Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Anasakt

Sagar Mal · 2011/01

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अनुक्रम (A) स्तुति 1. 1 2 2 3 3 4 4 5 5 6. 6 7 7 8 8 9 9 10 10 11 11 12 12 13 णमो अरहताण महामत्र नवकार पाचू परमेष्ठी प्यारा प्रात उठकर शुद्ध भाव से चैत्य पुरुष जग जाए श्री पार्श्वदेव चरणो मे पारस प्रभुवर थारे चरणा मे म्हारो मन पारस प्रभु रै चरणा मे जय तीर्थकर महावीर जय महावीर भगवान महावीर तुम्हारे चरणो मे जय बोलो वीर जिनेश्वर की महावीर महावीर बोल भाइडा महावीर री ध्याऊ मै तो ध्यावना गुण घुघरू, महावीर विराजै रे गौतम गणधर बडे महान स्वामीजी म्हानै दर्शण दीन्हाजी स्यामीजी । झणण, झणण सावरियो म्हारै रू रू मै रमग्यो और प्यारा प्रभु आपारा रे कल्पतरू रा बीज फल्या सुबह-सुबह उठकर भिक्षु-भिक्षु बोल तू आओ स्वामीजी, थाने झाला दे बुलावा सावरिया स्वामीजी । आओ आगणै हो आवो-आवो भिक्षु स्वामी 13 14 14 15 15 16 16 17 17 18 18 19 19 20 दीपा रा दुलारा 20 21. 21 22 22 23 23 24 24 25 25 26. 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 बोलो जय भिक्षु बोलो 27. सावरियो आयो म्हारै आगणियै हसतो 28 भज मन भिखू स्याम, भिखू स्याम 29. म्हारै सांस-सास मे बोलै रे 30. अलख जगावां स्वामीजी रै नाम री 31 वारी जाऊँ चरणा मे 32. | भिक्षु-भिक्षु जपता टूटै करमा रा बन्ध 33. दीपानदन । ल्यो शत वन्दन 34. म्हारै हियडे बसै जी 35. स्वामीजी रै चरणा, तन मन अर्पण 36 भिक्षु भिक्षु बोलो 37. श्री भिक्षु का नाम सुन्दर-सुन्दर है 38. सिरियारी विराजै सन्त 39. | भिक्षु स्वामी ! अन्तर्यामी । 40. स्वामी भीखणजी रो नाम 41. | भिक्षू भिक्षू भिक्षू म्हारी आत्मा पुकारै 42 स्वामीजी । थारी साधना री मेरू सी ऊँचाई 43. घणा सुहावो माता दीपांजी रा जाया 44. निहारा तुमको कितनी बार 45. पखीडा औ पखीडा 46 म्हारी नैय्या खेवणहार, गुरुवर तुलसीगणी 47. चमकै दुनिया मे देखो, लाडनूं रो हीरो 48 आधी और तूफाना मे 49 जय-जय श्री तुलसी गुरुवर 50. गुण धुंघरू, मा वदना रा लाल 51. वदना रो लाल म्हानै प्यारो लागै रे 52. आपणे भागा री 53 तुलसी, तुलसी समरल्यो 54 सात सुरो का बहता दरिया 40 42 44 46 48 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 (B) वैराग्य परक 55 बन्दे तजदे फदे 56 तन धन रो काई रै गुमान करै 57 ओ जग झूठो रे ससार 58 यह है जगने की बेला 59 चेतन | ले लै शरणा च्यार 60. | हेलो जागण रो 61 म्हारी चेतना रो दिवलो कद जळसी 62 चेतन । चिदानन्द चरणा मे 63 ई तन रो, पल रो भरोसो नहीं 64 जाणो पर भव मे 65 म्हारी चेतना मे प्रभु रो नाम है 66 जीवन ओ दो दिन रो 67 माटी री मूरत है काया 68 थारो सुधरेला जद व्यवहार 69 के करै भरोसो काळ रो 70. साच नै आच नहीं है 711 जीवन रो काई है भरोसो 72 जीवन है जाबक छोटो 73 बीत रही एक-एक लाखीणी घडी 74 मिल्यो मिनख अवतार 75 जीवन लाखीणो 76 सोवण मे जमारो बीत्या जाय 77 जरा सोचले तू मन मे स्याणा 78 झुठो जग रो नातो 79 मन को शान्त बनाए हम 80 आऊखेरी घडिया 81. आत्म शुद्धि रो साधन 82 डगमग डगमग डोलै नाड 83 ओ दूर के मुसाफिर 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 (C) तपस्या 84. तपस्या री महिमा देखो अपरपार 85. तप सुखकारी मगलकारी 86 तपस्या री महिमा भारी 87 तप स्यू आतमा मे भारी बल आवै 88 मनावा, हिलमिल सारा आज 89 एक बार आओ, तप रा गीत 90. तपस्या निराली रे 91 तपस्या री गगा मे 92. करल्यो-करल्यो अठाया 93 गुण घुघरू छम छमा छम 94 करो तपस्या, जग जाये जीवन ज्योति 95 करो तपस्या, मिटे समस्या 96. महा कठिन है काम तपस्या 97 घोर तपसी हो मुनि | घोर तपसी 98 ओ तपस्या रो रग 99 तपस्या मे सेठा रहिज्यो 100 धन्य गजसुकुमाल मुनि ध्यान धरै 101 धन्य जीवन, धन्य अनशन 102 | श्रावकजी । थारै सथारै रो (D) शासन महिमा 99 100 101 102 103 104 105 106 108 109 110 111 112 113 103./ राखज्यो शासण रो विश्वास 104.| आपा गण रो गौरव गावा 105 | प्रभो | यह तेरापथ महान 106 | ओ शासण है जयवन्तो 107 म्है तो शासन सेवा करस्या 108.| शासन कल्पतरू श्री जय-जय धर्म-सघ अविचल हो 114 116 116 अनासक्त -1 णमो अरहताण। श्रद्धा विनय समेत, णमो अरहताण । प्राञ्जल प्रणत सचेत, णमो अरहताण ।। स्थायी।। आध्यात्मिक पथ के वीतराग प्रभु विश्व शरच्चन्द्र सम श्वेत, णमो अधिनेता, विजेता। अरहताण || १|| अक्षय, अटल, अजरामर अरूज, अनन्त, अरूप, स्वरूप अद्वैत, णमो अचल जो, अमल श्री सिद्धाण ।।२।। जो। धर्म-सघ निर्मल के जो सवाहक, धर्म-नीति निर्वाहका मे समवेत, णमो आयरियाण।। ३।। शासन मे - आगम अध्यापन अधिकृत, विमल कमल सम जीवन अविकृत। शम सयम समुपेत, णमो उवज्झायाण ।। ४ ।। आत्म साधना लीन अनवरत, विषय वासनाओ से उपरत। 'तुलसी' है अनिकेत, णमो सव्व साहूण।।५।। (लय - धर्म की जय हो जय)

2- अनासक्त
महामत्र नवकार, सुमिरण नित्य करो जी नित्य करो।
जैनागम का सार, प्रात. ध्यान धरो जी ध्यान धरो।। स्थायी।।
श्रावक का आचार, पहला बतलाया जी बतलाया।
शुभ मन जपते जाप, मुक्ति पद पाया जी पद पाया।। १।।
है स्वार्थ भरा ससार, कोई नही अपना जी नही अपना ।
सुख-दुख मे है आधार, नव पद है शरणा जी है शरणा।।२।।
ले शरण सुदर्शन सेठ, जाता दर्शन को जी दर्शन को।
शूल बनी झट फूल, विस्मय जन-जन को जी जन-जन को।।३।।
बढा द्रोपदी चीर, नवपद जपने से जी जपने से।
बच गया अमर कुमार, देखो मरने से जी मरने से।। ४।।
नाग बना गलहार, श्रीमती हरसायी जी हरसायी।
अनल हुई झट शान्त, सीता जय पाई जी जय पाई।। ५।।
रोग शोक व्यवधान, सारे कट जाते जी कट जाते।
कष्टो के तूफान, पल मे हट जाते जी हट जाते ।। ६ ।।
राजुल
के उद्गार, माला नित जपना जी नित जपना।
क्या मिट्टी से प्यार, आखिर जग सुपना जी जग सुपना ।।७।।
(लय - चाँद चढ्यो गिगनार)

अनासक्त-3
पाचू
परमेष्ठी प्यारा,
जीवन धन सब कुछ म्हारा, पाचू ।
है असहाया रा सहारा, पाचू ।। स्थायी।।
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सर्वोच्च अर्हता धारी, अरहत अमल अविकारी।
तीर्थकर त्रिभुवन तारी, प्रवही प्रवचन री धारा ।। १।।
है सिद्ध सिद्धपद-वासी, अज अजरामर अविनाशी।
परमात्मा परम प्रकाशी, काटी करमा री कारा।। २||
धरमाचारज धृतिधारी, निष्कारण पर – उपकारी।
लाखा री नैय्या तारी, भगवान कहू भगता रा।। ३।।
है उपाध्याय अविकारी, गणिपिटका रा भडारी।
श्रुतदाता सकटहारी, जिन शासन गगन सितारा।। ४।।
मुनिवर जग-ममता त्यागी, समता री प्रतिमा सागी।
भीरू वैरागी, 'तुलसी' मनमोहनगारा ।। ५।।
है पाप
(लय - मै ढूंढ फिरी जग सारा)

4-अनासक्त प्रात. उठकर शुद्ध भाव से, परमेष्ठी का ध्यान धरू। देव, गुरु जिन-धर्म शरण से, भव सागर को पार करू ।। स्थायी।। बन्दू मै प्रतिदिन अर्ह को, श्री सिद्धम् आचार्य वरम् । उपाध्याय सद् ज्ञान प्रदाता, मुनिवर महा उपकार करम् ।।१।। ओम् अरिहन्त देव सिद्धम अघ-हरणम्, सिद्ध निरजन सुख करणम्। श्री आचार्य भवोदधि तरणम्, उपाध्याय मुनिवर शरणम्।। २॥ मस्तक पर अरिहत विराजित, भृकुटि भाग मे सिद्ध रहे। हृदय कमल मे गुरु नाभि मे, उपाध्याय मुनि चरण बहे।।३।। सकट कष्ट कटे भव सचित, महामन्त्र के दृढ बल भूत प्रेत बाधाए टलती, अभिमत्रित नव पद जल से।।४।। .. से। ओम हीं श्रीं क्लीं विघ्न विनाशक, महामन्त्र जग का त्राता। सच्चे दिल से जपने वाला, सुख शान्ति वैभव पाता।।५।। (लय - प्रभाती)

अनासक्त .5
चैत्य पुरुष जग जाए।
देव तुम्हारा पुण्य नाम मेरे मन मे रम जाए ।। स्थायी।।
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ उद्गाता ।
अर्ह अर्ह अर्ह अर्ह, अर्ह अर्ह त्राता।।
ॐ ही श्री जय, ॐ हीं श्री जय, विजय ध्वजा लहराए।। १||
ॐ जय भिक्षु भिक्षु जय ॐ ॐ, ही श्री ही श्री हीं श्रीं ।
विघ्न शमन ॐ व्याधि शमन ॐ, क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ।।
नाम मत्र तव व्रण - सरोहण, सतत अमृत बरसाये ।।२।।
मिटे विषमता मन की, तन की, अनुभव की, चिन्तन की।
पल-पल, पग-पग मिले सफलता, तन्मयता चेतन की।।
नाम मत्र तव भयहर-विषहर, साम्य सिन्धु गहराए।। ३।।
आत्मा भिन्न, शरीर भिन्न है, तुमने मत्र पढाया ।
आत्मा अचल अरुज शिव शाश्वत, नश्वर है यह काया ।।
आत्मा आत्मा के द्वारा ही, आत्मा मे लय पाए।। ४।।
तुम निरुपद्रव, हम निरुपद्रव, तुम हम सब है आत्मा ।
तव जागृत आत्मा से हम सब, बन जाये परमात्मा ।।
ॐ ही हू है हौ ह ह , अन्तर मल धुल जाये ।। ५।।
(लय - नैतिकता की सुर सरिता में)

6-अनासक्त
श्री पार्श्व देव चरणों में शत शत प्रणाम हो।
मेरे मानस के स्वामी ! तुम एक धाम हो।। स्थायी ।।
दुनिया मे देव लाखो, हैं पूजे जा रहे।
जिनदेव ! इस रसना में, तेरा ही नाम हो।।१।।
तुमसे न राग रत्ती, क्यो द्वेष और से ?
यह वीतरागता तेरी, मेरा विश्राम हो।। २।।
उऋण बनूं मै कैसे, उपकार से अहो ?
चरणो में भले पन्हैया, यह मेरी चाम हो।। ३।।
पा एक बार पारस, हतभाग्य जो रहा।
पारस अब स्वयं बनू मै, बस वैसा काम हो।।४।।
नस-नस मे बस रहे हो, रस ज्यो कवित्व मे ।
भगवान ! भक्त 'तुलसी' के, तुम ही राम हो।। ५।।
(लय - लो जैन जगत के तीर्थकर)

अनासक्त -7
पारस प्रभुवर
| थारै चरणा मे म्हे शीश झुकावा हा,
लागी तन-मन साची प्रीत, जीवन भेट चढावा हा।। स्थायी।।
अश्वसेन रा नदन वामादे रा लाडला,
थारै नाम री सकळाई पर, बलिहारी जावा हा ।। १।।
राग द्वेष मे काल अनन्तो यू ही बीतग्यो,
मिलग्यो वीतराग तू देव, मूसळा ढोल बजावा हा ।। २।।
अज्ञानी तापस रो ठागो खोल्यो चोहटे,
थारी सच्चाई रे साहस रा म्हे, गीत गावा हा ।। ३।।
-
जलतै नाग
युगल नै दियो शरणो धर्म रो,
ऊची करुणा रै इमरत रो कोई, पार न पावा हा।। ४।।
कमठ उपद्रव और विनय भारी धरणेन्द्र रो,
थारी आख्या रै समभाव रो म्हे, अलख जगावा हा।। ५।।
सकट मोचन वाळो तू प्रभु साचो पारस है,
नाम रो ले उजळो आधार, भव-जल पार जावा हा ।। ६ ।।
बीस जिनेश्वर सीझ्या आ धरती अति पावन है,
'बुद्ध' समवेत शिखर पर आज म्हे, स्तवना सुणावा हा ।। ७ ।।
(लय - भूरिये रा काका)

6-अनासक्त
श्री पार्श्व देव चरणो मे शत शत प्रणाम हो।
मेरे मानस के स्वामी ! तुम एक धाम हो ।। स्थायी।।
दुनिया मे देव
लाखो, हैं पूजे जा रहे।
जिनदेव ! इस रसना मे, तेरा ही नाम हो।।१।।
तुमसे न राग रत्ती, क्यो द्वेष और से ?
यह वीतरागता तेरी,
तेरी, मेरा विश्राम
हो।। २॥
उऋण बनूं मै कैसे, उपकार से अहो ?
चरणों मे भले पन्हैया, यह मेरी चाम हो।। ३।।
पा एक बार पारस, हतभाग्य जो रहा।
पारस अब स्वयं बनूं मै, बस वैसा काम हो।। ४।।
नस-नस मे बस रहे हो, रस ज्यो कवित्व मे।
भगवान ! भक्त 'तुलसी' के, तुम ही राम हो।।५।।
(लय - लो जैन जगत के तीर्थकर)

अनासक्त -7
पारस प्रभुवर
| थारै चरणा मे म्हे शीश झुकावा हा,
लागी तन-मन साची प्रीत, जीवन भेट चढावा हा।। स्थायी।।
रा
अश्वसेन रा नदन वामादे
लाडला,
थारै नाम री सकळाई पर, बलिहारी जावा हा ।। १।।
राग द्वेष मे काल अनन्तो यू ही बीतग्यो,
मिलग्यो वीतराग तू देव, मूसळा ढोल बजावा हा ।। २।।
चोहटै.
अज्ञानी तापस रो ठागो खोल्यो
थारी सच्चाई रै साहस रा म्हे, गीत गावा हा।। ३।।
धर्म रो.
जलतै नाग
युगल
नै दियो शरणो
ऊची करुणा रै इमरत रो कोई, पार न पावा हा।। ४।।
कमठ
उपद्रव और विनय भारी धरणेन्द्र रो,
थारी आख्या रै समभाव रो म्हे, अलख जगावा हा।। ५।।
सकट मोचन वाळो तू प्रभु साचो पारस है,
नाम रो ले उजळो आधार, भव-जल पार जावा हा ।।६।।
बीस जिनेश्वर सीझ्या आ धरती अति पावन है,
'बुद्ध' समवेत शिखर पर आज म्हे, स्तवना सुणावा हा ।। ७ ।।
(लय - भूरिये रा काका)

8-अनासक्त
म्हारो मन पारस प्रभु रै चरणा मे लाग्यो,
फैल्यो है आलोक अधेरो दूर भाग्यो,
प्रभु रै चरणा मे लाग्यो।। स्थायी ।।
अश्वसेन रा कुळ उजियाळा, वामा देवी रा जाया,
काशीवासी ज्ञान-विलासी, जन जन रै मन मे भाया,
अनुभव
वाळो स्रोत जाग्यो।।१।।
भीतर स्यू
तापस री अज्ञान तपस्या, देख सत्य-सधान कर्यो,
जळतै नाग-युगल नै दे, नवकार मत्र अपध्यान हर्यो,
धरणेन्द्र पदमावती गौरव
पाग्यो।। २॥
रो
दीक्षा धारी ध्यान लगायो, कमठ उपद्रव गहरायो,
भक्तिभाव स्यू देव सहायक, बण कर मन मे हरसायो,
वीतरागता पाई जीवन महकाग्यो।। ३।।
चातुर्यामिक धर्म बतायो, जन जीवन नै विकसायो,
सघ चतुष्टय रो अनुशासन, जम्यो साधना रो पायो,
सारो जग श्री चरणा रै शरणै आग्यो।।४।।
पुरुषदानी पारस प्रभु रो, चितामणी सो नाम खरो,
'बुद्ध' निरतर ध्यावै, पावै आत्मानद सदा सखरो,
मन पर पूरो भक्ति भाव रो रस छाग्यो।।५।।
(लय - अपने पिया की मैं तो)

अनासक्त -9
जय तीर्थकर महावीर,
पल-पल रटन लगावै, ओ म्हारो मन-कीर।
जय वर्धमान महावीर ।। स्थायी।।
अन्तर्यामी स्वामी, घट घट रा ज्ञाता।
समदर्शी सबदर्शी, सागर सम गभीर ।।
जय तीर्थकर महावीर ।। १।।
उदाहरण समता रो, सुण रू-रू कापै।
पैरा पर अज्ञानी, ग्वाला राधी खीर ।।
जय तीर्थकर महावीर ।। २।।
अर्जुनमाली चडकोशियै, जिस्या तऱ्या पापी।
जो ध्यावै बण ज्यावै, निरमल गगा-नीर ।।
जय तीर्थकर महावीर ।। ३||
रोग - सोग दुख-दुविधा, परबारी भागे ।
थारी अमरित वाणी, मेटै भव-भव पीर ।
जय तीर्थकर महावीर ।। ४।।
अजर अमर अविनाशी, ज्योतिर्मय आत्मा ।
प्रकट हुवै रवि-किरणा, ज्यू बादल ने चीर ।।
जय तीर्थकर महावीर || ५||
(लय - आरती)

10- अनासक्त
जय महावीर भगवान,
मन मदिर मे आओ, धरूं निरन्तर ध्यान।
जय महावीर भगवान।। स्थायी।।
पावन नाम तुम्हारा, मत्राक्षर प्यारा,
मेरी स्वर -- लहरी पर, उठे एक ही तान।
जय महावीर भगवान।। १।।
राग-द्वेष - विजेता, सिद्धि- सदन नेता,
क्षमामूर्ति जगत्राता, मिटे सकल व्यवधान ।
जय महावीर भगवान।। २।।
अनेकान्त – उद्गाता, अनुपम सुखदाता,
जनम-जनम के बधन, तोड कर सधान।
जय महावीर भगवान ।। ३।।
आधि - व्याधि की माया, मिटे प्रेत-छाया,
आत्म-शक्ति जग जाए, लघुभी बने महान ।
जय महावीर भगवान।।४।।
भक्ति भरा मन मेरा, तोड रहा घेरा,
तन्मय बनकर 'तुलसी', करू सदा सगान ।
जय महावीर भगवान।।५।।
.
(लय - आरती)

अनासक्त -11 महावीर तुम्हारे चरणों मे, श्रद्धा के कुसुम चढाए हम । ऊचे आदर्शोको अपना, जीवन की ज्योति जगाए हम।। स्थायी।। तप सयममय शुभ साधन से, आराध्य – चरण आराधन से । बन मुक्त विकारो से सहसा, अब आत्म विजय कर पाए हम ।। १।। दृढ निष्ठा नियम निभाने मे, हो प्राण-बलि प्रण पाने मे। मजबूत मनोबल हो ऐसा, कायरता कभी न लाए हम।। २।। यश लोलुपता, पद लोलुपता, न सताए कभी विकार-व्यथा। निष्काम स्व-पर कल्याण काम, जीवन अर्पण कर पाए हम ।। ३ ।। गुरुदेव-शरण मे लीन रहे, निर्भीक धर्म की बाट बहे। अविचल दिल सत्य, अहिसा का, दुनिया को सुपथ दिखाए हम।।४।। प्राणी-प्राणी सह मैत्री हो, ईष्या-मत्सर-अभिमान न हो। कहनी - करनी इकसार बना, 'तुलसी' तेरा पथ पाए हम।। ५।। (लय - दया दान का डंका भारत मे)

12-अनासक्त
जय बोलो वीर जिनेश्वर की,
त्रिशला-नन्दन अखिलेश्वर की।। स्थायी।।
सिद्धार्थ राज घर अवतरिया,
भण्डार धान धन स्यू भरिया,
चिहु दिशि फैली कीरति घर की।। १।।
भर जोवन मे वैराग लियो,
तप मे तन मन नै झोक दियो,
निखरी स्थिर छवि ध्यानेश्वर की।।२।।
शन दम रा अनुपम फूल खिल्या,
जन मन मे आस्था दीप जल्या,
ध्वनि गूजी जद जगदीश्वर की।। ३।।
हिसा रा बढता पग मुडग्या,
दासा रा दुख
दोहग गुडग्या.
उडगी उच्चावचता नर की।।४।।
दियो सूत्र समन्वय रो साचो,
बदल्यो जन जीवन रो ढांचो,
विकसी मति 'बुद्ध' परस्पर की।।५।।
(लय - जय बोलो संघ सितारे की)

अनासक्त-13
महावीर महावीर बोल भाइडा,
चेतना रा बद ताळा खोल भाइडा।। स्थायी।।
राग रीस मे ही सारी जिन्दगी बिताई,
वीतराग भावना तो नैडी नही आई,
न्याय तराजू
निज नै तोल भाइडा ।। १।।
रै
लोक रै प्रवाह सागै बहतो ही जा रयो,
घात प्रतिघात सारा सहतो ही जा रयो,
भूलग्यो क्यूं मानखै रो मोल भाइडा ।। २।।
वैर स्यू हुवैला वैर भाव री बढोतरी,
प्रेम स्यू बहैला प्रेमवाळी गगोतरी,
त्याग दे विष नै अमी-रस घोळ भाइडा ।।३।।
महावीर नाम जी री आतमा मे रमग्यो,
विघ्न बाधावा रो बीं रै खर खोज गमग्यो,
ई नाम रो आधार अनमोल भाइडा।। ४।।
महावीर नाम री अखड जोत जाग री,
हिवडै मे आ ही लाग रात दिन लाग री,
'बुद्ध' रो सोभाग है सतोल भाइडा।। ५।।
(लय • इक परदेशी मेरा दिल ले गया)

14-अनासक्त महावीर री ध्याऊ मै तो ध्यावना जी, म्हारी श्रद्धा रा आस्थान, अत्राणां रा शाश्वत त्राण, जीवन मे मिलग्या ज्यू वरदान, ओ भगवान ।। स्थायी।। मे नाश, साज, त्रिभुवन रा उजियाळा वण कर अवता जी, फेल्यो नयो प्रकाश, होम्यो मिथ्यातम रो जाग्यो नव जीवन रो विश्वास ।। १।। हिसा रा बढता पग थमग्या पलक मे जी, सुण कर प्रभु री दृढ आवाज, रुकग्यो पशुबलि वाळो आभारी बणग्यो सकल समाज ।।२।। जागी ही जीवन मे समता भावना जी, वणग्या हरिकेशी सा साध, मिटग्या जात पांत अपराध, धुपगी अन्तर्मन री असमाध।। ३।। गणधर हा गोतम सा भारी दीपता जी, चंदनबाला सती प्रधान, संत सत्यां गुणवंत महान, च्यारूं तीर्था रो सफल विधान।।४।। अनेकांत रो दर्शन ई जग नै दियो जी, आग्रह विग्रह रो के पसरी समता बेल ललाम, चरणा में शत शत 'बुद्ध' प्रणाम।। ५।। काम ? (लय - सांवरिया स्वामीजी आवो आंगणै)

अनासक्त -15
गुण घुघरू छम छमा छम छण ण ण ण ण बाजै रे।
हिवडे रे मदिर मे प्रभु महावीर विराजै रे ।। स्थायी ।।
कुण्डलपुर
मे जन्म्या भगवन, घर घर मगलाचार।
देव देविया मगल गावै, प्रभु लियो अवतार ।। १।।
सयम रे मारग पर चाल्या, कष्ट सह्या अनपार |
वर्धमान स्यू वीर बण्या प्रभु, मन मे समताधार ।। २।।
अन्तर्यामी समदर्शी बण, पायो केवल ज्ञान।
उपसर्गा रे तप मे तप कर, बणग्या आप महान।। ३।।
सगम, अर्जुन, चण्ड जिस्या री, आतम ज्योति जगाई।
एक एक प्राणी ने थे तो, मुगति राह दिखाई ।। ४ ।।
करूणा सागर अमरित गागर, जैन जगत सिणगार।
जो ध्यावैला चित्त लगाकर, होसी बेडो पार ।। ५।।
अजर अमर ज्योतिर्मय प्रभुवर, जीवन रा विश्राम ।
श्रद्धा रे भावा स्यू 'सुव्रत', नित उठ करे प्रणाम।। ६ ।।
(लय - धुंघरू छम छमा छम)

। - 14-अनासक्त महावीर री ध्याऊं में तो ध्यावना जी, म्हारी श्रद्धा रा आस्थान, अत्राणां रा शाश्वत त्राण, जीवन में मिलग्या ज्यूं वरदान, ओ भगवान।। स्थायी।। प्रकाश, साध, त्रिभुवन रा उजियाळा वण कर अवतर्या जी, फैल्यो जग मे नयो होग्यो मिथ्यातम रो नाश, जाग्यो नव जीवन रो विश्वास 911 हिंसा रा बढता पग थमग्या पलक मे जी, सुण कर प्रभु री दृढ़ आवाज, रुकग्यो पशुबलि वाळो साज, आभारी बणग्यो सकल समाज॥२॥ जागी ही जीवन में समता भावना जी, वणग्या हरिकेशी सा मिटग्या जात पांत अपराध, धुपगी अन्तर्मन री असमाधा३॥ गणधर हा गोतम सा भारी दीपता जी, चंदनवाला सती प्रधान, संत सत्यां गुणवंत महान, च्यासं तीर्थां रो सफल विधान।।४।। अनेकांत रो दर्शन ई जग नै दियो जी, आग्रह विग्रह रो के पसरी समता बेल ललाम, चरणां में शत शत 'बुद्ध' प्रणाम।। ५।। काम ? (लय - सांवरिया स्वामीजी आवो आंगणै)

अनासक्त -15
गुण घुघरू छम छमा छम छण ण ण ण ण बाजै रे।
हिवडे रे मंदिर मे प्रभु महावीर विराजै रे।। स्थायी ।।
कुण्डलपुर मे जन्म्या भगवन, घर घर मगलाचार।
देव देविया मगल गावै, प्रभु लियो अवतार ।। १।।
सयम रे मारग पर चाल्या, कष्ट सह्या अनपार।
वर्धमान स्यू वीर बण्या प्रभु, मन मे समताधार ।। २।।
बण,
अन्तर्यामी समदर्शी पायो केवल ज्ञान।
उपसर्गा रे तप मे तप कर, बणग्या आप महान ।।३।।
सगम, अर्जुन, चण्ड जिस्या री, आतम ज्योति जगाई।
एक एक प्राणी ने थे तो, मुगति राह दिखाई ।। ४ ।।
करूणा सागर अमरित गागर, जैन जगत सिणगार।
जो ध्यावैला चित्त लगाकर, होसी बेडो पार ।। ५।।
अजर अमर ज्योतिर्मय प्रभुवर, जीवन रा विश्राम ।
श्रद्धा रे भावा स्यू 'सुव्रत', नित उठ करे प्रणाम ।। ६ ।।
(लय - धुंघरू छम छमा छम)

16-अनासक्त
गौतम गणधर बडे महान,
रिद्धि सिद्धि का देते दान।
जिनके जप से नवों निधान,
मिलता सच्चा आत्मिक ज्ञान ।।
महावीर के शिष्य बडे, करते घटो ध्यान खडे।
बिना सहारे शिखर चढे, बन गये ज्ञानी बिना पढे ।। १।।
गौतम जप से मिटते रोग, टलते भूत प्रेत के योग।
मन वाछित सब मिलते योग, कटते दुष्ट कर्म-सयोग।।२।।
पृथ्वी मॉ वसुभूति विलास, वर्ष पचास रहे गृहवास ।
तीस वर्ष तक प्रभु के पास, द्वादश केवल ज्ञान प्रकाश।। ३।।
श्री अक्षीणलब्धि विख्यात, गौतम के कर मे साक्षात ।
नही खूटते घृत, मधु, भात, जो जपता गौतम को प्रात।।४।।
(लय - गौतम गणधर बडे महान)

अनासक्त -17
स्वामीजी म्हानै दर्शण दीन्हाजी।
दर्शण दीन्हा प्रेम स्यू, म्हारै माथै पर धर हाथ।
स्वामीजी म्हानै दर्शण दीन्हांजी ।
म्हारै मनडै री पूछी दो बात । स्वामीजी म्हानै ।। स्थायी।।
सावळी सूरत सोवणी, तपुतपु करतो ललाट।
काजळिया प्याला जीसी, आख्या करै
पल्ळाटा
काना केश सुहावणा, लम्बी लम्बी लहराती लोळ |
एकल भूहा भवर सी, चदै
चदै सो
सो चहरो गोळ।
लम्बो कद लम्बी ग्रीवा, लम्बा लम्बा गोडा ताणी हाथ ।
तीखी-तीखी लम्बी-लम्बी आगल्या, हथेल्या हिगळू री जात ।
भरवा अग अग भलकतो, चूडी उतार शरीर ।
सीनो बबर्ची शेर सो, मुद्रा मृदु
मुखडै ओपै मुहपती,
मुहपती, खाधै
पर
झोळी डावा हाथ मे, मलपती चाल मतगा
उभा पगा री चळकती, नख द्युति अजब अमीर।
क्यूँ रे ? कह्यो स्वामी मुळकता, खुलग्या म्हारा तकदीर ।
आठै तेरस भाद्रवी, मेह अधारी राता
'चम्पक' बिरधी भवन मे, सुपनै मे सुपनै सी बात।
गभीर।
ओघो सुरग।
(लय - सुपनो)

18. अनासक्त
स्यामीजी झणण, झणण, झण, झण, झणाट सीरू रू लागै रे,
सिरियारी समाधि पर कोई सगती जागै रे।। स्थायी।।
सुई पाग मे टागतो, बोल्यो दरजी हुसियार ।
अबतो देरी बाबाजी री, म्हारो काम सो त्यार || १||
स्यामीजी
पद्मासन पर विराज लीन्हो, काउसग मुद्रा ध्यान ।
आपा रै अब कैरी देरी ? कहता छोड्या प्राण ।। २।।
स्यामीजी
साठे भादव सुद तेरस नै, मगल चोथो पैर।
धर्म-गिरी पर चिता रचाई, रग गुलाल बिखेर ।। ३।।
स्यामीजी
मिली एकसो पिचपन वर्षा, पछे समाधि सचेत ।
सपतजी गधिये नै बाबो । दियो ज्योति सकेत।। ४।।
स्यामीजी
देह-भसम स्यू उठे तरगा, 'सागर' अपणे आप।
रगरली पाली चोमासै, बाबे रे परताप ।। ५।।
स्यामीजी
(लय - घुघरू छम छमा छम)

अनासक्त -19 सावरियो म्हारै रू रू मै रमग्यो, रू रू मै रमग्यो, मिश्री मे मीठास बण्यो सावरियो। भिखू स्याम, भिखू स्याम, जीभडल्या मै जमग्यो, जीभडल्या फुलडा जिया सुवास बण्यो सावरियो ।। स्थायी।। धूप-छाह लिया जिया, चादडलै मै च्यानणी, पून मै ज्यू प्राण प्रीत, रीत गीत रागणी, कविता मे अनुप्राश बण्यो, सावरियो ।। १।। खाता – पीता - सोता - उठता, याद आवै सावरियो, नाळ मै उतरता चढता, याद आवै सावरियो, साथी श्वासोश्वास बण्यो, सावरियो ।। २।। फिरता घिरतां काम करता, याद आवै सावरियो, मो. स्यू बारै नीसरता, याद आवै सावरियो, पखेरु आकाश बण्यो. सावरियो 11 ३।। विकट विरोधी-विष पी शकर, बणग्यो म्हारो सावरियो, डर्यो न धमक्या स्यू अभयकर, बणग्यो म्हारो सावरियो, सज्जन जन विश्वास बण्यो, सावरियो ||४|| लौकिक-लोकोत्तर व्याख्या मे, लोह पडसी मानणो, बाहर भीतर एक सरीखो, च्यानणो ही च्यानणो, देहली दीप प्रकाश बण्यो, सावरियो ।। ५।। त्याग भोग नै घी - तम्बाखू, मेळ बताकर सुलझायो, साधु-असाधु विभेद वेद रो, हेतु सुणाकर समझायो, सुरज तेज निवास बण्यो, सावरियो ।।६।। "सागर" भाद्रव सुद तेरस नै, ज्ञान सरायो सिरियारी, ध्यान योग मे प्राण विसर्जन, इचरज पायो सिरियारी, ले समाधि थिर वास बण्यो, सावरियो ।।७।। - (लय - बादळियो आंखडल्यां मै बरस्यो)

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अनासक्त -21
कल्पतरू रा बीज फल्या, बलिदाना रा सुमन खिल्या,
आ सुमना री सौरभ लेवण, आवो म्हारा स्वामीजी।
एकर तो पधारो नी।। स्थायी।।
दीपा सुत शासण सिरताज, नाम सुमरतॉ फळज्या काज
भगता
आशीर्वर देवण।। १।। आवो
नै
थारो शासण जग रो त्राण, ई शासन नै अर्पित प्राण
आ प्राणा
अमरत सेवण
|| २|| आवो
नै
निज हाथा स्यू लिख्यो विधान, सघ सगठन बण्यो महान
उण
पाछो
पलेवण ।। ३।। आवो
नै
आज
काटी करमा री जजीर, कष्टा मे ना बण्या अधीर
वा कष्टा री
कहाण्या
केवण।। ४।। आवो
आलोकित नभ धरा दिगन्त, जठै निकाल्यो तेरापथ
उण ओरी अब तो रैवण ।। ५।। आवो
मे
पल-पल छिन छिन ध्यावा ध्यान, श्रद्धानत हो करा प्रणाम
महा सगळा री नैया खेवण ।। ६।। आवो
(लय - लूटाकर लंका रो राज)

22.अनासक्त सुबह-सुबह उठकर भिक्षु-भिक्षु बोल तू सकट सब कट जावैला, ओ सुजना । विघन हरण ओ मगलकारी नाम है, दुख मे आडो आवैला, || स्थायी।। ओ सुजना ॐ ॐ भिक्षु सावरियै रो सुन्दर नाम, प्राणा स्यू भी प्यारो है। बल्लूशा रो पुत्र माता, दीपा रो दुलारो है। भक्ता रै मन भावैला || १|| ओ सुजना स्वामीजी रै नाम स्यू, सरै इच्छित काम है। सिरियारी बण्यो आज, पावन तीरथ धाम है। दुख दुविधा मिट जावैला ।। २।। ओ सुजना जय भिक्षु, मत्र चमत्कारी है। प्रति पल जाप जपो, भय भजन हारी है। पौरुष मन मे जागैला || ३|| ओ सुजना स्वामीजी रो नाम लाखा, लोगा रो आधार है। अतर मन स्यू ध्यान धर्या, होसी बेडो पार है। कल्मष सब धुप जावैला || ४|| ओ सुजना घोर कलिकाल मे, भिक्षु शासन पायो है। मानो चितामणि रत्न, कर मे म्हारै आयो है। वृक्ष लहरावैला || ५|| ओ सुजना सघ नायक घोषित भिक्षु, चेतना रो वर्ष है। तेरापथ धर्म सघ रो, भावी उत्कर्ष है। तीरथ हरषावैला ।।६।। ओ सुजना. "मुनि सुमति” री आस्था, था पर अपरम्पार है। खाता-पीता, सोता-उठता, भिक्षु री गुंजार है। मन निर्मल बन जावैला || ७|| ओ सुजना कल्प चार (लय - बादळियो आंखडल्यां मै बरस्यो)

अनासक्त-23
आओ स्वामीजी,
थाने झाला दे बुलावा, जाजम पलकॉ री बिछावॉ,
कुकुम पगल्या स्यू पधरावा ।। स्थायी।।
-
थारी पल पल रटन लगावा,
निशि दिन पल-२ छिन-२ ध्यावा ।
थारी गौरव
गाथा गावा।। १।।
मानस मदिर मे बिठास्या,
दीया भक्ति रा जळास्या ।
म्हारा तन-मन चरण चढास्या।।२।।
थारो नाम लिया बळ जागै,
डर भय हडको धडको भागै।
जाणै हरदम थे हो सागै ।। ३।।
तेरस रो दिन पावन आयो,
भिक्षु चरमोत्सव रग छायो।
जन-मन आनद घन लहरायो ।।४।।
थारै कदमा पर बढ पावा,
वचना पर औ प्राण चढावा।
शासन रो सम्मान बढावा ।।५।।
(लय - धरती धोरां री)

24-अनासक्त
सावरिया स्वामीजी | आओ आगणै हो, ध्याऊ थारो एक ध्यान।
अतर मन रा भगवान, देव उतारू थारी आरती हो भिक्षु स्याम।। स्थायी।।
सुधरी री
छतर्या
गावै प्रीत स्यू हो, थारी वीरता रा गीत
दृढ सकल्प
रा सगीत, पहलो प्रवास समसाण हो।। १।।
अधेरी ओरी मे हुयो च्यानणो हो, चसग्या ज्ञान रा दिया
हरषित जन जन रा हिया, आगै बढायो अभियान हो।। २।।
भोगी ही कठिनायाँ स्वामी आकरी हो, पूरो मिलतो नही आहार
तपता सरिता चर मे जाय, चाख्या तपस्या रा पकवान हो।।३।।
छाती मे धमूका ठोला शीष मे हो, तीखी गाल्या रा बै तीर
सह्या हस हस कर बो वीर, शकर बण्यो है कर विषपान हो।।४।।
चमक्यो है थारी साची साधना स्यू, सूरज सो ओ तेरापथ
आलोकित नभ धरा दिगन्त, अमर बण्यो है बलिदान हो।। ५।।
।
सकट टळे है फळे कामना हो, मन्त्राक्षर सो थारो नाम
सरज्या मनवाछित से काम, पाया तुलसी सा पुण्य निधान हो।।६।।
(लय - पणिहारी)

अनासक्त-25
आवो-आवो भिक्षु स्वामी । अब तो म्हारै आगणियै,
ऊभा अडीका कदका आपनै।
पक्ष उजलो तिथि है तेरस घट में म्हारै चान्दणियो,
श्रद्धा रा फूल
बिछावा सामनै।। स्थायी।।
।
शब्द-शब्द और श्वास-श्वास मे, भिक्षु री झणकार उठे।
खाता पीता सोता उठता, खोजा भिक्षु गया कठै ।
दर्शण तो देणा पडसी आपनै।। १।।
इसी जग्या नही म्हारै घर मे, जठै आपरो नाम नही ।
ऑख्या मे उतरो तो स्वामिन् । पाऊँ मै आराम सही।
म्है तो नही भूला थारै जापनै ।। २।।
कष्टा री काळी राता मे, एक आपरो ही शरणो।
एकर तो सभाल्या सरसी, बैठ्या कदका दे धरणो ।
भव मे शरणो थारो माहने ।। ३।।
ई कलयुग मे आप सरीखा, सत पुरुष मिलणा मुश्किल ।
अपणै श्रम स्यू ही पावै है, वीर पुरुष अपणी मजिल !
जग नै समझायो रात्यू जागनै ।। ४ ।।
थारै गण उपवन री शोभा, लहर लहर लहरावै है।
गण गुम्बज पर आज देखल्यो, धर्म ध्वजा फहरावै है।
तुलसी सा मालिक मिलग्या माहने ।। ५।।
भव
-
(लय - तेजा)

26-अनासक्त
बोलो जय भिक्षु बोलो, अन्तर रा श्रुतिपट खोलो,
दिल मे रमाल्यो भिक्षु नाम जी।
हो जपल्यो, जपल्यो नी सुबह और शाम जी।। स्थायी।।
बाबो भगत भाव रो भूखो, चाले नी क्यू देर करे,
साचे मन स्यू ध्यावणिए रा, सारा इच्छित काम सरे,
सकट हरसी बो सारा, सुणकर जय-जय धुकारा,
अपणो तो बाबो ही विसराम जी||१||
रोम-रोम मे बसग्यो बाबो, शबरी रे ज्यू रामजी,
हर धडकन मे बोले बाबो, मीरा रे ज्यू श्यामजी,
आख्या रो तारो बाबो, सगळा स्यू न्यारो बाबो,
आ पर अपणी आस्था उद्धामजी।। २।।
जद भी कष्ट पडे भगता मे, बाबो परचो दिखलावे,
दिवस गिणे ना रात गिणे बो, ध्याता ही सामी आवे,
दीन दयालू बाबो. परम कृपालू बाबो,
सोयो जगासी अपणो राम जी।।३।।
जगल मे मगल कर देवे, ककर ने कर दे मोती,
करे दूर अज्ञान अधेरो, जगा दिव्य सुखरी ज्योति,
सकट मोचक है बाबो, भव भय भजक है बाबो.
ध्यावो प्रमोद आठो याम जी।। ४।।
(लय - खिण खिण ए बीत्या)

अनासक्त-27
सावरियो | सावरियो | आयो म्हारै आगणियै हसतो,
आगणियै हसतो, दिवलो सो चसतोसावरियो || स्थायी।।
रोता रोता आवै सगळा, रोता - रोता जावै–सगळा०
हसतो खिलतो जलम्यो भिखू, मन मे हर्ष न मावै ।। १।।
एक दान्त रो बाल्हो गणपति, सगळे पूजा पासी-गणपति०
भले पिता पर भार जगत को, भार उतार दिखासी।।२।।
ऊँधै माथै लटकै दुनिया, गर्भवास दुख भोगै – दुनिया०
महातम लियो पगा जाया रो, भिखू जोग-सजोगै।। ३ ।।
पग मे पदम पागडा रेखा, धजा फरकती छाती-रेखा०
थाळी बाजी ऊभी जनता, लीया दीया - बाती।। ४।।
पेट साथियो दसा-आगल्या, चक्कर दतूं बतावे-आगल्या०
टीको सुवै लिलाड सामने, भागी भाग सरावै ।। ५।।
आख्या पळकै चहरो चळकै, हाथा रोळी घोळी-चळकै०
किया बणायू मोडो सता । वगती भुआ बोली ।। ६ ।।
मा देख्यो सिह सपनो राजा, होसी बोल्यो जोसी राजा०
महासत रा लक्षण 'सागर', कह रघुवर सतोषी।।७।।
(लय - पधारो, पधारो म्हारा प्रभुजी)

28-अनासक्त
भज मन भिखू स्याम, भिखू स्याम, विघन हरै, आनन्द करै,
सावरियै रै मगल शरणै, परबारा सै काम सरै।
भज मन भिखू स्याम, भिखू स्याम, नाव लिया दुख दूर टरै।। स्थायी।।
कळजुग रो ओ कल्प वृक्ष है, ठडी छाह सनूरी-अरे हा
चितामणी-कामित फल दाता, राख आसथा पूरी-अरे हा
ओ अचूक अनुभूत मत्र है, बिगडी गति मति स्थिति सुधरै।। १।।
.
रोग-शोक मे दुख-विजोग मे, चित पर चोट करारी-लागज्या
डाकण-शाकण भूत-प्रेत जद, लगै न कोई कारी-अरे हा.
चढज्या ज्योत-छोत झट उतरै, जो बाबलियै ने सिवरै।। २।।
नो-व्यजन स्वर मिलकर 'भिखू, स्याम' नाम निर्मायो-अरे हा
कुण जाणै किण पुल मे दीपा, मा ओ नाव कढायो अरे हा
तत्र योग मे गणित-शास्त्र मे, नो को आक अखडित रै।।३।।
सहज योग ऊर्जा-प्रयोग मे, तन छोड्यो सिरियारी-स्वामीजी.
आज समाधि स्थल पर घूमै, तेज वलय जयकारी-अरे हा
पाखड पापाचार कल्पना, करै अज्ञ कई जीभ झरै।। ४।।
नाव स्वाम रो ले हिन्दूजी, करी आख री कारी-हेम री
तपसी भागचन्दजी सरीखा, नैया पार उतारी-सघ मे
ओ मदरास-जागरण 'सागर', परिषद देख्या हियो ठरै।। ५।।
(लय - फूल्यो फूल्यो फिरे)

अनासक्त-29
म्हारे सास-सास मे बोलै रे | सावरिया स्वामीजी।
ओ परवत है राई रे ओलै रे । गुण दरिया स्वामीजी।। स्थायी।।
निजर पसार निहारू सामा उभा दीसै स्वामीजी
पल-पल विष मे अमृत घोढरे । सावरिया स्वामीजी।।१।।
बात-बात मे शब्द-शब्द मे घुर फिर आवै स्वामीजी
म्हारै घूमै ओळे दोळे रे । सावरिया स्वामीजी ।। २।।
कान लगार सुणू तो हर स्वर-स्वर मे गूजै स्वामीजी
म्हारा अन्तर श्रुति-पट खोलैरे । सावरिया स्वामीजी।। ३।।
आख मूद कर ध्यान धरू तो घट मे बेठ्या स्वामीजी
म्हारो भीतर लो टटोळे रे | सावरिया स्वामीजी।।४।।
समय-समय पर सावधान भी करता रेवै स्वामीजी
हेलो देवै होळे होळे रे । सावरिया स्वामीजी।। ५।।
मै स्वामीजी मे रम ज्याऊं म्हारै मे ज्यू स्वामीजी
'चम्पक' मनडो यू झक झोळे रे | सावरिया स्वामीजी।।६।।
(लय - परी वालरे ! तमाखू भूरिया रा काका)

30-अनासक्त
अलख जगावा स्वामीजी रै नाम री, झुक झुक करा प्रणाम
प्यारो लागै है, सावरियै रो नाम, माळा फेरा हा रोज सवेरै शाम || स्थायी।।
मरूधर रो वीरो, कोहिनूर हीरो, चमक्यो देश - प्रदेश ।
जनम्यो काटा मे, रम्यो हो भाटा मे, ल्यायो नव उन्मेष ।। १।।
बरस्यो हो इमरत, लोग हुया तिरपत, जाग उठी तकदीर ।
धर्म री विवेचना, मर्म भरी देशना, तोडी भ्रम-जजीर 11 211
तत्व प्रतिबोधि, मिलावट विरोधी, सिरियारी रो सत।
साधुपण पालै, न्याय पथ चालै, वो मतिमान महन्त ।। ३}
एक अनुशासना, बिना है विकास ना, अनुशासित ओ सघ ।
शुद्ध रीत नीत हो, गुरुवा पर परतीत हो, परमानद प्रसग ।। ४ ।।
स्वामीजी रो आसरो, केन्द्र विश्वास रो, अन्तर्मन रो राम।
सकट कटै है, विघन मिटै है, सिद्ध हुवै सब काम।। ५।।
'तुलसी' रै परताप स्यूं भिक्षु भिक्षु जाप स्यूं आठू पहर आराम ।
ग्राम सिरियारी, सुरगा री फुलवारी, पावन तीरथ धाम ।।६।।
(लय • ले चालूं तनै खेत)

अनासक्त -31
मे,
वारी जाऊँ चरणा
धन्य धन्य
भीखणजी स्वाम,
थारो मत्राक्षर सो नाम।। स्थायी।।
गाव कटालियै जनमिया,
पायो राजनगर प्रतिबोध,
केलवै तेरापथ रो,
थाप्यो सत पथ आगम शोध ।। १।।
सह्या थे परिषह आकरा,
कोई बह्या नित खाडै धार,
कदे ही पग नही चातर्यो,
थारो विमल बडो आचार ।। २।।
सरणै आया
रा सारिया,
कोई सकल मनोगत काज,
भीड पड्यां नै रखवाळिया,
राखी हाथ ग्रहे की लाज।। ३।।
सावरी
सूरत मन बसी,
म्हारी जागी अतर प्रीत,
'बुद्ध' लगन लागी साचली,
मै तो ली अब बाजी जीत।। ४।।
(लय - वारी जाऊँ चिरमी नै)

32-अनासक्त
भिक्षु-भिक्षु जपता टूटै करमा रा बन्ध,
म्हारी रग-रग मे रमगी इण नाम री सुगन्ध,
म्हारी नस-नस मे बसगी इण नाम री सुगन्ध,
म्हारी सास-सास मे भरगी इण नाम री सुगन्ध ।। स्थायी।।
धर्म तणो रथ फसै नही ज्यू, अब दळदळ रै बीच,
थे मर्यादा री सडक जमाकर, भारी को प्रबंध ।। १।।
कळजुग मे थे आया, साचे सतजुग रा अवतार,
थारै बोल-बोल मे गूज्या, प्रभुवर महावीर रा छद।। २।।
मर्यादा है जीवन म्हारो, मर्यादा है प्राण,
थारी मर्यादा मे पायो है म्हे, उन्नति रो आनन्द ।। ३।।
'बुद्ध' जुगो-जुग शासन थारो, पावो विजय महान,
है बूद-बूद स्यू भर्यो छला-छल, लहरो सघ-समन्द ।।४।।
(लय - आओजी पधारो)

अनासक्त-33
दीपा नदन । ल्यो शत वन्दन, नाव करो भव पार,
थारो ही आसरो है।
शीतल चन्दन विपदा भजन, नाम मत्र अनुहार,
थारो ही आसरो है।। स्थायी।।
भटक्यो चोरासी वाळी, गलिया मे कोरो ऑटा मारतो,
काळ अनन्तो होग्यो, बिसर्यो भरोसै वालो द्वार तो,
अबकै जाग्यो, शरणै आग्यो, कर द्यो नी उद्धार ।। १।।
गिणती करी औरा री, पण निज नै तो गिणनो भुलग्यो,
वैसाखी लेकर चाल्यो, लगडै पणै मे ही बस फूलग्यो,
काम अधुरो, कर छू पूरो, करो शक्ति सचार।।२।।
-
वृथा विकथा मे उळझ्यो, जीवन रो स्त्रोत सारो सूकग्यो,
आळस प्रमाद मे ही, करणै रो आयो अवसर चूकग्यो,
सकल्पी बण, जीवू हर क्षण, द्यो दृढतम आधार ।। ३।।
ज्ञान आनन्द वाळे, 'बुद्ध' स्वरूप नै निखार ल्यू,
बिसर्योडी चेतना रो, मगलमय आगणो बुहार ल्यू,
साहस भर द्यो, नव अवसर द्यो, स्वप्न हुवै साकार ।। ४ ।।
(लय - मिलो न तुम तो हम घबराये)

-
34- अनासक्त
म्हारै हियडै बसै जी, म्हारै हियडै बसै,
सावरिया स्वामीजी, म्हारै हियडै बसै।
दिवला ज्ञान रा चसै जी, दिवला ज्ञान रा चसै,
स्वामीजी नै सिवां, म्हारा 5 रू विकसै ।। स्थायी ।।
भीतर लो अंधेर मिटावण, सुरज बण कर आया।
आत्म ज्ञान री जोत जगाई, हलुकर्मी मन भाया ।। १।।
परवा करी नहीं कष्टां री, संजम पथ पर चाल्या ।
भूल्या भटक्यां नै संभाल्या, सूवे मारग घाल्या । २।।
पांच वर्ष अन्न मिल्यो न पूरो, पण मन डिग्यो न राई ।
'मर पूरा देस्यां' धारणियो, जीत्यो जग सदा ई।। ३।।
मर्यादा मजबूत बणाई, राख्या गुरु रखवाळा ।
मणका एक एक तो रुळज्या, मिलकर बणगी माळा ।।४।।
सिरियारी में स्वामीजी नै, सिवऱ्या राजी राजी।
'बुद्ध चेतना रै उपवन नै, हवा मिली है ताजी।। ५।।
(लय - म्हारी सोहन चीडी)

अनासक्त-35
स्वामीजी रै चरणा, तन मन अर्पण करियो रे, करियो रे,
भक्ति-भाव स्यू ओ हियडो, सागर ज्यू भरियो रे ।। स्थायी।।
जनम्या गाव कटाळियै मे,
बल्लू
दीपा गेह।
सिह-सुपन देख्यो माता जी, दूधा बरस्यो मेह।। १।।
भर जोबन घर त्याग नीसा, रुच्यो न शिथिलाचार ।
धर्म क्रान्ति रो पथ अपणायो, बण्या भाव अणगार ।। २।।
समकित चारित रै पाया पर, थाप्यो तेरापथ।
जन-जन रो उद्धारक बण्ग्यो, ओ प्रभुवर रो पथ।।३।।
सजम शुद्ध पळे सघळा रो, फळे न्याय अर नीत।
इसी सफळ मर्यादा बाधी, बधै परस्पर प्रीत ।। ४।।
एकाचार विचार एक सो, एक सुगुरु री आण।
आ सघळे ही पक्की बणगी, तेरापथ पिछाण।। ५।।
नही साच नै आच आण दी, करी न काची बात।
दियो न कष्टा मे पग पाछो, खती अलौकिक ख्यात ।।६।।
अभिनिष्क्रमण भूमि बगडी मे, सिवऱ्या भिक्षु स्वाम ।
'बुद्ध मिल्यो आनन्द आन्तरिक, फल्या मनोगत काम ।।७।।
(लय - धुंधरू छम-छमा-छम)

34-अनासक्त
म्हारै हियडै बसै जी, म्हारै हियडै बसै,
सावरिया स्वामीजी, म्हारै हियडै बसै।
दिवला ज्ञान रा चसै जी, दिवला ज्ञान रा चसै,
स्वामीजी नै सिवां, म्हारा रू रू विकसै ।। स्थायी।।
भीतर लो अंधेर मिटावण, सुरज बण कर आया ।
आत्म ज्ञान री जोत जगाई, हलुकर्मी मन भाया ।। १।।
.
परवा करी नहीं कष्टां री, सजम पथ पर चाल्या।
भूल्या भटक्यां नै संभाल्या, सूवे मारग घाल्या। २।।
पांच वर्ष अन्न मिल्यो न पूरो, पण मन डिग्यो न राई ।
'मर पूरा देस्यां' धारणियो, जीत्यो जग सदा ई।। ३ ।।
मर्यादा मजबूत बणाई, राख्या गुरु रखवाळा ।
मणका एक एक तो रुळज्या, मिलकर बणगी माळा ।। ४।।
सिरियारी मे स्वामीजी नै, सिवऱ्या राजी राजी।
'बुद्ध' चेतना रै उपवन नै, हवा मिली है ताजी।। ५।।
(लय - म्हारी सोहन चीडी)

अनासक्त -35
स्वामीजी रै चरणा, तन मन अर्पण करियो रे, करियो रे,
भक्ति-भाव स्यू ओ हियडो, सागर ज्यू भरियो रे।। स्थायी।।
जनम्या गाव कटाळियै मे, बल्लू दीपा गेह ।
सिह-सुपन देख्यो माता जी, दूधा बरस्यो मेह।। १।।
भर जोबन घर त्याग नीसा, रुच्यो न शिथिलाचार ।
धर्म क्रान्ति रो पथ अपणायो, बण्या भाव अणगार ।। २।।
समकित चारित पाया पर, थाप्यो तेरापथ।
जन-जन रो उद्धारक बण्ग्यो, ओ प्रभुवर रो
पथ।।३।।
सजम शुद्ध पकै सघळा रो, फळे न्याय अर नीत ।
इसी सफळ मर्यादा बाधी, बधै परस्पर प्रीत।। ४।।
एकाचार विचार एक सो, एक सुगुरु री आण ।
आ सघळे ही पक्की बणगी, तेरापथ पिछाण ।। ५।।
नही साच नै आच आण दी, करी न काची बात।
दियो न कष्टा मे पग पाछो, खती अलौकिक ख्यात ।।६।।
अभिनिष्क्रमण भूमि बगडी मे, सिवऱ्या भिक्षु स्वाम।
'बुद्ध मिल्यो आनन्द आन्तरिक, फल्या मनोगत काम ।।७।।
(लय - घुघरू छम-छमा-छम)

ar
36-अनासक्त
भिक्षु भिक्षु बोलो, सकट सारा कट ज्यासी।
करो भिक्षु रा गुणगान, काम सर ज्यासी।। स्थायी ।।
भिक्षु नाम है मगलकारी, विघ्न विनाशक भव-भय हारी।
आधि, व्याधि और उपाधि, सारी मिट ज्यासी।। १।।
कठिनाया मै नहीं घबराया, भूल्या भटक्या नै समझाया।
म्हानै बाबै री कुर्बानी, सदा याद आसी।।२।।
नगर केलवो, ओरी अन्धेरी, जिनमतरी बठे बाजी भेरी।
तत्व स्वामीजी रो धाऱ्या, नाव तर ज्यासी।।३।।
सिरियारी रो सन्त सुप्यारो, भिक्षु म्हारै हार हिया रो।
भिक्षु
रो आधार,
पार पहुंचासी।। ४।।
नाम
पाली रो है भाग सवायो, रग सुरगो ओ मन भायो।
श्रद्धा, भगति स्यूँ ओ शीश, चरणा झुक ज्यासी।।५।।
(लय - स्वामी भीखणजी रो नाम)

अनासक्त-37
श्री भिक्षु का नाम सुन्दर सुन्दर है।
मेरे सावरिये का काम सुन्दर सुन्दर है।। स्थायी।।
दीपा ने दीप जलाया, वह नई रोशनी लाया,
अधियारा दूर भगाया, तेरापथ हमे दिखाया,
पथ यह सुन्दर है, मेरे सावरिये का नाम ।।१।।
.
बगडी से चरण बढाये, ओरी अन्धेरी आये,
सिरियारी सत कहाये, तेरे चरणो शीष झुकाये,
जन्म तेरा सुन्दर है, मेरे सावरिये का नाम ।।२।।
तेरा दर्शन कितना सुन्दर, तेरा चिन्तन कितना सुन्दर,
तेरा आसन कितना सुन्दर, तेरा शासन कितना सुन्दर,
सघ यह सुन्दर है, मेरे सावरिये का नाम ।।३।।
तुम महापुरुष कहलाये, कष्टो से नही घबराये,
जो शरण तुम्हारी आये, वह अजर अमर बन जाये,
त्याग तेरा सुन्दर है, मेरे सावरिये का नाम ।।४।।
जो मन से अलख जगाये, वह निश्चित दर्शन पाये,
जब-जब कठिनाई आये, तेरे सुमिरण से मिट जाये,
जाप तेरा सुन्दर है, मेरे सावरिये का नाम ।।५।।
(लय - महावीर का नाम मंगल मंगल है)

38-अनासक्त
सिरियारी विराजै सन्त, शरणागत दुख दाझै,
ताजै-ताजै अन्दाजै स्यूं. सगती साझै सांवरियो,
कटालियै रै सावरियो ।। स्थायी।।
दीन दयालू सावरियो, परम कृपालू सावरियो,
भगता से प्रतिपालू म्हारी, बाह झालू सावरियो,
मणिधर राजै सावरियो, कटालियै रो सावरियो।। १।।
विद्यन निवारै सांवरियो, पतित उधारै सावरियो,
बिगड़ी बात संवारे भव-जल, पार उतारै सावरियो,
गाजै बाजै सावरियो, कटालियै रो सावरियो।। २।।
रंग रचावै सावरियो, जोश जगावै सावरियो,
जो ध्यावै वाछित फल पावै, आब बढावे सावरियो,
मन नै माजै सावरियो, कटालियै रो सावरियो।। ३।।
झिल मिल करतो सावरियो, ज्योति निखरतो सावरियो,
पलका इमरत झरतो दीसै, साफ उतरतो सावरियो,
लाज-लिहाजै सावरियो, कंटालियै रो सावरियो।।४।।
नाम सरस रस सावरियो, 'सागर' पारस सावरियो,
भाद्रव तेरस पाली वरसै, हरस-हरस जस सावरियो,
कठा गाजै सावरियो, कटालियै रो सावरियो।। ५।।
(लय - पाटी वरतो ल्यादै मां)

अनासक्त -39
भिक्षु स्वामी । अन्तर्यामी । करद्यो बेडा पार ।
आपरो आसरो है, केन्द्र विश्वास रो है।। स्थायी।।
काळजैरी कोर म्हारै, मन मे रम्यो है थारो नाम ओ।
सब कुछ अर्पण थारै, थे ही म्हारा राम घनश्याम हो ।
पलक बिछावा, दर्शण चावा, खोलो अन्तर द्वार ।। १।।
गगा मे न्हाल्यो चाहे, काशी बणाल्यो अपणै धाम मे।
चौसठ तीरथ मिलग्या, म्हानै तो सावरियै रै नाम मे।
रिद्धि सिद्धि, होवै वृद्धि, कल्प वृक्ष साकार ।। २।।
ऊँचो है दर्शन थारो, ऊँची है तेरापथ री साधना ।
पूजा मे फूल - चन्दन, दीप नही है शुद्ध उपासना ।
शत शत वन्दन, दीपानन्दन, अभिनन्दन उपहार ।।३।।
सयम री चान्दनी मे, चमचम चमकै थारो सघ है।
मेहदी ज्यू रमग्यो म्हारी, श्रद्धा
मे
एक
थारो रग है।
नयो नजारो, दिव्य सितारो, तुलसी तारण हार ।। ४।।
(लय - मिलो न तुम तो)

40-अनासक्त
.
।
स्वामी भीखणजी रो नाम आठू याम ध्यावा,
बाबलियै रो उपकार किंयां भूल ज्यावा ।
सांवरियो म्हारै सं-लं रम्यो है,
पल-पल छिन-छिन स्मृति सरसावा ।। स्थायी।।
मत्राक्षर
है नाम
स्वाम रो,
सरल पंथ है
परमधाम रो।
भिक्खू नाम री गंगोतरी मे नित न्हावां ।।१।।
"
बलिदाना री अमर कहाणी,
तीव्र तपोबल री सहनाणी।
कामकुभ, कल्पवृक्ष चितारत्न पावा ।।२।।
दो सौ वरसां री बै बाता,
बैठ जगाई बाबो राता।
कर याद मर्याद मन हुलसावा।। ३।।
खडा खडा पडिकमणो करता,
बूढापै रो ध्यान न धरता।
उतपातिया प्रतिभा री भारी घटनावां।।४।।

अनासक्त -41
गच्छा बाडा री
दुरवस्था,
मेटी सारी
विषम व्यवस्था।
तेरापथ री सजीव नीव थिर ठावा ।। ५।।
समझायो जीवन रो
दरसण,
नहि भायो उपरि आकरषण।
बा ही
श्रृखला
सजोश आपा अपणावा।।६।।
धर्म क्रान्ति
क्रान्ति रो बिगुल बजायो,
रूढिवाद रो
भूत
देखो आज ओ अनूठो दृश्य देख पावां ।। ७।।
भगायो।
है
है ज्योतिर्मय जीवन जीणो,
शान्त सुधारस पीणो।
झीणो स्वामीजी रो तत्व-बोध सीख पावां ।।८।।
जी भर
सुद
भाद्रव सरदारशहर मे,
धर्म बहार लगी घर घर मे।
'तुलसी' प्रेक्षा-ध्यान साधना रो रग ल्यावा।।६।।
(लय - म्हारै आंगणियें में तुलसी)

42-अनासक्त
भिक्षु भिक्षु भिक्षू म्हारी आत्मा पुकार,
भिक्षु रो म्हे साचो परचो पायो जी ओ।
जद-जद भीड पड़ी भगता में,
तो स्वामीजी रो शरणो, आडो आयो जी ओ।। स्थायी।।
शोभजी श्रावक नै नाथद्वारा जेल मे,
सदेह दरसण देण भिक्षु आया जी ओ।
ऊठता तडाक बेड्या टूट दूरी पडगी,
देख सारा इचरज पाया जी ओ।। १।।
स्वामीजी नै सिवऱ्या जद जोधपुर दरबार मे,
पटवोजी पूरी बाजी लेयग्या जी ओ।
रूपाजी रो खोडो टूट्यो रावळिया रै रावळे,
राजी-राजी घर का दीक्षा देग्या जी ओ।।२।।
धगधगता खीरा बरस्या बीदासर मे,
होग्या सै बेहोश सत बाकी जी ओ।
जयाचार्य तन्मय स्तवना सुणाई,
'मुणिन्द मोरा' ढाळ आज साखी जी ओ।।३।।
जबलपुर जावतां चम्पक मुनि नै,
शेर दो बबरची मिलग्या जी ओ।
भिक्षू-स्वाम भिक्षू-स्वाम नाम सहज्या निकल्यो,
बीस हाथ शेर दूर टळग्या जी ओ।।४।।

अनासक्त.43
स्वामीजी री ओट ली जसोल वाळा मानजी,
तो काळियै रो जहर उतरग्यो जी ओ।
जतर-मतर झाडा-झपटा सारा उत्तर दे दिया,
पर स्वामीजी रो नाम काम करग्यो जी ओ।।५।।
बोरावड रै ठाकरा पर सेना चढ आई,
मघवा गणी शरणा सुणाया जी ओ।
कोट सू उतरती फोजा दिखी अणगिणती,
भागता कुचामण पाछा आया जी ओ।। ६ ।।
एक के अनेक छेक देखल्यो थे परचा,
डूबता री नाव काढ़ आई जी ओ।
बारै बारै फिरै पडी बीच मे तिजूरी,
डाकुआ री आख्या चुधियाई जी ओ।। ७।।
रात नै विरात नै एकलो के दोकलो,
जद जद डर भय लागै जी ओ।
स्वामीजी रो नाम लिया खड्या हुवै रूगटा,
आतमा
मे पौरुष जागै जी ओ || ८||
दीपा रो दुलारो प्यारो हार हियारो,
सकट मोचनहारो अजमाल्यो जी ओ।
अपणोजाण वत्सलता स्यू सावळ बुचकार कर,
'चम्पक' ने एकरस्या हियै लगाल्यो जी ओ।।६।।
(लय - खमा खमा म्हारे)

44. अनासक्त
स्वामीजी ! थारी साधना री मेरु सी ऊचाई,
मेरु-सी ऊंचाई, है सागर-सी गहराई।
ओ स्वामीजी।। स्थायी।।
सिंह-सपन स्यू आया, माता दीपा रै प्रागण में,
सिंह वृत्ति स्यू ही उतऱ्या, सयम रै समरागण मे।
मरुधर रा धोरी वीर जी
चाल्या बाधावा चीर जी
कान खड्या होग्या दुनिया रा, बाजी जद शहनाई ओ।।१।।
१
तन नै साध्यो मन नै साध्यो, और साध्य नै साध्यो,
तपतै सूरज रो - आतप, लेता ओ हीरो लाध्यो।
सरिता-चर सुख री सेज जी
प्रकट्यो अंतर रो तेज जी
गण री जड मे खून पसीनै, री है खरी कमाई ओ।।२।।
सूझबूझ रा धणी सांतरा, सत्य धर्म रा खोजी,
आज्ञा अनुशासन रा हामी, वीर प्रभु रा फोजी।
ननु-नच रो है के काम जी
चाहे सुबै हुवो या शाम जी
सिद्धान्ता रै खातिर करता, बाबै स्यूं भी डाई ओ।। ३।।

अनासक्त-45
लाभ-अलाभ प्रशसा--निन्दा, सुख-दुख नै सम मान्यो,
मुखडै पर मुस्कान अजब, अज्ञानी मुक्को ताण्यो।
रहता तूफान जी
छोड्यो कद अनुसधान जी
हिम्मत री कीमत चिन्ता री, पडी नहीं परछाई ओ।। ४।।
आता
अतरग बहिरग घणी, रोमाचक है घटनावा,
एक-एक स्यू बढकर किसी, किसी कहकर बतलावा।
जुग जुग रहसी इतिहास जी
भरसी मन मे उल्लास जी
ई कलियुग मे आ सतयुग री, झाकी-सी दिखलाई ओ।।५।।
स्वर्ण कसौटी पर निखरै, आ केबत बोत पुराणी,
जीवन स्यू प्रत्यक्ष दिखाई, श्वेत- सघ- सेनानी।
जाग्यो अतर् विश्वास जी
टूट्या भक्ता रा पाश जी
धीरे-धीरै अपणी गति स्यू, प्रकट हुई सच्चाई ओ।। ६ ।।
वीतराग रै वचना पर ही, जीवन सारो वार्यो,
रात-रात भर जाग- जाग, कइया रोभार उतार्यो।
अकुर बण्या महान जी
फलवान हुयो उद्यान जी
गगाशहर भिक्षु-चरमोत्सव, 'तुलसी' गरिमा गाई ओ।।७।।
बै
(लय - मारुजी थारै देश में)

46-अनासक्त
घणां सुहावो माता दीपा जी रा जाया
थांनै तो ध्यावै सारो राजस्थान हो, सारो हिन्दुस्तान हो।
मानवता रा मान हो, जिन शासन री शान हो।। स्थायी।।
शास्त्रा री गहराई मे अति गहराई स्यू थे उतऱ्या,
काटां रै बीहड मारग मे निर्भयता स्यूं चरण धऱ्या ।
हो स्वामी ! कीन्हो धीरज धर अपणो अनुसधान हो।।१।।
एक रात री तीव्र ताव चिन्तन की धारा मोड दी,
रूढिवाद री सबल श्रृंखला इक झटकै स्यू तोड दी।
हो स्वामी विरला जन कर पाया थारी पहचान हो।।२।।
अंतिम आश्रय मानव रो थारो पहलो आवास हो,
मृत्यु मे ही जीवन रो मानो गहरो आभास हो।
हो स्वामी | पायो अमरत्व रो नूतन विज्ञान हो।। ३।।
चीर कुहासो पलट्यो पासो थारी कल्याणी वाणी,
पढतो-पढतो थकै न कोई थारै जीवन री कहाणी।
हो स्वामी । दीपै दुनिया मे तेरापथ महान हो।। ४।।

अनासक्त-47
एक सूत्र मे बाध्यो बाबो साधा रै समुदाय नै,
शिष-शाखा रो ममत मिटायो एक-एक नै ताय नै।
हो स्वामी । बत्तीसै रो बो सारो सविधान हो।।५।।
धर्माधर्म विवेचन थारो काना री खिडक्या खोलै,
बो साहित्य मारवाडी मे सारा रै मूढै बोलै ।
हो स्वामी । खुल्लै दिल सघर्षा मे झोकी ज्यान हो।। ६ ।।
म्हे कासीद प्रभु रै घर रा हळुका रै मनभावा,
करा उघाड पोप-लीला रो पाखड्या नै अणखावा ।
हो स्वामी । थारा आदर्श वीर वर्धमान हो ।। ७ ।।
घणी मधुर घटनावा थारी किसी-किसी नै याद करा,
पावन नाम प्रभु रो नाच रह्यो है जन-जन रै अधरा।
हो स्वामी | थारै पद-चिन्हा पर थारी सतान हो ।।८।।
'विश्व भारती रै प्रागण में चरमोत्सव की रगरळी,
चौतीसै भाद्रव तेरस दिन तुलसी खिलगी कळी-कळी ।
हो स्वामी । भक्ता रै भावा मे थे मूर्तिमान हो ।।
हो स्वामी । प्राणा री पुलकन हो मन री मुसकान हो।।६।।
(लय - खम्मा खम्मा हो अजमालजी रा कंवरां)

48.अनासक्त
*-
निहारा तुमको कितनी बार।
जितनी बार निहारा हारा,
कहीं न पाया पार।। स्थायी।।
शास्त्र सिन्धु मे देखा तरते,
तल तक गहरे नीर उतरते।
रत्न अमूल्य हस्तगत करते,
देखा हमने बड़े गौर से, भरते गण-भंडार।। १।।
-
कभी तपोवन मे तुम आये,
आतापन भूमि मे पाये।
प्राणार्पण सकल्प सझाये,
तीव्र प्रेरणा-प्रेरित फिर से, करते धर्म प्रचार ।। २।।
सराबोर चर्चा में रहते,
अपने शुभ प्रवाह मे बहते।
सत्य स्पष्ट भाषा मे कहते,
सहते कुवचन-वचन कही, सहते घूसो की मार ।।३।।

अनासक्त.49
-
करते सीधी सादी बाते,
गहन तत्व झट से समझाते।
तार निकाल तुरत दिखलाते,
अरे हेमा यो क्यो करते हो, आपस मे तकरार || ४||
कडे कडे दृष्टात सुनाते,
जड से मिथ्या रोग मिटाते।
जिन - वाणी की अलख जगाते,
कही नही भय खाते शम दम, गम खाते हर बार ।।५।।
कभी सघ सारण
वारण मे,
विधि विधान के निर्धारण मे।
परिचर्या विधिवत कारण मे,
तारण-तरण शरण-अशरण के, निराधार आधार ।।६।।
कवि, लेखक, वक्ता, व्याख्याता,
आगम सूक्तो के उद्गाता।
तेरापथ के भाग्य विधाता,
अयि भिक्षो। क्या गाए 'तुलसी', महिमा अपरपार ।।७।।
(लय - जगाया तुमको कितनी बार)

50-अनासक्त
पंखीडा औ पखीडा,
पंखीडा तू उड नै ज्याइजै सिरियारी रे,
भिक्षु बाबा नै म्हारी वन्दना कहीजै रे।
बाबा भिक्षु नै म्हारी वन्दना कहीजै रे ।। स्थायी।।
आयो दूर स्यू-३, आयो म्हारी बात कैवण नै,
प्रभु तु ही आधार म्हारी, नाव खैवण नै,
हो . प्राण तू ही, त्राण तू ही, रहतो रहीजै रे।। १।।
जन्म जन्म स्यू-३, प्रभु थारो म्हारौ साथ रे,
आगे थारे ही साथ रहस्यूं, साची बात रे,
हो गीत तू, सगीत यू ही, बहतो रहीजै रे ।। २।।
शुभ कामना-३, सोळह आने फळगी आज रे,
सारा देश ने ही था पर तो, पूरो नाज रे,
हो भक्त मे, भगवान तू ही, रहतो रहीजै रे।। ३।।
सोता जागता-३, हिवडे मे थारो नाम रे,
गुरु दृष्टि स्यू सुधरै है, सारा काम रे,
हो तन मे तू ही, मन मे तूं ही, दूर न रहीजै रे।।४।।
(लय - पंखीड़ा औ पंखीडा)

अनासक्त -51
म्हारी नैय्या खेवणहार गुरुवर तुलसीगणी,
म्हारा मोहन मुक्ताहार गुरुवर तुलसीगणी।
तुलसीगणी म्हारा हार हियारा, तुलसीगणी म्हारा नयन सितारा,
च्यार तीरथ रा आधार गुरुवर तुलसीगणी।। स्थायी।।
झुमरमलजी रा कुल उजियारा, मॉ वदना रा लाल दुलारा
सारै भूतल मे गुलजार, गुरुवर तुलसीगणी।। १।।
भैक्षवगण ने घणो दीपायो, तेरापथ ने
खूब
बढायो
याद आवैला उपकार, गुरुवर तुलसीगणी।। २।।
मिसरी सरीखी तुलसी वाणी, शिवपुर री है शुभ सहनाणी
चमकै सूरज सो दीदार, गुरुवर तुलसीगणी।। ३।।
क्रोड दीवाली राज करीज्यो, 'मुनि कन्हैया विजय वरीज्यो
साकार, गुरुवर तुलसीगणी।। ४ ।।
करो कामना
(लय - म्हारी नैय्या खेवणहार गुरुवर तुलसीगणी)

52-अनासक्त
चमकै दुनिया मे देखो, लाडनू रो हीरो ओ
चमकै दुनियाँ मे देखो, लाडनू रो हीरो,
ओ लाडनू रो हीरो, लाडाजी रो वीरो, देखो लाडनू रो हीरो, चमकै
देखण नै लोग आवै हिन्दुस्थान स्यू, इटली ताइवान स्यू,
लंदन जापान स्यू और सकल जहान स्यू, देखण लाडनू रो हीरो। स्थायी।।
सूरज जिस्यो चमचमाचम, चमकै भाल आ रो-२,
एक बार जो आवे नैडो, दास बणै चरणा रो।
लागै भक्ता नै, प्यारा भगवान ज्यू,
आवै हिन्दुस्थान स्यू, और सकल जहान स्यू,
देखण लाडनू रो हीरो ।।१।।
हो गुरुवर
चन्दना नै वीर मिल्या, और शबरी नै ज्यू रामजी-२,
म्हानै तुलसी स्वाम मिल्या है, फळग्या म्हारा कामजी।
हो गुरुवर किया बतलावा, खुशिया म्हे जबान स्यू,
आवै हिन्दुस्थान स्यूं, और सकल जहान स्यू,
देखण लाडनू रो हीरो ।।२।।
कुरु क्षेत्र मे अर्जुन रथ रा, कृष्ण बण्या हा सारथी-२,
आप सारथी तेरापथ रा, करा मुदित मन आरती।
हो गुरुवर मिलकर म्हे, करां अर्चना सगान स्यू,
आवै हिन्दुस्थान स्यू, और सकल जहान स्यू,
देखण लाडनू रो हीरो ।।३।।
(लय • अपने पिया की)

अनासक्त-53
आधी और तुफाना मे रुक्या न जो व्यवधाना मे।
नैणा मे म्हारै बसै सदा तुलसीगणी।। स्थायी ।।
मा वदना री कुख उजाळी, धन्य हुई धरती पाकर,
चदेरी मे चाद दूज रो, खुशिया छायी घर-घर पर ।
दिन दिन दीपै पुण्याई, बचपन बीत्यो सुखदाई ।। १।।
कालू गुरु कर लेकर दीक्षा, ज्ञान ध्यान मे रमण कर्यो,
पूज्यपाद बाईस बरसा मे, गण नायक रो विरद वर्यो ।
गगापुर हो बड भागी, सोयी ज्यू किस्मत जागी।। २।।
मील हजारा विचरण करके, जनता नै प्रतिबोध दियो,
दुख मुक्ति री राह बताकर, थे असीम उपकार कियो।
माझी बन नावा तारी, रहसी जग ओ आभारी।। ३।।
आख्या स्यू अमृत ज्यू बरसै, मानव खीच्या आवे है,
दर्शन कर प्रभुवर रा अपणी, अतर प्यास बुझावै है।
जादु पायो थारी वाणी मे, गौरव भो कहाणी मे ।। ४ ।।
श्रद्धा रा आधार नाथ थे, क्रोड दिवाली राज करो,
शासनरी सुषमा महकाओ, पग-पग पर थे विजय करो।
श्रद्धा स्वीकारो भक्ता री, जावा थारी बलिहारी।। ५।।
(लय - फूल खिल्या थारै बागां में)

54-अनासक्त
जय-जय श्री तुलसी गुरुवर, तुम राष्ट्र संत कहलाए,
मानव को राह दिखाने, तुम दीप शिखा बन आए। स्थायी।।
पावन है नाम तुम्हारा, पावन है आत्म कहानी,
पावन वन जग मे छाये, तुम तप की अमर निशानी,
ले तेरा पुण्य सहारा, हम भी पावन बन जाएं।। १।।
हम हैं कितने सौभागी, तुम जैसे पाए नेता,
जो भक्त अभक्त सभी की, है जीवन नैया खेता,
नव ज्योति किरण से देखो, ज्योतित हैं दशो दिशाए।।२।।
।
तुम युग चितक । युग प्रहरी, तुम युग के एक उजारे,
तुमको प्रणाम करते है, नभ के सब चाँद सितारे,
तुम कलाकार मतवाले, अगणित तेरी कलनाएं।। ३।।
अणुव्रत का दीप जलेगा, घर-घर सूने ऑगन मे,
बन शंख नाद गूजेगा, मानवता के कानन मे,
हे चिरंजीव चिरायु | धरती की प्यास बुझाए।। ४।।
(लय - ए मेरे वतन के लोगों)

अनासक्त-55
गुण घुघरू छम छमा छम छण ण ण ण ण ण ण बाजै ।
मा वदना रा लाल लाडला हिवडै विराजै रे।। स्थायी।।
उन्नीस सौ इकोतर जनम्या, झूमर कुल पुनवान।
मा वदना री कूख उजाळी, गूज्या घर-घर गान।। १।।
कालू कर कमला स्यू तुलसी, लिन्यो सयम भार ।
ग्यारह बरसा री उमर मे, छोड्यो सब घर-बार ।। २।।
कालूगणि री अनुपम दृष्टि, सदा रही इक सार ।
बाइस बरसा री उमर मे, थे बणग्या शासण हार ।। ३।।
तेतीस बरसा री उमर मे, दिन्यो अणुव्रत सार ।
गूजण लागी अणुव्रत भेरी, सात समन्दर पार ।। ४।।
चम्मालासै जी टी नापी, पिचपन साहित ज्ञान ।
छयासठ प्रेक्षा ध्यान दियो थे, सिततरै सधान ।। ५।।
बडभागी हा आपा सगळा, पायो सघ महान ।
गण आपा रो आपा गण रा, गण हित देस्या प्राण।। ६ ।।
भूल नै पासी युग-युग थारो, आ जनता उपकार ।
'सुव्रत' तुलसी हार हियै रो, जीवन रो आधार ।। ७।।
(लय - गुण धुंघरू)

56- अनासक्त
वदना रो लाल म्हानै प्यारो, प्यारो लागै रे
प्यारो लागै रे, मनहारो लागै रे..वदना ।। स्थायी।।
झूमर कुल रो है उजियारो, हा है उजियारो
मगलमय आरो ओ उणियारो, लागै रे वदना
||१॥
वीर प्रभु रो शासण-शिखरा चढायो, हा शिखरा
शासण गगन मे ध्रुव तारो, लागै रे वदना
।। २।।
अजब
गजब री थारी पुन्याई, हा थारी
कलयुग मे सतयुग सो नजारो, लागै रे वदना
||३||
अणुव्रत प्रेक्षा री थे अलख जगाई, हा अलख
भव-जल स्यू पार किनारो, लागै रे वदना
11४।।
युग-युग तप-तपो शासण देवता, हा शासण
चम्पक रो भ्रात मोहनगारो, लागै रे
लाडा रो वीरो म्हानै प्यारो, लागै रे वदना
11 ५॥
(लय - बाबै रो नाम)

अनासक्त-57
आपणे भागा री, के कहणै
री बात,
स्वामीजी रो गण मिल्यो और तुलसी रो शिर हाथ ।
आपणे भागां री || स्थायी।।
-
एक एक स्यू दीपता रे | हुआ जबर गणनाथ,
पर सगला ने छेकगी रे भाई | आ तुलसी री ख्यात ।
आपणे भागा री ||१||
-
मुलका मुलका मे हुयो रे । तेरापथ प्रख्यात,
कुण सो बो गणितज्ञ है, जो काढ सकै अनुपात ।
आपण भागा री ।।२।।
घोर अधारी रात मे रे । जो अवदात उदात,
माजी । थारै स्वप्न री आ. करामात साक्षात ।
आपण भागा री ||३||
जननी अरू जनु-भूमि की रे । राखी बात विख्यात,
अवसर पर भूलै नही रे | वो ही जात सुजात ।
आपणै भागा री ।।४।।
जुग जुग जीवो जगत मे रे । तपज्यो पुण्य--प्रभात,
शुभाशीष सो-सो हृदय स्यू, देवै 'चम्पक' भ्रात ।
आपणे भागा री ||५||
(लय - हरी गुण गाय ले रे)

58.अनासक्त
तुलसी तुलसी समरल्यो, तुलसी हिवडे री कोर,
सौ सौ वन्दना ।। स्थायी।।
रतनधारीणी मां वदना सुत, झूमर कुल उजियारो,
प्रवल पोरसो पुण्याई रो, है प्राणा स्यू प्यारो,
फूल पाखुडीया खिल उठी, पा तुलसी सा सिरमौर {{१}}
अणुव्रत प्रेक्षा री ज्योति स्यूं, हर घट ज्योत जगाई,
आगम री कर नव विवेचना, ज्ञान किरण फैलाई,
इण किरणा स्यू ही मिटै. अंतर रो घोर अधार ।। २।।
थारे शासन मे बरतीजै, हरदम चौथो आरो,
लाखा री आख्या में बरसग्यो, है थारो उणियारो,
इसा सारथी हाथ मे, शासण रथ री आ डोर ।। ३।।
चार तीर्थ रे सचालक नै, तन मन प्राण चढावा,
श्रद्धा अर्पण कर भक्ति स्यू, हरक-हरक विरधावा,
कीरत फूलां री महक, आ फैली चारो ओर ।।४।।
जुग-जुग ताई इण शासण री, करज्यो थे रखवाली,
गण भागां स्यू म्हानै मिलग्या, आप जिसा गणमाली,
'मोह जीत' तुलसी सुमर, जागैला भाग सजोर ।। ५।।
(लय - वारी जाऊं करमा नै)

अनासक्त -59
सात सुरो का बहता दरिया, तुलसी-तुलसी मेरे राम,
हर सुर से आवाज उठी है, तुलसी जय तुलसी नाम,
तुलसी-तुलसी मेरे राम ।। स्थायी।।
क्या मथुरा क्या काशी जाए क्यो नर भटके मदिर धाम,
तुलसी गगा तुलसी सागर तुलसी नाम है तीरथ समान,
तुलसी-तुलसी मेरे राम।। १।।
जाने बुलावा कब आ जाये छोड दे झूठे जग के काम,
सासो का धागा ये तन तेरा इसमे पिरोले तुलसी नाम,
तुलसी-तुलसी मेरे राम ।। २।।
मोह माया का छोड दे बन्धन तन-मन करदे तुलसी समर्पण,
तुलसी का नारा सत्य अहिसा तुलसी नाम है जग मे महान,
तुलसी-तुलसी मेरे राम ।।३।।
(लय - तुलसी-तुलसी मेरे राम)

60- अनासक्त
वन्दे तजदे फदे, आखिर परभव मे जाना।
पाई पाई का सब लेखा, होगा वहा चुकाना ।। स्थायी।।
छल बल कर रिश्वत लेकर, झूठा भी सच्चा बनकर ।
यहां छूट सकता है तूं, विभव लूट सकता है तू ।
पर न चलेगी पोल वहा, बता छुपेगा कहाँ कहाँ।
दूध दूध पानी का पानी, विधि का न्याय पुराना।। १।।
रघुपति राघव राजा राम, पूरा वेतन आधा काम !
चाल दुरगी यह तेरी, करता जो हेरा फेरी।
कुदरत जब खबरे लेगी, जडा मूल से खो देगी।
समझाले दिल अभी नही तो, होगा फिर पछताना ।। २।।
रोटी कपडा मिला मकान, रख न अधिक तृष्णा नादान।
आखिर एक दिन है मरना, क्यो फिर हाय हाय करना।
प्राप्त उसी मे कर सतोष,
सुन
अणुव्रत का उद्घोष।
देख स्वय से सिर्फ स्वय को, अगर शान्ति सुख पाना।। ३।।
ले
दीनो का शोषण कर-कर, खून गरीबो का पीकर ।
माया जोडी निर्दय बन, पर न हजम होगा यह धन ।
दगा किसी का सगा नही, कर्मों के फल मिले सही।
मुनि सजय क्यो तुच्छ स्वार्थ हित, बुनता ताना बाना।। ४।।
(लय - बच्चे मन के सच्चे)

अनासक्त-61
तन धन रो । काई रै गुमान करै. तन धन रो..
खाली हाथा जावै, करणी रा फल पावै,
क्यूं झूठी दौड लगावै ।। स्थायी।।
आज रो गरीब काल, धनी बण ज्यावै है,
करोडपति सेठ रा भी, भाग उड ज्यावै है,
हो किण स्यू न डरै बानै, मौत डरावै ।। १।।
माया किण रै साथ जावै, आगै पीछे देखलै,
थारी भी न साथ जासी, मन मे आ सोचलै,
हो सोने री लका भी तो, राख बण ज्यावै ।।२।।
एकलो ही आयो है तू, एकलो ही जावैला,
आसमा रा चाँद तारा, सारा छुप जावैला,
हो डेरा उठाऊ थारा, कद उठ ज्यावै।। ३।।
आज रो भरोसो नही, काल री के सोचै है,
भर्यो है खजानो भीतर, बाहर काई खोजै है,
हो नीद उडावो थाने, तुलसी जगावै ।। ४ ।।
(लय - दिल करता)

62-अनासक्त ओ जग झूठो रे ससार, नर तूं तो अतर आख उघार । ओ जग झूठो रे ससार, नर थारी नींदडली रे निवार ।। स्थायी।। उगै सो ही आथमै रे, फूलै सा कुमलाय। चिणिया देवल ढह पडै रे, जलमै सो मर जाय ।। ||१|| ओ सब ज्या स्यू हस हंस बोलता रे, दिन में सौ सौ बार । सो नर मर माटी थया ज्यारा, हाडा घडै कुभार ।। ||२|| ओ सब टेढा मेढा चालता रे, निरख जवानी रूप। ते नर जल बल भस्म हुया रे, ओ है अत स्वरूप ।। ।।३।। ओ सब सेर - सेर सोनो पेरती रे, मोत्या मरती भार । इक दिन झोलो बाजियो रे, घर-घर री पणिहार ।। ||४|| ओ सब सोने रा गढ कोट चिणाया, सोने रा दरबार । रति भर साथ न ले गयो रे, रावण मरती वार ।। ओ सब ||५|| ऐ दो अक्षर काम रा रे, ऐ दो अक्षर सार। मीरा रै प्रभु गिरधर नागर, प्रभु भज उतरो पार ।। |॥६॥ ओ सब (लय - मांढ)

अनासक्त -63
यह है जगने की बेला, क्यो अब सोना चाहिए ?
हृदय को धोना चाहिए कि पावन होना चाहिए।। स्थायी।।
मानव-तन-रत्न मिला है, सचमुच सौभाग्य खिला है।
कौडी मे इसको कभी न खोना चाहिए।। १।।
थोडी-सी करके हिम्मत, आको जीवन की कीमत ।
मक्खन पाने पानी न बिलौना चाहिए।। २।।
तर करके सागर सारा, अतिश्रम से मिला किनारा ।
तट पर आ नैया को न डुबोना चाहिए।। ३11
बिन समझे बात पकडकर, मिथ्या आग्रह मे अडकर ।
सिर पर लोहे का
भार
न ढोना चाहिए।।४।।
।
मन चाही मौजे ले ले, चाहे ज्यो इससे खेले ।
यो जीवन होना नही खिलौना चाहिए।। ५।।
धरती तैयार पड़ी है, मिलती उपदेश झडी है।
सयम का बीज यहा पर बोना चाहिए।।६।।
अणुव्रत है महगे मोती, 'तुलसी' जगमगती ज्योति ।
जीवन धागे हार
पिरोना चाहिए।। ७।।
मे
(लय - पाणी आया पुलादे)

64. अनासक्त
चेतन ! ले लै शरणां च्यार, साचो आरो ही आधार ।
सारो स्वारथियो संसार, कोई थारो नही है। स्थायी ।।
श्री अरहन्त, सिद्ध, अणगार, सोचो धर्म हियै मे धार।
ओ ही करसी बेडा पार, और चारो नही है।। १।।
जो त होणो चावै न्याल, आ च्यारा रो पल्लो झाल।
थारे माथै ऊभो काल, कोई पतियारो नही है।।२।।
जिवडा होकर रही सचेत, आ च्यारा स्यू राखी हेत।
चिडिया चुग ज्यावैली खेत, और रुखारो नहीं है।। ३।।
पग-पग पर थारै लूटाक, था पर रह्या निशाणो ताक ।
आं च्यारा नै सागै राख, और स्हारो नही है।। ४।।
औ है अत्राणां रा त्राण, औ है अप्राणां रा प्राण।
'तुलसी' करै कोड कल्याण, थारो- म्हारो नही है।। ५।।
(लय - सुगणा सिंवरो नी राम)

अनासक्त -65
हेलो जागण रो, ओ है महावीर रो हेलो,
ई नै शीश झुका कर झेलो, आग्रह विग्रह दूरा मेलो।
हेलो जागण रो।। स्थायी।।
मानव जीवन मिलणो ओखो,
मिलग्यो अब कै अवसर चोखो,
लाहो ले ल्यो रहै न धोखो ।। १||
जागणवाळा लाभ उठासी,
बाकी बासी भोजन खासी,
घर मे हाण, लोक मे हासी।।२।।
निद्रा विकथा मे मत राचो,
मत सुख दुख रो पोथो बाचो,
अन्तर रै भावा नै जाचो।।३।।
पाणी आया पाळ न बधसी,
टूट्यो काच न पाछो सधसी,
बिगड्यै तीवण रो के रंधसी।।४।।
सीखो न्याय नीत स्यू जीणो,
'बुद्ध' सदा समता रस पीणो,
जीवन बण ज्यासी लाखीणो ।। ५।।
(लय - धरती धोरां री)

66. अनासक्त
म्हारी चेतना रो दिवलो कद जळसी?
म्हारी साधना रो विरवो कद फळसी? स्थायी।।
पल-पल छिन-छिन काढू गिण-गिण,
म्हारै हिरदै मे हो रही हळचळसी,
अबै ज्योत मे ज्योत कियां रळसी।
म्हारी चेतना रो दिवलो ।।१।।
मन मृगलै ज्यू
ज्यू भरै छलांगा,
ईनै रोकू जियां हुवै गति चचळ सी,
किंयां समता रै साचै ढळसी।
म्हारी चेतना रो दिवलो ।।२।।
राग रोस अरि लारै
लाग्या,
म्हारी कोटडी नै कर दी काजळ सी,
आगै बर्दू कियां जमी लागै दळ-दळ सी।
म्हारी चेतना रो दिवलो. ।।३।।
सुगुरु
सहारो पायो 'मधुकर',
वाणी बरसै सावण
बादळ सी,
शक्ति सोयोडी जागैली शतदळ सी।
म्हारी चेतना रो दिवलो ।।४।।
(लय - स्वामीजी भीखणजी रो नाम)

अनासक्त -67
चेतन । चिदानन्द चरणा मे, सब कुछ अरपण कर थारो।
सफल बणा तू सतसगत मे, मूघा मोलो मिनख जमारो || स्थायी ।।
खाली हाथा आयो है तू, जासी खाली हाथा रे।
लारै रहसी इण दुनिया मे, जस अपजस री बाता
थोडै जीणे रै खातिर क्यू, बाधै शिर पापा रो भारो।। १।।
।
कोड्या साटे अहल हार मत, ओ हीरो लाखीणो रे।
विष मत घोळ वासना रो, जो शान्त-सुधारस पीणो रे।
अति झीणो परमारथ रो पथ, तू है नश्वर तन स्यू न्यारो।।२।।
भर्यो अनन्त अखूट खजानो, गाफिल । थारै घर मे रे ।
क्यू न निहारै बार-बारै, क्यू भटकै दर-दर मे रे ।
आग छिपी अरणी मे ढूढै, काठ काट मूरख कठिहारो।। ३।।
एक नयो पैसो भी थारै, नही चालसी सागै रे।
कर्या आपरा करमा स्यू ही, सुख-दुख मिलसी आगै रे।
सजम रै मारग पर चाल्या, 'तुलसी' निश्चित है निस्तारो ।।४।।
(लय - वृन्दावन का कृष्ण कन्हैया)

68-अनासक्त
ई तन रो, पल रो भरोसो नही, ई तन रो,
क्यूं इत्तो इतरावै, क्यूं दुष्कर्म कमावै, कद दिवलो बुझ ज्यावै ।। स्थायी।।
दिन रात एक धुन, भाग्यो - भाग्यो फिरै है,
उडे है आकाश नदी, सागरा नै तिरै है।
हो. पईसै रे खातर धरम गमावै-ई तन रो ||१||
मीठो - मीठो बोलै घणो, गाहका रै सामने,
ताकडी मे तोलै जणां, भूल ज्यावै राम नै।
हो कलम नै क्यू तलवार बणावै-ई तन रो ||२||
मोजा उडावै लोग, पाप कर्यो एकलै,
कोई ना बटावै हाथ, जाच कर देख लै।
हो बाल्मिकी घटना साफ सुणावै-ई तन रो ||३||
एक सांस आयो भाई, दूसरे रो के पतो,
एक कोर खायो रहग्यो, दूसरे नै देखतो ।
हो. सपना अधूरा ही रह ज्यावै-ई तन रो ।।४।।
जाग-जाग पाळ पाणी, आया पेली बाध लै,
टूट रह्या धागा कच्चा, साधणा तो साध लै।
हो 'मधुकर' साची बात बतावै-ई तन रो ।।५।।
(लय - रूं रूं में बसे है म्हारै सांवरियो)

अनासक्त-69
जाणो पर भव में, पखीडा पीजर छोड।
सब मोह माया नै तोड ~ जाणो ।।
कर कितनो मुंह मचकोड - जाणो ।। स्थायी।।
पाणी रो ज्यू बुदबुदो, पाको पीपल रो पान ।
क्षण भगुर तन बेलडी, है विविध रोग की खान ।।१।।
चार दिना री चानणी, झबको बिजली रो एक।
धन यौवन की साहिबी, ज्यू ढलती छाया देख ।। २।।
एक मुसाफिर तू सही, थोडा वर्षा रो वास ।
महल खड्या कितना कऱ्या, कितना छोड्या आवास ।।३।।
आयो तू किण देश
स्यू.
फिर जासी किण देश ।
पतो नही मा बाप रो, कितना बदले लो वेष।।४।।
नौ नौ दरवाजा खुल्या, है कोई न पहरेदार ।
कुण
जाणे किण वक्त मे, यम ले ज्यावै ललकार।।५।।
पीढ्या री पीढ्या खपी, कई सीढ्या हो गई राख ।
घर-२ आगी लग रही, तू खोल खोल कुछ आख ।।६।।
दीयो टिम टिम कर रहयो, तू तेल ज्ञान रो घाल।
टूट्या पहली बाधलै, तू सरवरिये री पाल ।।७।।
चोर घुस्या धन ले गया. अब जागण रो के मोल।
खाली हो गयो ठीकरो, लागी है मिड्या गोल।। ८11
आयो मुट्ठी भीच के. तू जासी हाथ पसार ।
'नवरत्न' साथ मे चालसी, थारै मगल शरणा चार ।।६।।
(लय • कोरो काजळियो)

72.अनासक्त
माटी री मूरत है काया, क्यू तू देख लुभायो ?
किंवाडी खोल हियै री।
झूठी सारी ममता माया, थोथै भरम भुलायो,
किवाडी खोल हियै री।। स्थायी।।
जीणो है थोडो सो, किसी बात पर तूं बण्यो आकरो ?
खावै पंसेरी री, फैंके जो दूजा ऊपर काकरो,
करै जको ही भरै जगत मे, क्यू तू समझ न पायो।। १।।
ढीलो भलाई मे तू, घणो है बुराई में उतावळो,
स्याणो कहावै कोरो, कामा स्यूं लागे पूरो बावळो,
सुलझण चाल्यो पण उलझण मे, खुद खूब फंसायो ।।२।।
नै
टिम-टिम करतो थारो, दियो जिन्दगी रो बुझ जावैला,
अंधेरो घिरैला जद, कोई न पूछण वाळो आवैला,
सुख रो ही साथी जग सारो, दुख स्यूं है घबरायो।। ३।।
चालै है सास जित्तै, सघळा नै लागै तू सुहावणो,
रुकता ही होवैला, हर पल भारी अलखावणो,
'बुद्ध' हुवैला साथी थारो, जो पुण्य पाप कमायो ।। ४।।
(लय - मिलो न तुम
तो हम घबरायें)

अनासक्त -73
थारो सुधरैला जद व्यवहार, सारो ससार सुधर ज्यासी।
थारो बिखरैला जद अहकार, सारो अधार बिखर ज्यासी।। स्थायी।।
गुण है घणा ही अवगुण घणा ही, जग बहुरगी है मेळो,
आछा घणा ही भूडा घणा ही, दो दिन वाळो है खेलो,
तू तो करले थारो निस्तार ।। १।।
जनम-मरण री है आग भयकर, सगळा जळे सूका गीला,
कोई सहायक बण नहीं पावै, गजव अठै री है लीला,
तू तो होज्या नी झटपट पार ।। २।।
काळ अनतो सूतै रो बीत्यो, आँख खोलण नही पायो,
नई कमाई करी नही कोई, बासी ही भोजन खायो,
किया होसी थारो उद्धार ।।३।।
बीत्यो आउखो पाछो न आवै, टूट्या कारी नही लागै,
टाडो लदैला जिण दिन थारो, पुण्य पाप जासी सागै,
'बुद्ध' भरले सुकृत रो भण्डार ।। ४ ।।
(लय - आ लौट के आजा मेरे मीत)

74- अनासक्त
के करै भरोसो काळ रो अणचिन्त्यो आवैला।
ओ माटी री महल एक पल मे ढह ज्यावैला।। स्थायी।।
बडा
बडा मनसूबा बाथै, ऊची भरै उडान रे,
अपणी मो मे बण्यो बावळो, भूल गयो भगवान रे,
सूरज सै जीवन नै ओ, राहू गह ज्यावैला।।१।।
समै-समै पर धक्को लागै, नींव निसरती ज्यावै रे,
बढ्यो नीर रो वेग नदी, सरणाटा करती आवै रे,
कांठे खड्यो रूखडो पतो न, कद बह ज्यावैला ।। २।।
चल्या गया केइ, केइ जासी, केइ जावण री त्यारी मे,
नगद उगावै रकम ईने, विश्वास न तनिक उधारी मे,
तकै बाज स्यू झपट, चिडकली के सह पावैला।। ३।।
निश्चै नहीं पलक रो आगै, कुण जाणै के होसी रे,
फळ पावैला बिसा जिसा तूं, बीज हाथ स्यूं बोसी रे,
बगत बीत ज्यासी कोरी, बातां रह ज्यावैला।। ४।।
अणमोलो ओ 'मधुकर' मिलियो, हीरो क्यूं ठुकरावै रे,
लोहबाणियै ज्यूं बण जिद्दी, क्यू निज शीश हिलावै रे,
संपद रा साथी न विपद मे, मुह दिखावैला।।५।।
(लय - आ बाबासा री लाडली)

अनासक्त.75
सांच नै आच नही है।
हो सौ-सौ बार परखल्यो, हीरो काच नही है।
सांच नै आच नही है।। स्थायी।।
साच मिनख री स्वाभाविकता,
झूठ अभिन्तर री निर्बलता,
हो निभ पावैलो झूठ पावडा पांच नहीं है।। १।।
चितन साचो कर तू पैली.
हुवै नही मति ज्यू मटमैली.
हो मोती चुगलै जिसी झूठ री चाच नहीं है।। २।।
-
घाई पेची रती न राखै,
सोचै बिसी करै अर भाखै,
हो साचै री इण स्यू, आगै कोइ जाच नहीं है।। ३ ।।
सीता रो सत तप्यो आग मे,
द्रुपद-सुता रो सभा-भाग मे,
हो हरिश्चन्द्र रै अक्षत यश मे टाच नही है।। ४।।
सत्य स्वय भगवान निरजन,
शुद्ध-प्रबुद्ध सदा भय-भजन,
हो 'बुद्ध' समन्वय रै घर कोई खाच नही है।।५।।
(लय · राग री रैस पिछाणो)

76-अनासक्त
जीवन रो, काई है भरोसो भाई जीवन रो?
पल भर सास न आवै, तो हंसो उड ज्यावै,
माटी लोग जळावै ।। स्थायी।।
तन नै सवारै खूब मन रो तो मैलो है,
वातां मे लाखीणो पण करणी मे धेलो है,
ओ हीरै सी जिदगी नै यूं ही गमावै ।। १।।
समता स्यूं जीणो है विषमता नै छोड दे,
चेतना नै आज स्यूं ही एक नयो मोड दे,
ओ. निज नै संभाळे बो ही लाभ कमावै।।२।।
सुख दुख दोनूं थारै आंता जाता पावणा,
दोनूं ही ठगोरा है मूंढै के लगावणा ?
ओ..सावधान रयां कोई नहीं भरमावै ।। ३।।
अवगुणां नै भूल तूं गुणां नै याद राख ले,
बारलो विसार स्वाद भीतरवाळो चाख ले,
ओ 'बुद्ध' निज भावां नै ही उन्नत बणावै ।।४।।
(लय - दिल करता)

अनासक्त.77
जीवन है जाबक छोटो, पाणी रो
ज्यू
परपोटो,
करले धरम री साची साधना,
रे मनवा करले अध्यातम री आराधना।। स्थायी।।
चौरासी रै चक्कर मे, कद स्यू तू भटकै रे,
अपणी ही कमजोरी स्यू, दुविधा मे लटकै रे,
दुख स्यू क्यू घिरतो जावै ?
चिन्ता रो पार न आवै।। १।।
मूघो है मिनख जमारो, अहलो क्यू खोवै रे ?
अमृत बोणै री वेळा, विष मत ना बोवै रे,
लूटै नी
लाहो चोखो,
अवसर ओ मिलणो ओखो।।२।।
हीरै सो हर पल थारो, माटी क्यू बणज्या रे?
चरणा मे लिपटी रज क्यू, माथै पर तणज्या रे?
वृत्या जो बदलै थारी,
दुनिया ही पलटै सारी।। ३।।
समता स्यू 'बुद्ध' जीवन, जीणो तू सीखै रे,
दुविधा रो अत तो फिर, आतो ही दीखै रे,
अंतर री जोत जगाले,
मन रा सै भरम भगाले।। ४।।
(लय - राखी ले आई बैनां)

78. अनासक्त
बीत रही एक-एक लाखीणी घडी,
सावधान रहजे मौत सामनै खडी।। स्थायी ।।
एक डग भर्यो दूसरै को के ठिकाणो है ?
एक कोवो खायो रैग्यो पुरस्योडो भाणो है,
बीच मे ही काळ आय चोटी पकडी।। १।।
बाधै तूं बंधाण बैठ्यो वर्षा का आगला,
देखै क्यू नी टूटै थारै सिर पर का डागळा,
सावण ज्यूं लाग री है मौत की झडी।। २।।
दो दिन के पैली पछै सगळा नै जावणो,
काळ
कै
कुण
होवै प्यारो और अणखावणो ?
पहुचसी मसाण मे सारा री लकडी।। ३।।
डरणै स्यूं 'बुद्ध' अब काम नही चालसी,
मौत नै जो सामो मडसी वो ही खेत घालसी,
मोक्ष स्यूं जुडैला बी री आप ही कडी।। ४।।
(लय - चुप चुप खडे हो जरूर कोई बात है)

अनासक्त - 79
मिल्यो मिनख अवतार, चेत तूं बावळा ।
चोरासी स्यू निकळ बारणे, डग भर जरा उतावळा ।। स्थायी।।
मोह माया मे मुग्ध बण्यो तू, काल अनतो बीतग्यो,
भर्यो खजानो आज देख ले, तर-तर सारो रीतग्यो,
रीतै रा कुण करसी जग मे चावळा ।। १।।
डगर अजाणी लोग अजाण्या, मिल्यो अजाण्यो साथ है,
च्यार दिना री चटक च्यानणी, फेर अधेरी रात है,
एक तराजू तुलसी गोरा - सांवळा ।। २ ।।
अकल बिना ही ऊट उभाणा, तू विवेक स्यू काम ले,
मिनख बण्या के हुवै ? ज्ञान की, जोत हियै मे थाम ले,
खोल अभिन्तर आंख मिटा दे झावळा ।। ३।।
टेढो न्याय न चलसी जग मे, सीधै स्यू सुख पावैला,
चलगत सुधा पार हुवैला, बिगड्या गोता खावैला,
'बुद्ध' एक ओळी मे राक र रावळा ।। ४ ।।
(लय - खडी नीम रै नीचे)

80-समासक
जीवन लाखीणो,
ने कोड़यां में मत खोचो, ई मे बीज धरम रो बोवो,
मोह-माया की नीद न सोवो।। स्थायी।।
मनरेगते कदे गत चालो, ई ने सजम-मारग घालो,
गुण रो इमरत ई मे ढालो ||१||
ई में आवै घणा उछाळा, ई रा छिप्या रहै नहीं चाळा,
कर दे खिण में उजळा-काळा11211
जाणं री आवे जो आंटी. वणज्या सोनो सारी माटी,
कटज्या दुख री ओखी घाटी।। ३।।
जीवन चंचल बहती पाणी, वाता करे घणी अणजाणी,
ई री विरला चाल पिछाणी।।४।।
काया है माटी री काची, लाखां विरिया परखी जाची,
चलगत रही न ई री साची।।५।।
सांस रोकिंयां भरोसो आवै ? वहतो पलभर मे रुक ज्यावै,
कोई कारी लाग न पावै ।।६।।
जनम्या है सो जम घर जासी, 'बुद्ध न कोई थिर रह पासी,
लागी सारा रै गळ फासी।।७।।
(लय - धरती धोरां री)

अनासक्त -81
सोवण मे जमारो बीत्या जाय, अब तो जाग रे,
भीतर लो इमरत रीत्या जाय, अब तो जाग रे,
जिवडलो घेरी मे आयो, बादळियो दुविधा रो छायो।। स्थायी।।
आख खोल कर देख बावळा, सूरज ढळतो जाय,
जो ऊगै सो आथम जासी, अखी रहण कुण पाय ।।१।।
घटती बढती छया जगत री, इक जावै इक आय,
किसै भरोसै सोय रयो तू ? सूत्या नै जम खाय ।। २।।
तन मन दोनू ही रीता है, तृष्णा रो नही अन्त,
पतझड री रुत रही सदा ही, आयो नही वसन्त ।। ३।।
मिनख हुयो तो मिनखपणै रो, समझ आज तूं मोल,
औरा नै के तोल रयो है ? पहली निज नै तोल ।।४।।
टूट्या सपना सांध रयो तू, लगा आस रा तार,
बिखर्यो जीवन जद साधैलो, 'बुद्ध' हुवैलो पार ।। ५।।
(लय -सूरज री उगाली पैली जाग)

80-अनासक्त
जीवन लाखीणो,
ई नै कोड्यां में मत खोवो, ई में बीज धरम रो बोवो,
मोह-माया की नीद न सोवो ।। स्थायी।।
मन रै मतै कदे मत चालो, ई नै सजम-मारग घालो,
गुण रो इमरत ई मे ढालो।।१।।
ई मे आवै घणा उछाळा, ई रा छिप्या रहै नहीं चाळा,
कर दे खिण मे उजळा-काळा।।२।।
जीणे री आवै जो आटी, बणज्या सोनो सारी माटी,
कटज्या दुख री ओखी घाटी।। ३।।
जीवन चचल बहतो पाणी, बाता करै घणी अणजाणी,
ई री विरला चाल पिछाणी।। ४।।
x
काया है माटी री काची, लाखा बिरिया परखी जाची,
चलगत रही न ई री साची ।। ५।।
सास रो किया भरोसो आवै? बहतो पलभर मे रुक ज्यावै,
कोई कारी लाग न पावै ।। ६।।
जनम्या है सो जम घर जासी, 'बुद्ध'न कोई थिर रह पासी,
लागी सारा रै गळ फासी।। ७॥
(लय - धरती धोरां री)

अनासक्त -81
सोवण मे जमारो बीत्या जाय, अब तो जाग रे,
भीतर लो इमरत रीत्या जाय, अब तो जाग रे,
जिवडलो घेरी मे आयो, बादळियो दुविधा रो छायो।। स्थायी।।
आख खोल कर देख बावळा, सूरज ढळतो जाय,
जो ऊगै सो आथम जासी, अखी रहण कुण पाय ।।१।।
घटती बढती छया जगत री, इक जावै इक आय,
किसै भरोसै सोय रयो तू ? सूत्या नै जम खाय ।। २।।
तन
मन दोनूं ही रीता है, तृष्णा रो नही अन्त,
पतझड री रुत रही सदा ही, आयो नही वसन्त ।। ३।।
मिनख हुयो तो मिनखपणै रो, समझ आज तू मोल,
औरा नै के तोल रयो है ? पहली निज नै तोल ।। ४।।
टूट्या सपना साध रयो तू, लगा आस रा तार,
बिखर्यो जीवन जद साधैलो, 'बुद्ध' हुवैलो पार ।। ५।
(लय -सूरज
री उगाली पैली जाग)

82-अनासक्त
-
जरा सोचले तूं मन में स्याणा,
थारै जीवन रो के आधार है ?
झोलो बहज्या कठीनै पून रो,
ई री चचलता रो के पार है।। स्थायी।।
झूठी है काया झूठी है माया, झूठो है जीवन रो खेलो,
झूठा है परिजन झूठा है सगपण, लाग्यो ज्यू दो दिन रो मेळो,
घेरो लागै जकै दिन मोत रो, सागै जावै नहीं एक तार है।।१।।
पीढ्या रा बंधाण बाधै घणा ही, खुद रो भरोसो नहीं पल रो,
चालै जकै सास री आस काची, रुकता ही भेद खुलै छळ रो,
सोचण सारू न पावै एक पल, सारी योजना बणै बेकार है।।२।।
इच्छा तो आकाश ज्यू है अनती, पण है पदार्था री सीमा,
इधन स्यू धापै नहीं आग भोळा, तो फेर पग तू धर धीमा,
रोक इच्छा रै बढतै वेग नै, इच्छा-वर्धन ही तो ससार है।। ३।।
समता स्यू रहणो समता स्यू सहणो, समता रो जीवन है साचो,
भावा मे विष सी विषमता न घोळी, मनडै नै करजे मत काचो,
'बुद्ध जीवन री बाजी जीतले, औ ही उत्तम थारा सस्कार है ।।४।।
(लय - जरा सामने तो आओ छलिये)

अनासक्त -83
झूठो जग रो नातो, तू मत हो ठडो तातो,
पलक झपकतां पलटै माया, राख मिलाया खातो।
झूठो जग रो नातो ।। स्थायी ।।
आप - आपरी ही करणी, सघळा नै पडसी भरणी,
पार होवणी है ओखी, मोह माया री वेतरणी,
सभळ-सभळ जो पग धरसी, बो जीवन सफळो करसी,
ऑख मीच कर चालणियै रै, बधसी भवरो तातो।। १।।
सास जितै ही आस अठै, बो नीठै जद ठोड कठै ?
जीतै जी रा सब साथी, मरता ही बस तार कटै,
पुण्य पाप सागै रैसी, भली बुरी क्हाणी कैसी,
सावधान होज्या अब स्यू ही, बाध आगलो भातो।। २।।
.
भौतिकता मे है खूत्यो, घर की गाडी मे जूत्यो,
अध्यातम रै लेखै तो, निपट नीद मे ही सूत्यो,
जाग वखत ओ जागण रो, आत्म लक्ष्य पर लागण रो,
काटा बोणा छोड मार्ग मे, बढ तू फूल बिछातो ।। ३ ।।
काल अनतो बीत्यो है, मन रो इमरत रीत्यो है,
हार्यो ही हार्यो है तू, जीवन रण कद जीत्यो है ?
अबकै अवसर आयो है, 'बुद्ध' सुमार्ग दिखायो है,
अप्रमत्त बण कर जीणै रो, चाली नियम निभातो।।४।।
(लय - बच्चे मन के सच्चे)

84-अनासक्त
मन को शान्त बनाए हम।
सास-सांस पर परमात्मा का, ध्यान लगाएं हम।। स्थायी।।
जीवन है सग्राम वीरता, से जीना सीखे हम ।
अमृत व विष दोनो समता, से पीना सीखे हम |
लाभ-अलाभ हर्ष-शोक मे, सम बन जाये हम।।१।।
वर्तमान मे जीने का, अभ्यास बढाते जाये।
भूतकाल के चिंतन मे हम, समय नही गवाये ।
प्रतिक्रिया के घावो से, निज को बचाये हम।। २।।
सहज भाव से हम अपना, कर्तव्य निभाते जाये।
हो विश्वास अटल पर फल की, आशा नही सताये।
आधि-व्याधि व उपाधि का सब, भार मिटाये हम ।। ३।।
बढे आत्म-विश्वास सदा, उल्लास भावना मे हो।
मिटे सभी तनाव, सजगता, सदा साधना मे हो।
दुख के क्षण को भी सुख मे, परिणत कर पाये हम।।४।।
जो भी हो कर्तव्य भार हम, उसे सहर्ष निभाए।
'मुनि राकेश' किन्तु मानस को, भारी नही बनाए ।
समता भाव बढाकर जीवन, सफल बनाएं हम।। ५।।
(लय - धर्म की लौ जगाएं हम)

अनासक्त -85
आऊखे री घडियाँ थारी घटती ही जावे हो, करले कमाई धर्म ध्यान री।
समय जो बीत जावे पाछो नही आवे हो,
ज्योति जगाले अन्तर ज्ञान री।। स्थायी।।
टूटण मे
सास रे धागा स्यू बण्यो जिन्दगी रो हार हो,
लागे नहीं देर हो।
मन मोहक तसवीर थारे तन री हो,
बणसी आखिर माटी रो ढेर हो।। १।।
आर्त रौद्र ध्यान रो मिटाले अधारो हो,
चाद उगाले समता भाव रो।
कोडा करमा रो फळ भोगणो ही पडसी हो,
करले उजालो मगल भाव रो।। २।।
एकलो ही आयो है तू एकलो ही जासी हो,
साथ न जासी एक तार हो।
मोह री मदिरा ने पी बण्यो क्यू बावळो,
पापा रो बाधे सिर क्यू भार हो।। ३।।
आतमा री चादर ने ऊजली बणाले हो,
सयम री साबुण लेकर हाथ
धूओ राग द्वेष रो उडे है च्यारु ओर हो,
रहजे सावधान दिन रात मे।।४।।
धर्म रे मार्ग मे बढतो ही रहजे हो,
मन मे
निर्मल भावना।
'मुनि राकेश' बेड्या टूट्या कर्मा री हो,
होसी सफल थारी कामना।। ५।।
मे।
तू रखजे
(लय - तेजो)

86-अनासक्त
आत्मशुद्धि रो साधन साचो धर्म कहावै रे।
भव-सागर में डूबतां नै पार लगावै रे ।। स्थायी।
सगळां नै अधिकार सरीखो साफ सुणावै रे।
जलधर ज्यूं घर खेता मे इमरत बरसावै रे।।१।।
परमात्मा री सत्ता सब में शास्तर गावै रे।
ऊंच नीच रै भेद - भाव स्यूं जी अकुलावै रे।। २।।
मिसरी स्यूं मुख मीठो होसी कोई खावै रे ।
जात-पात रो पचडो फिर क्यूं बिच मे आवै रे।।३।।
दान दक्षिणा और न टक्को पीसो चावै रे।
बिना भेद प्राणी मातर नै गलै लगावै रे।।४।।
--
-
परभव के, इ भव मे चमत्कार दिखलावै रे।
सिह हिरण नै एक घाट पर पाणी पावै रे।।५।।
शुद्ध बणै आचार हियो मंदिर बण ज्यावै रे।
तरुवर छाया ज्यूं पथिकां रो जी बहलावै रे।।६।।
सब रो आश्रय-दाता बन्धन तोड गिरावै रे।
भाईचारै रो 'तुलसी' नित पाठ पढावै रे।।७।।
(लय - लिछमी थांरा लाडला)

अनासक्त -87
डगमग डगमग डोले नाड,
सिगल देवे बारम्बार, ओ है बुढापे रो हाल,
झटपट चेत रे चेतनिया, जीवन बीत्यो जावे,
करले, करले रे धर्म, अवसर रीतो जावे।। स्थायी।।
बुढापो आया स्यू पहला, करणो है तो कर लीजै,
धरम खजानो भरणो हो तो, अवसर रहता भर लीजै,
चूक्यो मौको रहसी धोखो, आखिर मे पछतावैला,
कर्म उदय आया स्यू थारै, मन री मन रह जावैला,
आ है महापुरुषा री वाणी, चाहे राजा हो या राणी,
आगे आपरी कोडी करणी, (काम) आडी आवै।। १।।
-
बुढापो आया स्यू भाया, ओ तन परवश बण जावै,
आडा - टेडा पैर पडे है, हाथ पाव सब कम्पावै,
आंख्या रोओ दिवलो टिमटिम, बुझतो-बुझतो-बुझज्यावै,
बत्तीसी बिन पड्यो धान रो, मूंडो बेरी बण जावै,
खासी,
चालै,
नीद रात मे फोडा घालै (सारी रात नीद नही आवै),
राता लम्बी लागण लागै, माळा भूल जावै ।। २।।
खच
खच
खच
खच

88. अनासक्त
बचपन यौवन सगळा नै ही, रमतो गमतो लागै है,
बुढापो आता ही सारा नै, अण गमतो लागै है,
पुण्याई पोते हुए तो, पोता साथे चालै है,
पाप कर्म रो उदय हुए तो, पोता गोता घालै है,
जैसी करणी वैसी भरणी, अच्छी करणी पार उतरणी,
अच्छी करणी भवजल तरणी, करणी धर्म री कोडी,
निष्फल
नहीं
जावै।।३।।
आजकल री युवक धारणा, पहला मौज कर लेस्या,
धर्म-ध्यान तो बुढापो आया, पच्छै ही कर लेस्या,
समझदार तो पाणी आया, पहला पाळ बाधै है,
मूरख रा सरदार सदा ही, समय गया स्यू साधै है,
भाया बायां थे तो जागो, धर्म-ध्यान मे झटपट लागो,
इणे उणे
ताको,
जागो जल्दी जागो 'प्रसन्न' थानै जगावै।। ४।।
थे
मत
(लय - सिरियारी रो संत)

अनासक्त-89
ओ दूर के मुसाफिर, मजिल न भूल जाना रे।
मजिल न भूल जाना, जीवन सफल बनाना ।। स्थायी।।
काटो से यह भरी है, जिदगी की राह तेरी,
दिन का प्रकाश बीता, अब रात है अधेरी,
सुख खोजता यहॉ क्या, दुख से भरा जमाना रे,
मजिल न भूल जाना ||१||
आखो की सीपीयो से, मोती न गिरा प्यारे,
जग मानता है इन्हे, दो बूद आसू खारे,
मत बाट तू किसी को, यह दर्द का खजाना रे,
मजिल न भूल जाना || २||
ससार साथ देगा, तेरी हंसी खुशी मे,
होगा न सग कोई, पल भर की बेबसी मे,
रिश्ते है स्वार्थ के सब, है प्यार तो बहाना रे,
मजिल न भूल जाना ।।३।।
परमार्थ भावना को, तू 'बुद्ध' आज चुन ले,
समभाव की यह चादर, अपने ही आप बुन ले,
परदेशी पाहुने इन, सासो का क्या ठिकाना रे,
मजिल न भूल जाना ।।४।।
(लय - ओ दूर के मुसाफिर)

90-अनासक्त
तपस्या री महिमा देखो अपरंपार,
करम निरजरा साथ में हुवै, आधि-व्याधि उपचार ।
लौ लागै अध्यात्म में झट, सिद्धि हुवै साकार ।
तपस्या री महिमा. . .// स्थायी।।
बाजीगर ज्यूं मिनख नै औ, करम नचावै नाच,
एकमेक सा हो रया से, पत्थर-हीरा-काच ।
तपस्या री महिमा ||१॥
मन मुट्ठी मे जो करै, बो ही मानव मतिमान,
च्यार चाद तप स्यूं लगै, जागै अंतर भगवान ।
तपस्या री महिमा ||२||
तप रो तेजस प्रगटज्या तो, होवै काम कमाल,
श्रावक ज्यू सेवा सझे नित, देव-भूत-बेताल ।
तपस्या री महिमा .||३||
अनहद आतम बळ बढै, विपदा रो चलै न जोर,
दहन द्वारका रो रूक्यो, चाल्यो जद तक तप दोर ।
तपस्या री महिमा. . .।।४।।
तप रै सागै ध्यान जप स्यू, 'मधुकर' बढे प्रभाव,
तन्मय बण अजमाय ल्यो झट, पार उतरसी नाव।
तपस्या री महिमा.
।।५।।
.
(लय - आपणै भागां री)

अनासक्त-91
तप सुखकारी, मगलकारी,
हो तप री महिमा अति भारी, भव-भय हारी जी,
तपस्या है तरणी।। स्थायी।।
तन मन रा सब रोग मिटावै,
हो आत्मा ने ऊजळी बणावे, शिखर चढावे जी-तपस्या है तरणी।।१।।
वीर पुरुष ही तप अपणावै,
हो कष्टा स्यू नहीं घबरावै, शौर्य दिखावे जी-तपस्या है तरणी।।२।।
कायर री तो काया कपावै,
हो नाम सुण्या घबरावे, जी अकुलावे जी-तपस्या है तरणी।।३।।
भूख भुआजी जद घर आवै,
हो दिन मे ही तारा दिख जावे, चक्कर खावे जी-तपस्या है तरणी।।४।।
बाता बणाणी भाई घणी है सोरी,
हो रसना ने जीतणी है दोरी, बडी चटोरी जी-तपस्या है तरणी।।५।।
हिम्मत धारे बारे आवे शुभ घडिया,
हो छा जावे घर मे रगरळिया, बेहद खुशिया जी-तपस्या है तरणी।।६।।
देवे 'प्रमोद' थाने आज बधाई,
हो बढता ही रहिज्यो सदाई, सुखदायी जी-तपस्या है तरणी।।७।।
(लय - पीळो)

92-अनासक्त
तपस्या री महिमा भारी, तपस्या है मंगलकारी,
तपस्या जीवन रो सिणगार है।
हो भाया । तपस्या स्यू होवे नैया पार है।। स्थायी।।
तप है गगा तप है जमना, तप है तीरथ धाम जी,
तप रा जठे नगारा बाजे, सरे अचिंत्या काम जी,
आत्मिक शांति रो पथ है, शिवपुर जावण रो रथ है।
चढज्यावै बो हो जावे पार है।।१।।
तन मन रा सब रोग मिटावे, उजळे आत्मा राम जी,
तप रे मारग जो भी चाले, देव करे गुणग्राम जी,
टूटे तप स्यू अघबधन, आत्मा बण जावे कुदन।
खुल जावे शिवनगरी रा द्वार है।। २।।
उदर भरयोडो होवे जद तो, तप मे पूरो मन लागे,
के उपवास आठ के पूरो, मासखमण पचखू सागे,
पर जब आ भूख सतावे, सारो ही रोब गमावे।
छा जावे आख्यां में अधार है।।३।।
पर जो शुरवीर होवे वो, इण रे सामी मड जावे,
शुरवीर रे घर 'प्रमोद' आ, भजन मंडली गुण गावे,
हिम्मत की कीमत भारी, हिम्मत री महिमा न्यारी।
तप स्यूं चमन हुयो गुलजार है।। ४।।
(लय - खिण - खिण ए बीत्या)

अनासक्त -93
तप स्यू आतमा मे भारी बळ आवै,
कचरो करमा रो पल मे जळ ज्यावै,
कचन वरणी होवै काया,
रोग-दोख खनै आतां ही घबरावै।। स्थायी।।
कोरी बाता
करणी सोरी,
मन री तिषणा तजणी दोरी,
उर मे ऊदरा कूदै जद धीरज ढह ज्यावै-तप स्यू ।।१।।
इन्द्रया चचळ नाच नचावै,
बडा बडा रो रोब गमावै,
बिरला हिम्मती मिनख ही सभळ पावै-तप स्यू ।।२।।
-
मुश्किल है वश करणो मन नै,
चाहीजै दिन भर ई तन नै,
भाणो देखता ही लार टपक ज्यावै-तप स्यू ।।३।।
प्रगट हुवै केई लब्ध्यां मोटी,
पिण पैली हुवै कडी कसौटी,
खरो उतरै वो सोनो कहलावै-तप स्यू ।।४।।
मोक्ष महल रो चोथो पथ है,
भव-वन पार उतारण रथ है,
'मधुकर' तप रा आगम भी गुण गावै-तप स्यू ।।५।।
(लय - स्वामी भीखण जी रो नाम)

94-अनासक्त
मनावा . हिलमिल सारा आज म्हे तो, तपस्या रो त्यौहार
तपस्या रो त्यौहार, तप है जीवन रो आधार|| स्थायी।।
तप रै मार्ग ऊपर चलणो, बहुत बडो है भारी,
इण पर चलणे स्यूं आवेला, थारै जीवन मे निखार।
जीवन मे निखार, तप है जीवन रो आधार ।।१।।
कांटा सो ओ जीवन थांरो, फूलां सो बण ज्यासी,
यदि करस्यो तपस्या स्यूं थे, थोडो सो भी प्यार।
थोडो सो भी प्यार, तप है जीवन रो आधार ।।२।।
बडा-बडा रोगां री दवाई, तपस्या घणी सान्तरी,
डूबी नावडली भी हो जावेला, तपस्या स्यू पार।
तपस्या स्यूं पार, तप है जीवन रो आधार || ३||
आत्मबल रो तप रै खातिर, दियो जगाणो पडसी,
केवै तेयुप सुणल्यो तप ही है, जीवन रो श्रृगार ।
जीवन रो श्रृंगार, तप है जीवन रो आधार ।। ४।।
(लय - गावां हिलमिल सारा)

अनासक्त-95
एक बार आओ तप रा गीत आपा गावा।
कर्मा रो मैल सारो धो पावा, तप रा गीत..।।
तप री नौका स्यू भव जल तर ज्यावा ।। स्थायी ।।
जनम-जनम रा कष्ट काटै, तप सयम री साधना,
काया कचन-सी हो ज्यावै, मिटज्या मन री वासना ।
आओ तप की गगा मे हो
न्हाकर सुख पावा।। १।।
खाणे मे विवेक राख्या, रोग सारा मिट ज्यावै,
जीभडी रो स्वाद छोड्या, शेष सयम सध पावै ।
तपसी सन्ता रा आपा हो
गुण गावा।।२।।
भेक्षव-गण मे हुया तपस्वी, एक-एक स्यू जबरा हो,
हो ज्यावो तैयार सारा, कसकर काठी कमरा हो।
बरसै है रिमझिम सावण हो आपा हरसावा।।३।।
एक वास करणे वाळो भी, कर्म खपावै है भारी,
मास खमण कर कर लाखा ही, अपणी आत्मा नै तारी।
तुलसी रै शासण मे हो सब मौज मनावा।।४।।
(लय - अपने पिया की)

-
96- अनासक्त
।
.
.
तपस्या निराली रे देखो चमके है तपसी रो दीदार,
सयम री शक्ति, तपस्या-निराली रे।
खुल ज्यावै सुरगा रा भी द्वार, संयम री शक्ति ।।
मिट ज्यावै जनमा रा विकार, सयम री शक्ति।। स्थायी।।
करडो काम तपस्या रो, विरला ही कोई कर पावै।
नाम सुण्या ही जीवडो कापे, धडकन भी तो बढ ज्यावै।
दीखे है दिन मे तारा, आख्या मे अधियार, सयम री शक्ति ||१||
काया री नगरी मे थे तो, तप रो शख बजायो है।
पखवाडै री तपस्या करके, भारी लाभ कमायो है।
झिरमिर-झिरमिर बरसावै,सावणियो जलधार,सयमरीशक्ति ।।२।।
धीरे धीरे चालै तपसी, धीरे धीरे बोलै है।
अपनी धुन में बैठ्यो – बैठ्यो, भीतर गाठा खोले है।
समता रा दीप जलावै, समता ही सुखकार, सयम री शक्ति ।।३।।
धर्म ध्यान रो मेळो लाग्यो, होडाहोड लगाई है।
गळी गळी मे तप री चर्चा, शासन माता आई है।
भिक्षु रो शासण प्यारो, तुलसी रो आधार, सयम री शक्ति ।।४।।
(लय - सावण आयो रे)

अनासक्त-97
महावीर रै शासण री महिमा महकावा,
स्वामी भीखणजी रै सघ रा गुण गावा,
आओ तपस्या री गंगा मे,
सयम साबुन स्यूं आ आतमा री चादर धोवा ।। स्थायी।।
तप की गरमी तेज बढावै,
तन मन का सब रोग मिटावै,
शासन माता रा सब आओ मिलजुल, गीत गावा ।। १।।
बिना तपस्या त्याग अधूरो,
तप स्यू टळज्या सकट दूरो,
देव दानव राक्षस तप स्यू सारा, साध पावा ।। २।।
मत्र सिद्धि मे तपस्या जरुरी,
तन्त्र साधना हो ज्यावै पूरी,
तप है साचो मगल आवो मगल, बण ज्यावा ।। ३।।
तप है अमृत रस रो प्यालो,
शिवनगरी रो खोलै तालो,
फलज्या आशा बाछा मन री सारी, कामनावा।।४।।
मन नै वश मे करणो तपस्या,
नमणो खमणो दमणो तपस्या,
जीणो अल्पाहारी जीवन आपां, सीख जावा ।। ५।।
(लय - स्वामी भीखण जी रो नाम)

98-अनासक्त
करल्यो-करल्यो अठायां अब मास खमण थे करल्यो हो।
तप ही जीवन रो साचो सार हो।। स्थायी।।
मन रो मैल उतर तन हो ज्या, सागीडो नीरोग हो।
साचो गंगाजल तप है आपणै।। १।।
हाड मास मिट्टी री काया, चमक देख क्यू चकरावै।
कांई भरोसो बोलो सास रो।।२।।
बडी तपस्या कम खाणो गम खाणो, ओ नमज्याणो हो।
मन रे घोडै ने सीखो मोडनो।। ३।।
.
जागो-जागो नीद उडावो, शासन मां बतलावै है।
अवसर रा बाया मोती नीपजै ।। ४।।
जैन सघ मे हुआ तपस्वी, एक-एक स्यू मोटा हो।
धनजी खदक ले करल्यो याद थे।। ५।।
(लय - सेवा)

अनासक्त -99
गुण घुघरू छम छमा छम छण ण ण ण ण ण ण बाजै रे बाजै रे।
तपस्या अनुपम महिमा जन जन मे राजै रे।। स्थायी।।
री
निज रै तन स्यू जग जबर ओ, जीतै कोइक शूर ।
तप तलवार बजै हाडा पर, कायर भाजै दूर ।।१।।
तपसी रे तो खेल तपस्या, तन रो निकळ तेल।
वज जिसो मजबूत बण्या ही, कटै कर्म री बेल ।।२।।
अमी, भीम, राम, शिव, कोदर, बडा तपस्वी नाम ।
अन्तर भावा स्यू जो समरै, सरै अचित्या काम।।३।।
घोर तपस्वी सुख सुखदाता, वृद्धि-सिद्धि दातार ।
अगम साहसी उगम जगावै, सब रा शुभ सस्कार ।।४।।
रभा, जेतां, झूमा, मुक्खा, छोगा, वदना मात।
चादा, प्यारा, भूरा, अणचा, पन्ना तपसण ख्यात।।५।।
तुलसी चरण शरण मे तीखो, तरुण तपस्वी सत।
पारस नै पारस बणनो है, समतामय गुणवत।।६।।
योगक्षेम बरस मे मिलगी, आ सता री ओळ ।
'बुद्ध' भरी है मासखमण पर, पारस । थारी खोळ ।।७।।
(लय - घुघरू छम छमा छम)

100- अनासक्त
करो तपस्या, करो तपस्या, जग जाये जीवन ज्योति,
तन सुध करती मन सुध करती, फिर अन्तर आत्मा को धोती। स्थायी।।
पखी पांख-झाडता जैसे, कर्म तपस्या से झडते,
भव-भव के पातक झडते ज्यो, पतझड मे पत्ते पडते,
कर्ज चूकता, हल्का होता, आत्मा जिस बोझे को ढोती।।१।।
आगम, वेद, कुरान, पुराणो, मे तप महिमा गाई है,
सभी लब्धियां, सभी सिद्धिया, तप से ही बतलाई है,
सोई हुई अनन्त शक्तिया, तपस्या से ही जागृत होती ।।२।।
जब तक आयबिल-तप चलता, रहा द्वारिका नहीं जली,
दिया शराप दिपायन ऋषि ने, किन्तु एक भी नहीं चली,
अटल प्रभाव तपस्या का यह, कहे फिरोती भले मनोती।।३।।
तप से अर्जुन माली जैसे, पापी का उद्धार हुआ,
दृढ प्रहरी जैसे हत्यारे, का बेडा
बंधे हुऐ चिकने कर्मो की, करे कटोती कहे भगोती।। ४।।
पार हुआ,
तन से नही तपस्या मन की, मजबूती से होती है,
कायरता से नही विजय तो, रजपूती से होती है,
तू सौदागर मन है 'सागर', तन है सीप तपस्या मोती।।५।।
(लय - प्रभो तुम्हारे पावन पथ पर)

अनासक्त -101
करो तपस्या, मिटे समस्या, सुनलो रे,
भवजल तरणी, निर्मल करणी, करलो रे,
ऐसा अवसर, मिले न फिर फिर, सभलो रे ।। स्थायी।।
तन धन यौवन चचल माया, ज्यो बादल की छाया,
दुनियादारी झूठी यारी, क्यो मन को भरमाया ।
मन समझाना, धर्म खजाना, भर लो रे।। १।।
तप जप करते यौवन बीते, तो हम धन्य बनेगे,
तन की मन की ममता छूटे, आवागमन मिटेगे।
ज्ञान ध्यान कर, ये भव सागर, तरलो रे ।। २।।
सुख दुख अपना अपना ही है, मूल बात को समझो,
और सभी जो निमित्त मात्र है, भ्रान्ति मे ना उलझो।
'सजय' ज्योति, सदगुण मोती, चुनलो रे ।।३।।
(लय - दिल दीवाना)

102 - अनासक्त
महा कठिन है काम तपस्या, करता कोई बलवान रे।
बाते करना बहुत सरल है, मुश्किल है बलिदान रे।। स्थायी।।
तप की महिमा मुक्त कठ से, गाते शास्त्र मनस्वी,
नहीं भटकता गहन तिमिर मे, विजयी दिव्य तपस्वी,
मिल जाता, लक्ष्य स्वय उसको जो, करता अनुसधान रे ।।१।।
तपे तपस्वी देखो कितने, एक
एक से भारी,
धनजी, शालिभद्र, काकंदी, धन्ना की बलिहारी,
हम ध्याये, अभी रा शि को पीत्थल, गुलजारी गुणवान रे ।।२।।
काया कल्प सहज जीवन का, शोधन तप के द्वारा,
आधि - व्याधि को दूर भगाता, शुद्ध रसायन पारा,
भव सागर, पार पहुचने को है, तप अनुपम जलयान रे .
रे .||३||
नमन उसी आत्मा को जो तप, सयम मे रत रहता,
भूख तृषा के भीष्म परीषह, समता से जो सहता,
हम पाये, 'मुनि मणि' तपज्योति से, आत्म सिद्धि सोपान रे ।।४।।
(लय -बड़े प्यार से मिलजुल सीखें)

अनासक्त 103 घोर तपसी हो मुनि | घोर तपसी, थारो नाम उठ-उठ जन भोर जपसी, हो मुनि । घोर तपसी हो सुख घोर तपसी, थारो जाप जप्या करमा री कोड खपसी हो मुनि।। स्थायी।। । दो सौ बरसा री भारी ख्यात है बणी, थारो नाम मोटा तपस्या रै साथ फबसी हो मुनि । ओ अनशन आ सहज समता. लाखा लोगा रै दिला मे थारी छाप छपसी हो मुनि।। १।। काया पर कुल्हाडी व्हाणी काम करडो, सोरी पाटा ऊपर बैठ करणी गपशप सी हो मुनि तपस्या आतापना स्वाध्याय करणी, थारी सेवा-भावना रै लारै सारा दबसी हो मुनि।। २।। स्वामीजी रो शासन तप सजम री सुरसरी, इण मे न्हावसी जका रो सारो, पाप धुपसी हो मुनि । आपणै शासण री सता चढती कला, इण मे घणा ही तप्या है और घणा तपसी हो मुनि।। ३ ।। शिखर चढ्या ही रहसी, गण रो शीष आभै पैर जा पाताल रुपसी हो मुनि । इण स्यू विमुख अवनीत जो बां रै भाग रो भानूडो जा छिती मे छुपसी हो मुनि।। ४।। सजम जीवन जीवो पंडित मरण मरो, थारै दोन्यूं हाथा लाडू खावो खुशी रे खुशी हो मुनि । लघी लम्बी यात्रा मगल फागण 'सुख' साधना सुखदाई गाई गणी 'तुलसी' हो मुनि ।। ५ ।। (लय - और रंग दे रे वाल्या और रंग दे) है चढता होसी, बदी.

104-अनासक्त
ओ तपस्या रो रंग
तप रो त्योहार मनावोजी,
नस-नस मे जोश जगावोजी ।। स्थायी।।
जो तपरी ज्योत जलावै, वो अजर अमर बण ज्यावै।
थे समता श्रोत बहावो जी, ओ तपस्या रो रग .|| १||
जो लेवै तप रो शरणो, बहज्यावै अमृत झरणो।
निज घर में मौज उडावो जी, ओ तपस्या रो रग 11२||
सुरपति आ शीष झुकावै. नरपति निज भाग सरावै।
माटी रो मोल चुकावो जी, ओ तपस्या रो रग ।। ३।।
तपसी लोगा री आ जोडी, करमा री कारा तोडी।
गण गौरव खूब बढावो जी, ओ तपस्या रो रग ।।४।।
तप आत्म शान्ति रो पथ है, शिवपुर जावण रो रथ है।
तपसी बण नाम कमावो जी, ओ तपस्या रो रंग ||५||
(लय - ओ म्हारा गुरुदेव)

अनासक्त-105
तपस्या मे सेठा रहिज्यो
जबरो होसी लाड कोड थारो भाया (बाया) सुणज्यो ।। स्थायी।।
मणाबध घी
दूध मिठाया
स्यू
भी जीव न धाप्यो।
जनम जनम री भूख मिटेला जो तप मेवो खास्यो।। १।।
तप मे दूख होवै तो समझो, कटे कर्म मल निकले।
काई खाता पीता दुख नही होवे दिल मचले।।२।।
नरक निगोद अनत सह्यो दुख तपस्या मे मत भूलो।
ओ दुख शिव सुख देसी समता झूले मे झूलो।। ३।।
मगलकारी वीर प्रभु ने, याद करो भाया (बाया)।
घोर तपस्या समताधारी प्रभु शिव पद पाया ।। ४।।
तपसी बाली शक्तिशाली, रावण नृप ने दबायो।
को विशल्या तप पूर्व भव, लछमन ने जीवायो।। ५।।
तप प्रभवै काई न बिगड्यो, सुर स्यू पुरी द्वारिका रो
पापी दृढ प्रहारी अर्जुन माली कियो उद्धारे ।। ६।।
कर्म काटण ने तप है करवत, अग्नि खड्ग समान ।
मुक्ति नगर पहुचावण अनुपम है जहाज महान् ।। ७ ।।
बाहुबलि जी तप स्यू पाया, निर्मल केवल ज्ञान ।
धन्ना, शाली, गौतम प्रभु सतिया रा सुणो व्याख्यान ।। ८ ।।
रोग शोक दुख जनम मरण री तप है बड़ी दवाई ।
मिटे उपद्रव सिह सर्प, तप करो विवेक जगाई।।६।।
'मुनि सजय' सौभाग्य मिल्यो आत्मा री करो सफाई।
शूरा वीरा रो मारग तप राखीज्यो सेठाई।। १०।।
(लय - तावडा धीमों तो)

106-अनासक्त
धन्य गजसुकुमाल मुनि ध्यान धरै,
ऊभा अटल श्मशान गुण-ज्ञान भरै,
ज्ञान भरै अघ शान हरै।। स्थायी।।
-
।
-
--
-
जिण ही दिन दीक्षा लीन्ही जिनवर नेमी पास,
उण ही दिन कीन्हो दारुण साधना-अभ्यास।
पडिमा बारवी भिक्षू की अगीकार करै।। १।।
जीवित ही कीन्हो अपणे अंग को उत्सर्ग,
खड्यो एक ठोर ठा कठोर कायोत्सर्ग।
आयो सुसरो सोमिल विप्र पूरव वैर सुमरै।। २।।
वर्ण
ज्येष्ठ बाज की है दुष्टता कमाल,
सन्त शीष खीरा धर्या बाध माटी-पाल ।
चटकै करतो यूं चंडाल या कसाई भी डरै ।। ३।।
हा । हारे पापी । कर्यो पाप कित्तो घोर ?
सीग ~ पूछ स्थान दाढी
मूंछ वालो ढोर,
पायी आ ही है अधिकाई नहि घास चरै।। ४।।
रोम रोम दाह लागी सन्त के शरीर,
तो भी 'आह-ओह' शब्द कियो ना सधीर ।
जूझै जोधा ज्यू अडोल वीर - वृति बावरे ।।५।।
खधबध-खधबध कर शिर सीझै जाणै खीचडो,
तो भी अग अविचल है मुकावलो कडो।
अन्तर-भाव की दृढताई कविजन कल्पना परै ।।६।।

अनासक्त -107
रे रे चेतनिया | तनिया | मत ना हो अधीर,
तू ही कब ही किण ही रे करी हूसी पीर ?
आ है सोलह आना साच जो ही करै सो भरै।।७।।
ज्यादा ज्यादा वेदना तो नरका मे सही,
एक ना
ना अनेक ना अनन्त बार ही।
त्राही-त्राही की पुकार जियडा। मत ना बिसरै ।। ८ ।।
तू है ज्ञानवान ज्ञानशून्य थारो गात,
गात रै सम्बन्ध स्यू ही हुवै थारी घात ।
अब तू बिलकुल रै चुपचाप देही जरै तो तरै ।। ६ ।।
अपणी अत्ता कत्ता है विकता है विचार,
शत्रु बा ही मित्र बा ही सुख-दुख री दातार ।
अपणी आत्मा सुधरै तो सारा काज सुधरै ।। १० ।।
ओ तो उपकारी माथै बाध माटी पाल,
कर्म माल पार करण बण्यो है दलाल ।
मत द्वेष
भाव ल्याई उपकारी उपरै ।। ११।।
किचित भी कप न तन मे होणो चाहीजै,
आगी का जीव कोई क्यू पीडाईजै ?
देखै पीर जो पराई बो शिव-वास वरै ।। १२।।
चीटी को चुटको भी न सान्त सह्यो जाय,
इस्यै उपसर्ग मे तो
जुदा
जीव काय।
तब ही 'तुलसी' बिना नाव भव – उदधि तरै ।। १३ ।।
(लय - सरवर पाणी. मैं जाऊं)

108-अनासक्त
धन्य जीवन, धन्य अनशन, धन्य भाव है,
इस विनश्वर देह का छूटा लगाव है।। स्थायी ।।
चिमटते जिस देह से, अनुरागमय प्राणी,
भूषणो से है सझाते, बने अभिमानी,
आज खुद ही कर लिया, उससे दुराव है।। १।।
चेतना मे लीन हो, आनंद जो पाया,
गुड बना गूगे का वह, जाता न बतलाया,
अग्नि ज्यों निघूम चमका, निज स्वभाव है।।२।।
-
-
दृष्टि बदली तो स्वयं ही, सृष्टि भी बदली,
मलिन सी चादर धुली तो, हो गई उजली,
भर गये रिसते हुए, अन्दर के घाव है।। ३।।
.
देख ली गहराइयां, ऊचाइयां अपनी,
ढह गई घिरती हुई, परछाइयां अपनी,
आ गया मजिल का अब, अतिम पडाव है।।४।।
'बुद्ध' अपने मे निहारा, रूप जब अपना,
बन गया संसार सारा, तुच्छ सा सपना,
तीर पर आकर लगी यह, आज नाव है|| ५||
(लय - मेरा जीवन कोरा कागज)

अनासक्त-109
श्रावकजी । थारै सथारै रो भारी रंग छायो,
भारी रग छायो, थे जीवन सफल बणायो हो।। स्थायी।।
परिणामा री चढती श्रेणी, थे हरदम राखीज्यो,
काया रो तज ध्यान, आतमा मे गहरो झाकीज्यो,
भावा रो समझ्या मोल जी, लीज्यो निज बळ नै तोल जी,
धोरी बणकर पार करो, जो खधा भार उठायो हो।। १।।
शूर चढै रणखेता मे जद, साहमी छाती भिडज्या,
पुठ दिखा कर भाजै अरि-गण, पल मे पैर उखडज्या,
करमा स्यू है सग्राम जी, थे जीतो बण निष्काम जी,
अतिम बाजी है जीवन री, आछो अवसर आयो हो।। २।।
जीणे रो अनुराग नहीं, मरणै रो भय मत राख्या,
मिटा विषमता भावा री, समता रो अमृत चाख्या,
निश्चित है अब निस्तार जी, होवै लो खेवो पार जी,
भव-सागर रो अपर किनारो, निजरा बीच समायो हो।।३।।
राग द्वेष दो कर्म
बीज है, आ रो खोज गमाया,
वीतरागता की दिशि मे थे, आगै कदम बढाया,
काढ्या देही रो सार जी, खोल्या मुगती रो द्वार जी,
सथारै पर आज 'बुद्ध मुनि', ओ उपदेश सुणायो हो।। ४।।
(लय - मारुजी थारै देश मे)

110-अनासक्त
राखज्यो शासण रो विश्वास, राखज्यो शासण रो विश्वास।
शासण रो विश्वास राखज्यो, जब लग घट मे श्वास।
जिण घट मे शंका-काखा, नहि समकित करै निवास। स्थायी।।
अत्राणा रो त्राण है शासण, अप्राणा रो प्राण है शासण,
सयम जीवन शान है शासण,
मिट्टी, पाणी, हवा ज्यूं निर्मल, है शासण आकाश ।।१।।
-
अशरण-शरण,असहाय--सहायक,निर्धन-धन,जीवन-अधिनायक,
उपमा अनुपमेय रे लायक,
अतुलनीय नै तोलण रो मै. क्यू कर करू प्रयास ।।२।।
--
नुई - पुराणी रै झगडे मे, परिचय पक्षपात रगडै मे.
मति फस जाज्यो थे फगडै मे,
बगत बीत ज्यासी रहज्यासी, जुग जुग तक इतिहास ।। ३।।
MAR
1
उडती सुण हताश मत होइज्यो, निन्दा सुण उदास मत होइज्यो.
छापा पढ निराश मत होइज्यो,
जो करसी सो भरसी थे मत, करज्यो निज-गुण हास।। ४।।
प्राण चढाज्यो भैक्षव-गण मे, दृढ श्रद्धा तुलसी चरणन में,
विजय वरीज्यो समरागण मे,
'चम्पक' गड्या रहीज्यो गण मे, दिन-दिन चढतोल्लास ।।५।।
(लय - जगाया तुमको कितनी बार)

अनासक्त -111
आपा गण रा गौरव गावा, गणवेदी पर प्राण चढावां,
दिवला श्रद्धा रा उजळावा, च्यारू कूटा पसर्यो च्यानणो,
मोती निपजावा रे।। स्थायी।।
देख्यो सपनो सिह रो दीपा, सदा शेर ज्यू गूज्या,
थारी सत्य क्रान्ति रे आगे, खड्या विरोधी धूज्या,
झुकग्या सहज्या ही चरणा मे, बदल्यो जहर सुधा झरणा मे,
मन रो कलुष मिटावा रे, मोती निपजावा रे ।। १।।
त्याग तपस्या रे पाणी स्यू, गण री नीवा सीची,
अनुशासन री मर्यादा री, लोह लकीरा खीची,
तोडी जो आ लक्ष्मण रेखा, वानै जड स्यू मिटता देख्या,
के के नाम गिणावा रे, मोती निपजावा रे ||२||
अहकार ममकार विसर्जन, तेरापथ रा पाया,
पद लोलुपता शिष्य प्रथा रा, झझट सकल मिटाया,
चाहे पढ्या लिख्या कम ज्यादा, सब स्यू उपर है मर्यादा,
साक्षी है घटनावा रे, मोती निपजावा रे ।। ३।।
एक एक स्यू बढकर गण मे, हुआ तपस्वी सत,
आकर्षण रो केन्द्र बण्यो, तेजस्वी तेरापथ,
तुलसी युग री महिमा न्यारी, खिलगी गण वन री फुलवारी,
सतयुग सी रचनावा रे, मोती निपजावा रे।। ४।।
(लय - आभो घर र र घररावै)

110-अनासक्त
राखज्यो शासण रो विश्वास, राखज्यो शासण रो विश्वास।
शासण रो विश्वास राखज्यो, जब लग घट मे श्वास।
जिण घट मे शका-काखा, नहि समकित करै निवास ।। स्थायी।।
अत्राणा रो त्राण है शासण, अप्राणा रो प्राण है शासण,
सयम जीवन शान है शासण,
मिट्टी, पाणी, हवा ज्यू निर्मल, है शासण आकाश ||१||
अशरण-शरण,असहाय-सहायक,निर्धन-धन,जीवन-अधिनायक,
उपमा अनुपमेय रे लायक,
अतुलनीय नै तोलण रो मै, क्यूं कर करू प्रयास।।२।।
नुई - पुराणी रै झगडे मे, परिचय पक्षपात रगडै मे,
मति फस जाज्यो थे फगडै मे,
बगत बीत ज्यासी रहज्यासी, जुग जुग तक इतिहास ।। ३।।
उडती सुण हताश मत होइज्यो, निन्दा सुण उदास मत होइयो,
छापा पढ निराश मत होइज्यो,
जो करसी सो भरसी थे मत, करज्यो निज-गुण हास ।।४।।
प्राण चढाज्यो भैक्षव-गण मे, दृढ श्रद्धा तुलसी चरणन मे,
विजय वरीज्यो समरागण मे,
'चम्पक' गड्या रहीज्यो गण मे, दिन-दिन चढतोल्लास।। ५।।
(लय - जगाया तुमको कितनी बार)

अनासक्त -111
आपा गण रा गौरव गावा, गणवेदी पर प्राण चढावा,
दिवला श्रद्धा रा उजळावा, च्यारू कूटा पसर्यो च्यानणो,
मोती निपजावा रे।। स्थायी।।
देख्यो सपनो सिह रो दीपा, सदा शेर ज्यू गूज्या,
थारी सत्य क्रान्ति रे आगे, खड्या विरोधी धूज्या,
झुकग्या सहज्या ही चरणा मे, बदल्यो जहर सुधा झरणा मे,
मन रो कलुष मिटावा रे, मोती निपजावा रे।। १।।
त्याग तपस्या रे पाणी स्यू, गण री नीवा सीची,
अनुशासन री मर्यादा री, लोह लकीरा खीची,
तोडी जो आ लक्ष्मण रेखा, वानै जड स्यू मिटता देख्या,
के के नाम गिणावा रे, मोती निपजावा रे ।। २।।
अहकार
ममकार विसर्जन, तेरापथ रा पाया,
पद लोलुपता शिष्य प्रथा रा, झझट सकल मिटाया,
चाहे पढ्या लिख्या कम ज्यादा, सब स्यू उपर है मर्यादा,
साक्षी है घटनावा रे, मोती निपजावा रे ।। ३।।
एक एक स्यू बढकर गण मे, हुआ तपस्वी सत,
आकर्षण रो केन्द्र बण्यो, तेजस्वी तेरापथ,
तुलसी युग री महिमा न्यारी, खिलगी गण वन री फुलवारी,
सतयुग सी रचनावा रे, मोती निपजावा रे।। ४।।
(लय - आभो घर र र घररावै)

112-अनासक्त
प्रभो ! यह तेरापंथ महान
मिला, मिलेगा जिससे सबको आध्यात्मिक अवदान ।
प्रभो । यह तेरापंथ महान।। स्थायी।।
आर्हत-वाड्मय का उद्गाता, जीवन-दर्शन का व्याख्याता,
मानव सस्कृति का निर्माता,
जिसके कण-कण मे मुखरित है, शाश्वत का सगान ।।१।।
अभिनव धर्म-नीति निर्णायक, सबल सगठन-सूत्र विधायक,
श्रम सेवा समता सगायक,
जिसने जग मे सदा बढाया, मानवता का मान ।।२।।
अनुशासन का उदाहरण है, द्रुतगति से बढ़ रहा चरण है,
असहायों का सहज शरण है,
युग आस्था का सरल सस्करण, प्रगति-शिखर सोपान ।।३।।
.
बलिदानो की अमर कहानी, पौरुष की जीवत निशानी,
सघर्षो मे हार न मानी,
आर्य भिक्षु का त्याग तपोमय, 'तुलसी' अनुसधान ।। ४।।
(लय - जगाया तुमको कितनी बार)

अनासक्त-113
ओ शासण है जयवन्तो इण री प्रबल पुन्याई है।
शासण री नीवा भिक्षु गहरी लगाई है।। स्थायी।।
एक एक स्यू बढकर गण मे, हुया जबर गण नाथ जी,
शासण री है बागडोर, गुरुवर तुलसी रे हाथ जी।
ई शासण री महिमा, च्यारा कानी छाई है।।१।।
नन्दन वन की उपमा स्यू, उपमित है भिक्षु शासन जी,
ज्योतिपुज तुलसी दीपै, भिक्षु रै नवमै आसन जी।
घूम घूम जग मे अणुव्रत री, ज्योति जगाई है।। २।।
एक गुरु री आज्ञा ऊपर, संघ सकल कुर्बान है,
मर्यादा अनुशासन स्यू ही, जीवन रो निर्माण है।
मर्यादित जीवन स्यू ही निज, आत्मा भलाई है।। ३ ।।
गण आपा रो आपा गण रा, गण ही सब रो त्राण है,
खेरखवा बण करा समर्पण, सघ आपणो प्राण है।
'सुव्रत' ई शासण री गरिमा, सदा सुहाई है।। ४ ।।
(लय - बाबासा री लाडली)

114-अनासक्त म्है तो शासन सेवा करस्या, म्है तो शासन नै ही भरस्या, म्है तो आणा सिर पर धरस्या, गण में कुर्बानी रो काम पडै जद जोश जागै। म्हानै तुलसी रो दरबार प्यारो प्यारो लागे ।। स्थायी ।। शासन ही है वीणा और शासन ही झकार है, शासन है सगला री शोभा शासन रो आधार है, शासन रो औ बडलो देखो कितनो छायादार है, शासन रो अनुशासन प्राण मर्यादा श्रृंगार है, म्है बलिदान स्वय रो देस्या, जिम्मेवारी काधा लेस्या, म्है गणपति रा होकर रहस्या 1॥ १॥ गण मे पटवो जी सी श्रद्धा राख्यां ई गण मे सम्मान हुवै, गोठीजी री ज्ञान धारणा पर सबनै अभिमान हुवै, शासन री ई बलिवेदी पर वफादार कुर्बान हुवै, खून स्यू सीच्योडा बीज, निश्चित ही फलवान हुवै, म्है तो नव इतिहास बणास्या, साचौ अब विश्वास जमास्या ॥ २॥ गण मे

अनासक्त-115
महावीर री धरती ऊपर कुछ करके दिखलाणो है,
सुप्त चेतना जाग उठै ज्यू ऐसो शख बजाणो है,
नयो मोरचो बणा कार्यकर्ता मे जोश जगाणो है,
सो बरसा री नीव लगावण सगठन बणाणो है,
वीरभूमिरोमानबढास्या,घर-घर मेअणुव्रत पहूचास्या,
नैतिकता रा दीप जलास्या गण मे . ।। ३।।
-
साचो श्रावक सदा आत्मा रो ही राखै ध्यान है,
आचारजा री दृष्टि नै जो समझै जीवन प्राण है,
व्यवहारा मे नैतिकता और दिल मे दया महान है,
दास हुवै साधु सतिया रा विनयवान गुणवान है,
म्है तो अन्तर ज्ञान जगास्या, म्है तो प्रेक्षाध्यान लगास्या,
म्है तो गण री शान बढास्या
।। ४||
-
गण मे
(लय - गंगाजी रो पाणी खारो खारो लागे)

116- अनासक्त
शासन कल्पतरु, उतर्यो मोहरां रो चरु,
राखो राखो रखवाळी।
बाबै भिक्खू रो उपकार, माना जीवन भर आभार,
ज्यारी सावरी सूरत, तेरापंथ रो आधार || स्थायी।।
अलबेलो शासण आपा रो, सारां रै मनभावणो,
मनहारो प्राणां स्यूं प्यारो, लागै घणो सुहावणो ।
इण री ऊजली आमा स्यूं लेवां, जीवन उजार ।।१।।
मात-पिता-सो आसरो, ओ नन्दनवन-सो वास है,
आश्वासन है दूबलां रो, सबलां रो विश्वास है।
अनुपम शीतघर-सो है बण्यो, सब ऋतुवां मे सुखकार ।।२।।
गण आपा रो आपां गण रा, ओ आछो अनुबन्ध है,
धागै मे पिरोई माळा, सारीसो सम्बन्ध है।
युवकां बालका भाया बायां में, जाग औ संस्कार ।।३।।
एक है आचार एक, आचारज री आण है,
एक ही विचार एक, कायदो रु काण है।
अपणे एकता ही एकता रो, सारो कारोबार ।।४।।
काण लोप करै, शान अपणी सावली,
साध और श्रावकां में, बात करे बावली।
उणनै 'रीडी- वाळा सेठिया' रो, जाब जोरदार ।। ५
संघ री शालीनता मे, लीनता है राखणी,
बारीकी स्यू झांक आख, पूरी - पूरी राखणी।
महता बाववाळा 'ऊमजी' रो, आंकल्यो आचार।।६।।
आण

अनासक्त-117
आसथा पर आच, श्रद्धाशील किया आण दै,
ऐर - गैर बात ऊपर, ध्यान किया जाण दै।
इण मे ‘पटुवाजी' रो पोज आवै, सामनै साकार || ७ ||
'आचलियै' री आसथा रु, ‘पन्नै री मरदानगी,
'गोठीजी' रो ज्ञान भवरो', वीरता री बानगी।
'हनुमन्त' री इकतारी, 'दफ्तरी-सो' धार फार || ८ ||
भगती 'दूगड दूलजी' री, 'बादरियै' री बादरी,
'विरधोजी जीरावळा' री, बहस बडी पाधरी।
'चन्दूबाई' री चतुराई आवै, याद बारम्बार ।। ६ ।।
आपणो है काम एक, केन्द्र ने आराधणो,
एक तान एक ध्यान, राधा
वेध साधणो।
शेष सारी बाता गौण, चाहे लाख हो हजार ।। १० ।।
उतरती आलोचना सुणवान, बहरा कान हो,
उतरती-पडती करवा नै, बन्द ही जबान हो।
आपा खैरखवा रेवा, आलू पहर खबरदार ।। ११।।
अपछदा अवनीत श्रावक, श्राविका या साध हो,
'जयजिनेन्द्र' दूर स्यूं आ, आपणी मरयाद हो।
तोड देणी है तुरत जिल्ला, बन्दी री कतार ।। १२ ।।
आ है 'कामधेनु' गाय, देख्या लागै सोहणी,
ओ है रत्ना रो भण्डार, बणणो रखिया रोहणी।
ओ है आम्र-कुज 'तुलसी' छाया, शीतल सुप्यार ।
ओ है द्राक्षा-कुज 'तुलसी' छाया, शीतल सुप्यार ।। १३ । ।
(लय - भळकै भानुडै सो भाल)

118-अनासक्त
जय-जय धर्म-सघ अविचल हो।
संघ-संघपति प्रेम अटल हो।। स्थायी।।
हम सबका सौभाग्य खिला है, प्रभु यह तेरापथ मिला है।
एक सुगुरु के अनुशासन मे, एकाचार-विचार विमल हो।।१।।
दृढतर सुन्दर सघ- सगठन, क्षीर - नीर सा यह एकीपन ।
है अक्षुण्ण संघ-मर्यादा, विनय और वात्सल्य अचल हो।।२।।
सघ
-
सम्पदा बढती जाए, प्रगति शिखर पर चढती जाए।
भैक्षव शासन नदन वन की, सौरभ से सुरभित भूतल हो।। ३।।
'तुलसी' जय हो सदा विजय हो, संघ-चतुष्टय बल अक्षय हो ।
श्रद्धा-भक्ति बहे नस-नस मे, पग-पग पर प्रतिपल मगल हो।।४।।
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(लय - अमर रहेगा धर्म हमारा)

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Anasakt

Author
Sagar Mal
Title
Anasakt
File name
Anasakt
Text
OCR done
Citation
1980
Published
2011/01
Publisher
Loda Ofeset Limited
Language
Sanskrit
Pages
132
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548734
Barcode
4990010028831.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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