Adarsh Library, Jaipur
Andhe Akash Ka Suraz
Front matter
No text on this page.
अंधे आकाश का सूरज
No text on this page.
अंधे आकाश का
सूरज
•राबिनशा पुष्प
No text on this page.
उन्हें ही-
जिनके पास न कोई आकाश है
और न जिनके हिस्से कोई सूरज
-राविन शो पुष्प
No text on this page.
क्रम
काच-घर
9
तीसरा नाम
अपना-अपना भय
25
उजाले का चेहरा 30
एकदूसरा आकाश 37
कौर 43
हर 48
स्थिर-अस्थिर 59
रेगिस्तान को मछली 67
अधे आकाश का सूरज 73
No text on this page.
कांच-घर . कैसर से पीड़ित लड़की"चेहरे से बेहद खूबसूरत "हर क्षण मगर मौत मांगती हुई आखें और जव जिंदगी से तग आकर उसने एक चाकू से अपने को खत्म कर लिया, तो लहू से भीगा भीगा उसका शरीर देखकर लिपि विश्वास इतना हर गई कि हॉल से बाहर आ गई। उसने सहमी- हरी आखो से इधर-उधर देखा.. पाम का ऊचा-सा पेड। उसके मन में भी कोई ऊंचाई का वृक्ष लग गया"हरी सब्ज़ पत्तियां । वह हल्का-सा मुमकराने जा रही थी कि दीवार पर किसी अग्रेजी फिल्म का बडा-सा पोस्टर' 'अर्द्धनग्न गिरी हुई औरत, उसके पेट से बहता हुआ लहू लिपि को लगा, जैसे आज हर तरफ चाकू हो चाकू हैं और इन चाकुओं से औरत का पेट घिरा हुआ है"हर औरत का पेट । 'एलफिस्टन' से निकलकर वह टैक्सी-स्टेड के निकट आकर रुक गई। उसका मन हुआ, जब आज हर चीज किराये पर ली जाती है, तो वह भी एक टैक्सी ताउम्र किराये पर ले ले, और ड्राइवर से कहे-"मुझे घुमाते रहो "मिर्फ घुमाते रहो इतने दिन घुमाते रहो कि मैं मर जाऊं और फिर मेरी देह को किसी अंधेरे फुटपाथ पर फेंक दो..." मगर उसने अपने पसं को देखा। इस बार वह थोड़ा-सा मुस्करापी । टेक्मी-स्टेड क्रॉस कर वह वस-स्टेड की तरफ आ गई। किनारे एक बड़ा-सा बोर्ड । एक चुप खड़ी औरत । एक बच्चा, एक मुस्कराता हुआ आदमी। एक नोति-वाक्य-"परिवार सक्षिप्त कीजिए।" उसे लगा, यह आदमी सिर्फ इसलिए मुस्करा रहा है कि इसके हाथ एक नये किस्म का ठंडा चाकू आ गया है । जैसे शीत युद्ध होता है, वैसे ही यह नीति-वाक्य का शीत चाकू । मगर इसकी नोक का रुख भी हर औरत के पेट की तरफ ही है।
10 : अंधे आकाश का सूरज लिपि ने अपनी साड़ी को पूरी तरह से समेट लिया। सिटी जाने वाली बस वदी थी । मगध महिला कॉलेज की कुछ लड़कियां मूंगफली खरीदने लगीं । वे सब तंग कुरतों में थीं। दुबली-पतली, बीमार-सी लड़- कियां, सबके पेट की गोलाइयां साफ-साफ दिखती थीं 'लिपि ने एक बार फिर बोर्ड को देखा और आगे बढ़ गई। अब वह वाई तरफ बनी दुकानों के निकट से गुजर रही थी। पिछली जनवरी को यहां पर ये पक्के मकान नहीं थे। रातोंरात उनमें आग लग गयी। चिता की लकड़ियों की तरह ये दुकानें जल गयीं... इन दुकानों में बहुतों की जिन्दगियां थीं। एलेक्शन-युग था। फिर रातोंरात यहां पक्की दुकानें उठ गयीं । सहसा ही लिपि को स्मरण हो आया, यहीं कहीं फायरिंग हुई थी । वह पैर रखती, उसे लगता, ठीक उसके तलवे के नीचे कोई गिरा है, गर्म-गर्म महसूस होता वह शीघ्रता से चलने लगी। जल्द- से-जल्द वह इस लहू के दरिया को पार कर जाना चाहती थी। तलुवे की गर्माहट से वह इतना घबरा गई कि विना कुछ देखे अशोक राजपथ क्रॉस कारने लगी..बेक, एक कार उसे धक्का देते-देते रुक गयी । उसने कुछ नहीं देखा । वह सीधा 'नटराज' स्थित 'एडना' में घुस गयी। 'एडना' उसके लिए नयी जगह नहीं। वैसे उसे 'सोडा-फाउंटेन' अच्छा लगता रहा है । मगर शीतम को पसंद नहीं-"लिपि, तुम इसे विचित्र मानोगी, परंतु यह सत्य है कि आदमी "ढेर-सारे आदमी मिलकर भीड़ के जन्मदाता हैं। यह भी हमसे बनती है। फिर भी हम इस भीड़ से डरते हैं, कतराते हैं । इस भीड़ से अलग होकर शांति और सुकून तलाणते हैं।" - ----"और इसलिए मैं 'एडना' पसंद करता हूं। 'सोडा-फाउंटेन' में कई बार ऐसा हुआ कि हमें प्रतीक्षा में खड़े रहना पड़ा। प्रतीक्षा में खड़े रहना कितना बुरा है।''आई हेट !" "लेकिन शीतम, कुछ लोग सारी उम्र प्रतीक्षा में खड़े हैं, उनके विषय में तुमने कभी सोचा?" "तुम्हारी यही अदा तो मुझे प्यारी लगती है लिपि, तुम हर बात को 'सीरियस टर्न दे देती हो".. और वह खुलकर हंसा था। इतना हंसा था मांच-घर: 11 1 कि लिपि का वाक्य ही घुल-पुंछ गया । हसी अव तक हितरी हुई थी। वह चौंक गयी। शीतम की हमी? नहीं, यह कोई और हंस रहा था। उसने एक कप कॉफी मंगवाई। धीरे-धीरे सिप करती रही। पहले जब वह पटना रहती थी, हर शाम शीतम उसके साथ रहता था । वह फिर खुले में आ गयी। अव वह मुड़कर महेन्द्र घाट की तरफ आना चाहती थी, मगर ट्रैफिक ...मिपाही का हाय."वह रुक गयी । उमे लगा, वह जो चाहती है, जिसे चाहती है, जिधर जाना चाहती है, हर तरफ ट्रैफिक है, सिपाही का हाथ, प्रतीक्षा है। अब वह 'काटा ग्लास हाउस' और सेंट जोसफ्म कान्वेंट के बीच में है। एक तरफ सजा हुआ, जगमगाता, रोशनी और शीशे का घर, दूसरी तरफ सलीव, यानी धर्म, यानी एक किस्म को मृत्यु यह धर्म उसकी राह नही आता, तो वह पटना छोडती ही क्यो"उसके कंधो पर यह मुकदमा लादा ही क्यों जाता...! उमने देखा 'गुप्ता फर्नीचर्स'। सामने गार्डेन धेयम, सोफा- सेटमहेन्द्र घाट के रेस्तरा जाते ममय वह बरावर इन चीजों को देखा करती थी। मन-ही-मन सोचा करती थी, जब शीतम के साथ उसके पास एक घर हो जाएगा नो वह यही से गार्डेन चेयस ले जाएगी। प्रीतम को वताएगो भी नहीं, एकदम सरप्राइज देगी। वह एकदम आगे बढ़ गई। सोमवारी मेला । यहा से वहां तक फर्नीचर्स की दुकानें । सस्तो लकड़ियां, सस्ती कीमत। मगर आज उसकी यह भी हैसियत नहीं कि वह इनमे से भी एक खरीद सके। वह सीदिपा चढकर ऊपर आ गई। काच-घर। यहा वह रोज शोतम के साथ माया करती थी। दोनों देर तक गगा को लहरो को देखा करते । और जब तक शाम बाला जहाज छूटकर माधों से मोमल नहीं हो जाता, शीतम लौटने का नाम ही नहीं लेता'""यह भी कोई बात हुई ! जहाज छूट जाए और उसकी रोशनी के प्रतिविद को हम पानी में विना अनुभव किए ही लौट जाए.!" लिपि दरवाजे को थोड़ा धकेल कर भीतर आ गई। कांच-पर । याहर :: अंधे आकाश का सूरज व भला-भला लग रहा था। रेलिंग पर खड़े कुछ लोग, पीछे बैठे हुए कुछ गि । वह चाय मंगाकर पीती रही। उसने घड़ी देखी । समय से अधिक गया था। पटने आने के पहले उसने शीतम को लिख दिया था-"मैं नाम वाले जहाज से पटना छोड़ गी। मुझे विश्वास है, तुम छूटते जहाज का तिबिंब देखने अवश्य आओगे..." मगर शीतम तो अभी तक नहीं आया ! लिपि वैरे से बोली, “एक कप चाय और''हां, जहाज अव तक नहीं लगा?" --"वह देखिए मेम साहब, जहाज उधर पानी में फंस गया है। उस पार से आ रहा था "घंटा भर हो गया । इधर से निकालने इंजन गया कैसे . लिपि ने कांच-घर से देखा । दूर जहाज फंसा पड़ा था। उठता हुना धुआं । एक कप और चाय वह धीरे-धीरे सिप करने लगी। आखिरी चूंट लेने ही जा रही थी कि शीतम आ गया-"हैलो !" वह वस मुसकरायी-थोड़ा-सा । वैरा आया, तो लिपि ने चाय के लिए फिर कहा । दोनों चुप रहे । शीतम ने कहा, "अरे, कुछ कहो तो...! आज तुम्हारा गुजरा ? और वह कोर्ट ?" लिपि बोली, "फिर डेट पड़ गयी। 'अमन' देखने गई थी, विना पूरी तसवीर देखे आ गई..." वैरा चाय रख गया। दोनों खामोशी से सिप करते रहे। इस वार लिपि का कांपता स्वर उभरा-"शीतम, तुमने क्या सोचा?" "तुम तो बस यूं ही ज़िद करती हो! मैंने तो लिखा भी था' "ऐसे नहीं चल सकता?" - "ऐसे कैसे ?" -"वस, ऐसे ही जैसे अब तक चलता रहा है, क्या हम दोनों के वीच कागज़ का टुकड़ा ज़रूरी है ?" --"ज़रूरी तो कुछ भी नहीं, शीतम, मेरी मां के पास यही एक कागज़ का टुकड़ा नहीं था, और तुम तो जानते ही हो, मेरे पिता ने मां को यह कह घर से निकाल दिया कि वह उनकी कोई नहीं, मैं भी उनकी बेटी - कांच-पर: 13 नहीं पर से मुकदमा लाद दिया। कितने लोग किराये पर अदालत में साये गए, जिन्हे मेरी मां ने कभी देखा भी नहीं था, मगर हर शख्म मेरी सूरत देखकर कुछ कहने के पहले ही भाग गया क्योकि मेरी मूरत पिता से एकदम मिलती है । फिर भी मैं उनकी बेटी नहीं ! मेरी मा के पास यही मामूली-मा कागज का टुकड़ा नहीं है "शीतम, अगर तुम चाहो, तो मुझे यह कागज का टुकड़ा दे सकते हो..." ---"तुम मेरे इंटी को नहीं जानती लिपि "बस, ऐसे ही चलने दो!" लिपि कुछ नहीं बोली। उसके सामने मा का उदास चेहरा घिर आया । वह आंखों के सामने प्याले को से आयो। दोनो फिर खामोश हो गए। पोड़ी देर बाद शीतम उठा-"अच्छा, लिपि, मुझे एक बहुत ही इम्पोर्टेन्ट काम है.."उम्मीद है, तुम मेरी बात समझने की कोशिश करोगी!" वह धीरे से बोली-"रुकोगे नही? यह शाम वाला जहाज, आज तो इस पर मैं जाऊंगी."इसकी रोशनी के प्रतिबिंय को पानी मे..." वोच में ही वह हंसा, "होट वी इमोशनल... जहाज लगा ही कहा है...! वह तो उधर फंसा पहा है. यदि में प्रतीक्षा करता रहा, तो हो गया ! सी यू अगेन।" -और वह काच-घर से बाहर आ गया। लिपि विश्वास को लगा, वह काच-घर में एकदम अकेली है । सब फ्रेम मैं मजबूती से शीशे ठुकै हैं । कहीं से भी वह बाहर नहीं आ सरती । कही कोई दार नहीं और इसी तरह बद-वद उसे अपने फमे जहाज की प्रतीक्षा करनी है.. केवल प्रतीक्षा..! कापते हाथों में उसने बंग खोला। भाज ही कोर्ट में लिए हुए सिविल मैरेज के फार्म को अपनी मृट्टी में रखकर वह धीरे-धीरे पीसने लगी...
तीसरा नाम है। कमरे का ताला खोलकर वह भीतर आता है । वैग एक किनारे रख देता है । ताला मेज़ पर रखता है। हाथ में चावियों का गुच्छा है और उस गुच्छे में चौकोर प्लास्टिक का एक टुकड़ा । पिछली बार टूर पर निकला था, तो एक शाम प्रदर्शनी देखने चला गया था। साथ में वोहरा भी था। किसी भी रिप्रेजेंटेटिव के लिए शाम का वक्त काटना बहुत मुश्किल होता यूं ही सात बजे तक इधर-उधर करना होता है और फिर, किसी किताब की दुकान पर धरना । उसे कभी-कभी लगता है, उसके भीतर कई आत्माएं हैं. एक वह, जो सुबह-सुबह नहा-धोकर वैग में कितावें भर- कर कन्वेसिंग को निकल जाती है-"यह देखिए साहब, हमारे यहां से नई ; निकली है 'ऑफसेट प्रिंटिंग एक भी प्रूफ मिस्टेक निकल जाए तो इसमें जितने टॉपिक्स हैं, अव तक प्रकाशित किसी भी पुस्तक में नहीं.." और सर, कवर ट्राई कलर में है. साथ ही वानिश्ड...।" धीरे-धीरे दिन ढलता है और दूसरी आत्मा पहली से आकर कहती है-~"वाई, तुम्हारा टाइम ओवर'.." फिर वक्त काटने की एक लाचारी चारों तरफ भर जाती है। इस शाम का क्या किया जाए !.. ऐसी ही एक शाम थी, जब करने को कुछ नहीं था, वह बोहरा के साथ प्रदर्शनी चला गया था । स्टॉल्स अभी पूरी तरह से सजे नहीं थे। कुछ तो अभी बन ही रहे थे। पहले दोनों ने पॉपकार्न खाए । फिर एक-एक कप चाय । देखने को कुछ खास नहीं था। चाय की दुकान के सामने ही मौत का कुआं खोदा जा रहा था। दोनों उठकर वहीं आ गए थे। कुआं खोदा जा रहा था और वह आदमी भी वहीं था, जिसे तैयार हो जाने पर इसमें छलांग लगानी थी। वह कुएं को देखता रहा, अचानक उसकी आंखें उस आदमी पर चली तीसरा नाम : 15 गई, जिसे कूदना था "कही कुछ नहीं "वह शात भाव से कुएं का मुदना देख रहा था और जाने क्यों, उस आदमी की आये, उसे एकदम कुमुम जंसी लगी थी... हर बार की तरह वह टूर पर जाने का आर्डर लेकर आया था। जाने की तैयारिया शुरू हो गई थी। कुमुम एक-एक चीज लाकर रख रही थी। वह सूटकेम में पैक करता जा रहा था। हर काम वह तेजो में कर रहा था । एक बार जो उमने सिर उठाकर देखा, तो कुसुम, गुमसुम मुड़ी उसे एकटक देख रही थी। उसने पास आकर कहा था-"पसी के लिए आखिर बाहर तो जाना ही होगा न..." --"मैंने कभी मना किया है ।"-और कुमुम दूसरे कमरे में चली गई थी। वह फिर सूटकेस में कपड़े ठूमने लगा था। उस आदमी को आंखें "एकदम कुसुम की आखी की तरह थी-"मैंने कभी मना किया है...पैसों के लिए आखिर कूदना तो पड़ेगा ही..." और उमे लगा था, मिट्टी खोदता हुआ मजदूर और कोई नही, वह स्वय है--हर बार, वह को तरह अकेलेपन का एक कुआ खोदकर कही लग आ जाता है और कुसुम रोज इस अधे कुए मे डूबती रहती है... --"क्या देख रहे हो? चलो न।"-वोहरा ने कहा पा । वह चौक गया था। दोनो आगे बढ़ गए थे। एक स्टाल मे चाबियों के गुच्छे लटक रहे थे । वोहरा रुककर देखने लगा था। अनमने भाव से वह भी कुछ नमूने देखने लगा तभी ख्याल आया था, क्यो न एक को-रिंग कुसुम के लिए ले ले। उसने कागज पर कुसुम का नाम लिखकर दिया था। दुकानदार कम्पोज करने में लग गया, तब तक वह डिजाइन पसद करता रहा । एक चौकोर प्लास्टिक का टुकड़ा उसे पसद आया। उसने दुकानदार को बढा दिया। दुकानदार ने कम्पोज किया हुआ नाम एक मशीन में लगा दिया। स्विच दवा दी। टाइप्स गर्म होने लगे। जब पूरी तरह गर्मी आ गई, तो उसने नीचे वह चोकोर टुकडा रख दिया। फिर एक हरा चमकीला वागज उस पर रखकर, टाइप को दवाया और जब दुकानदार ने वह प्लास्टिक का टुकड़ा उसे दिया तो वहा एक नाम चमक रहा था-~-कुसुम । इसी मजदूर 16 : अंधे आकाश का सूरज "कितने पैसे ?" --"दूसरी तरफ भी लिख ई. ?" वह सोचने लगा था, अपना नाम लिखवा दे.."फिर उसने मना कर दिया था। वह चौकोर प्लास्टिक के टुकड़े को देखता है । जब उसने लौटकर, कुसुम को दिया था, वह उलट-पलटकर देखती रही थी-"दूसरी तरफ भी तुम्हें कोई नाम खुदवा लेना था।" वह एकदम कहने जा रहा था कि मैंने अपना नाम लिखवाना चाहा था...फिर खामोश हो गया। कुसुम के मुंह से अपना नाम सुनने का मन हो आया था। उसे अपने करीब समेटकर उसने पूछा था-"किसका नाम?" दो.. वस, एक अकेली -- की-रिंग से खेलती कुसुम स्थिर हो गई थी। -"बोलो न ।" --"नहीं, कुछ नहीं । यही ठीक है। दूसरी तरफ खाली ही रहने कुसुम और कहीं कुछ नहीं वह फिर रिंग से खेलने लगी थी। और वह एक ही बात सोच रहा था कि नाम लिखवाते वक्त उसने हरा रंग ही क्यों चुना''तभी कुसुम ने कहा था-"सुनो, यदि बुरा नहीं मानो तो एक बात कहूं... -"कहो न।" "इसे तुम अपने पास रख लो। अगली वार जव टूर पर जाना, तो दूसरी तरफ भी एक नाम खुदवा लेना।" "किसका नाम ?" -~"वेवी का 'अनु का नाम ।" इस बार वह सिहर गया था। जानता था, फिर एक सवाल आएगा -"वैवी को ला दो न."अनु को ला दो न..." इससे पहले कि सवाल आए, उसने कहा था--"ठीक है कहा था-"ठीक है । इसे सूटकेस में डाल दो। अगली बार नाम लिखवा दूंगा। अब बहुत नींद आ रही है..." करवट बदल कर उसने सोने का बहाना किया था। को-रिंग वह मेज पर रख देता है । पास पड़ी कुर्सी पर बैठकर जूते - तीसरा नाम : 17 के फोते ढीले करने लगता है-"रामचन्दर"रामचन्दर..." रामचन्दर आ जाता है। --"एक कप चाय । गरमागरम । फटाफट।" वह चाय की प्रतीक्षा करने लगता है । घड़ी देखता है--साढ़े सात । जल्दी-जल्दी जूते के फीते वांधने लगता है और धीरे-धीरे तीसरी आत्मा उसके भीतर प्रवेश कर जाती है । रामचन्दर चाय रख देता है। वह शीघ्रता करता है। दुकान दस मिनट के अन्दर पहुच जाना है, वरना किसी और फर्म का रिप्रेजेंटेटिव पहले पहुच गया तो दुकानदार उसे पैसे दे देगा और उसके पहुंचने पर कहेगा-"आइए साहब, चाय पीजिए।" -"पहले हिसाव..." -"नाश्ता भगवाऊ वह कमरे से बाहर आ जाता है। फिर हाथ में वही बैग, वही को-रिंग, वही मवाल-"बेवी को ला दोन अनु को ला दो न.." और जब दोबारा कमरे में आता है, कपडे बदलकर बिस्तर पर अवेला लेटता है तो चौयो आत्मा उसके भीतर जन्म ले चुकी होती है । वह सोना चाह कर भी सो नही पाता है... ..'करवट बदल लेता है"ऐसी ही करवट वह घर मे भी बदल लिया करता है, जब कुसुम कहती है- "बेबी को ला दो न..." उसकी समझ में नहीं आता है, वह क्या करे. किस तरह से अपनी मां, अपने पिता को कन्विस करे। रिप्रेजेंटेटिव को ट्रेनिंग में एक बात पर जोर दिया गया था-किसी भी फर्म के लिए, अच्छी किताब से अधिक कीमती अच्छा रिप्रेजेंटेटिव होता है । अगर उसमे कविस करने की कला है, तो वह रद्दी पुस्तक को भी पुश कर देगा." और उसका लोहा सभी मानते है इस लाइन में। जब कोई रिप्रेजेंटेटिव किसी क्षेत्र में असफल हो जाता है, तो कम्पनी उसे ही भेजती है। जावे समय मालिक कहते हैं-"भई राधेलाल, कम-से-कम हजार कापियां तो भिजवा ही दो ""मैं जानता हू. ये पहुधकर और कापियों के लिए तार करेगा'"ही इज ए जीनियस ।" ...और होता भी ऐसा ही है । यह बालेज के हेइम को कन्विस कर लेता है."मगर वह, पिताजी और मा को 16 : अंधे आकाश का सूरज --"कितने पैसे हुए ?" -~~-"दूसरी तरफ भी लिख दं ?" वह सोचने लगा था, अपना नाम लिखवा दे."फिर उसने मना कर दिया था। वह चौकोर प्लास्टिक के टुकड़े को देखता है । जब उसने लोटकर, कुसुम को दिया था, वह उलट-पलटकर देखती रही थी-"दूसरी तरफ भी तुम्हें कोई नाम खुदवा लेना था।" वह एकदम कहने जा रहा था कि मैंने अपना नाम लिखवाना चाहा था. फिर खामोश हो गया। कुसुम के मुंह से अपना नाम सुनने का मन हो आया था। उसे अपने करीव समेटकर उसने पूछा था-"किसका नाम ?" - की-रिंग से खेलती कुसुम स्थिर हो गई थी। -"बोलो न ।" -"नहीं, कुछ नहीं । यही ठीक है। दूसरी तरफ खाली ही रहने दोबस, एक अकेली कुसुम और कहीं कुछ नहीं...' वह फिर रिंग से खेलने लगी थी । और वह एक ही बात सोच रहा था कि नाम लिखवाते वक्त उसने हरा रंग ही क्यों चुना'तभी कुसुम ने कहा था--"सुनो, यदि बुरा नहीं मानो तो एक बात कहूं... -"कहो न ----"इसे तुम अपने पास रख लो। अगली बार जब टूर पर जाना, तो दूसरी तरफ भी एक नाम खुदवा लेना।" --"किसका नाम ?" --"वेवी का अनु का नाम ।" इस बार वह सिहर गया था। जानता था, फिर एक सवाल आएगा -"बेवी को ला दो न.."अनु को ला दो न..." इससे पहले कि सवाल आए, उसने कहा था--"ठीक है । इसे सूटकेस में डाल दो। अगली वार अनु का नाम लिखवा दूंगा। अब बहुत नींद आ रही है..." करवट बदल कर उसने सोने का बहाना किया था। की-रिंग वह मेज़ पर रख देता है । पास पड़ी कुर्सी पर बैठकर जूते तीसरा नाम : 17 के फोते ढीले करने लगता है-"रामचन्दर""रामचन्दर'.." रामचन्दर आ जाता है। --"एक कप चाय। गरमागरम । फटाफट।" वह चाय की प्रतीक्षा करने लगता है । घड़ी देखता है-साढ़े सात । जल्दी-जल्दी जूते के फोते वाधने लगता है और धीरे-धीरे तीसरी आत्मा उसके भीतर प्रवेश कर जाती है। रामचन्दर चाय रख देता है। यह शोधता करता है। दुकान दस मिनट के अन्दर पहुच जाना है, वरना किसी और फर्म का रिप्रेजेंटेटिव पहले पहुच गया तो दुकानदार उसे पैसे दे देगा और उसके पहुंचने पर कहेगा-"आइए साहब, चाय पीजिए।" -"पहले हिसाब..." --"नाश्ता मगवाऊ" - वह कमरे से बाहर आ जाता है। फिर हाय मे वहीं वंग, वही को-रिंग, वही मवाल-"वेबी को ला दोन अनु को ला दो न..." और जब दोबारा कमरे में आता है, कपडे बदलकर बिस्तर पर अकेला लेटता है तो चौयो आत्मा उसके भीतर जन्म ले चुकी होती है। वह मोना चाह कर भी सो नहीं पाता है. करवट बदल लेता है. ऐसी ही करवट वह घर में भी बदल लिया करता है, जब कुसुम कहती है- "वेवी को ला दो न..." उसको ममझ में नहीं आता है, वह क्या करे... किस तरह से अपनी मा, अपने पिता को कन्विस करे। रिप्रेजेंटेटिव की ट्रेनिंग में एक बात पर जोर दिया गया था-किमी भी फर्म के लिए, अच्छी किताब से अधिक कीमती अच्छा रिप्रेजेंटेटिव होता है । अगर उसमें कन्विम करने की कला है, तो वह रद्दी पुस्तक को भी पुश कर देगा. और उमका लोहा सभी मानते हैं इस लाइन मे । जब कोई रिप्रेजेंटेटिव किसी क्षेत्र में असफल हो जाता है, तो कम्पनी उसे ही भेजती है। जाते समय मालिक कहते हैं-"मई राधेलाल, कम-से-कम हजार कापियो तो भिजवा ही दो मैं जानता हू, ये पहुचकर और कापियों के लिए है करेगा'"ही इज ए जीनियस।" .. और होता भी ऐसा ही है । वह का के हेड्स को कन्विस कर लेता है। मगर वह, पिताजी और मां को 18: अंधे आकाश का सूरज : कन्विस करे, कसे?.. हर समय एक ही सवाल चक्कर काटता है "वेवी को ला दो न."अनु को ला दोगे न?" एक बार उसने साहस कर कहा था-"पिताजी, अनु को ले जाने दीजिए। कुसुम बहुत याद करती है वह इसे सगी बेटी की तरह प्यार करती है।" पिताजी उसे एकटक देखने लगे थे। वह उनकी आंखों का सामना नहीं कर सका था। एक चुप्पी गर्द की तरह वैठ गई थी। आखिर उन्होंने ही कहा था-"वेटे, अनु तुम्हारी सम्पत्ति है। जब इसकी मां मरी थी ''यह मुश्किल से वीस दिनों की रही होगी तभी से हमने इसे पाला है। 'अब तो इसके बिना एक पल भी अच्छा नहीं लगता ले जाओ, जाके डाल दो बहू की गोद में इस चार साल की बच्ची को वह अपनी है, सगी मां-सा प्यार देगी एक हम ही तो पराये हैं..." वह चुप था । पिता के सामने चुप था और अव कुसुम के सामने भी चुप रहता है । वह अब तक यह तय नहीं कर सका है, कि उसे किसे कन्विस करना है. पिताजी को, मां को या कुसुम को... तभी दरवाजे पर दस्तक पड़ती है-“सो गए क्या ?" वह समझ जाता है, सभी रिप्रेजेंटेटिव होटल लौट आए हैं । उठकर खिोलता है। सामने पारस खड़ा है-"चलो यार, कपूर साहब के कमरे में सभी जुटे हैं । ताश का प्रोग्राम है।" कमरे में ताला लगाकर, वह पारस के साथ हो लेता है । मुट्ठी में फिर को-रिंग है, यानी अव भी मुट्ठी में वही एक आग्रह -- "वेवी को ला दो न'''अकेला घर काटता है 'वोलो, अनु को ला दोगे न ?" उसे देखते ही शर्मा कहता है-"अरे यार, तू रात में देवदास क्यों बन जाता है ? दिन में हम सव तुझ से डरते हैं कि तू हमारी फर्म की किताव के पत्ते काट देगा.. और रात में इस तरह सीरियस देखकर भी डर लगता है तू रात में पीता-वीता तो नहीं ?..'सुना है, कुछ लोग पीकर बड़-बड़ करने लगते हैं और कुछ लोग देवदास बन जाते हैं.. तेरी तरह।" मगर वह कुछ कहता नहीं । वस, मुसकरा देता है और मुट्ठी के भीतर के सवाल को महसूस करता रहता है। . - सोनरानाम: 10 --"अबे, बोत न कुछ। तू कन्वेसिम के यका भी इसी तरह पुर रहता है ? समझ नहीं आता, तू हेड्स को कविस कमे कर सपा है। अच्छा चल, सबको खिला-पिला।" वह चोंक जाता है- "क्यों ?" --"फिर वही मवाल-जवाब...रामचन्दर रामपादर..अरे भई, आद चाय" मैं हो पिलाता हू" अपनी एलनेमा पालो हिताय पिर पर्द, इस खुशी में।' -~"मतलब ?" कपूर चोंककर पूछते हैं । -"कपूर साहब, इम देवदास ने सब कयाडा कर दिया । इस पार यह हाई स्कूल के लिए एक एलजेना की किताब लेकर आया है "करा -बुक्स एनाउंस होगी 'प्राइवेट सोसेंस से मैंने पता पषा लिया है. इसी किताव छः स्कूलों मे लग गई है - अपन तो पिट गए.मरा देपना, यह कम्पनी को तार करेगा-"सेन्ड थाउजेन्ड कॉपीज एसजेना. " और शर्मा हसने लगता है। उसे कोई खुशी नही होती है। सुबह का यक्त होगा, तो शायद पार सुश हो जाता" मगर इस चौथो आत्मा का क्या करे, जो रात गुरु होते ही उसके सामने घर लेकर पडी हो जाती है और कमरे में अपेली रोटी कुसुम उभर आती है एक सवाल लेकर-"येयी को ला दोगे • भनु को ला दोगेन?" तभी कपूर कहते हैं--"अरे, योहरा नहीं दिप रहा है ?" --"मुजफ्फरपुर गया है।" .-"अपनी अम्मा के पारा ।" -और पपूर हो-हो कर हमरी गगने -"क्या हुआ?" पारस पूछता है । -"बहुत हमरामी है माला । मेरो बुजुर्गों में नाजायज फायदा उठा लेता है। एक बार मैं उसके एरिया में घुम गया था। अपनी गायकापानी वाली किताब के लिए लेक्चरर को करीब-करीय कविरा भी कर fm. या कि वेटा आ धमका । दूर से ही चिल्लाया-'हैपोटी...' जब नजदीक आया तो संरचरर पूछ बैठी- ' बोहरापाला 20 : अंधे आकाश का सूरज .. आपके डैडी हैं ? छूटते ही उसने कहा था-'यस मैडम, ही इज़ लेटेस्ट लवर ऑफ. माई लेटेस्ट मदर..' मैं तो सन्न । लेक्चरर मुंह पर पल्लू रखकर स्टॉफ रूम के भीतर।" -"फिर क्या हुआ ?" "होना क्या था, उसके फर्म की किताव कॉलेज में लग गई और मैंने जो कन्विस किया, केम टु जीरो..." जीरो' सिफर''वह सोचता है, वह किसे कन्विस करे. अनु कभी कुसुम के पास रहती है तो कभी मां-बाबू जी के पास । जब कुसुम के पास होती है तो गांव से चिट्ठियां आने लगती हैं--अनु को भेज दो और जब घर होती है "वह की-रिंग को देखता है. दूसरी तरफ खाली ही रहने दो"बस, एक अकेली कुसुम और कुछ नहीं 'जीरो' सिफर' शून्य । एक बजे रात तक ताश । फिर सभी अपने-अपने कमरों में आ जाते है । वह भी अपने विस्तर पर आ जाता है । सोचता है, यह कैसी जिंदगी है। सुबह उठकर, हर कोई किसी का पत्ता काटना चाहता. है.. और रात, एक होटल या धर्मशाले के किसी कमरे में एक-दूसरे के लिए निःस्वार्थ भाव से पत्ते बांटता है.. यह एक आत्मा की जगह, दूसरी आत्मा का जन्म लेना नहीं तो और क्या है ! सुबह उठकर, फिर वह और उसका वैग। दिन-भर भागा-भागी । सचमुच छः स्कूलों में उसकी किताव एनाउंस हो गई। लिस्ट देखने के वाद, वह सबसे पहले पोस्ट ऑफिस आया। एक पोस्टमैन निकलता हुआ दिखा। उसे ख्याल आया, उसने कुसुम से चलते समय कहा था- "मैं जहां भी रहूंगा, पत्र डालता रहूंगा, मगर तुम्हें क्या पता दूं ! कब कहां रहना होगा, मुझे भी तो नहीं मालूम''आज पटना, तो कल भागल- पुर, परसों दरभंगा'समस्तीपुर "गया या कहीं भी..." इसी तरह का वाक्य उसने कमला से भी कहा था। कमला मां बनने वाली थी। और जब दो महीने बाद वह घर पहुंचा था, तो कमला नहीं थी। उसकी मां की गोद में नन्ही-सी अनु थी'न अनु के जन्म की खबर उसे मिली थी, + न फमला को मौत का समाचार | अगर ऐसा ही कुछ कुसुम के साथ हो गया तो वह सर से पांव तक सिहर गया या फिर उसके साथ हो... उमने जल्दी से अपना हाय पॉकेट में डाला। प्लास्टिक कवर मे उसमा फोटो। फोटो के नीचे नाम और पता। थोड़ी-सी तसल्ली हुई। आइडेन्टिटी कार्ड को भीतर वापस रख दिया उसने । लेकिन उगलियों पर, फिर उसी को-रिंग का ठण्डा स्पर्श वेवी को ला दो न."और कम्पनी को तार करते-करते उसने मन के भीतर भी एक तार जोड़ लिया। । महीने-भर बाद वह घर पहुंचा। उसे देखते ही कुसुम खिल गई । कोट यूटी पर टाग कर, वह हाय- मुंह धोने चला गया। जब फेश होकर लौटा तो उसने देखा, कुमुम मूट- केस से कपडे निकाल रही है। -"तुमने कुछ देखा?" "क्या?" -की-रिंग।" सचमुच कुसुम ने स्याल नहीं किया था। उसने जल्दी से की-रिंग को हायों में ले लिया। --"तुम्हारी फरमाइश यो न.."सयोग से भागलपुर मे प्रदर्शनी लगी हुई पी। वही मैंने अनु का नाम लिखवा लिया है, दूसरी तरफ । अच्छा, सुनो, जल्दी से तैयार हो जाओ। मेरे और अपने कुछ कपड़े मूटकेस मे डाल लो। अभी गाव चलते हैं।" -"गांव ?"-कुसुम चौंक गई। -"हा, कल रविवार है। शाम तक अनु को लेकर लोट आएगे यहां के०जी० में डाल देंगे । अव काफी बड़ी हो गई है। गांव में रहकर येस्ट हो रही है।" कुसुम को जैसे पर लग गये। । मां से मिलकर अनु हमेशा की तरह बहुत पुश हुई। पहले उसने कुट्टी की, फिर मिट्ठी । कुट्टी इसलिए कि मां उसे छोड़ गई पो और मिट्टी
2 : अंधे आकाश का सूरज
इसलिए कि मां आ गई थी।
सोने के पहले उसे दूध मिला करता था, लेकिन आज उसकी ज़िद थी
कि वह मां के हाथों के पराठे खाएगी।
दोनों मां-बेटी चौके में पहुंच गयीं। मगर चौके में पहुंचकर अनु बदल
गयी-"मैं पराठे बनाऊंगी। दादी जी ने मुझे सिखा दिया है।"
- "जिद नहीं करते अनु वेटी, मैं बना देती हूं।"
"नहीं, मैं बनाऊंगी..."
-"बुलाऊं पापाजी को?"
-"हां-हां बुला लो, मैं दादाजी को बुला लंगी.''दादी जी''दादा
जी..."
- "चुप कर बावा । तू वना, मैं सेंकती हूं।"-कुसुम हार गई ।
और अनु के बनाये टेढ़े-मेढ़े पराठे सेंकती रही
पराठे बन गए तो अनु ने कहा-"दादाजी के पास खाऊंगी..." और
थाली उठाकर भाग गई-"दादाजी, पराठे खाओगे ? मैं खा रही हूं..
-"ये पराठे हैं ?"
-"हां, मां ने बनाये हैं।"
"मैंने बनाये हैं ?" कुसुम टपक पड़ी।
-"और नहीं तो मैंने बनाए हैं.. दादाजी, आप मुझे शहर ज
दो। वहां रहकर मां को पराठे बनाना सिखा दूंगी."फिर आ जा
वापस..."
कुसुम का मन हुआ, अनु को सीने से लगा ले । चुम्मियों से 5
चेहरा भर दे।
...
रविवार की शाम सारी तैयारियां हो गयीं । अनु के कपड़े सू
रख लिए गए। पिताजी और मां ने कोई आपत्ति नहीं की। वह
कि अव कुसुम अकेली नहीं रहेगी।
गाड़ी रात आठ के करीव है । अभी छः बजे हैं। घर में ए:
तैर रहा है । मांजी चौके में कुछ-कुछ बना रही हैं-अनु के लि
जी बीच-बीच में कहते हैं-"वहू.."
तीसरा नाम:23 और कुसुम सारी बातें सुनती है। गिरह बांधती जाती है। अब चलने का समय हो गया है। स्टेशन तक छोड़ने के लिए टमटम आ गया है । अनु सो गई है । वह पिता के पैर छूता है-"जल्दी ही अनु को भेज देंगे."चिता मन कीजिएगा।" ---"स्कूल से जुड़ने के बाद, भला कोई छूटा है वेटे । पहली, फिर दूसरी, फिर तीसरी आगे.. और आगे..." इसके आगे ये कुछ नहीं कह मके कुमुम ने पैर छुए तो दोले-"बेटी, मेरे बिस्तर पर सो रही है अनु। रोज़ मेरे साथ ही सोती रही। उसे आहिस्ता मे उठाना, जग जाएगी। बड़ी कच्ची नीद है.. मैं रात में करवट भी लेता था, तो धीरे से .." और उनकी आवाज भर्ग जाती है । कुमुम को लगा, उनके पाव भी कार वह बिस्तर तक आई। अनु मो रही है दादाजी के तकिए पर । यह उठाने को होती है कि पिताजी कहते हैं-"यहू, जल्दी करो । गाड़ी का समय हो रहा है और हा, इमै नदिए की भी आदत है. मैं तो यू ही सो लेता था..." अचानक कुसुम कहती है-"नहीं बाबूजी, हम इमे नहीं ले जा रहे हैं। स्कूल में दो महीने बाद दाखिला होगा, फिर ले जाएंगे.. अनु के पर मैंने बिस्तर पर निकाल दिए हैं..." और वह मूटभ लेने भीतर चली गई । जल्दी-जल्दी अनु के कपड़े मूटकेम से निकाल कर बाहर आ गई। वह कुछ नहीं ममल पाता है । न तागे में, न देन में, न तब, जब कुमुम बहती है--"हम अनु को नहीं लाएगे"दो महीने बाद भी नहीं... कमी नहीं. वे लोग उसे बहुत प्यार करते है मेरा क्या है, यही कह कर मंतोष कर लगी कि मैं मौतेनी मा हूँ"वच्ची को अनग रगना चाहती हूं..." बम, उमे लगता है, उमी की तरह मुम भी बने भीतर कोई लड़ाई लड़ रही है । घर पहुंचने पर, मोने में पहले वह मारता है.'
24 : बंधे आकाश का सूरज
ने अच्छा ही किया जो अनु को गांव में छोड़ दिया"लेकिन वीच रात
में नींद
टूट जाती है । वह देखता है, कुसुम की-रिंग को अपने चेहरे से
सटा कर रो रही है, रोये जा रही है. अब वह क्या करे' किसे कन्विस
करे, पिताजी को 'मां को या फिर कुसुम को'''नहीं, उसमें कन्विसिंग
आर्ट है ही नहीं.. वह कुछ नहीं कर सकता, कुछ
तो
महज
एक तीसरा नाम है, जो की-रिंग के किसी तरफ भी नहीं है
भी नहीं. वह
अपना-अपना भय पर जाने पर एक दर्द होता है । लेकिन मुमी अनुभव करती है, यह कटना नहीं है। बट जाने पर कोई हिस्सा जमा हो जाता है, लहू को कुछ बूदें उमर आती हैं और ऐमा लगता है कि यह एक दर्द है और यहा हो रहा है। मगर मुमी मोचती है, यह कोई दूसरी किस्म का दर्द है न कोई हिम्ना पटा, न सह को वूदें उभरी, फिर भी लगता है जैसे मारा शरीर हिना है कि एकदम नीम-जगी हो गई है। वह चुपचाप छोटी कोठरी में पड़ी है। घर के लोग इसे छोटी कोठरी ही कहते रहे हैं। यह और बात है, कि घर को अन्य दो मोरिया भी इमी तरह छोटी हैं “कुन तीन छोटी-छोटी कार्वाग्यो का घर ! इमो के लिए सवा नौ लग जाते हैं । जिस दिन तनवाह मिलती है, हर कोई खुश होता है । मगर एक मुमी है, कि गहरी उदासी में घिर जाती है । सवा दो मो हायों में लेकर भी वह अपने को एकदम पालीवाली महसूम करती है । दूर तक खीची हुई रिक्तता! किराये के बाद सो पिताजी लै लेते हैं, और वह महीना-भर पैदल चलकर भाफिम आती-जाती रहती है। जिम दिन वेतन मिलता है, मुनीता अवष्य टोकती है-"क्यों सुमी, आज तो कम-मे-कम टैक्सी में माय चलोगीन?" -"ना । मुझे बाजार मे रुकना है । अपने लिए कुछ जरूरी सामान लेना है • " लेकिन वह जानती है, उसे कुछ भी नहीं लेना है । और यह बाजार की तरफ वाला रास्ता पकड़ लेती है। यह जानती है, यह रास्ता उगे काफी लम्बा पडेगा । कापी घूमना पड़ेगा। लेक्ति यह कितनी बड़ी विवगता है, कि अपने को छिपाने के लिए लम्बी राह से गुजरना होता है. जब कि आज समय की कमी के कारण हर चौउ सिकुड कर छोटी 26 : अंधे आकाश का सूरज होती जा रही है । यहां तक कि समय भी छोटा हो गया है। सुमी चुपचाप चलती रहती है । चलते रहना भी एक जीवन है, जो सुमी जैसों को ही नसीव होता है। अक्सर हां बाजार में किसी न किसी से भेंट हो जाती है.--"क्यों सुमी, कुछ खरीदना है ?" सुमी जानती है, अगर हां कह देगी तो उसे आग्रह मिलेगा--"हम भी मार्केटिंग के लिए ही निकले हैं । आओ, आज तुम्हारी पसंद से शॉपिंग कर लें।" मगर सुमी की भी कोई पसंद है ! जब पिताजी एक साधारण से क्लर्क थे, वही खादी की मोटी साड़ी ला दिया करते थे । खादी का कपड़ा भी। मां घर की मशीन पर लम्बी बांहों का ब्लाउज सिल देतीं और वह पहनकर स्कूल चली जाती । उसे याद है, एक वार उसकी किसी सहेली ने लाल पर सफेद धारियों वाली पेंसिल और हरी-हरी कापियां खरीदी थीं। घर आकर उसने पिताजी से यही कहना चाहा था। मगर एक छोटा-सा वाक्य कहने में उसे कितना तो भय लग रहा था । मां को भी अगर कुछ कहना होता, तो कई-कई वार पिताजी के पास जाती.. मगर साहस की कमी से या उनके बुझे-बुझे चेहरे के कारण कुछ भी नहीं कह पातीं ! और जव ढेर-सारी सांसों को अपनी छाती में भरकर, सुमी ने अपनी फरमाइश पिताजी के सामने रख दी, तो वे उसे देखते रहे । कुछ बोले नहीं । सुमी को अपने ही कहे वाक्य से भय लगने लगा। थोड़ी देर बाद पिताजी चले गए । और जब लौटे, तो एक साधारण-सी पेंसिल और दो थोड़ी फटी-कटी कॉपियां । ये वस्तुएं सुमी को न देकर, उन्होंने मां को थमा दीं-. "सुमी की मां, ये सस्ती किस्म की पेंसिल और फुटपाथों पर कटी-फटी कम कीमत में विकती कापियां, सुमी को दे दो उसके सामने एक पिता की हैसियत से जाते हुए मुझे भय लगता है। वह तो बच्ची है सुमी की मां, लेकिन तुम मेरी विवशता अनुभव कर सको ..' और वे उत्तर की प्रतीक्षा किए विना चुपचाप अपने कमरे में चले गए । सुमी को याद है, सुमी ने सव सुना था। सब समझा था। उसी वक्त । और जब मां ने आकर कहा--"देख वेटी, कितनी सुन्दर पेंसिल. और ये कापियां..." उसने अनुभव किया था, मां को इतना-सा वाक्य भी कहने ।
अपना-अपना भय :27 मैं कष्ट हो रहा है। और जब उन्होंने पूछा--"है न तेरी पसन्द की..." उसने स्वीकृति मे सिर हिलाया और फिर, पिताजी को पमन्द उसको 'पसन्द बनकर रह गई। अव भी पिताजी ही कपड़े लाते और यह मा की पुरानी पानी मशीन पर लम्बी वाही का ब्लाऊज सिलती। एक बार कपडा कुछ छोटा पड़ गया था। कुछ नमूना निकालकर उसने ब्लाउज निकाल लिया । पहन कर ऑफिस जाने लगी, तो हमेशा की तरह पिताजी के पास आई--"मा हरदम आयें वन्द किए हू' कहने वाले पिताजी ने आज उसे देगा। सुमी को भय लगने लगा। वह जानती है, पिताजी आखें धोने न को एकटक निहारते रहते है, मगर वह जैसे ही कमरे में आती-'पिताजी जा रही हूं...' तो आर्षे बन्द कर 'हूं' कर देते। उसे देखते भी नहीं। मुमो समझती है, अब तक वे उससे डरते रहे। वेटी की कमाई खाते-खाते में अपने को इतना तुच्छ और छोदा अनुभव करने लगे हैं, कि भर-आप उसे देख भी नहीं पाते। मगर आज सुमी को भय लग रहा था। और जब यह धूम गई, उसकी पीठ पिताजी की तरफ हुई, तो उन्होंने कहा- "सुमी, हमारे घर में जो रामायण पडी है न, उसको जिल्द को कोडे या गए हैं । अब वह भी और पुस्तकों में मिलकर उन जैसी ही लगती है । सुमी चुपचाप उलटे पैर छोटी कोठरी में लौट आई । पिताजी ने जो वहा था, उसने समझा था। तग और दूर तक उठे ब्लाउज को बदलकर उसने स्वय महसूस किया, कि लडकी किताव की तरह है, जिगरे विषय में पहला निर्णय जिल्द देखकर किया जाता है। लेकिन वह क्या करें ! साड़ी, ब्लाउज के अलावा भी उसे और चाहिए""उसने अब तक जैसे-तैसे अपने हाथो ही मिलकर काम चलाया है। कई बार गरीदना भी चाहा । मगर पूरा का पूरा वेतन यह पिताजी को देती आ रही है। एक बार उमने सोचा भी था कि सिर्फ घोरपये रय ले.. मगर उसे लगा, मगर पिताजी पूछ लेंगे, तो वह नया उत्तर देगी। गो जैसे पिताजी के आगे वह झूठ भी नही बोल पाएगी और मच भी नहीं। फिर पिताजी सोचेंगे, शायद उनके पास अब कोई अधिकार मंत्र 28 : अंधे आकाश का सूरज नहीं कि हिसाब लें. इसलिए तो सुमी चुप है। बस पिताजी के यही सब सोचने से तो सुमी को भय लगता है। उनकी अपराधी जैसी कांपती आंखें वह झेल नही पाती। आंखों को सहना भी कितना कठिन होता है । कितनी बार वे रिश्ते के लिए निकले । लड़के आए । सुमी अपने को अच्छी तरह से ढंकती रही। हर बार आइने में देखती रही कि कोई हिस्सा दिख तो नहीं रहा है और पूरी तरह से सन्तुष्ट होकर सामने जाती रही। लड़के चले जाते । फिर पिताजी पत्रों की प्रतीक्षा किया करते । और जिस दिन उत्तर आता-"क्षमा करें, आपकी लड़की हमें पसन्द नहीं..." वे हमेशा की तरह चारपाई पर लेट कर सूनी-सूनी आंखों से छत को एकटक देखा करते । जब वह ऑफिस से लौटती तो उनकी आंखों में भीख मांगने जैसी विवशता को देखकर ही समझ जाती कि क्या उत्तर आया है। वह चुपचाप अपने कमरे में चली जाती । कपड़े बदलकर चूल्हे में आंच देती। चाय बनाकर एक कप पिताजी की मेज़ पर रख देती। और उस दिन ऐसा होता, कोई किसी से कुछ नहीं वोलता। दोनों चुप-चुप खाना खाते। फिर पिताजी जल्दी ही सो जाते मगर वह जानती है, वे सोते नहीं हैं, हमेशा की तरह सूनी-सूनी आंखों से रात में न दिखने वाली छत को टटोलते रहते हैं। और सुमी अब भी छोटी कोठरी में कैद है । आज रविवार है। वह अपने पुराने ब्लाउज़ की बांह ठीक कर रही थी, कि यकायक पिताजी आए । कांपते हाथों से एक वण्डल थमा कर भयभीत स्वर में बोले- "बेटी रहने दे सिलाई। सामने के कमरे में एक लड़का आया है। बड़ी मुश्किल से माना है। तू तैयार होकर उससे बातें कर ' मैं कुछ लेने जा रहा हूं..." और वे थरथराते पैरों से वापस लौट गए। छोटी कोठरी में आकर सुमी ने वण्डल खोला.. उसके सामने पिताजी के कांपते हाथ उभर आए और उसने महसूस किया, उसके पिताजी अव एकदम टूट गए हैं । टूटन की आखिरी हद पर खड़े होकर बेटी के व्याह की भीख मांग रहे हैं. वह समझ गई, पिताजी कुछ भी लाने नहीं गए हैं, बल्कि - अपना-अपना भय: 29 इम भय से भाग गए हैं, कि यदि वह आखें उठाकर उन्हें देखेंगी, तो ये मामनाही कर सकेंगे "उमे लगा, उमका सारा शरीर छोल दिया गया है और वह बिना बांहो के उस छोटे-में ब्लाउज में अपना मह निकर इस भय से मिमकने लगी, कि इतना करने पर भी यदि लड़के ने उने अम्बी. कार दिया, तो कहां से वह इतना साहस लाएगी कि पिताजी के सामने फिर पड़ी भी हो मके...
28 : अंधे आकाश का सूरज । नहीं कि हिसाव लें. इसलिए तो सुमी चुप है। बस पिताजी के यही सब सोचने से तो सुमी को भय लगता है । उनकी अपराधी जैसी कांपती आंखें वह झेल नहीं पाती। आंखों को सहना भी कितना कठिन होता है । कितनी बार वे रिश्ते के लिए निकले । लड़के आए। सुमी अपने को अच्छी तरह से ढंकती रही। हर बार आइने में देखती रही कि कोई हिस्सा दिख तो नहीं रहा है और पूरी तरह से सन्तुष्ट होकर सामने जाती रही। लड़के चले जाते। फिर पिताजी पत्रों की प्रतीक्षा किया करते। और जिस दिन उत्तर आता-"क्षमा करें, आपकी लड़की हमें पसन्द नहीं..." वे हमेशा की तरह चारपाई पर लेट कर सूनी-सूनी आंखों से छत को एकटक देखा करते । जब वह ऑफिस से लौटती तो उनकी आंखों में भीख मांगने जैसी विवशता को देखकर ही समझ जाती कि क्या उत्तर आया है। वह चुपचाप अपने कमरे में चली जाती । कपड़े बदलकर चूल्हे में आंच देती। चाय बनाकर एक कप पिताजी की मेज़ पर रख देती। और उस दिन ऐसा होता, कोई किसी से कुछ नहीं बोलता। दोनों चुप-चुप खाना खाते। फिर पिताजी जल्दी ही सो जाते''मगर वह जानती है, वे सोते नहीं हैं, हमेशा की तरह सूनी-सूनी आंखों से रात में न दिखने वाली छत को टटोलते रहते हैं । और सुमी अब भी छोटो कोठरी में कैद है । आज रविवार है । वह अपने पुराने ब्लाउज़ की बांह ठीक कर रही थी, कि यकायक पिताजी आए । कांपते हाथों से एक वण्डल थमा कर भयभीत स्वर में बोले- "वेटी रहने दे सिलाई । सामने के कमरे में एक लड़का आया है । वड़ी मुश्किल से माना है । तू तैयार होकर उससे बातें कर मैं कुछ लेने जा रहा हूं..." और वे थरथराते पैरों से वापस लौट गए। छोटी कोठरी में आकर सुमी ने वण्डल खोला.."उसके सामने पिताजी के कांपते हाथ उभर आए और उसने महसूस किया, उसके पिताजी अब एकदम टूट गए हैं । टूटन की आखिरी हद पर खड़े होकर वेटी के व्याह की भीख मांग रहे हैं. वह समझ गई, पिताजी कुछ भी लाने नहीं गए हैं, बल्कि ।
अपना-अपना भय:29 इम भय से भाग गए हैं, कि यदि वह आंखें उठाकर उन्हें देखेगी, तो वे मामना नही कर सकेंगे "उमे लगा, उसका सारा शरीर छोल दिया गया है और वह बिना वाहों के उस छोटे-से ब्लाउज में अपना मुह दिवाकर इस भय से सिमकने लगी, कि इतना करने पर भी यदि लडके ने उसे अस्वी- कार दिया, मो कहां से वह इतना साहस लाएगो कि पिताजी के मामने फिर गड़ी भी हो मके" ...
@ उजाले का चेहरा - प्लेटफार्म पर जैसे कोई आदमियों को लेकर एक ऊनी दुशाला बुन रहा हो .''एक-दूसरे पर गिरते-भागते लोग, न बनते-विगड़ते फंदों की तरह । वह बड़ी कठिनाई से अपने को बचाने की चेष्टा कर रहा था। उसने सोचा, यही स्टेशन था। वह पहले-पहल जब यहां आया था, इसी तरह गाड़ी रुकी खड़ी थी। न कोई भाग-दौड़, न कोई रेल-पेल । वह कितनी आसानी से, इतमीनान के साथ उतरा था। दूर तक खाली-खाली लेटे प्लेटफार्म को उसने देखा था। वस, दस-पांच लोग चढ़ने वाले थे और शायद इतने ही उतरने वाले । उसने एक आदमी से समय पूछा। मगर वह तेजी से आगे निकल गया । शायद उसके पास समय नहीं था। और उसने तब भी समय ही पूछा था। जिससे उसने पूछा था, वह एक कुली किस्म का आदमी था। उसने कहा था, आओ भैया बैठो। थोड़ा जिरा लो ! कहां से आ रहे हो ? उसने बताया था। मगर वह नहीं समझा । उसके नही समझने पर, उसने उसे एकदम गंवार और अपने को काफी समझदार समझा था। एक बार फिर, उसने उसे प्रान्त के भेद को समझाया, मगर वह फिर नहीं समझ सका । चुपचाप खैनी लटाता रहा। जब खैनी तैयार हो गई, तो उसने उसे देकर सूरज को देखा था, और अन्दाज़ से कोई समय भी बताया था। तभी एक मुसाफिर ने हांक दी और वह उठकर चला गया । जब कुली किस्म का आदमी चला गया, तव वह स्टेशन से बाहर आया था। सामने मैदान जैसा खुला-खुला था। सिर्फ दो टमटम खड़े थे। उन्हें कोई सवारी नहीं मिली थी। दोनों घोड़ों के मुंह खुले थे और वे सिर झुकाकर घास खा रहे थे। उन्हें जोतने वाले आराम - उजाले का चेहरा: 31 से एक वृक्ष के नीचे बीड़ी पी रहे थे। यात्रियों का हंगामा और बढ गया था । किसी तरह अपने को बचा. कर वह बाहर आया । वाहर आने के इस क्रम में वह कई बार गिरते- गिरते बचा। एक बार तो एक आदमी ने चिढ़कर कहा था- 'जाने सरकार इन भिखमंगो पर कब रोक लगाएगी !' दह एकदम सन्न होकर, सुन्न हो गया था" जैसे बिजली का जोरदार झटका और फिर लाश उमे लगा, अब वह केवल अपने शव को ही ढो रहा है और उस खन्दक या गढे की तलाश में है, जहां वह इसे डालकर मुक्त हो जाए, मगर उसे तो अपने उम छोटे-से कस्वे की तलाश यो, जहां कभी मिशन के लोगों ने एक चिट्ठी देकर उसे फादर फ्रेंडी के पास भेजा था वही छोटा-सा, पवित्र-पविय उसका कस्बा जिसकी उसे तलाश थी। उस समय वह मुश्किल से वीस का रहा होगा। फादर मडी को एक युवक की खोज थी, जो मैजिक-लन्टनं दिखाने में उनकी मदद कर सके। गली-गली घूमकर उनके माय ईसा मसीह के सम्बन्ध में लोगों को बता सके । वह पूरी तरह से फादर के काम आया था... उसने प्लेटफार्म से बाहर देखा। ढेर सारे रिक्शे । टैक्सिया। दूर तक फैले हुए मकान । मकान-दर-मकान । वह अपनी उन गलियों को ग्रोजने लगा, जहा वह शाम होते ही, भाड़, लगाकर एक बड़ी-सी दरी विधा दिया करता था। इस काम में गली के लगभग सभी बच्चे उसकी मदद किया करते थे । सब की आखो मे चमक हुआ करती थी । पेट्रोमेक्म जलाकर वह रोशनी विषेर देता था। उजाले की चादर पर उछल-कूद शुभ हो जाती पी। फिर, फादर फ्रेंडो के आते ही शोर और बढ़ जाता। वे पहले बच्चों को मिठाई वाटते । तब तक वह प्रोजेक्टर का मुंह एक मादी दीवार की तरफ कर देता । मैजिक-लेन्टनं के वक्स में पेट्रोमेक्स डालकर स्लाइड्म दिखाता । फादर एक किनारे खडे होकर, अपनी लवी- मी छडी से बतलाते जाते-- उडाव पुत्र है, ये लाजर जिसे पीशु मसीह ने मुर्दो के बीच से उठाकर जिंदा किया, ये बादशाह हेरोदेस है, जिसने दर-मार बच्चो को क्ल करवा दिया, ये.. और ये... और उसने गुना, यही शोर । उसमें भी बढ़कर हगामा । पलट कर 32 : अंधे आकाश का सूरज देखा, कोई सिनेमा हॉल था। लोग टिकट के लिए भगदड़ मचाए हुए थे। उसने अपने चश्मे को उतारकर शीशे को साफ किया । हॉल की दीवार से सटे, एक विजली-खम्भे के ऊपर के तारों को उसने देखने की कोशिश की। वह धीरे से मुस्कराया । मगर तुरंत उसकी वह मुस्कान कहीं खो गई ! वहां मार-पीट हो गई थी। उसने महसूस किया, उसने इन आंखों को निकट से नहीं देखा है, मगर पहले जब वह ज़मीन साफ कर दरी बिछाया करता था तो बच्चों की आंखों में एक खास किस्म की चमक हुआ करती थी 'परन्तु आज, इन बड़े लोगों की आंखों में वह चमक नहीं होगी, कुछ होगी तो युद्ध जैसी कोई भावना । वह आगे बढ़ आया । ज़मीन पहले पथरीली थी। बड़े-बड़े रोड़े थे । कई बार उसके अंगूठे, ठेस लगने से ज़ख्मी हुए थे। इन पर बैलगाड़ियां चलती थीं। टमटम चला करते थे। इन सवारियों को जानबर खींचा करते थे। मगर आज सड़कें पक्की बन गई हैं। एक आदमी रिक्शा खींचता हुआ सामने से निकल गया। उसने रुककर ज़मीन को देखा। सड़क से सटकर ही, एक मिल चल रही थी। यह आटे की मिल थी। भीतर औरतें आपस में झगड़ रही थीं। कई मर्द भी शोर कर रहे थे। हर किसी को जल्दी मची थी। उसने सोचा, जव वह नया-नया आया था, अपने कंधे पर मैजिक-लैन्टर्न बक्स और हाथ में पेट्रोमेक्स लटकाए हुए, वह फादर फ्रेडी के साथ इन जगहों से गुजरता था, तो जहां-तहां उसे औरतें जांता चलाती हुई दिख जाया करती थीं। वे कोई लोक-गीत गाया करती थीं। उनकी कोशिश रहती थी, कि सब मिल कर गेहूं को पीसें। इस बार फिर, उसने विजली के खम्भे को देखा। उस तार को भी देखने की कोशिश की जो मिल के भीतर जाता था। वह धीरे-धीरे चलने लगा। उसकी कमर दुखने लगी थी। उसे आश्चर्य हो रहा था, उसने इतना मार्ग तय कर लिया, मगर किसी ने भी उसे नहीं पहचाना उसे प्यास महसूस हुई । वह एक नल के निकट आ गया। पानी तेज़ी से बह रहा था। कितनी ही वाल्टियां कतार मे लगी थी। यहां भी शोर या। वह साहस नहीं बटोर पा रहा था कि कुछ कहे.."डरी-डरी आंखों से उमने इधर-उधर देखने की कोशिश की। यही वही कोई कुआ या पहले । उस कुएं मे मुहल्ले-भर की औरतें पानी भरा करती थी। कितनी 'मिल्लत थी.. कि झटाक में किसी ने किमी की वाल्टो उठाकर फर दी। वह इतना डर गया, कि विना पानी मागे आगे बढ़ गया। वह चुपचाप चल रहा था। उसके कठ में एक तरह की जलन हो रही थी। यह जलन उस वक्त भी हुआ करती थी, जब वह थककर पीने से तर हो जाया करता था और किमी किनारे के समीप बडा हो जाता था । आप में आर पानी से भरी कोई बाल्टी उमके लिए झुक जाया करती थी "उमने कापनी आखो से एक बार फिर बिजली के तारो को देखा, जो उसके ऊपर बुरी न्तरह से छाए हुए थे "इम बार एक अजीब-मी कपकंपी उसके नमाम 'जिस्म मे भर गई। वह अब भी चल रहा था। मगर उमे लग रहा था, वह अपने परी को फेंक रहा है... रेडियो को एक दुकान से गुजरते गुजरते वह ठिठक गया। ममाचार हो रहे थे, परन्तु कोई मुनने वाला नहीं था । रेटियो यू ही चोखे जा रहा या। वेमानी ! उमे ग्याल आया, जब वह पहले-पहल आया था, खबरों का अपना अलग चक्तित्व था। वे इस प्रकार वरवाद नहीं होते थे। शाम के ममय, मिडिल स्कूल के मास्टर जी एक पुरानी-मी चौकी पर पालथी मार कर अखबार पढ़ते थे। लोग उन्हें घेर कर बैठते थे। माय-माथ उनकी टिप्पणी भी होती थी। रेडियो अब भी चीमे जा रहा था । उसने घूमकर फिर इस शहर को देखा, मगर उसका वह कस्बा उसे कही नहीं मिल रहा था। उसने गर्दन मोधी कर लो। वह दुखने लगी थी। उसे स्वय पर पाश्चर्य हो रहा 'था, उसे इस तलाश को सनक कैमे सवार हो गई.. फादर डेली के निर्ण इतना पूछने पर कि क्या वह कभी फादर फ्रेडी के साथ किसी कम्बे में 'प्रचार का काम किया करता था, तो उमने हा दिया था और फादर ने 'उमे बताया था कि उसका कस्वा जब एक बडा शहर बन गया है। वहा बड़े-बड़े वारणाने मुल गए हैं, ऊची इमारतें बन गई हैं... और जिन दिन से फादर ने ऐसा कहा पा, वह उमो दिन में इस कोशिश में था, कि फिर 34 : अंधे आकाश का सूरज - अपने उस छोटे से कस्बे में जाए, उसे महसूस करे, देखे । वह अव भी चल रहा था। सामने गिरजा-घर दिखा। उसने श्रद्धा- पूर्वक सिर झुकाया । ध्यान से देखा, वह पहले जैसा ही छोटा था. पहले से भी अधिक छोटा। अगल-बगल बड़ी-बड़ी इमारतें बन गई थी और यह एकदम बौना लग रहा था। उसे ख्याल आया, वह अपनी पत्नी के साथ इसमें आया करता था। पत्नी की याद आते ही उसका चेहरा विचित्र घृणा से विकृत हो गया। मिशन वालों ने उसे एक छोटा-सा मकान रहने के लिए दिया था। फादर फ्रेंडी ने उसकी शादी करवा दी थी। अब वह हमेशा के लिए इस कस्बे का बनकर रह गया था । फादर के साथ बरावर लगा रहता। उसकी, पत्नी हमेशा खांसा करती। और एक दिन, जव फादर फ्रेंडी का अचानक देहान्त हो गया, तो ढेर-सा अंधेरा उसके आगे फैल गया। इस अंधकार को दूर करने के लिए वह एक पराये शहर में चला गया। वहां बिजली कम्पनी में उसे नौकरी मिल गई । फिर भी वह समय निकालकर अपनी पत्नी के पास आया करता था। पत्नी दमे की शिकार थी। वह भरसक कोशिश करता था कि उसकी गृहस्थी टूटने नहीं पाए । परंतु एक रात, जव वह सो रहा था, खांसी से परेशान उसकी पत्नी कुएं में कूद गई। सुबह, पुलिस ने उस पर ही संदेह किया कि उसने पत्नी की हत्या की है। फिर भी, कोई ठोस सबूत नहीं मिला और वह छोड़ दिया गया। मगर वह ऐसा अनुभव करता था, जैसे वह अपराधी है, उस पर एक खून का इल्जाम है और वह छोड़ दिए जाने के बावजूद लोगों के आगे. वेगुनाह नहीं बन सका है.. उसका मन होता, वह कस्वे से भाग जाए। वह फिर चलने लगा। शाम हो चुकी थी। रास्ते को सारी बत्तियां जल गई थीं। अब वह अपने उसी पुराने मकान के सामने खड़ा था। उसका मकान, जो पहले बीच में लगता था, अब एक किनारे लगता था। उससे हटकर एक कोठी वन गई थी। कोठी में हर तरफ जलती हुई वत्तियां थीं । जिस मकान में वह रहता था, उसे लगा, बहुत नहीं बदला है। पहले, वह इसी मकान के सामने की जमीन को पानी छिड़ककर साफ करता था । प्रत्येक रविवार,.. ।
उजाले का चेहरा : 35 . फादर फ्रेंडी प्रेयर-मीटिंग किया करते थे। उनके लिए एक पुरानी-सी कुर्सी और एक तीन टांगों वाली मेज वह लगा दिया करता था। फादर पवित्र वचन बोलते थे, यीशु मसीह के वचन "तमी तक चपरासी किस्म का आदमी उमके करीब आया..."क्या है ? साहब नहीं है । मिलना है तो आफिम में आना • " फिर जाते-जाते खुद ही पलट आया-"मगर सुनो, अगर कुछ माल-पानी है तो मैं एक घण्टे के अंदर मुलाकात करवा सकता हू"निकालो · अरे बाबा जल्दी करो..." यह एकदम अपरिचित आवाज उसे अपने ही घर से सुनाई पड रही थी, जहां वह वो रह चुका था, जहा उसने फादर फ्रेंडी की दी हुई एक तम्ली लटका रखी थी । होम, स्वीट होम ! उसके गले के भीतर भयंकर जलन होने लगी। वह कुछ भी उत्तर नहीं दे सका। वह सोच ही नहीं पाया था कि क्या कहे... और उस आदमी ने डपटकर कहा- "चोर उचक्का कही का...निकल जा, वरना रपट लिखवा दी तो सड़ता रहेगा "हरामी ।" उमने पैर उठाने की कोशिश की । वे उठे नहीं। बर्फ में धस गए थे जैसे । मारी शक्ति बटोरकर उमने अपने को आगे की ओर धकेल दिया ... आगे.. आगे और आगे, कि एकदम रुक गया। वहीं पुलिया। पुलिया के पास वाला वही बिजली का खम्भा • तब इस कस्बे मे ढिबरी जलती थो । लालटेन वरती थी। मंसवती होती थी कि एक दिन वह आया। उसके साथ बड़े-बड़े कई अफमर आए थे। एक सीडी के सहारे चढकर वह खम्भे पर काम कर रहा था। बच्चे नीचे घेरे खड़े धे । वडे लोगों की भीड थी । औरतें पेड़ के पीछे से मगल गा रही थी। और जव, उमने तार जोडे तो बिजली की रोशनी पहली बार कस्बे में फैल गई। बच्चे शोर करते हुए दौडने लगे। वह सम्भे से उतरा तो उसकी आरती उतारी गई। थाली को पहलो मिठाई उसे दी गई थी "अफसरो ने कहा-"अब इस बिजली से मिलें चलेंगो, चक्कियां चलेंगी, जगह-जगह नल होंगे और इन सब के पीछे तुम होगे मेकनिक उसने गिरते अधेरे के बीच अपने उसी पुराने कस्बे को खोजने की कोशिश की। उसने देखा, पुलिया के पास वाला खम्भा "वह परपराते । " 36 : अंधे आकाश का सूरज परों से आगे बढ़ा। उसके हाथ उसे छूने के लिए कांप रहे थे...उसे लग रहा था, वह अपने कस्बे के एकदम निकट आ गया है "एकदम करीव... बस, दो कदम चलेगा और अपने कस्वे में आ जाएगा, कि तभी खम्भे के नीचे लेटा हुआ एक कुत्ता उस पर गुर्रा कर झपटा · वह लड़खड़ाकर गिरने लगा, गिरते समय उसकी आंखों के आगे ऊंची-ऊंची इमारतें धूम गईं, बड़ी-बड़ी मिलों की डरावनी आवाजें चीख बनकर उसके कानों में भर गई और उसे महसूस हुआ, उसका वह छोटा-सा प्यारा कस्वा इन बड़ी-बड़ी चीजों की भीड़ में कहीं खो गया है, अब इस धरती पर नहीं है 'कहीं भी नहीं है शायद !
एक दूसरा आकाश अब जो अक्सर होता है, वह एक बार अजाने हो गया था। छुट्टियों में घर गई थी। मुबह-सुबह पहुची। मेरा कमरा अलग था। मेरे पहुचने के बाद हमेशा की तरह कमरा खोला गया । फिर मफाई शुरू हो गई। पापा सामने ईजी-चेयर निकालकर अखबार पढ रहे थे। सेक्नि मां बार-बार किचिन से निकलकर एक वार कमरे को देख लिया करती और कोई न कोई मुझाव देकर जाती। मैं ग्रा करती हुई सामने आ गई। पापा कुछ बोले नहीं। चुपचाप आखें नीची किए पढ़ते रहे । मैंने ही टोका, “अव पैर का दर्द कसा है ?" "बस. ठीक है।" वे उसी तरह पढ़ते रहे। मेरे भीतर जैसे कुछ टूट गया । ये ही पापा बराबर कहा करते थे, "जब आदमी में कोई कमजोरी हो तो किसी में आखें मिलाकर बाते नहीं करनी चाहिए। लाख अपने को ऊपर से मजबूत बनाकर प्रस्तुत करने पर भी आखों से वह वीकनेम मलक जाती है, जिसे आदमी ािना चाहता है।" ऐसी कितनी ही बातें पापा तब कहा करते थे, जब वे जज थे। प्रश करता हुआ मेरा हाथ अपने आप एक जाता है । मैं अनुभव करती हूं, अपवार काप रहा है। पापा की आखें दौस नही रही हैं, लेकिन वह वीकनेम और मैं बिना कुछ बोले वायरूम की तरफ मुह गई थी। शाम निपु से मिलने गई। उमकी जिद थी कि मैं पाना उमके साय धाकर जाऊ। सरिन मेरा. मन था, हमेशा की तरह पापा को बगल में बैठकर याऊ।
36 : अंधे आकाश का सूरज 'पैरों से आगे बढ़ा। उसके हाथ उसे छूने के लिए कांप रहे थे."उसे लग रहा था, वह अपने कस्बे के एकदम निकट आ गया है। एकदम करीब वस, दो कदम चलेगा और अपने कस्वे में आ जाएगा, कि तभी खम्भे के नीचे लेटा हुआ एक कुत्ता उस पर गुर्रा कर झपटा · वह लड़खड़ाकर गिरने लगा, गिरते समय उसकी आंखों के आगे ऊंची-ऊंची इमारतें घूम गई, बड़ी-बड़ी मिलों की डरावनी आवाजें चीख बनकर उसके कानों में भर गई और उसे महसूस हुआ, उसका वह छोटा-सा प्यारा कस्वा इन बड़ी-बड़ी चीजों की भीड़ में कहीं खो गया है, अब इस धरती पर नहीं है ... कहीं भी नहीं है शायद !
एक दूसरा आकाश 1 अब जो अक्मर होता है, वह एक बार अंजाने हो गया था। छुट्टियों में घर गई थी। सुबह-सुबह पहुंची । मेरा कमरा अलग था । मेरे पहुंचने के याद हमेशा की तरह कमरा खोला गया। फिर सफाई शुरू हो गई । पापा सामने ईजी-चेयर निकालकर अखबार पढ़ रहे थे। लेकिन मां बार-बार किचिन से निकलकर एक वार कमरे को देख लिया करती और कोई न कोई सुझाव देकर जाती। में यश करती हुई सामने आ गई। पापा कुछ बोले नही । चुपचाप आयें नीची किए पढते रहै । मैंने ही टोका, "अब पर का दर्द कैसा है ?" "बस, ठीक है।" वे उसी तरह पढ़ते रहे। मेरे भीतर जैसे कुछ टूट गया ! ये ही पापा वरावर वहा करते थे, "जब आदमी में कोई कमजोरी हो तो किसी से आखें मिलाकर बातें नही करनी चाहिए। लाख अपने को ऊपर से मजबूत बनाकर प्रस्तुत करने पर भी आखो से वह वीकनेम झलक जाती है, जिसे आदमी छिपाना चाहता है।" ऐसी कितनी ही वार्ते पापा तब कहा करते थे, जब वे जज थे। वश करता हुआ मेरा हाय अपने आप रुक जाता है । में अनुभव करती हूं, अपवार कांप रहा है। पापा की आखें दीप नहीं रही हैं, लेकिन वह वीकनेस.. और मैं विना कुछ बोले वायरूम की तरफ मुड गई थी। शाम निपु से मिलने गई। उसकी जिद पी कि मैं खाना उमके साय खाकर जाऊं। लेकिन मेरा मन पा, हमेशा की तरह पापा की बगल में बैठकर खाऊं।
38 : अंधे आकाश का सूरज - जब घर लौटी तो आठ बज रहे थे। पापा अब भी उसी तरह ईजी-चेयर पर बैठे थे। नहीं, आंखें वन्द किए चुपचाप लेटे-से थे। एकदम शव की तरह। एक वार मुझे खयाल आया, अगर पापा यहां न रहें तो और मैं जल्दी से उनके निकट चली गई, "पापा ?" "ओह, तुम आ गई ?" पापा ने आंखें उठाईं। लेकिन मद्धिम रोशनी में कुछ भी नहीं देख पाई मैं। "इस तरह अंधेरे में क्यों बैठे हैं ?" "अव आंखें लाइट बर्दाश्त नहीं करतीं। अंधेरा अच्छा लगता है । चलो बेटा, खाना खाया जाये ।" और वे वहीं से आवाज़ देते हैं, "विभु आ गई है, खाना लगवाओ।" एक दिन मैं यूं ही लाइट ऑफ कर अपने कमरे में थी कि पिताजी आ गए। मेरे कमरे में अंधेरा देखकर दरवाजे तक आए, "सो गई विभा?" "नहीं, पापा । बस यूं ही ।" "नहीं वेटे, अंधेरे में नहीं रहते। जो रोशनी से निभा नहीं सकता, ' वही अंधेरे से समझौता कर लेता है । और समझौता एक किस्म की मृत्यु होती है।" मैं कुछ बोली नहीं थी। चुपचाप मैंने रोशनी कर दी। "दिस इज गुड ।" और पापा हंसते हुए चले गए थे। मैंने घूमकर देखा, पापा अव भी आंखें बंद किए चेयर पर लेटे थे । मैं धीरे-धीरे अपने कमरे तक गई। दरवाजा ठेलकर भीतर घुसी तो दम घुटने लगा । लगा, कमरे का सारा धुआं मेरी छाती में बैठ गया है । मैं खांसने लगी। घुप्प अंधेरा ! और अंधरे में ही स्विच के लिए मैं हाथ मारने लगी। अंधेरे में रोशनी के लिए छटपटाना कितनी बड़ी विवशता हो सकती है, उस दिन मैंने पहली बार जाना था। मैं खांसती हुई वाहर आ गई। मां किचिन से भागकर आई, "मैंने गोयठे का धुआं किया है.। इस बार मच्छर बहुत बढ़ गए हैं।"
एक दूसरा आकाश: 29 मैंने मां की तरफ देखा, मेरी आंखों में ढेर-सा पानी भर गया था। छाती के अदर धुआं एक किस्म की छटपटाहट. और अब यह घट- पटाहट में अक्सर भोगती हूं। मैं अनुभव कर रही हूं, यह मेरी वीकनेम है कि मैं अपने को सही-सही व्यक्त नहीं कर पाती । हमेशा गलत ढंग से किसी भी बात को प्रेजेन्ट करने लगती हूं। सामने की सीढियों पर परों की आहट होती है। मैं उठकर खिड़की के करीब आ जाती हूं। देखती हूं, वह गमले में लगे कैक्टस को धीरे-धीरे सहला रहा है। मैं समझ जाती हूं, आज वह खुश है। जब भी खुश रहता है, इसी तरह करता है । अब वह अपनी उगली को दवा देता है। मैं उसको एक उगली पर लहू की बूंद महमूम करती हूं। वह उंगली को थोडा ऊपर उठाकर खिड़की के पाम आ जाता है। पिल की डिजाइन मे हाथ भीतर कर अपनी वही उगली मेरे माथे पर रख देता है, "हैप्पी?" मैं कुछ नही कहती। आखिर इसमे खुश होने की क्या यात है। लेकिन इतना जानती हूं, वह कोई भी काम लहू से शुरू कर लहू से खत्म करना पसद करता है। ब्लड उसका स्वभाव बन गया है । भीतर आते ही हमेशा की तरह ईजी-चेयर के पास ठिठक जाता है, "कितनी बार कहा कि इसे किसी के हाय वेष दो या किसी कमरे में बंद करवा दी।" "लेकिन यह पापा की निशानी है।" "यट आई हेट इट । यह भी कोई बात हुई कि अपने आपको कुर्सी के हिस्से सौंपकर मुर्दै वन जाओ।" और वह लकडी की कुर्सी पर बैठने हुए कहता है, "गुड ! क्वाइट हाई।" फिर दो मिनट तक मेरी तरफ देखता है और ठहाका लगाने लगता है। और जब चुप होता है, तो केवल एक शब्द कहता है, "मॉरी।" फिर बहुत देर तक कुछ नहीं बोलता। में चुपचाप उसके बोलने की प्रतीक्षा करती रहती हूं। ऐसा लगता गून्य में कोई कास-वड-पजल उछाल दिया गया । ढेर-मारे खाली पाने । और इन खानों में हमे शब्द भरने हैं। हम इन्ही शब्दों को जैसे सोचते रहते हैं..." है, जैसे 40 : अंधे आकाश का सूरज और वह कुछ देर बाद एक शब्द तलाश लेता है, "गिल्टी ?" मैं शब्द ढूंढ़ने के बजाय उसकी तरफ देखती हूं। वह धीरे से कहता "यस विभु, आई फील गिल्टी."अब मैं क्या करूं ?" मैं दीवार पर टंगी उसकी बंदूक को देखती हूं। हत्या करना उसका स्वभाव है । ब्लड उसका नेचर है । तभी शर्मा का खयाल आ जाता है। वे बिल्कुल इसी तरह टूटे स्वर में वोले थे, "मैं क्या करूं विभु, मैं क्या करं?" "कुछ नहीं करो। लंदन की इस गली में सड़ते रहो। अपने घर वालों को खत लिखते रहो। और वे एक-एक पड़ोसी को दिखाते फिरेंगे कि फॉरेन से आया है।" "लेकिन मैं तुम्हें हिन्दुस्तान नहीं ले जाऊंगा।" "क्यों नहीं ले जाओगे?" "मुझे नफरत है । आई हेट इण्डिया ।" शर्मा पूरी शक्ति लगाकर चिल्लाए थे । मैंने देखा था, दो छोटे-छोटे वाक्यों में शक्ति खर्च कर शर्मा कंगाल लग रहे थे । उनका पूरा जिस्म पत्ते की तरह कांप रहा था और जब भी वे इस तरह कांपे हैं, मुझे वेहद घृणित प्रतीत हुए हैं। मैंने दूसरी तरफ मुंह फेर लिया, "वट आई लव इण्डिया ।" शर्मा ने दोनों हाथों से मेरे कंधों को दवाया, "सो यू वान्ट टू गो . "यस, इन योर वर्ड स्'द सेम हेल..!" और मैंने गुस्से में उनके हाथ झटक दिए । वे इस धक्के को बर्दाश्त नहीं कर सके । पलंग पर गिर गए। मैंने चिल्लाकर कहा, " 'ईस्ट एण्ड' की इन गलियों से मुझे घृणा है । तुम केवल पति होने के अधिकार से मुझे यहां तक ले आए...?" "मैं क्या करूं विभु''मैं क्या करूं?" "अव करने को शेप रह ही क्या गया है ! फैक्टरी के धुएं से मटमैली, बिना पुती छतें, एक-दूसरे से जुड़े मकान, धुएं से भरे कमरे"इन्हीं में से एक में तो तुमने मुझे जीवित दफन कर दिया है।" वे धीरे से मेरे करीव आए थे, " 'ईस्ट एण्ड' की इस गली को छोड़ एक दूसरा आकाग:41 देंगे। लदन के किसी भी खूबसूरत हिस्से में चले जाएगे। मगर विम, यह भाग मस्ता है । और यहां कितने भारतीय लोग वस गए हैं !" मैंने बिना उनकी तरफ देसे ही कहा था, "मैं जानती हूं, वे यहां किस तरह बस गए है। क्या 'ईस्ट एण्ड' 'वेस्ट एण्ड' के 'सोहो' को तरह नहीं है ? क्या यहां वेश्याएं नही रहती? क्या इन लड़कियों को हजार दो हजार इसलिए नहीं दिए जाते कि ये बाहर आने वालों से माह कर लें और जब वे ब्रिटिश नागरिकता स्वीकार लें, तो उन्हें छोह- कर औरो के पीछे लग जाए“बोलो, क्या यह सच नहीं है।" "सब सच है विभु, लेकिन कितने फर की बात है कि हम लदन में रहते हैं।" "और एक दिन तुम मुझे अकेली छोड़ जाओगे, कि मैं भी उन्ही तीन बूडी औरतों की तरह कचरे के डब्बे से जूठन वीनकर यारा कहंगी और कोई आदमी झाड़ से पीटेगा · तुमने भी तो देखा था उस दिन । याद है, तुमने कहा था, 'विभु, ये भूख रही पोछा नहीं छोड़ेगी और में एकदम शर्मा के सामने आ गई थी, "एक बात कहू ?" "क्या" - "तुम हिन्दुस्तान से उठाकर मुझे लदन की इस गली में ले भाए । में पूब जानती हू. तुमने ऐसा क्यों किया? तुम्हें पता चल गया था कि मैं माशीप से प्यार करती हू, ओर तुम मुझसे बदला लेना चाहते थे। इसी. लिए तुमने मुझे इन पशुओं के बीच मे रख दिया है । वट आई हेट यू एण्ड दिम सराउंडिंग..." "चीखो मत।" शर्मा पूरी शक्ति लगाकर एक बार फिर चिल्लाए, "आई नो. यू वान्ट टू गो?" "यस, आई वान्ट टूगो?" और मैंने गुम्मे में अपना लाउज फाड दिया। बाहर आ गए हिस्मो को अपने नाखूनो से नोच-नोचकर लहू-लुहान बनाती रही और चीखती रही, "भूख कहीं पीछा नहीं छोडती, शर्मा। कही नहीं, मैं मां बनना चाहती हूँ और तुम मेरी उस भय लायक नहीं "" शर्मा बीच-बीच में कापते हायों से मुझे रोरते रहे। गिड़गिडाते रहे. "मैं क्या करू विभ, मैं क्या कर ...?"
No text on this page.
कौर । रात की कजरारी आखों का काजल फैल गया। सुरजीत कौर तेज कदमो से कमरे में दाखिल हुई--जसे कोई यात्री शीघ्रता से चल कर बिसी ट्रेन में घुसा हो। बंधेरा घुप्प, रात चुप्प सुरजीत बुदबुदायी, "मुझे ही सब काम करने हैं। मा जरा रोशनी कर देती तो जाने कौन-सी कयामत आन पड़ती !" वह अंधकार में ही दियामलाई ढूढने लगी। नहीं मिली तो मुसकान आप-से-आप उसके अधरी पर तैर गयी-उस जैसी आस वाली को जब नहीं मिलती तो किमी अधी को, उमकी बेचारी नेत्रहीन मा को, कैसे मिलती ! इस बार उसका हाय माचिस पर जा पडा। उसने पहली तीली धिमी तो सिर्फ 'फिस' करके रह गयो, जली नहीं। उसने दूसरी तोली निकाली। घिसने ही जा रही थी कि उसे लगा, जैसे सलाई यार-बार घिमकर रोशनी देती है वैसे ही आज का इनसान भी तो सलाई-भर ही रह गया है। बार-बार जिंदगी इस उम्मीद में घिसता है कि ज्योति को रेखा उभर आये, रोशनी उतर आये। और फिर दिये से निकल कर रोशनी की मखमली चादर उम छोटे-से कमरे में इस तरह फैल गयी, जैसे कभी पहले एक छोटी-सी अगूठो से पान-भर ढारे की मत. मल छितर जाती थी। सुरजीत ने देखा, एक कोने मे टाट से लिपटी हुई मा रही कोपरी की तरह पड़ी थी। करीव ही उसकी बेटियो-प्रीत कौर, गीतकार और किरतन कोर-~-एक-दूसरे से कीडों की तरह लिपटी पड़ी थी। किमी का सर किसी के पैरों पर, किसी के पैर किसी को ती पर । गुरजीत से अपनी ही औलाद देखो न गयी। उसने दुपट्टे मे साया माटा गया .: अंधे आकाश का सूरज लए, टीन का पुराना-सा डिब्बा उठाना चाहा कि वह गिर गया। डिब्बे के गिरने की आवाज से मां की आंख खुल गयी, हड़बड़ा कर बोली, "कौन ?" "मैं सुरजीत।" "तेरे को आज फिर देर हुई ?" "मां-आजकल सुसरी गड्डी ही बहोत लेट आती है।" मां इस जवाव को सुनते-सुनते तंग आ गयी थी, झुंझला कर बोली, "ये गड्डी अक्सर ही पीछे क्यों आने लगी है ?" सुरजीत के गले में उत्तर फंस गया, जैसे कोई काटा हो । वह बार- वार निगलने का प्रयास करने लगी। अव वह कैसे कहे कि गड्डी पीछे नहीं आती, बल्कि अपने को प्रगतिशील कहने वाला इन्सान ही इन दिनों बहुत पीछे लौट गया है। फिर उसने वातों के खिलौनों से बहलाना चाहा, "मां, तुमी चैन से बैठो । मैं अभी फुल्के सेंकती हूं।" और जब वह फुल्के सेंकने लगी तो उसे ख्याल आया, जब उसकी मां की आंखें ठीक थीं और वह चूल्हे की करीव बैठकर फुल्के सेंकती थी, उस वक्त अक्सर सोचा करती थी कि जब वह सयानी हो जायगी तो खुद फुल्के सेंकेगी। मां को वह कोई तकलीफ नहीं होने देगी। चौके से उठा- कर कहेगी : "तेरे को सेंकने की ज़रूरत नहीं, क्या मेरे को सेंकने नही आते।" सोचने का क्रम आगे बढ़ा, तो, उसे लगा : वह रोटी लिए 'उन सामने बैठी है। अजाने ही उसके गालों पर सुर्थी फैल गयी-जैसे दि ने गुलाल मल दिया हो। कोई करीव बैठा, फुल्कों की मांग कर रहा उसे गलियों में बजता एक रिकार्ड सुनायी पड़ने लगा- "मोती चुगने गयी रे हंसी, मानसरोवर तीर । पंख-पंख पर राजहंस ने, लिख दी प्रीत की पीर ॥" उसने पलट कर देखा, वहां कोई भी तो नहीं सिर्फ उसकी थीं। किसी ने राजहंस का एक-एक पंख जवरन उखाड़ दिया, गालों के गुलाल को जान-बूझकर रगड़कर मिटा दिया । उसे ध्यान आया कि वह अक्सर ही सोचा करती थी : 5 . -
कौर:45
।
होंगे; वह उन्हे सेंक-मेंक कर रेशम की तरह मुलापम फुल्के खिलायेगी।
तभी उसकी आंघो में आसू तिर आये, "किस्मत दी मारियों ने अज वझे।
वैल से (सुवह से) कुछ पद्दी-पी नई".."और वह जल्दी-जल्दी पुल्क
सेंकने लगी।
पहले जब मुल्क आजाद नहीं हुआ था, मबी आंखों में आम को
तरह मीठे-मीठे, रम-भरे सपने थे । लेकिन जब देश आजाद हुआ तो उस
की माताजी को आप पहले जरा खराब हुई, फिर एकदम ही रोगनी
चली गयी। दगे में उसका शौहर मारा गया तो मपनों के आम में कोई
लग गए और फिर वह मा सहित शरणार्थी-जत्थे के साथ भारत भेज दी
गयी और वह फिर सुरजीत कौर बन गयी। और उमे याद आया,
आज जब उसने गाडी में एक यावू का दिया हुआ गीत गाया-
"और बात है, मेरे ख्यालाती के शिशु को
वातो के खिलौने से बहला दो
लेकिन तसव्वुर में, हमी ने, गगा की वाहो
मे झूमते चनाव देखे थे।
यह और बात है, कुर्बानियों को दुलहन को
सिंदूर चुरा के, याज दूल्हे हो,
लेकिन यह भी तो सच है, हम ने भी कभी
आजादी के स्वाब देसे थे।"
तो कोई नेता-सा लगने वाला आदमी एकदम विगह पड़ा था। वह
चुप हो गयी थी, जैसे चुप्पी की सगी हो । लेकिन उसे अजीब लगा-
आजादी से पहले यही नेता लोग कितनी मिन्नतें करते थे, लारा गुशामदें
और हजार तमल्लियां कि आजादी मिलते ही यह हो जायगा, वह हो
जायगा । और वह मन मसोस कर गाने लगी थी-
"तेरे वाजून कोई सहारा,
सोना लुटिया पंजाब पियारा।
रावलपिंडी, लाहौर विच मारे,
कया भेड़ादें घोर पियारे ।
46 : अंधे आकाश का सूरज रस्ते जा दियां न, गोते खादियां, छुरे मारे। वच्चे मां-मांदे गोदियां खो-खोके मारे।" एक यात्री विगड़ गया, "ओए, बिहार दे विच देख ।" और फिर हंसकर वोला, "यह पंजाव का रोनाधोना नहीं चलेगा।" सुरजीत उसे कैसे समझाये कि क्या विहार, क्या पंजाब, क्या बंगाल, सवका रोना तो एक ही है । क्योंकि सवका रोना, मन का है। रोना पेट का है। लेकिन वह मन को और पेट को दवाकर गा उठी थी- "ऐ मौत, तूने हमको दरि-दरि रुला के मारा, घर से तो किया वे-घर, वन में रुला के मारा- क्या दोष दूं किसी कू, अपने ही करम खोटे- घर के चिराग बनकर, घर कू जला के मारा।" लोग वाह-वाह करने लगे थे। फिर वह यकायक चौंक गयी, चपाती जल गयी थी। फुल्के सेंककर एक टीन के टूटे-से बरतन में नमक के साथ रोटियां रख मां के सामने बढ़ा कर उसने कहा, "तुसी खा लो न ।" "तयार हो गयी ?" "हैं जी," और उसने मां का हाथ चपातियों पर रख दिया। बच्चियां सो रही थीं। उसने एक-एक को झकझोर कर उठाया, "ओए, कुड़ी, लंगर वास्ते चल !" सवकी सब उठ गयीं। सिर्फ किरतन नहीं उठी । सुरजीत ने प्यार से पुचकारा, "मेरी लाडो, अव उठ भी जा । चल, चल न, चपातियां तयार हैं।" और जव दो-तीन आवाजों में किरतन उठी तो उसे यकीन न हुआ कि उसे भोजन के लिए उठाया जा रहा है। क्योंकि नानी दिन से ही कह रही थी कि तुम्हारी मां आटा लाने गयी है और अपलक इंतजार भरी आंखों से वह मां, नहीं-नहीं, आटे का इंतजार करते-करते सो गयी थी। लेकिन जव उसने नानी के सामने फुल्के देखे तो उसे अजीव- सी खुशी हुई और वह सुरजीत से लिपट गयी। सब ही सब खाने वैठी--प्रीत कौर, नीत कौर और किरतन कौर । - .
कोर:47 किरतन के मुह मे सुरजीत खुद निवाले दे रही पो, सबसे छोटी जो पी वह खाना पाती हुई प्रीत कौर ने पूछा, "मां जो, आज बहोत देर से आयो तू" "हा, गड्डी ही लेट यो"--सुरजीत कौर ने रटी-रटायी बात कह दी। मभी कोई न कोई सवाल कर रही थी। चुप थी तो केवल किरतन । सुरजीत ने भोजन का कौर उसके मुह मे देते हुए पूछा, "क्यो लाडो, तेरे को मवाल नहीं पूछने ?" मुरजीत कौर का हाथ रोकते हुए किरतन कौर ने कहा, "माताजी, पूछने तो हैं । तू मेरे को सिर्फ यह बता दे कि तू हमारे लिए रोटिया कैसे लाती है ? बडी होकर में भी तेरी ही नरह रोटिया साया करूगी।" मुरजीत कौर का हाथ बरफ की तरह जम गया । जवान, जैसे कोई यत, जिसमे सब-कुछ लिया तो है, लेकिन जिसे किसी ने मजदूरी के गोंद से, लिफाफे के भीतर डालकर चिपका दिया हो। अब वह अपनी लाडो से, किरतन कोर से कैसे कहे कि, वह पहले किलास मे सोई है, तोमरे किलान मे मोई है, गारड के डिब्बे में सोई है, स्टेशन मास्टर के कमरे मे मोई है और कुलियों के साथ पलेटफारम पर''वह कैसे समझाए कि पहले नो मिर्फ प्रीत कौर थी। जब वह प्रीत कौर के लिए रोटियो इकट्ठी करने लगी तो नीत कौर आ गयी। और जब वह प्रीत कौर और नीत कौर के लिए लगर का इतजाम करने लगी तो किरतन कौर आ गयी। उसका जी चाहा वह चीख-चीखकर कहे कि आदमी बहोत महरवान, बहोत रहमदिल हो गया है । उनके मुह में रोटियों का कौर देने के माय- साथ हर बार खेलने के लिए उन्हें एक 'कोर' भी दे देता है । और किरतन कौर है कि पूछे जा रही है, "माताजी, मेरे को बता दे न, न रोटिया कैसे लाती है बड़ी होकर में भी तेरी ही तरह रोटिया लाया कम्गी..." .
- . हुक आलिया को लगा, जैसे शव को वक्स में डालकर लोग एक-एक पेंच सत- कता से कसते हैं, वह भी वैसे ही दरवाजा बन्द कर रहा है। उसने पहले, केवल पल्ले जोड़ने की आवाज सुनी । वह घूमी। उसने देखा, वह झुककर नीचे की सिटकिनी लगा रहा है । फिर उसने ऊपर की सिटकिनी लगा दी, अन्त में लकड़ी लगा देने के पश्चात् जैसे वह आश्वस्त हो गया। इतना सब कर, वह बाथरूम में घुस गया । मगर तुरंत ही भयभीत-सा बाहर आ गया। उसने एक बार उसे देखा और सीधा मेज के निकट गया। दराज से कुछ उसे लेना था, शायद । काफी देर तक, चीजें उलट-पलट करता रहा। फिर कुछ ख्याल आया, दराज यूं ही खुली छोड़कर दूसरे कमरे में चला गया। वापस आया, तो उसके हाथ में एक बड़ा-सा ताला था। उसने, उसी दरवाजे में भीतर से ताला लगा दिया। चावी को एक बार उसने उछाला । फिर मुट्ठी में कसकर, वह आप ही आप मुसकराया । चाबी को पैंट की जेब में ढूंसकर, वह दुबारा वाथरूम में घुस गया। आलिया ने सोचा, शव को इस प्रकार वक्स में बन्द करना मूर्खता के अतिरिक्त और क्या है "लाश यदि बन्द न भी की जाए, तो क्या वह उठ- कर भाग जाएगी? और उसने, सामने के आईने में अपना अक्स देखा फिर दरवाजे को और वह बहुत धीरे से मुसकरायी। वाथरूम से लगातार पानी गिरने का स्वर आ रहा था । उसने सोचा, वह नहा रहा है। अभी उसे देर लगेगी चावी अपने साथ क्यों ले गया...क्यों? क्या दतता नोटा-मा TE एक:49 विश्वास नहीं था?" वह चुप पी डंडी एकदम आगे आ गए थे-"यू बिच..." और मुंह में एक बार भक से शराव को गध्र उठी। फिर एक मुक्का उसकी नाक और होंड के बीच । उसने जीभ से अनुभव किया, होठ से खून बहने लगा था। वह कुछ नहीं बोली थी। चुपचाप मूटकेस में अपने कपड़े रखने लगी थी। तभी उसका भाई आ गया था । डडी ने कहा, "सुनते ही चाल्स, यह हरामजादी घर छोडकर जा रही है..." "जा रही है !".. वह एकदम चौक गया था, "कहा?" वह फिर भी चुप रही। वह एकदम करीव आ गया, "कहा जा रही हो?" वह चुपचाप उसकी तरफ पीठ किए, कपडे पैक करती रही। यकायक उसका भाई चिल्लाया, "कुतिया बतलाती क्यो नही ?" और खीचकर उसे कमरे के बीच में ले आया। लगातार पीटने लगा। वह गिर गई। उसने कसकर एक लात उसको कमर पर दी । यह एकदम जोर से रो पड़ी थी। मम्मी ने कहा था, "चाल्सं. इसने सिविल मैरिज कर ली है।" -"किसके साथ ?" वह गुर्राया था। ---"वही पो०..." " ---"पी०? वह रास्कल "पूनी 'आवारा'"वह इसे ले जाकर चकला चलायेगा." आई विल किल हिम"आई विल सूट".. और तभी चौखट पर एक भारी आवाज आकर पडी हो गई थी, "मैं टैक्मी में बहुत देर से इतजार कर रहा था, चलो आलिया उसने देखा पा, ठोस मजबूत स्तम्भ की तरह पी० पड़ा था। वह उठी थी। मूटकेम उठाकर, चुपचाप चौखट के बाहर आ गई थी। गिनी में भी, उसे रोकने की हिम्मत नहीं पदा हुई."न मम्मी, न ही, न भाई!. खट् से बाथरूम का दरवाजा खुला। वह नहाकर बाहर आ गया। उमने गोला तौसिया वहीं - - 50: अंधे आकाश का सूरज - टांग दिया। फिर उसकी तरफ देखकर बोला, "अरे, तुम अभी तक खड़ी हो.''जाओ, जाकर नहा लो।" वह चुपचाप जाने लगी । जव वह एकदम दरवाजे के पास आ गई, तव वह तेजी से उसके करीव आ गया ".."सुनो, एक-एक चीज घिसकर साफ करना..." वह जोर से हंसा । विना कोई उत्तर दिए, वह भीतर घुस गई । फिर उसने दरवाजे को भीतर से वोल्ट कर लिया। शावर के नीचे एक पटिया पड़ी थी। गीली-गीली। वैसे शावर वन्द था, मगर एक-दो बूंद पानी जब-तब चू रहा था । बिना कपड़े उतारे, वह उसी पटिया पर बैठ गई, पैर मोड़कर... .''उस समय, वह मुश्किल से दस साल की रही होगी। एक दिन स्कूल से लौट रही थी, कि पानी हलके-हलके चूने लगा था। घर के रास्ते पर ही डेविड अंकल का घर पड़ता था। वह जैसे ही उनके गेट के सामने से गुजर रही थी, अंकल ने आवाज दी, "आलिया बेटी, भागकर भीतर आ जा..." वह भीतर चली गई थी। अंकल के घर वह मम्मी-डैडी के साथ कई वार आई थी। जब भी वे लोग आते, अंकल कहते, "भई, मैं तो ईश्वर का सेवक ठहरा । इसलिए मैंने शादी नहीं की। या तो पत्नी की सेवा करो, या फिर ईश्वर की। दोनों काम एक साथ हरगिज नहीं हो सकते' 'अव तुम ही उठो आलिया की मम्मी, और हम सब के लिए कॉफी वनाओ।" मम्मी उठकर भीतर किचिन में चली जाती। डडी और अंकल बातें करते । और वह दीवार पर लगे धार्मिक चित्रों को देखा करती । विशेष कर, उसे वह चित्र बहुत ही पसन्द था, जिसमें एक औरत अपने बालों से जीसस के पैर पोंछ रही थी. इस पेंटिंग को देखकर, उसके मन में कितने ही विचार उठे थे और हर बार उसने अपने वालों को छुआ था। मगर वे वहुत छोटे थे और उसे इस बात का बहुत दुःख था। जव वह भीतर गई थी, तो हमेशा की तरह उसकी नजर सबसे पहले उसी पेंटिंग पर गई. और पेंटिंग का ख्याल आते ही, उसने कंधे पर फैले
अपने बालों को छा"सम्बे, पने, छितराए हुए पास । टीक उसी
औरत की तरह
तभी दरवाजे पर दस्तक पडी, और यह बाहर से पिल्लाया--"गुली,
वही पाउडर का डिब्बा पड़ा है । बदन पर अन्धो सरह मे छिडक रोका..
मुझे पुश अच्छी लगती है।"
वह शायद दरवाजे के निकट से चला गया, मार्गकि अब यह रिपी
तरह पी आशा नहीं दे रहा था।
आलिया नहाने लगी।
जब वह वाथरूम से निकली, तो उसका माग गरीर महगह पर
रहा था। वह एक किनारे पडी होकर मौलिए गं बाल हटानं मी...
उने आश्चर्य हो रहा था, यह लहकी इस कदर निरा।।
उसने जानबूझकर, उसके भीतर भय पैदा करने के लिए.टा,
"तुम्हें माला नहीं लग रहा है."
जन्मिने मन को थोडा-मा घुमावर दंग देगा। सिर पहल की
तयगि दाल अटकने लगी, वपनाप ।
का कोनास, बर वानव में बहुत प्रगन्न था।
एका गरी।
की मामोगी में, अब वह भीतर-भीतराममाया
उदार फिर माहम मिया, “मचमुच तुम्र नही माया
,
-- दादन रहें हो।" आलिया ने पहला मामला
-~-"-:" , दुर्ग तरह बिहा गया।
~ 'न्टा हिउही मान राना टा
में नारी कर दी..दना मोटा-माशिवाय भी लो
पर नीमा को मारनामी?"
अगिरा ही देना प्रमों और arrify
पृष्ठवर, मंददाय किया
किमी, “fat
52 : अंधे आकाश का सूरज है। और जहां विश्वास नहीं होता है, वहां शंका होती है। फिर व्यक्ति केवल शंका को सोचता है । उसी से पुल बनाता है । और जव इस पुल से गुजर कर पार जाता है, वहां भी उसे शंका ही मिलती है. किसी का विश्वास नहीं।" वह एकटक उसे देखता रहा। फिर परखने के लिए कि यह लड़की उसकी हर बात मानती है या नहीं, उसने कहा, "मुझे एक कप चाय चाहिए।" --"किचिन ?" -"उधर ।" उसने उंगुली से इशारा किया । -"पत्ती, दूध...?" -"सब वहीं।" वह भीतर चली गई। उसने हीटर का प्लग लगाया। केतली चढ़ा दी, और इंतजार करने लगी... उसे पी० का इंतजार रहता था। पी० याने डॉ० वेनस का एक मामूली ड्राइवर, जिसका काम था हर सण्डे उसे, ममी और डैडी को उनके यहां पहुंचाना और लाना पी० कुछ भी हो सकता था, परीवक्श ...पीटर' 'या प्रभात "उसे जानने की आवश्यकता भी नहीं थी, उसे तो सिर्फ गाड़ी का इंतजार रहता था। हर सण्डे डाक्टर वेनस के यहां वाइन-पार्टी होती थी। मुर्गी, अण्डे, कवाब और हर किसी को सर्व करती हुई वह... डाक्टर वेनस खुद मम्मी और डैडी को सर्व करते. आधी पार्टी तक ही, वे दोनों पीकर औंधे पड़ जाते. फिर हर कोई उसी के हाथ से पीना चाहता। बड़ी रात तक उसके लिए छीना-झपटी होती.. और जब वह जाने को होती, डाक्टर बेनस मुर्दा पड़े उसके डंडी की जेब में नोटों का एक वण्डल ढूंस देते। फिर पी० उन दोनों को लादकर, पीछे की सीट पर डाल देता। वह आगे बैठ जाती। पानी खौलने लगा। उसने पॉट में पत्ती छोड़ दी। फिर पानी... कितने सण्डे यूं ही निकल गये अर्थात् कितने महीने -
हुक:53
अब वह बहुत कम बोलने लगी थी। उस छीना-झपटी में उमने
बोलना ही छोड़ दिया था. “बोलने से क्या लाभ? मात्र गन्दौं ।
अपव्यय !
एक दिन पी० ने पूछा था, "तुम्हारे बाप की जेब में पड़े नोटो का
क्या होता है ?"
--"हफ्ते भर का रागन और शराय ।" इतना सोधा उत्तर पाकर
पी० ने फिर कुछ नहीं पूछा।
उसे चाय का ख्याल आया।
प्याली में डालकर उसके मामने ले गयी। वह धीरे-धीरे सिप करने
लगा..
पी. गाडी हमेशा धीरे-धीरे चलाया करता था । एक रात लौटते
वात उमने पूछा, "तुम्हारा भाई क्या करता है?"
-"वहन की कमाई खाता है और जुआ खेलता है।" एकदम सपाट
उत्तर।
पो० भौंचक रह गया। उसने जोर से एक्स्लेटर दबाया"50 - 60
70...
--"लो, प्याली लो।" उमने कहा ।
झूठी प्याली लेकर वह पुन. किचिन मे आ गयी। प्याली धोते-घोते
उसके सामने पी० का चेहरा आ गया, "इस तरह रोज-रोज खाया जाना
अच्छा लगता है ?"
- "मुझे किसी ने नहीं खाया है ।" वह जोर से चिल्लायो यो ।
-"चिल्लाओ मत ।" वह चीखा था।
-"हा, हां, सूव चिल्लाऊगी."जानती हूं, तुम भी एक भावारा
और बदचलन आदमी हो"तुम अपने मालिक और मालिक के दोस्तो
को तडकिया पहुचाते हो. मैं अकेली हूं, तुक मुझे पा जाओ. मेरा बाप
पोछे की सीट पर वेहोश पड़ा है, जागेगा भी तो कुछ नहीं बोलेगा..
उसकी जेब में नोट भरे हैं..." वह हांफने लगी थी, "वे सब क्या खाएंगे
मुझे पीकर आधे मरे हुए लोग"आपस मे हो लहते-झगड़ते साले कुत्ते
कोई हाय पकडता है तो कोई, बस ।...वे गया पाएगे, तुम में हिम्मर
54 : अंधे आकाश का सूरज तो गाड़ी रोको और चवा जाओ मुझे।" मोड़ पर गुस्से से पी० ने स्टीरिंग घुमायी थी। प्याली धोकर वह कमरे में आ गयी। उसने कहा, "सुनो, इस साड़ी में बहुत सुन्दर लग रही हो।" वह चुपचाप खड़ी रही ।... उस सण्डे भी, जब वह तैयार हुई थी, तो डैडी ने हमेशा की तरह 'रिमार्क दिया था, "वेवी, टुडे यू विल किल सम वन..." और जोर का ठहाका । गाड़ी आ गई। कार में बैठते ही उसने देखा ड्राइवर कोई दूसरा था । रास्ते भर वह ड्राइवर से पी० के विषय में पूछना चाहकर भी पूछ नहीं सकी थी। डैडी- ममी होश में.. और जब रात में लौटते वक्त वे दोनों पीछे की सीट पर औंधे पड़े थे, उसने अपना सवाल उसके सामने रखा था। ड्राइवर ने कहा था, "मेम साव, उसने तो डाक्टर साहब की नौकरी छोड़ दी। कहता था, ये 'माल' ढोने का काम अपन से नहीं होगा 'ये नीच काम है । सच, उस्ताद का दिमाग फिरेला 'अपन कू क्या, जेब में रुपया तो आता है, फिर साला माल ढोओ या कूड़ा और उसकी तरफ देखकर वह भद्दे ढंग से हंसा । ----"सुनो, तुमने रुपयों का क्या किया ?" वह उसे देखती रही, चुपचाप । -"बताओ न, क्या किया?" -"कुछ भी।" वह कुछ सोचता रहा । फिर उसने कहा, "तुम यहां मेरे पास रहोगी न?" -"तुमने एक महीने के लिए रुपये दिए हैं, फिर अविश्वास का कारण ?" उसने कुछ नहीं कहा। वह सोचने लगी, एक दिन उसके प्रस्ताव को चौंक गया था, "तुम मुझसे शादी करोगी ?" ----"क्यों, तुम मर्द नहीं हो ?" - सुनकर पी० पी० एकदम हक:55 -"लेकिन मैं तो एक साधारण ड्राइवर "लड़कियां पहचाने याला बदचलन और..." ~"मुझे तुम पर विश्वास है।" -"मुझ पर !" -"हां तुम पर, तभी तो तुमसे एक पत्नी का अधिकार मांगने आई हूं." वरना डॉक्टर वेनस के पास जाकर उससे रुपये मांगती और इस शरीर को नुचवाती।" "और कही एक सूदखोर की तरह मैंने तुम्हे जाना शुरू कर दिया तो?" --"तुम ऐसा नहीं कर सकते।" ---"क्यों नहीं कर सकता "मैं तुम्हें पली बनाकर तुमसे ही भिजनेम शुरू कर सकता हूं।" -"तुम ये भी नहीं कर सकते।" --"इतना सारा विश्वास !" "औरत के पास विश्वास के अतिरिक्त और होता भी क्या है। कोई भी मदं जव चाहे उसे छोड़ मकता है. कानून केवल उसे पचं दिल- वाता है, मदं का मन नहीं लौटाकर दे सकता और ये विश्वास ही है, जो त्याग दिए जाने के बाद भी औरत से जीवन-भर प्रतीक्षा करवाता -- पी० कुछ सोचने लगा था। फिर उसने कहा, "मैं एक शतं पर गादी कर सकता हूं।" --"क्या?" और पी० की शर्त सुनकर वह हस दी थी -"मुनो, तुम हम रही हो, अपने-आप क्या बात है ?" वह एकदम शान्त हो गयी। -"इधर आओ। वह विस्तर के करीब आ गयी। "ऐसे नही, मैं जैसे चाहूं-तुम्हे याद है, तुमने कहा था कि एक माह तक मैं जिस प्रकार चाहू तुम्हारा उपयोग कर सकता हूं?" --"याद है।" उमने घोरे से कहा और वह लाइट ऑफ करने के 56: अंधे आकाश का सूरज . लिए आगे बढ़ी। -"नहीं, वत्ती मत बुझाओ मैं तुम्हें रोशनी में देखना चाहता हूं।" उसने कहा। वह स्विच-बोर्ड से पीछे हट गयी। पलंग पर पड़ी चादर लपेटकर उसने कपड़े उतारने चाहे । -"नहीं, चादर भी नहीं. मैं एकदम ऐसे देखना चाहता हूं।" चादर पलंग पर रखकर, वह दोनों हाथों को पीठ की तरफ कर, ब्लाउज के हुक खोलने लगी। एक खुला। फिर दूसरा। तीसरा हुक फंस गया.. वह कोशिश करती रही । तभी वह उठकर उसके पास आ गया, "लाओ, मैं खोल देता हूं।" -"रहने दो, मैं तो खोल ही रही हूं। हां, समय क्या हुआ है ?" -"क्यों ? समय से तुम्हें क्या 'अभी तो एक महीना मेरे पास रहना है !" उसने कहा। तभी दरवाजे पर दस्तक पड़ी। वह दरवाजे की तरफ देखने लगा। आलिया ने कहा, "दरवाजा खोल दो।" वह स्थिर खड़ा रहा। -"लाओ, चाबी मुझे दो।" वह बोली। वह शान्त रहा। वह चीखी, "चाबी लाओ।" वह इतना जोर से चिल्लायी थी, कि उसने जेब से चाबी निकाल उसकी हथेली पर रख दी। आलिया आगे बढ़ गयी। उसने ताला खोला। ऊपर-नीचे की सिटकिनियां खोली। लकड़ी हटायी । और दरवाजा खुला तो सामने गुस्से से कांपता हुआ पी० खड़ा था। ...
हक : 57 यह हमेशा की तरह धीरे से मुसकरायो, "इस तरह पागल नहीं होते... पी०, लो, ब्लाउज को हुक लगा दो।" और उमने पी० की तरफ अपनी पीठ कर दी। जय वह लगा चुका तो उसकी जेब से नोटो के कई गट्टर निकालकर सामने फेंकती हुई बोली, "डाक्टर वेनस, जिसको हुक लगाने का अधिकार होता है, वही उसे पोल भी मकता है."तुम्हारा हिमाव चुकता हुआ, शायद अधिक ही रुपये हों.वाई.. और वह पी० को लेकर नीचे धड़ाधड़ उतर गयी।.. डाक्टर बेनस ने रपये उठाये । उन रपयो के साथ एक पत्र भी ना गया था। पी०, एक सिपाही के द्वारा यह पर भिजवा रही हू, शायद तुम्हे मिल जाये... तुम चोरी के अपराध में पकड़े गए। तुम्हे मजा मुना दी गयी है जुर्माना या जेल। याद है शादी से पहले तुमने एक शर्त रखी थी, कि अगर कभी तुम पकडे गए, तो अपने-आपको घेचकर भी मुझे छुड़ाना होगा में तुम्हारा जुर्माना भर रही हूं-डाक्टर वेनस के हायों अपने को बेच कर । जानती हूं, तुम आज ही छूट जाओगे "और मैं एक महीने के लिए डाक्टर बेनम के चेम्बर मे बन्द हो जाऊगी । मगर मैं जानती हूं, लास बुरे से बुरा मर्द, वदचलन औरत को पली बना लेने के बाद उसका खून कर सकता है, लेकिन उसे किमी परिचित-अपरिचित की बांहों मे नहीं देख सकता. मैंने तो अपना वायदा पूरा किया, परन्तु मुई विश्वास है, तुम बडो से बडी चोरी करोगे, डाका डालोगे, मेरा सून कर दोगे."मगर मेरी इरजन डाक्टर बेनस को नहीं लेने दोगे। मेरे पास इतना मारा विश्वास अव भी शेष है पी०. और फिर, औरत के पाम विश्वास के सिवा होता हो क्या है। तुम्हारी आलिया तभी चारों तरफ से पुलिस को सीटियां मुनायो पाने सगौं। हार ।
56 : अंधे आकाश का सूरज लिए आगे बढ़ी। "नहीं, बत्ती मत वुझामो मैं तुम्हें रोशनी में देखना चाहता हूं।" उसने कहा। " वह स्विच-बोर्ड से पीछे हट गयी। पलंग पर पड़ी चादर लपेटकर उसने कपड़े उतारने चाहे। -"नहीं, चादर भी नहीं.. मैं एकदम ऐसे देखना चाहता हूं।" चादर पलंग पर रखकर, वह दोनों हाथों को पीठ की तरफ कर, ब्लाउज के हुक खोलने लगी। एक खुला। फिर दूसरा। तीसरा हुक फंस गया. वह कोशिश करती रही। तभी वह उठकर उसके पास आ गया, "लाओ, मैं खोल देता हूं।" - "रहने दो, मैं तो खोल ही रही हूं। हां, समय क्या हुआ है ?" --"क्यों ? समय से तुम्हें क्या 'अभी तो एक महीना मेरे पास रहना है !" उसने कहा। तभी दरवाजे पर दस्तक पड़ी। वह दरवाजे की तरफ देखने लगा। आलिया ने कहा, "दरवाजा खोल दो।" वह स्थिर खड़ा रहा। -"लाओ, चावी मुझे दो।" वह बोली। वह शान्त रहा। वह चीखी, "चावी लाओ।" वह इतना जोर से चिल्लायी थी, कि उसने जेब से चाबी निकाल उसकी हथेली पर रख दी। आलिया आगे बढ़ गयी। उसने ताला खोला। ऊपर-नीचे की सिटकिनियां खोलीं। लकड़ी हटायी । और दरवाजा खुला तो सामने गुस्से से कांपता हुआ पी० खड़ा था।
स्थिर-अस्थिर पानी स्थिर है। एकदम युत । लेकिन स्थिर पानी में जैसे पत्थर की परछाइया भी करती हैं, पाणी के भीतर भी बहुत कुछ अस्थिर है। वह खाट पर चुपचाप बैठी है। पाव भी नहीं हिलाती। पहले वह जय भी पैर लटकाकर बैठती यो, हिलामा करती थी। वह क्यो ऐमा करती थी, खुद भी नहीं जानती। भगर पिताजी जय भी देख लेते, बहते-पायी पर स्थिर रखो। वह महमूम करती है, बाट बहुत दिनो से कासी नहीं गई है । कसने से इसमें तनी हुई स्थिरता आ जाएगी। परन्तु फिर वही लिजलिजापन ! आखिर बार-बार प्रयास कर लाई गई स्थिरता से क्या लाभ? वह मतक-कोण को देखती है। इसी कोने में पिताजी का शव रणा था। उसका मन हुआ था, कि वह यूब जोर से पैर हिलाने लगे और तब तक हिलाती रहे, जब तक पिताजी न कहे--पानी और स्थिर रखो। पिताजो को मृत्यु से पूरा पर जैसे हिल गया था। अस्थिर । मा को चीय, धीरा का रोना, उसका मिसकना..फिर घर जैसे धीरे-धीरे बीमार पड़ गया। फिर मर गया । सब कुछ स्थिर हो गया। पहले से भी कही ज्यादा। वह जब भी घर आई है, अपने को यात्री समझती रही है। ऐसा क्यो समझती है, यह स्वय नहीं समझ पाती। यात्री-पानी अस्थिर । ठहरना, फिर पल देना। मगर इस पर में उसकी एक बीज स्पिर है। छोटो आलमारी। उसके जाने के बाद भी, न किसी ने उसे पीता, न हटाया। गर्दन मोड़कर वह धौरा की मेज देती है। इस बार पिडकी के - : अंधे आकाश का सूरज स मेज नहीं। पीठ फेरती है। मेज वहां रखी है, जहां पहले मैले कपड़े बक्स रखा था। इस घर में, जब भी वह आई है, उसने देखा कि सारी चीजें इधर-उधर हुई हैं, स्थिर है तो सिर्फ उसकी आलमारी। वह देखती है, धीरा की किताबें बेतरतीव ढंग से पड़ी हैं। मेज पर विछाया गया कागज भी फट गया है । कितावों पर वह कपड़ा पड़ा है जिस पर कोई अधूरा नमूना काढ़कर छोड़ दिया गया है । बगल में का शीशियां और टैब्लेट्स फेंके-से हैं। वह उठकर मेज के निकट आती है... यूटोमीनाल, हेपाटोग्लोविन, हेपाटोग्लोविन, स्टिप्टोवियोन, वेरालगेन 'एक कागज में लगे हुए टैवलेट्स उठाती है-इनाविड ई । वह देखती है, सिर्फ दो टैबलेट्स खाए गए हैं। और जहां से वे निकाले गए हैं, उस कागज के नीचे दो महीने पहले की तारीख डली हुई है। वह समझ नाती है, धीरा ने इसे खाना बन्द कर दिया है। उसे क्रोध आता है । धीरा को पीरियड ट्रवल झेलने में सुख मिलता है तो वह क्या करे ! वह फिर आकर बैठ जाती है। मां की खाट पर सिर्फ एक गुदड़ी बिछी है । तकिये पर शायद हमेशा की तरह खोल नहीं है, क्योंकि उस पर एक फटी-पुरानी साड़ी डली है। खिड़की पर भी दो-चार शीशियां पड़ी । वह उठाकर देखती है - एन्टीहिस्ट । दमे के लिए। उसके कानों में मां की खांसी सुनाई पड़ने लगती है। वह शीशी रख देती है । नॉट फॉर सेल । सैम्पुल फाइल । वह जानती है, ये सारी दवाइयां मिसेज दत्त दिय करती हैं। पाखी स्थिर है। तभी मां आती हैं । देखती हैं । मगर कुछ कहती नहीं। चुपचाप वाले कमरे में चली जाती हैं । पिताजी जव थे, इसी कमरे में सुबह किया करते थे। घण्टों। मां से वरावर इस घण्टी को लेकर झड़प जाया करती थी। मां का कहना था, कि पूजा के अतिरिक्त भी इस में और कुछ है। मगर और कुछ में जैसे पिताजी को कोई रुचि नहीं पूजा करते । घण्टों। उनकी मृत्यु के बाद यही रोग अब मां को ल है। धीरा ने ठीक ही लिखा था, मां बहुत बदल गई हैं। अब मां, नहीं रहीं। न घर में रुचि, न मुझ में। तुम्हारी चिट्ठी आती है। हैं ।
स्थिर-अस्थिर :61 हूं, तो बहती हैं तकिये के नीचे रख दे। मगर मैं जानती हूं दीदी, ये तुम्हारी चिट्ठी नहीं पढ़ती। पाखी के भीतर परछाई की तरह कुछ हिल जाता है। वह धीरा के लौटने का इन्तजार करती है । धीरा आती है। धीरे-धीरे । थकी-पकी। मेज पर कितावें फेंककर पूछती है- कब आई? -थोडी देर पहले। -मा से भेंट हुई ? -हुई, न भी हुई। -ओह !-धीरा गहरी सास लेकर घाट पर बैठ जाती है । धुप- चाप । स्थिर। पाखी के भीतर फिर कुछ हिलता है । यह धीरा कितनी स्थिर हो गई है। पहले कॉलेज से लौटती तो शोर मचाती हुई आती थी। चप्पल घिसकर चलती थी। उसने कितनी बार मना किया था-- -धीरा, पर उठाकर चला कर । मगर आज पता भी नहीं चला कि धीरा आई है ! -पढाई कैसी है ? उसने पूछा । -बस, ठीक। फिर दोनो चुप हो जाती हैं । पाखी पूजा-धर की तरफ देखती है । -मा अभी नहीं निकलेंगी।-धोरा कहती है। -क्यो? ---जहा चंठकर पिताजी पूजा किया करते थे, मा वही बैठी-बैठी रोती हैं। घण्टो । फिर वही सो जाती हैं । यह खाट यस यू ही सगी है । मो इम पर नहीं मोती। पाखी कुछ नहीं कहती। पूजा-घर से आयें हटाकर मा को पाती चारपाई पर डाल देती है। धीरा पूछती है-जीजाजी भी आए." नहीं । अकेली आई है। उमे डर लगता है, धीरा फिर कोई प्रश्न न करे। मगर धोरा धुप हो जाती है । उठकर वायरूम भीतर से बोल्ट कर लेती है। पासी को कुछ हुलका-हलका लगता है । वह उठकर किचिन में चली जाती है। देतली में तीन पाली पानी 62 : अंधे आकाश का सूरज । डालकर स्टोव पर चढ़ा देती है। वह देखती है, शक्कर का वही पुराना टीन । चाय का वही डव्वा । सिर्फ दोनों के रंग उड़ गए हैं । वस्तु में स्थिरता है, उसके आवरण में नहीं । चाय बनाकर पूजा-घर में जाती है। मां पेट के बल लेटी हैं उठाती है। उनकी आंखें पाखी पर स्थिर हो जाती हैं, फिर पानी की तरह बहुत कुछ हिलने लगता हैं । वे फर्श पर सिर टिका देती हैं । पाखी कहती है-मां, चलो चाय पी लो। अस्वीकृति में मां का सिर हिलता है। पाखी वहां से हिलती नहीं। थोड़ी देर बाद मां पूछती-अभी रहेगी न ? । पाखी धीरे से कहती है। उसे फिर भय लगता है, मां कोई और प्रश्न न करें। वाहर आ जाती है । बाथरूम अब भी बन्द है। वह दस्तक देती है। कोई उत्तर नहीं मिलता। उसे लगता है, जैसे धीरा भीतर सिसक रही है। वह चुपचाप खाट पर बैठ जाती है। फिर उठकर तीनों प्यालियों पर तश्तरियां रख देती है । धीरा आती है। मां की खाट पर बैठ जाती है । कुछ कहती नहीं । पाखी एक प्याली उठाकर ठण्डो चाय सिप करती है । धीरा भी वही करती है। पाखी की प्याली खाली होने पर, उठकर दोनों प्यालियां किचिन में ले जाकर धोती है। पाखी को लगता है, यह घर एकदम स्थिर हो गया है। इसकी सारी गति को जैसे कोई ग्रस गया है। धीरा आकर मां की खाट पर पसर जाती है। पाखी कुछ कहती नहीं। आंखें बन्द किए अनुभव करती है। फिर उठती है-मैं बाहर जा रही हूं। धीरा सिर भी नहीं उठाती। वैसे ही कहती है-अच्छा । पाखी घर का पिछला दरवाजा खोलकर गार्डन की तरफ निकल जाती है । छोटी-सी सड़क । उस पार गार्डन । पहले इसी सड़क को पार स्थिर-अस्थिर :63 करते समय, वह मुड़कर देखती थी कि कोई देख तो नहीं रहा। और जब वह पार कर जाती थी, तो एक विचित्र सुरमुरी-सी लगती है। वह सड़क पर आ जाती है । मुड़कर नहीं देखती, कोई देख भी रहा है या नहीं । धीरे-धीरे गार्डन में जैसे डूब जाती है। अधेरा पिर आया है और वह एक अंधेरी मुरंग में घुस जाती है। यह सुरंग, कही यहुत दूर गगा से होकर कही और निकल गई है । घुप्प अंधेरा। पाखी वही बैठ जाती है। स्थिर पाखी के भीतर-बाहर फिर जैसे बहुत कुछ हिलने लगता है। वह घुटने में मुंह डालकर सिसकने लगती है. वह पूरे तीन वर्ष बाद इस सुरग मे आई है । अकेली। इसके पहले भी तीन बार आई थी। रमेश के साथ । तब वह पढ़ती थी। वह अधेरे में छटपटाती है । उसका जो होता है, वह मधी सुरग मे चल पडे - सब तक पलती रहे, जब तक यह अघेरा उसे प्रस न ले । फिर धीरे-धीरे वह अपने को समेटकर स्थिर कर लेती है । बहुत देर से मन रोने को छटपटा रहा था । इम मुरग में वह पुलकर रोई थी। कुछ स्थिर होकर उठी। घर का पिछला दरवाजा, जो वह छुला छोड़कर आई थी, अब भी युला था। उसने सोचा, किसी को भी कोई चिन्ता नहीं । न मां को, न धीरा को । हर कोई अपने दुख में गो रहा है । उसने स्विच ऑन किया। करवट बदलकर धीरा ने कहा-बुझा दो दीदी, आख पर लगती है। --पढ़ोगी नहीं? -ना, जी अच्छा नहीं है।धीरा ने चादर घोच ली। पाखी बुत की तरह स्थिर । फिर एक चादर लेकर पूजा-घर में जाती है। मां पर डालकर, गुद खाट पर आ पड़ती है। सुबह वह उठती है। चाय-रोटी बनाकर मां को बुलाने जाती है। मां आ जाती है। मगर घोरा वापरूम उसी तरह बन्द लिए है। वह नहीं आती। पाछो जानती है, धोरा जान-बूझकर अपने को अलग घाटे हुए है।
No text on this page.
स्थिर-अस्थिर: 65 ? आई भी है या नहीं । कोई मतलब नहीं । पाखी चिन्तित हो उठती है। धीरा को अव से बहुत पहले या जाना चाहिए था। वह खाट पर बैठ जाती है । दरवाजे से बाहर देखती है। फिर धीरे-धीरे उठकर अपनी आलमारी के पास आती है। खोलती है । सारी चीजें रखी है। वह कुछ कपड़ो को उलटती है। तभी पारदर्शी कागज में लगी पीली गोलिया मा जाती हैं। उसके मारे शरीर में प. कपी पैदा हो जाती है । यही गोलिया... तभी धीरा मेज पर किताबें फेंकवर वाथरूम की तरफ जाने लगती है । पाखी अनुभव करती है, वह भीतर से चौट कर अभी घण्टों रोएगी, कल की तरह । टोकती है-धीरा, इधर सुन । धोरा उसके पास आती है। -इस पर को क्या हो गया है -~-कुछ नही दीदी-यह धीरे में कहती है। --कुछ कैसे नही । न मा को तेरी चिंता है, न तुझे मा को। धोरा कुछ नही कहती। --मैं देख रही हू तूने साया, न खापा । आई, न आई। इसकी भी मां को फिक्र नहीं। माना, उन्हें पिताजी का दुप है. "पर तुझे क्या हुआ ! --पापी धीरे में उसके सिर पर हाथ रप देनी है । धीरा एकदम अस्थिर हो जाती है। पानी को छाती में मुह छिपाकर बुरी तरह मुवकने लगती है ~दीदी मुझे कुछ दे दो। मैं मा को मुंह नही दिया सक्ती । तुम्हें भी नहीं । किसी को भी नहीं । मुझे कुछ दे दो। मैं मा. पाखी एकदम से जैसे हिल जाती है। "सुली आलमारी। वालमारी मे रखो पीली गोलिया- स्काटपिल्स । शादी में पहले, यही गोलिया रमेश उसे तीन बार सिला चुका है। तीन वार वह मां बनते-बनते बच गई। बहुत खुश हुई थी। मगर शादी के बाद, वह लाए चाहकर भी जब मां नहीं बन पाई, तो रमेश ने उसे वाश करार कर तलाक दे दिया और वह चुप- - ?
66 : अंधे आकाश का सूरज
चाप घर लोट आई। हर किसी के प्रश्नों से डरती रही । भागती रही।
धीरा अव भी सिसक रही है।
पाखी, कभी धीरा को, कभी गोलियों को, कभी
खुद
को देखती है।
वह एकदम अस्थिर हो गई है। उसका मन करता है, वह चिल्लाए, रोए,
सिर पीटे या फिर मां की तरह अपने को भी किसी कमरे में बन्द कर
भूल जाए कि यह कोई घर है, यहां लोग रहते हैं ।
रेगिस्तान की माली "निगम था, मताह में एक बार महतो असर और जागिर आता, पिताजी कहते-"विशि, महनी सा । पूशेपुर पर है। मोर रोहू, कोन पवई, कौन सिपो, कोन कतला...।" रिगि मएमा सेतो जाती। लौटतो, तो दूर से ही शोर करती हुई-पिता, भाष हितमा लाई हूं। हमेशा धार के विरुध जाने वालो माछ। मान सेरुपी, पुराना पुराना ददं भी चला जाए। आज देंगडा। आज योमारो। भार बयका । आज चिंगडी। आज..." और धीरे-धीरे शिगि आज में सो: आती है। आज, जब कि पिताजी शेप नही..'आज, जर कि राजेन्द्रनगर का पानी पूरी तरह से निकल पाया है। जब तक पानी करुयाग मे आकर राजेन्द्रनगर को घेरे रहा था, उसे लगा था, उसकी कोई सरमा "पूरी हुई है । और पुनपुन के बह आने पर तो यह अपने को हमेशा पानी से घिरी हुई एक मछली अनुभव करती हो... वह भीतर ही भीतर तृप्त होती रही। घरामदे पर घण्टो पड़ी रहती। पर दुपने सगते, विकीपर जाती। अब नावें चलने लगी थी। नेवी को ट्रेनिंग लेने वागे मागो की नावें। साफ धुले कपड़े। उजले-उजले हस जैसे। दूसरी तरफ पेपर मल्लाह । वही ठेहुने-भर की धोती। पसा-युला मंगा गरीर। मापे पर गन्दी-सी पगड़ी अंगोछे को लपेटकर बनाई गई । और जर गा गुगरती, उसे दुख होता, मल्लाहों के थो-बुझे पेहरो पर विवशतापूर्वक सामगई चुप्पी अनुभव कर । उसका जी होता, यह कोई सोक गीत पूर असा में गाए "पानी पर रखी हुई यह यामोशी तो उसे एकदम तोहार " देगी।
8 : अंधे आकाश का सूरज ... विशि देखती है, घर छोड़कर जाने वालों के चेहरों पर मौत जैसी उदासी । इन घरों में, सचमुच, ढेर-सारी लाशें हैं लाश, यानी फ्रिज । लाश, यानी कार-स्कूटर। लाश, यानी सोफा। लाश, यानी''कल इन घरों में, फिर इन्हीं चीजों की जरूरत होगी। और ये तमाम चीजें फिर उसी रास्ते से आएंगी, जिस रास्ते आई थीं.. जिसका नाम ऐसे ही लोगों ने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शात्री या इसी तरह की किसी और बड़ी हस्ती पर रख छोड़ा है। और इस मार्ग से होकर ये चीजें उस जगह आएंगी, जिसका नामकरण भारत के प्रथम राष्ट्रपति के नाम पर हुआ है. राजेन्द्रनगर । वह देखती है, दूर तक अंधकार की तरह लेटी हुई सड़कें 'उसके शरीर में कंपकंपी होने लगती है। विशि देखती है, पानी चला गया है। मगर उसके हाते की जमीन अव भी गीली है । गीली जमीन पर पैरों के निशान साफ-साफ उभरे हुए हैं..। जव पानी था, तो दूर तक कुछ भी नहीं दिखता था, सिर्फ पानी।। पानी से घिरा, पूरा राजेन्द्रनगर । फिर नावों पर दुकानें खुल गईं। विशि बेहद खुश हुई । वह जब-तब आवाज देती.. नाव वाले, इधर भी लाना भाई। नाव उसकी सीढ़ियों से सटकर, एकदम जैसे बरामदे तक आ जाती। कभी माचिस लेती। कभी आटा । कभी तेल । कभी कुछ। अपने हाते 'में नाव देखकर वह प्रसन्न होती । यदि थोड़ा पानी और आ गया होता तो सम्भव था, वह नाव को अपने कमरे तक ले जाती "उसका जिस सिहरन से भर जाता है । वह चुपचाप शान्त जल को देखा करती, इसी तरह । न कुछ बोल न कुछ सुनती। खामोश रहकर भी, ढेर सारा सुख बटोर लेना कि खूब जानती है । धर्मेश किसी घास से उसे धीरे-धीरे सहला रहा थ हाउ स्टिल, हाउ स्ट्रजली स्टिल टू वॉटर इज़ टु डे। इट इज़ नॉट गुड रेगिस्तान की मछली: 69 .. " चुप था। फॉर वॉटर टु बी सो स्टिल दट वे... और लगातार सहलाए जाने से वह एक्दम मिहर जाती..."धन, तुम जानते हो, मुझे पानी प्रिय है । मैं तो भगवान से यही प्रार्थना करती हूं, हे ईश्वर । अपनी विशि को उस क्षण मृत्यु देना, जब यह जन पं. मीर हो। --"तुम्हे अशुभ बोलना प्रिय है "-धर्मश ने पूछा था। वह शान्त भाव से स्थिर जल को देखती रही। फिर बोली-"ना, मुझे मिर्फ जल प्रिय है । मैं तो मात्र इतना चाहती हूं कि तुम मेरी माग मर दो, और मुझे उसी जगह रखो जहा पानी अवश्य हो।" धर्मेश उसने ही स्पर्श कर कहा पा-"तुम्हें ऐमा नहीं लगता धर्मग, कि जल के समीप आकर हम एक विशेष तरह की तृप्ति भोगते हैं..." -"तुम्हे औरत नही, मछली होना था।" वह बहुत ही आहिस्ता मुमकराई। इतना माहिस्ता, कि गायद घग ने देखा भी नही..."गहराई से देखो, तो मैं औरत यहाँ । मात्र एक मजी हूं। औरत की एक साथ होती है, कि कोई एक पुरुष उसकी माग भर है। इस साध के लिए उसके पास एक अधिकार भी होता है। परन्तु में तो वर्षों से तुम्हारे साथ यह जीवन जी रही हूँ, चाह रही हूं कि तुम मेरी माग भर दो.. मगर अन्त मे, केवल मध्ली-मर रह जाती हूं, निम तुम्हारी इच्छा के अनुरूप वह जाना पडता है।" -"विशि, क्या तुम्हें लगता नहीं कि तुम मेरी पत्नी हो". धर्मश ने उसके कन्धे पर हाय रखा था। -"लगना, और होना “क्या ये दो विपरीत स्थितियां नहीं है" -इतना कहकर फिर जल की तरह स्थिर हो गई थी। धर्मंग कुछ नहीं बोला । विगि चपचार उग गन्नों गीता करती रही, दमो हो । मन से विवश होकर रिमी को मनति गला... पत्नी होकर भी पत्नी न होना, और मात्र एक घुटकी मिन्दर को तरमा विशि ने इन दो वर्षों में गुद सीखा है। । - 70 : अंधे आकाश का सूरज " - .. धर्मेश ने सदा की तरह कहा-~~-"अब उठो। इट इज नॉट गुड फार द वॉटर, टु वो सो स्टिल देड वे एण्ड फार वुमेन टू..." साड़ी को समेटती हुई विशि उठी थी---"धर्मेश, मैं अब भी उस कम- जोरी को सोच नहीं पाई हूं, जिसने तुम्हारे समक्ष मुझे इतना विवश कर दिया है।' -"विशि, वर्ल्ड इतना एडवान्स्ड हो गया है, और तुम अब भी मरी हुई भावुकता से लिपटकर रो रही हो.''इज इट गुड ?" विशि ने उसे रुककर देखा..."रोने का क्या ! सती की लाश को अपने कंधों पर लादे-लादे भगवान तक रोते फिरे थे।" -"आज का युग भगवान का नहीं, इंसान का है 'वी आर लिविंग इन डेज़ आफ मैन, इन डेज़ ऑफ फैक्ट्स । विलीव मी, एक दिन यही आदमी, तुम्हारे भगवान के काल्पनिक चेहरे को नोंचकर फेंक देगा. और तब, तुम्हारा यह गॉड एकदम नंगा हो जाएगा.''न्यूड ।" विशि ने कोई उत्तर नहीं दिया था । बस, धीरे-धीरे चलती रही. धर्मेश ने ही कहा था 'तुम्हारी इसी भावुकता के कारण, मुझे रोज राजेन्द्रनगर से महेदूघाट आना पड़ा है। घण्टो वेमतलब, वेवजह पानी को महसूस हुए, खुद को, तुम को वेस्ट करना पड़ा है। यदि सम्भवः होता, तो इस पानी को उठाकर तुम्हारे घर के हाते में भर देता... विशि देखती है, पानी एकदम सूख गया है । एक नाव सड़क पर यूं ही वेकार पड़ी है याने वेस्ट हो रही है। न चाह कर भी वेस्ट होना कितनी बड़ी विवशता है। वह देखती है, धर्मेश आ रहा है। इसलिए, वह वरामदे पर घंटों से खड़ी है। वह एकदम निकट आ जाता है-~-तुम सचमुच लकी हो विशि, तुम्हारे दरवाजे तक पानी खुद आया 'तुमने तो इस जल के समीप अपने को बहुत तृप्त पाया होगा?" वह केवल मुसकराई। धर्मेश पानी निकल जाने के बाद पड़ी दरारों को देख रहा था । विशि ने ही पूछा-"तुम जो गए, तो फिर आए नहीं। यह भी नहीं जानना करते
रेगिस्तान की मछली:71
चाहा, कि विशि बवी या..."
----"तुम्हे अशुभ बोलना प्रिय है"लेकिन मैं जानता था, विगि तो
मछली है, जल के कारण उसकी आयु और बढ़ जाएगी।"-और यह
जोर से हसा । हसते-हंसते यकायक गम्भीर हो गया-'
-"तुमने शादी कर
ली?"
--
-"फिर ये सिन्दूर?"
-~"मात्र विवशता । धर्मेश, सब लोग राजेन्द्रनगर छोड़कर जा रहे
थे। मैं भी राची जाने के लिए यार्ड में पड़े एक खाली कम्पार्टमेंट में पी।
अकेली । अधकार । तभी किसी ने मुझे विवश कर, पुनर्समपिता बना दिया
... मैं चीख भी नहीं सकी थी। और जब वह जाने को हुआ, मैंने उससे
रुकने को कहा । सूटकेस से टटोल कर, सिन्दूर की वही डियिमा निकाली,
जो इन दो वर्षों में बार-बार तुम्हारे सामने रख चुकी हूँ। मैंने कहा-
तुम कौन हो, कैसे हो, मैंने तुम्हे देखा तक नहीं जाना तक नहीं। फिर
भी तुमने वह सब कुछ पा लिया, जो तुम्हें नहीं माना या.""क्या एक दया
नहीं कर सकते, कि इस डिविया से चुटकी-भर सिंदूर मेरी माग मे भर
दो? और धर्मेश, उसने सचमुच मेरो माग भर दी। फिर मैं जा नही
सकी। लोट आयी।"
धर्मंग उसे देखता रहा । फिर धीरे-धीरे उसके चेहरे पर पुणा उभर
आई-"इसका अर्थ हुआ, तुमने एक गुण्डे को शरीर दान दिया है..."
"मैंने पहले ही कह दिया, वह मात्र विवशता पो।"
-- "नहीं, तुम्हारी अपनी इच्छा थी। मैंने शुरु से अनुभव रिस,
तुम सिन्दूर के लिए परेशान थी. इसी लालच में तुमने भागे शे
बनाया है।"-धर्मश चीया था।
विशि ने करपते स्वर में कहा-"तुम ठीक ही रहते हो "
गलत पी । मैं अपनी इच्छा से हार कर जूठन पनीह
धर्मश ने, शायद फिर कुछ नही गुमना गाहा पा
सोड़िया उतर गया।
72 : अंधे आकाश का सूरज विशि शान्त खड़ी रही, स्थिर जल की तरह। - हाते की कच्ची जमीन पर, धर्मेश के जूतों के ढेर सारे निशान उगे थे। उन्हीं की बगल में नन्हें-नन्हें पैरों के छोटे-छोटे चिह्न"उसने कहा था "ये चिट्ठी?' 'जरा सुनो तो वेवी..." -"हम आपसे बात नहीं करेंगे । ममी बाहर सड़क पर खड़ी हैं।" "बात नहीं करोगी, क्यों?" "ममी ने मना किया है। आप बुरी औरत हैं न, इसीलिए। आप हमारे डैडी को घर नहीं आने देतीं..." और ढेर सारे नन्हें-नन्हें निशान उगते चले गए। विशि को लगा, वह स्वयं हाते की कच्ची जमीन है और उसके जिस्म पर ये चिह्न इस तरह उभर आए हैं, जैसे वह इन पैरों से बुरी तरह रौंदी-कुचली गई है और उसने माथे के सिन्दूर को अपने उसी कांपते हाथ से मिटा दिया, जिससे उसने स्वयं लगाया था कि एक पल को वह धर्मेश के सामने सिन्दूर भरी औरत बन सके, परन्तु इस क्षण उसे लग रहा था अब न वह एक और रदी है, न एक लड़की, मात्र मछली राजेन्द्रनगर का पानी सूख गय - दआ है, सि रेगिस्तान...
अंधे आकाश का सूरज । आज उसने फिर एक कांट्रेक्ट पर साइन किए। प्रोड्यूसर कई चक्कर लगा चुका या । साथ में स्त्रिप्ट भी थी। उसने नियम-मा बना लिया है, पहले वह कहानी सुनती है, जंच जाने पर कई सुझाव देती है, जैसे संगीत निर्देशक कौन होगा, गीत कोन लिखेगा? निद- शक का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता, क्योंकि वह वही फिल्म करती है जिमे डायरेक्टर मिस्टर बतरा करते हैं यानी उसके पति । काट्रेक्ट सामने रखकर वह कुछ सोचने लगी यो "बस यूं ही और निर्माता बार-बार नोटो की एक गड्डी उसके सामने रखता जाता था। उसका चेहरा देखता था, फिर थैली में हाथ डाल देता पा । उसे प्रोड्यू- सर पर दया भी आयी और क्रोध भी.."अब उसमे क्या अंतर आ गया है • ? पहले भी तो वह वही पो, वही बिन्नी लेकिन आज उसको एक साथ कई फिल्मे रिलीज हुई और सबकी सब हिट । सब में वह मां बनी है । और, अब ऐसी फिल्मो को बाढ आ गयी है। बड़े से बड़ा निर्माता भी उसे लेकर एक आदर्श मां पर फिल्म बना रहा है । अभी कल हो, एक फिल्म की शूटिंग हो रही थी, 'वंबई और बच्चा' । ट्रेफिक का एक बड़ा सेट बनाया गया था। लाग शाट में एक छोटा-सा बच्चा रोता हुआ जा रहा है । ववई को भीड, तेजी से आती हुई कारें" और तभी पलोजअप मै उमका चेहरा उभरता है । वह भय से चीखती है, नही."नहीं • नही '''और, धीरे-धीरे गिरकर बेहोश हो जाती है। उसके गिरते ही बतरा चीखता है, "कट"। बतरा उसके पास आता है, "तुमने तो कमाल हो कर दिया हालिग ।.. आमओ चलें।" दोनों दूसरे कमरे में आ जाते हैं। बतरा अपने हाथो से शराब उडे - :: अंधे आकाश का सूरज ता है, "कम आन वेवी। बतरा के वेवी कहने पर वह मुसकराने लगती है। सेट का शोर उभरता रहता है। लाइट नंबर वन थोड़ा नीचे करो। थी को उस साइड । कंटिन्युटी के कपड़े निकालो। सीन फोर शूट किया जाएगा। मस्ट हेस्ट । एसिस्टेंट डायरेक्टर इधर से उधर दौड़ रहा है। वे लोग जब दुवारा सेट पर आये तो कुछ एक्स्ट्रा किसी बात पर हंस रहे थे । दोनों को देखते ही चुप हो गए । वतरा ने एक बार सबको घूरा, फिर असिस्टेंट को बुला कर बोला, "तुम अच्छी तरह जानते हो, मैं सेट पर डिसिप्लिन पसंद करता हूं..." "सर, बात ये है कि..." "क्या बात है ?" वतरा की आवाज कड़ी थी। "वात कुछ भी नहीं सर"बस, वात ये है सर कि एक एक्स्ट्रा कह रहा था कि एक बार एक हीरोइन सेट पर बेहोश हो गई थीं। उनका बेहोश होना था कि सारी की सारी यूनिट घबरा गयी । शूटिंग तक कैंसिल कर दी गयी। तीन-चार दिनों वाद एक हास्य अभिनेता सेट पर वेहोश हो गया। डायरेक्टर ने कहा, इसे उठाकर पेड़ के नीचे रख दो। ठंडी-ठंड हवा खाकर होश में आ जाएगा। सेट खाली करो और शूटिंग चालू । चार जूनियरों ने उन्हें उठाकर पेड़ के नीचे रखा ही था कि वह उठ वैव "भाइयो, मैं बेहोश ही कहां हुआ था ? अजीव किस्मत है, हीरोइन वे हों तो कोका-कोला और मैं..तो पेड़ की छाया..." एसिस्टेंट की बात खत्म होते ही एक्स्ट्रा फिर हंसने लगे। बतरा ने चिल्लाकर कहा, "शट्अप । इन लोगों को भगा दे सिलाई वाला एक्स्ट्रा सप्लायर को फोन कर दो कि वह कल नये भेज दे । आज की शूटिंग कैमिल..." सारे वातावरण को सांप सूंघ गया। किसी प्रकार ड एसिस्टेंट ने कहा, "सर, ये बहुत गरीब लोग हैं । विचारे कभी हंस लेते हैं । आज का दिन मारा जाएगा तो .." वतरा ने मुसकराकर कहा, "ओ, आई सी, तो तुमने के वूनियन बनाई है ?" - .
अंधे आकाश का सूरज : 75
"नही सर, नहीं । मैं अभी पैक अप करता हूं..."
और, बतरा के कार में बैठते ही वह भी बैठ गई थी। वह बतरा के
क्रोध को जानती थी। उसमे टोकने का साहस नहीं हुआ। दोनों रास्ते भर
चुप रहे । बतरा चुपचाप सिगार पीता रहा। वह कार के बाहर देखती
रही।
पोर्टिको मे कार रुकते ही उसने सोचा, आज वह खूब आराम करेगी।
सिर्फ आराम ।
नेकिन भीतर घुसते ही प्रोड्यूसर ।
उसने सोचा, चलो अच्छा ही हुआ, जब तक वह कहानी सुनेगी, बतरा
अपने आप शांत हो जाएगा।
"विन्नीजी, अब तो साइन कर दीजिए।"
वह चौंक गई । सामने नोटों की कई गड्डियां थी।
"तुमने अब तक साइन नही किया डालिंग" बतरा ने भीतर से आते
हुए पूछन । बतरा की आदत है, जब कोई निर्माता आता है, वह या तो
भीतर चला जाता है या कार लेकर वाहर । बतरा की इस गैरहाजिरी
का अयं वह खूब जानती है। लेकिन कुछ कहती नहीं।
माइन करते-करते उसने धीरे से कहा, "इसमे बच्चे का जो करेक्टर
है उसका नाम बदल दीजिए।"
"क्या नाम है ?" बतरा ने पूछा।
"अमित" प्रोड्यूसर बोला।
"नाम तो अच्छा-खासा है । तुम्हे ऐतराज है डालिग...?"
"छोड़िए भी डायरेक्टर साहब, नाम मे क्या रखा है कुछ भी हो।
हमे तो बैनर पर बिन्नीजी का नाम चाहिए.''हे-हे ." और वह उठ
गया।
प्रोड्यूसर चला गया तो बतरा एकदम नाराज हो गया, "तुम भी
अजीब बातो पर ऐतराज करती हो"ऐतराज ही करना था नो इन
गड्डियो पर करती, कुछ दे भी जाता।" और, रुपये उठाकर बतरा भीतर
कमरे में चला गया।
वह जाने को उठी तो सेप्रेटरी आ गया, "मैडम, फस के यत हमेशा
धे आकाश का सूरज रह पोस्ट कर दिए गए हैं और आपके फोटोग्राफ्स भी..." "तो इसमें मैडम से पूछने की क्या बात है?" बतरा ने आते हुए कहा, खिर तुम्हें किसलिए रखा है। इसलिए कि लोगों के पत्र आएं और न हमें खबर दो। ये तुम्हारा काम है कि पत्रों को पढ़ो और मैडम का इप्ड खत उन्हें भेज दो। दैट्स आल । नाऊ यू कैन गो।" "लेकिन सर, एक मैगजीन से फोटोग्राफर आया है। वह मैडम का एक चित्र उतारना चाहता है, प्रशंसकों के पत्रों का उत्तर देते हुए..." "ओ आई सी। तुमने चाय-नाश्ते को पूछा ?" "यस सर।" बतरा ने कहा, "आओ डालिग।" दोनों कमरे में आ गए। फोटोग्राफर ने कैमरा ठीक किया । सेक्रेटरी ने रद्दी की टोकरी लाकर पलंग पर उलट दी। वह धीरे-धीरे पलंग तक गई। फिर एक पत्र खोलकर मुसकराती हुई लेट गई। "रेडी 'वन "टू'स्माइल.."थैक्स !" फोटोग्राफर चला गया । सेक्रटरी ने पत्रों को पुन: रद्दी की टोकरी में डाल दिया। वतरा ने पूछा, “आज तुमने कोई चेक भेजा ?" "नहीं सर ।" "अजीव आदमी हो, कितनी बार कहा कि रोज एक-दो चेक फैस के नाम भेज दिया करो जो पैसों की मांग करते हैं। मैं जानता इनमें से बहुत सारे वोगस लोग होते हैं । लेकिन कितना लाभ है, एक चेक मिलता है तो वह पचास को दिखलाता है। इससे बढ़कर पब्लि और क्या होगी...? विन्नी का कितनी दूर तक नाम फैल गया है कि दयालु और रहमदिल औरत है। तुम सब चौपट कर दोगे और टैक्स भी.."जाओ, जाकर भेजो।" वतरा अपने कमरे में चला गया। वह चुपचाप अपने कमरे में आ गई। एयरकंडीशनर ख गई। आंखें बंद करते ही उसे लगा दूर बहुत दूर तक एक से .
No text on this page.
अंधे आकाश का सूरज . गई। डायरेक्टर साहब ने कहानी थोड़ी बदल दी। अब कहानी में -अभिनेत्री का रोल बढ़ा दिया गया था। फिल्म शूट होती रही और चानक उसे एक दिन खबर मिली कि डायरेक्टर साहब का हार्ट फेल हो या। उसकी पहली ही फिल्म डब्बे में चली गयी। उसके पैरों तले की जमीन निकल गई। प्रोड्यूसर ने फाइनेंसर को लाख पटाया, लेकिन वह नहीं माना। और वह हीरोइन से फिर एक मामूली बिन्नी बन गई। अव वह कहीं भी जाती तो एक ही जवाब मिलता, "हमें ऐसी अनलकी स्टार लेकर फिल्म को डब्बे में नहीं भरना है।" एक शाम, वह थकी-हारी किसी स्टूडियो का चक्कर लगाकर लौट रही थी और सोच ही रही थी कि अचानक बतरा मिल गया। उसे एक होटल में ले गया। चाय पिलायी और बोला, "तुम्हें हीरोइन बनना है ? मैं बना दूंगा।" इम एक वाक्य से उसकी आंखों में आंसू आ गए। उसके पास अब केवल एक ही सपना बच रहा था और जब बतरा ने सपना सच करने की बात कही तो वह अपने को रोक नहीं सकी। बतरा ने कहा, "देखो विन्नी, तुम्हें हीरोइन बनना है और मुझे डाय- रेक्टर । तुम मेरा माथ दो और मैं तुम्हारा · वाइ द वे तुम कुंवारी हो न ?.. क्योंकि यहां के लोगों की टेस्ट कुछ इसी तरह की है ।" उसने किसी तरह सिर हिला दिया। "अब देखना बिन्नी, जो मेरा बाप नहीं कर सका, वह मैं कर दि लाऊंगा।" और बतरा हंसने लगा। फिर उमे रोज नये-नये प्रोड्यूसरों के पास ले जाता । घंटों कमरे में छोड़कर खुद अकेला फुटपाथ पर टहलता रहता या किसी मा सी दुकान में चाय सिप करता रहता । जब वह कमरे से बाहर निकलती, दौड़ा हुआ आता, "म सेठ ?" उसके इनकार में सिर हिलाते ही वह चुपचाप उसके साथ चलने लगता। फिर लोकल ट्रेन में सवार होकर दो तरफ निक वह अपनी जिंदगी से करीब-करीव ऊब चुकी थी । .. .
अंधे आकाश का सूरज : 79 एक दिन प्रस्ताव रखा, "२ रोज-रोज का लफड़ा ठीक नहीं, तुम मेरे कमरे में आ जाओ। ऐसे ममय बहुत नष्ट होता है।" "तुम्हारे कमरे में?" वह चौंक गई थी। "तुम्हारे लिए कोई नयी बात नहीं होगी, वैसे भी तुम मेरे बाप के कमरे में जा चुकी हो। अगर हीरोइन बनना है तो..." बतरा ने कहा । उसके आगे कोई रास्ता नहीं या । उसका आसमान बेहद छोटा हो गया था। और ये डर भी पा कि कव टूटकर उसके ऊपर गिर जाये.. वह बतरा की बात मान गई। अब रात में भी बतरा किसी-किसी के पास छोड़ देता । आखिर एक प्रोड्यूसर मान गया। उसने छोटी पूंजी की फिल्म में बतरा को निर्देशक और उसे हीरोइन बना दिया। फिल्म रिलीज होते ही तहलका चल गया। एकदम हिट फिल्म निकली। और, रातो-रात वतरा महान् निर्देशक और चह जुबली स्टार बन गयी। फिर तो फिल्मो पर फिल्म मिलने लगी। "मैडम, कोई खाली तारीख देकर डेट दे दू?" वह चौंक गई । सामने सेक्रेटरी खडा था। तभी बतरा आ गया । वह निर्माता से वातें करने लगा । वह चुपचाप सुनती रही। फोन की घंटी बजने लगी। सेक्रेटरी ने रिसीवर उठाया, "जी हा, हा हैं 'अच्छा, जरा रकिए "क्या बात है ?" बतरा ने पूछा। "सर, किमी समिति वाले का फोन आया है कि एक गरीब आदमी मर गया है। मरने के बाद बिन्नीजी का फोन नम्बर उसकी जेब से निकला। वह शायद कुछ सहायता चाहता हो । लेकिन अभी तो वे लोग इस उम्मीद में हैं कि मैडम कुछ मदद कर दें तो लाश उठे "ग्रेड आइडिया।" बतरा ने हंसते हुए कहा, "विन्नी, इट्स ए गुड चास । यू विल गेट नाइस पब्लिसिटी । जाओ, कुछ रुपये दे आओ।" "तुम नहीं चलोगे?" उसने धोरे मे पूछा। "चलो चलते हैं ।" और बतरा उठ खडा हुआ। वह मेकअप ठीक करने भीतर चली गई । सेक्रेटरी ने फोन पर पता पूछा। फिर कुछ पत्र- कारो को सूचना दी। पुलिसवालो को फोन किया। जब वे लोग पहचे.खोली के पास खासी भीड़ जमा थी। चतरा और ।
: अंधे आकाश का . है . भी नहीं सुन सकी। वह भीतर दाखिल हो गये । लाश यू १. शरीर अकड़ र कुछ टेढ़ा हो गया था। किसी ने सीधा कर वाचा ही था। आंखें दोनों फटी-फटी खुली थीं। उससे लाश देखी नहीं गई। तभी एक औरत ने कहा, "वह सामने है, उसका वच्चा..." उसने देखा, चेचक के दागों से गिजगिज भरा, दीवार टटोलकर आता हुआ चार-एक साल का अंधा बच्चा... "अभी पिछले ही साल इसका वाप इस खोली में आया था। पिछले ही वर्ष इस बच्चे को चेचक हुआ, चेहरा और आंखें एक साथ "वाप था तो कमाता था, अब भगवान ही जाने इस अंधे का क्या होगा..." तभी वच्चा ठोकर खाकर गिर गया। विन्नी आगे कुछ दौड़कर बच्चे से लिपटकर रोने लगी । और जब क्लिक-क्लिक कर फ्लैश बल्ब जलने लगे, तो उसने देखा, बतरा के हाथों में नोट थे और वह कह रहा था..."विन्नी केवल पर्दे पर ही मां नहीं बनती.. उसके पास सचमुच एक प्यार-भरा दिल है.. लाश का अंतिम संस्कार कर, वच्चे को किसी अनाथालय में दे दीजिएगा.''आप लोगों की बड़ी कृपा होगी।" फिर उसका हाथ पकड़कर उसे बाहर ले जाने लगा। बिन्नी ने पलट कर देखा. लाश कपड़े से ढंक दी गयी थी और वच्चा रो रहा था। कार स्टार्ट होते ही बतरा ने कहा, "कल देखना पेपर, क्या सुर्खियां कर न्यूज आएंगी। तुमने तो कमाल कर दिया करुणा की देवी !" और वह हंसने लगा। मगर विन्नी कुछ भी नहीं सुन रही थी, कुछ नहीं. अपने भीतर केवल इतना साहस जुटा रही थी कि वतरा से साफ कह सके, कि दूर तक फैले इस अंधे आकाश के लोभ में ही और बच्चे को छोड़कर भाग आई थी मगर यहां, वह जब भी तो हमेशा अपने अंधे वेटे अमित की तरह ही गिरकर उसका वह वतरा के कंधे पर सिर पीट-पीटकर रोये और कहे कि तर बना दिया वतरा...? ये क्या बना दिया मुझे...? लेकिन दूस उसके सामने आ गये कांट्रेक्ट्स.. प्लॉयमाऊथ · फ्लैटविय ऑन 'फैन ऑफ.. स्टार्ट कट.."ओ० के० प्रीमियर'."जुब .. और, उसने बतरा के कंधे पर आहिस्ता से सर रखकर .
No text on this page.