुङ्गवम् । पाहत्यदेवीवारणीधरपातयतभूतले ॥१४ चण्डिका देवी उन दोनो राक्षमो द्वारा चलाये गये वालो को अपने वागों के द्वारा जन्दी से काटकर अपने शत्रा मे दोनो विकराल प्रमुरी के गो पर वार करने लगीं ॥८॥ तेज धार वालो तलवार और चमवती दाल निशुम न देवी के वाहन सिंह के मस्तर में मारी ॥६॥ वाहन पर माक्रमण हुमा देवकर देवी ने पुरष नाम के पत्र से निशुभ वी तेज तलवार काटकर उमदी पहचन्द्रा दाल भी काट डाली ॥१०॥ तलवार और दान के कट जाने पर पमुर निशुभ ने देवी पर शक्ति घोडी लेक्नि देवी ने चक्र द्वारा जम सम्मुर माती हुई पनि के भी दो दुरडे कर दिये ॥११॥ फिर क्रोष में गरे हुए राक्षस ने मूल लार बनाया प्रोर देवी ने प्राण मे भूर को भी घूमा मारकर चूरणं कर डाला ।।१२।। तब उन दानव ने घुमावर गदा चलाई, किन्तु देवी ने उम गदा को भी अपने विगल मे गएड वसं भस्म कर दिया ॥१३॥ फिर जब वह महादानव परमा हाप में लेकर प्रापा दो देवो ने उसे वापी में पाचन पर परती पर गिरा दिया ॥१४॥ तम्मिनिपतिनभूमोनिशुम्भ भीमविक्रमे। भ्रातर्यतीवमा सन्प्रययौनुमम्बिाराम् ॥१५ [ माय पुराण सरथस्थस्तदात्युच्च गृहीतपरमायुध । भुजैरष्टाभिरतुलाप्यारोपवभौनभ ॥१६ समायांततमालोक्यदेवीशग्वमवादयत् । ज्याशब्द चापिधनुपश्चकारातीवदु सहम् ।।१७ पूरयामासक्कुभोनिजघटास्वनेन । समस्तदंत्यसैन्यानातेजोवविधायिना ॥१८ तत सिंहमहानादस्त्याजितेभमहामदः। पूरयामासगगनगातथैवदिशोदश ।।१६ तत कालीसमुत्पत्यगगनक्ष्मामताडयत् । कराभ्यातन्निनादेनप्राक्स्वनास्तेतिरोहिता ॥२० अट्टाट्टहासमशिवशिवदूतीचकारह । तै शब्द रसुरास्त्र सु शुम्भ कोपपरययौ ॥२१ महाबली भर्यकर भाई निशुभ को पृथ्वी पर गिरता देख कर राक्षस शुभ अत्यन्त क्रोधपूर्वक देवी को मारने पाया ।।१५।। तथा बहुत लम्बी महा पराक्रमयुक्त अष्टभुजाओ सहित और बडे बडे अस्त्र लेकर रथ मे बैठकर वह सम्पूर्ण प्राकाश मे फैला हुआ दीखने लगा ॥१६॥ उसे माता देखकर देवी ने शख बजाकर अत्यन्त असहनीय शब्द धनुष की प्रत्य चा से किया ॥१७॥ तथा सम्पूर्ण असुरो की सेना का गतिशील विनाश करने वाले मपने घन्टे की शन्द- ध्वनी से सम्पूर्ण दिशाम्रो को भर दिया ॥१८॥ अननन्तर सिंह ने भी हाथियों के महामद को नष्ट करने वाले महानाद से प्राकाश, पृथ्वी एव दस दिशामों को पूण कर दिया ||१६ फिर देवी काली ने आकाश में उछलकर अपने दोनो हाथो से पृथ्वी पर प्राघात किया जिसकी शब्द ध्वनि से पहली समस्त साब्द-ध्वनि मन्द हो गयो ।२०॥ शिवदूती भी शत्रु राक्षसो का प्रमगल करने वाली तेज हसी में हमी, उस के शब्द से राक्षस लोग दुखी हुए पौर शुभ पत्यन्त क्रोधित हुप्रा ॥२॥ शम्भनागत्ययाशक्तिमुक्ताज्वालातिभीपणा। प्रायांतीवह्निकूटामासानिररत रहोल्कया ।।२३

निगुम्भ वध
[ १९१
सिंहनादेनगुम्भस्यव्याप्त लोकत्रयांतरम् ।
निर्यातनि.स्वनोपोरोजितवानवनीपते ॥२४
गुम्भमुक्ताञ्छगन्देवीशुम्भस्तत्प्रहिताञ्छरान् ।
चिच्छेदस्वगरेर शतशोथमहबग ॥२५
तत साचण्डिकाकु दाशूलेनाभिजघानतम् ।
सतदाभिहतोभूमौमूछितोनिपपातह ॥२६
ततोनिमः सप्राप्यचेतनामात्तकामुकः।
प्राजघानशरैर्दै वीकालीकमरिणतया ॥२७
पुनश्वकृत्वावाहूनामयुतदनुजेश्वरः ।
चक्रायुतैनदितिजस्छादयामामचण्डिकाम् ॥२८
भाशय में स्थित देवगण तव वय-जय सन्द करने लगे जब अम्बिका
ने शुभ से कहा "दुरात्मन् ! ठहर, टहर" ॥२२॥ अनुर गुंभ ने अपन भयंकर
तेज पग्नि वाली शक्ति छोडी, अग्नि के समान माती हुई उन शक्ति को देवी
ने महोल्वानाम्नी शक्ति से काट कर दूर फेंक दी ॥२३॥ फिर तीनों लोक
मुम्भ दानव के पिहनाद से पूर्ण हो गये, तव है प्रवनीपाल ! मावास से उत्पन्न
विद्युत् को भयानक शब्द-ध्वनि ने मुंभ के नाद पर विजय पानी ॥२३॥
सुम द्वारा चलाये गये मी सहस्र सरों को देवी ने अपने तेज बागों से वाट
डाला और देवी द्वारा चलाये गये सरही सहस्त्रो वारणों को शुन ने भी अपने
तेज वाणों से काट डाला ॥२॥ तत्पश्चात् चरिडा देवी ने कोर सहित
मूल द्वारा गुंन को घायल दिया और मूल से पाहत प्रमुर गुंम प्रचेत होकर
घरती पर गिर गया ॥२६॥ इसके बाद चेतना माने पर निशुभासुर धनुप
धारणों से देवी काली पोर सिंह को मात करने लगा ॥२७॥ फिर रामसराज
दस्य निमुन ने दम हजार भुजाएं धारण की भौर उनसे चक व युद्धाम्यों
द्वारा चएिडा देवी पर छा गया ॥२८॥
ततोमगवतीक द्धादुर्गादुर्गातिनागिनी ।
चिच्छेदतानिचकारिणस्वशरः सायश्चितान् ॥२६॥

२०० ]
[ मागडेय पुराण
ततोनिशु भोवेगेनगदामादायचण्डियाम् ।
अभ्यधावतवंहतु दैत्य सेनासमावृत ॥३०
तस्यापततएवायुगदाचिच्छेदचण्डिका।
खङ्गनशित वारेणसचशूलसमाददे ॥३१
शूलहस्ततमाया निशु भममराईनम् ।
दिविव्याधशूलेनवेगाविद्ध नचण्डिका ॥३२
भिन्नस्यतस्यशूलेनहृदयानि सृतोपर ।
महाबलोमहावीर्य स्तिष्टेतिपुरुपोवदन् ॥३३
तस्यनिष्कामतोदेवीप्रहस्यस्वनवत्तत ।
शिरश्चिच्छेदखगनतत सावपतद्भुवि ॥३४
तत सिंहश्चयादोनदष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान् ।
असुरास्तास्तथाकालीशिवदूतीतथापरान् ॥३५
इससे क्रोधित हुई सकट नाशिनी देवी दुर्गा ने उन सम्पूर्ण वाणो और
चक्र को काट डाला ॥२६॥ उसके पश्चात् निशुभ दैत्यो की सेना सहित गदा
लेकर उन देवी को नष्ट करने के लिए अत्य त तेजी से दौडा ॥३०॥ तब निशुभ
राक्षस की उस पाती हुई गदा को चण्डिका देवी ने प्रत्यत तेज धार बाली
तलवार से काट डाला फिर निशु भ ने शूल ले लिया ॥३१॥ फिर शूल लेकर
सामने पाते हुए असुर निशुभ को देवी ने महान् गति से अपना त्रिशूल चला
पर हुवय के बीच बेघ दिया ॥३८॥ तो शूल से बिधे असुर हृवय से एक
दूसरा महावली और महावीर्यवान् पुरुप देवी से 'टहर' शब्द कहता हुआ
निकला
।।३३।। तव देवी ने हमकर नाद करते हुए उस बाहर आये हुए असुर का सिर
तलवार से काट डाला और वह धरती पर गिर पडा ॥३४। इसके बाद सिंह
तन दातोंसे गर्दन चवाकर असुर का भक्षण करने लगा नथा शिवदूती और
वाली अन्य दूसरे राक्षसो का भक्षण करने लगी ॥३।।
कौमारीशक्तिनिभिना केचिन्नेशुमंहासुरा ।
ब्रह्माणीमत्रपूनेनतोयेना येनिगकृता ॥३६

शुम्भ वध ] [ २०१ माहेश्वरीत्रिशूलेनभिन्ना:पेतुस्तथापरे । वाराहीतुडघातेनकेचित्त्चूर्णीकृताभुवि ।।३७ खंडखडचचक्रे रणवैष्णव्यादानवाःकृताः। वज्र णचंद्रोहस्ताग्रविमुक्तेनतथापरे ।।३८ केचिद्विनेशुरसुरा केचिन्नष्टामहाहवात् । भक्षिताश्चापरेकालीशिवदूतीमृगाधिपं. ॥३६ कई विकराल राक्षस कोमारी-शक्ति के घल से कटकर मरगये । ब्रह्माणी के मत्रपूत जल को छूने से ही अपने आप अनेक शक्षस समाप्त हो गये ॥३६॥ माहेश्वरी के त्रिशूल की चोट से बहुत से अनेक दानव अलग-अलग होकर गिर पडे और कोई-कोई दानव वाराही के मुख के आघात से पिमकर भूमि पर गिर गये ॥३७।। वैष्णवी ने चक्र से अन्य दूसरे असुरो को टुकडे. टुकडे कर डाला और ऐन्द्री द्वारा छोडे गये वज्ज से घायल होकर ॥३८॥ उन दानवो मे कोई समाप्त हुए और कोई-कोई महायुद्ध से भाग गये । तथा जो बचे, उनका काली, शिवदूती और सिंह ने भक्षण कर लिया ॥३॥ ८२.शुस्भ वध निशुम्भनिहतंदृष्टाभ्रातरंपारणसमितम् । हन्यमानंबलचैवशम्भःकद्धोद्रवीद्वचः॥१ बलावलेपादुप्टेत्वंमादुर्गगर्वमावह। अन्यासांवलमाश्रित्ययुध्यसेयातिमानिनी ॥२ एकंवाहजगत्याद्वितीयाकाममापरा। पश्यताटुष्टमय्येवविश त्योमद्विभूतयः ॥३ ततःसमस्तास्तादेव्याब्रह्माणीप्रसुखालयम् ॥ तस्यादेव्यास्तनौजग्मुरेकैवासीत्तदाविका ॥४ २ | मावण्डेय पुराण - अहविभूत्यावहुभिरिहरूपदयास्थिता ।। तत्सत्तमयकवतिष्ठाम्याजोस्थिरोभव ।। तत प्रवृतेयुद्ध देव्या शुम्भस्यचोभयो । यश्यतासर्वदेवानाममुराणाचदारुणम् ॥६ शरव शित शस्त्रस्तथाचास्त्रं सुदारुण । ततोयुद्धमभूद्ध य सर्वलोकभयकरम् १७ ऋषि बोले-शुभ ने प्राणा के समान भाई निशुभ और सेना को मग देवकर क्रोषपूर्वक कहा ।।१।। हे दुई दुर्गे । तू बल का अभिमान न पर, तू दूनगे के बल पर ग्राश्रित होकर मानवो के समान युद्ध करती है ॥२॥ दधी ने कहा--पर दुष्ट | इस समर म केवल एक मैं ही हूँ, मेरे अलावा दूपरा कौन है ? देख, यह मेरी सब विभूति मुझ मे ही विद्यमान हे ॥३॥ 'ऋपि चहा--इसके पश्चात् ब्रह्माणी यादि समस्त पाक्तियों देवी की देह में विलीन हो गई और तब अकेली अम्बिका हौ सम्मुख रह गई ॥४॥ फिर देवी बोली--- अरे शुभ । इस स्थान पर मैं अपनी विभूति द्वारा अनेक रूप में विद्यमान थी, अब उन सभी रूपो को नष्ट करके मैं युद्ध-क्षेत्र में अकेली ही रही हूँ, तू स्थिर हो ।।५५ ऋषि ने कहा--"तदनन्तर यह सब देखते हुए देवता और दानवो के सामने असुर शुभ और देवी दानवो का भयकर युद्ध होने लगा ॥६॥ फिर देवी और शु भासुर मे परस्पर बाणार्या, शोणित व दारण आत्रो के प्रहार द्वारा ऐसा युद्ध हुमा, जो सम्पूर्ण लोगो में भय उत्पन्न करने वाला था, दिव्यान्यस्मारिणशतशोमुमुचेवान्यथाविका । बभजतानिदै त्येंद्रस्ततत्प्रतोघातकर्तृभि the मुक्तानितेनचास्त्राणिदिव्यानिपरमेश्वरी। वभञ्जलीलयैवोपहुँकारोबारादि भ He तत शरशतद वीमाच्छादयतसोसुर । साचतत्कुपितादेवीधनुचिच्छेदचेपुभि ॥१.

गुन्म [ २०३ छिन्नेधनुपिद त्येंद्रस्तयाशक्तिमथाददे । चिच्छेददेवीचक्ररेणतामप्यस्यकरेस्थिताम् ॥११ ततवङ्गमुपादायशतचन्द्रचभानुमत् । अभ्ययावतताहतुदंत्यानामधिपेश्वरः ॥१२ तम्यापनतएवाशु खङ्ग चिच्छेदच डिका । धनुर्मुक्त शितर्वाणैश्वर्मचार्ककरामलम् ॥१३ प्रश्वाश्वपातयामासरथसारथिनासह । हताश्व.मतदाद त्यश्छिन्नधन्वाविसारथिः । जग्राहमुगद्रघोरमविकानिधनोद्यत ॥१४ मम्बिका द्वारा छोडे गये पात-शत दिव्य अस्त्रों को उस दैत्यराज शुभासुर ने उनको काटने वाले प्रस्त्री से मभी मन्त्रों को काट डाला ।।८।। पौर शुभमुर द्वारा छोडे गये सभी दिव्यास्त्रो को देवी चण्डिका ने अपनी सीता से व हुंकार द्वारा तोड डाला | फिर उन मयर राक्षम ने सैकडो वालों की वर्षा द्वारा देवी को मान्छादित कर दिया तब देवी ने भी क्रोध से वाणों द्वारा उमका धनुष काट डाला ।।१०॥ धनुष क्ट जाने पर शुभ रासस ने पक्ति ले ली, किन्तु देवी ने उस शक्ति को भी चक्र से उसके हापों ही में माट डाला ।।११।। तब वह देवराज ने दीप्तियुक्त विशिष्ट चन्द्र ढात मौर सलवार लेकर देवो पर पाक्रमण वाला हुमा ॥१२॥ तब देवीने शन को तनवार एवं मूर्य की किरणों के समान उज्ज्वल टाल को धनुष मे तीक्षण वारा छोड. कर काट डाला ।।१३। जब उम राक्षम-राज के रप के घोडे निद हो गये, अनुप सण्डित होगया और सारपी मी नष्ट हो गया, तब वह भयकर मुगदर लेर पम्बित्रा को मारने के लिये तैयार हुप्रा ॥१४॥ चिच्छेदापततस्तस्यमुद्गरनिशितै सरं तथापिसोन्यधावत्तामुष्टिमुद्यम्यवेगवान् ॥१५ ममुष्टिपातयामामहृदयेदं त्यपुङ्गवः । देव्यास्तचासिसादेवीतलेनोरस्पताडयत् ॥१६ २०४ ] । माकण्डेय पुराण तलप्रहाराभिहतोनिपपातमहीतले। सद त्यराज सहसापुनरेवतथोत्थित ॥१६ उत्पत्यचप्रगृह्योच्चदेवीगगनमास्थित । तापिसानिराधारायुयुधेतेनच डिका ॥१८ नियुद्ध खेतदादत्यनकिाचपरस्परम् । चतु प्रथम सिद्धमुनिविस्मयकारकम् ।।१६ ततानियुद्ध सुचिरकृत्वातेनाविकासह । उत्पात्यभ्रामयामासचिक्षेपधरणोतले ॥२० भक्षिप्तोधरणीप्राप्यमुष्टिमुद्यम्यवेगित । अभ्यधावनदुष्टात्माचडिकानिधनेच्छया ॥२१ तब सामने आये दानव का मुद्गर देवी ने तीक्ष्ण वाणो से नष्ट कर दिया, किन्तु फिर भी वह महादानव मुष्टिका तानकर तेज गति से देवी पर दौडा ११५॥ महादानव ने वह मुष्टिका प्रहार देवो के हृदय पर किया । तब देरी ने भो थप्पड द्वारा उमरे सीने पर आघात क्यिा॥१६॥ थप्पड के प्राधात से पीडित दैत्यराज पृथ्वी पर गिरा और तुरन्त ही पुन उठा ॥१७॥ इसके पश्नात् उछा कर देवी को लेकर शुभ माकाश मे पहुंच गया मोर देवी भी प्राकारा म निरालम्न होकर केवर भुनामो से युद्ध करने लगी ॥१८} भाकाश शुभ व चपिटका देवी प्रद्वितीय और मुनियो को अचम्भे में डालने याला युद्ध करने लगे ॥१६॥ उस दानव वे माथ बिना अस्त्र वैवल भुजामो से युद्ध परये उसे उदाल कर ऊपर घुमाया और फिर धरती पर पटक दिया ॥२०॥ धरती पर गिरपर वह दुष्टात्मा दानव मुष्टिका उठाकर घडिया को मारने की इच्या से पाकामरमा ॥२१॥ तमायांतततोदेवीसर्वदं त्यजनेश्वरम् । जगत्यापातयामाराभिस्वामूलेनवसि ।।२२ सगतामु पपातोदेिवीमूलाग्रविक्षत । पालयन्सफ्लापृथ्वीसाधिद्वीपासपर्वताम् ॥२३ देवी स्तोत्र ] । २०५ तत.प्रसन्नमखिलंहतेतस्मिन्दुरात्मनि । जगत्स्वास्थ्यमतीवापनिमलचाभवन्नभः ॥२४ उत्पातमेघाःसोल्कायेप्रागासस्तेशमययुः । सरितोमार्गवाहिन्यस्तथाशुम्भेनिपातिते ॥२५ तत'देवगणा.सर्वेहपंनिभरमानसाः। चभूवुनिहतेतस्मिन्गधर्वाललितजगुः ॥२६ अवादयंस्तथैवान्येननृतुश्चाप्सरोगरगाः । वयु.पुण्यास्तथावाता सुप्रभोभूद्दिवाकर ॥२७ जज्वलुश्चाग्नय.शांता शान्त.दिग्जनितस्वनाः ।।२८ उस दैत्यराज शुभ वो भाक्रामक देव देवी ने अपन मूर मे उमया हृदय वेध दिया और उसको पुनः पृथ्वी पर गिरा दिया ।।२२।। देवी के मूल के अग्र भाग द्वारा सुभ या हृदय पाहत हुपा जब यह निर्जीव होकर पृथ्वी पर गिरा तो उस समय ममुद्र, द्वीप और पर्वतो सहित समस्त पृथ्वी निचलित हो गई ॥२३॥ उस दुरास्मा दानव के मारे जाने पर भी मानन्दित हुए, समार पहत स्वस्थ हुमा और प्राकाश पूर्णन. स्वच्छ होगया ॥२४॥ शुभ के रहते हुए जो भी प्रनिष्टकारी मेघ मोर उवागरण विद्यमान धे, ये सब शुभ पे मृत्यू परान्त प्रहाय होगये और नदियों भी अपने समुचित मार्गों में बहने लगी ॥२५॥ (उम दानव के समाप्त होने पर मम्पूर्ण देवगरा के चित्त मे पत्यन्त हर्ष हुमा भौर गधर्व मपुर गान करने लगे ॥२६॥ कोई वाद्य वजाने लगा और अप्पगएँ नाचने लगी, शीतल मन्द वायू चलन लगी और सूर्य ने भी मुन्दर आभा फैला दी ॥२७॥ यश की वुमी मग्नि जलने लगी और मनी दिशामो मे सात सद फैला प्रतीत हुमा ॥२८॥ ८३.-देवी स्तोत्र देव्याहतपमहानुरेन्द्र मेन्द्रा:मुगवह्निपुरोगमान्ताम् । पारवापनीनुष्युरिष्टामाटिसामिकााजविवामिताहा: ॥१ [ माण्डेय पुराण देवाऊच देविप्रपन्नातिहरेप्रसीदप्रसीदमातर्जगतोखिलस्य । प्रसीदविश्वेश्वरिपाहिविश्व त्वमीश्वरीदेविचराचरस्य १२ प्राधारभूताजगतस्त्वमेकामहीस्वरूपेरणयत स्थितासि । अपास्वरूपस्थितयात्वयंतदाप्याप्यतेकृत्स्नमलध्यवीर्ये ।।३ त्वनैष्णवीशक्तिरनतविर्या विश्वस्पवीजपरमासिदेवि । मायासमोहितदेविसमस्तमेतत्त्वौप्रसन्नाभुविमुक्तिहेतुः ॥४ विद्या समस्तास्तवदेविभेदा स्त्रिय समस्ता सकलजगन्न । त्वयंकयापूरितमबयतत्कातेस्तुतिःस्तव्यपरापरोक्ति १५ सर्वभूतायदादेवीभुक्तिमुक्तिप्रदायिनी । वस्तुतास्तुतयेकावाभवतिपरमोक्तय.॥६ सर्वस्यवद्धिरूपेरणजनस्यहदिस स्थिते । स्वर्गापवर्गदेदेविनारायणिनमोस्तुते ॥ ऋषि ने कहा-देवी ने जब उस महादानव को नष्ट कर दिया, नो समस्त देवता अपने इच्छित फल प्राप्त होने के कारण प्रसन्न मुख कमलो से इन्द्र व मग्नि को पागे कर समस्त दिशाओं को प्रकाशित कर उन कात्यायनो देवी की स्तुति करने लगे ॥११॥ देवता बोले- "हे शरणागत दुष-भजन देवि । प्रसन्न हो, हे सम्पूर्ण जगत् को जननी प्रसन्न हो, हे विश्वेश्वरि । प्रसन्न हो, तुम विश्व की रक्षा करो, हे देवि । वराचरो को तुम ही ईश्वरी हो ॥२॥ हे देवि । तुम ही जगत् को मापात रूप हो, क्योकि पृथ्वी का रूप तुम्हीं में स्थित है है देवि । जल का स्वरूप भी तुम ही धारण करके इस सम्पूर्ण जगत् को तृप्त करती हो, हे देवि! तुम्हारा दोर्य उल्लघन नही दिया जा सकता ॥३॥ है देवि । धनन्त वीयं बष्णवी शक्ति तुम ही हो, ससार को हेतुभूत परमलीला तुम ही हो, सम्पूर्ण जगत् को तुमने ही मोहित कर रखा है, हे देवि । प्रसन्न होती हो, तब ही पृथ्वी पर मुक्ति का कारण होती हो ॥४॥ हे देवि ! तुम्हारी मूर्ति विशेष मे ही समस्त विद्या विद्यमान हैं और बिलोक में समस्त रिसा तुम्हारी मूर्ति विशेष हैं, हे जननी । तुम एक अकेसी इस जगत में व्याप्त हो तुम स्तुति रो परे और तुम्हारी स्तुति ही श्रेष्ठ उक्ति है और अधिक क्या तुम जब

देवी स्तोत्र ]
[ २०७
स्नुनि करे ॥२॥ ममम प्राग्गोबर में तुम ही प्रकाशमान हो मोर म्बग व
मुक्ति तुम ही प्रदान करनी हो, इमलिये तुम्हारी स्तुति करते हैं, किन्तु ह ददि ।
तुम्हारे निगुंग ब्रह्मम्बाप की स्नुनि के लिए कोई भी नि श्रेष्ट नहीं है,क्वाति
सुम निगुरंग हो और निगुग के मुगों को वीसंन म स्तुति क्मि प्रमर मभव
है । ॥६॥ तुम बुद्धि के रूप म म हृदय में दमी हो, हे स्वर्ग-मुक्ति दाता ।
ह देवि है नारायगि तुमको नमबार है।
कलाकाहादिस्पंणपरिणामप्रदायिनी।
विश्वम्योपरतोगक्त नागयरिणनमोस्तुते ।।
मर्वमङ्गलमागल्येगिवेमर्थिसाधिके ।
भरण्यध्यवरेगोरिनारायणिनमोस्तुते 16
नृष्टिस्थिनिविनागानाशक्तिभूतमनातनि ।
गुणाययगुणमयेनारायग्गिनमोस्तुते ॥१०
शरणागतीनातंपरित्राणपरायण ।
मर्वम्यातिहदेविनारायरिगनमोस्तुते ।।११
हमयुक्तविमानन्येब्रह्माणीस्पघारिणि ।
कौशाम शोरदेविनागयरिणनमोस्तुते ।।१२
ग्रिगलचन्द्राहियरेमहावृपमवाहिनि ।
माहेश्वरीम्दम्पेणनारायरिणनमोस्तुते ।।१३
मयूरखुकुम्बृतेमहागक्तिधरेन ।
योमारोम्पमस्थानेनारायणिनमोस्तुते ॥१४

२०८ ] ना एडेय पुराण - है देवि ! हे नारायणि ! तुमको नमस्कार ॥११॥ हस युक्त विमान में ब्राह्मी रूप धारण कर युद्ध क्षेत्र मे दुशामिमश्रित जल छिडक्ती हो, हे देवि ! हे नारायणि ! तुमको नमस्कार ॥१२॥ माहेश्वरी रूप मे बैल पर सवार होकर पक्ष चन्द्रप्रौर नाग भूपण सहित त्रिशूल प्रापने धारण किया,हे नारायणि ! तुमको नमस्कार है ॥१३॥ तुमने कौमारी रूप मे मयूर और कुक्कुट युक्त होकर महा शान्ति धारण की, हे अनघे । हे नारायरिण ! तुमको नमस्कार ॥१४॥ शङ्खचक्रगदाशाङ्ग गृहीतपरमायुधे । प्रसीदशैष्णवीरूपेनारायणिनमोस्तुते ॥१५ गृहीतोग्रमहाचक्र दष्टोद तवसुन्धरे । वराहरूपिणिशिवनारायणिनमोस्तुते ॥१६ नृसिंहरूपेणोनणहतु दैत्यान्कृतोद्यमे । त्रैलोक्यवारणसहितेनारायणिनमोस्तुते ॥१७ किरीटिनिमहावज्जे सहयनयनोज्ज्वले । वृत्रप्रारणहरेचैंद्रिनारायणिनमोस्तुते ।।१८ शिवदूतीस्वरूपेणहतद त्येमहाबले। घोररूपेमहारावेनारायणिनमोस्तुते ॥१६ दष्ट्राकरालवदनेशिरोमालाविभूषणे । चामुण्डेमुण्डमथनेनाणिनमोस्तुते ।।२० लक्ष्मिलज्जेमहाविद्य श्रद्धे पुष्टिस्वघेध्र वे। महाराजेमहामायेनारायणिनमोस्तुते ॥२१ वैष्णवी रूप मे शख, चक्र, गदा एवं शाङ्गं पनुप परम आयुधों को तुमने धारण किया, हे नारायणि । तुमको नमस्कार ॥१५॥ वराह रूप में तुमने हे शिवे ! हे नारायणि ! दांतो से जल-मग्न पृथ्वी को उठाकर महाचक ग्रहण किया, तुमको नमस्कार ॥१६॥ नृसिंह रूप दानवों के नाश को उद्यत हो त्रैलोक्य की रक्षा करने वाली हे नारायणि । तुमको नमस्कार ॥१७॥ हे नारायणि ! हे ऐन्द्री ! हजारों नयनो से उज्ज्वल किरीटो के धारण करने वाली एवं महावच ग्रहण करने वाली, तुमको नमस्कार ॥१८॥ शिवदूती के रूप में देवी स्तोत्र ] [ २०६ भयंकर स्वरूप धारण कर हे नारायणि तुमने महावलि दानवो दो समाप्त किया,तुमको नमस्कार ॥१६॥ दष्ट्रा और कराल मुख वे सिरो की माला धारण पर हे नारायणि । तुमने चण्ड और मुण्ड नाम के दानवो को नष्ट पिया, तुमको नमस्कार ॥२०॥ लक्ष्मी, लजा, महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, महारात्रि, महा- माया, ध्र वा तुम ही हो, हे नारायणि ' तुमको नमस्कार ।।२१।। मेधसरस्वतिवरेभूतिबाभ्रयितामसि । नियतत्वप्रसीदेशैनारायणिनमोस्तुते ॥२२ सर्वत पाणिपादासर्वतोक्षिशिरोमुखे । सर्वत श्रवणघ्राणेनारायणिनमोस्तुते ।।२३ मर्वस्वस्पेसर्वेशेसर्वशक्तिममन्विते । भयेभ्यस्त्राहिनोदेविदुर्गदेविनमोस्तुते ।।२४ एततेवदनसौम्य लोचन प्रयभूपितम् । पातुन.सर्वभीतिभ्य कात्यायनिनमोस्तुते ।।२५ ज्वालावरालमत्युग्रम पासुरसूदनम् । त्रिशूलपातुनोभीतभंद्रशालिनमोस्तुते ॥२६ हिनस्तिदं त्यतेजासिस्वनेनापूर्ययाजगत् । सापटापातुनोदैविपापेभ्योन मुनानिव ॥२७ प्रमुरामृग्वमापचितस्तेकरोज्वलः । गुभायसङ्गोभवतुचंडिकेत्वानतावयम् ॥२८ मेघा, मरम्वती, भूनि, वाभवी, ताममि तुम ही हो, हे नारायगि । है ईग । हे नियने । तुम प्रगान हो, तुमसरो नमस्कार ॥२२।। गवंर हाय, पर, गिर, मुख, कान, मामिला तुम्हारे ही स्वरूप है हे नारायणि ! तुमको नमः स्वार ।।२३।। मवंम्वरूप, मधरी, सर्वशक्ति समन्वित हे देवि । है दुर्ग । भय में रक्षा करो, तुमको नमस्कार ॥२४॥ सुम्हाग मौम्य मुग मोर उग पर विभू. रित पिनेत्री वामी है वारयापी सयो रक्षा गर्ग, सुमरो नमस्कार ॥२॥ मामा से भी अधिर बरास पल तेज पौर रोपायुर को नष्ट करने वाला २१० ] [ पाण्डेय पुराण सुम्हारा त्रिशूल हे भद्रकाना हमारी मय मे रक्षा बगे तुमको नमस्कार ॥२६॥ अपनी ध्वनि से विश्व को पूरित कर दानवों के तेज को नष्ट करने धाला तुम्हारा घंटा पुत्रवात पापो से हमारी रक्षा करे !॥२७॥ अमुरगण व लहू और वसा के पक से चचित किणो के तमाम उज्ज्वल यह शाभायमान तलवार, हे चण्डिके । हमाग कल्याण करे ॥२८॥ रोगानशेपानपहसितुष्टाददासिफामान्सक्लानभीष्टान् । स्वामाश्रितानानविपन्न रात्विामाश्रिताद्याथयताप्रांति ॥२६ एतत्कृतयत्कदनत्वयाद्यधर्मद्विपादेविमहासुराणाम् । रूपरनेकैहुधात्ममूत्तिकृत्वाविवेतत्प्रकरोतिकान्या ।।३० विद्यासुशास्त्रेषुविवेकदीपेप्वाद्य वाक्येषुचकात्वदन्या । ममत्वगर्तेतिमहाधकारेविभ्रामयस्येतदतीवविश्वम् ।।३१ रक्षासियनोविपाश्चनागायत्रारयोदस्युबलानियत्र । दावानलीयत्रतथाब्धिमध्येतस्थितात्वपरिपासिविश्वम् ।।३२ विश्वेश्वरीत्वपरिपासिविश्वविश्वात्मिकाधारयमीतिविश्वम् । विश्वेशवद्याभवतीभवतिविश्वाश्रयायेत्वयिभक्तिनम्रा ॥३३ देविप्रसीदपरिपालयनोरिभीतेनित्ययथासुरवधादधुनेवसद्य । पापानिमर्वजगताप्रशमनयाशुउत्पातपाकजनिताश्चमहोपसर्गान३४ प्रणतानांप्रपीदत्वदेविविश्वात्तिहारिणि । प्रैलोक्यवासिनामीडये लोकानावरदाभव ॥३५ प्रसन्न होने पर सभी रोगो को नष्ट करती हो एव अप्रसन्न होने पर सभी प्राकक्षित वस्तुओं को छीन लेती हो । तुम्हारे प्राश्रितो पर कभी कोई विपत्ति नहीं रहती और तुम्हारे प्राश्रित ही अन्य सवको प्राश्रय देने वाले होत हैं ॥२६) अनेक रूप धारण कर तुमने धर्म के विपक्षी घोर असुगेका माग घद क्या कोई दूसरो नागे कर सकती है । ॥३॥ विद्या, महा शास्त्री विवेक • दीप पौर वेदो व प्रादि वाक्यो के होते हुए भी महा अधकारमय ममत्व मापी गन मे विश्व को तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कौन बचा सकता है ।।३१।। जहाँ प्रमुर हैं, विकराल सर्प है, शत्रु हैं, चोरों के समूह हैं, दावानल है, तुम वहाँ देवतामो को देवी का वरदान ] इत्ययदायदावाधादानवोत्थाभविष्यति । तदातदावतीर्याहकरिष्याम्यरिसक्षयम् ।।५१ फिर जब सो साल तक वर्षा न होगी तो जल न होने यानी सूखा कारण ऋपिगरण मेरी प्रार्थना करेंगे उस समय मैं बिना मनुष्य योनि के ही जन्म लूगी ॥४३॥ उस समय मेरे सौ नेत्र हागे, जिनसे मुनियो को देखूगी और मुनिगण मुझे 'शताक्षी" कहकर कीर्तन करेंगे ॥४२॥ तत्पश्चात् जब तक वर्षा का अभाव रहेगा, तब तक हे सुरगण | स्वकीय देह उत्पन शाक से समस्त लोको का पालन करूंगी ।।४।। इमलिए जगत् म मेरा "शाकम्भरी" नाम प्रसिद्ध होगा और वर्षा न होने की उस अवधि मे दुगम नाम के महादानव को समाप्त करूंगी ॥४६।। और फिर मैं ऋपियो की रक्षा के लिए हिमालय पर विकराल स्वरूप से असुरो का वध करूंगी ॥४७॥ उस समय सभी ऋपिगण विनम्र होकर मेरी प्रार्थना करेंगे और मैं भीमा देवी के नाम प्रसिद्ध होऊँगी ।।४। जिस काल मे अरुण नामक एक महादानव तीनो लोको मे भारी विपत्ति पैदा करेगा,उस समय अनेक पट्पद मन्वित भ्रमरो का रूप ग्रहण कर ।।४।। तीनो लोको या उद्धार करने के लिए उस महादानव को मारूंगी, इसलिए प्राणी मेरी 'भ्रामरी' नाम से स्तुति करेंगे ॥५०॥ इस तरह जिस काल में मसुरो द्वारा विपत्तियां पैदा की जायगी, उस समय मैं अवतरित होकर उनका नाश करूगी ॥५१॥ ८४-देवताओं को देवी का वरदान एभि स्तनैश्चमानित्यस्तोष्यतेय समाहित । तस्याहसक्लांवाधानाशयिष्याम्यसशयम् ॥१ मधुक्टभनाशचमहिपासुरघातनम् । कोर्तयिष्यतियेतद्वद्वयशुम्भनिशुम्भयो ॥२ प्रारम्यांचचतुर्दश्यांनवम्यांचंक्चेतस । स्तोप्यन्तिचंवयेभवत्यामममाहात्म्यमुत्तमम् ॥३ २१२ ] [ माण्डेय पुराण शत्र प्रो को नष्ट करती रहो, यही पर हम मांगते हैं ॥३७॥ देवी बोली-- वैवस्वत मनवन्तर के बीच अट्ठाईसवें युग मे दो महादानव शुभ और निशुभ के माम ने जन्म लेगे ॥३८॥ उस समय में यशोदा के गर्भ से गापनन्द के गेह में जन्म लूगी और विध्याचलवासिनी होकर उन दोनो को नष्ट करूंगी ॥३६॥ फिर पृथ्वी पर अत्यन्त विकराल रूप में अवतार लेकर वैप्रचित नाम के प्रमुरो का विनाश करूगी ॥४०॥ वैप्रचित्त नाम ये भोपण दैत्यो को भक्षण करते हुए मेरी दन्तमुक्तावली कुसुम के समान लाल रंग की हो जायगी ।।४।। इसक पश्चात् स्वर्ग म देग्गरण और मयलोक मे मानव स्तुति करते हुए सदैव मुझे "रक्त दन्तिका" के नाम से पुकारेंगे ॥४२।। भूयश्चशतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनभसि । मुनिभिःसस्तुताभूमौसभविष्याम्ययोनिजा ॥४३ तत शतेननेत्राणांनिरीक्षिष्यामियन्मुनीन् । कीर्तयिष्य तिमनुजा शताक्षीमितिमातत ॥४४ ततोहमखिललोकमात्मदेहसमुद्भने । भरिष्यामिसुरा शाकैरावृष्टप्राणधारकै ॥४५ शाकभरीतिविख्यातितदायास्याम्यहभुवि । सत्र वचवधिष्यामिदुर्गमाख्यमहासुरम् । (दुर्गादेगतिविख्याततन्मेनामभविष्यति । पुनश्चाहयदाभीमरूपकृत्वाहिमाचले) ॥४६ रक्षासिभक्षयिष्यामिमुनीनांनाणकारणात् ।।४७ तदामामुनय सर्नेस्तोष्यत्यानम्रमूर्तय । भीमादेवीनिविख्याततन्मेनामभविष्यति ॥४८ यदारुणास्यस्त्रलोक्येमहावाधीकरिष्यति । तदाहभ्रामररूपकृस्वासख्येयपट्पदम् ।।४६ लोक्यस्य हितार्थायवधिप्यामिमहासुरम् । भ्रामरीतिचालोकास्तदास्तोप्यन्तिसर्वत ॥५० देवताओं को देवी का वरदान ] २१३ इत्ययदायदावाघादानवोत्याभरियति । तदातदावतीर्याहकरिप्याम्यरिसक्षयम् ॥५१ फिर जब सौ साल तक वर्षा न होगी तो जल न होने यानी मूखा कारण ऋषिगण मेरी प्रार्थना करेंगे उम समय में बिना मनुष्य योनि के ही जन्म लूगी ॥४३॥ उम ममय मेरे सौ नेत्र होग, जिनमे मुनियो को देवूगी और मुनिगरण मुझे 'शताक्षी" कहकर कीर्तन करेंगे ॥४२॥ तत्पश्चात् जब तक वर्षा का अभाव रहेगा, तब तक है सुरगण ! स्वकीय देह उत्पन शाक से समस्त लोगों का पालन करूंगी ।।४५! इसलिए जगत् में मेरा "शाकम्मरी" नाम प्रसिद्ध होगा और वर्षा न होने की उम अवधि में दुगम नाम के महादानव को समाप्त करूगी ॥४६॥ और फिर मैं पियो की रक्षा के लिए हिमालय पर विकराल स्वरूप से असुरो का वध करेंगी ॥४७॥ उस समय सभी ऋषिगरा विनम्र होकर मेरी प्रार्थना करेंगे और मैं भीमा देवी के नाम प्रसिद्ध होऊंगी ॥४८।। जिम काल में अन्य नामक एक महादानव तीनों लोकों में भारी विपत्ति पैदा करेगा,उस समय अनेक पटाद ममन्त्रित भ्रमरो का रूप ग्रहण कर ॥४६॥ तीनो लोको का उद्धार करने के लिए उम महादानव का मारूंगी, इसलिए प्राणी मेरी 'भ्रामरी' नाम से स्तुति करने ॥५०॥ इस तरह जिस काल में असुरो द्वारा विपत्तियां पैदा की जायगी, उस समय में अवतरित होकर उनका नाश करूंगी ॥५॥ ८४-देवताओं को देवी का वरदान एभि स्तवैश्चमानित्यस्तोप्यतेय समाहित । तस्याहसकलांवाघांनाशयिप्याम्यमशयम् ।।१ मधुक्टमनाशचमहिपासुरपातनम् । कोर्शयिप्पतियेनद्वयमुम्भनिशुम्भयो २ अप्ठम्यांचचतुर्दश्यांनवम्यांचंक्चेतमः । स्तोप्यन्तिचैवयेभक्यामममाहात्म्यमुत्तमम् ॥३

२१४ ]
! मार्कण्डेय पुराण
नतेपांदुष्कृतविचिदुष्कृतोत्थानचापद ।
नभविष्यतिदारिद्र यनवेष्टवियोजनम् ॥४
शत्रुतोनभयतेपदिस्युतोवानराजत ।
नशस्त्रानलतोयौघात्कदाचित्सभविष्यति ॥५
तस्मान्ममैतमाहात्म्यपठितव्यसमाहित ।
श्रोतव्यचसदाभक्त्यापरस्वत्ययनमहत् ॥६
उपसर्गानशेषांस्तुमहामारीसमुद्भवान् ।
तथात्रिविधमुत्पातमाहात्म्यशमयेन्मम ॥७
देवी ने कहा- इन सभी वचनो से सचेत होकर जो मनुष्य मेरी प्रति-
दिन स्तुति करेगा, यह सदेहहीन है कि मैं उन सभी विपत्तियो का विनाश
करूगी ॥१॥ मधुकैटभ, शुभ निशुभ और महिषासुर की कया का उत्तम
माहात्म्य जो मनुष्य एक चित्त होकर भक्ति पूर्वक प्रष्टमी, चतुर्दशी या नवमी
तिथि मे सुनें या कहे ।।२।। सो उनको पाप एव पाप से पैदा कनेई बाधा नहीं
रहेगी, दरिद्रता दूर होगी एव प्रियजनो का वियोग भी न होगा ॥४॥ दुश्मन,
चोर और राजा से किसी स्थान पर भय न होगा और अस्त्र, अग्नि व पानी
से भी निडर रहेगे 1५1) इसलिए मेरा वह माहात्म्य दत्तचित्त होकर मध्ययन
करे और श्रवण करे । मेरा यह माहात्म्य हो मेरी सर्वश्रेष्ठ स्तुति है ।।६।। यह
महापारी जन्य सभी विपदामो मोर तीनो प्रकार की विपत्तियो को नाश करता
है ।।७॥
यत्रतत्पठयतेसम्यवानित्यमायतनेमम ।
सदानतद्विमोक्ष्यामिसांनिध्यतममेस्थितम् ।।
बलिप्रदानेपूजायामग्निकार्यमहोत्सवे ।
सर्वममंतचरितमुच्चार्यश्राव्यमेवच ।।
जानताजानतावापिवलिपूजांतथाकृताम् ।
प्रतीच्छिष्याम्यहप्रोत्यावह्निहोमतथाकृतम् ॥१०
भारकालेमहापूजानियतेयाचवापिकी।
तस्याममंतन्माहात्म्य लाभक्तिसमन्वित ११

देवताग्रा का देवी का वरदान ] । २१५ सर्गवाधाविनिर्मुक्तोधनधान्यसमन्वित । मनुष्योमत्प्रसादेन भविष्यतिनसशय ॥१२ श्रुत्वाममैतन्माहात्म्यमथोत्पत्तो पृथक्शभा । पराक्रमांश्चयुद्ध पुजायतेनिभय पुमान् ।।१३ रिपव सक्षय यांतिकल्याणचोपपद्यते ॥ नन्दतेचकुलपु साँमाहात्म्य ममशृण्वताम् ।।१४ जिस गृह मे यह माहात्म्य समुचित विधि से मनन किया जाता है, मैं सर्वदा उसी गृह मे अथवा उसके समीप वास करती हूं ||८॥ पूजा-कार्य या वलि के अवसर पर तथा यज्ञ कार्य प्रादि उत्सवो मे मेरी यह समस्त कथा वोलनी और सुननी चाहिए ।।६॥ प्राणीगण जाने या अनजाने जो पूजा करें, बलि दे या अग्नि मे पाहुति देते हैं, वह सब मैं प्रसन्न होकर स्वीकार करती हूँ ॥१०॥ शरद् ऋतु म वार्षिक महा पूजा के अवसर पर मेरा यह चरित्र भक्ति- पूर्वक सुनने से १।११॥ मनुष्य मेरा प्रसाद पाकर मपस्त बाधामो से विमुक्त होते है और यह सदेह से परे है कि वे धन, सम्पत्ति और पुत्र प्राप्त करते हैं ॥१२॥ यह माहात्म्य, शुभ उत्पत्ति की कथा एवं युद्ध-कौशल चरित्र सुनने से मनुष्य को भय नही रहता ॥१३।। उसके शत्रुमा का शमन होता एव उसका कल्याण होता है । और मेरे माहात्म्य का श्रवण करने वाले मनुष्य का परिवार प्रानन्द- पूर्ण हो जाता है ॥१४॥ शान्तिकर्मणिसर्वत्रतथादु स्वप्नदर्शने । ग्रहपीडासुचोग्रासुमाहात्म्यशृणुयान्मम ॥१५ उपसर्गा शमयातिग्रहपीडाश्वदारुणा । दु स्वप्नचनृभिष्ट सुस्वप्नमुपजायते ॥१६ बालग्रहाभिभूतानावालानाशातिकारकम् । सघातभेदेचनृणामयीकरणमुत्तमम् ॥१७ दुर्वृत्तानामशेपारगावलहानिकरपरम् । रक्षोभूतपिशाचानापठनादेवनाशनम् ॥१८ सर्वममतन्माहात्म्यममसनिधिकारकम् ॥१६ [ मार्कण्डेय पुराण - पशुपुष्पाय॑धूपश्चगन्धदीपस्तथोत्तमैः । विप्राणाभोजनोंमै प्रेक्षणीयरहनिराम् ॥२० अन्यश्चविविधर्भोगैःप्रदानैर्वत्सरेण्या । प्रीतिक्रियतेसास्मिन्सकृदुच्चरितश्रुते ।।२१ सभी शाति कार्यों, भयानक स्वप्न देखने के अवसर पर और घोर पारि- वारिक दुख के समय मेरा यह चरित्र सुने ॥१५॥ इसके श्रवण से विपदाएं एवं घोर पारिवारिक दुख मिट जाते हैं और जैसे मनुष्य को दुखद स्वप्न शीघ्र फलदायक बनते है, उसी प्रकार तुरन्त उत्तम फल प्रदान करते है ।।१६।। मेरी यह कथा पूतना, डकिनी, शाकिनी, बालको पर पायी ग्रहो को शमन करने वाली है और यदि मनुष्यो मे आपस मे मतभेद व शयता हो जाय तो श्रेष्ठ विधि से पुन: प्रीति कराने वाली है ॥१७॥ यह समस्त प्रविचारी व दुष्ट मनुष्यो को निर्बल करता, उनके वल को घटाता है, इसके अध्ययन से असुर, भूत व पिशाच नष्ट हो जाते हैं ॥१६॥ माहात्म्य के अध्ययन से अध्ययन करने वाला मेरे निकट पाता है । यह प्रारम्भ, मध्य भोर समाप्ति पर मुझे सर्व प्रकार प्रसार करता है ।।१६। उत्तम पशु, फूल, अध्यं, धूप, गन्ध, दीप, ब्रह्मभोज, यज्ञ, प्रोक्षणीय एव ।।२०॥ अन्य दूसरी रीतियो से एक वर्ष पर्यन्त दिन रात पूजा करने वाले से मैं जितनी प्रसन्न हो सकती है, उतनी इस माहात्म्य को सिर्फ एक ही वार श्रवण से प्रसन्न हो जाती है ॥२१॥ श्रु तहरतिपापानितथारोग्यप्रयच्छति । रक्षाकरोतिभूतेम्योजन्मनाकीर्तनमम ॥२२ युद्ध पुचरितयन्मेदुष्टदै त्यनिवहरणम् । तस्मिन्छतेनेरिकृतमयपुंसानजायते ॥२३ युप्माभि.स्तुतयोयाश्चयाश्वग्रह्मपिभिःकृताः । ब्रह्मरणाचकृतायास्ताप्रयच्छतिशुभागतिम् ।।२४ अरण्येप्रति रेवापिदावाग्निपरिवारितः । दस्युभिर्वात शून्यगृहोतोवापिसत्रुभिः ।।२५ सुग्य और वैश्य को देवी का वरदान । । २१६ है मनुजेवर ! ममम्न ब्रह्माड उन देवी से युन है और प्रनय के समय मे यह लाइ महामारी के प महासानी से युक्त होता है ॥३॥ वहीं, जब समय प्राता है तो महामारी दन जाती है, तथा जगन की उत्पत्ति के प्रव- मर पर वही मृष्टि का दम्प हो जाती है और रक्षा के समय वही देवी सनातनी म्प मे मनुष्यों की रक्षा करती है ॥३॥ प्रानन्द के ममय वही प्राणियो के गह में विभिन्न ऐर्य प्रदान करती है और जब वह नहीं होती तो लक्ष्मी स्पी ऐश्वयं चला जाता है व विनाम हो जाता है ।।३७॥ रुम देवी की प्रार्थना जो करे और मुगल, धूप, पुष्प, दीप वगैरह में पूरा को करे से ऐश्वर्य, पुत्र मौर धर्म भक्ति की प्राप्ति होती है ॥३॥ ८५-मुरथ और वैश्य को देवी का वरदान एतत्ते कथितादेवीमाहात्म्यमुत्तमम् । एवप्रभावामादवीययेद धार्यतेजगत् ।। विद्यानर्थवकिपनमगवद्विष्णुमायया । तयात्वमेपवैश्यवलयवान्येविवेक्नि । मोह्य तेमोहिताय वमोहमप्यनिचापरेर तामुपहिमहागजगरणपरमेश्वरीम् । प्रागवितासंवनृणाभोगम्वर्गापवर्गदा 13 इतितम्यवच थ त्वामुन्थःमनराधिपः । प्रणिपत्यमहाभागतमृपिनगिनवतम् ।।४ निविपणोतिममत्वेनराज्यापहरगनच । जगाममद्यनपसेमववैश्योमहामुने ॥५ मदर्शनार्थमवाया नदीपुलिनमान्यत । मचर्वश्यम्नपम्नपेदेवीमूक्त परजपन ॥६ तोतम्मिन्पुलिनेदेया कृत्वातिमहीनयीम् । पहंग्णाचक्रतुम्नन्या पुष्पपाग्निनपरणं [ मार्कण्डेय पुराण जगद्विध्वसकेतस्मिन्महोग्ने तुलविक्रमे। निशुम्भेवमहाबीर्येशेषा पातालमाययु. ॥३२ एवभगवतीदेवीसानित्यापि पुन पुन. । सम्भूयकुरुतेभूपजगत परिपालनम् ॥३३ तगतन्मोह्यतेविश्वमैवविश्वप्रसूयते । सायाचिताचविज्ञानतुष्टाऋद्धिप्रयच्छति ॥३४ मेरे चरित्र को बार-बार मनन करने वाले प्राणी को देखकर ही मेरे प्रभाव से मिह जैसे हिंसक पशु, चोर और शत्र भी पलायन कर जाते हैं ॥२६ ऋषि ने कहा--प्रत ऐसा उपददा देती हुई महा पराक्रमी चरिडका देवी सुर- गरण के सम्मुन एक्दम अन्तर्धान होगई ॥३०॥ तत्पश्चात् दात्र मो के भय से निर्भीर सुरगण यज्ञ भाग भोजन करते हुए मरने-अपने कार्यों में व्यस्त होगमे ॥३१॥ विश्व का विनाश करने वाले महा पराक्रमी व देवताओ के मात्र शुभ एव महाबली निशुभ को जब रण स्थल मे चण्डिका ने नष्ट कर दिया तो दोष भगुग्गण पाताल दो पले पय ॥३२॥ हे राजा । वह भगवती देवी निस्या और भी पनेर वार पृथ्वी पर प्राट हावर इग विश्व या पोषण परती है ३६ उमी भगवती की माया में यह जगत् मोहित है. यही इस जगत की गरि-नापौर उगा गमीप स्तुति परन पर यह प्रमाल होर तरसमा एक पन-पान्य प्रमान पाती है ॥३॥ याप्तनयंतत्सयल ब्रह्माण्ड मनुजेश्वर । महापाल्यामहापालेमहामारीस्वरुपया ॥३५ क्षेत्रपालमहामार्गरभिरत्यगा । स्थिदिवनभूतानामवपालमनातनी ॥३६ भवयामनृणार्गवरामीवृतिप्रदान । मंयाभावगवानगीविनासायोपजायत ।।७ नागजिनापुष्पगंधुतादिभितपा। ददातिदितावांभमनिधर्मगाभाम् ॥३८ सुरय और वैश्य को देवी का वरदान | I २१९ हे मनुजेश्वर ! समस्त ब्रह्माड उन देवी से युक्त है और प्रलय के समय मे यह ब्रह्माण्ड महाभारी के रूप में महाकाली से युक्त होता है ॥३५॥ वही, जव समय पाता है तो महामारी बन जाती है, तथा जगत् की उत्पत्ति के अव. सर पर वही सृष्टि का स्वरूप हो जाती है और रक्षा के समय वही देवी सनातनी रूप मे मनुष्यो की रक्षा करती है ॥३६॥ प्रानन्द के समय वही प्राणियो के गेह मे विभिन्न ऐश्चयं प्रदान करती है और जब वह नहीं होती तो लक्ष्मी रूपी ऐश्वर्य चला जाता है व विनाश हो जाता है ।।३७१ उस देवी की प्रार्थना जा करे और सुगन्ध, धूप, पुष्प, दीप वगैरह से पूजा को करे उसे ऐश्वर्य, पुत्र और धर्म भक्ति की प्राप्ति होती है ॥३॥ -सुरथ और वैश्य को देवी का वरदान एतत्त कथितभूपदेवीमाहात्म्यमुत्तमम् । एवप्रभावासादेवीययेद धार्यतेजगत् ।। विद्यातथैवक्रियतेभगवद्विष्णुमायया । तथात्वमेपवैश्यश्चतथैवान्ये विवेकिन । मोह्य तेमोहिताश्च वमोहमेष्यतिचापरे ॥२ तामुपैहिमहाराजशरणपरमेश्वरीम् । आराधितासवनृणाभोगस्वर्गापवर्गदा ॥३ इतिनस्यवच श्रुत्वासुरथःसनराधिपः । प्रणिपत्यमहाभागतमृपिसशितव्रतम् ॥४ निविणोतिममत्वेनराज्यापहररणेनत्र । जगाममद्यस्तपसेसचवैश्योमहामुने १५ सदर्शनार्थमवाया सस्थित । सचवैश्यस्तपस्तपेदेवीसूक्त परजपन् ॥६ सौतस्मिन्पुलिनेदेव्या कृत्वामूतिमहीमयीम् । ग्रहणाचक्तुस्तस्या पुष्पधूपाग्नितपणे १७

२२० ]
{ पाण्डेय पुराण
।
ऋपि ने कहा है भूप । पापको मैंने यह सर्वोत्तम माहात्म्य देवी का
वर्णन किया। वह देवी जो इस विश्व को धारण करने वाली विष्णु माया
भगवती की कृपा ऐपी है कि वही मनुष्य को तत्वज्ञान प्रदान करती हैं और
वही तुम्ह इस वैश्य को एक अन्य दूसरे बुद्धिमान व्यक्तियो का भी मोहित किये
हुए है, साथ ही भविष्य मे भी मनुष्य उनके ही द्वारा माहित रहेगे ॥१॥ हे
राजा । ऐसी परमेश्वरी भगवती को शरणागत होओ जिनकी पूजा करने से ही
वह प्राणी को पान द स्वर्ग एव मुक्ति प्राप्त होती है ॥३॥ मार्कण्डेय ने कहा-
"हे महर्षि । भारी ममता एवं राज्य के हरण होने से बहुत दुखी वह कठोर
बत करने वाला सुरथ मुनि के इन वचनो को सुनकर वह उन मुनि को प्रणाम
करके तुरन्त तपस्या करने चला गया एव वह वैश्य भी तपस्या करने चला
गया ।।४-५।। तत्पश्चात् राजा व वैश्य दोनो नदी के तट पर पहुंचे और वहाँ
देवी के दशनो के लिए सर्वोत्तम देवी-सूक्त जपते हुए तपस्या में लीन होगये
11६ वही दोनो ने मिट्टी से देवी की मूर्ति स्थापित की और पुष्प, सुगन्ध,
धूप, यज्ञ एव तर्पण से उनकी पाराधना की ।।७।।
निराहारौयतात्मानौतन्मनस्कोसमाहिती।
ददतुस्तौवलिंचैवनिजगानासृगुक्षितम् ॥८
एवसमाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षेयतात्मनो ।
परितुष्टाजगद्धानीप्रत्यक्षपाहचडिका ।
यत्प्रायंतेत्वयाभूपत्वयाचवुलन्दन ।
मत्तस्तत्प्राप्यतासवपरितुष्टाददामितत् ॥१०
ततोवनृपोगज्यम विभ्र श्यग्रजन्मनि ।
अवचनिजराज्यहतश नुबलवलात् ।।११
सोपिवैश्यस्तनोज्ञानवनिविण्णमानस ।
ममेत्यहमितिप्राज्ञ सगविच्युतिकारकम् ॥१२
स्वल्परोभिनु पतेस्वराज्यप्राप्स्यतेभवान् ।
हत्वाग्पूिनस्सलिततवत अभविष्यति ॥१३

सुरथ और वैश्व को देवो का वरदान ]
[ २२१
मृतश्चभूय. सप्राप्यजन्मदेवाद्विवस्वतः ।
सावणिकोनाममनुर्भवान्भुविभविष्यति ।।१४
वैश्यवर्यत्वयास्मत्तोवरोयश्चाभिवाछितः ।
तप्रयच्छामिस सिद्धचेतवज्ञानभविष्यति ॥१५
इतिदत्त्वातयोर्दैवीयथाभिलपितवरम् ।
वभूवातहितासद्योभक्त्याताम्यामभिष्टता ।।१६
एवदेव्यावरलम्बासुरथः क्षत्रियर्पमः ।
सूर्याज्जन्मसमासाद्यसावणिर्भवितामनुः ।।१७
वे दोनो ग्राहार बिना अथवा सूक्ष्म आहार लेकर आराधना मे लीन
हुए और उन्होंने अपने शरीरो से रक्त की बलि दी ।।८इस तरह तीन वर्ष
पर्यन्त एकाग्र चित्त से तपस्या करने पर जगत् उद्धारक चण्डिका ने प्रसन्न हो
उनसे सम्मुख पाकर वहा ॥६॥ देवी ने कहा-हे राजा ! और हे श्रेष्ठ कुल
वैश्य ।
तुम जो मेरी आराधना करते हो, तुम मेरे समीप होकर सभी इच्छित
फल प्राप्त करोगे, मैं प्रसन्न होकर तुम्हें पदान करती हूँ ॥१०॥ मार्कण्डेय जी
ने कहा- दूसरे पश्चात् नृप ने वर मागा कि द्वितीय जन्म में अखड-राज्य और
इस जन्म मे वल द्वारा अपने शत्रुओ को नष्ट कर अपना राज्य पुन पा सकू'
॥११॥ पीडिन मन वाले विवेकी वैश्य ने 'यह मेरा' और 'मैं' के मोह नाश
करने वाला ज्ञान मांगा ॥१२॥ देवी ने कहा-हे राजा ! कुछ ही समय में
तुम शत्रु प्रो का शमन करके अपने राज्य को पुन प्राप्त करोगे एव भविष्य में
तुम्हे अपने राज्य का त्याग नहीं करना होगा ।।१३।। फिर मरने के बाद तुम
उत्पत्ति लाभ प्राप्त करके पृथ्वी पर सागि नामक प्रसिद्ध मनु होप्रोगे ॥१४॥
हे वैश्य । तुमने जो वर मुझम मांगा है, उसकी मिद्धि के लिए तुमको वर
प्रदान करती हूं ॥१५॥ मार्कण्डेय ने कहा- इस प्रकार उन दोनो को इच्छित
वरदान प्रदान कर तुरल ही वह अन्तर्धान होगई उससे पूर्व उन्होंने पूर्ण भक्ति से
देवी की स्तुति की ॥१६॥ अन क्षत्रिय मे श्रेष्ठ राजा सुरथ देवी से वर प्राप्त
करके सूर्यदेव से उत्पत्ति लाभ प्राप्त कर पृथ्वी पर सावरिण नामक मनु
होगे ॥१७॥

१२२ । । मार्कण्डेय पुराण ८६-~पाँच मन्वन्तर कथन सावरिपकमिदसम्यक्प्रोक्त मन्वन्तरतव। तथैवदेवीमाहात्म्यमहिपासुरघातनम् ॥१ उत्पत्तयश्चयादेव्यामातृणाञ्चमहाहवे। तथं वसभवोदेव्याश्चामुण्डायायथाभव ॥२ शिवदत्याश्चमाहात्म्यवध शुम्भनिशुम्भयो । रक्तबीजवधश्च वसर्वमेतत्तवोदितम् ॥३ श्रू यताँमुनिशार्दूलसावणिकमथापरम् । दत्तपुत्रश्चसावर्णिभावीयोनवमोमनु ॥४ कथयामिमनोस्तस्ययेदेवामनयोनृपा । पारामरीचिभचिसुधारणस्तथासुरा ॥५ एतेविधाभविष्यन्तिसर्वेद्वादशकागणा । तेपामिद्रोभविष्यस्तुसहस्राक्षोमहाबल ॥६ साम्प्रतकार्तिकेयोयोवह्निपुत्र पडानन । अद्भुतोनामशकोऽसौभाषीतस्यान्तरेमनो. 1१७ मार्कण्डेय जी ने कहा- हे ऋपि श्रेष्ठ। यह माणिक का मन्वन्तर मापसे वर्णन रिया एवं इसी सदमे मे देवी माहात्म्य, महिषासुर-ामन ॥१॥ घोर रण मे मातृगणो एघ देवी को उत्पत्ति, चामुण्डा देवी को उत्पत्ति ।।२।। शिवनी माहात्म्य, शुभ निशु भ और रक्त बोज वध इन सभी को उचित प्रकार से मापसे कहा ||३|| हे ऋषिवर । अब नवे दक्ष-पुत्र सावणिक के मन्वन्तर का वर्णन सुनो ॥४॥ उसम मनु के मानव-बाल मे जो देवता, मुनि और राजा होंगे, वह सुनो। पारावार, मरीचि, भगं पोर सुधर्मा देवतायो के ॥५॥ यह तीन गाण एव प्रत्यक गण म बारह सस्य दवाण हैं । वर्तमान बलि पुत्र पहानन बातिय, इस भविष्य के मन्वन्तर मे महा पराक्रमी सहस्राक्ष इन्द्र होंगे ॥६॥ ।

२२४ । [ मारडेय पुराण भूरिद्युम्न सुपर्वाचतस्यतेतनयामनोः । भविष्याधर्मपुत्रस्यसावर्णस्यान्तरशृणु ॥१६ विहगमा कामगाश्चनिर्माणरतयस्तथा । त्रि प्रकाराभविष्यन्तिएककस्त्रिशकोगण. ॥१७ मासत्तु दिवसायेतुनिर्माणपतयस्तुते । विहङ्गमारात्रयोऽथमौहूर्ताःकामगागपा ।।१८ इन्द्रोवृषाख्योभवितातेपाप्रख्यातविक्रम । हविष्माश्चवरिष्ठश्व ऋष्टिरन्यस्तथारुणि ॥१९ निश्चरश्वानधश्च वविष्टिश्वान्योमहामुनि । सप्तर्षयोऽन्तरेतस्मिन्नगितेजाश्चसप्तम ।।२० सर्वत्रग सुशर्माचदेवानीक पुरूद्वहः । हेमधन्वादृढायुश्वभाविनस्तत्सुतानृपा ॥२१ सुक्षेत्र, उत्तमौजा, भूरिपेण, वीयवान्, शतानीक, वृषभ, धनमित्र, जय- द्रथ ॥१॥ भूरिद्युम्न और सुपर्वा दस पुत्र दशम मनु के हैं, अन्य मनु धर्म पुत्र सावर्ण का मन्वन्तर इस प्रकार है ॥१६॥ विहगम, का मन एव निर्माण पत्ति तीन गण देवताग्रो के हैं और प्रत्येक गण मे तीस सुर होगे ॥१७॥ मास, ऋतु एव दिवस निर्माण-पति हैं, रात्रि विहङ्गमदेव और सम्पूर्ण मुहूतं जन्य विषय- कामग सुरो के गण हैं ॥१८॥ महा पराक्रमी वृपाख्य इन्द्र होगे। इस मन्वन्तर की अवधि मे हविष्मान्, वरिष्ठ, अरुणतनय ॥१६॥ निश्वर, मनद्य, विष्टि एव सप्तम अग्निदेव, सप्तपि होगे ॥२०॥ सर्वत्रग, सुशर्मा, देवानिक, पुरूद्वह, हेमधन्दा व हढायु उन मनु के पुत्र होगे और राजा होगे ॥२१॥ द्वादशेरद्रपुत्रस्यप्राप्तेमन्वन्तरेमनो । सावरख्याश्चयेदेवामुनयश्चशृणुष्वतान् ॥२२ सुधर्माण सुमनसोहरितोरोहितस्तथा । सुवर्णाशसुरास्तगपञ्च तेदशकागणा ॥२३ तेषामिन्द्रस्तुविशेयऋतधामामहावल । सगैरिन्द्रगुणयुक्ता सप्तपीनपिमेशृणु ।।२४ पाँच मन्वन्तर क्यन ] [ २२५ धु तिम्तपस्वीसुतपास्तपोमूर्तिस्तपोनिधिः । तपोरतिस्तयवान्यामतमन्नुनपावृतिः ॥२५ देवयानुपदेवनदेव प्ठोविदूरथः । मित्रवान्मित्रविन्दन्नमाविनस्तत्सुतानृपा. ॥२६ सावणं मनु के द्वादश मन्वन्तर के वीच जो देव और ऋषि होंग, अब उनका वर्णन सुनो ।।२२।। उनले मन्वन्तर में मुघमा, मुमना, हरित, रोहित एव मुदणं इस प्रकार के देवता हॉग और प्रत्येक गण मे दम देवगण हॉग ॥२३॥ इंद्र के समस्त गुणों से युक्त पराक्रमी ऋतघामा इंद्र होंगे। मर्पियो का वर्णन मुनो ॥२४॥ मप्तपियों के नाम हैं दृति,तपस्वी,मुदपा.,पोमूनि, तपोनिधि, तपो. रति एवं मप्तम तरोधूनि ॥२५॥ देववान्' उपदेव, देवप्रेश, विदूरय, मित्रवान् एव मित्रविन्द उन मनु के पुत्र एवं भावी नृप होगे ॥२६॥ प्रयोदशम्यपर्यायरीच्यास्यस्यमनो मुगन् । मतीश्चनृपानं वगदतोमेनिशामय ॥२७ मुधर्मारण मुगस्तमुकर्मागस्तथापरे। सुगर्माण मुराद्य तेममस्तामुनिमत्तम ॥२८ महाबलोमहावीयंन्तपामिन्द्रोदिवम्मतिः । भविप्यानथसप्तपन्गिदतोमेनिशामय २६ धृतिमानव्ययश्चयतत्वदर्गीनिरन्मुकः । निमोह मुनपाश्चान्योनिप्प्रदम्पश्चममम. ॥३० चियमेनोविचित्रननियतिनिनयोहटः । मुनेत्र भगवुद्धियमुद्रनम्वतत्नुता ॥३१ पब में मेष नाम के तृमोदम मनु के मन्वनर में जो मप्तपि और उनके पुत्र राजा होंगे, उनम वगंन मुनी ॥२॥ हे पिय? ! उन मन्वन्तर में मुधर्मा मोर मुशर्मा देवना होंगे ॥२॥ महादरामो दिवम्पति इन्द्र होंगे। माप ही मतपियों रिणय में भी सुनो ॥२१॥ निमान, पदय, तत्ती, निरा, निमोह, मुना एवं सप्तम निधाम मापि हो ॥३०॥ एव गच्च २२६ । [ मार्कण्डेय पुराण मनु के पुन चित्रसेन, विचित्र नियति, निर्भय, दृढ, सुनेत्र, क्षत्रबुद्धि और सुव्रत नामक पुन होगे ॥३१॥ ८७-रुचि को पितरों का गार्हस्थ्य उपदेश रुचि प्रजापति पूर्वनिर्ममोनिरहकृतः । पत्रास्तमितशायीचचचारपृथिवीमिमाम् ॥१ अनग्निमनिकेतन्तमेकाहारमनाश्रमम् । विमुक्तसङ्ग त दृष्ट्वाप्रोचुस्तत्पितरोमुनिम् ॥२ वत्सकस्मात्त्वयापुण्योनकृतोदारसग्रह । स्वर्गापवर्गहेतुत्वाद्बन्धस्तेनानिशविना ॥३ गृहीसमस्तदेवानापितृणाचतथाहणाम् । पीणामतिथीनाञ्चकुचल्लोकानुपाश्नुते ॥ स्वाहासारणतोदेवान्स्वघोच्दारगत पितृन् । विभजत्यन्नदानेनभूताद्यानतिथीनपि ॥५ सत्वदैवाहरणाद्वन्धवन्धमस्मदृणादपि । पावाप्नोपिमनुष्यपिभूतेभ्यश्चदिनेदिने ॥६ अनुत्पाद्यसुतान्देवानसन्तयपिस्तथा । भूनादीश्चवथमौढ्यात्मुगतिगन्तुमिच्छसि 11७ मार्कण्डेय जी ने कहा--प्राचीन साल की बात है कि प्रजापति रवि ने समरत ममता का याग कर दिया और अहष्ट्रवार रहित होपर जहा भी मूर्यास्त हो जाय, वही सो जाते थे इस प्रकार स पृथियो में भ्रमण घरने लगे ॥१॥ उनये पितरो ने जब उन्हें अग्नि रहित, गृह-रहित, एपाहारी, निराश्रय मोर मग त्यागी पे हमे देगा तो इम प्रगार बोले ।।२।। पितरो न पहा-हे वरम ! तुमन मी या पाणिग्रहण क्यों नहीं किया, योनि वह स्वर्ग और मोक्ष पा पारण है, विवाह रे न होने से सो सभी पन हैं ॥३॥ सभी देवता, . २२८ ] 1 मार्कण्डेय पुराण का कारण नहीं हो सकता ।।१०।। ममता रूपी कीचड़ में लिप्त होने वाले प्रात्मा को जो परिग्रह हीन पुरुष नित्यप्रति चित्त रूपी जल से धोते हैं वही पुरुप श्रेष्ठ हैं ॥११॥ अनेक जन्मो में उत्पन्न कर्मरूपी कीचड मे सने हुए मात्मा फो सद्वासना रूपी जल से स्वच्छ करना ही बुद्धिमानो को उचित है ।।१२।। पितर बोले-यह ठीक है कि सयतेन्द्रिय पुरषो को प्रारमा को स्वच्छ करना चाहिये, परन्तु हे वत्स । तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो, क्या वह मार्ग मोक्ष प्राप्ति कराने वाला है ? ||१३|| जैसे निष्काम दान से अमगल का नाश होता है, से ही शुभ अशुभ फल के भोग से पूर्व जन्म के सचित कर्म का नाश होता है।॥१४॥ एवनवन्धोभवतिकुर्वत कारणात्मक । नबन्धायतत्वमभवत्यनभिसन्धितम् ।।१५ पूर्ववर्मकृतभोग क्षीयतेऽहनिशतथा सुखदु खात्मकर्वत्सपुण्यापुण्यात्मरंYणाम् ॥१६ एवप्रक्षाल्यतेप्राज़रात्मावन्धाच्चरक्ष्यते । नत्वेवमविवेकेनपापपङ्घन लिप्यते ॥१७ अविद्यापठ्यतेवेदै कर्ममाग पितामहा । तत्यथर्मगोमागे भवन्तोयोजयन्तिमाम् ॥१८ अविद्यासत्यमेवैतवर्मतन्मृधावव । चिन्तुविद्यापरिप्राप्तीहेतुःवर्मनसशय ॥१६ विहितावरणात्पु भिरद्धि क्रियतेतुय । मयमोमुक्तयेनासोप्रत्युताऽधागतिप्रद ॥२० प्रक्षालयामीतिभवान्वरसारमाननुमन्यते । विहिताारणोद्भूतं पापैरवन्तुविलिप्यसे ।।२१ प्रविद्याप्पुषकारायविषयज्जायनेनृणाम् । मनुष्ठिाभ्युपायेनयन्धायान्यायतोहिमा ॥२२ तम्मावरमापत्यविधिवहारमग्रहम् । माजन्मविषयतस्तुममम्प्राप्यतुलीवितम् ॥२३ रुचिकृत पुषस्तव ] [ २२६ अनभि सधि के दम बन्धन का कारण न होने से कम करने वालों को ही समार के बन्धन मे नहीं पड़ना होता ॥१शा हे पुत्र । सुग्न. तुम्ब के रुप में भोगे जाने वाले भोग से ही पूर्व जन्म के नचिन पुण्य पाप युक्त कर्म दिन रात क्षीण होते रहते हैं ॥१६॥ बुद्धिमान मनुष्य का क्त्तव्य है कि वह अविवेक रूप पाप के कीचड में निमग्न न हो और आत्मा को इन प्रकार स्वच्छ को तया वन्धन से अपने को बचाये ॥१७॥ रचि ने कहा-हे पितरमग । देद में कम मार्ग को ही अविद्या कहा गया है, फिर आप मुझे कर्म मार्ग मे क्यो प्रवृत्त करना चाहते हैं ॥१८॥ पितरो ने कहा-धर्ममार्ग का अविद्या कहा है, वह ययाय है, परन्तु कर्म के द्वारा यह वचन अमत्य हा जाता है, क्योति मं न हो तो विद्या की प्राप्ति होती है ॥१॥ सभी करन याग्य कार्यों के न करन से अमत् पुष्प मोक्ष के लिये जो मयमादि करते हैं, अन्त में वह प्रधागति को प्राप्त होत हैं ।।२०।। है पुत्र । तुम समन्ते हो कि मैं प्रात्मा को धो रहा हूँ, परन्तु यह निश्चय समभो कि विहित कर्म के न कग्न में उमा पाप मे जरने हैं ॥२१॥ जैम अपकार करने वाला विष प्रौषधि प मे मनुप्य का उसकार करन वाला होता है, वम ही यह विद्या भी मनुष्य के लिये उपकारिणी होनी है, अन्य गुग्ण वाला होन पर भी अनुष्ठित कार्य उचित उपाय के द्वारा हमारे लिये कल्याण- प्रद होता है ।।२२।। हे पुत्र । इमलिय तुम अब विवाह कर लो,जिसने मानारित धर्म की प्राप्ति न होने से तुम्हारा जन्म असफल न हो ॥२३॥ :--रुचिकन पुत्रम्नर सतनपितृवाक्येनगमुद्विग्नमानस.। कन्याभिलापीविप्रापिपग्विभाममेदिनीम् ॥१ कन्यामलममानोऽमौपितृवाक्याग्निदीपित । चिन्तामवापमहतीमतीवोद्विग्नमानन. ॥२ विक्रोमिक्वगच्छामिपथमंदाग्मग्रह. । क्षिप्रभवेपितृणायोममन्युदयराग्य १३

[ माण्डेयपुराण
इतिचिन्तयतस्तस्यमतिर्जातामहात्मन ।
तपसारायाम्येनब्रह्माणकमलोद्भवम् ।।४
ततोवर्पशत दिव्यतपस्तेपेसवेधसम् ।
दिक्षु सुचिरकालपरनियममास्थितः ॥५
तत स्वदर्शयामासग्रह्मालोकपितामहः ।
उवाचतप्रपन्नोऽस्मीत्युच्यतामभिवाञ्छितम् ॥६
ततोऽसौप्रणिपत्याहब्रह्माणजगतोगतिम् ।
पितृणावचनातेनयत्वतु मभिवाञ्छितम् ।
ब्रह्माचाहविविप्रथु त्वातस्याभिवाञ्छितम् ॥७
मार्कण्डेय जी ने कहा-ब्रह्मपि रुचि ने पितरो का ऐसा मन्तव्य सुन
कर उद्विग्न चित से कन्या की इच्छा की और इसके लिये पृथिवी में विचरण
करने लगे ॥११॥ पिनरो की वाणी रूण अग्नि में तपने के पश्चात् कन्या प्राप्त
न होने से उन्हे बडो चिन्ता हुई ॥२॥ पितरो का अभ्युदय करने वाला मेरा
विवाह कार्य किम प्रकार से शीघ्रता पूर्वक सम्पन्न हो ? इसके लिये मुझे क्या
करना और यहाँ जाना चाहिये ? ।।३।। इस प्रकार चिन्ता करते करते उन्होंने
निश्चय किया कि मुझे तपस्या के द्वारा भगवान ब्रह्माजी को प्राराधना करनी
चाहिये ॥४॥ ऐसा निश्चय कर ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिये विधिवत
दिव्य सौ वर्ष तक तप किया ॥५॥ तव ब्रह्माजी उसके समक्ष साक्षात् रूप से
प्रकट हुए और रुचि से उन्होन दहा-मैं प्रसन्न हुआ हूँ, तुम अपना इच्छित वर
मांगो ॥६॥ यह सुनकर रुचि ने ब्रह्माजी को प्रणाम दिया और पितरो के
श्रादेशानुमार जो कामना की है वह उनमे निवेदन की, तब रुचि की इच्छा
जान कर ब्रह्माजी बोले ॥
प्रजापतिस्त्ववितास्रव्याभवताप्रजा ।
मृष्ट्वाप्रजा सुतान्विप्रसमुत्पाधानियास्तथा ।
कृत्वाकृताधिकारस्त्वतत सिद्धिमवाप्स्यसि ।
सत्ययथोक्त पितृभि कुम्दारपग्ग्रिहम् ॥

औचित पुत्रता । २.१ .. कामचेममभिघ्यायक्रियतांपितृपूजनम् । तएवतुष्टा:पितर प्रदाम्यन्तितर्वेप्सितान् । पत्नीमुताश्चसन्तुष्टाः विनदा :पितामहाः ।।१० इत्यूपेर्वचनथु त्वाब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मन । नद्या विविक्त पुलिनेचकारपितृतर्पणम् ॥१? तुष्टावच पितृन्विप्रम्तवंरेभिस्तथाहृतः । एकाग्र प्रयतोभूत्वाभक्तिन म्रात्मकन्धरः ॥१२ नमस्येऽहपितृञ्छाद्ध येवसन्त्यधिदेवता. । देवरपिहितय॑न्तयेचश्राद्ध स्वघोत्तर : ॥१३ नमस्तेऽह पितॄन्स्वर्गेयेतय॑न्तेमहर्षिभिः । श्राद्ध मनोमयभक्त्याभुक्तिमुक्तिमभीप्मुभिः ।।१४ उन्होंने कहा-है ब्रह्मन् ! तुम प्रजा को र पन्न करने वाले प्रजापति जब तुम प्रजा की मृष्टि और सन्तानोत्पत्ति करके समस्तु प्रिया || करके अधिकार से च्युत होजानोगे, तव तुम्हें मिद्धि की प्रानि होगी इसीलिये पितर गण तुम्हें विवाह करने का आदेश देने हैं ।।। में अपना वर्त्तव्य मानकर पितरो का पूजन करो, वह मन्तुष्ट होकर तुम्हें इन्छिन पन्नी और पुन देंगे? मन्तुष्ट हुए पितर गग क्या नहीं दे सकते ? ॥१०॥ मार्क डेयजी ने कहा- अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी का ऐमा प्रादेश पाकर रचि ने नदी के निर्जन तट पर पितरो का तर्पण किया ।।११।। उन्होंने अत्यन्त आदर पूर्वर, एकाग्रचित्त मे, भक्तिभाव के द्वारा मस्तक नुमा कर स्नान के हारा पितरो को प्रसन्न किया ||१२|| रुचि ने कहा-थाद्ध काल मे जो अधिदेवता म्प ने निहाम करते हैं पौर श्राद्ध मे देवगरा भी स्वाहा वह वर जिनका तृप्ति-विधान करते हैं, उन पितरो को मैं नमम्कार करता हू, ||१३|| जिन्हे महर्षि गरा मुक्ति-मुक्ति की वामना युक्त श्राद्ध मे तृप्त करने हैं, उन पितरों को नमस्कार है ॥१४॥ नमम्येऽपितृम्वर्गसिद्धा मन्नर्पयन्तियान् । धाडे पुदिव्य मरलैग्पहाररनुत्तमः ॥१५ २३२ ] [ मार्कण्डेय पुराण नमस्येऽपितृन्मत्यरचन्तेभुबियेसदा । श्राद्ध पुश्रद्धयाभीष्टलोकप्राप्तिप्रदायिनः ॥१७ नमस्येऽहपितृन्विप्रेरच्यन्तेभुवियेसदा । वाञ्छिताभीष्टलाभायप्राजापत्यप्रदायिनः ॥१८ नमस्येऽहपितृन्येवैतय॑न्तेऽरण्यवासिभि । वन्य श्राद्धर्यताहारस्तपोनि—तकिल्विपं ॥१६ नमस्येऽह पितृन्विप्रै ठिकवतचारिभि । येसयतात्मभिनित्यसतर्यन्तेसमाधिमि ॥२० नमस्येऽहपितृछाद्धं राजन्यास्तर्पयन्तियान् । काव्यर शेषविधिवल्लोकत्रयफलप्रदान् ।।२१ जिन पितरो को सिद्ध स्वर्ग मे श्राद्ध के समय सभी दिव्य उपहारो से तृप्त करते हैं उनको मैं नमस्कार करता हूँ ॥१५॥ जिन पितरो का अत्यु-कृष्ट समृद्धि की कामना वाले गुह्यगिण भक्ति में तन्मय होकर पूजन करते हैं, उन पितरो को मेरा नमस्कार है ॥१६॥ पत्यलोक के निवासी मनुष्यगण इच्छित लोको के दाता जिन पितरो को श्राद्ध मे श्रद्धा सहित पूजा करते हैं, उन पितरो को नमस्कार है ॥१७॥ जो पितरगण प्राजापत्य पद प्रदान करने वाले हैं, वे ब्राह्मणो के द्वारा इच्छिन विषय की प्राप्ति के निमित्त पूजे जाते हैं, मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ॥१८॥ जिन वन वामियो के पाप मिताहार भोर तपस्या के कारण क्षीण होगये हैं, वे वन्य श्राद्ध द्वारा जिन पितरो को तृप्त करते हैं, उन्हे मेरा नमस्कार है 11१६ सयतात्मा नैष्ठिक ब्रह्मचारी विप्र जिन पितरो को समाधि द्वारा तृप्त करते हैं, उहे नेरा नमस्कार है ॥२०॥ तीनो लोको में फत देने वाले जिन पितरो यो क्षत्रियाण श्रद्धा पूर्वर कव्य देकर तृप्त करते है, उन पितरों को नमस्कार है।॥२१॥ नमम्येऽहपितृन्वैश्य रयतेभुवियेसदा । स्वकर्माभिरतं नित्यपुष्पधूपानवारिभि ॥२२ नमस्येहपितृन्छाद येशूद्र पिक्तित । सन्तप्यन्तेजगत्यत्रनाम्नाख्याता सुकालिन ।।२३ हचिकृत पुत्र स्तव । । २३३ नमस्येऽहपितृञ्छाद्ध पातालेयेमहासुरै । सन्तप्यंन्तेस्वधाहारास्त्यक्तदम्भमदै सदा ।।२४ नमस्येऽपितृञ्छाद्ध रच्यन्तेयेरसातले। भोगरशेषविधिवन्तागं कामानभीप्सुभि ॥२५ नमस्येऽहपितृञ्छाद्ध सर्प सन्तपितान्सदा । तवविधिवन्मन्त्रभोगसम्पत्समन्वितं ॥२६ पितृन्नमस्येनिवसन्तिसाक्षाद्य देवलोकेचतथान्तरिक्षे। महीतलेयेचसुरादिपूज्यास्तेमेप्रतीच्छन्तुमयोपनीतम् ॥२७ पितृन्नमस्येपरमात्मभूतायेवैविमानेनिवसन्तिमूर्ता । यजन्तियानस्तमलमनोभिर्योगीश्वरा क्लेशविमुक्तिहेतून् ॥२८ अपने कम म लगे हुए वैश्य जिन पितरो को पुष्प, धूप, मन और जल के द्वारा तृप्त करते हैं, उन पितरो को मैं नमस्कार करता हूँ ॥२२॥ इस ससार म जिन सुकालीन नामक प्रसिद्ध पितरा को शूद्रगण श्रद्धा भक्ति पूर्वक तृप्त करते हैं उन पितरो को नमस्कार है ।।२३।। जिन स्वधाहारी पितरो को पातालवासी महाप्रमुर दम्भ और मद का त्याग करके श्राद्ध के द्वारा तृप्त करते हैं, उन पितरो को नमस्कार है ॥२४॥ काम को अभिलाषा वाले नागवगीय रसातल मे जिन पितरो को पशेष भोग और पाद से सदा तृप्त करते हैं, उन पितरा को मैं नमस्कार करता हूं ॥२५॥ जिन पितरो को वे सर्पगण मत्र, भोग और सम्पत्ति से युक्त होकर श्राद द्वारा तृप्त करते हैं, उन पितरो को नमस्कार करता हूँ ॥२६॥ जो पितरगण देवलोक और मतरिक्ष में प्रत्यक्ष- रूप से रहत हैं और भूतल म देवतामा द्वारा जिनका प्रपन दिया जाता है, उनको नमस्कार है वह मेरी प्रायना स्वीकार करें ॥२७॥ जो परम भात्मभूत पितर विमान म साक्षात् रूप से निवास करते हैं तथा जिन पितरों की क्लेश नाशिणी वाणो द्वारा यम म प्राराधना करते हैं उहें प्रणाम करता हूँ ॥२८॥ पितृन्नमस्येदिवियेचमूर्ता स्वघाभुज वाम्यफलाभिसन्धौ । प्रदानशक्ता सकलेप्सितानाविभुक्तिदायेनभिसहितेपु ॥२६

[ माकंगडेय पुराण
तृप्यन्तु तेऽस्मिन्पितर समस्ताइच्छावतायेप्रदिन्तिकामान् ।
सुरत्वमिन्द्रत्वमताऽधिक वासुतान्पशून्स्वानिवलगृहाणि ॥३.
सोमस्ययेरश्मियुयेऽकविम्बेशुक्लेविमानेचसदावसन्ति ।
तृप्यन्तुतेऽस्मिन्पितरोऽन्नतोयगन्धादिनापुष्टिमितोयजन्तु ॥३१
येषाहुतेऽग्नौहविपाचतृप्तिर्यभुञ्जते विप्रशरीरसंस्था. ।
येपिण्डदानेनमुदप्रयान्तितृप्यन्तुतेऽस्मिन्पितरोऽन्नतोय. ।। ३२
व व्यान्यशेषारिणचयान्यभीष्टान्यतीवतेपाममराचितानाम् ।।३३
तेपातुसान्निध्यमिहास्तुपुष्पगन्धान्नभोज्येपुमयाकृतेषु ॥३४
दिनेदिनेयेप्रतिगृह्णते_मासातपूज्याभुवियेऽष्टकासु ।
येवत्सरातेऽभ्युदयेचपूज्या प्रयान्तुतेमेपितरोऽत्रतृप्तिम् ।।३।।
जो स्वर्ग मे मूर्तिमान रहकर काम्यफल के निमित्त स्वधा का माहार
करते हैं और प्रार्थियो को इच्छित प्रदान करने में समर्थ है तथा निष्काम कर्म
में मोक्ष प्रदान करते हैं, उन पितरो को प्रणाम
॥२६॥ जो प्राथियो को
प्राथित वस्तु प्रदान करते हैं और जो देवत्व, इन्द्रत्व अथवा इससे भी बढ़ कर
हैं तथा जो पुत्र, पशु, धन, बल, घर आदि कामना के अनुसार देते हैं, वह
पितरगण मेरे इस पूजन से तृप्ति को प्राप्त हो ॥३०॥ जो पितरगण सोम-
किरणो, सूर्य-विम्ब पोर श्वेन विमान में निवास करते हैं, वह मेरे द्वारा तृप्त
होते हुए अन्न, जल, गधादि से पुष्टि को प्राप्त हो ॥३१॥ जो अग्नि मे घृत को
प्राहुति देने से तृमि को प्राप्त होते हैं। जो ब्राह्मण के देह मे प्रविष्ट होकर
भोजन-ग्रहण करते हैं तथा जो पिण्डदान से संतुष्ट होते हैं, वह पितरगण इस
अन्न और जल के द्वारा सन्तुष्ट हो ॥३२-३३१॥ देवतानो द्वारा पूजित उन
पितरो के लिए जो कव्य प्रभीष्ट हैं, उन्हो पुष्प, गन्ध, भन्नादि पदार्थों का मैंने
संग्रह
किया है, वह इनके निक्ट पावें ॥३४॥ जो नित्यप्रति पूजा ग्रहण करते
और प्रतिमास मष्टका में पूजे जाते है, तथा वर्ष के अन्त में जिनका पूजन
होता है, वह पितरगए मेरे इस पूजन द्वारा तृप्त हो ॥३॥

रुचिकृत पुत्र स्तव [ २३५ पूज्याद्विजानांकुमुदेन्दुभासोयेक्षत्रियाणांचनवार्कवर्णाः । तथाविशांयेकनकावदातानीलीनिभा शूद्रजनस्ययेच ॥३६ तेऽस्मिन्समस्ताममपुष्पगंधूपान्नतोयादिनिवेदनेन । तथाग्निहोमेनचयांतुप्तिसदापितृश्य.प्रणतोऽस्मितेभ्यः ॥३७ येदेवपूण्यतितृप्तिहेतोरश्नन्तिकव्यानिशुभाहुतानि । तृप्ताश्चयेभूतिसृजोभवतितृप्यन्तुतेस्मिन्प्रणतोऽस्मितेभ्यः ॥३८ रक्षांसिभूतान्यसुरांस्तथोग्राग्निर्नाशयन्तस्त्वशिवप्रजानाम् । प्राद्या सुराणाममरेशपूज्यास्तृप्यतुतेऽस्मिन्प्रणतोऽस्मितेभ्यः ॥३६ अग्निष्वात्तावहिपदप्राज्यपा:सोमपास्तया। ग्रजंतुष्तिश्राद्धऽस्मिन्पितरस्तपितामया ॥४० अग्विात्ताःपितृगणा.प्राचीरक्षन्तुमेदिशम् । तथावहिंपदःपान्तुयाभ्यायेपितर स्मृताः ॥४१ प्रतीचीमाज्यपास्तद्वदुदीचीमपिसोमपाः । रक्षोभूतपिशाचेभ्यस्तथैवासुरदोपतः ।।४२ जो पितरगण श्वेत वणं वाले मौर प्रभा से सम्पन्न होकर देवताओं के द्वारा पूजनीय होते हैं तथा नवोदित सूर्य के समान रक्त वणं वाले होकर सत्रियो के द्वारा पूजित होते हैं जो स्वणं जसो कान्ति वाले होकर वंश्यों द्वारा पूजे जाते हैं और नीलिमा रूप होकर शूद्रो द्वारा पूजनीय होते हैं ॥३६॥ वह सभी पितरगण मेरे द्वारा किये गये पुष्प, धूप, मन तथा जलादि की भेंट और भग्निहोत्र से तृप्त हो, उन पितरो को मेरा प्रणाम है ॥३७॥ जो अत्यन्त तृप्ति के लिये देवतामो के समक्ष होमे गये सब घट अन्न रूप कव्य वा माहार करके तृप्त होते पौर पणिमादि माठौं सिद्धियां प्रकट करते हैं, वह मेरे द्वारा सृप्ति को प्राप्त हो, मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ॥३८॥ जो पितरगण राक्षस, भूत पौर विकराल अमुरो को नष्ट करने वाले और अमगल को मिटाने वाले हैं तपा जो देवतामों के भादि पुरुष पोर इन्द्र के पूजनीय है, वह पितरगण मेरे द्वारा तृप्त हों, में उन्हें प्रणाम करता हूँ ॥३६॥ पग्निप्याता, पहिपर, --- २३६ ॥ [ माण्डेय पुराण ॥४२॥ । प्राज्यपा और सोमपा पितरगरण मेरे द्वारा तपए को प्राप्त होकर इस प्राद्ध में तृप्त हा ॥४०॥ मग्निप्वाता पितर पूर्व दिशा म मेरी रक्षा करें और बहिषद पितर दक्षिण दिशा म रक्षा करें ॥४१॥ माग्यपा पितर पश्चिम दिशा म तथा सोमप, पितर उत्तर दिशा म राक्षस, भूत, पिचास मौर असुरों द्वारा उत्पन्न विय उपद्रव से रक्षा करें सर्वतश्चाधिपस्तेपायमोरक्षाकरोतुमे । विश्वोविश्वभुगाराध्योधर्मोपन्य शुभानन ।।४३ भूतिदोभूतिकृद्भ ति पितृणायेगणानव । कल्याण कल्यताकर्ताकल्य कल्यतराश्रय ४४ कल्यताहेतुरनध पडिमेतेगणा स्मृता । वरोवरेण्योवरद पुष्टिदस्तुष्टिदस्तथा ॥४५ विश्वपातातथाधातासप्त वैतेतथागणा । महान्महात्मामहितोम हिमावान्महाबल ॥४६ गरणा पञ्चतथैवैतेपितृणांपापनाशना । सुखदोधनदश्चान्योधर्मदोअन्यश्वभूतिद ॥४७ पितृणाकथ्यतेचंतत्तथागरणचतुष्टमम् । एकत्रिशपितृगणायैव्यप्तिमखिलजगत् । तेमेऽनुतृप्तास्तष्यत्यच्छन्तृचसदाहितम् ॥४८ जिन पितरो के विश्व, विश्वभुक् माराध्य धर्म, पाय, शुभानन, anद, भूति कृत् मोर भूति यह नौ सख्यक गण हैं उनके मधिपति यम मेरी सब ओर से रक्षा करें, कल्याण, क्ल्यता, कर्ता कल्य, कल्पतराश्रय ॥४३-४।। कल्यता हेतु मौर मनघ यह छ प्रकार के गण जिन पितरो के हैं तथा जिन पतरो के वर, वरेण्य, वरद, पुष्टिद, तुष्टिद ॥४५॥ विश्वयाता और धाता रह सात प्रकार के गए हैं तथा महान्, महात्मा, महित, महिमावान, महाबल ।४६।। यह पांच प्रकार के गण जिन पितरो के हैं एव सुखद, धनद, धमद और भूतिदाता यह चार प्रकार के पितरो के गण हैं यह सब मिलाकर संच को पितरो का वरदान । । २३७ इकत्तीस पितरगण सम्पूर्ण विश्व को व्याप्त किये हुए हैं, वह सभी मेरे द्वारा शुति को प्रान होकर मरी कामना पूर्ण करें और मेरे लिए सदैव हितकारी हो ॥४॥ ह-रुचि को पितरों का वरदान एवतुस्तुवतस्तस्यतेजसोराशि छन । प्रादुर्वभूवमहसागगनव्याप्तिकारक. ॥१ तद्दृष्ट्वासुमहत्तज.समासाद्यस्थितजगत् । जानुभ्यामवनिंगत्वारचि स्तोत्रमिदजगीर अमूर्तानाचमूर्तानापितृणादीप्ततेजसाम् । नमस्यामिसदातेपाध्यानिनादिव्यचक्षुपाम् ॥३ इन्द्रादीनाचनेतारोदक्षमारीचयोस्तथा। मप्तीगतिथान्येपोतानमस्यामिकामदान् ।। मन्वादीनामुनीन्द्राणामूर्याचन्द्रमसोस्तथा। तान्नमस्याम्यहमग्यान्पितरश्चावेपुये ।।५ नक्षत्राग्गाग्रहाणाचवारवान्योनभमस्तथा। धावापृथियोश्चतथानमस्यामिताजलिः ।।६ देवणाग्रहाणाचसर्वलोपनमस्कृतान् । अक्षय्यस्यसदादातृन्नमम्ये हातांजलि Is मार्कण्डेय जी पहा-सचिरेरा इस प्रकार स्तवन किये जाने पर उनो ममोप उन्न मिसायुक्त पौर आभारी तेर सहमा प्राट हुआ | उग तेरा समूर्ण विश्व को पारमादिन दरर अपस्थित देगा तो गरि ने खानु से पृषिको परम स्तोत्रन रिया विरे- उन पान , लिम्प नत्र, दोष तर, निराकार एष पूजितरितरो में २३८ ] [ मारएडेय पुराण नमस्कार करता हूँ ॥३॥ दक्ष, मरीचि, सप्तपि तथा इन्द्रादि के नेता स्वरूप पाम देने वाले पितरा का में नमस्कार करता हूँ ॥४॥ मनु इत्यादि मुनीदवरो तथा सूर्य-चन्द्रमा के नेता मौर काम के प्रदान करने वाल, समुद्र पौर पल मे अवस्थित उन सभी पितरो को मैं नमस्कार करता हूँ ||५नक्षत्र, मह वायु, अग्नि, माकाश, स्वर्ग पौर पृथिवी के नेता तथा काम प्रदायक पितरो को हाथ जोड कर प्रणाम करता हूँ ॥६॥ देवर्षिया के उत्पत्ति कर्ता, अक्षय फ्ल के दाता पौर सब लोकों द्वारा नमस्कार किये जाने वाले पितरो को करबद्ध प्रणाम करता हूँ ॥७॥ प्रजापते कश्यपायसोमायवरुणायच । योगेश्वरेभ्यश्चसदानमस्यामिकृतांजलि ॥ नमोगणेभ्य सप्तम्यस्तथालोकेषुसप्तसु । स्वयभुवेनमस्यामिब्रह्मण्योगचक्षुषे ॥६ सोमाधारान्पितृगणान्योगमूर्तिधरांस्तथा । नमस्यामितथासोमपितरजगतामहम् ॥१० अग्निरूपांस्तथैवान्याम्नमस्यामिपितृनहम् । अग्नीषोममयविश्वयतएदशेषत ॥११ येतुतेजसियेचैतेसोमसूर्याग्निमूर्तयः । जगत्स्वरूपिरणश्चैवतथाब्रह्मस्वरूपिण ॥१२ तेभ्योऽखिलेम्योयोगिभ्य पितृभ्योयतमानसः । नमोनमोनमस्तेमेप्रसीद तुस्वधाभुजः ॥१३ प्रजापतियो म कश्यप और सोम, वरण तया योगेश्वर स्वरूप हैं, उन पितरो को मैं हाय जोड कर प्रणाम करता हू || जो सात लोकों में सात गणो के मध्य स्थित हैं, उन्हें तथा जो योग-चक्षु स्वयम् ब्रह्मा स्वरूप हैं, उन पितरों को प्रणाम करता हूँ ॥६जो पितर सोम के प्राश्रय, योगमूर्ति, सोम. रूप एव जगत्पिता है, उनको मैं प्रणाम करता हूँ ॥१०॥ जिन प्रशेप पितरों के द्वारा अग्नि सोम और जगत् उसन्न हुमा है, उन अग्नि रूपी प्रयान्य हचि को पिलरो का वरदान ] [ २३६ मभी पितरगण को मैं प्रणाम करता हूँ ॥११॥ जो चन्द, मूर्य, अग्नि रूपी सेज मे स्थित होकर विश्व स्वाप और ब्रह्मस्वरूप हैं उन समस्त योगी पितरो पो मैं अपने सयत मन रे द्वारा बारम्बार नमस्कार करता है, वे स्वधा का पास्वादन पने पाले पितर मुझ पर प्रमाप्त हो ॥१२-१३॥ एवंस्तुतास्ततस्तेनतेजसामुनिसत्तम । निश्चम मुम्तेपितरोभासयन्तोदिशोदश ॥१४ निवेदितचयत्त नपुष्पगधानुलेपनम् । तद्भ,पितानथमतान्ददृशेपुरत.स्थितान् ॥१५ प्रणिपत्यपुनर्भवस्यापुनरेवकृतांजलि. । नमस्तुभ्यनमस्तुभ्यमित्याहपृथगाहतः ॥१६ सत प्रसन्ना पितरस्तमू वुमुनिसत्तमम् । घरवृणीप्वेतिसतानुवाचानतकधर. ॥१७ सम्प्रतसगवर्तृत्वमादिष्टब्रह्मणामम। सोऽहपुत्रीमभीप्सामिधयोंदिन्याप्रजावतीम् ॥१८ प्रधवसद्य पत्नीतेभवत्वनिमनोरमा। तस्याचपुमोमविताभवतोमनुरुत्तमः ॥१६ मन्यन्तराषिपोषीमाम्रवन्नाम्नवोपलशित 1 रुचेरीच्यइतिम्यातियोयास्यतिजगत् ।।२० तम्यापिवहव पुत्रामहाबलपराकमा । भविष्यन्तिमहात्मान पृषिवोपरिपालवा. ॥२१ मारएडेय जी ने कहा-है मुनिवर ! रुपियारा इस प्रकार स्तवन गिने पर दमों दिशाओं को प्रााशित करते हुए तिरगए प्राट हए ॥१४॥ फिर उन्हें जो पुष, गए पम्पयामिण रिया गया था, उमर्म विभूषित हुए सिरोमोन ने परने सामने पो दर देसा ॥१॥ तर वह मनि माहित पोट र म पूर्वर परको ARRITY परने मगे ॥१६शिर निमें में मर होकर मुनियर रवि से कहा-यर मांगो, दम पर मर ने पोश नीरी .

२४० ] [ मावंडेण्य पुराण परके उनसे निवेदन किया ॥१७॥ रुचि बोले-मुझे ब्रह्माजी ने सृष्टि उत्पन्न करने का आदेश दिया है, इसलिए मैं अब सन्तानोत्पति के निमित भार्या प्राप्त करना चाहता हूँ ॥१८॥ पितरों ने कहा-हे वत्स! तुम्हें अभी इसी स्थान में मनोहारिणी भार्या की प्राप्ति होगी, उसके गर्भ से तुम्हारे येष्ठ मनु पुत्र की उत्पत्ति होगी ॥१६॥ हे रुचे ! तुम्हारा वह पुत्र बुद्धिमान मन्वन्तराधि. पति होगा और तुम्हारे नाम के अनुसार ही उसकी ख्याति होगी अर्थात् वह 'रोच्य' नाम से विश्व मे विख्यात होगा ॥२०॥ फिर उस रोच्य के भी महाबली, पराक्रमी, पृथिवी का पालन करने वाले बहुत से महात्मा पुत्र उत्पन्न होगे ॥२१॥ त्वंचप्रजापतिभूत्वाप्रजा.सृष्ट्वाचतुर्विधा । क्षीणाधिकारोधर्मज्ञततःसिद्धिमवाप्यसि ॥२२ स्तोत्रेणानेनचनरोयोऽस्मास्तोष्यतिभक्तित । तस्यतुष्टावयभोगानात्मज्ञानतथोत्तमम् ॥२३ शरीरारोग्यमर्थचपुत्रपौत्रादिकन्तथा। प्रदास्यामोनसदेहोयच्चान्यदभिवाँछितम् ॥२४ तस्मात्पुण्यफलं लोकेवांछद्भिः सततंनरैः । पितृणांचाक्षयांतृप्तिस्तव्या स्तोत्रेणमानवैः ॥२५ वांछद्धि.सततंस्तव्या स्तोत्रेरणानेनवैयतः । श्राद्धचयइमभक्त्याग्रस्मत्प्रीतिकरस्तवम् ।।२६ पठिप्यंतिद्विजाग्याणाँभु जताम्पुरतःस्थितः । स्तोत्रथवरणसंप्रीत्यासन्निधानेपरेकृते ॥२७ अस्माकमक्षपंश्राद्ध तद्भविष्यत्यसशयम् । पद्यप्यश्रोत्रियंश्राद्ध यद्यप्युपहतभवेत् ॥२८ तुम भी प्रजापति होकर चार प्रकार को प्रजा उत्पन्न करोगे और जब धर्म-ज्ञाता तथा अधिकार से सीण होगे तब तुम्हें सिद्धि की प्राप्ति होगी ॥२२॥ नो मनुष्य इस स्तोत्र के सहित भक्ति भाव पूर्वक हमारा स्तवन करेंगे, हम निशुम्भ वध ] उन पर मतुष्ट होंगे और उन्हें भोग तथा ? मात्मनान प्रदान करेंगे ॥२३॥ जो शरीर की प्रारोग्यता, धन, पुत्र-पौत्रादि की कामना अथवा मन्यान्य मभिलाषा परेंगे वह इस स्तोत्र के द्वारा इमारी स्तुति करने पर, हम से प्रभोट पदार्थ प्राप्त करेंगे ॥२४॥ इमलिए ससार मे पुण्यफन प्राप्ति की कामना वाले मनुष्यो को इम स्तोत्र के द्वारा पितरो को मसय तृप्ति करनी उचित है ॥२५।। जो हमें प्रसन्न करना चाहें, वह इम स्तोत्र का निरन्तर पाठ करें, बाद के समय भोजन करते हुए ग्राह्मणो के समक्ष स्थित होकर जो मनुष्य हमारी प्रीति उत्पन्न वरन वाले ॥२६॥ इम स्तोत्र को मतिपूर्वक पाठ करेगा और स्तोत्र मुनने से उत्पन्न हुई प्रीति के द्वारा निकट में स्थित को इष्ट मानेगा, उसके द्वारा हमारा मक्षय पाद अवश्य ही सम्पन्न होगा यदि श्राद्ध घोत्रिय रहित पयवा दोप युक्त हो ॥२७॥ अन्यायोपात्तवित्त नयदिवाकृतमन्यया । प्रथाद्धाहरुपतरुपहारस्तथाकृतम् ।।२६ अकालेप्यथवाऽदेगेविधिहीनमथापिवा । प्रश्रद्धयावापुरुपर्दम्भमाश्रित्यवाकृतम् ॥३० अस्मारतृप्तयेथाद्ध तथाप्येतदुदीरणाद् । यत्र तत्पधठतेश्राद्ध स्तोत्रमन्मत्सुखावहम् ॥३१ अम्माक्जायतेतृप्तिस्तत्रद्वादशवार्षिकी । हेमतेद्वादशाव्दानितृप्तिमेतत्प्रयच्छति ॥३२ शिशिरेद्विगुणादांश्चतृप्तिस्तोत्रमिद शुभम् । वसतेपोडशसमास्तृप्तयेथादकमणि ॥३३ ग्रीप्मेचपोडवितत्पठिततृप्तिकारकम् । विक्लेऽपिकृतेश्राद्ध स्तोत्रेणानेनसाधिते ॥३४ वर्षासुतृप्तिरस्माकमक्षयाजायतेरुचे। शरवालेऽपिपठितथाद्धकालेप्रयन्यति ॥३५ ।

२२ । [ मार्कण्डेय पुराण अस्माकमेतत्पुरुषस्तृप्तिपंचदशाब्दिकीम् । यस्मिन्गृहेचलिखितमेत्तत्तिष्टतिनित्यदा ॥३६ सन्निधानकृतेश्राद्धतत्रास्माकभविष्यति । तस्मादेतत्त्वयात्रा विप्राणांभुञ्जतपुरः ॥३७ या अन्याय द्वारा उत्पादित धन के द्वारा किया जाय या अममय में, विपरीत स्थान मे या प्रविधि से प्रश्रद्धा पूर्वक अथवा दूपित उपहार से दंभी मनुष्यो के द्वारा सम्पन्न किया जाय ॥२८-२९-३०॥ तो भी इस स्तोत्र का पाठ होने से वह बाद मे तृप्ति देने वाला होगा, जिस श्राद मे हमे सुखी करने वाले इस स्तोत्र का पाठ होता है ॥३१॥ उस श्राद से हमें बारह वर्ष तक तृप्ति रहती है, या हमन्त काल म यह स्तोत्र हमे बारह वर्ष तक तृप्ति देने वाला होता है ॥३२॥ शिशिर ऋतु मे यह स्तोत्र चौबीस वर्ष तक और वसंत ऋतु मे करने पर सोलह वर्ष तक तृप्नि दायक होता है ॥३३॥ ग्रीष्मकाल में पाठ पूर्वक श्राद करने से सोलह वर्ष तक तृप्ति रहती है, किसी कारणवश श्राद्ध दूषित हो तो इस स्तोत्र के पाठ से श्रेष्ठ हो जाता है ॥३४।। है रुचे । वर्षाऋतु मे श्राद्ध के समय इस स्तोत्र के पढने से हमारी अक्षय तृप्ति होती है, यदि शरद ऋतु मे इस स्तोत्र के पाठ सहित श्राद्ध का द्रव्य अर्पण करे तो पन्द्रह वर्ष तक तृप्ति होती है, जिस घर मे यह स्तोत्र लिखा हुमा श्रेष्ठ स्थान पर रखा रहता है, उस घर में याद करने से हमारी सन्निधि प्राप्त होती है, पर्यात् हम उस घर मे उस समय उपस्थित रहते हैं, इसलिये तुम याद मे भोजन करते हुए ब्राह्मणो के सम्मुख हमारे इस स्तोत्र को पढ़ कर सुनामी । इससे हमारी पुष्टि होगी। इस प्रकार रवि को समझा कर पितृगण स्वर्ग को चले गये ।।३५-३८॥ इस स्तोत्र १०-रोच्य मनु का जन्म ततस्तस्मानदीमध्यात्समुत्तस्थौमनोरमा। प्रम्लोचानामतन्वीतत्समोपेवराप्सरा ॥१ रोच्य मनु का जन्म ] । २४३ साचोवाचमहात्मानरूचिसुमधुराक्षरम् । प्रश्रयावनतासुध्र प्रम्लोचावेवराप्सरा र अतीवरूपिणीकन्यामत्सुतातपतावर । जातावरुणपुत्रेणपुष्करेगमहात्मना ॥३ तागृहाणमयादत्ताभार्थिवरवरिणनीम् । मनुर्महामतिस्तस्यासमुत्पत्स्यतितेसुत ॥४ तथेतितेनसाऽप्युक्तातस्मात्तोयादपुष्मतीम् । उज्जहारतत कन्यामालिनीनामनामत. ॥५ नद्याश्चपुलिनेतस्मिासरुचि, निसत्तम । जग्राहपाणिविधिवत्समानाय्यमहामुन न् ॥६ तस्यातस्यसुतोजज्ञ महावीर्योमहामति । रोच्योऽभवत्पितुर्नाम्नाख्यातोऽत्रवसुधातले ॥७ मार्कण्डेयजी ने कहा-फिर उस नदी में से प्रलोचना नाम की एक सरा बाहर भाई मोर उन रुचि नामक मुनि से कहने लगी हे महात्मन् मालिनी नामक एक कन्या है जो वरुण देव के पुत्र श्रीमान् पुष्कर द्वारा पन की गई है । उस अत्यन्त रूपवती सुशील कन्या रल को मैं आपको पंत करती हू । आप उसे भार्या रूप में ग्रहण करके गृहस्थी बनिये (उसके से आपका जो पुत्र उत्पन्न होगा वही मागामो मन्वन्तर मे मनु बनेगा। १ से ४) मार्कण्डेयजी कहने लगे कि उस पप्सरा के ऐसे वचन सुनकर रुचि उसे स्वीकार कर लिया और उसी नदी के तट पर महामुनियो को एकत्र रके उस मालिनी कन्या से विधिवत् विवाह कर लिया । कुछ काल उससे जो हापराक्रमी और वीर्यवान् पुत्र उत्पन्न हुआ वह अपने पिता के नाम के अनुसार च्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥७॥ तस्यमन्वन्तरेदेवास्तथासप्तर्षयश्चये । तनयाश्चनृपाश्चवतेसम्यकथितास्तव ॥ धर्मवृद्धिस्तथारोग्यधनधान्यसुतोद्भव । नृणाभवत्यसन्दिग्धमस्मिन्मन्वतरेथ ते ॥

२४४ ]
। मार्कण्डेय पुरार
पितृस्तवतथाच स्वापितृणांचतथागणान् ।
सर्वान्कामानवाप्नोतितत्प्रसादान्महामुने ।।१०
इस रौध्य नामक मन्वन्तर के देवता, सप्तर्षि और समस्त राजाओं तथा
धन के पुत्रो के विषय मे पहले बतलाया जा चुका है कि इस मन्वन्तर की
कथा सुनने से धर्म की वृद्धि होती है, प्रारोग्य, धन, धान्य' और पुत्र की प्राप्ति
होती है । जो पितरो की स्तुति और उनके गुणो को श्रद्धा पूर्वक धावण करता
है उसकी सभी अभिलाषायें पूरी होती हैं ॥६-१०॥
६१-भौत्य मन्वन्तर प्रारम्भ
तत परतुभौत्यस्यसमुत्पत्तिनिशामय ।
देवानृपोस्तथापुत्रास्तथैववसुधाधिपान् ।।१
बभूवाङ्गिरस शिष्योभूतिम्निातिकोपनः ।
चण्डशापनदोऽल्पेऽर्थेमुनिरागस्यसौम्यवाक् ॥२
तस्याश्रमेमातरिश्वानववावतिनिष्ठुरम्।
नातितापरविश्वकपज्जन्योनातिकदमम् ॥३
नातिशीतचशीताशुःपरिपूर्णोऽपिरश्मिमि ।
चकारभीत्यागैतस्यकोपनस्थातितेजसः ।।४
ऋतवश्वमंत्यक्त्वावृक्षेष्वाश्रमजन्मसु ।
तस्यपुप्पफलचक्रुराज्ञयासार्वकालिकम् ॥५
हुरापश्चयन्देनतस्याश्रमसमीपगा ।
फमण्डलुगताश्च वतस्यभीतामहात्मनः 11६
नातियलेशसहोषिप्र.सोऽभयरकोपनोभृशम् ।
अपुषश्चमहाभाग सप्तपस्यकरोन्मनः ।।
माएडेयजी ने कहा--"तत्पश्चात्" भौत्य 'नामय मनु वै उत्पन्न होने
पौर उनो मन्वन्तर के गुरगण,ऋपि भोर उनपे नृप पुत्रों का वर्णन गुभो ।।१।।

मौत्य मन्वन्तर पारम्भ ] [ ૨૪ हपि अङ्गिरा के भूति मुनि शिष्य थे, जो कि क्रोयी और क्षणिक प्रप- घि पर ही घोर शाप देते ये एवं अनजाने ही निरपराधी को उनके कटु वचनों सामना करना पहना था ॥२॥ उन क्रोधी और तेजस्वी का ऐसा भय छाया प्रा था कि उनके माधम मे वायु सरल स्वभाव वहनी थी, मूर्य असहनीय प्यता नहीं देते थे, इन्द्र अनपेक्षित वर्षा नहीं करते थे पूर्ण चन्द्रमा पनी चांदनी से शीत प्रदान नहीं करता था एवं उनके भा. से असहनीय शीत ही होता या 1४1) ऋतुएँ भी उनकी मात्रा का पालन करते हुए सभी ऋतुप्रो सभी प्रकार के फल पुर उनके पाश्रम को वृक्षावलियो मे उत्पन्न करती थीं १५॥ ऋषि भूति के भय से प्राश्रम के समीप बहता हुमा जल भी उनकी इच्छा- सार क्षणमान में उनके कमण्डलु में पा जाता था ॥६॥ हे ब्राह्मण ! वह हा क्रोधी ऋपि पिसी बाधा को सहन नहीं करते थे, चूंकि उनके पुत्र उत्पन्न ही हुमा इस कारण वह तपस्या में लीन हुए ॥७॥ पुत्रकामोयताहार शोतवातानलाहतः । तपस्यामिविचिन्त्येतितपस्येवमनोदघे ॥ तस्येन्दु तिशीतायनातितापायभास्करः। धनवन्मातरिश्वाचववोनातिमहामुने HE पापीध्यमानोद्वन्द्वं भ्रमभूतिमुनिसत्तमः । अनवाप्याभिलापंततपस सन्यवत्तंत ॥१० तस्यभ्रातामुव भूद्यनेतेनाभिमन्धित.। यियासु शान्तिनामानशिध्यमाहमहामतिम् ॥ प्रशान्तमक्षप्रतिमविनीतगुरुकमणि । सदोद्य क्त गुभाचारमुदार मुनिमत्तमम् ।।१२ महयनं गमिष्यामिभ्रातु शान्तेरावचंमः । तेनाहूतन्त्वयाचेहपतत्तं ध्यशणुप्पतत् ।।१३ मतिजागरणंवह स्त्वयाकाय्यममायमे । तयातयाप्रयत्नेनपयाग्निनंदरामवजेत् ॥१४

२४६ ]
[ मारगडेय पुराण
पुत्र की इच्छा से तपस्या करने वाले उन महात्मा ने सयत पाहार एवं
शीत, वायु व अग्नि की वेदना सहार भी तपस्या करने का प्रत लिया और
मन्तत तपस्या मे ही चित्त लगाया है महर्षि । उनरे तपस्या कार में
भी भयभीत चन्द्रमा शीत एव सूर्य असहनीय ऊष्णता नहीं देते थे तथा वायु भी
समक्ष में मन्द-मन्द मे स्वाभाविक बहती थी ।।६वह पि श्रेष्ठ भूति शीत एव
साप दोनो ही से पीडित रहकर अपनी मनोकामना प्राप्त न कर सके, तो उन्होंने
तपस्या त्याग दी ॥१०॥ उनके एव भाई सुवर्चा ने उनको यज्ञ में मामत्रित
क्यिा उस समय भाई के यहां जाने की इच्छा कर उन्होने अपने शिष्य शातिनाम
को बुलाया अपने नाम के अनुकूल वह गुरु के कार्य में सदैव तत्पर और उदार
चित्त एव सदाचारी घे ॥१२॥ भूति बोले-हे शान्ते । अपने भाई सुवर्चा के
प्रामन्त्रण पर मैं यज्ञ में जाता हू, अब तुम्हे प्राश्रम में रहकर जो कार्य करने
है, वह ध्यान से सुनो ।।१३।। मेरे पाश्रम प्रतिदिन मग्नि प्रज्वलित रखना
वह बुझे नहीं ऐसे यत्नशील रहना ।।१४।।
इत्याज्ञाप्यतथेत्युक्तोगुरु शिष्येणशातिना ।
जगामयज्ञ तभ्रातुराहूत सयवीयस ॥१५
सचशान्तिर्गनाद्यावत्समित्पुष्पफलादिकम् ।
उपानयतिभूत्यर्थीगुरोस्तस्यमहात्मन ॥१६
अन्यच्चकुरुतेकर्मगुरुभक्तिवशानुग ।
प्रशान्तस्तावदनलोयोऽसौभूतिपरिग्रह ॥१७
तदृष्ट्वासोऽनलशान्तशान्तिरत्यन्तदु खित ।
भीतश्वभूतेवहुधाचिन्तामापमहामति ।।१८
किंकरोमिकथ वात्रभवितागमनगुरो ।
मयाद्यप्रतिपत्तव्यकिकृतेसुकृतभवेत् ॥१६
प्रशान्ताग्निमिमधिष्ण्ययदिपश्यतिमेगुरु ।
ततोमाविषमेह्यद्यव्यसनेन्नियोक्ष्यति ॥२०
यद्यन्यमग्निमत्राहमग्निस्थानेकरोमितत् ।
सर्वप्रत्यक्षहरभस्मसोऽवश्यमाकरिष्यति ॥२१

भौत्य मन्वन्तर प्रारम्भ ] [ २४७ . मार्कण्डेयजी ने कहा-शिष्य शान्ति ने गरु वी माज्ञा को 'इसी प्रकार होगा' कहकर शिरोधार्य किया 1 तब भूति अपने भाई के यहां यज्ञ में गये ॥१॥ तदनन्तर अपने गुरु की अग्नि प्रज्वलित रखने के लिए जंगल से समिधा, पुष्प, फल प्रादि एकत्रित कर लाते ।।१६। साथ ही गुरु-भक्ति मे घशीभून शान्ति अन्य दूसरे कार्य भी करने लगे, उसी समय भूति द्वारा प्रज्व- लित रखी गई, अग्नि किमी प्रकार वुझ गई ॥१७॥ बुद्धिमान् मुनि शान्ति उस अग्नि को वुमी हुई देखकर दुखी हुए और अपने गुरु भूति के भय से चिन्ता- प्रस्त होगये ॥१८॥ वह विचारने लगे कि क्या किया जाय ? इस समय क्या उचित कर्म हो, जिसमे भला हो सके, अब गुरु किस प्रकार मायगे ? ॥१६॥ मेरे गुरु यदि पाश्रम में अग्नि को बुभी हुई देखेंगे तो तत्काल मुझे दण्ड देकर दुख देंगे ॥२०॥ मौर यदि में मुन. अग्नि प्रज्वलित करता हूं, तो वह सर्वज्ञानी गुरु मुझे निश्चय ही भस्म कर देंगे ॥२१॥ सोऽहपापोगुरोस्तस्यनिमित्त कोपशापयोः । तथात्माननशोचामिययापापकृतगरोः ।।२२ दृष्ट्वाप्रशान्तमनलंनूनशप्स्यतिमांगुरुः । यथावापावकः द्धस्तयावीयोहिसद्विजः ॥२३ यस्यप्रभावाविन्यन्तोदेवास्तिष्ठन्तिशासने । कृतागससमायुक्त्याकयानोघर्पयिष्यति ।।२४ वहुधैवंविचिन्त्यासौभीतस्तस्यसदागुरोः । ययौमतिमताश्रेष्ठ शरणजातवेदसम् ॥२५ सचकारतदास्तोत्रंसप्तयंतमानसः । सचकचित्तोमेदिन्यान्यस्तजानु कृताञ्जलिः ॥२६ मैं पापारमा उन गुरु के क्रोष भोर शाप का वैसा शोक नहीं कर सकता जिस तरह गुरु के समीप हुए पाप का शोक होता है ॥२२॥ गुरु जब मायेंगे तो मग्नि को युझी देखकर भवश्य घोर रूप में क्रोधित होकर मुझे शाप देंगे अपवा उनसे भयभीत मग्नि भी मुझे शाप दे सकती है, क्योंकि मेरे नुरु का

२४८
| माण्डेय पुराण
वीर्य हो ऐसा है ||२३|| जिनसे भयभीत होकर सुरगण भी उनके पराधीन हो
गये हैं,वह मुझ अपराधी को देखकर किस प्रकार दण्डित करेंगे ? ॥२४॥ माकं.
एडेयजी ने कहा--अपने गुरु से भयभीत विवेकी शिष्य शान्ति इस प्रकार
चिन्तित हुए जातवेशः अग्नि की शरण में पहुंचे ॥२५॥ इसके पश्चात् वह
शान्त संयत चित्त होकर धरती मे घुटने नवा एव हाथ जोड सप्तशिखा युक्त
अग्नि-स्तोत्र का पाठ करने लगे ।।२६।।
प्रोनम.सर्वभूतानासाधनायमहात्मने ।
एकद्विपञ्चधिष्ण्यायराजसूयेपडात्मने ।।२७
नम समस्तदेवानावृत्तिदायसुवर्चसे ।
शुक्ररूपायजगतामशेषाणास्थितिप्रद ॥२८
त्वमुखसर्वदेवानात्वयात्त भगवन्हविः ।
प्रीयस्यखिलान्देवास्त्वत्प्राणासर्वदेवताः ॥२६
हुतहविस्त्वय्यनलमेधत्वमुपगच्छति ।
सतश्चजलरूपेरणपरिणाममुपतियत् ।।३०
तेनाखिलौषधीजन्मभवत्यनिलसारथे।
औषधीभिरशेषाभि.सुखंजीवन्तिजन्तवः ॥३१
वितन्वतेनरायज्ञास्त्वत्सृष्टास्वोषधीपुच ।
यज्ञ देवास्तथादैत्यास्तद्वद्रक्षांसिपावक ।।३२
प्राप्याय्यन्तेचतेयज्ञास्त्वदाधाराहुताशन ।
अत.सनस्यस्ययोनिस्त्व वह सर्वमयस्तथा ॥३३
देवतादानवायक्षादत्यागन्धाराक्षसा. ।
मानुपा पशवोवृक्षामृगपक्षिसरीसृपाः ॥३४
आप्याय्यन्तेत्वयासःसंवध्यन्तेचपावक ।
त्वत्तएवोद्भवयान्तित्वय्यन्तेचतथालयम् ॥३५
शान्ति बोले-रामस्त प्राणियो के साधन, महात्मा, दो पच रूप एव
राजसूय यज्ञ मे पणमूर्ति धारण करने वाले, उनको नमस्कार ॥२७॥ सम्पूर्ण
मुरगण को वृत्ति प्रदान-कर्ता सुवर्चा और सम्पूर्ण विश्व को स्थिति प्रदान करने

भौत्य मन्वन्तर भारम्भ ] [ २४६ वाले शुक्र रूप तुमको नमस्कार ॥२८॥ हे सम्पूर्ण देवगण के मुख-स्वरूप ईश्वर तुम्हारे द्वारा ही घृत पान कर देवगण को सन्तुष्ट करते हैं एव तुम ही समस्त देव गण के प्राण रूप हो ॥२६॥ तुम ही में हदि हुत होकर अमल मेध्यत्व प्राप्त करती है और फिर उसका जल स्वरूप हो जाता है ॥३०॥ है अनिलसार ' तुम से ही सभी प्रौपषियो की उत्पत्ति होती है और उन प्रोप- धियो स ही प्राणिगण सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं ॥३१॥ हे पावक । तुम्हारे द्वारा उत्पन्न प्रौषधियों से प्राणी जो यज्ञ करते हैं, ऐसे यनो से ही सुर, दैत्य और असुर ॥३२॥ तृप्त होते हैं । हे हुताशन | उन सभी यज्ञो के तुम आधार रूप हो। इसलिए हे वह्न । तुम सभी के उत्पन्न करने वाले और सर्व व्यापी हो ॥३३॥ हे पावक | सुर, असुर, यक्ष, दैत्य, गन्धर्व, राक्षस, मानव, पशु,वृक्ष,मृग,प्रापही से तृप्त व पोपित होते हैं एव तुम से ही उत्पन्न अन्त में तुम हो मे मिल जाते हैं ॥३॥ अप.सृजसिदेवत्वत्वमत्सिपुनरेवता । पच्यमानास्त्वयाताश्चप्राणिनापुष्टिकारणम् ।।३६ देवेपुतेजोरूपेणकान्त्यासिद्ध प्ववस्थित । विपरूपेण नागेपुवायुरुप पतलिपु ॥३७ मनुजेपुभवान्क्रोधोमोह पक्षिमृगादिपु । अवष्टम्भोऽसितरुपुकाठिन्य त्व महीप्रति ॥३८ जलेद्रवस्त्व भगवाञ्जवरूपीतथाऽनिले। व्यापित्वेनतर्थवाग्नेनभसित्व व्यवस्थित ॥३६ त्वमग्नेसर्वभूतानामन्तश्वरसिपालयन् । त्वामेकमाहु कवयस्त्वामाहु स्त्रिविधपुन ॥४० त्वयासृष्टमिदविश्व वदन्तिपरमर्षय ॥४१ स्वामृतेहिजगत्सव सद्योनश्येधुताशन । तुभ्य कृत्वाद्विज पूजास्वकर्मविहितागतिम् ।।४२ हे देव | तुम ही जल के उत्पादक हो और फिर उसको पान करते हो, तथा तुम्हारे द्वारा ही उसका पाचन होता है, जो प्राणियों को पुष्टिकारक - २५० [ मार्कण्डेय पुराण - बनाता है ॥३६।। देवगण मे तुम्ही तेज स्वरूप' सिद्धो में क्रान्ति स्वरूप, मागो मे विष स्वरूप एवम् पक्षियो में वायु स्वरूप हो ॥३७॥ मनुष्यो मे कोप रूप मे पक्षी व मृगादि मे मोह रूप मे, वृक्षो मे जड रूप मे, पृथिवी में कठोर रूप मे ।।३८। जल मे द्रव्य रूप मे तुम ही स्थित हो और वायु को गति रूप में पौर प्रकाश को व्याप्त रूप मे प्रात्मा द्वारा प्रवस्थित किया है ।।३।। हे भाने ! पोषण करते हुए तुम ही उन प्राणियो के अन्तर मे विचरते हो । यद्यपि कवि तुम्हारा निर्देश एक से ही करते हैं, फिर भी तुम विविध कहलाती हो ॥४०॥ कविगण तुम्हारी भष्टघा के रूप में कल्पना करके माप यज्ञ की कल्पना करते है, तुम से ही विश्व की उत्पत्ति हुई है, ऐसा महान् ऋषियो ने कहा है ।।११।। हे हुताशन | समस्त विश्व तुम्हारे नष्ट होने पर विनाश होता है ॥४२॥ प्रयातिहव्यकव्याचे स्वधास्वाहाम्युदोरणात् । परिणामात्मवीर्याणिप्राणिनाममराचित ।।४३ दहन्तिसर्वभूतानिततोनिष्क्रम्यहेतयः । जातवेदस्त्वयैवेदविश्व सृष्टं महाद्य ते ।।४४ तवैववैदिककर्मसर्वभूतात्मकजगत् । नमस्तेऽनलपिंगाक्षनमस्तेऽस्तुहुताशन 11४४ पावकाद्यनमस्तेऽस्तुनमस्तेहव्यवाहन । त्वमेवसर्वभूतानांपावनाद्विश्वपावनः । त्वमेवभुक्तपीतानापाचनाद्विश्वपाचकः ॥४६ सस्यांनांपाककर्तात्वपोष्टात्वंजगतस्तथा । त्वमेवमेघस्त्वंवायुस्त्ववीजंसस्यहेतुकम् ॥ पोषायसर्वभूतानांभूतभव्यभवोह्यसि । त्वज्योति.सर्वभूतेपुत्वमादित्योविभावसुः ।।४८ त्वमहस्त्वतथाराविरुभेसन्ध्येतथाभवान् । हिरण्येतास्त्वंवह्न हिरण्योद्भवकारणम् ॥४६

भौत्य मन्वन्तर बारम्भ ]
[ २५१
विप्राण हव्य क्व्यादि द्वारा तुम्हारी माराधना करके 'स्वाहा' शन्द
का उच्चारण करके स्वकर्म विहित गति प्राप्त करते हैं। हे अमराचित अर्थात्
सुरगण द्वारा पूजित | प्राणियो के परिणामात्मा वीर्य स्वरूप ॥४३॥ तुम से
उत्पन्न सम्पूर्ण पग्निशिखाएँ भूतगणों को भस्म करती हैं, हे महाड्ने जातवेद !
सम्पूर्ण विश्व के तुम सृष्टि-कर्ता हो ॥४४॥ हे मनल । सर्वभूतात्मक पह विश्व
एवम् वैदिक कर्म तुम्हारे मधीन हैं । हे पिङ्गाक्ष मनल ' तुमको नमस्कार, हे
हुताशन | तुमको प्रणाम | ॥४५॥ हे माद्य हे पावक तुमको प्रणाम, तुम
ही भोज्य एवम् पेय को पचाने वाले विश्व-पावन हो, है विश्व पावन | तुम सर्व
भूत पवित्रा हो ।।४।। मन को पकाने वाले तुम विश्व को पुष्टिकरण एव
तुम ही मेघ, वायु व सस्य उत्पादन के लिए बीज रूप भी हो ॥४७॥ सभी
का पोपण करने वाले तुम ही भूत, भविष्य और वर्तमा रूप हो। तुम ही
सम्पूर्ण प्राणियों में ज्योति का स्वरूप मोर मादित्य मूर्य हो ॥४८॥ दिन, रात्रि
भौर सन्ध्या तुम ही हो । है वह । रेता एवम् हिरण्य की उत्पत्ति कारक तुम
हो हो ||४En
हिरण्यगर्भश्चमवान्हिरण्य सदृशप्रम ।
त्वमुह्मरणश्चत्वत्वत्रुटिस्त्वतथालव ॥५०
कलाकाहानिमेपादिरूपेणासिजगत्प्रभो ।
त्वमेतदखिलकाल परिणामात्मकोभवान् ॥५१
याजिह्वाभवत कालीकालनिष्ठाकरीप्रमो।
तयान पाहिपापेभ्यऐहिकाच्चमहाभयात् ॥५२
करालीनामयाजिह्वामहाप्रलयकारणम् ।
तयान पापिपापेभ्यऐहिकाच्चमहामयात् ।।५३
मनोजवाचयाजिह्वालघिमागुणलक्षणा ।
तयान पाहिपापेभ्यऐहिकाच्चमहाभयात् ॥५४
वरोतिकामभूतेन्योयातेजिह्वासुलोहिता ।
तयान पाहिपापेभ्यऐहिकान्चमहाभयात् ।।५५

२५२ 1 [ मावण्डेय पुराण मधुम्रवर्णायाजिह्वाप्राणिनारोगदायिका । तयान पाहिपापेभ्यऐहिकाचमहाभयात् ॥५६ तुम ही हिरण्य गभ एवं हिरण्य के समकक्ष कान्तिमान् हो । मुहत्त, क्षण शुष्ट एव लव तुम ही हो ॥५०॥ हे जगत्प्रभो ! कलाकाष्ठा और निमें पादि के रूप मे तुम ही परिणामात्मक अन्तकाल हो ॥५१॥ हे प्रभो । अपनी कालनिष्ठा पूर्ण काली जोम द्वारा पाप, भय एव ऐहिक भय हमारी रक्षा करो ॥५२॥1 कराली नामक जो जीभ तुम्हारी महाप्रलय के समय से है, उसके द्वारा हमारी ऐहिक भय और पापो से रक्षा करो ॥५३।। अपनी लघिमागुण युक्त मनाउदा जीभ से हमारी ऐहिक भय और पापों से रक्षा करो ॥५४॥ प्रणियो की कामना पूर्ति करने वाली अपनी सुलोहिता नामक जीभ से हमारी ऐहिक भय और पापो से रक्षा करो ॥५५।। प्राणियो के रोगो का शमन करने वाली, सधूम्रवर्ण जीभ से ऐहिव भय और पापो से हमारी रक्षा करो ॥५६।। रफुलिंगिनीचयाजिह्वायत सकलपुद्गला । तयान पाहिपापेभ्यऐहिकाच्चमहाभयात् ।।५७ यातेविश्वसृजाजिह्वाप्राणिनाशर्मदायिनी । तयान पाहिपापेभ्यऐहिकाचमहाभयात् ॥५८ पिङ्गाक्षलोहितग्रीकृष्णवत्महुताशन । त्राहिमासर्वदोषेश्य ससारादुद्धरेहमाम् ॥५६ प्रसीदवह्ल सप्ताचि कृशानोहव्यवाहन । अग्निपावकशुक्रादिनामाष्टभिरुदीरित ॥६० अग्नेऽग्रे सर्वभूतानासमुत्पत्तिविभावसो। प्रसीदहव्यवाहाख्यग्रभिष्ट तमयाव्यय ॥६१ त्वमक्षयोवह्निरचिन्त्यरूप समृद्धिमन्दुष्प्रसहोऽतितीव्र । तवाव्ययभीममशेषलोकसवर्धकहन्त्यथवातिवीर्यम् ॥६२ त्वमुत्तमतत्त्वमशेपसत्त्वहृत्पुण्डीक्स्थमनन्तमीड्यम् । त्वयाततविश्वमिदचराचरहुताशनकोयहुधात्वमत्र ॥६३ भौत्य मन्वन्वर प्रारम्भ ] [ २५३ । प्रात्मा एव देह को उपन करने वाले स्पुलिङ्गिनी भीम न रोहित महाभय और पापो से हमारी रक्षा करो ॥५७॥ प्राणियो को मङ्गरा दाता विश्या नामक अपनी जीम से ऐहित भय और पम्पो से हमारी रक्षा कगे ॥५॥ है हुताशन ! तुम्हारे नेत्र पिंगल वर्ण, ग्रोवा लोहित वर्ण और तुम्हारी देह कृष्ण वर्ण है । तुम सर्व प्रकार के दोषो से मेरी रक्षा करो और इस विश्व से उद्धार कीजिये ॥५६॥ है वह्न । बाठ नामो दाले हो सप्ताचि; हव्यवाहन,शानु,अग्नि, पादक, शुक्र नाम से विख्यात तुम प्रमप्न होतो ॥६॥ हे अग्ने ! समस्त भूतों से तुम उत्पन्न हो । हे विभायसो ! हे अ यय व्यवाह । मैं तुम्हारी प्राराधना परता हूँ उससे तुम मुझ पर प्रसन्न होतो ॥६१॥ हे वह्न । तुम अक्षय हो, तुम्हारा प्रचिन्त्य रूप है, तुम ममृद्धिमान्, प्राश्रयदाता एव अत्यन्त तीवनापूर्ण हो और प्रव्यय व भीम तुम्हारे मूर्तिमान् रूप प्रयन वतशाली एवं नमस्त विश्व का भी विनास करने वाले हैं ।।६२॥ हे हुनान । तुम श्रेष्ठ सत्त्व और समस्त जीवो के हृदय कमल सदृश हो और तुम उन मबरें पूज्य अनन्त ब्रह्म स्प हो । उम ब्रह्म स्वरुप मे तुमने इस प्राणी जगत् को परिपूर्ण कर रखा है। इसलिए तुम एक होकर भी मनेर स्प में इस विश्व में स्थिति परत हो ॥६॥ त्वमक्षय सगिरिवनावसुन्धरानम ससोमामहदिवासिलम् । महोदधेर्जठरगतश्चाडवोभवान्विभुःपिवतिपयसिपावक ।।६४ हुताशनस्त्वमितिमदाभिपूज्यसेमहाकतोनियमपरम्महपिभि । अभिष्टुत पिबसिचमोममध्वरेवपटतान्यपिचहवीपिभूतये ॥६५ त्वविप्रंमततमिहेज्यसेफलार्धवेदाङ्गप्रथमक्लेपुगीयसेत्वम् । त्वद्ध तोर्यजनपरायणाद्विजेन्द्रावेदाङ्गायविंगमयन्तिमाले ६६ त्वब्रह्मायजनपरस्तयंवनिष्णुभूतेश मुग्पतिरस्पनाजलेश. । मूर्येन्दूमकलसुरामुगश्नहब सन्नोप्यानिमतफ्लान्यथाप्नुवन्ति ६७ पचिंभिं परममहोपघातदुष्ट स्पष्ट तपशुविजायतेसमम्तम् । स्मानानापरममतीवमस्मनामत्सन्ध्यार्थामुनिभिरलीयसेन्यसेतत् ६८ २५४ ] । माण्डेय पुराण सत्कृत्वात्रिदिवमवाप्नुवन्तिलोवाः । सद्भक्त्यासुखनियता समूहगीतम् ॥६९ प्रसीदवह्न शुचिनामधेयप्रसीदवायोविमलातिदीप्त । प्रसीदमेपावकनैद्य ताभप्रसीदहव्याशनपाहिमाम् ।।७० यत्त वह शिवरूपयेचतेसप्तहेतय । ते पाहिन.स्तुतोदेवापितापुत्रमिवात्मजम् ॥७१ हे मनल ! तुम पक्षय हो, एव सूर्य सहित पृथ्वी तुम्हारे ही स्वरूप है भोर चन्द्रमा एवं सूर्य सहित माकाश स्वरूप तुम ही हो, दिन और रात के रूप मे निखिल कालस्वरूप हो, तुम ही महा समुद्र के अन्तर्गत वहवाग्नि और परम विभूति से समस्त किरणो में विद्यमान हो ॥६४॥ हे हुताशन ' तुम्हारा भोजन हुतहदि है इसीलिए नियम परायण परम मुनिगण यज्ञो मे तुम्हारी सदैव पूजा करते हैं और उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर विश्व के कल्याणार्थ सोमरस मौर वपटकारसहित हवि. सेवन करते हो ॥६५॥ सम्पूर्ण वेदाग मे तुम्हारा गायन है भोर यज्ञ परातरण हेतु श्रेष्ठ ब्राह्मण सदैव वेदाग अध्ययन करते हैं ॥६६॥ यजन परायण ब्रह्मा, विष्णु, भूतनाथ महादेव तुम ही हो । देवराज इन्द्र, मयंमा, जलेश्वर वरुण, सूपं एव चन्द्रमा तुम हो हो, सुर एवं असुर हव्य द्वारा सुम्हे सतुष्ट कर इच्छित फल प्राप्त करते हैं ॥६७॥ नहा उपघात से दूषित समस्त वस्तुएँ तुम्हारी लो स्पर्श मात्र से पवित्र होती है, अनेक स्नानो मे भस्म द्वारा ही स्नान उत्तम माना जाता है, अतएव शृपिगए। सध्या समय यही स्नान करते हैं ॥१८॥ इस प्रकार करने वाले मनुष्य स्वग प्राप्त करते हैं और सच्ची भक्ति से सर्व सुख प्राप्त करते हैं ॥६६॥ हे वह्न। इसीलिए हो तुम्हारा नाम शुचि है, पाप उसी रूप मे मुझ पर प्रसन्न होवें। तुम स्वच्छ एव प्रबल वायु स्वरूप, उसी रूप में मुझ पर प्रसन्न हो। । है पावर | सुम वद्युताग्नि ग्रादि नामों से कौतिमान उसी रूप मे मुझ पर प्रसन्न होयो । हे हव्याशन । तुम प्रसन्न होकर मेरी रक्षा करो १७०॥ है यह । तुम मङ्गलमय प हो । जो सपहेति ज्वालाएँ हैं, उनके है देव मेरी

म मन्वन्तर वरए फल कयन ]
स्तुति ने प्रपन्न होर जिस प्रकार एक पिठा प्रपने तुत्र की रक्षा करता है,
उमौ प्रकार मेरी रक्षा करो।७१॥
१२-मई मन्वन्तर श्रवण फल कथन
एवस्तुतस्ततस्तेनभगवान्हव्यवाहनः ।
ज्वालामालावृततनुम्तस्यासीदप्रतोमुने ॥१
देवोविभावसु.प्रीतस्तोत्रेणानेनवै द्विज ।
तशान्तिमाहप्रगतमेघगम्भीरवागथ ॥२
परितुष्टोऽस्मितेविप्रभक्त्यायातेस्तुति कृत्त्व ।
वरददामिभवतेप्रार्यतायत्तवेप्सितम् ॥३
भगवन्कृतकृत्योऽस्मियत्त्वापश्यामिर पिणम् ।
तथापिभक्तिनम्रस्यभवता यतांमम Ire
भ्रातृयज्ञ गतोदेवममाचार्योनिजाश्रमात् ।
प्रागनवाश्रमधिष्प्यत्वत्सनायसपश्यतु ॥५
ममापराधासन्त्यक्त धिप्पयतेविभावसो।
तत्वयाधिष्टिलसोऽद्यपूर्ववत्पश्यतुद्विज ॥६
तथान्यदपिमेदेवप्रसाद कुरुपेयदि ।
पुत्रोविशिष्टोभवतुतदपुत्रस्यभेगुरो Im
मारंएडेयजी ने कहा है ऋषि शांति को ऐसी स्तुति पर भगवान्
हव्यवाहन स्वालामाला सहित उनके समक्ष प्रस्ट हए ॥१॥ हे ब्राह्मण
विभावमु देव ने स्तोत्रो मे सन्तुष्ट होकर उन प्रपल तस्वी शाति से मेघ सम
गभोर पदों में रहा ॥२॥ पग्नि ने कहा-' हे ब्राह्मण में तुम्हारी भक्त्तिा
स्तुठि से पमन्न हुमा हूँ! तुम अपने इन्धित घर की प्रार्पना करो में वर
देता हूँ॥३॥ शांति बोते-है भगवन् ! मापके स्वरूप को दंग पर में
।

२५६ ] [ माक्एडेय पुराण कृतकृत्य हुअा है। फिर भी नम्रता एव भक्तिपूर्वक मेरा क्यन सुनिय ।।४।। हे देव । मेरे गुरु अपने इस आश्रम से भाई के यहाँ यज्ञ म गये हैं। पाश्रम मे आकर वह अग्निकुण्ड म अग्नि प्रज्वलित देखें ॥१॥ हे विभावसो जिस अग्निकुण्ड को तुमने मेरे अपराध के कारण वचित किया है वह द्विज पर गुरु आने पर पहिले की भाति ही प्रज्वलित दखें (1६।। हे देव । यदि तुम मुझसे प्रसन्न हो, तो दूसरा निवेदन है कि मेरे पुत्रहीन गुरु के गुणवान पुत्र उत्पन्न हो ॥७॥ तथाचमैत्रीतनयेसकरिष्यतिमेगुरु । तथासमस्तसत्त्वेपुभवत्वस्यमनोमृदु ।। यश्चत्वास्तोप्यतेऽनेनप्रोतियातोऽसिमेऽव्यय । स्तोनेणतस्यवरदोभवेथामप्रसादित IME एतच्छुत्वावचस्तस्यतमाह द्विजसत्तमम् । स्तोत्रेगराधितस्तेनगुरभवत्याचपावक ।।१० गुरोरथैयतोब्रह्मन्याचितमेवरद्वयम् । नात्मार्थतेनमेप्रीतिस्त्वय्यतीवमहामुने ।।११ भविष्यत्येतदखिलगुरोर्यत्प्रार्थितत्वया मंत्रीसमस्तभूतेषुपुत्रश्वास्यभविष्यति ॥१२ मन्वन्तराधिप पुत्रश्चभौत्योनामभविष्यति । महावलोमहावीर्योमहाप्राज्ञागुरुस्तव ॥१३ अनेनयश्व स्तोत्रेणस्तोप्यतेमाससमाहित । तस्याभिलपतसर्वपुण्यचास्यभविष्यति ॥१४ अपन उस पुत्र स मेरे प्राचाय जिस प्रकार प्रीति करें उसी प्रकार समरत प्राणियों से प्रीति और कोमल व्यवहार करने वाले हा ॥८॥ हे अव्यय ! मुझ पर हम प्रकार तुम्हें प्रसन्न हुया देस पर जो प्राणी भविष्य में तुम्हारी माराधना करें, उनके लिए भी, तुम मेरे लिए प्रसन्न होकर, घर प्रदान करने वाली हा HEN मारपडेय जी ने कहा---गुरु भक्ति एव इस स्तोत्र द्वारा प्रसन्न वं मन्वन्नर प्रवण फर क्यन । [ २५७ रग्नि देव द्विज शांति की प्रार्थना सुन कर वोले ॥१०॥ अग्नि ने कहा--है पहाण ! तुमने अपने निज के लिए वर न मागवर केवल अपने गुरु के लिए वर से प्रार्थना की, है महर्षि ! इस कारण मैं तुम से प्रत्यधिक प्रमान हूँ ॥११॥ पुरु के हेतु तुम्हारी प्रार्थना पूर्ण होगो, सम्पूर्ण जीदों के प्रति उनकी प्रीति रोगी मोर उनको पुत्र-प्राप्ति होगी ।।१२।। तुम्हारे गुरु मत्यन्त मेयावी हैं, उनके महापराक्रमी, वीर्यवान् भौरय नाम का पुत्र होगा, जो मन्वन्तराधिपति होगा ।।१३।। साथ ही जो मनृप्य एकवित होकर मेरे इस स्तोत्र में मेरी माराधना परेगा, उसको सम्पूर्ण मन की इच्छाएं पूरी होंगी मोर पुण्य का भागो भी होगा ॥१४॥ यज्ञ पुपर्वकालेपुतीर्थज्याहोमकर्ममु । धर्मायपठतामेतन्ममपुष्टिकरपरम् ॥१५ अहोरात्रकृतपापंथु तमेतत्मकृद्विज । नाशयिष्यत्यसन्दिग्धंममनुष्टिकरंपरम् ॥१६ अहोमकालदोपादीनयोग्यरपितत्कृत: । यैदोपास्तानिदंसद्यामयिष्यतिमंथुतम् ॥१७ पौर्णमास्याममावाम्यापर्वस्वन्येपुचस्तवः । ममपमंध तोमत्यं भवितापापनाशनः ॥१८ इत्युक्त्वाभगवानग्नि पश्यतस्तस्यवमुने । बभूवादन:मोदीपस्योनिवृतोयया ॥१६ मचशान्तिर्गतेवह्नी रितुष्टेनचेनमा । हरोमान्चिततनुःप्रविवेगाश्रमंगुरोः ॥२० जाज्वल्यमानंतत्रामौगुरविण्येहुनाशनम् । ददर्शपूर्ववत्प्रापतत:मपरमामुदम् ॥२१ यज, पाल, तीर्य यश, धमार्ग, ६ या-मं में यह वनदावा स्तोत्र पर बरने अथवा केवल एक बार मुनने मे ही दिन गन के मसूरी पारों का बिना सन्देह विनाश होगा। हे ब्राह्मण मेरा यह मोष मत्पन्न मंतुधिया २५८ ) [ मार्कण्डेय पुराण है।।१६॥ यसकाल के व्यतीत होने पर यज्ञ करने एवं अनधिकारी पुरुष द्वारा पज्ञादि करने पर जो दोष होता है, वह सभी इस स्तोत्र के अवरण सही तुरन्त नष्ट होगा ॥१७॥ यह उत्तम स्नोत्र पूणिमा, अमावस्या या अन्य किसी पर्व के अवसर पर श्रवण करने से प्राणियों के पापो का शमन होगा ॥१८॥ मार्कण्डेय जी ने कहा- हे ऋपिवर । किसी दीपक की लो जिस प्रकार अचानक बुझ जाती है, उसी प्रकार वे अग्नि भगवान् यह वर देकर उन शाति मुनि के सामने अन्तर्धान हो गये ||१९| पावक के अन्तर्धान होने पर शाति मुनि सन्तुष्ट हृदय एव मानन्द से पूर्ण होकर अपने गुरु के पाश्रम मे पहुंचे ।।२०॥ तदनन्तर शाति मुनि अग्निकुण्ड मे उसी प्रकार अग्नि को प्रज्ज्वलित देख कर अत्यन्त मानन्दित हुए ॥२१॥ एतस्मिन्नन्तरेसोऽपिगुरुस्तस्यमहात्मन । भ्रातुर्यवीयसोयज्ञादाजगामस्वमाश्रमम् ॥२२ तस्याग्रतश्चशिष्योऽसौचक्रपादाभिवन्दनम् । गृहीतासनपूजश्चतमाहसतदागुरुः ॥२३ वत्सातिहाद त्वयिमेतथान्येपुचजन्तुषु । नवेधिकिमिद त्वञ्चेद्वेत्स्येतत्कथाशुभे ।।२४ तत सशान्तिस्तत्सर्वमाचाव्यमहामुने । अग्निनाशादिकविप्र समाचप्टेयथातथम् ॥२५ तच्छु त्वासपरिष्वज्यस्नेहार्द्रनयनोगुरु । शिष्यायप्रददौवेदान्सागोपाङ्गान्महामुने ।।२६ भौत्योनाममनुस्तस्यपुत्रोभूतेरजायत । तस्यमन्वन्तरेदेवानृपीन्भूपश्चिमेशृणु ॥२७ भविष्यस्यभविष्यास्तुगदतोममविस्तराद । देवेन्द्रीयश्चवितातस्यविख्यातकर्मणः ॥२॥ उसी समय शाति के गुरु वह ऋषि श्रेष्ठ छोटे भाई के यहाँ से यश में अपने पाश्रम में पापिस पाये ॥२२॥ सब सम्मुख प्रापर शिष्य शान्ति ने सर्व मन्वन्तर प्रवण पत क्यन ] । २५९ उनको चरण वदना की। उसके पश्चात् गुरु पूजा वन्दन पूर्ण कर आसन पहरा कर गाति से बोले ।।२३।। हे वत्स ! तुम्हारे व अन्य दूसरे जोब प्राणियों के प्रति मेरे हृदय में प्रीति ससन्न हुई है, ऐसा कैसे हुपा, म पमिल है। हे वल्ल ! कदाचित, यदि तुम्हारे ज्ञान में हो, तो मुझ से वर्णन करो ॥२४॥ है महर्षि ! तव विप्र शानि ने मग्नि बुन्ने प्रादि को समूग विगत क्या गुर से वही ॥२५॥ है महपि ! गुरु ने समस्त घटना मुनकर प्रेम से मा नेत्रों से शिष्य घोति को मातिगन वर कर लिया मोर उसे साङ्गोपाङ्ग सम्पूर्ण वेद मो प्रदान दिये ॥२६॥ इस प्रकार उन मूनि कृषि के पुत्र भौच मनु ने जन्म लिया । उन मनु के मन्वन्तर के बीच जो देवगण, भूपि, राजा और इन्द्रादि होंगे उनमा विस्तार पूर्वक वनि सुनो ॥२७-२८॥ घाभुपाचकनिष्ठाञ्चपवित्राभाजिरास्तथा । धारावृकाने त्येते पञ्चदेवगणा म्मृताः ॥२६ शुचिरिन्द्रस्तदातेपाविदशानाभविष्यति । महावलोमहावीर्य सर्वरिन्द्रगुरणेचुत ॥३. प्राग्नीघ्रश्चाग्निवाहुनमुचिमुक्तोऽयमाधव । भुमोऽजितमसप्तं तेतदामतर्पय स्मृता ॥३१ गुरुगंभीरोद्रघ्नश्वभरतोऽनुग्रहस्तया । श्रीमानीचप्रतीरविपशु संक्रन्दनस्तया ॥३२ तेजम्बीमुवल वभौत्यस्यैतमनो सुनाः । चतुदं शमयतत्तेमन्वन्तरमुदाहृतम् ।।३३ त्वामन्वन्तरागोत्यसमेगमुनिसत्तम । पुण्यमाप्नोतिमनुजस्तयाझोणाचसन्ततिम् ।।३४ धु स्वामन्वन्तरपूर्वधर्ममाप्नोतिमानवः । स्वारोचिपस्पश्रवणारसर्वकामानवाप्नुते ॥३५ पापुर, निध, पवित्र, नातिर और पाराहरु प्रभार दे देवगर होने ॥२६॥ उस बाल में इन्द्र के समस्त गुणों में पूर्ण महाररामो बोसंवाद त्र

२६. ]
[ मायएटेय पुराण
"तुषि" उसके इन्द्र होंगे ॥३०॥ उस भवन्तर में प्राग्निघ्र, अग्निवाह, शुधि,
मुक्त, माधव, शुद्र पोर मजित नाम सप्त महषि होंगे ॥३१॥ गुह, गौर,
मध्न, भरत, अनुग्रह, श्रीमाणि, प्रतीर, विष्ण, गवगण तथा ॥३२॥ सेजस्वी
सुवल नामय पुत्र भौत्य मनु पं होग। इस प्रकार मैंन मार से चौदह मन्वन्तरी
पे विषय मे पहा ॥३३॥ हे मुनिश्रंट। यह समस्त मन्वन्तरों का प्रम पर
धान मुनने से मनुष्य पुण्य-नाभ प्राप्त करते हैं एवं उनका परिवार सदैव
अधुएरण रहता है ।।३४॥ प्रपम मन्वन्तर का वनि मुन पर धर्म में प्रास्था
पढ़ती है और दूसरे मन्यन्नर श्रवण से उनकीसमस्त मन की इच्छाएं पूरी
होती हैं ॥३॥
प्रोत्तमेधनमाप्नोतिज्ञानमाप्नोतितामसे ।
रेवतेचथ तेवुद्धिसुरूपाविन्दतेस्त्रियम् ॥३६
प्रारोग्यचाशुषेपु साथ तेवैवम्बतेवलम् ।
गुणवत्पुत्रपौनास्तुसूय्य मावणिकेश्रु ते ॥३७
माहात्म्यब्रह्मसावणधर्मसावणिकेशुभाम् ।
मतिमाप्तोतिमनुजोरुद्रसावर्णिकेजयम् ॥३८
ज्ञातिश्रेष्ठोगुणयुक्तोदक्षसावरिणकेश्रु ते ।
निशातयत्यरिवलरीच्यध त्वानरोत्तम ॥३६
देवप्रसादमाप्नोतिभौत्येमन्वन्तरेश्र ते ।
तथाग्निहोत्रपुत्रांश्चगुणयुक्तानवाप्नुते ॥४०
सर्वाण्यनुक्रमाद्यश्वशृणोतिमुनिसत्तम ।
मन्वन्तराणितस्यापिथ यताफल मुत्तमम् ।।४१
तृतीय मन्वन्तर प्रौत्तम के श्रवण से धन व चतुर्थ तामस मन्वन्तर के
श्रवण से ज्ञान प्रामि होती है । पचम रेवत मन्वन्तर के श्रवण से बुद्धिमान
एव रूपवती भार्या मिलती है । ३६।। पष्ठ मन्वन्तर चाशुष के श्रवण ग मनुष्य
नीरोग रहते हैं, सप्तम मन्वन्तर वैवस्वत के श्रवण से पराक्रम एवं अष्ठम सूर्य
सावमिक मन्वन्तर के श्रवण से गुणी पुत्र एव पौत्र प्राप्त होते हैं ॥३७॥

सर्थ मन्वन्तर प्ररस पल कपन ।
[ २६१
नवम ब्रह्म मारिण मन्वन्तर के श्रवण से माहात्म्य, दशम धर्म सारिणक
मन्वन्तर के प्रवरा से त्याग और ग्यारहवें रदमावणिक मन्वन्तर के अवरा
से मुबुद्धि और विजय प्राप्त होती है ।॥३८॥ है नर ग्रेट ! बार। मन्वन्तर
दस सावणिक के श्रवण से पुरुष जाति में सर्वोत्तम मोर गुणवान होता है,
तेरहवं मन्वन्तर रोच्य के श्रवण से शत्रुपो का बल गमन करन को समर्थता
प्राप्त होती है ॥३६॥ चौदहवें मन्वन्तर भौत्य के प्रवरण से भगवान का प्रसाद,
मग्निहोत्र फल एव गुणवान् पुत्र की प्राप्ति होती है ॥४०॥ हे ऋषि !
प्रयम मन्वन्तर से क्रमबद्ध सभी मन्वन्तरो का श्रवण करने वाले मनुप्यो को
किम प्रगर फल प्राप्त होता है, इसका वर्णन सुनो ॥४१॥
तरदेवानृपोनिन्द्रान्मनू लतनयान्नृपान् ।
श्रु त्वावंशांश्चसर्वेभ्य पापेभ्योप्रमुच्यते ॥४२
देवीन्द्रनृपानान्येयेतन्मन्वन्तराधिपाः ।
तेप्रीयन्तेनयाप्रीता.प्रयच्छन्तिगुनांमतिम् ।।४३
तन गुमामतिप्राप्यकृत्वावर्मतयागुनम् ।
शुभांगतिमवाप्नोतियावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥४४
सर्वप्युतव क्षेम्या.सर्वसौम्यान्तयाग्रहा ।
भवन्त्यनशयश्रुत्वाकमान्मन्वन्तरस्थितिम् ।।४५
हे ब्राह्मण ! उन मन्वनरों के देवगरा, सम्पूर्ण ऋपिारा, मनु के नूर
पुत्रगरा एव उनको वशावलि वर्शन का श्रवण करने पर मनुष्य समस्त पारों
से विमुक्त हो जाते हैं ॥४२॥ देवगण, मुनिगण, इन्ट, नृपनिगरा एय उम
मन्वन्तर में प्रपिपनि पर, वे मब सन्तुष्ट होते हैं एव सन्तुष्ट होने पर मबुद्धि
प्रदान परले हैं ॥४३॥ इम प्रसार सद्धि प्राप्त कर गुन कार्य करने से बब
सा पौदा इन्ट रहेंगे, तब-तर मधि मनुष्य प्राप्त करते रहेंगे ॥४॥ बम-
पर मारन्तरों का वर्णन श्रवण परन मम्मू ऋतुऐ सहनीय होती है और
निस्सन्देह गाय दह भी बात हो बात हैं ॥४॥

[ne
गर
- वन
समाधिमागासवदामादति ।
मनासावतामयापाnिt
लिगमन
मोमबास गामामादी २
भानुपामगृपमागमुद्भवम् ।
परिमाणमादौडाहाशादिम् ।।
पारियोमा सममि ।
पारिद्धिमानपत ॥
घरापानद्वापिग्लिानिमहामनाम् ।
उपतपारामामुले ।
मनुमंत्रतालाप्योभी
पन्येषातगोभूपा सम्म
মাহন বােঘ।
Marathuri..

राज वशानु कीर्तन ] [ २६३ - पातशः ॥६।। धर्मात्मा, यज्ञ कर्ता, और ब्रह्मज्ञानी नृपों ने जिस वश में जन्म लेकर पृथ्वी का पोषण किया, उस वा का वर्णन श्रवण करने से मनुष्य समस्त पापो से विमुक्त हो जाता हैं ॥७॥ तदयथ यतविंशोयतोवशा सहस्रशः । भिद्यन्तेमनुजेन्द्राणामरोहायथावटात् ॥८ ग्रह्माप्रजापतिःपूर्व सिसक्षुर्विविधा.प्रजाः । प्रगुष्टाद्दक्षिणाक्षमसृजद्दिजसतम 16 वामड्गुष्टाञ्चतत्पनीजगत्सूतिकृरोविभुः । ससर्जभगवान्ब्रह्माजगतांकारणपरम् ॥१० अदितिस्तस्यदक्षस्यकन्याजायतशोभना । तस्यांचकश्यपोदेव मातंडसमजीजनत् ।।११ ग्रह्मास्वरूपंजगतामशेपारणांवरप्रदम् । मादिमध्यान्तभूतंचसर्गस्थित्यंत कर्मसु ॥१२ मतोऽखिलमिदं यस्मिन्नशेपंचस्थितं द्विज । यत्स्वरूपंजगच्चेदसदेवासुरमानुपम् ॥१३ यःसगंभूतःसर्वात्मापरमात्मासनातनः । प्रादित्यामभवद्भास्वान्पूर्व माराधितस्तया ॥१४ एक वट वृक्ष के एक मंकुर से ही एक अलग पूर्ण वृक्ष सडा हो जाता है, उसी तरह मनुजेन्द्रो के सहस्रो यश उत्पन होगये, यह सुनिये ॥८॥ हे ब्राह्मण थेठ ! पूर्व समय में विभिन्न प्रजा उत्पन्न करने को राक्षा से प्रजापति ब्रह्माजी ने अपने दाहिने हाथ के अंगूठे से दश प्रधिपति को जन्म दिया II विश्व के जन्मदाता भगवान् ब्रह्माजी ने विश्व मृष्टि के लिए अपने बाये हाप के मंगूठे से दस की परनी को जन दिया ॥१०॥ अदिति नाम की एर गुन्दर सन्या ने दया के यहाँ जन्म लिया। उस कन्या पोर कश्यप से मातंर देव उटान्न हए ॥११॥ है प्राह्मण ! म स्याए जो पोप इस विरको परदाता है, सृष्टि स्पिति एवं प्रमय के मार्ग में प्रारम्म य पन्त स्वरूप २६२ ] [ मार्कण्डेय पुरा १३-राज वंशानुकीर्तन भगवन्कथितासम्यक्त्वयामन्वन्तरस्थितिः । क्रमाद्विस्तरतस्त्वत्तोमयाचवावधारिता ॥१ ब्रह्माद्यमखिलवशभूभुजाद्विजसत्तम । श्रोतु ममेच्छतःसम्यग्भगवन्प्रब्रवीहिमे ॥२ शृणुवत्सनृपारणत्वमशेपारगाँसमुद्भवम् । चरितचजगन्मूलमादोकृत्वाप्रजापतिम् ।।३ अहिवशोभपाल रनेकक्रतुकर्तृभिः । सनामजिद्भिर्धर्मज्ञ शतसख्यरलकृत ।।४ श्रु त्वापानरेद्राणांचरितानिमहात्मनाम् । उत्पत्तयश्चपुरुष सर्वपापैःप्रमुच्यते ॥५ मनुर्यश्रतथेक्ष्वाकुरनरण्योभगीरथः । अन्येचशतशोभूपाःसम्यक्पालितभूमयः॥६ धर्मज्ञायज्विन शूरा परमार्थार्थवेदिनः । श्रु तेतस्मिन्पुमाग्वशेपापौधाद्विप्रमुच्यते ॥७ कोष्टकि बोले-हे महाराज । मन्वन्तरो के विषय मे मापने भली प्रकार वर्णन किया है और मैंने भी उसे विस्तारपूर्वक श्रवण किया है ॥१॥ हे ब्राह्मण श्रेष्ठ ! मैं अधिपतियो की ,सम्पूर्ण वंशावलि ब्रह्माजी से प्रारम्भ कर सुनने का इच्छुक हूँ। हे महाराज ! वह मुझ से सम्यक् प्रकार से कहिये ॥२।। मार्कण्डेय जी ने कहा- हे विश्वाधार ब्रह्माजी से प्रारम्भ होकर सम्पूर्ण प्रधिपतियो को जन्म-गाथा एव चरित्र का वर्णन सुनो ॥३॥ यह वश यज्ञ करने वाले, रण विजेता, धर्मज्ञ सैकडो विविध नृपो से मलकृत है ॥। इन महान् नृपतियो के जन्म और चरित्र के विषय में सुनकर मनुष्य सम्पूर्ण पापों से विमुक्त होता है ।।५।। मनु, इक्ष्वाकु, मनरल्य, भगीरथ, एवं मन्य दूसरे राज वशानु कोतंन ] [ २६३ मातशः ॥६॥ धर्मात्मा, यन्न , और ब्रह्मनानो नृपों ने जिस वश में जन्म लेकर पृथ्वी का पोपण किया, उस वश का वर्णन श्रवण करने से मनुष्य समस्त पापो से विमुक्त हो जाता हैं ॥७॥ तदयथ यतांवशोयतोवशा सहस्रशः। भिद्यन्तेमनुजेन्द्राणामरोहायथावटात् ॥ ब्रह्माप्रजापति:पूर्व सिसक्षुविविधा.प्रजाः । अगुष्टाद्दक्षिणाक्षमसृजद्दिजसत्तम । वामड्गुष्टाञ्चतत्पनीजगत्मूतिकरो विभुः । ससर्जभगवान्ब्रह्माजगतांकारणपरम् ।।१० अदितिस्तस्यदक्षस्यकन्याजायतशोभना। तस्यांचरश्यपोदेवमातंडसमजोजन ॥११ ब्रह्मास्वरूपंजगतामसेपारणांवरप्रदम् । पादिमध्यान्तभूतवसर्गस्थित्यत कर्मसु ॥१२ यतोऽखिलमिद यस्मिन्नशेपंचस्थितंद्विज । यत्स्वरूपंजगच्चेदंसदेवासुरमानुपम् ॥१३ यःसर्वभूतःसर्वात्मापरमात्मासनातनः । प्रादित्यामभवद्भास्वान्पूर्व माराधितस्तया ॥१४ एक वटवृक्ष के एक व कुर से ही एक अलग पूर्ण वृक्ष सहा हो जाता उसी तरह मनुजेन्द्रो के सहस्रों व उत्पन्न होगये, वह सुनिये ॥६॥ है हाग श्रेष्ठ ! पूर्व ममय में विभिन्न प्रजा उत्पन्न करने की क्षा से जापति ब्रह्माजी ने अपने दाहिने हाथ के अंगूठे से दस प्रधिपति को जन्म या II विश्व के जन्मदाता भगवान ब्रह्माजी ने विश्व गृष्टि के लिए अपने हाप के मंगूठे से दस की पत्नी को जन्म दिया 2017 मदिति नाम की समुन्दर मन्या ने दस रे यहाँ जन्म लिया। रस त्या मोर सयप से नि देव बसन्न हुए ॥११॥ हे ब्राह्मण ! बहा साप जो पोप इन पदो परदाता है, गृष्टि स्पिनि एव प्रमय के वार्य में प्रारम्भ पन्त स्वरूप - २६४ ] [ माण्डेय हैं ॥१२॥ समस्त विश्व के जन्म दाता, जिनमे समस्त विश्व विद्यमान है असुर घोर मनुप्यो सहित यह विश्व उनका स्वरूप है ।।१३।। जो सर्भ स्वरूप और सर्वात्मा सनातन परमात्मा हैं, अदिति द्वारा स्तुनि करने पर उन्हीं भास्कर सूर्य ने उसके गर्भ से जन्म प्रहण दिया ।।१४।। भगवञ्छ्रोतुमिच्छामियत्स्वरूपविवस्वत । यत्कारणचादिदेव सोभिवत्कश्यपात्मज. ॥१५ यथाचाराधितोदेव्यासोऽदित्याकश्यपेनच । पाराधितेनचोक्त यत्तेनदेवेनभास्वता ॥१६ प्रभावचावतीर्णस्ययथावन्मुनिसत्तम । भवताकथितसम्यक्छ्रोतुमिच्छाम्यशेपतः ।।१७ विस्पष्टापरमाविद्याज्योतिर्भाशाश्वतीस्फुटा । कैवल्यज्ञानमाविर्भू प्राकाम्यसविदेवच ।।१८ वोधश्वावगतिश्च वस्मृतिविज्ञानमेवच । इत्येनानीहरूपाणितस्यारूपस्यभास्वत ॥१६ ध यताचमहाभागविस्तराद्वदतोमम । यत्पृष्टवानसिरवेराविर्भावोयथाभवत् ।।२० क्रोष्टुकी बोले-हे महाराज | भास्वान सूर्य के स्वरूप जिसके कारण वह प्रादि देव कश्यप के पुत्र के रूप मे उत्पन्न हुए उसका वर्णन सुनना चाहता हूँ।१५एव अदिति व कश्यप ने जिस प्रकार प्राराधना की और माराधना से प्रसन्न सूर्यदेव ने जो कहा ॥१६॥ एव गृहीत जन्मा सूर्य का प्रकार से पहले प्रापने वर्णन किया हे श्रेष्ठ । वह सभी सम्यक् प्रकार से प्रवण करने को इच्छा है ॥१७॥ मार्कण्डेय जी ने कहा-विस्पष्टा, परमा, विद्या, ज्योति, शाश्वती, दीप्ति, कंवल्य, ज्ञान, प्राविर्भाव, प्राकाम्य, सवित् ॥१८॥ बोध, भव- गति, स्मृति एवं विज्ञान प्रादि सभी सूर्य देव के स्वरूप है । हे महाभाग । रवि के अविर्भाव के विषय मे विस्तारपूर्वक श्रवण करो ॥२०॥ निष्प्रभेऽस्मिन्निरालोकेसर्वतस्त मसावृते । वृद्दण्डमभूदेकमक्षरकारणपरम् ॥२१

राज वशानुकीर्तन ]
। २६५
तद्विभेदतदन्त.स्थोभगवान्प्रपितामह ।
पद्मयोनि स्वयब्रह्माय स्रष्टाजगताप्रभु ॥२२
तन्मुखादोमितिमहानभूच्छन्दोमहामुने ।
ततोभूस्तुभुवस्तस्मात्ततश्चस्वरनन्तरम् ॥२३
एताव्याहतयस्तिस्र स्वरूपत द्विवस्वत ।
प्रोमित्यस्मात्स्वरूपातुसूक्ष्मरूपरवे परम् ॥२४
ततोमहरितिस्थूलजनस्थूलतरतत ।
ततस्तपस्तत सत्यमितिमूर्तानिसप्तधा ॥२५
स्थितानितस्यरूपाणिभवन्तिनभन्तिच ।
स्वभावभावयोर्भावयतोगच्छन्तिसक्षयम् ॥२६
श्राद्यन्तयत्परसूक्ष्ममरूपपरमस्थितम् ।
प्रोमित्युक्त मयाविप्रतत्परब्रह्मतद्वपु ॥२७
सृष्टि के पूर्व, जव यह विश्व आभाहीन, अन्धकारमय था तव क्षय
रहित एक विशाल अङ्ग उत्पन्न हुआ ॥२१॥ उमी समय जगत् के जन्मदाता
प्रपितामह ब्रह्म पद्म-योनि में विद्यमान थे, उन्ही ने स्वय इस अण्डे को भेद
दिया ।।२२।। है महपि । ब्रह्माजी के मुखारविन्द से उस समय ॐ शब्द हुआ।
प्रोकार अब्द से पहले भू, भुव एव तत्पश्चात् स्व उत्पन्न हुआ ।।२३।। यह
व्याहृति भगवान भास्कर का स्वरूप है । ॐ शब्द के स्वरूप से सूर्य का अत्यन्त
मूक्ष्म रूप हुआ है ॥२४॥ उमसे स्थूल रूप मह' तत्पश्चात् स्थूल रूप 'जन'
फिर स्थूल रूप 'तप' अनन्नर स्थूल रूप 'सत्य' उत्पन्न होगया। सूर्य का सपूर्ण
रूप स्थूल है । विवस्वान् सूर्य के स्थूलो के मूक्ष्म भेद स प्रोकार के सप्त स्प
उत्पन्न हुए ॥२५॥ सूर्य भगवान् के सप्त रूप भी कभी कभी मम्मुख होते हैं
और कभी छिप रहते हैं, क्योकि उनके स्वभाव एव प्रकृति का अस्तित्व सश-
यात्मक होता है ।।२६।। हे ब्राह्मण । इस जगत् के प्रारम्भ व अन्त में निराकार
परम सूक्ष्म परमात्मा विद्यमान हैं, ॐ वार से मेरा अभिप्राय उन्ही स है ।
है ब्राह्मण । वह ब्रह्मस्वरूप ही माकण्ड देव को देह है ॥२७॥

[ मा एडेय पुरार
१४-वेदमय-मार्तण्ट की उत्पत्ति
तस्मादण्डाद्विभिन्नानत्तुह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।
ऋचोवभूबु प्रयमप्रथमावदनान्मुने ॥१
जपापुष्पनिमा मद्यस्तजोरपाह्यसहता ।
पृथक्पृथग्विभिन्नाश्वरजोरुपवहास्तत ॥२
यजू पिदक्षिणाद्ववनादनिरद्धानिकानिचित् ।
यादृग्वातथावरणग्यमहलिधरारिणच (६३
पश्चिमयद्विभीर्वा ब्रह्मरण परमेधिन ।
आविर्भूता निसामानितत्तच्छन्दासितासितान्यथ ॥४
अथर्वगामशेपचभृङ्गाञ्जनचयप्रभम् ।
यावद्धोरस्वरूपतदाभिचारिक्शान्तिकम् ॥५
उतराप्रपटीभूतवदनात्तस्यवेधस. ।
सुगसत्त्वतम प्रायसीम्यासौम्यस्वरूपवत् ॥६
चोरजोगुग्गा मत्त्वय गुपाचगुणामुने ।
तमोगुणानिसामानितम सत्त्तमयमु ७
मागडेय जी ने महा-हरपि । उम मण्डे भदन पर कम
जन्मा मायाजी गावार हा मोर उनके मुग म निगे वचनों में हाः
रगना ॥१॥ वह जपापुष नुल्प तेजस्यप और पृथक् विभिन्न जोर
पाण करम दारा या २॥ ब्रह्माजी के दक्षिण गुग में स्वर्ण तुन्य बापु
समाति पण परन याले ममस्त पशु पो पनि भार मे सपा ॥३
मदनार परमारमा मागे + पतिम मुग में गाम की रचना म
माम पद पूग या ॥४॥ यात्री २ र मुग भृग ५ मान र
संगमान पाना Tum ari, दानिणालि, शान्तिका, गुलमहर, तम में
मग गोre और गोग्य प्रसंग अप को ना हुई ॥५.६॥ ना!
मा
TAIT, गापूर्ण यजुः म ग गुण, गपूर्ण गामो
ma recimनमा usin
में

वेदमय मार्तण्ड की उत्पत्ति )
॥ २६०
एतानिज्वलमानानितेजसाऽप्रतिमेन ।
पृथक्पृथगवस्थानभाञ्जिपूर्वमिवाभवन् ।
ततस्तदाद्य यत्तेजप्रोमित्युक्त्वाभिक्षब्दयते ।
तस्यस्वभावाद्यत्तेजस्तत्ममावृत्यस स्थितम् ।।
यथायजुर्मयतेजस्तद्वत्साम्नामहामुने ।
एकत्वमुपयातानिपरेतेजसिमथये ।।१०
शान्तिकपौष्टिकचैवतथाचवाभिचारिकम् ।
ऋगादिपुलयब्रह्मत्रितयविप्वथागमत् ।।११
ततोविश्वमिदमद्यस्तमोनाशात्सुनिर्मलम् ।
विभावनीयविप्रतियंगूर्ध्वमवस्तथा ॥१२
ततस्तन्मण्डलीभूतछान्दसतेजउत्तमम् ।
परेणतेजसाब्रह्मन्नेकत्वमुपगम्यतत् ।।१३
आदित्यसज्ञामगमदादावेवयतोऽभवत् ।
विश्वस्यास्यमहाभागकारणञ्चाव्ययात्मकम् ॥१४
इन सभी ने अद्वितीय तेज मे प्रकाशवान् होकर पृथक्-पृथक् भाव से
स्थिति को ।।८॥ उसके पश्चात् प्रथम का वह तेज, जिसके लिये ॐ दशब्द प्रयुक्त
हुमा है, उसमे उत्पन्न जो तेज है, उसे वह अपने में समेट कर स्थित हुप्रा ।।।
हे महर्षि । इस प्रकार साम युक्त तेज एव यजुयुक्त तेज को भी अपने में
समेट लिया, इस प्रकार सम्पूर्ण तेज उस ॐ स्वरूप परम तेज में प्रावृत होकर
एक होगये ॥१०॥ है विप्र । इसके बाद ऋक्, साम यजु तीनो वेदो मे, शाति
युक्त, पौष्टिक, प्राभिचारिक इन तीनो में पर्यव नेद भो मिल गया ॥११॥ हे
ब्रह्म । बन्धकार नष्ट हाने पर समस्त जगत् तुरन्त स्वच्छ हागया, जिससे
उसका ऊर्च, अव और निर्यम् अयदा पार्च देश प्रकाश म आये ॥१२॥ह
विप्र । तत्पश्चात् वह परम छन्दम तेज मडनीभूत हो फिर थे ॐ कार तेज
में लीन हाकर ए होगया ॥१३॥ इस प्रकार इस तेत्र को आदि में उसन्न
होने के कारण 'प्रादित्य' की सज्ञा दी गई। है महाभाग । यही इम जगत् का
मधयात्म कारण है ॥१४॥

२६८ ] { मार्वएडेय पुराण प्रातमध्यन्दिनेचंवतथाचवापरालिके । अयीतपतिसाकाले मृग्यजु.सामसजिता ॥१५ ऋचस्तपतिपूर्वाल्ल मध्याह्न चयजू पिवं । सामानिचाराहवेतपन्तिमुनिसत्तम||१६ शान्तिक मृक्षुपूर्वाह्ण यजुर्ववचपौष्टिकम् । विन्यस्तसाम्निसायाह्न ह्याभिचारिकमन्तत.॥१७ मध्यन्दिनेऽपराहुँचसमेचैवाभिचारिकम् । अपराले पितृणान्तुसाम्नाकार्यारिणतानिवै 11१८ विसृष्टीमृड्मयोब्रह्मास्थितीविष्णुर्यजुर्मयः । रुद्र.माममयोन्तेचतस्मात्तस्याशुचिध्वनिः ॥१६ तदेवभगवान्भास्वान्वेदात्मावेदसस्थित । वेदविद्यात्मकश्च वपरःपुरुप उच्यते २० सर्गस्थित्यन्तहेतुश्चरज सत्बादिकान्गुगणान् । आश्रित्यब्रह्मविष्ण्वादिसज्ञामभ्येतिशाश्वत ॥२१ देवै सदेडय.सतुवेदमूर्तिरमूर्तिराद्योऽखिलमय॑मूर्ति । विश्वाश्रयज्योतिरवेद्यधर्मावेदान्तगम्य परम.परेश ।।२२ ऋक्, यजु और साम तीनो सज्ञाऐं प्रात , मध्याह्न एव अपराह्न काल मे तपती हैं ॥१५॥ हे मुनिभ्रेष्ठ । उनमे ऋक् प्रान काल, यजु मध्याह्न मे और साम अपराह्न मे तपता है ॥१६॥ पूर्वाह्न-काल ऋक् मे शान्ति क ये, मशह मे यजु मे पौष्टिक एव अपराह्न काल मे साम मे सम्पूर्ण पाभिचारिक कर्म निहित है ॥१७॥ मध्याह्न और अपराह्न समय मे ही अभिचारिक-मं करे एव साम द्वारा केवल अपराह्न मे ही पितरो का कार्य सम्पन्न परे ॥१८॥ सृष्टि के समय में ब्रह्मा ऋक्मय, स्थितिकाल मे विष्णु यजुर्मय एव शमन काल मे रुद्रं साम मय होते हैं, इसलिये अपराह्न क ल को अशुचि कहते है ॥१६॥ इस कारण उपयुक्त प्रकार से वेदात्मा, वेद सस्थित एव वेद विद्यायुक्त भगवान भास्वान् परम पुरुप नाम उच्चारण किया गया है ॥२०॥ सृष्टि के आदि,स्थिति व प्रजयकर्ता यह शाश्वत प्रादित्य सन्व रज एव तमोगुण को पाश्रम कर ब्रह्मा,विष्णु पौर महेश नाम प्राप्त होते हैं ।।२१।। देवतामो द्वारा सदैव पाराध्य .

२७० [ मार्कण्डेय पुराण की स्तुति करने लगे ।।४॥ ब्रह्माजी ने पहा-जो समस्त जगत् के मारमा रूप और इस जगत् में विद्यमान हैं, विश्व जिनका मूर्त रूप है एव योगी भी जिम अनिन्द्रयगाह्य श्रेष्ठ ज्याति की पाराधना परत है, उन्ह मैं नमस्कार करता ॥५॥ ऋग्वेद युक्त अचिन य शक्ति, यजुर्वेद व प्राधार साम ी रचना वे कारण, स्थूलता प्रभुक्त तीनो म निहित, अद्धं माता स्वरूप, परपना रूप और महान गुणी हैं ॥६॥ सब प्रथम उन्ही सर्वाधार रूपी परम पूज्य, परमेश्वर, अवह्निरूप, परमज्योति, देवात्मता के लिये स्थूल रूप एव श्रेप्टो से अष्टनम प्रादि पुरुप भगवान् भास्कर को नमस्कार करता हूँ ॥७॥ सृष्टिंकरामियदहतवशक्तिराद्यातत्प्रेरितोजलमहीपवनाग्निरूपाम् । तदेवतादिविषयाप्रणवाद्यशेपानात्मेच्छयास्थितिलयावपितद्वदेव ।।८ वह्निस्त्वमेवजलशोषणत पृथिव्या सृष्टिकरोपिजगताचतथाद्यपाकम् । व्यापीत्वमेवभगवन्गगनस्वरूपत्वपञ्चधाजगदिदपरिपासिविश्वम् IIE यज्ञर्यजन्तिपरमात्मविदोभवन्त विष्णुस्वरूपमखिलेष्टिमयदिवस्वन् । ध्यायन्तिचापियतयोनियतात्मचित्ता सर्वेश्वरपरममात्मविमुक्तिकाम १० नमस्तेदेवरूवपाययज्ञरूपायतेनम । परब्रह्मस्वरूपायचिन्त्यमानाययोगिभि ॥११ उपसहरतेजोयत्तेजस सहतिस्तव । सष्टविघातायविभोसृष्टौचाहसमुद्यत ॥१२ इत्येवसस्तुतोभास्वाम्ब्रह्मणासगंबर्तृणा । उपसहृतवास्तेज परस्वल्पमधारयत् ॥१३ चकारचतत सृष्टिजगत पद्मसम्भव । तथातेपुमहाभाग पूर्वकल्पान्तरेपुवै ॥१४ देवासुरादीन्मांश्चपश्वादीन्वृक्षवीरुध । ससर्जपूर्ववद्ब्रह्मानरकांश्चमहामुने ॥१५ हे देव । अापकी ही शक्ति नित्या है, क्योंकि मैं उससे प्रेरणा पाकर ही, जल, पृथ्वी, वायु और अग्नि देवतादि एव प्रणवादि भशेष की सृष्टि करता हूं। इस प्रकार स्थिति और प्रलय भी स्वेच्छा से नहीं करता, वह सब भी पर वापति की वृष्टि । मापनी प्रेला गे ही करता हू आहे न तुम दहिप नी हो । जिस अभय पनी म तुन दल गुप्ष कन्ट हो तब मैं विन्द-मोटे एव प्रथम पाक समन करताचा भामा वन्य आप ही हो, पम्प इस बग्न के सा भी आर ही हो II है मादर ! परमा मन्दि मरल यनमय विष्णु स्वन्य में यक्ष द्वारा यात्री पारापना करते हैं, प्राम-मोक्ष के प्राकाझी जिते. निय पति नी मापशे परम सरवर मानर प्रापत मनन करते हैं ॥१०॥ मार देवम्प हैं, आपको प्रगान करता हू, माप ही पनप मोर परब्रह्म स्वरूप मातार योगी माता चिन्तन बरते है, मापको प्रगान करता हूँ ॥११॥ है प्रमो' मा देव गे त्यागे, मैं मृष्टि की रचना रे लिय व्यत हू, अापना तीन तेज नृष्टि की रचना म वाला है ॥१॥ मागडेव बी न दहा-मगदान भाकर ने टिक चियता ब्रह्मागेकी पाचपना र प्रवत होकर अपना तीन तेज त्वार रिमा और केवल सामान्य तब धारस पिया ॥१३॥ फिर महानाय ब्रह्माजी ने पूर्व बन्यान्त पन्य में विश्व को मृटि रचना को ॥१॥ हे म्हपि । ब्रह्माजी न पूर्व की नाति नुर, अनुर, मनुष्य, पशु वृक्ष मादि एक समाउ नरक की रचना की ॥१५॥ १६.--कश्यप प्रजापति की सृष्टि नवाजगदिदब्रह्माप्रविभागमघावरोद । वर्णाश्रममुद्राद्रिद्वीपानापूर्ववच्या ॥? देवदयोरगादीनाम्पन्थानानिपूर्वदन् । वैदेम्पएवभगवानपरोलमलोद्भव ॥२ प्रहालस्तनयोयोऽन्मरीविरितिदिन । कम्मपन्तस्यपुत्रोग्वारपानामनामतः ॥३ दक्षान्यतनवान्वन्तयनाम्योन्नयोदया। बरतनुतावासदेवदेवमादयः ॥x २७२ । । मार्कण्डेय पुराण अदितिजनयामासदेवास्तिभुवनेश्वरान् । दैत्यान्दितिदनुश्चोग्रान्दानवानुरुविक्रमान् ॥५ गरुडारुणौचविनतायक्षरक्षासिवैखसा। कद्रु सुपावनागाश्चगन्धर्वान्सुपुवेमुनि ॥६ क्रोधायाजज्ञिरेकुल्यारिष्टायाश्चाप्स रोगरणा । ऐरावतादीन्मातङ्गानिराचसुपुवेद्विज ॥७ माकर डेयजी ने कहा-ब्रह्माजी ने विश्व की रचना करके पूर्व की भांति वर्ण, पाश्रम, समुद्र, गिरि और सम्पूर्ण द्वीपो का विभाजन रिया ||१|| भगवान् ब्रह्माजी ने देवगण दैत्य एव उरगपो का रूप तया स्थिति देवगणा से प्रारम्भ कर पूर्व की भांति ही निर्दिष्ट किये ॥२॥ ब्रह्माजी के मरीचि नामक पुत्र से कश्यप नामक एक विरयात पुत्र उत्पन हुए थे जो कि कश्यप नाम से ही विरयात हुए ॥३॥ हे विप्र । दक्ष की तेरह कन्याएं उनकी पत्नियां हुइ , जिनके गर्भ से देव, दैत्य और उरग प्रादि अनेक पुत्र उत्पन हुए ॥४॥ अदिति से निभुनेश्वर देवताओ को जन्म दिया, दिति ने दैत्यो और दनु ने महापराक्रमी क्रोधी दानवो को जन्म दिया ॥१॥ विनता ने गरुण व अरुण खगा ने यक्ष व राक्षसो, कद्रू ने नागो एव मुनि ने गन्धों को जन्म दिया ॥६॥ हे ब्राह्मणा । क्रोधा से कुल्यागण, रिष्टा से अप्सराऐ और ईरा से ऐरावत इत्यादि हवियो ने जन्म लिया ॥७॥ . ताम्नाचसुपुवेश्येनीप्रमुखा कन्यकाद्विल । यासाप्रसूता खगमा श्येनभासशुकादय ॥ इलाया पादपाजाता प्रधायायादसागरणा । अादित्यायासमुत्पन्नावश्यपस्येतिसन्तति ॥ तस्याश्चपुत्रदोहित्र पोरदौहिनिकादिभि । व्याप्तमेतज्जगत्सूत्यातेपातासाञ्चवमुने ।।१० तेपावश्यपपुवाणाप्रधानादेवतागणा। सात्विकाराजसास्त्वेते तामसाश्चमुनेगणा ||११ कश्यप प्रजापति की सृष्टि] [ २७३ देवान्यज्ञभुजश्चक्रेनथानिभुवनेश्वरान् । ब्रह्मब्रह्मविदाथेष्ठ.परमेष्ठीप्रजापति ॥१२ तानवाघन्तसहिताः स पत्नादत्य दानवा । राक्षसाश्वतथायुद्ध तेपामासीत्सुदारुणम् ॥१३ दिव्यवर्पसहस्रन्तुपराजीयन्तदेवताः । जयिनश्चाभवन्विप्रवलिनोदंत्यदानवाः ।।१४ ताम्रा से श्येनी प्रादि कन्याएं उत्पन्न हुई । इन कन्याओ से ही श्येन, भास एव शुकादि खेचरगण उत्पन्न हुए ॥८॥ इला ने पादपगरयो एवं प्रधा से पतङ्ग गणो ने जन्म लिया। हे पिवर ! अदिति के गर्भ स उत्पन्न कश्यप की जो सन्नानें थी ॥४॥ उनके पुत्र घेवते और नाती, घेवते आदि एव उनकी सन्ताने समस्त विश्व में व्याप्त हो गई ॥१०॥ हे ऋपि । कश्यप के पुत्रो में देवता ही प्रमुख हैं, उनके त्रिविधगण, सात्विक, राजस एव तामस हैं ॥११॥ परमेष्ठ एव ब्रह्मन श्रेष्ठ प्रजापति प्रयाजी देवतागणो को त्रिभुनेश्वर एव यज्ञ- भुक् किया था ।।१२॥ किन्तु विमाताप्रो से उत्पन्न दैत्य, दावन और राक्षस मिलकर देवतागणों के प्रति शत्रुता का आचरण करते हुए वाधा पैदा करते थे, इसलिये उनका देवगणो के साथ हजारों वर्षों तक विकराल युद्ध हुमा । हे ब्राह्मण इस महायुक्त मे देवाणो की पराजय हुई और बलवान् दैत्य व दानव जीत गये ॥१३-१४।। सतोनिराकृतान्पुत्रान्दैतेयेर्दानवैस्तथा। हतत्रिभुवनान्दृष्ट्वाह्यदितिर्मुनिसत्तम ॥१५ प्राच्छिन्नयज्ञभागानशुचासपीडिताभृशम् । आराधनायसवितु परयत्नप्रचक्रमे ॥१६ एकाग्रानियताहारापरनियममास्थिता । तुष्टावतेजसाराशिंगगनस्थदिवाकरम् ॥१७ नमस्तुभ्यपरामूक्ष्माभोवर्णीविनतेतनुम् । धामघामवतामीराधाम्नामाधारशाश्वत ।।१८ पश्यप प्रजापनि वा टि ] [ २७५ यद्र पजीवनायकवीरुधाममृतात्मकम् । पीयतेदेवपितृभिस्तत्मसोमात्मनेनम ॥२६ प्राप्यायदाहम्पाभ्यास्पविश्वमयन्तव । समेतमग्नीपोमाभ्यानमम्तम्मैगुणात्मने ॥२७ यद् पमृग्यजु माम्नामैक्येनत्पतेव । विश्वमेतत्रयीमज्ञनमन्तमविभावमो ॥२८ जल व मे उपन्न अोप औषधिया को पकाने लिये जो भास्कर मूति पाप धारण करने हो, उस मूर्ति को प्रणाम ॥२२॥ हे तरणे । शत्य. पोषण हेतु हिमवर्षा इत्यादि के लिये घोर गोतपूर्ण आपका जो स्प है, प्रारकी उस मूर्ति को प्रणाम ॥२६॥ हे रवे । वसन्त ऋतु काल में न अत्यन्त तेज और न अत्यन्त शीतपूर्ण मापको जो सौम्य मूर्ति है, है देव । अापकी उस मूर्ति को नमस्कार ॥२४॥ अरोप देवता एव पितृगग को तृप्ति प्रदान करने वाले अन्न को पकाने वाली पापको जो मूर्ति है उमको नमस्कार करती हूँ ॥२५॥ नपूर्ण गुल्मलना के जीवन का आधार आपका जो अमृतमय रूप है, जिसे देवता और पितर नी पान करते हैं. ऐसे सोम स्वरूप प्रापको नमस्कार ॥२६॥ अग्नि एवं सोम दोनों स्पो के मिलन से आपका जो जगन्मय स्वरप बना है, ऐस पाप गुणात्मा को नमस्कार ॥२०॥ यत्त तस्मात्पररूपमोमित्युक्ष्वाभिशब्दितम् । अस्थूलानन्तममलनमस्तस्मैसदात्मने ॥२९ एवमानियतादेवीचक्र स्तोत्रमहनितम् । निराहाराविवस्वन्नमानिराधयिपुमुने ॥३० तत कालेनमताभगवास्तपनोवरे। प्रत्यक्षतामगादस्यादाक्षायण्याद्विजोत्तम ॥३१ साददर्शमहाकट तेजसोऽम्बरसश्रितम् । जगादमेप्रसोदेतिनत्वापश्यामिगोपते ॥३२ यथादृष्टवतीपूर्वमम्बरस्य सुदुदृशम् । निराहाराविवस्वन्ततपन्लादनन्तरम् ॥३३

२७४ ।
[ मार्कण्डेय पुराण
जगतामुपकोरायतयापस्तवगोपते ।
प्राददानस्यय पतीव्र तस्मैनमाम्यहम् ।।१६
ग्रहीतुमष्टमासेनकासेनेन्दुमयरसम् ।
विभ्रतस्तवयद् पमतितीव्र नतास्मितत् ॥२०
तमेवमुञ्चत सवरसवर्पणाययत् ।
रूपमाप्यायकभास्वस्तस्मैमेधायतेनम ॥२१
हे ऋषिश्रेष्ठ । तदुपरान्त दैत्य दानवो द्वारा त्रिभुवन का हरण किया
गया एव इस प्रकार अपने पुत्रो को पराजित हुप्रा एव यज्ञ भागो से वचित
किये हुए देखकर, अदिति शोक एव पीडा सहित भगवान भास्कर देव की
स्तुति करने लगी ।।१५-१६।। एकचित्त नियताहार एव उत्तम नियम परायणता
का पालन करती हुए आकाश मडल में विद्यमान तेज राशि भगवान सूर्यदेव की
पाराधना करन लगी ।।१७। अदिति बोली-हे शाश्वत । आप सुन्दर सूक्ष्म
सुवर्ण तन धारक हो आप ज्योति स्वरूप, ज्योतिष्वगणो मे मुरय एव ज्योति
में आधार हो, आपो नमस्कार ॥१८॥ हे गोपते । विश्व का कल्याण करने
के लिये जन ग्रहण करन वाली आपकी तीव्र मूर्ति को नमस्कार ।।१९।। पाठ
महीन की अवधि पयन्त इन्दुमय रप ग्रहण करने वाली प्रापकी अत्यन्त तीव्र
मूर्ति को प्रणाम करती हू ।।२०।। हे भगवन् । उस एकत्रित सम्पूर्ण रस को
परित्याग कर वर्षा करने के लिये माप जो तृप्ति वारस मेघ रूप धारण करते
हो, उस मेषरूप प्रापकी मूर्ति को प्रणाम ॥२१।।
वायुत्सर्गविनिष्पन्नमशेषञ्चौपधीगणम् ।
पावायतवयद्पभास्व रतनमाम्यहम् ॥२२
यरूपतवातीतहिमोत्सर्गादिशीतलम् ।
तत्वालसस्यपोपायतररणेतस्यतेम ॥२३
ना तीन चयद् पनातिशीतवयत्तव ।
वमन्तत्तौरसोम्यतस्मंदवनमोनमः ॥२४
भाप्यायनमसपासादवानाचतथापरम् ।
पितृगायनमस्तस्मै मस्यानापारहेतर ॥२५

कश्यप प्रजापति को सृष्टि । यद् पजीवनायकवीरुधाममृतात्मकम् । पीयतेदेवपितृभिस्तस्मसोमात्मनेनम ॥२६ प्राप्यायदाहम्पाभ्यात्पविश्वमयन्तव । समेतमग्नीपोमाभ्यानमस्तस्मैमुरणात्मने ॥२७ यद् पमृग्यजु साम्नामक्येनत्पतेतव । विश्वमेतत्रयीसज्ञनमन्तमविभावमो ॥२८ जल व से उपन्न अशेष औषधियो को पकाने के लिये जो भास्कर मूर्ति प्राप धारण करते हो, उस मूर्ति को प्रणाम (२सा हे तरणे । शस्य. पोषण हेतु हिमवर्पा इत्यादि के लिये घोर शीतपूर्ण यापका जो स्प है, आपको उस मूर्ति को प्रणाम ॥२३॥ हे रवे । बमन्त ऋतु काल मे न अत्यन्त तेज और न अत्यन्त शीतपूर्णे पापकी जो सौम्य मूनि है, हे देव ! आपकी उस मूर्ति को नमस्कार ॥२४॥ प्रशेप देवता एव पितृगण को तृप्ति प्रदान करने वाले अन्न को पकाने वाली मापी जो मूर्ति है उसको नमस्कार करती हूँ ॥२५॥ मपूर्ण गुल्मसता के जीवन का प्राधार आपका जो अमृतमय रूप है, जिसे देवता और पितर भी पान करते हैं, ऐसे सोम स्वरूप प्रापको नमस्कार ॥२६] अग्नि एव सोम दोनो स्पो के मिलन से प्रापका जो जगत्मय स्वरूप बना है, ऐसे प्राप गुरसारमा को नमस्कार ॥२८॥ यत्त तम्मात्पररूपमोमित्युक्वाभिशब्दितम् । अस्थूलानन्तममलनमस्तम्मंसदात्मने ॥२६ एवसानियतादेवीचक्र स्तोनमहनिशम् । निराहाराविवस्वन्तमारिराधयिपुर्मुने ॥३० तत वालेनमहताभगवास्तपनोऽम्बरे। प्रत्यक्षतामगादस्यादाक्षायण्याद्विजोत्तम ॥३१ साददर्शमहाकूट तेजसोऽम्बरसश्रितम् । जगादमेप्रसीदतिनत्वापश्यामिगोपते ।।३२ यथादृष्टवतोपूर्वमम्बरस्यसुदुद्देशम् । निराहाराविवस्वन्ततपन्ततदनन्तरम् ॥३३ २७६ ] [ माझ्ण्डेय पुराण सघाततेजसातद्वदिहपश्यामिभूतले । प्रसादकुरुपश्येययद् पन्नेदिवावर । भक्तानुकम्पविनोभक्ताहपाहिमेसुतान् ।।३४ इसके अतिरिक्त प्रापका जो उत्तम सूक्ष्म, अनन्त एव स्वच्छ प्रोकार रूप कहा जाता है उस नित्वस्वरूप का नमस्कार ॥२६॥ मार्कण्डेयजी ने फहा-हे ऋपिवर । अदिति देवी इस प्रकार नियमपरायण एव निराहार जीवन पालन कर भास्कर भगवान की पाराधना करने की आकाक्षा से दिन रात उनकी स्तुति करने लगी ॥३०॥ हे द्विजश्रेष्ठ । इसके पश्चात् बहुत समय व्यतीत होने पर भगवान् सूय गगन स्थित हुए दक्ष सुता के समक्ष दिखाई देने लगे ॥३१।। जो एकदम चमकने वाली अशुमाला द्वारा आकाश मडल मे भी स्पष्ट दशनीय नही थे, उन्ही तेजराशि स्वरूप रवि भगवान् को अदिति ने पृथ्वी के तल पर विद्यमान देखा। उन्हें देखकर अदिति बहुत भयभीत हुई और वोली-“हे गोपते | आप मुझ पर प्रसन्न होवें, मैं आपको देख नहीं सकती ॥३२।। प्रारम्भ मे निराहार होकर आकाश में विद्यमान असहनीय सूयदेव को जिस प्रकार तलता प्रदान करते देखा, अब इस धरातल पर भी मैं उसी प्रकार तीव्र तेजवान् मूर्ति को देख रही हूँ। दिनकर | मुझ पर प्रसन्न होवें, जिससे मैं आपको स्वाभाविक स्वरूप का दर्शन कर सकू। हे प्रभो । आप भतो पर कृपा करते हैं, मैं प्रापकी भक्त हूँ, आप मेरे पुत्रो की रक्षा करें ।।३३-३४॥ स्वधाताविसृजसिविश्वमेतत्त्वपासिस्थितिकरणायसप्रवृत्त । वय्यन्तेलयमखिलप्रयातितत्त्वत्वत्तोऽन्यानहिगतिरस्तिसर्वलोके ॥३५ त्वब्रह्माहरिरजसज्ञितस्त्वमिन्द्रोवित्तेश पितृपतिरस्पति समीर । सोमाऽग्निगंगनपतिर्महीधरोऽब्धि । किस्तव्यतवसक्लात्मरूपधाम्न ॥३६ यज्ञेशत्वामनुदिनमात्मर्मसक्ता । स्तुवन्तोविविधपद दिजायजन्ति । घ्यायन्तोविनियतचेतसोभवन्तयोगस्था परमपद प्रयातिन्मा ॥३७ अदिति के गर्भ से आदित्य का जन्म ] [ २७७ तपसिपचसिविश्व पासिभस्मोकरोपि, प्रादयसिमयूबहादयत्यम्बुगर्ने । सृजसिक मलजन्मापालयस्य, च्युताख्य क्षपयसिचयुगातेरुद्ररूपम्त्वमेकः ॥३८ प्राप ब्रह्मा के रूप में इस जगत् के जन्मदाता हैं, जगत् को सृष्टि के पश्चात् स्थिनि काल में इसका पोपण करते हैं एवं प्रलय काल म सम्पूर्ण तत्व आप मे ही विलीन होते हैं। इसलिए सभी लोगो में आपरे अतिरिक्त अन्य कोई मति नहीं है ॥३५॥ आप ब्रह्मा, हरि, अजमजित शिव, इन्द्र, धनपति कुवेर, यम, वरुण एव समीर हैं और आप हो अग्नि, आकाश, पृथ्वी का प्रावर एव सागर हैं। आप हो समस्त तेज पदार्थों के प्रात्मरूप हैं, अधिक आपको क्या स्तुनि वर १ ॥३६॥ है यज्ञश । आपरे कर्मोमे लीन ब्राह्मण लोग प्रतिदिन विभिन्न छन्दो द्वारा स्तुति करके आपको पूजा करते हैं । एकाग्रचित्त योगी पुरुष प्रापका ध्यान दरते हुए परमघाम प्राप्त करते हैं ।।३।। विश्व को प्यता प्रदान कर्ता तुम ही जगत् को क्षित, भस्म किरणो द्वारा प्रकाशिन करने हो एव जल गर्न को भेदने वाली किरणों के समूह से ग्राहा. दित एव पुन उत्पन्न करते हो, देवगण व मनुष्य सदैव आपको प्रणाम करत हैं और पापी मनुप्य एकचित्त होन पर भी प्रापको प्राप्त नहीं कर मस्त ॥३॥ १७-अदिति के गर्भ से आदित्य का जन्म तत स्वतेजसन्तस्मादाविर्भूतोविभावसु । अत्यनतदादित्यस्तहानाम्रोपमप्रभ ||१|| अथताप्रणतादेवीतम्यसदर्शनान्मुने । प्राभास्वान्वृणुष्वेष्टवरमत्तायमिच्छमिहार प्रणताशिरसासाचजानुपीडितमेदिनी। प्रत्युवाचविवस्वन्तवरद समुपस्थितम् ।।३ प्रदिति के गर्भ से आदित्य का जन्म 1 [ २७६ ततोरश्मिसहनात मोगुम्नाम्यो रवे कर । विप्रायतारसचक्र देवमातुरथोदरे ॥११ कृच्चान्द्रायणादौनिसाचचक समाहिता। शुचि मधारयामासदिव्यगर्भमितिद्विज ॥१२ ततस्ताकश्यप प्राकिंञ्चत्कोपप्लुताक्षरम् । विम्मारयसिगर्भाण्डमितिनित्योपवासिनी १३ साचतप्राहगाण्डमेतत्पश्येतिकोपना। नमारित विपक्षाणांमृत्यवेतद्भविष्यति ।।१४ मरकण्डेय जी ने कहा-हे ब्राह्मण । उसके पश्चान् जल शुष्क करने वाले भगवान भास्कर प्रसन्नतापूर्वक नतमस्तक अदिति से घोल ॥॥ हे अदिते । सहस्त्राभु तुम्हारे गर्भ से में जन्म लगा और तुम्हारे पुरगण न दाजु रामस्त दैत्य व दानो यो समूल नष्ट करूंगा। तुम्हारे पीडित पुत्र तुरन्न हो मुखो होंगे । इस प्रकार वर देकर भगवान भास्कर अदिति के सामने स अतर्धान हो गये और अदिति ने भी मनोवाछित वर प्राप्त करके तपस्या त्याग दी ॥१०॥ हे द्राह्मण । तदुपरान्त सूर्य की मौ पुत्र किरण सहस्त्राशु से अदिति के गर्म से अवतरित हुई ॥११॥ हे ब्राह्मरा वह अदिति सावधानी पूर्वक कृच्छचांद्रायण मादि बत व अनुष्ठान करती हुई पवित्रता पूर्व दिव्य गर्भ धारण करने लगी। तब कश्यप जीन क्रोधित हो पहा--तुम प्रतिदिन उपास करके अपने इस गर्भ को नष्ट क्रोगी ॥१३॥ अदिति बोली---"ह कुपित स्वभाव, मैं इस गभ वो नष्ट नहीं कर रही, यह तो शत्रु देश और दानवो का शमन करन वाला होगा ॥१४॥ इत्युक्त्वाततदागभंमुत्ममर्जमुरारणि । जाज्वल्यमानतेजाभि पत्युबचनको पिता ॥१५ तदृष्ट्वाक्क्ष्यपागर्भमुद्यद्भास्करवर्चमम् । तुष्टावप्रगतोभूत्वाग्भिराद्याभिरादरात् ।।१६ सस्तूयमान सदाभाण्डात्प्रपटोऽभवत् । पापनसवाभरतेजसाव्यातदिड मुख ॥१७ - [ मा डेय पुराण २८० ] अथान्तरिक्षादाभाप्यकश्यपमुनिसत्तमम् । सतोयमेघगम्भीरवागुवाचाशरीरिणी॥१८ मारिततेयत प्रोक्तमेतदण्डत्वयामुने । तस्मान्मुनेसुतस्तेऽयमात पडाख्योभविष्यति ॥१६ सूर्याधिकारचविभुर्जगत्येपकरिप्यति । हनिष्यत्यसुराश्वाययज्ञभागहरानरीन् ।।२० देवानिशम्येतिवचोगगनात्समुपागमन् । प्रहर्षमतुलयातादानवाश्चत्तौजस ॥२१ मार्कण्डेय जी ने कहा-इस प्रकार कह देवमाता अदिति पति के वचनो को सुनकर तेज एव जाज्वल गर्भ को परित्याग किया ।।१५।। उगते हुए सूर्य के तुल्य प्रभावान् उस गर्भ को देख कर कश्यप आदर सहित नत- मस्तक होकर मत्रोच्चारण द्वारा स्तुति करने लगे ॥१६॥ कश्यप की स्तुति का सुन कर वह भास्कर तेजस्वी किरणो को दिशाग्रो मे पैलाते हुए पद्मपत्र तुल्य वर्णयुक्त होकर गर्भाण्ड से प्रकट हुए ।।१७।। इसके पश्चात् जलपूर्ण मेघ के समान अतरिक्ष के मध्य कोई विदेह वाणी ऋपिवर कश्यप को सम्बोधित करते हुए कहने लगी ।।१८।। हे ऋषि, आपने इस प्रण्ड को 'मरित' कहा, इसलिए आपके इससे उत्पन्न पुत्र का नाम मातण्ड होगा ॥१६।। यह महा. पुरुष, विश्व में सूर्य को भनि तेजस्वी होगे एव प्रापके देव पुत्रो के यज्ञ भाग हरने वाले दैत्य, दानव और असुरो का विनाश करेंगे ॥२०॥ अतरिक्ष वाणी के इन वचनो को सुन कर देवगण अत्यन्त हर्षित होकर प्राकाश से पाये एवं दैत्य, दानवगण तेज व्हिीन हो गये ॥२१॥ ततोयुद्धायद तेयानाजुहावशतक्तु । सहदेनेमुदायुक्तोदानवाश्चसमभ्ययु ॥२२ तेपायुद्धमभूद्धोरदेवानामसुरं सह । शस्त्रास्त्रदीप्तिसदीप्त समस्तभुवनान्तरम् ।।२३ तस्मिन्युद्ध भगवतामार्तण्डेननिरीक्षिता । तेजसादह्यमानास्तेभस्मीभूतामहासुराः ।।२४

M
भानुन लेखन ।
[ २८१
ततःप्रहर्पमतुलंप्राप्ता. सर्वेदिवौकसः ।
तुष्टुवृस्तेजसांयोनिमार्तण्डमदितितथा ॥२५
स्वाधिकारांस्तथाप्राप्तायज्ञभागांश्चपूर्ववत् ।
भगवानपिमार्तण्ड.स्वाधिकारमथाकरोत् ॥२६
कदम्बपुष्पवद्भास्वानधश्चो चरश्मिभिः ।
वृत्ताग्निपिण्डसदृशोद नातिस्फुरद्वपुः ।।२७
उसके पश्चात् सुरगण सहित इन्द्र ने दैत्यो को युद्ध के लिये आमन्त्रित
किया तो वे उत्माहपूर्वक माये ॥२२॥ उस समय दानवों से सुरगण का
भयंकर युद्ध प्रारम्भ हो गया और त्रिभुवन सुरों व असुरों के शस्त्रास्त्रों को
चमक से भी उसी प्रकार तेजपूर्ण हो गया ॥२३॥ उस महाभयकर संघर्ष
में तमोगुण युद्ध में मसुरगण भगवान माण्ड के तेज द्वारा नष्ट हो गये और
देवगण शक्तिमान् होकर हपं मनाने लगे उन्होंने सूर्य भगवान् और अदिति
की स्तुति की ।।२४-२५।। अब देवत्ता अपने अधिकार को पुनः प्राप्त करके
यज्ञ भाग पाने लगे और सूर्य भगवान् और भी अधिक प्रकाशमान होकर आकारा
में कदम्ब पुष्प की तरह स्थित होकर सर्वांग तेजोमयी किरणो का प्रसार
करने लगे ॥२६:२७॥
९८-भानुतन लेखन
अथतस्मैददौकन्यांसंज्ञानामविवस्वते।
प्रसाद्यप्रणतोमूत्वाविश्वकर्मा प्रजापतिः ।
वैवस्वतस्तुसम्भूतोमनुस्तस्यांविवस्वतः ।
पूर्नमेवतयाख्याततत्स्वरूपविशेषतः।
भूयस्तच्छोतुमिच्छामिमार्तण्डस्यमहात्मनः ।
चरितहतियत्पापकलोसंशृण्वतांनृणाम् ॥२
त्रीण्यपत्यान्यसोतस्यांजनयामासगोपतिः।
द्वीपुत्रौसुमहाभागौकन्याञ्चयमुनामुने ।।३

२२ । [ माईण्डेय पुराण मनुवस्वतोज्येष्ट श्राद्धदेव प्रजापति । ततायमोयमीचैवयमलोसबभूवतु ॥४ यत्तेजोऽभ्यधिकतस्यमार्तडस्यविवस्वत तेनातितापयामासत्रील्लोकन्सचराचरान् ।।५ गोलाकारन्तुतदृष्ट्वासज्ञारूपविवस्वतः। असहन्तीमहत्तज स्वाछायाप्रेक्ष्यसाऽब्रवीत् ॥६ अहयास्यामिभद्र तेस्यमेवभवन पितु । निविकारत्वयाप्यत्रस्थयमच्छासनाच्छुभे १७ इमोचवालकोमा कन्याचवरवरिणनी। सभाव्यौवचाख्येयमिद भगवतेत्वया ॥८ मार्कण्डेय जी ने कहा-तदनन्तर प्रजापति विश्वकर्मा ने सूर्य नारायण ने सम्मुख प्रगत होकर उन्हे प्रसन्न किया और अपनी 'सज्ञा' नाम की कन्या का विवाह उनके साथ कर दिया सज्ञा के गर्भ से जिन 'वैवस्वत मनु, का जन्म हुमा उनका वर्णन विस्तार पूर्वक पहले ही किया जा चुका है। यह सुनकर कौष्टिक ने प्रार्थना की कि उसके पश्चात् मार्तण्ड का जो कुछ और चरित्र हो उसको भी मैं सुनना चाहता हूँ, क्योकि उनका पुण्य चरित्र कलि-काल के पापो को मिटाने वाला है। माकण्डेय जी कहने लगे कि सज्ञा से सूर्य- भगवान के नीन सतानें उत्पन्न हुई, वैवस्वत मनु तथा यम नामक दो पुत्र और पमुना नाम की पुत्री इनमें से वैवस्वत मनु ज्येष्ठ हैं और उनके पश्चात् यम पौर यमी जुडवा माई-बहिन उत्पन्न हुए। उस समय का सूर्य का तेज बहुत प्रधिक था जिससे वह तीनो लोको को बहुत अधिक तप्त करते थे। उनकी पत्नी सज्ञा उस महान तेज को सहन करने में असमर्थ हुई और उसने अपनी छाया से एक बार कहा-हे शुभे । तुम्हारा कल्याण हो। मैं अपने पिता के घर जाती हूँ। तुम मेरी प्राज्ञानुसार यही रह कर मेरी इन तीनो सन्तानो को प्रेमपूर्वक पालन करतो रहना पोर इस वृतान्त को सूर्य भगवान को कभी मालूम न होने देना ॥१-८॥

मानुतन लेसन ।
[ २८३
आदेशग्रहणाद्दे विनाशापान्नववहिचित् ।
प्रास्याम्यामिमततुभ्यगम्यतायवाञ्छितम् ॥
इत्युक्ताछाययासज्ञाजगामपितृमन्दिरम् ।
तमावसत्पितुर्गेहेकञ्चित्कालशुभेक्षणा ॥१०
भर्तु समीपयाहीतिपित्रोक्तासापुन पुन ।
अगन्धदडवाभूत्वाकुरुन्विप्रोत्तरांस्तत ॥११
तयतेपेतप साध्वीनिराहारामहामुने ।
पितु समीपयाताया सज्ञायावाक्यतत्परा ॥१२
तद् पधारिणोछायाभास्करसमुस्थिता।
तस्यांचभगवान्सूर्य सन्ने यमितिचिन्तयन् ॥१३
तथैवजनयामासद्वीसुतोकन्यकांतथा ।
पूर्वजस्यमनोस्तुल्य सावरिणस्तेसोऽभवत् ।।१४
यस्तयो प्रथम जात पुत्रयोद्विजमत्तम ।
द्वितीयोयोभन्चान्य सग्रहोऽभूच्छनैश्चर ॥१५
पाया ने कहा-वर तब मूर्य भगवान् जद तक दण्ड देने के मार से
मेरे देश नहीं परडेंगे पयवा साप देन को उदत न होग तब तक मैं इस रहस्य
को पदापि प्राट न होने दूंगी। यह सुन र सना अपने पिता के घर चली
गई पोर बुध समय तर वही निवास करती रही। इसके पश्चात् जब उसके
पिता विश्ववर्मा ने उमसे पति पर जाने का कहा तो वह बडवा (पोही)
रारूप धारण कर उत्तर कुरु प्रदेश में जाकर निराहार तपस्या गरने सगी ।
इस बीष मै दाया सना मूर्य भगवान् की सेवा करती रही और उन्होंने उसे
अपनी पत्नी सभा ही समझार उममें भी दो सन्नाने उपप्न की इनमें से एक
सापति मनु मोर दूसरे दानिरपर (प्ह) ये॥६-१॥
वन्याभूतपतीयातावरेसवरगोनृप ।
मनातुपापिवीतेपामात्मजानाययाबरोद ॥१६
रहानपूर्वजातानातपातयतीमती ।
मनुस्तत्वान्तवांस्तस्पायमधास्थानचक्षमे ॥१७

२८४ ।
[ मार्कण्डेय पुराण
बहुशोयाच्यमानस्तुपितु पल्यासदु खितः ।।
सवकोपाच्चवाल्याच्चभाविनोऽर्थस्यवंबलात् ॥१८
पदामन्तर्जयामासछायासज्ञायमोमुने ।
तत शशापचयमसज्ञासामपिणीभृशम् ॥१६
पदातर्जयसेयस्मारिपतृमागिरीयसीम् ।
तस्मात्तवेवचरण पतिष्यतिनसशय ॥२०
छाया के गर्भ से एक 'तपती' नाम की कन्या भी हुई जिसका विवाह
यथा समय मवरण नामक नृप से किया गया । छाया-सशा अपनी सन्तानों से
जितना अधिक स्नेह करती थी उतनी प्रथम पत्नी की तीनों सन्तानो से नहीं
करती थी। उसके इस पक्षपात पूर्ण व्यवहार को देखकर वनस्वत मनु ने तो
कुछ न कहा पर यम के दूत उसे सहन न कर सके और एक बार उन्होंने रोष
पूर्वक तथा होनहार के वशीभूत होकर छाया सज्ञा को डाट कर मारने के लिये
पैर उठाया। इस पर छाया को बडा कोष पाया और उसने कहा कि मैं
तुम्हारे पूजनीय पिता की पत्नी है, फिर भी तुमने मुझे मारने को लास उठाई
इसके फल स्वरूप तुम्हारा यह पैर कट कर गिर जायगा" ॥१६-२०।।
यमस्तुतेनशापेनभृशपीडितमानस ।
मनुनासहधर्मात्मासर्वपित्रेयवेदयत् ॥२१
स्नेहेनतुल्यमस्मासुमातादेवनवर्तते ।
विसृज्यज्यायसोऽन्यस्मान्कनीयासोबुभूप॑ति ।।२२
तस्यामयोद्यत पादोनतुदेहेनिपातित ।
वाल्याद्वायदिवामोहात्तद्भवान्क्षन्तुमर्हति ॥२३
शप्तोऽहतातकोपेनजनन्यातनयोयत. ।
ततोनमन्येजननीमिमावतपतावर ॥२४
विगुणेष्वपिपुरेपुनमाताविगुगापित ।
पादस्तेपततापुत्रथमेतत्प्रवक्ष्यति ॥२५
तवप्रसादाचरणोनपतेद्भगन्यथा ।
मातृशापादयमेश्यतथाचिन्तयगोपते ॥२६

रूचि को पिनरो का गाईच्य उपदेश J [ २८५ इम नाप को सुनकर यम बडे दुःखी हुए पौर पिता के पास जाकर सब वृतान्त उनगे सुनाया और कहा कि देव ! माना हमारी अपेक्षा छोटे भाई- बहिनो का अधिक स्नेह और पालन-पोपण करती है । इमसे ममन्तुष्ट होर बाल-सभाव वा प्रथवा भूल से मैंने उसकी प्रोर लान उठाई, पर मारा नहीं । फिर भी मैं उस मपराय को प्रापसे समा चाहता हूँ ॥ यम ने फिर कहा-पिता जो ! यदि कोई पुत्र दुष्ट, दुराचारी होना है तो भी माता उसका बनी पहित नहीं करती। पर उसने कोष करके 'तुम्हारा पर गिर जा' ऐमा जो शाप दे हाला इससे मुझे वह अपनी माता नही जान पहनी । मब पाप ऐमी 7 करें कि माता के क्रोध पूर्वक दिये शाप के कारण मेरा यह पैर न गिरे ॥२१-२६।। अमरायमिदपुत्रभविष्यत्ययकारणम् । येनत्वामाविशत्क्रोधोधर्मश मत्यवादिनम् ।।२७ सर्वपामेवसापानाप्रतिधातोहि विद्यते । ननुमायाभिशमानांचियापनिवर्तनम् ॥२८ नगक्यमेतन्मियानुकतुंमातुर्वचस्तव । विकश्चित्तवविधास्यामिपुत्रस्नेहादनुग्रहम् ।।२६ रुभयोमासमादायप्रपास्यन्तिमहोतलम् । कृततस्यावच सत्यत्वंचत्रातीभविष्यसि ॥३० मादित्यस्त्वनवीन्छायाकिरयंतनयेपुने। तुल्येप्रयधिक स्नेहएकमप्रियतेत्यया ॥३१ नूननंपात्व जननोमनासापित्वमागता । विगुणेष्वप्यपत्येपुरुष मातागपत्लुतम् ॥३२ गूर भगवान् ने महा-पुत्र ! तुम धर्माता और स प पराग होर भोजरकोप के पसीभूत हो गरे तो उनका यह परिधान होला मभर है। पौर मर गाओं मे छुटकारा मिन मा है पर माना के गा में बर महने का मार्ग नहीं है। मनिरे तुम्हारी मारा रे नारो मारने में तो मयमय है पर तुम्हारी विरारला पर आर-सलामा - -

२८६ ।
[ मागडेय पुराण
से तुम्हारी माता की बात पूरी हो जाय और तुम्हारा पर भी यच जाय । इम.
लिये ऐसा होगा कि मि तुम्हारे पर का मांस सेयर पृथ्वी तल पर डाल दंगे-
ऐसा होने पर तुम्हारी माता वा पाप पूरा हो जायगा और फिर तुम्हारा पर
भी ठीक हो जायगा । इसके पश्चात् सूर्य भगवान ने छाया से पहा रि-गुम्हारे
लिये सभी सन्तान समान रूप से प्रिय होनी चाहिये। पर ऐसा न करे तुम
किसी के प्रति कम और किसी से अधिक स्नेह करती हो। इससे मालूम पडला
है कि
तुम इनकी माता नही हो, यदि माता होती तो पुत्र को ऐगा पाप नहीं
दे सक्तीची" ॥ २७-३२॥
सातत्परिहरन्तीचनाचचक्षेविवस्वतः ।
सचारमानसमाधाययुक्तस्तत्त्वमपश्यत ।।३३
तशप्त मुद्यतट्टष्ट वाछायासज्ञादिवस्पतिम् ।
भयेनक पिताब्रह्मन्यथावृत्तन्यवेदयेत् ॥३४
विवस्वास्तुततोक द्ध श्रुत्वाश्वसुरमम्यगात् ।
सचापितयथान्यायमर्चयित्वादिवाकरम् ।
निर्दग्धुकामरोषेणसान्त्वयामाससुव्रत ॥३५
तवातितेजसाव्याप्तमिदरूपसुदु सहम् ।
असहन्तीतत सज्ञावनेचरतिवैतपः ॥३६
द्रक्ष्यतेताभवानद्यस्वभार्याशुभचारिणीम् ।
रूपार्य भवतोऽरण्येचरन्तीसुमहत्तप १३७
स्मृतमेब्रह्मणोवाक्ययदितेदेवरोचते ।
रूपनिवर्तयाम्येतत्तवकान्तदिवस्पते ॥३८
यतोहिभास्वतोरूपप्रगासीत्परिमण्डलम् ।
ततस्तथेतितपाहत्वष्टारभगवान रविः ॥
विश्वकर्मात्वनुज्ञात शाकद्वीपेविवस्वत ।
भ्रमिमारोप्यतत्तेज शातनायोपचक्रमे ॥४०
तब छाया सज्ञा ने सत्य वात छिपा कर कुछ बहाना बना दिया इस
पर सूर्य भगवान् ने मास्मिक दृष्टि से समरत घटना की वास्तविकता जान ली और

भानुतन लेखन ] ,२८७ थे छाया-मजा को शार देने के लिये उद्यत हुये। इस पर छाया-सना भयभीत होकर कांप उठी और जो कुछ घटना घटी थी वह सब खोल कर सुनादी। सारा हाल जान कर सूर्य को बडा कोष पैदा हुआ और मन में पाया समस्त विश्व को दाव कर दें। तब विश्वकर्मा ने उनकी यथाविधि पूजा करके उनको शान्त किया और कहा कि तुम्हारे इस अत्यन्त दुसह तेज को सहन न कर सकने से सज्ञा तप करने चली गई है। उसे अव भी एकान्त बन मे तपस्मा और सयम का पालन करते देख सकते हैं । अगर आपको प्राज्ञा हो तो मैं मापके वर्तमान रूप और प्राकार को सौम्य और दर्शनीय रूप में परिवर्तन करूं । सूर्य भगवान ने विश्व को बातो से संतुष्ट और प्रसन्न होकर कहा- 'ऐसा ही करो।' तब भगवान भास्कर शाकद्वीप मे चले गये और विश्व कर्मा उन्हे खराह के समान धुमाकर नवीन सौम्य रूप देने लगे ॥ ३३.४० ॥ भ्रमताऽशेप जगतर नाभिभूतेनभास्वता। समुद्राद्रिवनोपेतासारूरोहमहीनमः ॥४१ गगनञ्चाखिलब्रह्मन्सचन्द्रग्रह तारकम् । अधोगतमहाभागवभूवा क्षिप्तमाकुलम् ॥४२ विक्षिप्त सलिला:सर्ववभूवुश्चतयाब्धय. । भिद्यन्तमहाशैला.शीर्णमानुनिवन्धना ॥४३ ध्र वाधाराण्यशेषारिणधिष्ण्यानिमुनिसत्तम । त्रुट्यद्रश्मिनिवन्धानिह्यधोजग्मु सहस्रशः ॥४४ वेगभ्रमण सजातवायुक्षिप्तासमन्ततः । व्यशीयंतमहामेघापार रावविराविरण.॥४५ भास्वभ्रमणविभ्रान्तभूम्याकाशरसातलम् । जगादाकुलमत्यर्थतदासोन्मुनिसत्तम ।।४६ त्रैलोक्येसकलेविप्रभ्रममार सुरर्षयः। देवाश्चब्रह्मणासाद्ध भास्वन्तभितुष्ट वु ।।४७ प्रादिदेवोऽसिदेवानाज्ञातमेतत्स्वरूपतः । स्वर्गस्थित्यन्तकालेपुत्रिधाभेदेन तिष्ठसि ॥४८ २८८ ] [ मावंण्डेय पुराण स्वस्तितेऽस्तुजगन्नाथधर्मवर्षामिावर । जुषस्वशान्ति लोकाना देवदेवदिवाकर ४६ इन्द्रश्वागत्यतदेवलिख्यमानयथास्तुवत् । जयदेवजगद्व्यापिञ्जयाशेप जगत्पते ॥५० मार्कण्डेय जी कहने लगे-समस्त विश्व के नाभि स्वरूप मगवान, भास्कर के धूमने से समुद्र, पर्वत, वन, जलस्रोत, पृथ्वी, माकाश भारिपस्थिर होने लगे। उस समय चन्द्रमा, ग्रह, तारागण ग्रादि के सहित सम्पूर्ण गगन- भएडल ही नीचे गिरता हुआ सा जान पडने लगा। समस्त सागर, नदी, जला- यो की जलराशि मे हलचल पैदा होगई और महापर्वतो के शिखर-विखरने लगे। घर सपने स्थान से च्युत होने लगा और इससे समस्त प्रकाशस्थ पिहो को स्थिति उलटी-पलटी होने लगी। सब नीचे गिरने लगे। वायु भी महा भयङ्कर वेग से चक्कर काटने लगी और महामेघ घोर शब्द वरन लगे । इस प्रकार सूर्य भगवान् के धूम जाने पर पृथ्वी, भाकाश और रसातल म सर्वत्र विखलता, गडबडी उत्पन्न होकर समस्त विश्व मे माकुलता फैल गई । इस प्रकार त्रिलोक घूम जाने से सर्वत्र सङ्कट माया देखकर देवषि, देवगण, ब्रह्मा मादि भगवान् मादित्य को स्तुति, प्रार्थना करने लगे-माप समस्त देवो मे मादि देव हैं आपकी महिमा सर्वत्र विदित है, माप ही स्वर्ग आदि समस्त लोको और अखिल भुवनो की स्थिति का कारण है, भाप ही सबकी रक्षा और कल्याण करने वाले हैं । हे जगन्नाथ । पाप हो ग्रीष्म, वर्षा और शीत स्वरूप हैं । हे सब देवो में महान् दिवाकर देव प्रसन्न होकर विलोक को व्याकुलता को दूर करो। स्वर्गाधिपति इन्द्र ने भी प्राकर सूर्य भगवान की स्तुति की हे देव । पाप ही सर्वत्र व्याप्त है, आपको जय हो, हे अखिल जगत पति आपकी जय हो।।४१ से ५०॥ ऋपयश्चतत सप्तवसिष्ठात्रिपुरोगमा । तुष्ट विविधःस्तोत्रं स्वस्तिस्वस्तीतिवादिन ॥५१ वेदोक्ताभिरथान याभिलिखिल्याश्चतुष्टुवु । भास्वन्तमृग्भिराद्याभिलिख्यमानमुदायुता ।।५२ -

भानुतन लेखन 1
[ २६६
खनाथमोक्षिणांमोक्षोध्येयस्त्वंध्यानिनांपरः ।
त्वंगति.सर्वभूतानाकर्मकाण्डेऽपिवर्तताम् ॥५३
शप्रजाम्योऽस्तुदेवेशशन्नोऽस्तुजगताम्पते ।
शन्नोऽस्तुद्विपदेनित्यंशनश्वास्तुचतुष्पदे ॥५४
ततोविद्याधरगणायक्षराक्षसपन्नगाः।
कृताञ्जलिपुटा:सर्वशिरोमि प्रणतारविम् ॥५५
ऊचुरवं विधावाचो मन श्रोत्रसुखावहाः ।
सह्य भवतुतेतेजोभूतानाभूतभावन ॥५६
इसके पश्चात् पमिष्ट, प्रति प्रादि सातो ऋषियों ने स्वस्ति वचन
उचारण करके सूर्य भगवान् की अनेक प्रकार से स्तुति की । बालखिल्य ऋषि
भी ऋग्वेद के माद्य वचनो द्वारा इस प्रकार स्तुति करने लगे-"हे भगवन् !
आप ही मुमुक्षजनों को मोक्ष प्रदान करने वाले, ध्यानी पुरषो के ध्येय भोर
धर्मकाण्ड वालो को शुभ फल देने वाले तुम्ही हो। हे देव ! हे जगन्नाथ ।
भाप समस्त प्रजा का, हमारा और हमारे द्विपद तथा चतुष्पद जीवो का
कल्याण करो। फिर विद्याधर, यक्ष, राक्षस, पन्नग मादि सब हाथ जोडकर
सूर्य भगवान को प्रणाम करके वहने लगे-हे भगवन् ! मापका तेज समस्त
छोटे-बडे जीवो के सहन करने योग्य हो। सव कोई उससे सुखो हो सके
॥५१ से १६॥
ततोहाहाहुहूश्च वनारदस्तुम्बुरुस्तथा ।
उपगायितुमारव्यागान्धर्वकुशलारविम् ॥५७
पड़ जमध्यमगान्धारग्रामत्रयविशारदाः ।
मूच्छनाभिश्चतानश्वसप्रयोग सुखप्रदम् ॥५८
विश्वाचीचघृताचीचउर्वश्यतिलोत्तमा।
मेनकासहजन्याचरम्भाचाप्सरसांवरा ॥५६
ननृतुजंगनामोशेलिस्यमानेविमावसौ ।
शानभावविलासाट्यान्वुर्वन्तोऽभिनयावहून् ॥६०

२६० ] [ मारय पुराण प्रावाद्यन्तततस्तमवेणुवीरणादिसरा । पणवा पुष्कराश्च वमृदङ्गा पटहानवाः ।।६१ देवदुन्दुभय शङ्खा शतशोऽयसहस्रशः । गायद्भिश्च वगाधर्वनृत्यविश्वाप्सरोगणः ॥६२ तूर्यवादियघोपैश्वसनकोलाहलीकृतम् । तत कृताञ्जलिपुटाभक्तिनम्रात्ममूतंय ॥६३ लिख्यमानसहस्राशु प्रणेमु सर्व देवताः। सत.कोलाहलेतस्मिन्सन देवसमागमे । तेजस शासनञ्चक विश्वकर्माशन शनै ।।६४ इति हिमजलधर्मकालहेतोहरकमलासनविष्णुसस्तुतस्य । तनुपरिलिखननिशम्यभानोव जसिदिवाफरलोकमायुपोऽन्ते ।।६५ इसके अनन्तर सगीत शास्त्र मे निपुण हाहा-हूहू, तुम्बरु, नारद मादि पडन, मध्यम और गाधार तीनो ग्रामो तथा मूर्च्छना, ताल मादि के नियमा- मुसार सूर्य भगवान् के सम्मुख श्रेय गायन करने लगे ॥५७-५८॥ उसी अवसर पर विश्वाची, धृताची, उर्वशी, तिलोत्तमा, मेनका, सहजन्या, रम्भा मादि स्वर्ग को अमराऐ भी सूर्य भगवान् के नवीन रूप से प्रसप्त होकर हाव-भाव पूर्वक तरह तरह के मृत्यो का प्रदर्शन करने लगी ॥५६.६६।। देवनन्द द्वारा घेणु, वीणा, दुईर पणव, पुष्कर, मृदङ्ग, पटव, मानक, दुन्दभो, शख मादि हजारो वाद्यो की ध्वनि होने लगी। इस प्रकार गन्धर्वो के सगीत, मप्सरामो के नृत्य भोर देवगणों के वाद्यो के शब्द द्वारा उस समय समस्त जगत् महान् ध्वनि से भर गया । फिर सब किसी ने प्रत्यन्त भक्ति मौर-विनय सहित भग- वान् भास्कर को नमस्कार किया। उसी कोलाहल के बीच विश्वकर्मा धीरे-धीरे सूर्य के तेज को कम करते गये ॥६१-६४॥)जो सूर्य भगवान् जाडा, वर्षा और प्रीम प्रादि ऋतुमो के उत्पादक है और ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी जिनकी स्तुति करते उनको यह तनुलिखन को कषा भक्ति पूर्वक सुनने से भानुलोक मे सद्गति प्राप्त होती है ।।६।।

विश्वकर्मा द्वारा सूर्यस्तवन ]
[ २६१
ह-विश्वकर्मा द्वारा सूर्यस्तवन
लिख्यमानेततोभानोविश्वकर्माप्रजापतिः।
उद्भूतपुलक स्त्रोत्रमिदचक्र विवस्वतः ॥१
विवस्वतेप्रणतहितानुकम्पिनेमहात्मनेसमजवसप्तसप्तये ।
सुतेजसेकमलकुलावबोधिनेनमस्तम.पटलपटावपाटिने ॥२
पावनातिशयपुण्यकर्मणेनककामविपयप्रदायिने ।
भास्वरानलमयूखशायिनेसर्वलोकहितकारिणे नम ॥३
अजायलोकत्रयकारणायभूतात्मनेगोपतयेवृपाय ।
नमोमहाकारुणिकोत्तमायसूर्यायचभु प्रभवालयाय I४
विवस्वतेशामभृतेन्तरात्मनेजगत्प्रतिष्ठायजगद्धितपिणे।
स्वयम्भुवेलोकसमस्तचक्षुपेसुरोत्तमायामिततेजसेनम. ॥५
क्षणमुदयाचलमौलिमणि सुरगामहितहितोजगतः।
त्वंमयूखसहस्रवपुर्जगतिविभासितमासिनुदन् ॥६
भवतिमिरासवपानमदाद्भवतिविलोहितविग्रहता।
मिहिरविभासियत सुतरात्रिभुदनभावनमानिकर १७
मार्कण्डेय जी कहने लगे-जिस समय विश्वकर्मा जी सूर्य भगवान के
सेज को क्षोण करके सहन योग्य बना रहे थे, उस समय उसके नवीन रूप के
दर्शन से पुलकित होकर उन्होंने उस मूर्ति का स्तवन किया 1 विश्वकर्मा जी
योले-जो जीव मापके सम्मुख प्रणत हो रहे हैं । उन सबका माप कल्याण
पौर कृपा करने वाले हैं । पाप ही सम वेग वाले, सप्त अश्व वाले, कमलो को
खिलाने वाले और अन्धकार को दूर करने वाले हैं, मापको नमस्कार हो ।
प्रत्यन्त पवित्र, पुण्य शाली, वामनामो की पूर्ति करने वाले, अत्यन्त तोर
किरणो से युक्त और समस्त लोको के हितकारी भगवान भास्कर को नमस्कार
हो तीनो लोगो को उत्पन्न वने वाले, पंचभूतो के मूल, रश्मि पति, धर्म
सरप, कृपालु मोर नेत्रों को प्रकाश देने वाले सूर्य भगवान् को नमसार हो ।
मापार पन्तरात्मा के पास, स्वयम्भू, पम्पिल विश्व को दृष्टि शक्ति

२६२ ] { मार्कण्डेय पुराण देने वाले, देवों मे श्रेष्ठ, महान् तेजस्वी सूर्य भगवान् को नमस्कार हो । हे भगवन् ! तुम ही जगव के हितकारी और उदयाचल के शिखर के माला स्वरूप हो, तुम ही सहस्रो रूप ग्रहण करके जात् को प्रकाशित करते हो। तुम्ही तिमिर रूपी आसव को पान करने के निमित्त लोहित मूर्ति धारण करके किरणो द्वारा दीप्तिमान होते हो ॥१-७॥ रथमधिरुह्यसमावयवचारुविकपितमुरुरुचिरम् । सततमखिन्नहरभवश्वरसिजगद्धिताविततम् ॥ अमृतमयेनरसेनसमविबुधपितृनपितर्पयसे । अरिगरण सूदनतेनतवपतिमुपेत्यलिखामिवपुः ।। धुकसमवर्णहयप्रथितंतवपदपासुपवित्रतमम् । नतजनवरसलमाप्रगतत्रिभुवनपावनपाहिरवे ।।१० इतिसकलप्रसूतिभूतत्रिभुवनभावनधामहेतुमेकम् । रविमखिलजगत्प्रदीपभूतत्रिदशवरप्रणतोऽस्मिसर्वदात्वाम् ।।११ हे सूर्य नारायण ! जिस रथ पर चढकर सात घोडो के द्वारा जगत् हितार्थ तुम विचरण करते हो वह समान अवयव वाला, माकपंक विस्तार युक्त पौर विचित् बापने वाला । हे शत्रुहन्ता ! तुम देवता मोर पितरो को एक ही साथ जीवन प्रदायक सुधा प्रदान करते हो । सो निमित्त जगत् को हित कामना से मैंने प्रथम ही मापको प्रणाम करके प्रापके देह को लिखा है (तराशा) है । हे भक्तवत्सल ! हे त्रिभुवन को पवित्र करने वाले ! मैं मापकी ही इस हरी. भरी मृष्टि के कारण विख्यात हुमा हूँ घोर तुम्हारी परण-रज ये प्रताप से चायन्त पवित्र माना जाता है आप मेरी रक्षा करें। इस तरह में सर्वदा संसार के कारण रूप, विभुपन को पवित्र बनाने वाले, सेज के भएडार, जगत के प्रकाशक और निर्माणवा भगवान सूर्य को नमस्कार करता ॥८-११॥

रवि माहाम्प वपन ]
१००~ रश्मिाहाम्य वर्णन
एयगूयस्तयमुनिपरयादियस्पते ।
तेजम पोहगमागमण्डस्यमधारयत् ।।१
सातितम्तेजमोमागदसभि पञ्चभिस्तथा।
प्रतीवसानिममाएमानोरामोत्तदाबपु ॥२
शातितचास्यपत्ते जस्तैनचक्र यिनिर्मिनम् ।
विपणी भूसचगवंस्पशिविवाघनदम्यच ॥३
दहप्रेतपते शक्तिहमसेनापते तथा ।
अन्येषांचंयदेवानामायुधानिमविस ४
चकारतेजमाभानो सुगण्यग्मिान्तये ।
इतिशातितनेजा सगुगुभेनातितेजमा ॥
वपुर्द धारमार्तण्ड गयियशोमनम् ।
सरदर्शममाधिम्य स्वाभाविनातिम् ॥६
प्रघृप्यामयंभूतानातपसा नियमनत्र ।
उत्तरानपुरून्गत्वारोभानुरागमद ।।७
मारएडेय जी ने कहा-
विर्मा जी इस प्रकार मूर्य नारायण की
स्तुति कर उनके तेज या पद्रह म निकाल र गोरहवा भाग शेष रहने
दिपा । इमसे सूर्य का स्वर भरपल मुदर, सौम्य मोर काति वाला बन गया
पद्रह पंश तेज निकाला गया था उसके द्वारा विश्वकर्मा ने विष्णु वा पत्र,
शिव का त्रिमूल, और की पाली, यम का दएड, कानिदेय की दाक्ति मोर
प्रय वितन ही अमोघ अस्त्र निर्माण किये जिनसे देवगण गनुपी को जीत
सकें। इस प्रकार मातएड वा तेन नियन्त्रित हो जाने पर उनको दोभा महत
बढ़ गई और जगन के हितार्य उनका बलेवर अत्यन्त उत्तम बन गया । इस
प्रकार परमोपयोगी प्राकार पावर वे अपने स्थान पर स्थित हुए और फिर
ध्यान सगावर अपनी पत्नी को पौडी के रूप में देखा जो पुरु प्रदेश में उनके
हितायं अत्यत सयम नियम सहित तपस्या कर रही थी। तब सूर्यदेव भी घोडे
का स्वरूप रखकर उसके पास पहुंचे ॥१-७॥

२६४ ]
[ मार्कण्डेय पुराण
साचदृष्ट्वातमायान्तपरपु सोविशङ्कया।
जगामसमुखेतस्यपृष्ठरक्षणतत्परा ।
ततश्चनासिकायोगतयोस्तत्रसमेतयो ।
वडवायाचतेत्त जोनासिकाभ्याविवस्वत 16
देवौतनसमुत्पन्नावश्विनौभिपजावरौ ।
नासत्यदस्रोतनयावश्विवकाद्विनिर्गती ॥१०
मार्चण्डस्यसुतावेतावश्वरूपधरस्यहि ।
रेतसोऽन्तेचरेवन्त खङ्गीधन्वीतनुत्रधृक् ॥११
अश्वारूढ समुद्भूतोवारणतूणसमन्वित.।
तत स्वरूपममलदर्शयामासभानुमान् ॥१२
तस्यशान्तसमालोक्यसारूपमुदमाददे ।
स्वरूपधारिणीचेमासनिनायनिज
यम् ॥१३
सज्ञाभा-प्रोतिमतीभास्करोवारितस्कर ।
तत पूर्वसुतीयोऽस्यासोऽभूद्व वस्वतोमनु ॥१४
उनको समीप पाते देखकर सज्ञा को अपने सतीत्व रक्षा की चिन्ता हुई
मोर वह उनके सामने मुंह करके खडी हुई । जब दोनों को नासिकायें मिली
तो सूर्य भगवान का तेज नाप के मार्ग से ही घोही के भीतर प्रविष्ट हुमा पौर
उससे दोनों अश्विनीकुमार उत्पन्न हुए जो देवगण के वैद्य बने । उनके मुख से
निकले तेज से 'नासत्य' और 'दस' को उत्पत्ति हुई प्रोर दोष भाग से 'रेवन्त'
पा जन्म हुमा को रक्षा मावरण, खडग पोर पनुप धारी हैं। फिर जय सूर्य
भगवान् ने अपना निर्म र शान्त रूप दिखाया तो ससा परम प्रसन्न हुई और
अपना वास्तविक रूप ग्रहण कर उनके साथ स्वगृह में भागये ॥५-१४||
द्वितीयश्चयम सापादमंदृष्टिग्नुग्रहात् ।
यमस्तुतेनशापेनभृगपीडितमानस. ॥१५
धर्मोभिरोचतेयस्मादमराजस्तत स्मृत. ।
कृमयोमासमादायपादतम्तेमहीतलम् ॥१६

रवि माहात्म्य वर्णन ]
। २६५
पतिप्यन्तीतिशापान्ततस्यचक्रे पितास्वयम् ।
धर्महष्टियंतश्चासौसमोमित्रेतथाऽहिते ॥१७
ततोनियोगेतयाम्येनकारतिमिरापह ।
तस्मैददौपिताविप्रभगवाल्लोकपालताम् ॥१८
पितृणामाधिपत्यञ्चपरितुष्टोदिवाकर ।
यमुनाचनदीचक्र कलिदान्तरवाहिनीम् ।।१६
अश्विनौदेवभिपजीकृतोपित्रामहात्मना ।
गुह्यकाधिपतित्वेचरेवन्तोविनियोजित ॥२०
सज्ञा के ज्येष्ठ पुत्र वैवस्वत मनु की पदवी पर भघित्रित हुए, उनसे छोटे
यम धर्म के ज्ञाता होने से धर्मराज बने। वे धर्म और सत्य पर स्थिर रहकर
प्रत्येक प्राणी के साथ न्याय युक्त व्यवहार करते थे, इसे उन्हें जीवों के कर्मों
का फल देन का कार्य दिया गया। उनको छाया मज्ञा ने जो शाप दिया या
उसके फलस्वरूप उनके घर का मांस कृमि पृथ्वी तल पर ले गये। सूर्य भगवान्
ने उनको लोक्पाल और पितरो का अधिकार भी दिया। पुत्री यमुना को
कलि र देश में बहने वाली नदी बनाया गया। अश्विनी कुमारो को देवतापो
का वैद्य, रेवन्त को मुहकों का शासक नियुक्त किया ॥१५-२०॥
एवमप्याहचततोभगवांल्लोकभावित ।
त्वमप्यशेषलोकस्यपूज्योवत्समविष्यसि ॥२१
प्ररण्यादिमहादाववैरिदस्युभयेपुच ।
स्वास्मरिष्यन्तियेमामोक्ष्यन्तेतेमहापदः ॥२२
क्षेमबुद्धिसुखराज्यमारोग्यकीर्तिमुन्नतिम् ।
नराणापरितुष्टस्त्वपूजित सप्रदास्यसि ॥२३
छायासज्ञासुतश्चापिसावणि सुमहायशा ।
भाव्य सोऽनागतेकालेमनु सावरिणकोऽष्टम. ॥२४
मेरुपृष्ठेनपोघोरभद्यापिचरतिप्रभु ।
भ्राताशननरस्तस्यग्रहोभच्छासनाद्रवे ॥२५

२६६
। मार्कडेण्य पुराण
यवीयसीतुपाकन्याऽऽदित्यस्याभूद्विजोत्तम ।
अभवत्सासरिच्छष्ठातपतोलोकपावनी ॥२६
यस्तुज्येष्ठोमहाभाग सर्गोयस्येहसाम्प्रतम् ।
विस्तरतस्यवक्ष्यामिमनोवैवस्वतस्यह ॥२७
इदयोजन्मदेवानाशृणुयाद्वापठेतवा ।
विवस्वतस्तूनूजानारवेर्माहात्म्यमेवच ॥२८
मापदप्राप्यमुच्येतप्राप्नुयाचमहायश. ।
अहोरात्रकृतपापमेतच्छमयतेश्रु तम् ।
माहात्म्यमादिदेवस्यमार्तण्डस्यमहात्मनः ॥२६
भगवान् सूर्य नारायण ने रेवन्त से कहा कि तुम सब लोकों में पूजनीय
होंगे और जो कोई भग्नि, शत्रु, चोर मादि के भय से माकान्त होकर तुम्हारा
स्मरण करेगा तो तुम विपत्ति में उनकी रक्षा करने में समयं होंगे । छाया सज्ञा
पे पुत्र सावरण मेरु पर्वत पर तपस्या में निरत हैं और वे भागामी 'सावर्णक'
नाम वे मन्वन्तर में मनु होकर महान् यशस्वी होगे। उनके भ्राता रानश्वर को
प्रमुख प्रह नियत किया । यमुना जी को भी नदियों में स्थान दिया गया
पौर वे लोक्पावनी प्रसिद्ध हुई । देवत्वत मनु का मन्वन्तर समय मे चल रहा
है। उनके वश का विस्तार मौर वर्णन मन्वन्तर दिया जायगा । इस प्रकार
जो व्यक्ति सूर्य भगवान का माहारम्य पोर उनकी सबानो की कथा भक्षा पूर्वक
प्रवण परते हैं वे सब प्रकार की आपत्तियो से छुटकारा पार सुख सौभाग्य
के पधिकारी बनते हैं और उनके समस्त पाप दूर हो जाते हैं ।।२१-२६॥
१११--राज्य पद्धन की प्रायद्धि
भगवन्यथित मम्मम्भानो सन्ततिसभव ।
माहात्म्यमादिदेवस्यस्यम्पचातिविस्तरात् ।।१
भूयोऽपिमावत गम्पमाहात्म्य मुनिमत्तम ।
योतुमिच्छाम्यहंतग्मेप्रसन्नोवतुमर्हसि ॥२

राज्य वर्दन की प्रायुवृद्धि । २६७ - - श्रूयतामादिदेवस्यमाहात्म्यकथयामिते । विवस्वतोयच्चकारपूर्वमाराधितोजन. ॥३ दमन्यपुत्रोविख्यातोराजाभूद्राज्यर्धन । ससम्यक्पालनचक्र पृथिव्या पृथिवीपति ॥४ धर्मत पाल्यमानतुतेनराष्ट्र महात्मना । ववृधेऽनुदिनविप्रजनेनचघनेनच ॥५ हष्टपुष्टमतीवासीत्तस्मिनाजन्यशेपत । निर्भय सकलश्योापौरजानपदोजनः ॥६ नोपसर्गोनचव्याधिर्नचव्यालोद्भवभयम् । नचावृष्टिभयन्तरदमपुरमहीपतौ ॥७ कोप्टुकि बोले-है भगवन् । सूय के माहात्म्य को मैं पुन श्रवण करना चाहता हूँ, आप मुझ पर प्रसन होकर उसे मुझे सुनाइये ॥१-२॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-प्रादि देव भगवान् सूर्य ने पुराकाल मे प्राराधित होकर जो कुछ किया, वह सब तुम्हारे प्रति वर्णन करता हूँ ॥३॥ दम के पुत्र राज्यवर्द्धन नाम से प्रशिद्ध हुए और उन्हाने भले प्रकार से पृथ्वी का पालन किया ।।४॥ है ब्रह्मन् । उन्होंने अपने धर्म का पालन करते हुए प्रजा को रक्षा की, इसलिये उनके शासन काल म धन, जन से राष्ट्र को नित्य वृद्धि होने लगी ॥५॥ उनके राज्यास्ट हाने पर अन्य राजा पुरजन और सम्पूर्ण पृयित्री प्रत्यन्त पुष्ट हुई ॥६॥ उन राजा राज्यवर्सन के राज्य म कोई उपसग, रोग हिंसक जीवो का तया अनावृष्टि का भय आदि नही था ॥७॥ सईजेचमहायज्ञददौदानानिचाथिनाम् । सुधर्मस्याविराधेनवुभुजेविषयानपि ॥८ तस्यैवकुर्वतोराज्यसम्यक्पालयत प्रजा । सप्तवर्पसहस्राणिजग्मुरेक्मयथा 18 विदूरथस्यतनयादाक्षिणात्यस्यभूभृत । तस्यपत्नीवभूवाथमानिनीनाममानिनी ॥१० २६८ ] [ मारंएडेय पुराण कदाचित्तस्यसासुभ्र शिरसोऽऽयअनाहता । पश्यतोराजलोक्स्यमुमोचाशूणिमानिनी ।।११ तदश्र विन्दवोगात्रेयदातस्थमहीपते । तदावीक्ष्याथु वदनातामपृच्छतमाननीम् ॥१२ किमेतदितिपप्रच्छमाननीराज्यवधनः ॥१३ पृष्टासातुततस्तेनमीप्राहमनस्विनी। नकिचिदितिताभूय पप्रच्छसमहीपति ।।१४ वह महायज्ञो का अनुष्ठान करके अभ्यथियों को दान देते और विपयो का भोग भी धर्म सहित करते थे । इस प्रकार राज्य शासन चलाते और भले प्रकार प्रजा पालन करते हुए उनका सात सहस्र वर्ष का समय एक दिन के समान व्यतीत होगया 1811 उनका विवाह दक्षिण देश के राजा विदूरथ को पुत्रो मानिनी से हुआ था ॥१०॥ एक समय राजपुरुषो के समक्ष रानी मानिनी राजा के शिर पर तेल मल रही थी, तभी उसके नेत्र से प्रांसू टपक पड़ा ।।११।। जव वह आँसू राजा के शरीर पर पडा, तब उन्होने उसके अश्रु- पूर्ण नेत्र देखकर उसका कारण पूछा ॥१२॥ परन्तु,उसने कोई उत्तर नहीं दिया पौर वह विना शब्द किय रुदन करने लगी, यह देखकर राजा ने पूछा-तुम क्यों रो रही हो ? ॥१३॥ रानी ने राजा के प्रश्न का उत्तर 'कोई बात नहीं' पक्षर दिया ॥१४॥ बहुश पृच्छतस्तस्यभूभृत सासुमध्यमा। नकिचिदितिहोवाचसाभूयोराज्यवर्धनम् । किमेतदितिपप्रच्छमानिनीपार्थिवःपुन । यहुश प्रेरितातैनसाभवतित्रभामिनी ।) दशयामासपलित केराभारान्तरोद्भवम् ॥१५ पोराणाचमहीपालक्मिन्यन्मन्युकारणम् । ममातिमन्दभाग्यायाजहासाथनृपस्तत ॥१६ सविहस्यातापत्नीयतासर्वभूभृताम् । पौराणाचमहीपालायेतनासन्समावृता ।।१७ राज्य वर्द्धन की आयु वृद्धि ) [ २६६ शोकेनालविशालाक्षिरोदितव्यनतेमुभे । जन्मद्धिपरिणामाद्याविकारा सर्वजन्तुषु ॥१८ अधीता सकलावेदाइष्टायज्ञा सहस्रश । दत्तद्विजानापुत्राश्चसमुत्पन्नावरानने ॥१६ भुक्ताभोगास्त्वयासाद्ध येमत्यरतिदुर्लभा । सम्यक्चपालितापृथ्वीशौर्ययुद्ध ध्वनुष्ठितम् ।।२० मित्र सहेष्टं हंसितविहृतचवनान्तरे। किमन्यन्नकृतभद्र पलितेभ्योविभेपियत् ॥२१ राजा के पुन अनेक बार प्रश्न करने पर भी जब रानी ने कोई उत्तर नहीं दिया, तो राजा का आग्रह बढ़ा और उनके बारम्बार पूछने पर रानी ने उनके वालो के बीच में एक श्वेत बाल दिखाया ॥१५॥ और बोली-हे महाराज ! क्रोधित होने का कोई कारण नहीं है, आप इसे देखिये, यह मेरा मन्द भाग्य ही है, रानी की यह बात सुनकर राजा वडे जोर से हम पडे ॥१६॥ उन्होंने हंसते हँसते हो राजपुरपो और पुरजनो के समक्ष ही रानी मानिनी से कहा ॥१७॥ हे कल्याणी! हे विशाल नेत्र वाली। तुम क्योकि सभी जीवो मे जन्म, वृद्धि और परिणामादि विकार उत्तन्न होते रहते हैं, इसलिये इस विषय मे शोक नहीं करना चाहिये ।।१८। मैंने सभी वेदो का अध्ययन, हजारो यज्ञो का अनुष्ठान, ब्राह्मणो को दान और पुत्रोत्पादन ॥१९॥ मनुष्यो के लिय दुर्लभ सुखो का तुम्हारे साथ उपभोग, भले प्रकार पृथिवी-पालन, न्याय पूर्वक सम्राम ॥२०॥ तथा पित्रो के साथ हास-परिहास और वन-विहार आदि सभी कार्य किये हैं, ऐसा कौन-सा कार्य मेरे द्वारा होने से रह गया है, जिसके लिये तुम मेरा पका हुआ वाल देखकर डर रही हो ॥२१॥ भवन्तुकेशा.पलितावलय सन्तुमेशुभे। शैथिल्यमेतुमेकाय कृतकृत्योऽस्मिमानिनि ॥२२ मूनियद्दशितभद्रभवत्यापलितमम । चिकित्सामेवतस्याह रोमिवनमश्रयात् ।।२३ रोमो मत, ३०० ] { मार्कण्डेय पुराण वाल्येबालबियापूर्वतद्वत्कौमारकेचया। यौवनेचापियायोग्यावार्द्ध केवनसश्रया ।।२४ एवमत्पूर्वजैर्भद्रकृतत्वत्पूर्वजैश्चयत् । अतोनतेश्रु पातस्य किंचित्पश्यामिकारणम् ॥२५ अलन्तेमन्युनाभद्रेनन्वभ्युदयकारिमे। दर्शनपलितस्यास्यमारोदीनिष्प्रयोजनम् ॥२६ तत प्रणम्यतभूपा पौराश्च वसमीपगाः । साम्नाप्रोचुर्महीपालामहराज्यवर्धनम् ॥२७ नरोदितव्यमनयातवपल्यानराधिप । रोदितव्यमिहास्माभिरथवासर्वजन्तुभि ॥२८ हे शुभे । चाहे मेरे वाल पक गय हो, चाहे देह शिथिल हो जाय, इसमे अब मैं कोई हानि नहीं समझता, क्योंकि मैं अब ध य होगया हूँ॥२२॥ तुमने मेरे शिर में जो पका हुमा बाल देखा है, उसको चिकित्सा बन कर माधय लेकर करूगा ॥२३॥ वाल्यकाल मे वाल-क्रीडा, कौमारावस्था में उसके अनुरूप कायं मौर युवावस्था मे भोगादि तथा वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर वन का ही प्राथय लेना चाहिये ॥२४॥ मेरे पूर्व पुरपो ने तथा उनके भी पूर्व पुरुपो ने इसी प्रकार किया है, इसनिये में तुम्हारे रुदन को व्यर्थ हो समझता हूँ, इसलिये शोक को छोड दो ॥२।। मेरे इस श्वेन वेश वा दिखायी देना, मेरा भाग्योदय होना ही है, इसलिये रदन नहीं करना चाहिये ।।२६।। माण्डेय जी ने कहा- है मह । फिर पास मे वैठे हुए राज पुरुषो और पुरवामियो ने महाराज राज्य- वर्दन को प्रणाम करके विनय पूर्वव वहा ॥२७॥ हे राजन् । पापको भार्या का रदन व्यर्थ है, परन्तु पर हमारे अथवा अन्य सब प्राणियो वे रोने का समय पागया है ॥२८॥ त्वग्रवीपियथामाथवनवामाथितवचः । पतन्तिननन प्राणालालितानात्वया नृप ॥२६ सर्वेयास्यामहेभूपयदियातिभवान्वनम् । ततोपनियाहानि सर्वपृथ्वी निवासिनाम् ॥३० राज्य वर्द्धन की आयु वृद्धि ] [ ३०१ भविष्यतिनसन्देहस्त्वयिनाथवनाश्रये । साचधर्मोपघाताययदितत्प्रविमुच्यताम् ॥३१ सप्तवर्षसहस्रारिणत्वयेयपालितामही। तत्समुत्यमहापुण्यमालोकयनराधिप ।।३२ वनेबसन्महाराजत्वकरिष्यमियत्तप । तन्महीपालनस्यास्यकलानाहंतिपोडगीम् ।।३३ सप्तवर्पसहस्राणिमयेयपालितामही । इदानीवनवासस्यममकालोयमागत. ॥३४ ममापत्यानिजातानिदृष्ट्वामेऽपत्यसन्तती । स्वल्परेवमहोभिर्मह्यन्तकोनसहिष्यति ।।३५ हे नाथ | आप हमारा प्रति पालन करने वाले हैं, आपके मुख से वन का प्राधय ग्रहण करने की बात सुनकर हमारे प्राण ही निकले जा रहे हैं ॥२६॥ यदि आप वन को जाते हैं, तो हम सभी आपके साथ चलेंगे, क्योकि आपके वनवासी होने पर मनुष्यो की सभी क्रिया नष्ट हो जायगी ॥३०॥ यदि आप इससे धर्म को हानि समर्भ तो अपने वनाश्रयी होने के विचार को छोड दीजिये ॥३१॥ हे राजन् ! आपको इस पृथिवी का पालन करते हुए सात सहस्र वर्ष हुए हैं, इतने काल में कितने महा-पुण्य को उपलब्धि हुई है, इस पर विचार कीजिये ॥३२॥ हे राजन् । वन मे निवास करके वहाँ आप जितनी तपस्या करेंगे, उमका फल इस पृथिवी पालन रूप कर्म के सोलहवें भाग के बरावर भी नही होगा ॥३३॥ राजा बोले- मैं सात सहस्र वर्ष से इस पृथिवी पा पालन कर रहा हू, अब वनवास करने का उपयुक्त अवसर मेरे समक्ष उप- स्थित है ।।३४।। मेरे पुत्र उत्पन्न हो चुके हैं, उन पुत्रो की जो सन्तान होगी उसे देखकर यमराज बब कुछ समय के लिये भी मेरा जीवित रहना सहन नही करगे ॥३॥ यदेतत्पलितमूनितद्विजानीतनागराः । दूतभूतमनार्य्यस्यमृत्योरत्युग्रकर्मणः ॥३६ ३०२ ] [ माक्एडेय पुराण सोऽहं राज्येसुतंकृत्याभोगांस्त्यक्त्वावनाश्रयः । तपस्तप्स्येसमायान्तिनयावद्यमसंनिका. ॥३७ सतोयियासु सवनदेवज्ञानवनीपतिः । पुत्रराज्याऽभिपेकायदिनलग्नान्यपृच्छत ॥३८ धु त्वाचतेतुनृपतेर्वचोव्याकुलचेतस । दिनलग्नचहोराचनविदु शास्त्रदृष्टय ॥३६ ऊचुश्चतमहीपालदैवज्ञावाष्पगद्गदम् । ज्ञानानिन प्रणष्टानि त्वैतत्तेवचोनृप ॥४० ततोऽन्यनगरेभ्यश्चभृत्य राष्ट्र भ्यएवच । ततस्तस्माञ्चनगरात्प्राचुर्येणाभ्युपागमन् ॥४१ समुत्पत्यमहीपालतयियासु मुनेवनम् । प्रकम्पिशिरमोभूत्वाप्रोचुाह्मणसत्तमाः ।।४२ हे नागरिको । मेरे शिर में जो श्वेत वेश देवा गया है, उसी केश को उन कर्म वाली मृत्यु का दूत समझो ॥३६॥ इसलिये मैं पुत्र का राज्याभिषेक करके और सम्पूर्ण भोगो को छोड कर वन मे निवास करता हुअा यम-सैनिकों को आने तक तप करूगा ॥३७॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-फिर राजा ने वन मे पाने या दृढ निश्चय कर ज्योतिपियो से पुत्र के राज्याभिषेक दिन और लग्न दिखवाया ॥३८॥ राजा के वचन को सुनकर वे शास्तदर्शी ज्योतिषी भी व्याकुल हृदय होगये और इस कारण लग्नादि देखने में असमर्थ रहकर ॥३६॥ गद्गद स्वर से राजा के प्रति बोले-हे राजन् | आपकी बात सुनकर हमारा सभी शान लुप्त होगया है ।।४०।। हे मुने । इसके पश्चात् जो अन्यान्य राज्य उन महाराज के प्राधीन हुए थे, उनसे तथा उसी राजधानी के अन्य नगरों से अनेकानेक वृद्ध ब्राह्मण वहाँ ॥४१॥ माये और उन्होने अपने शिर को कम्पित करते हुए राजा से इस प्रकार वहा ॥४२॥ प्रसीदपाहिनोराजन्पालिता स्मयथापुरा । सीदिप्यत्यखिलोलोकस्त्वयिभपवनाथये ॥४३ त्वकुरणतयाराजन्ययानोसीदतेजगत् ।

राज्य वर्द्धन को आयु वृद्धि ] [ ३०३ यावज्जीवामहेबीरस्वल्पकालमिमेवयम् । नेच्छामश्वभवछून्यद्रष्टु सिंहासनविभो ॥४४ इत्येवतैस्तथान्यञ्चद्विज पौरपुर रारै । भूभृत्यरमात्यैश्चराजाप्रोक्त पुन पुनः ।।४५ वनवास विनिर्वचनोपसहरतेयदा । क्षमिष्यत्यन्तकोनेतिददौसचतदोत्तरम् ॥४६ ततोऽमात्याश्चभूपाश्चपौरवृद्धास्तथाद्विजाः । समेत्यमन्त्रयामासु किमत्रक्रियतामिति ॥४७ तेपामन्नयताविप्रनिश्चयोऽयमजायत । अनुरागवतातत्रमहीपालेऽतिधार्मिके I सम्यग्ध्यानपराभूत्वाप्रार्थयाम समाहिताः। तपसाराध्यभास्वन्तमायुरस्यमहीपते ॥४६ हे राजन् । प्रसन्न होइये, हम पर अनुग्रह क ते हुए पहिले के समान ही हमारा पालन कीजिये, हे महाराज आपके वन में जाने से सभी जीव अत्यन्त दुखित होंगे ॥४३।। इसलिये, जिस प्रकार यह विश्व दुखी न हो वैसा ही कार्य करिये, हमारा जीवन अल्पाल का ही रह गया है, इतने समय में हम इस सिंहासन को सूना नहीं देखना चाहते ॥४४॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-~-- उन विप्राण, राजागरण, प्रजाजन, मत्रिगण और भृत्यो के द्वारा बारबार अनु- रोध किये जाने पर भो ॥४५॥ उन्होंने वनवास की इच्छा को नहीं छोडा और उन सबको यही उत्तर दिया कि 'यम मुझे क्षमा नहीं करेगे' ॥४६॥ तब, ब्राह्मणो, वृद्ध पुरवासियो, मन्त्रियो और भृत्यों ने परस्पर विचार करना प्रारम किया कि 'अब क्या करें ॥४७॥ हे ब्रह्मन् । राजा के प्रति स्नेह रखने वाले उन विप्रादि ने यही निश्चय किया कि ।।४॥ म भले प्रकार ध्यान पूर्वक तष के द्वारा भगवान् सूर्य का पाराधन करें और इन राजा की आयु के लिये प्रार्थना करें ॥४६॥ तकनिश्चया.कार्यकेत्रि हेचभास्करम् । सम्यगर्घोपचाराद्य पहाररपूजयन् ॥५०

३०४ ]
[ मार्कएडेय पुराण
अपरेमौनिनोभूत्वामृग्जापेनतथाऽपरे ।
यजुषामथसाम्नाचतोपर्याञ्चतिरेर वम् ॥५१
अपरेचनिराहारानदीपुलिनशायिन ।
तपासिचक्रुरिच्छतोभास्कराराधनद्विजाः ॥५२
अग्निहोत्रपराश्चान्येरविसूक्तान्यहर्निशम् ।
जेपुस्तत्रापरेतस्थुर्भास्करेन्यस्तदृष्टय ॥५३
इत्येवमतिनिबन्धभास्कराराधनप्रति ।
बहुप्रकारचक्र स्तेततविधिमुपाश्रिता ।।५४
तथातुयततातेपाभास्कराराधनप्रति ।
सुदामानामागन्धर्वउपगम्येदमब्रवीत् ।।५५
यद्याराधनमिष्ट वोभास्करस्यद्विजातय ।
तदेतक्रियतायेनभानु प्रीतिमुपैष्यति ।।५६
ऐसा निश्चय करके सब सूर्य की पूजा करने लगे, किसी ने अर्घ्य देकर
और किसी ने अन्य विधि से सूर्य भगवान् का पूजन किया ॥५०॥ किसी ने
मौनावलम्बन कर ऋक् मन्त्र से, किसी ने सामवेद के मन्त्रो से और किसी ने
यजुर्वेद के विधान से भगवान भास्कर को सन्तुष्ट किया ॥५१॥ कोई नदी तट
पर निराहार रह कर और कोई कठिन तप करके सूर्य को प्रसन्न करने लगे
॥५२।। किसी ने अग्निहोत्र परायण होकर दिन रात्रि निरन्तर रविसूक्त का
जप किया और कोई भगवान सूर्य की ओर देखते हुए ही खडे रहे ।।५३।। इस
प्रकार वे सब अपनी-अपनी विधि से भास्कर की आराधना मे निश्चय पूर्वक
लग गये ॥५४॥ उन्हें इस प्रकार सूर्य के प्राराधन म दृढ़ता से लगे हुए देखकर.
एक सुदामा नामक गन्धवं वहाँ माया और उन पाराधको से कहने लगा ॥५५।।
है विप्रगण । यदि मूर्य की ही पारापना प्रापर। लक्ष्य है तो, इस प्रकार से
माराधना करो जिससे वह प्रसन्न हो सकें ।।५।।
तस्माद्गुरविशालास्ययनसिद्धनिषेवितम् ।
कामस्पेमहाशैलेगम्यतातरवलघु ॥५७

राज्य वर्द्धन की आयुवृद्धि ] [ ३०५ तस्मिन्नाराघनभानोःक्यितासुसमाहित । सिद्धक्षेत्रहिततत्रसर्वकामानवाप्स्यथ ॥५८ इतितेतद्वच श्रुत्वागत्वातत्काननद्विजा । ददृशुर्भास्वतस्तनपुण्यमायतनशुभम् ।।५६ तनतनियताहारावर्णाविप्रादयोद्विज । धूपपुग्पोपहारान्यापूजाचक्र रतन्द्रिता ॥६० पुष्पानुलेपनाद्यश्वधूपगन्धादिकस्तथा। जपहोमानदानाचं पूजनतेसमाहिता. । कुर्वन्तस्तुष्ट वुवान्विवस्वन्तद्विजातयः ॥६१ कायरूप महापर्वत मे एक गुह विशाल नामक वन है, जो सिद्धो द्वारा सेवित है, तुम उसी वन मे जाकर ॥५७।। सावधान चित्त से सूर्य का आराधन करो, इससे आपके इच्छित कार्य की सिद्धि होती है, क्योकि ऐसे कार्यों के अनु- टान मे सिद्ध क्षेत्र ही अधिक फल देने वाला होता है ।।१८।। माक्रडेयजी ने कहा--हे द्विज श्रेष्ठ । गन्धर्व की यह बात सुनकर सब आराधक ब्राह्मण उस वन मे पहुंचे, वहां उन्हें भगवान सूर्य का पवित्र मन्दिर दिखायी दिया ॥५६॥ ब्राह्मणादि सभी वर्गों ने वहां नियत आहार का अवलम्बन करके, प्रमाद रहित हो गन्ध-पुष्पादि के द्वारा सूर्य का पूजन किया ॥६०॥ हे विप्र । गन्ध, पुष्प, अनुलेप, धूप, दीप, नैवेद्य पूर्वक जप, होमादि करते हुए सावधान चित्त से सभी आराधक ब्राह्मण सूर्य की स्तुति करने लगे ॥६१।। देवदानवयक्षाणाग्रहाणाज्योतिपामपि । तेजसाभ्यधिकदेवव्रजामशरण रविम् ॥६२ दिविस्थितचदेवेशद्योतयन्तसमन्तत.। वसुधामन्तरिक्ष चव्याप्नुवन्तमरोचिभि. ॥६३ आदित्यभास्करभानुसवितारदिवाकरम् । पूषारणमर्यमारणचस्वानुदीप्तदीधितिम् ॥६४ । मायएडेय पुराण चतुयुगान्तकालाग्निदुप्प्रेक्ष्यमलयान्तगम् । योगीश्वरमनन्तचरक्त पीतसितासितम् ।।६५ पीणामग्निहोपुयज्ञदेवेप्यवस्थितम् । व्रजामशरणदेवतेजोराशिंतमच्युतम् । अक्षरपरमगुह्य मोक्षद्वारमनुत्तमम् ॥६६ छन्दोभिरश्वरूपश्चमकृद्य क्तविहङ्गमम् । उदयास्तमनेयुक्त सदामेरो प्रदक्षिणे ॥६७ अनृत चन्टतचैव पुण्यतीर्थपृथग्विधम् । विश्वस्थितिमचिन्त्यचप्रपन्ना स्मप्रभाकरम् ॥६८ ब्राह्मणो ने कहा--देवता, दैत्य, यक्ष और ज्योतिप-ग्रहो में अत्यधिक तेज सम्पन्न भगवान् भास्कर की शरण मे हम भाये हैं ।। ६२॥ जो देवेश्वर आकाश मे रह कर सभी दिशापो को प्रकाशित तथा अपनी रश्मियों से सम्पूर्ण पृथिवी और मन्तिरिक्ष को व्याप्त कर रहे है ॥६३॥ जो आदित्य, भास्कर, भानु, अविनादेव, दिवाकर, पूषा, पर्यमा, स्वर्भानु, दीप्त, दीधिति ॥६४॥ और योगीश्वर कहे जाते हैं और चतुर्युगी के अन्त मे दुष्प्रेक्ष्य कालाग्नि के समान होते हैं अथवा जो अनन्त, लाल, पीले, श्वेत और कृष्णा हैं ॥६५॥ जो ऋपियो के अग्निहोत्र के समय यज्ञदेव के रूप में अवस्थित होते हैं, जो अक्षर, परमगुह, अन्यत श्रेष्ठ मुक्तिद्वार रूप ब्रह्म हैं, जो एक बार युक्त हुए छन्द रूप अश्व पर प्रारूढ होकर आकाश मे स्थित है, उदय और अस्त तक गमनशील और सुमेरु की प्रदक्षिणा मे सदा तसर रहने है ।।६६-६७।। जो असत्य, सत्य, पुण्यतीर्थ तथा पृथक् रूप से विश्व मे अवम्बित हैं, उन अदिति-पुत्र अचिन्त्य स्वरूप आदिदेव भावान् प्रभाकर की हमने शरण प्रहण की है ॥६॥ योब्रह्मायोमहादेवोयोविष्णुर्य प्रजापति । वायुराकाशमापनपृथिवीगिरिसागरा १६६ ग्रहनक्षत्रचन्द्राद्यावानम्पत्य मौषधम् । ध्यक्ताव्यक्त पुभूतेषुधर्माधर्मप्रवत्तक ७०

रायरन की मायु पदि ।
दालोमाहेबगेनववंगवीन पनेननुः ।
विधायन्यम्बम्पन्नुमानो म्याप्रमीदतु ॥७१
पन्धनयमपम्वेदमङ्गभूनजगत्प्रभोः ।
मन प्रगीदनानाम्याजगनायजीवनम् ॥२
पस्या मरम्पप्रभामण्डलम् ।
द्वितीयमन्दयमोम्यगनोमाम्वान्प्रमीदतु ।।७३
तान्यांनतम्यम्पान्यामिविश्वविनिर्मितम् ।
प्रग्नीपोममयमान्यान्मनोदेर प्रमीदतु 11७४
যৈবনামাণশ্বালাবিদ্বানন।
तुनोपभगवान्भास्वास्त्रिनिर्मामद्विजोत्तम 11३५
ततःममण्डलायमिबियामप्रन ।
प्रपतीयं ददोनेग्योदुदं गोरगंजयः ॥७६
तनम्म्पटातपिताजनाः ।।
पुलोरपिनोविप्राभक्तिनमाःप्रणेमिरे ।
नमोनमम्नेस्नुमलसरपमेनयम्यहेतुमस्वमोपपेतुः ।

३०६ ] [ माण्डेय पुराण जब उन्होंने तीन महीने तक पूजन रिया, तब भगवान् प्रसन्न हुए ॥७॥ तथा स्वय दुर्दश होकर भी उन्होंने प्राकाश मडल मे प्रक्ट होकर अपनी उदय- कालीन प्रभा सहित उन्हें दर्शन दिया ७६॥ उनके प्रत्यक्ष स्वरूप का दर्शन करके पुलवायमान हुए उन मनुष्यो ने भक्ति से विन न होकर उन अनादि सवितादेव को प्रणाम करते हुए कहा ||७७॥ हे सहमरश्मे । अापको नमस्कार है, आप सभी भूतो के कारण और अखिल विश्व के पताकारूप हो, है अखिल यज्ञधाम । पाप ही सब यज्ञो के आश्रय मोर योगियो के ध्यान योग्य हो, पाप हम पर प्रसन्न हो ॥७ ६२--राजा और प्रजा की आयु वृद्धि ततःप्रसन्नोभगवान्भानुराहाखिलाञ्जनान् । प्रियतायदभिप्रेतमत्त प्राप्तु द्विजादय ॥१ ततस्तेप्ररिणपत्योचुर्विप्रक्षत्रादयोजना । ससाध्वसमशीताशुमवलोक्यपुरःस्थितम् ॥२ भगवन्य दिनोभक्त्याप्रसन्नस्तिमिरापह ॥३ दशवर्षसहस्राणिततोनोजीवतानृप । निरामयोजिताराति सुकोश स्थिरयौवन ॥४ तथेत्यूक्त्वाजनान्भास्वानदृश्योऽभून्महामुने । तेऽपिलब्धवरात्दृष्टा समाजग्मुर्जनेश्वरम् ॥५ यथावृत्त चतेतस्मनरेन्द्रायन्यवेदयन् । वरलब्ध्वासहस्राशो सकाशादखिल द्विज ॥६ तच्छुत्वाजपेतस्यसापत्नीमानिनीद्विजा । (प्रहपंपरमयाताहर्पोद्गततनूरुहा ) सचराजाचिरदध्यौनाहकिंचिच्चतजनम् ॥७ मार्कण्डेय जी ने कहा-फिर भगवान सूर्य ने प्रसन्न होकर उन सब राजा और प्रजा की आयु वृद्धि ] में कहा है ब्राह्मणो ! तुम मुझ से जो प्राप्त करना चाहते हो, वह मुझ से मांगो ॥१॥ तब उन ब्राह्मणो ने उनको अपने सामने देख कर उन्हें प्रणाम किया और उन वरदायक भगवान् से वोले ॥२॥ विप्र प्रजागरण ने कहा- हे भगवन हे अन्धकार का नाश करने वाले प्रभो । यदि आप हमारी भक्ति के कारण हम पर प्रसन्न हुए हैं ॥३॥ हमारे महाराज राज्यवर्द्धन रोग-रहित, दात्रुषों के विजेता और स्थिर योवन वाले होकर दश सहन वर्ष तक जीवित रहे ॥४॥ मार्कण्डेयजी ने कहा है महा मुने । भगवान् सूर्य ने उनसे 'ऐना ही होगा' कहा और अन्तर्घान होगये तब वे सभी ब्राह्मण वर प्राति से प्रसन- चित्त होकर राजा के पास पहुंचे ॥शा हे ब्रह्मन् । सहस्र रश्मि वाले भगवान् सूर्य से वर प्राप्त होने इत्यादि का सम्पूर्ण वृत्तान्त उन द्राह्मणो ने गजा को बताया ॥६॥ उस वृत्तान्त को सुन कर राजमहिपो मानिनो अन्यन्त प्रमतता को प्राप्त हुई, जिससे उसका देह पुलिस्ति हो गया, परन्तु राजा मौन रह कर बहुत समय तक विचार करते रहै ।।७॥ तत सामानिनीभूपहर्षापूरितमानसा । दिप्टयाऽऽयुपामहीपालवद्ध स्वेत्याहतपतिम् ॥८ तथातयामुदाभ मानिन्यायसभाजित. । नाहकिचिन्महीपालचिन्ताजडमनाद्विज HE सापुन प्राहभर्तारचिन्तयानमधोमुखम् । स्मान्नहर्पमभ्येपिपरमाभ्युदयेनृप ।।१० दशवर्पसहस्राणिनीरुजःस्थियौवन । भावीत्वमद्यप्रभृतिक्तिथापिनत्दृप्यसे ।।११ पिन्तुतत्कारणव हियच्चिन्ताकृष्टमानस । परमाभ्युदयेऽपित्वसप्राप्तेपृथिवीपते ॥१२ क्थमभ्युदयोभद्रेक्सिभाजयसेचमाम् । प्रामोदु बससाणाविमभाजनमिप्यते ॥ दशवपसारिणजीविष्याम्यहमेक्क. । गलतविपत्तोमेक्न्नुि देखभविष्यति १४ [ मार्कडेय पुराण - फिर मानिनी ने प्रसन्नचित्त होकर अपने स्वामी से कहा-हे महाराज इस बढी हुई प्रायु के द्वारा प्राप वृद्धि को प्राप्त हो १८॥ प्रसन्न चित्त वाली मानिनी के सत्कृत वचन सुनकर भी राजा ने चिन्तित चित्त के कारण कुछ उत्तर नहीं दिया ॥६॥ चिन्ता से नतमस्तक किये हुए राजा को देखकर मानिनी ने उनसे कहा- हे महाराज | ऐसे ग्रानन्द के समय भी पाप प्रसन्न क्यो नही हैं ? ॥१०॥ अब आप निरामय पौर स्थिर यौवन हो कर दश महन वर्ष 7 और जीवित रहेंगे फिर प्राप प्रसन्न को नहीं हैं ? ॥११॥ हे राजन् ! ऐसे प्रानन्द का समय प्रा गया है, तो भी प्राप चिन्ता से माकुल हैं, इसका क्या कारण है यह मुझे बताइये ॥ १२॥ राजा ने कहा-हे भने । मेरा कौन-सा भाग्योदय हुना है ? सुम मेरा सत्कार सरकार किस लिये कर रही हो? सहस्रो दुखो को प्राप्त होकर भी मैं क्सि मानन्द का उपभोग वहेमा ? ॥१शा में एकाको ही दश सहस्र वर्ष जीवित रहूगा, परन्तु तुम जीवित नहीं रहोगी, फिर क्या तुम्हारे न रहने का मुझे दुख नहीं होगा ॥१४॥ पुत्रान्पोत्राप्रपौत्राश्चतथान्यान्निष्टवान्धवान् । पश्यतोमेमृतान्दु खकिमल्पहिभविष्यति ।।१५ भृत्येपुचातिभक्त पुमित्रवर्गतथामृते । भद्रे दु खमपारमेभविष्यतितुसन्ततम् ॥१६ यर्मदर्थतपस्तप्त कृशंर्धमनिसन्ततं । तेमरिष्यन्त्यहभोगीजीविष्यामी तिधिक्करम् ।।१७ सेयमापद्वरारोहेप्राप्तानाभ्युदयोमम । स्थ वामन्यसेनत्वयत्सभाजयसेऽद्यमाम् ॥१८ महाराजयथात्यत्वतर्थतन्नानसशय । मयापारश्वदोपोऽयमीत्यानालोषितस्तव ||१९ एवगतेऽअधिकाय्यं नरनाथविचिन्त्यताम् । नान्यथाभावियत्साहप्रसन्नोभगवाप्रवि.00 उपवारःत:पौर प्रीत्याभृत्यश्चयोमम पपभोक्ष्याम्यहभागपगत्वातपामनिए राजा और प्रजा को आयु वृद्धि पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, तथा प्रिय वान्धवादि को मरते हुए देख कर क्या मुझे कुछ कम दु.स होगा ? ॥१५॥ हे भद्रे ! अत्यन्त भक्ति वाले भृत्यो और मित्रो की मृत्यु होने पर मुझे सदा ही महान् दुख भोगना पडेगा ॥१६॥ जिन्होंने मेरी आयु के निमित्त अपने तन को सुखा कर तप किया है, वे भी मर जायेंगे, परन्तु में जीवित रह कर सुख भोगूगा, क्या मेरे ऐसे जीवन को धिनकार नहीं है ? ॥१७॥ मेरी यह दश सहस्र वर्ण को परमायु वृद्धि बया हुई, यह तो मेरे लिये विपत्ति बन गयी है, यह भाग्योदय नही हुआ, सव बातो का विचार किये बिना ही तुम मुझे हर्पित करना चाहती हो ॥१८॥ मनिनी ने कहा-हे महाराज ! यथार्थ हो यह इतना दु.ख कर होगा, इस बात पर मैंने पुरवासियो ने आपको प्रीति के कारण ध्यान नहीं दिया था ।।१६।। अब, ऐसा हो गया है, तो क्या करना चाहिये, इस पर विचार कोजिये, भगवान् सूर्य ने जो कुछ कहा है, वह कदापि मिथ्या नही हो सकता ॥२०॥ राजा ने कहा--पुरवासियो पोर भृत्यो ने मेरा जो उपकार किया है, उसके विपरीत परिणाम को रोक कर किस प्रकार सुख को भोगू? ॥२२॥ सोऽहमद्यप्रभृत्यदिगत्वानियतमानस । (पौरलोकहितार्थचतोपयिष्यामिभास्करम् । यथापौराममकृतवान्धवाश्चसमन्तत । प्राराधनाग्देवेशतथाहमपिसाप्रतम् ) । तपस्तप्स्पेनिराहारोभानोराराधनोवत.॥२२ दशवर्षसहस्राणियथाहस्थिरयौवन । तस्यप्रसादाद्देवस्यजीविष्यामिनिरामयः ॥२३ तथायदिप्रजा.सर्वाभृत्यास्त्ववसुताश्चमै । पुत्रा पोत्रा प्रपोत्राश्वसुल्टदश्वरानने ॥२४ जीवन्त्येतप्रसाद'चकरोतिभगवादि। ततोऽहमविताराज्यमोश्येभोगास्तथामुदा॥२५ नचेदेवकरोत्यकम्तदाद्रीतत्रमानिनि । तपस्तप्स्यनिराहारयावज्जीवितसचय. ॥२६ ३१० ] [ मावंडेय पुराण प्रसन्न चित्त वाली फिर मानिनी ने प्रसन्नचित्त होकर अपने स्वामी से कहा-हे महाराज इस बढी हुई प्रायु के द्वारा प्राप वृद्धि को प्राप्त हो ||८|| मानिनी के सत्कृत वचन सुनकर भी राजा ने चिन्तित चित्त के कारण कुछ उत्तर नहीं दिया || चिन्ता से नतमस्तक किये हुए राजा को देखकर मानिनी ने उनसे कहा-हे महाराज ऐसे प्रानन्द के समय भी माप प्रसन्न क्यो नही हैं ? ।।१०।। अब आप निरामय और स्थिर यौवन हो कर दश महस वर्ष तक और जीवित रहेगे फिर आप प्रसन्न को नहीं हैं ? ॥११॥ हे राजन् ! ऐसे मानन्द का समय मा गया है, तो भी प्राप चिन्ता से शकुल हैं, इसका क्या कारण है यह मुझे बताइये ।।१२।। राजा ने कहा-हे भद्रे ! मेरा कौन-सा भाग्योदय हुमा है ? तुम मेरा सत्कार सत्कार किस लिये कर रही हो? सहस्रो दुखो को प्राप्त होकर भी मैं सि प्रानन्द का उपभोग वाँगा ।।१३। मैं एकाको ही दश सहस्र वर्ष जीवित रहूगा, परन्तु तुम जीवित नहीं रहोगी, फिर क्या तुम्हारे न रहने या मुझे दुख नही होगा ॥१४॥ पुत्रान्पोत्राप्रपौत्राश्वतथान्यान्निष्टवान्धवान् । पश्यतोमेमृतान्दु खकिमल्पहिभविष्यति ॥१५ भृत्येपुचातिभक्तपमित्रवर्गतथामृते । भद्र'दु खमपारमेभविष्यतितुसन्ततम् ।।१६ यमंदर्थतपस्तप्त कृशधमनिसन्ततं । तेमरिष्यन्त्यहभोगीजीविष्यामी तिधिक्करम् ।।१७ सेयमापदरारोहेप्राप्तानाभ्युदयोमम । क्थवामन्यसेनत्वयत्सभाजयसेऽद्यमाम् ॥१८ महाराजयथात्यत्वतर्थतन्नात्रसशय । मयापौरैश्वदापोऽयप्रीत्यानालोक्तिस्तव ॥१६ एवगतेऽत्रपिंकायनरनाथविचिन्त्यताम् । नान्यथाभावियत्प्राहप्रसन्नोभगवानवि ॥२० उपकारःत.पौर प्रीत्याभृत्यश्चयोमम । पयभोक्ष्याम्यहभोगान्गत्यातेपामनिष्पतिम् । २१ राजा और प्रजा को आयु वृद्धि । राजा ने पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, नथा प्रिय वान्धवादि को मरते हुए देख कर क्या मुझे कुछ कम दुस होगा ? ॥१५॥ हे भद्रे । अत्यन्त भक्ति वाले भृन्यो और मित्रो को मृत्यु हान पर मुझे सदा ही महान् दुख भोगना पडेगा ॥१६॥ जिन्होंने मेरी आयु के निमित्त अपने तन को सुखा कर तप किया है, वे भी मर जायेंगे, परन्तु में जीवित रह कर सुख भोगूगा, क्या मेरे ऐसे जीवन को धिक्कार नहीं है ? ॥१७॥ मेरी यह दश सहस्र वर्ण को परमायु वृद्धि क्या हुई, यह तो मेरे लिये विपत्ति बन गयो है, यह भाग्योदय नही हुमा, सब बातो का विचार किये बिना ही तुम मुझे पिन करना चाहती हो ॥१८॥ मनिनी ने कहा- हे महाराज | यथार्थ हो यह इतना दुख र होगा, इस बात पर मैंन पुरवासियो ने आपको प्रीति के कारण ध्यान नहीं दिया था ॥१६अब, ऐसा हो गया है, ता क्या करना चाहिये, इस पर विचार कोजिये, भगवान् सूर्य ने जो कुछ कहा है, वह पदापि मिथ्या नहीं हो सकता ॥२०॥ कहा-पुरवासियो और भृत्यो ने मेरा जो उपकार किया है, उसके विपरीत परिणाम को रोक कर किस प्रकार सुख का भागू? ॥२१॥ सोऽहमद्यप्रभृत्यदिगत्वानियतमानस । (पौरलोक हितार्थचतोपयिष्यामिभास्करम् । ययापौराममकृतवान्धवाश्चसमन्तन । प्राराधनारदेवेशतथाहमपिसाप्रतम् ) । तपस्तप्स्येनिराहारोभानोराराधनोचत.॥२२ दशवर्षसहस्राणियथाहस्थिरयौवन । तस्यप्रमादा वन्यजीविष्यामिनिरामय ॥२३ तथादिप्रजा सर्वाभृत्यास्त्वचनुताश्चमे । पुत्रा पोना प्रपोताचसुत्दश्ववरानने ॥२४ जीवन्त्येतप्रसाद चकरोतिभावाबवि । ततोऽहभविताराज्येमाक्ष्येभोगास्तथामुदा।।२५ नचेदेवकरोत्यक्षदाद्रीतत्रमानिनि । तपम्तम्यनिराहारयावज्जीवितसचय ॥२६ ३१२ ] [ माईएडेय पुराण इत्युक्तासातदातेनतयेत्याहनराधिपम् । जगामतेनचसमसाऽपितघरणीधरम् ॥२७ सतदायतनगत्वाभार्ययासहपार्थिवः । भानोराराधनचक्रे शुथ पानिरतोद्विज ॥२८ इससे तो यही उचित है कि मैं अब प्रभृति पर्वत पर जाकर पुरवासियों वे लिये घोर तप करूं, जिस प्रकार उन्होंने मेरे हितार्थ पाराधन दिया है, उसी प्रकार में भी उनके हितार्थ भागवान सूर्य की प्राराधना के उद्देश्य से निराहार रह कर तपस्या करूंगा ॥२२।। जैसे उनकी कृपा से मैं स्थिर यौवन और रोग रहित होकर दश सहस्र वर्ष तक जीवित रहूंगा, वैसे ही मेरी सम्पूर्ण प्रजा, भृत्य, तुम, पुत्री, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र और सभी सुहृदगणादि जोविन रहे, यदि भगवान् भास्कर मुझ पर कृपा करेगे तभी मैं प्रसन्न चित्त पूर्वक राज्य का भार वहन करता हुआ सुख-भोग करूगा ।।२३-२५॥ परन्तु, यदि भगवान सूर्य ने ऐसी कृपा नही की तो, जब तक मेरा यह जीवन रहेगा, तब तक निराहार कर उसी पर्वत मे तप करता रहूगा ॥२६॥ मार्कण्डेय जी ने कहा-महाराज की बात सुन कर राजमहिषी भामिनी ने उनका अनुमोदन किया और वह अपने पति के साथ उसी पर्वत मे चलो गई ॥२७॥ हे ब्रह्मन् । अपनी पत्नी सहित राजा उसी मदिर मे पहुचे प्रोर तपस्या पूर्वक भगवान सूर्य की उत्कट अाराधना मे तत्पर हुए ॥२८॥ निराहाराकृशासाचयथासौपृथिवीपति । तेपेतपस्तथैवोन शीतवातातपक्षमा २६ तस्यपूजयतोभानु तप्यतश्चतपोमहत् । साग्रसवत्सरेयातेतत प्रीतोदिवाकर ||३० समस्तभृत्यपौरादिपुत्रारणाचकृते द्विज । ददौयथाभिलषितवरद्विजवरोत्तम ||३१ लब्ध्वावरसनृपति समभ्येत्यात्मन पुरम् । चकारमुदितोराज्यप्रजाधर्मेसपालयन् ।।३२ भौत्य मन्वन्तर आरम्भ ] [ ३१३ ईजेयज्ञान्सचवहुन्ददौदानान्यनिशम् । मानिन्यासहिनोभोगान्तुभुजेचमधर्मविद ।।३३ दशवर्षसहवाणिपुनपौत्रादिभिःसह । भृत्य.पौत्र प्रमुदित.सोऽभवत्स्यिरयौवन ॥३४ तस्येतिचरितदृष्ट्वाप्रमतिर्नामभार्गवः । विस्मयाकृष्टत्दयोगाथामेतामगायत ॥ ५ जैसे निराहार रहने के कारण राजा दिनो दिन कृश होते जा रहे थे, वैसे हो रानी भी शीत, वायु, उप्पनादि के कष्टो को महती हुई क्षीण देह होन लगी और तपस्या में लगी रही ।।२६।। हे द्विजश्रेष्ठ । जब उन्होंने इस प्रकार भगवान सूर्य की उपासना में एक वर्ष से अधिक वाल व्यतीत कर दिया, तब भगवान् ने प्रसन्न होरर ।।३०।। समस्त भृत्य, पुरजन मौर पुत्रादि के सहित वाला मनोवाछित पर उन्हें प्रदान किया ॥३१॥ वर प्राप्त करके राजा पत्नी के सहित अपने घर को लौटे और प्रसनचित्त से धर्मपूर्वक प्रजा का पालनादि करते हुए राज्य करने लगे ॥३२।। वह धर्मात्मा महाराज अपनी राजमहिपी के महित अनेक यज्ञानुटाम परते और सत्रात्रो को दान देते हुए सुप भोगने लगे ॥३॥। इस प्रकार उन्होंने अपने पुत्र, पौत्र, भृत्य, पुरवासी पाहि के महित स्थिर यौवन मौर असम चित्तता लाम र दा सहन्न वर्ष ध्यतीत किये ॥३४॥ उस समय भृगुवशी महपि प्रमति ने उनका ऐमा चरित्र देश यर विस्मय युक्त होकर इस प्रकार गाया कीर्तन की थी ॥३५॥ भानुभक्त रहोशक्तिर्यद्राजाराज्यवर्द्धन । पायुपोबद्ध नेजात म्वजनम्यनयात्मन ॥३६ इतितेकथितविप्रयत्पृष्टोऽहत्वयोदित. । प्रादिदेवम्यमाहात्म्यमादित्यम्यविवम्बत ॥३७ विप्रेतदविथ त्वामानोर्माहात्म्यमुत्तमम् । पठश्चमुच्यतेपापं मप्तरायकृतनरः ॥३८ मगेगीधनानाटघ कुलमतिधीमताम् । जायतेचमहाप्रानोवश्वं तशाग्येसुध ॥३६

३१४ ]
[ माईण्डेय पुराण
( यजतंचमहायज्ञ समापवरदक्षिणः ।
थ त्वाचरितमेतद्धिसमानलभते फलम् ॥)
मन्त्राश्चयेऽयाभिहिताभास्वतोमुनिमत्तम ।
जपःप्रत्येक मेतेपाविसध्यपातकापहः ।।४०
समस्तमेतन्माहात्म्ययायतनेरवे ।
पठ्यतेतत्र भगवान्सानिध्यनविमु चति ॥४१
तस्मादेतत्त्वयाब्रह्मन्मानोर्माहात्म्यमुत्तमम् ।
धार्यमनसि जाप्य चमहत्पुण्यमभीप्सता ॥४२
सुवर्णशृङ्गीमतिशोभनाङ्गीपयस्विनीगाप्रददातियोहि ।
शृणोतिचैतन्यमात्मवान्नर समतयोःपुण्यफल द्विजग्न्य ।।४३
भगवान् भास्कर की कितनी प्राश्चर्यमय शक्ति है, जिसके प्रभाव से
राजा राज्य द्धन ने अपनी और अपने वात्मीयजनो की प्रायु वृद्धि की ॥३६॥
हे ब्रह्मन्
। तुमने प्रादि देव सूर्य के जिस माहात्म्य के विषय में प्रदन किया
था वह तुम्हारे प्रति कहा गया ॥ ३७।। सूर्य के इस उत्तम माहात्म्य को ब्राह्मण
के मुख से सुनने और पाठ करने वाले मनुष्य सप्सरात्र के किये हुए पापो
से मुक्त होते हैं ॥३६॥ उन सूर्य के माहात्म्य को जो बुद्धि पूर्वक रसते हैं,
वह धनी, नीरोग और महान विद्वान होकर जन्म लेते है ॥६६तथा महान
दक्षिणा वाले यज्ञो के अनुष्ठाता होते और इस चरित्र को सुन कर समान
फल को प्राप्त करते है, मूर्ख व्यक्ति, पाप कर्म करके भी यदि सूर्य के इस
माहात्म्य का जप करते हैं, उनके पाप नष्ट हो जाते हैं ।।४०॥ जिस देव-मन्दिर
में सूर्य के इस माहात्म्य का पाठ होता है, उसके सामोप्य से भगवान् नहीं
हटते ॥४१॥ इसलिये, हे ब्रह्मन् ! तुम भी महान पुण्य की काना स सूर्य
के इस माहात्म्य को हृदय मे धारण कर अप करो ॥४२॥ जो मनुष्य सोन
से सीगो को मढाकर दूध वाली गौ वा दान करते और जो सयत चित्त से
तीन दिन तक इस माहात्म्य को मुनते हैं उन दोनो को समान फल की प्राप्ति
होती है ॥४३॥

मूर्य वशानुक्रम ]
। ३१५
ह-मूर्य वंशानुक्रम
एवप्रभावोभगवाननादिनिधनोरवि ।
यस्यत्वकोप्टुकेभक्त्यामाहात्म्यपरिपृच्चसि ॥१
परमात्मासयोगिनायु जताचेतसालयम् ।
क्षेशज्ञ सांस्ययोगानायज्ञशोयन्विनामपि ॥२
सूर्याधिकारवहतोविष्णोरीशस्यवेवम ।
मनुस्तम्याभवत्पुनरिछनसर्वार्थसशयः ॥३
मन्वन्तराधिपोविप्रयस्यसप्तममन्तरम् ।
इक्ष्वाकु भगोरिष्टोमहावलपराक्रम ॥४
नरिध्यस्तोऽथनाभाग पृपध्रोधृष्टएवच ।
एतेपुनामनोस्तस्यपृथग्राज्यस्यपालका ॥५
विस्थातवीत य सर्वेसर्वेशस्त्रास्त्रपारगाः ।
विशिष्टतरमन्विच्छन्मनु पुन नयापुन ॥६
मित्रावरुणयोरिष्टिचकारकृतिनावर ।
ययचापहुतेहोतुरपचागन्महामुने ।।७
मार्कण्डेर जी ने कहा-हे प्रौटुकि । तुमन जिन भावान् भास्कर का
माहात्म्य भक्ति महिन पूछा था, वह भगवान् ऐम प्रभार वाले हैं ॥१॥ वह
सपतचित्त याशियों के ईयर, सास्त योग वालो में धोत्रज और यानिया के
पन्नश्वर हैं ।।२॥ ब्रह्मा विष्णु, मिव स्वरूप भूधर्माधिगर के वहन करन वाल
सन भगरान भामार साय रहित एक पुत्र मनु' नाम से हुमा ३ जिस
मनु या सानो मन्वनर इग ममय चल रहा है, महारती एव पराक्रमी
इरावु नाभाग, रिष्ट या नरिपन्त, नाभाग, पृपन और पृनामक यह
गभी मनु-पुत्र पर पृथर राज्यों के परिपान बग्न शा ममी प्रसिद्ध या
पाले शास्त्रा में पारण पोर मम्म विद्या र माता , उन मनु न उगरे
पश्चात् भरपत विशिष्ट पुष से अमिनापा म ॥६॥ मित्रावरण पा यजन
रिया, परन्तु वह मन हाता र प्रचार म प गहीन हा गया II

३१६ ) । मार्कण्डेय पुराण इलानामसमुत्पनामनो कन्यामध्यमा । तादृष्ट्वाकन्यकातसमुत्पन्नातनोमनु । तुष्टावमित्रावरुणौवाक्यचेदमुवाचह । भवत्प्रसादात्तनयोविशिष्टोमे भवेदिति 18 कृतेमखेसमुत्पन्नातनयाममधीमत.। यदिप्रसन्नांवरदीत दियतनयामम ॥१० प्रसादाद्भवतो पुत्रोभवत्वतिगुणान्वितः । तथेतिचाभ्यामुक्त तुदेवाभ्यासेवकन्यका ।।११ इलासमभवत्स द्य सुध म्नइति विश्रुत । पुनश्चेश्वरकोपेनमृगयामटतावने ॥१२ इस कारण इला नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई, उस यज्ञ से उत्पन्न हुई कन्या को देख कर ||८|| मनु ने मित्रावरुण की स्तुति की और उनसे निवेदन किया कि आपकी कृपा से मुझे एक असाधारण पुत्र की प्राप्ति ॥६॥ इसी कामना से मैंने यह यज्ञ किया, जिससे इस कन्या की प्राप्ति हुई है, यदि पाप मुझ पर प्रसन्न हुए हैं, तो आपकी कृपा से मेरी यह कन्या ही ।।१०।। अत्यन्त गुण सम्पत्र पुत्र हो जाय, इस पर दोनो देवतायो मे 'ऐसा ही हो' कहा और वह कन्या ॥१॥ उसी समय पुत्र होगई, जिसका नाम सुधाम्न हुप्रा, यह मेधावी मनु पुन एक दिन वन मे आखेट के लिये गये और ईश्वर के क्रोधित होने से यह पुन स्त्री हो गये ।।१२।। स्त्रीत्वमासादिततेनमनुपुनेरणधीमता। पुरूरवसनामानचक्रवर्तिनमूर्णिम् ॥१३ जनयामासतनययत्रसोमसुतायुधः । जातेसुतेपुन कृत्वासोऽश्वमेघमहाकतुम् ॥१४ पुरुषत्वमनुप्राप्त सुधू म्न पार्थिवोऽभवत् । सुधु म्नस्यत्रयःपुथाउत्कलोविनियोगय ॥१५ पुरुपरवेमहावीर्यायज्विन पृथुलोजस. । पुरुषत्वेतुयेज़ातास्तस्यराशस्त्रय सुता ॥१६ मूर्य वंशानुक्रम ] [ ३१७ वुभुजुस्तेमहीमेतांधर्मेनियतचेतसः । स्त्रीभूतस्यतुयोजातस्यराज्ञःपुरूरवा ||१७ नसलेभेमहीभागयतोवुधसुतोहिसः । ततोवसिष्ठवचनात्प्रतिष्टानपुरोतमम् । तस्मंदत्त सराजाभूत्तनातीवमनोहरे ॥१८ ऐसा होते हो चन्द्रमा के पुत्र युध ने उसके गर्भ से एक पुत्र उत्पन्न किया जो पुरुरवा नामक चक्रवर्ती राजा हुआ, उस पुत्र के उत्पन्न होने के पश्चात् अश्वमेध का अनुष्ठान करने से ॥१३-१४॥ उन सुद्युम्न को पुरपत्व की प्राप्ति हुई, जब वे पुरप राजा हुए तव उनके उत्कल, विनय और गय नाम ॥१५॥ तोन अत्यन्त वीर, यज्ञ करने वाले और विपुल तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुए, वे तीनो पुत्र ।।१६।। राज्य को प्राप्त करके धर्म पूर्वक पृथिवी का पालन करने लगे और राजा जव स्त्री हुए थे, तव उनके जो पुरूरवा नामक पुत्र हुए थे ॥१७॥ वह बुध के पुत्र होने के कारण भू भाग प्राप्त नहीं कर सके, परन्तु वसिष्ठ ऋषि को आज्ञा से उन्हें प्रतिष्टान नामक एक श्रेष्ठ नगर दिया गया, जहां के वह राजा हुए ॥१८॥ १००-पृपधोपाख्यान पृपधारयोमनो.पुत्रोमृगयामगमद्वनम् । तरचक्रममाणोऽमीविपिनेनिर्जनेवने १ नाससादमृगकञ्चिद्भानुदीधितितापितः । क्षुत्तृट्तापपरीताङ्गइतश्चतश्चचक्रमन् ॥२ सददर्शतदातत्रहोमधेनु मनोहराम् । लतान्तहछिन्नार्धाब्राह्मणस्याग्निहोत्रिणः॥३ समन्यमानोगवयमिपुरणातामताडयत् । पपातसापितवाणविभिन्नहृदयामुवि ।।४ राजा के पनोपाख्यान ] [ ३१६ सोऽपिराज्ञोविनाशायकोपचक्र द्विजोत्तम । तमभ्येत्यत्वरायुक्तोवारयामासवैपिता ॥१२ वत्सालमलमत्यर्थकोपेनातीववैरिणा। ऐहितामुष्मिकहित समएवद्विजन्मनाम् ॥१२ कोपस्तपोनाशयतिकुद्धोभ्रश्यत्यथायुपः । क द्धम्यगलतेज्ञानक द्धश्चार्थाञ्चहीयते ॥१४ नधर्म क्रोधशीलस्यनार्थचाप्नोतिरोपण.। नालसुखायकामाप्ति कोपेनाविष्टचेतसाम् ॥१५ मुख से अपने लिये ऐसे भर्सनायुक्त वाक्य सुनकर वे मौलि' नायक ऋषि के पुत्र रोप मे प्रागये और शाप दिया कि तुम 'शूद्र ही हो जानोगे और गाय का वध करने के कारण तुम्हारी पढी हुई समस्त विद्या नष्ट हो जायगी 18-१०॥ इस शाप को सुनकर राजा भी बडा दुखी और कापित हुमा भोर ऋपि-बालक को प्रतिशाप देन के उद्देश्य से हाथ मे जल लिया ॥११॥ इम पर 'वाभ्रव्य' और भी क्रोध में आ गया और राजा को नष्ट करने के लिये दूमरा शाप देने को उद्यत हुआ। पर उसी समय उसके पिता वहां आ पहुंचे और उसे रोक्ते हुए समझाने लगे-पुन | इस प्रकार का क्रोध अन्त में अपने लिये ही अहितकारी होता है । ब्राह्मण का धर्म तो शान्ति ही है और उसी से लोक तथा परलोक में उसका कल्याण होता है ॥१२-१३ यह कोष हर प्रकार से मनुचित है । इससे तपस्या का नाश, मायु का क्षय, ज्ञान का लोप, श्री धन का नाश होता है । क्रोध के वशीभूत होने वाला धर्म, अर्थ, काम सबसे वचित हो जाता है और बहुत दुस पाता है ।।१४-१५॥ यदिराज्ञाहताधेनुरियविज्ञानिनासा । युक्तमनदयाफर्नुमात्मनोहितबोधिना ॥१६ अयवाजानतानुरियव्यापादितामम । पत्कयशापयोग्योऽयदुष्ट नास्यमनोयतः ।।१७ प्रारमनोहितमन्विच्छन्यायतेयोऽपरनरः । पर्नयामूऽविनानेदयातप्रधालुभिः ॥१८ ।

- [ मार्कण्डेयपुराण अज्ञानत कृतेदण्डपातयन्तिबुधायदि । बुधेभ्यस्तमहमन्येवरमज्ञानिनोनरा ॥१६ नाद्यशापस्त्वयादेय पार्थिवस्यास्यपुत्रक । स्वर्मणवपतितागोरेपादु खमृत्युना ।।२० पृपध्रोऽपिमुने पुनपरगम्यानम्रकन्धर । प्रसीदेतिजगादोच्च रज्ञानाद्धातितेतिच ॥२१ भयागवयबुद्धयागौरवध्याघातितामुने । अज्ञानाद्धोमधेनुस्तेप्रसीदत्वचनोमुने ॥२२ ऋषि ने फिर कहा-हे पुत्र अगर राजा ने गाय का बघ जान कर किया है अपना हित चाहने वाले को इन पर दया ही करनी चाहिये । यदि यह कार्य अनजान मे भूलवश हो गया तो शाप देने का कोई कारण हो ही नहीं सक्ता,क्योकि मन म किसी प्रकार पाप की भावना नहीं होती ॥१६-१७॥ दयालु पुरष तो उन घ्यक्तियों का भी भहित नहीं करते जो जान बूझार उनवे दुख का कारण होते हैं, फिर भूल से होने वाले अपराध पर दण्ड देना तो मशानियों के लिये भी मनुचित है ॥१५-१६॥ मैं जानता हूँ कि अपने भाग्य- वश ही इस दुर्घटना मे ग्रस्त हुई है, उसके लिये राजा को पाप देना उचित नहीं ॥२०॥ राजा न भी ऋषि पुत्र के सम्मुख मस्तक झुका कर प्रार्थना को-- है मुनि येष्ठ । प्रसन्न होहये, मैंने भूल से ही इस धेनु पर बाण चलाया पा । मैं ने उसे जगली गवय ही अनुमान किया था, मतएव भाप बोध को त्याग कर मुझे समा परें ।।२१-२२॥ माजन्मनोमहीपालनमयाव्याहृतमृपा । मोधमाधमहाभागनान्पयामेव दाचन ॥२३ तनामनरायनोमिशापरतुं नृपान्यथा । यन्तममुद्यत नापोद्वितीय रानियतित ॥२४ घरगुत्तपन्ततवालमादायस पितातत । जगामदायमसो-पिपत्र भूदतामगात् ॥२५ नाभागोपाख्यान (१) ] [ ३२१ अपि ने कहा-राजन् । मैंने आज तक कभी मिथ्यामापण नहीं किया इसलिये मेर मुख से जो वचन निकल चुका वह अब मिट नहीं सक्ता । पर मैं मापको जो दूसरा शाप देने वाला था उमसे अव विरत होता हूँ। ऋपि पुत्र का यह क्यन सुनकर मुनि उसे प्राश्रम के भीतर लिवा ले गये और पृपन भी शूद्रत्व को प्राप्त हो गया ॥२३.२४॥ १.१-नाभागोपाख्यान (१) कारुपा क्षनिया शूरा करपस्याभवन्सुता । तेतुमप्तशतवीरास्तेभ्यश्चान्येसहस्रश ॥१ दिष्टपुत्रस्तुनाभाग स्थित प्रथमयौवने । ददर्शवश्यतनयामतीवसुमनोहराम् ॥२ तस्यासहरमानायामदनाक्षितमानस । बभूवभूपतनयोनि श्वामाक्षेपतत्पर ॥३ तस्या.सगत्वाजनक्वतावश्यकन्यकाम् । ततोऽनङ्गपराधीनमनोवृत्तिनृपात्मजम् ।।४ तचाहसपितातस्याराजपुत्र कृताजलिः । विभ्यत्तस्यपितुर्विप्रप्रथयावनतवच ॥५ भवन्तोभूभुजोभृत्यावयव.करदायका.। कथसम्बन्धमसमरस्माभिरभिवान्यति । माएडेयजी ने वर्णन किया कि वस्य नामर राजा के दराज कारुप त्रिय हुए जिनकी मुम्मा पहले सात सौ यी फिर उनमें अन्य हमारी वीर उत्पन्न हुए । इमो वश में दिट नामर गजा के पुष 'नाभाग ने युवावस्या मे विमो समय एक परम मुन्दरी वन्य कन्या को देगा । वह उने देखते ही मोहा- सत्त होगया मोर वैश्य मे कन्या का विवाह अपने माय बर देने की प्रार्थना

३२२ ]
[ मार्कण्डेय पुराण
करने लगा। इस पर वैश्य ने राजभय से भयभीत होकर हाथ जोड़ कर कहा
कि आप राजा हैं और हम सेवक की भांति प्रापकी प्रजा हैं, इमलिये प्राप ऐसे
अममान सम्बन्ध का प्रस्ताव क्यो करते है ॥१-६॥
साम्यमानुपदेहस्यकाममोहादिभि कृतम् ।
तथापिकालेरेवयोज्यतेमानुपवपु १७
तथैवचोपकारायजायन्तेतस्यतान्यपि ।
अन्यानिचान्यजीवन्तिभिन्नजातिमतासताम् ॥८
तथान्यान्यप्ययोग्यानियोग्यतायान्तिकालत ।
योग्यान्ययोग्यतायान्तिकालवश्याहियोग्यता
आप्याय्यतेयच्छरीरमाहारादिभिरीप्सिते ।
कालज्ञात्वानथाभुक्त तदेवपरिशिष्यते ॥१०
इत्थममंषाभिमतातनयादीयतात्वया ।
अन्यथाभन्छरिस्यापातिरुपलक्ष्यते ॥१४
परतन्त्रावयत्वचपरतन्नोमहीभुजः ।
पिनातेनाभ्यनुज्ञातस्त्वगृहागणददाम्यहम् ॥१२
राजपुत्र 'नाभाग' ने कहा कि सभी मनुष्यो के भीतर काम, क्रोध प्रादि
ब्रह्माजी ने ही उत्पन्न क्यि हैं। पर ये काम, क्रोध सदैव बने रहते हो ऐसी
बात नहीं है, किसी समय सयोगवश वे उत्पन हो जाते हैं। ये काम, क्रोध
विभिन्न जाति के व्यक्तियो मे विभिन्न प्रकार के भावो म प्रकट होते हैं, पर
उनका प्रभाव किसी में नहीं होता और वे किसी परिस्थिति मे उचित और
विमी मे अनुचित बन जाते हैं । उनका बुरा या अच्छा कहा जाना काल के ही
अधीन है । जिस प्रकार भोजा द्वारा शरीर की पुष्टि होती है, पर यदि उसको
मसमय मे ग्रहण किया जाता है तो वह उल्टा हानिकारक हो जाता है ।७-१०
इसलिये सयोगयश तुम्हारी पन्या क लिय मेरी अभिलाषा हुई हैं तो तुम
उसे
मुझे दे दो, अन्यथा मरा अन्त हो जायगा। इस पर वंश ने कहा कि मुझे
राज्य के अधीन रहना पडता है और प्रापका भी महाराज के अनुवूल रहना
है, इसलिये आप उनको पाना ले लें,मैं कन्या का विवाह कर दूंगा ।।११.१२।।

नामागोपाग्यान (१) ]
प्रष्टव्या मर्वकार्यपुगुरवोगुवतिभि ।
नत्वीदृशेप्वकार्येपुगुरुणावाक्यगोचर ॥१३
क्वमन्मथक्थालापोगुरूपाश्रवणक्वच ।
विरुद्धमेतदन्यत्रप्रष्टव्यागुरवोनृभि. ॥१४
एवमेतत्समरालापस्तवायपृच्छमागुरुम् ।
अपृच्छामिनालापोममकामक्थाश्रय ॥१५
इत्युक्त सोऽभवन्मौनीराजपुत्र.मचापितत् ।
तत्पिनेसर्वमाचष्टराजपुत्रस्ययन्मतम् ॥१६
ततस्तस्य पिताविप्रानृचीकादीन्द्विजोत्तमान् ।
प्रवेश्यराजपुत्र चगयास्थानन्यवेदयत् ।।१७
निवेद्यचतत प्राहमुनीनेवव्यवस्थिते ।
यत्कर्तव्यतदादेष्ट मर्हन्तिद्विजसत्तमाः ॥१८
राजपुतानुरागस्तैयद्यस्यावश्यसन्तती।
तदस्तुधर्मएवंपकिन्तुन्यायक्रमेणसः ॥१६
मूर्धाभिपिक्ततनयापारिणग्रहोत्सव.पुरा ।
भवत्वनन्तरचेयतवभाभिविष्यति ।।२०
एवनदोपोभवतितथेमामुपभुञ्जत. ।
अन्यथाऽन्येतितेजावित्कृष्टावालकानयात् ॥२१
राजपुत्र ने कहा कि यपि मनुप्पो को गुम्जनो को इच्छानुसार चलना
चाहिर पोर मभी विपयो में उनसे माना लेनी चाहिये, पर यह विपर ऐमा
है दिमे दन सम्मुख प्रकट नहीं किया जा सकता। कहाँ तो गुरुजनों का पद
पौर महत्त्व पोर कही यह काम क्या का वर्णन, इन दोनों बातों में कोई मेल
नहीं, इमतिये इस बात को उनरे सामने नहीं रह सकता । वैश्य ने कहा-
टी
इस सम्बन्ध में गुरुजनो को माना लेना काम क्या होगी, पर यदि में
इम सम्बन्ध में चर्चा कर तो दह काम-क्या नहीं मानी जापनी ।।१३-१५॥
इस बात पर रामार निरुत्तर होगा प्रोर बर ने सब वृत्तान्त राजा के
समक्ष जार निवेदन किया। राजा ने अपने पुष तथा वीर प्रादि घमंतब

३२४ ]
[ मा एडेय पुराण
वेत्तानो को सामने बुलाकर समस्त हाल कह सुनाया और पूछा कि इस विषय
मे आप क्या निर्णय करते हैं ? ऋपियो ने कहा- राजकुमार । यदि आप
वैश्य कन्या पर भासत होगये हैं तो इसमे कोई बड़ा प्रघम नहीं है. पर इसका
न्यायोचित मार्ग यह है कि पहले आप किसी स्वजातीय कन्या का पाणिग्रहण
करलें, जो राजहियो के पद पर अभिषिक्त हो सके, उसके पश्चात् इस वैश्य
कन्या को भी अपनी पत्नी बनावें । इस प्रकार श्य-कन्या से विवाह करने से
किसी प्रकार का दोष नहीं होगा। अन्यथा हीन वर्ग की कन्या से सम्बन्ध हो
जाने पर पापको भी उसी हीन जाति का हो जाना पडेगा ॥१६-२१॥
इत्युक्तस्तदपास्यववचस्तेपामहात्मनाम् ।
विनितम्यगृहीत्वातामुद्यतासिरथाब्रवीत् ॥२२
राक्षसेनविवाहेनमयावश्यसुताहृता।
यस्यसामध्यमवास्तिसएतामोचयत्विति ॥२३
तत सर्वश्यस्तादृष्ट्वागृहोतातनयाद तम् ।
माहीतिपितरतस्यप्रययोशरण द्विज ॥२४
ततस्तस्यरिता दयादिदेशबलमहत ।
हत्यतान्यतादुष्टोनाभागोधर्मदूपक ॥२५
ततस्ता युधेसंन्यतेनभूभृत्सुतेनवं ।
वृत्तास्प्रेणतदास्गतत्प्राचुयेगपातितम् ।।२६
सथ त्वानिहतसंन्यराजपुषेणभूपति ।
स्वयमेवययोयोपु स्वसैन्यपरिवारित ॥२७
ततोयुद्धमभूत्तस्पभूभुज स्यमुतेनयत् ।
राजपुगतानास्त्रतत्रातिशयित पिता ॥२८
वतीस्तरिक्षादागत्यपरिबाटाहमामुनि ।
प्रत्युवानमहीपालविरमस्वेतिमपुगात् ॥२६
रवत्पुत्रस्यमहामागविधर्मोज्यमहात्मन ।
तवापियनगहनपुर धनवन्नृप ।।३०

नाभागोपाख्यान (१) ] [ ३२५ यद्यपि इस प्रकार ऋपियो ने राजपुत्र को बहुत समझाया, पर यह मार्ग उसे पसन्द न आया और उसने बाहर आकर वैश्य-कन्या को पकड लिया और तलवार निकाल कर कहा कि मैं इसके साथ बल पूर्वक राक्षस-विवाह करता है जिसकी सामर्थ्य हो वह इसे मुझमे छुडाले ॥२२-२३॥विश्य यह देखकर भागा हुआ राजा के पास गया और 'रक्षा करो' यह कहकर पुकारने लगा। इस पर क्रोधित होकर राजा ने प्राज्ञा दी कि 'दस अधर्मी 'नाभाग' को शीघ्र ही मारो।' राजा की आज्ञा पाकर सेना 'नामाग' के साथ लडन लगी, पर उसने अस्त्र-शास्त्री का प्रयोग करके शीघ्र हो उसे हरा दिया। सेना के पराभव का वृत्तान्त सुन कर राजा स्वय उससे लडने पाया और सघपं होने पर नाभाग' को दवा दिया । पर उसी समय आकाश मार्ग से नारद मुनि का वहाँ पर आगमन हुआ और उन्होंने राजा द्विष्ट से कहा-महाराज ! भव प्राप युद्ध बन्द कर दीजिये । आपका यह पुत्र अपने वरण से पतित होकर वश्य होगया है,इस- लिये उसके साथ प्रापका युद्ध करना धर्म सगत नहीं है ॥२४-३०।। ब्राह्मण्याव्राह्मण पूर्वकुर्वन्दारपरिग्रहम् । ब्राह्मण्यात्सर्ववणेपुनहानिमुपगच्छति ॥३१ तथवक्षत्रियसुताक्षत्रिय.पूर्वमुद्वहन् । इतरेचततोराजश्च्यवतेनस्वधर्मत ॥३२ पूर्व वैश्यस्तथावैश्यापश्चाच्छूद्रकुलोद्भवाम् । नहीयतेवैश्यकुलादयन्याय क्रमोदित ॥३३ ब्राह्मणा क्षनियावश्या मवर्णापाणिसग्रहम् । प्रकृत्वाऽन्यभवापारणे पतन्निनृपमग्रहाइ ॥३४ यस्यायस्याहिहोनायाःपुरुतेपारिगसग्रहम् । अहत्वावर्णसयोगसोऽपितद्वर्णभाग्भवेत् ॥३५ सोऽयवैश्यत्वमापनस्तवपुत्र सुमन्दधी । नास्याधिकारीयुद्धायक्षरिवेणत्वयासह ॥३६ वयमेतन्नजानीम कारणनृपनन्दन । । यथाविप्यतीदचनिवर्तरणकमंत ॥३७

३२६ ]
| माण्डेय पुराण
नारदजी ने कहा- दात्र का यह विधान है कि यदि ब्राह्मण पहले
ब्राह्मण-स्त्री स विवाह करके उसके पश्चात् तीनो वणं में से किसी भी वर्ण
की स्त्री को ग्रहण करे तो उसका ब्राह्मणत्व नष्ट नहीं होता। इसी प्रकार
क्षत्रिय अगर पहले अपने वर्ण की कन्या का पाणिग्रहण करवे फिर वैश्य-शूद्र
मादि की कन्या से विवाह करे तो वह पतित नहीं होता। वश्य भी अपने वर्ण
को कन्या से विवाह करने के पश्चात् शूद्र कन्या से विवाह करले तो अपने वैश्य
कुल से भ्रा नहीं होता । पर किसी भी वग का व्यक्ति यदि प्रथम अपने वर्ण
की कन्या स विवाह विये विना दूसरे वर्ग की कन्या से विवाह कर लेता है तो
वह उसी हीन वण का हो जाता है जिस वर्ग की वह कन्या होती है। सर्व
प्रथम सवर्णा कन्या से विवाह न करने के कारण वह पिता के उत्तराधिकार
का पात्र भी नहीं माना जाता। इस नियम के अनुसार आपका यह मन्द बुद्धि
पुष वैश्यत्व को प्राप्त होगया और माप क्षत्रिय हैं इससे आप दोनो का युद्ध
उपयुक्त नहीं । आगे इसका क्या परिणाम होगा यह तो नहीं कहा जा सकता ।
पर अब पाप युद्ध बन्द करदें ॥३१-३७।।
१०२--नाभागोपाख्यान (२)
निवृत्तोसौनतोभूप सग्रामात्स्वसुतेन ।
उपयमेचतापश्यतनयासोऽपितत्सुत ॥१
तत सर्वश्यताप्राप्त ममुपेत्याहपार्थिवम् ।
भूपालयन्मयावार्यतत्समादिश्यतामम ॥२
धर्माधिकरणयुक्तावाभ्रव्यद्यास्तपम्विन ।
यदम्यवर्मधर्मायनद्वदतुतयाचर ।।३
ततस्तेमुनयस्तस्यपानपात्यत पिम् ।
वाणिज्य वपरधर्ममाचचरयु सभासद ॥४
तथंयचक्र समुनस्तस्यराजोपयोदितम् ।
धर्मवादिभिधमंच्युतस्यनिजधर्मत ॥५

नाभागोपारयान (२) ] [ ३२७ तस्यपुत्रस्ततोजातोनाम्नारयातोभलन्दन. । समानाप्नहितोगच्छद्गोपालोभवपुत्रक ॥६ मानातथानियुक्तोऽयप्रणिपत्यस्वमातरम् । राजपिमगमन्नीपहिमवत्पर्वताश्रयम् ॥७ इस प्रकार नारदजी के समभाने पर राजा ने युद्ध वन्द कर दिया और नामाग भी वैश्य-कन्या से विवाह करके वैश्यत्व को प्राप्त होगया। फिर वह राजा के पास गया और पूछा-"महाराज ! अब मैं क्या काम करके जीवन- निबाह करू उसका आदेश दें।" राजा ने कहा कि वाभ्रव्य आदि जो भूपिगण धर्माधिकरण का निर्णय करत हैं, उनसे पूछ पर जैसा वह बतलायें तदनुमार भाचरण करो। तब उन धर्माधिकारी मुनिया ने कहा कि-सेती, पशु-पालन और व्यापार ही वैश्य के लिये निहित धर्म है । राजपुत्र नाभाग न इस निर्णय को स्वीकार किया और वैश्य कर्मों का आचरण परक निर्वाह करने लगा ॥१.५।। यया समय उनके भलन्दन नामक पुत्र हुमा । उसके बडे होन पर माता ने आदेश दिया 'पुत्र । गोपाल होनो अर्थात् गौ पालने का कार्य करो। पर 'गो' का प्रयं पृथ्वी भी होता है और भलन्दन न उमी अर्थ को ग्रहण किया । वह हिमालय निवासी नीप नाम राजपि को सेवा में उपस्थित हुमा ॥६-७।। तसमेत्यचजग्राहतस्यपादौययाविधि । परिणपत्याहचैवैनराजपिपभनन्दन ॥ आदिष्टोभगवन्मालागोपालम्त्वभवेति । मयाचपालनीयाक्ष्मातस्या स्वीकरणक्यम् 16 मयाहिगो पालनीयातायदाम्वीकृताभवेत् । प्राकान्ताचलवद्धि मादायाद पृथिवीमम ॥१० तायथाप्राप्नुयांपृथ्बीत्वत्प्रमादादविभो। तथादिशरिप्यामिनवाज्ञांप्रणतोऽस्मिते ॥११ तत मनोपोरापिस्तम्मेनिग्वशेषत । भलन्दायददीब्रह्मास्त्रग्राममहात्मने ॥१२

३२८
[ मार्कण्डेय पुराण
प्राप्तास्नविद्य सययौपितृव्यतनयान्द्विज ।
वसुरातादिकान्पुत्रानादिष्ट.समहात्मना ॥१३
अयाचतस राज्याऽपितृपतामहोचितत् ।
तेचोचुवैश्यपुत्रस्त्वकथभोक्ष्यसिमेदिनीम् ॥१४
भलन्नदन ने राजपि नीप को यथा-विधि वन्दना की और कहा कि
मेरी माता ने मुझे 'गोपाल' होने का प्रादेश दिया है, इसलिये पृथ्वी पालन मेरा
पतंव्य है । पर इस समय पृथ्वी पर मेरे अन्य कुटुम्बियों ने अधिकार कर रखा
हैं । इसलिये पाप मेरा इस प्रकार मार्ग दर्शन करें जिससे मैं पृथ्वी को प्राप्त
करके उस क्तव्य को पूर्ण कर सकू। राजयि नीप उसकी शालीनता से सन्तुष्ट
हए और उन्होने उसे सम्पूरणं अस्त्र विद्या की शिक्षा दी । इस प्रकार प्रस्त्र.
विद्या द्वारा शक्तिशाली बन कर अपने पितव्य-पुत्र वसुरान् के पास गये मोर
उनमे राज्य का पाधा भाग देने को कहा । उन्होने उत्तर दिया कि 'तुम वैश्य
सन्तान हो इससे राज्य-शासन वा मधिकार नहीं है।" ॥८-१४॥
ततम्तयुद्धमभवद्भलन्दस्यात्मवशज. ।
वसुरातादिभि कलंकृताखस्यास्पपिभि ॥१५
सजित्वातागदोपास्तुशस्त्रविक्षतसनिवान् ।
जहारपृथिवीतेपाधर्मयुद्ध नधर्म वित् ।।१६
सनिजितारि सकलापृथ्वीराज्यतथापितु ।
निवेदयामागततस्तत्पिताजागृहेनच ।
प्रत्युवाचमतपुत्रमार्यायाःपुरतस्तदा ॥१७
भनन्दराज्यमेतत्तक्रियतापूर्वज एतम् ॥१८
पहनतवाप्राज्यनामामध्ययुत.पुग।
पैदयतातुपुरम्मत्यतथंवानाकर पितु ॥१६
मृत्वानोनिपितुरत्यागन्यापरिग्रहान् ।
नपुष्पलाप प्राजायाबदाभूनगावयम् ॥२०
उलध्यामामानस्तस्यपाल यामिमीयधि।
नाम्निमोक्षाललोनूनममारासगरपि ॥२॥

नामागोपान्यान (२) ]
३२६
नचापियुक्त त्वद्वाहुनिजितमममानिन ।
राज्यभोक्तुमनीहम्यदुर्वलस्येवस्यचित् ।।२२
राज्यकुरुस्वयपुत्रदायादेभ्योविमु चवा ।
ममाज्ञापालनशस्तपितुर्नक्षितिपालनम् ।।२३
इस पर भलन्दन ने उनका युद्ध के लिय माह्वान किया और अस्त्रो के
प्रयोग से उनकी सब सेना को घायल करके राज्य पर अधिकार कर लिया।
इस प्रकार भलन्दन के समस्त राज्य जीत कर पिता के चरणों में अर्पण किया,
पर पिता उसे ग्रहण करने को तत्पर नहीं हुए। उन्होंन कहा-हे पुन । पूर्वजों
द्वारा शासित इस राज्य का उपभोग तुम्ही करा। मैं राज्य नहीं कर सकता
ऐसी बात नही है, पर मैन पिता की आज्ञा को अस्वीकार करके वंश्य कन्या से
विवाह किया और इसके लिये राज्य अधिकार को त्याग दिया । अगर अब मैं
उस राज्य का पुन अधिकार ग्रहण करूंगा तो यह पिता की प्राज्ञा का उल्लघन
हागा । इस मिथ्या व्यवहार के कारण मैं और मेरे पिता प्रलय काल पर्यन्त
मुक्ति लाभ नहीं कर सकेंग ॥१५-२१॥ वैस भी मेरे जंस निराकाक्षी व्यक्ति
का तुम्हारे वाहुवल से जीता राज्य उपभोग करना उचित नहीं है । इसे तुम्हीं
भोगो या कुटुम्बिया को ही वापस कर दो । मरे लिय पिता की प्रज्ञा पालन
करना ही हितकारी है ॥२२-२३॥
तत प्रहस्थतद्भार्यासुप्रभानामभामिनी ।
प्रत्युवाचतिभूपगृह्यताराज्यमूजितम् ।।२४
नत्ववेश्यानचवाहजातावश्यकुलेनृप।
क्षत्रियस्त्वतथैवाहक्षत्रियाणाकुलोद्भवा ।।२५
पूर्वमासीन्महीपाल सुदेवइतिविश्रुत ।
तस्याभूचसखाराज्ञोधूम्राश्वस्यमुतोनलः ॥२५
सतेनसख्यासहितोजगामानवनननम् ।
पत्नीभि ससमरन्तु माधवैमासिपार्थिव ॥२७
तत पानान्यनेकानिभक्ष्याणिभुजेतदा।
भााभि साहनम्नाभिस्तेनसरयासमन्वितः ॥२८

३३० ]
[ मार्कण्डेय पुराण
तत.पुष्करिणीतीरेददातिमनोरमाम् ।
पत्नीच्यवनपुत्रस्यप्रमते पार्थिवात्मजाम् ॥२६
ससातस्यनलोमतोजगृहेताचदुर्मति ।
पश्यतस्तस्यराक्षश्चताततातेतिवादिनीम् ॥३०
इस वार्तालाप को सुनकर नाभाग की पत्नी सुप्रभा ने हंसते हुए कहा
कि वास्तव में माप वैश्य नहीं हैं और मैं भी वैश्य नही हू, मेरा जन्म क्षत्रिय
वंश में ही हुआ है । इसलिये आप सुशी से इस राज्य को ग्रहण कर सकते हैं ।
इमका रहस्य यह है कि मेरे पिता पूर्वकाल में सुदेव नाम के राजा पे मोर
उनरे मित्र राजा पूम्राश्व रे पुत्र नल नाम के राजा थे। एक दिन राजा मोर
उन मित्र अपनी पलियों सहित ग्रामो वे वन में बिहार परने गये । वहाँ ये
भांति-भांति में पान-पान की वस्तुएँ उप: परने लगे। इसके पश्चात् नल ने
गरोवर के रिनारे च्यवन पुत्र प्रभनि को मुन्दरी पत्नी को देखा, जो किसी
राजा वी पुत्री थी । दुश्मनि गल ने उग रमणी पो जाकर पनड लिया । इस
पर यह 'रक्षा गे' 'रक्षा वरी' बहार राजा के सम्मुम रोने लगी ॥२४-३०॥
प्राक्रन्दित निशम्यवमतस्या प्रमति पतिः ।
प्राजगामस्वरायुक्त विमेतदितिवैवदन ॥३१
सताददगंगजानसुदेवतनमस्थितम् ।
गुहीलानाथापल्लीनतनगुगलना ॥३२
सन मुदयप्रगति प्राप्यताम्यतामिति ।
स्वरमाम्नाभवद्राध्यदृष्टयायालोनृप ॥३
तम्यानम्वनाथ स्वागुदेवोगागाग्वात् ।
प्रावियामिगरणान्यक्ष मागाारणा ॥३४
शतगप्रमति नामोल नगानिरनिय ।
प्ररायगजानयंश्योमीभिभापिगम् ॥३५
एवम नवादास्यनियमानायगान् ।
शनिगायतकानाराममानवैदिति ।
गयात्रियोमावीमेन नाय ॥३६

पावती मास्थान ]
उघर से महर्षि प्रमति भी 'क्या हृया ?' कहते हुए शीरता पूर्वक वहाँ
माये। प्रमति ने मुदेव ने कहा कि माप इने रोदिये क्योंकि पाप ही यहां के
गाज है और एंने कार्य को रोक्ना मापका क्तुंध है । प्रमति के इस प्रकार के
विनीत वचन नुनकर राना मुदेव अपने मित्र को मम्मान रक्षा पे विचार से
दोन-'मैं तो वैश्य हूँ आप किसी क्षत्रिय के सम्मुख जबर रक्षा की प्रार्थना
सौजिये।" मुदेव को इस तरह की बात सुनकर प्रति को दटा बोध माया
और उन्होंने कहा-"तथास्तु, तुम सचमुच वश्य हो जानोगे, कॉरि क्षत्रियों
की उत्पत्ति तो अन्याय-पोहितों की रक्षा ६ लिये ही की गई है । क्षत्रिय इनी
लिये शस्त्र धारण करते हैं कि कोई व्यक्ति प्रन्याय से पीडित न हो । इन धर्मे
का पालन न करने से तुम सबिच नहीं रह करने और वैश्य ही होग।"
१०३ कृपावती उपारस्यान
तम्मंदत्वातन ज्ञापनलक दोऽप्रवाद्विज ।
प्रमतिर्भार्गव कोपावलोक्यनिर्दहन्निव ।।।
मदोन्मत्तोयतोभार्थ्यानवाननममाधने ।
वलागृहातिभस्मत्वतस्माद्मजनुमाचिरम् ॥२
तेनोदात्नमानेचवाक्येतस्मिस्तदानल ॥
देहजेनाग्निनामद्योभस्मयुश्चम्नदाऽभवत् ॥३
दृष्ट्वाप्रभावततन्यसुदेवोविमदस्तत ।
प्रणामनम्र प्राहेदाम्यताक्षम्यतामिति ॥४
यमुक्तवास्त्वानगवन्मुगपानमदाकुलम् ।
तत्दान्यताप्रमीदवसापोनविनिपीताम् ॥५
एवप्रमादितस्तेनप्रननि प्रामार्गव. ।
मनोमानलेवग्नानौनेनवतना ॥६

| मार्कण्डेय पुराण
नान्यथाभावितद्वाक्ययन्मयासमुदीरितम् ।
तथापितेकरिष्यामिप्रसन्नोऽनुग्रहपरम् ॥७
इस प्रकार सुदेव को माप देकर प्रभति ने अत्यन्त क्रोधित होकर नल
से कहा- "जब तूने उन्मत होकर मेरे प्राश्रम हो मेरी पत्नी को जब
दस्ती पकड लिया तो तू तुरन्त भस्म होजा । यह वचन मुह से निकलते ही
नल के देह मे भयकर ज्वाला प्रकट हुई और वह तुरन्त भस्म हो गया । प्रमति
का ऐसा प्रभाव देख कर सुदेव की मत्तता दूर भाग गई और वह बार-बार
प्रणाम करके कहने लगे 'भगवान् । क्षमा करो। मद्यपान के दूषित प्रभाव के
कारण मैंने जो बक-झत की उसके लिये क्षमा प्रदान करें और शाप से मुझे
मुक्त करें। राजा के इस प्रकार विनय करने और नल के नष्ट हो जाने से
प्रमनि का क्रोध शान्त हुघा और उन्होने कहा-जो वाक्य मेरे मुख से निकल
चुके वे अय मिट नहीं सकते. तो पापको प्रार्थना पर कुछ अनुग्रह कर सकता
हूँ ।।१-७॥
.
भवितावश्यजातीयोभवानास्त्यासशय ।
भविनाक्षणियोवभ्यस्तम्मिन्नेवाशुजन्मनि ॥८
ग्रीप्यतिपातात्वन्यायदातेक्षनमम्भव ।
तदात्वक्षामियोवैश्य स्वगृहीतोभविष्यमि IE
एक्सवेश्योभूपालसुदेवोऽस्मपितामवत् ।
मह चयामहाभागतरसर्वश्र यता त्वया ॥१०
मुरनोनामगजपि प्रागासौगन्धमादने ।
तपस्वीनियताहारस्यक्तसगावनाश्य ॥११
तत श्येनमुगभ्रामाशारियाभुवि ।
पान्भुजनितामूतियातस्यमहामन. ॥१२
गोगा जमानेननम्योत्सनागरीरत ।
समानारगणहरिनारमानेगमा १३

कृपावती उपारपान ] यस्मात्कृपाभिभूतस्यममजातेयमात्मजा । तस्मात्कृपावतीनाम्नाभविष्यत्याहसप्रभो ॥१४ प्रमति ने कहा-आपको कुछ काल के लिये वैश्य तो अवश्य होना पटेगा पर जब कोई क्षत्रिय राजकुमार आपकी कन्या को बल पूर्वक पत्नी बना- येगा तो आप इसी जन्म मे पुन क्षत्रिय हो जायेंगे । इस प्रकार घटनावश मेरे पिता को वश होना पड़ा था। मैं भी ऐमी ही अन्य घटना वर वैश्य के घर उत्पन्न हुई थी। कुछ काल पूर्व गन्धमादन पर्वत के समीप मुरथ नाम के राज- वन म रह कर तपस्या करत थे। एक दिन उन्नान वान क मुष पर पृथ्वी पर गिरी सारिका छटपटाने देखा तो वे दुख के मारे मूछित हो गये । मूर्धा दूर होने पर मैं उन्ही के शरीर से उत्पन हुई। उन्होंने मुझे देख कर वहा स्नेह किया और कहा कि-इम कन्या का प्राविभिव मेरे कृपाभिभूत होने स हमा है, इस कारण इसका नाम 'कृपावती' ही होगा ॥३-१४) ततोऽहमाश्रम तस्यवर्धमानदिवानिशम् । सखीभि सहतुल्याभिर्विचरामिवनानिच ॥१५ ततोमुनेरगस्त्यस्यभ्रातागस्त्यइतिश्रु त । सचिन्वन्काननेवन्यसखीभिकोपितोऽशपत् ॥१६ यस्मान्मावश्यइत्याहभवतीनतेरापे । वैश्याभविष्यसीत्युक्तेप्रसाद्योक्तोमयामुनि । नापराधकृतवतीतवाहद्विजसत्तम । अन्यासामपराधेनकिमर्थशप्तवानसि ॥१३ दुष्टनादुष्टससर्गाद्दष्टत्वमपिगच्छति । सुराविदुनिपातेनपञ्जगव्यघटायया ॥१८ प्रणिपत्यानिष्टापियत्त्वयाप्रमादिन । तस्मादनुग्रहवालेशृणुष्वचक्रोम्यहम् ॥ वश्ययोनौयदाजातात्वपुत्रवोधविनि । राज्यायजातिस्मरतातहालसमवाचन २० ३३४ ] [ मापएदेय पुराण ततोभूय क्षप्रजातिप्रामात्यपतिनासह । दिव्यानवाप्स्यसेभागान्गच्छभीतिरपतुते ॥२१ एवशप्तास्मिराजेन्द्रतेनपूर्वमहर्षिणा । पिताचमेपूर्वमेवशप्तःप्रमतिनाऽभवत् ॥२२ एववंश्योनराजस्त्वनचवश्य पितामम । नत्व हिमयिससर्गाददुष्टोदुप्यसेक्थम् ॥२३ सुप्रभा ने कहा- मैं उन्ही राजपि के आश्रम में रह पर पलने लगी और बडी होने पर समान वय की सखियो के साथ विचरण करने लगी । वहाँ एक दिन अगत्स्य मुनि के भ्राता पुष्प बीन रहे थे। उन्हें देख कर मेरी सखियो ने उन्हें चिढाया, जिस पर क्रोधित होकर उन्होने मुझे शाप दिया है कि "तुमने मुझको वैश्य कह कर चिढाया है, इस लिये तू वैश्य की ही कन्या हो जायगी। इस शाप को सुन कर व्यथित होरर मैंने बहा-" हे महा- मुने । मैंने तो मापसे कुछ भी बुरा नहीं कहा, अन्य सखियो के दोप के कारण मुझे शाप क्यों देते हैं।" ऋपि ने कहा-जिस प्रकार पचगव्य से पूर्ण पवित्र घट मे एक वूद सुरा के पड जाने से इपित हो जाता है उसी प्रकार निर्दोष व्यक्ति भी दुष्टो के सग मे रहने से दूपित हो जाता है। पर अब तेरी विनय मैं तुझ पर यह अनुग्रह करता हूं कि वैश्य वर्ण मे उत्पन्न होने के पश्चात् जब तू मपने पुत्र को राज्य ग्रहण करने का उपदेश देगी तो तुझे अप- नी पूर्व जाति का स्मरण हो जायगा और पति के समक्षत्रियत्व को प्राप्त के दिव्य भोगो की अधिकारिणी होगी। इसलिय अब तू भय त्याग कर अपने प्राथम में निवास कर ॥१५॥२१॥ हे राजेन्द्र । इस प्रकार ऋषि के शाप के वारण मैं वैश्य योनि को प्राप्त हुई थी और मेरे पिता भी महर्षि प्रभति के शाप वश वैश्य हो गये थे। वस्तुत पाप व मेरे पिता कोई वैश्य नहीं हैं और गोने मे शापका वैश्य होना भी निराधार है। सुन कर कर It इस वारण मेरे ॥१५-२३॥

मलन्दन वत्मप्रीति चरित्र ]
[ ३३५
१०३---भलन्दन वत्सप्रीति चरित्र
इतितस्यावच.श्रु त्वापुत्रस्यसचपार्थिवः ।
पुनःप्रोवाचधर्मज्ञस्तापत्नीतमयतथा ॥१
यन्मयापितुरादेशात्यक्त राज्यनतत्पुनः ।
ग्रहीष्यामिवृथोक्तेनकिमात्मक्लिश्ययेत्वया ॥२
अहतेसम्प्रदास्यामिकरवैश्यव्रतेस्थित. ।
भुद श्वराज्यनशेपत्वमिच्छयावापरित्यज ।।३
इत्युक्त सतदापित्राराजपुत्रोभलन्दन ।
चकारराज्यधर्मजतद्वद्दारपरिग्रहम् ॥४
अव्याहततस्यचक्र पृथिव्यामभवद्विज ।
नचाधर्ममनोभूपास्तस्यसर्वेऽभवन्वो ॥५
तेनेष्टोविधिवद्यज्ञ सम्यवशास्तिवसुन्धराम् ।
सएवंकोऽभवद्भतापृथिव्यामरिशासनः ॥६
पली और पुत्र को बात सुन कर नाभाग ने उत्तर दिया कि चाहे जो
कुछ हो, पर जिस राज्य को मैंने पिता की आज्ञानुसार एक बार त्याग दिया,
तो अब उसे फिर ग्रहण करके अपनी पतिज्ञा को भग नहीं कर सकता। अब
तुम्ही इस राज्य के अधिकारी बनो और चाहो तो दूसरो के लिये छोड दो,
मैं तो वैश्य वृत्ति मे रहकर राजा का कर देता रहूगा। इस प्रकार पिता को
आज्ञा पाकर भलन्दन राज्य शासन करने लगे और यथा समय विवाह करके
गृहस्थ बने । राजा मलन्दन वडे प्रतापी थे और उनका रथ पृथ्वी पर सर्वत्र
भ्रमण करता था, वे कभी अधर्ममार्ग पर अग्रसर नहीं हुए, इमलिये सब राजा
उनके अनुगामी बन गये । वे राज्य धर्मानुसार यज्ञानुष्ठान करते और प्रजा का
पूर्ण कर्तव्य परायणता से पालन करते थे और उन्हें सर्वत्र एक अद्वितीय
शासक माना गया ॥१-६॥
अजायतसुतस्तस्यवत्प्रीतिस्तुनामतः।
पितातिशयितोयेनगुपौधेनमहात्मना ।।७

[ माण्डेय पुराण
तस्यापिभार्यासोनन्दाविदूरथसुताऽभवत् ।
पतिव्रतामहाभागासाप्राप्तानयोग्यंत ।
हत्वापुरन्दररिपु कुजदितिजेश्वरम् ।।
भगवस्तेनसप्राप्ताकुजू भनिधनात्कथम् ॥
एतदाख्यानमाख्याहिप्रसन्नेनान्तरात्मना ॥
विदूरथोनामनृप ख्यातकोतिरभूद्भुवि
तस्यपुनद्वय जातसुनीति सुमतिस्तथा ।।१०
एकदातुवनयातोमृगयाँसविदूरथ ।
ददर्शगतसुमहद्भ मेखमिवोद्गतम् ॥११
तदृष्ट्वाचिन्तयामासकिमेतदितिभैरवम् ।
पातालविवरमन्येनैतद्भ मेश्चिरन्तनम् ॥१२
चिन्तयन्नितित नासौददर्शविजने वने ।
ब्राह्मण सुरतनामतपस्विनमुपागतम् ॥१३
मार्कण्डेयजी कहने लगे-महाराज भलन्दन के पुत्र वत्सप्रोति हुए जिन्होने
अपने गुणो से पिता की कीर्ति को और भी बढ़ाया। बरसप्रीति का विवाह
विदूरथ को कन्या 'सौनका' से हुआ था और उहोंने इन्द्र के शत्रु 'कुजम्म'
नामक दैत्य पति को मार कर उसे प्राप्त किया था। यह सुन कर कोष्ट की ने
पूछा--"भगवन् । वत्सप्रीति का आरयान वतलाइये कि उसके किस प्रकार
कृजृम्भ से सोनन्दा को छुडाया ।' माकण्डेय जी ने कहा-विदूरथ एक बडे
प्रतापशाली और प्रसिद्ध नरेता थे। उनके सुनीति और सुमति नामक दो पुत्र
थे। एक दिन राजा ने वन मे शिकार के लिये भ्रमण करते हुए एक अथाह
गढा देखा। उन्हाने विचार किया कि यह कैसे उत्पन्न हो गया। सम्भवत
यह पाताल लोक का मार्ग है । उसी समय वहाँ उनको सुनत नाम के एक
तपस्वी ब्राह्मण दिखाई दिये ।।७-१३॥
सतपप्रच्छचनृप किमेतदितिविस्मित ।
अतिम्भीरमवनेदंशितातर्गतदरम् ।।१४

भलन्दन वत्सप्रीति चरित्र ]
[ ३३७
किन्नवेत्मिमहीपालवागर्थस्त्वहिमेमतः।
ज्ञेयसर्वनरेन्द्र रेणवर्ततेयन्महीतले ॥१५
दानवःसुमहावीर्योवसत्युनोरमातले ।
सजम्भयतित्पुनीकुजम्भ प्रोच्यतेतत. ॥१६
क्रियतेतेनयत्किञ्चिद्रलभूतमहीतले ।
त्रिदिवेवानरपपेर्तकथवेत्तिनोभवान् ॥१७
सुनन्द नाममुशलत्वष्टायनिर्मितपुरा।
तज्जहारसदुष्टात्मातेनहन्तिरऐरिपून ॥१८
पातालान्तर्गतस्तेनभिनत्तिवसुधामिमाम् ।
ततोऽमुराणासर्वपाद्वाराणिकुत्तेऽसुरः ॥१६
तेनभित्रात्रवसुधासुनन्दमुशलेनतु ।
भोक्ष्यते वसुधामेतातमजित्वकथभवान् ।।२०
यज्ञान्विध्वसयत्युग्रोदेवानामुपरोधक ।
आप्याययतिदैतेयान्सवलीमुशलायुध. ॥२१
राजा ने उनका वह गढा दिखा कर पूछा कि यह क्या है ? तपस्वी
पहा कि क्या आप इसे नहीं जानते ? राजा को तो ऐसी विशेष बातो का
पता अवश्य रखना चाहिये । अब मैं आपको इसका सव वृतान्त बतलाता हू ।
रसातल में एक बहुत बलवान् दैत्य रहता है। जिसको 'कुजम्भ' कहते हैं,
क्यों कि वह समस्त पृथ्वी को जभाई लिवाता है । पृथ्वी और स्वर्ग के प्राणी-
मात्र, भाई लेना उसी के कारण होता है। प्राचीन समय मे विश्वकर्मा ने
'सुनन्द नाम का जो 'मूसल' ( अस्त्र) बनाया था यह दुष्ट राक्षस उसी को
लेकर युद्ध मे शत्रुओ को मारता है और पृथ्वी को भेद कर रसातल का मार्ग
भी बना देता है । जिससे अन्य दानब भीतर जा सके। उम सुनन्द मूमल
से ही उसने यह विवर बना दिया है। वह शक्तिशाली दैत्य उस 'मूमन' के
द्वारा अजेय बन कर यज्ञ और देवताओं को नष्ट करता रहता है और दैत्यो
की मनोवाला पूर्ण करता है ॥१४-२१॥
ने

[ मारण्डेय पुराण
तस्यापिभार्यासोनन्दाविदूरथसुताऽभवत् ।
पतिव्रतामहाभागासाप्राप्तानशौय्यंत. ।
हत्वापुरन्दररिपु कुजभदितिजेश्वरम् ।।
भगवस्तेनसप्राप्ताकुज भनिधनात्कथम् ।।
एतदाख्यानमाख्या हिप्रसन्नेनान्तरात्मना ।
विदूरथोनामनृपःख्यातकीतिरभूद्भुवि।
तस्यपुत्रद्वयंजातसुनीति सुमतिस्तथा ॥१०
एकदातुवनयातोमृगयाँसविदूरथः ।
ददर्शगर्तसुमहद्भ मेमुखमिवोद्गतम् ॥११
तदृष्ट्वाचिन्तयामासकिमेतदितिभैरवम् ।
पातालविवरमन्येनैतद्भ मेश्चिरन्तनम् ।।१२
चिन्तयन्नितित नासौददर्श विजनेबने।
ब्राह्मणंसुव्रतनामतपस्विनमुपागतम् ।।१३
मार्कण्डेयजी कहने लगे-महाराज भलन्दन के पुत्र वत्समीति हुए जिन्होने
अपने गुणो से पिता की कीर्ति को और भी बढाया। बत्पनीति का विवाह
विदूरथ को कन्या 'सोनका' से हुआ था और उन्होंने इन्द्र के शत्रु 'कुम्भ'
नामक दैत्य पति को मार कर उसे प्राप्त किया था। यह सुन कर कोष्ट की ने

भन दन वत्मप्रीति चरित्र ]
.
तमन्न नियमारणन्तुमन्निभिस्तेनभूभृता।
तत्पावर्तिनीकन्याशुश्रावाथमुदावती ॥३०
तत कतिपयाहेतुताकन्यावयसाविताम् ।
जहारोपवनात्य कुम्भ मसखोवृताम् ॥३१
तच्छुत्यासमहीपाल क्रोधप-कुलक्षणा ।
पुनावुयाचत्वरितगच्छतवनकोविदौ ॥३२
निविन्ध्यायास्तटेगतस्तेनगत्वारसातलम् ।
सहन्यतायोऽपहर्तामुदावत्या सुदुर्मति ॥३३
ततस्तोतत्सुतौप्राप्यतगत तत्पदानुगौ ।
युयुधातकुजम्भेगस्वसैन्येनातिका पितो ॥३४
तत परिधनिस्निशशक्तिशूलपरश्वधं ।
वाणश्चाविरतयुद्ध तेपामामीत्सुदारुणम् ।।३५
ततामायावलवतातेनदत्येनतावुभौ ।
राजपुनौरणेबद्धौनिहताशेषसैनिको ॥३६
जब ऋषि इस प्रकार राजा को सब बातें बताकर चले गये तो
राजा अपने नगप मे वापस आये और वहाँ अपने मप्रिया से इस विषय म
सलाह करने लगे। उ होने मूसल के प्रभाव तथा उसकी शक्ति नष्ट होने की
वात मनियो को बतलाई । उस समय उनको कया मुदापती भी वही पर
बैठी सव बातें सुन रही थी। इस घटना से कुछ ही समय पीछे शीघ्र ही एक
दिन जब मुदावती अपनी सखिया के साथ उपवन में गई थी कुम्भ दानव
वहाँ प्राकर उसे पकड कर ले गया । जब यह खबर राजा को मिली तो वे
वरे क्रोधित हुए और अपने दोनों पुत्रो को बुला कर कहा कि तुम दोनो बन
प्रदेश का हाल जानते ही हो इसलिए वहां जाकर निवि या नदी के तटवर्ती
पातात वियर म होकर कुजम्भ दानव को मारो क्योकि वह तुम्हारी वहिन
को
हर कर ले गया है। राजा के आदेशानुसार दानो राजपुत्र उस विवर
पर पहुंचे और वहां दानव के पैरो के चि ह देखते हुए कुम्भ के निवास
स्थान पर आ गये। तब राजपुत्रो की सेना का दानव की सना के साथ घोर

भलन्दन वत्मप्रीति चरित ] [ ३३६ तमन्त्र क्रियमाणन्तुमन्त्रिभिस्तेनभूभृता । तत्पार्ववर्तिनीकन्यागुधावाथमुदावती ।।३० तत कतिपयाहेतुताकन्यावयसान्विताम् । जहारोपवना? त्य.कुजम्भ ससखीवृताम् ॥३१ तच्छुत्वासमहीपाल क्रोधप-कुलक्षणा । पुनाबुयाचत्वरितगच्छतवनकोविदौ १३२ निर्विघ्यायास्तटेगर्तस्तेनगत्वारसातलम् । सहन्यतायोऽपामुदावत्या सुदुर्मति ॥३३ तनस्तोतत्सुतौप्राप्यतंगत तत्पदानुगौ। युयुधातेकुजम्भेणस्वसन्येनातिको पितौ ॥३४ तत परिघनिस्त्रिशशक्तिशूलपरश्वधैः । वाणश्चाविरतयुद्ध तेपामासीत्सुदारुणम् ।।३५ ततोमायावलवतातेनदत्येनतावुभौ। राजपुत्रोरणेबद्धौनिहताशेषसै निको ॥३६ जव ऋषि इस प्रकार राजा को सव बातें बतलावर चले गये तो राजा अपने नगप मे वापस आये और वहाँ अपने मन्त्रियो से इस विषय में सलाह करने लगे। उन्होंने मूसल के प्रभाव तथा उसकी शक्ति नष्ट होने की बात मन्नियो को बतलाई 1 उस समय उनकी कन्या मुदावतो भी वही पर बैठो सब बातें सुन रही थी। इस घटना से कुछ ही समय पीछे शीघ्र ही एक दिन जद मुदावतो अपनी सखियों के साथ उपवन में गई थी कुम्भ दानव वहाँ माकर उसे पकड कर ले गया। जब यह खबर राजा को मिली तो वे बडे कोधित हुए और अपने दोनो पुत्रो को बुला कर कहा कि तुम दोनो बन- प्रदेश का हाल जानते ही हो इसलिए वहां जाकर निविधा नदी के तटवर्ती पाताल वियर मे होकर कुम्भ दानव को मारो, क्योंकि वह तुम्हारी वहिन को हर कर ले गया है। राजा के आदेशानुसार दोनो राजपुत्र उस विवर पर पहुंचे और वहां दानव के पैरो के चिन्ह देखते हुए कुम्भ के निवास स्थान पर आ गये । तव राजपुत्रो की सेना का दानव की सना के साथ घोर भलन्दन वत्सप्रीति चरित्र ] [ ३४१ स्थानेस्थास्यतिमेयत्मोयद्ये वकुरुतेविधिम् । वत्सतक्रियतामानुया त्साहिमनस्तव ॥४४ तत सखङ्ग सघनुवंद्धगोघाङ्ग लित्राणवान् । जगामवीर.पातालतेनगर्तेनसत्वरः ॥४५ तजोज्यास्वनमत्युग्र सचक्रे पार्थिवात्मजः । येनपातालमखिलमासीदापूरितान्तरम् ।।४६ ततोज्यास्वनमाकर्ण्यकुम्भोदानवेश्वरः । आजगामातिकोपेनस्वसंन्यपरिवारितः ॥४७ ततोयुद्धमभूत्तस्यतेनपायिवतूनुना। ससैन्यम्यमसैन्येनवलिनोवलबालिन ॥४८ दिनानित्रीरिणसयदायौघियस्तेनदानव । तत कोपपरीतात्मामुमलाभ्यधावन ।।४६ महाराज विदूरथ ने मिनापुत्र वत्मप्री का हार्दिक स्वागत करते हुए- "हे वत्म । यदि तुम इस कार्य को कर सकोगे तो मैं तुम्हारा मित्र पुत्र होना सार्थक समभूगा। अतएव यदि तुम्हारे मन में इसके लिये पूर्ण उत्साह हो तो नोघ्रातिशीघ्र इसे पूरा करने का प्रपल करो। तदनन्तर महावीर वत्मप्री खड्ग, धनुप, गोपा गोर अ गुलीनाण धारण करके शीघ्रतापूर्वक उम विविर में घुम और वहां पहुंच कर अपने भक्तिगालो धनुप को प्रत्वचा की टकार भरी जिमन वह समस्त विवर महाशब्द ये परिपूर्ण हो गया। उस टकार के घोर रव को सुन कर दानव श्रेष्ठ कृजम्म क्रोध से भर गया और अपनी सेना को लेकर लडने के लिये तैयार हो गश। राज कुमार वत्सप्री और वृजम्भ का यु- तीन दिन तर होता रहा, पर तब भी वह वन्नी को जीत न सका। तब वह मूमल को लेन के लिए अपने महल में गया !!४३-४६॥ गन्धर्माल्यस्तथाघूपैःपूज्मान मतिष्टति । अन्त पुरेमहाभागप्रजापतिविनिर्मितः ॥५० ततोविज्ञानमुगलप्रभावामामुदावती । पस्पर्ममृशालश्रेष्ठम तनम्रगिरोधरा ॥५१ ३४२ ] [ मार्कण्डेय पुराण पुनर्यावत्सगृह्णातिमुशलतमहासुर 1 तावत्सावन्दनव्याजात्पस्पनिकश शुभा ॥५२ तत सगत्वायुयुधमुशलेनासुरेश्वरः । व्यर्थामुशलपातास्तेसजग्मुस्तेपुशनुपु ॥५३ परमास्न तुनिर्वीयसौनन्देमुशलेमुने । अस्त्र शस्त्रश्चदंतेय सोयुध्यतरणेऽरिणा ॥५४ शस्लाम्नं समस्तस्यराजपुत्रस्यमोऽसुर । मुशलेनवलन्तस्यतच्चतन्व्यानिराकृतम् ॥५५ राजाविदूरथ की कन्या मुदावती जो दानव के महल में कैद थी इस मूसल के विषय म मब रहस्य अपने पिता से सुन चुको थी। इसलिये, उसने उस मूसल को प्रणाम करके उसे छू लिया। जब कृजम्भ उस मूमल को ले जाने लगा तब तक मुदावती ने पूजा के बहाने उसे बार-बार छुपा जब दानव- पति उस मूमल को लेकर युद्ध क्षेत्र मे लड़ने लगा तो उसका प्रहार बार-बार असफल होने लगा, क्योकि उसकी शक्ति स्त्री के स्पों के कारण नष्ट हो चुकी थी। यह देख कर दानव अस्त्र शस्त्र द्वारा युद्ध करने लगा। पर अस्त्र युद्ध में वत्सपी दानव को अपेक्षा अधिक निपुण था । उसको जिस मूसल का भरोसा था वह अव चतुराई से व्यर्थ कर दिया गया था ॥५०-५५।। तत पराजित्यसभूपसूनुरस्नारिणशस्तारिणचदानस्य । चकारसद्योविरथततश्चमचमखङ्ग पुनरप्यधावत् ॥५६ तमापन्तरभसाभ्युदणं विस्पप्टकोपनिदशेन्द्रशम् । रास्त्रेणवह्न विराजपुत्राजघानकालानलसप्रभेगा ।।५७ सपावकारनेणत्दृदिक्षतोभृशतत्याजदेह त्रिदशारितत्मन । वभूवमद्यश्चमहोरगाणारसातलान्तपुमहानथोत्सव ॥५८ ततोपतत्पु'पष्टिमहीपालसुतापरि । जगुर्गन्धर्वपतयादेववाद्यानिसस्वनु ॥५ सचापिराजपुत्रस्तहत्वातौनृपतेसुतौ । मोनयामामविगोतानन्यामुदावतीम् ।।६०

भलन्दन वत्सप्री चरित्र ।
[ ३४३
-
तचापिमुशलतस्मिन्युजम्भेविनिपातिते ।
जग्राहनागाधिपतिरनन्त पनि ॥६१
तस्याश्वपरितुष्टोऽमोगेप सर्वोरगेश्वर ।
मुदावत्यामुदाध्यातमनोवृतिस्तपोधन ॥६२
सुनन्दमुशलस्पर्शयन्चकारपुन पुन ।
यापित्करतलस्पगप्रभावज्ञानियोभना ।।६३
मुदावत्यान्ततोनामनागगजम्तदाकरोत् ।
सुनन्दामितिमानन्द सौनन्दगुरगजद्विज ॥६४
जव दत्सप्री ने दानवराज के सब अस्त्र-शस्त व्यर्थ करके उसके रथ
को भी ना कर दिया तो वह तलवार, ढाल लकर वत्मप्री से युद्ध करन के
लिये बडे वेग से दौडा। पर वत्मप्रो ने उसे बीच में ही कालाग्नि के समान
सुप्रकाशित आग्नेयास्त्र से मार दिया ।।५६-५७॥ यह कृतम्भ देवनामो तथा
पातालवासी नागो के लिये वडा कष्टकारक यो, इसस उमरे मरत हो नागगरण
महान् उत्सव करने लग । हम समय चारो ओर स राजपुत्र वत्मप्री पर
पुष्पवर्षा होन लगी, गन्धव गायन करने लग और देवगण तरह तरह क वाच
वआने लगे। वत्मप्री ने दानव की कैद मे राता विद्रथ के दोना पुत्र सुनीनि
नया सुमति और कन्या मुरवती को हुआया। हनुम्भ का अन्न हो जाने पर
उपर मूमत्र नागगन अनन नै ग्रहण किया और वे राजकन्या मुदावती को
चतुराई को जान कर बडे प्रसन्न हुए। उमी मूमल को बार-बार सूबर उमगे
दशक्ति को मिटा दिया था और इस प्रकार कृतृम्भ का नाश कराया था। उम
मूमल का नाम मोनन्द हान स नागराज ने मुदायटी का नाम 'मुनन्दा' रख
दिया ।।५८-६४॥
संचापिराजपुवर्मताभतृभ्यासहितापितु ।
समोपमानिनायाशुपरिणपत्याहवतम् ॥६५
ग्रानीतौननयोताततययमुदावती।
तवालयामयान्यद्य कर्तव्यतत्समादिन ॥६६
.

[ मार्कण्डेय पुराण
तत प्रहर्षसपूर्णहृदय समहीपतिः ।
साधुमाध्वित्यथाहोच्चवंत्सवत्सेतिशोभनम् ।।६७
सभाजितोऽस्मिविदर्शवत्साहकारणं स्त्रिभि. ।
त्वजामाताचयत्प्राप्तोयञ्चारिविनिपातितः ।
भागता यक्षताम्ययञ्चापत्यानिमेपुनः ।
तद्गृहाणाद्यशस्तेऽह्निपाणिमस्यामयोदितम् ।।६६
स्वराजपुत्रचार्वङ्गवा कन्यायादुहितुर्मम ।
मुदावत्यामुदायुक्तःसत्यवाक्यकुरुष्वमाम् ॥७०
तत्पश्चात् राजकुमार वत्सप्री ने दोनो राजकुमारो तथा कन्या को
अपने साथ लाकर राजा विदूरथ की सेवा में उपस्थित किया और उनको
प्रणाम करके निवेदन किया--"महाराज, आपकी प्रानानुसार पापके दोनो
पुत्रो तथा कन्या मुदावती को कृज़म्भ को मार कर छुडा साया हू । अब जो
अन्य कोई कार्य हो तो वैसी प्राज्ञा दे ॥६५-६६॥ यह सुन कर राजा बडे
प्रमन्न मोर सतुष्ट हए और बारम्बार वत्मप्री की सराहना करके उसे धन्यवाद
देने लगे। उन्होने कहा-माज मेरे लिये बडो प्रसन्नता का दिन है क्योकि
तीन वारणों से मैं देवताम्रो द्वारा भी प्रशसा वा पधिकारी बन गया हूँ।
प्रथम तो तुम यो जमाता के रूप में प्राप्त विया, दूसरे ऐसा दुर्घपं शत्रु मारा
गया और तीसरे मेरे पुत्र और कन्या सकुशल मुझे प्राप्त हो गये। इसलिये
पद में अपनी प्रनिशानुमार प्रपनी कन्या का तुम्हें देता हूँ। तुम उसका
पाणिग्रहण पगे ॥६७-७०॥
तातस्याशामयापार्यायावीपिकरोमितत् ।
स्वमवतातजानीपेनवानाधितावयम् ।।७१
ततस्तयों मराजेन्द्रश्च वैवाहिकमम् ।
मुदायत्यानदुहितुर्भलन्दनसुतस्यय ७२
तत महतयारमंवत्सप्रीनवयोवन ।
गमगीयदेवोपुत्रामादभिपरपुर ॥७३
पालनगतात पितातम्यभैलन्दन ।
मान जगामवरगती सबभूवमहापति. Isr

खनित्र चरित्र ]
[ ३४५
राजपुन वत्सप्री ने
इयाजयक्षान्सततंप्रजाधर्भणपालयन् ।
पुत्रवत्पाल्यमानास्तुप्रजास्तेनमहात्मना ॥७५
ववृधुविपयेतस्यनचाभूवर्णराङ्कर ।
नदस्युव्यालदुवृत्तभयमासीच्चकस्यचित् ।
नोपसर्गभयञ्चवतस्मिञ्छासतिभूपतौ ॥७६
कहा-महाराज | आपकी प्राज्ञा शिरोधार्य है ।
आप जानते ही है कि मैं गुरुजनो को आज्ञा पालन को सदैव तत्पर रहा हूँ।
तब राजा विदूरथ ने वत्सप्री तथा मुदावती का विवाह सस्कार बडी धूमधाम
से सम्पत किया। ये दोनो नवयुवा पति-पत्नी रमणीय स्थानों और महलो
में प्रेमपूर्वक विहार करने लगे । कुछ समय पश्चात् वत्सप्री के पिता भलन्दन
अधिक वृद्ध हो जाने से पुत्र को राज्य देकर बन को चले गये । वत्सप्री ने
राज्य का सचालन और प्रजा का पालन वडी योग्यता से किया जिससे समस्त
प्रजाजन निरन्तर समृद्धिशाली और सुखी होने लगे। उनके राज्य में कोई
वर्णसकर नहीं होते थे और हिंसक जन्तु, दुष्ट लोगो, ठग, धूर्त आदि का भय
जाता रहा ।।७१-७६॥
।
१०४---खनित्र चरित्र (१)
तस्यतस्यासुनन्दायापूत्राद्वादशजज्ञिरे ।
प्राशु प्रवीर शूरश्चसुचक्रोविक्रम क्रम १
वलीबलाकश्चण्डश्चप्रचण्डश्चसुविक्रम ।
सुनयश्चमहाभागा सर्वेसग्रामजित्तमा २
तेपाज्येष्ठोमहावीर्य प्राशुरासीन्नराधिप ।
इतरेभृत्यवत्तस्यबभूवुर्वशत्तिन ॥३
तस्ययज्ञ द्विजत्यक्त रनेकद्रव्य राशिभि ।
न्यूनवर्णविसृष्टंश्चमत्यनामावसुन्धरा ॥४

[ मार्कण्डेय पुराण
सम्यक्पालयतस्तस्यप्रजा पुवानिवौरसान् ।
योभूद्धनचय कोशेतेननिष्पादितास्तुये ॥५
मतद शतसहस्रास्तेतेपासव्यानविद्यते ।
अयुताय नकोटीभिर्नचपचादिभिमुने ।।६
माकरडेय जी ने कहा- सूर्यक्सोत्पन्न महाराज वत्सप्री के बारह पुत्र
हुए थे, जिनके नाम प्राशु, प्रवीर, शूर, सुचन, विक्रम, क्रम, बलाक, चण्ड,
प्रचण्ड, सुविक्रम और सुनय हुए, यह सब अत्यन्त भाग्यशाली और युद्ध में
विजय प्राप्त करने वाले थे ॥१-२॥ उनमे सबसे प्राशु राजा हुए और अन्य
ग्यारह भाई उनके अधीन भृत्य के समान रहने लगे ॥३॥ उनके यज्ञ करने के
समय में ब्राह्मणो तथा अन्य जाति के मनुष्यो ने भी धन का त्याग किया था,
इसीलिये पृथिवी का नाम वसुन्धरा पडा ||४|| उन्होन अपने पुत्र के समान हो
प्रजा का पालन किया तथा उनके राज-कोप मे जो धन एकत्र होता था, उसी
धन के द्वारा सभी असख्य यज्ञानुष्ठान सम्पन्न हुए थे। उन यज्ञो की प्रयुत,
करोड अथवा पद्म प्रादि सख्या में गणना सम्भव नहीं है ॥५-६॥
प्रजातिस्तस्यपुनोऽभूद्यस्ययज्ञेशतक्रतु ।
अवाप्यतृप्तिमतुलायज्ञभाग सुरै सह ।।७
दानवानासुवी-रणाजघाननवतीनव ।
बलचबलिनाश्रेष्ठोजम्भचासुरसत्तमम् ॥८
अन्याश्वसुमहावी-नाजघानामरद्विप ।
प्रजातेस्तनया पचखनिनप्रमुखामुने (16
तेपावनित्रोराजाभूत्प्रख्यातोनिजविक्रम ।
सशान्त सत्यवाक्छूर सनप्रारिणहितैरतः ॥१०
स्वधर्माभिरतोनित्य वृद्धसेवीबहुश्रु तः ।
वाग्मीविनयसपन्न कृतास्त्रोऽप्यविकत्यन ॥११
सर्वलोकप्रियोनित्यमुवाचतदहनिशम् ।
नन्दन्तुमभूतानिस्निह्यन्तुविजनेष्वपि ॥१२

३४७ खनित्र चरित्र (१) स्वस्त्यस्तुसनभूतेपुनिरातङ्कानिसन्तुच । माव्याधिरस्तुभूतानामाघयोनभवन्तुच ॥१३ उन राजा प्राशु के प्रजाति नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई, उनके यज्ञ में देवताप्रो के सहित इन्द्र यन्न भाग प्राप्त कर तृप्त हुए थे और उन्होने अत्यन्त पराक्रमी वर और जम्म नामक दैत्यो तया अन्य दव-शत्रु असुरो का वध क्यिा था, उस राजा प्रजाति के सनित्र इयादि नाम वाले पांच पुत्र हुए थे ।।७।। उन पाचों में खनित्र ही अपने वल, वीर्य से प्रसिद्ध राजा हुए, यह शान्त सत्य- वता, वीर, सब जीवो का हित चिन्तन करन वाले ॥१०॥ अपन धर्म में परा- यण, वृद्धजनो की सवा करने वाले, अनेक शास्त्रो के देसन वाले, वाग्मी, मस्त्र शस्त्र के ज्ञाता, विनयशील, अहसार हीन ॥११॥ तथा सर्व लोरप्रिय थे, वह सदैव क्ढे रहते--सभी जीव मानन्दित रहे, विजन स्थान में स्नेह युक्त हों, समी जीवो का कल्याण हो, सब निर्भय हा, सव को पीडा नष्ट हो और मनाव्यथा किसी को भी न हो ॥१२-१३॥ मंत्रीमशेपभूतानिपुप्यन्तुसकलेजने । शिवमस्तुद्विजातीनाप्रीतिरस्तुपरस्परम् ॥१४ नमृद्धि सर्ववर्णानासिद्धिरम्तुचर्मणाम् । भोलोका सर्वभूतेपुगिवावोऽस्तुसदामति ।।१५ ययात्मनियथापुनेहितमिच्छथसर्वदा । तथासमस्तभूतेपुवर्तवहितबुद्धय ॥१६ एतद्वोहितमत्वन्तकोवाक-यापराध्यने । यत्करोत्यहितकिचित्कम्यचिन्मूटमानन ॥१७ तसमन्येतितन्यूनक्र्तृगामिफ्लयत । इतिमत्वातमस्तेपुभोलोकाहितबुद्धय ॥१८ सन्तुमालौक्किपापलोका प्राप्यय युवा । योमऽद्यस्निह्यनेतस्यशिवमन्तुनदाभुवि ॥१६ ममी प्राणी सबसे मित्रना प्रस्ट पर, ब्राहाणा का बल्याण, पार- स्परिक स्नह ।।१४।। सभी वर्गों को नमृद्धि मोर सभी कमों की ३४८ ] [ मारण्डेय पुराण हे मनुष्यो । तुम्हारी मङ्गलमयी बुद्धि सदैव सब प्राणियों पे हित में लगी रह ॥१५॥ जैसे तुम अपनी और अपने पुत्र की शुभ कामना सदा बिया करले हो, से ही समस्त प्राणियो के हित की कामना करो ॥१६।। इसी में तुम्हारा अत्यन्त हित निहित है, कौन किसके प्रति अपराधी है । जो मन्द बुद्धि मनुष्य किसी का अहित वरता है ।।१७।। उससे उसी का अहित होता है क्योकि धम के फल का भोगने वाला वर्मक्ता ही है, ऐमा विचार करके सभी प्राणियों के हित मे अपनी बुद्धि को रखो ॥१८॥ हे ज्ञानियो । लोक्कि पाप में प्रवृत्त मत्त होना, इसीसे तुम्ह पुण्यलोक प्राप्त हो सकते है, मुभने स्नेह रखने वाले मनुष्य का भूमण्डल मे सर्वत्र ही यल्याण हो और जो मेरे प्रति द्वेष करे, उसका भी कल्याण हो ॥१६॥ यश्चमाद्वेष्टिलोकेऽस्मिन्सोऽपिभद्राणिपश्यतु । एवस्वरूप पुत्रोऽभूत्सनित्रस्तस्यभूपते ॥२० समस्तगुणसम्पन्न श्रीमानब्जदलेक्षण । तेनतेभ्रातर प्रीत्यापृथग्राज्येपुयोजिता ॥२१ स्वयचपृथिवीमेतार भुजेसागराम्बराम् । प्राच्यातेनकृत शौरिदक्षिणस्यामुदावसु ॥२२ दिशिप्रतीच्यामुनयउत्तरस्यामहारथा । तेपातस्यचभूपस्यपृथग्गाना पुगेहिता ॥२३ वभूयुमुनयश्च वमन्त्रिवशक्रमागता । शोरेरविकुलोद्भुत मुहोमानामद्विज ॥२४ उदावसो कुशावत्ततॊगौतमान्वयजोऽभवत् । काश्यप प्रमति मसुनयस्यपुरोहित ॥२५ महारथस्यवासिष्ट पुरोघाऽभू-महीभृत । बुभुजुम्तेम्बराज्यानिचत्वारोऽपिनराधिपाः ।।२६ सनित्रश्चाधिपस्तेपामदोपदसुधाधिप । तेषुभ्रामरशेपेपुरानिय ममतपति ॥२७ सनिन चरिश (१) ] [ ३४६ वे . प्रजासुचसमस्तासुपुत्रेष्विवसदाहित । एक्दामन्त्रिणाशौरि सप्रोक्तोविश्ववेदिना ॥२८ राजपुत्र खनित्र इस प्रकार की कामना वाले थे, उन्होने अपने सब भाइयो को पृथक् पृथक् राज्य देकर ॥२०-२१।। स्वय भी समुद्र तक इस पृथिवी का पालन करते रह, शोरि को पूर्व प्रदश म, उदावमु को दक्षिण म ॥२२॥ सुनय को पश्चिम मे और महारथ को उत्तर प्रदेश म बसाया और पृथक् राजा के पृथक् गोन के पुरोहित हुए ॥२६॥ सनित्र और उनके भाइयो के मन्त्रिवश के क्रम से उपलब्ध पृथक् गोत्र वाल जो पुरोहित थे, उसी के अनुसार शौरि के अनि वसोत्पन सुहोत्र ऋपि, उदावसु के गौतम वशोत्पन्न कुशावर्त, सुनय के कश्यप गोत्रीय प्रमति तथा महारथ के वसिष्ठजी पुरोहित थे, इस प्रकार चारो भाई राजा होकर राज्य करते थे ।।२४-२६|| सम्पूर्ण पृथिवी के स्वामी सनित्र उनके अधीश्वर हुए, राजा खनित्र सभी भाइयो और प्रजा के प्रति पुत्र के समान व्यवहार करते थे, एक दिन राजा शौरि स उनके मन्त्री विश्ववेदी ने कहा ॥२७-२८11 विविक्त पृथिवीपालकिंचिद्वक्तव्यमस्तिन । यस्येयपृथिवीकृत्स्नायस्यभूपावशानुगाः ॥२६ सराजातस्यपुनश्चतत्पौनाचान्वयस्तत । इतरेभ्रातरस्तस्यप्रास्वल्पविषयाधिपा ॥३० तत्पुनाश्वाल्पकास्तस्मात्तत्पौत्राश्शाल्पाल्पका । कालेनहासमासाद्यपुष्पात्पुरुपान्तरम् ॥३१ कृष्योपजीविनोभूपभवन्तीतितदन्वयाः । नोद्धारकुरुतेभ्राताभ्रातृस्नेबलार्पण ॥३२ स्नेह व पृथिवीपालपरयो तृपुनयो । तत्पुनयो यरतरामतिर्भवतिपार्थिव ॥३३ तत्पुन केनेकार्यणप्रीतियुक्तोभविष्यति । अथवायेनतेनवसत्तोपकुरुतेनृप ॥३४ [ मावएडेय पुराण क्रियतेतत्किमर्थन्तुभूपैमंत्रिपरिग्रहः । भुज्यतेसकलराज्यमयातेमत्रिणासता ॥३५ हे राजन् । मुझे इस एकान्त के समय मे कुछ निवेदन करना है, यह सब पृथिवी और राजागरण जिनके अधीन हैं ॥२६॥ वह तथा उन्ही के वंशधर राजा होते है, उनके अन्य भाई पहिले थोडे से राज्य के अधिकारी होते हैं ॥३०॥ फिर उनके पुत्र उनसे भी थोडे और पौत्र तो पुत्रों की अपेक्षा भी अत्यल्प राज्य के अधिकारी होते हैं, समय पावर क्रमान्तर से पीढी प्रति पीढी राज्य के घटते- घटते अन्त मे ॥३१॥ उस वश के लोग कृषि कर्म से जीविवा चलाते हैं, हे राजन् । भाई के स्नेह मे बंधा हुआ भाई कभी भी अपने भाई का उद्धार नहीं करता ॥३२॥ फिर दोनो भाइयो को सन्तान भी एक दूसरे को पराया ही मानने लगती है, उनके भी जब सन्तान होती हैं, तो वे और भी दूर होती जाती हैं ।।३३।। उनके मन मे अपनी सन्तति के सुख की ही चिन्ता रहती है, यदि राजागण सतोप का ही अवलम्बन करें ॥३४॥ तो मन्त्रियो की नियुक्ति क्यो करे ? मेरे जैसे मन्त्री के होते हुए पाप सम्पूर्ण राज्य का सुख भोग सकते हैं ॥३॥ तत्किमुधाधारयसेसतोषकुरुतेयदि । कार्यनिष्पादकराज्यकरणकर्तुं रिष्यते ॥३६ राज्यलब्धुश्चतेकायंत्वकर्ताकरणवयम् । सोऽस्माभि करणराज्यपितृपंतामहकुरु । फलप्रदाभविष्याम.परलोकेनलेवयम् ॥३७ ज्येष्ठोभ्रातामहीपालोवयंतस्यानुजायतः । तत सभुक्तपृथिवीवयचाल्पवसु धराम् ॥३८ वयन्तुभ्रातर.पचपृथ्वीवकामहामते । अतोऽम्या पृथगैश्वर्यकथकृत्स्नभविष्यति ।।३६ एवमेतद्भवत्वत्रयद्य कावसुधानृप । तांत्वमेवाभिपद्यस्वज्येष्ठ शास्नुयथाभवान् ॥४.

खनिन चरित (१) ] । ३५१ सर्वाधिपत्य सन्योभवत्वमखिलेश्वर । यतन्तेचयथाहतेनेपामपिहिमन्त्रिण ॥४१ मैं चेष्टा करने को प्रस्तुत हू तो आप सतोप को व्यर्थ ही क्यो धारण किये हुए हैं ? राज्य को निष्पादन कर देना मन्त्री का कर्तव्य है ॥३६॥ परन्तु उस राज्य प्राप्ति के कार्य म मैं कारण हूंगा और आप कर्ता होंगे, इसलिये कारण के द्वारा अपने पैतृक राज्य पर अधिकार परिय, हम तो इसी लोक मे प्रापके लिय फल देने वाले हैं, परलोक मे नही । ३७॥ राजा बोले-गृथिवी का पालन करने वाले राजा हमारे बडे भाई हैं, इसीलिये वे समस्त पृथिवी का गज्य करते हैं और हम योडी पृथिवी को भोगत हैं ॥३८॥ हम पांच भाई हैं और पृथिवी एक ही है इसलिए पृथिवी के सम्पूर्ण ऐश्वर्य को हम सब पृथक रूप से किस प्रकार भोग सकते हैं ? ॥३६॥ इस पर विश्ववेदी ने कहा है राजन् । अापका वचन सत्य है परन्तु यदि पृयित्री एक ही है तो इस पर प्राप ही अधिकार करिय और सबके अधीश्वर होकर इस पृथिवी को भोगिये ॥४०॥ सम्पूर्ण प्राधिपन्य को प्राप्त होकर सब भाइयो म पाप ही सबके स्वामी बनिये, मेरे द्वारा नियुक्त अन्य मन्त्रिगण भी ऐनी ही चेष्टा कर रहे हैं ॥४॥ ज्येष्ठोराजाययाप्रीत्यामजतेऽस्मान्सुतानिय । कय तस्यकरिष्यामिममत्व नगतीगतम् ॥२ राज्ये स्थित पूजयेथाज्येष्ठ भूपाहणीनं । कनिष्ठज्येष्ठताकेयराज्यथियतानृणाम् ॥४३ तथेतिचप्रतिज्ञातेभूभुजातनसत्तम । विश्ववेदीततोमन्त्रीतभ्रातृननयद्वशम् ।।४४ तेपापुरोहिताश्च वात्मन शातिकादिपु । नियाजयामासतत खनिनस्याभिचारके ॥४५ विभेदतस्यनिभृतान्सामदानादिभिस्तथा । चकेचपरमोद्यागनिजदडप्रभावने ।।४६ राजा वाले-बडे भाई पुत्र के ममान सवका परिपालन कर रहे हैं, फिर उनके राज्याधिकार म मुझे ममत्व क्यो करना चाहिये ? ॥४२॥ विश्ववेदी

३५२ )
[ माडेण्य पुगण
ने कहा-फिर तो पाप राज्याधिधार पूर्वक विभिन्न प्रकार के सत्कारो द्वारा
उनका पूजन करिये, वैसे राज्य की कामना वाले पुरप के लिए छोटे वडे का
विचार करना व्यर्थ ही है ॥४३॥ मार्कण्डेय जी ने कहा-राजा द्वारा विश्व
वेदी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने पर विश्ववेदी ने उनके अन्य भाइयो को
अपने वश में किया ॥४४॥ तथा उनके पुरोहितो को अपने लिये शान्ति कर्म
और खनित्र के प्रति प्राभिचारिक कर्म करने के लिये नियुक्त किया ॥४५
तथा खनित्र के विश्वासपात्र भृत्यो को भी सामदानादि की नीति से अपने वश
में करने का यल करने लगा ।।४६॥
आभिचारिफमत्युग्रमहन्यहनि कुर्वताम् ।
पुरेऽधसाचतुर्णाचजज्ञेकृत्याचतुष्टयम् ।।४७
विकरालमहावक्नमतिभीषणदर्शनम् ।
समुद्यतमहाशूलप्रभूतमतिदारुणम् ॥४८
तयस्तदागतन्तत्रखनित्रोयनपार्थिवः ।
निरस्तचाप्यदुष्टस्यतस्यपुण्यचयेनतत् ॥४६
कृत्याचतुष्टयन्तपुनिपपातदुरात्मसु ।
पुरोहितेपुभूपानातथागैविश्ववेदिनि ॥५०
ततानिहन्त्यानिर्दग्धा कृत्ययातेपुरोहिता ।
विश्ववेदीतयामन्त्रीसशोरेर्दुष्टमन्त्रद ॥५१
जब पुरोहितो ने अत्यन्त उग्र अभिचार कर्म दिया, तब चार वृत्यायें
उत्पन्न होगई ॥४७॥ वह सभी विकराल शरीर याली अत्यन्त भयानर प्रतीत
होती थी, उनके हाथा में महागूल स्थित थे और वे अत्यन्त विशाल तथा दारुण
यो ॥४॥ इसके पश्चात् वे चारों यायें राजा सनित्र के पास पहुंची, परन्तु
पाप-रहित राजा के पुण्य प्रभाव मे तेजहीन होकर ॥४६॥ उन दुरात्मा पुरो-
हितों पौर विश्ववेदी के पास हो लोटार मागई ॥५०॥ देने वाला यह दुष्ट
मन्त्री विश्ववेदी, यह सभी उन लौटी वृत्यापो के द्वारा मारे जाकर भस्मीभूत
होगये ॥५॥

खनित्र चरित्र (२) ] [ ३५३ १०५-खनित्र चरित्र (२) तत समस्तलोकस्यविस्मय सोऽभवन्महान् । यदेककालनेशुम्तेपृथक्पुरनिवासिन. ॥१ तत शुश्रावनिधनयातान्भ्रातृपुरोहितान् । मन्निण चतथाभ्रातुर्दग्धतविश्वेदिनम् ।।२ किमेतदितिसोऽनीवविस्मितोमुनिसत्तम । खनित्रोऽभून्महाराजोनाजानात्तचकारणम् ॥३ ततोवसिष्ठ पप्रच्छसराजागृहमागतम् । यत्कारणविनेशुम्तेभ्रातृमन्त्रिपुरोहिता ॥४ तेनपृष्टस्तदाप्रायथावृत्तमहामुनि । यच्छोरिमन्त्रिणाप्रोक्त यच्चशोरिरुवाचतम् ।।५ यथाचानुष्ठितन्तेनभ्रातृणाभेदकारियै। मन्तिरणातेनदुप्टेनयच्चक्रुश्चपुरोहिता ॥६ यनिमित्तविनेशुस्तेअपापस्यापकारिण । पुरोहितास्तस्यराज्ञ शतावपिदयावतः ।।७ मार्कण्डेयजी ने कहा उस समय सभी को यह विस्मय हुआ कि यह पृथक् पृथक् नगर में निवास करने वाले होकर भी एक ही समय में किस प्रकार नष्ट होगये ॥१॥ हे मुनिवर । तदुपरान्त राजा खनित्र न अपने भाई पुरो- हित और मन्त्री विश्ववेदी का मृत्यु समाचार सुना तो ॥२॥ इसका कारण न समझ कर 'ऐसा क्यो हुप्रा' इस प्रकार विस्मय युक्त विचार करने लगे ॥३॥ फिर जव वसिष्टजी घर पर आये तब उनसे राजा ने अपने भाई के मन्त्री और पुरोहितो के इस प्रकार मरने का कारण पूछा ॥४॥ महामुनि वसिष्ठ से पूछने पर उन्होंने शोरि और उनके मन्त्री के मध्य जो वार्ता हुई थी ।शा तथा उस दुष्ट मन्त्री ने भाइयो में फूट डालने के लिए जो कार्य किये थे और पुरोहितों ने जिस कर्म का अनुष्ठान किया था ॥६॥ तथा शत्रुनो पर भी दया करने वाले

[ माण्डेय पुराण
यह पुरोहित निरपराध के अपवार मै तत्पर होकर स्वयं ही नाश को प्राप्त
होगये थे, वह सब वृत्तान्त प्राद्योपान्त गजा खनित्र को सुना दिया ॥७
सतच्छु त्वाततोराजाहाहतोऽस्मीतिवंवदन् ।
निनिन्दात्मानमत्यर्थवसिष्ठस्याग्रतोद्विज ।।
घिमामपुण्यसस्थानमल्पभाग्यमशोभनम् ।
देवदोपकृतपापसर्वलोकविहितम् IIE
मन्निमित्तविनष्ट तत्तद्ब्राह्मणचतुष्टयम् ।
मत्त कोऽन्य पापतरोभविष्यतिपुमान्मुवि ।।१०
नाभविष्ययदिपुमानहमत्रमहीतले ।
ततस्तेनविनश्येयुर्ममभ्रातृपुरोहिता ॥११
धिग्राज्य धिक्चमेजन्मभूभुजामहताकुले ।
कारणत्वगतोयोऽहविनाशस्यद्विजन्मनाम् ।
कुर्वन्त स्वामिनातेऽथभातृणाममयाजका ।
नाशययुनंदुष्टास्तेदुष्टोऽहनाशकारणे ।।१३
किंकरोमिक्वगच्छामिनान्योमत्तोहिपापकृत् ।
पृथिव्यामस्तिहेतुत्व द्विजनाशस्ययोगत ॥१४
यह वृत्तान्त सुनकर राजा अत्यन्त दुखित होकर वसिष्ठजी के समक्ष
ही अपने को धिक्कारने लगे ।।८।। राजा ने कहा-मैं कितना मद भाग्य
भसचित पुण्य वाला तथा शोभा रहित हूं कि देव भी मेरे अनुकूल नहीं है, मैं
लोक में निन्दा का पात्र मोर पापी हूं, इसलिये मुझे धिक्कार है |सा क्योकि
मेरे ही कारण चार ब्राह्मणो की मृत्यु हुई है, इसलिये इस पृथिवी पर मुझमे
बढकर अन्य कोन पापी हो सकता है ? ॥१०॥ यदि मैं इस पृथिवी पर पुरुष
के शरीर में उत्पन्न न हुआ होता तो मेरे भाइयो के पुरोहित नाश को प्राप्त न
हुए होते ॥११॥ उन ब्राह्मणो के नाश का कारण मैं ही हूँ इसलिये मेरे इस
राज्य को मौर महान् राज-वश में जन्म लेने को धिक्कार है ॥१२॥ मेरे
भाइयो को प्रयोजन सिद्धि के लिय कर्म करके जो याजकगण नाश को प्राप्त हुए
हैं, उममे वे स्वय दोघी नही थे, उनके नष्ट होने का कारण मैं ही था,
इसलिये

खनित्र चरित्र (२) ] । ३५५ दोपी भी मैं ही हुमा ॥१३॥ अब मेरा क्या ग्र्तव्य है, मुझे कहीं जाना चाहिये? ब्रह्महत्या का कारण होने से मेर समान पापी इस भूमण्डल पर अन्य कोई नहीं है॥१४॥ इत्यमुद्विग्नहृदय खनिन पृथिवीपति । वनयियासु पुत्रस्यकृतवानभिपेचनम् ॥१५ अभिपिच्यसुतराच्येापसज्ञमहीपति । भार्याभिस्तिमृभि सापंतपसेसवनययौ ॥१६ सवागत्वातपस्तेपेवानप्रस्थविधानवित् । शतानितीरिणवारणासा निनृपसत्तम ॥१७ तपसाक्षीणदेहस्तुराजवयोंद्विजोत्तम । निगृह्यसयोतासितत्याजासून्वनेचर ॥१८ तत पुण्यान्ययोलोकान्सर्वकामदुहोऽक्षयान् । अश्वमेधादिभिर्यज्ञैरवाप्यायेनराधिप ।।१६ भार्याश्चतस्यतास्तिस्र समन्तेनैवतत्युजु । प्राणानवापु सालोक्यतेनंबसुमहात्मना ॥२० एतत्खनित्रचरितथ तकल्मपनाशनम् । पठताञ्चमहाभागभुपस्यातोनिशामय ॥२१ राजा खनित्र ने इस प्रकार उद्विग्न चित्त से वनवासी होने की इच्छा करके अपने पुन का राज्याभिषेक किया ॥१५॥ क्षुप नामक पुत्र को राज्य देकर स्वय अपनी तीन पलियो को साथ लेकर तप करने के लिय वन म गय ॥१६॥ और वन मे वास करते हुए वानप्रस्थी रहकर साढ़े तीन सौ वर्ष तक उन्होंने सप क्यिा ।।१७। फिर हे द्विज श्रेष्ठ | उन वनवासी राजा ने तप के द्वारा कृश शरीर होने पर मद स्रोतो के निरोध पूर्वक प्राण का परित्याग कर दिया ॥१८॥ अन्यान्य राजागरण संकडो अश्वमेघ यज्ञो को करके भी जिस लोक को नहीं पा सकते उम सर्व अभीष्ट देने वाले अक्षय पुण्य लोक को राजा स्खनित्र ने प्राप्त किया ॥१६॥ इनकी तीनो पत्नियां भी उनका अनुगमन करके उन्ही क साथ समान गति को प्राप्त हुई ह महाभाग ! इस प्रकार खनित्र के परिव को ५५६ ] [ माण्डेय पुराण तुम्हारे प्रति कहा है, इसके पढने या सुनने से पापो का नाश होता है, अब भुप का चरित्र कहता हूँ उसे श्रवण वरो ॥२१॥ १०६-विविंश चरित्र क्षुप खनित्रपुत्रस्तुप्राप्यराज्ययथापिता । तथैवपालयामासप्रजाधर्मेणरजयन् ।।१ सदानशीलोयष्टाचयज्ञानामवनीपति । समःशौच मित्रेचव्यवहारादिवर्मनि ॥२ एकदासमहीपालानिजस्थानगतोमुने । सूर्तरुक्तीयथापूर्वक्षुपोराजातथाऽभवत् ॥३ ब्रह्मणस्तनय पूर्वक्षुपोऽभूत्पृथिवीपतिः । यादृक्चरितमस्यासीत्ताहक्तस्य वचेष्टितम् ।।४ श्रोतुमिच्छामिचरितक्षुपस्यसुमहात्मन । यदितादृड्भयाशक्य चेष्टितु तत्कराम्यहम् ॥५ सचकाराकरान्भूपराजागोब्राह्मणान्पुरा । पष्ठाशेनकृताचोामिष्टिस्तेनमहात्मना ॥६ तेपामहार नाराज्ञाकोऽनुयास्यतिमद्विध । तथाप्युत्कृष्टचेतानाचेष्टासूद्यमवान्भवेत् ।।७ माकण्डेय जी ने कहा-राज्य म अभिपिक्त हुए खनित्र पुत्र क्षुप प्रजा विविध चरिन । [ ३५७ ही सब बातें आपमे है ॥४॥ राजा वोले-में उन महात्मा का क्षुर का चरित्र सुनना चाहता हू यदि मैं भी उनरे जैसा हो आचरण पर सा तो वैसा ही प्रपन्न कहंगा ॥५॥ सून बोले हे महाराज । यह राजा भुप गो-ब्राह्मण से कर प्राप्त नहीं करते थे तथा छटे यश से यज्ञो का अनुष्ठान करते थे ॥६॥ राजा बोले--मेरा जैसा मनुष्य उनके कार्यों का अनुकरण मे कर मरता है । फिर भी ऐसे महा मानो के उत्कृष्ट प्राचरण पर चलने का प्रयल करना चाहिय ॥७॥ तयताप्रतिज्ञायासाम्प्रतक्रियतेमया। क्षुपम्यानुकरिष्यामिमहाराजस्यचेष्टितम् ।। त्रीस्त्रोन्यज्ञान्करिष्यामिसस्यापातेगतागते । पृथिव्याचतुरन्तायाप्रतिज्ञय कृतामया 16 यच्चगोब्राह्मणा पूर्वमददन्भूभृतेकरम् । तमेवप्रतिदास्यामिब्राह्मणानातथागवाम् ।।१० इतिप्रतिज्ञायवच क्षुपस्तत्कृतवान्तथा । सम्यापातेसयज्ञास्त्रीनयजयजतावर. ॥११ गोब्राह्मणा पुराराज्ञामददद्य चौकरम् । तावत्सत्यमदाद्वित्तमन्यगोब्राह्मणायसः ॥१२ तस्यपुत्रोऽभवहीर प्रमयायामनिन्दित । यम्पप्रतापगौ-याकृतावश्यामहीभृन ॥१३ सम्यापिनन्दिनीनामवैदर्भादयिताऽभवत् । विविंशतनय तस्याजनयामासमप्रभु ।।१४ इमलिय मैं इस मपय प्रण करता हू उसे थवरण करो, मैं उन महाराज भुप के कार्य का प्राव मे अनुकरण करेगा | मैं चारो वर्ण और पृथिवी के प्रति यह प्रनिना करता कि कृषि आन वाले, वत्तमान और व्यतीत होने वाले समय में तीन-नीन यनो का अनुष्ठान करूंगा ।।। तथा पहिले जिस-जिस समय में राजापा ने ब्राह्मणो से जो कर लिया है, उसे मैं उनको लोटा दूंगा ॥१०॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-पनवतांनी म श्रेष्ठ गजा क्षुप न ऐसी प्रतिज्ञा पसे उमकी रक्षा को अर्थात् कृषि की उपस्थिति के ममय तीन यरानुभान

३५८ ]
[ मात्रएडेय पुराण
क्येि ॥११॥ तथा पहिले राजाओ को गो पौर ब्राह्मणी ने जितना पर दिया
था, उतना धन उनको दे दिया ॥१२।। उनकी प्रमथा नाम की भार्या हुई, उसव
गर्भ से एक अत्यन्त सुन्दर और बलवान् पुत्र की उत्पत्ति हुई, उस पुत्र ने अपनी
शूरता मोर पराक्रम से सभी राजामों को अपने अधीन कर लिया था ॥१३॥
उनकी भार्या विदर्भ देश के राजा की पुत्री नन्दिनी हुई, उसने गर्भ से विविध
नामक एक पुत्र उत्पन्न हुग्रा॥१४॥
विविशेशासतिमहीमहीपालेमही जसि ।
महीतलमभू-द्याप्तनिरन्तरतयाना ॥१५
ववर्षकालेपर्जन्योमहीसस्यवतीतथा ।
सुफलानिचसस्यानिरसवन्तिफलानिच ॥१६
रसा पुष्टिकराश्चासन्न्पुष्टिर्नोन्मादकारिणी।
नविनिचयानृणाप्रभूतामदहेतव ॥१७
तत्प्रतापेनरिपवोभयमापुमंहामुने ।
स्वास्थ्य जन सुहृद्वर्गोमुदमापसुपूजितः ॥१८
इष्ट्वासयज्ञान्सुबहू-सम्यक्सम्पाल्यमेदिनीम् ।
सम्रामे निधनप्राप्यशवलोकमितोगत ॥१६
राजा विविंश के राज्यकाल मे पृथिवी पर इतनी प्रजा थी कि कही
भी स्थान शेष नहीं था ॥१५॥ उस काल मे मेघ यथा समय वृष्टि करते थे
पौर पृथिवी भी अन्न से परिपूर्ण रहती थी, सभी अनाज फल
से
युक्त
मोर
सभी फल रस से युक्त थे ।।१६।। रस मे पोषक तत्व होते थे, उससे होने वाली
पुष्टि से मनुष्य उन्मत्त नही होता था, बहुत धनवान् होकर भी मनुष्यो मे
मिथ्यामद नही था ॥१७॥ शत्रु उनके बल से सदा भयभीत तथा अस्वस्थ रहते
थे, सुहृदो को सदा मन्तोप रहता था ॥१८॥ इस प्रकार उस राजा विविंश ने
अनेकानेक यज्ञ दिये और भले प्रकार प्रजा का परिपालन रिया, अत मे युद्ध
करते हुए मृत्यु को प्राप्त होकर स्वर्ग नोक को गये थे ॥१६॥

खनित्र चरित्र (३) ]
[ ३५६
१०७~~-खनित्र चरित्र (३)
तस्यपुत्र खनीनेत्रोमहावलपराक्रम ।
यम्ययज्ञप्वगायलगन्धर्वा विस्मयान्विता ॥१
खनीनेनसमोनान्योभुवियज्वाभविष्यति ।
तेनयज्ञायुतेपूर्णेदतापृथ्वीससागरा ॥२
दत्त्वाचसकलापृथ्वीवाह्मणानामहात्मनाम् ।
तपमाद्रघमासाद्यमोदयन्साधितेनय ॥३
यतश्चप्राप्यवित्तद्धिमतुलादातृमत्तमात् ।
जगृहुाह्मणाविप्रनान्यराज प्रतिग्रहम् ।।४
सप्तपष्टिमहस्राणिसप्तपटिशतानिच ।
सप्तपाप्टचयोयज्ञानयजद्भरिदक्षिणान् ॥५
अनुव.समहीपालोमृगयामुपचक्रमे ।
पुनार्थ पितृयज्ञायमासकामोमहामुने ।।५
अश्वारन्दाविनासन्यमेकएपमहायने ।
बद्धगाधागुलिमारपोवारणसङ्गधनुर्धर ७
मार्कण्डेयजी ने कहा-राजा विविंश के पुत्र सनी नेत्र हुए, वे महादली
और पराक्रमी थे, उनके यज्ञानुप्रान को देखकर विस्मय का प्राप्त हुए गन्यों ने
उनकी गाथा का इस प्रकार कीतन किया था ॥१॥ इस पृथिवी पर खनी नेत्र
के समान कोई यज्ञकर्ता नहीं होगा क्योंकि उन्होंने दश सत्व यज्ञों का अनुदान
किया और समुद्र पर्यंत सम्पूर्ण पृथिवी का दान कर दिया ।।२।। उन राजा
खनीनेत्र ने ब्राह्मणो को सब पृथ्वी दे दी थी और फिर तप क द्वारा धन लाभ
करक उम पृथ्वी को हुडा लिया था ।।३] है ब्रह्मन् । उन दानियो मे श्रेष्ठ
राजा सनीनेत्र से ब्राह्मणो ने विपुल द्रव्य प्राप्त करसे, पुन अन्य किसी से दान
ग्रहण नहीं किया था ।।४। उन्होंने निहत्तर हजार सरसठ यता का अनुमान ।
किया और मभी यज्ञो म विपुल धन की दक्षिणा दो ॥५॥ एक समय की बात
है कि खुनी नेत्र ने पुत्र की कामना से पितृ-रज्ञ के अनुपान की इच्चा की, उन

३६० ॥ [ मावएडेय पुराण समय अनुष्ठान के निमत्त मृग के लिये धनुष बाण प्रादि धारण कर और अश्वा. रूढ होकर वन मे प्रापेट के लिये गये ।।६-७॥ तबाह्यन्ततुरगमन्यतोगहनावनात् । विनिष्क्रम्यमृग प्राहमाहत्वाभिमतकुरु ।। अन्येमृगाःपलायन्तेमहाभीत्याविलोक्यमाम् । कथमात्मप्रदानत्वमृत्यवेकर्तुमिच्छसि II अपुत्रोऽहमहाराजवृथाजन्मप्रयोजनम् । विचारयन्नपश्यामिप्राणानामिहवारणम् ||१० अथाभ्येत्वमृग प्रातमन्योवसुधाधिपम् । मृगस्यतस्यप्रत्यक्षमलमेतेनपार्थिव ।।११ घातयस्वेतिमामासर्ममकर्मसमाचर। यथाकृतार्थतातेस्यान्ममचाप्युपकारितत ॥१२ पुत्रार्थत्वमहाराजस्वपितृन्यष्टुमिच्छसि । अपुत्रस्यास्यमासेनलप्स्यसेवाच्छितकथम् ॥१३ यादृक्कर्मविनिष्पाद्य तादृग्द्रव्यमुपाहरेत् । दुर्गन्धो सुगन्धानागन्धज्ञानविनिर्णय ॥१४ जब उन्होने एक वन से दूसरे वन मे जाने के लिये अपने अश्व को दौडाया, तभी एक मृग ने एक ओर से निकल कर उनसे कहा-हे राजन् मेरा वध करके अपना इच्छित कार्य करिये ।।८।। राजा बोले-ौर सभी मृग तो मुझे देखते ही भाग जाते है, परन्तु तुम मरने के लिये क्यो इच्छा कर रहे हो ? ॥६॥ मृग ने कहा-हे राजन् । मैं पुत्रहीन हू, इस लिये जीवित रहना व्यर्थ समझता हूँ॥१०॥ मार्कण्डेयजी ने कहा- तभी एक अन्य मृग वहाँ पर पहिले मृग के ही सामने राजा से बोला-हे राजन् । इस मृग का आप क्या करेंगे? ॥११॥ पाप मेरा वध करके अपने कार्य का सम्पादन करेंगे तो प्रापका अभीष्ट सिद्ध होगा और मेरा भो उपकार होगा ॥१२।। हे राजन् ! याप पुत्र की कामना से जो पितृ यज्ञ करना चाहते हैं उसकी सिद्धि इस पुत्र- होन के मास से कैसे हो सवे गो? ॥१३॥ जो कर्म जिस प्रकार का हो, उसके चनित्र चरित्र (३) ] ३६१ लिये वैसा ही द्रव्य ग्रहण करना चाहिये, भला कभी दुर्गन्ध से सुगन्ध की पूर्ति हो सकती है ? ॥१४॥ वैराग्यकारणप्रोक्तमनेनापुत्रतामम । कथ्यताप्राणमत्यागेयत्तेवैराग्यकारणम् ॥१५ वहवोमेसुताभूपवह्वयोदुहितरस्तथा । यचिन्तादुखदावाग्निज्वालामध्येवसाम्यहम् ॥१६ सर्वसाध्यानरेन्द्र यमृगजाति सुकातरा। तेप्वपत्येपुमेचातिममत्वतेनदुखित ॥१७ मनुप्पसिंहशार्दूलवृकादिभ्योविभेम्यहम् । विहीनात्मर्वसत्त्वेभ्य.श्वशृगालादपिप्रभो ॥१८ सोऽहनिमित्तवन्धूनामिमाशून्यावसुन्धराम् । नृसिंहादिभयात्मर्वामिच्छामिसुनृशसकृत् ।।१६ तृणान्यन्येऽपिखादन्तिगोऽजावितुरगादिका. ! तास्तेपापोपरणायाहमिच्छामिनिधनगतान् ।।२० निष्क्रान्तेपुततस्तेपुममापत्येपुदेपृथक् । भवन्तिचिन्ता.शतशोममत्वावृतचेतसः ॥२१ राजा बोले-उस प्रथम मृग न पुत्रहीनता को ही अपर्न वैराग्य का कारण बताया है, परन्तु तुमको वैराग्य किसलिये हुआ है, जो अपना प्राण देने को तन्पर हुए हो? ॥१५॥ मृग ने कहा-हे राजन् ! मेरे पुत्र पुत्रियो की अधिक्ता है, उन्ही को चिन्ता से मैं टु वरूपी अग्नि मे जलता रहता हूँ ॥१६॥ यह मृग जाति सभी के वश में हो जाती है, मुझे अपनी सतान के प्रति अत्यन्त मोह है, इसीलिये मैं सदा ही दुखित रहता हूँ ॥१७॥ हे राजन् ! मनुष्य, सिंह, व्याघ्र, वृक तथा सभी प्राणियो में अत्यन्त हीन श्वान और गीदड आदि से भी भयभीत रहता हूँ ॥१८॥ मैं सदा यही कामना करता हूं कि इन मनुष्य सिंहादि के डर से, यह पृथिवी मुक्त हो जाय और मैं भी विघ्न रहित हो जाऊं ॥१६॥ गो, बकरी, अश्व प्रादि पशु जब इस पृथिवी के सम्पूर्ण तृण को खा जायेंगे तव मेरे पुत्र-पुत्री आदि क्या सार जीवन धारण करेंगे, इसीलिय मुझे अपनो [ मावएडेयपुगा सतान के पोपणार्य में तृण पाने वाले जीवो के मरने की कामना करता रहता हूँ ॥२०।। जब मेरे पुत्र पुत्री पृथक पृथक् रूप से गमन करते हैं तब उन से। के कारण मेरे हृदय मे सैक्डो चिन्ताएं उपस्थित हो जाती हैं ॥२१॥ विकूटपाशविन वागुराक्सुितोमम । प्राप्तचरन्वनेक्विानृसिंहादिवशगत ॥२२ प्राप्तोऽयमेक सप्राप्तास्तेवस्थाकीदृशीमम । साम्प्रततेचिरायतेयेगता सुमहावनम् ॥२३ दृष्ट्वाप्राप्तान्ममाभ्याशमहन्तानात्मजान्नृप। ईपदुच्छ्वसित क्षेममिच्छामिरजनीपुन ॥२४ प्रभातेदिवसक्षेममस्तगेऽक निशामपि । वाछाम्यहरदाक्षेमसर्वकालभविष्यति ॥२५ एत्ततेकथितभूपमहोद गस्यकारणम् । अत प्रसादसुरुमेवारणोऽयपात्यतामयि ॥२६ इतिदु खशताविष्ट प्रारणान्नहत्यजामियत । तत्कारणनिबोधत्वव वतोममपार्थिव ॥२७ असूर्यानामतेलोकायान्गच्छन्त्यात्मघातका । यज्ञोपयुक्ता पशन सम्प्रयान्त्युच्छ्रिती प्रभो ॥२८ कभी कभी लगता है कि कोई पुत्र किसी कठोर पाश में बँधा है अथवार वच्च या सिंहादि के द्वारा माग गया है ।।२२।। यदि एक प्राजाता है तो दूपरे को चिन्ता रहती है, जो वन मे चग्ने के लिये गये हैं, वह वहाँ कैसी दशा होगे यह मुझे ज्ञात नहीं है ॥२३॥ हे गजन् । जब वह सब मेरे पास आ जाते हैं, तब उन्हे देखकर कुछ सतोष होता है, परन्तु उस समय भी समस्त रात्रि ममन पूर्वक व्यतीत हो, यही चिता करता रहता हूँ॥२४॥ प्रात कात होने पर दिन भर की मगल कामना और सूर्यास्त होने पर रात्रि के मगल पूवर्क रतीत होने की चिन्ता करता हुआ यही सोचता रहता है कि यह हर समय निरापद अवस्था म रहे ॥२५॥ है राजा । मेरे उद्वेग या यही कारण है जो भने पापरा वहा है अब पाप वृपा करके मुझ पर वाण चलाइये ॥२६॥ है, खनित्र चरित्र (३) 1 राजन् ! मैं जिस लिये संक्डो दु खो से दुखित हृदय हुमा अपने प्राण त्याग की कामना कर रहा हूँ उमे पाप यथार्थ समनिये ॥२७॥ हे प्रभो । आत्मघात करने वालो को अमूर्य नामक नरक की प्रानि होती है और यज्ञ के लिये प्रयुक्त हुए पशुप्रो को सद्गति को प्राप्ति होती है ॥२८॥ अग्नि पशुरभत्पूर्वपगुरासोज्जलाधिप । भास्वानयोच्छिती प्राप्तायज्ञेनिष्ठामुपागताः ॥२६ तन्ममताकृपाकृत्वानयमामुच्छितिनृप। अत्मनश्च प्सितकामपुत्रलाभादवाप्स्यसि ॥३० राजेन्द्रनपरन्तघ्योधन्योऽयसुकृतीमृगः । वहवस्तनयाह्यस्यहन्तव्योऽहमसन्तति ॥३॥ एकदेहभवंयस्यदु खघन्य सर्वभवान् । वहूनियस्यदेहानितस्यदु खान्यनेवधा ।।३२ एकोयदाहमासतुप्राक्तदादेहजमम । दुखमामीन्ममत्वैतुभार्यायास्तदभूविधा ॥३३ यदाजातान्यपत्यानितदायादन्तितानिदै । तावच्छरीरभूमीनिममदु खान्यथाभवन् ।।३४ नकृतार्योभवाम्यस्यनातिदु खायसम्भव. । इटु खायमत्सूति परत्रचविरोधिनी ॥४५ यतोरक्षणपोपार्थमपत्यानाकरोमितत् । चिन्नयामिचसभूतिस्तेनमेनरकेध्र वम् ॥३६ पुराकाल में अग्नि, वरण और सूर्य भी पशु होकर पदार्थ वियुक्त हुए थे, इसीलिये उनको सदाति को प्राप्ति हुई थी ॥२६॥ ह गजन् ! इसीलिये मुझ पर कृपा करके प्राप मुझे सद्गति को प्रास गइये, ऐसा करके आप अपने इन्छिन पुत्र को प्राप्त वरेंगे ॥३॥ प्रथम मृग ने कहा-हे राजन यह मृग अधिक मनान वाला तो स्वय हो सुर्मवान हाता है, इसलिये मुझ पुत्रहीन का ही वध करिये ॥३१॥ इस पर दूसरे मृा ने कहा-एक शरीर वाले को एक ही दुम होता है वह तुम्हारे गुमान पन्य ही है, परन्तु अधिक देह वाल को [ माण्डेय पुराण अनेकानेक दु तो पी प्राप्ति होती है ॥३२॥ जय मैं भी एक था, तब मुझे भी एक देह वा ही दुरा था, परन्तु जब परनी हुई, तब स्नह में वारण इसकी दो भागों में विभक्ति हुई ॥३३॥ पिर जितनी रातान होती गई, उतन ही भागों में दुरा बढता गया, इस प्रकार मुझे पनप देहा ये वारण अन दुग्मों की प्रानि हुई है ॥३४।। जव तुम्हे अधिक दुम्य नहीं है तब क्या तुम धन्य नहीं हो ? मुझे तो मेरी यह रातान इस लो म दुस का पारण और परलोक में भी अहितकर है ॥३५॥ मैं प्रपती रातति पे पोपण और रक्षार्थ जो प्रयत्न अथवा चिन्ता करता हूं, वह सभी मेरी नरफ प्राप्ति का साधन रप ही है ॥३६॥ नवेमिक्सिन्ततिमान्धन्योऽपुनोऽअक्मृिग। पुनार्थश्चायमारम्भोममदालायतेमन. ॥३७ दुखायसन्तति सत्यमहिकामु कायतत् । तथाप्यतनयान्यान्ति मणानीतिश्रु तमया ॥३८ सोऽहयतिष्येपुनार्थ मृतप्राणिवध मृग । तपसवप्रचण्डेनयथापूर्वमहीपति ॥३६ राजा बोले-हे मृग । पुत्रहीन और पुत्रवान् इन दोनो मे सिका जीवन सफल है, यह मुझे ज्ञात नहीं है, मैं पुत्र प्राप्ति के कार्य में प्रयत्नवान हूँ, परन्तु मरा मन अत्यन्त उचलता को प्राप्त हो रहा है ॥३७॥ यद्यपि इहलोक और परलोक मे सतान के कारण ही दु खो की प्राप्ति होती है, परन्तु ऐसा सुना जाता है कि पुत्रहीन पुस्प ऋण-मुक्त नहीं होता ॥३८॥ इसलिये हे मृग । मैं जीवहत्या किये बिना ही, पूर्वकालीन भूपालो के समान थोर तप करके ही पुत्र लाभ का प्रयत्न करूंगा। ३६॥ १०८-फरन्धम चरित्र तत सनृपतिर्गत्वागोमतीपापनाशिनीम् । तत्रतुष्टाव नियतोभूत्वादेवपुरन्दरम् ॥१ करण्यम चरित्र [ ३६५ तप्यमानस्तपश्चोग्न यतवाकायमानस । तुष्टावप्रयत शक्रमपत्यार्थमहीपति ॥२ तस्यस्तोत्रेणतपसाभक्त्याचापिसुरेश्वर । तुतोपभगवानिन्द्र प्राहचैनमहामुने ॥३ अनेनतपसाभक्त्यास्तोत्रेपोच्चारितेनच । परितुष्टोऽस्मितेभूपवियताभवतावर ।।४ अपुनस्यसुतोमेऽस्तुसर्वशस्त्रभृतावर । सदाचाव्याहतैश्वर्योधर्मकृद्धमवित्कृती ॥५ तथेतिचोक्त शक्रेणराजाप्राप्तमनोरथः । प्रजा पालयितु भूपयाजगामनिजपुरम् ॥६ तनास्यकुर्वतोयन सम्यक्पालयत प्रजा । अजायतसुतोविप्रतदाशवप्रसादतः ॥७ मार्कण्डेयजी ने कहा- तदनन्तर राजा खनीनेत्र ने पापो को नष्ट करने वाली गोमनी के किनारे पहुंच कर जितेन्द्रिय रहते हुए पुरन्दरदेव का स्तवन किया ॥१॥ है मुने । राजा ने जब देह, मन और वचन से सयत होकर पुत्र की इच्छा से देवेन्द्र की स्तुति की, तब भगवान् पुरन्दर ने उनको भक्ति और स्तुति से प्रसन्न होकर कहा ॥२-३॥ हे राजन् ! तुम्हारी तपस्या, भक्ति और स्तुति से मैं अत्यन्त सतुष्ट हुमा है, इसलिये तुम मुझमे वर मांगो ॥४॥ राजा बोले---- है प्रमो । मैं पुत्रहीन हूँ, मेरे सभी शस्त्रधारियो से बढकर, बाधा रहित और ऐश्वर्यवान् धर्म के जानने वाला एक पुत्र हो ॥५] मार्कण्डेयजी ने कहा- इन्द्र ने 'ऐसा ही हो' कहकर जब राजा की प्रार्थना स्वीकार की, तब राजा अपने नगर मे लोट माये ॥६॥ वहाँ प्रजा पालन मे तत्परता पूर्वक यज्ञ का मनुष्ठान करने पर इन्द्र की कृपा से उन्ह एक पुत्र को प्राप्ति हुई ॥७॥ तस्यनामपिताचक्रेबलाश्वइनिभूपति । अस्त्रग्राममशेपचनाहयामासतसुतम् । पितर्यु परनेविप्रसोऽधिराज्येस्थितोनृप । सवलाश्वोवशनिन्येभुविमर्वमहीक्षितः 16 । मार्कण्डेय पुराण करचदापयामाससारग्रहणपूर्वकम् । ससर्वभूमिपात्राजापालयामासचप्रजा. ॥१० अथाखिलनरेन्द्रास्तेदायादास्तस्यदुर्मदा । नचाभ्युत्थायमतततेचास्मैप्रददु करान् ॥११ व्युत्थिता स्वेपुराष्ट्र पुनसन्तोपपरास्तत । भुवतस्यनरेन्द्रस्यजगृहुस्तेनराधिपा ||१२ सगृहीत्वास्वकराज्यपृथिवीशोबलान्मुने । तस्थोस्वनगरेभूपैविरोधोबहुभि कृत ॥१३ समेत्यसुमहावी- ससाधनधनास्तत । रुरुधुस्तमहीपालपुरेतवनरेश्वरा ॥१४ पिता ने उसका नाम 'बलाश्व' रखा और उसे सम्पूर्ण अस्त्र शस्त्र की शिक्षा दी ।।८।। हे ब्रह्मन् । वह बलाश्व अपने पिता के मरणोपरान्त, पृथिवी ये सब राजामो को जीतकर सम्राट् बन गये ॥६॥ वह उन राजामो से सार रूप कर को लेकर भले प्रकार प्रजा का पालन करने लगे ॥१०॥ फिर समय प्राप्त कर उन राजाम्रो पौर जाति वालो ने राजा का अभ्युत्यान न होने देने के निमित्त कर देना रोक दिया ॥११॥ तद वह राजागण बलाश्व के अधीनता मुक्त होकर ही सतुष्ट न हुए वग्न उन्होंने राजा बलाश्व की भूमि भी छीन ली ॥१२॥ राजा वसाक्ष्य प्रपने दात्रुनो स युद्ध परते-करते इतने बलहीन होगये कि उनके पाग अपना राज्प मात्र ही रह गया और वह अपनी राजधानी मे ही रहने लगे ॥१३॥ गरे पश्चात् उन धन गापन सम्पन्न राजाम्रो ने इन राजा घलाव को उनके नगर में ही घेर रिया ॥१४॥ पुररोधेनतेनाथपुपित रामहीपति । स्वल्पगोगोल्पद एश्ववतव्यपरमगत ॥१५ प्रपश्यमान शरणमरतोद्विजगत्तम । परोमुसाग्र स्वानिनवासार्तमानस ॥१६ तोऽम्यहस्तपिरवान्मुगानिलरामाता । निर्जगु शतमोयोपारमनागतुरजमा ॥१७ से [ ३६७ करन्धम चरित्र ] तत क्षणेनतत्सर्वनगरतस्यभूपते । व्याप्तमासीद्वलौघेनसारेणातिवलान्मुने ॥१८ अयसोऽतिबलौधेनमहतातेनसवृत । निर्मथ्यनगरात्तस्मात्तान्विजिग्येनराधिप ॥१६ जित्वाचवशमानीयचकारकरदान्पुन । यथापूर्वमहाभागमहाभाग्योनरेश्वर ॥२० धुतयो करयोज्ञ यतस्तस्यारिदाहदम् । वलकरन्धमस्तस्मात्सबलाश्वोऽभिधीयते ॥२१ सधर्मात्मामहात्माचसमैत्र सर्वजन्तुषु । क्रन्धमोऽभवद्भपस्त्रिपुलोकेपुविश्वत ॥२२ सम्प्राप्तस्यारामातिददावरिविनाशनम् । वलन्धर्मेणचाक्षिप्तमभ्युपेत्यस्वयनृपम् ।।२३ नगर के घिर जाने से बलाश्व को बडा क्रोध हुआ, परतु वह अल्पकोप और अल्प दण्ड व्यवस्था वाले होने के कारण १५॥ रक्षा का कोई अन्य उपाय न देखकर अत्यन्त व्याकुलता पूर्वक मुख को दोनो हाथो से ढक कर दीर्घ नि श्वास छोडने लगे ॥१६॥ ऐसा करने से उनके मुख की वायु ही सैकडो योद्धा, ग्थ, हाथी और अश्व निक्ल पडे ॥१७॥ हे मुने । क्षण भर म ही इस प्रकार अत्यन्त बल युक्त सनाप्रो के द्वारा राजा बलाश्व का सम्पूर्ण नगर व्याप्त होगया ॥१८|| तब उन राजा बलाश्व ने अपनी उस महान् सेना के सहित नगर से बाहर आकर युद्ध किया और शत्रुनो पर विजय प्राप्त को ॥१६॥ पोर उन सबको अपने अधीन करके उन्हे पुन करदाता बनाया, इस प्रकार वह पुन सौभाग्यशाली हुए ॥२०॥ वलाश्व के दांपते हाथों से जो सेना उत्पन्न हुई उसके कारण राजा बलाश्व को प्रमिद्धि 'करल्यम' नाम से हुई ।२१॥ परन्धम त्रैलोक्य मे प्रमिद्ध, धर्मात्मा तथा सब प्राणियो के प्रति सख्य भाव वाले थे ॥२२॥ वह राजा स्वय बल प्राप्त करके परम प्रात्त हुए प्राणियों के रात्रो या दुखो का नाश करने वाले हुए ॥२३॥ के साथ

| मावएडेय पुराण
१०६-अवीक्षित चरित्र (१)
वीय्यंचन्द्रसुतासुभ्र वीरानामशुभवता ।
स्वयवरेसाजगृहेमहाराजकरन्धमम् ॥१
तस्यापुनसराजेन्द्रोजनयामासवीर्यवान् ।
अविक्षितमितिख्यातिमुपेतजगतीतले ॥र
जातेतस्मिन्सुतेराजासदेवज्ञानपृच्छत ।
कच्चि प्रशस्तनक्षनेशस्तलग्नेसुतोमम ॥३
कच्चिच्चालोकितजन्मममपुत्रस्यक्षोभने ।
ग्रहै कच्चिन्नदुष्टानाग्रहाणाक्पथगतम् ॥४
इत्युक्तास्तेनदैवज्ञास्तमूचुनृपतितत ।
शस्तेमुहूर्तेनक्षत्रेलग्नेचवसुतस्तव ।।५
समुत्पन्नामहावीर्योमहाभागोमहाबल ।
भविष्यतिमहाराजमहाराजस्तवात्मज ॥६
अवैक्षतेमदेवानागुरु शुक्रश्चसप्तम ।
सोमश्चतुर्थ स्तनयतवैनसमवक्षत ।।७
उपान्तसस्थितश्च वसोमपुत्रोप्यवक्षत ।
नावेक्षतेमसवितानभौमोनशनैश्चर ॥
मार्कण्डेय जी ने कहा--महाराज करन्वम ने स्वयवर मे वीर्यचन्द्र नरेश
को फन्या शुभता वीरा का पाणिग्रहण किया था। वीरा के गर्भ से महाराज
परन्धम के एक पुत्र रत्न उत्पन्न हुप्रा जिसका प्रवीक्षित माम लोक में प्रसिद्ध
है। उसमें जन्म लेने पर राजा ने ज्योतिपियो को बुलाकर कहा कि मेरे
प्रशस्त लग्न और शुभ नक्षत्र मे तो जन्म लिया है ? इसके लग्न स्थान में शुभ
ग्रहो की दृष्टि है । किमी दुष्ट ग्रह को ष्टि तो नही पड़ी ? राजा के प्रश्न सुनार
ज्योतिषियो ने गणना करके बतलाया कि 'महाराज उत्तम मुहूर्त, शुभ नक्षत्र
मौर थेट लग्न में उत्पन्न हुमा है । इसलिय बडे भाग्यशाली, बडे पराक्रमी,
मसीम पाक्तिशाली नृपति होंगे। इनकी पुण्डली मे वृहस्पति तथा शुत्र सप्तम
-

प्रवीक्षित चरित (१) ] हैं और सरम पर पर देखते हैं । चौथे घर को चन्द्रमा देख रहा है और ग्या- रहवें पर बुध की दृष्टि है । रवि मंगल तथा दशनिश्चर जैसे क्रूर ग्रहो की दृष्टि नहीं है ।।१-८॥ तवपुत्रमहाराजधन्योऽयतनयस्तव । सर्वकल्याणसम्पत्तिसमवेतोभविष्यति । इतिदेवज्ञवचननिशम्यवसुधाधिपः । हर्षपूर्णमना प्राहनिजस्थानगतस्तदा १० अवक्षतेमदेवानागुरुःसोम सितोयुध । नावक्षतनमादित्योनार्कसूनुर्नभूमिज ॥११ अवेक्षतेतियत्प्रोक्त भवद्भिवहुमोवचः । अविक्षितेतितेनास्यख्यातनामभविष्यति ॥१२ अविक्षित सुतस्तस्यवेदवेदाङ्गपारग । अस्त्रनाममशेपंसकरवपुत्रादथाग्रहीत् ॥१३ सरूपेणातिभिपजोदेवानापार्थिवात्मज.। बुद्धयावाचस्पतिकान्याशशाङ्क तेजसारविम् ।।१४ धेर्येणाधितथोचिसहिष्णुत्वेनवीयवान् । शौर्यगतसमस्तस्यकश्चिदासोन्महात्मनः ।।१५ इसलिये महाराज आपके पुत्र बड़े मान्य, भाग्यवान् और वैभवशाली होंगे। यह सुनकर राजा प्रसन्न होकर कहने लगे कि आपके कथनानुसार 'वृह- स्पति और बुध पुत्र को अवलोकन करते हैं, पर रवि मगल, शनि की इन पर दृष्टि नहीं है। आपने बार-बार 'अवक्षत' शब्द रहा है, इसलिये इसका नाम अवीक्षित रख दिया जाप । माण्डेय जी बोले---बडा होने पर राजकुमार अवीक्षित ने वेद-वेदाग को शिक्षा प्राप्त करके करावपुत्र से अन्त्र विद्या का पूर्ण रूप से अभ्यास किया । यह राजपुर परम रूपवान्, दुद्धिमार. कानिमान और तेजस्वी या । वह समुद्र के समान पर्यशाली और पृथ्वी के यभान सहिष्णु भी था । उस समय उसो तुनना का कोई और व्यक्ति नहीं मिलता था 11-२५॥

३७० ]
[ मार्कण्डेय पुराण
स्वयवरेतजगृहेहेमधर्मात्मजावरा।
सुदेवतनयागौरीसुभद्रावलिन.सुता ॥१६
लीलावतीतीरसुतावीरभद्रसुतानिभा।
भीमात्मजामान्यवतीदम्भपुत्रीकुमुद्वती ।।१७
याश्च ननाभिनन्दन्तिस्वयवरकृतक्षणा ।
ताश्चापिसवलाद्वीरोजग्राहनृपते सुत ।।१८
निराकृत्यनृपान्सर्वांस्तासापितृकुलानिच ।
स्वयहिवीर्यमाश्रित्यबलवान्सबलोद्धतः ॥१६
एकदातुविशालस्यविशालाधिपते सुताम् ।
वशालिनीससुदतीस्वयवरकृतक्षणाम् ।।२०
परिभूयाखिलान्भूपान्स्वेच्छयानवृतस्तया ।
वलाज्जग्राह धिप्रयथान्यावलगीवत ॥२१
धर्म की कन्या वरा, सुदेव की कन्या गौरी, बलि की पुत्री सुभद्रा,
धीरभद्र की निभा, वीर-पत्री लीलावती, भीम पुत्री मान्यवतो ने उन्हे स्वयवर
में वरण किया था। और भी अनेक कन्यानो को, जिन्होंने उनको वरण नहीं
पिया या वह दाक्ति से ग्रहण करके ले प्राये थे। एकबार विशाल राजा की
कन्या मुदती न स्वयंवर मे उनको वरण नहीं किया । इस पर उन्होने बल के
गर्व से सब राजामो को पराजित कर उस भी अन्य कन्याओ की भांति बल.
पूर्वत्र प्रहण विया ॥१६-२१।।
ततम्तेभूभृत सर्वेयहुमस्तेनमानिना।
निराकृता.सुनिविण्णा प्रोग्रन्योन्यमायुला ॥२२
क्षमतावचनामनामेस्माद्वरागालिनाम् ।
बहूनामेव वर्णानाजन्मधिग्योमहीभृताम् ।।२३
क्षत्रियोय क्षतात्यारावघ्यमानस्यदुर्मदै ।
परोतितस्पतानामर्थवान्येहि विप्रति ॥२४
मात्मनोपिक्षतगारणदुष्टास्मादपंताम् ।
भवताक्षत्रियकुलेजातानापोशोगनि ॥२५

वीक्षित चरित्र (१) ] [ ३७१ उच्चार्यतेस्तुतिर्यावःमूतमागघबन्दिभिः । सामत्यामावृथावीराभवत्वरिविनागनात् ।।२६ चरतामातथवैपाभूपाचारदिगन्तरे । पौरुपायिण मविशिष्टकुलसम्भवा ॥२७ विभेतिकोनमरणात्कोयुद्ध नविनाऽमर । विचिन्त्यतनहातव्यपौरुपशस्त्रवृत्तिभि ॥२८ एतन्निराम्यतेभूपाविस्पष्टामर्पपूरिता. । उनु परस्परसर्वसमुत्तस्युश्वनायुधाः ॥२६ चिद्रयानारुरहु केचिन्नागास्तयाह्यान् । अन्येऽमपंपराधोनास्तमुपेता पदातय ॥३० इम पर वे राजा बारम्बार पराजय होने से दुखी होकर परस्पर रहने सगे कि इतने राजामो के इस स्थान पर एकत्रित होने पर भी इस प्रोले ने वलपूर्वक इस कन्या को ग्रहण कर लिया मौर तुम सब देखते रह गये यह घिकारन योग्य बात है । दुर्मद मनुष्य के प्राघात करने पर भी अन्य की रक्षा- रूप तंटा पालन में तत्पर रहता है वही दास्तविक दानिय है अन्यथा क्षत्रिय मा नाम धारण करना व्यर्थ है। २२-२४।। पर तुमतो दूसरे को क्या अपनी रक्षा का उद्योग भी नही कर पाते । क्षत्रिय बलाने पर भी यह तुम्हारी कमी बुद्धि है ? मूत, मागय,वन्दीगण तुम्हारी शूर वीरता को जो प्रशसा करते हैं ने ममत्व सिद्ध मत करो वरन् शत्रु का परामर परपे उसे यथार्थ सिद्ध कर दिपलामो तुम समार मे 'भूग' के नाम से प्रसिद्ध हो इमे वृथा मत होने दो। तुम सबने श्रेष्ठ पुती में जन्म लिया है पौर तुम सभी वीरता पोर पगरम में प्रनिद हो ॥२१-२॥ वोर पुरण मृत्यु का भय क्व करते हैं मोर पुर मे विमुर होन वाला कौन प्रमर होता है ? इन सब बातो पर विचार कर क्षत्रिय नाम- पारी को कभी पोप का त्याग नहीं परना चाहिये । ऐने उत्तेजना पूरा वचनो को मुनार राजागण घोष से मर गरे पोर पापा में उत्साह्मगं यातिाप परे हरिपार लेकर तैयार होगये। कोई रय पर, कोई हायो पर, कोई घो? पर गदार होगये और कोई नही पोभिन दे ममोर माये ॥२८.३०॥ -

३७२ ]
[ माकण्डेय पुराण
११०-~प्रवीक्षित चरित्र (२)
इतिसग्रामसज्जास्ते भूपाभूपसुतस्तथा ।
निराकृता सुबहुशस्तत्कालश्चाप्यविक्षिता ॥१
ततोबभूवसग्रामस्तस्यतै सहदारुण ।
एकस्यवहुभिभू पेभूपपुत्रवरमुने ॥२
तेऽसिशक्तिगदाबाणपाग्गयस्तसुदुर्मदा ।
अभिनन्तोयुयुधिरेते समस्तैरसावपि ।।३
सताञ्छरशतरुग्रं विभेदनृपनन्दन ।
कृतास्त्रोबलवान्वारस्तेचत विभिदु शितै ।।४
कस्यशिञ्चिच्छिदेबाहुमन्यस्यचशिरोधराम् ।
दृदिविव्यायचैवान्यवक्षस्यताडयत् ॥५
करञ्चिच्छेदकरिणस्तुरगस्यतथाशिर ।
रथस्येपान्तथैवाश्वाबथस्यान्यस्यसारथिम् ॥६
बाणानापततश्चके द्विधाबारणस्तथा द्विपाम् ।
चिच्छेदान्यस्गखङ्गश्चधनुरन्यस्यलाघवात् ।।७
सनुनेपहृतेतेनननाशान्योनृपात्मज ।
अविक्षिताहतश्चान्य पदाति प्रजहौरणम् ।।
मार्कण्डेय जी कहने लगे-उस अवसर पर प्रवीक्षित द्वारा पराजित
हुए वे कितने ही राजा एक साथ मिल कर भयकर सग्राम करने लगे। वे
खमा शक्ति, गदा, बाणो प्रादि से प्राघात करने लगे और वीक्षित भी मवेला
ही उनके साय युद्ध करने लगा। प्रसिद्धवीर नन्दन ने सैकडो वाणो से प्रवीक्षित
पर भाघात किया और उसने तीक्ष्ण वाणो से उनको विद्ध दिया। प्रवीक्षित
ने किसी की भुजा, किसी का मस्त क काट दिया और किसी का हृदय छेदकर
पासी पर प्राधान किया। किसी के हाथी की सूड काट डाली, किसी का
पोहा मार दिया किसी के रथ के सारथी को मार दिया। उन्होंने शत्रुमो में

प्रदक्षित चरित्र (२)]
दात-रात वारणो को बीच में ही दो सएड करके गिरादिया, किसी के खङ्ग मोर
क्सिी का घनुप काट डाला कोई वीर क्वच के क्ट जाने में मारा गया और
पोई पैदल युद्ध करने वाला घायल होर युद्ध क्षेत्र से हट गया ॥१-।।
इत्याकुलीकृतेनस्मिन्समग्रेराजमण्डले ।
तस्थु.मप्तशतवीरामरणेकृतनिश्चयाः IME
आभिजात्यवय शौर्यलज्जाभारसमन्विता ।
निजितेमक्लेसैन्येपलायनपरायणे ॥१०
तै समेत्यमहोपाल सतुपुनोमहीभृत
युयुधेधर्मयुद्धनतेनतनातिकोपित ॥११
विच्छिन्नयनकवचान्सतानपिमहावल ।
क्त व्यवस्थितस्तेचततक्रद्धा महामुने ॥१२
धर्ममुत्सृज्ययुयुधुयुध्यमानेनवर्मत ।
नरेन्द्रपुत्रा प्रम्वेदजलविलनानना ममम् ॥१३
विव्यापकश्चिद्वारणोघं कश्चिच्छेदकामुकम् ।
ध्वजमस्यापरोवारणविद्वत्वाभूमावपातयत् ॥१४
जघ्नुग्न्येतथैवाश्वान्वभञ्जुनापरेरथम् ।
गदापातेनायचान्येवारण पृष्टमताडयन् ।।१५
जब प्रवीक्षित ने इस तरह ममम्त गजानो को व्याकुल कर दिया और
उनकी मंना भाग ने लगी तो मान सौ वीर अपने वदा, कोनि और धीरता का
विगार परसे मरने का भर त्याग कर पुट में तदए । प्रवीक्षित भी
पत्पन्न प्रोधित हो उन माय धर्म युद्ध कान ला।
जब वह उन पत्रों
बोर कवच पाहि पाटने ला, तद, द पमीन में लथपय राजा गरा धर्म विरन
माप मिलकर उन पर अम्बा वा पाघात करने लगे। शिमी ने आगेर में बाग
मारे, रियो ने धनुष को तोड़ दिपा, स्मिी ने घना को काट अना, रिमी
ने घोड़ों को मार दिया, रिमी से रथ पो तोहा किमी ने पीछे से मात्र का
पापात रिया-१

३७४ ]
[ मावंगडेय पुराण
छिन्नेधनुषिसक्रोध सतदानृपते सुत.।
जनाहासितयाचमतदप्यन्योन्य पातयत् ।।१६
च्छिन्नासि-चजिग्राहसगदागदिनावरः ।
तामप्यन्य क्षुरप्रेरणचिच्छेदकृतहरतवत् ।।१७
अन्येशरमहस्र गशतेनान्येनराधिपाः ।
विव्यधु कोष्टकोकृत्यधर्मयुद्धपराड मुखा. ॥१८
सविह्वल पपातोयामकोबहूभिरदित.।
राजपुत्रामहाभागाववन्धुस्तेचततत. ॥१६
तमधर्मेणतेसर्वगृहीत्वानृपतेःसुतम् ।
विशालेनसमराज्ञावैदिश विवशु.पुरम् !।२०
त्दृष्टा प्रमुदिताबद्ध समादायनृपात्मजम् ।
स्वयवराचमाकन्यान्यस्तातेनतत पुरः ॥२१
धनुष के कट जाने पर क्रोधित होकर अवीक्षित ढाल तलवार लेकर
युद्ध करने लगा, पर एक अन्य वीर ने उसे भी काट गिराया ।
लेकर सग्राम मे प्रवृत्त हुआ तो एक अन्य ने गदा को भी काट दिया। इसके
पश्चात् उन धर्म विमुख राजानो ने उस शस्त्रहीन को घेर कर हजारो और
सकडो वाल मारे । उनसे विद्ध होकर जब वह व्याकुल होकर गिर गया तव
सब ने मिल कर उसे वाध लिया ग्रोर -- र विशाल राजा के नगर
वैदिलपुर मे उपस्थित हुए और वन्धनयुक्ती प्रवीक्षित
शाल
नप के सामने खडा किया ॥१६-२१॥
इस पर गदा
.

[
३७५
प्रतीक्षित चरिम (२) ]
इतिपृष्टोनरेन्द्ररणमदं वज्ञोविमृश्यतत् ।
दुर्मनाःप्राहविज्ञातपरमार्थीमहीपतिम् ।।२५
भविष्यन्त्यपराणीहदिनानिपृथिवीपते।
प्रशस्तलग्नयुक्तानिशोभनान्यचिरेणवे ॥२६।।
करिष्यसिविवाहत्वतेपुप्राप्त पुमानद ।
अलमेतेनयत्रायमहाविघ्न उपस्थितः ।।२७
तत्पश्चात् राजा और पुरोहितो ने उस स्वयवरा पन्या से कहा विवाह
इन राजामों में से जिसे उचिन समझे वरण करे पर उसने किसी को भी वर
रूप मे स्वीकार नहीं किया । तब राजा ने इस मम्बन्ध में ज्योतिपियो की
सम्मति मागी। उन्होंने कहा कि ग्राज तो स्वयंदर पर यह विघ्नकारी युद्ध
उपस्थित होगया, इममे अब ग्राप विवाह का कोई अन्य शुभ मुहूर्त वतलावें।
राजा के इस प्रकार पूछने पर ज्योलिपी उम सम्बन्ध में विचार करने लगे और
कुछ देर बाद उन्होंने कहा- हे महाराज आपकी कन्या के विवाह के उपयुक्त
अच्छी लग्न वाला और शुभ दिन शीघ्र हो पायेगा। उसी दिन आप विवाह
की समुचित व्यवस्था करें प्राज तो इसमें जो यह महाविघ्न पट गया इसलिये
इस कार्य को म्यगिन कर देना ही उचित है ।।२२-२७॥
१११ ---अधीनित चरित्र (३)
तनःशुधावतवद्धतनयमकरन्धमः ।
तम्यपत्लीतथावीरानन्ये चापिमहीभृतः ॥१
तमधर्मगतनयंबद्धथु त्वामहीपति ।
सामन्तै. पृथिवीपालचिरन्दच्यौमहामुने । २
केचिदूवुमहीपालावच्या मर्वेमहीभृतः
यरेक.मयुगेबद्ध ममस्तस्तरधर्मतः ॥३
युज्यतावाहिनोगीघ्रमूचुरन्ये किमास्यते ।
विगालोवध्यतांदुष्टस्तमयेऽन्येसमागता. 18

[ माएडेय पुराण
छिन्नेधनुषिसक्रोध सतदानृपते सुत ।
जग्राहासितथाचर्मतदप्यन्यान्यातयत् ।।१६
च्छिन्नासि चर्माजग्राहसगदागदिनावर ।
तामप्यन्य क्षुरप्रेणचिच्छेदकृतहत्तवत् ।।१७
अन्येशरमहस्रगशतेनान्येनराधिपा ।
विव्यधु कोष्टकीकृत्यधर्मयुद्धपराडूमुखा ।।१८
सविह्वल पपातोयामकोवहूभिदित ।
राजपुनामहाभागाववन्धुस्तेचततत ॥१६
तमधर्मेणतेसर्वेगृहीत्वानृपते सुतम् ।
विशालेनसम राज्ञावैदिश विवशु पुरम् ।।२०
दृष्टा प्रमुदिताबद्ध समादायनृपात्मजम् ।
स्वयबराचमाकन्यान्यस्तातेनतत पुर ॥२१
धनुप के कट जान पर क्रोधित होकर अवोक्षित ढाल तलवार लेकर
युद्ध करने लगा, पर एक अन्य वीर ने उसे भी काट गिराया। इस पर गदा
लेकर सग्राम मे प्रवृत्त हुआ तो एक अन्य ने गदा को भी काट दिया। इसके
पश्चात् उन धम विमुख राजानो ने उस शस्त्रहीन को घेर कर हजारो पौर
सैक्डा वाण मारे। उनसे विद्ध हाकर जब वह व्याकुल होकर गिर गया तव
राब ने मिल कर उसे बाध लिया और उसे लेकर विशाल राजा व नगर
वंदिलपुर म उपस्थित हुए और धनयुक्त राजकुमार प्रवीक्षित को विशाल
नुप के सामने खडा किया ।।१६-२१।।
पुन पुनश्चापत्रोक्तातथापिचपुरोधसा ।
पालम्यता मतिवरायस्तेराजसुरोचते ।।२२
यदामामानिनीसश्चिनजग्राहवरमुने ।
तदापप्रच्छदं वज्ञ रियाहार्थनरेश्वर ॥२३
विशिष्टा'मेतस्याविवाहायग्निवद ।
गद्य तदीयराजातयुद्ध विघ्नोपपादयम् ॥२४
।

३७५ प्रीक्षित चरिन (२) ] इतिपृष्टोनरेन्द्र सदैवज्ञोविमृश्यतत् । दुर्मनाःप्राहविज्ञातपरमार्थोमहीपतिम् ॥२५ भविप्यन्त्यपराणीहदिनानिपृथिवीपते। प्रगस्तलग्नयुक्तानिशोभनान्यचिरेणवे ॥२६॥ करिष्यसिविवाहत्वतेपुप्राप्त पुमानद अलमेतेनयनायमहाविघ्न उपस्थितः ।।२७ तत्पश्चात् राजा और पुरोहितो ने उस स्वयवरा कन्या से कहा विवाह इन राजाम्रो में से जिसे उचित समझे वरण करे पर उसने विमी को भी वर रूप मे स्वीकार नही दिया । तव राजा ने इस सम्बन्ध में ज्योतिपियो की सम्मति मागी। उन्होंने कहा कि प्राज तो स्वयंवर पर यह विघ्नकारी युद्ध उपस्थित होगया, इससे अब पाप विवाह का कोई अन्य शुम मुहूर्त वतलावें। राजा के इस प्रकार पूछने पर ज्योतिपो उस मम्बन्ध मे विचार करने लगे और कुछ देर बाद उन्होने कहा-हे महाराज आपकी कन्या के विवाह के उपयुक्त अच्छी लग्न गला और शुभ दिन शीघ्र हो पायेगा। उसो दिन आप विवाह को समुचित व्यवस्था करें प्राज तो इसमे जो यह महाविघ्न पट गया इमलिये इस कार्य को स्थगित कर देना ही उचित है ।।२२-२७॥ १११-प्रवीक्षित चरित्र (३) ततःशुथावतवद्धतनयसकरन्धमः । तम्यपत्नीतथावीराप्रन्येचापिमहीभृत ॥१ तमधरणतनयंबद्धंथ त्वामहीपति । सागन्त. पृथिवीपालचिरन्दच्योमहामुने । २ फेचिदू वुर्महीपालावच्या.ममहीभृतः । यरेक.सयुगेवद्ध समस्तस्तरधर्मत. ॥३ युज्यतावाहिनीगोत्रमूचुरन्येकिगास्यते । विज्ञानोबध्यतांदुष्टस्तरयेऽन्येसमागता. 1॥४ .

३७६ ]
[ मार एडेय पुराण
प्रत्येतयोचुर्धर्मोऽप्रत्यक्त.पूर्वमहीक्षिता ।
अन्यायेनबलायनगृहीतातमवाछती ।।५
स्वयवरेवशेपेपुतेनराजसुतास्तदा ।
खिलीकृतास्तत.सर्वेसमेत्यसवशीकृत. ॥६
मापण्डेयजो कहने लगे-जब राजवुमार प्रवीक्षित ये बाध लिये जाने
का समाचार महाराज कर-धम और राजमहिपी वीरा को मिला तो वे बहुत
चिन्तित होकर अपने सामन्तो और ममियो से सलाह करने लगे। किसी ने
कहा कि जिन बहुत से राजानो ने मिलकर प्रवेले वीर को अधर्म युद्ध में
पराजित करके बांध लिया है वे सव मार देने योग्य हैं। दूसरे ने सम्मति दी
कि अब निश्चित क्यो बैठे हो, अव तुरन्त विशाल राज और वहाँ एकत्रित
अन्य राजानो पर आक्रमण करके उन सब को बांध लेना चाहिये । किसी किसी
यह भी कहा कि इस अवसर पर राजकुमार ने भी वरण करने को अनिच्छुक
राज-कन्या को बलपूर्वक ग्रहण करके धम विरुद्ध कार्य किया है। उन्होंने पहले
भी कई स्वघरो म ऐसा ही कार्य कर के अन्य राजपुत्रो से शत्रुता मौन ले ली
है और इसी कारण उन सब ने मिल कर र हे पराजित किया है ।।१-६।।
तेषामेतद्वच.थ त्वावीरावीरप्रजावती।
वीरगोत्रसमुद्भ तावीरपत्नीप्रर्षिता ॥७
उवाचभर्तु प्रत्यक्षमन्येषाचमहीक्षिताम् ।
भद्र कृतभद्रभुजाममपुत्रेणपार्थिवा ॥८
गृहीतायद्वलात्कन्याजित्वासर्वमहीक्षित ।
तदर्थयुध्यमानोऽयवद्धएकोनधर्मतः ।।
तदप्यस्मत्सुतस्याजोमन्येनापचयदप्रदम् ।
एतदेवहिपौरुष्ययदमर्पवशान्नर ।।१०
नीतिनगणयत्येव जिघासुरिवकेसरी।
स्वयवरायविन्यस्ताममपुत्रेणकन्यका ॥११
वह्वयोगृहीताभूपानापश्यतामति मानिनाम् ।
क्वक्ष नियकलेजन्मक्वयाचाहीनसेविता ॥१२

भवोक्षित चरित्र (३) ] [ ३७७ वलादेवसमादत्तक्षत्रियोवलिनांपुरः। लोहशृड खलवद्धावानवशयान्तिकातरा ॥१३ प्रसह्यकारिणोयान्तिराजानोधर्मशालिन । तदलन्दोमनस्येनरलाध्यमेवास्यवन्धनम् ।।१४ इस प्रकार की वात सुन कर प्रवीक्षित की माता दीर वशीय वीरा देवी बहुन प्रसन्न हो कर महाराज काधम तथा अन्य मामन्तों के सामने कहने लगी कि मेरे पुत्र ने यदि सब राजामो को हरा कर कन्या को बल पूर्वक ग्रहण किया तो यह कार्य प्रशसा योग्य हो है । इसके फलस्वरूप वह अधमंयुद्ध में बांध लिया गया तो इसमे भी मेरी सम्मति में उसकी कोई हानि नहीं हुई। पुरपार्थो का तो यही तंव्य है कि वह अधर्म से मार ने की इच्छा रखने वाली से भी भयभीत न हो और सिंह के समान सब का मुकाबला करता रहे। अगर मेरे पुत्र ने अनेक स्वयवरो में सम्मानित राजागणो के सम्मुख कयामों को बलपूर्वक ग्रहण किया तो इसे भी मैं क्षत्रियोचित कार्य हो मानती हू । तुच्छ व्यक्तियों के समान किसी वस्तु को मांगने की अपेक्षा उसे पौर शक्ति प्रक्ट करके ग्रहण करना श्लाघनीय ही है। क्षत्रियो को शोमा तो इसी में है कि वह बलवानो के सम्मुख भी अपना पराक्रम दिखलाकर वल- पूर्वक ग्रहण करे इस प्रकार के कार्य में मगर जजीर से बांध भी लिया जाय, तो भी वह भयभीत होकर किसी को वश्यता स्वीकार नहीं करता। यदि मनुप्प निडर हो कर पूर्ण दिखलाने के बाद इन्धन प्रस्त भी हो जाय तो मैं इसमें कोई दुगई नही समझती, वरन् मैं तो ऐसो पराजय को भी प्रशमा का कारण मानती हूँ ॥७-१४|| युप्माक्मपियेपूर्वकृत्वारीणानिपातनम् । रहत्ववपृथिवीशानापृथ्वीपुत्रादिक्वसु ॥१५ भाावीर्य निमित्तानिततोयातातिगौरवम् ॥ तत्त्वय्यंतारणायागुम्यन्दनान्यधिरोहत ॥१६ सज्जीकुरुतनागाश्वमचिरेणससारथिम् । मन्यक्मिहीपालवंहुभि सहविग्रहम् ॥१७

| माईण्डेय पुराण
प्रगूताएवतोपायशू स्याल्ल गोक्रिया ।
कस्यनाल्पेषुसामर्थ्य नरेन्द्रादिपुजायते ॥१८
येभ्योनविद्य तेभीति विक्रातस्यापिशग्रुप।
व्यरोचतेनिशूरःसतमासीवदिवाकर IITE
दत्यमुद्धपितोराजाऽनयापल्याकरन्धमः ।
चकारसवलोद्योगहन्तुपुत्राहितान्मुने ।।२०
ततस्तस्यसमभूविशालेनचसङ्गरः ।
बभूवबद्धपुत्रस्यतरोपमहामुने ॥२१
वीरा ने कहा कि आपके पूर्वजो ने भी इसी प्रकार शत्रुओ पर विजय
प्राप्त कर उनके राज्य, योप और पुत्र प्रादि पर अधिकार किया था। राजा
लोग पृथ्वी धन, भार्या प्रादि समानता वालो से ही छीन कर इवट्ठी करते हैं
और उसके लिये प्राघात राहना भी श्लाघनीय मानते है। इसलिये प्राप शीघ्र
रथ, हाथी, घोडो को सजाकर युद्ध के लिये तैयार हो। वीरगरण छोटे युद्ध
भी अपनी पूरी वीरता दिखला कर गौरव प्राप्त करते हैं। तो फिर ऐसे
स मान्य राजानो पर आक्रमण करने में आप लोगो को क्या भय हो सकता
है ? सूर्य जिस प्रकार समस्त दिशामो के अन्धकार को नष्ट कर देता है, उसी
प्रकार जो शूरवीर हर प्रकार के शत्रु को पराजित करने के लिये तैयार
रहता है, वही सच्चा बहादुर है। माईण्डे जी ने कहा कि राज महिपी
द्वारा इस प्रकार उत्साह और प्रेरणा दिलाये जाने पर महाराज करन्धम
तुरन्त पुत्र के शत्रुप्रो पर आक्रमण करने को रवाना हो गये और शीघ्र ही
विशाल राजा नगर के समीप पहुच कर वहाँ एकनिष सब राजाम्रो से करने
लगे ॥१५-२१॥
दिनत्रयमभूयुद्ध तेनराशासमतदा ।
करन्धमेनभूपानाविश लस्यानुकुर्वताम् ।।२२
यदापराजितप्रायतत्सर्वभूगमण्डलम् ।
तदाविशालोऽयकर करन्धममुपस्थितः ।।२३

प्रवीक्षित चरिन (३)
[ ३७६
करघमोऽपिसप्रीत्यातेनराज्ञाभिपूजित ।
विमुक्त तनयेतननिशातासुखमावसत् ॥२४
ताचकन्यामुपादायविशालसमुपस्थितम् ।
अविक्षिप्राहविप्र विवाहार्थपितु पुर ॥२५
नाहमेताग्रहीष्यामिनचान्यायोपितनृप ।
परैर्यस्यानिरीक्षन्त्या सग्रामेऽहपराजित !॥२६
अन्यस्मैसप्रयच्छेमामियञ्चान्यवृणोतुतम् ।
अखण्डितयशोवीर्योय पर पमानित ॥२७
विशाल राजा तथा उसके सायो राजानो से करन्धम का युद्ध तीन दिन
तक चलता रहा और अन्न म वे सब पूर्णत पराजित होगये। तब विशालराज
पूजा सामग्री लेकर करन्धम के सामने उपस्थित हुए । करन्धम ने इस पर शत्रु-
भाव त्याग दिया और राजा द्वारा पूजित होकर तया पुत्र को छुडा कर उस
दिन वही ठहरे । जव विशालराज प्रपनी कन्या का विवाह प्रवीक्षित से करने
को प्रस्तुत हुए तो उसने इसे अस्वीकार कर दिया और पिता के सामने ही कहा
कि-हे महाराज । जिस कन्या के सामने मैं शो से परास्त होगया उसको
तो कभी ग्रहण कर ही नही सकता, साथ ही अब किसी अन्य क्न्या से भी
विवाह नहीं करूंगा । माप इसका विवाह क्मिी ऐसे वीर से कीजिये जो कभी
शत्रपों से पराजित न हुमा हो और जिसका या प्रसडित बना हो ।।२२-२७॥
पर पराजितोऽयत्कातरेययथाऽवला ।
मित्रमानुपत्वमेनेतस्याममचान्तरम् ॥२८
स्वतन्त्रतामनुष्याणांपरतलामदाश्वला।
नरोऽपिपरतन्त्रीयस्तस्यकोड्मनुप्यता ॥२६
सोऽहमम्यामुखभूयोदृष्ट दर्शयिताकथम् ।
गेऽहमस्या पुरोभूमौपरभू प खिलीकृतः ।।३०
इत्युक्त तेनतनयामुवाचजगतीपति ।
यु ततेवचनवत्सेवदतोऽस्यमहात्मन ॥३१

- ३८ । [ माकरहेग पुण वयवासप्रयच्छामोयस्मिस्तस्मिस्तवादति । एतयोंह्ययमातिष्ठमागंयो रुचिरानने ॥३२ पराजितोऽयबहुभिनसम्यासम्यगाचरन् । समामेतद्यशोवीयंहानिकारिनपार्थिव ॥३३ एकोबहूनांयुद्धायगजानामिवकेसरी । यत्सस्थित परशोर्यतेनास्यप्रकटीकृतम् ॥३४ न केवलमयतस्थौयुद्ध तेऽप्यखिलाजिताः । बहुशोऽनेनयत्नेनविक्रमोऽपिप्रकाशितः ॥३५ शौर्यविक्रमसयुक्तगिमसर्वमहीक्षित । धम्मयुद्धमधर्मेण जितवन्तोऽत्रकानपा ॥३६ अवीक्षित ने कहा-हे राजन् । जब मैं इसके सामने एक कातर. प्रबला के सामने शत्र प्रो द्वारा बन्धन ग्रस्त होगया तो मेरा पुरुषत्व हो क्या रहा। अतएव अब मुझ मे और इस कन्या मे कोई भेद नहीं रहा। पुरुष का मुख्य लक्षण तो स्वाधीन होना है और नारियां सदैव पराधीन मानी गई हैं। इस- लिये पुरुप होकर जो पराधीन होगया उपका पौरुप कहाँ रहा ? जिसके सामने मैं समस्त राजामो से पराजित झेगया हूँ उसको अपना मुंह किस साहस से दिखाऊंगा ? महीपाल विशाल ने प्रवीक्षित के वचन सुनकर कन्या से कहा कि तुमने राजकुमार की बात सुनलो । अब तुम्हारी इच्छा हो तो किमी भी, राजा को स्वेच्छा पूर्वक वरण करलो अन्यथा पिता के कर्तव्य का ध्यान रखता हुआ मैं जिसके योग्य समभूउसके साथ तुम्हारा पाणिग्रहण सत्कार कर दूं। इन दोनों बातो म से तुमको जो स्वीकार हो वह कहो।।२८-३२॥ या ने कहा- पिताजी' इन राजकुमार ने बहुत से वीरो के साथ संग्राम दिया और फिर भी पूर्णत पराजित नहीं हो सके । इन्होने जो अकले ही इतने, राजामा के साथ घोर युद्ध किया इससे ही इनका सर्वोकृष्ट शौर्य प्रकट होगया । केवल निर्भीक भाव स स्थित हो नहीं रहे वरन् समस्त राजामो को इन्होने अनेक बार गया भी। फिर इन धर्म युद्ध के नियम का पालन, करने वाले को अनेक - मे

प्रवीक्षित चरित्र (३) ।
राजापो ने मिलकर प्रथम युद्ध मे हराया, इसमे मुझे लज्जा को काई वान नहीं
जान पडती ॥३३-३६॥
नचापिरूपमावेहलोभमस्यगतापित ।
शौर्यविक्रमधारिणहरन्त्यस्यमनोमम ॥३७
तत्विमुक्त नबहुनायाच्यतामत्कृतेनृप ।
स्वयामहानुभावोऽयनान्योमेभवितापति ॥३८
राजपुत्रसुताप्राममंतच्छौभनवचः ।
एवषवत्वयातुल्य कुमारोनमहीतले ॥३६
अविसवादितेशीयंमतीवचपराक्रम ।
पावयास्मत्कुलवीर्रदुहितुर्मपरिग्रहात ॥४०
नाहमेताग्रहीप्यामिनचान्यायोपितनृप ।
आत्मन्येवहिमेबुद्धि स्त्रीमयीमनुजेश्वर ॥४१
ततःकरन्धम प्रापुत्रेयगृह्यतात्वया ।
विशालतनयासुभ्रूस्त्वयिहार्दवतीदृढम् ॥४२
नाज्ञाभन कदाचित्तकृत पूर्वमयाप्रभो।
तथाऽऽज्ञापयमातातयथाज्ञाकरवाणिते ॥४३
पन्या ने कहा-मैं इनके रूप को देखकर ही विवाहोचत नहीं हुई हूँ
परन् इनके शौर्य तथा पराक्रम ने मेरे मन मे धर कर लिया है। इसलिय
पिताजी ' पब मैं निश्चय कर चुकी हूँ कि इतके अतिरिक्त मैं कभी अन्य किसी
को वरण नहीं करूंगी। माप इनको ही मेरे लिये समझाइये। इस पर राजा
विशाल न भवीक्षित से कहा--राजकुमार । मेरो कन्या ने जा पुष कहा वह
बिल्कुल ठोक ही है। तुम्हारे समान राजकुमार मुझे कही भी दृष्टिगोचर नहीं
होता । तुम्हारी वीरता मे कुछ भी सन्देह नही पोर तुम्हारा पराक्रम भी प्रत्यक्ष
ही है, इसलिये तुम्हारे द्वारा मेरी कन्या का पाणिग्रहण किये जाने से मेरा कुल
पवित्र हागा । यह सुनकर प्रवीक्षित ने कहा-"राजन् । अब मैं इस मयदा
तिमी भी अन्य स्त्री को ग्रहण नहीं करूंगा क्याकि मैं अब अपने का स्री ही
समझता हू।" तब महाराज रघम न भी अपने पुत्र को समझाया कि तुप

३८२ ।
[ मावंडेय पुराण
इस कन्या का पाणिग्रहण यगे, क्योकि इसको तुम्हारे प्रति हार्दिक अनुराग
उत्पन्न होगया है। प्रवीक्षित ने उत्तर दिया-पिताजी | मैंने माज तक कभी
आपकी आज्ञा का उल्लघन नहीं दिया । इसलिये पाप मुझे ऐमी कोई पाशा न
दें जिसे पालन करने में समर्थ न होऊ ॥३७-४३॥
अत्यन्तनिश्चितमतीतस्मिनाजसुतेसुताम् ।
तामुवाचविशालोऽपिव्याकुलीकृतमानस ॥४४
निवत्यंतामन पुत्रिएतस्माचप्रयोजनात् ।
अन्यवरयभरिसन्त्यनेकेनृपात्मजा ॥४५
वरवृणोम्यहतातमामेपयदिनेच्छति ।
तपसाऽन्योनमे भर्ताजन्मन्यस्मिन्भविष्यति ॥४६
तत कर धमोराजाविशालेनसममुदा ।
स्थित्वादिनत्रयतत्रनिजमभ्याययोपुरम् ॥४७
अविक्षितोपितेनंवपित्रान्यश्चनराधिप ।
निदर्शने पुरावृतं सान्त्वितोऽभ्यागमत्पुरम् ॥४८
जब विशाल राजा ने देखा कि अधीक्षित ने विवाह न करने का हर
निश्चय कर लिया है तो उसने अपनी पुत्री से कहा कि जब इस राजपुत्र की
ऐसी भावना होगई है तो अब तू इस विचार को त्याग कर किसी अन्य राजपुत्र
का वरण करले । कन्या ने उत्तर दिया-पिताजी । यदि ये राजपुत्र विवाहार्थी
नहीं होते तो मेरा निश्चय भी यही है कि इस जन्म मे मेरा पति तपस्या' के
अतिरिक्त और कोई न होगा। मार्कण्डेय जी कहने लगे-राजा करन्धम तीन
दिन तक विशाल राजा के यहाँ अतिथि सरकार ग्रहण करके भपनी राजरानी
को वापस चले गये और उनके तथा अन्य सामन्तो के समझाने से प्रवीक्षित
भी उनके साथ चले गये ।।४४.४८॥
सापिकन्यावनगत्वानिसृधानिजवान्धर्व ।
तपस्तेपेनिराहारावैराग्यपरमास्थिता ॥re
निराहारायदासातुमासत्रयमवस्थिता।
सप्रापपरमामातिकृशाधमनिसन्तता ॥५०
-

मोतिन चरित्र (३) ] मन्दोत्ताहातितन्दगीमुमूर्षुरपिवालिका । देहत्यागायमाचक्रेतदावुद्धिनृपात्मजा ॥५१ प्रात्मत्यागायताज्ञात्वाकृतवुद्धिसुरान्तत । समेत्यप्रेषयामासुर्देवदूतन्तदन्तिकम् ।।५२ समुपेत्यसताप्राहदूतोऽहपार्थिवात्मजे । प्रेपितस्निदशैस्तुभ्यमत्कार्यतन्निशामय ॥५३ नभवत्यापरित्याज्यशरीरमतिदुर्लभम् । खभविप्यसिकन्याणिजननीचक्रवर्तिन ॥५॥ पुणनमहाभागेभोक्तव्यानिहतारिणा । अव्याहताश नचिरसप्तद्वीपवतीमही ॥५५ हन्तव्यस्तैनतरुजिवानापुरतोरिपु. । थय मकुस्तथान रोधर्मेस्थाप्यास्तत प्रजा ॥५६ प रपालनीयमखिलचातुर्वण्यस्वधर्मतः । हन्तव्यादस्यवोम्लेच्छायेचान्येयुष्टचेष्टिता ॥५७ यष्टव्यविविधर्यन्नं समासवरदक्षिरण । वाजिमेधादिभिभद्रपटमस्र श्वसम्यया ॥५८ उघर वह विशाल राजा की कन्या भी परिवार वालों में विदा ले वन में निवास करती हुई बहे तपम-नियम के साय तपस्या करने लगी। इस प्रकार तीन महीने तक निराहार रहने से यह प्रत्यन दुईल होगई पोर उनके शरीर को नसें दिखलाई पडने लगी। अपने शरीर की ऐसी दशा देखकर उस कच्चा ने निराश हो प्राण त्याग का निश्चय यिा। बर देवनायो ने उमरी ऐमा कार्य करते देखा तो उन्होंने एक देवदूत उसके पास भेजा, जिसने उस तरोपन में पार कहा-हे राजकुमा। मैं देवनामों का दूत हूँ। उन्होंने कहलाया है कि यह दुतंम गरीर महल में नहीं मिलता तुम प्राण त्याग मत करो, तुम मागे चलकर एक चावी राजा की जननी बनोगी। हे महामागे । तुम्हारा पुत्र अपने बादल से ममस्त शत्रों पर विषय प्राप्त करके भने वर्षों तक समस्त पृनो का अधीश्वर बरा रहेगा । दर देवगतों के सर तरुविन् पोर

३८४ ]
[ मार्कण्डेय पुराण
अपशकु को भी मारकर उनका हितकारी होगा। वह प्रजा को धर्माचरण के
लिए प्रेरित करेगा, चातुर्वण्य धर्म को प्रतिष्ठित करेगा और म्लेच्छ, दस्यु आदि
दुष्टो को नष्ट करके प्रजा को सुखी करेगा । वह वडो दक्षिणा वाले अश्वमेध और
अन्य प्रकार के छ हजार यज्ञ करेगा ॥४६-५.८॥
तदृष्ट्वासातीरक्षस्थदिव्यस्रगनुलेपनम् ।
देवदूतमुवाचेदराजपुत्रीततोमृदु ॥५६
सत्यत्वमागत स्वर्गाद्दबदूतोनसशय ।
किन्तुभ विनापुत्र सकथमेमविष्यति ॥६०
अविक्षितमृतेभ ममनान्योऽत्रजन्मनि ।
भवितेतिप्रतिज्ञातमगतत्सन्निधौपितु ॥६१
सचनेच्छतिमाप्रोक्तोमरिपत्राजनकेनच ।
करन्धमेनाथसम्यग्याचितश्चमयातथा ॥६२
विमनेनमहाभागेबहुनोक्त'नतेसुत ।
समुत्पत्स्यतिमात्याक्षौस्त्वमात्मानमधर्मत ।।६३
नवकाननेतिष्ठतनु क्षीरणाचपोपय ।
तप प्रभावादेतत्तेसर्वसाधुभविष्यति ।।६३
इत्युक्त्वादेवदूतोऽसीयथागतमगन्छत ।
चकारानुदिनसुभ्र साप्यात्मतनुपोषणम् ॥६५
मार्कण्डेय जी कहने लगे--वह राज्य कन्या उस दिव्य विह्नों से युक्त
देवदूत को साकाश मे देखकर मीठी वाणी से कहने लगो-माप स्वर्ग के देव.
दूव हैं और इस कारण मापकी बात प्रसत्य नहीं हो सकतीं, पर पति के बिना
मेरे पुत्र किस प्रकार होगा ? मैंने यह प्रतिज्ञा की है कि प्रवीक्षित के अतिरिक्त
में किसो मौर को वरण नहीं करूंगी मोर उन्होंने मेरे पिता, अपने पिता तथा
मेरे अनुरोध को भी स्पष्टत अस्वीकार कर विवाह न करने का दृढ निश्चय
प्रपट दिया है । देवदूत ने कहा---देवगण का क्यन मन्यथा नहीं हो सकता,
निसन्देह तुमको पुत्र उत्पन्न होगा। इसलिये तुम इस आत्म-हत्या स्पो पाप के
विचार को त्याग कर इस धन में रहकर हो अपनी देह की रक्षा परो। तपस्या

अवीक्षित चरित्र (४) ]
[ ३६५
में प्रभाव से तुम्हारे सभी मनोरथ अवश्य पूर्ण होंगे। इस प्रकार विशाल राजा
की कन्या को समझा कर देवदूत अपने स्थान को चला गया और वह भी
माहार ग्रहण करक शरीर का पोपए करने लगी ॥५६-६||
११२-~अनीतित चरित्र (४)
प्रथसाऽविक्षितोमातावीरावीरप्रजावती।
पुण्येऽहनिसमाहूयपाहपुत्रमविक्षितम् ।।१
पुत्राहमभ्यनुज्ञातातपित्रामहात्मना ।
उपवासकरिष्यामिदुष्करोऽय किमिच्छकः ॥२
सचायत्तस्तवपितुस्त्वयासाध्योमयापिच ।
प्रतिज्ञातेत्वयापुत्रततस्तत्रयताम्यहम् ॥३
द्रव्यस्याद महाकाशात्तवदास्याम्यहपितु ।
धनतेपितुरायत्तमनुज्ञाताऽस्मितेनच 11४
क्लेशसाध्योमदात्त सहिथयोभविष्यति ।
साध्योभवेद्वादितेकश्निवलपराक्रम ॥५
सनेमाध्योहन्यथावादु खसाघ्योभविष्यति ।
तन्वप्रतिज्ञाकुरुषेयदिपुत्राचवते ।
तदेतदमावास्येकप्यतायन्मततव ॥६
मार्कण्डेय जी कहने लगे-किमो समय प्रवीक्षित को माता वीरादेवी
ने अपने पुत्र को बुला कर कहा- वटा । मैं फिमिच्छिन' नाम का दुष्कर व्रत
करना चाहती हू मौर तुम्हारे पिकान उसकी आज्ञा देवी है। यह व्रत तुम्हारे
पिता, मेरे और तुम्हारे सहयोग स पूर्ण हो सकता है, इमलिये जब तुम उसकी
प्रतिज्ञा कर लागे तमो मैं उसे भारम्भ करूंगी। इस व्रत म मुझे राज्यकोप का
प्राधा धन दान करना है और इसके लिये तुम्हारे पिता न स्वीति देवी है।
शरीर के का का सहन करना मेरा काम है, उसे में भली प्रकार सम्पन्न करूंगी

[ मारंएडेय पुराण बोर दल तपा पगाम मे होने वाला गितना सा है यह सुन्हारे मन है। वहशा सुमार, दुसमा भोर माम्म भी हो सकता । इसलिये तुम समस्त पार्यों को रन की प्रतिमा परो तो में इस पन से प्रारम्भ पास. निय तुम्रारामा चिार हो यह पट महो ॥१-६॥ वित्तमेपिनुगपत्तमायामित्यनन । पन्मन्दरीरनिप्पाच तलरियेत्वोदितम् ।। शिमिच्छर व्रतमातनिश्चिन्ताभवनियंपा। रामापिनाम्यनुज्ञातयतिवित्तवरेगमे । मत मागमदिपोतदातममुपोषिता । पपोत गारापूजाराजराजम्यगमना ।। निधीनाममोपागोनिधिपासगराग्यप। सम्बाधारयामायापनपारापमानगा ।।१० विविकतगृहायोसमपरागरम । पामीन उस मविनाविभावविशारद ॥१॥ पारिपतनधामगोमहीम्।

अवीक्षित चरित (४) I
बड़े उत्साह पूर्वक वस द्रत को प्रारम्भ किया और उपवास रखकर काम, मन,
वचन से पूर्ण संयम करते हुए शास्त्र विधि से निधि समूह, निधिपालगए और
लक्ष्मी देवी का पूजन करने लगी। इस अवसर पर महाराज करन्धम अपने
सुयोग्य मन्त्रियो के साथ मरणागृह में बैठ कर सव व्यवस्था करते रहते थे।
उस समय यत्रियो ने राजा से कहा-हे महाराज ! राज्य का पालन करते हुए
पापको अवस्था पूर्ण हो चली है और प्रापके एकमात्र पुत्र ने स्त्री मम्पर्क त्याग
कर कोई सन्तान उत्पन्न नहीं की है। यदि वे पाजन्म इसी प्रकार ब्रह्मचारी
बने रहे तो अन्त में प्रारका यह राज्य शत्रुप्रो के अधिकार में चला जायगा।
इस प्रकार आपका वश क्षय होकर पितरो का श्राद्ध और तर्पण वन्द हो
जायगा। इस प्रकार सब क्रियाओं के रुक जाने पर शत्र प्रो का भय उपस्थित
होगा । इसलिये जैसे भी सम्भव हो पाप ऐसा उपाय कोजिये जिससे प्रापका
पुत्र गुहस्य पाश्रम स्वीकार करके पितरो के बाद और तर्पण को स्थिर रस
सके ।।७-१५॥
एतस्मिन्नन्तरेशन्द शुश्रावजगतीपति. ।
पुरोहितस्यवीरायागदतोह्यार्थिनप्रति ॥१६
क किमिच्छतिदु साध्यकस्यकिसाध्यतामिति ।
करन्धमस्यमहिपीकिमिच्छिकमुपोपिता ॥१७
राजपुत्रोऽप्यविक्षित थत्वापौरोहितवच ।
प्रत्युवाचाथिन भत्रिाजद्वारमुपागतान् ॥१८
मयासाध्यशरीरेण्यस्यकिश्चिद्ब्रवीतुस ।
मममातामहाभागाकिमिच्छकमुपोपिता ||१६
शृणुवन्तुमेथिन. सर्वेप्रतिज्ञातमयातदा ।
किमिच्छथददाम्यैपक्रियमाणैकिमिच्छके ॥२०
ततोराजानिशम्यतद्वाक्यपुनमुखाच्छ तम् ।
तमुत्पत्याब्रवीत्पुत्रमहमर्थोप्रयच्छमे ।।२१
दातव्ययस्मयानातभवतैतदवी हिमाम् ।
कर्तव्यदुष्करवातेसाध्यदु साध्यमेववा ॥२२

३८० ]
मान्य पुराण
मार्कण्डेयजी बहने लगे-उसी समय रजा के कानों के पुरोहितों के
ये शब्द पाये कि 'कम्धम वी राजमहिषी विमिच्छा' यावरती है-तुम
पया इच्छा करते हो। जिसका जो पटिन पार्य पूरा किया जाने को हो वह
उसके सम्मुख कहो।" राजपुत्र प्रवीक्षित ने भी पुरोहितो के इन ववना का
सुना पौर तब वह भी द्वार पर आकर कहने लगे-' हे प्रर्थीगणो ! मेरी प्रतिज्ञा
है कि मेरी भाग्यवती माता जो विमिच्छर' व्रत कर रही है उसके सम्बन्ध में
में भी प्रत्येक कार्य, जो कुछ मेरे शरीर से सम्भव है, पूरा करने को प्रस्तुत है।
जब राजा करण्यम ने प्रदीक्षित को इस प्रकार कहते सुना तो उसने अवीक्षित
के सामने जाकर कहा-'पुत्र ) मैं भी अर्थी हू, मेरी अभिलाषा को भी पूर्ण
करो।" प्रवीक्षित ने कहा--पिताजी । मैं प्रापको क्या हूँ? पाप जो चाहते
हों उसकी प्राज्ञा
वह कार्य कैपे भी दु साप या असाध्य भी क्यो न हो मैं
उसे पूरा करूंगा ॥१६-२२।।
यदिसत्यप्रतिज्ञस्त्वददासिकिमिच्छकम् ।
पौत्रस्यदर्शयमुखममोत्सङ्गगतस्यतत् ।।२३
अहन्तवैकस्तनयोब्रह्मचर्यचमेनृप ।
नमेपुत्रोऽस्तिपौत्रस्यदर्शयामिकथमुखम् ॥२४
पापायब्रह्मचर्यन्तेयदिद धार्यतेत्वया ।
तस्मात्त्वमोचयात्मानममपौत्रचदर्शय ॥२५
विषमस्यान्महाराजयदन्यत्तत्समादिश ।
वैराग्येणमयात्यक्त स्त्रीसंभोगस्तथास्तुसः ॥२६
बहुभियुध्यमानानादृष्टोवैवैरिणाजय ।
तत्रापियदिवैराग्यमुपैपितदपण्डित ॥२७
किंवानोबहुनोक्तनब्रह्मचर्यपरित्यज ।
मातुस्त्वमिच्छयावक्त्रपौत्रस्यममदर्शय ॥२८
गजा ने कहा-"अगर तुमने किमिच्छक व्रत मे दान करने की प्रतिज्ञा
सचमुच की है तो मुझे पौत्र का मुख दिखाओ।' प्रवीक्षित ने उत्तर दिया--
पिताजी ! आपका एकमात्र पुत्र तो मैं ही हूँ और मैंने सदैव के लिये ब्रह्मवयं

अवीक्षित चरित्र (४) [ ३८६ पालन का निश्चय किया है और मेरे कोई पुत्र नहीं है। इस कारण मापको पौत्र का मुख कैसे दिखा सकता हू?" महाराज करन्यम ने कहा-तुमने जो ब्रह्मचर्य धारण किया है वह नोति विरुद्ध पाप कार्य है । इमलिये उमे त्याग कर मुझे पौत्र का मुख दिसाम्रो।" प्रवीक्षित ने कहा कि इस प्रकार ब्रह्मचर्य व्रत का त्याग मेरे मन के बहुत विरुद्ध है । मैंने वैराग्य भावना से म्बी-सम्पर्क का त्याग किया है, प्रतवए आप मुझे ऐमो आज्ञा दें जिसमे मेरा व्रत सडित न हो । गजा ने कहा- तुमने बडी-वही सेनामो सहित प्रवल वैरियो को हराया है, इस पर भी तुम वैराग्य धारण करते हो तो कोई तुमको बुद्धिमान नही कह सक्ता । कुछ भी हो, इस विषय में अधिक विवाद न करके अपनी माता के व्रत का पानन करने के लिये मुझे पौत्र का मुख दिसाम्रो ॥२३०२८।। यदासवहुशस्तेनप्रोक्त पुत्रेणपार्थिवः । नान्यत्प्रार्थयतैकिंचित्तदापुत्रोऽब्रवीत्युन १२९ दत्वानिमिच्छकतुभ्यप्राप्तोऽहंतातसङ्कटम् । तत्करिप्यामिनिर्लज्जोभूयोदारपरिग्रहम् ॥३० स्त्रिया समक्षविजित पतितोपरणीतले। स्त्रीपतिर्भविताभूयस्तातंतदतिदुष्करम् ॥३१ तथापिकिंकरोम्येषसत्यपाशवङ्गतः। करिष्यामिययाऽऽत्यत्वभुज्यतानिजशामनम् ॥३२ मार्कण्डेय जी कहने लगे-यद्यपि प्रवीक्षित ने बार-बार अपनी कठि- नाई. बतमाई मोर राजा से कोई दूसरी बात मांग लेने को कहा-पर जब वे न माने तो उसने कहा-"पिताजी ! मैं 'बिमिच्छक व्रत के लिये इच्छानुसार दान देने की प्रतिज्ञा करके सङ्कट में पड गया है इसलिए निलंग्ज होकर फिर गृहम्य माधम में प्रविष्ट होना ही पटेगा । मन्यथा मच्ची बात तो यह है कि जब मैं स्त्री के सामने पराजित होकर पृथिवी में गिर गया तो मन में स्त्री और वह पनि के समान होगी, वास्तव में यह मेरे लिये बड़ा कठिन कार्य है । तोभी जव मैं पापसे प्रवीना-बन्धन में बंध गया है, तो आपने जो कहा है उसे अवश्य

| माण्डेय पुराण
पगा। पाप प्रब इस विषय में निश्चित हो जाये और अपना राज्य-कार्य
पर पूर्व परते रहे ॥२१-२२॥
११३-~श्रीक्षित नारित्र (५)
पदाचिदाजपुरोऽनौमृगयामपरदने ।
मृगान्धिप्यन्वराहावादूंनादोधद ष्ट्रिण ॥१
पुधावरह्मागरम वाहिवाही नियोपित ।
विनोगत्या गुयशोमयगदगदमुरारं ॥२
गार्मा भरिनिवदनाजपुत्र गये गिन ।
पोदयामागतुग्गयत र ममागत ॥३
रानामापिसाराविमनेयने ।
गीतानुषत्रणहदानमानिनी ॥४
पम्पम गुतस्यामा पर्यापारमपिक्षित ।
Prनातिनिधिवासायपीमत. ॥५
घरगमरीशमान गुमरा ।
नगमा पुरावा नयभाहतारमा
মূখাবি খান।
FREETपानामावा

प्रवीक्षित चरित्र (५) ] प्रादि देवगण भी शत्रुभव से नहीं ठहरते हैं, मैं उनको ही पत्नी होकर हरण की जा रहा हूं। जिनके क्रोध में पडकर कोई वचकर नहीं जा सकता और जो इन्द्रतुल्य पराक्रमी हैं, उन महाराज करन्धम के पुत्र को भार्या को यह पापी हरण कर रहा है ।।१-७॥ इत्याकर्ण्यमहीपालतनयःसशरासनी। चिन्तयामासकिमिद मममात्रिकानने ॥5 मायेयरक्षसांनूनंदुष्टानांकाननौकसाम् । अथवागतएवाहंसर्वं वेत्स्यामिकारणम् Int त्वरित सततोगत्वाहदर्शातिमनोरमाम् । कानने कन्यकामेकासलिङ्कारभूपिताम् ॥१० गृहोतांदनुपुत्रेण दृढक्शेनदंडिना। त्राहित्राहीतिकरुणविक्रोशन्तीपुन:पुनः ॥११ माभैरितिसतामाहहतोऽसीतिचतंवदन् । शासतीमांमहीदुष्ट.कोदूयेतकरंधमे ॥१२ यस्य प्रतापावनताभुविसर्वेमहीक्षित. । ततस्तमागतदृष्ट्वागृहीतवरकामुकम् ॥१३ मांत्राहीत्याहतन्वङ्गीहृतास्म्येपेतिचासकृत् । राज्ञ.करन्धमस्याहस्नुपाभार्याप्यविक्षितः । हृतास्भ्येतेनदुप्टेनसनायाऽनाथवद्वने ।।१४ मार्वएडेयजी कहने लगे-अवीक्षित इन शब्दो को सुनकर विचार करने जगा कि इस वन में मेरी पत्नी कहाँ से पायी । हो न हो यह राक्षसों की माया है । तोभी जब मागे बढ कर उन्होंने देखा कि ढकेश नामक दानव मनेक आभूपरणों से युक्त एक अत्यन्त मनोहर कन्या को पकड़ रहा है और वह बार- चार 'त्राहि-त्राहि कहकर रो रही है तो उन्होंने कन्या से कहा-'डरो मत ।' फिर वे उस दानव से वोले-भव तेरी मृत्यु भा चुकी है, महाराज करन्थम के शासन काल में कौन इस प्रकार अत्याचार कर सकता है। जिन महाराज करल्यम के सम्मुम्न, पृथ्वी के समस्त नृपनिगए. मानक मुमते हैं, नन के शासन

३६२ ]
[ मार्कण्डेय गण
मे कोई दुष्ट जीवित नहीं रह सकता । उस समय उन प्रचण्ड धनुष धारण किये
हुये राजकुमारी को वहाँ पाया देखकर वह कुमारी बार बार कहने लगी-
"मेरी रक्षा करो-यह दुष्ट मुझे अपहरण कर रहा है । मैं करन्धम पुत्र पव:
क्षित को भार्या हूँ और सनाथ होकर भी इस समय प्राय के समान हरण की
जा रही हूँ ॥८-१४॥
ततोविममृशेवाक्यमविक्षित्सतयोदितम् ।
कथमेषाहिमेभायर्यास्नुपातातस्यवाकथम् ॥१५
अथवामोचयाम्येतातन्वीवेत्स्यामितत्पुनः ।
क्षत्रियर्धार्यतेशस्त्रमानिावारणकारणात् ॥१६
तत क्रुद्धोऽब्रवीद्वीरोदानवतसुदुर्मतिम् ।
जीवनाच्छविमुच्यनामन्यथानभविष्यसि ॥१७
तत सताविहायो दण्डमुक्षिप्यदानवः ।
तमप्यधावत्सोऽप्येनशरवपरवाफिरत ॥१८
सवार्यमापोवाणीघनवोऽतिमदान्वित ।
राजपुत्रायचिक्षेपदण्डशकुशतावृत्तम् ।।१६
तमापतन्तपिच्छेदशरैर्भूपसुतस्ततः ।
सोऽप्यासन गृहीत्वोच्चममाजौव्यवस्थितः ॥२.
सृजत शरवाणितचिक्षेपततो मम् ।
सचत तिलशश्चक भल्ल कामु कमोचितः ॥२१
ततविक्षेपचशिलाराजपुत्रायदानवः ।
सापिमोधापपातामुभवातेनलापवाद ॥२२
राजपुत्रायकुपितोयद्यविक्षेपदानयः ।
ततपिच्छेदवारणोपर्भूभृत्यूनु सलीलया ॥२३

अवीक्षिा चरित्र (५) ]
व्यक्तियों की रक्षा के लिए ही क्षत्रीगण शस्त्र धारण करते हैं। तत्पश्चात्
उन्होने प्रत्यन्त कोष पूर्वक उस दुष्ट दानव से कहा यदि तुझे अपनी जान
घचानी हो तो यहां से शोध भाग कर चला जा, अन्यथा मैं तुझे अभी यमालय
पहुंचाता हूँ । राजपुत्र की बात सुनकर वह उस कन्या को छोड दण्ड हाथ में
ले उन्हें मारने दौडा। प्रवीक्षित ने उसे बीच में ही वारणो से रोक दिया।
दानव ने उन बाणो को रोक कर बडे महङ्कार के साथ राजपुत्र पर दण्ड को
फेंक कर मारा, पर उन्होंने उसे वाणो से काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया । तब
दानव एक बड़ा वृक्ष उखाड कर मारने को चला, पर प्रवीक्षित ने वाणो द्वारा
उसे भी खण्ड-खण्ड कर डाला । तत्पश्चात् वह बडे-बड़े शिलाखण्ड लेकर उनके
पर फेंकने लगा, पर राजकुमार ने उन सबको वाणो द्वारा व्यर्थ कर दिया ।
उसने मारने के लिये जो कुछ चलाया उसे मदीक्षित ने सहज में काट डाला
ततोविच्छिन्नद डोसाविछिन्नसकलायुधः ।
मुष्टिमुद्यम्यसक्रोधोराजपुत्रमधावत ।।२४
तस्यापततएवासोकरन्धमसुतःशिरः ।
छित्त्वावेतप्तपत्रेणपातयामासवंभुवि ॥२५
तस्मिन्विनिहतेदेवेनवेदुष्टचेष्टिते ।
करन्धमसुत सर्वे:साधुसाध्वितिभापितः ॥२६
वरवृणीष्वेतितदादेवरुक्तोनृपात्मजः ।
व पुत्रमहावीर्यमितुःप्रियचिकीर्पया ॥२७
भविष्यतिहितेपुत्रश्चक्रवर्तीमहावलः ।
अस्यामेव हिकन्यायांमोक्षितायांत्वयानध ॥२८
पियाहसत्यपाशेनवदइच्छाम्यहंसुतम् ।
राजभिनिजितेनाजोत्यक्तोमेदारसंग्रहः॥२६
साचमेयावतात्यक्ताविशालनृपते सुना।
तयाचमत्कृत्यक्तोमामृतेनरसङ्गमः ।।१०

का शासन,
प्रबोक्षित चरित्र (५)]
भविष्यतिचपुत्रस्तेचक्रवर्तीमहाबलः ।
प्रोग यिष्यतियोदेवानसुरामहनिष्यति ॥३७
इतिदेवाज्ञयातेनदेवदूतेनवारिता ।
नसत्यक्तवतीदेहत्वत्सङ्गममनोरथा ॥३८
देवों ने कहा-"यह वही विशाल नृप की कन्या है। जिसकी तुम
प्रशसा कर रहे हो और जो तुम्हारे लिए बनवासिनी होकर तपस्या कर रही
है । इसी के गर्भ से तुम को एक ऐसा पुन जन्म ग्रहण करेगा जो सातो द्वीपो
सहस्रो यज्ञो पा करने वाला होगा।" जब देवगण यह कह कर
अन्तर्धान हो गये तो राजकुमार ने पत्नी से पूछा-"तुम इस विपत्ति मे किम
प्रकार फंस गई" वह कहने लगी-"जब आप मेरे पिता के नगर से मुझे
छोड कर चले पाये तब मैं भी दुसित चित्त से परिवार वालो को त्याग वन
में रहने चली आई । यहाँ पर निराहार तपस्या करने से जब मैं अत्यन्त दुर्वल
हो गई और निराश होकर देह त्याग का विचार करने लगी तो एक देवदूत ने
पाकर मुझे ऐसा कहा-"तुम्हारे गर्भ से एक महा पराक्रमी पुत्र जन्म
लेगा, जो असुरों को मार कर देवताओं का कृपापात्र बनेगा, इसलिये तुम इस
प्रकार मात्मघात मत करो। इस प्रकार माशान्वित हो कर मैंने जीवन त्याग
करने का विचार छोड दिया ।।३२-३०॥
परश्वश्चमहाभागस्नातुंगनांहदंगता।
अवतीर्णा विकृष्टास्मिवृद्धनागेनकेनचित् ।।३६
ततोरसतलंनीतातेनतत्रचमेपुरः।
नागाःसहस्रशस्तस्युर्नागपल्यःकुमारकाः 180
तुष्टुवुर्मासमभ्येत्यमामन्येऽपूजयस्तथा ।
ययाचिरेसविनयंनागामामङ्गनास्तथा ॥४१
प्रसादकुरुसर्वेपांत्वमस्माकसुतस्त्वया ।
अपराधमुपेतानांसनिवार्योवघोन्मुखः ।।४२
अपराधकरिप्यन्तित्वत्पुत्रस्यानिलाशनाः।
तनिमित्त निवार्योऽसौप्रसाद.नित्यतामिति ॥४३

[ मकण्डेय पुराण
नतिचमयाप्रोक्त दित्य पातालभूवरी ।
भूपताहतथानुपर्गन्धवासोभिरुत्तमः ॥४४
समानीतातथालोक मिमन्सेनानिलाशिना ।
पुरायथाकान्तिमतोपूर्ववद्पशालिनी ।।४५
इतिरूपवतीदृष्ट्वासर्वालङ्कारभूषिताम् ।
जग्राह्ढकेशोऽयह काम सुदुर्मति ॥४६
युप्मदाहुवलेनाहराजपुत्रविमोक्षिता ।
प्रसीदमहाबाहोमाप्रतीच्छत्वयासम' ।
भूलोकेराजपुषोऽन्योनास्विसत्यवीम्यहम् ॥४७
मभी दो दिन पूर्व जब गगा के निकटवर्ती कुएट से स्नान करने गई
सो एक बूढ़ा नाग मुझे सोचकर रसातल मे ने गया, जब मैं वहाँ पहुंची तो
हजारों नाग, नाग-रमरिणयां और वानव मेरे सामने इकट्ट हो गये और मेरी
पूरा, स्तुति करके महने लगे कि माप हमारे ऊपर कृपा करें। जिस समय
हम किसी भपगम के कारण पापो पुष क मम्मुख दण्डनीय हो तो माप
उनको रोक पर हमारी रक्षा परना। यदि वायु भधारण करने वाले नागगण
तुम्हारे पुत्र का कोई पराध को ना समय आप हमारी महायिका बन.
पही प्रार्थना करते है 11१-४॥जय ने उनसे बात स्वीकार परली
तब उन्होंने पाताल-लोग ये रिव्य पाभूषणो, मनोहर नय, मस्त्र, पुष मारि
मे मुझे पापा और पंग मुझे स्त्री पर पहना गये पोर मागों के प्रभाव
या रूपपती पोर गोयं मुक हो गई। भार मुझे इस प्रकार मामूपलों
विभूति और सम्मान देश र म हा माRF Te वाम सरण
र सिंजा रहा थाfr पाप प्रा गर घोर उमरे पंजे ने मुझे पुरा लिया।
मात्र प्रापये हो गया था हो गयी है रानिये पर पापही पुगे
पागाईमा पाnिskrग समय पाप गाय
गुणवान गपुमार ही भीxit Returt-rail

मरुन जन्म वर्णन ।
। ३६७
११४--मस्त जन्म वर्णन
इतितस्यावच थत्वॉस्मृत्वीपितृवच शुभम् ।
किमिच्छकेप्रतिज्ञातेयदुक्त तनभूभृती ॥१
प्रत्युवाचसताक्न्यामविक्षिनृपत सुत ।
सानुरागमना.कन्यात्यक्तभोगाञ्चतत्कृते ।।
यदाहत्यक्तवास्तन्वीत्वामरातिपराजित ।
विजित्यशत्रून्सप्राप्तात्वमयत्रिक रीमिकिम् ॥३
ममपाणिगृहाणस्वरमगोयेऽत्रकानने ।
सकामाया सकामनसङ्गमोगुणवान्भवेत् ॥
एवभवतुभदन्तविधिरेदात्र कारणम् ।
अन्यथाकथमन्यनत्वामहञ्चसमागतः॥५
मार्कण्डेयजी ने कहा- राजकुमार प्रवीक्षित ने जब राजकन्या के मुम
से यह सब वृत्तान्त सुना पोर किमिच्छक व्रत के अवसर पर पिता से कोई
प्रतिज्ञा का स्मरण किया और यह भी देखा कि विशाल राज-न्या ने मेरे
हो लिये सब भोंग त्याग रसे है तब उसके चित में उम मौन्दयमपो के प्रति
अनुराग उत्पन्न हो गया उपने रहा-हे सुन्दरी । परमों से हार जाने पर ही
मैंने तुम्हाग त्याग किया था मौर आज फिर शत्रु को जीत पर ही तुमको
प्राप्त किया है, पत भव में क्या करूं? राजकुमारो ने उत्तर दिया-इम
रमणीय वनस्थली में ही प्राप मेरा पाणिग्रहण करें तो दो सकाम युवक युवती
का यह सम्मिलन मुख शान्ति और सस्परिणाम से सिद्ध होगा। राजकुमार पवी.
क्षिन ने कहा-ऐसा ही हो-तुम्हारा मगल हो । इस घटना के पीछे स्पष्ट-प
से देव का हाप है, मन्यया तुम पोरे मैं पृथा पृथक् स्थान में रहते हुए भी
माज इस अवसर पर कैसे इस्? हो सकते थे ।।१-५॥
एतस्मिन्नन्तरेप्राप्तोगन्धर्वतनयोमुने।
राप्मरोभिःसहिनीगन्धर्वरपरं. 11

३६८ ) 1 मार्कण्डेय पुराण राजपुत्रसुते यम्मेभामिनीनाममानिनी । अभिशापादगस्त्यस्यविशालतनयाऽभवत् ॥७ बालभावेनयोगस्त्य कोपित क्रीडमानया । ततस्तेनतदाशप्तामानुपीत्वभविष्यसि ।। प्रसादित सचास्माभिलियमविवेकिनी। तवापराद्धविप्रप्रसाद क्रियतामिति ।ME प्रसाद्यमान सोऽम्माभिरिदमाहमहामुनिः । बालेतिमत्वाशापोऽल्पोदत्तोऽस्यानान्यथैवतत ॥१० इतिशापा गस्त्यस्यविशालभवनेशुभा । जातेयमत्सुतासुभ्र ामिनीनामनामत ॥११॥ तदस्याहकृतेप्राप्तोगृहारमानृपात्मजाम् । ममात्मजासुतस्तेऽत्रचक्रवर्तीभविष्यति ॥१२ मार्कण्डेयजी कहने लगे-जिस समय प्रवीक्षित और विशाल राज- कन्या का यह वार्तालाप हो रहा था उसी समय तनय नामक गर्व अन्य अनेक गन्धवों तथा अमरायो के साथ वहाँ पाया। उसने कहा- यह कन्या वास्तव में मेरी ही है और इसका नाम मानिनी है। अगस्त्य ऋषि को इसने एक बार क्रोवित कर दिया था और तब उन्होने शाप दिया कि तू मनुष्य योनि मे जन्म ले । मैंने उनसे प्रार्थना कि यह एक प्रबोध--कन्या है इस के अपर क्रोधित होना उचित नही, माप इस पर कृपा करें। महामुनि अगस्त्य जी ने मैरी प्रार्थना से प्रसन्न होकर कहा कि-बालिका समझ कर ही मैंने इसे सामान्य शाप दिया है, पर अब वह सर्वथा मिट नहीं सकता मेरी प्रिय कन्या ने उसी शाप के कारण विशाल राजा के यहाँ जन्म ग्रहण किया था। अब में इसके लिये ही यहाँ माया हूँ कि आप मेरी कन्या का पाणिग्रहण करें, इसके गर्भ से पाप को चक्रवर्ती पुत्र प्राप्त होगा ॥६.१२।। तथेत्युक्त्वे तितस्याश्चसपाणिपाणिवात्मज । जग्राह विधिवद्धोमचक्र तत्रचतुम्वुरु ॥१३ मका जन्म वर्णन । प्रजगुर्देवगन्धर्वाननृतुश्चाप्मरोगणा । पुष्पारिगससृजुर्मेधादेववाद्यानिसस्वनु. ॥१४ विगहेराजपुत्रस्यतयातसमे यूपः । समस्तवसुधात्रारणकर्तृ कारणभूतया ॥१५ सतोगन्धर्वलोकन्तेसहतेनमहात्मना । निःशेपेरण्ययु साडसचराजसुतोमुने ११६ भामिन्यामुमुदेसाई मविक्षिन्नृपनन्दन । साचतेनसमतत्रभोगसम्पत्समन्विता ॥१७ कदाचिदतिरम्येऽमोगगनोपवनेतया । विक्रीडतिसमतन्व्याकदाचिदुपपर्वते ॥१८ क्दाचित्पुलिनेनद्याहसमारसशोभिते । कदाचिद्भवनस्यान्तेप्रासादेचातिशोभने ॥१६ विहारदेशेष्वन्येपुरमणीयेवहनिशम् । सरेमेसहितस्तन्व्यासाचतेनमहात्मना ।।२० राजकुमार प्रवीक्षित न गन्धर्व का वा सुन कर तथास्तु कहा। तब गन्धवों के पुरोहित तुम्बुरु ने उन दोनो का पाणिग्रहण सस्कार ययाविधि होम करके सम्पादन कराया। उस अवसर पर देवता तथा गन्धर्व हर्प से गाने बजाने लगे, अप्सरायें नाचने लगी, प्राकाश से पुष्पवर्षा होने लगी और देव- गरण अपने वाद्य बजाने लगे । तत्पश्चात् सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डल के पालनकर्ता (चक्रवर्ती शासक) की जननी हाने वाली कुमारी तथा राजकुमार प्रवीक्षित के विवाह में आये हुए समस्त गन्धर्व उस प्रमुख गन्धर्व तनय के साथ गन्धर्व लोक को चले गये । राजकन्या और राजकुमार प्रवीक्षित उन्हीं के साथ गये। वहाँ पर ये दोनो पति पत्नी एक दूसरे के सहवास और प्रेमयुक्त व्यवहार से प्रत्य त सतोप को प्राप्त हुए। वे अपनी उस मनोहर भार्या सहित कभी नगर के उपवनो म भी उपपर्वतो मे क्रीडा करने लगे। कभी हस-सारस यादि से शोभायमान नदियो के तट पर कभी भवनो में, कभी ऊँचे महलों और कभी अन्य रमगीर स्थानो मे वे दोनो विहार सुख प्राप्त करने लगे ॥१३-२०॥

-
४००
। मार्कण्डेय पुराण
भध्यानुलेपनवस्त्रं स्रक्पानादिकमुत्तमम् ।
उपाजह्न स्तयास्तत्रमुनिगन्धर्व किनराः ॥२१
तयाचरमतस्तस्यभामिन्यासहदुर्लभे ।
गन्धर्वलोकेवीरस्यपुत्र सासुपुवेशुभा ॥२२
तस्मिजातेमहावीर्यगन्धर्वाणामहोत्सवः ।
बभूवमनुजव्याघ्रतेनकार्यमवेक्षतम् ॥२३
जगु केचित्तथैवान्येमृदङ्गपटहानकान् ।
अवादयन्तचैवान्येवेणुवीरगादिकास्तथा ।।२४
ननृतुश्चतथातत्रबहवोऽप्सरसांगणाः ।
पुष्पवृष्टिमुचोमेघाजगजुंमृदुनिस्वना. ॥२५
तथाकोलाहलेतस्मिन्वर्तमानेऽयतुम्बुरुः ।
प्रणयेनस्मृतोम्येत्यजातकर्माकरोन्मुनिः ॥२६
वहां रहने वाले मुनि, गन्धर्व और किन्नर उनके उत्तम मध्य पदार्थ,
पानीय, वस्त्र, माला और गंध भादि भेंट स्वरूप देने लगे भोगो से भरपूर
गन्धर्व लोक में राजकुमारी मानिनी के इस प्रकार विहार करते हुए राजकन्या
ने एक पुत्र को जन्म दिया। (उस महावीर्य शालौ पुत्र का जन्म होने पर
भविष्य में उसके द्वारा महान् कार्यों के सिद्ध होने की प्राशा से गन्धवा ने महान
उत्सव का आयोजन किया। वहीं पर कोई गान करने लगा, कोई मृदंग,
पटह, ढोल वेणु, वीणा, आदि बजाने लगे। अप्सराय मनोहर नृत्य करने
लगी और मेघ फूलों की वर्षा करते हुए मपुर मन्द श करने लगे ) इस
प्रकार जब वही सर्वत्र मंगल शब्द हो रहा था तनय के स्मरण करते ही पुरोहित
तुम्बुरु ने वहां प्रारर शिशु का जात कर्म पूरा किया ॥२१-२६।।
देवा.समाययु सर्वतयादेवर्षयोऽमला ।
पातालात्पन्नगेन्द्रावशेषवासुक्तिक्षकाः ।।२७
तथादेवासुराणाचयेप्रधानाद्विजोत्तम ।
यक्षाणांगुह्यकानांचवायवश्वतथाऽपिलाः ॥२८

मरुत जन्म वर्णन ]
[ ४०१
तदाऽऽगतरशेषषिदेवदानवपन्नगः ।
मुनिभिश्नाकुलमभूद्गन्धर्वाणामहत्पुरम् ॥२६
तत सतुम्बुरुःकृत्वाजातकर्मादिका क्रिया ।
चक्र स्वस्त्ययनतस्यबालस्यस्तुतिपूर्वकम् ॥३०
चक्रवर्तीमहावीोमाहाबाहुमहाबलः ।
महान्तकालमोशित्वमशेयायाःक्षिते.कुरु ॥३१
इमेशकादय सर्वलोकपालास्तथर्षयः।
स्वस्तिकुर्वन्तुतेवीरवीय चारिविनाशनम् ॥३२
मरुत्तवशिवायास्तुवातिपूर्वेणयोरजा ।
मरुत्त विमलोक्षीणोऽवैषम्यायास्तुदक्षिण ॥३३
पश्चिमस्तैमरुद्वीर्यमुत्तमतेप्रयच्छतु ।
बलयच्छतुचोत्कृष्मरुत्तेचनथोत्तर ॥३४
मार्कण्डेय जी कहने लगे-उस समय वहाँ पर सभी देवपि, पाताल
निवासी शेष, वासुकि, तक्षक मादि नागाग, राजा, देव, असुर, पक्ष, गुह्यको
के प्रधान व्यक्ति और समस्त वायुकुल उपस्थित हुए।
माने वाले समस्त ऋषि, देव, दानव, पन्ना और मुनियो मे गन्धवों का सम्पूर्ण
नगर भर गया । जातकर्म सम्पन्न हो जाने पर उन तुम्बुरु ने बाल का
स्वस्त्ययन इस प्रकार किया हे वीर तुम महावली, महावीर्य और महाबाहू
होकर पृथ्वी सार्वभौम प्राधिपत्य प्राप्त करके अत्र श्रेष्ठ शासक बनो। समस्त
इन्द्रादि लोकपाल और ऋषिगण तुम्हारा मगलमय और शत्रुनो को विजय
करने वाला वीर्य विधान करें। पूर्व दिशा से चलने वाली स्वच्छ वायु तुम्हारा
कल्याण करे। प्रक्षीण और विमल• दक्षिण -पवन तुम्हारे अनुकून रहे ।
पश्चिम का मरुत तुमको महावीर्य और उत्तर का पवन उत्कृष्ट वल प्रदान
करे ।।२७-३४॥
इतिस्वस्त्ययनस्यान्तेवागुवाचाशरीरिणी।
महत्तवेतिवहुशोयदिद गुरुरखवीत् ॥३५
उस अवसर समस्त

४०२ ] [ मार्कण्डेय पुगण मरुत्तइतितेनायभुविख्यातोभविष्यति । भुविचास्यमहीपालायास्यन्त्याज्ञावशायतः ॥३६ एपसर्व क्षितीशानावीर स्थास्यतिमूर्द्धनि । चवीमहावीर्य सप्तद्वीपवतीमहीम् ॥३७ आरभ्यपृथिवीपालानयभोक्ष्यत्यवारित । प्रधान पृथिवीशानाभविष्यत्यपयाग्वनाम् । प्राधिक्यशौर्यवीयेणभविष्यत्यस्यराजसु ॥३६ इत्याकर्ण्यवच सर्वकेनाप्युक्त दिवौकसाम् । तुतुपुर्विप्रगन्धर्वाश्चास्यमातातथापिता ॥३६ इस स्वरस्ययन का पाठ समाप्त होने पर माकाशवाणी हुई कि गुरु ने बार-बार महत' शब्द का उच्चारण क्यिा है इसलिये इस बालक का नाम 'मरत' ही होगा और समस्त समार विख्यात होगा। सम्पूर्ण राजागण इसके प्राज्ञावर्ती होंगे इस प्रकार सब राजामो मे शिरोमरिण होगा। यह सब राजामो को हरा कर चक्रवर्ती पदवी पायेगा सानो द्वीपो में विस्तृत पृथ्वी का भोग परेगा । यह सब नरेशो और यश करने वालो मे थेष्ठ होगा और समस्त राजाओ की मपेक्षा दल-बीर्य मे प्रधानता प्राप्त करेगा। देवगण की इस वापी को मुनपर मय ब्राह्मण, गन्धर्व पोर यात्रा के माता पिता अत्यन्त प्रसन पौर सतुष्ट हुए ।॥३५.३६॥ ११५- मरुत चरित्र (१) तत सराजपुषस्तमादायदयितसुतम् । पली-चानुगतोविनगन्धर्वराययोपुरम् ॥१ रापितुर्भवनप्राप्यववन्देपितुरादरात् । चरणौसाचतन्वङ्गीहोमतीनृपते सुता ॥२ तथाहराजपुत्रोऽसौगृहीत्वाचालवमुत्तम् । धर्मासनगतभूपरानामध्येय राधमम् ।।३ मुम्रपौत्रस्यपश्यंतरराजस्ययन्मया । विगच्छोप्रतिमतनुग्यमातु परोपुरा र गत चरित्र (१) ! [ १०३ इत्युक्त्वापितुरुसङ्गतकृत्वातनयंततः । यथावृत्तमशेपसकथयामासतस्यतत् ॥५ सपरिष्वज्यतपोत्रमानन्दास्राविलक्षणः । सभाग्योऽस्मीत्ययात्मानप्रसशसपुन.पुन. ॥६ तत सोादिनासम्यागन्धर्वान्समुपागतान् । समानयामासमुदाविस्मृतान्यप्रयोजन. ७ मार्कण्डेयजी कर्ने लगे-नत्पश्चात राजकुमार प्रतीक्षित अपने नवजात पुत्र तथा पत्नी के साथ अपने नगर में भाये । उस समय भनेक गन्धर्व भी उनके पोछे-पीछे थे। उन्होने राज भवन में जाकर पिता की वन्दना की, विशाल राज- पन्या ने भी सलजमाव से उनको प्रणाम दिया। तदनन्तर अपरीक्षित ने पुत्र को लेकर बडे-बडे सरदारो के साथ राजसिंहासन पर विराजमान अपने पिता महाराज करन्यम से कहा-"माताजी के किमिच्छक व्रत के अवसर पर मैंने मापसे जो प्रतिज्ञा की थी, तदनुसार पौत्र को गोदी में लेकर इसका मुख देखिये ।" यह कहते हुए उन्होंने पुत्र को पिता की गोदो मे दे दिया और विवाह तया पुत्र-जन्म का पूरा वृत्तान्त उनको सुना दिया। पोत्र को देखकर राजा के नेत्रों म हर्प रो अर्घ आगये और अपने का परम सौभाग्यवान् मानकर स्वयं ही अपनी प्रशसा करने लगे । इसके पात्रात उन्होने साय में पाये गधों का सब प्रकार से सम्मान किया।॥१-७॥ तत.पुरेमहानासोदानन्द पौरवेश्मसु । अस्माकसन्ततिर्जातानायस्येतिमहामुने । हृष्टपुष्टेपुरेतस्मिन्गीतवाद्य वराङ्गनाः । वितासिन्योऽतिचार्वङ्गयोननृतुस्यिमुत्तमम् । राजाच द्विजमुस्येभ्योरलानिचवसूनिच । गावोवस्त्रायलङ्कारानददाद्धृष्टमानसः॥१० तत सवालोववृधेशुक्लपक्षेययाशशी। पितृणाप्रीतिजनकोजनस्येष्टश्चमोऽभवत् ॥११ प्राचार्याणासकाशात्सप्राग्वेदाञ्जगृहेमुने। तत.शस्त्राप्यशेपारिणधनुर्वेद तत परम् ॥१२ ४०४ 1 [ माईण्डेय पुराण कृतोद्योगोयदासोऽभूत्वखङ्गकामुककर्मणि । अन्येपुचतथावीरःशस्त्रविजितश्रम ॥१३ ततोऽस्त्राणिसजशहभार्गवाभृगुसभवात् । विनयावनतोविमगुरो प्रीतिपरायण ॥१४ मावण्डेय कहने लगे-उस समय समस्त नगर में भी बहुत बड़े उत्सव होने लगे पोर लोग यह कह पर खुशी मनाने लगे कि "हमारे रक्षक राजा के गन्नान हुई है।"(उस समय नगर के भीतर स्थान-स्थान पर नतंरियो' नृत्य भोर गायन करने लगी। महाराज परन्धम गुणवान् ब्राह्मणों को धन, रन, पस्त्र, आभूषण और गौमों का दान देने लगे। इस प्रकार के प्रसन्नतापूर्ण वाता. घरमा में यह बाला प्रमश बडा होता' हुमा पिता वा प्रीतिपात्र और अन्य गाधारण मनुष्यो का भी प्यारा बन गया। या होने पर उसने प्राचार्य समीप रहार वेद, पास्त्र पर पनुद को शिक्षा ग्रहण की। जय यह इन सब शास्त्रों पाशाता हो गया तो राग, पनुप वाण पोर अन्याय शास्त्रो का प्रयोग सोसने लिए गुवतीय भागंव के निकट जार उनसरा रहस्य सौपने सपा-१४॥

मस्त चरित्र (१) }
[ ४०५
-
इस प्रकार सुयोग्य गुरुप्रो से परिश्रम पूर्वक शिक्षा ग्रहण करके वह
घनुवंद में पारंगत चन गया भोर युद्ध सम्बन्धी सब कलामो मे पूर्ण निष्णात
होगया । उस समय इन विद्याप्रो मे उसमे बदकर कोई अत्य दिखाई नही पडता
या। अपनी कन्या के मनोरथ को सिद्धि दोहिन की विशेप यारयता को जानकर
विशाल राजा को भी अत्यन्त हर्ष हुा । शत्रु पर सदा विजय प्राप्त करने वाले
मौर परम बुद्धिमान महागज करन्यम ने पोत्र का प्राप्त करने की खुशी म
अनेक यज्ञ करके थियो बहुत सा दान दिया और बहुत से सत्काय करके प्रजा
का हित साधन क्यिा । तदनन्तर कुछ समय पीछे दन जाने की इच्छा से उन्होंने
अपने पुत्र अदीक्षित से कहा-'पुत्र | अब मेरी वृद्धावस्था है भोर मेरी अभिलापा
वन में रहकर भगदद् भजन करने की है, अतएव भव तुम इस राज्य को ग्रहण
कगे। मैं सभी दृध्यिो से अपने जेवन को सफल हुआ देख रहा हूँ अब तुम्हारा
गज्याभिषेक करने के अतिरिक्त मेरे लिये कोई कर्तव्य शेष नही रह गया है,
इस कारण मैं तुमसे इस मांति से सम्पन राज्य का शासक भार ग्रहण करने
का आग्रह करता हूँ ॥१५-२०॥
इत्युक्त पितरप्राहसोऽविक्षिन्नृपनन्दन ।
प्रश्रयावनतोभूत्वायियासुस्तपसेवनम् ॥२१
नाहतातकरिष्यामिपृथिव्या.परिपालनम् ।
नापतिह्रीर्मेमनमिराज्येऽन्यत्वनियोजय ॥२२
तातेनमोक्षितोवद्धोनस्ववी-दहयत ।
तत.क्रियत्पौरुपमेपुरप पाल्यतेमहीम् ॥२३
योऽहनपालनायालमात्मनोऽपिवसुन्धराम् ।
सकथपालयिष्यामिराज्यमन्यत्र विक्षिप ॥२४
सस्त्रीसधर्मापुरुपोसश्चान्येतावद् ह्यते ।
मात्माऽमोहायभवतावन्धनाय नमाक्षित ॥२५
सोहकप भविष्यामिस्त्रीसधर्मामहीपति ।
स्त्रिप पुमान्भवेद्भाय शूर समहीपति ॥२६

[ माण्डेय पुराण
कृतोद्योगोयदासोऽभूत्वखनकामुककर्मणि ।
प्रन्येपुचतथावीर-शस्त्रविजितश्रमः ॥१३
ततोऽस्त्राणिसजग्राहभार्गवाभृगुसंभवात् ।
विनयावनतो विप्रगुरो.प्रीतिपरायण ॥१४
मार्कण्डेय कहने लगे- उस समेय समस्त नगर में भी बहुत बडे उत्सव
होने लगे और लोग यह कह कर खुशी मनाने लगे कि "हमारे रक्षक राजा के
सन्तान हुई हैं।"(उस समय नगर के भीतर' स्थान-स्थान पर नर्तकिया नृत्य
मोर गायन करने लगी। महाराज करन्धम गुणवान् ब्राह्मणों को धन, रन,
वस्त्र, आभूपण पोर गौत्रों का दान देने लगे'। इस प्रकार के प्रसन्नतापूर्ण वाता-
घरण में वह बालक कमशः बडा होता' हुमी पिता का प्रतिपात्र और अन्य
साधारण मनुष्यों का भी प्योरा बन गया । बडा होने पर उसने प्राचार्य के
समीप रहकर वेद, शास्त्र और धनुर्वेद की शिक्षा ग्रहण की। जब वह इन सब
शास्त्रों का ज्ञाता हो गया तो खड्ग, धनुष-वाण और अन्यान्य शास्त्रो का प्रयोग
सीखने के लिए भृगुवंशीय भार्गव के निकट जाकर उनका रहस्य सीखने
लगा ॥८-१४॥
गृहीतास्त्र कृतीवेदेधनुर्वेद्रस्यपारग. ।
निष्णातःसर्व विद्यासुनवभूवततःपरः ।।१५
विशालोऽपिसुतावार्तामुपलभ्याखिलामिमाम्।।।
हर्ष निर्भरचित्तोऽभूदौहित्रस्थषयोग्यताम् ।।१६
प्रथराजासुनसुतदृष्ट्वाप्राप्तमनोरथः ।
यज्ञाननेकानिपाधववादोनामियापिनाम्॥१७
कृतशेपक्रियोयुक्त सवधिमतोमहीम्।
परिपाल्यारिविजयीबलवुद्धिसमन्वितः ॥१८
सयियासुर्वनपुत्रमविक्षितमभापत ।
पुत्रवृद्धोऽस्मिगच्छामियन राज्यगृहागमे ।
कृतकृत्योऽस्मिनास्त्यन्यस्किधित्वदभिपेषनास ।'
मुनिष्पन्नमतोराज्यरघंगृहारगमयापितम् ॥२०

मस्त चरित (१) ]
[ ४०५
-
इस प्रकार सुयोग्य गुरुप्रो से परिश्रम पूर्वक शिक्षा ग्रहण करके वह
धनुर्वेद मे पारगत बन गया और युद्ध सम्बन्धी सब कलामी में पूर्ण निष्णात
होगया । उस समय इन विद्यानो में उसमे बढकर कोई प्रत्य दिखाई नहीं पड़ता
या । अपनी कन्या के मनोरथ की सिद्धि दौहित्र की विशेष योग्यता को जानकर
विशाल राना को भी प्रत्यन्त हर्ष हुप्रा । शत्रु पर सदा विजय प्राप्त करने वाले
और परम बुद्धिमान् महागज करन्धम ने पौत्र का प्राप्त करने की खुशी मे
अनेक यज्ञ करके थियो बहुत-सा दान दिया और बहुत से सत्काय करके प्रना
का हित साधन किया । तदनन्तर कुछ समय पीछे वन जाने की इच्छा से उन्होंने
अपने
पुत्र अवीक्षित से कहा-पुत्र | मर मेरी बृद्धावस्था है मौर मेरी मभिलाषा
बन मे रहकर भगवद् भजन करने की है, अतएव अव तुम इस राज्य को ग्रहण
कगे। मैं सभी दृतियो से अपने जीवन को सफल हुआ देख रहा हूँ अब तुम्हारा
गज्याभिषेक करने के अतिरिक्त मेरे लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रह गया है,
इस कारण मैं तुमसे इस भांति से सम्पन्न राज्य का शासक भार ग्रहण करने
का प्राग्रह करता हूं" ॥१५-२०॥
इत्युक्त पितरप्राहसोऽविभिन्नुपनन्दन ।
प्रश्रयावनतोभूत्वायियासुस्तपसेवनम् ॥२१
नाहताकरिष्यामिपृथिव्या.परिपालनम् ।
नापतिहीममनमिराज्येऽन्यत्वनियोजय ।।२२
तातेनमोक्षितोबद्धोनस्ववीर्यादयत.।
ततक्रियत्पौरपमेपुरुष पाल्यतेमहीम् ।२३
योऽनपालनायालमात्मनोऽपिवसुन्धराम् ।
सकथपालयिष्यामिराज्यमन्यत्र विक्षिप ॥२४
सस्त्रोसधर्मापुरुषोसश्चान्येतावदह्यते ।
मात्माश्मोहायभवताबन्धनाय नमोक्षित ॥२५
सोहकप भविष्यामिस्त्रीसधर्मामहीपतिः ।
स्त्रिय पुमान्भवेद्भाय शूर समहीपति ॥२६

[ मार्कण्डेय पुराण
थे
ল
पर राजकुमार प्रवीक्षित स्वय वन में जाकर तप करने थे इच्छु
उन्होने कहा-'पिताजी ! मैं राज्य का भार ले सकने में असमर्थ ह. अभी तक
मेरी पहली लज्जा की भावना दूर नहीं हुई है, इसलिये पाप इस उत्तरदायित्व
को अन्य किसी को दे । जब मैं हार कर बन्धन प्रस्त होगया और पिता के
द्वारा छुडाया गया तो मेरे पुरुपाय पोर वीरता का महत्त्व हो क्या रह गया ?
स्वय अपनी रक्षा करने में समय न हो सका तो पृथ्वी का पालन किस
तरह कर सकता है ? बुद्धिमान और धर्माचरण वाला होने पर भी जो मनुष्य
शत्रुओं से पराजित होगया, जो अपनी प्रात्मा का भी उद्धार न कर सका और
रिता की सहायता से ही जो बन्धन मुक्त हो सका, वह पुरुष कहे जाने के योग्य
नही, वह लो एक प्रकार से स्त्री हो है प्रोर कदापि राज्य करने में समर्थ नही
हो सकता ।।२१-२६॥
नभिन्नएवपुत्रस्य पितापुत्रस्तथापितुः ।
नान्येनमोक्षितोवीरयस्त्वपित्रामोक्षित ।
हृदयनान्ययानेतु मयाशक्यनरेश्वर ॥२७
हृदयेहीमातीवयस्त्वहमोक्षितस्त्वया ॥२८
पित्रोपात्ताश्रियभुक्त पित्राकृच्छात्समुद्धृत ।
विज्ञायतेचय पित्रामानव सोस्तुनोकुले ॥२६
स्वयमजितवित्तानाख्यातिस्वयमुपेयुषाम् ।
स्वयनिस्तीर्णकृच्छ्राणायागति साऽस्तुमेगति ॥३०
करन्धम ने कहा- हे वीर श्रेष्ठ, पिता और पुत्र में कोई अन्तर नहीं

महत्त चरित्र (१) ]
[ ४०७
वैभव प्राप्त करता है, स्वयं नाम कमाता है और स्वंय ही आपत्तियो से छुटकारा
पाने में समर्थ है वही सच्चा पुरुप है ॥२७-३०॥
इत्याहबहुश.पित्रायदाप्युक्त्वोऽप्यसौमुने।
तदातस्यसुतराज्येमरुत्तमकरोन्नृप ॥३१
सपित्रासमनुज्ञातराज्यप्राप्यपितामहात् ।
चकारमम्यक्सुहृदामानन्दमुपपादयन् ।।३२
राजाकधमश्चापिवीरामादायतान्तथा ।
वनजगामतपसेयतवाक्कायमानस. १३३
तत्रवर्षसहस्र सतपस्तप्रवासुदुश्चरम् ।
विहायदेहनृपति शम्यापसलोक्ताम् ।।३४
सास्यपलोतदावीरावर्षाणामपरशतम् ।
तपश्वचारविप्रजटिलामलपकिनी ।।३५
सालोक्यमिच्छतीभतु:स्वर्गतस्यमहात्मन ।
फलमूलवृताहाराभार्गवाश्रमसश्रया।
द्विजातिपत्नीमध्यस्थाद्विजशुथ पणाहता ॥३६
मा एडेयजी ने कहा--जब प्रवीक्षित ने पिता के बारम्बार पहने पर
भी राज्य भार ग्रहण करने में अपनी असमर्थता प्रकट को तो महाराज करन्धम
ने उसके पुत्र महत को राज्य मार दे दिया । भरत ने तिा की अनुमति पाकर
पितामह द्वारा प्रदत्त राज्य भार को स्वीकार किया और ऐसे मुपारु रूप से
सचालन करने लगे जिससे तनके समस्त निस्टवतियों को परम सनोप मोर मानद
हुआ। तब महाराज करधम भी अपनी पली वीरा को साथ लेकर मन, वचन,
पाया से तपस्या में निरत होने के लिये वन में चले गये वहाँ पर करन्यर के एक
हमार वपे तक कठिन तप करके देह त्याग करने पर वह इद्रलोक को प्राप्त हुए।
उनकी पत्नी वीरा देवी इसके पश्चात् भी सौ वर्ष तक तपस्या में निरत रही।
वह सदैव पन्लोर में भी पति का सामीप्य प्राप्त करने की इच्छा करती रहती

४०६ ] [ मारडेय पुराण पौर केवल फल, मूल को माहार करके भागव के प्राश्रम में हिज पनियों में साथ सेवा और सम्मान पाती हुई समय व्यतीत घरती थी ॥३१-३६।। -- ११६ --मरुत चरित्र (२) भगवन्विस्तरात्सर्वममतत्कथितत्वया । करन्धमस्यचरितमविक्षिचरितचयत १ प्राविक्षितस्यनृपनमरुत्तस्यमहात्मनः । श्रोतुमिच्छामिचरितथ यतेसोऽतेचेष्टित ॥२ चक्रवर्तीमहाभाग शूरकान्तोमहामति । धर्मविद्धर्मकृच्छ वसम्यक्पालयिताभुव ॥३ सपित्रासमनुज्ञात राज्यप्राप्यपितामहात् । धर्मत पालगामासपितापुत्रानिवारसान् ॥४ इयाजसुबहून्यज्ञान्यथावत्स्वाप्तदक्षिणान् । ऋत्विक्पुरोहितादेशादनिविएगोमहीपति ॥५ तस्याप्रतिहतचक्रमासीवीपेपुसप्तसु । गतिश्चाप्यनवच्छिन्नास्व पातालजलादिषु ॥६ तत प्राप्यधनविप्रयथावत्स्वक्रियापर । अयजत्समहायज्ञ देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥७ कोष्टुति बोले- हे भगवन् । अब मैं सूर्यवंश के राजा मरुत्त के चरित्र को सुनना चाहता हूँ, सुना जाता है कि वह अत्यन्त उद्यमी, प्रतिष्ठावान् ॥२॥ पक्रवर्ती, महाभाग, शूर, वान्त, श्रेष्ठ बुद्धि, धर्मग, धर्माचारी तया भले प्रकार से पृथिवी का पालन करने वाले थे ॥३॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-पिता की प्रामा से महत्त ने अपने पितामह से राज्य को प्राप्त विपा और प्रजा का पालन प्रपने के समान करने लगे ॥४॥ याशियों और पुरोहितो की अनुज्ञा पूर्वक | मार्कण्डेय पुराण समस्त यज-स्थान और स्वर्णमय उज्ज्वल भवनों का निर्माण हुआ था ॥१३।। इन महत्त के चरित्र को आधार बना कर ऋषिगण सदा इनका वृत्तान्त कीर्तन करते और इनके चरित्र का अध्ययन करते थे ॥१४॥ मरुत्तनसमोनाभूधजमानोमहीतले । सद समस्तयद्यज्ञ प्रासादाश्च वकाचना ॥१५ प्रमाद्यदिन्द्र सोमेनदक्षिणाभिर्द्विजातय. । विप्राणापरिवेष्टार शकाद्यास्त्रिदशोत्तमा ॥१६ यथायज्ञ मरुत्तस्यतृप्मा सर्वेमहीपते । सुवरणमखिलत्यक्त रत्नपूर्णगृहेद्विजं ॥१७ प्रासादादिसमस्तचसौवर्णतस्ययत्क्रती। अयोवर्णाह्यलम्यन्ततस्मात्केचित्तथाददु ॥१८ (तेन त्यक्ते नशिष्टायेजना पूर्णमनोरथा । तपियज्ञान्यजतेस्मदेशेदेशेपृथक्पृथक् ।) यस्यवकुर्वतोराज्यसम्यक्पालयतःप्रजा । तपस्वीकश्चिदम्येत्यतमाहमुनिसत्तम ॥१६ पितुर्मातातवाहेददृष्ट्वातापसमण्डलम् । विषाभिभूतमुरगमोन्मत्त रेश्वर ॥२० पितामहस्तेस्वर्यातःसम्यक्सपाल्यमेदिनीम् । पितातवतथाशक्तोहित्वाग्रामवनगत । (तपश्चरणशक्ताऽहमिहचौथिमेस्थिता ) ॥२१ जिनके यज्ञ में समस्त सभा भवन एव प्रासाद स्वर्णमय बनाये गये थे, इन्द्र सोमपान करके पोर प्राह्मण दक्षिणा को प्राप्त करके मत हो उठे थे, सब प्रधान देवतामों ने प्राणों को पेर रखा था, उन मरुत्त पे समान पश करने वाला कोई पुरुष पृथियो पा उत्तर नहीं मा ॥१५-१६।। ब्राह्मणों ने जितनी नमय गृह और स्वर्ण रागि उन महत्त के पग में प्राप्त की थी उतनी अन्य रिसर में भी उगी के समय में माह्मण, क्षत्रिम, यश्य तीनों वर्ग स्वयं मय भवनदिको पासरे पे, उनसे मतिरित ऐगा दान पोर रिस पुष्प मे 'मात्त चरित्र (२)] किया है २॥१८॥ उनके धन को प्राप्त कर जो मनुष्य पूर्ण काम हुए, उन्होंने भी अपने द्वारा समस्त यज्ञों का सम्पादन किया था) हे मुनिवर । उनके इस प्रकार के बेष्ट राज्य शासन, एव प्रथा पालन काल में एक दिन एक तपस्वी उनके पास पाकर बोला ॥१६॥ है राजन् 'तुम्हारी पितामही ने तापस मडली को मदोन्मत्त सो के विप से पीडित होता हुआ देखा और यह सदेश भेजा है ॥२०॥ तुम्हारे पितामह भले प्रकार से पृथिवी का पालन करने के कारण स्वयं को प्राप्त हुए हैं और तुम्हारे पिता ने भी वन का माधय लिया है (मैं भी तप में मासक्त होकर और्वाश्रम में स्थित हूँ) ॥२१॥ साहपश्यामिर्वकल्यतवराज्यप्रशासत । पितामहस्यतेनाभूद्यत्पूर्वेषाचतेनृप १२२ नूनप्रमत्तोभोगेपुसक्तोवाऽतिजितेन्द्रिय । चारान्धतायतोस्तीयदुष्टादुष्टनवेत्सियत ॥२३ पातालादम्युपेतेस्तुभुजगंदंशशालिभि । दष्टामुनिसुता सप्तदूपिताश्चजलाशयाः ॥२४ स्वेदमूत्रपुरीपेरणदूषितसुशृतहवि । अपराधसमुद्दिश्यदत्तोनागवलिश्विराव ।।२५ एतेसमर्यामुनयोभस्मीक भुजगमान् । किन्त्वेपानाधिकारोऽत्रत्वमेवात्राधिकारवान् ॥२६ तावत्सुखभूपतिज गजप्राप्यतेनृप । अभिषेकजलयावन्नमूनिविनिपात्यते ॥२७ हे राजन् । जो घटनाएं तुम्हारे अन्यान्य पूर्व पुरुषों के शापन काल में पर्टी, उन्हें तुम्हारे शासन काल मे घटती हुई देख रहा हू ॥२२॥ तुम या तो प्रमत्त हो अथवा प्रतिन्द्रिय रहकर भोगों के प्रति अनुरक्त हुए हो, तुम दूनों को न रखने के कारण मच्छी-बुरी घटनामो को जानने में समय नहीं हो ।२३। दशनशील नागों ने पातात से आकर सात मुनि कुमारों को डम लिया है तथा स्वेद, यून मोर पुरीष से सब जलादाय और यज्ञ हदि को दूषित कर दिया है, इसलिये अपराध हुआ जानकर मुनिगण सों को बलि दे रहे हैं ।।२४-२५॥

[ माण्डेय पुरण यद्यपि यह मुनिगण सों को स्वय हो भस्म पर साते हैं, परन्तु उस कार्य के तुम्ही अधिकारी हो ॥२६।। हे राजन् । राजपुत्रो को भोग जनित मुख के भोगने का अधिकार तभी तक है, जब तक उनके शोश पर अभिषेक का बल नहीं सोचा जाता ॥२७॥ कानिमित्राणिक शत्रुर्ममशयोवलवियत कोऽहकेमन्त्रिण पक्षेकेवाभूपतयोमम ॥२८ ( कियानकोशोवलकिंवाकोनुरक्तोजनोमम ) । विरक्तोवापरैभिन्न परेषामपिकीदृश । क सम्यगत्रनरेविषयेवाजनोमम ॥२६ धर्मकर्माश्रयोमूढ क सम्यग पिवर्तते । कोदण्डच परिपाल्य क केचोपेक्ष्यानरामया ॥३० सामभेदतयादम्यादेशकालमवेक्षता । चाराश्वचारयेदन्यैरज्ञातान्भूपतिश्चरं ॥३१ सचिवादिषुसर्वेपुचरान्दद्यान्महीपतिः । इत्यादौभूपति त्यकर्मण्यासक्तमानसः ॥३२ नयेद्दिनतथारातिनतुभोगपरायण । राज्ञाशरीरग्रहणनभोगायमहीपते ॥३३ मित्र कौन है ? शत्रु कौन है ? शत्र के पास कितनी शक्ति है ? कौन मत्री वैसा है ? कौन राजा अपने पक्ष का है ? ॥२८॥ (मेरे पास कितना कोष है? कितनी शक्ति है | कौन मुझसे प्रीति करता है } शत्र के द्वारा भेद को किसने पा लिया है ? कौन शत्र किस प्रकार का है ? अपने नगर अथवा राज्य मे धर्म-कर्म का मात्रय लेने वाला कौन है ? ॥२६॥ कौन मूर्ख रहना है ? कौन दडनीय है ? कौन पालनीय मोर कोन उपेक्षणीय है ? ॥३०॥ छिद्र भेद के भय से किसके प्रति दृष्टि रखनी चाहिये । इस सबका ज्ञान करने के लिये दून के प्रपरिचित गुप्तचर को नियुक्त करना उचित है ॥३१॥ सब सचिवादि पर दृष्टि रखने के लिये भी दूत को नियुक्ति बरे, इस प्रकार राज्य काज के प्रति गजामा दत्तचित्त होना चाहिए ॥३२॥ इसी में दिन-रात्रि व्यतीत करे मोर ?

मरुत्त चरित्र (२) ।
-~-
भोग-परायण न हो,हे राजन् ! गजानों का जन्म भोग के लिये नहीं होता है ३३
क्लेशापमहतेपृथ्वीस्वधर्मपरिपालने ।
सम्यक्पालयतःपृथ्त्रीस्वधमंचमहीपतेः ॥३४
इहक्लेशोमहान्स्वर्गपरमसुखमक्षयम् ।
तदेतदवबुध्यस्वहित्वाभोगानरेश्वर ॥३५
पालनायक्षिते क्लेशमङ्गीक मिहाहंसि ।
इतिवृत्तपोणायद्वयसनत्वयिशासति ॥३६
भुजङ्गहेतुकभूपचारान्धोनापिवेत्सितत् ।
वहुनाकिमुक्त नदुप्टेदण्डोनिपात्यताम् ॥३७
शिष्टान्पालय राजस्वधर्मपड़भागमाप्स्यगि ।
अरक्षन्पारमखिलदुप्टरविनयात्कृतम् ॥३८
समवाप्स्यस्यसन्दिग्धंयदिन्छसिकुरप्वतन् ।
एतन्मयोक्तसक्लयत्तवाहपितामही ।
कुरुप्वेवंस्थितेयत्त रोवतेवमुशधिप ॥३६
पृथिवी का पालन पोर अपने धर्म का पालन करने के लिये उन्हें तो
महाकष्ट हो भोगने होते हैं, उन्हें अपने धर्म और पृथिवी के पालन से ॥३॥
इस जन्म मे अत्यन्त नतेश भोग लेने पर परलोर में उन्हें प्रश्य सुन की प्रालि
होती है, है राजन् ! इस पर विचार करके और भोग का परित्याग करके
॥३५॥ तुम्हें पृथिवी का पालन करने के लिये क्लेश को अंगीकार करना चाहिये,
तुम्हारे शासनकाल में ऋषियों को सर्पो से जो भय उपस्थित हुमा है ॥३६॥
उम भय को दूनों के न होने के कारण ही जानने में समर्थ नहीं हुए. हे राजन् !
सुम दुष्टों को दरिल करो ॥३७॥ मोर शिष्टजनों का पालन करो, इसमे धर्म के
पठ माग की प्राप्ति होगी, दुष्टगए जिम उहाडना को करते हैं, उमसे मरजनों
भी रा न करोगे तो तुम अवश्य ही पाप के भागी होगे, अब तो
पत्तव्य समझो, वह रो. हे राजन् ! मैं तुम्हारी पितामही, इसीलिये ऐमा
पहा है, अब तुम्हें जो उचित प्रतीत हो, वही बरो॥३॥

| माण्डेय पुराण ११७ -मरुत्त चरित्र (३) इतितापसवाक्यसथ त्वालज्जापरोनृपः। घिड्माचारान्धमित्युक्त्वानि.श्वस्यजगृहेधनु ॥१ तत सत्वरितगत्वाखल्वोर्वस्याश्रमप्रति । ववन्देशिरसावोरामातरपितुरात्मन ॥२ तापसाश्वयथान्यायतश्वाशीभिरभिष्टुत । दृष्ट्वाचतापसान्सप्तनागदष्टान्मृतान्भुवि ॥३ निनिन्दात्मानमसकृत्पुरस्तेपामहीपति । उवाचचैतदद्यामद्वीर्यमवमन्यताम् ॥४ यत्करोमिभुजङ्गानादुष्टानाबाह्मणद्विषाम् । तत्पश्यतुजगत्सर्वसदेवासुरमानुषम् ॥५ इत्युक्त्वाजगृहेकोपादस्त्रसवर्तकनृप । नाशायाशेषनागानापातालो/विचारिणाम् ।।६ सतोजज्वालसहसानागलोक:समन्तत । महास्त्रतेजसाविप्रदह्यमानोनिवारित ७ मार्कण्डेयजी ने कहा-तापस की बात सुनकर राजा लज्जित हुए और "मुझ प्राचारान्ध को धिक्कार है' ऐसा कहते हुए हाथ मे धनुप उठाया ॥१॥ और प्रत्यन शीघ्रतापूर्वक मौर्वाश्रम मे जाकर नत मस्तक हो सपनो पितामही वीरा ॥२॥ पोर तपस्वियो को प्रणाम किया, उन्होने भी राजा को माशीर्वाद दिये, फिर राजा ने सर्पदश से मरे हुए सात तपस्वियो को पृथिवी म पड़े देखा ॥३॥ राजा ने मुनियो के समक्ष बारम्बार अपनी निन्दा की भोर बाले-~यह दुष्ट नाग मेरे बल के तिरस्कार पूर्वक ॥४॥ ब्राह्मणो से द्वेप करते हैं इसलिये अब मैं उनकी जो दवा परता है, उसका देवता, दैत्य मोर सम्पूर्ण विश्व प्रव- लोक्न करे ॥५॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-ऐसा कहकर राजा ने पाताल मौर पृथिवी में रहने वाले सव नागों को नष्ट करने के उद्देश्य से संवर्तन अस्त्र को मस्त चरित्र (३) । हाम म उठाया ॥६॥ उस समय इस महा प्रस्त्र के क्षेत्र से समस्त नागलोक प्रकाशमान हो उठा और भस्म होने लगा ॥७॥ हाहातातेतिहामातहाहावत्सेतिमभ्रमे । तस्मिन्नस्त्रकृतेवाच पन्नगानामथाभवन् । केचिज्ज्वलद्धि पुच्छा फरसैरन्येभुजङ्गमा । गृहीतपुत्रदाराश्वत्यक्ताभरणवासस 16 पातालमुत्सृज्यययु शरणभामिनीतदा । मरुतमातर पूर्वययादत्ततदाभयम् ।।१० तामुपेत्योरगा सर्वेसप्रमाणभयातुरा । सगद्गदमिदमोचु स्मर्यतान पुरोदितम् ॥११ प्रणम्याणितपूर्वयदस्माभीरसातले । तस्यकाऽलोऽयमायातस्त्राहिवारप्रजायिनि ।।१२ पुत्रोनिवार्यताराशिप्रारणे सयोज्यमस्तुन । दह्यतेसक्लोलोकोनागानामस्त्रवह्निना ॥१३ एवसदह्यमानानामस्माकतनयेनते। स्वामृतेशरणनान्यत्कृपाकुरुयशस्विनि ॥१४ इम अस्त्र के भय से भीत हुए नागगण माता, तास, वत्स प्रादि पुकारते हुए चीत्कार करने लगे || किसी की पूछ मोर किसी का फल दग्य होने किसी ने वस्त्राभरणो को परित्याग कर स्त्री पुत्र सहित ॥६पाताल- लोक को छोड़ राजा मरुत्त की माता भामिनी को शरण ग्रहण की, क्योकि उसने इनको कभी अभय दान दिया था ॥१॥ सभी नाग उसके समक्ष उप- स्थित होकर गद्गद वचनो से कहने लये-आप रसातल मे हमारे द्वारा की हुई प्रार्थना का स्मरण करिये, उसके निर्वाह का यही समय है, माप हमारी रक्षा करिये ॥११-१२|| हे राजमाता । अपने पुत्र को रोक कर हमारे प्राणो को रक्षा करिये, समस्त नागलोक उनके प्रखो से उत्पन्न मग्नि से भस्म हुमा जाता है ॥१॥ हे यशस्विनी । मापका पुत्र इस विधि से हमे जलाता है, इम- लगा, । मावण्डेय पुराण लिए मापके म-िरिक्त मन्य किसी की शरण हम नहीं ले सकते, पाप हम पर दया करे ॥१४॥ इतिश्रुत्वावचस्तेपासस्मृत्यादीचभापितम् । भर्तारमाहसासाध्वीससभ्रममिदवच ॥१५ पूर्वमेवतवाख्यातपातालेयद्भुजङ्गमं । प्रोक्तमभ्यर्थनापूर्वममासीत्तनयप्रति ।।१६ तइमेऽभ्यागताभीतादह्यन्तेतस्यतेजसा । मामेतेशरणपूर्वदत्तमेम्योमयाभयम् ॥१७ येमाशरणमापन्नास्तत्वाशरणमागता । अपृथग्धर्मचरणायाताहशशरणतव ॥१८ तनिवारयपुत्रत्वमरुत्त वचनात्तव । मयाचाभ्यथितोऽवश्यशममभ्युपयास्यति ॥१६ महापराधेनियतमरत्त क्रोधमागत । दुनिर्वयंमहमन्येतस्यक्रोधसुतस्यते ॥२० मार्कण्डेयजी ने कहा-सपो के करुणापूर्ण वचन सुन कर उस साध्वी स्त्री को सपों को दिया अपना अभय वचन स्मरण हो पाया तो वह सभ्रम- सहित अपने स्वामी मे बोली ||१५॥ मानिनी ने कहा- पाताल स्थित सपगणो ने विनय-पूर्वक जो कुछ मेरे पत्र के सम्बन्ध मे कहा वह पूर्व ही मैंने मापसे वर्णन किया ।।१६।। वही मपंगण इस काल मेरे पुत्र तेज के कारण दग्ध हुए जाते हैं मैंने पहले ही इन्हे अभय-वर दिया था इसलिए भयभीत होर वे मेरी शरण मे माये हैं ॥१७॥ जो मेरी शरण में पाये हैं वे प्रापके भी शरणागत हैं क्योकि एक धर्माचरण के कारण मैं अपनी शरणागत हुई हूँ ॥१८॥ इसलिए माप पुत्र मरुत को रोकिये । आपके आदेश मोर मेरे पाग्रह से वह निश्चित ही शान हो जायगा ॥१६॥ प्रवीक्षित बोले-इनकी सदैव अपराधी प्रवृत्ति के बारणवश हो मरत कोधित हुमा है इस कारण तुम्हारे पुत्र या क्रोध सरलता से शान्त हो जायगा, ऐसा प्रतीत नहीं होता ।।२०।।

मस्त चरित्र (४) 1 भरणागतास्तववयप्रसाद क्रियतानृप । क्षत्रस्यातपरित्राणनिमित्त शस्त्रधारणम् ॥२१ नागानांतद्वच श्रुत्वाभूतानाशरण पिणाम् । तयाचाम्यथित.पल्याप्राहावीक्षिन्महायशाः ॥२२ गत्वाबवीमितंभनेतनयंत्वरयातव । परित्राणायनागानानत्याज्या:शरणागता. ॥२३ मोपसहरतेसोस्त्रयदिमद्वचनान्नृपः । तदास्त्रंर्वारयिष्यामितस्यास्त्रतनयस्यते ॥२४ ततोगृहीत्वासधनुरविक्षिक्षत्रियोत्तमः । भाव्यासहितःप्रायात्वरावान्भार्गवाथमम् ॥२५ सर्प बोले-हे राजा ! हम अापके शरणागत हैं, आप हम पर कृपा करिये, क्षत्रिय मनुष्प सदैव त्रसित मनुष्यों की रक्षायं ही प्रस्न ग्रहण करते हैं ।।२१ मार्कण्डेयजी ने कहा-यशस्वी प्रवीक्षित ने पत्नी का निवेदन प्रौर शरण में पाये सर्षों के वचन सुनकर कहा-॥२२॥ हे भट्टै । मैं तुरन्त हो तुम्हारे पुत्र मरत के निकट जाकर नागो की रक्षा हेतु उममे कहना हू, शरण मे पाये को शरण न देना कभी उचित नहीं है ॥२३॥ यदि तुम्हारा पुत्र राजा मन मेरे कहने पर हो अस्त्र त्याग नहीं करेगा तो मैं उसके विरुद्ध प्रस्त्र का प्रयोग करूंगा ॥२४॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-इसके पश्चात् नग्धीक्षित धनुष धारण करके भार्या को सग लेकर भार्गवायम गये ॥२५॥ ११८मत चरित्र (४) सतुतत्रसुतं दृष्ट्वागृहोतवरकामुकम् । धनुःशस्त्रचतस्योग्रंज्वालाव्याप्तदिगन्तरम् ॥१ उद्गिरन्तमहावह्निदीपिताखिलभूतलम् । 'पासालान्तर्गतंप्राप्तममा चोरनापरणार

an
४१८
| माई एडेय पुराण
सत दृष्ट्वामहीपालभृकुटीकुटिलाननम् ।
माफ धस्त्वमरुत्तास्यमुपसह्नियतामिति ॥३
माहास कच्चानुलुसवर्णक्रममुदागधी ।
सनिशम्यगुरोवक्यिदृष्ट्वातचपुन पुनः ।।४
गृहीतकामुक पित्रो.प्रणिपत्यसगौरवम् ।
प्रत्युवाचापरादामेसुभृशपन्नगाःपिता ॥५
शासतीमामयिमहीपरिभूयरलमम ।
सप्ताश्रममुपागम्यदष्टामुनिकुमारकाः ॥६
ऋषीणामाश्रमस्थानाममोपामवनीपते।
मयिशासतिदुर्वृत्तं दूषितानिहदीपिच ॥७
मार्कण्डेय जी ने कहा-वीक्षित ने वहाँ माकर देखा कि महल धनुष
पर शस्त्र चढाये हुए हैं, जिस की तीन ज्वाला से समस्त दिशामएडल प्रकाशित
है ।।१उस उग्र शस्त्र में से तीव्र अग्नि उत्पन्न होकर पृथ्वी को प्रदीप्त कर
रही है, जो कि अत्यन्त भोपण व मसहनीय है एवं पाताल तक पहुच रही
है ॥२॥ यह देख कर कि महीप महत की मुखाकृति व भ्रकुटि कुटिल हैं, तो
थे वोले-हे मरुत ! अस्त्र त्याग दो और क्रोध समाप्त करो ॥३॥ बार बार
इस प्रकार कह कर जब चुप हो गये तो उस बुद्धिमान मरुत ने उनकी पोर
देख कर ॥४॥ पिता व माता दोनों को प्रणाम सहित प्रादर पूर्वक बोला-
हे पिता । यह सर्पगण मेरे घोर अपराधी हैं ॥५॥ मेरे पराक्रम की भवेहलना
कर इन्होंने मेरे राज्य-काल में माश्रम में प्राकर सात मुनिकुमारो को काटा
-

मस्त चरित्र () I नाहमेपक्षिमिष्यामिदुष्टानामपराधिनाम् । अहमेवगमिष्यामिनरकयदिपापिनाम् । ननिग्रहेयताम्येपामानिवारयमापित ॥१. मामेतेशरणप्राप्ता.पत्रगाममगौवाद । उरसंहियनामस्त्रमल कोपेनतेनृप ।।११ नाहमेपाक्षमिष्यामिदुप्टानामपराधिनाम् । स्वधर्ममुल्लध्यकथकरिष्यामिवचस्तव ॥१२ दण्डयो निपातयन्दण्ड भूपःशिष्टाभ्रपालयन् । पुण्यलोकानवाप्नोतिनर काश्चाप्युपेक्षणात् ।।१३ इसलिए मार इन सगरो के विषय में कुछ भी न कहे और ब्रह्म- हत्यारे न गों के संहार-कार्य से मुझे न » वीक्षित बोले-~-यदि उन्होंने ब्रह्म-हत्या की है तो मरने के परमात् नरक को जायेंगे किन्तु तुम पात्र का प्रयोग न करक मेरे वचन की रक्षा करो मस्त बोले-यदि इन पापियो पर नियन्य का यत्न छोट तो मुझे ही नक को प्राप्ति होगी, इम. लिए हे पिता जी आप मुझे उनके सहार से मत रोकिये, मैं इन दुःो को क्षमा नही करना चाहता ॥१०॥ मीक्षित बोले-यह नाग में शरण को प्राप्त हुए हैं, इसलिए मेरे गौरव की रक्षा के निमित प्रोष छोड कर सम्म त्याग दो ॥१॥ मरुत बोले-इन दुको मैं क्षमा करके अपने धर्म का उल्लघन कैसे कह मोर मापके वचन को कैसे निभाऊ ॥१२॥ दड योग्य जीवो क दड देकर भौर शिE पुरुषों का पालन करके ही राजा पुण्य लोक को प्राप्त होते हैं पन्यथा उन्हें नर्क की प्राप्ति होती है ॥१३॥ एक्सबहुश पत्रावार्थमागोम्बयासह । नोपसहरतेसोऽस्त्रततोऽसौपुनरद्रवीत् ॥१४ हिससेपनगान्मीतान्ममताञ्छरणगतान् । वार्यमाणोऽपितस्मात्तेकरिप्यामिप्रतिक्रिया ।।१५ माप्यस्त्राध्यवासानिनत्वमेकअविद्भुवि । ममाग्रतःसुदुत्तारुपञ्चकियत्तव ॥१६

४२० ]
। माकण्डेय पुराण
तत कामुकमारोप्यकोपताम्रविलोचन ।
अविक्षिदस्त्रजग्राहकालस्यमुनिपुङ्गव ॥१५
ततोज्वालापरीवारमनिसघनमुत्तमम् ।
कालास्त्रतुमहावीर्ययोजयामासकामुके ।।१८
ततश्चुक्षोभजगतीसवत्तस्त्रिप्रतापिता ।
साधिशलाऽखिलाविप्रकालस्यास्त्रसमुद्यते ॥११
कालास्त्रमुद्यतपित्रामरुत्त सोऽपिवीश्यतत् ।
प्राहोच्च रस्त्रमेतन्मेदुष्टशास्तिसमुद्यतम् ।।२०
नत्वद्वधायकालास्त्रमयिमु चतिविभवान् ।
स्वधर्मचारिरिगसुतेसदेवाज्ञावरतव ॥२१
माकरडेय जी ने कहा-पिता के द्वारा बारम्बार निषेध किये नाने पर
भी मस्त ने जब अस्त्र का परित्याग नहीं किया तब मवीक्षित ने उनसे पुन
पहा ॥१४॥ ये नाग भयभीत होकर मेरी शरण को प्राप्त हुए मरे द्वारा निवा.
रए ये पाने पर भी तुम इनकी हिंसा म प्रवृत्त हो, इसलिए मैं इसका
प्रतिकार करूंगा ॥१॥ पृथ्वी पर एक्मान तुम्हीं पस्त्र विज्ञातर नहीं हो, मैंने
Tamu माय है।

मरुन चरित्र (४)
[ ४२१
शरणागतसत्राणकतुं व्यवसितावयम् ।
तस्यव्याघातकर्तात्वनमेजीवन्विमोक्ष्यसे ॥२३
मावाहत्वास्त्रवीर्येराज हिंदुष्टानिहोरगान् ।
स्वावाहत्वाऽहमस्त्रेणरक्षिध्यामिमहोरगान् ॥२४
धिक्तस्यजीवितपु स शरणार्थिनमागतम् ।
योनार्तमनुगृह्णासिर्वरिपक्षमपिघ्र वम् ॥२५
क्षनियोऽहमिमे भीता शरणमामुपगता ।
अपकत्विमेवपाकथवध्योनमेभवान् ॥२६
मित्रत्रावान्धवोवाऽपिपितावायदिवागुरु ।
प्रजापालनविघ्नाययोहलव्य सभूभृता ॥२७
सोऽहन्तेप्रहरिष्यामिनकोद्धव्यत्वयापित ।
स्वधर्म परिपाल्योमनास्तिक्रोवस्तवोपरि ॥२८
है महाभाग । प्रजा पालन ही मेरा परम कर्तव्य है, फिर पाप मेरे
सहार के लिए इस प्रकार के अस्त्र को क्यों प्रयुक्त करते हैं ।।२२।। प्रवीक्षित
बोले-मैंने शरणागतों की रक्षा का दृढ निश्चय किया है, तुम उस कार्य में
विघ्न उपस्थित करते हो इसलिए तुम मेरे जीवित रहते रक्षा नही प्राप्त कर
सक्ते ॥२३॥ इस काल या तो तुम्ही मुझे अस्त्र दल से मार-कर दुष्ट नागो
को मार डालो या मैं ही अस्त्र की सहायता से तुम्हारा वध करके इन सो
की रक्षा करूंगा ।।२४ा जो शत्रु पक्ष के मनुष्य भी प्रातं होकर शरण ग्रहण
करें उनकी रक्षा न करने वाले पुरुष के जीवन को धिक्कार है ॥२५॥ मैं
क्षत्रिय हू. भयभीत होकर मेरी शरण में प्राय हैं और तुम्हीं इनका अपकार
करते हो, इसलिये तुम मेरे द्वारा मारे जाने योग्य क्यो नहीं हो ॥२६॥ मरुन
बोले-मित्र, वन्धु, पिता अथवा गुरु भी यदि प्रजा के पालन म विघ्न उपस्थित
करे तो राजा के द्वारा वध किये जाने के योग्य है ॥२५॥ इसलिए हे पिता ।
में प्राप पर जो प्रहार करू', उमसे पाप क्रोधित न हो, मैं अपने धर्म के पालन
के लिये ही ऐसा करने को तत्पर हुमा हूँ। यह मेरा क्रोप मापके प्रति
नही है ॥२८॥

४२० ] 1 मावंण्डेय पुराण तत कामुकमारोप्यकोपतानविलोचनः । प्रविक्षिदस्त्रजग्राहकालस्यमुनिपुङ्गवः ॥१५ ततोज्वालापरीवारमनिसघनमुत्तमम् । कालास्त्रतुमहावीर्ययोजयामासकामु के ॥१८ ततश्चुक्षोभजगतीसवर्तास्त्रप्रतापिता । साधिशलाऽखिलाविप्रकालस्यास्त्रेसमुद्यते ॥१६ कालास्त्रमुद्यतपित्रामरुत्तःसोऽपिवीक्ष्यतत् । प्राहोच रस्त्रमेतन्मेदुष्टशास्तिसमुद्यतम् ।।२० नत्वद्वधायकालास्त्रमयिमु चतिकिमवान् । स्वधर्मचारिरिंगसुतेसदेवाज्ञाकरेतव ।।२१ जो ने कहा-पि के द्वारा बारम्बार निषेध किये जाने पर भी मरुत ने जब अस्त्र का परित्याग नहीं किया तर प्रवीक्षित ने उनसे पुन: कहा ॥१४॥ ये नाग भयभीत होकर मेरी शरण को प्राप्त हुए मेरे द्वारा निवा. रण किये जाने पर भी तुम इनकी हिंसा में प्रवृत्त हो, इसलिए मैं इसका प्रतिकार करूंगा ।।१।। पृथ्वी पर एकमात्र तुम्ही प्रस्त्र विनाता नहीं हो, मैंने भी अनेक प्रस्त्र प्राप्त पिये हैं, मेरे सामने तुम्हारा पौरुप नगएप है ॥१६॥ है मुनिश्रेष्ठ ! प्रवीक्षित ने ऐसा कह कर क्रोध से ताम्रवणं नेत्र कर धनुष उठा पर कालास्न ग्रहण किया ॥१७॥ ज्वाला से परिपूर्ण सत्रुमो के नाश करने थाला यह थेष्ठ कालास्त्र धनुष पर चढाया ॥१८॥ हे ब्रह्मन् ! मरुत के सवतं. कास्त्र से तप्त हुए पर्वत एव समुद्र से युक्त सम्पूर्ण विश्व कालास्त्र के संघान से सोम को प्राप्त हुमा ||१६|| मरुत भी धनुष पर चढ़ाये हुए उस कालास्त्र को देख कर उच्च स्वर में बोले-मेरा सवत्त कास्त्र दुष्टो का समन करने के लिए तत्पर हुमा है ।।२०।। वह आपके हनन के लिए नहीं है, तो फिर सदा सत्पथ सामाश्रय लेने वाले भोर मनी माज्ञा-पालन में तत्पर रहने वाले पुत्र के प्रति आप इस बालास्त्र को क्यों छोड़ते हैं ॥२॥ मयाकार्यमहाभागप्रजानापरिपालनम् । स्वयंवप्रियतेवृस्मान्मदधायास्त्रमुद्यतम् ॥२२

मरुत चरित्र (४) ]
। ४२१
शरणागतसत्राणकतुव्यवसितावयम् ।
तस्यव्याघातकर्तात्वनमेजीवन्विमोक्ष्यसे ।।२३
मावाहत्वास्त्रवीर्यजहिदुष्टानिहोरगान् ।
त्वावाहत्वाऽहमस्नेगरक्षिध्यामिमहोरगान् ।।२४
धिक्तम्यजीवितपुंस शरणार्थिनमागतम् ।
योनार्तमनुगृहासिवैरिपक्षमपिध्रुवम् ॥२५
क्षनियोऽहमिमेमीता शरणमामुपगता ।
अपकर्तात्वमेवैपाकथंवघ्योनमेभवान् ॥२६
मित्रयावान्धवोवाऽपिपितावायदिवागुरु ।
प्रजापालन विघ्नाययोहन्तव्य सभूभृता ॥२७
सोऽहन्तेप्रहरिप्यामिनकोद्धव्यत्वयापित ।
स्वधर्म परिपाल्योमेनास्तिकोवस्तवोपरि ॥२८
है महाभाग । प्रजा पालन हो मेरा परम क्तव्य है, फिर भाप मेरे
सहार के लिए इस प्रकार के प्रस्त्र को क्यों प्रयुक्त करते हैं ।।२२।। प्रवीक्षित
बोले-मने शरणागतो को रक्षा का दृढ निश्चय किया है, तुम उस कार्य में
विघ्न उपस्थित करते हो इसलिए तुम मेरे जीवित रहते रक्षा नहीं प्राप्त कर
सक्ते ॥२३॥ इस काल या तो तुम्हीं मुझे प्रस्त्र बल से मार-कर दुष्ट नागो
को मार डालो या मैं ही अस्त्र को सहायता से तुम्हारा वध करके इन सो
की रक्षा करूंगा ॥२४॥ जो शत्रु-पक्ष के मनुष्य भी प्रार्त होकर शरण ग्रहण
करें उनकी रक्षा न करने वाले पुरुष के जीवन को धिक्कार है ॥२५॥ मैं
क्षत्रिय हू, भयभीत होकर मेरी शरण में पाये हैं और तुम्ही इनका भपकार
करते हो, इमलिये तुम मेरे द्वारा मारे जाने योग्य क्यो नहीं हो ॥२६॥ मरुत
बोले--मित्र, बन्धु, पिता प्रयवा गुरु भी यदि प्रजा के गलन में विघ्न उपस्थित
परे तो राजा के द्वारा वध किये जाने के योग्य है ॥२५॥ इसलिए है पिता !
में प्राप पर जो प्रहार कर, उमसे प्राप क्रोधित न हो, मैं अपने धर्म के पालन
के लिय ही ऐमा करने को तत्पर हुमा हूं। यह मेरा क्रोष प्रापरे प्रति
नहीं है ॥२८॥

४२२ ।
। मावएरेय पुगए
तमस्तौ नश्चितोदृष्ट्वापरस्परवधप्रति ।
समुत्पत्यान्तरेतस्थुमुनयोभार्गवादयः ।।२६
जवुरचननमोक्तव्यत्ययास्त्र पितरप्रति ।
त्वयाचनायहन्तव्य पुत्र प्रख्यातचेप्टितः ॥३०
मयादुटानिहन्तव्या.सन्तोरध्यामहोक्षिता ।
इमैचदुष्टाभुजगा कोपराधोऽत्रमद्विजा ॥३१
शरणागतसन्त्राणमयाकार्यमयञ्चमे ।
अपराध्यासुतोविप्रायोहन्तिशरणागतान् ।।३२
इमेवदन्तिभुजगास्त्रासलोलविलोचना ।
सजीवयामस्ताविप्रान्येदष्टादुष्टपन्नगः ।।३३
तदल विग्रहेणोभौराजवयाप्रसीदताम् ।
उभावपिनिव्यूढप्रतिज्ञधर्मकोविदो ॥३४
सस्तुबीरासमयेत्यपुत्रमेतदझाएत ।
महापादेषतेपुत्रोहन्तु नागान्कृतोद्यमः ।।३५
तन्निप्पन्नयदाविप्रास्तेजीवन्तितथामृता ।
सजीवन्तश्चामुच्यन्तेयधु मच्छरण गताः ॥३६
मार्कण्डेय जी ने कहा- उन दोनो को परस्पर सहार करने में
प्रवृत्त
देख कर भार्गवादि मुनि शीघ्र पाकर दोनो के मध्य खडे हो गये ॥२६।। और
मरुत से कहा-पिता के ऊपर प्रस्त्र चलाना किसी प्रकार भी उचित नहीं
है और प्रवीक्षित से कहा कि आपको भी इस श्रेष्ठ कर्मा पुत्र को नष्ट करना
मनुचित है ।।३०।। मरुत बोले- हे द्विजो । मैं राजा है, दुष्टों का वध करना
मौर शिष्ट जनो का पालन करना मेरा परम कर्तव्य है । ये नाग भी दुष्ट हैं,
इमलिये इनके विषय में मेरा क्या अपराध है ॥३१॥ प्रवीक्षित बोले-हे
विप्रो । शरणागतो की रक्षा करना मैं अपना कर्तव्य मानता जो पुत्र मेरे
शरणागतो का वध करने को तत्पर है, वह मेरा अपराधी है ॥३२॥ ऋपि
बोले--भय से च चल नेत्र हुए भुजगो ने कहा कि जिन ब्राह्मणो को दुष्ट नागो
ने डम लिया है, हम उनको जीवित कर रहे हैं 1॥३३॥ इमलिये प्रब युद्ध की

मस्त चरित्र (४) J [ ४२३ मावश्यक्ता नही रह गई, माप दोनो ही राज श्रेष्ठ, धर्मशानी पोर प्रतिज्ञा. पालक है, पाप प्रसन्न हों ।।३४॥ मार्कण्डेयजी ने कहाभी वीरा ने भाकर पपने पुत्र प्रवीक्षिन से कहा कि मेरे कहने से ही तुम्हारा पुत्र सो को नष्ट करने मे तर हुमाया ॥३५॥ मोर प्रब जब ये मृतक ग्राहा ग जीवित हो रहे हैं, तव उमका काय भी सम्पन्न होगण मौर तुम्हारे ये शरणागत भी मुक्त हो गय ॥३॥ सहमभ्यथितापूर्वमेभि पातालसथय । तन्निमित्तमयमामपाप्रविनियोजित ॥३७ तदतदायेंनिवृत्तमुभयोर पिशोभनम् । ममभतुंश्चपुनस्यत्वत्पत्रिस्यार जस्यच ॥३८ तत सजीरयामासुस्तान्विप्रास्तेभुजङ्गमा । दिध्यरोपधिजातंश्वविपसहरणेनच ॥३६ पित्रोननामचरणोसततोजगतोपति । मरुत्तश्चमतप्रीत्यापरिप्वज्येदमब्रवीत् ।।४० मानहामवशरणाचिरपालयमेदिनीम् । पुत्रपौगंश्चमोदस्वमाचतेसन्तुविद्विप ॥४१ ततोद्विजैरनुशातीवीरयाचनरेश्वरी। ममास्ढोरपसाचमामिनीस्वपुरङ्गता ४२ भामिनी बोली-पातास म रहने वाले इन सभी सों ने पहन मुझ ममय पाचना की थी, इसीलिए मैंने अपने स्वामी से तद् विषया मनुरोप पिया या ॥३७॥ इस समय मेरे स्वामी मोर पुत्र प्रपा तुम्हारे पुत्र और पौत्र रा यह ग्रेट रीति से पूर्ण हुमा है ॥३५॥ माकण्डेयजी न कहा-फिर सपो ने उन मरे हुए ब्राह्मणों का विष दिव्य पोपपिया के द्वारा दूर करे उन्हें जीवित कर दिया | फिर राजा मस्त ने भी माता पिता के परपों में प्रएम रिया भोर असोगिन ने भी मरतो मानिगन परके प्रीमियूर यह मागीदिदिया दार पो रे मान-मर होमो, पृथ्वी रामा से

४२४ ॥
[ मार्कण्डेय पुराण
पालन करो, पुत्रगोत्र महिन मुग-पूर्वक समय व्यतीत को तुम्हारे पत्र. नष्ट
हो ॥४१॥ फिर ब्राह्मणो और वीरा की मात्रा प्राप्त कर दोना राजा और
भामिनी रथारूद होकर अपने नगर को चले गये [१४२।।
वीराऽपिकृत्वासुमहत्तपोधर्मभृतांबरा।
भतुं सलोकताप्राप्तामहाभागापतिव्रता ।।४३
मरुत्तोऽपिचकारोविर्मत परिपालनम् ।
विनिजितारिषड्वर्गोभोगाश्चबुभुजेनृप ।।४४
तस्यपत्नी महाभागाविद तनयातथा ।
प्रभावतीसुवीरम्पसौवीरीचाभवत्सुता ॥४५
सुकेशो केतुवीर्यस्यमागधस्यात्मजाऽभवत् ।
सुताचसिन्धुवीर्यस्यमद्रराजस्यकेकयी ।।४६
केन्यस्यचसैरन्ध्रीसिन्धुभवपुष्मती।
चेदिराजसुताचाभद्भार्यातस्यसुशोभना ॥४७
तासापुत्रास्तस्यचासन्भूतोऽष्टादशद्विज ।
तेषाप्रधानोज्येष्टश्चनरिष्यत सुतोऽभवत् ॥४८
एववीर्योमरुत्तोऽभून्महाराजामहाबल ।
तस्याप्रतिहतचक्रमासीवीपेषुसप्तसु IME
यस्यतुल्योऽपरोराजान भूतोनभविष्यति ।
सत्यविस्मयुक्तस्यरारमितौजस. ॥५०
तस्यैतच्चरितश्रु त्वामरुत्तस्यमहात्मन ।
जन्मचाग्र य द्विजश्रेष्ठमुच्यतेसर्वकिल्बिपै ॥५१
फिर धामिक- परम भाग्यवतो पतियता वीरा देवी घोर तपस्या
का आचरण करके अपने स्वामी के सालोक्य को प्राप्त हुई ॥४३॥ राजा मस्त
ने भी छ हो शत्र प्रो पर विजय प्राप्त करके धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन और
विभिन्न प्रकार के मुख भोग किये ॥४४॥ विदभसुता प्रभावती तथा सुवीर की
की पुत्री सोबोरी, मगधेश्वर केतु-वीर्य को पुत्री सुवेशा, मद्रराज सिंधुधीर्य
की पुत्री केपी, सिंधुनरेश की पुत्री संघवी, चेदिराज की पुत्री वपुष्मती, ये

। मार्कण्डेय पुराण
पराक्रमी वीर्य दान में उनका वृत्तान्त अापके मुखारविन्द से श्रवण करना
चाहता हू ।।२।। मार्कण्डेय जी ने कहा-~महत के अठारह पुत्र हुए. जिसमे
नरिष्यन्त सबसे बड़ा और श्रेष्ठ पुत्र हुआ || क्षत्रिय श्रेष्ठ मरुन ने सत्तर
सहस पंद्रह वर्ष पर्यन्त समस्त भूतल पर राज्य दिया ॥४॥ धर्म के अनुसार
शासन कर और सर्वश्रेष्ठ यज्ञ एवं अनुष्ठान करके वह अन्त में अपने ज्येष्ठ पुत्र
नरिष्यन्त को राज्याभिषेक करके वनवास करने चले गये ॥५॥ हे द्विज !
तदुपरान्त दत्तचित्त से वन मे तपस्या करते हुए पृथ्वी से यश प्राप्त करके राजा
मरुत ने स्वर्ग प्राप्त किया ।।६।।
नरिष्यतःसुत:सोस्यचिंतयामासबुद्धिमान् ।
पितुसमालोक्यतथान्येपांचभूभृताम् ७
अवशेमहात्मानोराजानोममपूर्वजाः ।
यज्विनोधर्मत पृथ्वीपालयामासुरूजिताः ।।
दातारश्चापिबित्तानासग्रामेष्वनिवर्तिनः ।
तेषांकश्चरितशक्तस्त्वनुयातु महात्मनाम् ।।
किन्तुतैर्यत्कृतकर्मधर्म्यमा हवनादिभिः ।
तदक मिच्छामितचनास्तिकगेमिकिम् ॥१०
धर्मात्पालयन पृथ्वीकोगुणोत्रमहीपतेः ।
असम्धनपालनात्पापीनरेन्द्रोनरखाव्रजेत् ॥११
सतिवित्त महायज्ञा कर्तव्याएवभूभृता ।
दातव्यचाप्रकिचित्रसीदतामीश्वरोगति ॥१२
याभिजात्यतथालज्जाकोपश्चारिजनाश्रयः ।
कारयंतिम्रधर्मश्चसग्रामादपलायनम् ॥१३
एतत्मर्वयथामम्यमत्पूर्वे पुष्पं कृतम् ।
पिनाचमेमात नतयातलेनमारयते ॥१४
परम विद्वान पुत्र नरिप्पन्न ने अपने पिता व अन्य दूगरै प्राधिपतियों के
वहार देमार विचार किया 110 दिम पुल में मेरे समस्त पूर्वज महान्
पारमा नृपगरण या द प्रधान करने वाले, महा पराक्रमी, वीर्यपा, पनदाता

नरिप्यन्त चरित्र ] 1४२७ संग्राम में कभी भी मुख न मोडने वाले थे एव सभी ने धर्म के अनुसार भूनत का पोपण किया था, उन महान् प्रात्मामा के चरिम का अनुरररा करन की सामयं रिस में हागो 711८-६॥ पाहवानादि स उन्होंने जो पानि च पूर्ण किये उन्हें करने की मेरी भी प्राराक्षा है परन्तु वह भी ता प्रश्न नहीं हैं, इसलिए मैं कैसे कर ॥१०॥ यदि नृप घमं व न्याय पूर्वक भूतन का पालन न करे तो फिर उसमे नृप वे क्या गुण है ' उनकै गुण म वह बाई पिपता नहीं है, क्योकि न्यायिक प्रकार से पृथिवी का पालन न करने वाला राजा पाप का भागी बनकर नरव प्राप्त करता है ॥११॥ धन युक्त होन पर नृप को दान और यज्ञ करने चाहिये, इसमे भी कोई अद्भुत वान नहीं है, राजा के लिए तो ईश्वर ही एकमात्र गति है ॥१२॥ अपने घम में स्थित रहन से ही राजा अपनी जाति पे श्रेष्ठ व और लज्जा के कारण पत्र के कार और मग्राम म पोधे नहीं मुटता है।।१३।। यह सब कार्य मेरे पूच पुरपो प्रौर मेरे पिता मरत न बिम प्रहार किये हैं, वैस का अन्य पीन पर गाता है ? ॥१४॥ तदहस्पिरिप्यामियत्तुत पूर्वज कृतम् । येय विनोवरादाता मग्रामाच्चानितिन ॥१५ ममग्रामममध्वदिमवादिपोरया । क्रमेणाहयतिप्यामिक्स्मंतानभिनधितुम् ।।१६ अथवात स्त्रययज्ञा कृता पूर्वजनेश्वरः। अविश्रमद्भिर्नान्यस्तुकारितास्तत्व रोम्यहम् ॥१७ इनिसचित्ययज्ञसचकारक नरेश्वर । यादृशनवागन्योरित्तोत्नर्गोपमोभितम् ।।१८ द्विजानाजीवनागलदत्त्वामुमहाधनम् । तत गतगुणतेपायनाथ मददान्नृप ॥१६ गारोवस्त्राप्यनारधाग्दागारादिनथा। प्रत्येकमददात्त पामवंपृथ्वीनिवामिनाम् I मेर मभी पूर्व पुरप बेटी का मान पर वारे, दानगी दम. गुमा नया युट म विमुग हान पारे न घे ॥१५॥ तथा गुट उम्गित हाने ४२८ ] | मावंडेण्य पुगण पर शत्र प्रो को अपना पराक्रम दिपाते थे, मैं इस समय ऐगा कौन पार्य पर, जिसे उन्होने नहीं दिया? मैं कर्म द्वारा हो निष्काम वर्म को वरमा ॥१६॥ अथवा जो यज्ञ मेरे पूर्व पुरुषों ने स्वय किये ये, किसी अन्य को नहीं कराये, उन्ही यज्ञो पो मैं करूंगा ।।१७11 मार्कण्डेयजी ने कहा-राजा न ऐसा विचार करके विपुल धन द्वारा एक ऐसे यज्ञ का अनुष्ठान किया, जिसे पूर्व में कोई भी नहीं कर सका था ||१८|| उस यज्ञ में उन्होन ब्राह्मणो को अत्यधिक धन प्रदान किया और उससे भी सो गुणा अन्नदान विया ॥१६॥ पृथिवी पर जितन भी ब्राह्मण थे, उनमे से प्रत्येक को उन्होने गौ, वस्त्र, अलकार, घर, धान्य आदि प्रदान किया था ॥२०॥ ततस्तेनयदायज्ञ प्रारब्धोभूभुजापन । प्रारब्धेसमखेयष्टु ततोनालभतद्विजान् ।।२१ यान्यावृणोतिसनृपोविप्रानात्विज्यकमणि । तेतेतमूवुयज्ञायवयमप्यनदीक्षिता ॥२२ अन्यवरययद्वित्त त्वयास्माक विसर्जितम् । तस्यातोनास्तियज्ञपुदद्यास्त्वनृपतेक्थम् ।।२३ नचापऋत्विजोविप्रास्तदाशेपक्षितीश्वर । बहिर्वेद्यातदादानसदातुमुपचामे ॥२४ तथापिजगृहुर्नवधनसपूणमदिरा । द्विजायदातु भूयोऽसोनिविएणइदमप्रवीत् ॥२५ अहोतिशोभनपृथ्व्यायद्विप्रोनाधन क्वचित् । अशोभनयत्कोपोविफलोयमयज्विन २६ नात्विज्यकुरुतेकश्चिद्यजमानोसिलोजन । द्विजानानचनोदानददतासप्रतीच्छते ॥२७ जब राजा ने पुन. यमानुष्ठान रिया तब उन्हें कोई भी ब्राह्मण यज्ञ के लिए उपलब्ध नहीं हुप्रा ॥२१॥ उन्होने जिस-जिस को भी ऋवि के रूप म वरण वरने की इच्छा की, उमी-उमी ने कहा हि मैं यज्ञ के लिये अन्यत्र वरण किया जा चुरा ॥२२॥ माप विपी अन्य को वरण कर ले है राजन् ! प्रापने

नम्प्यिन्त चरित्र ]
। ४२६
प्रापने यज्ञ मे हमे जितना धन दिया, वह अनेकानेक यो मे भी समास नहीं हो
सका ॥२३॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-सम्पूर्ण पृथिवी के राजा होकर भी जब
उन्हे ऋत्विक बनन के लिये कोई ब्राह्मण न मिला, तव वह वहिदी मे धान
करने को उद्यत हुए ।।२४।। फिर भी धन से युक्त घर का दान ब्राह्मणो ने
प्रहण नहीं किया, जव राजा दान करने म सफल नहीं हुए और उनका श्रम
व्यर्थ गया तब ये अत्यन्त दुखित होकर सोचने लगे ॥२५॥ पृथिवी मे रही
कोई भी इस समय धनहीन ब्राह्मण नहीं है यह अपन्त सनोप की वाल है,
परन्तु पज्ञानुष्ठान के बिना मेरा मेरे पास राजकोप का होना सार्गक नहीं है,
यही का कारण है ॥२६॥ सभी ब्राह्मण इस समय व्यय ही यज्ञ कार्य मे
प्रवृत्त हैं, इसलिए ऋत्विक होने में कोई वाहाण सहमत नहीं है, इस समय वह
स्वय ही दान कर रहे हैं, इसलिय मेरा दान स्वीकार नहीं करते ।।२।।
तत काश्चिद्विजान्भक्तचापरिणपत्यपुन पुन ।
स्वयज्ञे मृत्विजश्चक्रतेप्रचक्र महामसम् ॥२८
प्रत्यद्भुतमिद चासीद्यदातस्यमहीपते ।
सयशोभूतदाख्यायजमानोऽसिलोजन ॥२६
द्विजन्मनामभूमातोत्सदस्यस्तत्रश्चन ।
यजमानाद्विजा केचित्केचित्त पातुयाजका ॥३०
नरिप्यतोनरपतिरियाजसयदातदा ।
तत्प्रदातुपनेर्यागयु पृथ्व्यामशेपत ॥३१
प्राच्याकोटयस्तुयज्ञानामसन्नष्टादशाविका ।
प्रतीच्यासप्तवकोटचोदक्षिणम्याचतुर्दश ।।३२
उत्तरस्याचपचाशदेकवालतदाभवन् ।
मुनेब्राह्मणयज्ञानानरिप्यतोयदाऽयम् ॥३३
एवमराजाधर्मात्मानरिष्यता ससुरा ।
महत्ततनयोविविख्यातरलपारयः ।।३४
मार्कण्डेय जी ने कहा--फिर बारम्बार परम भक्ति और प्रणाम पूर्वक
उन्होंने कोई ब्राह्मणों को अपने यज्ञ में अस्तित होने पर सहमत कर लिया और

४३० ] | माण्डेय पुराण तब जन प्राह्मयो ने उस महायज्ञ का सम्पादन पिया ॥२॥ यह यत्यन्त विस्मय की बात थी कि राजा द्वारा सम्पादित उस महायज्ञ में सभी ब्राह्मण स्थय ही यजमान हुए ॥२६।। उस यज्ञ मे कोई सभासद नहीं हुआ था, ब्राह्मणो मे से ही कोई स्वय यजमान और कोई याजक हुआ ॥३०॥ जब राजा नरिष्यन्त ने यज्ञ किया तब उन्ही के धन से ब्राह्मणगा अनेक यज्ञो के अनुष्ठान उस समय अट्ठारह करोड से भी अधिक यज्ञ किये गये, पश्चिम मे सात करोड, दक्षिण मे चौदह करोड ॥३१-३२॥ तथा उत्तर मे पचास करोड यन हुए, ब्राहाणो के सभी यज्ञ एक ही अवसर मे सम्पन्न हुए ॥३३॥ हे ब्रह्मन् । पुरा- काल मे विख्यात बली एव पराक्रमी मरत पुत्र नरिष्यन्त ऐसे धर्मज्ञ थे ॥३४॥ प्रवृत्त हुए थे १२०-~-दम चरित्र (१) नरिप्यतस्यतनयोदुष्टारिदमनोदमः । शक्रस्येववलतस्यदयाशीलमुनेरिव ॥१ बाभ्रव्यामिन्द्रसेनायासजज्ञेतस्यभूभृत । नववर्षारिणजठरेस्थित्वामातुर्महायशा ॥२ यद्यायामासदममातरजठरेस्थित । दमगीराचवितायतश्चायनृपात्मज ॥३ ततस्विमालविज्ञानःसहितस्यपुरोहित । दमझत्यय रोनामनरिप्यतमुतस्यतु ।।४ सदत्तोराजप्रस्तुधनुर्वेदमरोवत । जगृहेनुपराजस्यसवाशापपर्वण ॥५ दुन्दुभेदत्यवय्यंग्यतपोवननिवामिनः । सपाशाजगृहम्नमस्त्रग्रामचायत ॥६ शतमाशाददाश्ववेदाजान्यमितानिन । तथाष्टिपेगादाजजंगृयागमात्मवान् ॥७ दम चरित (१) ] मार्कण्डेय जी न कहा~राजा नरिष्यन्त के पुत्र दम हुए, वे इन्ट के समान वली, मुनि के समान दयावान योर शीलवान् तथा शन शो का दमन करने में समर्थ घे ॥१॥ बभ्र की पुत्री इन्द्रसेगा के जठर से वज्र, नरिप्यात के मोर्य से उत्पन्न हुए, यह नो वप पयन्तु माता क गर्म म हो रहे ॥२॥ इसके गर्भ ने स्थित रहने के ममय माता को इन्द्रिय निग्रह पूर्वक रहना पड़ा था और यह राजकुमार भी दमतोल हुए ॥३॥ यह देखकर नीनो काल के जानने वाले राज- पुरोहिनी ने उनका नाम दम रखा, इस राजकुमार ने रागा वृषपर्वा से सम्पूर्ण धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त को ॥४-५॥ तपा तपादन म रहने वाले दत्पयर दुःदुभि से उन्होंन समस्त प्रस्त्र ग्राम के प्रयोगो को महार सहित प्राप्त किमा ॥६11 शक्ति मुनि से सम्पूर्ण वेद-देदान और ग्राष्टिपेण म याम शिक्षा प्राप्त की ॥१॥ तसुरुपमहात्मानगृहीतानमहाबलम् । स्वयवरेतापिताजगृहेगुमनापतिम् 112 सुतादशार्णाधिपतेर्वलिनश्चास्वमरण । पश्यतासर्वभूनानायेतदर्थमुपागताः ।। तस्याचसानुरागोऽभून्मद्रराजम्यवमुन । मुमनायामहानादोमहावलपराधम १० तयाविदर्भाधिपते पुन सनन्दनस्यच । चपुष्माराजयुनश्चमहाधनुरुदारधी ॥११ तेनदातमृत दृष्ट्वादुधारिदमनदमम् । मन्त्रयामासुरल्यान्यावानङ्गविमाहिना ।।१२ एतामस्यबलात्वन्यागृहीत्वारूपमालिनीम् । गृपयामस्तस्येयमस्माश्यग्रहीप्यति ॥१३ भर्तृ बुद्धचावरारोहा-वरवगिनन । तम्यच्छयानोभरिनोभारिमपिपादिता ||१४ अनिच्छनिमारूचिदम्मामदिरेक्षणा । ततस्तम्पनावित्रीमायोदमदानविष्य ते ॥१५ ४३२ ] [ मावंडेय पुराण दशार्णाधिपति चारुवर्मा को पन्या सुमना ने अपने पिता के द्वारा स्वयं- यर किये जाने पर, महाबली महात्मा दम को ही अपना पति बनाया ॥८-६॥ मद्रराज के पुन महानन्द, विदर्भ राज के पुत्र वपुष्मान् तथा महाधनु नामक राजपुत्र ने उस सुमना की कामना की थी ।।१०-११॥ परन्तु शत्र.ओ का दमन करने वाले 'दम' को राजकन्या ने वरण किया, यह देखकर वह राजकुमार परस्पर विचार करने लगे ॥१२।। हम इस रूपवती राजकुमारी को इससे बल पूर्वक छीन कर ले जायगे ।।१३।। इसके पश्चात् यह राजकुमारी स्वयंवर को विधि से हममे से जिसे चाहे स्वेच्छापूर्वक वरण करे, तब यह उसी की धर्म से उपलब्ध पत्नी मानी जायगी ।।१४) यदि यह हममे से किसी को भी ग्रहण नहीं करेगी तो जो दम का वध कर देगा, यह उसकी पत्नी होगी ॥१५॥ इतितेनिश्चयकृत्वावग्र.पार्थिवनन्दनाः । जगृहुस्तासुचार्वङ्गीदमपाशर्वानुवत्तिनीम् ॥१६ तत केचिन्तृपाम्तेपायेतत्पक्षाविचुक शुः । चुक शुश्वापरेभूपा केचिन्मध्यस्थतागता ॥१७ ततोदमस्तान्भूपालानवलोक्यसमन्तत । अनाकुलमनावाक्यमिदमाहमहामुने ॥१८ भोभूपाधर्मकृत्येषुयद्वदन्तिस्वयवरम् । दशार्णपतिनाभूपाःकृतेधर्मेस्वयवरे । अधर्मोवाध्यवाधर्मोयदेभिगृह्यतेबलात् ॥१६ यद्यधर्मोनमे कार्यमन्यभाभिविष्यति । धर्मोवातदलप्रारगयरक्ष्यन्ते रिलघने ॥२० ततोदशार्णाधिपतिश्चारुवनिराधिपः । निःशब्दकारयित्वातत्सद.प्राहमहामुने ।।२१ मार्कण्डेयजी ने कहा-उन तीनो राजकुमारो ने ऐसा विचार परके दम के पावं मे बैठी हुई उस राजकुमारी का हरण कर लिया ॥१६॥ उस समय दम पक्षीय राजाम्रो ने उनकी निन्दा मोर भत्रांना पी, बहुत से राजा प्रत्यस्त कोधित हुए और बहुत से तटस्थ रहे ॥१७॥ फिर अपने चारो घोर राजाओ को स्थित [ ४३३ दम चरित (१) ] देखकर दम ने व्याकुलता पूर्वक कहा ॥१८॥ दम बोले-हे राजायो । जिरा स्वयवर को धर्म कार्य समझा जाता है वह यथार्थ मे धर्म है ज्यवा अधर्म है । इन्होने स्वयंवर द्वारा प्राप्त हुई कन्या का जो हरण बलपूर्वक क्यिा है ||१९तो यदि स्वयवर धर्म-कार्य नहीं है तो अवश्य ही यह अन्य की पत्नी बनै, परन्तु यदि आप इसे घर्म कहते हो, तो शत्र से तिरस्कृत हुए इस शरीर को प्रारण रखने की क्या आवश्यक्ता है ? फिर दशार्णाधिपति चारुवर्मा ने सभामवन को शब्द रहित कराते हुए कहा ॥२१॥ दमेनय दिद प्रोक्त धर्माधर्माश्रितनृपा । तद्वदध्वयथाधाममाम्यचनलुप्यते ।।२२ तत केचिन्महीपालास्तमूवुर्वसुधाधिपम् परम्परानुरागरणगान्धर्वोविहितोविधि. ॥२३ क्षनियारणापरमयनविद्विजन्मनाम् । दममाथित्यनिष्पन्न सचास्यादुहितुस्तव ।।२४ इतिधर्माद्दमम्यपादुहितातवपार्थिव । योऽन्यथावत तमोहालामात्मासम्प्रवत्तं ते ॥२५ तथाऽपरेतदाप्रोचुमहात्मानोहिभूभृताम् पक्षेयेभूभृतोविप्रदशाधिपतिवच ॥२६ मोहात्विमाहुर्धर्मोऽयगान्धर्वक्षनजन्मनः । नयेप्रशास्तानान्योहिराक्षम शम्बजीविनाम् ॥२७ वलादिमायोहरतिहत्वातुपरिपन्थिन । तम्यपास्याद्राक्षसेनविवाहेनावनीश्वरा ॥२८ हे राजामौ । दम नै धर्म प्रधर्म विषयक जो वान रही है उस पर पर अपनी सम्मति दीजिये, जिसमे माप धर्म से च्युन न हों ॥२२॥ मार्क- डेयजी ने कहा-नब अनेक राजा उनसे बोले कि परम्पर वो प्रोनि से गापर्व वेवाह का विधान है ॥२३॥ यह विवाह क्षत्रियों के लिये उत्तम है, ब्राह्मण पंप या गूद के यि नहीं, प्रापको इम कन्या का विवाह उक्त विधान में दम में माय हो सम्पन्न होगया है ॥२॥ इमनिये हे राजन् । मापी पुत्री दम ४३४ ॥ { माराध्य युग Pी हुई, पर यामागफ गनुप्प ही मोर में या भूत होपरगा fra करते हैं ॥२५॥ मा स्यात् विरोध पक्ष रामापी में काशिनि रा प्रकार महा-~-|२६|| मोह ये पगाभा यह राजामण मी यान या रहे है ? क्षत्रियों के हित में यह गायव विवाह का ही नहीं, अब विवाह ने उनके लिये प्रगम्त नहीं हैं, स्पजीवियों पं निय तो घल राक्षम विदाह है उचित माना गया है ॥२७।। हे राजन् । विपक्ष को न2 परखे गया जो बलपूर्वर ले रांगा, राक्षम विवाह के विधान में यह उमी की भा होगी ॥२८॥ प्रधानतरएपोऽनविवाहद्वितयेमत. । क्षत्रियाणामतोधर्मोमहामन्दादिभि कृत ॥२६ प्रथप्रोचु पुन पाय पूर्वमुदितोनृप । परस्परानुरागेातिधर्माश्रित वचः ॥३० सत्यशस्ताराक्षसोऽपिक्षत्रियाणापरोविधि.। किन्त्वसौजनकस्वाम्येकुमार्यानुमतोवर ॥३१ हत्यातुपितृसम्बन्धवलेनहियतेहिया । सराक्षसोविधि प्रोक्तोनारमत करेस्थिता ॥३२ पश्यतासर्वभपानामनयायदवतोदम ।

दम चरित्र (१) । में 'दम' का वरण किया है ॥३१॥ राक्षस विवाह वही है, जिसमे कन्या पक्ष के पिता प्रादि को मार कर वा घायल परके कन्या का हरण कर लिया जाय, परन्तु पति को प्राप्त हुई कन्या का हरण करने से उसे राक्षम विवाह नहीं माना जा सकता ॥३२॥ सब नृपालो के मामन ही सुमना ने दम का वरण किया है, इमलिये यह विवाह गा विवाह ही है, इमम राक्षस विवाह का विधान कोन- सा हुमा ? ॥३३॥ विवाह होने पर दन्यात्व नही रहता, इमलिये विवाह के होने तक ही से पन्या समझना चाहिये ॥३४॥ दम के हाथ से इस कन्या का बलपूर्वक हरण करने वाले लोग अपने बल के मद मे ऐमा कर सकते हैं, परन्तु यह कोई भच्या वापं नहीं है ।।३।। तच्छु त्वामौदम कोपक्पायीकृतलोचन । ग्रारोपयामासधनुर्ववनवेदमब्रवीत् ॥३६ ममापिभाविलिमि पश्यतोहियतैयादि । तत्कुलेनभुजाम्यावाकोगुण क्लीवजन्मन ॥३७ घिड ममास्त्राणिधिक्छौय्यं धिक्छरान्धिक्छगमनम् । विग्यर्थमेकुलेजन्ममरुत्तम्यमहात्मन ॥३ यदिभार्यामिमेमूटा समादायवनान्विता । प्रयान्तिजीवलोधिवताममध्यर्थमनुप्यताम् ॥३६ इत्युक्त्वातान्महीपालान्महानन्दमुवान्वली । अथाब्रवीत्तदासर्वान्महारिदमनोदम ||४० एपातिशोभनाबालाचार्वङ्गोमदिरेक्षणा । विन्तस्यजन्मनाभानियस्येयकलोद्भवा ॥४१ इतिसञ्चिन्त्यभूपालास्तथायत्तसयुगे । ययानिजित्यमामेतापत्नीवुलमानिन. ।।४२ मारंण्डेयजी न कहा-यह बात सुनकर दम ने कोच से लाल नेत्र पर अपने धनुष पर ज्या चढाते हुए कहा-~||३६॥ यह मेरे सामने ही मेरी पत्नी का बलपूर्वक हरण पहते हैं, इसलिए मैं क्लीव ही हुआ समभो दश प्रकार मेरे दम दे गौरव मोर दोनो भुजामो में कोई गुण ही नहीं है ।।३७॥ मेरे जीवित

४३४ ]
। मार्कण्डेय पुराण
ही पत्नी हुई, परन्तु कामासक्त मनुष्य ही मोह के वशीभूत होकर इसका विरोध
करते हैं ।।२५।। इसके पश्चात् विरोध पक्ष के राजामो ने दशाधिपति से
इस प्रकार कहा-॥२६॥ मोह के वशीभूत हुए यह राजागरण कसी बात कर
रहे है ' क्षत्रियो के हित मे यह गाधर्व विवाह तो है ही नहीं, अन्य विवाह भी
उनके लिये प्रशस्त नहीं हैं, शस्त्रजीवियो के लिये तो केवल राक्षस विवाह ही
उचिन माना गया है ॥२७॥ हे राजन् । विपक्ष को नष्ट करके इस कन्या को
जो बलपूर्वक ले लेगा, राक्षस विवाह के विधान से यह उसी की भार्या
होगी ।।२८॥
प्रधानतरएपोऽत्रविवाद्वितयेमत. ।
क्षत्रियाणामतोवर्मोमहानन्दादिभि कृतः ॥२६
अथप्रोचु पुनभूपाय पूर्वमुदितोनृप ।
परस्परानुरागेपजातिधर्माधित रचः ॥३०
सत्यशस्ताराक्षसोऽपिक्षवियागापरोविधिः ।
किन्त्वसौजनकस्वाम्येकुमा-नुमतोवर ॥३१
हत्वातुपितृसम्बन्धवलेनह्रियतेहिया ।
सराक्षमोविधि प्रोक्तोनायभतृकरेस्थिता ॥३२
पश्यतासर्वभूपानामनयायवृतोदम..
गान्धर्वस्येहनिष्पत्तीविवाहोराक्षसोऽत्रक ॥३३
विवाहिताया.न्यायायान्यात्वनैवविद्यते ।
मन्यायाश्चविवाहेनसम्बन्ध पृथिवीश्वरा ३४
तइमेयेवलादेनादमादादातुमुद्यता ।
वलिनस्तेयक्तित युर्वन्तुनतुमाधुनत् ।।३५
क्षत्रियो मे जब राक्षस विवाह को ही प्रमुखना है तब महानन्द मादि
राजमारों ने धर्म या ही धावरण दिया है ॥२६॥ गायएडेय जी ने यहा--
जिन राजाओ ने पहिले परम्परागत धर्म पोर जानि धर्म मे विषय मे रहा था,
उन राजापों ने पुन पहा ॥३०॥ यह भी गरय है िक्षत्रियों में राम विवाह
वो माना गया है, परन्तु दम राजमारी ने तो अपने रिता पी पीनता

दम चरित्र (१) [ ४३५ में 'दम' का वरण किया है ॥३१॥ राक्षम विवाह वही है, जिसम कच्चा पक्ष के पिता प्रादि को मार कर वा घायल घरके कग्या का हरण कर निया जाय, परन्तु पनि का प्राप्त हुई कन्या का हरण करने से उस राक्षस विवाह नही माना जा सकता ||३१|| सब नृपालो क सामन ही सुमना ने दम का वरण किया है, इसलिय यह विवाह गाववं विवाह ही है, इसम राक्षस विवाह का विधान कौन- सा हुमा? ॥३३॥ विवाह होन पर कन्यारत्व नही रहना, इसलिये विवाह के होने तर ही उसे कन्या समझना चाहिये ॥३४॥ दम क हाथ से इस कन्या का बलपूर्वक हरण करने वाले लोग अपने बल के मद मे ऐमा कर सक्त हैं, परन्तु यह कोई पच्चा वार्य नहीं है ॥३॥ तच्छ त्वाऽमौदम कोपक्पायीकृतलोचन । आरोपयामासधनुर्वचनचेदमप्रवीत् ॥३६ ममापिभाविलिभि पश्यतोहियतेयदि । तत्कुलेनभुजाभ्यावाकोगुण क्लीवजन्मन ॥३७ घि ममास्त्राणिधिक्छौम्यधिक्टरान्धिक्छरासनम् । विग्यर्थमैकुलेजन्ममरुत्तस्यमहात्मन ॥३८ यदिभा-मिमेमूटा समादायबलान्विता । प्रयान्तिजीवनोधिनाममध्यर्थमनुष्यताम् ॥३E इत्युक्त्वातान्महीपालान्महानन्दमुवान्वली । अथाब्रवीत्तदासर्वान्महारिदमनोदम ॥४० एपातिशोभनावालाचार्वङ्गीमदिरेक्षणा। विन्तस्यजन्मनाभानियस्येयकुलोद्भवा ।।४१ इतिराचिन्त्यभूपालास्दथाय-तसयुगे । यथानिजित्यमामेतापत्नीवुलमानिन ॥४२ माण्डेयजी ने कहा- यह बात सुनकर दम ने क्रोध से लाल मेन पर अपने धनुप पर ज्या बढ़ाते हुए कहा--१३६॥ यह मेरे सामने ही मरी पली का बलपूर्वक हरण पत हैं, इसलिए मैं क्लोद ही हुमा समनो, इस प्रकार मेरे दश के गौरव और दोनो भुजाम्रो में कोई गुण ही नहीं है ।।१७। मेरे जीवित माएडेय पुराण ही पत्नी हुई, परन्तु यामासक्त मनुष्य ही मोह पे वीभूत होकर हमषा विरोध करते हैं ।।२५।। इसके पश्चात् विरोध पक्ष में राजानो ने दशाधिपति में इस प्रकार वहा-॥२६॥ मोह के वशीभूत हुए यह राजागए सी बात कर रहे हैं ? क्षत्रियो के हित में यह गाधव विवाह तो है ही नहीं, अन्य विवाह भी उनके लिये प्रशस्त नही हैं, शस्त्रजीवियो के लिये तो केवल राक्षस विवाह ही उचित माना गया है ॥२७॥ हे राजन् । विपक्ष को नष्ट कर इस कन्या को जो बलपूर्वक ले लेगा, राक्षस विवाह के विधान से यह उसी की भार्या होगी ॥२८॥ प्रधानतरएपोऽमविवाहद्वितयेमत. । क्षत्रियारणामतोधर्मोमहानन्दादिभि कृत ॥२६ प्रथमोचु पुन पाय पूर्वमुदितोनृप । परस्परानुरागेगजातिधर्माश्रित पचः ॥३० सत्यशस्ताराक्षसोऽपिक्षत्रियारणापरोविधि । किन्त्वसौजनकस्वाम्येकुमार्यानुमतोवर ।।३१ हत्वातुपितृसम्बन्धबलैनहियतेहिया । सराक्षसोविधि प्रोक्तोनानभर्तृ करेस्थिता ॥३२ पश्यतासर्वभूपानामनयायवृतोदम । गान्धर्वस्येहनिष्पत्तौविवाहोराक्षसोऽनक ॥३३ विवाहिताया कन्यायायान्यात्वनैवविद्यते । कन्यायाश्चविवाहेनसम्बन्ध पृथिवीश्वरा ॥३४ तइमेयेबलादेनादमादादातुमुद्यता । वलिनस्तेयदितत कुर्वन्तुनतुसाधुतत् ।।३५ क्षत्रियो मे जब राक्षस विवाह को ही प्रमुखता है तत्र महानन्द आदि राजकुमारो ने धर्म का ही प्राचरण क्यिा है ॥२६॥ मार्कण्डेय जी ने कहा- जिन राजाओ ने पहिले परम्परागत धर्म और जाति धर्म के विषय में कहा था, उन राजानो न पुन कहा ॥३०॥ यह भी सत्य है कि क्षत्रियो मे राक्षस विवाह को श्रेष्ठ माना गया है, परन्तु इम राजकुमारी ने तो अपने पिता की अधीनता दम चरित (१) । [ ४३५ मे 'दम' का वरण किया है ॥३१॥ राक्षस विवाह वही है, जिसमे कन्या पक्ष के पिता भादि को मार करवा घायल परके दग्या वा हरण कर लिया जाय, परन्तु पनि को प्राप्त हुई पन्या का हरण करने से उम राक्षम विवाह नहीं माना जा सकता ॥३२॥ सब नृपालो के सामन ही सुममा ने दम का वरण किया है, इसलिय यह विवाह गाघवं विवाह ही है, इसम राक्षस विवाह का विधान कौन- सा हुमा ? ॥३३॥ विवाह होन पर वन्यात्व नही रहना, इसलिये विवाह के होने तक हो उसे कन्या समझना चाहिये ।।३४॥ दम के हाथ से इस कन्या का दलपूर्वक हरण करने वाले लोग अपने बल क मद म ऐमा कर सकते हैं, परन्तु यह कोई मच्दा कार्य नहीं है ॥३॥ तच्छु त्वाऽमौदम पोपक्पायीकृतलोचन । आरोपयामासधनुर्वचनचेदमब्रवीत् ॥३६ ममापिभाविलिभि पश्यतोहियतैगदि । तत्कुलेनभुजाम्यावाकोगुण क्लीवजन्मन ॥३७ धिड ममास्त्राणिधिक्छौम्यं धिक्दराधिक्टरामनम् । घिग्न्यर्थमेकुलेजन्ममरुत्तस्यमहात्मन ॥३८ यदिभार्यामिमेमूटा समादायनान्विता । प्रयान्तिजीवनीधिक्लाममध्यर्थमनुप्यताम् ।।३६ इत्युक्त्वातान्महीपालान्महानन्दमुग्यान्वली । प्रयाब्रवीत्तदासर्वान्महारिदमनोदम ॥४० एपातिशोभनावालाचावंगीमदिरेक्षणा । विन्तस्यजन्मनाभानियस्येयकलोद्भवा ॥४१ इतिसविनयभूवालास्तुथायः तसयुगे। ययानिजित्यमामेनापरलीपुरुतमानिन ॥४२ मारंएडेयजी ने कहा-यह वात मुनगर दम ने कोप सलान नेत्र र मपने धनुष पर ज्या चढाते हुए कहा-~३६॥ यह मेरे सामने ही मरी पत्नी का बलपूर्वक हरण पहले हैं, इसलिए मैं क्नोव ही हुमा ममभो, इग प्रकार मेरे वस के गौरव मोर दोनों भुनाया मे कोई मुग्ण ही नहीं है ॥३७॥ मरे जीवित ४३६ ] । मार्कण्डेय पुगण रहते हुए यह पत्नी वा हरण कर लेजाय तो मेरे अस्त्री, बाणों और घनुप को धिक्कार है तथा महात्मा मात्त के वश में उत्पन्न होने और मनुष्य बनने यो भी धिक्कार है ॥३८-३६॥ शत्रओ का दमन करने वाले महावली दा ने ऐसा कहकर महानन्दादि के प्रति कहा ॥४०।। हे सम्मानिस राजागरण ! यह सत्कुल में उत्पन्न हुई सुन्दरी बालिका जिसकी पत्नी नहीं हुई, उसका जन्म ही वृथा हुआ है ।।४१॥ यह सोचकर मुझे पगजित करके इसे अपनी पत्नी बना सको, वैमा ही प्रयत्न सग्राम भूमि मे करो ।।४२।। इत्याभाष्यततस्तत्रशरवर्पममुचत । छादयन्पृथिवीपालास्तमसेवमहीरहान् ॥४३ तेऽपिवीरामहीपाला शरक्तयष्टिमुद्गरान् । मुमुचुस्तत्प्रयुक्ताश्चदमश्चिच्छेदलीलया ॥४४ तेऽपितत्प्रहितान्वारणास्तेपाचासौशरोत्करान् । चिच्छेदपृथिवीशानांनरिष्यन्तात्मजोमुने ।।४५ वर्तमानेतदायुद्ध दमस्यक्षितिपात्मज. । प्रविवेशमहानन्दःखङ्गपाणिर्यतोदम ॥४६ तमायान्तदमोदृष्ट्वाखङ्गपाणिमहामृधे । मुमोचशरवारिणवारणीवपुरन्दर. १४७ तदस्त्राणिततस्तानिशरजालानितत्क्षणात् । महानन्द प्रचिच्छेदखङ्ग नान्यानवचयत् ।।४८ ततोरोपात्समारुह्यतदमस्यतदारथम् । महानन्दोमहावीर्योदमेनयुयुधेसह ।।४६ ऐसा कहकर दम ने उन राजाओ के माच्छादन पूर्वक वाण-वृष्टि की ॥४३॥ उन राजानो ने भी बाण, शक्ति, मृष्टि, मुगदर मादि इन पर चलाये, परन्तु इन्होने उन सब शस्त्रास्त्रो को लीलापूर्वक हो नष्ट कर दिया ॥४४।। हे मुने । उम समय सब राजा दम के मस्त्री को मोर दम भी उनके प्रस्त्रो को काटने लगे ॥४॥ दम और उन राजपुत्रो के मध्य इस प्रकार सम्राम हो हो रहा था, तभी हाथ खङ्ग ग्रहण किये हुए महानन्द उनके सामने हुमा ।।४६।। में दम चरित (१) ] [ ४३७ उन हाथ में बङ्ग लिये पाता देयकर, इन्द्र द्वारा जल वृष्टि करने के समान, दम ने वाणो की वर्षा प्रारम्भ की ॥४७॥ महानन्द ने उन सब बस्नो मोर बाणो को अपने खङ्ग से काट डाना, उमने यह कार्य इस चतुराई से किया कि अन्य राजागरण उमे देस भी न स ॥४८॥ फिर प्रोध में भरा हुमा वह महा- नन्द दम के रथ पर चढकर गरे साथ लडन लगा ॥४६॥ वहुधायुध्यमानस्यमहानन्दस्यलाधवात् । दमोमुमोचहृदयेशरंकालानलप्रभम् ॥५० तलग्नमात्मनोत्कृप्यविभिन्नेनततोहुदा । दमप्रतिविचिक्षेपमहानन्दोऽसिमुज्ज्वलम् ।।५१ पतन्तचनमुल्काभगवत्याचिक्षेपतदम । शिरोवैतसपनेणमहानन्दम्यचाच्छिनत् ॥५२ तस्मिन्हलेमहानन्देप्राचुयेगपगट मुगा । बभूवु पार्थिवास्तयौवपुष्मान्युण्डिनाधिपः ॥५३ दमनयुधैचासौबलगर्वमदान्वित । दाक्षिणात्यमहीपालतनयोरणगोचर ॥५४ युध्यमानस्यतम्योन करवालसबैलघु। मिग्वेदमारथेश्चैवगिर मम्येतयाधनम् ।।५५ विन्नबनोगदासोऽथजग्राहबहुक्ण्टकाम् । तामध्यस्यमचिच्छेदकरस्यामेरमत्तर ॥५६ बहुत समय ता इस प्रकार युद्ध करते हुए दम ने उगवे हृदय में शाला- ग्नि के गमान जलन वाण घोटा ॥५०॥ महानन्द ने मेसगे बाय को स्वयमी निशला मोर दम पर मपन सम्वन माया वार किया ॥५१॥ दम ने विद्युत् पे गमान गिरते हए म सङ्ग पो शक्ति द्वाग काट वर तुग्न ही वेनमपत्र बाग के द्वारा उप महानन्द वा पोम प्रारदाला ॥५॥ महानन्द वे ममाप्त होने ही पुन्निाधिनि पुष्मान के प्रनिरिक अधिकतर नृारण से विमुप हो गरे ॥५३॥ वर गजपत्र दागिणा य पपने पराक्रम नि मस्मिानपूर्ण मान मर में दर मे युन से समापन [ माण्डेय पुराण क्षेत्र मे दम ने तुरन्त वपुष्मान् की तीन तलवार एव उसबै सारयो का सिर व रथ की ध्वजा काट डाली ।।१५।। तलवार के नष्ट होने पर वपुप्मान ने अनेर काटो से युक्त गदा धारण की और उसके वार करने से पूर्व ही दम ने वह गदा उसके हाथो मे सएड-खएड वर डाली ॥५६।। यावदन्यत्समादत्त सबपुष्मान्वरायुधम् । तावन्छरेणतविद्धादमोभूमावपातयत् ॥५७ सपातितस्ततोभूमौविह्वलाङ्ग सवेपथु । विनिवृत्तमतियुद्धाद्वभूव क्षितिपात्मज ॥५८ तमालोक्यतथाभूतमयुयुद्धमतिमात्मवान् । उत्सृज्यादायसुमनासुमना प्रययौदम ॥५६ ततोदशाधिपति प्रीतिमानकरोत्तयो । दमस्यसुमनायाश्वविवाहविधिपूर्वकम् ।।६० कृतदारोदमस्तनदशाराधिपतेःपुरे । स्थित्वाऽल्पकालप्रययौसभार्योनिजमन्दिरम् ॥६१ दशाधिपतिश्चासौदत्त्वानागास्तुरङ्गमान् । रथगोऽश्वख रोष्ट्राश्वदासीदासास्तथावहून् ॥६२ वस्त्रालङ्कारचापादिवरोपस्करमामनम् । अन्येस्तैश्वतथाभाण्डे परिपूर्णव्यसर्जयत् ।।६३ इसके पश्च व वपुष्मान् द्वारा सर्वोत्तम अस्त्र ग्रहण करने पर भी दम ने उसे अपनी वारण-वर्षा द्वारा टुकडे कर पृथ्वी पर गिरा दिया ।।५७।। तव राज- पुष वपुष्मान ने व्याकुल व कपिल शरीर को पृथ्वी पर गिरा दिया व युद्ध की तत्परता त्याग दी ।।५८॥ दम ने उसकी ऐसी स्थिति एव उसकी युद्ध के लिए तत्परता न देख उसे छोड दिया एव मानन्दपूर्ण हृदय से सुमना को लेकर चले गये ।।५६।। इसके पश्चात् दशाणाधिपति ने आनन्दित चित्त होकर सुमना व दम का विवाह विधिपूर्वक सम्पन्न किया ॥६०॥ भार्या प्राप्त करके दम कुछ रामय तर दमार्णाधिपनि के महल में रहे तदनन्तर पत्नी के साथ अपने गृह को पर गय ॥६॥ उनको विदा परते समय दशाणाधिपति ने उन्हें प्रनेको हाथी, [ ४३६ दम चरित (२) ] घोडे, रथ, गौ, खर, ऊँट, दाम, दामी !॥६२॥ वस्त्र, भूपण, धनुप अादि विभिन्न प्रकार को बहुमूल्य वस्तुऐ भेंट स्वस्प एव दानस्वरूप धन, रत्न आदि प्रदान किये ॥६॥ १२१-दम चरित्र (२) मतालब्ध्वातथापत्नीसुमनांसुमहामुने । प्रणम्यसपितु पादौमातुश्चक्षितिपात्मज. ॥१ साचतौश्वशुरौसुभ्र ननामसुमनातदा । ताम्यातौचतदाविप्रय सीभिरभिनन्दितौर महोत्मवश्चसजज्ञनरिष्यन्तस्यवपुरे । कृतदारेचसप्राप्त दशार्णाधिपतेपुरात् ॥३ सम्बन्धिनदशानुगजिताश्चपृथिवीश्वरान् । श्रुत्वापुत्रेणमुमुदेनरिष्यतोमहीपति ।।४ सोऽपिरेमेसुमनयामहाराजसुतोदमः वरोद्यानवनोद्देशप्रासादगिरिसानुपु ॥५ अथकालेनमहतारममाणादमेनसा । ग्वापगर्भमुमनादशार्णाधिपते सुता ॥६ सोऽपिराजानरिष्यन्तोभुक्तभोगोमहीपति । वय परिणतिप्राप्यदमराज्येऽभिपिच्यच ॥७ वनजगामेद्रमेनापत्नीचास्यतपस्विनी। वानप्रस्थ विधानेनमत समतिष्ठत ॥ मारंण्डेय जी ने कहा- हे महपि । दम ने अपनी भायां सुमना सहित प्राकर अपने माता-पिता चरणा म प्रणाम विया ॥१॥ एव इसी प्रकार मुमना ने भी उन्ह प्रणाम दिया । हिज । उन दोना माता पिता ने भी आशीर्वाद प्रदान करते हुए उनका अभिनन्दन पिया ॥२॥ मुमना के भार्या के ४४० ] [ मार्वएडेय पुराण रूप मे ग्रहण करके दम दशार्णाधिपति के महल से आये, तो नरिप्यन्त के महल मे आनन्दोत्सब प्रारम्भ हो गया ॥३॥ नराधिपति नरिष्यन्त को दशााराज के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित होने एव प्रपने पुत्र द्वारा अन्य राजाओ को हराने का वृतात सुनकर अत्यन्त सतोष हुअा ॥४॥ इसके पश्चात् राज कुमार दम अनुपम उद्यानो, वनो, महलो एव पर्वत ग्रादि स्थलो पर भार्या सुमना के साथ विहार करने लगे ।।५।। इस प्रकार विहार करते हुए कुछ समय पश्चात् दशार्ण सुता ने गर्भ धारण किया ।।६। उसी काल नृपेन्द्र नरिष्यन्त ने वैभव का उपभोग कर अपनी वृद्धावस्था को देखकर दम को राज्याभिषेक कर दिया ॥७॥ अपनी भार्या रानी इन्द्रसेना को साथ लेकर वन मे प्रस्थान कर गये एव यहाँ विधिपूर्वक वानप्रस्थ जीवन व्यतीत करने लगे ॥६॥ दाक्षिणात्य सुदुर्वृत्त सकन्दनसुतोवने । वपुष्मान्समृगान्हन्नुययावरूपपदानुग ॥६ सतदृष्ट्वान रिप्यन्ततापसमलपाड्किनम् । इन्द्रसेनाचतत्पनीतपसातिसुदुर्वलाम् ।।१० पप्रच्छकस्त्वभाविप्रःक्षनियोवावनेचरः। वानप्रस्थमनुप्राप्तोवंश्योवाममकथ्यताम् ॥११ ततामौनव्रतीभूपोनहितस्योत्तरददी । इन्द्रसेनाचतत्सर्वमाचष्टाम्मैयथातथम् ॥१२ ज्ञात्वातञ्चनरिष्यन्त वपुमान्पितर रिपो । प्राप्तोऽमोतिवदन्योपाज्जटासुपरिगृह्यच ।।१३ हाहेतिचन्द्रमेनायारदयावाप्पगद्गदम् । चककोपात्यङ्ग वाक्य चेदमुयावह ।।१४ एर बार दाक्षिणात्य नृप मनन्दन वा दुराचारी पुत्र वपुष्मा अपने कुछ प्रगुपगे ये माय उन दन म मागेट पे लिए आया है। वहाँ वानप्रस्थी नापियन वा मरिन देव नियं नाली इन्गना पो देपर १०॥ पुष्मान उसमे पूछा तुम कौन हो प्राह्मण, क्षत्रिय प्रथयां वय में से मि जाति के पा वापरथी होगर वावागी एप हो, यह गुरे यताप्रो ॥१॥ रामा मौन दर चरित्र (0) ] ग्रत में थे, इसलिए इसका उत्तर नहीं दे सके परन्तु, इन्द्रसना ने सय वात यया- वत् वतादी ॥१२॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-वपुष्मान् ने उह शत्रु का रिता नरिप्यन्त जान कर "पा गया" कहते हुए क्रोरपूर्वक उनकी जटा पाडनी ॥१३॥ उस समय इद्रसेना हाहा कर रोने लगी, तभी दुराचारी ने म्यान से तलवार निकालकर कहा ॥१४॥ निजित समरेयेनयेनमेसुमनाहता । दमस्यतस्यपितरहनिष्येऽवतुतन्दमः ।।१५ येनाखिलमहीपालपुना कन्यार्थमागता । अवधूताहनिप्येऽहपितरतस्यदुर्मतेः॥१६ यौवनास्त्रस्वस्पेषुमदोयस्यदुरात्मन । सदमोवारयत्वेपहन्मितस्यरिपोर्गुरुम् ॥१७ इत्युक्त्वासदुराचारोवपुष्मानवनीपति । बदन्त्यामिन्द्रसेनायाशिरश्चिच्छेदतस्यच ।।१८ ततोधिग्धिड्मुनिजनाअन्येचवनवासिन तमूचु सचतहत्वाजगामस्वपुरवनात् ।।१६ गतेतस्मिन्विनिश्वस्यसेन्द्रसेनावपुष्मति । प्रेपयामासपुनस्यसमीपशूद्रतापसम् ।।२० जिसने मुझे युद्ध मे हरा दिया था और जो मेरी सुमना का हरण कर ले गया है उस दम के पिता का मैं बघ करता है, वह दम यहा पाकर इसको रक्षा करे ॥१॥ कन्या की कामना से सद राजकुमारो को जिसने अपमानित किया, उस दम के पिता को माज मैं मार रहा ॥१६॥ जो योद्धाओ के दमनकारी स्वभाव वाला है, मैं आज उस दुरात्मा शत्रु के पिता को विनष्ट करता हू दम माकर इसको बचावे ॥१७॥ मार्कण्डेयजी ने कहा-इतना कह पर दुरात्मा राजा वपुष्मान् ने रुदन करती हुई इन्द्रसेना के समक्ष नरिष्यन्त का मस्तक छिन कर दिया ॥१८॥ यह देखकर मुनिगण और मन्य सब वन- वासी उसे धिक्कार देने लगे मोर वह भी नरिप्यन्त को इस दशा में छोडवर

४४२ ]
{ माण्डेय पुराण
अपने नगर पो चला गया ॥१६॥ जर वपुष्मा चना गया, तब इन्द्रसेना ने
दोघं विश्वास लेबर एक शूद्र तपस्वी को अपने पुत्र
पास भेजा ॥२०॥
गच्छथापाशुमेपुत्रदमन हिवचोमम ।
अभिजोह्य सिमद्भर्ट वृत्तान्तप्रोच्यतेऽवकिम् ॥२१
तथापिवाच्य पुत्रोमेयद्ववीम्यतिदु खिता।
लघनामीदृशीप्राप्ताविलोक्यतामहीपते ।।२२
मद्भर्नाऽधिकृतोराजाचतुर्णापरिपालकः ।
त्वमाश्रमाणाकिंयुक्त तापसान्यन्नरक्षसि ।।२३
भर्ताममन रिष्यन्तस्तापसस्तपसिस्थित ।
विलपन्त्यास्तथानाथोयथानासिनथात्वयि ॥२४
प्राकृष्यकेशेषुबलादपराधविनातत ।
हतोवपुष्मताख्यातिमितितेभूपतिर्गता ।।२५
एवस्थितेतरिक्यतायथाधर्मोनलुप्यते ।
तथाचनववक्तव्यमाताहतापसीपत ॥२६
पितावृद्धस्तपस्वीचनापराधनेदूषित ।
निहतोयेन यत्तस्यकर्तव्यतद्विचिन्त्यताम् ॥२७
सन्तितेमन्त्रिणोवीरा सर्वशास्त्रार्थवेदिन ।
ते सहालोच्ययत्कार्यमेवभूतेकुरुष्वतत् ।।२८
इन्द्रसेना ने उससे कहा कि तुम शीघ्र ही हमारे पुत्र म के पास जाकर
इघर का समाचार कहो, तुम सब वृतान्त को मले प्रकार जानते हो, इसलिए
तुम्हे बताने की कोई पावश्यकता नहीं है ।।२१।। फिर भी राजा का ऐसा अप-
मान उपस्थित देखकर और अत्यन्त दुखित होकर मैं जो कह रही हूँ, वह सब
मेरे पुत्र से कहना ।।२२।। सुप राजा हो, चारो प्राथम के पालन कर्ता एवं
स्वामी नियुक्त हुए हो, फिर भी तुम तपस्वियो की रक्षा करते, क्या यह उचित
है ? ॥२३॥ मेरे पति नरिष्यन्त यहाँ तप करते थे, परन्तु, तुम रक्षा करने वाले
के होते हुए भी मेरे द्वारा विलाप करते करते वपुष्मान् ने उनका निरपराध
ही वध कर दिया है । तुमने राजा होकर पसिद्धि उपलब्ध की हैं ॥२४॥२५॥

दम चरित्र (२) ]
। ४४३
इस दशा मे जिससे धर्म लुप्त न हो वैसा ही कार्य करो, इसस अधिक कहना
उचित नही समझतो (२६॥ तुम्हारे पिता प्रथम तो वृद्ध थे, इस पर भी तप-
स्वी मोर सर्वथा निरपराधी थे, ऐमो अवस्था में उनकी हत्या की गई है।
इस विषय में अपने कर्त्तन्य का भलीभाति निश्चय करो ॥२७)। तुम्हारे वीर
मन्त्री शास्त्र ज्ञाता हैं उनसे परामर्शपूर्वक जो वर्त्तव्य हो वही करना चाहिए
॥२८॥
नास्माकमधित्रकारोऽतापसानानराधिप ।
कुरुष्वैतदितीत्यत्वमेवभूपतिभाषितम् ॥२६
विदूरथस्यजनकोयवनेनयथाहत ।
तथायतवपुत्रस्यकुलतेनविनाशितम् ॥३०
जम्भस्यासुरराज्यस्यपितादप्टोभुजङ्गमै ।
तेनाप्यखिलपातालवासिन पन्नगाहता. ॥३१
पराशरेणापितरशक्तितरक्षसाहतम् ।
श्रुत्वाऽग्नोपातितकृत्स्नरक्षसामभवत्कुलम् ।।३२
अन्यस्यापिस्ववशस्यलघनाकियतेहिया ।
तानालक्षत्रिय सोदु किंपुन पितृमारणम् ॥३३
नायपितातेनिहतोनास्मिञ्छस्त्रनिपातितम् ।
त्वामत्रनिहतमन्येत्वयिशस्त्रनिपातितम् ॥३४
हे राजन् । तुम्हारे पिता ने मरत समय कहा है कि मैं तपस्वी हूँ, इस
विपय मे अनधिकारो हू, इसलिए तुम्हे ही इसका प्रतिकार करना है ॥२६॥
हे पुत्र । जिस प्रकार विदूरय के पिता का यवन ने वध किया था, वैसे ही
वपुरमानन् ने तुम्हार पिता का वध करके कुल को नष्ट किया हैं ॥३०॥ जब
दैत्यराज जभ के पिता को सपों ने काट लिया था, तब जभ ने पातालवासी
समी नागो को गिहत किया था ॥३१॥ और उस असुर के द्वारा पिता शक्ति
को मृत्यु हुई सुनकर परासर जी ने सम्पूर्ण असुर-वा को अग्नि मे दग्ध कर
दिया या ॥३२॥ जब क्षत्रियगण अपने कुल के किसी भी व्यक्ति का अपमान
सहन नहीं कर पाते तो पिता के वध की बात का तो कहना ही क्या है ॥३३॥

| माण्डेय पुराण - मैं समझती हू कि तुम्हारे पिता का वध नहीं हुआ है उन पर शस्त्र नहीं बनाया गया अपितु इस प्रकर तुम्हारा ही वध हुया है ||३४|| विभेत्यस्यहिक शस्त्रन्यस्तयेनवनोक्साम् । तवभूपस्यपुत्रस्यमाविभेतुविभेतुवा ॥३५ तवेयलघनायुक्तायदस्मिस्तत्समाचर । वपुष्मतिमहाराजसभृत्यज्ञातिबाधवे ॥३६ इतिसक्रान्तसन्देश मिन्द्रसेनाविसृज्यतम् । पतिदेहमुपाश्लिष्यविवेशाग्निमनस्विनी ॥३७ वन वासियो के ऊपर जो हथियार नहीं उठाता है उसका भय कौन करेगा ? अथवा उसका पौरुप ही क्या होगा ? तुम उनके पुत्र तथा पृथ्वी के पालक हो, यदि शत्रु को नष्ट करागे तो तुम्हारा भय सभी मानेंगे अन्यथा तुम्हारे शासन मे भी विघ्न उपस्थित हो जायगा ॥३५॥ हे राजन् । ये तिर- स्कार हुआ है, इसलिए भृत्यो व वपुष्मान् के प्रति तुम्हे जो करना चाहिये, वही करो ॥३६॥ मार्कण्डेय जी ने कहा- इन्द्रसेना ने उस तापस से यह सदेश कह कर उसे विदा किया भोर पति के शरीर का मालिंगन करके अग्नि मे प्रवेश विया ॥३७॥ १६२--दम चरित्र (३) इन्द्रसेनासमाज्ञप्तःसगत्वाशूद्रतापस । समाचष्टयथापूर्वदमायनिधन पितु ॥१ तापमेनसमाख्यातेदमस्तेनपितुर्वधे । मोधेनातीवजज्वालहविषेवाग्निरुद्धत ॥२ मतुकोधाग्निनाधीरोदह्यमानोमहामुने । परवरगनिप्टिप्यवाक्यमतदुवाचह ॥३ [ ४४५ क्षम चरित (३) ] अनाथइवमेतातोमयिपुत्रेनुजीवति । घातित सुनृशंसेनपरिभूयकुलमम ॥४ तापकरोम्यहकिवाप्येपक्लैव्यात्क्षमाम्यहम् । दुवृत्तशातौशिष्टानापालनेऽधिकृतावयम् ।।५ पितरंचापिनिहत दृष्ट्वाजीवन्तिशत्रवः तत्किमेतेनबहुनाहातातेतिकिपुनः ॥६ विलापेनात्रयत्कृत्यतदेपोऽत्रकरोम्यहम् । यद्यहंतस्यरक्तनदेहोत्थेनवपुष्मतः । नकरोमिगुरोस्तृतितत्प्रवेक्ष्येहुताशनम् ।।७ तुच्छोणितेनोदककर्मतस्यामासेनसम्यग्विजभोजनच । कुर्यापितुस्तस्यचपिंडदाननचेत्प्रवेक्ष्यामिहुताशनतत ।।८ मार्कण्डेय जी ने कहा- इन्द्रमेना को प्राज्ञा से शूद्र तापम मे दम के निकट जाकर उनके पिता की मृत्यु का समाचार और रानी इन्द्रमेना ने जो कहा था, वह सब कह सुनाया ॥१॥ पिता की मृत्यु का पूर्ण सम्वाद सुन कर घृताहुति से तीक्ष्ण हुई अग्नि के समान राजा दम क्रोध से लाल हो गये ॥२॥ यद्यपि वह स्वभाव से धीर थे, परन्तु उस समय क्रोगाग्नि मे प्रवलिन होकर बोले ॥३॥ मुझ पुत्र के जीवित रहते हुए उस नुशस ने मेरे कुन के अपमान पूर्वक पिना की ननाय के समान हत्या की है ॥४॥ मैं क्रोध फरू या क्लीवता से क्षमा कर दूं, परन्तु मैं दुष्टो का दमन करने और शिष्ट- जनो का पालन करने के लिये नियुक्त हुप्रा हूँ ॥५॥ पिता का वध करने पर भी मेरे शत्रु अभी तक जीवित हैं, परन्तु इस प्रकार अधिक वार्ता से क्या लाभ है ॥६॥ अव मुझे जो कर्तव्य है। वही करता हूं। यदि वपुष्पान् के देह से निकले हुए रुधिर से अपने पिता का तण न कह तो पग में प्रवेश कर जाऊंगा ॥७॥ यदि उसे मारकर उसके रक्त से मृत-पिता का तपर्ण न करू पौर पितरो को पिंड दान न करूं तो मैं अग्नि में प्रविष्ट होऊँगा ।।। साहाय्यमस्यासुरदेवयक्षगन्धर्वविद्याधरसिद्धसघाः । कुर्वन्तिचेत्तानपिचास्त्रपूगर्भस्मीकरोम्येपरपासमेतः ।।६ हाथ मलते

४४६ ]
[ मार्कण्डेय पुराण
नीशूरमाघार्मिकमप्रशस्ततदाक्षिणात्यसमरेनिहत्य ।
भोक्ष्येततोऽहपृथ्वीचकृत्स्नावह्निप्रवेक्ष्याम्यनिहत्यतवा ।।१०
सुदुर्मतितापसवृद्धघातिनवनस्थगसाधुविधिविदग्धगम् ।
हन्ताहमद्याखिलवन्धुमित्रपदातिहस्त्यश्ववले समेतम् ।।११
एपोऽहमादायधनु सखगोरथीतथैवारिवलसमेत्य ।
करोमिवयत्कदनसयस्ता पश्यन्तुमेदेवगरणा समेता ॥१२
योय सहायोभविताद्यतस्यमयासमेतस्यरणायभूय ।
तस्यैवनि शेपकुलक्षयायसमुद्यतोऽहनिजवाहुसैन्य ॥१३
यदिकुलशिखराऽस्मिन्सयुगेदेवराज,
पितृपतिरथचोग्र दण्डमुद्यम्यकोपात् ।
धनपतिवरुणारिक्षितुन्त यतन्ते,
निशितशरवरोधैर्षातयिष्येतथापि ॥१४
नियतमतिरदोष काननाखण्डलोका,
निपतितफलभक्ष सर्वभूतेपुमैत्र ।
प्रभवतिमयिपुत्रेहिंसिततोयेनत त ,
पिशितरुधिरतृप्तास्तस्यसन्त्वद्यगृध्रा ॥१५
असुर देव, दक्ष, गन्धर्व, विद्याधर अथवा सिद्ध गण जो भी उसकी
सहायता करेगा, उसे भी में अपने प्रस्त्रानल से भस्म पर डालू गा ॥६उस
अशीयं प्रधार्मिक, निदित, दाक्षिणात्य को युद्ध मे मारकर ही सम्पूरा पृथ्वी
को भोगूगा अथवा उसके वध में असमर्थ होने पर भग्नि में प्रविष्ट हो जाऊँगा
॥१०॥ जिस दुमति ने मेरे तोपिरत वनवासी मौन व्रती वृद्ध पिता के सात
वचनों के उपरात भी उनकी हत्या की है, उसे मैं अभी उसके सर बन्धुनो
मित्रो तथा पंदल पौर सवार के सहित मार डालूंगा ॥११॥ मैं अब प्रति
और धनुष ग्रहण करता हुआ रथारुढ़ होकर शत्रु सेना के मध्य उपस्थित
हो कर उसके सहार कार्य में लगता हूँ। मेरा वह कृत्य सब देवगण देखें ।।१२।।
बुद में मेरे साथ भिहने पर उसका जो जो भी सहायक होगा उस उसको अपनी
बाहु और सेना द्वारा कुल सहित नाश करने के लिये मैं माज तत्पर हुमा हु
,

दम चरित (३) ]
[ ४७
-~-
।।१३।। इस सग्राम मे वचधारी इन्द्र, उग्र दड देने वाले यम, अथवा कुबेर,
वरुण और सूय भी यदि उसकी रक्षा का प्रयत्ल करेंगे तो मैं अपने श्रेषु वाणी
से उनको भी नष्ट कर डालूगा ॥१४॥ मुझ प्रभावशाली पुत्र के रहते हुए भी
जिसने मेरे सयमचेता दोष रहित वनवासी केवल गिरे हुए फल से जीवन.
निर्वाह करने वाले एव सब पाणियो के प्रति मंत्री भाव रखने वाल पिता की
हत्या की है । आज उसके रक्त और मास से गृद्ध-गरण तृप्ति को प्राप्त होगे ॥१५
१२३--वपुप्मान् वध
इतीप्रतिज्ञायतदानरिष्यतसुतोदम. ।
कोपामर्यविवृत्ताक्ष.श्मश्रु मावृत्यपारिगना ।।१
हाहतोऽस्मोतिपितरध्यात्वादेवविनिद्यच ।
प्रोवाचमत्रिण मर्वानानिनायपुरोहितम् ।।२
यदनकृत्यतततातेप्राप्तसुरालयम् ।
भूत भवद्भिर्यत्प्रोक्त तेनशूद्रतपस्विना ।।३
वृद्धस्तपस्वीसनृपोवानप्रस्थवतेस्थित ।
मौनव्रतधगेऽशस्त्रोमन्मात्राचन्द्रसेनया ।।।
प्रोक्त ससृष्टयास्वात्म्याद्याथातथ्यवपुष्मते ।
तेनापिखङ्गमाकृष्यजटासव्येनपाणिना ॥
धृत्वाजधानदुष्टात्मालोकनाथमनाथवत।
माताचसदिश्यमाधिक्छन्दव वतीसती ॥६
मदभाग्यचनि श्रीकप्रविष्टाहव्यवाहनम् ।
तमालिग्मनरिष्यत प्रयातानिदशालयम् ॥७
मार्कण्डेय जी ने कहा-इस प्रकार प्रण करके क्रोध मे भरे हुए दम
ने पूर्णित नेत्रों से मूछो पर हाथ फेर कर उन्हे ऊँची स्थिा ॥१॥ मोर मपने
पिता कान्तिम तयार दे ती निन्दा रले लगे, फिर पुरोहित को उतपा

[ मार्कण्डेय पुराण
पौर पमारयो मे गमरा उनमें बोले ।२।। दम ने कहा-पिता जी स्वगंदामा
होगये, गर तापस के द्वारा यह यात माप सब को मात हो चुकी है, अब क्या
य, वह मुझे बताइये ॥३॥ सब पर शामन परत वाले वह महाराज
गावस्था मे यानप्रस्थी होगर मौन प्रत या भवनम्बन कर रहे थे, वपुष्मान
मारा परिषय पूछने पर मेरी माता इन्द्रमेना ने ॥४॥ उसे अपना ममूर्ण
परिपग पगार्थ रूप से दिया, तभी उस दुष्ट नै तनबार निकाल कर अपने
महास से ॥१॥ मेरे पिता को प्रनाथ के समान पाड लिया और उनकी
स्या कर दी, राव मेरी सती माता ने मुझ मदभाग्य मोर नि श्रीक को विसारा
और मेरे सामालिंगन परके अग्नि म प्रविष्ट हागई ॥६-७।।
सोऽहमधारिष्यामियन्मेमातुरुदीरितम् ।
हस्त्यश्वरधपादातरोन्यचपरिकल्प्यताम् ।
भनिर्याप्य पितुर महत्त्वा पितृघातकम् ।
भान्गारवगोमातुर्जीवितु किमिहोत्महे ।।
मनिणस्तद्वय श्रुत्वाहाहेत्युक्त्वातथाचतत् ।
पुतयन्तो विमनस सभृत्यबलवाहना ॥१०
निर्ययु सपरीवारा पुरस्कृत्यदमनृपम् ।
गृहीस्वाचाशियो विप्रास्त्रिकालज्ञात्पुरोधस. ॥११
प्रहिराजिपनि श्वस्यदम प्रायाद्वपुष्मतम् ।
सीमापालादिसामतानिनन्याम्यादिशत्वरा ॥१२
निरीक्ष्यत समायातयपुष्मान्मर्पपरितः ।
सेफदनसुतेनापिरमोशातोवपुष्मता ।
मायात सपरीवार सामात्य.सपरिच्छमः ॥१३
अनापितेनमनसारासैन्यानिदिदेशह ।
दूतचप्रेपयामासनिर्गम्यनगरातहि ।।१४
माता ने जो माशा मुझे भेजी है पब मुझे तदनुसार कार्य करना है,
पप दस मादि से युक यह नरगिसो रोना मुसज्जित की जाय ||८||
पा

हुए दक्षिण वपुरमा:-३२ [ ४४६ पितृ-देपी मोर पितृ पातक को मारे विना और माता की आज्ञा का पालन किये बिना जीवित रहने पर मुझ मे उत्साह नहीं रह सकता ॥ मार्कण्डेय जी ने कहा- उनके बचन सुन कर मन्त्रिगण ने शाक व्यक्त कर राजाज्ञा का पालन क्यिा मोर वे मृत्य, सेना, वाहनादि के सहित ॥१०॥ मपरिवार चन पडे और निकालज पुरोहितो का प्रायोर्वाद लेका दम भी ॥११॥ नागराज के समान वासोच्छ्वास छोड़ते हुए मोमापालक सामलो को मारते दिशा मे गये ॥१सा सपरिवार मौर मन्त्रिगण के साय वीर देश म दम का प्रागमन सुन कर सक्रन्दन पुत्र वपुष्मान ने भी कोर पूर्वक ||१३|| दृचित्त से अपनी सना का युद्ध करने का आदेश दिया और नगर से बाहर निकल कर दून के द्वारा यह सन्देश भेजा ॥१४॥ स्वशीघ्रतरमागच्चनरिष्यत प्रतीक्षते। सभार्यक्षत्रवधोत्वसमायाहिममातिकम् ॥१५ इमेमदाहुनिमुक्ता.शितावारणा पिपासिता । भिस्वाशरीरसग्रामेपास्यतिरुधिरतव ॥१६ श्रुत्वादमस्तुतत्सर्वदूतप्रोक्त ययोत्वरन् । स्मृत्वाप्रतिज्ञापूर्वोक्ताननिःश्वसन्नुरगोयथा ॥१७ आहतसमरेचवपुमान्मेनाविकत्यनः । ततोयुद्धमतीवासीद्दमस्यचवपुष्मत ॥१८ रथोचरथिनानागोनागिनाहयिनायो। अयुध्वनचविप्रर्पता द्ध तुमुलह्यभूत ॥१६ पश्यतासर्वदेवानासिद्धगवर्वरक्षसाम् । चपेवसुधाब्रह्मन्युध्यमानेदमेयुधि ॥२० नगजोनरथोनाश्वस्तस्यवारणसहस्तुयः । ततोदमेनयुयुधेमेनाध्य भावमुष्मत ॥२१ मरे क्षत्रियाधम । शीघ्र ही सामने प्रा, मरिष्यत भी पानी के महित तेरो प्रतीक्षा कर रहे हैं, इसनिये तुरन्त ही मेरे पास प्रा॥१२॥ यह रक्त-पिपासु वाण शिला पर पनाये गये हैं और मच मेरो भुजामो द्वारा चलाये । माग्डेय पुराण जाकर तेरे देह को विदीर्ण कर रक्तमान करेंगे ॥१६॥ दून की बात सुन कर मोर पूर्व प्रतिमा का स्मरण कर सपं के समान श्वास त्याग करते हुए दूतगति से दम वहाँ पहुँचे ॥१७॥ तथा युद्ध पे लिये ललकारते हुए वहा-प्रत पुष्प प्रात्मश्लाघा कभी नहीं करते, इसके पश्चात् वाष्मान के साप दम पा प्रत्यन्त घोर सयाम हुआ ||१८}} रथी से रथी, हाथी सवार से हाथी सवार और अश्वारोही से अश्वारोही भिड गये और घोर युद्ध होने लगा है ब्रह्म । उस युद्ध को अपने सामने ही सब देवता, सिद्ध, गंधर्वादि देख रहे थे, जब प्रत्यन्त क्रोध सहित दम युद्ध में प्रवृत्त हुए, तब पृथिवी कम्पायमान हो उठी ॥२०॥ उनके बाणो को सभी हाथी, अश्व या रथारोही सहन करते थे, दम के साथ वपुष्मान् का सेनापति भिड रहा था ॥२१॥ हदिविव्याधचदमइषुणागाद्यमातिकम् । तस्मिन्निपतितेसैन्यपलायनपरह्यभूत ॥२२ सस्वामिनतत प्राहदम शत्रु दमस्तथा। क्वयासिदुष्टपितरघातयित्वातपस्विनम् ॥२३ प्रशस्त्र चतपस्यतक्षत्रियोसिनिवर्तताम् । ततोनिवृत्यसदमयोधयामाससानुज ॥२४ सपुत्र सहसवधिवाधवैयुयुधेरथी। तत शरासनान्मुक्तबारगातास्ततोदिश ॥२५ दमचसरथचाशुनरजाल रपूरयत । तत पितृवधोत्थेनकोपेनसदमस्तथा ॥२६ चिच्छेदताञ्छरास्तेपाविव्याधान्यश्चतानपि । एकेकेनबारणेनसप्तपुत्रास्तथाद्विज ॥२७ सवधिबाधवान्मित्रान्निनाययमसादनम् । वपुष्मान्सरथीकोधाग्निहतात्मजवाधव ॥२८ युयुधेचसनातेजोशरैराशीविषोपमः। चिच्छेदत्तस्यतावारणा-सद्मश्चमहामुने ।।२६ वपुष्मान-वध ] -- उसके हृदय को दम ने वींध दिया, उसके गिरते वपुष्मान के सहित समस्त सेना भाग ने लगी ॥२२॥ तव शत्रुनाशक दम बोल-अरे दुष्ट मेरे पिता की हत्या करके तू विघर जा रहा है ।।२३।। तूने शस्त्र रहित तपस्वी पिता का वध किया है, भाग मत, यह सुन कर वपुष्मान् अपने अनुज, पूत्र एव बाधवादि के सहित डट कर रथ पर चढ़ा हुमा युद्ध करने लगा और उसने अपने धनुष के द्वारा वारण वर्षा करके सभी दिशाओ को ढक दिया ।।२४- २५॥ उसने अपने बाणो के जाल से रथ अश्व सहित दम को मावृत्त कर और दम ने भी अपने पिता की हत्या से उत्पन्न हुए क्रोर मे उत्त जित होकर ॥२६॥ उसके सव वाणो को काट कर, शत्रुप्रो के देह वाणो से बोध कर, एक-एक बाण से उसके सात पुत्र ॥२७॥ मनुज, सम्बन्धी मादि का वध कर दिया, जव वपुष्पान ने अपने पात्मज तथा वन्यू मादि का मरण देवा, तब वह भी अत्यन्त क्रोध मे भर कर ॥२८॥ नागो के समान बारणो के द्वारा दम से युद्ध करने लगा, परन्तु दम ने वे सभी बाण काट दिये ॥२६॥ युयुधातेचसरब्धौपरस्पररजय पिणौ। परस्परशराघातविच्छिन्नधनुपौत्वरा ॥३० गृहीतखङ्गाबुतीयंचिक्रीजतेमहाबलो। दम क्षरणनृपध्यात्वापितरनिहतवने ॥३१ केशेष्वाकृष्यचाकम्यनिपात्यधरणीतले । शिरोधारायापादेनभुजमुद्यम्यचाब्रवीत् ॥३२ पश्यंतुदेवता.सर्वामानुपा:पन्नगा खगाः । पाट्यमानचत्दृदयक्षत्रवघोर्वपुष्यतः ॥३३ एवमुवत्वाचसदमोदयचय्यदारयत् । पातुकामश्वससुर क्षतजेननिवारतः ॥३४ ताश्चकारतातस्यारक्त नवोदकक्रियाम् । आनृण्यप्राप्यसपितु.पुन प्रायास्वमन्दिरम् ॥३५ वपुष्मतश्चमासेनपिंडदानचकारह । ब्राह्मासान्मजयामासरस.कुलसमुद्भमाद ॥३६ ४५२ ] [ मार्कण्डेय पुराण एवविधाहिराजानीयभृत् सूर्यवशजाः । अन्येपिसुधिय.शूरायज्विनोधर्मकोविदा ॥३७ वेदातपारगास्ताश्चनसल्यातुमिहोत्सहे । एतेषाचरित श्रु त्वानरःपा.प्रमुच्यते ॥३८ इस प्रकार क्रोध पूर्वक एक दूसरे को मारने की इच्छा से घोर संग्राम करने लगे, दोनो ही महाबली थे, दोनो के ही धनुष टूट गये थे, तव दोनो ही तलवार से युद्ध करने लगे, वन में मारे गये पिता की क्षण भर याद करके दम ने वपुमान् ॥३०-३१।। केश खीच कर पृथिवी मे डाल दिया और उसकी ग्रीवा को पांव से दाब कर भुजा उठा कर दम ने इस प्रकार कहा ॥३२।। मैं इस क्षत्रियाधम वपुमान् के हृदय को विदीर्ण करता है, इसे सभी देवता, मनुष्य, सिद्ध और नागगए देखें ॥३३॥ ऐसा कह कर दम ने तलवार से उस का हृदय चीर डाला और उसका रक्त पीने को उद्यत हुए, तब देवताग्रो ने उन्हें रोका ॥३४॥ उसके रक्त से दम ने अपने पिता को उदक दान और मास से पिंडदान दिया, इस प्रकार पितृ ऋण से मुक्त हुए दम मपनी राजधानी मे लोट माये ॥३५.३६॥ सूर्यवश मे ऐसे पराक्रमी राजा हुए तथा अन्य अनेक राजा यशदान, धर्मात्मा, ज्ञानी एव पीर हुए हैं ॥३७॥ ऐसे-ऐसे वेदान्त पारगत हुए, जिनका वर्णन नहीं हो सका और न उसकी गणना की जा सक्नो है, इनके चरित्र को सुनने वाला मनुष्य पापो से मुक्त हो जाता है ।।३८ ११३----पुराण श्रवण पठन फल एवमुक्त्वाजैमिनेयमार्कण्डेयोमहामुनि. । विसृज्यकोप्टुकिमुनिचक्र माध्याह्निकोक्रियाम् ॥१ अस्माभिश्वथ तंतस्माद्यत प्रोक्त महामुने! प्रनादिसिद्धमेत दिपुराणोक्त स्वयंभुर पुराग श्रवण पठन फ्ल --- । ४५३ - मार्कण्डेयायमुनयेयत्त स्माभिरुदाहृतम् । पुण्यपवित्रमायुप्यधर्मकामार्थमिद्धिदम् ॥३ पठनाशृण्वतासद्य सर्वपापप्रमोचनम् । पादावेवकृतायेचप्रश्नाश्चत्वारएवहि ॥४ पितु पुनस्यसवादस्तथासृष्टि स्वयभुव । तथामनुनास्थितयोराज्ञाचचरितमुने ।।५ अस् भिरेतत्तं प्रोक्त किमद्यश्रोतुमिच्छसि । एतान्सर्वान्नर श्रुत्वापठतेवासभासुच ॥६ विधूयसर्वपापानिब्रह्मणोह्यालयब्रजेत् । अष्टादशपुराणानियानिप्राहपितामह ॥७॥ पक्षियो ने कहा है जैमिने । महामुनि मार्कएयजो ने इस प्रकार कह कर क्रोष्ट कि मुनि को विदा किया और मध्याह्न क्रिया सम्पन की ॥१॥ हे महामुने । जो हमने प्रापसे कहा है वह सब स्वय भगवान् मार्कण्डेय जी ने कहा था, हमने भी उही से सुना है ।।२।। आपसे कहा गया यह मनोहर पुराण माकण्डेय जी के द्वारा कहा गया एव अत्यन्त पवित्र है, इसके पढ़ने या सुनने से अायु की वृद्धि और सभी कामनाप्रो की सिद्धि होती है ॥३॥ और इसके पाठ करने से सभी पापो से मुक्ति होती है पग्लेि आपने जो चार प्रश्न किये थे, उन सब का उत्तर ॥४॥ पिता-पुत्र सम्वाद स्वायभुव को सृष्टि, मनुष्यो की उत्पत्ति और राजागरण का चरित्र भो ॥५॥ आपके प्रति कहे गये हैं, अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ? इस सब को सुनने और सभा स्थल मै दाधन कराने वाला मनुष्य ॥६॥ सभी पापा से छूट कर ब्रह्म में लीन हो जाता है ॥७॥ तेपातुसप्तमज्ञेयमार्कण्डेयसुविथु तम् । ब्राह्म पाद्म वैष्णवर्शवभागवततथा ll तयान्यनारदीयचमार्कण्डेयचसप्तमम् । आग्नेयमप्टमप्रोक्त भविष्यनवमतथा 18 ४५४ ] [ मार्कण्डेय पुराण दशमब्रह्मवैवर्त लंगमेकादशस्मृतम् । वाराहद्वादशप्रोक्तंस्कादमत्रत्रयोदशम् ॥१० चतुर्दशवामनचकौमपंचदशतथा । मात्स्यचगारुडचंयब्रह्माड चतत परम् ।।११ अष्टादशपुराणानानामधेयानियःपठेत् । त्रिसध्यंजपतेनित्यसोऽश्वमेधफललभेत् ॥१२ सर्गश्चप्रतिसगंश्ववशोमन्वतरारिणच । वशानुचरितचैवपुराणपचलक्षणम् ॥१३ चतु प्रश्नसमोपेतपुराणह्य तदुत्तमम् । श्रुत्वापुनश्वनेपापकल्पकोटिशतं कृतम् ।।१४ ब्रह्महत्यादिपापानियान्यन्यान्यशुभानिच । सानिसर्वारिणनश्य तितृणवातहत यथा ॥१५॥ पितामह ब्रह्मा जी ने मठारह पुराण कहे थे उनमे यह मार्कण्डेय पुराण सातवां है, प्रथम पुराण ब्राह्म, द्वितीय पान, फिर वैष्णव, शैव, भागवत ॥ नारदीय, मार्कण्डेय, माग्नेय, भविष्य १६॥ ब्रह्मवैवर्त, लिंग, बाराह, स्कन्द ॥१०॥ वामन, कोर्म, मत्स्य, गरुड मोर फिर अठारहवां ब्रह्माण्ड पुराण है ॥११॥ इन मठारह पुराणों के नाम का ही पाठ करने वाला तथा तीनो सध्या मे जप करने वाला मनुष्य मश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त करता है ॥१२॥ सर्ग, प्रति सर्ग, वश, मन्वन्तर, वंशानुचरित यह पांच लक्षण पुराणो के होते हैं ॥१३॥ चार प्रश्न वाला इस मार्कण्डेय पुराण के सुनने सौ करोड मल्ल के भी पापो का क्षय होना है ॥१४॥ तथा ब्रह्महत्या मादि सब महापाप प्रचण्ड वायु से टूटे हुए तृण के समान हो इसके पाठ करने से नष्ट हो जाते हैं ॥१५॥ पुष्करैदानजपुरयश्रवणादस्यजायते । सर्ववेदाधिकपलंसमाप्त्याचाधिगच्छति ॥१६ य श्रावयेत्पूजयेत्त यथादेवपितामहम् । गधपुप्पस्तथावस्त्रं ह्मणानांचतपणे. ॥१७ पुराण श्रवण-पठन फल ] । ४५५ यथाशक्त्याचदातव्यं नृपामादिवाहनम् । एतत्पुराणमखिलवेदार्थरुप हितम् । धर्मशास्त्र कनिलयंश्रुत्वासर्वार्थमाप्नुयात् ।।१८ श्रुत्वापुराणमखिलव्याससपूजयेद्बुध । धर्मार्थकाममोक्षारायथोक्तफलहेतवे पE दद्याद्गागुरवेस्वर्णवस्त्रालकारसयुताम् । श्रवणस्यफलावाप्त्यदानं सतोषयेद्गरुम् ॥२० अपूज्यपाठकरिश्लोकमेकशृणोतिय नासौपुण्यमवाप्नोतिशास्त्रचोर स्मृतोहिसः ॥२१ इमके श्रदरण करने से वैसा ही पुण्य मिलता है, जैसा पुष्कर मे दान करने से मिलता है, इसकी सम्पूर्णता मे वेदपाठ की सम्पूर्णता के समान फल को उपलब्धि होती है ॥१६॥ इस पुराण को सुनाने वाले पडित का ब्रह्मा के समान पूजन करे, गध, पुष्प, वस्त्रादि से पुराण का पूजन कर ब्राह्मण भोजन करावे ॥१७॥ राजा ययाशक्ति ग्राम तथा वाहनादि प्रदान करे, यह पुराणा सम्पूर्ण वेदार्थ से युक्त तपा धर्म का स्थान रूप है, इसके प्रवण करने से सर्वार्थ सिद्धि होती है ॥१८॥ इस सम्पूर्ण पुराण को सुन कर व्यास पूजन करे तो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारो पदार्थों की प्राप्ति होती है ॥१६॥ स्वर्ण, वस्त्र, तथा अलवारादि से युक्त गो गुरु को दे, क्योकि सुनने का फल प्राप्त करने के लिये दान द्वारा गुरु को सतुष्ट करे ॥२०॥ वाचक को पूजा पिये पिता जो पुरुष इसको सुनते हैं, उन्हें कुछ भी पुण्यलाभ नहीं होता, ज्ञानीजन उन्हें शास्त्र चोर कहते हैं ॥२॥ नतस्यदेवा.प्रीगतिपितरौनवपुत्रकान् । दत्तं श्राद्ध तथेच्छतितीर्थस्नानफलनच ||२२ लभतेशास्त्रचोरश्चनिंदासज्जनसंस द । अवज्ञयानश्रोतव्यशास्त्रमेतद्विचक्षण ॥२३ पठ्यमानेत्ववज्ञातेसाधुभि शास्तउत्तमे। मूकोभवतिजन्मानिसप्तमूर्ख प्रजायते ॥२४ ४५६ ) [ मार्क गडेय पुराण श्रुत्वातत्पूजयेद्यस्तुपुराणसप्तमपुन । सर्वपापविनिर्मुक्त पुनारयेवनिजकुलम् ॥२५ पूतोयातिनमदेहोविष्णुलोकसनातनम् । च्युतस्तत पुनर्ने वसभविष्यतिमानव ॥२६ पुराणथवरणादेवपरयोगमवाप्नुयात् । नास्तिकायनदातव्यवृपलेवेदनिदके ॥२७ गुरुद्विजातिनिंदायतथाभग्न व्रतायच । मातापिनोनिंदकायवेदशास्त्रादिनिदिने ।।२८ देवता उनसे रुष्ट हो जाते हैं, पितरगण भी अप्रसन्न होकर उनके द्वारा दिया गया श्राद्ध ग्रहण नहीं करते और उन्हे तीर्थ स्नान के फन से भी वचित होना पडता है ॥२२॥ सज्जनो के समाज मे उनकी निन्दा होती है, इसलिए विद्वानो को अवज्ञापूर्वक श्रवण नही करना चाहिये ।।२३।। जो मनुष्य साधुग्रो द्वारा शास्त्र पढो समय अवज्ञा करते हैं वह कई जन्म तक यूरे पौर सात जन्म तक बधिर होते हैं ।।२४।। इस सप्तम पुराण का पूजन करने वाले मनुष्य सब पापो से मुक्त होते और अपने कुल को पवित्र करते हैं ।।२५॥ यह पवित्र होकर अवश्य ही विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं, वहां से पुन संसार में नहीं लौटते ।।२६॥ केवल इस पुराण के ही सुनने मात्र से उत्कृष्ट योग की प्राप्ति होती है, परन्तु यह पुराण नास्तिक, शूद्र, वेदनिन्दक, गुरद्वपी, प्रतत्यागी, माता पिता के निन्दक पोर शास्त्रादि के निन्दक वो प्रदान करे ॥२७ २८॥ भिन्नमर्यादिनेचंवतथावैधातियोपिने । एतेपानवदातव्यप्राण करगतैरपि ।।२६ लोभाद्वायदिवामोहाद्भयाद्वापिविशेषत । पठेद्वापाठयेद्वापिसगच्छेन्नरक वम् ।।३० एनत्मर्वमुपाख्यानधय॑स्वर्गापवर्गदम् । योतिपठेद्वापिसिद्ध तस्यसमीहितम् ।।३१ प्राधिव्याधिजदु खेनयदाचिन्नाभियुज्यते । ब्रह्महत्यादिपापेम्योमुच्यते नात्रस राय ॥३२ पुर ए श्रवण-1टन फर } [ ४५७ स1 स्वजनमित्राणिभवतिहितबुद्धय । नारय सभविष्यतिदस्यवोवाकदाचन ॥३३ सदर्थोमिष्टभोगीचदुर्भिक्षेनवसीदति । परदारपरद्रयहिसादिकिल्पिं ॥३४ मुच्यतेनेकदु खेभ्योनित्यत्ववद्विजोत्तम । ऋद्धिवृद्धि स्मृतिशाति श्री पुष्टिस्तुष्टिरेवच । नित्यतस्यभदेद्विप्रय शृणोतिकथामिमाम् ॥३५ मर्यादा के तोड़ने वाले और जाति को दूपित करने वाले मनुष्य को भी न दे तया प्राण कठगत होने पर भी इस पुराण को प्रदान न करे ॥२६॥ यदि लोभ, मोह या भय के कारण इनमें से जो कोई पुराण का पाठ करता है या पाठ करा कर श्रवण करता है, तो वह अवश्य हो नरकगामी होता है ॥३०॥ माव एडेय जी ने कहा- यह समस्त उपाख्यान धर्म, स्वग और मोक्ष का दाता है, इसे जो पडता है, उसकी सम्भूण कामगाएं सिद्ध होती हैं ॥३१॥ उसे कभी रोगादि से कष्ट नहीं होता और वह ब्रह्महत्या आदि के पापो से मुक्त हो जाता है ॥३२॥ उसके स्वजन और मित्र उसका हित करने वाले हो जाते हैं, उसका कोई भी शत्रु नहीं होता और न चोरो की ही बाधा उपस्थित होती है ॥३३॥ उसके यहाँ श्रेष्ठ धन विद्यमान रहता है वह मिष्टान्न का भोजन करता और दुभिक्ष से कभी भी पीडिन नहीं होता पर नारी, पर धन, और पर हिंसा के पापो से ॥३४॥ अथवा अय अनेक प्रकार के दु खो से मुक्त हो जाता है इस कथा को जो मुनता है, ऋद्धि वृद्धि, स्मृति, शान्ति, श्री, पुत्रि, तुष्टि उसके साथ रहती हैं ॥३॥ मार्कण्डेयपुराणमेतदखिलशृण्वनशो- च्य पुमान्योवासम्यगुदीरयेद्रसमयशोच्योनसोपिद्विज । योगज्ञानविशुद्धसिद्धिसहिन स्वर्गादिलोकेप्यसौ- राधा श्वसुरादिभिपरिकृत स्वसदापूज्यते ४२६

[ मावएडेय पुराण
पुराणमेतच्छ त्वाचज्ञान विज्ञानसयुतम् ।
विमानवरमारुह्यस्वर्गलोकेमहीयते ।।३७
पुराणाक्षरसख्याचप्रख्यातातत्त्वबुद्धिना ।
श्लोकानापट्सहस्राणितथाचाष्टशतानिच ॥३८
श्लोकास्तत्रनवाशीतिरेकादशसमाहिता. ।
कथितामुनिनापूर्वमार्कण्डेयेनधीमता ॥३६
भारतेनाभवद्यन्मेसशयस्फोटनद्विजा ।
तद्भवद्भि कृतयनकश्चिदद्यकरिष्यति ॥४०
यूयदीर्घायुषःस्यातप्रज्ञाबुद्धिविशारदा.।
सास्ययोगेतथाचास्तुबुद्धिरव्यभिचारिणी ॥४१
पितृशापकृताह खाद्दौर्मनस्यव्यपेतुवः ।
एतावदुक्त्वावचनजगामस्वाश्रममुनिः।
चितयन्परमोदारपक्षिणावाक्यमीरितम् ॥४२
इस सम्पूर्ण मार्कण्डेय पुराण का श्रवण करने वाला कभी शोचनीय
नही रहता, इसके कहने वाले विप्रगण भी शोचनीय नहीं रहते, वे योग, ज्ञान
पौर सिद्धि के सहित स्वर्गादि लोको को प्राप्त होते हैं तथा इन्द्रादि देवताओ
के साप रह कर सदा पूजे जाते हैं ॥३६॥ इस ज्ञान-विज्ञान से युक्त पुराण
का प्रवण करने वाले मनुष्य श्रेष्ठ विमान में चढ कर स्वर्ग को गमन करते
हैं ॥३७॥ पहिले सूक्ष्मदर्शी श्री मार्कण्डेय जी ने इस पुराण में छ हजार
नौ सौ श्लोक बहे थे ३८-३४ा जैमिनि ने कहा-हे खगगरण ! महाभारत
में जो सन्देह था, वह सब तुमने मिनभाव से दूर कर दिया, इस प्रकार मन्य
फोन पर राबता या ? ॥४०॥ तुम अत्यन्त दीर्घायुष्य, नौरोग पौर बुद्धि
विशारद हो, तुम्हारी बुद्धि सांस्य योग में श्रेष्ठ गति वाली हो ॥४१॥ तुम
पिता के वचन से ही दुखों प्राप्त नही हुए हो, ऐसा कह कर मोर उन खगो
के वचनों का स्मरण करते हुए मुनि अपने माश्रम में लौटे ।।४२॥

मार्कण्डेय पुराण का नैतिक व सांस्कृतिक अध्ययन पुराण रचना की पात्रता और मार्कण्डेय की दूरदर्शिता इस पुराण के प्रणेता अथवा वक्ता महपि मार्कण्डेय हैं। उन्ही के नाम से यह पुराण अभिहित हुआ है । मार्कण्डेय उच्चकोटि के साधक और मात्मानुसधान के प्रवीण पात्र थे। वे प्रात्मसाक्षात्कार की अन्तिम सीढी तक पहुंच चुके थे। नारायण उनके इष्ट देव थे। उनके साक्षात् दर्शन होने के सम्बन्ध मे स्वय नारायण ने प्रकट होकर महाभारत में मार्कण्डेय को सम्बोधित करते हुए कहा "हे मार्कण्डेय ! तुम्हारे ब्रह्मचर्य की महानता अवर्णनीय है । मेरे जिस रूप को देवता भी तत्व रूप से नहीं समझ सकते, उसे तुम अपने प्रत्यक्ष नेत्रो से देख रहे हो। मैं नारायण हूँ, विश्व का शाश्वत और अध्यय प्रसव स्थान हूँ। इन्द्र, प्रजापति, कुवेर शिर, ब्रह्मा, विष्णु, यम, सोम सब मैं ही हू । चारो वेद मुझ से ही पवित होते हैं मोर मुझ मे ही समा जाते हैं। जो कुछ भी स्थावर और जगम वस्तुओं को तुमने देखा है, उन्हें मेरी ही मात्मा समझो, "मैं नारायण हूं।" मार्कण्डेय ने महाभारत में युधिधिर के एक प्रश्न के उत्तर में कहा है "एकाएंवीभूत स्थिति में एक वटवृक्ष की शाखा पर मैं ने एक बालक के दर्शन किए जो स्वय नारायण थे। उन्होंने स्वयं कहा-मार्कण्डेय ! मैं तुम से सन्तुष्ट हू. तुम थक गये होगे, तुम मेरे शरीर में विश्राम लो।" कथा के अनुसार मार्कण्डेय उस नारायण रूपी बालक के मुख में चले गये, वहां उन्होंने भारत वर्ष के दिव्य दर्शन किये- उसके जनपद, नगर, नदियां और पर्वत।" जिस तरह से भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को पात्र समझ कर विराट रूप के ४६० ॥ [ मार्कण्डेय पुराण दर्शन दिये थे, उसी तरह से नारायण ने मार्कण्डेय को उत्तम पात्र जानकर उन्हें अपना साक्षात् दर्शन दिया और भारत वर्ष का विराट् रूप दिखाया। दूसरे शब्दो मे उन्होने मार्कण्डेय को भारत वर्ष को भौगोलिक समीक्षा और उसके निवासियो का नैतिक, सामाजिक, सास्कृतिक और पात्मिक विष्लेषण कर के मार्ग दर्शन करने का अधिकार दे दिया हो । नारायण को मार्कण्डेय उत्तम पात्र दिखाई दिये । ऐसा लगता है कि मार्कण्डेय पुराण को रचना का भार स्वम नारायण ने मार्कण्डेय को सौंपा हो। इससे स्पष्ट है कि मार्कण्डेय पुराण के प्रणयन की पृष्ठभूमि मे स्वय नारायण उपस्थित हैं । प्रस्तुत पुराण में जो भी शिक्षाएँ और प्रेरणाएं दी गई हैं, वे मार्कण्डेय के मस्तिष्क मे नारायण के प्रकाश से ही पाई हैं। पुराणो को वैसे भी वेदो की सरल धारया मानी जाती है । वेदो मे जो सिद्धान्त गहन रूप मे प्रतिपादित किये गए हैं, उन्हें कपाओं, कहानियो और रूपको के माध्यम से पुराणो मे वणित किया गया है ताकि वे सर्व साधारण की समझ मे मा सके। वेदो को ईश्वरीय रचना मानने में किसी को सन्देह ही नही हो सकता । प्रत यदि मार्कण्डेय पुराण की रचना के लिये नारायण ने मार्कण्डेय को पात्र समझ कर मादेश दिया हो तो इसमें कुछ अतिश्योक्ति नहीं है । पुराण की रचना मे मार्चएडेय ने अपनी पात्रता सिद्ध कर दी। उन्होने युगानुरूप सामग्री का चयन दिया, पुराणो को रासारित किया, जो दोप बुध अन्य पुराणों में थे, उन्हें दूर किया, साम्प्रदायिक विद्वप से दूर रहे, किसी भी साम्प्रदाय में देवी देवता पा उन्होने सएहन नहीं लिया, उसे लिए सभी देवता समाए हैं, वे तो रामो वो नारायण रूप देखते थे। जिसे नारायण दास्वय साक्षारपार हो गया हो, उसके मन मे भेदभाव की उत्ति बंग हो सकती है। वे तो सभी प्राणियों में अपने ही रूप में दर्शन करणे उनो पल्याण की योजना में मान रहते होंगे मोर महपि मा एडेय ने रिया भी ऐरोही। गारंडेय दूरसी थे, उन्होंने मानव मारा गहन पध्ययन रिया था, धेरचय साधन प्रौर जियारमा हप रो देता पा r frm तरह से शुदगे नतिक व सांस्कृतिक अध्ययन ] महान अथवा नीचे से ऊपर चढने की क्रियाए सम्पन्न होती हैं। वे ऋषि थे, मात्मसाक्षात्कार किए हुए थे, उन्हें स्वय प्रात्मा के अतिरिक्त ससार में कुछ सूझता ही न होगा । वे इस जगत को अनित्यना को भली भांनि अपने खुले नेत्रो से देखते होगे परन्तु जगत से उन्होने मुह नही मोडा। वे जानते थे कि स्थूल शरीर की सुरक्षा के लिए हर प्रकार की भौतिक सामग्री की अपेक्षा रहती है । उनसे घृणा करना अपने मार्ग को अवरुद्ध करना होगा। अमोत्थान के लिए दोनो का समन्वय अभीष्ट है । मार्कण्डेय ने अपने पुगण म यही किया है। भौतिक, नैतिक, सामाजिक और आत्मिक सभी विषयो का प्रतिपादन किया गया है। भौतिक विद्यानों के विकास का समर्थन- महर्षि ने भारत वर्ष के भूगोल का विस्तृत विवेचन किया है। जिससे भारत की प्राचीन सीमानो का दिग्दर्शन होता है। पर्वतो और नदियो का भी विस्तार से वर्णन है । सम्पूर्ण जनपद सूची भी दे दी गई है। मार्कण्डेय राष्ट्रवादी सत थे। प्राज तो पढे-लिखे लोग अपने देश की उपेक्षा करते हैं और इङ्गलैंड, अमेरिका को प्रशमा के पुल बांधते नहीं थकते परन्तु माण्डेय ने भारत को कर्म भूमि और शेप भू-भाग को भोग-भूमि घोपित किया है । ब्रह्मपुराण २७१७२-७८ मे भी कहा है कि भारत में जन्म लेने वाले धन्य है। पहाँ सब पुण्यो के फल प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होते हैं । स्वर्ग के देवता यहां जन्म लेने मे गौरव का अनुभव करते हैं । जो कार्य यहां के लोग कर सकते हैं, वे देवतानो मोर असुरो किसी के लिए गी सम्भव नही है ।" वास्तव में प्राचीन भारत का गौरव ऐसे ही था जिसकी समृद्धि, विकास और उत्थान को स्याही चागे और फैली हुई थी। आज भी यदि ऋषियो के पदचिह्नो पर चलने लगें तो उस खोए गौरव को पुन प्राप्त कर सकते हैं। महपि ने भौतिक विद्याओ को उपेक्षा नहीं की। जीवन के पूर्ण विकास को भी मावश्यक मानते हैं। तभी उन्होने धन सग्रह करने के सभी उपायो का वर्णन किया है जिसे पशिनी विद्या का नाम दिया गया है। व्यापार द्वारा ४६२ ] । म एडेय पुराण धन कमाने के जितने भी साधन हो सकते हैं, उन सब का ब्यौरा पुराण में दिया गया है । आशय यह है कि व्यक्ति को घोर परिश्रम करके भौतिक जीवन को सुखी बनाने के लिए धन का सञ्चय करना चाहिए परन्तु अनैतिक उपाय से नहीं। वे धन को व्यक्तिगत सम्पत्ति भी नहीं मानते । जब राष्ट्र को उसके भावश्यकता पडे तो उससे मोह न करके राष्ट्रहित मे सारी सम्पत्ति का दा कर देना चाहिए । हरिश्चन्द्र का लम्बा पाख्यान इसी उद्देश्य से लिखा गय है कि धनबानो को अपने धन से मोह नही करना चाहिए। यह ईश्वर द्वार सकायों के लिए उन्हें दिया गया है । यदि वह इसका दुरुपयोग करेंगे तो अ से छीन लिया जायेगा। मार्कण्डेय धन कमाने के पक्ष में तो हैं पर हरिश्चन को भादर्श मान कर समय आने पर सर्वस्व लुटाने के लिए तैयार रहने । प्रेरणा भी देते हैं। महर्षि जगत को मनित्य, क्षणभङ्गार मौर अस्थायी मानते हैं परन् मामा के इस मन्दिर शोर की सुरक्षा पर भी पूरा ध्यान देते हैं। पुराए में सागर विज्ञान का प्रतिपादन किया गया है, जो आधुनिक विज्ञान से मिलन है। इस सम्बन्ध में लिखा है कि रज और वीर्य के मिलने से जिस तरह न दारीर की रचना भारम्भ होती है और किस तरह उसका प्रमिक विकास होता है। गर्भ में पारीर का पोपण राि प्रकार से होता है, माता मोर गर्भस्थ शिशु के शारीरिक समायरी पद्धत व्यवस्था रा वर्णन है । मायुः वेद चिकित्सा का भी वर्णन है जिससे शरीर का प्रमाध रोग हो पर भी स्वास्य नाय जा सो । प्रादि ये उपायों पर भी प्रकार डाला गया है। दम पुत्र राग्य-वधन की रानी ने उगरे सर पर रापे। बाल देखा तो दुखोई। राजा ने गममा प्रिय युनिवर है और पाप में प्रवेश पर पन में तपने पलना चाहिए । प्रजा पाहती पीरि बदी राजा राम तामन वागहोर ममालते रहें। प्रभा ने राजा की प्रालिले लिये पं. सनी गामूहि पाराधना निरषय रिया पोरामा पर पर IT मे सग गई। तीन माग भी सामना पार पूर्वदेव प्रमय हए पोर राम कोपापु गहमार वरोरा परमानप्रतिपातिदनी में वापत नैतिक व सास्कृतिक अध्ययन ] [ ४६३ यह कथा प्रायुवृद्धि के लिए सूर की शरण में जाने को इङ्गिर करती है। माधुनिक विज्ञान ने मी सिद्ध किया है कि सूर्प हो समस्त भौतिक शक्तियो का स्रोत है और शरीर के विकास, सुरक्षा सुदृढता और चिकित्सा के लिए सभी आवश्यक तत्व इसमे विद्यमान है । सूर्य किरणे शरीर के लिए अत्यन्त माव- प्यक मानी जाती हैं। जो लोग सूर्यदेव से विमुख रहते हैं, उन पर ही रोग प्राक्रमण करने का साहस करते हैं । सूर्य किरणो से रोग मुक्ति को एक नवीन चिकित्सा पद्धति का भी माविषकार हो चुका है । सूर्य के बिना पृथ्वी पर मानव का जीवन असम्भव है। सूर्य के प्रभाव में जीवधारी अपने प्राणों को रक्षा नहीं कर सकते । जहाँ सूर्य के यदाकदा दर्शन होते हैं, वहाँ पर जब सूर्य निकलता है तो उत्सव मनाए जाते हैं । तभी भारत मे सूर्य को देवता की सज्ञा दी गई है और मार्कण्डेय पुराए में भी उसका भव्य स्तवन किया गया है। (पुराणकार मनोरंजन के सापनो को आवश्यक मानते हैं और कला की प्रशसा करते हैं ।" जिसमे गुण रूप नही होता, उसे नाटक में सफलता प्रास नहीं होती। नृत्य का सुन्दर मधिधान आवश्यक है। उसके बिना नृत्य एक विडम्बना ही रह जाती है।") ऐसा लगताहै कि प्राचीनाकाल मे सब प्राणियो की बोली समझने की विद्या का विकास हो चुका पा तभी विभावरी ने जव स्वरोचिप को प्रारम- समपर्ण किया तो विभावरी ने सब प्राणियो की बोली समझने की विद्या को शुल्क रूप में प्रदान किया। जिस समय पुराण को रचना हुई, उस समय मत्र विज्ञान की प्रक्रिया उत्तशिखर पर थी । मत्र-विज्ञान की एक शाला-इटि क्रिया का उल्लेख किया गया है। एक राजा की पत्नी किसी कारण से राजा को छोड़ कर चली गई । एक ब्राह्मण व राजा से मित्रविन्दा नाम को इष्टि करादो और जर वह साधना पूरी हो गई तो ब्राह्मण ने राजा से कहा “अब मापनी पत्नी आप में पूर्ण अनुरूप रहेगो, प्रत: पाप उसे प्राप्त करने का प्रपल कोजिए" यह मंत्रविज्ञान का ही धमत्कार है। - ४६४ ] [ मा पुगग कर्तव्य परायणता का निर्देश- पुगणो मे क्षत्रिय राजाम्रो के शौर्य, साहस और जीवन चरित्रों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। उन क्षत्रियों के सत्रिय का पूर्ण परिचर मिलना है। वे अपने शरीर को पाहुति देकर भी क्तव्य पालन करते हैं और प्रजा को सुरक्षा को अपना आवश्यक धर्म मानते हैं । तभी कहा है "हम वनवान दात्रियों के सामने यदि इस कन्या का अपहरण हो जाये तो हमारे जीवन को विककार है। जो दुष्ट लोगों से दुखी व्यक्ति की सुरक्षा करता है, वही सच्चा क्षत्रिय है।" अलंक के पूछने पर मदालसा ने ब्रह्मण के धर्म का विवेचन करते हुए कहा "दान, अध्ययन और यज्ञ यह ब्राह्मण के निरपेक्षा धर्म है ' चारो और पाथमो के कर्तव्यो का उल्लेख है। राजा के वर्तव्य तो विस्तार से वरिपत किये गये हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि आजकल की तरह उस समय भी शासक वर्ग मे स्वार्थपरता का अवगुण पा चुका था तभी वह कडे शब्दो मे शासको को चेतावनी देते हैं कि "वश्य अपनी प्रायका १२ वी भाग राजा को इमलिए देता है कि उसके जान माल की सुरक्षा हो सके । ग्वाले, घी, तक प्रादि का तथा किसान भनाज का छटा भाग इसीलिए देते हैं। जो राजा व्यापारियों से उसकी आय का अधिकांश भाग लेते हैं, यह चोर हैं। यदि कर लेकर भी राजा प्रजा सुरक्षा में असमथ रहता है और प्रजा को अन्य उपायो का सहारा लेना पडता है तो राजा निश्चय ही नरक जाता है । यदि चोरो से रक्षा नहीं कर सक्ता तो वह पापी कहलाता है।" इस तरह से मार्कण्डेय एक स्वतन्द्र और निर्भीक विचारक की तरह अपने विचार व्यक्त करते हैं। उनका उद्देश्य जनता की भलाई है। उसमे उन्हें कष्ट भी सहना पड़े तो उसके लिए वे तैयार हैं। शामक वर्ग का कडा विरोध करने पर क्या परिणाम निकराते हैं, इससे सभी परिचित हैं। फिर भी अपनी पारमा की मावाज को बन्द नहीं करते वरन् निर्भय रूप से उमका प्रचार करते हैं। वास्तव में ऐमे विचारक ही जनहित में सफल होते हैं ।

नतिक व सास्कृतिक पपयन ] । ४६५ मार्कण्डेय माध्यात्मवादी है, भात्म-साक्षात्कार कर चुके हैं, परन्तु भौतिक वाद की मोर प्रांख मूदना उन्हें प्रभीष्ट नहीं है। इसीलिए अनेको प्रकार को भौतिक विधामो को मोर उन्होंने अपने पाठको को माकृष्ट शिया है। वे चेतावनी भी देते हैं कि इन में लिप्त रहना निरी मूरतिा होग, केवल मोनिक विकास पर ही सन्तुष्ट न हो जाना, मानव का चहुंमुखी विकास होना आवश्यक है। पारिवारिक, सामाजिक, नैतिक और मात्मिक सभी धारामो मे उमका प्रवेश होना चाहिये और बिना विधाम के प्रगति पथ पर निरलर प्रागे बढने चले जाना चाहिए। केवल भौतिक या माध्यात्मिक-दोनो एकागो हैं । दोनो का विकास ही पूर्ण विकास माना जाता है । पारिवारिक व सामाजिक समस्याओं का मभावान-~ मार्कण्डेय योग्य चिकित्सक थे। वे उलझी गुत्थियो को सुलझाना जानते थे और हवा का रुखा देख कर उसो के अनुसार अपनी नीति का निर्धारण करते थे। उनके सामने वौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार हो रहा था। जनता का मुकाव प्रवृत्ति मार्ग की अपेक्षा निवृत्ति मार्ग की ओर अधिक होने लगा था। परिणामस गृहस्थ में प्रवेश की भपेशा लोग सन्यास ग्रहण करना अधिक पन्सद करते थे। गृहस्थ मे प्रत्यक्ष रूप से लौकिक सुख को उपलब्धि थी परन्तु सन्यास में पारलौकिक कल्याण का लोभ निहिन था। इसमें अनीश्वरवादी धारा का प्रवाह वह चला। समाज में एक अजीव पागलपन मागया। भारतीय ऋषियो ने चार माश्रम बडी सूझ बुझ से बनाये थे । उसमे भी सन्यास का विधान है परन्तु गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रम के वाद जब साधक उसको पात्रता प्राप्त कर लेता है। जब तक मन स्थिति में सन्यास या रंग न आए, तब तक उससे अपेक्षित लाभ की मासा करना व्यर्थ है भले हो पर बार छोड़ने और त्यागमय जीवन व्यतीत करने का ढोंग रचा जाये। मार्कण्डेय ने इस प्रन्यवहारिक प्रवृत्ति का विरोध किया, गाने पक्ष मे व्यवहारिक समाधान प्रस्तुतिया, गृहस्प के मादर्श कनों का निभाग किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार से गृहस्य प्राश्रम में रहकर ही [ माण्डेय पुगए सोविक और पारलौशिय दोनों प्रकार की सिद्धियां प्राप्त की जा गाती हैं । इनवे सभी पक्षो का प्रतिपादन किया। मदालसा के माध्यम । उन्होने अपनी विचारधारा प्रवट करते हुए कहा है कि जिसन गृहस्प पाश्रम ग्रहण दिया, यह समझना चाहिए नि उसने विश्व के पालन का भार अपने कन्धों पर ले लिया है । देव, पितर, मुनि, भूत, मनुष्य, कृमि, कोट, पतग, पशु पोर पक्षी सभी गृहस्थ माधम से ही जीवित रहते हैं और उसो से तृप्त होते हैं। सेरहवें मनु रोच्य की जन्म नया में प्रजापति रुचि पोर पितरों के सम्बाद में भी यह चर्चा पाई है । पितरों ने रुचि को सम्बोधित करते हुए कहा ' वत्स । तुमने गृहस्य को छोड़ कर पच्छा काम नहीं किया। गृहस्थाश्रम स्वां और मोक्ष दोनों का माधन है । इनी माथम मे रहकर ही व्यक्ति देवना. ऋषि, पितर मौर अतिथियो के प्रति अपने कर्तव्य को निभाते हुए उत्तम लोकों की प्राप्ति कर सकता है।" सन्यास मागियो की दृष्टि तो एक ओर थी परन्तु मार्कण्डेय ने पारो मोर घूम कर देखा तभी एक सुनिश्चित नीति को अपनाया । यदि युवक सन्यासी हो जाएं तो लोक की युवतियो का क्या होगा । यौवन के प्रवेश पर काम भावो का उत्सन्न होना स्वाभाविक है, यदि उनकी पूर्ति की सामाजिक व्यवस्था न हो पाये तो अर्नगल उपायो की ओर मन का दौड़ना कौन रोक सकता है। हर एर मे सयम की साधना कहाँ से पाए इसका कुप्रभाव चरित्र पर पड़ेगा और स्वच्छ जल कीचड के छोटे पड जायेंगे इस कुप्रवृति का विरोध करते हुए माकण्डेर ने व्यवस्था दी कि सन्यास .

नतिक व सास्कृतिक अध्ययन ] दूसरा मार्ग यह है कि जब युवक सन्यापी हो रहे हैं तो युवतियां भी उमो मार्ग पर चलने लगें। सन्यास ग्रहण करने पर भी जव युवक और युवतियाँ साथ २ रहेंगे तो वहां पर भी वही प्राकृतिक प्रतिक्रियाएं उत्पन्न होगी, जिन्हें दोप, व्यभिचार और चरित्रहीनता की सजा दी जाती है। मठो मे जहाँ स्त्री पोर पुरुष दोनों निवास करते हैं, वहाँ ऐमो घटनामो की चर्षा प्राय: सुनी जाती है । युवक मन्यासियों के पास वहाँ स्त्रियो का माता जाना बना रहता है, वहाँ भी दवा हुअा काम उभर पडना है भोर अपने बाह वेप को लज्जित करने में सकोच नहीं करता । सम्भव है उस समय भी ऐको घटनाएं घटी हों और दूरदर्शी ऋषि ने समाज को नया मोड देना चाहा हो। कुछ भी हो, वे विवाह के पक्ष मे थे। तभी उन्होने कहा कि ब्रियो को बहुत दिन तक पिता के घर बन्यु धवो के बीच रहना यशस्कर नहीं होता। उनका अपने पति के पर रहना ही वधु वान्धवो को अभीष्ट होता है। विवाह है ने पर भी स्त्री का पधिक दिन तक बन्धु बान्धवो के बीच रहना ठीक नहीं गाना गया है। सातवें मनु की कपा में इसका विवेवन है । स्वष्टा की पुत्री सज्ञा का पाणिग्रहण-सस्कार सूय से हुमा था। एक बार सजा को पिता के घर अधिक दिन हो गये तो पिता ने पुत्री से कहा- "इस तरह से तुम्हारे धर्म का लोप हो रहा है । वन्धु वान्धवो के बीच स्त्री का अधिक दिन तक रहना ठीक नहीं है । तुम मेरे लिए पूज्य हो और मैं तुम से प्रमन्न भी हू पर तुम्हारा पतिग्रह मे जाना ही ठीक है।" विवाह के नियमों का विस्तृत विवेचन है । पिता के अभाव मे स्त्रियों को अपने पति के चुनाव को स्वतत्रता दी गई है। कैसो पन्या से विवाह करना चाहिए, उमके लक्षणो का भी वर्णन किया गया है। पुत्र प्राप्ति के बंज्ञानिक नियम का भी उल्लेख है कि "जो पुरुष कन्या जन्म नहीं चाहता। वह पांचवीं रात छोड कर छटवीं रात में स्त्री संग करे क्योकि इसके लिए युग्म रात्रि ही श्रेष्ठ मानी गई है ।" ऋतुकान के दिन, चौदश, अमावस्था, प्रष्टमी पथव सक्रान्ति काल में नारी समागम का निषेध किया गया है।

- [ माण्डेय पुराण विवाह एवं पवित्र प्रायोजन है, सामाजिक व्यवस्था का साधन है, सृष्टि सच लन की एक व्यवस्थित प्रक्रिया है, ऋषियों ने इसे पूर्णता प्राप्ति का साधन बताया है भोग का नहीं। भोग को सीमा स्त्री के ऋतुमती होने पर ही है अन्यथा नही । नारी को केवल भोग को सामग्री मात्र मान लेना उसका अपमान है । जो नारी को देवल अपनी व सना की तृप्ति का साधन मानते हैं। वे अपनी पत्नी से सन्तुष्ट नही होते पोर नित्य नया स्थान देखने की टोह मे रहते हैं। इसी दूपित विचारधारा ने बहुपत्नी प्रथा को जन्म दिया । राजानो मे इसका अधिक प्रचलन था। इस से पारिवारिक क्लेश की वृद्धि होती है । दीनो पत्नियों द्वप की अग्नि में जलती रहती हैं। उनकी सन्तान भी इसी महारोग का शिकार होती हैं । यह छुन का रोग पीठियो तक चलता है । राम वनवास की पृष्ठभूमि मे इसी कुप्रथा का दोप झलकता है। कंकयो के द्वप ने ही राम को राजतिलक की बज ये वन जाने को बाध्य किया। ऋषि ने स्वरोचिष के सम्बन्ध मे वहा है कि यह पुरुष धन्य नहीं कहा जा सकता क्योकि "एक स्त्री के समक्ष दूसरी स्त्री के सम्पक करने मे इसे लज्जा नहीं पाती। यह अन्य स्त्री से भी सम्पर्क रखता है। इसका चित्त किसी में अनुरक्त नहीं है। किसी एक पालम्बन मे अनुराग होना चित्त का स्वभाव है, अत. अनेक भार्या प्रो में इसकी प्रीति कैसे हो सकती है । यह निश्चय जानो किन इन स्त्रियो में इसका प्रेम है और न इसमे इन स्त्रियो का प्रेम है । इनका परस्पर प्रेम व्यवहार एक विनोद मात्र है।" म्वरोचिष ने अपनी पली मनोरमा के अतिरिक्त विभावरी और कलावती से भी विवाह कर लिया था। पति-पत्नी में हार्दिक प्रेम न होने पर पारिवारिक सुख शान्ति की उप- लब्धि सम्भव नही। पारिवारिक जीवन को सुखी बनाने के लिए दोनो को अपने वर्तव्यो • पर ध्यान देना चाहिए । पुराणकार ने दोनो का ध्यान इस पोर माकृष्ट किया है । कहा है "वेद की प्राज्ञा है कि पति को अपनी पत्नी की रक्षा करनी चाहिए क्योति पत्नी की रक्षा से सन्तान की रक्षा होती है। पली में व्यक्ति सनय के रूप में स्वयं जन्म लेता है। अत पत्नी को रक्षा मे स्वय अपनी नैतिक व सांस्कृति अध्ययन ] [ ४६६ . रक्षा होती है।" एक और स्थान पर कहा है। 'पति को सदैव अपनी पत्नी का भरण और रक्षा करनी चाह्येि क्योंकि धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति में पली पति को सहायिका होती है । जब पत्नी और पति प्रेम पूर्वक व्यवहार करते है, तभी धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि होती है। पली को त्यागने से धर्म का त्याग हो जाता है। व्यक्ति किसी भी वर्ण का क्यो न हो, वह पत्नी के अमाव में किसी भी क्र्म के योग्य नहीं रह जाता। आदर्श पत्नी के कर्तव्य का बोध कराते हुए ऋपि ने अनसूया जी से कहलवाया है 'पुरुप महान कष्ट उठाकर जो पुरय प्राप्त करते हैं, स्त्रियां केवल पति सेवा से ही उमा आधा भाग प्राप्त कर लेती है। स्त्रियो के लिए यज्ञ, श्राद्ध और उपवास के लिए प्रयक विधान नहीं है, वे पनि की सेवा से ही इहलोको को प्रात कर लेती है। पति नारी की श्रेठ गति है।" एक कोशिक नाम के कढी ब्राह्मण की कथा दी गई है जिसकी पतिव्रता परली ने सूर्य का उदय रोक दिया था क्योंकि सूली पर चढे एक अन्य ब्राह्मण ने उसके पति को शाप दिया था कि सूर्य उदय होते ही उसकी मृत्यु हो जायेगी। ऐसी पतिव्रता नारियों की कथाएं अन्य पुराणों में भी परिणत हैं। पत्नी पति को सच्ची मित्र और सलाह पर होती है । हरिश्चन्द्र के प्रास्थान में जब विश्वा- मित्र को दक्षिणा देने का कोई साधन दिखाई नहीं देता और वह चिन्ताग्रस्त हो जाता है, तो परनी उनसे कहती है---महाराज ! चिन्ता छोड दो, सत्य का पालन करो, सत्य से च्युत मनुष्य श्मसान के समान त्याज्य होता है। पुरुप के लिए सत्यता से बढ कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। जिसका वचन असत्य होता है, उसके अग्निहोत्र, वेदाध्ययन, दान आदि समस्त पुण्य कर्म व्यर्थ हो जाते हैं। धर्म शास्त्रो में सत्र से उत्थान और असत्य से पतन होना बताया है।" प्रादर्श पत्नी के यह विविध रूप दिखाए गए हैं। पली का एक और महत्वपूर्ण रूप माता का है। मदालसा की प्रसिद्ध कपा इसका माध्यम चुना गया है। मदालमा अपनी सतान को इच्छानुसार बनाती है। स्तन्य को प्रवित्र धारा के साथ अपने उद्देश्य के अनुरूप यच्चे ४७० [ मार्कण्डेय पुराण को लोरियां देती है। परिणाम स्वरूप बच्चे में वैसे हो सस्कार उत्पन्न होते है। मनोविज्ञान के पाश्चात्य पण्डितो ने तो माज इस तथ्य की खोज की है परन्तु हमारे ऋपियो ने हजारों वर्षों पूर्व इसे प्रकट कर दिया था। मदालसा ने अपने तीन पुत्रों को लोरियों और उपदेशो से प्राध्यात्मवादी बनाया तो राजा को चिन्ता होने लगी कि हमारे सभी पुत्र विरक्त होते गए तो हमारे बाद राज्य का संचालन कोन फरेगा? राजा के भनुरोध पर मदालसा ने चौथे पुत्र को धर्म की शिक्षा दी। वह पुत्र आदर्श शासक निकला। परिवार में माता-पिता के साथ पुत्र का भी अपना स्थान है। सभी को मिलाकर एक परिवार बनता है। अत' सभी को अपने-अपने कर्तव्यो का पालन करना चाहिए । ऋषि ने कहा है "पिता द्वारा प्रजित यश, धन मोर कीर्य को जो कम नही होने देता, वह मध्यम कोटि का पुत्र है। जो अपनी माक्ति से पिता के वीर्य धादि से मधिक वीर्य मादि का सम्पादन कर लेता है, यह उत्तम कोटि का पुत्र है और जो अपनी अर्कमण्यता से पिता के यश, धन को कम कर देता है, वह अधम कोटि का पुत्र है ।" कुपुत्र की पनेक स्थानों पर भरसना की गई है। "मनुष्य का पुत्रहीन होना पन्छा पर कुपुत्रवान होना अच्छा नहीं क्योकि कुपुत्र माता-पिता के हृदय को सदा सन्तप्त करता रहता है पौर स्वर्गस्प पितरों को नीचे गिरा देता है। उस मुधर्मी वा जन्म माता-पिता के लिए दुःखदायक होता है । वह माता- पिता को चिन्ता से असमय में ही वृट बना देता है ।" मुकृप नाम के बाह्मण पेपाम एवार इन्द्र पक्षी के रूप में माए पोर अपने प्रातिथ्य के लिये मनुष्य का माम पथवा रक्त मांगा। ब्राह्मण ने अपने पुत्रो से पक्षी का पातिय राना थाहा परन्तु परीर के मोह में पड़कर बाहोंने अपनी मसमर्थता प्राट की। इस पर प्राह्मण ने अपने पुत्रोमो पक्षी होने या चार दिया। परिवार को स्वर्गीय बनाने के लिए बही पति पत्नी प्रगम पवहार पावरपर है। यहाँ समान को भी मातारी होना चाहिए। परीर रे सभी मंग पुर होने पर ही शरीर स्वस्थ रह सकता है। एष पोटा सा गोहा भी मारे तरीर के लिए दुखदायी हो जाता है। परिवार मे अब एक 1 नैतिक व सास्कृतिक अध्ययन ] -- भी सदस्य अपने कर्तव्यो को अवहेलना करता है तो स्वर्ग को नरक बनने में देर नहीं लगती। उत्थान के व्यक्तिगत व सामाजिक नियमों का विवेचन परिवार की शान्ति सदस्यो के मापसी नम्र व्यवहार पर निर्भर करती है परन्तु यही पर्याप्त नहीं है। सुख वृद्धि के लिए उनके शरीर हृष्ट- पुष्ट और स्वस्थ होने चाहिये । स्वस्थता के नियमो की जानकारी होनी चाहिए । सभी को सदाचारी, चरित्रवान और शिष्ट होना चाहिए तभी समाज मे उनका सम्मान स्थिर रह सकता है। चरित्र को सम्पत्ति माना गया है । परिवार को यह शोभा है । जहां इसका प्रभाव रहता है, वह निधन परिवार कहलाता है । मास्तिकता का सदाचार से घनिष्ट सम्बन्ध है क्योकि ईश्वर को सर्वत्र व्यापक मानने वाला दुरावारों से भय खाकर दूर रहना है । स्वस्प और सभ्य नागरिक बनने के लिए महपि मार्कण्डेय ने विस्तृत नियमो का प्रतिपादन किया है जो विज्ञान और अनुभव की कसौटी पर खरे उतरते हैं। प्रात काल उठकर मल-मूत्र त्याग, दंत पावन, तेल मर्दन और स्नान के नियम बताये गये हैं । स्नान करने पर विशेष बल दिया गया है । स्वच्छता को स्वास्थ्य का एक भावश्यक नियम बताया गया है। यहां तक कि दूसरे के पहने हुए जनेऊ विभूषण और कमंडलु को भी ग्रहण करने की मनाही की गई है। ब्रह्ममुहूर्त में उठने का आदेश देकर स्नान मादि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पूर्वभिमुख बैठकर नक्षत्र के स्थित रहते हुए ही सन्ध्या करने का उपदेश दिया गया है। सायकालीन सन्ध्या भो सूर्य के स्थित रहते बताई गई है । प्रात साय हवन करने को भी कहा गया है। पांच महायज्ञो मोर पितृ तपणं करने की भी शिक्षा दी गई है। मारमतत्व का चिन्तन भी आवश्यक बताया गया है। पूजा उपासना करने के बाद ही भोजन की माता दी गई है। अधिक नमक, अत्यन्त गरम अन्न का व बहुत दिनो का रखा हुआ अथवा वासी भोजन का निषेध किया गया है।

४७२ | माण्डेय पुराण - सदविचारो था स्वास्थ्य से गहरा सम्बन्ध है। बुरे विचारो वाला व्यक्ति कभी पूर्ण स्वस्थ नही रह सकता । स्थान-स्थान पर कहा गया है कि गृहस्थ को सदाच र परायण होना माहिए, पर नारी को बुरी दृष्टि से न देखे सब से शिष्ट व्यवहार करे, प्रहकार, उद्दण्डता पी गन्ध न हो, वाणी से प्रम झलयता हो । ऋषि ने स्पष्ट शब्दों में कहा है "मावार का पालन गृहस्थ का नित्य वर्तव्य है । जिसमे प्राचार नहीं, उसे न यहाँ सुख मिलता है म यहाँ । सदाचार के बिना यज्ञ, दान, तप कोई करे भी तो क्या लाभ ? जिस पुरुप मे भाचार का नियम नही बघा, उसे दीर्घमायु नहीं मिलती।" अतिथि सत्कार को भी भाचार का एक प्रग माना गया है, मातिथ्य का अभिवाय वेवन भोजन कराना ही नही है वरन् प्रभावग्रस्त के प्रभाव दूर करना, सकटग्रस्त के सकट को दूर करना और दुखी प्रणी को हर प्रकार से सहायता करना है। जो सामथ्र्य रखते हुए ऐसा नहीं करता, यह निन्दा का पात्र माना गया है। ऋषि के अतिथिसत्कार में समाजवाद पे दर्शन होते हैं। वह अपने मत का स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं "समाज मे धनवान व्यक्तियो के रहते अन्य लोगो को धनाभाव के कारण जो कुकर्म परने पड़ते हैं, उनका उत्तरदायित्व धनी व्यक्तियो पर ही होता है।" परिश्रम- पूर्वप पन व माने की सलाह भी दी गई है परन्तु उसका कुप्रभाव किसी भन्य पर न पड़े, इराकी चेतावनी भी दे दी गई है अन्यथा समाज में परस्पर परातोप और हप की भावनामो को जन्म मिलेगा। महर्षि माफएडेय अपने पाठा को प्राध्यात्म की साधना प्रारम्भ करने पे पूर्व उत्तम नागरिक बनाना चाहते हैं। उनके मतानुसार नागरिक्ता के नियमो की उपेक्षा घर के मध्यारम पथ पर बढ़ना मसम्भव है क्योकि यह तो उसपी पहली सीढ़ी है। उत्तम स्वास्थ्य तो उसकी नीय है हो । भरगुणों के प्रति चंतापनी-- येवम सामाxि प्राणी है योr उसे घुद्धि जमो महानतम सम्पति से विभूपित किया गया है। अपने इस गौरव की स्पिरता से लिये नैतिक व सास्कृतिक अध्ययन ] [ ४७३ अावश्यक है कि वह बुद्धिमानी जसे कार्य करे। बुद्धिमान वही है जो अपने विचारो को स्वस्थ और पवित्र रखता है क्योकि मानव जीवन की समस्त सुख- शान्ति उमके विचारो पर ही निर्भर करती है, इन्हीं से वह अपने भविष्य की, अपने भाग्य की रेखाओं का निर्माण करता है । विचारों को जो तत्व गदला बनाते हैं, उन्हें दूर करना आवश्यक है । बुरे विचारो को प्रामुरी शक्तियों की सज्ञा दी जाती है । इनसे सुरक्षा के लिये हमारे शास्त्रकारो ने बारबार चेतावनी दी है । सिद्धार्थ को गौतम बुद्ध बनने के लिये भी यही करना पड़ा था। प्राध्यात्म पथ के पथिको को मारम निरीक्षण की शिक्षा दी जाती है ताकि मन के एक करने मे घुसे हुए दुर्गुणों को छांट छांट कर बाहर निकालने का प्रयत्न करना चाहिए क्योकि इनसे बढकर अपना और कोई शत्रु नहीं है । यह ऐसे शत्रु हैं जो निरन्तर अपने साथ रहते हैं और पग-पग पर चोट पहुंचाने का प्रयत्न करते रहते हैं। दुर्गुणी व्यक्ति अपनी प्रामक शान्ति खो बैठता है क्योंकि उसे बाह्य जीवन में सब प्रोर लाछना, मसफलता और तिरस्कार ही मिलता है । जिस प्रकार गन्दे, गलोज, घिनौने और दूत के रोगी से बचन का हर कोई प्रयत्न करता है, इसी प्रकार दुर्गुणी व्यक्ति जिघर जाता है, उधर से दुस्कारा जाता है। शरीर मे धुसे हुए रोगों को दूर करने को हम चेष्टा करते हैं परन्तु अन्तः क्षेत्र को अस्त-व्यस्त कर डालने वाले दुर्गुणो की ओर कोई ध्यान नहीं देता । वास्तविक्ता यह है कि शारीरिक रोगों की अपेक्षा मानमिक दोप दुगुणो से अधिक हानि की सम्भावना होती है । दुर्गुण मानव के लिये एक अभिशाप हैं, एक कलङ्क हैं। समाज में सर ऊँचा उठाकर चलने के लिये दुगुणो से रक्षा प्रावश्यक है । मार्कण्डेय ने बार-बार चेतावनी दी है, दुर्गुणो के दुष्परिणामों के भयङ्कर चित्र खीचे हैं सम्भव है उन्हें असम्भव की सजा दी जाने लगे । परन्तु ऋषि का उद्देश्य घेवल उन दुगुणो के प्रति सजग रहने की प्रेरणा मात्र है शि इनसे यह परिणाम भी निकल सकते हैं। उदाहरण के लिये मद्यपान से बचने के लिये बलराम की कथा दी गई है कि जब महाभारत युद्ध में उन्होने पाएडवो और कौरवों में से किसी को भी पक्ष लेना उचित नहीं समझा तो वह तीर्थ ४७४ ] । मार्कण्डेय पुराण यात्रा को चल पडे । एक दिन उन्होंने अधिक मद्यपान कर लिया और रेवत वन में प्रवेश किया जहाँ पर ऋपियो के समक्ष सूतजीको क्या हो रही थी। ऋषि बलराम जी के सम्मान मे उठ खडे हुए परन्तु सूतजी ने व्यास जी की मर्यादा का पालन किया और प्रासन पर बैठे रहै। इससे बलराम जी को क्रोध मा गया और उन्होने सूतजी का वध कर दिया । थोड़ी देर के बाद उन्हे होदा पाया तो इस कुकृत्य पर लज्जित हुए और प्रायश्चित के रूप मे नये सिरे से तीर्थाटन का प्रारम्भ किया। शराब को भी लोग पीते हैं । वह गालीगलौच और लडाई-झगडा तो करते देखे जाते हैं परन्तु ऐसा कभी नहीं सुना कि किसी शराबी ने नशे में चूर होकर किसी का वध कर दिया हो । यदि दो-चार हत्यायें इस तरह की हो जाये तो इसे कानून से ही बन्द करना पडे क्योकि इससे लोगों के जानमाल को सुरक्षा का खतरा उत्पन्न जायगा । परन्तु वास्तव में ऐसा होता नहीं है। महर्षि माकंडेय भी इस तथ्य से अवश्य परिचित होगे परन्तु उन्होने मतिश्योक्ति शैली में अपरोक्ष मे मद्यपान के दोष का ही वर्णन किया है कि नशे में जब ज्ञान ततु सज्ञा शून्य हो जाते हैं तो उस क्षणिक पागलपन का प्रवाह किसी भी भोर वह सकता है और वह व्यक्ति मारपीट से लेकर हत्या तक कर सकता है। काम भी एक नशा है जो मनुष्य को अन्धा बना देता है । मन मे इसकी उत्तेजना इतनी तीन होती है कि कामी व्यक्ति सामाजिक मर्यादामो का उल्ल- घन कर बडे दु साहस कर बैठता है। प्राजकल युवतियो से छेडछाड तो साधारण बात हो गई है । सहक पर जाती हुई युवती का अपहरण कर लिया जाता है और उससे मनमाने कुकृत्य किये जाते हैं। वह युवती अपने दुर्भाग्य और फिर भगवान को कोसती होगी कि ससने यह पशुरूप में कैसे मानव बना दिये जो मानव भारीर को भी लज्जित करते हैं। वह इस समाज से भी घृणा घरने लगती है जो पतन की पराकाष्टा में पहुंच गया हो, फिर शासन को दोप देती है जहाँ क्सिो की लाज सुरक्षित नहीं है । इन घटनामों पर सभी विचारक सेद प्रकट करते हैं परन्तु यह धातावरण उत्पात परने वाले जो माध्यम हैं, नैतिक व सास्कृतिक प्रध्ययन ] । ४७५ उनकी पोर किसी का ध्यान नही जाता। प्रश्लील फिल्में मोर उपन्यास, पत्रिकायें मिनसे इस विषय की उत्पत्ति होती है, उनमें सुधार की प्रावश्यक्ता है ताकि युवको मे यह सद्विचार उत्पन्न हो कि समाज की हर युवती उनकी बहिन है । यही सम्प समाज की निशानी है अथवा तथाकथित विकसित युग की दुहाई देने से कोई लाभ नहीं है। इतिहास साक्षी है कि काम भावना से प्रेरित होकर रावण ने सीता का हरण किया और एक महान युद्ध को निमन्त्रण दिया । अलाउद्दीन खिलजी ने पपिनी को प्राप्त करने के लिये भीषण नर सहार कराया। काम के कारण हत्यारो के समाचार प्राज भी प्राप्त होते रहते हैं। इसी ओर महर्षि ने हमारा ध्यान प्रापित किया है । एक कथा इस प्रकार से दी गई है कि नरिष्यन्त के पुत्र दम को दर्शाण के राजा चास्वर्मा की पुत्री राजकुमारी सुमना के स्वयंवर मे अपना पति चुना परन्तु भद्रप्रदेश के राजकुमार महानद,विदर्भ के राजकुमार वप्पुमान व महाधनु को यह सहन नही हुमा । उन्होने एक पड्यन्त्र रचा जिसके अनुसार सुमना को बलपूर्वक छीन लेना था और यह निश्चित किया गया कि वह हम तीनो मे से जिसको भी चुन लेगो,नसको पत्नी हो जायेगी। यदि वह हममे से किसी को चुनेगी तो उसका वध करने वाला हो उसका पति माना जायगा। एक सुन्दर स्त्री को अपनी पत्नी बनाने के लिये बह घोर मन्याय और अधर्म पर उतारू हो गये । जब सुमना ने स्वयंवर मे अपना पति चुन लिया तो इस दिशा में कोई भी पग जिसको लाठी उसकी भैस की सज्ञा मे पा जाता है। दम और उसके शत्रुनो में घोर युद्ध हुा । दम ने महानन्द का मस्तक काट दिया और बपुष्मान को वारणों से बीघ दिया और सुमना को अपने घर ले गया । यदि कथा का मोड इस प्रकार से होता कि वह तीनो दम को कैदी वना लेते, या उसका वध कर देते और सुमना को भगा कर ले जाते मोर तीनों में कोई समझौता न हो पाता तो वह भी परस्पर युद्ध की लपेट में प्राकर नष्ट हो जाते तो और भी सुन्दर होता क्योकि काम वासना के अन्तिम परिणामो नक कथा पहुंच जाती।

४७६ ] [ मार्कण्डेय पुराण पर स्त्री को युरी दृष्टि से देखने वाले को पारलौवित भय भी दिखाया गया है। कहा है कि ऐसे कामी व्यक्ति को नरक में तो जाना पडता है परन्तु वहां पर वज़ की चोच वाले पक्षी उनको यो नोंचते हैं । यह यातना बार- बार दी जाती है पौर लम्बे समय तक चलती है । जितने क्षणों तक यह पाप किया जाय, उतने वर्षों तक इसका फल भुगतना पडता है। नेत्रों से दोप करने वाले को नेनो की ही यातना दी जाती है । नियम यही है जिस मग से दोष किया जाता है, उसके सुधार के लिये उस भङ्ग को ही प्रताडना दी जाती है ताकि उसे अपने किये पर पछतावा हो और फिर उसको पुनरावृत्ति न करने का सङ्कल्प ले। महर्षि ने यह भी दिखाने का प्रयत्न किया है कि भले ध्यक्तियों की कभी की घडी भी पाती है जब ननको काम वासना की मोर घसीटा जाता है परन्तु इस समय विवेक से काम लेना चाहिए । महर्षि दुर्वासा को पतित करने के लिये वपु नाम को अप्सरा ने सब तरह को काम चेष्टायें की तो ऋषि पर कोई प्रभाव नहीं पडा परन्तु जव वह फिर भी अपने हाव भाव प्रदर्शित करने में लगी रही तो दुर्वासा ने उसे शाप दिया कि तुम सुपर्ण गोय में पक्षिरणी बनो। मार्कण्डेय ने काम वाणो से सुरक्षा के लिये सजग रहने की प्रेरणा दी है क्योंकि किसी समय भी भाक्रमण होने का अवसर पा सकता है । क्रोध मानव का दुर्जय शनु है । सब जानते हैं कि इससे मस्तिष्क की नसो में उत्तेजना उत्पन्न होती हैं, वह बलती हैं जिनका कुप्रभाव सारे शरीर के स्वास्थ्य पर पड़ता है, मन व इन्द्रिया भी इस अग्नि को लपेट में पाती हैं, बुद्धि भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती। गाधीजी ने इसे पाराब और अफीम के नशे को सजा दी है क्योकि इनके लक्षण मिलते जुलते हैं। कवियो ने भी कहा है कि पाप का मूल क्रोध है और क्रोध के मिटे बिना जीव का सन्ताप नही मिट सकता । गीता में क्रोय से मविवेक की उत्पत्ति कही है क्योकि क्रोधी को उस दौरे के बाद ही वास्तविकता से परिचय होता है । इसे नरक द्वार भी बताया गया है। यह प्रध्याम साधना को तो नष्ट ही करने वाला है । इन नैतिक व सास्कृतिक अध्ययन ] [ ४७७ दुष्परिणामों के कारण ही महपि मार्कण्डेय ने इस महारोग के प्रति सावधान किया है । इसके लिये उन्हें अनेको कथानो का सहारा लेना पड़ा । वैवस्वत मनु के पुत्र पृषन एक बार मृगया के लिये वन मे गये, तो एक ब्राह्मण की गो को गलती से मार दिया। तब ब्राह्मण ने पृषध्र को शूद्र हो जाने का शाप दिया । क्रोध से क्रोध की वृद्धि होती है। गजा को भी क्रोध पा गया। राजा भी ब्राह्मण को शाप देने लगा। इस पर ब्राह्मण राजा को नष्ट करने के लिए दूसरा शाप देने को प्रस्तुत हुना। उसी समय उसका पिता वहां पहुंच गया और उसे समझाया कि ब्राह्मण का भूषण क्रोध नहीं क्षमा है। क्रोध से तो धर्म, अर्थ मोर काम तीनो का नाश होता है । यदि ब्राह्मण का पिता बीच में न मा जाता तो दोनो को उत्तेजना बढतो हो जाती पोर दोनो एक दूसरे को शाप देते हो जाते, जब तक कि उन दोनो मे से कोई एक नष्ट न हो जाता। विश्वामित्र और वशिष्ठ का द्वेष और सघर्ष पुगण प्रसिद्ध है। इस पुराण में भी उसे दिया गया है परन्तु वदले हुए रूप में। वशिष्ठ हरिश्चन्द्र के पुरोहित थे । जब विश्वामित्र ने हरिश्चन्द्र से राग्य लिया तो वह जल मे तपस्या कर रहे थे। जब वह बारह वर्षों के बाद तप करके भाग तो उन्ह हरिश्चन्द्र के भीपण कष्टों से परिचय कराया गया। उन्हें क्रोध का प्रावेश आया और विश्वामित्र को बक पक्षी होने का शाप दिया। विश्वामित्र तो क्रोध के लिए प्रसिद्ध है ही। उन्होंने वशिष्ठ को सारस हो जाने का शाप दे डाला। मनुष्य से पक्षियों की योनि प्राप्त होने पर भी दोनो को शान्ति न मिली और युद्ध पर उतारू हो गये। इससे सारे विश्व में हाहाकार मच गया और देवतापो को प्रेरणा से ब्रह्मा को बीच बचाव के लिए पाना पड़ा, तद कही वह शान्त हो पाए। इसमें क्रोध की पक्षियो के प्रज्ञान से तुलना की गई है मौर बताया है कि क्रोध से मानव कितना गिर जाता है। वह इसके आदेश में माकर घोर से घोर अपराध कर सकता है। एक अन्य कथा में विश्वामित्र के क्रोध से विद्यालो का नारा बताया गया है। विद्या का मभिप्राय ज्ञान और विवेक है । क्रोध की उत्पत्ति हो असान और ।

४०] 1 मागडेय पुराण अविवेक की नीव पर होती है । मत शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक स्वास्थ्य व्यक्ति को इससे बचना चाहिए, तभी माध्यात्म साधना में प्रगति की माशा की जा सकती है। क्रोध का माघार महङ्कार होता है । जब पहवार को ठेस पहुंचती है तो क्रोध से उसकी शान्ति करने का प्रयत्न किया जाता है परन्तु उसका परि- गाम प्रशान्ति ही होता है । जो व्यक्ति इन दोनों के पजे मे फंस जाता है, उससे बडे बडे अपराध हो जाते हैं । बलराम जैसे बुद्धिमान व्यक्ति भी उससे नहीं बच पाए, जिनको भगवान् का अवतार भी माना जाता है। उनकी शक्ति, सामर्थ्य व अन्य कार्यों को दृष्टि में रखते हुए ही यह उच्च सम्मान दिया गया होगा परन्तु सूतजी जैसे कथावाचक उनके प्रागमन पर सम्मान के प्रदर्शन के लिए खड़े नही होते तो उनके पहवार को ठोकर लगती है। जैसे दुखी और चिन्तित व्यक्ति अपने दु ख को कुछ क्षणो के लिए भुलाने के लिए शराब पीता है, उसी तरह से महकार की पुष्टि न होने का वो दुख होता है, उसकी निवृत्ति के लिए क्रोध के नशे की आवश्यकता आ पडती है। क्रोध का परिणाम कुछ भी हो, उससे अहकार का रोग तो दूर हो हो जाता है। एलोपैथिक दवाको का भी यही प्रभाव पड़ता है । प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले रोग को वह शीघ्र ही दवा देती हैं परन्तु निश्चित रूप से अन्य भयकर रोगो की उत्पत्ति होती है। उसका परिणाम कुछ भी हो परन्तु रोगी व अभिभावक को यह प्रत्यक्ष दिखाई देता है कि रागो जिस रोग से पीडित हो रहा था, वह ठोक हो गया । महकार वो प्रोधि क्रोष है परन्तु कोष तो मार-पीट, गाली गलौच, युद्ध, संघर्ष और हत्या आदि से ही शान्त होता है, उसका पाहार बहुत ही भय कर राक्षयो का सा है । इसका कारण तो महकार ही है । यदि अहङ्कार की उत्पत्ति न हो तो क्रोध का जन्म लेना भी सम्भव नही है । मत महकार रूपी जह को तो काट देना चाहिए जिससे भन्य दोषो की वृद्धि न होने पाए। पुराणमार ने लोभ के भोपण रूप को भी प्रस्तुत किया है। राजा बिना कारण दूसरे के राज्य पर अपना मधिकार जमाना चाहता है। उस पर प्राक्रमण करता है, घोर पुद्ध प्रौर नर-सहार होते हैं और शक्तिशाली नैतिक व सास्कृतिक मध्ययन ] [ ४७६ राजा कमजोर को दवा देता है। अनेको वार राजामो के मन में सारी पृथ्वी का सम्राट बनने की लालसाए' उत्पन्न की गई हैं । लोभ के भयङ्कर परिणामो को भी प्रस्तुत किया गया है। भोग से पुण्य का क्षय बताया गया है। एक क्था मे इससे शक्ति का नाश होना भी व्यक्त किया गया है। सुव्रत तपस्वी ने राजा विदूरथ को कुम्भ नाम के एक राक्षस के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि जिस दिन उसे कोई स्त्रो छू देती है, उसकी शक्ति कम हो जाती है, दूसरे दिन पुन. बढ जाती है। इससे स्पष्ट है कि स्त्री के ससर्ग से शक्ति का व्यय होता है। भोग गानव पर अपना चहुंमुखी प्रभाव डालते हैं। इसीलिए प्राचीन काल में वानप्रस्य और सन्यास की व्यवस्था बनाई गई थी ताकि भोगो से निवृत्त होकर प्रात्मकल्याए की साधना में अपना पूरा समय लगाया जा सके। यह तभी सम्भव है जब पक्ति के व्यय को रोका जाए। राजा राज्य बघन का जब एक दाल पक गया तो उसने समझा कि यह यमराज का दूत है मौर मृत्यु का सन्देश लेकर माया है। मत. मुझे अपने राज्य का भार अपने पुनो को सौरकर विषय-भोगों से निवृत होकर वन मे जाकर तप करना चाहिए ।" गृहस्थ में रहकर इस साधना को किया जा सके तो अत्यन्त उत्तम है । इस तरह से पतन के जितने भी मार्ग हो सकते हैं, उनका ऋषि ने दिग्दर्शन कराया है और दुष्ट मावों से बचने की प्रेरणा दी है क्योंकि दुगुणो के रहते हुए इस लोक और परलोक दोनों में शान्ति की सम्भावना नहीं हो सकती, चाहे सैकडो प्रकार के भौतिक साधन उपलब्ध हो । दुराचारी सदैव प्रशान्त रहता है । शान्ति के लिए सदाचारी बनना आवश्यक है। उस मार्ग पर चलने के लिए मार्कण्डेय प्रेरित करते हैं। मानव दोपो का पुतला है। अपने प्रबल सस्कारो व बुरे सङ्ग के कारण वह बुरे काम करता है परन्तु जब रोग उत्पन्न होते हैं, तो उन लिए दवानो की भी खोज कर ली गई है । शारीरिक रोगों की तरह मानसिक रोगो के भो उपचार । भारतीय मनोपियो ने मानसिक विकारो की निवृत्ति का प्रमोष उपाय यह बताया है कि पापी अपने पाप की घोपणा सार्वजनिक दूर करने के नैतिक व सांस्कृतिक प्रध्ययन ] पुरुष सदा- परायण होकर हव्य, कच्य और प्राग्नदान करते हुए पितर, देवता, प्रतिषि और बापवो का पूजन करने वाला होना चाहिए । इनके अतिरिक्त भून, भृत्य, पशु पक्षी, पिपीलिका, भिशुक, याचक या पर अपर जो कोई भी जैसे प्रार्थना करे, गृहस्थी यदि नित्य नैमित्तिकी क्रिया का उल्लघन करे तो उसे पाप का भागी होना पड़ता है।"गृहस्थ को सदैव सदाचार का पालन करना चाहिए, याचार हीन पुरुष को लोक में कभी भी सुख नहीं मिल सकता, जो पार को छोडकर संसार माग मे प्रवृत्त होता है उसके द्वारा किये हुए यज्ञ, दान और तपस्या मादि सभी ममङ्गलजनक होते हैं।'' "दुराचार में प्रवृत्त मनुष्य दोधजीवी कदापि नही हो सक्ता, इसलिये सदाचार मे ही प्रवृत होवे, सदाचार से बुरे लक्षण नष्ट हो जाते हैं । ... गृहस्थ को उपाजित किये हुए धन का चतुर्थ भाग धर्म के लिये सचित करना चाहिए, प्राधे भाग से अपना पोषण और नित्य नैमित्तिक कार्य करे, भोर शेप भाग को मूलधन के रूप में वृद्धि करे." गुरु को देख कर उठ कर खड़े होने इत्यादि से सरकार पूर्वक आसन और प्रणाम करके अनुकूल वार्तालाप करे । उनके गमन समय उनके पीछे घले, प्रस्कूिल बरने न कहे।" द्विजाति की निदान करे !""गुरु के दुष्कर्म को किसी प्रकार प्रकट न परे तथा उनके कुपित होने पर उन्हे प्रसन्न करे ....... किसी के मर्म को व्यथित न करे, किसी को न कोसे, चुगली न करे, दम, अभिमान भोर तीसे व्यवहार को छोड़ दे । मूर्ख, उन्मत्त, दुखी प्रापद्ग्रस्त, विरूप, मायावी, अङ्गहीन प्रथवा अधिक न की हसी उडा कर न छेडे । .... परनारोगमन न करे क्योकि परनारोगमन से इष्टापूर्त नष्ट होता है और दीर्घायु का हारा होता है । इस लोक में इस पाप के रामान अन्य कोई पाप नहीं है, देव-पूजन, अग्नि कार्य और गुरुजनो को प्रणाम सदा कर्तव्य है । ""पूर्वाल्ल मे देवतामो का, मध्याह्न मे मनुष्यो एत्र अपराह्न मे पिपरो का पूजन करे ।" देवता, वेद, ब्राह्मण, सत्यनिष्ठ, महात्मा, गुरुजन, पतिव्रता, यज्ञ पोर तप परायण पुरुष इनको हसी न उडावे । यदि कोई पविनय वाला पुरुष इनकी निन्दा करे तो घर ध्यान न दे, देवता, पितर मोर अतिथि का पूजन सदा करे । सावधान वित्त सेवेदाध्ययन करे, अपने से श्रेष्ट या निम्न ४०० [ मारंडेय पुराण रूप से पर दे। यदि वह अपने मन में उसे दवाए रगता है तो उसकी प्रन्धि बन जाती है जो जन्म-जन्मान्तरो तप कष्ट का कारण बनती है। सभी विधान बनाया गया है कि जब विमी से गो हत्या हो गाय तो ग्राम मे घूमकर पोर उस गाय की पूछ पार पर चिल्ला २पर कहे कि मैंने इस गाय वा अय किया है । यह उस पाप का प्रायश्चित्त मान लिया जाता है। हमें पाप नहीं धुलता है और न ही पापी को फिर पाप परन से बचाया जा सकता है । पाप एक मानसिक रोग है, उसी का उपचार भी इसके भनुम्म्प ही होना चाहिए । माकण्डेय ने भी यही दवा बताई है। जब बलराम जी से मद्यपान के नशे में सूनजी का वध हो गया तो नशा उतरन पर वह अपने कुकर्म पर सज्जित हुए। उन्होने निश्चय किया कि इस पाप का क्षय करने के लिए अपने चरम का बखान करता हुमा बारह वर्ष का व्रत करूंगा। वही मेरे पाप का सर्वोत्तम प्रायश्चित्त होगा । प्राधुनिक मनोविज्ञान ने भी इस सिद्धान्त को अपनी स्वीकृति प्रदान की है। सद्गुणों के विकास पर बल अवगुणों के प्रति सावधान रहने के साथ साथ सद्गुणो का विकास भी मावश्यक है । सद्गुणो को बहुमूल्य सम्पत्ति, मानव जीवन की मबसे बर्दा विभूति मानी जाती है । सद्गुणो को सच्ची सम्पत्ति इसलिये वहा जा सकता है कि उन्ही के आधार पर समस्त प्रकार की प्रगति कर सकना सम्भव होता है । दूसरो की सहानुभूति, श्रद्धा एव सद्भावना केवल उन्ह मिल सकती है जो सद्गुणी हैं । स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल मादि के आधार पर आमतौर पर कुछ कमाया जाता है पर सच्ची शिक्षा और विरस्थायी समृद्धि केवल सद्गुणों के आधार पर ही सम्भव होती है । ऐसी ही समृद्धि से मनुष्य का लौकिक और पारलौकिक जीवन सुख शान्तिमय बनता है । पुराणकार ने इसकी भोर विशेष ध्यान दिया है । वह अपने पाठक को सत्यवादी, सदाचारी, चरित्रवान्, श्रेष्ठ, परिथमो और स्वावलम्बी देखना चाहते हैं। माकण्डेय का भिन्न-भिन्न स्थानों पर प्रादेश है कि-"गृहस्थ को सदाचार नैतिक व सास्कृतिक प्रध्ययन ] पुरुष सदा- परायण होकर हव्य, कव्य और प्रान्नदान करते हुए पितर, देवता, अनियि पोर बाधवो का पूजन करने वाला होना चाहिए । इनके अतिरिक्त भूत, भृय, पशु पक्षी, पिपीलिका, निशुक, यावक या पर अपर जो कोई भी जंस प्रार्थना करे, मृगस्थी यदि नित्य नैमितिकी क्रिया का उल्लघन करे तो उसे पाप का भागी होना पड़ता है। गृहस्य को सदैव सदावार का पालन करना चाहिए, आचार होन पुरुष को लोक में कभी भी सुख नहीं मिल सकता, चार को छोडकर ससार मार्ग में प्रवृत्त होता है उसके द्वारा किये हुए यज्ञ, दान पोर तपस्या मादि सभी अमङ्गलजनक होते हैं । ..."दुराचार मे प्रवृस मनुष्य दोर्यजीदी कदापि नहीं हो सकता, इसलिये सदाचार मे ही प्रवृत्त होवे, सदाचार से बुरे लक्षण मष्ट हो पाते हैं ।' ""गृहस्थ को उपाजित किये हुए धन का चतुर्थ भाग धर्म के लिये सचित करना चाहिए, आधे भाग मे अपना पोपण और नित्य नैमित्तिक कार्य करे, भोर शेष भाग की मूलधन के रूप में वृद्धि करे..... गुरु को देख कर उठ कर खडे होने इत्यादि से सलार पूर्वक आसन रे मोर प्रणाम करके अनुकूल वार्तालाप करे। उनके गमन समय उनके पीछे चले, प्रतिकूल वरने न कहे।" द्विजाति की निदान परे ।""गुरु के दुष्कर्म को किसी प्रकार प्रक्ट न करे तथा उनके कुपित होने पर उन्हें प्रसन करे। किसी के मर्म को व्यथित न करे, किसी को न कोसे, चुगली न करे, दम, अभिमान और तीखे व्यवहार को छोड दे । मूर्ख, उन्मत्त, दुखी आपद्ग्रस्त, विरूप, मायावी, अङ्गहीन मयदा अधिक न की हसी उडा कर न छेडे (......परनारोगमन न करे क्योकि परनारोगमन से टापूतं नष्ट होता है और दीर्घायु का ह्रास होता है । इस लोक में इस पार के समान अन्य काई पाप नहीं है, देव-पूजन, अग्नि कार्य और गुरुजनों को प्रणाम सदा कर्त्तव्य है । "पूर्वाह्न मे देवतानो का, मध्याह्न मे मनुष्यो एव पपराह्न मे पितरों का पूजन करे ।..."देवता, वेद, ब्राह्मण, सत्यनिव, महात्मा, गुरुजन, पतिनता, यज्ञ पोर तप परापण पुरष इनको हसी न उडावे । यदि कोई पविनय वाला पुरुष इनको निन्दा करे तो उपर ध्यान न दे, देवता, पितर और प्रतिषि का पूजन सदा करे। सावधान वित्त सेवेदाध्ययन करे, अपने से श्रेष्ठ या निम्न ४०२ ] [ माण्डेय पुराण मनुष्य को शय्या अथवा भासन पर न बैठे। प्रमगल देश न घारे, ममगल वचन न कहे 1.""गुरु या देवता के सामने पैर फैलाना भी निषिद्ध है । दुर्वासा की तरह अपने चरित्र को सुरक्षा के लिये किस प्रकार सजग रहना चाहिए, पि एक ब्राह्मण की कथा के माध्यम से स्पष्ट करते हैं । लोग यह समझ सकते हैं कि दुर्वासा तो ऋषि थे, वह तो हर प्रकार को सामध्य रखते हैं परन्तु एक साधारण गृहस्थ कैसे पतन के माग पर चलने से बच सकता है। एक व्र ह्मण के रूप लावण्य पर मुग्ध होकर वरूथिनी नाम की अप्सरा प्रणय-प्राथना करती है । मिर्जन पवतीय स्थान और युवती का प्रणय प्रस्ताव, स्वीकृति के लिये कोई बाधा नही, समाज का कोई बन्धन नही, अप. मान का कोई अवसर नही, फिर भी जिन का विवेक जाग्रत रहता है और उच्च भावनामो से मोत-प्रोत रहते हैं, वह कोई देखता हो या नही, कदापि दुष्कर्म नही कर सकते क्योंकि वह ईश्वर को सर्वव्यापक मानते हैं और उसके सहस्र नत्रो का अनुभव करते हैं । ब्राणण कुमार ने बाह्य रूप का मूल्यान न दिया और प्रस्ताव को तत्काल ठुकरा दिया । ब्राह्मण के शब्द ध्यान देने योग्य हैं ब्राह्मण के लिये भोग चेष्टा, प्रशस्त नहीं मानी गई है अपितु धर्मनुष्ठान और कतव्यपरायणता का प्रयत्न ही श्रेष्ठ है क्योकि वह इस लोक में क्लश देने वाली होने पर भी परलोक मे उत्तम फल देती है । मेरे गुरुजनो की यह शिक्षा है कि परायो स्त्री को मभिलाषा कभी नहीं करनी चाहिए। प्रत मैं तुम्ह किसी प्रकार भी स्वीकार नहीं कर सक्ता भले ही तुम रोती चिल्लाती रहो मोर निराशा के शाक से मूख जामो।" ब्राह्मण की प्रार्थना पर ही उसके परित्र का परिचय मिलता है। "यदि मैंने भी भी ठीक समय पर वैदिक धर्म का त्याग न किया हो भोर भी भी मेरे मन में पराये धन और परायी स्त्री की इच्छा न हुई हो तो मेरा मनोरथ पूर्ण हो, परित्रवान् नी का मन सवल मोर मात्मा शक्तिशाली होती है, उसका कोई भी कठिन से वठिन कार्य का नहीं रहता। जीवन पे हर पण पर सफ्नता उसका स्वागत परती है।

नतिक व सास्कृतिक अध्ययन J सद्गुणों के विकास मोर चरित्र के उत्यान व स्थिरता के लिए अच्छे सङ्ग की अपेक्षा रहती है । मङ्ग का प्रभाव अपरिहार्य है। अच्छा सङ्ग भाग्य वानों को ही प्राप्त होता है। ऋषि ने भी शिक्षा दी है कि "सदाचारी साधु मनुष्यो के साथ ही मित्रता करे, बुद्धिमान, उद्योगों को मित्र बनादे। वेदज्ञान से युक्त विद्वान्, व्रत परायण पौर स्नातक का सङ्ग करे, बुद्धिमान् मदालसा ने भी कष्ट माने पर सत्पुरुषों का मन करने की शिक्षा दो है । मदालसा ने अपने पुत्र अलक को एक अंगूठी दं। यी कि जब सङ्कट म ए तो इसम लिपटे कागज पर लिखो शिक्षा का सहारा लेना। एक बार मलक के बडे भाई सुनार ने काशीश्वर को सहायता से मलक के राज्य पर आक्रमण करके उसे राज्य- च्युत कर दिया तो उसने माता को मेंगूठी में लिपटो शिक्षा खोली । सम लिखा था "प्रत्येक को सङ्ग का त्याग करना चाहिए। ऐसा सम्भव न हो तो सरजनो के साथ ही सङ्ग करना चाएि । सज्जन पुग्यो का सङ्ग पौषधि है।" मां को इस शिक्षा को शिरोधार्य कर अलर्क योगीराज दत्तात्रय के पास गए। वहाँ से उसके दुख का समाधान हुपा। सत्सङ्ग का प्रभाव यदि मनुष्य के व्यवहार पर मनुकूल नहीं पड़ता तो उस सङ्ग स क्या लाम' मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह समाज मे उच्च सम्मान का इच्छ्रत रहता है परन्तु भूठ, छल, कपट से वह मान मिट्टी में मिल जाता है, और सरल सत्य व्यवहार से सम्मान की वृद्धि होती है। लोग उस पर विश्वास करते हैं। कपटी और छनी व्यक्ति पर अपने बन्धु-बान्धव भी विश्वास नहीं करते और उसके हर व्यवहार को सन्देह की दृष्टि स देखते हैं। इसलिए पुराणकार ने घोर से घोर सङ्कट में भी सत्य का परित्याग न करने की शिक्षा दी है। इसके लिए राजा हरिश्चन्द्र का लम्बा माख्यान देना पडा है। रानी के मुख से ही सत्य पालन के प्रति दृढ निष्ठा की प्रेरणा दिलाई गई है। "राजन् । चिन्ता का त्याग करो, सत्य का पालन करो। सत्य से च्युत व्यक्ति श्मशान की तरह त्याग योग्य होता है। व्यक्ति के लिए सत्य पालन से बड़ा कोई धर्म नहीं है । सत्य पालन न करने वाले के अग्निहोत्र, वेदाध्ययन, दान भौर समस्त पुण्य कम नष्ट हो जाते हैं। धर्म शास्त्र कहते हैं कि सत्य से - - नैतिक व सास्कृतिक अध्ययन ] [४८५ पराजित होने पर लज्जा का अनुभव करने वाले एक राजकुमार ने पुरुषार्थ मय जीवन को कामना की है। राजा करन्यम का पुत्र मदीक्षित एक स्वयम्बर में गया । राजकुमारी को बलात् अपने वश में कर लिया। यह अन्य राजकुमारी को बुरा लगा। सबने विरोध किया और विरोध सघर्ष में बदल गया। अन्त में प्रवीक्षित को बन्दी बना लिया गया। फिर उसके पिता ने अपनी सेनामो की सहायता से उसे सुडाया । जब राजा बन जाने लगे तो राज्य का भार उसको सौंपना चाहते थे। इस पर पुत्र कहा कि 'मैं इस योग्य नही हूँ, मैं अपनी पराजय से लज्जिन हूँ। मुझ वन्दी का मापने मुक्त कराया था, मैं स्वय मुक्त न हो सका। फिर मुझमे क्या पुरपत्व है ? पौरुप से युक्न व्यक्ति पृथ्वी का शासक होने योग्य है। जो पिता की अजित सम्पत्ति का भोग करे, या पिता द्वारा सङ्कट से उबारा जाए, कुल मे ऐसा व्यक्ति नहीं होना चाहिए, जो अपने बल, पोरुप से सम्पत्ति और ख्याति का मर्जन करते तथा अपने पोरुप से सङ्कटो को पार करते हैं, मैं उन जैसे लोगो की गति चाहता हूँ", ऐसे विचार वाला व्यक्ति हो गौरव के साथ नेपोलियन की तरह सर ऊंचा करके कह सकता है कि असम्भव शब्द को मेरे कोप में से निकाल बाहर करो । इसे कायरों ने बनाया है, मैं इसे सुनना भी नहीं चाहता। मार्कण्डेय भी यही प्रेरणा देते हैं कि पुरपार्य और स्वावलम्बन की सत्प्रवृत्ति से ही मानव का उत्थान सम्मव है। परमार्थ तत्व का निरूपण अनोखे उदाहरण पुराण में परिणत हैं । साधारण बुद्धि उसको कल्पना भी नहीं कर सकती। उन पर महज में विश्वास भी नहीं होता। हरिश्चन्द्र का विश्वामित्र को अपना सारा राज्य दान में दे देना एक कल्पनातीत घटना है । देने वाला अनुमान लगा सकता है कि उसे जीवन म कितनी ठोकरें खानी पडे गी? निधन व्यक्ति पर यदि कोई कष्ट प्राता है तो उसका सहन करना सरल होता है क्योकि प्रभावों का देखना उसका स्वभाव बन चुका है परन्तु जिसकी नस-नस मे ऐश-पाराम मोत-प्रोत हैं, उन पर मुसीबतों के पहाड दान के ४८४ ] [ मार्कण्डेय पुराण उत्थान और प्रसव से पतन होता है। सत्य से ही सूर्य तपता है । सत्य पर ही पृथ्वी टिकी हुई है । सत्य सर्व श्रेष्ठ धर्म है। स्वग का मधिष्ठान भी सत्य ही है । एक पलडे पर सत्य को और दूसरे पर एक हजार अश्वमेध यज्ञो का फल रख दिया जाए तो सत्य का पलडा ही भारी रहेगा।" ब्राह्मण का तो विशेष गुण घोषित किया गया है। कहा है, "ब्राह्मण का ब्राह्मणत्व इसी मे है कि वह पक्षो के सामने भी सत्य का पालन करे । ब्राह्मण को जो पुरय सत्य व्यवहार से होता है वह मच्छो दक्षिणा वाले यज्ञो से अथवा किसी उत्तम कार्य से नहीं प्राप्त हो सकता।" सत्यवादी ही सच्चा मित्र समझा जा सकता है, उस पर कोई भी विश्वास कर सकता है। उसके सामाजिक सम्बन्ध विस्तृत हो जाते हैं। जन नतृत्व के याग्य भी वही होता है। मित्रता को कसौटी उपकार बताई गई है । ऋषि ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए कहा है 'मित्रता का स्वार्थ जिससे अपूर्ण नही रहना, वह मनुष्य धन्य है, उसका जन्म धौर जीवन धन्य है। मित्रो के उपकार का बदला चुकाए बिना जा अपने को जीवित समझता है, उसके जीवन को धिक्कार है।" इसकी पुष्टि के लिए एक रोचक कथा का भी सहारा लिया गया है। मदालसा ने जब अपने पति राजा ऋतध्वज को मृत्यु का समाचार सुना तो वह उसी क्षण मूछिन होकर यमपुर पहुंच गई। यह समाचार गलत था । जब ऋतध्वज पाए तो उन्हें बहुत दुख हुआ और जीवन भर विवाह न करने का निश्चय किया । नागराज प्रश्वतर के पुत्र इनके मित्र थे। उन्होने यह पटना पाने पिता को सुनाई। पिता अपने पुत्रो को अपने मित्र का स्वागत सवार उपकार करन को शिक्षा देते थे परन्तु पुत्रो की दलील थी कि ससार को हर वस्तु उसको उपलब्ध है, देवल पानी का उसे पभाव है जो सर्वथा प्रसम्भव है। पिता ने सोख दो दि पुरुषार्य करने पर हर असम्भव वस्तु भी सम्मद हो जाती है। पिता प्रपरल से यह भी सम्भव हो गया। मित्रता मानवता का एक मावश्य लक्षण है। पुरुषार्थ की महिमा का पान भी स्थान २ पर दिया गया है। लक्ष्मी की प्रातिरापितारी भी उसे ही घसाया गया है।

नतिक व सास्कृतिक प्रध्ययन [४८५ पराजित होने पर लज्जा का अनुभव करने वाले एक राजकुमार ने पुरुषार्थमय जीवन की कामना की है। राजा करन्धम का पुत्र प्रवीक्षित एक स्वयम्बर मे गया । राजकुमारी को बलात् अपने वश मे कर लिया। यह अन्य राजकुमारो को बुरा लगा। सबन विरोध किया और विरोध सघर्ष में बदल गया। अन्त में प्रवीक्षित को बन्दी बना लिया गया। फिर उसके पिता ने अपनी सेनामो की सहायता से उसे छुडाया। जब राजा बन जाने लगे तो राज्य का भार उसको सौरना चाहते थे। इस पर पुत्र ने कहा कि 'मैं इस योग्य नही हूँ. मैं अपनी पराजय से लज्जित हूं। मुझ बन्दी को प्रापने मुक्त कराया था, मैं स्वय मुक्न न हो सका। फिर मुझमे क्या पुरपत्व है ? पौरुप से युक्त ध्यक्ति पृथ्वी का शासक होने योग्य है । जो पिता को अजित सम्पति का भोग करे, या पिता द्वारा सङ्कट से उबारा जाए, कुल में ऐसा व्यक्ति नहीं होना चाहिए, जो अपने बल, पोरुप से सम्पत्ति और ख्याति का अर्जन करते तथा अपने पोरुप से सङ्कटो को पार करते हैं, मैं उन जैसे लोगो को गति चाहता हूँ", ऐसे विचार वाला व्यक्ति हो गौरव के साथ नेपोलियन की तरह सर ऊंचा करके कह सकता है कि असम्भव शब्द को मेरे कोप में से निकाल बाहर करो । इसे कायरों ने बनाया है, मैं इसे सुनना भी नहीं चाहता। माकण्डेय भी यही प्रेरणा देते हैं कि पुरुपार्थ और स्वावलम्बन की सत्प्रवृत्ति से ही मानव का उत्थान सम्मव है। परमार्थ तत्व का निरूपण दात के कुछ अनौसे उदाहरण पुराण में वर्णित हैं । साधारण चुद्धि उसको कल्पना भी नहीं कर सकती। उन पर ग्रहज में विश्वास भी नहीं होता। हरिश्चन्द्र का विश्वामित्र को अपना सारा राज्य दान में दे देना एक कल्पनातीत घटना है । देने वाला अनुमान लगा सकता है कि उसे जीवन म कितनी ठोकरें खानी पडे गो? निर्धन व्यक्ति पर यदि कोई कष्ट प्राता है तो उसका सहन करना सरल होता है क्योकि प्रभावों का देखना उसका स्वभाव बन चुका है परन्तु जिसकी नस नस मे ऐश-आराम मोत प्रोत हैं, उन पर मुसीबतों के पहाड ४८६ ] । मायरडेय पुराण . टूट पड़े, तो उनका पात्म-हत्या जसो निराशाजनक यातों में सोचने के नि- रिक्त पोर कोई मार्ग नहीं दिखाई देता। विसी परोडपति को एक दिन में कङ्गाल पर दिया जाय तो उससे हृदय की गति बन्द हो जायगो परन्तु हरि- श्वद्र ने सब कुछ प्रसन्नतापूर्वक भेला । कारण स्पष्ट है, उसके मन में दिव्यता छाई हुई थी, उसकी प्रवृत्ति देने की थी। यदि यह स्वार्थी स्वभाव का होर, तब तो वह मवश्य जीवन से निराश हो जाता । ऋपि प्रेरित करते हैं कि यदि समाज हित के लिये घोर कष्टो का सामना कपना पडे तो भी उनका स्वागत करना चाहिए। दान से परमार्थ की सद्प्रवृत्ति का उदय होता है । मन स्थिति में उदारता पाती है, स्वार्थपरता का नाश होता चलता है और मनुष्य अपने अतिरिक्त दूसरी के बारे मे भी सोचता है । उनके हित को अपना हित मानने मगता है । पुराणकार ने लिखा है कि जो दूसरों के अहित की योजना बनाता है उसका स्चय ही अहित होता है । एक कथा में राजा खनित्र के मन्त्री विश्ववेदी ने उसके विरुद्ध पड्यन्त्र रचकर चार पुरोहितों से मभिचारक प्रयोग करवाये जिससे चार कृत्यायें उत्पन्न हुई परन्तु वह खनित्र का कुछ भी न विगाड सकी । परि- णाम स्वरूप उन्होने लौटकर चार पुरोहितों भोर विश्ववेदी पर माक्रमण किया और उन्हें मार ड ला। पुराणकार ने इस बुरी भावना से बचने पोर परमार्थ भावना को मन में स्थिर रखने पर बल दिया है । हरिश्चन्द्र के कष्टों के नाटक का जव अन्त हुमा तो देवता उन्हे स्वर्ग लेने के लिये प्राये परन्तु राजा ने अस्वीकार कर दिया और कहा कि मैं भयोध्या की प्यारी प्रजा को व्यथित छोड कर अकेला नहीं जा सकता। वह अपनी पुण्य राशि का उपयोग अपनी प्रजा के साथ करना चाहते हैं । यदि वह सब के सब मेरे साथ स्वर्ग जा सके तभी मैं वहाँ जा पाऊँगा मन्यथा उनके साथ मुझे नरक जाना ही पसन्द होगा।" एक बार किसी कारण से विदेहराज को थोडे समय के लिये नरक जाना पड़ा । उसके पहुंचते ही नरकवासियों को बहुत सुखद प्रतीत हुमा । राजा ने उसका कारण पूछा तो यमदूत ने कहा--"आपके पुएप अनगिनत हैं, नतिक व सास्कृतिक अध्ययन ] [ ४८७ मापने बहुत से अश्वमेध यज्ञ किये हैं। समुद्र में जल को बूदों, प्राकारा मे तारो, मेघ मे से जल को बरसती हुई जलधाराप्रो मोर गगा में बालू के कणो की तरह प्रापके प्रसख्य पुण्य है। उसके कारण आपको स्पर्श करके जो वायु चल रही है, उससे नरकवासियो को अपने कष्टो मे कमी अनुभव हो रही है।" यह सुनकर विदेहराज ने नरक से जाने को मना कर दिया और स्पष्ट कहा कि जब तक यह लोग नरक मे पड़े हैं, में भी यहीं रहूंगा ।" यह कहना सरल है करना कठिन है। जिसने जीवन भर मुख ही देखे हों उसके लिये दुख की एक घडी भी युग के बराबर होती है परन्तु जिसके मन में ऐसी उच्च भावनायें उठती हैं, वह मानव नही महामानव है। मार्कण्डेय ऐसा ही महामानव अपने पाठकों को देखना चाहते हैं तभी भिन्न-भिन्न कयानों द्वारा इस प्रकरण को दुहराया गया है। राजा राज्यवर्धन को प्रायु बढाने के लिये प्रजा ने सूर्यदेव को सामूहिक प्रार्थना की। इससे राजा को आयु दस हजार वर्ष बढ गई। राजा इससे चिन्तित कि 'मैं तो दस हजार वर्ष तक जीवित रहूं, मेरे प्रजाजन यम- राज के शिकार होते रहेंगे । मुझे यह प्रायु तभी ग्राह्य है जब मेरी प्रजा को भी यही प्रायु हो।" इस परमार्थ भावना से प्रोत प्रोत हो राजा ने सूर्यदेव की एक वर्ष तक पाराधना की मोर सारी प्रजा को मायु भो दस हजार वर्ष की हो गई तभी दे सन्तुष्ट हुए । ऋषि ने इस मत का प्रतिपादन किया है कि स्वार्थ भासुरी वृत्ति है, परमार्य दैवी गुण है। इस गुण के विकास के लिये सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए। इससे जो मानसिक शान्ति मिलती है, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। इस शान्ति को होरे-पन्नों से नहीं खरीदा जा सकता, इसे तो अपनी भावनाओं को उदार बनाकर सारे ब्रह्माण्ड में बिखेर देने से पापित किया जा सकता है। इस मावना की पुष्टि व सवर्धन के लिये विश्व कल्याण की प्रार्थना को बडे ढङ्ग से सजोया गया है "सव प्राणी सुखी हो, प्रन्यों में स्नेह रस, समस्त प्राणियों का कल्याण हो और उन्हें किसी प्रकार का कष्ट न हो।

- ४८८ [ मार्कण्डेय पुराण जीवो को किसी प्रकार का शारीरिक व मानसिक रोग न हो, सब लोग सबके मित्र हो"तुम्हारो बुद्धि में सब प्राणियों के कल्याण की भावना हो । जिस प्रकार अपना और अपनो सन्तान का हित चाहते हो, उसी तरह सब प्राणियो के कल्याण को बात सोचो।..."जो मुझसे प्रेम करता है उसका सदैव हित साधन हो । मुझसे द्वप करने वाले का भी सदैव कल्याण हो ।' इन पवित्र भावनाओं को अपने जीवन का अङ्ग बनाने वाले ही विश्व हितपी महामानव बन पाते हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नही। इस भावना के विकास के लिये ऋपि ने एक अनुभव सिद्ध साधना का भी निर्देश किया है । वह है यज्ञ । यज्ञ का अर्थ है त्याग, बलिदान, परमार्थ, नि स्वार्थता। यज्ञ का लाभ शत्रु पोर मित्र सभी को एक समान पहुंचता है । यह समरत प्रशी जगत् के हित साधन की साधना है । रश करने वाले का कोई शत्रु नही रह जाता, उसे सब पोर प्रपना ही रूप दिखाई देता है तभी तो वह अपने गाढ़े पसीने की कमाई को वायु मे बिखेरने के लिये प्रस्तुत हो जाता है । वह जानता है कि अपने पियों को भी लाभ पहुंचने से वह रोक नहीं सकता । मत वह भानु को शत्रु मानना ही छोड देता है । यज्ञ से वह सारे ब्रह्माण्ड से अपना नाता जोडता है । पहले वह केवल अपने परिवार तक ही सीमित था परन्तु यज्ञ का प्रभाव तो ईथर तत्व के माध्यम सारे विश्व में फैल जाता है, मत वह अपने शरीर को हो ब्रह्माण्ड सरीर मानने लगता है। जात-गांत, रगभेद मोर सम्प्रदाय के सड्कीए विचारो से ऊपर उठकर विश्व मंत्री की उच्च भावना को जागृत करने के लिये यज्ञ सरल वश्रेष्ठ साधन है। प्राचीन काल में इसी माध्यम से जनता के नैतिक स्तर को अ चा उठाया जाता था ! पुराणकार का कहना है कि नरिप्यन्त ने एक यहुत बड़ा पश किया जिसकी प्रतिषिया स्वरूप जनता ने प्रसस्यों यश दिये। पूर्व मे मठारह परोस, प्रथिम मे साठ रोड, दक्षिण में चौदह परोड मोर उत्तर में पन्द्रह परोड या सम्मान हए । इन महान योजनामों के फलस्वरूप ही जन-साधारण घी महोणं भावनामों परिवार हो पाया मोर राम राग्य का साकार रूप देखने को मिला जहाँ पाप, ताप, घोरी, पती, एम रपट, मादिया माग नैतिक व सास्कृतिक प्रध्ययन ] । ४८६ उछ सूक्ष्म, निशान न था । लोग इस लोक की अपेक्षा परलोक का प्रधिक ध्यान रखते थे। आज उसके विपरीत है । वह युग पुन आ सकता है यदि हम ऋपियो को योजनाग्रो के अनुसार अपने जीवन को मोड दें तो। जीवन निर्माण के मिद्धान्तों का प्रतिपादन- मार्कण्डेय पुराण में विभिन प्रकार के सिद्धान्तो का उल्लेख है जिनका प्रगति पय पर आरूढ होने वाले हर मानव के लिए समझना आवश्यक है। भौतिकवादी स्थूल नेत्रो से दिखाई देने वाले इस पञ्चमौतिक शरीर को ही सर्वस्व मानते हैं, उससे आगे की वे कल्पना भी नहीं कर सकते । वे चेतन तत्व से अपरिचित है जिसके प्राधार पर समस्त क्रियानो का सञ्चालन होता है। भारतीयों ने उस जीवनतत्व का नाम प्रात्मा रखा। जो इसे समझता नहीं, वह दुखी रहना है क्योकि शरीर अनित्य व नष्ट होने वाला है, उस पर अपने भविष्य को निभर करने वाला कभी शाश्वत सुख की पाशा नही रख सकता। शान्ति के लिए मूल तत्व को जानना होगा। उसके लिए प्रयत्न करने होंगे। मात्मा को जान कर उस के उत्यान की योजनामा को क्रियान्वित करना होगा। जो विघ्न बाधाएँ इसके मार्ग में आती हैं उन्हें हटाना होगा, अपनो विचारधारा प्रौर जीवन पद्धति को परिष्कृत करना होगा। पुराणकार ने दुख वो निवृत्ति के लिए शरीर भावना के त्याग का परामश दिया है। जब मदालसा पुत्र अलक के राज्य पर सुबाहु और काशि. राज ने माक्रमण करके उसके राज्य को छीन लिया तो उसे अपनी मा की तम शिक्षा का स्मरण हो अया कि सकट के समय इस अगूठी में लिपटी शिक्षा के मार्गदर्शन मे चलना । उसम सापुरुषों के सग को प्रेरणा दी गई थी। अल योगी दत्तात्रेय के पास गया । दत्तात्रेय ने कहा कि अपने दुख का कारण बतायो, मैं बाज ही उसे नष्ट कर दूंगा। जब प्रलक ने उस पर गम्भीरता पूर्वक विचार किया तो लगा कि उसने मारी भूल को, दुप तो शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियो से सम्बन्ध रखता है और वास्तव में ४६० । [ मारडेय पुराण मैं इन से भिन्न है। दुग तो मेरे याध उपकरणों को था, मुझे नहीं, मैं तो इनमें सर्या भिन्न है। मुझे तो दुम टू भी नहीं सकता। मेरे प्रशान के वारण उरा ने मुझे दवाये रखा। मा में शरीर से सम्बन्धित नहीं है। इसलिये इस से परे है। - जव तक मनुष्य पारीर भावना से लिप्त रहता है, तब तक वह शारीरिक परिवर्तनों से प्रभावित होता रहता है। इस से ऊपर उठकर जर मारम भावना में स्थित होता है तभी उसे मानन्द का मार्ग मिलता है। इसी मार्ग पर चलने की प्रेरणा पि देते हैं । इस सम्बन्ध में साधना का भी पथ प्रदर्शन किया है। प्रात्मा को बीतने के लिए लिखा है "प्राणायाम से दोपो को, धारणा से पापो को, प्रत्याहार से विषयों को और ध्यान से पनीश्वर गुणों को भस्म करे। जैसे मग्नि मे पडकर सक धातु दोप-रहित होती हैं, वैसे ही प्राण वायु के निप्रह से इन्द्रियों के सम दोप नष्ट होते हैं ।" मह प्रात्मदर्शन में बाधक तत्व हैं, इन्हें दूर करना आवश्यक है । जिसे मारमदर्शन हो जाते हैं, वह सांसारिक दु खो से अलिप्त रहता है । मृत्यु उसका कुछ भी बिगाड नहीं सकती। वे मृत्यू का प्रसन्नता पूर्वक, आलिंगन करते हैं, अपने सम्बन्धियो की मृत्यू पर शोक नही मनाते। मुत्यु को तो वे केवल वस्त्रों का बदलना मात्र मानते हैं। जीवन तो एक अखण्ड तत्व है । शरीर नाश से उसका नाश असम्भव है। एक शरीर के नाश के वाद प्रात्मा दूसरा शरीर धारण करेगी, उस के भी नष्ट होने पर तीसरा धारण करेगी, जब तक जीवन का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो जाता, यह यात्रा चलती ही रहेगी । यह तो यात्रा के भिन्न-भिन्न पहाव हैं, इनकी वास्तविक्ता से प्रांस मूदकर रोना पीटना मशानता है । मदालसा ने अपने पति की मृत्यु के समाचार सुन कर शरीर त्याग दिया तो राजा ने कहा कि "सब प्रकार फे सन्वन्धों की अनित्यता पर विचार करने पर ऐसा लगता है कि क्या पुत्र के लिये रो और क्या पुत्र बधु के लिये रोऊँ । प्रति दोनों में किसी के लिय रोने का कोई कारण नहीं है।"

नतिक व सांस्कृतिक अध्ययन ] [ ४६१ इन विचारो की पुष्टि के लिये पुर्नजन्म के सिद्धान्त को उभारा गया है। सुमति नाम के एक ब्राह्मण कुमार की कया दी गई है कि जब उसका उपनयन सस्कार किया गया तो उसे उपदेश दिया गया कि उसे क्रमश ब्रह्मचर्य गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्याम चारमाश्रमों में प्रवेश करना होगा । इनके तमो का दृढना पूर्वक पालन करने पर ही उसे ब्रह्म प्राप्ति होगी। इन पर सुमति ने अपने भनेको जन्मों का वृतान्त सुनाया। उन जन्मों में वेदाध्ययन मोर आश्रम धर्मों के पालन की बात कही, कैसे एक बार नरक को यातना भोगनी पडी, उसका भी वृतान्त है । पुर्नजन्म का सिद्धान्त बताता है कि शरीर के नाश से हमारी प्रगति अवरुद्ध नहीं हो जाती। जितना विकाम हम ने इस शरीर के माध्यम से कर लिया है, वह भी नष्ट नहीं होता, उसके सहकार हम सूक्ष्म शरीर के साप ले जाते हैं और भागामी जीवन में हम इस विकास का उपयोग करते हैं । कई व्यक्तियो में जन्मजात विलक्षण प्रतिभा बाल्यकाल से ही प्रस्फुटित होने लगती है, वह उनके इस जन्म के कारण नहीं वरन् पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण होता है । इमोलिए मार्कण्डेय ने जीवन निर्माण के प्रमुख मूत्र कर्म को प्रमुखता दी है। मं को ही समस्त सफलतामो का श्रेय दिया है। कहा है "कर्म का बल पृथ्वी के मानव को श्रेष्ठतम शक्ति है। यही उमको विजय का रहस्य है। यही कारण है कि स्वर्ग के देवता भी पृथ्वी पर जन्म लेने को उत्सुक रहते हैं। जिनके पास कम का हपिपार होता है, वह उसको महायता से देवत्व, इन्द्रत्व मौर ब्रह्मत्त सभी को प्राप्त करने को क्षमता रखते हैं। जिन व्यक्तियों का चित्त, इन्द्रियों मोर मात्मा अपने वश में हैं और जो करने के लिये उद्यत हैं, उनके लिये कुछ भी मसम्भव नहीं होता। चलती हुई पोटी हबारों योजन चल जाती है, बिना चले गरुड मी एक पग नहीं जा पाता।" इन नसक्त गम्शे मे ऋषि माया को जीवन ज्योति बताते हैं और आश्वासन देते है कि जमी भी परिस्थितियां इग बीवन में उपलब्ध हुई हैं.

४६. ] [ मार्कण्डेय पुराण उनसे निराश न होना चाहिये, उनके लिये भाग्य और भगवान को कोसना कायरता और निबलता को निशानी है, कर्म का विस्तृत क्षेत्र मानव के लिये खुला पडा है, वह स्वतन्त्रता पूर्वक मपने कर्मों का जाल बिछा सकता है उन्हें नष्ट करने का अधिकार किसी भी मानव को नहीं दिया गया। यह अलग बात है कि उनमे विघ्न बाधाएं उपस्थित हो, जिन्हे दूर करने के लिये कुछ अतिरिक्त पुरुषाय करना पड़े परन्तु उस दयालु परमात्मा ने उति का मार्ग हमारे लिये खुला छोड दिया है । हम अपने कर्मों के द्वारा अच्चत्तम प्रासन पर स्थित हो सकते हैं। यदि हम मागे नहीं बढ़ रहे तो इसका कारण हम स्वय हैं न कि भाग्य और भगवान । किसी को हमारे लिये कुछ नहीं करता है। करने वाले हम स्वम हैं । अपने भाग्य को हमे स्वय लिखना है, बनाना है। इसी पर ऋषि ने विशेष बल दिया है। जब राजा शत्र जित के पुत्र अपने मित्र ऋतध्वज के दुख निवारण के लिये कुछ नही कर सकते तो पिता ने कहा "पुत्रो। तुम्हारी यह धारणा ठीक नहीं है । बुद्धिमानों के लिए कोई कार्य प्रसाध्य नहीं होता, पुरुषार्थ से सब कुछ उपलब्ध किया जा सकता है -उद्योगी व्यक्ति के लिए कोई भी स्थान गम्य और कोई स्थान प्रगम्य नही होता । कहाँ भूतल और कहां ध्रव का पद ? फिर भी इस भूतल पर निवास करने वाले ध्रुव ने उद्योग द्वारा ध्रव का पद पा ही लिया।" एक राजकुमार ने कामना की है कि "जो अपने बल पौरुप से सम्पत्ति और स्याति प्रजित परते हैं मोर अपने पौरुप से ही सकटो को पार करते हैं मैं उन जैसे लोगों को गति चाहता हूँ।' पुरषार्थ ऐसा प्रस्त्र है जिससे मासारित विघ्न बाधामो, कठिनाइयों व रुकावटों को दूर करपे मानव लोक्कि मोर पारलौषि सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त कर सकता है। उसी की मोरपि ने हमे प्रामुष्ट किया है। मानव को कुमार्ग से बचाने पोर समागं को मोर प्रेरित करने के निये अनेक प्रकार के उपाय पपनाये जाते हैं । उनमे एक गरमों के मप मंतिक व सांस्कृतिक अध्ययन ] [ ४६३ दिखाना भी है। वर्मफल के सिद्धान्त को तो हर भारतीय स्वीकार करता ही है। वर्तमान बुरी यह अच्छी परिस्थितियो का श्रेय भी पिछले जन्मों के खुरे या अच्छे कर्मों को ही होता है । नरक अथवा स्वर्ग का सम्भोग तो वह यहाँ भी कर लेता है । यदि इन्ही तथ्यों को भीपण रूप से वगित करक नरक और स्वर्ग पृथ्वी से दूर किसी दूरस्थ लोक मे वतार जाते हैं तो उन पर साधारणजन विश्वास कर लेते हैं और उनमे दी जाने वाली यातानापो की भयङ्करता को सुनकर वह भयभीत हो जाते है और बुरे कर्मो से बवते हैं । इसी उद्देश्य से मारण्डेयपुराण में नरको का विस्तृत वणन है जिनमे लाखो करोडो जीव अपने दुष्कर्मों के भोग भोगते दिखाये गये हैं। वहाँ की लोमहपंक यातनामो को सुनकर हृदय वाप रठना है। उदाहरण के लिए "जिन नराधम मनुष्यों ने पर नारी को दूपित नेत्रों से देखा है अपवा पराये धन को हडपने की इच्छा वाले नेत्रो से देखा है, उनके दोनो नेत्रों को यह वचतुरडी पक्षी हरण फरते है तथा वही ने बारम्बार उत्पन्न हो जाते हैं. इन मनुष्यो ने जितने पलक लगने तब यह पाप दिये हैं, उतने हो सहत वर्ष यह इम नेत्र पीडा को प्राप्त करते रहेगे, जिन्होंने शत्रु को भी ज्ञान दृष्टि का हरण करने के लिय अन्याय पूर्वक विपरीत शास्त्रोपदेश अयवा भ्रमात्मक परामर्श दिया है या मिया मापण "जिन्होंने वेद, देवता, ब्राह्मण और गुरुजनों की निन्दा की है, यह वन- सुण्डी पक्षी उनकी बीम को वाटते है, जितनी बार यह पाप किया है, उतने ही वर्ष उन्हें ऐसो पन्त्रणा मिलती है तथा जिन्होंने मित्रो मे या पिता-पुत्र से भेद दलवामा है मपवा माझिा-यजमान में, माता-पुत्र मे या पनि पलो मे पन- मुटाव करा दिया है, वे इस वर पत्र से पाहत होते है पथवा जो रिसी को मोघ दिलाते या किसी को प्रसपता नष्ट करते हैं, जो ताइ कापसा या सस या चन्दन का हरण परते अथवा साधुनों को प्रारतिर पोडा देते हैं, वे पापी सम रेत में गिर र पाप का पल पाते है अथवा जो एक याद में निर्माता होकर दूसरे के यहां भोजन करते हैं उनको यह पक्षीगण व्यक्ति करते हैं।" पुर्नजन्म का मिक्षान्त समाय है । यह निश्चित है कि हमारी र ४६४ ॥ [ मावएडेय पुराण की पशु, पक्षी, कोट, यतग प्रादि को नीच योनियों से होकर मानव को यह योनि प्राप्त होती है । इस योनि मे पाकर भी यदि वह पतित कार्य करता है तो पुन उन योनियो में उसे जाना पडा है । कैसे कर्म से किन योनि में जाना पडता है, इसकी विस्तृत सूत्री पुराणकार ने दी है। उदाहरण के लिए "पतित मनुष्य से धन लेने वाला ब्राह्मण गधे की योनि को प्राप्त होता है तथा पतित मनुष्य को यज्ञ कराने पर नरक से मुक्त होकर कृमि योनि पाता है। उपाध्याय के प्रति छल करने, उसको स्त्री या अन्य व तु की इच्छा करने से श्वान-योनि मिलती है। माता पिता का अपमान करने वाला गधा और उन्हे गाली देने वाला मैना होता है । भाई की पत्नी का अपमान करने वाला कबूार होता है उसे पीडित करने से कछुपा होता है। स्वामी का पिण्ड भोजन करके जो उसका अभिलिपित नहीं करता,वह मोह मे भरकर मरणान्तर बन्दर बनता है । किसी की धरोहर हडपने वाला नरक से मुक्त होने पर कृमि होता है, असूया करने वाला नरवान्त मे राक्षस होता है।" नरको, उसमें दी जाने वाली यातनाओं और विभिन्न प्रकार की योनियो के वर्णन का उद्देश्य यह है कि मानव दुष्कर्मों से बचे मोर सत्कार्यों का सम्पादन करे ताकि उसे श्रेष्टतम योनि मे पाकर पुन शुद्र योनियो मे न जाना पढे । यह मानव की पतित अवस्था का ही परिणाम हो सकता है। पतन से वचने के लिए ही मार्कण्डेय ने यह सत्प्रयास किया है ।

नैतिक व सारकृतिक अध्ययन [ ४६५ 1 साधनात्मक प्रक्रियाएँ इस सिद्धाल से हर व्यक्ति परिचित है कि इस जीवन की सुख-मुविधाएँ पिछले उदार कार्यों के कारण प्राप्त हुई हैं और कठिन परिस्थितियो का कारण सङ्घीणं और क्षुद्र भावनाएं रही हैं । स्वर्गीय सुखो का भोग करना तो हर कोई पाहता है परन्तु उसके अनुरूप सहकार्यों का करना हर किसी के बस की बात नहीं है । मनुप्प न चाहते हुए भी पाप करता है । कार्यों को बुरा समझते हुए भी उनमे फंसता है । इसका कारण उसका अपवित्र और निवल मन है। पविन और सबल मन मे ही सदविचार उठते हैं । परन्तु मन को अपनी इच्छा- नुसार चलाना सरल नहीं है । उसकी गति वायु से भी तीत्र है। इसको चञ्चलता तो प्रसिद्ध है हो। इसे पवित्र, शनिशाली और अपने नियन्त्रण में रखने के लिए अनेको प्रकार की प्राध्यात्मिक साधनामो का प्राविष्कार किया गया है जिन्हें अपना कर हितसाधन किया जा सकता है। जप, तप, योग और विवार- साधना के अनेको मार्ग हैं जिनमें से कुछ का मार्ग दर्शन किया गया है। मार्कण्डेय ने प्रएव की साधना की घोर सापकों का ध्यान प्राहर किया है । यह मन्त्रों का सेतु व शिरोमणि है। योगियों ने समाथि अवस्था में देखा कि मूक्ष्म प्रकृति के अन्तराल में जो ध्वनि निरन्तर हो रही है, यह प्रणव की ध्वनि से मिलती जुलती है। अत उस ध्वनि को अपने दिव्य कयों द्वारा श्रवण करके उन्होंने मानव के हितार्थ साधना का रूप दे दिया ताकि मानव उसके अनुरूप अपने को बना सके। अनुकूलता में शक्ति का विकास और प्रति- दूलता में उसका हास होता है। इसलिए प्रशव को श्रेष्ठतम माधना माना गया है जिसकी महिमा का गान स्वय पुराएकार ने किया है.-"मो विश्व स्वरूप, विश्वेश्वर और विश्वमावन हैं तथा विश्व ही जिनके पाद, ग्रीवा और मस्तक हैं, उन्ही परब्रह्म को प्रत्यक्ष करके योगी उनको पाने के लिये '' इस एकाक्षर यन्त्र का जप करे। यही उनका स्वाध्याय है, इसी मोकार का श्रवण करना चाहिये..." योगी अक्षर-पथर मे पोवार युक्त होता है, प्राण को अनुप रूप. मामा को शरण प और ब्रह्म को लक्ष्य स्प जाने • .."मोकार हो त्रिवेद, ४६६ ] | माण्डेय पुराण लोक्य और तीनो प्रग्नि, ग्रहाा, विष्णु, शिय तपा र यजु गाम न है.....येवल 'ॐ' का उच्चारण करये ही सदेव सत् प्राधा ग्रहण हो जाता है......जो योगी प्रोकार स्वरूप या ब्रह्म को जानकर उन ध्यान करते हैं वह ससार चक्र का पतिप्रमण करते हुए तीनों बन्धनों को छोड़ कर उग पर- ब्रह्म मे ही लीन हो जाते हैं। यदि उनके कम वन्यन क्षीण न हो तो वह प्रष्टि द्वारा मृत्यु जानवर उस समय स्मृति साभ पूर्वक योगित्व यो पुन प्राप्त होत ।" वेद शास्त्रो मे वरिणत मृपियों के अनुभवो से भी इन तथ्यों की पुषि होती है। योग साधना की भी विस्तृत शिक्षा पुराणकार ने दी है ! अस्तेय, ब्रह्म- चयं, त्याग, अलोभ, अत्सिा के पांच यमो और लोध, गुरुमेधा, शौच, लघु पाहार और नित्य स्वाध्याय के पांच नियमो के पालन को मावश्यक माना गया है। इसी स्थिति पर प्रागामी क्रियाओ का सफल सञ्चालन सम्भव है। योग की नीव को दृढ करने के लिए इन नैतिक नियमों का पान प्रावयव है। प्राणायाम से दोपो को, धारणा से पापो को, प्रत्य हार से विषयों को और ध्यान से अनीश्वर गुणो को भस्म करने की प्रेरणा दी गई है। प्राण वायु के निग्रह से इन्द्रियो के समस्त दोपो का नष्ट होना बताया गया है। प्रात्मा पर विजय प्राप्त करने का साधन योग की इन साधनायो को माना गया है। इन सभी क्रियाओ को खोलकर समभाया गया है। इनसे प्राप्त होने वाली सिद्धियों का भी वर्णन है। अष्ट सिद्धि की प्राप्ति का आश्वासन दिया गया है और इन्हें अन्तिम लक्ष्य तक पहुंचाने वानी कहा गया है । ध्यान के सम्बन्ध मे कहा है- "निखिल वेद और सब प्रकार की यज्ञ क्रिया उत्कृष्ट है, उस यज्ञ से जप श्रेष्ठ है, जप से ज्ञानमार्ग और ज्ञानमार्ग से नि मङ्ग और रागहीन 'ध्यान' श्रेष्ठ है क्योकि इस ध्यान के द्वारा ही शाश्वत ब्रह्म की प्राप्ति होती है। जो सावधानी से ब्रह्मपरायण, प्रमादरहित, एकान्तवासी और जितेन्द्रिय होकर योग साधन करते हैं. वे आत्मा मे आत्मा के सयोग का पाकर मोक्ष लाभ करते हैं ।" इन साधनामो को किया रूप देवर निश्चित रूप से आत्मा और परमात्मा के लक्ष्य यो प्राप्त किया जा सकता है।

। ४६७ नैतिक व सास्कृतिा अध्ययन ] - तप की प्रेरणा तो पग-पग पर दी गई है। जितने भी राजामों के जीवन-चरित्रो अथवा क्यानो का पुराण में वर्णन है, लगभग सभी ने वृद्धावस्था आने पर राज्य का भार अपने पुत्रो को सौंप कर तपश्चर्या के लिए वन के लिए प्रस्थान किया। तपस्वी का वेप धारण करके वे क्रोध, हिंसा, बदले की भावना से बचते रहे हैं । कई बार जब वन म मुनियो को नागो, राक्षसो व अन्य प्रामुरी शक्तियो ने परेशान किया तो उन्हें शाप द्वारा स्वय भस्म करने की शक्ति- सामध्यं रखते हुए भी वे राजा के पास रक्षा की प्रार्थना के लिये जाते हैं क्योकि क्रोध से उनकी प्राध्यात्मिक शक्ति के क्षय होन की मम्भावा थी। तप द्वारा शक्तियो और सिद्धियो की प्राप्ति का वर्णन है। मात्मोत्थान के लिये चिन्तन मनन एक उच्चरोटि की साधना है। इसम दोनों पक्षो की मोर ध्यान रखना प्रा-धक होता है । एक तो अपनी भावनायो मे सात्त्विका लानी चाहिय । नागगज ने जब ऋतध्वज से वर मांगने के लिय कहा तो उसने उत्तर दिया-'यदि पार कुछ देना ही चाहते हैं तो मुझे यह वर दें कि मेरे हृदय से धर्म की भावना कमी दूर न हो।" वास्तविकता में धारण करन का धर्म कहते हैं। क्तव्य पालन ही सच्चा धर्म है। घमं भावना तो आत्म-विकास की नींव है । इसरा पुनित-पन्लवित होता मावसक है । मात्म-दशन के लिए शरीर-भावना से ऊपर उठकर पात्म भावना के क्षेत्र में प्रवेश करना पडता है तभी मोक्ष का-स्वतन्त्रता का मार्ग प्रशस्त होता है। जब साधक आत्मभावना मे दक्ष हो जाता है तो उसका कोई शत्रु मित्र नहीं रह जाता, सवतो वह समान हरि से देखता है, किसी मे घृणन्द्वप नहीं करता। वह जगत् के कल्याण के लिए अपनी समस्त शत्तियों के व्यय के लिए तत्पर रहना है । जब मदालसा पुत्र मल को दत्तात्रेय के मसग से मात्मज्ञान हुआ तो उसकी भी यही स्थिति हो गई। वह चारो मोर अपनी आत्मा के ही दर्शन करन लगा । यह माम माधना की उच्च स्थिति है। इस स्थिति तक पहुंचने के लिए पात्म सयम को सापना एर महायपूर्ण मग है जिसकी प्रेरणा पुराणकार ने दी है। इसे मोक्ष का मायन माना गया है। मयम मे दाक्तियो की सुरक्षा होती है। शक्ति की माधना का मूत्र है ४६८ ] | माण्डेय पुराण उसकी सुरक्षा के लिये विर धो सांसारिक भावनामो के प्रति सावधान रहना पड़ता है। इनमें अनित्यता, असग और ममता के त्याग पर ऋषि ने विशेष बल दिया है । अनित्यता की भावना से सासारिक वस्तुओं के क्षय होने पर दुख नहीं होता। उनकी स्वाभाविक गतियो को वह भली प्रकार जानता है, उनमें लिप्त नहीं रहता, अलिप्तता की भावना से प्रोत-प्रोत रहता है। ममता के प्रति विशेष रूप से सजग रहने को कहा गया है क्योकि "ममता मनुष्य के हृदय में एक महान वृक्ष के रूप में स्थित है। अज्ञोन को इसका बोज, अहङ्कार को भकुर और ममक र को तना कहा गया है। घर-द्वार, खेती-बाडी को शाखाएँ, धन सम्पत्ति की पत्ते, स्त्री पुत्र को पल्लव, पाप पुण्य को पुष्प, सुख दुख को फल, इच्छात्रो को भ्रमर की सज्ञा दी गई है। यह प्रादि काल से खड़ा है और निरन्तर बट रहा है। यह साधक को प्रात्म विस्मृत करता है। सत्सङ्ग और विद्या के प्रस्त्रो से इसको काटा जाना सम्भव है तभी मोक्ष मार्ग प्रशस्त होगा।" प्रलय के विस्तृत वर्णन करने का उद्देश्य यह है कि हम नित्य के मनन चिन्तन और ध्यान में यह अनुभव करें कि इस विश्व की जितनी वस्तुप्रो से हमारा सम्बन्ध है. वह धरे धीरे नष्ट होती जा रही हैं। बन्धु बान्धव साथ छोडते जा रहे हैं, पञ्चभौतिक शरीरो का निरन्तर क्षय होता जा रहा है, ये विनाश की पोर तीव्र गति से बढ़ रहे हैं, बडे-बडे भवन और प्रासाद ध्वस्त होते जा रहे हैं, असख्यो जीव-जन्तु अपने प्राण छोड़ रहे हैं, बडे बडे राजा- महाराजा और 'धन' कुबेर भी इस प्रवाह मे बहे जा रहे हैं। किसी मे रुकने की क्षमता नहीं है । स्थिति यहाँ तक पहुंच गई है कि सारा विश्व जल कर भस्म हो गया है और चारो ओर जल ही जल दिखाई दे रहा है । यह भावना दृढ होने पर साधक झट, छल, कपट, फरेब, धोखेबाजी घूस, मिलावट मादि धन एकत्रित करने के अनुचित उपायो से विरत हो जाता है और सदमार्ग पर चलने का प्रयल ३रता है। उसका विसी से लगाव नहीं रहता, पलित भावना से वह जगद मे विचरता है। देवी उपासना का निर्देशन इम पुराण की एक प्रमुख विशेषता है। देवी पे माविर्भाव, उद्देश्य, आसुरी शक्तियो से सहर्ष प्रादि वा विस्तृत वर्णन - नैतिक व सांस्कृतिक अध्ययन ( ૪૯ है। देवता देवी को स्तुति करते हुए कहते हैं । "इस प्राणी जगत् को अपने प्रभाव से विस्तार करने वाली, समस्त देवगणों की एकवित दशक्ति से उत्पन्न होकर साकार रूप मे परिसित हुई हैं एवम् जो समस्त सुद्गणो एवम् महामुनियों को पूज्या हैं, अनन्त भगवान्, ब्रह्मा, एवम् महेश भी जिनकी शक्ति और प्रभाव का वर्णन करने में असमर्थ है, वह देवी चण्डिका समस्त विश्व का पोपण करने के लिये और उसके प्रहित व भय के नारा के लिये आगलत हो । समस्त विश्व की घोर विपत्ति को शमन करने वालो पाप ही हैं। माप ही बुद्धि स्वरूप हैं, कठिन भा सागर से निस्तार करने वाली अनुपम नौमा स्वरूप हैं, कैटभ शत्रु के वध कर्ता भगवान विष्णु के हृदय में निवास करने वाली लक्ष्मी पौर महादव के बाए अङ्ग पर प्रतिष्टित गौरी प्राप ही हैं। प्रापका पराक्रम किसी अन्य के साथ तुलना नहीं लिया जा सरता। पापका रूप शत्रुमो की भयदाता एवम् प्रत्यन पनुपम है।" देवी का माविर्भार देव शक्तियों के सग्रह में हुआ है । जव जव राष्ट्र पर घोर सङ्कटो के बादल छाए हैं, तव-नव दिव्य पुरुष एकत्रित होर अपने ममस्त सामथ्यो को राष्ट्र हित के लिये समर्पित कर देते हैं। परन्तु पृयक प्रपला का कोई भाशा जना फन नहीं प्रतीत होता । सङ्गठन से ही शक्ति का विक स होता है । जब महिपासुर, मधु कंदम, गुंभ निशुभ मादि शक्तिशाली विरोधियों न सर उठाया तो देव शक्तियो ने उनमे मलग मग जूझने में प्रपने को मममर्य पाया। यह सब मिलकर एक हो गए तव असुरों को पराजित होना पडा । भगवान् वृष्ण ने भी बालों को वहा था, तुम अपनी-अपनी अंगुली लगा दो, यह गोवर्धन सहज में ही उठ जायगा। यह सङ्गठन शक्ति की मोर ही समेत पा । भगवान राम ने बानरो की निम्न स्तर को जाति वा सगठन पर ही लता पर पाक्रमण क्यिा मोर सिद्धहस्त सेना को परास्त कर दिया। प्रार हमारा सामाजिक, नैतिक व सांस्थतिम दौवा प्रस्तुच्यस्त हो रहा है । पारी ओर से प्रामुरी शक्तियां इमे पोर धस्त करने का प्रयास कर रही हैं। पर यह लहसडाती स्थिति में है। इसे स्थिर रखने में लिये आवरा है दयो पो उपासना दो जाए, देव शक्तिों को एकत्रित पिया जार पौर अमुरों के नगरा - [ मारंडेय पुगत व गढी को नष्ट भ्रष्ट किया जाए ताकि देवता मुख को सांस ले म । अर्थात् राष्ट्र का नैतिक व सास्कृतिक विकाम हो। ऐसे मगठन बनाये जायें या बने हुग्री का सहयोग किया जाए तो सामाजिक रोगो और युरीतियों के विरुद्ध अभियान चलायें, उन से घोर संघर्ष कर, उन्हें नष्ट करके ही दम सें, ताकि सारे राष्ट्र में मैनिक्ता की अजस्र धारा प्रवाहित हो। देवी उपासना का एक उद्देश्य यह भी है कि जब हम देवी को जग- अननी मानते हैं तो समस्त स्त्री जाति को ईश्वर रूप मानना होगा। प्राज दूपित हरि की कमी नहीं है। कही भी इसका अनुभव किया जा सकता है । नारी जाति के प्रति मादर व मम्मान की भावनायें रखना और उन्ह पुत्री, भगिनी और मातृत्त्व की पवित्र भावना से देखना ही सच्ची देवी उपासना है । इसी की ओर पुराणकार ने इ गित किया है। अश्लीलता, युवतियो का अपह- रण, बलात्कार, कामवासना के ताण्डव नृत्य चारो पोर होते दिखाई दे रहे हैं। इनका शमन इस देवी उपासना से ही सम्भव है। समन्वयात्मक दृष्टिकोण माण्डेय पुराण के रचियता एक सांसारिक बन्धनों से मुक्त महपि हैं जो अात्मसाक्षात्कार प्राप्त हैं । वह चाहते तो इसमे अपने पक्ष का प्रतिपादन करते और युद्ध में नारद की तरह सब को ही गृह त्याग को शिक्षा देकर सन्यासी बना देते । गीता का प्रतिपाद्य विषय तो कर्म-योग है परन्तु हर टीकाकार प्राचार्य ने अपनी मान्यताग्रो के अनुसार उसे अपने अनुकून मोड दे दिया । माण्डेय चाहते तो वे भी सुविधापूर्वक कर सकते थे परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं क्यिा । उन्होने तो जगत् के कल्याण की पवित्र भावना से इसका निर्माण किया था। जन साधारण का हित इसी में है कि उनके बौद्धिक स्तर भौर पात्रता के अनुमार ही उन्हें शिक्षा व प्रेरणा दी जाय ताकि वह उसे सुविधापूर्वक अपना सकें। शिक्षायें ऐसी व्यवहारिक होनी चाहिये जिन्हे जन-साधारण के लिए असम्भव न पहा जा सके । माकण्डेय दूरदर्शी थे। उन्होने जगत् के प्रवाह का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन किया और अपने अनुगाइयो को इस धारा के अनुरूप ही ननिय व सांस्कृतिक अध्ययन ] [ ५०१ हर व्यक्ति को उपदेश दिया । धारा के विरुद्ध चलने में कटा सङ्घर्ष करना पडता है जो सर्वसाधारण के लिए प्रत्यन्त कठिन प्रतीत होता है। इसलिये उन्होंने ऐसे मार्ग का निर्देशन किया जिसे अपनाकर हर कोई क्रमिक विकास करता हुप्रा उच्चतम स्थिति तक पहुंच सकता है । माकण्डेय स्वय विरक्त थे परन्तु उन्हें गृहस्य से विद्धप नहीं था। उन्होने भौतिक जीवन को हर प्रकार से समुनत करने की प्रेरणा दी, सभी सापनी को पूर्णरूप से विकमित करने पर बल दिया परन्तु इन समस्त प्रक्रियाम्रो का माधार धर्म और कर्तव्य हो माना है । गृहस्य को उन्होंने प्रशमा की है क्योकि इसमें सघर्षमय जीवन की क्रियात्मक शिक्षा मिलती है । सहर्ष से ही सब प्रकार को शक्तियों का विकाम होता है जिन्हें प्राध्यात्मिक भापा म सिद्धियां कहा जाता है । यही जीवन-निर्माण को आधार शिला बनती हैं। प्रगति पय पर प्रारुढ होन के लिये आवश्यक नियमों का विवेचन किया गया है और सद्गुणों के विकास पर बल दिया गया है । साथ ही साय अवगुणों के प्रति चेतावनी भी दी गई है ताकि उपाजित शक्तियां सुरक्षित रह सके, उनका व्यय होकर वह मानव को दीन हीन न बनादें। ऋपि व्यक्तिगत उत्थान के समस्त मिद्धान्तो का प्रतिपादन करते हैं, परन्तु इम उत्यार को वे अपूरा मानते हैं जब तक कि परहिन की उदार भावनायें मन क्षेत्र में जाग्रत न हो जायें। पूर्णता की प्राप्ति के लिये वह मारे विश्व को अपना परिवार मानने पर बल देते हैं । इस स्पिति तक पहुँचने के लिये महत्वपूर्ण साधनामों का भी मार्ग दर्शन किया गया है। मार्कण्डेय ने भौतिक और माध्यामिक दोनों प्रकार के जीवन का उचित मूल्याइन किया है। वे भौतिकवाद को उपेक्षा नहीं करते, उमे मी मावश्यक समझते हैं परन्तु वेवल उन्हीं वे लिये जीवन नष्ट करने को मनानना मानते हैं । उनका दृष्टिकोण समन्वयात्मक है। यही जन-साधारण के अनुकूल है । इमोनिय इमे एक उचकोटि वा पुराण माना जाता है ।

... ... भारतीय संस्कृति के गौरवशाली धर्म-ग्रंथ हिन्दी अनुवाद सहित १. चारों वेद ८ जिल्दों में- ऋग्वेद ४ खण्ड .."२७) अथर्व वेद २ खण्ड "१३)५० यजुर्वेद १ खण्ड सामवेद १ खण्ड २. १०८ उपनिषदें (३ खण्डों में) ज्ञान खण्ड ७/७५ ब्रह्म-विद्या खण्ड साधना खण्ड ७)७५ ३. पट् दर्शन ( ६ जिल्दों में ) वेदान्त दर्शन सांख्य दर्शन ... ४) योग दर्शन ०४) वैशेषिक दर्शन ४) मीमासा दर्शन ४.२० स्मृतियाँ २ खण्ड ""१४) ५. शिर पुराण ..."१२/७५ वायु पुराण र खण्ड "१४) विष्णु पुगण २ सण्ड ."१४) प्रकाशकः संस्कृति संस्थान, ख्वाजाकुतुव, बरेली (उ.प्र.) ... न्याय दर्शन ...

देव वाद वैज्ञानिक स्वरूप भाग-१ विष्णु रहस्य नै हिन्दुसस्कृति के जितने भी विवादस्पद विषय हैं, उनमे देव वाद प्रमुख स्थान रखता है। देव वाद ठोप मनोवैज्ञानिक विचार- धारा पर आधारित है। देव देवियो का स्वरूप निर्धारित करते समय साधक के व्यवहारिक व क्रमिक विकास पर ध्यान दिया गया है, परन्तु आज का शिक्षित वर्ग इनके वाह्य रूप को देखकर आलोचना करने लगता है। देव देवियो सम्बन्धी समस्त शकागो का समाधान करने के लिये देव वाद का वैज्ञानिक स्वरूप चार खण्डो (१ विष्णु रहस्य, २ शिव रहस्य, ३ ब्रह्मा रहस्य, ४ देव रहस्य) में प्रकाशित किया जा रहा है। प्रथम खण्ड विष्णु रहस्य छपकर तैयार हो चुका है । इसमे विष्णु के स्वरूप, क्षीर सागर मे निवास, शेष शय्या, समुद्र मथन, मोहिनी रूप, शालग्राम, चक्र, पद्म, गदा, शस, वैजयन्ती माला, श्री वत्स, वाण, धनुप, लक्ष्मी से सम्बन्ध, वेद, उपनिपेदो, रामायण, महाभारत, पुराणो आदि शास्त्रो मे प्रतिपादन, उनके विभित अवतारो का रहस्य आदि समस्त विषयो का प्रमाणित व शास्त्रीय विवेचन दिया गया है जिससे विष्णु साधना एक उच्चकोटि को जीवन निर्माण की प्रक्रिया सिद्ध होती है। पुस्तक अत्यन्त खोज पूर्ण है। इस विषय पर यह सर्व प्रथम पुस्तक है। मूल्य केवल छ रु० मात्र है। प्रकाशक संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतुब, बरेली (उ.प्र.)

सांस्कृतिक विचारधारा के प्रमार का प्रतिनिधि मासिव -- "युग-संस्कृति" "युग सस्कृति" युग यो वाली व युकार है। इसका उद्देश्य, रवीन, आधुनिक, वैज्ञानिक ढग से भारतीय सस्कृति की विशेषतायो, महत्तामो, विचारधारामो व परम्परायो का बौद्धिक आधार पर प्रति- पादन करना है। भारतीय तत्वज्ञान के मूत्राधार तत्वा का स्पष्टीकरण करके सस्कृति के विशुद्ध र परिष्कृत रूप को जनता के सम्मुख रसना है । व्रत, त्यौहार, रीतिरिवाजो, आचार-विचार, पूजा-उपासना पद्धति को मनोवैज्ञानिक उपयोगिता को प्रस्तुत करना है । वेद-विज्ञान,सस्कार- विज्ञान, योग विज्ञान, परलोक-विज्ञान, तुलसो-विज्ञान, पुराण-विज्ञान, पर प्रकाश डालना है । ऋपि चरित्रो व्रत कथायी व पुराणो में असम्भव दिखाई देने वाली कथाओं में निहित वास्तविक तथ्यो र अनुसन्धान करना है। उपनिषदो को ज्ञान-गगा का प्रवाह, स्मृतिय को नीति, रामायण की पारिवारिक शिक्षा व गोता का तात्विद विवेचन इसकी विशेषता है। धर्म व सस्कृति की भावना का व्यापर विस्तार, समाज, का नव-निर्माण, व नैतिक पुनरुत्थान इसव लक्ष्य है। यदि आप अपने धर्म के प्रत्येक ग्रङ्ग को आधुनिक विज्ञ की कसौटी पर खरा उतरता देखना चाहते है तो गुग-सस्कृति को पढे । पत्रिका साइज के ३४ पृष्टो व बढ़िया ग्लेज कागज के दोरगे टाइटिल से सुमजित होने पर भी मूल्य केवल ४) वार्षिक है। चप मे एक विशेपाक भी छपता है नमूने की प्रति मुफ्त मॅगाइये TETME- -संस्कृति संस्थान, ख्वाजातय, बरेली ( उ. प्र. )

Markandaya Purana(saral Hindi Bhshya) Khand-ii

Author
Sharma,pt.shriram
Title
Markandaya Purana(saral Hindi Bhshya) Khand-ii
File name
Markandaya Purana(saral Hindi Bhshya) Khand-ii
Text
OCR done
Citation
1967
Published
2012/08
Publisher
Barely.,uttar Pradesh.,sanskriti Sansthan Vednagar
Language
Sanskrit
Pages
514
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313002
Barcode
99999990321734.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
FBVY5OkUwSA
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