Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Poorna Kalas

Dr. Rangeya Raghav · 2011/03

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राजस्थान साहित्य-धारा
४
पूर्ण-कलश
डॉ० रागेय राघव
राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर (राज०)

प्रकाशक
डॉ० मोतीलाल मेनारिया
सचालक
राजस्थान साहित्य अकादमी
उदयपुर।
प्रथम सस्करण
१९६१
मूल्य
दो रुपये पचहत्तर नये पेमे
मुद्रक
जगन्नाथ यादव
अध्यक्ष
केशव पाट प्रिण्टर्स
अजमेर।

प्रकाशकीय डॉ. रागेय राघर हिन्दी के उन गिने-चुने विद्वान साहित्यकारो मे से है जिन्होंने भारतीय और यूरोपीय दोनों ही साहित्या और चिन्तन- धाराओं का सम्यक अध्ययन किया है । आपकी नवीनतम कृति 'पूर्ण-कलश' आपके समक्ष प्रस्तुत है। पूर्ण-कलश मे मनुष्य की चेतना के विभिन्न स्तरो को खोजा गया है। हीन फारमी, सस्कृत, चीनी, अंग्रेजी आदि स्रोतो मे उपनिपदों के गहन चिन्तन की झलक को उपस्थित किया गया है, क्याकि लेखक को मनुष्य की ज्ञान पिपासा की यात्रा मे सत्य के अनेक रूप दिखाई दिये हैं। इन रूपो की जो काव्यात्मक अनुभूति हुई है और दर्शन ने जहाँ मानस चक्षुओ से दिखाई देने वाले सौन्दर्य को आत्मसात किया है, उस महानता के रूप को ममेटकर सस्कृति की विराट् भूमि को प्रस्तुत करने की चे की है। इसलिये 'पूर्ण क्लश' मनुष्य को उदात्त करने वाला एक मशक्त करिता सग्रह है।

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दो शब्द घडा । खाली बजता है, भरा छलक सकता है, उसके छीटे नीच गिर सकते हैं। और मानव ने इन छोटो को ही देखा है, क्याकि वह कभी इतना शक्ति ही नहीं पा सका कि उसके भीतर देव सके, उसके पूर्णत्व का अक्न कर सके। - मनुष्य की सौदय की जिज्ञासा उसके सत्य का ही प्रवेपण बनकर बार-बार प्रगट हुई है। एक स्थल ऐसा है जैसा मानव सार्वभौम और सार्वकालिक होने का महान स्वप्न देखने की चेष्टा करता रहा है। वह प्रयत्न क्सिी एक सीमा के भीतर घिरा हुआ नही मिलता, बल्कि हम प्राय सवत्र ही मिल जाता है। मैंन उसाकी खोज की है और उह एक्-मूत्रता म उपस्थित करन की चेष्टा की है। यहाँ मैन पहले भारतीय मनीया के उद्गारा का प्रस्तुत किया है। फिर मैंने जहां-तहा प्राचीन और अर्वाचीन ग्रयो के पृष्ठ वैस ही उलट डाले । मैं यह दखकर आश्चय-चक्ति रह गया कि मनुष्य के सारे व्यवधानो के ऊपर, मभ्यता, सस्कृति और इतर भेदो के ऊपर काल के व्यापक प्रसार की गरिमा घटावाली एक 'समता' थी, 'एकरसता विद्यमान थी। वह महत्तर मानव की उपस्थित बग्न को एक ऐसी बलवती कामना थी, जो मानो सब प्रकार के बधनो का दूर कर देना चाहती थी। और मैंने अनुभव क्यिा कि उस भूमि पर आने के बाद भाषा का भी भेद पार हो जाता था। कान्य जब तक साहित्य मात्र का शृगार बना रहता है, तब तक उसम अभिव्यक्ति का वाह्य रूप अर्थात् भापा ही प्रधान होती है, किंतु एक स्थल ऐसा अाता है जब काव्य जीवन की चेतना का प्रतिनिधि बन जाता है, तब भावा को समष्टि अन्त सत्य का उद्घाटन परन लगती है, और वाह्य की प्रधानता का महत्त्व कम हो जाता है । जब मुझे यह दृष्टि मिली तब मैंने निमित रूप से देखा वियह सत्य शतशत किरणा दे रूप में मुखरित हो रहा था। जिस प्रकार सूय की किरणों के अनक रग है पर उनका मूल 'तप है, 'पालोक' है, जिसमें लय हो जाने पर रग नही दीसते, उमौ प्रकार भाव-मृष्टि में भी एष 'तप' है जो सम्वेदना है, एव 'पालोष' है जो सत्य का परम दर्शन है। मैंने उसी को अपनाने की चेष्टा की । उसी नाते मैंने भग्रेजी, चीनी, मिसी, अरबी, राकृत, होत्र, और फारसी भाषामो को विताए चुनी और उपनिषदो तया वेदों के प्रेरणा- विदु देसे और दाना वा सावभौम सामाश्य देवा । और बार मे जव सहृदया को पढपर व अनुवाद सुनाये तो जानवारा ने यह यहवर बढावा दिया कि अनुवाद मौलिक रचनानो जैसे लगते हैं, अपने चाह्यरूपेण ही नहीं, वरन् इसलिय भी कि उनका क्थ्य उनके प्रस्तुतीकरण से भी वही वडा था। मैंन अपन चयन में जीवन की विविधताना को लेने की चेटा पी है। इसलिये 'वधन' म सामाजिर मढि का तिरस्कार है । उसके वा की चीनी कविता मे भी सामाजिक विषमता या ही चित्र है । जम और प्रेम दो ही यदि वन्दी हैं तो मनुष्य का मौलिक सुन्न वहाँ है ? शेप जिज्ञासाए मानव को शाश्वत भावनामों का प्रतिनिधित्व करती हैं । जिज्ञासु पाठको को एक तुलनात्मक दृष्टि तो मिलगी हो, एक नयी भावभूमि भी मिलेगी, जिसमे समय मानव काल को दूरियो को लांघ कर चलता हुआ दिखाई देगा। चेर, वाया-बयाना (भरतपुर) -रागेय राघव

काव्य
काव्य जीरन की विविध जिज्ञासाओं
की पूर्ति की साधना है।
श्रादिम काल से श्राज तक जिन कवियों
ने मनुप्य के व्यापक सम्बन्धों को
अपनी अनुभूतियों में गहराई तक
उतार लिया था, वे उन भावनाओं को
जन्म दे गये जो कालान्तर मे धर्म के
नाम से विरयात हुई । उनमे कुछ
इतना गहन, इतना मार्मिक और इतना
प्रेरणाप्रद था, कि उनकी शाश्वत
ज्योति जीरन काही अग बन गई।
जो मनोरजन करके उदात्ततम बनाता है,
एक सीमा के परे वह ऐसे स्थल पर
पहुँच जाता है, जहाँ उस उदात्त में
अपना लय र देना मनुष्य के जीवन
की कामना बन जाती है।
जो उस तक पहुँच सकता है, वही आनद
की पहली झलक को देखकर प्रणाम
करने की चेतना को भी जान लेता है।

फविता TATE anthariyar पुर था. ११ ३ पि در دماوند در ادا गा JILLAIN .... 16 الزمال.د زلميلا पामाग ५ गि? HILI TWITTLध्याग high dejudjet पति " CY पगली पगार भु परमार কমিণি বিতা ७ राम्यगया पारमा नतिजा ভাবিদি ববিতা ও মা গৃপি শ আশা थारा मगरजी पति उप-सहार यमिकविता विनियम स्वय

भूमिका
निश्चय जो भूमा है, सुख है,
नही अल्प में सुख मिल पाता,
सुख भूमा है, उसकी ही तुम
जिज्ञासा नित करो हृदय म ।
जहां और कुछ नही देखता
नही जानता और न मुनता
वह भूमा है,
जहां और देखता, जानता,
सुन लेता है,
वही अल्प है।
जो भूमा है वही अमृत है,
जो है प्रल्प, मत्य है वह ही।
[छादोग्योपनिषद् ७।२३-२४]
-
पृथ्वी और अमृत, मोर ममृत का पर्याय परमात्मा मानव + मन की
जिनासा का विषय मनादिकाल से ही रहते चले पाये हैं। हमारे वैदिक
[एक

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एकातवास
(विनियम वडस्वय)
में मनुज, प्रकृति, मानव जीवन
के बारे में सोचा करता,
बहुधा ही देखा करता हूँ, चिता-निमग्न
एकात निभृत म जग उठती मेरे सम्मुख
कल्पना अनेको सुदरतर
पावन मुप की अनुभूति लिये रहती कोमल
दुख को छाया को रेखा भी आतो न पास ।
चेतन हो उठता हूँ, विचार ऐसे निहार
ओ' मीठो स्मृतियां घिर घिर पाती है उदार
मन म भरती सतोप तप्ति
या प्रात्मा को करती उदात्त उन्नद्ध स्वय
इम मत्य-वास में असत् गोर सत्
रही तोल।
मायगे एसे भाव, जहां से भी मुझमे,
इस वाह्य-व्यवस्था के श्वासा से समुद्भुत
या स्वानुभूति उद्रेकमयी मात्मा मे से
[तान

मेरे छदो मे बोल उठेंगे वार वार- प्राशा, सुन्दरता, प्रेम, सत्य, गौरव अपार भो' अवसादो का भय श्रद्धा से होजायेगा दूर दूर, में गाऊंगा उस दिव्य सात्वना के बारे मे मुखरित हो जो पीडा को करती विलीन । वह नैतिक बल, मेधा-प्रसार, सम्पूण लोक मे जो भर देगा अमित हप बहुजन हिताय, जिसमे रक्षित व्याघातहीन होगा निश्छल रे व्यक्ति-मनस का प्रिय-नीरव-एकान्त-शान्त केवल अन्तश्चेतन का ही है जहां राज्य, में गाऊँगा औ' सब पर जो करते शासन हैं पूरणप्रज्ञ के नियम नम मेरे शब्दो मे पायेंगे अभिव्यक्ति स्वय । यद्यपि क्म हैं श्रोता अनुरूप-योग्य वे मुझे मिलेगे ही निश्चय, में गाऊँगा। यो कवि, पवित्रतम मानव- करता रहा प्राथना झुका शीश, याश्वा स करता अधिक प्राप्त । चाहिये मुझे कोई दिखलाये पथ और वाणी समथतम शब्दो मे भरदे गौरव उतरे धरती पर, स्वर्गों के शिखरो से मुझमें भरे स्फति । चार ]

मुझको चलना है छायाप्रो से भरे मार्ग पर
तन्मय हो
डूबना गहन में और पुन
ऊपर उठना है लिये ज्योति,
भरना है मुझको श्वास लोक लोको में जो
भर उठे प्राण
स्वर्गों का स्वग बने झिलमिल अवगुण्ठन सा ।
वह शक्ति, सकल आतक, निहित जो
हुआ व्यक्ति-प्राकृति मे पा
विद्युत्गजनमय परमात्मा न्यायो कठोर
स्तुति-गान गुंजाते देवदूत
वैभव अपार दर्शित करते वे सिंहासन
सम्राटो के
में निकल रहा सबके समीप से
नही भीत।
उत्पात घोर, रे सघन तिमिरमय
नरक निम्नतम या कि विजन
गहनाधकारमय महाशून्य
स्वप्नो के भय से उद्वेलित-मी महारिक्ति
इन सबसे भी वह भय पातक नही जगता
जसा अपने मन के भीतर ही
हमे झाकने में लगता,
मानव के मन मे झुककर है देखना कठिन,
पर वही ठौर है रे मेरी,
मेरे गीतो की मूल-भूमि तो है वह ही ।
जीवत एक सता पृथ्वी को जागरूक
धरिणी के भौतिक तत्त्वो से

अति सूक्ष्म चेतनाएँ जिम अनिकोगल से निर्मिन करती उसको भी जो कि पराजित घर दनी महमा वह सुन्दरता- पाई मेरे मोपानो पर। मै चलता हूँ, मेरे मम्मुग्य ही गिविर किये स्थापित अपना है बनी पडोसिन मेरी वह इस बेला म, वे युज मधुर छाया वाले जिनम नदनवन का विहार था कर उठना कलरव मृदुतर, रे स्वग, सभी कुछ हुए भला क्यो विगतमार? इतिहास बन गये क्यो उनके, जो च न गये ? या वह केवल थी दत कथा प्राधारहीन ? मानव का यह जिज्ञासु-मनस पावन सुग्रोज प्रेम मधुर से हुमा पूर्ण जब सबल सष्टि से कर लेता तादात्म्य स्वय खाजेगा सबको ही जैसे साधारण कोई वस्तु सहज दिन की पाये, कर लेगा सबको पुन प्राप्त । वह मधुर काल आये उससे ही पहले मै इस महत् विलय की गाथा को गाऊँ पावनतम हुआ शान । जो हम हैं उतने ही शब्दो म उठू बोत, वासना-ग्रस्त उन सबको जाग्रत कर डालू छ । -- जो मृत्यु-विनिद्रा में डूबे, औ' शूय, ग्रह से त्रस्त रिक्ति से जो प्राणी उनमे उदात्त प्रानन्द जगादू स्फुरित प्राण । उद्घोषित करद मेरा स्वर- सम्पूण यानि की प्रगतिशक्तियो के समान यह व्यक्तिमनस है बाह्यलोक से किये हुए निज सामजस्य मनोज्ञ प्राप, औ' बाह्यजगत् भी मन से है अनुक्ल स्वय यद्यपि इसका है नहो अभी तक हुमा लोक को स्पष्ट ज्ञान, यो सष्टि सकल का रागात्मक सम्बन्ध जगे मेरा है यह उद्देश्य श्रेष्ठ! भूमा की वह जीव त मधुर शोमन सत्ता, सूक्ष्मातिसूक्ष्म चेतन प्रात्मानो ने जिसका पृथ्वी के तत्वो से चुन चुनकर अकथनोय सुपमा भरकर रे सर्वश्रेष्ठ छवियो की सीमा किये पार निर्माण किया- वह सुदरता- कर रही प्रतीक्षा है मेरे ही चरणो पर, मैं चलता हूँ वह मुग्धा अपना शिविर सामने ही मेरे स्थापित करतो, क्षणभर का सगी स्वर्ग मधुर, वे ने दनवन, वे मधुर निलय, के बल अतीत के विगत रुप क्यो बने हाय 7 [ सात

या वे केवल थे कल्पित हो
जिनका अस्तित्व न था मू पर
रे क्त्तमान?
मानव को बौद्धिकता जिज्ञासा में विरता
सुदर जग म जव प्रेम और ग्रावेश मग्न
होती है तन्मयता से भर
सब कुछ हाजाता है सहज पाप ।
वह अतिम क्षण अति मधुर
करे अपना प्रवेश
उससे पहले ही मधुर शान्ति से भर उदार
इस अतिमहान
रागात्मक लय का गाऊँगा वह मुखरगीत ।
उन शब्दो से जो करें हमारा बिबन
बिल्कुल ही यथाथ
वासनापीडितो को मै उनकी मृत्यु-नीद
से जाग्रत कर दूंगा समर्थ ।
जो अहकार से ग्रस्त भटकते शून्य हृदय
उनम उदात्त तल्लीन एक
सम्मोहन मै
भर-भर दूंगा,
यदि त्याग कभी जाना होगा मुझको इन मधुर स्थलो को मौ'
विविध मानवो तथा जातियो का होगा सान्निध्य प्राप्त,
विद्वेष परस्पर दोसेगे सघष जन्य
सृष्णामो के कारण प्रभूत,
खेतो कुप्रो में दोखेगो रोती प्रपीडिता
मानवता,
आठ ]

या दुखो के तूफानो के ऊपर उठ कर
करना होगा मुझको चितन
नगरी की प्राचीरो में घिर,
तब भी ये स्वर न कभी छोडगे मुझे दीन,
मैं होऊँगा न कभी सूना या रे
निराश ।
प्रो उतर
उतर पा ऋपि चेतना । उतर पा तू ।
जो सावभौम मानव-आत्मा म
भरती है प्रेरणा दिव्य !
जो सतत भविष्यो के देखा
करती है सुपने उजियाले,
जिसका पवित्र गौरव निवेत मदिर पलता
है सदा महाकवियो के हृदयो मे
महान ।
!
मा दे मुझको वरदान
एक जागे मुझमे
वह अतह ष्टि प्रकाशपूण
हो दीप्तिमान
मेरा प्रबुद्ध ये गीत
नसत सा विस्फुरत,
झर-झर बरसे कोमलताएँ
दुष्कृत प्रभाव हो सकल दूर
जो अतलतलो तक व्याप्त हुए
द्विगुणित होते है बार-बार !
औ' यदि मे निम्नस्तरो पर प्रा,
योजना निरत, चितन रत मानव के मन की
वरगना करू
[ नौ

था कौन, कहां से आया वह, यह दिव्य दृष्टि क्षण भगुरता मे जो वह पाता, था कहां, किस तरह रहता था, तो मेरा श्रम हो नही व्यथ । यति वस्तु यही छूल अपने स्तर श्रेष्ठ उच्च, तो सकल ज्योति की स्रोत दया जिसकी अपार- ओ भीम शक्ति । मेरा जीवन सत् युग का बिंवाकन करने मे हो समथ, तृष्णाएं हो पाई विवेक, साद होवे व्यवहार सहज,- सच्ची स्वतत्रता मे मेरा मन पालित हो निमल विचार सारे हो मुझमे मा केद्रित, तब ता तेरा अक्षय दुलार अन्तिमक्षरण तक देगा सहायता, प्रोज, स्कृति पथदशक बन - पालोक पूरण -दस ]

बधन
सत्यकाम ने कहा जबाला से-हे माना।
ब्रह्मचय्यपूवक गुरुकुल में वास करूंगा,
बता गोत्र मेरा तू मुझको अब है जननी !
बोली मां है पुत्र । गोत्र में नही जानती,
यौवन मे परिचारिणी थी मैं कई घरो मे,
सत्यकाम जाबाल बताना नू अपने को।
गौतम हारिद्रुमन निकट जा सत्यकाम ने
कहा-पूज्य सन्निधि में पाया विनत प्रापकी,
ब्रह्मचय्यपूवक गुरुकुल मे वास
करूंगा।
गौतम बोले-सौम्य ! गोत्र है कोन तुम्हारा
बोला सत्यकाम
पूछा मैंने माता से
नही जानती यही कहा है उसने मुझसे ।
ग्यारह

बोले गौतम--ऐसा सत्य बोल सक्ता जो
वह ब्राह्मण को छोड नहीं कुछ भी हो सकता,
समिधा ला, उपनयन परू,तू सत्यसप है ।
[छादोग्योपनिषद् ४४]
उपनिषदो में वेवल मध्यात्म की हो चचा नही है, मनुष्य के सत्य को
व्यापकरुप से व्याख्या की गई है। सत्यकाम की कथा एक शाश्वत प्ररणा
देती है, जिसमे हम लघुता से ऊपर उठने हैं।
'गुलाब को कहानी' चीन के वाई ची लिन नामक एक युवक पवि का
बहुत प्रसिद्ध करता है, जिसम मम को छू लेने की शक्ति है । पाप क्यामी
प्रातीय हैं। यह कथा एक प्राचीन किंवदतो पर आधारित है।
यारह ]

२
7
गुलाब
की कहानी
( वाई ची लिन)
मैं, हरीभरो पवतमाला घेरे शादल में गाता हूँ,
रे बहुत दिनो पहले की गाथा एक
सुनाता हूँ तुमको-
था एक ग्राम
प्रति शात वहाँ झोपडे बने थे मनरजन
फ़पो नद का निमल जल था
बहता कल कल ।
था वहा एक रहता अति सुदर युवक,
पिता था कमकर हो,
वह तरुण चपल तरु सा था जैसे घाटी में,
निर्भीक सुदृढ
धरती पर कोई शक्ति न जो
उसे दबा लेती ग्रस कर,
वह नील नाम से ख्यात
चनाता हल खेतो मे कौशल से,
[ तेरह

पशुमो के लिए दयालु-हृदय,
ले खडग और भाला करता था वह अहेर
रे दुनिवार ।
उसके तुरग के सुम पृथ्वी पर बजते थे,
औ' भीम शृग मे स्वर उमका
भर भर उठता था तुमुलनाद,
वन के वे भीषण हिंस्र जन्तु
प्रातकित से थर्राते थे
उसके शब्दो को सुन छिपते ।
अश्वारोही वह अनुपमेय था
अति त्वर गति,
सब थे पुकारते उसे 'वीर'
अति लाड भरे ।
थी यिना सुन्दरी
एक कृषक को प्रिय पुत्री
थी कुशल अंगुलियाँ सूक्ष्म कढाई म उसकी,
मितव्यय मे निपुणा थी कुशाग्रधी वह सुमुखी
रुक जाते थे मृग स्तब्ध हुए
जब वह करती थी नृत्य मधुर,
स्फटिकाभ नयन उसके निमल,
स्वर करता था झकृत उर उर,
इद्रजाल का सम्मोहन
भरता उसका कोमल गायन
सुन व्यामविहारिणी कोयल भी
हारती, विसुध होते तन मन ।
था
चौदह ]

वह
अपराजिता मनोज्ञा थो,
सब जो पुकारते थे उसको
वह 'कुसुम' नाम के योग्या थी।
जो तरुण देखता था उसको
न्यौछावर करता था जीवन,
सम्पूरा समर्पित कर देने
लालायित हो उठना था मन ।
प्रो'नील रूप का स्रोत बना
था किशारियो का रूप के द्र,
सकोच रोकता था उनको
अन्यथा वहीं उनका वरेद्र !
पर हृदय यिना का था कवल
पासक्त नोल में सराबोर,
ओ' नोल सुदृढ था उसको ही
वरने को होकर अति विभोर ।
क्षण क्षण मिलते वे प्रणय मुग्ध,
पल पल लगता उनको मुखकर,
हो कोई बला क्यो न उन्हे
जीवन मीठा लगता रह रह,
जब अलत भोर में मद पवन
चलता था रे धीरे-धीरे
या प्रस्तप्राय दिन की छाया
जब होती थी तम के तीरे
वे सको वृक्ष के नीचे छाया में मिलते
या खाडी में
[पद्रह

थी जहां हिलोरें भर लहर छप् छप् करती चांदनी ओढ । ऋतुएँ पाती फिर बिलमाती वे अकह सुनाते एक दूसरे को तन्मय उच्छसित भाव निज बार बार मखमली पछांही मृदु बयार जब मधुऋतु की बहती मृदुला, या तोतर चौर फडक झिडकी देते जब ग्रीष्मा मे फिर-फिर, या जब गुलदाउदिया खिलती हेमन बोच, या कठिन शीत की स्तब्धा मे, उनके मन का था प्यार विमल, दृढ सग-मग, उज्ज्वल भी था, अति था बलमय जैसे हीरक । सुन्दरतम शोभन मृदल कुमुम का रूप तिरोहित हो जाता, हरियाली के मु दर वस्रो से शोभित वन भी एक दिवस- निज जीण पात झर जाने से नगा होता। - यो पहुँच गई चल राज सभा में बात यिना की सुदरता की एक दिवम सौलह ]

नृप ने प्राज्ञा दी-हो परिणय
छोटे कुमार से उस सुन्दरतम वाला का।
होगई एक प्राज्ञा नृप को,
किसमें साहस था अस्वीकार उसे करता
दुर्भाग्य आगया प्रणय-ग्रथित उन हृदयो पर,
दुर्दिन था वह '
?
फपो नद ने उच्छवास भरे
अवसाद-मलिन होकर व्याकुल,
कोयल न कह सको निज मानस की
पीडा को,
सुखकर स्मृतियो को दुहराने से
अधिक सालती यया पोडा ?
अब उन्हे बिछुडना था कल ही
कसी कठोर थी वह बला।
मर अश्रु नयन मे रहे मौन
प्रालिंगन मे वे बहुत देर,
पर विवश दीन।
औ' राजमहल म यिना भेज दी गई हत
परवश बलात् ।
मोठी स्मृतियो की कसकन भर
घर के प्रति इतनी हो कातर
निर्मम विषाद से हो जर्जर
ऐसी न गई होगी पति-गृह
कोई दुल्हन
.

सात्वना कही मिलतो न तनिस
मन मे दुप था उसके असीम,
पासून प्रधे किये नयन
वहती धारायें हुई अस्व ।
ऐसी उदास पा वधू होगया
नृपकुमार मन म उदास,
नृप हुग्रा ऋद्ध भ्र
चढी और
तन गई प्राप।
किसलिये यिना थी व्यथासिक्त ?
कारण उसका हो शीघ्र दूर ।
तव पिता पुत्र योजना क्रूर में हुए लीन ।
अवसाद पूर्ण प्रासाद नहीं होगा प्रमन्न
जब तक न रुप मय नील कही वह
हो जायेगा निर्वासित ।
,
तब हुप्रा नील बदो, उसके
सिर पर था अब झूलता दण्ड,
औ' सभा बीच
दुख भरी यिना भी लाई गई विवश व्याकुल ।
नृप न्यायाधीश कठोर बना
बोला अपराधी ! दिया कष्ट
तून अपार
वेदना यिना की तेरे कारण है अगाध
मै अत तुझे दे रहा दण्ड
कर बद काठ के वक्स बीच बदी तुझको
फुपो को चढी हुई धारा पर ही निश्चय
फेंका जायेगा अब तुझको,
अब होगा तेरा यही भाग्य ।
अठारह ]

-
तब लेकर बदी नील तरुण
बह चली नाव जर्जर, जल पर डगमग,
उत्तुङ्ग लहर,
निमल आसू गिर गये यिना के
टपटप कर
नद के जल मे मिल गये विंदु जल के व्याकुल
जब नाव नील की हुई दृष्टि से चल जल पर
धीरे धीरे धीरे प्रोझल ।
,
वहते वहते फूपो नद की
धारा जाकर करती प्रवेश
दूसरी भूमि मे, जहाँ दूसरा है प्रदेश ।
था वहाँ एक उत्तुङ्ग महल
खपरैल सुनहली और स्निग्ध
दूर से चमकती थी जिसको ।
थी राजकुमारी वहाँ
तीर पर विचरण करती देर देर,
लम्बे कुन्तल उसके जल पर वहते रहते
धारा लघुलहरी से कल कल
कोडा करती।
उस दिवस हुमा जब नव प्रभात,
रवि हुप्रा उदित ऊपर चढता
हर्पित कलरव से विहगो ने भर दिया
पवन,
अति स्वच्छ स्फतिमय मदु बयार
बह चला मद,
वह राजकुमारी तट पर थी
काढती केश
फपो की धारा को निहारती स्निग्ध दृष्टि ।

छेडा उसने सगीत मृदुल
जो रोम रोम झकार गया
सुनने वालो का झूमझूम,
तब अकस्मात्
दिख पडा काठ का वक्स एक
जल पर वहता।
वह चकित देखती रही, विखर उड चले केश,
जा उलझी उससे और रुक गया
चपल काठा
अनुचरिया भागी, अति उत्सुक,
खोला ढक्कन
देखा मृतवत् था तरुण एक
उसमे वदी।
सवाद त्वरित गति गया नृपति को सेवा में,
राजाज्ञा आई उसे बचालो मरने से।
चेतन होकर तव उठा नील
दुख भरी कथा अपनी उसने
नृप के सम्मुम्ब कहदी कातर ।
पो' राजकुमारी विचलित हो रो उठी दोन,
नृप ने दुहिता के भावो को पढ कर मन मे
तब लिया नील को वही रोक ।
घूमती सदा ही राजकुमारी सग सग,
पर नील हृदय दृढ पर चढ पाता नहीं रग,
उसके लहराते वेशो का क्या उसे मोल
जब यिना और उसमे इतनी दूरी अबोल !
दुखमय प्रवास मे प्रात्त नील
फपो की धारा के समीप
जीम]

गा उठा करुण वेदना से भर अपनी पीडामो को उडेल- 'प्रो मेरी सुन्दरतर प्रेयसी बिछुडे हम कितने हुए दूर । बस एक बार लेता निहार चल सग तुम्हारे श्रात चूर । होता खग में संगीत भरा पाता तब मैं तेरे कुटीर में बैठ झरोखे मे गाता बस एक तुम्हारे हेतु धीर । हो पाता प्रिय यदि मे रूमाल जो रहता तेरे सदा पास, या अनिल कक्ष मे जा तेरे जो धीरे से भरता उसास जव तुम्हें नहीं आती होगी वह मधुर नीद, यत्नो मे जाते होगे तेरे नयन भीग वह दुखद गीत ले चला अनिल प्रो' गया महल मे यिना कक्ष मे गुजन भरकर बहुत दूर, [इक्कीस प्रो' यिना उही भावो मे होकर जीर्णशीरणं अवसादमलिन गा उठी, पवन के , झोको पर- 7 'क्या कभी नही लौटोगे प्रिय मेरे भय होगे नही दूर देखो ये आखें सूज गई। पलके हैं मेरी क्लाति चूर । कितना रोऊँ अवतो देखो आँसू भी मेरे नहीं पास, चुक गया सोत, केवल बाकी हैं ये जलते जलते उसास । प्रिय कहा गये तुम अटक हाय नद, पवत या मैदान बीच ? अब टूट गया है मेरा दिल कब लौटोगे फिर, हाय सीच जब तैर यिना के स्वर पहुँचे रे नील पास, तब प्रेम तोड कर सब बन्धन कर सका नही पल भर विलम्ब, अव राजकुमारी के अनुनय या कृपा या कि वे चल कुन्तल कुछ भी न नील को सके बाघ, अब दिनभर को भी दूभर ही हो गया विरह बाईस ]

यद्यपि उदास
थी राजकुमारो हो निराश,
फिर भी उसने दे दिया उसे
ऊंचा तुरग अति सबल एक,
औ' एक धनुष दृढतम कठोर ।
वह विदा न कह पाया उससे
आतुर प्रतीव
चल पडा यिना की खोज लिये
मन मे अधीर।
दर कंच और दर मजिल चल
मैदान कर उठा नील पार
अनथक प्रनगढ खादर उलापता
वह अधीर
थी रात मौन
चांदनी बिखर कर फैली थी
आगया प्रत मे वह सम्मुख
उस यिना कक्ष के गाकुल मन,
वृक्षो के पल्लव ममर कर
आधा चदा थे ढंके हुए
अब तक विपाद को गाई थी गाथा व्याकुल
प्रातको को दुहराया था
अब इस सुख को कह उठे चपल
भुज ब धन म खोये दोनो
चुम्बन बरसे
मानो अव होगे अलग नही
भूले जग को
।
[तईस

पर नयी प्रापदायें प्राई
नृप पोर कुमार सहित आये
दुधप पठिन योद्धा कठोर
वे रहे घेर
उस राजकुमारी ने जो थे
शर दिये बहुत वे तीक्ष्ण फलक
निद्व द्वनील
होगया खडा
सकट से लडने को निभय
उड चले वारण
प्रत्येक भेदता एक क्रूर उर को सहसा
क्षण भर न रुका वह भीम वेग ।
पर घिरा हुआ मृग सा अहेर म कुत्तो से
वह नील अकेला था लडता
खेलता वहां पाखिरी दांव ।
यो आया क्षण
चुक गये बारण।
तब दोनो प्रेमी कूद पडे
उन सगममरी सोपानो पर
टकराये उनके सिर गिर
बह चला लाल लोहू तुरत निझर जैसा
रुक गये श्वास,
अनजान क्सिी नीरव अनाम
कन मे सोगये
हो विलीन ।
रुक गया मधुर कोयल का वह
सगीत मद,
चौबीस ]

चद्रमा सलज दुख से अपना
पीला मुख छिपा रहा व्याकुल,
तट के बादल घिर घिर आये
ढक लिया गगन,
झाकता नहीं कोई तारा,
इस हिंस्र कर्म का साक्षी था
वह एक शब्द
जो नील-अश्व दुग्व से कातर
उठता कराह ।
ज्यो महाखड्ड पर बहती कोई भौम बाढ
बह रहा काल,
ऋतुएँ करती थी परिक्रमा,
बीता ऐसे ही एक वप ।
उस विजन कब्र पर उग आया तब धीरे से
अनजान नया सा एक फल
बिल्कुल विचित्र
कोमल दल वाला लाल रग मा फ़ट रहा
लज्जा का सा ज्यो नया उत्स,
1
।
भरता है उपवन म वह अपनी मदिर गध
आते यात्री है ओरपास ओ' दूर-दूर से
बहा तोथयात्रा सी करने को उत्सुक
पहले गुलाब को देख क्यिा करते अचरज
तब स कुमारियो का जो है
अति काम्य कुसुम
। पत्नी

प्रपन
तब न था असत्
औ' सत् न कही
थी भूमि नही, औ' नही व्योम,
श्रावरण कहा क्या किमके हित
केवल जल था गम्भीर गहन ।
थी नही मृत्यु, मृत न कही,
दिन नही और थी नही रात,
था वही एक, निज में निमग्न,
अतिरिक्त न था कुछ और शेप ।
तम था, सब कुछ था तम निमग्न,
था सबही सलिल, अस्प मात्र,
उस तुच्छ अविद्या व्याप्त विश्व स
तप महिमा से उमी एक ने लिया जाम।
पहले इच्छा वन गया काम,
था क्योकि चीज तो विद्यमान,
मत् मेधा में तब मनीषियो ने लिया जान
सत् माध्यम को ही हुअा असत् साक्षात्कार ।
छपीम ]

बन रश्मि तन गया तब वितान, क्या मध्य और ऊपर नीचे, कुछ नहो भान, तब जगे जोव, मोक्ता महान था भोग्य अधम । जानता कौन frस भांति हुई यह महा सृष्टि आगई कहा से, हे कौन ? क्सिने रच दी ? आये वे दे देव तभी जब पहले भत सष्टि थी विद्यमान फिर किससे आई मष्टि, ज्ञात मिसको रहस्य जिमने भी इसका किया सकल विस्तार आदि वह हो धारण करता इमा या नहो म्वय ? जो है इसका अध्यक्ष स्वय औ' पर व्याम मे है अपना करता निवास क्या स्वय जानता है वह भो या उमको भो है नहो ज्ञात कह सके कौन ? [नासदीय सूक्त. ऋग्वेद १०।१२६।१-७] ? 7 सृष्टि की उत्पत्ति के विषय मे वद की यह ऋचा सचमुच महान है, इसम जितनी गहराई है, उतनी ही बौद्धिकता की विशालता है, जिसम किसी भी डिवाद या सकीणता को स्थान नहीं है। प्राचीनकाल में अन्य जातियो म मृष्टि की उत्पत्ति और व्यारया के विषय म जिनासा रही है । प्राज मिस्र देश ससार के सबसे प्राचीन देशा म समभा जाता है । मिस्र देश में प्राचीनकाल म विभिन देवताओं की पूजा होती थी। विशाल मदिरो का वहां जाल फना हुअा था। उस समय वहाँ एक समार हुए, निहाने तसालीन देवता 'मम्मन' का सर्वोच्च स्थान देने से इनार कर दिया। इस विद्राही सम्राट ने यह नहीं माना कि हर एक दश का एक एक अलग देवता है। उसने सबका प्राणदाता और सर्वेश्वर मतन् अर्थात् मूथ्य माना और अपन नाम में भी उस शद को फाडकर अखनातन कर लिया। यह समाट मधिन दिन नहीं रह । तत्कालीन मिमिया न उह 'काल्परिक और 'अव्यावहारिक समझ कर समाप्त वर दिया। सूय्य देवता को मिली पहले रा बहते थे । सम्राट ने उनसे प्रत [सत्ताईस मावमाम पता का स्थापित मनुप्या ५ भदा का मिटाना चाहते थे । अखनातन की पूजा के गीतो मे से यह उद्धरण लिये गये हैं। सम्भवत यह उही के द्वारा रचित भी थे। उनका समय ईमा से १५०० वप पूर्व के लगभग माना जाता है । हो सकता है कुछ पहले ही हो । उ होने परमेश्वर का व्यापक रूप देखन की चेष्टा की थी। भारतीय चिंतन म यह विचार हमे वेद म मिल जाता है, उपनिपदो में भी, महाभारत में तो इसको पाना कठिन हा गया है। अनुवाद में मैंने जहा तक बन सका है अपनी अभिव्यक्ति म इस रचना की साव भौमिक्ता को उतार लाने की चेष्टा की है। भारतीय मस्तिष्क को यद्यपि इस रचना म तुलनात्मक गहनता कम मिलेगो, फिर भी जिज्ञासा को तृप्ति ता होगी हो। भारतीय मनीषा न जिस व्यापकता से वस्तुमा को छुपा है, उसकी एक भनक हम सम्भवत इसम भी प्राप्त हो जाय । अटठाइम]

३
सूर्य अतन
प्रखनातन
अतन को शक्ति
है उदय मनोहर अति सुन्दर
तेरा नभ के उस क्षितिज बीच,
हे जीवित अतन, स्वय तू ही
जीवन क्या है प्रारम्म,
आदि
जव पूर्व क्षितिज मे उठता तू
मे तेरा हो
लावण्य व्याप जाता मनोज्ञ ।
तेरी किरणे, तेरे द्वारा
निर्मित पृथ्वी की सीमाप
जाती उलाघ।
सपूरण भूमि
तू है सुन्दर, तू है महान्
देदीप्यमान,
सारी पृथ्वी से ऊँचा तू,
तू ही रा है
[उ तीम

सबको तू ही अपने बदी मा रहा बांध, तू सवको ही निज प्रेमपाश मे किये बद्ध तू यद्यपि है इतना सुदूर, पर किरण तेरी हैं भूपर, यद्यपि तू इतना ऊँचा है सबसे ऊपर, पर यह दिन हैं तेरे ही तो पग-चिह सदृश । रात्रि जव तू नभ के पश्चिमी क्षितिज मे आती है, पृथ्वी पर छाता अधकार जैसे निष्प्राण वना सब कुछ । सोते सब अपने कक्षो मे, अपने लेते वे शीश ढाक, रुक जाते उनके श्वासश्वास, कोई न देखता एक दूसरे को निश्चय, सिर के नीचे की सकल वस्तुएँ खो जाती हैं छिन जाती पर उनको होता नही ज्ञान । निज गुहा छोड वाहर आते हैं क्रूर सिंह, विचरण करते विषवर भुजग इसते फिरते । वस अधकार निस्तब्ध शात सब विश्व मौन । तीस ]

जिसने सबका निर्माण किया
वह इस बेला
जा क्षितिज प्रात मे है करता
विश्राम शात।
दिन और मनुष्य
तू जब उठता है क्षितिज प्रात में कर प्रकाश
पालोकित होतो वसुन्धरा
तू दिन मे वन कर अतन चमकता दीप्तिमत
रे सडसड कर तिमिर दूर करता अभीत,
भेजा करता जर तू अपनी किरणें सुन्दर
उत्सव भूमा म जगता है तब
प पूरण
जव जाग्रत करता सकल प्रजायें तू अपनी
अपने चरणो पर मानव है उत्थित होत ।
कर स्नान, वस्त्र धारण करते,
तेरे भरणोदय को निहार
वे हाथ उठा कर लिये प्रशसा नयनो म
रे कर उठते हैं नमस्कार ।
पो' सकल भूमि पर होते हैं
वे व्यस्त, काय करते अपार ।
दिन और पशु पादप
पशु करते है विश्राम चरागाहो पर
सुख से घूम रहे,
तरु पादप होते है वद्धित,
दलदलो बीच पक्षी फर फर करते मुखरित
उडते मनहर,
[इकतीस

वे पस सोलते हैं अपने
मानो करते हैं वे तेरा ही अभिनदन ।
मेमने और
भेड पुलक्ति
चचल पग धर कर चलती हैं
मानो वे करती है नर्तन ।
पखो वाले सब उडते हैं,
जब उनको तू देता प्रकाश
वे प्राण भरे से मुखरित हो
जीवन का दते हैं दशन ।
दिन और जल
धारापो पर चलती नाव
ऊपर जाती,
नीचे बहती,
प्रत्येक पथ खुल जाता है,
जब तू नभ मे आ जाता है
भर नवालोक ।
तुझको निहार कर ही जल मे
मछलियां उछलती मुग्ध प्राण,
उस गहन हरे नोले सागर के जल प्रमार
के बीच किरण तेरी करती
झिलमिल प्रवेश ।
मानव-सृष्टि
नारी मे तू ही रज का
निर्माता है औ
नर मे तू ही उत्पत्ति बीज की करता है,
माता के तन मे बालक को
तू ही तो देता है जीवन,
बत्तीस ]

सात्वना स्नेह तू देता है जो
रो न उठें वह पाकुल वन,
तू करता पालन गभ बीच,
जिसका करता निर्माण, उसी चेतन मे तू
है सांस फूक कर भर देता !
जब वह तन से बाहर आता
निज जन्म दिवस पर, तब तू ही
वाणी भरता उसके मुख मे
तू ही उसकी आवश्यकता
पूरी करता।
पशु-सृष्टि
जब शावक मृदु कलरव करता
अडें में से बाहर आता
तू ही उसको जीवन देता
देता उसको है मृदुल सांस,
जब तू उसको उद्यत करता
अडे से बाहर आने को
तब ही बाहर आकर अपनी
सम्पूरण शक्ति से वह कर उठता है कलरव ।
बाहर आकर अपने दो पांव पर पक्षी
तेरे कारण ही चलता है ।
सम्पूर्ण सृष्टि
बहुकृत्य
। अरे कितने व्यापार यहाँ
अगरिणत देखते तेरे।
हमसे वे सब हैं छिपे हुए,
ओ एक मात्र ईश्वर । तेरी

अनुसार किया जैसी है शक्ति नही मिलती अन्यत्र कही, कोई भी है तुझ सा न और सामथ्यवान जब तू था एकाकी तूने अपनी इच्छा इम वसुधा का निर्माण स्वय । मानव, पशु सारे लघु विशाल, जो भी भूमा पर चलते हैं, जो भी पृथ्वी पर रहते हैं, जो ऊपर हैं उडते अपने पखो को फैला कर नभ मे, सब तेरे है। तू ही सिरिया औ' कुश जैसे परदेशो मे, तू मिस्र देश मे, सब मे ही प्रत्येक मनुज को लगा रहा उसके अपने ही कार्यों में, तू सबको सयोजित करता अपने अपने व्यापारी मे । तू सबकी आवश्यकताएँ पूरी करता। प्रत्येक व्यक्ति को तू ही देता है कुछ कुछ, तू ही सबको है आयु नियत करता जग में। भाषाएं विविध मनुज बोला करते पृथ्वी के अचल पर, फिर भी सब लगते हैं समान पर अलग अलग पहचाने जा माते हैं सर सवये रगो म भेद किया है तू ने हो, घातीम]

तू ही विदेशियो से परिचय रखता सुदूर,
अनजाना कर देता मनुजो को,
आपस में।
मिस्त्र और विदेशो मे जल सिंचन
नू ही पृथ्वी के नीचे है
निर्माण नीलनद का करता
अपनी इच्छा अनुसार उसे
बाहर लाता,
मनुष्यो को जीवित रसने को
है उसे प्रवाहित कर देता।
तूने मनुजो का निर्माण किया केवल
अपने हित ही,
तू है सबका स्वामी शासक,
तू
सबमे ही करता अपना विधाम अमर ।
तू है स्वामी प्रत्येक भूमि का एकमात्र,
जिन पर मानव रहते हैं प्रब,
मो दिन के उज्ज्वल सूय्य ! महत् तेरा गौरव !
रे दूर-दूर के सकल देश
तेरे हैं, सबमे तू ही जीवन चला रहा,
तूने ही नभ मे एक नील नद
का ऊपर निर्माण किया,
जब वह गिरता है झर-झर कर
मनुजो के हित,
तब वह शैलो पर लहरो सा घुमडा करता,
जैसे वह सागर नील-हरा घहरा करता है
रे महान,
वह नगरो में मनुजो के है
सिंचन करता।
पैतीस

-
ओ रे अनत के शाश्वत प्रभु
व्यापार सकल तेरे कितने
अद्भुत सुन्दर,
कसा उनमे कौशल अपार !
है विदेशियो के हेतु गगन मे एक नील
नद की धारा,
जो चलते पृथ्वी पर पशु अपने चरणो पर
प्रत्येक देश में
उनके हित प्राणो की सवड न
बहती नभ मे धारा ।
पर मिस्र देश के हेतु नील नद की धारा
आती पृथ्वी के नीचे वाले
गहन लोक से ही
ऊपर।
ऋतुएं
तेरी किरणें पालन करती
प्रत्येक मनोहर उपवन का,
जब तू उठता है
वे जीवित हो उठते ह,
तेरे कारण ही बढते ह,
रे पलते हैं।
तू ही ऋतुमो का करता है
निर्माण यहाँ,
अपने व्यापारो का सिरजन करने के
हेतु स्वय निश्चय।
शीतलता देने को ऋतु शोत बनाई है,
है ग्रोप्म बनाई ताकि करें वे तेरा
भी तो प्रास्वादन !
एसीस]

यह नभ सुदूर भी तूने ही निर्माण किया
हो जिससे तेरा उदय पोर तू उठ पाये,
देखे जिससे उस सवको तू
जिसका तूने निर्माण किया।
जीवत प्रतन बन दीप्तिमान अपने स्वरूप में
एकाकी औं तू केवल
हो उदय, प्रोज्ज्वलित, चले दूर तक स्वेच्छा से
भो' सके लोट,
इस हेतु किया तूने नभ का सिरजन ऊपर ।
एकाको तू केवल अपने द्वारा ही करता है सिरजन
लाखो रूपो का रे अपार,
नदियां, पथ, नगर, ग्राम, औ' पुर,
जातियाँ प्रादि ।
सारे लोचन तुझको निहारते
अपने ही सम्मुख प्रोज्ज्वल ।
तही है दिन का प्रतन ज्योतिमय
भूमा पर
[संतीस

विश्वास
जो नाशवान देवो की करते उपामना
वे भोपण अधकार में हैं परते प्रवेश
जो अविनाशी की उपासना के
झूठ गर्वो में रत हैं,
वे उनसे भी मीपण तम म
गिरते अवाक् ।
[ ईशावास्योपनिषद् १२ ]
उपनिषदा म ब्रह्म को सर्वोपरि माना है । सत्य के रूप में ब्रह्म है। यद्यपि
ब्रह्म का स्वीकार न करने वालो का हम यहां विरोर मिलता है, पर तु मूलत यह
विरोध मनुष्य को रूढिवादिता से है जिसम व्यक्ति अपने को ही सबसे ऊपर
समझ लेता है।
ईश्वर के एक्ख म इस्लाम का भी अटूट विश्वास है। छोट-छाटे देवतामो के
राज्य में मनुष्य जातिया विभाजित थी। पगम्बर बन कर माये थे मुहम्मद
मौर
उ हाने सब कबीलो को एक करने की चेष्टा की। अल्लाह को सर्वोपरि बताया।
सिमाइट भाषाम्रो मे अरबी के अल्लाह और हीन के ऐलोहीम दानो एक ही
धातु से निकले हैं।
मुहम्मद ईसा की छटी शताब्दी म अरबदेश में हुए थे। वे दाशनिक भी थे,
शासक भी। उहोने अपन को पगम्बर भी धोपित किया था और अपने
अनुयायियो को मुसलमान कहा था ।
प्रस्तुत रचना अल मलाइकाह या गल फातिर नामक, कुरमान के एक अध्याय
के, एक अश को प्रस्तुत करती है। इसका इलहाम मुहम्मद को मक्का नगरी में
हुप्रा था।
अडतीस ]
--
Fr

स्रष्टा
[पगम्बर मुहम्मद ]
जय हो अल्लाह महत् की
जिसने रचे लोक यौ' यह पृथ्वी,
दो, तीन, चार प्रादिक पखो के देवदूत
जिसने नियुक्त हैं किये स्वय,
स्वेच्छा से वह अपनी समग्र इस सृष्टि बीच
चाहे जितना वर्द्धन करता,
ऐ हो । वह है अल्लाह पूण
केवल है वह ही अतिसमथ !
अपनी करुणा से जो भी वह मनुजो के हित
करता प्रदान
उसमे बाधा बन कर कोई सकता न रोक ।
जो स्वय नही देता है वह
उसको ला सकता कोई भी न सशक्त शेष ।
वह शक्तिमान ! है बुद्धिमान !
प्रोर मानवो न भूलो तुम
उसको तुम पर करुया अपार !
[ उनतालीस

उमके अतिरिक्त गगन-भू मे है कोन और स्रष्टा बोलो
जो तुम्ह तुम्हारी आवश्यकताए देता
ऐसा उदार !
उसके अतिरिक्त नही कोई भी परमात्मा,
फिर कहां जा रहे हो बोलो, तुम हुए दूर !
यदि तुझे, मुहम्मद को, करते स्वीकार न वे
तो उसके भेजे देवदूत थे पहले भी
मनुजो ने अस्वीकार किये,
सब कुछ उसमें हो जाता है
स्वयमेव लौट !
मानवो ! निहारो।
सत्य प्रतिज्ञा है उसकी।
जग का जीवन तुमको न भ्रमो मे सके डाल
पथभ्रष्टा तुमको नही सके बहला निश्चय
उसके पथ से।
देखो । शैतान तुम्हारा है अति भयद शत्रु,
अतएव उसे तुम समझो अपना शत्र घोर !
अल्लाह सदा ही न्यायपूर्ण
शैतान दुष्ट के दल के अनुवर्तीजन को
भीषण ज्वालामो मे निश्चय फका करता ।
जो हैं आस्तिक करते हैं अच्छे कम, उहें
प्रहार मिलेगे अनुपमेव,
औ' क्षमा उन्हीं को रहे प्राप्य ।
जिसको अपना दुष्कर्म श्रष्ठ सा लगने का भ्रम होता है,
क्या वह शैतानी-पाश मुक्त
अल्लाह उसे भटकाता है जिसको होती उसकी इच्छा,
7
चालीस]

चाहता जिसे उसको वह पथ दिसलाता है,
अतएव भरो मत श्वास पाप के लिये मूढ !
है उसे ज्ञात सब कौन कहां क्या करता है,
वह जागरूक
है वही भेजता पवनो को जो
ऊपर लाते घने मेघ,
हम उसे मृत्यु-भू मे ले जाते और पुन
मृत धरती को करते सप्राण,
है वही पुनर्जीवन अतिम ।
हो जिसे शक्ति कामना जानले वह निश्चय
सामध्य उसी की है समस्त ।
सत्शब्द उसी तक उठते हैं,
वह ही करता है पुण्यो का रे
सदोत्थान।
जो असम विषमतामो के है रचते कुचक्र
उनका होगा परिणाम भयकर और प्रत
वे खण्ड खण्ड होगे दुष्कर्मों के विपाश ।
था किया धूलि से उसने ही
निर्माण तुम्हारा, और तनिक-सा
लिया साथ मे तरल तत्व,
फिर द्वन्द्व बनाये उसने ही नर नारी के,
करती न गर्भ धारण कोई नारी, न जन्म
देती शिशु को निश्चय
उसके अनजाने मे,
प्रो' जो होते हैं वृद्ध, नही हो सकते वे,
घटता न दिवस भी एक प्रायु से कभी क्योकि
सबका लेखा है वर्तमान ।
ऐ हो । उसको है नही कठिन यह सकल कार्य !
उक्तालीम

दोनो ममुद्र है नही एप ही सदृश
यह मोठा है, है मधुर पेय,
यह है सारा।
दोनो मे तुम पाते हो मा भक्ष्य मास
प्रो' ये प्राभूपण जिहें पहनते हो तन पर ।
चढ़ते जहाज हैं उन्हें चोर
मिल सके तुम्हें उसया अपार सम्पूर्ण
इस प्रकार
तुम परो निरन्तर नमस्कार !
वह ही रजनी से दिन करता
दिन से कर देता वही निशा,
उसने अपनी सेवा में है
रवि-शशि को भी भाधीन किया,
जिसका जितना नियत समय
वह उतना ही जीवित रहता।
ऐसा है वह अल्लाह,
तुम्हारा स्वामी है,
वह ही है रे सम्पूरण शासना का अधिपति
उसकोतज कर करते हो तुम जिनकी उपासना भूल भूल
उनकी सत्ता उसके सम्मुख है नही शेष ।
यदि तुम प्राथना करोगे उनसे, तो वे सब
सुन भी न सकेगे शब्द तुम्हारा वह विनीता
सुन कर वर दें इतनी उनमे है वहा शक्ति ?
वह दिवस कयामत वा जिस दिन
प्रात्मायें फिर से जागेंगी
वे तुमसे सव सम्बध त्याग देंगे पल मे,
सवज्ञ वही एक
मही उस जैसा कोई जो तुमको
अवगत कर सकता है सबसे ।
धैयालीस

ऐ हो मनुजो । अल्लाह निकट तुम सभी दोन ।
वह ही है बस सर्वात्म भौर
रे शक्तिमान,
स्तुतियो का अधिकारी है केवल वही एक ।
यदि वह चाहे,
तो पाले तुमसे छटकारा
कर सकता कोई अन्य सृष्टि
जो स्थानान्तरित करे तुमको ।
अल्लाह हेतु यह काय्य नही है कठिन तनिक ।
रे भारग्रस्त प्रात्मा कोई सक्ती न भार है अन्यो का,
यदि कोई भाराकुल पुकारती त्राहि त्राहि
कोई सम्बन्धी भी उसकी
कर सकता है पीडा न दूर ।
तुम सावधान करते हो केवल उनको ही
जो अपने प्रभु से डरते हैं एकातो मे,
स्थापित उपासना की है जिनने झुका शीश ।
जो सद्धित होता (पुण्यो मे ) वह केवल
अपने हित ही तो बढता है,
(अन्यो का कर सकता है पर वह नही नारण)
वह तो है बस याना करता
अल्लाह ओर।
अधा होता है नही कभी दृष्टा समान,
होता न तिमिर आलोक सदृश,
छाया हो सक्ती नहीं बराबर
प्रखर सूय्य को महाज्योति सी तापमान,
जीवित होते हैं नही कभी मृत के समान ।
[ तालीस

देसो । अल्लाह उन्हीं या है सिरजन करता
जिनकी सुनना चाहता स्वय ।
तुम नही पहुँच सकते उन तम
जो सोय हैं पत्रा में प्रय ।
तुम तो हो केवल सावधान पर्ता, केवल ।
ऐ हो ! हमने भेजा तुमको है मत्य सहित,
शुभ सदेशो का वाहक कर,
पर सावधान कर्ता तुमको,
है नहीं एक भी जाति जहाँ
है सावधानरत्न न हो चुका पहले हो।
यदि तुम्हे नवे स्वीकार करें,
तो पहले भी
कर चुके यही हैं और लोग ।
उनके पैगम्बर तो प्रमाण प्रत्यक्ष साथ
प्राय थे उन तक
ले दिव्य-गोत, आलोक जगाते
लेकर रे अति दित्य ग्रन्थ ।
तब मैंने स्वय नास्तिको को रे लिया घेर,
कितनी भीषण थी मेरी घृणा अपार घोर ।
क्या नही देखते तुम कि गगन से
वरसाता है वही वारि
जिसके कारण हम उपजाते हैं
भिन वरण के फल फलादि,
दिखती पहाडियो पर रेखाये श्वेत, लाल,
रे भिन्न वरण, यौ' सघन कृष्ण,
मानव, पशु जतु सभी में हैं
ये मित वण
?
चवालास]

उसके जो प्रतिभू हैं उनम
विद्वज्जन हैं डरते केवल बस उमसे ही,
ऐ रे वह ही है शक्वित रे क्षमावान ।
रे जो पढते हैं दिव्य अथ अल्लाह महत् का
उपासना मे नत तन्मय,
जो हमने उनको दान दिया है
गुप्त या कि रे प्रगट और प्रत्यक्ष उसीसे
व्यय करते,
अक्षय लाभो की भोर जा रहे हैं निश्चय ।
वह देगा उनको मजदूरी,
प्रो' अपनी करणा का कर देगा वह प्रसार
उन पर उदार,
वह क्षमावत, है सदा ध्यान रखता महान ।

आभास
H
यहाँ
वहाँ
सवत्र
पूरण वह
और पूरण यह
पूण पूण से निकला है
मोर पूरा से पूरा हटालो
तदपि पूण ही बचता है।
[ईशावास्योपनिषद् शातिपाठ)
पूण की भावना परमात्मा के साथ जुडी हुई है। वद से श्रीमद्भागवत तक
भारतीय साहित्य में विराट पुरुष का वणन मिलता है । भिन्न-भिभ वनो मे
विभिन्न अनुभूतियां प्रगट हुई हैं, जो चिंतन पौर मनन के विभिन्न स्तरो को ही
अभिव्यक्ति करती हैं।
गीता म श्रीकृष्ण ने अजुन को अपना विराट रूप दिखाया है । गोता श्रीकृष्ण का
दिया हुआ उपदेश है, किन्तु महाभा त का भी एक मग है। जिस रूप में वह
अव वर्तमान है, उसे कृष्णद्व पायन व्यास की ही कृति समझना होगा । यहाँ
मैंने गीता के दस और ग्यारहवें मध्याय को प्रस्तुत किया है।
(.
छियालीस ]

५ विराट रूप (कृपा पायन पास ) बोले माधव हे महाबाहु तू मुन य मेरे परम वचन, मेरा रहस्य तेरा प्रखण्ड यह स्नेह जगाता है मुझमे तेरे हित की कामना प्रबल । मेरी उत्पत्ति नही, निश्चय जानते देवता मौ' महपि, में हूँ उनका भी कारण- जन्मे हैं मुझसे हो वे सब भी, जो मुझे अजन्मा प्रो' अनादि लाको का ईश्वर मान चुका हैं वहीं ज्ञानमय पुरुष जोकि सारे पापा से विनिमुक । रे बुद्धिज्ञान, मन का निग्रह, इद्रियवश, सुस, दुख, असमोह, [सतालीस

.
यौ' मत्य, प्रलय, उत्पत्ति, अहिंसा, सृप्ति, स्नेह,
तप, दान, अभय, भय, यश अपयश
जो जगतो में
दिराते विभिन्न प्राणियों बीच
सब मेरे कारण होते हैं।
इम लोग बीच यह सकल प्रजा जमो जिनसे
मातो महर्षि, ओ' चौदह मनु वे दीप्तिमा
जन्मे मेरे ही सकल्पो से यहाँ देय !
मेरी विभूति,
मम योग तत्व
जिसने अरुप घरध्यान
लिये हैं यहां जान
वह एक भाव से मुझमे ही
स्थिर रहता है।
में वासुदेव
सम्पूरण जगत का कारण है,
मुझम ही है उत्पत्ति और सब चेष्टायें
जो श्रद्धा से पहचान इसे लेता तुरन्त
वह मुझमे भाउ समवय हो पा लेता है।
कर चित्त लीन जो मुझमे ही रहते सदव,
अपने प्राणो का करते हैं मुझमें अपरण,
जो मेरे वचनो मे सतोपित हो जाते
अनवरत मुझी मे रम जाते होकर विभोर ।
जो लीन निरतर हैं मुझमे
जिनकी न प्रीति का कही छोर
--
अडतालीस ]

में चुद्धियोग से उन्हें नया देता प्रकाश
वे हो जाते हैं प्राप्त मुझी को रे अनन्य ।
मै अनुकम्पा से प्ररित हो
लय होता उनके मानस में
अज्ञानो से उठता जो भीपण भधकार
मै ज्ञान-दोप वन करता हूँ, उसका विनाश ।
बोला प्रजुन
-
हे परब्रह्म । हे परमधाम ।
ह शाश्वत परम पविन पुरुप हे सवव्याप्त
तुम प्रादि सनातन ! अज महान
ऋपि करते नतशिर सदा तुम्हारा गहन ध्यान ।
हे दिव्यरूप तुमसे देवो ने लिया जन्म ।
देवपि सकल नारद, देवल, प्रौ' असित, व्यास,
साक्षात् स्वय,
कहते फिर फिर सब प्रीतिमान ।
हे केशव । कहते जो मुझसे
है सकल सत्य, यह मुझे ज्ञात
जानता कोन तुमको भगवन् ।
दानव न जानते तुम्हे, नही जानते देव ।
भो । सकल भूत को है तुमने ही दिया जन्म । हे देव देव
हे पुरुषोत्तम । भूतेश! जगत्पति! स्वय भूतभावन । ईश्वर ।
तुम स्वय जानते हो अपने को, नही और ।
-
अपनी विभूतियां दिव्य सकल
कहने में केवल तुम समथ ।
जिनके द्वारा तुम लोको को कर रहे व्याप्त ।
[ उनचास

यौ' सत्य, प्रलय, उत्पत्ति, अहिंसा, सृप्ति, स्नेह,
तप, दान, अभय, भय, या अपयश
जो जगतो में
दिराते विभिन्न प्राणियो बीच
सब मेरे कारण होते हैं।
इस लोक वीच यह सकल प्रजा जमो जिनसे
मातो महपि, ओ' चौदह मनु वे दीप्तिमत
जमे मेरे ही सकल्पो से यहां देय !
मेरी विभूति,
मम यांग तत्व
जिसने अकप घरध्यान
लिये हैं यहाँ जान
वह एक भाव से मुझमे ही
स्थिर रहता है।
में वासुदेव
सम्पूण जगत का कारण हूँ,
मुझम ही है उत्पत्ति और सब चेष्टायें
जो श्रद्धा से पहचान इमे लेता तुरन्त
वह मुझम भाव-समन्वय हो पा लेता है।
कर चित्त लीन जो मुझमे ही रहते सदैव,
अपने प्राणो का करते हैं मुझम अपण,
जो मेरे वचनो में सतोपित हो जाते
अनवरत मुझी मे रम जाते होकर विभोर ।
जो लीन निरतर हैं मुझम
जिनको न प्रीति का कही छोर
अडतालीस]

मैं बुद्धियोग से उन्हे नया देता प्रकाश वे हो जाते हैं प्राप्त मुझी को रे अनन्य । मैं अनुकम्पा से प्ररित हो लय होता उनके मानस में प्रज्ञानो से उठता जो भीषण अधकार में ज्ञान-दीप वन करता हूँ, उसका विनाश । बोला अजुन । । हे परब्रह्म हे परमधाम ह शाश्वत परम पवित्र पुरुष हे सवव्याप्त । तुम आदि सनातन प्रज महान ऋपि करते नतशिर सदा तुम्हारा गहन ध्यान है दिव्यरूप तुमसे देवो ने लिया जन्म देवपि सकल नारद, देवल, औ' असित, व्यास, साक्षात् स्वय, कहते फिर फिर सब प्रीतिमान । . - । केशव । कहते जो मुझसे है सकल सत्य, यह मुझे ज्ञात जानता कौन तुमको भगवन् दानव न जानते तुम्हे, नही जानते देव । ओ । सकल भूत को है तुमने ही दिया जम हे देव देव हे पुरुषोत्तम भूतेश जगत्पति स्वय भूतभावन । ईश्वर तुम स्वय जानते हो अपने को, नही और । 1 अपनी विभूतियाँ दिव्य सकल कहने में केवल तुम समथ । जिनके द्वारा तुम लोको को कर रहे व्याप्त [उनचास

हे पोगी। कंसे में सक्ता है तुम्हें जान ।
किस भौति निरन्तर चिंतन में में रहूँ लोन ।
किन पिन भावो में तुम मेरे हो ध्यान योग्य !
हे दीप्त जनादन ! मुझे बतानो निज विमृति
विस्तारपूरण निज याग करादो मुझे ज्ञात
इन अमृत भीगे वचनो को सुनते सुनते
हो पाती है मेरे मानस को नहीं तृप्ति ।
तव बोल उठे श्रीकृष्ण घोर
कुरश्रेष्ठ । दिव्य मेरी विभूतिया हैं अनत ।
हे गुडाकेश । सब भूतो के मानम म स्थित
रे में ही सबका आत्मा हूँ,
सवका मैं ही हूँ, आदि, मध्य प्रौ' अत म्वय !
आदित्यो म में हो हूँ ज्योति रूप विष्णु,
औ' सकल प्रकाशो में में ही हूँ,
किरणो वाला प्रसर मूय्य,
उन्चास मरुत जो चलते है
मे ही मरीचि हूँ, उनमे, हूँ दुधप वायु,
नक्षनो मे मै ही उन सबका अधिपति हूँ
रे च द्रदेव ।
वेदो मे मैं हूँ, सामवेद,
देवो मे मैं हूँ स्वय इद्र,
मै सकल इन्द्रियो मे मन हूँ,
औ' सकल प्राणियो मे मै हूँ चेतना ज्ञान ।
पचास ]

एकादश रद्रो मे में हूँ शकर महान,
में यक्ष राक्षसो मे धन का अधिपति कुवेर,
वसुप्रो म में हूँ, अग्नि और
उन्नत शिवरो के सक्ल पवता मे में ही
मर्वोच्च शृङ्ग वाला सुमेरु !
मैं पुरोहितो मे स्वय बृहस्पति ज्ञानवान,
सेनापतियो में में सेनानी वीर स्कद,
पृथ्वी पर फैले जलाशयो म
मैं ही हूँ, गहरा समुद्र ।
मैं हूँ महर्पियो मे भृगु हो,
वाणी म मै हूँ, प्रोकार अक्षर पुनीत,
यज्ञो म हूँ जपयज्ञ पौर
जो स्थिर हैं उनमे स्वय हिमालय हूँ, गभीर !
हे वीर धनजय I मागर मथन बेता मे
अमृत
से उच्चश्रवस् श्रेष्ठ ज मा तुरग
वह ही मै हूँ,
जितने गजेन्द्र हैं उनम में एरावत हूँ,
श्री' सकल नरो में मैं ही हूँ, निभय नरेद्र।
मै सकल प्रायुधो मे हूँ वह दुदम्य वज्र,
गायो मे मैं हूँ, कामधेनु,
मैं सकल प्रजा-उत्पत्ति-मूल हूँ कामदेव,
मैं सपों में हूँ, मपराज वासुकि प्रचण्ड ।
में नागो मे हूँ, शेषनाग
मै सकल जलचरो मे हूँ अधिपति वरुण देव ।

पितरो मे हूँ अर्यमा स्वय प्रो' सकल शासको में मै हो यमराज घोर । में दत्यो मे प्रह्लाद श्रेष्ठ, तुम जिस जिस को गिन सकते हो उस सबमे म हूँ स्वय काल, पशुप्रो में हूँ मृगराज स्वय, पक्षियो वीच हूँ गरुड पाप । जो करते हैं पावन उनमे मैं स्वय पवन, में योद्धामो मे वोर राम, मत्स्यो मे मै हूँ मार ग्राह, औ' नदियो मे मै हूँ वह पावन सलिला उज्ज्वल गग-धार । में ही हूँ सारी महासष्टि का आदि, मध्य औ' अन्त, पाथ । में वादो मे तात्विक निणय, विद्यायो मे अध्यात्म ज्ञान । मै सकल अक्षरो मे प्रकार हूँ 'पहला ही, मै सकल समासो मे हूँ, अजु न ! स्वय द्व द्व!, अक्षय है जो ये काल काल हूँ, मै, उसका, मै ही सबका धाता विराट् । 11 - ॥ 1111 मैं हूँ सबका विध्वसक दुदमनीय मृत्यु, मैं हूँ भविष्य के जमो का सारा व कारण धृति मेधा, स्मृति, श्री, कोत्ति, वाक्, प्रौ'क्षमा स्वय नारियो वीच म हूँ केवल । बावन ] - ---

.
में सकल गेय श्रुतियो मे हूँ वह बृहत्साम,
छदो में मैं हूं गायत्री वह सवश्रेष्ठ,
‘में मासो मे हूँ मार्गशीप सबसे मनोज्ञ,
ऋतुप्रो मे मै ही हूँ, वसत ऋतुराज पाप ।
मै हूँ छलियो 'मे स्वय द्यूत,
में तेजधारियो में हूँ प्रोज्ज्वल स्वय तेज,
'मै ही जय हूँ, स्थिर निश्चय मैं,
मैं ही हू, सात्विक पुरुषो का वह सत्त्व-भाव ।
में वृष्णिवशियो मे हूँ पायन वासुदेव,
मैं ही हूँ पाण्डवगण में धीर धनजय भी।
मुनियो मे घेदव्यास और
कवियो में मैं ही शुक्राचार्य समर्थ आप ।
जो भी करते हैं दमन दण्ड हूँ, मैं उनका, में दमन शक्ति,
जय की इच्छा करने वालो की मैं हूँ स्वय नोति,
मै सकल गुप्त भावो मे हूँ साक्षात् मौन,
हूँ सकल ज्ञानवानो का मै ही तत्त्वज्ञान ।
हे अजुन' सारे जीवो का मे एक बीज,
है नहीं चराचर मे कोई मुझसे विहीन
जो कुछ है, है मेरा स्वरूप !
मेरी देवी विभूतियो का है नही अन्त,
तेरे हित ही इस एक वेश से कहता हू
अपना विभूति-विस्तार, परतप ! समझ देख
[ तिरेपन

जो कान्तियुक्त, है शक्तियुक, जिसम विभूति
उम-उसको न मेर हो तेजस का ही अर्जुन !
अश मान,
वह उसी प्रश से लेता जग मे यहा जन्म ।
इस अधिक जानने से तेरा क्या अभिप्राय ?
म अशमान से ही अपने
मम्पूण जगत् को धारण कर स्थित हूँ महान !
सुन कृष्ण वचन
बोला अजुन
मुझ पर जो किया अनुग्रह है
कह गोपनीय अध्यात्म विषय
उससे मेरा अज्ञान हो गया है विनष्ट ।
हे कमलनयन । भूतो का सिरजन और प्रलय
मे जान चुका,
हो स्वय तुम्ही अव्यय अविनाशी
चुका जान ।
हे परमेश्वर । जैसा अपने को कहते हो
है वही सत्य,
पर पुरुषोत्तम । अव ज्ञान, शक्ति, ऐश्वय्य, वीर्य,
बल, तेजयुक्त वह रूप तुम्हारा
चाह रहा प्रत्यक्ष देखना
मै निश्चय
उत्पत्ति और स्थिति, प्रलय तथा
अतर्यामी शासक हो तुम
कहलाते प्रभु
चौवन ]

यदि रूप तुम्हारा वह सक्ता मैं झेल देख,
तो योगेश्वर । दशन प्रवदो
अपना प्रविनश्वर म्प प्रगट
करदो
महान
-
बोले माधव अजुन की सुन कर यह वारणी
हे पाथ । देश मेरे प्रनक, सकडो, हजारा
तरह तरह के, भिन्न वरण, भिनायति वाले
स्प अलौकिक । ले निहार ।
है भरतवश अवतश । दस प्रादित्यो, यमुना, रद्रा औ'
अश्विनीकुमारो मस्तो को
यौ' अनदसे वितन ही अद्भुत स्पो को
तू मुझमे हो अब ले निहार
मेरे शरीर म एस जगह स्थित हुए
चराचर सहित अरे सम्पूण जगत्
तू देस, देख और भी चाहता
जो निहारना गुडाकेश !
निद्राविजयी।
पर प्राकृत नयनो से निश्चय
तू देख नही पायेगा मेरा वह स्वरूप
ले तुझे दिव्य लोचन देता हूँ ह अर्जुन!
अव तू मेरा ऐश्वर्य योग की शक्ति देख!
यह कह सजय धृतराष्ट्र नृपति से
फिर बाला
[ पचपन

हैं राजन् ! यो कह स्वय महायोगेश्वर हरि ने अर्जुन को दिखलाया अपना परम रूप ऐश्वय्य दिव्य । - उनका अनेक मुख नेत्रो वाला वह अद्भूत निस्सीम रूप दशन करके दिव्यास्त्र और प्राभरण दिव्य से शोभमान रे दिव्य वस्त्र मालाओ से मनहर स्वरूप रे दिव्यगध अनुलेपनमय आश्चय्यजनक ऐसा विराट् ऐसा अनन्त वह रूप देख । अजुन अवाक रह गया कि जैसे एक साथ आकाश बीच वे उदित हुए जयमय प्रदीप्त सूरज सहस्र भी ज्योतिहीन से लगें देख कर यह प्रकाश देखा उसने प्राश्चययुक्ता। सम्पूण जगत् जो काल बीच मे हैं विभक्त जो अलग अलग लगता प्रवाह वह लोक लोक अपनी अनेकता सहित स्वय उस देवदेव हरि के शरीर' मे क्रम से, था। सब एक जगह स्थित अप्रमेय तब रोम रोम दुधप धनजय का विभोर होगया हप से बार बार, पाश्चय्य चक्ति तब हाथ जोड श्रद्धा से नतशिर गद्गद्-सा उस विश्वरप पो देस देख वह उठा बोल । - पप्पन]

देवाधिदेव ।
में देख रहा
देवता सफल, सब भूततत्व समुदाय और
कमलासन ब्रह्मा, महादेव, ऋषि भी समस्त
सब दिव्य सप
प्रापकी देह मे हे सब ही ये वत्तमान !
हे विश्वेश्वर । हैं अगणित सुख, लोचन भनेक,
है अगणित लोचन, उदर कई,
हैं पाप लिये कितने प्रनत निज गहनम्प !
मुझको दिखता है प्रत नही, दिखता न मध्य,
में खोज नहीं पाता हूँ कोई यहा आदि ।
हे परम विष्णु । सिर पर किरीट,
वर गदा-चत्रमय प्राप दीखते हैं मुझको
हर दिशि से केवल ज्योतिपु ज,
ढेरी प्रकाश की, जैसे हो प्रज्वलित अग्नि,
जैसे होता जाज्वल्यमान वह मातण्ड,
पाती है मेरी दृष्टि प्रापको गहन गहन,
सब ओर देखता हूँ मुझको तो पाप लग रहे
अप्रमेय ।
हैं सकल विश्व के परम पाप ही तो निधान,
अक्षर हैं केवल आप जानने योग्य परम्,
हैं आप धम शाश्वत के रक्षक अविनाशी,
हैं आप सनातन पुरुष अकह रे दीप्तिमान ।
हैं आदि, मध्य औ' प्रत रहित,
सामथ्य लिये निज मे अनत,
शशि सूय्य आपके लोचन हैं, हे भुज-अनत !
[ सत्तावन

प्रज्वलित अग्नि-सा मुख प्रदीप्त है ज्योतिमत । हैं आप जगत् को तपा रहे अबरे स्वतेज से महामहिम ! ऐ हो महान् आत्मा समग्र- द्यावा पृथ्वी के बीच व्याप्त यह अन्तराल औ' सकल दिशाये, एक आपसे हैं प्रपूण यह उग्र और अद्भूत स्वरूप आपका देख अति व्यथित हो रहे हैं त्रिभुवन ये बार बार ! करते प्रवेश, गोविद ! देवताप्रो के वे सारे समूह आपमे और भयभीत हाथ जोडे करते मापके नाम गुण का उच्चारण रोमाचित, सारे महर्षि औ' सिद्ध प्राथना करते हैं कल्याण मागते उत्तम स्तोत्रो द्वारा हैं आपकी कर रहे स्तुति अपार । यक्ष, ग्यारहो रुद्र, प्रादित्य बारहो, पाठो वसु, उचास मरद्गण, विश्वेदेव, समस्त साव्य अश्विनीकुमार, पितर सारे, गधव, राक्षस मौ' सारे सिद्धो के अब वे समूह सब ही विस्मित से चकित भ्रमित हैं रहे आपको ही निहार। हे महाबाहु प्रापका अनेको मुखवाला अगणित लोचन, अगणित कर, पग, जघानो प्रौ' उदरो वाला , अठावन ]

अगणित कराल दाढी वाला
ऐमा विराट यह रूप देख
हैं लोक लोक भय से व्याकुल,
मैं भी हूँ भय से आतमान
।
यह नभ तक फैला हुमा व्याप्त
देदीप्यमान
अगणित वर्णो से भासमान
मुख फलाये, जलते विशाल नेत्रो वाला
भीपरण स्वरूप,
म प्रततम तक थर्राता हूँ देखदेख
हे विष्णु । शाति भो' धेय्य नही घर पाता हूँ म
कपमान !
विकराल दाढ है चमक रही जिनमे मयकर
जो प्रलयकाल की महा अग्नि की भांति
दीखते है भीपरण
अापके मुखो को देख देख
हूँ दिशा ज्ञान,
जग के निवास ! देवेश ! हो रहा सुख विलीन,
हो अब प्रसन्न ।
मैं भूल रहा
म देख रहा
राजामो के समुदायसहित
रे सब ही वे धृतराष्ट्र पुत्र
कर रहे पाप मे ही प्रवेश,
रे भीष्म पितामह और स्वय
प्राचाय्य द्रोण,
वह कर्ण और
[उनसठ
HE

अपनी सेना के भी प्रधान योद्धा अनेक,
सबके सब हो अति वेगयुक्त
आपकी भयकर दाढो बाले भयद मुसो मे
घुसते हैं
हैं जहा चूरण हो जाते उनके गवित शिर
भीषण दांतो मे चिपये दिखते हैं मुझको
वे प्राणहोन!
हे विश्वमूर्ति !
जैसे नदियो के सब प्रवाह दौडते और
जाकर समुद्र में ही गिरते,
वैसे यह योद्धा-शूरवीर समुदाय सभी
आपके प्रज्वलित मुखा बीच
करते प्रवेश !
जैसे मोहित होकर पतग हैं
दीप्त वह्नि को देख वेग से
जा गिरते उसमे औ'
हो जाते विनष्ट,
वैसे ही यह सब भी अपने अपने विनाश के
हेतु शीघ्र
आपके मुखो मे गिरते है मिट जाने को।
औ' प्राप सकल लोको को अपने इन भीपण
प्रोज्वलित मुखो मे ग्रसते से
हैं चाट रहे सब अोरो से, ह महाविष्णु !
आपका उग्र आलोक तेज द्वारा अपने
हैं तपा रहा सम्पण जगत को, हे विराट् !
"
साठ ]

जय
नमस्कार करता हूँ मैं,
होवें प्रसन्न । हे आदि रूप
मैं नहीं समझ पाता प्रवृत्ति प्रापको किन्तु,
हे उग्ररूप । हैं कौन आप
कहिये हे देवो मे वरेण्य
मुझको दें अपना तत्व-भास ।
?
सुन कर अर्जुन के वचन दीन
भगवान कह उठे अरे पाथ !
मैं लोको का करने विनाश
हूँ बढा हुआ वह महाकाल ।
इस समय लोक का करना है मुझको विनाश,
प्रतिपक्षी सेना के योद्धा
अब नहीं रहेगे जीवित वे,
वे नहीं रहेगे अब तेरे भी बिना शेष !
तू करे युद्ध या नही करे,
पर इनका होगा स्वय ध्वस
इसलिये खडा हो जा निभय,
यश करले तू अब प्राप्त देख !
तू जोत शत्रुप्रो को समृद्ध वह राज्य भोग !
ये शूरवीर योद्धा सारे
मेरे द्वारा हैं पहले ही सब मरे हुए,
प्रो सव्यसाचि ! तू तो वनजा केवल निमित्त !
ये मोम, द्रोण, ये करण, जयद्रथ,
और अनेको शूरवोर,
मेरे द्वारा हो चुके निहत पहले ही सुन हे पाण्डुपुत्र ।
तू इह मार । अब भय मत कर।
[इसठ

तू निश्चय ही जीतेगा अपने शत्रु माय
सग्राम वीच !
इसलिये युद्ध कर महाधीर
-
तब वह किरीटधारी अजुन
कशव के सुन ये वचन
हाथ जोडे कपित, कर नमस्कार,
भयभीत हुअा सा, गद्गद स्वर,
या उठा बोल
हे अतर्यामी | उचित है कि
कर कोत्तन जग
आपके नाम का होता है मन मे हर्षित,
होता है फिर अनुराग प्राप्त,
भयभीत हुए भागते दिशाओ मे राक्षस,
औ' नमस्कार करते हैं सिद्धो के समूह ।
1
हे महामहिम | प्रात्मा महान !
हैं आप स्वय ब्रह्मा के भी उत्पत्ति तूल,
क्यो करे नही वे नमस्कार
हे जगनिवास ! देवेश । आप तो हैं अनत,
सत्, असत्, परे उनसे अक्षर भी तो ह
स्वय प्राप।
स्वत्र व्याप्त,
हे प्रादिदेव हे पुरुप सनातन, परमाश्रय, हे परमधाम,
जानने योग्य, जानते स्वय,
परिपूरण स्वय हे छवि प्रनत
हे हरि । लें मेग नमस्कार
।
पासठ।

हैं आप स्वय- यमराज, वरण, चन्द्रमा, वायु हैं पाप प्रजापति ब्रह्मा मौ' ब्रह्म हे भी है पिता आप | शत नमस्कार मेरे सहस्र लें नमस्कार मै वारम्वार विनीत कर रहा नमस्कार मेरा वदन स्वीकार करें जय हे विराट । ले नमस्कार। - हे चिर प्रनत सामथ्यवान सम्मुम्ब से करता हूँ मै वदन नमस्कार ! करता अव पीछे से श्रद्धारत नमस्कार । है सर्वात्मन् । सव ओर मापको नमस्कार हैं आप पराक्रम धर अनत सब लोको को कर रहे व्याप्त, हे सवरप। - हे परमेश्वर। जो सखा मान आपके प्रभावो से प्रजान में प्रेम या कि अपने प्रमाद से हे यादव हे कृष्ण मित्र हठ पूर्वक जो कह चुका मगन, औ' हे अच्युत जो हँसा-हँसी मे शय्या,प्रासन औ' भोजन प्रादिक विहार को बेला मे मित्रो के सम्मुख या कि अकेले में ही मैं अपराध आपके सम्मुख हूँ कर चुका दीन, है अप्रमेय छवि । उन सबकी म क्षमा मागता बार-बार 1 [तीरसठ

हे विश्वेश्वर ।
हैं प्राप चराचर-लोक-पिता,
गुरू स भी गुरु है पूजनीय,
अतिशय प्रभाव वाले हैं निश्चय प्रभु महान
लोको म है न समान आपरे जब कोई
हो सकता कसे प्रषिक और
हे विश्वमूत्ति । अापके चरणतल
मेरी वाया हुई विनत
हे स्तुत्य आपको कर प्रणाम,
प्रार्थना कर रहा पाप श्रेष्ठ | होवे प्रसन ।
हे देव । पिता जिस भांति पुष,
औ' मित्र मित्र प्रौ'
पति प्रिय स्त्री के अपराधी को सह लेते,
वसे ही मेरे अपराधो को सह प्राप
।
देखा न आज तक जो स्वरूप वह देख देख
हपित हूँ मैं रोमाचित हूँ,
पर मन है मेरा रहा काप,
हे जगनिवास | देवेश । दिसाये मुझे किन्तु
निज देव रूप ही हो प्रसन्न ।
करता हूँ मै शत नमस्कार
1
हे विष्णु । चाहता हूँ देखू
वह मुकुट, शख औ' गदाचक्र वाला स्वरूप ।
है विश्वरूप ।
तज कर स्वरूप यह भुज सहस्र का प्रादि देव ।
फिर वही चतुर्भुज घरे रूप
घोसठ ]

- अर्जुन को सुन प्रार्थना कृष्ण यो उठे बोल कर दया तुझे दिखलाया मने आत्मयोग से यह स्वरूप अति तेजोमय,- निस्सीम, प्रादि सबका विराट वह रूप, पाथ । तेरे अतिरिक्त नहीं कोई भी देख सका । यह तो है लोक मनुष्यो का इस विश्वरूप मे यहाँ मुझे देखे कोई- अध्ययन यज्ञ का, और दान और क्रिया, उगतप, स्वय वेद के माध्यम से भी कोई भी सकता न देख । मेरा ऐमा विकराल रूप यो देख न होवे तू व्याकुल या मूढभाव, हो भौतिहीन फिर प्रीतियुक्त इसलिये देख मेरा वह ही फिर पाथ रूप- वह शख, चक्र, औ' गदा, पद्म वाला स्वरूप। यह कह कर सजय बोला नृप अर्जुन से यो कह वासुदेव ने पुन वही निज रूप चतुर्भुज दिखलाया औं' सौम्य रूप घर कर उसको आश्वासन देकर, दूर किया उसके मन से वह भय अपार । तब अजुन बोला फिर स्वभाव मेरा है मुझको हुमा प्राप्त, यह शात मधुर आपका मनुष्यो सा स्वरूप फिर देख हो गया शात चित्त । सिठ बोले श्रीकृष्ण वचन ये सुन,- प्रिय हे अजुन मेरा यह रूप चतुभु ज भी अति दुर्लभ है जो रहे देख, देवता सदा मेरी इस छवि के दशन को ही लालायित रहते अधोर। अध्ययन यज्ञ का, और दान औ' क्रिया, तपस, या स्वय वेद के माध्यम से भी कोई भी सकता न देख । - पर श्रेष्ठ तपस्वी हे अजुन म इस स्वरूप मे हो सकता हूँ प्राप्त यहा प्रत्यक्ष या कि म ज्ञेय, या कि करने प्रवेश- मुझम यह है सभाव्य, पाथ । है पाण्डुपुर । जो मेरे ही हित, सब कुछ को मेरा समझ करता सब कुछ, जो मुझे प्राप्त करने को है तत्पर मानस में लिय भक्ति, प्रासक्तिहीन जो सकल प्राणियो के प्रति है रखता न वैर, ऐसा अनन्य वह भक्त सदा मुझको ही होता प्राप्त अत । छियासठ }

भक्ति
जिस भांति प्रवाहित होती नदियाँ
अपना अपना नाम छोड
हो जाती सागर मे विलीन
विद्वान उसी विधि से अपने
तज नाम रूप
उत्तम से उत्तम दिव्य पुरुष परमात्मा को
पा जाता है।
[मुण्डकोपनिषद् ३१२१८
परमात्मा म लय की भावना ने ही भक्ति को जन्म दिया, जिसमे तमय और प्रेम
को साथ लिया गया है।
होब्र साहित्य यहूदिया का पुराना साहित्य है । यहाँ मैंने दाऊद नामक सम्राट
१६, २३वें, २७३, ४२वें, १०३वें गीत का अनुवाद किया है। यह गीत भक्ति से
प्रोत-प्रोत है और पुरानी इजील में ईसाईया द्वारा भी स्वीकृत कर लिये गये हैं।
कालक्रमेण इनको ईसा से लगभग ८०० से १००० वप माना जाता है। इन
गीतो मे यद्यपि सघप का भी परिचय है, मात्म-रक्षा के लिये याचना प्रमुख लगती
है, परन्तु फिर भी यहाँ, आत्म-निवदन है, वह बहुत ही मार्मिक है, और उसमे
हृदय को छू लेने की शक्ति है । यहूदी जाति मुख्यत भेड पालती थी इसलिये
प्रभु की कल्पना चरवाह के रूप में की गई है।
के
[ सड़सठ

प्रभु: चरवाहा
[ दाऊद]
आकाश प्रदर्शित करता है प्रभु का गौरव
नक्षत्र दिखाते है उसके कर का कौशल,
दिन से दिन उसके ही स्वर को दुहराता है,
रजनी से रजनी उसके ज्ञान दिखाती है ।
ऐसी न कही भी कोई भाषा विद्यमान
जिनम उसका स्वर होता किंतु न श्रव्यमान ।
उनकी श्रेणी भूमा पर है सम्पूण व्याप्त,
उनके ह शब्द सकल जग को कर चुके पार ।
रवि के हित उसने पटमण्डप
है किया एक स्थापित उनमें,
वह है दूल्हे सा निज प्रकोष्ठ से जो वाहर पाता धीरे
आनद मनाता ज्यो कोई नर शक्तिमान
है जाति चला देता अपनी सामथ्यवान !
वह स्वर्गस्थल से चलता है,
सम्पूण लोक वह कर लेता है व्याप्त पार,
उसके तापो से नही छिपा है रे कुछ भी
अड़सठ ]

प्रभु का है नियम प्रशुभ्र पूर्ण,
प्रात्मा को परिणित करता है,
उसका प्रामाण्य विनिश्चित है,
मतिमानो को करता है वह रे सहज स्वय ।
प्रभु के निर्देश सदैव सत्य,
प्रानदित करते मानस को
उसकी आज्ञा है अति पुनीत,
ज्योतिमय करती नयनो को।
प्रभु का भय है रे अति निमल,
वह रहता है शाश्वत अनत,
प्रभु का है न्याय अखड परम,
है सत्य और समुचित सदैव !
उनको कामना सदैव श्रेष्ठ,
रे अधिक स्वरण से वही काम्य,
कचन उसके सम्मुख न श्रेय,
वह मधु से मीठी मृदुतम ।
उनके
द्वारा तेरा सेवक
यह हो जाता है सावधान,
उनके पालन में मिलता है
उपहार और वरदान श्रेष्ठ ।
उसकी भूलो को कौन समझ सकता बालो?
तू कर मुझको परिशुद्ध गुप्त
पापो से मेरे ज्योतिमान ।
के
तू महकार पापो से
हत विनत दास की रक्षा कर,
[उनहत्तर

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प्रभु के सम्मुख मैने है बस
याचना एक ही को मन से,
जिसकी प्राथना म सतत करूंगा बार बार,
वह यह कि रहूँ म जीवन भर
प्रभु के घर मे,
देखू उसका सौंदर्य सतत,
उसके मन्दिर मे रहूँ सदा जिज्ञासु सदृश ।
सकट के दिवसो म मुझको
निज शिविर बीच प्राश्रय देगा,
अपने पटमडप के प्रदेश जो गहन गुह्य
वह मुझे छिपा लेगा उनमें,
दृढतम चट्टान मिलेगी मुझको स्थिर करती,
मै ऊभ चूभ रे भटक न पाऊंगा निश्चय ।
मेरे रिपुप्रो पर मेरा सिर
उनत दोखेमा इसीलिये
उसकी वेदी पर बलि दूंगा अपने हर्षों की
श्रद्धा से।
म गाऊंगा, सच,
प्रभू की स्तुतियाँ गाऊँगा।
हे प्रभु
तू सुन,
जव म पुकार कर तुझे बुलाऊँ प्रात्तमान,
मेरे मन ने तुझ से अनुनय को हे उदार
प्रभु मै तेरा मुख देखूगा
1
मुझ से न छिपा अपना आनन,
तू क्रोध न कर, मै सेवक हूँ,
यहत्तर ]

दुतकार न तू, कर दूर नहीं,
तू एक सहायक है मेरा,
मत छोड मुझे,
मत कर तू मेरा परित्याग,
स्वामी।
प्रो मेरे मोक्ष प्रदाता हे ।
श्री प्रभु
जब मुझे जनक जननी भी तज देंगे, तब मी
प्रभु के कर देगे मुझे अभय प्राथय महान ।
हे प्रभु । तू अपना माग मुझे दिखला सुन्दर
तू अपने पथ की शिक्षा दे,
ले चल तू मुझको समतल पथ म क्योकि मुझे
धेरे हैं मेरे भयद शत्रु
मेरे रिपुमो की इच्छा पर मत मुझे छोड,
भूठे साक्षी हैं खडे हुए मेरे विरुद्ध,
निष्ठुरता ही उनकी सांसो मे पलती है।
प्रभु अच्छे है जब शिथिल हुआ यह भाव तभी
हो गया विकल में मूछित सा,
जीवित मनुजो की भूमा मे
प्रभु का सत् ऊपर रहता है।
प्रभु की सेवा करना अविरत,
साहस मन म रखना अविकल,
वह निश्चय तुमको बल देगा,
केवल प्रभु की सेवा करना
मेरा है यह वचन एक
सुन मेरे मन ।
X
x
[तिहत्तर

प्यासा मृग ज्यो निर्भर के हित तरमा करता हे प्रभु ! मेरी आत्मा भी तेरे हेतु तड़पती उसी भांति, मेरी प्रात्मा है प्यासी प्रभु के हेतु प्ररे उस सजीवन प्रभु के हित हो, क्व पायेगा वह दिन जब में जाऊंगा प्रौ' प्रत्यक्ष वहां प्रभु सम्मुस पाऊँगा दशन मै प्रहनिशा अपने प्रासू पर चलता हूँ, औ' वे अविरत पूछा करते तुझसे फिर फिर- तेरे प्रभु हैं वे कहाँ बोल ? ? जब पाती मुझको ये स्मृतियाँ अपनी प्रात्मा को तब निज मे देता उडेल में सोच सोच, में गया भीर के सग गया प्रभु के मन्दिर मे स्तुतियो हर्षों से पुलकित वह भीर जो कि प्रभु प्राज्ञा से उस दिन थी प्रार्थना लीन । प्रो मेरी आत्मा । तू क्यो इतनी विकल और ऐसी निराश? क्यो तू मेरे भीतर इतनी 7 व्याकुल उदास अपनी प्राशा प्रभु मे वेन्द्रित कर ले तू री । उसके दशन का पाऊ में सबल क्षण भर चौहत्तर ]

इस हेतु करूंगा मैं तो उसका ही अपार
जयगान मुखर ।
हे मेरे प्रभु, मेरी प्रात्मा
मुझम इतनी है दीन हुई
इस हेतु करूंगा में फिर स्मति
जोदन, हर्मनतिस के देशा की
और मिज़र पवत की
पाता हुआ
शक्ति ।
तेरे जल उत्सो के प्रवाह की ध्वनि सुनकर
देता समुद्र है गहन सिंधु को आमन्त्रण,
तेरी लहरें, तेरी हिलोर
मुझ पर से निकली हुई पार ।
फिर भी प्रभु प्राज्ञा देंगे ही
दिन में निज प्रीतिभरो करुणा कर
अमल व्याप्त,
निशि मे उस नीरव बेला म
प्रभु का ही गीत रहेगा मेरे
पास सग,
मेरे जीवन के परमात्मा ।
मै तो तेरी ही स्तुति करता
वदना करूंगा रे नत शिर ।
प्रभु है मेरी चट्टान सुदृढ,
में पूछूगा उससे तू मुझको
हाय गया किसलिये भूल
रिपु के पातको से व्याकुल
क्यो फिरता हूँ मैं यो
उदास ?
[पचहत्तर

वे करते हैं भत्सना घोर मानो करते हैं मेरे तन मे खड्गो का भीपण प्रहार, हैं नित्य पूछते वे मुझमे- है तेरा वह प्रभु कहाँ बोल ? 7 ओ मेरी आत्मा ! तू क्यो है इतनी व्याकुल ? मेरे भीतर तू क्यो इतनी विह्वल उदास विश्वास अटल घर री प्रभु मे, में तो उसकी ही स्तुति मे होऊंगा विभोर, वह ही मेरे सुख का है री प्राधार एक, वह भी मेरा है प्रभु स्वामी । x x । -- प्रभु की जय हो, मेरी प्रात्मा जो कुछ भी है मेरे भीतर सव उस पुनीत के नाम उचारे बार बार, नो मेरी प्रात्मा प्रभु का वदत कर फिर फिर, मत भूल कभी उसको महिमा तेरी सारी निबलताएँ करता है वह ही क्षमा नित्य, तेरो पीडाए हर लेता तेरे रोगो को करता है वह सदा दूर, विव्यसो से तेरे जीवन को करता रक्षा है सदैव, कोमल करुणा प्रो' स्निग्य दया से तुझको वह मडित करता, घियत्ता ]

तेरे मुख को भोजन देता कितने सुस्वादु,
तेरे यौवन को कर देता वह नव ऊर्जामय बल देकर
ज्यो श्येनो की है शक्ति उमडती वेगवती ।
कह सत् को है स्थापित करता
दलितो को देता वही न्याय
मूसा पैगम्बर को उसने पथ दिखलाया,
अपने नियमो से उसे किया अवगत निश्चय,
इजरायल को सतान हुई उससे ज्योतित ।
प्रभु है करुणामय
दयावान,
आता न उसे है शीघ्र क्रोध,
उसकी करुणा कितनी अपार !
वह सदा न देता दुरित दण्ड,
वह सदा नही रहता प्रक्रुद्ध,
जब से हमने हैं पाप किये
उसने न दिया है दण्ड अभी,
अपनी निर्वलताएँ निहार
उसने न दिया है हमको फल ।
जिस भांति व्योम है भूमा से इतना ऊँचा
उसको करुणा भी है रे वैसी ही महान
उन पर जो उससे अपने मन म
डरते हैं।
प्राची से है पश्चिम जितना रे अति सुदूर,
वह सदा हमारी नियमोल्लघन की भूलें
रखता है उतनी ही दूरी पर हमसे भो।
[सतहचर

वे करते हैं भत्सना घोर मानो करते हैं मेरे तन मे खगो का भीषण प्रहार, हैं नित्य पूछते वे मुझसे- है तेरा वह प्रभु कहाँ बोल ? ? ओ मेरी प्रात्मा ! तू क्यो है इतनी व्याकुल मेरे भीतर तू क्यो इतनी विह्वल उदास ? विश्वास अटल घर री प्रभु मे, मै तो उसकी ही स्तुति म होऊंगा विभोर, वह ही मेरे सुख का है री आधार एक वह भी मेरा है प्रभु स्वामी । x > । प्रभु को जय हो, मेरी प्रात्मा जो कुछ भी है मेरे भीतर सब उस पुनीन के नाम यो मेरी प्रात्मा प्रभु का वदन मत भल कभी उस तेरी सारी निबलताएँ करता है तेरी पीडाए हर तेरे रोगो को विवसो से तेरे कोमल करुणा स्निग्य- घियत्ता

जो उसकी आज्ञा का करते रहते पालन,
है जिन्हे याद आदेश सदा रहने उसके,
वह उन पर रहता है प्रसन ।
प्रभु ने अपना सिंहासन है
उस व्योम बीच
रे स्वग सुखद मे
किया स्वय स्थापित महान,
साम्राज्य बृहत् है ये उसका
सबका शामक है वही एक ।
प्रो सुनो सुनो रे तुम तन्मय
प्रभु का नीराजन करो विनत,
हैं देवदूत उमके महान
अति शक्तिमान
वे उसकी आज्ञाओ का पालन करते हैं
उसके शब्दो को प्रतिपालित करते,
उनको भी तुम वन्दना करो।
प्रभु की स्तुति करो,
कगे उसके उन ज्योतिमय सेवको
देवदूतो को भी,
वे उसको इच्छा का हो करते अभिनन्दन ।
उसके महान साम्राज्य वीच
जो यथास्थान है रे सब कुछ
उसका बदन तुम करो दीन,
भो मेरी मात्मा।
[अन्यासी

जिस भाति पिता होता निज शिशुप्रो के प्रति रे
मन मे दयालु
जो डरते है प्रभु से उन पर
वह भी करता है दया सतत रे
उसी भाति ।
वह हमे जानता है,
प्रवगत है उसे हमारी सोमाये,
है याद उसे,
हम तो केवल हैं माटी ही।
मानव जीवन,
यह आयु घास के है समान,
वह, खेतो मे उगते कोमलतम
कुसुम सदृश
करता है सुखमय सवद्धन ।
पाती बयार, चलती उस पर,
औ' दूर निकल जातो सुदूर,
पर कुसुम जहा पर खिलता है
होता न वहाँ यह ज्ञान भास ।
पर जो उस प्रभु से डरते हैं,
उन पर शाश्वत से शाश्वत तक
होती हैं प्रभु - करुणा अपार,
रहता
जीवित भखड ।
अठहत्तर]
पीढी दर,
पीढी सत्

जो उसकी आज्ञा का करते रहते पालन,
हैं जिन्हे याद आदेश सदा रहते उसके,
वह उन पर रहता है प्रसन ।
प्रभु ने अपना सिंहासन है
उस व्योम बीच
रे स्वग सुखद मे
किया स्वय स्थापित महान,
साम्राज्य वृहत्
ये उसका
सबका शामक है वही एक ।
प्रो सुनो सुनो रे तुम तन्मय
प्रभु का नीराजन करो विनत,
हैं देवदूत उसके महान
अति शक्तिमान
वे उसकी आज्ञाओ का पालन करते हैं
उसके शब्दो को प्रतिपालित करते,
उनको भी तुम वदना करो।
प्रभु की स्तुति करो,
को उसके उन ज्योतिमय सेवको
देवदूतो की भी,
वे उसको इच्छा का हो करते अभिनन्दन ।
उसके महान साम्राज्य बीच
जो यथास्थान है रे मब कुछ
उसका वदन तुम करो दीन,
ओ मेरी आत्मा
1
[उन्यासी

तुम प्रभु की वन्दना करो।
है अभिनन्दन ।
x
x
हे प्रभु
तुम मुझको सोज चुके,
तुमको तो में अनजान नहीं,
मेरा उठना बठना सभी है तुम्ह ज्ञात,
मेरे सुदुर जाते विचार भी
नही अपरिचित हैं तुमको,
ये मेरा तन, ये रोम रोम
है तुम्ह ज्ञात।
मेरे पथ पर हो तुम्ही व्याप्त,
मै सोता हूँ तब भी तुम लेते मुझ देख,
मेरे मन में कुछ भी तुमसे है नही छिपा,
मेरी जिह्वा पर नही एक भी शब्द जिसे
हे प्रभु ! लेते तुम नही जान,
सवज्ञ तुम्ही।
मेरे पागे पोछे का तुमने ही जग मे
सयोजन सारा किया प्राप,
मुझ पर तुमने ही घरा हाथ ।
यह ज्ञान कि तुम सब जान रहे,
मुझको लगता कितना
अद्भुत
यह कितना ऊंचा भाव कि मैं
इस तक पाता हूँ पहुँच नहीं।
N
पो तेरी इस चेतना व्याप्त
से दूर कहा मैं हो सकता ?
अस्सी]

मे
बह
उपस्थिति से तेरी
जा सकता हूँ अव परे कही
7
यदि में अम्बर मे उठ पाऊ
तो तू है वहा स्वय पहले,
यदि नरक बीच जा में सोऊँ
ऐ रे । फिर भी तू वहाँ प्राप्त
?
यदि लेकर मैं ऊपा के पखो को जाऊँ
उड कर समुद्र के पार कही पर छिप जाऊँ
तो तेरा हाथ वहा भी पथ दिखलायेगा,
तेरा दक्षिण कर लेगा मुझको वहाँ थाम ।
यदि केहूँ कि निश्चय
तिमिर घेर लेगा मुझको,
तो रजनी भी बन जायेगी
उजियारी मुझको वहाँ घर ।
।ऐ रे । यह अंधियारा न छिपा
सक्ता है तेरे नयना से,
है निशा उजागर होजाती दिन के समान,
तुझको प्रकाश औ' अधवार
दोनो ममान ।
सेरे हाथो म है मेरी सारी लगाम ।
जब था मै मा के गर्भ बीच,
तूने हो तो था ढेगा मुझ ।
[क्यामी

जय हो तेरी । आतक भरा में है कितना
पाश्चय्य जनक निर्माण एक
अद्भुत है तेरी रचनायें,
मेरी प्रात्मा इसका अनुभव
करती है कितनी पूर्णतया ।
--
जब में गोपन एकात बीच था हुग्रा
विनिर्मित तव भी तो
में जिस पदार्थ का बना,
छिपा तुझसे न रहा.
निम्नातिनिम्न वसुधा के नीरव स्तरो वीच
जब अतिकौशल से था मेरा निर्माण हुमा
तुझको कुछ भी था नहीं प्रजाना
उस क्षण भी।
जब हुआ नहीं था वह पदाथ प्राकार व्याप्त
सव था अपूर्ण
तब भी तेरी अखिो ने था
देवा मुझको,
मेरे ये सारे अग-प्रग
तेरे लेसे थे लिखे हुए
जो मम से निर्मित हुए, किन्तु
जब नही बने थे तब भी थे, वे
,
तुम ज्ञात
तेरे विचार भी मुझको हैं
कितने अमूल्य,
ध्यासी

. है प्रभु 1 सच है कितनी महान उनको विराट यह पूण राशि' .- यदि गिनू उन्हे, तो वे हैं अधिक धरा के बालू करण से भी, जब जगता हूँ, तब भी रहता हूँ मैं तो तेरे पास, पास सचमुच ऐ प्रभु तू दुष्टो का वध करता है, अतएव हिंस्र जन । तुम मुझमे अव रहो दूर प्रभु। वे तेरे कितने विरुद्ध कहते है कैसी कुटिल बात ? तेरे रिपु लेते हैं वे तेरा नाम व्यथ । जो तुझमे करते घृणा नहीं क्या करूं घृणा उनमे हे प्रभु । जो उठते है तेरे विरुद्ध क्या मुझे न होता देख दृश्य वह कठिन क्लेश? - है धोर धृणा उनसे मुझको, मैं शनु मानता हूँ उनको । ले मुझे खोज ! हे प्रभु ' ले तू मेरे मन को निहार, कर देख परीक्षा प्रो' मेरे, प्रभु तू विचार । यदि मुझमे हो कोई विकार, तो मुझको अपने शाश्वत पथ में तू ले चल । तू ही ले चल स्वय देखले [तिरासी खोज सदा ससा सगी दो खग ह एक वृक्ष पर ही रहते है, एक स्वाद ले ले कर उसके फल खाता है, किन्तु दूसरा खाये बिना देखता रहता। ( श्वताश्वतरोपनिषद् ४१६) आत्मा और परमात्मा को एक ही समान माना गया है। उपनिषद् के इस विचार ने भारतीय जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव डाला है। सूफी कविया ने भी इसे अनुभव किया था । ईरान सूफी कवियो में दिव्य दशन पान की वही परम्परा मिलती है, जो भारतीय सता के बार म भी दिखाई देती है। पारसी कवि फरीदुद्दीन अत्तार एक साधु-जीवन व्यतीत करन वाल मवि थे। मनिकुन तामिर को यह कविता एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती है जिसम गुरु पौर परमात्मा से प्रात्मा का तादात्म्य दिखाया गया है। अत्तार को प्राक्रमणकारी मुगला ने १२३० ई० में मार डाला था। अनुवाद म मैंने फारसी शब्दा को हटा दिया है, क्योकि उनम हिदी मे व्याघात उत्पन होता था। इसीलिये पक्षियो नाम भी बदल दिय हैं। वम तो सवत्र हो मैंने विदेशी स्पर्शो को अलग क्यिा है, ताकि एकत्ल म बाधा उपस्थित नहीं हो। प्रस्तुत कविता मे प्रात्मा की यह यात्रा बहुत ही रोचक वन पड़ी है। और अत में जब कवि अपनी कल्पना के शिखर पर पहुँचता है तन उममे एक महान् दाशनिक्ता फूट पड़ती है। चौरासी

रहस्यमय पक्षी
(फरीदुद्दीन अत्तार)
बीती रजनी
जन्मा प्रभात
अवनी अम्बर के बीच
नवल आलोक स्नात,
जागा जीवन का प्रततम
अपने रहस्य को छाया औ'
प्रतिमूत्ति देखने को नवीन ।
तरु-तरु पर खग क्लरव करते
अपना अतस् देत उडेल
निमल क्रीडारत शिशुओ से
वे ज्योति और कुसुमो को भापा मे मुसरित ।
बहु विविध रग, स्वर ह अनेक,
उद्देश्य सभी दे भिन्न भिन्न,
पर सबके स्वर जा मिलते है
बन एक शब्द
[पचासी

वदना निरत,
उगते रवि की गौरव गाथा गाते तन्मय ।
पालोक प्रखर हो चला दिवस,
उठ चले विहग नभ म विभिन्न पथ लिये
समोरण पर फर फर,
वन, पवत पर, मैदान, खेत, निझर झरझर प्रो' झोल
सभी पर मंडराये दानो की करते
खोज विहग,
थी चाह किसी को नीड बनाने को
कोमल टहनी की हो
तो कोई पत्ता ढूंढ रहा,
अपने घर मे मिल सके ताकि
प्रानन्द और
चल सके गृहस्थी सुख से भर ।
जब सध्या मे दो बेलायें मिल जायेगी
तारिल अवगुण्ठन आकर सबको ढंक लेगा
वे पहले ही चल पडते घर
सध्या की छायाप्रो सी फैली लम्बमान
बांहो मे करते है वे प्रिय विश्राम शात
नव सुख की प्राशाग्रो से भर
रजनी की नीरव निद्रा में होते निमग्न ।
पर कुछ है जो करते प्रकाश की
सतत खोज,
उडते मेघो को, पखो की भर कर उडान
नापते विजन ऊंचाई तक,
छियासी ]

हिमगिरि के शृङ्गो से ऊपर जाते उलांघ, अपने अनदेखे तारे को खोजते हुए वे दूर दूर तक जाते हैं औत्सुक्य-लीन, कुछ ले चलते अपने दल को अनजाने देशो म बढ़ते परदेशी तीरो पर उडते है कही दूर, बहते न जहा कोई निझर दिखता न पवन का जहाँ छोर, मदान हरे, पर्वत न झील, कोई न जहा- बस एक श्वेत निस्सीम सिंधु काले अनत के तीरो मे दिसता अछोर । दिन में चलते निशि मे चलते अविराम अरुक, जाने कितने ही पथ मे ही मिट जाते हैं, घेरा करती है भूख, शीत बन दुनिवार कांपते विहग मन मे सशक- बिछुडेंगे अपने वृक्षो के परिचित साथी, स्मृतिया हैं उन्हें सताती घिर घिर बार-बार, फिर नही मिलगे अपने सगी मोद पूण। था एक कही पक्षी, जिसकी गाथा मैं था सुन चुका कभी, अज्ञात और वह था अनाम, जिसने ध्रुव से ध्रुव तक सारा जग लिया देख [ सतासी जो आत्मध्येय के उपवन मे था पहुँच गया, हो पूण काम, पर जिमने तब था छिपा लिया अपने को दिन औ' रजनी को आखो से होकर परे प्रोट, कोई न बता सकता मुझको था कहा निवसता वह पक्षी । पर जब दिन औ' रजनी मिल बनते एक रूप, रवि, शशि, तारा, पृथ्वी सबही दिक् और काल की बांहो मे प्रालिगन कर मुम्काते मिल कर सङ्ग-सङ्गा जब धूम और ज्वालाग्नि तथा मथर तरङ्ग प्रौ' पवन चपल,- अज्ञात अपरिभाषित अजान देदीप्य एक आलोक मुखर मे मिल जाते- कहते थे-यह घरती विचिन सी हिल उठती थी जागी सी तन एक शब्द की प्रतिध्वनि सी सुन कर सहमा औ' कुछ थे, जो उस अद्भुत से पक्षी का दशन भी थे कर चुके प्राप्त । यो यही सोचता वार बार में डूब गया निद्रा में वेसुध सा होकर, तब जगा स्वप्न- अठासी ] देखा मैने,-मैदान एक तारो से गुफित सा वह मनहर लगता था कितने ही पक्षी वहां दिखाई दिये मुझे, शुक, पिक, कोकिल, मरकत पखो वाला मयूर, वह खग विचित्र जो पृथ्वी पर है एक अकेला ही होता औ' प्रत काल मे जव मरता तब हो उठता है भस्म और उसमे से ही है नया निकलता वैसा ही, औ' ताम्रचूड, औ' श्यन, गिद्ध प्रौ' अबाबोल, कितने न वहाँ थे तरह तरह के खग अनेक, वे रगविरगे भाँति भाति के गाते अद्भुत मधुर गीत, उपर सबसे था एक विहग शिर पर था जिसके शिखर चूड लाबे पर जिसके थे ज्योतित चांदी के सिंहासन पर था बैरण गभीर- अति सुधी विचक्षण सुलेमान नृप, था उसको ले गया सग जब गगन विजन के पथो को लांघते समय थी हुई उसे पथ-दगक की आवश्यकता । निवासी

अब ज्योति चूड वह, उडने मे
सबने अपना नेता माना,
वह उड्डीयन मे था प्रवीण,
उड्डीन, डीन श्री' डीन-डीन,
औ' डीनो डीयन कुशल गहन
सब विधियो मे था पारगत।
वह यद्यपि भीड में बैठा था,
फिर भी था एकाकी सबसे,
परिवर्तित उसका हुआ रूप था, फिर भी था वह
अविज्ञात,
मै बैठा सुनता रहा वहीं,
प्रत्येक शब्द मुझको लगता था
प्रतिध्वनि सा।
बोले विहग,
चाहते सभी थे प्रभु चुनना
जानते न थे
किसमे थी मेधा वह मनोश
जो विभु से पाई हुई शक्ति अपनी महान का
सदुपयोग करना सम्यक
स्वय जानता
स्थित प्रज्ञ
जो उन्हें धरणि से पहुँचाने मे स्वर्गीवल मे
था समथ।
था
तर ज्योतिचूड बोला "
था अद्भुत
नोहार
नत्र

वह विजन गुफा थी गुप्त जहाँ
उसका निवास था, चट्टानो,
लहरो, पवनो से रक्षित था,
उसके थे लोचन विद्युत से,
थे श्वास कि जीवन और मृत्यु का
अनल उन्ही म पलता था ।
यदि उसे चुना जायें राजा
तो सर्वश्रेष्ठ।
अपने पखो को ले पसार
उड चले विहग प्रव
उसी द्वार।
उस पक्षी का था नीड जहाँ
वह स्थान ज्ञात था उसे और
अनुनय कर उसे मना लेने की
कला जानता था वह, पर
पथ था निजन
अति कठिन शीत से ग्रस्त भयद
छाया था उस पर अधकार,
केवल वे ही चल सकते थे
जिनमे भय की थी नही रेस,
पथ म था कोई नही शब्द
कोई न दृश्य
सब सूना था,
अपनी ही उखडी सासा के
अतिरिक्त नही था वहा और ।
सुन ज्योतिचूड की बात सभी ने
कर उसको
स्वीकार लिया,
[स्थान

उड चले भूमि से ऊपर उठ कर
वे तुरत,
आये प्राची मे वहाँ, जहाँ थे
देश धूप के उजियाले,
औ' में
अधमाधम, अति निकृष्ट
उनके पीछे चल पडा सग
पीछे की पांतो के पीछे ।
दिन था प्रकाशमय
और गगन था रे निमल,
पाल्हादित थे अपने
मानस,
हल्के थे डने और पख ।
यो पहाडियो पवतो आदि से ऊपर हम
उड गये
शीघ्र ऊंचे ऊचे,
तब धूप होगई उष्ण तनिक जब पृथ्वी पर
रेगिस्तानी घाटी आई
कर चले पार हम उसे चलाते पखो को
उठ भभक आ रही थी फिर फिर,
कुछ खग मूछित हो गये,
गिर गये कुछ अचेत,
औ' कई याद कर उठे वहा
उन मीठे सु दर दृश्यो की
जो पीछे थे वे गये छोड,
वह स्मृतिया टोस बनी कसकी।
दुपहर आई,
मात्तण्ड हो गया व्योम बीच,
ज्वालाग्रो के से मोके बन
बानवे ]

उन्मत्त पवन के उठे हमे तब
घेर घेर।
तब नयन चौंधिया गये हमारे ऊष्मा मे
थक गये पख, कंप गये हृदय,
भारी मन उडते रहे दीन हम क्लात, भात,
कितने ही खग तब छूट गये
पीछे पीछे,
कुछ लौट गये,
जव सध्या की छायाए गहरी हुई धनी
तब भीड हो गई थो अदृश्य,
कुछ चुने हुए खग रहे शेष थे
वहाँ सग।
रवि डूब गया,
दक्षिणी समुद्रो से बहती
आई बयार
कस्तूरी और मदिर गधो से
मारिल सी।
जल पर बहते भस्मिल पदाथ की
सुरभि होगई
अतराल में व्याप्त व्यस्त,
गोधूलि समय की नयनहारिणी छाया ने
भरदी अपनी मनहर सुवास ।
तब प्रेम-पिपासो कोकिल ने
छेडी अपनी मोहक तानें
[तिरानवे

गाई गुलाव की कहानिया
प्यारी प्यारी
बीते दिवसो की कसक जगादी
लोरो पर,
चादनी रात मे कुञ्जो को
यादें छेडी
वेदना भरी उच्छसित हो गई
वह विकला,
तब आत्त श्येन का हृदय उठा सहसा कराह,
सग एकमात्र भस्मोज्जीवित भी हुआ दीन,
शुक को पीडा भी प्रगट होगई
शब्दो मे,
वे लौट पडे
उड चले पुन घर को अपने ।
तज गये खोज,
जिसमे इतना था श्रम विपाद ।
सगी अपने कम तुरत होगये उडते म
वे गये छूट।
जब सध्या ने अपना अवगुण्ठन
उठा दिया,
तब झुका पख अपने हम
उत्तर दिशा ओर
बढ चले सग,
चौरानवे]

देखा मैंने--
जो भीड सग मे आई थी
अब कही नहीं थी अोर-पास,
नीले निजन नभ के नीचे
अब केवल दो थे वहाँ शेप-~
आगे आगे था ज्योति-चूड
पीछे पीछे उडता था में ।
नीरव रजनी के कक्षो से
भीगे तारे दीखे टिमटिम,
उडते थे हम अव भी अनुक्षण,
पृथ्वी सुदूर दिखती थी अब
टिमटिम करते से तारे सी
लघु विदुमात्र ।
आई फिर आधी रात और
धीरे धीरे
स्पा-भीने कुहरे से तन्द्रिल ज्योति लिये
चदा उठ पाया, औ' नभ म
उजला माथा टेका उसने
सबको निहार,
तब ज्योति-चूड बोला मुझसे
क्या तुझे दोखते हैं ऊपर के वे पर्वत ?
उनकी अपार श्रेणियां पार कर
वहां बीच मे
रहता वह अद्भुत पक्षी
एकाकी ही,
,

है तुझे ज्ञात ?
घाटियां अनेको अभी पार करनी हमको,
इन चट्टानो की गहन ढेरियो के ऊपर
भरनी उडान,
फिर उतर खोजती है उसकी वह
निभृत गुहा,
जो पवनो यौ' लहरो के छोरो पर दिखती।
भय मत कर,
आ मेरे पीछे,
अब तू देखेगा वह जिसको
देखा न किसी ने भी अब तक,
है अनुपमेय।
पौ फटती थी अब पूरब मे,
दुगना उछाह भर गया हमारी
प्राशा में,
कितनी ही वे घाटियां पार करदी हमने
क्तिनी पहाडियां, कितने ही पवत
हमने डाले उलाघ,
क्षण भर न लिया विश्राम कही उस
अपनी एकाकिनि उडान मे सततलीन,
तब जा पहुंचे इतने ऊपर इतने ऊपर
रे जहाँ ऊँचाई नक्षनो की झिलमिल काया को
वढ कर थी रही चूम,
रुक गये वही पर और झुके क्षण भर मे हम
उतरे नीचे हम फरफर कर
मरकत वर्नी था एक द्वीप
नीलम की भील उसे घेरे थी शोभमान,
पर नही एक लहरी उठती हिलती उसम
छियानवे ]

"
नीरव प्रशात था वह प्रसार
मन सा उदार,
उतरे उस पर तब हम दोनो
सरके समीप,
देखा हमने तब एक दूसरे को गम्भीर
में चकित रह गया देख लोचनो म उसके
पण विवित सी थी मेरी ही प्राकृति सी
तब लगा मुझे
वह था मुझको परिचित वर्षों से
युग-युग से ,
जब वह बोला
तव लगा मुझे में सुनता था
अपना ही स्वर
जो प्रतिध्वनि बन कर
निकल दूसरे के उर से
यो अब बाहर सुन पडता था
मेरे उर मे वह नाद व्याप्त था पहले से
फिर भी मुझको अपने से बाहर लगता था ।
बोला वह 'ले । वह ही रहस्यमय पक्षी है ।
व उसे देख
"
आशिक मा सुन पाया उसको
अाशिक सा अनुभव किया उसे ,
देखा कि झील के वक्ष बीच
लहरी सो कापी एक और फिर
गई फेल,
टूटा स्तर नौ' उठाई आकृति एक
घर लिया जिसने अद्भुत रूप आप ।
[सतान

?
क्या सचमुच या में देख रहा
था कौन, कौन वह जो मुझको था रहा देय
अपलक ऐसे निज नयनो से
जिनमे अपार था प्रेम अतल गभीर स्निग्ध ?
उसका उत्सुक आनन निहारता रहा स्तन्य मै
निनिमेष,
फिर चकित हो गया उसके भी नयनो मे जर
दपण बिंबित सी छवि दीसी
जसे वह थी मेरी अपनी,
तब लगा कि अपने जन्मो का
शाश्वत रहस्य
पृथ्वी के छोरो पर बिखरा
था नही ज्ञात हम सबको भी ।
वह ज्योतिचूड औ' वह रहस्यमय पक्षी प्रौ'
मैं, सब थे केवल एक, एक ही
उस अनत मे, शाश्वत मे ।
और प्रात्मा की उस दिन्यदृष्टि मे सहसा हो
दिप गया, मुझे वह प्रिय उपवन
जो हम सबके ही लक्ष्यो का था एक बिंदु ।
तव पडा सुनाई मुझे एक गभोर शब्द
'पाश्चय्य देख तू एक नाम का, ले निहार ।
सब अलग, कि तु फिर भी सदैव
सब वही एक ।
अपनी पागल तृष्णाओ औ' प्राशाग्रा का
कर परित्याग,--
वह नेरी लोलुप अनल शिखा का सघन घम,-
अठानमे ]

निज प्रेम और निज घृणा कठिन की मर्मर तज,
अवसादो के उच्छवास, भाग्य का भय तज दे,
न् गहन निगशा की घाटी कर पार और
ऊपरी पवन पर ऊँचा चढ तू उठ उपर,
औ' मच्चो दवी दीप्त दृष्टि से ले निहार
सर्वात्मभूत, शाश्वत गनन म जीवन का
जाग्रत रहस्य ।
.
मे जगा और देखा मैने
दिन का प्रकाश
तत्र लगा मुझे ज्यो कहता था वह
मम उर से,--
'ते देख सत्य को, और ध्येय की ओर सतत
चलता चल त्
है तेरी प्रात्मा का यह ही सारा रहस्य
नीनानमे

वह अब न देय पाता है में
रह कर भी इतना निनिमेप ।
नभ म प्राता है इद्रधनुष
हाता विलीन,
सिलते गुलाव ल छवि अपार,
निर्मेध व्योम में शशि उजाम
कमनीय कान्तिमय अमत का
वपण करता है रसभीना,
तारिल निशीथ मैं उन फैले
निस्तब्ध जलो पर टिमटिम कर
झलमल करते पालोक बिंदु
मोहक मनहर मुदमान मौन,
पालोक किरण रवि की झरती हैं
स्निग्ध स्पर्श
गौरव असड का बनी जम,
पर जहां कही भी मै जाता
मुझको लगता
इस वसुधा से उठ गई कही
वह विभवान्विति, वह गौरव है
होगया दूर।
मृदु कलरव कर गाते विहग
आनद मुखर अपना मीठा-सा
मधुर गोत,
कूदते खेल
मेमने मृदुल
भागते चपल
ज्यो प्रिय मृदग वशी-रव से
उत्फुल्ल-प्रारण,
एक सो दो ]
m

केवल मुझको
केवल मुझको हो पाया है कैसा विवाद
कैसा अवसाद मलिन विचार,
समयानुकूल उद्गार एक दे गया शाति
में फिर दृढतर,
खड्डो मे छलछल करता जल
करता निनाद उच्छल अपना
कुसुमित सुपमा के माध्यम से
कर तूय्यनाद,
मेरा विपाद
ऋतु के सुख में
धो लेगा अव न विपाद भग्न ,
पवत पवत
उठती प्रतिध्वनि
गूजती दूर तक रे अपार,
निदिया के सेतो से झूमी
प्राती मुझ तक कोमल बयार,
भूमा समस्त
आनद भरी,
पृथ्वी सागर सत्र मे हिलोर
भर गई एक
हातिरेक हो गया व्याप्त,
मधुऋतु के मन मे रागात्मक लय
किये हुए है सकल जीव,
ओ शिशु कोमल । नानदपुत्र
मुझो सुनने दे पर तेरी
मीठी दिलवारी बार वार,
प्रो चरवाह ! सुम-मरे हृदय वे
घर उदार।
रमीतीर

वह अब न देख पाता हूँ में
रह कर भी इतना निनिमेष ।
नभ मे पाता है इद्रधनुप
हाता विनोन,
सिलते गुलाब ले छवि अपार,
निर्मेध व्योम मे शशि उजास
कमनीय कान्तिमय अमृत का
वषण करता है रसभीना,
तारिल निशीथ म उन फले
निस्तब्ध जलो पर टिमटिम कर
झलमल करते पालोक बिंदु
मोहक मनहर मुदमान मौन,
पालोक किरण रवि की झरती है
स्निग्ध स्पर्श
गौरव प्रसड का बनी जन्म,
पर जहाँ कही भी मै जाता
मुझको लगता
इस वसुधा से उठ गई कही
वह विभवान्विति, वह गौरव है
होगया दूर ।
--
मृदु क्लरव कर गाते विहग
आनद मुखर अपना मीठा-सा
मधुर गीत,
कूदते खेल
मेमने मृदुल
भागत चपल
ज्या प्रिय मृदग वशी-रव से
उत्फुल्ल प्रारण,
एक मो दो]

केवल मुझको केवल मुझको हो पाया है कैसा विषाद कैसा अवसाद मलिन विचार, समयानुकूल उद्गार एक दे गया शाति में फिर दृढ तर, खड्डो म छलछल करता जल करता निनाद उछल अपना कुसुमित सुपमा के माध्यम से कर तूय्यनाद, मेरा विपाद ऋतु के सुख मे धो लेगा अव न विपाद भग्न, पवत पवत उठती प्रतिध्वनि गूंजती दूर तक रे अपार, निदिया के खेतो से झूमी आती मुझ तक कोमल बयार, भूमा समस्त आनद भरी, पृथ्वी सागर सब मे हिलोर भर गई एक हातिरेक हो गया व्याप्त, मधुऋतु के मन मे रागात्मक्लय किये हुए हैं सकल जीव, ओ शिशु कोमल । प्रानदपुत्र मुझको सुनने दे अव तेरी मोठी किलकारी बार बार, श्रो चरवाहे । सुस भरे हृदय के ! घर उदार । [एक मो तीन श्रो वरदानो से ग्रोत-प्रोत जीवो मेंने है सुना मुग्ध जब तुम उठते हो एक दूमरे को पुकार , में देख रहा पायाश स्वर्ग हंसते विभोर तुम्हारा देस देस। मानद मेरा मन भी इम सुपद तुम्हारे उत्सव का हो एक प्रग, मेरे सिर पर गोभित है देखो कुसुम हार, वरदान हप तव पूण फुल्ल- अनुभव करता हूँ रोम-रोम में मैं समस्त, मेरे अतस् म रम रम कर भरता है वह, प्रो रे दुर्दिन । यदि मैं उदास होऊँ इस क्षण जय प्रकृति मुसर के महाकोड में वसुधरा इस मधुर उपा का करती है शृङ्गार स्वय हैं खेल रहे शिशु पावन दिक् दिक् झूम झूम, सौ सौ सुन्दर घाटिया भरी हैं फलो से महमह करते इन मृदुल मृदुल से कुसुमो से सुनहली धूप की मृदु अमा भरती है स्निग्ध सलोनापन, मां को बाहो पर पुलक शिशु उछल रहे हैं रे कोमल, सुनता हूँ, में सब कुछ सुनता प्रानद भरा अततम तक एक सौ चार] पर इन अगरिणत तरुनो म से है एक दिलाता याद मुझे है एक खेत जो देख चुका मै पहते से, दोनो कहते है यही कि कुछ है बीत गया यह पेन्सी पुष्प चपल, मेर चरणो के सम्मुन झूल रहा है वही कहानी दुहराता वह स्वप्निल देवी ज्याति कहा होगई लान वह वैभव, गौरव और स्वप्न अप कहा गय? हो दूर दूर 7 है जन्म हमारा एक नीद, विम्मरण एक जिस आत्मा का होता है अपने साथ उदय, अपने जीवन के तारा का है अस्त कही अयन दूर, वह पाता है अति रे सुदूर से नही पूरा, विस्मरणलीन रे नही दिगम्बर-पूर्णतया, हम परमात्मा से आते हैं बन मेघ घुमडते वैभव के, वह ही है अपना प्रादि गेह शैशव में स्वर्ग बिखर, रहता है पास हमारे वहा सग 1 वदीगृह की छायाये फिर बढते बालक को धीरे धीरे फिर लेती है घेर घेर । [ एक सौ पाँच पर वह निहारता मुखर ज्योति, श्री ज्योति स्रोत देखता परमहर्पित तन्मय, यौवन पाता है औ' प्रतिदिन वह उदय भूमि से होता जाता और दूर फिर भी रहता है प्रकृति-पुजारी-सा मन मे, अपने देवी-दशन पाता उस पथ पर ही चलता रहता रे मधुर मधुर, पर धीरे धीरे मनुज देखता ज्योति तिरोहित हो जाती साधारण - दिन के ही प्रकाश में खोजाती, दिखती न और । . पृथ्वी अपनी गोदी अपने ही अगन मुखो से भरती है अपनी ही सृष्टिसहज मे उसकी बसती है चाहना कई, माता की ममता जैमी कुछ लेकर निज में आदर्श ध्येय लेकर ऊँचा वह घाय सदृश पालन करती अपने पालित शिशु इस मानव को है विस्मृत करवा देती- वे वैभव जिनका होता उसको ज्ञान, और वह ठौर जहाँ से प्राता वह उस पूणविमवमय स्मृति को भी करतो विलीन । महा-महल को एक सी छह ] - वह देखो शिशु छह वर्षों का कोमल प्यारा कितना छोटा-सा मृदुल अग सारे नव-जात मधुर पुण्यो से भरा हुप्रा मां के मीठे चुम्बन अपार अकित उस पर, औ' स्नेह-ज्योति गिर रही पिता के नयनो से जिम पर अनुक्षरण, देखो उसके पगतल, कोइ योजना या कि रें रेखाकन, मानव-जीवन के उसके किसी स्वप्न का कोई एक प्रश नव प्राप्त ज्ञान की मधुर कला से स्वय जिसे उसने दी है प्राकृति कोइ, कोइ परिणय या रे उत्सव, दुख बेला, या अतिम यात्रा, उसने है उसका हृदय कर लिया पूण व्याप्त अपने गीतो को उसके ही अनुकूल रचा करता रह रह, औ' प्रेम या कि संघर्ष या कि व्यापार सुधर के ही समापण के 'नुकूल अपनी वाणी को भी वह कर लेगा समथ, पर अधिक दिनो की नहीं बात यह सब भी पीछे छूटेगा, तब हप गव से यह छोटा अभिनेता लेगा नया रूप, यो समय समय पर इस 'प्रहसन' मे भित भिन जन से मिलता हो जायेगा वह स्वय वृद्ध, [एक सौ साव जोवन लाता है जरा सग ही अपनी ही सामग्री में, बीतेगा यह सारा जीवन ज्यो अनथक और अनत एक थी नकल माग। - यो। तू | जिसका बाहरीरूप भीतर की उस प्रात्मा की सारी मानवता को छिपा रहा, तू सर्वश्रेष्ठ दारानिक एक जो उत्तराधिकारी समस्त का प्रात्मरूप, तू अघो मे है नयन दीप्त, तू शात बधिर, पढ लेता है गभीर प्रतल को भी अनत । वह शाश्वत चेतन तुझमें भी पहाता है- यो शक्तिमान पैगम्बर । हे ऋपि पूणकाम | तुझमे वह सत्य निहित हैं जिनको-- रहे ढूंढते हम हैं जीवन अपना सारा- रहे बिता भी भटक रहे अंधियारे मे, रे अधकार म मूक कन ये रहे ड्व, प्रो । तू । जिस पर तेरी प्रज्ज्वलित अमरता दिवस सदृश है फैल रही, तू है जसे हो किसी दास पर कोई प्रभु, वह सत्ता है जिसको न बुझाया जा सकता, ओ रे लघु शिशु । तरे अस्तित्वमान मे ही वह स्वग-जात स्वात य लीन उसके गौरव से ही प्रखण्ड है शक्ति व्याप्त तुझमे अथोर, एक सौ पाठ ] ।

तू क्यो इतनी सच्चाई से दुस पाकर भी जाग्रत करता उन वर्षो को जो ले पाते हैं भार जिन्हे ढोना ही पडता है निश्चय । ? तू अपने ही वरदानो से अनजान बना क्यो रहा जूझ रे शीघ्र सकल पार्थिव बधन "तेरी आत्मा को ढक लेंगे, श्री' परम्परा प्राचार सकल तुम पर छायेगे बन कर भारी एक बोझ, भारिल तुपार से अधिक गहन गहरे स्वयमपि इस जीवन जैसे तुझको वे लेंगे दबोच । श्रो हप । हमारे अगारो में भी कोई जीवित बन कर ही रहता है है प्रकृति अभी भी कर लेती रे स्मरण पाप उसका जो चपल पलायन करके छिपता है । अपने अतीत के वर्षों की स्मृतियां मुझ मे पालती एक - कल्याण निरतर, अविरल प्राशीर्वाद एक वह पुण्यरूप, निश्चय ही वह है स्तुत्यरूप मानद और स्वातम्य, यही हैं शैशव के अति सरल धम हो व्यस्ति या कि विशाम यही है एक रूप, उर में नव पख फडफडाते खगभावक सी आशा करती किलोल [ एक सौनो

पर में इसके हित नही कर रहा स्तुति, न
हो रहा हूँ कृतशे,
पर वे हठ पूर्ण प्रश्न जो करते हैं अबाफ
इस वाह्यरूप, चेतना आदि के विपयो पर
अपनी निर्वलताए दिखलाते, औ' वे सब
जो हमसे हैं हो गये लुप्त,
अनजाने विश्वो में विचरण करते
प्राणी की भूलें बार बार,
वे प्रवृत्तियाँ अति उच्चस्तरी
जिन यम्मुस यह मत्र्यप्रकृति अपनी होती
अपराध चकित सी कपमान,
वे प्रथम स्नेह,
वे छायामय-सो मदु स्मतियां,
वे चाहे जो कुछ भी हो, सच,
वे ही है अपने हित अब तक
पालोक स्रोत,
इस सकल दृश्य मे वह ही है प्रभु ज्योति पूण
वह उठा रहो हमको करती है प्रतिपालित,
उसमे ही है सामथ्य कि अपने
इन कोलाहलमय वर्षों को
उस अनत निस्तब्धा मे क्षण भर जैसा
दशित करदे ।
जागे वे सत्य कि जो अक्षर हो अविनश्वर,
उसको प्रशाति, पागल प्रयल,
नर या कुमार,
या वह समस्त जो हप शत्रु,
कोई भी जड से नष्ट नहीं कर सकता औ'
कर कभी नहीं सक्ता विलुप्त
एक सौ दस ]
-

,
प्रतएव, भले ही दूर देश मे हो हम, पर
जब शात पवन, बेला हो निर्मल, उस क्षरण हम,
आत्मा अपनी सकते निहार
वह अमर सिंधु
जो है लाया हमको बाहर,
क्षण भर मे ही हम उस तक जा भी सकते हैं,
औ' सकते हैं अवलोक तौर पर
खेल रहे शिशुषो को भी,
औ' प्रतल गजना करती भीम तरंगो की
ध्वनि वह गभीर सुन सकते हैं जो अरुकमान
होकर अवाक् ।
तो गाग्रो विहगो, गाओ अब
मानद मरा सा एक गीत ।
फिर मृदुल मेमनो को भगने दो चपल खेल,
ज्यो प्रिय मृदग वशी-रव से
उत्फुल्ल प्रारण
।
हम भी भावो मे शब्द बनेंगे
अब तुमसे
तुम जो करते हो मधुर वेणु वादन विभोर
मधुऋतु के सुखमय हर्षों से एकात्म हुए
क्या हुया कि वह पालोक जो कि था कभी दीप्त
छिन गया सदा के लिये लोचनो से मेरे।
यद्यपि अब कुछ भी नही ज्ञात,
सृष्टा ला सकता वह वैभव क्षण
दूर्वा का,
वह शोभनीय गौरव फिर से अब फूलो का,
पर दुख न करूंगा मे कोई,
[ एक सौ ग्यारह

.
जो भी बाकी है उमम में
पाऊंगा अपनी दोष शक्ति
वह प्रादि माता
जो तर थो मो' सदा रहेगी, वही रहे,
मानव पोडा स जो फट
सवेदन से हो हाथ धरें,
पो' मृत्यु मत्यु का देस सके जा पारपार,
वे वप जा कि दाशनिक बुद्धि जागृत करते,
पर बन जाये मेरे सबल ।
औ' हे पवत, हे पहाडियो हे मधुर युज,
यह प्रीति हमारो राडित हो, ऐमा न करो
कोई विचार ।
मैं अपने प्रततम मे करता हूं अनुभव
वह शक्ति तुम्हारी अनुपमेय
केवल वह सुख है टूट गया
मुझमे कि सहज में रहूँ तुम्हारी
छाया मे निद्वन्द्व बना
मानन्दपूर्ण ।
ममर करते जो कहते हैं
वे निझर मुझको लगते हैं
प्यारे प्यारे।
तब जव में चचल पग घर कर
चलता था, वे क्षरण कही अधिक
अव भाते हैं।
अब मो मधु माधव का
नूतन दिन अरुणोदय मुझको
एक सौ चारह ]

प्रति प्रिय है,
र अस्तप्राय रवि को घेरे दिखते है जो बादल नभ में
वे एक नयन से (लेते है
अब भी अपने गभीर रग)
जिसने मानव की मत्यमानता पर रखी है
सतत दृष्टि,
जागी हैं नूतन जाति और
कितने नूतन भुज विजय प्राप्त ,
मानव के मन तू धन्य कि तेरे ही बल पर
हम रहते हैं।
तेरी कोमलता ममता भी हैं धन्य
घय तेरे सुख भी, तेरे भय भी,
मुझको तो रे वह अति निकृष्टतम कुसुम जो कि
खिलता भू पर
देता है ऐसे गहन भाव
प्रासू जिस तक हैं पहुँच नहीं सकते परवश,
मैं हो जाता हूँ मग्न किसी प्रतलात वीच ।
[ एक सौ तेरह

१७
उपसहार
सहृदयता
प्रो' समनस्कता
का करता सबमे प्रचार
सब के मन का विद्वेष हटा,
जिस भांति गाय अपने बछडे को करे प्यार
उस भाति आप सब करें एक दूजे से
पुलकित हो दुलार।
हो पुत्र पिता के व्रत पालन तत्पर ही
माता को प्राज्ञा का रखता हो शिरोधाय,
पत्नी अपने पति से बोले
मीठी वाणो अति शातियुक्त
भाई भाई मे हो न परस्पर तनिक द्वेष,
हो बहिन बहिन के प्रति न तनिक ई वाली,
सब बनें एकमत,
एक सौ चौदह ]

सबका ही हो व्रत समान,
सव मृदुल भद्र वाणी बोलें
मिल कर सहास ।
जिस मधुर प्रेम के कारण वे
होते न देव हैं अलग अलग,
प्रापस में करते नही द्वेष,
में वही ज्ञान स्थापित करता हूँ लो देखो
गेह मे तुम्हारे, प्रो सारे
पुरुषो मे होवे मेलमाव।
सब करो श्रेष्ठता प्राप्त
हृदय से मिलकर सबही रहो साथ्
होओ न विलग
रख एक दूसरे को प्रसन्न ।
सब एक साथ
मिल कर के भारी बोझे को
ले चलो खीच ।
मृदु सम्भापरण कर चलो परस्पर,
औ' अपने अनुरक्त जनो से
मिले रहो।
जल और अन्न की सामग्री होवे समान,
में सबको बन्धन एक,
एक से ही करता हूँ युक्त साथ ।
जिस भांति अरे हर ओर लगे रहते हैं
रथ के नाभि देश मे, गति भरते,
वैसे ही सब मिल करो अग्नि की परिचर्या ।
[ एक सौ पन्द्रह

में मम गति वाले सबको ही
अव बना रहा हूँ समनस्क,
जिससे सब पारस्परिक प्रेम से एक भाव हो
एक अग्रणी का
अनुसरण करे समान ।
जिस भाति देव अमृत की रक्षा
करते हैं मिल एक चित्त,
उस भौति आपकी सांझ भोर
हो श्रेष्ठ समिति रे मोतियुक्त।
(सज्ञानसक्त अथववेद, पपलाद शाखा ५/१६)
मनुष्य को यह स्नेह कामना ही शाश्वत बन्धुत्व
का मूल है । यही सबसे बडा आशीर्वाद है। इसी
को हम दुहराते रहे, तो हमारे जीवन में भी एक
नया प्रभात अवश्य होगा।
एक सी सोलह]

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Poorna Kalas

Author
Dr. Rangeya Raghav
Title
Poorna Kalas
File name
Poorna Kalas
Text
OCR done
Citation
1961
Published
2011/03
Publisher
Rajasthan Sahitya Akadmi Udaipur
Language
Sanskrit
Pages
132
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Poetry
DLI number
551502
Barcode
4990010032236.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
FU5Dl9sLef4
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