Sanmati Library, Jaipur

Vaidik Yagya Sanstha (vol Ii)

Satavalekar, Damodar · 2009/09

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संस्कृत पाठ माला
धारह पुस्तकोफा मूल्य म. आ. सं३) और बी. पी. संभ) प्रति.
भाग का मूल्य :-) पांच आने और डा. ग.) एक मामा आर्यन
सुगम रीतिसे संस्थत भाषाका आययन करने की दापूर्व पद्धति ।
इस पदतिकी विशेषता यह है-
प्रथम, द्वितीय और तृतीय माग।
इन भागाम संरल के हार गधाम परिसराला ।
२ चतुर्थ भाग।
इस नुर्य नागमें सपि विचार मा।
३ पंचम और पट भाग।
इन दो भागों में संस्कृत साबिर पाई।
४ सप्तम ले दशम भाग।
इन चार भागाम पुलिंग, स्त्रीलिंग और नाम रूप
बनानेकी विधी ताई है।
५एकादश भाग।
इस नागमें "सर्वनाम के समान है।
दद्वादश भाग।
इस भागमें समासों का विचार किया
७ तेरहले मठारह भाग तक ६ भाग
इन : भागों में किया विचार की पाठविधि मा है।
८. उन्नीससे चौबीसवे भागतको भाग
इन छ: मागोमें वेद के साथ परिचय कराया है।
अर्थात् जो लोग इस पद्धतिले अध्ययन फरेंगे उन को आ
परिश्रमले बा लाम हो सकता है।
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साध्याय मंडल औंध (जि. सातारा

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वैदिक यज्ञ संस्था
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द्वितीय भाग।
Maiसकसीवी
संपादक और प्रकाशक
श्रीपाद दामोदर सातवळेकर
स्वाध्याय मंडल, औंध (जि. सातारा)
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प्रथम बार.
संवत् १९८३ , सन १९२७.....
मूल्य १) रु०

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मुद्रक तथा प्रकाशः।
श्रीपाद दामोदर सातवळेकर
भारत मुद्रणालय, स्वागार मंटन
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वैदिक यज्ञ संस्था
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द्वितीय भाग!
2
विषय संबंध।
इस या ग्रंथमाला का उद्देश्य वैदिक या संस्था का
विचार प्रकाशित करना है। इस लिये यहका तत्त्व जानना
अत्यावश्यक है । यह वैदिक यज्ञ के तत्त्वका विवेचन
भारत वर्ष यज्ञकी कमी " लेख में पाठक देख सकते
हैं। इस लेखमें श्री पं० देवशर्माजी विद्यालंकार ने जिस
दंगसे यशक तत्त्वका स्पष्टीकरण किया है उस प्रकार का
कोई लेख इस समयतक भारत वर्षकी किसी भाषामें
प्रकाशित नहीं हुआ है और नाही किसी अन्य देशमै
हुआ है । हरएक दृष्टिसे यह लेख अपूर्व है और यदि
पाठक मनन पूर्वक यह लेख चार पांच वार पढेंगे, तो
उनको यत्रके तत्वका ज्ञान परिपूर्णतया हो
है। आशा है कि पाठक इस लेखसे लाभ उठावेंगे । यह
लेख प्रारंभसे पृ. ११८ तक विस्तृत है और इस में एक
भी पंक्ति ऐसी नहीं है कि जो लेखक महोदय.जीने विना
पूर्ण विचार करके लिखी न हो । हरएक बात इतनी
सकता

४
परिपूर्ण विचार से लिखनेका कौशल्य और प्रथित करनेकी योग्यता
पं० देवशर्माजी के अंदर अपूर्वहै और इस बात का अनुभव इस
लेखमें पाठक देख सकते हैं।
दूसरा लेख श्री० पं० बुद्धदेवजी का संज्ञपन और अवदानका
है। लेख यद्यपि छोटा है तथापि प्रभाव शाली है । पं० बुद्धदेव
के यज्ञविषयक लेख पहिले भाग में भी प्रसिद्ध हुए हैं और
इनके लेख बडी अन्वेषणापूर्वक लिखे होने के कारण हरएक
पाठक इनकी प्रशंसा मुक्तकंठसे करते हैं। यदि पं० बुद्धदेवजी
अपनी ब्राह्मणग्रंथोकी गवेषणा अधिक वेगसे चलायेंगे, और
उन ग्रंथोंमें संगृहित यशतत्त्व का आविष्कार करना अपना जीवनो-
घेश्य बनायेंगे तो गूढ •यक्ष विषयकी उलझान करने में
वे कृतकार्य हो सकते हैं इस में हमें शंका नहीं।
तीसरा लेख “ यज्ञ में पशुहिंसा तथा उसका इतिहास " है।
यह लेख गुरुकुल कांगडी की साहित्यपरिषद् द्वारा संपादित
यज्ञ हिंसा विषयक ग्रंथसे उद्धृत किया है, जो अवश्य पढने
योग्य है।
आगे पुरुषमेध या 'नरमेध' शीर्षक का संपादकीय लेख
है जिससे नरमेध की कल्पना स्पष्टरूप से व्यक्त हो सकती
है।
इस प्रकार यह द्वितीय भाग का लेखोका विषय है। इसके
आगे तृतीय भागमे एक एक 'वैदिक यज्ञ
तथा 'वैदिक
इष्टियां लेकर उनका विचार प्रकट करना है तथा यज्ञ का

कशा तथा अन्यान्य यकी विशेषताएंभी बताना है। और इस
प्रकार यह यह विषयक लेखमाला पांच भागोंमें समाप्त करनी
है। आशा है कि यह माला अपने कार्य के लिये उपयोगी सिद्ध
होगी।
निवेदक,
आँध (जि. सातारा) श्रीपाद दामोदर सातवळेकर,
१ पौष सं० १९८३
स्वाध्याय मंडल.

ww विषय सूची। पृथ गुरु कुल कांगडी) १ ३ विषय (१)भारत वर्ष में यशकी कमी (ले०-श्री० पं. अभय देवशर्मा विद्यालंकार, वेदाध्यापक १-११८ भूमिका यज्ञकी महिमा २ सबको बांधने वाली वस्तु यज्ञका मुख्यार्थ यज्ञका वाच्य अर्थ इन अर्थोका समन्वय १२ १३ यज्ञसे जो चाहे प्राप्त कर लो यज्ञमें अविश्वास १८ यज्ञके नियमोका अज्ञान १९ यज्ञपुरुषके तीन अंग २० ४ यज्ञोंके रूप यज्ञपुरुष (कोष्टक ) यज्ञपुरुषकं अंगोंका रस ૨૩ यज्ञपुरुषके अंगोंका व्यापार व कर्म २४ यज्ञके उत्तमांगमें त्रुटि ૨૬ यज्ञके मध्यमांगमें त्रुटि २९ यज्ञके अधरांगमें त्रुटि ३२ ३४ यज्ञ का प्राण यज्ञके देव और असुर ३८ ६९ ७२ विषय पृष्ठ पहिले दूसरे फिर मैं यक्षका घातक शत्रु परार्थ में स्वार्थ और स्वार्थ में परार्थ ४९ हवन प्रक्रिया क्या यक्ष सौदा है ? ५४ यशशेष ५६ उच्छेष ६० यशशेष और उच्छेष ६१ यक्षसे लोक और परलोकसिद्धि ६५ यत्रविस्तार ६६ यक्षसे यज्ञका यजन यज्ञ और पाश्चात्य लोग यशके चार ऋत्विज पुस्तकोंमें वर्णित प्राचीन यज्ञ राजसूय-यक्ष, विश्वजित्, अश्वमेध यज्ञ ७९ पुरुषमेध गोमेध सर्वमेध वाजपेय पशुबलि ८१ वैयक्तिक यश पंचमहायश, अतिथियज्ञ भूतयज्ञ पितृयज्ञ देवयज्ञ ब्रह्मयक्ष ९६ सूक्ष्म यज्ञों का उद्धार संसारकी नाभि १०० ७७ ८७ ८९ ८ विषय पष्ट मनुष्ययक्ष हमारा उद्धार कौन करेगा? १०८ परिशिष्ट प्रश्नोत्तर ११०-१२८ (२) संज्ञपन और अवदान (ले०-श्री. पं० बुद्धदेवजी विद्यालंकार आर्य सेवक) ११९-१२५ ३) यक्ष पशुहिंसा तथा उसका इतिहास । (गुरुकुल कांगडी द्वारा प्रकाशित) १२६-१३६ ४) नरमेध (संपादकीय) मेधका अर्थ १३७ मेधमें हिंसा का भाव ૨૨૮ नरमेध (कोप्टक) आलंभन का तात्पर्य १४० नरमेधका तात्पर्य मनुष्यत्वका विकास है १४१ नरमेध के विषयमें युरोपीयनो की संमति १४२ वेद स्वयं क्या कह रहा है ? १४७ क्या वेदमें हिंसा नहीं है ? १४८ पुरुषमेध के विषयमै महाभारतकी साक्षी नरयशवाचक शब्द वेदमें नहीं है नरमेध का विषय कहां है ? १५४ यजु० अ ३० का आशय १५४ पुरुष शब्दका अर्थ १५६ परमेश्वरका पुरुषमेध १५७ मनुष्यका पुरुषमेध १५८ कोष्टक, अंतिम वक्तव्य १५३ १६..

Tammar ॐ - ගe 'भारतवर्षमें यज्ञकी कमी। DoG JI - १ भूमिका। इस देशम होनेवाले किसीभी सार्वजनिक कार्य की गति देखते हए यह अनुभव हए बिना नहीं रहता कि हम लोग “यत्र को नहीं समझते । 'यज्ञ' शब्दका उच्चारण बेशक हम लोगा करते हैं परन्त जो यशवस्तु है उसे हमही सबसे कम समझते हैं संसार के अन्य उन्नत देशोंम 'यज्ञ' शब्द तो बोला नहीं जाता (क्यों कि उनकी भाषायें हमसे भिन्न हैं ) परन्तु यज्ञवस्तुका अ- नष्ठान हमारी अपेक्षा वे वहत अधिक करते हैं, इसी लिये वे उन्नत. और सुखी हैं। हमारे लिये यज्ञशब्द मुर्दा होगया है । वेदों और शास्त्रोंमें,सव प्राचीन संस्कृत साहित्य में हम " यज्ञ" बार बार पढते हये भी किसी सजीव वस्तुका बोध नहीं प्राप्त करते हैं। हमारा सव सा- हित्य ही मृतप्राय है । यह बहुत थोडोंके लिये जीवन रूपमें है। शब्द जीवित तब होते हैं जब उनके अर्थोका किसी जनसमुदाय में मनुष्यजीवन के साथ सम्बन्ध होता है । जिन शब्दोंका केवल ।

२ वैदिक यज्ञसंस्था। उच्चारण शेष रह जाता है और उनकं अर्थो से जीवन का कुछ सम्बन्ध नहीं रहता वे शब्द मर जाते हैं और उन से बने साहित्य भी मर जाते हैं । तो स्पष्ट है कि हम वैदिकधर्मावलम्बियोंको क्या कर्तव्य है जो कि वैदिक साहित्यका पुनरूजीवन करना चाहते है ? वैदिक साहित्यमें वर्णित बातों को अपने दैनंदिनीय व्यवहारमें लाना चाहिये । इसके विना कभी भी वैदिक साहित्य जीवित नहीं हो सकता। यहीं तो 'यम' का प्रकरण चल रहा है । हमें अपने जीवनों को 'यज्ञीय बनानेका यत्न करना चाहिये। जितना जितना हम यज्ञवस्तु को अपने दैनिक जीवन में बनेंगे उतना उतना हो यज्ञकातत्त्व, यज्ञका रहस्य, यज्ञका वास्तव अर्थ प्रगट होता जाय. गा। और धीरेधोरे इसी प्रकार हमें यनका असली तत्त्व स्पष्टतया प्रकाशित हो जायगा, तथा हमारे बहुतसे भ्रम दूर हो जायंग हमारे शास्त्रों में जो यज्ञके बडे बडे आश्चर्यकारी फल बतलाए हैं, तब हम उन्हें न केवल सत्य समझंगे पर उन्हें साक्षात्प्राप्त किया करेंगे। तव हमारे शास्त्रोंको कौन मुर्दा कह सकेगा? और यशजैसे एक महत्त्व के विषय को पुनरुज्जीवित करना हमारी बहत ही भारी सफलता होगी। २ यज्ञ की महिमा । वैदिक साहित्य में यज्ञका वडा भारी महात्म्य है. यह बात तो इसीसे प्रगट है कि इस सभी साहित्यमें- इस साहित्य की प्रत्येक पुस्तकमें- यज्ञचर्चा भरी पडो है। प्राचीन वैदिक साहित्यमे से यदि सव यज्ञ सम्बन्धी स्थलोका उद्धरण मात्र किया जाय तो एक वडा भारी पोथा वन जायगा । वहुतसे लोग तो मानते हैं कि वेदमें केवल यज्ञका हो विषय है । हम भी इले ठीक समझते हैं। परन्तु केवल भेद इतना है कि हम

सबको बांध रखनवाली वस्नु ।
३
-
-
यसका अर्थ बहुत विस्तृन समझते हैं । 'याशिक ' कहलाने वाले
लोग जिस वस्तुको या कहते हैं हमारा यम उससे बहुत विशाल
है. व्यापक है । बल्कि हम तो कहते हैं कि चारों वेद पैदा ही यशसे
हुए हैं।
तस्माद्यशात्सर्वहुत बचः सामानि जगिरे।
जन्यादि । अस्तु । हम यहां तो यह कह रहे हैं, कि वैदिक सा-
हिन्यम सर्वत्र यजका वर्णन है । वेद. ब्राह्मण, उपनिषद्, गीता
( महाभारत ) आदि सब ग्रंथों में जो यज्ञका बहुत बहुत व्या-
ग्यान है यह बतलाता है कि चैदिक धर्म में यम का महात्म्य कि-
तना अधिक है और हमारा स्वभावतः ध्यान खींचता है कि हम
ऐलो अन्नन वस्तु को जानं कि या क्या है।
मयको बांध रखनेवाली वस्तु ।
इस या महात्म्यकं प्रकरण में निम्न लिखित वेदमन्त्र ध्यान देने
योग्य है-
अयं यो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः ।
क्र.१११०४।३५ यजु.२३। ६२ अथ०९।१०।२४
यह या सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकी नाभि है, बान्धन वाला है।" यह
मन्त्र ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद तीनों में आता है । इससे
पहिले मन्त्रम प्रश्न किया गया है-
"पृच्छामि विश्वस्य भुवनस्य नाभिम् ।"
क।१०।३४, यजु. २३।६१ अथ०९।१०। १३
इस मन्त्रके चारा पादों में चारही प्रश्न हैं और अगले मन्त्रमें
क्रमशः इन चारों के उत्तर है । शेप तीन प्रश्नोंका यहां प्रसंग न
होनेसे उन्हें छोड दिया है और यहां एक एक पाद ही दोनों

वैदिक यज्ञसंस्था। ४ है मन्त्रों का उद्धृत किया है । प्रश्न यह है " मैं तुझ से पूछता हूं कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको बांधने वाली वस्तु कौन हैं ?" इसका उत्त- र दिया कि "यह यज्ञ इस संसार को बांधने वाला है।" "अयं यशो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः।" तो फिर यह जानना चाहिये कि यह यह क्या है, कहां जिससे कि सब संसार बंधा हुआ है ? ४ यज्ञका मुख्यार्थ। "भारतवर्ष में यज्ञ की कमी " यह शीर्षक देखकर कई लोग समझेंगे कि शायद मैं इस लेखद्वारा इस बात पर जोर देने लगा हूं कि भारतवर्ष में प्रत्येक घरमै प्रातः और सायं अग्निहोत्र होना चाहिये । परन्तु यह बात तो दूर है । अन्य उन्नत देशांकी अपेक्षासे तो इस बातकी भारत में कमी भी नहीं है। यज्ञ और अग्निहोत्र में भेद है। अग्निहोत्र भी एक प्रकारका या र्थात् यज्ञ अग्निहोत्र से एक बहुत व्यापक वस्तु हैं । यज्ञ वह है जिससे कि सब ब्रह्माण्ड बन्धा हुआ है: विखरता नहीं । अन्नि- होत्र तो गृहस्थाश्रमियों के नैत्यिक कौमसे एक कर्म है । परन्तु यह कर्म भी वृथा है जब तक कि हम यज्ञके असली अर्थको नहीं समझते । वह असली अर्थ क्या है ? इसे प्रकट करनेके लिये निम्न लिखित शब्दोको प्रयोग करूंगा। मेल, मिलना, जुडना, सम्बन्ध रखना. ठीक तरह जुडना, ठीक तरह सम्बन्ध स्थापित रखना। इन शब्दोंका स्पष्टीकरण आगे इसी लेखमें आता जायगा। यहां केवल यह अभीष्ट है कि पाठकोको पता लगे कि यज्ञ के अर्थ में मुख्य वात " संगतिकरण" है या वेदके भावानुसार कहा जाय तो "वांधे रखना " ( नाभि) यह यज्ञका मुख्य चिन्ह है। परन्तु यज्ञका है अ- यज्ञ " का वाच्य अर्ध । एक अर्थ क्या हुवा ? यशका लक्षण क्या है ? यदि यह मुझसे पूछा जाय तो मैं कहूंगा कि- मिल कर किये जाने वाले शुभकर्म का नाम यज्ञ है । यही यसका लक्षण है । यही यशका मुख्य अर्थ है । इसी अर्थ में वेदशास्त्रोम यह शब्द मुख्यतया कहा गया है । यही मेरी स्थापना है। इस स्थापना के आधार पर हो मेरा अन्य सव कथन है ।अतः इस विना सिद्ध किये आगे चलना कठिन है । उपर्युक्त लक्षण ही यसका मुख्यार्थ है यदि इस पर पाठकोंका विश्वास न हुआ तो मेरा यह लेख लिखने का श्रम ही व्यर्थ जायगा । अतः पहिले इस स्थापना को पुष्ट, प्रमाणित और स्पष्ट करके हम आगे चलेंगे। आशा है पाठक धैर्य रखेंगे यदि इसके कारण " भारतवर्पमें यज्ञ की कमी" कैसे है यह दिखलाने में कुछ विलम्ब हो जाय । यज्ञ "का वाच्य अर्थ । यसका स्वरूप समझना और समझाना अवश्य वडा कठिन है। परन्तु सत्यान्वेषण के लिये हमें यह दुःसाहस या सुसाहस ही करना चाहिये । चाहे पीछेसे कोई साहस दुःसाहस सावित हो, परन्तु सत्यान्वेपण में वहभी सहायक होता है । अस्तु । प्राचीन साहित्यमें यमशब्द बहुत से भिन्न भिन्न अर्थोमें प्रयुक्त हुवा प्रतीत होता है। अतः स्वभावतः स्वाध्यायकर्ता विचलित हो जाता है कि फिर यहाका मतलब क्या हुआ? परन्तु हमारी समझमें उन सब यन्त्र के अर्थों में एकसूत्र होना चाहिये और है । उस सूत्र को जहांतक मैंने पहिचाना है मैं इसी निश्चय पर पहुंचा है कि वह सूत्र वह है जिसे कि ऊपर मैंने “ मेल, मिलना, जुडना, ठीक तरह सं. बन्ध स्थापित रखना" इन शब्दोंसे प्रकट करना चाहा है । इस ५" यज्ञ ६ वैदिक यज्ञसंस्था। १ सूत्रको सर्वत्र गया हुआ दिखलाने के लिये यज्ञ शब्दकं जो जो वा. च्यार्थ प्राचीन साहित्य में हुए हैं उन्हें एक क्रमसे रखता हूं । आशा है पाठकगण इनकी व्याख्या पढते हुए इस सूत्र को सुगमतासे इनमें देखते जायगे । पहिले इन यज्ञवाच्य अर्थोंको केवल गिनाता हूं। (१) परमात्मा यज्ञ है। (२) यह संसार यज्ञ है। (३) संगठित मनुष्यसमुदाय यज्ञ है । (४) मनुष्यजीवन यश है। (५) मनुष्यका प्रत्येक श्रेष्ठ कर्तव्यकर्म भी यज्ञवाच्य है। इन अर्थोके अतिरिक्त यदि कोई अन्य यज्ञवाच्य रह गये हुवे पाठकोंको प्रतोत होंगे तो वे आगे देखेंगे कि इन पांच या पांच प्रकारके अर्थों की व्याख्या में वे संभवतः आजायंगे। अस्तु । पा- उकोको ध्यान होगा कि इन पांच अर्थों में तीसरा अर्थही मुझे मुख्य अभिप्रेत है । यही दिखलाता हआ कि यह तीसरा अर्थही यज्ञ का मुख्यार्थ है । मैं क्रमशः इन पांचों का स्पष्टीकरण करता हूं। (१) सबसे पहिले परमात्माका नाम यज्ञ है । उसने इस सव संसार को पूर्णतया ठीक ठीक जोडा है अर्थात् उसने अपने यश रूप से इस संसार को रचा है। अत एव पुरुषसूक्त में इस परमा त्मपुरुषको बारबार यज्ञ नामसे पुकारा है । परमात्मामें यज्ञकी भी पराकाष्ठा है। यज्ञो यत्र पराकान्तः।" अतएव मनुष्य के किये हुए सब यज्ञोंका अन्तिम एक मात्र वि षय वही है । वह यज्ञरूप है । इसलिये उसे यज्ञ शब्द से पुकारा जाता है। परन्तु परमात्मा तो सब कुछ है अतः यज्ञ भी है । वह सब का मूल है, अतः संसार ब्यापक यज्ञ का मूलभी वही होने से उसक यज्ञ का वाच्य अर्थ। नाम यज्ञ भी हो गया। जैसे अग्नि वायु आदि उसके सैकडों नाम है वैसे ही यज्ञभी एक उसका नाम है । यज्ञ उसका मुख्य नाम नहीं है। (२) यह संसार यज्ञ है । वेदमें बहुत जगह इस संसार को या कहा है। यह असल में यश है । यशका अर्थ इसी में स्पष्टतया दीखता है। परमात्मा तो इसमें भी यहत्व कादेखनेवाला होनेके का- रण यज्ञ कहलाया है। यह संसार बडी अच्छी तरह ठीक ठीक जुडा हुआ है. इसमें सब कार्य ठीक ठीक अटल नियमों द्वारा इस तरह रहे हैं कि यहां सर्वदा सब वस्तुयें ठीक ठीक स्थानपर ठीक ठीक सम्बन्ध में विद्यमान रहती है । यह संसार ठीक तरह बंधा हुआ है। ऐसा बंधा हुआ है कि मिलकर एक वस्तु बना हुआ है। और इतनी अच्छी तरह बंधा हुआ है कि यह सब मिलकर पूर्ण है। 'पूर्णात्पूर्णमुदचति ।' यह संसार यज्ञ है। परन्तु इस पूर्ण यशका कर्ता है परमात्मा । इसी लिये यह यज्ञ पूर्णतया सदा विना त्रुटिके चल रहा है । हम अल्पज्ञ, अल्प शक्ति जीवों में से कोई इस यज्ञको नहीं कर सकता है । अतः हमारे लिये यह यज्ञभी गांण है । इसे हमने नहीं करना है। यह परमात्मा का यज्ञ है । हमें तो वह यज्ञ जानना है जो कि वह हम मनुष्यो ने करना हैं । वह इन में से कोई नहीं है ! (३) इस दो यज्ञों के बाद जो शेष तीसरा, चौथा, पांचवा यज्ञ रह गये हैं वे हम मनुष्यों ने करने हैं ऐसा कहा जा सकता । परन्तु इनमें भी चौथे के विषय में वास्तव ऐसा नहीं कहा जा सकता है जैसा कि चौथे की व्याख्या बतलाया जायगा तथा पांचवे को यज्ञांग होने से ही यज्ञ कहा जाता है यह भी वहीं दीख. लाया जायगा । अत: यह तीसरा अर्थात् "मनुष्यों का संगठित है वैदिक यज्ञसंगा समुदाय" ही मुख्य यज्ञ है जो कि मनुष्यने करना है । और इसी वास्तविक यज्ञ की भारत वर्षमें बहुत कमो है। क्यों कि पीछे इस सब लेखमें इसीअसली यज्ञ की व्याख्या होनी है अतः यहां इस पर कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं है। केवल इतना कह देना आव. श्यक है कि सव सभा. समिति, संग्राम इसी यन में आते हैं अर्थात सव संगठण, सब संघ, सव संस्थायें इसी में समाविष्ट है, कर्म काण्ड के प्रसिद्ध बडे बडे (आज कल या शब्द इन्ही में प्रयुक्त होता है ) राजसूय विश्वजित आदि या इसी तीसरे प्रकार के अर्थमे आते हैं। (४) फिर मनुष्य जीवन यज्ञ है । ऊपर संसार का यत्र कहा है जिस का कि कर्ता परमात्मा है । मनुष्यभी संसारकी एक छोटीसी प्रतिमा है । एवं यह मनुष्यजीवन भी एक यज है जिसे कि जीवात्मा (इन्द्र) शतक्रतु वनकर सौवर्ष तक चलाता है। मनुष्य जीवन यज्ञ है इसका वडा सुन्दर वर्णन छांदोग्योपनिपद में हुवा हुचा है । पर मनुष्य जीवन क्या है ? अपने अन्दरकी सब वस्त ओं को ठीक जोडे रखना, उनका सम्बन्ध विगडने न देना और साथ ही संसार के साथ सम्बन्ध न बिगाडना । संवन्ध विगडते ही यज्ञ विध्वंस होजाता है। रोग या कोई अन्य कष्ट आते हैं। इस पवित्र यशको बडी सावधानी से चलाना चाहिये । परन्तु पाठको को देखना चाहिये कि यह यज्ञ मनुष्य का प्रारंभ किया हुआ नहीं है । यह प्रारम्भ तो परमात्मा का किया हुआ है। मनुष्य ने तो इसे ठीक तरह चलाना है या (ऐसा कहना अधिक ठीक है ) चलते रखना है। परमात्मा के यज्ञ का-संसार का मनु ष्य भी एक अवयव है । अतः यह भी एक तरह उसी का यज्ञ परन्तु उसने इसे चलानेका काम अपनी आधीनता में जोव को यज्ञका वाय अर्थ। ९ ! सौंप रखा है । मनुष्य की दृष्टि यही होनी चाहिये कि यह मेरा जीवन परमात्मा की वस्तु है-उसके यज्ञका एक अंग है-इसे विगा- इने न देना तथा संसारयज्ञ में काम आने के लिये इसे ठीक तरह चलाना ही उसका कर्तव्य है।अस्तु! तात्पर्य यह है कि यज्ञ भी वह नहीं है जिसे कि मनुष्य ने स्वयं रचना है, चलाना है और पूर्ण करके लाभ प्राप्त करना है। ऐसा यश तो उपर्युक्त "मनुष्य संगठन" ही है । इस मनुष्ययम को तो मनुष्यने संसारयज्ञके आधीन चलते रखना है, बस यही कर्तव्य है, परन्तु इस कर्तव्य के लिये जो उस- ने स्वयं या रचने है और चलान है वे नाना प्रकार के मनुष्यसंग. उनम्प यज है। इस बात को और स्पष्टतया देखने के लिये यो विचारना चा- हिये कि या एक पुरुष है । या पुरुपका वर्णन हमारे साहित्य में- प्रायः पाया जाता है। यहां पुरुष का अर्थ है " अवयववान् शरीर" या " संगठन" ( Crunnizol Bntly ) या (Orgae vization) संसार और मनुष्य ये दोनों यह " पुरुप " है (orgn rvisim है) संसार भी पुरुप है, विराट् शरीर प्रसिद्ध है । मनुष्य तो पुरुप (Organisation) है हो । परन्तु ये दोनों (संसार और मनुष्य) पुरुष ( Organisation) पहिलेसे बने हुए हैं । मनुष्य ने जो पुरुष बनाना है-अवयववान् शरीर बनाना है वह अपने आपसे बनाना है। अर्थात् मनुष्योंका सामुदायिक संगठनरूपमें वनाना है। यह राष्ट्रपुरुप है (Borly politic) या समाज पुरुष है, एवं अन्य पुरुष है । यह (पुरुष ) यज्ञ है जो कि मनुष्यने करना है। इस लिये मैं कहता है कि मनुष्यने जो यज्ञ करना है वह मिलकर किये जानेवाले किसी संगठित कार्य" के रूप में है। यही हमारे यज्ञ का अर्थ है । अस्तु । यहां तो इतनाही अमित था कि " है १० वैदिक यज्ञामस्था। मनुष्यजीवन यज्ञ भी वह यज्ञ नहीं है, जो कि मनुष्यने करना है । (५) यज्ञ का अन्तिम वाच्य अर्थ मनुष्य के प्रत्येक उस कर्म का है जिस से कि उसका इस (परमात्मा के ) संसार के साथ ठीक सम्बन्ध जुडा रहता है । इस प्रकार प्रत्येक श्रेष्ठ कर्म का नाम, प्रत्येक कर्तव्य का नाम यज्ञ है, क्यों कि उचित अर्थात् प्रकृति नियमों के अनुकूल कर्मसें यह संसार संगत रहता है जुडता है। हमारे प्रत्येक बुरे नियमों के विपरीत कार्य से संसार विगडता है विखरता है. हमारा जगत् से सबन्ध उग्वडता है और फलतः हमें क्लेश पहंचता है, ये सब अयश कर्म हैं। भगवद्गीतामें कहा है- यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मवन्धनः ।। भ.गी.३।९ इस लोकमें वे ही कर्म बन्धन होते हैं जो कि यज्ञार्थ के अ- तिरिक्त किये जाते हैं ।" इस का अर्थ यह हुआ कि यज्ञार्थ कर्म ही हमें करने चाहिये, क्यों कि यज्ञ के लिये संसारयझको ठीक तरह चलने के लिये- जो कर्म किये जाते हैं । ( वे निष्काम स्वय- मेव ही होंगे) उनके करने से वन्धन कभी नहीं होता । एवं अन्य- व गीता में कहा है कि यज्ञ, दान और तप ये कर्म करने चाहिये । यदि यज्ञका उपर्युक्त अर्थ ले तो दान और तपभी इसी में आजा- यंगे और इस प्रकार गीता का कहना है कि यज्ञके अतिरिक्त और कुछ कर्म नहीं करना चाहिये अथवा हमारा प्रत्येक कर्म यज्ञ होना चाहिये । यज्ञ के इस अर्थ में बहुत से यज्ञ आजाते हैं। भगवद्गीता में चौथे अध्यायके २५ से ३३ श्लोक में जो बहुतसे यज्ञों का वर्णन है वहां यज्ञ इसी अर्थ में हैं।

यज्ञका वाच्य अर्थ। यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि ।" यहां भी इसी अर्थमें यशशब्द है । सन्ध्या और अग्निहोत्र को यम इसी अर्थमैकहते हैं। पांचों महायज्ञ प्रसिद्ध है ।गीतामें स्वधर्म पालन को ही यश कहा है। ये सब बातें यज्ञ के इसी अर्थ में संगत है । यदि प्रातः से सायंतक हमारा प्रत्येक कर्म " यह मेर। कर्म जगत-यज्ञ के चलाने के लिये है, यह कर्म भगवान् के लिये है" इस भावनास किया जाय तो हमारा प्रत्येक कर्म यज्ञही हो जायगा और हम जीवन्मुक्तिका आनन्द लेंगे । परन्तु यज्ञ का यह अर्थ मेरी समझम लाक्षणिक अर्थ है । मुख्य अर्थ नहीं। यहां यज्ञ के एक अंग कर्म को या कहा जाता है या भगवद्गीता के शब्दों में यशार्थ कर्म " को या कह दिया जाता है । ये कर्म मुख्य अर्थ में या नहीं है किन्तु संसार यज्ञ के या मनुष्य यज्ञ के या अन्य मनुष्यकृत संगठन यम के अंग होने से यज्ञ कहलाते हैं। उदाहर- णार्थ राष्ट्रीय महासभा का चर्खासंगठन एक यज्ञ है, जो कि प्रत्येक राष्ट्रसभासद के बर्खा चलानेसे बना है । परन्तु व्यक्ति के चर्खा चलानेके कर्म के लिये भी यज्ञ शब्द का प्रयोग किया जा सकता है। तात्पर्य यह है कि यज्ञ के एक कर्म को भी यज्ञ कहा जाता इले खूब ध्यान रखना चाहिये कि इस अर्थ में साहित्य में यज्ञका बहुत बहुत प्रयोग हुआ है। यह ठीक भी है । क्यों कि यज्ञ का एक कर्म अर्थात् सामाजिक यज्ञमें एक व्यक्तिका कर्म बडे महत्त्व का है । मैं इसे "वैयक्तिक यज्ञ" के नाम से कह सकता हूं। यद्यपि ये मुख्य यज्ञ नहीं हैं, तो भी क्यों कि इनके विना मुख्य सामाजिक यज्ञ नहीं बन सकता इसलिये इन यज्ञों की रैदिक साहित्य में इतनी चर्चा है तथा इन्हें यज्ञ नामसे ही पुकारा गया है । इनका विशेष वर्णन अन्त में किया जायगा।

चदिक यज्ञसंस्था। १२ है ६ इन अर्थों का ममन्वय । इन पांचों यज्ञार्थों की व्याख्या से यह स्पष्ट होगया होगा कि पहिला दूसरा और चौथा यज्ञ ऐसा है जो कि स्वयं हो रहा इसे मनुष्यने नहीं रचा है और पांचवां वास्तवमै यज्ञ नहीं है किन्तु यज्ञार्थ कर्म है। इसलिये तीसरा ही वास्तविक या है । इसलिये हमारी यह स्थापना प्रमाणित हुई कि यज्ञका मुख्य अर्थ है "मि- लकर किये जानेवाला संगठित शुभ कार्य ।" इस सब विवेचनका एक वाक्य में अर्थ यह हुआ कि यह संसार यशस्वरूप परमात्मा का चलाया वा एक वडा भारी महायज्ञ है, इसी महायश के अन्तर्गत उसीके नियन्त्रण में मनुष्यों के जीवनरूपी वहत से छोटे छोटे यज्ञभी चल रहे हैं, इस लिये कल्याण चाहनेवाले मनुष्य को न केवल यह चाहिये कि वह सब ऐसे हो कम करे जो कि इस महायज्ञ के अनुकूल हो -सहायक हो अर्थात् यज्ञार्थ कर्मही करें अपि तु उस स्वयं भी ऐसे यज्ञ (जो कि मनुष्य संगठन का नाम है ) करने चाहिये जो कि इस महायज्ञके अनुरूप हो अर्थात् हमारे यज्ञ-सब संगठन-ऐसे ठीक होने चाहिये जैसे कि यह संसार, है या ऐसे सुसंगठित ( Woil orgunisard)होने चाहिये जैसे कि यह शरीर है। संक्षेप में इस का अर्थ यह है कि जैसे आधिदैविक यज्ञ संसार में हो रहा है और आध्यात्मिक यज्ञ शरीर में हो रहा है उसी तरह मनुष्य को भी यज्ञ करना चाहिये अर्थात् आधिभौतिक संगठित शरीर बना कर कार्य करना चाहिये । यही यज्ञ का वास्तविक अर्थ है । इसी लिये शायद (निरुक्त के पढनेवाले जानते ) निरुक्तकारने मन्त्रोंके आधिदैविक अर्थ किये हैं और आध्या- यज्ञोंके रूप। १३ त्मिक अर्थ भी किये हैं, परन्तु उस में आधिभौतिक अर्थ नहीं दिखाई देते उसकी जगह 'अधियज्ञ' अर्थ विद्यमान है । इसका तात्पर्य यह समझमें आता है कि उन के समय में आधिभौतिक और यज्ञ बिलकुल समानार्थक होगये थे। इस से भी स्पष्ट है, कि यक्षका असली अर्थ आधिभौतिक है-सामाजिक है, आध्यात्मिक व वैयक्तिक नहीं। अब हम इसी वास्तविक यश की मनुष्यों के संगठित होकर किये जानेवाले कार्यों की ही अच्छी तरह व्याख्या करेंगे। और पीई से वैयक्तिक यशा की अर्थात् यशार्थ कर्मों की भी व्याख्या करेंगे। (9) यज्ञांक रूप । इस यशकी व्याख्या पढने से पूर्व पाठकों को इस बातसे परिचय प्राप्त कर लेना आवश्यक है कि यह संगठनरूप यज्ञ हमारे सामने किन किन नपामें आता है और इस परिचय को पाने के लिये पा- ठकों को अपने मनसे याविषयक अन्य सब अशुद्ध संस्कार निक- ल डालने चाहिये। अभीतक 'यज्ञ' शब्द सुनने से या तो हमें हवन अग्निहोत्र का ध्यान आता है या किन्हीं कथाओंमें सुने अज्ञात गांमध, नरमेध, अश्वमेध, राजसूय, पुत्रेष्टि आदिका अपना अपना मनः कल्पित चित्र सामने आजाता है । पर मैं जानता हूं कि अव इतने विवेचन के बाद आपके सामने यज्ञ शब्द किसी 'संगठित मनुष्य समुदाय द्वारा किये जाते हुए शुभ कार्य' का ही चित्र आने लगे, अधिक से अधिक अपने नैत्यिक पवित्र वैयक्तिक कर्तव्योको भी यज्ञांग होने के कारण आप यज्ञ कह सकते हैं । परन्तु इसके अतिरिक्त और सब याविषयक कल्पनायें अपने मन से निकाल दीजिये। तभी आप यज्ञको यथार्थरूप में समझ सकेंगे। इस प्रकार समाज का घातुर्वर्ण्य और आश्रम व्यवस्था का संगठन एक महायज्ञ है । राष्ट्र एक यज्ञ है । स्वराज्यसंगठन (Govern वैदिक यज्ञ संस्था । nment) एक यज्ञ होता है । संग्राम-बुराई के नाश के लिये किया गया संग्राम-यज्ञ है। वर्तमान समयमें भारत में राष्ट्रीय महासभा ( Nationl Congress) एक यज्ञ है। आर्य समाज एक उच्च यज्ञ है । गुरुकुल आदि शिक्षा संस्थायें यज्ञ हैं। हमारी प्रतिनिधि सभायें यज्ञ हैं । राष्ट्रीय सभासमितियां यज्ञ हैं । सेवा समितियां पवित्र यज्ञ हैं ।दलितोद्धार सभा यज्ञ है। सम्मेलन और सभाका प्रत्येक अधिवेशन यज्ञ है। व्यापार संगठन (जो कि गरीवॉका नाश नहीं करता) यज्ञ है । प्राचीन भारतके एक पेशेवालाकं ये संगठन यज्ञ होते थे। एक गृहस्थ परिवार यज्ञ है । तात्पर्य यह कि सब छोटे बडे संगठन जो कि कल्याण के लिए किए गए यज्ञ हैं । इनमें हमारी यज्ञभावना होनी चाहिये । यदि हम इनमें महत्त्व देखेंगे और इन यज्ञों का अनुष्ठान करेंगे तभी हम इस योग्य भी होंगे कि हमारे शास्त्रोंमें जो अन्य सूक्ष्म यक्ष प्रतिपादित है, उन्हें भी समझ सके । इसलिए हमें ऐसा अभ्यास डालना चाहिये कि हम इन उपर्युक्त संगठनों में यज्ञदृष्टि रखें । येही रूप हैं जिन रूपों में कि यज्ञ प्रतिदिन हमारे सामने रहता है। इन्ही यज्ञों का ठीक तरह करना हमारा पहिला कर्तव्य है। इन्हीं को करने से हमारा कल्याण हो सकता है । और इन्हें विना पूरा किये हम आगे नहीं बढ सकते। इसके लिए हमें यह पता लग जाना चाहिये कि ये उपर्युक्त संगठन यज्ञ हैं और येही अवश्य कर्तव्य यश हैं। यह तो लिखने की आवश्यकता नहीं कि प्रत्येक प्रकार कासंग- ठन (अर्थात् अशुभ के लिये किया गया संगठन भी) यज्ञ नहीं होता। यह बात आगे विस्तार से लिखी जायगी, पर यहांइतना संकेत कर देना आवश्यक है कि परपीडन के लिए, गरीवोंको सताने के लिए, दूसरों का खून चूसने के लिए भी संगठन चडे भारी संगठन-किए जा सकते हैं, पर वे इतने ही बडे भारी पाप

यासे जो चाहो प्राप्त करलो ।
१५
पुंज होते हैं या नहीं। दुर्लक्ष्य सामने आते ही संगठनमें से यशकी
देवता निकल जाती है और उस पर असुरों का कब्जा हो जाता
है । जब लांग या करना सीख जाते हैं तो यह हो सब से बड़ा
खतरा है जिससे कि यसको प्रतिक्षण बचाना होता है । शक्ति पाने
पर उसके दुरुपयोगका प्रलोभन स्वभावतः आता है । यज्ञ एक
महाशक्ति है अतः इसे भी इस शत्रु से बचाना आवश्यक है । ऋपि
लांग सब यशोंको लगातार असुरोंके आक्रमण से बचाया करते
थे। अस्तु । भारत वासियोंने तो अभी यज्ञ कला सीखो हो नहीं
अतः इन्हें अभी इस बात पर जोर देने की आवश्यकता
नहीं।
(८) यज्ञमे जो चाहो प्राप्त कर लो।
यदि पाठक यह जान गए कि यज्ञ मिल कर काम करनेका नाम
हैं तो वे अब जरा गीतामें कहे भगवान् कृष्णके निम्न श्लोक का
मनन कर:-
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेप वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥
'प्रजापतिनं यज्ञके सहित प्रजाओंको बना कर (प्रजाओसे)
कहा कि (तुम) इस (यज्ञ) से (जो कुछ चाहो) उत्पन्न
करो। यह (यश) तुम्हारी सब अभिलपित इच्छाओका पूरा
करने वाला होवे ।
इस श्लोकमें दो बातें कहीं है (१) प्रजाओंके साथ साथ ही
यज्ञको भी प्रजापतिने पैदा किया (२) यज्ञ प्रजाओंकी सव इच्छा
परी करने वाला होता है। पहिले वातको समझनेके लिए यह
ढूंढना चाहिये कि मनुष्यके साथ ही पैदा होनेवाला यज्ञ कौनसा
हैं । वेदमें भी मनुष्यमें स्थित इस यज्ञका वर्णन पाया जाता है ।
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१६ वादेक यज्ञसस्था । उदाहरणार्थ अथर्व वेदके केन वाणी सूक्त (२०१२) में जहां मनुष्यके अंग अंगोंके उत्पादक की पूछा गया है वहां यह भी पूछा है कि- को अस्मिन्यज्ञमदधादेकोदेवोऽधि पूरुपे। अ०१०।२।१४ " किस एक देवने इस मनुष्यके अन्दर यज्ञको रखा है ऐसी अन्य भी कई स्थल हैं जहां कि यज्ञको परमात्मा द्वारा मनु प्यके अन्दर रखा हुवा बताया गया है । वह यज्ञ क्या है ? यह है मनुष्य का मिलनेका, मिलकर काम करने का स्वभाव, मनुष्य स्वभावतः मिलनस्वभाव है, यज्ञशील है । प्रायः लोग कहा करते हैं कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है; ( Jun is a rocial }ring.) यहां मूल यज्ञ को यज्ञ कहा है । मनुप्यमें जो यज्ञका बीज है उसे यज्ञ कहा है। यह है यज्ञ जो कि मनुष्य के साथ ही मनुष्य के हृदयमें प्रजापति ने पैदा किया है, क्यों कि स्वभावतःही प्रजापति परमा- स्माने मनुष्य को मिलनसार बनाया है । यह मिलन स्वभावता का वीज ही-यह मनुष्य के साथ पैदा हुआ यश ही बढता हुआ सब सामाजिक संगठनों को बनाता है । अथर्व वेदके ८1१०। (१) सूक्त में इस वीज का गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय, सभा, समिति, आदि रूप में विकास दिखाया गया है । इस लिए यहां तथा अन्य ऐसे स्थलोपर यज्ञ का अर्थ है मनुष्य का मिलने का स्वभाव जो कि वाहर यज्ञ (संगठन ) के रूपमें प्रकट होता है। अस्तु । हम प्रजाओंके पालनेवाले ने हम में उत्पति के साथ उस यज्ञ को पैदा कर अर्थात् हमें मिलन स्वभाव बनाकर हो मानो कह दिया है कि तुम इस यज्ञ से जो चाहो पैदा कर लो। यह दूसरी बात सब जानते हैं कि संगठन, मिलना 'इष्टकामधुक्' है । संघशक्तिसे जो चाहो प्राप्त करलो। कमसे कम बातें करने के लिए हम यज्ञसे जो चाहो प्राप्त कर लो। -- भी यह जानते हैं। हम इस पर व्याख्यान दे सकते हैं, मेरे जैसे इस पर लेख लिख सकते हैं। परन्तु इस यज्ञको करना इससे अपनी कामनायें पूरा करना जरा विश्वास की अपेक्षा रखता है । जिसे विश्वास है कि संघशक्ति के बिना ये काम पूरे नहीं हो सकते वह अवश्य इस यज्ञको अवश्य करता है। उसी के विषय में कहा जा र सकता है कि वह इस तत्त्वको जानता है। चाहे उसने भगवद्गीता को भी न पढा हो। इस तत्त्व को जानते है हालैण्ड निवासी जो कि मुट्ठी भर लोग समुद्र में समुद्रको अपने वांधोंसे वांधते हुए अपनी सत्ता रखते हैं। अपनी स्वतंत्र उन्नति शील और स्वाभिमान सत्ता रखते हैं। क्या अपनी यह इच्छा पूरी करना साधारण बात है ? इस तत्त्व को जानते हैं वे थोडेसे इंग्लैण्ड निवासी जो कि सात समुद्र पार एक छोटे से टापूमें रहते हुए ३० करोड हिन्दुस्थानियोंको भेडों की तरह जिधर चाहते हैं हांकते हैं इससे अधिक और अ. संभव इच्छा क्या हो सकती है ? पर यज्ञ-संघशक्ति उन की यह इच्छा भी पूरी करती है । इसमें किसी का क्या है; भगवान् कृष्ण के शब्दों में कोई यज्ञका अनुष्ठान करेगा यज्ञ उसके सामने काम- धेनु होकर खडा हो जावेगा और कहेगा कि " मुझ से जो चाहो दुह लो"। भले ही यह लेख हिन्दुस्थानियों की पवित्र धर्म पुस्त- क में लिखा रखे, पर जो इसे करेगा फल तो उसे ही मिलेगा। यज्ञ के विना हिन्दस्थानियोंकी स्वराज्य (अपना राज्य) होने की परम स्वाभाविक इच्छा भी पूरी नहीं हो सकी और न पूरी होगी जब तक कि हम ठीक ठीक यज्ञ करना न सीखेंगे । हमारी हालत तो यह है कि वह यज्ञ जिससे कि स्वराज्य की इच्छा पूरी हो वह तो दूर रहा, हमारे अभी छोटे छोटे मिलकर किये जानेके कार्य भी नहीं चलते हैं । छोटासा यज्ञ भी हमसे निबाहा नहीं जाता है १८ वैदिक यस संस्था । tho हमारे चाहे कैसी हालत हो पर यह सत्य तो सूर्यकी तरह चमक रहा है और सदा चमकता रहेगा (हम इसे देखें या न देखें ) कि 'यज्ञसे जो चाहो दुह लो। (९) यज्ञम अविश्वास । हर एक विचारशील भारतवासी के मन में अन्तत: आता कि यज्ञ के विना हमारा विस्तार नहीं । पर फिर भी हम मिलकर कार्य करने में असमर्थ रहते हैं। क्या ? इस के दो कारण है। (१) यज्ञमें अविश्वास (२) यज्ञ के नियमों का अज्ञान। हमार, इस यज्ञमें विश्वास तो तब हो यदि हम पहले इन्हें या तो समझे। मुझे यह फिर दोहराना पडता है कि हमारी इन कार्यों में यह भावना होनी चाहिये । यदि कोई हमारा पवित्र संगठन टूटता है या हमारी कोई संस्था विगडती है तो हमें कोई विशेष बात नहीं अनुभव होती। हम यह नहीं समझते कि यजध्वंस हो गया, एक बडा पाप होगया । यह इस लिए होता है क्यों कि हम इस श्रेष्ठ संगठनों में कार्य करते हुए अपना स्वाभिमान नहीं अनुभव करते कि " मैं यज्ञ में संमिलित हं।" राष्ट्रीय महासभा के एक सभ्य को तथा प्रतिनिधि सभा के अधिकारी को गुरुकुल के एक कर्म- चारी को अपने अपने संगठन के कर्तव्यों को करते हुए यह भाव सदा जागृत रखना चाहिये कि मैं यज्ञ कर रहा हूं। इस यज्ञ- भावना के विना यज्ञ में श्रद्धा कैसे हो सकती है जो कि परम आवश्यक है । यह यज्ञभावना हो हमें बहुत ऊंचा उठा देगी और हमारे कार्य में, कर्तव्य पालन में तेज, वल और सौन्दर्य लादेगी। इस के साथ फिर यज्ञ की सफलता में श्रद्धा होनी चाहिये । चाहे कितनी विपरीत अवस्थायें हो यज्ञका सहारा न छोडना चाहिए और विश्वास स्थिर रखना चाहिये कि यज्ञ से अवश्य विजय यताक नियमों का ज्ञान । १९ मिलंगी । इष्ट काम अवश्य पूरा होगा। वेदों और उपनिषदों के मानने वालों को चाहिए कि वे या की ही शरण नो उनके दुःख निश्चयसं ही निवृत्त होंगे। यह ठीक है कि हमारे संगठन जल्दी जल्दी विगड जाने हैं और विगडते भी रहंग, पर में प्रवरा कर. यम को न छोड देना चाहिये । यह तो अमांच अम्ब है कंवल इस में श्रद्धा और तज्जनित धैर्य चाहिए । (१० ) यज्ञ के नियमों का अज्ञान । दुसरी बात है यम के नियमों का न जानना। यह एक घार सवार है. कि हम भारतवासी यहाँ के चलाने के नियमों को-मि- न्टकर काम करने के सिद्धान्तों को कुछ भी नहीं जानते हैं। कारण पष्ट है कि हम न नंगठन बनाये ही नहीं, इन्हें यज्ञ समझना भूल गये, अत: इनकं नियमों का हमारे समाज में विकास नहीं हआ । पाश्चात्य देगा में ( यद्यपि वे याशब्दका प्रयोग नहीं करते ) इन यमों का बडा प्रचार हुआ और वे मिल कर काम करने की विद्या के नियमों को बहुत जान गए । अस्तु । आगे इस लेखमें इन्हीं नियमों को कुछ बतलाने का यत्न किया जायगा परन्तु असल में नियम व्यवहार में आने से ही समझमें आते हैं, किताबों में लिग्न रहने से कुछ नहीं होता । अतः विचारशील पाठकों से निवेदन है कि ये आग लिखे यज्ञ के मोटे मोटे नियमों का ही पालन करें-व्यवहार में लाकर देख (तव अन्य नियम इन्हें अपने आप दीखने लगेंग) तो इनकं संगठन अच्छी तरह चलने लगेंगे। हम पूरा विश्वास है कि अपने पवित्र संगठनों को यज्ञ समझते हुप. यदि हम उन निम्न नियमों का पालन करेंगे तो हमारी स्व- राज की इच्छा ही नहीं पूरी होगी किन्तु हम भी सचमुच यज्ञ- वैदिक यज्ञमंन्या। रूपी कामधेनुवाले हो जायेंगे और अपनी अतीव असम्भव दग्विने वाली इच्छाओं को भी र्ण कर सकेंगे । (११) यज्ञ पुरुप के ननि अंग। यज्ञ के नियमों को जानने के लिए मरी समझ में यमक धात्वर्थ को ही समझ लेना बहुत है । ( यश) शब्द में हो सब कुछ विद्या मान है । संस्कृत को धातुओं में कितनी उत्तमता है और पूर्णता है इसका शायद सर्वश्रेष्ठ उदाहरण यानन्द की यज्' धातुमें देखने को मिलता है। एक बार धातुपाठकं रचयिता ऋषिके आगे सिर झुक जाता है और हृदयमें उन के लिए सम्मान का पद स्थिर हो जाता है। अस्तु । यज धातुका अर्थ है 'देवपूजा-संगति- करण-दानेषु ' । यज् धातु के ये तीन अर्थ हैं। (१) देवपूजा = देवकी पूजा। (२) संगतिकरण = मिलना, मिले रहना। (३) दान = देना। मैं पहले बतला चुका हूं कि यज्ञका मुख्य अर्थ बोत्र के अर्थ में अर्थात् ' संगति करण ' में है। यश अपने मध्य के अर्थ में केन्द्रित है । इसी लिए यज्ञ का स्वरूप मैंने बतलाया है "मिलना सम्बन्ध रखना, ठीक संवन्ध रखना" इत्यादि। परन्तु यह मिलना या सम्बन्ध तीन प्रकारसे हो सकता है, अत: यज् धातु के तदनुः सार ऋषिने तीन ही उपर्युक्त अर्थ रक्खे हैं । मनुष्य का मनुष्य के साथ निम्न लिखित तीन प्रकार का सम्बन्ध हो सकता है।

२४ पुरणनीन अंग। २३ (:) अपने में बडे के माय सम्बन्ध जुड़े रहना । २. अपने यगयर वाले के साथ सम्बन्ध जुड़े रहना । (3) अपने से छोटे माय सम्बन्ध जुद रहना। गगा तीन प्रकार का सम्बन्ध क्रमशः देवपूजा, संगतिकरण और दान काना नारिणापट है कि इस प्रकार प्रत्येक संगठन के विभाग मकन । गती या तीन अंग हैं। तात्पर्य यह दुआगि अपने में यक माय, अपने चगवर बालं के साथ, अपने मछांट के साथ समनः देवपूजा के सम्बन्ध मे.संगति करण के सम्बन्ध मे. दान के संबंध में जुई गाने का नाम या है । और मराट का जाय तो प्रत्येक संगठन में अपने में बहाके साथ देववत पूजाका संबंध गाना चाहिए. अपने माथियोंके साथ सदा मिला गाना नालिग और अपने में छोटॉफी देत रहना चाहिए तब प्रत्येक नंगटन ठीक नगा गलना रहेगा। बडों की पूजा हो, सेवा हो, उनका आनापालन हो. इसीम हम बड़ों के साथ जुड़े रह मझते हैं. इन में त्रुटि होने से यज्ञ ऊपर से भंग हो जाता है । यगर बालीक माय परम्पर मल रहना चाहिए. प्रेम काआक- पंणना चाहिए. मैत्री-नह रहना चाहिये, नहीं तो या मध्यसे टूट जायगा । और अपने से छोटों को सब कुछ देना चाहिये, कमी पूर्ण करने रहना चाहिए नहीं नो या नीचे से गिर पडेगा। इस प्रकार इन नान नियमों में ही सब कुछ आगया है। इसे वि. म्नार में ममझने के लिए, पाठक निम्न लिखित कोष्टक को ध्यान से दग्व और आगे जो दूर तक इसकी व्याख्या की गई है उसे पढकर रम फाटक को अच्छी तरह हृदयंगम करलें तो वे यश के रहस्य को समझ जायेंगे। ।

२२ १२ यज्ञ पुरुप । यश के तीन अंग ||अगोंका अंगीकी चेमा एकएक अंगके एकएक अंगके यशका कर्म रक्षक देव नाशक असर चालकशत्रु यदाका रस प्राण अंग ॥ नार आमापालन उत्तमांग सिर उत्तिसांग बडोकी देवपूजा भनि अहसान अभिमान संदेह, काम आदि बलि दान श्रन्द्रा क..-२५१ विश्वासी स्वार्थ अनुसरण वैदिक यज्ञमगा। मध्यमांग धड स्वार्थ अधरांग नामि॥ वरावरवा- एकोहंगाम सांमनस ईर्ष्या ठंप यलि लोस,संग प्रेम तत्परता अथ०३-३० क्रोधद्रोह तिकरण दान सांग परस्परमैत्री आदि साम, औषधि, ऋरता,अन्याय|| ॥ बलि छोटोको महायता देना. १०-१७ काणा दान महानुभति आदि रक्षा करना रोनाचेका भाग लोभ.मद स्वार्थ म . यज्ञपुरुपके अंगोंका रस। ૨૨ १३ यज्ञ पुरुषक अंगोंका रस। संसार में दो प्रकार की शक्तियां काम कर रही हैं । एक शक्ति मिलाने वाली है, दूसरी जुदा करनेवाली हैं । एक जोडने वाली, इकट्ठा करने वाली और दूसरी अलग अलग करने वाली, फोडन वाली है। इनका नाम भिन्न भिन्न दोन क्षेत्र में भिन्न भिन्न है। पर मानवी संसार में मिलने वाली शक्ति का नाम प्रेम है और जुदा करने वाली का नाम घृणा है। इन में पहिली शक्ति यज्ञिय और दूसरी अयशिय है। जिन्हें यज्ञ करना है-मिलना है और-मिलाना है वे प्रेम कोअपनाएंगे, जिन्हें यज्ञभंग करना है-लोगों को फाडना है-एक दूसरे को जुदा करना है वे घृणाकी पूजा करेंगे। अतः यज्ञ चाहने वाले भारत वासियों को प्रेम की उपासना करना चाहिए। प्रेमही यज्ञशरीर में " अंगिरस" है। यज्ञ के अंगों में वहने बाला रस है। प्रेम के हास होने से यज्ञ सूख कर नष्ट हो जाता है। इस प्रेम रसके सखने पर यज्ञ का प्राण ( जो पाठक आगे देखेंगे) निकल जाता है । प्रेमके रस से यज्ञ का एक एक अणुअणु परस्पर जुडा रहता है । प्रेम मिलाने वाली शक्ति है और मिले हुए संगठन का नाम यज्ञ है। इसलिए 'प्रेम ' यज्ञ का जीवन रस है। पं० भगवानदास जी ने (The Science of the Emotions) नामक अपनी पुस्तकमें सब भावोंके ( Einotion के) दो विभाग किए हैं (१) प्रेम मूलकभाव (२) घृणा मूलक भाव। फिर प्रत्येक के तीन तीन विभाग किए हैं। उसे यहां यज्ञ की व्याख्या में अवश्य स्मरण करना चाहिए । यज्ञ शरीर में बहने वाले रस का एक नाम प्रेम है परन्तु वह रस भिन्न भिन्न अवयवों में भिन्न भिन्न नाम से पुकारा जाता है। उत्तमांग में वह भक्ति है, मध्य कैदिक यज्ञमंन्धा। शरीर में प्रेम है और तृतीय भाग में करुणा है अर्थात अपने से बडे में प्रेम का नाम " भक्ति " है. अपने वरावरवाल में प्रम प्रेम " शब्द से ही कहा जाता है और छोटे में प्रेम करना करुणा" कहलाता है। इस प्रकार एक ही प्रेमरस यज्ञशरीर के नोन अंगा मदन तीन रूप से वहता है और यश को सजीव रखता है। यज्ञ का उत्तमाग अर्थात देवपूजा तभी ठीक नरह काम कर गा यदि उस में भक्तिरस द्वारा हम अपने बडों का आदर सत्कार करते रहेंगे। यज्ञ का मध्य अर्थात संगति करण नभो ठीक तरह काम करेगा यदि प्रेमका रस बरावर वालों में मल बनाए रवंगा। और यज्ञ का अधराङ्ग अर्थात् दान तभी ठीक तरह काम कर ता रहेगा यदि करुणा रस से आई रहकर हम अपनेसे छोटों को सदा देते रहने में तत्पर रहेंगे (देखो कोष्टक का दसरा स्तम्भ) १४ यज्ञ पुरुप के अंगों का व्यापार व कम परन्तु केवल ( भक्ति आदि ) भावों से काम नहीं चलंगा जब तक कि भावसे प्रेरित होकर कर्म न निकलेंगे,भाव कम कप में न प्रकट होंगे। इसी लिए यज्ञ में कर्म को मुख्यता है। शरीर के अपने कर्म को व्यापार व चेष्टा कहते हैं । इन भक्ति, प्रेम और करुणा द्वारा क्रमशः तीनों अंगों में जो कर्म होने चाहिए-जो व्या. पार होने चाहिए- उन्हें कोटक के तीसरे स्तम्म में लिखा हुआ पाठक देखेंगे। भक्ति प्रेरित हो यज्ञ के उत्तमांग में वडों का आज्ञापालन तथा उन का अनुसरण ( नेतृत्वस्वीकार ) यह चेष्टा होनी चाहिये। प्रेम प्रेरित हो यज्ञ के मध्यमांग में एकोद्देश्य से मिलकर काम करना सहोद्योग यह चेष्टा उत्पन्न होनी चाहिए तथा करुणाप्रेरित हो यज्ञ. 1 यज्ञके उत्तमांगमें त्रुटि । २५ के तृतीयांग में दान द्वारा छोटों की सव प्रकारसे सहायता करना, उनकी रक्षा करना यह चेष्टा व कर्म होता रहना चाहिए । देवपूजाका अर्थ वाचिक या मानसिक ही नहीं है । यज्ञ में तो कर्म मुख्य है । इस लिए बडों की पूजा जब भी की जावेगी, बडों को पूजा क्रिया आएगी तब वह "उन का आज्ञापालन, उनकी शिक्षा मानना, उनका अनुसरण करना" इन रूपों में ही प्रकट हो- गी। एवं क्रियात्मक संगति करण " एकोद्देश्यता मे चलने, पर स्पर मिलकर सहोद्योग" के रूपमें ही प्रकट होगा । और दान का अर्थ कुछ हो दे देना नहीं है किन्तु छोटों को उनकी आवश्य- कता जान कर उसकी पर्त्यर्थ देना, छोटो को कष्टोंसे रक्षा करने की चिन्ता रखना और सदा सहायता देते रहना है । यज्ञका दान अंग इसी रूपमें अपना काम करता हुआ प्रकट हागा। यह यज्ञ के तीन अंगों के तीन व्यापार हैं जो कि स्वस्थ यज्ञ शरीरमें होते रहने चाहिए। यदि ये व्यापार होते ही नहीं या ठोक तरह न होकर विपरीत प्रकार से होते हैं तो समझना चाहिए कि यज्ञ शरीरमें कोई रोग है। इन रोगोंका इलाज करना चाहिए जिस से कि शरीर के ये तीनों अंग उपरिनिर्दिष्ट अपने अपने व्यापार (Pinctio.1 ) ठीक प्रकार करते रहें। १५ यज्ञ के उत्तमांग में त्रुटि । यज्ञांगों में बहने वाला रस जान लेने के बाद तथा यज्ञका प्रत्येक अंग का व्यापार समझ लेने के बाद अब यह सुगमता से जाना जा सकता है कि हम भारतवासियोंके यज्ञ क्यों नहीं चलते। इसका कारण यज्ञ के किसी अंगके कार्य में त्रुटि होना है। ये रोग हमें हटाने पडेंगे, यदि हम भारतमें यज्ञों को चलाना चाहते हैं ।

२६ वैदिक यजसथा। पहले. यज्ञके प्रथम अंग- देवपूजा - की त्रुटियां देखिए । या तो अपने संगठनों के वडों में हमारी भक्ति नहीं होती ( हम उन्हें योही स्वीकार कर लेते हैं) या हमारी भक्ति बीमार होती है जो कि आज्ञापालन के रूप में प्रकट नहीं होती। म. गान्धीक (जो कि राष्ट्रमहासभाके यशमें देववत् पूज्य हैं ) दर्शन करने के लिए सहन्त्रों लोग आते हैं - उन्हें रातको नींद भी नहीं लेने दंते, परन्तु ये न तो खद्दर पहनते हैं और न उन की अन्य आमाओका पालन करते हैं । इस का नाम देवपूजा नहीं है । यह तो घोर देव निन्दा है । पर हम लोगों की अकल में यह बात नहीं आती है । नेताका आझापा- लन तथा अनुसरण में जिस नियंत्रण, तंत्र निष्ठा की जरूरत है उस का ' क ख ' भी हमने अभी नहीं सीखा है। यदि गत वर्षों के स्वराज्य आन्दोलन में (और अवभी) हम राष्ट्रमहासभाकी फेवल खद्दर धारण और खद्दर की उत्पत्ति की आज्ञा का जी जान से पालन करते तो अवतक बहुत कृतकार्य होचुके होते,न जाने कहां पहुंचे होते । पर यहां तो काम शुरू नहीं हुआ। देवपूजा की जगह हम अपना मनमाना करते रहे । एक वक्ता ने बहुत सच कहा था कि लायड जार्ज जैसे मिथ्याचारी, मिथ्यावादी पुरुष के नेतृत्वमें इंग्लैण्ड ने महासमरमें विजय पा ली, परन्तु महात्मा गांधी जैसे सच्चे दिव्य पुरुप को पाकर भी भारत वासी कृतकार्य न होसके, इसका कारण है ( Organisation) संगठन का अभाव । परन्तु वैदिक शब्दों में मैं कहूंगा कि इसका कारण है " यज्ञ का अभाव, यज्ञमें भी देवपूजा अंगका अभाव i" विलकुल सैनिकों की तरह आज्ञापालन को न करते हुए अपने को देवपूजक समझना कोरी मूर्खता है जो कि जितनी शीघ्र हट जाय उतनाही अच्छा है । बोर युद्ध के अवसरपर भोजन की कमी पूरी करने के लिए अंग्रेज । २७ -- यश्के उत्तमांगमें त्रुटि। लोगों को कहा गया कि अपने घरों के छोटे छोटे आंगनों में आल यो दो, उन्हों ने बोए और यह मूर्खता युक्त प्रश्न न उठाया कि आं-- गन की जरा सी भूमि के थोडेसे आलुओसे क्या लाभ होगा। परन्तु भारतवासी पूछते हैं कि चर्ख के जरासे सूत से क्या होगा? कई पूछते हैं मेरे थोडासा कातने से क्या होगा? केवल पूछते ही नहीं, किन्तु कार्य करना भी नहीं शुरू करते । यह है भेद हम में और यज्ञ का महत्त्व समझने वाले अंग्रेजों में । वहां वचपन से आज्ञापालन सिखाया जाता है। वहां के लोगों ने आत्मार्पण करते हुप." आशापालन" अङ्ग को साधना की है। वहां कैसे विये- का जैसे बालक पैदा होते हैं । आज्ञा के न मिलने के कारण जल मरना तो दूर रहा, हम तो अपने संगठन की आज्ञा को थोडे से स्वार्थ के लिए तोड देते हैं और तोडनेका कारण प्रायः धार्मिक (?) बताते हैं बहुतों को जरासी बात में अन्तः.. करण : tonscirlier, बोलने लगता है। ऐसे कार्य करते हुए हम सचमुच समझते हैं कि हम धर्म कर रहे हैं, जब कि असल में हम यज्ञ भंग का भारी पाप कर रहे होते हैं । यदि हमने अपनी वर्तमान अवस्थासे उठना है तो हमें यज्ञ धर्म को स- मझना होगा और अपने अन्तःकरणों को विशाल बनाना होगा । मतभेद होने के कारण आज्ञाभंग का अधिकार प्राप्त कर लेना वहां का धर्म है । वेद में तो संग्रामवाचक शब्द तथा यज्ञवाचक शब्द बहुत कुछ एक हो हैं । इसका एक अर्थ यह समझा जा स- कता है कि यज्ञ में संग्राम जैसा नियंत्रण ( Discipli ne ) होना चाहिए । संग्राम यज्ञ में यदि सेनापति देव की आज्ञा पालन द्वारा पूजा न की जाय तो यह यज्ञ कैसे चल सकता है । राष्ट्रयज्ञ में यदि राजा की आशाओंका पालन न हो तो राष्ट्र कैसे जिवंत रह सकता है । परन्त गुलाम भारतवासियों को सैनिकों की तरह विना "कथं २८ क्षदिक यज्ञसंन्या। किमर्थ" के आज्ञा पालन करने में गौरव की जगह बन्धन दिखाई देता है । और वह भी अपने वनाप नेता के अपने राजाकं आमा पालन में | हमें यह सैनिकीय आशापालन भंड चाल दिखाई देता है, इसी लिए हम पराये राजा द्वारा भेडों की तरह होके जाने हैं। यदि हम अपने वनाए राजा का आनापालन सोख जाय तो हम ही सैनिक हो जाय । ग्रामों में जहां पुरानी पंचायतों का रिवाज विगडा नहीं है वहां तो अब भी (जो कि बहुत ही विरले उदाहरण हैं)"पांचों में परमेश्वर" मानकर लोग पंचायत को कठोर से कठोर आज्ञाको भी पालन कर देते हैं, परन्तु साधारणतया आज कल की सभाओं और सम्मेलनों में देखा जाता है कि सभापति बना को बोलने से बन्द करते हैं, पर वक्ता बोलता जाता है: सनापति चुप होने को कहता है पर लोग शोर करते रहते हैं। बल्कि कई लोग रोके जाने के कारण सभापतिसे नाराज हो जाते हैं । भला वहां नाराजगी का क्या काम ? इस सव का कारण यह है कि हम सभ्य, साम्मित्य नहीं हुए हैं यज्ञाई नहीं हैं बड़े हुए नहीं है । हमें घड कर अपने आपको यशाह बनना चाहिए । पहलेही अपने सभापति को खूब सोच विचार कर चुनना चाहिए, पर जब वह सभापति चना गया और जब तक है तब तक यदि उस देव पूज्य का आज्ञापालन न हो तो काम कैसे चल सकता है। यह तो आ- त्महत्या होगई । अपने यज्ञ का अपने आप नाश करना है। कुटुम्ब यज्ञ में बालक माता पिता के आदेशों को न माने, गुरु शिष्य यज्ञ में शिष्य गुरु वचनों को न माने तो इन यज्ञों का क्या हाल होगा। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक यज्ञ में आज्ञापालन आवश्यक है, इस के विना यज्ञ का पहला ही अंग नहीं चल सकता । यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि अपने नेता का आज्ञापालन अर्थात Au . यनके मध्यान में त्रुटि २९ भकिसे, सच्चे दिलसे उस के पीछे चलना ही देव पूजा है यज्ञ केप्रथम अंग का कर्म है। १६ यज्ञ के मध्यान में त्रुटि। अब भारत वर्ष के यज्ञों के मध्याग की अवस्था सुनिए ! यज्ञ का यह मध्यभाग प्रायः सभी संगठनों में बड़ा है, क्यों कि उन में बड तथा प्रायः छोटे भी थोडे होते हैं और वरावर वाले बहुत होत है तथा क्यों कि प्रायः सभी संगठनों में बडे और छोटे का सम्बन्ध विशेष अवसरों पर होता है और वरावर का सम्बन्ध प्रायः सदा रहता है । उत्तमांग से तो यह अवश्यही बडा होता है। अत: इसे ठीक रखना बहुत आवश्यक है । यह ठोक रहे, फिर यदि ऊपर नीत्रं का भाग कुछ विगड जाय तो वह शीघ्र ही सुधर सकता है । यह मध्य अंग का महत्त्व है । अतः मध्य अंग के स्वास्थ्य के लिए संगठन में के सब सभ्योको परस्पर प्रेमसे जुडे रहना चाहिए, और एकोद्देश्य में तत्पर रहना चाहिए । उन सबको जोड़ने वाली एक वस्तु संगठनका उद्देश्य होता है । जैसे कि भारतीय राष्ट्रमहासभा के सभ्यों को जोडने वाला देश प्रेम है, आर्य समाज सभासदों को जोडनेवाला वैदिक धर्म है, एक संग्राम के सैनिकों को जोडने वाला शत्रुपर विजय पाने का उनका उद्देश्य है, एवं एक शिक्षणालय के छात्रों को परस्पर जोडनेवाली उस शिक्षणालय का विशेष शिक्षण या विद्या होती है। इस जोडने वाले एकोद्देश्य को जब कोई सभ्य भूलता है या इसे गौण कर देता है तभी वह अपने कर्मद्वारा यज्ञ को हानि पहुंचाता है । इस संयोजक वस्तु को वेद में यज्ञ तन्तु' कहा गया है। यह या तन्तु कभी नहीं टूटना चाहिए। इस तन्तु से यज्ञ के सब सभ्य ३० वैदिक यज्ञसंस्था। . जुड़े होते हैं । परन्तु हमारा यह यातन्तु इतना ढीला होता है कि अन्य छोटी छोटी बातें इसके ऊपर हो जाती है और यज्ञ का लो. प कर देती हैं । हिन्दु और मुसल्मान आपसमें लडते हैं क्यों कि देशप्रेम के तन्तु से अपने आपको नहीं जोडते, इस यज्ञ तन्तु के सामने अन्य गौण वातो को मुख्यता दे देते हैं और इसीलिए रा ष्ट्रीय महासभा का यश छिन्न भिन्न हो जाता है ।दा आर्य समाजी सभासद आपस में ही लडते हैं; वैदिक धर्म का तन्तु उन्हें जोडने में असमर्थ रहता है, क्यों कि वे अन्य वैयक्तिक वाताको मुल्यता दे देते हैं और फलतः आर्यसमाजके यश को हानि पहुंचती है । यन के लिए सब सभ्यो को एकोद्देश्य में तत्पर रह कर सहाद्यांग कर- ना चाहिये, परंतु हम सहोद्योग तब तक नहीं कर सकते जब तक पहले हम एकोद्देश्य से जुड कर एक न हो जाय । इसी लिए अथर्ववेद के सामनस्य (३-३०) सक्त में जहां " सम्यञ्चः सवता भूत्वा" होने को कहा गया है वहां कहा है कि 'समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि' अर्थात् मैं तुझे एक जुग में जोड़ता है। इस सूक्त में तथा ऋग्वेद के प्रसिद्ध, “संगच्छध्वं संवदध्वं" वाले सूक्त में यज्ञके मध्याग का कार्य बहुत ही अच्छी तरह बताया गया है । भारतवासियों को यह उपदेश न जाने कब तक समझम नहीं आवे- गा। "सहस्रवाहः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् " (अथर्व २९-६-१) यह यदि यज्ञ पुरुष का ही वर्णन नहीं है तो या पुरुष का भी तो है ही । क्याही सुन्दर दृश्य हो, जव कि सहनों बाहुपं मिल कर एक ही उद्योग कर रही हो । राष्ट्रपति की आज्ञासे यदि राष्ट्र शरीरके सहस्रों हाथ सूत निकलने में ही लग जाय तो क्या हम अपना एक कार्यक्रम पूरा नहीं कर सकते । भारत राष्ट्र - पुरुष के तो ६० करोड हाथ हैं। पर रोना यही है कि हमारी धर्म पुस्तक यज्ञके मध्यागमें त्रुटि। ३१ में चाहे कुछ लिखा पडा हो, पर उस का करना और बात है। हम से ग्रह बनता नहीं कि किसी उच्च प्रेमसे प्रेरित हो मिल कर किसी रूपमें जुड़ जाय । यदि कहीं कहीं जुड़ते हैं और यज्ञ के "संगति करण " अंग को बनाते हैं तो यह अंग इतना निर्वल या जग्ण होता है कि इस से 'सहोद्योग कांपते हुए नहीं के बरावर निकलता है । फूट, नाना प्रकार के भेद ही सर्वत्र दिखाई देते हैं । इन भेदों को भी जोड़ने वाला यश तन्तु कहीं कहीं ही टूटा फूटा दिखाई देता है। नाना मत तो योरोप में भी पाश्चात्य लोगों में भी हैं। वहां ता पति और पत्नी भिन्न भिन्न गिरजों में जाते हैं। वहां के (यथा इंग्लैण्ड में) राष्ट्र कार्य में भी वहत से दल हैं । वे पर राष्ट्र कार्य को सदा ऐकमत्य से ही करते हैं। और वातों में चाहे कितना मतभेद रहे पर वे देश कार्य के लिए सब एक हैं । अतः उनका अपना अपना राष्ट्र पुरुष संसार में एक बलवती सत्ता रखता है ।उन का देश प्रेम का तन्तु अन्य बातों से नहीं टूटता । गत महायुद्ध में इंग्लैण्ड वासियों ने कितना मिलकर काम किया, उस की कथा हमारे लिये आश्चर्यकर है परन्तु जर्मन लोगों का सहो- द्योग इन सभी बढकर था। उन्होंने तो मानो अक्षरशः "संगच्छध्वं संवदध्वं" का पालन किया था। फिर भी उन की हार क्यों हुई यह और बात है । इस का भी वर्णन आगे आजायगा । यह तो स्पष्ट है कि हम में तो इतने जोर से लड़ने की भी सामर्थ्य नहीं है । उन को पुरुप बनाने वाली और सामर्थ्य देने वाली सम्मेलन शक्ति हमारे लिए सदा ही अनुकरणीय है । अस्तु । सारांश यह है कि यज्ञ का मध्य अंग (जो कि बहुत बड़ा भाग होता है ) तभी ठीक तरह चल सकता है जब कि उस के सब सभ्य एकोद्देश्यता में तत्पर हो- का सहोद्योग करते रहे, यही इस अंग के स्वास्थ्य का चिन्ह है वैदिक यज्ञसंस्था। ३२ १७ यज्ञ के आधाराङ्ग में त्रुटि। इसी प्रकार यज्ञ का "दान" अंग जो कि आधार अंग है मुर्दा हो जायेगा, यदि हम अपने संगठन में निर्बलों को, छोटे भाइयों को सदा सहायता प्रदान न करते रहेंगे । छोटों के साथ अपना संवन्ध ठीक रखने के लिए उन्हें अपने साथ जुडा रखने के लिए यह आवश्यक है कि हम उन्हें धन देकर, बल देकर, ज्ञान देकर जो उन की कमी हो उसे पूरा करते रहें । संगठन के, यज्ञ के ऊंचे लोग जब घमण्ड में आकर, अपनी शक्ति के नशे में मस्त होकर अपने छोटे हीन भाइयों को भूल जाते हैं और यज्ञ शरीर में करुणा के जीवन रस का प्रवाह बन्द हो जाता है तो आधार से ही यज्ञ का भंग हो जाता है। क्या हम नहीं देखते कि भारत के पददलि. त अछूतों के कारण भारत का राष्ट्रीय यज्ञ बीचमें ही पडा हुआ है। इन विचारों की दशा किन्हीं स्वामीहीन पालतू पशुओंसे भी अधिक शोचनीय है, परन्तु भारतीय हिन्हुओं के हृदय इस पर भी नहीं पिघलते । देश और जाति के इन आधारों को जबतक हम अपने सर्वविध दान कर्म से तृप्त न कर लेंगे तबतक हमारा हिन्दु संगठन और देश संगठनका यज्ञ आगे नहीं बढ सकता । इसी प्र- कार हमारे देश में ज्ञान में छोटे पुरुष बहुत हैं, हम में अक्षर ज्ञान ही बहुत थोडा है, जहां अन्यदेशों में ९५, ९९ प्रतिशतक शिक्षित होते हैं वहां इस देशमै ५ प्रतिशतक शिक्षित कहे जा सकते हैं। इस ज्ञान दान को कमी के कारण हमें कितनी कठिनाइयां हैं यह सब भारतके यज्ञप्रिय पुरुष अनुभव करते हैं। परन्तु इस से भी पहले तो धनका दान आवश्यक है, क्योंकि इस देशमें निर्धनता के कारण भूखे मरने वालों की संख्या हृदय विदारक है भूखे को ज्ञान और उपदेश तो पोछे चाहिए, पहले भोजन चाहिए। - यज्ञके मध्याह्नमें त्रुटि। ३३ इस देश में दस लाख मनुष्य प्राणी ऐसे हैं जिन्हें कि एकवारही सूखी रोटी नसीब होती है और एक दुर्भिक्ष में लाखों आदमी मर जाते हैं। बहुतों को वास्तव में इन संख्याओं पर विश्वास नहीं होता है, अत एव वे निश्चिन्त रहते हैं। परन्तु करुणा मूर्ति महात्मा गांधी इसी चिन्ता से चर्खेपर पागल हए हुए हैं और वर्ख के प्रचार की इतनी आवश्यकता अनुभव करते हैं । चर्खा प्रचार अपना अन्य फल पीछे लायगा, पहिले यज्ञ के तीसरे 'दान ' अधराङ्ग को चलता करने के लिये इस में प्राण डाले- गा ! अस्तु। अभिप्राय यह है कि प्रत्येक संगठन में जो जिस वातमें वडा हो उस का कर्तव्य है कि अपने से छोटो को वह वस्तु देने के लिए न केवल सदा तत्पर रहे, किन्तु उसकी कमी को स्वयं यल से जानकर पूरा करता रहें । एवं शानियों को अपना ज्ञान देना चाहिए और बलवानों को अपने बल से निर्वलों की सहा- यता करनी चाहिए । धमियों को अपना धन छोडना चाहिये और शूद्रों को शारीरिक श्रम की अपनी सेवा का दान करना चाहिए । ठीक तरह काम करते हुए यज्ञ के आधारांग का यही स्वरूप है। यह यज्ञ आधार अंग है । जिस संगठन में छोटे आवश्यक दान पाकर तैयार नहीं होते रहते वह संगठन समझना चाहिए कि जड सूख रहा है । भारत ने छोटों की उपेक्षा की अतः छोटे बढते गए और सामूहिक रूप से सारा देश ही हर एक बात में छोटा रह गया है । पाश्चात्यों के राष्ट्र यज्ञ में यदि कोई त्रुटी है तो वह आधाराङ्ग में ही है। वहां सब बातों में नहीं तो धन में तो बडो ने छोटों की उपेक्षा की है। वहां धनियों और निर्धनों का वहत फर्क है । अत एव वहां ' सोशियलिझम् । 'चौलोविझम (So- . ३ ३४ वैदिक यज्ञ संस्था। cialism, Bolsherism) आदि रोग अथवा रोग को दूर कर- ने को स्वाभाविक चेष्टाएं (जो कि वास्तव में सब रोग होते हैं) उत्पन्न हुई और उन से सारे राष्ट्र शरीर को दुःख भोगना पड़ा। गत महासमर में रूस को इसी विपत्ति के कारण युद्ध से जुदा होना पडा तथा जर्मनी शिथिल पड जाने के कारण भी उस के अन्दर साम्यवादियों ( crocialists ) का जोर हो जाना था। अत: इस आधाराङग का हमें विशेष ध्यान रखना जाहिए, विशे. पतया हम में से उन भाइयों को जो हरवात में पाश्चात्यों का अनु- सरण करना लाभदायक समझते हैं । अस्तु । आशा है अव पाठक बहुत कुछ समझ गए होंगे कि हमारे यज्ञ किन किन त्रुटियों के कारण असफल रह जाते हैं । १८ यज्ञ के देव और असुरा परन्तु ये त्रुटियां क्यों होती है, और इनको हटाया कैसे जा सकता है ? इसका उत्तर है कि यज्ञ के देवों और असुरों में सदा यह होता रहता है जब असुरोका पगडा भारी होता है तव यज्ञ में उतनी त्रुटि रह जाती है और जव देवों की विजय होती रहती है तब यज्ञ पूरा पूरा चलता है; अतः त्रुटिओके हटाने का उपाय है कि देवों की ही लगातार विजय रखीजाय । ये देव असुर कहीं बाहर नहीं हैं, ये अन्दर है और हमारे हृदय के अन्दर हैं। देवा- सुर संग्राम की रणस्थली यज्ञकर्ता मनुष्य का हृदय ही है। यदि यह बात पाठकों को कुछ विचित्र लगती हो तो उन्हें भगवद्गीता के १६ वें अध्याय में दैव और आसुर संपदोंका वर्णन पढलेना चाहिए। अस्तु । इस यज्ञ में देव कौन हैं जिनसे कि यज्ञ वढता है और असुर कौन हैं जिनसे कि यज्ञ की रक्षा करनी चाहिए यह पाठक कोष्टक के चौथे पांचवें स्तम्भ में देखेंगे।

यज्ञके देव और असुर ।
३५
या के उत्तमांग में 'श्रद्धा' देवता है और इसके विरोधी
असुर हैं अमान, अभिमान , सन्देह, काम आदि । देवपूजा अंग
को निर्विघ्न चलाने के लिए हमें अपने हृदयों में 'श्रद्धा' को
आसनान्द करना होगा । यश के बडों में, नेता में यदि
श्रद्धा नहीं तो उसका पजन , उसका आज्ञापालन आदि कर्म
। कैसे हो सकता है। जहां नेताको चुनना हमारे हाथ में है, तव
अवश्य हम गेला ही पुरुष चुनना चाहिए जिसमें हमारी श्रद्धा
हो । दीर्भाग्य से किसी समाज में यदि कोई भी पुरुष श्रद्धनीय
नहीं है ना यहां या बन ही नहीं सकता। प्रत्येक दशामें अपने
बडा में श्रद्धा आवश्यक है। नेता लोग कई बार ऐसे काम
कन्ग जो कि हम अच्छी तरह समझ में न आवे तो उनमें एक
दम श्रद्धा छोड देना बडी मूर्खता होगी । गुरु शिष्य यज्ञ में शिष्यों
को, या गृहस्थ यज्ञ में पुत्रों को, बहुत बार अपने स्वाभाविक अज्ञान
के कारण अपने आचार्य या माता पिता की बाते बुरी और
अहित कर लगनी है परन्तु यदि वे इससे उनमें श्रद्धा छोड कर
मनमाना कर तो कितना अनर्थ होगा। ऐसी अवस्था में उन्हें यही
उत्रित होता है कि वे अपने बडों के पास जावें और नम्र होकर
अपना अमान दूर करने का यत्न करें: न कि 'श्रद्धा' देवता की
शरण छोड है। 'श्रद्धा' ही बालको अज्ञानियों, निर्वलो, असहा-
या अर्थात् सब छोटी की एकमात्र रक्षिका देवता है।
परन्तु इस देवता को पदच्युत कर अपना राज्य स्थापित
करने के लिये अमानादि असुर सदा जोर करते रहते
है। श्रद्धा को स्थिर रखने की इच्छावाले यज्ञ प्रिय को
सदा इस से लगातार लडना पड़ता है। अज्ञान ऐसा
भ्रमाता है कि छोटे को अपना हित अहित दिखाई देने
लगता है। सन्देह आकर आना पालन नहीं करने देती।
-
.

३६ वैदिक यज्ञसंस्था। है अभिमान । के वश हो जाता है। तो कहता है कि 'क्या यही सब कुछ जानता है " यह वात तो स्पष्ट हानिकारक " अभिमान का रंग और चढता है तो वह पूजा की जगह देव का तिरस्कार करने में नहीं झिझकता । 'काम' अर्थात् अपने विषय की तीव्र इच्छा उसे और भी कर्तव्याकर्तव्य विचार के अयोग्य बना देती है। इस प्रकार श्रद्धा का आसन डोल जाता है। इसे स्थिर रखना ही यह कर्ता की वीरता है । जिस पुरुष की हृदयस्थली पर इस युद्ध में सदा 'श्रद्धा' देवता की ही विजय रहती है वही पुरुप यज्ञ के उत्तमांग में सम्मिलित होनेके योग्य - - यज्ञके मध्यमांग में 'साम्मनस ' देवता है जो कि इस अंगमे सम्मिलित सव पुरुषों को अपने हृदयों में विठलानी चाहि- ए। परन्तु इसकी जगह छीनने के लिए ईर्ष्या आदि अ. सुर चारों तरह सदा चक्कर लगाते रहते हैं। इन से सा- वधान रहना चाहिए। यदि 'ईर्ष्या' को हृदय राज्य में थोडासाभी स्थान मिल गया तो वह हमारी आंख ऐसी फेर देती है कि हमें अपने भाई की बढती देखकर आ. नन्दकी जगह दुःख होने लगता है । अव प्रेम की जगह द्वेष' असुर ले लेता है। जहां इन दो असुरों का प्रवेश हुआ तो 'क्रोध ' महासुर की विकराल मूर्ति अपना काम दिखाने लगती है और भारत माता के दो पुत्र आपस में एक दूसरेका सिर फोडने लगते हैं क्यों कि वे हिन्दु और मुसल्मान हैं। धीरे धीरे इतनी आसुरी माया छा. जाती है कि वे भाई एक दूसरों को धोका दे देकर नाश करना चाहते हैं और 'द्रोह' की फौजें आ खडी होती है। इस .

पल देव भार भसुर ।
३७
प्रकार 'या' नष्ट नष्ट हो जाता है। पाठक अपने अपने
संगठनों में स्वयं इस देवासुर संग्राम को अनुभव करें ।
यहां नो यही कहना है कि युद्ध में 'साम्मनस ' देवता की
ही विजय जानी चाहिए | कोई चाहे कितना यत्न करे
। अपने साथियों को कभी न छोडना चाहिए। अपना साथी
नाई मग्या प्रतीत हो. प्रेम न रक्वे. हानि भी पहुंचाये तो भी
उससे मन मिलाए रखना चाहिए। वैयक्तिक हानि चाहे
कितनी हो, पर यमतन्तु को न टूटने देना चाहिए । अन्त
में निश्चयस " साम्मनस " देवकी ही विजय होगी । यदि
र विचार कि
इसकी वृति में तो मुझे प्रसन्न होना
वाहिण, यार मुझे काट देगा तो वह भी मैं प्रेम से सह
लंगा, अन्ततः यह मेरा भाई हो है " तो इन भावना ओं
द्वारा हमारे पवित्र उद्दश्य प्रेम के नेजस ईर्ष्या द्वेष आदि
मब असुर भस्मीभूत हो जाएंगे और यम निर्विघ्न चलता
हुआ यदना जायगा।
एवं या कं नीस अंग के देवता का नाम
" ओपधी
कहा जा सकता है । इनका अर्थ है दूसरों के
कष्ट निवारण करने या दूसरों की की पूरी करके तृप्त करने
वाली देवता । इसका तात्पर्य है हृदय में सहानुभूतिका राज्य
होना । परन्तु इस राज्य के मुकाबले में विरोध का झण्डा
खड़ा करने वाले क्रूरता आदि राक्षसभी विद्यमान हैं । क्रूरता
राक्षसी जब आती है तो मृदय में से दयानांत निकलना बन्द
जाता है । इसी लिए. हिन्दु चमारोंको ऊपर से गालियां देते हैं,
इसकी जगह कि उन्हें गट्ठों का सडा पानी पीते देखकर तरस
स्वावें । इस क्रूरता राक्षसी को और पोपण मिलता है जब कि
या साम"

३८ वैदिक यज्ञसंस्था। अन्याय . , साथ मिल जाता है, क्यों कि "अन्यायासुर हमें देखने ही नहीं देता कि हमार छोटे भाइयों की बुरी दशा है । देश में विरले ही पुरुष हैं जो कि अपने देश की गरीबी आदि कमियों को अनुभव करते हैं। 'मद' भी आजाय तव तो कहना ही क्या है । तब तो पडौसी घरका आर्तनादभी सुनाई नहीं देता और पैरों तले रौंदे जाते अपने भाई की चीखें निकलवाना उनका मनोविनोद होता है। ऐसे 'मद' मम्तों की भी हमारे देश में कमी नहीं है । परन्तु 'लोभासर' के वश होने वाले तो इस देश में बहुत से भले आदमी है जो कि अपने छोटों को कुछ देने की जगह उन से रिश्वनें लेते हैं, बंगार लेते हैं और न जानते क्या छीना झपटा करते हैं । इस प्रकार हमारे हृदयों में से सोम देवता का राज्य लगभग सब छिन जा चुका है जिस कि हमने फिर स्थापित करना है यदि हम अमने देश के यमों का समूल नाश नहीं कर देना चाहते हैं । हमें इस देवता की विशेष आराधना करनी चाहिए और अपने में करुणा, दया का पूर्णतया उदय करना चाहिए, जिससे कि क्रूरता, अन्याय, लोभ, मद आदि असुरों का सर्वथा पराजय होकर हृदय में सहानभूति का राज्य जम जाय । तभी यज्ञ के आधारांग की रक्षा हो सकती है। इस प्रकार अब तक हम यह समझ गए होंगे कि यदि यज्ञ के इन तीनों अंगों में उपर्युक्त तीनों देवताओं का निर्विघ्न राज्य रख जाय तो यज्ञ स्वयमेव ठीकठीक चलता रहेगा । परन्तु इन देवता ओका राज्य स्थिर करने का उपाय क्या है यह भी बात हमें जान लेनी चाहिए। १९ यज्ञ का प्राण। यज्ञ की सब से आवश्यक वस्तु का वर्णन तो अभी रहता ही । यज्ञ के इन वाधक असुरोंका निरन्तर हनन करने वाला अस्त्र । ahor are यज्ञका प्राण। ३९ क्या है? देवों का राज्य स्थिर रखने वाली वस्तु क्या है? अथवा यज्ञ के देवपूजादि अंगों को निरन्तर जीवित रखने वाली वस्तु क्या है? यह है आत्मबलिदान ( Sacrificc ) स्वार्थत्याग ! यह यशका प्राण है । जैसे प्राण शरीरमें सब से बडी देवता है, वैसेही यज्ञ शरीर में सब देवो का महादेव यही 'बलिदान' है। इस लिए इसके उत्क्रान्त होने से श्रद्धा आदि सब देव उत्क्रान्त हो जाते हैं और इस के स्थापित होने से स्थापित हो जाते हैं। इसे यज्ञ की आत्मा भी कह सकते हैं । यह यज्ञ का सब कुछ है । क्यों कि इस के विना यज्ञ केवल मृतवत् है, लाश है । इसी लिए कई विद्वान यज्ञ शब्द का अर्थ ही वलिदान ' ( Sacrifice ) किया करते हैं । यह बहुत हदतक ठीक है, क्यों कि बलिदान के बिना यज्ञ कुछ देर भी जीवित नहीं रह सकता । जैसे कि जीवित पुरुष में प्राण प्रयास के रूप में निरन्तर चलती रहती है और पुरुप को जीवित रखता है, एवं यज्ञ के जीवन के लिए भी यह आवश्यक है कि उस में 'बलिदान निरन्तर चलता रहे। इसी लिए बाहर के अग्नि होत्र आदि यज्ञ में भी एक एक मंत्र पढकर न्वाहा स्वाहा' करते हुए ही यज्ञ चलाना होता है। यह 'स्वाहा' ही यज्ञ की जान है। (देखो स्तंभ ६) यज्ञांगों की इतनी मीमांसा पूर्व प्रकरणों में हो जाने के बाद अव पाठक गण प्रत्येक अंग में वलिदान के प्राणत्व को स्वयं सुग- मता से देख सकते हैं । ( १) उत्तमांग में जब आज्ञा पालन तथा अनुसरण का व्यापार होता है। तव.प्रत्येक व्यापार में कुछ न कुछ बलिदान करना होता है। उस एक आज्ञप्त इच्छा के अतिरिक शेप सब इच्छाओं का, शेष सब बातों का बलिदान करना होता है । प्रायः अपने सुख या आराम की इच्छा, अपने किसी विषय .

वैदिक यज्ञसंस्था। की इच्छा इस आत्रप्त इच्छा के विरोध में खड़ी होती है और इस के खडे करने वाले होते हैं हमारे पूर्व परिचित असर । पर यह खूब समज्ञ लेना चाहिए कि इस आज्ञप्त इच्छा के सामने अन्य सब विरोधी इच्छाये हीन हैं, पशु हैं, विघ्न हैं, इन को तुरन्त बलि चढा देना चाहिए। यदि हम इच्छा रूप में विचार रूप में विद्यमान इन को बलि न कर देंगे तो इन के कर्म रूप में आजाने पर इन का बलिदान करना बडा कठिन हो जायगा और यज्ञ को हानि तो पहुंच हो जायेगी । उदाहरणार्थ कभी "अज्ञान" और " अभि मान" के असुर यह विरोधी विचार खडा करते हैं कि " यह आशा अशद्ध है, सेनापति की इस बात से अधिक अच्छी बात तो फलानी है, क्या हम में अकल ही नहीं ... है"। परन्तु सच्चा याज्ञिक इन सब विरोधी विचारोंकोश्रद्धा की अग्निमें स्वाहा करदेता है और इस आहुति द्वाराश्रद्धा की अग्नि और भी अधिक प्रचण्ड हो जाती है। कभी मन कहता है "सभा की यह बात इतनी अशुद्ध है कि मेरे अन्तःकरण की आवाज इसे करने से रोकती है। परन्तु पीछे ज्ञात होता है कि यह भी “अज्ञान" असुर की करतूत है और वह अपने अन्तःकरण की झूठी आवाज का भी वलिदान देता है। इस प्रकार यदि विचारावस्था में ही पशु भावौका स्वाहा होता जाय तो यह स्वाभाविक तौर पर बढता जाता है। यज्ञ के प्रत्येक अङ्ग आ जीवन यज्ञकर्ताओं की वलिदान शक्ति पर निर्भर है। वे निरन्तर बलिदान कर सकते हैं या नहीं इस बात पर निर्भर है। प्रत्येक आज्ञापालन में और अनुसरण में भिन्न भिन्न प्रकार के विरोधी विचार आते रहेंगे उनका निरन्तर स्वाहा करते रहना ही यज्ञ को जीवित रखना है। एकवार जोश में आकर बलिदान कर- ना और बात है तथा निरन्तर बलिदान करना और वात है। दूसरी अवस्था हो यज्ञ का जीवन है । पहिली अवस्था तो किसी चाका प्राण । ४१ कृत्रिम उपायों से थोड़ी देर के लिए ध्यास चला देने के तुल्य है । हमने भी असाहयांग के दिनों में बलिदान किए हैं, कइयों ने राष्ट्र को आना पाकर करोड़ों की आमदनी और भोगविलास का बलि दान कर दिया. हजारों ने जेल में जाकर अपने घर के सुखोका बलिदान कर दिया । किन्तु यदि यह सब हमारा बलिदान स्थिर नहीं है तो यह हमारे रायश के जीवन का चिन्ह नहीं है। हमारा गष्टया यदि जीवित है ना उस में अब (जब कि जोशका काम नहीं है ) से पर्याप्त पुण्य होने चाहिए जो कि देश के लिए फकीर बन जानेक उग्रत हो. ऐसे लोग अधिक होने चाहिए । जो कि गष्ट आजा से चखां कानन के लिये आलस्य का बलिदान, अपने गाय माग्ने के समय का बलिदान, सीखने का कष्ट उठाने के रूप में बलिदान और नियमपूर्वक न कातने में जो सुविधा होती है उसका बलिदान करनेको उद्यत हो और ऐसे लोग तो सभी होने चाहिए जो कि विदेशी वस्त्र पहिनने के सुख का बलिदान कर सकन हो । जांचन तो सतत बलिदान से ही चलता है, देवों की पूजा करने के प्रकरण में वेद में बहुत जगह " हविषा विधेम " यह पाट आता करता है । इसका अर्थ यह है हम उस देवकी त्याग द्वारा पूजा करते हैं । कितना स्पष्ट है कि देव पूजा के लिए दवि की, त्याग की जरूरत है। कम से कम वेदविहित देवपूजा न्याग के बिना नहीं हो सकती। यह हुई देवपूजा अंग की चर्चा । (२)इसी प्रकार संगतिकरण के लिए सहोद्योग का व्यापार चलत रखने के लिए बलिदान को परमावश्यकता है । पहिले तो मेल ही बलिदान के विना नहीं होगा। किन्ही दो वस्तुओं को मिलाने के लिए उन्हें घिस कर, पिघला कर या किसी अन्य तरह कुछ न कुछ त्याग कराया जाता है । अपना व्यक्तित्व विना छोडे --- . ४२ वैदिक यज्ञसंस्था। कोई चीज मिलकर एक नहीं बन सकती। समाज में संगठित होने के लिए व्यक्ति को अपना बहुत कुछ बलिदान करना पड़ता है । रसायन के दो वस्तुओं के मिलने में भी यही सिद्धान्त है। सभाओं में एक निर्णय कर ("ये ते के च सभासदः ते मे सन्तु सवाचसः" अथ० ७-१२-२) "सवाचसः" होने के लिए बहुधा समझौते करने होते हैं जिसमें कि दोनों को कुछ न कुछ छोडना होता है । सभाके सव सभ्य यदि अपनी सम्मति को जरा भी छोड़ने को तैय्यार न हो तो सभाओं का एक भी निश्चय न होसके । मिलने का तो मूल मन्त्र ही बलिदान है । यज्ञ के सब बरावर के सभासद मिले रहे इसके लिए आवश्यक है कि वे अपने एकोद्देश्य की आग में अन्य मतभेदों को अन्य सब अपनी अपनी भिन्न भिन्न इच्छाओं को स्वाहा करते रहे। त्याग से मेल होता । अत एव संस्कृत में यज्ञ को " मेध" शब्दसे भी कहा जाता है, जैसे कि अश्वमेध,गोमेध आदि। यहां भी धानु पाठ के रचयिता ऋषि का कौशल देखने योग्य है । धातु है मेधृ संगमे च च" कहने से पूर्वोक्त हिंसा अर्थ भी इस का है । एवं मधु धातु का अर्थ हुआ " हिंसा और संगम"। और मेध का अर्थ हुआ वह कार्य जिसमें कि हिंसा करके (नाश करके) कुछ संगम किया जाय । ऊपर कहा है कि प्रत्येक संगम (मेल) के लिए कुछ न कुछ नाश करना होता है। स्वाहा करना होता है कैसी अच्छी तरह यज्ञ का रूप समाया हुआ है। गोमेध आदि का वर्णन तो आगे आवेगा, यहां केवल मेध शब्दका अर्थ समझना अभीष्ट था। अपने यज्ञ के साथियों में से यदि कोई जुदा होने लगे तो अपनी सब इच्छाओंकी हिंसा करके भी उसे मिलाए रखना (संगम करना) " मेध " है । स्वर्गीय देशबन्धु दास Aho मेध्" शब्द में पना का माग । ४३ कांध ' आदि असुर में यह विशेष गुण था. इसी कारण उन का दल संगठित रहता था । उन का स्मरण करते हुए महात्मा गान्धी को उनके इसी गुण का विशेष ध्यान आया था । अपने साथियों को मिलाए रखने के लिए या अपने आप संगठन में मिले रहने के लिए अपने एकाद्देश्य को छोडकर और जो कुछ मिलने में बाधक हो उस सब को छोडत जाना चाहिए । कभी कभी ईर्ष्या 'प' मौका पाकर हमारे अन्दर अपने भाई के विरुद्ध विचारों को उत्पन्न कर देने । पर हम संभाल कर ऐसे सब विरोधी विचागें को माम्मनस अग्नि में स्वाहा कर देना चाहिए । जिस में कि 'साम्मनस अग्नि' बुझने की जगह और भी दोम कर यम के मध्य अंग को बढाती जाय । एवं हम देवंग कि मिट रहने के लिए जिस प्रकार बलिदान की आर- श्यकता है वैसे ही सहायोग के लिए भी निरन्तर बलिदान का प्राण चलने रहना चाहिए । उदाहरणार्थ, आर्य समाज में सहोद्योग के लिए प्रत्येक आर्यपुरुष को अपना पुत्र गुरुकुल भंजना चाहिए । इधर मनमें पशु कहता है 'मेरा प्यारा पुत्र है. इस में क्यों चौदह सालके लिए जुदा कर ई " परन्तु इन्स पशु की तुरन्त हिंसा कर डालनी चाहिए जिससे कि वह यश में जुड़ा रह सके-संगम हो सके । यह भी मेध हुआ। भारतकी विदेशी सरकार के किसी कानून का कभी भंग करने में सहाद्यांग करना हमारा कर्तव्य होता है तो मनमें पशु कहता है " अरे! जेल जाने में बडे बडे कष्ट होंगे इस काम में सम्मिलित मत हो" पर इस पशुको साम्मनस अग्नि में भस्म करके उसे अपने साथियों के संगम में संमिलित ही होनाचाहिए।

वैदिक यज्ञसंस्था । (३) यज्ञका तीसरा अंग " दान" तो स्वयं ही पलि दान रूप है । इस में छोटो की सहायता के लिए, उनकी कमी पूरी कर- ने के लिए जो कुछ हमारे पास हो वह सब देना होता है। अतः इसमें बलिदान की सत्ता दिखलाने की आवश्यकता नहीं है । पर- न्तु यह स्पष्ट है कि यह अंग इसी कारण आधार अंग है क्यों कि बलिदान रूप है और बलिदान यज्ञका प्राण रूप है । अन्त में इस तरफ निर्देश करना भी अनुचित न होगा कि बलिदान की मात्रा का निश्चय उसके बाह्य त्याग की मात्रा से कमो नहीं किया जा सकता। इस कारण में महाभारत में कही गई अपने सत्तुओं का दान करने वाले ब्राह्मण और अर्ध सुवर्णमय नेवले की कथा स्मरण करलेनी चाहिए । परन्तु यह सर्वथा सत्य है कि यज्ञकर्ता में वास्तव में बलिदान की मात्रा जितनी अधिक होगी उनका यज्ञ उतनाही वीर्यवान और जीवनशाली होगा। इस लिए जो लोग बलिदान से डरते हैं। उनके लिए यज्ञ नहीं है । उन्हें यज्ञ से दूर रहना चाहिए और जब वलिदान करने की इच्छा पैदा हो तभी यज्ञ में सम्मिलित होना चाहिए । एक स्वस्थ पुरुष में अवश्यही बलिदान की इच्छा पैदा होगी। यह भी हमें समझ लेना चाहिए कि स्वस्थ यज्ञमें यह वलिदान वैसेही आसानी से, सहजता से, प्रसन्नता से होना चाहिए, जैसे कि हमा- रा श्वास प्रश्वास होता है । बलिदान सीखने वालों को प्रारम्भ में अवश्य कुछ बलिदान कार्य में कष्ट अनुभव होगा, परन्तु स्वस्था- वस्था होजाने पर यह कार्य सहज हो जायगा। यज्ञ कर्ता पुरुष तो"यह त्याग, यह त्याग, यह भी त्याग दिया, अब यह भी" इस तरह आनन्द से बलिदान करता हुआ ही यज्ञ में अग्रेसर होता जाता है । असहयोग आन्दोलन के दिनों में एक मनुष्यने " पहिले दुसरे. फिर मैं ४५ -- . म० गांधी से पछा "आप क्यों इतने लोगों को जेल भिजवा रहे हैं और मरवा रहे है इस का पाप आपके सिर है। उन्हों ने कहा कि मैं तो किसी को मरने या जेल जाने को नहीं कहता हूं पर उन्हें इस काम में मजा आता है इस लिए करते हैं । सचमुच बलिदान करने में बडा मजा आता है । यह मनुष्य के लिए श्वासकी तरह परम स्वाभाविक बात है. यदि वह यज्ञ दृष्टिसे स्वस्थ है । जिन मनप्यों का बलिदान में आनन्द नहीं आता उनके प्रेम में( यज्ञोद्देश्य के प्रति प्रेम में ) की होती है । १३ वें प्रकरण में बताया जाचु- का है कि या तो प्रेममय वस्तु है और "प्रेम" विना बलिदान के जिन्दा ही नहीं रह सकता । प्रेमको तो भोजन की तरह रोज बलिदान बाहिण | प्रेम ना कहता है- प्रेम पियाला जो पिय, सीस दक्षिणा देय । लोभी सीस न दे सके, नाम प्रेमका लेय ॥ अतः यह ठीक है कि जब कभी बलिदानमें कठिनता अनुभव होती है तब वास्तव में ध्येय में प्रेम की कमी होती है। अन्यथा प्रेमी तो बलिदान का भूखा होता है। परन्तु जहां प्रेम से बलिदान स्वयं होता है, वहां वलिदान से भा प्रेम बढता है जैसे कि रस से प्राण बढता और प्राण बढ़ने से रस अधिक बनता है । अतः प्रेम और बलिदान दोनों अपने में वढाने का यत्न करना चा- हिए और इन के बढाने का यत्न करते हुए निश्चिन्त रहना चाहिए कि फिर हमारा यज्ञ सर्वथा सुरक्षित है । २० " पहिलं दूसरे, फिर मैं। या में प्रेम और बलिदान का महत्त्व पूरी तरह समझने के लिए यज्ञ का मूल सिद्धान्त जान लेना आवश्यक है। . ।"

४६
वैदिक यज्ञसंस्था।
यज्ञ का मूल सिद्धान्त है “पहिले दुसरे (सव ) फिर में
(अकेला)" इसी सिद्धान्त से यज्ञ की उत्पत्ति होती है ।
मनुष्य क्यो मिलते हैं ? क्यों संगठित होते हैं ? क्यों यश
प्रारंभ करते हैं ? क्योंकि अकेले जुदा जुदा रहने में उनका
भला नहीं होता । अपना जुदा जुदा स्वार्थ पूरा करने में लगने
से वे देखते हैं कि हम में से किसी का भी स्वार्थ
पूरा
नहीं होता है। इस लिये लोग मिलते हैं और देखते हैं कि
मिलने से-सव का सामुदायिक स्वार्थ देखने से सभी का
(एक एक का) लाभ होता है- एक एक का स्वार्थ पूरा
होता है। उदाहरणार्थ, सबसे पहिले मनुष्य कुटुम्ब यज्ञ में
शामिल होना सीखता है। कुटुम्ब में यदि पति पत्नी या
पिता पुत्र या दो भाई अपने जुदा जुदा स्वार्थ रखें और
अपने स्वार्थ के लिये दूसरे से लड़ते रहे, तो वे एक
दूसरे को हानी पहुंचा कर दोनों ही निर्बल रहेंगे और
उन निर्वलों का वाह्य जगत् नाश कर देगा परन्तु यदि वे
यज्ञ को समझ जाते हैं और मिलनेका लाभ स्पष्ट देखते
हैं तो वे मिल कर सब का स्वार्थ देखने के बाद ही
अपना जुदा स्वार्थ का विचार करते हैं । प्रत्येक दूसरे के
सुख का विचार पहिले करता है, अपना पीछे। यज्ञ (मेल)
को समझने तक उनका सिद्धान्त था।" पहिले मैं, फिर
दूसरे सब" यह पशुपन है। पशु अपना ही स्वार्थ जानता
है। परन्तु यज्ञ के जानने पर उनका सदैव का सिद्धान्त
हो जाता है कि " पहिले दूसरे सव फिर मैं ( अकेला ) ।
इस प्रकार यज्ञ मनुष्य को पशु से वास्तविक
मनुष्य
बनाता है। मनुष्य अपना केवल विचार छोडकर सव की दृष्टि

1
वन का घातक शत्रु ।
से विचार करता है और कर्म करता है । इस लिये
आर्य समाज का वा नियम प्रवर्तक ऋपिन बताया कि
प्रत्येक को अपनी ही उन्नति में सन्तुष्ट न रह कर सब
की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये। इसी लिये
भमि सक्त में कहा गया है-
मा नो मिर्वर्धयत् वर्धमाना ।
अथ० १२१-२३
वह हमारी मातृभूमि ( हम द्वारा ) बढती हुई हमें बढावे"।
वास्तव में सब मातृ भूमि (३० करोड भारतवासियों ) की
वृद्धिम ही हमारी ( एक एक भारत यासी की) वृद्धि है । यदि
हम " पहिले मैं " के पशु सिद्धान्त के अनुसार सस्ता विदेशी
वस्त्र लेना छोड कर अपना घाटा सहकर भी पहिले मातृभूमि
को बढायेंगे.नो मातृभूमि सब घाटा पूरा कर देगी और हमें बढाती
जायगी । इस लिय एक यन कर्ता कपडा लेते समय महंगा और
खरदरा बहर लेगा ( पढिले ३० करोड भारतवासियों को
देवेगा) फिर उन खद्दरों में से वेशक सस्ता और अच्छापन
देखेगा। (फिर अपना भी विचार करेगा)। इस प्रकार
या की उत्पत्ति प्रारंभ ही प्रेम और वलिदान से होता है।
२१ यज्ञ का घातक गनु ।
अब स्पष्ट है कि यज्ञ का घातक शत्र है स्वार्थ खुदगर्जी
(पहिले मैं, फिर दूसरे सब )। यह स्वार्थ प्रेम रूपी
इन्द्र का वृत्र है। प्रेम सूर्य को यह सदा आ आकर ढके-
लने की चटा किया करता है । बलिदान का यह निषेध
रूप है। बलिदान दिन है तो स्वार्थ रात है। जैसे कि
वलिदान यज्ञ देवा में महादेव है, वैसे ही यज्ञ के-सव

४८ वैदिक यज्ञसंस्था । कामः में काम असुरों का एक असुर " स्वार्थ " है । अहंकार, मोह, अ. पनापन ये सब इसी के भिन्न भिन्न रूप हैं। यज्ञ में जिस जिस वस्तु का बलिदान करना होता है उन उनका एक नाम स्वार्थ है। यज्ञ में निरन्तर इसी का बलिदान किया जाता है। यही यन का पशु है । प्राणाग्नि होत्र. उपनिषद में शरीरस्थ यज्ञ का चित्र खींचते हुवे लिखा है। पशुः" " काम अर्थात् “ (पहिले) अपनी इच्छा " यही यज्ञ में वलिदान करने योग्य पशु है। आज कल की भाषा में जिसे स्वार्थ कहते हैं उसके लिये अपेक्षया प्राचीन साहित्य शब्द का प्रयोग होता था। गीता में स्वार्थ- रहित, विना खुदगर्जी के, कार्य करने का नाम " निष्काम " कर्म है। यह (' काम ') ही यज्ञ का सब से बडा या एक मात्र शत्रु है। यज्ञ में अपनी जुदी इच्छा रखना यज्ञ को भ्रष्ट कर देना है । गीता का मुख्य उपदेश यही है कि मनुष्य को अपने ने प्रत्येक कर्मों से सकामता का दोष निकाल कर अपने प्रत्येक कर्म को पवित्र यज्ञ कर्म बना लेना चाहिये, ऐसे यज्ञार्थ कर्म करता हुआ मनुष्य मुक्त हो जाता है । यज्ञ कर्म और अ-यज्ञ कर्म में निष्कामता और सकामताका ही भेद है । गीता के दूसरे अध्याय में जो नाश का मार्ग बताया है वह 'संग' और 'काम' से ही प्रारंभ होता है। यह 'काम' और 'स्वार्थ' सव पापों की भी जड है इसी लिये वेदने अकेले अपने आप खाने वाले को केवल पाप खाने वाला कहा . घो भवति केवलादी"। यही वात “भुंजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ' इस गीता वाक्य में कही है । यही अव - , "केवला- स्वार्थ और परार्थ। १९ यह भी स्पष्ट हो जायगा कि जो अब तक हमने यज्ञ का लक्षण करते हुये कहा है कि 'मिल कर किये जाने वाले शुभ कर्म का नाम या है. यहां शुभ कर्मका क्या अर्थ है? शभ कर्मका अर्थ है " अपने लिये न करके दूसरे के लिये करना, स्वार्थ की जगह परार्थ, परोपकार करना।" परोपकार के लिय जो संगठन है वही रन हैं। दूसरों को पीडा देने वाले संगठनों से जो कमाई मिलती है. वह कमाई नहीं वह तो पापका ढेर है । इस प्रकार पाठफ नाना प्रकार से विचार कर देख लें कि 'स्वार्थ' ही यम का विघातक है। मनुष्य में यह स्वभावतः उत्पन्न होता । परन्तु इसका बलिदान होता जाना चाहिये । बलिदान मपी प्राण का काम निरन्तर इसी स्वार्थ मल का निकालना है। यदि यह स्वार्थमल यशशरीर में कहीं भी ठहर गया नो याद रखना चाहिये कि यह ठहरा हुवा थोडासा भी स्वार्थ- मल वह विष है जो कि सब यश का प्राणान्त कर देता है. है। । २२ परार्थ में स्वार्थ और स्वार्थ में परार्थ । परन्तु हमें "स्वार्थ" का अर्थ अच्छी तरह समझ लेना चाहिये । क्योंकि कई वार स्वार्थ में परार्थ होता है । यह स्वार्थ में परार्थ समझने के लिये हमें पहिले २० वें प्रकरण में बताये गये परार्थ में स्वार्थ को जरा दूर तक समझना चाहिये। इसे दूर तक समझने में यह बात भी स्पष्ट हो जायगी कि यम परार्थ क्यों होना चाहिये और स्वार्थ के लिये संगठन क्यों नहीं बनाने चाहिये। २० वें प्रकरण में बताया है कि जब शुरू में मनुष्य यक्ष करना सीखता है तब वह यही नयी बात सीखता है कि ४ चदिक यज्ञ संस्था। " "परार्थ में ही मेरा असल में स्वार्थ सिद्ध होता है" और इसी लिए वह दूसरों से मिलता है यज्ञ में संगठित होता है । अब यदि पश्चिम के लोग पूंछे या नयी सभ्यता से प्रभावित भारत वासी पूछे कि- हम अपना स्वार्थत्याग करते हुवे अपना संगठन बनायेंगे तो संगठन बल से हमें लाभ अवश्यही मिलेगा, हम चाहे उस संगठनके से दूसरों को लूटे या कुछ ही करें। हमारे संगठन का उद्देश्य परोपकार हो इसकी क्या आवश्यकता है ?" तो मैं कहूंगा कि जिस सिद्धान्त से अपना संगठन बनाया है उसे ही आगे क्यों नहीं लगाते। यदि एक व्यक्ति का सच्चा स्वार्थ परार्थ में है अतः उसे दूसरों से मिल कर संगठित होना चाहिये, तो एक संगठित व्यक्ति (यज्ञ) का भी सच्चा स्वार्थ परार्थ में ही है अतः उसे ईश्वरीय संसार महायज्ञ में संगठित होना चाहिये। एक मनुष्य की तरह फिर एक यज्ञ पुरुष को भी सीख लेना चाहिये कि “पहिले, दूसरे, फिर मैं"। दूसरे शब्दों में इसे यों कहना चाहिये कि हमारे बनाये सब यज्ञ (संगठन ) परिमित हैं, अपूर्ण हैं, अतः वे तभी सफल हो सकते हैं यदि वे परमात्मा के परम परोपकारमय संसार यज्ञ की अनुकूलता में चले । सब के मूल में तो सव यज्ञों का स्तोत्र परमात्मा का परमपरोपकार है। इस लिये जिनका मुख उस तरफ है वे ही यशजीवन प्राप्त कर सकते हैं, जिन्होंने उधर से पीठ फेरी हुई है वे अपने तुच्छ वल पर कब तक जोते रहेंगे। जो चाहे छोटे छोटे भी यज्ञ हैं पर यदि वे संसार महायज्ञ के अभिमुख हैं तो उनकी जड़ें जमी हुई हैं। परन्तु जो बडेसे बडे ऐसे संगठन हैं ( उन्हें यज्ञ नहीं कहा जा स्वार्थ और परार्थ। सकता) जोकि परपीडन के लिये हैं। अतः संसार यज्ञ के स्वार्थ से जुदा अपना स्वार्थ रखते हैं वे कृत्रिम तरीको से जितने ऊंचे खड़े किये गये हैं उतनी ही जोरसे घडाम से गिरेंगे । इसलिये ऐसे संगठनों का थोडा वढना ही अच्छा है, जितनी थोडी दूर जाकर ही वे टूट जाय अच्छा है, नहीं तो धोखा बढता जाता इन संगठनों को यज्ञ इस लिये नहीं कहा जा सकता क्यों कि इनके सब स्वार्थत्याग राक्षस खाते जाते हैं, वे देवताओं को नहीं पहुंचते । राक्षस (स्वार्थ ) देवताओं (परार्थ) की तरह अमर नहीं होते, क्यों कि उन्हें पीठ फेरी हुई होने के कारण लगातार यशस्वरूप से जीवन नहीं मिलता रहता। अतः राक्षसों की आयु पूरी होने पर सब संगठन गिर पडता है । इस लिये हमने कहा कि यज्ञ परोपकार के लिये ही होना चाहिये । अस्तु । अब दूसरी बात समझना आसान है । क्यों कि मनुष्य एकदम परिपूर्ण यज्ञ नहीं कर सकता और एकदम सब स्वार्थ नहीं छोड सकता, इसलिये वह परिमित यज्ञ करता है; परिमित रूपसे स्वार्थ को छोडता है । इसके लिये वह अपने यज्ञ पुरुष के स्वार्थ बना लेता है। उदाहरणार्थ जो अभी कुटुंबयज्ञ तक पहुंचा है, वह कुटुंब के लिये अपने सव स्वार्थ छोडता है, परन्तु कुटुंब के स्वार्थ को नहीं छोडता । एवं एक भारत वासी राष्ट्रयज्ञकर्ता अपने भारत गष्ट के लिये अपने सब स्वार्थ छोड देगा, पर भारत का स्वार्थ (स्वराज्य प्राप्ति ) को नहीं छोडेगा । यह स्वार्थ छोडना भी नहीं चाहिये, क्योंकि यह वास्तव में स्वार्थ नहीं है। यह तो परार्थ है, क्योंकि हम अभी समझ कर आये हैं कि सब यज्ञों का उद्देश्य परार्थ होता है । कुटुंब समाज में काम आने के लिये हैं, भारत की स्वराज्यप्राप्ति संसार के लिये है, यदि ये दोनों संगठन वास्तव 83 वैदिक यज्ञ संस्था। में यज्ञ हैं । इस लिये अपने यज्ञका - वास्तविक यज्ञ का- स्वार्थ स्वार्थ नहीं होता। इस स्वार्थनामक परार्थ को तो कभी न छोड़ना चाहिये । तात्पर्य यह है कि संसार यज्ञ के अविरुद्ध जो स्वार्थ है, यह स्वार्थ नहीं है परार्थ है ( संसार यशार्थ है)। इसलिये इस स्वार्थ को यज्ञ का घातक शत्रु न समझकर यज्ञ का परम पोषक समझना चाहिये । यह केवल बालनेके लिये स्वार्थ है। (असल में तो परार्थ है ) क्योंकि यह परार्थ का स्वार्थ है। अन्त में भगवद् गीता के ४ - १८ श्लोक को बदल कर मैं यो पढ सकता हूं- स्वार्थ परार्थ ईक्षेत परार्थे स्वार्थमेव च । स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नस्वार्थकृत् ॥ २३ हवन प्रकिया। हवन का नाम सब ने सुना होगा। बहुतसे लोग हवन और यज्ञ को पर्यायवाची समझते हैं । परन्तु वास्तव में 'हवन' एक प्रक्रिया का नाम है जो कि यज्ञ में अवश्य भावितया होती है। इस हवन प्रक्रिया का अर्थ जानने के लिये फिर एकबार धातु पाठके रचयिता ऋषि का स्मरण करना चाहिये। उन्होंने 'हु' धातुका अर्थ लिखा है 'दानादानयोः' अर्थात् दान और आदान, देना लेना । एक ही धातु के देना लेना ये दो परस्पर विरोधी अर्थ कईओको असंगत या विचित्र प्रतीत होंगे। परन्तु इसी में सुसंगतता और सौन्दर्य है । क्योंकि हवन करने का अर्थ है ऐसा दान करना जो कि आदान करावे । प्रत्यक यज्ञ में वह प्रक्रिया होती है कि उनमें एक वस्तु दी जाती है, त्यागी जाती है और उसका परिणाम यह होता है कि एक उत्तम वस्तु का आदान हवन प्रक्रिया। होता है, प्राप्ति होती है। इसी प्रक्रिया का नाम हवन है। भगवद् गीता के यज्ञ प्रकरण में इस प्रक्रिया का वर्णन इस प्रकार हुवा है:- । . देवान् भावयतानेन । ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः। श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ इस (यजन) से तुम देवों को भक्ति (पुष्ट करो) और वे देव तुम्हें भावित करें (इस प्रकार) परस्पर-एक दुसरे को-भावित करते हुवे तुम परमकल्याण को प्राप्त हो ओगे। इस प्रकार देन लेन की प्रक्रिया(हवन)सब प्रकारके यज्ञों में होती है। उदाहरणार्थ, दैनिक अग्निहोत्र में हम अग्निद्वारा वायु आदि देवों को धृत सामिग्रो आदि का दान करते हैं तो हमें वायु शुद्धि, वृष्टिशुद्धि आदि का आदान होता है । इस प्रकार आदान करने वाला दान यसमें जिस वस्तु का किया जाता है वह वस्तु "हविः" कहलाती । 'हवि ' शब्दभी उसी 'हु' धातु से बना है। जैसे की उपर्युक्त उदाहरणमें घृत सामिग्री हवि है। इसी प्रकार राष्ट्र- यज्ञ में हवि राजकर होता है, क्योंकि प्रजा जन जो राजकर देते हैं उससे उन्हें जान, मालकी रक्षा, वृद्धि आदि फल प्राप्त होते हैं। समाज यज्ञ में एक चिकित्सक को, एक ब्राह्मण को हवि दी जाती है इस से जनता को शारीरिक स्वास्थ्य और आत्मिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है। गुरु शिष्य यज्ञ में जव शिष्य समिधा होकर गुरु के पास जाते हैं तो गुरु उनकी भक्ति और शुश्रूषा की हवि स्वीकार करते हुवे उन्हें अपना सप अनमोल ज्ञान देते हैं। राष्ट्रयज्ञ में फिर सरकारी नौकर अपनी सेवायें देते हैं और उन्हें सरकार वेतन देती है। समाज यक्ष में एक दुकानदार लोगों के लिये आवश्यकीय वस्तुयें इकट्ठी वैदिक यज्ञ मंस्था। करके रखता है और सहूलियत पहुँचाता है तो लोग उसे वस्तुओं कामूल्य देकर उसकाभरण पोपण करते हैं। इस प्रकार सैंकड़ों प्रकार के सव यज्ञो में हम देख सकते हैं कि यही 'हवन प्रक्रिया' हो रही है। केवल सव यज्ञोंमें नहीं किन्तु जैसा कि हम आगे वैयक्तिक यज्ञ के प्रकरण में देखेंगे कि सब यज्ञों के प्रत्येक अंग में यह हवन प्रक्रिया होती है। २४ क्या यज्ञ सौदा है ? उपयुक्त हवन प्रक्रिया देख कर कोई पूछता है कि क्या फिर यज्ञ सौदा है ? हां यज्ञ सौदा है, पूरा पूरा और पक्का सौदा है ऐसा पकाया और सच्चा सौदा है कि हमारे बाजारी सौदे ऐसे पक्के और सच्चे होही नहीं सकते। यह बात अटल है कि यह में जो कुछ हवन किया जायगा उसका ठीक, निश्चित पूरा पूरा प्रतिफल अवश्य अवश्य मिलेगा। पर यज्ञ के निश्चित सौदा होने के कारण ही हमें यज्ञमें सौदा करना नहीं चाहिये। सौदा तो यहां हुवा हुवा है, बाजार में हम सौदा या शर्त बन्दी इस लिये करते हैं क्योंकि या तो हमें इस के कच्चे होते व टूट जानेका डर होता है या अपनी तरफ इसके झुक जानकी आशा होती है । पर यज्ञ का सौदा तो पक्का है, न यहां ऐसे डरका काम है, न ऐसी झूठी आशा का अवसर है। यह याद रखना चाहिये कि सब यज्ञों का सामाजिक संगठन यज्ञों का भी- फलदाता परमात्मा है या उसके देव हैं। वे न तो रियायत कर सकते हैं और न ठगे जा सकते हैं। अतः यह समझ लेना चाहिए कि यज्ञ में सौदा करना न केवल व्यर्थ है किन्तु हानिकारक है। क्योंकि जो यज्ञ में सौदा करता है वह यज्ञ में अश्रद्धा और संशय प्रकट करता है और जो वस्तु श्रद्धा और विश्वास के योग्य है उसमें श्रद्धा और विश्वासन श्या गम मादा है? ५५ रम्बना अपने आपको हानि पहुंचाना है। अधयाना, संशयात्मा विनश्यति" गी०४१४० जो संशय रसता और अनएच सौदा करके यश में शामिल होता है वह नए होता है, क्योंकि पहिले तो अपूर्ण श्रद्धा के कारण पूरे यत्न से या कार्यही नहीं करता और फिर यदि कहीं उसके कल्पित त्याग के अनन्तर उमका कल्पित फल उसे मिलता नहीं अर्थात् इतने त्याग में फल अवश्य मिल जायगा उसकी यह कल्पना अशुद्ध निकलती है नो वाद घबडा जाता है और या छोडकर हानि ठाता है। उदाहरणार्थ एक अधूरी श्रद्धावाला भारतवासी राष्ट्र महासमा के या में अपनी इतनी कुर्वानी करता है जितनेसे कि वह फल की आमा रग्यता था. परन्तु स्वराज्यादि कुछ फल मिलतान देव अपने उस सय बलिदान को भी व्यर्थ गया समझता है और किनी नरफ का भी नहीं रहता। इसके विपरीत, एक श्रद्धालु पुरुष (जिम मन में सौदा तो आही नहीं सकता) यदि फल निकलना नहीं देखता तो यही समझता है कि इसमें मेरी तरफ से कहीं त्रुटि रह गया है, या तो त्याग की कमी है या त्याग करने (इषि डालने की विधि में कुछ त्रुटि है. अनः वह अपने यज्ञको ही अधिक अच्छी तरह करने में तत्पर रहता है । इस लिये कहा है कि या में सादा नहीं करना चाहिये । यहां यह भी स्पष्ट है कि फल न मिलता देखकर विचलित न होना, श्रद्धा बनाये रखना वे ही लोग कर सकते हैं जिनके कि संगठन यज्ञ हैं- परोपकाराय हैं। जो परपीडन के लियं, स्वार्थ के लिये किये गये आसुरी संगठनों में गामिल हैं वे स्वभावतः बहुत घबराते हैं, फल मिलता न देख बेचैन हो जाते हैं। अपने भरोसे वे कब तक चल सकते हैं। उन्हें अपनेसे किसी ऊंची चीज में श्रद्धा नहीं होती परन्तु यज्ञकर्ता - वैदिक यज्ञ संस्था। परोपकारी पुरुषका दृढ आधार अगला यश या अन्त में यशमय परमात्मा होते हैं उसकी उच्च यज्ञ में श्रद्धा या परमात्मा में श्रद्धा उसे न केवल सांत्वना देती रहती हैं अपि तु बहुधा कठिनाइयों के आने पर घबराहट की जगह उसमें उत्साह को पैदा करती है। क्योंकि उसे पूरा विश्वास रहता है कि वह परोपकार-कार्य सफल तो होगा ही यदि मेरे जीवित रहते नहीं होगा तो पीछे होगा अतः वह अपनी आहुती देने के लिये भी सदा उद्यत रहता है। कभी निराश नहीं हो सकता। जव यज्ञ परांपकारके लिये है अपना स्वार्थ नहीं है तब घबराहट किस लिये ?। जब यह अटल विश्वास है कि निश्चित समय पर परिणाम निकलेगा ही और परोपकार होगा ही तो यज्ञकर्ता परोपकार फल की तरफ भी (अपने लिये फल की इच्छा तो पहिले ही नहीं है ) ध्यान नहीं देता किन्तु अपने कर्तव्य को अच्छे से अच्छे प्रकारसे विना टि के करने में लगा रहता है। असल में अल्पज्ञ पुरुप संसार की जटिल कर्ममति को कैसे जान पाचे, उसे तो यदि किसी प्रकार परमात्मा के न्यायकारित्व और कल्याणकारित्व में श्रद्धा हो जाय तो उसका बेडा पार है। यह श्रद्धा ही मनुष्य को फल से निश्चिन्त कर शुभ कर्म करनेके कार्यमें लगातीहै। इसी श्रद्धावश मनप्ययक्षका पल्ला अन्त तक नहीं छोडता। अतः यज्ञ तोपरोपकारिओ और श्रद्धा लुओं के लिये है,स्वार्थिओं और सौदा करनेवालों के लिये नहीं है। क्या हम भारतवासियोंको यज्ञ स्वरूप परमात्मामे इतनीश्रद्धाहै? २५ यज्ञशेष । अभी तक यज्ञके करने कराने के बहुतसे सिद्धांत और नियम बताये गये हैं। इसी प्रकार यज्ञकर्ता को क्या खाना चाहिये इसका भी एक आवश्यक नियम है- व्रत है। यज्ञ कर्ता को केवल यशशेष यज्ञ शेप। ही खाना चाहिये । यज्ञ से जो कुछ बचे वह यज्ञशिष्ट है। यश का सिद्धान्त पता हो लग चुका है कि “पहिले, दूसरे, फिर मैं" अतः यज्ञ से जो कुछ फल मिले जो कमाई हो उसे पहिले यज्ञ के काम में ही (जो कि दूसरे सयों को देता है ) लगाने के बाद जो कुछ बचे- अपने हिस्से में आवे उसे ही खाना चाहिये। यदि यज्ञ कर्ता जो कुछ यज्ञ का फल हो उस सवको अपने भोग में ही खर्च कर दे तो संसार में चलने वाले यज्ञों को वन्द करने में भागी हो और एवं प्रवर्तितं चक्रं नानवर्तयतीह यः।" इस भारी पापका भागी हो । यज्ञकी कमाई पर तो सब से पहिले यज्ञ का अधिकार है-यज्ञ के देवों का अधिकार है। इसे प्राप्त करते हुवे ही यज्ञ के देव संसारमें यज्ञ चक्र को चलाते है और सब संसार का लाभ करते हैं। इस लिये यदि कोई मनुष्य यज्ञ से प्राप्त सब कमाई को अपनी ही समझ लेता है और अपने ही भोग में लगालेता है वह इन देवों के हिस्से को खाता है और इस लिये उसे गीता में "चोर" कहा गया है। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्त स्तेन एव सः॥ गीता ३. १२ उन (देवों) से दिये गये (यज्ञ फलों को) जो इन्हें विना दिये भोग करता है वह चौर ही है। वेद में जो "त्यक्तेन भुंजीथाः" का उपदेश है वह यही है। इस लिये वैदिक सिद्धान्तानुसार यज्ञ करने वाला पुरुष पहिले सब के लिये अवश्य कर्तव्य पंचमहायज्ञों का हिस्सा देवों को देता था (इन यज्ञों का वर्णन वैयक्तिक यज्ञ के प्रकरणों में पीछे आवेगा), फिर जिन जिन अन्य यक्षों में वह संमिलित रहता था उनका भी हिस्सा अपनी कमाई में से निकाल देता था इस प्रकार सब यज्ञों का

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वैदिक यन संस्था।
हिस्सा देने पर जो कुछ शेष बचता था उसे ही वह अपने
लिये भोगता था। आज कल भी हमें चाहिये कि पहिले हम
सव के अवश्य कर्तव्य पंचयों को कर लें [(१) परमात्मा-
चिन्तन कर ले, (२) अग्निहोत्र आदि से दैविक देवों को
हवि दे ले, (३) माता पिता आदिको, (४) अतिथिओं को
खिलायें, (५) काकादि शुद्ध जन्तुओं का भी हिस्सा निकाल
दे] फिर यदि हम राष्ट्रमहासभा के सभ्य है तो उसका।
वार्षिक कर निकाल दें, यदि हम चर्खा संघ यज्ञ में भी हैं
तो (भोजन से पहिले ) प्रतिदिन आधा घंटा कात ले, स्वराज
की अवस्था में जो जो राष्ट्र कर हम पर होगे उन्हें
भी देंगे।
यदि आर्य समाज के सभासद हैं तो समाज का चंदा
( अपनी आपका एक शतांश भाग) निकाल दे, एवं हमारे
यहां कोई कन्या पाठ शाला आदि यज्ञ संस्था हो तो उसका
जो हमारा भाग हो उसे दे कर, गुरुकुलों को अपना देय
भाग दे कर. इस प्रकार सब यज्ञ देवों को देने बाद जो कुछ शेष
हो उसे ही खाना चाहिए। जो जितना बड़ा यज्ञ कर्ता होगा
वह उतना हो थोडा शेष खायगा। कोई पूछता है कि यदि
यज्ञ शेष कुछ न बचे तो ? यदि किसी का सच मुच सव
आवश्यक यज्ञों में सर्वस्व समाप्त हो जाय तो वह मनुष्य संन्यासी
है उसे यदि यज्ञ के लिये संसार (या परमात्मा) जोगित
रखना चाहे तो रखें, उसे अपने लिये जीवित रखने की जरूरत
नहीं होती। वह तो अमर हो चुका है। यज्ञ को भूखा नहीं
मारना चाहिए अपने आप भूखा बेशक मर जाय क्योंकि
यज्ञ तो मनुष्य का असली जीवन है। मनुष्य को यज्ञ शेष

यज्ञशेप |
मी केवल इस लिये ही खाना है जिससे कि वह यश को
कर सके । अतः यदि मनुष्य ने यक्ष को (जो कि उसका
जीवन है)दान देकर न चलता रखा तो वह पहिले मर गया।
इसी लिये वानसक्त में वेद ने कितने निश्चय से कहा है कि-
सत्यं वदामि वध इत् स तस्य " ॥
ऋ० १०-११७-६
दान न देकर या को भूखा मारना निश्चय से अपना (वध)
नाश करना है। इसके विपरीत यज्ञ के लिये स्वयं भूखा मर
जाना अमर हो जाना है। इसी लिये शास्त्र में यश शेष' को
अमृत कहा है। क्योंकि यम शेष खाने वाला सव यज्ञों को जीवीत
रस्वन द्वारा अमर होता जाता है। इस लिये कहा है कि-
याशिष्टामृनभुजो यान्ति बाल सनातनम् । " गीता ४ - ३१ ।
यम शेप गपी अमन को खाने वाले सनातन ब्रह्मगति को
प्राप्त होते हैं। अर्थात् इस अमृत का आहार करने से मनुष्य
धीरे धीरे परम अमृत को प्राप्त हो जाता है। पहिले अकले
खाने वाले को पाप खाने वाला कहा है, यहां एक दूसरे
लोक में यमशेष म्पी अमृत खाने से सब पापों से छुटकरा
बतलाया है-
यमशिष्याशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः ।
गी.३१-३
अकले खाने से पापही पाप मिलता है और यशशेप खानेसे
सब पापों से छुटकारा होता है । इस प्रकार यज्ञ शेष का वडा
महात्म्य है। इस से स्पस्ट है कि यशशेष खाने का व्रत यज्ञ में
कितना आवश्यक है।

. वैदिक यज्ञसंस्था। २६ उच्छेष । यज्ञ के शेष के साथ ही यज्ञ का उच्छेप भी समझ में आजायगा। यज्ञ की कमाई में से जो अपने लिये बचता है वह शेष है और जो यज्ञ के लिये छोड दिया जाता है वह उच्छेप है। यह यज्ञ के लिये छोडना दो प्रकार से हो सकता है, एक तो यज्ञ की कमाई को स्वीकार करके फिर उसे यज्ञार्थ देना दूसरा यज्ञ के फल को स्वीकार ही न करना, परिणामतः दोनों एकही बात है, परन्तु, उच्छेप का असली अर्थ दूसरे प्रकार के उच्छेष में हैं, जो ऊचे यज्ञ करने वाले होते हैं वे नीचे के यज्ञों के फलों को स्वीकार ही न करने द्वारा उच्छेप छोड़ते हैं। इसकी पराकाष्ठा भी परमात्मा में है। परमात्मा सब से बड़ा यज्ञ करने वाला है अतः उसने सब के सब यशो के फलों को छोड़ रखा है। वह कुछ भी नहीं भोगता । "अनश्नन् अभिचाकशीती" कुछ भी न खाता हुवा केवल प्रकाशमान है। माना उसने भरी भराई थाली वैसी की वैसी छोड दी है। उसका यज्ञ का 'शिष्ट' कुछ भी नहीं है, सन का सब उच्छिष्ट ही है। अतः वह परम अमृत है। संसार का सब ऐश्वयं उस का उच्छिष्ट है। इस उच्छिष्ट की महिमा अथर्व वेद के ११-७ सूक्त में अच्छी तरह बतायी गयी है । पर- मात्माके इस उच्छिष्ट छोडनेसे ही सब संसार बना है। परमात्मा के बाद संसारके अग्न्यादि देव तथा फिर ब्राह्मण आदि भू देव भी उच्च यज्ञ करने के कारण यज्ञोच्छिष्ट छोडत हैं। इसी लिये सब संसार चलता है, और सब समाज चलता है । यदि देव नीचे के यज्ञो की कमाई (फल ) को न छोडे तो नीचे के प्राणी मारे जांय । यदि चातुर्वर्ण्य यज्ञ में ब्राह्मण

यक्षशेप और उच्छेप।
६१
एक समय से अधिक का भोजन पास न रखने के नियम
का त्याग कर प्राकृतिक भोग के सामान को शुद्रो और
वेश्यों के लिये न छोडे तो सब समाज बिगड जाय। शरीर
में यदि प्राण अन्य इंद्रियों की तरह भोग करने लगे और
भुक्त को इंद्रियादि के लिये न छोडे तो शरीर नष्ट हो जाय ।
यह सब उच्छिष्ट छोडने का महात्म्य है। इस उच्छेप के
कारण ही इन में देवत्व. ब्राह्मणत्व और प्राणत्व है। इसी
उच्छप से जगत् स्थित है। कार्य के लिये वेतन ही न लेना
उसे यम के लिये छोड देना उच्छेप है। (लकर छोड़ने का
नाम भी उच्छप हो सकता है ) और लेकर तथा यज्ञका
माग छोडकर जो खाने के लिये बचता है वह शेष है।
२७ यजशेप और उच्छेप।
अब यह के शेप और उच्छंप के अत्यावश्यक व्रत को भी
भारतवासी कहां तक निभाते हैं यह भी देख लीजिये।
अपने अन्दर के अमान साथ साथ विदेशी सभ्यता के
प्रचार के कारण अब हम लंगों में पंचयज्ञ तो लुप्तप्राय
है। संध्याअग्नि हांत्र को प्रथा पहिलं सं ही घट रही थी; माता,
पिता, गुरु, अतिथि आदि को पूजा से भी अब हमारा मन फिर
गया है और बलि चैश्वदेव तो मखौल समझा जाता है।
इस प्रकार आज पंच महायज्ञों में अपनी कमाई का
भाग कौन खर्च करने लगा है ( इनका वर्णन आगे आवेगा)।
शेष रहे संगठन यज्ञ, उनका हाल सुन लीजिये । आर्य समाज
का चन्दा लंने के लिये चपरासी पीछे पीछे फिरते रहते
हैं, फिर भी हम टालते जाते हैं और प्रायः चन्दा पिछाडी(यकाया)
बना रहता है । राज कर (Tax) तो विदेशी सरकार अपने डंडे
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६२ वैदिक यज्ञसंस्था। के जोर से इकट्ठा कराही लेती है, पर जो अपनी राष्ट्र समा है उसका जरासा।) वार्षिक चन्दाभी किस तरह और कितना वसूल होता रहा है यह वहां के कार्यकर्ता ही जानते हैं और फिर जब सूत का चन्दा देना पड़ा तब तो मानों हमारी जान हो निकल गई। इसी प्रकार जहां पहिले प्रत्येक गृहस्थ का यह यज्ञीय । कर्तव्य होता था कि वह अपने विद्यालयों के लिये मुट्ठी भर अन्न निकाल कर ही भोजन पकावे या भिक्षार्थ आये ब्रह्मचारिओं को भिक्षा देकर ही स्वयं खावें, वहां आज अच्छे चलते चलाते गुरु कुलभी केवल धनाभाव के कारण टूटने लगते हैं और संरक्षक लोग अपने हो बच्चों के लिये अपना प्रतिज्ञात धन भी नहीं देते। क्या यह हमारे 'वध ' का चिन्ह नहीं है? इन सब यज्ञ संगठनों में यदि हम कुछ देते भी हैं तो ऐसा अनुभव करते हैं कि मानों हम कुछ ऐहसान कर रहे है। इसे आवश्यक कर्तव्य नहीं समझते और न देने ( या अविधिवत् या देर से देने ) में चोरी' नहीं समझते । इसी लिये हम यथा शक्ति अपनी कमाई को यज्ञों से बचाना चाहते हैं । विदेशी लोग तथा अन्य लूटने वाले वेशक हमें लूट ले जाय और मूर्ख साधुओं और भिखमंगों और गंगाजी को भो हम दान दे देंगे, परन्तु यज्ञों को (उनका हिस्साभी) न देंगे। यह हमारी हालत है । याद रखना चाहिये कि यज्ञहवि को खानेसे बढ कर और कोई सामाजिक पाप नहीं है । वेद में ( अथ.५ - १८ - १० ) लिखा है कि राष्ट्र हवि खा जाने के कारण वैतहव्य नष्ट होगये । हम तो नष्ट होही रहे हैं पर यदि हमने इन राष्ट्र महासभा, आर्य समाज आदि यज्ञों की हवि को भी चुरा कर खाया, इन यज्ञों को भूखे रख कर कष्ट पहुंचाया तब तो हमें कोई भी नहीं बचा सकता। ये थोडे से यज्ञ ही हमारी एक- . .. यज्ञर और उच्छेप। मात्र आशाये हैं। हवि देने के अवसर बहुत वार सुनाई देता 'मैं गरीय । परन्तु इन यज्ञानभिज्ञ भाईओं को यह मालूम नहीं कि 'तू गरीब नहीं है, तेरा सारा देशही गरीब है और यह गर्गव इस लिये हुवा है कि हम अपने को गरीब बतला पतला कर या को भी हवि नहीं देते हैं। हवि भी अपने आपखा जाते हैं। हम चाहे कितने गरीय हो, पर उद्धार तो यशहोसे होना है।' चोरी' सेतो पाप का बोझ और और बढता जायगा और नाव पार होने की जगह डूब जायगी। यश के सामने कोई गरीव नहीं है । यदि कोई सच्चा याशेपामृतको खानेवाला गरीब है तो उसी एक कोडी भी या में लाख रुपयों के बराबर है। इस लिये, तुम्हें तो और गरीब होने की जरूरत है। यदि सब देश- वासियों को अपना भाई समझ सक्नं तो इस नाते से एक भारत- घासी का यमशेष दो आन प्रति दिनसे अधिक नहीं है क्योंकि यह भारत वासियों की औसत आमदनी है। यदि तुम ईमानदारोसे दो मानेसं अधिक प्रतिदिन कमाते हो तो अच्छा है। परन्तु तुम्हारी उस सब दी आन से अधिक कमाई पर भारत माता (देवी) का अधिकार है, तुम्हें कंवल यशशेषके तौर पर शेप दोआने ही प्रति दिन अपन भोग पर व्यय करने का अधिकार है। क्या तुम ४०) कमाते हुवेभी अपने को गरीब समझते हो? इस में से प्रतिमास ३५),३६) दशकं लिये खर्च न करने को चोरी नहीं समझते हो मैं. इस लिये कहता हूं कि तुम्हें तो जान बूझ कर अपने को १० गुना गर्गव बनाने की जरूरत है। इस देश के गरीव वे हैं जो ५),६) मासिक से कम आमदनी कर सकते हैं। अतः रोना आता है जब कि देश के नवयुवक ४०) से भी अपने को अमीर नहीं समझते और ४० ) पर देश के लिये विक जानेको, उत्कंठित नहीं हो उठतं । भारत के नव युवको! सुन लो, इस नष्ट होते हुये देश में पैदिक यज्ञसंस्था है यज्ञ की फिकर, देश की फिकर, किसी किसी विरले को ही । सब अपना अपना पकाना चाहते है और पापजीवन बने हुवे हैं। ऐसे थोडे से ही हैं जो की यज्ञशेष खाते हैं और जान चूझ कर गरीब बने हैं। पर ये थोडे से लोग ही इस देश शरीर का थोडा सा जीवीत भाग हैं। शेप सब तो इन्द्रियाराम हैं। अपने इन्द्रियसुख के लिये अधिक धन की इच्छा करते हैं और इसके लिये ३०), ४०) से लेकर अधिक से अधिक रुपये लेकर देशको चुसाने का साधन बनते हैं और पाप जीवन बिताते हैं। अधारिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति । गी.३-१६ 'हे अर्जुन ( जो प्रवर्तित यज्ञ चक्र को यज्ञशेष खाने द्वारा चलाता नहीं रखता ) वह इन्द्रिय सुख की इच्छा करने वाला अधा जिसका कि जीना पाप है ; व्यर्थ हो जी रहा है। इन अघायु इन्द्रियारामों से यह देश व्यर्थ ही भरा पड़ा है। ऐसा देश कबतक अपनी खैर बजा सकता है। इस लिए हे भारत की आशा के नव युवको! तुम निश्चय कर लो कि तुमने भी अघायु और इन्द्रियारामों का पाप बोझ ही बनना है या यशशेषामृत खाने वाले इस मुर्दा शरीर के थोडे से जीवित भाग को बढाना है। यदि तुम यज्ञशेषामृत खानेवाले ( इस चटक भडक के जमाने में स्खारोटी खानेमें परमानन्द मानने वाले) बन कर इस अमृतसे अपने को अपने देशको जीवित नहीं कर दोगे, तो प्रकृति तो अघायओं को अधिक देर तक इस भूमि पर व्यर्थ भारभत नहीं रहने देगी यह निश्चित है । इस लिये यज्ञ ही इस देश की आशा है और यज्ञ को आशा तुम हो । इस प्रकार तुम्हारा यज्ञशेष खाने का पवित्र किन्तु कठिन व्रत ही इस देश की एक मात्र रहो सही .

यज्ञसे लोक और परलोक की सिद्धि ।
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आशा है । चिल्ला चिल्ला कर रुदन हो रहा है। 'नव युवको !
अपनी आवश्यकताओं को कम करो' जान बूझ कर बने गरीब
होकर यम में लग जाओ यह रोना सुनाई देता हो तो सुन लो।
यह के उन्छेप के विषय में केवल इतनाही कहना है कि भारत
वर्ष में जिन जिन संगठन यशों के ऊपर के लोग त्यागी ब्राह्मणवृत्ति
। वाले नहीं है, यदि पाश्चात्यों की तरह यज्ञ में बडे होने के कारण
इन लोगों को प्राकृतिक भोगभी अधिक चाहिये, यदि ये बडे लोग
अपने प्राकृतिक भागों को छोटोंके लिये उच्छेप नहीं छोड़ सकते
तो इन संगठनों में रोग है । इस की चिकित्सा होनी चाहिये।
उच्छेप के बिना कोई या नहीं चल सकता।
२८ यज्ञसे लोक और परलोक की सिद्धि ।
हम भारतवासी याशेप खाने का व्रत नहीं निभा सकते,
हमसे यन में बलिदान भी करते नहीं बनता। हमको यज्ञ में
आशापालन, परस्पर प्रेम और दान आदि नियम पालना भी
अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है। इस प्रकार हमारी सब प्रकार
से यशहीन अवस्था है। इसे देख कर प्रायः हमें भगवद्गीता
का निम्न लिखित ग्लोक स्मरण आया करता है:-
नायं लोकोऽस्त्ययशस्य । कुतोऽन्यः कुरु सत्तम ।
गीता ४-३१
'हे अर्जुन ! जो यशहीन है उसे यह लोक ही नहीं प्राप्त
होता, अन्य लोक का तो कहना ही क्या है। हमारा इह
लोक तो जितना अधिक से अधिक विगड सकता है उतना
विगड ही चुका है, केवल नाम निशान मिटना शेष है। इह
लोक तो प्रत्यक्ष है। हम लोग दुनिया में सव से अधिक
निर्धन हैं, सब से अधिक पढे हैं, सबसे अधिक निर्वल
५

का५ । यर.क्या
६.
शरीर हैं और सब बातों में अनुन्नत हैं। ऐसे तो हम अपने
देश के अन्दर हैं। अपना गुलामी का कलंक लगाये हुवे यदि
हम कहीं बाहर जाते हैं तो सिवाय अपमान पर अपमान
के हमे और कुछ नहीं प्राप्त होता। यह हमारी इह लोक की अवस्था
हुई। अब यदि किसी ने परलोक की आशा लगा रखी हो तो
उसकी इच्छा है । परलोक यहां से तो प्रत्यक्ष दिखाई देता
नहीं।
भारतवासी परलोक की याते वेशक किया करते हैं। परन्तु
यदि कृष्ण भगवान से पूछा जाय तो वे तो यही कहेंगे कि
अयज्ञ को यह लोक ही नहीं मिलता, परलोक कहां से
मिलना है। यदि उनकी इह लोक की बात सच निकली
और हमारी यशहीनता के कारण इह लोक में ऐसी दुर्गति
है तो परलोक में पर-दुर्गति होती है इसका अनुमान हमें अवश्य
लगा लेना चाहिये।
हे यज्ञस्वरूप परमात्मा ! तुम्ही हम पर कृपा करो। हमारी
यज्ञ करने में प्रीति कराओ।
२९ यज्ञ विस्तार।
वेद में बहुत जगह 'यज्ञं विततं ' यज्ञं वर्धयामः' 'यज्ञवर्धन'
इस प्रकार के वाक्य या शब्द आते हैं, जिनमें कि यश के
विस्तार करने, यज्ञ के बढाने का वर्णन होता है। यह यम का
बढाना या विस्तार क्या है।
यह. पहिले बतलाया जा चुका है कि यज्ञ का बीज मिलने
के स्वभाव के रूप में प्रत्येक मनुष्य के हृदय में रखा हुआ है।
यह बीज ही बढता हुआ जब इतना विस्तृत हो जाता है कि
सब विश्व में फैला जाता है तो मनुष्य को सर्वव्यापक यक्षरूप
परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है। यही हमारा यज्ञ विस्तार

यज्ञ विस्तार ।
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से तात्पर्य है। मनुष्य पहिले पहिले अपनी अयक्षता को छोड
कुट्यया (गाईपत्य) में संगठित होता है । (देखो अथ०८-१०)
कुटुम्ब के आगे वह ग्राम पंचायत (आहवनीय) बनाता है,
ग्राम पंचायत के बाद बहुत से ग्रामों (देश) पर एक राजा
की संस्था ( दक्षिणाग्नि ) बनती है। इसके बाद लोक सभा
(सभा) का विकास होता है, फिर अन्तरंग, मंत्री मण्डल
आदि किसी रूपसे एक विशेषज्ञों की सभा (समिति)
का विकास होता है और अन्त में सब देशो की अन्तर्राष्ट्रीय
सार्वभौम सभा (आमन्त्रण) में मनुष्य संघटन यक्ष परिपूर्ण
होता है। परन्तु मनुष्य हृदयस्थ यश तव परिपूर्ण होता है
जब सब मनुष्यही नहीं किन्तु संसार की एक एक वस्तु सूक्ष्म
या स्थल सब लोक लोकान्तर इस संपूर्ण ईश्वरीय महासंगठन
में वह अपने को संगठित अनुभव करता है । तव वह सर्व
मेध यक्षको पूरा करता है। यह यज्ञ विस्तार की अवधि है।
यही परम सीमा है। इस यज्ञ विस्तार को यश की सब
रटिओं से देखा जा सकता है। यज्ञ का उद्देश्य 'परोपकार'
बतलाया जा चुका है, इसे परोपकार दृष्टिसे देखें तो कहेंगे
कि मनुष्य परोपकार को बढाता हुवा, 'परोपकार' शब्दस्थ
'पर' की अवधिको बढाता हुवा, उन्नति करता है। पहिले
वह कुटुंब का 'पर- उपकार' करना सीखता है। तब तक
उसकी 'पर' की सीमा कुटुंब तक होती है, फिर वह इसे
देश तक फैला देता है और देश का परोपकार करता है।
फिर सब संसार का परोपकार करता है।
स्वामी रामतीर्थ जी ने इसे आत्मविस्तार (Expansion of
Self) के रूप में देखा है। यह यज्ञ को स्वार्थ के सच्चे
साधक की दृष्टि से देखना है। मनुष्य पहिले अपने आपको

६८ वैदिक यज्ञ संस्था । अपने शरीरादि को ही अपना (आत्मा) समझता है और इसी का स्वार्थसाधन करता है। फिर वह कुटुंब को अपना समझता है, इस के स्वार्थ को अपना स्वार्थ समझता है। एवं जाति, देश और फिर सब संसार को अपना समझता है और इसके स्वार्थ के अतिरिक्त उसका कुछ और स्वार्थ नहीं होता है, इस प्रकार वह अपने आप (आत्मा) को बढाता हुवा परमात्मा को प्राप्त करता है। प्रेम और बलिदान की दृष्टिसे यज्ञ विस्तार को देखें तो प्रारंभ में मनुष्य अपने आप से ही प्यार करता होता है, वह पहिले कुटुंब के लिये स्वार्थत्याग करता हुवा कुटुंब से प्रेम करना सीखता है और इस प्रथम यज्ञ से उसे कुटुंब के सब सुख प्राप्त होते हैं। फिर जब वह इस यज्ञ से उन्नत और बली हो कर देश के लिये सब कुछ त्यागने को उद्यत होता है तब उसे राष्ट्रयज्ञ द्वारा राष्ट्र के सब सुख मिलते हैं। इसके बाद जब वह प्रेम विस्तार में और बलिदान शक्ति में वृद्धि करके संसार भर के लिये वैसे ही प्रेमवश स्वार्थ- त्याग कर सकता है तो उसे संसार भर का सुखं मिलता है। पाठक देखेंगे कि ज्यो ज्यों यज्ञ का विस्तार होता है त्यो त्यो यज्ञार्पण भाग बढता जाता है और यज्ञ शेष घटता जाता है और इस लिये उसकी यज्ञ करने की शक्ति भी उत्तरोत्तर बढती जाती है और मनुष्य उससे भी बडा यज्ञ करता है। अंत में यदि वह इस सब संसार सुख को संसारके मूल । परमात्मा के प्रेम में अर्पित कर सकता है तो उसे परमानन्द मिल जाता है। इस प्रकार मनुष्य अपने हृदयस्थ यज्ञ को ही हृदय द्वारा बढाता हुवा अपने परम पुरुषार्थ को सिद्ध कर लेता है।

यज्ञ से यज्ञ का यजन । ६९ इस प्रकरण में जो हमने यक्ष के घढने पर्व. बतलाये हैं यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक मनुष्य इन पर्वो पर अटकता हुवा ही आगे बटे, कोई इनमें से किसी या कई पर्वो को एकदम लांघ जाता है, कोई किसी में अधिक देर तक अटकता है। किन्तु उन्नति का, या विस्तार का मार्ग यही है, प्रकार यही है। हम भारत सियों वा की दशा इस यज्ञ विस्तार के संवन्ध में भी कैसी है ? हम लोग तो अभी राष्ट्रयश तक भी नहीं पहुंचे हैं। बहुन कुछ कुटुंब यमों में ही ग्रस्त हैं। इस से ऊपर उठे हैं तो नाना जाति पाँति के बन्धनों में ऐसे झूठे यक्षों में उलझे पडे हैं जो कि हमें राष्ट्र यश तक भी नहीं पहुंचा सकते। इस समय में जब कि संसार के सब सभ्य देश अपने अपने राष्ट्र पुरुषों के रूपमें अपनी अपनी उन्नति कर रहे हैं, वहां हमारा अभी तक राष्ट्र भी न बन सकना कितन दुःखप्रद है। ३० यज्ञ से यज्ञका यजन। अब तक यह तो स्पष्ट हो गया होगा कि क्योंकि सब यह परोपकार के लिये होते हैं और क्योकि निचला यश अगले यश को प्राप्त करने वाला होता है, इस लिये मनुभ्य के यज्ञों में कहीं टाकरा नहीं हो सकता। पर पीडन के लिये, स्वार्थ के लिये रचे गये संगठनों का तो ऐसे ही किन्हीं आसुरी यज्ञों से या सच्चे यज्ञों से टकरा होता है, पर यश का यज्ञ से कभी नहीं हो सकता । यह तो परस्पर सहायक होते हैं। इस लिये एक मनुष्य जो संसार यन तक पहुंचा होता है राष्ट्र- यज्ञ, कुटुंबयक्ष तथा वैयक्तिक यक्षों को भी करता रहता क्योंकि राष्ट्रयक्ष संसारयज्ञ का विरोधी नहीं है और उसका वैदिक यज्ञसंस्था। ७० कुटुंबयज्ञ' राष्ट्रयज्ञ का विरोधी नहीं है। बल्कि यह एक दूसरे के सहायक होते हैं। इस लिये जैसे कि एक संसार यक्ष तक पहुंचा पुरुष आवश्यकता पड़ने पर अपना बलिदान संसार, राष्ट्र या कुटुंब यज्ञ के लिये कर देता है। वैसे ही वह अपने कुटुंब यज्ञ का भी वलिदान आवश्यकता पडनेपर संसार या राष्ट्रयज्ञ के लिये कर देता है और अपने राए- यज्ञ का संसार के लिये कर देता है। इस प्रकार, छोटे यज्ञ का बडे यज्ञ के लिये वलिदान करना ही " यज्ञ से यज्ञ का यजन" कहलाता है। . यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः। ऋग्वेद ॥ देवों ने यज्ञ से यज्ञ का यजन किया । उदाहरणार्थ, मनुष्य- जीवन स्वयं एक यज्ञ है । इसे सौ वर्ष तक या ११६ वर्ष तक चला कर पूरा करना प्रत्येक का धर्म है (इस यज्ञ का वर्णन अन्त में होगा), परन्तु उच्च यज्ञ में आवश्यकता पड़ने पर इसे बलि- दान कर देना होता है । एवं राष्ट्र यज्ञमें जब मनुष्य नौ जवानी में ही अपने प्राण दे देते हैं तो उन्हें मध्य आयु में मरने का पाप होने की जगह बडा भारी पुण्य होता है । यह हुवा यज्ञ से यज्ञ का यजन मनुष्य यज्ञ से राष्ट्र यज्ञ का पूजन । एवं कुटुंबयज्ञ द्वाराभी राष्ट्र का यजन तथा संसारयज्ञ का राष्ट्रयज्ञ द्वारा यजन हो सकता है और अन्त में आत्म यज्ञ (ब्रह्मप्राप्तियज्ञ ) के लिये अपने सब राष्ट्र को तथा अपने सब संसार के ऐश्वर्य को भी त्यागा जा सकता है। इस ज्ञानको पंचतंत्र के एक श्लोक में निम्न प्रकार से भर दिया है- यास यश का यजन। ७२ - त्यजेदेकं कुलस्यार्थे । ग्रामस्थार्थे कुलं त्यजेत् । फुलं जनपदस्याथें । आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् । 'कुल के लिये एक आदमी को त्याग दें, ग्राम के लिये कुलको त्याग दे । दश लिये कलको और आत्मा के लिये पृथिवी को (संसार को भी) छोड दें। परन्न हम भारतवासी या से यश का यजन कहां तक करते हैं ? पहिले तो हमारे यहां या ही बहुत कम हैं और बुरी दशा हैं। जो कुछ या है उनमें भी हम बडे यज्ञ के लिये छोटो को अर्पण करके अपनी शक्ति बढ़ाने के लिये तैय्यार नहीं होते। छोटे छोटे टे फट या बनाये रखते हैं। इसका कारण है हमारा आईफार, मारयों का वास्तव में पदार्थ न होना । यदि हमारे संगटन वस्तुतः परोपकारार्थही हो तो उनका परस्पर मिल जाना कुछ भी कठिन न हो । असल में यज्ञ संगठनों में हमारा वैयक्तिक स्वार्थ भी रहता है जो कि हमें मिलने नहीं देता। दूर जाने की जमात नहीं, आर्यसमाज की ही कई ऐसी संस्थायें हैं जो कि परस्पर मिल सकती हैं। यदि वे मिल जाय तो आर्यसमाज की शक्ति बढे और जनता का धन भी दो जगह व्यर्थ व्यय होने से बन जाय । हमारी राष्ट्र सभा के दल भी कई समय एक । दूसरे में अर्पित हो सकते हैं, परन्तु केवल अपनी पृथक् सत्ता (जिसकी कि देश को जरूरत नहीं होती ) रखनेके लिये जुदाही रहते हैं। इसके निपरीत इग्लैंड में परस्पर विरोधी दल भी काम आने परं मिल जाते हैं और मिल कर राष्ट्र कार्य चलाते हैं। इस विषय में भी हमें अपनी दशा विचारनी और सुधारनी चाहिये।

वैदिक यज्ञ संस्था। ७२ ३१ यज्ञ और पाश्चात्य लोग । पाश्चात्य लोग हम भारतवासियों की अपेक्षा यज्ञ को अधिक समझते हैं यह मैं कहता आया हूं और आगे भी कुछ कहूंगा । परन्तु यह कथन कहीं भ्रमजनक न हो । उनके यज्ञ का दोष भी तो मैं बतलाता रहा हूं तथापि यह स्पष्टतया समझ लेना अच्छा है कि पाश्चात्य लोग यज्ञ विषय में कहां तक अनुकरणीय हैं और कहां नहीं । एक शब्द में कहा जाय तो संगठन बनाने में (अपने संगठन के लिये स्वार्थत्याग करने, कर्म करने में) वे हमारे अनुकरणीय हैं, किन्तु संगठनों को पर पीडनार्थ वनाने में वे कभी भी अनुकरणीय नहीं हैं । पाश्चात्य लोग परीक्षण स्वभाव होते हैं । वे प्रकृति में एक एक वस्तु का परीक्षण करते हैं । उनके परीक्षणों से हमें लाभ उठाना चाहिये। उन्होंने दुनियां में बड़े से बड़े संगठन बना कर संगठन शक्ति का बल सब संसारको दिखला दिया है। पहिले हमें इस से लाभ उठाना चाहिये। किन्तु उनके बनाये संसार यज्ञ के विरोधी संगठन अब नाश हो रहे हैं, महायुद्ध से अव तक सभी पाश्चात्य देश गिरे पडे हैं उनकी बहुत बुरी हालत है। उनके इस परीक्षण से भी हमें लाभ उठाते हुवे यह सीख लेना चाहिये कि हम उच्च यज्ञ विरोधी संगठन न बनावें, किन्तु यज्ञ ही खडे करें, परोपकारार्थ ही संगठन बनावें । उनके संगठन की जितनी प्रशंसा की जाय थोडी है, किन्तु उनकी स्वार्थपरता, उनका संसार में परोपकारमय परमात्मा को न देखना निन्दनीय है। अपने राष्ट्र के लिये तो वे बडे बडे स्वार्थत्याग करते हैं परंतु दूसरे देशों का नाश करके, लूट कर भी वे अपने स्वार्थ पूरा- करते हैं । इस बुराई का प्रभाव उनके देश पर कैसा न होगा? 4 यज्ञ और पाश्रात्य लोग। ७३ महायंत्रप्रवृत्ति ( Industrialism) के वे ही बडेबडे व्यापार संगठन जिनसे कि वे दूसरों को लूटते हैं उनके देश में बेकारी पदाने के साधन होते हैं और फलतः वहां सदा अमीरों और पुंजीपतिओं के झगडे चलते रहते हैं। वे हवि द्वारा देवों की पूजा करना नहीं चाहते, किन्तु देवों से जबरदस्ती फल छीनना चाहते हैं। एवं उनके राष्ट्र संगठन में हवन प्रक्रिया विगडी होती है और फलतः ऐसे उपद्रव होते रहते हैं । वहां के ब्राह्मण (ज्ञानी) लोग भी अपने पास प्राकृतिक भोग इकठ्ठा करना चाहते हैं और उच्छेप नहीं छोडते हैं। ये सय अयशीय वात उनके यहां स्वार्थ- परता के कारण ही है। फिर वे स्वार्थपरता के कारण एक दूसरे के विरुद्ध संगठन खडे करके लडते रहते हैं । इस लडाई अशान्ति के कारण आज पश्चिम के देशों का क्या हाल है वे वहां की आन्तर अवस्था देखने वाले ही जानते हैं। अतः हमें उनके इस परीक्षित अनुभवसे लाभ उठाकर परपीडनकारक संगठन बनानेसे दूर रहना चाहिये। बात यह है कि पश्चिमवाले हर एक बात नीचे से (जडप्रकृति) शुरू करते हैं, उन्हें ऊपर का प्रकाश कम मिलता है । अत: वे व्यर्थ में ही अतिपरीक्षण करते हैं । दूसरी तरफ हम अनुभव करते हैं कि भारत वर्ष में प्रकाश है, किन्तु भारतवासिओं में बल नहीं है जिससे कि वे प्रकाश को देखभी सके और तदनुसार कार्य कर सके। यदि पश्चिम को आत्मज्ञानका प्रकाश मिल जाय तो उस परोपकारमय यज्ञ प्रजापति से आने वाले प्रकाश में (अपने केवल मनके प्रकाश को छोडकर) वहां का प्रत्येक व्यक्ति वह जिस जिस परोपकारार्थ यज्ञ के योग्य है उस उस में जुटता हुआ अपना और संसार का भला कर सकता है। एवं भारत में उनको धर्म पुस्तकों तथा गुप्त विद्याओं में प्रकाश से . ७४ वैदिक यज्ञ संस्था। विद्यमान है, यदि उनकी निर्बलता दूर हो जाय और भारतीयों को आंखें उसे देखने लगे तथा हाथ पैर काम करने लगे तो. वे भी अपना और संसार का भला कर सकते हैं । अस्तु । यह तो हुई कुछ ऊपर की बातें, हम फिर प्रकृत विषय पर आते हैं। ३२ यज्ञ के चार ऋत्विक् । अब तक हमने बतलाया है कि यज्ञ का शास्त्रोक्त स्वरूप 'मिलना' है और इसका मुख्यार्थ संगठित होकर परोप- कार कार्य करना है। इस लिये शास्त्रोंमें जो होता, उद्गाता आदि चार प्रसिद्ध ऋत्विजों का वर्णन आता है ये चारों ऋत्विक संगठन यज्ञ में होते हैं यह भी हमें जान लेना चाहिये । वेदमें इन चार ऋत्विजों का वर्णन निम्न मंत्र में है। ऋचा त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् । गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु ।। ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्याम् । यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उ त्वः ॥ ऋ० १० इस मंत्र के चारों पादों में क्रमशः होता, उद्गाता, ब्रह्मा और अध्वर्यु इन चारों का वर्णन हुवा है। इनमें से मंत्र में नाम केवल ब्रह्म का आया है । औरों का कर्म ही बतलाया है। इनमें से एक एक को समझते हुवे पाठक जान जायंगे कि ये चारों प्रत्येक संगठन में रहने वाले कार्य कर्ता हैं। (१) पहिले अध्वर्यु को लीजिये। यह यज्ञ का प्रबंध- कर्ता होता है। यह यज्ञ की सब तैयारी करता है और फिर यज्ञ के बीच बीच में जिस कार्य की आवश्यकता होती है उसे करता है । यह यजुर्वेद अर्थात् कर्म का प्रतिनिधि होता है। इसलिये यजर्वेट यज्ञो का विधायक वेद समझा जाता यज्ञके चार ऋस्विक् । - , है। यह आवश्यक है कि अध्वर्यु सव प्रकार के यो को जानता हो और उनका प्रवन्ध कर सकता हो।' अध्वरं युनक्ति, अध्वरस्य नेता, अध्वरं कामयते, अर्थात् यज्ञ को जोडने वाला, ले जाने वाला, इच्छा करने वाला यह अर्थ यास्काचार्य जी ने इस मंत्र में अध्वर्यु शब्द का किया है। यही यात इस मंत्र के अंतिम पाद में कहो गयी है 'यशस्य मात्रा विमिमीते ' अर्थात् अध्वर्यु यश की इतिकर्तव्यता को बताना है (२३)फिर यश में' होता' और ' उद्गाता , होते । इनका वर्णन इस मंत्र के पहिले और दूसरे पाद में ये क्रमशः प्रस्तावक और अनुमोदक कहे जा सकते हैं। ऋक् और साम ( मानस्तुति और उपासना) के प्रति- निधि होते हैं। होता पहिले ( कचां ) स्तोतव्य विषयों की (पोषं पुपुष्पानास्ते ) अच्छी तरह समझा कर पुष्टि करता कि यह बात ऐसी है, इस पर उद्गाता वोलता है और समा में ( शक्यरोपु ) इस प्रकार सुप्रविष्ट हुवे हुवे विषयों की (गायत्रं गायति ) बारीकियों का वर्णन करता है। 'होता' का शब्दार्थ है सभा को बुलाने वाला या निर्णय पाने के लिये विषय को सभा में देने वाला । ' उद्गाता' का अर्थ गुणगान करने वाला '। होता और उद्गाता के उपर्युक्त अर्थ केवल सभायज्ञ में संगत होते हैं। प्रत्येक संगठन में इनका क्या कार्य है यह जरा अधिक अध्ययन और विचार बाद बताया जा सकता है। (४) इसके बाद प्रत्येक संगठन के प्रधान या सभापति ब्रह्मा' होता है। यह चौथा यज्ञ का मुख्य ऋत्विक होता है। यह अथर्ववेद (विज्ञान) का प्रतिनिधि है। - ७६ वैदिक यज्ञ संस्था । -- अतः यह सब कुछ जानने वाला 'जानं जातं वेदिता' होता है। इस का ज्ञान चतुर्मुख होना चाहिये तभी यह प्रधानत्त्व कर सकता है। 'ब्रह्मा' का शब्दार्थ यही है 'ज्ञानमें वढा हुआ' श्रुतितः परिवृढः । इसका वर्णन इस मंत्रके तीसरे पादमें हुवा है। इस प्रकार यज्ञ के यह चार कार्यकर्ता प्रत्येक संगठन में होते हैं । वैसे तो संगठन यशों के ऋत्विक ( अधिकारी ) बहुतसे होते हैं। कहीं अठारह कहे हैं, कहीं इससे भी अधिक । होता और उद्गाता के ही बहुत प्रकार बताये गये हैं। यहां तो इन चार मुख्य ऋत्विजों का दिग्दर्शन करा देना पर्याप्त है। इन चार यशों के प्रमुखों के कर्तव्यों या व्रतो (कर्म नियमों) का वर्णन जगह जगह पुस्तकों में पाया जाता है । उदाहरणार्थ छान्दोग्य ४ अध्याय के १५, १६, १७ खंड में ब्रह्मा' का वर्णन है। वहां कहा है कि ब्रह्मा का काम यज्ञ को 'मनन' द्वारा पवित्र करना है, जब कि शेष तीनों 'वाणी' द्वारा यज्ञ को पवित्र करते हैं। अतः ब्रह्मा को अपने समय से पूर्व घोलना- अपनी सम्मति आदि प्रकट करना नहीं करना चाहिये, ऐसा करने से यज्ञरथ का मननचक्र टूट जाता है। हमारे संग- ठनों के प्रधानों को भी यह नियम सीखना चाहिये । एवं आगे लिखा है कि ब्रह्मा ऐसे को बनाना चाहिये जो कितनी विद्याओके निचोड को जाननेवाला हो (जो कि निचोड वहां भूः भूवः स्वः बतलाये हैं ) जिससे कि यज्ञ यदि कहीं से टूटने लगे तो वह उसका इलाज कर उसे जोडे रख सके और यज्ञ की रक्षा कर सके। इसी प्रकार उद्गाता के कर्म 'उद्गीथ ' का वर्णन छान्दोग्य के प्रारंभ में बहुत कुछ आता है। वहांसे जाना जा सकता है कि उद्गाता कैसा गेना चाहिये । बृहदारण्यक के तृतीय ब्राह्मण .

पुस्तकों में वर्णित प्राचीन यज्ञ । ७७ में वर्णन है कि देवो और असुरोंके युद्ध में देवों ने अपना उद्- गाता वाणी, नासिका, चक्षु, श्रोत्र आदि सब को क्रमशः बनाया, किन्तु असुरोंने इन सबको पापसे युक्त कर दिया, अन्तमें उन्होंने प्राण को उद्गाता बनाया तो यह निःस्वार्थ होने के कारण (यह अपने लिये कुछ नहीं रखता था) ऐसा उद्गाता बना कि उसपर प्रहार करनेपर सब असुर इस तरह नष्ट हो गये जैसे कि एक शिलापर फेंका गया मट्टी का ढेला चकनाचूर हो जाता है। इस से यह नियम पता लगा कि उद्गाता प्राण की तरह सर्वथा निःस्वार्थ, निस्पृह होना चाहिये । इसी प्रकार होता वाक् की तरह, अध्वर्यु चक्षु की तरह तथा ब्रह्मा मन की तरह संगठन यक्ष में होना चाहिये। (वृ.३.३।१।३-६) ३३ पुस्तकों में वर्णित प्राचीन यज्ञ । अब प्रश्न है कि पुरानी काण्ड की पुस्तकों में वर्णित जो नाना प्रकार के यज्ञ, याग, इष्टियां, मेध, ऋतु, सत्र हैं क्या वे भी मनुष्य- संगठन रूप यज्ञ है. ? हां, उनमें से बहुत से तो अवश्य ही मनुष्य संगठन रूप यक्ष है, उनका दिग्दर्शन हम नीचे कराते हैं। शेष जो कोई प्राचीन यश है वे वैयक्तिक यश है और उनका वर्णन आगे 'देव यज्ञ' के प्रकरण में पाठक देखेंगी परन्तु इन सब प्राचीन यज्ञों का आज ठीक ठीक रूप समझना कठिन है। उनकी सब क्रियायें, कर्म काण्ड लुप्तप्राय हैं । इनके लोप होने का मुख्य कारण यही है ('याशिक लोग हमें क्षमा करेंगे ) कि हम यशतत्त्व को भूल गये और उनके वाह्य कर्मों को ही लिये बैठे रह गये । इसलिये जैसे आत्मा के निकल जाने से शरीर नष्ट ही हो जाता है वैसे ही सब कर्म काण्ड स्वाभाविक मृत्यु से नष्ट हुआ है और होता जा - ७८ वैदिक यज्ञसंस्था। रहा है। हमें यत्न करके अब भी इसे बचाना चाहिये । परन्तु इस- के बचानेका उपाय यही है कि हम पहिले यश वस्तु के तत्त्व को समझें, प्रत्येक यज्ञ के अपने अपने तत्त्व को भी समझे, इस तत्त्व के जान लेने पर इन यशों के बाह्य रूपों में वर्तमान भिन्न अवस्था- ओं के अनुसार यदि किन्हीं परिवर्तनों की आवश्यकता हो तो उन परिवर्तनों को करके भी हमें यक्षप्रथा को जीवित करना चाहिये । यद्यपि कर्म काण्ड को बिगडे बहुत समय होगया है, भगवान बुद्ध के समय सं यज्ञ के बाह्य रूपों परही जोर हो गया था और अतएव इस समय इनके तत्त्वों को समझना वडा कठिन होगया है, तथापि एक बात तो स्पष्ट है और यह निःसन्देह कहा जा सकता है कि यशो में जो नानाप्रकारकी विधियां किन्हीं बातों के चिन्ह हैं, किन्हीं सिद्धान्तो को स्मरण कराने वाले हैं। बहुधा वे प्रकृति में होने वाले बडे बडे कार्योको समझाने के लिये छोटे छोटे क्रिया चित्र हैं । अतः हमें यज्ञो में उन उन बातों, उन सिद्धान्तों, उन बडे बडे प्राकृतिक कार्यों के भावों को समझना चाहिये । इनके समझने से यज्ञ तत्त्व सुगमता से समझमें आजाय- गा। ब्राह्मणों में इन्हीं का वर्णन है। किन्तु इन सिद्धान्तों, इन भावों को विना समझे बुझे केवल कर्म काण्ड करते जाना सर्वथा व्यर्थ है, राख में आहुति डालना है। भस्मनि जुहुयात्ताहक तंत्स्यात् छा० ५ - २४ - १ । मनुष्यका स्वभाव है कि वह सूक्ष्म या दूर दूर फैली वस्तुओं को आसानी से ग्रहण नहीं कर सकता है, जब तक कि उसे दृश्य और सन्मुख स्थित चित्र द्वारा वह बात हृदयंगत न करायी जावे । इसलिये भूगोल आदि विद्यायें भी चित्रों से पढाई जाती हैं । परन्तु यदि कोई असली गंगा नदी को न जाने और चित्र की नीली रेखारूप गंगापरही अंगुली फेरता रहे तो उसे भूगोल ज्ञान का फल कैसे मिल सकता है। इस ।

राजसूय यज्ञ। ७९ लिये प्राचीन यज्ञों का तत्त्वभी उनके चिन्हों के असली अर्थ को समझने से ही जाना जा सकता है। इसके लिये परीक्षण करने होंगे और नाना प्रकार के यल करने होंगे। तात्पर्य यह है कि इतने देर से छूटे हुवे इन प्राचीन यशों के स्वरूपों को अभी ठीक ठोक बतला सकना अशक्य है अतः हम इनका केवल दिग्दर्शन कर सकते हैं । तदनुसार इन प्राचीन यज्ञों में से जो जो यज्ञ मनुस्य संगठन रूप हैं उनका प्रदर्शन इस प्रकार किया जा सकता है। (शेष वैयक्तिक प्राचीन यज्ञों का वर्णन आगे आवेगा)। १ राजसूययज्ञ । इसमें राजा का प्रसव किया जाता है। राजा का चुनाव और राजतिलक जिस सम्मेलन में मिल कर किया जाता है उसका नाम राजसूययक्ष है । इसका वर्णन अथर्व वेद के ४- ८ सूक्त में देखा जा सकता है। २ विश्वजित् । इस यश द्वारा एक राष्ट्र या एक मनुष्य समुदाय सब संसार को जीत सकता है। ३ अश्वमेध यज्ञ । शतपथके 'राष्ट्र वा अश्वमेधः' 'वीर्य वा अश्वः' आदि वचनों से स्पष्ट है कि अश्वमेध भी कोई राष्ट्र संगठन हो है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अश्व का मेध राष्ट्र में धान्य की वृद्धि के लिये होता था। अश्व का अर्थ वहां सस्य (धान्य) लिखा है। कृषको से सस्य का केवल एक दशांश भाग लेकर शेष नऊ दशांश भाग उन्हें ही छोडकर उनको सस्य वृद्धि में उत्साहित किया जाता था। पाठकों को मेध शब्द का अर्थ स्मरण ही होगा। नऊ दशांश भाग धान्य त्याग कर धान्य का संगम करना मेध है।

८०
वैदिक यज्ञ संस्था।
प्रकृति में जो अश्व मेध यश स्वयं हो रहा है तथा अर्क और
अश्वमेध का तत्त्व क्या है इसका वर्णन बृहदारण्यक उपनिषद् के
प्रारंभ में हुवा है।
(४) पुरुपमेध ।
उपर्युक्त बौद्ध ग्रन्थानुसार राजपुरुषों को पूरा पूरा और नियमसे
वेतन देकर उनको राज्य से मिलाये रखना (संगम)- राजप्रिय
रखना राष्ट्र में पुरुष मेध है। इसी प्रकार मनुष्य समाज में भी यह
यज्ञ देखा जा सकता है जिस से कि प्रत्येक मनुष्य अपना अपना
त्याग करता हुवा उच्च, उन्नत होता जावे । तथा संग्राम में कुछ
मनुष्यों का आत्मसमर्पण करने द्वारा अन्य सब राष्ट्र की रक्षा भी
पुरुषमेध है।
(५) गोमेध ।
कृषक समुदाय द्वारा भूमि को तोडा फोडा जाकर भूमि की
उपजाऊ शक्ति का बढाना गोमेध है।
(६) सर्वमेध ।
किसी उच्च यज्ञ के लिये कि मनुष्य समुदाय का अपना सर्वस्व
त्याग देना सामुदायिक सर्वमेध है।
(७) वाजपेय।
प्रिय वाणी या अन्नसे जनता को तृप्त करने वाले संगठन का
नाम वाजपेय है।
वास्तव में तो जितने भी प्राकृतिक यज्ञ आधि दैविक
जगत्
में हो रहे हैं उन सब के अनुसार एक एक यज्ञ आधिभौतिक
जगत्
में -मनुष्य संगठनों में-ढूंढा जा सकता है । अभी तक
जिनकी तरफ ध्यान गया है वे थोडे से ऊपर लिख दिये हैं।

सभी मिलकर किये जाने वाले प्राचीन यज्ञ इसमें गिनाये जा सकते हैं: या यूं कहना चाहिये कि सभी सैकडों प्रकार के संगठन यज्ञों के प्राचीन नाम पता लगा कर लिखे जा सकते हैं। सोलहों संस्कार यज्ञ इसी सूची में आजावेंगे। इन सब यशों में इकठे मंत्र बोलते हुवे संगठित मनाशक्तिद्वारा अभीष्ट फल प्राप्त किये जाते थे। ३४ पशु बलि । इस प्रकरण को समाप्त करते हुवे वह आन्दोलित पशुबलि विषय पर भी कुछ लिखना आवश्यक है। शब्दार्थों को अशुद्ध समझ कर जहां गौ, अश्व, अज. नर की बलि का विधान लोग समझ लेते हैं , उनका स्पष्टीकरण बहुत बार हो चुका है और होता रहता है। अतः उसपर मुझे कुछ नहीं लिखना है । मैं तो कहता हूं कि बलिदान तो यज्ञ का प्राण है और यह बलिदान सदा पशु का ही होता है। पशु ( मारने योग्य ) का यदि हम बलिदान न करें तो क्या आत्मा (न मारने योग्य) का बलिदान कर दें । यह तो आत्महत्या हो जायगी। परन्तु बलिदान और हिंसा में भी आकाश पाताल का भेद है । वलि. दान अपनी वस्तु का (अपना ) होता है और स्वेच्छासे होता है, हिंसा दूसरेकी की जाती है और उसकी इच्छा के विरुद्ध की जाती है। यज्ञ में न तो अपने आत्मा का (अपने सच्चे स्वरूप का ) बलिदान कर आत्मघात किया जाता है और न किसी दूसरे का नाश कर हिंसा की जाती है , किन्तु अपने पशु का (नाशनीय बुरे रूपका ) आत्मबलिदान किया जाता है। अपने पशु का आत्मबलिदान यज्ञ में इस लिये किया जाता है कि इस से "पशु- मनुष्य" मनुष्य बन जाता है । फिर "मनुष्य-मनुष्य" ६ ८२ वैदिक यज्ञ संस्था । अपने मनुष्यत्व का ( मनुष्य भी एक उच्च प्रकार का पशु है) बलिदान करके "देव मनुष्य" न जाता है, इस प्रकार यज्ञ पशुको मनुष्य बनाता है और मनुष्य को देव बनाता है । ' कामः पशुः कह कर यह पहिले बतलाया ही जा चुका है कि मनुष्य का पशु स्वार्थ है । काम, क्रोध, लोभ आदि इसी स्वार्थ के भेद हैं यह भी बतलाया गया है । तो यह काम क्रोध आदि हो पशु हैं जिनका कि आत्मवलिदान करने पर " पशु मनुष्य " अपने आप को "मनुष्य मनुष्य" बना लेता है। काम क्रोध आदि को पशु कहना कोई कविता की आलंकारिक वात नहीं है। यह तो वास्त. विक बात है, एक वैज्ञानिक ( scientific ) वात है । जैसे मनुष्य में सब देवता रहते हैं, वैसे पशुभी रहते हैं। मनुष्य तो संसार का एक अत्यन्त छोटा सा पुरा नमूना है। जैसे कि देव अन्दर भावों के रूपमें रहते हैं ऐसे ही पशु भी (पशु भावों के रूप में रहते हैं । ) ये निराकार पशुभाव ही जब साकार हो जाते हैं तो ये वाहर के दिखाई देने वाले पशु वन जाते हैं अर्थात अन्दर के पशू भाव ही जीव को साकार पशु. योनि में ले जाते हैं। उदाहरणार्थ श्येन (वाज ) घमंड का रूप है। गिद्ध पक्षी लोभ का प्रतिनिधि है, चाप लुसी से कुत्ते की पशु योनि मिलती है तथा अज्ञान में रहने के कारण जीव को उल्लू या गदहे चोला पहिनना पड़ता है। मेरी कही हुई ये समानतायें कुछ अशुद्ध हो सकती हैं, किन्तु यह तो सर्वथा सत्य है कि ये सव दिखायी देने वाले पशु हमी बनते हैं यदि हम उस उस प्रकारके 'स्वार्थ' में जीवन भर ऐसे ग्रस्त रहते हैं कि मनुष्य- मनुष्य बनाने में असमर्थ रहता है । बाह्य पशुओंकी आकृति यज्ञ हमें पशुमनुष्य से : पशु बलि। पशुभाव और वाहर के शकल सूरत में भी उस उस बुरे भाव से समानता होती है। अतः ये अन्दर के पशु एक ही वस्तु है, केवल कच्चे पक्के होने का अवस्थाभेद है। यदि हम इन अन्दर के कच्चे पशुओं का बलिदान करेंगे तो पक कर ये साकार पशु हो जायगें । यह है यज्ञ में पशुबलि- दान का तत्व। इस तत्त्व को समझ लेने के बाद यदि आप देखते हैं कि ब्राह्मण में या किसी अन्य श्रद्धेय ग्रन्थ में लिखा है कि इस मंत्र से पशु के इस अंगको यज्ञ में काटे तो आप इस विधि का क्या अर्थ समझेंगे ? क्या आप किसी दूसरे विचारे दयनीय पशु को जबरदस्ती पकड लाकर वहां काट डालेंगे या अपने अन्दर के उस पशु के नाश का दृढ संकल्प करने के लिये पिष्ट या मट्टी के (जैसा कि विधान भी है ) तदा- कार पशु को काटेंगे और ध्यान करें कि " यह मैं अपने भावी पशुरूप का नाश कर रहा है, यदि मैं छोडूंगा तो इस पशु योनि में पहुंचूंगा, मेरी ऐसी दुर्गति होगी इस भावी दुर्गति का मैं अभी से नाश करलं इत्यादि।" बलिदान तो अपना करना है, अपने अन्दर के पशुका या अपने भावी पशु रूप का जिसका कि चित्र पूरा हृदयपर: अंकित करने के लिये पिष्ट का पशु बना लिया है। बाहर के किसी अन्य पशु से हमारा क्या सम्बन्ध । हमारे यज्ञ में तो हमारी ही वस्तु का बलिदान होगा। पशु अपना यज्ञ अपने आप करें और चाहे तो उसमें अपने शरीर की बलि दे दें। स्वामिभक्त पशुभी स्वेच्छा से अपना वलिदान कर सकते हैं, तो उस बलिदान का फल उस पशु को मिलेगा। पर अपने अन्दर के पशु को जगह किसी दूसरे पशु को मार डालना काम , को नहीं यह तो विलकुल उलटा होगया। यजन की जगह हिंसा । आत्म- बलिदान की जगह दूसरे का घात । पशु के साथ जो मनुष्यने यज्ञ करना है वह तो पंच महा यज्ञों के भूतयशद्वारा किया जाता है। उस द्वारा अपने से छोटे, दुर्बल, मूक पशु पक्षि और कृमि आदि की रक्षा का व्रत लिया जाता है और चिन्ह रूपसे काकादि को बलि खाने को दी जाती है । इन विचारे हमारे आश्रित पशुओं से तो हमारा यज्ञ (संवन्ध स्थापन) इसी प्रकार हो सकता है । इन की तो रक्षा सहायता के लिये हम जो कुछ कर सके करना चाहिये । उलटा इन्हें मारना और यज्ञ के नाम से। इनके तो रक्षित रखने की प्रार्थना करनी चाहिये। यजमानस्य पशून् पाहि " | सब भूल इसमें है कि अपनी जगह पराया और नकल की जगह असल समझ लेना । यह तो ऐसा हुआ कि गणिताध्यापक प्रश्न लिखने को कहे कि 'उसमें से १०० मोहन को दे दो' तो कोई लडका इसे स्लेट पर लिखने की जगह उठकर मोहन को १०० )देने हो चले देवे । अस्तु । यह तो हुवा अध्यात्म यज्ञ में अपने पशु का बलिदान । इसी प्रकार संगठन यज्ञ में भी अपने पशुका बलिदान कियों जाता है। राष्ट्र पुरुष अपने अन्दर के वीरों का युद्ध में बलि- दान करता है। राष्ट्र के वे वीर उसके अङ्ग होते हैं, अपने होते हैं। मनुष्य संगठन यज्ञ के पशु कोई मनुष्य ही होंगे। सैनिको या अनुयायिओं को पशु इसी लिये कहा जा सकता है क्योंकि वे ' अभिनिवेश' पशु को निकालने के लिये ही मरने को उद्यत होते हैं। वे मनुष्य अपनी इच्छा से के लिये मरते हैं अत: यूं कहा जा सकता है कि राष्ट्र स्वेच्छा राष्ट्र से उनका बलिदान करता है। वारदौली के प्रस्ताव पर जब

पशुयलि।
८५
लोगोंने गांधीको कहा कि आप के सत्याग्रह स्थगित कर देने
के कारण जो लोग जेल में सड़ रहे हैं उनका क्या होगा,
तो गांधीने कहा कि " यदि वे स्वेच्छा से जेल नहीं गये
हैं और अत एव लगातार देरतक जेल के कष्ट नहीं सह सकते तो
उन्हें माफी मांग कर आजाना चाहिये, परन्तु यदि वे स्वेच्छा
से देश के लिये कष्ट सहने जेल गये हैं तो मैं उन्हें वलिदान
करता हूं, चौरीचौरा के पाप के प्रतिकार के लिये यह मेरा
पहिला बलिदान है " । तात्पर्य यह हुवा कि गांधी के
अनुयायिओं का देर तक जेल में कष्ट पाना गांधी का अपना
बलिदान है। स्वेच्छा से मरने वाले अनुयायि नेता के अंग होते
हैं। अब राष्ट्र के पशु का और अधिक स्पष्ट उदाहरण ले
लीजिये । राष्ट्र में जो मनुष्य घातक मनुष्य (पशु) होता है
उसे फांसी चढाकर राष्ट्र आत्म वलिदान करता है। वह
मनुष्य भी राष्ट्र का अवयव है, परन्तु क्यों कि ऐसे आदमी
के जीवित रहने से राष्ट्र विगडता है अंतः उस पशु
का बलिदान कर दिया जाता है। इसी प्रकार यदि कोई
मनुष्य पशु धर्म के नाम से, यज्ञ के नाम से, अपने नर मेध
में किसी निरपराध मनुष्य प्राणी को काट डालता
या किसी विचारे रक्षा पात्र दयनीय गौ आदि पशु को काट
डालता है तो वह निश्चय से राष्ट्र का पशु है। आज यदि
चैदिक राट् हो तो या तो उसमें कोई ऐसा नर पशु ही न
होगा । यदि उसमें भी होगा तो उसको प्राण दण्ड देने का
चेद में विधान है-
यः पौरुपयेण ऋविपा समङ्क्ते या अश्व्येन
पशुना यातुधान। यो अन्याया भरति शीर.
मग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च । अथ०८-३१५

८६ वैदिक यज्ञसंस्था । "जो राक्षस मनुष्य-मांस से या घोडे के या अन्य पशुमांस से अपने को पुष्ट करता है या जो अहन्तव्य गौसे दूध छीनता है, हे अग्नि ! तू शीघ्र उनके सिर काट दे"। यह राष्ट्र या के हीन पशु हैं। पहिले कहे गये सैनिक उच्च पश होते हैं, कि वे स्वेच्छासे मरते हैं और मनुष्य से देव बनते हैं, किन्तु ये पशु से मनुष्य बनाने के लिये मारे जाते हैं। वे स्वेच्छासे मरते हुवे स्वयं एक बडे पुण्यप्रद यज्ञ के कर्ता होते हैं, किन्तु ये यज्ञ के लिये मारे जाने वाले पशु ही बनते हैं। असल में तो यही चाहिये कि राष्ट्र के लिये पुरुष स्वेच्छा से ही मरने को तैयार हो परन्तु जब संपूर्ण राष्ट्रको ऐसे पुरुषों के जीवित रहने से हानि होती है और उनके वलात्कार वध के सिवाय और कुछ उपाय राष्ट्र नहीं कर सकता तो राष्ट्र इन्हें प्राण दण्ड दे देता है। इसी सिद्धान्त को और आगे ले जाकर जव हम देखते हैं कि सिंह व्याघ्रादि हिंस्र जन्तु राष्ट्र का नाश करते हैं और इनसे बचने का और कोई उपाय नहीं है तो इन हिंस्र जन्तुओको भी राष्ट्र के लिये बलिदान कर दिया जाता है। परन्तु विचारी दीन गौ के मार डालने का उतना ही पाप है जितना कि एक निरपराध मनुष्य को मार डालना। ऐसा काम कोई राष्ट्रका हन्तव्य हीन पशु ही करता है, वह भी हिंस्र जन्तु ही है। इस प्रकार ईश्वरीय महा संसार यज्ञ में जो प्राणी मरते रहते हैं, ये सव उसके पशु हैं, इन द्वारा ईश्वर आत्मबलिदान करता रहता है और संसार यज्ञ चलता रहता है। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक यज्ञ में अपने अन्दर के पशु ओं वलिदान किया जाता है। परन्तु इतनी स्पष्ट वात अज्ञान के कारण या स्वार्थ वश यदि किसी के समझ में न आवे, द्वारा आत्म यक्तिक यज्ञ। उलटो समझ में आवे तो क्या किया जाय । जिन्हें आत्म बलिदान का अर्थ दूसरं की हिंसा समझ पडता है ऐसे ही अहानिओं से सतायी गई विद्या रोती हुई ब्राह्मण के पास आयी थी कि 'हे ग्रामण ! तू मेरी इन से रक्षा कर'। या जिनकी अकल मारी गयी है उनको बलिदान की विद्या का उपदेश कभी न करें ये इसका उलटा ही अर्थ समझेंगे। भारत के हिन्दु और मुसलमान इसकी जगह कि अपने राष्ट्रके लिये आत्म बलिदान फर एक दूसरे के सिर फोडने में लगे हुवे हैं । यह मों को उच्च मान बतलाने का फल है या- "विनाशकाले विपरीतबुद्धिः ३५ वैयक्तिक यज्ञ। अब हम मनुष्य संगठन यशों का प्रकरण समाप्त कर वैयक्तिक यहों पर आते हैं। पाठकों को स्मरण होता है कि "वैयक्तिक " या 'यह नाम हमने संसार महा यश या संगठन यज्ञों के अगभूत कर्मों का रखा था। संगठन यज्ञों के अंगों का वर्णन तो पहिले हाही चुका है। किन्तु संसार महा यज्ञ के अंग कर्म बहुत है, सैकडों है, हजारों हैं । इस विशाल संसारकी एक एक वस्तु सं संबंध करना एक एक यज्ञ कर्म है। क्योंकि संसार के अंग- भूत ये यश कर्म बहुत है और इनके अंगी विश्वका सदा स्मरण रखना बडा कठिन है, अत एव इन-अंग कौ कोयही कह दिया जाता है। परन्तु हमें अब बात समझ लेने पर इस विवाद की कुछ आवश्यकता नहीं कि यश इन अंगों का नाम है या अङ्गीही यक्ष है। यदि आप इन अंगों को ही यज्ञ कहना चाहे तो जो संगठन यज्ञ हैं या संसार यज्ञ व मनुष्य जीवन यज्ञ हैं इनको यमपुरुष ( यज्ञों का बना पुरुष) कहिये । मैं भी सहूलियत के e वैदिक यज्ञसंस्था। में लिये इन्हें यज्ञ-वैयक्तिक यज्ञ-ही पुकारूंगा। पाठकों को यह भी स्मरण होगा कि उपर्युक्त हवन प्रक्रिया या के प्रत्येक अंग में होती है। क्योंकि यह प्रक्रिया प्रत्येक अङ्ग पूरी हो जाती है इस लिये भी प्रत्येक अङ्ग को यश कह देना चाहिये । एवं प्रत्येक वैयक्तिक यश में एक हवि, एक अग्नि तथा एक फल होता है। उदाहरणार्थ यज्ञ के देवपूजा अङ्ग में वहां अनुः सरणार्थ जो जो बलिदान करना होता है वह हवि है. श्रद्धा अग्नि है, तथा नेतृत्त्व फल है जिसकी कि (आदान) प्राप्ति होती है। एवं मध्याग और अधराङ्ग में भी जान लेना चाहिये । इस प्रकार प्रत्येक वैयक्तिक यश में हम जब कभी संसार की किसी वस्तु (बडी, वरावर की या छोटी) से संबंध करते हैं तो उसमें हवन प्रक्रिया होती है । संवन्ध के लिये हम.जो कुछ देते हैं वह हवि होती है जिस द्वारा हवि जाती है या संबन्ध जुडता है वह अग्नि होती है और जो कुछ उस संबन्ध से हमें मिलता है वह फल होता है। इस लिये वैयक्तिक यश का लक्षण वह हुआ कि " यश पुरुष (संसार यज्ञ, संगठन यज्ञ या मनुष्यजीवनयज्ञ) के आधीन अपना दूसरे के साथ हवन प्रक्रिया द्वारा ठीक ठीक संबन्ध रखना वैयक्तिक यज्ञ है। अब पाठक समझेंगे कि यज्ञ शब्द का इतना प्रयोग ग्रन्थों में क्यों है ? प्रत्येक कार्य को ही यज्ञ क्यों कह देते हैं ? इस लिये क्यो कि संसार में प्रत्येक दूसरे वस्तु के साथ ठीक संबन्ध रखना यज्ञ है। हमारा प्रत्येक कर्म या तो यज्ञ होगा या अयज्ञ होगा, क्यों कि हम प्रत्येक कर्म द्वारा किसी दूसरे से संबन्ध ही करते हैं। यदि यह संबन्ध ठीक हुवा है तो वह कर्म यज्ञ है। यदि संवन्ध विगडा है तो वह कर्म अयज्ञ है । इस प्रकार संसार की एक एक वस्तु पंचमहायज्ञ। ८९ के साथ अपने ठीक संवन्ध से जुड़े रहना एक एक वैयक्तिक या है। इस लिये यशों के इतने नाम पड गये हैं। ऐसे अनन्तो वैयकिक या होते हैं। ३६ पंचमहायज्ञ। वैयक्तिक यशों में पंच महायज सबसे मुख्य हैं। ये निम्न लिखित हैं- (.) ब्रह्मयज्ञ । (२) देव यज्ञ। (३) पितृ यज्ञ। (४) भूत यश। (५) मनुष्य यज्ञ। इन पांच यज्ञों द्वारा मनुष्य अपना संबन्ध सब संसार से ठीक रखता है और दानादान करता हुवा उन्नत होता जाता है । ब्रह्म या द्वारा वह सबसे बड़े परमात्मा के साथ अपना संबंध करता है, देव यज्ञ द्वारा परमात्मा के अग्नि, वायु, सूर्य आदि देवों से अपना संबन्ध जोडे रखता है, तथा पित यज्ञ द्वारा अपने से बडे मनुष्यों से संबन्ध ठीक रखता है [ एवं ये तीनों देवपूजा अङ्ग में आगये, तीनों में अपनेसे वडों से संवन्ध है] चौथे यज्ञ से अपने छोटे रोगी, हीन, पशु, पक्षी आदि से भी अपना संवन्ध ठीक रखता है (दान) तथा पांचवे अतिथि यज्ञ से मनुष्यों की सेवा द्वारा सब बराबर वालों से अपना संबंध ठीक रखता है। (संगति करण) इन यज्ञों को प्रतिदिन करता हुवा मनुष्य सव संसार से ठीक तरह जुड़ा रहता है । इस लिये ये पांचों महा यज्ञ समझे जाते हैं। अन्य सब वैयक्तिक यश इन्हीं पांचों में समा जाते हैं। असल में तो ये तीन ही (देव पूजा, संगतिकरण ) यज्ञ हैं ९० वैदिक यज्ञ मंस्था। है किन्तु देवपूजा के विविध होने के कारण (श्वर के साथ आधिदैविक देवों के साथ, वडे मनुष्यों के साथ ) पांच हो गये हैं। इनमें पहिला दूसरा और चौथा संसार महायश के अंगभूत यज्ञ हैं तथा तीसरा और पांचवां मनुष्यसंगठन यशों के अंगभूत भी हैं। अब हम नीचे के क्रम से प्रत्येक महाया की कुछ व्याख्या करेंगे- - ३७ अतिथि यज्ञ इसका अर्थ यह है कि घर में जो कोई भी मनुष्य मात्र आवे उसको भोजन आदि देकर सखी करना । इस यश में 'मनुष्य मात्र से प्रेम ' अग्नि है। अतिथि के सत्कार में सब कुछ किया गया प्रेम कर्म हवि है और सब मनुष्यों के साथ प्रेमसे रहने का सुख फल है। अथर्व वेद के ८-९, सूक्त तथा कई अन्य स्थलों पर भी इस अतिथिपूजन का प्रबल शब्दों में उपदेश है। वैदिक सभ्यता में अतिथि से पहिले खाना, उसको कुछ भी कष्ट पहुंचाना बडी हानि पहुंचाने वाले पाप समझे जाते हैं। इस यज्ञ का महापन इस बात में है कि इसमें सब संसार के मनुष्य हमारे भाई समझे जाते हैं। इस प्रकार यह सब संगठन यज्ञों का मूल है। यह मनुष्य को प्रत्येक दूसरे मनुष्य साथ मनुष्य होने के कारण ही आत्मवत् प्रेम करना सिख- लाता है । अतः केवल दूसरेको भोजन खिला देने से इस यज्ञ की पूर्ति नहीं समझ लेनी चाहिये।

भूतयज्ञ।
९१
३८ भूत यज्ञ।
यह इस बात का सूचक यज्ञ है कि मनुष्य को अपने से
सब छोटो को पालना चाहिये, रक्षा करनी चाहिये। मनु
महाराज ने सब छोटो को निम्न ६ विभागों में रखा है और
तदनुसार इस यश की विधि यह है कि भोजन खाने से
पहिले इनके नाम के ६ ग्रास निकाल कर भोजन शुरू करें।
वे छे निम्न हैं-
(१) पतित
(४)श्वा
(२) श्वपच
(५) वायस
(३) पापरोगी (६) कृमि
इनमें से पहिले तीन किसी कारण हीन अवस्था में पहुंचे
हुवं मनुष्य ही हैं। पतित का अर्थ है अपनी साधारण अवस्था
से गिरा हुवा मनुष्य । सभी रोगग्रस्त, दुष्कालपीडित, मानस
व्यथासे पीडित या महायंत्र प्रवर्तन के कारण वेकारो या गरीवीसे
पीडित 'पतित ' कहलायेंगे। उनकी रक्षा करना, सेवा करना
भूतदया का पहिला लक्षण है। श्वपच या चांडाल का अर्थ
किन्हीं 'कुत्ते को खाना' आदि अधर्माचरण के कारण समाज से
गिरे हुवे पुरुषों का नाम प्रतीत होता है । इनका उद्धार करना भूत
यज्ञ का दूसरा लक्षण है । एवं कुष्ट आदि घृणित रोगों से पीडितो
की भी सेवा करनी चाहिये । इन हीन हुवे मनुष्यों के नीचे
(वा)कुत्ता आदि सब पशुओं की, (वायस) कौआ आदि सब
पक्षिओंकी तथा (कृमि) कीडे मकौडे तक सब क्षुद्र जन्तुओं की भी
पालना भरना भूतमहायज्ञ या वलिवैश्वदेव यज्ञ कहाता है। यह तो
स्पष्ट है कि यह महायज्ञ केवल छे ग्रास निकाल देने से पूरा नहीं
हो जाता। ग्रास निकालना तो केवल चिन्ह मात्र है। इन
.

वैदिक यज्ञसंस्था। ९२ सव की सेवा का अवसर प्रति दिन न आते रहने से कहीं हम अपने धर्म को न भूल जाय इस लिये प्रति दिन इन के निमित्त ग्रास निकालते हुवे इसे स्मरण रखा जाता है। भोजन से पहिले निकाल ने का अर्थ यह है कि इनकी सेवा पहिले, अपना भोग पीछे अर्थात् हमें अपना भोग छोड करके भी इनकी सेवा करनी है । अब यदि कोई पतित और पाप रोगी आदिओं की सेवा नहीं करता किन्तु ६ ग्रास रोज निकालता हुवा समझता है कि मैं भूत महा यज्ञ कर रहा हूं तो वह बड़े भारी धोखे में है। ऐसे हिन्दू इस देश में बहुत मिल जायगे, जो कि इन छै ग्रासों की विधि पूरी करते होंगे, परन्तु पतितो का उद्धार धर्मविरुद्ध बतलायगे, विचारे चांडालों को छुवेगे भी नहीं तथा कुष्ट रोगिओ के पास नहीं फटकेंगे। सच मुच हमारे यज्ञो में से आत्मा निकल चुकी है, केवल बाह्यावडंबर शेष रह गया है। यह यज्ञ भी बहुत अंशो में हम लोगों की अपेक्षा दूसरे ही अधिक करते हैं । कई सच्चे ईसाई यहां इस देश में कोढियो की इतनी सेवा करते हैं कि उनके लिये हृदय में वडासन्मान पैदा होता है। पतितो का उद्धार अपने मतानुसारी ढंग से ईसाई और मुसलमान भी सदा करते रहते हैं, किन्तु हिंदु ओको इसका कुछ होश नहीं इंग्लैंड में पहिले कोढ की बीमारी बहुत ही अधिक होती थी, पर उन्होंने थोडेही समयमें इसका नामनिशान अपने देश से मिटा दिया है। पशुओं का हिस्सा निकालने का अर्थ हिंदुओं के बडे भारी धर्म गोरक्षा से है। किन्तु यह स्मरण आनेपर सिर लज्जा से झुक जाता है कि हिन्दुस्थान को छोड़ शेष सभी देशों में गौवों की संख्या यहां से बहुत अधिक है, वे बहुत अच्छी हालत में है और बहुत दूध देनेवाली हैं। इनकी धर्म पुस्तक - वेद में तो गौ और घी, दूध का बहुत वर्णन है। पर अब इस देश में गौ नाम लेने के लिये ही रह गयी है । हिन्दुओं को कोई समझा दे कि पहिली रोटी गाय के नाम से रख लेने से या ग्रास देने से गोरक्षा नहीं हो जायगी, इसके लिये तो आट्रेलिया आदि देशों की तरह क्रियात्मक बहुत से यत्न करने होंगे। इसी तरह अन्य देशों में बैल, भेड, वकरी घोडे आदि सभी पशुओंकी वृद्धि और उन्नति की जाती है, इन्हें राष्ट्रीय संपत्ति समझा जाता है । पर भूत यज्ञ का दावा करने वाले हिन्दुस्थान में यह कुछ भी नहीं है केवल ये पशु ही नहीं, किन्तु पक्षी भी और छोटे छोटे परम असहाय कीडे मकोडो तक जो कुछ प्राणी है इन सब की रक्षा का भार बडा कहलाने वाले मनुष्यपर जगद्रचयिता ने छोड रखा है । अतः हमें उन्हें कभी भी हानि तो पहुंचानी ही नहीं चाहिये, अपि तु जो कुछ हम कर सकें इनके पालनार्थ करना चाहिये । परन्तु पालना का अर्थ यूं हो खिलाना नहीं है, काम लेना और खिलाना इसी सिद्धान्त से पशुओं की भी पालना होती है और होनी चाहिये । भूत महायज्ञ की प्रथाको चलाने वाले ऋषि जानते थे कि महायन्त्र प्रवर्तन को हटाकर न केवल मनुष्यको रेकारी से बचाना चाहिये अपितु पशुओं को भी बेकारी से बचाकर पालना चाहिये । अत एव कृषि आदि वैलों से की जाती थी, यानों में हाथी, घोडे काम में आते थे एवं सब पालत पशुओं की रक्षा होती थी। शहर व्यवहार द्वारा मधु मक्षिकाओं की पालना होती है यह भी कहा जा सकता है। पाश्चात्य लोग भी इसी सिद्धान्त से गोरक्षादि करते हैं । भेद इतना है कि वे जहांतक उनका स्वार्थ सिद्ध होता है वहीं तक पशुओंको पालते हैं। यदि बहुत से घोडे बेकार हो عام गये हैं तो उन्हें गोलिओं से खतम कर दिया जाता है। परन्तु भूत यज्ञ करने वाले इन इन असहायों की पालना करने में हो अपना स्वार्थ समझते हैं और किन्ही कारणों से इन दयनीय पशयोनिओं में आये हुवे हमारे जैसे जीवों को अपने छोटे गिरे हुवे भाई समझ कर पालना कर्तव्य अनुभव करते हैं भूतयज्ञ में भी पूर्ववत् जो रक्षा पालना के लिये त्याग किया जाता है वह ' हवि ' है, सहानुभूति या जिस द्वारा यह त्याग पहुंचता है वह अग्नि है तथा इस पुण्य से मिलने वाला नाना प्रकार का सुख फल है। ३९ पितृ यज्ञ। अब अपने से बड़ों से संबन्ध कराने वाले तीन या शेष रह गये। इनमें पहिला पितृयज्ञ है। इस द्वारा माता पिता आचार्य तथा अग्निष्वात्तादि पितरों को पूजा की जाती है । यह यज्ञ मनुष्यसंगठन यज्ञ का अंग है। माता पिता की पूजा कुटुम्ब यज्ञ में तथा आचार्य की पूजा गुरु कुल यज्ञ में आजाती है। मनुमें (२-१३१ ) कहा है कि पिता गार्हपत्त्याग्नि है, माता दक्षिणाग्नि है और आचार्य आहवनीयाग्नि है । इन श्रेष्ठतर अग्नियों में पितृयज्ञ होता है और माता पिता गुरु की सेवा की जाती है। पवं अग्निवात्त आदि भी कोई पालक पुरुष होते हैं, इनकी भी सेवा शुश्रूपा आदि करनी चाहिये । इन सबको अपनी भक्तिप्रेरित श्रद्धामय सेवाओं से तृप्त करना ही पितृयज्ञ है, तर्पण है, श्राद्ध है । इस-यशंका ' 'महा पात में है कि ये पितृलोग ही समाज, देश व संसार के भावी स्तंभों -नव युवकों को बनाने वाले होते हैं । अतः इन को तृप्ति (तर्पण ) होना आवश्यक है। -- देव यज्ञ ९५ ४० देव यज्ञ। यह प्रसिद्ध यश है । अपने पूज्य मनुष्यों के बाद मनुष्यों से बडे जो संसार के अग्नि, वायु आदि देव हैं जो कि ईश्वर के संसार महाया को चलाने वाले हैं उन आधिदैविक देवों को पूजा इस या से की जाती है। प्रसिद्ध अग्नि होत्र तथा अन्य सय यश जिन में कि कुंड में भौतिक अग्निस्थापन पूर्वक घृत अन्नादि हवि देवों को पहुंचायी जाती है ये सब देव- या है । इसकी विधियां भी कई बातों की चिन्ह होती हैं, जैसे कि अगिको क्रमशः बढाना, आत्मा को समाज व राष्ट्र को बढाने का चिन्ह है तथा एक एक मंत्र पढ कर हवो डालते जाना सतत बलिदान का चिन्ह है । इन यज्ञोंके फल भिन्न भिन्न होते हैं। हमारा विश्वास है कि साधारण नैत्यिक अग्नि होत्र से वायु शुद्धि होती है तथा वृष्टि होने में सहायता मिलती है । गीता में भी कहा है कि 'यशात् भवति पर्जन्यः ।' सब प्राकृतिक अवस्थाओं को ठीक रखना इन देव यशों से सिद्ध होता है, क्योंकि इस याद्वारा हमाराप्राकृतिक देवों से ठीक संबन्ध रहता है। अग्नि- होत्र में जिस जिस प्रकार की हरि डाली जाती है उस उससे भिन्न भिन्न प्रकार का असर वायुमण्डलमें उत्पन्न होता है। प्रतिदिन के अग्निहोत्र के अतिरिक्त प्रति पूर्णिमा और अमावास्या के दिन पौर्णमास और पष्टि की जाती है । एवं चातुर्मास में तथा अन्य तुओं पर भिन्न भिन्न प्रकार की इवि द्वारा उस उस प्राकृतिक अवस्था से अपनी अनुकूलता प्राप्त की जाती है। परन्तु जैसे कि पहिले कहा जा चुका है, अब ये सब कर्मकाण्ड लुप्त- प्राय हैं। अतः इनका ठीक ठीक रूप अभी नहीं समझ में आ सकता है । इस हवि से क्या प्रभाव होगा इत्यादि बातों .

की हमें पाश्चात्य परीक्षण के ढंगों से परीक्षण करके फिर से इस कर्म-काण्ड को तर्क द्वारा स्थापित करना होगा। अतः इस विषय पर इस से पहिले अधिक लिखना निष्प्रयोजन है। इन्हीं यशों को मैने पूर्व प्रकरणों में सूक्ष्म या' नाम से पुकारा है । सूक्ष्म यज्ञ से मेरा तात्पर्य यही है कि जिन यशों की हवि और क्रियाओंका फल के साथ कारण-कार्य-संबन्ध स्थल दृष्टि से समझ नहीं आता है उन्हें मैं सूक्ष्म विशेषण से पुकारता है। यदि इनका लोगों में प्रचार करना है तो उन क्रिया और फल में कारण कार्य संबंध को बतलाना होगा, तभी या पक विमान (Science)वन सकेगा । प्राचीन कर्मकाण्ड में तो मनुष्य की एक एक कामना को पूरा करने के लिये एक एक अग्निहोत्र बताया गया है। वर्षा हो या वर्षा बंद हो, वाय चले या तेज धूप निकले, रोग दूर हो, विद्या बुद्धि बढे, तेज बढे, मैं ज्येष्ठ श्रेष्ठ होऊ, राज्य मिले, ऐश्वर्य मिले, तेजस्वी विद्वान या वली पुत्र उत्पन्न हो आदि आदि सब कामनाओं को पूरा करने के लिये आधि दैविक यज्ञ हुवा करते थे और इन प्राकृतिक देवों की सहायता से वे सब फल प्राप्त किये जाते थे। परन्तु इन सब बातो पर आज कौन विश्वास कर सकता है। इन सब सूक्ष्म यज्ञों को हमें फिर स्थापित करना चाहिये। ११ वह यज्ञ. अन्त में सबसे बड़े परमात्माके साथ संबन्ध जोडना ब्रह्मयज्ञ है । दैनिक कृत्यों में संध्या ब्रह्मयज्ञ है । परमात्म- दर्शन के लिये अपने अन्दर जितनी मन प्राण आदि द्वारा क्रियायें की जाती हैं वे सब ब्रह्मयज्ञ है । गीता - ब्रह्म यज्ञ। ९७ - के चौथे ज्ञानयोग नामक अध्याय में जो संयमयज्ञ, इन्द्रिययज्ञ आत्मसंयमयोग यज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ, स्वाध्याय यश, प्राणयज्ञ, अपानयज्ञ. कुंभकयश, प्राणाग्निहोत्र यश आदि यश वर्णन किये हैं वे सब ब्रह्मयश में आते हैं । यह आन्तर यश हैं अतः सब से मुख्य और प्रभावशाली यश हैं । सव बाह्य यश वास्तव में इस आन्तर यश की सहायता के लिये ही हैं। जो यह यश पूर्णतया कर सकता है उसे वाहा यज्ञों की आवश्यकता नहीं रहती, अतः संन्यासीजोकि सदैव ब्रह्मयश करता रहता है अन्य सब यशों से मुक्त हो जाता है । कृष्ण भगवान ने अपनी विभूतिओं में कहा है कि 'यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि ।' यशों में ब्रह्मयज्ञ श्रेष्ठ है और ब्रह्मयज्ञ में भी, जपयज्ञ इस लिये श्रेष्ठ है क्योंकि यह निरन्तर चलता हुवा मनोवृत्ति को एक रंगमें रंग कर शीघ्र मनोनिरोध करा देता है। योगदर्शन में भी प्रणव जपद्वारा 'आत्मदर्शन तथा विघ्नों का नाश' यह वडा भारी फल बतलाया है। सव ब्रह्मयज्ञ ज्ञानको प्रकाशित करते हैं। 'ब्रह्म' का अर्थ भी 'ज्ञान' होता है। अत पव इस अन्दर के यज्ञ का नाम ज्ञानयज्ञ भी कहा जाता है । भगवद्गीता में इस यज्ञ की प्रशंसा इस प्रकार की है। श्रेयान् द्रव्यमयात् यज्ञात् ज्ञानयज्ञः परंतप । सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परि समाप्येत । . गीता ४-३३ । अतः सव कर्मयज्ञों से (जिनमें कि किसी वाह्य द्रव्य की भी 'आवश्यकता होती है ) ज्ञान यज्ञ ही श्रेष्ठ है, क्यों कि सब कर्म अन्तमें ज्ञान में ही समाप्त हो जाता है। अथवा यूं कहना चाहिये कि ज्ञानकर्म ही सब से ऊंचा और प्रभावशाली कम ।। सव योग क्रियायों से विवेक ख्याति अर्थात् ज्ञानप्रकाश वैदिक यज्ञसंस्था। होता है। योगोक्त धारणा, ध्यान और समाधि ब्रह्मयज्ञ की उच्च अवस्थायें हैं। इन ब्रह्मयज्ञों के जो बडे बडे आश्चर्यकारी फल प्राप्त होते हैं वे योगदर्शन के विभूति योग में वर्णित हैं। ये ये फल अवश्य प्राप्त होते हैं इस बात में विश्वास न रखने वाले मनुष्य बहुत हैं। परन्तु ये सब फल योग नामक ब्रह्मयज्ञों से जरूर मिल सकते हैं और मिलते हैं ऐसा हमारा विश्वास है। प्रत्येक ब्रह्मयज्ञ में पूर्ववत् हवि, अग्नि और फल निर्दिष्ट किये जा सकते हैं। हवनप्रकिया ब्रह्मयज्ञ में भी होती है, परन्तु यह सूक्ष्म होती है। यह दिखायी नहीं देती, परन्तु फल से अनुमित हो सकती है। उपनिषद् में आता है कि ब्रह्म ज्ञान होने पर चेहरा बदल जाता है अतः एक ब्रह्मज्ञानी जान लेता है कि 'ब्रह्मविदिव भासि'। इस बाह्य फल से हम अनुमान कर सकते हैं कि ब्रह्मज्ञान होते ही उसमें कुछ भेद आगया है। जैसे कि अग्नि के पास बैठते ही शीत दूर होता है, वैसे ही ब्रह्मयज्ञ की उच्च अवस्थाओं में तुरंत फल मिलता है, यद्यपि केवल इस स्थूल जगत् में रहने वाले हम इसकी प्रकिया को नहीं समझ सकते। यह भी स्पष्ट है कि इतने बड़े फलों को लाने के लिये हवि भी बहुत बडी होती है। ब्रह्मयज्ञकर्ता. अपना सब प्राकृतिक भोग छोड़ देता है, सब वस्तुओं की कामनाओं के त्यागने की हवि देता है। पुत्र, धन, मान ऐषणाओं को त्यागने वाला संन्यासी सदा ब्रह्मयज्ञ का आनन्द प्राप्त करता । ब्रह्मयज्ञ की अन्तिम अवस्था वैयक्तिक सर्वमेध है। एक जीवनयुक्त अपना शरीर, मन, इन्द्रिय, आत्मा अपना एक एक कर्म दिन भर में चलाने वाला एक एक प्राण अर्थात् पूर्ण तया सब कुछ ब्रह्माग्नि में डालकर सर्व को प्राप्त कर लेता है। यह वैयक्तिक यश की पराकाष्ठा है। यह ब्रह्मयज्ञ सबसे बडा यज्ञ है। ww सूक्ष्म यज्ञों का उद्वार। ९९ 4 ४२ सूक्ष्म यज्ञों का उद्धार । संगठन यशों के प्रकरण में लिखे प्राचीन यज्ञों में तथा अभी वर्णन किये देव यज्ञों में और ब्रह्मयों में यहुत से ऐसे यश हैं जिन में कार्यकारणभाव को अभी हम बतला नहीं सकते। इनको कर सकना तो अभी दूर ही है। इस लिये इनका होना न होना हमारे लिये एक वरावर है। परंतु हमारी तरह बहुतों की वह इच्छा होगी कि इन लुप्तयज्ञों का फिर उद्धार होना चाहिये। पर यह उद्धार कैसे हो । प्रथम तो जैसा कि हमने इस निवन्ध के प्रारंभ में लिखा है हमें यश के तत्त्व का समझ लेना चाहिये । मेरा विचार है जो मनुष्य सामान्यतया यज्ञ तत्त्व को समझता है उसे यज्ञों में विश्वास भी होगा। तात्पर्य यह है कि जो मनुप्य सामान्यतया यज्ञ के स्वरूप को समझता है और जिसको सूक्ष्म यशों के फलों में विश्वास है कि ऐसे यज्ञ से यह फल मिल सकता है वही पुरुष स्वयं परीक्षण करके इन सूक्ष्म यज्ञों के कार्यकारणभाव को बतला सकता है । जव कि ऐसे पुरुष अपना जीवन लगाकर परीक्षणों से अनुभव प्राप्त करते हुवं वतला सकेंगे कि इस प्रकार के यज्ञ से वर्षा क्यों होती है, इस दृष्टि से पुत्रजन्म कैसा हो जायगा, या इस योगसाधना से फलानी सिद्धि कैसी मिल जायगी, तभी इस जीर्ण यज्ञसंस्था का पुनरुद्धार हो सकता है। परंतु यह सब भी अकेले अकेले करने का काम नहीं है। जब तक कि हम इस यज्ञसंस्था के उद्धार कार्य को संगठित होकर नहीं करेंगे और संगठन यज्ञों में वर्णित नियमों के अनुसार ही इस संगठन को नहीं चलायंगे तब तक हमारे यत्न व्यर्थ जायंगे। कोई श्रद्धालु और यशोन्नति चाहनेवाले कर्मयों की हविओं के परीक्षण करें, कोई पुगने ग्रंथों का अनुशीलन करें और कोई योग 8 १०० वैदिक यज्ञसंस्था । की उच्च अवस्थाओं का अनुभव प्राप्त करें और फिर अपने अपने अनुभवों से विधिवत् एक दूसरे को लाभ पहुंचाते हुवे मिलकर काम करेंगे तो हम इस यज्ञद्वारा ही प्राचीन यज्ञों का उद्धार कर सकेंगे इसी लिये मैंने इस लेख में संगठन यशों पर विशेष वल दिया है। ये जो पंचमहायज्ञ हैं, यदि हम इनका भी फिर घर घर प्रचार करना चाहते हैं तो वह भी संगठन यज्ञों के ठीक ठीक चलने से ही होगा। अतः आशा है इस लेख को पढनेवाले पाठक पहिले अपने अपने संगठन यज्ञों को ठीक करने का यत्न करेंगे यज्ञसेही यज्ञ का उद्धार होना है। ४३ संसार की नाभि । संगठन यज्ञ और वैयक्तिक यज्ञों का वर्णन पूरा होगया। अब पाठक अनुभव कर सकते हैं कि पूर्वोक्त नाना प्रकार के मनुष्य संगठन यज्ञों, सहस्रो वैयक्तिक यज्ञों तथा पंच महायज्ञों और सब से अधिक ईश्वरीय देवोंके महायज्ञ के कारण ही यह सब संसार बंधा हुवा है, विखरता नहीं है । यदि संसार में यज्ञ न हो तो प्रत्येक प्राणी और वस्तु ( यदि जीवित रहे) जुदा जुदा पडो हुई नष्ट हो जाय या अयज्ञ शक्ति द्वारा परस्पर टकराई जाकर संघर्पण से उत्पन्न हुई अग्नि में सब संसार भस्म हो जाय । परंतु सबके मूलमें यज्ञस्वरूप परमात्मा विद्यमान हैं, उनकी प्रेरणासे उनके सूर्य वायु, अग्नि आदि देव ठीक ठीक विलकुल त्रुटिरहित महायज्ञ कर रहे हैं जिससे कि इस अगम्य विश्व के ब्रह्माण्ड तथा लोक. लोकोत्तर एक दूसरे से जुड़े हुवे हैं । एवं यह मनुष्य संसार भी यज्ञ से ही जीवित रहता है । मनुष्य में स्वभावतः यज्ञ का भाव है, अतः वह दूसरों से प्रेम करता है और उनके लिये खुशी से बलि- दान करता हुआ उनसे जुड़ा रहना चाहता है। यदि मनुष्य के संसार की नाभि ! A अन्दर यह यश न रहे तो सब मनुष्य संसार साज ही लडभिडू कर नष्ट भ्रष्ट हो जाय । मनुष्य चाहें कितनी थल वन्यज्ञ को सर्वथा त्याग नहीं सकता। वह जितना यज्ञ को त्यागता है उतना ही संसार यज्ञ के आधीन होने के कारण वह कष्ट पाता रहता है और यदि वह यशका अधिक उल्लंघन करता है तो यह संसार स्वभावतः उसका नाश कर देता है और इस प्रकार अयज्ञ को नाश करते हुवे अपनो स्वाभाविक गतिसे चलता जाता हुवा यह संसार इस बंद वाक्य की प्रामाणिकता की गवाही देता है कि- अयं यशो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः । अब केवल मनुष्य जीवनयश का वर्णन शेष रह गया है। ४४ मनुष्य यज्ञ। पाठकों ने देखा होगा कि यद्यपि हमने ईश्वरीय संसार महा- यज्ञ का नाम तो बहुत जगह लिया है किन्तु इसका निरूपण कहीं नहीं किया। इसका कारण यह है कि इस अनन्त महिमो- पेत, विश्वरूप, अनन्तो सूक्ष्म और स्थूल स्थित, इस संसार महायज्ञ को समझना हमारे लिये शक्य नहीं है । हम इस संसारके कुछ भाग को ही जानते हैं और इस शान से ही आगे चलते हैं। यह ठीक है कि अन्त में इस सव विश्व के रहस्य को मनुष्यने जानना है और जानना शक्य है। अत एव मनुष्य अपने वैयक्तिक यज्ञों द्वारा तथा संगठन यज्ञों द्वारा इसी महायज्ञ के रहस्य को समझनेकी चेष्टा करता रहता है। परन्तु अन्ततः यदि हम इसे किसी तरह जानते हैं तो वह अपने आपको - अपने सूक्ष्म स्थूल सम्पूर्ण शरीर जीवन को समझने द्वारा ही जानते हैं, क्यों किया। जीवन भी बिलकुल संसार महायज्ञ जैसा छोटासा यश अंगों में सुव्यव- "मनुष्य R

१०२
वैदिक यज्ञसंस्था।
हमारे शरीर में ही सब संसार छिपा हुआ है। पूर्वोक ब्रह्मया
द्वारा अपने शरीर में इस सब महा-संसार को पूर्णतया
देखना होता है । अन्त में जव मनुष्य सर्वमेध यशद्वारा अपने
में इस सब महासंसार को - इस के पर अपर सर्व रूप
को - दर्शन प्राप्त कर लेता है तभी कृतकृत्य होता है।
अतः मनुष्य जीवन यज्ञ का महत्त्व हमारे लिये बहुत है।
यह यज्ञ हमारे सव से अधिक नजदीक का यज्ञ है। यह
मनुष्ययज्ञ हमारे सब यज्ञों का आधार है. क्यों कि मनुष्य जीवन
में ही मनुष्य अन्य सव यज्ञ करके कृतकृत्य होता है।
अतः अन्त में हम अब इस मनुष्य जीवनयज्ञ का थोडासा
वर्णन करके इसकी व्याख्या में यह भी दिखला कर कि हम
भारत वासियों की इस आधार यज्ञ में भी कैसी दुर्दशा है- इस
निवन्ध को समाप्त करेंगे।
इस मनुष्य यज्ञ का वर्णन भी शास्त्रों में बहुत जगह है,
जैसे कि नारायण तथा प्राणाग्नि होत्रोपनिषद् में है । इस यज्ञ
अङ्गभूत भी बहुत से यज्ञ देखे जा सकते हैं। यद्यपि
इस आधारयज्ञ के विस्तृत और व्यापी वर्णन की आवश्यकता है
तो भी विस्तारभय से तथा इस विषय के अनुभवगम्य ही
अधिक होनेके कारण यहां केवल इसका सामान्य रूपही
छांदोग्योपनिषद् के तृतीय प्रपाठक १६ खंड से सुना देना ही
पर्याप्त समझते हैं ।
पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विंशति वर्षाणि तत्प्रात:-
सवनं चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य
वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीदं सर्व
वासयन्ति ॥१॥ तं चेदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स व्या-
प्राणा वसव इदं मे प्रातः सवनं माध्यन्दिनं सवनमनु-
के

मनुष्य यज्ञा १०३ सन्तनुतेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यशो विलोप्सी- येत्युद्धव तत एत्यगदो ह भवति ॥२॥ अथ यानि चतुश्चत्वा- रिंशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिनं सवनं चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप् त्रैष्टुभं माध्यंदिनं सवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः। प्राणा वाव रुद्रा एते होदं सर्व गरोदयन्ति ॥३॥ तं चैदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स व्यात्प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यन्दिनं सवनं तृतीयसवनमनुसन्तनुतेति माह प्राणानां रुद्राणां मध्ये यज्ञो चिलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ ४॥ अथ यान्यष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि तृतीयसवन- मष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वाचादित्या एते हीदं सर्वमाददते ॥५॥ तं चेदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवनमायुरनुसन्तनुते माहं प्राणानामादित्यानां मध्य यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो हैव भवति॥६॥ पतद्ध स्म वें नद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुप- तपसि योऽहमनेन न प्रेप्यामीति स ह पोडपं वर्षशतम- जीवत्स ह पोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥ ७॥ छां३१६ मनुष्य जीवन निश्चय से यज्ञ है। उसके जो २४ वर्ष हैं यह प्रातःसवन है। २४ अक्षरों की गायत्री होती है और गतःसवन गायत्र है। इसमें (प्रातःसवन में ) वसु देवता अनु गत हैं। प्राण ही वसु हैं क्योंकि वे इस सवको वसाते हैं। इसलिये इस आयु में मनुष्य को कोई रोगादि आकर क्लेशित करने लगे तो वह चोले ' हे वसु प्राणों ! मेरा यह प्रातःसवन है इसे माध्यंदिन सवन तक लेते चलो। तुम प्राण वसुओं के बीच में (तुम्हारे उपस्थित होते हुवे ) में यज्ञ को खण्डित

१०४
वैदिक यज्ञसंस्था।
नहीं होने दूंगा।' इस (ध्यान ) से वह रोग उठ जाता है
और
मनुष्य
नीरोग हो जाता है।
इससे अगले जो चवालीस वर्ष ( अर्थात् २५ वर्ष की आयु
से ६८ वर्ष की आयुतक) है वह माध्यंदिन सवन है। १४
अक्षरोंका त्रिष्टुप् छंद होता है और माध्यंदिन त्रैष्टुभ है।
इसमें रुद्र देवता अनुगत है, प्राण ही रुद्र हैं, क्योंकि ये रुलाते
हैं। इस वायु में यदि कोई रोग आदि आकर क्लेशित
करने लगे तो बोले 'हे रुद्र प्राणो, मेरा यह माध्यंदिन सवन
है , तृतीयसवन तक इसे ले चलो, मैं तुम प्राणरुद्रों के बीच
में (तुम्हारी उपस्थिति होते हुवे ) यज्ञ को खण्डित नहीं कर
सकता' इस ( ध्यान ) से वह रोग आदि उठ जाता है और
मनुष्य नीरोग होजाता है।
अब जो (शेष ) अडतालीस वर्ष (अर्थात् ६८ से १.६
वर्ष तक ) हैं वह तृतीय सवन है । ४८ अक्षरों का जगती छन्द
होता है और तृतीय सवन जागत है। इस में आदित्य देवता
अनुगत है, प्राणही आदित्य हैं, क्योंकि वे सब का आदान
करते हैं, इस आयु में यदि कोई रोगादि आकर क्लेशित करने
लगे तो बोले 'हे आदित्य प्राणों ! यह मेरा तृतीय सवन है,
इसे पूरी आयु यज्ञसमाप्ति तक ले चलो, मैं तुम आदित्य प्राणों के
बीच में (तुम्हारे उपस्थित होते हुवे ) यज्ञ को खण्डित नहीं
होने दूंगा' इस (ध्यान ) से वह रोगादि से उठ जाता
और मनुष्य नीरोग हो जाता है।
यह वात इस विद्या के विद्वान् ऐतरेय महीदास ऋषिने
कही थी। (वह कहता रहा 'हे रोग! तू मुझे क्या क्लेशित करता
है जो कि मैं (बीच में ) मरने वाला नहीं हूं, इस प्रकार वह

मनुष्य यज्ञा १०५ ११ वर्ष जीता रहा और भी जो कोई इस बात को समझता है वह ११६ वर्ष तक जीता है। उपनिषद के इस उपदेश का हमें खूब मनन करना चाहिये इससे कितना गूढ रहस्य है उसकी सुन्दरता तो अभ्यासी ही जानेगा। परन्तु एक वाक्य में इसका अर्थ यह है कि मनुष्य- जीवन को यह समझना चाहिये । यज्ञ को तरह इस के भी तीन विभाग हैं और प्रत्येक विभाग में जो भिन्नभिन्न तीन प्रकार के देवता प्राण में रहते हैं उनके ध्यान द्वारा अपनी प्रवल इच्छाशक्ति से इस यश को कभी भी भंग नहीं होने देना चाहिये, बल्कि नियमपूर्वक ११६ वर्षमें इसे निर्विघ्न समाप्त करना चाहिये। पहली बात है कि मनुष्य " यज्ञ" है । भारत के वे प्राचीन मही- वास आदि. ऋषि मनुष्य जीवन को २.६ वर्ष तक चलने वाला यज्ञ समझते थे। यश का भंग होना पाप है। यज्ञका नाश करन- वाले असुर होते हैं और यशकी रक्षा करने वाले देवता । अब कोन भारतवासी अपने जीवनको यज्ञ समझता है, इसकी रक्षा की चिन्ता करता है, बीच में मर जानको यज्ञनाश का अनर्थ समझने वाले अब कौन हैं ? हममे अधिक तो इस यज्ञ की रक्षा करने वाले विदेशी लोग हैं । उदाहरणार्थ अमेरिका का हाल सुनिये, सन् १८०० में वह मनुष्यों की औसत आयु ३३ वर्ष थी, १८५५ में उन्होंने अपनी आयु वढा कर ४० वर्ष की कर ली। एवं १९१० में उनकी औसत आयु ५४ हुई और अब १९२० में यह ५८ हो गयी है। यज्ञ की रक्षा को चिन्ता तो उन्हें है, हम लोगों की आयु सौ से घट कर २२॥ रह गयी है !!! (शायद अब और भी घट चुकी है) पर हमें कुछ खबर भी नहीं है हमारे देश में इन करोडो ईश्वरीय यज्ञों का प्रातःसवन में हीभंग कर दिया जाता है, तब हमारा उद्धार कैसे हो ? पर हम तो यज्ञ १०६ वैदिक यज्ञसंस्था । वज्ञ सब भूल चुके हैं, हमारी अव की धर्म (1) की शिक्षा के अनु. सार हम समझते हैं कि जल्दी मर गये तो झगडा कटा। पर हम अधर्मियों को कोई यह समझा दे कि यह जीवन तो भगवान की दी हुई पवित्र वस्तु है, हम पापी इसका झगडा काटने वाले कौन होते हैं। यह तो हमें इस लिये दिया गया है कि परमात्मा के संसार महायज्ञ में इसके अंगभूत इस यज्ञ को अच्छी तरह चलावें और पूर्ण करें और इस यज्ञ को अच्छी तरह चलाते हुचे या तो इस यज्ञ से यज्ञ का यजन कर डालना है अर्थात् आत्मवलिदान करना है । जैसे कि देश या धर्म के लिये वीर पुरुष करते हैं ) या इसे पूर्ण कर परमात्मार्पण करना है, इस लिये यह यज्ञ है। परन्तु इसके विपरीत इसे अच्छी तरह न चलाना, इस में रोगादि आने देना एवं इसका भंग करना पाप है, निर्बलता वश इसे एकदम नाश कर डालना अर्थात् आत्महत्या और भी घोर पाप है, वेद में तो रोग और पाप एक ही बात है, रह:, रपः, कण्वः आदि सब पापवाचक शब्द रोगवाचक है फिर भी न जाने वेदों को मानने वालो को रोग में पाप क्यों नहीं दिखलाई देता है ? रोग केवल इसी लिये पाप नहीं है क्यो कि पाप के कारण ये उत्पन्न होते हैं, पर हमें सामाजिक दृष्टि से भी रोग की पापमयता देखनी चाहिये, रोगी पुरुष समाजमें रोग का वायुमण्डल पैदा करता है, दूसरों में रोग फैलाने का कारण होता है, समाजमे जीवन की उपयोगिता, जीवन का आनन्द, जीवन की वढनेवाली कार्यक्षमता इन सब को रोगी होना धक्का पहुंचाता है, फिर समाज को अपनी शक्ति रोगी के रोग दूर करने उसको सेवा करने में व्यय करनी पड़ती है, अच्छा हो जाने पर भी जो रोग की निर्बलता उसमें स्थिर हो जाती है वह समाज को हानि पहुंचाती है, यह सब समझकर हमें अपने यज्ञ को रोगों के आक्रमणो से मनुष्य यज्ञ। १०७ . सदा बचाये रखना चाहिये और प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध कर्म (पाप) कभी न करना चाहिये, म० हैनसेन ( Hansen) के अनुसार उपर्युक्त अमेरिकाकी आयुवृद्धि भी रोगों के रोकने के द्वारा ही प्राप्त की गई है। मृत्युसंख्या को देखें तो वहां भी अमेरिका ने १९११ से अब १०२४ तक के बीच में मृत्युसंख्या को प्रति सहस्र १७ से ११.६ तक घटाया है, जब कि भारत में मृत्युसंख्या (जहां तक मुझे स्मरण है) लग भग ३० प्रति सहस्र है और उनमें भी बालकों की मृत्युसंख्या तो हृदयविदारक है यह है लग भग ३०० प्रतिसहन्न, फिर वही कहना पड़ता है कि जिस देशमें तने ईश्वरीय यज्ञों का प्रारंभ में ही भंग हो जाता है वहां असुरों की सदा जय है, वहां देव कैसे बसें, उनका उद्धार कैसे हो? इस लिये इस देश के प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवनयज्ञ को अच्छी तरह चलाने में प्रवृत्त होना चाहिये। इसे ठीक तरह चलाने के नियम भी इसी उपनिषद् के वचन में आगये हैं। वे संक्षेप से इस प्रकार है, जो कोई करेगा इन्हे विस्तार से भी जान लंगा, प्राण ही जीवन है, इस लिये प्राणों को ही लगातार १६ वर्पतक ठीक रखना है, इसके लिये प्रत्येक सवनमें भिन्न भिन्न देवों को प्राणमें लाना चाहिये । वसु, रुद्र, आदित्य में सब देव आ जाते हैं। इस यज्ञ की ये वसु आदि प्राणस्थ देवता रक्षा करते हैं और रोग आदि असुर उनमें विघ्न डालते हैं। उपनिषद में कहे संकल्प के द्वारा और तदनुसार आचरण करते रहने से इन देवों की विजय होती रहती है और असुर विघ्न नहीं डाल सकते। एवं यह यज्ञनिर्विन चलता हुवा पूर्ण होता है। प्रारम्भ के २४ वर्ष वृद्धि के हैं, इस समय में अपने में सब बातें बताई जाती हैं, इस लिये इस की १०८ वैदिक यज्ञसंस्था । में ने समय प्राणों में वसुओं का ध्यान करते हुवे अपना भोजन, . व्यायाम, व्यवहार, विचार आदि सब ऐसा ही करना चाहिये जिससे कि हमारे शरीर में वृद्धि होती जाय, सब आवश्यक वस्तुओं का इस में वास हो जाय। फिर २५ से ६८ वर्ष तक आयु जवानी को आयु है, आज कल हमारी जवानी वेशक २५ वर्ष में ही समाप्त हो जाती है । पर “साठासो पाठा" की कहावत के अनुसार पहिले लोग ६० वर्ष की उमर तक पहिलवान हुवा करते थे और अब भी होने चाहिये। अस्तु । इस आयु मनुष्य ने खूब कार्य करना है, प्रतःसवन में यदि युद्ध की तैयारी है तो इस समय में असल में युद्ध करना है, इस लिये इस समय में हमारे प्राण 'रुद्र 'बनने चाहिये, इस समय का हमारा भोजन, व्यायाम, विचार, व्यवहार सब ऐसे होने चाहिये जो रुद्र गुणों के पोषक है तो रुद्र देव सब रोगादि असुरों को भगाते हुवे यज्ञ को तृतीय सवन तक निर्विघ्न पहुंचाते हैं। फिर ६९ से ११६ वर्ष तक बुढापे का समय है। इस समय प्राण आदित्यरूप होकर सब काम समेटने लगते हैं, इस समय में यद्यपि मनुष्य तेज प्रकाश तो बढ जाता है. पार्थिवपन नहीं रहता, शरीर सूक्ष्म हो जाता है, इस लिये इस समय के आहार विचार आदि भी तदनुकूल होने चाहिये, इस से मनुष्य अपने परिपूर्ण जीवन वय को समाप्त कर परमात्मार्पण होता है। इस में भी पाठकों ने देखा कि मनुष्यजीवन के यज्ञ में भी हम भारतवासी सबसे पीछे हैं। ४५ हमारा उद्धार कौन करेगा? अन्त में भारत देश का यश द्वारा उद्धार करने में निम्न वेद मंत्रों का विनियोग करनेकी मेरी धृष्टता को क्षमा में - - हमारा उद्धार। १०९ करते हुवे आशा है पाठक मेरे साथ निम्न प्रार्थना में सम्मिलित होगे। हे यज्ञ भूमि ! क्या अब तेरा फिर उद्धार होगा या नहीं। यह हमारी यज्ञ भूमि भारत भूमि- यस्यां सदो हविर्धाने यपो यस्यां निमीयते । ब्रह्माणो यस्यामर्चन्त्य॒ग्भिः साम्ना यजुर्विदः । युज्यन्ते यस्यामृत्विजः सोममिन्द्राय पातवे ॥३८॥ यस्यां पूर्वे भूतकृत ऋषयो गा उदानचुः । सप्त सत्त्रेण वेधसो यज्ञेन तपसा सह ॥ ३९ ॥ अथ०-१२-१-३८,३८ "जिस भूमिपर सभास्थान और हविस्थान होते थे, जहां यज्ञस्तम्भ गाडा जाता था, जहां कि ब्रह्मा और अध्वर्यु आदि लोग ऋचाओं और सामों से अर्चन करते थे, जहां इन्द्र को सोम पिलाने के लिये नित्य यज्ञशील लोग संगठित होते थे"। " जहां कि भूत को बनाने वाले पूर्व ऋषि सत्र यज्ञों द्वारा सातो गौओंकी पूजा करते हैं और विधाता (ऋषिलोग ) तपसहित यज्ञसे ( देव ) पूजन करते रहे।" वह हमारी मातृभूमि अब भी फिर यशभूमि बनेगी। इस के ये सैंकडों भेदभाव और फूट कब कैसे दूर होंगे ? यहां के लोगों को कौन परस्पर मिलायगा ? को अस्य नो द्रुहोऽवद्यवत्या उन्नेष्यति क्षत्रियो वस्य इच्छन् । को यज्ञकामः क उ पूर्तिकामः को देवेषु वनुते दोघमायुः ॥१॥ अथ०७-१०३-१ "हमें इस पापमयी द्रोह की अवस्था से कौन उद्धार करेगा? ऐसा कौन क्षत्रिय श्रेष्ठ धन की इच्छा करने वाला है ? यज्ञ की वैदिक यज्ञसंस्था। में आज किसे फिकर है, फिर शुरू किये हुवे भी यश को अवश्य पूरा करने की किसी की इच्छा है ? कौन आज देवों में दीर्घ आयु की याचना करता है ?" परन्तु कोई कहता है "ऐसे निराश होने की बात नहीं है । यक्ष का जगत् में सर्वथा नाश नहीं हो सकता, जब तक कि जगत् "क" देव, यज्ञ प्रजापति का शासन है। यज्ञप्रजाति 'क' देव सदा सहायक होंगे यदि हम यज्ञप्राप्ति के लिये अपना यथाशक्ति यत्न करते रहेंगे।" वेही यज्ञ प्रजापति हमार लिये श्रेष्ठधनों की इच्छा करने वाले और हमें क्षतों से त्राण करने वाले हैं। वे हमें हमारी इस पापमयी द्रोह अवस्थासे उठायंगे उन्हें यहो की इच्छा है और सब प्रारंभ हुवे यज्ञों की पत्ति की इच्छा है। वे ही 'क' देव हमारी देवों में दीर्घ आयु चाहते हैं । इस लिये आओ, हम ऐसे वनें कि हमारे देशमें यक्ष प्रजापति की जय हो। , (परिशिष्ट) ( १ ) प्रश्न । निवन्धमे यज्ञ को परोपकारार्थ घतलाया गया है, किन्तु वास्तव में यज्ञ स्वार्थ को पूरा करने के लिये ही होते हैं । स्वार्थ ' शब्द बुरे अर्थमे यूं ही प्रयुक्त होने लगा है। उत्तर। यह बात ठीक है। वास्तव में सच्चा स्वार्थ और सच्चा परोपकार एक ही बात है । इस शाब्दिक उलझन को हटाने के लिये ही हमने निवन्ध में स्वार्थ में परार्थ और परार्थ में स्वार्थ' वैदिक यज्ञसंस्था। इस नामसे एक पृथक् प्रकरण ही लिख दिया है। इसे पूरा समझने के लिये वह प्रकरण फिर पढ लेना चाहिये। संक्षेपमें यों कहा जा सकता हैकि क्योंकि मनुष्यका और उनके प्रत्येक (अपूर्ण) यशका परोपकारमें ही सच्चा स्वार्थ हैअतः 'यश- परोपकारार्थ होना चाहिये' इसका यही अभिप्राय है कि हमारे सव यक्ष पूर्ण ईश्वरीय यशके या प्रत्येक इससे ऊपरके यज्ञके 'उपकारार्थ' होने चाहिये, विरोधी नहीं। इसी में हमारा सच्चा स्वार्थ है। स्वार्थ कमौका द्योतक है । जो पूर्ण है उसका अपना कुछ स्वार्थ नहीं रहता। अतः पूर्ण परमात्मा का पूर्ण यश किसी स्वार्थ के लिये नहीं कहा जा सकता। हमारे अपूर्ण यश वेशक स्वार्थ(सच्चे स्वार्थ) के लिये होते हैं जो कि सच्चा स्वार्थ परोपकारार्थ होमेसे ही सिद्ध होता है। अतः परोपकार को ही यज्ञका लक्ष्य कहना चाहिये, यद्यपि मनुष्यों के अपूर्ण यज्ञों के संबंध इस परोपकार शब्दकी जगह 'सच्चा स्वार्थ शब्द भी रखा जा सकता है। सच्चे स्वार्थसे उलट जो झूठा स्वार्थ या त्याज्य स्वार्थ है जो या के स्वार्थ से भिन्न है या विरोधी है । क्यों कि साधारणतया 'स्वार्थ' इसी बुरे अर्थमें प्रयुक्त होता है इस लिये कहा जाता है, कि यज्ञमें स्वार्थ नहीं चाहिये। (२) प्रश्न । क्या परमात्माभी बलिदान करता है ? पशुबलिदानप्रकरणमें कुछ ऐसा ही कहा गया है। उत्तर । परमात्मा को दार्शनिकोंने 'अकर्ता' भी कहा है। उस असंगरूप में वेशक परमात्मा भी कुछ नहीं करते हैं । परन्तु संसार महायज्ञके कर्ता परमात्मा अवश्य आत्मबलिदान करते ११२ वैदिक संस्था । है, इसके विना यज्ञ नहीं चल सकता । संसारमहायश में जो नित्य अनगिनत प्राणी मरते हैं, वस्तुयं नष्ट हो जाती हैं यह सब संसारयज्ञमें बलिदान - क्रिया हो रही है। इसका वर्णन अर्थ वेदके ९१८ सूक्तमें अच्छी तरह हुआ प्रतीत होता है । संसार में जब जिस वस्तु या जिस प्राणीकी आयु समाप्त हो जाती है. उसकी संसारमें आवश्यकता नहीं रहती (या यूं कहना चाहिये कि उसका रहना हानिकारक होता है। ) वह उसी क्षण समाप्त हो जाती है। यह ईश्वरके संसाररूपी विराट शरीर में होनेवाला बलिदान है। यह ईश्वरका अपनसंसार यम में आत्मबलिदान है। (३) प्रश्न । इस निबन्ध में 'यज्ञ' एक सांसारिक वस्तु बतायी गयी या यज्ञ के इसी रूप को दर्शाना आवश्यक समझा गया है। पया निवन्धकर्ता स्पष्ट करेंगे कि यश वस्तुतः सांसारिक वस्तु है या आध्यात्मिक, या पारलौकिक ? 1 - उत्तर । यज्ञका अर्थ है वह संगठित शरीर जिस का कि प्रत्येक अंग एक दूसरेके साथ ठीक सम्बन्ध जुडा हो । An organized body in which ers 2-uber is connected in right relation with each other) फिर साधारणतया प्रत्येक ठीक सम्बन्ध रखना (Right relation) ही यज्ञ कह- लाता है ( मैने इसे यज्ञांग या वैयक्तिक यज्ञ कहा है ) इस लिये यज्ञ सांसारिक भी है और पारलौकिक भी है । मनुष्यने अपनी अवस्थाले यज्ञ द्वारा उठते हुए ही पुरुषार्थ सिद्ध करना परिशिष्ट। है। प्रत्येक दूसरी वस्तु से ठीक सम्बन्ध ( Right Relation ) स्थापित करते हुए ही उठना है। वह सांसारिक वस्तुओंसे ठीक सम्बन्ध रखेगा तो उसे सांसारिक सुख मिलेंगे। आध्यात्मिक वस्तुओंसे ठीक संबंध रखेगा तो उसे उनका सुख मिलेगा। अतः हमने प्रकरणमें उद्धृतगीतावाक्यके शब्दोंमें कहा है, कि विना यज्ञ के इह लोक और परलोक दोनों विगडते हैं । अतः यश सर्वत्र है। सांसारिक भी है आध्यात्मिक भी। हम संसारी लोगों को पहिले सांसारिक या ही करने हैं । अतः इस निवन्ध में इन्ही रूपोपर चल दिया है। वर्तमान भारतको अभी इसीकी आवश्यकता है। ( ४ ) प्रश्न । बलिदानको यज्ञका प्राण बतलाया गया है। वलिदान अच्छीसे अच्छी वस्तु का करना चाहिये । जितनी अच्छी वस्तुका बलिदान होगा उतनाही भारी पुण्य होगा और यश उतना ही वढेगा। तो राष्ट्रयशकी वृद्धिके लिये झूठ बोलना अर्थात् सत्य जैसी सर्वोत्तम वस्तु का बलिदान करना उचित है? अपने देशके लिये अपनी आचार या नीति(diorality)का बलिदान कर चोरी करनी, डाका डालना आदि कर्म उच्च प्रकारका बलिदान या नहीं ? उदाहरणार्थ गत रूसजापानयुद्धमें जापानने रूस में वेश्यायें भेजी थीं कि रूसके बडे बडे राज्याधिकारिओ को ललचा कर जापान के अनुकूल रखे तो क्या वह जापान वेश्याओंका स्वदेश के लिये अपने चरित्रका भी बलिदान देना उचित था? उत्तर। यह एक बडा भारी भ्रम है कि अपनी अच्छी से अच्छी वस्तु को त्याग देना चाहिये या नाश कर देना चाहिये और यही अच्छेसे अच्छे बलिदान है । हमें इसका ठीक अर्थ ८ वैदिक यज्ञ संस्था । समझना चाहिये। इस निबन्ध में (देखो ३४ ३ प्रकरण का प्रारंभ) बतलाया गया है, कि नाश तीन प्रकारसे हो सकता है, (१ हिंसा-किसी दूसरे का नाश । (२) आत्मघात-अपने आपका ही नाश कर देना । (३) आत्मबलिदान-अपनी उस प्रियसे प्रिय वस्तुको भी त्याग देना जो कि हमारे यज्ञके आगे बढनेमें बाधक हो रही हो। पहिले दो कार्य अर्थात् हिंसा और आत्मघात दोनों पाप हैं। यज्ञ में ये दोनों कार्य नहीं होते हैं । किन्तु तीसरा अर्थात् आत्मबलिदान बडा भारी पुण्य है और यज्ञ में प्राण की तरह आवश्यक है । हिंसा अर्थात् दूसरे का नाश करना तो स्पष्ट एक पृथक् वस्तु है, किन्तु आत्मघात और आत्मवलिदान का अर्थ हमें साफ विवेकपूर्वक समझ लेना चाहिये, क्यों कि इनके समझने में बहुतों को भ्रम होता है। आत्मघात- द्वारा अपने आपको ( यज्ञांग को, क्यों कि यज्ञकर्ता यश का अंग है) नाश करने से तो यज्ञ को हानि पहुंचती है, परन्तु आत्मबलिदान द्वारा अपनी बुराइओं को (जो कि यज्ञ में बाधक होती हैं ) त्यागने से यज्ञ की वृद्धि होती है। हमारी (यशाङ्ग) शुद्धिसे यज्ञ की शुद्धि होती है। आत्मघात तो अपने सच्चे स्वार्थ (यज्ञके स्वार्थ) का नाश करता है और इस यज्ञके स्वार्थ के अतिरिक्त और विरोधी जो स्वार्थ मनुष्योंमें पैदा हो जाते हैं उन झूठे स्वार्थों का त्याग करना आत्मबलिदान है। यज्ञके स्व+अर्थ (अपने अर्थ ) की पोषक जितनी बातें होती हैं वे मिलकर यज्ञको 'आत्मा' हैं, इस आत्मा की तो सब यत्न से रक्षा करनी चाहिये, इसका घात नहीं करना चाहिये, किन्तु इसमें भी बाधक वस्तुओंका बलिदान कर देना चाहिये यह आत्मपुष्टि है। इस आत्मघात और अत्मबलिदान का भेद है। यह ठीक है कि कईवार यह निर्णय करना .

परिशिष्ट। ११५ . पर - आत्मा कठिन हो जाता है कि इस समय इस वस्तु का त्याग आत्म- गत, या आत्मबलिदान । ऐसे समयपर जव कि शरीर को त्यागना नहीं चाहिये, शरीर द्वारा सेवा करनी चाहिये, जोपमें जाकर मर जाना आत्मघात ही है, यद्यपि ऊपर गलिदान प्रतीत होता है। इसी प्रकार जहां कि यगमें धन को व्यय नहीं करना चाहिये. यहां धनन्यय कर देना आत्मघात है. (धन द्वारा ) आत्मबलिदान नहीं। एवं बहुत स्थलों आत्मघात और आत्मबलिदान का निर्णय करना सचमन बहुत कठिन होता है । परन्तु अपने सदाचार का नाश नां सदा ही आत्मघात है, स्पष्ट का नाश करना और अतएव याका नाश करना है। क्यों कि ऋत ( सत्य नियम Moral laws ) का भंग कर अनृत कर्म करना बाम्नवमें 'आत्मा' को मारना आत्मा को मारना है। आत्मा अमर कहानी है. यह शरीरक मरनेसे भी नहीं मरती हैं । किन्तु मंसारमै आत्मा यदि किसी तरह मरती है तो वह संसार- व्यापी सत्यनियमों के भंग से ही मरती है, क्योंकि इससे यह संसाग्व्यापी परम आत्माक विरुद्ध हो जाती हैं । इसी लिये इन संसारव्यापी महान् नियमोंके भंग करनेसे किसी मी यम का उपकार नहीं हो सकता । जापान को वेश्या भेजने के कर्म से कुछ क्षणिक लाभ होता हुआ दिखायी दिया हो या न दिया हो किंतु इस कर्म से उसे ( उसके राष्ट्रयश को ) हानि तो निःसन्देह हुई होगी। क्यों कि एक आचारहीन पुरुष यजमें 'नहीं' बराबर है, बल्कि 'ऋण ' (-) तुल्य है । जिस यमके अंग आचारहीन पुरुष होगे वह यज्ञ उनके कारण असफल ही होगा। यह यज्ञ जिस हदतक ऐसे लोगों से बना होगा उस हदतक वह आत्मघात सिद्ध होगा। ऐसी

१
वैदिक यज्ञसंस्था।
शंका करनेवाले लोग यह बात भूल जाते हैं कि जो लोग
देशके लिए झूठ बोलनेको, चोरी करनेको उद्यत होते हैं वे
वस्तुतः सत्य और अस्तेयके असली महत्व को न जाननेके
कारण ही उनका बलिदान करनेको उद्यत हो जाते हैं। वे अपनी
समझमें देशके लिये देश से एक हीन वस्तुका बलिदान करते
हैं। जो मनुष्य सत्य और अहिंसा आदि विश्वनियमों
( Universal lars ) की असली कीमत जानता है वह सत्य
के लिये देशकार्य को ही बलिदान कर देगा, सत्यको कभी
नहीं। यह तो सभी मानेंगे कि जिस वस्तु ( यज्ञ) के लिये
बलिदान किया जाता है उसकी अपेक्षा तो बलिदान की.
जानेवाली
वस्तु छोटी ही होगी। तो छोटी वस्तु के लिये उससे
भी कीमती वस्तु ( ' अच्छोसे अच्छी वस्तु ' ) का त्याग
करना बलिदान नहीं किन्तु नाश (आत्मघात) है । हमने
यज्ञसे यज्ञका यजन
नामक प्रकरण में बतलाया है कि
बड़े यज्ञके लिये छोटे यज्ञका ही त्याग बलिदान है - वडा भारी
आत्मबलिदान ' है। पर यहां आचारनाश करना तो छोटे यज्ञके
लिये बडे यज्ञका नाश है - राष्ट्रयज्ञ के लिये संसारव्यापक ब्रह्म
यज्ञ का नाश करना है। अहिंसादि ऋत तो इस देश या इस
संसारके ही नहीं, किन्तु सब विश्वके यज्ञतंतु हैं। हां, ऊपर जाकर
ऐसी भी एक अवस्था आती है जब कि पुण्य और पाप दोनों एक
समान हो जाते हैं, किन्तु यह अवस्था तब आती है जब कि
मनुष्य मनोमय कोशके भी ऊपर विज्ञानमय, आनन्दमय कोशमें
पहुंच जाता है । जव उसका अपना जुदा मन नहीं रहता है तव
वह पापपुण्य से अस्पृष्ट हो जाता है । पर उस अवस्थामें पहुंची
न तो वे कस गयी हुई वेश्यायें थी और न हम साधारण आदमि-
ओं में भी कोई ऐसा है। पुण्यका भी वलिदान करनेवाला तो वही

परिशिष्ट । ११७ कहला सकता है जो कि उपर्युक्त प्रकारसे बुद्धितत्त्वमें पहुंच गया हो, हममें से कोई नहीं । यह ऐसी ही बात है जैसे कि वैश्यक लिये तो धनसंग्रह करना धर्म है, परन्तु धनसे ऊपर हो जानेके कारण ब्राह्मण के लिये वही धन जैसी आवश्यक वस्तु निरर्थक और त्याज्य होजाती है। इस लिये जब तक कि हम मनोमय कोशको 'नहीं जीत लेते तब तक तो पुण्यकर्म, सदाचार के नियम हमारी 'आत्मा' हैं और इनका त्यागना अपना और अपने यज्ञ का घात है। ( ५ )प्रश्न- निवन्धमें वर्णित यह 'वाद' तो वडा सुन्दर लगता है कि अन्दर के काम क्रोधकर्म आदि पशु ही वाहर के साकार पशु होते हैं, परन्तु यशों में जिन गौ, अश्व आदि पशुओं के काटने को बात आती है, वे पशु तो बडे अच्छे अच्छे हैं । ऐसा कौनसा दुर्भाव रूपी पशु है जो कि गौ या अश्व बनता है? इसके विपरीत जो वास्तवमें गंदे पशु हैं जैसे उल्ल, गदहा, कुत्ता, सूअर आदि (जो कि दुर्भावों के परिणाम स्पष्ट दीखते हैं ) उनके यज्ञ में वलि- दान की वात कहीं नहीं सुनी जाती। उत्तर-- यह प्रश्न अवश्य विचारणीय है। मैंने तो विचार मेरे मनमें आया था उसे एक वाद ( Theory ) के रूममें रख दिया है। इस वाद पर की गयी इस शंका का समाधान मैं तव तक नहीं कर सकता जब तक कि मैं उन स्थलों का विशेष अध्ययन न कर लूं जहां कि पशुओंके काटनेका वर्णन है तथा यज्ञमें वध्य कौन कौन पशु समझे गये हैं उन का पूरा पता न लगा लूं। फिर भी इतना तो स्पष्ट है कि ये गौ, अश्व, अज आदि भी आखिर पशु तो है ही और इन की दशा हमारी अपेक्षा बहुत दयनीय है।

११८ वादक यज्ञ सस्था। इतना और विचार दौडता है कि शायद इन अच्छे अच्छे ( उच्च पशुओं) के बलिदान का वर्णन इस लिये है क्यों कि उच्च बातों का बलिदान करना कठिन होता है। जैसे कि 'क्रोध त्याज्य है। इस की अपेक्षा यह समझना और करना कठिन है कि 'यश की भी इच्छा नहीं करनी चाहिये ' या 'सुखकीभी स्पृहा त्याज्य है। फिर भी यह मेरा वाद अभी बहुत विचारणीय है। (६) प्रश्न- इस समय में पुराने यज्ञों का उद्धार करना व्यर्थ है। यह कर्म- काण्ड जिससे कि उस समय बुद्ध भगवान् ही तंग आगये थे यदि फिर उद्धार किया जायगा तो हानि ही होगी। । मैंने बतलाया है कि यज्ञों की विधिमे, काण्डमें वर्तमान कालानुसार परिवर्तन कर लेने चाहिये । निर्जीव कर्मकाण्ड का मैनेभी विरोध किया है किन्तु जैसे कि आत्मा के लिये शरीर चाहिये वैसे कुछ न कुछ कर्मकाण्डविधि आवश्यक है। मैने विशेषतया सूक्ष्म यज्ञोके उद्धार की बात कही है अर्थात् वे यज्ञ जो जो कि पहिले बडे बडे अद्भुत फलदायक होते थे जैसे कि ब्रह्मयज्ञमें योग की सिद्धिये नथा पुत्रोत्पत्ति, वर्षा लाने, आदि के देव यज्ञ । इन प्राचीन यज्ञों का उद्धार तो (नये परिवर्तन सहित) आवश्यक है । पंचमहायज्ञोका भी उद्धार होना चाहिये । सभी का उद्धार (चाहे नये रूपसं )। होना चाहिये।

संज्ञपन और अवदान।
(ले०-धी० पं० घुददेव विद्यालङ्कार, 'आर्य सेवक')
आलम्भन. संमपन और अवदान इन तीन शब्दों ने मीमांसा के
साहित्य में जितना अनर्थ मनाया है उतना कदाचित् ही किन्हीं
अन्य शब्दों ने मचाया हो। इन्हीं शब्दों के कारण श्रीत यमों
की यमशाला याशाला नही प्रतीत होती, किन्तु एक अच्छा
खासा सैनिकागार दीख पडती है । समय समय पर भवभूति
कालिदासादि कवि " मया पुनर्मातं कोऽपि व्याघ्र इति"
" पशुमारणकर्मदारुणांऽप्यनुकम्पामृदुरेव श्रोत्रियः ।" आदि
शब्दों में इस बात पर दबी चांट भी करते रहते हैं। चार्वाक तो
बिलकुल स्पष्ट ही बोल उठा:-
पशुश्चग्निहतः स्वर्ग ज्योतिष्टोमे गमिप्यति ।
स्थपिता यजमानन नत्र फस्मान्न हन्यते ॥
पर यदि गम्भीर दृष्टि से देखें तो बहुत अंशों तक इस नृशंस
काण्ड का आधार इन्हीं तीन शब्दों पर है। आज हमारा विचार
इन में से 'संगपन ' और 'अवदान' पर कुछ प्रकाश डालने
का।
पहिलं संभपन को लीजिये । यह शब्द सं पूर्वक णिजन्त शा
धातु में ल्युट प्रत्यय करने पर बनता है । देवा भागं यथा पूर्वे
संजानाना उपासते ' आदि शतशः प्रमाणों से सिद्ध है कि संपूर्वक
मा धातु का अर्थ परिचय, प्रेम, सम्भूयशान आदि हैं, कहीं भी
हिंसा नहीं । फिर पता नहीं चलता कि णिच् तथा ल्युट् प्रत्ययों
स

१२०
वैदिक यज्ञ संस्था ।
ने इस में क्या वैचित्र्य उत्पन्न कर दिया जो इस का अर्थ एकदम
हिंसा हो गया ? अस्तु । देखना चाहिए कि वेद तथा वैदिक
साहित्य में णिच् तथा ल्युट प्रत्ययान्त प्रयोग भी किस अर्थ में
आया है।
विचित्र वात है कि प्रयोग भी मीमांसकों के पक्ष को समर्थन
नहीं करता। लीजिये, चारों वेदों में संझपन शब्द णिजन्त
तथा ल्युट् प्रत्ययान्त रूप में केवल एक स्थान पर अथर्व
वेद में आया है । मन्त्र यों हैं:-
सं वः पृच्यन्तां तन्वः सं मनांसि समु बता
संबोध्यम्ब्रह्मणस्पतिभर्गः संवा अजीगमत् ।
संज्ञपनं वो मनसोथो संशपनं हृदः
अथो भगस्य यच्छ्रान्तं तेन संशपयामि वः
यथादित्या वसुभिः संयभूवुर्मरुद्भिया अदृणीयमानाः
एवा त्रिणामन्नदृणीयमान इमान् जनान् संमनसस्कृधीह ॥
अथर्व ६ काण्ड ७४ सू० १-३ मन्त्र
इस प्रकरण में " संपृच्यन्तां" "समजीगमत्" "संवभवुः"
संमनसस्कृधि " यह संगठन की मुहारनी प्रबल साहचर्य
के बल से संज्ञपन के अर्थ पर क्या प्रकाश डाल रही है इसे
सहृदय लोग अनुभव करें। संस्कृतानभिज्ञ पाठकों के लिये
हम केवल तीन मंत्रों का अनुवाद और देते हैं ।
विद्वान् उपदेश करता है:-
" तुम्हारे शरीर सम्पृक्त ( आपस में खूब मिले हुए) हो।
मन सम्पृक्त हो, व्रत सम्पृक्त हो। उस ब्रह्मणस्पति कल्याण
स्वरूप प्रभु ने तुम्हें इकट्ठा किया है। तुम्हारे मनों में मिलकर
शान उत्पन्न हो । हृदयों में प्रेम हो। उस प्रभु के नाम पर

मापन और अवदान १२१ वै किये श्रम से मैं तुम्हें उत्तम ज्ञान प्राप्त कराता हूं" फिर वही विद्वान प्रभु से प्रार्थना करता है:- जिस प्रकार आदित्य (ब्रह्मचारी) वसुओं से, जिस प्रकार क्षत्रिय वैश्यों से निस्संकोच मिलते हैं उसी प्रकार हे भूर्भुवः स्वः अथवा अ उ म तीन नाम वाले प्रभो ! आप इन सब मनुष्यों को एक मन कर दीजिये।" यह हुआ एक संझपन। अव शतपथ का भी उदाहरण लीजिये- " अथातो मनसधैव चाचश्च। अहम्भद्र उदितं मनश्च ह वाक्चाहम्भद्र ऊहाते । तद्ध मन उवाच अहमेव त्वच्छ् योऽ- स्मिन व त्वया त्वं किञ्चनानभिगतं वदसि । सा यन्मम त्वं कृतानुकरानुवर्मास्यहमेव त्वछ्रे योऽस्मीति । ९ । अथ ह वागुवाच अहमेव त्वछे यस्यस्मि यद्धे त्वं वेत्थाह तद्विज्ञपयाम्यहं संज्ञ- पयामीति ॥" शतपथ कां० १ अ०४॥ अव मन वाणी के झगडे का हाल सुनो। एक वार मन और वाणी में "मैं बडा" "मैं बडी" हो पडी। सो मन बोला-मैं बडा। भला तू कौनसी बात बोलती है जो मैं नहीं, जानता। बस तू मेरा कहा करने वाली मेरी अनुचरी तुझ से बडा हूं । वाणी बोली बडी तो मैं ही हूँ। तुझे तो केवल शान ही ज्ञान है पर वह ज्ञान किसी काम का। 'आप को कुछ शान है' यह ज्ञान लोगों को तो मेरे द्वारा ही होता है। जोआप को ज्ञान है वह में ही प्रकाशित करती हूं और हृदयङ्गम , करती हूं। क्या यहां भी "संज्ञपयामि" के अर्थ के विषय में किसी को सन्देह हो सकता है ?

वादकयज्ञसंस्था। (२९ अब जरा उन प्रकरणों को लीजिये जहाँ संझपन का अर्थ काटना लिया जाता है। उदाहरणार्थ अग्नीपोम के प्रकरण में संज्ञपन का अर्थ वकरे को काटना किया जाता है। प्रथम तो संज्ञपन का अर्थ हिंसा है ही नहीं; और यदि कथञ्चित् दुर्जनतोषन्याय से यह अर्थ स्वीकार भी कर ले तो भी कम से कम इतना तो हम ऊपर व्याकरण तथा प्रकरण के वल से निर्विवाद रूपेण सिद्ध कर ही चुके हैं कि संशपन का अर्थ सम्यग्ज्ञान करना भी है। ऐसी अवस्था में यदि यह भी मान ले कि इस शब्द के हिंसा तथा सम्यक ज्ञान करना दोनों अर्थ हैं तो भी 'सैन्धवमानय' की तरह जो अर्थ प्रकरण सङ्गत होगा वही मानना पडेगा। अब अग्नीपोम में पशु संज्ञपन के पश्चात् 'वाचं ते शुन्धामि चरित्रास्ते शुन्धामि यजु० ६...... 'वाक्त आप्यायताम् ' आदि जितने शब्द पड़े हैं सव सम्यग्ज्ञान के अधिक अनुकूल हैं और हिंसार्थ के. सर्वथा प्रतिकूल हैं । चरित्रास्ते शन्धामि (तेरे चरित्र सुधारता हूं) को संगति पशु प्रकृति मूढ, वालकादि को सम्यग्ज्ञान कराने में ही हो सकती है न कि छाग वध इसी प्रकार अश्वमेध प्रकरण में वाक्य आता है-'एप वा स्वर्गों लोको यत्र पशुं संज्ञपयन्ति'। इस का अर्थ पौराणिक लोग करते हैं कि अश्वमेध में जिस स्थान पर अश्व का वध करते हैं उस स्थान का नाम स्वर्ग लोक है । क्यों न हो ? वहीं उसी स्वर्ग लोक में कपडा तान कर फिर घोडे और राज- महिषी का समागम कराया जाता है। इन लोगों को इस प्रकार वेद की हत्या करने में तनिक भी सङ्कोच नहीं होता। अब इस शब्द का दूसरा (हमारो सम्मति में एक मात्र) अर्थ लीजिये तो कितना सुसंगत है। 'वही स्थान स्वर्ग लोक -.

सशपन और अवदान। १२३ है जहां मूढ पशु भाव के लोगों को सुशिक्षित किया जाता है। अश्वमेध के लिये स्पष्ट ही कहा है 'राष्ट्र वा अश्वमेधः।' यही वाक्य उद्धृत करके यही अर्थ ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका में ऋपि दयानन्द ने किया है। धन्य है उस वेदोद्धारक ऋषि को जिसने इन के अविद्याजाल को इस प्रकार छिन्न भिन्न कर दिया। अब कहा जा सकता है कि विधि वाक्य के बलवान होने के कारण 'शुन्धामि 'यह मंत्र लिंग कुछ काम नहीं दे सकता। सो यह बात भी उपहसनीय है। क्योंकि यहां विधिवाक्य तथा मंत्र लिंग का विरोध नहीं किन्तु विधिवाक्य के अर्थ निर्णय में विवाद है। ऐसे समय में मंत्रलिंग के प्रावल्य को कोई पण्डित.पुंग व दुर्बल कहने का अधिकार नहीं रखता । हां, यदि विधिवाक्य का अर्थ अन्यथा निर्णीत हो जाता नो मन्त्र लिंग अवश्य कुछ दुर्वल हो जाता। किन्तु इस समय तो वह वज्र की भांति प्रतिवादियों के दुर्ग को भृमिसात् कर रहा है । अब लीजिये अवदान को। यह शब्द डुदान दाने ' 'दो अवखण्डने'' देञ् रक्षणे ' आदि अनेक धातुओं से सिद्ध होता है तथा यज्ञ में भिन्न भिन्न देवता निमित्तक हवि के लिये प्रयुक्त होता है । अब इसको वर्तमान मीमांसक लोग 'दो अवखण्डने ' से सिद्ध करते हैं। अर्थात् पशु के हृदय पाद नासिका जिहादि वह भाग जो भिन्न भिन्न देवताओं के लिये खण्डित करके ( काटकर ) रखे जाते हैं ' । हविः के लिये वार वार शब्द भी आता है " अवद्यति " और यह निस्सन्देह "दो अवखण्डने " का रूप है क्योंकि इस में श्यन् विकरण पडा है जो देवादिक "दोअवखण्डने" का निर्धारक है। किन्तु यह मीमांसक भद्र पुरुष इस वाक्य को न मालूम क्यों भूल जाते हैं ? शतपथ ब्राह्मण ने.इस समान रूपता मूलक भ्रम के निवारणार्थ ही लिखा है। . . में १२४ बदिक यज्ञसंस्था। - ऋणं ह वै जायते योऽस्ति । स जायमान एव देवभ्य ऋणिभ्यः पितृभ्यो मनुष्येभ्यः । स यदेव यजेत तेन देवेभ्य ऋणं जायते । तद्धथेभ्य एतत् करोति यदेनान्यजने यदभ्यो जुहोति ॥ २॥ अथ यदेवानुचीत नेनर्षिभ्य ऋणं जायने तद्धथेभ्य एतत् करोत्यूपीणानिधिगोप इत्यनूचानमाहुः ॥ ३ ॥ अथ यदेव प्रजामिच्छेत । तेन पितृभ्य प्रणं जायते तदशेभ्य एतत् करोति यदेवां सन्नताव्यवच्छिन्ता प्रजा भवति । अथ यदेव वासयेत । तेन मनुष्येभ्य ऋणं जायते नयेभ्य पतत् करोति यदेनान्वासयते यदेभ्योशनं ददाति स य एतानि सर्वाणि करोति स इतका तस्य सर्वमानं सर्व जितं । स येन देवेभ्य ऋणं जायते । तदनांस्तद. घदयते यद्यजतेऽथ यदन्नौ जुहोति तदनांस्तदचदयने तस्मा- धत्किचनाग्नौ जुद्धति तदवदानं नाम । " (शतपथ कां० १ अध्याय ७) इस सन्दर्भ में " तदनास्तदवदयते " यह भाग अत्यन्त ध्यान देने योग्य है । यह प्रयोग दे रक्षणे धातु का है, जिस से स्पष्ट है कि अवदान शब्द में दो अवखण्डने का भ्रम न हो। इसलिये महर्षि याज्ञवल्क्य स्पष्ट कह रहे हैं कि आहुतियों का नाम अवदान इस लिये है क्यों कि वह रक्षा करती हैं (ऋण के बन्धन से बचाती हैं)। फिर न मालूम मीमांसक लोग यहां दो अवखण्डने का प्रयोग क्यों बताते रहे? अब तो केवल इतना कर्त्तव्य शेप है कि इस सन्दर्भ का अनु- वाद कर दिया जाय । सो यों है संझपन और भवदान। १२५ पुरुष जन्म लेते ही ऋणी पैदा होता है । वह जन्म लेते ही चार का ऋणी होता है देवताओं का, ऋषियों का, पितरों का और मनुष्यों का । सो मनुष्य जो यश करता है सो देवताओं से ऋणी होता है। सो जो यश करता है जो आहुति देता है सो उन के निमित्त । जो दूसरों को पढाता है सो ऋषियों का ऋणी होता है सो उन के निमित्त पढाता है। इसी लिये अध्यापक को ऋषियों का निधि रक्षक कहते हैं। और जो सन्तान की इच्छा करे, सो पितरों का ऋणी होता है जो उन के निमित्त करता है जिस से उन की सन्तान - परम्परा टूटने नहीं पाती । जो घर में अतिथियों को बसाता है सो मनुष्य मात्र का ऋणी होता है सो यह उन के निमित्त करता है जो उन को घर में विश्राम देता है उन्हें भोजन कराता है । सो जो यह सब कर्म करता हो वही कृतका है। उसने सब कुछ पा लिया, सब कुछ जीत लिया सो क्योंकि देवों का ऋणी होता है । सो जो यज्ञ करता है वह यज्ञ ( सगठन) और आहुति उस की रक्षा करते हैं । इस लिये इस रक्षा करने के कारण जो कुछ आहुतिये अग्नि में की जाती हैं उन सब का नाम अवदान है।" नहीं मालूम कि इस से अधिक स्पष्ट प्रमाण और क्या उपस्थित किया जा सकता है?

--..-1 १२६ वैदिक यज्ञसंस्था । әәзәвәЭЭэээээээээээээээээээээээээээээвам यज्ञ में पशुहिंसा तथा उसका इतिहास । EEEEEEEEEEEEEEEEFFPPEECerradiff*LEKEEPERFET अव इस विषय पर विचार करने की आवश्यकता है कि यज्ञ में पशवध करना चाहिये वा नहीं तथा या में पशुहिंसा कर से चली और क्यों ? यज्ञ का पर्यायवाची शब्द एक अचर भी है जो प्रायः वेद में प्रयुक्त किया गया है, वर हिंसा का नाम है, परन्तु जिस कर्म में हिंसा का सम्पर्क न हो उसे अध्वर कहंग, इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि अध्वर, अथवा यनमै दिसा नहीं होनी चाहिये । महाभारतके शान्तिपर्व के २४ अध्यायमें एक श्लोक आता है:- अव्यवस्थितमर्यादेविमनास्तिफैन । संशयात्मभिरव्यक्तहिंसा समनुवर्णिता ॥ ४ ॥ अर्थात् उच्छङ्खल, मर्यादाशन्य, नास्तिक. मृढ तथा संशया. त्मिक लोगों ने यज्ञ में हिंसा का विधान वर्णित किया है, वस्तुतः यज्ञ में हिंसा नहीं करनी चाहिये । अस्तु । थापि हमारे बहुत से भाई यह शङ्का किया करते हैं कि यदि यज्ञ में हिंसा का विधान नहीं तो " अग्निपोमीयं पशुमालभेत इत्यादि ब्राह्मण वाक्यों में यज्ञ में पशु का आलम्भन अर्थात् मारना क्यों लिखा है तथा अश्वमेध, गोमेध आदि यज्ञ अति प्राचीन काल से प्रचलित चले आ रहे हैं उन की कैसे सड्गति होगी, उन भाईयों की शङ्का की निवृत्ति करने के लिये. हमें इन दो शब्दों के अर्थों पर विशेष ध्यान देना चाहिये । (१) आलम्भन (२) पशु । इन दोनों शब्दों के अर्थों के निर्धारित हो जाने पर इस आशंका का उत्तर स्वयमेव मिल जाता है। उनमें से पहले हम आलम्भन शब्द को ही लेते हैं।

-- पशुहिंसा तथा उसका इतिहास । १२७ इस बात में सन्देह नहीं कि ब्राह्मणग्रन्थ वेदों की व्याख्या है, वेदों में यशों के अनुष्ठान का विधान किया गया है अतएव ब्राह्मण अन्य भी उन उन यज्ञों के करने की विधि को बतलाते हैं, परन्तु इस बात को भी अपनी दष्टि से हटा नहीं देना चाहिये कि समय के भेद से प्रयुक्त भाषा के शब्दार्थों में भी भेद आ जाता है, उदाहरण के लिये हम निरुक्ककार यास्काचार्य के समय का एक शब्द "उपेक्षितव्यं" ही ले लेते हैं, वर्तमान समय में 'उपेक्षिनव्यं' कहने से उपेक्षा की दृष्टि से देखने अथवा किसी वस्तु की ओर ध्यान न देने का बोध होता है, परन्तु यास्काचार्यके समय इस शब्द का यह अर्थ न घा जो आप वर्तमान समय में कर रहे हैं, यास्काचार्य के समय इस शब्द का अर्थ वर्तमानार्थ से सर्वथा विरुद्ध " उप समीपं गत्वा ईक्षणीयं विचारणीयम् " अर्थात् ध्यानपूर्वक विचार करने से था. इत्यादि दृष्टान्तो से स्पष्ट प्रतीत होता है कि समय भेद से शब्दार्थ बदलते रहते हैं । अतएव हमारा कथन है कि यदि वर्तमान समय में आलम्भन का अर्थ मारना किया जाता है तो इस से यह नहीं समझ लेना चाहिये कि ब्राह्मणग्रन्धो के समय अथवा मूलवेद में भी आलम्भन का अर्थ मारना ही है। जैसे हम पहले पतला चुके हैं कि ब्राह्मणग्रन्थ वेदों की ही व्याख्या है अतः ब्राह्मणग्रन्थों के पारिभापिक शब्दों के अर्थों का यदि मूलवेद से ही पता लगसके तो लगाना चाहिये । यजुर्वेद के २४ वें अध्याय में एक मन्त्र आता है- प्रजापतये पुरुपान् हस्तिन आलभते वाचे प्लुपीन् चक्षुपै मशका छोत्राय भृगाः॥ य०२४।२९ यदि इस मन्त्र में आलभते क्रिया को मारण परक माना जाय तो हम पूछते हैं, कि प्रजापति, अर्थात् जो प्रजा का १२८ पदिक यज्ञसंस्था। मालिक हो वा राजा हो उस के लिये पुरुषों और हाथियों का आलम्भन क्या होगा ? क्या राजा लोग पुरुषों तथा हाथियों का मांस ही खाते हैं, जिससे उनके लिये पुरुषो तथा हाथियों को मारा जाय, एवं चक्षुओं के लिये मपको तथा कर्गों के लिये भृगों वा भ्रमरों का मारना कैसे बन सकता है, क्या भ्रमरों की मधुरगुञ्जान कर्णों के लिये कटु प्रतीत होती है जिस से कर्णों के लिय भ्रमरों का आलम्भन वा मारण किया जाय। हमारे विचार में तो यहां आलम्भन का अर्थ मारण उचित्र प्रतीत नहीं होता, किन्तु आलम्भन से प्राप्ति का अर्थ लेना चाहिये। जिस से प्रजापति अर्थात् राजा महाराजाओं के लिये युद्धों के लिये तथा अपनी सेवा के लिये तथा प्रजा के प्रबन्ध के लिये पुरुषों का आलम्भन वा प्राप्ति, एवं सवारी वा युद्ध के लिये हाथियों की प्राप्ति सङ्गत प्रतीत होती है। वही पुरुष प्रजापति कहलाता है जिस के पास बहुत से नौकर चाकर तथा हाथी घोडे हो, इसी प्रकार कर्ण के लिये भ्रमरो के आलम्भन से भी यही तात्पर्य है कि यदि मधुर मधुर शब्द सुनने हो तो वाटिकामें जाकर भ्रमरों की प्राप्तिसे अपने कानों को आप्यायित करो। इत्यादि, इसी अध्याय में एक और मन्त्र आता है। धूम्रान्वसन्तायालभेत श्वेतान्ग्रीष्माय कृष्णान् वर्षाभ्योऽरुणाञ्छरदे पृपतो हेमन्ताय पिशंगान् शिशिराय ॥ ११॥ य०२४ । ११ इस मंत्र में भिन्न भिन्न ऋतुओं में काली सफेद आदि वस्तुओं के आलम्भन करने की आज्ञा दी गई है। तथा ग्रीष्मऋतु मै श्वेत वस्तु का आलम्भन बतलाया गया है, इस से स्पष्ट प्रतीत होता पशुहिंसा तथा उसका इतिहास । , १२९ कि गर्मियों में श्वेत वस्त्र पहनने चाहिये, क्योकि वर्तमान समय का नवोन विज्ञान भी बतलाता है कि उष्णता तथा प्रकाश को श्वेत वस्त्र बहुत जल्दी अपने ऊपर से प्रतिक्षिप्त कर देता है अत: गर्मियों में श्वेत वस्त्र ही पहनने चाहिये एवं वसन्त ऋतु वा शीतऋतु में कृष्णवस्त्र धारण करने उचित हैं इसी प्रकार अन्य भिन्न भिन्न ऋतुओं में भी । इस लिये हमें मानना पडता है कि यहां पर आलम्भन के अर्थ आप्ति के ही हैं, यदि यहां पर आलम्भन का अर्थ पशमारण ही लिया जाय, सब हमें संसार में ऐसा कोई नियम नहीं दीखता जिस से पता लगे कि गामयों में श्वत पशुओं को ही मार कर खाना चाहिये और वसन्त तथा वर्षाऋन में कालों को ही, और नहीं। इस मंत्र में पशु शब्द पठित हैं, अतः दिकभाषा में आलम्भन शब्द से मारने के अर्थ को न लेकर प्राप्ति का अर्थ ही लेना चाहिये । अतएव:- वर्मताय फपिंजलानालभते ग्रीष्माय कलविकान् वर्षाभ्यस्तित्तिरी- छरदं वर्तिका हेमंताय ककरान शिशिराय विककरान्। समुद्राय शिगमारा नालभंत पर्जन्याय मण्डूकान् अदभ्यो मत्स्यान् मित्राय फुलांपयान् वारुणाय नाक्रान्। भूम्या आखूनालभतेऽन्तरिक्षाय पा- इफ्तान् दिवं कशान दिग्भ्यां नकुलान् वभुकानवान्तरदिशाभ्यः॥ इत्यादि यज.२४ अ.के मन्त्रों में भी यही समझना चाहिये कि वेद में भिन्न भिन्न प्राणियों के भिन्न भिन्न समुदाय बतलाये हैं जिन को मनुष्य ऋतुभेद से तथा स्थानभेद सं प्राप्त कर सकता है खाने के लिये नहीं किन्तु मनाविनादार्थ प्रदर्शनी के लिये । यदि खाने के लिये हो होते तो "वरुणाय नाकानालभते" इस के लिखने से क्या प्रयोजन था, नाको के मांस को तो मनुष्य नहीं खाता इसी प्रकार वैद्यक में चूहे के मांस को भी हानिकारक बतलाया है फिर भूम्या आखूनालमते " इस के लिखने से क्या प्रयोजन था ?

१३० वैदिक यज्ञसंस्था। हमारे विचार में तो यही आता है कि वेद में केवल इन प्राणियों का उत्पत्ति काल तथा निवासस्थान मात्र बतलाया है। क्योंकि वेद सब सत्य विद्याओं का भण्डार है अतः उस में बीजरूपेण प्राणिविद्या का होना भी आवश्यक ही था। इस प्रकार जब आप देख चुके हैं कि वेद में आलम्भन के अर्थ प्राप्ति के हैं न कि मारण के तव आप कैसे मान सकते है कि ब्राह्मणग्रन्थों में जो वेदों की ही व्याख्या है आलम्भन शब्द मारने के लिये आता होगा, अतएव मानना पडेगा कि ब्राह्मणग्रन्थों में भी आलम्भन शब्द प्राप्त्यर्थक ही है। आलम्भन शब्द को प्राप्त्यर्थक मान लेने पर यज्ञ में गौ अश्व आदि पशुओं को प्राप्ति आवश्यक हो प्रतीत होती है, क्योंकि ऋत्विजों को दूध के लिये गौवों तथा भार आदि उठाने के लिये बैलों और अश्वों की आवश्यकता पड़ती ही है। रामायण तथा महाभारत आदिमें जहां अश्वमेध आदि बडे बडे यज्ञों का वर्णन आता है वहां हम देखते हैं कि केवल एक ही पशु नहीं किन्तु सहस्रों की संख्या में वहां पशु एकत्रित किये जाते हैं। महाभारत अश्वमेधपर्व के ८५ अध्याय में हम इस प्रकार का लेख पाते हैं- स्थलजा जलजा ये च पशवः केचन प्रभो! सर्वानेव समानीतानपश्यस्तत्र ते नृपाः. ॥३२ ।। गाश्चैव महषीश्चैव तथा वृद्धस्त्रियोऽपि च औदकानि च सत्वानि श्वापदानि वयांसि च ॥३३॥ जरायुजाण्डजातानि स्वेदजान्युदभिजानि च पर्वतानपजातानि भूतानि ददृशुश्च ते ॥३४॥ एवं प्रमुदितं सर्व पशुगोधनधान्यतः यज्ञवाट नृपा दृष्ट्वा परं विस्मयमागताः ॥३५॥ अर्थात युधिष्ठिर के अश्वमेधयज्ञ में आये हुवे राजाओं पशुहिंसा नया उसका इतिहास | १३१ ने स्थल में उत्पन्न होने वाले, जल में रहने वाले तथा अन्य नाना प्रकार के प्राणि देखेः जिन में से भिन्न भिन्न प्रकार की गोएं, भैसे, भिन्न भिन्न देशों से आई हुई वृद्धस्त्रियें, जल में निवास करने वाले नानाप्रकार के प्राणि. तरह तरह के पक्षी, जरायज, अण्डज, तथा स्वेदज, इसी प्रकार पर्वतों में निवास करने वाले प्राणि, इन सब प्रकार के प्राणियों को देख कर जो अस्वमधयम में लाये गये थे राजा लोग बडे ही प्रसन्न हुवे । एवं सहस्रों की संख्या में भिन्न भिन्न प्रकार के पशुओं का यक्षों में एकत्रित करना केवल मारने के लिये ही नहीं हो सकता, किन्तु अनुमान किया जा सकता है कि प्राचीन समय में यशों के समय पशुओं की प्रदर्शिनी की जाया करती थी। अथवा यश शब्द यज धातु से बना है जिस के अर्थ देवपूजा. 'संगतिकरण तथा दान यह तीन हैं, अतः जिस प्रदर्शिनी में अश्व आदि नानाप्रकार के पशुओं को एकत्रित वा सङ्गत किया जाता है उस प्रदर्शिनी को भी हम अश्वमेधयक्ष के नाम से कह सकते हैं। यह यक्षों में पशुवध सर्वथा नवीन कपोलकल्पित है, प्राचीन नहीं: भीष्मपितामह महाभारत के शान्तिपर्व के२६४अध्यायमें कहते हैं- अव्यवस्थितमर्यादेविमढेर्नास्तिकैनरैः संशयात्मभिरन्यकैहिंसासमनुवर्णिता ॥४॥ , अर्थात् यश में हिंसा का विधान, उच्छृङ्खल, मर्यादाशून्य, मुद्र, नास्तिक, लोगों की ओर से किया गया है; यह सव कपोल-- कल्पित है प्राचीन समय में यज्ञ में हिंसा नहीं होती थी। शतपथ ब्राह्मण के चतुर्दश काण्ड में तो एक स्थान पर स्पष्ट लिखा है कि " राष्ट्र या अश्वमेधः " अर्थात् राष्ट्र की रक्षा वा पालन करने का ही नाम अश्वमेव है।

- १३२ वैदिक यज्ञसंस्था । उपनिषद् में " इन्द्रियाणि हयानाहुः" इत्यादि वाक्यों से इन्द्रियों को अवों के साथ उपमा दी गई है अत: अश्वमेध का अर्थ इन्द्रियों का वश में करना भी हो सकता है। इसी आशय कोमन में रखकर मनुभगवान् मनुस्मृति के एकादश अध्याय में कहते हैं:- यथाश्वमेधः ऋतुराट् सर्वपापापनोदनः तथा घमर्षणं सूक्तं सर्वपापोपनोदनम् ॥ यहां पर अघमर्षण सूक्त की अश्वमेधयज्ञ के साथ तुलना करके कहा गया है कि जिस प्रकार सब यज्ञों का राजा अश्वमेध यज्ञ सर्व पापों का दूर करनेवाला होता है इसी प्रकार अघमर्षण सूक्त भी पापों का दूर करनेवाला है। यज्ञ में घोडे को मारने से कभी पाप दूर नहीं हो सकते किन्तु यदि अश्व शब्द से इन्द्रिये ले ली जाय तो इन्द्रियों को वश में कर के शान्तचित्त रहने से पापों से अवश्यमेव छुटकारा हो सकता है, अतः अश्वमेधयज्ञ से तात्पर्य इन्द्रियदमन से भी है। गोमेध यज्ञ के विषय में महर्षि दयानन्द जी लिखते हैं कि "गौ शब्द का अर्थ पृथिवी का है अतः पृथिवी में हल चलाकर उस में कृषि करने के व्यवहार को ही गोमेध यज्ञ कहना चाहिये न कि उस याग को जिस में गौ का वध किया जाय, क्यों कि गौ अभ्या है। इसी प्रकार पारसियोमें भी गोमेजयज्ञ प्रसिद्ध है जो गोमेध का अपभ्रंश प्रतीत होता है, उनकी धर्मपुस्तक जिन्दा- वस्था में भी गोमेज के वही अर्थ किये गये हैं जो स्वामी जी महाराज ने गोमेध के अर्थ किये हैं। अतः मानना पडता है कि यज्ञ में गौ, अश्व आदि का मारना यह सब आधुनिक कपोल कल्पित हैं प्राचीन नहीं।

-- पशु शब्द। वेद में पशु शब्द से किन किन वस्तुओं का ग्रहण होता है इसको हम एक घेदमन्त्र से ही दिखलाना चाहते हैं । यजुर्वेद के २३ वे अध्याय में एक मंत्र है:- अग्निः पशुरासीत्तेनायजन्त स एतं लोकमजयत् यस्मिन्नग्निः स ते लोको भविष्यति तं जेप्यसि पिवैता अपः । वायुः पशुरासी- तेनायजन्त स एतं लोकमजयत् यस्मिन्वायुः स ते लोको भविष्यति तं जप्यसि पिवैता अपः । सूर्यः पशुरासीत्तेनायजन्त स एतं लोक- मजयत् यस्मिन्सूर्यः स ते लोको भविष्यतितं जेप्यसि पिचता अपः। यह मन्त्र स्पष्टतया बतलाता है कि अग्नि, वायु, सूर्य यही पशु हैं जो मनुष्य इन पशुओं से यज्ञ करता है अर्थात् इन को अपने प्रयोग में लाना सोखता है वही सर्वत्र विजय को प्राप्त होता है। वेद में पशु शब्द कंवल पशु में ही रूढ नहीं किन्तु वैदिक शब्द प्रायः यौगिक होते हैं इसी प्रकार ब्राह्मणग्रंथों में भी समझ लेना चाहिये । परन्तु यदि ब्राम्हणग्रंथों में कहीं मांसभक्षण वा यज्ञ में मांसप्रक्षेपण का विधान आ भी जावे तव भी हम उसे ब्राम्हणग्रंथके परतः प्रमाण होनसे तथा वेदविरुद्ध होनेसे त्याज्य मान सकते हैं। अत एव जब वेद में पशु शब्द से अग्नि, वायु तथा सूर्य लिये गये हैं तो ब्राह्मण वाक्यों में पशु शब्द से साधारण लोकप्रसिद्ध पशु कैसे लिया जा सकता है इस से प्रात होता है कि ब्राह्मणग्रंथ तथा घेद " अग्निपोमीयं पशुमालभेत । " इत्यादि वाक्यों से एक अति महान् तथा उच्च, अग्नि, वायु, तथा सूर्य की विद्या कोप्राप्त करने का उपदेश करते हैं। किन्तु मूर्ख मनुष्यों ने उस के यथार्थ अर्थों को न समझ कर अपने स्वार्थ के लिये मनघडन्त अर्थ कर लिये हैं। महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्मपितामह युधिष्ठिर से मांस का यक्ष में डालना कव से चला इस को बतलाते हुये कहते हैं- - य इच्छेत् पुरुषोत्यन्तमात्मानं निरुपद्रवम् स वर्जयेत् मांसानि प्राणिनामिह सर्वशः ॥ श्रूयते हि पुरा कल्पे नृणां व्रीहिमयः पशुः येनाध्यजन्त यज्वानः पुण्यलोकपरायणाः ॥ अर्थात् जो मनुष्य अपनी जीवनयात्रा शांति से व्यतीत करना चाहे उस के लिये चाहिये कि वह मांसभक्षण कभी भी न करे। ऐसा सुना जाता है कि पुराने जमाने मेमनुष्य "पाति इति पशुः" पालन करने हारा होने से बीहिमय अथवा धान्यमय ही पशु सम- झते थे और उसी से पुण्यलोक की प्राप्ति के लिये ऋत्विग लोग यश किया करते थे। ये श्लोक स्पष्ट बतला रहे हैं कि महाभारत से ३०० वा ४०० वर्ष पूर्व यज्ञ में मांस नहीं डाला जाता था, किन्तु पशु शब्द से बीहि को ही लिया जाता था क्योंकि धान्य ही प्राणरक्षार्थ उपयोगी वस्तु है यह यज्ञ में पशु का मांस डालने की विधि महाभारत से कुछ ही पूर्व जब आर्यजाति पतित होने लगी थी चली है। महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म जी कहते हैं- दुष्करं हि रसाने मांसस्य परिवर्जनम् चर्तुं व्रतमिदं श्रेष्ठं सर्वप्राण्यभयप्रदम् ॥ अर्थात् मांस के रस का आस्वाद विदित हो जाने पर मांस का छूटना असम्भव है, मांसभक्षी कभी भी सर्वोत्तम अहिंसावत . का पालन नहीं कर सकता। केवल मांसभक्षणरूपी दुर्व्यसन का । ही यह हाल नहीं किन्तु सब व्यसनों में ऐसी ही प्रवृत्ति देखी जाती है, एक वार भी यदि कोई व्यसन किसी मनुष्य के पीछे लग जाय तो उस का उस व्यसन से छूटना दुःसाध्य हो जाता है पशुहसा तथा उसका हातहास। मांस को तो कथा ही क्या है, क्योंकि मांसास्वादन तो रसना का विषय है, लोभ से बढकर अन्य कोई पाप नहीं "लोम ही सब पापों का मूल कारण होता है। अतः जब आर्यजाति को इस मांसभक्षण रूपी दुर्व्यसन ने आ दवाया तय यह लगातार शीघ्रगति से बढता ही गया, इसकी वृद्धि इतनी होगई कि लोग मांसभक्षण तथा पशुओं को यक्षों में डालने को धर्म ही समझने लग गये। । उन्होंने वेदमन्त्रों तथा ग्राह्मणवाक्यों के अर्थों का भी अनर्थ कर डाला तथा सैकडों स्वार्थी मांसलोलुपों ने धर्मग्रन्थ मनुस्मृत्यादि में भी मांसभक्षणपरक श्लोक मिला दिये, परन्तु उन धूतों की यह धूर्तता छिपी न रह सकी, यदि वह मांसवर्जनपरक श्लोकों को इन धर्मग्रन्थों से निकाल कर अपने मन घडन्त श्लोक वा सूत्र इन में मिलाते तो उनकी कार्यसिद्धि हो जाती परन्तु-- धूर्तानाञ्च खलानाञ्च परद्रव्यापहारिणाम् । अभिप्रायाः न सिद्धयन्ति तेनेदं वर्तते जगत॥ इस न्यायानुसार उन धुत्तों को मांसनिषेधक श्लोकों वा सूत्रों के निकाल देनकी न सूझी अतएव अव उन की पोल स्पष्टतया खल गई है, पत्रं जितने मनुस्मृत्यादि धर्मग्रन्थों में मांसपरक श्लोक मिलते हैं उनको महाभारत के समय के पश्चात् का क्षेपक समझना चाहिये, पुराण तथा तन्त्रग्रन्थ तो बने ही वामियों के समय में हैं अतः इनके वचनों पर श्रद्धा नहीं की जा सकती। वाममार्ग के समय यज्ञ में पशुवध इतना बढ गया था कि उस समय अहिंसाधर्म के प्रचारार्थ महात्मा बुद्ध को जन्म धारण करना पडा । परन्तु तथापि पौराणिकधर्म वल पकडता हीगया। यही मुख्य कारण है जिस से मांसभक्षण तथा मांस को यशों में डालने का प्रचार दिन दुना रात चौगुना वढता ही गया, और १३६ वैदिक यज्ञसंस्था । - आज हम देखते हैं कि प्रायः सारे भमण्डल में मांस का प्रचार हो रहा है । कोई धर्मपुस्तक ऐसी नहीं मिलती जिस में मांसभक्षण का विधान न पाया जाता हो परन्तु वास्तविक बात क्या है इस को वही समझ सकता है जिसने प्राचीन संस्कृत साहित्य का अनुशीलन किया हो तथा सत्य की खोज करना चाहता हो। वर्तमान समय की सांसारिक दशा को देख कर हम परमात्मा से यही प्रार्थना करेंगे ये वाजिनं परि पश्यन्ति पक्वं य ईमाहुः सुरभिर्निर्हरेति । ये चार्वतो मांसभिक्षामुपासते उतो तेषामभिगूर्तिर्न इन्वतु ॥ अर्थात् ए भिन्न भिन्न देश के राजे महाराजाओं ! वह मनुष्य जो सुन्दर गमन स्वभाव तरुणावस्थापन्न परिपक्व शरीरयुक्त अश्वो अथवा अन्य प्राणियों के मांसों की भिक्षा करना चाहते वा करते हैं जिन के मन में दया का लेश नहीं उनको अपने अपने राज्यों से (निःहर) पृथक् कर दो। और उन मांसभोजियों का बल शाक वा फलभोजियों को प्राप्त हो जिस से फलभोजी अपने सच्चे धर्म का प्रचार सुगमता से कर सके तथा मांसभक्षण की कुरीति को संसार से सर्वथा दूर हटा सके । इति ।

पुरुप मेधा 'नर-मेध ह 'पुरुष-मेध, नर-मेध,न-मेध, मनुष्य-यज्ञ, न-यज्ञ' आदि नरमेध- वाचक सब शब्द एकहि भाव रखते हैं। 'मेध' शब्दके यौगिक अर्थ:- (१) मिलना, (२) परस्पर मित्रता करना, (३) ऐक्य करना, (8) एक दूसरेको जानना, (५) जोडना, (६) प्रेम करना, (७) धारणाबुद्धिका बल और नेज बढाना, (८) पवित्रता करना,(९) सत्व, बल और उत्साह बढाना, (१०) यज्ञ अर्थात् 'सत्कार- मंत्री-उपकार' करना इनन हैं। मेध-वाचक इन अर्थोंके साथ 'नर-मंध 'शब्दके अर्थः- (१) मनुष्योंका मिलान करना, (२) मनुष्योम, परस्पर मित्रता करना; (३) मनुष्योका ऐक्य करना; (४ : मनुष्योंने परस्पर एक दूसरेको अच्छी प्रकार जानकर व्यवहार करना: (५) मनुष्योंमें परस्पर प्रेमका संबंध जोडकर उसको अधिक दृढ बनानाः (६) मनुष्योंमें परस्पर प्रेमका वर्ताव करना: (७) मनुष्योंकी धारणाशक्तिको वृद्धि करना; (८) मनुष्योंको पवित्र बनाना, (९) मनुष्योमे सत्व, वल, उत्साह आदि गुणोंकी वृद्धि करना, (१०) मनुष्योमें सत्कार भाव, परस्पर मित्रता और परस्परका औदार्य वढाना; इ० होते हैं। इन्ही अर्थोंको लेकर मनुभगवानने कहा है कि:- नृ--यझोतिथि--पूजनम्। 'अतिथिका सत्कार करनाहि मनुष्य--यज्ञ है। ' आजकल 'नर. मेध' का भाव 'नरमांसका हवन करना,' समझते हैं, परंतु इस मनु. ३७०॥ , १३८ वैदिक यज्ञसंस्था - आशयके लिये वेदमें कोई आधार नहीं । यजु० अ० ३० और ३१ में 'नरमेध' का विषय आया है। इन दोनों अध्यायोमें ऐसा एकभी मंत्र नहीं है, कि जिससे नरमांसके हवनका थोडासामी भाव निकल सके। अ० ३१ के विषयमें जो लिखना होगा वह उस अध्यायके प्रस्तावमें लिखूगा, यहां केवल अ० ३० के विषयम हि लिखना है। मेधमें हिंसाका भाव । 'मेध' में हिंसाका भाव है। 'मेध- मेधा-हिंसनयोः संगमे । ऐसा अर्थ मुनीश्वर पाणिनी देते हैं । अर्थात् 'मेध' का अर्थ- (१) मेधा बुद्धि वढाना, (२) हिंसन करना और (३) संगम अर्थात् संगति किंवा मित्रता करना । जिनके साथ मित्रता करनी और जिनकी मेधावुद्धि बढानी, उन्होकी हिंसा करनी: यह बात सुसंगत नहीं दीखती । उदाहरण के लिये देखीएः--शानी पुरुषोंके साथ मित्रता करनी उचित है और साधारण मनुष्योंकी धारणा- शक्तिकी वृद्धि करके उनको उन्नत करना आवश्य है, ये दोनों बात सर्वसंमत हो सकती हैं। परंतु इनही मनुष्योंका हनन करना किस प्रकार योग्य होसकेगा? यदि शानियोका हनन हुआ, तो ज्ञानप्रचार और बुद्धिवर्धनका कार्यहि नष्ट होगा; इसलिये इस शब्दमें जो हिंसा का भाव है, वह ज्ञान के विरोधियोंके विषयमें समझना उचित है। जैसा देखीए:-(१)विद्वानोंके साथ मित्रता करना, (२) मनुष्यों की धारणावुद्धिकी वृद्धि करना और (३) जो इन दो कर्तव्यों के साथ विरोध करेंगे उनकी हिंसा करना अर्थात् उनका विरोध हटाना अथवा विरोध करनेवालोको दूर करना । इसी प्रकार इस शब्दके हिंसाका अर्थ समझना उचित है । अन्यथा अर्थका अनर्थ हो जायगा और वेदके उत्तम आशयका विघाड होगा। इसलिये १३९ उतिक विरोधक दस्युमायका हनन अर्थात् नाश करनाही याकी हिंसा है। इसी हेतुस अहंकार, क्रोध, आलस आदिका मानस- या-वारा नाश करनेके लिये उपनिषद् ग्रंथोंमें कहा है। 'मन्युः पशुः ' आदि शादोका यही आशय है कि, शानविरोधक जो क्रोध आदि पाशवी वृत्तियां हैं, उनहीका नाश करना आध्यात्मिक यीय दिसाका तात्पर्य है। निम्न कोष्टकस 'मेध' के 'मेध, संगम और हिंसा के भावोका स्पष्ट पता लग जायगा- नर-मध। मंधाशनि। संगति करण । हिंसा। - : मनोका मेलमिलाफ, २ परस्पर मित्रता. ३ परम्पर पाय, परम्परका उत्तम जान, ५ परम्परका रढ संबंध, ६परस्परका प्रेम, ७ बुद्धिका विकास, ८ मनुष्योकी पवित्रता, बलकी वृद्धि, २० परस्पर सत्कार और सहाय संरक्षक विचार। १ परस्पर न मिलना, २ परस्पर उपभाव, ३ परस्पर भेदभाव, ४परस्परका अज्ञान, ५परस्परकी उदासीनता ६ परस्पर अप्रीति, ७ बुद्धिका संकोच, ८ मनुष्योंकी अपवित्रता, २वलका नाश, १० परस्पर निरादर और दोपष्टि विनाशक विचार। दूकरना। प्राप्त करना।

4 २४० वैदिक यज्ञसंस्था। इस प्रकार 'मेघ' केहिंसाभावका तात्पर्य है। 'बुद्धि, संगति' और हिंसा'इन तीनोभावोंका विशेषतया नरमेध और सामान्यतया सव मेधोमयही तात्पर्य है। जो बुद्धि और संगति का विरोध करेगा, उसको दहटाना है। यहीभाव लेकर इस अध्यायका निम्न मंत्रदेखीए ब्रह्मणे ब्राह्मणं आलभेत । क्षत्राय राजन्यं आलभेत। 'शानके लिये ब्राह्मणको प्राप्त करे । शौर्य के लिये क्षत्रियको प्राप्त करे । ' यह वास्तविक अर्थ है। परंतु भ्रमसे इन मंत्रोका निम्नप्रकारका अर्थ समझा जाता है- ब्रह्म देवताके प्रीत्यर्थ ब्राह्मणका आलंभन अर्थात् बलिदान फरे, क्षत्रदेवताके प्रीत्यर्थ क्षत्रियका बलिदान करे। इस अध्याय के श्री. उवटाचार्य और महीधराचार्यके भाष्योमै इसीप्रकार. अर्थ किये हैं। और इनके भाष्यानुसार पं० ज्वालाप्रसाद मिश्रजीने अपने यजुर्वेदके मिश्रभाप्यमें भी इसी प्रकारका भाव बताया है। पंडित ज्वालाप्रसादजी कहते हैं कि, ' ग्यारह यूप... सुशोभित करने चाहिए।' जिसमें ...... ब्राह्मण--क्षत्रियादि सब पुरुषोंको नियुक्त करना चाहिए।' इसी अध्यायके प्रसंगमें पं० स्वाला- प्रसादजी ब्राह्मणक्षत्रियादिकोंको यूपोंके साथ बांधनेके लिये कहते हैं। कौनसा तेजस्वी ब्रह्मवर्चस्वी ब्राह्मण तथा मानधन वीर्यशाली उग्र क्षत्रिय अपने आपको यूपके साथ बंधवानेके लिये सिद्ध होगा? अथवा जो अपने आपको पशुवत् यूपके साथ बंधवाने के लिये सिद्ध होगा, वह ब्राह्मण और वह क्षत्रिय भी किस श्रेणीका होगा? जिसमें मनुष्यत्व और पशुत्वके भेदका भी परिशान नहीं है। वास्तव . बात इतनीही है कि, जो बात वेदमंत्रोंमें नहीं है, वही वेदमंत्रोपर लदानका संकल्प इन लोगोंने किया है । शानसे अथवा अशानसे इन लोगोंने अर्थका अनर्थ कर छोडा है, इसमें कोई संदेह नहीं।

नरमंध। १४१ साधारण विचारसे भी इसका पता लग सकता है कि मानके लिये मानीकं पास पहुंचना चाहिए न कि शानीका वध करना चादिए, तथा 'वीरताके लिये क्षत्रियको पास करना चाहिए' न कि शर पुरुषका वध करना चाहिए । वध तो उनका करना चाहिए कि,जो मान और शौर्य के प्रचारमै विघ्न खडा करेगा और लोगोंको भान और शौर्यसे वंचित रखेगा। मेधक मंधा-संगम' 'हिंसा' इन तीन अर्थोकी व्यवस्थाको न समझने के कारण इन लोगोंने भ्रमसे विपरीत अर्ध किये हैं, वे सब त्याज्य है । 'न-यज्ञ' का अर्थ अतिथि-पूजा, जो मनुने कहा है, उसकी ओर भी यदि इनका ग्याल चले जाता. तो भी ये सब विद्वान ठीक मार्गपर आ सकते थे: परंतु दुर्दैव है कि मनुको सूचनाको ओर किसीका ध्यान पहुंचाहि नहीं। अव नरमेधका अर्थ विशेष स्पष्ट होने के लिये नरमंधका तात्पर्य नीचे देता ई- 'नरमेधा का तात्पर्य मनुष्यत्वका विकास' है। यावाचक वैदिक शब्दोका विचार करनेसे नरमेध अथवा पुरुष मंधका मुख्य उद्देश ' मनुष्यत्वका विकास' है, यही बात निश्चित होती है। मान, बल, तेज, वीर्य, पौरुप आदि गुणोंकी वृद्धि प्रत्येक मनुष्यमें करना और प्रत्येक मनुप्यके सब शक्तियोका विकास करना, नरमेधका व्यक्तिविषयक कर्तव्य है। तथा राष्ट्र और समाजम उक गुणोंसे युक्त गुणी पुरुषोंकी संख्या बढाकर शान, चल, तेज, वीर्य, पीरुप और उत्साहमय ओजस्विता उत्पन्न करना नरमंथका जनता विषयक कर्तव्य है। समाजमें संघकी शक्ति यढाकर सब राष्ट्रको एक जीवनसे युक्त करना ही पुरुषमेधसे वैदिक यज्ञसंस्था । साध्य है। (१) सत्कार, (२) ऐक्य, (३) मित्रता, (४) परोपकार, (५) सुविचार, (६) अहिंसा, (७) शानप्रचार, (८) नीतिधर्म, (९) उत्साह, (१०) उपभोग, (११) देवत्वका विस्तार, (१२) उन्नति, (१३) विकास, (१४) शांति और (१५) रक्षण। ये पंध्रह भाव मुख्यतया यमके पंध्रह नमोसे प्रकट हो रहे हैं। यशवाचक प्रत्येक शब्दके जो अनेक अर्थ हैं, उनको देखनेसे और भी अनेक गूढ आशय प्रकट हो सकते हैं। परंतु उक्त१५ भावहि यशका आत्मा है। इनमें 'अ-ध्वर' शब्दसे 'अ-हिंसा' का आशय व्यक्त होनेके कारण यशमें हिंसाका अर्थ आ नहीं सकता। मनुष्य अथवा पशुका वध करना और उसके मांसकी आहुतियं देना, तथा इस प्रकारके समांस यशकी कल्पना करना, वेदमंत्रोंके उपदेशसे सर्वथा विरुद्ध है। नरमेधका वर्णन यजु० अ० ३० । ३१ में है। इन दोनों अध्यायोंमें एकभी ऐसा मंत्र नहीं, कि जिससे नरमांसके हवनको शंकाभी किसीके मनमें उत्पन्न हो सके। नरमेधके विषयमें युरोपीयन लोगोंकी संमति । म० राल्फ टी० एच्. ग्रिफिथ् महोदय कहते हैं:- (यजुर्वेद भाषांतर अ. ३० पृ. २५५) 'यजु.३० । ३१ अध्याय पुरुषमेध अथवा मनुष्यके बलिदान का वर्णन करते हैं। यह प्रथा प्रायः सब प्राचीन देशोमे बहुत पुराणे समय से चली आई है। यह यश ब्राह्मण अथवा क्षत्रियकोहि करनेका अधिकार है। इसके करनेसे वह फल प्राप्त होते हैं, कि जो अश्वमेधसे नहीं मिल सकते। इस पुरुषमेधको यज्ञप्रक्रिया अश्वमेधके समानहि है। अश्वके स्थानपर, मनुष्य, सबसे श्रेष्ठ वलि, केवल नरमेध। १४३ चिदमावस अथवा वास्तविक रीतीसे अर्पण किया जाता है, तथा मनुष्यके साथ अनेक जाति, आकार, रंग, स्वभाव, धंदे आदिके अनेक स्त्रीपुरुष यूपके साथ बांधे जाते हैं, जहां अश्व मेध में जंगली और ग्रामीण पशु गंधे जाते हैं, जैसा कि अ. २४ में लिखा है। ये नाममात्र बलि यशसमाप्तिके पश्चात, किसी प्रकारका घातपात न कराके, खुले किये जाते, है, और शुक्लयजुधेदके आधारसे यह बात स्पष्ट है कि यह सब क्रिया केवल लक्षणमात्र है। विश्व-पुरुप, चैतन्य, अथवा पुरुषके आत्म-बलिदानके रूपक अलंकारका यह एक नमूना - म० झनैद अ० रागोझिन महोदय को संमतिः- ( राष्ट्रोंकी कथाएं-चैदिक इंडिया पृ०४०७-४१३ ) परसे- "अश्वमेधर्म प्रथमतः घोडे के पीछेसे मनुष्य और पहिले बकरा पलिदानके लिये ले जाते थे। प्राचीन आर्योंकी पूजा- विधिम नरवलिका एक भाग था इसमें कोई संदेह नहीं...... हिंदुस्थानके आर्य खुलंखुला स्पष्ट बात कह देनेमें, सव अन्य आयोकी अपेक्षा, आगे कदम बढाये हुए थे। उन्होंने स्पष्टतासे मनुष्यको पहिला श्रेष्ठ पशु कहा था। यश दो प्रकारका था, एक रक्तयुक्त और दूसरा रक्तरहित । रक्तयुक्त खूनी यज्ञ के लिये मनुष्य, घोडा, हरण, बकरा और मेंढा ये पांच पशु योग्य माने गये हैं। असली यशमें पांचहि पशुओंका बलिदान इष्ट है। प्रकट हुआ दुआ श्रुतिशास्त्र, यजुर्वेद, श्रौतसूत्र और शतपथ ब्राह्मण आदि सब पुस्तके इस विषय में सब विधि बता रहे हैं। शहरके कोलेकी दिवारोंके लिये जो इंटे बनाई जाती थीं, उनके लिये गारा बनानके कारण पानीमें उक्त पांच पशुओंके शरीर वैदिक यज्ञसंस्था। रखे जाते थे, जिनके रकसे ईटोकी दृढता अधिक होती है ऐसा उनका ख्याल था। मनुष्य यशका यह एक अवसर था। दूसरा नरमेधका अवसर अश्वमेधके समय होता था। इससे तीसरा अवसर खुल्लंखुल्ले मनुष्यवलिदानका पुरुषमंध होता था। यह यज्ञ सबसे श्रेष्ठ था और क्षत्रिय और ब्राह्मणहि, हजार गौवें और सौ घोडोंके बदले खरीद फर इसमें बलिदान किये जाते थे। इसमें १६६ से १८४ तक विविध जातियोंक मनुष्योका बलिदान होता था। इस प्रकारके पूरे पूरे कसाईपनकी विधि शतपथ ब्राह्मणमें दी है। परन्तु वहां उक्त विधि एकदम बंद होती है और एक आवाज सुनाई देता है। 'जब वह अग्नि उक्त पशुओंके चारों ओर घुमाया जाता है और जब उनके वधकी सब तैयारी होती है तब एक आवाज सुनाई देता है-- 'हे मनुष्य ? पूर्ण न कर, यदि तू यह कर्म पूर्ण करेंगा. तो एक मनुष्य दूसरे मनुष्यको खायेगा। यह बात समझमें आनेके लिये एक प्रथा ध्यानमें धरनी चाहिए, वह यह है कि अर्पित वलिओका मांस ऋत्विजोमें गंटा जाता था। इस भयानक प्रथाका उच्छेद करनेकी अत्यंत आवश्यकता उत्पन्न होनी अत्यंत स्वाभाविक बात थी। किसीकिसी समयसुवर्ण के सिर प्रतिनिधिके रूपमें रखे जाते थे। परंतु निःसंदेह अश्वमेधके साथ मनुष्यका बलि देनेका विधि बहुत देरतक आचरणमें था। इस बलि- दानके लिये ऋषिकुलमें उत्पन्न हुआ हुआ वृद्ध, अशक्त, मरियल कुष्टरोगी-जिसको कि 'देवोंके पास जाना' इस दुःखसे छुटकारा होने के कारण सुखकारक था-खरीदा जाता था। परंतु इस प्रकार के रक्त पातके विधिकी निरादरता हिंदी आर्योंके मनमें आरूढ हुई और उसी शतपथ ब्राह्मणमें रकरहित अर्पणका प्रभाव निम्न कथाभागसे वर्णन किया है-

नरमेध।
१४५
1
२०...... परंतु किसी बातके निषेधसेहि उस यातकी एक
कालमें स्थिति सिद्ध होती है। इसलिये हम आर्य पूर्वजोसे उस
धच्यको मिटा नहीं सकते और जो धव्या सव जातियोपर
लगाही हुआ है, कि किसी न किसी समय, मनुष्यका बलिदान
करने की भयानक प्रथा उनमें आवश्य थी।'
महाशय ए. यो. कीथ महोदय की संमतिः-
(ते. संहिता. प.१३१ - १४०)
इसमें कोई संदेह नहीं कि यह सब विधि याशिकोकी कल्पित
बनाई है, इसलिये कि, यश परिपाठीमै मनुष्यके लिये कोई स्थान
नहीं था: इस न्यनताको पूर्ति इस कल्पित विधिने की है
यजु-
चंदके मूलमंत्र केवल आलंकारिक मनुष्यवध बता रहे हैं, जो सब
मनुष्य थोडे उचित विधिके पश्चात् खुले किये जाते हैं और
मनुष्यंतर पशुओंकाहि वलिदान किया जाता है । ......... अब
मनुध्यका रक्त याविधि छिडका जाता था इस बातका इनकार
नहीं किया जा सकता। ............इस बातका इनकार करना
अशक्य है, क्योंकि मकानोंकी तयमें मकानका संरक्षण करनेके
लिये मनुष्यका वध किया जाता था। यह परिपाठी दुनियांभर
चल रही थी, जिसकी नकल हिंदुस्थानमें भी वारंवार हो रही
थी परंतु नरमेधका वास्तविक अर्थ देखनेसे पता लगेगा कि यह
नरमेध नहीं। यजुर्वेदमें इस प्रथाके समान कोई विधि नहीं
इसी प्रकार सब युरोपीयनोंकी संमति है ।इनके मतका सारांश
निम्न प्रकार हो सकता है:-
(१) प्राचीन कालके सब लोगोंमें मनुष्यके बलिदानकी प्रथा
थी।
१०

२४६
वैदिक यज्ञसंस्था ।
(२) घोडा, बैल, बकरा, मेंढा आदि पशुओंके बलिदानकीभी
प्रथा थी।
(३) यजु. अ. ३०। ३१ इन दो अध्यायोंमें पुरुषमंधका
वर्णन है। यद्यपि इन अध्यायोंमें साक्षात् मनुष्यवधके लिये कोई
आधार नहीं, तथापि वेदके पूर्वकालीन मनुष्यके वलिदानकी प्रथा
का सूचक यह यज्ञ प्रतीत होता है।
(४) यज. अ० ३० । ३१ इन दो अध्यायोंमें अनेक जातियों
के मनुष्योंका उल्लेख सूचित करता है, कि वेदके पूर्वकालमें
सररास मनुष्यका बलिदान आयोंमें प्रचलित था।
५)रूपक अलंकारसे ये दोनों अध्याय परमात्माका वर्णन
करते हैं ऐसा भी माना जा सकता है।
(६) आर्योंकी पूजाविधिमें अन्य पशुओंके बलिदानके साथ
मनुष्य के बलिदानका भी एक भाग अत्यंत प्राचीन काल में था।
(७) यद्यपि मंत्रोंमें मनुष्यवधके लिये कोई आधार नहीं,
तथा ब्राह्मणोंमें भी निर्मास यज्ञको पुकार दिखाई देती है, तथापि
एक कालमें मनुष्यका बलिदान तथा अन्य पशुओंका बलिदान
करनेका प्रचार आयोंमें था; यह बात सिद्धहि है । क्योंकि
निषेधसेहि इसका अनुमान हो सकता है ।
(८) यज्ञमें इतर पशुओका हवन है, मनुष्योंका नहीं। इस
लिये याशिक लोगोने वधरहित नाममात्र मनुष्ययज्ञकी प्रथा शुरु
की होगी।
(९) कदाचित् मनुष्यके बलिदानकी प्रथा अनार्योंमें होगी
उसमें वधका निषेध करनेके लिये आयोंने यह वधरहित नाममा
आलंकारिक मनुष्ययज्ञ खड़ा किया होगा ।
(१०) शतपथ आदि ब्राह्मणग्रंथोंमें नरयाकी विधि दी है
और आगे जाकर यज्ञविधिकी पूर्णता न लिखते हुएहि मनुष्य

नरमेध १४७ बलिदानका जोरसे निषेध किया है। सारांशरूपसे ये दस सत्र हैं, कि जो युरोपीयन लोगोको संमति प्रकाशित कर सकते हैं। युरोपीयन पंडितोंकी संमति किसी एक बातमें अत्यंत निश्चित हुई है, ऐसा नहीं दिखाई देता। (वैदिक वाङ्मय पढनेसे उनके मनमें जो शंकाएं आती है, उनको वे लिख मारते हैं । उनकी अबतक निश्चित कोई संमति नहीं। ऊपर लिखी हुई उनकी संमतियां रेतके कीलेके समान अस्थिर हैं। (१) हमें वेदके पहिले क्या प्रथा थी इसका विचार कर्तव्य नहीं, (२) अवैदिक अनार्य दस्यु लोगोंमें क्या आचार थे इसका भी विचार करनेकी हमें आवश्यकता नहीं, (३) सब दुनिया- भरके प्राचीन कालके अज्ञानी पूर्वज क्या करते थे, इसका विचार हमें इस समय करना नहीं है, (४) वेदके अतिरिक्त अन्य ग्रंथों. मैं क्या लिखा है, इसका भी हमें विचार करना नहीं है, परन्तु(५) हमको इस बातका अवश्य विचार करना है कि 'वेद' स्वयं क्या कह रहा है? युरोपियन पंडितोंकी संमतियों के महासागरका मंथन करनेके पश्चात् हमारे पास कोई ऐसा एक भी वेदमंत्र नहीं आया, कि जिस में मनुष्यके वलिदानका स्पष्टतासे उल्लेख किया हो । अथवा नर-मांस-हवनका स्पष्टतापूर्वक संबंध बताया हो। सब यूरोपियन पंडित इस वातमें सहमत हैं कि, "यजु० अ०३० और ३१ ममनुष्य के बलिदानका उल्लेखतक नहीं है, तथा नरमांसका हवन करनेका उल्लेख करनेवाला एक भी मंत्र तमाम वेदोंमें नहीं है। "बस ! हमें तो यही बताना है कि, वेदके मंत्री नर-मांस-हवनका उल्लेख १४८ वैदिक यज्ञसंस्था । . नहीं है। बाकी दुनियांकी जो अवस्था होगी, सी होगी, हमें उसका विचार करनेके लिये इस समय फुरसत नहीं है और न आवश्यकता है। जब सब यूरोपियन पंडित एक मतसे मानते हैं, कि मनुष्यके बलिदानका उल्लेख मंत्रमय वेदमें नहीं है, तब वे कैसे कह सकते कि आर्योंमें मनुष्यके बलिदानकी प्रथा अवश्य थी ? वेदके मंत्रोंने जितना धर्म कहा है, उतना ही आर्योंका वैदिक धर्म है। और जिस कारण वेदमंत्र मनुष्यवलिका उपदेश नहीं करते हैं, उस कारणसे यह बात सिद्ध है कि 'शुद्ध वैदिक धर्ममें मनुष्यके बलिदानका विधि नहीं है।' जबतक कोई पंडित वेदके मंत्रोको पेश करके यह वात नहीं सिद्ध करता, कि मनुष्यका बलिदान वेदक मंत्रोमें है, तबतक अन्य ग्रंथोंके प्रमाणसे सिद्ध होनेवाला नर-बलि अन्य ग्रन्थोंका मत होगा, वह मत बंदपर नहीं लगाया. जा सकता। मैं यहां पाठकोंसे स्पष्टतापूर्वक बल के साथ कहता हूं कि नर-मांस - हवनकी प्रथा न केवल यजु० अ० ३० और ३१ में नहीं है, परंतु वेदके चारों संहिताओंमें ऐसा एक भी मंत्र नहीं है, कि जिससे नर-मांस-हवनका ध्वनि तक निकल सकता हो। क्या वेदमें हिंसा नहीं है ? जो लोक वेदमें हिंसा है और नरमेध, अजमेध, गोमेध आदि हिंसामय कर्म हैं; उनको निन्म मंत्र अवश्य देखने चाहिए:-- ! अश्वं.........मा हिंसी:......॥४१॥ गां मा हिंसीरदिति विराजम् ॥ ४२.॥ अवि.........माहिंसी....... ॥ ४३ ॥ इमं मा हिंसीर्द्विपादं पशुम् ॥ ४७) ॥

नरमेध १४९ इमं मा हिंसीरेकशर्फ पशुं कनिक्रदं वाजिनम् ।। ४८ ॥ घृतं दुहानामदिति जनाय मा हिंसीः ।। ४९ ।। इममूर्णायु...मा हिंसीः ॥ ५० ॥ यजु. अ. १३ ओषधे गायस्व । स्वधिते मैनं हिंसीः ॥ १॥ यजु. अ.४ मा हिसिष्ट पितरः केनचिन्नो । यजु. १९६२ ॥ मा हिंसीः पुरुषम्..... ॥ ३ ॥ यजु.१६॥३॥ मा हिंसीस्तन्वा प्रजाः॥ यजु. १२॥३२॥ घोड़की हिंसा न कर । ( अ - दिति ) हनन करने अयोग्य गाय हैं, इस लिये गायकी हिंसा न कर । भेडकी हिंसा न कर । दो पांववाले मनुष्य आदि प्राणियोंकी हिंसा न कर।घोडेकी हिंसा न कर | चूंकि लोगोंको गाय दूध और घी देती है; इस लिये उनकी हिंसा न कर । बकरेकी हिंसा न कर क्योंकि वह ऊन देता है। हे औषधी ! रक्षण कर, हे शहा, हिंसा न कर । हे रक्षको, किसी की हिंसा न कोजिए । पुरुष अर्थात् मनुष्यकी हिंसा न कर । प्रजाओको हिंसा न कर ॥' इस प्रकार हिंसा का निषध है। और देखिए:- मा हिंसिपुर्वहनुमुद्यमानम् ॥ अथर्व १४।२।९ मा हिसिष्टं कुमार्य स्थूण देवकृते पथि ॥ अथर्व १४।१।६३ ओढनेवाले बैल आदिकी ( अधिक जोरसे ) ओढने के लिये हिंसा न कर । देवोक विस्तत मार्गमें (कु-मार्य; कु-मर्य) पृथ्वीके ऊपरके मनुष्य आदि मर्य अर्थात् मर्त्य प्राणीकी हिंसा न कीजिये।' और देखीए:- घोहिमत्तं यवमत्तमथी मापमथो तिलम् ॥ एप वां भागो निहितो रत्नधेयाय दन्तौ मा हिसिष्टं पितरं मातरं च ॥ अथर्व. ६१४०२॥

आरे ते गोप्नमुत पुरुषघ्नम् चांवलोंका भोजन कीजिए, जौ खाईए, उडद अथवा तिल भक्षण कोनिए । रमणीयताके लिये आप सब लोगोका यही भाग है। आपके दांत रक्षकोंकी तथा मान्यकर्ताओंकी हिंसा न करें।' वेदका यह आशय है । इस प्रकार मनुष्य, घोडा, गाय, बैल, भेड और बकरा आदि पशुकी हिंसा करनेका निषेध वेद कर रहा है फिर यज्ञमें उक्त पशुओंका वध किस प्रकार किया जा सकता है । वधकर्ताओंको दूर करनेकी आशा वेद करता है:- आरे गो-हा न-हा वधो वो अस्तु ... ॥ ऋ.७॥ १६ ॥ १६ ॥ ऋ०१।११४ । १० गायका वध तथा मनुष्यका वध करनेवालेको दूर करो। इस प्रकारकी वेदकी आशा है । तात्पर्य वेद अहिंसामय कौका उपदेश कर रहा है। यह वात 'अ-ध्वर' शब्दसे भी स्वयं सिद्ध है, क्योंकि इस शब्दका अर्थ ' अ-हिंसा' ऐसाहि है, और अध्वर्-यु ' ( अ-वयु) का अर्थ अहिंसामय कोका प्रयोग करनेवाला है । इन बातोंका विचार करनेसे वेदका अहिंसाका भाव ज्ञात हो सकता है। यहां इतना कहना आवश्यक है कि, जैन और बौद्धोके समान वेदकी अहिंसा सार्वत्रिक नहीं है। साप, बिच्छ, वाघ आदि कर प्राणियोंका तथा शत्रुभूत क्रूर मनुष्योंका वध करनेके लिये वेदकी आज्ञा है । जहां मनुष्यसमाज होगा वहां युद्धादिमें मनुष्यवध होना ही है। धर्मयुद्धमै मरनेसे उच्च गति होती है, और ऐसे स्थानोपर मनुष्योंका वध करनाहि चाहिए । इस प्रकार उपदेशोंका भाव है । इन सब प्रमाणोको यहां उद्धृत करके इस भूमिकाको अधिक लंबा बढाना में आवश्यक नहीं समझता। क्योंकि इस विषयकी अन्य वाते अश्वमेध, अजमेध आदि प्रकरणोंमें अपने अपने प्रतिपादनके साथ आनेवाली हैं।

पुरुष मेधा .१५१ पुरुषमेध के विषयमें महाभारतकी साक्षी। इस प्रकार मतभेदोंकी समालोचना करने के पश्चात अब थोडा पतिहासिक निरीक्षण करना चाहिए । जरासंध नामक एक अनाय राजा पांडवोंके समय बडा शर और प्रतापी था, जिसने अनेक गजाओंका पराभव करकं उनको कारागृहमें इसलिये ला कर रखा था, कि उन सरकं बली अपनी देवताकी तृप्ति के लिये देकर नरमध किया जाय । इस जगसंघकी इच्छाका निषेध करनेके लिये श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन उसके पास गये थे । यदि इन आर्य गजाओंका कहना यह मानता और सुलह करता तो वह बन जाना, परंतु आर्यमतका स्वीकार न करनेके कारण तथा अपनही अनार्यमतपर रह रहने के कारण भीमने उस जगसंघको यलमें मार डाला. और सैकडों राजाओंका होनेवाला बलि दान बंद किया । देखीए:-- वा बोपहना राजन् क्षत्रिया लोकविश्रुताः ॥ नदागः करमुत्पाच मन्यस किमनागसम् ॥८॥ राजा गाः कथं साधन हिस्यान्नृपतिसत्तम । यद्रामः संनिगा त्वं रुद्रायोपजिहीपसि ॥ ९ ॥ अस्मांस्तदनोपागच्छेन्सतं वाहंद्रथ त्वया ॥ वयं हि शका धर्मस्य रक्षणे धर्मचारिणः ॥१०॥ मनुष्याणां समालंभी न च दृष्टः कुतश्चन ॥ स कथं मानपदवं यष्टुमिच्छसि शंकरम् ॥ ११ ॥ महाभारत सभा.२२ .

२५२ वैदिक यज्ञसंस्था । श्रीकृष्ण जरासंघसे कहता है: - 'हे राजा ! तुमनें प्रसिद्ध क्षत्रियोंको पकडकर रखा है । तेरा भयानक पाप होता हुआ भी तुम अपने आपको कैसे निष्पाप समझते हो ? हे राजाधिराज ! उत्तम राजाओकी किस प्रकार एक राजा हिंसा करे? तुम इतने राजाओंको बंदिखानेमें रखकर रुद्रदेवताके लिये उनका बलिदान करना चाहते हो? यदि तुमने वह वलिदानका कर्म किया, तो हम सवको वह पाप लगेगा; क्यों कि हम स्वयं धार्मिक लोगोंका रक्षण करनेमें समर्थ हैं । मनुष्योंका बलिदान किसी भी स्थानमें हमने नहीं देखा । तो तू किस प्रकार मनुष्योंके मांसका हवन करके, शंकरका यजन करनेकी इच्छा करता है ?' इससे पता लग सकता है कि, आर्य राजालोग नरवलिदानका अत्याचार अपने राज्यमें तथा अपने पास राज्याम करने नहीं देते थे । और इस प्रकारके कर्म, जव अनार्य राजालोग अपनी शक्तिकी घमंड करके, करने लगते थे, तब युद्धतक नौबत पहुंचती थी । जैसा कि जरासंधके साथ भीमका महायुद्ध हुआ और जरासंध मारा जानेके पश्चात सब कारागृह में रखे हुए राजाओंको खुला किया गया। आर्यत्व और अनार्यत्व गुणकर्मोंसे था न कि केवल जन्मसे। इसी कारण आर्योका अनायोंसे शरीरसंबंध होनेपरभी उनका अनार्यत्व वैसाहि समझा जाता था। इसी कारण जरासंध, रावण आदिको को राक्षस माना गया था और कई रक्षसोंकी लडकियोंकी शादियां आर्य राजाओके साथ भी होगयीं थीं । अस्तु । इस प्रकार नरबलिदानका श्रीकृष्णमहाराजने निषेध किया था। इसप्रकार नरबलिदान करना अनार्योंका कार्य था और आर्य राजालोग उसका निषेध किया करते थे। इसी दृष्टिसे ब्राह्मणग्रंथों के उल्लेख नरमंध । १५३ देग्यनं चाहिए । ऊपर दिये हुए महाभारतके लोकोमें 'मनुष्याणां समाल भी न न रएः कुतधन।' (नरबलिदान कहां भी देखा नहीं) यद चास्य यदा विचार करने योग्य है । आर्य राजाओका किया दुमा नग्मांस-यम एमने आजतक सुना नहीं, यह भाव श्री. कृष्णजीका है। जो बात सनीभी नहीं वह देखनी कहां ? इस प्रकार न सुना और न देखा हुआ भयानक कर्म जरासंध कर गहा है. हमार जैस शक्तिशाली आर्य राजाओंकी विद्यमानताम उन, घोर कर्म नहीं होना चाहिये । यदि जरासंध सामोपचारसे नहीं सुनेगा तो उसके साथ युद्ध करके उनको मनवाना हमारा कार्य होगा। उक्त कथा यह भाव मुख्य है। उक्त कथाम महा- भारतमें कसलोक हैं किजिनका आशय 'असवर्ण नरबलि' का दान फग्नमें है गैमा टीकाकार करते हैं, परंतु 'मनुष्योका आलंभन हमने कहां भी देखा नहीं' ऐसा जो ऊपर वाक्य दिया है, उस वाक्यकं साथ इसप्रकारका आशय विरुद्ध होनसे ग्राह्य नहीं माना जा सकता। नर-यज्ञ वाचक शब्द वेदमें नहीं हैं। पुरुष मेध, नर मंध, मनुष्य यश, नर-यश, नृ-यश, ये अथवा इस भाववाले शब्द चारों वेदोम किसी स्थानपर नहीं हैं । अर्थात् ये शब्द पीछसे घडे गये है। यद्यपि इन शब्दोंमें प्रारंभमें कोई बुरा भाव नहीं होगा, तथापि ये नाम वेदमंत्रोंके समकालीन नहीं है और निःसंदेह आधुनिक है । ये नाम जिस किसी समय प्रारंभ हुप होंगे, प्रारंभमें इनका अर्थ वेदके आशय के अनुकूलहि होना अधिक संभवनीय है ! क्योंकि वेदके सब अध्यायका तात्पर्य बतानेके लिये ये नाम प्रारंभमें शुरू हुए हैं। पोछेसे स्वेच्छा. चार्ग लोगोन मनमाने आचार प्रचलित किये और उन भिन्न - - वैदिक यज्ञसंस्था। आचारोंके कारण उन शब्दोंका अर्थ भी भिन्न भिन्न होगया । इसलिये हमें भी इन शब्दोंके मूलहि अर्घ देखने चाहिए। इन शब्दोंके जो मूल अर्थ होते थे उनका संग्रह पूर्वस्थलमें किया है वहांहि पाठक उन अर्थों को देखें और उनके आशयको सोचें। नरमेधका विषय कहां कहां है? वाजसनेय यजु. अ. ३० और ३१ में मुख्यतः यह विषय है। तैत्तिरीय संहितामें यह विषय नहीं है, परंतु तैत्तिरीय ब्राह्मण ३।४।१।१ में वाजसनेय संहितासेहि लिया है। ऋग्वेद मंडल. १।२४-३० तक ९७ मंत्र हैं उनका संबंध नरमेधसे वताया जाता है, जिनका विचार स्वतंत्रतापूर्वक करना चाहिये। और साथ साथ ऐतरेय ब्राह्मणकी शुनः शेपकी कथाका भी विचार करना चाहिये वह आगे किया जयगा । शतपथ ब्राह्मणके विवेचनका तात्पर्य पूर्व स्थलमें विस्तारपूर्वक बतायाही गया है । इसके अति- रिक्त पुराणोंमें नरमेधकी कथाएं नहीं हैं। केवल शुनःशेपकीहि है। अनार्य जरासंधकी कथा महाभारतमें आई है। उसका वर्णन पहिले हो चुका है । बस इतनेही स्थानोपर नरमेधका उल्लेख आया है । अब हमें प्रथमतः यजु. अ. ३० का भाव देखना है। यजुर्वेद अ० ३० का आशय । 'हे सबके उत्पन्नकर्ता ईश्वर ! मनुष्योंमें सत्कर्मकी प्रेरणा करो और सत्कर्मके पालनकर्ताको उन्नतिकी प्राप्तिके लिये प्रेरित करो। ज्ञानसे पवित्र बना हुआ उत्तम दिव्य उपदेशक हम सब के ज्ञानको पवित्र बनावे । और उत्तम वक्ता हम सबका भाषण मीठा बनावे ॥ उस उत्पादक ईश्वरके श्रेष्ट तेजका हम सब ध्यान पुरुपमेध। १५५ 1- करते हैं, ताकि वह हम सबके बुद्धियोंको उन्नतिकी और प्रेरित करे। हे उत्पादक ईश्वर ! सब दुष्ट भावोंको दूर कर और सब अच्छे भावोंको हम सबके पास कर। विलक्षण सिद्धिके वसु नामक धनका सब लोगोंमें योग्य विभाग करनेवालेकी, सवको उत्साहमय प्रेरणा देनेवालेकी तथा सव मनुष्योको सुशि- क्षित करनेवालेकी हम सब प्रशंसा करते हैं। ज्ञानके लिये विद्वान को प्राप्त करता है, शौर्य के लिये क्षनियके पास पहुंचता है, सब मनुष्यों के लिये वैश्यको नियुक्त करता है और परिश्रमके कर्मके लिये शूद्रको रखता है। इ० ॥ " इसीप्रकार कर्मविभाग आगेके मंत्रोंमें बताया है। उसको पाठक स्पष्टीकरणमें भलीप्रकार देख सकते हैं। उसकी द्विरुक्ति यहां करनेकी आवश्यकता नहीं । यज. अ० ३० के पहिले पांच मंत्रोका भाव ऊपर दिया है, उसको देखनेसे किसीप्रकार भी नरके बलि- दानका विगर उनमें कहीं भी प्रतीत नहीं होता। मनुष्यत्वका विकास करनेके लिये जिन जिन बातोंकी आवश्यकता है उन उन बातोंका उल्लेख उनमें है। तथा अवशिष्ट अध्यायमें विशिष्ट गुणोंका विकास करनेके साधनोंका वर्णन किया है। इसलिये इस अध्यायको नर-वलि-दानका सूचक मानना, समझना अथवा बताना, तथा इस अध्यायसे नर-बलि-दानकी प्रथा आर्यों में अथवा वैदिक धर्ममें थी ऐसा अनुमान करना, सर्वथा भ्रांतिका चिन्ह है। (:) सबको सत्कर्मकी प्रेरणा करना ( २) सवकी शानसे शुद्धि करना, (३) एक ईश्वरकी सामुदायिक उपासना करना, (४) सद्भावोंको पास करना और दुष्टभावोंको दूर हटाना, (५) शान, वल, धन, कुशलता इन चार वसुओंका सब लोगों में योग्य विभाग करना, (६) कर्मविभाग, कर्मका उत्साह और सुशिक्षा इनके - १५६ वैदिक यज्ञसंस्था । - - द्वारा सरका भला करना; यह भाव इस अध्यायके पहिले चार मंत्रोंका है । तथा मं०५ से अध्यायसमाप्तितक वसुविभागका प्रक- रणहि चला हुआ है। उसका प्रकरणशः वर्णन यहां करने की आव श्यकता नहीं है । उससे पता लग जायगा कि नरमेधका वैदिक आशय कितना अच्छा था और उसको कर्मकांडी लोगोंने कहांतक गिराया। पुरुप शब्दका अर्थ। अध्याय ३० में पुरुष शब्द नहीं है। अ० ३. में पुरुष शब्द आया है। वहांहि उसका विस्तन अर्थ पाठक देख सकेंगे। यह इतनाही बताना है कि इस पुरुपमेधौ 'पुरुष' शब्दसे मुख्यतया 'परमेश्वर, परमात्मा, अथवा परब्रह्म 'लिया जाता है । और यही वात युरोपीयन लोगोंको खटकती है। पुरुषमेधसे नर बलिदानकी कल्पना करनेमें जो बडी भारो रुकावट है वह यही है । आगामी अध्याय ३१ में जो वर्णन है उससे स्वयं सिद्ध होता है कि, पुरुषमेवसे पुरुष अर्थात् एक ईश्वरको मानसपूजा करना है और उस पुरुषमेधको करनेवाले देव है न की साधारण मनुष्य । यह देखनेके पश्चातहि कई युरोपीयन कहते हैं कि, सब पुरुषमेध प्रकरण आलंकारिक है और इसका संबंध साक्षात परमेश्वरके साथहि है और नरबलिदानके साथ नहीं है। अध्याय ३२ में सर्व-मेध' का वर्णन आता है । इस अध्यायका स्वतंत्र पुस्तक स्वाध्यायमंडलद्वारा प्रकाशित हो चुका है। इस सर्व- मेधका तात्पर्य सबमें जो मेध अर्थात् पचित्र, अर्थात् 'सर्वपूज्य'- परमेश्वर है, उसकी मानस-पूजा करना है। एकेश्वर उपासना' इस अ० ३२ में कही है । उसकी तैयारीके लिये ' मनुष्यत्वका विकास' करना इन दो अध्यायोंका उद्देश्य है।"

नरमंध । १५७ परमेश्वरका पुरुपमध । परमेश्वरके पुरुषमेधका वर्णन शतपथमें निम्न प्रकार है- पुरुयो ह नारायणोकामयत । अतिष्ठेयं सर्वाणि भूतान्यहमेवेदं सर्व स्यामिति, स एतं पुरुपमेधं पंचगवं फतुमपश्यत्, तमाहरत, तेनाध्यजत, ननेष्टवान्त्यतिष्ठत् सर्वाणि भतानीदं सर्वमा भवदतितिष्ठति सर्वाणि भूतानीदं सर्वं भवति, ग्र पवं विद्वान् पुरुषमेधेन यजते, यो वैतदेवं चंद ॥ ६॥ शत. ना. १३।५।११ 'नारायण पुरुष (परमात्मा) ने इच्छा की । कि मैं सब भूतोंसे श्रेष्ट बनं और यह सब मेंहि बन जाऊं, उस (परमात्मा ) ने यह पंचरात्र यन देखा, उसको लाया, उसका अनुष्ठान किया, उसके अनुष्ठानसे यह ( परमात्मा ) सब भतोंमें श्रेष्ट बना और यह सव वही बन गया, जो ऐसा जानना है और जो विद्वान पुरुषमेधका अनुष्ठान करता है, वह यह सब बनता है और वही सब भूतोंसे श्रेष्ठ बनता है। परमात्माके सर्वमेधका यह आलंकारिक वृत्तांत शतपथमे आया है। और सब विद्वान मनुष्योको परमेश्वरके अनुरूप पुरुषमेध करना चाहिए ऐसाभी उक्त विधानमें कहा है । परंतु यदि प्रत्येक विद्वानको पुरुषमंध करना हो, और प्रत्येक पुरुषमेधमे १८४ मनुष्य मारे जाने हो, तो संभवहि नहीं कि प्रत्येकके लिये पुरुषमेध करनेका अवसर प्राप्त हो सके।यह या सर्व लोकोको करना उचित है, इसी एक बातसे सिद्ध है, कि यह यक्ष हिंसामय कर्म नहीं है । अस्तु अय परमेश्वरके पुरुषमेधका तात्पर्य देखिए । #०१३ के पहिले ५ मंत्रहि यहां देखेंगे- ----- वैदिक यज्ञसंस्था । । परमात्माका पुरुषमेध । | मनुष्यका पुरुषमेध । (१)(सविता)- परमे (१) मनुष्य सबको अच्छी श्वर सबका उत्पादक, प्रेरक, उत्साहमय प्रेरणा करे, तथा और पोषक किंवा ऐश्वर्यवर्धक उनका पोषण करके उनको है। ऐश्वर्य के मार्गले चलावे। (२)(प्रसुव यर्था)-सत्क- (२) सत्कर्मकी प्रेरणा करो। " मकी प्रेरणा करो। यज्ञ-सत्कार, यश सत्कार, संगति. दान। संगति, दान। (३)(यज्ञपति भगाय प्र (३) जो जो मनुष्य सत्कर्म सुव)- सत्कर्मकर्ताको ऐश्वर्य करते हो, उनको उत्साह देकर, उनको ऐश्वर्य और उन्नतिके और उन्नतिके लिये प्रेरित करो। मार्गपर रहनेकेलियेहि प्रेरणादो। (४)(केत - पू: गंधर्वः नः (४) स्वयं शानसे पवित्र पुनातु ) -- ज्ञानसे पवित्र बनना और दूसरोंको शानके वका हमारे ज्ञानको पवित्र करे। साथ पवित्र बनाना। (५)(वाचस्पतिःवाचस्वदतु) (५) वक्ता दूसरोंके वाणी- वक्ता वाणीको स्वादिष्ट बनावे । को पवित्र और मोठा वनावे । (६) ( वरेण्य - भर्ग-- (६) मनुष्य सदा श्रेष्ठ गुणों ध्यानं )-- श्रेष्ठ तेजका चिंतन । काहि विचार करे । कभी दुर्ग- जोका विचारतक मनमें नलावे। (७)( दुरित निवा- (७) मनुष्य श्रेष्ठ गुणोंका रणं)- दुर्गुणोंका दूर करना स्वीकार और दुर्गुणोंका त्याग करे(सत्यको ग्रहण औरअसत्य और (भद्रस्वीकरणं). अच्छे का त्याग करनेके लिये सदा गुणोंका स्वीकार करना। मनुष्यको तत्पर रहना चाहिए। केत .

'केन । उपनिषद्। व्याख्या, -10 '. इस पुस्तकमे निम्न लिखित विषयोंका विचार हुआ है- केन उपनिषद् का मनन, १८ इंद्र.कौन है? उपनिषद् शान का महत्त्व १९ उपनिषद् का अर्थ और- ३ उपनिषद् का अर्थ, ४ सांप्रदायिक झगडे, २० अथर्ववेदीय केन सूक्तका .५"न" शब्द का महत्त्व, अर्थ और व्याख्या, ६ वेदान्त, २१ व्यष्टि समष्टी और परमेष्टी, ७.उपनिषदों में ज्ञान का विकास, २२ गिलोकी, ८ अग्नि शब्दका भाव, २३ अथर्वाका सिर ९ उपनिषद् के अंग, २४ ब्रह्मशानी की आयुष्य मर्यादा १० शांतिमंत्रोका विचार, २५ब्रह्मनगरी,अयोध्याआठच ११ तिनों शांति मंत्रों में तत्त्व २६ आत्मवान् यज्ञ, २७ अपनी राजधानी में ब्रह्मका १२ तीन शांतियोंका भाव, प्रवेश. -१३ ईश और केन उपनिषद्, । २८ देवी भागवतमें देवी की कथा, २५ " यक्ष" कौन है ?; २९ वेदका वार्गाभृणी सूक्त इंद्र १५५ हेमवती उमा, सूक्त,वैकुंठ सूक्त,अथर्व सूक्त, ११६ पार्वती कौन है? ३० शाक्तमत, देव और देव-- २७ पर्यत, पार्वती, रुद्र, सप्त ताकी एकता ऋषि और अरुंधती ३१ वैदिक ज्ञान की श्रेष्टता। इतने विषय इस पुस्तक में आगये हैं, इस लिये उपनिषदों का विचार करने वालों के लिये यह पुस्तक अवश्य पढने योग्य है। मूल्य १) रु. डाकव्यय= ) है १-

महाभारत।
si
(भाग--भाष्य-लमंत)
तैयार हैं।
(1) आदिपर्व । - पृष्ठ संख्या ११२५मूल्य म. आ.से६) २.
और पी.पी.से).
..२
(२.) सभापर्व । पृष्ठ संख्या ३५० गल्प म. आ. से २)
और पी. पी. से.)स.२॥)
(३) वनपर्व । पृष्ठ संख्या १५३८ मूल्य ८) क.
और चो. पी. से. ९).
(8) विशटपर्व । पृष्टसंख्या ३०६ मू म.आ. से॥)ो.
बी. पी. से२).
(५) महाभारत समालोचना।
१ प्रथम भाग म. ॥) वी. पी. से ||2) आने । २ रितीय भाष
म्..) बी. पो से =) जाने।
महाभारतके ग्राहकों के लिये १२००पृष्ठोंका ६) रु. मूल्य अंगा।
मंत्री- स्वाध्याय मंडल, औंध, (जि. सातारा)
-
मुत्रक तथा प्रकाशक--श्री. दा. सातधळकर, भारत मुद्रणालय

Vaidik Yagya Sanstha (vol Ii)

Author
Satavalekar, Damodar
Title
Vaidik Yagya Sanstha (vol Ii)
File name
Vaidik Yagya Sanstha (vol Ii)
Text
OCR done
Citation
1927
Published
2009/09
Publisher
G. Satara
Language
Sanskrit
Pages
169
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
345555
Barcode
99999990233890.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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Copyright permitted
VMLT id
FdMCk6vWT87
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Vaidik Yagya Sanstha (vol Ii)