Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Jain Dharam Praveshika Bhag 3
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- सरल जैनधर्म-प्रवेशिका [चौथा भाग] 5-२ लेसक- मोहनलाल जैन, काव्यतीर्थ, बरायठा (मागर) सी० पी० - प्रकाशन- व्यवस्थापक, मरल प्रज्ञा पुस्तकमाला मु० लुहर्रा, पो० मडावरा, निला-माँसी, यू०पी० तृतीय सरपरण २००० अनन्तचतुदशी वीर नि.स.२४७३ मूल्य 11-) नौ प्राना ED विपयानुक्रमणिका १-स्थाप ३ --देवशास्त्रगुरपूना ३-शान्तिपाठभाषा ४-~-विसर्जनभाषा ५---इशप्रायना ६-पूना या पूजन १३ ७-पचपरमष्ठी मूलगुण १७ ८-सप्तव्यसन ३४ ६-जुश्रा की प्रधानता १०-अष्टमूलगुण ५१-अभक्ष्यों का वर्णन ४३ १२-श्रावक के व्रत १३--एकादशप्रतिमा १४-तत्त्व वा पदाथ १५-याइसपरापह १६-कमों के उत्तरभेद १७-अन्तरप्रदर्शन आभार प्रदर्शन- इस पुस्ता मनिन विद्वानों श्रीर परियों के लेसा या पाण्या का ममह क्यिा गया है उनके हम अतिशय प्रभारी हैं। इस पुस्तक के सम्पादन वा प्रकाशन के हेतु जिन विद्वाना ने सहय ग, प्रोत्साहन और माधुवाद लिया है, उन्हीं की कृपा से यह पथ आज अपनी तृतीयावृत्ति से प्रकाश में आ रहा है। इसकी आवश्यक्ता, सरलता और सुन्दरतामापरिज्ञान पाठकगगा स्वय परेंगे। यह पुस्तक भा० दि० जैन परीक्षालय सोलापुर की परीक्षा के कोस में रपी जा चुकी है। छात्रों को अब इसी में प्रवेश फार्म भरना चाहिये।
सरल जैनधर्म-प्रवाशका चौथा-माग २ पाठ पहला स्थाप श्रा जय जय जय, नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु । णमो अरिहताण, णमा सिद्धाण, णमो पाइरियाण, णमो उपमा- याण णमो लोए स वसाहण। ओं अनादिमूलमने-यो नम (पुप्पामनिक्षिपेत् ) यह पढ कर थाल में पुप्प छोड़ना चाहिये। चत्तारि मगल-अरिहता मगन, मिद्धा मंगल, माहू मगल, केवलिपएणत्तो, धम्मो मगल । चत्तारि लोगुत्तमा अरिहता लोगु. त्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, माह लागुत्तमा, फेलिपएणचो धम्मो लोगुत्तमो। चत्तारि मरण पयजामि-परिहते मरण पचनामि, सिद्धे सरण पन्नामि, साहूमरणं प रजामि, केलिपएणत्त धम्म सरण कयनामि ! आ नमोऽहते स्वाहा (पुष्पा नलि क्षिपेत्।) अपवित्र परितो वा, सुस्थितो दु स्थितोऽपि वा । ध्याये त्पचनमस्कार, सर्वपापे प्रमुच्यते ॥१॥ अपमित्र पवित्रा वा, सर्ग वस्था गतोऽपि पाय स्मरेत्परमात्मान, स पायाभ्यतरशुचि ॥२॥ अपराजितमनाऽय, सर्वविघ्नविनाशने । मगेलेपु च सर्वेषु, प्रथम ४ www ~~ सरल जैनधम प्ररेशिका-चतुर्थ भाग मंगले मत ॥शा एसो पंच णमोयागे, सधपावपणासो । मंग लाण च सव्येसि पढम होइ मगल ॥२॥ अहमित्यतर महा, वाचणे परमेष्टिन । सिद्धचक्रस्य मद्वीज, सर्यत प्रणमाम्यहम् ॥शाकमा विनिमुक्त, मोक्षलक्ष्मीनिकेतनम । सम्यक्पादिगुणोपेत, सिद्ध- चा नमाम्यहम् |||| उदरचदनतदुलपुष्प , चरसुदीपसुधूप फला । धवलमगलगानर वाकुले जिनगृहे जिननाम यह यजे ।। आ ही भगवजिनसहमनामधेयेभ्य अघ निर्वामीति स्वाहा श्रीमजिनेन्द्रमभिवर जगत्त्रयेश, स्याद्वाहनायकमनन्तच- तुष्प्रयाहम् । श्रीमूलसपसुदृशा सुकृत्तम्हेतु नेने यज्ञविधिरेष मया भ्यधायि ॥११॥ स्वस्ति शिलोकगुरवे जिनपुङ्गवाय, स्वस्ति स्वभान महिमोदयसुस्थिताय । स्वस्ति प्रकाशसहजोर्जिनहाइ मयाय, स्वस्ति प्रसनललिताद्भुतभाय॥२॥ स्वस्त्युच्छलाद्विमलरोधमुधाप्लवाय, स्वस्ति स्वभावपरभावविभासकाया स्वस्ति मिलोरग्नितेकचिदुद् गमाय, स्वस्ति त्रिकालसकलायतविस्तृताया।३। द्रव्यत्य शुद्धिमधि गम्य यथानुरूप, भावस्य शुद्धिमधिरामधिगतुकाम ॥श्रालयनानि विविधा यवलन्य बल्गन, भूतार्थयज्ञपुस्पस्य क्रोमि यज्ञम् ॥४॥ अईपुराणपुरुषोत्तमपावनानि, वस्तूनि नूनमसिलान्ययमेक एर। अस्मिञ्वलद्विमलयेवलबोधवहौ, पुण्य समप्रमहमेस्मना जुहोमि ।। श्री कृपभो न स्वस्ति, स्वस्ति श्री अजित । श्री सभव स्वस्ति, स्वस्ति श्री अभिनन्दन । श्री सुमित स्वस्ति, स्वस्ति श्री पद्मप्रभ । श्रीसुपार्श्व स्वस्ति, स्वस्ति श्री चन्द्रप्रभ । श्री पुष्पदन' स्वस्ति,स्वस्ति श्री शीतल । श्री श्रेया रस्सस्ति, स्वस्तिकी वासुपूज्य । श्रीनिमल घस्ति, सस्ति श्री अनन्त । श्री धमे स्वस्ति, स्वस्ति श्री शाति । श्री कुथु स्वस्ति, स्वस्ति श्री अरनाथ । श्री मल्लि स्वस्ति, स्वस्ति श्री मुनिसुव्रत । श्री नमि स्वस्ति, स्वस्ति श्री नैमि- नाथ | श्री पाश्र स्वस्ति, मस्ति श्री वर्धमान ।
* श्री देवशास्त्रगुरुपूजा स्थारना प्रथम देव अरिहत सुश्रुत सिद्धावनी । गुरु निम्रय महन्त मुकतिपुर पथनी ॥ तीन रतन जगमाहि सो ये मवि भ्याइये। तिन की भक्ति-प्रसाद परम पद पाइये ।। पृनों पद अरिहत के, पूनों गुरुपद मार । पूजों देवी सरस्वती, नितप्रति अष्ट प्रकार ।। ॐ ह्रौं रेवशास्त्रगुरूममूह । अत्र अवतर अवतर मोपट् , इति श्राद्वानम् । ॐ ह्रीं रेवशाम्रगुरुममूर | पत्र निष्ठ तिष्ठ 3 इति स्थापनम् । ॐ ह्रीं नवशाम्रगुरुममू अत्र मम सनिहितो भर भय वषट् , ति सन्नि रीकरण । परिपुष्पाजलि क्षिपेत् । सुरपति उरगनरनाथ तिनार बन्दनीक सुपदरमा । अतियोमनीक सुवर्ण उज्ज्वल देव छवि मोहित समा॥ वर नीर क्षीर ममुद्र घट भर अग्र उसु बहुविधि नचू । अग्हित श्रुतमिद्धात गुरु निथ नित पूजा रचू ॥१॥ मलिन वस्तु हर लेत मा जल स्त्रमाव मलछीन । जामों पूजों परमपद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥१॥ ॐ ह्री देवशास्त्रगुरुभ्ध उन्मजरामृत्युविनाशाय लम् । जे त्रिजग उदर मझार प्राणी तपत अति दुदर खरे । तिन अहितहरण शुभ ववन जिनके परम शीतलता भरे ।।
Am सरल जैनधर्मप्रवेशिमा-चतुथभाग तसु श्रमर लोमित घ्राण पावन सरम चदन घसि मचू । अरिहत श्रुत सिद्धात गुरु निग्रंथ नित पूजा रचू ।। च दन शीतलता करे, तपतवातु परवीन । जासों पूजों परम पद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥२॥ ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्य मसारनापविासाय च । यह भव ममुद्र अपार तारण के मित्त सुनिधि रही। अति दृढ परम पारन जथारथ मक्ति बग्नीका मही ।। उज्ज्वल अपडित शालि तदुल पुजधर अयगुग जणूं । अरिहत श्रुत सिद्धांत गुरु निग्रंध नित पूजा स्चू ॥३ तदुल शालि सुगध अति, परम असडित वीन । जासों पुजों परम पद, देव शास्त्र गुरु तीन ।।३।। ॐ हा देवशास्त्रगुमभ्य अक्षयपदप्रानय अक्षतम् । जे विनयनत सुमव्य उा अम्युज प्रशासन भान हैं। जे एक मुस चारित्र मापित त्रिग माहि प्रधान हैं। सहि कु द कमलादिक पटुप भा भव कुवेदन सौ वच् । अरिहत श्रुत सिद्धांत गुरु निर्गध नित पूजा रच ॥४ विविध मानि परिमल सुमन, भ्रमर समजावीन । जामों पूजों परम पद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥४॥ ॐ ह्रीवशास्त्रगुरु य कामवाणविनाश य पुष्पम् । यतिमधल मद कदर्य जाको अधा उम्म अमान है। दु यह भयानक तासु नाशनको सुगरुड़ समान है ।
देवशास्त्रगुरुपूजा
उत्तर छहों रमयुक्त नित नैवेध कर घृन में पचू
अरिहत भूत सिद्धात गुरु निर्गय निन पूना रच ॥५
नाना विधि सयुक्तग्म, व्यनन मरम नीन ।
नामों पूनों परम पद, देव शास्त्र गुरु दीन ।।५।।
ॐहो देव शास्त्रगुर-य तु पारागविनाशाय नाम।
जे विना उपम नाश कीने मोह निमिर महाबली ।
तिह कर्मघाती ज्ञानदीप प्रकाश जोति प्रभावली ।।
इह माति दीप प्रनाल कञ्चन के सुभाजन में एच् ।
अरिहत श्रुत सिद्धान गुरु निग्रंथ नित पूजा स्चू ॥६
स्त्रपर प्रकाशक जोति अति, दीपक तमकर हीन ।
जामों तूनों परम पट, देव शास्त्र गुरु तीन ।।६।।
ॐ ह्रीदेवशास्त्रगुमभ्य मोहधिशारविनाशाय दीपम् ।
जो कर्म इंधन दहन अग्नि मम्इ अति उद्धन लसे ।
वर धूप ताम सुगधता कर मकल परिमलता हैसे ॥
इह माति धूप चढ़ाय नित मवमरनमाहिं नहीं पचू
अरिहत्त श्रुत सिद्धात गुरु निग्रंथ नित पूना रच ॥७
अग्नि माहिं परिमल दहन, च दनादि गुण लीन ।
जासों पूजों परम पद, देव शास्त्र गुरु तीन 11911
ॐहों देवशास्तगुरू- अष्टक्म विनाशाय
धूम
लोचन सुरमना प्राण उर उत्साह के कार है।
मो न उपमा जाय वरणी माल पल गुणमार हैं ।
सो फल चढ़ावत अर्थ पूग्न परम अमृत रम मचू ।
अरिहत श्रुत सिद्धात गुरु नि नित पूजा रचू ।।८
Ji mv- - vroin -- वर मरल जैनधर्मप्रवेशिका-चतुर्थमाग जे प्रधान फल पल विष, पचकरण रस लीन । जासों पूजों परम पद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥८॥ ॐनों देवशास्मगुरुभ्य मोनफलप्राप्तये पलम् । जल परम उज्ज्वल गन्ध अक्षत पुष्प चरु दीपक धरूं । धूप निर्मल फल विविध बहु जन्म के पातक हरू । इहि भाति सुकृत अपार वाण करत शिव पानि मन् । अरिहत शुरु सिद्धान गुरु निग्रंथ नित पूजा रच ॥ बसु विघ अर्घ सँजोय कर, अनि उछाह मन कीन। जासों पूजो परम पद, देव शास्त्र गुरु तीन ॥९॥ ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्य अनर्धपमानये महाध्यम । जयमाला देवशास्त्र गुरु रतन शुभ, तीन रतन करतार । भिन्न भिन्न क. आरती, अल्प सुगुण विस्तार ।। जे करम तिरेमठ प्रति नाश, जीते अष्टादश दोष राश जे परम सुगुण हैं अनन्त धीर, कहवत के च्यालिम गुण गमीर ॥१ शुभ समयमरण शोमा अपार, शत इन्द्र नमत कर शीश धार । अघानिया क्मों की ४७ तथा नरकतियाति , तदानुपूर्वी २, विकलाय ३, श्रायु ३, ग्योन, भारुप, एद्रिय साधारण, सूचन और स्थावर ।। ६३ ॥
देवशास्त्रगुरपूजा देवाधिदेव अरिहत वन्दों मनवचतन कर सुसेव ॥२॥ जिन की शनि है ओंकाररूप, निरअसमय महिमा अनूप ।। दश अष्ट महामापा ममेत, लघु-मापा सात शतक सुचेत ॥३॥ सो स्याद्वादमय मप्तमा गणघर गूधे बारह सुअङ्ग । रविशशि न हरै सो तम हराय, सो शास्त्र नम बहु प्रीति लाय ॥४॥ गुरु आचारज उवझाय साध, तन नगन ग्लयनिधि अगाध ।। समार वैराग धार, निम्बाउ तप शिवपद निहार ||५|| गुण छत्तिा पश्चिम आठवीम, मवतारण तरण जिहाज ईश । गुरु की महिमा वरणी न जाय, गुरुनाम जपों मनपचनकाय ॥६॥ कीजे शक्ति प्रमाण, शक्ति पिना श्रद्धा धरो। 'धानन' श्रद्धावान्, अजर अमर पद भोगवे ।। ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुा अनघपदमा नये महाय॑म् ।
१०
मरल जैनधमप्रशिक्षा-चतुर्धभाग
शान्तिपाठ ( भापा-हिन्दी)
शातिनाथ मुष शशिउनहारी, शीलगुणायतसयमधारी ।
लसन सौ आठ विराज, निरपत नयन कमल दल राजे ।।
पचम चक्रवर्तिपद धारी, मोलम तीकर सुग्यकारी।
इन्द्रनरेद्रपूज्य जिननायक, नमों शांतिहितशातिविधायः ।।
दिव्यविप पगुग्न की परमा, दुन्दुमि आमन वाणीमरमा ।
छन चमर भामण्डल मारी, ये तुब प्रातिहार्य मनहारी ।।
शांति जिनेश शांति सुखदाई, नगवपूज्य पूनों सिर नाई ।
परमजाति दीजे हम मन को, पढ़ जिह, पुति चारसघ को॥
पून जि मुकुटहार किरीट लारे,
इद्रादिदर, अर पूज्य पदाज जाके ।
सो शांनिनाय वग्वजगत्प्रदीप,
मेरे लिय बाहिं शाति मदा अनुप ॥
सपूजकों को प्रतिपालकों को, यतीनकों वा यातिनायकों को।
राजाप्रजाराष्ट्रमुदश काले, कीजे सुसी हजिन शातिको द॥
हो मारी प्रना को, सुस बलयुत हो, धर्मधारी नरेशा,
होवे वपी समें पै, तिलमर न रहे, व्याधियों का अंदशा ।
होवे चोरी न जारी, मुपमय वरने, हो न दुष्काल भारी,
सारे ही देश धार, जिनपरपृषको, जो मदासौख्यकारी ।।
घातिकर्म जिन नाश कर, पायो कालराज ।
शांति कर न जगत में, अपमादिक जिनराज
शाति विमर्जन पाठ
शास्त्रों का हो, पठन सुसदा, लाम समझती का,
मवृत्तों का, मुनम रहके, दोष टाकू ममी का।
पोले प्यार, वचन हित के, आपका रूप ध्याऊँ,
तौलो सेऊँ, चग्न जिन के, मोस नीलों न पाऊँ ।।
तर पद मेरे हिय मे, मम हिय तेर पुनीत चरणों में ।
तरलों लीन रहे प्रभु, जबलों प्राप्ती न मुक्तिपद की हो ।
अक्षरपद मात्रा से, पिन जो कह कहा गया मुझ से ।
क्षमा क्रो प्रभु सो मय, करुगाकरि पुनि छुड़ाय मगदुखसे।
जगरधु जिनेश्वर, पाऊँ तत्र चरण शरण बलिहारी ।
मरण समाधि सुदुर्लभ, कर्मों का क्षय मुबोध सुसकारी ।।
विसर्जन (भापा-हिन्दी)
विन जाने वा जान के, रही टूट जो कोय ।
तुव प्रमादतें परमगुरु, से सर पूरन होय ||
पूजन विधि जानें नहीं, नहि जान आदान ।
और विमनन , नहीं, समा करो भगवान ॥२॥
मानहीन धनहीन हूँ, क्रियाहीन निनदेव ।
क्षमा कर सराहु मुझे, देहु चरण की सेव ॥२॥
जाये जो जो दवगण, पूजे भक्ति प्रमान ।
ते अब जाबहु कृपा कर, अपने अपने यान ॥४॥
मरत जैनधर्मप्रवेशिका चतुर्थभाग [ हारमोनियम पर कई व्यक्तियों द्वारा मिलर गाने योग्य । ईश-प्रार्थना पलिमलगनन भविश्रलरजन, भक्त जनों के है भयमजन । तुमहिं निरजन देव जगन में रयपतो निनदेव ॥१॥ श्राप अन त ज्ञान के स्वामी, वीतराग छयालिम गुणगामी । हित उपदेशी देव, जगत में जयरन्तो चिनदेव ॥२॥ परमपूज्य तुम को लस पर के, सय शतेद्र सुर पशु श्रम नर के। करते है निनसेन जगत में जयवन्तो जिनदेव ॥३॥ मुनिजन तुमको ध्येय बनाकर, प्रभो श्रापका रम्य ध्यान धर । करते नितप्रति मेव, जगत में जयवन्तो जिनदेव ॥ ४॥ सरल मुरासर बन्दनीय हो, फर्म पलङ्क निकदनीय हो। हे त्रिभुवन के दव, जगन में जयव तो निदेव ।।५।। जो मानत्र तुममा ध्याता है, यह भी दुख रहित होता है। अजर अमर स्वयमेव, जगत में जयन्तो जिनदेव ॥६॥ मेरे उर में बसो मयदा, जिमसे जग की भापणापदा। नशे नाथ स्वयमेर जगत में यवन्तो चिनदेव ॥७॥ नाथ तिहारे नित गुण गाऊँ तुम्हें हृदय का हार बनाऊँ। तज कर और कुदेर, जगत में नयवतो जिनदेव ॥ ८॥ श्राव निरजन नाथ पधारो मन मन में नित-योति पसारो। दो अब ज्ञान अछेत्र गत में जयब तो जिनदेव ।।। हितकारी है मार्ग तुम्हारा, भव्यननों को परम पियारा। नाशक कर्म बुटेन, जगत म यतो जिव ॥१०॥ -SOES पूजा या पृजन अरिहन्त, सिद्ध, निगम्बर साधु, निनवाणो और जिन तीर्थ स्थान प्रादि की स्तुति करना या उन्ह श्रष्टद्रव्य चढाना पूजा कह लाती है । यह पूनन दो प्रकार की होती है। १-द्रव्यानन और २-भावपूजन। उपर्युक अरिहन्त आदि को उनका गुणगान करते हुए जल, चन्दन प्रादि द्रव्य भेंट चढा द्रव्यपूजा कहलाती है। और अष्टद्रव्य गिना शुद्ध मन से केवल गुणगान करना भानसूमन कहलाती है। भारम्भ और परिग्रह रहित, २८ मूल्गुणा के धारी दिन साधु भारपूजन हो करते हैं, वे द्रव्यपूजन नहीं करते। क्योकि वे किमा प्रकार का परिग्रह नहीं रखने और प्रारम्भ नहीं करते। घ इतन सावधान होते हैं, कि बाह्य अवलम्बन के बिना ही केवल अपने शुद्ध भावों मे अरिहन्त, सिद्व या शुद्ध प्रा मा का ध्यान कर लेतई। गृहस्था का चित्त सामारिक काया म खिंचा रहता है। इसलिये गृहस्यों के लिये द्रव्यपूजा के द्वारा ही भारपूजन का कथन है। गृहस्थ श्रायर प्रारम्भ और परिग्रह सहित है। इसलिये अशुभापयाग से हट कर शुभोपयोग में प्रवृत्त होने के लिये उन्हें द्रव्य से देवपूनन करना अनिवार्य या परमावश्यक है। क्योंकि अशुभोपयोग से हटकर इकदम शुद्धोपयोग में लगना टढी खीर है। द्रव्यपूजा करने में यर्याप कुए से जल भरना, जल को अग्नि पर प्रासुक परना और सामग्री धोना आदि प्रारम्भ पड़ता है, तो भा शुभापयोग से होने वाले इस श्रारम्भ से पाप ता थोड़ा होता है जितु पुण्य ज्या होता है। इसलिये वह थोड़ा पाप द्रव्यपूजन-जनित महान् पुण्यराशि में कोई गेष पैदा नहीं कर सकता। जैसे विष के कुछ क्ण समुद्र में डाल दिये जाय तो वे ममुद्र की अथाह जलराशि यो विषमय नहीं कर सरते। अथात् जैस समुद्र की जलराशि में वह विप छिप जाता है, वैसे ही द्रव्यपूजा के प्रारम्भ से होने वाला पाप भी दयपूना से उत्पन पुण्यराशि में छिप जाता है। क्याकि हमारगुणा म एक दुर्गुण छिप ही जाता है' यह नीतिप्रसिद्ध यान है । यह पूना इसलिये नहीं की जाती है कि हम पूज्या को प्रसन परें । वे तो वीनराग होते हे-न तो हमारी प्रशमा से राजी होकर हमें कुछ देत हैं, न हमार द्वारा को गइ निन्दा से नारान होकर हमारा फुछ विगाड हा करते हैं। उनका पूजन केवल अपने भावा की (निर्मलता। और पापों के विनाश के लिय ही स्यिा जाता है। यह नियम है कि-गुणों के मनन से अपने भाव गुण प्रेमो तथा अवगुण के मनन से अपने भाव दापी बन जाते है । हमार भाषा मे ही हमारा भला या बुरा होता है। अरिहन्त श्रादिक परम वीतराग हैं। इनमरी भक्ति से हमार भाषा में शान्ति पाती है। भक्तियम शान्त भावो से हमारे पाप करते हैं और पुण्य का लाभ होता है । इसलिये प्रत्येक प्रात्महितैषा को पूजन अवश्य करना चाहिये। यह पूजन श्रावर के पदों म प्रथम पत्तव्य है। पूजन के भावमात्र से राजगृही नगरी के मेंढक को उत्तम पल मिलाथा। जल, चन्दन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप और फल ये पूना की अष्ट द्रव्य हैं। अब इनर मिश्रण को ही पहते हैं। ये द्रव्ये शुद्ध, उत्तम और यथाशक्ति होना चाहिय । 1 ।
पूजन या नाकावणेन अपद्रव्य चढ़ाने का पल या कारण- (सागारधमामृत वा ओं ह्रीं के श्रापार से) १-जल चढाने से पाप या उम जरा मृत्यु का नाश, चन्दन घटाने से शरीर में मुगाय की प्राप्ति या पसाराताप का नाश, ३-थक्षत चढाने स अष्टऋद्धि या सपत्ति की प्राप्ति या शाक्षय पद की प्राप्ति, ४-पुष्प चढ़ाने से मंदारमाला की प्राप्ति या कामवेदना का नाश,५-नैवेग चढाने से लक्ष्मीपतित्व की प्राप्ति या नुधारोग का नाश, ६-दीप चढाने से सौन्दर्य को प्राप्ति या अज्ञानरूप अन्धकार का नाश, ७-धूप घढाने से परममोभाग्य की प्राप्ति या अष्टकर्म का नाश, 5-पल चढ़ाने से मनोवाछित या मोक्ष फल की प्राप्ति, और -अर्थ चढ़ाने से विशेष मान-प्रतिष्ठा या श्रादरणीय पद की प्राप्ति होती है। इस प्रकार श्रष्ट द्रव्य चढ़ाने का फल जानना चाहिये। विशेप- विशेष -१-सडे होरर पूजन करने में विशेष श्रादर और भक्ति सूचित होती है, इसलिये पूनन पडे होरर करना विशेष महत्व का है। -अष्टक के छन्दों के बाद 'यों श्रवश्य घोलना चाहिये । ३--अपद्रव्य ( जल आदि) उक्त मम से ही चढ़ाना चाहिये । ४-जिसरी पूजा का जाती है जयमाला में उमी के गुणों का वर्णन होता है।५-श्राहान, स्थापना, सनिधीकरण, पूनन और विसान ये पाँच 'पृना के अह' है, पूना में इनका करना आवश्यक है। ६-स्नान के पाद शुद्ध वस्त्र पहिन कर, मन की चचलता रोग र भक्तिपूर शातभाषा मे पूनन करना चाहिये।
सरल जैनधर्म प्रवेशिका-चतुथभाग प्रश्नावली- -अर्य, जयमाला, द्रव्य २-अष्टद्रव्य, उत्तमरस्तु, पूजा, पूजा और भावपूना से तोन रतन, पूजन, मङ्गल और आप क्या ममझते हैं ? शरण के भेद बतलाइये। ३-लेक में सर्वोत्तमधर्म ४-तुम्हारे लिय सच्चा कौन है? मङ्गल और शरण कान ? ५-देवशास्त्रगुर पून ६-पूजन क्सि रिस की किसने बनाई है? की जाती है? ७-पूजन करने वाले को ८--पूजन सने हाकर सर से पहिले और मन से करना चाहिये या बैठकर या अन्त मे क्या करना चाहिये। क्यों? ६-पूजन के लिये नि १०--अष्टद्रव्य का क्रम किन चीजा की जरूरत क्या है, अगम भी किया जा होती है। सस्ता है क्या? ११-अमुक द्रव्यचढाने का १२--पूनन और अष्टद्रव्य छन्द पढ़ो और बतलाओ कि का फल बतलाइये? बद के बाद क्या कह कर १४-चेमठ प्रकृतियाँ द्रव्य चढाइ जाती है? कौन हैं जिनका नाश अरिहत १३-श्राहान, पूजन,विस करते हैं। जैन, और १४-मच्चे गुरु, देव, स्थापना कर और क्यों किये शास्त्र का मक्षिप्त वर्णन जाते हैं। कीनिये? १६-शान्ति-पाठ ओर १७-जयमाल म मिस विसजन करते समय क्या बात का पणन हाता है ? करना चाहिये? १८-अमुक्छद पूर्ण करो! शातिपाठ पाठ दूसरा पच परमेष्ठी के मृल गुण परमेष्टी का लक्षण- जा धामिक पदोंम सयमे उत्तमपद के धागे होते हैं, लोक में गुणों की अपेक्षा सर मे घडे होते हैं और बर्ड यड राना महा रामा वा इन्द्र श्रादि निनको मस्तक झुकाते हैं उन्ह परमेष्ठी परमेष्ठी के भेद- परिहन्त, सिद्ध, प्राचार्य, उपाध्याय और साधु ये ५ पर- मेधी हैं । क्यारि इनसे बड़ा पद अन्य किसी का नहीं होता। अरिहन्त परमेष्ठी का लक्षण- जिनरे जानामरण, दशनावरण, मोहनीय और अन्तराय ये चार घातिया मम नष्ट हो जाते हैं, जिनमें ४५ मूलगुण होते ६ अठारह होप नहीं होते और जो घातराग, सवज्ञ तथा हितो पदशी होते हैं महे अरिहन्त परमेष्ठो कहते हैं। अरिहन्त परमेष्टा के मूलगुण- चौतीमा अतिश्यसहित, प्रातिहार्य पुनि आठ । अन तचतुष्टय गुणसहित, ये छ्यालीमों पाठ ॥ इस पाठ पे समस्त श्लोर वर्गीय परिवर प० बुधनरत इष्टयत्तीमी से लिसे ग ये हैं । परमे ददादियन्ये पदे तिष्ठनीति - परमेष्टा www ~~ ~ - ~~ १८ सरल जैनधर्म प्रवेशिका-चतुर्थभाग ३४ अतिशय, ८ प्राप्तिहाय और ४ अनन्तचतुध्य ये अरिहन्त के मूलगुण हैं। इनके मिपाय और भी उत्तरगुण अनता अतिशया के भेद या नाम- दश अतिशय हैं जम के, दश ही केवलज्ञान । चौदह होते देवकृत, अतिय चौतिस जान ।। जन्म के अतिशय १०, फेवलज्ञान के अतिशय १० श्री देवकृत अतिशय १४, इस प्रकार ३४ अतिशय होते हैं। अतिशय का लन-सव साधारण प्राणियों में न जाने वाली अद्भुत या अनोखी बात को अतिशय कहते हैं । म के दश अतिशयों के नाम- अतिशय रूप सुगन्ध तन, नाहिं पसेव निहार । प्रियहित वचन अतुल्य पल, रुधिरयेत आकार | लक्षण सहम रु आठ तन, ममचतुक सठान । वजयपम नाराचजुत, ये जनमत दश जान ।। १- शरीर मे प्रत्य व सुन्दरता, २-शरीर म अत्य मुगध हाना, ३-शरीर म पसीना ने घाना, ४--मलमू होना, ५-वचन का हित, मित और प्रिय होना, ६-बल अतुल हाना, ७-सून सफेद होना, ८-शरीर में १००८ ल होना,६-समचतुरनसस्थान x हाना आर १०-वमपभ राचसहनन हाना ये दस अतिशय (श्राश्च यजना असाचार अनोखी बाते) अरिहन्त भगवान कम से ही होते हैं। अतुल = अनुपम प्रयास जिनकी घरापरी का काइ दूस नहीं । लक्षण-श्रीवृक्ष, संघ, कमल, स्वस्तिक श्रादि सुई मुर भाकार, दाइ, येठन और कोला का वमय होना ----- अरिद त परमेष्ठो के मूलगुणों का वर्णन संचलनान के अतिशयों के नाम- योजन गतइक में मुमिस, गगनगमन मुख पार । नहिं अदया उपमा नहि, नाही कालाहार ।। मम विद्या ईश्वर पनो, नाहिं बड़े नख कश । अनिमिप दृग छायारहित, दश केवल के वेश ।। १-भगनान अरिहन्त के चारा और मौसी योजन में मुकाल होता, २-गमन पृथ्वी से ऊपर श्राराराम श्रपर होना, ३-एक होने पर भी चारा शोर चार मुग्न दिसना, ४-श्रदया (हिमा) का न होना ५-~उपमग 7 होना, ६-कसलाहार (मास चाला) आहार न लेना, ७-~-समस्त विद्याश्रा का नाता होना, मनग्य धीर देशों का न बढ़ना, नेरों को पलन भपना और १०-शरीर को छाया (परछाइ ) पड़ना । अरिहन्त भगरान के ये १० अतिशय विज्ञान होने के समय प्रगट होते है। इमसे इन्हें केवलज्ञान के अतिशय करते हैं। देवन अतिशया के नाम- दवरचित है चार दश, अर्धमागधी भाप । आपम माही मित्रता, निर्मर दिरा आकाश ॥ होत फलफल मतु मौ, पृथ्वी कार ममान । चरण कमल तल कमल है, नमते जय जय वान ।। मन्द सुग व पयार पुनि, गन्धोदक की वृष्टि। भूमि वि कटक नही, हर्षमई मर मुष्टि ॥ धर्मचक आगे रहै, पुनि वसु मगल मार । अतिशय श्रीअरिहन्त के, ये चातीम प्रकार ।।
सरल जैनधर्म प्रवेशिका-चतुर्थभाग १-भगवान् को मापा अर्धमागधी होना, २-समस् जीयों में परस्पर मित्रता होना, ३-दिशाा का निमल होना ४--आकाश निर्मल होना, ५-छहा ऋतुओं के फलफूल धाय श्रादिक एक ही समय फलना, ६-एक याजन तक पृथिवी दर्पण की तरह निमल हाना ---घलत समय भगना के चरणों के नीचे सुवर्ण कमल रचना, ८-श्राकाश म ज- जय शब्द होना, --मन्द और मुगन्धिन पवन चलन १०-सुगन्धमय जल की वृष्टि होना ११-पनकुमार देव द्वारा भूमि का कटक रहित होना, १२-समस्त प्राणियों शानद होना, १३--भगवान् के आगे धमचक चलना भी १४- अष्टमगला द्रव्यों को साथ रहना ये १४ देवकृत अतेश है। ये देवा के द्वारा दिये जाते हैं, इसलिये इह देवकृत वह (ये देवत अतिशय भी केवलज्ञान होने पर ही होते हैं। प्रातिहायों के नाम- तरु अशोक के निष्ट मे, सिंहामन उचिदार । तीन छन सिर पर लस, भामण्डल पिछवार ।। दिव्यध्वनि मुसते पिर, पुष्पवृष्टि सुर होय । ढोरचौमठ चमर जस बाजे ददामि जोय ॥ सान प्रशर पीनारत भाषा में एक मागधो जाति है। कहा भी है कि-मागध्यावृत्तिका प्राच्या, मारसै यधमाग वाहोनी दाक्षिणात्या च भाषा सप्त प्रतिता ।। + मागे, चमर, दर्पण, स्वस्तिका (ठोना ), क्लश, पE धजा और छत्र ये अष्टमगल द्रय है। मिहासन व छत्र श्रादि प्रथम ता इद्रादक देवों द्वारा र जाने हे दूमर उनम मोहू का सवथा श्रभार होता है इमलि इनवे होन पर भी अरिहन्त अपरिगृही हा हे। है me अरिहन्त परमेष्ठी के मूलगुणों का वर्णन १-भगवान के पास में अशोक वृक्ष का होना, २.- रत्नमयर सिदामन, ३-भगवान के शिर पर चीन छत्रों का होना, ४-- भगवान् की पीठ के पीछे भामरहल का होना, ५- दिव्यध्वनि+का होना, ६-दनों द्वारा पूलों की वर्षा होग- यक्षजाति के देश द्वाग चौंसठ चमरों का दुरा और 5- दुन्दुभि याना का घनना ये पाठ प्रातिहाय है। विशेष शोभा की यात्रा या चानों को प्रातिहार्य कहते हैं। अन तचतुष्टयों के नाम- ज्ञान अनन्न, अननसुख, दरश अनन्न प्रमान। चल अनन्त अरिहन मो, इटदर पहिचान ॥ 1-अन तदर्शन, २~-अनन्तज्ञान, ३-अनन्तसुख और ५-अनन्तनीय ये चार अनन्तचतुष्टय हैं । इन चारा से भगवान निस वृक्ष के नीचे भगनान् को केवलज्ञान होता है वही वृक्ष समवसरण में अशोवृक्ष कल ता । एमा ही त्रैलोक्यप्रज्ञप्ति म कहा है रि- जेमि तरुणामूले, पण केवल शाण । उमहपहादिनिणारण तन्चेसावि अमोयकासति ।। * भगवान् मिहासन से ४ अंगुल अन्तरान रािनमान रहते हैं। * ता, कठ और श्रोष्ट आदि से हिलन चलन और स्पर्श रहित, पिना अक्षर को प्राय और अनार्य मर की समझ में श्रानेवाली, प्राणियों के पुण्य के प्रतिदिन ४५ वार ६६ घडी निस्सने वाली भगवान की वाणी दिव्य पनि कहलाती है । वही उत्तरपुराण में कहा है कि- मुखाम्युरेऽस्य वक्त विकृति न भू मनाग न च । ताल्योटाना परिम्पो, नियंयौ भारती मुगान् ।। से पिना इन्द्रा - Amran- AMMAnnn - सरल जैनधर्म प्रवेशिका-चतुथभाग का दर्शन, बान, सुस और वल अन त अर्थात् सोमा या हद रहित होता है, इसलिए इन्ह अनन्नचतुष्ट्रय कहते हैं। अठारह दोपा के नाम- जन्म जरा तिरपा क्षुधा, विस्मय आरत सेद । रोग शोक मद मोह भय, निद्रा चिन्ता स्वेद ।। राग द्वेप अरु मरणजुत, ये अष्टादरा दोप । नहिं होत अरिहत के, सो छवि लायक मोष ॥ १- म, २-जरा (घुढापा) ३--तृपा (प्यास), ४ तुधा (भूत), ५--विस्मय (आश्चय), ६-अरति (पीडा), ७–ोद (दुस)-रोग, ६-शाक, १०--मद (ग) ११-- मोह (अनान), १५-भय (टर) १३-निद्रा, १४-चित्ता, १५--स्वेद (पमाना), १६--राग, १७-द्वेष और १८-मरण ये अठारह दोप है। ये श्रारहत परमष्ठो के नहीं हाते | सिद्ध परमेष्ठी का लक्षण- अष्ठार्म और पाच शरीर रहित, लाम और अलोर के झाना दृष्टा (जानने देखने वाले ), पुस्प के । अन्तिम शरीर से फुर छोटे) आमार के धारक और लो के अग्रभाग में स्थित आत्मा को सिद्ध परमष्ठी कहते हैं। ये ससार के वचन से मदेव को मुक्त हो जाते हैं, फिर भी लोटर समार में नहीं आते । x जैसे वीर के बिलकुल जल जाने पर अकुर पैदा नहीं होता वैसे ही यमरूप चीज के जल जाने पर अर्थात समस्त कर्मों ना सवथा क्षय हा जाने पर ससारस्पी अकुर पदा नहीं होना अथान फ्रिजम मरण नहीं होता। 1 PAR Aanana- - सिद्ध परमेष्टो के मूलगुणा का वर्णन मिद्ध परमेष्टा के मूलगुण वा उनके लक्षण- समकिन दर्शन, ज्ञान, अगुरुलधू अवगाहना। मूसम वीरजवान, निगवाघ गुण सिद्ध के । शायिकमम्यक्त, अनन्तदर्शन अनन्तज्ञान, अगुरुलघुत्व, अनगाहनत्व, सूदमन, अनन्त योय पोर अव्याराव व ये पाठ सिद्ध परमेष्टी के मूलगुण हैं। इनमें भी उत्तरगुण अनन्त हैं। १-यथार्थ तत्त्वा के विषय में सिरोत अभिप्राय रहित भद्धान होना क्षायिस्मभ्यक्र कहलाता है। --लोक भार अलोक ये ममस्त पदार्थों की मचा-मात्रमा ग्रहण करना कवन दशन कहलाता है। ३-त्रिकामा समस्त पदार्थों को समस्त पयागा का दर्पण के समान युगपत् जानने वाला जान अनन्तज्ञान कहलाता है। ४-लाइपिएड के समान गुरुपने का अभार तथा पाक को २३ र समान लघुपने का प्रभार अगुगलघु र गुण कहलाना है। ५-जैम एक दीपर के प्रकाश में अनेक दीपा के प्रकाश का ममापश हो जाता है टसो प्रकार एक सिद्ध के क्षेत्र में प्रनत सिद्धा को अवकाश देने की शक्ति श्रवगाहनत्र गुण कहलाता है। ६-मिद्धो के स्वरूप का इद्रिया के गोचर न होना, केज केवलज्ञान का रिपय होना सूक्ष्मत्व गुण कहलाता है। - अनन्त पदायों जानने में भी स्वेद न होना पनन्तषीय गुण कहलाता है।८-और दुमका सरथा श्रमाव हाना अव्योगध स्वगुण कहलाता है । ये आठ सिद्ध परमेधी के गुण हैं। सिद्धों में मोहनीयकर्म के अभाव मे सम्यक्त्व, शानावरा पर्म के प्रभार से माननान, दशनावरण कर्म के प्रभार से अन तदशन, अतरायकम के प्रभार मे अनन्वयीय, नामस्म के प्रभाव से सूमर, आयुक्म के अभाव से भगाहनत्व, २४ सरल जैन म प्रवेशिका-चतुर्थभाग गोत्रकम के प्रभाव से गुरुलघुत्र और वेदनीय के प्रभाव से अव्यावाधत्व गुण प्रगट होते है। अर्थात् अाठा क्मों के नाश होने पर सिद्धों क ये पाठ गुण प्राप्त होते हैं। श्राचार्य परमेष्ठी का लक्षण- जो पांच प्राचारों का स्वय पालन फरत हे तथा दूसर मुनिया से । पालन कराते हैं और जो मुनियों के सघ के अधिपति होत हे, उनको दीक्षा वा प्रायश्चित्त प्रानि दण्ड देते हैं उन्हें प्राचार्य परमेष्टी करते हैं प्राचाय के मूलगुण ३६ होते हैं । श्राचाय परमेष्ठी के मूलगुणों के नाम- द्वादा तप दश धर्मजुत, पाले पचाचार । पट् आवशि जयगुप्ति गुन, आचारज पद सार ।। १२ तप १० धर्म ५ अाचार, ६ श्रावश्यर और ३ गुप्ति ये ३६ श्राचाय के मूलगुण है। उत्तरगुण इमरे भी अनेक हैं। तपा क नाम वा लक्षण- अनशन उनोदन करे, व्रतसरया रम छोर । विविक्त शयन आमन धरे, कायक्लेश सुठोर ।। प्रायश्चित घर विनय नुत, वैयावृत स्वाध्याय | पुनि उत्सर्ग विनारकै, धरै ध्यान मनलाप ॥ अनशन, उनोदन, प्रतपरिसस्यान, रसपरित्याग, विरक्त शल्यासन, कायक्लेश, प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत, स्वाध्याय, व्युत्सग और ध्यान से १२ तप हैं। इच्छाओं का जीतना तप कहलाता है - साधु के मूल गुणों का पालन करना भी श्राचाय वाग्पाध्याय को श्रावश्यक है। - --------- i - श्राचार्य परमेष्ठी के मूलगुणों का वर्णन २५ १-सर्व प्रकार के भोजन म त्याग कर उपवास पर अनशन कहलाता है | २- भूख से कम पाना या एकासन करना ऊनादन नहलाता है।३- भोजन को जाने ममय घर या दम्पती कन्या प्राति के पडाहने का अटपटा नियम लेना मनपरि सल्यानतप कहलाता है। -हा या एक दो श्रादि रसों का त्याग करना सपरित्याग कहलाता है। ५--एका त स्थान में सोना या बैठना विविक्तशग्यासन कहलाता है। ६-शरार को वश करने के लिय मदर्दी, गर्मी श्रादि का कष्ट देना कायालेश कहलाता है। -तोपों का दण्ट लेना प्रायश्चित्त कहलाता है। -रलत्रय वा सके धारकों का विनय करना विनयतप है। -रोगा या युद्ध मुनि की मेवा करना वैयावृत्य कहलाता है। १०-शास्त्रों का पाना, पटाना विचारना और उप देश स्वाध्याय तप कहलाता है। (शगर से ममता छोडना व्युत्सर्ग तप कहलाता है । १२-रता म अात्मचिन्तनन करना ध्यान तप कहलाता है। धर्मों के नाम राना लक्षण- छिमा माग्दव मारजव, मत्यवचन चितपाग । मजम तप त्यागी मन्च, आकिंचन सिरत्याग ।। अपमानित और दुखित रिये जाने पर बदला लेने की शक्ति हाने पर भी नशेधन करना उत्तम-क्षमा कहलाती है। २-मान नहीं करना उत्तम मादेव कहलाता है। -पटनरनारत्तम श्राजन कहलाता है।४-मर बोलना उत्तम मत्य कहलाता है। ५-मतोप धारण कर लोभ न करना और मन को पवित्र रसना उत्तम शौच कहलाना है।६-छह गाय के जीवों की दया पालना और पाचा इन्द्रियों वा मन यो वश में रखना उत्तम सयम यह लाता। ७-चारह प्रकार का तप करना उत्तम तप पहलाना है। --चार प्रकार का दान देना और राग द्वेष श्रादि का त्याग A RA - AM M PM marn । सरल जनधम प्रवेशिका-चतुर्थ भाग करना उत्तम त्याग कहलाता है। ई-परिग्रह का त्याग करना उत्तम प्राविञ्चन पहलामा है। और १०-स्त्रोमाने का त्याग करना उत्तम प्रह्मचर्य लाता है। ये दश धम है। जो प्राणिया फो ससार के दसों से दुग कर उत्तम सुम्प प्राप्त कराता है वह धम कहलाता है। प्राचारों तथा गुप्तियों के नाम व लक्षण- दर्शन ज्ञान चरित्र तप, वीरज पगाचार | गोप मन वर काय को, गिन छीम गुन मार ।। दर्शनाचार ज्ञानाचार चरिनाचार, तप प्राचार और वीर्या पार ये ५ श्राचार (विनय ) हैं १-सम्यग्दर्शन के दोप हटाना दशनाचार कहलाता है। -सम्यग्ज्ञान को बहाना और उसके दोष हटाना ज्ञानाचार कहलाता है। ३-मम्यक्चारित्र को विशुद्ध करना चारित्राचार कहलाता है। ४-ता की वृद्धि करना तप आचार कहलाता है। और ५-ग्राम-बल का प्रगट करना वीयाचार कहलाता है। मनोगुप्ति वचनगुप्ति श्रोर कायगुप्ति ये ३ गुप्तिया है। १-मन को यश म करना मनोगुप्त कहलाती है ! २-वचन का वश में करना वचनगुप्ति कहलाती है। ३.-काय का वश म करना काय गुप्ति कहलाती है। गुप्त का लक्षण-विपयामिलापा छोडकर मन, वचन, काय वी स्मन्छाद प्रवृत्ति का रोकना गुप्त म्हलाती है । ग्याति, लाभ, पता और सरकार प्रालिका इक्छा के नहीं होने या मम्यग्ज्ञानपूर्वक हो २ अभिनाय से दश धर्मों के साथ 'उत्तम निशेषण दिया है। sairan - - उपाध्याय परमेष्ठी के मृलगुणों का वरणन श्रापश्यरों क नाम वा लक्षण- ममा घर वदन करे, नाना धुती बनाय । प्रतिक्रमण स्वाध्यायजुत, कायोत्सर्ग लगाय॥ ममता बन्दना, स्तुनि प्रतिरमण, न्याध्याय और कायोमर्ग ये ६ श्रावश्या है। १-ममस्त जीवा से समताभार रखना समता कहलाती है। -हाय जोडरमरतक से लगाकर नमस्कार करना यदना कहलाता है । ३-पचपरमेष्टी का गुणगान करना स्तुति पहलाती है। ४-लगे हुए दोपा पर पश्चात्ताप करना प्रविस्मण कहलाता है। ५--शाम्ना का पढना साध्याय कह लाताहे। श्रार-सडे होकर ध्यान लगाना तथा शरीर से ममत्व बाा कायोत्सर्ग कहलाता । प्रारश्यक कालदरा- प्रतिन्नि रन योग्य जरी कार्यों को श्रावस्या रहते हैं। उपा याय परमेष्ठी का लक्षण- जो मुसी स्मय पढ़ते हैं तथा शिष्यों को सदा पाते और धर्मोपदेश देत हे वा ११ श्रङ्ग और १ पून क ज्ञानी होते हैं। श्रथवा निन दिगम्बर साधुना में ई-चारिख-वाग्मत्व, -परित्व और-गमरत्व गुण होते हैं ह पाध्याय कहते है । उपा याय परमेष्टा क मृलगुण-- चौदह पूरव को धरै, ग्यारह अग सुनान । उणभ्याय पच्चीम गुण, पढ पहावें मान || १. श्रद पोर ११ पूनों का पढना पढाना ही उपाध्याय के २५ मूलगुण हैं। इनके भा गत्तागुग्ण श्रमक हैं। १-वादित्य याद म जीतने की शक्ति। २-वाग्मित्व- उपदेश देन में चतुरता । ३–करित्व कविता करन का चतुरता और ४-गमरव-टीका करने क याग्यता । - - २८ मरल जैनधम प्रवेशिका चतुयभाग mamiww www ग्यारह अङ्गा के नाम- प्रथमहिं आचागण गनि, दो सूत्राताङ्ग । ठाण अङ्ग तीजो सुभग, चौधों समवाया ।। व्याख्यापण्णति पाँचमों, ज्ञातृस्था पट जान । पुनि उपासकाध्ययन है, यत त दश ठान ।। अनुत्तरण उत्पाद देश, नरिपाक पिछान | बहुरि प्रश्नव्याकरण जुन, ग्यारह अङ्ग प्रमान ॥ १ श्राचाराग, सूनाताग, ३ स्थानान, १ समनायाङ्ग, ५व्याग्याप्रज्ञाप्त ६ जातक्थाग,७उपासकाध्ययनाङ्ग,मअन्त कृतदशान, ६ अनुत्तरोत्पादक्दशाग, १० प्रश्नव्यारणा और ११ विपारसूत्राशये १९ अङ्ग हैं। चौदह पूर्ण के नाम- उत्पादक पूर्व अप्रायणी, तीनो वीरतसाद । अस्तिनास्तिपरसाद पुनि, पचम तानप्रमाद ॥ छट्टो धर्मप्रवाद है, सत्प्रवाद पहिचान । अष्टम आत्मप्रमाद पूनि, नवमी प्रत्यारयान । विद्यानुवादपूर दशम, पूर्वरल्याण महत । प्राणवाद किरिया बदुर, रोनि दु है अत !! १ उत्पादन, प्रप्रावणीपूर्व, ३ वीयानुगदपूष, ४ अस्ति नास्तियारपुष, ५ ज्ञानप्रना- पूच,६षमप्रगापूर्व सत्प्रवादपूर्व, ४ अङ्गों को पूर्ण सरया १२ होती है। १ वे श्रङ्ग का नाम मुष्टि प्रया है उपाध्यायों को उसरा पूर्ण ज्ञान नहीं होता इममे वह यहाँ नहीं गिनाया गया है । १८ पूर्व इमी चौदहवें अङ्गके भेद है।
साधु परमेष्ठी के मूलगुणों का वर्णन ८ श्रात्मप्रवादपूर्व, ६ प्रत्यार यानपूर्व, १० विद्यानुवादपूष, ११ कल्याणपादपूर्व, १ प्राणानुवादपूर्व, १३ क्रियाविशालपूर्व और १४ लोकविन्दुपूर्व ये १४ पूर्व है। साधुपरमेष्ठी का लक्षण जो पाँचों इन्द्रियों के विषया पी चाह नहीं करते, कुछ भी परिग्रह नहीं रमते श्रारम्भ नहीं करते, सदा ही ज्ञान ध्यान वप में लीन रहते हैं श्रात्मस्वरूप या मोहमार्ग का माधन करते हैं उन्हें साधुपरमेष्ठी या सुगुर कहते हैं। साधुपरमठो के मूलगुणों के नाम--- पर महानत समिति पत्र, पपेन्द्रिय का रोध। पट आवश्यक सामुगुण, सात शेष अवोध ॥ ५ महानत, ५ समिति, ५ इन्द्रियविजय, ६ पारश्यर और ७ शेष ये २८ साधुपरमेष्टी के मूलगुगण हैं। इनमें से ६ पारश्यकों का वर्णन प्राचारपरमेष्ठी के मूलगुणा म हो चुका है। महानतों के नाम या लक्षण- हिंसा अनृत तसरी, अब्रह्म परिग्रह पाप । मन बच तन ते त्यागौ, पच महानत थाप ।। १ अहिमामहावन, २ सत्यमहामत, ३ अचीर्यमहारत, ४ प्रहाचर्यमहाप्रत और ५ परिग्रहत्यागमहायत ये ५ महानत हैं। मन, वचन, काय से मर्वथा हिंसा का त्याग करना अहिंसा महावत कहलाता है। सत्यमहाव्रत का लक्षण-मन, वचन, काय से सरया असत्य का त्याग करना सत्यमहानन रहलावा माधुश्रा ही याग्यनानुसार प्राचार्य वा उपाध्याय पद होते हैं।
सरल जैनधर्म प्रवेशिका चतुथभाग 1३ चीयमहावत का लक्षण-मन, वचन, काय से मवथा घोरी का त्याग करना अजीयमहानत कहलाता है। ब्रह्मचर्य महाप्रत का लनण-मन वमन, काय से सर्वथा मैथुन का त्याग करना ब्रह्मचयमहाबत कहलाता है। ५ परिग्रहत्यागमहावन का लक्षण-मन, वचन, काय से सथा ४ परिमहा का त्याग करना परिप्रहयोगमहालत कहलाता है। ममितियों के भेद वा लक्षण- इर्या भाषा एपणा, पुनि क्षेपण आदान । प्रतिष्ठापना जुन प्रिया, पाचा ममिति विधान ।। १-इर्या, २-भाषा, ३--एपणा, ४-पादाननिक्षेपण और ५–प्रतिष्ठापना ये समितियाँ है।१-इयासमिति का लक्षण- गमन करते समय चार हाथ भागे प्रथिवी देखने का ध्यान रखना इर्यासमिति कहलाती है। २-भापाममिति का लक्षण-- वचन बोलने समय हित और परिमित पने का लक्ष्य रचना भाषा समिति कहलाती है। ५-एपणासमिति का लक्षण- थाहार के विषय म एक्वार रिदापता और शुद्धि का विचार रखना एपणासामति कहलाता है । ४--आदाननिक्षेपणसमिति का लक्षण-अपने शास्त्र, पीठो और क्मण्टनुवादि धरत उठाते समय भूमि शोधना श्रादान निक्षेपणममित कहलाती है। ५-- प्रतिष्ठापनासमिति का लक्षण मनमूत्र श्रादि क्षेपण करते समय भूमि की प्रास्ता (जीवहिनता) का लक्ष्य रस] प्रतिष्ठापना समिति बहलाती है। मन, वचन, राय से सर्वथा पार्यो पापों का पूर्ण त्याग परना महाग्रत कहलाता है। गमगदि में जीवघात से बचने के लिये यत्नाचार रसना समिति कहलाती है।
- माधु परमेष्टो के मूलगुणों का वर्णन ३१ मायु के पाच द्रियविनय और सात शेप मूलगुण- मपरम रमना नामिका, नयन श्रोत्र का गेघ । शेप मात मजनतजन, शयन भूमि का शोध ।। वस्त्रत्याग कन्लुच अरु, लघु मोनन इकवार । दांतुन मुस में ना करें, ठडे रेहिं अहार ।। स्पर्शन-रमना माग पत्र कर्ण इन पाचों इन्द्रियों को वश में परना-पनो इष्ट थोर अनिष्ट पिया म राग द्वेप नहीं करना ये पाय 'इन्द्रयविरय' नामक पाच मूलगुण हैं। -स्नान का त्याग २-शयन करते समय भूमि का शोधन, ३-उम्रयाग, ४-चाला का लाच ना, -भोजन दिन म पार वा थोड़ा करना, ६-दक्षतान नहीं करना और ७-आहार खडे होरर लेना ये ७ साघुपरमेष्ठी के शेप मूलगुण हैं। उत्तरगुण इनके भी अनकहें। पचपरमष्ठा में सम्पूर्ण मूलगुण- अरिहता छ्यालीमा, मिद्वा अहेव सूर छत्तीमा । उवझाया पणनीसा, साहूण होति अपीमा ॥ पाचों परमेष्ठिया के नमश ४६++३६+२५+२८%3 १४३ पसीततालीम मूलगुण होते हैं। उत्तर गुण का पार नहीं। प्रकारातर में साधु परमेष्ठी क मूलगुण- पच मदाप्रत श्रादरन, समिति पंच परकार। प्रल पच इन्द्रिय रिजय, पट प्रायशिक प्राचार ।। भूमिशयन मननननन, वमनत्याग कचलोंच। एकवार लघुप्रशन पिति, प्रशन दवनन मोच ।।
movie सरल जेनधम प्रशिका-चतुर्थभाग प्रश्नावली १- अतिशय, अमुक v-अतिशय, अग्हितगुण श्राचार, अमुक आरश्यक श्राचार,प्राचायगुण,थारश्यक, अमुरगुप्ति अमुक्चतुष्टय, थङ्ग, उपा यायगुण, केवल अमुस्तप,अमुकधम,अमुक झानातिशय, गुमि, घातिया, परमेठो, अमुक्महाजन, चतुष्टय, जन्मातिशय, नप, अमुरस मेति, अमुमसिद्ध देवातातिशय, दोप, द्वादशाग, गुण,अनतचतुल्य,आचार धमे, परमेष्ठी, पूर्व, परमेष्ठी के थानश्यक गुप्ति, तप, धम, पूण मूलगुण, प्राविहार्य, परमेष्ठी,प्रातिहार्य, यमप महानता मगलद्रव्य, भनाराचसहनन, महायत, समिति, साधुगण, सिद्धगुण मूलगुण,समचतुरस्रसस्थान और सयम के भेद का नाम योर समिति का स्वरूप गिनाइये? लिये ? ६-महावीर स्मामी जर २--अानन और महा * पैदा हुये थे तर उनम अन्य व्रत में अरिहन्त और सिद्ध मनुप्यों से कौन कौन सा मे, प्राचाय-उपाध्याय ना धारण वातें थीं। साधु म अन्तर बतलाइये? ७-टेररत अतिशय कष ३-अरिहन्त परमेष्ठी पर प्रगट हात हे, कालज्ञान के उपसग नहीं होता, तो पास पाहले या पावे? नायसामी पर कमठ ने ८-अरिहन्त मुनि हैं या उपसग कैसे किया? नहीं? क्या समस्त मुनियों -अरिहन्त भगवान् के केवल ज्ञान मेने पर केरल, म वा साधारण माया म ज्ञान के अतिशय प्रगट बाहरी वातो म क्या क्या होते हे या केवल अरिहन्तों थ तर होता है? क?
३ -~- -ener साधु परमेष्ठो के मूलगुणा का वर्णन ३३ -भगवान की बाणा १६-धारहन्त और सिद्ध क्सि मापा म सिरती है। में पहिले किसे नमस्कार उमे सर ममझ सकते हैं कना चाहिये और क्या ? या नहीं? २०-मुक्त जागा में कितने १०-दोष किम किस पर कितने और कौन कौन गुण मेष्टी में और कम नहीं होत होते हैं ? किस कम के क्षय से कौन गुण प्रगट हाता है ? ५१-मोन में रहने राले २१-श्राचार्य और साघु जीनों को परमेष्ठी कह में पहिले किस पद की प्राप्ति सस्ते हैं या नहीं? होनी है? १२-उपाध्याय क्निको ०-उपाध्याय पूर्वो क्या पढाते हैं? और अङ्गा के पाठी होते १३-चारहवें अङ्ग का याज्ञानी? क्या नाम है ? पूर्व उससे २३-यपराध हान पर जुदे हैं क्या? मुनिरान क्या करते हैं? १४-माधु गुणा का २४-साने, पीने, नहाने, पानन आचाये और पा पहिनने, सोने और चलने ध्याय करते हैं या नहीं? आदि कार्यो म हम में और १५-पारश्यक, पँचा साधु में क्या अतर है। घार, प्रातिहार्य, महावत, २५-एक परमेष्टा र गुण अतिशय, गुप्ति और समिति दूमर परमेष्टो में हो सकते हैं सिरे हाती है? या नहीं ? सप्रमाण कहिये । १६---परमष्टियों में सम २६-तुमने किस परमेष्टो सेवड़ापद क्सिका होता है? को दसा है? १५-तुग भी कभी पर २७-मृर्निया कौन पर मेष्टी हो मझते हो क्या? मष्टी हैं और वे किस किस १८-साधु परमष्टी कौन परमेष्ठा की होती हैं ? वीन वस्तु रय सस्ते हैं ?
पाठ तीसरा सप्तव्यसन का वर्णन निन कार्यों के करने से आत्मा भलाई (कल्याण) से विमुख जाता है उन्हें व्यसन कहते हैं। अथवा पतन को कारण दुरी (जो पीछे लग जाने पर काठनाइ मे छूटती हे ऐमी) आदत या ज्यादह शासक्ति को व्यसन कहते हैं। हानि व्यसन सेवन करने वाले व्यसनी कहलाते हैं । इसलोक और परलोक में रहेंदुए और अपयश उठाना पड़ता है। दुर्गति की प्राप्ति होती है। व्यसन के नाम या भेद- जूआ चोरी माम मद, वेश्या रमण शिकार । पर रमणी रति ध्यसन ये सातों हैं दुसकार ।। १ जुआ खेलना, २ मास खाना, ३ मदिरापान करना, ४ शिकार खेलना, ५ वेश्यागमन करना, ६ चोरी करना और ७ परस्त्रीसेवन करना ये सात व्यसन है। जुआ का लक्षण- हार या जीत के रयाल से शर्त लगाकर कोई काम करना जुआ खेलना कहलाता है। हानि -जुआ खेलने वाले जुआरी कहलाते हैं । जुमारी का हर जगह अनादर होता है । राजा उसे दण्ड देता है उसका कोई विश्वास नहीं करता। जुआरी को अन्य सब व्यसना म जमरन फँमना पडता है। जुआरी कमी पकीर भी बन जाता है। कभी अपनी स्त्री को भादाव पर लगा देता है । जुत्रा से युधिष्ठिर को राज्य से भी हाथ धोना सप्तव्यसन का चपन - डा था। यहा भी है कि- जमा खेले, मनुष की रहती नेक नाव । औरों की गिनती कहा, पाण्डा हुए खराब ।। मास व्यसन का लक्षण- जीवों को मार कर अथवा मरे हुए जोयो का फ्लेवर शरीर)साना मास खाना कहलाता है। हाति-मास खाने ले हिंसक और निद्य कहलाते हैं। मास में अनन्त जीव होते । इसके काटने और पकाने में घोर हिंसा होती है। इसके खाने शरीर म अनेक रोग भी हो जाते हैं। ससार में दूध, दही, नो, मिठाइ, 'अन्न, शाक और फल साने को हैं, फिर भी मूर्स जन मास साते हैं, यह खेद की बात है। मासभक्षण से यक राजा के समान महान् दुख होता है । कहा भी है कि- यक राजा ने मास ग्या, खोया राज महान । मर कर दुर्गत को गया, हुआ यहा अपमान । मदिरापान व्यसन का लक्षण- भाग, गांजा, शराब, अफीम, कोकोन, तमाखू और चरस इत्यादि मादक पदार्थों का मवन करना मदिरापान कहलाता है। हानि -इनका सेवन करने वाला शरारी और नशेगान कहलाता है। उसका धर्म, अमे, विवेक और ज्ञान नष्ट हो जाता है। काम, नोध, येहोशी आदि उत्पन्न हो जाते हैं। उसके मुख में कुत्ते भी मूत जाते हैं महान् हिंसा का पाप लगता है। तया एक पाद सन्यासी के समान दुगति होती है। कहा है कि- मदिरा पी मला मलिन, लोटे पीच बजार । मुख में मत कूकरा, चाटें बिना विचार ॥ श्राव-इज्जत या श्रादर।
३ सरल जनयम प्रशिका-चतुथभाग ~~ 'एकपाद' साधू यहा, कर कर मदिरापान । चाण्डालो क हाथ से, वो बैठा निन जान ।। शिकार व्यसन का लक्षण-- जगल में स्वतन्त्र फिरने वाले सिंह, वाघ, सुगर और हरिणा वगैरह जानवरों को तथा प्राकाश म उडन वाले पत्तियों को यानिमी भी प्राणी का मासहार या शौर के लिये बदूक श्रादि हथियारों म मारना शिर सेलना कहलाता है। हानि-- शिकार सेलने वाले शिकारी, निदेय और हत्यारे कहलाते हैं। उनके परिणाम यदुत ही क्रूर हो जाते हैं। उनके हाथ में हथियार देखते ही प्राणी डर जाते हैं। ये पापी पीर का जान को अपने ममान न समझ भैरव शिकारी के समान कभी अपने प्राण भागमा देते हैं । यहा भी है रि- जैसे अपने प्राण हैं, तेस पर क जान । कैसे हरते दुष्ट जन, विना पैर पर प्रान ॥ हरिण, कमा सुअर पर धान । जीवा ही शुर बचा, ली भैरव की जान । श्यागमन व्यसन वालक्षण- वश्या से रमण करने की इच्छा करना, उसके घर श्राना जाना, उससे सम्पध रखना वेश्यागमन कहलाता है। हानि- वेश्यागामी लुच्चा, बदमाम और "यभिचारी कहलाता है । वेश्या- गमन से अनेक प्रकारचे असा य रोग हो जाते हैं। शरीर और घन क्षीण हो जाता है। हिंसा का पाप लगता है। जगत में निन्दा होती है । युद्धि पिगड़ जाती है । तथा चारदत्त के समान दुदशा होती है । कहा भा है कि- भैरव ने मारा - सप्तव्यसन का वणन -------- 4- - चारुदत्त की चतुरता, 'तिलका' ने की चूर । पुरा उमका धन हप, दिया नालि में पूर ।। द्विज सनी कोली यनिक, गनिका चासत लाल । ताओं सेवत मृद जन, मानत ननम निहाल || चोरी व्यसन का लक्षण- विसा फी गिरी हुइ, भूली हुई या रस्त्री हुइ यस्तु छिपाने की नियत से ले लेना या लेकर किमी दूसर को दे देना चोरी कह- लाती। हानि --चोरी करने वाले को चोर कहते हैं। समका कोई विश्वास नहीं करता है। राना दण्ड देता है। धन प्रारणों से भी प्यारा होना है, इसलिये धन हरने वाले को प्राण हरने का पाप लगता है। चोर की अपसर नामक चोर सायु के मामार दुर्दशा होता है। कहा भी है कि- अपमर मा होय कर, चोरी कर मतिदीन । सनदण्ड को भोग कर, मरा लही गति हीन ।। परखीसेवन व्यसन का लक्षण- धर्मानुकूल अपनी विवाहिता स्त्री के सिवाय दूसरी त्रियों फे साथ रगण करना परस्त्रीसेवन कहलाता है। हानि -अपनी विवाहिता स्त्री को छोड़ श्रय स्त्रियाँ मा, बहिन और लड़की के समान है। इसलिये परस्त्रीसरन करने वाल को मा, बहिन च बेटी के साथ विषय सेवन करने का पाप लगता है। ममाज व राजा दण्ड देता है। श्रमाध्य रोग हो जाने हैं। शरीर व धन क्षीण हो जाता है । सिा का पाप लगता है। गौरव जाता रहता है। और रावण क समान लोकनिन्दा होनी है। कहा भी है रि- ना सेई नाही तुड, राउन पाई घात । चली जात निन्दा अजों,नगम मई विग्यात ॥ -
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सरल जैनधर्म प्रवेशिका-चतुर्थभाग
जुश्रा व्यसन की प्रधानता-
किसी मनुष्य को कुमङ्गति के कारण जुवा खेलने का
में
चश्का (व्यसन) लग गया। जब वह अपना सारा धन जुए
हार गया तय उमे जुश्रा के लिये धन की आवश्यकता हुइ इससे
वह चोरी कर जुआ खेलने लगा।
चोरी में निपुण हो जाने पर जुआ खेलने के बाद भी उसके
पास धन बचने लगा। एक दिन वह वेश्या के द्वार के सामने
से जा रहा था कि उसके एक जुआरी मित्र ने आवाज देकर
उसे वहाँ घुलाया। उसे देखकर वेश्या ने अपने हाव भार वा
कानों से उसे अपने पर अनुरक्त कर लिया। तब वह वेश्या
सेवन करने लगा और चोरा द्वारा बहुत धन लार वेश्या को
देने लगा।
वैश्यासेवन म अानन्द की पृद्धि के लिये वेश्या ने मदिरा
पान का चशा मा उसे लगा दिया। तब वह दिनरात मदिरा के
नशे में चूर रहने लगा।
मदिरा के नशे म उसे साद्य और असाद्य का विचार भी
नहीं रहा और वह वेश्या के साथ मास आदि असाद्य वस्तुएं भी
खाने लगा।
मांसभक्षण की श्रादत पड़ जाने से मासप्राप्ति के लिये
वह जगल आदि म पशु पक्षियों का शिकार करने लगा। जिस
से वह परिणामी हो गया।
करपरिणामी हो जाने और नशे म चूर रहने के कारण वह
परत्रियों के साथ बलात्कार भी करने लगा। तथा बलपूर्वक
उनका सतीत्वहरण कर अधिक व्यभिचारी और लाक निन्य
हो गया।
इम प्रकार एम जुत्रायसन क लग जाने से यह प्रमश
सातों व्यसनों का सेवन करने वाला, अति पापी प्रष्ट और
M सप्तव्यसन का वर्णन ३ - दुर्गति का पात्र बन गया। इमलिये जुआ सबसे बुरा व्यसन है। इसका मईया त्याग कर देना चाहिये। ये व्यसन नडे हा दुष दायी है । व्यसन का अर्थ ही दुस है। इसलिये इनमे मदा दूर रहना चाहिये। प्रश्नावलो- १-चोरा व्यसन, जुआ -सन्त तिलका वेश्या व्यसन, परस्त्रीव्यसन, वेश्या के एक ही भव में १६ नाते व्यसन,मदिरापानव्यसन,मास व्यसन शिकारज्यसन का लक्षण १०-भाग घोड़ो,चिलम वा प्रत्येक व्यसन के सेवन म पीना मदिरापान है यानहीं? हानि बतलाइये? ११-ताश,शनरत,सट्टा, ---यमन के भेद या नाम लाटरी,जीरनामा, कवी, गिनाइये? जुश्रा है या नहीं ? ३-परस्त्री और वेश्या में ५२-क्सि किम व्यसन क्या अन्तर है? स किम क्सि ने दुख पाया ४-सरमे पुरा व्यसन है। क्सिो एक को क्या कौनसा है और क्या? सुनाओ। ५-ससे अच्छा व्यसन १३-यारहवा प्राण कोनमा ? कौन है और क्यों ६-परस्त्रा सेवन से मा १४-अमुक श्लोक पूरा धहिन येदो के सेवन का पाप कीजिये? क्यों लगता है? १५-दूसरा की रक्षा के ५--परस्त्री का त्यागी वेश्या लिये हिंसक पशुओं या जीवों का त्यागी है या नहीं? को मारना अच्छा है या -ऐसे कौन व्यसन है पुरा ? कारणमाहित त जिनके सेवन महिमा होती है ? लाइये।
- पाठ चौथा श्रावक के अष्टमूलगुणो का वर्णन श्रावक के भेद- मूलगुण का लक्षण- श्रावक के सनसे पहिले मुरय नियमों को मूलगुण कहते हैं। कोई भी व्यक्ति जब तक इन मूलगुणों को धारण नहीं करता, तर तक श्रावक नहीं कहला सक्ता। इसलिये श्रावर बनने के लिये मूलगुणों का धारण करना आवश्यक है। मूल का अर्थ 'जड' है से जड़ के बिना पेड़ नहीं ठहर सक्ता उसी प्रकार कुछ नियम ऐसे है जिनका पहिले पालन क्येि मिना पाणी श्रारक नहीं पहला सक्ता न्न नियमों को ही मूलगुण कहते हैं। के मूलगुणा (१) मद्यत्याग, (२) मासत्याग, (३) मधुत्याग, (४) बडत्याग, (५) पीपलत्याग, (६) पात्रत्याग, (५) कठूमरत्याग तथा (5) गूलरत्याग इस प्रकार तीन मकार का त्याग और पाच उदुम्बर पली का त्याग ये पावर के पाठ मूलगुण हैं। मद्यत्याग मूलगुण का लक्षण- शराब, भंग, गाजा, अफीम, चरम, तम्बाखू, बीड़ी और चुस्ट श्रानि नशीली वस्तुओं के सेवन का त्याग करना मयत्याग मूलगुण कहलाता है। माया, सरायगुड (राब), ताडप रस श्रादि पदार्थो को मिला और सड़ा कर (शरार) घनाई जाती है मद्य, मास और मधु को मकार इसलिये कहते हैं कि इनका पहिला अक्षर 'म' है। । .
श्रावक के अष्टमूलगुणों का वर्णन ४१ हानि -वस्तुओं के मडो मे मद्य में हर समय मूक्ष्म प्रमजीर पैदा होते और मरते रहते हैं। जीवहिंसा के बिना शराय किमी प्रकार तैयार ही नहीं हो पाती। इसलिये शरार पाने मे जीर हिसा का पाप लगता है। शराब पीने स मनु य पागल सा हो जाता है । उसे भले बुरे का ज्ञान नहीं रहता। कभी कभी शरानी में कुत्ते पेशार कर जाते हैं । इसी प्रकार भाग, अफीम और तम्बाकू वगैरह वरतुएँ भी स्वारस्य और रिचर को रिगाइती है इसलिये डाका त्याग करना ही उचित है । मासत्याग मूल्गुण मा लक्षण- माम साने का त्याग करना मासत्याग मूलगुण कहलाता है। यस जीवों के मृत शरीर को माम कहते हैं। हानि-मास म हर समय अनेक सूक्ष्म जसजीन पैदा होते और मरत रहते हैं। माम को छूने मे हा जीव मर जाते हैं। इससे मामभक्षो अनेक जीनों की हिंसा करता है । मांस भक्षण से अनेक प्रकार के रोग हो जात है। बुद्धि भ्रष्ट हो जाताभार फूर हो जाता है। इसलिये मास माने का त्याग करना ही उचित है। मधुयाग मूलगुण का लदण- शहद साने का त्याग करना मधुत्याग कहलाता है। हानि -शहर मधुमक्सियों का नमन ( कय या गाल) है। से लोग मक्सियों के छत्ते को निचोड पर शहद निगलने है। छत्ते में छोटी छोटी मस्सिया रहती हैं। छत्ते को निचोड़ने से वे सय मर जाती हैं और उन सारमशाद मश्रा नाता है। मधु में हर समय अनेर सूचम रेस जाया को रत्पत्ति होती रहती है । ऐसी अपवित्र, हिंमा की सानि और घृणाकारक व तु के खाने का त्याग करना ही उचित है। - ૪૨ मरल जैनधर्मप्रवेशिका चतुर्थभाग ~~ - पाच उदुम्बरत्याग मूलगुण- वड़ फल, पीपल फल, पाफर फ्ल, गूलर फल और कठूमर पल इन फला के साने का त्याग करना पाच उदुम्बरो का त्याग करना कहलाता है। हानि -इन फलों में छोटे छोटे अनेक प्रमजीव रहते हैं। वे जीव अनेकों में तो साफ साफ दिखाई देते हैं और अनेकों में छोटे होने में दिखाई नहीं दते । तो भी उनकी पैदायश का ये स्थान है। इन फला के साने से वे सजीव मर जाते हैं। इस लिये इन फ्लों के खाने का त्याग ही उचित है। नोट -किन्हीं श्राचार्यों ने गद्य, मास, मधु और पाच पापों के त्याग को भी अष्टमूलगुण कहा है। इसके अतिरिक्त इन मूल गुणा के विषय में और भी कई मत हैं। जिनका विवरण हमारे 'रत्नकरण्डश्रावकाचार अन्य के श्लोक न०६६ से जानना। प्रश्नावली- १-मद्य, मधु माम वा ६-क्या सभी फ्ला मूलगुण का लक्षण पदिये ? खाने म दोष है वा कालगड़, २-मद्य, मधु वा मास पीपल आदि के ही गाने में ? के गाने से क्या हानि है। कारण-सहिन बतलाइये । ३-मद्य, मधु वा माम ७-मास का त्यागी मद्य सेवन क गा या नहीं? है-ये आठ मूलगुणक्सिके -सवथा जीयहिमा का प्यागो मूलगुणधारी है यानहीं ? ५-उदुम्बर, मकार या मूलगुणों के भेद बतलाइये। व्यसनसेन करगा या नहीं? कैसे बनता है? -मूलगुणो का घोरी पाठ पांचवां अभक्ष्य का वर्णन अभक्ष्य का लक्षण-- जो पदाथ साने (मक्षण करने योग्य नहीं होते उन्हें श्रभक्ष्य कहते हैं। अभक्ष्य के भेन- -प्रसहिमाकारक,२-यहुस्थापर-हिंसाकारक,३--प्रमाद पारक, ८-अनिष्ट शार ५-अनुपसेव्य ये अभक्ष्य के भेद है। प्रसहिंसाकारक अमक्ष्य का लण- जिन पदार्थों के खाने मे प्रसनामों का पात होता है उन्हें नसहिमाकारक अभक्ष्य कहते हैं। जैसे--पद, पोपल, उमर मुलठी, वेर, कमल की डंडो के समान पोले पदार्थ, वीघा (धुना) अन्न, अमर्यादित वस्तु, मुख्या और । द्विदल श्रादि के गने मे सजीरों का पात होता है। स्थाहिंसागर अमक्ष्य का लक्षण- जिन पदायों के स्वाने में अनन्तस्थावर जीवा का पान होता है यह स्थाररहिसाकारक अभक्ष्य कहते हैं। जैसे-पाल, घुझ्या, मूली, गानर, लहसुन, अदरक, शारदी, सूरण, दलने पर निनो प्राय परार बराबर दो टुरडे होते हैं ऐसे उडद, मूग, चना श्रादि को बच्चे दूध, कच्चे दही और काचे दूध म जमाये गये छाल में मिला कर म्याना द्विदल कहलाता है। उसम मुप की लार मिलते हो प्रमजीव पैदा हो जाते हैं।
४६ - -~- - -- सरल जैनधमप्रवेशिका-चतुभाग प्रश्नावली ६-अभक्ष्य के भेद या नाम बतलाइ -कौन कौन से पदार्थ क्या क्या मिलाने से द्विदल हो जाते हैं। -अजानफल, अनिष्ट, अनुपसेव्य,अभक्ष्य,पन्दमूल, चलितरस, तुच्छफ्ल, प्रस हिंसाकारस, द्विदल, प्रमाद कारक, बहुबीजा बहुबीजा वा विष का लक्षण कहिये। २-अमक्ष्य का त्यागी मूलगुण का धारी है या नहीं? ३-दूध, दही या छाछ न मिलाने पर मूग, उड़द वगैरह द्विदल कहलायेंगे या नहीं? ४-प्रस और स्थावरों की हिसा किन अभक्ष्य पदार्थों के साने में होती है। ५-मम्पूर्ण शाक पात का त्यागी किन्तु अय चीजों का खाने वाला अभक्ष्य का त्यागी है या नहीं। ८-पेड़ा, टमाटर, गोभी का फूल, बेर, घो, बदाम का रायता, अप्रासुफ दूध, नीबू का अचार,भालू, मलगट्टा, खीरा, मूली मस्सन, शहद और दहापड़ा इनमे अभक्ष्य कौन कौन है? --अनिष्ट और अनुप सेव्य र्म क्या श्र-तर है? प्रत्येक के दो दोउदाहरण भो पताइये? १०-क्या सभीशाकपात अभक्ष्य है?
पाठ इटवॉ श्रावक के व्रतों का वर्णन प्रतका लक्षण- सेवन करने योग्य विषयों का कुछ दिनों की मर्यादा लेकर रसिक्षापूर्वक त्याग करना या हिमा श्रादि सोटे कार्यों का सम्ल्पपूर्वर निलकुल त्याग करना और अच्छे कार्यों के करने का नियम लेना न कहलाता है। ग्रत के भेद- पाव अशुनत तीन गुणवत, चो रिसावन शास्त्रविधान । धन र भावक व्रत बारह, मेद बताओ तुम युधिमान ।। ५ अशुप्रत, ३ गुणरत और ४ शिक्षाप्रत ये १० व्रत के भेद हैं । इहें श्रावक के उत्तरगुण भी कहते हैं। ये मूलगुणों के बाद पाले जाते हैं अथवा मूलगुणों की अपेक्षा उत्तम हैं इस लिये इहें उत्तरगुण रहते हैं। इनका पालने वाला श्रावक 'प्रती या प्रतप्रतिमाधारी' कहलाता है। अणुव्रत का लक्षण- जिन्हें सर्वसाधारण (जेनेवर ) जन भी हिंसा, भूठ श्रादि कहते हैं उन हिंसा, भूठ, चोरी, मैथुन और परिप्रह के कुछ अश के त्याग को अमन कहते हैं । भाव के ये व्रत महानतों की अपेक्षा लघु (छोटे) होते हैं इसलिये इ हें अप्रत कहते हैं। - अरावत के भेद- १ अहिसावत, २ मत्यानुप्रत, ३ अचौर्याप्रत, ४ प्रम- पर्याशुवत और ५ परिग्रहपरिमाणाणुमत ये पाच अगुवक के भेद है। किन्ही भाचार्यों ने रात्रिभाजनत्याग नामक छटवा अाग्रत भी माना। -- -- ४८ सरल सेनयममशिरा चतुथभाग मैं इम हिमारामन का लक्षणा-- स जोया का मारपी ( इरादा पूर) हिसा का परना अहिसाणुमत कहलाता है । अहिसागायती 'मैं को मारू" ऐसे सम्रूप ( इरादा)स कमी क्सिी का धाम परता, न वचन द्वारा किसी मे रहता है रितुम इसे मार न भी क्सिी जीव के मारने का विचार करता है।" घ पनान, व्यापार करने और शत्रु से अपने को बचान में जो होती है उमरा त्यागी गृहस्थ नहीं होता । तो भी यन्नाथा- दया का भाव रखता है। वह स्थानर जीवों की भी व्यर्थ नहीं करता। सत्यानत का लक्षण- स्थूल भूठ बोलने का त्या । करना सत्यागावत क हा अथात् स्थल (मोटा) भूठ न तो श्राप बोला और से बुल माना और ऐसा सच भी नहीं बोलना निसके वो क्सिी जीव या धम का घात हो जाय, उसे मत्यागुनन व श्रचीयाशुव्रत का लक्षण- प्रमाद या लोम के वश होकर किसी को गिरी, पड़- या भूली हुइ वस्तु चिना दिये स्यय नहीं लेना और र किसी दूसर को भी नहीं देना चौर्याणुमत कहलाता है। वहाचयागुमत का लक्षण- के साथ रमण, घुरो निगाह, तथा गदा वातालापवा व्यवहार करने का त्याग कर कराय का कर नहीं चुकाना, मघट तौला, दूध घो में तेल मिला, भूल विज्ञापन दना, माल का नमन परस्त्री या परपुरुष श्रावक के प्रमो का वणन ४६ TraM - उन पर बहिन वा भाइ के समान दृष्टि रखना ब्रह्मचयागात्रत कहलाता है। परिग्रहपरिमाणाणु धन का लक्षण- वेत, मान, रुपया, पैसा, सोना, चाँदी, पशु, अनाज, दासीदास, वस्त्र और वर्तन वगैरह वस्तुओं का अपनी इच्छा और निवाह के अनुसार परिमाण कर लेना कि मैं जन्म भर के लिये इतनी रखूगा बाकी सब का त्याग कर देना परिपह- परिमाणानत कहलाता है। शिक्षाव्रत का लक्षण व भेद-- अणुव्रतों में गुण लाने वाले श्रधात अणुनना के पालन में पकार करने वाले प्रतों को गुणरत कहत है। १-दिग्यत, २ दशरन और ४ अनर्थदण्डात ये ३ युणयन क भेद हैं। दिग्यत का लक्षण- लोभ वा श्रारम्भ घटाने के लिये दशा दिशाओं में आने जाने की मयादा जीवन भर के लिये कर लेना दिग्नत कहलाता है। इसमन का धारी इम प्रकार नियम करता है कि-में अमुक दिशा में अमुक पर्वत, नदी या नगर से आगे जीवनपर्यत नहीं जाऊँगा। जेमे-किसी मनुष्य न पूर्व में ब्रह्मदेश, पश्चिम में सि धनदी, उत्तर म हिमालय पर्वत और दक्षिण म कन्याकुमारी से आगे जीरन भर नहीं जाने का नियम ले लिया तो यह नियम दिग्नन पहलावेगा। धमकाय क लिये मयादा नहीं का जाती है। देशवन का लक्षण- दिग्वन म जीवनपर्यत को का गइ थाने जाने के नेत्र की मयादा घडी, घण्टा, दिन, पन, महिना वगैरह नियत समय ता घटाना देशनत कहलाता है । जेमे-क्मिी ने दिग्वन लेकर - ५० सरल जेन म प्रोशिमा चतुर्थ-भाग पूर्वादशा में जीवन भर ब्रह्मदेश से श्रागे नहीं जाने का नियम लिया था, अब वह नियम करता है कि मैं श्रठाइ पर्न म शिखर जी से आगे न जाऊँगा। फिर क्सिी और दिन यह नियम करता है कि आज मैं अपने माम से बाहर न जाऊँगा, तो उसका यह नियम देशनत समझना चाहिये। अनर्थदण्डवत का लक्षण-- पिना प्रयोजन ही निन कार्यों में पाप का प्रारम्भ हाता है उन कार्यों का त्याग करना अनर्थदण्डनत कहलाता है। इस जनकाधारी कभी किसी को हिमा वगैरह पाप का उपदेश नहीं देता, किसी को जहर हथियार वगैरह हिंसा के उपकरणों का मागे नहीं देता, किमी का बुरा नहीं विचारता, पाय उत्पन्न करने वाली कथाएं नहीं सुनता और मेमतलन पानी ढालना, वनस्पति छेदना व जमीन सोदना वगैरह कार्य व्यथ नहीं करता। गुणव्रत का लक्षण वा भेद- जिन व्रतों के पालन से मुनिघ्रत के प्रयास की शिक्षा मिलती है, उह शिक्षाग्रत कहते हैं। उसके सामायिक, प्रोषधो पचास, भोगापभोगपरिमाण और अतिथिसविभाग ये ४ भेद है। मामायिक शिक्षानत का लक्षण निश्चित समय तक मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना से पाँचों पापों का त्याग करना तथा सरसे राग द्वेष छोड़ कर शुद्ध प्रात्मा का अनुभव करना सामायिर शिक्षाप्रल कहलाता है। सामायिक को रिधि इसी पुस्तक म अलग देखिये। प्रोषधोपवास शिक्षामन का लक्षण- प्रत्येक अष्टमो और चतुर्दशी को समन प्रारम्भ वा विषय पाय तथा मव प्रकार के श्राहार का त्याग कर १६ पहर 1 ----vine - --- - श्रावक के प्रता का वर्णन तर वमध्यान करना नोपयोपपास कहलाता है। दिन भर में एकवार भोजन करना प्रोपर ( एकाशन ) कहलाता है। सर्वथा भोनन नहीं करना पवास (अनशन ) कहलाता है। दो प्रोपों के बीच एक उपास करना प्रोषधोपमास कहलाता है। प्रोषधोपवास का ट्रात और विधि- जेसे रिसा मनुष्य को अष्टमो का प्रोपचापपास करना है तो यह सप्तमी और नरमी को एकनार भोनन करे तथा अष्टमी को भोजन का सर्वथा त्याग करे। इस समय पाँचों पाप, व्यागर, गृहकार्य, शृङ्गार, त्र, तेल, अंजन, मनन, मायुन, रेल और यात्रा का सपथा त्याग परे। अपना ६६ पहर का समय पूनन, स्वाध्याय, सामायिक तथा धर्मचर्चा ही में व्यतांत कर । यह उत्तम प्रोपधोपगम की विधि है। मध्यम प्रापयोपवास १२ पदर का और जघन्य पहर का होता है। इस व्रत के समय यदि स्पाय और थियसेवन की कमी न को गइ तो इस व्रत से युद्ध लाभ नहीं हाता । भोगापमागपरिमाणशिक्षाप्रन का लक्षण भोजन, पत्र, श्राभूपण आदि भौगोपभोग की वस्तुओं का परिमाण कर यासी सबका जीवनपयन्त अथवा कुछ निय मित काल तर त्याग करना भोगापभोगपरिमाणन कहलाता । इस व्रत में अभक्ष्य वस्तुओं का तो जीवनपयत्त के लिये त्याग जो वस्तु एकवार ही भोगने योग्य हातो हैं वह भोग कह- लाती है। जैसे-रोटी, फूलमाला, पान इत्यादि । जो वस्तु वारपार काम में श्रा सक्ती है वह उपभोग कहलाती है । जसे- यस्त्र, मान, सवारो श्रादि। नोयन पयत के लिये जो त्याग किया जाता है यह 'यम' कहलाता है और परिमित समय के लिये जो त्याग पिया जाता है यह त्याग 'नियम' कहलाता है। - t- सरल जैनधम प्रवशिका-चतुर्थभाग दिया जाता है और भक्ष्य यस्तुओं कापड़ी, घा, दिन, महिना, वर्ष वगैरह काल की मयादा लेकर या जीवनपयन के लिये त्याग किया जाता है। इस ग्रन के पारी को भोजन, वाहा, शयन श्रादि १७ कार्यों का नियम प्रतिदिन प्रात ही अवश्य करना चाहिये। जैसे श्राज भोजन इतने यार करूँगा, रस इतो साऊँगा आदि। अतिथिसविमागशिक्षामन का लक्षण- फल की इच्छा के बिना भति और आदर पूर्वफ धम बुद्धि मे मुनि, त्यागी तथा अन्य धमात्मा जनों को यथायोग्य दान देना+अतिथिसंविभागशिक्षामन कहलाता है। अतिथि सविभागवत के ४ भेद है-पाहारदान, शानदान, आधिदान और अभयदान। १-पाहारदार या लक्षण-मुनि, त्यागो, प्रता, भावक तथा भूसे अनाथ-विधया-गरीब आद्रियो भोजन देना 'पा र दान' कहलाता है। २-ज्ञानदान का लक्षण-पनाना, व्याग्यान देना, पाठ शाला सोलना, वाचनालय गोलना और पुस्तमें पाना वा याटना यादि ज्ञानदान कहलाता है। ३-गोगिया का गौपधि देना, उनमी परिचया करना तथा श्रीषधालय म्बुलवाना श्रादि औषधिदान कहलाना है। ४-मठ या धमशाला बनवाना, सडका पर लेम्प लगाना, चौमी पहरा लगवाना, औरा का दुस व समर दूर करना तथा जीवों की रक्षा करना श्रादि अभयदा कहलाता है। +जा भिक्षा के लिये निना पिसी तिथि का निश्चय पिये भ्रमण करते हैं उह 'अतिथि' कहत है। अपने कुटुम्न के निये बनाये हुए भाजा में स भाग करके देना 'सविभाग' कहलाता है श्रावफ के प्रतों का वर्णन -~- ~ -~ ww प्रश्नावली १-अणुव्रत, अमुपदान, अमुवान, उपभोग, उपवास, गुणवत, नियम, प्रोपघ, भोग, यम बार शिक्षाप्रत का लक्षण उदाहरण सहित तिलाइये! २-गुमन गुणवत, दान प्रन और शिक्षानत के भेद गिनाइये? ३-अणुमत और महा धन म, परिग्रहपरिमाणारामत वा भोगोपभोगपरिमाणवत में, प्रोपध, उपवास और प्रो पोपवास में दिग्वत और देशवत में, नियम और यमम अन्तर उदाहरण सहित यत लाइये? ४~यहिंसाबनी युद्ध और सेवा करेगा या नहा ? मन्दिर, फुत्रा और तालाब यनवावेगा या नहीं? ५-एर दुष्टा खोटुश दो मे मदा अपने स्वामी का दिल दुसाती है तो वह कौनसा पाप करती है? ६-मिध्यात्व का नाश और ज्ञान का प्रचार करने के लिये अक्लक ने प्रापत्ति आने पर भूठ बोल पर अपने प्राणों की रक्षा की तो उन्हें झूठ का पाप लगा या नहीं? -अपराधी को निश्चित कासी से बचाने के लिये भूठी गवाही दे देना अच्छा है या बुरा ? ८-स्त्री के पाम रपया होने पर भी पति के द्वारा जुए कोरपया मागे जाने पर 'मेरे पास नहीं है। ऐसा कह देश पाप है या नहीं? क्या? १-सहक पर पड़ा हुश्रा रपया उठा कर भिपागेको दे देना पाप है या नहीं ? १०-पाशुपतोकापाल- क कौन प्रतिमाघारी है? ११-यिनाश्रयानत पालन क्येि गुणवत और शिक्षाप्रत हो सफ्ते हैं या नहीं ? क्यों? १२-शिक्षायत फापालक पाठ सातवा एकादश-प्रतिमा का वर्णन प्रतिमा का लक्षण- श्रारक के श्रावरण के ग्यारह दरजों (कक्षाओ, श्रेणियों को प्रतिमा कहते हैं। श्रथया भोगों से राग घटाना, सयम पायदाना और कर्तव्यपाला की प्रतिज्ञाएँ करना प्रतिमा कहलाता है। कविवर १० बनारमीदास जी ने कहा भी है कि- सयम अश जग्यो जहा, भोग अरुचि परिणाम | उदय प्रतिमा को भयो, प्रतिमा ताको नाम If पृष्ठ ५३ का प्रश्नारली का शेपभाग-~ अणुमती है या नहीं? वहाँ वा स करना चाहिये १३-एशिया, युरोप, और स समय क्या विचार अमरीका, श्रास्ट्रेलिया और करना चाहिये? श्राफ्रीमासघाहर न जाना १६-प्रोषधोपचास के दिन नियम कर लेना दिग्नत है या क्या करना चाहिये। नहीं क्यों? १७-छपी पुस्तकें बाटना, १४-जिनमें युद्ध और अग्रेजी और शिल्पशिक्षा के जीवहिंसा का क्या है सी लिये छात्रवृत्ति देना ज्ञानदान पुस्तर अनथदण्डप्रतवारी है या नहीं। पटेगा और सुनेगा या नहीं, (६-एर पण्डित जी विना क्या? कुछ लिये दिये पढ़ात हे तो १५-मामायिक व, उनके कौनसा नत हुआ?
एकादश-प्रतिमा का वर्णन ५५ - प्रतिमा के भेद या नाम- दर्शन, त सामायिक प्रोषय, भुक्ति मचित्त रात्रि परिहार । ब्रह्मचय आरम्मत्याग वा बम परिग्रह त्याग विचार ॥ अनुमतित्याग उद्दिष्टत्याग कहि, प्रतिमा ग्यारह श्रीगणधार। अगली प्रतिमा में पूरय की, गुटी सपना होप चितार ।। नोट-पायक अपने सयम की उनात फ्रता हुआ पहिली से दूसरी, दूसरी से तीसरी और नीसरी से चौथी इस प्रकार ग्यारहती x प्रनिमा तर चढ़ता है। इससे उपर चढ कर साधु प्रथा मुनि हो जाता है। अगली श्रगलो प्रतिमाश्राम पहिले की प्रतिमाओं की क्रिया का पालना भी जरूरी है। दशनप्रतिमा का लक्षण- अष्ट मूलगुण सग्रह कर, व्यसन अमक्ष्य सबै परिहरे । युत अष्टांग शुद्ध मम्यक्त्व, धहि प्रतिज्ञा दर्शनरत ॥१॥ नर्मन सम्यग्दर्शन सहित निरतिचार पाठ मूलगुणों का पालन करना, सात -यसों का अतिचारसदित त्याग करना और अहिंसा पानि पाँच अणुनतों का अभ्यासमात्र करना 'दर्शन-प्रतिमा हिलानी है । इस प्रतिमा का धारक 'दाशनिक श्राव' कहलाता है । वह सदा ससार, शरीर वा भोगामे ग ४ प्रतिमा श द से यहाँ किनमन्दिर में विराजमान अरिहन्त आदि की मूर्ति नहीं लेना रितु श्रावक के नियम या व्रतपालन की भिन्न भिन अवस्था या कक्षा सममना चाहिये। कोइ कोइ श्रावर ऐसे भी होते हैं कि जो बतप्रनिमा धारण पर गृह छोड़ विचरते हुए धर्ममाधन म तत्पर रहते हैं वे व्रत प्रतिमावारी गृहत्यागो कहलाते हैं।
- - सरल वैनधर्म प्रवेशिका-चतुर्थभाग सीन, दृढ़ निश्चय ( श्रद्धान) वाला और सामारिकपल की इन्छारहित होता है। तथा अपने सम्यक्त्य में दोष नहीं लगाता। नप्रतिमा का लक्षण- अणुनत पन अतिचार विहीन, धारहिं जो पुन गुणना तीन। चौ शिक्षानत समुत सोय, बनप्रतिमाघर श्रावक होय ॥२॥ पाच अप्रत, तीन गुणमत और चार शिक्षाप्रत १२ मनों का पालन करना प्रतप्रतिमा कलाती है। इस प्रतिमा का धारी तो श्रावक कहलाता है। इस प्रतिमा में अतिचार केवल अनतों के ही टलने हैं। शेष सात प्रतों का अभ्याम-मात्र होना है। मामायिप्रतिमा का लसण- मम जीव में ममभाव घर, शुमभावना सयम मही दुनि आरत रौद्र तज कर, त्रिविध काल प्रभानही । परमेष्ठि पन जिन वचन जिनप, चिजिन जिनगृह तनी। वदन त्रिकाल करें सुजानहु, मव्य मायिक धनी ॥३॥ प्रतिदिन सोरे, दोपहर और शाम को कम से कम दो दो घड़ा विधिपूर्वक अविचार हित मामायि फरना सामायिक प्रतिमा कहलाती है। इस प्रतिमा का धारी पिसी भी प्रकार के उपमग वा परापह के श्राजाने पर सामायिक से च्युत नहीं होता। इस प्रतिमा का धारी 'सामायिनी कहलाता है। प्रोपधप्रतिमा का लक्षण- वर मध्यम जघन त्रिविध धरेय, प्रोपावधियुत निजबलप्रमेय । प्रतिमाप चार पर्वी मझार, नानह सो प्रोषध नियमधार ४ एमादन प्रतिमामा का वजन Ham ~ wwArurt- प्रत्येक अष्टमी वा चतुर्दशी को अविचार रहित प्रोपयोपनाम करना और इस दिन व्यापार, प्रारम्भ, भोजन, स्नान आदि मोगोपभोग को सामग्री का त्याग कर एकन्त में माध्याय वा धमध्यान करना प्रोपधनिमा कहलाती है। यह प्रोपध रत्कृष्ट १६ पहर का, मध्यम (२ पदर का और जपाय पदर का होता है। विशेष प्रष्ट न० ५१ पर लिया है। मचित्तत्यागप्रतिमा का लक्षण जो परिहर मवित्त व चीन पत्र प्रगल कर फल वीज । अरु अप्रामुक नल भी मोय, मनितन्याग प्रतिमावर मोय ॥५ हरी ननस्पति अथान काच फल, फूल, बीन, पत्ते वगैरह नहीं साना, पानी भी प्रासुर कर पीना, वनस्पति को+प्रासुक कर काम में लाना स्वच्छन्दता से हर एक वस्तु न साता पीना मचिनत्यागप्रतिमा कहलाती है। गत्रिभो नित्यागप्रतिमा का लक्षण- मन वच तन त कारित अनुमेंदें नहीं, नवविध मधुन दिवम माहि जो वर्नहि । अरु चतुर्विध आहार निशामाहीं न, गत्रिमुक्तिपरित्यागप्रतिमा सो मजे ॥६॥ +नीपमहित हरी वनस्पति को मचित्त कहते हैं। ४ इम प्रतिमाधारी के मचित्त का अधित्त करने का स्याग नहीं होता। सचित्त को अचित्त करने की गति यह है~मूसी, परी गम, सटाइ या नप म मिली हुइ तथा इंटी और पिमी हुइ वस्तु प्रामुक (अचित्त ) हो जाती है। पानी में लनङ्ग श्रादि का चूर्ण डाल देने पर जब उमरा वर्ण और रस बदल जाता है तर यह भी प्रामुक (अचित्त ) हो जाता है। बीज सचित्त होता है।
सरन जैनधर्म प्रवेशिका-चतुर्थभाग मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना से रात्रिम चारा प्रसार क श्राहार का सस्था त्याग परनाx रानिभोमन- त्यागातिमा कहलानी है । इस प्रतिमा का धारी सूर्य छिपने के दो घडी पहिले मे सूर्य निकलने के दो पड़ी याद तक भोजन नहीं कर सकता। यहीं कहाँ इस प्रतिमा का नाम 'दिवामेथुनत्याग' (दिन म मैथुनत्याग करना) भी कहा है। ब्रह्मचर्यप्रतिमा का लक्षण- मैथुन नव साल प्रभेद, मर्वप्रकार वजे निरखेद । नारिकथादिक मी परिहरी, ब्रह्मचर्य प्रतिमा को धरै ॥७॥ मन, वचन, काय वा कृत, कारित, अनुमोदा से अपनो भी स्त्री का त्याग करना ब्रह्मचयप्रतिमा कहलाता है। श्रारम्मत्यागप्रतिमा का लक्षण- जो कछु अस्प बहुत अधकार, गृहमनधी मो मब त्याज। निगरम्म है वृपरत है, सो जिय अष्टम प्रतिमा वहै ॥८॥ हिमा के कारण स्वरूप नोक्रा, सेती, व्यापार श्रादि गृह- कार्य सम्मन्धी सभा तरह की नियात्रा का मन, वचन, काय और कृत कारित अनुमोदना मे त्याग करना प्रारम्भ-स्याग" अनिमा कहलाती है। इस प्रतिमा का धारी स्नान, दान और xमास-दोष का अपेक्षा दशनप्रतिमा म और जसहिंसा की अपेक्षा प्रतप्रतिमा में यद्यपि रात्रि में चारों प्रकार क श्राहारा का अतिचारसहित त्याग हो जाता है तथापि पुन पौत्रादि फुटुम्या ताश्रयजना के निमित्त से कृत, कारित, अनुमोदना सम्बन्धी जो दोप आते थे जाके यथावत् त्याग की प्रतिज्ञा यहाँ होता है।
एकादश प्रतिमा का वर्णन पूनन कर मरता है। अथात धर्मकार्य का प्रारम्भ कर सस्ता है। इस दर्जे का गृहस्थ घर म रह कर भी धर्म साधन कर सकता हे श्रार घर को छोड़ कर भी धर्मसाधन र सस्ता है। जो बुलाता है उसके यहाँ भोजन कर पाता है। चातुमास करना इसके लिये असिाय है। परिग्रहत्यागप्रतिमा का लक्षण- वस्त्रमात्र रस परिग्रह अन्न, त्याग कर जो प्रतमम्पन्न । ताम पुनि मृच्छा परिहर, नवमीप्रतिमा सो भवि धरै ॥९॥ धन, धाय श्रादि दश प्रकार के याहा परिग्रह को पाप का कारण जान त्याग कर सन्तोप धारण करना परिप्रहत्यागप्रतिमा पहलाती है। इस प्रतिमा का धारी अपने लिये कुछ आवश्यक घस्न वा वतन रस लेता है। स्पया पेमा नहीं रखता, घर का स्याग पर घमशाला आदि एकान स्थान में रहता है। द्रव्य मे पूनन भा नहीं करता । माननशुद्धि का निश्चय रहने पर निमत्रए स्वीकार करता है। अनुमतित्यागप्रतिमा का लक्षण- जो प्रमाण अघमय उपदेश, देय नहीं पर को लवलेश । तसु अनुमोदन भी जो तज, सो ही दशमीप्रतिमा सर्ने । सेली, व्यापार, पिनाह श्रादि गृहस्थी के सिी भी लौकिक कार्य मे अनुमोदना या सम्मति नहीं देना अनुमतित्याग- जान पड़ता है रितप्रतिमा से लेकर स्मिी भी प्रनिमा म गृहत्यागा होने पर उसक कुटुम्पसम्बन्धी वृद्धि हानि का सूश्रा सूतक नहीं माना जाता, क्याकि श्रय उसके कुटुम्ब सम्बन्ध नहीं रहा। जूता व छतरी का त्याग अाठी प्रतिमा में होता। - L re- सरल जैनधर्म प्रवेशिका-पतुघमाग प्रतिमा कहलाती है। इस प्रतिमा का धारी भोजन के ममय जो श्रावक उसे अपने यहाँ भोजन को युलाता है उसके यहाँ मोजा कर पाता है। परन्तु यह नहीं पहता कि मेरे लिये अमुक भोपन पनाओ । उदासीन होकर प्राय पैत्यालय या मठ आदि म रह पर धर्मध्यान में तत्पर रहता है। उदिष्टत्यागप्रतिमा का लक्षण- ग्यारम थान मेद हैं दोय, इक क्षुल्लक एक ऐलक सोय । घण्टबस्त्र पर प्रथम सुजान, युत कोप नहि दुतिय पिछान ।। ये गृहत्याग मुनिन ढिंग है, वा मठ मन्दिर में निवसहै। उतर उदण्ड उचित आहार, करहिं शुद्ध अप्राय निवार । घर छोडार धन या मठ में तपश्चरण परना, ४ सण्डार या लगोट धारण करना, विना याचना क्येि भिक्षावृत्ति मे योग्य आहार करना अपन निमित्त पनाया भोजन, पीबी, कमण्डलु या वसतिका नहीं लेना "उद्दिष्टत्यागप्रतिमा कालानी है। इम प्रतिमा के दो भेद है। १~ शुल्लक और ऐलक । क्षुल्लक का लक्षण- जो एक लगोली वा योधी चदर (ग्वएडवस्त्र) रसते है, माल पैंचाया स्तरे से बनवाते हैं, + पीछी और कमडलु रखते हैं, चया से गृहस्थ के यहाँ धैठरश्मिी पान म भोजन करत हैं वे चला कहलाते है। - x जिससे शिर दक्ता है तो पर नहीं ढक्ता और पर डरता तो शिर नहीं डक्वा ऐसा वस्त्र 'सएडवस्त्र कहलाता है। + वहीं पही कोमलयरत्र रसने का भी विधान है। शुद्ध क्षला लोहे का और उच्चवण वाले पीतल का पात्र रसते हैं।
एकादश प्रतिमाया का वर्णन -- ऐलक का लक्षण- जो अपने केशो का लार करते हैं, केवल लगोटी, पीछो वा कमण्डलु रसते हैं। चया से जाकर गृहस्थ के यहाँ बैठकर अपने हाथ पर ही रखकर भोजन करते हैं और मुनियत का अभ्यास करते हैं उन्हें ऐलक कहते हैं। ये माह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के ही होते हैं। मतिमाधारी के गुणस्थान-- इमि सब प्रतिमा एकादश, 'दौल देशवत थान । गहै अनुक्रम मूल सह, पाले भनि सुखदान । ये १९ प्रतिमाएँ 'देशनत नामक पचम गुणस्थान में होती हैं। इनको क्रम से पालने वाला भव्य स्गादि का उत्तग सुम्य पाता है। इनमें मे १ मे ६ प्रतिमा वाले जप याधक, से प्रतिमा वाले मध्यमग्नावक तथा १० या ११शी प्रतिमा याले उत्तम प्रावक कहलाते हैं। प्रश्नावली १-अमुकप्रतिमा, एलक, लन के लिये उममे पहिले तुला, प्रतिमा और सचित्त की प्रतिमा का पालन करना का लक्षण कहिय। श्रावश्यक हे २.-अतिम प्रनिमाधोरी, ६-धायक की प्रतिमा प्रतिमा के भेद बनलाइये। और भगवान की प्रतिमा में ३--प्रतिमाधारी के कौन क्या अन्तर है? दोनों में कुछ सा गुणस्थान होता है? सम्बन्ध है या नहीं? ४-प्रतिमाश्रा का धारण ७.-सामान के त्यागो, प्रोप कौन, कर और क्यों करता घोपवासी, लौकिक कार्यों की है। अनुमति के त्यागा ओरलगोर्ट ५-क्सि प्रतिमा के पा के सिराय मय परिह के -~- के कौन कौन प्रतिमाएँ ? --व्यापार,रेल की मुसा लन्दनयात्रा, मृत्यु का युद्व, अध्यापकी, ज्यो सम्पादकी, वकानात, , राज्य और न्याय करते नसी प्रतिमा का पालन कता है? २-पहली,सातवी,नयमी, ग्यारहवीं प्रतिमा पा । कौन कौन काम उससे आप क्या समझे है। १४-माम प्रतिमाधारी खोसमा म भाषण देगा या नहीं? १५-अनुमति यागोनिम प्रण मानेगा या नहीं। १६-अष्टम प्रतिमाधारी मदिर पनगाने की सलाह देगा या नहीं? १७-अंतिम प्रतिमाधारी श्रावक है या मुनि ? उसके पाम कौन कौर वस्तुएँ होती है ? उसके प्रावन होते हैं या महायत? १८-प्रेतिम प्रतिमाधारी पाठशाला की स्थापना, पाठ शाला के लिये चन्दा की अनु मोदना, रल घोड़ा गाड़ी में सारी, शाखयाचना, प्रन्थ रचना और रोग की सूचना परेगा या नहीं? १६-प्रतिमाधारी जिन मदिर रहित प्राम में रहेगा? २०-ए प्रभचारी प्रोष धोपवास नहीं करते तो उनके कौनसी प्रतिमा होसफ्ती है? १०-द्वितीय प्रतिमाधारी न म भोजन करेगा या ? यदि नहीं तो रात्रि बनत्याग छटवी प्रतिमा रसी? ११-द्वितीय प्रतिमाधारी निमाल सामयिक करना वश्यक है या नहीं? १०-सामायिक की विधि लाइये ? सामायिर रिस माधारी को अनिवार्य है? १३-छटवी प्रतिमा का नरा नाम क्या है और पाठ आठवां तत्वो और पदार्थों का वर्णन - तत्तका लक्षण- जिनके जानने या नद्धान करने मे हमें अपने प्रात्मा के सरचे हित का ज्ञान हो सस्ता है हम अपने श्रात्मा को पवित्र कर सकते हैं उन बातों का, या वस्तु के स्वभाव को तत्त्व कहते हैं। तत्त्वों से भेद या नाम- १-जीय, -अजीन ३-श्राव,४-यध,५-संवर, ६-निर्जरा और ७ मोत ये सात तत्त्व है। इनमें पुण्य और पाप मिला देने के पदार्थ हो जाते हैं। जीव और अजीव का लक्षण- जिसम भावप्राण और द्रव्यप्राण दोनों या कोई एक पाया जाता ६ उसे जीव कहते हैं । जिसमें एक भी प्राण नहीं होता वह अनोय कहलाता है। जीवों के द्रव्यप्राणों का विवरण जीव इन्द्रियाँ चल पायु, राम, सरया रेन्द्रिय सशन ४ दीन्द्रिय " रसा ६ श्रीद्रिय "माण चतुरिन्द्रिय श्रसैनी'क्ण " मन " वचन " " " " " , " चनु n " " " ६ पचेन्द्रिय सेनी " " " , सही कमों का प्रायन होना है। ये चार श्रास्त्रव के कारण है। मिथ्यात्व या मियादशन कहलाता है। या प्रतत्वद्वान सरल जनधम प्राणों में भेद का निभाग- ज्ञान और दर्शन या जानने और देखने की शक्ति ये दो माव- प्राण हैं । यथा ५ इन्द्रियाँ, ३ बल (मनोरल, वचनयल, फायबल), आयु और स्वासोच्छनास ये १० द्रव्यप्राण है। श्रास्त्रव का लक्षण- राग द्वेष आदि भागों के कारण पुद्गल कों का सिंच कर आत्मा की ओर पाना श्रास्रव कहलाता है। जैसे किसी नाव में छेद हो जाने पर पानी पाने लगता है, वैसे ही आत्मा के शुभ अशुभ भाव होने पर पुद्गल र्म सिंच पर आत्मा को और आते है। अथवा जिस प्रकार गरम लोहा पानी को रीच लेता है, उमी प्रकार प्राणी अपने योग और भावों द्वारा कमों को अपनी पर टींच लेना है। यही प्रास्त्र कहलाता है। श्राव के भेद या उनके लक्षण- श्रात्मा के दिन राग द्वेष श्रादि भाग से कर्म आत्मा की ओर भाते हैं न भावों को भार श्रार' कहते है। पुद्गलमय शुभ और अशुभ रम परमाणुया का पाल्मा की ओर सिंच कर मिश्यात, अपिरनि, पाय और योग इन चार मुरय कारणा श्रामा म मिन ससार की वस्तुत्रा में राग द्वेष करता और शुद्ध आत्मा का अनुभव (निश्चय या अद्वान) न होना श्राना 'द्रव्य भाव कहलाता है। मात्रय के कारण- - Ind मिथ्याय का लक्षण, कार्य वा भेद-- तत्वों और पदार्या का वरणन होना श्रर्थान् यथार्थ तत्त्या तथा उनके यथाथ स्वरूप से उल्टे अयथार्थ तत्वों पर तथा उनके अयथाथ स्वरूप पर विश्वास करना मिथ्यात्व कहलाता है। इस मिथ्यात्व के कारण ससारी प्राणी के अनेक प्रकार के सकल्प विकल्प हुआ करते हैं और शान्तस्वभार का नाश हो जाता है इमो से यह कर्मों के पासव का कारण है। एकान, विपरीत, विनय, सशय और ज्ञान ये ५मिथ्यात्व x के भेद हैं। अपिरति का लक्षण वा भेद- श्रात्मा का अपने शुद्ध चिदानन्दमय स्वभाव मे विमुख होकर वाहिरा अन्य विषयों में लगमा अविरति कहलाती है। पाचों इन्द्रिया और मन को वश म नहा रसना तथा छह काय क जीवा की हिंसा करना ये १२ अविरति के भेद हैं। ४ १-स्तु म रहन गाले अना गुगण या धर्मों का लक्ष्य न रख मा म ही रूप श्रद्धान करना एकान्त मिध्यात्व कहलाता है। २-वस्तु के असली स्वरूप को न जान कर उटा श्रद्धान, करना विपरीत मिध्यान कहलाता है। ३-मुगुरु सुदव सुधर्म, या बुगुर उदेव-कुधर्म इन सब को एक सदृश मानना-पूजना या सच्च तत्वों वा भूले तत्वों को एक्मा मममता, दोना को एक्सो महत्त्व की दृष्टि से देखना या सभी मतों का एकरूप मानना निनय मिथ्यात्व कहलाता है। ४--किमी वस्तु के स्वरूप का ठीक-ठोर निर्णय न होना, यह वस्तु ऐमो है या नहीं ? कौन मत्य है कोन असत्य ? इस प्रकार भ्रम बना रहना मराय मिथ्या कहलाता है।५--हित अहित की परीक्षा क्येि बिना हो श्रद्धान करना और विरेकरहित रहना अज्ञान-मिथ्यार पहलाता है।
६ uy - wwwaunMMAR - । सरल धर्म प्रशिक-चतुर्थभाग नोट-कषायों के लनण ५भेद तथा भेदों के लक्षण एमी पुस्तक के दश पाठ में लिम्वे हैं। इन पाया में भी को का प्राव होता है। योग का लक्षण- मन म कुछ विचारने, जिह्वा से कुछ घोलने और शरीर से कोइ काम करने से मन, जिहा और शरीर का हलन चलन होना और मन आदि के हलन चलन से उनमें रहने वाले प्रात्मा का हलन चलन होना योग कहलाता है। प्रात्मा में हलन चलन होने से भी कर्मों का पात्रय होता है। योग के भेद वा प्रभेद- योग के द्रव्ययोग और भावयोग ये दो भेद हैं। अथवा मनो योग, वचनयोग और काययोग ये तीन भेद भी हैं । योग के विशेष भेद १५ पद्रह हैं- सत्यमनोयोग, असत्यमनोयोग, उभयमनोयोग, अनुभय मनोयोग, श्रीदारिफकायगोग, औदारिकमिश्रकाययोग, वैक्रियिक काययोग, वैवियिमिक्षकाययोग, आहारकमाययोग, आहारक मिश्रमाययोग, कार्माण योग, सत्यवचनयोग, असत्यवचनयोग, उभयवचनयोग और अनुभयवचनयोग ये १५ योग के भेद हैं। श्रास्त्रव के कारण या भेद- ५ मिथ्यात्य, १२ अविरति, २५ क्पाय और १५ योग फुल मिलाकर पासव के भेद या कारण ५७ होते हैं। जो आत्मा के गुए का घात करता है अथवा जिससे आत्मा विभावरूप होकर वध अवस्था को प्राप्त होता है उसे पाय कहते हैं। - यह द्रव्ययोग का लक्षण है। + यह भारयोग का लक्षण है। +- तत्वों और पदार्थों का वर्णन ६७ - वन्धका लक्षण- राग द्वेष के निमित्त से आये हुए शुभ और अशुभ पुद्गल कर्मों का आत्मा के साथ दूध और जल के समान मिल कर एक मेक हो जाना यन्ध कहलाता है। नेम नाच म छेद के द्वारा पानी श्रावर नाव में इक्ट्ठा हो जाता है वैमे ही क्म श्राकर आत्मा के साथ बँध जाते हैं। यन्ध के भेद या उनके लनण- भाग्य व श्रार द्यबन्ध ये दो वन्ध भेद हैं। श्रात्मा रेनिन शुभ या अशुभ भावों से क्म का पन्य होता है उन भावों को भावनध पहते हैं। तथा शुभ या अशुभ माना के पारण जो कर्म परमाणु आत्मा के प्रदेशों के साथ दूध और पानी के ममान एक्मेक होकर मिल जाते हैं उहें द्रव्यमन्ध यहत है। पन्धकाठान- जैसे धूलि उद्द कर गाले कपडे म लग (चिपक ) जाती है, सी एकार मिध्यात्र प्रादि परिणामों से कर्म आते हैं और ये प्रात्मा के प्रदेशों के साथ मिल जाते हैं। बघ के कारण- श्राव भोर घध यद्यपि साय माथ एक ही समय म होता है तो भी इनमें कार्यकारण-भार है। श्राखर कारण है, और वध काय है। इसलिये नितने श्राव हे, व सभी यन्ध के कारण हैं। सवर का लक्षण- श्राम्रव का न होना अर्थात श्राते हुये कमा का ना सबर कहलाता है । जसे निस छेद से नाव में पानी श्राता है, -whomww--- - - सरल जैनधर्म प्रवेशिका-चतुथभाग उस छेद म डाट लगाकर पानी पाना बन्द कर दिया जाता है, वैसे ही शुभ और अशुभ परिणामों द्वारा पाने वाले कर्म शुद्ध भारी से रोक दिये जाते हैं। वही सपर कहलाता है। समर के भेद और उनके लक्षण-- भावसंवर और द्रव्यसंवर ये दो मवर क भद हैं। जिन परिणामा से कमां का श्राना रुस्ता है, घे परिणाम भावसकर कहलाते हैं। तथा भाषसवर के द्वारा पुद्गलपरमाणुश्रा का कर्म- रूप होकर श्रात्मा की ओर न आना व्यसबर कहलाता है । सवर के कारण- ३ गुप्ति, ५ ममिति, १० धम, १२ अनुप्रक्षा ( भावना २० परीपहजय और ५ चारित्र- ये ५७ सबर के मुरयकारण हैं। इनमें से गुप्ति, समिति और धर्म का घणन पचपरमेष्ठी के मूलगुणों में इसी पुस्तक के प्रष्ट न. २५, २९, ३० में है। अनुप्रे क्षाओं (भावनाओं) का वणन इप्सी पुस्तक के द्वितीय भाग के द्वितीय पाठ में किया गया है। और परीपदों का पणन इसी पुस्तक में भागे पृष्ट ७३ पर देखिये। चारित्र का लक्षण वा भेद- श्राम स्वरूप म स्थिर होना चारित कहलाता है। इसके सामायिन और छेदोपस्थापना 'प्रादि ५ भेद हैं। में समान x मब जाना पर ममताभाय रसना, सुप दुर रहना तथा शुभ और अशुभ विकल्पों कात्याग करनामामायिक चारित कहलाता है। २~मामायिक चारिन से डिग जाने पर अपने को शुद्ध श्रात्मा के अनुभव में फिर लगाना तथा व्रत श्रादिक भग हो जाने पर प्रायश्चित श्रादि लेकर फिर साधा होना छेदोपस्थापना चारित्र कहलाता है। ३-राग द्वष श्रादिक ।
--- -- वत्त्वों और पदार्थों का वर्णन ६६ निर्जरा का लक्षण- श्रात्मा के माथ बंधे हुए कमों का थोड़ा थोड़ा माग क्षय होजाना निर्जरा कहलाती है। जैसे भाव में छिद्र के द्वारा पाकर जो पानी भर जाता है यह थोड़ा थोडा करके थाहर निकाल दिया जाता है वैसे ही श्रात्मा के साथ बंधे हुए कर्मों को धीरे घोर तपश्चरण द्वारा या उनकी स्थिति को पूर्णता द्वारा प्रारमा जुदा कर दिया जाता है वही निर्जरा है। निर्जरा पे भेट और उनके लक्षण- भारनिजग और दयाननरा ये दो निरा के भेद है। आत्मा के निस परिणाम (भार) स पुद्गलकम अपना कल देकर या मिशा फज्ञ दिये नष्ट हो जाता है उस परिणाम को भाष निर्जरा कहते है। और यमरूप पुद्गला का समय पार या तपश्चरण द्वारा आत्मा से अलग होने की द्रव्यनिर्जराकहन हैं। विकल्पा का त्याग पर अधिना के माथ आत्मशुद्धि करना परिहार निशुद्धिचारित्र कहलाता है। 1-अपने अात्मा को पाय से रहित करते करते सूक्ष्म लोभ कपाय नाममात्र रो । रह जाता सूक्ष्म साम्पराय कहलाता है । नाममात्र रहे सूदालाम क्याय को भो दूर करने की कोशिश करना सूचनमाम्परायचरित्र कहलाता है । --श्रामा को जैसा कपायरहित निकम्प शुद्ध स्वभार है वैसा होकर सम मग्न होना यथारयान चारित्र दलाता है। + पज कर अपनी स्थिति पूर्ण होने पर कर्मों का श्रात्मा मे स्वयमेव जुदा हाना सविपार निर्जरा कहलाती है। तथा स्थिति पूण हुए पिना ही तप करक निमी कम का श्रात्मा से जुदा कर देना अस्पिानिपरा कहलाती है।
७० सरल जैनधमस्यशिका-चतुर्थभाग marawww मान का लक्षण- ज्ञानावरण आदिक पाठ धर्मों का सय हार श्रात्मा का सर्वथा शुद्ध हो जाना मोक्ष कहलाता है। जैस किसी नाप के श्रदर भरा हुश्रा सय पानी मिलकुल निकाल फर नाव को साफ कर दिया जाता है उमी प्रकार सर पूघर निरा होते होते जय सय कमां का क्षय हो जाता है और केरल पारमा का शुद्ध स्वरूप रह जाना है तभी यह श्रात्मा उध्वगमन स्वभाव होने से तीनों लोगों के ऊपर जा विराजमान होता है, दमा का नाम मोक्ष है। मोक्ष के भेद और उनके लक्षण- द्रव्यमोक्ष और भावमोद ये दो मोक्ष के भेद है। श्रामा का जो शुद्ध परिमाण समस्त पुद्गल कम के नाश का कारण होता है, वह परिणाम भावमाक्ष कहलाता है । द्रव्यम्मा का प्रात्मा से सर्वथा दूर हो जाना द्रव्यमोक्ष कहलाता है। पदार्थ का लक्षण योर भेद- जिसम तत्व पाया जाता है स पदाथ रहते हैं। सात तब्ध और पुण्य तथा पाप मिला पर । पदाथ होते हैं। पुण्य का लक्षण और दृष्टान्त- निसके उदय से प्राणी को इष्टवस्तु तथा सुग्यदायक सामी प्राप्त होता है, उसे पुण्य कहत हैं। जैस-मुपुर की प्राप्ति, व्यापार म लाभ और उच्चपद की प्राप्ति ये सब पुरय उदय से होते हैं। पुण्यष व के कारण धर्मपालन करना, पूजन करना, दान देना शिक्षामचार और परोपकार करना श्रादि शुभ (अच्छे) पायर्या स पुण्य का बन्ध होता है।
------ -me- - - - तरमों और पदार्था का वरणन ७१ पाप का लक्षण और दृष्टान्त- निमम उदय से प्राणो को अनिष्टवस्तु और दुसदायक सामग्री प्राप्त होती हैं उमे पाप कहते हैं। मे-पुत्र मर जाना, घाटा पड़ जाना, चोरी हो जाना और गेग हो नाना श्रादि। ये सर पाप के उदय से हाते हैं। पापरघ के कारण- हिंसा परना, भूर बोलना, चोरी करना, परनिन्दा रना, किसी का बुरा विचारना और जुत्रा सेजना श्रादि सरान कार्यों के करने से पाप का यन्ध होता है। प्रश्नावलो- १--अमीर, प्रज्ञान, अनु पदार्थ, पन्ध,मिथ्यात्य, मात, प्रेक्षा,अपिरति,पासव,एकान्त योग, समित और सवर के मिथ्यात्व, क्पाय कुनय भेद बतलाइये? मिथ्यात्म गुमि चारित्र,छेदशेप ३-असेनी, चींटी ति स्थापनाचारित्र, तत्व, पदार्थ, यय, देव, नारकी, पचेन्द्रिय, परिहारचारित्र,पाप,पुण्य,प्राण, वृक्ष, मक्खा शरर और विपरीतमिथ्यात्न,विनयमिध्या हाथ + कौन कौन प्राण स, मिथ्यान, मोक्ष, यथारया होते हैं ? तचारित,योग,ममिति, सामा ४-प्रारहिन वस्तुप्रा या यिषचारित्र, मूदमसाम्पराय तत्त्वों के नाम कहिये ? चारित्र और मशमिध्यान -ऐसा कौन जार है का लक्षण कहिये। जिममें द्रव्यमाण एक भी नहीं २-~अजीव, श्रनुप्रता, होता? अनिरति, श्रावर, पाय, ६-जावतर का और गुप्ति, चारित्र, नत्र, निरा, तत्वों से कौनमा सम्बन्ध ? पदार्थ, प्राण, प्राणरहित और क्र मे क्य तक है ?
rani ५२ सरल जैनधर्मप्रवेशिमा-चतुर्थभाग ७-विस हालत मानव कारण हैं जिनसे पन्ध नहीं और इन्ध नहीं होते केवल होता। निजरा होती है। १२-~बन्ध जो सुना जाता -पहिले श्रासा होता है यह किम वस्तु का होता है या वध? --भानास्तव और द्रव्या १३-कौनसा चारित्रहाने नव में, भावनिर्जरा और द्रव्य पर श्रास्रा और उन्ध नहीं निर्जला में, निर्जरा और मोक्ष होते? में क्या अन्तर है, उदा १४-पहिले निर्जरा होती हरण दरर रतलाइये? है या मोक्ष १०-जहाँ भानास्रव होता १५-किन पिन कार्यों के है वहाँ द्रव्यात्रा होना है या करने मे पुण्य और पाप नहीं ? होता है? ११-पन्ध के कारण कौन १६-पुण्यपाप को अदा पौन हैं? ऐमे कौन कौन हरण देकर सममाइये। १७-पाठशाला, अनाथालय, श्रीपधालय, महिलाश्रम सुल वाने, छात्रवृत्ति देने, स्त्रिया को पाने, स तान को न पढाने, भक्तिपूर्वक पूजा स्तुति करन, मदिर हाने र उही फो व्यवस्था न होने पर भी अपने नाम को नया मदिर धनवाने, धर्मादाक स्पयों का दुरुपयोग करने, मदिरों का पेसा न देने, गुप्त दान वो धम करने हिमकों म धम की पुस्तकें बॉटने, निधनों का महायता करने, हिमकों से नाता रखने, बेटी बेच कर पूजा प्रतिमा कराने, छोटी उमर में स तान का विवाह करने, स्पया लेकर अयोग्य वर से विवाह करने, धर्म के लिये भूठ बालने, भूठी हो म हाँ मिलाने, उल्टा अर्थ समझा देने, पिता क न देने पर पुस्तका के पैसा चुराने, अपने निये भीस माँगने और धर्मशय को रिशवत लेने आदि से पुण्य होता है या पाप ?
पाठ नरमा वाइम-परीपही का वर्णन परीषद का लक्षण- वपन्न हुई भूप-प्रादि को वेदना को कमों की निरा और कायक्लेश करने के लिये शात भावों में सह लेना परीपद यह लाती है। परीपदा के भेद-सुपा, तृपा, सीन ना, दशमशक, नाग्य, अति, घी, चया,निपया, शरया, श्रामोश, वध, याचना, अलाम, रोग, तृणाश, मल, सरकार पुरस्कार, प्रज्ञा, अशान और श्रदशन ये बाइस परीपद हैं। १-सुधापरीप का लक्षण-सुधा (भूम) ये दुम को शान्त- भार म सह लेना सुधापरापह कहलाती है। -तुपापरोपद का लक्षण - भूपा (प्याम ) के दुख से शातभार मे सह लेना मुपापरोपह कहलाती है। ३-शीपरीपद का लक्षण-शीत (श, जाडे) का दुग्य शा तमाव से महलेना शातपरोपद कहलाता है। ४-माणपरीपत का लनग्ग-3 (गर्मी) का दुस शा नमार में मह लेना परीपद सरलाती है। ५ दगमशक्परापह का लक्षण-डास, मच्छर, वियू, कानसनूरा, घिरती आदि के काटने मे स्पन्न दुपाको शान्त भाष मे मह लेना देशमनपरीपह कहलाती है। ६-नायपरीपद का लक्षण- बरस्यागी हाने स नग्न रहने पर भी मन में मिमीप्रसार लावा निकार नहीं करना नायपगेपइ कहलाती है। -अरविपरीपद का लक्षण- इष्ट और अनिष्ट पदार्था में राग द्वेप नहीं करना, ममतामाष धारण करना भरतिपरीषद कहलाती है। - - सरल नैनघमप्रवेशिम-चतुर्थमा प्रश्नावली- N 1-परीपह मे श्राप क्या समझते हैं? २-अमुक परीपह का लक्षण बतलाइये। ३-परापहा के नाम या भेद यनलाइये? ४-परीपद कौन क्यों सहन करते हैं। उनके सहने से क्या लाभ होता है? y-ऐसा वीर पताश्री जिसको परीपह सहने की जररत हा नहीं होतो? ६-एक समय म एक ही परीप होती है यो ज्यादह ? ७-द्वीपायन ने कद्व होकर कौन परीपत्नी जीती थी? -ऐमी कौन परीपहें हैं जो परस्पर विरद्ध है? -अरिहत क स्तिना परीपहं होती हैं ? उनसे उ हैं दुख होता है या नहीं? १०-निम्न प्रश्नों में कौन कौन परीपहें सहन की गई हैं ? क-सुकुमाल का आधा शरार स्यालनी नेसालिया पर वध्यानारुद ही रहे। स-ए* साधु ने भयर रोग हो जाने पर भा दया न मागा। ग-राजा श्रेणिक ने एक मुनिराज के गले म मरा सर्प डाला परतु उन्होंने प्राशी द ही दिया। घ-एक मुनि जेठ की दुपहरी में पर्यंत पर ध्यान लगायेरहे, गर्मी की पर्वाद नहीं की। च-स्वर्गमे पार सीता के जीव ने ध्यानम्र राम को अपने हामार मे मोहित करने की कोशिश की परन्तु य विचलित हुये। छ-कुछ उपद्रविया ने एक क्त्तव्यशील साधु पर पत्थर फेंक और गालियाँ दी परन्तु वे मुद्ध नहीं हुये।
पाठदशवां कर्मों के उत्तर भेद या प्रकृतियाँ ३ ५ ज्ञानापरणाम की दशनावरणस्म की वेदनीयकर्मको २ मोहनीयरर्म की आयुर्म की नामस्म की ६३ गोत्रकर्म की अतरायर्म की इम प्रकार मय मिलाकर पों की उत्तर प्रकृतियों या उसर भेद १५८ एकसो अड़तालास हैं। ज्ञानापरणकर्म की उत्तर प्रकृतियाँ या भेद मतिज्ञातावरण, श्रुतज्ञानावरण, अवधितानावरण, मन - पययज्ञानाचरण और कलज्ञानापरण ये ५ ज्ञानापरणकर्म के भेद याप्रतियाँ हैं। मतिज्ञानावरणसम का लक्षण- १-विस फम के उदय से मतिज्ञान का श्रापरण x या घात होता है उसे हमतिमानावरण कहते हैं । -श्रुतज्ञानापरणम का लक्षण-जिस कम के उदय से शुतज्ञान का प्रावरण या पात होता है उसे श्रुतज्ञानावरण कहते हैं। ४ श्रावरण-श्राद, धात या परदा। यद्यपि मनिशाना वरण और १ तज्ञानापरणाम के स्ििचत् क्षयोपशम से थोडा यहुत शान सभी प्राणिया के होता है, परन्तु शेष सर हानों को पाँचा शासवरण कम न्यूनाधिररूप से ढाँके रहते हैं। ( ७७ )
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सरल जैनधम प्रयेशिका-चतुर्थमाग
३-अवधिज्ञानावरण कम का लक्षण-निमे कम उदय
से विज्ञान का प्रावरण या पार होता है मे अधिशाना
वरण यहते हैं।
४ मन पययज्ञानाचरणम्म का लक्षण-निम कर्म के उदय
से मन पर्ययज्ञान का प्रावरण या घात होता है उसे मन
पर्ययज्ञानाचरण कहते हैं।
५-केवलझानावरणकर्म का लक्षण-निम धर्म के उदय मे
केवलज्ञान का श्रावरण या पात होता है या समता प्राप्त
नहीं होती उस केवलज्ञानावरण कहते हैं।
दर्शनावरणफर्म की उत्तरप्रकृतियाँ या भेद
चतुदर्शनावरगा, अचतुदर्शनावरणा, अवधिदर्शायरण, क्य
लदशनामरण, निर निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचनाप्रचला और
त्यानगृद्धि ये ६ दशनावरण फर्म की प्रवृतियाँ या भेद है।
१-चतुर्दर्शनावरण का लक्षण-निस फर्म के दय से पतु
द्वारा होने वाले सामान्य अवलोकन का पात हाता है या अधा,
फाना या दृष्टिहीन होता है उसे चक्षुर्दशनावरण कहते हैं।
२-अचशनायरण का लक्षण-निम कर्म के अन्य मे
चतु के मिवाय अ य चार इन्द्रिया या मन द्वागने घाले
सामान्य अवलोकाया घात होता है या पहिरा था गंगा होता
है उसे अचक्षुर्दशनासरण कहते हैं।
३-अवधिदर्शनावरण का लक्षण-जिस कम के उदय से
अवधिदर्शन का घान होता है उसे अघधिदर्शनायरण कहते हैं।
४-देवलदशनावरण का लक्षण-जिस कम के उदय से
केयलदशन था। सर्वदीपने का पात होता है उसे फेरल
दर्शनावरण कहत हैं।
, घेदनीयस्म की प्रकृतियाँ या भेद ५-निद्रादर्शनावरण का लक्षण-लिस कर्म के उदय से निद्रा (नींद) आती है उसे निद्रादशनावरण कहते हैं । ६-निद्रानिदादशनावरण का लक्षण-जिस कम के उदय से नींद के बाद फिर नाद (गाढनींद ) थाती है, आँख भा नहीं खोल सकता उसे निद्रानिद्रादर्शनावरण कहत हैं। ७-प्रचलादर्शनावरण का लक्षण-जिस कर्म के उदय से प्राणो कुछ नागता है और कुछ सोता है उसे प्रचला कहते हैं। ८-प्रचलामचलादर्शनावरण का लक्षण-जिम कर्म के उदय मे सोते समय मुख के बार बहती है, कुछ अङ्गोपाङ्ग भी चलते हैं और सुइ आदि चुभाने पर भी चेत नहीं होता उसे प्रचलाप्रथला कहते हैं। -स्त्यानगृद्धिदशनावरण का लक्षण-जिस धर्म के उदय मे प्रायो सोते समय नाना प्रकार के रौद्र कार्य कर डालता है और जागने पर मासूम भी नहीं रहता कि मैंने क्या क्यिा उसे स्यानगृद्धि कहते हैं। इमरे उदय से प्राणी सोने ही गार जारर श्राजाता है । नाचने, गाने, दौडने और मारने लगता है। वेदनीयकर्म की प्रकृतियाँ या भेद- मातावेदनीय और असानावेदनीय ये दो चेदनीय क्म की प्रकृतियों या भेद हैं। श्र तदर्शन और मन पय यदर्शन न मारने का कारण- १- नधान, मतिज्ञान या श्रु तज्ञान के हो पश्चात् होता है इसके पेरनर दशन नहा होता इसलिये ध्रु तदशन नहीं माना गया है। -मन पययमान भी इहामतिनान के हा पश्चात् होता है इससे इसके पूर दर्शनापयोग नहीं होता इमलिये मापय यदर्शन नहीं माना गया।
ANTARA
मरल जैन म प्रवशिका-चतुथभाग
१-सातादिनीयकम का लक्षण-जिस यम के उदय से
शारीरिक और मानसिक आदि अनेक प्रकार सुख सामग्री या
सुस को प्राप्ति होती है उमे साता वदनीयर्म कहत हैं।
२-असातादनीयकम का लक्षण-सिक्के दय से
दु सदायक्साममो या दु सफा प्राप्ति होती है उमे असावा-
येदनोयकर्म कहते हैं।
मोहनीयकर्म की प्रकृतियाँ या भेद---
दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनाय ये दो मोहनीयकम के
भेद या प्रतियाँ है।
दशनमाहनीय का लक्षण-जिम पम के उदय से प्रामा
के सम्यक्त्वगुण का घात होता है उमे दशनमोहनीय कहते हैं।
दर्शनमोहनीय के भेद-मिथ्या प्रकृति, सम्याइ मिध्यान
प्रति और मम्यक्त्व प्रति ये तीन दशनमोहनीय के भेद हैं।
५-मिथ्यात्वप्रकृति का लक्षण-जिस पर्म के उदय से
सर्वज्ञमापितमार्ग से विमुखता, तत्त्वार्थद्वान में अनुत्साह और
हित श्रहित की परीक्षा में श्रममथना होती है उसे मिया
समति कहते है।
-सम्यामि या प्रकृति का लक्षण-जिम पम के उदय
से दही और गुड़ के मिले हुये स्वाद क ममान तत्त्या के श्रद्धान
और अश्रद्वान रूप गिले हुए भार होते ई उसे मम्मा मिथ्यात्व
--सम्यक्त्वप्रकृति का लक्षण-जिम फर्म के उदय से
यथार्थ तत्वा का श्रद्धान चल, मलिन और श्रगाद नामक दापा
से दूपित होता हे उसे सम्यक्त्वप्रकृति कहते हैं।
चारित्रमोहनीय का लक्षण-निस क्म के उदय से बात्मा
के चारित्रगुण का पात होता है उसे चारित्रमोहनीय कहत हैं।
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-~ - Anww 1 मोहनीयकर्म की प्रतियाँ या भेद चारमोहनीय क भेद-पायमोहनीय और अपाय- मोहनीय ये दो चारित्रमोहनीय क भेद हैं। पायमोहनीय का लक्षण -जो श्रात्मा के ज्ञानादिगुण, शुद्ध या शुभ भाव, धर्मक्षेत्र और उत्तमक्षमादि धर्म को कृश या नष्ट करता है से पायमोहनीय कहते हैं। पायमोहनीय के भेद-अनन्तानुरधी, अप्रत्यार यान, प्रत्यारयान और सन्चलन ये ४ पायमोहनीय के भेद है। इनमें भी प्रत्येक के शोध, मान, माया, लोभ ये ४४ भेद है। इस प्रकार पायमोहनीय के १६ भेद हो जाते हैं। अनतानुरधी कपाय का लक्षण-जी पाय आत्मा के सम्यक्त तथा स्वरूपाचरणचारित गुण का घात करता है और मिप्यार को मदद देता है उसे अनन्तानुसन्धाकपाय कहते हैं। अप्रत्यारयानावरण पपाय का लक्षण-पिस पाय के उदय से जीव के परिणाम देशचारित्र (मानक के चारित) धारण करने योग्य नहीं होते उम अप्रत्यार यानाचरण काय कहते हैं। प्रयारयानाचरणस्पाय का लक्षण-जिम पाय के उदय से जीव क परिणाम सालचारित्र या मुनित्रत धारण करने योग्य नहीं होते उसे प्रत्यारपानापरणपाय कहते हैं। सन्चलनस्पाय का लक्षण-नो पाय श्रात्मा क यथा त्यातचारित्र का पात क्रता दे,सयमक साथ जगमगाता रहता है या प्रमादादि दोपा द्वारा प्रारमपरिणाम को जलाता है उसे सम्पलनस्पाय कहते हैं। अम्पायमोहनीय का लक्षण-किचिन्स्पाय या इपत् कपाय को अथवा जा पाय के माथ साथ अपना कार्य या फल दिसलाता है उसे अपाय मोहनीय कहते हैं। इसक उदय मे पर पदार्थों में विशेष रागभाव हाता है। 1
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सरल जेनधम प्रवेशिका-चतुर्थभाग
अपायमोहनीय के भेद-हास्य, रवि, अरति, शोक, भय,
जुगुप्सा, स्त्रीपद पुरपद और नपुसकद ये अम्पायमोह
जीय के भेद हैं।
२०-हास्यप्रकृति का लक्षण-जिस कर्म के उदय से अपने
कोसी भाती है उसे हास्यप्रकृति रहते हैं।
२१-रतिप्रकृति का लक्षण-जिस कर्म के उदय से इनिया
के विपयों में अपना राग या प्रेम होता उसे रतिप्रति
कहते हैं।
२२---अरतिप्रकृति का लक्षण-निम कर्म के रदय से इन्द्रियों
५ विपयों में अपने को परति या द्वेष होता है उसे परति प्रति
“३-शोप्रति का लक्षण-जिस कम के उदय से शोच या
चिता होती है इसे शोर परति कहते है।
२४-भयप्रति का लक्षा-रिम पम के उदय मे भय
(डर ) या पद्वेग होता है उस भयप्रकृति रहते हैं।
२५-जुगुप्सा मति का लक्षण-जिम क्म लिन्य से
दूसर से ग्लानि या घृणा होता है उसे जुगुप्सा प्रकृति कहते हैं।
२६-स्त्रीवेदप्रकृति का लक्षण-जिस कम क उदय से पुरुषसे
रमने की इच्छा होती है उसे स्त्रीवेदप्रकृति कहते हैं।
-पुस्पदप्रति का लक्षण--जिस धर्म के उदय मे स्त्री
मे रमने की इच्छा होती है उस पुरपदप्रकृति कहते हैं।
२८-नपुसक्वेदप्रकृति का लक्षण-जिस फम के
त्रा और पुरुष दोनों मे रमने भी इन्छा होती है उसे नपु सक्द
प्रति कहते है।
नोट-३ दशनोइनोय, १६ क्याय और नोपाय मिला
पर मोहनीय कम के २८ भेद हाते हैं।
an- शरार आयुर्म की प्रकृतियाँ या भेद अायुकर्म की प्रकृतियाँ या भेद-- नरायु, वायु, तिर्यगायु और मनुष्यायु ये ४ श्रायुएम यो प्रकृतिया या भेद है। १-नरकायु का लक्षण-निस कम के उदय से प्राणो नारकी के शरीर में रुक रहता है से नरकायु कहते हैं। -पायु का लक्षण-निस कर्म क उन्य से माणो देव के शरीर में रक रहता है उसे वायु कहते हैं। ३-तिर्यगायु का लक्षण-पिस कम के दय मे प्राणोतियच के में रस रहता है मे तिर्यगायु कहते हैं। -मनुष्यायु का लनण-निस क्म ने उदय मे प्राणो मनुष्य के शरीर में रुक रहता है मनुप्यायु कहते हैं। नामकर्म की प्रकृतियां या भेद- ४ गति, ५ जाति, ५ शरीर, ३ अगोपाल, १ निर्माण, ५५ धन, ५ सयात, ६ सस्थान, ६ महना, ८ सर्श, ५ रस, २ गन्ध, ५ वण, ४ अाउपूर्व्य, अगुरलयु, पात, परघात, प्रातप, न्योत, विहायागति, उदराम, श्रम, स्थारर, बादर, सूक्ष्म, पयाति अपयाप्ति, प्रत्येक, माधारण, स्थिर, अस्थिर, शुभ, नरमायु और नरगति नामस्म म अन्तर-नरकायुर्म का पर प्रारणाश नरक म अवश्य जाना पडता है परन्तु नरक्गतिकर्मबन्ध हान पर नरवनि मनाना ही पड़े ऐसा नियम नहीं। क्योंकि गतिधर्म का बन्ध प्रत्येक ममय म होता है परन्तु उसकी नितरा हो जाती है। कि तु पो गतिस्म श्रायुकम के साथ वध को प्रान हावा है यह गतिस्म नियमित रूप से फल देता है। - बन्ध ८८ -~ ~ सरल जैनधमप्रवेशिका-चतुर्थभाग अशुभ, सुभग, दुमग, सुस्वर, दुस्वर, श्रादेय, अनादेय, यश- फीति, अयश कीर्ति और तीर्थकर ये १३ नामस्म की प्रकृतिया या भेद हैं। गतिनगमक्म का लक्षण या भेद-जिस क्मे के उदय से प्राणी दूसरे भव या पयाय को जाता है उसे गतिनामस्म कहते हैं। इसके ४ भेद हैं-रक्गति, देवगति, तिर्यग्गति और मनुष्यगति। जातिनामर्म का लक्षण या भेद-जिस नामम के उदय से अनक जोनों में अधिरोधो समान अवस्था प्राप्त होती बसे जाति- नामस्म कहते हैं। इसके ५ भेद हे एरेद्रियनाति, द्वीन्द्रियजाति मोन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियाति और पचेन्द्रियजाति । यदि जाति नामस्मन माना जाय तो जलकायिक और प्रथिवीकायिक जीरों को तथा मनुष्य और स्त्री पयाय धारक जीवा का एक कोटि में नहीं रस सरा शरीरनामस्म का लक्षण वा भेद-निस नामकर्म के उदय मे शरीर धारण करना पड़ता है उसे शरीर नामस्म कहते हैं। शरीर के ५ भेद है-श्रोदारिक्शरीर, क्रियिशरीर, श्रादारक- शरीर, ते नसशरीर और कामायशरीर । -ौगरिक्शगर का लक्षण-मनुष्य और तिर्यच के इन्द्रियों स दिसने योग्य स्थूल शरीर का औदारिफशरीर कहते हैं। नियशरीर का लक्षण-निस शरीर में स्थूल, सूक्ष्म, हलका, भारी अादि अनेक प्रकार के शिकार होने की योग्यता होती है उसे वैवियिक्शरीर कहते हैं। ३-आहारक्शगर का लक्षण-छटरें गुणात्थानवर्ती मुनि के मस्तक से जो एक हाथ का पुतला निकलना है उसे पाहारकशरीर नामार्म की प्रकृतिया या भेद xcx - - अगोपाग नामकर्म का लक्षण या भेद- निस कर्म के उदय से श्री उपाग का भेद प्रगट होता है उसे अगोपाग नामर्म कहते हैं। मस्तक, पीठ, हृदय, नितम्ब, २ हाथ और पैर ये अंग है और नाक, अगुली, कान वगैरह उपाय कहलाते हैं। औदारिक अगोपाग, वैक्रियिक गोपाग और पाहा रक अगोपाग ये ३ अगोपाग नामकर्म व मेद हैं। निर्माण मकर्म का लक्षण वा भेद-- पिस र्म के उदय से भगों और पागों का स्थान वा प्रमाण चनता है उसे निर्माण नामर्म रहते हैं। स्थाननिर्माण और प्रमाणरिमाण ये दो निर्माण नामकम के भेद है। १-निमम के दय मे जातिनामर्म की सहायता द्वारा नाक, कान श्रादि भी योग्य स्थान में रचता होली है नमे स्थान निमाण नामर्म कहते हैं। 2-निसर्म के उदय मे आँस, नाक कान इत्यादि की लम्बाइ चौडाइ अादि का परिमाण यथावत होता है उसे प्रमाण निमाण नामस्म कहते हैं। कहते हैं । यह शरीर मशय दूर करने, र दना और दीक्षा आदिक कल्यागानों के लिये निमलता है। ४ तैनमशरीर का लनण -निस धर्म के उदय से शरीर में तेज होता है उसे तसशरीर नामस्म कहते हैं। इसके नि मरण स्वरूप और अनि सरणम्वरूप दो भेद है। सर समारियों के पिटला अनि मरणस्वरूप तैनस होता है। ५-कार्माणशरीर का लतृण-ज्ञानावरणारिक आठ को के ममूह को रामाणशरार कहते हैं।
www ~~ ~~ सरल जैनधर्म प्रवेशिका चतुथमाग वधन नामकर्म का लक्षण ना भेद- जिस र्मक उदय से पाचोशरीरा के पुद्गल परस्पर पँधते हैं उसे व धननामम्मकहते हैं। श्रीदारियरवन्धन, वैनियिम्वन्धन, आहारक्बन्धन, तेजसवन्धन और कामाणबन्धन ये ५ चन्धन नामकम के भेद हैं। सघातनामर्म का लक्षण- जिस कम के उदय से पाचा शरीरों के परमाणु परस्पर मिलर छिद्ररहित हो एकता को प्राप्त हो जाते हैं उसे सघात नामक्म कहते हैं । औदारिक्सघात, निायकसघात, पाहारक संघात, तैजससघात और कार्माणसघात ये ५ सघात नामर्म सस्थाननामकर्म का लदण या भेद- निस कम के उदय से शरीरी का श्राकार बनता है उमे सस्थाननामकर्म कहत हैं। समचतुरस्रसस्थान, न्योपोधपरिमण्डल सस्थान, स्वातिसस्थान, कुब्जक्सस्थान, बामनसस्थान ओर हुण्डासस्थान ये ६ सस्थाननामक्म के भेद है। १-जिस कर्म के उद्य मे शरीर का साकार उपर नाचे तथा बीच म समान विभाग से साँचे में ढला जमा उत्पन्न होता है उसे समचतुरस्रमस्थान कहते है। --जिस कम के उदय से शरीर का श्राशर पटवृक्ष के समान नाभि के नीचे का भाग पतला और उपर का भाग मोटा होता है उसे न्यग्रोधपरिमण्डल सस्थान कहते हैं। ३-निस कम के उदय से शरीर का श्रासार बाँमा क समान उपर का भाग पतला और नीचे का भाग माना होता हे उसे स्वातिसस्थान है।
मकर्म का प्रतियों या भेद ४-निस कम के रदय से थोच के भाग में बहुत से पुद्गलों का समूह होता है अथात् पाठ दुख उठी रहती है उमे कुनक सस्थान रहते हैं। ५--जिम कर्म के उदय से शरीर योना अथात् बहुत छोटा या ठिगना होता है उमे वामनमस्थान रहते हैं। ६-जिस कम के उन्य से शरीर के अगवा उपाग कहीं के कहीं, छोटे या बडे कम या ज्य दह हाते हे प्रार्थात शरीर का प्राकार घेटौन या पराम होता है उसे हुँघरमस्थान कहत हैं सदनननामर्म का लक्षण वा भेद- जिस कर्म के उदय स हाड़ वगैरह के वधा म विशेषता पतो उमे सहनननामक्म कहत हैं। वमपभनाराचसहनन, मिनाराचसहनन, नाराचसहनन, अधनाराचसंहनन, कीलक रहनन और असमानासपाटिकासहनन य ६ सहनन नामकर्म ८ भेद हैं। १--निस कम के उदय से पम (नला के हाडौंका मन्धन) राच (पील ) और सहनन (हाहा का समूह) ये ताना वन समान अभेद्य होते हैं उमे वनपभनाराचसहनन कहते हैं। म सदनन वाला प्राणी नियम मे मोक्ष को जाता है। --जिस क्म के उदय स कीलें वा हाड तो वन्नसमार होते हैं पर तु नमों क जाल यस समाउ नहीं होते उसे वनाराय नहनन करते हैं। सर्ग, नरक, एपेन्द्रिय, गर्मागाशरीर श्राहारकशरीर वीरहवें गुणस्थानपर्ती और सिद्ध क सहनन नहीं होना । चर्चाममाधान पृष्ठ २६ से-- -- सरल तैनधम प्रवेशिका-चतुर्थभाग ३-निसर्म के उदय मे हाइ तथा सन्धियों में लें तो होती है परन्तु वे वस के समान कठोर नहीं होती और सा जाल भी वस के ममान कठोर नहीं होता उसे नाराचमहनन कहते हैं। ४-जिस क्म के उदय से हागे मक तरफ कोलें लगी होती हैं तथा दूसरी और कीलें नहीं लगी होती उसे अर्धनारान । सहनन कहते हैं। ५-जिस क्म के उदय से हाड़ परह र कोलित (कील सहित ) होत है उसे कोलक्सहनन कहते हैं। ६-निस कर्म के उदय से हाड़ों का सधियों परस्पर कीलित नहीं ह ती पर तु नसों, स्नायुओं और मास म घी रहती है उसे असमाप्तारसपाटिकासंहनन कहते हैं। स्पर्शामर्म का लक्षण और भेद- जिम कम + उदय से शरीर में स्पश गुण प्रगट होता है से स्पर्शनामकम कहते हैं। क्श और मृदु श्रादि म्पर्श वे ८ भेद हैं। रसनामक्म का लक्षण और भेद- जिस कर्म के उदय से शरीर म रस (स्वाद ) होता है उम रसनामकर्म कहते हैं । सट्टा और मीठा श्रादि रस के ५ भेद हैं। काल और प्राणी की अपेक्षा सहनन का विभाग-- प्रथम द्वितीय अरु तृतियकाल में पहिला पाना। चौथे पट् सहनन, पचमें तीन बसा। क्मभूमि तिय तीन, एक छट्टे के माहीं। विक्ल चतुष्कै एक एक इन्द्रिय के नाहीं । चचाममाधान से ४ -~- - - और दृणत- निम चमक उदय म अपना ६ पात या व धन करने +यहा पर शरीर सहित ग्रामा ६ विषय म गुरलघु नामश्म की प्रकृतियों या भेद गधनामर्म के लक्षण और भेद- जिस कर्म के उज्य से शरीर में ग घ होती है स गन्ध मर्म पहते हैं। सुशबू और बदबू ये दागक भेद हैं। वर्णनामकर्म का लक्षण जिस कम के उदय मे शरीर में वर्ष (रग होता है उसे वर्णनाम कर्म कहते हैं। कृपण, पीत श्रादि वर्ण ५ भेद हैं। अनुपूज्यनामक्म का लक्षण, हणत और भद- जिस कम के उदय से अन्य गति का नाते हुए प्राणी के आत्मा का प्रामार विप्रहगति म पूर्व शरीर के आगर रहता है उसे श्रानुपूर्य नामक्म कहते हैं । जैसे कोई मनुष्य गर कर तिर्यग्गति को रवाना हुआ, जब तक वहाँ न पहुंचा तब तक विप्रगति म मनुष्य पर्याय का श्राकार बना रहा, उस श्राकार को तिर्यग्गत्यानुपूर्वी सममना चाहिये। नररगयानुपूर्वी श्रादि आनुपूर्वा के भेद हैं। श्रगुरुलघु नामकम का लहरा- निस कम क -दय से प्राणी का शार मारीपन स लोह पिएष्ट्र के समान नीचे नहीं पड़ जाता है भार हल्केपन मे रुई के ममान ऊपर नहीं रह जाता है म+गुरुलघु नामर्म कहते हैं। उपपातनामस्म का लक्षा- याले अंग (अवयव ) होने हैं उस अपान नामस्म कहते है । जैसे-यारहसिगा के सींग शादि। प्रकृति गानी गइ है। अन्य द्रव्यों में ही यह उनका स्वाभाविक गुण होता है। गुरुलघुत्व होता - - मरल जैनधम प्रोशिमा-चतुथभाग परघातनामर्म का लक्षण- जिस कम के उदय से पर का घात यावन्धन करने वाले अङ्ग (अरयन) होते हैं उसे परघात नामर्म रहते हैं। जैसे वियूका डक, रीछ की जीभ, शर के नय और येल कसींग प्रालि पातपनामस्म का लक्षण- जिस क्म के उदय सेपर को शातपारी शरीर होता है उत्ते आतप नाम र्म कहते हैं। इस र्म का उदय सूय विमानों के मणिस्वरूप पृथियाकायिक यादर पयानक जीव के होता है। उद्यातनामकम का लक्षण- जिस कर्म क उदय से शरीर म प्रकाश हाता है उसे उद्योत नामम्म कहते हैं । इम कर्म का उदय चद्रयिमान घ पृथिवीकायिक जीनों के तथा पटयीज (जुगनू ) श्रादि क होता है। विहायोगतिनामकम का लक्षण वा भेद- जिस कम के उदय से आकाश में गमन हाता है उसे विहायो गति नामस्म कहत हैं। इसके प्रशस्तविहायागति और प्रशस्त निहायोगति ये दो भेद है। १-जिस धर्म के उदय मे हस, घाड़ी और गाय की चाल के ममान सुन्दर गमन होता है उसे पशस्तविहायोगति कहते हैं। २-जिस कम के उदय से 3 ट और गधा की चाल के समान भदा गमन होता है उसे अप्रशस्तविहायोगति कहते हैं। उधासनामस्म का लक्षण- निस कम के उदय से शरीर में स्वास चलता है उसे उछ्वास नामक्म कहते है। प्रत्येक्शरीर नामक्म का लक्षण- निस कम के उदय एम शरीर एक हा श्वात्मा के भोगने योग्य होता है उसे प्रत्येकशरार नामाम कहते हैं। - ।
नामक्म को प्रकृतिया या भेद ११ -- v - 1 माधारणशरीर नामस्म का लक्षण- निस कर्म के सदय से एक शरीर बहुत से जीवों के वार वार भोगने योग्य होता है उसे साधारणशरीर कहते हैं। जैसे मूली, गाजर पाल आदि म निगोदिया जीव का शरीर सावारण होता है। सनामकर्म का लक्षण- निम क्म के उदय में आत्मा द्वीन्द्रिय प्रादि में जन्म लेता है बमे मनामर्म कहते हैं। स्थार नामकर्म का लक्षण- निम धर्म क उन्य स श्रात्मा पृथिवी और जल श्रादि परेन्द्रिया स ज म लेना है उसे स्थापर नामर्म कहते हैं। सुभगनामम का लक्षण- जिस कर्म के उदय में अपना शरीर देखते हैं। दूसर का अपने पर प्राति हो जाती है उसे सुमगनामक्म कहत है। दुर्भगनामक्म का लक्षण- निस र्म के उदय से अपना शरीर रूपादिगुणों मे युक्त होने पर भी दूसरोरा बुरा मालूम हाता है-अप्राति मालूम होती है उमे टुभगनामर्म कहते हैं। मुम्घर नामस्म का लक्षण- तिम क्म के उदय मे सुदर स्वर अथात् सबको मीठा लगने वाली श्रायान प्राप्न हाती है उसे मुसरनामक्म कहते हैं। एक वृन म वृक्ष भर का स्यामा एक जीर तथा पृन, पत्ते, फल आदि क स्वामा अलग अलग जीव भी हार है।
-~- - - मरल नधम प्रोशिमा-चतुर्व भाग अयश कीर्तिनामस्म का लनण- निस फर्म रदय से अपने दुर्गुण प्रगट होते हैं उसे अयश कीनिलामर्म करते हैं। तीर्थकरनामर्म का लक्षण- निस क्म के उदय मे पचक याणक आदि अनुपम विभूति युक्त तीथर पद की प्राप्ति होती है उसे तार्थारनामर्म कहते हैं। गोत्रकर्म की प्रकृतियाँ या भेद- २ उच्चगोत्र और नीचगोत्र ये दो गोजमर्म के भेद या प्रकृतियाँ हैं। १-निस म के उदय से प्राणी का लोकमान्य उच्चकुल में जन्म होता है उसे उच्चगोन कर्म कहते हैं। -जिस फर्म के उदय से प्राणी का लोकनिन् नीच कुल में जन्म होता है उसे नीचगोत्र कर्म कहते हैं। अन्तरायकर्म की प्रकृतियाँ या भेद--- दानान्तराय, लामा तराय, भोगातराय, उपभोगान्तराय और वीर्यान्तराय ये ५ अतरायक्म के भेद या प्रतियाँ हैं। १-जिस क्म के उदय से यह जीव दान नहीं दे सस्ता है उसे दाना तरायम कहते हैं। २-जिस कम के उदय से प्राणी को लाम (कायदा या मुनाफा) नहीं हो पाता उसे लाभान्तरायम्म बनते हैं। ३-निस कम क उदय से भोग करने का इच्छुक भी प्राणी भोग नहीं कर पाता है उसे भोगान्तरायर्म कहते है। ४-जिस कम के उदय से उपभाग का इन्द्रुक भी प्राणी उपभोग नहीं कर पाता है उसे उपभोगा तरायस्म कहते हैं अन्तरायक्म की प्रतियाँ या भेद hom ------ wwwse wwvvwnA - वीर्यान्तरायरम का लक्षण- निम मि के उदय मे शक्ति या सामध्य में हीनता, काय रता या अनुत्सारता होती है उसे वीया तरायक्म कहते हैं। न्तराय प्रश्नावली- १--अगुरलघु, अनादेय, भाग पूरा चला जाता है? अवधिज्ञान, भानुपूर्य, ५-नाम और मोहनीय श्राहारक्शरीर, क्म, नपुस कर्म की प्रकृतियों के पूर क्द, नरकगत्यानुपूर्वी, नीच पूरे नाम गिनाइये? गोत्र, नोरुपाय, प्रचलाप्रचला, ६-नामस्म की ऐसी मतिज्ञानावरण, मनुष्यायु, प्रतियाँ बतलाइये जो एक मनुप्यगत्यानुपूर्वी, चाया दूमर स उलटी हैं। सातावेदनीय, -ऐसे जीव तायो साधारण, सहनन और मिनके श्रानुपूर्वी, कम, मस्थान आदि की परिभाषा पर्याप्ति, सहनन, चतलाइये। सस्थान और शरोर नहीं २-अपाय, श्रानुपूर्व्य, होता कम की उत्तर प्रतियों ५-देव, नारसी, मनुष्य, अमुकम्म को मूलप्रतिया, खी, तीर्थकर, वृक्ष, चिन्छु, सहनन, सस्थान और शरीर अग्नि, बटर, सिंह, मप, के भेद या नाम रहिये। कुराड़ा इनके सौन कौन ३- सय से ज्यादह और श्रानुपूर्वी, इन्द्रिय, गति, सबस कम प्रकृनियाँ पिस जानि, पयाप्ति महनन, कम को होती है। मस्थान और शरीर होते हैं। है-किन फ्नि कर्मा की -नीचल में पैदा प्रकृतियों में २ या ३ का यश, निद्रा पर निद्रा, जूसी, A--- - - मरल नेनधम प्रवेशिका-चतुय भाग अयश कीर्तिनामस्म का लक्षण- जिस कर्म के रदय से अपने दुर्गुण प्रगट होते हैं उसे अयश कीतिनामकर्म कहते हैं। तीर्थकरनामर्म का लक्षण- जिस कम के उदय से पचकल्याणक श्रादि अनुपम विभूति युक्त तीथकर पद की पाप्ति होती है उसे तार्थ रनामर्म कहते हैं। गोत्रकर्म की प्रकृतियों या भेद- १ उच्चगोत्र और २ नीचगोन ये दो गोर्म के भेद या प्रकृतियाँ हैं। १-जिम कम के उदय से प्राणी का लोकमान्य उचकुल में जन्म होता है उसे उच्चगोत्र कर्म करते हैं। २-जिस कर्म के उदय से प्राणी का लोकनिन्य नीचकुल मे जन्म होता है उसे नीचगोत्र कर्म कहते हैं। अन्तरायकर्म की प्रकृतियॉ या भेद- दानान्तराय, लामान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय और वीर्या राय ये ५ अन्तरायकम के भेद या प्रवृत्तियों है। १-मिस क्म के उदय से यह जीव दान नहीं दे सक्ता है उसे दाना तरायम कहते हैं। २-जिस कम उदय से प्राणी को लाभ (फायदा या मुनाफा) नहीं हो पाता उप्त लाभान्तरायकर्म कहते हैं। ३-निस कम के उदय से भोग करने । इच्छुक भी प्राणी भोग नहीं कर पाता है उसे भोगा तरायक्म कहते हैं। ४-जिस कम के उदय से उपभोग का इन्दुक भी प्राणी उपभोग नहीं कर पाता है से उपभोगा तरायकम कहते हैं।
अन्तरायस्म की प्रकृतियाँ या भेद - वीयान्तरायरमा लक्षण- तिम कम के उदय मे शक्ति या मामय में हीनता, काय रता या अनुत्साहता होती है से वीर्यान्तरायम्म कहते हैं। आनुपूर्दी, प्रश्नावली- १-अगुरलघु, अनानेय, भाग पूरा चला जाता है ? अवधिज्ञान, ५-नाम और मोहनीय श्राहारक्शरार, कम, नपुस र्म को प्रकृनियों के पूरे कद, नरकगत्यानुपूर्वी, नीच पुरे नाम गिनाइये? गोन, नोक पाय, प्रचलाप्रचला, ६-नामस्म का ऐसी मतिज्ञानावरण, मनुष्यायु, प्रकृतियाँ पतलाइये जो एक मनुष्यगत्यानुपूर्वी, वीया दूमर म उलटी हैं? न्तराय मातादनीय, --ऐसे जीव बतायो साधारण सहनन और जिनक थानुपूर्वी, कम, मस्थान आदि की परिभाषा पर्याप्ति, सहनन, यतलाइये। सस्थान और शरीर नहीं २-अक्पाय, श्रानुपूर्दी, कम की उत्तर प्रतियों ८-देव, नारकी, मनुष्य, अमुरम को मूलप्रकृतियों, स्त्री, तीर्थकर, वृक्ष, बिच्छू, सहनन, सस्थान और शरीर अग्नि, चन्दर, सिंह, सप, के भेद या नाम रहिये? कुनडा इनके कौन कौन ३-मन में ज्यादह और श्रानुपूर्वी, इन्द्रिय, गति, सबसे कम प्रकृतियाँ रिम जाति, पयाप्ति कम को होती हैं। सस्थान और शरीर होते है। 1-किन पिन कमा पी -नीचकुल में पेदा प्रकृतियों में २ या ३ का यश, निद्रा पर निद्रा, जूमी, रूप, हाते। पयाति महनन, mwww ३४ मरल नधम प्रशिरा-चतुर्थ भाग अयश कीर्तिनामस्म का लक्षण- जिस म क रदय से अपने दुर्गुण प्रगट होते हैं उसे अयश कीतिनाममर्म कहते हैं। तीर्थकरनामर्म का लक्षण- जिस कम के उदय पचकल्याणक श्रा अनुपम विभूति युक्त तीथर पद की पाप्ति होती है उसे तीर्थस्रनामर्म रहते हैं। गोत्रकर्म की प्रकृतियाँ या भेद- सचगोत्र और २ नीचगोत्र ये दो गोकर्म के भेद या प्रकृतियाँ हैं। १-जिस वर्म के उदय मे प्राणी का लोकमान्य उच्चकुल में जन्म होता है उसे उचगोन कर्म कहते हैं। २---जिस कम के उदय से प्राणी का लोसनिन्ना नीचबुल में जन्म होता है उसे नीचगोत्र कर्म कहते हैं। अन्तरायकर्म की प्रकृतियाँ या भेद- दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय 'और वीर्या राय ये ५ अतरायक्म के भेद या प्रकृतियाँ हैं। १-निस कम के उदय से यह जीव दान नहीं दे सकता है उसे दाना तरायर्म कहते हैं। -निस कम उदय से प्राणी को लाभ (फायदा या मुनाफा) नहीं हो पाता उसे लाभा तरायस्म कहते हैं। ३-निस कम के उदय से भोग करने का इच्छुक भी प्राणी भोग नहीं कर पाता है उसे भोगान्तरायकम कहते है। ४-जिस कम के उदय से उपभाग का इन्दुक भी प्राणी उपभोग नहीं कर पाना है उसे उपभोगा तरायकर्म कहते हैं ।
अतरायस्म की प्रतियों या भेद Wwwamre-- -~- वीयान्तरायम्मा लक्षण- निम कर्म के उदय मे शक्ति या मामध्य म होनता, काय. रता या अनुत्सा ता होती है से वीर्यातरायाम कहते हैं। - सहनन और प्रश्नावली- १-गुग्लघु, अनादेय, भाग पूरा चला जाता है ? अवधिज्ञान, श्रानुपूज्य, ५-नाम श्रीर मोहनीय पाहारकशरीर, धर्म, नपु म धर्म का प्रदियों के पूरे स्वद, नरकगत्यानुपूर्वी, नीच पूरे नाम गिनाइये। गोत्र, नोकपाय, प्रचलाप्रचला, ६-नामकम की एसी मतिज्ञानावरण, मनुप्यायु, प्रकृतियाँ घतलाग्ये जो एक मनुप्यगल्यानुपूर्षी, वाया दूसर म उलटी है। न्तराय सातादनीय, ७-ऐसे जीव बनायो साधारण निना श्रानुपूर्वी, यम, मस्थान आदि को परिभाषा सहनन, यतलाइये। संस्थान और शरीर नहीं -अपाय, भानुपूर्व्य, कम की उत्तर प्रकृतियों ८-देव, नारको, मनुष्य, अमुकरम को मूलप्रकृतियों, स्त्री, तायकर, वृक्ष, विध सहनन, सस्थान और शरीर अग्नि, व दर, मिंह, सर्प, के भेट या नाम पाहिये? कुबड़ा इनक कौन कौन ३- सब से ज्यादह और आनुपूरी, इन्द्रिय, गति, सबसे कम प्रतियाँ मिस जाति, पयानि महना, कर्म को हाती हैं। सस्थान और शरीर होता है। ४-पिन किन मा की -नाचाल में पैदा प्रकृतियों म २ या ३ का यशनिद्रा पर निद्रा, कंजूमी, पर्याप्ति, रूप, होते?
maya- १६ सरल जैनधमशिका चतुथभाग घृणा, बीमारी, अगोपाग १९-श्रयश काति, जु का ठीक ठीर रचना, प्रा. गुप्सा, तोपर, दनायु काशगमन, अन्धापन, पहि मिध्यात्य, शुभ, रस्यानगृद्धि, रापन, लूलापन, लम्बी नाक, शुभ और हुँडक प्रकृति के छोटी पास, ठिगा शरार, उदय से क्या क्या होता है? अपन या दूसर पा प्यार, १२-श्रगुरलघुत्वगुण हसा, अच्छा गयापन, और श्रगुरलघुप्रति म, बदनामी और थतिशयों का रति और सुभग में, सम्याद प्राप्ति किस किस क्मरकृति शन और सम्यक्प्रकृति में, के उदय से होती है। साधारण और सूक्ष्म में, १०- हमारी प्रशसा क्या संहनन और सम्थान में, नहीं होती । सम्यग्दशन शुभ और सुभग म क्या १व नक नहीं होता? हमको अतर है। याद क्यों नहीं होता हम १३-5 तदर्शन हर जगह क्या नहीं जा मन पययशन क्या नहीं सक्ते? हम तीर्थपर क्या नहीं होत ? हम मुनि या १४-मिध्याष्ट्रि दर के, भास क्यों नहीं हो पाते ? के हम काले क्या हैं? देर और इ- होन थाले मुनि के अपना शरीर छोटा बड़ा कौन कौन प्रानुपूर्वी होगी? म कर लेते हैं। श्रीर हाता? घोडा होने वाले गनुष्य पाठ ग्यारहवी श्रन्तर-प्रदर्शन - १-द्रव्यपूजा वा भावपूना म अन्तर-- द्रव्यपूजा में तो अष्टद्रव्य चढाये जाते हैं किन्तु भावपूजा में केवल गुणगान किया जाता है यही इन दोनों में अन्तर है। २-मूलगुण वा उत्तरगुणों में अन्तर- मूलगुण तो असाधारण खास खास गुणों को कहते हैं किन्तु उत्तरगुण साधारण गुणों को कहते हैं।x ३-अरिहन्त या सिद्ध में प्रान्तर- अरिहन्न के तो चार धानिया-कर्मों का ही नाश होता है किन्तु सिद्ध के पाठ कमों का नाश हो जाता है। ४-अतुल्यबल मा अनन्तबल में अन्तर- अतुल्यबल का क्थन तो शरीरसम्बन्धी पल की अपेक्षा है किन्तु अनन्तवल का कथन अतरायक्म के नाश से उत्पन्न आत्मवल की अपेक्षा है । यही इन दोनों में अन्तर है। ५-प्राचार्य उपाध्याय वा साधु में अन्तर- प्राचार्य शिक्षा और दण्ड देते हे, उपाध्याय पदाते और पढते हैं तथा माधु केवल आत्मचिन्तवन करते हैं। ६-ज्यमन वा पाप में अतर-- पाप तो कभी कभी और भूल चूक पर बोध श्रादि के वश होकर किये जाते हैं किन्तु व्यसन आसक्ति और प्रेम वश मेवन क्येि जाते हैं । यही इन दोनों में अतर है। x "ग्रही इन दोनों में अन्तर है। यह वाक्य हर एक वाक्य के अत में लगा लेना चाहिए । ६७ ) - , , -- सरल जैनर्म प्रवेशिका-चतुर्थभाग पर लो और वेश्यामें श्रन्तर- -रखो के तो एक हो निश्चित स्वामी (पति) होता रितु वेश्या ये अनेक स्वामी होते हैं, जिसने पैसा दिया उसी यो स्वामी बना लेती है। यही इन दोनों में अन्तर है। -अनिष्ट वा अनुपसेव्य में अन्वर- अनिष्ट तो किसी रोगी आदि क लिये ही अभक्ष्य होता विन्तु अनुपसेव्य सभी के लिये अभक्ष्य होता है। -अषत वा महाप्रत में अन्तर- अगुपत में तो पाचा पापों का एकदेश त्याग किया जाता कित महामतों में पाचों पापों का सर्वदेश त्याग किया जाना है यही इन दानों में अन्तर है। १०-दिग्वत वा देशघ्रत में अन्तर- दिग्वत की मर्यादा तो जीवनपयन्त के लिये होती है किन देशनत की घड़ी, पँटा श्रादि नियमितकाल के लिये। ११-दिग्वत और अनर्थदण्डवत में अत्तर- दिग्बत में तो मर्यादा के बाहर ही पापों का त्याग होता कितु अनर्थदण्डनन म मर्यादा के भीतर भी त्याग क्यिा जाता १२-प्रोपध, उपवास और प्रोषधोपवास में अन्तर- प्रोषध में सो शारम्म और विषयकपाय आदि का त्या फरते हुए एकबार भोजन किया जाता है, किन्तु उपवास भोजन का सर्वथा त्याग रहता है और प्रोषधोपवास में पर दिन आरम्म, विषयकवाय तथा आहार को त्याग कर धार और पारणा के दिन भी एकासन क्यिा जाता है १३-भोगोपभोगपरिमाण या परिप्रहपरिमाणत में अतर- परिग्रहपरिमाणायत म जिस परिग्रह का परिमाण कि जाता है भोगोपभोगपरिमाणत में उसम भी कमी कभी कमी जाती है। - - - m vwan - अन्तर प्रदर्शन प्रकरण १४-भोग वा उपभोग में अन्तर-- भोग तो एक ही पार भोगने योग्य होता है किन्तु उपभोग पार वार भोगने में पाता है। यही इन दोनों में अन्तर है। ४५-यम और नियम में अन्तर- यम में तो जीवनपयत के लिये भोगोपभोग का त्याग दिया जाता है किन्तु नियम में घड़ी, घण्टा प्रादि परिमित काल के लिये भोगोपभोग का त्याग किया जाता है। १६-अतिचार और अनाचार में अन्तर- अतिचार में सो व्रत का अंश मंग होता है, जो औरों के दृष्टि गोचर नहीं होता, किन्तु अनाचार में प्रत का पूर्ण रूप से ही भंग हो जाता है, जो औरों के दृष्टिगोचर तक होने लगता है। यही इन दोनों में अन्तर है। १५ श्रापकप्रतिमा और जिनप्रतिमा म अन्तर- श्रावक की प्रतिमाओं में तो प्रतिमाशब्द मे गायक के पत्तव्यों को कक्षा या श्रेणी से तात्पर्य है किन्तु जिनप्रतिमा में भगवान की मूति से तात्पर्य है। यही इन दोनों में अन्तर है। १८-सामायिक शिक्षाप्रत वा सामायिकप्रतिमा में अन्तर- सामायिकशिनामत में तो सामायिक के अतिचार कदा चित्त लग सकते है किन्तु सामायिप्रतिमा में अतिचार भी सवथा हटाने पड़ते हैं। यही इन दोना में अन्तर १६-प्रोषधग्रत पाप्रोषधप्रतिमा में अन्तर- प्रोषधोपवास शिक्षाप्रत में नो कभी अतिचार भी लग सक्ते हैं परतु प्रोषधप्रतिमा में अतिचार भी दूर करने पड़ते हैं। २०-सचित्त और अचित्त में श्रतर- सचित्त में तो जीव या अंकुर पैदा हाने को शक्ति रहती है किन्तु अचित्त में ये दोनों बातें नहीं रहती। । .
- । माल पम प्रवेशिका-चतुर्थभाग 01-ब्रह्मचर्यानत वा ब्रह्मचर्यप्रनिमा में अतर- मारर्याप्तव में तो अपनी नी के साथ विषयसेवन का स्याग नहीं होता परन्तु ब्रह्मचर्यप्रतिमा म अपनी और पगई दोना प्रगर की स्त्रियों का त्याग होना है। यही इन दोनों में अन्तर है। 2-ब्रह्मचर्यमहायत वा प्रहाचर्य प्रतिमा में श्रन्नर- यद्यपि इन दोना में ही स्त्रीमात्र का त्याग हो जाता है तथापि प्रापर्यप्रतिमा में ब्रह्मचर्यमहानत जैसी पिशुद्धता नहीं होती। अझचयप्रतिमाधारी को वस्त्र छोड़न मलना आती है परतु असचर्य महाप्रत का पारी नग्न रहता हुा भी लजित नही होता । यही इन दोनों म अतर है। २३-परिग्रहपरिमाणपत वा परिपात्यागप्रतिमा में अन्तर- परिमहपरिमाणाणुमन में तो गृहस्थी के काम आने वाली दशप्रकार के परिग्रह का वस्तुएँ अपने पास रखी जाती है किन्तु परिप्रहत्यागप्रतिमा मै घमसाधन के उपकरणों को छोड़ कर दश प्रकार के परिग्रहों का सर्यथा त्याग करना पड़ता है। •y-सुल्लक वालक में अतर--- क्षुल्लक तो चादर वा पात्र रसते हैं और माल कटपाते या मनगाते हैं किन्तु ऐलक चादर या पात्र नहीं रखते और पेश लौच करते हैं। यही इन दोना में अतर है। २५-धर्मभावना और धर्म म अतर- धर्मभावना में तो कर्तव्यपालन का वार वार विचार मा किया जाता है किन्तु धम में कर्तव्य पालन किया जाता है। २६-एकत्व वा अन्यत्वमावना में अन्तर- एकत्वमावना म अकेलेपन का और अयत्वमाकना भिन्नपने का विचार किया जाता है। - .