Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shri Vedant Sangya
Front matter
ANANDLA
वेदान्तज्ञा।
मापाटनासमिना
समग कामासन
...............
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।
इस पुस्तकके सर्व हक यंत्रालयाधिपने स्वाधीन रक्वेहै ।
श्रीः ।
सूचनेयम् ।
वेदान्तसंज्ञेति नामकोयं ग्रंथः पुरातनोऽशुद्धश्च लब्धः
ततो रोहतक इति पदवाच्यराजधान्यन्तर्गत वेदरी (वेरीति)
नगरनिवासिना गौडवंशोद्भव द्विजशालिगरामात्मज पु-
ण्डित वसति रामशर्मणा बहु श्रमेण संशोधितः टिप्पणि-
काभिरलंकृतश्च तदनंतरतेनैव मया नृगिराऽनुवादितः इति
सर्वजनोंको मालूम हो कि यह वेदान्तसंज्ञा नामक ग्रं-
थ आज तक किसी छापाखानामें मूलमात्र भी नहीं
छपाहै यह ग्रंथ गुप्त होरहाथा बहुतसे मुमुक्षुजनों की
अपेक्षासे जिलारोहतक कसबै वेरी निवासि शालग्रामात्मज
पंडितवस्तीरामजीकेद्वारा हिंदुस्थानी सरलभापामें टीका
रचनाकराय प्रकाशितकी है इस छोटेसे ग्रंथके देखनेसेही
वेदान्तके मतको जानेंगे और पंचदशी आदिबड़े ग्रंथोंको
समझ सकेंगे इस लिये एकवार देखनेही योग्य यह अपूर्व
ग्रंथ तयार भयाहै इसका संपूर्ण अधिकार हमने स्वाधीन
रक्खा है ॥
सज्जनोंका कृपाभिलापी-
.खेमराज श्रीकृष्णदासं
"श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाना-मुंबई..
श्रीगणेशाय नमः। अथ वेदांतसंज्ञा। श्लोकः। श्रीमद्गुरोः पादयुगं नत्वा तस्य प्रसादतः ॥ वेदांतसंज्ञा प्रत्येक निरूप्यते यथामति ॥ ३॥ भा०-अथ मंगलाचरण दोहा-मतिको जो निश दिन लपै, मतिसे लषा नजाय।।ताहि सच्चिदानंद कू, प्रति दिन सीस नवाय॥१॥ भापाटीका रचतहूं निजबुद्धीअनुसार, भूलचूक काहं होयतो पंडित लोहि संभार ||२|| लोकार्थः- श्रीमद्गुरुके दोनों चरणोंको नमस्कार करिकै तिसगुरुके प्रसादसे वेदांत- 'संज्ञा यथामति बुद्धिके अनुसार निरूपण करते हैं ॥ १॥ अध्यारोपाऽपवादाभ्यां निष्प्रपंचप्रपंच्यते इति वृद्ध- वचनादवाऽध्यारोपो नाम वस्तुन्यवस्त्वारोपः। वस्तु सच्चिदानन्दात्मकं ब्रह्म । अवस्तु अज्ञानादि- सकलजडसमुदायस्वरूपमहाप्रपंचः॥ भा०-अध्यारोप और अपवादन्यायकरके निष्प्रपंच जो ब्रह्म है अर्थात् पंचतत्वोंके विकारोंसे रहित जो ब्रह्म है तहाँ पंचतत्व आचरण करिये है पंचतत्व दिखाई देते हैं; जैसे रज्जुमें सादि तैसे, ऐसा यह वृद्ध- वचन है। यहां अध्यारोप नाम वस्तुविषे अवस्तुका आरोपण वस्तु सत् चित् आनंदरूप ब्रह्म है, अवस्तु अज्ञानसे आदिलेके सकल जडममुदाय- स्वरूप महामपंच है तिस महामपंचका आरोपण वस्तुसच्चिदानन्दमें होरहा है रज्जुमें सर्प, शुक्तिमें रजत, स्थाणूमें पुरुप इत्यादिकोंकी तरह यहां असत्य समझना यह अपवाद है इति ।
+ वेदांतसंज्ञा। प्रपंचद्रयम् १ अज्ञानद्वयंर सूक्ष्मंशरीरद्वयं३ स्थूल- शरीरद्वयं शक्तिद्वयं निःश्रेयसद्वयं६संशयद्वयम् ७. असंभावनाइयं ८ विपरीतभावनाद्वयं ९ प्र- ज्ञादये १० समाधिद्धयम् ११॥ भा०-मपंच दोहे १ अज्ञान दौ, २ सूक्ष्म शरीर दोहैं ३ स्थूल शरी दौ ४ शक्ति दोहैं ५ निःश्रेयस दोहे ६ संशय दोहै ७ असंभावना दो ८ विपरीतभावना दौ ९ प्रज्ञा दो १० समाधि दोहे ११ इनसबों स्पष्टकरके आगे लिखेंगे इति । 20 ब्रह्मवयं १ जीवत्रयं.२ शरीरत्र्यम् ३अवस्थाव॒यंट कारणत्रयम् ५ कर्मवयम् ६ पुण्यकर्मत्रयं ७ पाप- कर्मवयम् ८ मिश्रकर्मवयं ९ प्रारब्धत्रयम् १० प्र- तिबंधवयम् ११ संबंधत्रयम् १२ तापयं१३ अ- ध्यात्मिकत्रयम् १४ करणत्रयम् १५॥ गुणत्रयं ६ कालव्यम् १७ मूर्तित्रयं १८ ज्ञानादित्रयं १९ प्रपंचत्रयं २० लोकत्रयं २१ ज्ञानप्रतिबंधकवयं २२ वासनात्रयं २३ श्रवणादिवयं २४ ज्ञानादित्रयं२५ हेत्वादिवयं २६ प्राणायामत्रयम् २७ आंध्या- दिवय २८ तादात्म्यत्रयम् २९ एपणात्रयम् ३० मुषुप्यादित्रयम् ३१॥ भाल-ब्रह्म तीन है १ जीव तीन हैं २ शरीर तीन हैं .३ अवस्था तीन है ४ कारण तीन है ५ कर्म तीन हैं ६ पुण्यकर्म तीन है७ पापकर्म तीन है ८ मिश्रकर्म तीन है ९ मारन्ध तीन है १० प्रतिबंध तीन हैं ११ । ६ भाषाटीकासमेता। संबंध तीन हैं १२ ताप तीन हैं १३ अध्यात्मादि तीन हैं १४ करण तीन हैं १५ गुण तीन हे १६ काल तीन हैं १७ मूर्ति तीन है १८ ज्ञानादि तीन हैं १९ प्रपंच तीन हैं २० लोक तीन हैं २१ ज्ञानप्रतिबंधक तीन हैं २२ वासना तीन हे २३ श्रवणादि तीन हैं २४ ज्ञानादि तीन हैं २५ हेत्वादि तीन हैं २६ प्राणायामादि तीन है २७ आध्यादि तीन हैं२८ तादात्म्यादि तीन हैं २९ एषणा तीन हैं ३० सुपुतिमादि तीन हैं ३१॥ वर्तमानप्रतिबंधचतुष्टयम् १ पुरुषार्थचतुष्टयम् २ शब्दप्रवृत्तिचतुष्टयम् ३ वर्णचतुष्टयम् ४ आश्र- मचतुष्टयम् साधनचतुष्टयम् ६ अंतःकरणचतु- प्रयम् .७ अनुबंधचतुष्टयम् ८ संकल्पादिचतुष्टयम् ९ वेदचतुष्टयम् १० प्रमाणचतुष्टयम् ११ विघ्नचतु- प्रयम् १२ मैत्रादिचतुष्टयम् १३ भूतग्रामचतुष्टयम् १४ ब्रह्मविद्याचतुष्टयम् ॥१६॥ भा-वर्तमान प्रतिबंध चार है १ पुरुषार्थ चार है २ शब्दप्रवृत्ति विमित्त चार है ३ वर्ण चार है ४ आश्रम चार है ५ साधन चार है अनुबंध चार है ७ अंत:करण चार है ८ संकल्पादि चार है ९ वेद चा है १० प्रमाण चार है ११ विघ्न चार है १२ मैत्रीआदि चार है. १ भूतग्राम चार है १४ ब्रह्मविद्या चार है इन सवोंको स्पष्ट करके आ लिखेंगे इति ॥ कोशपंचकम् ज्ञानेन्द्रियपंचकरशब्दादिपंचकं३ कर्मेंद्रियपंचकम् ४ वचनादिपंचकम् ५ प्राणादि. पंचकम् ६ उपवायुपंचकं ७ कर्मपंचकं ८ सूक्ष्म भूतपंचकं ९ स्थूलभूतपंचकं १०.यमपंचकं ११ (४) वेदांतसंज्ञा। नियमपंचकं १२ भूमिकापंचकं १३प्रलयपंचकं१४ . भ्रमपंचकं १५ निवर्तकदृष्टांतपंचक १६ दृष्टांत- पंचकं १७ ख्यातिपंचकम् १८ इति ।। भा-पंच कोश है अर्थात् शरीरमें खजाने पांच है १ ज्ञानइंद्री पांच है २ शब्दादि पांच है ३ कर्मइंद्री पांच है ४ वचनादिक पांच है ५ प्राण पांच है ६ उपप्राण पांच है ७ कर्म पांच है ८ सूक्ष्मभूत पांच है ९ स्थूलभूत पांच है १० यम पांच है ११ नियम पांच है १२ भूमिका पांच है १३ मलय पांच है १४ भ्रम पांच है १५ निवर्तक दृष्टांत पांच हैं १६ दृष्टांत पांच है १७ ख्याति पांच है १८ इति । समाधिपदम् १ अरिपड्वर्गः२ पदावविकाराः३ पटौ- शिकाः ४ पडू उर्मयः ५ पड़िधलिंगानि६ पडअव- स्थाः ७ पट्शास्त्राणि ८ पट्सूत्राणि ९ पडंगानि १० पङ्कर्माणि ११ शमादिपटम् १२ ॥ इति । भा-समाधि छह है १ वैरी छह है २ भावविकार छह है ३ कौशिक छह है ४ लहरी छह है ५ लिंग छह प्रकारके है ६ अवस्था छह है ७ शास्त्र छह है ८ सूत्र छह है ९ अंग छह है १० कर्म छह है ११ शमादि छह है १२ इति। सप्ताऽवस्थाः १ सप्तचैतन्यानि २ भूतादिसप्तकम् ३ अतलादिसप्तकम् ४ सप्तभूमिकाः५ ॥ भा अवस्था साप्त है १ चैतन्य सात है। भूतादि सात है ३ मतलादि सात लोक है ४ भूमिका सात है ५ इति । पुर्यटकम् १ प्रकृत्यायकम् २ अष्टांगानि ३ अष्टांगः४॥ १ - भाषाटीकासमेता। (५) भा-पुरी आठ है १ प्रकृति आठ है २ अंग आठ है ३ अष्टांग योग है। नवविधसंसारः१ देवतापंचदशकम् १ अस्यादिपं- चदशकम् २॥ भा०-संसार नव प्रकारका है १ देवता पंदरह है १ अस्थि आदि पंदरह है २ इति । युगादिपोडशकं १ पोडशकंलिंगं २ सप्तदशक लिंगम् ३ नवदशकं लिगं ४ चतुर्विंशतिस्तत्वानि पत्रिंशत्तत्वानि पण्णवस्तितत्वानि ।। भा०-युगादि सोलह है १ सोलह लिंग हैलिंग सतरहभी है ३ लिंग उन्नीस है।तत्त्व चौबीश है छत्तीश तत्व है छियानवें तत्त्व है। परमहंससंन्यासद्वयं १ विद्वत्संन्यासद्वयं २ निग्रह- द्वयम् अहंकारद्धयम्आनंदत्रयं जाग्रत्रयं स्वपत्र- यम् सुपुप्तित्रयं आत्मत्रयम्द संन्यासचतुष्टयं भू- मिकाचतुष्टयं २ युक्तिचतुष्टयम्३ अजिहादिपङ्क १ मौनादिसप्तकं नाडिकादशकं नाडिदेवतादशकम् अष्टांऽतरंगमदाः पड्बहिर्मदाः अष्टमूर्तिमदाः अष्ट पाशा १ सप्तधातवः सप्तव्यसनानि २ पड्भ्रमाः१ भा०-परमहंसोंके पद दो है १ विद्वानोंके संन्यासदो है २ निग्रहदो है ३ अहंकारदो है ४ आनंद तीन है १ कर्म तीन है २ जाग्रत् तीन है। स्वप्न तीन है ४ सुपुप्ति तीन है ५ आत्मा तीन है ६ संन्यास चार है १ भूमिका चार है २ युक्ति चार है ३ अजिबादि छह है १ मौनादिक सात है १ नाडी दशमकारकी है १ नाडीयोंके देवता दश है २ आठ .
१ वेदांतसंज्ञा। भीतरके मद है १ छह बहिर्मद हैरआठ मूर्तियोंके मद है २ आठ फांसी है २ सात धातु है १ सात व्यसन है १ छह भ्रम है १ । पंचक्केशाः १ आध्यात्मिकतापत्रयम् १ स्वर्गलोक- तापत्रयम् २ पंचसप्ततिर्गुणाः १ रूपपटुम् स्पर्श- चतुष्टयम् ॥ भा०-पांच क्लेश है १ आध्यात्मिक आदि ताप तीन है स्वर्गलो. कके ताप तीन है १ पिछत्तर गुण है १ रूप छह है १ स्पर्श चार है। शब्दद्वयम् १ रसपदम् १ गंधद्वयं १ नववर्णाः ऐ- श्वर्यादिपटुम् १ उत्पत्त्यादिपट्टम्पनादादित्रयम् । इत्येता संज्ञा शास्त्रज्ञैरुदाहताः एताःप्रत्येकं निरू- प्यते ॥ इति । भा०-शब्ददो है १ छह रस है १ गंधदो है १ वर्ण नव है १ छहए- श्वर्य आदि है १ उत्पत्ति मादि छह है १ नाद तीन है ये इतनी संज्ञा शास्त्रके जानने वालोंने कही है ये संज्ञा एक एकके प्रति निरूपण करी जाती है-इति ॥ सदऽसद्भयामनिर्वचनीयम् त्रिगुणात्मकं ज्ञानविरो- धि अहमज्ञः मोहित इत्यनुभवरलात् भावत्वेन व्यपदेशरूपमज्ञानामूलकारणत्वात् सत्वरजस्तमो- गुणानां साम्यावस्थारूपत्वाच मूलप्रकृतिःप्रलया- वस्था अव्यतम व्याकृतं महामतिः कूट। निर्वि- कारेण तिष्ठतीति कूटस्थाज्ञानं विनान क्षरतीतिअ- क्षरमितिव्यपदिशतोस्थूलसूक्ष्मकारणप्रपंचानां स- मष्टिमहाप्रपंचः॥ - । भाषाटीकासमेता। (७) भा०-जो सत्य अरु असत्यइन दोनुवोंसे विलक्षण होवे न साचाहै न झूम है साच झूठसे न्यारा है । तीनों गुणोंका आत्मा है ज्ञानका वि- रोधी है में अज्ञहूं मोहकू प्राप्त होरहा हूं इस अनुभवबलसे होने कारके विपरीत रूप है उसको अज्ञान कहते है क्यों कि मूलका कारण होनेसे अरु सत्वरजतमोगुणोंका समरूप होनेसे अज्ञानको मूल प्रकृति भी कहते हैं प्रलयाऽवस्था कहते है इसीकू अव्यक्त कहते हैं अव्याकृत भी कहते हैं महासुपुप्ति भी इसीकू कहते है ज्ञान विना जो नष्ट नहीं होवै इसलिये अक्षर भी अज्ञानको ही कहते है ऐसा व्यपदेश कहा है स्थूलसूक्ष्म कारण इन प्रपंचोका जो समष्टि समग्र समूह है उसको महा- प्रपंच कहते हैं-इति ॥ बाह्यप्रपंच आंतरप्रपंच इति प्रपंचद्वयम् पृथिव्यादि पंचमहाभूतानि तजन्यो ब्रह्मांडस्तदंतर्भूतोपर्युपरि विद्यमानभूर्भुवः स्वःमहर्जनस्तपःसत्यनामकाऽधोड धोविद्यमानाऽतल,वितल, सुतल, तलांतल, महा- तल, रसात्तल, पाताल, नाम चतुर्दश भुवनानि तनिष्ठजरायुजांडजस्वेदजोद्भिजचतुर्विधभूतग्रामस- मुदायः यथायोग्यं विविधनामरूपगुणधर्मशक्त्या- अयः बाह्यप्रपंचः ॥ इति। भा०बाह्य प्रपंच और आंतर प्रपंच ऐसे दोमकारका प्रपंच है तिसकी स्पष्ट कारकै दिखाते हैं। पृथिवीसे आदिलेके जो पंचभूत हैं तिन्होंसे उत्पन्न हुवा ब्रह्मांड ब्रह्माडके अंतरभूत जो उपरि उपरि विद्यमान भूर्लोक भुवः लो स्वः लो महलोजन लो तपः लोसस्य लोक है अरु इन्हके नीचे नीचे जो अतल वितल सुतल तलातल महातल रसातल पाताल नामक . लोक ऐसे जो चतुर्दश भुवन हे तिनं विषे जो जरायुज अंडज स्वेदज उद्भिज अर्थात् जेरसे अंडासे पसीनासे चोमासासे होने वाला चार प्रकार - वेदांतसंज्ञा । का भूतग्राम समुदाय है. जैसा जैसा विविध प्रकारका नाम रूप गुणध शक्तिके आश्रय जो हो रहा है सो बाह्य प्रपंच कहा जाता है-इति । अन्नमयादिपंचकोशस्थूलादिशरीरत्रयाऽस्तीत्या- दिपड्भावविकारत्वङ्मांसादिषट्वौशिकाऽशनपिपा- सादिपडूमिश्रोत्रादिज्ञानेद्रियपंचकवागादिकमद्रि- यपंचकप्रणादिवायुपंचकमनआयंतःकरणचतुष्ट- यम् ॥ संकल्पाद्यतःकरणवृत्त्यवस्थात्रयतव्या- पारतदभिमानिविश्वतैजसमानसमाधिमूर्छाकरण- त्रयम् कामक्रोधारिपवगै साधनचतुष्टयसत्वा- दिगुणत्रयम् सुखदुःखज्ञानाऽज्ञानादिपंचक्केशमै- व्यादिचतुष्टययमाद्यष्टांगप्रत्यक्षादिप्रमाणचतुष्टय- रोगारोग्यादिसमुदायः यथायोग्यं विविधनामरूप- गुणधर्मशत्याश्रयः आंतरप्रपंचः इति विवेकः॥ भा०-अत्रमय आदिक जो पंचकोश अन्नमय १ प्राणमय २ मनो- मय ३ विज्ञानमय ४ आनंदमय स्थूलादि तीन प्रकारके शरीर अ. स्ति, जायते, वर्द्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते विनश्यति ऐसे ये बनाववि. कार अर्याद छह प्रकारके होने वाले विकार त्वचा आदिलेके छह कोश त्वचा १ मांस २ मज्जा ३ रक्त ४ अस्थि ५ वार्य ६ ये है और अशना. दिक अर्थात् क्षुधा पिपासाआदि छह ऊर्मी नाम लहरीमात्रसे आदि पंचज्ञान इंद्री वासे आदि पंचकर्मइंद्री प्राणसे आदिले के पंचवायु मनसे मादि चार अंत: करण मन बुद्धि चित्त महंकार संकल्पादि अंत:करणकी वृत्ति की जाग्रत् स्वप्न मादि तीन अवस्था तीनोंके व्यापार तिन्होंके मभिमानी विश्वतेजप्राज्ञ समाधि मूर्छा । तीन करण कामसे आदि अरिषद वर्ग. चार साधन सत्व आदि तीन गुण दुःख आदि पांच केश चार मैयादि भाषाटीकासमेता। यमसे आदि अष्टांग, चार प्रत्यक्ष आदि प्रमाणारोग आरोग्यादि समुदाय जैसा तैसा अनेक नाम रूप गुण धर्म शक्तिके आश्रय जो है सोसव आं- तर प्रपंच कहा है ऐसा विवेक है इति ॥ समष्टयज्ञानं व्यस्यज्ञानमिति भज्ञानद्वयम् अज्ञान- स्यसमध्यभिप्रायेणैकत्वव्यपदेशःव्ययभिप्रायेण नानाव्यपदेशः समष्टयज्ञानमीश्वरोपाधिः उत्कृष्टोपा- धितया विशुद्धसत्वप्रधानामाया अखिलकारणत्वा- त् कारणशरीरम् आनंदप्रचुरत्वात् कोशवदात्मन आच्छादकत्वाचानंदमयकोशः सर्वोपरमत्वात्सु- पुप्तिः अतएव समष्टिस्थूलसूक्ष्मशरीरत्वस्थानमि- तिचोच्यते व्यष्टयज्ञानं जीवोपाधिः इयं व्यटिनिक- टोपाधितयामलिनसत्वप्रधानाऽविद्या अहंकारादि- कारणत्वात् कारणशरीरमानंदप्रचुरत्वादेवहेतोः कोशवदात्मन आच्छादकत्वाचानंदमयः कोशः सर्वोपरमत्वात्सुपुप्तिः अतएव व्यटिस्थूलसूक्ष्मश- रीरलयस्थानमितिचोच्यते इति ॥ भा-समष्टि अज्ञान अरु व्यष्टि अज्ञान ऐसे दो प्रकारका अज्ञान है. अज्ञानको समष्टिमभिप्राय करके एक कहा जाता है, व्यष्टिअभिप्रायस अज्ञानकू नाना कहते है अर्थात् अनेक कहते हैं ईश्वरकी उपाधी समष्टि अज्ञान कहते है उत्तम उपाधि करिके तहां विशुद्धसल गुणप्रधानवाली माया है इसी मायासहित अज्ञान• अखिल अर्थात् सभीका कारण होने. से कारण शरीर कहते है मानंद जादै होनेसे कोश नाम म्पानकी तरह मर्यात् जैसे तलवारको म्पान टकलेता है तैसे आत्माकू ढकनेसे तहां आनंदमय कोश रहता है. सब इंद्रीमन मादिका उपराम होनेसे सुपुत्ति .
वेदांतसंज्ञा । (१०) अवस्था है इसी वास्ते समष्टिके स्थूलसूक्ष्म२ इन दोनों शरीरोंकालय स्थान है इति ! जीवउपाधीकू व्यष्टि अज्ञान कहते है यह व्यष्टि अल उपाधिता कारकै मलिनसत्त्व प्रधान अविद्या है, अहंकारादिकोंका कारण होनेसे कारण शरीर रहता है विशेष आनंदका हेतु होनेसे कोश म्यानकी तरह आत्माको ढकनेसे आनंदमयकोश कहाता है सभीका उपराम होनेसे सुपुप्ति अवस्था है इसी वास्ते व्यष्टिके स्थूल और सूक्ष्म शरीरका लयस्थान है ऐसे कहा जाता है ॥ इति ॥ समष्टिसूक्ष्मशरीरं व्यष्टिसूक्ष्मशरीरमिति सूक्ष्म शरीरद्वयम् . अखिलसूक्ष्मशरीरमेकबुद्धिविपयत्वे- नवनवजलाशयवद्वा समायः अनेकवुद्धिविप- यतया वृक्षवजलाशयवद्वा व्यष्टिश्च भवति यत्स- मटिकारणशरीरतयाऽज्ञोपाधिभूतमअखिलं सूक्ष्म- शरीरं हिरण्यगर्भोपाधिः विज्ञानमयादिकोशवयं जाग्रत् वासनामयत्वात् स्वप्नः अतएवसमष्टिस्थूल- प्रपंचलयस्थानमिति चोच्यते १ भा-समष्टि सूक्ष्म शरीर व्यष्टि सूक्ष्म शरीर ऐसे दो सूक्ष्म शरीर है, संपूर्ण जो सूक्ष्म शरीर है तिनको एक बुद्धिविपयता करिके बनकी तरह वा जलाशय समुद्रकी तरह होवे उसको समष्टि कहे है अर्थात बहुत वृक्ष है परंतु वनबुद्धि एकविषयता है अरु प्रति वृक्ष भिन्न २ बुद्धि करना यह अनेक वुद्धिविषयता कहलाती है सोव्यष्टिके लक्षणमें जानना अनेक विषयता करिके वृक्षकी तरह जलोंकी तरह जो हवि उ. सकों व्यष्टि कहते हैं जो समष्टि कारणशरीर ता करके अज्ञ उपाधिभूत है संपूर्ण सूक्ष्म शरीह है उसको हिरण्यगोपाधि कहते हैं तहां विज्ञा. नमय आदि तीन कोश है अर्थात् विज्ञानमयः मनोमयः प्राणमयः नाम- त् वासनामय अर्थात् जाग्रत् वासना प्रधान होनेसे स्वप्न अवस्था है इसी. वास्ते समष्टिके स्थूल प्रपंच लय होनेका स्थान है ऐसा कहा जाता है इति ।
११) . भाषाटीकासमेता। पूर्वोक्तव्यष्टिकारणशरीरतया अज्ञोपाधिभूतं सकलं सूक्ष्मशरीरम्अनेकवुद्धिविपयतया व्यष्टिसूक्ष्मश- रीरं तैजसोपििधभूत विज्ञानमयादिकोशत्रयम अत एव व्यटिस्थूलप्रपंचलयस्थानमिति चोच्यते इति ।। भा०-पूर्वोक्त जो व्यष्टि कारणशरीर है तिस करिकै अज्ञ उपाधि- भूत अर्थात् में कछु नहीं जानता हूं ब्रह्मज्ञानरहित जो सब सूक्ष्म शरी- र है सो अनेक बुद्धिविषयता करिके अर्थात् प्रति शरीर भिन्न २ सम- झके व्यष्टि सूक्ष्म शरीर कहलाते हैं सो तैजसकी उपाधि है तहां विज्ञान- मय आदि तीन कोश हैं इसीवास्ते व्यष्टिके स्थूल प्रपंच अर्थात् स्थूल- शरीर का लयस्थान है ऐसें कहा जाता है-इति । समष्तिस्थूलशरीरं व्यष्टिस्थूलशरीरमिति स्थूलश- रिद्वयम् जरायुजांडजस्वेदजोद्भिजाख्यं च चतुर्विध सकलं स्थूलशरीरं वनवज्जलाशयवद्वा एकवुद्धि- विपयत्वात्सूक्ष्मशरीरा पेक्षया स्थूलत्वाच्च समष्टि- स्थूलशरीरं विराडुपाधि अन्नविकारत्वात्कोश- वदात्मन आच्छादकत्वाच्च अन्नमयकोशः स्थूल- भोगायतनत्वाजाग्रदिति चोच्यते इति ।। भा०-उमष्टिस्थूलशरीर व्यष्टिस्थूलशरीर ऐसे दो प्रकारके स्थूल शरीर है. जरायुज, अंडज, स्वेदन, उद्भिज, अर्थात् जेरसे अंडासे पसीनासे चमांसे नारप्रकार से संपूर्ण स्थूल शर होते है हिन्दोको परी, नारद जलाश पसमुद्रकी तरहहै व एक्बुद्धिविपयता होनेसे अर्थात् जैसे अनेक वृक्षहे तो भी वन एक ही है अनेक जलोंका समुद्र एकंही है ऐसे सवनीपोंका एकता समझनेसे सूक्ष्म शरीरकी अपेक्षा करकै स्थूल होनेसे समाधि स्थूल शरीर कहते है सोविराट् उपाधि है मनका विकार होनेसे कोशकी तरह '(१२) वेदांतसंज्ञा। आत्माकू ढकनेसे अन्नमय कोश कहते हैं स्थूल भोगोंका आयतनस्थानहो. नेसे जाग्रत् कहते हैं-इति । पूर्वोक्तं चतुर्विध स्थूलशरीरं सकलं वृक्षवजलाशय- वद्वाअनेकवुद्धिविपयतया सूक्ष्मशरीरापेक्षया स्थू- लत्वाच्च व्यटिस्थूलशरीरं विश्वोपाधिः अन्नविकार- त्वादेतोरेवात्मनः कोशवदाच्छादकन्यायाच अन्नम- यकोशः स्थूलभोगायतनत्वाजादिति चोच्यते इति । भा०-पूर्वोक्त जो चार प्रकारका स्थूल शरीर ताको वृक्षकी तरह वा जलाशयकी तरह होनेसे अनेक बुद्धिविषयता करकै अर्थात प्रतिशरीर भिन्न २ बुद्धिसे विचारके देखनेंसे और सूक्ष्म शरीरकी अपेक्षा करके स्थूल होनेसै व्यष्टि स्थूल शरीर कहते हैं सोविश्व उपाधि है अनविकारहतु होनेसे आत्मा कोशकी तरह ढकनसे अन्नमयः कोशकहते हैं स्थूल भोगोंका आयतन स्थानहोनेसे जाग्रत अवस्था कहते हैं इति । आवरणशक्तिर्विक्षेपशक्तिरिति शक्तिद्वयम् ॥ अंतई- गदृश्ययोभदं बहिश्च ब्रह्मसर्गयोभैद वा स्वात्माऽव- लोकयित्री बुद्धि अखंडसचिदानंदं वा आवृणोती- त्यावरणशक्तिः ॥ १॥ भा०-आवरण शक्ति और विक्षेपशक्ति ये दोप्रकारकी शक्ती हैं तहां आवरण शक्तिकू कहते हैं कि जोभीतरहग् अर्थात् दृष्टि अरु दृश्यका भेद, वाहर जोब्रह्म अरु सर्गका भेद सो, स्वात्मावलोकयित्री अपने आत्माको दिखानेवाली ब्रह्मविद्यायुत जो बुद्धि तिसको अथवा प्रखंड सच्चिदानंद ब्रह्मको जो दकले दै उसकू आवरणशक्ति कहते हैं । विविधस्वरूपेण भवनं विक्षेपशक्तिः॥ भा०-प्र.विक्षेपशक्ति किसको कहते हैं उ० अनेक स्वरूप कारकै जी हो उसफू विक्षेप शक्ति कहते हैं | भाषाटीकासमेता। (१३) अनर्थनिवृत्तिरानंदप्राप्तिश्चेति निःश्रेयसद्वयम् ॥ प्रमाणगतसंशयःप्रमेयगत संशयश्चेति संशयद्वयम्॥ तथाहि श्रुतिभिः कर्म बोध्यते उत सिद्धब्रह्म प्रतिपा. द्यतेइत्येवंरूपा चित्तवृत्तिःप्रमाणगतसंशयः १ ॥ भा०-अनर्थकी निवृत्ति अरु आनंदकी प्राप्ति ये दो निश्रेयसहै संशय दोप्रकारके है एकतो प्रमाणगत संशय है दूसरा प्रमेयगत संशय है तथा हि-सो कहतेह-श्रुतिकर्मकूँ वोधन करतीहै अथवा क्या श्रुतियोंसे सिद्ध ब्रह्म प्रतिपादन किया जाताहै ऐसी चित्तकोवृत्ति होनेकू प्रमाण- गतसंशय कहतेहै ।। ब्रह्म जगत्कारणं उत प्रधानादिकमित्येवं रूपाच्चित्त वृत्तिःप्रमेयगतसंशयः॥ प्रमाणगताऽसंभावना प्रमे- यगतासंभावना इत्यसंभावनादयं । भा०-ब्रह्म जगत्का कारणहे क्या प्रधानादिक माया आदिक जगत्के कारण है असी चित्तवृत्ति होनेकू प्रमेयगत संशय कहते है प्रमाणगत असंभावना दूसरी प्रमेयगत असंभावना ऐसे असंभावना दोपकारकीहै ।। ब्रह्मणः सिद्धत्वात्पृथिव्यादिवत्प्रमाणांतरगम्यत्वे श्रुतिः सिद्धब्रह्मप्रतिपादिका कथं भवेत् फलाभा- वानभवत्येवेति निश्चयात्मिका चित्तवृत्तिःप्रमाणग- ताऽसंभवना, ब्रह्मणो जगद्विलक्षणत्वेन स्थितत्वात जगत्कारणत्वं कथं संभवति नसंभवत्यवति निश्चया- त्मिका चित्तवृत्तिः प्रमेयगत असंभावना इति ।। भा०-प्रमाणपत मसंभावनाओं कईतहै कि ब्रह्मो स्वतःसिद्ध होनेसे पृथिवी आदिकी तरह अन्य प्रमाण अगम्यत्त्व करके अर्यात् जो (१४) वेदांतसंज्ञा । पृथ्वी आदि पंच भूतमयहै उनकोही प्रमाणांतर करके श्रुति कहतीहै श्रुति स्वत:सिद्ध ब्रह्मकी प्रतिपादक कैसे है फलका अभाव होनेसे नहींहै क्या ऐसी निश्चयात्मिक चित्तवृत्तिको प्रमाण गत असंभावना कहतेहैं १ ममेयगत असंभावनाको कहतकि ब्रह्मको जगत्से विलक्षणता करकै स्थित होनेसै अर्थात् ब्रह्मतो जगत्से विलक्षण व्यतिरिक्त धर्म- वालाहै वह ब्रह्म जगतका कारण कैसे है अथवा नहींहै ऐसी निश्चयात्मिका चित्तवृत्तिको प्रमेयगत असंभावना कहतेहैं इति ।। प्रमाणगतविपरीतभावना प्रमेयगतविपरीतभावना- इति विपरीतभावनाद्वयम् । ब्रह्मणःसिद्धत्वेन श्रुती- नांतत्प्रतिपादकत्वेन निष्फलत्वप्रसंगात् । श्रुतयः कर्मपरा एवेति निश्चयः प्रमाणगतविपरीतभावना ॥ तंतुपटयोः कार्यकारणयोः सारूप्यं दृश्यते अतो जगद्ब्रह्मणोःसारूप्याभावात् जगत्कारणं प्रधानादि. कमेवेति निश्चयः प्रमेयगतविपरीतभावना इति। भा०-प्रमाणगत विपरीतभावना अरु प्रमेयगतविपरीतभावना ऐसे दो प्रकारकी विपरीतभावना होती है ब्रह्मको सिद्ध होनेसे श्रुति- योंकू तिस ब्रह्मको प्रतिपादन करने निष्फलत्वमसंगसे अर्थात् जो वस्तु स्वतःसिद्ध ही होती है,तिसमें प्रमाणादिकदेना निष्फलत्व है ऐसा निष्फलत्व प्रसंग आवैगा इस लिये श्रुति जो है वे कर्मपर है अर्थात विशेषता करके कर्मकोही वर्णन करती है ब्रह्मका प्रतिपादन नही करती ऐसा निश्चयको प्रमाणगत विपरीत भावना कहते हैं १ ॥ तंतु अरु पटका कार्यकारणोंका सारूप्य देखिये है अर्थात् समान सदृशता देखिये है ऐसेही जगत् अरु ब्रह्मके सारूप्यका अभाव दीखनेसे जगका.कारण प्रधानादिक है ऐसा निश्चयको प्रमेयगत विए- रीतभावना कहते हैं क्योंकि जैसे प्रधान भादिक अपात् मापा अहंकार ।
भाषाटीकासमेता। (१५) आदिक अनित्य है तैसाही जगत्भी अनित्य है ऐसी सारूप्यता मिलती है इतिभावः ॥ एवमांतरे तथाहि जगदंतर्यामिणमपिजगद्विलक्षणं ब्रह्मत्वमस्तिनवेति प्रत्यगात्मविषयकःसंशयः॥१॥ भा०-ऐसा अंतर होनेसे तथाहि सोई कहते हैं कि जगत्के अंत- र्यामी कोभी जगत्से विलक्षण ब्रह्मत्व है अथवा नहीं है इसको प्रत्य- गात्मविषयक संशय कहते हैं । कर्तृत्वायनेकधर्मविशिष्टस्यममाऽकर्तृब्रह्मस्वरूप- त्वं कथं भवेन्न भवत्येवेति निश्चयात्मिका चि- त्तवृत्तिः प्रत्यगात्मविषयकाऽसंभावना ॥२॥ भा.-कर्तासे आदि अनेक धर्मयुक्त मेरेको अती अरु ब्रह्मस्वरू- • पत्त कैसे है अथवा क्या नहीं है ऐसी निश्चयात्मिका चित्तवृत्तिको प्रत्यग् आत्मविषयक असंभावाना कहते हैं-इति । यद्यऽकर्ताहंतर्हिकथं ममंशास्त्रैस्त्वयाकर्तव्यमिति कर्मोपदेशः अतः कर्तेति निश्चयात्मिका चित्तवृत्तिः प्रत्यग्विपयिणीविपरीतभावना ।।३।। भा०-जो मैं अकीहूं तो मेरेको तेने कर्मकरनेही चाहिये ऐसे शास्त्रों करके कैसे कमौका उपदेश है इसवास्ते कर्ताहूं ऐसी निश्चयात्मिका चित्त- यत्तिको प्रत्याविषयिणी विपरीतभावना कहते है ।। इति । स्थितप्रज्ञाऽस्थितप्रक्षेति प्रज्ञाद्वयम्१ संप्रज्ञातसमा- घिरसंप्रज्ञातसमाधिश्चेतिसमाधिद्वयम् २ एकमे- वाद्वितीयं ब्रह्मसमष्टिस्थूलसूक्ष्मकारणशरीरोपाधि- तयाविराट् २ हिरण्यगर्भर ईश्वर ३ इतिचोच्यते एतदेवब्रह्मत्रयम् ॥
वेदांतसंज्ञा। भा-स्थितप्रज्ञा मस्थितप्रज्ञा दो मकारकी बुद्धि है १ समाधी दो है संप्रज्ञात समाधि है अरु असंमज्ञात समाधी है। एक अद्वितीय ब्रह्म है वही समष्टीके स्थूल, सूक्ष्म , कारण, शरीरोंकी उपाधी करिक विराट् १ अरु हिरण्यगर्भ २ ईश्वर ३ इति उच्यते ऐसे कहा जाता है यही तीन ब्रह्म है. इति । ब्रह्म १ ईश्वरः २ साक्षी परमात्मा कूटस्थः अ. क्षरं जगदधिष्टानं जगन्निपेधावधिभूतंच व्यवह्रियते बृहत्त्वाबृंहणत्वात् ब्रह्म, वृहत्त्वं व्यापकत्वं बृहणत्व शरीरवृद्धयादिहेतुत्वमितिविवेकः ॥ समष्टिस्थूल- शरीरोपाधिकचैतन्यं विविध राजमानत्वाद्विराट् ॥ विश्वेषु समस्तेपुनरेष्वहमित्यभिमानित्वाद्वैश्वानरः। विशेपेण भासमानत्वाद्विराज इतिचव्यपदिश्यते ॥ भा-ब्रह्म कहो अथवा ईश्वर कहो अ० साक्षी , अरु परमात्मा, अ कूटस्थ अक्षर जगदधिष्ठान जगनिषेधावधिभूत, ये सब ब्रह्मकही वाचा शब्द है ऐसा व्यवहार है। बृहत्त्वात बडा होनेसे बृंहणत्वात् बदनेसे ब्रह्मका बडापन कम है कि व्यापक होना बटना क्या है, शरीरवृद्धयादिहेतुत्व ऐसा विवेक है समष्टि स्थूलशरीरउपाधी चैतन्यकू अनेक प्रकार करिके रानभान होनेसे विराट् कहते है, समस्त विश्वविषे अरु नरोविर्षे में हूं ऐसा मभिः मान होनेसे वैश्वानर कहतेहै, विशेषता कारकै भासमान होनेसे विराज कहते है एस, आयपदप है । इति । समष्टि सूक्ष्मशरीरोपाधिचैतन्यं ज्ञानशक्तिमत्त्वा- द्धिरण्यगर्भः मणिसूत्रवत्समस्तप्रपंचानुस्यूतत्वात्सू त्रात्मा क्रियाशक्तिमत्त्वात्प्राणः इति च व्यपदिश्यते॥
भाषाटीकासमेता। भा०-समष्टि सूक्ष्मशरीर उपाधि चैतन्यको ज्ञानशक्तिवाला होने से हिरण्यगर्भ कहते हैं, माणिके विष सूतकी तरह. समस्त प्रपंच विषे अनुस्यूत, अर्थात् जैसे मणियोंकी मालामें सब जगह सूत्र पुयारहता है तैसे होनेसे सूत्रात्मा कहते हैं, क्रियाशक्तिवाला होनेसे प्राण कहते हैं ऐसा व्यपदेश है। समष्टय ज्ञानोपाधिकचैतन्यंसमस्तप्राणिनियामक- त्वादीश्वरः। समस्तप्राणिहृदयनिष्ठत्वेसति समस्त- प्राणिकर्मप्रेरकत्वादतर्यामीरूपरहितत्वादव्याकृतः॥ भा-समष्टिके अज्ञान उपाधि चैतन्यको समस्त प्राणीयोंका नियाम- क प्रभु होनेसे ईश्वर कहते हैं, समस्त प्राणियोंके हृदय में स्थित होनेसे सम- स्त प्राणियोंका कर्ममेरक होनेसे अंतर्यामी कहते हैं, अरूप होनेसे अर्थात् रूपरहित होनेसे अव्याकृत कहते हैं । सकलाऽज्ञानतत्कार्यावभासकत्वाजगत्कारणंकेना- पि प्रमाणन न व्यज्यत इत्यव्यक्तमितिच व्यपदि- श्यते एकएवप्रत्यगात्मा ॥ व्यष्टिस्थूलसूक्ष्मकारण शरीरोपाधिकत्वेन विश्वातैजस प्राज्ञ इति च व्यपदि- श्यते एतदेवजीवत्रयमितिव्यवहारः॥ भा०-सकल जो अज्ञान अरु तिस मज्ञानका कार्यमा अवमासक होनेसे जगत्का कारण कहते हैं. किसी प्रकार परिकभी न्यारा प्रगट नहीं होवे उसको अव्यक्त कहते हैं. प्रत्यगात्मा एकहै सो व्यष्टिक स्यूल सूक्ष्म कारण शरीर की उपाधि कारके विश्व अरु तेजस अरु प्राज्ञ ऐसे कहाता है ॥ प्रत्यगात्मा शरीरचयाधिष्ठानं जीवः साक्षी कूटस्थः न भरतीत्यक्षरः चित् चैतन्यं चितिरितिपर्यायाः। . ૨ (१०) वेदांतसंज्ञा। प्रातिलोम्येनाऽचतीति प्रत्यक् तथाहि प्रातिलोम्ये, नानृतजडदुःखात्मकाऽहंकारादिभ्यो विलक्षणत्वेन सचिदानंदात्मकतयाअंचति प्रकाशते इति प्रत्यक्॥ भा०-भत्यक्मात्मा तीनों (स्थूल सूक्ष्म कारण) शरीरोंका अधिष्ठान (मालिक) जीवहै सो साक्षीभी कहलाता है कूटस्थ है क्षीण नहीं होता इस लिये अक्षर है चित् कहिये चैतन्य है चित्ति ऐसाभी कहा जाताहै. जो प्रातिलोम्य अर्थात् जो शरीरधर्मोस विलक्षणता करके प्रकाशित हो सो प्रत्यक् है तथाहि सो दिखाते है कि जो (प्रातिलोम्पकरके) झूठे, जडदुःखात्मक अहंकारआदिकोंसे विलक्षण रहके सच्चिदानंद स्वरूपसे प्रकाश होवे सो प्रत्यक् आरमा है इति ।। तथाचाहंकारोनात्मा देहोनात्मा इंद्रियाणिनात्मा इत्येवं निकृष्टाहंकारादिचैतन्यं प्रत्यगित्यर्थः। शरी- रद्वयोपादानव्यश्यज्ञानकल्पनाधिष्ठानत्वाच्छरीर- त्रयाधिष्ठानम्॥स्वाध्यस्तान पदार्थान् साक्षावृत्ति- व्यवधानं विना अपरोक्षेणेक्षते प्रकाशयतीति साक्षी॥ भा०-तथाच इति-अहंकार आत्मा नहीं है देहमी मात्मा नहीं है ई. द्रियभी आत्मा नही है ऐसे जो निकृष्ट अहंकारादिकोंमें चैतन्य प्रका- शता है सो प्रत्यक है और दो (सूक्ष्म, कारण,) शरीरोंका उपादान अ. र्थात् जो मादि कारण (व्यष्टि) सब विश्वका अज्ञान है तिसकी कल्पनाका अधिष्ठान होनेसे तीनों शरीरोंका अधिष्ठान (स्थान) है और अपने में (अध्यस्त) प्राप्तभये पदार्थोको साक्षात्, वृत्तिके व्यवधान विना अर्थात् निरंतर वृत्ति करके (अपरोक्षण) साक्षात् करके देखता है इस लिये साक्षी है. कूट. (धन) की तरह जो निर्विकार करके ठहरे सो कूटस्थ कहिये ऐसा विवेक है. इति॥ ८ भाषाटीकासमेता। व्यष्टिस्थूलशरीरोपाधिक आत्मा, स्थूलसूक्ष्मकार- शरीराऽसमस्ताभिनिविष्टत्वाद्विश्वः सूक्ष्मशरीरम- परित्यज्य स्थूलशरीरप्रवेष्ट्रत्वाच्च विश्वः समस्त- व्यवहारकृतकत्वाव्यावहारिक: चिद्वदभासमान- त्वे सति चिल्लक्षणरहितत्वाच्चिदाभास इति व्यपदि- श्यते। व्यटिसूक्ष्मशरीरोपाधिक आत्मा तेजोमयांतः करणवृतिविशिष्टत्वात्तेजसिवासनायामहंममाऽभि- मानितया तृप्तो भवति इति व्युत्पत्तेश्चतैजसः प्रतीतिकालमात्रे विद्यमानत्वात्प्रातिभासिकः अ- ज्ञानकाय॑निद्राशक्तिकल्पितत्वात्स्वप्नः कल्पितः इति व्यपदिश्यते॥ भा-व्यष्टि, संपूर्ण विश्वके अलग २ स्थूलशरीरकी उपाधिवाला आरमा जो है वह स्थूल, सूक्ष्म, कारण, इन तीनों शरीरोंका अभिमानी होनेसे विश्व संज्ञक कहलाता है और सूक्ष्मशरीरको विनाही त्यागे हुए स्यूलशरीरमें प्रवेश रखता है इस लिये भी विश्व संज्ञक कहाता है-सं- पूर्ण व्यवहार करनेवाला होनेसे व्यवहारिक है. चित् चैतन्य, भासमान होनेसे भी, चित् चैतन्य ब्रह्मके, लक्षणोंसे रहित होनेसे चिदाभाप्त भी कहते हैं, व्यष्टिके सुक्ष्म शरीरकी उपाधिवाला आत्मा तेजमय अंतःकर- णकी वृत्तिसे विशिष्ट (युक्त) रहनेसे और तेजलि अर्याद वासनामें (मई) मेंहूँ (मम) मेराहै ऐसे अभिमान करके तृप्त रहता है ऐसी व्युत्पत्ति करके उसे तैजस कहते हैं. प्रतीतिकाल मात्रमें विद्यमान होनेसे प्रातिभासिक कहते हैं और अज्ञानका कार्य निद्रशक्तिकल्पित होनेसे वही स्वम- कल्पित होता है अर्थात् स्वप्न ऐसा भी कहा जाता है। व्यष्टय ज्ञानोपाधिक आत्मा शरीरद्धयोपादान- व्यष्टय ज्ञानतत्कार्यावभासकवादस्पटोपाधि- . (२०) वेदांतसंज्ञा। तया अनतिप्रकाशकत्वात्प्रज्ञारूपचैतन्यं प्रधान पुरुपत्वाच्च प्राज्ञःअवस्थात्रयानुस्यूततया विद्यमान- त्वात् पारमार्थिकः । अविद्याहंकारदेहाद्युपाधिपरि च्छिन्नत्वेन भासमानत्वावच्छिन्न इति व्यपदिश्यते स्थूलं सूक्ष्मं कारणं इतिशरीरत्रय॥३॥जाग्रत्स्वमसु पुप्त्यवस्था इत्यवस्थात्रयम् ॥४॥ मनोकायानि विविधकारणानि॥६॥पुण्यपापमिश्रकर्माणि कर्मत्र. यम् ॥६॥ पुण्योत्कर्पपुण्यमध्यमपुण्यसामान्यानीति पुण्यकर्मत्रयम् ॥७॥ भा०-व्यष्टिके, संपूर्णजीवोंके अज्ञानकी उपाधिवाला जो मात्मा सो दो शरीरोंका जो उपादानकारण व्यष्टिका अज्ञान है तिमके कार्य- को ( अवभासक ) प्रकाश करनेवाला होनसे और स्पष्ट उपाधि करके अत्यंत नही प्रकाशक होने से (प्रज्ञा,) बुद्धिरूप चैतन्य है सोही प्रधान पु- रुप है, इसलिये प्राज्ञ कहलाता है और तीनों अवस्थाओंमे ( सईमें जैसे तागा पुपा रहता है )तछे अनुस्यूतता करके विद्यमान रहनेसे पारमार्थिक है. अविद्या, अहंकार देह इन उपाधियोंसे (परिच्छिन्नल)अल्पज्ञ रहता हुआ भासमान होनसे अवच्छिन्न ऐसा भी कहा जाता है स्थूल १ सूक्ष्म २ कारण ३ ये तीन शरीर जानों॥३॥ जाग्रत् १ स्वप्न २ मुपुति ३ य तीन अवस्था है।सामन, वचन, शरीर, ये तीन करण अर्यात् इन कर: के दिया जाता है|५||पुण्य, पाप, पुण्यपापसे मिलेहुए कम ऐसे तीन प्रकार कम है।।६।।पुण्योरप पुण्यामध्यम पुण्यसामान्य, एमे तीन तो पुण्यकर्म है। पुण्योत्कर्परूपकर्मणः हिरण्यगर्भशरीरप्राप्तिः फलं पुण्यमध्यमरूपकर्मणः इन्द्रादिशरीरप्राप्तिःफलं पुण्य- .
(२१). भाषाटीकासमेता। सामान्यरूपकर्मणः यक्षरक्षआदि शरीरप्राप्तिः फलं पापोत्कर्पपापमध्यमपापसामान्यानीतिपापकर्मत्र- • यम्।।८पापोत्कर्पस्यपरतापकर गुच्छगुल्मवृश्चिक यूकवनमक्षिकादिशरीरप्राप्तिः फलं पापमध्यम- स्य आम्र- पनस- नारिकेल- महिप्यऽश्वगर्दभादि शरीप्राप्तिःफले पापसामान्यस्य गोगजाश्वत्थतुल स्यादिशरीरप्राप्ति फलं मिश्रोत्कर्ष- मिश्रमध्यम मिश्रसामान्यानीति मिश्रकर्मवयम् ॥ ९॥ भा-पुण्योत्कर्ष अर्थात् विशेष पुण्यवाले कर्मका फल यह है कि हिरण्यगर्भ ब्रह्माके शरीरकी प्राप्ति होवे, मध्यम पुण्यवाले कर्मका फल, इंद्रादि शरीरप्राप्ति होना, सामान्य पुण्यवाले कर्मका फल यक्ष राक्षस आदि शरीर प्राप्ति होना है-पाप उत्कर्प, पाप मध्यम, पाप सामान्य, ऐसे तीन पापकर्म हैं ॥ ८॥ पापउत्कर्ष, विशेषपापवाले कर्मका फल अन्यको दुःसदायी, (कंटकादिसे युक्त) गुच्छा, (गुल्म) योहरसरीखा, वीछू जूम धनकी मांखी इत्यादिकोंकी शरीरकी प्राप्ति है पाप मध्यम फर्मका फल आम फालसा नारियल. वृक्ष भैस घोडा गधा आदि शरीर माप्त होना है, सामान्य पापवाले कर्मका फल गौ हस्ती पीपलवृक्ष, तुलसी इत्यादिक शरीरकी प्राप्ति है-मिश्र उत्कर्प, मिश्र मध्यम, मिश्र सामान्य , ऐसे तीन यकारके मिश्रकर्म हैं ॥९॥ मिश्रोत्कर्पस्यनिष्काम कर्मानुष्ठानादि-निर्विकल्प- कसमाधिपर्यंतयोग्यशरीरप्राप्तिःफलं मिश्रमध्य- मस्य स्वाऽऽश्रमोचितकाम्यकर्मयोग्यशरिप्राप्तिः फलम् । मिश्रसामान्यस्य चांडालव्याधादिशरीर प्राप्तिःफलं मनोवाकायभेदेन कामांदिप्रेरितमनो- ' (२२) वेदांतसंज्ञा। वाकायकृतकर्मोत्कर्पादिभेदेन कर्मतत्फलं चाने- कविधमितिज्ञातव्यम् ॥ इच्छाप्रारब्धं परेच्छामां- रब्धम् अनिच्छाप्रारब्धमिति प्रारब्धत्रयम् ॥१०॥ तद्यथा स्वेच्छाकृतं भिक्षाटनादि । समाध्यवस्थायां शिष्यादिदीयमानमन्नादिकं परेच्छाकृतं । समाध्यव- स्थायांव्युत्थानदशायां वा आकाशफलपातवदक- स्मान्जायमानं पापाणपतनकंटकवेधादिकंमनि- च्छाकृतम् ॥ भा०-मिश्रोत्कर्ष विशेषामिले हुए उत्तम कर्मको फल निष्कामकर्म के अनुष्ठानमें निर्विकल्प समाधिपर्यंत जो योग्य होवे ऐसा शरीरकी प्राप्ति होना और मिश्र मध्यम कर्मका फल अपने आश्रमके योग्य काम्य कर्म करने लायक शरीरकी प्राप्ति होना मिश्र सामान्य कर्मका फल चांडाल व्याध आदि शरीर प्राप्तहोना और मन वचन शरीर इनके भेदकरके काम आदिकी प्रेरणासे मन वचन शरीरसे किये कमौका उत्कर्ष आदि भेदकर जो कर्म किया जाताहै उसका फल अनेक प्रकारका होताहै ऐसे जानना।इच्छा प्रारब्ध १ परेच्छा प्रारब्ध २ अनिच्छा प्रारब्ध ३ ऐसे तीन प्रकारके प्रारब्ध है।॥१०॥सो ऐसे कि भिक्षा मांगना आदि अपनी इच्छाकृत मारब्ध १ समाधि अवस्थामें शिष्य आदि जो कछु अन्न आदि देते हैं वह परेच्छाकृत प्रारब्ध हैं २ और समाधि अवस्थामें अथवा जागत्में माकाशसे फल गिरनेकी तरह जो ऊपरसे पत्थर आदि गिरपडे अथवा कांटा आदि लगाव यह अनिच्छाकृत पारधभोगहै ॥ ३॥ भूतप्रतिवन्धो, वर्तमानप्रतिबन्ध, आगामिप्रतिवन्ध- श्चोत ज्ञानप्रतिवन्धकप्रतिवन्धवयम् ॥ ११ ॥ श्रवणमननादिकाले सर्वजडवस्तुसाक्षात्कारो भूत- . . भाषाटीकासमेता। (२३) प्रतिवन्धः । पापकर्मजनितकार्योन्नेयः वर्तमानप्रति- बन्धः । एकस्मिन्पुरुपे दयाविश्वासादिरूढशक्ति- जनकों यः प्रारब्धशेपः स आगामिप्रतिवन्धः । स तु जडभरतादिपु प्रसिद्धः । संयोगसमवाय आ- ध्यासिकस्तादाम्यसंवन्ध इति संबन्धत्रयम् ॥१२॥ अथवा कार्यकारणभावाविपयविपयिभावः, आधारा- धेयभावश्चेति संवन्धत्रयम्, अथवा पदयो सामानाधि- करण्यं पदार्थयोविशेषणविशेष्यभावः,प्रत्यगात्मल- क्षणयोर्लक्ष्यलक्षणभावश्चेति संवन्धत्रयम् ॥ ३॥ लक्षणंतत्त्वमस्यादिवाक्यमित्यर्थः॥ भा०-भूतप्रतिबंध १ वर्तमानप्रतिबंध २ आगामिमतिबंध ३ ऐसे ज्ञानके प्रतिबंधक ये तीन प्रतिबंध है ।।११॥ श्रवण मनन आदि कालमें संपूर्ण जड़ वस्तुओंका साक्षात्कार अनुभव रहना यह भूतमतिबंध है-पापकर्मसे उत्पन्न हुआ कार्य बढ़जावे यह वर्तमानप्रतिबंध है-किसी एक पुरुषमें दया विश्वास आदिसे आरूढशक्तिको-उत्पन्न करनेवाला जो अवशेष रहा प्रारब्ध है वह आगामि प्रतिबंध है सो तो जडभरत मा- दिकोंमें प्रसिद्ध ही है-संयोगसमवाय १ आध्यासिक २ तादात्म्य संबंध३, ऐसे तीन संबंध हैं ।।१२॥ अथवा कार्यकारणभाव १ विषयवि- पयिभाव २ आधाराधेयभाव ३ ये भी तीन संबंध कहे है; अथवा पदों २ में सामानाधिकरण्य १ पदार्थों में विशेषणविशेष्यभाव २ मत्यगात्मा और प्रत्यगात्माके लक्षणमें लक्ष्यलक्षणभाव संबंध ३ ऐसे तीन संबंध जानो। तत् त्वमसि इत्यादिक पाक्योंका लक्षण कहते है-इति ।। इदं तत्त्वमसीतिवाक्यं. संबन्धवयेणाऽखंडार्थवो- : धकं भवति । संवन्धत्रयं नाम पदयोः सामानाधि- . (२४) वेदांतसंज्ञा । करण्यं पदार्थयोः विशेषणविशेष्यर्भावःप्रत्यगात्म. लक्षणयोर्लक्ष्यलक्षणभावश्चेति । तदुक्तं च श्लोकः। सामानाधिकरण्यञ्च विशेपणविशेष्यतालक्ष्यलक्ष- णसंबन्धः पदार्थप्रत्यागात्मनाम्॥१॥इति|सामाना- धिकरण्यसंवन्धस्तावद्ययथा । सोयं देवदत्त इति वाक्ये तत्कालविशिष्टदेवदत्तवाचकशब्दस्य एत. कालविशिष्टदेवदत्तशब्दस्य चैकस्मिन्पिडे तात्प- >संबन्धः ॥ तथाच तत्त्वमसीतिवाक्ये परोक्ष- त्वादिविशिष्टचैतन्यवाचकतत्पदस्याऽपरोक्षत्वादि- विशिष्टचैतन्यवाचकत्वंपदस्य चैकस्मिश्चैतन्ये ता- त्पर्यसंवन्धः॥ विशेपणविशेष्यभावसंवन्धस्तु । भा०-सो यह तत् त्वमसि ऐसा वाक्य तीनों संबंधो करके (अखंड) पूर्ण अर्थका बोधक है संबंध तीन वेही प्रसिद्ध है पदोंमें सामानाधिकरण्यर पदार्थों में विशेषणविशेष्यभावर प्रत्यगात्मा और लक्षणमें लक्ष्यलक्षणभाव ३ १ भिन्न भिन्न शब्दयोरेकस्मिन्नर्थे प्रवृत्तिः सामानाधिकरण्यम् ।। २ व्या वर्तक विशेषणं व्यावर्त्य विशेष्य तथाच सोय देवदत्त इतिवाक्ये एव सशब्दवा- च्यो योसावेतत्कालतद्देशसमविशिष्टो देवदत्तपिंडः अय सइति तच्छन्दवा- च्यैतत्कालतद्देशसवधविशिष्टदेवदत्तपिडाद्भिन्नानेति यंदा प्रतीयते तदात- रछान्दार्थस्यायशन्दवाच्यार्थनिष्ठभेदव्यावर्तकतया विशेषणत्वमयशब्दार्थस्य त्या- वर्तकवाद्विशेष्यत्वम् । यदाच सइति तच्छन्दवाच्यतत्कालतद्देशविशिष्टो देवदत्तपिंडः सोयामितीदशब्दवाच्यादेतत्कालतद्देशसवधगिशिष्टादस्मापदन- पिंडान्न भिन्न इति यदा प्रत्तीयते तदा अयशब्दवाच्यस्य तच्छन्दानिष्ठभे- दव्यावर्तकतया विशेषणत तच्छब्दार्थस्य व्यवय॑त्वाद्विशेष्यत्व तथा अय स एवायमित्यन्योन्यभेदव्यावर्तकतया सोयशब्दार्थयोः परस्सरं विशेषण: विशेष्य इत्यर्थः ।
भाषाटीकासमेता। (२५) सो कहाभीहै श्लोकार्य:- सामानाधिकरण्य १ विशेषणविशेष्यभावरलक्ष्य- लक्षण ३ ऐसे ये ३ संबंध पदार्थोके और प्रत्यागात्माके रहतेहैं ॥१॥ सो सामानाधिकरण्य संबन्ध पहले कहते हैं जैसे-(सायं देवदत्तः) यह वहीं देवद- तहै इस वाक्यमें तिस पहले कालमें देखाहुआदेवदत्तके वाचक शब्दका और अब वर्तमानकालमें प्राप्तहुआ देवदत्त शब्दका एकही पिंडशरीर उसीशरीरमें तात्पर्यसंबंध है तैसे ही तत्त्वमसि इस वाक्यमें परोक्षत्व आदि विशिष्ट जो चैतन्य (ब्रह्म) का वाचक तत् पद है उसका और जो अपरोक्षत्व (प्रत्यक्ष) आदि विशिष्ट (त्वंके) चैतन्यका वाचक जो पद है उस- का एकही चैतन्यमें तात्पर्य संबंधहै । इति । और विशेषणविशेष्यभाव संबं- ध तो आगे कहतेहैं। यथातत्रैववाक्ये सशब्दार्थतत्कालविशिष्टदेवद- त्तस्याऽयंशब्दार्थे तत्कालविशिष्टदेवदत्तस्य चा- न्योन्यभेदव्यावर्तकतया विशेषणविशेष्यभावः तथा तत्त्वमसीतिवाक्यपि तत्पदार्थपरोक्षत्वादिविशिष्ट चैतन्यस्य त्वंपदार्थाऽपरोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्यस्य चान्योन्यभेदव्यावर्तकतयाविशेषणविशेप्यभावः ।। लक्ष्यलक्षणसंबंधस्तु यथा तत्रैववाक्ये सशब्दायं शब्दयोस्तदर्थयोर्वा विरुद्धतत्कालैतत्कालवि- शिष्टत्वपरित्यागेनाऽविरुद्धदेवदत्तेन सह लक्ष्य- लक्षणभावः॥ भा०-जैसे तहां ही वाक्यमें सशब्दका अर्थ तत्कालविशिष्ट जो देव दत्त है उसका और (सोयं) अयं शब्दका अर्थ जो एतत्कालविशि देवदत्त है उसका आपसमें भेदकी निवृत्ति होनेसे विशेषणविशेष्यभाषा तैसे ही तत् त्वमसि इस वाक्यमें तत्पदका अर्थ परोक्षत्वादिविशिा
(२६)
वेदांतसंज्ञा।
चैतन्यका और त्वंपदका अर्थ अपरोक्ष (प्रत्यक्ष) त्वं आदि विशिष्ट वे
तन्यका भेदकी (व्यावर्तकता,) निवृत्ति होनेसे विशेषण विशेप्यभा
संबंध है । लक्ष्यलक्षणसंबंध तो जैसे तिसी ( सोयं देवदत्तः) वाक्यां
सशब्द और अयं शब्द अथवा तिनके अर्थका विरुद्ध तत्काल और एतत
कालविशिष्टत्व धर्मके परित्याग करके अविरुद्ध देवदत्तकी साथ अर्याद
सोर्य देवदत्तः इस वाक्यमें (स अयम्) इन शब्दशब्दकाभेदहे देवदत्तक
अभेदहै इस लिये यहां लक्ष्यलक्षणभाव संबंध है।
तथाऽत्रापि तत्त्वंपदयोः तदर्थयोर्वाविरुद्धपरोक्ष-
त्वादिविशिष्टत्वपरित्यागेनाऽविरुद्ध चैतन्यन सह
लक्ष्यलक्षणभावः।इयमेव जहदऽजहल्लक्षणा अपर-
पर्याय एकांशपरित्यागेन एकांशस्य ग्रहणं भाव-
लक्षणेत्युच्यते ॥ आध्यात्मिकं आधिभौतिकमा-
धिदैविकं चेति तापत्रयम्।।१४|आध्यात्म्यमाधिभू-
तमाधिदैवतमित्यध्यात्म्यादित्रयम्।।१६॥ आरंभप-
रिणामविवाःकारणत्रयम् ॥१६॥
भा०-तैसे यहां भी तत्त्वं इन पदोंका अथवा इनके अोंका जो
विरुद्ध परोक्षत्व आदि विशिष्टस्य धर्म है उसके परित्याग करके आविरुद्ध
चैतन्यके साथ अर्थात् जैसे तत् त्वं इन पद पदाथोंका भेद है चैतन्य
वही है इसलिये यहां लक्ष्यलक्षणभाव. संबंध है-यही जहत् मजहत
लक्षणा होती है। यह दूससधि है कि एक अशफा' परियामा करके
एक अंशका जहां ग्रहण हो सो भावलक्षणाभी कहलाती है-आध्यात्मिकर
आधिभौतिक २ आधिदैविक ३ येतीन ताप है १४-आध्यात्म्य आधि-
भूत २ आधिदैवत ३ ये अध्यात्म आदि तीन कहे है १५-और-आई.
में १ परिणाम २ विवर्त ३ ऐसे तीन कारण हैं ॥१६॥
भाषाटीकासमेता। (२७) यथा दुग्धमेवदंध्याकारं विपरिणमते तथा प्रकृतिप्र- धानशब्दवाच्यामायैव जगदाकारं परिणामंगता इति प्रक्रिया सांख्यानांमते परिणामवादः॥ यथा बहुमृत्कणिकासमिलितोघटोयथा बहुतंतुसंमिलितः पटस्तथावह्वणुसंमिलितं सत्जगदुत्पद्यते इति नै- यायिकानांमते ॥ आरंभवादः चिद्विवर्त्तश्चिदेव इति वेदांतिकानांमते विवर्तवादः । सत्वरजस्तमांसीति गुणवयम् ॥ १७॥ भा-जैसे दूधही दहीके आकार विकारको प्राप्त हो जाता है तैसेही प्रकृति प्रधान, इन शब्दोंसे वाच्य मायादि जगत्के आकार हो विकारको प्राप्त हो रही है ऐसी यह प्रक्रिया सांख्यवालोंके मतमें है यही परिणाम वाद कहलाता है।जैसे बहुतसी मृत्तिकाकी किणकोंसे मिलके घट होता है और जैसे बहुत (तंतु ) तागोंसे (पट) वस्त्र होता है तैसे बहुतसे अणुवोंसे मिलके जगत् उत्पन्न होता है ऐसे नैयायिकोंके मतमें आरंभबाद है। (चित् ) चैतन्य ब्रह्मका विवर्त (आभास ) (विब) ( चित् ) ब्रह्म स्वरूपही है ऐसे वेदांतियोंके मतमें विवर्तबाद है-सत्वगुण रजोगुण , तमोगुण ये तीन गुण है १७॥ प भूतभविष्यद्वर्तमानकालाः कालवयम् ॥ १८॥ झविष्णुमहेश्वराः मूर्तित्रयम् ॥ १९ ॥ ज्ञाताज्ञानं क्षेयं ज्ञानादियम् ॥२०॥ एतदेवत्रिपुटीत्युच्यते। बयाणां पुटानां प्रकाराणां ज्ञात्रादीनां समाहारः त्रिपुटीत्यर्थः । स्थूलप्रपंचः सूक्ष्मप्रपंचः कारणा- पंचश्चेति प्रपंचत्रयम् ॥२१ ॥ पातालमर्त्य स्वर्गाः (२८) वेदांतसंज्ञा लोकत्रयम् । एतदेव जगत्रयमितिचोच्यते ॥२२॥ संशयाऽसंभावनाविपरीतभावना ज्ञानप्रतिबंधकत्र- 'यम् ॥ २३ ॥ लोकवासना देहवासना शास्त्रवास- ना चेति वासनात्रयम् ॥ २४ ॥ श्रवणमनननिदि- ध्यासनानि श्रवणादित्रयम् ॥ २५ ॥ भा-भूत, भविष्यत् वर्तमान, येतीन काल है। १८प्रह्मा,विष्णु, महेश्व- र, शिव ये तीन मूर्ति है।।१९।।(ज्ञाता, जानने वाला, ज्ञान, २ (क्षेप ) जानने योग्यपदार्थ ये तीन ज्ञात्रादिक है ॥२०॥ यही त्रिपुटी कहाती है तीन पुटोंका ( ज्ञाता आदि प्रकारोंका जहां संचय हो सो त्रिपुटी कहिये स्थूल प्रपंच, सूक्ष्म प्रपंच, कारण प्रपंच, ऐसे तीन प्रकारका प्रपंच होता है ॥ २१ ॥ पाताल, मृत्यु, स्वर्ग ये तीन लोक है यही जगत्रय कहलाता है॥२२॥संशय,१असंभावना २ विपरीतभावना ३ येतीन ज्ञानके प्रतिबंध कहै ॥२३॥ लोकोंकी घासनारदेहकी वासना,२शास्त्रकी पासना ३ ये तीन वासना है- ॥ २४ ॥ श्रवण १ मनन २ निदिध्यासन "ये तीन श्रव• णादिक है ॥ २५ ॥ सर्वसंशयनिवर्तकंश्रवणम् ।मननं मनसंभावनानिव- तकम् ॥ निदिध्यासनं तु विपरीतभावनानिवर्तक- मिति विवेकः॥ज्ञानं वैराग्यमुपरतिश्चेति ज्ञानादि- त्यम् ॥ २६ ॥ हेतुस्वरूपकार्याणि हेत्वादिय- म् ॥ २७॥ ज्ञानस्य हेतुः श्रवणादित्रयम् । अहं देहेंद्रियायतिरिकः साक्षी प्रतीयमानप्रपंचोप्यंसत्य इति दृढनिश्चयोज्ञानस्य स्वरूपम् । अत्रनिश्चयस्य दाढय नाम संशयादिराहित्यम् ॥
-
,
.
भाषाटीकासमेता।
(२९)
भा०-संपूर्ण संदेहोंकी निवृत्ति करै ऐसा श्रवण कहा है. मनकी
भावना ( संशय ) को निवृत्त करनेवाला मनन है, और निदिध्यासन
मतों विपरीतभावनाको दूर करनेंका है ऐसा विवेक है ॥ ज्ञान , वैरा-
य, उपरति, ये तीन ज्ञान आदिक है।॥२६॥-हेतु १ स्वरूप २ कार्य ३
रे तीन हेत्वादिक कहाते है।॥२॥(जैसे ) ज्ञानके हेतु श्रवणादिक तीन
श्रवण १ मनन २ निदिध्यासन ३ , है(अहं) में देह , इंद्रिय , आदि-
कोंसे न्यारा साक्षीहूं (प्रतीयमान ) यह दीखता हुआ सब प्रपंचभी
मसत्य है ऐसा दृढ निश्चय ज्ञानका स्वरूप है। यहां निश्चयकोभी जो
दृढपना कहा है सो संशय आदि रहित निश्चयका नाम जानना।
अनात्मस्वात्मत्वबुद्ध्य भावोज्ञानकार्यमिति विवे-
कावैराग्यस्य हेतुर्विषयेषु दोपदृष्टिः।वांताशनवद्धे-
यतावुद्धिः स्वरूपं पुनराशाऽभावः कार्यामिति
भावनीयम् । उपरतेहेतुः यमनियमादि ॥ चित्तनि-
रोधः स्वरूपं सर्वव्यवहारनाशः कार्यमिति हेतु
स्वरूपका-णि ज्ञानवैराग्योपरतीनां विज्ञेयानि ॥.
• वैराग्यस्याऽवधिब्रह्मलोकतृणीकारः। अज्ञानकालेदे-
हादावात्मत्वविपयिणी दृढा बुद्धिर्यथातथा तदप्रती-
तिपूर्वकमहं ब्रह्मेति दृढनिश्चयः बोधस्यावधिः॥
भा०-देह आदिक, अनाम वस्तुओंमें अपने आत्मापनकी बुद्धिका
अभावको ज्ञानका कार्य कहते है ऐसा विवेक है-वैराग्यका हेतु यह है,
विपयोंम दोषकी दृष्टि करना और वमन किये हुए भोजनकी तरह
विषयोंके त्यागकी बुद्धि वैराग्यका स्वरूप है, फिर भी आशा नहीं करनी
यह कार्य है ऐसे विचारना-उपरतिका हेतु यम नियम आदि हैं और
स्वरूप (चित्तनिरोध) चित्त वशमें करना है-संपूर्ण व्यवहार चेष्टाका
.
, (३०) वेदांतसंज्ञा। नाश करना (उपरतिका) कार्य है-इस प्रकारसे ज्ञान, वैराग्य, बंपरा इनके हेतु, स्वरूप, कार्य, जानने ॥ वैराग्यकी अवधि ब्रह्मलोकपर्य तृणवत् समझना और अज्ञानकालमें जो देह आदिकॉमें (मात्मत्व आत्मापनके विषयवाली दृढ बुद्धि होजावे तब जैसे तैसे उसको दू करके(महं ब्रह्म) मैं ब्रह्मस्वरूपहूं ऐसा दृढ निश्चय करना यह बोधर्क अवधि है- सुपुप्तिवत्समस्तवस्तुविस्मृतिरुपरतेरवधिरितिविज्ञ यम् । प्राणनिग्रहोपाया रेचकपूरककुंभकाम्प्रा- णायामत्रयम् ॥२८॥नेत्रधम्मोऽऽध्यमांद्यपटुत्वान्यां.. ध्यादित्रयम् ॥२९॥ सहजतादात्म्यं कर्मजन्यता- दात्म्यं भ्रांतिजन्यतादात्म्यमिति अहंकारस्य चि- च्छायादेहसाक्षिभिस्तादात्म्यत्रयम् ॥३०॥ तत्र चिच्छायया सह यदहंकारस्य तादात्म्यं तत्सहजम्। यच्च देहेन सह अहंकारस्य तादात्म्यं तत्कर्मजम् ॥ यत्साक्षिणा सह तद्रांतिजम् ॥ भा०-सुपुति अवस्थाकी तरह . संपूर्ण वस्तुओंकी विस्मृत्ति होना उपरतिकी अवधि है ऐसे जानना-प्राणोंका निग्रहके उपाय रेचक, पूरक कुंभक, ये तीन प्राणायामहै।।२८॥नेत्रके धर्म (आध्य) अंधापन (मांद्य) स्वल्पदीखना (पटुत्व,) अच्छी तरह दीखना, ऐसे ये तीन है ॥२९॥ सहजतादात्म्य, कर्मजन्य तादात्म्य, भ्रांतिजन्यतादात्म्य ऐसे अहं. कारके (चिच्छाया) चिदासा देह, साक्षी, इनके साथ तीन तादात्म्या संबंध रहते है ॥३०॥ तहां विच्छायांक साथ जो अहंकारका तादाम्य संबंध है सो सहज कहाहै, और देहके साथ जो अहंकारका तादात्म्य संबंध है सो कर्मज अर्थात् काँसे हुआ है, और साक्षी अर्थात् जीव .
भाषाटीकासमेता। संज्ञक आत्माके साथ जो अहंकारका संबंध है सो भ्रांतिज अर्थात् भ्रांति करके हो रहा है। अथास्य निवृत्तिः॥ संबंधिनोः चिच्छायाहंकारयोः सतोः विद्यमानयोः सहजस्य निवृत्तिन भवति संबं- धिनाशे निवृत्तिरस्तीत्यर्थः॥ यथा शरावोदकनि- मित्तोदयस्य सवितृप्रतिविवस्य शरावोदकनिवृ- त्या निवृत्तिवदित्यर्थः। यत्तु शरीराहंकारयोस्तादा- त्म्यं तत्कर्मक्षयान्निवर्तते यश्च आत्माहंकारयोस्ता- दात्म्यं तत्प्रवोधानिवर्तते।ब्रह्मात्मतत्त्वसाक्षात्कारा- विविधमपितादात्म्यं युगपदेवनिवर्तते ॥ भा०-अब इस (साक्षी) जीवकी निवृत्तिको कहते हैं-कि संबंधवाले चिच्छापा) चिदाभास और अहंकार इन दोनुओंके साक्षात् विद्यमान हुए इन्ते सहज जो संबंध है उसकी निवृत्ति नहीं होगी और जब संबंधवालोंकी नेवृत्ति होजागी तब निवृत्ति होजावेगी; जैसे कि-सराईमें पाले हुए जलके निमित्त करके उदय हुए सूर्यके प्रतिबिंबका नाशसराईके जलकी निवृत्ति होनेसे होता है तैसे ही (यह सहज संबंध अहंकारके नाश होने से होगा) और जो शरीरके संग अहंकारका वादात्म्य संबंध है वहतो कर्म नष्टहोते ही निवृत्त होता है और ब्रह्म आत्मतत्वकें साक्षात्कार होनेसे तो यह तीनों प्रकारकाही तादात्म्य संबंध एकहीवार (निवृत्त) दूर हो जाता है । अज्ञानादेवाहमित्यात्मपरिच्छेदो भवति प्रबोधेनाs ज्ञाननिवृत्तावपरिच्छिन्न एवात्माहमिति चोच्यते । पुत्रैपणा वित्तैपणालोकैपणा चेत्येपणात्रयम्॥३१॥ सुषुप्तिमू समाधयः सुपुप्त्यादिवयम्॥३२॥विप- यासक्तिः १ प्रज्ञामांद्य २ कुतर्कः ३ विपर्यायदुरा- वेदांतसंज्ञा। ग्रह ४श्चेतिज्ञानेवर्तमानप्रतिबंधकचतुष्टयम् ॥१॥. विपयेरूढासक्तिर्विपयासक्तिः। वोधितस्यार्थस्य बु याऽग्रहणं प्रज्ञामांद्यम् ॥ भा०-अज्ञानसेही (अहं। मेहूं ऐसा आत्मासे (पीच्छे३) अलग होता है, जब(प्रयोध) ज्ञान होता है तब अज्ञानकी निवृत्ति में (अपरिरिकर) परि- च्छेदरहित ही में (आत्मा) ब्रह्मई ऐसा कहा जाता है । पुरणा र वित्तधनकी एपणा(इच्छा)लोकवीएपणा ऐठे ये तीन एपना अर्थात् इच्छा है॥३१॥सुपुति मूर्छा समाधि ये सुपुति आदि तीन अवस्थाहै।। ३२॥विषया- सनि १ प्रज्ञामांद्य २ कुतर्क ३ विपर्षपदुरामह ४ ये चार बानविणे वर्तमान प्रतिबंधक रहते है-१ विषयमें कट लगी हुई मासति रहना पह विषयासक्ति है, और (पोधित) पोध कराये हुए मर्थका भी मुद्धि करके ग्रहण नहीं करना यह प्रज्ञामांय कहलाता है। प्रतिपादितस्यार्थस्य विपरीतग्रहणं कुतकः । अहं श्रोत्रियः पंडितोऽहं विरक्तोऽहमिति देहद्रियादीवात्म- त्वबुद्धिर्विपर्ययदुराग्रहः । शमादिपटकेन विपयास- क्तनिवृत्तिः श्रवणेन प्रज्ञामांद्यस्य मनने । कुतर्कस्य निदिध्यासनेन विपर्ययदुराग्रहस्येति विवेकः । प. मार्थकाम मोक्षाः पुरुषार्थचतुष्टयम् ॥२॥ जाति- गुणक्रियासंबन्धाः शब्दप्रवृत्तिनिमित्तचतुष्टयम् । ३ शब्दप्रवृत्तिनिमित्तानां तेषां ब्रह्मण्यऽसत्वेन त. स्मिन् शब्दाऽप्रवृत्तिरिति विभावनीयम् ।। भावहे हुए नर्थको (विपरीत) उघटे मासे अहम करवाई १५पागो:शुपातिपत्र नाति गुण प्रिया समधात सर्वप्रथम् । .
भाषाटीकासमेता। (३३) म्हातारे-में विद्वान् हूँ (पंडित) ज्ञानवान् हूँ विरक्त हूं ऐसा देह मंद्रिय मादिको विपे आत्मत्व बुद्धि करना यह विपर्यय दुराग्रह कहाताहै. शम मादिक छहो करके विषयासक्तिकी भिवृत्ति होती है, श्रवण करके प्रज्ञामां- द्यकी निवृत्ति, मनन करके कुतर्ककी, निदिध्यासन करके विपर्यय दुरा- ग्रहकी निवृत्ति होतीहै ऐसा विवेकदै ३ । धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, यह पुरुषार्थचतुष्टय, चार पुरुषार्थ है २ | जाति, गुण, क्रिया, संबंध, ये चार शब्दकी प्रवृत्तिमे निमित्त है ।इनशब्दप्रवृत्तिनिमित्तोका ब्रह्ममे अभाव है इस लिये तिस ब्रह्मविषे शब्दाप्रवृत्ति अर्थात् शब्दकी प्रवृत्तिही नहीं है ऐसी (भावना) विचारना चाहिये । ब्रह्मक्षत्रियवैश्यशूद्रा इति वर्णचतुष्टयम् ४ । ब्रह्म- चर्याश्रमः गृहस्थाश्रमः वानप्रस्थाश्रमः यत्या- श्रमश्चेत्याश्रमचतुष्टयम् ५। नित्यानित्यवस्तुविवे- कः इहामुत्रार्थफलभोगविरागः शमांदिपसंपत्तिः मुमुक्षुत्वं चोत साधनचतुष्टयम्६ । विषयप्रयोजन- संबन्धाऽधिकारिणः अनुबन्धचतुष्टयम् । तद्यथा साधनचतुष्टयसपनप्रमाताधिकारी, विपयोजीवब्रह्मे- क्य, शुद्धं चैतन्यं प्रमेयम् तत्रैव वेदांतानां .तात्प- र्यात् । संबन्धस्तु तदैक्यप्रमेयस्य तत्प्रतिपादको- पनिपत्प्रमाणस्य च बोध्यबोधकभावलक्षणः इति॥७॥ भा०-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये चार वर्णहै ब्रह्मचर्य आश्र- म १ गृहस्थाश्रम २ वानप्रस्थाश्रम ३ यति आश्रम ये चार आश्रमहे । नित्य अनित्य वस्तुका विवेक, इसलोक और परलोकके फलभोगोंका त्याग, शम आदिक छहसंपत्ति, मुमुक्षुत्वधर्म, ये चार साधन (साधन चतुष्टय) है हविषय, प्रयोजन, संबंध, अधिकारी यह (अनुवंधचतुष्टय) .
(28) वेदांतसंज्ञा। चार अनुसंधहै ६। सो ऐसेहै कि इन चार साधनोंसे युक्तहुआ (प्रमांत) मुमक्षुजन अधिकारी है जीवब्रह्मकी ऐक्यता यह विषयहै, शुद्ध चतन्य परमात्मा प्रमेयहै, तहांही घेदान्तशालीका तात्पर्य होनेसे संबंधतो तिस जीवकी अरु प्रमेयकी ऐक्यताका और तिस ऐक्यताको प्रतिपादन करने वाले वेदप्रमाणका योध्योधकमावलक्षण है.|| ७॥ इति । प्रयोजनं तु तदेक्यप्रमेयगताऽज्ञाननिवृतिः स्वरूपा- नंदावाप्तिश्च मनोबुद्धयाहंकारचित्तान्यन्तःकरणच- तुष्टयम् ८ । संकल्पाध्यवसायाऽभिमानाऽनुसंधा- नानि संकल्पादिचतुष्टयम् १ । संकल्पवृत्तिरूपेण परिणतमंतःकरणं । मनः । मननात्मकं वा मनः । संकल्पवृत्तिहेतुर्वा मनःसंकल्पः१ निश्चयाख्यवृत्ति- रूपेण परिणतमंतःकरणं बुद्धिः निश्चयात्मिका वा बुद्धिः । निश्चयहेतुर्वा बुद्धिः अध्यवसायः २ अभिमानवृत्तिरूपेण परिणतांतःकरणमहंकारः अ-, भिमानात्मको वाऽभिमानकरो वा ३ पूर्वोत्तरानुसं- धानरूपवृत्तिमदंत करणचित्तमअनुसंधानात्मकंवा अनुसंधानकर वाऽनुसंधानम् ४ ॥ भा०प्रयोजन तहां तिस जीवब्रह्मकी ऐक्यता, ( प्रमेय ) शुद्ध चैत- न्यमें प्राप्त हुए अज्ञानकी निवृत्ति और अपनें स्वरूप आनंदकी प्राप्ति है मन बुद्धि, अहंकार, चित्त, यह अंतःकरणचतुष्टय, अर्थात् चार प्र- कारका अंत:करण है वासंकल्प १ अध्यवसायर अभिमान ३ अनुसंधा- न ४ ये चार संकल्प आदिक है ९ -संकल्पवृत्तिरूप काके विकारको प्राप्त हुआ अंत करण मन होना, अथवा मननरूप मन वृत्तिका हेतुरूप मन संकल्प कहलाता है १ निश्चय नामक वृत्तिरूप अथवा संकल्प (३५) ॥ भाषाटीकासमेता। करके विकारको प्राप्त हुई तकरणबुद्धि अथवा निश्चयारिमका वृद्धि अयंका निश्चयका हेतुरूप बुद्धि अध्यवसाय कहलाता है २ अभिमान वृचिरूप करके विकारको प्राप्त हुआ अंत:करण, महंकार अथवा मभि- मानं स्वरूप अहंकार अथवा अभिमानको करने वाला अहंकार अभि- मान है ३ पूर्व उत्तरका अनुसंधान रूप. वृत्तिवाला अंत:करण चित्त अथवा अनुसंधानात्मक अर्थात् ऐसे काना एवं विचारात्मक अथवा मनु- संधानको करनेवाला चित्त अनुसंधान है ॥ ४ ऋग्यजुःसामाथर्वाणः वेदाः वेदचतुष्टयम् ॥१०॥ प्रत्यक्षानुमानोपमानशन्दाः प्रमाणचतुष्टयम्॥११॥ लयविक्षेपकपायरसास्वादाः समाधिविघ्नचतुष्टयं- म् ॥ १२॥लयस्तावदखंडवस्त्वऽनवलंबनेन चित्त- वृत्तेनिद्रा, अखंडवस्त्वनवलंबनेन चित्तवृत्तेरन्याव- लंबनं विक्षेपः । लयविक्षेपाभावेपि चित्तवृत्तेरागा- दिवासनया स्तंभीभावादखंडवस्त्वनवलंबनं कपायः. अखंडवस्त्वऽनवलंबनपि चित्तवृत्तेः सविकल्पानं- दाऽऽस्वादनं रसास्वादः समाध्यारंभसमये. सचिक- ल्पानंदास्वादनं वा॥ मैची, करुणा, मुदितोपेक्षा मैन्यादिचतुष्टयम्.॥ १३॥ भाग १ यशु २ साम३ मयवेद ४ ये चार वेद है ॥ १०॥ प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शन्द, ये चार प्रमाणहै ॥१२॥ लय, विक्षेप, पाय, रसास्वाद, ये चार समाधिके विन।।:१२ ।। तहां (अगंड) परिपूर्ण वस्तुका ( बनवलंबन )आश्रय नहीकरनेसे चित्ती वृत्तिको (निद्रा) आलस्यहोना लय कहा है । अखंडवस्तु (ब्रह्म) का अवलं. बन नहीं करनेसे चित्तवी वृत्ति अन्यवस्तुका अवलंपन कालेवे यह विशेष (३६) वेदांतसंज्ञा। है २ लय विक्षेप इन दोनुषों के अभावमें भी राग (मेह) आदि वासना करके.चित्तकी वृत्तिका (स्तंभीभाव) बन्दहोनेसे रुकनेसे अखंड परंतु (ब्रह्म) का अवलंबन ( प्राधि) नहीं होना कपाय है ३ अखंडवस्तुके । अवलंबन (प्राप्ति) हुए विनाही चित्तकी वृत्तिको सरिकल्प आनन्द म र्थात् ब्रह्माहमस्मि इत्यादिक विकल्प भानन्दके स्वादको रसास्वार कहते हैं अथवा समाधिके आरंभसमयमेंही यह सविकल्प मानन्दक स्वाद होनेको रसास्वाद विघ्न जानो ४ | मैत्री १ करुणार मुदिता३ उपे क्षा ४ ये चार मैत्री आदिक हैं ॥ १३ ॥ जरायुजांडजस्वेदजोद्भिजानि भूतग्रामचतुष्टयम् ॥१४॥ ब्रह्मविदरवरीयोवरिष्ठा इति ब्रह्मविदादि- चतुष्टयम् ॥ १५ ॥ अन्नमयप्राणमयमनोमयविज्ञा- नमयनंदमयाः पंच कोशाः ॥१॥ श्रोत्रत्वचक्षु- जिह्वाघ्राणानि ज्ञानद्रियपंचकम् ॥२॥ शब्दस्प- रूपरसगंधाः शब्दादिपंचकम् ॥३॥चांपा- णिपादपायूपस्था कमंद्रियपंचकम् ॥ ४ वचना- 'दानगमनविसर्गानंदा वचनादिपंचकम् ॥६॥ प्राणा पानव्यानोदानसमानाः पंचप्राणाः ॥६॥ नागकू- मकृकलदेवदत्तधनंजयाः पंचोपचायवः ॥७॥ नि- त्यनैमित्तिकप्रायश्चित्तकाम्यनिपिद्धानि कर्मपंच- कम् ॥८॥ भाo-जरायुज, मंडल, . स्वेदज, उद्भिज, यह भूतमामचतुष्टय कहा ॥ १४ ॥ ब्रह्मवित् १ ब्रह्मविद्हर .२ ब्रह्मविद्वरीय ३ ब्रह्मविद्वरिष्ठ ५ ये ब्रह्मपित् आदि ५ हैं अर्थात उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है।॥ १५॥ अन्नमय. माणमय, मनोमय, विज्ञानमय, मानंदमय, ये पांच कोश हैं।॥१॥ C भाषाटीकासमेता (३७) श्रोत्र त्वचा २ चक्षु ३ जिह्वा ४ (. नासिका) घाण ५ ये पांच ज्ञान ई- द्विय है ॥२॥ शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध ये शब्दादिक पांच हैं (अर्थात् इन इंद्रियनके विषय हैं) ॥३॥ वाणी, हाथ, पैर, गुदा, लिंग, ये पांच 'कर्म इंद्रिय हैं ॥ ॥ वचन, आदान, (ग्रहण करना) गमन, निसर्ग (मलत्याग) आनंद, ये वचन आदिक पांच हैं अर्थात् इन कर्मईद्रियनके विषय है ॥५॥ प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, ये पांच माण हैं ॥ ६ ॥ नाग, कूम, कृकल, देवदत्त, धनंजय, ये पांच उपवायु हैं ॥ ७ ॥ नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त, काम्य, निषिद्ध, ऐसे पांच प्रकारके कर्म होते हैं ॥४॥ नित्यानि अकरणे प्रत्यवायसाधनानि संध्यावंदना- दीनि नैमित्तिकानि पुत्रजन्माउनुबंधीनि जातेष्टया- दीनि २ प्रायश्चित्तानि पापक्षयसाधनानि कृच्छ्रचां- द्रायणादीनि ३ काम्यानि स्वर्गादीप्टसाधनानि ज्यो- तिष्टोमादीनि निपिद्धानि नरकाद्यनिष्टसाधना-. नि ब्रह्महत्यादीनि इति विवेकः ॥ शब्दतन्मात्र- स्पर्शत्तन्मात्ररूपतन्मात्ररसतन्मात्रगंधतन्मात्राणि सूक्ष्मभूतानि पंच ९ पंचीकृतानि पृथिव्यप्तेनो- वाय्वाकाशानि पंच स्थूलभूतानि ॥१०॥ अहिंसा- सत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः पंचयमाः ॥ ११ ॥ शौचसंतोपतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि पंच नियमाः॥१२॥ १ आकाशवाम्याग्निजलपृथिव्य इति । २ पंचीकृतानीति द्विधा विधाय चककं चतुर्दा प्रथम पुनः स्वस्वेतरद्वितीयांशोजनापंच पंचते इति १ पंची- करणम् ॥
वेदांतसंज्ञा । (३८) भा०-जो कमकिनहीं करनमें दोषको सिद्ध करने वाले है ऐसे संध्या वंदन आदिक नित्यकर्म हैं ॥ १॥ और पुत्रके जन्म आदिके नियम वाले(जातेष्टि)जातकर्म आदि नैमित्तिक कर्म हैं॥२॥जो पापक क्षय करने वाले कृच्छ्रचांद्रायण आदि हैं वे प्रायश्चित्त कर्म है॥३॥स्वर्गादिक इष्ट साधक ज्योतिष्टोमयज्ञ आदिकर्म काम्यकर्म कहेहे ॥४॥ नरक आदि करे फलको सिद्ध करनेवाले ब्रह्महत्त्या आदिकर्म निषिद्ध कहेहै ॥ ५॥ ऐछ। विवेक है-शब्दतन्मात्र १ स्पर्शतन्मात्र २ रूपतन्मात्र ३ रसत- न्मात्र ४ गंधतन्मात्र ५ ये पांच सूक्ष्मभूत, (तत्त्वं ) है. पंची. करण किये हुए पृथिवी १ जल २ अनि ३. वायु ४ आकांश ५ ये पांच स्थूलभूत, (तत्य) कहलाते हैं।।१०॥ अहिंसा १ असत्य २ अस्तेय ३ ब्रह्म- चर्य ४ अपरिग्रह ५ ये पांच यम, (अर्थात् हिंसा न करना ॥ ११ ॥ १ असत्य न बोलना२ चोरी न करना३ ब्रह्मचर्य में रहना संग्रह न करना। शौच १ संताप २ तप ३ स्वाध्याय ४ (वेदका पठन पाठन) ईश्वरकी प्रार्थना ये पांच नियम है ॥१२॥ क्षिप्तं मूढं विक्षिप्तमेकायं निरुद्धमिति पंच भूमयः ।। १३ ॥ यल्लोकशास्त्रदेहवासनासु वर्तमानं चित्तं क्षिप्तभूमिका, निद्रातंद्रादिग्रस्त चित्तं मूढभूमिका, कदाचिज्ज्ञानयुक्तं चित्तं शिप्ताद्विशिष्टं तथा विक्षि- प्तभूमिका, तत्र क्षिप्तमूढयोः समाधित्वशकैव ना- स्ति, विक्षिप्ते तु समाधित्वशंका । इतरभूमिद्वये स- माधिएकाग्रेमनसि सद्भतमथै प्रद्योतयति प्रक्षिणो- तिचक्केशान् कर्मबंधनानि शथयति निरोधमभिमु- खीकरोतीति संप्रज्ञातो योगः एकाग्रभूमिका ।। भा-क्षिप्त १ सूढ.२ विक्षिप्त ३ एकार निरुद्ध ५ ऐसे ये पांच भूमिका ॥१३॥ जोलोक, शास्त्र देह इत्यादिकोंकी वासनामें चित्त वर्स: .
भाषाटीकासमेता। मान है वह क्षिप्तभूमिकाहै १ निद्रा आलस्य मादिकसे पित्त ग्रसितही रहता है यह मूढभूमिका है २ कभी ज्ञानयुक्त चित्त. होजानों और क्षिप्त- भुमिकासे कछु विशेष ( उत्तम ) ऐसी विक्षिप्त भूमिकाहै ३ तहां क्षिप्त और मूटभूमिकामें तो समाधि दोनेकी शंकाही नहीं है अर्थात् कभी नहीं होती है और विक्षिप्तभूमिकामें समाधिभावकी शंकाहै-और अन्य दो (एकाग्र, निरुद्ध) भूमी तो समाधिही है-एकाग्रमें प्राप्तहुआ मन, सत् मर्यको प्रकाशितकरै और क्लेशोंको नष्टकर, कर्मबंधनोंको शिपिलकर १ निरोधभावको सन्मुखकरै अर्थात्मन वशमें होवे ऐसा संप्रज्ञातयोग एकाग्र भूमिका कहीहै ॥ ४ ॥ सर्ववृत्तिनिरोधरूपाऽसंप्रज्ञातसमाधिःनिरुद्धभूमिका॥ नित्यप्रलयः अवांतरप्रलयः दैनंदिनप्रलयः ब्रह्मप्र- लयः आत्यंतिकप्रलयश्चेति पंच प्रलयाः॥ १४॥ प्राणिनांसुषुप्तिः नित्यप्रलयः ॥ चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणोदिनमुच्यते इति ब्रह्मण एकस्मिन्नहनि चतु- देशमनूनां चतुर्दशेंद्राणां. चाधिपत्यमेकस्याऽपगते अन्यस्य प्राप्ते सतिं आधिपत्यानुकूलपर्यतं तस्मि- न्समये चतुर्दशाऽवांतरप्रलया इत्युच्यते ॥ भा०-संपूर्ण वृत्तियोंका निरोधरूपवाली असंमज्ञात समाधि जो है वह निरुद्धभूमिका कहींहै । नित्य मलय, १ अवांतर प्रलय, र दैनंदिन प्र. लपा ३ ब्रह्ममलंय, ४ आत्यंतिम्भलय, ५ ऐसे ये पांच प्रलय हैं॥ १॥ प्राणियोंकी जो सुपुत्ति अवस्थाहै वह नित्यमलय कहीहै, और चार हजार युगोंका ब्रह्माजीका दिन होताहै ऐसे ब्रह्माजीके एक दिनमें चौदह मनुवोंका और चौदह इंद्रोंका आधिपत्य ( राज्य ) होता है सो एकके नाधिपत्य दूरहोने में दूसरेके प्राप्तहोने में तिस आधिपत्यके अनुकूलपर्यंत तिससमय चौदह भवांतर प्रलय होतीदे ॥ .
(४०) वेदांतसंज्ञा । तेपा नैमित्तिकप्रलय इति मन्वंतरप्रलय इति च सं. ज्ञा एतेषु युगप्रलयानामंतरभावः । ब्रह्मणः सुपुप्ति दैनंदिनप्रलयः॥ ब्रह्मणो नाशावस्था ब्रह्मप्रलयः तदानीमाकाशादिप्रपंचरहितं सज्ज्ञानमात्रं वर्तते, ब्रह्मप्रलयस्य महाप्रलय इति संज्ञा प्राकृतप्रलयः सुषुप्तिरिति च मुक्तावस्था आत्यंतिकालयः ॥ तत्समये अज्ञानस्य.सर्वात्मना अभावः इति पंच प्रलयाः॥ जीवात्मा परमेश्वराव भिन्नः आत्मनि प्रतीयमानं कर्तृत्वादिवास्तवं २ शरीरचयावच्छि- नात्मसंगी३ जगत्कारणत्वेन ब्रह्मणो विकारित्वं । कारणादिनस्य प्रपंचस्य सत्यत्वम् ५ इति पंच- भ्रमाः॥ १५॥ भा--तिनकी नैमित्तिक प्रलय, ऐसी और मन्वंतर प्रलय ऐसी संज्ञाहे, इन्होंमेंही युगप्रलयोंकाभी अंतरभाव जानलेना । ब्रह्माजीकी जो सुपुति (सोनेकी) अवस्था है वह दैनंदिन प्रलय है, ब्रह्माजीकी नाश (अवस्था पूरी होनेंकी)समय है सो ब्रह्ममलय है तिस समय आकाश आदि प्रपंचरहित सत् ज्ञानमात्र वर्तता है, ब्रह्ममलयकी महाप्रलय संज्ञा और मामत प्रलय तथा सुपुति ऐसीभी संज्ञा है, मुक्तअवस्था आत्यंतिक प्रलप है तिस समय अज्ञानका सब प्रकारसे अभाव होजाता है- इति पंच प्रलया। जीपारमा परमेश्वरसे भिन्न है १ आत्मामे प्रतीत होताहुआकर्तापन आदि वास्तव (सिद्धांतही) है २ तीनों शरीरोंसे मच्छिन्न (युक्त हुमा) मामा संग वाला है ३ जगत्का कारण होनेसे ब्रह्मके विकारभाव है ४ का रणसे भिन्नहुमा प्रपंच ( जगत् ) को भी सत्यपना है ५ ऐसे ये पाय भ्रम कहलाते है अर्थात् वृया ५ भ्रम होतेहै । .
. . भाषाटीकासमेता। (४१) विवप्रतिविदृष्टांतेन भेदभ्रमो निवर्तनीयः १ स्फटि कलोहितदृष्टांतेन पारमार्थिककर्तृत्वभ्रमो निवर्तनि- यारसूर्याऽग्न्युत्पादकाऽदर्शदृष्टांतेन विकारित्वभ्रमो निवर्तनीयः ३ घटाकाशदृष्टांतेन संगीतिभ्रमोनि- वर्तनीयः४स्वर्णकटकलोहखड्गादिदृष्टांतेन कारणा- भिन्नत्वेन प्रतीयमानप्रपंचस्य सत्यत्वभ्रमो निवर्त- नीयः५ इति पंचभ्रमनिवर्तकदृष्टांतपंचकम्॥१६॥ ब्रह्मणि जगत् भ्रांत्याप्रतीयते इत्यत्र शुक्तौ रजतं । रज्जो सर्पः२ स्थाणौ पुरुषः ३ गगने नीलतादि ४ मरीचिकायां जलम् द इति दृष्टान्तपंचकम् ॥१७॥ आत्मख्यातिरसत्ख्यातिरख्यातिरन्यथाख्यातिर- निर्वचनीयख्यातिश्चेति पंचख्यातयः ॥१८॥ भा०-विप्रतिबिंषके दृष्टांत करके जैसे सूर्यके विवसे जल में गिरा हु- आ प्रतिबिंब भिन्न नहीं है एसा भेदभ्रम दूर करना ॥१॥ मणिमें(काचमें) जैसे दूसरी वस्तुका लाल रंग दीखताहै इस दृष्टांत करके आत्माका कर्तापनभ्रम दूर करना ॥ २॥ जैसे सूर्य और अनिको उत्पन्न करनें- वाला सीसा (चकमक) इन दोनुवोंके योगसे अनि उत्पन्न होता है तहां सूर्य कारण है सो विकाररहित है विकारवान् सीसाही है. ऐसे मायाही विकारवाली है इस दृष्टांत करके विकारित्व भ्रम दूर करना ॥३॥ जैसे पटके आकाशमें महाकाश बंधा नहीं है इस घटाकाश दृष्टांत करके संगी (संगपनाका) भ्रम दूर करना ॥ ४॥.सुवर्णके कडूले लोहा- की तलवार जैसे सोना लोहासे भिन्न सत्य नहीं है किंतु सोना लोहा रूपही है इस दृष्टांत करके कारणसे भिन्नपना करके प्रतीत होते हुए जगत्का सत्यत्व (सत्यपनाका )भ्रम निवर्त करना ॥५॥ इति पंच:
(४२) वेदांतसंज्ञा। भ्रमनिवर्तक दृष्टांतपंचक ॥ १६॥ ब्रह्मविषे जगत् भ्रांति करके म. तीत होता है इसमे जैसे सीपमें चांदी१ रजुमें सर्प २ स्याणु (य)में पुरुष, ३ आकाशमें नीलवर्ण आदि रंग ४ मरीचिका (चिमकता हुआ कालरमें जल) ५ ये सब मिथ्या हे (इसी तरह जगभी मिथ्या है ) ऐसे ये पांच दृष्टात हे ॥ १७॥ आत्मख्याति १ असरख्याति २ अ. ख्याति, ३ अन्यथा ख्याति ४ अनिर्वचनीयख्याति ५ इन नामावाली पांच ख्याति कहलाती है ॥ १८ ॥ अख्यातिमतं सांख्यप्रभाकरयोः अन्यथाख्यातिमतं भादृवैशेषिकयोः आत्मख्यातिमतं विज्ञानवादिनः असत्ख्यातिमतं शून्यवादिनः अनिर्वचनीयख्याति- मतं वेदांतवादिनः इति ॥ एकरसवस्तुमावत्वेन चित्तस्य तदाकारवृत्तिविशेषाऽवस्थानं संप्रज्ञातस- माधिः सच सविकल्पक इति चोच्यते सन पुनः दृश्यानुविद्धः शब्दानुविद्धश्चेति द्विविधः ॥ दृश्य- मिश्रो दृश्यानुविद्धः शन्दमित्रः शब्दानुविद्धः इति विवेकः॥ भा०-अख्याति मत सांख्य और प्रभाकरोका है, अन्यथाख्यातिका मत भादृवैशेषिकोंका है-और आत्मख्यातिका मत विज्ञानवादियोंका है. असख्याति मत शून्यवादियोंका है. अनिर्वचनीयख्याति मत (अ. र्थात् रज्जुमें सर्पभान शुक्तिमे रजत इत्यादिक स्थलमे वेदान्तवालोंका শনিবৰীৰ দাবি ক ছু অনুত্ত বিভাগ সাষ্ট আমার' होता हुआ सर्प है ऐसी अनिर्वचनीय ख्याति मत है, ऐसेही रज्जुमें सर्प इसही दृष्टातपर ये पांच ख्याति.मत है) इति ॥५॥ एक रस पस्तु १-रजी सर्प इत्यादि दृष्टातेप्यासारयातीना प्रपोजनम्, तत्र कमः अस्या- तिमत सांख्यप्रभाकरयोरित्यादि। .
क भाषाटीकासमेता। (१३) मातृत्त्व करके चित्तकी तदाकार वृत्तिका विशेषकालतक अवस्थान (स्थि- 'त) रहना यह संप्रज्ञातसमाधि कही है सो यह सविकल्पक कहलाती है। फिर यह सविकल्प समाधि दृश्यानुषिद्ध, १ शब्दानुविद्ध २ ऐसे दो प्रकार की है-दृश्यसे मिली हुई दृश्यानुविद्ध कहलाती है और शन्दसे मिलीहुई शब्दानुविद्ध है ऐसा विवेक है । वृत्तिमपि अखंडैकरसमात्रत्वेनोपसंहृत्य वृत्तिमत- श्चित्तस्य प्रलयपूर्वकं वस्तुमात्रत्वेनाऽवस्थानम- संप्रज्ञातसमाधिः। स एव निर्विकल्पक इतिच गी- यते । दृश्यानुविद्धशब्दानुविद्धनिर्विकल्पकसमाधय एव वाह्याऽभ्यंतरभेदेनं पट्समाधय इति व्यवह्रियते। सत्वरजस्तमोगुणात्मिकाःशांतिधोरमूढवृत्तयः। तत्र शांतिः सुखमौदार्य वैराग्यं च । घोरस्तु कामलोभ- क्रोधस्तृष्णा।मूढो मोहो भ्रांतिः एतासां वृत्तीनां ह- दये यत्स्फुरणं दृश्यं तस्य द्रष्टा साक्षीअनुस्यूतोह- मिति दृश्यानुविद्ध आंतरीयसविकल्पकसमाधिः १ भा०-गृत्तिकोभी अखंड एकरस मात्रत्व करके उपसंहार कर वृत्तिवाले चित्तकी प्रलयपूर्वक वस्तु मात्रत्व ब्रह्मरूपत्व ) करके (अ- वस्पान) स्थित रहनेको असंप्रज्ञातसमाधि कहते है; वही निर्विकल्प समाधि कही है-दृश्यानुविद्ध, शन्दानुविद्ध, निर्विकल्पक येही (तीन) समाधि वाद्य अभ्यंतर भेद करके छद समाधि गिनी जाती है ऐसा पपहार है ॥ १ ॥ सत्व, रज, तमोगुण स्वभाववाली शांति, पौर, सूट ये वृत्ति है-तहां शांतिनाम मुस, उदारपना, और वैराग्य है-पोर नाम काम, क्रोध, लोभ तृष्णा-मूढ नाम मोह भ्रांति । सो इन वृत्तियों १ ध्यानमय दृश्यानुषिद्धः। .
(४४) वेदातसंज्ञा। की दृश्य (वस्तु) जो कछु हदयमें फुरना होवे तिसका, द्रष्टा साक्षी मे ही (ब्रह्मरूप करके ) अनुस्यूत (मिलाहुआ) हूं ऐसी दृश्यानुविद्ध आतरीयस- विकल्पक समाधि हे अर्थात् अंतर कहिये हृदयमें यह विकल्प रहता है इस लिये यह नाम है। वृत्तीनां त्रिगुणात्मकत्वादसंगोहमिति ॥१॥शब्दा नुविद्र आंतरीयसविकल्पकसमाधिः॥२॥ हृदये एतयोर्विकल्पयोरस्फुरणमसंप्रज्ञातसमाधिः स एव निर्विकल्पक इति चोच्यते ॥३॥ अथवा ह्यसूया- दिकस्य द्रष्टा साक्षी अनुस्यूतोहमिति दृश्यानुविद्धः सविकल्पकसमाधिः ॥४॥ सूर्यादिकादसंगोहमि- ति शब्दानुविद्धः॥५॥ एतदुभयविकल्पास्फरणा निर्विकल्पकसमाधिः॥ ६॥ कामक्रोधलोभमोह- मदमात्सर्याणि अरिपवर्गः ॥२॥ अस्ति- जायते वर्द्धते विपरिणमते अपक्षीयते नश्यतीति पदाववि काराः ॥ ३ ॥ त्वइमांसरुधिरमेदोमनास्थीनि पटकौशिकाः॥४॥ भा०-वृत्तियोंको त्रिगुणात्मक हानेसे में असंग (प्रत्यगात्मा) हूं। ऐसे शब्दानुविद्ध आतरीय सविकल्पक समाधि है २ हृदयमे इन दोनुवा ही विकल्पोंकी स्फुरना नहीं होनी यह असंप्रज्ञात समाधिहै यही निवि- कल्पक कहलाती है ३ इस्से अनंतर वाहिर सूर्यादिकोंका द्रष्टा ( देखने वाला ) साक्षी में ही (ब्रह्मरूपकरके ) मनुस्यूत ( अनुगत मातहू ) ऐसी दृश्यानुविद्ध सविकल्पक समाधिहै ४ और सूर्यादिकोंसे में असंगहूं या कहना, सो शब्दानुविद्ध समाधिहै ५ और इनदोनोंही विकल्पोकी स्फुर- १-प्रत्यगात्माहमस्मीति शब्दानुविद्धः।
. भापाटीकासमेता। (४५) मा नहीं होनेसे निर्विकल्पक समाधि होतीहै ६ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, ( अन्यके कल्याणमें दुःखपाना) ये छह अरिषड्वर्गसं- बहै २ । अस्ति १ (है) जायते २. (जन्मना) वर्द्धते ३ (बढना) विप- रिणमते (विकारको प्राप्तहोना) अपक्षीयते ५ (क्षीणहोना) नश्यत्ति ६ (नष्टहोना ) ये छःभावविकार कहें ॥ ३ ॥ त्वचा १ मांस २ रुधिर ३ मेद ४ मज्जा ५ अस्थि ६ ये छह कोशेहे ॥ ४ ॥ जरामरणक्षुत्पिपासाशोकमोहाः पडूमयः॥५॥उप- क्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वताफलम् ॥.अर्थवादोपप- .त्तिश्चलिंगंतात्पर्यनिर्णये॥ इति पड्विधलिंगम्॥६॥ अद्वितीयात्मप्रतिपादकत्वात् सृष्टेः पूर्व नामरूपर- हितं सत्तामात्रमिदंजगदितिच्छांदोग्ये पष्टप्रपाठकप्र- करणे सदेवसोम्येदमग्र आसीत्' इति श्रुत्याप्रतिपा- दनमुपक्रमः 'प्रतिपाद्यमानं सर्वमिदं जगत्पूर्वोक्तं स- स्वयमेव नान्यदिति एतद्वात्म्यमिदछसर्वमिति' श्रु- त्यंते प्रतिपादनमुपसंहारः॥ १॥ प्रकरणे प्रतिपा- 'यस्य मध्ये तत्त्वमसीति नवसंख्याकोपदेशेन प्र- तिपादनमभ्यासः॥२॥.प्रमाणानां मध्ये लक्षणया तत्वोपनिपदं पुरुपं पृच्छामीत्युपनिषत्प्रमाणेन गम्य आत्मा नेतरेणेति विवेक अपूर्वता ॥३॥ भा-जरा १ (वृद्धावस्था) मरण २ क्षुधा ३ पिपासा ४ (सपा) शोक ५ मोह ६ ये छह कमि ( लहरी): ५। रमझमकाउपसंहार २ मभ्यास ३ अपूर्वता ४ फल ५ अर्थदं ६ उपपत्ति ये लिंग तात्पर्य- के निर्णय करने में है; ऐसे छह मकारके लिंगहै ६। अब इनको स्पष्ट कहते है, अदितीय मारमा प्रतिपादक होनेसे सृष्टिसे पदठे नामरूपरहित । (४६) - . वेदांतसंज्ञा । सत्तामात्र यह जगत् है ऐसे छांदोग्य षष्ठमपाठक प्रकरणमें कहाहै. इंसोम्प यह सत्तामात्रही पहले होताभया ऐसे श्रुतिसे प्रतिपादन कियांजरता है सो उपक्रम है। (फिर) प्रतिपाद्यमान संपूर्ण यह जगत् पूर्वोक्त सदस्वरूप आपही है अन्य नहीं यह सब कुछ आत्मस्वरूप है ऐसे श्रुतिके अन्तमें प्रतिपादन कियाहै सो उपसंहारहै ऐसे उपक्रमोपसंहार लिंगहें १ और प्रकरणमें कहने योग्यके मध्यमें तत् त्वमसि ऐसे नव उपदेशों करके प्रतिपादन करनेको अभ्यास कहतेहैं २.प्रमाणोंके मध्यम लक्षणा करके तिस औपनिषद (उपनिषदमें कहेहुए) पुरुपको (आत्माको ) पूछताई ऐसे उपनिपतं प्रमाण करके गम्य मात्माह अन्यकरके नहीं-ऐसे विवेक- को अपूर्वतालिंग कहते हैं ॥ ३ ॥' प्रारब्धक्षयपर्यंत देहद्रियादौ मिथ्याप्रतीतिः प्रार- ब्धस्य निश्शेपताप्राप्ते तदप्रतीतिपूर्वकमद्विती- यात्मस्वरूपेणाऽवस्थानवान पुरुपो देवदत्तस्य ता- वदेव चिरं यावन्न विमोक्षेऽथं न संपत्स्य इत्पादिश्रु- त्या प्रतिपादनं फलम्॥४॥प्रकरणप्रतिपाद्यस्योत्तम- मादेशः । श्रुतं भवतांमतं मतं विज्ञान विज्ञात- मित्यादिश्रुत्या प्रशंसनमर्थवादः॥५॥ यथामृज- न्यघटशरावादीनां मृदऽभिन्नत्वं स्वर्णजन्यकटंक- मुकुटादीनां स्वर्णाभिन्नत्वं तथा कारंणजन्यजगतः कारणाभिन्नत्वमिति वाचारंभणविकारो नामधेयम् मृत्तिकेत्येवसत्यमित्यादिश्रुत्या प्रतिपादिता युक्ति- रुपपत्तिः ॥६॥ भा-प्रारब्धके क्षयपर्यत देह इंद्रिय मांदिकोंमें मिध्या असत्य, प्रती- ते है, प्रारब्धपूरी हो लेवे तप तिनकी अप्रतीतिपूर्वक अद्वितीय आत्म .
भाषाटीकासमेता। (४७) स्वयं करके स्थित रहनेवाला पुरुष है देवदत्तकी (इस शरीरयुक्त जीवामाकी ) इतनही (चिर) बहुत अवस्था है कि जबतक मैं मोक्षसंप- तिको प्राप्त नहीं होता हूं ऐसे श्रुति करके प्रतिपादनको फल कहते हैं ॥ ४॥ प्रकरणमें प्रतिपादन करनेयोग्यका उत्तम आदेश करना कि सुनना तुम्हको माना २. जानलिया जानलिया ऐसे श्रुति करके प्रशंसा की जावे सो अर्थवाद लिंग कहाता है ॥ ५ ॥ जैसे मृत्तिकासे उत्पन्न हुए घट शिकोरे सराई आदि मृत्तिकासे भिन्न (जुदे) नहीं है और सुवर्णसे घनें हुए कडुले मुकुट आदि सुवर्णसे भिन्न नहीं है ऐसेही कारण जो ब्रह्म है तिससे उत्पन्न हुआ जगत् कारणले अभिन्नत्व है अर्थात् का- रूपही है किंतु वाणीके आरंभमात्रमें नाममात्रकाही विकार है और मृत्तिकाही जैसे सत्य है(ऐसे ब्रह्मही सत्य है) ऐसे श्रुति करके कहीं •हुई युक्ति उपपत्ति लिंगहै ॥ ६ ॥ शिशुत्ववाल्ययौवनकौमारतारुण्यवाईक्यानिपड- वस्थाः ॥७॥ पूर्वमीमांसोत्तरमीमांसाशब्दतर्क- सांख्ययोगाः पट्शास्त्राणि ॥ ८॥ आश्वलायना- पस्तंवबौधायनकात्यायनसत्यापाठीवैखानसाःपटू सूत्राणि. ॥ ९॥ शिक्षा कल्पव्याकरण, निरु- तिज्योतिछंदांसि पडंगानि ॥ १०॥ स्नानसं- ध्याजपहोमदेवतार्चनातिथ्यवैश्वदेवाः पटू का- णि ॥ ११ ॥ पूर्वोक्तप्रमाणचतुष्टयमनुपलब्धि- रंन्यथानुपपत्तिरिति पट्प्रमाणानि ॥ १२ ॥ शमो, दम उपरतिस्तितिक्षा समाधान, श्रद्धति शमादि- पट्कम् ।। १३॥ १ अर्थापत्तिरित्यपिपाठः।
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(१८) वेदांतसंज्ञा।
भा०-शिगुत्व१(अत्यंत बालक) पाल्प २. यौवन ३ कुमारमवस्था
तरुण अवस्या ५ वृद्ध । येछह अवस्या है ॥७॥ पूर्वमीमांसा र उत्तम
मांसा २ शब्द अर्थात् पातंजल ३ (तक) न्याय ४ मांख्य ५ योग ६
छद्द शास्त्र (इनकी पद् शास्त्रसंज्ञा) है ८आश्वलायनर आपस्तंब श्योधायन
कात्यायन ४ सत्यापाढी वैखानस६ ये छह मूत्र है॥९॥शिक्षा १ कल्प,
ध्याकरण ३ निरुक्ति ४ ज्योतिष ५ छंद ६ ये छह अंगहै ।। १०
स्नान १ संध्या २ प ३ होमदेवताका पूजन, आतिथ्य(अतियि अभ्या
गतका पूजन)५ यटिवैश्वदेवकर्म ६ ये छह कर्म है ।। ११ ।। पहले की
हुए अत्यक्ष आदि चार प्रमाण और अनुपलब्धि प्रमाण अन्यथानुफ्पति
प्रमाण ऐसे ये छह प्रमाण है ।।१०॥ शम १ माभ्यंतर (इंद्रिय) मनादि
पशमें काना, दम २ (पाह्य मंद्रिय रोकना) उपरति३(पराम)तितिक्षा ।
(सहना) समाधान ५ ( समाधिकी तरह चित्त वशमें रखना) श्रद्धा ६
ये छह शमादिक है ॥ १३ ॥
'अज्ञानमावरणं विक्षेपः, परोक्षमपरोक्षम्, अनर्थनि-
वृत्तिरानंदावाप्तिश्चेतिसप्ताऽवस्थाः॥ १॥ आवरणं.
द्विविध न भाति कूटस्थ इत्यभानावरणमतोऽभां-
नात् नास्तिकूटस्थ इत्यसदावरणमिति। परोक्षज्ञ।
नादसदावरणनिवृत्तिः। अपरोक्षज्ञानादऽभानावरण
निवृत्तिः॥ ततो विक्षेपनिवृत्तिः अतोऽनर्थनिवृत्ति
रानंदप्राप्तिश्च भवतीति विभावनीयम् ॥श्लो०॥शुद्ध
मीश्वरचैतन्यं जीवचैतन्यमेव च ॥ प्रमाता चप्रमा
गंच प्रमेयं च फलं तथा ॥ १॥ इति सप्तविधं प्रो
भिद्यतेव्यवहारतः॥इति सप्तविध चैतन्यम्।।२।
मायोपाधिविनिमुक्तं शुद्धमित्यभिधीयते । मायासं.
पंधतश्चेशो जीवोऽविद्यावशस्तथा ॥१॥
भाषाटीकासमेता।
(४९)
भा-
-अज्ञान १ आवरण, २ विक्षेप, ३ परोक्ष, ४ अपरोक्ष
५ अनर्थ निवृत्ति ६ आनंदप्राप्ति ७ ये सात अवस्था है ॥ १ ॥
तहां आवरण दो प्रकारका है। कूटस्थ (चैतन्य ) भान नहीं होता है
ऐसा यह अभान आवरण है इसलिये भान नहीं होनेसे कूटस्थ
(चैतन्य ) है नहीं है ऐसा यह असत् आवरण है २ परोक्ष ज्ञानसे
(ब्रह्म) है ऐसे ज्ञानसे असत् आवरणकी निवृत्ति होती है।अपरोक्षज्ञानसे
ब्रह्मको मे जानता हूं इस ज्ञानसे अभान आवरणकी निवृत्ति होती है
तिरसे अनंतर विक्षेपकी निवृत्ति होती है फिर इससे अनर्थकी निवृत्ति
होती है और आनंदकी प्राप्ति होती है ऐसा विचार करना । श्लोक-शु-
द १ (ब्रह्म) ईश्वर चैतन्य २ जीव चैतन्य ३ प्रमाता ४ प्रमाण ५ प्रमे-
य ६ फल ७ ऐसे सात प्रकारसे कहा है यह भेद व्यवहारसे हो रहा है.
इस प्रकार यह सात प्रकारका चैतन्य कहा है २ मायाकी उपाधिते वि-
निर्मुक्त हुआ (चैतन्य) शुद्ध कहाता है और मायाके संबंधसे ईश (ईश्वर)
कहलाता है अविद्याके वशसे जीव कहलाता है ॥ १ ॥
अंतःकरणसंबंधात्प्रमातेत्यभिधीयते ॥ तथात-
त्तिसंबंधात्प्रमाणमिति कथ्यते ॥२॥ अज्ञातमपि
चैतन्यं प्रमेयं कथ्यते तथा ॥ ज्ञातं चैव तु चैतन्यं
फलमित्यभिधीयते ॥३॥ भूर्भुवः स्वमहर्जनस्त-
पः सत्यमिति भूरादिसप्तकंम् ॥३॥ अतल-वित-
ल-सुतल-तलातल-रसातल-महातल-पाताला-
न्यतलादिसप्तकम् ॥ ४॥ज्ञानभूमिः शुभेच्छांख्या
प्रथमा समुदाहृता॥ विचारणा द्वितीयास्यात्तृतीया
तनुमानसा ॥१॥सत्वापत्तिश्चतुर्थी स्यात्ततोः संस-
तिनामिका ॥ पदार्थाभावनी पष्टी सप्तमी तुर्यागा
स्मृतेति ॥२॥ सप्तभूमिकाः॥५॥
. . वेदांतसंज्ञा। अन्तःकरणके सम्बन्ध होनेसे प्रमाता कहाजाताहै तथा अंत:करणकी वृत्तिके सम्बन्ध होनेसे प्रमाण कहाजाता है ॥२॥ अज्ञात (विनाजाने). तन्यको प्रमेय कहतेहै; ज्ञात (जाना हुआ) चैतन्यफल कहलाता है । भूलोक १ भुव० २ स्वर्लोक ३ मह० ४ जन ५ तप० ६ सत्यलोक ७ ऐसे भूलोकमादि सातौ ।। ३ ॥ अतल १ तल २ सुतल ३ तलातल ४ महातल५ रसातल६ पाताल ७ ये अतल आदि सातलोक हैं || ज्ञान- भूमि शुभेच्छा नामक. पहली कहीहै, दूसरी विचारणा नामक भूमि है, तीसरी तनुमानता नामक भूमिहै ॥१॥ चौथी सत्वापत्ति भूमिकाहै, पांचवों संसक्तिका नामवाली है, छठी पदार्थाभावनी नामक भूमिहै, सातवीं तुर्य- गानामक भूमिहै ॥२॥ ऐसे सातभूमिका कहींहै ५॥ भूमिका नाम चित्तस्य अवस्थाविशेपः अत्र भूमि- कारयं ब्रह्मविद्यासाधनमेव । नतु ब्रह्मविद्याको टावंतर्भावः ॥ भेदसत्यत्वबुद्धेरनिवृत्तत्वात् ॥ यश्चतुर्थभूमिकांप्राप्तःसब्रह्मविदित्युच्यते । पंचमभू- मौ निर्विकल्पात्तदा स्वयमेव व्युत्तिष्ठति सोयं योगी ब्रह्मविद्वरः ॥ पठभूमौ पार्श्वस्थवोधितोऽव्युत्तिष्टते सोयं ब्रह्मविद्वरीयान् ॥ तदैतमिद्रयं सुषुप्तिरिति चाभिधीयते। असंप्रज्ञातसमाधिप्रतिपादकानि योग शास्त्राणि सप्तमभूमिकां प्राप्ते योगिन्येव पर्यवस्यं ति सोयमीहशो योगी व्युत्थानरहितःनिर्विकल्पक- समाधिस्थः । परमहंसः सप्तमभूमौ ब्रह्मविद्वरिष्ठः। इति चोच्यते ॥ भा०-भूमिका नाम.चितवी अवस्याविशेष है यहां तीसरी भूमिका ब्रह्मविद्याका साधनही है, ब्रह्मविद्याकोटिमें अंतर्भाव नहीं है क्योंकि (५१). भाषाटीकासमेता। वहां भद्रबुद्धिका सत्यभावना रहता है और जो चौथी भूमिकामें प्राप्त है वह ब्रह्मवित् कहलाता है और पांचवी भूमिमें निर्विकल्पक होनेसे तय आपही उठता है सो यह योगी ब्रह्मविद्वर कहलाता है। छठी भूमिमें बराबरमें स्थित हुआभी बोधकरानेसे नहीं उठता है सो यह ब्रह्मविद्व- रीयान् योगी कहाहै सो यह दोनों भूमिका सुपुति ऐसीभी कहलाती हैं. असंप्रज्ञात समाधिके प्रतिपादक योगशास्त्र सातवी भूमिविषं पहुंचे हुए योगीजनमें समाप्त होते हैं सो यह ऐसा योगी व्युत्थान (उठना कंपना आदि) रहित हुआ निर्विकल्पक समाधिमें स्थित हुवा ( यह) परमहंससातवी भूमिमें ब्रह्मविद्वरिष्ठ कहलाता है। श्लोकः-ज्ञानेंद्रियाणि खलु पंच तथापराणि कमेंद्रि- याणि मनआदिचतुष्टयं च ॥ प्राणादिपंचकमथो वियदादिकञ्च कोमश्च कर्म च तमः पुनरष्टधापूः १ इति पुर्यष्टकम्॥३॥भूमिरापोऽनलोवायुःखं मनोवु- धिरेव च।अहंकारइतीयमे भिन्ना प्रकृतिरप्टधा॥१॥ इति प्रकृत्यष्टकम्॥२॥ यमनियमाऽऽसनप्राणायाम- प्रत्याहार धारणाध्यानसमाधयः॥ अष्टांगानि॥३॥ निर्विकल्पसमाधेरिति केचित् । भा श्लोक-पांच ज्ञान इंद्रिय १ पांचकर्म इंद्रिय २ मन आदि चतुष्टय३ (मन बुद्धि चित्त अहंकार) पांच प्राण४ आकाश आदि पांचतत्व ५ काम अर्थात् इच्छा ६, (कायिक वाचिक मानसिक) कर्म ७ तम अर्थात् मूल याज्ञान ८ ये आठ पुरी कहलाती हैं ॥१॥ इति पुर्यष्टकम् ॥१॥ भूमि १ १ कामोभिलाषाकर्म कायिकंवाचिकं मानसिकमिति त्रिविधम् । तमश्शन्देन मूलाज्ञानं गृह्यते इति । २ भूम्यादिशब्देन पंच गंधादितन्मात्राण्युच्यन्ते मन इति मनसः कारणमंहकारो गृहाते । बुद्धिरित्यहंकारकारणं महत्तत्त्वमहंकार त्यव्यक्तं गृहाते इति॥
- (५२) वेदांतसंज्ञा । जल २ अग्नि ३ वायु ४ आकाश ५ अर्थात् गंध आदिक इनकी ५ तन्मात्रा मन अर्थात् मनका कारण अहंकार ६ बुद्धि अर्थात् अहंकारका कारण ७ अहंकार, कहिये महत्त्व, अव्यक्तमाया ८ ऐसे यह मेरी प्रकृति आठ प्रकारकी हे १ इति प्रकृत्यष्टकम् ॥२॥ यम १ नियम २ आसन ३ प्राणायाम ४ प्रत्याहार ५ धारणा ६ ध्यान ७ समाधि ८ ये आठ अंग निर्विकल्पक समाधिके हैं ऐसे केचित् मत है; सब आचार्योंका मत नहीं है (कितु) अन्य सविकल्पकसमाधिके अंग मानते है ॥ ३ ॥ .अस्मिन्पक्षे अष्टांगघटकसमाधिशब्देन सविकल्प- काख्यसंप्रज्ञातसमाधिरुच्यते॥ संप्रज्ञातसमाधेरेता- न्यष्टांगानीति केचित् । अस्मिन्पक्षे अंगघटकसमाधिः संप्रज्ञाताद्भिन्न इत्यंगीकरणीयम् । अंगांऽगिनोभेंद- स्यावश्यकत्वात् ॥तथाच विच्छिद्य प्रत्ययावृत्तिः ध्यानं सावधानेनाऽविच्छिद्याविच्छिद्यप्रत्ययावृत्ति- रंगघटितसंप्रज्ञाताख्यसाधनसमाधिः ॥ निर्वाणेनाऽ विच्छिद्याऽविच्छिद्य प्रत्ययावृत्तिःअंगिस्वरूपसंप्रज्ञा- ताख्यसाध्यसमाधिरिति भेदः त्रयाणां विपयैक्यपि चित्तपरिपाकतारतम्येनांगीकरणीयः ॥. भा०-सी इस पक्षमें अष्टांगघटित समाधि शन्द करके सविकल्प नामक संप्रज्ञात समाधि कही जाती है; संप्रज्ञात समाधिके आठ अंग है यहभी.(वेचित् ) किसीका मत है (इस लिये यहां) इस पक्षमें अंगघटक समाधि, संप्रज्ञात समाधिसे भिन्न है ऐसा अंगीकार करना, क्यों अंग और अंगी कहिये अंगवालेका भेद अवश्यही रहता है. तथाच सो कह- ते हैं कि विच्छेद विच्छेद होके निश्चयरूप वृत्ति होना ध्यान है और सावधानता करके विच्छेद नही होके २ निश्चयरूप वृत्ति होना यह अंगघटित (अष्टांगवाली) संप्रज्ञात नामक साधनसमाधि है और नि-
भाषाटीकासमेता।
(५३)
मुक्तता, करके विच्छेद नहीं होके अंगके स्वरूपवाली संप्रज्ञात नाम
साध्यसमाधि है ऐसा भेदहै इन तीनुवोंका एकही विषय है परंतु चि-
तके परिपाक (निरोध) की तारतम्य अर्थात् ज्यादे विशेषता करके यह
भेद अंगीकार करना योग्य है ॥
करचरणादिसंस्थानविशेपलक्षणानि पद्मकस्व-
स्तिकादीनि आसनानि इंद्रियाणां स्वस्वविपयेभ्यः
प्रत्याऽऽहरणं प्रत्याहारः॥ अद्वितीयवस्तुनि अंतरि-
द्रियधारणा।।धारणा|श्लो॰दर्शनंस्पर्शनं केलिः कीर्तनं
गुह्यभापणं ॥संकल्पोऽध्यवसायश्चक्रियानिवृत्तिरेवच
॥१॥एतन्मैथुनमष्टांगंप्रवदंतिमनीषिणः॥ विपरीत
ब्रह्मचर्य्यमनुष्ठेयं मुमुक्षुभिरितिअष्टांगम्॥४॥रागपू-
वैकंख्यादिविषयकज्ञानदर्शनम् तत्पूर्वकं क्रियादि-
विशेपमन्यं ज्ञानंस्पर्शनम् २ रागपूर्वकंपरिहासादि-
व्यवहारः केलिः॥३॥
भा०-हाथ पैर आदिकोंकी (संस्थान) स्थिति करनेके विशेष लक्षणों-
चाले पद्मक, स्वस्तिक आसन हैं और इंद्रियोंको अपने २ विषयोंसे हटाना
यह प्रत्याहार है. अद्वितीय वस्तुमें (ब्रह्मविषे) मन बुद्धि आदिकी धारणा
करनी यह धारणा है-श्लोक दर्शन१ स्पर्शनर कैलि ३ कीर्तन४ गुह्यभाषण
५ संकल्प ६ अध्यवसायं ७ क्रियाकी निवृत्ति ८॥ १॥ यह मैथुनका
अष्टांगहै ऐसे पंडितजन कहते हैं और इससे विपरीत अर्थात् इनको
नहीं करना ऐसा ब्रह्मचर्य है सो मुमुक्षुजनोंने करना २ इति अष्टांगम्
४ (राग) प्रीतिपूर्वक स्त्रीआदिविषयकज्ञानको दर्शन कहते हैं ?
तिम प्रीतिपूर्वक जिसमें विशेष क्रिया होके उत्पन्न होता हो सो स्पर्श
कहाहै २ और रागपूर्वक हास्य आदि व्यवहार करना यह केलि
कहाहै ॥ ३॥
वेदांतसंज्ञा। ख्यादेरनुरागपूर्वकं सौंदर्यादिवर्णनं कीर्तनं ४ राय- पूर्वकरहसिसंभापर्ण गुह्यभापणंदस्यादेवियपकोदृष्टं च्छाविशेषः इदमस्तीतिसंकल्पः ६ अनयारमे इति निश्चयः अध्यवसायः ७ रागपूर्वकं स्यादिविषय-. कानुभवविशेषः क्रियानिवृत्तिः ८ ज्ञाताज्ञानंज्ञेयम् भोक्ताभोग्यंभोगः कर्ता, करणं, क्रियेत्येकः पक्षः नवविधसंसारः॥३॥ पक्षांतरंचवर्तते तथाहि इति- भा०-स्त्री आदिकोंके अनुराग (प्रीति ) पूर्वक सौंदर्य (सुंदरता) आदिका वर्णन कीर्तन है ४ रागपूर्वक एकांतमें संभाषणे ( वार्तालाप ) करना गुह्यभाषण है ॥५॥ स्त्री आदि विषयक देखनेकी इच्छाविषेश (कोई ) यह है ऐसा दृढ ( करना)संकल्प कहाहै ॥ ६ ॥ इस(स्त्रीके संग) रमण करूं ऐसा निश्चय करना अध्यवसाय है ॥ ७॥ रागपूर्वक स्त्री आदि विषयक अनुभवविशेष ( मासक्त होना ) क्रियानिवृत्ति है॥८॥ ज्ञाता १ ज्ञान २ ज्ञेय ३ (जानने योग्य ) भोक्ता ४ भोग्य (पदार्थ) ५ भोग ६ कर्ता ७ करण ८ क्रिया ९ ऐसे यह एक पक्ष ( में) नव मकारका संसार है १ दूसरा पक्षभी वर्तमान है सो दिखाते हैं । पंचमहाभूतानि ज्ञानेंद्रियाणि कर्मेंद्रियाणिचप्राणादि पंचकं मनआदिचतुष्टयं स्थूलशरीरमेकं त्रिविधक माणिअवस्थात्रयम् । एतेपांकारणीभूतमज्ञानं चेति नवविधसंसारः । श्लो दिग्वातार्कप्रचेतोऽश्विवहीं- द्रोपेंद्रमृत्युकाः॥ ब्रह्मा चंद्रः सुराचार्य क्षेत्रज्ञाशिव ईश्वरः१ इत्यधिष्टानदेवतापंचदशकम् । अस्थिचर्म- १ दिग्वातार्कादयएताः क्रमतः ज्ञानेंद्रियकर्मेन्द्रियान्तःकरणचतुष्टया- ज्ञानानां देवता इति ज्ञातव्यम् । .
भाषाटीकासमेता। स्तायुमजावसामांसशुक्रशोणितश्लेष्मदूपिकाविण्म- कफवातपित्ताः इति अस्थ्यादि पंचदशकम् ॥ एतत्पंचदशसमुदायात्मकं स्थूलशरीरमिति ज्ञात- व्यम् ॥ रागद्वेपकामक्रोधलोभमोहमदमात्सय्ये- प्सूयादम्भदयाहंकारेच्छाभक्तिश्रद्धा इति रागा- दिपोडशकम् ॥ भा०-पांच महाभूत १ ज्ञानीद्रय २ कर्मेंद्रिय ३ पांचप्राण ४ (मन, बुद्धि चित्त अहंकार) मन, आदि चतुष्टय ५ एक स्थूल शरीर ६ तीन प्रकारके वर्म ७ तीन अवस्था ८ इन सबोंका कारणभूत अज्ञान ऐसे नव प्रकारका संसार है । श्लोक-दिशाश्वायु २ सूर्य ३ प्रचेता(वरुण) ४ अश्विनीकुमार ५ आनि ६ इंद्र ७उपेंद्र (विष्णु) मृत्यु९ब्रह्मा१०चंद्रमा ११ बृहस्पति १२ क्षेत्रज्ञ १३ शिव १४ ईश्वर १५ ऐसे पंदरह आधिष्ठान- देवता है । अस्थि १ चर्म २ स्नायु,३मज्जा, ४ वसा, ५ मांस ६ शुक्र ७ शोणित ८ श्लेष्मा ९ दूपिका( टीट, ) १० विष्ठा ११ मूत्र १२ कफ २३ वात १४ पित्त १५ ये पंदरह अस्थि आदिक है इनही पंदरहका समुदा- यात्मक स्थूल शरीरहै ऐसे जानना चाहिये ॥ रागद्वेष २ काम ३ शोघ ४ लोभ ५ मोह ६ मदछमात्सर्यटईर्ष्या ९ असूया(गुणोमें दोष निकालना,) १० दंभ (पाखंड,) ११ दया १२ अहंकार १३ इच्छा १४ भक्ति १५ श्रद्धा १६ ऐसे सोलह राग आदिक है । एतेपांमध्ये भक्तिश्रद्धे मुक्तिहेतू इच्छातुमुक्तेहेतुर्व- धहेतुश्चभवति अन्येवंधहेतवः इतिविवेकः॥ कम- द्रियपंचकं५ज्ञानेंद्रियपंचकं५प्राणांदिपंचकं५ अंतः करणंचेतिपोडशकं लिंगमित्येकाइदमेवसूक्ष्मशरी- रमितिज्ञातव्यम्।।श्लो पंचप्राणामनोबुद्धिर्दशेंद्रियसम.
(५६.) वेदांतसंज्ञा! न्वितम्॥अपंचीकृतभूतोत्सूक्ष्मांगंभोगसाधनमिति, १ सप्तदशाऽवयवकंलिंगमित्येकापक्षः॥चित्ताहंका- राभ्यां सहितं पूर्वोक्तं नवदशकं लिंगमिति पक्षा- तरम् ॥ भा०-इन्होंके मध्यमें भक्ति और श्रद्धा मुक्तिकी हेतु हैं और इच्छा मुक्तिकी हेतुहै तथा बंधकीभी हेतु है, अन्य सव बंधके हेतु, ऐसा विवेक है ।। पांच कर्म इंद्रिय ५ पांच ज्ञान इंद्रिय ५ पांच प्राण ५ अंत:- करण १ ऐसे सोलह वस्तुओंका लिंगहै यही सूक्ष्मशरीर है ऐसे जानना चाहिये ।। श्लोक-पांच प्राण ५ मन १ बुद्धि १ दश इंद्रिय १० इन्होंसे समन्वित हुआ अपंचीकृत तत्वोंसे उत्पन्न हुआ सूक्ष्मशरीर भोगका साधन कहा है १ ऐसे यह सतरह वस्तु ओंका लिंग है ऐसा एक पक्ष है; और चित्त, अहंकार इनदोनुओंसे युक्त हुआ यह पूर्वोक्त शरीर उन्नीस तत्वोंका लिगहै ऐसाभी एक पक्ष है ॥ ज्ञानेंद्रियपंचकं, कर्मेंद्रियपंचकं प्राणादिपंचके श- ब्दादिपंचकं, मनआदिचतुष्टयमित्येवं चतुर्विंशति- तत्वानीति केचित्॥पंचीकृतभूतानि पंच५ शरीर- त्रयम्३ अवस्थात्रयम्३ अज्ञानंच पूर्वोक्तैस्तत्त्वैः सह पत्रिंशत्तत्त्वानिइतिकेचित् ॥ पड्भावविकाराः पडूर्मयः पट्कोशिकाः अरिपड्वर्गाः जगत्रयम् गुण- त्रयम् कर्मत्रयं वचनादिपंचकं संकल्पादिचतुष्ट- यम् मैत्र्यादिचतुष्टयम् दिग्वातार्कायधिष्ठानदेवता श्चतुर्दशकम् ॥ १४॥ -पांच ज्ञान इंद्रिय ५पांच कर्म इंद्रिय ५ पांच प्राण ५शब्द आदिक . . भा०- भाषाटीकासमेता। (.५७) पांच ( विषय ) मन आदि चार ४ ऐसे चौवीश प्रकारके तत्व हैं ऐसे कईक कहते हैं-पंचकृित तत्व पांच ५ सूक्ष्म आदि तीन शरीर ३ तीन अवस्था ३ अज्ञान १ ये पूर्वोक्त (चौवीश ) तत्वोंके साथ मिलके छत्तीस प्रकारके तस हैं ऐसे कितेक कहते है ॥ छह भावविकार६पहले कह- दिये हैं, छह ऊर्मि, ६ छह कोश,६छह प्रकारका अरिवर्ग, ६ तीन जगत् (लोक,) ३ तीन गुण, ३ तीन कर्म, ३ वचन, आदान इत्यादिक पांच कर्म इंद्रियोंके विषय ५ संकल्प आदि चार ४ मैत्री आदि चार ४ दि- शा, वायु सूर्य इत्यादिक अधिष्ठानदेवता चौदह ॥ १४ ॥ अज्ञानाऽधिष्ठानव्यतिरिक्ताश्चतुर्दशकम् पूर्वोक्तस्त त्वैःसह पप्णवतिरितिकेचित् ॥ विविदिपासंन्यासो विद्वत्संन्यासश्चेति परमहंससंन्यासद्वयम् ॥ जात- रूपधरः कमण्डलुधारीति विद्वत्संन्यासद्वयम् ।। क्रमनिग्रहोरूढनिग्रहश्चेतिनिग्रहद्वयम् ॥ सामान्या- हंकारो विशेपाऽहंकारश्चेति अहंकारद्वयम् ॥ ब्रह्मानंदो विपयानंदो वासनानंदश्चेति आनंद- त्रयम् ॥ भा-यहां अज्ञानके अधिष्ठानदेवता ईश्वर से अलग चौदह देव- तोंको लेना फिर ये सब पूर्वोक्त तत्वोसमेत छियानवें ९६ तत्व होते हैं ऐसे भी कितेक आचार्योंका मत है, विविदिपासंन्यास विद्वत्संन्यास २ ऐसे परमहंससंन्यास दो प्रकारका है । जातरूप धर १ (नग्न रहना)। और कमंडलुमादि धारण करना २ ऐसे दो प्रकारका विद्वत्संन्यास है । क्रमसे निग्रह(रूड)एकवार निग्रह करना.ऐसे दो प्रकारका निग्रह है। सामान्य अहंकार विशेष अहंकार ऐसे दो प्रकारका महकार है। ब्रह्मका आनंद १ विषयका आनंद २ वासना आनंद ३ ऐसे तीन प्रका. रवा मानंद होता है।
(५८.) वेदांतसंज्ञा । निजानंदमुख्यानंदात्मानंदयोगानंदाद्वैतानंदानांव मानंदेंऽतर्भावः। विद्यानंदस्यविपयानंदेंतर्भावः आ- गामिसंचितप्रारब्धानिकर्मत्रयम्। प्रारब्धकर्मफलभो- ता सन् मरणपर्यंतं कृतंपुण्यपापरूपं कर्म आगा- मीत्युच्यते १ जन्महेतुभूतं स्थितंपूर्वजन्मकृतं कर्म संचितमित्युच्यते २ शरीरारंभककर्म प्रारब्धमि- तिभेदः३ जाग्रजायजायत्स्वप्नः जाग्रत्सुषुप्तिरिति जाग्रत्रयम् १ स्वप्रजाग्रत् स्वप्नस्वनःस्वप्नसुषुप्तिरि- तिस्वमत्रयम् २ भा०-निजआनंद, मुख्यआनंद, आत्मानंद, योगानंद, अद्वैतानंद इन्होंका अंतर्भाव ब्रह्मानंदमेंही है और विद्यानंदका विषयानंदमें अंतर्भा- व है । आगामि १ संचित २ मारब्ध ३ ऐसे तीन कर्म है । प्रारब्धकर्म- को भोगता हुआ मरणपर्यंत जो पुण्यरूप अथवा पापरूप कर्म करता है वह आगामि कर्म है १ जन्मका हेतुभूत जो पूर्वजन्ममें किया हुआ कर्म स्थित है वह संचित कर्म कहलाता है २ शरीरका आरंभक कर्म प्रारब्धकर्म है ऐसा भेद है ॥३॥ जानवजाग्रत् १ जाग्रत् स्वप्न २ जाग्रत सुपुति ३ ऐसे तीन प्रकारकी जाग्रत्अवस्था है। स्वप्नजाग्रत् १ स्वप्न- स्वम २ स्वप्रसुपुति ३ ऐसे तीन प्रकारकी स्वप्नअवस्था है ॥ २॥ सुपुप्तिजाग्रत् सुषुप्तिस्वप्नः सुपुप्तिसुषुप्तिरितिसुषुप्ति- त्रयम्३ तथाहि-प्रमाज्ञानं जाग्रजाग्रत् शुक्तिरजता- दिभ्रमो जाग्रत्स्वनः२ श्रमादिनास्तब्धीभावोजाग्र- त्सुषुप्तिः३एवंस्वप्नेमंत्रादिप्राप्तिः स्वप्नजाग्रत् १स्वप्ने- पिस्वप्नोमयादृष्टःइतिबुद्धिःस्वप्नस्वप्नः२ जाग्रदशा-
भाषाटीकासमेता।
योकथयितुं न शक्यते स्वप्नाऽवस्थायां यत्किचिद-
नुभूयते तत्स्वप्नसुषुप्तिः३एवंसुपुप्त्यवस्थायामपिसा-
त्विकीयासुखाकारावृत्तिः सासुषुप्ति जाग्रत् ॥१॥
तदनंतरसुखमहमस्वाप्समितिपरामर्शः ॥
भा०-सुपुप्ति जाग्रत् १ सुपुति स्वप्न २ सुपुतिसुषुप्ति ३ ऐसे तीन
प्रकारकी सुपुतियवस्था है-तथाहि-सो इन सबोंको दिखाते हैं-(प्रमा-
ज्ञान ) ययार्य बुद्धिसे वस्तुका ज्ञान रहना सो जाग्रत्में जाग्रत् है ।
जैसे सीपमें चांदीका भ्रमहोता है ऐसे वस्तुका भ्रम होना तहां जाग्रतमें
स्वम है २ श्रम आदि करके (स्तब्धीभाव) चित्तमें कछुभी विचार न
रहना तब जाग्रत्में सुपुत्ति है ॥ ३ ॥ ऐसेही मुपनामेभी मंत्र नादिकी
माप्ति होना तव स्वप्न जाग्रत् है १ सुपनामेभी मैंने सुपना देखा ऐसी
बुद्धि स्वप्नमें स्वप्न है २ जाग्रत् दशामें कहनेको समर्य नहीं है
सुपनामें तो कलुक ( अनुभव हुआ)दीखाया, यह स्वप्न अवस्थामें सुषुप्ति
है ॥ ३ ॥ ऐरोही सुपुति अवस्था भी ( सात्विकी ) सत्वगुण प्रधान-
पाली जो सुखाकारवृत्ति है सो सुपुप्तिमें जाग्रत् है, तिसके ननंवर में
सुखसे सोता भया ऐसा (परामर्श ) ज्ञान होता है ।।
तत्रैवयाराजसीवृत्तिः सासुपुप्तिस्वमः ॥२॥ तद्-
नंतरंदुःखमहमस्वाप्समिति परामर्शोपपत्तिः तत्रैव
यातामसीवृत्तिः सासपुप्तिसपुप्तिः३तदनंतरं गाढंमूढो
हिमासमितिपरामर्शाज्ञानात्मा महात्मा शांतात्मा
चेतिआत्मत्रयम्। कुटीचकोवहूदको हंसो परमहंस-
श्चेति संन्यासचतुष्टयम् । अथभूमिकावर्णनम्।तत्व-
विदोपिलेशसयायाऽस्त्येवमसंप्रज्ञातसमान्यपेक्षात-
स्य असंप्रज्ञातसमाधेोऽश्वादिविषयागनिरोधःप्र-
धमाभूमिः ॥१॥
वेदांतसंज्ञा। (६०) भा०-तहां सुपुत्तिअवस्थामें जो ( राजसी ) रजोगुण प्रधानवाली वृत्ति है सो सुपुत्ति अवस्थामें स्वप्न है ॥२॥ तहां, तिस सोनेके अनंतर दुःखपूर्वक मैं सोता भया ऐसे (परामर्श) ज्ञानकी उपपत्ति होती है और तहां जो (तामसी) तमोगुण प्रधानवाली वृत्ति है सो सुपुप्तिमें सुषुप्ति है ॥३॥ तिसके अनंतर (गाढ़) बहुत्तधना (मूढ) अचेत में होता भया ऐसा परामर्श ज्ञान होता है इति॥ ज्ञानात्मा १ महात्मा २ शांतारमा ३ ऐसे तीन प्रकारके आत्माहें । कुटीचक १ (कुटीमेंही प्रकाशनेवाला) बहूदक २ वहुतजगासेअन्नजलादिलाने वाला हंस ३ परमहंस ४ ऐसे चार प्रकारका संन्यास है ॥ अथ भूमिका वर्णनम् ॥ तत्ववेत्ता पुरुषकेभी क्वेश नष्ट होनेके वास्ते हो ऐसे असंप्रज्ञात समाधिकी अपेक्षा होवे तिस तत्व- वेत्ताके असंप्रज्ञात समाधिसे जैसे गौ अश्व आदिकोंकी वाणीका निरोध है ऐसे (मनके रहे संतेही) वाणीका (निरोध ) बंध होना प्रथम भूमि है ॥ १॥ वालमूकादिष्विवनिर्मननत्वं द्वितीया २ तंद्यामिवाहं कारराहित्यं तृतीया ३ सुपुप्ताविवमहत्तत्वराहित्य चतुर्थभूमिकेतिभूमिका चतुष्टयम्. ४ तदेतद्भूमिका चतुष्टयमभिप्रेत्यशनैःशनैरुपरमेदित्युक्तं भगवता । श्लोकः। अध्यात्मविद्याधिगमः साधुसंगम एव च ॥ वासनासंपरित्यागः प्राणस्पंदनिरोधनम् ॥ १ ॥ इतियुक्तिचतुष्टयम् ॥ भा०-पालक और गूंगा पुरुषकी तरह निर्मननत्व, कछुकहनेका मनन नहीं होना यह दूसरी भूमिका है २ और मू में जैसे अहंकार भी नहीं रहता है ऐसे अहंकार नहीं रहना यह तीसरी भूमिहै ३ सुषुप्ति- अवस्थाकी तरह महत्तत्वको भी अभाव होजाना यह चौथी भूमिका है ते भूमिकाचतुष्टयम् ॥ ४ ॥ सो इन चारों भूमिकाओंमें प्राप्त होके, . भाषाटीकासमेता। शनैः शनैः उपरमको प्राप्त होजावे ऐसे भगवान्नें भी कहाहै-श्लो अध्यात्म- विद्याकी प्राप्ति १ साधुजनका संग २ वासनाओंका सम्यक प्रकारसे त्याग ३ (फिर ) प्राणवायुको रोकना ४ इति.युक्तिचतुष्टय अर्थात् ये चार युक्ति हैं। चित्तक्षये एकैवयुक्तिःसाधनमित्यतः पूर्वस्मिन् दा- ढंयाभावे उत्तरस्मिन्साधने प्रवृत्तिरितिचज्ञेयम् ॥ श्लोकाः । अजिह्व-पंढकःपंगुरंधोवधिरएवच ॥. मु- ग्धश्चमुच्यतेभिक्षुः पभिरतैर्नसंशयः ॥१॥ इत्य: जिह्वादिपट्कम् । इदमिष्टमिदंनेति योइनन्नपिन स- जते ॥ हितं सत्यं मितं वक्ति तमजिर्जा प्रचक्षते॥२॥ अद्यजातांयथानारी तथापोडशवापिकीम् ॥ शत. वर्षीचयोदृष्ट्वा निर्विकारःसपंढकः॥३॥ भा०-चित्तक्षय करने में एकही युक्ति साधनरूप है तहां पूर्व साधनमें प्रवृत्ति नहीं होवे तो उत्तर साधनमें प्रवृत्ति करना ऐसे जानना । लोक- जिहारहित १ नपुंसक २ पांगला ३ अंधा ४ यहिरा ५ मुग्ध (भोला) ६ इन छह गुणों करके भिक्षु (संन्यासी) जन मुक्तिको प्राप्त होता है इसमें संदेह नहीं १ इति अजिहादिपटम् || अव स्पष्ट कहते है यह-मीठा है यह नहीं है ऐसे भोजन करता हुआ जो नहीं मासक्त होता है और हित, सत्य (मित) स्वल्प प्रमित जो बोलता है उसको अनि अर्यात जिहारहित कहते हैं २ जसे अब जन्मी हुई नारीको (कन्याको ) जाने वैसेही सोलह वर्षकी तयाही सौ वर्षकी स्त्रीको देखके जो विकारको प्रा- सन हो (मन चलायमान नहो ) सो नपुंसक है ॥ ३ ॥ भिक्षार्थमटनं यस्य विण्मूत्रकरणाय च ॥ योजना- न परंयाति सर्वथा पंगुरेव सः॥३॥ तिष्टतोवनतो । (६२) वेदांतसंज्ञा। वापि यस्यचक्षुर्नदूरगम्॥चतुर्दिक्षुभुवंगत्वा परिवाष्ट्र, सोऽधउच्यते ॥ ४॥हिताहितं मनोरामं वचःशोका- वहं च यत् ।। श्रुत्वापिनशृणोतीह बधिरः सप्रकीर्ति- तः॥५॥ सान्निध्येविषयाणांच समर्थोऽविकलेंद्रियः। सुप्तवर्तते नित्यं स भिक्षुर्मुग्ध उच्यते ॥६॥ भा०-जो भिक्षाके वास्ते गमन करै अथवा मलमूत्र त्यागके वास्ते कही जावे और (योजन ) ४ कोशसे परे कभी न जावे वह संन्यासी सर्वथा पांगला है ३ ठहरते हुएके अथवा गमन करते हुएके जिसके नेत्र (दृष्टि) दूर नहीं जाते हैं चारों दिशामें पृथ्वीको प्राप्त होके (विचरके भी) वह संन्यासी अंधा है ४ हित अहित, मनको प्रिय, शोक करने वाला, इत्या- दिक सब प्रकारके वचनोंको सुनके भी जो नहीं सुनता है वह संन्या. सी इस जगत्में बहिरा है ५ विषय समीप हुये पीछे समय और परि. पूर्ण इंद्रियोंवाला भी जो सोताहुआकी तरह वर्तता है वह संन्यासी मु. ग्ध अर्थात् भोला कहलाता है ॥ ६ ॥ मौनं योगासनं योगस्तितिक्षकांतशीलताम्॥निस्पृ- हत्वं समत्वं च सप्तेतान्येकदंडिनः ॥७॥ इति मौना- दिसप्तकम् ॥ ईडा च पिंगला चैव सुषुम्ना च ततःप- रम् ॥ गांधारीहस्तिजिह्वाच पूपाचैवपयस्विनी ८॥ लकुहाऽलंबुसाचैव शंखिनीदशनाडिकेति ॥ ना- डिकादशकम् ।। ईडाचंद्रनाडी १ पिंगलासूर्यना- डी२ सुषुम्ना मध्यनाडी ३गांधारीदक्षिणनत्रिका हस्तिजिह्वावामनेत्रिका ५ पूपादक्षिणकर्णिका ६ भा-मौन १ योगका आसन र योगाभ्यास ३ तितिक्षा (सहना) निरंतर शीलता ५ इच्छा रहित ६ समता ७ ये सात एकदंडी संन्यासीके .
- (.६३) । भाषाटीकासमेता। धर्म ७ इति मौनादिसप्तकम् ॥ इडा, पिंगला,सुपुम्णा, गांधारी, हस्ति, जिही पूषा, पयस्विनी ॥ ८॥ लकुहा, अलंबुसा, शंखिनी, ये दश- नाडी हैं-इति नाडी दशकम् ।। ईडा चंद्रमाकी नाडी है १ पिंगला सूर्य- की नाडी है २ सुपुम्णा मध्यकी नाडी है ३ गांधारी दहिने नेत्रमें है। हस्तिजिहा वायें नेत्रमें है ५ पूषा दहिनें कानमें है ॥ ६॥ पयस्विनी वामकर्णिका लकुहागुदानाडी ८ अलं- वुसामेट्रनाडी ९ शंखिनीनाभिनाडीति विवेकः १० हरिब्रह्मरुदेंद्रवरुणेशपद्मोद्भवपृथिवीसूर्यचन्द्राः क- मानाडीनां दश देवताः॥धनिनः स्थायिनः कृतिः नः चक्रवर्तिनः क्रोधिनो मायिनः अतिचारिणो वाहनवतः अन्तर्मदोस्ति इत्यष्टांतरंगमदाः ॥ कुलं चैव धनं चैव रूपं यौवनमेव च । तथा राज्यं तपश्चैव इत्येते मड्बहिर्मदाः॥ भा०-पयस्विनी वाये कानकी नाडी है ७ लकुहा गुदाकी नाडी है ८ अलंबुसा लिंगकी नाडीहै ९ शंखिनी नाभिकी नाडी है ऐसा विवेक है ॥ १० ॥ हरि, ब्रह्मा, रुद्र, इंद्र, वरुण, शिव, ब्रह्मा, पृथिवी, सूर्य चंद्रमा, ये क्रमसे इडा आदि नाडियोंके दश देवता हैं ॥ धनवालेके १ किमी एक जगह स्थित रहने वालेके २ विद्यावाले पंडितके ३ चक्रवर्ती राजाके ४ क्रोधवालेके ५ मायावालेके ६ अत्यंत विचरनेवालके ७ (इस्ती आदि ) वाहनवालेके. ८ भीतर मद (अभिमान ) रहता है ऐसे ये नाठ अंतरंग मद कहलाते हैं ॥ कुल १ धन २ रूप ३ यौवन ४ राज्य ५ तप६ऐसे ये छह बहिर्मद अर्थात् वाहिरके मद हैं । पृथिवीसलिलं पावकःशशी पवनोंवरंरविःआत्मेत्य- प्रमूर्तिमदाः॥ पृथ्वीमदाविर्भावे तद्गुणभरितः वस्त्रा- दीच्छावान् भवति जीवः १ सलिलमदाविर्भाव १ वेदांतसंज्ञा। ' संसारभरितः ममेदमावश्यकमितिर्चितायुक्तो भय, तिजीवः ॥२॥ पावकमदाविर्भाव कामरसभरित वनितासंभोगेच्छायां तदनुकूलव्यापारवान जीवो भवति ॥३॥ भा-पृथ्वी १ जल २ अग्नि ३ चंद्रमा ४ वायु ५ आकाश ६ सूर्य आत्मा अर्थात् क्षेत्रज्ञ अथवा बुद्धिध्ये आठ मूर्तिके(शरीरके,)मद हैं। पृथ्वीका मद प्रगट होताहै तब तिस पृथ्वीके गुणोंसे भराहुना जीव वस्त्र आदिकोंकी इच्छावाला होता है १ चंद्रमाका मद प्रकट होने में संसारसे भरा हुआ जीव मैंने यह (काम) अवश्यही करना चाहिये ऐसी चिंतासे युक्त होताहै २ आग्रेका मद प्रकट होताहै तब कामदेवके रससे भराहु- आयह जीव स्त्रीक संभोगकी इच्छामें तत्परहोतिसके ही अनुकूल व्यापार वाला होताहै ॥३॥ शशिमदाऽऽविर्भावे चिंताभरितः करिष्यमाणकार्य भविष्यति वा कृतं चेदन्यथाभविष्यति वेतिसंशया- तूष्णीस्थितो भवति जीवः ॥४॥ पवनमदावि- र्भावे प्रयाणभरितः परदेशेच्छावान् भवति ॥५॥ आकाशमदाविर्भाव वाहनभरितः गजाश्चादीइच्छा- वान् भवति ६सूर्यमदाविर्भावक्रोधाग्निभरितः इदं संहर्तव्यमितीच्छावान् ॥७॥ आत्ममदाविर्भावे अहंकारभरितः विद्यादिभिः मम समः को वेत्तीति प्रज्ञावान् भवति जीवः इति विवेकः॥ ८॥ भा-चंद्रमाका मद प्रकट होवे तब चिंतासे भराहुआ जीव, किया जावेगा यह काम होगा क्या? किया हुआ उलटा (निष्फलही) होगा ऐसे संदेहसे चुपका हो बैठता है ४ वायुके मद प्रकट होनेपर गमनसे भरा .
भाषाटीकासमेता। . (६५) हुआ पीव परदेशकी इच्छावाला होता है॥५॥आकाशमद प्रकट होवे तब वाइनसे भरा हुआ हस्ती घोअ आदि वाहनोंका .इच्छावाला होता है ॥ ६॥ सूर्यका मद प्रकट होनेंमें क्रोधमिसे भरा हुआ जीव यह हरना चाहिये ऐसी इच्छावाला होता है ।। ७॥ आत्मा (बुद्धि वा क्षेत्रज्ञ मात्माके )मद प्रकट होनेपर अहंकारसे भरा हुआ जीव विद्या आदिकों करके मेरे समान कौन जानता है ऐसी बुद्धिवाला होता है। ऐसा दि- वेक है ॥८॥ अथ श्लोकौ ॥ घृणा शंका भयं लज्जा जुगुप्सा चेति पंचकम्।।कुलंशीलंच वित्तंचह्यौपांशाः प्रकीर्तिताः ॥॥रसोरुधिरमांसेच मेदोमजास्थिरेतसी।सप्तधा- तुरयंप्रोक्तः सर्वदेहसमाश्रयः ॥२॥इति सप्तधातवः। भुक्तमन्नं रसात्मकतयापरिणतं सत् रस इत्युच्य- ते एवंसर्वत्ररुधिरादिषु रसात्मकतयादि ज्ञेयम् ॥ तनुव्यसनमनोव्यसनधनव्यसनराज्यव्यसनविश्वव्य- सनोत्साहव्यसनसेवकव्यसनानीति सप्तव्यसनानि । . भा०-अथश्लोक-घृणा(दया) १ शंका २ भप ३ लज्जा ४ जुगुप्सा (निंदा)५ ये पांच और कुल १शील (स्वभाव)२ धन ३ ऐसे ये आठ पाश भर्यात् फाँशीकही हैं ॥१॥रसररुपिर २ मांस इमेद ४ मज्जा ५ मस्पि ६ वीर्य ७ ये सात धातु सो संपूर्ण देहके आश्रय रहते हैं।॥२॥इति सप्तधा- तवः॥भोजन किया हुमा भन्न रसात्मकता करके नर्यात् रस रूपहोके विकारको मात हुमा रस ऐसे कहलाता है। ऐसेही सब जगह रुपिर- मादिकोंमेभी रसात्मकता नादि जानना; मर्यात् रससे रुपिर, सपिरसे मांस यह क्रम जानना ॥ तनु (शरीरवा) म्पसन १ मनोव्यसन ५ . (६६) वेदांतसंज्ञा। २ धनव्यसन ३ राज्यव्यसन ४ विश्वव्यसन ५ उत्साहव्यसन /सवक- व्यसन ७ ऐसे सात व्यसन हैं। तनुव्यसनोद्मे शरीरं कृशं जातमिति जीवः खिन्नोभ- वति।मनोव्यसनोद्गमे चौर्यादिभीतिमान जीवो- भवति ॥२॥ विश्वव्यसनोद्मे ग्रहक्षेत्रादिसंपादनेच्छा वान्भवति जीवः॥३॥उत्साहव्यसनोद्गमे पुत्रकलवा- दीच्छावान्भवति जीवः ॥४॥ सेवकव्यसनोद्गमे पर राष्ट्रगमनादिसकंलधर्मपोषणरतो भवति जीवः॥५॥ शेपं स्पष्टम् ॥ कुलगोत्रजातिवर्णाश्रमनामभेदेन पत्रमाः । कर्णाटकद्राविडभेदाभिमान व्यवहारः कुलभ्रमः भा०-तनुव्यसन उठता है तब शरीर (कृश) माडा होगया ऐसे जीव दुःखी होता है १ मनका व्यसन उठनेमें चोरी आदिके डरवाला जीव होताहै २ विश्वव्यसन उठने में घर सेत आदि बनानेकी इच्छा। बाला जीव होताहै ३ उत्साहव्यसन प्रकट होवे तव पुत्र, स्त्री आदिकी इच्छावाला जीव होताहै ४ सेवकव्यसन प्रकट होनेमें पराये राज्यमें गमन आदि करके सम्पूर्ण धर्मके पालनमें जीवरहताहै५(शेष)अन्योंका म- र्यस्पष्ट है । कुल १ गोत्ररजाति ३ वर्ण ४ आश्रम, ५ नाम ६ इनभेदों- करके छह प्रकारके भ्रमहै।कर्णाटक द्राविड आदि भेदके अभिमानवाला जो व्यवहार है सो कुलभ्रम है १ ॥ विश्वामित्रादिव्यवहारोगोत्रभ्रमः २ ब्रह्मक्षत्रवैश्यशू- भेदाभिमानव्यवहारोजातिभ्रमः३अप्टादशवणेष्व-. हंश्रेष्ठ इत्यभिमानव्यवहारो वर्णभ्रमः४शेपंस्फुटम्॥
(.६७)। भाषाटीकासमेता। अविद्यास्मितास्यास्पर्धाभिनिवेश-पंचक्लेशामलमू- त्रादिवेष्टितस्थूलंशरीरमेवाहमित्यभिमान एवाविद्या ॥१॥ तापत्रयेण परिभवानुभवएवास्मिता. ॥२॥ रागादिभिः परिभवानुभवएवासूया ॥३॥ सज्जन- दर्शने द्वेपवुद्ध्या निषेधनमेव स्पर्धा ॥४॥ भा-विश्वामित्र आदि जो व्यवहार हैं सो गोत्रभ्रम है २ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, भेदके अभिमानवाला जो व्यवहार है सो जातिभ्रम है ॥ ३ ॥ अठारह वर्षों में मैं श्रेष्ठ हूं ऐसे अभिमानका जो व्यवहार है सो वर्गभ्रम है ॥४॥ (शेष ) वाकी स्पष्ट अर्थ है-अविद्या १ अस्मि- ता २ असूया ३ स्पर्धा ४ अभिनिवेश ५ ऐसे ये पांच क्लेश हैं ॥ मल- मूत्र आदिकोंसे वेष्टित जो स्थूल शरीर है ‘सोही मैं हूँ ऐसा अभिमान अविद्या है १ तीन तापोंकरके' दुःख होनेका अनुभव करना (सूक्ष्म अहंकाररूपं) अस्मिता है ॥ २ ॥ और राग आदिकों करके तिरस्कार- का अनुभव करना असूया है ॥३॥ सज्जनके दर्शन होनेमें वैपकी बुद्धि करके निषेध करना यह स्पर्धा है ॥ ४॥ लोकरंजनाय तदुचितकमोद्योगद्धेपादिधारणाऽभिनि वेश इति भावनीयम् ॥मानसतापःशारीरताप इ- त्याध्यात्मिकतापद्वयम् ॥ ज्वरगुल्मादिदोपसंपा- दिततापः शारीरः ॥ १ ॥ असूयाममा त्सर्यादिसंपादितचित्तव्याकुलतैव मानसतापः२॥ इति विभावनीयम् । क्षयतापः, अतिशयतापः, साहसपतनतापः, इतिस्वर्गलोकतापत्रयम् ॥ यथा १ गुणेषु दोषारोपः मंसूया अर्थात् गुणों में जो दोपका आरोपणकरना यहा मसूयाका लक्षण है। .
'(६८) वेदांतसंज्ञा। स्वाजितधनक्षयेन मनोविचारात्मकतापः तथा, पुण्यकर्मक्षये पुनः पतनभीतिजन्यताप एव क्षय- तापः १ स्वर्गलोकगमनसमये स्वाधिकतरदेवता. स्थापितलोकदर्शनमे वाऽतिशयतापः २॥ भा०-लोगोंको प्रसन्न करनेके वास्ते तिनके मनलायक कर्मका उद्योग द्वेष आदिकी धारणा करनी सो अभिनिवेश है ऐसे जानना ।।५।। मानसताप १ शारीरताप २ ऐसे आध्यात्मिक दो ताप है-ज्वर १ तापतिल्ली २ आदि दोष संपादितताप शारीरसंज्ञक हैं १ असूया, मदा मत्सरता, इत्यादिकोंसे उत्पन्न हुई चित्तकी व्याकुलता मानसताप है ॥२ ऐसा विचार करना ॥ क्षयताप १ आतिशयताप २ साहसपतनताप ३ ये तीन स्वर्गलोकके ताप (दुःख ) हैं ॥ जैसे अपने संचित किये हुए धनके नष्ट होने में मनको विचारात्मक ताप होता है तैसेही पुण्य नष्ट .होनेंमें फिर परनेकी (भीति ) भयसे उत्पन्न हुआ ताप क्षयताप है ? स्वर्गलोकमें जाते समय अपनासे जो अधिक देवताका स्थापित किया हुआ लोकके दर्शन होना यह अतिशयताप है ॥ २॥ पुण्यकर्मक्षयाऽनंतरं तत्रत्यसुरकोटिभिर्मुद्गरमुसल. प्रहरणेन कम्पितसर्वांगपतनं स्वर्गलोकसाहसपतन- तापः॥३॥इतिबोध्यम्॥अथपंचसप्ततिगुणाःकथ्यते। अस्थिमांसत्वचानाडी रोमचैवतुपंचमम् ॥ पंचशि- तिगुणाप्रोक्तास्तथैवांशाप्रकीर्तिताः॥१॥ श्लेष्मा मूत्रंतभास्वेदः शुक्रशोणितमेवच ॥ अपांपंचगुणाः प्रोक्तास्तथैवांशा प्रकीर्तिताः ॥२॥ क्षुधापा तथानिद्रा ह्यालस्यंसंग एवच ॥अग्ने पंचगुणाःप्रोक्का स्तथैवांशा प्रकीर्तिताः ॥३॥ .
भाषाटीकासमेता। (.६९) भी--पुण्यकर्म क्षय होनेके अनंतर तहां स्वर्गवासि देवगणों करके मुद्रे, मुसल, आदिके प्रहारसे कांपते हुए सब अंगवालेको नीचे पटक- ना ऐसा यह स्वर्गलोकमें साहसपतन ताप है ऐसे जानना ॥ अब पिछत्तर गुणोंको कहते है।अस्थि १ मांस २ त्वचाइनाही ४ रोमध्ये पांच पृथ्वी- के गुणहैं तथा इनको पृथ्वीके अंशभी कहते हैं॥१॥श्लेप्म (कफ) १ मूत्र २ पसीना ३ शुक्र ४ शोणित ५ ये पांच जलके गुण हैं तथा इनको जलके अंशभी कहते हैं ॥२॥ क्षुधाश्तृपा २ निद्रा ३ आलंस्य ४ संगहोना ५ये पांच अनिके गुण हैं तथा ये अनिके अंशभी कहलाते हैं ।। ३ ।। धावनंचलनचैव कुंचनंचप्रासारणम् ॥ वियोगश्चेति विज्ञेयं वायोः पंचगुणाइति ॥४॥रागद्वेपौभयंल- ज्जा मोहश्चनभसस्तथा।। इतिपंचगुणा प्रोक्तास्तथै- वांशाप्रकीर्तिताः ॥ ५ ॥ तथाचपृथिव्याः श- ब्दस्पर्शरूपरसगन्धात्मकपंचगुणकत्वेन शब्दादि- पंचगुणसंबंधिन्यां पृथिव्यांपंचविंशतिंर्गुणाःप्राप्ताः एकैकस्यशब्दगुणादेः श्लोकोक्तपंचविशेषगुणत्वकथ- नात् ॥ तथाऽपविशतिर्गुणाः अग्ने पंचदशगुणाः वायोर्दशगुणाः आकाशस्य पंचगुणाः इत्याहत्य पंचसप्तत्तिर्गुणाः ७५ इति सुधीभिर्विभावनीयम् ॥ भा०-भाजना १ चलना २ सिमटना ३ फैलना ४ वियोग (अलग) होना ५ ये पांच वायुके गुण हैं तथा अंशभी कहलाते हैं ॥४॥ राग, १ द्वेष.२ भय ३ लजा ४ माह ५ ये पांच आकाशके गुण है तथा अशी . १ शन्दगुण आकाश इत्युक्तत्वात् शब्दगुणादेः कोर्थ आकाशादेः पृथक् पृथक पंचपंचगुणकथनात् तेषां चाकाशादीनां पृथिव्यां सत्त्वात् पृथिव्याः पंचविंशतिगुणा इति ।
(७०) वेदांतसंज्ञा कहलाते हैं ५ सो इनको स्पष्ट कहते हैं; पृथिवी में शब्द स्पर्श रूप रस गंध ये पांच गुण (पांचोंही तत्वोंके हैं) इस लिये शब्द आदि पांच गुण संबंधिनी पृथ्वीमें पच्चीस गुण प्राप्त है क्योंकि एक २ (शब्द गुणादि) आकाशादिके पांच२ गुण कहचुके हैं।और जलके बीस गुण है। अनिके पंदरह गुण हैं, वायुके दश गुण हैं, आकाशके पांच गुण हैं ऐसे ये सब इकट्ठे होके पिछहत्तर ७५ गुण होते हैं ऐसे पंडितजनोंको विचा- रना चाहिये। श्वेतपीतहरितरक्तकृष्णमांजिष्ठभेदेन रूपंपड्विधम् ॥ शीतोष्णमृदुकठिनभेदेन स्पर्शश्चतुर्विधः ॥ अ- क्षराऽनक्षरभेदेनशब्दोद्विविधः ॥ मधुराऽम्लतिक्त- कटुककपायलवणभेदेन रसः पड्विधः ॥ सुगं- धदुर्गधभेदेन गंधोद्विविधः ॥ प्राणवायुः नील- वर्णः १ अपानवायुः हरितवर्णः २ व्यानः कपि- लवर्णः ३ उदानवायुः तडिद्वर्णः ४ समानः नी- लंवर्णः ५ नागवायुः पीतवर्णः ६ कूमश्वेतवर्णः ७ कृकलः अंजनवर्णः ८ देवदत्तः स्फटिकवर्णः । ९ धनंजयः नीलवर्णः १० इति दशवातानां वर्ण- कथनम् ॥ भा०-सफेद, १ पीला २ हरा ३ लाल ४ काला ५ मंजीठा ६ ऐसे भेदों करके छह प्रकारका रूप(रंग) है ॥ शीत १ गरम २ कोमल करडा ४ इनभेदों करके चार प्रकारका स्पर्श है ॥ अक्षर, अनक्षर (विनाअक्षर) ऐसे भेद करके दोप्रकारका शब्द है।मधुर १ खट्टारकडुवा, चरा ४ कसैला ५ नमकीन ६ ऐसे भेद करके छह प्रकारका रस है ।। सुगंध दुर्गंध भेद करके दोपकारका गंध है। प्राणवायु नलिावर्ण है १ .
भाषाटीकासमेता। ६७१) अपानवायु इरावर्ण है २ व्यान (कंपिल) धूसरवर्ण है ३ उदानवायुका विजेली सरीखा वर्ण है । समानवायु नीलवर्ण हैपनागवायु पीलावर्ण है ६ कूर्म सफेदवर्ण है ७ कृकल अंजनवर्ण है ८ देवदत्त स्फटिकवर्ण है ९ धनंजयवायु नीलवर्ण है १० इति दशवायुओंका वर्ण ॥ ऐश्वर्यस्यसमग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः॥ज्ञानवैरा- ग्ययोश्चैवपण्णांभग इतोरणात्।१।इत्यैश्वर्यादिपट्- कोउत्पत्तिनिधनेयोवैभूतानामाऽऽगतिगतिम्।। वेत्ति विद्यामविद्यांचसवाच्योभगवानिति॥२॥इत्युत्पत्त्या- दिपट्कम् । नादविदुकलाः नादादित्रयम् गलविवरे यत्कंठनिनादनकरणं सनादः १ अनुस्वारोविंदुः२ नादैकदेशा कलेत्यर्थः ॥३॥ तथाचाऽसंगाऽद्विती- यब्रह्मप्रतिपादके वेदांतशास्त्रे वृद्धवचनमुपसृत्याऽ- ध्यारोपवशात्संज्ञाः संतीति प्रतिपादितम् ॥ भा०संपूर्ण ऐश्वर्य १ वीर्य अर्थात् पराक्रम २ यश ३ लक्ष्मी ४ ज्ञान ५ वैराग्य ६ इन छहाँको भग कहते हैं १ इति ऐश्वर्यादिपदकम् ! जो पुरुष प्राणियोंकी उत्पत्ति. १ मृत्यु २ आवना ३ जाना ४ तथा वि. या ५ अविद्याको जानता है वह भगवान ऐसा कहना २ इति उत्पत्ति आदि छह ॥ नाद १ बिंदु २ कला ३ ये नाद आदि तीन हैं । गलके छिद्रमें जो कंठमें निनाद किया जाता है सो नाद है १ अनुस्वारको बिंदु कहते हैं २ नाइके एकदेशमें होनेवाली कला है ३ तथाच कहते हैं असंग अद्वितीय . ग्रंक्षको प्रतिपादन करनेवाले चेदान्तशास्त्रमें वृद्ध- वचनका आश्रय लेकै अध्यारोप जैसे (रज्जुमें सप) तिसके वशने ये सब संज्ञा है ऐसा (प्रतिपादित ) कहा है !! १-अध्यारोपे नाम वस्तुनि अवस्त्वारोपः । वस्तु सच्चिदानंदात्मकं ब्रह्म, अवस्तु अज्ञानादिसकलजडसमुदायस्वरूपमहामपच इति । - । (७२.) वेदांतसंज्ञा। अथ अपवादलक्षणम् ॥ अधिष्ठानमात्रपर्यवशेष- णमपवादः । तथाच सर्वप्रपंचरहितब्रह्माऽहमस्मी- ति प्रत्यगऽभिन्नब्रह्मज्ञानान्मुक्तिरिति सिद्धम् ॥ इति संज्ञाप्रकरणं समाप्तिमगार सं० १९५२ ॥ भा-अथ अपवादका लक्षण । जो अधिष्ठान मात्रही अवशेष रह जावे अर्थात् जैसे रज्जुमें सर्प है तहां रज्जु अधिष्ठान है वही ज्ञान होके शोष रह जावे, सो अपवाद है ।। तथाच सोही सर्व प्रपंचसे रहित (ब्रह्माह- मास्मि) मैं ब्रह्म हूं ऐसा प्रत्यक् आत्मासे अभिन्न ब्रह्मज्ञानसे मुक्ति है ऐसा सिद्ध भया ॥ इति श्रीवदरीपुरनिवासि-गौडवंशोद्भवद्विजशालि- ग्रामात्मज-पंडित-वसतिरामविरचित-भाषाटीकायां वेदान्तसंज्ञाप्रकरणं समातम् ॥ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना-खेतवाड़ी-मुंबई,