Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Vivied Ratn Satwan Sanghra-11

Bhansali,gobindram · 2011/08

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सूचि पेज २ २ ६ ६ मी पार्श्वनाथ प्रभृ का स्तवन श्री शान्तिनाथ प्रभू का स्तवन सीख गीत (यहनोइ सा प्यारा लागे) गीत (मांजोया धोया थाल) गीत (ध्यावो जी ध्यावो महावीर) गीत (सुनो हमारी बात) गीत (तोरण आयोयनो) गीत (बोल्योरे बोल्यो) बधायो पंखी श्री (मरणो जाणणो) मो (पुरूपों मत करना अभिमान) श्री भरत महाराज का स्तवन श्री दसारण भद्र राजा का स्तवन श्री सीतलनाथजी का स्तवन श्री कोतिध्वज राजर्षि की दाल स्रो पावकरी सज्झाय श्री सातवारों का स्तवन उपदेशी फटको श्री उपदेशो फटको दूजो श्री चोवीस जिनवर का स्तवन श्री ऋषभ जिन स्तवन श्री चोवीस जिनपर फी स्तुति श्री वीस विहरमान की लावणी श्री सोले स्वप्ना की लावणी १६ २६ ४० का पंज १३ नाम श्री विजया सेठ विलिया सेठानी का सबन श्री रहनेम जी की सजाय श्री महावीर स्वामी को पारणो श्री एपदेशी स्तवन श्रीपारसनाथ जी का स्तवन भी चिन्तामणि पार्श्वनाथ खोत्रम् खाघरा शार्दुल विमोडीत मालिनी मो उपसमगहर घोत्र भी घंटाकरण स्रोत्रम् गायन (जिन धर्म को जाना नहीं) प्रेम भजन ५६ टाखो प्रणाम गायन ( योहन पायनोरे) गायन (मनया मोह नींद को त्याग) गायन (समय फे फेर से) गायम (विषय यहा दुबाई) गायन (मुझको रखो) गायन (सुनलो २ घोर अनुशी) गायन (करले २९ चेतन करना) गायन (सक्षा मित्र समार में) गायन (कलयुग पल बायो) गायन (शमा दे रही) गायन (भारत देश में जो कमी २ हो गई नारी) गायन (करले २ रे पेदन। गायन (मानो रोप्यारी यदिनों) गायन (सनदी वजदी प्यारी बहिनों) ७१ હર

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ग
नाम
१०३
१६
महायक भगवान
जिनवाणीका अधार
नियो जागी
কথা
mन (शिक्षा दे रही भी)
गायन ( भारत देश में
गगन (पदनी मान लोग)
गायन (पाली गोल गत गुणकारी)
गागन (गोयरीका)
गायन (पाला यनित्रत )
गायन (गं गुम ध्यान शिक्षा से)
गायन (मी पनियता नार)
गायन (मि पार पदय कुलमत्रो नार)
गायन (धान का कर गहना )
गगन (
मत्री पद गयी बातम)
गायन (या मुनीनी मही)
नयागन
गवन ( पहनी वामगी।
गायन (मामानि वो im)
पवन (ो मुमाल)
गत मंदा मलारोग में)
रन बनम मूलदे)
ra(मा)
११८

છે!”
श्री पार्श्वनाथ प्रभू का रतवन
vi રિપો જાપા, પાવા માંગ છ વિશr
ડો બારી પાપી, રે મ ાંતિ પૂરી
થી ૪ વાર પાક, પુરી sો શશિ !
૪. રાગ તિરાડો, ડી શિર તિજ પિયા !
સુપરવા કાળો, મુજ હા પા પામી છે
ભાષinત હોલી વિ શાળા જાનુ માપ 1
viળી રાગ રે વિપાશે. પુરાણી પિપ પાસે !
જ પાણી (uી તિમ કપા, મારી પણ મામા !
મધ જ, માપન હશે ?
િપ પ ા ા પિતા અને દર પાસે
જ ઉપ પરની મારી, પાળી ખાવાથી
જો પા ઘરે લાવો, વાવ વિશે જાણે છે
નિવાર તt tતેને ગાવે, પાણીની જવા દો
જ પાકા છોત અs. It is પહારી છે
પતિ પદક વિજs માળ, વંત હિ પણ !
પણ જઈ વાત ઘiાળ, આળો છે
ગત તાપી હિમ પાણી,
in 1 વિષ !

शनि Firmalatkarrat Ferry
Emitra:
प्रभु nari.xar, rat hirt KE TAN
ना ERY ar,
mi Emin
minyatfor mami
RRIER, #महाभि: ना
नामा मागुन कर,
तीntfar am
पामा गुनगदन गायनमनगर गयो,
मित राज अपना मी आन को
पर शोदिपली भी में,
संगम करी भी पार करो।
श्रो शान्तिनाथ प्रभू का स्तवन
भी शांति शिनरया শসা বুল আলা ।
हस्तिनापुर पारण।
रियन भाम ॥
नमघर पाणी। अमिला हप रमास ।
सुपा सेज्या पदया। स्थान लिगा दश गार

हिये हर्ष धरीने। गल चाल पता। कर कमला जोडीने । स्वामी चचदे स्वप्ना । फल तेहनो फदिये। जय बोले राजा। बल प्रामाम पुरो। स्वप्नारी माला। एज्येष्ट बदि तेरसने । इन्द्रादिक मिलने। जोयन में आया। जाग्या निण हिज पार ॥ आया नरपति पास ।। स मुख तणी यात ।। राणी लीधा (दीग ) रात ॥ सांभल श्री महाराज ॥ पुत्र होसो प्रधान ॥ फुल मंडन अवतार ॥ राणी निश्चय धार ।। सन्मिया श्री शांति कुमार । जन्म महोच्छव कीधी। परणिया राज कुमार ।। योटी अमृत धार॥ पाम्यां रिद्धि भंडार ॥ चयदे रतन उदार ॥ ओ संसार असार ॥ लेसं संजम भार ।। मृाणी तत्काल॥ कादोनी पात रसाल ॥ वली आगम किम धासी। धारे लाग्य चोरासी॥ ग्राम छिनानु मोड़। राजा सेवा करे कर जोड़। ए दिन रूप रंभा सरखी। • वधाता। खट ग्वंडज नवनिध। एक दिन चिन्तये राजा । सर्व आरम्भ छोड़ीने। सुण रतनां राणी। ए घातां मति काढ़ो। दियड़ा काई ओहो। गज रथ तुरंगा। छनु मोड़ प्यादल। बतीस सहस्र मुकुटधर ।

सुर सोले सान। देवीघर लाख पचास ॥
प्रभाते उठके नित्य।
नित्य प्रणमें तास ॥
वली चोसठ सहन्न ।
चालंनि गजगेल॥
पोले उत्मा राणी। रूपज मोहम येल॥
कण्ठ कोयल बोले।
बैनजसा जाण ॥
निज राजामुखसे।
नेत्र मृगाणी नार ॥
एयी नारिया ने छोड़ो। कहोनी कोन पिचार ।।
विन अपराध्यां तजसो। तो कुण राखणहार॥
राजा नी सेज्या। तड़के तोड्या नेह ॥
एनयो न माने। तिणने दीजे छह ॥
सईयाने छोड़ो। सोभा नहीं इण यात ॥
पिल पिल तो चोले। प्रभुजी कहयो न जात॥
राजा उतर आये। सांभलत पटराणी।
सुख भोग भोगता। पीछे दुरगत सेनाणी॥
माताने बंधययन भाई दास। स्वार्थ रो मेलोजथलगपूरे आस
दीखणा रा यादल।
क्षण में खेरू थासी॥
सजनां रो मेलो। बिछड़ीया किम होसी ।
तिण कारण राणी आदरजो तपसार। चरित्र लेईने शाल्या
आत्म दोप।।
श्री शांति जिनश्वर जाय विराज्या मोक्ष।
श्री शांति जिनेश्वर जाय विराज्या मोक्ष।
॥

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(४) 1 . - + सुर सोले सहन्न। देवीधर लास पचास ॥ प्रभाते उठके नित्य। नित्य प्रणमें ताम॥ बली चोसट सहन । चाटंति गजगेल ॥ पोले उत्मा राणी। रूपज मोहम पेल॥ कण्ठ कोयल पोले। यनज जेसा जाण ॥ निज राजामुखसे। नेत्र मृगाणी नार ॥ एहवी नारिया ने छोड़ो। कहोनी कोन विचार । विन अपराध्यां तजसो। तो फुण राखणहार ॥ राजा नी सेज्या। तड़के तोड़या नेह ॥ ए कहपो न माने। तिणने दीजे छह ।। सईयाने छोड़ो। सोमा नहीं इण पात॥ बिल पिल तो बोले। प्रभुजी कहयो न जात ॥ राजा उतर आये। सांभल त पटराणी॥ सुख भोग भोगता। पीछे दुरगत सेनाणी॥ भाताने यंधव वनभाई दासा स्वार्थ रो मेलोजय लगपुरे आस दीखणा रा यादल। क्षण में खेरू यासी॥ सजनां रो मेलो। विड़ीया क्रिम होसी । निण कारण राणी आदरजो तपसार। चरित्र लेईने टाल्या आत्म दोप॥ श्री शांति जिनेश्वर जाय विराज्या मोक्ष । श्री शांति जिनेश्वर जाय विराज्या मोक्ष ॥

"सीख"
तर्ग:जायो जावो ए मेरे साधु रहो गुरु के संग"
जावो जावो ऐ प्यारी बेटी रहो खुसी के साथ ॥ हिंग
चौदह वर्ष तक घर आंगन में खेली धूम मचाई।
आज लाड़ली एक पलक में तूं हो गई पराई ॥
सभी तरह की सही मुसीयत पाली और पढ़ाई।
दूर हृदय से होती है तूं आज हृदय की जाई
लड़ी महली जिद भी करती यहां तो खट गई मैना ।
वह है देश विराना वहां पर चतुराई से रहना !!
आज विदा करने में तुमको हृदय फटा जाता है
मत रोवो ए वेटी जग का ऐमा ही नाना है
सासु सुमर और पनि देव की सेवा बृय बजार
ननद देरानी जेठानी से झगड़ा नहीं मकान
गृह लक्ष्मी गृह चन्द्रिका यन प्रकार -
केवल 'मुनि' धर्म जिनवर को
भूल
+
'गीत
तज :-~सरीता को भूल
आये
यहनोई सा माहे प्यारा ला
नाम आपका
मान तान के परम दुला
.

औसर मोसर च्याह शादिमें मतना खर्च करीजो 10 रंडी बोड़ कभी न जाजो येश्या मनी मचाजो। नाटक जया सिनेमा छोड़ी वीर ने ध्याजो॥३॥ खेती करजो गोपाल जी दूध छजोरा रो पीजो। माँस मदिरा छोड़ यहनोई सा नीति धर्म चिन घरजो ॥४॥ धर्म पालनो पायक पनजो जीवन सफल बनाजो। परमार्थ के खातिर अपना जीयन पली चढ़ाजो ॥५॥ (प्रकाशचन्द जैन, देशनोक) 'गीत' तज:-मांजीया धोया थाल परोसिया भात जी... घोया धोया पाल परोसिया भात जी टे। आयो आयो ज्ञानी रामजी, मट पट घालो हाथ जी। यांप थारी खरो सुधारक पतियता माताजी ॥१॥ पदिया लिपीया विद्वान हो थे लायक थांकी साथ जी। उत्तम इल में जन्म लियो ऊँची थांकी जातजी चैन यांकी सुलक्ष्मी और ज्ञानी यांका माता जी। आण कर कर काम गमें अभी लीजोम्पात जी ॥३॥ पास रियाद सुदेश माधणो पहुंचाई पात जी। पूराने ध्यादामु जगमें धणा कुंवारा प्रान जी ॥४॥ मोमर की जीमन मायन मुंयुद्धि मय घट जाती जी। गंगाके पाम जगमें अपना दम मगाय जी १५१ (संसाराम दोरापन देशनोक)

गीत
तज:-आवोरी आवो धन श्याम'
ध्याघोजी ध्यावो महावीर हो यहनोईसा प्यारे ॥टेर।।
सोदो फाटको थे सप छोड़ो,
प्यारे गुरु से प्रीति जोड़ो,
पीयो जी पीयो ज्ञान भंग हो यहनोई ॥१॥
सिगरेट पीनी है दुःख कारी,
जारा ओगन तो है जारी,
छोडोजो छोड़ो सिगरेट .."हो पहनोई ॥२॥
चोपट रमणी नहीं सुहावे,
फालतु टाईम आतो गमावे,
छोड़ो वोपट ने अरू तास ''हो पहनोई ॥३॥
खोटी संगत छोड़ो पहनोई सा,
संतो की सेवा करजो यहनोई सा,
हो जासी जल्दी चेड़ा पार हो पहनोई ॥४॥
गीत
राज:-पंछी वावरिया"
सुनों हमारी बात थे प्यारा
बहनोई सा।
तजो फूट अभिमान धे प्यारा पहनोई सा ॥टेर।
सुन्दर सुरत मोहन प्यारी मुख चन्द्र की शोभा निराली।
देखत ननन धापे थे प्यारा पहनाई सा ॥१॥

मात तात के पिनयी पुरे भ्रात यहिन के हो यपीरे। पहिम गले के हार, घे प्यारा पहनोई सा ॥२॥ युसंगत से पचते रहना, भले जनों की संगत करना। यही कुलीन आधार घे प्यारा पहनोई सा ॥३॥ परनारी और वेश्या त्यागो, झूठ कपट से दूर भागो। करो सरल व्यवहार ये प्यारा यहनोई सा ॥४॥ पहिन हमारी एक लाख की, मान पड़ोये आप राज की। सया लाल का आप ये प्यारा पहनोई सा ॥ चन्द्र चाँदनी जोड़ी मिली है, प्रेम प्यार को क्यारी खिली है। मिलकर करो सुधार के प्यारा पहनोई सा ॥६॥ चार भुजा का ब्रह्मा होता, दुनियों को जो पावन करता। आप उन्ही के लाल धे प्यारा यहनोई सा ॥७॥ पहिन हमारी अति ही प्यारी, पीचर छोड़ी हुई नुम रखजो इसका मान धे प्यारा पहनोई सामा लारी। गीत तोरण आयो वना धर धर कोपे राज । नोरण आयो धनो सामु जो ग प्यारो गज । मायड़ को जायो धनी भुवा गोद बिलायो राज । मुख वतीसी ग्विल रही चमके उनीयारी राज । विद्या को पंड़ित बना गुरु कुल को ब्रमचारी राज । उमो अमराव यन सर छोडेरी अमयारी राज ।

।
गीत
तन:-बोल्यो रे बोल्यो गालियांरी खातिर बोल्यो..
पोल्यो रे बोल्यो गीतां री खातिर योल्यो,
ज्ञानवाली रा छेल, फूटरो घोल्यो ।
विद्यावाली रा समय देखने योल्यो,
अवसर वाली रा, हाँ रे हाँ,
म्हारे देश री सेवक है शुभ गीत सनाम हूँ ।
(तोलाराम हीरावत, देशनोक)
वधावो
तर्ज: केशरीयालाल कोयल बोले.
मंगल गीतों रो आज गावो वधाचो।
गावो गावोधाया सारी पोल रंग रसियाराज ॥टे गावो...
पहले वधावो राज विद्यारो आयो।
आयो आयो गुरुसा री द्वार, गुण रसियाराज ॥१॥ गायो
दूजो यधावो राज ज्ञान रो आयो ।
आयो २ ज्ञानजी रे द्वार रंग रसिया राज || गायो
तीजो बघावो राजा धर्म रो आयो।
आयो आयो साधुजी रे द्वार, रङ्ग रसिया राज॥३॥ गायो..
चोधो बधावो राज विनय रो आयो ।
आयो २ सुसराजी रे द्वार, सुख रसिया राज ॥४॥ गावो"
पञ्चम यधावो राज धीरज रो आयो ।
आयो २ ज्ञान भण्डार श्री नाथराज, गावो यचावो ॥५॥

(१४) । : ॥श्री दसारण भदराजा का स्तवन । पधारिया वीरजी नंद भारी, दसारण नगरी के धारी। मुनीश्यर यदा सहस धारी, आरज्यां छतीस हजार दोहा :-~-तमोय सरण देवां रच्यो, सोहे श्री जिनराज इन्द्रा इन्द्राणी सेवा करता पाये हरप अगाज ॥ वीर जी ने यन्दन कुंआया दसारण भद्र पड़े राया। वीर जी ने कि धीर जी आप उतरया वागे खवर राजन्द्र भणी लागे जावणो दरसके काने । फर' सजाई यहु धाजे ॥ दोहा :-हाथी घोड़ा रथ पालम्बी पायदल के परवार भाई बेटा अपरार अँतेयर सपको लीनां लार । वीर जी ने ॥१॥ पाठारा सहस गजराजे युहला ला चावीस गा. इक थीम महम रथ जोती पालावी एक सहस सोती दोहा :-गल घुमें गुहला से रथ नणे झणकार । पापदल मरमुन आगे हैई करता जय जय कार वीर जी ने ॥ पाय में अनयर लार मो यनाकर कर सिण गार । परीया रतन जड़ा गहेगा याजना याजीन्ना पण दोहा:~पर एम होना अभी चाल्या महयनार । देष आरम्पर भाको राय गरम्पो मन मुझार धीर जीने ॥३ ।

स्वर्गसु इन्द्र , जो आया, वेठा श्री जीनयर के पाया। ज्ञान सुं वात सर्व जानी। दसारण भद्र बड़ो मानी ।। दोहा :-मान उतारण फारने इन्द्र दियो आदेश । ऐरावत ऐसी करे ईको मान गले विशेष । वीर जी ने ॥४॥ चौऊँस: सहस गज छाजे गगन में जमाही गाजे । एका एक वरण चजो आयो सुणता अचरज जो पायो॥ दोहा :--एक एकके मुख पांच से, मुख मुख के आठ दन्त । दन्त दन्त आठ पावड़ी में आठ कमल में हँत । वीर जी ने ॥५॥ फाकड़ी लाख जी के। नाटक वतीस यतीस दोखे । इन्द्र को इन्द्रासन सोहे, करण का ऊपर मनमोहे ॥ दोहा :-जणीपर इन्द्र वीराजीया लारे सब परिपार । दसारण भद्र नरीन्द्र देखने गरम गयो तत कार । वीर जी ने ॥६॥ विचारे नृप मनके मांहीं घड़ाई किस विध रहे भाई। इन्द्र से जीत सकू नाही करू उपाय कठाताई ॥ दोहा : -अवसर ने संजम लियो दसारण भद्र नरीन्द्र। तुरत आप उतावला पग लागा शकेन्द्र। वीर जी ने ॥७॥ मुनीसु करजोड़ी बोले, नहीं कोई आपतणे तोले। और तो शक्ती घणी म्हारी ऐसी नहीं एकण लगारी॥

श्री
Tril मत करना अनिमान,
पनि निमरत जायगा प्राण
वग की गति देगी जितको दी।
रापा का माहा,
formा गई दगमंडी ॥१॥ पुग्यो ।
गात amr को कंगने माग,
भया मशुग में।
अशा याम न गया
न मिला मन में 11 • Eat |
सापर कर देगी
पा महागीर
मीनामा "
या
।
"पनामा "
.
" श्री मान माननवन ॥
.Am
1
.
......"

डाख सतोतर पुरवताई कुंवर पदे महाराज । पर लाख पुरव राज पदवी भोग विया श्री काज । मुगत॥२॥ माठ सहेस वरसां लगताई दिग चीजे अधिकार । अष्ट भगत त्रिदेश अराधी यस कीना सुर भोपाल। मुगत ॥३॥ रतन चतुरदस नवनिध नायक राण्या चौसठ हजार । महल वीयालीस भोमी यासरे नाटक नांझणकार । मुगता दोय सहस देवता किया सरे तन तणां रखवाल । लाख-चौरासी रथ हय गय वरपायक छन्, कोड झंजार । मुगत ॥१॥ आरीसा का भवन में सर आयो ऊजवल ध्यान । अनीत भावना भावतां सरे पाया केवल ज्ञान । मुगत ॥६॥ संजम लेय पधारिया सरे भरी सभाके मांय । दस सहस समझाया नृपति ज्ञान पंध दीखलाय । मुगत ॥७॥ तीजा अङ्गके मायने सरे चऊ ठाणे अधिकार । जगी ऊगीने जगीया सरं पुन्य तणा फलसार । मुगत ॥८॥ भरत बँडना चमावर्त पहेला भरतेश्वर जी नाम । ऐमा धनी को ध्यान जो धरता पावे सुख्न आराम । मुगत ।।६।। लाख पुरव लग पालियो सरे केवल पद अणगार । अणसण कर अष्टा पद ऊपर पहुंचा भवजल पार। मुगत॥१०॥ जगणी सो पैतालीस यरसे रतन पुरी चौमास । हीरालाल फहै पुज प्रसादे पुरो मनकी आस । मुगत ॥११॥ -

'पंखों
राज''उरार दक्षिण मुं पंची आई कर पंजीरो मोल
र आ पंजी म्हारी,
उत्तर दक्षिण गुं धरि मेरे आगा
पा मुंम्हारे सम्पन्धरे थे मगी म्हारा ॥टेर
मार रहार घर से चोगो, पनीयो रहे सम्पन्ध रे,
थेमगी महारा।
कापोशानन कदे न टूटे, दृद न मागो नहरे,
थेमगीदांगा
म्हंयां आ धम्हार प्रानो करजो मीठी यानर,
मगी महारा।
मम्म पुग्यों में ये पार पात्र, गमो काजी करजरे,
मगीहाँग।
माम माटानी की। rita माता आपरे,
is not anni
भा: CA निवाय.
यमगीगा
हया न गंदा गीत
मगी महांग।
निr भार,
मगी महारा।

आंपा मिलने ज्ञान बढ़ावां, करां सत्य प्रचार रे,
धे सगी म्हारा।
(तोलाराम हीरावत)
श्री
या मनखा मोटी पात मरणो जाणणो
मरणो मरणो सारा केवे मरे सभी नरनारी रे।
मरवापेटी जो मरजावे तो बलिहारी रे ॥१॥
जीवा सु सगलो जगराजीमरणो मन नहीं भावेरे।
राजा रंक सरीखो सप रे तो पण आवे रे ॥२॥
दूजा भूप डरप मलेठारी कीधी तावे दारी।
वीर प्रातप जाण ने मरणो टेक न टाली रे ॥३॥
गुरु गोविंद रो पामणा भूत्यो बालक दो चीणाया रे ।
भामा साह धणीयोने धन दे जाता लाया रे ॥४॥
मरवाने वन वीर वीसरीयो धाय याद करलीधोरं ।
धोरे चूखो यारे साटे जायो जाती की धोरे ॥५॥
मरवा जो जाणे वीस पाप करम नहीं होवे रे ।
सुख दुखरी परवा नहीं राखे प्रभु ने सेवे रे ॥६॥
मरने जप रामने देणो या जीरे मनमें लागी रे ।
चतुर चरण पाणरे लागे वो पड़ भागी रे ॥७॥

,
दोहा:-न धन हे आपने राख्यो मान अण्ड,
पार चार गुण गायता गर गया गगन के मंह।
धीर जी ने
गुनी मंगम गो पाली मारिया गुगत सुझारी ।
मीदाई जना मणीकरी, आतमा अलट हुई जेरी ॥
दोहा :-गाइयां प्रमाद से, सुगाजो भयियन लोग।
जी करणी मांगी करे, तो मिटकर्म का रोग।
पीर जी ने
ममन जगणी ग गाद तनीस मन मोहे।
आगाज गुर पामी गुण पाया।
महागलाद गाया।
-~दमदानी मापन ग मायाहर।
मनापामा १५ मन की टा।
॥ श्रीमान र नवजी काम्नयन ।
11. गली में ।
.
.
qil fair
नकी
म
जिन
मनोका
गमा

जिनन्द जी काज समों कीजे। नाथ जी। मैं द्वारा। हाजर रदसु पन्दगी करसं फिर किम नहीं रीझे ॥जि नन्दजी।। दिल उदार कृतार के लायो। विनती मांनीजे । विनती मानीजे ॥ जिनन्द जी नाथ जी। मैं द्वार ॥३॥ मेघ सघन घन वरसत समजन आशा तृपतीजे जिनन्दजी। औरांरे पास जाचना करता। यात न सोहीले जिनन्दजी|| नाथ जी। में करणा सागर करुणानी वाजत, हुक्म कराइजे ॥जिनन्दजी। मगन कहे प्रभु याप गल्ता की। ओड़नी भाई जे ॥ ओड़नी भाई जे । जी नन्दजी । नाथ जी । मैं द्वार ॥५॥ द्वार ॥४॥ ॥ श्री कीर्तिध्वज राजर्षि की ढाल ॥ ॥ दोहा ।। श्री श्री आदि जिनेश्वर. पंश चलावणा भूप । कुल दीपक प्रभु कुल विपे, भर्तन वड़ा अनप ॥१॥ इक्षाकु वंश में अपना, भूपति केह असंख्य । कीर्तिध्वज की वीरता, सुणजो चित्त निशङ्क ॥२।

॥ रस महेली-॥
श्री आदि जिनेश्वर कियो पारणा ॥ पदेशी ।।
अनी त पाणीवा गरं कीसिंगन को पाट।
आर निगम्या मानायी कर्म की गांड
सीलिप नाभा गुनीश्या गोर का
गजा ग का कीति, मनमें :
गार मंमार नागनकी लगी

जिम वर्ष तिम चेतन जबल, कर्मनाह तिण लार ।
भव माहि देवे वेदना, घिश पिझ यो संसार हो
की० ॥
मन्त्रीरवर बुलायने सरे, राज भण्डार संभलाय ।
तिलक कियो श्री कुवर ने भरे, राणी दीवी समभाय हो
की ll
अयोध्या नगरी तणो सरे, छोड़ दियो राज ।
कीर्तिध्वज राजा चल्या सरे, करवा आसन काज हो
की ० ॥१०॥
कमल प्रभा राणी तजी सरे, सो कौशल्य तो पूत । .
आप हुआ मुनीरवर मोटका सरे, किया मुक्तिका सुन हो
की० ॥१२॥
संयम लिप्यो भावसुं सरे फीनो उन विहार ।
तपस्या मांढी आफरी सरे, मुनीश्वर गुण भण्डार हो
की० ॥१२॥
ज्ञान भणी
फने सरे, हुआ पूर्व का धार ।
आज्ञा मांगी एकटा सरे. फरे देश में पिहार हो
की.
10 ॥१६॥
दिन किता एक आंतर सर, आया उपा ही शहर ।
मास खमनको पारणो सरे, नो चरियां की बेर हो
की० ॥१४॥
मंझार।
राणी झरोखे झाकती सरे, बैठी महल
मुनिवर आंवता सरे, पूर्व पात चितार हो
झी० ॥१५॥

।। रस सहेलड़ी-॥ श्री आदि जिनेश्वर कियो पारणो । एदेशी पृथ्यो भूपत पापीया मरे कीर्तिघ्यज को पाट । आर मयंम से निमरया मरे, तोड़ी कम की गांठ हो । भीतिध्वज राजा हुआ मुनीश्वर मोट का टेर।। राजा गज कर कीर्तिध्यम, मन में बसे यंराग । मार मंमार नहीं की गजकी लगी मंजम की स्लाग कीतिघ्यज . मंग्रीग्या मममा निकादिन, यिना टुआ मन्नान । गजराट मि नम लिनका घर जिनका शमशान की० ॥३॥ तुम पगमंना या गोवाम अजाग । हम मान ली नागविगा मुग्न माग हो की ॥४॥ 2.2011 TUTHI 177 मंद नगर कोई भेद की ॥५॥ .ना. न मन PER गे मन हो की ॥३॥ गगन नास्ति। रकमकीत हो की. ॥il जिम सूर्य तिम चेतन जज्ज्वल, कर्म-राह तिण लार । भव माहि देवे वेदना, धिक धिक यो संसार हो की० ॥ मन्त्रीश्वर बुलायने सरे, राज भण्डार संभलाय । तिला कियो श्री कुवर ने सरे, राणी दीवी समझाय हो की. हा अयोध्या नगरी तणो सरे, छोड़ दियो राज । कीर्तिध्वज राजा चल्या सरे, करवा आसन काल हो की० ॥१०॥ कमल प्रभा राणी तजी सरे, सो कौशल्य सो पृत । . आप हुआ मुनीश्वर मोटका सरे. किया मुक्तिका सुन हो की० ॥११॥ संथम लिष्यो भावसुं सरे फीनो उम्र पिहार । तपस्या मांडी आफरी सरे, मुनीश्वर गुण भण्डार हो की. 10 ॥१॥ फने सरे, हुआ पुर्व का धार । आज्ञा मांगी एकला सरे. फर देश में विहार हो की. 10 ॥१॥ दिन किना एक आंतरं सरे, आया उण हीज शहर । मास खमनको पारणो सरे, गों चरियां की वेर हो की० ॥१४|| राणी झरोखे झाकती सर, बैठी महल मंझार । मुनिवर आंवता सरे, पूर्व पात चितार हो की to ॥१५॥ झान भणी -- (२०) , आगे मासु आविया सरे, ले गया मुझ भरतार । यो भरतार साधु यण आपो मरे, पुत्र ले जासी लार की. ०॥१६॥ आप गयो पहिला यन योगी, लेखन आयो पत । जो पर ले जावमी मरे, किसो रहे घरसुनहो की ॥२७॥ दिगो गर, गो नहीं आये शहर में मरे, महजे ही टल जाय । भायर पड़े नहीं राज कुंयग्ने मरे, आया नहीं आप ! की॥१८॥ ने कम ये माधु अणगार। जाया ने दीनी मा मन हा दादर मंभार की १६॥ दुम्मश्रा गीजी कंग हयादाप गार। दो भाई मा मनि का, नागा RINE 10 ||२00 कार यापन मान समानता। गजानना वयानी । 1. मन प्रार दामी नरहने मनिना आया । मिना भारत 17 नागा नयर ram प्रगत राम वंदना... 'टा मनिक नामा

(२१)
हाद जोड़ के कंधर फहे सरे, क्षमा करो मुनिराज ।
i मने खबर नहीं इस बात की सरे, माताकी यो अकाज हो
की० ॥२४॥
जन्म जराने मरणा मीटाया, दे मुनिवर उपदेश ।
वाणी सुन वैरागीया सरे, पेरयो साधुको भेप हो
की० ॥२॥
दो कर जोड़ी कहे कंबर जी, सांभल जो मुनिराय ।
इन संसार में राग कैप की, लांग रही ते लाय हो
.
की० ॥२६॥
यो संसार समन्द्र भारी, तारो थे मुनिराज ।
। दीक्षा ले गुरु के पग लाग्या, तरण तारण जहाज हो
की० ॥२७॥
खवर हुई राणी भणी सरे, पुत्र लीनो संयम भार ।
मोह कर्म की धाकज आई, उठी तनमें झाल हो
की० ॥२८॥
पति गयो पहिला मने छोड़ी, पुत्र गयो छ आज ।
धिक धिक मुझ पापणी सरे, मोटो हुयो अकाज हो
की० ॥६॥
इम विचार करती राणी महल सेती छिटकी ।
आरत ध्यान के वशमें होकर, कर्म दुर्गति में पटकी हो
।
की० ॥३०॥
हुई यन राजा धर राणी, सिंहणी नाम धरावे ।
फिर हुई यनमें रहे रंगमें, जीव मारने खावे हो
की० ॥३१॥

आगे माधु आयिया मरे, ले गया मुझ भरतार । यो भरतार माधु पण आयो मरे, पुत्र से जासी लार की.॥१॥ आय गयो पहिमा पन योगी, लेवन आपो पूत । पून ले जावमी मरे, किमो रहे घरसुतहो की० ॥१७॥ गो नहीं आये शहर में मरे, महजे ही टल जाय । मयर पहें नहीं गज कंवग्ने मो, आगाके नहीं आप की ॥१८॥ हलकाग ने एरम विगो मां, ये माधु अणगार । जायो ने गोदाजी मा मनहर मंभार की ॥१६॥ मागणी गारदार गार । यादगा माहो ही ॥२०॥ 'T' ना। गजाननाय .. 17 , मारहा नाना पानी आगा। 11यायाही का गित लाम। व मुनिक गाम हो की 10 (२१) - हाह जोड़ के कंवर कहे सरे, क्षमा करो मुनिराज । | मने खबर नहीं इस बात की सरे, माताकी यो अकाज हो की० ॥२४॥ जन्म जराने मरणा मीटाया, दे मुनिवर उपदेश । चाणी सुन वैरागीया सरे, पेरयो साधुको भेप हो की० ॥२५॥ दो कर जोड़ी कहे कंवर जी, सांभल जो मुनिराय । । इन संसार में राग कैप की, लोग रही ते लाय हो की० ॥२६॥ यो संसार समन्द्र भारी, तारो थे मुनिराज । । दीक्षा ले गुरु के पग लाग्या, तरण तारण जहाज हो की० ॥७॥ खवर हुई राणी भणी सरे. पुत्र लीनो संयम भार । मोह कर्म की धाकज आई, उटी तनमें झाल हो की० ॥२॥ पति गयो पहिला मने छोड़ी, पुत्र गयो है आज । धिक धिक मुझ पापणी सरे, मोटो हुयो अकाज हो की । इम विचार करती राणी महल सेती रिटकी। आरत ध्यान के वशमें होकर, कर्म दुर्गति में पटकी 21 की० ॥३० हुई पन राजा धर राणी, सिंहणी नाम धरावे । फिर हुई यनमें रहे रंगम, जीव मारने खावे हो की:

अब मुनियर की सुनो चारता, वे गुरु चेला दोही। गंयम पाल दोपग टाले, ज्ञान गुनाकर मोही हो की० ॥३॥ भ्रमंडल में विहार करता, करता जान अभ्यास। मित्रकोट गह उपरं मरे, आप कियो पौमाम हो की० ॥३४॥ माम पामण पारणे मरे, गोरिया मिधाय । मीना प्रहरके पालन मां, मुनियर मारग जाय हो की ॥४॥ हंगा पर जानां धां मा. गाधी की गाल । माली पाता आगा माती मनि ममता में लाल । की ॥३॥ गायनमा नर या गल। मट जार मात्र नामिका आहार हो सी 4 रात्री... सनगम, पान। उसमा दाग :7." in हो की 90 मन माग । मानहावार हो गुन । '..

दुधार कारी। कहे चेला जी सुणों गुरुजी . एक करू' अरदास । सारं कारज आप देखता करू कर्म को नाश हो । गुरुजी महारा आज्ञा देवो तो आगे चलांसु । टे॥३ दो म्हाँने खरची अमरापद की, जन्म जन्म सुख पा ॥ सुख सासता सिद्ध पुरी का, गरभावास नहीं आऊँ हो ॥ गुरु॥४०॥ तुं वालक नानहियो म्हारो, कोमल काया धारी। यो परी सोह घणो दोहिलो, मान कहण तु म्हारी रे ॥ सुन ॥११॥ दुकर दुधार घणोज दुधर, तेमा मने सनदे मान लेस तु घणो परिसह भारी रे "सुन ॥४॥ या वेला छे दोहिली सरे, रहणो ध्यान अडोल । संयम पालो सुख में रहो सरे, मानो हमारो पोलरे ।। सुन |॥८॥ थे गुरु दाता ज्ञान का सरे, तरण तारण जहाज । म्हारे यंठां आप दुख पावो घनी आये मुझ लाज हो ।। गुरु ॥४४॥ हाय जोड़ने कहे कुंवरजी में सो राजपून हो । जन्म लियो घर आप के सरे, सिहनी जायो पूत हो ॥ गुरु ॥४॥ भांत भांन करने समझायो, चेलो नमानी एक । सूर क्षत्री रण में चहे सरं पार दर्प विशेप हो - 1HNE

(२४)
आलोट मिदी निशल्य पहने, अणमण कीयो सार ।
माया पियनी मामे मुनीश्यर, गुग देख चार धार हो
।। गुरु ॥४७॥
उठी पानी मारी थापकी, कोमल काया हारी।
नाम शाल नहीं पानगो मुनीरयर, ममता चित विचारी
॥ गुरु ॥४॥
मार पाटन बायण स्वामी कारबाह मियो शरीर ।
नमा भाली जय लागी दुटया,
स्टोही पई जिम नीर
॥ गुम ॥२६॥
A. अं! ! पान जपायो।
पनि म । 14 न, मान पानी हो
गम् ॥१०॥
miRana
मानाचा
+ । मनि में वाम
। गुरु ॥
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की ॥५॥

कहे मुनीश्वर सुणे वाघणी धिम थारो जम्मार । पुत्र विणास्यो आज आपणो, सो कौशल्य कँवार हो ॥५॥ धिक्क २ घणा हो जो, पुत्रर मार्यो थे पापणी पटेर॥ जिनके कारण महला सेती, पड़के कीधो काल । उन्हीं पुत्र को हाथ से मारी, करवा लागी अहार हो धिक्क ॥५६॥ सुणी वचन मुनीश्वर केरा, घट में पड़ियो भर्म । वली विचार कियो मन माही, कोण घोले इम मर्म हो धिक्क ॥७॥ इहाथी वलि अंत समय में, करता तिणावार । जातिस्मरण ज्ञान उपनो, जाप्यो सकल विचार हो धिक्क ॥५॥ कीर्तिध्वज राजा था म्हारा, सो कौशल्य धो पृत। मैं राणी हुंनी राजा की, कमल प्रभा मंयुक्त हो धिक्क रह मने छोड़ने संयम लीधो, दुःख में पाई भारी । पुत्र वियोगे मरणो मांधी, कीनो जान खवारी हो धिक्क 1800 छिटफ महल से पड़ो मैं हेठे, कर्म तणी गल भारी। तिहां धी मई यहां उपनी, सिंह तणे घर नारी हो धिक्क ॥६॥ घोही पुत्तर पाने पड़ियो, ते मै मार्यो आज । धिक्क २ मैं पापणी सरे, मोटो कियो अकाज रो - .

इणी पापमुं केम गुदमुं. जन्म के नाय । पुन हत्या में करी हायसे, ला यग मुनिगय हो शिक्का अब जीवणो युक्त नहीं मरे, अमन करनो मार । पाप आलोपाला सरे. जिम उनम् भवपार हो धिक्क । आत्म ने धिकारज देती, गई पन के मांय । चढ़ता भाव धरी ने सिंहणी, दिया मंधारों टाय हो धिक्क ॥२५॥ दिन किता एक में मीज्या मंधारो, काल ममे करीब हुई देवता स्वर्ग आटमें, देव लोक महामार हो धिक्क all कोतिध्वज गजा 1 पासे, आन्नः न सुनारी । चला जाणा पे उगने जन मामाला हो को० ॥ अन्न समय अगमा आगो पाया केरल जान अष्ट कर्म को अन्न करीने. दुवा मिटु भगवान हो की ॥१८॥ म अनंक हुआ मुनावर. ए. ची अधिमा । कष्ट पड़यां कायम रहने दिया मुक्त. में का हो सी०॥६६॥ गज मुकमाल दुआ मुना घर, बरी गोश पर आग । मामल र कोप न कीयो मुक्त नरा महाभाग हो की ७०॥

पील्या शिष्य पांचसो मुनिका खंधक खाल उतारी।
औरही घना हुआ मुनीश्वर कहुं कहाँ लग जहाँरी हो
की० ॥७॥
गुरु श्री नत्नचन्दजी सरे, ज्ञान तणा दातार ।
जवाहरलाल जी मोटा मुनीश्वर, गुण तणा भंडार हो
की।७२॥
उन्नीसे इकतीस में सरे, उदयपुर चोमास ।
.. होरालाल यो करे विनति, गुरु चरणका दास हो
,
,
की० ॥७३॥
कीर्तिध्वज सो कौशल्य ननिकी. ढाल करी एक मन हो ।
कीतिध्वज राजा हुआ मुनीश्वर मोटका ॥७॥
इति-
॥ श्री श्रावकरी सम्झाय ॥
श्रावक तुंउठे परभात. चार घडी ले पाउली रान ।।
मन में समरे श्री नवकार, चुं पामे भवसागर पार ॥६॥
कवण देश कवण गुरु धरम कवण हमारे छे कुल करम ॥
फवण हमारं हे यिन साथ पदवी चितपजे मनमाय
सामायिक लेजे मन सुध, धरम तणी हिये धरिजे बुध ॥
प्रतिकमणो कर रहे नितनो, पातीक आलोये आपणो Ill
काया सगति करे पचखाण, सुधी पाले जिनवर नी आण ।।
भणजे गुपजे स्तवन सजाय, जिणहती निस्तारो धाय ॥
॥२॥

,
चितारे नित पयदे नेम, पालेजीव दया ते सीम ॥
गुम्ने मुल लिजे आलही धरम न मेले एका घड़ी
या सुध करजे व्यापार, आच्छा अधिक रो परिहार ॥
मामर कड़ी कहनी साम्ब कडा सुमधन मत भाप
परमाते उठ गुरु यांदणजाय, सुणोपयाण मदासुधे चिमला
निर दूपण गूजतो आहर, माधुने देजे सुविचार .
सामी यल करने गणो, मग पण मोटो सामीणो!
दुःषीया हीना देग्य, कर्ज ताम दया सुविशेष
घर अनुमाग दिनं दान, मोटाम मतको अभिमान ||
अनन्त काय ऋदिये यत्तीम, अमक्षया यीसे यीशया यीस
कालिया माया दम, कागा कयला फल मन जीमें
डाणापण हे जाग जागग विना ने पापज हाय १
पारन नीरवाजे नो अगल नीन धाव धीर ।।
वार न मुगा पाल अनिमा मगला टारज ॥१
करना पना कामा दान पणा परिहाने माण ||
गधि माजन ना परदार नागान काज मंत्राप ॥१
मार माजी महान गुनी. पर गाड़ी मनयंग थाली ।।
वन नगरगहाम्म
पापा के नाम:
पाना - यार প্রনা খাসা চা অৰ।
पानीमा जान रिकामी करजे पुण्य ॥
न मृगमने. बोल पिणाने मावों ॥
मागमाग पित.स पगार को आमनिन ।

(२६) तेल तकर घृत दुधने दही, जघाड़ा मत मेलेसही ।। पांचे तिथ न कर आरम्भ पाले शील तजे मनदंभ ॥१६॥ दिवस तनो आलोय पाप, जिम मांगे सगलो संताप ।। आ करम पातला, भव भव ना भाजे आमला ॥१७॥ बारू लहिये अमर विमाण, जिम पाओ शिवपुरनो थ.न ॥ किरत हरप कहे सनेह, श्रावकनी करणी वे एह ॥१०॥ ॥ श्री सातवारों का स्तवन ॥ अदीतवार ने दिन भोली दुनिया, मिनख जमारो पायजी । छव कायारा आरम्भ करता, गयो जमारो हारजी ॥ सुणो भवियण महावीरजी री वाणी, सत पुरपारी अमन वाणी॥६॥ सोमवार ने सुता भूख, मनमतवाली निंदजी। काल सीराणे आण खडो, जिम तोरण आयो बीदजी ।। सुणो० ॥२॥ मंगलवार ने मंगलाचार, दया धरम सुप्रेमजी । सामायक पाहिकमणो करतां, लाहो त्यो नित नेमजी । सुणो० ॥॥ बुधवार ने यटी अवस्था, बुढ़ापो दुःख दायजी । बैठे खार पोटके उपरे, पडियो कर चिलापजी ॥ सुणो० ॥

विसपनयार ने विम्योज पहियो, कोई न मेटण हारजी मात पितारी करो यंदगी, जिम उनसे भवपार जी ॥ सुणो० ॥ गुगवार ने शुक्राचार, जामी शिवपुर माय जी अनन्न गुग्नामे मेरो दिपा, ज्यारो होगामी यो पारस सुणो० ॥३॥ पायरयार ने घिरना हामी, धमनी नार जी। सेर सर गोनी परती मोन्या भरती भाल जी।। मुणी ॥ १ मानुवार मदा मिजे आ मम की मिस: मानवार निनमिन मिग्गिा रजनी यो पार नुगी । । उपमा फटका ॥ FEELI if 1:न ii. In दिगा मं. ...- Ruru दर अधिक •+ दि. ftotal

पप्या का स्याल राग आनुरागे.
घयका खाय तोही से आगे ॥ धि० ॥१॥
नाटकमें उभा रहे रात सारी,
मुनि दन्शन आलस अति भारी ॥ धि
तप जप यात में पर नट जाये,
खाणे में लोटो लेई झट लाये । घि० ॥७॥
तवन सझाय कहतां शरमाये,
लड़ना
तो कादाय न आवे ।। धि० ॥३॥
दान देनां थर थर सर धुजे,
हिंसा करण में कर अति जो ॥ धि०॥६॥
लोभ कारण करेअति नर माई,
साधी चुकरे गुमराई । बि० ॥१०॥
पाप करणी में मन उल सावे,
धर्म शियामें न चिन लगाये ॥ धि०।११॥
मोष मान हपणा पल भारी,
दान शीयल तप भाव भिखारी || धि॥
पाप करण में जोर जणाये,
धर्म उद्यम मांदि कायर धावे ॥ धि० ॥१६॥
परम्ख नहीं देव गुरुः
धर्म केरी,
विज में दृष्टि पहोंचादे घणेरी ।। धि० ॥१४॥
जीय दशाने खररना रोवे,
जत सोना में निर्थक धन खोवे ।। धि० ॥१॥

निंदा विकथा में निशि दिन रातो,
गुणि जनकर गुण सुणी अकुलातो ॥ धि० ॥१३॥
कर्म पन्धन की शिख सुनिराजी,
धर्म शिक्षा सुणि अधिक नराजी । धि० ॥१७॥
पापी कु आदर देके विठाये,
धर्मीकु देस अधिक घुरराये ॥ धि० ॥१॥
पाप को परचो दगा यकी दूरो.
धर्म में पायो कर्म माहीं से घि० ॥१६॥
पर दुग्य देग्वीने अति हरपाये,
निज मपत्त से अधिक पीमाये ॥ धिः ॥२०॥
पवुल बोय आम फल चहावे,
विष भक्षण करि जीवणा बहाये । घि० ॥२१॥
पच पच ग्वाय दियो भव मारा,
दलका येलज्यं हाग्यो जमा। धि० ॥२२॥
निश दिन हाय हाय धन धन की.
लाज नहि पर मय गुरु जन की ॥ धि० ॥२३॥
धावी का स्वान ज्यु कहे धन मंगे,
मांच नवंबर नरक में रंग। पि॥२४॥
यहां अपयश आगे दुःश्व भारी,
वर्म विना भव भव में खुवारी ।। धि० ॥२॥
जैमा जापानमा मिधापा,
धिक जननी मिणो गोद खिलाया ॥ धि० ॥२६॥

उगणिों अतिस महावदि जाणो. चोध तिथि रविवार वाखाणो || धि० ॥२७॥ निलोक रिन्य कहे अवाल कोही माहि, इम सुनि करजो थे कर्म फझई ॥ धि० ॥२८॥ ॥ श्री उपदेशी फटको दुजो॥ धनतेरा जीवटा, नित करता धरम कुं। धन तेरा तन मन, धन है जनम ॥१॥ रत्न चिन्ता मणि नरभव पाई, धर्म चिन्ता मणि ले उलसाई ॥२॥ मिथ्यात्वी नरकु नहिं सरसावे, धर्मी / देख अधिक हरपावे ।। धर्म कथा सुनवा चित चहाचे, सुण कर सारग्रही उलसावे ॥४॥ नप जप किरिपामें रहे अगवानी, पुदगल पर कपहूँ ममता न आणी || ख्याल नाटक में कबहुं न जावे, मुनिदरशण आलस नाहि आवे ॥६॥ प्रभु गुण गावता अधिक गुंजावे, मोघ कलेश धकी शरमावे ॥७॥ दान देवे नित उलट परिणामें, N

(३४)
ठाणो |१२||
पापका काम में डर अनि आणो,
धर्म को काम सदा भलो जाणो 10
मोघ मान तृष्णा यल त्यागे,
दान शीयल तप भावमें आगे||१०||
सत्य पक्षकी प्रतीत जो आणे,
को पक्षरति नहीं टाणे ||१२||
जीव दया धन ग्वरचण जाणो,
लाभ अनंत हिये
न फरे निन्दा विकथा सणे नाई,
गुणि जननां गुण मुणि उलामाई ।।१३
फर्म यन्धन की शोकन धार,
धर्म शिक्षा मुग्वदायी विचारे ||१४||
पापीमुप्रीति न राय कदाई,
धर्मो कुँ आदर
अधिकाई ||१५॥
धरम में परचो पाप धी दगे,
कर्म में पानी मा तप जप मृग १३||
पर दुःख देग्बि अणुकम्पा घगरी,
मगहरी कर नहीं निज मुग्ध केरी ||१७||
भाम को योय आम फल चाहावं,
में गुणामी फदिन ठगावं ॥१८॥
पनि दिन यछना धम मरम की,
लाज घणी परमव जनकी
॥१६॥

धन कुटुम्ब तन नहीं जाणे मेरो, जाणे जैन धर्म सहायक तेरो ॥२०॥ इन भव शोभा आगे सुख भारी, कर्म शत्रु हणीवरे शिवनारी ॥२॥ नरभव पाय के धर्म कमाया, धनजननी जिणे गोद खिलाया ॥२२॥ निलोकरिग्व कहे उपदेशो, इम सुणि कर जो थे धर्म हमेशो ॥२३॥ ॥ श्री चौविश जिनवर का स्तवन ।। प्रातः उठी चोविश जिनवर को समरण कीजे भाव धरी मा०॥ अपम अजित सम्भव अभिनन्दन, सुमति कुमति सप दूर हरी ।। पदम सुपास चन्दा प्रभु ध्यायो, पुप्प दंत हणया कर्म अरि मा० १॥ शीतल जिन श्रेयांस वासु पूज्य, निर्मल विमल बुद्धि देतवरी ।। अनंत धर्म श्री शान्ति जिनेश्वर, हरियो रोग असाध्य मरी मा० २॥ कुंथु अरह मल्लि मुनि सुव्रतजी, नमी नेमि शिव रमणी चरी ।।

पारस नाथ बर्द्धमान जिनेश्वर, केवल लहयो भय आधे तरी ॥मा० ३|| तुम सम नहिं कोई सारक दूजो, इम निश्चे मन माहे घरी॥ तिलोक रिख कहे जिम तिम करिने, मभु महर करी ॥मा०४॥ मुक्त लोध्यो ॥ श्री ऋषभ जिन स्तवन ॥ जे गणेश जी गणेश ने गणेश देवा ॥ए देशी ॥ जो जिणंद जी जिणंद जै जिणंद देवा, उठि प्रमान ममरनाथ, श्री ऋषभ देवा ॥ र ॥ पिता तेरो नाभि राज, जननी है मम्देवा । देही कचन वृषभ लंछन, तेजें रनिपनि जेहवा ॥ १० ॥ जुगलाधर्म निवार कियो प्रभु, छे कुल गरकी ठेया ।। मजम लीगी श्री जिन मात्र कर्म अरिने हगंवा ॥ जे केयल ले प्रभु देशना दीधो, वाणी ज्युं अमृत मेवा ॥ चार नीरयकी स्थापना कीनी, भवजल पार करंधा ।। .. दम महम मुनि मग अष्टापद, चहीया अणमण लेवा ॥ छदिन मंधारे मुक्ति विराज्या, सुन्वि अनन्त निनमेवा ॥० निलोकगिग्य कह में तुम चाकर, ह चरणारज खेवा ।। जिम तिम करि भवगार उनाग, दिजो अविचल रवा ।।०५॥

॥ श्री चोविस जिनवर की स्तुति ॥
विमल अनन्त
राग बसन्त ॥शांति चरणकी गाउं बलिहारी।शाए देशो!
झेलो चंदणा नाथ हमारी, तुमारे चरण की बलिहारी ।।
॥ए देशी।।
अपभ अजित संभव अभिनन्दन, सुमति पदम सुखकारी 11
श्री सुपारी चंदा प्रभु समरो, जगनायक जस धारी ।
प्रभु
जी
परण
उपगारी ॥झे०१॥
सुविधि शीतल श्रेयांस वासु पूज्य,
अनन्त धर्मधारी।।
शांति जिनन्द सुखकंद जगतमें. मेट दीनी सयमारी,
हरो मेरी विपत विमारी । झे० २ ॥
कुंभु अर मल्लि मुनिसुवन जी, नमी नेमी सुविचारी ॥
तोरण से पाला फिर आया, यो छोड़के राजदुलारी.
नाथ तुम करुणा भटारी । ..।।
चे वारस के वारस पारस, पच परमेष्टी उचारी ॥
नागनागणि जरत पचाया, कीना मुर अवतारी,
महिमा जगमें अति धारी || ०४ ॥
शासन नायक वीर जिनेश्वर, हद क्षमा प्रभु धारी।
फेवल ले प्रभु धर्म यतायो, सूघ परिन सारी,
तीरथ पाप्पां प्रभुचारी ।। .. ५ ॥
अणसण ई प्रभु जोग लाग कर, पर बाद मुक्ति मंभारी ---
,

. अनन्त सुख माही जाय विराज्या तो, नरिंजन नीरामा रहा लोका लोक निहारी ॥ ०६॥ 'मोह माया मांहि उलझ रह्यो में, पायो हुँ दुःख अपारी तुम शरण यिन चउगति भटक्यो, धर्म की बुद्धि विसा शीख सतगुरु की न धारी । ०७॥ अशुभ कर्म का दूर भयास, वाणी लगी प्रभुयारी ॥ आतम उद्धारण चिमद सुणिने, शरणो लियो सुविचारी सार करजो प्रभु हमारी ।। शे०८।। मुझ सरिखो नहि दीन जगतमें, तुमसरखो दातारी । जिम तिम करि भवपार उतारो, या मांगु रिझवारी, अरज लीजो अपधारी ।। शे०६॥ उगनीसे अडतीश माघ कृष्ण पक्ष, तीज तिथी शनिवा देश दक्षिण आवल कोटि पठेमें जोड करी हितकारी, तिलोक रिम्य कहे सुविचारी ॥ शे० १०॥ ॥ श्री वीस विहर मानकी लावणी ॥ दीन दयाल कृपाल, करुणा भण्डारी ॥ क०॥ जय विहर मान जिनवीश, धर्म अधिकारी ।। श्री सी मंधर स्वामि, सदा सुखकारी ॥ स० ॥ जय युग्मंधर जसवंत, चरण पलिहारी॥ वाहु जिणंद कृपाल, करुणा भण्डारी ॥क०॥

श्री सुबाहु जगदीश, परम पद धारी ॥ सुजान प्रभु घनधाती, कर्म कीयां छारी ॥ क० ॥ स्वयं प्रभु वीतराग, ममता विडारी ।। ऋपभानन्द आनन्द, करे नर नारी ॥ क० ॥ जय विहरमान महाराज, धर्म अधिकारी ॥ ए टेर ॥१॥ अनन्त वीरज जगनाथ, लज्या जगनाता ॥ त०॥ श्री सूर प्रभु सुविख्यात, करो सुख शाता ॥ विशाल प्रभु सुविशाल, विजगनु त्राता ॥ त्रि० ॥ श्री बजरंग धर नव वन कर्न के घाता॥ चन्द्रानव सुखकंद दर्श चित चाता ।। द० ॥ चन्द्रवाह कमराहु, हठा या खाता ।। कियो कर्म से जंग भुजंग प्रभु भारो ॥ भु० ज० ॥२॥ ईश्वर त्रिजग ईश. मेरे मन भावे ॥ मे० ॥ श्रो नेमीरवर जिन ध्यान करता दुःख वीरसेन करे केण अमर पद पावे महाभद्र करे भद्र विधन कुँ हटावे ।। देव जखा करे सेव, रिटू सिद्ध आवे ।। रि०॥ अजीत वीरज निजपद. देत भज भावे ॥ जघन्य पदे वर्तमान, जिनद उपगारी । जि. मनुष्य पांचरों प्रमाण, प्रभुजी की काया ॥ १० ॥ लक्ष चौराशी पूरव आपु फरमाया ॥ धाप्या हे तीरथ चार भविक मनभाया ॥ भ० ॥ जावे ॥ ज० ।।

(४०) होप अयोगी मोक्ष, जाति महाराया ।। में अधम उद्धारण विम्द, सुणी हरखाया ॥१०॥ तिलोक रिण युं जाण, शरणागत आया। गिम लिम करो भयपार, आज अयधारी ॥ ज०॥४॥ --- ॥ श्री सोले स्वपा की लावणी॥ दोहा-सामन नायक सुरत, भयभंजन भगयंत ॥ त्रिशालानन्द जिनंद मम, प्रण; मन परिवंत ॥१॥ गली प्रामु गौतम गुरु ना गंजम दातार ॥ नाम प्रमाद पर्ण सुगन मोठे अधिकार || पाइलिगा नगरिवि चन्द्रगुम naz वार या धारक गुणा, परजा न मुख कन्द ॥३॥ पद परब जान शृद्ध भगवाह मुनिगज ॥ गमो माया पान, माग सम्ण जिहाज [[४! पाची वामान विष देशपां न्याना माल ॥ पनप करतीदिन. अर्थ ही मुनिमाल ॥५॥ अनाम अगदम पानं गायादा। देगी। कारवृक्ष की दामादरी, अब गुणी न म्यनों का)। प्रपाका गंजम योनही नका।। मन मा अा. मंदसुनो अपरमका मही। ५५ मा म , उन कयल जान नहीं । मन अप , 7 अन्धकार मा भारी ।

(४१) भद्रवाट मुनि कहे भूपसु, पानमो आरो दुःखकारी ॥१॥ चांद देखा तुम चालणी जैसा, तिसरं सपना के मांई ।। अलग अलग समचारी होयगी, योल फरक कुन्द दरमाई ॥ भूत भूतणी नाचत हिल मिल, देखा जाये सुपना माई ।। देव गुरु धर्म खोटा जिनक, लोक मानेगा अधिकाई ।। दगा धर्मपर पहोत जलंगे घोड़े जैन धरम धारी ।भ०॥२॥ पांचमें देख्या सर्प भयंकर, पारे फणकर फंकार ।। कितेक साल पिहें फाल पड़ेगा, वारे वरस लग भयंकारे ॥ उत्तम साधु पर संथारा, आतम कारज सारंगा ।। कायर साधु सो ढीले पड़ेंगे, हिंसा धर्म विस्तारेगा। छोटा दे उपदेश लोकोकु, होदेगा कोई घरवारी॥भ०॥६॥ छठे स्वप्ने देव विमाणकुं, आता सो देख्या फिरता ।। जिसका अर्थ सुगो तुम राजिंद दिल अन्दर आणी थिरन।।। जंघा चारण लब्धि धारक, और विद्याचारण जाणा ॥ ए दो लब्धि के है धारक, ऐसे मुनिवर की हाणा ।। चक्रिय और अहारिक की लब्धि, एयी विच्छेदेगा सारी भ०॥४॥ विकसा कमल उकारडी ऊपर, जिसका भेद सुनो भाई ॥ चारवर्ण में महाजन के घर धरम रहेगा अधिकाई ।। सास्तर की रुचि रहेगी धोडी, तुणतां निद्रा लेवेगा। स्तवन सजाय और दाल चौपाई, जिसमें बहुत खुश रहेगा। प्रति चोध पिण इसमें पाके, होवेगा संयम धारी ॥भ०||I. - , (४२) , आग्या का चमत्कार आठमें, भेद सुनो इसका नीका उद्योत होयगा जैन धरम का, वाकी मिथ्यातम है फीः समुदर सृको तीन दिशापर दक्षिण दिश डोलो पार्ण दक्षिण दिशापर धरम रहेगा, तीन दिशा रहेगी हार्ण पंच कल्याणिक भये जिणा पुरमें, धरम हानि जहाँ उन भ०॥३॥ दशमें सोनेकी थाली जिममें कुत्ता देखो खीर खाता | उत्तम कुलकी दौलत है मो जावेगी मध्यम हाता ।। नटखट सोदा चोर ठगारा, धृन होयगा धन वाला ॥ साहुकार सो झुग्गा दिलमें, कहे न शके मनकी ज्वार धन मंपत मज्जन की हाणी, मन्यवादी कम नर ना भ०|| हस्ती कर इग्यारमें बने. देवा यंदर कुठा । नीच गजा मो मालिक होयगा, उच्च गजा रहेगा हे वाग्मे स्वपने देखा तुमने, दरि ने मरजादा छोडी।। बेटा बेटी मान पिता की मरजादा रखें धोड़ी। यहु मासु का न करेगी कह का उल्टी दुःव देशी भा ॥मा नांच ग्राही मी अग्री होयगा, वचन देके नट जावेगा दगाहार विध्याम वाति नर मच्चे नरकुं हटायेगा। मला मक्म का आदर कमती, पापी आदर पावेगा। गुरु गुगणी की चला चली, सेवा भक्ति कम चहावेगा .. .

आफ्नी पाई करेगा नगसे, गुम्य होयगा दुःयकारी मि०६॥ सोन्या देवी स्वपने तेरमें, बाहर के महारथ मांही ।। नादान उमरके धरम करेगा, मंजन लंगा उनमाई ।। लज्जामुं तप मंजम पाली, सपजप में पिन देगा ! युहा पिठा होयगा धर्म में आदम अधिको रहे येगा ॥ सरखा नरि, सप लड़का युद्दा. समुनय भाय फाया जहारी मि॥१०॥ रत्न की कांनि मंदी देवी पदमा स्वपनामें जाणो॥ भरत क्षेत्र का संत साधके, हेत कलार घोटो मानो। मोधी क्लेशी अरू अभिमानी, अपनी यात समावेगा ।। भली सीख जो देगा कोई, उसका गुण पनायेगा । अलप होयगा संजमयंता, होयगा पहनमा लिंगधारी भ०॥११॥ राज कुंवर सो चट्य पोठिपर, देखा स्वपने पंदरमें ।। राजा जैन धरम तजदेगा, रागा मिथ्या करमें ॥ पातकरे जो सच्च घटकी उसकी घोड़ा मानेगा ।। भूट की परतीत फरेगा, खोटे का पक्ष तानेगा । धर्मी की करेगा ठठा, पापी का आदर भारी भ०॥१२॥ लहते हस्ती देखे सोलमे, विन मानव आपस मांहि ॥ चार बार दुष्काल पड़ेगा, मन बहाया वगा नाहि ॥

(४५) मात पित गुरु पालके फरतां, विच विच यात करेगा बेटा भाई भाई में मंपन ओडी, पोटेगा निर्धक खोटा। पिना पक्ष को आदर ओठो, प्रिया पक्ष सु फरंगा यार म०॥१३॥ काग दायला प्रामाणिक न्यायी, गुणिजन थोड़ा होयेगा झगड़ा टंटा निरर्थक करफे, राजमाही धन खोवेगा ।। केण न माने भला गरम को, फिर पीछे पछतायेगा। एक पिश हजार घरम लग गजिद, ऐमा रीनि करजायेर अरथ मुर्गा स्रोले स्थपना, राज भया दृढ़ बनधारी मि०१|| मंमन उगणी माल सेतीमका, फागण पदि ग्यारम तलाक सिग्य मरेपान लावणी. मात्र कडामें यणाई । मंगम आगे दम्मम नामें दम है में अधिकाई ॥ चम्म पान और ममना गवं. उनके मम्ब ममजी भाई पी जानके हा. उनगंग भवजन पारी १५ ॥ श्री विजय मेट विनिया मेठानी का स्तवन गुस्न बिया नदीना।। मेट अग जाणी।। मन पास 7777 नारा विजय संटने सेठाणी ।। : ताहार विमार माजी नन. .

24x (१५ ) पाम घटा शिम उलमाणी।। सज मिणगार पदी पिउ मंदिर हेज शो किरपाणी नीन दिवस मुजान नणारे. सेट पोले मधुरी पाणी॥ परम सुणी नेणा नीर दलीयो चदन कमन्न गरी पिलगानी पूछ भीनम सुन सुख लेणी, कुण चिता मनमें साणी । म. पक्ष गुरमुख मन लीनो तुमे परणो वीजी नाणी । अपर नार नुन. बहन बराबर, धन धीरज धारी जाणी एकान सेच्या हेज अपर पल, नो पिण मन राज्यों नाणी । घ० ॥ ४॥ वर्षा काल वीजा धन गाजे. चउधारा वर पाणी ॥ खद तु वरम बादश निरमल, शील पालवी जी ममता आणी | ५० विमल वली करीशंसा, एदोनु उत्तम पाण। ग्वधर हुँई संजम व्रत लीनो, मोह करम कीया भुल वानी गुज गुमान चंदजी गुरु मिटया, सेट कथा व्यां मुग आजी रिख मचन्द्र जी पाय बन्द, केयर टे गरी निर बाणा ॥ घर ॥1 (४६ ) ॥ श्री रहनेमी जी की सजाय ॥ देखी देवर को मन डोल्यो, राजे मती कहे एम ॥ काम केल करणी इण काया नेम पिना मोहे नेम ॥ देवर दूर खडोरे, लोकां भरम धरेगा। नारी मंग किया सुरे, पापे पिंड भरेगा ॥१॥ जोवन रूप रच्यो जगदिसर, जगने मोहो जाल ॥ कामी मिनख मारण करतारे मूह मे पडदे फाल देवा केसर वरणी देखी काया, मुड़ करे मन हुंस ।। पिण ए जेहेर हलाहल गोटी, जैसे धुली के तूंस देवर देवी नेण काजल्द मुं भरया, जाणो दल बादल का । कांमी पुरुष मारण विध लिना काम देवका भलका ॥देय कणक कलश मारिया धगदग्नी, मह जाणे मनमाह ।। कांमी धीजमरायण करना लोहा गाला की एहस्साहादेव उज्यल फुलंने कलंक चढ़ाये, नाखे दुरगत उही । वाये लाज जनम की बोटी, नारी नरकनी कुट्टी देवर गजा जाण नो पा लुटे, ग्या यह मिर मुंहो । जगमप माटी मुटकर कथा, " करणी जग झंडी देव फिरता, गिरना, गज दुवार, मंचाना फिर गलोया !! * महान दे डाली महाजन. दे बड़े आंगलीया दिया। दुममा हामी चितयियो, मामल पात न मिणी ॥ काम पजाबी करसे हामी, जामी साम्य लाम्बीणी ॥ - ॥देवरा (४७) , बंसमोर लागे तुम फुलधी, सजग लेसी सिंघो । परियानों पाणी उतरसे, जादव जोसो नीचो देवरा॥१०॥ भोजाइ सुं रह अकारज, उत्तम ने नवी बाजे ।। अति मीठो हुवे तो पिण देवर, अखज कहो किम खापजे देवर॥११॥ सुणी यात लाग्यो मन मुनिवर, लागो राजुल पाप ।। फुवचन जेमे का पानी, ते खमनो मोरी माय देवरा॥१२॥ मुज माता वेन सुहावण, तुं तिरथ तुंगुरणी ॥ तु मुजतारण पाप निवारण, तुमुज पातीक हरणी देवरा१॥ धनधन राजेमतो सतवंनी, जिण लाल्यो रहनेम ॥ वचन वाण देई वस आरयो, अंकुश देई गजम ॥देवर नगरी माहे वड़ी द्वारका सोरट देश मंझार ॥ कुलमाहे जादव कुल मोटो, शीलवंत नेम कुमार ।।देवर।।१५।। मती माहे राजेमती मोटी, मुनिवर माहे रहनेम ।। गह पतमे विजय सुरिदा, भद्धि हरप कहे एम देवर।॥१६॥ ३ - ।। श्री महावीर स्वामी को पराणो । दोहा-श्री अरिहंत अनंत गुण, अतिसे पुरण गात ॥ ज्ञानी ध्यानी सुनि संजमी, फहिए उत्तम पात्र (४८) पात्र नणी अनु मोदना, करतो जीरण सेट। श्रावकं उंची गतिलही नवग्रीवेग ने हेठ दम चोमामा वीरजी, विचरतां संजम यास ॥ विशाला पुरे आविया, इग्यारमें चोनाम -चोमासो इग्यारमे जी चिचरंत सञ्जमधीर ।। यिमाला पुर में आधियाजी स्वामी श्री महावीर ॥ जगत गुरु नसला नन्दनयीर ॥१॥ मंद भले भदया जिनराज मग्वीरी,मेरो माग अनोपम सार मग चीफ पुगओ आज | जगत ॥ यदव नो देवरजी. निहां प्रभु काउमगलीध ।। माग माननाजी. म्यामीनप की 10 जोर मनिह यमनी, पाल धायक धर्म । साकार करी और पाजी जाम्या धर्म नो मर्म जिला भाजपमामा म्वामी श्री महावीर ॥ भाटापा इमाकर दम दान जll वा मेटम चितवजी, मकर होशी मुज आम || • मान : RTI क्यों चौमाम जoll ही मनपार ॥ .' मानाजीचा संचार जी समाचार नामा एक बार ॥ FIEमती विनंती करी याबाराज

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- निरपन जिम जिम चितयेजी, निम तिम निर फल थार ज०॥१६॥ स्वामी जी कियो तिहां पारणोजी, कियो उन विहार ।। आया पाम संतानीयाजी, ले मुनि फेवल धार जिला विसालानो राजपी जी. लोक सहु आनन्द ।। राय प्रश्न करे इमोजी मतगुरु चरण पाय बंद ॥०॥२४ मेरे नगर में कुण अछे जी, पुन्ययंत ने जसवंत ।। फहे केवली आज अवे जो, जीरण सेठ महंत जा२२॥ राय कहे फीण कारणे जी, जीरण सेठ महंत ।। दान दियो श्री वीरने जो, पूरण ले जमवंत ज०१२३! राय प्रते कहे केवली जी, परण दियो दान । हेम वर्षा तिहां हुई जी अवर नहीं परमाण ज०॥२४! देव लोक जिण बारमे जी, जीरण धाल्यो वन्द । अनदियां दिया फल्गा जी, उत्तम फला मम्यन्ध ज०॥२ एक घड़ी सुर दुंदुभी जी, जो नई सुणतो कान ॥ तो जीरण लेता मटाजी उत्तम केवल ज्ञान ||ज०॥२६॥ राय जीरण बधावियोजी, अधिको मान सनमान । मुख्य नगरमें धापीयो जी, जावो पुण्य प्रमाण ॥०॥२७ दान देवे सुपात्रने जी, से नही निरफल होय ॥ पात्र नणी अनुमोदना जी जीरण सेठ फल जोयजार इम जाणी अनुमोदना जी. दान सुपात्र रमाल । दान देवछे साधु ने जी, तेने नमें मुनि माल ॥०॥२६॥ . , (५१) ॥ श्री उपदेशी स्तवन ।। परव सुगृत करीने, मानधारो भव पाया ।। आर्य क्षेत्र ने पुल उत्तम छ, पली निरोगी पापा ॥ अब पाने जोग मिलियोछे, छ त्यो जिनपर जीरो नाम ।। सुज्ञानी योग मिलियो। पूरी इंद्रिया हांपो आउ खो, चली साधकी सेवा ।। सुण जो जती पायक प्रणमुं, पाणी अमृत मेवा ॥१० ॥२॥ आठ योलरा टाणा मिलिया, नहीं थारी सरधा सूंटी ॥ कुगुग फुदेव समरण, कुबुद्ध कुमत मनकूटी ॥अ०॥३॥ आदेही धारी भस्मज होसी, किया चंजनमुं चरचा ।। दान शील तप भावना भाव जो, लार लिजो ग्वरचा अ०॥४॥ : चार पहेर का टेणा देणा, चार पहेर का घाटा ।। आठ पहेर जय वित गया, तप आयां मुदल में तोटा ॥अ०॥५॥ विमा तीसा भलो पचासा, लगा निसाना नेमा ॥ करना होय तो फरले प्राणी, हुवा बड़ा अंधेरा ॥अ०॥६॥ रात दिवस तुं धंदो करतो, जिन जीरो नाव न लेतो ।। : तेरा सिरपर फाल इरछे, बंव नगारो देतो अ०॥७॥ मात पिता भाई सुत बंधव, हुवा स्वारथ वेला ।। : दिनरे खतरा जासी जीवहे, सवी फनारा मेला ॥८॥ ."

, साथ झूठ कर जगने दगिया माल पराया खाया ।। अण चितवीयो थारो आयो, आउट घडीरी सप माषा |अER साची साकर देवने सिमरया, जे सिमरया जे खोटा। याद नहीं आणी मनमाहे. भया जालमें मोटा अ०१७ माया ममता सवी मेटकर, जिनधरम कर यास को ॥ कहे माधु जी सुनो भविकजी य, इण अवसर तुम मतचु' [अ०॥११॥ मागुम मिष हिया धारो, फुयुद्ध कुमत निवारो। यार यार मनगुरू ममजाये, काया कारज मारो॥०॥ कंग मामधिक पामा पदिशमणा, देमम गौतम माता। दिन दिन चनना नहा आया, कीमा भाम मंठा 10॥१३ दान धरम | कद नहीं सोनी, मन ममता नहीं आणि || आउम्पा जाना चार न लागे, ज्यों अनलमें पाणी ॥अ०१४॥ जीय जपजीवनि यो, मरण ने पंछ कोय ॥ जीय जीयाण हाना पका, मुक्त न पता काय [अ०॥ ॥ श्री पारसनाथ जी का स्तवन ।। तुम मम यिगनी नी॥ श्री मायनीया महागज मिर मस्टे चिराजा जी

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( ২ )
সাস তার গা নাগাদা গান।
শিল্প সমাপ্ত নং সী ফ বিন্নাঘর
গলা না সানি : কানায়।
#ী খিলাম বাংলা গালিশি মান )
বৃথা না বিসিসীমাগিঃ কামম পূর্ণ স্থগি
মান নিপি: কী শি? মাগি।
সুন খ মনিশান লন ঋগি হৃা }ি।
শিশান মা গগিনগনি গা শিগগি: }}}
নি•সারণি পাস নিশা না লগ্য।
দাশ শন ( ৪৪নকামশরিয়াম।
ভূমি মাপ না সি সি সনাখাoিf ।
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মনে' ** মামা সুমান ।
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(५५)
श्री चिन्तामणि मन्नमो कृति युतंही फारसाराधितं ।
गे मह मिऊण पास कलितं लोश्ययस्यायहम् ॥
मन विपापई विपरिश्रेयः प्रभायाश्रयं ।
लोहारा बमहाशितं जिन पुष्टिका नन्ददं देहिनाम् ॥७॥
धा
ॐही श्रीशारदरं नमोक्षरपरं ध्यायन्तिये योगिनो।
हृत्पद्म विनिवेश्य पार्श्व मधित चिन्तामणि संज्ञकम् ॥
भाले वाम भुजेच नामि फरको भूयो भुजे दक्षिणे ।
पश्चादष्टदले पुते शिवपदं द्वित्रं भवन्त्य हो ।
॥ स्त्रगधरा ॥
नो रोगा व शोको न कलह फलना नारिमारिप्रचारो-
नवाधिर्नास माधिनच दर दुरिते दुष्ट दारिद्र तानी ।।
नो शाकिन्यो ग्रहानोन हरिकरिगगणा पालवताल जाला
जायन्ते पाच चिन्तामणि तिवशतःप्राणिनां भक्तिभाजाम
॥६॥
। शार्दूल विक्रीडित ॥
गीर्वाण
मधेनु कुम्भ मणयस्तस्पाङ्गणेरगिणो ।
देवादानव मानवाः सविन तस्मै हित ध्यायिनः ।।
लक्ष्मी स्तस्य वशा वशेव गुणि नां ब्राह्माण्ड संस्थापिनी ।
श्री चिन्ता मणि पार्श्वनाथ मणिशंसंस्तौतियो ध्यायते॥१०॥

(५६) "मालिनी॥ इति जिनपनि पार्थः पाच पर्याख्य यक्षः प्रदलित दुरितीधः प्रीणितः प्राणिसार्यः । त्रिभुवन जनवांच्छा दान चिन्ता मणिकः । शिव पद तस्बीज बोधिवीज ददातु ॥१९॥ इनि ॥ श्री उवसग्गहर स्तोत्र ॥ ( अनुष्टुप ) उपसग्ग हरै पार्म। पार्म धन्दामि कम्मघण मुक्क विमहर विम निन्नाम। मङ्गाल कल्याण आवास॥१ पिसहर कुलींग मा। कंटे धारड जो तया मणुउ तस्म गहरोग मागे। मुटुजरात उथसामं ॥ चिट उदुरं मंत्रो। तुझ पणामोवी बहुफलो हो। नरसिरिमुवी जीवा। पावनि न दुम्ब दोगच्च ॥३ ॐअमरना कामर्धणं! चितामणी काम कुंभ माझ्या सिरि पाम(पाच) माह सेवा । गहाणं मध्ये विद्यासतं ॥ ॐ ह्रीं श्री ॐ नुह दमण मामीय । पणांमइ रोग मोग दुख दोहगं कलपन मिय जाय। नुह दमण समफल हेॐ स्वाहा ॥

ही नमिणधोपणासाय। मायावी एण धरणनागिर्द ॥ सिरि कामराज पली। पास जीणंदनगंसामि ॥६॥ ॐ ही श्री पास पिसहर । विशु मंतेण माणझाए । वोधरण पौमावह देवा ॥ ॐ ही क्ष्ल युस्वाहा |७|| जयउ धरण देव। पड़ महत्ती नागणी विना ।। बिमल झाण संहियो ।। ॐ ही म्ल – यु स्वाहा ॥ धुणा मीपासं। ही पणमामी पर मभतीए। अटवर धरणे दो। पउ मावय पय डीयो कात्ति ॥६॥ जस पय फमलसप। घसइ पोमावय धरणे दो। तस नांमद सयल। विसहर विस नासेइ ॥१०॥ तुह सम्पत्ते लद्ध। चिंत्तामणी फाप पायवण्भ हीए। पार्वती अवीधणं। जीवा अवरामरं ठाणं॥१२ ऊँ न ठमय ठाणे। पणठ कमठ नठ संसार । परमट नीठी अठे। अठ गुणा धीसंर वन्दे ॥१॥ सनुह नाम सुद्धे मंते। जो नर सपंति सुद्ध भावस्स ।। सो भयरा मरं टाठां। पार्वती नयगय सुखं ।।१३।। पनास गोषी डांकुर। गहदसण भयं फाये॥ आवीन टुंती एतहवी। तसी झंगुणी जासो ॥१२॥ पिउजत भगंदरं। खास सास मुल सहनीवाह ॥ सिरि सामल पास महं। तमाम पउरप उलेण ॥१२॥ ... ... -- (५८) a रोगगल जलण विसहर । चोरारि मईद गयरण भगाई। पाम जिनाम। फित्तणेवापस मंति सम्माई अंम युभो महायम। भत्ती भरनिम्मरण हीय पर ना देय दीझ योदि। भयेभये पास जीण , ॥ श्री घटाकरण स्तोत्रम् ॥ ( अनुष्टुप) टीकाणी महायी। मर्य ध्याधि शिनाशा: कि नापा । पम्य निमग। यानि यापित कफोडाया अग्रभा नागन। पांशिकीन पाक्षा रक्ष रक्ष महापट ॥१॥ लिविमोक्षर शिमिः मानxn नाव: An। प्रधान, गक्षमा प्रमयंतिन नग मपंग वरनं ॥ rizाकरणो नमोस्तुते ट: 2:टः स्वाहा

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(६०)
प्रेम मान॥
कप होगा प्रभू कर होगा, यह विषप्स हमारा क्य होगा।
दम मपसे मथा प्रेम कर, पद दियस हमारा कर होगा।
हम पतियों से अति प्रेम करे, और दुश्मन पर भी रहम करें
हम मय जीयों से क्षेम करे, यह दियस हमारा कय होगा
अमिमान प्रम को छोड़ोगे, जिन पाणि रहस्य समझ में
हिर सत्य हवामें घर में, यह नियम हमारा कप होगा
पर निन्दा गुगली दूर रहे. और ईप्यो सन से भग जाए
हृदय में उमड़ आग, यह दियम हमारा कब होगा
गह माशु मेरा वेग
मा. मंग मी मेरा रा है।
पारिका दो मिट. या. दियम माग कप होगा।
Tग पक्षगर की छाया और मय हदय में पारंगें।
मुधम गन्धा या पग. मिमग कप होगा ।
पायाम क पनीम मु"
7 दिन प्रति यनं जाये।
प, के दौरा यह दिवमहमाग ऋय होगा।
म्वभाव एम वा कर
और विभाग गण को छोगे।
कि मन मिनिन र य दियममाग कय होगा ।
।
'रमुख नार म्यागी बनी।
करमानना nान्यागी पनी ।।
माग पिना माल न जाय पाग का मारा।

(६१) r- - कर्म खपाना हो तो प्यारे त्यागीपनो, त्यागी को सुर नर नमते है। घरते चरण विघ्न टलते हैं, गर्भ विच नहीं आना हो तो प्यारे ॥ चम्नति को रिद्धि भारी, त्याग सामने तुट है सारी। आत्मा उच्च पनाना हो तो प्यार ॥ जहाँ वैरान्य वह पावे, सुर वीर नर पार लगावें। जग से मोह हटाना हो तो प्यारे । पुगिटक सुख भागे च गनिमें तृष्णा पूरी हुई न जगतमें। दुख मिटाना होतो प्यार ।। इन्द्रीय अनीत सुख विषय समह, किम्पाक फल यह शास्त्र कथन है। सच्चा सुख पाना हो तो प्यार || वीर मभूने त्याग किया था, तन मनसे यतिदान किया था। सन्त मुनि सुख पाना हो तो प्या। ॥ गायन । यो तन पावनो रे या को मत कोई कर गुमान । तिर्यभर चक्री हुजारे जीन का कंचन वर्ण शरीर ॥ आगम देवे साक्षी तन को छोड़ गए अमीर गए । अन्तेवर रम्भाज सीरे रमणी रूप विशेष ॥ गहणा कपड़ा जेवर जहाज मोहा सुर नर देखा। भीतर हाड़ मास रूधिर है जिसमें भरी दुगंध २॥ जपर मड़ियो चामडो, यां ये मत भूलो मति मंद ।

(६२)
ऊपर रंग सुरंग छेरे तां ऊपर सिंगार ॥
मन मानी करता घणारे उरमें भरी भंगार
समझो २ सय नारी भय पूर्व को सोच ॥
कहाँ से आया कहाँ जाना है संत मुनिकर सोच ४ ।
॥ गायन ।
मनवा मोह नींद को त्याग २ नाम रूपमय यह जग स्वपना
क्या सोये है जाग॥
जिन विषयों को आज भोग रहा कल वह स्वप्न समान ।
इनमें कहाँ भयो रत मूर्ष, अज हो अचेत अजान ||
मायाका सुख आदि अन्त यत् याँ से क्यों मरमाय ।
ब्राम अनन्त अनादि है ये वाको क्यों विम राय ॥
मनुष्य जन्म दुर्लभ है मिलना यार नहीं पाय।
उठ स्वरूप चिन्तन कर जोर पहुरी यहाँ नहीं आय ।।
1 गायन ।
मप्रय के फेर से जो भारत दशा और की और
पितु आज्ञा रामचन्द्र ने बन की करी तयारी ॥
आज वाप से सम्मुख लड़ने देते मुम्ब से गाली।
मन्य निभावन हरिश्चन्द्र ने दिया गज का दान ।।
ग्वाटी गवाही देत फिरने भारत के संतान ।
मन्य व्रत चारी निम्म पिना धे रहे बाल ब्रह्मचारी ।।
आज उनही के कृल में उपजे नाके पराई नारी।
नल गजा ने दम्यन्ति से चीड़ काई कर लीना ॥

कहीं गए
.
आज तो गहगे कपड़े खातिर नित उठ पति से लड़ना।
गोपाल
कृष्ण
गोओं के लाड़ लड़ाते ॥
आज अधर्मी, गो वेटी को बेच २ कर खाते ।
पहिले पति परदेश सिधात नार उदासीन होती।
आज पति परलोक सिधावे रगड़ २ पग धोती
काम देव अरणक श्रावक को देव ने शीश झुकाया ।
आज भैरू रामदेव करणी माँ शीश झुकाया !
पदमावती और जोहर पाई धारणी शील रखाया ।
अग्नि
कुण्ड में जिन्दी जल गई जवि खेचली पाया।
आज की धांया मोज शौक फैसन में आनन्द माने ।।
पति धर्म को जो नहीं समझे मनुष्य जन्म को हारे ।
पहिले की अवला नारि तो सासू नन्द की सेवा करतो ।।
आज की अवला रगड़ झगड़के मनमाना हुक्म चलाती है
मोटा खाते मोटा पहनते मोटा जिनका प्रेम ।।
आज तो पतला पहिने खावे पतला जिनका प्रेम ।
सहा याजी और सिनेमा फैसन में धन को लुटावे ।।
दान धर्म के हित कहे तो ऊँचा थोव सुनावे ।
॥ गायन ।।
.
विषय पड़ा दुख दाई अरे चेतन प्यार
क्यों इसमें ललचाय अर चेतन प्यारे ।
मोद कर्म यस यह भाते हैं. शुद्ध बुद्ध भूल दुख पाते हैं
जन्म मरण बढ़ जाए चेतन प्यारे ।।

(६४)
विषय भोग जय तक नहीं छूटे तब तक कोई मुक्ति ना पहुंचे
शास्त्रों में फुर माय अरे चेतन ॥
अमृत छोड़ जहर जो पीते चतुर नहीं यो मूर्व पजते ।
चतुर गनि रूलयाय ॥
शब्द सुनी हिरना यस होये दीपक देख पतंगा रोवे ।
भंवर सुगन्ध ले दुम्सपाय ॥
रसना वस व मीन भरे है कामाना गज हथिनि परे हैं।
झट से प्राण गमाय॥
पांच चोर से प्रेम करे है, आत्म सुन्न का नास करे है
सन्न मुनि यो गाय, अरे चेतन"
|| गायन ।
मुझको दर रग्यो भगवान से पिन धर्मी लोगों से,
में फैशन के लोगों से।
परम्परागत माढापन का कर दिया देश निकाला,
उल्ल जमा रूप धनाकर फिरता है मतवाला ।
मतसंगत में कदय न आये गप्पा वृष उड़ावे,
यनक मंडली सांझ सवेरे एक मिल फिर आवे
प्ररज उट्ठो मृतो उठो आलस्य न बाड़े.
ले चीड़ी मुहम पीतो ही सामो दोड़े।
पहिले पीये चाय वो तो पीछे मुंडा धोवे,
मृछ मंडायन कर हजामत मर्दपणा ने खोवे ।

गई टोप पनन्टन पनि कर नेत्रों पर नेत्र चढ़ावे,
नेट सुगंधित घाल घाल में नुवमें पान चवाये।
जीते जीनां पाप वृद्ध की सेवा नहीं जाये,
मेरे बाद मोसर यत मुण्टा लाह ग्व्व उड़ावे ।
राह की सेवा छोड़ी भे राम देव को ध्यावे,
गये पण्डों के चरणों में जाकर शीप नवाए।
हाय यांसे तम्मा से दांत गधा सा दीखे,
ऐसे मनुष्य की संतान वे ज्ञान कटान सीखे ।
पुरुषार्थ में खोटो समझे मांग तांगने खावे,
ऐसा मनुष्य पराया वश है वृथा जन्म गमावे।
मई हो के सीखे वो तो जनाने की चालें.
चोटी न रखे टोपी न रखे वलो सिरयों डोले ।
भांग पीये और उल्लू रहवे मनमें समझे मोटे.
अधगलामें अक्ल पता उनसे भी वे बाट ।
खूब गया भारत का पैसा अब तो मस्ली छोड़ी।
नियम धर्म में श्रीनि लगाकर मंनो से प्रीति जोड़ो ।
M
पाचन ।।
सुनलो वीर प्रभुजी मन वश में नहीं होता.
प्रवल पुण्य का उदय हुआ तय मानव तन पाया।
सत्संगत का निमित मिला फिर जैन धर्म भी पाया,
मन वश करने जोग लिया फिर साधु भेप बनाया।

; সহী चरण भेट या ज्ञान ध्यान सिप्ललाया,
छिन में राजा हिन में योगी बनकर ध्यान लगाया
दिन में छैल छपीला होकर दौड़ दिशावर जावे,
पहिले पाग यगीचा जाकर गोठ घूमरी खावे ।
इन पापो ने डर नही लागे जहल में फिर आये.
जिम तिम जत्न करीने राग्बू तिम २ अलगो भागे
शर्म रति नहीं राखे किसकी इधर उधर को भागे,
जै जै यात कह नहीं धारे आप मति रहि न्यारो।
सुरनर पण्डित जन समझाये समझे न मारो सारो,
मैं जान यह लिंग नपुंसक सकल मरदने ठेले ।
नोकपाय मेणी गज चढता श्वान लठि गत झेले।
धर्म ज्ञान मत्य यान भृलावें पाप से भय नहीं खायें।
सम्यक ज्ञान बिना फिर भटकना विषयों में ललचा
पलभर में नर्क दलिए करना पल में स्वर्ग चुनाता।
पलम निगोद झाले बुनता है आकाश गगन में जाता
दणा ग्वानिर
दुग्न
में
यागो नाच नचाये।
और ठिकाण मा धर्म मे आगो भागे ।
इम भव में प्रभु मन बम कग्दो जन्म मरण मिट जाये।
पृश्य गणेशी नाम रटे से मन मुनि सुख पाये ॥
।। गायन ।।
करले . अय चनन करनी धर्म साथमें जाय,
पल पल आयु जानी दिन में पीछे यह नहीं आए।

(६७)
नहीं भरोसा साँस स्वास का कर निकली यह जाए,
राज, तख्त और भरा खजाना यहाँ धरा रह जाए।
स्वर की नारि माण से प्यारी वो भी साथ न जावे,
कांच में मुखड़ो नरख २ कर फूलरयो मन माय ।
हाड़ मास मल मूत्र है अन्दर आखिर पिनसो जाय
भाई वन्धु कुटुम्य कयीला सब स्वार्थ के भाई,
अन्त समय दांतो की चु कादि लेगा भाई।
होरे पन्ने गहणे पहिने पैठे मोटर माय.
आगे पीछे मरना तुमको मोहन भोग छिट काय ।
तृ नहीं किसका कोई न तेरा सब झूठाहै नाता,
खरा मित्र धर्म है यारो यही साथ में जाता।
चार कोस जय जावे भाईबांधे खर्ची लारे,
पर भव जाना तुझको चेतन इसका करो विचार ।
अपना २ देश पुकारत चले गए फेई राना,
इन्द्रजीत, रावण अभिमन्यु भीम जेसे यलवाना ।
करना हो तो करले पारे कालचंद मिर आए.
यह नहीं छोड़े भाई तुझको, अय झटकेसे ले जावे।
दानशील तप भावना साधे निरावाद सुख पाये,
पूज्य गणेशी नाम जपेसे जन्म मरण कट जाये।
सचा मित्र संसार में एक धर्म नजर में आता,
मात पिता और भगिनी भाई मली है संसार सगाई।

जिन पर है तू रहा फुलाई
देगे धोय क्षण चार में जय निफल पयन है जाता।
पाप कपट कर द्रव्य कमाया, अनहद नृने जीव सताया,
निम दिन जिम पर रहा मुलाया
क्यों फमा इश्क प्यार में, है धन पर भव दुग्य दाना
सुन्दर ॐगा महल घुनाया विषय भोगों में
भूटी भाषा में भरमाया,
मोग समझ दिन भार में
टूटेगा मयसे नाता।
मंकट भय दुग्न मय टल जायें, दुश्मन आकर शीश नमा
जो निज धर्म मदा मन ध्याये पायें शिय सुग्न स्थान को
मय मिट गंग का खाना।
हललचाया
-
सध्यन ।
कलया र आगमण लीजो ममा हाल्ट
बन लानी जो मान पिता यई ना काटे चाल
नक दाग नादान पर पापी माली माल
मनी बिगागा उमाटीका ओमान
पद मास पिना ग ग 17 हार माल
मानी मागतानाम्ग मन नृपाल
.लो गर म या मिग्र तुम मजा प्रम निकाल ।
दुनिया में
जमा का कमाया
मामा
न ही गमाया, हयाही गंवाया

s= ਕਰ ਵੋ ਗੇ -
ਲ
| !
।

(७०)
राज हार सब भाई हारे हारी द्रोपदी नारी
अत्याचार किया द्रोपदी पे दुर्योधन ने भारी
जल्दी ही फल दिया जुल्म ने कौरय कुल संघारी
कष्ट पड़े पर सत्य धर्म ही करना है रखवारी
मत्य ने ही द्रोपदो को लना राखी सभा में जारी
परोपकर निस्वार्थ सिखाती कुन्ती माता भारी
प्रारमण के बदले राक्षस के भेजा सुत सुख कारी
विद्याधर फैद पड़ा जप दुर्योधन अहंकारी
लव दुड़वापा धर्म नन्द ने अपना यंधु विचारी
विना जान पहिचान दुग्वी के कैसे हो सहकारी
सुखी किया अर्जुन ने इन्द्र को राक्षम विद्रोह हारी
दुष्टों को संगति से बिलकुल जाति है मति मारी ।।
कौरव मग भीपम ने गाय चोरी विगट मंझारी
पर नारि के छेद का फल होताहै दुग्न कारी
भीमसेन ने माग कामो कीच की भूमि पछाग
मलाह कराने वातिर मजन करने कोशिश भारी
पाण्डव कारय यर मिटावण बन गए इन मंझारी
मम भाव में छोटे बड़ो का भाव न रम्या विकारी
रण में अर्जुन का ग्ध होका खुद ही कृत्र पिहारी
धर्म पालन कर पाण्डव हो गए मुनित्रत धारी
धर्म शामा यन कर यन गर अमर मदा अधिकार

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(७२)
" गायन ॥
करले २ ये चतन करनी समय मिला अनमोल
भूल भूलैया में मव खोया खाने गोते भारी।
अन्न काल से भटक रहा है अय करले तैयारी ॥
मात पिना सुत यन्धव भगनी धन दौलत भी पाया।
चोर पलि है कुटम नहीं है क्यूं इसमें भरमाया ॥
पर की खातिर काल गमाया मोह माया में लुभाया।
करि कमाइ नहीं कुछ आकर उलटा यहां गमाया ||
तु नहीं किमका कोई नहीं तेरा मब झूठा है पसारा ।
पर को चिन्ता छोड़ा चनन करलो निज निस्तारा॥
अपना • देश पुकारन चले गए कई राजा ।
रामचन्द्र युधिष्ठर जैमा जग में नाम कमाजा ।।
मूल पंजी को हार मन ना नफा कमा कर जाना।
मनुष्य जन्म मिन्टना दुःकर है माय चैन हो जाना ।
पुदगल नामीन अविनामी यही तत्व है मारा।
गुदगल वाद मिटावे मत मुनी पार मोक्ष द्वारा ॥
।। गायन ।।
मानो माना गया बहिनो लाडो सब मिथ्यात ।।
मनुस्य जाम पाया मुश्किल से सुनलो ध्यान लगाई।
अन्य मामे जनम न यावे गम को ममझाई ।।
जनी कुल में जन्म लिया मन गुम की मगत पाई।
नि मास्त्र का पहा मुनो जरा मिथ्या दिल से हटाई॥

होली माता तीज न पूजो राखी और गनगोर ।
राम देव भैरू भोपा को पूजा फल न होई ॥
चोदरा में दाना पानी डालके करी पूजा ।
नीति मार्ग दया को छोड़ा ये क्या उल्टा सूझा ।।
झाड़ो और मूर्ती को पूजके धन ओलाद को चावो ।
उनकी रक्षा उनसे न होती तो तुम क्या फल पावो ।।
सुघ देव गुरु धर्म शास्त्र से रखो सचा प्यार।
सफल होयगी मनोकामना संत मुनि जय कार ।।
॥गायन।
तज दो तज दो ऐ प्यारी पहिनों फैशन का प्रहार
तजे पुराने जेवर अब तो पायल को अपनाई ।
सीधागूधना छोड़ा अब तो टेढ़ी माँग जमाई ।।
पति देव की एक मास की द्वादश की है तनख्वाह ।
तुम्हें फैसनेविल कपड़ों का खूप लगा है चसका ॥
रिष्टवाच तुमको एक चाहिए साठ रुपया वाली।
पियर सोप नाहने को चाहिए टेढ़ रुपया वाली !!
सादी वस्तु सादा कपड़ा सादी यन कर रहना ।
नाथ मुनि कहे सुख चाहो तो मानों मेरा कहना ।।
॥गापन।
तुम सुनो सभी नर नार ध्यान घर आज कृष्ण गुण गानो
जयन्ती आज मनालो।।

(७४)
पापों की कल मिली छाई थी दुनिया भी अति दुख पाई।
फिर जन्म लिया उसी धार मुखी जय पापो-जय
ये अरघ निसानी भी आई थी घनघोर घटा भी छाई थी
अथ करके आय प्रकाश पुण्य प्रगदायो ये धर्म दलाली
भी की थी।
दुनिया को साता दीनी थी फिर पांध तिथंकर गोत्र
अति सुख पायो-जयन्ती
सेवा करके पतलाई थी, साप जीतन पे रखाई थी।
अरे बुढ़े की उठावे इंट नाम कमाओ
जो महा पुरुषों के गुण गावे, यो इस भयपार अन
सुख पाए ये मनुष्य जन्म को पाय भाष सुध लायो ।
|| गायन ।।
क्या २ सत्य ताई यह है वृक्ष हमें सिखलाते,
अपने अपने मोसम पे जप गृक्ष लय फल जाते ।
छोड़ शीघ करड़ाई नम्र हो नीच को
झुक
जाते ॥
मार मार कर हेले लोग जब चोट इन्हें पहुंचाते ।
तप खुश होकर देग्यो मीटे फल ये वृक्ष चरवाते ॥
सर्दी गर्मी वर्षा का दुग्व अपने पर ही उठाते ।
पर निज आश्रित जीयों को तो हरदम सुग्व पहुँचाते।
सदा दमरों को फल देते स्वयं कभी नहीं खाते।
दान चारना और कृमणमा साथ ही साथ सिखाते ।

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गायन । सुनलो २ ओ बंधु जग में कैसे थे नर नारे। सत्य की खातिर हरिश्चन्द्र ने भरा भंगी घर पानी दुख सहे रोहित सुत केसे पिक गई तारा रानी ॥१॥ राम लखन और सनी सिया ने धन में दुख उठाया पितु आज्ञा और भाई प्रेम का जग को पाठ पढ़ाया ॥२॥ आठ ललनों का सुख धन जम्बू ने छिट काया चोर पांच सो को समझाके मोक्ष गति को पाया ॥३॥ कामदेव अरणफ आवक को देव डिगाने आया निश्चल रहे धर्म के ऊपर सुर ने शीश झुकाया ॥४॥ बन्दक गन सुग्व माल मुनि सुर क्षमा वन्त ते भारी वीरेख बाल उतारो डिगन पीर लगारी ॥५॥ काया माया मोह हटाया बंभव तज सुख पाया केवल मार ग्रही दुनिया में धर्म कर सीव माया ॥३॥ || गायन।। फंक देते फल ज्यों वाय तन नहीं लना कोई चतन निकल जाने के बाद । निकल जाने के बाद ।। आज करते जो किलाल दिल है माथ में कल देख डरंग नन निर्जय हो जाने के याद || यात भी करने नहीं आज धन की गठ में भि नजर आने वही नकदीर फिर जाने के याद |

(७७
बोलते जप लगे सगे हैं जय पार पैसे पाम में
नाम भी पूरे नहीं पैसा निकल जाने के बाद ।।
स्वार्थ प्यारा रह गया असली मोट्यन उगई
भूल जाना मां को पहलाएं निकल जाने के पाद |
भाग जाना ईसा भी निर्जन सरोवर देख कर
: छोड़ देते वृक्ष की पत्ता झड़ जाने के याद ॥
इस अधिर संसार में क्यों मगन कुंदन हो रहा
देख फिर सता महीं असुन्न हो जाने के बाद ॥
॥ गायन ॥
यंकाई पड़ो पसरने डागी धारे कणी जगह जाबाकी ।
कटी पाखरगी कठी अंगरखी कठी पागड़ी नाखी ।।
अरे टीकर टेमरी खबर खोज नहीं कटगी गांठ टका की
अरे घर घर जाण टुओ यो गाफिल रेल घणी दादगी :
चहे जड़ी ने पड़े उतरने या है रीत उनकी ।
आयो कठे सु को उत्तरंगा कितना टेसन याकी ।।
खादी भंग गाल में की धी बोतल पीपी आखी ।
कौन सुणे न किने कैवाँ हालत है नशा की
शंकर सावधान हो जाने देख दशा दूजा की ।।
।
गायन ।
ईश्वर का गायन नहीं किया तो क्या है गायन गाने में।
प्रभूके प्रसाद में स्वाद नहीं तो क्या है वरफी के खाने में।

(७%) फिर जाये थाहे शत्रुन्जे गिर नारि सी करके औरमथुगा, मन शुद्ध नहीं तो क्या है गंगा में गोता खाने से ॥१॥ दिन रात मंदिरों में जाकर मिर घिस्ते २ घिस हाले। गंतन स्वरूप का ध्यान न हो तो क्या है ठोंग पनाने से । पंदित उपदेशक का पद ले मुंद फाइर उपदेश करे । गदि शुद्ध मत्य आक्षम नहीं तो क्या सिधान्त सिसाने से पाहै मृत्यु जन की अर्थ यहाँ क्लिना मिष्टान्न तैयार करें। उपकार गुणों का स्मरण न हो तो क्या है माद जमाने से मीटे अमृत मम यमन कहे अनुराग प्रेम से भरे हुए। विष कम पेपा मुंह बंद करके क्या मिश्या प्रीत दिलाने से कोटीम देय देयी पूजो चाहे प्रिय च्या से । र का गम गदि मुनि नहीं तो क्या दगा धर्म कमाने से मायन पाना मना की तुम माग्न भयो ना जायना 'मन मा मुमा आमामान मिद गति पायना । या ना गन बना मन मोटा अभिमान Teraiनान पट अन्दाजीय आपिरमरजायन मा नमाना जानी की नहानी भी मत बोलो यह मर जायता "की या ठाली दुम न दीजे

(७६)
खूप
रहार परभव का कीजे दढाढीलफरो मनभाई फिर पछतावनारे
तनातू क्या लेकर आयो थयाथिर नहीं रहेगी
बाय ददा दूर हददे माया धधो धारे समकित रंग
मद गति पावनारे पपा पाप को दूर हटायो फका फिरे
ही पछतावनारे यया यचन को
निभावो भभा भक्ति
वेगर हरगिज मोक्ष नहीं पावना र
या याद करो ईश्वर को ररा रोको अपने मन को
ला लोभकरोमत धन को ववादोरी पल को छोड़तिरजावना
सा समाकित को सार पपा वह
ध्य हृदय विचार शशा शास्त्र
य उचार हहा हंस राज कह हृदय दया विचार नारे
मन पीयो तमात्र आवे मुखड़ा री भंटी वामना
जरदो खाचो चूनो रचावो जिनसे बिगड़े धन
पद्मीन योली थुक २ क्यूं जगह दिगाड़ो कन्त
मगज समापन चाली या तो रही न नरकी डीन
कपड़ा वासे आप खाँसे आवे छींक पर कि
हुको पड़ी चिलम पिये से घर मांग भीग्व
चले वायरो उड़ चिनगारी नहीं पीवन में ठीक
आग लगा धणी आदिका घर का मा जा
लोग हंसे और घर में हानि स्त्री धान समझाई
समझ तमाखू संघ लीन काई कुत्ता न बागा
जिनको पीवे मान वीसरे उनका सारा भाग

कथा मानो मति करो जी बुटी तमाखू हेत
टका एक की टांट में मारे दिन उगाही देत
हुका से हुरमत सप पिगड़ी लाज शरम गई छूट
सयका ऊँटा भूठा पीवे गयी हिया की फूट
सुख दुख देख दम्य परायो थे लेवा भागी कीन्हों
भूखा मरता टापर रोवे धुक २ तमाखू पीवो
धाँको लल्यो का जोसर फेर विगाड़े दंत
गुल उघाड़ी रास उड़ावी संह नमाखु खाथ
चिट्टी पाल दियासलाई फेकें ताके योड़ सभी जल जाने
घाम तणो नुकसान
बीड़ी देवी तृली देवो इनके हाथ पसारे
भीड़ी याज की दशा देखकर मंगताही झकमारे
घर में बीड़ी योर में बीड़ी झाई जाता पीड़ी
बीड़ी के बस मा पड़या कीचड़ में कीड़ी
चाओ पीवी मृघनां कयन याकी गयो नमाल पर दृष्ट पड़ों
ज्यं भिष्टा पर माग्यो
झाई जानां मीड़ी पीवो भी थे उह काओ
थां के मरीवा मृगला म्हाने और नजर नहीं आये
मांची यान कह कं थाने भूठी एक न भावं
धीक यान न होश नहीं जाने वाट भी पीय तमाख
इकोनो हुद कर मर चिलमना हैं चंगी
भाग्य पादुर पट्टा धे ज्यं मुठा पर भंगी

जो कोई बामण पीवे तमाखु उनको देवे दान
वामन गाव गहूरो होसी नरक पड़े जजमान
धर्म और धन बिगड़सी और विगइसी काया
अकट बिगड़ रह जासी आदी जिनस में समझाया
एक बीड़ी के कारण से थे अपने जीव हरायो
दोकणी में पानी लेकर डूबकी ले मर जावो
घे सायपली जरदो खावो भारी मिलावो चूनो
मुखडो धारों ऐसु बांसे जाणे जाजरो जूणों
इससे खोटो असर पड़े से छोरा ऊपर थांको
अब तो बीड़ी और चिलम ने तोड़ फोड़ कर नाखो
हिहं आर्य और जैन धर्म दुर कोर
तो भी नकटा पणा करके पड़ा तमाग्वृ लारे
घांसी खांसी दमो होसी पहली पणो खेग्वार
ऐसी तमान्नु पीकर कन्धा फाई कादोगा सार
मानो तो या सीख हमारी, नहीं मानों मरजी
म्हें तो म्हारी तरफ से धाने साफ सुनायां बरसी
धांको न्हाको घर नहीं न्यारो जिनसे कटवा थाने
ऊँच नीच कोई यात करी तो मां करिजोहान
तुको-दादी जले मूग जले सिम्मा और सून जले
लार जसे इंटी अटे धुन के पान से
आंख और कान जले नाम और जवान जटे
शानी और माधो सटे नाड़ी पीच पंक्षा पसे

(८२)
हुक्के की मिरम से दंत की पा और होट जले
हुका से हारा से हाथ जले जगत झूठ खाने से
॥ गायन।
यहां के महल मंदिर और न विस्तर काम आएगें।
ए मिष्टर ये मदर तेरे न फादर फाम आएगें।
नहीं यहां काम आएंगे तेरे धंगले या फुलवारी
नहीं वहां हीरा मोती और जवाहर काम आएंगे।
हजारों दोस्त है तो क्या यहीं तक की मोहब्बत है
की ब्रिटिश एम्पायार केन मैम्पर काम आएंगे।
यहां पर लोक में नहीं काम आते जज या बैरिस्टर
कजा के सामने वना न लीडर काम आएंगे।
हुक कामों से मरांसर है मुलाकात यहुन गहरी
मिपारप के वहां उनकी न लेटर काम आएंगे।
मयारो पठने की वहां प केवल और ही होगी
चलती रेल माइकिल और न मोटर काम आगे।
|| गायन ।
नर्ज-मरम्ब मन क्यों करता अभिमान
काल वलीहल आन याये छिन में लेवे प्राण ।
मन ढालत मय महल मालिया
कुछ मीन अपनो जान
मग मयन्धी जिम प्यारं मय ही सुम्ब के जान ।
विपन पड़े कोई काम न आये मतलय के सय जान
जगह है मुमाफिर खाना न सोया चादर तान

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(४)
महा पुगप अपनीत को भी हारे विपदा सारी।
गोशाला की रक्षा कीनहीं तापस तेजु निपारी ॥
महा पुरए पाते हैं शालि पापचार संहारी।
दर करि या पामें प्रमू ने पशु हिंसा दुखकारी ॥
उदय भगन से निकलेगी जप पिपया सा सुखहारी।
साही आत्मानन्द मिले यह पीर कपन बुरा हारी।
पनो कर्म योगी कर सुगृत होयो पर उपकारी ।
पृथ्यी गन्द्र के पाली पनकर प्रमू ने जनता मारी ॥
।। गायन ।।
प्रणा ग यानी जिगजीर की मान उमी को
पारकोमान भाग मिट मिट जाय।
पादान करना कभकार भिजाये।
माराम: मीठा नहर पाल मे नही मेट ।
मे नाम आगगा मिट्टी का।
पीटा गय मना पाय माप।
मादा पानी र मम॥
प्रोमानी TT Triरा गजमा।
काम मारनामम्॥
जनन पारmी पाटी
कारमा पाया।

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संगठन कच्चे धागे का होने से रस्सा बन जाता
अजि गज राज को छिन में देत वो यंध ठारी है ।।
संगठन प्रेम से निभता प्रेम को प्रथम अपनाओ
'अमृत' से ययन वर्षा कर उन्नति दे पधारी है ।
गायन ।
(तर्ज-सुन्दर रहिजे महिलो माय)
करलो मात पिता सेवा सुख पहुं पापना रे।
जिमसे मिलती शुभ आगोश विपद नहीं आवनारे।
करके के तन का मोपन करते तान मात सुत पोष
उनका उल्टा देते दोपण लज्जा लावनारे ।
मित्री यहा नाम उपकार कैसे भूल मके इणवार
जिनके चरणों में हरवार कि शीश झुकावना
आयत तीर्थ मूगी मोटा उनको दुग्य देने में टोटा
ग्योटा नजकर के अभिमान के यिनय दिखावना रे ॥
मागत भक्ति धीर बताई उनको मृल मकों किम भाई
आई कल्प सूत्र में बात के ध्यान जमावनार ।।
परा पुण्य वन्त जोधमा मायत सेया रोजल लेसी
यांका अमर नाम जग रमी 'अमृत' गावना रे ।।
भाग्न की गवली गान अहो देग्यो इन जैन दुलारों ने
प्रताप मला जय देश नज, यल भक्ति भामा शाह
दानी कैसे हाने बनलाया जैन दुलारों ने ।
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(
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असली दिवाना और है नकली दिवाना और है ।
व्याख्यान सुन तल्लीन हो, मस्तक हिलाना और है।
आत्म रस में मम हो आनन्द पाना और है
धर्म सेवा ज्ञान सेवा संघ सेवा ना करी।
मुखिया कहाना और है सेवा बजाना और है ।।
आश्रय सर्वश का लें खंचने एक पक्ष को।
सिद्धान्त पढ़ना और है पर रहस्य पाना और है ॥
गोतम व केशी की तरह संघ दल के नायक हैं।
प्रतिष्ठा पाना और है कर्तव्य यजाना और है ।।
महावीर के सेवक हमी असली यों कहते हैं सभी।
अनेकान्त कहना और है अने कान्ती बनना और है।।
धर्म ध्यानी 'शुक्ल' ध्यानी यनना चाहते हैं सभी ।
विभाष ध्यान और है स्वभाव ध्याना और है ॥
गायन ।
करो प्रचार दुनिया में प्रभुका नाम लेकर
प्रमन्न चित हो धर्म ग्वातिर जो अपने प्राण खोते हैं।
यहुत कम से कोड़ो में मनुष्य पुण्य वान होते हैं ।
बिलासिता पढ़ी दुनिया चाहे सर्वस्व लुटा देवे ।
उदय जय दुग्य कर्म आ फेर नादान रोते हैं।
पढे मिथ्यान्च या एकान्त में, नर तन को खोते हैं।
ममय अनमोल जाता है वे चादर तान सोते हैं ।
V

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(8.)
द्रुपद सुता को कष्ट दिए अति दुर्योधन अज्ञानी ।
अन्याय किया प्रतिव्रता से तो कुल की हो गई हानि ॥
गज सुकमाल मुनि सिर उपर अंगोर रखानी।
दान शील तप ग्रहण करे हो, अष्ट कर्म की हानि ।।
पूज्य गुरु सु प्रसाद पाय मति 'शुक्ल' मुनि कहे वाणी।
सोमल मर कर गया नरक में मुनि मोक्ष गति पामी ॥
खन्दक मुनी के शिष्य पाँच सो धानीसे पिल पानी।
पालक मर कर गया दुर्गति मुनि सिद्ध गति पामी ।
रामचन्द्र को राजतिलक की हो रही थी येठानी।
कर्म यजाई ऐसी भेरी पन को दिए भिज वानी ॥
राज दुलारी चन्दन वाला मूला दुख दिरानी।
पूरण अविग्रह किया धीर का निरा वाद सुख थानी ।।
॥ सत धर्म,
। गायन ।
तर्ज-मुझे है काम ईश्वर से
मिया जिन वाणी के दुनिया मभी धो के की रही है।
प्रलोभन में फिरे प्राणी विषय तृष्णा की भट्टी है ॥
फिी तल्लीन स्वार्थ में प्रेम मय रण में पदला
बिना मवन के वाकी धर्म धाके की ही है ।
फोई ज्योतिपि कोई स्याना कोई नंतर मंतर पादी
लगा कोई हा फरी में मभी भद्र पर घही है।
धर्म सेमींचकर आग्नं पाप दिन रात करते हैं
और तो क्या यह सुन्दर तन भी होने घाला मिट्टी है

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(६२)
॥ निर्मल आत्मा की तर
॥गायन।
म
तर्ज-हमें तो काम जिनवर से जगत
अरूपी आत्मा मेरी को क्यों रूपी
मुक्त हूं अष्ट कर्मों से उसी में फिर
अज्ञानत से अपने से भी मुझे नीच
कल्पना करके भगवन की मेरी
पिनाए विश्व भर का सिद्ध आत्मा
किसे फिर पाटने में लोरियां देकर
सर्दी हो चाहे गर्मी हो मुझे
पहिनाते क्यों मुझे वस्त्र या क्यों :
मैं यद्धान्म हं निर्मल हूं यनों तुम भी
पड़े मिथ्या भ्रम में तुम किसे मल
यमा निर्पिकारी कामना मुझ में
पुष्प रस गायन यादिसर भला:
में निस्कर्मी नहीं भूम्बा मिष्ट फल
यथा से नाम मेरा पाप क्यों नित
धर्म करके जाल मिस्या का ।
और
"
रसानल
.
मेरा
5

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ME आत्माकी तरफ स॥
*inatam Ramait!
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Marwari नी नील बना।
* * * भाhinig initi
4tantra ।
- rk ra, citint are it
* पा 11 मानी।
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(६४)
मिले तार जप निर्मल आकर जनता ग्रहण करे सयमा
यात्रादिक सुख का -प्रेम की...
प्रेम पिना च नहीं यहां है फिर सुर पुर या मोक्ष कः
'एक्ल' यान शुभ धार-मेम की।
यन।
धर्म
बजे :-शान भारत के लिए प्राण भारत के लिए
जनिया अप रक्षा के लिए तैयार हो।
स्टाल दो लुट गए अपनीद से मेदार हो।
पाण्डियों ने टान रपी है मिटाने की तुम्हे ।
पपाद आलम में मगर तुम मीनदोमर मार हो।
नट माधना सामान के मांगी मान !
काल पा ममी को हम कदर येदार हो।
माता मंमार मग्गा माग पतलाये कोई ।
Mr मा मं में पारा
निगद का अनातिना मुमा धर्म है।
पाग मागणी जीयो का निग्य उदार हो
मी गार निगमेदान में।
अन्गार कारनामार्ग प्राणामधार हो।
आगाmumit मा गामने।
Sumi

(६५)
*
विशाल
हृदय हो आपका देश धर्म सेवा के लिए।.
सर्वस्व लाने पर खुशी हो इस तरह का प्यार हो ।
फुट का मुंह काला करके साफ हृदय से रहो।
त्याग अवगुण का करो सद् ज्ञान हृदय संचार हो ।
ध्यान गुम धर्म अपना आत्म तारया के लिए।
. 'शु' लेश्या ध्यान से ही जन समूह भवपार हो ।
॥ आत्म शक्ति ॥
11 गायन ।
पलों में आत्मिक यल धार
आत्मिक पल का जिस घड़ी होत हृदय संचार ।
तन पल धन पल अरू पशुयल होत तुरंत फरार ।
सिंह को देख के जैसे स्पार ।।
पालक पनीर से यूं कर रहा खंदक मुनि पुकार ।
तेरा पल यह सर्व तेज है ओ जालिम पदकार ।
। स्टेगा त अनंत संसार ।
फरले मन माने सितम तृ भी दिन दो चार ।
रोना होगा तुझ और नृप को पढ़े जमों की मार ।
पाप की नौच न होगी पार ।।
दस फंधर तू है पली जाने.सप संसार ।
मैं भी दासी श्री राम की सीता अयला नार ।
परे हर सो पापी मार ॥
मेरे पट के सामने पह तेरी तलवार ।

क्या मजाल जो कर मके मेरा वांका चाल।
यताता क्या धमकी हरवार ।।
जहाँ धर्म तहाँ हैं विजय जहाँ अधर्म तहाँ हार ।
कहाँ दुर्योधन की शक्ति कहाँ द्रोपदी चीर गज चार।
मान का अंतिम खाना म्वयार ॥
वीर सिकन्दर योद्वा था एक यूनानी खूखार ।
उसने आकर पराजय पाई चन्द्रगुप्त नूप लार।
भुका चरणों में फेंक हथियार ॥
धर्म धीर डरते नहीं मरने से जिनहार ।
जैसे भुनि खंदक चले धर्म वीर अवतार ।
क्षमा से पाया मोक्ष द्वार ।
गज सुकुमाल ने अग्नि धराई सिर श्मशान मंझार ।
मामल पापी पाप कमा गया चौपी नरक द्वार
जीव की करताद्वैश चार ।।
मामा शाहने गिरता गिरना राणा लिया उभार ।
देश धर्म इन्चत को रग्या 'शुल' मभी कुछ बार।
धर्म से जीता शास्त्रानुमार ॥
॥ कर्तव्य पालन ॥
॥ गायन ।
नज :--प्राण भारत के लिए
कतव्य पालन ना किया मनुष्य बन पाया नो क्या।
दुग्न न दुखियों का हस मंमार में आया तो क्या

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(१००)
सगडाल नियंठा कुण्डकोलिया रसिक जिन वानी का ।
आर्द कुमार सम मिश्यामान, मसलो अज्ञानी का सुमन
खंडक गजसुकुमाल धर्म रूचि अर्जुन माली का।
प्रति त्याग नियति है मंत्र मोक्ष निशानी का सुमर॥
काम देव अरणक सुदर्शन हद श्रद्धानी का।
मम्यक शुद्ध प्रतधार भ्रम सज अनित्य जवानी का समरा!
दुनिया र भूटी जाल भयंकर है मिजमानी का।
ले धर्म कमाई लार नहीं घर आगे नानी का ॥सुमी
म्यमाय में कर संतोप आमग छोड़ विरानी या।
धम 'क्ल' गुम ध्यान मदा होता नमानी का ॥सुमर
॥ जैनियो जागो॥
|| गायन ।
-प का परिणाम प्राणी मागते मंमार में।
वन करने का नहीं पूरा कर दिखाओ जैनियों,
मंच की गिनती शुई शनि पढ़ाओ जैनियो
শাখার সাত সাদি খালানি ও বিষাক্ত,
कत्तं व्यपानाम अपना मम मजामा जैनियो।
अभिमान श्रम को छोड़कर भगीर का मार्ग लामो,
fort की प्रेम में गानी नियो
यो हे पथक श्रदा गनार समाकर आपकी,
मय की भी सिली नामोनियों ॥
छोड़ दो सिम मानी दाल का था.

बीर वाणी ज्ञान का प्रवाह बहाओ जैनियो॥
निन्दा व चुगली में हुआ सब हाश आत्म शक्ति का,
संग्रह करो चित्त वृत्तियां भगमें लगावो जैनियो ।
अपने अपने शास्त्र का प्रचार दुनिया कर रही,
तुम अपने व्याख्यानों को मत मिश्रण पनाओ जैनियो ।
तत्व का व्याख्यान हो मिध्यात्व हरने के लिए,
दुनियां को खुश करने में मत शक्ति गमाओ जैनियो ।
भाव निक्षेपा व राद्ध नय की तरफ आगे यहो,
आत्म विकास के प्रेम की उर्मी लहरावो जैनियों॥
शुक्ल' शुभ दो ध्यानों का अभ्यास नित करते रहो,
पर गुण में रमना छोड़ निज गुण में समायोनियों ।।
॥ कर्म दशा ॥
तर्ज-विना
रघुनाथ
के देखे नहीं दिल को करारी है।
शुभा शुभ कर्म प्राणी को हंसाता भी लाता भी
गति हो जैसे पागल की मुलाता भी यचाता भी
पनाता शादों का भी शाह फरे दर दर का याचक भी
राज ऐश्वर्य प्राणी को दिलाता भी छिनता भी ।।
खुशीमें पज रही नौवत सभी मंगल मयी गाने
कर्म चार बदल उल्टारूआता भी पिटता भी
परिवर्तन शील है दुनिया चाहे परिक्षा फरो सोसो
समय का चम में ऐसा गिराता भी उठाता भी।

(१०२)
सदा ना एक रस कोई गतागत में कहीं देखा
क्यों कि है नियम कर्मा का शुभाता भी फंसता मी :
जलाशय झरने हरियाली कही यौवन है फूलों का
खिजां करता समय गुलशन खिलातामी सुवासं भी।
ध्यान है चार दुनिया में शुभा शुभ वीर. फरमाया।
'एक्ल' ये आत्म का गुण पताता भी छिपाता भी।
॥ गायन ।
शिक्षा दे रहो जी हमको जिन धाणी अति प्यारी॥
अन्त काल से भटकत २ आर्य क्षेत्र मझारी ।
पुण्प योग मानव भव मिलिया अप करले तैयारी॥
पल पल आयु जाती दिन में उमर घटे छे थारी।
चंतन होतो चेत ले प्राणी नहीं तो होगी बारी ।।
हाट हवेली याग यगीचा मभी धरी रह मारी।
अन्न ममप दांतों की चंपा काडी लेगा थारी॥
कृटुन्य कम्पोला नाना नानी म्वार्थ की महतारी।
घर की नारी प्राण से प्यारी प्रीति छोड़ उस वारी ।।
आग्वं मोच बोटे क्षिण माय सुनो नहीं समारी।
जन्म मरण का दुम्ब अनन्ना कहत शास्त्र पुकारी।
नार क्रीम जाये माई चा वरची सारी।
पर मय जाना तुझको चतन इमकी करो नयारी ।।
करना ही मां काले प्यार काल बन्द कर स्यारी।
पं नहीं होई तुझको प्यार भयके से ले जारी ।।

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(१०४)
4
प्राण जाँय पण धर्म न छोडूं , मैं हूँ जनक दुलारी ।।
कुन्ती ने सुत भीम सेन को आज्ञा देई करारी।
प्रारमण के बदले में जाकर, पूरण कर पकवारी
दुस्साशन ने सभा भवन में पट खींचा की स्वारी।'
पर द्रौपदी ने चीर यहाया अपना सत्य संभारी ॥४
सिलिंका ने अध्योपुर की भारी विपदा धारी।
दिखलाया रण कौशल ऐसा भागे योधा हारी
सत्ययती चन्दन याला की धारणी प्रिय महतारी।
अपना सत्य राखन को दखो मर गई खाप कटारी ॥
जोहर पाई और पद्मावती गढ़ चित्तोर मझारी।
जोहर व्रत दिखला के कर गई भारत में बेदारी
दुर्गा और लक्ष्मी ने रण में कभी न हिम्मत हारी।
मातृभूमि की खातिर आखिर कर गई जान निशारी॥
जय थीं मी यहिन यहीं पर नम थी इन्नत मारी।
जय से पहिने मग मे मिट्टी हया पिगड़ गई सारी ॥
पहिनों अय फिर इठों मम्मल कर निजादर्श विचारी
'अमर' हिंद को मय देशां का करदो सत्ता धारी ॥१
। गायन ।।
टर-पटना:मान माग अपनो मेरा कहना।
इंश भाय कर दर हमा मिलजुल करके रहना
गर कोई गाली भी देखें तो म्युग हो करके सहना ॥१॥

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तात म्रात सम तुल्य नर से करिए यात विचारी।
होप हक नाक खुमारी॥
पिन कारण घर पर जाकरके कीजे न थारी म्हारी।
पर धन, सुत, गृह, पट भूपण ललि करिए ना ईर वारी।
गहो संतोप पिटारी॥
पति परदेश गयो पद्मनी को तजयो सरस अहारी ।
पट भूपण नूतन न पहिरवा तीज त्यौहार विनारी।
न जाओ धाग मंझारी॥
। गायन ।
तर्ज-गोरख ईश्वर जी कहवे तो।
प्यारी! कर पति व्रत से प्रती के जीवन पावना ए।
सुन्दर ! मिनख जमारो पार २ नहीं पावना ए टेर।।
कका, कर्तव्य ओहिज धारो,
ग्वावा, खेल इन्हीं पर सारो,
गगा. गफलत मे मन हारो,
घधा, घट उजियारो पतिव्रत नेम निभावणा ए॥
चचा, चित्त चंचल यश कीजे,
छा, छल छिदर तज दी,
जजा, जश लियां जग जीजे,
झझा, झूठो संसार एक दिन जावणा ए ॥
टटा, टंफ निभाओ भारी,
उठा, ठीक सलाह है म्हारी,

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(१०८)
॥ गायन।।
त-होली काफी
टेर-पालो पतिग्रत धर्म प्यारी सुनो सुहागिन नारी ।
गुण सम्पति जो चाहे जगत में रहो पनि आज्ञाकारी
माग स्थमुर और ननद जेटानी उनकी सेया करो:
मानो मा मीय हमारी॥
पनि भाशा जो कर बंधन है यो
नारी।
उनके माय पान करने में लगे साधन मारी।
लिपयोग नीलिममारी॥
पति, जो आशा देणे तुमको यो यह तिर धारी।
पीयू को ममको मय गुण दाता शोमा मुम भण्डार
को यो श्रुतियों मारी॥
गीय मदनी पाणी कमी की या मीता नारी।
पनिनत बम मम पानी नदि महम मानी।
पीयन जना माग ।।
विममता गयो ज्ञान विशारी।
मा पनि मन में नसी गली मारी।
बना बिल मय ना
जनम TEE IT मनोगत मारी।
mymantrnimही मारी।
मान

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(११०)
कहे तुमको मभी सज्जन यह लड़की धर्म धारी है ॥
यदि तुम चाहो गाने को तो गायो पंच कल्याणक ।
कहे सपहर्ष लाफर के देखो याह नारी है।
॥ गायन ॥
तर भय निकमी जाय।
र-मी पतिव्रता नार मिली पुरुप पुण्य यान को ।।
पंची दोरी अन्न जिमाये मम पियू भगवान को।
दामी ममान कम उटाये पोले मिष्ठ जपान को।
माय मगुर का मान लियो माने यह फरमान को।
पासा नम्रता बन्न प्रात मम पर मान को ॥
कुमद्रागिणी यल अर्धक यहीं पर अगर कुलयान को।
मत्य मला र ममा नाम और नुपमान को ।
मिति में महान पति की माय
मध्यानको
गतिमा प्रतिमा यान हा आदर का महमान को।
टन गा का ममि का गाम का निशान को।
सा मानमत समिपा मार को ।।
।
मिय : सनमान की।
Trnatara चान को।
नगाव - Stara नादान की।
*.न
मिसान।
, arm. अभिमान को।

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|| गापन।
मरमियानगीना
में अंगरेजी पर गई पालम खाना नही पानी॥
में अंगरेजी पा कर आई मर्टीफिकेट पी० ए० का लाई
हिन्दी उद पड़ी नहीं अब नाक कटाऊंगी।
दाल माता रोटी का याना ये मेरे मन में नहीं माना।
না যি মz দি গা ।।
नही हे को मिला कर नही मान्य काम
नीगंन्ट उन्ही गटाल करागी।
मार और माग ग्रीन पार
प्रगना fanm बहनदा में मारगी।
man FRAR अन पंगणे आप निमार।
AMERI # मग मी ॥
गा'
पाटी
मी
-" on firml
• हीर

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॥ गायन।
तर्ग-रसिया नवीन।
पहनों वस्न स्वदेशी बहनों ! कहनों मानों हमारोए।
खादी के कपड़े तन धारो, जिन से होसी भलो तुम्हारो।
प्यारो भारत देश इसे अय मति विसारो ए॥
कान हाय से सूत सहेली खादी यनवाचो अलबेली।
पहिले को मर्यादा सग्दी जिसे नाहीं बिमारो ए॥
झीणा कपड़ा तन पर धारो दिखे मारो पदन उधारो।
निर्लज दो पोपाक त्याग नन लज्जा धारो ए॥
मीणा कपड़ा से सुन प्यारी शीत घाम नहीं बचे करारी
उनकी रक्षा करी वस्त्र मोटे तन धारो ए॥
धर्म अहिमा यहिन तुम्हागे चाय के कपड़े नन धारो।
कसे होमी भलो यहिन दिल बीच विचारोए॥
गायन ।
नज-नवडा बाम तो पडजा।
भवर म्हाने चर्चा मगवादी • कानां झीणो मन
जिनकी म्हान रजी मंगवादो।।
गणं रदियो मिर-चाले अनोम्बी चाक ।
नाकर चाकर शाही मयकी, धरी रह गई धाक ||
भारत देश दुनिया तक को, माधा को मिरमोड़ ।
आज मनी जगह हमी देश को मिल रही है होड़प होर
मय देशां ने पालना मा यनिया आज आजाद ।
घर को बाढी पहरन लाग्या शीग्या आय सादा साद ।।

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(११६ )
॥ गायन।
तर्ज-सीता माता की गोद में हनुमन डाली मृदड़ी,
ओहो २ ए अयि प्यारी ! पतिव्रत धर्म को चंदड़ी।
ओहो २ ए सुहागिन । शील सुरंगी चूदड़ी।
मन मलमल देसी मंगाओ
जिनको ज्ञान गुलाबी रंगाओ
उन पर गुण गोटा चदवाओ
ऊपर विनय खेल बनवालो चम चम चमके चंदड़ी ॥
सुरभो शरमाई को मारो
मिस्मी मीट पचन उचारो
हिन्दी पति प्रेम की धारो
नध नो पति नाम की राग्यो जगन लग्बी है चंदड़ी ॥
चूड़ी चतुराई की पहरी
कंकण जान तणी है लेगे
झोला झंट यचर ने फेरो
प्यार धार हर्ष को हार के हरदम ओपे चंदड़ी ।।
माड़ी शील धर्म को पहिलो
करजी मन कबज कर लेनी
लहंगो लटुताई को पहिना
धागे प्यारी से बंश के चाची लाग चंदड़ी।
माम म्यमुर की मया कीज
घर का काम शिघ्र कर लीजे

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(११८)
५० पचाम फुटरी लागे संसार की आस ।
६० साठ शरीर होग्यो काठ ।
७. सत्तर उकचुक होग्या नखतर।
० अस्सी अब जीये तो थारी खुशी।
१० नये अये जीये तो दुनिया हब्वे ।
१०० एफे उपर मिंदी दो अये दुनिया में निर्भय सो
। गायन।
तन-वंशरिया कहाँ भूल आये।
धर्म मय भूल गये कैसे दिन आये।
मत्य के उपर तारा रानी बीच बाजार बिकाये।
आजकल की नारी पति पर अपना हुक्म चलाये ॥१॥
प्रातः काल उठ मात पिता को रामचन्द्र सिर नपाये।
आजकल के बंटा दग्यो छे
जना
যক্ষাব
गया मुदर्शन वीर चंदवा माली भय विसराये ।
अब तो बात ही बार में धर्म छोड़ते जाये
गज सुकमाल मही मिर अनि बन्दक कष्ट उठाये ।
आज परियह आने पर मुनियों का जी घबराये ॥४॥
पभू भजन मत्संग छोड अब नित्य सिनेमा जाये।
चौथमल कडे चार माल धर्म किया सुख पापे ॥५॥

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(१२०)
॥ शुभा शुभ भाग्यके फळ ॥
पर गार पर नित नयन, एक भरं घर ही घर पानी।
पालो पाभ या वागी कराया, एक कहाया है करानी
T.तो पार पिताम्बर ओरत, पान को है पिदी पुरानी।
भाग्यमान हिलर, तीन मत सटमाणी
॥ पुण्य की खुधी॥
म पलायन हाथीन पर।
हाता य नाममा ।
नागीर समान प्रायन।
4. Ma Tना।।
यnaa ar प्राधिका।
कीय inगा।
माग विमाना।
7mm गीपन आ

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Vivied Ratn Satwan Sanghra-11

Author
Bhansali,gobindram
Title
Vivied Ratn Satwan Sanghra-11
File name
Vivied Ratn Satwan Sanghra-11
Text
OCR done
Citation
1923
Published
2011/08
Publisher
Kalkatta,banik Press
Language
Sanskrit
Pages
132
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313858
Barcode
99999990311243.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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