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Smritishlok Sangrah

Jainmuni, Upadhayay · 2009/11

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* प्रस्तावना
ग्य सुझ पुरुषो! यह संसार चक द्रव्यार्थिक नय के मत
नादि अनन्त हैं तथा काल की अपेक्षा इसे अनादि
रन्त कहते हैं क्योंकि इसकी उत्पत्ति वा अन्त इटिगोचर
नहीं है अतः इस संसार चक को अनादि अनन्त कहा जाता
किन्तु पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा यह चक सादि सान्त
खा जाता है कारण कि समय २ पूर्व पर्याय का नाश और
र पर्याय का उत्पाद दृष्टिगोचर होता रहता है।
जिस प्रकार हम एक पदार्थ के पूर्वपर्याय (हालत ) की
को प्रथम नग में देखते हैं वह दशा उस पदार्थ की
पर क्षण में दृष्टिगोचर नहीं होती।
कारण कि सर्व द्रव्य परिणमन शील हैं इसी कारण
इच जन इस .अनित्य पर्याय वाले पदार्टी में किसी
कार से भी लिप्त नहीं हो सकते, प्रत्येक पदार्थ की पर्याय
मानने पर ही स्थिति मानी जा सकती हैं।
जीव श्रनन्त मान अनन्त दर्शन अनन्त सुख वा अनन्त
शक्ति युक्त होने पर भी कमी के कारण नरक तिर्यक् मनुष्य
और देव रूप पर्यायों को प्राप्त हो रहा है, फिर उन गतियों
मुख वा दुःख रूप अनुभवों को भोगता है।
जिस प्रकार कूप का मध्य भाग कहीं पर भी देखने में
ही श्राता, ठीक उसी प्रकार संसार चक्र का भी मध्य भाग
नहीं पर भी दृष्टिगोचर नहीं होता यात्मा उत्पत्ति धर्म वाला
ही है इससे सिद्ध हुश्रा कि अनादि काल से यह प्रात्मा
सी चक्र में अपने निज स्वरूप को भूल कर परिभ्रमण कर
हा है संसार की दृष्टि से अनुभव किया जाय तो अनन्त काल
क इस यात्मा ने तिर्यक् गति में ही कई जन्म व्यतीत किये
क्योकि शेष गतियों में अनन्त काल की काया स्थिति
दी है उन में तो संख्यात वा असंख्यात काल की काया

( २ )
स्थिति मानी गई है।
विचार कर देखा जाय तो यदि अब भी यात्म हि
का मार्ग ग्रहण न किया गया तो फिर वही तिर्यक गई
काल में प्रविष्ट होना पड़ेगा।
कारण कि जब श्रात्मा निज विकास के मार्ग से प
मुख हो जाता है तब वह स्वकर्मों के कारण नाना !
केक के ही भोगने का स्थान बन जाता है।
विचार कर देखा जाय तो देव नारकीय वा तिर्यक्
सर्वथा आत्म विकास करने में असमर्थ हैं कारण कि
जीवों के इस प्रकार के कर्मों का उदय होता है जो वे
योनि में सर्वथा क्षय करने में अपनी असमर्थता रखते हैं।
केवल एक मनुष्य योनि ही है जो आत्मा को सर्वथा विदा
के मार्ग में ले जाने की योग्यता रखती है परन्तु इस
में आये हुए जीवों को फिर बहुत से सहकारी कारणं,
मिलने की अत्यन्त आवश्यकता रहती है।
जिस प्रकार वीज अारोपण का समय ठीक मिल जाने
भी फिर वीज उत्पत्ति के लिये भूमि श्रादि सहकारी का
की अत्यन्त आवश्यकता रहती है ठीक उसी प्रकार मा
योनि में जव जीव पाते हैं तव उनको आत्म विकास क
के लिये आर्य देश, आर्य कुल, दीर्घायु, पंचेन्द्रिय पूर्ण, नीर
शरीर, धर्म कथा श्रवण श्रादि अनक कार्यों के उपल
होने की अत्यन्त आवश्यकता है, क्योंकि इन सहकारीका
के विना उपलब्ध किये प्रात्मा कभी भी आत्म विकास
ओर झुक नहीं सकता।
अव प्रश्न यह उपस्थित हो सकता है कि जब उक्त ।
कारी कारण सर्व प्रकार से उपलब्ध हो जाएं तच फिर को.
कारणों से आत्मा आत्म विकास करने में अपनी योग्य

रखता है जिस से वह फिर आत्म विकास करने लगता है।
उत्तर में आत्मविकास करने में शास्त्रकारों ने मुख्यतया दो
ही कारण बतलाए हैं जैसे कि विद्या और चारित्र।
विद्या शब्द से सम्यग् दर्शन, सम्यग् ज्ञान का ही ग्रहण
किया गया है क्योंकि जब तक आत्मा सम्यग् दर्शन से वंचित
रहता है तब तक काल पर्यन्त वह मिथ्या हठ से ग्रसित
रहता है अतएव सम्यग् दर्शन के साथ ही फिर उस जीव
को सम्यग् ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। यदि ऐसे कहा
जाय कि जव दर्शन (निश्चय ) और ज्ञान हो गया तब फिर
सम्यग् शब्द के साथ जोड़ने की क्या आवश्यकता है।
इस शंका के समाधान में कहा जाता है कि संशय विपर्यय
और अनध्यवसाय ये तीनों मिथ्या ज्ञानों के निरास
करने के लिये सम्यग् शब्द की संयोजना की गई है ।
क्योंकि संशयात्मक ज्ञान पदार्थों का यथार्थ ज्ञान कराने
में स्वयं असमर्थता रखता है जिस प्रकार आंखों की पीड़ा
'वाला पुरुप भली प्रकार से पुस्तकावलोकन करने में अपनी
असमर्थता धारण करने लग जाता है ठीक उसी प्रकार
संशयात्मक ज्ञान पदार्थों के पूर्ण वोध कराने में असमर्थता
रखता है। जिस प्रकार उक्त ज्ञान अपनी असमर्थता सिद्ध करता
है ठीक उसी प्रकार विपर्यय ज्ञान जैसे शुक्ति में रजत अर्थात्
सीप में चांदी की बुद्धि यह ज्ञान भी मिथ्या ज्ञान ही है
के
द्वारा भी पदार्थों का यथार्थ बोध नहीं हो
क्योंकि इस
तृतीय जो अनध्यवसाय ज्ञान है वह भी पदार्थों के यथार्थ
वोध से पराङ्मुख ही रखता है जैसे कि चलते हुए पुरुष के
पाद ( पग) में कांटा वा तृणादि पदार्थ लग गये तव वह
कहता है जैसे कि "किमिदम् " यह क्या है सो यह ज्ञान भी

( ४ ) पूर्णतया प्रकाश करने में अपनी असमर्थता सिद्ध करता है। अतएव तीनों मिथ्या मानों के निराकरण के वास्ते ही 'सम्यम्' शब्द ज्ञान के साथ जोड़ा गया है अतएव निष्कर्ष यह निकला कि सम्यग् ज्ञान द्वारा ही पदार्थों का यथार्थ स्वरूप जाना जा सकता है। जय पदार्थों का यथार्थ बोध हो गया तब फिर वह श्रात्मा सम्यग् चारित्र की ओर झुक कर अात्म विकास करने में लग जाता है। जिस प्रकार एक सुयोग्य वैद्य जब एक रोग की भली प्रकार परीक्षा द्वारा रोगों के कारण या रोग का पूर्णनया निश्चय कर लेता है तब फिर वह उसी रोग के योग्य औषध द्वारा शीघ्र उस रोग को शान्त कर देता है ठीक उसी प्रकार सच्चरित्र द्वारा आत्म प्रदेशों पर जो कर्म वर्गणाएं ग्राम प्रदेशों के साथ सम्मिलित हो रही हैं उनकी शुद्धि कर अात्मा विकास करने लग जाता है। अव विचार केवल इसी बात का रहा कि यदि स्वपक्ष गृहीत ज्ञान के निर्णय में समय लगाया जावे तब तो पक्षपात के कारण किसी प्रकार से भी एकता होने की सम्भावना नहीं की जा सकती। प्रत्युत स्वपन के कारण द्वेषाग्नि श्रागे से भी प्रचण्ड रूप धारण करने लग जाती है जिसके कारण फिर कृत्य और अकृत्य तथा उचित अनुचित क्रियाओं के करने का भी वोध नहीं रहता। अपितु व्यभिचार की मात्रा बढ़ जाती है कारण कि यावन्मान अकार्यों के करने वाले व्यक्ति हैं वे स्वर के आश्रित होकर मनमानी क्रियायें करने लग जाते हैं किन्तु अपने आप को फिर वे निदाप ही सिद्ध करते हैं। क्योंकि उनके पास एक स्वपक्ष रूप शस्त्र ही ऐसा होता है जिससे वे सबके समक्ष उसका प्रहार करने से चुकते नहीं है।

अतएव यावन्मात्र कार्य हो रहे हैं उनमें अधिकांश धर्म के नाम पर विशेष अत्याचार होते दिखाई पड़ते हैं! कथन करने का सारांश इतना ही है कि विद्या और चारित्र से ही श्रात्मा निज विकास कर सकता है परन्तु यावत्काल पर्यन्त परस्पर प्रेम और सहानुभूति न हो जाये तावत्काल पर्यन्त तात्त्विक पदार्थों का भली प्रकार से निर्णय भी नहीं हो सकता अतएव तात्त्विक पदार्थों के निर्णय के लिये सव से प्रथम चारित्र संगठन की अत्यन्त आवश्यकता है क्योंकि यह बात भली प्रकार से मानी हुई है कि जब तक आचरण ठीक नहीं होता तब तक ज्ञान की भी पूर्णतया सफलता नहीं हो सकती, अतएव श्राज कल भारतवर्ष के निवासी साधु वर्ग वा गृहस्थ वर्ग का चारित्र शोचनीय दशा को प्राप्त होता जा रहा है सो उसका मूलकारण यही प्रतीत होता है कि बहुत से लोगों ने अपनी शास्त्रीय शिक्षाओं से मुंह पराङ्मुख किया हुश्रा है। इस बात का हमारे मन में चिरकाल से विचार था कि- हिन्दु जनता के सामने हम ऐसे एक पुस्तकको उपस्थित करें जिस से उनके मान हुए स्मृति ग्रन्थोंसे उनको पवित्र जीवन का दिग्दर्शन कराया जासके क्योंकि परम पवित्र उभय लोक हितकारी जैनमतके उपदेशों के विद्यमान होने पर भी वे लोग शीघ्र कह बैठते हैं कि यह शिक्षाएँ तो जैनमतकी है अत एव हम माननीय नहीं है। अपि यह कथन विचारशील व्यक्तियोंका नहीं है तथापि इस विषय के विवाद में न पड़ते हुए हमारा यही विचार निश्चित हुया कि एक इस प्रकार का पुस्तक प्रकाशित किया जाये जिससे जैनेतर लोग भी अपने स्मृतिग्रन्थों के ही नाम से शुद्धाचरण की कोटि में प्रविष्ट हो जाएँ।

( ६ ) अकस्मात् हमें श्वताम्बर स्थानकवासी जैन कान्फरंस के महोत्सव देखने का सौभाग्य प्राप्त हुया, फिर वहां से कार्तिक मास में कान्फरंस के महोत्सव के पश्चात् पंजा साधुओं के दर्शनों के लिये उत्कण्ठा उत्पन्न हुई । जब हम पंजाब देश के सुप्रसिद्ध लुधियाना नगर में पहुंचे तब वहां पर विराजमान शांतमुद्रा श्री संघ के परम हितैपी श्रीधीश्री १००८ गणाचच्छेदक या स्थविरपदविभृपित श्रीश्रीश्री स्वामी गणपतरायजी महाराज श्रीश्रीश्री १०८ स्वामी जयराम दास जी महाराज व श्रीश्रीश्री स्वामी शालिग्राम जी महाराज व श्रीश्रीश्री १०८ श्री स्वामी उपाध्याय श्रात्मा. राम जी महाराज वा श्रीश्रीश्री १०८ स्वामी हेमचन्द्र जी महाराज इत्यादि मुनियों के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ उस समय हमने अपने अन्तरङ्गभाव श्री उपाध्याय जी महाराजके समक्ष प्रगट किये। श्री उपाध्याय जी महाराज ने फरमाया कि यद्यपि अापके विचार परमोत्कृष्ट और परमपवित्र हैं तथापि जैनेतर लोगों के स्मृतिकारों ने पूर्वीपर विरोध कथन करने में कोई भी त्रुटि नहीं रखी जिस बात को प्रथम निषेध करने लगते हैं उसी वात का उसी स्थल में मण्डन कर देते हैं। जैसे कि-मनुस्मृति के पांचवें अध्याय में किसी श्लोक में मांस भक्षण का निपेध और किसी श्लोक में मांस भक्षण विधि का विधान इत्यादि प्रायःसभी स्मृतियों में यह दशा देखें: जाती है। तव हमने फिर विज्ञप्ति की कि जो श्लोक जैनात की शिक्षाओं से सम्बन्ध रखते हैं यदि उन का ही संग्रह होजाए तव जनता को परम लाभ की संभावना की जा सकेगी। प्रत्युत्तरमें श्री उपाध्याय जीमहाराजने फरमाया कि-ऐसा हो सकता है किन्तु साथ यह भी कृपा की कि जिस प्रकार ७ स्मृतिकारों ने परस्पर विरुद्ध श्लोकों का निर्माण किया है ठीक उसी प्रकार उन ग्रन्थोंकी आधुनिक समयके भापाटीका- परों ने भी अपने पूर्वाचार्यों की शैली का उल्लंघन नहीं किया । अर्थात् अपनी ओर से कोई २शब्द अधिक वा न्यून करही देया है। जैसे कि-गौतम स्मृति के द्वितीय अध्याय में यह गद्य पाठ श्राता है कि-वर्जयेन्मधुमांस गन्ध माल्यादि वा स्वप्रांज- जाभ्यंजनया नोपानच्छत्रकामक्रोधलोभमोहवाद्य वादन स्नान दन्तधावन हर्प नृत्य गीत परिवाद भयानि, इसका अर्थ भाषा- टीका कारने यह लिखा है कि ब्रह्मचारी मधु, मांस, गन्ध, फूलमाला, दिन में शयन, अंजन, उवटना, सबारी, जूता, छत्री, काम, क्रोध, लोभ, मोह, बाजा बजाना, अधिक स्नान, दन्तान, हर्ष, नृत्य, गाना, निन्दा, मदिरा, और भय इन सब को त्यागदे, सोभापाटीकाकारने स्नान शब्द की भापा टीका करते समय अधिक शब्द अपने पास से जोड़ दिया है, सो इस प्रकार जनता को मूलग्रन्थकार के श्राशय से वंचित रखना विद्वानों के लिये उचित कार्य नहीं है,तदपि श्रानन्द का विषय इतना है कि भाषाकार ने मूलमें ही नित्य स्नान नहीं कर दिया, अस्तु ।फिर हमने श्रीमहाराज से विज्ञप्ति की कि उन्हीं स्मृति- कारोंके श्लोक वा उन्हीं के किये हुए अर्थों से युक्त एक पुस्तक की अत्यन्त श्रावश्यकता है। जिससे वे लोग अपने स्मृति- अन्यों के व्याज (बहाने ) से ही अपने जीवनको पवित्र बना सकें जिस से फिर वे सम्यग् मान के अधिकारी बन कर मोन पथ के भी अधिकारी बन जाएँ। इसपर फिर श्रीमहाराज ने कृपा की कि- अष्टादश स्मृति भापाटीका समेत पं० श्यामसुन्दरलाल त्रिपाठी कृतभाषानुवाद प्रकाशक-खेमराज श्रीकृष्णदास "श्री वेङ्कटेश्वरस्टीम" यन्त्रालय वंवई, से जो पुस्तक १६६५ शक (८) • संवत् १८३० में प्रकाशित हुआ है और मनुस्मृति श्री पं० केशवप्रसाद शर्मा द्विवेदी विरचित भापाटीका श्री खेमराज श्रीकृष्णदास ने (मुंबई से अपने श्रीवेकटवर स्टीम) यन्त्रालय से मुद्रित कर शके १८४७ संवत् १६०२ को प्रकाशित की है और याज्ञवल्क्यस्मृति (धर्मशास्त्र) श्री मन्महामहोपाध्याय पण्डिनवर्य धीमेहरचन्द्र विरचिता भापाटीका प्रकाशक-श्रीकृष्णदासात्मजगंगाविष्णु "श्रीवेक- टेश्वर' मुद्रणगारे सं० १९८० शकादाः १८४५ कल्याण मुंबई इन स्मृतियों में जो जैनमत से प्रायः श्राचारविषय से सम्बन्ध रखनेवाले श्लोक हैं उन पर मैंने चिन्ह अंकित किये हुए हैं यदि आप उन श्लोकों की इच्छा रखते हैं तो यह लोक पृथक पुस्तिका पर विन्यस्त किये जा सकते हैं। हमने इस बात को सहर्ष स्वीकार कर लिया- परन्तु श्री उपाध्याय जी महाराज एक "जैनतत्व कलिका विकास" नामक पुस्तककी रचना कर रहे थे अत एव समय अधिक न मिलने के कारण उनकी श्राशासे श्री मुनि अभय- चन्द्र जी महाराज ने उक्त श्लोकों का संग्रह एक पुस्तिका पर लिख कर तय्यार कर दिया, जिस से हम श्री उपाध्याय जी महाराज के कृतज्ञ हैं। श्रीसंघ के जैनेतर लोगों से सनिवय नम्रता पूर्वक निवेदन करते हैं कि-श्राप लोग अपने पूर्वजोंकी शिक्षा पालन करते हुए वा धर्म वा देशोन्नति सदाचारद्वारा करते हुए निर्वाणाधिकारी वनें। भवदीयकृपापात्र- हीरालाल प्रतापचन्द जी नादेचा खाचरोद (मालवा) ओ३म् अहम् । ओ३म् नमासिद्धेभ्यः स्मृति श्लोक संग्रहः अत्रिस्मृतिः १ एकमप्यक्षरं यस्तु गुरुः शिष्ये निवेदयेत् ॥ पृथिव्यां नास्ति तद्व्यं यदृत्त्वा घनृणीभवेत् ।।६।। एकाक्षरं प्रदातारं यो गुरुं नामि मन्यते ।। शुनां योनिशतं गत्वा चाण्डालेवभिजायते ॥१०॥ यदि गुरु ने शिष्य को एक अक्षर भी पढ़ाया है तथापि पृथ्वी में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिस अर्पण कर शिष्य ऋण से मुक्त हो सके ।। ६ ।। एक अक्षर के शिक्षा देने वाले गुरु का जो मनुष्य सन्मान नहीं करत वह सौ जन्म तक कुत्ते के जन्म को भोग कर अंत में चांडाल हो जन्म लेते हैं ॥१०॥ वेदं गृहीत्वायः कश्चिच्छास्त्रं चैवावमन्यते ॥ स सद्यः पशुतां ग्राति संभवाने कविं शतिम् ॥११॥ जो मनुष्य येद को पढ़ कर उसके गर्व से अन्यान्य शास्त्र के उपदश को ग्रहण नहीं करता वह इक्रीस वार पशु की योनि में जन्म लेता है ।।१।।

(२)
स्वानि कर्माणि कुर्वाणा दूरे संतोपि मानवाः ।।
प्रिया भवंति लोकस्य खे से कर्मण्युपस्थिताः॥१२॥
जो मनुष्य अपने श्राचार के पालन में तत्पर है अर्थात्
कभी कुमार्ग में पैर नहीं धरते वह दूर होने पर भी मनुप्यों
की प्रीति के पात्र हैं ॥१२॥
कर्मविप्रस्य यजनं दानमध्ययनं तपः ।।
प्रतिग्रहोऽध्ययनं च याजनं चेति वृत्तयः ।।१३।।
क्षत्रियस्यापि यजनं दानमध्ययनं तपः ॥
शस्त्रोपजीवनं भृतरक्षणं चेति वृत्तयः॥१४॥
दानमध्ययनं वार्ता यजनं चेति वै विशः॥
शूद्रस्य वार्ता शुश्रूपा द्विजानां कारु कर्म च ॥१॥
तदेतत्कर्माभिहितं संस्थिता यत्र पणिनः ॥
बहुमानमिह प्राप्य प्रयांति परमां गतिम् ॥१६॥
ब्राह्मणों के छः कार्य हैं उनमें यजन दान और अध्ययन
यह तीन तपस्या हैं और दान लेना पढ़ाना यज्ञ कराना यह
तीन जीविका हैं ॥१३॥
क्षत्रियों के पांच कार्य हैं उनमें यजन दान अध्ययन यह
तीन तपस्या है और शस्त्र का व्यवहार और प्राणियों की
रक्षा करना यह दो जीविका है ॥१४॥
वैश्य को भी यजन दान अध्ययन यह तीन तपस्या है
और वार्ता अर्थात् खेती वाणिज्य गौत्रों की रक्षा और
व्यवहार यह चार आजीविका हैं शूद्रों की ब्राह्मणों की सेवा
करना यही तपस्या और शिल्प कार्य उनकी जीविका है ॥१॥

( ३ )
मैंने यह धर्म कहा ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र यह
चारों वर्ग इस धर्म के अनुसार चलन पर इस काल में
बहुत
सा सन्मान प्राप्त कर परलोक में श्रेष्ठ गति को पाते हैं ॥१६॥
सद्यः पतति मांसेन लान्या लवणेन च ॥
व्यहेण शूद्रा भवति त्राह्मणः क्षीरविक्रयी ॥२१॥
ब्राह्मण मांल लाग्य और लवण के वचने से तत्काल पतित
होता है और दूध के बेचने से भी तीन दिन में शूद्र के
समान हो जाता है ॥२३॥
दुष्टस्य दंडः सुजनस्यपूजा
न्यायेन कोशस्य च संप्रवृद्धिः ॥
अपनपाताऽर्थिषु राष्ट्र रक्षा
पंचव यज्ञाः कथिता नृपाणाम् ॥२८॥
दुष्यों का दमन और श्रेष्ठों का पालन न्याय के अनुसार
धन का संग्रह करना विचार के निमित्त श्राये हुए श्रर्थियों
पर पक्षपात का न करना और सब प्रकार से राज्य की
रक्षा करना यह पांच राजाओं के यज्ञ (अर्थात् तत्सदृश
श्रावश्यक ) कर्म हैं ॥२॥
शौचमंगलानायासा अनसूयाऽ स्पृहादमः ॥
लक्षणानि च विग्रस्य तथा दानं दयापि च ॥३३॥
शौच, मंगल, अनायास, अनसूया, अस्पृहा, दम, दान,
और दया यह ब्राह्मणों के लक्षण हैं ॥३३॥
अभक्ष्यपरिहारश्च संसर्गश्चाप्यनिदितः ।।
आचारेषु व्यवस्थानं शांचमित्यभिधीयते ॥३॥

( ४ )
प्रशस्ताचरणं नित्यमप्रशस्त विवर्जनम् ।।
एतद्धि मंगलं प्रोक्त मृपिभिर्धर्मवादिभिः ॥३शा
शरीरं पीब्यते येन शुभेन ह्यशुभेन वा ।।
अत्यं तं तन्न कुर्वीत अनायासः स उच्यते ॥३६॥
नगुणान्गुणिनोहंति स्तौति चान्यान्गुणानपि ।।
नहसेच्चान्य दोपांश्च सानसूया प्रकीर्तिता ॥३७||
यथोत्पन्नेन कर्तव्यः संतोपः सर्ववस्तुपु ॥
नस्पृहेत्परदारेषु साऽस्पृहा च प्रकीर्तिता ॥३८॥
वाह्य श्राध्यात्मिके वापि दुःख उत्पादिते परः ।।
नकुप्यति न चाहंति दम इत्यभिधीयते ॥३६॥
अहन्यहनि दातव्यमदीने नांतरात्मना ।।
स्तोकादपि प्रयत्नेन दानमित्यभिधीयते ॥४०॥
परस्मिन्वंधुवर्ग वा मित्र द्वेष्येरिपौ तथा ।
आत्मवद्वर्तितव्यं हि दयैपा परिकीर्तिता ॥४१॥
यश्चैतैर्लक्षणैर्युक्तोगृहस्थोपिभवेद्विजः ।।
सगच्छति परं स्थानं जायते नेह वै पुनः ॥४२॥
अभक्ष्य वस्तु का त्याग, श्रेष्ठ का संसर्ग, और शास्त्र
में कहे हुए अन्यान्य प्राचारों के पालन करने का नाम
शौच है ॥ ३४॥
उत्तम कर्मों का आचरण और निन्दित कर्मों का त्याग
करना इसी को धर्म के जानने वाले ऋपियों ने मंगल
कहा है ॥ ३५॥

( ५ ) शुभ कार्य हो अथवा अशुभ कार्य हो जिस से शरीर को ग्लानि होती हो उसे अत्यन्त न करे उस का नाम अना. यास है ॥ ३६॥ गुणवान् मनुष्यों के गुणों को नष्ट न करना और दूसरे के गुगों की प्रशंसा करना दूसरे के दोनों को देख कर उन का उपहास न करना इसी का नाम अनमूया है ॥३७॥ श्रावश्यकीय सम्पूर्ण वस्तुओं में से जो कुछ भी मिल जाय उसी से संतुष्ट रहना यार पराई स्त्री की अभिलापान करना इसी का नाम अस्पृहा है ॥३॥ कोई मनुष्य यदि याहा वा मानसिक दुःख उत्पन्न करे तो उस के ऊपर शोध या उल की हिंसा न करने का नाम दम है ॥३॥ किञ्चित् प्राप्ति के होने पर भी उस में से थोदा २ प्रति दिन प्रसन्न मन से दूसरे को देना इस का नाम दान है ॥१०॥ दुसरे के प्रति, माता पिता श्रादि अपने कुटुम्बियों के प्रति, मित्रों के प्रति बैरकारी के प्रति और शत्रु के प्रति समान व्यवहार करना इसी का नाम दया ई. ॥४॥ जो ग्रामण गृहस्य हो कर भी इन सब लक्षणों से भूपित ६ बद उत्तम स्थान को प्राप्त करता है उस का फिर जन्म नहीं होता ॥२॥ यमान्सवेत सततं न नित्यं नियमान्वुधः ।। यमान्पतत्यकुर्वाणो नियमान्केवलान्भजन ॥४७॥ बुद्धिमान मनुष्य सर्वदा यमों का सेवन करे, नियम का अनुष्ठान यथा समय में किया जाता है सर्वदा नहीं, और जो ( ६ ) यमों का त्याग कर केवल नियम ही करता है तो वह पतित होता है ॥४७॥ आनृशंस्यं क्षमा सत्यमहिंसा दानमार्जवम् ।। प्रीतिः प्रसादो माधुर्य मार्दवं च यमादश ||४|| शौचमिज्या तपो दानं स्वाध्यायोपस्थ निग्रहः।। व्रतमौनोपवासं च स्नानं च नियमा दश ॥४६॥ अकरता, क्षमा, सत्यवादिता, अहिंसा, दान, सरलता. प्रीति, प्रसन्नता, मधुरता और मृदुता इन दशों का नाम यम है ॥४॥ शौच, यज्ञ का अनुष्ठान. तपस्या, अर्थात् वेद का पढ़ना, विधि रहित रति का त्याग, व्रत, मौन, उपवास और न्नान यह दश नियम हैं ॥४॥ मद्यभांडे द्विजः कश्चिदज्ञानात्पिरते जलम् ।। प्रायश्चित्तं कथं तस्यमुच्यते केन कर्मणा ॥६॥ पालाशविल्व पत्राणि कुशान्पद्मान्युदंबरम् ।। काथयित्वा पिवेदापनि रात्रेणैच शुद्धयति ।।२।। (प्रश्न) यदि कोई ब्राह्मण विना जाने हुए मदिरा के पात्र में जलपान करले तो उसका प्रायश्चित्त किस प्रकार होता है और उस मनुष्य की शुद्धि किस कर्म के अनुष्ठान करने से होती है ? ॥६॥ (उत्तर) ढाक के पत्ते, वेल के पत्ते, कुश कमल के पत्ते, गूलर के पत्ते, इन सब का काथ बना कर तीन दिन तक पान करे तव शुद्ध होता है । ६२ ।।

(. ७ ) सव्रतस्तु शुना दष्टस्त्रिरात्रमुपवासयेत् ।। सघृतं यावाकं प्राश्य घृतशेपं समापयेत् ॥६॥ यदि व्रती ब्राह्मण को कुत्ते ने काटा हो तो वह तीन दिन तक उपवास करे, और घृत सहित यावाक (आधा पका हुश्रा जी वा कुलथी ) को भोजन कर व्रत की समाप्ति करे ॥६॥ मोहात्प्रमादात्सलोभाबतभंगं तु कारयेत् ।। त्रिरात्रेणव शुद्धत पुनरेव व्रतीभवेत् ।।६।। मोह वा असावधानता से या लोभं के वश से जिस ने व्रत भंग कर दिया है वह तीन दिन तक उपवास करने से शुद्ध होता है और फिर व्रत को धारण करे ॥६॥ अज्ञानात्प्राश्य विएमृत्रं सुरा संस्पृष्टमेव वा ।। पुनः संस्कारमहति त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥७४॥ जिस ब्रामण, क्षत्रिय और वैश्य ने विष्टा, मूत्र वा सुरा जिल में मिली हो ऐसी कोई वस्तु अशान (भूल ) से खाई है, तो वह फिर संस्कार के ( यमोपवीत इत्यादि के ) योग्य है ।।७४॥ एकै बर्द्धयन्नित्यं शुक्रे कृष्णे च दासयेत् ।। अमावस्यां न भुजीत एप चांद्रायणो विधिः ॥११०॥ शुभपक्ष की प्रतिपदा को केवल एक ही ग्रास खाय, इस दिन से प्रारम्भ कर पूर्णिमा तक पक २ ग्रास को बढ़ाता जाय, अर्थात् पूर्णिमा तक तिथि की संख्या के अनुसार ग्रासों की संख्या होगी, और कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से प्रति

(८)
दिन एक २ ग्रास को कम करे, और अमावस्या को उपचास
करे, ऐसा करने से चान्द्रायण व्रत होता है, यह चान्द्रायण
व्रत की विधि है ॥११॥
एकैकं ग्रासमश्नीयान्व्यहाणि त्रीणि पूर्ववत् ।।
व्यहं परं च नाश्नीयादतिकृच्छं तदुच्यते ।।
इत्येतत्कथितं पूर्वमहापातक नाशनम् ॥१११।।
पहले तीन दिन तक एक २ ग्रास का भोजन करे और
अगले तीन दिन में सर्वथा भोजन न करे इसे अतिकच्छ
कहते हैं पहले आचार्यों ने इस व्रत को ही महापातकों का
नाश करने वाला कहा है ॥११॥
त्र्यहं सायं त्र्यहं प्रातस्त्रयहं भुक्ने त्वयाचितम् ।।
व्यहं परं च नाश्नीयात्प्राजापत्यो विधिः स्मृतः ११७
सायं तु द्वादश ग्रासाःप्रातः पंचदश स्मृताः।
अयाचितैश्चतुर्विंशं परैस्त्व नशनं स्मृतम् ॥११॥
कुक्कुटांड प्रमाणं स्याद्यावद्वास्य विशेन्मुखे ।।
एतद्यासं विजानीयाच्छुद्धयर्थ कायशोधनम् ॥११॥
तीन दिन सायंकाल को और तीन दिन प्रातःकाल को
और तीन दिन विना मांगे हुए जो मिल जाय ऐसे भोजन को
करे इस के पीछे तीन दिन तक उपवास करे ( इन वारह
दिन में होने वाले व्रत को) प्राजापत्य कहते हैं ॥११७॥
इस व्रत में सायंकाल के समय वारह ग्रास और शतः
काल के समय पंद्रह ग्रास और विना मांगे हुए चौवीस ग्रास
खाय इसके पीछे तीन दिन तक उपवास करे ॥११८॥

(१) यह सभी को जानना उचित ई कि इस प्रायश्चित्त के अंग से उत्पन्न हुए शरीर की शुद्धि करने वाले भोजन का ग्रास मुरंग के अंडे की समान हो या जिनना ग्रास उल के मुर में स्वच्छन्दता से जा सके उसके निमित्त वही ग्रास श्रेष्ट है ॥१६॥ कृच्छानिन्छः पयसा दिवसानेक विंशतिम् ।। द्वादशाहांपवासेन पराकः परिकीर्तितः॥१२॥ श्रार. मीस दिन तक केवल दृध ही को पकिर रहे इस प्रकार से गन्दानिशन्छ यत होता हैं और बारह दिन तक उपवास कर इस को पराक प्रत करने हैं ॥१२५॥ तीर्थन्नानार्थिनी नारी पतिपादोदकं पिवेत् ॥ शंकरस्यापि विष्णोधी प्रयाति परमं पदम् ॥१३शा यदि बी को तीर्थ के स्नान करने की इच्छा है तो वह अपने पति के चरणोदक का पान करे तब वह स्त्री शिव या विष्णु भगवान् के परम पद (कैलास वा बैकुण्ठ ) को प्राप्त कर सकेगी ।। १३५॥ मावणीय मतानंपु कांस रोप्यमयेषु च ॥ मिनादातुर्न धर्मोस्ति भिनुभुक्ने तु किल्विपम् ॥१५४॥ न च कांस्पेषु मुंजीयादापद्यपि कदाचन ।। मलाशाः सर्ववत यतयः कांस्य भोजनाः ॥१५५॥ कांस्यकस्य च यत्पात्रं गृहम्यस्य तथैव च ॥ कांस्यमोजी यतिव प्राप्नुयात्किन्धिपं तयोः ॥१५६ यदि संन्यासी को तृवर्ग के पात्र लोहे के पात्र चांदी

( १० )
.
अथवा कांसी के पात्र में जो भिक्षा दी जाती है उस का धर्म
नहीं होता और उस से प्राप्त हुई भिक्षा को खाने वाला भिनु
(संन्यासी ) पाप का भोता होता है ॥१५४||
भिक्षुक कभी अधिक विपत्ति के आ जाने पर भी कांसी
के पात्र में भोजन न करे कारण कि जो संन्यासी कांसी के
पात्र में भोजन करते हैं उन्हें मल भक्षण का दोप कहा है॥१५५
कांसी के पात्र की जो अपवित्रता है और गृहस्थ में जो
पाप है कांसी के पात्र में भोजन करने वाला भिक्षुक इन
दोनों का पापों का अधिकारी होता है ॥१५६।।
चरेन्माधुकरी वृत्तिमपि म्लेच्छकुलादपि ॥
एकानं नैव भोक्तव्यं बृहस्पति समोयदि ॥१५॥
यती म्लेच्छ के गृह से भी भ्रमर ( भोरे ) की वृत्ति का
अवलम्बन करे (अर्थात् अनेक स्थानों से अन्न का संग्रह
करे) परन्तु एक के स्थान का अन्न भक्षण न करे चाहे उस
का देने वाला बृहस्पति के भी समान क्यों न हो ॥१५॥
मद्यसंस्पृष्ट कुंभेषु यत्तोयं पिबति द्विजः ।।
कृच्छ्रपादेन शुद्धचेत पुनः संस्कारमर्हति ॥२०१॥
जिस ब्राह्मण ने मदिरा से छुए घड़े का जल पिया हो तो
वह कृच्छुपाद प्रायश्चित्त करके शुद्ध होता है और फिर वह
संस्कार के योग्य है ॥२०१॥
गोदोहने चर्मपुटे च तोयं
यंत्राकरे कारुकशिल्पिहस्ते ॥
स्त्रीवालवृद्धा चरितानि यान्य
प्रत्यक्षदृष्टानि शुचीनि तानि ॥२२७॥

( १ ) दोदिनी और मशक का जलयन्त्र (जलादि के निकालने की कल) श्राकर (ग्वान ) कारीगर और शिल्पी का हाथ स्त्री चालक और बुड्ढों के प्राचरण और जिन का अपवित्र पन प्रत्यक्ष में नहीं देखा गया है वह सब पवित्र है ।।२२७॥ श्रीभशस्तो द्विजारण्ये ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् ।। मासोपवासं कुर्वीत चांद्रायणमथापिवा ॥२८७|| वृथा मिथ्योपयोगेन भ्रूणहत्यात्रतं चरेत् ।। श्रमचो द्वादशाहेन पराकणव शुद्धयति ॥२८॥ जो प्रारमग अभिशस्त (कलंकित ) हो वन में जा कर प्रत्महत्या का प्रायश्चित करे और एक महीने तक उपवास करे या चांद्रायण व्रत को कर ॥२७॥ यदि भूठा ही दोष लगा हो तो भ्रूणहत्या का व्रत करे धारद दिन तक केवल जल ही को पीकर पराक व्रत का अनुष्टान करे. (नव शुद्ध होता है)।२८॥ अधीत्य चतुरो येदान्सर्वशास्त्रार्थ तत्ववित् ॥ नरेन्द्र भवने भुक्त्वा विष्ठायां जायते कृमिः ॥३०२।। चारोंघेदों का पढ़ने वाला सर्व शास्त्रों के मर्म को जानने वाला (बाह्मण ) जो राजा के घर जाकर भोजन करता है (तो बद राजा के यहां का अन्न खाने वाला) विष्टा के कीड़े होकर जन्म लेता है ॥३०२॥ जन्म प्रभृति यत्पापं मावकं पैतृकं तथा ।। तत्सर्व नश्यति क्षिप्रं वस्त्रदानान संशयः ॥३३१॥ जन्म से लेकर जितने पाप किये हैं वह और माता पिता में ( १२ ) का जो अपराध किया है वह शीघ्र ही वन दान करने से निःसंदेह नष्ट हो जाते है ॥३३॥ आतुरे प्राणदाता च त्रीणि दानफलानि च ॥ सर्वेपामेव दानानां विद्यादानं ततोधिकम् ॥३३६॥ पुत्रादिस्वजने दद्याद्विप्राय च न कतये || सकामः स्वर्गमामेति निष्कामो मोक्षमाप्नुयात् ॥३३७ दुःख की अवस्था में जो प्राण की रक्षा करता है उसको दान के तीन (धर्म, अर्थ और काम) फल प्रात होते हैं समस्त दान के बीच में विद्या का दान सब दानों से श्रेष्ठ है ॥३३६ पुत्रादि श्रात्मीय मनुष्य को और ब्राह्मण को विद्या का दान दे और कपटी मनुष्य को विद्या का दान न दे किसी मनोरथ से विद्या का दान करने वाला स्वर्ग को और निष्काम विद्या का दाता मोक्ष को प्राप्त होता है ॥३३७॥ आविकश्चित्रकारश्च वैद्यो नक्षत्र पाठकः ॥ चतुर्विप्रा न पूज्यंते वृहस्पति समायदि ॥३४॥ भेड़ों को पालने वाला चित्रकार वैद्य और नक्षत्र पाठक (जो घर २ नक्षत्र तिथि बताता हुश्रा फिरता है) यह चार प्रकार के ब्राह्मण वृहस्पति के समान पंडित होने पर भी पूजनीय नहीं है ॥३८४॥ इति अविस्मृतिः१ (१३ ) विष्णु स्मृतिः २ शीचमाश्रयसम्बन्धं यतिधर्माश्च शिक्षयेत् ।। अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यमफल्गुता ॥४॥ दयां च सर्वभूतेषु नित्यमेतद्यतिश्चरेत् ॥ ग्रामांते वृक्षमूल च नित्यकाल निकेतनः ॥५॥ पर्यटकीटबद्धृमि वर्षा स्वकत्र संविशत् ॥ वृद्धानामातुराणां च भीरूणां संगवर्जितः ॥६॥ ग्रामे वापि पुरे वापि वासो नैकत्र दुष्यति ॥ कॉपीनाच्छादनं वासः कथां शीतापहारिणीम् ॥७॥ पादुके चापि गृहीयाकुर्यान्नान्यस्य संग्रहम् ।। संभाषणं सह स्त्रीभिरालंभप्रेक्षणे तथा ॥८॥ नृत्यं गानं सभा सेवां परिवादांश्च वर्जयेत् ।। वानप्रस्थ गृहस्थाभ्यां प्रीतिं यतेन वर्जयेत् ॥६॥ एकाकी विचरन्नित्यं त्यक्त्वा सर्वपरिग्रहम् ।। याचितायाचिताभ्यां तु भिक्षया कल्पयेत्स्थितिम् ॥१० संन्यास आश्रम के धर्मों को सीमे शौच और संन्यासियों के धर्मों को सीखता रद यहिंसा सत्य चोरी को छोड़ देना ब्रह्मचर्य अफल्गुता (निरर्थकपन का त्याग ) in समस्त प्राणियों पर दया करना यति इतने कमों को

( १४ )
नित्य प्रति अवश्य करे ग्राम के निकट किसी वृक्ष के नीचे
सदा अपना स्थान बना कर रात भर रहे ॥५॥
वर्षा ऋतु में एक स्थान पर बैठा रह और कीड़े की
समान पृथ्वी पर भ्रमण करे वृद्ध रोगी भयानक इनकी संगति
न करे ॥६॥
वर्षा काल के समय ग्राम में अथवा नगर में जो यति
एक स्थान में रहता है वह दूपित नहीं होता कोपीन (लंगोटी)
श्रोढ़ने का वस्त्र जिस में कि शरदी न लगे ऐसी कंथा
(गुदड़ी)॥७॥
और खड़ाऊं इनको ग्रहण करे और इनसे इतर का संग्रह
न करे स्त्रियों का स्पर्श और उन के साथ वार्तालाप तथा
देखना ॥८॥
नाच गान सभा सेवा नौकरी निन्दा इनको छोड़ दे
वानप्रस्थ और गृहस्थी इनका संग भी यत्त सहित त्यागदे॥
सम्पूर्ण परिग्रह त्याग कर केवल अकेला भ्रमण करे मांगे
या चिना मांगे से ही जो मिल जाय उसी भिक्षा से अपना
निर्वाह करे ।। १०॥
अन्नार्थ लिंगमुद्दिष्टं न मोक्षार्थ मिति स्थितिः॥
त्यक्त्वा पुत्रादिकं सर्व योग मार्ग व्यवस्थितः ।।१।।
चिह्न अन्न के निमित्त कहा है मोक्ष के लिए नहीं कहा
ऐसी मर्यादा है तीसरे इस में सम्पूर्ण पुत्रादिकों को त्याग
और योग मार्ग में स्थित रह कर ।।१।।
पात्रमस्य भवेत्पाणिस्तेन नित्यं गृहा नटेत् ॥
अतैजसानि पात्राणि भिक्षार्थ जप्तवान्मनुः ॥२६॥

सर्वेपामेव भिक्षुणां दालात्रुमयानि च ॥ कांस्यपात्रे न भुंजीत प्रापद्यपि कथं चन ॥३०॥ मलाशाः सर्व उच्यते यतयः कांस्यभोजिनः ।। कांसिकस्य तु यत्पापं गृहस्यस्य तथव च ॥३१॥ कांस्यभांजीयतिः सर्व तयोः ग्रामोति किल्विपम् ।। ब्रह्मचारी गृहस्यश्च वानप्रसो यतिस्तथा ।।३२।। मिनुक का पात्र हाय ही है उनी से नित्य गृहों में विचरण करे अर्थात् भिक्षा मांगे और मनु जी ने भिक्षा के लिय बिना धातु तुंरा श्रादि के पात्र रचे हैं ॥२६॥ सम्पूर्ण भिनुकों को काट तावी आदिकों के पात्र कहे हैं और विपत्ति के श्रा जाने पर भी कांसी के पात्र में भोजन न करे ॥३०॥ जो यनि फांसी के पात्र में भोजन करते हैं उन्हें विष्टा का खाने वाला कहा है कांसी के पात्र बनाने वाले को और उस में भोजन करने वाले गृहस्थ को जो पाप होता है ॥३२॥ उन दोनों का वह पाप कांसी के पात्र में भोजन करने वाले संन्यासी को मिलता है जो ब्रह्मचारी गृहस्थ वानप्रस्थ और संन्यासी ॥ ३२॥ उत्तमा वृत्तिमाश्रित्य पुनरावर्तयद्यदि ।। अारूढपतितो जयः सर्वधर्म बहिष्कृतः ॥३३॥ निंद्यश्च सर्वदेवानां पितृणां च तथोच्यते ।। त्रिदंडं लिंगमाश्रित्य जीवंति बहवोद्विजाः ॥३४॥ उत्तम श्राचरण को स्वीकार कर फिर उस का त्याग ( १६ ) करता है और उसे प्रारूढ पतित जानना और सब धर्मों से वहिष्कृत (वाह्य ) है ॥३३॥ और वह सब देवता और पितरों में निंदित कहलाता त्रिदंड ( संन्यास ) के आश्रय से बहुत से द्विज जीवन करते हैं ॥ ३४॥ इति विष्णुस्मृतिः २ अध्यायः ४ हारीत स्मृतिः३ सायंप्रातश्चरेद्वेक्ष भोज्यार्थ संयतेन्द्रियः ॥ आचम्यप्रयतो नित्यं न कुर्यात धावनम् ॥७॥ छत्रं चोपानहं चैव गंधमाल्यादि वर्जयेत् ॥ नृत्यं गीतमथालापं मैथुनं च विवर्जयेत् ॥८॥ हस्त्यश्वारोहणं चैव संत्यजेत्सयतेन्द्रियः ।। संध्योपास्ति प्रकुर्वीत ब्रह्मचारी व्रतस्थितः ॥४ अभिवाद्य गुरोः पादौ संध्या कावसानतः ॥ तथायोगं प्रकुर्वीत मातापित्रोच भक्तितः॥१०॥ जितेन्द्रिय होकर भोजन की प्राप्ति के निमित्त प्रातःकाल और सन्ध्या के समय भिक्षा के निमित्त भ्रमण करे और नित्य सावधानी से आचमन करने पीछे दन्त धावन करे॥७॥ छत्री जूता गंध माला नृत्य गाना निरर्थक बोलना और मैथुन इन को त्याग दे ॥८॥ जितेन्द्रिय हो ब्रह्मचारी हाथी और घोड़े पर न चढ़े और (१७) मन में मिशन पर नाग संध्योपासना करे ॥६॥ संध्या करने के उपगन्न गुन दोनों चरणों में नमस्कार कर गोद भनिहित गिना और माना की सबा कर ॥१०॥ प्रतिपन्यपष्टीए नवम्यां चैव सत्तमाः ॥ दन्नानां काष्ठमंगोगाइहत्या नतम कुलम् ॥१०॥ मार्गतम्मृतिः अध्याय , मन्नों में उनमा पदया, अमावस्या और नवमी तिधि जो दान करना , उस के मात फुल दन्ध हो जान १० मार्यप्रानदिजानीनामशनं श्रुनिचोदितम् ।। नांना भोजनं कृयादग्निहोत्रममा विधिः ॥६॥ द्वारीनस्मृतिः अध्याय सायं काल सीमानका मानन करन की प्रामा ग्रामीको दनवम बीच (दिन में वाग) भोजन नहीं मंग, मागला कि, यह भोजन विधि भी अशिदोन के तुला गृहम्यः पुत्रपात्रादीन्दृष्ट्या पलिनमान्मनः ॥ भार्या पुत्रए निःविष्य सह था प्रविशेदनम् ।।२।। द्वारीतस्मृतिः अध्याय ५ गृहस्थी पुत्र पानादि को और अपनी मृत अवस्था को देखकर पुत्रों के ऊपर अपनी सी को सौंप या उस अपन संगलकर यन को चला जाय ॥२॥ एवं च कुर्वना चेन कृतबुद्धिर्यथा क्रमम् ।। अनि स्वात्मनि कृन्वा तु प्रत्रजदुत्तरां दिशम् ।।८।।

( १८ ) आदेहपातं वनगो मौनमास्थाय तापसः ।। सरनतींद्रिय ब्रह्मब्रह्मलोके महीयते ।।६।। हारीतस्मृतिः १०५ जो क्रमानुसार इस प्रकार कमों के करने में समर्थ होता है वह धर्मात्मा अग्नि को अपने प्रात्मा में रख कर उत्तर दिशा में जाय ॥८॥ पीछे वन में जाकर शरीर छूटने तक मौन धारण कर जो तपस्वी अतींद्रिय (जिस को नेत्र आदि न जाने) ब्रह्म का स्मरण करता है वह ब्रह्मलोक में पूजित होता है ॥६॥ तपो हि यः सेवति वन्यवास: समाधियुक्तः प्रयतांतरात्मा ॥ विमुक्तपापो विमलः प्रशांतः सयाति दिव्यं पुरुष पुराणम् ॥१०॥ हारीतस्मृतिः अ०५ जो वानप्रस्थ वन में जाकर मन को वश में कर समाधि लगाये तप करता है वह पापों से रहित निर्मल और शांतरूप वानप्रस्थ सनातन दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है ॥१०॥ योगाभ्यासबलेनैव नश्ययुः पातकानि तु ।। तस्माद्योगपरोभूत्वाध्यायेन्नित्यं क्रियापरः ॥३॥ हारीतस्मृतिः अ०७ यागाभ्यास के बल से ही सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं इस कारण योग में तत्पर हो कर मनुष्य उत्तम आचरण से नित्य ध्यान करे ॥३॥ प्राणायामेन वचनं प्रत्याहारेण चेंद्रियम् ।।

( १६ ) धारणाभिर्वशे कृत्वा पूर्व दुर्धर्षणं मनः ॥४॥ एकाकारमनानं तं बुद्धौरूपमनामयम् ।। सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं ध्यायेज्जगदाधारमच्युतम् ।।५।। हारीतस्मृतिः अ०७ प्रथम प्राणायाम से वाणी को प्रत्याहार (विषयों से इन्द्रियों को हटाने ) से इन्द्रिय को और धारणा (स्थिरता के कर्म ) से वश करने योग्य मन को वश में करके ॥२॥ एकाग्र चित्त होकर देवताओं को भी अगस्य (प्राप्ति के अयोग्य ) और सूक्ष्म जो जगत् के आश्रय विष्णु भगवान् है उनका ध्यान करे ॥५॥ आत्मना बहिरंतःस्थं शुद्धचामीकरप्रभम् ।। रहस्येकांतमासीनो ध्यायेदामरणांतिकम् ॥६॥ हारीतस्मृतिः १०७ जो ब्रह्म अपने स्वरूप से वाहर और भीतर स्थित है और शुद्ध सुवर्ण के समान जिस की कांति है ऐसे ब्रह्म का एकान्त में बैठ कर मरण समय तक ध्यान करे ॥६॥ यत्सर्वप्राणिहृदयं सर्वेषां च हृदि स्थितम् ।। यच्चसर्वजनयिं सोऽहमसीति चिंतयेत् ॥७॥ हारीतस्मृतिः अ०७ जो सम्पूर्ण प्राणियों का हृदय है जो सब के हृदय में विराजमान है और जो सब के जानने योग्य है वह परमात्मा मैं ही हूं ऐसा चितवन करे ॥७॥ आत्मलाभसुखं यावत्तपोध्यान मुदीरितम् । श्रुति स्मृत्यादिकं धर्म तद्विरुद्धं न चाचरेत् ॥८॥ हारीतस्मृतिः अ०७

( २० )
जब तक आत्मा के लाभ का सुख न हो तब तक शास्त्र-
कारों ने तप, ध्यान, श्रुति और स्मृति का धर्म करना कहा
है आत्मा की प्राप्ति का विरोधी जो है उसको न करे ॥ ८॥
यथा रथोऽवहीनस्तु यथाश्वो रथहीनकः ।
एवं तपश्च विद्या च संयुत भेषजं भवेत् ॥ ६॥
यथान्नं मधुसंयुक्तं मधु वान्नन संयुतम् ।
उभाभ्यामपि पक्षाभ्यां यथा रवे पक्षिणां गतिः॥१०॥
तथैव ज्ञानकर्मभ्यां प्राप्यते ब्रह्म शाश्वतम् ।
विद्यातपोभ्यां संपन्नो ब्राह्मणो योगतत्परः ॥ ११ ॥
देहदयं विहायाशु मुक्कोभवति बैधनात् ।
न तथा क्षीणदेहस्य विनाशो विद्यते क्वचित् ॥१२॥
हारीतस्मृतिः अ०७
जिस प्रकार से घोड़े के बिना रथ और सारथी के बिना
घोड़ा नहीं चलता और दोनों ही परस्पर में सहायक हैं इसी
प्रकार विद्या भी तपस्या के विना साथ हुए कुछ काम नहीं
कर सकती। विद्या (ज्ञान)तप यह दोनों मिलकर संसार के
रोग की औषधी हैं ||६| जिस भांति मोठे से युक्त अन्न और
अन्न से युक्त मीठा और जैसे दोनों पंखों से ही आकाश में
पक्षियों की गति ( उड़ान) है ॥१०॥ उसी भांति ज्ञान और
कर्म इन दोनों से ही सनातन ब्रह्म की प्राप्ति होती है शान
और तप से युक्त और योग में तत्पर हुश्रा ब्राह्मण ॥ ११ ॥
दोनों देहों (स्थूल और सूक्ष्म ) को शीघ्र छोड़कर बंधन से
छूट जाता है इसी भांति जिसका देह नष्ट हो गया है उसका
नाश कभी नहीं होता ॥ १२ ॥

( २१ ) शुद्रानन तुमुनेन यो द्विजो जनयत्सुतान् । यस्यान्नं तस्य ते पुत्रा अन्नाच्छुक्र प्रवर्तते ॥५२॥ श्रांगिरलस्मृतिः। जो वास्मग शद अन्न को ग्याकर पुत्र उत्पन्न करता है वह पुष उसी के हैं जिनका यह धन था कारण कि अन्न से ही पीय की उत्पत्ति है ॥५२॥ भः शरीर शुश्रूषां दोगत्म्याद प्रकुर्वती । दंझ्या द्वादशकं नारी वर्ष त्याज्या धनं विना ॥१८॥ यमस्मृतिः। दुए भाय से जोली अपने पति के शरीर की सवा नहीं कर उस स्त्री को बारह वर्ष तक दंड करे अर्थात् उस के साथ यारह वर्ष तक व्यवहार नहीं कर और उसके पास धन अल- कार कभी नहीं रयो । १८ ॥ मातरं गुरुपवीं च स्वमृदुहितरं स्नुपाम् । गवताः प्रविशदनि नान्या शुद्धि विधीयते ॥३॥ यमस्मृतिः। जो मनुष्य माना, गुम की स्त्री, भगिनी, लदकी. पुत्रवधू इन में गमन करता ६ वट अग्नि में प्रवेश करने से (मरजानेस) शुद्ध होता है और किसी भांति उसकी शुद्धि नहीं है ॥ ३५ ॥ श्याभिगमनपापं व्यपाहन्ति द्विजातयः । पीत्वा सकृत्सुतप्तं च पंच रात्रं कुशोदकम् ॥३८॥ गुरुतल्पव्रत केचित्केचिद्बामहणो व्रतम् । गोवस्य फेचिदिच्छन्ति कचिचवावकीणिनः ॥३६॥ यमस्मृतिः।

( २२ ) जिसने वेश्या के साथ गमन किया है उस पाप को तीनों द्विजाति अत्यन्त तपे हुए कुशा के जल को पांच रात्रि तक प्रतिदिन एक वार पीकर दूर कर सकते हैं ॥३८॥ कोई ऋपी गुरु की शय्या में गमन करने के व्रत की कोई ब्रह्महत्या के बत की कोई गोहत्या के प्रायश्चित की और कोई अवकीर्णी (अर्थात् ब्रह्मचर्य से पतित हो उस ) के प्रायश्चित करने की आज्ञा देते हैं अर्थात् वेश्या गामी पुरुप इन में से कोई प्रायः श्चित करने से शुद्ध हो सकता है ॥ ३६॥ मूर्छितः पतितो वापि दंडेनाभिहतस्तथा । उत्थाय परपदं गच्छेत्सप्त पंच दशापि वा ॥४६॥ ग्रासं वा यदि गृह्णीयात्तोयं वापि पिवेद्यदि । पूर्व व्याधिप्रनष्टानां प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥ ४७ ॥ यमस्मृतिः। यदि दंड के आघात लगने से जिस गौ को मूर्छा श्रा गई हो या गिर पडी हो और फिर वह गौ या बैल उठकरछःसात पांच अथवा दश कदम चल दे और घास श्रादिक खाकर जल पीने पीछे मर जाय तो पूर्व व्याधि से भरे हुए उस चैल या गौ का प्रायश्चित मनुष्य को नहीं कहा है ॥४६॥४७॥ वत्सानां कंठ बंधे च क्रियया भेष जेन तु । सायं संगोपनार्थ च न दोपो रोध बंधयोः ।। ५२ ।। यमस्मृतिः। यदि बछड़े का गला वांधने से या औपधी के देने से अथवा रक्षा के लिये सन्ध्या को रोकते और वांधते समय में मर जाय तो बांधने वाला पाप का भागी नहीं है ॥ ५२ ।। हलमष्टगवं धर्म्य पड्गवं जीवितार्थिनाम् ।

जोछः ( २३ ) चतुर्गवं नृशंसानां द्विगवं हि जिवांसिनाम् ।। २२ ।। श्रापस्तम्बस्मृतिः १०१ श्राट चेलों का दल जो चलाते हैं वह धर्मात्मा है और चलों का हल चलान है वह अपनी जीविका के लिये करने हैं चार बैलों का हल कठोरों के लिये है और जो दो घेला का इल चलाने हैं वह हत्यार हैं ॥ २२ ॥ अन्यस्तु खानिताः कृपास्तडागानि तथैव च । एषु स्नात्वा च पीत्वा च पंचगव्येन शुद्धयति ॥५॥ श्रापस्तम्बस्मृतिः अ०२॥ दूसरों के बनवाये हुए कृप शथवा तालाबादि के जल में स्नान करने से पंचगव्य के पीने से शुद्ध होता है ॥ ५॥ ब्राह्मण्या सह योऽश्नीयादुच्चिाटं वा कदाचन । न तत्र दोपं मन्यन्त नित्यमेव मनीपिणः ॥ ७॥ श्रापस्तम्बस्मृतिः श्र०५। ग्राह्मण कदाचित् अपनी ब्राह्मणी के साथ भोजन करले तो विद्वान् मनुष्य उस में दाय नहीं मानते ॥ ७ ॥ भुंजते ये तु शुद्रान्नं मासमेकं निरन्तरम् । इह जन्मनि शुद्रत्वं जायन्ते ते मृताः शुनि ॥६॥ शुद्रानं शूद्रसम्पर्कः शुद्रेणव सहासनम् । शूद्राज्ज्ञानागमः कश्चिज्ज्वलंतमपिपातयेत् ॥७॥ आहिताग्निस्तु यो विप्रः शूद्रानान्न निवर्तते । तथा तस्य प्रणश्यंति यात्मा ब्रह्मत्रयोऽग्नयः ।।८।। शुद्धानेन तु भुक्तेन मैथुनं योधिगच्छति ।

( २४ )
यस्यान्नं तस्य ते पुत्रा अन्नाच्छुक्रस्य सम्भवः 1180
शूद्रान्नेनो दरस्थेन यः कश्चिन्मियते द्विजः ।
स भवेच्छूकरो ग्राम्यस्तस्य वा जायते फुले ॥१०॥
आपस्तम्बस्मृतिः अ०८॥
जो ब्राह्मण एक महीने तक बराबर शव के यहां अन्नको
खाते हैं वह इस जन्म में ही शुद्र हो जाते हैं और मरने के
पीछे उनको कुत्ते की योनि मिलती है | शुद्र के यहां का
अन्न भोजन शूद्र के साथ एक श्रासन पर बैठना शुद्र से विद्या
पढ़ना, यह सम्पूर्ण कार्य तेजस्वी पुरुप को भी पतित करते
है॥७॥जो ब्राह्मण नित्य होम के लिये अग्नि स्थापन करता
है वह यदि शूद्र के यहां अन्न भोजन करना न छोदें तो उस
की आत्मा वेद और तीनों अग्नि नष्ट हो जाती हैं।
शूद्र के अन्नको भोजन कर जो स्त्री संग कर उसमें पुत्रादि
उत्पन्न करता है वह पुत्र शूद्र के हैं कारण कि अन्न से ही
शुक्र उत्पन्न होता है ॥॥
शूद्र का अन्न पेट में रहते हुए जो ब्राह्मण मरजाता है
वह उस जन्म में गांव का सूकर होता है अथवा शुद्र के ही
कुल में उत्पन्न होता है ॥ १० ॥
अल्पेनापि हि शुल्केन पिता कन्यां ददाति यः ।
रौरवे बहुवर्षाणि पुरीपं मूत्रमश्नुते ॥ २५ ॥
आपस्तम्बस्मृतिः अ०६।
जो पिता कुछ भी धन लेकर कन्या का दान करता है वह
मनुष्य बहुत वर्षों तक रौरव नरकमें निवास करके विष्ठा मूत्र
को खाता रहता है ॥ २५ ॥

( २५ ) न यमं यममित्याहुगत्मा वैयम उच्यते । आत्मा संयमितो येन तं यमः किं करिष्यति ॥ ३ ॥ श्रापस्तम्बस्मृतिः अ० १०। यमराजको यम कहकर नहीं पुकारते परन्तु अपनी आत्मा को ही यम कहते हैं जिस मनुप्य ने मन को अपने वश में कर लिया है यमराज उसका क्या कर सकता है ॥३॥ न चवासिस्तथा तीक्ष्णः सर्पो वा दुरधिष्ठितः। यथा क्रोधो हि जन्तूनां शरीरस्थो विनाशकः ॥ ४॥ श्रापस्तम्बस्मृतिः अ० १० । घड्ग भी ऐसा तीनण नहीं है और सर्प भी ऐसा भयङ्कर नहीं है जैसा फिप्राणियों के शरीर में क्रोध उनका नाश करने है (इस कारण सब भान्ति से क्रोध को त्याग दे) ॥४॥ क्षमा गुणा हि जंतूनामिहामुत्र सुखप्रदः । चमावतां दोपो द्वितीयो नोपपद्यते यदेनं चमयायुनमशनं मन्यते जनः ५ श्रापस्तम्बस्मृतिः अ०१०। मनुष्यों में जमा ही एक गुण है वह इस लोक और पर- लोक में मुख की देने वाली है क्षमावान् मनुष्यों में एक दोप के अतिरिक्त दूसरा दिवाई नहीं देता (वह दोप क्या है उस कहते हैं) क्षमा शील मनुष्य को मूर्खजन असमर्थ विचारते हैं॥५॥ न शब्दशास्त्राभिरतस्य मोक्षो न चव रम्यावसथानियस्य । न भोजनाच्छादनतत्परस्य न लोकचित्तग्रहणे रतस्य ॥६॥ वाला ( २६ ) एकान्तशीलस्य दृढव्रतस्य मोक्षो भवेत्प्रीतिनिवर्तकस्य । अध्यात्मयोगैकरतस्य सम्यमोक्षो भवेन्नित्यमहिंसकस्य ||७|| श्रापस्तम्बस्मृतिः अ० १०॥ व्याकरण शास्त्र में जिस का मन लवलीन हो जाय उसकी और जिस का प्यारा रमणीक घर है उसकी और भोजन वस्त्र में तत्पर हैं उनकी और जो संसार के मन को वश करने में रत हैं उनकी मोक्ष नहीं होती ॥ ६ ॥ परन्तु जो एकान्तमें निवास करे और दृढ़ बनसे रहे और सव की प्रीति से दूर रहे जो दूसरे की हिंसा न करे और जो अध्यात्म योग में तत्पर रहे ऐसे मनुष्य की मोक्ष हो जाती है।॥ ७॥ क्रोधयुक्तो यद्यजते यज्जुहोति यदर्चति । सर्व हरति तत्तस्य प्रामकुम्भ इवोदकम् ।। ८॥ आपस्तम्बस्मृतिः अ० १०॥ क्रोधी मनुष्य जो यश करता है होम करता है जो पूजा करता है वह कच्चे घड़े की समान नष्ट हो जाता है अर्थात् जैसे कच्चे घड़े में जल नहीं ठहरता ॥ ८॥ मातृवत्परदारांश्च परद्रव्याणि लोप्टवत् । आत्मवत्सर्वभूतानि यः पश्यति स पश्यति ।। ११ ।। आपस्तम्बस्मृतिः अ० १० । जो मनुष्य माता की समान पराई स्त्री को देखता है और पराये द्रव्य को लोष्ट (ढेले) की समान देखता है और जो सम्पूर्ण प्राणियों को अपने समान देखता है वह मनुष्य ही यथार्थ देखने वाला है ज्ञानवान् है ॥ ११ ॥ उपनीतो द्विजो नित्यं गुरचे हितमाचरेत् ।

। २७ ) सग्गन्धमधुमांसानि बग्मचारी विवर्जयेत् ॥ ५ ॥ संवतस्मृतिः। यसोपान हो जाने पर ग्राम प्रतिदिन गुरुदेव का हित. कारी कार्य करेगारी माला गन्ध मध मांस इन का त्याग करद ॥ ५॥ सायं प्रातस्तु भिक्षन ब्रह्मचारी सदा व्रती। निवेद्य गुरवेशनीयात्प्राङ्मुखो वाग्यतः शुचिः ॥१२॥ संवर्चस्मृतिः। ग्रामचारी नियम अवलम्बनपूर्वक प्रातःकाल और सायं काल में मिना मांग रसके उपरांत उस भिक्षा को गुरुदेवको निवेदन कर पूर्वमुमती मीन को धारण कर पवित्र भाव से भोजन कर॥३ सायं प्रातद्विजातीनामशनं श्रुतिनोदितम् । नांना भोजन योदग्निहोत्री समाहितः ।। १२ ॥ संवतस्मृतिः। ब्राह्मणों को सायंकाल श्रीर. प्रातःकाल दिन में दो समय भोजन करना बेद ने यहा है इस में सावधान मनुष्य बीच में भाजन नही करे ॥१२॥ ब्रह्मचारी तु यः स्कन्दकामतः शुक्रमात्मनः । अवकीणिवतं कुर्यात्स्नात्वा शुद्धयदकामतः ॥ २७ ॥ संवत्र्तस्मृतिः। जो ग्रामचारी जानकर अपन वीर्यको निकाल तोश्रवकीर्णि नामक (ब्रह्मचर्य मत न हो जाने पर के) प्रायश्चित्त से शुद्ध होता है और यदि अमान (म्यमादिक) से वीर्य निकल जाय तो मान करने से उसकी शुद्धि होती है ।। २७ ॥

( २८ ) वस्त्रदाता सुवेपः सागुप्यदो रूपमेव च । हिरण्यदः समृद्धिं च तेजश्चायुश्च विदति ।। ५२ ।। संवर्तस्मृतिः। जो मनुष्य वस्त्र दान करता है वह मुन्दर बनाले शोभाय- मान होता है चान्दी का देने वाला मनुष्य नपचान होता है सुवर्ण के देनेवाले की बड़ी आयु होती है और धन की वृद्धि होती है॥५२॥ भूताभयप्रदानेन सर्वान्कामानवाप्नुयात् । दीर्घमायुश्च लभते सुखी चैत्र सदा भवेत् ॥ ५३॥ संवर्तस्मृतिः। प्राणियों को अभयदान देने से सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होते हैं अथवा दीर्घायु और सुखी होता है ।। ५३ ।। औप, स्नेहमाहारं रोगिणं रोग शान्तये । दत्त्वा स्याद्रोगरहितः सुखी दीर्घायुरेव च ॥ ५६ ।। संवर्चस्मृतिः। जो मनुष्य रोगियों के रोग को दूर करने के लिये औषधी नेह (घृत) इन को मिलाकर भोजन देता है वह रोग रहित होकर सुखी और चिरंजीवी होता है ॥ ५६ ॥ अन्नदस्तु भवेन्नित्यं सुतृप्तो निभृतः सदा । अंत्रुश्च सुखी नित्यं सर्व कर्म समन्वितः ॥ २० ॥ सर्वेषामेव दानानामन्नदानं परं स्मृतम् । सर्वेषामेव जन्तूनां यतस्तज्जीवितं परम् ।। १ ॥ यस्मादन्नात्प्रजाः सर्वाः कल्पे कल्पेऽसृजत्प्रभुः ।

( २६ ) तस्मादनात्परं दानं विद्यते न हि किंचन । अन्नाद्भूतानि जायन्ते जीवंति च न संशयः ॥२॥ संघर्तस्मृतिः। जो मनुष्य अन्न दान करता है वह नित्य पुष्ट और तृप्त रहता है जल का दान करने वाला सुखी और सम्पूर्ण कर्मों : से युक्त रहता है || ८० ॥ सम्पूर्ण दानों में अन्न का दान ही थेष्ट है कारण कि सब प्राणियों का जीवन अन्न से ही है।।१॥ इसी कारण से ब्रह्मा जी ने कल्प २ में सम्पूर्ण प्रजा अन्न से ही रची हैं इस से उत्तम और कोई दान नहीं है कारण कि अन्न से ही प्राणियों की उत्पत्ति है और अन्न से ही उनका जीवन है इस में किंचित् भी सन्देह नहीं ॥२॥ औपधं पथ्यमाहारं स्नेहाभ्यंगं प्रतिश्रयम् । यः प्रयच्छति रोगिभ्यः स भवेन्याधिवर्जितः ॥८६॥ संवर्चस्मृतिः। जो मनुप्य रोगियों को औषधी पथ्य भोजन तेल का उबटन रहने के लिये स्थान देता है वह रोगरहित रहता अर्थात् उसे कभी कोई रोग नहीं होता ॥८६॥ दानश्च विविधैः सम्यक्फलमेतदुदाहृतम् । विद्यादानेन सुमतिब्रह्मलोके महीयते ॥ ८ ॥ संवर्तस्मृतिः। यह अनेक प्रकार के दानों का फल कहा जो मनुष्य विद्या का दान करता है वह श्रेष्ठ बुद्धिवाला पुरुष ब्रह्मलोक में पूज- नीय होता है ॥८॥ चत्वार्येतानि कर्माणि संध्यायां वर्जयेवुधः । thu ( ३० ) आहारं मैथुनं निद्रां तथा संपाठमेव च ।। ६७ ॥ संवतस्मृतिः। ज्ञानी मनुष्य सन्ध्या के समय में इन चार कामों को न करे भोजन, मैथुन, शयन और पढ़ना ॥ १७ ॥ आहाराजायते व्याधिर्गर्भो वै रौद्र मैथुनात् । निद्रातो जायतेऽलक्ष्मीः संपाठादायुपः क्षयः ॥१८॥ संवर्तस्मृतिः। भोजन करने से रोग उत्पन्न होता है मैथुन से भयंकर गर्भ रहता है शयन करने से दरिद्रता आती है और पढ़ने से 'अवस्था का नाश हो जाता है | || मृत्यु च नाभिनंदेत जीवितं वा कथंचन । कालमेव प्रतीक्षेत यावदायुः समाप्यते ।। १०६ ।। संवतस्मृतिः। मरन और जीने की प्रशंसा कभी न करे इस भांति से इतनी अवस्था समाप्त हो जाय इस कारण समय की प्रतीक्षा करता रहे ॥ १०६॥ ब्रह्मनश्च सुरापश्च स्तेयी च गुरुतल्पगः । महापातकिनस्त्वते तत्संयोगी च पंचमः ॥११२॥ संवर्तस्मृतिः। ब्रह्महत्या करनेवाला मदिरा पीनेवाला चोर, गुरु की शय्या ( स्त्री) में गमन करने वाला यह चारों महापातकी होते हैं और जो इनका संगी है वह भी महापातकी होता है ॥ ११२॥ हस्तिनं तुरगं हत्वा महिपोष्टकपींस्तथा ।

( ३२.) एपां वध द्विजः कुर्यात्सप्तरात्रमभाजनम् ॥१४३।। संवर्तस्मृतिः। जो ब्राह्मण हाथी, घोड़ा, भैंस. ऊँट और वानर इनको मारता है यह सात दिन तक भोजन न करे तब उसकी शुद्धि होनी है ॥ १४३॥ हंसं का बलाकां च बहिकारंडवावपि । मारसं चापभासी च हत्वा त्रिदिवसं क्षिपेत् ॥१४६॥ चक्रवाकं तथा क्रौंचं सारिकाशुकतितिरीन् । श्येनगृध्रानुलूकांच पारावतमथापि वा ॥१४७॥ टिट्टिमं जालपादं च कोकिलं कुक्कुटं तथा । एषां बंध नरः कुर्यादक रात्रमभोजनम् ॥१४८।। पूर्वोक्तानां तु सर्वेषां इंसादीनामशेषतः । अहोरात्रापित स्तिष्टेञ्जपन्चे जातवेदसम् ॥१४६।। संवतस्मृतिः। जो मनुष्य हंस, कोया, मोर. कारंड्य, सारस, चाप भास इनको मारता है वह नीन दिन तक उपवास करने से शुद्ध होता है ॥ ३४६ ॥ जो मनुष्य चकवा, कृन, मैना, नोना, नीनर शिवरा, गोध, उल्लू, कबूतर ॥ १४७ ॥ टटोरी, जालपाद (हंसमंद) कोयल मुरगा इनको मारता है वह मनुष्य एक गत्रि उपवास करने से शुद्ध होता है ॥ १४ ॥ पूर्वोक्त कहे हुए सम्पूर्ण जीव और विशेष करके हंस श्रादि के मारने वाला ग्रहांगर उपवास कर जातवेद ल मन्त्र का जप करता हुया मिथन रहे ॥१४॥ मंहक चत्र इत्ता च सर्पमार्जार मृपकान् ।

( ३२ ) त्रिरात्रो पोपित स्तिष्ठेत्कुर्याबाह्मणभोजनम् ॥१५०॥ जो मनुष्य मंडूक, सांप, विलाव, मूसा इनको मारता है वह तीन उपवास कर ब्राह्मण भोजन कराने से शुद्ध होता है। पतिमुल्लंघ्य मोहात्स्त्री किं किं न नरकं व्रजेत् । कृच्छ्रान्मनुष्यतां प्राप्य किं किं दुःखं न विन्दति ॥११ कात्यायनस्मृतिः खंड १६ । स्त्री अज्ञानता से पति का उल्लंघन करके किस २ नरक में नहीं जाती इसके पीछे बड़े कष्टों को पाकर मनुष्य योनि मिलती है उस में वह किस २ दुःख को नहीं भोगती ॥११॥ पतिशुश्रूपयैव स्त्री कान्न लोकन्समश्नुते । दिवः पुनरिहायाता सुखानामम्बुधिर्भवेत् ॥१२॥ का० खंड ३ स्त्री केवल पति की शुशृपा करके ही सम्पूर्ण स्वर्ग के सुखों को भोगती है और स्वर्ग से पुनर्वार भूलोक में आकर सुखों का समुद्र हो जाती है ॥ १२॥ मान्या चेन्प्रियते पूर्वभाया पतिविमानिता। त्रीणि जन्मानि सा पुंस्त्वं पुरुपः स्त्रीत्वमर्हति ॥१३।। का० खंड २०। यदि निदोप माननीया स्त्री स्वामी से अपमानित हो मर जाय तो यह स्त्री तीन जन्म तक पुरुप होती है और वह पुरुष स्त्री होता है ॥१३॥ मा शोकं कुरुतानित्ये सर्वस्मिन्प्राण धर्मणि । धर्म कुरुत यत्नेन यो वः सह गमिष्यति ॥ ४ ॥ मानुष्ये कदली स्तम्भे निःसारे सारमार्गणम् ।

( ३३ )
यः करोति स संमृदो जलवुवुद्सन्निभे ॥शा
गंत्री वसुमती नाशमुदवितानि च ।
केन प्रख्यः कथं नाशं मर्त्य लोको न यास्यति ॥६॥
पंचधा संभृतः कायो यदि पंचत्वमागतः ।
कर्मभिः स्वशरीरोत्थस्तत्र का परिदेवना ॥ ७॥
सर्वेक्षयांता निचयाः पतनांताः समुच्छ्याः ।
संयोगा विप्रयोगान्ता मरणां तं हि जीवितम् ।।८।।
श्लेष्माथु बांधवर्मुक्त प्रेतो भुक्ने यतोऽयशः ।
अतो न रोदितव्यं हि क्रियाः कार्याः प्रयत्नतः॥8
कात्यायनस्मृतिः खंड २२॥
अर्थ-सम्पूर्ण प्राणी अनित्य हैं, इस कारण तुम शोक
मत करो, यन पूर्वक धर्म कार्य करो, यह धर्म ही तुम्हारे
साथ चलेगा ॥४॥ केल की पिराडी के समान असार और
जल के बुलबुल के समान मनुप्य-लोक में जो मनुष्य सार
ढूंढना है वह अत्यन्त मूर्ख है ॥५॥ पृथ्वी. समुद्र, देवता
सभी का नाश है तो इस मृत्यु-लोक में किसका नाश न
होगा? ॥६॥ पांच भूतों से बना हुया यह देह यदि देह धारण-
जनित कर्मों के फल में पंचत्व को प्राप्त होजाय, तो इसमें
शाक क्या है ॥७॥ सम्पूर्ण सत्रयों का अन्त में तय है,
उन्नति का शेष पतन है, संयोग का शेप वियोग है, और
जीवन का शेष मरण है ॥८॥ जो बन्धु बान्धव रुदन के
समय नत्रास यांमृ डालते हैं प्रत अवश होकर उनका भोजन
करता है इस कारण रुदन करना उचित नहीं वरन यत्नपूर्वक
कर्म करना कर्तव्य है ॥६॥

( ३४ ) लवणं मधुमांस च सारांशो येन हुयते । उपवासेन भुञ्जीत नोरु रात्रौ न किंचन ॥ ६ ॥ अर्थ-लवण सहित मांस सारका भाग इनका जो हवन करता है वह दिन में उपवास करे और रात्रि में अधिक न खाय ॥६॥ गौर्विशिष्टतमा विप्रेर्वेदेष्वपि निगद्यते ॥ न ततोऽन्यद्वरं यस्मात्तस्माद्गावर उच्यते ॥ १४ ॥ येषां बतानामन्तेषु दक्षिणा न विधीयते । वरस्तत्र भवेद्दानमपि वाऽऽच्छादयेद्गुरुम् ।। १५ ॥ कात्यायन स्मृतिः-सप्तविंशः खण्डः अर्थ-ब्राह्मणों ने गौ को वेदों में भी उत्तम कहा है इसी कारण गौ से श्रेष्ठ और कोई नहीं है इसी से गौ को वर कहते हैं ॥ १४ ॥ जिन व्रतोंके अन्त में दक्षिणा नहीं कही है वहां वर (गौ) दक्षिणा दे अथवा गुरु को वस्त्रों से ढक दे ॥ १५ ॥ अन्नदाः सुखिनो नित्यं वस्त्रदश्चैव रूपवान् । स नरः सर्वदा भूपोयो ददाति वसुंधराम् ।।१३ ।। वृहस्पति स्मृतिः । अर्थ-अन्न का दान करनेवाला मनुष्य सर्वदा सुखी रहता है, वस्त्र का दान करने वाला रूपवान होता है, और जो मनुष्य पृथिवी दान करता है वह सर्वदा राजा होता है ॥१३॥ प्रावृता वस्त्रदा यांति नन्नायांति त्ववस्त्रदाः। तृप्तायांत्यन्नदातारः क्षुधिता यांत्यनन्नदाः ॥ १६ ।। वृहस्पति स्मृति।

(३५)
अर्थ-यन्त्र का दाता वस्त्रों से पाच्छादित होकर
(परलोक में जाना ई) जिसने वस्त्र दान नहीं किये वह
मनुष्य नंगा रहता है अन्न का देने वाला तृप्त होता है और
जिसन अन्न दान नहीं किया वह चुधित होकर जाता है ॥१६॥
यो न हिंस्यादहह्यात्मा भृतग्रामं चतुर्विधम् ।
नस्य देहाद्वियुतस्य भयं नास्ति कदाचन ।। ३४॥
वृहस्पति स्मृति।
अर्थ-जो मनुप्य में सब का श्रात्मा है. यह जान कर
अंडज स्वेदज उद्भिज्ज जरायुज इन चार प्रकार के भृतों को
दुःन नहीं देना उस जीयान्मा को देह से पृथक होने पर भी
कभी भय नहीं होता ॥ ३४॥
पंच कन्यानृतं हतिदश हंति गवानृतम् ।
शतमश्वानृतं हंति सहस्रं पुरुषानृतम् ।।४३ ।।
हंति जातानजातांश्च हिरण्यार्थेऽनृतं बदन् ।
सर्व भूम्यनृतं हंनि माम्म भृम्यनृतं वदीः॥४४॥
वृहस्पति स्मृति।
अर्थ-कन्या के सम्बन्ध में झूठ बोलने से पांच को गी के
सम्बन्ध में झूठ बोलन से दश को घोदेके निमित्त झूठ बोलने
ससी को और
पुरुप के निमित्न झूठ बोलने में हज़ार
को
माग्ने वाला होना है ॥४३॥ सुवर्ण के सम्बन्ध में जो झट
बोलताई उसके कुल में जो उत्पन्न ई और जो उत्पन्न होगा
वह उन सबको नए कर देगा और पृथ्वी के निमित्त झूठ
गालने में सब को मारता है. अतएव पृथ्वी के विषय में झूट
चालना उचित नहीं है ॥४४॥

( ३६ ) धनं फलति दानेन जीवितं जीवरक्षणात् । रूपमारोग्यमैशवर्यमहिंसाफलमश्नुते ॥ ७१ ॥ वृहस्पति स्मृति। अर्थ-दान द्वारा धन सफल होता है, जीत्र की रक्षा करने से श्रायु की वृद्धि होती है, जो मनुष्य हिंसा नहीं करता वह ऐश्वर्य और आरोग्य रूप अहिंसा के फल को भोगता है ।। ७..॥ नाके चिरं सबसते उपवासी च यो भवेत् । सततं चैकशायी यः स लभेदीप्सितां गतिम् ॥७६॥ वृहस्पति स्मृति । अर्थ-जो मनुष्य नियम पूर्वक उपवास करता है वह बहुत काल तक स्वर्ग में निवास करता है और जो मनुष्य निरन्तर एक ही शय्या पर शयन करता है अर्थात् एक ही स्त्री के साथ भोग करता है उस को अभिलपित गति प्रान होती है ॥ ७६ ॥ वीरासनं वीर शय्यां वीरस्थानमुपाश्रितः। अक्षय्यास्तस्य लोकाः स्युस्सर्वकामागमास्तथा ॥७७॥ बृहस्पति स्मृति । अर्थ-जो मनुप्य वीर श्रासन वीर शय्या और वीर स्थान में स्थित रहता है उसके सब लोक और सम्पूर्ण काम अक्षय हो जाते हैं ॥ ७७॥ उपवासं च दीक्षां च अभिपेकं च वासव । कृत्वा द्वादशवर्षाणि वीरस्थानाद्विशिष्यते ।।७८|| बृहस्पति स्मृतिः।

( ३७ ) अर्थ- वासव! जो मनुष्य बारह वर्ष तक उपवास दीना और अभिषेक इन को करना है यह स्वर्ग में उत्तम होता है ॥ ७॥ चतुर्णामपि वर्णानामाचारो धर्मपालकः । प्राचारभ्रष्टदेहानां भवेद्धर्मः पराङ्मुखः ।। ३७ ॥ पाराशर स्मृति ऽध्यायः । अर्थ-वाचारही चारों वर्षों के धर्मों का पालन करने- द्वारा हैं कारण कि श्रावार के बिना किये केवल धर्म के कथनमात्र से ही धर्म का पालन नहीं हो सकता जो मनुष्य श्राचार से भ्रष्ट है और जिन्होंने धर्माचरण करना छोड़ दिया उन में धर्म विमुघ हो जाता है ।। ३७ ॥ मुत्तेत्रे वापयेहीजं सुपात्र निक्षिपद्धनम् । सुक्षेत्रे च सुपात्रे च युप्तं दत्त न नश्यति ॥४७॥ न पृच्छेद्वोत्रचरण न स्वाऽध्यायं श्रुतंतथा । हृदय कल्पयेवं सर्वदेवमयो हि सः॥४८॥ पराशर स्मृतिः ऽध्याय श्रध-श्र मन में बीज बोये और सुपात्र को दान देवे अच्छ नत्र में जो अन्न वाया जाता है और सुपात्रको दान दिया जाता है वह कमी नष्ट नहीं होता ॥४७॥ अतिथि से गोत्र प्राचरण तथा आपने फिन शास्त्रों को पढ़ा या श्रवण किया ई इत्यादि बात न पूंछ कारण कि अतिथि देवस्वरूप है उसे देवता के समान जान कर उसका सम्मान करना उचित है ॥४॥ यतिश्च ब्रह्मचारी च पक्वान्नस्वामिनाचूमों।

( ३८ ) तयोरन्नमदत्त्वा च भुक्त्वा चांद्रायणं चरेत । ५१ । पाराशर स्मृतिः ऽध्याय १ । अर्थ-यति और ब्रह्मचारी यह दोनों पक्कान की भिक्षा के अधिकारी हैं इन को विना अन्न दिये हुए जो भोजन करता है उसकी शुद्धि चांद्रायण व्रत के करने से होती है।॥५१॥ यतये कांचनं दत्त्वा तांबूलं ब्रह्मचारिणे । चोरेभ्योऽप्य भयं दत्वा दातापि नरकं ब्रजेत् ॥३०॥ पाराशर स्मृतिः अध्याय १ अर्थ-जो दाता सन्यासी को सुवर्ण श्रादिक धन दान करता है तथा ब्रह्मचारी को ताम्बूल और चोरों को अभय देता है वह नरक को जाता है ॥६०॥ पुष्पं पुष्पं विचिनुयान्मूलच्छेदं न कारयेत् । मालाकार इवाऽरामे न यथांगार कारकः ॥६६॥ पाराशर स्मृतिः ऽध्याय १। अर्थ-जिस भांति माली उपवन में से फूल फलादि को ग्रहण करता है परन्तु अग्नि लगाने वाले के समान वृक्षों की जड़ को,नहीं काटता उसी भांति राजाओं को उचित है कि अपना भाग प्रजा से थोड़ा २ लेकर प्रजा की रक्षा कर सर्वा- पहारी न हो ॥६६॥ लाभ कर्म तथा रन गवां च परिपालनम् । कृषिकर्म च वाणिज्य वैश्यवृत्तिरुदाहृता ॥ ७० ॥ पाराशर स्मृतिः ऽध्याय १। अर्थ व्याज लेना रत्नों का क्रय विक्रय गौ का पालन .

( ३६ ) नौग्री की रक्षा और उन के यछटे आदिकों को बेचकर जीविका करना खेती और व्यापार यह वैश्यकी वृत्ति है ॥७॥ लवणं मधु तलं च दधि तक्रं घृतपयः ।। न दुप्येच्छूद्रजातीनां कुर्यात्सर्वेषु विक्रयम् ॥७२॥ पाराशर स्मृतिः ऽध्याय १। अर्थ-लवण मधु नेल दट्टी महा और घृत दुग्धादि सम्पूर्ण रसों के बचने का शूद्र को अधिकार है ऐसा करने से शुद्र को दोप नहीं लगता ॥ ७२ ॥ विक्रीणन्मद्यमांसानि ह्यभन्यस्य च भक्षणम् कुर्वन्नगम्यागमनं शूद्रः पतति तत्क्षणात् ॥७३।। पाराशर स्मृतिः ऽध्याय॥ श्रध-मदिरा श्रीर मांस को शूद्र न बेचे अभक्ष्य वस्तु का भक्षण न करे और अगम्या स्त्री के साथ गमन न करे इन कामों के करने से शुद्ध तत्काल पतित होता है ॥७३॥ तिला रसा न विक्रेया विक्रेया धान्यतत्समाः विप्रस्यय विधा वृत्तिस्तृण काष्ठादिविक्रयः ॥७॥ पाराशर स्मृतिः ऽध्याय २। बालगों को उचित है कि निल सम्पूर्ण प्रकार के रस नथा लोद लानादिक, फल, पुष्प, नील बा रसवर्ण के वस्त्रों का न चचे ॥ ७॥ ब्राह्मणश्चत्कृपि कुर्यात्तन्महादोपमाप्नुयात् । अष्टागवं धर्महलं पङ्गवं वृत्तिलक्षणम् ॥ ८॥ चतुर्गवं नृशंसानां द्विगवं गोजिघांसुवत् । द्विगवं वाहयेत्पादं मध्याह्न तु चतुर्गवम् ।।६।।

(४०) पनवं तु त्रियामाहेश्टभिः पूर्ण तु बाहयेत् । न याति नरकेष्वेवं वर्तमानस्तु वै द्विजः ॥१०॥ ब्राह्मण को खेती करने से बड़ा पाप होता है परन्तु पाठ वैलों वाला हल धर्म पूर्वक उत्तम है छः बैलों का हल मध्यम है ॥ ८॥ जो मनुष्य चार चैलों वाला हल जोतते हैं वे दया- हीन है और जो दो बैलों का हल जोतते हैं वह गोहिंसक हैं दो वैलों वाले हल को पहर भर दिन चढ़े तक जोतना उचित है और चार बैल वाले हल को मध्याह्न तक जोते ॥ ६॥ हल में छः वैलों को जोतकर तीसरे पहर तक कार्य ले और श्राट वैल वाले हल को सायंकाल तक जोते, इस भांति प्राचरण करने से ब्राह्मण नरक में नहीं जाता ॥ १०॥ कंडनी पेषणी चुल्ली उदकुंभी च मार्जनी ।। १३ ॥ पंच सूना गृहस्थस्य अहन्यहनिवर्तते । ओखली, चक्की, चूल्हा तथा जल से भरे हुए पात्रों के स्थान वुहारी ।। १३ ।। इन पांचों वस्तुओं से नित्य प्रति हिंसा होती है। वृक्षं छित्त्वा महीं भित्वा हत्वा च कृमि कीटकान्॥१॥ पाराशर स्मृति अध्याय २ खेती करने से वृक्षों का छेदन और पृथ्वी का भेदन होता है और हल से कमी आदिक असंख्य जीव मरते हैं ॥ १५॥ अतिमानादति क्रोधास्नेहाद्वायदिवाभयात् । उद्धनीयात्स्त्री पुमान्वा गतिरेपा विधीयते ॥१॥ पूय शोणित सम्पूर्ण त्वन्धे तमसि मज्जति । पष्टि वर्ष सहस्राणि नरकं प्रतिपद्यते ॥ २ ॥ पाराशर स्मृति अध्याय ४।

( ४१
जो सी पुरुष अत्यन्त क्रोध, हेर वा लोक भयादि के
कारण अपने श्राप फांसी लेकर मर जाए तो उसकी गति इस
प्रकार होती है ॥६॥ वह मनुष्य रुधिर और पीव से भरे
हुए अन्धनामिन नामक नरक
में
इयता
है और फिर बाट
सहन्न वर्ष तक निवास करता है ॥२॥
चांधवानां सजातीनां दुर्वृत्तं कुरुते तु या ।
गर्भपातं च या कुर्यान्न तां संभाषयेक्वचित् ॥१६॥
यत्पापं ब्रह्महत्याया द्विगुणं गर्भ पातने ।
प्रायश्चिनं न तस्यास्ति तस्यास्त्यागो विधीयते ॥२०॥
पाराशर स्मृत्तिः अध्याय ४।
जो स्त्री अपने यन्धु बान्धचों से अथवा अपनी जाति
याला से दुराचरण करती है या जो गर्भपात करती है उस
रखी न कभी वार्तालाप न करे. ॥ १६ ॥ जो पाप ब्रह्म हिंसा में
होना है उस मे दुगुना पाप गर्भ गिराने में होता है उस का
प्रायश्चित्त नहीं हैं इस कारण उस स्त्री का त्याग ही करना
उचित हैं ॥२०॥
मृत भर्तरि या नारी ब्रह्मचर्य व्रते स्थिता ।
सा मृता लभते स्वर्ग यथा ते ब्रह्मचारिणः ॥ ३१ ॥
पाराशर स्मृति अध्याय ४।
पति के मर जाने पर जो स्त्री ब्रह्मचर्य नियम. में स्थित
हो वह मरन के उपरान्त ब्रह्मचारी के समान स्वर्ग में
जाती है ॥३॥
क्रौंच सारस इंसांश्च चक्रवाकं च कुक्कुटम् ।
जालपादं च शरभं हत्वाऽहोरात्रतः शुचिः ॥२॥

( ४२ )
बलाकाटिट्टिभौ वापि शुकपारावतावपि ।
अटीनवकघाती च शुद्धयते नक्कभोजनात् ।। ३ ।।
पाराशर स्मृति अध्याय ६।
कुंज, सारस, हंस, चकवा, कुक्कुट और जालपाद तथा
जिन पक्षियों के चरण जुड़े हैं जिनके हड्डी हो इनका मारने
वाला एक दिन रात उपवास करने से ही शुद्ध हो जाता है
॥ २॥ वगली, टटीरी, तोता तथा पारावत, मछली और
वगला इनका मारने वाला नक्क भोजन व्रत के करने से शुद्ध
हो जाता है॥३॥
भेरुंडचापभासांश्च पारावतकपिंजलौ ।
पक्षिणां चैव सर्वेपामहोरात्रमभोजनम् ॥ ८॥
पाराशर स्मृति अध्याय ६।
भेरुंड, नीलकंठ, भास और पारावत तथा कपिंजल इन
समस्त पक्षियों में से जिस किसी ने एक की भी हिंसा की
हो उसकी शुद्धि एक दिन रात निराहार व्रत करने से होती
है ॥८॥
शिशुमारं तथा गोधां हत्वा कर्म च शल्लकम् ।
वृंताक फलभक्षी वाप्यहोरात्रेण शुद्धयति ॥ १० ॥
पाराशर स्मृति अध्याय ६।
शिशुमार, गोह तथा कच्छप और शिल्लू, सांप इनकी
हिंसा करने वाला मनुष्य और चैगन के फल को खाने वाला
अहोरात्र व्रत करने से शुद्ध होता है ॥ १० ॥
कुरंग वानरं सिंहं चित्रं व्याघ्रं च घातयन् ।
शुद्धयते स त्रिरात्रेण विप्राणां तर्पणेन च ॥ १३ ॥

( ४३ ) मृगरोहिद्वराहाणामवेबस्तस्य घातकः । अफालकृष्टमश्नीयादहोरात्रमुपोष्य सः ॥ १४ ॥ पाराशर स्मृति अध्याय ६। मृग, वानर तथा सिंह, चीता और व्याघ्र की हिंसा करने वाला मनुष्य तीन दिन तक उपवास कर सुपात्र ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥ १३॥ मृग, रोहित, शुकर तथा भेड और बकरी की हिंसा करने वाला अहोरात्र उपवास कर विना हल से जुते हुए श्रन्न को खाकर शुद्ध होता है ॥ १४ ॥ सद्यो निःसंशये पापेनभुञ्जीतानुपस्थितः । भुजानो बर्द्धयेत्पापं पपद्यत्र न विद्यते ॥ ४ ॥ संशये तु न भोक्तव्यं यावत्कार्यविनिश्चयः । प्रमादस्तु न कर्त्तव्यो यथैवासंशयस्तथा ॥ ५ ॥ पाराशर स्मृतिः-अध्यायः यदि निश्चय ही पाप किया है यह विदित हो जाय तो उस पापको धर्मम ब्राह्मणों के अर्थ निवेदन किये विना भोजन न करे यदि बिना परिषद् के निकट गये भोजन कर ले तो पाप की वृद्धि होती है॥४॥ यदि पाप करने में सन्देह हो जाय तो उस का निश्चय विना हुए भोजन न करे और जव नक उसका निश्चय न हो जाय तब तक असावधान भी रहना उचित नहीं ॥५॥ तेऽपि पापकृतां वैद्याहतारश्चैव पाप्मनाम् । व्याधितस्य यथा वैद्या बुद्धिमन्तोरुजापहाः ।।७।। पाराशर स्मृतिः अध्यायः कारण कि उस के पापों को जान कर जिस भान्ति बुद्धि- ( ४४ ) मान् वैद्य रोगी की पीड़ाको दूर करता है उसी प्रकार ब्राह्मण उस के पाप को नष्ट कर देने का उपाय कह देगें ॥ ७ ॥ प्रायश्चित्ते समुत्पन्ने हीमान्सत्यपरायणः। मुहुरार्जव संपन्नः शुद्धि गच्छेत मानवः ॥ ८॥ पाराशर स्मृतिः अध्यायः = (इस भान्ति परिषद् की आज्ञानुसार) पाप का प्रायश्चित करने पर लज्जाशील संत्यपरायण सरलखभाव पुरुष शीघ्र ही शुद्धि प्राप्त करते हैं ॥ ८॥ अत ऊचं तु ये विप्राः केवलं नामधारकाः। परिपत्वं न तेष्वस्ति सहस्रगुणितेष्वपि ।। २३ ।। यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । ब्राह्मणस्त्वनधीया नस्त्रयस्ते नामधारकाः ॥ २४ ॥ पाराशर स्मृतिः अध्याय - इसके अतिरिक्त जो केवल नाममात्र के ब्राह्मण हैं वह सहस्रों एकत्रित होने पर भी परिपद् नहीं होकती ॥ २३ ॥ जिस भान्ति काठ का हाथी जैसा चर्म का मृग वेद का न जानने वाला ब्राह्मण भी उसी प्रकार है यह तीनों केवल नाम मात्र के धारण करने वाले हैं ॥ २४ ॥ ग्रामस्थानं यथा शून्यं यथा कूपस्तु निर्जल। यथा हुतमनमौ च अमंत्रो ब्राह्मणस्तथा ॥ २५ ॥ यथा पंढोऽफलः स्त्रीषु यथा गौरुपराऽफला। यथा चाज्ञेऽफलं दानं तथा विप्रोऽनृचोऽफलः ॥२६॥ पाराशर स्मृतिः अध्याय ८ ( ४५ ) जिस भान्ति शुन्य ग्राम निर्जल कूप और अग्निहीन भस्म के देरमें हवन करना निष्फल है उसी भान्ति विना मन्त्रा का जानने वाला ब्राह्मण भी निष्फल है ॥ २५ ॥ जिस भान्ति नपुं. सक का स्त्रीके साथ संभोग निष्फल हो जाता है जिस भांति ऊपर भूमि निष्फल है जिस भांति मूर्ख को दान देना निष्फल है उसी भांति वेद मन्त्रीकोन जानने वाला ब्राह्मण निषिद्ध है। उप्णे वर्पति शीते वा मारुते वातिर्वा भृशम् ।.. न कुर्वातात्मनस्त्राणं गोरकृत्वा तु शक्तितः ॥ ४० ॥ आत्मनो यदि वाऽन्येषां गृहे क्षेत्रेऽथवा खले । भक्षयन्ती न कथयत्पिवंतं चैव वत्सकम् ॥ ४१ ॥ पाराशर स्मृतिः अध्याय ८ चाई गर्म पवन चल चाहे.ठराठी हवा चले चाहे श्रान्धी चलती हो, चाह वर्षा होती हो परन्तु अपनी रक्षा की और ध्यान न देकर अपनी शक्ति के अनुसार गौ की रक्षा करनी अवश्य कर्तव्य है ॥ ४०॥ अपने या दूसरे के घर में श्रथवा खेत में या प्रल में यदि गौ कुछ धान्यादिक खाती हो तो कुछ न बोल और जो यच्छदा गौ का दूध पीता हो तो भी कुछ न महे ॥४॥ ब्राह्मणार्थ गवार्थे वा यस्तु प्राणान्परित्यजेत् । मुच्यते ब्रह्महत्याया गोप्ता गोत्रामणस्य च ॥ ४३ ।। पाराशर स्मृतिः अध्याय जो मनुष्यं ब्राह्मण और गौ के निमित्त अपने प्राण त्याग करता है वह और ब्राह्मण और गौकी रक्षा करने वाला पुरुप ब्रह्महत्या के पाप से छूट जाते हैं ॥४३॥ .

( ४६ ) to गवां संरक्षणार्थाय न दुप्येद्रोधवन्धयोः । तद्वधं तु न तं विद्यात्कामाकामकृतं तथा ॥१॥ पाराशर स्मृतिः अध्याय: भली भान्ति शिक्षा करने की इच्छा से गौ को वान्धने या रोकने में यदि गोहत्या हो जाय तो इस में दोप नहीं है और उस अवस्था में वह कामकृत वा अकामकृत गोवध नहीं कहा जा सकता ॥ १ ॥ अतिदाहेतिवाहे च नासिकाभेदने तथा । नदी पर्वतसंचारे प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् ।। २८ ।। अविदाहे चरेत्पादं द्वौ पादौ वाहने चरत् । नासिक्ये पादहीनं चरेत्सर्व निपातने ॥ २६ ॥ दहनात्तु विपद्येत अनड्वान्योक्न यंत्रितः । उक्तं पाराशरेणैव ह्येक पादं यथाविधि ।। ३० ।। पाराशर स्मृतिः अध्याय : दागते समय में यदि अधिक दग्ध हो जाय या अधिक वोझ ले जाने के निमित्त लादा जाय नाथा जाय या कष्ट देने वाले नदी पर्वतके मार्ग से ले जाय तोप्रायश्चित्त करना उचित है॥२८॥ अधिक दग्ध करने पर एकपाद प्रायश्चित्त करे बोझा अधिक लादने पर दोपाद प्रायश्चित्त करे नासिका के छेदने पर तीनपाद और मारने में पूर्ण चतुष्पादका प्रायश्चित्त करना चाहिये ॥ २६ ॥ यदि जोत में वन्धा बैल अग्नि से मर जाय तो विधि सहित एकपाद् प्रायश्चित्त करने से शुद्ध होता है यह पराशर मुनि का वचन है ॥ ३० ॥ रोधनं बंधनं चैव भारप्रहरणं तथा ।

( ४७ ) दुर्गप्रेरणयोक्तं च निमित्तानि वधस्य पद् ॥ ३१ ॥ पाराशर स्मृतिः अध्याय : जोत बन्धन रोष अधिक बोझा लादना प्रहार और जोत कर नदी पर्वत इत्यादि दुर्गम मागों में ले जाना यह छः ही प्रत्येक वध का मूल है ॥ ३१ ॥ इह यो गोवधं कृत्वा प्रच्छादयितुमिच्छति । स याति नरकं घोरं कालसूत्रमसंशयम् ॥ ६० ॥ विमुक्तो नरकात्तस्मान्मर्त्यलोके प्रजायते । लीवो दुःखी च कुष्ठी च सप्तजन्मानि वै नरः ॥६१॥ तस्मात्प्रकाशयेत्पापं स्वधर्म सततं चरेत् । स्वाबालभृत्यरोगातेप्यति कोपं विवर्जयेत् ॥ २ ॥ पाराशर स्मृतिः अध्याय जो मनुष्य इस लोक में गोवध करके उस पापको छिपाने की इच्छा करता है वह निश्चय ही कालसूत्रनामक घोर नरक में जाता है ॥ ३०॥ इसके उपरान्त उस भयानक नरकसे कर फिर इसी मृत्यु लोकम मनुष्य योनिमें जन्म लेता है और फिर जन्म लेकर बहिरा दुःखी कोढी होकर क्रमानुसार सात जन्म उस को व्यतीत करने पड़ते हैं ॥ ६ ॥ इस कारण पाप करके उस को छिपाने की चेष्टा कदापि न करे प्रकाश करदे श्रीर स्त्री बालक सेवक गौ तथा इन के ऊपर क्रोध कदापि न कर ॥ ३२॥ एक हासयेद्ग्रास कृप्णे शुक्ने च बर्द्धयेत् । अमावस्यां न भुञ्जीत हप चांद्रायणो विधिः ॥ २ ॥ कुक्कुटांडप्रमाणं तु ग्रासं वै परिकल्पयेत् ।

( ४८ ) अन्यथा जातदोपेण न धर्मो न च शुद्धयते ॥३॥ पाराशर स्मृतिः अध्याय १० कृष्ण पक्ष में प्रतिदिन एक ग्रासं.कमती करता रहे और शुक्ल पक्ष में प्रतिदिन एक २ ग्रास को बढ़ावे और अमावस्या के दिन कुछ भी न खाय यह चांद्रायण व्रत की विधि है ॥२॥ एक २ ग्रास को मुरगी के अण्डों के समान वड़ा बनावे । इसके अन्यथा करने से न धर्म है और न शुद्धिही होती है॥३॥ चंडाली वा श्वपाकी वा अनुगच्छति यो द्विजः। त्रिरात्रमुपवासी च विप्राणामनुशासनात् ॥ ५ ॥ पाराशर स्मृतिः अध्याय १० ॥ जो ब्राह्मण चंडाली वा श्वपची में गमन करता है वह ब्राह्मण, ब्राह्मणों की आज्ञानुसार तीन रात्रि उपवासं करे ॥५॥ पतत्यर्द्ध शरीरस्य यस्य भार्या सुरां पिवेत् । पतिताई शरीरस्य निष्कृतिन विधीयते ॥२८॥ पाराशर स्मृतिः अध्याय १०॥ जो स्त्री मदिरा पान करती हैं उसका प्राधा शरीर पतित हो जाता है इस प्रकार से जिसका शरीर पतित हो गया है उसकी शुद्धि नहीं है वह नरक को जाती है इस में सन्देह नहीं ॥२७॥ गोमूत्रं गोमयं वीरं दघि सर्पिः कुशोदकम् । एक रात्रोपवासश्च कृच्छ्रे सांतपनं स्मृतम् ॥ ३०॥ पाराशर स्मृतिः अध्याय १०॥ गोमूत्र, गौ का गोवर, दूध, दही, घृत और कुश का जल यह पंचगव्य पान कर एक रात्रि उपवास करे यह सांतपन कहाता है।॥ ३०॥ .. 4 (४६) जारण जनयद्गर्भ मृते त्यक्ते गते पतौ। तांत्यजेत् परे राष्ट्र पतितां पापकारणीम् ।। ३१ ।। पाराशर स्मृतिः अध्याय पति के त्याग करन सया पति के मर जाने न स्त्री अन्य पुरुप के संयोग से गर्भवती हो जाय तो उल पापिनी पतित स्त्री को अन्य राज्य में होद श्राव ॥ ३२॥ पीयपं श्वेत लशुनं घृताकफलजने । पलाई वृत्तनिर्यासान्देवस्वकपकानि च ॥ १० ॥ उष्टी चीर मत्रीनीरमनाना जने द्विजः । त्रिरात्रमुपवासेन पंचगव्येन शुद्धयति ॥ ११ ॥ पाराशर स्मृतिः अध्याय ११ । परची, श्वेत लहसन, बैंगन, गाजर, प्याज, वृक्ष का गांद. देवता का द्रव्य, फरक (पृथ्वी की ढाल ) ॥ २० ॥ ऊंटनी नया भेद का दुध जो ब्रामण इन वस्तुओं को अमा- नना सखाता वह तीन रात्रि उपवास कर पंचगव्य के पान से शुद्ध हो जाता है ॥ ३ ॥ नवाहमति कुच्छी स्यात्पाणिपूरान्न भोजनः । त्रिरात्रमुपवासः स्यादतिकृच्छः स उच्यते ॥५शा पाराशर स्मृति अध्याय । एक अंजुली भर अन्न को नौ दिन तक खाय वह अति सन् कदाता है और नीन रात्रि उपवास करे उसे कृच्छ कटन ॥ ५५॥ चत्यवृत्तश्चितिः पूयथंडालः सोम विक्रयी। एनांस्तु ब्राह्मणः स्पृष्ट्वा सवासा जलमाविशेत् ॥२॥ पाराशर स्मृति अध्याय १२ ।

( ५० ) ॐ चैत्य का वृक्ष ( इसकी पूजा बौद्ध मत वाले करते हैं) चितारोध चांडाल सोमलता का वेचने वाला इन सब का स्पर्श करने से ब्राह्मण वस्त्रों सहित स्नान करे ॥ २५ ॥ गृहस्थतु दयायुक्तो धर्ममेवानुचिंतयेत् । पोष्यवर्गार्थसिद्धयर्थ न्यायवर्ती सबुद्धिमान् ॥ ४२ ॥ न्यायोपार्जित वित्तन कर्त्तव्यं ह्यात्मरक्षणम् । अन्याये नतुयो जीवेत्सर्व कर्म बहिष्कृतः॥४३॥ पाराशर स्मृतिः अध्याय १२। दयावान गृहस्थ सर्वदा धर्म की चिन्ता करें और अपने पुत्र वा भृत्य आदि के प्रयोजन की सिद्धि के लिये बुद्धिमान, सर्वदा न्याय का वर्ताव करता रहै ॥ ४२ ॥ न्याय के उपार्जन किये हुए धन से अपनी रक्षा करै जो अन्याय से जीवन व्य- तीत करता है वह धर्मों से रहित हैं ॥४३॥ श्रांतः क्रद्धास्तमोऽधोवा क्षुत्पिपासाभयादितः । दानं पुण्यम् कृत्वा वा प्रायश्चित्तं दिनत्रयम् ॥५॥ पाराशर स्मृति अध्याय १२ । थका या क्रोधी अथवा अज्ञानता से अन्धा तुधा तृष्णा से दुःखी उस ब्राह्मण को दान पुण्य करना उचित नहीं, वह केवल तीन दिन तक ही प्रायश्चित्त करे ॥ ५५ ॥ * चैत्य वृक्ष जैन मत में उसको कहते हैं जिस वृत के नीचे श्री तीर्थ- करदेव भगवान् को केवल ज्ञान उत्पन्न होता है अतः वह वृक्ष लोगों की दृष्टि में माननीय हो जाता है तथा इसी का अनुकरण वौद्धमत ने किया है सो इस कथन से यह भली भांति सिद्ध हो जाता है कि उक्त स्मृतिकार के पहले जैन मत और वौद्धमत भली प्रकार से विद्यमान थे।

( ५ ) नापचिप्तोऽपि भापेत नावजेत्ताडितोऽपि वा । विद्वपमथ पैशुन्यं हिंसनं चार्कवीक्षणम् ।। २७॥ तौर्यत्रिकानृतोन्मादपरिवादानलंक्रियाम् । अञ्जनाहर्तनादर्शस्रग्विलेपनयोपितः ॥२८॥ वृथाटनमसंतोपं ब्रह्मचारी विवर्जियत् । ईपचलितमध्याह्वेऽनुज्ञातो गुरुणा स्वयम् ॥ २६ ॥ अलोलुपश्चरेक्षं वृत्ति पृत्तम् वृत्तिषु । सद्यो भिक्षान्नमादाय वित्तवत्तदुपस्पृशेत् ॥३०॥ व्यास स्मृतिः अध्याय ।। यदि किसी समय गुरुदेव तिरस्कार भी करें तो उनके सन्मुम्ब कुछ न बोले और गुरू की ताडना करने पर भी वहां स न भांग, वैर (किसी के साथ शत्रुता ) पैशुन्य (चुगलपन) हिंसा सूर्य का दर्शन ॥ २७ ॥ तीर्यात्रिक ( गाना बजाना ) भूट, उन्माद, निन्दा, भूपण, अंजन, उवटन. (आदर्श शीशेका) दखना, माला चन्दन श्रादि का लगाना और स्त्रीसंग ||२|| वृथा फिरना असंतोष इन का ब्रहाचारी त्याग करदे श्रीर मध्याद समय उपस्थित होने पर स्वयं ही गुरुकी श्राक्षासे ॥२६॥ चपलता को छोड़ कर उत्तम श्राचरण करने वाली जातियों में भिक्षा मांग और शीघ्र ही भिक्षा को लेकर धन की समान उसका उपस्पर्श (रक्षा) करे ॥ ३० ॥ मनोवाकर्मभिः शुद्धा पतिदेशानुवर्तिनी । छायेवानुगता स्वच्छा सखीव हितकर्मसु ।। २६ ।। दासीवादिष्टकार्येषु भार्या भर्तुः सदा भवेत् ।

( ५२ ) ततोऽन्नसाधनं कृत्वा पतये विनिवेद्यतत् ॥ २७ ॥ व्यास स्मृतिः अध्याय २ वह पतिव्रता स्त्री पति की आज्ञानुवर्तिनी होकर मन वचन और कायासे पवित्र स्वभाव प्रकाशकर छायाकी समान पति के पीछे चले निर्मल चित्तवाली सखी की समान पतिका हित करे ॥ २६ ॥ स्वामी की आज्ञापालन करने के विषय में दासी के समान व्यवहार करे इसके उपरान्त भोजन बनाकर पति को निवेदन करे ॥ २७ ॥ पादधावनसंमानाम्यंजनादिभिरचितः। त्रिदिवं प्रापयेत्सद्यो यज्ञस्यास्यधिकोऽतिथिः ।।३६ ।। व्यास स्मृतिः अध्याय ३ अतिथि के चरण धोने, भली भान्ति सत्कार करने और उवटन आदि मलने से यज्ञ से भी अधिक वर्ग की प्राप्ति होती है।॥ ३६॥ गुरुभक्तो भृत्यपोपीदयावान न सूयकः । नित्यजापी च होमी च सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥३॥ खदारे यस्य संतोषः परदारनिर्वतनम् । अपवादोऽपि नो यस्य तस्य तीर्थफलं गृहे ॥ ४ ॥ व्यास स्मृतिः अध्याय ४ जो गृहस्थी गुरुमै भक्ति करने वाला भृत्योंका प्रतिपालक दयालु निन्दा न करने वाला सर्वदा जप होम करने वाला सत्यभाषी और जितेन्द्रिय है ॥ ३ ॥ जिसे अपनी स्त्री से ही सन्तोप है पराई स्त्री की इच्छा न करने वाला जिसकी कहीं निन्दा न हो उस गृहस्थी को घर में बैठे ही तीर्थ का फल मिलता है ।।४॥

( ५३ ) इन्द्रियाणि वशीकृत्य गृह एव वसेन्नरः । तत्र तस्य कुरुक्षेत्रं नैमिपं पुष्कराणि च ।। १३ ।। गंगाद्वारं च केदारं सन्निहर तथव च । एतानि सर्वतीर्थानि कृत्वा पापः प्रमुच्यते ।। १४ ।। व्यास स्मृति अध्याय ४ इन्द्रियों को वश में कर गृहस्थाश्रम में जो मनुष्य वास करता है उसको घर में ही कुरुक्षेत्र नैमिप और पुष्कर ॥१३॥ हरिद्वार केदार सन्निहत्य (कुरुक्षत्र) यह सम्पूर्ण तीर्थ हैं वह इन सब तीयों के प्रभाव से सब पापों से छूट जाता हैं ॥१२॥ यद्ददाति चदश्नाति तदेव धनिनो धनम् । अन्य मृतस्य क्रीडन्ति दाररपि धनरपि ॥ १७ ॥ किं धनन करिष्यन्ति देहिनापि गतायुपः । यवर्द्धयितुमिच्छं तस्तच्छरीरमशाश्वतम् ।। १८ ।। अशाश्वतानि गात्राणि विभवो नैव शाश्वतः । नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ।। १६ ।। यदि नाम न धर्माय न कमाय न कीर्तये । यत्परित्यज्य गंतव्यं तद्धनं किं न दीयते ॥ २० ॥ जीवन्ति जीविते यस विग्रमित्राणि बांधवाः॥ जीवितं सफलं तस्य प्रात्मार्थ को न जीवति ॥२१॥ पशवोऽपि हि जीवंति केवलात्मोदरंभराः। किं कायन सुगुप्तेन बलिना चिरजीविना ॥२२॥ ग्रासादर्द्धमपि ग्रासमर्थिभ्यः किं न दीयते ।

( ५४ ) इच्छानुरूपो विभवः कदाकस्य भविष्यति ॥२३॥ व्यास स्मृतिः ऽध्यायः ४ अर्थ-जो धन दान दिया जाता है भोगा जाता है वही धनी का धन है मृतक के धन रख जाने पर अन्य पुरुप उस की स्त्री वा धन से क्रीडा करते हैं ॥ १७॥ धन को रख कर जो मर जाते हैं वह उस धन से श्रात्मा का क्या उपकार करेंगे धन को भोग कर जिस शरीर को पुष्ट करने की इच्छा करते हैं सो वह शरीर भी सर्वदा रहने वाला नहीं ॥ १८ ॥ देह और धन सर्वदा रहने वाला नहीं सर्वदा मृत्यु सन्मुख खड़ी रहती है इस कारण धर्म का संग्रह करना उचित है ॥ १६ ॥ जो धन सम्पत्ति धर्म के निमित्त या अभिलापा पूर्ण के निमित्त तथा कीर्ति के निमित्त न हुई उस धन को त्याग कर परलोक जाना होगा फिर उस धन को किस कारण दान नहीं करता ॥ २० ॥ जिस मनुष्य के जीवित रहने से ब्राह्मण मित्र तथा बंधु बांधव जीवित रहते हैं उन्हीं का जीवन सफल है अपने लिए कौन नहीं जीता ॥ २१ ॥ केवल अपने पेट भरने के लिए तो पशु भी जीवन धारण करते हैं (जो मनुष्य धन से दानादि सत्कार्य नहीं करते ) उन्हें भली भांति शरीर की रक्षा करने से या बलवान होने तथा चिर- जीवी होने से ही क्या फल है ॥ २२ ॥ यदि एक ग्रास वा आधा ग्रास भी अभ्यागत को न दे (और यह कहे कि जव इच्छानुसार धन मिलेगा तव देंगे) सो इच्छानुसार धन कव मिला और किस के होता है ॥ २३ ॥ अदाता पुरुषस्त्यागी धनं संत्यज्य गच्छति । दातारं कृपणं मन्ये मृतोऽप्यर्थ न मुंचति ॥२४॥ व्यास स्मृतिः ऽध्यायः ४ है परन्तु मैं (५५) अर्थ-श्रदाता (न देने वाला ही) पुरुप त्यागी है कारण कि वह धन को छोड़ कर जाता दाता को कृपण मानता हूं कारण कि दाता मर कर भी धन को नहीं छोड़ता अर्थात् मरने पर भी उसे धन मिलता है ॥२४॥ प्राणनाशस्तु कर्तव्यो यः कृतार्थो न समृतः । अकृतार्थस्तु यो मृत्यु प्राप्तः खरसमो हि सः॥२शा व्यास स्मृतिः ऽध्यायः४ अर्थ-एक दिन अवश्य ही प्राण त्याग करने होंगे परन्तु जो कृतार्थ है वह मृतक नहीं हुआ और जो विना धर्म किए मरा है वह गधे के समान है ॥२५॥ अनाहूतेषु यद्दत्तं यच्च दत्तमयाचित्तम् । भविष्यति युगस्यांतस्तस्यांतो न भविष्यति ॥२६॥ मृतवत्सायथा गौश्च कृष्ण लोभेनदुह्यते । परस्परस्य दानानि लोकयात्रा न धर्मतः ॥२७॥ अदृष्टे चाशुभे दानं भोक्ता चैव न दृश्यते । पुनरागमनं नास्ति तत्र दानमनंतकम् ॥२८॥ व्यास स्मृतिः ऽध्यायः४ अर्थ-विना मांगे जो दान दिया है युग का तो अन्त हो जायगा परन्तु उस दान का अन्त नहीं होगा ॥२६॥ मरे चछड़े वाली काली गौ को जिस भांति दुहते हैं परन्तु उसके दूध से देवकार्य नहीं होता इसी भांति परस्पर के दान का भी कोई फल नहीं होता केवल लोकाचार की रक्षा होती है परन्तु उससे पुण्य नहीं होता ॥ २७ ॥ जो मनुष्य पाप को न देखकर (अर्थात् किसी पाप के लिए न दे) वा दान के

( ५६ )
भोक्ता को न देखकर ( यह इच्छा न करे कि इसका फल
मुझे मिले ) और यह भी अभिलापा न करे कि मैं फिर इस
संसार में श्राऊंगा तो उस समय में दान का फल अनन्त
होता है अर्थात् जो दान निष्काम होकर किया जाता है
वही सफल होता है ॥ २८॥
मातापितृपु यद्दद्याद्भातृपु श्वसुरेषु च ।
जायापत्येषु यद्दद्यात्सोऽनन्तः स्वर्गसंक्रमः ॥२६||
पितुः शतगुणं दानं सहस्रं मातुरुच्यतेः।
भगिन्यां शतसाहस्रं सोदरे दत्तमक्षयम् ॥३०॥
व्यास स्मृतिः ऽध्यायः ४
अर्थ--माता पिता भाई श्वसुर स्त्री पुत्र वा पुत्री जो इन
को दान करता है वह अनन्त काल तक स्वर्ग में निवास
करता है ॥ २६ ॥ पिता को दान करने से शतगुणा फल
मिलता है और भगिनी को दान दिया जाता है वह लाख
गुणा होता हैं और जो भाई को दिया जाता है उसका कभी
भी नाश नहीं होता ॥ ३० ॥
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयोमृगः ।
यश्च विप्रोऽनधीयानत्रयस्ते नामधारकाः ॥३७॥
ग्रामस्थानं यथा शून्यं यथा कूपश्च निर्जलः।
यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नामधारकाः ॥३८॥
व्यास स्मृतिः ऽध्यायः ४
अर्थ--जिस भांति काठ का हाथी और जैसा चमड़े का
मृग होता है. उसी भांति विना पढ़ा ब्राह्मण है यह तनिों
नाममात्रधारी है अर्थात् निरर्थक हैं ॥३७॥

( ५७. )
शुन्य ग्रामस्थान और जल हीन कुआं जिस प्रकार किसी
अर्थ का नहीं उसी भान्ति विना पढ़ा ब्राह्मण है यह तीनों
नाममात्र के ही धारण करने वाले है ॥ ३८ ॥
शतेपु जायते शूरः सहस्रेषु च पण्डितः ।
चक्का शतसहस्रेषु दाता भवति वा न वा ।।५८||
न रणे विजयाच्छूरोऽध्ययनान्न च पण्डितः ।
न वक्ता वाक्पटुत्वेन न दाता चार्थदानतः ।।५।।
इन्द्रियाणां जये शूरो धर्म चरति पण्डितः ।
हितप्रायोनिभिर्वका दाता सन्मानदानतः ॥६॥
व्यासस्मृतिः अध्यायः ४ ।
अर्थ-सौ में एक शूरवीर हजार में एक पण्डित और
लाग्न में पक वला होता है और दाता तो दो या न हो ॥८॥
रण को जीतने से ही शूरवीर नहीं होता एदन से ही पण्डित
नहीं होता वाणी से ही वाला नहीं होता और धन के दान से
ही दाता नहीं होता ॥५६॥ परन्तु जो इन्द्रियों को जीतता है
वही शूर हैं जो धर्माचरण करता है वही पण्डित है जो हित-
कारी और प्रियवचन कई. वही वक्ता है और जो मनुष्य
सन्मानपूर्वक दानकरे वही दाता है।
ऊखरे वापितं वीज भिन्नमांडेपु गोदुहम् ।
हुतं भस्मनि हव्यं च मूर्खे दानमशाश्वतम् ।।६२।।
व्यासस्मृतिः अध्यायः ४
अर्थ -ऊपर भूमि में बोया हुया वीज फूटे पात्र में दुहा
हुश्रा दूध भस्म में किया हुश्रा हवन और मूलका, दिया हव्य
और दान-यह सभी निष्फल हैं ॥ १२ ॥

( ५८ ) यजनं याजनं दानं तथैवाध्यापनक्रिया । प्रतिग्रहं चाध्ययनं विप्रकर्माणि निर्दिशेत् ॥२॥ दानं चाध्ययनं चैव यजनं च यथाविधि । क्षत्रियस्य च वैश्यस्य कर्मेदं परिकीर्तितम् ॥३॥ क्षत्रियस्य विशेषेण प्रजानां परिपालनम् । कृषिगोरक्षवाणिज्यं विशश्चपरिकीर्तितम् ॥४॥ शूद्रस्य द्विजशुश्रूपा सर्वशिल्पानि वाप्यथ । शहस्मृतिः अध्यायः अर्थ-यज्ञ करना यज्ञ कराना दान देना और पढ़ाना प्रतिग्रह और पढ़ना यह छः कर्म ब्राह्मणों के कहे हैं ॥२॥ दान, पढ़ना, और विधिके अनुसार यज्ञ करना यह तीन कर्म क्षत्रिय और वैश्यों के हैं ॥३॥ क्षत्रिय जाति का विशेष कर्म प्रजा की पालना करना है और वैश्यका खेती गौओं की रक्षा तथा लेन देन कहा है ॥ ४॥ और तीनों जातियों की सेवा करना और सम्पूर्ण कारीगरी यह शुद्र का कर्म है । माता पिता गुरुश्चैव पूजनीयास्सदा नृणाम् । क्रियास्तस्याफलाः सर्वा यस्यै तेनादृतस्त्रयः॥३॥ चतुर्दशी पंचदशीमष्टमी राहुसूतकम् । उल्कापातं महीकंपमाशौचं ग्रामविप्लवम् ॥ ७ ॥ इन्द्रप्रयाणं श्वहतं सर्वसंघात निखनम् । वाद्यकोलाहलं युद्धमनध्यायान्विवर्जयेत् ।।८।। नाधीयीताभियुक्तोऽपि यानगोन च नौगतः ।

( ५६ ) देवायतनवन्मीकश्मशानशवसन्निधौ ॥६॥ शङ्खस्मृतिःअध्यायः३ मनुष्यों को सर्वदा माता पिता और गुरु यह तीनों पूजने योग्य हैं कारण कि जो इन तीनों का आदर नहीं करता है उसके सम्पूर्ण कर्म निष्फल हो जाते हैं ॥३॥ चौदस पूर्णमासी अष्टमी ग्रहण उल्का बिजली का पात भूकम्प अशौच ग्राम का उपद्रव ॥ ७॥ इन्द्रप्रयाण (वर्षा ऋतु में धनुप का दर्शन) कुत्ते का मरण शवके समूहका शब्द बाजोका कोलाहल और युद्ध इन दिनों में न पढे ॥८॥ सवारी और नाच में देवमन्दिर में वामी में श्मशानमें और शव के निकट बैठ कर किसी के कहने पर भी न पढे ॥६॥ मधु मांसांजनं श्राद्धं गीतं नृत्यं च वर्जयेत् । हिंसां परापवादं च स्त्रीलीलां च विशेपतः ॥१३॥ शहस्मृतिः अध्यायः३ अर्थ-मधु (शहद श्रादिक मीठापदार्थ वा मदिरा) मांस अंजन श्राद्ध काभोजन गान नाच हिंसा पराई निन्दा और विशेष कर स्त्रियों की लीला इन्हें त्याग दे ॥ १३ ॥ पंचमूना गृहस्थस्य चुल्ली पेपण्युपस्करः। कंडनी चोदकुंभश्च तस्य पापस्य शान्तये ॥ १॥ शहस्मृतिः अध्यायः ५ अर्थ-गृहस्थी में सर्वदा पांच हत्या होती हैं चूल्हा चक्की बुहारी ओखली और जलका घड़ा इन हत्याओं के पाप की शान्ति के निमित्त ॥१॥ न व्रतैनौपवासश्च धर्मेण विविधेन च । नारी स्वर्गमवामोति प्रामोति पतिपूजनात् ।।८।।

( ६० ) न व्रतैनॊपवासश्च न च यज्ञैः पृथग्विधैः। राजा खर्गमवाप्नोति प्रामोति परिपालनात् ।।६।। न मानेन न मौनेन नैवाग्निपरिचर्यया । ब्रह्मचारी दिवं याति संयाति गुरुपूजनात् ॥१०॥ नाग्निशुश्रूपया क्षान्त्या स्नानेन विविधेन च । वानप्रस्थो दिवं याति याति भोजनवर्जनात् ॥११॥ न दंडेन च मौनेन शून्यागाराश्रयेण च । यतिः सिद्धिमवामोति योगेनामोत्यनुत्तमम् ॥१२॥ न यज्ञैर्दक्षिणावद्भिर्चन्हिशुश्रूपया तथा । गृही स्वर्गमवामोति यथा चातिथिपूजनात् ।।१३।। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गृहस्थोऽतिथिमागतम् । आहारशयनायेन विधिवत्प्रतिपूजयेत् ॥१४॥ शप स्मृतिः अध्यायः ५ --व्रत उपवास और अनेक भांति के धर्म करने से स्त्री को स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होती परन्तु केवल एक मात्र पति के पूजन से स्वर्ग को जाती है ॥ ॥ व्रत उपवास और अनेक प्रकार के यज्ञों को करके राजा को स्वर्ग प्राप्त नहीं होता परन्तु एक प्रजो की रक्षा करने से ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है ॥६॥ ब्रह्मचारी स्नान मौन और नित्य अग्नि की सेवा करने से ही स्वर्ग को नहीं जाता परन्तु एकमात्र गुरु की सेवा करने से ही स्वर्ग को जाता है ॥ १०॥ चानप्रस्थ अग्नि की सेवा करने से या क्षमा से तथा अनेक प्रकार के स्नान करने से स्वर्ग को नहीं जाता केवल एक भोजन क अर्थ-- त्याग

( ६१ )
करने से ही स्वर्ग को जाता है ॥ ११ ॥ संन्यासी दराड मौन
और शुन्य स्थान में रह कर ही सिद्धि को प्राप्त नहीं होता
परन्तु योग से ही सर्वोत्तम गति को प्राप्त होता है ॥१२॥
गृहस्थी दक्षिणावाली यशा की और अग्नि की सेवा करने से
स्वर्ग को नहीं जाता केवल एक अतिथि के पूजन से ही स्वर्ग
प्राप्त होता है ॥ १३ ॥ इस कारण गृहस्थी का यत्न पूर्वक
अतिार्थ को भोजन और शय्या आदि से पूजा करनी
उचित है ॥१४॥
गृहस्थस्तु यदा पश्यदलीपलितमात्मनः ।
अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत् ॥१॥
शंख स्मृतिः ऽध्यायः ६
अर्थ- गृहस्थी मनुष्य जिस समय देखे कि शरीर का
मांस सूख गया है. अर्थात् बुढ़ापा पा गया है और पौत्र को
देखले तब वानप्रस्थ श्राश्रम को ग्रहण करने के निमित्त वन
को चला जाय ॥१॥
कृत्वोष्टिं विधिवत्पश्चात्सर्ववेदसदक्षिणाम् ।
यात्मन्यग्नीन्समारोप्य द्विजो ब्रह्माश्रमी भवेत् ॥१॥
शंख स्मृतिः ऽध्यायः ७
अर्थ-इसके उपरान्त सर्ववेद संदक्षिणा नामक इष्टि करके
अपनी देह तथा अपनी यात्मा में ही अग्नि को मान कर
ब्राह्मण संन्यास श्राश्रम को ग्रहण करे ॥१॥
विधुमेन्यस्तमुसले व्यंगारे भुकबजने ।
अतीते पात्रसंपाते नित्यं भिनां यतिश्चरेत् ।।
सप्तागारांश्चरेद्रेक्ष्य भिक्षित नानुभिक्षयेत् ॥२॥

( ६२ ) न व्यथेच तथाऽलाभे यथा लब्धन वर्तयेत् । न स्वादयेत्तथैवान्नं नाश्नीयात्कस्यचिद्गृहे ॥३॥ शगुस्मृतिः अध्यायः ७ अर्थ-जिल समय ग्रामवासी मनुष्य भोजन कर चुके हों धुआं न उठता हो मूसलभी चावल निकाल कर यथा स्थान पर रख दिये हों और रसोई वा जल के पात्रों का इधर उधर लेना भी बन्द हो गया हो उस समय सन्यासी भिक्षाक लिये जाय सात घरों से भिक्षा मांगे एकदिन जिन घरोंम से भिक्षा मांगी हो फिर दूसरे दिन उनसे भिक्षा न मांगे ॥२॥ यति भिक्षा के न मिलने से दुःखी न हो जो कुछ मिल जाय उस से ही जीविका निर्वाह करे अन्न को खादिष्ट न करे और ना ही किसी के घर में भोजन करे ॥३॥ मृन्मयालाबुपात्रााण यतीनां च विनिर्दिशेत् । तेषां संमार्जनाच्छुद्धिरद्भिश्चैव प्रकीर्तिता ॥४॥ कोपीनाच्छादनं वासो विभृयादव्यथश्वरन् । शून्यागारनिकेतः स्वायत्र सायगृहो मुनिः ॥शा दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिवेत् । सत्यपूतां वदेवाचं मनः पूत समाचरेत् ।।६।। सर्वभूतसमो मैत्रः समलोप्टाश्मकांचनः । ध्यानयोगरतो भिक्षः प्रामोति परमांगतिम् ॥७॥ जन्मनायस्तु निर्मुक्तो मरणेन तथैव च । आधिभियाधिभिश्चैव तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥८॥ अशुचित्वं शरीरस्य प्रियाप्रिय विपर्ययः।

( ६३ ) गर्भवासे च वसते तस्मान्मुच्येत नान्यथा ॥8॥ जगदेतन्निराकंद निःसारकमनर्थकम् । भोक्तव्यमिति निर्दिष्टो मुच्यते नात्र संशयः ॥१०॥ प्राणायामर्दहेद्दोपान्धारणाभिश्व किल्विषम् । प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥११॥ मनसः संयमस्तनर्धारणेति निगद्यते । संहारश्चेन्द्रियाणी च प्रत्याहारः प्रकीर्तितः ॥१३॥ हृदिस्यध्यानयोगेन देवदेवस्य दर्शनम् । ध्यानं प्रोक्तं प्रवक्ष्यामि ध्यानयोगमतः परम् ॥१४॥ शगुस्मृतिः श्रध्यायः ७ यति के लिये मिट्टी और तुम्बेके पात्र कहे गये हैं यह जल से मांजने से दी शुद्ध हो जाते हैं ॥ ४॥ और दुःख से रहित संन्यासी वन में निवास करता हुया कौपीन और गुदडी के ही वस्त्रों को पहर शून्य स्थान में निवास करे जहां संध्या हो जाय वहीं घर मान कर मीन हो निवास करे ॥५॥ भली भांति चारों श्रार को देखकर पैर रक्खे और वस्त्रों से छान कर जल पीव सत्यवचन बोल और मनसे पवित्र पाचरण करे ॥ ६ ॥ सम्पूर्ण प्राणियों को समान दृष्टिले देखे सबका मित्र बना रहे और सुवर्ण पत्थर देला इनको भी एकसाही समझे ध्यान और योग में रत रहे ऐसे पाचरण करने वाला भिनुक परमगति को प्राप्त होता है ॥७॥ जो शरीर जन्म मरण वा मनकी पीड़ा और देह के रोग से छूट जाय देवता उसी को ब्राह्मण शरीर कहते हैं ।।८॥शरीरकी अशुद्धता से प्रियके स्थान पर अप्रिय और अप्रियके स्थान पर प्रिय हो जाता है और गर्भमें निवास ( ६४ ) होता है इन सव क्लेशों से ब्राह्मण जन्म के विना नहीं छूटता ||६|| यह संसार वड़ा भयंकर है सार रहित और अनर्थरूप है इस में जो आये हैं उन को अवश्य ही भोगना पड़ेगा जो अपनी बुद्धिसे इसको भोगता है उसकी मुक्ति होजाती है इस में सन्देह नहीं॥ १० ॥ प्राणायाम से दोपों को और धारणाओं से सम्पूर्ण पापों को भस्म करदे प्रत्याहार से संगों को और ध्यान से अज्ञान आदि गुणों को दग्ध करदे ॥ ११॥ धारणा के जानने वाले मनके रोकने को धारणा कहते हैं इन्द्रियोंके विपयोंसे हटानेको प्रत्याहार कहते हैं ॥१३॥ और योगाभ्यास से हृदय में स्थित देवदेव परमात्मा का जो दर्शन है इस को ध्यान कहते हैं इसके उपरान्त ध्यान योग को कहता हूं ॥१४॥ वालागशतशो भागः कल्पितस्तु सहस्रधा । तस्यापि शतमाद्भागाजीवः सूक्ष्म उदाहृतः ॥३२॥ शङ्खस्मृतिः अध्यायः७ अर्थ-वाल (केश) के अग्रभागके सहस्र टुकड़े किये जायें उनमें से एक टुकड़ेका जो शतवां भाग है उस से भी जीव सूक्ष्म है ॥ ३२ ॥ बहूनां प्रोक्षणाच्छुद्धिर्धान्यादीनां विनिर्दिशेत् । प्रोक्षणात्संहतानां च दारावाणाञ्च तक्षणात् ।।६।। शङ्खस्मृतिः अध्यायः १६ अर्थ-वहुत से अन्नोंकी तथा दले हुए अन्न और काष्ठके पात्रों.की शुद्धि जलके छिड़कने से होती है ॥ ६ ॥.. कृत्वा पापं न गृहेत गृहमानं विवर्द्धते । कृत्वा पाप बुधः कुर्यात्पर्पदानुमतं व्रतम् ॥६२॥ शङ्खस्मृतिःअध्यायः १७ ( ६५ ) अर्थ-पाप करके उसे न छिपाचे कारण कि छिपाने से पाप की वृद्धि होती है बुद्धिमान, मनुष्य पाप करके सभा की अनुमति से प्रायश्चित्त करे ॥ ६२॥ द्वादशाहोपवासेन पराका परिकीर्तितः ॥शा शहस्मृतिः अध्यायः १८ अर्थ-और बारह दिन तक उपवास करने का नाम पराक व्रत है ॥५॥ व्रतं तु चादिकं कुर्यात्सर्वपापापनुत्तये ॥११॥ ग्रास चन्द्रकला वृद्धया प्राश्नीयार्द्धयन्सदा । हासयञ्च कलाहानी व्रतं चान्द्रायणं स्मृतम् ॥१२॥ शहस्मृतिः अध्यायः १८ अर्थ-सम्पूर्ण पापा के नाश करनेवाले इस वार्द्धिक व्रत को करे उसी को चान्द्रायण व्रत भी कहते हैं उसका लक्षण यह है ॥३॥ चन्द्रमा की कला की भान्ति वृद्धि के अनुसार एकग्रास प्रतिदिन यावे और कला की हानि के अनुसार एक एक ग्रास प्रतिदिन घटाता जाय यह चान्द्रायण व्रत है ॥१२॥ पूरणे कृपयापीनां वृक्षच्छेदनपातने । विक्रीणीतगजं चावं गोवधं तस्य निर्दिशेत् ।।७७॥ लिखित स्मृतिः अर्थ-जो मनुष्य कुए या चावडी को पाट दे वृक्षों को काट डाले हाथी या घोड़े को बेचता रहे उस को गोवध का प्रायश्चित्त करना उचित है ॥७७॥ गृहस्थोपि क्रियायुक्ने गृहेण न गृही भवेत् ।

( ६६ ) नचैव पुत्रदारेण स्वकर्म परिवर्जितः ॥५१॥ दक्ष स्मृतिः ऽध्यायः २ अर्थ-कर्म में परायण गृहस्थी घर में रहने से ही गृहस्थी नहीं होता अर्थात् घर उस का बन्धन नहीं है और जो गृहस्थी अपने कर्म से हीन है वह स्त्री पुत्र से गृहस्थी नहीं होता अर्थात् पुत्र इत्यादि उस के नरक में सहायक नहीं होते ॥ ५१ ॥ विभागशीलो यो नित्यं क्षमायुक्तो दयालुकः । देवतातिथि भक्तश्च गृहस्थः स तु धार्मिकः ॥५४॥ दया लज्जा क्षमा श्रद्धा प्रज्ञा त्यागः कृतज्ञता। गुणा यस्य भवत्येते गृहस्थो मुख्य एव सः ॥५॥ दक्ष स्मृतिः ऽध्यायः २ अर्थ-जिसका स्वभाव वांट कर खाने का है जिस में क्षमा और दया जो देवता और अतिथियों का भक्त है वह गृहस्थी ही धार्मिक है ॥ ५४ ॥ दया लज्जा क्षमा श्रद्धा बुद्धि त्याग कृतज्ञता इतने गुण जिस में विद्यमान हो वही यथार्थ गृहस्थी है ॥ ५५ ॥ पैशुन्यमनृतं माया कामः क्रोधस्तथा ऽप्रियम् । द्वेपो दंभः परद्रोहः प्रच्छन्नानि तथा नव ।।१३।। आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रं मंत्रो मैथुन भेपजे । तपोदानापमानौ च नव गोप्यानि सर्वदा ॥१४॥ दक्ष स्मृतिः ऽध्यायः ३ अर्थ-और चुगली झूठ माया काम क्रोध अप्रिय द्वेष दंभ दूसरों से द्रोह यह भी नौ विकर्म ही है इन सव को भी है वा ( ६७ ) त्याग दे । प्रच्छन्न ये है कि ॥ १३ ॥ अवस्था, धन. घर का लिद. मन्त्र. मैथुन, भेषज्ञ, तप, दान, अपमान यह नौ सर्वदा छिपाने योग्य हैं ॥ १४ ॥ माता पित्रोर्गुरो मित्र विनीते चोपकारिणि । दीनानाथ विशिष्टेपु दत्तं तत्सफलं भवेत् ॥१६॥ दन स्मृतिः ऽध्यायः ३ अर्थ-माता पिता गुरु मित्र नम्र उपकारी दीन अनाथ सजन इन को देना सफल है ॥१६॥ यथैवात्मा परस्तद्वद्रष्टव्यः सुखमिच्छता। मुखदुःखानि तुल्यानि यथात्मनि तथापरे ॥२१॥ सुखं वा यदि वा दुःखं यत्किंचित्क्रियते परे । यत्कृतं तु पुनः पश्चात्सर्वमात्मनि तद्भवेत् ।।२२।। दक्ष स्मृतिः ऽध्यायः३ श्रर्थ-जो मनुष्य अपने मुख की अभिलापा करता है वह अपने ही समान दूसरे को भी देख कारण कि जिस भांति मुम्न दुःख अपने को होता है उसी भांति दूसरे को भी होता है ॥ २१ ॥ जो सुख दुःख दूसरे के लिए किया जाता है वह सब अपनी श्रात्मा में ही पाकर प्राप्त होता है ॥२२॥ नक्शेन विना द्रव्यं विना द्रव्येण न क्रिया । क्रियाहीने न धर्मः स्याद्धर्महीने कुतः सुखम् ।।२३।। सुखं वांचंति सर्व हि तच धर्मसमुद्भवम् । तस्माद्धर्मः सदा कार्यः सर्ववणः प्रयत्नतः ॥२४॥ दक्ष स्मृतिः ऽध्यायः३ ( ६८ ) अर्थ-और क्लेश के विना पाए धन नहीं मिलता और विना धन के कर्म नहीं होता कर्महीन मनुष्य से धर्म नहीं वनता धर्महीन को सुख नहीं मिलता ॥२३॥ सुख की अभि- लाषा सभी करते हैं और वह सुख धर्म से ही मिलता है इस कारण सम्पूर्ण वर्णों को यत्न सहित धर्म करना उचित है ।॥ २४ ॥ न्यायागतेन द्रव्येण कर्तव्यं पारलौकिकम् । दानं हि विधिना देयं काले पात्रे गुणान्विते ।।२।। समद्विगुण साहस्रमानत्यं च यथाक्रमम् । दाने फलविशेपः स्याद्धिसायां तावदेव तु ॥२६॥ दक्ष स्मृतिः ऽध्यायः ३ अर्थ-और जो धन न्याय से प्राप्त हुआ है उस धन से परलोक के कर्म करने उचित हैं और उत्तम अवसर में विधि सहित सुपात्र को दान दे ॥२५॥ उस दान का फल क्रमानुसार सम दूना सहस्र गुना और अनन्त इस भांति विशेष रीति से होता है और उतना ही हिंसा में पाप की वृद्धि जान लेना ॥ २६ ॥ प्रहृष्टमानसा नित्यं स्थानमानविचक्षणा। मर्तुः प्रीतिकरी यातु भार्या स चेतरा जरा ॥१३॥ दक्ष स्मृतिः ऽध्यायः ४ अर्थ-जो स्त्रिये सर्वदा प्रसन्न चित्त रहती हैं स्थान और मान की ज्ञाता स्वामी में प्रीति करने वाली गृहोपकरण द्रव्यों में अवस्थान और परिमाण विषय में अभिज्ञ वह स्त्री ही स्त्री कहने के योग्य है और जिस में यह गुण न हो वह ( ६६ ) केवल शरीर को क्षय करने वाली जरास्वरूप है ॥१३॥ शिष्यो भार्या शिशुभीता पुत्रो दासः समाश्रितः। यस्यैतानि विनीतानि तस्य लोके हि गौरवम् ॥१४॥ दक्ष स्मृतिः ऽध्यायः ४ अर्थ-जिस गृहस्थ के शिप्य स्त्री यालक भाई मित्र दास और श्राधित नियम सहित चलते हैं उसका संसार में गौरव होता है ॥ १४॥ प्रथमा धर्मपत्नी तु द्वितीया रतिवर्द्धिनी दृष्टमेव फलं तत्र नादृष्टमुपपद्यते ॥१॥ दक्षस्मृतिः ऽध्यायः ४ अर्थ-पहली विवाही हुई स्त्री धर्मपत्नी है दूसरी विवा- हिता स्त्री केवल रति बढ़ाने के निमित्त है उस स्त्री का फल केवल इस लोक में ही है परलोक में नहीं ॥१५॥ दरिद्रं व्याधितं चैव भारं यावमन्यते । शुनी गृध्री च मकरी जायते सा पुनः पुनः॥१८॥ दक्ष स्मृतिः ऽध्यायः४ अर्थ-जो स्त्री दरिद्र वा रोगी पति का तिरस्कार करती है वह स्त्री कुतिया गीधनी मकरी बारम्बार होती है ॥१८॥ अशीचाद्धि वरं बाह्यं तस्मादाभ्यंतरं चरम् । उभाभ्यां तु शुचिर्यस्तु स शुचिर्नेतरः शुचिः॥४॥ दक्ष स्मृतिः ऽध्यायः ५ अर्थ-शौच में वाद्य शौच श्रेष्ठ है और वाह्य शौच से श्रान्तरिक शौच श्रेष्ठ है जो इन दोनों से शुद्ध है वही शुद्ध है दूसरा नहीं ॥२ (७०) मृत्तिकानां सहस्रेण चोदकुंभशतेन च । न शुद्धचंति दुरात्मानो येषां भावो न निर्मलः ॥१०॥ दक्ष स्मृतिः ऽध्यायः ५ अर्थ-जिन पुरुषों का अन्तःकरण शुद्ध नहीं है वह दुष्टात्मा हजार वार मट्टी से वा सौ घड़े जल से भी शुद्ध नहीं हो सकते ॥ १० ॥ नारण्यसेवनाद्योगो नानेकग्रंथचिंतनात् । व्रतैर्यज्ञेस्तपोभिर्वान योगः कस्य चिद्भवेत् ॥४॥ नच पथ्याशनाद्योगो न नासाग्रनिरीक्षणात् । नच शास्त्रातिरिक्तेन शौचेन भवति क्वचित् ।।५।। न मंत्रमौन कुहकैरनेकैः सुकृतैस्तथा । लोकयात्रा नियुक्रस्य योगो भवति कस्यचित् ।।६।। अभियोगात्तथाभ्यासात्तसिन्नेव तु निश्चयात् । पुनःपुनश्च निर्वेदाद्योगः सिद्धयति नान्यथा ॥७॥ आत्मचिंता विनोदेन शौचेन क्रीडनेन च । सर्वभृतसमत्वेन योगः सिद्धयति नान्यथा ॥८॥ यश्चात्मनिरतो नित्यमात्मक्रीडस्तथैव च। आत्मानंदस्तु सततमात्मन्येव सुभावितः ॥६॥ रतश्चैव सुतुष्टश्च संतुष्टोनान्यमानसः । आत्मन्येव सुतृप्तोऽसौ योगस्तस्य प्रसिद्धयति ॥१०॥ सुप्तोऽपि योगयुक्तश्च जाग्रचापि विशेषतः। ईडकवेष्टः स्मृतः श्रेष्ठो गरिष्ठो ब्रह्मवादिनाम् ॥११॥.

(७) अत्रात्मव्यतिरकण द्वितीयं नैव पश्यति । ब्रह्मभृतः स एवेह दक्षपक्ष उदाहृतः ॥१२॥ विपयासकचित्तो हि यतिौदं न विंदति । यवन विपयासनि तस्माद्योगी विवर्जयेत् ।।१३।। विपयेंद्रिय संयोग केचिद्योगं वदति । अधर्मो धर्मयुद्धथा तु गृहीतस्तर पंडितः ॥१४॥ श्रात्मनो मनसचव संयोगं तु ततःपरम् । उनानामधिकायते केवलं योगवंचिताः ॥१२॥ वृत्तिहीनं मनः कृत्वाक्षेत्रनं परमात्मनि । एकीकृत्य विमुच्यत योगोऽयं मुख्यउच्यते ॥१६॥ कपाय मोह विक्षपलजा शंकादिचतसः। व्यापारास्तु समाख्यातास्ताञ्जित्वा वशमानयेत् ॥१७॥ कुटुम्यः पंचभिमः पष्टस्तवमहत्तरः । देवासुरमनुप्यश्चसजंतुं नव शक्यते ॥१८॥ चलन परराष्ट्राणि गृहञ्छूरस्तु नोच्यते । जिता नन्द्रियग्रामः स शुरः कथ्यते बुधैः ।।१६।। बहिर्मुखानि सर्वाणि कृत्वा चाभिमुखानि । मनस्येवेंद्रियाण्यत्र मनश्चात्मनियोजयेत् ॥२०॥ सर्वभावविनिर्मुक्नं चत्रज्ञं ब्रह्मणिन्यसेत् । एतद्धयानं तथा ज्ञानं शेपस्तु ग्रंथविस्तरः ॥२१॥ दतस्मृतिः ऽध्यायः ७ अर्थ-चनमें निवास अनेक ग्रन्थों का विचार व्रत या ( ७२ ) और तप इनसे किसी को योग प्राप्त नहीं होता ॥४॥ पथ्य भोजन नाक के अग्रभाग का देखना शास्त्रों की अधिकता और शौच इनसे भी योग नहीं होता ॥ ५॥ मंत्र मौन कपट अनेक प्रकार के पुण्य और लोक के व्यवहार में तत्पर इनसे भी योग नहीं होता ॥६॥ अभियोग श्रभ्यास योग में ही निश्चय से और वारंवार निर्वेद विरक्ति से योग सिद्ध होता हैं ॥ ७ ॥ श्रात्मा की चिन्ता के आनंद से शौच श्रात्मा में क्रीडा सव भृतों में समता इनके द्वारा योग सिद्ध होता है इसके अतिरिक्त नहीं॥८॥ सर्वदा आत्मामें मिलना श्रात्मामें क्रीडा श्रात्मामें श्रानंद स्वभाव और निरन्तर आत्माम प्रीतिमान् ॥ ६॥ आत्मा में रमा श्रात्मा में सन्तुष्ट जिसका मन अन्यत्र न हो और जो भली भांति से आत्मा में तृप्त हो उसी पुरुप को योग सिद्ध होता है ॥ १० ॥ योगी सोता हुआ भी जागते के समान है जिसकी ऐसी चेष्टा हो वही श्रेष्ट और ब्रह्मवादियों में वड़ा कहा गया है ॥ ११॥ इस संसार में आत्मा के विना जो दूसरे को न देखे वही ब्रह्मरूप है यह दक्ष ऋपि के पक्ष में कहा है ॥ १२॥ जिसका चित्त विपय में आसक्त हो वह यती मोक्ष को प्राप्त नहीं होता इस कारण योगी विपय की ओर से अपना मन हटाले ॥१३॥ कोई मनुष्य विषय और इन्द्रियों के संयोग को योग कहते हैं उन निर्बुद्धियों ने अधर्म को धर्म बुद्धि से जाना है ॥ १४ ॥ उनसे अन्य कोई प्रात्मा और मनके संयोग को योग कहते हैं यह योग पूर्वोक्त ठगों से भी अधिक है ॥ १५ ॥ सव वृत्तियों से मन को हटाकर और जीव को परमात्मा में लगाने से मुक्त हो जाता है यही योग मुख्य है ॥ १६ ॥ कपाय मोह और विक्षेप का जो नाश है उसका वही व्यापार कहा है जिसका मन वश में हो जाय इस कारण कपाय आदि से रहित मन

( ७३ )
को अपने वश में करे ॥ १७ ॥ पांच कुटुम्बियों का ग्राम
होता है और उस ग्राम में छठा (मन) सबसे बड़ा है उसको
जीतने को देवता मनुष्य श्रमुर यह कोई भी समर्थ नहीं
होता है ॥ १८ ॥ जो बल पूर्वक दूसरे देशों को छीन लेता
है वह शूर नहीं कहाता परन्तु वास्तव में वही शूर हैं जिसन
इन्द्रिय कपी ग्राम को जीत लिया हो ॥ १६ ॥ सर्व बहिर्मुख
इन्द्रियों को अंतर्मुम्न कर फिर उन इन्द्रियों को मन में युक्त
कर मनको प्रात्माम योजित करे ॥२०॥ और सब भावों से
रहित क्षेत्रमा को ब्रह्म में मिलाव इसी का नाम ध्यान और
मान शेषता सब अन्य का विस्तार ही है।। २२॥
तन्मात्यलकपायेण कर्तव्यं दण्डधारणम् ।
इतरस्तु न शक्नोति विपयरभिभूयते ॥२६॥
न स्थिरं चामप्येकमुदकं हि यथोमिभिः ।
वाताहतं तथा चित्तं तस्मात्तस्य न विश्वसेत् ॥३०॥
दक्षस्मृतिः अध्यायः ७
अर्थ-इस कारण जिसने मनक मलका त्याग करदिया हो
वही दंड को धारणा करे और जिस ने त्याग न किया हो उस
को दंड घारगा करने की सामर्थ्य नहीं है और विषय उसका
तिरस्कार करते है ॥२६॥ जिस भान्ति तरहों के कारण जल
नगामात्र को भी स्थिर नहीं रहता इसी भान्ति वासनाओं से
रहता हुया चित्त भी स्थिर नहीं रह सकता इस कारण उस
का विश्वास न कर ।। ३०॥
त्रिदंड व्यपदेशेन जीवन्ति वही नराः।
यस्तु ब्रह्म न जानाति न त्रिदंडी हि स स्मृतः ॥३३॥

( ७४ ) नाध्येतव्यं न वक्तव्यं श्रोतव्यं न कथंचन । एतैः सर्वैः सुसंपन्नो यतिर्भवति नेतरः ॥३४॥ पारिवाज्यं गृहीत्वा तु यः स्वधर्म न तिष्ठति । श्वपदेनांकयित्वा तं राजा शीघ्रं प्रवासयेत् ॥३॥ दक्षस्मृतिः श्रध्यायः ७ अर्थ-त्रिदंड के बहाने से बहुत से मनुष्य जीवन धारणा करते हैं परन्तु जो ब्रह्म को नहीं जानता वह त्रिदंडी नहीं कहाता॥ ३३॥ न पढना न बोलना न किसी प्रकार सुनना जो इन सव गुणोंसे युक्त हो वही संन्यासी है दूसरा नहीं ॥३४॥ जो संन्यास लेकर अपने धर्म में स्थिर न रहे उसको राजा अपने नगर से कुत्तके पैरका दाग देकर निकाल दे ॥ ३५ ॥ यसिन्देशे भवेद्योगी ध्यानयोगविचक्षणः । सोपि वेशो भवेत्पूतः किं पुनर्यस्य बांधवः ॥४१॥ दक्षस्मृतिः अध्यायः ७ अर्थ-ध्यान और योग में पण्डित जिस देश में निवास करता है वह देश भी पवित्र हो जाता है फिर उस के वन्धु बांधव क्यों न होंगे ॥ ४ ॥ संचितं यद् गृहस्थेन पापमामरणांतिकम् । स निर्दहति तत्सर्वमेकरात्रोषितो यतिः ॥४७॥ दक्षस्मृतिःअध्यायः ७ अर्थ-गृहस्थीने अपने शरीर में जो पाप संचय किये हैं यति उसके घर में एक रात्रि निवास कर उसके सम्पूर्ण पापों का नष्ट कर देता है ॥ १७॥ वर्जयेन्मधुमांसगन्धमाल्यादि वा खमांजनाभ्यंजन- ( ७५ ) यानोपानच्छत्रकामक्रोधलोभमोहबाद्यबादनमानदंतधावन- हर्पनृत्यगीतपरिवादभयानि । गौतमस्मृति अध्याय २ अर्थ-ब्रह्मचारी मधु मांस गन्ध फूलमाला दिन में शयन अंजन उवटना सवारी जूना छत्री काम शोध लोभ मोह वाजा बजाना अधिक मान दोन हर्प नृत्य गाना निन्दा मदिरा और भय इन सब को त्याग दे॥ ९. गन्धरसकृतान्नतिलशरणक्षौमाजिनानि रक्तनिर्णिक्ने- वाससीधीरं च सविकारं मृलफलपुप्पोपधमधुमांसतृणो- दकापथ्यानि पशवश्व हिंसा संयोगे पुरुपयशा कुमारी चेह- तश्च नित्यं भृभित्रीहियवाजाव्यश्वर्षभधेन्वनदुहश्चैक विनि- मयस्तु रसानां रस पशूनां च न लवणाकृतानयोस्तिलानां वसमेनामेन तु गौतमस्मृति अध्याय ७ अर्थ-परन्तु ब्राह्मण, गन्ध, रस, पका अन्न, तिल, सन, मृगत्रम, रंगेवन, दूध, दृधके विकार, मूल, फल, फूल. औषधि शहत, मांस, ऋण, जल, अपथ्यवस्तु, हिंसा के संयोग में पशु. पुरुष वांझ स्त्री. कुमारी, जिसका गर्भ गिरजाता हो, भूमि. .. 1 मूलमें प्रदानागके लिये सानका निपध किया गया है किन्तु भाषाकार अधिक शब्द 'अधिक' माध जोर दिया है. इससे भली भान्ति सिद्ध होता दिक धर्म का नल्य भाप्य अादि कर्ताओं ने पक्षपात के वशीभूत होकर नष्ट ही कर दिया क्योंकि किसीने मूल विगाटा और किसी ने अनुवाद नष्ट दिया क्या यह उन लोगों के लिये लज्जा की बात नहीं है ।

- ( ७६ ) धान, जौ, बकरी, भेडइनको कदापिन बेच, और कोई ऐसा भी कहते है कि श्रीपधि गौ चैल इनका भी घेचना उचित नहीं एक प्रकारके रसके साथ दूसरे प्रकारके रसका बदला न करे पशुके साथ पशुका बदला न करे लवणक साथ लवणका, पके अन्न के साथ पके अन्नका और तिलों से तिलकाभी बदला न करें। अथ चतुःपष्टिषु यातनास्थानेषु दुःखान्यनुभूय तत्रे- मानि लक्षणानि भवंति ब्रह्महाईकुष्ठी सुरापः श्यावदन्तः गुरुतल्पगः पंगुः स्वर्णहारी कुनखी श्वित्री वस्त्रापहारी हिरण्यहारी द१री तेजोपहारी मण्डली स्नेहापहारी क्षयी तथा अजीर्णवानन्नापहारी ज्ञानापहारीमूकः प्रतिहता गुरो- रपसारी गोनो जात्यंधः पिशुनः पूतिनासः पूतिवक्कस्तु सूचकः शूद्रोपाध्यायः श्वपाकस्त्रयपुसीसचामर विक्रयी मद्यप एकशफविक्रयी मृगव्याधः कुंडाशीमृतकचैलिको वा नक्षत्री चावंदी नास्तिको रंगोपजीव्य भक्ष्यभक्षी गंडरी ब्रह्म- पुरुषतस्कराणां देशिकः पिंडितः पंढो महापथिको गंडिक- श्रांडाली पुष्कसी गोष्वकीर्णी मध्वामेही धर्मपत्नीपु स्यान्म- थुनप्रवर्तकः खल्वाटः सगोत्रासमयस्व्यभिगामी श्लीपदी पितृमातृभगिनीस्च्यभिगाम्यविजितस्तेषां कुजकुंडपंडव्या- धातव्यंगदरिद्राल्पायुपोऽल्पबुद्धिः चंडपंड शैलूपतस्करपरपुरुषप्रेष्यपरकर्मकराः खल्वा- टवक्रांगसंकीर्णाः क्रूरकर्माणः क्रमशश्चात्याश्चोपपद्यन्ते ( ७७ ) तस्मात्कर्तव्यमेवह प्रायश्चित्तं विशुद्धलक्षणैर्जायन्ते धर्म- स्य धारणादिति ॥ गौतम स्मृतिः अध्यायः २०. । अर्थ-सम्पूर्ण पापी चौंसठ नरक के स्थानों में दुःख भोग कर मनुष्य लोक में पूर्वोक्त पापों से चिह्न युक्त हो जन्म लेते हैं ब्रह्महत्या करने वाले के गीला कुष्ठ होता है मदिरा पीने वाले के दांत काल होते हैं गुरु की शय्या पर गमन करने वाला लंगदा होता है सुवर्ण की चोरी करने वाले के नख चुरे होते है. वस्त्रों का चुराने वाला दाद युक्त होता है सोने का चोर मंडक होता है तेज का चोर चकत्ते रोग से युक्त होता है घी की चोरी करने वाला क्षयी होता है अन्न की चोरी करने वाला अजीर्ण रांग से युक्त होता है शान की चोरी करने वाला गूंगा, गुरु का मारने वाला मिरगी रोग से युक्त होता है । गौ की हत्या करने वाला जन्मान्ध होता है सूचक की नाक और मुख में सर्वदा दुर्गन्धि अाती रहती है, शुद्र का पढ़ाने याला चण्डाल, रांग, सीसा, चंचर इनका चेचने वाला, मद्यप, एक शफ पशुयों को बेचने वाला, मृगव्याध, कुंडाशी, भृत्य या धोवी और विना शास्त्र के जाने नक्षत्रों को बताने वाला, अर्बुद रोगी, नास्तिक, रंगरेज, भक्षण करने योग्य का भक्षण करने वाला गंडमाल का रोगी होता है। ब्राह्मण, कठोर तस्कर, इनका जो गुरु हो, नपुंसक, रात दिन रास्ता चलने घाला गंडमाल का रोगी और चाण्डाली, (भंगन) इनके साथ रमण करने वाला प्रमेह रोग से युक्त होता है, पतिव्रता दूसरे की स्त्री में मैथुन की इच्छा करने वाला गंजा, अपने गोत्र की नी में गमन करने वाला और अपनी स्त्री के साथ कुसमय में गमन करने वाला श्लीपदी होता है, पिता और माता की ( ७८ ) वहन और पिता की अन्य स्त्री में वीर्य डालने वाला कुवड़ा, मूत्र कृच्छी तथा अंगहीन, दरिद्री और अल्पबुद्धि होता है, तथा क्रोधी, नपुंसक, नट, चोर, पराये भृत्य और टहलुए, खल्वाट, गंजे, कुवड़े, वर्ण संकर और क्रूर कर्म करने वाले होते हैं, क्रमानुसार अन्त्यज भी होते हैं इस कारण मनुष्य योनि में पाप का प्रायश्चित्त अवश्य करना चाहिए, कारण कि धर्म के धारण करने से निर्मल चिह्न वाल मनुष्य उत्पन्न होत हैं। व्याघ्रण हन्यते जन्तुः कुमारीगमनेन च । विपदश्चैव सर्पण गजेन नृपदुष्टकृत् ॥ ६ ॥ राज्ञा राजकुमारघ्नश्चौरेण पशुहिंसकः । वैरिणा मित्रभेदी च बकवृत्तिवृकेण तु ।.१०॥ गुरुघाती च शय्यायां मत्सरी शौच वर्जितः ! द्रोही संस्काररहितः शुना निक्षेपहारकः ॥ ११ ॥ नरो विहन्यतेऽरण्ये शूकरेण च पाशिकः । कृमिभिः कृत्तवासाश्च कृमिणा च निकृन्तनः ॥१२॥ श्रृंगिणा शंकरद्रोही शकटेन च सूचका । भृगुणा मेदिनीचौरो वह्निना यज्ञहानिकृत् ।। १३ ॥ दवेन दक्षिणाचौरः शस्त्रेण श्रुतिनिन्दकः । अश्मना द्विजनिन्दाकृद्विषेण कुमतिप्रदः ॥१५॥ उद्वंधनेन हिंस्रः स्यात्सेतुभेदी जलेनतु । द्रुमेण राजदन्तिहृदतिसारेण लोहहृत् ॥ १५ ॥ डाकिन्यायश्च म्रियते स दर्पकार्यकारकः । - है ( ७६ ) अनध्यायेऽप्यधीयानो म्रियते विद्युता तथा ॥ १६ ॥ अस्पृश्यस्पर्शसंगी च बान्तमाश्रित्य शास्त्रहृत् । पतितो मदविक्रेताऽनपत्यो द्विजवस्त्रहृत् ॥ १८ ॥ शातातप स्मृतिः अध्यायः ६ । अर्थ-जो मनुष्य कुमारी कन्या में गमन करता वह सिंह से मारा जाता है, जो मनुष्य किसी को विप देता है वह सर्प के श्राघात से हृत होता है, और राजा के पुत्र को मारने वाला तथा राजा के साथ दुष्टता करने वाला हाथी से मरता है ॥ ६ ॥ जो राजपुत्र को मारता है वह राजदंड से मरता है, पशु की हिंसा करने वाला चौर से मारा जाता है, और मित्रों का भेद करने वाला शत्रू के हाथ से मारा जाता है. जिसकी वकवृत्ति है उस की मृत्यु वृक से होती है ॥ १० ॥ गुरु की हत्या करने वाला शय्या पर मरता है, मात्सर्य युक्त मनुप्य शौचरहित हो कर मरता है दूसरे का अपकार करने वाला मनुप्य दाहादि संस्कार से हीन होकर मरता है, और धरोहर का चुराने वाला कुत्ते के काटने से मरता है ॥ ११ ॥ फांसी वाला मनुष्य बन में शुकर से मरता है, और वस्त्रों का चुराने चाला कीडॉ से, और छेदन करने वाला भी कीदों से मरता है ॥ १२ ॥ शिवजी के साथ द्रोह करने वाला सींग वाले पशुओं से मरता है, चुगली करने वाला मनुष्य गाड़ी से, पृथ्वी का चोर बढ़ी शिला से और यश में हानि करने वाला अग्नि से मरता है ।।१३|| दक्षिणा का चोर चन की अग्नि से, वदों की निन्दा करने वाला शस्त्र से, ब्राह्मणों का निन्दक पत्थर से और कुबुद्धि का देने वाला विप से मरता है॥१४॥ हिंसा करने वाला मनुष्य फांसी से मृतक होता है, पुल को तोड़ने वाला जल से, राजा के हाथी को चुराने वाला (८०) वृक्ष से और लोहे का चुराने वाला अतिसार से मरता है ॥२५॥ अहंकार से कार्य करने वाला शाकिनी श्रादि से और अनध्याय में पढ़ने वाला विजली से मरता है ॥ १६॥ अयोग्य का स्पर्श करने वाला, और शास्त्र को चुराने वाला यह दोनों वमन रोग से मरते हैं, मदिरा का चेचने वाला पतित होता है, ब्राह्मण के वस्त्रों का चोर सन्तान हीन होता है ॥१७॥ अथाप्युदाहरंति ॥ सद्यः पतति मांसेन लाक्षया लवणेन च । त्र्यहेण शूद्रो भवति ब्राह्मणः क्षीरविक्रयात् ।। वशिष्ठ स्मृतिः ऽध्यायः २ अर्थ-इस में भी यह वचन कहते हैं कि मांस, लाख, लवण इन के वेचने से ब्राह्मण शीघ्र पतित होता हैं और दूध के वेचने से तीन दिन में पतित होता है। ग्राम्यपशूनामेकशफाः केशिनश्च सर्वे चारण्याः पशवो वांसि दैष्ट्रिणश्च । धान्यानां तिलानाहुः ॥ अर्थ-ग्राम के पशुओं के बीच में एक खुर के पशु और केशों वाले पशु तथा वन के सव पशु पक्षी और डाढ़ वाले पशु अन्नों में तिल यह सब बेचने के अयोग्य कहे हैं। अद्भिर्गात्राणि शुद्धयंति मनः सत्येन शुद्धयति ।। विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्धयति ।। अद्भिरेव कांचनं पूयेत तथा राजतम् ॥ वशिष्ठ स्मृतिः ऽध्यायः३ अर्थ-जल से शरीर की शुद्धि होती है, सत्य से मन की शुद्धि है विद्या और तपस्या के द्वारा भूतात्मा की शुद्धि होती ( १ ) है शान के उदय से बुद्धि निर्मल होती है सुवर्ण और चांदी के पात्र की शुद्धि जल से होती है। पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । पुत्राश्च स्थाविरे भावे न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति ।। वशिष्ठ स्मृतिः ऽध्यायः ५ अर्थ-बाल्यावस्था में पिता रक्षा करता है, यौवनावस्था में पति रक्षा करता है, और वृद्धावस्था में स्त्री की रक्षा करने वाला पुत्र है स्त्री कभी स्वाधीन नहीं हो सकती। आचारः परमो धर्मः सर्वेपामिति निश्चयः । हीनाचारपरीतात्मा प्रेत्य चेह च नश्यति ॥१॥ नैनप्रयाति न ब्रह्म नाग्निहोत्रं न दक्षिणा । हीनाचाराश्रितं भ्रष्टं तारयति कथंचन ||२|| आचारहीनं न पुनति वेदा यद्यप्यधीताः सहपभिरंगः । छंदांस्येनं मृत्युकाले त्यति नीडं शकुंता इवतापतप्ताः ॥३॥ आचारहीनस्य तु ब्राह्मणस्य वेदाः पडंगा.अखिलाः सपक्षाः । कां प्रीतिमुत्थापयितुं समर्थी अंधस्य दारा इव दर्शनीयाः ॥४॥ नैन छंदांसि वृजिनात्तारयति मायाविनं मायया वर्तमानम् । तत्राक्षरे सम्यगधीयमाने पुनाति तद्ब्रह्मयथावदिष्टम् ।।५।। दुराचारो हि पुरुपो लोके भवति निंदितः । दुःखभागी च सततं व्याधितोल्पायुरेव च ।।६।।

( ८२ ) आचारात्फलते धर्ममाचारात्फलते धनम् । आचाराच्छ्यिमामोति श्राचारो हत्यलक्षणम् ॥७॥ सर्वलक्षणहीनोपि यः सदाचारवान्नर । श्रद्दधानोनसूयश्च शतं वणि जीवति ॥८॥ वशिष्ट स्मृतिः ऽध्यायः ६ श्रर्थ-यह निश्चय है कि प्राचार ही सब का परम धर्म है श्राचार भ्रष्ट मनुष्य इस लोक और परलोक में नष्ट होता है जो मनुप्य श्राचार से रहित और भ्रष्ट हैं उनको तपस्या वेदाध्ययन अग्निहोत्र और दक्षिणा यह किसी प्रकार भी उद्धार नहीं कर सकते, यदि छैहों (६) अंगों सहित वेद को पढ़ता हुआ मनुष्य आचारहीन होने के कारण किसी प्रकार शुद्ध नहीं हो सकता जिस प्रकार अग्नि से तपाये हुए घासले को पक्षी त्याग देते हैं उसी प्रकार श्राचार से हीन ब्राह्मण को मृत्यु के समय में वेद त्याग देते हैं प्राचार से हीन मनुष्य को सांगोपांग वेद और छैहों अंग किस प्रीति को उत्पन्न करने में समर्थ हैं जिस भांति अंधे को सुन्दर स्त्री, और माया से वर्तमान और मायावी मनुष्य को दुःख से वेद उस का उद्धार नहीं कर सकते परन्तु भली भांति से पढ़ा हुश्रा एक अक्षर भी वेद का मनुष्य को पवित्र करने वाला है दुराचारी मनुष्य लोक में निन्दित और सर्वदा दुःख का भागी है। वह रोगग्रस्त और अल्पायु होता है, श्राचार का फल धर्म है, प्राचार का फल धन है, प्राचार से सम्पत्ति की प्राप्ति होती है, प्राचार दुष्ट लक्षणों का नाश करता है जो मनुष्य सम्पूर्ण लक्षणों से हीन होकर भी केवल एक सदाचार के करने वाला है, श्रद्धालु और निन्दारहित वह मनुष्य सौ ( ३ ) वर्ष तक जीता है। आहारनिहारविहारयोगः सुसंवृता धर्मविदा तु कार्याः। चाम्बुद्धिवीर्याणि नपस्तथैव धनायुपी गुप्ततमे तु कार्ये ।।६।। वशिष्ट स्मृतिः ऽध्यायः ६ अर्ध-धर्म मनुष्य, भोजन, गमन. क्रीडा, वाणी, बुद्धि, वीर्य, तप और काम इनको गुप्त भाव से करे। अष्टौ ग्रासा मुनर्भकं वानप्रस्थस्य पोडश ।। द्वात्रिंशच गृहस्थस्य अमितं ब्रह्मचारिणः ॥१८॥ अनड्वान्ब्रह्मचारी च हिताग्निश्च ते त्रयः। भुंजाना एवं सिद्धयति नैपां सिद्धिरनश्नताम् ॥१६॥ तपोदानोपहारेषु व्रतेपु नियमेषु च । इज्याध्ययन धर्मपु यो नासतः स निष्क्रियः॥२०॥ वशिष्ठ स्मृतिः ऽध्यायः६ अर्थ-श्राट ग्रास यति का भोजन है सोलह ग्रास वान- प्रस्थ का भोजन है बत्तीस ग्रास गृहस्थी का भोजन हैं, ग्रामचारी के भोजन का नियम नहीं है. चल ब्रह्मचारी और वानप्रस्थ यह तीनों भोजन से ही सिद्धि को प्राप्त होते हैं। और भोजन करने वाले इनकी सिद्धि नहीं है, तप, दान, प्रत. उपहार. नियम, यम. पढ़ना. धर्म जो इनमें श्रासक न हो यह निष्क्रिय है। अमयकः पिशुनश्चत्र कृतन्नो दीर्घरोपकः । चत्वारः कर्मचांडाला जन्मतश्चापिपंचमः ॥२३॥ दीर्घवरममयां च असत्यं ब्रह्मदूपणम् ।

( ८४ ) पैशुन्य निर्दयत्वं च जानीयाच्छूद्रलक्षणम् ॥२४॥ वशिष्टस्मृतिःऽध्यायः६ अर्थ-निंदक, चुगल, कृतघ्नी, फ्रोधी, यह चारों जन कर्म से चांडाल है, और इसके अतिरिक्त पांचवां जाति चांडाल है, अधिक वैर, निन्दा, झूठ, ब्राह्मण को दोष लगाना चुगलपन, निर्दयता यह सच लक्षण शुद्र के जानने । परिव्राजकः सर्वभूताभयदक्षिणां दत्त्वा प्रतिष्टेन् । अथाप्युदाहरति । अभयसर्वभूतेभ्यो दचा चरति यो द्विजः ॥ तस्यापि सर्वभूतेभ्यो न भयं जातु विद्यते । अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यस्तु निवर्तते । हंति जातानजातांश्च प्रतिगृह्णातियस्य च । संन्यसेत्सर्वकर्माणि वेदमेकं न संन्यसेत् । वेदसंन्यासतः शूद्रस्तस्माद्वेदं न संन्यसेत् । एकाक्षरं परब्रह्म प्राणायामः परं तपः। उपवासात्परं भैक्ष्यं दयादानाद्विशिष्यते । वशिष्ठस्मृतिःऽध्याय १० अर्थ-संन्यासी सम्पूर्ण प्राणियों को अभय देकर प्रस्थान करे, इस विषय में पंडितों ने कहा है, कि जो ब्राह्मण सम्पूर्ण प्राणियों को अभय देकर विचरण करता है, उसे कभी किसी प्राणी से भय नहीं होता, सम्पूर्ण प्राणियों को अभय देकर जो स्थिति करता है उसे किसी प्राणी के निकट भय नहीं रहता और जो ऐसा संन्यासी जिस गृहस्थी से कुछ भी प्रतिग्रह करता है वह उस गृहस्थी के जात और अजात .

( ५ ) तथा पिछले और अगले सम्पूर्ण पापों को नए करता है, एक अक्षर (ॐ) ही श्रेष्ठ वेद है और प्राणायाम परम तप है, उपवास करने से भिक्षा का अन्न श्रेष्ठ है, दान की अपेक्षा दया प्रधान है। अथाप्युदाहरति । अरण्यनित्यस्य जितेंद्रियस्य सर्वे- न्द्रियप्रीतिनिवर्तकस्य ॥ अध्यात्मचिंतागतमानसस्य ध्रुवा हानावृत्तिरूपेक्षकस्य ॥ अव्यक्तलिंगोऽव्यका चारः अनु- न्मत्त उन्मत्तवेपः ।। वशिष्ठस्मृतिःऽध्यायः १० अर्थ-इसमें यह भी वचन है कि वनमें नित्य निवास कर, जितेन्द्रिय होकर रद, जिस संन्यासी को इन्द्रियों से प्रीति न हो और जिसका मन श्रात्मा की चिन्ता में लगा रंद, उसे जन्म मरण का अभाव है, जिसके चिह्न प्रगट न हो और पाचरण प्रगट हो, और जो उन्मत्त न हो, जिसका चप उन्मत्त की समान हो। प्रथाप्युदाहरति । न शन्दशास्त्राभिरतस्य मोक्षो न चापि लोकग्रहणे रतस्य । न भोजनाच्छादनतत्परस्य नचापिरम्यावसथप्रियस्य । न चोत्पातनिमित्ताभ्यां न नक्षत्रांगविद्यया । अनुशासनवादाभ्यां भिक्षां लिप्सेत- कहिचिन् । श्रलाभे न विपादी स्याल्लामेचैव न हर्पयेत् । ग्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रासंगाद्विनिर्गतः ॥ न कुट्यां नोदके संगेन चले न त्रिपुष्करे । नागार नासने शेते यः सर्वमोक्षवित्तमः ।। वशिष्ट स्मृतिः ऽध्यायः १०

( ८६ )
अर्थ-और यह भी कहा है कि, जो कंबल बारादित्य
में तत्पर है (स्वयंम्वविदित क्रिया को नहीं करना), जो
लौकिक व्यवहार में ही नत्पर रहता है । पारमार्थिक ईश्वर
प्रणिधानादि नहीं करता ), जो केवल खान पान यसपामा-
दिका में ही श्रासन रहना है और उनम मट मन्दिर श्रीर
सुन्दर ग्राम श्रादिकों में ही नत्पर रहता है, उस संन्यानी
का माक्ष नहीं होता है संन्यासी ने लौकिक व्यवहार मे
उपजीविका सम्पादन करने के लिए दिव्य भीम श्रीर अंतरिक्ष
वृष्टि विद्युत् तेजी मंदी वगैरह बात नथा नक्षत्र विद्या
ज्योतिष शास्त्रानुसार तिथि नक्षत्र जन्मपत्रिका आदिकों के
फल वैद्यकीय श्रीपधियों से चिफिन्सा धर्मशास्त्रादिके अनुसार
विधि और प्रायश्चितादिकों का कथन किसी का कथन नुन
अपना भी अनुवाद करके कहना ऐसी वृत्ति रग्य, भिना
मिलाने की इच्छा करना भिक्षा नहीं मिले तो पद न
करे भिक्षा मिल जाय तो दर्प भी न कर फवल मागयात्रा
जितने अनादि से हो सके उतन से निर्वाह करले इन्द्रियों के
विपयों में श्रास न रह जो संन्यासी कुटी में उदको दुसरे
के संग में वस्त्र के ऊपर त्रिपुष्कर में घर में वासन के ऊपर
शयन नहीं करता वह मोक्ष का तरच जानने वाला तत्वा
मोक्षगामी पुरुप है।
पंचकन्यानृते हंति दश हंति गवानृते ।
शतमश्वानृते हंति सहस्रं पुरुपानृते ।
व्यवहारेमृतेदारप्रायश्चिचेकुले स्त्रियः।
तेपी पूर्वपरिच्छेदाच्छेद्यते वागवादिभिः ।
वशिष्ठ स्मृतिः ऽध्यायः१६

( ८७ )
अर्थ-कन्या के निमित्त जो असत्य कहता है उसके
पांच पुरुप नरक को जाते हैं, गौ के निमित्त मिथ्या कहने
पर दश पुरुप नरक को जाते हैं श्रश्वके निमित्त असत्य
बोलने पर एक सौ पुरुप नरक को जाते हैं और पुरुप के
निमित्त मिथ्या बोलने पर सहव पुरुप नरक को जाते हैं
व्यवहारमें, मरणमें, वैवाहिक विधि में प्रायाश्चत्त में और
(?) स्त्री के कुल के विषय में (?) मिथ्या साक्षी देने वाली
के पूर्व के सम्बन्ध (१) छूट जाते हैं।
अधाप्युदाहरति ।
अन्नादे भ्रूणहामार्टि पत्यौ भार्यापचारिणी ।
गुरा शिप्यश्च याज्यश्च स्तेनो राजनि किल्विपम् ।।
राजभि तदंडास्तु कृत्वापापानि मानवाः ।
निर्मलाः स्वर्गमायांति संतः सुकृतिनोयथा ॥
एनो राजानमृच्छत्यप्युत्सृजतं सकिल्विपम् ।
तं चेन्न घातयेद्राजा राजधर्मेण दुष्यति ॥ इति ॥
वशिष्ठस्मृतिः ऽध्यायः १६
अर्थ-यहां यह भी वचन है, कि भ्रूणहत्या करने वाला
अन्न के भोक्ता को, व्यभिचारिणी स्त्री पति को, शिष्य और
याज्य गुरु को और चोर राजा को अपना पाप देते हैं, यह
पाप करने वाले राजा के दंड देने से शुद्ध होते हैं और शुद्ध
होकर स्वर्ग में इस भांति जाते हैं जिस भांति पुण्यात्मा
पापियों को छोड़ने से पाप राजा को लगता है यदि राजा
पापी का बध न करे तो राजधर्म दूपित होता है।
अष्टादशस्मृतयः समाप्ताः॥

( ८८ ) नमस्यामो देवाननु हतविधेस्तेऽपि वशगा। विधिर्वन्धः सोऽपि प्रतिनियतकमैकफलदः।। फलं कर्मायनं यदि किमपरैः किं च विधिना । नमस्तत्कर्मेभ्यो विधिरपि न येभ्यः प्रभवति ।। १०८ ॥ ब्रह्मायेन कुलालवनियमितो ब्रह्माण्डमाण्डोदरे। विष्णुर्येन दशावतारगहने क्षिप्तो महासङ्कटे ।। रुद्रो येन कपालपाणिपुटके भिक्षाटनं सेवते । सूर्योभ्राम्यतिनित्यमेव गगनेतस्मै नमः कर्मणे ॥ १०६॥ भर्तृहरिशतक-नीतिशतकम् । अर्थ-देवताओं को हम नमस्कार करते हैं परन्तु उनको विधाता के वश में देखते हैं, इस लिये विधाता को नमस्कार करते हैं, पर विधाता भी हमारे पूर्व निश्चित कर्म के अनुसार फल देता है, फिर जब फल और विधाता दोनों कर्म क प्राधीन हैं तो देवता और विधाता से क्या काम है ? इस कारण कर्म ही को नमस्कार है क्योंकि, विधाता का भी सामर्थ्य जिस पर नहीं चलता ।। १०८॥ जिस कर्म ने ब्रह्मा को कुम्हार के समान निरन्तर ब्रह्मांड रचना के हेतु बनाया और विष्णु को वारम्वार दश अवतार ग्रहण करने के संकट में डाला और रुद्र को कपाल हाथ में लेकर भिक्षा मांगने के में रक्खा और सूर्य को आकाश में नित्य भ्रमण चक्र में डाला उस कर्म को प्रणाम है ॥ १०६ ।। न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोग स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥ नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। कष्ट ( ६ ) -अध्याय ५। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जंतवः ॥ १५ ॥ गीता श्रर्थ-अर्थात् श्रात्मा या परमेश्वर लोगों के कर्तृत्व को उनके कर्म को (या उनको प्राप्त होने वाले ) कर्म फल के संयोग को भी निर्माण नहीं करता। स्वभाव अर्थात् प्रकृति ही ( सब कुछ ) किया करती है ॥ १४॥ विभु अर्थात् सर्व व्यापी यात्मा या परमेश्वर किसी का पाप और किसी का पुण्य भी नहीं लेता । शान पर अज्ञान का पर्दा पड़ा रहने के कारण (अर्थात्.माया से ) प्राणी मोहित हो जाते हैं ॥१५॥ तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते । द्वापरे यज्ञमेवाहु निमेकं कलौयुगे ।। ८६ ॥ मनुस्मृतिःऽध्यायः-प्रथमः अर्थ-यद्यपि तप आदि सब शुभ कर्म सव युगों में करने योग्य हैं तिस पर भी सत्ययुग में तप मुख्य था अर्थात् बड़े फल का देने वाला था ऐसे ही त्रेता में श्रात्मा का शान और द्वापर में यश और कलियुग में दान ही एक बड़ा फल देने वाला है॥६॥ श्राचाराद्विच्युतो विप्रो न वेदफलमश्नुते । आचारेण तु संयुक्तः सम्पूर्णफल भाग्भवत् ।।१०६।। एवमाचारतो दृष्ट्वा धर्मस्यमुनयोगतिम् । सर्वस्य तपसा मूलमाचारं जगृहुः परम् ॥ ११० ॥ मनुस्मृतिः अध्याय प्रथमः अर्थ-प्राचार से रहित ब्राह्मण वेद के फल को नहीं प्राप्त कर सकता है और प्राचारयुक्त सम्पूर्ण फल का पाने वाला होता ॥ १०६ ॥ इस कहे हुए प्रकार से प्राचार के द्वारा ऋपियों (१०) ने धर्म की प्राप्ति को जान कर सम्पूर्ण जो चांद्रायण श्रादि तप हैं उनके मूल रूप प्राचार को ग्रहण किया ॥ १० ॥ समाहृत्यतु तद्भेक्ष्यं यावदर्थममायया । निवेद्य गुरवेऽश्नीयादाचम्य प्राङ्मुखः शुचिः ॥५१॥ आयुष्यं प्राङ्मुखो भुक्ने यशस्यं दक्षिणामुखः । श्रियं प्रत्यङ्मुखो मुंक्त ऋतं भुक्ने ह्यदङ्मुखः ।। ५२ ।। मनुस्मृतिः अध्याय द्वितीयः अर्थ-तृप्ति के योग्य उस भिक्षा को बहुतों से लाकर गुरु को निवेदन कर कपट रहित हो पूर्व को मुख करके आचमन करके भोजन करे ।। ५२ ॥ अव काम्य भोजन कहते हैं आयुष्य की इच्छा हो तो पूर्व को मुख करके. यश की इच्छा हो तो दक्षिण को मुख करके भोजन करे लनमी की इच्छा हो तो पश्चिम को मुख करके और सत्य की इच्छा हो तो उत्तर को मुख करके भोजन करे ।। ५२ ।। हिमवद्विन्ध्ययोमध्यं यत्प्राग्विनशनादपि । प्रत्यगेव प्रयागाचमध्यदेशः प्रकीर्तितः ॥ २१ ॥ आसमुद्रात्तु वै पूर्वादा समुद्रात्तु पश्चिमात् । तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त विदुर्बुधाः ।। २२ ॥ मनुस्मृतिः अध्याय द्वितीयः अर्थ -उत्तर और दक्षिण दिशाओं में स्थित हिमाचल विन्ध्याचल पर्वतों का मध्य और विनशन नाम सरस्वती नदी के गुप्त होने का स्थान है उस से जो पूर्व और प्रयाग से जो पश्चिम है उस देश का नाम मध्यदेश है ॥ २६ ॥ पूर्व के समुद्र से और पश्चिम के समुद्र से उन्हीं दोनों अर्थात् हिमाचल विन्ध्याचल पर्वतों के बीच के भूमि भागको पण्डित आर्यावर्त ( १ ) कहते है इस से समुद्र के मध्य के द्वीप आर्यावर्त में नहीं हैं यह निश्चिन हुआ ॥२२॥ अनारोग्यमनायुप्यमस्वयं चातिभोजनम् । अपुण्यं लोकविहिष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ।। ५७ ॥ मनुस्मृतिः अध्याय द्वितीयः । अर्थ-अति भोजन में दोप कहते हैं अति भोजनं प्रारो- ग्य और आयुष्य को नाश करने वाला है और स्वर्ग के कारण- भृत यज्ञादिकों का विरोधी होने से स्वर्ग का भी नाश करने वाला है अपवित्र और लोक में निन्दित हैं तिससे उस अति भोजन का त्याग कर अर्थात् बहुत कभी न खाय ॥ ५७ ॥ इन्द्रियाणां प्रसंगेन दोपमृच्छत्य संशयम् । संनियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं नियच्छति ॥६॥ न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविपा कृष्णवम॑व भृय एवाभिवर्द्धते ।। १४ ॥ मनुस्मृतिः अध्याय द्वितीयः अर्थ-इन्द्रियों के विषयों में लगने से निस्सन्देह दृष्ट अदृष्ट दोष को प्राप्त होता है फिर उन्हीं इन्द्रियों को भली भांति रोक कर सिद्धि, अर्थात् मोक्ष प्रादि पुरुषार्थ की योग्यता को प्राप्त होता है तिसस इन्द्रियों को रोके ॥ १३ ॥ काम जो अभिलाया है और काम जो विषय हैं तिनके भोग से कभी नहीं शान्त होता है घी के डालने से अग्नि के समान पुनः अधिक बढ़ता है ।। ६४॥ न तथतानि शक्यन्ते संनियन्तुमसेवया । विपयेपु प्रजुष्टानि यथा ज्ञानेन नित्यशः॥६६॥ वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च ।

( ६२ ) न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कहिंचित् ।।१७॥ मनुस्मृतिः अध्याय द्वितीयः अर्थ-श्रव इन्द्रियों के संयम का उपाय कहते हैं विषयों में लगी हुई इन्द्रिएं उन विषयों के छोड़ने से रोकने को समर्थ नहीं हैं जितनी सदा ज्ञान से रुक जाती हैं।। ६६ ॥ वेद अथवा दान यज्ञ नियम और तप माला श्रादि विषयों को सेवा चाले पुरुप को कभी सिद्धि के लिये नहीं होते ॥ १७ ॥ श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा च यो नरः । न हृष्यति ग्लायति वा सं विज्ञेयो जितेन्द्रियः ||६|| मनुस्मृतिः अध्याय द्वितीयः अर्थ-स्तुति का वचन तथा निन्दा का वचन सुनकर और छूने में सुख देने वाले वस्त्र आदि तथा छूने में दुःख देने वाले मेदों के बालों के कंवल आदि कोछूकर और कुरूप सरूप को देख और स्वादयुक्त तथा विना स्वाद की वस्तु को खाकर और सुगन्धि तथा विना सुगन्ध की वस्तु को सूंघकर जिसको हर्ष विपाद नहीं होता उसे जितेन्द्रिय जानना चाहिये ॥ १८॥ पूर्वा संध्यां जपंस्तिष्ठन्नेशमेनो व्यपोहति । पश्चिमां तु समासीनो मलं हन्तिदिवाकृतम् ॥१०२॥ न तिष्ठति तु यः पूर्वा नोपास्ते यश्च पश्चिमाम् । स शूद्रवद्वहिष्कार्यः सर्वस्मानिजकर्मणः ॥१०॥ मनुस्मृतिः अध्याय २ अर्थ-प्रातःकाल की संध्या में स्थित जप करता हुआ रात्रिके पाप को दूर करता है और सायंकाल की संध्या में स्थित जप करता हुआ दिन में किये हुए पाप को दूर करता ( ६३ ) है ॥२०२॥ जो प्रातःकालकी सन्ध्या नहीं करता और पिछली अर्थात् सायंकालकी सन्ध्या की उपासना नहीं करता अर्थात् उस काल में कहे हुए जप श्रादि को नहीं करता है वह शूद्र के समान सब ब्राह्मण के कर्म और अतिसत्कार से बाहर करने योग्य है ॥॥ श्राचार्यपुत्रः शुश्रपुळीनदो धार्मिकः शुचिः । आप्तः शक्लोऽर्थदः साधुः स्खोऽध्याप्यादशधर्मतः ।।१०६॥ नापृष्टः कस्यचिद् व्यान्न चान्यायेन पृच्छतः । जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत् ॥११॥ मनुस्मृतिः श्र.२ अर्थ-कैसा शिप्य पढ़ाना चाहिये सो कहते हैं। प्राचार्य का पुत्र सेवा करने वाला २ दूसरे प्रकार के मान देनेवाला ३धर्म का जानने वाला ४ मृत्तिका तथा जल श्रादि से शुद्ध ५ बांधव ६ लेने देने में समर्थ ७ धन देनेवाला८द्रोह न करने वाला माति का १० ये दशप्रकार के शिष्य पढ़ाने योग्य है। १०६ ॥ जो किसी ने थादे अक्षरों में अथवा विना स्वरके पढ़ा हो उस को अर्थ विना पूछे उसके तत्त्व न प्रकाशित करे और शिप्य से तो विना पूछे भी कहे और भक्ति श्रद्धा आदि जो पूछने के धर्म है तिन को छोड़ कर पूछे ऐसे के पूछने पर भी न कहे बुद्धिमान् पुरुष जानता हुश्रा भी लोक में गूंगे के समान रहे ॥१०॥ धर्मार्थ यत्र न स्यातां शुश्रूपावापि तद्विधा । तत्र विद्या न वक्तव्या शुभं वीजमिवोपरे ॥११२॥ विद्ययव समं कामं मर्तव्यं ब्रह्मवादिना ।

(६४) आपद्यपि हि घोरायां न त्वेनामिरिणे वपेत् ॥११३।। विद्या ब्राह्मणमेत्याह शवधिस्तेऽसिरक्षमाम् । असूयकाय मां मादास्तथास्यां वीर्यवत्तमा ॥ ११४ ॥ यमेव तु शुचिं विद्यान्नियतं ब्रह्मचारिणम् । तस्सै मां ब्रहि विप्राय निधिपायाप्रमादिने ॥११॥ मनुस्मृतिः अ०२ अर्थ-जिस शिष्य के पढ़ाने में धर्म अर्थ न हो अथवा पढ़ने के अनुरूप सेवा न हो वहां विद्या न देनी चाहिये वह देना ऐसे निष्फल है जैसे ऊपरमें वोया हुआ धान श्रादि वीज नहीं उगता ॥ १२ ॥ वेद पढ़ाने वाले को विद्या के साथ ही मरना अच्छा,सव भान्ति पढ़ाने के योग्य शिप्य को न होने रूप आपत्ति में भी इस विद्या को ऊपर में न बोवे ॥ १३ ॥ विद्या की अधिष्ठाता देवी किसी अध्यापक के समीप आके ऐसे बोली कि मैं तुम्हारी निधि हूँ मेरी रक्षा करो और असूया श्रादि दोपवाले मनुष्य को मुझे मत दे सत्यकी अधि- कता से में वीर्यवती होऊ ॥ ११४ ॥ जिस शिष्य को शुद्ध जितेन्द्रिय और ब्रह्मचारी जानते हो उस विद्यारूपी निधिक रक्षा करने वाले प्रमाद रहित को मुझे दे ॥ ११५॥ शय्यासनेऽध्याचरिते श्रेयसा न समाविशेत् । शय्यासनस्थश्चैवेनं प्रत्युत्थायाभिवादयेत् ॥११॥ मनुस्मृतिः १०२ अर्थ-विद्या आदि में अधिक अथवा गुरु करके मुख्यता से अङ्गीकार की हुई शय्याअथवा आसन परन वैठे और आप जो शय्या अथवा श्रासन पर बैठा हो तो गुरु के आने पर उठ कर नमस्कार करे ॥ ११६ ।।

विद्या यश ( ६५ ) अभिवादनशीलस नित्यं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्यायशोवलम् ॥१२१॥ मनुस्मृतिः १०२ अर्थ-उठ कर सदा वृद्ध को नमस्कार करने वाले और वृद्ध की सेवा करने वाले मनुष्य को प्रायु और चल ये चारों बढ़ाते हैं । १२१ ॥ मातृवसा मातुलानीश्वश्रूरथपितृप्वसा। संपूज्या गुरुपत्नी वत्समास्ता गुरुभार्यया ॥१३१।। मनुस्मृतिः अ०२ अर्थ-भावसी मामी सास वुश्रा ये सब गुरु की स्त्री के समान उत्थान अभिवादन श्रासन देने श्रादि से पूजने योग्य हैं क्योंकि वे गुरु भार्या के समान हैं ॥ १३१ ॥ पितुर्भगिन्यां मातुश्च व्यायस्यां च स्वसर्यपि । मातृयवृत्तिमातिष्ठन्माता ताभ्योगरीयसी ॥१३॥ मनु००२ अर्थ-पिता की वहिन तथा माता की और अपनी बड़ी यहिन इन सब का आदर मान माता के समान करे परन्तु माता इन सब से बहुत ही अधिक है ।। १३३ ॥ न हायनैर्न पलितन वित्तेन न बन्धुभिः। ऋषयश्चक्रिरे धर्म योऽनूचानः सनो महान् ॥१५४|| मनु० अ०२ अर्थ-न वी से और न सफेद दाढ़ी मूछों से न बहुत धन से न चचा ताऊ श्रादि बहुत से भाईयों से अथवा कटे हुए भी इन सबों से बड़ापन नहीं होता है। न बहुत ( ६६ ) किन्तु ऋपियों ने धर्म किया है कि जो हम लोगोंमें अंगों समेत वेद का पढ़ने वाला है वही बड़ा है ॥ १४४ ।। न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः । यो चै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः॥१५६।। यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । यश्चविनोऽनधीयानरस्ते नाम विभ्रति ॥१५७|| यथापण्ढोऽफलः स्त्रीपु यथा गार्गविचाफला । यथा चाज्ञेऽफलं दान तथा विनोऽनृचोऽफलः ॥१५i अहिंसयैव भूतानां कार्य श्रेयोऽनुशासनम् । वाक्चैव मधुराश्लक्षणा प्रयोज्या धैर्यमिच्छता ।।१५।। यस्य वाङ्मनसे शुद्धे सम्यग्गुप्ते च सर्वदा । सधैं सर्वमवाप्नोति वेदान्तोपगतं फलम् ॥ १६० ।। नारंतुदः स्यादातोऽपि न परद्रोह कर्मधीः । ययास्योद्विजते वाचा नालोक्यां तामुदीरयेत् ।। १६१ ॥ मनुस्मृतिः अध्याय द्वितीयः अर्थ-शिर के बाल सफेद होने से वृद्ध नहीं होता है जो जवान भी पढ़ा लिखा हो तो उस को वृद्ध कहते हैं ॥१५६॥ जैसे काठ का बना हुआ हाथी और जैसे चमड़े का बना हुआ मृग और विना पढ़ा हुआ ब्राह्मण ये तीनों केवल नाम को धारण करते हैं हाथी आदि शत्रु वध अादिकों के काम को नहीं कर सकते हैं ॥ १५७ ॥ जैसे नपुंसक स्त्रियों में निष्फल होता है और गौचों में गौ और जैसे मूर्ख में दान निष्फल होता है तैसे श्रौतस्मातकर्मों में अयोग्य होने से बिना पढ़ा ब्राह्मण निष्फल होता है ॥ १५८ ॥ शिष्यों को अति हिंसा के ( ९७ ) विना ही कल्याण देने वाले अर्थ की शिक्षा करनी चाहिए और धर्म वृद्धि की इच्छा करने चाले पुरुप को मधुर एवं प्रीति उत्पन्न करने वाली वाणी मन्दस्वर से कहनी चाहिए ।। १५६ ॥ जिसके वाणी और मन दोनों शुद्ध होते हैं और वाणी मिथ्या श्रादि से दूपित नहीं होती और मन राग द्वप आदि से दूषित नहीं होता है अर्थात् जिसके वाणी और मन निषिद्ध विपयों से भली भांति बचे रहते हैं वह वेदान्त के सम्पूर्ण मोक्ष रूप यथार्थ फल को प्राप्त होता है ॥ १६० ॥ पीड़ित होने पर भी किसी से मर्म भेदी दुःख देने वाले वचन न कहे और दूसरे के द्रोह की बुद्धि न करे इस की जिस वाणी से दुसरे का मन दुःखी हो ऐसी अनालोक्या अर्थात् स्वर्ग श्रादि लोकों की प्राप्ति से विरुद्ध वाणी को न कहे ॥ १६१ ॥ मुखं हवमतः शेते मुखं च प्रतिबुध्यते । मुखं चरति लोकेऽस्मिन्नवमन्ता विनश्यति ।। १६३ ।। मनुस्मृतिः अध्याय २ अर्थ-दूसरे से अपमान किया हुश्रा पुरुप सुख से सोता है और सुख से जागता है और मुख से इस लोक में विचरता है और अपमान करने वाला.उस पाप से नाश को प्राप्त होता है ।। १६३॥ वर्जयेन्मधुमांसं च गन्धं माल्यं रसांस्त्रियः । शुक्तानि यानि सर्वाणि प्राणिनां चैव हिंसनम् ॥१७७|| अभ्यङ्गमञ्जनं चाणोरुपानच्छत्रधारणम् । काम क्रोधं च लोमं च नर्तन गीतवादनम् ॥ १७८ ॥ द्यूतं च जनवादं च परीवाद तथानृतम् ।

( १८ )
स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भमुपधातं परस्य च ।। १७६ ॥
एकः शयति सर्वत्र न रेतः स्कन्दयेत्वचित् ।
कामाद्धि स्कन्दयन् रेतो हिनस्ति व्रतमात्मनः ॥१८॥
मनुस्मृतिः अध्याय २
अर्थ-शहद और मांस का ब्रह्मचारी त्याग कर और गंध
अर्थात् कपूर, चन्दन, कस्तुरी आदि को न खाए न देह में
लगावे, फूलों की माला न पहिरे, गुड आदि जो रस हैं उन
को न खाय, स्त्री गमन न करे और शुक्त कहिये सिरका श्रादि
न खाय और जीव हिंसा न करे, ब्रह्मचारी को ये सब वर्जित
हैं ॥ १७७ ॥ तेल आदि का लगाना, आंखों को प्रांजना, जूता
और छाते का धारण करना और काम, क्रोध, लोभ, गाना,
वजाना इन सबों को ब्रह्मचारी वर्जित करे ॥ १७ ॥ धृत
अर्थात् पासों से खेलना और वाद अर्थात् विना प्रयोजन लोगों
से झगड़ा करना, पराये दोप का कहना, झूठ बोलना और
मैथुन की इच्छा से स्त्रियों को देखना अथवा आलिंगन करना
और पराया अपकार इन सब का त्याग करे ।। १७६ ॥ सदा
अकेला सोचे, इच्छा से वीर्य को न गिराचे, इच्छा से वीर्य को
गिराता हुआ ब्रह्मचारी अपन व्रत का नाश करता है ॥१८॥
भैक्षेण वर्त्तयेन्नित्यं नैकान्नादी भवेद्बती ।
ऑक्षण व्रतिनो वृत्तिरूपवाससमा स्मृता ॥ १८ ॥
मनुस्मृतिः अध्याय २
अर्थ-ब्रह्मचारी एक का अन्न न खाय किंतु बहुत घरों
से लाये हुए भिक्षा के समूह से जीवे जिससे भिक्षा के समूह
से ब्रह्मचारी की जीविका मुनियों ने उपवास के तुल्य कही
है॥ १८॥

(६६ ) चोदितो गुरुणा नित्यमप्रचोदितएववा । कुर्यादध्ययने यत्नमाचार्यस्य हितेषु च ॥११॥ मनुस्मृतिः ऽध्यायः २ अर्थ-श्राचार्य के कहने से अथवा न कहने से आप ही प्रतिदिन पठन में और गुरु के हितकारी कामों में उद्योग करे ॥ १६१॥ हीनानवस्त्रवेपः स्यात्सर्वदा गुरुसंनिधौ। उत्तिष्ठेत्प्रथमं चास्य चरमं चैव संविशेत् ॥१६४॥ मनु०अ०२ अर्थ-गुरु के समीप सदा गुरु से हीन अन्न वस्त्र खाय पहिने और सवेरे दो घड़ी रहते गुरु से पहले उठे और सन्ध्या को गुरु के सोने के पीछे आप सोवे ॥१६४॥ नीचं शय्यासनं चास्य सर्वदा गुरुसन्निधौ । गुरोस्तु चक्षुर्विषयेन यथेष्टासनो भवेत् ॥१६॥ नोदाहरेदस्य नाम परोक्षमपि केवलम् । न चैवास्यानुकुर्वीत गतिभापित चेष्टितम् ॥१६॥ गुरोर्यत्र परीवादो निन्दा वापि प्रवर्त्तते । करें तत्र पिधातव्यौ गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः॥२०॥ परीवादात्खरो भवतिश्वा वै भवति निन्दकः। परिभोक्ता कृमिभर्वति कीटो भवति मत्सरी ॥२०१।। मनु० अ०२ . अर्थ-गुरु के समीप शिष्य के शय्या और श्रासन नीचे ही होने चाहिएं और गुरुके देखते हाथ पांव फैला कर इच्छा

( १०० )
पूर्वक न बैठे ॥ १९॥ पीठ पीछे भी गुरु का केवल नाम
अर्थात् उपाध्याय प्राचार्य इत्यादि सत्कार के उपनामों के
विना उच्चारण न करे और हंसी से उन के चलने बोलने
आदि की नकल न करे ।।१६६॥ जहां गुरु का परीवाद अर्थात्
उन में वर्तमान दोपों का कहना और निंदा अर्थात् झूठे
दोप लगाना ये दोनों वातें जहां होती हों वहां स्थित शिप्य को
कान मूंद लेने चाहिएं अथवा वहां से अन्यत्र चला जाना
चाहिए ॥ २०० ॥ गुरु के परीवाद से शिष्य गधा होता है
और निंदा करने वाला कुत्ता होता है और परिभोक्ता अर्थात्
अनुचित गुरु के धन से जीने वाला कृमि होता है और
मत्सरी अर्थात् गुरु का उत्कर्प न सहने वाला कीट अर्थात्
कृमी से कुछ मोटा होता है ॥२०१।
अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुनः।
प्रमादा ह्युत्पथं नेतु काम क्रोधवशानुगम् ॥२१॥
मात्रा स्वस्वादुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् ।
वलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्पति ॥२१॥
मनु० अ०२
अर्थ-मैं विद्वान् हूं जितेन्द्रिय हूं ऐसा समझ कर स्त्रियों
के समीप न बैठना चाहिए देह के धर्म से काम क्रोध के
वशीभूत पुरुष विद्वान् हो अथवा मूर्ख हो उस को स्त्रियां
कुमार्ग में ले जाने को समर्थ हैं ॥ २१४ ॥ माता वहिन अथवा
पुत्री इनके साथ एकान्त स्थान में न वैठे क्योंकि इन्द्रियों का
समूह वलवान् है शास्त्र की रीति से चलने वाले पुरुप को
भी वश में कर लेता है ॥२१॥

( १०१ ) यं माता पितरौ क्लेशं सहेते संभवे नृणाम् । न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तु वर्षशतैरपि ।।२२७॥ तयोनित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा तेवेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्व समाप्यते ।।२२८॥ मनु०प्र०२ अर्थ-सन्तति के सम्भव अर्थात् गर्भाधान के पीछे उत्पत्ति पालन श्रादि में माता पिता जिस क्लेश को सहते हैं उसका ऋण सैकड़ों वर्षों में भी नहीं दूर हो सकता है इस कारण देवतारूप माता पिता अपमान करने योग्य नहीं हैं ॥ २२७ ॥ माता पिता का और प्राचार्य का सदा प्रिय करे अर्थात् जिसमें वह प्रसन्न रहे सो करे क्योंकि उनके प्रसन्न रहने से सब तप पूरे होते हैं ।।२२८॥ विपादप्यमृतंग्राह्य बालादपि सुभापित्तम् । अमित्रादपि सद्वृत्तंममेध्यादपि काञ्चनम् ।।२३।। मनु०प्र०२ अर्थ-विष में जो अमृत मिला हो तो विप को दूर करके अमृत लेना चाहिये और चालक से भी हितवचन लेना चाहिये और सज्जन का चरित्र शत्रु से भी लेना चाहिये और अपवित्र स्थान से भी सुवर्ण श्रादि लेने चाहिये ॥२३६॥ एवं चरति यो विप्रो ब्रह्मचर्यमविप्लुतः। स गच्छत्युत्तमस्थानं न चेह जायेत पुनः ॥२४॥ मनु०अ०२ अर्थ-जो ब्राह्मण ऐसे अखंड ब्रह्मचर्य को निवाहता है वह उत्तम ब्रह्म के स्थान में प्राप्त होता है और कर्मों के वश ( १०२ ) से इस संसार में जन्म को नहीं लेता है ॥२४॥ यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रा फलाः क्रियाः॥५६|| शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम् । न शोचन्ति तु यत्रता वर्धते तद्धि सर्वदा ॥५७|| जामयो यानि गेहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः । तानि कृत्याहतानीव विनश्यन्ति समन्ततः॥८॥ मनु० अ०३ अर्थ-जिस कुल में पिता श्रादि करके स्त्री पूजी जाती है वहां देवता प्रसन्न होते हैं और जहां ये नहीं पूजी जाती वहां देवताओं की प्रसन्नता न होने से सब यज्ञादिक क्रिया निष्फल हो जाती हैं ॥ ५६ ॥ जिस कुल में वहिन स्त्री पुत्री और पुत्र की बहु आदि दुःखी होती है वह कुल शीघ्र ही निधन हो जाता है और देवता तथा राजा आदि द्वारा पीडित होता है और जहां ये नहीं शोचती हैं वह धन प्रादि सदा वृद्धि को प्राप्त होता है ॥ ५७ ॥ भगिनी पत्नी वेटी बहु यह दुःखी होकर जिन घरों को कोसती हैं वे घर कृत्या या अभिचार करके नाश किये की समान धन पशु आदि समेत नाश को प्राप्त होते हैं ॥ ५ ॥ पञ्चसूना गृहस्थस्य चुल्ली पेपण्युपस्करः । कण्डनी चोदकुम्भश्च वध्यते यास्तु वाहयन् ॥६॥ मनु० अ०३ अर्थ-गृहस्थके यह पांच हिंसाके स्थान हैं चूल्हा १चकी २ बुहारी ३ ओखलीमुसल ४ जल का घट ५इन को अपने काममें 4 लाता हुमा पुगए पापा से युक्त होता है ॥ ६ ॥ न भोजनार्थ स्वेविप्रः कुलगोत्रे निवेदयेत् । भोजनार्थ हि ते शमन्वान्ताशीत्युच्यते बुधैः ॥१०॥ मनु००३ अर्थ-वामा ब्रान कुल नधा गोत्र का भोजन के लिये न जिसन भाजनके लिए उनका कहना हुआ यह पंडितों करक यांनाही कहा गया है ।। १०६ ॥ मंतापं परमात्याय मुखार्थी संयतो भवेत् । संतापमूलं हि सुख दुःखमूलं विपर्ययः ॥१२॥ मनु००४ अंध-भय के अनुसार भृत्यों के तथा अपने प्राणों के नियाकलिंग यावश्यक नीर पश्चयता के फरनदी के योग्य धनसे अधिक चाहनान करनको सन्ताप महंत ई उस सन्तोप का भली भान्ति साधय ल यात स धन के जोदने में संयम कर क्योंकि इस संसार में मन्नार की सुग्न का कारण है और परन्नीयम वर्गादियानुग का कारण है इससे विपरीत अर्थात् उलटा अमलोर सो दुर काकारण क्योकि बहुत धन जोदन के श्रम से यान दुग उत्पन्न होने कारण संपत्ति नधा विपत्ति मशाताई ॥१२॥ इन्द्रियार्था सर्वेष न प्रसज्येत कामतः । अतिप्रसति चतेषां मनसा संनिवर्तयेत् ॥१६॥ मनु००४ अर्थन्द्रियों के अर्थ अर्थात् जो कप रस गन्ध स्पर्श प्रादि विषय निषित नहीं है उन में अर्थात् अपनी स्त्री आदि भागमें कामस अत्यन्त सक्त न होय श्योकि विपय अस्थिर ( १०४ ) हैं और स्वर्ग तथा मोक्षरूप कल्याणके विरोधी है यह जानकर इन ले मन को निवृत्त करे ॥ १६ ॥ यथा यथा हि पुरुपः शास्त्रं समधिगच्छति । तथा तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते ॥२०॥ मनु० अ०४ अर्थ जैसे जैसे पुरुप शास्त्र को अच्छी तरह से पढ़ता है वैसे वैसे विशेप कर जानता है और अन्य शास्त्रों के विषय का भी विशेषज्ञान इसको रुचता है अर्थात् उज्ज्वल होता है ॥२०॥ नाधार्मिके वसेद्ग्रामे न व्याधि बहुलेभृशम् । नैकः प्रपद्येतावानं न चिरं पर्वते वसेत् ॥६॥ मनु० अ०४ अर्थ-जिस ग्राममें बहुतसे अधर्मी रहते हो और जिस मैं बहुत से मनुष्य कठिन रोगों से पीड़ित हो उस गांव में अत्यन्त वसना योग्य नहीं है और मार्ग में अकेला कभी न चले और बहुत काल तक पर्वत पर न बसे ।। ६० । दशसूनासमं चक्र दशचक्रसमो ध्वजः। दशध्वजसमो वेशो दशवेशसमो नृपः॥८॥ दशसनासहस्राणि यो वाहयति सौनिकः । तेन तुल्यः स्मृतो राजा घोरस्तस्य प्रतिग्रहः ॥८६॥ मनु० अ०४ अर्थ- दशसूनावालों में जितना दोप होता है उतना एक तेली में होता है और दश तेलियों में जितना दोष होता है उतना एक. कलालमें होता है और दश कलालों में जितना दोष होता है उतना एक वेश्या बहुरूपियों में होता है और जितना ( १०५ ) दश वेश्या वा बहुरूपियों में होता है उतना एक राजामें मनु आदिकों ने कहा है ॥ २५ ॥ जो सूनावाला दश हज़ार जीवों का वध करता है उसकी वरावर राजा को मनु आदिकों ने कहा हैं निससे राजा का धन लेना नरक का कारण होने से भया- नक हैं ॥८६॥ विद्यत्स्तनित वपु महोल्कानां च संसवे । अकालिकमनध्यायमेतेपु मनुरब्रवीत् ॥१०३।। एतांस्त्वम्युदिनान्विद्याद्यदा प्रादुप्कृताग्निपु । तदा विद्यादनध्यायनमनृती चाभ्रदर्शने ॥१०४|| निर्यात भूमिचलने ज्योतिपां चोपसर्जने । एतानकालिकान्विद्यादनध्यायानृतावपि ॥१०॥ प्रादुप्कृतेप्वग्निपु तु विद्युत्स्तनि तनिाखने । सज्योतिः स्यादनध्यायः शेपे रात्रौ यथा दिवा ॥१०६॥ मनु० अ०४ अर्थ-विजली का चमकना गर्जना और इन सबोंके एक साथ होने पर और इधर उधर बहुत से उल्कापात अर्थात् तारों के टूटने पर उस समय से लगा कर दूसरे दिन उसी समय तक मनुने अकालिक अनध्याय कहा है ॥ १०३ ॥ जो अग्निहोत्रं के समय विजली श्रादि इन सब उत्पातों को एक साथ प्रगट हुए जाने तो वर्षाऋतु में अनध्याय करे सदा नहीं और ऋतु अग्निहोत्र के समय मेघके देखने ही से अनध्याय होता है वर्षा ऋतु में नहीं होता है॥१०४॥ आकाशमै उत्पन्न हुए उत्पात शब्द के होने पर और भूमिकम्प होने पर और ज्योति जो सूर्य चन्द्र तारागण है तिनके उपद्रव होने पर इन ( १०६ ) अनध्यायों को अकालके जाने और ऋतुम भी वर्षाके विषय भूकम्प आदि दोपके लिये नहीं होते हैं इस अभिप्रायसे "ऋती अपि' यह कहा ॥१०॥ होम के अग्नि के प्रकाशित करने पर सन्ध्या समय जो विजली और गर्जना हो वर्षा न हो तो सज्योति अनध्याय होता है अकालका नहीं है उनमें जोप्रातः कालकी सन्ध्यामें विजली और गर्जना हो तोजवतक सूर्यज्योति है तव तक एक दिन का अनध्याय होता है और सायं काल की सन्ध्या में हो तो जव तक नक्षत्र ज्योति है तब तक रात्रिभरका अनध्याय होता है और बिजली गर्जना तथा वर्षा तीनों में से जो वर्षा नाम तीसरा ही हो तो जैसे दिनमें अनध्याय होता है ऐसे ही रात्रि में भी अर्थात् दिन रात का अनध्याय होता है। १०६॥ नीहारे वाणशब्दे च संध्ययोरेव चोभयोः । अमावस्या चतुर्दश्योः पौर्णमास्यष्टकासुच ॥११३।। अमावस्या गुरुं हन्ति शिष्यं हन्ति चतुर्दशी । ब्रह्माष्टकापौर्णमास्यौ तत्मात्ताः परिवर्जयेत् ॥११॥ मनुस्मृतिः अध्याय चतुर्थः अर्थ-कुहिर में और वाण के शब्द में और दोनों संध्याओं में और अमावस्या तथा चतुर्दशी को पूर्णमासी और अष्टमी को वेद न पढ़े ॥ ११३ ॥ अमावस्या गुरु को मारती है और चतुर्दशी शिष्य को और अष्टमी तथा पूर्णमासी वेदको भुलाती इस कारण ये सब वेद के पढ़ने में वर्जित हैं ॥ ११४॥ अमावस्यामष्टमीश्च पौर्णमासी चतुर्दशीम् । ब्रह्मचारी भवेन्नित्यमप्यतौ स्नातको द्विजः ॥१२८!! मनुस्मृति अध्यायः चतुर्थ.

( १०७ ) अर्थ-अमावस्या अएमी पूर्णमासी और चतुर्दशी को स्नातक द्विज ऋतुकाल में भी स्त्री से भोग न करे सदा ब्रह्म- नागरई ॥ १२८॥ होनागानतिरिकाङ्गान् विद्याहीनान् वयोऽधिकान् । रूपद्रव्यविहीनांश्च जातिहीनांच नाक्षिपेत् ।। १४१ ।। मनुस्मृतिः श्रध्याय ४ अर्थ-दीन अंगवालों की. अधिक अंगवालों की मूखौं की चूदा की और नप तथा द्रव्य से हीन अर्थात् कुरूप और कंगालों की श्रीर दीन जाति की कभी 'काना' यादि शब्द कह कर पुकारन से निन्दा न करे ॥ १४ ॥ मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यञ्च प्रयतात्मनाम् । जपतां जुहृताञ्चैव विनिपातो न विद्यते ॥१४६॥ मनु० श्र०४ अर्थ-माल तथा प्राचार से नित्य शुद्ध और जप तथा होम में लगे हुए पुरुषों को देवी तथा मानुपी उपद्रव नहीं होत ॥१४६॥ परकीयनिपान न मायाच कदाचन । निपानकर्तुः न्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते ॥२०१॥ यानशय्यासनान्यस्य कृपोद्यानगृहाणि च । अदत्तान्युपभुजान एनसः स्यातुरीयभाक् ॥२०२॥ अथ-पराये बनाये हुए ताल ( तालाब) आदि में कभी स्नान न करे उन में नहा कर उन के बनाने वाले के पापसे चौथाई भागका पानेवाला होता है बिना बनाई हुई नदी आदि न हो तो पराये बनाये हुए तालाव आदि में प्रदान से पहले मनु० अ०४

(१०० )
पांच पिण्डा का उद्धार कर नहाना चाहिये ॥ २०॥ ॥ पराया
यान आलन कुत्रा बाग और घर जो बिना दिये इनका भोग
करे तो बनवान चालेके पापके चतुर्थ अंशका भानी होता है ।।
वारिदस्तृप्तिमामोति सुखमक्षय्य मन्नदः ।
तिलपदः प्रजामिष्टां दीपदश्च तुरुत्तमम् ॥२२॥
भूमिदो भूमिमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः ।
गृहदोयाणि धेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम् ।।२३०॥
मनु० अ०१
अर्थ-जलका देने वाला जुवा पिपासा दूर होने से तृप्ति
को प्राप्त होता है और अन्नका देने वाला अजय सुखको और
तिलका देने वाला चाही हुई संतनिको और दीपका देनेवाला
उत्तम नेत्रों को प्राप्त होता है ॥ २२६ ॥ भूमिका देनेवाला भूमि
को और सुवर्ण का देने वाला बड़ी घायु को और घरका देने
वाला बहुत अच्छे घरों को और रूपका (चॉन्दीका देनेवाला
सम्पूर्ण जनोंके नेत्रों को मनोहर रूपको देने वाला होता है।
योऽचित प्रतिगृहाति ददात्यचिंतमेव च ।
तावुभो गच्छतः स्वर्ग नरकं तु विपर्यये ॥२३॥
मनु० ५०४
अर्थ-जो दाता सत्कार पूर्वक देता है और जो लेनेवाला
उस दान को सत्कार पूर्वक लेता है वे दोनों वर्गको जाते हैं
और विपर्यय अर्थात् उलटे होनेमें नरक होता है अर्थात् विना
सत्कार के देने लेने वाले दोनों नरकगामी होते हैं ॥ २३५ ॥
धर्मशनैः संचिनुयाल्मीकमिव पुत्तिकाः ।
परलोकसहायार्थ सर्वभूतान्यपीडयन् ॥२३॥

(१०६ ) नामुत्र हि सहायार्थ पिता माता च तिष्ठतः। न पुत्र दारा न ज्ञातिधर्मस्तिष्ठति कंवलः ॥२३॥ एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते । एकोऽनुभुक्ने मुकृतमेक एव च दुप्कृतम् ॥२४०॥ मृतशरीरमुत्सृज्य काष्ठलोप्टसमं क्षिती। विमुखा बान्धयायान्ति धर्मस्तमनुगच्छति ॥२४१॥ तसाद्धर्भ सहायार्थ नित्यं संचिनुयाच्छनैः। धर्मण हि सहायन तमस्तरति दुस्तरम् ।।२४२॥ मनु००४ श्रध-सब जीवों की पीड़ाका त्याग करता हुआ परलोकमें नहायके लिये शक्तिके अनुसार शनैः शनैः धर्मको ऐसे बढ़ावे जैन दीमक बांधी को बढ़ाती है ॥ २३ ॥ जिससे परलोक में सहायकी कार्य की सिद्धि के लिये पिता माता पुत्र स्त्री और जानि के नहीं स्थित होते हैं किन्तु एक धर्मही दुसरा हो उप- कार के लिये स्थित होता है तिससे पुत्र आदिकों से भी बड़े उपकार करने वाले धर्मको करे ॥२३६॥ प्राणी एक ही उत्पन्न होता है और एक ही मर जाता है और एक ही पुण्य तथा पापको भागता है माता श्रादिक साथ नहीं तिससे मातादिकों की अपेक्षा से भी धर्म को न छोड़े ॥ २४० ॥ मृत अर्थात् मन प्राग श्रादि से रहित शरीरको काष्ट तथा लोटके समान भूमि में छोड़ कर भाई बन्धु मुँह फेरकर चले जाते हैं मरे हुए जीव के साथ नहीं जाते हैं और धर्म तो उस के साथ जाता है ।। २४३ ॥ जिस कारण सहाय करनेवाले धर्म से दुस्तरतम अर्थात् कठिनाई से उतरने योग्य नरक आदि के दुःखको उतर

( ११० )
जाता है तिससे धर्मको सहायभाव से सदा शनैः शनैः कर.॥
लशुनं गृञ्जनं चैव पलाएहुं कवकानि च ।
अभक्ष्याणि द्विजातीनाममेध्यप्रभवानि च॥५॥
मनु० अ०५
अर्थ-लशुन गूजन प्याज (कांदा ) धरती के
फूल
श्रीर
अशुद्ध विष्ठा आदि में उत्पन्न चौलाई आदि ये द्विजातियों को
अभक्ष्य है शूद्रों को नहीं ॥ ५॥
न कृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित् ।
न च प्राणिवधः स्वय॑स्तसान्मां संविवर्जयेत् ॥४८||
मनु० अ०५
अर्थ-प्राणियों को मारने विना कहीं मांस नहीं उत्पन्न
होता है और प्राणियों को मारना स्वर्गका कारण नहीं है किन्तु
नरक ही का कारण है तिससे मांस को छोड़ दे ॥ ४ ॥
अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी।
संस्कर्ता चोपहर्वा च खादकश्चेति घातकाः ॥५१॥
मनु० अ०५
अर्थ-अनुमंता अर्थात् जिसकी आज्ञा विना मारन सके
और विशसिता जो अंगोको काटकर जुदा २ करे और क्रय
विक्रयी जो मोल ले और बेचे और संस्कर्ता जो पाक करे
और उपहर्ता अर्थात् परोसने वाला और खादक अर्थात् खाने
वाला ये सब घातक अर्थात् मारने वाले हैं ॥ ५१ ॥
वर्षे वर्षेऽश्वमेधन यो यजेत शत समाः।
मांसानि चन खादेद्यस्तयोः पुण्यफलं समम् ॥५३॥

फलमूलाशनमध्यैर्मुन्यन्नानां च भौजनैः ।
न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्जनात् ॥५४||
मांस भचयितामुत्र यस्य मांसमिहाम्यहम् ।
एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदंति मनीषिणः॥५॥
मनु० अ०४
अर्थ-जो सौ वर्ष तक प्रत्येक वर्ष में अभ्यमेध से यजन
करना है और जन्म भर. मांस को नहीं स्याता उन दोनों के
पुण्य का फल स्वर्ग श्रादि समान है ॥ ५३॥ पवित्र फल
मूलों के खान से और वानप्रस्थों के खाने योग्य तण धान्य
आदि के खान से ही यह फल नहीं मिलता है जो शास्त्र में
नियम किए हुए मांस के न पाने वाले को मिलता है ॥ ५४॥
इस लोक में जिस के मांस को मैं वाताई परलोक में वह
मुम को वायगा पंडितों ने मांस शब्द का यही अर्थ
किया है ॥ ५५॥
मोमाग्न्यर्कानिलेन्द्राणां विताप्पत्योर्यमस्य च ।
अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः ॥६६॥
मनु० श्र०५
अर्थ-चन्द्रमा अग्नि सूर्य वायु इन्द्र कुबेर वरुण यम
इन पाठा लोकपाला शरीर को राजा धारण करता है ॥६६॥
मर्वेपामेव शोचानामर्थशाचं परंस्मृतम् ।
योऽध शुचिहि स शुचिर्न मृद्वारि शुचिः शुचिः ॥१०६
चान्त्या शुद्धयन्ति विद्वांसी दानेना कार्यकारिणः ।
प्रच्छन्न पापा जप्येन तपसा वेद वित्तमाः ॥१०७॥

( १९२ ) में है मृत्तो यः शुद्धयते शोध्यं नदी बेगेन शुद्धयति । रजसा स्त्री मनो दुष्टा सन्यासेन द्विजोत्तमः ॥१८॥ अद्भिर्गात्राणि शुद्धयन्ति मनः सत्येन शुद्धयति । विद्यातपोभ्यां भृतात्मा युद्धिर्ज्ञानेन शुद्धथति ॥१०६।। मनु० थ०५५ -सव शौचों में अर्थात् मिट्टी पानी श्रादि में देह की शुद्धि और मन की शुद्धि इन सयों में अर्थ शुद्धि अर्थात् अन्याय से पराये धन के लेने की इच्छा को छोड़ कर धन का इकट्ठा करना सब से अधिक शौच मनु यादिकों ने कहा है क्योंकि जो धन शुद्ध वह शुद्ध है और जो मृत्तिका तथा जल से शुद्ध है और धन में अशुद्ध है वह अशुद्ध ही है ॥ १०६॥ दूसरे के अपकार करने पर उस के बदले के अपकार करने में वुद्धि न करने रूप क्षमा से पंडित शुद्ध होते हैं और नहीं करने योग्य काम के करने वाले दान से और जिन के पाप छुपे हुए हैं वह जप से और वेद का अर्थ तथा चांद्रायण आदि तप के जानने वाले एकादश अध्याय में कहेंगे उस तप से शुद्ध होते हैं ॥ १०७ ॥ मल आदि से दूपित शोधने योग्य मृत्तिका तथा जल से शोधे जाते हैं और श्लेष्मा आदि अशुद्ध से दूपित नदी का प्रवाह वेग से शुद्ध होता है और जिस का मन परपुरुप से मैथुन के संकल्प से दूपित है ऐसी स्त्री प्रतिमास में रजोधर्म से उस पाप से शुद्ध होती है और ब्राह्मण छठे अध्याय में जो कहेंगे उस संन्यास से शुद्ध होता है ॥ १०८ ॥ पसीना आदि से दूपित अंग जल के धोने से शुद्ध होते हैं और निपिद्ध चिंता आदि से दूपित मन सत्य से शुद्ध होता है और सूक्ष्म श्रादि लिंगं शरीर में में ( १९३ ) अवच्छिन्न जीवात्मा ब्रह्मविद्या तथा पाप के नाश करने वाले तप से शुद्ध होता है और अन्यथा ज्ञान से दूषित वुद्धि यथार्थ विषय के ज्ञान से शुद्ध होती है ॥ १०६ ॥ वालया वा युवत्या वा वृद्धया वापि योपिता। न स्वातन्त्र्येण कर्त्तव्यं किंचित्कार्य गृहेष्वपि ।।१४७॥ बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत्पाणिग्राहस्य यौवने । पुत्राणां भर्तरि प्रेते न भजेत्स्त्री स्वतन्त्रताम् ।।१४८।। मनु० अ०५ अर्थ-चालकपन तरुणावस्था में अथवा वृद्धावस्था में स्थित स्त्री को घर में भी कुछ काम स्वाधीन हो कर नहीं करना चाहिये ॥ १४७ ॥ वालकपन में पिता के वश में रहे और तरुणावस्था में पति के अधीन रहे और पति के मरने पर पुत्रों के और जो पुत्र न हो तो उनके सपिंडों के और सपिंड भी न हो तो पिता के पक्ष के और जो दोनों पक्ष न हो तो जाति तथा राजा श्रादि के अधीन रहे कभी स्त्री स्वतन्त्र न हो ॥१४॥ विशीलः कामवृत्तो वा गुणैर्वा परिवर्जितः। उपचर्यः स्त्रिया साध्व्या सततं देववत्पतिः॥१५४॥ नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतं नाप्युपोपितम् । पति शुश्रूपते येन तेन स्वर्ग महीयते ॥१५॥ पाणिग्राहस्य साध्वी स्त्री जीवतो वा मृतस्य वा । पंतिलोकमभीप्सन्ती नाचरेकिंचिदप्रियम् ॥१५६॥ मनु० अ०५ (११४ ) अर्थ-शील से रहित हो अथवा दूसरी स्त्री से प्रीति करने वाला हो अथवा विद्या श्रादि गुणों से हीन हो तिस पर भी पतिव्रता स्त्री को पति देवता के समान मानने योग्य है ॥ ३५४ ।। जैले पति की किली स्त्री के रजोधर्म आदि के योग से उपस्थित न होने पर दूसरी श्री से यम की निद्धि हो जाती है ऐसे स्त्रियों की भर्ती के बिना या सिदि नहीं होती है और भर्ती की प्रामा विना बन तथा उपवास भी नहीं है किंतु भर्ता की सेवा ही ले स्त्री स्वर्ग लोक में पूजित होती है ॥ १५५ ॥ पति की लेवास प्राप्त हुए स्वर्ग श्रादि लोक की इच्छा करने वाली पतिव्रता स्त्री जीते हुप अथवा मरे हुए पति का कुछ भी अप्रिय न करे मरे हुए का अप्रिय व्यभिचारसे तथा कहे हुए श्राद्ध के न करने से होता है।३५६ आसीता मरणात्क्षान्ता नियता ब्रह्मचारिणी । यो धर्म एकपत्नीनां काङ्क्षन्ती तमनुत्तमम् ॥१५८ अनेकानि सहस्राणि कुमार ब्रह्मचारिणाम् । दिवं गतानि विप्राणामकृत्वा कुलसंततिम् ।।१५।। मृते भर्तरि साध्वी स्त्री ब्रह्मचर्ये व्यवस्थिता। स्वर्ग गच्छत्यपुत्रापि यथा ते ब्रह्मचारिणः ॥१६॥ अपत्यलोभाया तु स्त्री भर्तारमति वर्त्तते। सेह निन्दामवामोति पतिलोकाच हीयते ॥१६॥ नान्योत्पन्ना प्रजास्तीह न चाप्यन्य परिग्रहे । न द्वितीयश्च साध्वीनां क्वचिद्भर्तोपदिश्यते ॥१६॥ मनु००५ ( १९५ ) अर्थ--क्षमायुक्त, नियम वाली और पतिव्रताओं के उत्तम धर्म को चाहने वाली तथा मधु मांस मैथुन के त्याग रूप, ब्रह्मचर्य से शोभित, मरण पर्यंत रहे और जो पुत्र रहित भी हो तो पुत्र के लिये परपुरुष की सेवा न करे ॥ १५८ ॥ बालकपन से ब्रह्मचारी जिन्होंने विवाह नहीं किये ऐसे सनक वालखिल्य श्रादि हजारों ब्राह्मण कुल की वृद्धि के लिये सन्तति के उत्पन्न किये बिना भी स्वर्ग को गये ॥ १५६ ॥ जिसका प्राचार अच्छा है ऐसी स्त्री भर्ती के मरने पर पर- पुरुष से मैथुन को न करके पुत्र रहित भी स्वर्ग को जाती है जैसे वे सनक बालविल्य पुत्र न होने पर भी स्वर्ग को गये ॥ १६० ॥ मेरे पुत्र उत्पन्न हो उस से मैं स्वर्ग को जाऊंगी इस लोभ से जो स्त्री भर्ता का उलंघन करती है अर्थात् व्यभिचार करती है वह इस लोक में निन्दा को प्राप्त होती है और उस पुत्र से स्वर्ग को नहीं प्राप्त होती है ॥ १६१ !! भर्ता से भिन्न उत्पन्न सन्तति शास्त्रीय नहीं होती है दूसरी स्त्री में उत्पन्न की हुई प्रजा उत्पन्न करने वाले की नहीं है और अच्छे प्राचार वाली स्त्रियों का शास्त्र में कहीं दूसरा पति नहीं कहा है ।।१६।। व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोके प्रामोति निन्द्यताम् । शृगालयोनि प्रामांति पापरोगैश्च पीब्यते ॥ १६४ ॥ मनुस्मृतिः अध्याय ५ अर्थ-पराये पुरुष के साथ भोग करने से स्त्री लोक में निन्दा को प्राप्त होती है और मरकर शृगाली (स्यारी, गीदड़ी) होती है और कुष्ट श्रादि पाप रोगों से पीड़ित होती है ॥१६४ गृहस्थस्तुयदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः ।

( ११६ ) अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत् ॥२॥ मनुस्मृतिः अध्याय ६ अर्थ-गृहस्थ जव अपनी देह की त्वचा को शिथिल देखे और वालों को सफेद देखे और पुत्र को पुत्र उत्पन्न हुआ देखे, तब विषयों में वैराग्य युक्त हो वानप्रस्थ आश्रम के लिये बन का आश्रय ले ॥२॥ यस्मादण्वपि भूतानां द्विजानोत्पद्यतेभयम् । तस्य देहाद्विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ।। ४० ॥ आगारादभिनिष्क्रान्तः पवित्रो पचितो मुनिः। समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥ ४१॥ एक एव चरेन्नित्यं सिद्धयर्थमसहायवान् । सिद्धिमेकस्य संपश्यन्न जहाति न हीयते ॥ ४२ ॥ अनग्निरनिकेतः स्याद् ग्राममन्नार्थमाश्रयेत् । उपेक्षकोऽसंकुसुको मुनिर्भाव समाहितः ।। ४३ ।। कपालं वृक्षमूलानि कुचेलमसहायता । समता चैव सर्वस्मिन्नेतन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ ४४ ।। नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम् कालमेव प्रतीक्षेत निर्देशं भृतको यथा ॥ ४५ ॥ दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिवेत् । सत्यपूतां वदेवाचं मनः पूतं समाचरेत् ॥ ४६ ।। अतिवादांस्तितिक्षत नावमन्येत कंचन । न चेम देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत् केनचित् ।। ४७ ॥

( ११७ ) क्रुध्यन्तं न प्रतिक्रुध्येदा क्रप्टः कुशलं वदेत् । सप्तद्वारावकीर्णा च न याचमनृतां वदेत् ।। ४८ ॥ अध्यात्मरतिरासीनो निरपेचो निरामिपः। श्रात्मन्नव सहायन सुखार्थी विचरदिह ।। ४६ ॥ न चोत्पातनिमित्ताभ्यां न नक्षत्राङ्गविद्यया । नानुशासन वादाभ्यां भिक्षां लिप्सेत् कर्हिचित् ॥५०॥ न तापसाह्मणवा वयोभिरपि वाश्चभिः । पाकीण भिचुकन्यैरागारमुपसंव्रजेत् ।। ५१ ॥ मनुस्मृतिः अध्याय ६ श्रर्थ--जिस द्विज स भूतों को थोड़ा भी भय नहीं है उस को वर्तमान देह के नाश होने पर किसी से भी भय नहीं होता हैं 12०॥ घर से निकला हुनापुरुष पवित्र दंड कमंडलु श्रादि से युक्त तथा मानी और प्राप्त हुए कामों में अर्थात् किसी से पहुं. चाय हुग. स्वादिष्ट अन्न यादि में इच्छा रहित हो संन्यास धारण कर ॥ ४२ ॥ सब सम रहित एक पुरुष को मोक्ष की प्राप्ति होती है इस बात को अकेला ही सदा मोक्ष के लिये विचारे, एक ही इसके कहने से पहले पहिचान हुए पुत्र प्रादि का त्याग कहा गया, और असहायवान् अर्थात् सहायक कोई न हो जो एकाकी विचरता है वह किसी को नहीं छोड़ता है, और न किसी के छोड़ने का दुःख पाता है न किसी से वह छोड़ा जाता है और न कोई इस से छोड़ने के दुःख को अनुभव कराया जाता है तिससे सर्वत्र ममता रहित सुख से मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ ४२ ॥ लौकिक अग्नि के छूने से तथा घर से रहित और उपक्षा से अर्थात् शरीर में रोग आदि के उत्पन्न होने पर उस के दूर होने का उपाय न करे और (१९८) असंकुसुक अर्थात् स्थिर बुद्धि रहे और मुनि अर्थात् मौनी हो भाव जो ब्रह्म है उसमें मन को एकान लगा कर वन में दिन रात वसता हुश्रा केवल भिक्षा दी के लिये ग्राम में पार ॥४॥ मिट्टी का खपरा (मिट्टी का वर्तन ) श्रादि भिना का पात्र और वसने के लिये वृक्षों के मूल और मोटा फटा वस्त्र अर्थात कौपीन कंथा (गुदडी) श्रादि और सब में ब्रह्म बुद्धि होने से शत्रु मित्र का न होना यह मुक्ति का साधन होने से मुक्त का चिन्ह है ।। ४३ ॥ जीने और मरने की इच्छा न करे, किन्तु अपन कर्म के श्राधीन काल हैं जो मरण काल है उसकी प्रतीक्षा करे, जैसे सेवक अपने सेवन काल के गोधने की प्रतीक्षा करता है ॥ ४५ ॥ बाल तथा हाड श्रादि बचाने के लिये आंखों से देखकर भूमि में पैर रक्खे और बस्त्र से धान कर जल पीवे तथा सत्य से पवित्र वाणी बोले और निपिद्ध संकल्पों से रहित मन से सदा पवित्रात्मा हो ॥ ४६॥ दुसरे की कही कठोर वातों को सह ले, किसी का अपमान न करे और रोग आदिकों के स्थान में इस चंचल देह का श्राश्रय लेकर इस के लिये किसी से वैर न करे ॥४७॥ कोध करने वाले के ऊपर क्रोध न करे और निन्दा करे तो मधुर वाणी बोले, आप भी निन्दा न करे और सप्तद्वारावकीर्ण अर्थात् चक्षु आदि पांच बुद्धीन्द्रिय और मन तथा बुद्धि इन सातों द्वारा ग्रहण किये हुए पदार्थों के मध्य में कुछ वचन न कहे किन्तु ब्रह्मविषयक ही कहे, अनृत अर्थात् नाश होने वाले कार्यों के मध्य में वाणी को न उच्चारण करे किन्तु अविनाशी ब्रह्म के मध्य में प्रणव तथा उपनिपट रूप वाणी का उच्चारण करे ॥ ४८ ॥ सदा ब्रह्म के ध्यान में लगा हुआ और स्वस्तिक आदि योग के आसन में बैठा हुआ दण्ड कमण्डलु आदि में भी विशेष अपेक्षा रहित और निरामिप अर्थात् विषयों ( ११६ ) की इच्छा रहित अपने देह ही की सहायता से मोक्ष के सुख का चाहने वाला संसार में विचरे ॥ ४६ || भूकम्प श्रादि उत्पातों का और नेत्रों के फड़कने श्रादि निमित्तों के और अश्विनी आदि नक्षत्रों के तथा सामुद्रिक से हाथों की रेखाओं के फल कहने से और नीति मार्ग के उपदेश से और शास्त्र का अर्थ कहने से कभी भिक्षा पाने की इच्छा न करे ॥ ५० ॥ वानप्रस्थों से तथा अन्य खाने वाले ब्राह्मणों से और पक्षियों तथा कुत्तों से युक्त घर में भिक्षा के लिये न जाय ॥५॥ अतेजसानि पात्राणि तस्य स्युनिणानि च । तेपामाद्भिः स्मृतं शौच चमसाना मिवाध्वरे ॥ ५३ ॥ अलायुं दारुपात्रं च मृन्मयं वेदलंतथा । एतानि यतिपात्राणि मनुः स्वायंभुवोऽब्रवीत् ॥५४॥ एककालं चरेद्वैतं न प्रसज्जेत विस्तरे । भैने प्रसको हि यतिविषयेष्वपि सज्जति ॥ ५५ ॥ विधमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने । वृत्ते शरावसम्पाते भिक्षा नित्यं यतिश्चरेत् ॥ ५६ ॥ अलाभे न विपादी स्याल्लामे चैव न हर्पयेत् । प्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रा संगाद्विनिर्गतः ॥७॥ मनुस्मृति अध्याय ६ अर्थ--सुवर्ण आदि धातुओं को छोड़कर छेदों से रहित सन्यासी के भिक्षापात्र हों, उन पात्रों की यज्ञ में चमसों के समान जल से शुद्धि होती है । ५३ ॥ तूंवी काठ मृत्तिकातथा यांस आदि के खंड से बने हुए संन्यासियों के भिक्षापात्र होते हैं यह स्वायं मनु ने कहा है ॥ ५४ ॥ एक बार प्राण ( १२० ) धारण के लिये भिक्षा करे अधिक न करें क्योंकि वहुत भिक्षा के भोजन करने वाले यति की प्रधान धातु के बढ़ने से स्त्री आदि विपयों की इच्छा होगी ॥५५॥ रसाई का धुश्रां दूर होने पर और मूसल के कूटनेका शब्द बंद होने पर तथा रसोई की आग बुझी होने पर और गृहस्थ तक सा के भोजन कर लेने परशरावों के त्याग किय जाने पर ही यति सदाभिक्षा को करे५६ भिक्षा आदि के न मिलने में दुःखी न हो और मिलने में सुखी न हो, प्राणों के निर्वाह योग्य भोजन किया करे और दण्ड कमण्डलु अदि मात्राओं में भी यह बुरा है इसको छोड़ता हूं यह अच्छा है इसको लेता हूं ऐसी बातों को छोड़ दे ॥५॥ अल्पानाम्यवहारेण रहः स्थानासनेन च । ह्रियमाणानि विपयैरिन्द्रियाणि निवर्तयेत् ।। ५६ ॥ इन्द्रियाणां निरोधेन रागद्वपक्षयेण च । अहिंसया च भूतानाममृतत्वाय कल्पते ॥ ६० ॥ अवेक्षेत गतीनृणां कर्मदोपसमुद्भवाः । निरये चैव पतनं यातनाश्च यमक्षये ॥ ६१ ॥ विप्रयोग प्रियश्चैव संयोगं च तथाप्रियैः । जरया चाभिभवनं व्याधिभिश्चोपपीडनम् ॥ ६२ ॥ मनुस्मृति अध्याय ६ अर्थ-थोड़े श्राहार के खाने से और एकान्त स्थान में रहने से रूप आदि विषयों द्वारा खींची गई इन्द्रियों को.निवृत्त करे अर्थात् विषयों से हटावे ।। ५६ !! इन्द्रियों के रोकने से और रागद्वेष के दूर होने से और प्राणियों की हिंसा न करने से मोक्ष के योग्य होता है ॥६० ॥ शास्त्र में कहें हुंए के न करने और निन्दित के करने रूप.कर्म के दोष से उत्पन्न हुई ( १२१ ) मनुष्यों की पशु श्रादि योनि की प्राप्ति का और नरक में गिरने का और यमलोक में स्थित का तीब खड्ग से काटने श्रादि से उत्पन्न, श्रुति पुराण आदि में कही हुई तीन पीडाओं का चितवन करे ॥ ६॥ प्यारे पुत्र आदि के वियोग को और अनिष्ट अर्थात् न चाहे हुए हिंसक श्रादि के मिलने को और बुढ़ाप के दवा लेने को तथा रोग श्रादि से पीडित होने यादि को फर्म के दोषों से उत्पन्न ऐसा चितवन करे ॥ २ ॥ अधर्मप्रभवं चव दुःखयोगं शरीरिणाम् । धर्मार्थप्रभवं चैव सुखसयोगमक्षयम् ॥६॥ सूक्ष्मतां चान्ववेनेत योगेन परमात्मनः । देहेपु च समुत्पत्तिमुत्तमेवधमेषु च ॥ ६५ ॥ पितोऽपि चरेद्धर्म यत्र तत्राथमे रतः। समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥ ६६ ॥ फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम् । न नामग्रहणादेव तस्यवारि प्रसीदति ॥ ६७ ॥ संरक्षणार्थ जन्तूनां रात्रावहनि वा सदा । शरीरस्यात्यये चव समीक्ष्य वसुधां चरेत् ।।६८|| मनुस्मृति अध्याय ६ अर्थ-जीवात्माओं को अधर्मकारण दुःख होने का और धर्म जिस कारण ऐसा अर्थ ब्रह्म का साक्षात् होना उससे उत्पन्न मोक्षरुप अक्षय ब्रह्म मुम्न के मिलने का चितवन करें ॥ ६४ ॥ योग से अर्थात् विपयों से चित्त की वृत्ति के रोकने से परमात्मा के स्थूल शरीर श्रादि की अपेक्षा से सव के अन्त- यामी भावसे सूक्ष्मतया अर्थात् अवयव रहित होने का उसके ( १२२ ) त्याग से ऊंच नीच देव पशु आदि शरीरों में जीवोंके शुभअशुभ फल भोगने के लिये उत्पन्न होने का चितवन करे ॥६५॥ जिस किसी आश्रम में स्थित उस श्राश्रम के विरुद्ध आचार से दृषित होने पर भी और श्राश्रम के चिह्नीं से रहित भी सब भूतों में ब्रह्म वुद्धि से समान दृष्टि होता हुआ धर्म को करे दंड आदि चिह्नों को धारण करना ही धर्म का कारण नहीं है किंतु शास्त्र में कहे हुए का करना यह धर्म की मुख्यता दिखाने के लिए कहा है कुछ दंड श्रादि चिहाँ के त्यागने के लिये नहीं कहा है ।। ६६ । यद्यपि निर्मली के वृक्ष का फल जल को निर्मल करने वाला है तर भी उसके नाम लेने से जल निर्मल नहीं होता है किन्तु फल के डालने से ऐसे ही केवल चिह्न धारण करना ही धर्म का कारण नहीं है किन्तु कहे हुए का करना ॥ ६७ ॥ शरीर को दुःख होने पर भी छोटी चीटी आदि की रक्षा के लिए रात्रि में अथवा दिन में सदा भूमि को देख कर विचरे ॥६॥ दह्यन्ते मायमानानां घातूनां हि यथा मलाः। तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोपाः प्राणस्थ विग्रहात् ॥७॥ मनु० १०१ अर्थ-जैसे घरिया में रख कर तपाने से सुवर्ण श्रादि सब धातुओं के मल जल जाते हैं ऐसे ही प्राणायाम के करने से इन्द्रियों के सव दोष भस्म हो जाते हैं ॥ ७९ ॥ उचा वचेषु भूतेषु दुज्ञेयामकृत्तात्मभिः । ध्यानयोगेन संपश्येद्गतिमस्यान्तरात्मनः ॥७३॥ सम्यग्दर्शनसंपन्नः कर्मभिननिवध्यते ।

(१२३. )
दर्शनेन विहीनस्तु संसारं प्रतिपद्यते ॥७४||
मनु००६
अर्थ-शास्त्र से जिन का अन्तःकरण संस्कारयुक्त नहीं
है ऐसे पुरुषों द्वारा दुःख से जानने योग्य ऐसी इस जीव की
ऊंच नीच देव पशु प्रादि में जन्म की प्राप्ति को ध्यान के
योग से कारण सहित भली भांति जाने तिस पीछे ब्रह्मज्ञान
निष्ट हो ॥ ७३ ॥ तत्त्व से ब्रह्म का साक्षात् करने वाला
पुरुप कर्मों में नहीं बंधता है और कर्म उस के पुनर्जन्म के
लिए. समर्थ नहीं होते हैं कारण यह है कि पहले इकट्ठे किए
हुप पाप पुण्य का ब्रह्म मान से नाश हो जाता है और दर्शन
जो घाम का साक्षात् करना है उस से रहित संसार अर्थात्
जन्म मरण के प्रयन्ध को प्राप्त होता है ||san
जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम् ।
रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमंत्यजेत् ।।७७,
मनु००६
अर्थ-युढ़ापा नथा शोक से युक्त और नाना प्रकार के
रोगों का स्थान और आतुर अर्थात् सुधा पिपासा शीत
उम्ण आदि में घबराने वाला तथा रजोगुण से युक्त और
अनित्य अर्थात् नाश होने वाले और पृथिवी श्रादि पांचभूतों
से बने हुए. इस आवास अर्थात् जीव के घररूप देह को छोड़
दे जिससे फिर देह न धारण करनी पढ़े सो करे HGGI
धृतिः क्षमा दमो ऽस्तेयं शौचमिद्रियनिग्रहः ।
धीविद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ।।१२।।
मनु० १०६
अर्थ-धृति अर्थात् सन्तोप और क्षमा अर्थात् दूसरे के

( १२४ ) अपकार करने पर भी उसका वदले का अपकार न करना और दम अर्थात् विकार के कारण विपय के निकट होने पर भी मन का नहीं विगडना और अस्तेय अर्थात् अन्याय से पराये धन का न लेना और शौच अर्थात् मट्टी तथा जल से देह को शुद्ध करना और इन्द्रिय निग्रह अर्थात् विपयों से चक्षु (ख ) श्रादि को रोकना और धी अर्थात् शास्त्र आदि के तत्त्व का ज्ञान और विद्या अर्थात् श्रात्म ज्ञान और सत्य अर्थात् यथार्थ (ठीक ) कहना और अक्रोध अर्थात् क्रोध का कारण होने पर भी क्रोध न होना यह दश प्रकार का धर्म का स्वरूप है ॥२॥ तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च । भयादोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च ॥१॥ मनु० अ०७ अर्थ-उस दंड के भय से स्थावर जंगम सय प्राणी भोग करने को समर्थ होते हैं और जो दंड न होता तो वलवान् दुर्बल के धन दारा आदि के लेने में और उस से बलवान् को उस के तो किसी का भी भोग सिद्ध न होता और वृत आदि स्थावरों के काटने में भोग की सिद्धि न होती तैसे ही सज्जनों को भी नित्य नैमित्तिक अपने धर्म का करना योग्य हुआ न करने में यमयातना दंड के भय से ही ॥१५॥ दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति । दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्म विदुर्बुधाः ॥१८॥ मनु०अ०७ अर्थ-दंड सब प्रजाओं का शासन करता है और दंड ही सब प्रजात्रों की रक्षा करता है और है और सब.के सोने पर (१२५. ) दंड ही जागता है अर्थात् उस के भय से चोर श्रादि नहीं प्रांत हैं और दंड ही को धर्म का कारण होने से धर्म जानते हैं यहां कार्य में कारण का उपचार और इस लोक तथा परलोक के धर्म दंड ही के भयस किये जाते हैं। तस्याहुः संप्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम् । समीक्ष्यकारिणं ग्रानं धर्मकामार्थकोविदम् ॥२६॥ मनु० अ०७ अर्थ-सत्य बोलने वाले और विचार के करने वाले नथा तत्व अतत्व के विचार में उचित बुद्धि से शोभायमान और धर्म अर्थ काम के जानने वाले अभिषेक श्रादि गुणों न युक्त राजा को मनु श्रादि दंड का प्रवर्तक अर्थात् चलान याला करते हैं रक्षा वेनो विनष्टोऽविनयानहुपश्चैव पार्थिवः। सुदाः पैजवनश्चैव सुमुखो निमिरेव च ॥४॥ पृथुस्तु विनयाद्राज्यं प्राप्तवान्मनुरेव च । कुवेरश्च धनश्वर्य ब्राह्मण्यं चैव गाधिजः ॥४२॥ विद्यभ्यस्त्रयी विद्यां दण्डनीतिं च शाश्वतीम् । आन्वीक्षिकी चात्मविद्या वारिम्भांश्च लोकतः ।।४।। इन्द्रियाणां जये योग समातिष्ठेद्दिवानिशम् । जितेन्द्रिया हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः॥४॥ दश कामसमुत्थानि तथाप्टी क्रोधजानि च । व्यसनानि दुरन्तानि प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥४५॥ कामजेपु प्रसनो हि व्यसनेषु महीपतिः।

( १२६ ) वियुज्यतेऽर्थधर्माभ्यां क्रोधजेप्यात्मनैव तु ॥४६॥ मृगयाक्षो दिवास्वमः परिवादः खियो मदः । तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गुणः ॥४॥ पैशुन्यं साहस द्रोह ईर्ष्या सूयार्थ दूपणम् । वाग्दण्डजं च पारुण्यं क्रोधजोऽपि गणोऽटकः ॥४॥ दूयोरप्येतयोमलं यं सर्च कवयो विदः! वं यतेन जयेल्लोभ तजावतावुभौ गणौ ॥१६॥ पानमक्षाः स्त्रियश्चैव मृगया च यथा क्रमम् । एतत्कटतमं विद्याचतुष्कं कामजे गणे ॥५०॥ दण्डस पावनं चैत्र बास्पारुण्यार्थ पूर्ण । क्रोधजेऽपि गणे विद्यात्कप्टमेतत्रिकं सदा ॥५१॥ सप्तकस्यास्य वर्गस सर्वत्रैवानुपङ्गिणः । पूर्व पूर्व गुरुतरं विद्याद्वयसनमात्मवान् ।।५२॥ व्यसनस्य च मृत्योश्च व्यसनं कष्टमुच्यते । व्यसत्यधोऽधोत्रजति स्वर्यात्यव्यसनी मृतः ॥५३॥ मनु० अ०७ अर्थ-चेन तथा नहुप राजा भी और पिजवन का पुत्र सुदा नाम तथा सुमुख और निमि यह अविनय से नाशको प्राप्त हुए ॥ ४१ ॥ पृथु तथा मनुने विनय से राज्य पाया और कुवर विनय से धन के स्वामी हुए और गाधिक पुत्र विश्वामित्र ने क्षत्रिय होने पर भी उसी शरीर से ब्राह्मणत्व पाया ॥ ४२ ॥ त्रिवेदीरूप विद्या के जानने वाले ब्राह्मणों से तीनों वेदों को ग्रन्थ से तथा अर्थसे अभ्यास करे और शाश्वती अर्थात् सदा ( १२७ :) से चली आई हुई नीति विद्या जो अर्थशास्त्र है उसको उसके जानने वालों से सीखे तथा युक्ति और प्रत्युत्तर में सहायता देनेवाली आन्वीक्षिकी अर्थात् तर्क विद्या को तथा उदय और दुःख में हर्प विषादको शान्त करने वाली ब्रह्म विद्याको सीखे और वाणिज्य पशुपालन प्रादि वार्ता को उसके प्रारम्भ धन के उपायार्थों को जानने वाले कर्पक आदिको से सीखें ॥४३॥ चक्षु आदि इन्द्रियों को विपयों में आसक्त होने से रोकने में सदा यत्न करे क्योंकि जितेन्द्रिय राजा सदा प्रजाओं को वश में रखने के लिये समर्थ होता है ॥ ४४ ॥ आदि में सुख और अन्त में दुःख देनेवाले दश कामके और आठ क्रोधके व्यसनों को यत्न से त्याग करे ॥ ४५ ॥ जिससे कामके व्यसनों में प्रसक्त अर्थात् लगा हुश्रा राजा धर्म तथा अर्थ से हीन हो जाता है और क्रोध के व्यसनों में प्रसन्न प्रकृति कोप से देह के नाश को प्राप्त होता है ॥ ४६॥ उन व्यसनों को नाम से दिखाते हैं मृगया अर्थात् अहेर और अक्ष अर्थात् जुआ खेलना और सब कामों की नाश करने वाली दिनकी नींद और पराये दोप का कहना तथा स्त्री का भोग और मद्यपानसे उत्पन्न मद और तौर्यत्रिक अर्थात् नाचना गाना बजाना आदि और वृथा भ्रमण करना यह दश गण काम जो सुख की इच्छा है उससे उत्पन्न है ॥४७॥ पैशुन्य अर्थात् अज्ञात दोप का प्रगट करना और साहस अर्थात् वन्धन आदि से दण्ड देना और द्रोह अर्थात् छल से मारना और ईर्ष्या अर्थात् दूसरे के गुणों का न सहना और असूया अर्थात् पराये गुणों में दोपोंका प्रगट करना और अर्थ दूपण अर्थात् द्रव्यका ले लेना तथा देने योग्य को न देना और वार दंड अर्थात् गाली देना और पारुष्य अर्थात् ताडना श्रादि यह पाठका गण क्रोध से उत्पन्न जानिये ॥४८॥ 'जिस को काम से तथा क्रोध से उत्पन्न व्यसनों के गण का ( १२८ ) कारण स्मृतियाँके बनानेवाले जानते हैं उन व्यसनोंके कारण रूप लोस को यत से त्याग करे जिस से ये दोनों गण लोभ से उत्पन्न होते हैं कहीं धनके लोभसे और कहीं दूसरे प्रकार के लोभ से ॥५६॥ मद्यका पीना पांलासे खेलना स्त्री का भोग और मृगया अर्थात् अहेर (शिकार खेलना ) क्रम से पढ़े हुए ये चार काम से उत्पन्न व्यसनों में से बहुत दोपयुक्त होने से इन चारों को अतिशय करके दुःखका कारण जाने ॥ ५० ॥ क्रोध से उत्पन्न व्यसनों के गण में दंड देना वाणीकी कठोरता तथा अर्थ दूपण इन तीनों को बहुत दोप युक्त होनेसे सदा अधिक दुःख देनेवाले जाने ॥ ५१ ॥ काम तथा क्रोध से उत्पन्न इस मद्यपान आदि सात व्यसनों के गण जो सव राज मंडल में बहुधा स्थित हैं उनमें से प्रशस्त चित्तवाला राजा पहले पहले को अगले अगले से अति कठिन जाने सोई कहते हैं जैसे जुश्रा से मद्यका पीना अतिकष्ट देनेवाला है क्योंकि मद्यपीने से संज्ञा न रहने के कारण इच्छा पूर्वक चेष्टा करनेसे देह धन आदिके विगाड़ने वाले दाप होते हैं और जुत्रा में तो धन आता है अथवा जाता है और स्त्री व्यसन से जुआ अतिकष्ट का देने वाला है जुग्राम वैरका उत्पन्न होना आदि नीतिशास्त्र के कहे हुए दोप होते हैं और सूत्र पुरीष श्रादि वेगोंके रोकने से रोग की उत्पत्ति होती है और स्त्री व्यसन में फिर सन्तान की उत्पत्ति श्रादि गुणों का योग भी है और मृगया तथा स्त्री का व्यसन. इन दोनों में स्त्री व्यसन दुष्ट है उस में कार्यों का नहीं देखना और कालके उल्लंघन करनेसे धर्मलोप आदिदोष होते हैं और मृगया में तो श्रम करने से आरोग्य आदि गुणों का भी योग है इस प्रकार काम से उत्पन्न चार व्यसनों के गण में पहला पहला भारी दोषयुक्त है और क्रोध से उत्पन्न ( १२६ ) वाक्पारुप्य श्रादि में वाक्पारुष्य से दंडपारुप्य दुष्ट है क्योंकि अंगच्छेद धादिका समाधान नहीं हो सकता है और वाकपारुप्य में तो दान मानरूप पानी के छिडकनेसे क्रोधरूप अग्नि की शान्ति हो सकती है और अर्थ दूपणसे वाक्पारुण्य दोपयुक्त तथा मर्मस्थान को पीडा देनेवाला है क्योंकि वाक्पा- रुप्य की चिकित्सा अतिकठिन है सोई कहा है "न प्ररोहति वाकृतं' अर्थात् वाणी का किया हुआ फिर नहीं ऊगता है अर्थ दूपण का तो बहुतसा धन दनेसे समाधान हो सकता है इस भान्ति क्रोधज तीन व्यसनों में पहला पहला अतिदुष्ट है इस से इसको यत्न से त्याग दे ॥ ५२ ॥ ऊपर कहे हुए व्यसन और मृत्यु के उसमें से व्यसन बहुत दुःखद है कारण व्यसनी मनुष्य व्यसन से नीचे नीचे बहुत नरक में जाता है और निव्यसनी मरा हुश्रा ऊपर स्वर्ग में जाता है ।। ५३ ॥ धर्मज्ञं च कृतज्ञं च तुष्टप्रकृतिमेव च । अनुरक्तं स्थिरारम्भ लघुमित्रं प्रशंस्यते ॥२०६।। प्राज्ञ कुलीनं शूरं च दचं दातारमेव च । कृतज्ञ धृतिमन्तं च कष्टमाहुररिं बुधाः ॥२१०॥ मनु० अ०७ अर्थ-धर्म का जानने वाला तथा किए हुए उपकार का जानने वाला और जिस की प्रकृति अर्थात् स्वभाव संतोषयुक्त हो ऐसा और प्रीति करने वाला और जिन के प्रारम्भ स्थिर हैं ऐसे कामों का करने वाला मित्रं प्रशस्त अर्थात् उत्तम है :२०६ ॥ विद्वान् कुलीन शूर चतुरदाता किये की जानने वाला और धीरज वाला अर्थात् सुख दुःख में एक रूप ऐसे शत्रु को पंडित दुरुच्छेद अर्थात् दुःख से उखाड़ने योग्य कहते ( १३० ) हैं इस कारण ऐसे शत्रु के साथ मिलाप करना चाहिये ।।२१०॥ आपदर्थ धनं रक्षेद्दारान् रक्षेद्धनैरपि । आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥२१३।। मनु० अ०७ अर्थ-आपत्ति निवारण करने के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए और धन के परित्याग से भी स्त्री की रक्षा करनी चाहिए और अपनी फिर स्त्री तथा धन के त्याग से भी रक्षा करे ॥२१३॥ धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मों हतोऽवधीत् ॥१५ मनु० अ०८ अर्थ-अतिक्रमण किया हुआ अर्थात् न माना हुआ धर्म ही इष्ट अनिष्ट समेत नाशकर देता है अर्थी प्रत्यर्थी श्रादि नहीं वही धर्म अनतिकान्त अर्थात् माना हुआ इष्ट अनिष्टों समेत रक्षा करता है इसलिए धर्म का अतिक्रमण न करना चाहिये अतिक्रमण किया हुआ धर्म तुम समेत हम को न मारे सभासदों के कुमार्ग में प्रवृत्त होने पर यह प्राविवाक का सम्बोधन है अथवा जो यह निषेध अर्थ में अव्यय है तो नो हतो धर्मो मावधीत् अर्थात् नहीं अतिक्रमण किया हुआ धर्म नहीं मारता है यह अभिप्राय है ॥१५॥ एक एव सुहृद्धों निधनेऽप्यनुयाति यः। शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति ॥१७॥ मनु० अ०८ अर्थ-धर्म ही एक मित्र है जो मरने के समय भी वांछित फल देने के लिए साथ जाता है और सब स्त्री पुत्र शरीरही के साथ नाश को प्राप्त होते हैं तिस से पुत्र श्रादि के स्नेह की अपना से भी धर्म न छोदना चाहिये ॥१७॥ श्राकाररिङ्गितर्गत्या चष्टया भापितेन च । नेत्रवत विकारेश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥२६॥ मनु० अ०८ अर्थ-पहले कहे हुए धाकार श्रादि से और गति से अर्थात् पैरॉ के टीक न रखने से वेणा से बोलने से और नेत्र तथा मुग्य के विकार से मन की भीतरी बात जानी जाती है। सत्येन पूर्वत साक्षी धर्मः सत्येन वर्धते । तस्मात्सत्यं हि वक्तव्यं सर्ववर्णपु साचिभिः ||३|| आत्मव ह्यात्मनः साची गतिरात्मा तथात्मनः । मावमस्थाः स्वमात्मानं नृणां साक्षिणमुत्तमम् ||८|| मन्यन्ते व पापकृतो न कश्चित्पश्यतीति नः । तांस्तु देवाः प्रपश्यंति स्वस्यैवान्तरपुरुपः ॥८॥ यौ मिरापो हृदयं चन्द्रार्काग्नियमानिलाः। रात्रिः संध्यं च धर्मश्च वृत्तज्ञाः सर्वदेहिनाम् ॥८६॥ मनु० अ०८ अर्थ-साक्षी सत्य कहने से पूर्व जन्म में भी इकट्ठे किए हुए पाप से छूट जाता है और सत्य कहने से इसका धर्म बढ़ता है तिस से सर्व वर्ण के विषय में साक्षी को सत्य कहना चाहिए ॥ ८३ ।। शुभाशुभ कर्मों में स्थित आत्मा ही अपना रक्षक है तिस से मनुष्यों के मध्य में उत्तम साक्षी श्रात्मा का झूठ बोलने से तिरस्कार न करे ॥४॥ पाप करने चाले ऐसा जानते हैं कि अधर्म करने में हमें कोई नहीं देखता ( १३२ ) है परन्तु उन को आगे कहे हुए देखते हैं और अपना अन्त- रात्मा पुरुष देखता है ॥ ५५ ॥ युलोक, पृथिवी, जल, हृदय में स्थित जीव, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, यम, पवन, रात्रि और दोनों संध्या और धर्म यह सब देहधारियों के शुभाशुभ कर्म को जानते है ॥८६॥ एकोऽहमस्मीत्यात्मानं यत्त्वं कल्याण मन्यसे । नित्यं स्थितस्ते होप पुण्यपापेक्षिता मुनिः ॥११॥ यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैप हदि स्थितः । तेन चेदविवादस्ते मा गङ्गां मा कुरून् गमः ॥३२॥ मनु० २०० अर्थ-हे भद्र ! मैं जीवात्मक एक ही हूं यह जो तुम आप को मानते हो तो ऐसा मत मानो क्योंकि पापों और पुरयां का देखने वाला मुनि अर्थात् सर्वज्ञ परमात्मा सदा तुम्हारे हृदय में स्थित है ।। ६१ ॥ सव के संयमन से यम और दंडधारी होने से वैवस्वत और क्रीडा करने से देव जो यह तुम्हारे हृदय में स्थित है उस के साथ यथार्थ कहने से जो तुम्हारा विवाद न हो जब तुम्हारे मनोगत को यह और प्रकार से जानता है और तुम और प्रकार से कहते हो अन्तर्यामी के साथ तुम्हारा विरोध होगा इस से सत्य कहने ही से पाप रहित और कृतकृत्य हो पाप दूर करने के लिए गंगा तथा कुरुक्षेत्र को मत जाओ || २ || यमिद्धो न दहत्यग्निरापो नोन्मज्जयन्ति च । न चातिमृच्छति क्षिप्रं स ज्ञेयः शपथे शुचिः ॥११५ वत्सस्य ह्यभिशप्तस्य पुरा भ्रात्रायवीयसा ।

(२३३ )
नारिददाह समापि सत्येन जगतः स्पृशः ॥११६॥
मनु०५०-
अर्थ-जिस को प्रकाशमान अनि न जलाये और जल
जिस को ऊपर का न उडाले और जो बदी पीड़ा को न प्राप्त
हो यद शपथ में गुम जानना चाहिये ।। १९५॥ पहले समय
में यन्म नान ऋषि को छोटे भाई ने यह दोप लगाया
किन बात नहीं है शुद्रका पुत्र है इनके शपथके लिये अग्नि
में धन टुप इस प्रषिक रोमका भी अग्नि ने सत्य के कारण
म नहीं जलाया ॥ १५६॥
कामक्रोधी तु संयम्य चोर्थान् धर्मण पश्यति ।
प्रजान्तमनुवर्तन्ते समुद्रमिव सिन्धवः ॥१७शा
मनु०००
अंध-जो राजा रागद्वेष को छोद कर धर्म से कार्यों को
देता है उस राजाको प्रजा ऐसे सेवन करती है जैसे समुद्र
को नदियां अयान नदियां जैसे समुद्रसे नहीं लौटती है उसी
के. माथ पकना को प्राप्त होती है प्रजा भी पले ही राजा
को अनुगामिनी होनी है ॥ १७५ ॥
नान्यदन्येन संमृष्टरूपं विक्रयमर्हति ।
न चाप्तारं न व न्यनं न रेणातिरोहितम् ॥२०३||
मनु० थ०८
अर्थ-शर नादि द्रव्यों में कुलुम प्रादि मिला कर न
बचना चाहिये और प्रसार को सार कह कर न बचे और
नगजुधादि में कमनीन नीले और पीठ पीछे न येचे औरप्रीति
से राव हुए द्रव्य को न रं विना स्वामी के विक्रयके समान
हान से बिना स्वामी के बेचने ही का दण्ड होता है॥२०३॥

(१३४ ) किश्चिदेव तु दीप्यः स्यात्संभाषां ताभिराचरन् । प्रैष्यासु चैकभक्तासु रहः प्रत्रजितासु च ॥३६३।। मनु० अ०८ अर्थ-शून्यस्थान में चारण और श्रात्मोपजीविकी स्त्रियों से बातचीत करता हुआ पुरुष राजा से थोड़ासा दण्ड का लेश दिलाने योग्य है क्योंकि वेभी परदारा हैं तथा रुकी हुई दासियों से और वौद्ध आदि की ब्रह्मचारिणियों से संभाषण करता हुआ कुछ दंड मात्र देने योग्य होता है ॥ ३६३ ॥ गर्भिणी तु द्विमासादिस्तथा प्रत्राजितो मुनिः। 'ब्राह्मणा लिङ्गिनश्चैव न दाप्यास्तारिकं तरे ॥४०७॥ मनु० अ०८ अर्थ-दो महीनोंके उपरान्तकी गर्भिणी स्त्री तथा सन्यासी मुनि वानप्रस्थ ब्राह्मण और ब्रह्मचारी ये (नाव में बैठने का) पार उतरने में उतराई का मूल्य न देवें ॥ ४०७ ।। पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । रक्षन्ति स्थविरे पुत्राः न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥३॥ मनु० अ०६ १-"प्रव्रजितासु" शब्द की हिन्दी भाषा करने वाले चौद् श्रादि की ब्रह्मचारिणयों से संभाषण करना इत्यादि अर्थ लिखते हैं इस से स्वतः ही सिद्ध होता है कि-उक्तस्मृतिकार के पहले बौद्धधर्म विद्यमान था और आदि शब्द से भाषाकार ने जैनमत स्वीकार किया है किन्तु सर्वशास्त्रीय प्रमाणों से भली प्रकार से सिद्ध हो चुका है कि-बौद्धमत जैनमत से पीछे निकला है इतना ही नहीं किन्तु वौद्धमत के प्रामाणिक ग्रन्थों में जैनमत विषय उल्लेख किया हुआ है तथा जैनमत के शास्त्रों में दीक्षा का अपर नाम प्रवजिन “यञ्चइय" ऐसा पाठ पुनः २ आता है में (१३५ ) अर्थ-विवाह से पहले स्त्री की पिता रक्षा करता है पीछे तरुण अवस्था में भी रक्षा करता है उसके अभाव पुत्र उससे स्त्री किसी अवस्था में न्वतन्त्र न हो और जिस के पति पुत्र नहीं है उसकी पिता श्रादि भी रक्षा करते हैं ॥३॥ पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च बिरहोऽटनम् । स्वमोऽन्यगेहवासश्च नारीसंदपणानि पट् ॥१३॥ मनु० अ०४ अर्थ-मद्य पीना असत्पुरुपों का संसर्ग पति से वियोग भ्रमण करना कुसमय में सोना पराये घरमें रहना ये छः स्त्री कव्यभिचार दोप के उत्पन्न करने वाले हैं इस कारण ये इन सरना करने योग्य है॥ १३ ॥ उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम् । प्रत्यहं लोकयात्रायाः प्रत्य त्रीनिवन्धनम् ॥२७॥ मनु००६ अर्थ-सन्तान का उत्पन्न करना और उत्पन्न हुए का पालना और प्रतिदिन अतिथि मित्र श्रादि का भोजन आदि लोय में व्यवहार की प्रत्यक्षमाया ही कारण है ॥ २७ ॥ पति या नाभिचरति मनाचाग्दहसंयता। मा भर्तृलोकानामोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते २६ व्यभिचारातु भर्तुः स्त्री लोके प्रामोति निन्द्यताम् । शृगालयोनि चानोति पापरोगैश्च पाड्यते ॥३०॥ मनु० अ०६ अर्थ-जो स्त्री मन वाणी तथा देहके संयत हो मन वाणी नया देह से व्यभिचार को नहीं प्राप्त होती है वह पति के साथ ( १३६ ) अर्जन किये हुए स्वर्ग श्रादि लोकों को प्राप्त होती है और इस लोक में सजनों द्वारा साध्वी कही जाती है ॥ २६ ॥ दूसरे पुरुष के योग से लोक में निंदा को और दूसरे जन्म में स्यारी की योनि को पाती है और क्षय रोग श्रादि से पीडित होती है स्त्रीधर्म कह भी चुके परन्तु ये दो श्लोक उत्तम संतान के निमित्त हैं इस कारण बहुत प्रयोजन को जान फिर पढ़े ॥ नोद्वाहिकेषु मन्त्रेपु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् । न विवाहविधायुक्तं विधवावेदनं पुनः ॥६शा मनु. ६ अर्थ-"अर्यमणंनु देवं" इत्यादिक विवाह के मन्त्रों में किसी शाखा में नियोग नहीं कहा है और न ही कहीं विवाह का विधान करने वाले शास्त्रों में दूसरे पुरुष के साथ विवाह ॥६५॥ द्यूतमेतत्पुरा कल्पे दृष्टं वैरकरं महत् । तस्माद्यूतं न सेवेत हास्यार्थमपि बुद्धिमान् ।।२२७॥ प्रच्छन्न वा प्रकाश वा तन्निपेवेत यो नरः । तस्य दण्डविकल्पः स्याद्यथेष्टं नृपतेस्तथा ।।२२८|| मनुस्मृति अध्याय अर्थ-अभी ही नहीं किन्तु पहले कल्प में भी यह द्यूत अतिशय कर वैर कराने वाला देखा गया है इससे बुद्धिमान् हंसी के लिये भी उसका सेवन न करे ॥ २२७ ॥ जो मनुष्य उस धूत का गुप्त अथवा प्रगट सेवन करता है उस को जैसी राजा की इच्छा हो वैसा दण्ड हो ॥ २२८ ।। कहा है ( १३७ ) *पौण्ड्रकारचौद्रविडाः काम्बोजायवनाः शकाः । पारदाः पवारचीनाः किराताः दरदाः खशाः॥४४॥ मनुस्मृति अध्याय १० अर्थ-पौंड्रक (मेदिनीपुर परदेश ) औद्र ( कटक ) द्रविड (पूर्वीघाट ) काम्बोज (अरव ) यवन (मक्का) शक (टरकी) पारद ( महाचीन ) पह ( कावुल) चीन, किरात (देश विशेष) दरद (दार्जलिंग) खश (ईरान) यह सब क्रिया के लोप से शुद्रता को प्राप्त हुए ॥४४॥ सर्वान्नसान पोहेत कृतानं च तिलैः सह । अश्मनो लवणं चैव पशवो ये च मानुपाः ॥८६॥ सर्व च तान्तवं रक्तं शाणनामानिकानिच । अपि चेत्स्युररनानि फलमूले तथौपधीः ॥ ८७॥ अपः शस्त्रं विपं मांस सोम गन्धाश्च सर्वशः। क्षीरं क्षौद्रं दधि घृतं तैलं मधु गुडं कुशान् ॥८॥ भारण्यांश्च पशुन्सर्यान्दष्ट्रिणश्च वयांसि च । मद्यं नीली च लादं च सर्वाश्चैकशफांस्तथा ||८|| मनुस्मृतिः अध्याय १० अर्थ-उन. वर्जनीय वस्तुओं को कहते हैं सब रसों को तथा सिद्ध अन्न अर्थात् पूरी श्रादि, तिल, पापाण, नोनपशु मनुष्य इन सब को न बेचे ।२६॥ सब तागों से वने वस्त्र कुसुम श्रादि से रंगे हुए न बेचे और सन तथा अलसी के * उत देशों के नामों से यह भली भांति सिद्ध हो जाता है कि उक्त स्मृतिकार के समय उह देश भली भांति विद्यमान थे तब ही तो उक्त देशांक नाम उक्त लोक में ग्रहण किए गए हैं।

(१३८ ) तागों से बने हुए तथा भेड़ के रोमों से बने हुए चाहे लाल भी न हो तिस पर भी न बेचे, तैसे ही फल मूल और गुडूची आदि को न वेचे ॥ ८७ ॥ जस्त, लोह, विप, मांस, सोम, दूध दही, घी, तेल, गुड, डाभ और सुगन्ध युक्त सब कपूर आदि माक्षिक (शहद ) मोम इन सब को न बेचे ॥८॥ सव जंगली पशु हाथी घोड़ा श्रादि और दंष्ट्री अर्थात् सिंह आदि और पक्षी मद्य लाख और एक खुर वाले घोड़ा आदिकों को न वेचे ।। ८६ यस्य कायगतं ब्रह्म मद्येनाप्लान्यते सकृत् । तस्य व्यपैति ब्राह्मण्यं शूद्रत्वं च स गच्छति ॥६॥ मनुस्मृति अध्याय ११ अर्थ-जिस ब्राह्मण के शरीर में स्थित वेद अर्थात् संस्कार रूप से स्थित एक वार भी मद्य से डुवाये जाएं अर्थात् एक वार भी जो ब्राह्मण मद्य पीता है उसका ब्राह्मणत्व चला जाता है और वह शूद्रता को प्राप्त होता है इस कारण सर्वथा मद्य न पीना चाहिये ॥ ८ ॥ कृत्वा पापं हि संतप्य तस्मात्पापात्प्रमुच्यते । नैव कुर्यात्पुनरिति निवृत्त्या पूयते तु सः ।। २३१ ।। एवं संचिंत्य मनसा प्रेत्य कर्मफलोदयम् । मनोवाङ् मूर्तिभिनित्यं शुभं कर्म समाचरेत् ।।२३२! मनुस्मृति अध्याय ११ अर्थ-पाप को करके पीछे सन्ताप युक्त होने से उस पाप से छूट जाता है जब पश्चात्ताप युक्त हो ऐसे कहता है कि मैं फिर कभी ऐसा न करूंगा तब तो उस पाप से बहुत ही पवित्र होता है ॥ २३१॥ इस प्रकार शुभ अशुभ, कमों के ( १३६ ) 4 परलोक में इष्ट अनिष्ट फल को मन से विचार कर मन, वाणी और शरीर से सव शुभ ही करे क्योंकि उसका फल इष्ट और नरक आदि दुःख का कारण होने से अशुभ कर्म न करे।। २३२॥ तपोमूलमिदं सर्व दैवं मानुपकं सुखम् तपोमध्यं बुधैः प्रोक्तं तपोऽन्तं वेददशिभिः ॥२३॥ ब्राह्मणस्य तपो ज्ञानं तपः क्षत्रस्य रक्षणम् । वैश्यस्य तु तपो चार्ता तपः शूद्रस्य सेवनम् ॥२३६।। मनुस्मृति अध्याय ११ अर्थ-इन सब देवताओं और मनुष्यों के सुख का कारण तप ही है और तपही से उसकी स्थिति है और तप ही मध्य है यह परिडतों ने कहा है और तप ही अन्त है यह वेद का अर्थ जानने वाले कहते है ॥२३५ ॥ ब्राह्मण का ब्रह्मचर्य रूप जो वेदान्त का ज्ञान है वही तप है और क्षत्रिय का रक्षा करना तप है और वैश्य का खेती वाणिज्य और पशुओं की पालना श्रादि तप है और शुद्ध का ब्राह्मण की सेवा तप है यह वर्ण विशेष से उत्कर्ष सूचन के लिये है ।। २३६ ॥ कीटारचाहि पतङ्गाश्च पशवश्च वयांसि च । स्थावराणिच भूतानिदिवं यांति तपोबलात् ।।२४१॥ यत्किचिदेनः कुर्वन्ति मनोवाङ्मृतिभिर्जनाः । तत्सर्व निर्दहन्त्याशु तपसैच तपोधनाः ।। २४२ ।. मनुस्मृति अध्याय ११ अर्थ-कीड़े, पतंग, सांप, पशु, पक्षी और वृक्ष गुल्म आदि स्थावर आदि सब भूत तप के माहात्म्य से स्वर्ग को

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( १४० )
जाते हैं, इतिहास आदिकों में कपोतों के उपाख्यान आदि में
पक्षी अग्नि में प्रवेश प्रादि तप को करके और कीटो. का
उनकी जाति का स्वाभाविक दुःख का सहना तप है उससे
क्षोण पाप हो विकार रहित जन्मान्तर में किये हुए सुकृत से
स्वर्ग को जाते हैं ।। २४१ ।। मनुष्य मन, वाणी और देह से जो
कुछ पाप करते हैं उन सब पाप को तपोधन तप ही से जला
देते हैं ॥ २४२ ॥
शुभाशुभफलं कर्म मनोवाग्देहसंभवम् ।
कर्मजा गतयो नृणामुत्तमाधममध्यमाः ॥३।
तस्नेह त्रिविधस्यापि त्र्यधिष्ठानस्य देहिनः ।
दशलक्षणयुक्तस्य मनो विद्यात्प्रवर्तकम् ॥४॥
परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम् ।
चितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम् ॥शा
पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः।
असंबद्धप्रलापश्च्य वाङ्मयं स्याचतुर्विधम् ।।६।।
अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः।
परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम् ॥७॥
मानसं मनसैवायमुपभुङ्क्ते शुभाशुभम् ।
वाचा वाचा कृतं कर्म कायेनैव च कायिकम् ॥८॥
शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः ।
वाचिकैः पक्षिमृगतामानसैरन्त्य आतिताम् ॥६॥
वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव च ।
यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते ॥१०॥

थर्थ- ( १४१ ) त्रिदण्ड मेतनिक्षिप्य सर्वभूतेषु मानवः । कामक्रोधौ तु संयम्य ततः सिद्धि नियच्छति ॥११॥ मनु० अ०१२ -मन वाणी देह जिस का कारण ऐसा सुख दुःख रूप फल का देने वाला विहित निपिद्ध रूप कर्म और उसी से उत्पन्न मनुष्य तिर्यक् श्रादि के भाव से उत्कृष्ट मध्यम और अधम की अपेक्षा मनुष्यों की गति अर्थात् जन्मान्तरों की प्राप्ति होती है ॥३॥ उस देह की कर्म की उत्कृष्ट मध्यम अधमता से तीन प्रकार के मन वाणी तथा काय के आश्रित और श्रागे कहे हुए दशलक्षणों से युक्त कर्मका मनही प्रवर्तक जानना चाहिये मन से संकल्प क्रिया हुश्रा कहा जाता है और किया जाता है सोई तैत्तिरीय उपनिपद में कहा है जैसे "तस्मात् यत्पुरुषो मनसाऽभिगच्छति तद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति" इति ॥ अर्थ-इससे पुरुप जिस को मनसे जानता है उसको वाणी से कहता है और कर्म से करता है ॥ ४॥ उन दश लक्षणों के कर्म दिखाने को कहते हैं । कैसे कि, पराये धन को अन्याय से ले लो इस भान्ति सोचना और मन से ब्रह्म वध आदि की निषिद्ध इच्छा और परलोक नहीं है देह ही अात्मा है इस भान्ति तीन प्रकार का अशुभफल मानस कर्म ये तीनों और विपरीत बुद्धि तीन प्रकार का शुभफल मानस कर्म है ॥ ५॥अप्रियका कहना झूठ बोलना पीठ पीछे पराये दूपणों का कहना और सत्य भी राजा देश और पुर- वासियों की वार्ता श्रादि का विना प्रयोजन वर्णन करना इस भान्ति चार प्रकारका अशुभफल वाचिक कर्म होता है इससे विपरीत प्रिय सत्य और परगुणों का कहना और श्रुतिपुराण ( १४२ ) आदि में राजा श्रादिकों के चरित्र का कहना शुभफल है ॥६॥ अन्याय करके पराये द्रव्यका हरण करना वेदादिक शास्त्रोंसे निषिद्ध हिंसा का करना और पराई स्त्री के साथ संभोग करना, इन तीन प्रकार का अशुभफल देनेवाला शारीर कर्म होता है.और इन से विपरीत अर्थात् न्याय से व्यका संग्रह करना वेदादिक शास्त्रों से यज्ञादिकों में विहित पशुओं की हिंसा करना और अपनी स्त्री के साथ ऋतुकाल में संभोग करना यह तीन प्रकारका शुभफल देनेवाला शारीरकर्म होता है ॥७॥ मन से जो सुकृत अथवा दुष्कृत कर्म किया है उसका फल सुखदुःखरूप इस जन्म में अधवा दूसरे जन्म में मन से ही यह भोगता है ऐसे वाणी से किया हुत्रा शुभ अशुभ वाणी के द्वारा मधुर, गद्गद बोलने आदि से और शरीर सम्बन्धी शुभ अशुभ शरीर के द्वारान्न चन्दन आदि प्रिया के उपभोग से व्याधित आदि होने से भोगता है इसले यत्न करके शरीर मानस और वाचिकधर्म रहित और धर्मजनक कर्मोको छोड़े तथा करे।। यद्यपि पापिष्ठोंके शरीर, वाचिक और मानसिक ही तीन पाप होते हैं तिस पर भी वह जो बहुधा अधर्म ही करे धर्म थोड़ा करे तो बाहुल्य के अभिप्राय से यह व्याख्यान किया है जैले अधिकता से शरीर के कर्मों से उत्पन्न पापों से युक्त मनुष्य स्थावरत्व को प्राप्त होता है और बाहुल्य से वाणी से किये हुओं ले पक्षिभाव और मृग भाव को अथवा बाहुल्य से मन द्वारा किये हुओं से चांडाल आदि के भाव को प्राप्त होता है ॥ ६॥ वाणी का दंड, मनका दंड, तैसे ही काय दंड यह तीनों दंड जिसकी बुद्धि में स्थित हैं वह त्रिदंडी कहा जाता है और तीन दण्डों के धारणमात्र से त्रिदंडी नहीं होता ॥ १०॥ इस निषिद्ध वाणी आदिकों का ( १४३ ) सब भूतों की गोचरता से दमन करके और इन्हीं के दमनके लिये काम तथा क्रोध को रोककर उस पीछे मनुष्य मोक्ष प्राप्तिरूप सिद्धि को प्राप्त होता है । ११ ॥ बेदाभ्यासस्तपो ज्ञानं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धर्मक्रियात्मचिन्ता च साचिकं गुणलक्षणम् ।।३।। प्रारम्भरुचिता धैर्यमसत्कार्य परिग्रहः । विपयोपसेवा चाजस्रं राजसं गुणलक्षणम् ॥३२॥ लोभः स्वमोऽधृतिः क्रौर्य नास्तिक्यं भिन्नवृत्तिता। याचिष्णुता प्रमादश्च तामसं गुणलक्षणम् ॥३३॥ मनु० अ०१२ अर्थ-वेद में अभ्यास और प्राजापत्य आदिका करना और शास्त्र के अर्थ का ज्ञान और मिट्टी जल आदि से शुद्धि और इन्द्रियों का रोकना दान आदि धर्मों का करना और श्रात्मा के ध्यान में तत्पर होना ये सवनाम गुण के कार्य हैं ॥ ३१॥ फल के लिये कर्मों का करना और थोड़े भी अर्थ में व्याकुल होना और निपिद्ध काँका करना और सदा शब्द श्रादि विषयों का भोगना यह रज नाम गुणका कार्य है ॥३२॥ अधिक धन की इच्छा, अधिक सोना, कातरपन, क्रूरता और नास्तिक्य अर्थात् परलोक के न होने की बुद्धि और श्राचार का लोप और याचना का स्वभाव होना और प्रमाद अर्थात् सम्भव होने पर भी धर्म यादिकों में मन का न लगाना ये तामसनाम गुण के लक्षण हैं ॥ ३३॥ देवत्वं सात्त्विका यान्ति मनुप्यत्वं च राजसाः ।

( १५४ ) तिर्यक्त्वं तामसा नित्यमित्येपा त्रिविधा गतिः । ४० मनु० अ०१२ अर्थ-जो सतोगुण की वृत्तिमें स्थित हैं वे देवत्वको प्राप्त होते हैं और जो रजोवृत्तिमें स्थित हैं वे मनुष्यत्व को और जो तमो वृति में स्थित है वे तिर्यग् योनि को प्राप्त होते हैं यह तीन प्रकार की जन्म की प्राप्ति है ॥ ४० ॥ इन्द्रियाणां प्रसंगेन धर्मस्यासेवनेन च । पापान्संयाति संसारान विद्वांसो नराधमाः ।५२॥ मनु० य०१२ अर्थ-इन्द्रियों के विषय में लगनेसे और निपिद्ध श्राव- रण से और प्रायश्चित्त आदि धर्मों के न करने से मूढ़ मनुष्यों में नीच कुत्सित गतियों को प्राप्त होते हैं ॥ ५२ ॥ सर्वेपामपि चै तेपामात्मज्ञानं परं स्मृतम् । तद्धययं सर्वविद्यानां प्राप्यते छमृतं ततः ॥शा मनु० अ० १२ अर्थ-इन वेदाभ्यास श्रादि सब में से उपनिषद से कहा हुआ परमात्मा का ज्ञान उत्कृष्ट कहा है जिस से सय विद्याओं का प्रधान है इसी हेतु से कहते हैं कि जिससे उस के द्वारा मोक्ष मिलता है ॥ ५ ॥ अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठा ग्रन्थिम्यो धारिणो वराः। धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठा ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः ॥१०३॥ तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम् । तपसा किल्विषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ १०४ ।। मनुस्मृति अध्याय १२ ( १४५ ) अर्थ-जो थोड़ा पढ़े हैं वे अज्ञ हैं उनसे सम्पूर्ण वेद के पढ़ने वाले श्रेष्ठ हैं उनसे पढ़े हुए ग्रन्थ के धारण में समर्थ श्रेष्ठ हैं और धारण करने वालों से पढ़े हुए ग्रन्थ के जानने वाले श्रेष्ठ हैं और उनसे करने वाले श्रेष्ठ हैं ॥ १०३ ॥ तप अर्थात् श्राश्रम के लिये विहित कर्म और विद्या अर्थात् आत्म ज्ञान ये दोनों ब्राह्मण को पर अर्थात् उत्कृष्ट निन्थेयसकर अर्थात् मोक्ष के साधन हैं उन में से तप से पाप को नाश करता है और ब्रह्मज्ञान से मोक्ष को प्राप्त होता है ।।१०४॥ एप सर्वाणि भूतानि पञ्चभिर्व्याप्य भृतिभिः । जन्मवृद्धि चयनित्यं संसारयति चक्रवत् ॥ १२४ ।। मनुस्मृति अध्याय १२ अर्थ-यह श्रात्मा सब प्राणियों को शरीर के प्रारम्भ करने वाले पृथिवी आदि पांच महाभूतों से ग्रहण करके पूर्व जन्म के अर्जित कमाँ की अपेक्षा से उत्पत्ति स्थिति विनाशा स रथ आदि के चक्र के समान बारम्बार फिरने से मोक्ष तक संसारी करता है ।। १२४ ।। कृतज्ञाद्रोहिमेधाविशुचिकल्पानसूयकाः । "ध्याप्या धर्मतः साधुशक्ताप्तज्ञानवित्तदाः ॥२८|| याज्ञवल्क्य० श्राचारा० ब्रह्मचारिप्रकरण २ अर्थ-कृतझ, अद्रोही, बुद्धिमान् , शुद्ध, नीरोग, अनिंदक साधु, शक, प्राप्त तथा शान और धन के दाता इनको धर्म से ढावे ॥२८॥ मधुमांसांजनोच्छिशुक्तस्त्रीप्राणीहिंसनम् । भास्करालोकनारलीलपरिवादादिवर्जयेत् ।। ३३ ।। याज्ञवल्क्य० प्राचारा०ब्रह्मचारि २ ( १४६ ) अर्थ-शहत, मांस, अंजन, गुरु का उच्छिष्ट, कटार वचन, स्त्री संग, प्राणियों की हिंसा, उदय अस्त के समय सूर्य को देखना और झूठ बोलना और गन्ध माल्य को चारना इन सब को ब्रह्मचारी वर्ज दे ॥३३॥ क्रीडां शरीरसंस्कार समाजोत्सवदर्शनम् । हास्यं परगृहे यानं त्यजेत्प्रोपितभर्नका ॥४॥ याज्ञवल्क्य० श्राचारा० विवाह०३ अर्थ-जिस स्त्री का पति परदेश में हो वह नंद आदि क्रीडा और उवटने श्रादि से शरीर का संस्कार, जनों का समूह और विवाह आदि उत्सवों का दर्शन, हंसी और पराये घर में गमन इन सब को त्याग दे॥४॥ रक्षेत्कन्यां पिता विन्नां पतिः पुत्रास्तु वार्धके । अमावे ज्ञातयस्तेपां न स्वातंत्र्यं वचित्त्रियाः ॥५॥ याज्ञवल्क्य० प्राचारा० विवाह०३ अर्थ-विवाह से पहले कन्या की निंदित कमी से पिता विवाह के अनन्तर पति और पति के अभाव में पुत्र रक्षा करे और यदि वृद्ध अवस्था में ये न हो तो जाति के मनुप्य और जाति के मनुष्य भी न हो तो राजा रक्षा करे क्योंकि इस वचन से पितृकुल और पतिकुल के अभाव में राजा को ही प्रभु और रक्षक लिखा है इससे स्त्रियों को किसी अवस्था स्वतन्त्रता नहीं ॥५॥ तवाहं वादिन क्लीवं निहेंति परसंगतम् । न हन्याद्विनिवृत्तं च युद्धप्रेक्षणकादिकम् ।।३२६॥ याज्ञवल्क्य० प्राचारा० राजधर्म० १२ में (११७ ) अर्थ-तराई पसे कहना हुश्रा. नपुंसक. निरायुध, दूसरे ल युद्ध करता हुधा. युद्ध से निवृत्त हुश्रा, युद्ध को देखने याला और श्रादि शब्द से अन्य सारथि इनको न मारे ॥३२॥ * अनाध्ययनसम्पन्ना धर्मज्ञाः सत्यवादिनः। राजा सभासदः कार्यो रिपौमित्रेच ये समाः ।।२।। याम० व्यवहार०साधा व्यव० मातृ०प्र०१ अर्थ-मीमांसा श्रादि शास्त्रों के श्रवण और पठन ले शुक्र धर्म के जानने वाले सन्यबादी और शत्रु और मित्र में समान राजा को सभासद करने ॥२॥ यतिपात्राणिमृद्वेणुदावलावुमयानिच । सलिलंशुद्धिरेतेपांगोवालश्चावर्पणम् ॥ ६० ॥ যারা প্রায় নগম अध-मिट्टी, अंगु, काष्ट, नुम्बी इनके बने हुए यतियों के होत है और उनकी जल से श्रीरनों के बालों के घिसने शुद्धि होती है ॥ १० ॥ सन्निरुद्धन्द्रियग्रामरागडेपांग्रहायच । भयं हित्वाचभूतानाममृनी भवति द्विजः॥६१॥ যা এখ০ অনিয়ম अर्थ-इन्द्रियों को जीनकर राग द्वेर को निवृत्त करके गियों को भय न देने से हिज मोक्ष को प्राप्त होता है | • मन दलाक में सुनाणयन शब्द पाजिल का अर्थ भारकार ने मांसादि शाप किया किन्तु इस प्रकरण दयने में नीति आदि शाली माना होना मिलना चाहिए या ममि मुनाद में सब विगायों क ग किया जा सकता। -4 २४८ ) कर्तव्याशयशुद्धिस्तुभिक्षुकेणविशेपतः । ज्ञानोत्पत्तिनिमित्तत्वात्स्वातंत्र्यकरणायच ।। ६२ ।। याम० प्रायः यनिधर्म: अर्थ-भिनुक विशेष से अन्तःकरण की शुद्धि को करें क्योंकि वह ज्ञान की उत्पत्ति में कारण है और आत्म शान में स्वतन्त्र करने वाली है ॥३२॥ सत्यमस्तेयमक्रोधोहीः शौचधीतिर्दमः । संयतेंद्रियताविद्याधर्मः सर्वउदाहृतः ।। ६६ ।। याम० प्राय० यति धर्म अर्थ-सत्य, चोरी न करना,क्रोध से रहित हानः, शौच, बुद्धि, धैर्य, दम, इन्द्रियों को जीतना और श्रान्म शा ये सम्पूर्ण धर्म का स्वरूप है ॥६६॥ निःसरंतियथालोहापिंडात्तप्तात्स्फुलिंगकाः । सकाशादात्मनस्तद्वदात्मानः प्रभवंतिहि ।। ६७ ॥ याज्ञ० प्राय० यतिधर्म, अर्थ-जैसे तपाये हुए लोह के गोले में से स्फुलिंग निव लते हैं इसी प्रकार आत्मा के सकाश से आत्मा (जीव उत्पन्न होते हैं।६७॥ लक इति स्मृतिश्लोकसंग्रहः

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Smritishlok Sangrah

Author
Jainmuni, Upadhayay
Title
Smritishlok Sangrah
File name
Smritishlok Sangrah
Text
OCR done
Citation
1928
Published
2009/11
Publisher
Lahore, Bharatdwaj Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
158
Library
Sanmati Library
Classification
Shlok sangrah
DLI number
344326
Barcode
99999990234196.00
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Banasthali University
Digital publisher
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