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Samarsaram

Ramchandra · 2012/08

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भूमिका। भारतकी भूमि रत्नगर्भा कहीजाती है, वास्तवमें यह उपाधि सत्त्व- शून्य नहीं है । अवश्यही इमके सुविशाल गर्भमें अनन्त रत्नगशि संस्थापित हैं किन्तु रत्न कहानेसे हीरा लाल-पन्ना आदि मूल्यवान् कंकर पत्थर ही फेवल रत्न मान लियेजॉय सो बात यहां नहीं है। ऐसे पत्थर रत्न तो अन्यत्र भी उपलब्ध होसकते हैं परन्तु भारतभूमिके पवित्र गर्नमें 'नवरत्न, नररल, नारीरत्न, विद्यारत्न, वस्तुरल और अन्य ग्लादि ' अमूल्प और बहुमूल्य विविध रत्न वह भरेहुए हैं, जिनकी अन्यत्र उपलब्धि असाध्य ही नहीं, असम्भव भी है यहांके किसीएफ रलको उठाकर अवलोकन कीजिये-एक एफ रत्नमें अनेकानेक सद्गुण प्रतीत होते हैं। यदि भारतीय रत्नराशिका प्रदर्शन करायाजाय तो उसके लिये बड़ेभारी आयोजनकी आवश्यकता है। इस क्षुद्रकाय भूमिकास्थलमें प्रदर्शिनी तो क्या, रलनाम संग्रह करनेका भी सुप्रबन्ध नहीं हो। सकता है । और सब छोड़कर यदि अन्यान्य रत्नोंके अतिरिक्त यहाँ फेवल ग्रन्यरत्नोंका ही प्रदर्शन कराना चाहें तो उसके लिये भी आज आवश्यक समय, सामग्री और स्यल नहीं है और न उनकी सूचीमात्र ही यहाँ देसको हैं। इस काम के लिये मद्रचित "भारतमें रत्न " नामक पुस्तक आवश्यक है । फिन्तु प्रन्यरलोमसे नमूनेका जो एक स्ल आज हमारे हाथमें है, केवल उसीका यहां कुछ परिचय देना उचित, आवश्यक और लाभदायक समझते हैं। इस ग्रन्थरत्नका नाम "समरसार"है। इसको श्रीरामचन्द्र सोमः याजीने स्वाशाखाका सार लेकर ८५ पचाशी श्लोकों में संग्रह किया है। इसमें छोटे छोटे और उपयोगी केवल दश प्रकरण वर्णन किये (४) भूमिका । गये हैं । कर्ण, कंठ, करांगुलीय भूषणोंमें जडने योग्य यह एक छोटासा किन्तु अमूल्य रल है। यद्यपि समरको लक्ष्य देकर युद्धो. पयोगी सारका इसमें संग्रह किया है । तथापि समरके सिवाय सांसा- रिक कार्यों में भी यह संग्रह बहुत उपयोगी और आवश्यक है। युदके निमित्त यात्रा करनेवाले दो नरेशमिस विजयश्री किसको मिलेगी ? किससमय किस प्रकार गमन करने से कम सेनावाला राजा कैसे जीत सकेगा ? असंख्य सेनासे घिराहुआ क्षुद्रकाय किला किस बलके आश्रयसे अटूट रहसकेगा ? एक बलवान् मल्ल से मुठभेर होजाने पर निर्बल मल्ल किस युक्तिसे उसे चित्त करेगा ? अभियोगमें फंसे हुए 'दो अभियुक्तों से न्यायालयमें कौन घरी होगा ? शास्त्रार्थ करतेहुए दो दिग्विजयी विद्वानोंमें किसका पक्ष मान्य रहेगा? किस साल संवत्, मास, दिनमें कौन वस्तु कितनी महँगी, सस्ती विकसकेगी ! कौनसा सेवक, स्वामीको सम्पत्ति सुख देनेवाला होगा ? अथवा किस नौकरकी योजनासे मालिकको ऋणग्रस्त होना पडेगा ? दिन रातमें मनुष्यका मन किस किस बातपर कब कब चलायमान होगा? किप्त समय कौन काम करनेसे क्या लाभालाभ मिलेगा ? किस स्वरसंचालनको रीतिसे दम्पतिप्रेम प्रगाढ होगा? और वर्ष दो वर्ष वा दश बीस वर्षतक जीवित रहने अथवा कबतक मरजानेकी चिंतासे निश्चित होनेका किस सरल उपायसे निश्चय होसकेगा ? (कहांतक गिनार्वे) इत्यादि इत्यादि अनेकों बातोंका विचार समरसारमें भलेप्रकार वर्णन किया है । और 'सर्वतोभद्र जैसे कोई कोई प्रकरण तो इसमें ऐसे हैं जिनसे एकही प्रकरणसे अगणित बातोंका क्षयोद्भव । शुभाशुभ सत्य विदिरा होता है.... विशेष महत्व और आरामकी बात इसमें यह अधिक है कि वर्ष जन्मपत्रादि देखने, गणितकरने और पतड़ा पोथी हूँढनेकी इसमें विशेष . 4 ' भूमिका। (५). झंझट नहीं करनी पड़ती है जो कुछ अच्छा बुरा फल हो चटपट मालूम होजाताहै । और वह सच्चा मिलता है । कितने बड़े गौरवकी बात है कि एक छोटेसे ग्रन्पमें संसारका महोपकार करनेवाले बड़े बड़े काम भरे हुए हैं। यह सब कुछ होनेपर भी आजतक यह अन्य भाषाटीका सहित कहीं प्रकाशित नहीं हुआ है। इस ग्रन्यपर संस्कृतमें दो टीका प्राप्त हुई हैं । प्रथम भरतटीका है और दूसरी रामटीका है किन्तु इन दोनों उत्तम टीकाओंके होने परभी किसी किसी स्थलमें यह ग्रन्थ ऐसा अड़जाताहै कि विद्वानोंको भी इसके चलानेमें कुछ श्रम करना पड़ता है । अत एव विद्वान से लेकर सर्वसाधारणपर्यन्त यह ग्रन्य सबके उपयोगमें आसके ऐसा होने के लिये श्रीमान् सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजीके आग्रह और चौमूं राजके आश्रित ज्योतिपरत्न पं० झुंथालालजीकी अनुमतिसे मैंने इसकी कई. एफ हस्तलिखित प्राचीन प्रतियाँ एकत्र करके संस्कृतीफा और भाषाटीका सहित इसे तैयार किया है। यह ग्रन्थ सर्वसाधारणकी समझमें सरलतासे आसके और इसका असली आशय स्पष्टरूपसे विदित होसके इसलिये इसमें कई प्रकारके उदाहरण, उपदेश, चक्र, अन्वयांक और टिप्पणी आदि संयुक्तकरके इसको सर्वांगसुन्दर बनानेकी पूरी चेष्टाकी है। भगवान् बम्बईके " श्रीवेंकटेश्वर" प्रेसके अध्यक्ष श्रीमान् सेठ खेमराजजीके भाग्यभास्करको उदित रक्खें। आपने भारतीय अन्यालोंके अस्तित्वको रक्षाके निमित्त मुक्तहस्त धनव्यय करनमेपका प्रण कियाहै । समरसार जैसे अमाप्य ग्रन्यरत्नोंका सम्प्राप्त होना आपही के सद्विचारका फल है।

((६) भूमिका। यदि विद्वान् लोग स्थिरतासे इसका आद्योपान्त अवलोकन और अनुशीलन करेंगे तो देश और ग्रन्थका बड़ा उद्धार होनेके साथही इसके तैयार करने में मुझे जो आयोजन और परिश्रम कानापड़ाहे वह सफल होसकता है। आशा है कि, विद्वान लोगइस ओर अवश्य ध्यान देंगे और इसमें भ्रम या दृष्टिदोषसे कहीं कुछ भूल हुई हो तो उसकी . क्षमा करेंगे। मैं इस ग्रन्थका सर्वाधिकार सेठ खेमराज श्रीकृष्णदास अध्यक्ष "श्रीवेंकटेश्वर "स्टीम् प्रेस बम्बईको सादर समर्पित करता हूँ और कोई महाशय इसके छापने आदिका साहस न करें नहीं तो लाभके बदले हानि उठानी पड़ेगी। शुभटक-हनुमान् शर्मा, जयपुर-सिटी.

श्री। समरसारकी-विषयानुक्रमणिका । विषय. पृष्ठांक. विषय. पृष्टांक. " ४ . ४७ मङ्गलाचरण दिशास्वर चक्र ३५ श्रीमहादेवही स्वरशास्त्रको पूर्णतया राशिस्वर चक्र ३७ जानते है २ | रविदतदिशा स्वर शास्त्रज्ञराजा अकेलाभी करोडों रविहनदिक्चक्र ३८ शोका जारसकता है चन्द्रहत विदिशा और उनके स्वामी अनधिकारीको स्वरशास्त्र नहीं चन्द्रहतदिश्चक ३९ धताना गूढाख्यकेतुहत दिग्विदिशा ४० अधिकारी शिष्यको स्वरायता. गृढचक्र ४१ नेके लाभ सूर्य और चन्द्रमाके पुत्र दिशा- जयपराजय चक्रोपक्रम- दिम होनेसे जय भौर पराजय जयपराजयचक्र. मायुयल-राहुबल जयपराजयका दूसरा चक्र १०-१३ राहुचक्र फुल प्रकुल-फुलाकुल गण योगिनीयन फलाकुलादि चक्र योगिनीवास चक्र वर्णस्थर योगिनियोंके नाम वर्णस्वर चक्र २० राहुभुक्त योगिनियोंका बल २१ दूसरा | रविआदिवारोंमें घर्जनीय काला, अकारादि प्रक्षरोके ग्रहराशि- महराध स्वामी प्रादि और उदय अधयामकालचक्र ४९ ग्रहराशिनवांशादिकका स्परचकर३ साप वा में अर्धयामका भोग ५० द्वादशान्दादि पश्चस्वर करुभदिाचा दादशान्दादिकस्वर चक्र २८ युद्धमें छोडनेयोग्य होरा मात्रा स्वरादि २९ वारप्रनिजानने की रीति योगस्वर वर्णवरोका विशेष फल ३१ विरुद्धयाम गढराहुरविमादिम युद्ध पुद्ध मादिमें पोधामोंका जप करने पर प्रहारक स्थल पराजपसाम्यज्ञान ३३ प्रहाकी स्थितिसे महारो स्पल ५४ जिप पराजय चक्र युद्ध में महिपक्रषिद्धापाग्यनस पारकुमारपादिस्वरके से +पार दिएपन ३५ गरमाहोकाबाने भोग किये। " (८) विपयानुक्रमणिका । विपय. पृष्ठाक विषय पृष्टांक. ८८ " जाते नक्षत्र, अश्विनीप्रादि मदनयुद्ध २७ नक्षत्रोंका प्रवान्तर भोग ६० जूएकेलिये स्वरबल चंद्रसूर्णधिष्ठितनक्षत्रांतर्भागवक्र ६३ औषधादिको मुखमे रखकर युद्ध ग्राहकालानलचक्र करने में युद्ध जय प्रवकहरचक्र हसचारोक्तिपूर्वक स्वरपलज्ञान ७० युद्धमे जयके लिये कोटचक्र पृथ्व्यादि तत्वहन फल ७६ कोटचक्रके चित्र ९७-९८ हरकमलपत्रमे रविचन्द्रवहन- क्रूर सौम्यग्रहोंकी स्थितिसे दुर्ग- भंग और रक्षादि पूर्वक प्राणवायुके संचारमे कोटचक्रके स्वरूप १०० अर्धघट्यादिज्ञान- ११० चन्द्रस्वर ज्ञान चक्र ७८ वशीघ्रग्रह वेध ११४ रविआदिनाडीके स्वरमें युद्धके ऋणधनशोधन ११९ आरंभहोनेमे जय ८२ऋणधनसाधनचक्र १२० रविवादिनाडीके स्वरमे प्रश्नविशेष" भातुर साध्यामाप्यज्ञानचक्र सूर्यचन्द्रनाडीके चलनेमे वर्तव्य ८५ छायापुरुषदेखनेका प्रकार १२३ रविनाडीवहन वियोका द्राक्षण दूसरे शकुन १२५ वशीकरण ८७ ग्रन्थकी समाप्ति इत्यनुक्रमणिका। ७७मर्वतोभद्र चक्र १२७

श्रीः ।
* अथ खमरसारम्
संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् ।
नत्वां गुरून्समालोक्य स्वरशास्त्राणि भूरिशः।
वक्ष्ये युद्धजयोपायं धार्मिकाणी महीक्षिता ॥2॥
नत्वा भक्त्या महेशानं सर्वसिद्धिविधायकम् ।
व्याख्या समरसारस्य संग्रहाख्या प्रकाश्यते ॥ १॥
टोका समरसारस्य रामेण भरतेन च ॥
याकारि तत्संग्रहोज्न यथायोगं विधियते ॥ २ ॥
(संस्कृतटीका ) अहं रामो वाजपेयी धार्मिकाणां धर्मा-
स्मनां महीक्षितां भूपानां युइजयोपायं वक्ष्ये कथयिष्ये । किं
रुत्वा गुरुन्नत्वा नमस्कृत्य । पुनः किं कृत्वा भूरिशः बहुशः
बहूनि स्वरशाखाणि समालोक्य सम्यग्विचार्य,युद्ध जयः युद्ध-
जयः युद्धजयस्योपायः युद्धजयोपायः तं युदजयोपायम्, स्वर-
शास्त्राणि स्वरमन्थान पूर्वाचार्यरुचान् । गृणन्ति हितमुपदिश-
न्तिवे गुरवस्तान्गुरून् ॥ १ ॥
(भापाटीका) गुरुओंको नमस्कार करके यदुतसे स्वरमाखोंको
भले प्रकार देखकर धार्मिक राजाओंफे युदमें जय होने का उपाय,
कहता हूँ॥१॥

समरसार- बहुधौ विदधे सदाशिवोऽवे स्वरशास्त्राणि तदेकवा- क्यतां तु । भगवानयमेव वेदै संम्यग्गुरुमाग्नु- गतोऽपरस्तु लोकः ॥२॥ सदाशिवः महादेवः अत्र युद्धजयोपायनिमित्तं बहुप्रकारं बहूनि च स्वरशास्त्राणि स्वरग्रन्थान् विदधे चकार रुतवान् । अयमेव भगवान् सदाशिवः तदेकवाक्यतां तेषां ग्रन्थानां स्वरशास्त्राणाम् एकवाक्यताम् ऐकमत्यं वेद जानाति । अप- रोस्मदादिलोंकः अल्पबुद्धिः गुरुमार्गानुगतः गुरूपदिष्टं मार्गम अनुगतो भवति गुरूपदिष्टमार्गानुसारी भवति गुरूपदिष्टमेव जानाति न त्वन्यत् ॥ २॥ यहाँ सदाशिवने बहुत स्वरशाखोंका विधान किया है और वही शिवभगवान् उनकी एकवाक्यताको भी भलेप्रकार जानते हैं। चाकी हमलोग तो गुरुमार्गानुगत हैं अर्थात् गुरुसे शिष्य और शिष्यसे प्रशिष्य जानते हैं ॥२॥ वक्ष्याम्यह यदिहे किंचन सर्वसारमेतावदेवं परि- चिन्त्य नृपः प्रवृत्तः । एकोपि कोटिभटलोलपतङ्ग- दीपलीला मुदानुभवतु स्फुटकौतुकेन ॥३॥ अहम् आचार्यः इह अस्मिन् यन्थे यत्किञ्चन सर्वसारं सापां ग्रन्थानां सारं सारभूतं वक्ष्यामि कथयिष्यामि एवा- वदेव सम्यक् परिचिन्त्य विचार्य योद्धु प्रवृत्तः चलितः एकोपि नृपःकोटिभटलोलपतंगदीपलीला मुदा आनन्देन स्फुट- , कौतुकेन प्रत्यक्षकौतुकेन अनुभवतु अनुभवं करोतु । कोटिभटा-

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् ।
स्त एवं लोलाः चंचलाः पतंगा दीपे पतंनशीलास्तेपां लीलाम्
अनुभवतु । कोर्थः यया पतंगा ज्वलद्दीपोपरि दूरतः समागत्य
निपतन्ति तथा अभिप्रायम् एकं राजानम् उपरि बहवःशूराः
शत्रवः सन्निपत्य पतंगवद्भस्मीभवन्तीत्यर्थः ॥ ३ ॥
हम यहाँ जो कुछ सर्वसार कहते हैं केवल उसीको चिन्तन करके
राजा युद्ध में प्रवृत्त हो तो जैसे दीपकके ऊपर अगणित पतंग अपने,
आप पडकर भस्म होजाते हैं और दीपक तमाशा देखता रहता
है वैसेही, वह अकेला राजा भी करोडों चंचल योद्धाओं के बीच खडा'
रहकर उस दीपककी लीलाके आनन्दका अनुभव करसकता है अर्थात्
उसपर करोडों योदा टूटपडे तौभी वही जीत सकता है ॥ ३ ॥
नै तैय दुर्विनीतार्य जातुं ज्ञानं गुप्तं तद्धिं सम्यक्फ-
लाय । अस्थाने हि स्थाप्यमानैव वाचां देवी कोपी-
निईहे नो चिरौय ॥४॥
एतत्स्वरज्ञानं दुर्विनीताय दुष्टाय शिष्याय जातु कदा-
चिन्न देयम् । तत्तु ज्ञानं गुप्तं रुतं सत् सम्यक् फलाय भवेत्
सम्पफलतीत्यर्थः । अस्थाने दुष्टे शिष्ये स्थाप्यमाना दीय-
माना वाचां देवी सरस्वती कोपात् क्रोधात निर्दहेढुंटे शिष्य
भस्मीकुर्यानो चिराय नो विलम्येन शीयमेव तं भस्मी-
कुर्यात् ॥ ४ ॥
इस स्वरज्ञानको पुष्टशिष्यको कदापि न देना चाहिये। और
इसफो अच्छे फलके वास्ते गुप्त रखना चाहिये। यदि अपात्रको
देदिया जाय तो वह सरस्वती देवीके कोपसे विना विरम्म भस्म
होजाता है ॥४॥

(४)
समरसारं-
विनयावनताय दीयमानी प्रभवेत्कल्पलते सत्फ-
लायें। उपकृत्यनुचिन्त्यकानि शास्त्राण्युपकारस्य
पदं हि साधुरेवं ॥५॥
विद्याविनीताय नवाय विनयनम्राय शिष्याय दीयमाना
कल्पलतेव कल्पवृक्षलतेव सत्फलाय उत्तमफलाय भवेत् समर्था
स्यात् । कुतः यतः शाखाणि उपकत्यनुचिन्त्यकानि भवन्ति
उपकत्यानुचिन्त्ययन्ति तानि उपकत्यनुचिन्त्यकानि । उप-
कारस्य पदं स्थानं साधुरेव भवेन्नान्यः । वस्मात् साधोरेव
उपकारः कर्तव्यः न दुष्टस्य । दुष्टस्योपकारा?परीत्यं
भवति ॥ ५॥
विनयसे झुके हुए शिष्यको देनेसे अच्छे फलके वास्ते कल्पलताकी
तरह बढता है । क्योंकि चिन्तन करने योग्य शास्त्रोंका उपकार
करनाही उचित है । और उपकारके योग्य साधु ही होते है ॥५॥
जयपराजयचक्रमाह १.
१२
शं५ मे ५ गं ३ गा ३ग ३ ति ६ स्ते ६८६८८धि
९ तदधः सर्गपण्ढान्विनाचकायाँख्यालीप्व॒ते ङञ-
मंपि सुभेटयो मवर्णोत्थसंख्ये। खारप्तेशेपेप्यशेपे
विजयपरिभवो दा ८ प्तिशेपे" न० व४ स्ते ६मारमा
७ली ३ का १ रिजेता क्रमत इह मतोऽग्योऽत्र्य
इत्युक्तमाद्यैः ॥ ६॥

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । कादयोंका ९ पादयोंकाः ९ पादयः पंच ५ कीर्तिताः । यादयोऽष्टौ ८ तथा प्राज्ञेर्गणकर्बुद्धिमत्तरैः" " कादयः अंका नवसंख्यका ज्ञेयाः तथा चक-ख२- ग३ १४-१५-चद-छ७-ज ८ झ ५ । टादयो नव ज्ञेयाः। २१-४२-३३-ढ४-७५-६-थ७-८- ९तथा पादयः पंच ज्ञेया:प१-फर--ब३-भ४-म५- । तथा याद- योऽष्टौ ज्ञेयाःय१-२२-०३-१४-श५-१६-स७-हे ८ एवं अक्षरैः अंकाःबुद्धिमद्भिःअस्मिन्मन्थे ज्ञेयाः सर्वत्र । अन्यत्रापि कटपयवर्गनवनवपञ्चाष्ट, न-त्र-ज्ञाः शून्यवोधकाः इति ।” अन्यत्रापि-" कादिर्नवाका नवटादिरङ्काः पादिश्शरा यादि भवन्ति चाष्टो" ने शून्ये स्वराश्च शून्याः। इति । शम्मेगंगा इत्यादीनाम्' अंकानाम् अधः-सर्गा विसर्गः अः। 'चत्वारश्च नपुंसकाः' इति वचनात् पण्डा ऋ मल 'एतान्विना त्यक्त्वा, अन्यान् (स्वरान् अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं) एतान् तदधस्तेपाम् अंकानामधः एकाद- शेसु कोठेपु तिर्यक् लिखेत् । पुनख्यालीपु तिस्पु पंक्तिपु तदधः कायान् ककारः आयः येपां ते कायाः वर्णाः इकार- अकारवर्जिताः हकारान्ताश्च ताहिखेतू । सुभटयोः शोमन- भटयोः शोभनशूरयोः नाम्नि ये वर्णाः स्वराश्च भवन्ति तेपाम् अंकाः एकीकर्तव्या। एवं द्वयोः अंकान् पृथक् पृथक् एकी- (६) समरसारं- सत्य खेन दाभ्यां भजेत् । यस्मिन्नेकशेपो भवति तस्य विजयः। यत्र शून्यं तत्र पराजयः। पुनस्त एवांकाः पृथक् पृथक् स्थाप्याः दभक्ता अष्ट- भक्ताः भक्ते सति शेषांकाः यदि ऐवे भवन्ति । एते के न० व ४ स्ते ६ मा ५ सा ७ ली ३ का १रि २' एपाम् अंकानां मध्ये यस्य योधस्य अंकः अग्र्यः अग्रिमः भवति तस्याये च जेवा यस्याये यः स जेता। एवमयेपि ज्ञेयम् । इति आयैः पण्डितैः उक्तम् ॥ ६॥ बारह आडी और सात उभी रेखा खींचकर प्रथम पंक्तिके ग्यारह कोठोंमें 'शं५ मे ५ ३ गा ३ ग ३ ति ६ स्ते ६ द ८ ह ८ द ८धि ९, यह लिखै । और इन अंकोंके नीचे सर्व (विसर्ग) और पण्ढ (ऋऋलल ) बिना अचू (अआइईउऊएऐओऔअं) स्थापन कर और उनके नीचेकी पंक्तिपोमें 'ङ' बिना क ख ग आदिको लिखै तो “जयपराजयचक्र ' बनजाता है। यह चक्र नीचे स्पष्ट लिखा है । इस चक्रने योद्धाओंके नामके अक्षरोंसे उठी हुई संख्यामें दोका भाग देनेसे यदि शेष रहै तो विजय और अशेष (०). रहे तो. पराजय होता है। यदि उसी संख्या में आठका भाग दे और 'न० व ४ स्तै ६ मा ५ सा ७ ली ३ का १ रि २१ इनमेंसे कोई अंक बचे तो जिससे जिसका आगे हो उसीका विजय होता है, ऐसा पूर्वाचार्योंने कहा है। उदाहरण । ग्रंथका आशय अच्छीतरह समझमें आनेके लिये उदाहरण देना होता है। किन्तु उदाहरणके पहले अन्यकारके पारिभाषिक- (७) संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । संख्यांक आदि विदित करना अत्यावश्यक है। क्योंकि मार्गभेद जान- लेनेसे गतिमें भ्रम या रुकाक्ट नहीं होता है। मायः ज्योतिषग्रन्योंके गणितमें एक-दो-तीन-आदि संख्यावाची अंकोंमें एकद्विश्यादि अथवा भूभुजभुवानादि शब्द व्यवहत किये जाते हैं । किन्तु समरसारकारने गोप्य और लाघवके लिये कटपयक्रम रचकर [क १-ख २-ग ३-घ ४-ड. ५-च ६-छ ७-८-झ९। ८१-ठ २-३ ३-द ४-ण ५-त ६-थ ७-द ८-ध ९।प १-फ२-३ ३-भ ४-५-1 य १-२ २-ल ३-४-श ५-५ ६-स ७-६ ८ ] इन अंकोंसे एक दो तीन चार आदि संख्याके अंक लिये हैं। और जहाँ ९ से ऊपर 'दश, बारह, वीश या सौ दोसी, हजार आदि' अधिक संख्या लिखनेका प्रयोजन पड़ा है वहांभी 'अंकानां वामतो गतिः' मानकर इन्हीं अंकोंसे संख्यात्मक अंक लिये हैं। यथा-1०४१ से १०-२२ थ७ से ७२-घर २४२ से २२४-और ल ३ वो ४ द ८ र २ से २८४३ इत्यादि । इनके अतिरिक्त संख्यावाची और अक्षर यथास्थान पर चक्रोंमें दिये गये हैं । स्मरण रखनेकी बात है कि, चक्रोंसे अंक लेते समय प्रकरणके अनुसार वर्ण और मात्रा दोनों के संख्यावाची अंक लिये जाते हैं। बस अब इसका उदाहरण देते हैं। उपर जो लिखागया है कि, योद्धाओंके नामफे अक्षरोंसे उठी हुई संख्या २ का भाग दे तो यहाँ इसके अनुसार राम और रावण इनका जय पराजय देखने के लिये " राम नाममें रेफ, आकार मकार, अकार यह चार अंक हैं। चक्रमें इन अंकों के ऊपर गं३-मे ५-५ शं ५ यह अंक हैं। अतः इन सबको जोडनेसे अठारह होते हैं। ऐसेही रावण " नाममें-फ, आका, वफार, अफार, णकार, भकार यह छः अंक हैं । और चक्रमें इन अंकोंके जपर 'गं ३-में ५-गं ३-५-में ५-0५' यह अंक हैं अतः इन सबको जोडनेसे (८) समरसारं- छब्बीस होते हैं । इन १८ और २६ में पृथक पृथक ख अर्थात् दोका भाग देनेसे दोनोंमही शेप नहीं बचता है । अतएव राम और रावणकी साम्यता आती है । (कदाचित् इस उदाहरणसे कोई यह सन्देह करें कि रामरावणमें तो रामका विजय हुआया। यहां साम्यता क्यों हुई । इसलिये सूचित करना पडता है कि यह साम्यता अनुचित न होनेपर भी आगे चक्रांतरसे रामकाही जप आता है । जयपराजय चक्रम् गा ग ति v at सा इ ई ऊ ए ऐ ओ औ क ग घ क ट ठ म ण त थ ध न प व ७ म य र घ श प स . 0 न स्ते । मा व ४ लिरिका २ . ० दाते शेषे०इसके अनुसार दोनोंका जपपराजय जानने के लिये पहलेकी भांति राम रावणको नामाक्षर संख्या १८ । २६ में आठफा भाग दिया तो २१ २ शेष रहनेसे यहांभी साम्यताही है ॥ ६ ॥ पुनः जयपराजयचक्रमाह । अङ्कास्तुलारिभजतीधभुगानको स्यू रूपै १२ तोऽक्षरमिती रहित विधार्य । तस्मात्पुन ८ हति- संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । शेपबदुत्वतः स्याज्जेती स एव बलपः सुधियों विधेयः ॥ ७॥ 'तु ६ ला ३ रि २ भ ४ ज ८ ती ६ ध ९ भु ४ गा३ न० का १' एते अंका एकादशसु कोठेषु तिर्यक् लेख्याः । पुनस्तदधः अकढम -आखणय -इगवर -ईघथल -उचदव-ऊछ धश एजनप -ऐशपस -ओटफह -औठय अंडभ इति क्रमेण वर्णा लेख्याः । पुनः द्वयोः अक्षराणां च स्वराणां च अंकान् तुलारिभजतीत्यादिकान् विचार्य स्थानदये भिन्नं भिन्नं लेख्यम् । पुनः रूपैः द्वादशभिः पृथक् पृथक् रहितं वर्जितं विधाय कृत्वा । द ८ हृतिशेषबहुत्वतः देन अष्टभिर्हरेत् हते सति यस्यांकबाहुल्यम् अवशिष्टं भवति वस्य जयो भवति । यस्य स्मल्पांको भवति तस्य पराजयो भवति । सुधिया सुवु- दिना राज्ञा युद्धादौ स एव बलपः सेनापतिर्विधेय इति॥ ७ ॥ तु ६-ला ३-रि २-भर-ज ८-ती ६-८ ९-भु १-गा ३- न०-का १- इन अंकोंको पहलेकी भांति ग्यारह कोठामें लिखकर उनके नीचे पूर्वोक्त अचू आदि लिखे तो " जयपराजय बनजाता है । इन अंकोंसे दोनों योद्धाओंके नामाक्षको पृथक पृथक संख्या आवे उसमें बारह घटाये और शेषमें आठका भाग दे तो जिसका शेष बहुत हो उसीका जय होता है । अतश्व सुन्दः बुद्धिवाला राजा इसप्रकार विचार कर सेनापति नियत करे ॥ ७। उदाहरण । जिस प्रकार पहले (शं ५-मे ५-गं २-गा-३ । से अंक लिये थे उसी प्रकार यहाँ भी तुलारिभजताते राम-रावण-के भकलिये तो . चक .

.. . (१०) समरसारं- र २- आ३-म६-, रामके १७ और र२- आ३-- व८- अ६-ण ३-अ६-, गवणके २८ आये । इनमें पृथक पृथक बारह घटाये तो रामके ५--रावणके १६ बचे । फिर इन ५ । १६ में आठका भाग दिया तो रामके ५ और रावणके० रहे.अतएव यहाँ, श्रीराम चन्द्रकाहो जय प्राप्त होता है ॥ ७॥ पुनः जयपराजय चक्रम् । रि २ भुगा का diar Eur | . आ उ पो औ अं ग घ ट ठ 15 | ण त प च भ ढ म र ल व श प स ह . . . अथापरं जयपराजयचक्रमाह । वर्गाष्टकांको दशतिघासकालारितद्युतौ । नानो सभाजितायों स्याँद्विजयोऽधिकशेषके ॥८॥ अकचटतपयशाः' अष्टौ वर्गा अष्टसु कोठेपु क्रमेण लेख्याः कथं- तदाह-प्रथमकोष्ठे अकारायाः पोडशस्वरा । द्वितीयकोष्ठ कवर्गः ( क ख ग घ डा) तृतीय- . - संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेवम् । कोष्ठे चवर्गः ( च छ ज झ ञ) चतुर्थकोष्ठे टवर्गः ( ट ठ ड हण ) पंचमकोष्ठे तवर्गः ( त थ द ध न ) षष्ठे पवर्गः (प फ ब भ म ) सप्तमे यवर्ग( य र ल व ) अष्टमे शर्वगः(श पस है )एवम् अष्टानां वर्गाणां वर्णान अधोलिखित्वा अष्ट सुकोठेपु, पुनस्तेषां कोष्ठानामुपरि 'दशतिघा४ संका लारि२ एते अंकाः क्रमेण लेख्याः । पुनः योर्योधयो नोः वर्णानां स्वराणां च अंकायुतिं पृथक् पृथक् विधाय रुत्वा सेन सप्त- भिहरेत् । यस्य नाम्नि अधिकांकशेपस्तिष्ठति तस्य विजयः यस्य न्यूनांकस्तस्य पराजय इति ॥ ८॥ 'द-श-ति-धा-स-का-ला-रि' इन अंकोंके नीचे अवर्गादि क्रमसे आठ वर्ग लिखें तो "जयपराजयचक्र इसमें भी पूर्ववत दोनोंके नामाक्षरोसे अंक लाकर पृथक पृथक सातका भाग दे तो जिसका शेप अधिक रहै उसीका जय होता है ॥ ८॥ - बनजाता है.. + उपरोक शंमेगंगे-कास्तुलारि-वर्गाकांका- जिसे दो योद्धामों के प्रय पराजय विदित होनेगा उल्लेय कियागया है किन्तु दो दो संवन्धी यायी, स्यायी, वादी मतिवादी और मालादिको ममी इनकी योजना होसक्ती । किमी यातपर दो साली अदर. हैं इनमें किसका पक्ष रहेगा, पु० घरेलू भगा लेकर दो मनुष्य वादी मतियादी हुए हैं इनमें कौन जीतेगा, किसी लोमवश दो मनुष्योने प्रण (शत) यदी है. इनमें किसको लाभ होगा! त्यादि २ पातोका इनसे समुचित निधय हो सकता है। प्रीति टिये तीन उदाहरण देते हैं । यया-धर्मप्रदीपको निम्तन्य या प्रदीप्त करने के लिये माग और यादव शासी में शादार्थ चलाहाहे इनमें बिसय पर सत्यरहेगा? यह जान लिये (१२) समरसारं- उदाहरण । यया 'राम-रावण' के नामाक्षरोंकी संख्या लानेमें रामका रेफ सप्तमवर्गीय है और इसका अंक ला से ३ है । आकार प्रथमवर्गीय है इसका अंक दकारसे ८ है । मकार पष्ठवर्गीय है इसका अंक कका. रस १ है । अकारका पूर्ववत् ८ है । इसभाँति रामनाम संख्या २० है और रावणमें इसी प्रकार र ३-आ८-३-अ-ण ४-अ नाम संख्या ३४ इन दोनों २० । ३४ में सातका भाग दिया तो शेष ६ । ६ बचनेसे परस्परमें साम्यता आती है ॥ ८ ॥ . २३४४ 3६२४ -'शंमेगंगा' के अनुसार म-या घ-अ-व-श्र' माधवकी सस्या २९ और 'य आ दु-अन-थ' यादवकी संख्या २६ इन ११४२६ में २ का भागदियातो माधवका और यादवका०इस शेषमें माधवका अधिक शेष रहनेसे इसीका पक्ष सत्य रहेगा। दुकानके श्राय व्यय विषयपर गोपी और हरी मुकदमा कररहे हैं इनमें कौन जीतेगा ? यह जाननेके लिये । तुलारिभजती ' के अनुसार • ग-श्री-प-ई: गोपीकी संख्या १३ ' .ह-श्र-र-ई ' हरीकी सरया १५-इन १३ पृथक् २ बारह घटाये तो १।३ रहे इनमें श्राठका भाग दिया तो १।३शेप रहनेसे हरीका शेष अधिक है अतएव हरी मुकदमा जीतेगा । वेग से बहती हुई गंगामें इस तीरसे शीघ्र तैरकर जानेके लिये कछिया थौर पछिया में सौ सौ रुपयोगी शर्त चदी है। इनमें किसको लाम होगा? यह जाननेके लिये 'घर्गाष्टकांका के अनुसार 'क-अप-य-श्रा' कछियाली सरया ३८ और ब-श्र छह यु आर बछियाकी संख्या३४ इन ३८ । ३४ में ७ का भाग दिया तो ३२६ शेष रहनेसे घछिया शोन तेरकर १.०) 'पारितोपिक पावेगा। इन उदाहरणोंमें पृथक् २ चोसे जो अंक लिये है मो केवल दिखा- के लिये लिये है। पृथक् २ लेने का कोई नियम नहीं है। किमीभी एक चकसे सर बातें देशी जासी हैं। उस तीर - संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (१३) इति समरसारे जयपराजयचिन्ताप्रकरणम् । । अपर जयपराजयचकम् । ति ६ स ७ का १ लारि भ भाइई के च ट त प उ ऊऋऋ ख ठ थ फ ल ल ए ऐ ग ब ल स प्रो औ घ म ध ह ङ त्र ण न ० न ० कुला-कुंल-कुलाकुलगणमाह । मूला भिजिदम्बुपोड दशमी षष्टी द्वितीया बुधो राज्ञोः सन्धिकरः कुलाकुलगणः स्थानोर्जयार्थे कुलः । मासाख्यास्थितभाँनि शेषतिथयो युग्माः कुजो भार्गवः संघो"न्यो"कुलसंज्ञको विजयते तस्मिन्प्रयातो ध्रुवमें ॥ ९ ॥ मूलम्, आर्दा, अभिजित, अंबुपः, शतभिपा एतानि उडूनि नक्षत्राणि, पष्ठी, द्वितीया, दशमी एताः तिथयः बुधवासरच कुलाकुलगणः, अयं योद्धमिच्छनोईयोः राज्ञो- ..

- - (१४) समरसारं- भूपयोः सन्धिकर-प्रीविकरः स्यात् । मासाख्यास्थिवभानि चैत्रादिमासानाम् आख्या नामानि तैर्नामभिःस्थिवानि भानि तानि कानि ? चित्रा,विशाखा,ज्येष्ठा, पूर्वापाढा,श्रवणः, भाद्रपदा, अश्विनी, कृत्तिका, मृगशिरः, पुष्यः, मघा, पूर्वा 'फाल्गुनी एता मासाख्यास्थिवभानि,-शेपतिथयो युग्माः चतुर्थी, अष्टमी, द्वादशी, चतुर्दशी, कुजः भौमवारः भार्गवः शुक्रवारः कुलगणः, अयं स्थास्नोःस्थायिनः जयार्थ जयार्थी भवति । अन्यःशेष तिथिवारनक्षत्रसमूहःअकुलगणः । स कः १ प्रतिपत्, तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, नवमी, एकादशी,पूर्णिमा, अमावस्था एताः तिथयः । रवि-चन्द्र-गुरु-शनयो वाराः । भरणी, रोहिणी, पुनर्वसु, श्लेपा, हस्त, स्वाती, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवती, उ. पा, उ. भा, उ, फा, अयं तिथिवार- नक्षत्रसमूहः अकुलगणः । अस्मिन् गणे प्रयातो यायी विजयते विजयं प्रामोति ॥ ९॥ मूल, आर्द्रा, अभिजित्, शतभिषा, यह नक्षत्र-दशमी, पठी, द्वितीया, यह तिथि और बुलवार-इनकी "कुलाकुल" संज्ञा है । इनमें युद्धकी इच्छा करनेवाले राजाओंफे परस्परमें सन्धि होजाती है। और महीनोंके नामवाले-चित्रा, विशाखा, जेष्ठा, पूर्वापाढ, श्रवण, पूर्वाभा द्रपट, अश्विनी, कृत्तिका, मृगशिर, पुष्य, मघा और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र, तया शेपयुग्म-चतुर्थी, अष्टमी, दादशी, चतुर्दशी, तिथि- और मंगल, शुक्र वार इनकी "कुल" संज्ञा है। इसमें स्थाई (जिसपर दूसरेने चढाई की है और वह अपने राज्यमें बैठा है उस ) राजाका जय होता है, और अन्यसंघ-भरणी, रोहिणी,पुनर्वस, संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (१५) मालेपा, हस्त, स्वाती, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवती, उत्तराषाढ, उत्तरा- भाद्रपद, उत्तराफाल्गुनी प्रतिपदा, तृतीया, पंचमी मप्तमी, नवमी, एकादशी, पूर्णिमा और अमावास्या-सूर्य, चन्द्र, गुरु, शनि इनकी अकुल " संज्ञा है । इसमें युद्धारम्भ हो तो यायी गनाका निश्चय विजय होता है ॥९॥ " कुला-ऽकुल-कुलाकुलगणचक्रम् । म. पा. भि. श-३ । १० । ६।-बुध, कुलाकुलगणःसन्धिः चि वि, ये पूषा. श्र.पू. भा. अश्वि. कृ. म. पुण्य, म पूका.-४।८।१२। १४ मं.शु कुलगणः स्थायि. जयः भि.रो.पु.ऽ उफा ह स्वा.ऽनु.उषा.धं उभा रे. ॥११३५।१९।११।१३। १५।३०। सू. चं. श. अकुलगण यायि- जयः सकलस्वरशिरोमणिं वर्णस्वरमाह । पंचोणेस्वरीः कछडधभवमुखेष्वङ्गव्यञ्जने स्युनन्दोदेस्तिथेस्ते तिथिकपिलवतोप्यन्तराभोग- भाजः । नाम्रो" बालाकुमारो युवसजरमृतास्त्वादि वत्स्वरास्ते सिद्धयुत्को युवान्तो' ऽपचयँहत- रयोयुदयतां द्विण्मृताचि ॥ १० ॥ पञ्चाणेडे स्वराः अण्-ए-प्रत्याहारान्तर्भूताः ये स्वरा अ इ उ-अप्रत्याहारः ए ओ एडप्रत्याहारः एवम् (१८) समरसार- सर्वसिद्धिं युवा दत्ते यात्रायुद्धे विशेषतः ॥ ३ ॥ दोन देवाने दीक्षागूढमंत्रप्रकल्पने । वृद्धस्वरो भवेद्रव्यो रणे भङ्गो भयं गमे ॥ ॥ ४ ॥ विवाहादि शुभं सर्व संग्रामाघशुभं तथा । न कर्तव्य नृभिः किञ्चिजाते मृत्युः स्वरोदये ॥ ५॥ मृतो वृद्धस्तथा वालः कुमारस्तरुणः स्वरः । यथोत्तरबलाः सर्वे ज्ञातव्याः स्वरवैदिभिः ॥ ६ ॥” इति । यत्र नन्दादितिथीनां कपिलवो यल्लिखितस्तत्पष्टिय टिकात्मकतिथिभोगेन न्यूनाधिके तु त्रैरा- शिकमूह्यमिति ॥ १० ॥ अ-इ-उ-ए-ओ-' यह पांचोस्वर ड-ण-अ-पिनाक-छ ड-ध-भ-व प्रमुख वणों के स्वर हैं । अर्थात् 'कछडधभव 'इन अक्षरोंका अ-स्वरहै। (१) अ इ उ ए प्रो-यह पांचो स्वर सर्वत्र व्याप्त है । श्रतएव केवल इन्हीं पाचों के सम्यग् ज्ञानसे मनुष्य सर्व शुभाशुभ कथनमें समर्थ होसकता है। अपना प्रयोजन साधनेवालोंको उचित है कि जो कार्य देव, तत्त्व, शक्ति और गंध श्रादि जिस किसी सम्बन्धी हो उसको उसी देव, शक्ति, गन्धादिके उदयस्वरों में करे तो कार्यकी सिद्धि होसकती है । यथा-ब्रह्मासम्बन्धी प्रयोगादि 'अ' में, विष्णुसम्बन्धी 'इ' मे, रुद्र सम्बन्धी 'उ' में सूर्यसम्बन्धी 'ए' में और चन्द्रसम्मन्धी 'श्री' में करनेसे सिद्धि होती है । ऐसेही 'अ' में इच्छा, 'इ' में ज्ञान, 'उ में प्रभा,'ए' में श्रद्धा, और 'श्री' में मेधा यह शक्ति फलीभूत होती है। '' में चौकोर, 'इ पर्द्ध, 'उ' में त्रिकोण, 'ए ' में पट्कोण, और — में धतुलाधार चक्रर्मे पूजादिक उचित है । 'श्र' के उदयमें पृथ्वीगत, 'ई' के उदयमें जलगत, 'उ' के उदयमें पग्निगत, 'ए' के उदयमें वायुगत और ‘श्रो' के उदयमें आकाश ( 3 ) गत प्रश्न होते हैं । और 'अ' गन्ध, 'इ' रस, 'उ' रूप, 'ए' स्पर्श, और 'श्री' में शब्दविषयक प्रश्न कहे जाते हैं । प्रकार श्रधारादि स्वरोके उदयमें तत्तत्सम्बन्धी प्रश्नोका शुभाशुभ कहना .

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम्। (२१) वर्णस्वरचक्रम् । स्व कअ प, उप aaवाल Raमार LIAबायुवा yalalanje.. SEAla[araEAN मृत च आअ इ उ व LETTERFFor इस चक्रले सव वर्णांक वाल, कुमार, युवा, वृद्ध, मृतवर पृथर २ स्पष्ट जाने जाते है। जउ झाउ एआ दए श्राप Ra/AaiNSTRanावाल | SAAMAAJISM | |कुमार भANE| युवा laral || मृन Relala] aslm लान व श डभइ उए दोन ताउएओय थएओभई दइ37 स है ) अकारादीनां ग्रहराशिदेशत्वं तत्तद्राशावदयं चाह । भौमेनयोनेशर्शिनोश्च गुरोगोस्ते क्षेत्रे शने. रुदयिनोऽथ नवांशकेजात् । भौरे २४ करे २१ तु पैरनोंत्तिमभादिसप्तस्वौदित्यतस्विरमुखों अपि पंचकेपु ॥ ११॥ पूर्वश्लोकेन वर्णस्वराः कथिताः । अनेन श्लोकेन ग्रहराशि- क्षत्रस्वराः प्रोच्यताम् । भौमेनयोः भौमभास्करयोः क्षेत्र राशी (२०) * समरसार- 'ए' वृद्ध और 'ओ' मृत होतीहै । ऐसेही 'ख' काई वाला 'उ' कुमार 'ए'युवा' 'ओ' वृद्ध और 'अ' मृत होताहै । इसी प्रकार सबसे जानना चाहिए (१)। युवा स्वरके अन्त तक सिद्धिमें उत्कर्पता और वृद्ध, मृतमें अपचय होता है अर्थात बालसे कुमार श्रेष्ठ और कुमारसे युवा अधिक श्रेष्ठ होता है और इनमें वृद्ध नेष्ट और वृद्धसे मृत आधिक नेष्ट होता है। यह जानना चाहिये । यदि अपना युवा और शत्रुका मृतं स्वर जानके युद्धारम्भ किया जाय तो सिद्धि होता है ॥ १० ॥ वर्णस्वरचक्रम। वाल कुमार युवा वृद्ध मृत इ ए ओ क ख च छ ट ढ द ध न च भ म र ल प नन्दा भद्रा जया रिक्ता पूर्णा श६।११।२१७१२४१३४।१४।१०।१५ .२(1) जिस नामका जो स्वर हो वह बाल, दूसरा कुमार, तीसरा तरुण, पोथा रद्ध और पांच मृत होता है । यथा-रामका 'ए' स्वर है अतः इनका 'ए' बाल, 'मो' कुमार ''युवा' वृद्ध और 'उ' मृत स्वर है। यह चक्रमे . सा लिसा है।

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (२३) उदयस्वर होतेहैं । एवं मेष राशिसे चौबीस और बाकीके इक्कीस २ नवांशामें अ-इ-उ-ए-ओ नवांशेश होते हैं। और रेवती आदि सातमें अ तथा पुनर्वसु आदि पांच २ में क्रमसे इ-उ-ए-ओ नक्षत्रस्वर होते हैं। यह सब नीचेके चक्रमें स्पष्ट लिखे हैं ॥ ११ ॥ १ ग्रहगशिनवाशनक्षत्राणां स्वरचक्रम् । स्वराः ए प्रो वाराः भौम, सूर्य, बुध, चंद्र. गुरु. शुक्र. शनि. 'मेष, वृश्चिकन्या, मि- मकर, राशयः धनुर्मान. वृष, तुला क, सिह थुन कर्क कुम्भ. ९.मि. ३ क- कन्या ९तु. वृश्चिक ६ मकुं. नवांशाः मिथुन ६ क ९सि. ९/९ वृश्चि. ३ ध.९ म ६ रेवत्यादि । पुनर्वसु उ. फा. दि. अनुराधा श्रवणादि। प्रादि ५ निक्षत्राणि उदाहरण । ग्रहस्वर-“देवदत्तका" ग्रहस्वर क्या है ? यह जाननेके लिये. देदोचाची रेवती इसके अनुपार रेक्ताकी मीन राशि है और मानका स्वामी वृहस्पति है अतः चक्र वृहस्पति उकारके नीचे होनेमे देव. दत्तका ग्रहस्वर उकार है। राशिस्वर-नोयायायू ज्येष्ठाके अनुसार यज्ञदत्त " की वृश्चिक राशि होती है और चक्र वृश्चिक राशि अकारके नीचे है अतः यज्ञदत्तका राशिस्वर अ है।

(२२) समरसारं- मेपवृश्चिकसिंहेषु अकार उदयो भवति । शशिनोः बुधचंद्रयोः क्षेत्रे मिथुन-कन्या-कर्क-राशिपु इकारस्योदयः । गुरोबृहस्पते. धनुर्मानयोः उकार उदयं प्रामोति । शृगोः शुक्रस्य क्षेत्रे तुला- वृपयोः एकारस्योदयः । शनेः क्षेत्रे मकरकुम्भयोः ओकार- स्योदयः । एतेषां राशीनां स्वामिनो ये ग्रहाः अकारादीनां स्वामिनो भवन्ति । एवं ग्रहराशिस्वराः प्रोक्ताः । अथ नवांशेशत्वमाह । अजान्मेपादारस्य भारे चतुर्विशतिनवां- शानां मध्ये मेषस्य नवांशाः वृपस्य नवांशाः मिथुनस्य पडशा- स्तेषु यस्य जन्म भवति तस्याकारः स्वामी। परतः इकरादौ करे२१एकविंशतिनवांशा ज्ञेयाः । इकारे मिथुनस्य त्रयोंशाः, कर्कस्य नवांशाः' सिंहस्य नवांशाः उकारे कन्यायाः नवांशाः, तुलायाः नवांशाः, वृश्चिकस्य त्रयोंशाः । एकारे वृश्चिकस्य पडंशाः धनुपो नवांशाः मकरस्य पडशाः । ओकारे मकरस्य त्रयोंशाः, कुंभस्य नवांशा, मीनस्ये नवांशाः । एवम् अंशस्वराः प्रोक्ताः । अथ नक्षत्रस्वराः प्रोच्यते । अन्तिमभादिसप्तसु रेवत्यादिसप्तसु नक्षत्रेषु अकारः स्वामी । आदित्यतः पुनर्वसुतः इउमुखाः इकारोकारायाः। उक्तं च-पुनर्वसुतः पंचसु इकारः। उत्तराफाल्गुनीतः पंचसु उकारः। अनुराधातः पंचसु एकारः। श्रवणादिपंचसु ओकारः स्वामी । नक्षत्रस्वर इत्यर्थः ॥११॥ मंगल, सूर्य, बुध, चन्द्र, वृहस्पति, शुक्र और शनि इन ग्रह तथा इनकी राशियोंके, अइ-उ-ए ओ यह क्रमसे - M राक . (२२) समरसारं- मेपवृश्चिकसिंहेषु अकार उदयी भवति । ज्ञशशिनोः बुधचंद्रयोः क्षेत्रे मिथुन-कन्या-कर्क-राशिपु इकारस्योदयः । गुरोबृहस्पतेः धनुर्मीनयोः उकार उदयं प्रामोति । शृगोः शुक्रस्य क्षेत्रे तुला- वृपयोः एकारस्योदयः । शनेः क्षेत्र मकरकुम्भयोः ओकार- स्योदयः । एतेषां राशीनां स्वामिनो ये ग्रहाः अकारादीनां स्वामिनो भवन्ति । एवं ग्रहराशिस्वराः प्रोक्ताः । अथ नवांशेशत्वमाह । अजान्मेषादारस्य भारे चतुर्विशतिनवां- शानां मध्ये मेपस्य नवांशाः वृपस्य नवांशाः मिथुनस्य पडंशा- स्तेपु यस्य जन्म भवति तस्याकारः स्वामी । परतः इकरादौ करे२१एकविंशतिनवांशा ज्ञेयाः । इकारे मिथुनस्य त्रयोंशाः, कर्कस्य नवांशाः' सिंहस्य नवांशाः उकारे कन्यायाः नवांशाः, तुलायाः नवांशाः, वृश्चिकस्य त्रयोंशाः । एकारे वृश्चिकस्य पडशाः धनुपो नवांशाः मकरस्य पदंशाः । ओकारे मकरस्य त्रयोंशाः, कुंभस्य नवांशा, मीनस्ये नवांशाः । एवम् अंशस्वराः प्रोकाः। अथ नक्षत्रस्वराः प्रोच्यते । अन्तिमभादिसप्तसु रेवत्या दिसप्तसु नक्षत्रेषु अकारः स्वामी । आदित्यतः पुनर्वसुतः इउमुखाः इकारोकारायाः । उक्त च-पुनर्वसुतः पंचसु इकारः! उत्तराफाल्गुनीतः पंचसु उकारः । अनुराधातः पंचसु एकारः। श्रवणादिपंचसु ओकारः स्वामी । नक्षत्रस्वर इत्यर्थः ॥११॥ मंगल, सूर्य, बुध, चन्द्र, वृहस्पति, शुक्र और शनि इन ग्रह तया इनकी राशियोंके अइ-उ-ए ओ, यह क्रमसे. - - - (२४) समरसारं- नक्षत्रस्वर-गोशाशीशु शतभिषके अनुसार 'श्रीनिवास" का शतभिषा नक्षत्र है और यह चक्रमें ओकारके नीचे है। अत: श्रीनिवास का नक्षत्रस्वर ओ है। द्वादशाब्दादीन् पञ्चस्वराणामाह । रूपान्देवंथ हायनर्तुषु च ते तत्काय भागान्तरा- भुक्त्यांवाच्यऽपरेयने त्व इरिमौ कृष्णान्ययोः पायो': । राधे भाद्रपदे सहस्यं इरिपापाढे नभत्यु- मंधौ पौपे थैरपि शुक्र उर्ज उदयी माघान्त्ययो' रो स्तथा ॥ १२॥ अस्मिन् श्लोके द्वादशवार्पिकस्वर-वार्पिकस्वरा-ऽस्यनक्षत्र- स्वर-ऋतुस्वर-मासस्वर-पक्षस्वरानाह-रूपान्दाः दादशाब्दा- स्तेपु रूपाउदेपु द्वादशसु वर्षेषु प्रभवादिपु अकार उदयी भवति । प्रमाथ्यादिपु द्वादशवपु इकारः स्वामी । खरा- दिवादशवत्सरेयु उकारः स्वामी । शोभानादिपु द्वादशवर्षेषु एकारः सामी । राक्षासादिषु द्वादशवर्षेषु ओकारः स्वामी । येपु वत्सरेषु यस्य जन्म भवति तेपां संवत्सराणां यः स्वामी भवति तं स्वरमारस्य द्वादशाब्दिकस्वरो बालादिः ज्ञातव्यः । अथ वार्षिकस्वरमाह-प्रभवादिवर्षेषु अकाराया उदयं प्राप्नु- वन्ति । प्रभववर्षे अकारः स्वामी, विभववर्षे इकारः स्वामी, शुक्लधर्षे ओकारः स्वामी, प्रमोदवर्षे एकारः स्वामी, प्रजापतिवर्षे ओकार: स्वामी, पुनः अंगिरसि व अकारः, श्रीमुखवर्षे इकारः, उकारः, युवसंवत्सरे एकारः, धातृसम्वत्सरे ओकारः।

. संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (२५) एवम् ईश्वरादिवर्षेषु पंचसु अकारायाः । पुनः चित्रभान्या- दिपंचसु अकारायाः। हेमलम्बादिपंचसु वर्षेषु अकारायाः। पुनः शुभकदादिपंचसु अकाराद्याः । पुनः पिंगलादिपंचसु अकारायाः । पुनः दुंदुम्यादिपंचसु वर्षेषु अकागद्याः स्वामिनः। एवं पंचसु वर्षेषु अकारायाः स्वामिनो भवन्ति । 'तत्काय- भागान्तराभुक्त्या' पां कायभागः एकादशांशः स एवा- न्तराभुक्तिः । अन्तरोदयाः दादशवार्पिकस्वरे अंतराभुक्त्या अंतरोदयेन स्वरा ज्ञातव्याः। तमेवान्तरमाह-एको वर्पः, एको मासः, दिनदयम्, त्रयश्चत्वारिंशद्धट्या, अष्टत्रिंशत्पलानि । एवं पुनदिशवारं स एव । एतावद्विादशवर्षरय अस्वरे अंतरोदयः । अथ वर्पस्वरे अन्तरोदयः-एको मासः, दिनयं, त्रयश्चत्वा- रिंशदघट्यः, अष्टात्रिंशत्पलानि । एवं पुनर्वादशवारम् एताव- द्भिर्माप्तदिनघटीपलैः अन्तरोदयः स्यात् अथ ऋतुस्वरमाह- वसन्तुमारस्य द्विसप्ततिभिर्दिनैः एकैकस्य ऋतोरुदयः स्यात् । वसन्ततो पष्टि दिनानि, ग्रीष्मतः द्वादशदिनानि यावदका- रस्योदयः । ग्रीष्मतारष्टचत्वारिंशदिनानि वर्पतॊश्चतुर्विशति- दिनानि यावदिकारस्योदयः । वर्पतॊः पत्रिंश दिनानि,शरदत्तोः पदिशदिनानि यावदुकारस्योदयः शरतोश्चतुर्विशतिदिनानि, हेमन्तस्याप्ट चत्वारिंशदिनानि यावदेकारस्योदयः । हेमन्तस्य द्वादशदिनानि, शिशिरः पष्टिदिनानि यावदोफारस्योदयः । एवम् मतुस्वराः प्रोक्ताः।ऋतुस्वरमध्ये एकादशांशेनान्त- रोदयः-दिनानि पट्, द्वारिंशद् घट्यः, त्रिचत्वारिंशत्पलानि, अनेन प्रमाणेन एकादशान्वरोदयाः भवन्ति । अथायनस्वर- . -- २१ (२४) समरसारं- नक्षत्रस्वर-गोशाशीशु शतभिपके अनुसार 'श्रीनिवास" का शतभिषा नक्षत्र है और यह चक्रमें ओकारके नीचे है। अत: श्रीनिवासमा नक्षत्रस्वर ओ है। द्वादशाब्दादीन् पञ्चस्वराणामाह । सपोवदेवथ हायनापु च ते तत्काय भागान्तरा- भुक्त्यौवाच्यऽपरेयने त्व इरिमों कृष्णान्ययोः पक्षयो': । राधे भाद्रपदे सहस्यं इरिपापाढे नभस्यु- मंधौ पौपे थैरपि शुक्र उर्ज उदयी माघान्त्ययों रो स्तथा ॥ १२॥ अस्मिन् श्लोके द्वादशवार्पिकस्वर-वार्पिकस्वरा-ऽस्यनक्षत्र- स्वर-ऋतुस्वर-मासस्वर-पक्षस्वरानाह-रूपान्दाः द्वादशाब्दा- स्तेषु रूपादेषु द्वादशसु वर्षेषु प्रभवादिपु अकार उदयी भवति । प्रमाथ्यादिपु दादशवर्षेषु इकारः स्वामी । खरा- दिवादशवत्सरेणु उकारः स्वामी । शोभानादिपु द्वादशवर्षेषु एकारः स्वामी । राक्षासादिपु द्वादशवपु ओकारः स्वामी । येपु वत्सरेषु यस्य जन्म भवति तेपां संवत्सराणां यः स्वामी भवति तं स्वरमारस्य द्वादशाब्दिकस्वरो बालादिः ज्ञातव्यः । अथ वार्पिकस्वरमाह-प्रभवादिवर्षेषु अकाराचा उदयं प्राप्नु- वन्ति । प्रभववर्षे अकारः स्वामी, विभववर्षे इकारः स्वामी, शुक्लप ओकारः स्वामी, प्रमोदवर्षे एकारः स्वामी, प्रजापतिवर्षे ओकारः स्वामी, पुनः अंगिरसि व अकारः, श्रीमुखवर्षे इकारः, भाववर्षे उकारः, युवसंवत्सरे एकारः, धातृसम्बत्सरे ओकारः ।

, . संस्कृतटीका-भांपाटीकासमेतम् । (२५) एवम् ईश्वरादिवर्षेषु पंचसु अकाराद्याः । पुनः चित्रभान्वा- दिपंचसु अकारायाः । हेमलम्बादिपंचसु वर्षेषु अकारायाः । पुनः शुभकदादिपंचसु अकारायाः । पुनः पिंगलादिपंचसु अकारायाः । पुनः दुंदुत्यादिपंचसु वपेंषु अकारायाः स्वामिनः । एवं पंचसु वपु अकारायाः स्वामिनो भवन्ति । 'तत्काय- भागान्तराभुक्त्या' तेषां कायभागः एकादशांशः स एवा- न्तराभुक्तिः । अन्तरोदयाः द्वादशवार्पिकस्वरे अंतरामुक्त्या अंतरोदयेन स्वरा ज्ञातव्याः । तमेवान्तरमाह-एको वर्पः, एको मासः, दिनद्वयम्, त्रयश्चत्वारिंशद्वट्या, अष्टत्रिंशत्पलानि । एवं पुनदशवारं स एव । एताव दिदिशवर्षस्य अस्वरे अंतरोदयः । अथ वर्पस्वरे अन्तरोदयः-एको मासः, दिनहय, त्रयश्चत्वा- रिंशद्घटयः, अष्टाविंशत्पलानि । एवं पुनदिशवारम् पताव- द्भिर्मासदिनघटीपलैः अन्तरोदयः स्यात् अथ ऋतुस्वरमाह- वसन्तुमारस्य द्विसप्ततिमिर्दिनः एकैकस्य ऋतोरुदयः स्यात् । बसन्तोः पटिदिनानि, ग्रीष्मतोः द्वादशदिनानि यावदका- रस्योदयः । ग्रीष्मतारष्टचत्वारिंश दिनानि वर्पत्तोंश्चतुर्विशति- दिनानि यावदिकारस्योदयः । वर्षोः पशिदिनानि,शरहतोः पत्रिंश दिनानि यावदुकारस्योदयः शरहतोश्चतुर्विंशतिदिनानि, हेमन्तस्पाष्टचत्वारिंशदिनानि यावदेकारस्योदयः । हेमन्तस्य द्वादशदिनानि, शिशिरतॊः पष्टिदिनानि यावदोकारस्योदयः । एवम् नतुस्वराः प्रोक्ताः ऋतुस्वरमध्ये एकादशांशेनान्त- रोदयः-दिनानि पट्, द्वात्रिंशद् घट्यः, विचत्वारिंशत्पलानि, अनेन प्रमाणेन एकादशान्तरोदयाः भवन्ति । अथायनस्वर- - (२६) समरसारं- माह-अवाचि दक्षिणायने अपरे सौम्यायने तु अ-इ-इमौ स्वरौ भवतः । उक्तं च-दक्षिणायने अकारः स्वामी, उत्तरायणे इकारः स्वामी । अस्मिन्नयने स्वरे अन्तरोदयः-पोडश- दिनानि, एकविंशतिर्घटयः, एकोनपञ्चाशत्पलानि । अथ पक्षस्वरमाह-इमौ अकारेकारस्वरौ कृष्णान्ययोः पक्षयोः स्वामिनौ भवतः । उक्तंच-कृष्णपक्षे अकारस्योदयः शुक्लपक्षे इकारस्योदयः । अत्र पक्षस्वरे अन्तरोदयः एक दिनम्, एकविंशविघटिकाः, एकोनपंचाशत्पलानि, अनेन प्रमाणेन एकादशांतरोदया भवन्ति । अथ मासस्वरमाह-राधे वैशाखे, तथा भाद्रपदे, सह सि मार्गशी अकारः स्वामी इपे आश्विने, आपाढे, नभस्ये श्रावणे इकार उदयं प्राप्तोति । मधौ चैत्रे, पौपे च उकार उदयी भवति । अथानन्तरं शुक्रे ज्येष्ठे, ऊर्जे कार्तिके एकार उदयी भवति । माघः प्रसिद्धः अन्त्यः फाल्गुनः तयोः माघान्त्योः ओकार उदयं प्रामोति । अत्रापि मासस्वरे अन्तरोदयः पूर्ववज्ज्ञातव्यः, दिनद्वयं, त्रिचत्वारिंशद्घटया, अष्टात्रिंशत्पलानि । अनेन श्लोकेन द्वादशान्दिकवार्पिकायन- ऋतुमासपक्षस्वराः सान्तरोदयाः कथिताः। दिनस्वरघटीस्वरौ 'पंचाणेङ' इति श्लोकेन पूर्वमेव कथितौ ॥ १२ ॥ प्रभवादे भरह बारह सवत्सरोंमें अ-इ--ए-ओ यह क्रममे द्वादशगार्षिक स्वर होते हैं । और प्रव विभव आदि प्रत्येक वर्षमें, अ-इ आदि पांचों ग्वा वार्षिक स्वर होते हैं। और वसन्त आदि पट ऋतुओंमें इनके ३६० दिनोंके पंचमांश ( बहत्तर दिन ) प्रमाणसे अ-इ आदि पांचों स्वर ऋतुस्वर होते हैं। तथा इन , संस्कतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (२७) द्वादशवार्षिक, वार्षिक और ऋतुस्वरोंके मध्यमें एकादशांश प्रमाणसे यही स्वर अन्तरस्वर होते हैं। (द्वादशवापिका १ वर्ष, १ मास २ दिन ४३ घड़ी, ३८ पल एकादशांश होता है वार्षिकका १ मास, २ दिन, ४३ घड़ी, ४३ पल, एकादशांश होता है-और+ऋतु स्वर का ६ दिन, ३२ घड़ी, ४३ पल, ३८ एकादशांश होता है। दक्षिणा- यनका अ ओर उत्तरायणका इ अयनस्वर होते हैं । एवं कृष्णपक्षका अ, और शुक्लपक्षकाइ, यह पक्षस्वर होते हैं । और वैशाख, भाद्रपद, मार्गशोर्षका अ, आषाढ आश्विन श्रावणका ई, चैत्र पौषका उ; कार्तिक ज्येष्ठका ए; और माघ,फाल्गुनका ओ यह मासस्वर होते हैं। इनमें भी (अयनक, १६ दिन, २१ घड़ो, ४९ पल एकादशांश हाता है, पक्षस्वरका १ दिन २१ घड़ी, ४९ पल एकादशांश होता है, और मासका २ दिन ४३ घड़ी ३८ पल एकादशांश होता है)। + ऋतुगणना-सौरमान और चान्द्रमान दोनोंसे की जाती है, यथा सौर. मानके अनुसार-" मृगादिराशिद्वयभानुभोगः पदक ऋतूना शिशिरो वसन्तः । ग्रीष्मथ वर्षाः शरदश्च तद्वद्धेमन्तनामा कथितोऽत्र षष्ठः ॥ १॥ "-मृगादि दो दो राशियों के भानुभोगसे शरदादि छः ऋतु होते हैं । यथा-मकर फुभके सूर्यमें शिशिर, मीन मॅपमें वसन्त, पूष मिथुनमें ग्रोम, कर्क सिंहमें वर्षा, कन्या तुलामें शरद और वृश्चिक धनमें हेमन्त ऋतु होती है । एव चान्द्रमानके अनुसार-" मधुश्च माधवध वसन्तान् । शुक्रश्च शुचिश्च श्रेष्मातू । नभश्च नभस्यथ वार्षिकावृत् । इपश्चोर्जश्व शारदातू । सहच. सहस्यश्व हेमन्तिकावतू । तपश्च तपस्यथ शैशिरावृतू । इति श्रुतौ । "-वैत वैशाखमें बसन्त, जेष्ठ आषाढमें ग्रीष्म, श्रावण भादपदमें वर्षा, आश्विन कार्तिकमें शरद, मृगशिर पोप, हेमन्त और माघ फाल्गुन में शिशिर रुतु होती है । " श्रौतस्मार्तक्रिया सर्वा. कुर्यायान्ममर्नुः । तदभावे तु सौतुध्विति ज्योतिर्विदां मतम् १" प्रोत और स्मार्त कर्म चार ऋतु में और अन्य सौरन्तु में करने चाहिये ऐसा ज्योतिपियोका मत हे । “ वर्षायन युगपूर्वकमत्रसौरान्" इति सिद्धातशिरोमणी भास्कराचायणो- • कन्। ॥ युगपूर्वक वर्ष, अयन और ऋतु यह यहां सौर मानने चाहिये । अतएव उपरोक. उदाहरण सौरमानले दिया गया है।

द्वादशान्दिकम्वरचक्रम यापिकस्वाचक्रम अयनस्वरम ऋतुस्वाचक्रम क्षस्वरचक्रम (२८) उ ओ श्री har ६ थ ३ एमा ६ पभा -- पा.व्य श्रो । प्रमा सर शोभरात विभव | कि. नंदन कधी नन अ. भी मा युधा, विजय विधा कि पमानिन. जय रामपाल चिमु ा मजार गुभा मन्म. प्लागा साग म वि वि ग अमि. तारए दुर्म. बीन रोद्री न वि म श्रीमपाप हेमल मीभ्य' दुर्म || ३ वि. वि शाल. व्यय विन सास दुदुभि शो को वि. ५ वाज विका विरोध विरल की सीमा वि. धाता सर्वथा शर्वरी परिषरता प. म. था. रा. न विप्लव प्रमाथी, कोयन पि.स. | सिरी. दुर्म यहुधा दिक शुभा मार्नर चय. दु रको सय दक्षिणायने उत्तरायरे वमन्तोनोंः ६० दिनानि, ग्रीष्मतोः १२ यावत् प्रीमतॊः ४८ दिनानि, वपतॊः २४ यावत् वर्णत: ३६ दिनानि, सरहतोः ३६ यावत् शास्तोः २४ दिनानि हेम्न्तस्य ४८ यावत् हेमन्तस्य १२ दिनानि, शिशिानोंः ६० यापन् समरसारं-. मामस्वरचक्रम् भा.मा- आ. च.पो. जे.पा. मा.फा वै.धा,श्रा. । म HEER स्वर मास १२।१२।१२।१२।१२ संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (२९) मानास्वराया। मात्रौ नाममुखार्णजैव तु तदमंत्रादिसिद्धौं हलच्- संख्यैक्य तप" संख्ययाऽक्षु भि यशो : काये मि" जीवाष्णुभे" । पिण्डाज्माधिकवर्णिकैक्यमहते शेपे" चमूसत्कृती" मात्राणग्रहपिण्डजीवभगृहाजै- क्यान्म हूँ द्यौगिकः ।। १३ ।। मात्रास्वर-जीवस्वर-योगस्वर-पिण्डस्वरानाह । नाममुखा- जैव मात्रादयश्च ज्ञेयाः। नाममुखे नामदौ यः अर्णो वर्णस्त- ज्जाता एतादृशी या मात्रा तदच् मात्रास्वर इत्यर्थः । सः मात्रास्वरो मन्त्रादिसिद्धौ शुभः । मात्रास्वरबले मन्त्रादिसाधनं कर्तव्यम् । तदुक्तम्-" साधनं मन्त्रयन्त्रस्य तन्त्रयोगं च सर्वदा । अधोमुखानि कार्याणि मात्रास्वरबले कुरु" इति । जीवस्वरानयनार्थ-हलचसंख्यैक्यं कर्तव्यम्, अक्षु स्वरेषु वपसंख्यया पोडशसंख्यया ग्राह्याः । यशोः यवर्गशवर्गयोः भिसंख्या चतुस्संख्या ग्राह्याः । काये वर्ग-कवर्ग-चवर्ग-टवर्ग- तवर्ग-पवर्गेषु मिसंख्याः पंच पञ्च संख्या ग्राह्याः । नानो ये हलः अचश्च तेषां कथितक्रमेणागतसंख्यायामज्झलयोरैक्यं जीवस्वरो भवति, स च शुभे मङ्गलकत्ये ग्राह्यः । पंचाधिका चेत् संख्या, तदा पंचभिर्भागोऽनुपदिष्टोऽपि कायः । भागे यः शिष्टोंकः तत्संख्य एवाकारादिपु पंचसु स्वरो ग्राह्यः । शून्य- (३०) समरसार- शेपे तु पंचमः ओकार एव ग्राह्यः । जीवस्वरफलं चोक्तं स्वरो- दये-"खानपानादिकं सर्व वखालङ्कारभूपणम् । विद्यारम्भं 'विवाहं च कुर्याज्जीवस्वरोदये ।" इति । मात्रिकर्णिकैक्यं- मात्रिको मात्रास्वरः वर्णिको वर्णस्वरः, तत्संख्ययोरैक्यं म ५ हते शेपः स पिंडाच् पिण्डस्वरः भवतीति संबंधः । स च सेनायाः सत्कतौ सत्कारे सज्जीकरणे ग्राह्यः । उक्तं च- शत्रूणां देशभंगं च कोटयुद्धं च वेष्टनम् । सेनाध्यक्षस्तथा मंत्री कर्तव्यः पिण्डकोदये । ” इति । यदा यस्य पिंडो युवा स्वरो भवति तदा तस्य सेनाधिपत्यं दातव्यम् । यौगिकस्वर- माह-मात्राणेति, मात्रास्वरवर्णस्वरौ प्रागुक्तौ, ग्रहस्वरस्तु तन्नामराशिग्रहणसम्बन्धात, पिण्डस्वरः प्रागुक्तः, जीवस्वरश्च- भं जन्मनक्षत्रं, तदधिपस्वरः गृहं राशिस्तस्य च यः अच् एषां मात्रादि-स्वराणां याः संख्यास्तासामैक्यं तत्पंचभिर्भक्तं शिष्टो यौगिकः स्वरः । तत्फलं " योगेन साधयेद्योगं दहस्थं ज्ञानसंभवम् । इति ।" ॥ १३ ॥ नामके आदिवर्णफी जो मात्रा हो वही मात्राबर होता है यह मन्त्रादि साधनमें उपयोगी है । अ आ इ ई आदि स्वरोकी संख्या १६, कवर्गकी ५ चवर्गकी ५, ट्वर्गकी ५, तवगकी ५, पवर्गकी ५, यवर्गकी ४ और शवर्गकी ४ इस प्रकार संख्या मानकर नामके स्वर और व्यंजनकी संख्याका योग करनेसे जीवस्वर होता है । यदि सख्या ५ से अधिक हो तो ५ का भाग देनेपर शेष 'जीवस्वर १

संस्कृतटीका-मापाटीकासमेतम् । (३१)
होता है । यह शुभ गायोंमें अच्छा है। मानास्वर और वर्णस्वरकी
सख्याके योगमें ५ का भाग देनेसे जो शेष रहै वह पिण्डस्वर होता है
यह सेनाके सत्कार (स्वागत, सजावट, सेनापति आदि ) में उपयोगी
है और माना, वर्ण ग्रह, पिण्ड,जीव, नक्षत्र और राशि इनके स्वों की
संख्याके योगमें ५ का भाग देनेसे जो शेप रहै वह यौगिकस्वर
होता है ॥ १३ ॥
उदाहरण ।
मावास्वर-रामके आदिवर्ण रकारमें आ मात्रा होनसे गमका
अकार मात्रा स्वर है । जावस्वर-रामनाममे रेफ २ आकार २
मकार ५ अकार १ की संख्याके योग १० में ५ का भाग देनेसे शेष
शून्य बचता है अतः गमका ओकार जीन स्वर है । पिण्डस्वर रामका
वर्णस्वर एकार चतुर्थ होने ४ संख्या है। और मात्रास्वर अकार
प्रथम होनेसे १ संख्या है । अतः इनके योग ५ में ५ का भाग दिया
तो शेप शून्य रहनेसे रामका ओकार पिण्डस्वर है। योगिकस्वर-राम
का मात्रावर प्रयय होनेसे १/संख्या, वर्णस्वर एकार चतुर्थ होनेसे ४
संख्या ग्रहस्र (रामको तुला गशि होनेसे तुलाधिप शुक्का) एकारकी
४ संख्या, पिण्डस्वर आकारकी ५ संख्या, जीवस्वर ओकारकी ५
संख्या नक्षत्रस्वर (गम के चित्रा नक्षत्रका उकारको ३ संख्या और
राशिस्वर ( तुलाराशिका एकारस्वर ) की ४ संरूषा, इस प्रकार
मात्रा १ वर्ण, ४, ग्रह ४, पिण्ड ५, नीव ५ नक्षत्र ३, राशि ४ इन
सबकी संख्याओंके योग २६ में ५ का भाग देनेसे शेप १ रहा अतएव
रामका अकार यौगिकस्वर है ॥ १३ ॥
योगस्वरवर्णस्मरयोविशेषफलमाह ।
योगाचा योगभजन वर्णाची सर्वमावहेत् ।
विशेपतच संपाम सहि सर्वस्वरायणीः ॥ १४ ॥

. दा (३२) : समरसारं- योगाचा-योगस्वरेण, योगस्वरबले संति योगभजनं योग साधनं कर्तव्यम् । वर्णाचा-वर्णस्वरेण, वर्णस्वरवले सति सर्वकर्म आवहेत् कुर्यात् । विशेषतः संग्रामं कुर्यात् । यता सर्वस्वराणां मध्ये अग्रणीमुख्यः । तस्मायदा वर्णस्वरो युवा भवति तदा सर्वकर्मसाधने अतीव शुभतरः ॥ १४ ॥ योगस्वरमें योगमार्ग माधन और वर्णस्वरमें सब कार्योका साधन करना चाहिये । विशेषकरके संग्राम करना चाहिये, क्योंके यही सब स्वरों में अग्रणी है ॥ १४ ॥ युद्धादौ भटादीनां जय-पराजय-साम्य-ज्ञानमाह । तेपामची लयभरायमिति हलां चे नानोरलां तुं मिलिता महतों पृथक्सा । हीना मृति' विजयमाह तथाधिका सा तुल्यों समं च समरं यदि वापि संधिम् ॥ १५ ॥ तेपाम् अ इ उ ए ओ इंति प्रागुक्तानां पंचानां स्वराणां तत्सम्बन्धिनी मितिः संख्या ल ३-य १-भ ४-रा २-य १ एवंरूपा स्यात् । तेन अकछडधभवानां ल इति त्रिसंख्या । इखजठनमशानां य इति एका संख्या । उगझतपयपाणां भ इति चतुःसंख्या । एघटथफरसानां रा इति द्विसंख्या। ओचठदबल- हानां य इति १ संख्या भवति । नानोर्योर्जयपराजयज्ञान- मिष्टं वन्नाम्नोर्ये हलः स्वरा वर्णाश्च तेपां सम्बन्धिनी सा संख्या लयभरायेत्युक्ता प्रतिस्वरं मिलिवा सती पृथक्पंचभिता च या स्यात्सा संख्या चेदितरापेक्षया हीना, तदा तन्मृति हीननाम संस्कवटीका-भापाटीकासमेतम् । (३३). संख्यस्य मरणमाह । इतरापेक्षयाधिका चेत्सा वदा विजयमाह । सा संख्येतरेतरं तुल्या समा चेत्तुल्यं समरं संयाममाह । यदि वा पक्षांतरे सन्धि द्वयो राज्ञोहि । अत्र वर्णसंख्याग्रहणे निपिछ- वर्णानां डकारणकारादीनां नान्नि संभवे शुन्यमेव ग्राह्यं न कदाचित्संख्या । इति ॥ १५॥ पूर्वोक्त रीतिके अनुसार पांच कोठोंमें ल ३-५ १-भ४-रा२-य१ यह अंक लिखकर इनके नीचे अ इ उ ए ओ और क ख ग घ च आदि वर्ण लिखे तो जयपराजय देखनेका चक्र बन जाता है । इस चक्रसे दोनों योद्धाओंके नामके स्वर और व्यंजनोंकी संख्या लेकर उसमें पृथक् पृथक् ५ का भाग दे तो जिसका शेप न्यून हो उसका पराजय और जिसका शेप अधिक हो उसका विजय होता है । यदि बराबर वचै तो समान युद्ध होता है । अथवा सन्धि हो जाती है ॥१५॥ उदाहरण । राम-रावण, नामोंमें र २-आ ३-म १-अ३- रामनाम ख्या ९ एवं र २-आ३- ३-अ३-ण अ- रावण नामसरूपा १४ इन ९-१४ में पृथक पृथक ५ का भाग दिया तो ४-४ शेष रहे अतएव युद्धमें साम्यता प्राप्त होती है।

. (३४) समरसारं-, जयपराजयचक्रम् भ १२ उ मो ख जढ ग झत घटथ च ठद धभव tr श प य इति समरसारे स्वरभेदजयपराजयप्रकरणम् । बालकुमारादिस्वरवशाबलमाह । पूर्वादिदिक्ष्वन्तरगोश्च तेऽः सुखं जयेथूनि जयस्तु घातात् । स्यादाधयोन्तिमयों स्वशत्रुबलाबला- भ्यां भुवमादीत ॥ १६ ॥ तेऽचः अकाराद्याः स्वराः पूर्वा दिदिक्षु अन्तः अन्तरिता लेख्याः । एका दिशं विहाय लेख्यास्तदेवाह । पूर्वस्यां दिशि अकारः । दक्षिणस्यां दिशि इकारः । पश्चिमायां दिशि उकारः । उत्तरस्यां दिशि एकारः । मध्ये ओकारः लेख्यः । यस्य योद्धः वर्णस्वरो युवा यस्पां दिशिभवति संग्रामे तस्यां दिशि

समरसारं-
4
ऐशानीतःसितकुजशनिर विखगराशयः प्रतीचीन्दोः ।
गुरुगृहयोरक्ष उदर्गदिशौज्ञगृहयोस्तु वायव्याम्।।१७॥
रविचन्द्रहति विवक्षुस्वनद्गृहराशीनां दिग्विशेषे निवेश
'माह । ऐशानीतः ईशानकोणमारभ्य एते राशयो भवन्ति ।
कोऽर्थ-ईशानकोणे सितराशिः वृपस्तुला च बलिनौ भवतः ।
पूर्वस्यां दिशि भौमराशी मेपवृश्चिको बलिनौ भवतः । शनि-
राशी मकरकुम्भी आनेय्यां बलिनौ भवतः । रविराशिः
सिंहो दक्षिणे च बली स्यात् । इन्दोः प्रतीची दिकू चन्द्रराशिः
कर्कः पश्चिमायां बली स्यात् । गुरुगृहयोः अक्ष उदक् दिशौ
ज्ञातव्यौ । धनुपो राशेनितिदिग् ज्ञातव्या । मीनराशेश्चोत्तरा
दिग् ज्ञेया । ज्ञगृहयोः बुधराश्योः मिथुनकन्ययोः वायव्य दिर
ज्ञेया । एतासु दिक्षु एतेपा राशीनां वास' स्यादित्यर्थः ॥१७॥
ईशानसे आरंभ करके शुक्र, भीम, शनि और सूर्यको गशि बल-
वान होती है अर्थात् ईशानमें वृप तुला, पूर्व में वृश्चिक मेप, अनिमें
मकर कुम्भ, दक्षिणमे सिंह राशि बलवान होती है । तथा पश्चिममें
फ, नैऋत्यमें धन, उत्तरमें मीन और वायव्यमें कन्या मिथुन राशि
,
अलमान होती है ॥ १७॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (३९) चन्द्रः यामेयामे प्रहरेपहरे ईशादिविदिशां वृपकुम्भो, मृग- सिंहौ, धनुः, कन्यामिथुने क्रमेण हन्ति । तदेवाह-चन्द्रः स्वोदयात्पथमप्रहरे ईशानकोणे स्थितो वृपराशि तथा च कुम्भ- राशि हन्ति । द्वितीयमहरे अग्रिकोणे स्थितो मकरराशिं वथा च सिंहराशि हन्ति । तृतीयपहरे नैऋत्यकोणे धन राशि हन्ति। चतुर्थप्रहरे वायुकोणे कन्याराशिं तथा च मिथुन राशि हन्ति । एवे राशयो यासु दिक्षु तासु स्थित्वा युद्धं न कुर्यादित्यर्थः १९॥ इशानसे आरम्भ करके सब कोणोंमें प्रहर प्रहरमें चन्द्रमा अपने उदयसे क्रमसे उक्त राशिपोंका घात करता है । यथा ईशानमें वृष कुम्भ राशिवालोंका, अमिमें मृग (मकर) सिंहवालोंका, नैऋत्पमें धनवालोंका और वायव्यमें कन्या मिथुनवालोका घात करता है ! अतएव यह राशि जिस कोगमें हो उस कोणमें स्थित होकर युद्धादि नहीं करना चाहिये ॥ १९॥ . . पू २५११ ५।१० ककका चन्द्रहत्तदिश्चक्रम उदाहरण यथा चैत्र शुक्ल ९ चन्द्रमा है। और मनमोहनका सिंह राशिका अमिकोण में धात होता है। अतएव आग्नेयस्थ होकर मनमोहनको युदादिकाना उचित नहीं है ॥ १९॥ ने.

. (३८ समरसार- दक्षिणां दिशं हन्ति । प्रागन्त्ययोर्यः प्रथमप्रहरस्य प्रथमाईः अन्तस्य चतुर्थप्रहरस्य द्वितीयार्द्धस्तयोर्युगं तेन प्रथमचतुर्थ- यामयोः प्रथम द्वितीयाईयुग्मेन याम्यां हन्तीति भावः । एवं रविदग्धा दिशः तत्काले शुभकर्मसु त्याज्याः ॥ १८ ॥ सूर्य दिनमें प्रथम प्रहरके दूसरे यामार्द्धसे दो दो यामादोंमें अर्याद प्रथममहरका अन्त्य यामाई और द्वितीय प्रहरका आद्य यामाई इस कमसे पूर्व आदि तीसरी तीसरी दिशाका निहत (घात ) करता है। अतः प्रथम प्रहरका आद्ययामाई और अन्त्य ( चतुर्य) प्रहरके अन्त्य यामाईमें दक्षिण दिशाका घात करता है ॥ १८ ॥ उदाहरण । रविहतदिक्चक्रम् । जो दिशा सुर्यसे निहत पूर्व ६-७ हो रही हो उस दिशामें उक्त दक्षिण १-८ यामा में यात्रा युद आदि नहीं घा पश्चिम २-३ ने. करना चाहिये । यथा मध्याइके समय उत्तर दिशा रविहत है तो इस दिशामें यात्रा नहीं करनी चाहिये । अथा इस समय इस दिशामें स्थित होकर द्यूत वा युद्धादि भी नहीं करना चाहिये। चन्द्रहवा विदिग्दिशस्वद्राशींचाह । ईशाद्विदिशौ चन्द्रो यामे याम निहन्ति वृपकुंभौं । । मृगसिंही धन्विनमथ कन्यामिथुनी क्रमेणवे ॥१९॥ आ. उत्तर ४-५ संस्कवटीका-मापाटीकासमेतम् । (३९) चन्द्रः यामेयामे प्रहरेप्रहरे ईशादि विदिशां वृपकुम्भौ, मृग- सिंहो, धनुः, कन्यामिथुने क्रमेण हन्ति । तदेवाह-चन्द्रः स्वोदयात्प्रथमपहरे ईशानकोणे स्थितो बृपराशि तथा च कुम्भ- राशि हन्ति । द्वितीयमहरे अग्निकोणे स्थितो मकरराशिं चथा च सिंहराशि हन्ति । तृतीयमहरे नैऋत्यकोणे धन राशि हन्तिा चतुर्थप्रहरे वायुकोणे कन्याराशिं तथा च मिथुनराशि हन्ति । एवे राशयो यासु दिक्ष वासु स्थित्वा युद्धं न कुर्यादित्यर्थः १९॥ इशानसे आरम्भ करके सब कोणोंमें प्रहर महरमें चन्द्रमा अपने उदयसे क्रमसे उक्त राशिपोंका घात करता है । यथा ईशानमें वृष कुम्भ राशिवालोंका, अमिमें मृग (मकर) सिंहवालोंका, नैत्यमें धनवालोंका और वायव्य कन्या मिथुनवालोका घात करता है ! अतएव यह राशि मिस कोगमें हो उस कोणमें स्थित होकर युद्धादि नहीं करना चाहिये ॥ १९॥. गू ५.१० चन्द्रदतदिश्चक्रम उ. द. उदाहरण। यथा चैत्र शुक्ल ९ को कक्का चन्द्रमा है। और मनमोहनका सिंह राशिका अभिकाणमें बात होता है। अतएव आग्नेयस्य होकर मनमोहनको युद्धादि करना उचित नहीं है ॥ १९॥ था. ३१६

समरसारं-:
गूढापरायकेतुहतदिग्विदिश आह ।
गूढाख्योऽप्रहरैराग्नेयीतस्तथा दिवा निशि चें।
पष्ठीं पष्ठी हन्यात् तन्मुखयात्रा शुभी ने रणे ॥२०॥
।
गूढाख्यः गूढनामग्रहभेदः अष्टभिरईप्रहरैः आग्नेयीतः
अग्निकोणतः दिवा दिवसे निशि रात्रौ वा पष्ठीं पष्ठी दिशं हन्यात
घावयेत् । तत्सम्मुखं यात्रा शुभा न स्यात् । संग्रामे एतन्न
शुभम् । तदेव प्रकटयति।प्रथमेऽर्दयामे गूढोआग्रेयी दिशहन्ति ।
द्वितीयेऽईयामे उत्तर दिर्श हन्ति । पञ्चमेऽर्द्धयामे नैर्ऋत्यां
• दिशं हन्ति । चतुर्थेईयामे पूर्वी दिशं हन्ति । पञ्चमेऽईयाम
वायवी दिश हन्ति । पठेऽईयामे दक्षिण दिशं हंति । सप्तमेऽद्ध-
यामे ईशान दिशहन्ति । अष्टमेऽईयामे पश्चिमां दिशे हन्ति । एवं
रात्रावपि ज्ञेयाः । एता दिशो विदिशश्च दिवानिश युद्धयात्रायां
वाः। तस्य संमुखे यात्रा न कर्तव्या,संग्रामोन कर्तव्यः॥२०॥
ग्रहभेद नाम जो गूढाख्य है यह दिन गत्रिमें अर्द्ध प्रहरमें
आग्नेय दिशासे छठी छठी दिशाका घात • करता है । यथा-प्रथम
प्रहरसे आरंभ करके पहले यामाईमें आग्नेयका, दूसरेमें उत्तरका, तीस.
में नर्ऋत्यका. चौयेमें पूर्वका, पांचवेंमें गयध्यका; छठेमें दक्षि-
णका, सातवेंमें ईशानका और आठमें पश्चिम दिशाका दिनमें और
ऐसे ही रात्रिमें घात करता है । अतएव रणमें इसके सन्मुख यात्रा
शुभ नहीं होती है ॥ २० ॥

(४.०१)
समरसारं-.
गूढापराख्यकेतुहतदिग्विदिश आह ।
गूढाख्योऽप्रहरैराग्नेयीतस्तथा दिवा निशि चें।
पष्ठी षष्ठी हन्यात् तन्मुखयात्रा शुभी ने रणे ॥२०॥
--
---
.
गूढाख्यः गूढनामग्रहभेदः अष्टभिरईप्रहरैः आनेयीतः
अग्निकोणतः दिवा दिवसे निशि रात्री वा पष्ठीं पष्ठों दिशहन्यात्
घावयेत् । वत्सम्मुखं यात्रा शुभा न स्यात् । संग्रामे एतन्न
शुभम् । तदेव प्रकटयति।प्रथमेऽर्दयामे गूढोआमेयी दिशहन्ति ।
द्वितीयेऽईयामे उत्तर दिशं हन्ति । पञ्चमेऽर्दयामे नैर्ऋत्यां
दिशं हन्ति । चतुर्थे'ईयामे पूर्वी दिशं हन्ति । पञ्चमेऽर्द्धयामे
वायवी दिश हन्ति । पप्ठेऽईयामे दक्षिण दिशं हंति । सप्तमेऽई-
यामे ईशान दिशहन्ति । अष्टमेऽर्दयामे पश्चिमां दिश हन्ति । एवं
रात्रावपि ज्ञेयाः । एता दिशो विदिशश्च दिवानिश युदयात्रायां
वाः। तस्य संमुखे यात्रा न कर्तव्या,संग्रामोन कर्तव्यः॥२०॥
,
ग्रहभेद नाम जो गूढाख्य है यह दिन मंत्रिमें अर्द्ध प्रहरमें
आग्नेय दिशासे छठी छठी दिशाका घात करता है । यथा-प्रथम
प्रहरसे आरंभ करके पहले यामाईमें आग्नेयका, दूसरेमें उत्तरका, तीस.
रमें नर्गत्यका. चौथेमें पूर्वका, पांचवेमें गयच्यका, छठेमें दक्षि-
णका, सातमें ईशानका और आठमें पश्चिम दिशाफा दिनमें और
ऐसे ही रात्रिमें घात करता है । अतएव रणमें इसके सन्मुख यात्रा
शुभ नहीं होती है ॥ २०॥

समरसार-
गूढापरायकेतुहतदिग्विदिश आह ।
गूढाख्योऽप्रेहरैराग्नेयीतस्तथा दिवा निशि चें।
पष्ठी षष्ठी हन्यात् तन्मुखयात्रा शुभी ने रणे ॥२०॥
--
गूढाख्यः गूढनामग्रहभेदः अष्टभिरईप्रहरैः आग्नेयीतः
अमिकोणतः दिवा दिवसे निशि रात्रौ वा पष्ठीं पष्ठों दिशहन्याद
घावयेत् । वत्सम्मुखं यात्रा शुभा न स्यात् । संग्रामे एवन्न
शुभम् । तदेव प्रकटयति।प्रथमेऽईयामे गूढोआग्रेयी दिशहन्ति।
द्वितीयेऽईयामे उत्तर दिशं हन्ति । पञ्चमेर्दयामे नैर्ऋत्यां
दिशं हन्ति । चतुर्थैर्द्धयामे पूर्वी दिशं हन्ति । पञ्चमेऽर्द्धयामे
वायवी दिर्श हन्ति । पष्ठेऽईयामे दक्षिण दिशं हंति । सप्तमेऽर्द्ध-
यामे ईशान दिशहन्ति । अष्टमेऽईयामे पश्चिमां दिश हन्ति । एवं
रात्रावपि ज्ञेयाः । एता दिशो विदिशश्च दिवानिरा युदयात्रायां
वाः। तस्य संमुखे यात्रा न कर्तव्या,सयामोन कर्तव्यः॥२०॥
t.
ग्रहभेद नाम जो गूढाख्य है यह दिन गनिमें अई प्रहरमें
आग्नेय दिशासे छठी छठी दिशाका घात - करता है । यया-प्रयम
प्रहरसे आरंभ फरके पहले यामाईमें आग्नेयका, दूसरेमें उत्तरका, तीस
में नपका. चौयेमें पूर्वका, पांचवेमें गययका, छठेमें दक्षि-
णका, सातवेंमें ईशानका और आठवे में पश्चिम दिशाफा दिनमें और
ऐसे ही रात्रिमें घात करता है । अवएत रणमें इसके सन्मुख यात्रा
शुभ नहीं होती है ॥ २०॥

संस्कृतटीका-भोपाटीकासमेतम् । गूढचक्रम् । पूर्व ४३१२ आ. ७.१५ उदाहरण । यथा-रामको रणके निमित्त दक्षिण यात्रा करनी है तो दिन वा रात्रिमें तीसरे प्रहरका उत्तराई त्यागकर यात्रा करनी उचित है। रणके अतिरिक्त मल्लयुद्ध वा द्यूत आदिमें भी यह बल उपयोगी है. ६।१४ पश्चि. ८।१६ ३।११ रविचन्द्रयो पृष्ठदिगादिस्थितौ जयपराजयौ चाह । पृष्ठेऽकों' यदि दक्षिापे पुरतश्छायाँथ वामें जयः कित्व वहतीह यायिनि विधी वादस्थिने स्थायि- नि । छाया पृष्ठगदक्षिणी निशि शशी' वामेऽग्रतो वो जयो यातुश्चन्द्रवः" परस्य तु खेमिः शशीटः क्षयी ॥२१॥ यायिनः स्थायिनोऽपि अर्को यदि दिने पृष्ठे, स्वपृष्ठप्र- देशे दक्षिणप्रदेशे स्यानदा छाया पुरतः स्वायप्रदेशे वामनदेशे वा पतेत् तदा यायिस्थायिनोर्जयः। किन्त्वयं विशेषः । अर्के वहति दक्षिणभागस्थे पिंगलास्परविनाडयां प्राणवायौ वहत्यर्के च पृष्ठदक्षस्थे यायिनि जयो न स्थायिनि । पृष्ठदक्षिणस्थेकें विधौचन्द्रमसि वाहस्थिते वहति वामभागस्थेडारुपचन्द्रनाडयां प्राणवायौ.वहति स्थायिनि जयः । निशि रात्रौ तु शशी

समरसारं-:
गूढापराख्यकेतुहतदिग्विदिश आहे।
गूढाख्योऽप्रेहरैराग्नेयीतस्तथा दिवा निशि चें।
पष्टीं पष्ठी हन्यात् तन्मुखयात्राँ शुभी ने रणे ॥२०॥
--
गूढाख्यः गूढनापग्रहभेदः अष्टभिरर्द्धप्रहरैः आग्रेयीवः
अग्निकोणतः दिवा दिवसे निशि रात्रौ वा पछी षष्ठी दिशं हन्यात
घावयेत् । तत्सम्मुखं यात्रा शुभा न स्यात् । संग्रामे एतन्न
शुभम् । तदेव प्रकटयति।प्रथमेऽदयामे गूढोआग्रेयी दिशहन्ति ।
द्वितीयेऽर्दयामे उत्तर दिशं हन्ति । पञ्चमेदयामे नैर्ऋत्यां
दिशं हन्ति । चतुर्थे यामे पूर्वी दिशं हन्ति । पञ्चमेऽर्द्धयामे
वायवी दिश हन्ति । पठेऽर्द्धयामे दक्षिण दिशं हंति । सप्तमेऽर्द्ध-
यामे ईशान दिशं हन्ति । अष्टमेऽर्द्धयामे पश्चिमां दिश हन्ति । एवं
रात्रावपि ज्ञेयाः । एता दिशो विदिशश्च दिवानिश युद्धयात्रायां
वाः। तस्य संमुखे यात्रा न कर्तव्या,संयामो न कर्तव्यः॥२०॥
ग्रहभेद नाम जो गूढाख्य है यह दिन रात्रिमें अर्द्ध प्रहरमें
आग्रेय दिशासे छठी छठी दिशाका घात करता है । यथा-प्रथम
प्रहरसे आरंभ करके पहले यामाईमें आग्नेयका, दूसरेमें उत्ताका, तीप्स
में नेत्यका. चौयेमें पूर्वका, पांचवेमें गयध्यका, छठेमें दक्षि-
णका, सातवेंमें ईशानका और आठमें पश्चिम दिशाका दिनमें और
ऐसे ही रात्रिमें घात करता है । अवएस रणमें इसके सन्मुख यात्रा
शुभ नहीं होती है ॥ २०॥

संस्कृतटीका-भोपाटीकासमेतम् । (४१) गूढचकम् । ७१५ पूर्व ११२ + + + उदाहरण । यथा-रामको रण के निमित्त दक्षिण यात्रा करनी है तो दिन वा रात्रिमें तीसरे प्रहरका उत्तरार्द्ध | त्यागकर यात्रा करनो उचित है। रणके अतिरिक्त मल्लयुद्ध वा द्यूत आदिमें भी यह चल उपयोगी है. द ६१४ શ૧૦ वा. पश्चि.८१६ रविचन्द्रयोःपृष्ठदिगादिस्थितौ जयपराजयौ चाह । पृष्ठेऽकर्को' यदि दक्षिापे पुरतश्छायाँथ वामें जयः कित्व वस्तीह यायिनि"विधौ वादस्थिते स्थायि- नि । छाया पृष्ठगदक्षिणी निशि शशी' वामेऽग्रतो वो जयो यातुश्चन्द्रवहे" परस्य तु खेमिः शशीटः क्षयी ॥२१॥ यायिनः स्थायिनोऽपि अकों यदि दिने पृष्ठे, स्वपृष्ठम- देशे दक्षिणपदेशे स्यानदा छाया पुरतः स्वायप्रदेशे वामप्रदेशे वा पवेत् तदा यायिस्थायिनोर्जयः। किन्त्वयं विशेषः । अर्के वह ति दक्षिणभागस्थे पिंगलास्परविनाड्यां प्राणवायौ वहत्य च पृष्ठदक्षस्थे यायिति जयो न स्थायिनि । पृष्ठदक्षिणस्थेकें विधौ चन्द्रमसि वाहस्थिते वहति वामभागस्थेडारुपचन्द्रनाडयां प्राणवायौ.वहति स्थायिनि जयः । निशि रात्री तु शशी ४२) समरसारं, चन्द्रो निजवामे अग्रतो वा चेत्तदा छाया स्वपृष्ठदेशे स्वदक्षिण- प्रदेशे च गच्छति तदा यायिस्थायिनोजयः। किंत्वयं विशेपः। वामायतो गते चन्द्रे चन्द्रनाडी वहति च यातुजयो न स्थायिनः। परस्य स्थायिनस्तु घामायगे पेत्सर्यनाडीवहति च न यायिनः। क्षयी क्षीणः शशी चन्द्रो वाम एवेष्टः ॥ २१ ॥ यदि सूर्य पृष्ठभाग (पीठपीछे ) या दक्षिण भागमें हो तो छाया आगे वा बांयी तर्फ होती है । उस समय युद्ध करनेसे स्थायी और याची दोनोंका जय होता है। किंतु यदि उस समय सूर्यनाड़ी दक्षिण स्वर चलता होगा तो यायी (चलनेवाले) का जय होता है। और. चन्द्र वामस्वर चलता होगा तो स्थायी (स्थिर रहनेवाले) का जय होता है । ऐसे ही गत्रिमें चन्द्रमा बाँयो तर्फ वा आगे हो तो छाया दक्षिण वा पृष्ठ भागमें होती है । उस समय युद्ध करनेसे दोनोंका जय होता है। किंतु यदि उस समय चन्द्रनाड़ी वामस्वर चलता होगा तो यायी और सूर्यनाड़ी दक्षिणस्वर चलता होगा तो स्थायी राजाका जय होता है । और क्षीण चन्द्रमा वाम भागमें शुभ होता है ।। २१ ॥ उदाहरण । सूर्य-गमके पृष्ठभाग और रावणके दक्षिण भागमें होनेसे छाया अग्रभाग और वामभागमें है सो दोनोंका जय प्राप्त होता है, किन्तु रामका स्वर दक्षिण चल रहा है । अर्थात् नासिका दक्षिणछिद्रसे श्वास चल रहा है अतएव रामचन्द्रका ही जय होगा । मल्लयुद्धादिमें भी यह उपयोगी हो सकता है । प्रागादिदिगवस्थिवचंद्रवशात्स्थायियायिनोर्जयपराजयम् । प्राचीमुदीची वा चन्द्र गते स्थायी जयी भवेत् । प्रतीचीदक्षिणादिवस्थे यायी विजयमाप्नुयात्॥२२.

. संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेवम् । (१३) प्राची पूर्वदिशं गते चन्द्रे उदीचीम् उत्तर दिशं गते चन्द्रे उत्तरायणे च सति तदा स्थायी जयी भवेत् । प्रतीची पश्चिमा दिक् दक्षिणा अवाची दिक् ते प्रति गते चन्द्रे दक्षिणायने सति तदा यायिनो जयो भवेत् ॥ २२ ॥ पूर्व और उत्तर दिशामें चन्द्र हो तो स्थायी राजाका जय होता है । और दक्षिण तथा पश्चिम गत चन्द्र हो तो यायी राजाका जय होता है ॥ २२ ॥ वायुबलमाह । वायुः पृष्ठे दक्षिणे च वहन्सुचयते बलम् । सम्मुखीनच वामश्च भटानां भङ्गसूचकः ॥ २३ ॥ पृष्ठे दक्षे च वहन् वायुर्वलं सूचयते । यथा प्राङ्मुखस्य पाश्चात्यो दक्षिणात्यो वायुबलसूचकः । संमुखीनः सम्मुखे वहन्वामश्च भटानां योधानां भंगं पराजयं सूचयति ॥ २३ ॥ द्वंद्वयुद्धके समय पीठकी ओर और दक्षिण भागकी और वायु चले. तो युद्ध करनेवाले को बल देती है। और सम्मुख तथा वामभागकी वायु चलै तो योद्धाओके भंग होनेकी सूचना देती है ॥ २३ ॥ उदाहरण । यथा-पूर्वकी और और पश्चिमकी ओर मुख करके युद्ध करते समय यदि पश्चिम वा दक्षिणकी ओरसे हवा चल रही हो ता पूर्वकी ओर मुख करके जो युद्ध करता है उसीका जय होगा। यह वायु वल मल्लयुद्धमें विशेष उपयोगी है ॥ २३ ॥ राहुबलमाह । प्राग्वातान्तकशम्भुपाशिहुतभुपौलस्त्यरक्षोदिशो यामारगुरहि पाशिककुभोऽसौ पष्टिपटी निशि।

(४४) समरसार- ; पृष्ठे दक्षिणतः शुभो द्विषंटिकोऽसौ तुर्यो- बजेनीशीवाक्पवनेन्द्रराक्षसहिमग्वनिप्रतीचीदिशा२४ अगुः राहुः अह्नि दिने पार पूर्वदिशं प्रथमेऽर्द्धप्रहरे याति । द्वितीयाईप्रहरे राहुर्वायुदिशं याति । तृतीयाईपहरे अन्तकदिशं-दक्षिण दिशं याति । चतुर्थेईप्रहरे शम्भुदिशम् ईशानकोणं याति । पंचमेर्दयामे पश्चिम दिशं याति । पष्ठे- ईप्रहरे हुतभुग्दिशम् अग्निकोणं याति । सप्तमेईपहरे पौल- स्त्यदिशम् उत्तर दिशं याति । अष्टमेद्धप्रहरे रक्षोदिशं निति- दिशं याति । एवं दिनेप्यर्दयामराहुः। अथ पाशिककुभः पाशी वरुणस्तस्य दिशं पश्चिमां दिशमारभ्य निशि रात्रौ पष्ठी पष्ठी' 'दिशं याति राहुः । तत्र क्रममाह--रात्रौ प्रथमाईप्रहरमारस्य पश्चिमाग्निकोणोत्तरनत्यपूर्ववायुदक्षिणेशानेपु राहुर्याति । अयं पृष्ठे दक्षिणतः शुभः । असौ द्विघटिको राहुः तुर्यतुर्यां चतुर्थी चतुर्थी दिशं ब्रजति । तस्य क्रममाह--ईशानकोणे, अवाचि दक्षिणस्यां, पवने वायुकोणे,इन्द्रे पूर्वस्यादिशि,राक्षसे निति- कोणे, हिमगोरुत्तरे, अग्रिकोणे, प्रतीच्यां च, एतासु दिक्षु पटिकायेन एकैकां दिशं याति । पुनर्मध्याह्नोत्तरसंध्यावधि एवं वसनमः ॥ २४ ॥ राहुः-दिनमें-पूर्व, वायु, दक्षिण, ईशान, पश्चिम, अग्नेि, और नत्य इन.दिशाओंमें क्रमसे आधी आधी प्रहरमें जाता है - उत्तर संस्कृतटीका--भापाटोकासमेतम् । (४५) और यही राहु रात्रिमें-आधी आधी प्रहरमें पश्चिम दिशासे आरंभ करके छठी छठी दिशामें जाता है । यह पृष्ठ तथा दक्षिण शुभ होता है। और यही राहु-ईशान चौथी चौथी दिशा अर्थात-ईशान दक्षिण, वायु, पूर्व, नैर्ऋत्य. उत्तर, अग्नि और पश्चिम दिशाओंमें दोदो घडीमें गमन करता है ॥ २४ ॥ -- दिवारांहुचक्रम। निशि गहुचक्रम् । द्विघटिकं राहुचक्रम् । ई ४/ पूर्व १ अ२ पूर्व ७-८ घडी अ.१३ १४ उत्त. 10 दक्षि ३ उत्तर एवमव क्रमेण दक्षि. १५ मध्याहोत्तर ३-४ १२ चमति ३ वा,२/पश्चि.५/ने ८वा.६ प १ ar.५ ६ १० । उदाहरण । रंगनाथजीको पूर्वदिशामें जाना है । अतएव राहुबल प्राप्त होनेके लिये मातःकालमे दूसरी और तीसरे प्रहरके पूर्ग में वा रात्रि में पहली और चौथी के पूर्वार्द्ध में गमन करना शुभ है । अथवा शघ्रिता हो तो प्रातःकालसे तीसरी चौथी वा पन्द्रहवीं सोलहवीं घडीमें गमन करना भी श्रेष्ठ है । ग्रूत आदिमें भी राहुबल देखना आवश्यक है ॥ २४ ॥ योगिनीबलमाह । प्राक्सोमानलरक्षोऽवाक्पाशीरेशदिक्षु दर्शान्तैः । तिथिमिस्तिथिपदतोऽईप्रहरै रिनबर्ग योगिनी शस्तों ॥२५॥ २ F (४६) समरसारं- प्राक् पूर्वदिक्, सोम उत्तरदिक्; अनलदिगनिकोणः, रक्षोदिक् नैऋत्य कोणः, अवाक् दक्षिणा दिक्, पाशी पश्चिमा दिकू, इरो वायुदिक्, ईशा ईशान दिक् एतासु दिक्षु प्रतिपद- मान्य दर्शान्तैः तिथिभियोगिनी भ्रमति । तदाह-प्रति- पन्नवम्यां पूर्वदिशि, द्वितीयादशम्यां चोत्तरदिशि, तृतीय का- दश्यां चाग्निकोणे, चतुर्थी द्वादश्यां च नितिकोणे, पंचम्यां त्रयोदश्यां च दक्षिणस्यां दिशि, पष्ठयां चतुर्दश्यां च पश्चि- मायां, सप्तम्यां पूर्णिमायां च वायच्याम्, अष्टम्याममायां चैशान- कोणे पोगिनी चमति । तिथिपदतः तिथिस्थानात् अर्द्धप्रह- योगिनी अष्टसु अईप्रहरेषु पूर्वक्रमेणैव भ्रमति । सा योगिनी इनषत् सूर्यवत् पृष्ठदक्षिणतः शुभा भवति ।। २५ ॥ प्रातेपदासे आदि लेकर अमावस पर्यन्त पूर्व, उत्तर, अग्नि, नैर्ऋत्य, दक्षिण, पश्चिम, वायव्य और ईशान इस क्रमसे इन दिशाओं- में योगिनी भ्रमण करती है । अर्थात् प्रतिपदा और नवमीको पूर्वमें, २-१० को उत्तरम, ३-११ को अग्निमें ४-१२ को नेऋत्यमें, ५.-१३ को दक्षिणमें, ६-१४ पश्चिममें, ७-१५ को वायव्यमें और ८-३० को ईशानमें योगिनी रहती है। और तिथिके आरम्भसे लेकर अष्टमांश प्रमाण आधी आधी प्रहरसे उपरोक्त दिशाक्रमानुसार एकही तिथिमें आठों दिशाओमें योगिनी भ्रमण करती है। और सूर्यकी तरह पृष्ठकी तथा दक्षिणयोगिनी शुभ होता है ॥ २५ ॥ उदाहरण । रंगनाथजी प्रयोदशीको पूर्वकी यात्रा करेंगे अतएव १३ को योगिनीका निवास दाक्षण दिशामें दाहिना है तो श्रेष्ठ है । यदि .

संस्कवटीका--भापाटीकासमेतम् । (४७)
त्रयोदशीको न जाय और दशमीको ही जाना पड़े तो उस दिन पूर्वमें
योगिनी संमुख होनेसे शुभ नहीं है । किन्तु तिथिपदतः इसके
अनुसार दशमीकी तीसरी प्रहरके पूर्वार्द्धम दक्षिण और उतरार्द्धमें
'पश्चिममें योगिनी रहती है । अतएव उस समय गमन करनेसे योगिनी
चल श्रेष्ठ रहता है ॥ २५ ॥
३-यामा
योगिनीवासचक्रम् । तिथिपदतो योगिनीचरूम।
ईशा. तिथि-१-९/ ३-११ यामा १-यामा
पूर्व
ईशान
अग्नि
प्रतिनिधी
-यामा-
द.५-११
ई उत्तर
अष्टमाशेन
भ्रमनि।
उत्तर
५-यामा
द्धदक्षिण
वाय.
पश्चि
नैऋ
७-या
वायव्य
६-यामार्द्ध | ४-या
पाश्रम, नैऋत्य-
योगिनीनामान्याह।
ब्राह्मी कौमारी वाराही वैष्णव्यथैन्द्री च । स्याचं.
डिका च माहे धरी महालक्ष्म्यभिख्या च ॥ २६ ॥
ब्राह्मा, कौमारी, वाराही, वैष्णवी, ऐन्द्री, चाण्डका, माहेश्वरी और
महालक्ष्मी यह प्रतिपदादि क्रमसे उनके नाम हैं ॥ २६ ॥
राहुयुक्तयोगिनीषलप्रशंसामाह ।
पृष्ठे दक्षे योगिनी राहुयुक्तां यस्यैको ये शर्चुला
निहन्ति । श्रेष्ठं सर्वेभ्यो" बलेभ्यस्तदेतत् संक्षेपों"
ऽये सर्वसारो"ऽभ्यधायि" ॥२७॥

((.४८) समरसारं. पृष्ठे पृष्ठभागे, दक्षे दक्षिणभागे राहुयुक्ता योगिनी यस्य भवेदयम् एकः शूरः शत्रूणां लक्षं निहन्ति मारयति । तदे- तद्योगिनीराहुबलं सर्वेश्यः श्रेष्ठम् । मया अयं संक्षेपः सर्वसारः सर्वबलसारः अध्यधायि कथितः एतद्वचनं राहुयोगिन्योः प्रशंसामात्रमेव ॥ २७ ॥ जिसके राहुयुक्त योगिनी पृष्ठकी या दक्षिण होय तो वह मनुष्य अकेला ही लाख शओको मार सकता है। अतएव यह राहुयो- गिनी बल सब बलोंसे श्रेष्ठ है। मैंने इसको सबका सार लेकर संक्षेपसे कहा है ॥ २७ ॥ उदाहरण । श्रीमान् देवीसिंह महोदय चैतकृष्ण पञ्चमीको उत्तर यात्रा करेंगे । अतएव यदि उस दिन एक प्रहर दिन चढे पछि दूसरे प्रहरके पूर्वार्द्ध में गमन करें तो राहुयुक्त योगिनी पीठ पीछेकी होगी और. इसका फल बहुत उत्तम है ॥ २७ ॥ रव्यादिवारेषु युद्धे वान्कालाईप्रहरानाह । हालान्तकाभसख-यामदलैस्तु कालैः सूर्यादिवासर- गतो युधि वर्जनीयः । भासारमेतिदल यामदलानि भानुवारक्रमादपि नरः स्वहितार्थमुज्झेत् ॥ २० ॥ युधि संग्रामे हा ८-लां ३-त ६ का १-भ ४-स७-ख २- यामदलैः । अष्टविरसचन्द्रवेदशैलाश्विप्रमितैः यामदलैः यामाः कालः कालवेलाख्यः । सूर्यादिवासरगतः वर्जनीयः। रवि- वासरे अष्टमोऽर्द्धप्रहरस्त्याज्यः, चन्द्रे तृतीयाईप्रहरस्त्याज्यः, , .

- संस्कृतटीका-भाराटीकासमेतम् । (४९) भौमे पष्ठोऽईप्रहरस्त्याज्यः, बुधे प्रथमोऽर्द्धप्रहरस्त्याज्यः, गुरौ चतुर्थोऽईप्रहरस्त्याज्यः, शुक्रे सप्तमोऽईप्रहरस्त्याज्यः, शनौ द्वितीयोऽर्द्धप्रहरस्त्याज्यः कालवेलाख्योईप्रहरः युद्ध वर्जनीयः, भा४-सा ७-र २-मे ५-६८-ल ३-ति६-यासदलानि भानुवार- कमानरःस्वहितार्थमुज्झेत् । रविवारे चतुर्थोऽदयामस्त्याज्यः । चन्द्रे सप्तमोर्दयामरत्याज्यः, भौमे द्वितीयः, बुधे पंचमः, गुरौ अष्टमः, शुक्रे तृतीयः, शनौ पष्ठः । एतेऽर्द्धयामाः संग्रामे सदा त्याज्याः ॥ २८ ॥ - सूर्य आदि वारोंमें क्रमसे ह ८- ३- त ६-क १-भ ४-म-" ख २ यह अईयाम अर्थात् रविवारको आठवां यापाई, चंद्र को तीसरा, मंगलको छठा, बुधको प्रथम, गुरुको चौथा, शुक्र को सात और शनिको दूसरा अर्द्धयाम काल युद्धर्मे वर्जनीय है । और सूर्यादिवारोंमें कपसे भा ४-सा ७-१२-मे ५-द८-ल३-ति ६-इन प्रहरोंका अर्याद सूर्पको चौथा, चंद्रको सातवां, भौमको दूसरा, वुधको पांचवां, गुरुको अाठवां, शुक्रको तीसरा और शनिको छठा अर्द्धयाम काल अपने हितके निमित्त त्यागदेना उचित है ॥ २८ ॥ 1 अईयामकालचक्रम् । ॐइयामकालचक्रम् । हाल ३न भ.स सभागार न शनि. 4. यु 1 प श रा प सु Pr

(५०)
समरसारं-
उदाहरण
यया-विहारी लालजी मुनीम शुकको विताऊ जायेंगे अतपय
युद्धविध यो साता प्रहराई और अपनी शुभकामनाके निमित्त उस
दिन तीसरा पहराई त्याग करके जाना चाहिये ॥ २८॥
वारेशमैन्यां विनिवेश्य पश्येत्प्रदक्षिणस्थानगान्
क्रमेणे। यामाई भोगाच्छनिस्ति यस्यां यदा न
यात्किभंत ता ॥२९॥
..
वारविरोपेऽईयामभोगः शन्पाक्रान्त स्वतदिग्वर्जनमाह ।
वारे वारस्वामिनं सूयिम् ऐन्द्रयां पूर्वस्यां दिशि विनिवेश्य
संस्थाप्प । अपरान् वासरान् क्रमेण प्रदक्षिणतः पश्येत् विचार-
येत् । उक्तं च-यो वारो वर्तमानो भवति तं वासरं पूर्वस्यां दिशि
संस्थाप्य अग्रिमवारम् अगिकोणे, तदयिमं दक्षिणे, तदग्रिम
नैनबत्ये, तदधिर्म पश्चिमे, तदपि वायव्ये, तदयिममुत्रे,
तदधिममीशाने एवं वारान् पश्येत् । एवं न्यासे हवे सति यस्यां
दिशि शनिर्भवति सा दिल पूर्वतः कियती वसंख्याके अर्द्ध
प्रहरे वां ककुभं दिशं वर्जयेत् । तत्र युद्धार्थ न गच्छेत् ॥२९॥
सूर्यादि वारों में जो वारेश हो उसको पूर्व दिशा में स्थापन करे
और उसने आगेके वारेशोंको प्रदक्षिण क्रमसे और दिशाओंमें देखे
तो जिस दिशामें शनि हो उस दिशा पूर्वसे आदि लेकर उस
दिशातक जितनी संख्या हो उस संख्या प्रमित अमहरमें उस दिशामें
नहीं जाना चाहिये ॥ २९ ॥

संस्कवटीका-मामाटोकासमेवम् । (५१)
32260
ककुभदिक्चक्रम् ।
उदाहरण ।
यथा-चैत्र कृष्ण
पंचमी गृहस्पति
सूपू
वारकी श्रीमान्
सेठ खेमराजजी
दक्षिणयात्रा करें
गे। अतः उस दिन
वारेश 'बृहस्पतिको
पूर्वमें स्थापन कर
शुवा ६
वृप ५
नेसे पूर्व में वृहस्पति, अग्निमें शुक्र और दक्षिणमें शनि दीखता है और
पूर्वसे दक्षिणतक दिशासंख्या ३ है । अतएव इस दिन तीसरे प्रहरादौ
इस दिशामें नहीं जाना चाहिये ॥ २१॥
युद्धे वा होरामाह।
वारारम्भादेव्याखानो माप्ताश्च वारपौधोगः ।
रविसिनबुधेन्दुशनिगुरुभौमानामरिखगस्य सवि३ि०
वारारम्भात्-वारस्य आरम्भात् वारपवृत्तिमारराय यावत्यो
घटिकाः गच्छन्ति वाः खाना द्विगुणिताः कार्याः । पुनः
माप्ताः पंचभक्ता वारपादोरा भवन्ति । तत्र वारगणनायां कम-
रविः १- सितः २-बुधः ३- इन्दुः ४- शनिः ५ -गुरुः ६
। भौमः ७ एतेषां होराः कमेण भवन्ति । साईद्वयप टिका-
प्रमाणा सा होरा- अरेः खगस्य शत्रुयहस्य वा यो योदर्भ
। गच्छति तस्य राशेः स्वामी यो ग्रहो भवति वस्य यः शत्रुपको
भवति तस्य होरां युद्ध वर्जयेत् ॥ ३० ॥

.
-
संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । ((५३),
अतएव उपरोक्त गणनानुसार जिस दिन जिस समय सूर्य, चन्द्र,
मंगलकी होरा हो उस समय युद्धमें नहीं जाना चाहिये ॥ ३० ॥
वामांसेऽत्र विरुद्धयामदलजः प्राग्भागके गूढजो
राहाः स्यात्तुं कुचाधरे श्रुतिशिरोहस्ते प्रहारो वेग
चन्द्रादास्यभुजव्ये प्रहरणं शत्रुग्रहस्यापि तु..
स्यौदातः किल होरयो हदि मुखेखङ्गादियुद्धे ध्रुव ।।
विरुद्धयामगूढराहुरव्यादिपु युद्धाचरणे प्रहरस्थलान्याह, । .
वाईप्रहरादो एपु अजेयु युद्धे घातौ भवति । तदाह- विरुद्ध-
यामदलजः विरुद्धं यामदलं यामाई तस्मिनातः विरुद्धयाम-
दलजः प्रहारः-योदुः वामांसे वामस्कन्धे स्यात् । गूढजा
अर्धप्रहरजः प्राग्भागके शरीरपूर्वभागके स्यात् । राहोरर्धामजा
कुचाधरे कुचयोः अधरप्रदेशे च स्यात् । रखेः हवा दिक
श्रुतिशिरोहस्ते घातं करोति । चन्द्राचन्द्रहता दिक् भुजद्वये
घावं करोति । शत्रुग्रहस्य होरा हृदि मुखे च घातं करोति ।
खङ्गा
शादियुद्धसमये धुवं निश्चयेन ज्ञेयम् ॥ ३ ॥
युद्धके समय उपरोक्त यामार्द्ध, रवि, राहु आदिमें यदि यामार्द
विरुद्ध हो अर्थात् श्रेष्ठ न हो तो शरीरके वामस्कन्दमें, गृह विरुद्ध हो
तो शरीरके ऊर्श्वभाग,राहु विरुद्ध हो तो कुर्चीपर, सूर्य विरुद्ध हो
तो कान शिर और हार्थोपर, चन्द्रमा विरुद्ध हों तो सम्मुख तथा
दोनों मुजाऔपर और होरा विरुद्ध हो अर्थात् शखग्रहकी होरा हो
चो मुख और हृदयपर खड्गादिके युद्ध में निश्चय प्रहार होता है ॥२१॥

(५४) समरसारं- उदाहरण । उपरोक्त घातव्यवस्था दो प्रकारसे संघटित होती है। एक तो यह कि विरुद्ध यामादिमें आये हुए युद्धप्रवृत्त योद्धाके लिये दैवज्ञसे कोई पूछे कि इसके अङ्गमें कहांर घात होगा तो वह पहले ही कह सकता है कि अमुक स्थानपर घात होगा । अर्थात् जैसे सन्मुख सूर्य में गया है तो कान, शिर और हार्थोपर प्रहार होगा । इत्यादि । और दूसरे यह भी है कि, अपना शत्रु यदि विरुद्ध यामादिमें आया है और वह विरुद्धताअपनेको विदित है तो उक्त स्थानपर घात. करनेसे शत्रु पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है । यथा राहु विरुद्धमें आया है तो कुचोंपर घात करनेसे अधिक प्रभाव पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त-मल्लयुद्धमें अनुकल यामदलादिमें उपस्थित एक मल्लको, यदि दूतरे मल्लका विरुद्ध यामदलादिमें उपस्थित होना विदित है तो वह उक्त स्थानों में च ट लगानेसे विजयीहो,सकता है। यया- चन्द्र विरुद्ध हो तो मुख ओर हृदयपर चोट मारनेसे दूसरा मल्ल शीघ्र पराजित हो सकताहै ॥ ३१॥ ग्रहस्थित्या प्रहारस्थलान्याह । लग्नाद्राशेश्च पुंसः करिपुकपिनयाधोदभामातसंस्थाः खेटी हन्युनवापि द्विपमथ सहसाँ मूर्ध्नि वैके सह- के । वक्षाजे चोरुदेशे" गुर्दै इति तदर्नु ग्रन्थि- दो गण्डभागे" वास्तुः सुनुः स काले खलसमनि, शगैः कर्णकण्ठे शये च ॥३२॥ . "लमादाशव पुसः शशि १ रवि १२ शिव "दिग् १. व्योमगो द्वीप ८ वेद ४ स्थानेष्वर्ष ५ ई ६ संस्था रविशशिकुजवित्यूग्यशुकादिखेटाः । पातं कुर्युर्यथोकाः विसिव बदने हत् देशे स मूर्धि वक्षस्यूरुपदेशे गुद इति तदनु प्रथिदोगेंडभागे ॥ ३२. विपाठान्ताम् ।

संस्कतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (५५) - पुंसः पुरुषस्य जन्मल नाव जन्मराशेश्च क १-रिपु १२- कपि १,१-नया १०-धो ९-द ८-भा ४-मा ५-त ६ एषु प्रथम, द्वादशैकादश, दशम, -नवाट, -चतुर्थ, पंचम, -पष्ठेषु स्थानेषु स्थिताः नवापि खेटाः रव्या दिग्रहाः मल्लयुद्धे एवंगेयु अवयवेषु द्विपं शत्रु कमात् मूर्ध्नि मस्तक, वक्के मुखे, सहृत्के सहृदयमुखे, वक्षोजे स्वने, ऊरुदेशे, गुदे, तदनु पश्चात् ग्रन्थ्यो, दोर्भुजे, गंडभागे कपोले शत्रुम् एतेषु शरीरस्थानेषु यहाः घावं कुर्युः । उतंच-यो योद्धा युद्धं कर्तुं प्रवृत्तस्तस्य जन्मराशिस्थो भास्करो भवति स तस्य शत्रोः मस्तके घातं करोति । योबु- जन्मराशितो द्वादशे जन्मलग्रतो द्वादशे वा चन्द्रः स्थितो भवति तदा तस्य शत्रोः मुखे घातं करोति । यदा योद्धः एकादशे भौमः स्थितो भवति तदा तस्य शत्रोः हृदये घातं करोति । यदा योद्धः दशमे बुधग्रहो भवति तदा तस्य शत्रोः वक्षःस्थले घातं करोति । यदा योधुर्नवमे गुरुग्रहो भवति तदा तस्य शत्रोः ऊरुदेशे पातं करोति । यदा योद्धरष्टमे भृगुग्रहो भवति तदा तस्य शत्रोः गण्डभागे घातं करोति । यदा योद्धश्चतुर्थे शनिग्रहो भवति तदा वस्य शत्रोः गुदे घातं करोति । यदा योद्धः पंचमे राहुः स्थितो भवति तदा तस्य शत्रोः भुजायां घातं करोति । यदा योद्धः पष्ठे केतुग्रहो भवति तदा तत्य शत्रोः कपोले घातं करोति । वास्तुः सूनुः; सकालः, ख २-ल ३-स ७-मनिशगः कर्ण-कण्ठे राये च । युद्धं कर्तुं प्रवृत्तस्य वास्तुः वास्तु स्वामी गृहारंभलन- स्वामी गृहप्रवेशलनस्वामी वा ग्रहः खगतः द्वितीयस्थाने स्थिवः म समरसार- तदा तस्य शत्रोः कर्णे घातं करोति । युद्धं कर्तुं प्रवृत्तस्य सूनुः जेष्ठपुत्रोत्पत्तिलग्नेशस्तु ग्रहः ले-तृतीये स्थितस्तदा तस्य शत्रोः कुंठे घातं करोति । योद्धः सकालराशेः अष्टमस्वामी समः सप्तम- स्तदा तस्य शत्रोः अनिशं निरन्तरं शये हस्तपृष्ठे च. घातं करोति.। इति ॥ ३२ ॥ युद्ध करनेवालेको जन्मलग्न वा जन्मराशिसे 'युद्ध के समय ' सूर्या- दिग्रह के १-पु १२ कापे ११-नय १०-ध ९-द -भा ४- मा ५-त ६-इन स्थानोंमें हों तो क्रमसे शत्रुके मस्तक, मुख, हृदय वक्षःस्थल, अरु, गुहा, ग्रन्थि, भुन और कपोल इनमें घात.करती हैं। अर्थात् अपने जन्मलग्न वा जन्मराशिप्से सूर्य प्रथम हो तो शत्रुके मस्त. कमें, चन्द्रमा बारहवें हो तो मुखपर, भौम ग्यारहवें हो तो हृदयमें बुध दश हो तो. वक्षस्थल, (कुचस्थार ) में, गुरु नौवें हो तो ऊरू (जंगल) में; शुक्र आठवें हो तो गुदापर, शनि चौथे हो तो ग्रन्यिभाग (गोड़ों) में राहु पांचवें हो तो भुजाओंपर और केतु छठे हो तो कपोल (गालोपर) सहा घात करता है । और गेहारम्भ या गृहप्रवेश लग्न का स्वामो उस समय दूसरे हो तो कानोंपर, ज्येष्ठ पुत्रके जन्म उनका स्वामी तीसरे हो तो कंठोंपर और अपना अष्टमेश सातवें हो तो शत्रुके हाथ और पीठ पर निरन्तर घात. करता है !! ३२॥ - : उदाहरण । यथा लेक्षणनिहका राशीश मंगल युदके समय कुंभशशिर होनेन लक्ष्मणसिंहको ग्यारहवां है अतएव यह शत्रुके हृदयमें घात करता है ! वास्तु-गृहप्रवेशलग्न वृपका स्वामी शुक्र युद्ध के समय वृषका . होनेसे लक्ष्मणसिंहको दूमरा है अतएव यह शत्रुके कानोंपर घात करता है। लक्ष्म 'हिके ज्येष्ठ पुत्रका जन्मलग्नेश सूर्य युद्धके समय मिथुन का होनेसे संस्कृतटीका-पापाटीकासमेतम् । लक्ष्मणसिंहको तीसग है अतएव यह शत्रुके कंठोंमें बात करता है। और अष्टमेश युद्ध के समय तुलाराशिका होनेसे लक्ष्मणसिंहको साता: है अतएव यह शत्रुके पीउपर निरन्तर घात करता है ॥ ३२॥ जन्मलमा जन्मराशेर्वा ग्रहस्थितिवशारीरघातचक्रम् । १० ८ ४ ३ १ सू ९ गु ६ २ के | वा च मे श दस्तयो इति समरसारे गूढयामाद्धयोगिन्यादिसहमहारलक्षण- कथनप्रकरणम् । युद्धेऽहिचक्र विरुद्धत्याज्यनक्षत्राण्याह । आर्द्रादिभिस्त्रिनाड्यांमहिचकें यद्ये फनाड्यां स्युः । नामाकंचन्द्रभानि प्रयने तदहस्त्यजेयत्नात् ॥३३॥ आर्द्रादिभिरिति । यस्मिन दिने आाटिनक्षत्रैर्नारीचयनि मिताहिचके एकस्यां नाडयां जन्मभं नामभं वा सूर्याधिष्ठित भं चन्दाधिष्ठित में च त्रीण्यपि स्युस्तदहस्तद्दिनं प्रधने युद्धे यत्नात्यजेत् । यत्रा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफ ल्गुनी, अनु- राधा, ज्येष्ठा, धनिष्ठा, शतभिषक्, भरणी, कृत्तिका एतानि नक्षत्राणि एकनाडोस्थानि ९, पुनर्वसु-मघा-हस्व-विशाखा मूल-श्रवण-पूर्वाभाद्रपदा-अश्विनी-रोहिणोति द्वितोपनाडीस्था भानि ९, शेषाणि युप-श्ठेशा-चिधा-स्वाती-पूर्वापाढोत्तरापा- ढोत्तराभाद्रपदारेवती-मृगशीर्षाणि भानि तृतीयनाडीस्थानि ।

समरसार- अत्र-एकनाड्यां. नामार्क चन्द्रभाति यस्मिन्दिने त्रीण्यपि एकस्यां नाडयां स्युस्व दिने युद्ध वयमित्यर्थः ॥ ३३॥ आर्द्रा आदि नक्षत्रोंसे नीचे लिखे अनुसार तीन नाडीका अहि (सर्प) चक्र बनावे । उस चक्रमें यदि एकही नाडीमें नामनक्षत्र यह सूर्यनक्षत्र और चन्दनक्षत्र यह तीनों जिस दिन हो तो वह दिन युद्ध यात्रामें यत्लसे त्याग देना चाहिये + ॥ ३३ ॥ उदाहरण । यथा-चैत्र शुक्ल सप्तमी बुधवार मुगशिर नत्रक्षके दिन 'गजसिंहका जन्मनक्षत्र चित्रा. और सूर्य नक्षत्र रेवती, एवं चंद्रनशन मृगशिर है तो यह तीनों नक्षत्रही अंतिम ( तीसरी) एक नाडीमें स्थित है अतएव राजसिंहको युद्धपात्राके निमित्त यह दिन त्यागदेना चाहिये ॥ ३३ ।। , वारदिक्शूलमाह । शनिचन्द्रौ' गुरुः मूर्यमिता कुजबुधौं त्यजेत । चतुर्दिक्षु निपिद्धार्द्धयामें शूलं विशेपतः ॥३४॥ शनिचन्द्रो वारौ पूर्वस्यां त्यजेत् । गुरु दक्षिणस्यांत्यजेत् । रविभृगुवारी पश्चिमायां त्यजेत् । भौमबुधवारौ उत्तरस्यां त्यजेत् । चतुर्दिक्षु एवं क्रमेण ज्ञातव्यम् । निषिदाईयामे यस्मिन् वासरे योऽध्यामो निपिद्धो भवति स त्याज्यो. भवति + यह सर्पाकार एकनारीचक युद्धयात्राके सिवाय अन्यत्र भी देखा जाता है. ।

--- संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (५९) । तस्मिन्नईयामे वारशूले च गमनं विशेपण वर्जयेत् । उक्त च-शनिवासरे पष्ठे यामाई, चन्द्रवासरे सप्तमे यामार्दै पूर्वस्यां दिशि न गच्छेत् । रविवासरे चतुर्थेऽर्द्धयामे, शुक्रवासरेतृतीय- यामा पश्चिमां दिशं न गच्छेत् । गुरुवासरे अष्टमयामाः 'दक्षिणां दिशन गच्छेत् । भौमवासरे द्वितीययामार्दु, बुधवासरे पंचमयामार्दै उत्तरां दिशं न गच्छेत् । एतेऽईप्रहराः विशेषतो वाः, सामान्यतस्तु तदिनानि सकलान्येव वानि ॥३४॥ शनिवार व सोमवारको पूर्वमें, गुरुवारको दक्षिणमें, रविवार व शुक्र- वारको पश्चिममें और मंगलवार व बुखारको उत्तरमें नहीं जाना चाहिये और जिन वारोंके जो निपे अर्द्धयाम हों उनमें दिकशूलको विशेष. कर त्याग देना चाहिये। नथा-शनि को छठे और चन्द्र को मातवें यामा- ईमें पूर्वमें नहीं जाना चाहिये । गुरुको आठवें यामादमें दक्षिगमें नहीं जाना चाहिये । सूर्यको चौये, शुक्रको तीसरे यामार्द्धमें पश्चिममें नहीं जाना चाहिये । और मंगलको इमरे तथा बुधको पांच यामा. दमें उत्तरमें नहीं जाना चाहिये ॥ ३४ ॥ उदाहरण । दिशूलचक्रम् । गणेशप्रसाद मिश्र गुरुवारको श.च.पू ६-७ दक्षिणमें जाना दक्षिण चाहत हैं किन्तु उस दिन दक्षिणमें दिग्शल रहनेसे वह दिन सम्पूर्णः निपिद्ध है। दिक + + + + Q. भौ. ८ सू शु.प.४-३ 7 समरसार- शूलमें बहुधा लोग वारप्रवृत्ति से दोप. मानकर सूयोदयसे.घड़ी दो घडी आगे पीछे.भेज देते हैं। किन्तु ऐसा नहीं करना चाहिये । दिकला :, दिमें सूर्योदयसे ही वागरंभ मानना चाहिये । यदि गणेश प्रसादको, गुरुवारके दिनही जाना आवश्यक हो तो आठवां अर्द्धयाम त्यागकर फिर जाना चाहिये ॥ ३४ ॥ नवग्रहाणां स्वस्वभुज्यमाननक्षत्रेऽश्चिन्यादि- सप्तविंशतिनक्षत्राणामवान्तरभोगमाह । धीनों भभुक्तनाइयो नखाप्तिपरिशेपयोग सदपि। तत्काले शशिभमिति व्यायां गतिनुतिलवस्तु घटिकेह ॥ ३९॥ भभुक्तनाइयो नक्षत्रस्य भुक्तघटिकाः धीना नवगुणिताः कार्याः ततो नखाता विंशतिभक्ताः कार्या। यल्लभ्यते. तानि गतनक्षत्राणि भवन्ति । तन्नक्षत्रमारस्य यन्नक्षत्र दिने भवति । यत्परिशिष्टं भवति तत्तात्कालिकनक्षत्रं ज्ञातव्यम् । एवंतात्का लिक-शशिभमिति-तत्कालिकचन्द्रनक्षत्र प्रमाण भानोः सर्व- संघटिकाः सप्तविंशतिभिर्भाजिताः । लब्धे सति नक्षत्रयटिका भाजिता गतं भवेत् । खगानां सर्वघटिकाः पूर्वोक्तसहिता भवन्ति । : गतिनुतिलवः नक्षत्रगतिः । यावत्सूर्यभौमादीनां अहाणां या सर्वविटिका भवन्ति घटयात्मकं प्रमाणं भवति- तासां पष्टयराघटिका प्रमाणं भवति । एवं याः घटिका नक्षत्रस्य गता भवन्ति ताः घटिकाप्रमाणेन भाजयेत्,-या गवघटिकाः संस्कतटीका-भापाटीकासमेतम् । (६१) भवन्ति, वा धीना नवगुणिता नसाप्ताः लब्धं गवनक्षत्राणि भवन्ति, शेपं वर्तमानं भवति । एवं सूर्यचन्द्रौ विचारणीयौ कस्मिन्नक्षत्रे तात्कालिको भवेतामित्यर्थः । सूर्यादिभोग्यनक्ष- त्राणां वद्भोम्यफालः षष्टयंशः ॥ ३५॥ मिस किसी नक्षत्रपर कोईनी ग्रह जितने समयतक स्थित होता है उतने ही समयम उस एकही नक्षत्रके बीचमें सत्ताइसा नक्षत्रोंके अन्तरभोग होते है । नक्षत्रपर जिस समय ग्रह स्थित हो उस समय से लेकर अपने इष्टके समयता जितना व्यतीत हुआ हो वह भयात होता है। और आरम्भसे अन्ततक जितना नक्षत्र हो वह भभोग होता है। एवं भभोगमें ६० का भाग देने जा लब्धि हो वह पष्टयश होता हे। V 'भभोग चाहे घटयात्मक (पूरा ६० घटी वा न्यूनाधिक) हो, चाहे दिनात्मक हो और चाहे मासात्मक हो-उ । सम्पूर्ण मानको ६० धटी और उसके पष्टयशको एक घटी मानकर उस पट्यंशा भयातमें भाग देना चाहिय । स्मरण रखनेकी बात है कि, भयान और पष्टयंश दोनोंकी रिपल करके भाग देना चा.ये । भाग ने जो लब्नि हो वह भभुक्त नाडी होती है । उन भभुक नाडियों को नौसे गुणाकर बीसका भाग देनसे जो लब्धि हो वह ग्रह के मान नक्षसे आरम्भ कर गणना करनेते गत नक्षत्र होते है। और जो शेरहो वह वर्तमान नक्षत्र होते है । तात्कालिक चन्द्र नक्षत्रसे और इसी प्रकार सूर्यादि ग्रहों के नक्षत्रसे प्रत्येक नक्षत्र में सब नक्षों के अन्तरभोग होते है ॥ ३५ ॥ उदाहरण । संवत् १९६७ शके १८३२ कार्तिक कृष्णाष्टमी मङ्गलवारको ४९ घटी २१ पलके इष्टपर चन्द्रसूर्यफे नक्षनावरभाग जानते हैं । अतः उ,

.
(६२)
समरसारं-
दिन पुनर्वसु २। ५६ और दूसरे दिन पुष्प १।७ है । अतएव चन्द्र
नक्षत्र पुष्पमें अन्तरभोग जाननेके निमित्त उपरोक्त इष्टपर- गणितकर-
नेसे ४६ घटी ३५ पल भयात । ५८ घटी ११ पल भभोग और
घटो ५८ पल ११ विपल पटयंश आता है । इस पष्टवंश ५८११ के
विपलपिण्ड ३४९१ का भयान ४६१२५ के विपलपिण्ड १६७१०० में
भाग दिया तो ४७११२ भभुक्तताड़ी प्राप्त हुई । इन ४७१५२ भभुक्त
नाड़ियों को नौसे गुणा किया तो ४३०१४८ हुए। इनमें २० का भाग
दिया तो २१ लब्ध हुए और १०४८ शेष रहे। यहां वर्तमान पुष्य.
नक्षत्र है अतएव पुरुषसे लेकर अश्विनीतक २१ अन्तरभोगहो चुके
और वर्तमान भरणी है।
इसी प्रकार सूर्यनक्षत्रका अन्तरभोग देखना है तो कार्तिक कृष्ण
५ रविवारको १९५८ के समय स्वाती पर सूर्य आया है और कार्तिक
शुक्ल गचिारको ६।३२ पर्यन्त रहा है । अतएव इस सम्पूर्ण काल
को पटियालक मा के गणित करनेसे सूर्य का-२ दिन घटी १३
पल भगत । १३ दिन १७ घटी २४ पल भमोगा। और १३ घटी
१७ पल १५पिल षष्टयश आता है। इस १३१७१२५ पटवंशके
विपलपिण्ड ४७८४४ का-नयात २१०११३ के विपलपिण्ड ४३२७.
८० में भाग दिया तो ९३३ भभुक्त नाडी प्राप्त हुई। इन ९ । ३
भभुक्त न.डिपोंको नोसे गुणा किया तो ८२७ हुर-इनमें २० का
भाग दिया तो ४ लन्ध और ११०७ शेप रहे । यहां सूर्य का वर्तमान
नक्षत्र स्वाती हैं । अतः स्वातीसे ज्येष्ठातक ४ अन्ताभोग हो चुके
और वर्तमान मूल है । स्माण रखने की बात है कि जिस ग्रहमा जो
वर्तमान नक्षत्र हो उसीसे गिनना चाहिये अश्विनीसे कदापि नहीं
गिनना चाहिये बस इसी प्रकार भोमादि सब ग्रहोंके होसकते हैं ।
यहां कवर सूर्यचन्द्रका ही प्रयोजन है। इसलिये और ग्रहों के उदा.
इरण नहीं दिये हैं ॥ ३५॥

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चनाधिष्ठितपुष्यनक्षत्रस्यांतर्भागचक्रम् ।
का कृ८
४५६७८
ke|१२.३.४/१५/१६ १७ १८ १९२०२।
लम उचिस्वा वि| 74मूपउ, श्रधशापू] 33 भकृरा मृ"पु
ગે
मंस्रुवटीका-भापाटीकासमेवम् ।
सूर्याधिष्ठितस्वातिनक्षत्रस्यांत गचक्रम ।
१
२३४
स्वा विज्येमपूश्रधशपू उर अभकरो मुआ"श्लम पूह चि
(६३)

१६) समरसारं-..
राहुकालानलचक्रमाह ।
पक्षों' जीवों वलितगतिनी राहुणेतोडुलोका गम्यो
ऽस्तस्तद्युतमुडुशयं कर्तरीग्रस्तसं । स्थायीनो'
याय्युडुपतिरि मौ जीवगौ तजयाय प्रेताजग्धं
किमपि तु वरं कर्तरी जग्धतश्च ॥ ३६॥
वलिता विपरीता वक्रा गतिर्यस्य तादृशेन राहुणा इवा
भुक्ता ये उडूनां नक्षत्राणो लोकास्त्रयोदश जीवपक्षः । राहुः
भुक्तत्रयोदशभानि जीवपक्षसंज्ञानि स्युरित्यर्थः ।गम्यस्तु त्रयो-
दशनक्षत्रात्मकः पक्षोऽस्तो मृतसंज्ञकः । तेन राहुणा युतमुडु
नक्षत्र कर्तरी संज्ञम्, शयं पंचदशं तु यस्तसंज्ञ स्पात् । स्थायी
इनः स्यों ज्ञेयः । यायो उडुपतिश्चन्द्रो ज्ञेयः । इमौ खीन्दू
जीवपक्षे गतौ तयोः स्थायियायिनोः क्रमाज्जयाय भवतः ।
धीन भैत्यादि पूर्वश्लोकोक्तरीत्या नीतयोस्तनक्षत्रस्थितरवी-
दोस्तु तत्कालं जयपराजयज्ञानम् । तान्मृतनक्षत्रात् जग्धं
यस्तं पंचदशं नक्षत्रं किञ्चिदरं श्रेष्ठम् । जग्धाद्मस्ताकर्तरीसंज्ञ
राहुभुज्यमान में श्रेष्ठ मित्यर्थः । इति राहुकालानलः ॥३६॥
राहुके वर्तमान नक्षत्रको छोड़कर विलोम गणना करके तेरह
नक्षत्र जीवपक्षके, तया करगणनासे आगेके तेरह नक्षत्र मृतपक्ष के
और राहुयुक्त नक्षत्र कर्तरी तथा उससे पन्द्रहवां नक्षत्र प्रस्तसक
होता है । इनमेंते जीवपक्ष के नक्षत्रों में यदि सूर्य हो तो स्थायी और
चन्द्र हो तो यायोका जय होता है । शेष मृत, ग्रस्त, कर्तरीमें-मृतसे
ग्रस्त अच्छा होता है और प्रस्तसे कर्तरी अच्छा होताहै ॥ ३६ ॥

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । , - उदाहरण । यथा-संवत् १९६८ श्रावण शुक्ल एकादशी शनिवारको अश्विनी पर राहु, जेष्ठापर चन्द्रमा और श्लैपापर सूर्य है । अतः अश्विनी नक्षत्र- पर राहु होनेसे अश्विनी कर्तरोंसंज्ञक और भरणी, कृत्तिका, रोहिणी मृगशिर, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्प, श्लेपा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त और चित्रा यह १३ भुक्त नक्षत्र जीवपक्षके है । एवं रेवती, उत्तराभाद्रपद, पूर्वाभाद्रपद, शतभिषा, धनिष्ठा, श्रवण, अभि- जित, उत्तराषाढ, पूर्वापाढ, मूल, ज्येष्ठ , अनुगधा और विशाखा यह १३ भाग्यनक्षत्र मृतपक्षके हैं । तथा स्वाती ग्रस्तसंज्ञक है ॥ यहाँ इस दिन चन्द्रमा जष्ठानक्षत्र पर होनेसे मृतपक्षका है। और सूर्य श्लेषा नक्षत्रपर होनेसे जीवपक्षका है, अतः स्थायीका विजय आता है। यदि इसी दिन यायीका विजय देखना हो तो "धीप्राभभुक्त" के अनुसार इस दिन १५।२२ के इष्टपर जेष्ठानक्षत्रमें १७ अन्दरभोग व्यतीत हो जानेसे जेष्ठासे पुनर्वसु तक १७ अन्ताभोग हो चुके और वर्तमान पुष्यका भोग है, अतएव पुष्य जीवपक्षमें आ जानेसे १५।२२ के समय यायीको विजय प्राप्तहो सकता है ॥ ३६ ॥ अश्विनीकर्तरी। राहुकालानलचक्रम् । प्रस्त स्वाती भक रोममा पुपु श्लेम उहावि भुक्त ११२३४५६७८९/१०/११११३/१३ म. उपशधश्रम उपम जे नुवि भा ३/४/५/६/७/८/९/१०/११/१२/१३ स समरसारं नामनक्षत्रज्ञानायावकहडचक्र माह । शुण्ठीकोष्ठेघु तिर्यक् त्ववकइडलिखांधःस्थिताली- विंदाचस्तान्युक्तस्तैः स्वरेश्च क्रमत इहे कुयुग्धं छो मध्यकोष्ठे । धैर्धेरूध्वाधरालीष्वनलभते इहासार्पण भंपादों एवं चान्ये दद्यान्मटपरत- पुयुकपण्णठौं मध्यकोष्ठे ॥३७॥ पितृभत इति भानि चाद्विदैवें नयभजखाश्चै तथा भुयुग्धैफौ- है। हरिभैमवधिरत्रमेवतः स्युगसदचलों वसुभाँ- दुयुक्थझः ॥ ३८॥ .. शुंठीकोष्ठेषु पंचविंशतिकोष्ठेषु तिर्यामार्गेण अवकहइड ति पंचवर्णान् लिख । दधःस्थितपंक्तिपु उक्तैः कथितैः तदायैः स्वरैः तान्वर्णान्मतः संयोज्य लिख । इह अत्र चक्रे मध्य- कोष्ठे कुयुक् घङछा लेख्याः । इकारायैः स्वरैस्वेपां वर्णानां योगः कथं कर्तव्यः १ तत्राह-अ व क ह ढ' एतेषु इकार संयोगेन इ वि कि हि डि' भवेत् । एवम् उकारसंयोगेन' उ वु कुहु दु' भवेत् । एवमेकारसंयोगेन 'ए वे के हे डे' भवेत् । एवमोकारसंयोगेन 'ओ वो को हो डो' भवेत् । एवं पंचर्वि- शतिकोष्ठेषु वर्णाः लेख्याः यत्र मध्यकोष्ठेषु कुकारः वत्र घडछा लेख्याः । धैर्धेश्चतुभिचतुर्भिर्वणः अनलभतः आसा

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संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (६७)
प्टेषान्तं भपादा नक्षत्रचरणाः भवन्ति । यथा-अ इ उ ए कति
कापादाः,ओवा वि वुरोहिणीपादाः,वे वो का की मृगशिरा-
पादाः, कु घ छ आपिादाः, के को ह ही पुनर्वसुपादा हु
हे हो डा पुष्यपादार, डिडुडे डो श्लेपापादाः। एवमन्येपामपि ।
एवं च अनेन प्रकारेण अन्येषु पंचविंशतिकोष्ठेषु मटपरतःवर्णा
स्टेस्पाः । पुनः इकरायैः स्वरैर्युक्ताः कार्याः। अथ तबाह-
मि टि पि रि ति, मुटु पु रु तु, मे टे पेरे ने, मोटो पोरो
तो। एवं क्रमेण वर्णा लेख्याः । यत्र मध्यकोष्ठे पुकार-तत्र
पणठा लेख्याः । पितृभतः मघामारभ्य आद्विदैवं विशाख
चतुभिर्वर्गः नक्षत्राणि भवन्ति । तथा च नयभजखा लेख्या।।
पूर्वोक्तकमेण इकारायैः स्वौर्युक्ता वर्णा लेख्याः। कथा तबाद-
नि यि मि जि खि, नु यु भुजु खु, ने ये भेजे खे, नो यो
भो जो खो। यत्र कोठेपु भुकारः तत्र धफडा लेख्याः ।मैक
मनुराधामारस्य हरिभमवधिः श्रवणपर्यन्तं चतुर्भिश्चतुर्भिवणः
नक्षत्राणि भवन्ति । पुनः गसदचलास्तथैवलेख्याः । पुनरिका
रापैः सरैः संयुक्ता लेख्याः । कथं वाह-गि सि दि चि लि,
गु सदु चु लु, गे से दे चे ले, गो सो दो चो लो। एवंषत्र
कारः तत्र थझत्रवर्णा लेख्याः । एवं वसुभादनिष्ठाताभरणी
पर्यन्तं नक्षत्राणि भवन्ति ॥ ३७ ॥ ३८ ॥

(६८) समरसारं- पांच पांच कोठोंकी पांच पंक्ति बनानेसे पच्चीस कोठक बन जावे है। उन (१) पञ्चसि कोठोंका प्रथम पंक्तिमें अ-व-क-ह-ड लिखें! और उसके नीचेकी पंक्तियोंमें अ के नीचे इ-उ-ए-ओ-लिखकर 'व. कह ड को इ आदि स्वरोंसे युक्त करके लिखें । और इनके मध्य कोठमें जहाँ “ कु" लिखा है उसमें 'घङ' लिखें तो ऐसा लिखनेसे उधिः पंक्तियोंमें कृत्तिकासे आदि लेकर श्लेषापर्यन्त चार चार चरणं गत वर्ण हो जाते हैं (२) ऐसे ही फिर पच्चीस कोठोमें म-ट प. स्त-लिखकर उनके नीचेकी पंक्तियों में इनको इ आदि स्वरोंसे युक्त कर लिखें । और इनके वीचके 'पु' युक्त कोष्ठमें 'पणत ' लिखें तो मघासे लेकर विशाखा तक उसीप्रकार चरणगत वर्ण होते हैं । (३) फिर ऐसे ही पच्चीस कोठोंमें न-य-भ-ज-ख लिखकर इनके नीचे की पंक्तियों में इनको इ आदि स्वरोंसे युक्त लिखें और भु' युक्त कोष्ठमें 'धफट' लिखे तो अनुराधासे लेकर श्रवण तक चरणगत वर्ण होते हैं। (४) और फिर ऐसे ही पच्चीस कोठग-स-द-च-ल-लिखके नीचेकी पंक्तियोंमें इ आदि स्वगेंसे युक्त लिखकर 'हु' युक्त मध्य फोट थान' लिखे तो धनिष्ठासे भरणी तक चरणगत वर्ण होते हैं। (यह सब नाम और नक्षत्र ज्ञानके उपयोगी हैं ) ॥ ३७॥ ३८ ॥ मध्य संस्कवटीका-भापाटीकासमेतम् । (६९) अवकह डक्रम् । क ह म प ट ३४वा AN १ ३ १ ३ ३/४ पु २/ वि ड मि टि kr रि पि ति कि हि ४ मृ ४१ ४ चि AN ३ १ २ म रु उ टु ३/४पू १ ३, ४ रो. णह १-४| २ वे ते टे पे के मे ४म ३ १ ओ रो वो को टो! पो डो | मो हो तो वि ३/४ २ ग स द च य भ ३४ऽश्वि ३ १ ३४ ऽभि थि दि जि | खि गि सि चि | लि 2. २ ३ २ ३ ४३ 684 खु गु झाउ यु..भुधफद जु १-४पू चु चे ले खे से tur न भे गे ३. ४ध ४ऽनु| १ २] है दो गो सो जो खो चोलो ३४भ भो नो । यो २ (७०) समरसारं- - . उदाहरण । इस चक्रसे नाम और नक्षत्रका सम्यक ज्ञान होनेके निमित्त सब अक्षरोंके पास एक, दो, तीन चार संख्या लगाकर चार चार संख्याके अन्तरपर नक्षत्रका नाम रख दिया है, इससे नाम नक्षत्र और राशि देखनमें सुगमता होती है । यया-प्रथम कोष्ठ अ को १ संख्या है वो उसके नीचे २ । ३ । ४ । होनेसे अ इ उ ए कृत्तिका नक्षत्र होता है। इसी प्रकार नाम देखना हो तो अच्युत, ईश्वर, ऊर्ध्वबाहु, एफनती, नाम कृत्तिकाके होते हैं। ऐसे ही और भी देखे जाते हैं ॥ ३७ ॥ ३८॥ इति समरसारे नामनक्षत्रज्ञानादिप्रकरणम् । हंसचारोक्तिपूर्वकं स्वरबलज्ञानमाह । नागैर्हनिधिज्ञाश्रयनशुमितेः श्वासपायकै वोत्यभ्रं वातोऽनलोम्वुक्षितिरपृथगुपयन्तगधोप्यु - वे । व्यत्यासाचीवनीतो हृदयकमलजे पत्र एकत्र- तेन श्वासौ नानाधिसंख्याननरसँकमलेऽहनिशीस्त्रि- भैमोऽत्र ॥ ३९॥ हृदयकमले अष्टदले पूर्वदिशातः एकैकस्मिन्दले पत्रे एकव- गर्दे मूलमारस्य नागैः त्रिशद्भिः श्वासपर्यापकैः अधम् आकाश- बत्वं चलति । कथं वाति अपृथकवाति संलग्नमेव संधौ वाति। पुनर्नीचः ६० पष्टिसंस्पैः श्वासपर्यापैः उपार ऊर्द्ध वानी वायु- वत्तं वाति चलति । निधि९० मितैनवतिपरिमितैःश्वासपर्यायः संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (७१) अन्तरा तिर्यक् अनलः अमितत्त्वं वाति चलति । पुनः ज्ञाश्रयः १२. विंशत्यधिकशवपारमितैःश्वासपर्यायैःअधोभागे अंबुतत्त्वं जलतत्त्वं वाति चलति । पुनः नशुक १५० मितैःश्वाशपर्यायः ऋजुत्वं शुमार्गे सति क्षितिः पृथ्वीतत्त्वं वाति चलति । पुनः इतराई पत्रायादारस्य अवनीतः मध्यात् पृथ्वीतत्त्वात् व्यत्या- साद्वैपरीत्या पृथ्वीतत्त्वम् ऋजुमार्गेण नशुक १५० मितैः श्वासपर्यायैः वाति चलति । पुनस्तदुपार विंशत्यधिकशत मितैः श्वासपर्यायैः अधोभागे अम्बुतत्त्वं वाति चलति । पुनर्नवतिमितैः श्वासपर्यायैः अन्तरा तिय अमितत्त्वं चलति । पुनः पष्टि- संख्याकैःश्वासपर्यायैः उपरि ऊर्द्ध वायुतत्त्वं चलति । हृदयक- मलजे एकत्रपत्रे एवं क्रमेण स्यात् । प्रथमं कमलस्य पूर्वभागस्थे पत्रे वायुर्वाति । पुनः अग्निकोणस्थे पत्रे वायुर्वाति, पुनः दक्षि- जस्थपत्रे वायुर्वाति । पुनः निऋतिस्थपत्रे वायुर्वाति, पुनः पश्चिमस्थे, पुनः वायव्यस्थे, पुनरुत्तरस्थे, पुनरीशानस्थे पत्रे वायुर्वाति । एवं क्रमेण तत्त्वं चलति । तत्र तत्त्वानां चलने विशेपमाह । आकाशतत्त्वमनंगुलं चलति । चतुरंगुलपर्यंत वायु- तत्वं चलति । अष्टांगुलपर्यंत वह्नितत्त्वं चलति । पोडशांगुल- पर्यंत जलतत्त्वं चलति । द्वादशांगुलपर्यंत पृथ्वीतत्त्वं चलति । तेन वायचलनेन नानाधि ९०० संख्याः श्वासपर्यायाः एक : - ३ - (७२) समरसारं- स्मिन्पत्रे भवन्ति । संपूर्णम्-अष्टदले कमले ननरसिसंख्याः ७२०० द्विसप्ततिशतसंख्याः श्वासपर्यायाः भवन्ति । एकैकस्मि- पत्रे साद्वयघटिकायाः तत्त्वानि चलंति । एवमष्टसु · पत्रेषु विंशतिघटिका भवन्ति । एवमहर्निशोः दिनराग्योः त्रिीमो भवति । विंशतिघटिकाभिः त्रिवारं भ्रमो ज्ञेयः । एवं सम्पूर्ण- महोरात्र त्रिवारचमेण २१६०० निःश्वाससंख्यात्मिका पष्टि- घटिका ज्ञातव्याः । “एकविंशत्सहस्राणि पट्शतानि वथोपरि। हंसहसेति हंसेति जीवो जपति नित्यशः॥” इति ॥ ३९ ॥ .. हृदयमें आउपत्रोंका अष्टदल कमल है । उस कमलके पूर्वादि दिशाक्रमसे प्रथम पत्रमें ३० श्वास चलें इतनी देरतक नासारंध्रसे लगा हुआ आकाशतत्त्व चश्ता है । फिर ६० श्वास चलैं इतनी देरतक उपरकी तर्फ होकर वायुतत्व चलता है । फिर ९० श्वास चलें इतनी देतक तिळ होकर अग्नितत्त्व चलता है । फिर १२० श्वास चले इतनी देरतक अधोरू से जलतत्य चलता है। फिर १५० श्वास चलें इतनी देरतफ सरल मार्गसे पृथ्वीतत्त्व चलता है। यह पत्रके एक तरफमें मूलसे चलकर अपरफो गये हैं। और ऊपरसे चलकर पत्रके दूसरी तर्कमें, इसीप्रकार पृथीतत्त्वसे विपरीत होफर मूलतक चलते हैं। अर्थात् १५० तक पृथ्वी, १२० तक जल, ९० तक अग्नि, ६० वफ वायु और ३० तक आकाश तत्व चलता है। (इस संचालनके / ० ०१५ २ है संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (७३) विषयमें अधो लिखित चक्र और टिप्पणी + देखना बहुत आवश्यक है)। इस भांति यह पांचों तत्व आठों पत्रोंपर चलते है। इनमें एक पत्रकी श्वाससंख्या ९०० अर्थात् अढाई घडी और आगे पत्रोंकी श्वाससंख्या ७२०० अर्थात् बीस घडी होती है । और इनके तीन वार भ्रमण करनेसे अहर्निश (दिनरात्रि) की श्वाससंख्या २१६०० अर्थात् ६० घडी होती हैं ॥ ३९ ॥ ५ आग्नेय ४10 ईशान (१५०४५५० ५२० जज १६ १५०८१०० 11107ज १२० ९० अ ९० ६०वाचा. ३०/३० १०० (५२० जना “เสี่ยง जाआ मा वावा. आ 1001 IN onts 132 4. दक्षिण उत्तर १२० जज १२० AP 018 Ile ik ०६) 1012 ve islete of [ " •เธ•ๆ เ ० . ... • 10te 0 ...८ वायु ohan int पधिम अर्थ. +पृथिव्यापत्तथा तेस्रो पायुराकायमेव च । मग्ये पम्मी मपचाप रहात चानला । तिर्यग्वायुमपाइय नभोवहति संम्मे ।। यामे या दक्षिणे निका । पोग्यांगुलमापा गुस्वेजय चतुपलम् । ३ :- (७४) समरसारं प्रागादिदिक्पत्रगामिनि प्राणवायौ यादृक् चित्तवृत्तिस्तामाह इन्द्रादिदिग्दलचरे श्वमने रणायं भोक्तुं पे ऽथ विषयाय मुंदे गाय । चेतोभवेत्केपयितुं च नृपास्प- दार्य पत्रद्वयान्तरचरे तु मुद परस्म ॥ ४० ॥ इन्दादिदिग्दलचरे श्वसने पूर्वादिदिक्प्रगते वायौ एवं फलं मवेत् । पूर्वपत्र श्वसने वायौ चरति सति रणाय मनो भवेत् । -दादशागुलदीर्घ. स्यामायुयॊमागुलेन हि ॥ ३ ॥ पृथ्वी पीता सित बारि रकवों धनजयः । मारुतो नीलजीमूत आकाशो वर्गपचकः ॥ ४ ॥ पृथिव्यादि- प्रितश्वेन दिनमासान्दके. फलम् । शोभन च तथा दुष्ट व्योममारुतवहिमि ।। ५ ।। पूवीजले शुभे तत्त्वे तेजो मित्रफलोदयम् । हानिमृत्युक्रौ पुंसामुभी हिं व्योम- मारतौ ॥ ६ ॥ पार्थिवे सतत युद्ध सन्धिभवति वाहणे । विजयो वहितत्त्वेन वायो भंगो मृतिस्तु ये ॥ ७ ॥ हसचारस्वरूपेण येन ज्ञान त्रिकालनम् । पयतत्त्वेषु भेदोऽय कथित. पूर्वसूरिभि. ॥ इन सबका आशय यह है कि, पचभूतात्मक मनुष्य शरीरके हृदयमें आठ पोंका एक कमल होता है । उस कमलके पाठो पत्रोपर उपरोक क्रमानुसार प्रदेव दिनरात वायु चलता रहता है । उस वायुमें पृथ्वी, आप, तेज, वायु, आकाश-यह पांचों तत्व उपरोक्त नियमानुसार चलते रहते हैं और इनके सचालनसे प्रकारका शुभाशुभ फल विदित होता है । किन्तु शोचनीय स्थल है कि इनका चावन कैसे विदित होसकता है । यदि प्रात कालसे गतकालका हिसाब लगा. कर केवल उसी के अनुसार तत्त्वसवालन मान लिया जाय तो वास्तविक तत्त्व- शान असभव प्रतीत हो सकता है । अतएव वास्तपिक तत्त्वज्ञान के निमित्त " मध्ये पुप्पी अधधाप:" 'घराशगुलदीपिका " इत्यादिक उपायोका माध्य लेखा समुचित है । यद्यपि बहुत कालतक स्वराभ्यास किये विना सम्यक् तस्वयक नही होता है तथापि जब यह नियम है कि हृदयकमलपर भ्रमण करनेवाला वायु- 1 संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (७५) अग्रिकोणे वायौ चरति भोक्तं मनो भवेत् । दक्षिणपत्रे वायो चरति रुपे क्रोधाय मनो भवेत् । नितिकोणे वायौ चरति विषयभोगाय मनो भवेत् । पश्चिमपत्रे वायौ चलति सति मुदे सन्तोषाय मनो भवेत् । वायुकोणपत्रे वायौ चलति सति गम- नाय मनो भवेत् । उत्तरपत्रे वायौ चलति कपयितुं कपां कर्तु मासिकाके वाम या दक्षिण किसीभी एक छिद्रसे बाहर निकलता रहता है और इसीसे तत्त्वज्ञान किया जासकता है। तब इस कामके लिये उपरोक्त यह, युक्तिया बहुत ही उपयोगी हैं कि नासिकाके दक्षिण वा वाम किसी भी छिद्रसे निकलता हुमा वायु (वास) यदि छिद्र के बीचसे निकलता तो पृथ्वीतर चलता है। यदि छिदके अधोमागसे अर्थात् ऊपरवाले श्रोष्ठको स्पर्श करता हुआ निकलता हो तो जलतत्व चलता है। यदि छिद्र के प्रभागको स्पर्श करता हुआ निकलता हो तो अमितत्त्व चलता है। यदि छिद्रसे तिळ होकर निकलता हो तो वायुतत्त्व चलता है और यदि एकछिद्रसे बढकर क्रमसे दूसरेसे निकलता हो तो आकाशतत्त्व चलता है ऐसा. मानना चाहिये। अपवा सोलह अगुलका एक शंकु बनाकर उसपर ४ अगुव ८ अगुल १२ गुल और १६ अगुलके अन्तरपर हुई वा अत्यन्तमदवायुप्रवाहसे हिल सके ऐसा मोर कुछ पदार्य लगाके उस शकुको अपने हाथमें लेकर नासिकाके दक्षिण वा वाम किसी भी छिदसे श्वास चल रहा हो उसके समीप लगाकरके तत्त्वकी परीक्षा करे। यदि आठ अगुलतक वायु पाहर जाता हो तो पृथ्वीतत्व समझना चाहिये ।। पदि सोलह अगुलतक वायु बाहर जाता हो तो जलतत्त्व समझना चाहिये । यदि चार अगुलतक वायु बाहर जाता हो तो अमितत्त्व समम्ना चाहिये । यरिवारह भंगुलतक बाहर जाता हो तो वायुतत्व समझना चाहिये । यदि अशुल प्रमाणे न हो तो मानाशतत्व समझना चाहिये । इसप्रकार तत्वसंचालन विदित करके शुभाशुभ फड पानना चाहिये।

समरसारं-
मनो भवेत् । ईशानकोणे वायौ चलति सति तदा नृपास्पदाय
मनो भवेत् । पत्रद्यांतरचरे द्वयोः पत्रयोर्मध्ये वायौ चरति
परस्मै मुदे सन्तोपाय मनो भवेत् । एवं सन्धौ चेत्सर्वत्र परस्मै
ज्ञेयः । वायुसाधनं गुरूपदेशादेव बोद्धव्यम् ॥ ४०॥
उस अष्टदल कमलके पूर्व पत्रमें वायु चलता हो तो संग्रामके वास्ते
मन होता है । आने कोणक पत्रपर चलता हो तो भोजन के वास्ते ।
दक्षिण पत्रपर चल रहा हो तो क्रोध करने के वास्ते । नत्य कोणके
पत्रपर चलता हो तो विषय भोगके वास्ते । पश्चिम पत्रपर चलता हो.
तो आनंदके वास्ते । वायुकोणके पत्रपर चलता हो तो गमन करनेके
बास्ते । उत्तर के पत्र र चलता हो तो कृग करने के वास्ते । ईशान
कोणर चलता हो तो राज्यप्राप्तिके वास्ते । और दो पोंक बीचमें
वायु चलता हो तो परमानन्दकी प्राप्ति के लिये मन होता है ॥ ४० ॥
पृथ्व्यादितत्त्ववहनफलमाह ।
J
धराम्बुनी शुभे मंहो विमिश्रितं फलं भवेत् ।
मरुन्नभश्च दुःखदे मते स्वरार्थवेदिभिः ॥ ११ ॥
धरामधुनी तत्त्वे पृथ्वीजलतत्वे शुभौ भवतः । महः अग्नितत्वे
चलने मिभितं फलं भवेत् । मरुद्वायुतत्त्रं नभश्वाकाशतत्त्वम्।एवे
द्वे दत्त्वे दुःख मते इष्टे कथिते इत्यर्थः । कः स्वरार्थवेदिभिः
स्वराणामर्थ वात्सर्वं विदन्ति जानन्ति तैः॥ ४३ ।।
पप्पी मी जलतत्त्वमें शुभ फल होता है । आग्नतत्वमें शुभाशुभ
मिला हुआ फल होता है और वायु क्या आकाशतत्य दुःखदायी होते
है, यह स्वरशास्रके वार्य जाननेगलोंका मत है ॥ ११॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (७७) हत्कमलपत्रेषु रविचंद्रवहनकथनपूर्वक प्राणवायु- संचारेऽर्द्धघंट्यादिज्ञानमाह । द्वे द्वे पत्रे इनेन्दु वह इह तयोः पंच पंचेति घट्यो नाकी गुर्वक्षरोत्तयोऽसुरथ चं नतला सुर्घटी कथ्य- ते । शुक्लादित्रिविघहिमगुरथ रविः प्रत्युपश्चेत् प्रवृत्तः श्रेयः स्यादकनायायदि वहति शिखी पंच- घनैर्मृतिः स्यात् ॥४२॥ दे हे पत्र इति । इनेन्दु सूर्यचन्द्रौ प्रेत्येके दे दे हृत्कमलदले अभिव्याप्प वहतः तयोस्तयोःपत्रयोःसूर्यचन्द्रवहनात पंच पंच घट्यः भवन्ति । नाकी गुर्वक्षरोक्त्या,दशगुर्वक्षरोक्त्या दशगुर्व- क्षरोचारणैरेकासुः प्राणः । कालरूपो भवति । नतला३६° सुः पष्टयुत्तरत्रिशतप्राणपरिमाणैका घटी अत्र शास्त्रे कथ्यते । शुक्लादि शुक्लपक्षमारस्य प्रतिपदादिभिः विभिविभिनर्दि- नैहिमगुश्चन्द्रः प्रत्यूपः प्रातःकाले पंचघटीर्वाति । पुनः पंच घटीरकः । एवं क्रमेणाहोरात्रम् । वदनु चतुर्थ्यादिविदिन रविः पावस्तापति काले वाति । एवं कृष्णपक्षे प्रतिपदादिदिनेष्वर्कः। पुनश्चतुर्थ्यादौ इन्दुः। एवंक्रमेणवाति । एवमुक्तेषु स्वस्वदिनेषु शशिरव्यादिषु-सोमो रविध प्रत्यूषः प्रातःकाले प्रवृत्तः स्यानदा ।

(७८) समरसारं- श्रेयः कल्याण स्यात् । यदि एकस्यां चान्यो सौर्या नाडयां शिखी वह्नितत्त्वं पंचघर्दिनपंचक वहेत् वदा मृत्यु विजानी- यात् । तदुक्तं स्वरोदये-" आदौ चन्द्रस्सिवे पक्षे भास्करस्तु सिवेवरे । प्रतिपादितोऽहानि त्रीणि त्रीणि क्रमोदयः ॥ १॥ चन्द्रोदपे यदा सूर्यश्चन्द्रः सूर्योदये यदा । अशुभं हानिरुदेगः शुभं सर्वे निजोदये ॥२॥ शशाङ्क चारयेदात्री दिवाचार्यों दिवाकरः। इत्ययासरतो नित्यं स योगी नात्र संयशः ॥३॥" ॥ इति ॥४२॥ उपरोक्त अष्टदल कमलके दो दो पत्रोंपर सूर्य चन्द्रमा पांच पांच घडी चलते है । ( यथा दक्षिणनाडीके एक एक पत्रमें अढाई अढाई घडी चलनमे दोनों पत्रोपर पांच पडी सूर्य चलता है। ऐसे ही वाम नाडीके दोने पत्रोंमें पांच घडी चन्द्रमा चलता है। फिर "वैसे ही ५ घडी सूर्य और ५ घडी चंद्रमा चलता है। इस प्रकार २० घडीमें संपूर्ण कमलमें चलकर रात्रिदिनमें तीनवार भ्रमण कर जाते हैं। यहाँ एक घडीका प्रमाण इस प्रकार मानना चाहिये कि-दीर्घ अक्षरके दशवार उच्चारण करनेमें जितना समय लगे उतने समयका एक असु (प्राण वा श्वास) होता है। ऐसे ३६० श्वास जितनी देरमें चलें उतनी देरकी एफ घडी होती है। ऐसी पांच पांच घडोमें सूर्य (दक्षिणावर) चंद्र ( वामस्वर ) चलते हैं। शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे तीन तीन दिन चंद्रमा और सूर्य संस्कृतटीका-भापाटीकासमेवम् । (७१) क्रमसे चलते हैं यदि यह प्रातःकालके समय नियमित दिनों में चलैं तो कल्याणकारक होते हैं । और यदि पांच दिनतक एक नाडीमें अग्नि- तत्व चल तो मृत्यु होजाती है ॥ १२ ॥ शुभपक्षे चन्द्रस्वरज्ञानचक्रम् । चं. चं. चं सू सू सू चं चं चंस सूसू चं चं चंशु भ की तिथि स्वर १२३४५६७/८/९/१०/११/१२/१३/१४/१५/म कृष्णपक्षे सूर्यस्वरज्ञानचक्रम् । सू ससच |चं सससस सू सू शु । स्वर ३ २१२ ८९1०/११/१२/१३/१४/१५म ४ विधोर्दशम्यात्रिषु भास्वतः * (शुक्लपक्षे ) प्रतिपत्तिषु चन्द्रस्य चतुर्थ्यात्रिषु भास्वतः । सप्तम्यादित्रिपु ॥ १॥ ततत्रिषु विधोः प्रावस्यादुदयः स्वे खेरपि । (कृष्णपक्षे ) प्रतिपत्रिषु सूर्यस्य चतुर्थ्यात्रिषु चन्द्रमाः ॥ २ ॥ सप्तम्यादित्रिषु रवैर्दशग्यास्त्रियु चन्द्रमाः । ततत्रिषु रखे. प्रास्यादुदये स्वे शुभे इमौ ॥ ३ ॥ प्रतिप प्रमृतिरेव ज्ञेयः । पचपचपटीमाना देकेकस्य हि यो भवेत् । श्रादी चन्दस्ततस्सूर्यस्सितेऽन्येऽस्तेतो विधुः ॥ ४ ॥ सूचना-इस प्रकरणमें जो तिधिका उदय लिया गया है वह पचागस्य तिथिके उदयानुसार नहीं लेना चाहिये । जिस दिन जो तिमि हो उसीको आजके प्रातःकालसे लेकर कल्ह (आगामी) प्रात:काल पर्यन्त मानना चाहिये । और उन्ही ६० घडियो में उपरोक्त नियमानुसार चन्द्रस्वर और सूर्यस्वरका उदर मानना चाहिये । " सूर्योदयादारभ्य प्रातिएका, न तिभ्युदये (८०) समरसारं- तिथयः । शुक्ले पंचघश्यात्मकस्वरचारचक्रम । प्रतीपदा स्वच सू च सू च सू च सू च सूचस घ ५ ५ म्मच सू चम च सूबसू च सूचसू द्वितीया तृतीया सच सू च सूच सुच सच घ ५५५ चतुर्थी ध स्वसूचसूच सचमुच सूच पचमी घ पठी घ सप्तमी स्वच सु च सूचसू सूच सू ५५५५५ स्वच स च मचम्चसान अष्ठमी नवमी स्वच सू च स च सूचि स च सू च सू घ द्वादशी स्वस च सू चम्प सून सू चे सूच दशमी .५५ ५५ स्व सू च सू च स च सू च सू च सूच एकादशी घ ५५/५५५ ५५/५/५.५.५ स्व सू च सू च सू च सू च घ ५५५५५५ स्वच सूचसूनमच सूच त्रयोदशी घ ११५५५५५५५५५५ स्वच सुसूच सच सूच चतुदशी ५1५ स्वच सूच सुच सू च सूच पूणिमा ५५ رام My1 | 454 E संस्कवटीका भापाटीकासमेवम् ! (I) तिथयः प्रतिपदा कृष्णे पंचघट्यात्मकस्वरचारचक्रम् । स्व. सच सू चं सव.सूचं. सू.चं.स. घा ५/५/५/५/५/५५५५ | स्व.सू सू च सू च.मूच घ.1५/५/५.५ ५/५/५/५/५/५/५/५ स सच सूच च घ. द्वितीया तृतीया 44414144 स्व चतुर्थी घ. ५ सूच सूचमूचस पंचमी घ. पष्ठी च सूचस्वाग ५५ ५ घ स्व सामो स्व.सू च सचमचं सच सच 'म अष्टमी नवमी म्व सूचं सूचि सु च सव घ५ ५.५५५ स्व.च सचं. सू च म च स दशमी ५ ५५ एकादशी स्वच.'माचार द्वादशी घ.५५ ni त्रयोदशी चतुर्दशी 41 स.न.मयं समग मू. ग्रमावस्या (८२). समरसारं- रख्यादिवहने युद्धाद्यारम्भे जयमाह । अर्केऽमितत्त्ववहने हरिदेलयौ य- धेकोऽपि इन्ति सुबईन् किमुतात्र चित्रम् । शून्ये रिपून् स्वपृतनामपि वाहक्षे निक्षिप्य विक्षिपति लक्षमैरीन क्षणेन ।। ४३ ॥ अर्के सूर्यनाड्याम् अग्नितत्त्वं वहति चेचदा. हरिहेलया विष्णुलीलया सिंहलीलया वा एकोऽपि भटः सुबहून्योधान हन्ति अत्र किं चित्रम् किमाश्चर्यम् । शून्ये शून्यनाड्यां रिपून् शत्रू निक्षिप्य संस्थाप्य । स्वपृतनां स्वकीयां सेनां वाहपक्षे या नाडी चलति तत्र निक्षिप्य संस्थाप्य लक्षम् अरीन् शत्रून् एकेन क्षणेन विक्षिपति नाशयति ॥ १३ ॥ यदि सूर्यनाडीमें अग्नितत्त्व चलता हो तो सिंहकी लीलाकी तरह अकेलाभो अच्छे अच्छे बहुत योद्धाओंको मार सकता है । इसमें कोई आश्चर्य नहीं है । और जिस तर्फका स्वर नहीं चलता हो उस तर्फमें शत्रुको और वाहपक्ष अर्थात् जिस तर्फका स्वर चलरहाहो उस तर्फमें अपनी सेनाको स्थापन करे तो क्षणभरमें बहुत शत्रुओं का नाश कर सकता है ॥ ४३ ॥ रच्यादिनाडीवहने प्रश्नविशेषमाह । प्रश्ने चंद्रवहे तु वामगरेणोक्त जयो निश्चित सूर्य दक्षगतेने कृच्छ्विजयी शून्यस्थदूते क्षतिः ।

a - संस्कृवटीका-भापाटीकासमेवम् । (८३) सूर्ये चेदिपमाक्षरीणि शैशिनि ब्रूते समौनि ध्रुवं । जैतीसी पुरतोपि वामग इव स्यात्पृष्ठंगो दक्षिणः॥४४॥ प्रश्नकाले चन्द्रवहे सति चन्द्रनाड्यां वहत्यां सत्यां वाम- भागस्थितनरेण उक्त कथिते सति निश्चितं जयो भवति । सूर्य संगनाड्यां वहत्यां सत्या दक्षिणभागे गतेन नरेण प्रश्न उक्त सति कच्छविजयी कष्टेन विजयी स्यात् । शून्यनाडीभागे स्थित्व चेतः पृच्छति तदा क्षतिर्दा निर्वाच्या । सूर्ये सूर्यवहने दक्षिणनाडीवायौ चलति सति दुतो विपमाक्षराणि ब्रूते कथयति। शशिनि चन्द्रवहे वामनाडीवायो चलति सति समानि अक्षराणि वदति तदा असौ जेता धुवं निश्चयेन जयति । यः पुरतः अग्रतो भूत्वा पृच्छति स वामभागस्थो ज्ञातव्यः । यः पृष्ठगः सन् पृच्छति स दक्षिणभागस्थो ज्ञातव्यः । उक्तंच-"ऊर्ध्वामाग्रतो दूतो ज्ञेयो वामपथस्थितः । पृष्ठे दक्षे तथावस्थादक्षवाहस्थिती मतः ॥ पूर्णनाडीस्थितो दूतो यत्पृच्छतिशुभा शुभम् । तत्सर्व सिदिमायाति शून्ये शून्यं न संशयः ॥ सूर्ये चेद्विपमान्वर्णा- न्समवर्णान्निशाकरे । वाहस्थे भास्करे दूतस्तदा लाभोऽन्यथान हि" इति ॥४४॥ । प्रश्नके समय चंद्रस्वर चलता हो और पृच्छक वाम भागमें रण्डा रोकर पूछे तो निश्चय जय होता है। और सूर्यस्वर चलता हो - (८४) समरसारं- और पृच्छक दक्षिण भागमें खडा होकर पूछे तो कष्टसे जय होता है। यदि शून्यभाग अर्थात् जिस तर्फका स्वर नहीं चलता हो उस तर्फमें खडा होकर पूछे तो हानि होती है । यदि सूर्य (दक्षिण) नाडी विषम और चंद्र (वाम) नाडीमें समाक्षर उच्चारण करे तो अवश्य जय होता है। यहाँ-सम्मुखहो उसको वामभागमें और पृष्ठगत स्थित हो दक्षिणभागमें जानना चाहिये। ४४ ॥ प्रश्ने परं विशेषमाह । प्रश्रेः श्वासांतर्गमे चेयः स्यौद्भङ्गो नियीत्या सूक्ष्मं तदेतत् । लाभः पुत्रादेश्च वाहस्थदूते पृच्छे- त्युक्तः शून्यगे स्यादसिद्धिः ॥ ४५ ॥ प्रष्टम्पस्य निश्श्वासादानाकाले चेत्मष्टा पृच्छेत्तदा तस्य जयः। अनिश्श्वासवायौ निर्याति बहिर्भवति भनः स्यात् । वेदवत्सूक्ष्म स्वरयोगान्वरेण्यः । किंच पुत्रादेः पदार्थस्पेष्टलाभ उक्ता कथमित्याह-वाहस्थेति।दूते पृच्छके वाहस्थे वहन्नाडीप्रेदशसंस्थे सति तथा शून्यस्थे दूते पृच्छति असिद्धिः स्यात् । तथाचो- कम्-" श्वासप्रवेशकाले तु दूतो वाञ्छति जल्पितुम् । वत्स सिद्धिमायाति निर्गमे नास्ति सुन्दरि" इति ॥ ४५ ॥ जिस समय श्वास भीतर जारहाहो उस समय पृच्छक प्रश्न फरे तो जय और बाहर मारहा हो उस समय प्रश्न करे तो हानि होती है। किन्तु यहाँ यह विचार घडा सूक्ष्म है। यदि जिस तर्फका स्वर

(८५)
संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् ।
चारहाहो उस तर्फ खडा होकर पुत्रादिकोंका प्रश्न करे तो लाभ
रोता है । और जिस तर्फका स्वर नहीं चलताहो उस तर्फसे पूछे तो
कार्य नहीं होता है ॥४५॥
* सूर्यचन्द्रनाडीवहने कर्तव्यकाण्याह ।
चंद्रे वेहे नृपविलोकनगेहवेशपट्टाभिषेकमुखैमर्भवे-
च्छुभं यत् । सौरे तुं मजनवधूरतिभुक्तियुद्धमुख्यं
भवेदशुभकर्मफलार्य सत्यमें ॥१६॥
.
चन्द्रे वहे इति । चन्दे वहे चंद्रसम्बन्धिनि वामनाडी-
पहने नृपस्य राज्ञो विलोकनम् गेहप्रवेशो गृहप्रवेशः, पट्टाभिपेको
नृपाणामेवन्मुखम् एतदादिकं यत्कर्म शुभं वत् शस्तं भवेत् ।
सौरे तु सूर्यनाड्यां दक्षवहने तु मजनं स्नानं, वधूरतिः
भुक्ति जनं, युद्धम् एतदादिकं कर्म अशुभं सिद्धयति ।
यत्कर्म तदिह फलदं भवेत् । सत्यमिति बुझ्चनुकूलम् ।
उक्तंच-" यात्राकाले विवाहे च वखालंकारभूपणे । शुभ-
कर्मणि सन्धौ च प्रवेशे च शशी शुभः ॥ १॥ ग्रिहे यूत-
युद्धेषु स्नानभोजनमैथुने । व्यवहारे भये भंगे भानुनाठी प्रश-
स्यते ॥ २॥ होमश्च शांतिकं चैव दिव्यौपधिरसायनम् ।
विद्यारंभ स्थिरं कार्य कर्तव्यं च निशाकरे ॥ ३॥ मारणं
मोहनं स्तंभ विवेपोच्चाटनं वशम् । प्रेरणाफर्पणं क्षोभं भानु-
नाडयुदये कुरु ॥ ४ ॥” इति ॥ ४६ ॥

(८६) समरसारं- चन्द्रस्वरमें राजदर्शन, गृहप्रवेश और राज्याभियेकादि शुमकोंकी सिद्धि होती है और सूर्यस्वरमें-स्नान, स्त्रीसंभाग, भोजन और युद्ध आदि अशुभ कर्मोंकी सिद्धि होती है ॥ ॥ ४६॥ + रतिविधि विक्ास्तत्र त्रीणां मुख्य द्रावणमाह । वहति शशिनि वश्चेिदंगनायो नरस्य द्युमणिमनु कृशानुस्तक काले रतेछु । स्त्रवैति मदनवारां निझर' सार्थं पुंसा यदि शिखिनवनीताशक्तिवैद्भाविता स्यात् ॥ ४७॥ अंगनायाः खियः शशिनि चन्द्रनाड्यां वहति सवि वान जलतत्त्वं चेद्वाति । नरम्य पुरुपस्य युमणिः, सूर्यनाडी तम् अनु लक्षीकत्य कशानुः अमितत्त्वं चेद्वाति । पुरुपस्य सूर्य- नाडीवहने अमितत्वं वाति । तत्र काले रतेपु प्रारम्धेषु सत्स सा योरित् मदनवागं कंदर्पजलानांनिसरं सवति । अथ यदि पुंसा सा योगित् नवनीताशक्तिवद्भागिता स्यात् यथा अग्नि- संयोगे नवनीतं द्रवति तथा पुंसा भापिता वशीकता-योपिन्म- दनजलानां निरं सवति बलहानिर्भवति, योपित्पराजयो भवति, पुरुपस्य जयो भवति ॥ ४७ ॥ + इस स्वर प्रसंगमें जहा नहा चन्दस्वर, सूर्यस्वर, चन्द्रनाडी, सूर्यनाडी,- नन्द वहे. सूर्ये वहे-और चन्द्रचारे सूर्यचारे, इत्यादि वाश्योका जो उपयोग किया गया है इन सबका यही प्रयोजग है कि नाकके दक्षिण और वाम दोनों छिद्रोसे किसी भी एकसे सफी वा सदेर बाहर निकलती रही है । श्रतएव यह हवा दक्षिण हिवसे निकल रही हो तब तो सूर्य और बामछिद्र से निकल रही हे त चन्द्र स्वर जानना चाहिये ।।

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (८७) यदि जिस समय स्वीका चन्द्रस्वर चलरहा हो और उसमें जलतत्त्व चलताहो + और पुरुपका सूर्यस्वर चलरहा हो और उसमें अग्नितत्त्वः चलताहो तो उस समय रति ( मैथुन-संभोग ) करनेसे-जैसे आमसे नवनीत (मक्खन, लुनी घी) गलकर वह जाता है वैसेही वह स्त्री, पुरुषसे दावित होकर मदनजल त्याग करदेतीहै। एवं निर्मल और पराजित होजाती है ॥ १७ ॥ J वशीकरणमाह । सुप्तायां निजवहदुष्णरश्मिनाड्या चंद्रं चेहेनगतं पिबेत्तदानीम् । आमृत्योर्वशर्यति तामियं च कति चन्द्रेण धुमणिवंह मुहुः पिबन्ती ॥ १८ ॥ सुतायाः खियः भर्ता निजबहदुष्णरश्मिनाड्या स्त्रियश्चन्द्रं वहनगतं चन्द्रनाडीवायुं तदानीं पिबेत् । कोऽर्थः ? भर्ती स्वद- क्षिण नाड्या स्त्रियो वामनाडी पिवेत् तदा तां खियं आमृत्योः मृत्युपर्यन्तं वशयति वशीकरोति । इयं च योपित्स्वचंद्रनाडया भर्तुः धुमणिवहं सूर्यनाडीवायुं मुहुः वारं वारं पिबन्ती सती तदा आमृत्योर्मृत्युपर्यन्तं भर्तारं वशयति ॥ ४८ ॥ भर्ताका सूर्यनाडी चलती हो अर्थात् दक्षिणस्वर चलरहा हो अर भर्ताके समीप शयन करतीहुई स्त्रीका चंद्र ( वामस्वर) चल. .. + इन्ही चन्द्रस्वर, सूर्यस्वरों में पृथ्वी, श्र, तेज, वायु और श्राकाश यह पाची तत्त्व उपरोक हसचारोक्तिके नियमानुसार चलते रहते हैं। किंतु इनका अनुलक्ष्य सरलसाध्य नहीं है । मिथ्याहार विहारादि दोषोंसे प्रत चलता अदमी ही यदि नाक पकडकर सिद्धासिद्ध कहने में तत्पर होजाय तो शास्त्रको क्लकित करनेके सिवाय दूसरा फल प्रतीत नहीं होता है।

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(८८)
समरसारं-
रहा हो तो भर्ता अपने दक्षिणस्वासे स्त्रोके वामस्वरका पान करै तो
स्त्री मरणपर्यंत वश होजाती है ऐसे ही यदि स्त्री अपने वामस्वरसे भर्ता
(पति) के दक्षिण स्वरका वारंवार पान करे तो पुरुष मृत्युपर्यंत
वशीभूत होजाताहै ॥४८॥
मदनयुद्धमा ।
मोईनं मदनयुद्धचिरे तत्सुधीरण इवात्र चेदलम् ।
प्रोक्तमेतदुपैतिमैथुनंद्रावयेतेंदबली सुविह्वलाम्॥१९॥
मोहनं सुरतं, बुधाः मदनयुद्धं कंदर्पयुद्धम् ऊचिरे कथया-
मासुः कोऽर्थः-तत्र कंदर्पयुद्ध सुधीः बुधः रणे संग्रामे इव बलम्
आचरेत् अंगीकुर्यात् । यथा रणे स्वरबलविचारः क्रियते तथा
सुरतेऽपि स्वरबलं विचारणीयम् । किं कुर्वन् प्रोक्तं बलं यदा
अंगीकुर्वन् सन् मैथुनं सुरतं उपैति पामोति तदा सुविह्वलाम्
अबलां स्त्रियं द्रावयेत् निर्बलां कुर्यादित्यर्थः ॥ ४९ ॥
सुंदर बुद्धिवाले पण्डित लोग मोहन (स्वीसंयोग) को मदनयुद्ध
कहते हैं । इस युद्धमेंभी संग्रामकी तरह उक्तस्वरबल लेना चाहिये ।
यदि स्वरबल लेकर मैथुन करे तो मदविद्वला अबलाको दावित करके
निर्बल कर सकता है ॥४९॥
J यूवविपये स्वरबलमाह ।
स्वरच्छायोनिलाकन्दुयोगिनीराहुंभूबलैः ।
अन्यैश्च द्यूतमाबनञ्जयत्येव धनं बहु ॥ ५० ॥

संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम्। (८९), - परः बालः कुमारको वर्णस्वराः, छाया सूर्यचन्द्रयो- छाया, अनिलो वायुः, अर्कः सूर्यः, इन्दुः चन्द्रः, योगिनी प्रसिद्धा, राहुभूबलानि च एतेषां बलैः अन्यश्च बलैः काल- चाराईप्रहरहोरादीनां बलान्यादाय तैर्बलैः सहायडूंतं कीटा- विशेषम् आवनन् कुर्वन् वदा बहु धनं जयत्येव ॥ ५० ॥ "ॐहीरणहुंफट्स्वाहा” ( इति यतमंत्रः) । बाल कुमारादि वर्णवर, सूर्यचन्द्रादिकी छाया, वायु, सूर्य, चन्द्र, योगिनी, राहु और भूरल इत्यादि सब बलोंको विचारकर यदि द्यूत- क्रीडा फरै अर्थात् जुआ खेले तो बहुत धनको जीत सकता है ॥ ५० ॥ इति समरसारे तत्वविचारस्वरकथनप्रकरणम् । भक्ष्यधारणादिना जयसाधनान्यौपधान्याह । आस्ये तालजंटाथकेतकिदलंशी चे खाजूंरके मूले- ऽङ्कस्थ इंपुढंगनै संघृतैर्भुक्तैरंजीर्णैश्च तैः । कमायुत्तर- मूलिकानिरशन: पुण्यार्क आत्ता धृता जग्धा वाँ सह तंदुलांबुभिरथो पाठा जटापीहेशी ।। ५१ ॥ आस्पे मुखे तालजटा तालवृक्षस्य मुलं स्थाप्य, केवकीदलं केवकीपत्रं शीर्षे मस्तके धार्यम्, खाजूरके मूले खजूरस्य वृक्षस्य मूळे अंकस्थे सति इषुम्बाणःन उगेत् । अथवा सघतानि इमानि वालमूलं, केतकीपत्रं, खार्जरमूलम् इमानि भुक्तानि यावत् उदरे जीर्णानि न भवंति वावद स च बाणोन लगेत् । कंसारी हींसेति प्रसिद्धा लता,वस्या उत्तरदिक्स्था मूलिका मूळं निरशनैः शना- - (९०) 1. समरसारं-- वुपोष्य पुष्पार्कयोगे आना गृहीता धृता शरीरे । सह तंदुला- बुभिर्जग्धा खादिता वा शरीरे शरीरवारणाय स्यात् । अथः पाठा जटापि । पाठा प्रसिद्धा तन्मूलमपि ईक्शनिवारे निरशनैः' पुरुपेण पुष्या माह्यम् । सघृततंडुलजलेन वा सह भुक्तश्वेत्तदापि वाणो न लगेत् ॥ ५ ॥ मुखमें तालकी जड, शिरम केतकीके पात और गोदमें खजूरकी जड लगावे तो बाण नहीं लगता है। अथवा इन सबको धीम मिलाकर खानाय ते जबतक इनका अजीर्ण रहै तबतक बाण नहीं लगता है । अथवा कंसारीकी उत्तरदिशाकी तर्फकी जडका शनिगरके दिन उवाम करके पुष्पसहित इतबारके दिन लाकर धारण करे तो वाण नहीं लगता है। अयवा घीमें और आलोक पानाय सहित खा तो भी वाण नहीं लगता है । अथवा पाठाजटाको इसी प्रकार धारण कर वा खांव तो भी बाग नहीं लगता है॥५१॥ अंकोलो लक्ष्मणों पंखो संपक्षिी शिखिचू लेको । विष्णुकांती काकजंघांनी श्री देवी चं पाटला॥५२॥ भुजास्यमूर्धगो भुक्ता तजटापि वारयेत् । रणेदारुणस्त्रिीचं यावजीर्यति नोदरे । ५३ ॥ अंकोलः प्रसिद्धः, लक्ष्मणा पुरुपाकारमूलोपधिविशेषः, पुंसा शरपुंसा,सपक्षो-सर्पनेत्रारुतिपुप्पा, शिखिचूलिका मयूरशिखा विष्णुकान्ता, नीटपुष्पा-प्रसिद्धा, काकजंघा तदाकारा, नीली प्रसिद्धा, देवी सहदेयो,पाटला प्रसिद्धव वजटा एतासामोपधीनां मूलानि तन्मध्ये एकापि जटा भुजे याही धृता आस्ये मुखे वा वा शिरसि स्थिवा वा खादिता वा रणे संग्रामे -

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम्
दारुणं शखौघ तीक्ष्णशस्त्रसमूहं वारयेत् । कियत्कालमित्यपे-
क्षिते यावदिति । यावत्पर्यन्तमुदरे न जीर्यति ।भुक्तपक्षे चैवत्
धारणपक्षे तु यावद्धारणं वावच्छसवारणम् ॥ ५२ ॥ ५३ ।।
अकोहर, लक्ष्मणा (सफेद कटेली), शर(खा, साक्षी, मयूर-
शिखा, विष्णुकान्ता, काकजंघा, नीली, सहदेवी और पाटली यह
औषध भुज, मुख और मस्तकमें लगावे । अथवा इनमेंसे किसी भी
एककी जडको खालेवे तो जबतक वह नहीं पचे तबतक रणमें दारुण
शत्रोंके समूहको निवारण करती है ॥ ५२ ॥ ५३॥
स्वणांभा सिंहिकाकिण्यों मिहीपृष्टः सतज्जटः।
अंतस्थः पारः सिक्थमुद्रो जयद आस्यर्गः ।।५४॥
स्वर्णाभा स्वर्णवत्पीतवर्णा या सिंही काकिणी कपईकस्त
स्मिन सिंही कंटकारी तन्मूलरसेन घृष्टःसिंही नटासहितःपारदः
सोऽन्तरस्थो मध्यस्थः। सिक्थेन मुद्रमीणकेन मुद्रितः ।
आस्यगो मुखस्थो जयदः रणादौ विजयदाता ॥५४॥
सोनेके रंग जैसी पीली, निहीनामकी फौडीमें कटेलीके पत्ते और
जड़के रसमें घोटा हुआ पाग भरकर गुटिका बनावे और उस गुटि-
फाको संग्रामके समय मुखमें ग्यखे तो जय होता है ॥ ५४॥
चक्रमर्दगोजिहाशि खचूडोजटास्वपि ।
एकैका वादजयदा पुष्यार्कात्तास्यमूर्द्धगा ॥१५॥
चक्रमर्दको चकवंदः, गोजिह्वा गोभी, शिखिचूडा मयूर-
शिखा, एतासु मध्ये एकैका जटा पुष्पार्कयोगे आता गृहीता
आस्यगा मूर्द्धगा वादजयप्रदा ॥ ५५ ॥

- (९९२) समरसारं- चकवंद (पँवाड ), गोभी, मयूरशिखा इनमें से किसी एफकी जड पुण्यार्कके दिन ग्रहण करके मुख, अथवा म कमें धारण करें तो वादमें जय होता है ॥ ५५ ॥ विशेष ' ऊपर जो औपाधि+ कहीगई हैं इन सबको उपाडने लाने + ईश्वरी ब्रह्मदडी च कुमारी बंपावी तथा । वाराही पनिणी चढी तथा सभटाभिधा ॥ १॥ लागली सइदेवी च पाठा राजी पुनर्नवा । मुद्गरी भूतकेशी ध सोमराजी हनूजटा ॥ २ ॥ श्वेतापराजिता गुजा श्वेता च गिरिकर्णिका । भुद्रिका शसिनी चैव विहगी शरपुखिका ॥ ३ ॥ खजूरी केतकी ताडी पूगी स्यानारिकेलिका । अंजनः काचनारच चपकोऽश्मतक. फुहू ॥ ४ ॥ अपामार्कमृतौ च ब्रह्माचो बस्तथा। शतमूली बलायुग्म गोजिरेपलसारिका ॥ ५॥ अष्टलोहा रसा वज़ी हदिा तालक शिला । एताश्चौपधयो दिव्या जयाथै संप्रहेयुधः ॥ ६ ॥ खजूरी मुखमध्यस्था कटिबद्धा च केतकी । भुजडस्थितस्तालः सर्वशस्त्रनिवारणः ॥ ७ ॥ दक्षबाहुस्थितवाचे वामेंदुईदये परा । रुदः पृष्ठस्थितो युद्धे वनदेहो भवेन्नरः ॥ ८ ॥ (यामले) सिंही न्याघी मृगी हसी चतुधैव कपर्दिका । एतासा लक्षण वक्ष्ये प्रभाव च यथाक्रमम् । १ ॥ सिंही सुवर्णवर्णी च व्याघ्री धूम्रा सरेसिका। मृगी तत्र विजानीयात्पीतष्ठी सितादरी ॥ २॥ इसी जलतरा श्वेता विदता नातिदीर्घिा । एव विशेषान्विज्ञाय ततः कर्म समाचरेत् ॥ ३॥ औषधी सिंहिका नाम तस्या मूलस्य यो रसः सिंहीकपर्दिकामध्ये क्षेप्यस्तन्मूलसयुतः ॥ ४ ॥ पिधाय वदन तस्याः 'सक्थेन च समन्वितः । अस्या वकस्पिताया तु सिंहमायते नरः ॥ ५ ॥ व्याघ्रीरसेन सपृष्टः पारदो मूलसयुतः । पूर्ववरसाधयेषाम्री फल चैव तथाविधम् ॥ ६ ॥ मृगमण समिमा मृत्तिकारसस्युता । मृगधिष्णे हिपेन्मग्या तस्या. फलमत्तः Pणु ॥ मुसमध्ये स्थिताया प वशीमवति मानवः । रतिकाले मुनस्यास रातापायहरो नरः ॥ हसपादीरसपटः "भारद मूलसयुतः। इसीमध्ये क्षिपेद्धीमान मुखस्वा सर्वसिद्धिदा । इति ।

। संस्कवटीका-भापाटीकासमेतम् । (९३) और ग्रहण करनेकी यह विधि है कि जिस किसी दिन पुष्यनक्षत्र और इतनगर हो उसके प्रथम दिन शनिवारको उपवास करके शुभ समयमें इच्छित औषधिको नाल सुपारी और अक्षतादिसे “ओं नमो नाराय- णाय स्वाहा” इस मंत्रसेन्पोतकर रविवार के दिन औषधिके समीप जाकर खरकी खूटीसे खोदके "ओं की अनु हुं फट् स्वाहा" यह मंत्र 'बोलता हुआ उपाडकर ओं कुमारजननीय स्वाहा” इस मन्त्रसे ग्रहण करके “ओं सर्वार्थताधनीयस्वाहा" इस मन्त्रसे ले आवे और फिर यथासमय काममें लेवे तो यथोक्त फल होता है। इति समरसारे औपधप्रकरणम् । यायिस्थायिनोर्जयपराजयौ विवक्षुः कोटचक्रमाह । भास्राणि प्रलिखेदुपर्युपरि च त्रीणीशदिश्यग्निभाद- बाह्यात्रीणि लिखांतराच्छिवभतोप्यन्या साप वहिता आग्रेयादिति पिततो यमदिशि न्यस्यन्बहिःसप्तम मैत्राद्वासवतोऽन्ययोःखयहि मध्यमेंतश्चदम् ॥१६॥ भवर्णेन चतुःसंख्या लक्ष्यते । ततः भास्राणि चतुरस्राणी- त्यर्थः । तानि उपर्युपार च त्रीणि । एकस्य चतुरस्रस्य लघुनः उपरि महदन्य लिखेत् । तदुपरि च सतोऽधिकमन्यदेवं त्रीणि लिखेदित्यर्थः। वत्र च मध्यस्थं चतुरस्र कोटसंज्ञम्, तेपु त्रिष्यपि चतुरस्रषु ईशदिशि ऐशान्याम् अनिभातत्तिकानक्षत्रमारण्य बालाचतुरस्रादारस्य विष्वपि ऐशान्यामन्तर्विशति त्रीणि मृग- शिरोऽन्तानि लिखेति शिप्यनिमन्त्रणेलोट् । अन्तरात् मध्य- वर्तिनश्चतुरस्रात् शिवभमातिदायत्रीणि भानि ऐन्यां प्राच्या (९४) समरसारं- दिशि चतुरस्त्रत्रयायेखामध्प्रस्थानेषु बहिनिस्सरन्ति लिख । सार्पमाश्लेषां बहिर्वाह्यचतुरस्रापि वहिः प्राच्यमेतल्लिख । इत्य- मुनैव प्रकारेण आगेयात्कोणादारश्य पितृतो मघानक्षत्रायम- दिशि दक्षिणस्यां सप्तमं विशाखां पहिय॑स्य लिख । मैत्रादनु- राधाभादासवतो धनिष्ठाभाच अन्ययोनत्यवायव्ययोःकोणयोः प्राग्वल्लिखेति सम्बन्धः। एवं दिग्विदिग्वाह्यचतुष्कत्रयेण सय १२ द्वादशभानि बहिःचतुरस्रे लिखिवानि स्युः । मध्ये चतुरस्र च दं ८ दिग्विदिस्थवया अष्टौ स्युः । अन्तः मध्यचतुरस्त्रे च दं ८ अष्टौ भानि स्युः। एवं कोटचके साभिजिति अष्टाविंशति- भानि लिखितानि स्युः चक्रम् ॥ ५६ ॥ . [ यहां जो कोटचक्रके विषयमें वर्णन कियाजाता है इसी चक्रको एक इस प्रकारका किला समझो कि मानों किसी जगह एक राजाका सेना आदि जन समूह सहित पुर, आवश्यक सामग्री सहित वसाहुआ है (१) उसके चारों तरफ चार ढूंटका एक सुविशाल किला वा पारकोटा खडा हुआ है (२' और उस परकोटेके बाहर चौतर्फ अन्य सेना आदि जनसमूह उपस्थित होनेका स्थल है (३) इस प्रकार यह किला तीन भागोंमें विभाजित होरहा है । अर्थात् (१) भीतर गढप. तिका जनसमूह सहित पुर (२) बीचमें परकोटा और ( ३ ) बाहर अन्य सेना आदि है । अतएव इन्हीं तीन विभागोंपर लक्ष्य देकर 'भात्राणि प्रलिखे.' इसके अनुसार तीनरेखात्मक चतुरस्र चक्र संघ टित फियागया है । उसमें प्रथम रेखात्मक भीतरकी तरफके स्थलको मध्य वा अंतर । द्वितीय रेखात्मक परकोटे को-वप्रकोट प्राकार वा चप्रमध्य । और तृतीय रेखात्मक बाह्यस्थलको वाय और वेष्टक संस्कृतटीका-भापाटीकासमेवम् । (९५)) इन नामोंसे उल्लेख किया गया है। अतएव ग्रहस्थित्पनुसार फल देख नेमें इसका स्मरण रखना चाहिये ] भास्र अर्थात् चार कोणका तीन रेखात्मक चक्र बनावै । और उसके ईशानकोणमें बाहरवाली रेखासे आरंभ करके कृत्तिकादि तीन नक्षत्र लिखे । फिर पूर्वकी तर्फ भीतरवाली रेखासे आरंभ करके आद्रासे नि नक्षत्र लिखे और इन तीनों से बाहर श्लेषा लिखे, फिर ऐसेही अभिकोणमें मघा आदि तीन नक्षत्र और दक्षिणमें हस्तसे तीन लिख । यहां चाहर विशाखा लिखै; फिर ऐसेही नैऋत्यकोणमें अनुराधा आदि तीन लिखे और पश्चिममें प्राप ढादि तीन लिखे और बाह्यपागमें श्रवण लिखे और वायव्यमें धनिष्ठा आदि तीन नक्षत्र लेखे और उत्तरमें उत्तगभाद्रपदादि तीन लिखे और बाह्यभागमें भाणी लिखे तो "कोटचक्र बन जाता है । इसमें १२ बाह्यके ८ मध्यके और ८ अन्तरके नक्षत्र होते हैं ॥ ५६ ॥ कोण भानि प्रवेशे स्युदर्शान्यानि निर्गमे । पृष्ठपष्टं सप्तकेछु मध्ये स्तम्भ वनुष्टयम् ॥ ७ ॥ कोणा ईशानायाः तत्र लिखितानि यानि कृत्तिका, मघा, अनुराधा, धनिष्ठादीनि त्रीणि त्रीणि भानि कनिका,रोहिणी, मृगशिरः, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, अनुराधा ज्येष्ठा,मूल, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा-एवानि द्वादश कोणभानि तानि ग्रहाणांकोटप्रवेशे भवन्ति । प्रवेशक्यालिखि- तत्वात् । अन्यानि पुनर्वसु, पुष्य, श्लेपा, चित्रा, स्वाति, विशाखा, उत्तरापाढ, अभिजित्, श्रवणं, रेवती, अश्विनी, भरणी, एतानि चतसृषु प्राच्यादिदिक्षु स्थिवानि द्वादशभानि -

समरसारं-
निर्गमे गृहाणांस्युः । निर्गमदया लिखिवत्वात् । सप्तकेषु अश्विन
नीपुष्पस्वात्यभिजिदादिषु चतुर्यु चतुर्दिक्षु स्थितिपु प्रथमात
यत्पष्ठं षष्ठं यथा अश्वियादिसप्तसु नक्षत्रेषु पष्ठम् आर्दा ।
पुष्यादि सप्तसु नक्षत्रेषु पष्टं हस्तः। स्वात्यादिसप्तसु नक्षत्रेषु
* पष्ठं पूर्वापाढः । अभिजिदादिसप्तसु नक्षत्रेषु पष्ठम् उत्तरा
भाद्रपदा एतानि चत्वारि भानि मध्ये कोटस्थं भचतुष्टयं स्तम्भ
संज्ञ स्यात् ।। ५७॥
चारों कोणके बारह नक्षत्र प्रवेशक होते हैं । अन्य बारह नक्षत्र
निर्गमके होते हैं। और अश्विन्यादि सात सातमें उठे छठे चार नक्षत्र
वीचौ स्तम्भके होते हैं ।। ५७ ॥
उपलझणमेव कृत्तिकादी प्रथम दुर्गर्भ वैरिभ वा।
ग्रहचकेमुद्दुस्थमालिखे द्वै चतुरस्र वरणं च मध्यम
स्यात् ॥ ५८॥
इदं पूबश्लोके कृत्तिका दिभलेखनमुक्तम्,तदुपलक्षणमेव न तु
नियमेनोक्तम् । कत्तिकादौ च लेख्ये प्रथम दुर्गस्थानं दुर्गमें
पूर्वोक्कादवकहडचकाज्ज्ञातव्यम् । दुर्गनक्षत्र कोणभम् ईशान-
कोणे लेख्पम् । अथवा वैरिभंशत्रुभम् । अवकहडचकोत्यंवदा
ईशानकोणे लेख्यम् अन्यानि प्र.मल्लेख्यानि। तेषु च भेषु
यहचक्र सूर्यचन्द्रादिनवमहान् उडुस्थनक्षत्रगततया लिखेत् ।
समस्तग्रहाः स्वस्वभुज्यमाने नक्षेत्र स्थाप्या इत्यर्थः। अथ
कोटचके मध्यम चतुरसं वरणं प्राकारस्थानीयं भवेत् ॥५८॥

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (९७) ऊपर जो कृत्तिका आदि लिखा है वह केवल उपलक्षण है। ऐसा नियम नहीं है कि कृत्तिकासे आदि लेकरदी लिखना) दुर्ग (फ्लिा) वा वैरीका जो नक्षत्र हो उसीसे आरंभ करके उपरोक गीतके अनुसार में नक्षत्रोंको लिदै । और जिस नक्षत्रपर जो ग्रह हो उनकोभी उन नक्षनोंपर स्थापन करै । इस चक्रमे वीचका चतुरस्र जोहे यह प्राकारस्थानीयहै ॥ ५८॥ "कोटचक्र " वाटचकस्य चित्रम्।

(९८) समरसारं- कोटचक्रम् । पु म श्रा hor संवत् १९६८ शके १८३३के आश्विन शुक्ल १० दशमी चंद्रवारको पान पुज" नामक कल्पिा क्लेिपर ग्रह- स्थिति देखनीहै अतएव पात्रपुञ्जाके नामनक्षत्र उत्तराफाल्गुनीको ईशा नकोणमें स्थापितकरके उपरोक्त क्रमानुसार कोटवक" निर्माण क्यिा तो इसप्रकार अरे दृचिवा वि म धा पू उ अभि श्रप 'वा तैयार हुआ। शक AB भू बुध गुरु ( ह स्वायतु म पु ऽभि ५ ধি आ ऊ शनि रोभौम

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (९९)
उसदिन हस्तपर सूर्य, उत्तरपाढपर चन्द्रमा, रोहिणीपर मङ्गल,
उत्तराफाल्गुनीपर बुध, विशाखापर गुरु, उत्तराफाल्गुनीपर शुक्र,
कृतिकापर शनि, अश्विनीपर राहु और स्वातिपर केतु है। अतएव
इनको भी कोटचक्रमें यथास्थानपर स्थापना किया तो फलदेखने के उप-
योगी चक तैयार होगया ॥२८॥
दूरसौम्यग्रहावस्थित्या दुर्गभंगरक्षादिकमाह ।
पूरा अंतर्बाह्यगाः सौम्यखेटी दुर्गे भंगो वेके वेपरी-
त्यात् । क्रूरा मध्ये वप्रगाः सौम्यखेटी भेदो भंग-
श्वान युद्धं विनापि ॥१९॥
क्रूराः पापग्रहाः अन्यन्तरे । बाह्यगाः सौम्यसेटाः शुभग्रहाः
तदा दुर्गभंगः कोटभंगो भवति । वैपरीत्यादेवं वेष्टकभंगः। कथं-
शुभयहाः अध्यंतरगाः पापग्रहाः बाह्यस्था- स्युस्वदा वेटकानां
भगः । क्रूरा मध्ये सौम्येखेटा वप्रगाः कोटबाह्यस्थाः अत्र योगे
युदं विनापि भेदो भंगश्च भवति ॥ ५९ ॥
कृपग्रह कोटके भीतर हों और सौम्यग्रह कोटफे बाहर हो तो
फिलेका भङ्ग होता है (१) यदि इससे विपरीत अर्थात् सौम्यग्रह
भीतर हों और पापग्रह बाहर हो तो वेष्ट अर्थात् आए हुए राजाको
सेनाफा भङ्ग होता है (२) और कूरग्रह मध्यमें अर्थात् परकोटेके
भीतर और सौम्पग्रह कोटपर हों तो पिनायुद्धही भेदसे भंग होना
है (३) ॥ ५९ ॥

(१०७), . समरसारं-
उदाहरण।
इस कोटप्रसंगके उदाहरणमें भापाटीकामें जहां जहां (१)(२)
आदि संख्याके अंक दियेगये हैं तहां तहाकी स्थितिके अनुसार उदा.
हरणरूप चक्र लिख दिये हैं । अतएव इन चक्रोंकी स्थितिके अनु-
सारही सर्वत्र फल जानना चाहिये ॥१९॥
(१) (२)
३)
मोम्य
सौम्य
भूयायिभा
10.20a
PPPREENA
सौम्य
RAMETHE
दुर्गभग
भेद, भन्न
LALLE3DZAL
व्यत्यासे त्वांवेटकस्यैव भैगो दुर्गे भंग्रेऽप्युद्भवे नात्र
मिथ्र्यो । प्रकारेंऽतः क्रूरखेटा बहिश्चेत्सौम्या:
कृच्छ्रादुर्गभंगस्तदानीम् ॥६० ॥
व्यत्यासे उक्तवैपरीत्ये आवेष्टकस्यैव भंगः । कथं शुभग्रहाः
कोटमध्यस्थाः । पापग्रहाः वगाः कोटस्थाः । तदा दुर्गे
भनेपि आवेष्टकस्यैव भंगः । अत्र मिथ्या च-सत्यमेव वदेत् ।
प्राकारे मध्यकोट, अंतःकोटमध्ये फरखेटाः पापग्रहाः । बहि-
श्चत्सौम्याःशुभग्रहाः तदानी रुच्छात्कष्टादुर्गभंगो वाच्यः ॥६॥

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (६१०१) विपरीत अर्थात सौम्यग्रह कोटके भीतर हों और पापग्रह कोटपर हो तो किला टूटनाय तौ भी नाहरकी सेनाकाही नाश होताहै (१) और परकोटेपर तथा परकोटेके भीतर सो पापग्रह हों और परकोटेसे वाहर सौम्यग्रह हों तो कष्टो फिलेका भङ्ग होता है ॥६०॥ उदाहरण । (२)37260 सौम्य कृच्छ्रादुर्गभग भय दुगपि जामिनाभग । वेष बौद्ये क्रूरखेटोश्च मध्ये सौम्याः खंडिः स्यान्न दुर्गस्य भंगः । वप्रे सौम्या अन्तरा बाह्यतश्च क्रूरा भंगः सैन्यन्योः स्याईयोस्तु ॥६१ ॥ वप्रे, बाह्य क्रूरग्रहाश्चेत्स्युः । मध्ये सौम्यास्तदा दुर्गे खंडिमात्रं स्यान्न दुर्गस्य भंगः । वप्रे सौम्याः । अन्तरा बाह्यतश्च क्रूराः क्रूरखेटाः तदा द्वयोः स्थायियायिसैन्ययोः भंगः स्यात् ॥ ६३ ॥ यदि पापग्रह परकोटेपर और गहर हों और सौम्यग्रह भीतर हों वे दुर्ग खंडितमात्र होजाता है। टूट नहीं सकता है (१) और सौम्पग्रह तो किलेपर अर्थात् परकोटेपर ह और दूरग्रहबाहर और भीतरों तो यापी (चढ़ाईकरके आनेवाला राजा) की और स्थायी ( दुर्गाधीश राना) की दोनोंकी सेनाकाभङ्ग होता है ।। ६१ ॥

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (१०३)
उदाहरण ।
सौम्य
कर सौम्य
कर
कर सौम्य
सो
सौम्य
तुल्ययम्
धोरे युद्धे द्वयोभग
अन्वस्वस चान
तुल्यो बायेंतश्च चेत्कूरसौम्याः
सन्धिवांच्यो यायिदुर्गेशयोस्तु ।
तुल्याः समरसौम्याः पापग्रहाः शुभग्रहाः बाह्ये देश
अन्तर्देशे च स्युस्तदा यायिदुर्गेशयोः सन्धिः प्रीतिर्वाच्यः ।
यदि कोटके बाहर और कोटके भीतर दोनों जगह दूर
और
सौम्यग्रह तुल्य हों अर्थात् बाहर जितने क्रूर ग्रह हों उतनेही सौम्यग्रह
भी हों । और भीतर जितन सोम्यग्रह हा उतनेही ऋग्ग्रह हों तो स्थायी
(दुर्गाधीशो और याची दोनों राजाआमें सन्धि (राजीनामा) होजाता है।
फर मौम्य
पर सौम्य
याचिदर्गेशयोस्तुमंधि स्थान

। . ( १०४) : समुरसार- ज्ञारौ स्तंभक्ष प्रवेशेपि, वा: चेचेद्रो जीवत्पक्षर्गः स्यात्वेशे ॥ ६३ ॥ रुन्ध्यादुर्ग वा कुलौघेऽथे युद्धं व्यत्यासे नातस्थसैन्यं विदध्यात् । दिवी- ज्यारौ काव्यवस्थसौम्यो दुर्गे 'भंगं निर्दिशन्ति क्रमेण ॥६४॥ ज्ञो बुधः आरो भौमः । एतौ चेत्स्तंभनक्षत्रगतौ स्तः । प्रवेशकोणभेषु मध्ये कस्मिंश्चिद्वा स्याताम् । चन्द्रस्तु राहु- कालानलचक्रे वा जीवत्पक्षगानि नक्षत्राणि तेषां मध्ये कस्मि- श्चित्स्यात् प्रवेशे कोणनक्षत्रे वा स्यात्तदा दुर्ग रुन्ध्यात्।।६३॥ यायी स्वसैन्यनारिदुगम् अकुलौवे अकुलगणे रुन्ध्यात् वेष्ट- येत् । अकुलौघश्च-भरणो, रोहिणी, पुनर्वसु, श्लेपा, पूर्वा- फाल्गुनी, हस्त, स्वात्यनुराधोत्तराषाढा, धनिष्ठोत्तराभाद्र- पदा, रेवतीसंज्ञानि १२ भानि । प्रतिपदा, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, नरम्पेकादशी, त्रयोदशी, पंचदश्यष्टतिथयः । रवि, सोम, शनि, गुरु ४ वारा इति । अथ व्यत्यासे सति तु अन्तःस्थस्य स्थायिनः सन्यं यायिना सह युद्ध विदध्यात् । व्यत्यासश्चैवं बुधभौमौ स्तम्भक्ष न स्यातां न प्रवेशः किन्तु निर्गमक्ष । चन्द्रो मृतगो न तु जीवत्पक्षगः न च प्रवेशः । किन्तु निर्गमः कुलगणे च तदा स्थायी युद्धयेत । दिक्षु पाच्यादिपु चतसृष दुर्गस्य ईज्यो गुरुः, आगे भौमः, काव्यः शुक्रः, वक्रस्थसौम्यो चक्रीबुधः एते चेत्क्रमेण स्पुस्तदा तस्मिन्दुर्गे भंग दिशन्ति ॥ ६४॥ -- अकु संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । ((१:५). ऊपरके चक्रों में तो दोनों ओरकी सेना तथा किलेका भंग होना न होना विदेत कियागया। अब नीचेके चक्रोंसे कोटको घेरनेका तथा आई हुई सेनाको परास्त करने के लिये आक्रमण करनेका समय सचित किया जागहै ।' यदि बुध और मंगल स्तंभके नक्षत्रों में अथवा प्रवेशके नक्षत्रोंमें हों और चन्द्रमा जीवपक्षके नक्षत्रोंमें अयवा प्रवेशके नक्षत्रों में हो तो ऐसे समयमें यायी (चढाईकरके आनेवाला) राजा अपनी सेनासे किलेपर आक्रमणकरे। (१) अथवा लगण " जो ऊपर १० वें श्लोकमें कहचुकेहैं उसमें किलेपर आक्रमण करे (घेरलेवे ) । (२) और इससे विपरीत अर्यात् वुध भौम तो निर्गमनक्षत्रों में हों और चंद्रमा मृतपक्ष वा निर्गम नक्षत्रोंमे हो तो स्थायी (किले का अधिपति) राजा आईहुई सेनाको परास्त करनेके लिये उप- रोक्त समयम अपनी सेनाको युद्ध करनेके लिये आज्ञा देवे । (३) अथवा "कुलगण" में युद्धका आरम्भ करे । (४) यदि पूर्वमें गुरु, दक्षिणमें कुज, पश्चिममें शुक्र और उत्तरमें वक्री वुध हों तो यह निज निज दिशाका नाश करते हैं ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ उदाहरण। पायी-दुर्गरूभ्यात् । अथवा बु.म. . पता वीरपक्ष चन्द्र

(१०६)
समरसारं-
निर्गम क्षचन्द्र
मृतपत्राचन्द्रः
गिबुधः
अतस्थ
सेन्य युद्धि
निर्गमावभौमः
नियोजनीयम्।
यत्र क्रूरस्तेन युक्तः शशी वो खण्डिस्तत्रतत्पथे च
प्रवेशः । क्रूगः स्तंभः यदांतस्तदानी दुर्गे मुक्त्वा
योति दुर्गाधिनार्थः ।। ६५ ।।
यत्र प्राच्यादिदुर्गरेखास्थळे क्रूरग्रहस्तेन ग्रहेण कूरेण युक्तः
शशी चन्द्रो वा तत्र दुर्गे खंडिः पतेत् । एतस्य क्रूरस्य मार्गे
बाह्यसैन्यश्वेशी दुर्गे भवेत् । यदा क्रूराः स्तंभनक्षत्रे अन्त-
मध्ये स्पुस्तदानी दुर्गाधिनाथो ग्रहयात् तदुर्ग त्यक्त्वा याति
ततः पलायत इत्यर्थः ॥ ६५॥
कोटपर जिस जगह क्रूराह हो, अथवा जिस जगह क्रूरयुक्त
चंद्रमा हो तो (1) उसी जगहसे कोट खंडित होताहै । अत: उसी मार्गसे
प्रवेश होगा और यदि रग्रह स्तंभके नक्षत्रोंमें भीतर हों तो (२)
दुगंधिनाय किलको छोड़कर भागजाता है ॥ ६५ ॥

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (१०७) उदाहरण । कर सडिरत स्पथेप्रवेशः शच करा. GIRI दुर्गाधिनाथःदुगैत्यरत्या निर्गत्यः बाागे वैक्रितश्चेत् करः खंडि निश्चित त कुर्यात । वप्रस्थीतर्हन्ति मध्ये प्रवेशः वक्री चेदन्ति बाह्यस्थसैन्य ॥ ६६॥ निर्गत्यः निर्गमनक्षत्रे बाह्यगे वाह्यावर्तमाने निर्गमनक्षत्रे वकी क्रूरयहो यदि स्यात् तत्र स्थाने निश्चितं खंडिं कोटभंग कुर्यात् । वप्रस्थः कोटस्थो वक्री करश्चेद्भवति तदा अतः कोटमध्यं हन्ति नश्यति । मध्ये कोटमध्ये प्रवेशः प्रवेशनक्षत्र चेद्दकी कूरस्तदा बाह्यस्यसैन्यं यायिसैन्यं हन्ति ॥ ६६ ॥ यदि बाहरफे निगम नक्षत्रपर वको रग्रह हों तो उसी जगहसे कोटको खण्डित करते हैं । (१) और यदि कोटपर वो करग्रह हों तो कोटके भीतरवालोंका नाश करते हैं। (२) और जो कोटके भीता प्रवेश के नक्षत्रापर वक्री रग्रह हों तो बाहरवालो सेनाफा (३) नाश करते हैं। ६६॥

(१०८) समरसारं- (१) वकारो नितिन ३२ वकीकर यवसा BESSO अतस्थ CIPES बायस्थी य हत वक्रीकरो दुर्गे तदीशभजयोरिति कोटयोस्तु भगं चार्य दिशिं तत्र लगंतु बाह्यांः । आभ्यंतरी बलपभोत्थित. चक्रंदोपे सेनान्यमन्यमुपदिश्य दिशोप्यतुं ॥६॥ दुर्गस्य एतदीशस्य दुर्गेशस्य च ये भे तयोरेशान्यादौ लिखनेन इत्यमुना प्रकारेण उत्पन्ने कोटचके तयोः प्रागुक्त- प्रकारेण भंग विचार्य यस्यां दिशि भंगसंभावना तस्यां सस्कृतटीका-भोपाटीकासमेतम् । (१०९) दिशि बाह्या यायिनो लगन्तु तत्र लगाश्च दुर्ग गृहंतु । आत्य- तरा दुर्गाधिपास्तु स्वबलपो यः सेनापतिस्तस्य यद्धं तत उत्थितो यः कोटचक्रदोपस्त स्मिझाते अन्यसेनापतिम् उपदिश्य नाम- पूर्वकं कृत्वा दिशोऽपि दुर्गज्ञा अवन्तु रक्षन्तु । एतदुक्तं भवति-एतग्रन्थकतोकप्रकारेण यायिस्थायिनावुभा- वपि जयतः ॥ इति ॥ ६७ ।। दुर्ग और दुर्गेश इन दोनोंके नामके नक्षत्रोंसे उपरोक्त रीत्यनुसार दो चक्र बनाकर उसी उपरोक्त क्रमानुसार कोटका भंग होना निश्चय . करके उसी उसी जगहपर यायी (बाहरवाला) राजा अपनी सेनाको लगावै तो किला टूटजाता है । और इसीप्रकार स्थायी ( भीतरवाला) राजा अपने सेनापतिके नक्षत्रसे विचार कर देखे आर किले का भंग होनाही प्राप्त हो तो उस सेनापतिको बदलकर दूसरा सेनापति नियम को और जिस दिशामें फिलेका भंगआवे उस दिशाकी •क्षा करे॥६७॥ इति समरसारे कोटेचक्रप्रकरणम् । x" अथातः संप्रवक्ष्यामि कोटचकस्य निर्णयम् । स्तोकारि: कुस्ते वन भूरिसन्यपरान- वर ॥१॥ यस्यायवलादेव राज्य पुति मनले । विग्रह चतुराशायु सीमास्यः शभिः सह ॥ २ ॥ विपम दुर्गम घोर चक मीभयारहम् । कपिशपिस्तु शोभाइप रोदाहालकमाहित तम् ॥ ३ ॥ बोली यस्य काला स्थापरिसा कालरूपिगी। रणपर्नुस्ताटो रिलीयात्रि- तम् ॥ ४ ॥ मुरालमुरैः पाशः स्तरामधनः शरैः । संयुतः मुः रिति दुर्ग समादि- शे ५॥(इन पाइयोसे विदितहेगा कि प्राचीन ग्रारमें से कोट ग्नाचे जातेथे । भातु) । उपरोफचयोग्युतफलमाह-"पगुरेन्दुनीनाथ रारा गोम्प्रहा मनाः । शन्य- . राहुमाया तुः पहा मताः भगो जयः सोम्बनियानपतमाम् ।।

KI.)) समरसार- .. सर्वतोभद्रचक्रमाह । पूर्वोदीचीलिखालीयनयगणिताः कंदकोप्टेष्वथै- शाकागतोयस्वरान्वह्नयुडुत इह दिगालीघु भान्य- तरा तुं । नारीवर्णान्पुरोक्तानवकहडमुखोंनतरास्मा- पादीन खेटासंबंधिवारैः सह लिख च तिथीन मध्यतो नंदिकादीनें ॥ ६८॥ ऐन्यादि मध्यभचतु- एकवेधतो वेधमोदिशेत्कमशः । घङछी पणठी धर्फढां थझमिति सर्वतोभद्र ॥ ६९ ॥ नय १० नय १० गणिता दशदशगणिताः पूर्वोदीचीः पूर्वाश्च उदीच्यश्च पूर्वोदीच्यः ताः पूर्वोदीचीः पूर्वोत्तराः आलीः पंक्तीलिख । अथानंतरं कंद ८१ कोष्ठेषु एकाशीति- कोठेपु ईशात् ईशकोणतः कर्णैः कर्णमार्गः तोय १६ स्वरान् पोडशस्वरान् अकारायाँल्लिखेर । अन्तरा मध्ये वह्नयु- डुतः कृत्तिकादितः सप्त सात नक्षत्राणि दिगालिपु दिक्पं- क्तियु पूर्वादिदिक्षु लिखेत् । पुनः पूर्वोक्तान् पूर्वोक्तनारी २० वर्णान् विंशतिवर्णान् अवकहढमुखान् अस्मात् स्थानात् .. -उरुते युद्ध कोटचक्रे स्वरोदवी ॥ २ ॥ वाह्यम मध्यमेतस्याः फूला हानिकरा मताः । पाखभे मध्यभे तास्थाः सौम्या विजयमादिशेत् !! ३ ॥ दुर्गमध्ये गते सूर्ये जलदोपः प्रजायते। चंदे भगः कुजे दाहो बुधे वुद्धिवला नराः ॥ ४ ॥ वाक्यतो दुर्गमध्यस्ये मुभिक्ष प्रचुर जलम् । चलचित्तनराः शुक्रे मृत्युसेगौ शनैश्चरे ॥ ५ ॥ राहो मध्यगते दुर्गे भेदभजो महद्भयम् ॥ केतो मध्यगते तत्र विषदानं गदाधिप ॥ ६ ॥ एवं कोटवावेपि ज्ञयम् ॥

संस्कृतटीका--भापाटीकासमेतम् । (१११)
अधः अन्तरा मध्ये लिखेत् । चतुर्दिक्षु व सव्येनोच्यते । पूर्वस्यां
दिशि सप्तसु कोष्ठेपु कत्तिकादीनि सप्तनक्षत्राणि लेख्यानि ।
तदधः पंचसु कोठेषु अवकहडान लिखेत् । पुनः दक्षिणस्यां
दिशि मघादीनि समनक्षत्रानिलेपानि । तदधः पंचसु कोष्ठेपु
मटपरता लेख्याः । पुनः पश्चिमायां दिशि सप्तसु कोष्ठेपु अनु-
राधातः सप्त नक्षत्राणि लेख्यानि । तदुपरि नयभजखा लेख्याः
पुनरुत्तरस्यादिशि धनिष्ठातः सप्त नक्षत्राणि लेख्यानि । तदुपरि
गशदचला लेख्याः । तदंतरा (मध्ये) वृपादीनि त्रीणि, सिंहा-
दीनि त्रीणि, वृश्चिकादीनि त्रीणि, कुंभादीनि त्रीणि,पूर्वादि-
दिक्षु लिखेत् । पुनः मध्यतः नन्दादितिथीन् लिखेत् । अंकै
सह खेटासम्बन्धिवारैः सह खेटानां अचः स्वरास्तत्सम्ब-
निधनो ये वारास्तैः सह तिथीन लिखेद । रविभौमयोः अकारः
स्वरस्तस्य वारौ रविभौमौ नंदायां लेख्यौ । बुधचन्द्रयोः इका-
रस्तत्सम्बन्धिनौ वारौ बुधचंद्रौ भदायां लेख्यो । गुरोः स्वर
उकारस्तस्माद्गुरुजपायां लेख्यः । शुक्रस्य एकारस्तस्माच्छुको
रिक्तायां लेख्यः ॥ ६८ ॥ ऐन्द्रयादिमध्ये यद्भचतुष्क
नक्षत्रचतुष्टयं तस्य वेधतः क्रमात् घडछां, पणठां, धफढां,
थानां वर्णानां वेधमादिशेत् । तदेवाह-आविधे सति घङछा
विद्धयन्ते, हस्तवेधे पणठा विदयन्ते, पूर्वापाढावेधे धफडा
वियन्ते, उत्तराभाद्रपदावधे थाना विध्यन्ते इति सर्वतोभद्र
वेधकत् ज्ञेयम् ॥६९॥

(११२.)
समरसार-
पूर्वसे और उत्तरसे आरंभ करके दश दश रेखा खींचनेसे ८१ कोठे
बन जाते हैं। उन कोष्ठोंमें ईशान कोणसे आदि लेकर कोणों कोणोंके
कोष्ठाम 'अआइई आदि सोलह स्वर लिखै । और ऊपर उपरकी
चौतरफकी दिक्पंक्तियोंके जो सात सात कोठ हैं उनम कृत्तिकादि
अहाईस नक्षत्र लिखे। इनके नीचेके चौतर्फ के पांच पांच कोठोंमें
उपरोक्त अपहड-प्रटपरत-जयभजख-गशदचल-यह बीस वर्ण
लिखे। और इनके नीचे जो नि तीन कोठे हैं उनमें वृपादि बारह
राशि और ग्रह लिखे । इनके नीचे जो एकएक कोठे हैं उनमें स्वर•
संबंधी वारों सहित नन्दादि तिथि लिखे ॥ ६८ ॥ और इसके अति-
रिक्त पूर्वादि दिशाओंमें जो चीच बीचके भचतुष्क हैं उनमें कमसे
पूर्वक घडछ, दक्षिगको पणठ, पश्चिममें धफड और उत्तरक
थान लिखे तो वेधोपयुक्त नीचे लिखे अनुसार " सर्वतोभद्रचक"
बन जाता॥ ६९।।
प्रथमायभस्थखेटो विध्येत्कोणस्थितानचश्चतुरैः ।
तिथिमपि पूर्णी न शुभैः क्रूरजवेधःशुभैःशुभंजः॥७०॥
प्रथमाय्यभस्थखेटः कोण स्थितान् चतुरः अचः विध्येत् ।
यथेशान्यां प्रथमं नक्षत्र भरणी तदयभं कनिकास्थो ग्रहः
ईशानकोणस्थानअ,उ,ल,ओ सरान् पूर्णा तिथींश्च विद्धयेत् ।
आग्नेम्याम् आर्दामघास्थो ग्रहः आमेयस्थान् आ, ऊ, ल,
औ स्वरान् पूर्णातिथींश्च विद्धयेत् । नर्मत्यां विशाखानुराधास्थो
ग्रहः नर्सविस्थान्' इ, ऋ, ए, अं स्वरान्' पूर्णातिथींश्च विद्धयेत् ।
यायच्यां श्रवणनिष्ठास्थो ग्रहः वायव्यस्थान ई, ऋऐ, अः
स्वरान् पूर्णातिथींच विद्धयेत् । तत्र करवेधः न शुभः,
शुभकतवेधस्तु शुभदः ॥ ७० ॥

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (११३) कोणस्थ प्रथमनक्षत्र-और अग्य (आगेका ) भ नक्षत्र इन दोनों नक्षत्रोंपर कोई ग्रह स्थित हो तो कोणस्थ चारों स्वर्गको तथा पूर्णा तिथिको वैधताहै। यया-शान कोणमें प्रथम नक्षत्र भरणी और अग्र्यम कृत्तिकापा कोई ग्रह हो तो उस कोणके अ, उ, ल, ओ इन चारो स्वरोंको एवं पूणां तिथिको वेधता है। अग्रिकोणमें ऐसेही आर्द्रा, मघापर कोई ग्रह हो तो आ, ऊ, ल औ और पूर्णातिथिका वैधताहै । नत्यमे विशाखानुराधास्थ ग्रह इ, ऋ ए, अं साहेत पूर्ण को वेधता है और व यव्यमें श्रवणधनिष्ठास्य ग्रह ई, ऊ, ए, अः इन स्वोंको और पूर्णातिथिको धेधता है । यह वेध यदि क्रूर १ ग्रहोंका हो तो अशुभ और सोम्य २ का हो तो शुभ होताहै ॥ ७० ॥ इश्विल वृप गयुन की ला निन्द्रा औ सिंह ता पात्रा उ मीन भूम रित्ता पूर्णा भड़ा शाचदु लिया कन्या लं श मिकर धन वृद्धि २ १ शन्या राहुकेवार " । शुभाः । युतो दुध वीणचद्रोपि ऋौ ॥३ यदि हा चरको " मसारचक" वा ससारदीपकचक" कहा जाय ८ (११४) समरसारं- वक्रशीघ्रग्रहवेधमाह । वक्री दक्ष कणंगत्यार्थ वाम शीघ्री विध्येदीक्षतेग्रे समस्तु । नित्यं वैक्रो राहुकेतूं इनेन्दै शीघ्रौ नित्यं दृग्व्यधौ तुल्यरूपौ ॥ ७ ॥ वकी शुभोऽशुभो वा कर्णगत्या कोणरीत्या दक्ष स्वपश्चा- भाग विध्येत् । वक्रगतित्वं च सूर्यः स्वस्थानापंचमे पष्ठे वा स्थाने स्यात् । अथ शीघ्रगविग्रहो वामं स्वामिमभाग कोण रीत्यैव विध्येत् । शीघ्रगतित्वं चार्के द्वितीयस्थानगे समः सम- गतिस्तु ग्रहः अये स्वसम्मुखे नेक्षते । अतः सम्मुख एव तदृष्ट- रूपो वेधः । अथ नियतशीघ्रग्रहानाह-नित्यमित्यर्दैन । राहुकेतू नित्यं सर्वकाले वकायतोऽनयोर्दक्ष एव कर्णगत्या वेधः। रवीदू नित्यं शीघ्रगती अतोऽनयोश्च वामवेधः । दृाव्यधौ दृष्टिवेधौ तुल्परूपी सर्वकाले समानफलावेव नान्यथा भवतः ॥ ७१ ।। वकी ग्रह दक्षिण फर्णगति ( कानी तर्फ होकर तिछी दृष्टि) से और शीघ्रगति ग्रह वामकर्णगतिसे वेधता है और सम (न वक्री न शीघ्र ) ग्रह सम्मुख वेचता हे ।-राहु कतु नित्य ही वक्री रहते है और सूर्य चंद्र नित्यही शीघ्र रहतेहैं अतएव राहु केतु सदैव दक्षिण फर्ण- गविते और सूर्य चंद्रमा सदेव वाम कर्णगतिसे धते ।। ७ । ॥ उद्वेगार्थ विनाशरोगमृतिदा विध्यंत एकादयो वर्णे होनिझडी भ्रमोऽचि तु मजाबि ""तियोंभीरपि । -तो कोई भत्युक्ति न होगी। क्योकि इसका मघटन हाईसो नक्षत्रोंसे हुआ है और ससारके यावन्मान पदाथोंके नामाक्षर हाईसो नक्षत्रों के अन्तर्गत है, अत नक्षप्रवेधानुसार वस्तुमारका क्षयोद्भव विदित हो सकता है।

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (११५) रौशौ विघ्नततिश्च पंचसु मृतिर्विध्यज्ञ ईज्यः सितः। प्रज्ञा सर्वसुखं रतिं विदधते वका अतीप्टी ईमे॥७२॥ एकादयो ग्रहा विध्यन्त उद्वेगार्थविनाशरोगमृतिदा भवन्ति । एकपापमहविद्धे नरे उद्वेगः, द्विग्रहवेधेनार्थविनाशो द्रव्यहानिः, त्रिग्रहवेधेन रोगः, चतुर्यहवेधेन मरणं भवति । वर्णे अक्षरे पाप- महविद्धन हानिःद्रव्यहानिःबलहानिःपक्षहा निर्वा-उडौ नक्षत्र पापविद्ध त्रमः चित्तन्त्रमणं भवेत् । अचि स्वरे पापविद्ध रुजः रोगो भवति । तिथौ पायविद्ध भीः भयं स्यात् । राशौ पापविद्ध विनततिः विघ्नपरंपरा भवति । पंचसुवर्णनक्षत्रस्वरति थिराशिषु एककाले विद्धषु मृतिमरणं भवति । ज्ञः बुधो वेधेन प्रज्ञा बुदि ददाति, ईज्यो गुरुर्वेधेन सर्वसुखं ददाति, सितः शुक्रो वेधेन रति प्रीतिं ददाति । इमे शुभग्रहाश्वेदकाः विध्यन्ते नहि अतीटाः अत्यन्त श्रेष्ठाः ॥ ७२ ।। : यदि एक पापग्रह वेधता हो तो उद्वेग, दो वेधते हों तो अर्थनाश, वीन वैधते हों तो रोग और चारग्रह वेधते हों तो मृत्यु होती है । वर्ण (नामाक्षर) का वेध हो तो द्रव्यनाश,नक्षत्रवेध हो तो भ्रम,स्वरवेध हो तो रोग, तिथिवेध हो तो भय और राशिवध हो तो शिनपर विघ्न होता है और यदि इन पांचोंकाही वेध हो तो मृत्यु होती है + 1 यदि वेधकर्ता बुध हो तो बुद्धि, मुरु हो तो सर्वसुख और शुक्र हो तो - + इस वेधसे मनुष्यों का सुस दुख, हानि, लाभ, रोगका हास, वृद्धि और यावन्मात्र वस्तु पदार्थों का क्षय उत्पत्ति एव व्यापारिक बल्योंका महर्व समर्घ ( वेजी मदी) अदि सब कुछ देखा जा सकता है । इसीसे यह ' समारचक्र' कहा जा सकता है . . (११६) समरसारं- रति (स्त्रीसंभोग) की प्राप्ति होती है और यदि यह वक्री हो तो अत्यन्त अच्छे होते हैं । ७२ ॥ क्रूरा वक्रेऽतीव दुष्टा रैविः स्याद्यद्राशी. सां दिक्स- दिश्यास्तमेति । प्राच्या ईशाशास्थिताश्च मोऽयं" सर्वाशासु ज्ञायतां बुद्धिमद्भिः ॥ ७३ ॥ क्रूरा वके पापग्रहाः वक्रिणः अतीव दुष्टाः स्युः । रवि- यस्मिन्नाशौ स्यात् यद्दिग्लिसितेपु राशिए स्यात् । यथा प्राच्यां वृपमिथुनफर्कटा लिखितास्तेषां मध्ये चेदेकस्मिन्नाशी तिष्ठेत्तदा सा प्राच्यादिदिक् सदिश्या 'दिशि भवं दिश्यं' नक्षत्र, स्वर, वर्ण, राशि, तिथिवारादि तेन सह वर्तव इति' सदिश्या आशा नक्षत्राद्यैर्युता सा दिगस्तगा स्यादित्यर्थः । विदिक्षु ये स्वरायास्ते कथमस्तगता ज्ञेया इत्यपेक्षायां विदिशा दिक्ष्वेवांतर्भावमाह-पाच्या इति । ईशाशा ऐशानी तत्र स्थिताः अत्र प्राच्या प्राचीदिग्गता ज्ञेयाः । आमेयीस्था दक्षिणदिग्गताः ज्ञेयाः । एवं नैर्ऋतिस्थाः प्रतीचोगताः । वायव्यस्था उदीची- गता ज्ञेयाः ॥ ७३ ॥ क्रूरग्रह वक्री होकर वेध करते हों तो अत्यन्त दुष्ट होते हैं । सूर्य वृपादि जिस गशिपर स्थित हों और वह गशि जिस दिशामें हो तो उस राशिके तर्फकी दिशा एवं स्वर, वर्ण, नक्षत्रादि सब अस्त होते हैं। (१) और कोणस्थ स्वरवर्णादि उक्त दिशाके साय अस्त होते हैं । यथा ईशानकोणस्थ पूर्वमें, अग्निकोणस्य दक्षिण, नैर्ऋत्य- फाणस्य पश्चिममें और वायुकोणस्थ उत्तरमें मानकर अस्त समझे जाते हैं । (२)॥ ७३ ॥ -- .

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । ' (११७) उदाहरण । पथा सूर्य वृपराशपर है तो पूर्वदिशाके स्वर वर्ण नक्षत्र राश्यादि मब अस्त हैं। अतः अस्त दिशाका फलभी नीचे लिखे अनुसार होता है ॥७३॥ - अस्ताशास्थाजायः क्रूरव्यधवशात्फलं वाच्यम् । उदितास्थैिः सौम्यव्यध इव फलंमादिशेच्छष्टम्७४॥ अस्वाशा सूर्याक्रान्ता दिक् तस्यां स्थितैरजायैः स्वरवर्ण- क्षेतिथिवारैः कूरग्रहवेधवदुष्टफलं वाच्यम् । उदिताशा सूर्या- कान्तदिग्व्यतिरिक्ता तत्र स्थितैः स्वरायः सौम्यग्रहवच्छेष्ठ फलम् अस्ताशास्थाः सत्फला अप्यसत्फलाः । उदिताशास्था- स्त्वसत्फला अपि सत्फला इत्यर्थः ॥ ७४ ॥ अस्त दिशामें स्थित स्वगदिकोंका बूरवेधको भॉनि नेष्टफल-और उदित दिशामें स्थित स्रादिकोंका सौम्यवेध की भांति श्रेष्ठ फल कहना चाहिये अर्थात् शुभ फल देनेवाले स्वर जो वर्णादिहैं वे यदि अस्त दिशामे हों तो अशुभ फल देतेहैं और अशुभ फल देनेवाले स्वरवर्णादि उदित दिशामें हों तो शुभ फल देते है ॥ ७४ ॥ हानी रुकलदोपि पीडित इहे स्थार्जन्मभेऽस्मानये कर्मासिदिरथो भिदा चर्यमिते द्रव्यक्षयः स्याजये। गोरे"देहरुजः शरे सुखहती सूज्ञो) देशोडनि" झुण्णे. जात्यभिपेकयो रैपि तयोस्तत्तद्भयनिर्दिशेत्७५ इह सर्वतोभद्रे जन्मनक्षत्र पीडिते कूरग्रह विद्ध हानिर्दव्यादेः, रुक् रोगः, कलहो मित्रायः, एतानि फलानि भवन्ति । अस्मा- जन्मभानये १० दशमः पीडिते कर्मासिद्धिः कर्म यत्कर्नु- शितम्यासिद्धिः । अथो तव एव चय १६ मिते पोडश- - .. -- (११८) . समरसारं- संख्याक विद्ध भिदाभेदः इष्टवर्गेण सह । जये १८अष्टादशसंख्ये तु विद्ध द्रव्यक्षयः। गौरे २३ त्रयोविंशतितमे विहे देहरुजः। शरे २५ पंचविंशतिमे विद्धे सुखहतिः सुखनाशः। अथ राज्ञो देशोडुनि अवकहड़चक्रे यत्तु देशनक्षत्रं तस्मिन् विहे । तथा जात्यभिपेकयोः जातिः क्षत्रियत्वादिः तद्वं अवकहड़चक्रजम् । एतच्चक्रजमेव यद्राजाभिषेककालीननाम- नक्षत्रमेतदभिपेकभम् । एतेषु विद्धेषु तत्सम्बन्धिनां देश-जाति- राज्यानां भयं निर्दिशेत् ॥ ७५।। इस सर्वतोभद्रमें यदि जन्मनक्षत्र वेधा गया हो तो हानि, रोग, और क्लश यह होते हैं । यदि जन्मक्षसे दशवां वेवित हो तो कर्मकी अमिद्धि होती है । यदि जन्मनक्षत्रसे सोलहवां नक्षत्र वेधित हो तो भेद (परस्परभेद-अविश्वास ) होता है । यदि अठारहवां वेधित हा तो द्रव्य- क्षय होता है । तेईसवां वेधित हो तो देहमें रोग होताहै और पञ्चीसा नक्षत्र वेधित हो तो सुख हानि होती है। यदि राजाके देश का अथा राज्याभिषेकका वा किसी जातिका नक्षत्र विद्ध हो तो उस उम देश, राज्य वा जातिको भय होता है । यह सब नाम नक्षत्र पूर्वोक्त अवकहडचकसे देखलेने चाहिये ।। ७५ ॥ इति समरसारे सर्वतोभद्रप्रकरणम् । . *विण्यात सर्वतोमन चक रैलोक्यदीपरम् । यस्मिन्नृशे स्थितः खेटस्ततो वचत्रय भवेत् । प्रहदृष्टिवर्शनान वामसम्मुखदक्षिणे ॥ १ ॥ भुक्त भोग्य तथा कात पद्ध करप्रहेण भम् । शुभाशुभेषु कार्येषु वर्जनीय प्रयत्नतः ॥ २॥ सूर्यमुक्ता उदीयन्ते सूर्यप्रस्तास्तगामिनः । ग्रहा. द्वितीयगे सूर्ये स्फुरदिवाः कुजादयः ॥ ३ ॥ समा तृतीयगे ज्ञया मन्दा भानी चतुर्थगे । वका स्या पंचपष्ठेऽर्फ त्वतिवऽष्ट. सप्तमे ॥ ४ ॥ नवमे दशम भानौ जायते कुटिला गतिः । द्वादशैकादशे सूर्ये भजते शीतता पुनः ॥ ५ । मदृश्यता पुनर्लोके मजस्वगता प्रहाः ।, अवर्णादि--

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संस्कृत टीका-भापाटोकासमेतम् । (१९)
ऋणधनशोधनमाह ।
साध्यांको अकठबौदयस्ततत्तुं नगभूभानुनिन्नग दाप्ता ।
रुरुमननरयनभवगांसाधके ऋणमधिकशेषतो दीप्तौ७६
साध्यस्य सम्बन्धयाह्यस्य दासदासीशिप्याद मसम्बन्धि-
नोंकाः साध्यते । तत्रैवं-त६, त६, तुंद, न०, ग३, भू ४,
भा४,नु०नि०,न०,गा ३, अकठबादयस्तत्सम्बन्धिनश्चान्काः
साध्यनामाक्षर स्वरसम्बन्धिन एकीकता दा ८ मा अष्टभक्ता
यदि शेषांकः साधकनामाक्षरांकसंख्याष्टभागाव शिष्टांकादूनस्तदा
साध्यस्य साधकः ऋणप्रदः । अधिकं तु गृह्णाति । साधकः
साध्याणमिति भावः । साधकांस्तु तत्र वर्गास्त एव तदंकास्तु
रु२, रु२, म:, न०, न०,२२, य, न०, भ४, १४,गाः३,
एते एकादश । अत्रापि साधकनामाक्षरसम्बन्ध्यंका एकीकता
अष्टभक्ताः साध्याङ्कादधिकशेपे साध्यस्य ऋणप्रदः साधकोऽल्पे
तु गृह्णाति ॥ ७६ ॥
ग्यारह कोठोंमें त ६-त ६-तुं -न०-ग ३-भू-भा -नु०-
नि०-०-गा ३ यह नाध्यके अंक लिखकर एनके नीचे अफठवादि
अर्थात् · अआ ईउऊएऐओओम कखगवङ चउचझन टठडढण
तथदधन पफवनम यरलव शप-ह-पहलिखे और ऐसेही र २-२-म.
५-न-न0-10-य १-३०-४-२ गा-३-यह साधकके अंक
--स्वरोदी द्वावस्येपे द्वगोळयः । स्वग्युचारमनो धयानुस्वार विसर्गयोः ॥ ॥ वदो
सो पो व ज्ञेशै मो परस्परः । एपेन दिनय प्लेय गुभाशुभखगम्य ॥ .
मानकाले भवेद्विस पाउन फरसाबरः । तदुष्ट शोभन सौम्यनिधीपल मतम् ॥ ८ ॥
मलना प्रामो दुर्ग देवालयः पुग्म् । रुनयतो विद्ध विनश्यति न राय
तल भाडे
गजादि चतुपस । गर्व महर्षता यानि को
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-
J
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रसो धान्य
ग्यवस्थित.॥१०॥

(१२०) समरसारं- लिखकर इनके नोचेभी वही अकठवादि लिखे तो 'ऋणधन' चक्र वनजाता है। इस चकसे साध्य और साधकके नामाक्षगेकी संख्या लेकर उसमें आठका भाग दे तो जिसका शेष अधिक बचे वह ऋण- प्रद होता है ॥७६ ॥ उदाहरण । जैसे-'राम सीता' का धनर्ण देखना है तो यहां राम साधक और, सीता साध्य है । अतएव साधक रामनामक र०-आ २-म ५-अ २ इन अंकोंका याग ९ है और साध्य-सीतानाम के स०-ई०-त 3- आ ६-अंकोंका योग । है । इन ९ । ५ दोनोंमें आठको भाग देनेसे १।१ बचता है । अतएव राम-सीता-दोनों समान हैं। साधक वह कहा जाता है जो किसी व्यक्तिविशेष वा वस्तुविशेषसे अपना कार्य साधन करे और साध्य वह कहाजाता है जो साधक्के कार्यविशेपमें उपयुक्त हो यया स्वामी साधक, सेवक साध्य, पति साधक, पनी साध्य -गुरु माध, शिष्य साध्य इत्यादि इत्यादि ॥७६।। ऋणधनसाधनचक्रम । . . न| तन ग मायारा भू भानु नि निगा ६ ६ ६ ०३ ३ । आइ 17 ए ओ ओ कायाग घ छजझजट ठ द ढतव द धन भा रल वाशाप सह साम रु मनन रायन भावगा माया २५ ०१ ० ४ ३ आतुरसाध्यासाध्यादिप्रश्ने तज्ज्ञानमाह । कोहीद्वतोऽर्थं च विमगनपुंसकोनेष्वंकास्तुलारिभ- मतीभृगुकानकाः म्युः । दतातुराह्वयतदैक्यदभक्त- 'शेपे जीवेद्दो"समधिकेम्रियते समाने ।। ७७ ।।

.. संस्कृतटीका-भाषांटीकासमेतम् । ( १२१) कात् ककारात्-ठात् ठकारात्-बात् बकारात्-वर्णा लेख्याः । विसर्गनपुंसकोनेपु-विसर्गः अः, नपुंसकाः लल एतैः व्यतिरिक्तेषु, अधः कठबादयो वर्णा लेख्या वर्णोपरि तु६. ला३-रि २-भ४-ल-ती ६-भृ ४-गु३ का १-न - काः १-अंकाः स्युः लेख्याः भवन्ति । दूतः पृच्छकः आतुरो रोगी तयोः आह्वयं नाम तस्य अंकैक्यं पृथक् पृथक् कर्तव्यम् द ८ भनम् अष्टभक्तं, दूतांकशेषाददिनो रोगिणोंके समधिके अधिके सति रोगी जीवेत् । दूतांक्शेषाद्रोगिणोंके समे होने चमति रोगी म्रियते ॥ ७७ ॥ विसर्ग (अ) और नपुंसक (लल ) इनके अतिरिक्त और जो-अकठवादि स्वर व्यंजन हैं इनको तु ६-ला ३-रि २-भ ४-स ७-ती ६-भृ ४-गु ३-फा १-न-का १-इनके नीचे लिखे तो आतुरसाध्यासाध्यज्ञानचक्र बन जाता है। इसमें दूत (प्रच्छक) और आतुर (रोगी) के नामाक्षरोंको संख्या लेकर उनमें पृथक पृथक आठका भाग देनेसे दूत के शेपसे रोगीका शेप सम वा न्यून हो तो रोगी मरजाता है ॥ ७ ॥ उदाहरण। यया देवदत्त तो रोगी है और इसके अच्छे होने न होने विश्यमें यज्ञदत्त पूंजता है तो-रोगी देवदत्त का नामांक (द -२४-३५-अ ६-६ ५-६-त् ७-त७-६-) संख्यायोग १८ । और दूत वा प्रच्छक यज्ञदत्तका नामांक-(यर-अ ६-ग ३०-अ ६ दर-अ ६-त् ७-त ७-६- ) संख्यायोग १९ है । इनमें आठमा भाग दिया तो दूत- । रोगी ३-दोष रहा । यह दूतके शेषसे रोगीका शेष अधिक है अतएव रोगी देवदच जीवेगा । ७७॥

(१२२)
समरसार-
आतुरसाध्यासाध्यज्ञानचकम् ।
तु ६ ला ३ र २भ स ती ६/४/गु ३T / नका १
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रुग्णप्रश्न एव विशेपमाह ।
प्रश्नाज्झलां च मितिः कयुक्तो भूयो रनिघ्नो लह-
तार्थ शेपे"के जीवित खे"निरुजो म॒तिनै भवेच
तिथ्यां मरणाभिधायाम् ॥ ७८ ॥
प्रश्नस्य प्रश्नवाच्यस्य दूतोक्तस्य येऽचो हलश्च तेषां प्रमितिः
प्रमाण के १ नैकेन युता । भूयः पुनः रे २ण दाम्यां गणिता।
ले ३ न विभिभक्ता तच्छेपं च यदैकं तदा रुग्णस्य जीवित
निर्दिशेत । योस्तु शिष्टयोनितरां रोग विनिर्दिशेत् । ने.
शून्ये तु शेपे तन्मरणं वदेत् । तदपि वर्णस्वरवशाद्या मृत-
तिथिस्तस्यामेव वदेत् ॥ ७८ ॥
प्रश्न के समय प्रच्छक जो कुछ है उस कथनके अच् और हलकी
उपरोक्तकमानुसार जितनी संख्या हो उसमें १ मिलाकर दोसे गुणादे
और तीनका भागदे याद १ शेष बचे तो रोगी जीता है । २ बचे तो
रोग ३ढता है। और • बचे वो रोगी मरजाता है। ऐसे ही वर्ण-
स्वरके वशसे मृततिथिका विधान करै । अर्थात् वर्णस्वरसे जो मृतस्पर
हो उसी स्वरकी तिथिको मरणतिथि जान ॥८॥

मस्कतटीका-भापाटीकासमेतम् । उदाहरणा जैसे देवदत्तने-यज्ञदत्तके विषयमें कहा कि “यज्ञदत्त कब अच्छा होगा" तो इस कथनके अक्षरोंके संख्यां म्योग९९ में एकयुक्त १०० करके दोसे गुणा किया तो २०० हुए। इनमें तीनका भाग दिया तो २ शेप रहा । अतएव--यज्ञदत्तके रोग बढ़रहाहै । यदि यह जानना हो कि, यज्ञदत्त किस तिथिको मरेगा तो "मर णाभिधायो" के अनुसार यज्ञदत्तका वर्णस्वर उकार है और उकारसे मृत्युस्वर इकार है अतएव इकारकी जया ३। ८ । १३ तिथि होनेसे यज्ञदत्त जया तिथिमें मरेगा । इसी प्रकार मृतपुरुपोंगी भी मृत तिथि विदित होताहै ॥ ७८ ॥ इति समरसारे ऋणधनातुरसाध्यासाध्यादिप्रकरणम् । भविष्यदर्थसूचक छायानरं पश्यति तत्पकारमाह । प्रातः पृष्ठगते ग्वावानिमिपं छायां गले स्वां चिरं दृष्ट्वोद्ध नयनेन यत्सिततरं छायानरं पश्यति । तत्क- णामकरास्यपार्थहृदयाभावेक्षणेकश्चिदिग्भूरामाक्षि. समाः शिरोविगंमतो मासांस्तु पटू जीवति ॥ ७९ ॥ प्रातःकाले मेघायैरनाच्छादिते खौ पृष्ठगते अनावृत्ने स्थले स्थित्वाऽर्क पृष्ठभागे कृत्वा प्रत्यक मुखस्तिष्ठन् । अनि मिपं- निमेपशून्ये चक्षपी कुर्वन्सन् स्वां स्वकीयां चिरं चिरकालंगल स्थले दृष्ट्वैव वाहशी अनिमिषे एवनेने ऊर्ध्वप्रदेश नयन । सिव- तरम्-अतिशयेन श्वेत छायानरं छापापुरुपं पश्यति । एवंप्रका- रेण शरदादिसित विमलरात्रिपुछायापुरुषो दृश्याएवं दृष्टे पुरुपे फलमाह-वदिति । तस्य छापानरस्य कर्णाभावदर्शने दृष्टाअर्क- वर्षाणि द्वादशवर्षाणि जीपति। द्रष्टाअंसकरवास्पपा उदय ( १२४.) समरसार- विना छावापुरुपदर्शने क्रमादायुर्वणि सप्त ७, दश१० एक त्रि ३, द्विसंख्यानि जीवतीति सम्बन्धः। शिरोविगमतः अशिरस्कच्छायापुरुपदर्शने पण्मासान् जीवतीति श्लोकार्थः । अत्र स्वसंकेतितवर्णलक्ष्यां संख्या परित्यज्य अर्कादिसंज्ञाग्रहो लोकप्रसिद्धिमाश्रित्य ॥ ७९ ॥ प्रातःकालके समय सूर्यको पीठदेके पश्चिमाभिमुख खड़ा होकर अनिमिप ( पलक न मिलें ऐसी) दृष्टिसे अपनी छापाको गलस्थल के पास बहुत देरतक देखे । फिर नेत्रोंको सहसा ऊँचे लेजाय अर्थात् ' आकाशको देखे तो एक अत्यन्त सफेद छायाका पुरुप दीखता है। उस छायापुरूपके यदि कान न दाखें तो बारह वर्षतक. अंन कंबे) न दोखें तो सात वर्षतक, हाथ न दीखें तो दश वर्षतक, मुख न दीखे तो एक वर्षतक, पार्श ( पांशू ) न दीखें तो तीन वर्पतक,हृदय न दोखे तो दो वर्षतक. और शिर न दीखे तो छ: महाने पर्यंत छायापुरुषको देखनेवाला मनुष्य जीवित रहता है ॥७९॥ अत्रव विशेपमाह । हृदंघटयो मुनिसंख्यमासान दिदइदृष्टौ तु मृति- स्तदैव । सम्पूर्णदृष्टी तु न वर्षमध्ये रोगो मृतिन्नति वदन्ति सत्य ।। ८० ॥ छायापुरुषस्य हृदये चेदन्, दृश्यते तदा सप्तमासान् जीवति शरीरयं चेद् दृश्यते छायापुंसः तदा तदानीमेव मरणं जानी- यात् समूणे तु छायापुरुष दृष्टे वर्षमध्ये रोगो मरण च न. भवेदिति सत्यं ज्ञेयम् ॥ ८॥ यदि उस छायापुरुषके हृदयमें छिद्र दीखे तो सात महीने पीछे और दो शरीर दखें तो उसी समय मृत्यु होती है । यदि छायापुरुप सांग: .

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेतम् । (१२५) 'पांग सम्पूर्ण दीखे तो एक वर्ष किमी प्रकारका रोग वा मृत्यु कुछ नहीं होना है । यह सत्य कथन है ॥ ८० ॥ छायापुरुप गेन शकुनान्तरमाह । नातस्य पूर्व कणीदेः शोपे प्रामुक्तवत्फलम् । सर्वांगास्यं हृच्छोपे पल्मासाभ्यन्तरे मृतिः ॥८॥ स्नातस्य कृतस्नानमात्रस्य पुंसः कर्णादेः कर्णासहस्तमुख- पार्थहृदयादीनां प्रथमतः इतरांगेयः पूर्व शोपे पूर्वश्लोकोक्त -फलं योज्यम् । यथा कर्णशोपे द्वादश वर्षाणि, असशोपे सप्त वर्षाणि, हस्तशोये दश वर्षाणि, मुखशोषे एकं वर्प, पार्थशोपे त्रिवर्षाणि, हृदयशोपे युग्मवर्षाणि जीवनम् । सर्वांगाईस्य हृच्छोपे हृदयस्थले प्रथमतः शीपणे पण्मासमध्ये तस्य पुंसः मरणं विनिर्दिशेत् ॥ ८ ॥ नान करचुकनेपर यदि पहले कर्णादि सूखजॉय तो उपरोक्त तुल्य फल जानना अर्थात् सब शरीर तो भीगा रहै और कान पहलेही सूखजॉय तो बारह वर्ष, कंधे सूख जाय तो सात वर्ष, हाय सूखें तो 'दश वर्ष, मुख ससे तो एक वर्ष, पार्थ सूखें तो तीन वर्ष और हृदय सूखे तो वह मनुष्य दो वर्ष तक जीवित रहता है। और यदि केवल हृदयस्थल ही पहले सूखनाय तो छः महीनेके भीतर मृत्यु होजाती है॥ ८ ॥ अन्यदाह । हस्ते न्यस्ते शिरसि यदि न च्छिन्नदण्डोऽस्य दृष्टः पण्मासान्तन मरणभेयं सम्पुटे हस्तयोस्तु । न्यस्ते 'शीर्षे यदि , कदलीकोरकाभं तदेतदृष्टं 'नो भीस्तरति सलिले चेत्स्वशेफो न मृत्युः ।।८२॥ शिरसि स्वकीये हस्ते न्यस्ते यदि छिन्नदण्डो न श्यते - ( १२४) समरसारं- विना छायापुरुपदर्शने कमादायुवाणि सप्त ७, दश१०एक त्रि ३, वि संख्यानि जीवतीति सम्बन्धः। शिरोविगमतः, अशिरस्कच्छायापुरुपदर्शने पण्मासान् जीवतीति श्लोकार्थः । अत्र स्वसंकेतितवर्णलक्ष्यां संख्या परित्यज्य अर्कादिसंज्ञाग्रहो लोकप्रसिद्धिमाश्रित्य ॥ ७९ ॥ प्रातःकाल के समय सूर्यको पठिदेके पश्चिमाभिमुख खड़ा होकर अनिमिप (पलक न मिलैं ऐसी) दृष्टिसे अपनी छापाको गलस्थलके पास बहुत देरतक देखे । फिर नेत्रों को सहसा ऊँचे लेजाय अर्थात् आकाशको देखे तो एक अत्यन्त सफेद छायाका पुरुष दीखता है । उस छायापुरुपके यदि कान न दीखें तो वारह वर्पतक, अंस कवे) न दी तो सात वर्पतक, हाथ न दीखें तो दश वर्पत क, मुख न दीखे तो एक वर्षतक, पार्श (पांशू न दीखें तो तीन वर्पतक,हृदय न दोखे तो दो वर्पत रु. और शिर न दीखे तो छ. महाने पर्यत छायापुरुषको देखनेवाला मनुष्य जीवित रहता है ॥७९॥ अत्रैव विशेपमाह। घदृष्टयों मुनिसंख्यमासान दिइदृष्टौ तु मृति- स्तदैव । सम्पूर्णदृष्टी तु न वर्षमध्ये रोगो मृतिनैति वदन्ति सत्यमें ।। ८० ॥ छायापुरुपस्य हृदये चेइन्, दृश्यते तदा सप्तमासान् जीवति शरीरद्वयं चेद् दृश्यते छायापुंसः तदा तदानीमेव मरणं जानी- याद सम्मणे तु छायापुरुपे दृष्टे वर्षमध्ये रोगो मरणं च न. भवेदिति सत्यं ज्ञेयम् ॥ ८ ॥ यदि उस छायापुरुष हृदय में छिद्र दीखे तो सात महीने पाछे और दो शरीर दोखे तो उसी समय मृत्यु होती है । यदि छापापुरुष सांगो - १ "नो भीस्तरति सैलिले चेत्स्वशेफो न मृत्युः ॥८॥ शिरसि स्वकीये हस्ते न्यस्ते यदि छिन्नदण्डो न हरने संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेतम् । (१२५) 'पांग सम्पूर्ण दोखे तो एक वर्ष किमी प्रकारका रोग वा मृत्यु कुछ नहीं होता है । यह सत्य कथन है ।। ८० ॥ छायापुरुपसंगेन शकुनान्तरमाह सातस्य पूर्व कणीदेः शोपे प्रागुंक्तवत्फलम् । सागाईस्य हृच्छोपे पण्मासाभ्यन्तरे मृतिः ॥८॥ स्नातस्य कतस्नानमात्रस्य पुंसः कर्णादेः कर्णासहस्तमुख- पार्थहृदयादीनां प्रथमतः इतरांगेयः पूर्व शोपे पूर्वश्लोकोक्तं फलं योज्यम् । यथा कर्णशोपे द्वादश वर्षाणि, अंसशोपे सप्त वाणि, हस्तशोपे दश वर्पाणि, मुखशोपे एक वर्प, पार्थशोपे विवर्षाणि, हृदयशोपे युग्मवर्याणि जीवनम्। सर्वागाईस्य हृच्छोपे हृदयस्थले प्रथमतः शीपणे पण्मासमध्ये तस्य पुसः मरणं विनिर्दिशेत् ॥ ८ ॥ स्नान करचुकनेपर यदि पहले कर्णादि सूखजाय तो उपरोक्त तुल्प फल जानना अर्थात् सब शरीर तो भीगा रहै और कान पहलेही सूखजॉय तो बारह वर्प, कंधे सूखजॉय तो सात वर्ष, हाय सूखें तो 'दश वर्ष, मुख सूखे तो एफ वर्प, पार्थ सूरखें तो तीन वर्ष और हृदय सूखे तो वह मनुष्प दो वर्ष तक जीवित रहता है। और यदि केवल हृदयस्यल ही पहले सूख जाय तो छः महीने के भीतर मृत्यु होजाती अन्यदाह । हस्ते न्यस्ते शिरसि यदि न च्छित्रदण्डोऽस्य दृपः पण्मासान्तन मरणभेयं सम्पुटे इस्तयोस्त । यस्ते 'शी यदि कुदलीकोरकाभं तदैतहट - (१२६) समरसार- .वदा न मरणभयं भवेदिति ज्ञेयम् । अत्रैव प्रकारान्तरमाह- सम्पुट इति । हस्तयोस्तु सम्पुटे शो मूर्ति न्यस्ते धृते सति तदन्तः तयोयोः प्रकोष्ठयोरन्तरालं यदि कदलीकोरकामं रम्भाकलिकातुल्यं चेदृष्टं तदा नो भीः . मरणादेरिति शेपः । अन्यच्चाह-सलिले जले चेत्स्वशेफः प्रजनन स्वकीयं तरेन्न मज्जेत् तदा मृत्युन स्यादिति ज्ञेयम् ॥ ८२ ॥ यदि हाथको शिरपर लगानेसे हस्तदंड टूटाहुआ न दीखे तो छ: महीनेके भीतर मृत्युका भय नहीं होता है । यदि दोनों हाथोंका सम्पुट बनाकर शिरपर लगानेसे सम्पुटकी पोल के भीतर केलाकी कोर(चमक- दार लाल कली) जैसी दीखे तो मृत्युआदिका कुछ भय नहीं है। और यदि अपनी इन्द्री जलमें नहीं डूबे तो भी मृत्यु नहीं होती है ॥८२॥ उक्तशकुनानामुपयोग स्तुतिं चाह । इमानि चिह्नानि विचार्य यौटुं विनिश्चये स्वायुपं एव यायात् । आईर्हि मुख्यं शकुंनंस्वदेहचिह्नानि बाँझैः शकुनैः कि मन्यैः ।। ८३ ॥ इमानि प्रामुक्तानि चिह्नानि शरीरभवानि विचार्य स्वायुपः सत्तायां विनिश्चये एवं योद्धं शत्रुर्निर्गच्छेत् । न त्वल्पायु ने कथमेभिः शकुनमात्रैः स्वायुनिश्चय इत्याह-आहुरिति । हियतः कारणात्स्वदेहचिह्नानि मुख्यं शकुनमाहुः गर्गादिमुनयः । अत एभिरायुनिश्चय इत्यर्थः । अन्यः बाह्यः काकशिवादिवाशित- रूपैः शकुनैः किंचिद्विसंवादित्वात्कि प्रयोजनमित्यर्थः ।।८३॥ उपरोक्त चिट्ठोंको विचारकर आयुष्यका निश्चय करके फिर युद्ध करना चाहिये । अपनी देहके चिह्नोंके शकुन ही मुख्य शकुन कहे है । याहरके खग मृग आदिके अन्य शकुन क्या हैं ? ॥ ८३ ॥ इति समरसारे शकुनप्रकरणम् । .

संस्कृतटीका-भापाटीकासमेत। (१२७ ) ग्रन्थसमाप्तौ प्रचयगमनाय मंगलप्रयोक्तुः प्रशंसा- पूर्वकमाशिपं प्रयुक्त। सकलस्वरशास्त्रसारमेतत्परिसंक्षिप्य मया न्यगादि सर्वम् । गुरुभक्तिजुपोऽथ धर्मवृत्तेः स्फुरतादेतँदभी- प्सितार्थसिद्धयै ॥ ८॥ सकलं समस्तं यत्स्वरशास्त्रम् ईशादिप्रणीतं तस्य सारम् अव्यभिचारादत्युपयोगाच्च गुरुत्वात्सारं संक्षिप्य सर्व मयान्यगादि नाम यात्रांगादि उक्तम् । एतद् गुरुभक्तिपः गुरुभक्तस्य अथच 'धर्मवृत्तेः धर्मवर्तनं यस्याभीप्सितार्थसिद्धयै स्फुरतात् चम- कुर्यादित्यर्थः ॥ ८४॥ यह सब स्वरशास्त्रोंका सार मैने संक्षेपसे सम्पूर्ण कहा है। यह सो गुरुभक्तियुक्त,धर्मवृत्तिवालोंके अभीप्सित सिद्ध करनेको स्फुरित होवे८४ ग्रन्थरुत्स्वगोत्रोत्कीर्तनस्वपूर्वजनाम- कथनपूर्वकं सम्बन्धमाह । वैशे वत्समुनीश्वरस्य शिवदासाख्यादुरुख्याँतितः सम्राडंमिचिदाप यस्य जनकः श्रीसूर्यदासोऽनि । यन्मातुर्यशसी दिशो दशै विशालाक्ष्या वली व्यधात्स प्राज्यस्वरशास्त्रसौरविचिति रोमो वस- नैमिषे" ॥८॥ इति श्रीरामचन्द्रसोमयाजिविरचितं समरसारं सम्पूर्णम् । वत्समुनीश्वरस्य . वंशे उरुतरमसिद्धेः शिवदासाख्यान यस्य

Samarsaram

Author
Ramchandra
Title
Samarsaram
File name
Samarsaram
Text
OCR done
Citation
1912
Published
2012/08
Publisher
Bombay.,venkateshwar Steame Press
Language
Sanskrit
Pages
136
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311362
Barcode
99999990320257.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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FPMS1m37xGA
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