Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Sanskrit Path Mala Bhag 19
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. 1 असु+रः = असून् राति ददाति । जो (असु) प्राण (राति देता है, जो दूसरोको प्राणशक्ति देता है उसका नाम असुर है । असुका अर्थ है जीवनक्ति, उसका प्रदान करनेवाला परमात्मा है। इसलिये उसका नाम असुर है। यह शब्द 'असु+र' ऐसा लिखना चाहिये। इसके उदाहरण देखिये- १ स्वस्ति पूषा असुरो दधातु नः= (नः) हमें ( असुरः पूषा) जीवन शक्ति देनेवाला पोषक ईश्वर (स्वस्ति) कल्याण (दधातु) देवे। (ऋ०५५१११) २ असुरः पिता ना (न) हम सबका (पिता)जनक (असु-रः) जीवन देनेवाला ईश्वर है । (प्रा० ५८३६) ३ जनानां यो असुरो विधर्ता- (जनानां) लोगोंका जो जीयन- दाता ईश्वर(विधर्ता)विशेष धारण करनेवाला है।(ऋ०७५६।२४) इन मंत्रों में असुर शब्द के ये अर्थ पाठक देखें । असुर शब्दका तीसरा अर्थ (असुपु रमते) असु अर्थात् प्राणोंमें जो रमता है, यह है। राक्षसवाचक असुर शब्द जिन मंत्रों में होता है उस समय यह अर्थ प्रधानतया होता है, क्यों कि जो अपने शारीरिक प्राणकी सजावट के लिये ही प्रयत्नशील होते हैं। असुरक्षा सपत्नहा। ०१०११७०२ "(असुरक्षा) राक्षसोंको मारनेवाला (सपरनहा)शशुओं को मारनेवाला" इत्यादि प्रसंगोंमें असुर शन्दका अर्थ राक्षस है, ऐसे स्थानों में असुरका अर्थ जो सयसे प्रथम दिया है यह भी यहां लिया जा सकता है। "अस्" धातका अर्थ "दूर फेंकना" है। इससे भी (अस्थति इति असुरः)जो चोर चाणाको शपर दूर फेकता है.यह असुर अर्थात शरपीर है। यह अर्थ मी घेद में कई स्थानों में दे इसका अपंगपार होता है। .. १.
(५) एकही असुर शब्द के इस प्रकार तीन अर्थ होते हैं और औरभी अधिक अर्थ होने संभवनीय है। इन अर्थी का नाम यौगिक अर्थ है क्यों कि इन सब अर्थों में धातुके मूल अर्थकी प्रधानता होती है। शब्दोंके अर्थोके तीन भेद होते हैं। एक यौगिक अर्थ,(२) दूसरे योगरूढिक अर्थ और (३) तीसरे केवल अदि अर्थ । इनमें दिक अर्थ भाषामें प्रसिद्ध है। हाथी, घोडा, गाय आदि शब्द सढिके हैं, इनका उच्चार करते ही विवक्षित जानवर की कल्पना सन्मुख आती है। इस शन्द का रूढार्थ यह है यह हरएकजानतही हैं परंतु संस्कृत में "अश्व" शब्दघोडेका वाचक होता हुआ भी मूल अर्थका बोध करता है जैसा (अश्नुते अध्वानम्) अर्थात् "जो मार्गको खा जाता है यह अन्य है"जिसकोभापामे घोडा कहते है। इसलिये अश्व शब्द रूढ अर्थ में प्रयुक्त होता हुआ भी यौगिक अर्थ को बताता है। इसी प्रकार "पाचकः" (पकाने वाला, रसोईया) आदि बहुत शब्द हैं। इनको योगरूढी शब्द कहा जाता है। ये रूढ शब्द भी हैं और यौगिकभाव भी बताते हैं। केवल यौगिक शब्द कैसा विलक्षण अर्थ बताते हैं इसके उदा- हरण इससे पूर्व स्थल में दिये ही हैं। ये वेदके यौगिक और योग- सढिके शब्द संस्कृत भाषामे पूर्ण रूढिके शब्द बने हैं। रूढिके शब्द चननेपर भी उनका मूल यौगिक भाष विलकुल हटा नहीं है । इसीलिये संस्कृत भाषाके प्राय सभी शब्द यौगिक हैं ऐसा कई ध्याकरणाचार्य और प्रायः सभी निरुक्ताचार्य मानते हैं और वेद का अर्थ करनेवालों को या वेदका पठनपाठन करनेको इच्छा करने वालों को इस प्रकार शब्दोंके मूल अर्थ जाननेकी शक्ति अपने अंदर बढानी चाहिये। क्योंकि इसीसे वेदका अर्थ जानने की संभावना है अन्यथा वेदका गूढार्थ जानना असंभव है। , F
(६)
पाठ २
रामायणम्
धीरामचंद्रस्यादेशानुसारेण सर्वेऽपि पानरयोधा दक्षिण दिशं
प्रतस्थिरे । महेन्द्रं अघ पर्वतं संप्राप्य रामः शिखरमारोह।
सणं मलयं च समतिक्रम्यानुपूयण सर्ये समुद्रमासेदुः।धीतोत्पला
च पेलां स्पृष्ट्या राम उवाच "इयमत्र माता पूर्योपस्थितैव चिन्ता।
सदिदमस्त्यताम् मन्त्रः" इति।
सुप्रीपस्तदा सेना तीरे न्ययेशयत् । सागरसमीपस्थित
तसैन्यं द्वितीयः सागर य मिरराज । "सोगरधाम्यरमस्य:,
अंयरं च सागरोपमम् । सागराम्ययोर्मध्ये न फोऽपि विशेषी
श्यते।"ति धानराः परस्परं पदन्तस्तत्र सपि तं सागर
प्रशसुः।
(७) - वाम् ।कुरुम्ब मम वचनम् ।न्यायेन यो राजकार्याणि करोति स एष निश्चितार्थमतिः पश्चान्न सन्तप्यते।" इति। रावणस्तु कालप्रेरितो विभीषणं हितं ब्रुवन्तमब्रवीत्- "विभीषण ! त्वं तु शत्रुसेषी स्वार्थमयुक्तः सन् एवं भाषसे न त्वादशेषनायेंषु सौहदं संभवति । योऽन्य एवं ब्रूयात् अस्मिन्नेव मुहुर्ते स न भवेत् एवा हे कुलपसिन त्वां तु धिक पवास्तु । नात्र तिष्ठ, गछान्यत्र कुत्रचित् ।" इति। न्यायवादी विभीषणंस्तु चतुर्भी राक्षस. सह सदा गदापाणि- में त्या उदतिष्ठद्ववीच्च रावणं- “हे रावण । न स्थितोऽसि धर्मपये, मान्तोऽसि । अनेनाधर्ममार्गेण गच्छन्नाशमेव शीघ्र गमिभ्यसि । अप्रियस्य च पथ्यस्य वकाधोताच दुर्लभ । अतोऽहं गच्छामि त्वं आरमानं स्वकीयां पुरी च यथासुखं रक्ष।" इत्येवमुक्त्वा विभीषणो रामस्य समीपमाजगाम । चतुर्मिः सह राक्षसैरागच्छन्तं विभीपणं दृथ्वा सुग्रीव उवाच-"पश्यैष राक्षसोऽ स्मानेष हन्तुमत्राभ्येति । " इति । विभीषणस्तु तत्रागत्य नातिरे व्यतिष्ठत उवाच च- ".दुर्व त. स्याहं रावणस्यानुजो विभीषणः । स तु मे हितमप्युक्तं न प्रतिजग्राह, दासवच्चाहं तेनावमानितः। अतः पुत्रदारांश्च त्यक्या राघवं शरणमागतोऽस्मि । निवेदयत मां तस्मै सर्वलोकशर. ण्यायरामाय"इति । सुग्रीवस्तु राममब्रवीत्। :-" अतकिंत शनु समयं लब्धा अस्मानिहन्यात् । अन्तर्धानगता होते राक्षसा अविश्वसनीयाः । न तेषां विश्वसेत् । " इति । श्रुत्वैतद्रामः सुग्रीवमुवाच -" परमर्पिणा कण्डुना पुरा गाथा प्रकीर्तिता यत्र तेन उत्तम -शत्रुमपि दीनं याचन्तं शरणागतं न हन्यात् । आत? वा यदि वानातः परेषां शरणं (८) " -- 1 गतारि प्राणानपि परित्यज्य कृतात्मना धीरेण रक्षितव्य । अत आनयैनं विभीषणमन । मया दत्तं अस्याऽभयं । असौ विभीषणो भवतु स्वयं वा रावणो भवतु ।" इति । सुग्रीवस्तदा प्रत्युचार ममाप्यन्तरात्मा विभीषणं शुद्ध पेत्ति । अनुमानाच्च भावाच्चासौ सर्वतः सुपरीक्षितः । ससित्व- मभ्युपैतु तस्मात् विभीषण । इति । विभीषणस्तत सनत सहानुचरो रामसमीपमुपस्मृत्योवाच. भरतं हि मे राज्यं जीवितं सुखानि च " इति । रामस्ततो राक्षसानां पलायलं तं पप्रच्छ । सोप्यारयातुमुप-- चामे -"वरदानास्पयंभुव सर्वभूतानामवध्योऽयं दशनीयः । रावणान्तरो मम ज्येष्टश्च भ्राता पुम्भकर्णों युधि शानियलः। रावणस्य च सेनापतिः प्रहस्तो नाम विधुतो येन कैलासे मणिभद्र पराजित । इन्द्रजित पुत्रो रावणस्य पद्धगोलांगुलिनोऽवध्य- कवचच संग्रामेऽस्ति ।महोदर-महापा-कम्पनाश्चास्थानीफपा लोकपालसमा विद्यन्ते चास्य रक्षसां दशकोटिसहस्राणि सैन्यो" भुस्यैतद् विभीषणयची रामेण दानी हत्या विभीषणाय राज्य. दानं तय प्रतिशतम् । समुद्राच्च अलमानीय लक्ष्मणहरतेन रक्षसां राजेति तच चाऽसी विभीषणोऽभिपितः। ततो रामोऽममत्त नियमं पालयन् कुशास्तीर्णायां सागर- थेलायां तिम्री निशा भतिशिरये । तदा यानरसैन्यस्य प्रस्थानाय नलोपि धानरः तत्र सेतं. पतु प्रचामे पानरा पादपान् पमन्जुस्तान् समानयामास्थासागर- पूरणाय ते पपंतपत्नस्तरा अप्युत्पादयन्ते । प्रक्षिप्यमाणेस्तक्ष. प्रातरादिभि सहसा सागरजरमुदतम् । समस्यामापुर:सरे। it प्रयमेनाला चतुर्दश गोजनानि सेतुबंधनं रतम् । पन्धमि- स्त्वहोमि सेतुः संपूर्णः शुशुभे । असौ सेतुर्दशयोजनविस्तीर्णः शतयोजन आयतश्चासीत् । कोटिसहस्राणि वानराणां सेतु यध्या सागरस्य पारं जग्मुः। वानरयूथपास्ततो लंकायां भेरीमृदंगशब्द शुश्रुवुः । अमृध्यमाणाश्च तद्घोषं स्वयमपि घोषवत्तरं विनेदुः । प्लवंगगर्जितं च तद्राक्षसैरपि श्रुतम् । ततोऽरिंदमौ रामलक्ष्मणौ लंकामासेदुः । न्यविशन्त च लंकाम्। रामलक्ष्मणावत्तरं द्वारं रुरुपतुः। नीलमैन्दद्विविदाः पूर्व द्वारम्। अंगदश्च दक्षिणं, पश्चिममपि हनूमान् रुरुधे । मध्यमे गुल्मे सुग्रीव. समतिष्ठत सह सुपर्णपचनादिभिर्वानरैः। सहजाम्बचांस्तु सुपेणो रामस्य पश्चिमेन तस्थौ । एवं दूमपाणिभिननिरैलेंका वायुनाऽपि दुष्प्रवेशा सर्वतः संवृता । ततो रामोऽगदं दशनीवं प्रति प्रेषयमास । संदिदेश च " येन बलेनाधममायया सीता हृतवानसि तदलमधुना दर्शय । अराक्षसं लोकं कर्ताऽस्मि यदि नाभ्येषि शरणं मां सीतामादाय । धर्मारमा बिभीषणश्च ध्रुवं लंकैश्वर्य प्राप्नोति । न हि क्षणमपि शक्यमधर्मण राज्यं स्वया भोकुम् ।" इति। रामप्रेषितोगदोपि रावणं ददर्श सामात्यम् । रामवचनं च तं धावयामास । तच्छु त्वा सरोषं रावण शशास-- मयमिति ।" दीप्ताग्निरिव रजनीचरास्तं जगृहुः । अंगदोऽपि वलं दर्शयितुं स्वयमेवात्मानं प्राहयामास । पश्चाद् वाहुद्वयासकांश्च ताराक्षसानादायोत्पपाता तद्वेगेन निधूताश्च ते भूमौ निपतिता। चालिपुत्रोऽगदोऽपि सत्वरं रामपार्श्वमुपागतः । समासाः १ वानरयोधा. - वानराणां योधाः1. ३ पूर्वोपस्थिता- पूर्व एव उपस्थिता। ३सागरसमीपस्थितं-सागरस्य समीपम्।सागरसमीपे स्थिती " वध्यता- (१०) ॥ ४कालप्रेरितः ५शत्रुसेवी ६ स्वार्थमयुक्तः ७गदापाणिः ८ अधर्ममार्गः ९धर्मपथः १० अविश्वसनीयः ११ परमपिः १२ वृक्षप्रस्तरादयः कालेन प्रेरितः। शत्रु सेवते इति। स्वार्थन स्वार्थाय वा प्रयुकः। गदा पाणौ यस्य सः। न धर्मः अधर्मः। अधर्मस्य मार्गः। धर्मस्य पंथाः। न विश्वसनीयः। मरमवासी ऋपिश्च । वृक्षाश्च प्रस्तराश्च वृक्षप्रस्तराते आदिः येषां ते वृक्षप्रस्तरादयः सेतोः बंधन । दीप्तश्चासौ अग्नि। १३ सेतुबंधनं १४ दीप्ताग्निः शब्दः। दुर्वृत्त = दुराचारी अनुज - छोटा भाई अतकित = जिसकी परीक्षा नहीं हुई है। आदेश - आधा योधः -धीर प्रतस्थिरे चले आमेदुः प्राप्त हुप अंयरं आकाश मानसेवी - शत्रुका आश्रय करने वाला फुलपांसन -बुलका कलंक अप्रमत्त उन्मत्त न होता हुआ अंतर्धान = गुप्तता %3D एतात्मा = आत्मिक यलसे आत पादप = दुसी घृक्ष पाठ ३ । घेदके शौके विषयमें थोडासा इससे पूर्व की अब और थोडासा स पाठमें कहना है। इस पाठके लिये हम "इन्द्र" शब्द लेते हैं- इन्द। इस शन्दकी उत्पत्ति कई प्रकार मानी हुई है। ऐतरेय उपनि - इदंद्रि-इन्द्र (इदं) इसमें (इ) सुराख करनेवाला, इसका भेदन करने- वाला, इसको तोडने मोडनेवाला। शरीरमें यह इन्द्र इन्द्रियोंक स्थानमें सुराख करता है, इस शरीरका भेदन करके अपने कार्य केलिये जैसे चाहे पैसे द्वार बनाता है, इसलिये इस आत्मा का नाम इन्द्र है। विजुली भी इन्द्र कहलाती है इसलिये कि यह जहागिरती है उसको छिन्न भिन्न करती है । उपनिषदों और ब्राह्मण प्रथों में दिये इन्द्र के ये अर्थ घडे मनन करने योग्य हैं। इन प्रथोंमें लिखा है कि पहिला शब्द ' इद द्र" जिसका सुगम रूप 'इन्द्र' बना है। यह यौगिक अर्थ देखनेकी पद्धति वेदाभ्यासीको विचार करने योग्य है । इन्द्रशन्दका दूसरा अर्थ- था, (इन् ) शत्रुओका(द्र) विदारण करनेवाला, शत्रुका नाश करनेवाला यह है। इन्द्र और राक्षसोंके युद्धोका वर्णन वेदमें बहुत स्थानों में है और हरएक स्थान में इन्द्र का विजय और राक्षसों का पराजय लिया है। इस प्रकार यह अर्थ भी सार्थ प्रतीत होता है । इन्द्रशब्द का तीसरा अर्थ-
(१३)
इन्दं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः।
अस्माकमस्तु केवलः ॥ ऋ० १७१०॥
(वः जनेभ्यः ) आप लोगोंके लिये (विश्वतः परि) सबके
ऊपर (इन्द्रं हवामहे ) प्रभुको प्रशंसा करते हैं। यह प्रभु
(अस्माकं ) हमारा ही केवल वनकर (अस्तु) रहे।
इन्द्रस्य न वीर्याणि प्रधोचं यानि चकार प्रथमानि बनी।
अन्नहिमन्यपस्ततर्द प्रवक्षणा अभिनत्पर्वतानाम् ॥३०॥३३॥१
(इन्द्रस्य) इन्द्रके (वीर्याणि) पराक्रम (नु) निश्चयसे
(प्रवोचं ) मैं कहता हूं (यानि) जो (प्रथमानि) पहिले
पराक्रम (वनी) वन्न लेनेवाला वीर (चकार) करता रहा।
उसने (अहिं) शत्रुका (अहन् ) वध किया (अपः अनुततर्द)
जल को फैलाया और (पर्वतानां) पर्वतोंसे (वक्षणाः)नदियां
(अभिनत् ) भेदन करके चलाई।
इन्द्रो यातोऽवसितस्य राजा शमस्य च गिणो वजयाहुः ।
सेदु राजा क्षयति चर्षणीनामरान नेमिः परि ता बभूव ॥
ऋ० १३२।१५.
(वन-बाहुः) वज्र हायमें पकड़नेवाला (इन्द्रः) प्रमु(यातः
अधसितस्य)जंगम और स्थावर का तथा (शमस्य गिणः च)
शांत और सींगवालों का (राजा) राजा है । (स राजा इत् उ)
वह राजा ही निश्चयसे (चर्पणीनां) प्रजाओंका (क्षयति)
निवास करता है। (अरान् नेमिःन) आरे जैसे रथचक्रकी
नाभीके साथ होते हैं उस प्रकार (ताः परि बभूव) वह प्रजाएं
उसके चारों ओर रहती हैं।
इस प्रकार पाठक इन्द्र के मंत्रोंका विचार करें। इन्द्र देवताकी
कल्पना इस प्रकार होसकती है और मंत्रोंकाइस ढंगसे पाठ करके
पाठक बहुत लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
(१४) पाठ ४ रामायणम् तत उत्स्नं प्राकारपरिसान्तर घामरीतं स राक्षसा ददृशु । रामश्च मनसैध पीडधमाना सीता जगाम । क्षिप्रमाशापयामास च पानरान् द्विपता पधाय । तेऽपि वानरास्तृणपासुपर्वताप्रै परिखा पूरयन्तो लड्दा ममन्यु.। रायणोऽपि राक्षसाना सैन्यनिर्याण- माठापयामास । ततस्तेपा सप्रामो देवासुरसग्राम स्याऽतिघोर समपद्यत । राक्षसाना घागराणा घमासशोणितकर्दमः सपभूध । रात्रिश्च प्रवृचा तदा निशायुद्धममूत्। राक्षसा प्रयगान भक्षयन्त परिपेतु । युने यलिनो पानरा राक्षसींचममक्षोमयन्। सदा भूमि शोणितसायमा यस्य ।
विमानेन गत्वाऽपि सीता सर्वानिपतितान्ददर्श शरतल्पगती च रामलक्ष्मणौ दृष्ट्वा दुःखार्ता सीता करुणं विललाप- "उत्सादितं. कुलं त्वया, कैकेयि कलहशीलया।हा हतास्मि विधवा मधोना. या हेतोः सागरमुत्तीर्य रामो गोप्पदे इत। रामस्योपरिमां क्षिप्रं. यातय, रावण! संमानय यत्नात्पतिम् ।" इति । त्रिजटा तु राक्षसी परिदेवयमानां सीतामब्रवीत- " जीवति ते भर्ता । मा विषादं कृथाः।तथाहि वैदेहि! नेदं दिव्यं पुष्पक विमान त्वां धारयेद्यधेती गतजीवितौ। नेमौ रणे सैन्द्रैरपि सुरासरैः शक्यौ जेतुम् ।" इति । एतस्मिन्नंतरे पुष्पकं लंकां विमानमाग- तम्। ततो भयाविष्टं सुग्रीवं विभीषणोऽब्रवीत्- "अलं त्रासेना निगृ- ह्यतां बापवेगः। एवंप्रायाणि युद्धानि । नास्ति नैष्टिको विजयः। सभाग्यशेषताऽस्माकमस्त्येव यत पती घोरेण शरबन्धेनैव बद्धी दशरथात्मजौ, नैतो मृतौ।" इति । अन्तरे तु राम स्थिरत्वात्सत्त्वयोगाउच सलक्ष्मण प्रत्यबुध्यत । राघवौ नीरुजौ दृष्ट्वा वानरयूथपाः सिंहनादं विनेदुः पुनश्च युद्ध कामा लंकाद्वाराण्युपाजग्मुः। रावणो नदतां वानराणां शन्दं श्रुत्वा राक्षसानाज्ञापयामास "शायतां किमेतत्" इति । ते तु राक्षसाः राघवो शरबंधेन विमुक्ती दृष्ट्या विपेदुः । धूम्राक्षो नाम राक्षसो हनूमन्तं गदया मस्त- के प्राहरत्। हनुमानपि तस्य शिरसि महान्तं प्रस्तरमपातयत् । तस्मिराक्षसे मारुतिना इतेऽपरोऽपि वज्रदंष्ट्रो नाम राक्षस आगतः सोऽगदेन निपातितः । ततःसेनाध्यक्षेण प्रेषितोऽकम्पनो नाम राक्षसः आगतः स मारुतिना हतः। ततः सेनापति ग्रहस्तं स्वयं वृक्षमुत्पाटय नीलस्ताडयामास । विधनश्च कृतोऽसौ नीलेन चाहिनीपति । सोऽपि नीलं मुसलेनाजधान ललाटे । अनन्तरे नीलन प्रहिता शिला प्रहस्तस्य शिरो विभेद । इते च प्रहस्ते स्वयं राक्षसरा रायपो नियंयो। तमागतं रट्या रामो सिमीपण- मुवाच- "अहो' दुपेक्ष्यो रावणो दीप्तमहातेजा आदित्य इव रश्मिभिः । विष्टया पापात्मा रष्टिपथं गत" इति । ततो रामो रावणं अभ्यद्रवत् । तदा हनूमांस्तु तं प्रार्ययामास- पृष्ठं मे समारहा राक्षसं शास्तुमईसि ।" इति । रामस्तया या रथस्ये ददर्श रावणम् । इन्द्र ध पत्रेण मे तरसा याने दाधुंचासी जघान । रक्षोऽधिपतेरपर्ण किरीटं च चिच्छेद । निरत्तचापो हताश्वस्तध मिलन राजा रायणो लंका यियेश।
-
कुंभकर्णमागतं दृष्ट्या प्रथम पानरा भीति प्राप्ताः । परंतु
वालिसुतस्यांगदस्य प्रोत्साहनात्तु ते सर्वेऽपि क्रुद्धानं शिला
पादपादिभिर्निर्जप्नुः
। असावपि वानरसैन्यानि ममन्थ । तदा
रामस्य सायकाः कुंभकर्ण विव्ययः । सोऽपि शृंगं नाम महार
रामस्योपरि चिक्षेप । रामस्तदा वायव्यास्त्रेणास्य बाई जहार।
अन्योऽपि वाहुरेन्द्रेणास्त्रेण रामेण कृत्त । तथैवास्य पादावपि
रामेण बाणैलूनौ । अन्तं गत्वा ऐन्द्रं शरं निशितमादाय कुंभकर्णस्य
शिरोऽपि रामश्चकर्त, तेन स राक्षसः पपात ममारच।
पवं सर्वान्राक्षसान् हत्वा अन्ते रावणमपि संहन्य लंकाया
राज्यं विभीषणाय रामः प्रददौ । सीतां चादाय, तस्या अग्निशुद्धि
कृत्वा, ततस्तां परिशुद्धां ज्ञात्या, तया सह पुष्पक विमानं समारहा
सर्वैवानरैः सह अयोध्यां प्राप्तो रामः । तदा रामं सर्वे अयोध्या-
वासिनः राज्ये अभिपेचितवन्तः वस्य रामचंद्रस्य राज्ये सर्वेऽपि
मानवा. हृष्टाः पुष्टास्तुष्टाः सन्तःह लोके पुष्टिं लम्वाऽन्वे मुकि-
मपि प्रापुः । इति।
समासाः।
१ प्राकारपरिखान्तरं प्राकारश्च परिखा च प्राकारपरिखे । तयोः
अन्तरं।
२ तृणपांसुपर्वतायाः - तृणं च पासुश्च पर्वताग्रं च ।
३ देवतासुर संग्रामः = देवताश्च असुराश्च । तेषां संग्रामः ।
४ मांसशोपितकर्दमः- मांसं च शोणितं च । तयो कर्दमः।
५शोणितनावकर्दमा = शोणितस्य नावः । तेन कर्दमयुका ।
६ रामशरताडितः = रामस्य शरः। तेन ताडितः।
७ वालिपुत्रः
८हताश्व - हतः अश्वः यस्य ।
९हतसारथिः = हतः सारथि यस्व।
- वालिनः पुत्रः।
२
१०शरशल्याचितः = शरस्य शल्यं । तैः भाचितः । ११शरतल्पगतः-शरस्य तल्पं । तत्र गतः। १२ दुःसार्ता - दुःसेन आता। १३ कलहसीला - कलयकं शीलं यस्याः। १४ गतजीवितः = गतं जीवितं यस्मात् । १५ भयाविष्टं - भयेन आपिएं। १६ पानरयूथपः = घानराणां यथानां पालफाः । १७ युद्धफामाः = युद्धं कामः येषां ते। १८ अफालयोधनं = न काल अकालः तस्मिन् बोधनं । १९ मालवृद्धायशेपिता = पालाम्य पदाथ । ते अपशे पिताः यत्र । राप्द। शरस्नं - संपूर्ण पांसु धूलि प्राकार = फालेकी दिवार तृणं - घास परिता = संदक निर्याणं - प्रयाण शोणित रक फर्दमा फीचर प्रयगः-पानर साप - प्रयाद अंतरपीयत 5.गुप्त हुआ अनालयं न दीपनेवाला गोपदे =गायक पायके समान पायेगा = आंसुगोका घेग छोटे थानपर मेष्ठिफा-निधयसे मिलनेवाला नीमनी नारोग रश्मिः - किरण समर युद्ध पापन- जगाना शाकान्त पास निशिरा सीमा परिशुल = पवित्र शित = . पिंदन .
वीराका भाव इस शब्द में है। युद्द उपस्थित होनेपर धीर है वे मरुत् कहलाते हैं। सच वीर ही भरनेके लिये कटिबद करनेपर मिलता है। जो रोते नहीं वे भरत् कहलादेदीदास्थमन्त्री पाठ५ मरुता मरुत् देयता इन्द्र के साथ रहनेवाली है. इसलिये इसका विचार न्द्र देवता के साथ होना योग्य है। इससे पूर्व इन्द्र देताका विचार हुमा. अब इस पाटमें मरुत् देवताका विचार करते है- "नियन्ते इति ममतः" अर्थात् मरते हैं इसलिये इनको मरुत् कहते हैं।"मय, मर्य" मादि शब्दके समान अर्थवाला हो - धीर लोग युद्ध में मरने के लिये तैयार होते हैं, यह अर्थ मरन शब्द में देखा जाता है। इस कारण वेद में मरदेवता के मंत्रों में बात कर के धोयेंका ही वर्णन होता है, यही अर्थ- "मर#उत्" इन शब्दो मैदेखा जाता है। मरने के लिये जो उने रहते हैं, इसी लिये सच्चे वीरौका वर्णन मयसूक्तों में होता है। গা+” (মনু না) অর্থ দুৰ এন্ধা, গঙ্গ বিমা "मगत " शब्द है। आनंद करते हैं, कभी डरते नहीं और की रात नहीं। यह साथ मिलता जुलता है, यह बात पाटक भावभी पूर्वोक्त भाष मननपूर्वक देखें।
(२०) "मा रु" (मत् प्रतिबंध करना)जो स्वयं किसीको प्रति चंध नहीं करते और जिनकी कोई प्रतिबंध कर नहीं सकता। यह भी एक धीरोंकाही लक्षण है। क्यों कि वीर कभी दूसरों की उन्नति में रुकावट नहीं डालते, नाही अपनी उन्नति में किसी को रकावट डालने देते है । "मरुत् " (मत् शन्द करना) अर्थात् जो बहुत बोलते नहीं, बहुत यकवाद नहीं करते' जो करनेका कर्तव्य हो वह फरते है परंतु बहुत शम्दजाल नहीं फैलाते । यह व्युत्पत्तिमी मरुतो का एक विलक्षण गुणधर्म यता रही है। घीरों के अंदर यह गुणधर्म । अवश्य चाहिये, अन्यथा जिनकी शक्ति शब्दजाल फैलाने में व्यर्थ सर्च होगी, वे लोग पौरुप कर्म कर ही नहीं सकेंगे। मयत् शब्द के ये यौगिक अर्थ निस्ककार के दिये हैं, पाठक इन अर्थों को देखें और जाने कि वेद के शब्दों के यौगिक अर्थ कैसे होते हैं। शाद एक ही होता है, परंतु उस के विभाग करके प्रत्येक विभाग के अर्थ देसने से विविध अथों की प्राप्ति होती है। इन अयों को ध्यानमें धरकर नीचे लिखे मंत्रोका अभ्यास अय कीजिये- - ये शुभ्रा घोरयर्पसः सुक्षत्रासो रिशादसः । मभिरग्न आगदि ॥ प्रा० ११ १२१५ (ये) जो (शुमाः) गौरपर्ण ( घोरपर्पसः) पदे शरीर- पाले (सु-समासः) उचम क्षत्रीय तथा (रिचादसः) शनु का माश फरनेपाले हैं. उन (मादिः) ममतोंगे साथ हैं अग्ने, (भागटि)आओ।
(२१) -- मरुतो'यद वो बलं जना अचुच्यवीतन । गिरीरचुच्यवीर्तन ॥ ऋ० ११३७ ११२ है (मरतः) मरतो ! (यत् है) जो निश्चयसे (व वलं) आपका बल है जिससे आप (जनान् ) लोगोंको (अचुच्य- घीतन) प्रेरित करते हैं और (गिरीन्) मेघोंको भी (अचुच्यवीतन) हटा देते हैं। प्र यदित्या परावतः शोचिनं मानमस्यथ । कस्य ऋत्वामरुतः कस्य वर्षसाकं यायकं ह धूतय ॥१॥ स्थिरा घः सन्स्वायुधा पराणुदें वीळू उत प्रतिष्कमे । युप्माकमस्तु तविपी पनीयसीमामय॑स्य मायिनः॥२॥ ऋ०१।३९। है (मरुतः) महतो! (शोचिन)प्रकाशके समान (पराधतः) दूरसे दिखाई देनेवाला (यत् मान)जों वीरताका प्रमाण आप (इत्था) इस प्रकार (प्र अस्थय) छोड़ देते हैं। (कस्य ऋat) किस के कर्मसे (कस्य वपैसा) किस के रूपसे या आकारसे आप (कं याय) किसके पास जाते हैं और तुम्हारी (धूतयः) कंपाने- पाली शक्तियां (क) किसको हिलाती है?(पा आयुधा) आपके शस्त्र (स्थिरा. सन्तु) स्थिर हो, तुम्हारे शस्त्र ( परा-नुदे) शत्रु को दूर करनेवाले कर्मके लिये और (प्रतिष्कमे) शत्रुको प्रतिबंध करने के लिये (वीळू) बलवान हैं (युप्माकं ) आपकी (तविषी) शक्ति (पनीयसी)प्रशंसनीय ( अस्तु) होवे वैसी (मायिनः) कपटी (मर्त्यस्य)मनुष्यकी (मा) न हो।
(२२) 1 महतोका यह वर्णन पाठक देखें। वि ये नाजन्ते सुमखास ऋष्टिभिः प्रच्यावयन्तो अच्युता चिदोजसा । मनोजुवो यन्मरुतो रयेवा वृषवातासः पृषतीरयुग्ध्वम् ॥ १ ॥८५४ हे (मस्तः) मरुतो! (ये) जो आप (सु-मखासः) उत्तम कर्म करनेवाले होकर (ऋष्टिभिः) शस्त्रोंसे (वि-नाजन्ते) चमकते हैं और (ओजसा) शति से (चित्) निश्चयपूर्वक (अ-च्युताः)न हिलनेवालों को भी (प्रच्यावयन्तः)हिला देते है। आप (मनोजुवः) मनके समान धेगवान होते हुए (वृष- चावास:)घेलों और गोषों के अनेक झुंडोंको पास रसनेवाले अपने (रयेषु) रयोंको (पृषतीः) नानारंगवाले पशुओंको (अयुग्ध्वम् ) जोतते हैं। यूयं तत्सत्यशवस आवित महित्वना । विध्यता विद्युता रक्षः ॥३० १।८६.९ (यूयं) आप (सत्य-शवसः) सत्य पलपाले हैं। अपने (महित्वना) महत्वसे (आविश्कत ) प्रकट होते है और विद्युता) बिजलीके समान चमकवाले शस्त्रसे (रक्षः) दुष्ट राक्षसोको (विध्यत)धेष करते हो, काटते हो। इस प्रकार मयत् देवताके मंत्रोंका अध्ययन पाठक करें और चीरताका पाठ सीसे।
(२३)
पाठ ३
महाभारतम् । (भीष्मपर्व अ. ९९)
सञ्जय उवाच।
.
११॥
ततः शान्तनवो भीमो निर्ययो सह सेनया।
व्यूह चान्यूहत महत्सर्वतोमद्रमात्मनः
कृपश्च कृतवर्मा च शैब्यश्चैव महारथः।
शकुनिः सैन्धवाश्चैव काम्बोजश्च सुदक्षिणः ॥२॥
भीष्मेण सहिताः सर्वे पुत्रैश्च तव भारत ।
अग्रतः सर्वसैन्यानां व्यूहस्य प्रमुख स्थिताः ॥३॥
द्रोणो भरिश्रवाः शल्यो भगदत्तश्च मारिप ।
दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थिता व्यूहस्य दंशिताः ॥४॥
अश्वत्थामा सोमदत्तश्चावन्यौ च महारथौ ।
महत्या सेनया युक्ता वाम पक्षमपालयन्
दुर्योधनो महाराज त्रिगतः सर्वतो
वृतः
व्यूहमध्ये स्थितो राजन्पाण्डवान्प्रति भारत
अलम्बुपो रयश्रेष्ठः श्रुतायुश्च महारथः।
पृष्ठत सर्वसैन्यानां स्थिती व्यूहस्य दंशितौ
एवं च तं तदा व्यूहं कृत्वा भारत तायकाः ।
सन्नद्धाः समद्दश्यन्त प्रतपन्त इवाऽग्नयः
ततो युधिष्ठिरो राजा भीमसेनश्च पांडवः ।
नकुल सहदेवश्च माद्रीपुत्रायुमावपि
।
॥८॥
॥९॥
ne 1
अग्रतः सर्वसैन्यानां स्थिता व्यूहस्य दंशिताः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्च महारथः ॥ १०॥
स्थिता सैन्येन महता परानीकविनाशनाः।
शिखण्डी विजयश्चैव राक्षसच घटोत्कचः ॥१९
चेकितानो महावाहुः कुन्तिभोजश्च वीर्यवान् ।
स्थिता रणे महाराज महत्या सेनया वृताः
॥१२॥
अभिमन्युर्महेप्यासो द्रुपदश्च महायलः।
युयुधानो मद्देप्यासो युधामन्युश्च वीर्यवान् ॥ १३ ॥
कैकया भ्रातरश्चैव स्थिता युद्धाय दंशिता
पयं तेऽपि महान्यूहं प्रतिव्यूह्य सुदुर्जयम्
पाण्डयाः समरे शूराः स्थिता
युद्धाय दंशिताः।
ताबकास्तु रणे यचा सहसेना नराधिपाः
अभ्युद्ययू रणे पार्थान्भीयं कृत्वाऽग्रनो नृप ।
तथैव पाण्डया राजन्भीमसेनपुरोगमाः ॥ १६॥
भीष्म योद्धममीप्सन्त संग्रामे विजयैषिणः ।
स्वेडा:फिलकिलाशसान्फफचान्गोषिपाणिका॥१७॥
मेरीमृदङ्गपणयानादयन्तश्च पुष्करान् ।
पाण्डवा अभ्यवर्तन्त नदन्तो भैरवारवान् ॥१८॥
मेरीमृदगशसानां दुन्दुभीनां च निःस्वनः ।
उसिंहनादेव पलिगतेश्च पृथग्विधैः
घयं प्रतिनदन्तस्तानगच्छाम स्वरान्यिताः ।
सहसैपाऽमिसंक्रुदास्तदासीत्तुमुलं महत्
ततोऽन्योन्यं प्रधायन्तः संप्रहार प्रचतिर।
ततःदेन महता प्रयकम्पे पसुंधरा ॥२१॥
॥२०॥
पक्षिणश्च महाघोरं व्याहरन्तो विवनमुः सप्रभवोदितः सूर्यो निष्प्रभः समपद्यत पश्च पातास्तुमुला. शंसन्त सुमहद्भयम् । घोरश्च घोरनिदा शिवास्तत्र पवाशिरे ॥२३॥ वेदयन्त्यो महाराज महद्वैशसमागतम् । दिशः प्रज्वलिता राजन्पांसुवर्षे पपात च ॥२४॥ रुधिरेण समुन्मिभ्रमस्थिवर्ष तथैव च । रुदतां वाहनानां च नेत्रेभ्य प्रापतज्जलम् ॥२५॥ ततः शांतनवः शंतनुपुत्रो भीम सेनयां सह निर्ययौ। सर्वतो. मदं नामक महद्वयूहं च आत्मन सैन्यस्य अव्यूहत ॥ १॥ कृपश्च कुनधर्मा च महारथ शैब्यश्च शकुनिः सैन्धवः सिंधुराजः च सुद. क्षिण कांबोजः कंयोजदेशाधिपतिश्च एव ॥२॥ हे भारत' तव पुत्रै भीमेण च सहिता सर्वसैन्यानां अग्रत न्यूहस्य च प्रमुखे रथाने स्थिताः॥३॥हे मारिष! धृतराष्ट्र! द्रोणो भूरिश्रवा शल्यः । भगदत्तश्च व्यूहस्य दक्षिणं पक्षं आथित्य पंशिता रक्षिताः । स्थिता ॥ ४॥ अश्वत्थामा सोमदत्त महारथी आवन्यौ अवन्ति- देशीयो राजानौ महत्या सेनया युक्ता व्यूहस्य वामं पा अपा- लयन् ॥५॥ हे महाराज राजन् ! त्रिगर्मी सर्वतो वृतः दुर्योधन । व्यूहमध्ये स्थित पांडवान् प्रति युद्धं कर्तुम् ॥६॥रयश्रेष्ठ अलं. बुष, महारथ. श्रुतायुश्च सर्वसैन्यानां व्यूहस्य पृष्टतः दंशिता स्थितौ ॥७॥हे भारत ! तावका तब संबंधिनः एवं च तं व्यूह छत्वा सन्नद्धा सिद्धाः समदृश्यन्त या प्रतपन्तोऽग्नय ॥ ८॥ ततः राजा युधिष्ठिरः पांडवो भीमसेनश्च नकुलः सहदेवश्च उभी अपि माद्रीपुत्रौ ॥९॥ सर्वसैन्यानां व्यूहस्य अग्रत दंशिताः - + (२६) रक्षिताः स्थिताः। घृष्टद्युम्नः विराटश्च महारयः सात्यकिश्च ॥१०॥ परानीकविनाशनाः शत्रुसैन्यविनाशकाः महता सैन्येन स्थिताः । शिखण्डी विजयोऽर्जुनधेष घटोत्कचोराक्षसध ॥११॥ महायाः पेकितानः, घीर्यवान् कुन्तिभोजश्च । हे महाराज ! महत्या सेनया वृताः रणे स्थिताः॥१२॥ महेप्यासोऽभिमन्युः, मझायलो द्रुपद्ध मदेण्यासो युयुधानः, पार्ययान् युधामन्युध ॥ १३॥ केकया ब्रातःचैय युद्धाय दंशिताः सुरक्षिताः स्थिताः। तेऽपि एवं दुयं महान्यूदं प्रतिन्यूह्य ॥१४॥ शूराः पांध्याः समरे युद्धाय दंशिताः स्थिताः । तायकाः तु सहसेनाः नराधिपाः रणे यताः सिद्धाः ॥१५॥ नपमीष्मं अप्रतः हत्या रणे पाधान् अम्युपपुः। तथैप पांडया, हे राजन् ! भीमसेनपुरोगमाः ॥ १६ ॥ संगामे विजयेषिणः भीमं योरमीप्सन्तः । येसाः पिलपिला- सपा संपाम् ऋकान् गोयिपालिकाः ॥ १७॥ मेरी-मृदंग-पण.
(२७)
समासाः
१ न्यूहमध्य-व्यूहस्य मध्यं ।
२परानीकविनाशनपरस्य अनीकी तस्य विनाशनः ।
३ विजयैषिन्नविजयं इच्छति ।
४ मेरीमृदंगपणवान्म्भेरी च मृदंगश्च पणवश्च ।
५ उत्कृष्टसिंहनादः उकृष्टश्चासौ सिंहनादश्च ।
६ सप्रमः प्रभया सहितः।
७ निषमा निर्गता प्रभा यस्मात् ।
८ घोरनिर्हाद घोर: निर्दादा यस्य ।
९ पांसुवर्प-पांसूनां वर्षे ।
शब्द।
पक्षा विभाग, बाजू
दंशित-रक्षित
सनद्ध-सिद्ध
अनीक= सैन्य
शत्रु
घोरनिहर्हादाबडेशब्दवाले
वैशसंम्भय
अस्थि-हड़ी
महेप्यासा बडा धनुपधारी
अभ्युधयुः =हमला किया
अभीप्सन इच्छा करनेवाला
घल्गित शब्द, भाषण
क्ष्वेडागर्जना
शिवागीदड, सियार
पांसु = धुली
वर्ष- वृष्टि
पर
D
(२८)
पाठ ७.
रुद्र
रद शब्द के अर्थ मी पूर्ववत् अनेक प्रकारके होते हैं। ये
अर्थ अब इस पाठमें देखिये-
रोदिति इति रुद्रः।
रोता है इसलिये इसको रद कहते हैं । जो यहुत बुरे कर्म
फरता है और उनका युरा फल भोगने के प्रसंगमें रोता है उसका
नाम रुद्र है। चोर, दुष्ट इस अर्थसे रुद्र है । तथा-
रोदयति इति रुद्रः।
जो चलाता है उसका नाम रुद्र है। युरे कर्म करनेवालों को
फटोर दण्ड देकर जोरलाता है उसको रुद्र कहते हैं, परमेश्वर,
न्यायाधीश आदि सब इस अयं से रुद्र हैं।
(८) शब्दका (द) भेदन करनेवाला रुद्र कहलाता है।
सद को व्यक स्थितिमें प्रकट करनेवाला सद्र है।
स्त+रा-रद्र
(सत्) शब्दको (रा) देनेयाला जो है, जो शम्बका प्रेरक
देव है उसका नाम रुद्र है। शम्दका प्रेरक आत्मा, परमात्मा.
मेघस्थानीय विद्युत्, पका मादि है। ये सब इस कारण रद की
विभूतियां समजी जाती है।
इस रीतिसे ये मिन्न भिन्न व्युत्पत्तियां देसभर पाठफ रुद्र
यताके मंत्र परेंगे, तो उनकी पहायो मिल सकता। यहां
उमंत्र नमूने के तौर पर दिये जाते हैं-
-
इस मंत्रमें
या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी।
तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताऽभिवाकशीहि ॥
यजु १६ १२
" हे (स्द्र) रुद्र ! (या)जो (ते) तेरा (पापकाशिनी)
पापनाशक (अ-धोरा तन्ः) क्रूरतारहित शरीर है । हे (गिरि-
शन्त) वाक्शक्ति द्वारा सुख को फैलानेवाले देवा (तया
शन्तमया) उस सुख फैलानेवाले (तन्या) शरीरसे (न)
हम सबको (अभिचाकशीहि ) देख, सुखी कर।"
गिरिशन्त " शब्द बहुत विचार करने योग्य
है-- (गिरि) वाणीमें रहकर जो (शं+त)सुख फैलाता है,
उसको “गिरिशन्त " कहते हैं। चाणीके अंदर आत्मा की
शक्ति है और यह ही सच्चा सुख देखनेवाली है, इत्यादि भाव
यहां देखने योग्य है।
'असौ यस्ताम्रो अक्षण उत बभ्रुः सुमंगलः।
ये चैनं रुद्रा अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्रशोऽवैषां हेड ईमहे।
य०१६।६
(य असौ) जो यह (ताम्रः अरुणः उत बभ्रुः सुमंगल )
लाल, अरुणवर्णका, तथा भूरे वर्णवाला, मंगल करनेवाला रुद्र
है (ये) जो (सहनशः रुद्राः अभित दिक्षु पनं श्रिता.)
हजारों दूसरे रुद्र चारों ओरसे दिशाओमें इसके आश्रयसे
रहते हैं (पपां इंडः अव ईमहे) इनका क्रोध हम भक्तिद्वारा दूर
.
करते हैं।
रुद्र सवको आधार देनेवाला मुख्य है और उसके
आधारसे अनेक हजारों रुद्र रहते हैं। मुख्य का नाम भी रुद्र
है और उसके आधार से रहनेवालोंका नाम भी रुद्र ही है।
यहां यह वर्णन समझने के लिये एक परमात्माके आधार से
(३०)
रहनेवाले अनेक जीवात्मा, पक सेनापतिके आश्रयसे रहनेवाले
हजारों सैनिक, एक राजाके आश्रयसे रहनेवाले हजारों राजपुरुष
आदि एक के आधारसे रहनेवाले अनेकों का संबंध यहां देखने
योग्य है । स्लानेवाला रुद्र होता है, राजा दुष्टोको दण्ड देकर
रुलाता है इस लिये यह कद्र है, उक्त कारण हीराजपुरुष भी रुद्रही
है। इनके शोधसे अपने आपको यचानेका यत्न हरपक करें ।
इसी अध्यायमें-
नमो हिरण्यवाहव सेनान्ये ॥ १६ । १७
नमो दायाततायिने क्षेत्राणां पतये नमः ।
नमः स्तायादन्त्यै पनानां पतये नमः ॥ १६ ॥१८
नमा मात्रणे पाणिजाय कक्षाणां पतये नमः ।
नम उच्च/पायानन्दयते पचीनां पतये नमः ।
- (३१) यह देखें और रुद्र का अर्थ समझ लें. जनताको रुलानेवाले तो चोर डाकु आदिमी होते है इसलिये ये भी रुद्र ही है देखिये इनका वर्णन- स्तनानां पतये नमः।। य० १६२० नमो वञ्चते परिवञ्चते स्तायूनां पतये नमः। - नमो निषंगिण इपुधिमते तस्कराणां पतये नमः ॥ नमः सकायिभ्यो जिघांसद्भयो मुष्णतां पतये नमः ।। नमोऽसिमद्यो नक्तंजर यो विकृन्तातां पतये नमः । य०१६।२१ (स्तेनानां पतये) चोरोंके स्वामीके लिये (नमः) शस्त्र या दण्ड दिया जावे। (वञ्चते, परिवञ्चते स्तायूनां पतये) ठगाने वाले सब प्रकारसे ठगाने वाले, लुटेरों के स्वामीकेलियेदंड दिया जावे। (निपंगिणे इषुधिमते तस्कराणां पतये नमः) सड्ग धारण करने वाले, वाण धारी चोरोंके स्वामी के लिये दण्ड दिया जावे ।(सृकायिभ्य जिघांसद्भयः मुंष्णतां पतये नम:) शस्त्र- धारी घातपात करनेवाले डाकुओंके स्वामीके लिये दण्ड दिया जावे। (असिमद्भधः नकं चरद्भधः विकृन्तानां पतये नमः) तलवारधारी, रात्रीके समय घूमनेवाले और काटनेवालों के मुखियाके लिये दण्ड दिया जावे। । इन मंत्रोंमें जो स्तेन आदि शब्द है वे सब रद्रोंके ही रूप हैं। ये रुद्र जनताको रलाते हैं, यह बात सब जान सकते हैं। चोर डाकू खूनी लुटरे ये जनताको कितने सताते हैं यह सब जानते ही हैं। ये रुलाते हैं इसी लिये ये रद्र हैं । पाठक यहां विचार करके देखें कि राजा और राजपुरुष दुष्टोको रुलाते इस कारण ही रुद्र है और ये चोर आदि जनताको रुलाते हैं इस कारण रुढ़ हैं। दोनों में रुलानेका धर्म समान है। परंतु " शब्द के अर्थ- (३२) शब्द के अर्थमें भेद है। " "नमन, वज्र, शस्त्र, दण्ड, मेघी विद्युत्" आदि हैं। चन, शस्त्र और दण्ड ये शत्रुको तथा दुष्टों को नमाते हैं इसलिये इनक नाम "नमः" है। यहां भी पाठक नमः का यौगिक अर्थ ही देखें। नमः शब्दका यह अर्थ वैदिक कोश निघण्टुमें दिया है । पन के अंदर ही दुष्टोको नम्र बनाने कासामर्थ्य है इसलिये पत्रकानाम नमः है। यह अर्थ लेकर उक मंत्र भागमै नमः का अर्थ शस्त्र या दण्ड किया है। । रुद्र नाम परमात्माका है क्यों कि वह दुष्टोंको सलाता फिर रुद्रों के रूपोंमें "चोर" किस प्रकार आगये हैं, यह शंका यहां पाठकोंके मनमें उत्पन्न हो सकती है, इसका समाधान पडे लंबे लेस से दिया जा सकता है, परंतु अतिसंक्षेपसे यहाँ इस का समाधान किया जाता है. पाठक उसका विचार करें- परमात्मा हृदयकी गुदामे छिपारहता है, चोर मी पहाड के गुहामें छिपा रहता है, कितना भी ढूंढा जाय तो भी परमात्म प्रत्यक्ष नहीं होता, उसी प्रकार प्रयीण चोर भी प्रत्यक्ष नहीं होता जिस प्रकार चोर न समझते हुए धन का अपहार करता है, ठीय उसी प्रकार परमेश्वर भी जिस पुरे मनुष्यका धन हरना चाहत है न समझते हुए उसका धन हरण करता है । इस प्रकार यदि समानता कायिकी से देखी जाय तोपाठकोकोपतालगजायग कि इनमें समानता कहां है और विषमता कहां है। यह यह गढ़ विषय देसलिये इस समय समझमें आना कठिन है जो आगे विशेष अभ्यास होनेपर स्वयं पुल जायगा।
(३३) पाठ८ महाभारतम् । (भीष्मपर्व.अ.१००) सन्जय उवाच। अभिमन्युरथोदार. पिशङ्गैस्तुरगोत्तमैः । अभिदुद्राव तेजस्वी दुर्योधनवलं महत् ॥१॥ विकिरशरवर्षाणि पारिधारा इवाऽम्बुदः। न शेकुः समरे क्रुद्धं सौभद्रमरिसूदनम् शस्त्रौघिण गाहमान सेनासागरमक्षयम् । निधारयितुमच्याजो त्वदीयाः कुरुनन्दन ॥३॥ तेन मुक्ता रणे राजश्शरा शनिबर्हणाः । क्षत्रियाननयशूरान्प्रेतराजनिवेशनम् यमदण्डोपमान्धोराज्वलिताशीविषोपमान् । सौभद्रः समरे क्रुद्ध प्रेषयामास सायकान् ॥५॥ स रथारथिनस्तूर्ण हयांश्चैव ससादिन । गजारोहांश्च सगजान्दाग्योमास फाल्गुनिः ॥६॥ तस्य तस्कुर्वतः कर्म महत्संख्ये महीभृत । पूजयाञ्चक्रिरे हृष्टाः प्रशशंसुश्च फाल्गुनिम् ॥७॥ तान्यनीकानि सौभद्रो द्रावयामास भारत । तूलराशीनिवाकाशे मारत सर्वतोदिशम् ॥८॥ तेन विद्राव्यमाणानि तव सैन्यानि भारत । प्रातारं नाध्यगच्छन्त पड्के मग्ना इव द्विपा ॥९॥ विद्राव्य सर्वसैन्यानि तावकानि नरोत्तम । अभिमन्युःस्थितोराजन्विधमोऽग्निरिव ज्वलन्॥१०॥ न चैनं तावका राजन्धिपेहुररिघातिनम् । प्रदीप्तं पावकं यद्वत्पतड्गा• कालचोदिता.॥ ११॥ ३ त्वदीयाः स्वपक्षीयाः अक्षयं सेनासागरं गाहमानं शस्त्रीषिणं अभिमन्यु आजी युद्धे निवारयितुं अपि न शेकुः ॥ ३॥ हे राजन् ! तेन अभिमन्युनारणेमुका शत्रुनिवर्हणा शत्रुनाशकाशरा वाणाः शूरान् क्षत्रियान् प्रेतराजनिवेशनं यमसदनं अनयन् ॥४॥ समरे क्रुद्धःसौभद्ःआशीविपोपमान यमदण्डोपमान् घोरान् ज्वलितान् सायकान् वाणान् प्रेषयामास ॥५॥स फाल्गुनिः फाल्गुनस्य अर्जुनस्य पुत्रः तूर्ण सत्वरं सरथान् रथिना, ससादिनी हयान्, सगजान गजारोहान् व दारयामास ॥६॥ तस्य तन्महत्कर्म संख्ये युद्धे कुर्वतः हृष्टा महीमृतो राजानः फाल्गुनि अभिमन्यु पूजयां- चक्रिरे तं प्रशशंसुश्च ॥ ७ ॥ हे भारत ! सौभद्रः तानि अनीकानि सर्वतोदिशं द्रावयामास, मारुतः तूलराशीन् आकाशे इव ॥८॥ हे भारत | तेन विद्राव्यमाणानि तव सैन्यानि, पंके कर्दमे मग्ना द्विपाः गजा इक, त्रातारं नाध्यगच्छन्त न जानन्तं ॥९॥हे नरोत्तम ! तावकानि सर्वसैन्यानि विद्राव्य, हे राजन् ! विधमोऽग्निरिव ज्वलन्, अभिमन्युः स्थितः ॥ १०॥ हे राजन् ! पनं अरिघातिनं अभिमन्यु तावका वीराः न विपेहुः । काल- चोदिताः कालप्रेरिताः पतंगा यद्वत् प्रदीतं पायकं ॥ ११ ।। पाण्डवानां महारथः महेष्वासः अभिमन्युः सर्वशत्रुभ्यः प्रहरन् सवज्रावासव इन्द्र इव अदृश्यत ॥ १२॥ हे राजन् ! अस्य हेमपृष्ठं धनुः दिशः विचरत् ददृशे । यथा तोय देषु मेघेषु शतहदा विद्युत् राजमाना ॥ १३ ॥ हेराजन् ! निशितोः पीता शरा: संयुगे युद्धे निश्चरन्ति स्म फुलछमात् वनात् भ्रमराणां मजा इव ॥१४॥ तथैव नस्य.महात्मनः सौभद्रस्थ चरतः कान्चनांगेन रथेन अन्तरं 'जना न ददृशुः ॥१५॥ कृपं द्रौणि अश्वत्थामान,सवृदयलं वृहद्व- लेन सहितं सैधन्वं सिंधुराज मोहयित्या महेश्यासो, महाधनु- धारी लघु सुष्टु च व्यचरत् ॥ १६॥ हे भारत ! अस्य तव चाहिनी दहतः धनुः मंडलीकृतं सूर्यमंडलसंकाशं एव पश्याम ।। १७ ॥ शूराः क्षत्रियाः तं तरस्विनं प्रतपन्तं दृष्ट्या, तस्य कर्मभिः इमं लोकं भूलोकं द्विफाल्गुनं मेनिरे ॥ १८॥ हे महाराज! सा भारती महाचमः तेन आर्दिता । मदशा योपिदिव तत्र तत्रैव व्यभ्रमत् ॥ १९॥ महासन्यं द्रापयित्या महारथान कंपयित्वा, सहदः नंदया- मास, यासव इन्द्रो मयं जित्या इव ॥२०॥ भारत! तेन तम सैन्यानि संयुगे विद्राव्यमाणानि तव सैन्यस्य घोरं आस्विनं चः ।।२१।। मारतोद्धतवेगस्य सागरस्य पर्वणि इथ. हे राजन् ! तदा दुर्योधनः आयगि अलंयुपं राक्षसमभापत ॥ २२ ॥ समासाः। %3D १ तुरगोत्तमः - तुरगेपु उत्तमः । २ दुर्योधनवलं = दुर्योधनस्य यलम् । ३शरवर्ष = शरणां वर्षम् । ४ सेनासागर सेना पय सागरः। ५प्रेतराजनिवेशनम् = प्रेताना राजा । तस्य निवेशनम् । ६ यमदण्डोपमः यमस्य दण्डः । तस्य उपमा यस्मै। '७ विधमः = विगतः धूमः यस्मात् । ८ फुलद्रुमं = फुला द्रमा यस्मिन् । ९ मारतोदतवेगः - मास्तेन उदतः । उद्धतः वेगः यस्य । सन्दा तुरमः - घोटा प्रेतराज - यम अम्युदः : मेघ तूल - कपास ठोयदः पंक कीचड छियदायी गाहमान - तेरनेवाला कांचनं = सुपर्ण, सोना पादिनी = सेना योपिन् = स्पी -- 1
(३७)
पाठ ९
औषधि.
इस पाठमें वैदिक शब्द की एक विशेषतापतानी है। कई शन्दों
प्रथमाक्षर लुप्त हो जाते हैं। यह औषधि या ओषधि शन्द
स्तवमें "दोपधि" है, इसके प्रथम स्थानके दकार का लोप
कर 'दोषधि' का 'ओषधि बनता है। इसका अर्थ-
दोष+धिन्दोषोको घोनेवाली
ऐसा होता है। शरीरके अंदर जितने दोपा रोगबीज अथवा
क्षीण करनेवाले कारण होते हैं, उन सब दोपोंको धोकर
करनेवाली बनस्पति होने के कारण उसको वास्तव में "दोष
कहना चाहिये परंतु "ओषधि" कहते हैं। अब इसके
खिये-
या ओषधी पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा।
मनै नु पभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च ॥ ७५ ॥
! दहतः धनुः मंडलीकृतं सूर्यमंडलसंकाशं पर पदयाम || १७ : शूराः क्षत्रियाःतं तरस्विनं प्रतपन्तं दृष्ट्वा, तस्य कर्मभिः मं लोकं भूलोक द्विफाल्गुन मेनिरे ॥ १८॥ हे महाराज! सा भारती महाचमः तेन अदिता ! मदवशा योपिदिव तत्र तत्रैव व्यभ्रमत् ॥१२॥ महासैन्यं द्रावयित्या महारथान् कंपयित्वा, सुहृदः नंदया. मास, वासव इन्द्रो मयं जित्वा इव ॥२०॥ भारत! तेन तक सैन्यानि संयुगे विद्राव्यमाणानि तय सैन्यस्य घोरं आस्विनं चः॥२१॥ मारतोद्धतवेगस्य सागरस्य पर्वणि इक, हे राजन् ! तदा दुर्योधनः आर्यभूगि अलंधुपं राक्षसमभापत ॥ २२ ॥ BAIET: 1 १ तुरगोचमः - तुरगेषु उत्तमः । २दुर्योधनवलं = दुर्योधनस्य बलम् । ' ३ शरव = शरणां वर्षम् । ४ सेनासागरः = सेना पव सागरः। ५ प्रेतराजनिवेशनम् = प्रेतानां राजा । तस्य निवेशनम् । ६ यमदण्डोपमः यमस्य दण्डः । तस्य उपमा यस्मै। '७ विधमः विगतः धूमः यस्मात् ८फुल्लद्रुम = फल्लामा यस्मिन् । ९ मारतोद्धतवेगः = मारतेन उद्धतः । उद्धतः वेगः यस्य । शब्द । तुरगः - घोडा प्रेतराज - यम अम्बुदः = मेघ तूल = कपास तोयदः पंक-कीचड जलदः- द्विप - हाथी गाहमान - तैरनेवाला 'कांचनं = सुवर्ण, सोना घाहिनी = सेना योपित् = स्नी - %3D - (३७) पाठ ९ औषधि. इस पाठमें वैदिक शन्द की एक विशेषता बतानी है। कई शब्दों के प्रथमाक्षर लुप्त हो जाते हैं। यह औषधि या ओषधि शब्द वास्तवमै " दोषधि" है, इसके प्रथम स्थानके दकार का लोप होकर दोपधि' का 'ओपधि' बनता है । इसका अर्थ- दोप+धिन्दोपोको धोनेवाली ऐसा होता है। शरीरके अंदर जितने दोषा रोगबीज अथवा आयु क्षीण करनेवाले कारण होते हैं, उन सब दोपोंको धोकर शुद्ध करनेवाली वनस्पति होने के कारण उसको वास्तवमें "दोष +धि" कहना चाहिये परंतु "ओषधि" कहते हैं। अब इसके मंत्र देखिये- या ओषधी पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा। मनै नु पभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च ॥ ५ ॥ यजु०१२।७५ (या ओषधी )जो औषधियां (देवेभ्य ) देवासे (त्रियुगं पुरा पूर्चा जाता ) तीन युग पहिले उत्पन्न हुई थी, उन (वभूणा) भरण पोषण करनेवाली औषधियोंके (शतं सप्त च धामानि) सौ और सात धाम है ऐसा मैं (मनै नु) मानता हूं। शतं वो अम्ब धामानि सहनमुत वो रुह । अधा शतक्रत्वो यूयमिमं मे अगदं कृत हे ( अम्ब) रक्षक औषधि' (व शतं धामानि) आपके सौ धाम है (उत व रुहः सहस्रं) और आपके अंकुर हजारों हैं। - (३८) अधा) तथा (यूयं शतक्रत्वः) आप सौ कर्म करनेवाली वन- कर (इमं मे अगदं कृत) इस मेरे रोगीको नीरोग बना दो। औपधीः प्रतिमोदध्वं पुष्पवतीःप्रस्वरी। अभ्या इय सजित्वरीरिधः पारयिष्यवः ॥७॥ (पुष्पयतीः) फूलवाली (प्र-सूवरीः)सुख देनेवाली औष- धियां (वीरुधः) वनस्पतियां (पारयिष्ययः) रोगोंके पार पहुंचाने वाली हैं, ये (अश्वा इव सजित्वरीः) घोडों के समान वेगवान अर्थात् अपना कार्य करने में पूर्ण समर्थ हैं, इन से (प्रति- मोदध्वम् ) आनंदित होओ। ओषधीरिति मातरस्तद्वो देवीरुप ग्रुवे । सनेयमश्वं गां वास आत्मानं तव पुरुप ॥७॥ औषधियां (मातरः) माताएँ हैं, हे (देवी) दिव्य औषधियों! तथा हे पुरुष! (तत् वः उपवे) वह आपसे मैं कहता हूं कि (अश्व, गां, वासः, आत्मानं) घोडा, गाय, वस्न तथा अपने आत्माको (सनेयं ) नीरोग होकर मैं प्राप्त करूं ।। यत्रीषधीः समग्मत राजानः समिताविव । विमः स उच्यते भिपक्षोहाऽमीवचातनः॥८॥ (राजानः समिती इव) राजा लोक जैसे युद्धों में जाते हैं उस प्रकार ( यम औषधीः समग्मत) जहां औषधियां इकट्ठी होती हैं (सः विप्रः मिपा उच्यते) उसी विप्रका घेद्य कहते हैं यह(अमीय. रक्षो-हा) रोगोका दूर फरनेवाला है और रोगवीजों का भी नाश करता है। इदिमा पाजयन्नदमोपीईस्त आदधे । आरमा यस्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा ॥८५॥ चातन, (अहं यन् इमाः ओषधीः)मैं यदि ये औषधियां (वाजयन् हस्त आदधे)बल बढाता हुआ हाथ में पकडूं तो (यक्षमस्य आरमा नश्यति )रोगकी जड नष्ट हो जाती है (यथा पुरा जीवगृमः), जिस प्रकार पहिले रोगले पकडा हुआ प्राणी नष्ट होता . यस्यौषधी प्रसर्पयाडगमगं परुष्पकः । ततो यमं वि वाधस्व मो मध्यमशीरिव ॥८६॥ हे औषधियो। (यस्य अंग अंग परुः परः) जिसके अंग अंगमें और जोड जोडमें तुम (प्रसर्पय) जाती हो (ततः यमं वि वाघस्व ) उसके बाद तुम रोग को प्रतिबंध करती हो जैसे (उग्रः) क्षत्रिय (मध्यमशील) वीचके मर्मीको काटता । या फलिनीयर्या अफला याश्च पुष्पिणीः। वृहस्पतिप्रस्तास्ता नो मुञ्चन्हसः ॥ ८॥ (या फालिनी ) जो फल बाली, (या अफलाः) जो फल- रहित और (याः च पुपिणीः) जो फूलयाली औषधियां हैं (ता: वृहस्पतिप्रसूताः) घेशानी के द्वारा दिये जानेपर (नः अंहसः मुन्धन्तु ) हमें पापरूपी रोगोंसे बचायें । या भोपी सोमराशीवीः शतविपक्षणाः । तासामलि त्यमुत्तमार कामाय हृदे ।।१२।। जो औषधियों (सोम-राडी) जिनका राजा सोम है और जो (पही शतविचक्षणाः) बहुत सी प्रकारके शुमगुणों से युक्त है। (तासांत्वं उत्तमा असि) उनमें तू उत्तम है (कामाय अरं) प्सित कार्य के लिये पर्याप्त और (देव)हृदयके लिये आनंद दायक है।
(४०) या ओषधीः सोमराशीविष्ठिता पृथिवीमनु । वृहस्पतिप्रसूता अस्यै संघत्त वीर्यम् ॥ ९३ ॥ जो सोम राजाके राज्यमें रहनेवाली औषधियां पृथ्वीपर (अनु- वि-स्थिताः) आकर रही हैं। वे (बृहस्पति-प्रसूताः) विद्वान् द्वारा दिया जानेपर (अस्यै वीर्य संधत्त) इसके लिये वीर्य धारण करें। ओपघय. समवदन्त सोमेन सह राशा । यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन्पारयामसि ।९६|| सोम राजा के साथ औषधियां चोलती हैं कि जिसफेलिये ब्राह्मण हमें देता है, हे राजन् ! (तं पारयामसि)उसे हम पार ले जाती है। नाशयित्री पलासस्मार्शस उपचितामसि । अथो शतस्य यक्ष्मणांपाकारोरसि नाशनी ॥२७॥ (पलासस्य) कफ, (अर्शसा) यवासीर, (अपचितां) सूजन आदिकी (नाशयित्री असि) नाश करनेवालीत है। (अयो) और (यक्ष्मणां शतस्य) रोगोंके सेंकडों भेदोंका तथा (पाकारो) पककर होनेवाले रोगोंकी (नाशनी मसि) नाश करनेवालीत है। इस प्रकार औषधि प्रकरण का पाठक अभ्यास कर सकते है ।
(४१)
पाठ१०
(महाभारत उद्योग० अ० ३३)
विदुर वाच ।
राजा लक्षणसंपत्रिस्नैलोक्यस्याधिपो भवेत् ।
प्रेयस्ते प्रेपितश्चैव धृतराष्ट्र युधिष्ठिर ॥१६॥
विपरीततरश्च त्वं भागधये न समत।
अर्विषां प्रक्षयाच्चैव धर्मात्मा धर्मकोविद.
आनृशंस्यादनुकोशाधर्मात्सत्यारपरास्मात् ।
गुरुत्वात्वयि संप्रेक्ष्य यहून्क्लेशास्तितिक्षते ॥१८॥
दुर्योधने सौवले च कर्णे दुशासने तथा।
पतेवश्वैर्यमाघाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि ॥१९॥
आत्मज्ञान समारंमस्तितिक्षा घर्मनित्यता ।
यमर्थानापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥२०॥
निषेवते प्रशस्तानि निदितानि न सेवते ।
अनास्तिक श्रद्दधान एतत्पंडितलक्षणम् ॥२१॥
शोधो हर्पश्च दर्पश्च न्हीस्तंभो मान्यमानिता।
यमर्थानापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥२२॥
यस्य कृत्यं न जानन्ति मंत्रं वामंत्रितं परे।
कृतमेवास्थ जानन्ति स वै पण्डित उच्यते
॥२३॥
यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रति,
समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते
॥२४॥
(४२)
।
-
यस्य संसारिणी प्रथा धर्मार्थावनुपर्तते ।
कामादर्थे वृणोते यः स वै पण्डित उच्यते ॥२५॥
यथाशक्ति चिकीर्पन्ति यथाशक्ति च कुर्वते ।
न किंचिदवमन्यन्ते नराः पण्डितयुद्धयः ॥२६॥
निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्यसति कर्मणः।
अवंध्यकालो वक्ष्यात्मा स वै पण्डित उच्यते ॥ २७॥
आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते ॥
हितं न चाभ्यसूयन्ति पण्डिता भरतर्षभ ।॥ २८ ॥
न हप्यत्यात्मसंमाने नायमानेन तप्यते।
गांगो हद् वाऽक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते ॥ २९ ॥
तत्वशः सर्वभूतानां योगछः सर्वकर्मणाम् ।
उपायझो मनुष्याणां नरः पण्डित उच्यते ॥ ३० ॥
श्रुतं प्रशानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा ।
असंमिनार्थमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः ॥३१॥
अश्रुतश्च समुनद्धो दरिद्रश्च महामनाः ।
अर्थाश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते युधैः ॥३२॥
स्वमयं यः परित्यज्य परार्थमनुतिष्ठति ।
मिथ्या चरति मिनार्थे यश्च मूढः स उच्यते ॥ ३३ ॥
अकामान्कामयति य. कामयानान्परित्यजेत् ।
यलयन्तं च यो द्वेटि तमाहुढचेतलम् ॥ ३४ ॥
अमित्रं कुरते मित्रं मिनं द्वेष्टि हिनस्ति च ।
फर्म चारमते दुष्टं तमाहुढचेतसम् ॥ ३५ ॥
(५३)
संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते ।
चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्पम ॥३६ ।।
धाई पितृभ्यो न ददाति देवतानि न चार्चति ।
सुहृन्मित्रं न लमते तमामूढचेतसम् ॥३७॥
अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भापते।
अविश्वस्त विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥३८॥
परं क्षिपति दोपेण वर्तमानः स्वयं तथा ।
यश्च अभ्यत्यनाशानः स च मूढतमो नरः ॥३९॥
आत्मनो चलमज्ञाय धर्मार्थपरिवर्जितम् ।
अलभ्यमिच्छन्नैष्कान्मूढधुद्धिरिहोच्यते ॥ ४० ॥
अशिष्यं शास्ति यो राजन्यश्च शून्यमुपासते।
कदर्य भजते यश्च तमाहुर्मुढचेतसम्
॥४१॥
अर्थ महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव या।
विचरत्यसमुन्नद्धो यः स पण्डित उच्यते ॥ ४२ ॥
पकः संपन्नमवाति बस्ते पासश्च शोभनम् ।
योऽसंविभज्य भृत्येभ्यः को नृशंसरततस्ततः।।४३ ॥
एकः पापानि कुरुते फलं मुक्के महाजनः ।
भोकारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोपेण लिप्यते ॥४४॥
पकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मु को धनुष्मता।
बुद्धिथुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद्राष्ट्र सराजकम्॥ ४५ ॥
एक विपरसो हन्ति शस्त्रेणैकश्च वध्यते।
सराष्ट्र सप्रजं हन्ति राजानं मंत्रविप्लवः ॥ ४६॥
(४४) ॥४९॥ एका स्वादु न भुञ्जीत एकवार्थान चिंतयेत् । पको न गच्छेदवान नैकः सुप्तेषु जागृयात् ॥४७॥ एकमेवाद्वितीयं तद्यद्राजन्नावबुध्यसे । सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारारस्य नौरिव ॥४॥ एकः क्षमावतां दोपो द्वितीयो नोपपद्यते। यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः सोऽस्य दोषो न मन्तव्यः क्षमा हि परमं बलम् । क्षमा गुणो वंशकानां शक्कानां भूपणं क्षमा , ॥ ५० ॥ क्षमा वशीकृतिलोंके क्षमया किंन साध्यते । शान्तिखड्गः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः ॥५१॥ अतृणे पतितो घह्निः स्वयमेवोपशाम्यति । अक्षमावान्परं दोपैरात्मानं चैव योजयेत् पको धर्मः परंथेयः क्षमैका शांतिरुत्तमा । विचका परमा तृप्तिरहिसका सुखापहा दायिमी नसते भूमिः सो यिलशयानिय । राजानं चापिरोद्धारं वालणं चाऽप्रयासिनम् ॥ हे कर्मणी नरः कुर्वन्तस्मिल्लो विरोचते । अमुपपदपं किंचिदसतोऽनयंस्तथा म. मा. स्यो.३३ ॥५२॥ - पाठ ११ [१] सत्यं वृहस्तमुपं दीक्षा तपो ब्रह्म यक्षः पृथिवीं धारयन्ति । सा नो भूतस्य भन्यस्य पत्न्युर्या लोकं पृथिवी नः कृणोतु॥१॥ अथर्ववेद. १२।११ (सत्यं) सत्य, (वृहत् ) वृद्धि, (ऋतं) न्यारा व्यवहार, (उप्र) क्षामतेज, (दीक्षा) दक्षता, (तपः) तपा द्वंद्व सहन करने की शक्ति, (ब्रह्म ) ज्ञान, (यज्ञः) शुभकर्म ये गुण (पृथिवीं धारयन्ति) मातृभूमिका धारण करते है । (सा.नः पृथिवी ) वह हमारी मातृभूमि हमारे (भूतस्य भव्यस्य पत्नी) भूत भविष्य की पालन की है, वह (नः ऊरं लोकं कृणोत्) हमारे लिये विस्तृत स्थान करे । अर्थात् हमें विस्तृत स्थान देवे। [२] असंबाधं मध्यतो मानवानां यस्या उद्वत. प्रयतः पमं बहु । नानावीर्या औषधी विभर्ति पृथिवी नः प्रथतां राध्यतांन:॥२॥ (यस्याः मानवानां मध्यतः ) जिस मातृभूमिके मनुष्यों के अंदर (उद्घतः, प्रवत, समं बहु अ-संवाधं) उच्चता और नीचता तथा समता के विषयमें बहुत ही निर्वैरता है और (या नाना- वीर्या ओषधीः विभर्ति) नाना प्रकारके वीर्योसे युक्त औषधियोंको धारण पोषण करती है, वह (न पृथिवी ) हमारी मातृभूमि (नःप्रयतां राध्यतां) हमारी कोर्तिका साधन करे। अर्थात् इस मातृभूमिके कारण हमारी प्रसिद्धि होवे।
[३] यस्याञ्चतन प्रदिशः पृथिव्या यस्यामनं कृष्टय संचभूतुः। या विमति बहुधा प्राणदेजत्सा नो भूमिगोप्नप्यने दधातु Irell (यस्या पृथिन्या चतन्नःप्रदिशः)जिस मातृभूमिको चारों दिशाओं में (कृष्टय) विविध सेतियां (यस्यां मनं संयम्युः) जिसमें सन्नको उत्पन्न करती हैं। और उससे (य) जो भूमि (एजत् प्राणत् यया विमति )घमने फिरनेवाले प्राणिमात्र को यहुत प्रकारसे पुष्ट करती है (सानो भूमिः) यह हमारी मातृ. भूमि हमें (गौयु अग्ने अपि दधातु) गौओम तथा अन्नमें भी धारण करें। [४] (१७) यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानी देवा भूमि पृथियीमप्रमादम् । सा नो मधु प्रियं दुहामथो उक्षतु वर्चसा ॥७॥ (विश्वदानी यां भूमि पृथिवी) सब कुछ देनेवाली जिस विस्तृत मातृभूमि की (अ-स्वप्नाः देवाः) सुस्ती न करनेवाले देव (अ- प्रमाद रक्षन्ति) प्रमादरहित होकर रक्षा करते हैं (सानः प्रियं मधु दुहा) वह हमको मीठे मधुर पदार्थ देतीरहे (अथो वर्चसा उक्षतु) और तेजके साथ हमें बढाये ॥ . यो नो द्वेपत् पृथिवि यः पृतन्याद्योऽभिदासान्मनसा योवधेन। तं नो भूमे रंधय पूर्वकत्वरि ॥१४॥ हे (पृथिवि) मातृभूमि ! (याना द्वेपत्) जो हम सब का द्वेष १(य पृतन्यात् ) जो हमारे ऊपर सेना चलावे, (या मनसा भदासात् ) जोमनसे हमें दास बनाने का विचार करे तथा (यः न) जो वधसे हमारा नाश करनेका यत्न करे, हे (पूर्व-कृत्वरि) किर्नामें कुशल (नः भूमे) हमारी मातृभूमि तू (तं रंधय) तका पूर्ण नाश कर। ।
(४) [७] त्यज्जातास्त्वयि चरन्ति मास्त्वं बिभर्पि द्विपदस्वं चतुष्पद तवेमे पृथिविपञ्च मानवायेभ्योज्योतिरमृतं मत्येभ्य उद्यान्सूर्यो रश्मिभिरातनोति ॥१५॥ हे (पृथिवि) मातृभूमि! (ये मांः त्वज्जाताः)जो हम सब मनुष्य तुझसे ही उत्पन्न हुए हैं और (त्वयि चरलि) तुझपर ही चलते हैं, (स्वं द्विपदः चतुष्पदः विभर्पि) तू द्विपाद और चतु- पादोंको धारण पोषण करती हो, (येभ्यः मत्र्येभ्यः) जिन मस प्राणियों के लिये (अमृतं ज्योतिः) अमृतमय प्रकाश (उद्या सूर्यः) उदय होनेवाला सूर्य (रश्मिभिः आतनोति) अप किरणोंसे फैलाता है, वे (इमे पंच मानवा ) ये सब पांच प्रकार के मनुष्य (तव पव) तेरे ही सुपुत्र हैं। [८] विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमि पृथिवीं धर्मणा धृताम् । शिवां स्पोनामनुचरेम विश्वहा ।। १७ ।। (ओपधीनां मातरं) ओपधियोंकी माता अर्थात् उत्पाद (शियां) कल्याणकारका (स्योनां) सुखदायक, (धर्म धृतां) धर्मसे धारण की हुई, (ध्रुवां पृथिवीं भूमि ) स्थिर से विस्तृत भूमिको (विश्वदा) सर्वदा (विश्ववं) सर्वस्व अर्थ करके (अनुचरेम) सेवा करेंगे।
संस्कृत-पाठ-माला।
चोचीस पुस्तकोका मू०६॥) और डा० व्य० ॥=) बारह
पुस्तकों का मूय ४) और डा.व्य.॥) प्रति भागका मूल्य !)
आने और डा.प.-) एक आना। अत्यंत सुगम रीतिसे
संस्कृत मापाका अध्ययन करने की अपूर्व पद्धति ।
इस पद्धतिकी विशेषता यह है-
१ प्रथम द्वितीय और तृतीय भाग। इन भागों में संस्कृतके
साथ साधारण परिचय करा दिया गया है।
२ चतुर्थ भाग । इस चतुर्थ भागमें संधिविचार बताया है।
३ पंचम और पट भाग। इन दो भागों में संस्कृनके साथ
विशेष परिचय कराया है।
४ सप्तम से दशम भाग। इन चार भागोंमें पुलिंग,, स्त्रीलिंग
और नपुंसलिंगी नामों के रूप बनाने की विधि पताई है।
५ एकादश भाग। इस भागमें "सर्वनाम" के रूप यताये हैं।
६ द्वादश भाग | इस भागमें समासोका रिचार किया है।
७ तेरहसे अठारहवें भाग तक ६ भाग। इन छ: मागोमें
क्रियापदविचार की पाठविधि बताई है।
८ उन्नीससे चौबीस मागत ६ भाग। इन छ: भागोम
दफे साथ परिचय कराया है।
अर्थात् जो लोग इस पद्धतिसे अध्ययन करेंगे उनको अप
परिश्रमसे पड़ा लाभ हो सकता है।
मंत्री-स्वाध्याय-मंडर, आँध (जि. सातारा)
मक तथा प्रकाशक-धी. दा. सातपळेकर, भारतमुद्रणालय
स्थाप्यायमंडल, आँध (जि. सातारा.)
HNDBIRTHDRDEReart
५६GENERekse
"
अंक२०ॐ
संस्कृत पाठ
माला।
.
Rig
(संस्कृत भाषाका अध्ययन करनेका सुगम उपाय)
भाग वीसवाँ।
HEMA
लेखक और प्रकाशक,
श्रीपाद दामोदर सातवळेकर,
स्वाध्याय मंडल, औंध (जि. सातारा)
प्रथम वार.
Indian
संवत् १९८४, शक १८४९, सन १९२७
मूल्य पांच आने
HOMERHETANEERINNARAY
केन उपनिपद। इस पुस्तकमें निम्नलिखित विषयोंका विचार हुआ है- १ केन उपनिषद् का मनन, १८ इंद्र कौन है? २ उपनिषद् शान का महत्त्व १९ उपनिषद् का अर्थ और ३ उपनिषद् का अर्थ, व्याख्या, ४ सांप्रदायिक झगड, २० अथर्ववेदीय केन सूक्तका ५" केन" शब्द का महत्त्व, अर्थ और व्याख्या, ६ वेदान्त, २२व्यष्टि, समष्टी और परमेष्टी ७ उपनिषदोंमें शानका विकास, २२ त्रिलोकी, ८अग्नि शन्दका भाव २३ अथर्वाका सिर, ९ उपनिषद् के अंग, २४ ब्रह्मशानी की आयुष्य मर्यादा, १०शांतिमंत्रों का विचार, २५ब्रह्मनगरी अयोध्या,आठवत. २१ तीनों शांति मंत्रों में तत्त्व- २६ आत्मवान् यज्ञ, ज्ञान, २७ अपनी राजधानीमें ब्रह्मका १२ तीन शांतियोंका भाव, प्रवेश, १३ ईश और फेन उपनिषद्, २८ देवी भागवत में देवीकी कथा, १४“यन" कौन है?, २९ वेदका वागांमृणी सूक, इंद्र १५ हेमवती उमा, सूक्त, चैकुंठ सूक्त, अथर्व सूक्त १६ पार्वती कौन है? ३० शास्तमत, देव और देवता २७ पर्यत, पार्वती, रुद्र, सप्त की एकता, अपि और अरंधती, ३१ चैदिक ज्ञान की श्रेष्ठता। इतने विषय इस पुस्तक में आगये है, इस लिये उपनिषदों का विचार करने वालों के लिये यह पुस्तक अवश्य पढ़ने योग्य है। मूल्य २१) रु. डाकव्यय) है। मंत्री-स्वाध्याय मंदल, ऑघ. (जि. सातारा)
Receepakleey
过长会长定子会会会长长长长
अंक२०
संस्कृत पाठ माला।
(संस्कृत भाषाका अध्ययन करने का सुगम उपाय)
भाग वीसवाँ।
ORDERPREETTEShantinay
लेखक और प्रकाशक,
श्रीपाद दामोदर सातवळेकर,
स्वाध्याय मंडल, औंध (जि. सातारा)
प्रथम वार.
संवत् १९८४, शक १८४९, सन१९२७
मूल्य पांच आने
वहीRANTOSH
म्वरचिन्ह ।
वेदमें अक्षरों के नीचे और ऊपर स्वरचिन्ह दिये जाते हैं उन
को स्वर कहते हैं । इन स्वरोके कुछ नियम इस पुस्तक में दिये
हैं। यदि पाठक इन नियमोको ध्यानसे पढ़ेंगे तो उनको स्वर किस
नियमसे दिये जाते हैं और स्वर कैसे बदलते हैं इस यातका पता
लग जायगा | स्वरका प्रकरण बडा लया चौडा है, परंतु इस
मागको संक्षेप से यहां दिया है। इसलिये इसके मनन से पाठक
स्थरके विपयकी आवश्यक बात समझ सकते हैं।
औंध (जि. सातारा)
लेखक
श्रापाद दामोदर सातवळेकर
स्वाध्याय मंडल
२० । ११ । २७
महक तथा प्रशाशक- श्रीपाद दामोदर सातवळेकर,
मारत मुद्रणालय, आंध (जि. सातारा)
ॐ
संस्कृत-पाठ-माला।
भागवीसवाँ ।
DECE
पाठ १
इस पाठमें निम्नलिखित मंत्रोंका अध्ययन कीजिये-
(१)
नमस्ते हरसे शोचिपे नमस्ते अस्त्वचिंचे।
अन्यास्ते अस्मत्तपन्तु हेतयः पावको अस्मभ्यं शिवो भव ॥
यजु.३६१२०
हे ईश्वर ! ( हरसे) दुटताका हरण करनेवाले, (शोचिपे)
पवित्रता यढानेवाले और (अचिंपे)तेज फैलानेवाले (ते नमः,
ते नमः ) तेरे लिये हमारा नमस्कार (अस्तु ) है । (ते हेतयः)
तेरे शस्त्र (अस्मत् अन्यान् ) हमको छोडकर अन्य अर्थात् धर्म
के शत्रुओंको (तपन्तु ) ताप देते रहें। (पावकः) पवित्रता
करने वालातूश्वर (अस्मभ्यं) हम सयके लिये (शियो भय)
कल्याण कारी होये ॥
परमेश्वर दुष्टता दूर करने वाला, पवित्रता बढाने वाला और
प्रकाश को फैलाने वाला है, इसलिये उसको ही नमन करना हम
-
()
यजु. ३६०२१
सयको उचित है । हरएक मनुष्य उसीकी पूजा करे । हम सबका
आचरण ऐसा धर्म नियमों से युक्त होवे कि जिससे हमपर ईश्वर
का शासक दण्डन गिरे, वह दण्ड उनपर गिरेकि जोअधर्माचरण
करते हो। पवित्रता बढ़ाने वाले ईश्वर की दया हम सब पर
घरसती रहे।
(२)
नमस्ते अस्तु विद्यते नमस्ते म्तनयित्नवे।
नमस्ते भगवन्नस्तु यतः स्वः समोहसे ।।
है ईश्वर ! (विद्युते ते नमः अस्तु) विशेष तेजःस्वरूप तेरे
लिये हमारा नमस्कार हो। (स्तनयित्नवे ते नमः) महान शब्द
करने वाले नेरे लिये मेरा नमस्कार हो । हे (भगवन् ) ऐश्वर्य
संपन्न ईश्वर !(यतः ) जिस स्थानसे त् (स्वः) अपने निजानंद
में (संहसे)सम्यक् चेष्टा करता है, वहां (ते नमः अस्तु)
तेरे लिये मेरा नमस्कार हो।
श्वर परम तेजस्वी है, महान ऐश्वर्य संपन्न है और शब्दका
प्रवर्तक भी है तथा वह अखंड आनंदमय है। इसलिये उसको
नमस्कार करना चाहिये । उसी की पूजा करनी चाहिए। और
उसी की भक्ति करनी चाहिये।
(३)
यनो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु ।
शं नः कुरु प्रजाभ्योभयं नः पशुभ्यः॥
यजु.३६३२२
है ईश्वर ! (यतः यतः) जिस जिस स्थानसे तू (संहसे)
प्रेरणा करता है (ततः) उस उस स्थानसे (नः अभयं कुरु )
हम सबका अमय कर । (नः प्रजाभ्यः) हमारी सय प्रजाओ के
लिये ( शं अभयं) कल्याणकारक अभय (कुरु) कर और
(मः पशुभ्यः ) हम सबके पशुओं के लिये भी अभय दान कर
ईश्वर हम सबको अभय देवे, हमारी प्रजाओं और हमारे
पशुओंको भयरहित करे अर्थात् हम सबका पूर्ण कल्याण करे।
वह तो सब प्रकार से कल्याण करता ही है। परंतु यहां यह
प्रार्थना है। इस प्रकार की प्रार्थना मनुष्य करें और उसकी
निर्भयतामें सदा रहे।
(४)
नमः सायं नमः प्रातर्नमो राज्या नमो दिवा ।
भवाय च शर्वाय चौमाग्यामकरं नमः॥
अथर्ववेद ११।२।१६
(भवाय) सबके उत्पादक ईश्वर के लिये और (शर्वाय)
सबका दुःख निवारण करने वाले ईश्वर के लिये सायंकाल,
प्रातःकाल, रात्रीके समय और दिनके समय (नमः अकर)
नमस्कार करते हैं।
दिनमें प्रातःकाल, दोपहरके समय, सायंकाल और रात्रीमें
सोते समय ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना भक्तिसे और प्रेम
से करनी चाहिए।
-
ता अस्य नमसा सहः सपर्यन्ति प्रचेतसः
ब्रतान्यस्य सश्चिरे पुरुणि पूर्वचित्तये वस्वीरनु स्वराज्यम्॥
ऋग्वेद १।८४ । १२
स्वराज्य
अनु
वस्वीः) स्वराज्य प्राप्तिके अनुकूल व्यवहार
करने वाले (ताप्रचेतसः) वह ज्ञानी जन (अस्य सहः) इस
ईश्वरकी शक्तिका ( नमसा सपर्यन्ति ) नमस्कारोंसे पूजन करते
हैं। तथा (अस्य पुरूणि वता) इसके विविध नियमों का (स.
श्चिरे) पालन करते हैं इसलिये कि उससे (पूर्व चितये) अपूर्व
लाभ प्राप्त हो।
अपना अभ्युदय चाहने वाले सब लोक परमेश्वर की शक्तियों
का, उसके महान काँका और उसके अनंत यश का चिंतन
करें और अपनी भक्तिसे उस की पूजा करें। ऐसा करने से ही
उनको अपूर्व लाम प्राप्त हो सकता है।
यदिन्द्र ब्रह्मणस्पतेपि मृपा चरामसि ।
प्रचेता न आंगिरसा दुरितात्पावंहसः॥
अथर्ववेद. ६।४५।२
हे (इन्द्र) प्रभो ! हे ( ब्रह्मणस्पते) शानके स्वामिन् ! (यत्)
यदि (अपि भूपा चरामसि ) असत्य आचरण हमसे हुआ हो,
(दुरितात् अंहसः) तो उन सब पापोंसे (आंगिरसः प्रचेताः)
विशेष छानी विद्वान् (नः पातु ) हमको बचाये ।
इस जगत् का एक ही प्रभु है वह सर्वक्ष है, वही सबसे श्रेष्ठ
और सर्वोपरि है। कोई भी मनुष्य उस से छिपकर कोई पाप कर
नहीं सकता। इस लिये सबको उचित है कि वे उस ईश्वर की
भकि करें और श्रद्धासे उसकी प्रार्थना करें कि यह हम सयको
ऐसी प्रेरणा करें कि हमसे कमी युरा आचरण न हो और हम
सय सदा पापसे पचते रहें।
सूचना ।
पाठक इस प्रकार मंशोक शप्दोका अर्थ करें और शम्दार्य के
अनुसार मनन करफे मंत्रका मावार्थ दे ।छोटेसे मंत्र का मी
मानार्य पहा गंभीर हो सकता है, क्यों कि मायार्य में एक एक
सदके आशय का सीकरणके साथ तात्पर्य लेना होता है।
इस टंगसे अभ्यास करनेसे पाटको को यदा लाम होगा।
(७)
पाठ२
वैदिक स्वर ।
उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितश्च स्वरास्त्रयः।
व्हस्वो दीर्घ प्लुत इति कालतो नियमा अचि ॥
शिक्षा. ११
उदात्त, अनुदात्त, स्वरित ये तीन स्वर हैं और उच्चारण
के लघुदीर्घ भेद मे -हस्व, दीर्घ, प्लुत ये भी तीन भेद होते
इनमें उदात्त अनुदात्त और स्वरितये स्वरके भेद ऊपर नीचे के
आघात के कारण बनते हैं और
न्यून
अधिक काल लगने के
कारण व्हस्व दीर्घ प्लुत होते हैं।
हस्व स्वर-अ, उ, ऋ,ला
दीर्घ स्वर--आ, ई, ऊ, ऋ,०, ए, ऐ, ओ, औ।
हस्व स्वरका काल एक, दीर्घस्वर का काल दो और प्लुत
स्वरका काल तीन मात्रा होता है। अर्थात् -हस्व स्वर ही दो गुणा
लंधा करनेसे दीर्घ और दीर्घ स्वर और अधिक बढाने से प्लुत
बनता है । देखिये-
हस्व-हे राम-।
दीर्घ - हे रामाs-5-1
प्लुत - हे रामा 5-5-5- ||
एक ही अकार दो गुणा और तीन गुणा लंया करने से दीर्घ
और प्लुत क्रमश. होता है । इसी प्रकार अन्य स्वरोके विपयम
समझना योग्य है।
।
(१०) इन वैदिक स्वरोका उच्चारण भिन्न भिन्न रोतिसे होता है। अर्थात् उदात्त अनुदात्त और स्वरित स्वरोका उच्चार भिन्न भिन्न रीतिसे होता है। और यदिइन स्वरों के उच्चारण में अशुद्धि हुई तो अर्थका अनर्थ भी होता है। इस लिये वेदोच्चार करने के लिये इन स्वरोंके ठीक शान होनेकी अत्यंत आवश्यकता है। आग्निीळे पुरोहित यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥ ऋ. १ । ११ यह मंत्र देखिये । इसमें कई अक्षरों के नीचे रेपा है, कईयो के सिर पर रेपा है और कई अक्षर इस प्रकार की रेपाओसे रहित हैं। ये स्वर चिन्ह ऐसे क्यों आते हैं और इसका इन अक्षरोसे क्या संबंध है यह अब देखना है । यदि पाठक इस विषयके लेख आगेके पाठोंमें विशेष ख्याल से पढ़ेंगे तो उनको इस विषयका आरश्य ज्ञान हो जायगा । इस लिये पाठकोंमे निवेदन है कि वे इस स्वरबोधक पाठोका अध्ययन विशेष मनन से करें और लाभ उठायें। पाठ ३ इस पाठ में निम्न लिखित मंत्रोका अध्ययन कीजिप- (१) पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धुर्तेरराव्णः । पादि रीपत उत या जिघांसतो वृहदानी विष्ठय । ऋग्वेद : '३६ । १५ हे (वृहत्-मानी) विशेष तेजस्यी! है (यविष्ठथ) बलवान् ( अग्ने ) प्रकाश देय या !(न )हम सयको (रक्षसः) (११) राक्षसोंसे ( पाहि) बचाओ । (धूर्तेः अ-राणः) धूर्त स्यार्थियों से (पाहि) यचाओ। (जिघांसतः) हनन करनेवाले शत्रुसे (उत वा) तथा (रीपतः ) विनाश करनेवाले शत्रुसे (पाहि) हम सथको यचाओ। हे ईश्वर ! त हम सयका पचाय कर, राक्षस, दुष्ट, धूर्त, स्यार्थी आदिसे कर । तूही सबमें समर्थ, सपको तेज देनेवाला सयका प्रेरक देव है। इसलिये हम सबको अपने यचाय करनेके लिये समर्थ बनाओ और हमें तेजस्वी तथा यशस्वी कर । (२) विजानीहार्यान्ये च दस्यवो हिप्मते रन्धया शासदवतान् । शाकी भव यजमानस्य चोदिता विश्वेत्ता ते सधमादेपुचाकन ॥ ऋग्वेद.११५१।८ हे ईश्वर ! (आर्यान् विजानीहि) अोंको अर्थात् सत्य धर्मीयों को जान लो और (येच दस्यवः ) जो चोर हैं और घातक तथा हिंसक हैं उनको भी जान लो । (बहिष्मते ) सत्कर्म करने वाले के लिये (अ-व्रतान् ) नियम तोडनेवालों को (शासत्गंधय) शासन करते हुए दण्ड दो । तू (शाकी भव) समर्थ है। तथा तू ( यजमानस्य चोदिता) कर्मण्य पुरुष को प्रेरणा करने घाला है (ते) ये (ता विश्वा) वे सब कर्म में (सधमादेषु ) आनंद प्राप्तिके पुरुषार्थमे ( चाकन) चाहता हूं। हे ईश्वर ! हम सबमें जो सच्चे धर्मात्मा है और जो दुराचारी अधार्मिक हैं तथा नियमविरुद्ध आचरण करने वाले हैं उन सबको देख लो! जो सज्जन हैं उनकी रक्षा कर और जो दुर्जन हो उनको दण्ड दो। त् ही यह सब कर्म करने के लिये समर्थ है ।तू ही सब को पुरुषार्थ करने की प्रेरणादेता है और तुम्हारे ही कर्म हम सबको आनंद बढाने के कार्य में सहायकारी होते हैं, इसलिये हम सब . यह प्रार्थना कर रहे हैं। ऐसे मंत्र मनुष्योंको भी धर्म के नियम बताते हैं इस लिये इन से जो बोध लेना उचित है वह यहां बताया जाता है- (१) मनुष्य प्रथम सज्जन कोन है और दुर्जन कौन हैं इस का विचार करे, (२) उनमें पुरुषार्थी कौन हैं और नियम तोडने घाले कौन है यह देखे, (३) पश्चात् सज्जनों की रक्षा करे और दुर्जनों को दण्ड देवे, (४ ) अपना सामर्थ्य बढाये,(५) सत्कर्मी पुरुषार्थीयोंकी सहायता करे, (६) इस प्रकार व्यवहार करके जगत में उन्नतिको प्राप्त हो। इन आशयोंको प्रकट करने वाले इस मंत्र के ये शब्द हैं- (१) आर्यान विजानीहि ये च दस्यवः, (२-३) यहिप्मते शासत, अवतान् रन्धय, (४) शाकी भय, (५) यजमानस्य चोदिता, (६) ते ता विश्वा सधमादेप चाकन । पाठक इस रीतिसे मंत्रोद्वारा अपने आचरण के लिये घोर प्राप्त करें । घेद के मंत्रोंसे मनुष्योकं व्यवहार में बोध इस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। धधैर्दुःशंस अप दूढयो जहि दूर था ये अन्ति वा के चित्रिणः । अधा यशाय गणने सगं ध्यग्ने सन्ये मा रिपामा घयं तव । ऋग्वेद. १ । ९४।९ हे (अग्ने ) प्रकाश नेवाले प्रभो ! ( वधैः) वध के साधन- भून शास्त्रोसे (दुःशंसान ) दुष्ट (ढय ) दुर्घ दियालों का (अपहि) मार । जो (दरे या ये अन्ति वा) दूर हैं पास दो नथा (ये के च) जो कोई (अत्रिणः)सर्वमक्षक स्वार्थी हैं। उन सय को दण्ड दे । (अधा) पश्चात् (यनाय गणने) या परनाले स्तोताको (सुगंधि) सुगम मार्ग कर। हे प्रभो ! नरी (मरण) मित्रनाम (वयं मा रिकाम) हम नष्ट नहीं होंगे। अथवा जो (१३) हे ईश्वर ! दुष्ट दुर्जनों को, जो पास हो या दूर हो, एकदम हम से दूर कर दे । स्वार्थी खुदगर्ज केवल अपने पेट भरने वाले ही जो हैं उनको भी योग्य दण्ड दे । तथा जो यक्ष कर्ता है उसकी उन्नति का मार्ग सुगम कर । है प्रमों ! हम तुम्हारी मित्रतामें रहेंगे तो कभी नष्ट नहीं होंगे। इस मंत्र व्यवहार का बोध इस प्रकार लिया जाता है-(१)दुष्ट को अपराध के योग्य दण्ड देना चाहिये, (२) स्वार्थी स्वयंभोगी लोगों को भी योग्य मार्गपर लाना चाहिये, (३) सत्कर्मी पुरुषार्थी जो हो उनकी उन्नति का मार्ग मुगम करना चाहिये, (४) जो मनुष्य ईश्वर की भक्ति करते हो उनका कभी नाश नहीं होगा। यहां पाठक देख लें कि किस वेदवाक्य का कौनसा अर्थ होता है और उससे भावार्थ तथा बोध कैसा प्राप्त किया जाता है। इन्द्रातिभिर्बहुलाभिर्नो अद्य याच्छष्टामिमघवर जिन्य । यो नो द्वेप्यधरः मस्पदीष्ट यमु द्विप्मस्तमु प्राणो जहातु ।। ऋग्वेद.३१५३ । २१ हे (इन्द्र ) प्रभो ! ( अद्य ) आजही (बहुलाभिः अतिभिः) अनेक क्षणों के साथ (न:) हमारा रक्षण कर । है (मघवन् ) धनवान् ! हे शूर [ हम सबको ( श्रेष्टाभिः) श्रेष्टताओंके साथ (यात् ) आगे (जिन्व ) बढाओ। (यः नः द्वष्टि ) जो हम सब का द्वेष करता है उसको (अधरः सस्पदीए) नीचे दबाओ। हम सब (यं उद्विष्मः ) जिसका द्वेष करते हैं (तं उ) उसको (प्राणः जहानु)प्राण छोड देवे ॥ हे ईश्वर हमारी रक्षा कर।हे ऐश्वर्यमय प्रभो !हम सबको श्रेष्ठ गुणों के साथ आगे चढाओ। जो अकेला हम सबका निष्कारण द्वेष करता है इस कारण जिसका हम सब द्वेष करते हैं वह हमसे दूर हो ।
(१४) सूचना । पाठक यहा प्रथम मंत्रोंके पद अलग अलग करना सीखें। तत्पश्चात् उन पदोंका अन्वय करें। अन्वयके पश्चात स्थर्य अर्थ करने का यत्न करें। और यदि अर्थ नहीं हुआ तो फिर यहा दिया हुआ अर्थ पढकर ठीक अर्थ लगा। इस प्रकार प्रयल के साथ अध्ययन करेंगे तो वे बहुत उन्नति प्राप्त कर सकते हैं। तवाहमग्न ऊतिमिर्मित्रस्य च प्रशस्तिभि । द्वेपोथुनो न दुरिता तुर्याम मानाम् ।। ऋग्वेद.५।९।६ पद- तव । अह । अग्ने । ऊतिमि मित्रस्य । च । प्रशस्तिमि डेप +युत ।न। दुरिता । तुर्याम । मयानाम् । अन्यय-हे अग्ने ! मित्रस्य तव प्रशस्तिभि तिमि द्वेष भ्युत. न माना दुरिता तुर्याम । अर्थ-हे ( अग्ने)प्रकाश देनेवाले ईश्वर ! (मिनस्य तव)तू जो मिन उसकी (प्रशस्तिमि अतिमि ) प्रशसनीय रक्षणों से सुरक्षित होकर (द्वप +युत न ) द्वेष युक्त लोगोंके समान अहित करनेघाल (मत्यांना) मनुष्योंके (दुरिता तुर्याम) दुष्ट कमोसे दूर होकर सुरक्षित होग। भावार्थ-ईश्वर ! त् हमारा मित्र है और हमारा उत्तम सर- क्षण करता है । तेरे अद्भुत संरक्षणसे युक्त होते हुए हम दुष्ट- मनुष्योंके पतों से अपने आपको यचायेंगे, क्योंकि जो मनुष्य तेरी रक्षा ओगया है उसको डरानेघाला इस जगत् में कौन हो सक्ता ? अग्नि "शष्ट आग का वाचक है, परतु अग्निको भी जिसने पनाया उमका मा नाम येमें" अग्नि "ही होता है।
. शब्द निपेध, नकार अर्थमें आता है, परंतु येदमें "" (समान ) के अर्थमें आता है । पाठक इसप्रकार मंगोंके अर्थ लिखनेका यत्न करें। मंत्रोको कंठभी करने जांय । ऐसा करने से उनको घडा लाम हो सकता है। 9929 पाठ४ वैदिक स्वर। वेदमंत्रों के अक्षरों के ऊपर और नीचे जो रेपाएं होती है उनको म्बर कहते है और उनके भेद उदात्त, अनुदात्त और स्वरित है इस विषयमें इससे पूर्व पताया जा चुका है । इन रेषाओं के अनु- सार ऊपर अथवा नीचे आघात करके मंगाक्षरोंका उच्चारण किया जाता है अथवा वैसा करना चाहिये, अन्यथा कभी कभी अर्थमें भी विपरीत परिणाम होता है। उदात्त पर के लिये कोई चिन्ह लिखा नहीं होता है अर्थात् साधारणतया स्वरचिन्ह रहित अक्षर उदात्त समझना योग्य है। अनुदात्त स्वरका चिन्ह अक्षर के नीचे रेपा () ऐमी दी जाती है और स्वरित चिन्हकी रेषा अक्षरके सिरपर ऊपर खड़ी (1)ऐसी रहती है। प्रायः प्रत्येक शब्दमें एक स्वरको छोड कर शेष सब स्वर अनुदात्त होते हैं- अनुदात्तं पदमेकवर्जम् ॥ अष्टाध्यायी.६।१।१५८ पदमे एक स्वरको छोडकर शेष स्वर अनुदात्त होते हैं।" उदात्त का उच्च उच्चारण, अनुदात्तका नीच भागमें दया हुआ उच्चारण और दोनों का संयुक्त उच्चारण स्थरित स्वर- का होता है-
(१६)
उच्चैरुदात्त । नीचैरनुदात्त ।
समाहार स्वरित ॥ अष्टाध्यायी १।२।२९-३१
उदात्तका उच्चारण उच्च, अनुदात्त का नीच और स्वरित का
उच्चारण मिश्रित होता है ।
यद्यपि पेसा कहा है तथापि इससे सब बातोंका स्पष्टीकरण
नहीं होता है । इस लिये इसका अधिक सुबोध विवरण करना
चाहिये । पाठकम्मरण रखें कि वेदमत्रोंका उच्चार करते समय
इन स्वरचिन्होंकी ओर ध्यान देना अत्यत आवश्यक है, अशद्ध
स्वरोच्चार से मनका भार बदल जाता है, इस विषय में व्याकरण
शिक्षा का वचन देखने याग्य है-
मत्री हीन स्वरतो वर्णता वा
मिथ्या प्रयक्तो न तमर्थमाह । शिक्षा ४९
सर और वण बरे उच्चार के कारण मत्र अपने याग्य
अर्थ को प्रकट नहीं कर सकता।" तथा-
व्याघ्री यथा हरत्पुत्रान्दष्टाभ्या न च पीडयेत।
तद्वद्वां प्रयोक्तव्या .॥ शिक्षा।
'शरणी जैमी अपने सच्चोंको अपने जबड में पकडकर ले
जाती है. परतु वन्चोका दात नहीं लगाती, उसी प्रकार समाल कर
अक्षरोंका उच्चारण करना चाहिय ।'
इत्यादि सब कथन इस लिय कहा गया है कि अक्षरोका उच्चा
रण योग्य रीतिसे किया जाये । इसीलिये ऐसा कहा है कियाग्य
गुरुके पास से वेद मीसना चाहिये । घरका गलत उन्चार करने
न्दिरा पद का बिल्कुल उलग अर्थ होता है, यह उदा
हरण भी शिक्षामय में इसीलिय दिया है। न्यादि वर्णन से पाठक
जान गय होंगे विदिक भाषामे म्यगेका महत्व क्तिना है।
"
-
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(१७)
उदात्त अनुदात्त और स्वरित ये स्वर अथवा इनके स्वर चिन्ह
केवल स्वरोंके साथ ही संबंध रखते हैं, इनका व्यंजनों के साथ
कोई संबंध नहीं है यह यात पाठकोको विदित हो है।
प्रत्येक शब्दमें एकसे अधिक उदात्त स्वर नहीं होता है यह सर्व
साधारण नियम इससे पूर्व बताया ही है। सामासिक शब्दों में
कई स्थानोपर एकसे अधिक उदात्त स्वर रहते हैं। येह सब
बातें ध्यानमें लेनेसे शब्दोंके नऊ भेद होते हैं यह पाठकों के
ध्यानमें आ जायगा। ये भेद यहां दिये हैं-
१ अंतोदात्त- जिसमें अंतभागमें उदात्त स्वर होता है । जैसा-
अग्निः
२ आधुदात्त- जिसमें प्रथम स्वर उदात्त होता है। जैसा-
"सोमः।'
३ उदात्त- केवल उदात्त स्वर युक्त शब्द । जैसा ""
४ अनुदात्त- अनुदात्त म्वर युक्त शब्द । जैसा-"
५ नीच स्वरित-निम्न स्वरसे उच्चारा जानेवाला स्वरित स्वर
वाला शब्द । जैसा- "वीय',
६ मध्योदात्त- मध्य स्वर जिसमें उदात्त होता है। जैसा-
" हविषा"
७ स्वरित- उदात्त और अनुदात्त इन दोनों स्वरोके धर्मों का
संयोग जिसमें होता है, ऐसे स्वरयुक्त शब्द । .
जैसा- "स्व"
८ द्वथुदात्त- जिसमें दो उदात्त स्वर होते हैं । जैसा-"वृहस्पतिः"
९ ज्युदात- जिसमें तीन उदारा स्वर होते हैं। जैमा-
"इन्द्राबृहस्पती
(२०) पाट५ इस पाठमें निम्न लिखित मंत्रों का अध्ययन कीजिये- or विशां कविं विश्पति शश्वतीनां नितोशनं वृषभं चर्षणीनाम् । प्रेतीपणिमिपयन्तं पावकं राजन्तमग्नि यजत रयीणाम् ।। ऋग्वेद.६।१।८ पद-विशां । कविं । विश्पति । शश्वतीनां । नितोशनं । वृपमं । चर्पणीनां । प्रेति इपणि । इपयन्तं । पावकी राजन्त । अग्नि । यजतं । रयीणाम् । अन्वय-शश्वतीनां विशां कवि विश्पतिं नितोशनं चर्षणीनां वृपमं प्रेतीपणी इपयन्तं पावकं रयीणां यजतं राजन्तं अग्नि (स्तुमः)। अर्थ-( शश्वतीनां विशां कर्वि) शाश्वत प्रजाओं का कवि अर्थात् वाणीका प्रेरक, (विश-पति ) प्रजापालक, (निम्तोशनं) शत्रु- नाशक (चर्षणीनां वृषभ) मनुष्योंके बलोंका वर्धक, (प्रेतीपर्णी) प्रेरक (इपयन्तं) अनादिको सिद्धता करने वाला (पावकं ) पवित्रता करनेवाला (रयीणां यजतं)धनोंका दाना (राजन्तं अग्नि)प्रकाशमय तेज के देवकी हम प्रशंसा करते हैं। भावार्य- अग्निको भी उप्पाताने चाला ईश्वर है, वह सब प्रजाओं को पाशक्ति देता है, वही सब का पालनकर्ता है, वही दुष्टोंको दूर करता है, वही मनुष्यों के बलौकी वृद्धि करता है, सब को उन्नति के मार्ग पर चलाता और सयको अम आदि देता है, यही सबको पवित्रता करता हे और सयकी शोभा बढाता है।यही पक देव हम सयको नमस्कार करने योग्य है।
(२१)
(२)
नाना व १ नेवसे स्पर्धन्ते रायो अर्य । तूर्धन्तो दस्युमायवो
प्रतै सीक्षन्तो अग्रतम् ॥
ऋग्वेद६।१४।३
पद- नाना । हि । अग्ने । अरसे । स्पर्धन्ते । राय । अर्य ।
तन्त । दस्यु । आयव ॥ वतै ।सीक्षन्त । अवतम् ।
अन्वय-भग्ने ! अर्थ नाना राय अवसे स्पर्धन्ते । आयव दस्यु
तुर्षन्त प्रतै अग्रत साक्षात ।
अर्थ-६ (अग्ने ) तेजस्विता के देष ! (अर्थ)शत्रुके (नाना
राय ) नाना प्रकारके धन (अवसे स्पर्धन्ते) अपनी रक्षाके
लिये यहा स्पर्धा कर रह है। आयव ) मनुष्य (दस्यु) शत्रुको
(तुर्यन्त )नष्ट करते हुए अपने (प) यताचरणोंस (अ-बत)
धर्म नियमोंका पालन न करने वाले मनुष्यका (सीक्षन्त ) परा
भूत करते हुए आगे पढते हैं।
भावार्थ-हे ईश्वर ! शत्रुके नाना प्रकारकं धन अपने बचाव
लिये प्रयत्न कर रहे हैं, परतु उनका प्रयत्न अब निष्फल है। क्यों
कि हमारे मनुष्य शत्रुका पराभव करत हुए अपने शुद्धधर्माचरणों
से अधर्मिकों को हटाते हैं । अर्थात हमारे नियम पालन करने
वाले लोगोंके सामने शत्रु ठहर नहीं सकते। हे ईश्वर ! यह
तुम्हारी हमपर बडा कृपा है।
सुधीररयिमाभर लातवेदो विचर्षणे ।
जदिरक्षासि सुक्रतो। ऋग्वेद ६।६।२९
पद- सुवोर । रयिं । आ भर । जातवेद । वि चर्पणे । जहि ।
रक्षासि । सुक्रता।
अन्यय-हे जातवेद विचर्षणे ! सु-वीर रयिं आभर । हसु-
अतो! रक्षासि जहि।
(२२) अर्थ-हे ( जात-वेदः) सयके शाता ! हे (विचर्षणे ) सर्व साक्षी ईश्वर ! (सुधीरं रयि) उत्तम वीरों से युक्त धन को हमें (आ भर) दो और हे (सु ऋती) उत्तम कर्म करने वाले ! (रक्षांसि जहि) दुशका नाश कर। भावार्थ-हेशानी सर्वसाक्षी ईश्वर ! हमें ऐसा धन दो कि जिसके साथ उत्तम पीर रहें। तथा हे उत्तम कर्म करने वाले ईश्वर ! ऋर कर्म करने वाले दुष्टोको दूर कर ।। इस मंत्रम " सुधीरं रयिं आभर " ये शब्द प्रयोग महत्त्व रखते हैं । धन ऐसा चाहिये कि जिसके साथ वीरता भी वसती । अर्थात् वीरता के साथ जो धन रहता है वही सुरक्षित रहता है । जिस धनके साथ वीरता नहीं रहती वह सुरक्षित नहीं रहता। यह मंत्र घोध देता है कि अपने धनकी सुरक्षितता के लिये प्रत्येक मनुष्य अपने में वीरता बढाये। अशक्त मनुष्योंका धन कोई भी छीन सकता है। (४) इन्द्रः सुत्रामा म्बया अयोभिः सुमृळोको भवतु विश्ववेदाः। वाभतां वेपो अमयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम ॥ ऋग्वेद.६४७ । १२ पद-इन्द्रः। सुत्रामा । स्व-यान् । अयोमिासु मुळीक भवतु विश्व-घेदाः। बाधतां । द्वेपः। भयं । कृणोत् । स धीर्यस्य । पतयः। स्याम । अन्यय-सुत्रामा स्ववान् सुमृळीक विश्वयंदाः इन्द्रः अघोभिः भयतु । द्वेषः पाता। अभयं कृणोतु । सुवीर्यस्य पतयः स्यामा अर्थ- (स- धामा) उत्तम रक्षक, (स्यवान् ) आत्मिक शाकिसे युक्त, (सुमृळीकः ) उत्तम ससदेनेवाला । (विश्व-घेदाः) सपंड, (इन्द्रः) प्रमु अपनी (अयोमिः) संरक्षक शक्तियों के साथ (२३) हमारा सहायक (भवतु ) होये । यह (द्वेषः याधतां) द्वेप करने वालों को दूर करे। (अमयं कृणोतु ) हमे निर्भय करे । हम (सुवीर्यस्य पतयः स्याम ) उत्तम शौर्य के स्वामी पर्ने । भावार्थ- परमेश्वर हमारा उत्तम रक्षण करनेवाला है, उसमें विलक्षण आत्मिक शक्ति है, यही सयको सख देनेवाला है और सर्वज्ञ भी वही है। यह अपनी रक्षक शक्तियों से हमारी रक्षा करे, द्वेष भाव दूर करे, हमें निर्भय करे। हम उसकी कृपासे शौर्य धैर्य वीर्यादि गुणों के स्वामी बने। (५) तस्य वयं सुमतौ यक्षियस्यापि भद्रं सौमनसे स्याम । स सुत्रामा स्ववा इन्द्रो अस्मे आराच्चिदद्वेषः सन्तयुयोतु ।। ऋग्वेद.६।४७ । १३ पद-तस्य । वयं । सुमतौ । यशियस्य । अपि । भद्रे । सौम- नसे । स्याम । सः। सु-त्रामा । स्व-चान् । इन्द्रः। अस्मे। आरात् । चित् । द्वेषः । सनुतः । युयोतु ॥ अन्यय-तस्य यशियस्य सुमतौ भद्रे सौमनसे च वयं स्याम । सः सुत्रामा स्वधान् इन्द्रः अस्मे आरात् चित् द्वेपः सनुतः युयोतु॥ अर्थ- (तस्य यशियस्य) उस पूजनीय परमेश्वर की (सुमतौ भद्रे सौमनसे च) सुमति और उत्तम मन के अंदर (वयं स्याम) रहेंगे। अर्थात् हम ऐसा आचरण करेंगे कि हमारे विषय में उसका मन सदा प्रसन्न रहेगा । (सः) वह (सु-त्रामा) उत्तम रक्षक और ( स्ववान् ) आत्म शक्तिसे युक्त (इन्द्रः) प्रभु है वह ( अस्मे आरात् चित् ) हमारे पाससे और दुग्से भी (द्वषः) द्वेष करनेवाले शत्रुओको ( सन्तः) अंदर ही अंदरसे (युयोतु) । नए करे ॥
भावार्थ- परमेश्वर परम पूज्य है। हम ऐसा आचरण करेंगे कि उसका मन हमारे विषयमें सदा प्रसन्न रहेगा और उसकी दया इमपर बरसती रहेगी। वह प्रभु ही हमारा राम रक्षक, अप्रतिम आत्मिक पलसे युफ्त और सबसे श्रेष्ठ है। इस लिये हम उत की प्रार्थना करते है कि यह हमारे सब शत्रुओको दूर भगा देये। सूचना। पाठक इस प्रकार पद अन्वय पदार्थ और भावार्थ स्वयं करने का यत्न करें। यदि यत्न करनेपर न यना तए उतनी ही सहायता यहाँ के पद पदार्थोसे लें। यदि पाठक इस प्रकार स्वावलंबन करते जायगे तो उनकी वेदमंत्रों का अर्थ बनानेमें बड़ी उन्नति होगी। । → पाठ वैदिक स्वर । भगवान पाणिनिमुनिने अपने धातुपाठमें करीब दो हजार धातु दिये हैं और ये धात, दस गणोंमें विभक्त किये हैं । इन धातुओंमें कौनसा धातु उदात्त और कौनसा अनुदात्त है यह सब उन्होंने दे रखा है। इसी प्रकार शब्द सिद्धिके प्रत्यय मी उदात्त अनुदात्त या स्वरित, जैसे है वसे बताये हैं। धातु और प्रत्यय से शब्द यनता है। इसलिये धातु का स्वर और प्रत्ययका स्वर यदि विदित हुआ तो शब्द का स्वरसमझमें आने में कोई रुकावट नही हो सकती। यहुनसे स्वर इस रोतिसे स्थयं निश्चित हो जाते हैं। देखिये- (२५) "ये दोनों धातु प्रत्यय " अग् + नि : अग्नि यह +नि-बहि शब्द सिद्ध हुए । इनमें " अग् और यह उदात्त हैं तया“ नि" भी उदात्त ही है। अर्थात् यहां धातु और प्रत्यय मी उदात्त ही है। इसलिये यह शब्द केवल उदात्त ही होना चाहिये था, परंतु यहां और एक नियम ऐसा है कि :- शब्द- का अंत्य स्वर उदात्त रहता है, इस नियम के अनुसार इन शब्दोका अंतिम स्थर उदान रहा और "अग्नि वह्निः ये शम्द स्वरसहित इस प्रकार घन गये। यद्यपि इन रान्दोंके केवल पद स्थितिमें ये ऐसे स्वर होते हैं तथापि जिस समय इनका उपयोग मोमें होता है उस समय भी आगे पीछेके सब्दोंके संबंध से इन स्वरों में परिवर्तन हुआ करता है। इसी 'कारण शब्द मंत्रमें रहने के समय उसका स्वर अन्य होता है और मंत्रके पद लिखनेफे समय उसका स्वर अलग होता है यह सय बात स्पष्ट रीतिसे दर्शाम के लिये एक मंत्र यहां लेते हैं। अग्निमीळ पुरोहित यज्ञस्य देवमुस्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ।। ऋग्वेद०१।१।१ यह मंत्र ऋग्वेद का प्रथम मंत्र है। अब इसके पद देखिये- अग्निम् । ईळे । पुरः हितम् । यज्ञस्य॑ । देवम् । ऋत्विजम् । होतारम् । रत्नधातमम् ।। पाठक मंत्र के स्वर और पदों के स्वरोंमे जो फरक हुआ है . वह यहां देखें। पद पाटके पदोंके स्वर मंत्रमें जानेपर बदलते । इस विषयका विचार यह है- (२६) स्वर १" अग्नि" शब्द पहिला है। इसका अग"धातु उदात्त "नि " प्रत्यय भी उदात्त है । परंतु उदात्त धातुके परे उदारा प्रत्यय आनेसे शब्द " अन्त्योदात्त " बन गया । अर्थात् पहिला अनुदात्त पना और अन्यस्वर उदात्त रहा और "अग्नि यह रूपयन गया। २" ई" क्रियापद है, क्रियापद प्रायः अनुदार ही होते हैं। इस नियमको अपवाद भी हैं, उस का विचार पीछेसे किया जायगा। ३ " पुरः हितम् ' इस पदमें पु अनुदारा है, २ः उदार है, हि स्वरित है और त अनुदार है। यह अनुदात्त होते हुए भी त अक्षरके नीचे रेपा नहीं है, इसका कारण यह है कि यह त स्वरित स्वर के पश्चात् आगया है और पीचर्म और कुछ मी नहीं है। इसका नियम यह है कि- स्वरित स्वर के पश्चात् यदि, अनुदात्त स्वर आगया तो वह उदात्ततर किया सम्नतर कहलाता है और उसके लिये कोई चिन्ह नहीं होता है। इसका नाम एकति भी होता है। ४" यत्रस्य " इस पदमें " य और स्य" ये वस्तुतः अनुदान है, परंतु अनुदासका चिन्ह य के नीचे है और स्पफनीचे वैसा चिन्ह नहीं है। उदात्त के पीछे अनुदात्त आगया तो यह स्वरित होता है, इस नियम के अनुसार स्य स्यरित यन गया है। देयम्" शब्दमें दे अनुदात है और उसका चिन्ह उसके नीचे है। व उदात्त है, उदात्त के लिये कोई चिन्ह नहीं होता, यह पाठक जानते ही है। ऋत्विजम् " इसमै " यशस्य " के अनुसार ही समझना चाहिये । अर्थात् ऋ अनुदात्त, ज भी अनुदात्त है, परंतु यह उदात्त वि के पीछे आनेसे स्वरित पन गया है। ६
॥
होतारम् " इस पदमें हो उदाच है, ता अनुदात्त है, परंतु
वह उदात्तके पश्चात् आनेसे पूर्ववत् स्वरित यन गया है और
उसके पीछेका र अनुदाच है, परंतु यह अनुदात्तके पीछे आनेले
इसको अन्दात्ततर कहा जाता है।
रन - था - तमम् ॥ यह शब्द है, इसमें रत्न ये दो
अनुदात्त है । धा उदात्त है। इस उदासके पश्चात् अनुदात्त त
आगया है इसलिये उदात्त के पीछे आनेवाला अनुदात्त स्वरित
होता है, इस नियमके अनुसार यह त स्थरित हुआ है और
उसके
पश्चात् का म अनुदारातर हुआ, धास्तवमें यह अनुदारा
ही है।
यहां तक पदों के स्वरोंके विषयमें विवरण हुआ। यह विवरण
पाठक वारंवार पढे और जब तक ठीक समझमें आ जाचं तब
तक मननपूर्वक पढते जांय । ऐसा करने से ही यह विषय ठीक
समझमें आ सकता है। अप पुनः दृढीकरणार्थ स्वर्गके नियम
यहां देते है--
१ स्वरोच्चारणमें कालमर्यादाके न्यून और अधिक होनेसे
स्वरके " -हस्व, दीर्घ, प्लुत " ये तीन भेद होते हैं ।
२ स्वर के आवास के भेद से उदात्त, अनुदान और स्वरित
ये भेद होते हैं, उदात का आघात मुखके उच्च भागमे, अनुदात्त
का नीच भागर्म और स्वरित का दोनों भागोंमें होता है।
३ अनुदात्त स्वर का चिन्ह अक्षरके नीचे रेपासे बताया
जाता है। उदात के लिये कोई चिन्ह नहीं है और स्वरित
का चिन्ह अक्षर के सिरपर खडीरेपा से बताया जाता है।
४ प्रायः शब्द में एक स्वरको छोड कर शेष सप स्वर अनुदात्त
होते हैं!
(२८) ५शब्द में यदि एक ही स्वर रहा तो वह प्रायः उदात्त होता ६ वेदके शब्द यौगिक हैं अर्थात् ये धातु और प्रत्यय लगकर बने हैं। ७ धातु के स्वर धातुपाठ में बताये हैं और प्रत्ययके स्वर व्याक- रणमें बताये हैं। दोनों के मेलसे शब्दका स्वर बहुत करके निश्चित होता है। ८ प्रायः पद का अन्त्य स्थर उदात्त रहता है । ९ साथ साथ दो स्वरित चिन्ह (अर्थात् सिरपर खडी रेषा के चिन्ह ) कभी नहीं आते । अनुदात्तके चिन्ह साय साथ अधिक भी आते हैं। १० उदात्त के परे उदात्त आनेसे अन्त्य उदात्त रहता है और पीछे का अनुदात्त बनता है। ११ सय क्रियापद प्रायः अनुदात्त होते हैं । १२ स्वरित के परे अनुदात्त आगया तो उस अनुदात्त के लिये नीचे स्वर चिन्ह नहीं लगाया जाता। १३ उदात्त के पीछे अनुदात्त आगया तो वह स्वरित बन जाता इस समय तक इतने नियम दिये हैं। ये सय नियम विवरण के साथ और उदाहरणके साथ दिये हैं। इस लिये पाठक इनका मननपूर्वक अभ्यास करेंगे तो यह स्पर की यात उनके ध्यानमें आजायगी । आशा है कि पाठक इस का अध्ययन विशेष प्रयलके साथ करेंगे।
(२९)
पाठ ७
इस पाठमें निम्न लिखित मंत्रीका अध्ययन कीजिये-
(१)
पाहि नो अग्ने रक्षसो अजुष्टात्पाहि धूर्तरररुषो अधायोः ।
त्वा युजा पृतना रभि प्याम् ॥ ऋग्वेद ७।१।१३
पद-~~ पाहि । नः । अग्ने । रक्षसः। अ-जुष्टात् । पाहि । धूतः।
अररुपः । अघ-आयो। त्या । युजा। पृतना-यून् । अभि । स्याम् ॥
अन्वय-हे अग्ने ! अजुधात् रक्षना पाहि । अररूपः धूर्तेः
भघायो न पाहि । त्या युजा पृतनायून् अभिष्याम् ।।
अर्थ- है ( अग्ने ) नेजस्वी ईश्वर ! ( अजुधात्) होन (रक्षा)
राक्षसों से (नः पाहि ) हम सब की रक्षा कर॥ (अररुपा धूर्तेः)
अनुदार धूर्त (अघ-आयोः) पापीसे हमारा (पाहि) पचाव
कर । (त्या युजा) तेरे साथ रहते हुए हम (पृतनायून् ) सेना
लेकर चढाई करने वाले शनुका (अभिप्याम ) हम पराभव
॥
भावार्थ-हे ईश्वर [ दुष्ट, दुर्जन, धूर्त, धोखेबाज, पापीइस प्रकार
के लोगोंसे हमारा घबाव कर । तेरी कृपा हमपर रही तो हम
सय प्रकारके शत्रुओं का पराभव कर सकेंगे।
यत इन्द्र भयामहे ततो नो अमयं कृधि । मधवग्धि तय
तन्न ऊतिभिर्वि द्विषो वि मृघो जहि । ऋग्वेद.८।६।१३
पद-यतः। न्द्र । भयामहे । ततः निः। अभयं । कृधि । मघ.
यन् । शधि । तर । तत् ।नः। ऊतिभिः। वि। द्विपः । वि समृधा
॥
अहि।
अन्धय-है. इन्द्र ! यतः भयामहे, ततः नः अभयं कृधि । हे मघवन् ! शन्धि ! तब ऊतिभिः नः द्विपः मृधः च वि वि जहि । अर्थ-हे ( इन्द्र) प्रमो ! (यतः भयामहे ) जहांसे हमें भयों होता है ( ततः) वहांसे (नः) हमारे लिये ( अभयं कृधि) अभय कर । हे (मघवन् ) धनसंपन्न प्रभो ! तू शन्धि शाति- मान हो, इसलिये (तय ऊतिभिः) तेरी रक्षाकी शक्तियों द्वारा (नः द्विपः ) हमारे द्वेपकर्ताओं का तथा हमारे (मृधः) हिंसक का (विवि जहि) विशेष पराभव कर । भावार्थ-हे परमेश्वर ! हमें निर्मय कर, किसी भी दिशा से हमें मय प्राप्त न हो । तू समर्थ है इसलिये तेरी रक्षाकी शकियों द्वारा हम सुरक्षित हो गये तो हमें किसी सेमी भय नहीं हो सकता। क्यों कि तूही हमारे शत्रुओं, द्वेपकर्ताओं और हिंसकों का नाश करेगा और तेरी रक्षासे सरक्षित होकर हम सदा विजयी होते रहेंगे। त्यं नः पश्चादधरादुत्तरात्पुरन्द्र नि पाहि विश्वतः। आरे अस्मत्णुहि दैव्यं मयमारे तीरदेवीः ॥ भग्वेद.८।६१ । १६ पद-त्वं । नः । पश्चात् । अधरात् । उत्तरात् परः।न्दा नि । पाहि । विश्यतः। आरे । अस्मत् । कृणुहि । दैव्यं । भयं । आरे । हती। अदेषी। अन्यय हे न्द्र! त्वं पश्चात, अधरात्, उत्तरात्,पुरः च विश्वतः पनि पाहि दिव्यं मयं अस्मत आरे फणुदि। अदेयी हेती आरे ॥ अर्थ- है (न्द्र) प्रमो! (स्वं) तू (पश्चात्, अधरात्, उनरान् ) पीछमे. नीचे से, ऊपरसे ( पुनः विध्यतःच) आगेमे और सये और में हमारी ( नि पाहि) रक्षा कर । तथा (देयं भयं )देयिक भयको (अम्मन् आ) म मय दर (गणुदि) कर तथा (अदेयाः हेतीः) राक्षसी शस्त्र भी हम सबसे (आरे) मावार्थ- हे ईश्वर ! तु हम सबका सब ओर से रक्षण कर, हमें सब ओर से निर्मय बना । विद्युत्पात् अवर्षण आदि देषी आपत्ति हम सबसे दूर रहे और अन्य विपत्तियां भी हमसे दूर रहे। (४) यदिन्द ब्रह्मणस्पतेऽपि मृषा चरामसि । प्रचेता न आंगिरसो दुरितात्यात्वंहसः॥ अथर्व० ६३५।२ यद- यत् । इन्द्र । ब्रह्मणस्पते । अपि । मृपा। चरामसि । प्रचेता । नः । आंगिरसः । दुरितात् । पातु । अंहसः। इन्द्रं । ब्रह्मणस्पते । यत् अपि मृपा चरामसि दुरि. तात् अंहसः आंगिरसः प्रचंता नः पातु ॥ । अन्वय- - त्वं विश्वस्य मेधिर दियश्च ग्मश्च राजसि । स यामनि प्रति भूधि ॥ कन्धेद. १ । २५।२० पद-त्वं । विश्वस्य । मधिर | दियः। च । ग्मः । च राजसि। सः । यामनि । प्रति । श्रुधि ॥ अन्वय-हे मेधिर ! त्वं विश्वस्य दिवः समः च राजसि । सत्वं । यामनि'प्रति श्रुधि॥ अर्थ-हे (मेधिर ) पद्धि प्रदाता ईश्वर ! (वंत (विश्वस्य दिपः मः च ) सप धुलोक और भूमिका ( राजसि) राजा । यह तु हमारी (यामनि प्रतिश्रुधि ) प्रार्थना श्रवण कर। भावार्थ- हे युद्धिप्रदाता ईश्वर ! तूही संपूर्ण जगत् का सच्चा पर राजा है । यह त हमार्ग प्रार्थना श्रवण कर।
(३२)
(६)
स नो दूराच्चासाच्च नि मादधायोः।
पाहि सदमिद्विश्वायुः। ऋ.१।२७१३
पद- सः। नः 1 दूरात् । च । आसात् । च। नि । मात् ।
अघायोः। पाहि । सदं । त् । विश्व-आयुः।
अन्वय- हे ईश्वर ! सः त्वं दूरात् च आसात् च अधायो
मात विश्वायुः सदंरत् नः नि पाहि ।
अर्थ-हे ईश्वर ! (सः त्वं ) वह तू (दूरात् च आसात्
च)
दूरसे और पाससे ( अघ-आयोः मांत् )पापी मनुष्यस (विश्व
आयुः सदं इत् ) सय आयुमरमें सदा सर्वदा (नः) हम सबकी
(नि पाहि) रक्षा कर।
(७)
त्वं हि नः पिता घसो त्वं माता शतक्रतो वभूविय ।
अघा ते सम्नीमहे । ऋग्वेद.८.९८॥ ११
पद-त्वं हि नः। पितावसोवं माता । शत-ऋतो।
यम् विय । अधा । ते । सुम्नं । ईमहे ।।
अन्वय-- है बसो शतक्रतो! त्वं हिनः पिताच त्वं माता
बयिय । अथा ते मुम्न मिहें।
अर्थ-- है (यसो) सय निवासक (शतक्रतो) सैंकडों
सन्त्य करने पालघर ! (त्वं हिनः पिता) तहि हमारा
पिता और (त्वं माता पविय)त् माता होता है। (अघा)
इसलिये हम सब ( ते सु-म्नं तेरे उत्तम विचार को (ईमहे ।
प्रास करते हैं।
भाग-हैदर! त् ही हम सबका पिता और माता है.
इमलिये नेमी दया दीदम चाहते हैं।
सूचना। पाठक इस प्रकार मंत्रों के अर्थ लगानका यल करें । इस हंगसे प्रयत्न करनेसे उनकी मंत्रार्थ लगाने में प्रगति शीध हो सकती है। जहां तक हो सकता है वहां तक यत्न करके पाठक मंत्रों को कण्ठ करनेका भी पुरुषार्थ करें। पाठ८ -- वैदिक स्वर । पूर्व पाठोंमें बहुत सा वैदिक म्वरोका विचार हुआ है । प्रत्येक पदके स्वरका भी विचार किया है । अब चेही पद मंत्रमें किस प्रकार आगये और उनके स्वर किस कारण बदले हैं इसका विचार करना है । देखिये वही मंत्र- अनिमीचे पुरोहितं पक्षस्य देवमृचिजम् । होतारं रत्नधातमम् ।। ऋग्वेद १।११ १ इसमें पहिला अ अनुदात्त है और उसका चिन्ह उसके नीचे आया है। २ दूसरा अक्षर ग्नि उदात्त है इसलिये उसको कोई चिन्ह नहीं है। ३ चीलरा अक्षर मी है । यह वास्तवमें अनुदात्त है, परंतु यह उदात्त के पश्चात् आगया है, इसलिये नियमानुसार स्वरित हुआ।(नियम १३ देखिये)इस नियमके अनुसार स्वरित होने के कारण इसके सिर पर स्थरितका चिन्ह खडी रेपा आगया ३
(३४)
४ चतुर्थ अश्नर अथवा डे अनुदात्त है, परंतु यह अनुदात्त
के पश्चात् आया है इसलिये इमको अन्दात्ततर कहते हैं। अतु
दात्त होनेसे इसके लिये कोई चिन्ह नहीं है।
५पंचम अक्षर पु अनुदात्त है और उसका चिन्ह उसके नावे
है । यह अक्षर भी पूर्व नियमानुसार अनुदात्त के पीछे आनेके
कारण अनदात्ततर होना चाहिये था, परंतु उसके परं रो उदार
आने के कारण पु अक्षर उदात्त हो रहा है।
१ छठां अक्षर गे उदात्त है, इसलिये उसके साथ कोई चिन्ह
नहीं लगा।
सातयां अक्षर हि पूर्ववन् स्वरित हुआ है जिसका चिन्ह
उसके मिर पर पड़ा है।
८ आठयां अक्षर तं पूर्ववत् अनुदात्ततर है । इसलिये उसका
कोई चिन्ह नहीं है।
९ नवम अक्षर य अनुदात्त है जिसका चिन्ह उसके नीचे है।
१० दशम अक्षर न उदात्त है इसलिये उसका कोई चिन्ह
नहीं है।
ग्यारहवां अक्षर स्य स्थरित है उसका स्वरित चिन्ह उसके
सिरपर सडा है।
१२ बारहवां अश्नर है अनुदात्त है । स्य स्वरितके आगे दे
अनुदात्त आनेसे थाम्नबमें वह अनुदात्ततर होना चाहिये था,
परंतु उसके आगे उदात्त व आने के कारण वह अनुदात्त ही रहा
और उसकी
अनदात्तका
नीच चिन्ह लगा है।
१३ तंग्यां अक्षर व उदात्त है, इसलिये उसकी कोई चिन्ह
नहीं है।
१ चोदयां अक्षर मृ अनुदात्त है । उदात्त ध के आगे आने के
कारण पूर्वोक्त स्य के ममान म्यग्नि होना चाहिये थापरंतु आगे
,
उदात्त अक्षर वि आनेके कारण स्वरित नहीं बना और अनु-
दात्त ही रहा, इसलिये उसके नीचे स्वर आगया है ।
१५ पंद्रहवां अक्षर खि उदात्त है। इस कारण उसके लिये कोई
स्वर चिन्ह उसके साथ नहीं है।
१६ सोलहवां अक्षर ज अनुदास है, परंतु यह उदात्त के पीछे
आनेसे स्वरित चिन्ह उसके सिर पर लग गया
है
२७ सतरहवां अक्षर हो है। यह उदात्त है, इसलिये कोई चिन्ह
उसको नहीं लगा।
।
• १८ अठारहवां अक्षर ता अनुदात्त है परंतु यह उदात्तके पीछे
आनेके कारण स्वरित बना है । जिस कारण उसके सिरपर स्वर
लगा है।
१९उन्नीसवां अक्षर र अनुदात्त है परंतु यह पूर्वोक्त प्रकार अनु
दात्ततर हुआ है और इसकारण उसको कोई स्वरचिन्ह नहीं लगा।
२० चीसवांर भी उसी प्रकार अनुदात्ततर हैं।
२१ इक्कीसवाल अनुदात्त है, आगे धा उदात्त आने के कारण
इसके नीचे स्वर चिन्ह लगा है।
२२ बाइसवां अक्षर धा उदास है, इसलिये चिन्ह रहित है।
२३ तेईसवां अक्षर त पूर्वोक्त कारण ही स्वरित पना और
उसका चिन्ह उसके सिरपर खडा रहा।
२४ चोचीसवाँ अक्षर म पूर्वोक्त प्रकार ही अनुदात्ततर
इसलिये उसकी कोई स्वर चिन्ह नहीं लगा।
इस विवरण से पाट को को पता लग जायगा कि स्वरित
घर कहां बनता है और अनुदात्तत्तर कहां होता है।
समास में स्वर
समास में स्वरोका कुछ हेर फेर होता है। इसचिपय का
सामान्य नियम ऐसा है..
" २ पद में एक स्वर को छोड कर सच अन्य स्वर अनुदात्त होते है । इसलिये समासमें संमिलित हुए पदों के कैसे भी स्वर हुए तीभी उनका समास बनने पर उनसे एक का ही उदात्त अव- शिष्ट रहता है और शेप स्वर अनुदात्त होते हैं। • समासों में सामान्यतः नियम यह है कि अन्य समासो में उत्तर पद अपना स्वर स्थिर रखता है और पिछले पद के स्वर अनुदात्त होते है तथा वहुव्रीहि समास में ही पूर्वपद अपना स्वर स्थिर रखता है और पिछले पदों के स्वर अनुदात्त बन जाते हैं । ३ तत्पुरुष समासों में भी प्रायः पूर्ववत होता है। ४ कृदन्त और उत्तरपद समासों में भी पूर्वपद का उदात स्थिर रहता है और उत्तर पद का स्वर बदल जाता है। पूर्वोक्त में प्रमें “पुरो-हितं " और "रत्न-धा-तमं " ये पद समाम है। पूर्वोक्त नियमों के अनुसार पुरः उदात्त यदला नहीं, परंतु "हितं" पदही अनुदात्त रहा। वस्तुतः और" हितं " ये दोनों शब्द अन्तीदात्त है तथापि पूर्वोक्त नियम के अनुसार पहिले पद का स्वर स्थिर रहा और दूसरे पद के सय स्थर अनुदात्त यने, परंतु उदात्त के पीछे अनु. दात्त आने मे 'हि" स्वरित चिन्ह याला बन गया। रत्न-धा-तमं " शन्दमें तीन भाग है। इसमें पहिला रन" शब्द आधुदार है. परंतु आगे धा धातु आने से और उपपद पूर्व तत्परुप समास यनने से रलया शब्द अन्तोदात धनगया और तम प्रत्यय स्वयं अनुदात्त है, इस के त का स्वरित पूर्व नियम के अनुसार बन गया और म अनुदात्ततर हो गया । इस के नियम पहिले यताय ही है। अय और नियम देखिये- (१)संपायन वाद तथा क्रियापद फेशब्द पाक्यों में प्रायः " "
इस का
आ जायगा।
शक्ति प्रशंसाके योग्य है।सको उल्लांघने याला अर्थात इसकी
(३७)
अनुदात्त रहते हैं । परंतु यदि ये वाक्य के या मंत्रपादके प्रारंभ में
आगये तो उसके स्वर अन्य नियमानुसार हो जाते हैं।
(२) उदात्त और अनुदात्त म्बरोंके संधि होनेपर उदात्त
स्वर की प्रधानता रहती है । जैसा - "आ + इह
संधि उदात्त स्वर यक्त
" एहि " ऐसा होता है।
इस प्रकार सामान्य नियम हैं । पाठक यदि इनका विचार
वारंवार मनन करके.फरेंगे तो उनको स्वर विषयक अत्यावश्यक
शान प्राप्त होगा। यह विषय थोडा कठिण है तथापि यहां अति-
सगम बनाकर लिख दिया है, वारंवार पढनेसे पाठकों के समझमें
पाठ ९
इस पाठ में निम्न लिखित मंत्रों का अभ्यास कीजिये-
नकिरस्य सहन्त्य पर्यंता कयस्य चित् ।
पाजो अस्ति श्रवाय्यः ।
पद - नकिः । अस्य । सहन्त्य। पर्येता । कयस्य । चित् । याजः।
अस्ति । श्रवाय्यः।
अन्धय - हे सहन्त्य ! वाजः श्रवाय्यः अस्ति । अस्य कयस्य
चित् पर्येता नकिः।
अर्थ - है (सहन्त्य ) बलवान ईश्वर ! तेरा ( बाजः ) पल
(श्रवाय्यः अस्ति) प्रशंसनीय है (अस्य कपस्य चित् ) इस का
(पर्येता) उल्लंघन करनेवाला (नकिः) कोई भी नहीं है।
भावार्थ - परमेश्वर सय बलवानों में यलवान है इस लिये उसकी
ऋग्वेद १ । २७।८
शक्ति को दयानघाला कोई नहीं है।
(३८)
:
।
न यस्य देवा देवता न मर्ता आपश्चन शवसो अन्तमापु.।
स प्ररिदश लक्षसा क्षमा दिवश्च मरूपानो भविन्द्रऊती।।
ग्वेद ६.००१
पद न । यस्य । देवा । दयता । न । मर्ता । आप । च । न ।
शरस । अन्त । आपु । स । रिक्वा । त्वक्षसा । म I दिव ।
च । मरुत्वान् । न मरतु । इन्द्र । ऊती।
अन्धय यस्य शरस अन्त देना दयता न, मता न, आप.
च न आपु , स मरुत्वान् इन्द्र दिव क्ष्म च वक्षसा परिक्यान
ऊती भवतु ।
अर्थ (यम्य शरस ) जिस ईश्वरके घरका (अन्त)अन्त
देव या देवता (न)न प्राप्त कर सकते, (मर्ता न) मनप्य भी
न प्राप्त कर सकते तथा ( आप च न आपु)जल भी नहीं प्राप्त
कर सकते । (स मरत्वान् इन्द्र') यह प्राण शक्तिस युक्त इन्द्र
(दिव क्ष्म च)द्युलोक और पृथ्वी लोक को (त्वक्षसा परिक्वा)
वल्से परित करने वाला ईश्वर (न ऊती भवतु )हम सबका
रक्षण करने वाला होने।
भावार्थ परमेश्वर की शक्ति इतनी अगाध है कि उस शक्ति
का अत कोई दव देवता मनुष्य या अन्य कोई भी नहीं पा सकता।
घह जीवनशक्ति से परिपूर्ण ईश्वर जा कि धुलोक और पथ्वि
रोक का अपनी शक्तिसे परिपूर्ण कर रहा है, यह हम सब का
उत्तम रक्षा करे।
प्रतुविद्युम्नस्य स्थविरस्य घवेदिचो ररप्श
महिमा पृथिव्या । नास्य शनुर्न प्रतिमानमस्ति
न प्रतिष्ठि पुम्मायस्य सद्यो । पद ६१८।१-
।
।
प्रतिष्ठिःन।
पद- तुवि-धु--म्नम्य । स्थविरम्य । घृष्वेः। दिवः।
ररो। महिमा। पृथिव्याः। न । अस्य । शत्रः । न। प्रतिमानम् ।
अस्ति । न । प्रतिष्ठिः । पुरुमायस्य । सह्यो।
अन्वय-तुविद्युम्नम्य स्थविरस्य ध्वेः महिमा दिवः पृथिव्याः
मरशे । न अस्य शत्रुः । न प्रतिमानं अस्ति । पुरुमायस्य सह्योः
अर्थ- (तुवि- गुम्नस्य) अत्यंत तेजस्वी (स्थविरस्य) स्थिर
अथवा पुराण पुरुष और (घृष्वेः) दुष्टताको पीसनेवाले ईश्वर
की (महिमा) महिमा (दिवः पृथिव्याः) घलोक और पृथिवी
लोक के भी (ध ररशे) बाहर फैला है। (न अस्य शत्रुः)
इसका कोई शत्रु नहीं है, (न अस्य प्रतिमानं ) न' इसकी
कोई प्रतिमा या उपमा है । इस (पुरु-मायस्य ) अनंत प्रज्ञापाले
और (सह्योः) शक्तिवाले ईश्वर के लिये भी कोई दूसरा
(प्रतिष्ठिःन) आधार नहीं है। अर्थात् यही सव का आधार है।
भावार्थ ईश्वर अत्यंत तेजस्वी दुष्टता का नाश करनेवाला और
बड़ा पुराण पुरुष है। उसकी महिमा सब जगत् में फैली है। इसका
कोई शत्रु नहीं और ना ही इसकी कोई उपमा है। इस अनंत शक्ति
वाले ईश्वरको छोडकर और कोई दूसराआधार किसीकोनही है।
४
स नः पितेव सूनवेभने सूपायनो भव ।
सचस्या नः स्वस्तये ।।
मायेद १ । २६ । ३
पद- सः । न । पिता । इव । सून) अग्ने । सु- उपायनः। भया
लचस्वनः। स्पस्तये ।
अन्चय- हे अग्ने! सः त्वं सूनवे पिता इव नः सूपायनः भव ।
नःस्वस्तये सचस्व ।
अर्थ-६ (अग्ने) प्रकाश देनेपाले प्रभो! (स: लं) यहत (सून
अन्यय
..
न यस्य देवा देवता न मर्ता आपश्चन शवसो अन्त्तमापुः।
स परिक्ष्या स्वक्षसा मो दियश्च मरुत्वानो भयविन्द्रऊती।।
ऋग्वेद ११००११५
पद-न । यस्य । देवाः । देवताः। न । मर्ताः। आपः । च । न ।
शवसः। अन्तं । आपुः । सः । प्ररिफया । वक्षसा । मः 1 दिवः ।
च । मरुत्वान् । नः । भवतु । इन्द्रः । ऊती।
यस्य शवसः अन्तं देवाः देवताः न, मताः न, आप:
च न आपुः, स मरत्वान् इन्द्रः दियः म. च वक्षसा परिक्चानः
ऊती
भवतु॥
अर्थ - (यम्य शयसः)जिस ईश्वरके बलका (अन्तं) अन्त
देव या देवता (म)न प्राप्त कर सकते, (मर्ता न) मनुष्य
तस्य भी
न प्राप्त कर सकते तथा ( आप च न आपुः)जल भी नहीं प्राप्त
कर सकते । (सः मरुत्यान् इन्द्रः) यह प्राण शक्तिसे युक्त इन्द्र
(दियः क्ष्मःच)द्युलोक और पृथ्वी लोक की (त्वक्षसा परिक्या)
पलस पूरित करने वाला ईश्वर (नः ऊती भवतु ) हम सबका
रक्षण करने वाला होवे ।
भावार्थ - परमेश्वर की शक्ति इतनी अगाध है कि उस शक्ति
का अंत कोई देय देवता मनुष्य या अन्य कोई भी नहीं पा सकता।
घह जीवनशक्ति से परिपूर्ण ईश्वर जो फि धुलोक और पृश्चि
लोक को अपनी शक्तिले परिपूर्ण कर रहा है, वह हम सय की
उत्तम रक्षा करें।
प्रतुविद्युम्नस्य विरम्य वृदियो ररप्श
महिमा पृथिव्याः । नास्य शत्रुन प्रतिमानमस्ति
न प्रतिष्ठि पुम्मायस्थ महोः ।। मरद १८०१२
(३९)
1
पद-म । तुवि-धु-~म्नम्य । स्थविरस्य । घृष्वः। दिवः ।
ररो। महिमा । पृथिव्याः । न । अस्य । शत्रः । न प्रतिमानम्।
अस्ति । न । प्रतिष्ठिः। पुरुमायस्य | सह्यो ।
अन्यए- तुविद्युम्नस्य स्थविरस्थ ध्वे महिमा दिवः पृथिव्याः
परयो । न अस्य शत्रुः । न प्रतिमानं अस्ति । पुरुमायस्य सहाः
प्रतिष्ठिान ।
अर्थ- (तुवि- द्युम्नस्य ) अत्यंत तेजस्वी (स्थविरस्य) स्थिर
अथवा पुराण पुरुष और (घृष्णेः) दुष्टताको पीसनेवाले ईश्वर
की (महिमा) महिमा (दिवः पृथिव्याः) धुलोक और पृथिवी
लोक के भी (प्र ररशे) बाहर फैला है। (न अस्य शत्रुः)
इसका कोई शत्रु नहीं है, (न अस्य प्रतिमान ) न इसकी
कोई प्रतिमा या उपमा है । इस (पुरु-मायस्य ) अनंत प्रशावाले
और (सह्योः) शक्तिवाले ईश्वर के लिये भी कोई दूसरा
(प्रतिष्ठिः न ) आधार नहीं है। अर्थात् यही सब का आधार है।
भावार्थ ईश्वर अन्यंत तेजस्वी दुष्टता का नाश करनेवाला और
बडा पुराण पुरुष है। उसकी महिमा सब जगत में फैली है। इसका
कोई शत्रु नहीं और ना ही इसकी कोई उपमा है। इस अनंत शक्ति
वाले ईश्वरको छोडकर और कोई
दूसराआधार किसीकोनहीं है।
(४)
स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव ।
सचस्वा नः स्वस्तये॥
ऋग्वेद १।२६।३
पद- स । न । पिता 1 इव 1 सूनये। अग्ने । सु-उपायनः। भवा
सचस्व । नः स्पस्तये।
अन्वय हे अग्ने! सः त्वं सूनवे पिता इव नः सूपायनः भव ।
ना स्वस्तये सचस्व।
अर्थ-६ (अग्न) प्रकाश देने वाले प्रमो) (स: त्व)चदत (सूनये
(४०) पिता इव)पुत्रके लिये पिताके समान (नः)हम सबके लिये (स- उपायनः) उत्तम प्रात होने वाला भय) हो। (नः) हम सब का (स्वस्तये) कल्याण के लिये (सचम्ब) हमारे साथ रह । भावार्थ- हे प्रकाश देने वाले प्रभो! जैसा पिता पुत्रका सहायक होना है वैसा तू हम सबका सहायक हो और हमारा कल्याण करने के लिये हमें सहायक हो। आ हि मा सूनवे पिताऽपिर्यजत्यापये। सखा सख्ये घरेण्यः॥ ऋग्वेद १।२६ । ३ पद- आ । हि । स्म । सूनये । पिता 1 आपिः। यजति । आपये। सखा। सख्ये । वरेण्यः । अन्यय और अर्थ-- जिस प्रकार (पिता सूनवे ) पिता पुत्रके लिये (आपिः आपये) बंधु बंधु के लिये तथा (घरेण्यः सखा सख्ये) श्रेष्ठ मित्र मित्र के लिये (आ यजति स्म) सहायता करता है उस प्रकार हे ईश्वर ! तू हमारी सहायता कर । भावार्थ जैसा पिता पुत्र की, भाई भाई की, और मित्र मित्र की सहायता करता है उस प्रकार ईश्वर हमारी सहायता करें। । न्यमाने प्रमतिस्त्वं पितासि नस्त्वं घयस्कृत्तव जामयो सयम् । सं त्वा रायः शतिनः सहनिणः सुधीरं यन्ति व्रतपामदाभ्य । ऋग्वेद १।३१ । १० पद-त्वं । अग्ने । ममतिः । त्वं । पिता। असिना । । घयस्थत् । तव । जामयः । वयम् । सं । त्या रायः शतिनः । महनिणः । सुधीर । यन्ति । तपां। अदाभ्य । अन्यय-हे अग्ने र प्रमतिः, नः पिताअसिावं ययस्थत् । पपं तय जामयः । हे अदास्य ! सुचौरं प्रतपां त्वा शतिनः
(४१)
सहन्त्रिणा रायः संयन्ति ।
अर्थ- है (अग्ने) प्रकाश देनेवाले ईश्वर! तू(प्रमतिः) विशेष
बुद्धिमान हो, तू हम सबका पिता है । तूहि (वयः कृत् ) जोधन
देनेवाला है। (वयं ) हम सब (घ) तेरे (जामयः) बंधु हैं।
है (अवास्य), दयनेवाले ईश्वर ! (सुचीरं बसपा ) उत्तम
चोर्गेसे युक्त नियमों के पालक तुझ ईश्वर के प्रति सौ और
सहस्रों (रायः) धन (संयन्ति ) इकट्ठे होते हैं ।
भावार्थ-हे ईश्वर तू हि सब में अत्यंत बुद्धिवान् हो, तहि हम
सवका पिता हो और तहि सबको जीवन देनघाला हो। तेरे ही
हम सब भाई है । हे न दब जानेवाले ईश्वर ! तू अनेक वीरताके
गुणोंसे युक्त तथा उत्तम नियमोंके चलाने वाले ही, इसलिये
सेंकडौं धन तेरे पास इकट्ठे होते हैं। अर्थात् जो इस प्रकार उत्तम
नियोका पालन कर्ता और वीरताक गुणों से युक्त होगा वह भी
अनेक धनीको अपनेपासधारण कर सकेगा और धनी बन जायगा।
पाठक इस प्रकार मंत्रीका अध्ययन करें।
पाठ १०
अयं शरेभिरस्तभिरिन्द्र त्वया युजा चयम् ।
सासधाम पृतन्यतः॥
ऋद १।८।४
अन्वय- वयं वया युजा अस्तुभिः शूरेभिः (च सह) वयं
पृतन्यतः सासहाम।
अर्थ- हम सब तेरे (युजा) साथ और ( अस्तृभिः)अस्त्री-
का प्रयोग करनेवाले (भिः) शूरवीरों के साथ हम (पृतन्यतः)
सेनासे हमला करनेवाले शत्रुका (सासह्याम ) परामय करेंगे।
भावार्थ-है ईयर! तेरी सहायता लेकर तथा शरपोरोको सहा.
यता लेकर हम शत्रुका पराजय करेंगे।
(२) वयं जयेम त्वया युजा वृतमस्माकमंशमुदया भरे भरे। अस्मभ्य मिन्द्र परिवः सुगं कृधि प्रशत्रूणां मघवन वृष्ण्यारुज ॥ ऋग्वेद.१ १ १०२ १४ अन्यय और अर्थ-हे (मघवन्) धनैश्वर्य संपन्न प्रभो ! (त्वया युजा)तेरे साथ युक्त हो कर (वयं घृतं जयेम) हम सब घेरने वाले शवका परामय करेंगे । (मरे भरे) हरएक प्रकारके युद्ध में (अस्माकं अंश)हमारे भागका (उदय) उत्तम रक्षण कर! हे (इन्द्र) प्रभो! (अस्मभ्यं ) हम सबके लिये (वरियः सुगं कृधि ) धन सुखसे प्राप्त होने योग्य कर । (शत्रूणां वृष्ण्या) शत्रुओं के मल (म रुज)नम्रष्ट कर ॥ भावार्थ-हे प्रभो ! तेरी कृपा प्राप्त करके हम सब प्रकारके शत्रओपर विजय प्राप्त करेंगे। है ईश्वर ! हर एक प्रकार के युद्ध हमारा कर्तव्यका भाग हमसे ठीक प्रकार हो जाये, ऐसी उन्नति हमारी हो जाये । हे देव ! हमें सब प्रकारके धन सगमता प्राप्त हो और तेरी मेरणाले हमारे शत्रुओंके यल पूर्णतासे नष्ट भ्रष्ट कर और सदा हमारा विजय हो । (३) त्य इन्द्राप्यम विना धियं बनेम ऋतया सपन्तः। अवम्यया धीमहि प्रशस्ति मस्ते रायो दायने स्याम || ऋ.२।११।१२ अन्यय और अर्थ-हं (इन्ट) प्रभो ! म सय (विनाः) शानी लोग (ये अभूम) तेरे अंदर अर्थात् तेरे होफर रहेंगे। (ऋतया सपन्तः ) माधे मार्गमे व्ययहार करते ६५ (धियं बनेम) युद्धि और धर्म की सिद्धि प्राम करेंगे हम सर (अवस्थवः अपनी रक्षा करने का यत्न करने वाले लोग (प्रशस्ति धीमति) गणोंगी मनमें धारण करेंगे । (मद्यः) नकारही (तं गाः
तेरे धनके (दापने)
दान के लिये हम योग्य (स्याम) होंगे ।
भावार्थ-हे ईश्वर ! हम सब लोग तेरे घनकर रहेंगे। सीधे
मार्गसे चल कर फर्म की सिद्धि प्राप्त करेंगा हम सब अपनी रक्षा
करने का पुरुषार्थ करेंगे और सदा तेरे शुभगणोंका ध्यान करेंगे ।
ऐसा करनेस तेरे धन के दानके भागी हम सब बन जायगे।
(४)
यो जात एव प्रथमो मनस्यान देयो देवान्क्रतुना पर्यभूषत ।
यस्य शुष्माद्रोदसी अभ्यसेतां नम्णस्य महा स जनास
ऋग्वेद २।१२।१
अन्यय तथा अर्थ-(यः प्रथमः देवः)जो आदि देव (जातः
एव) प्रकट होते ही (मनस्तान्) मनन शक्तिसे श्रेष्ठ होकर अपने
(ऋतुना) कर्मसे (देवान्
पयंभूषत) देवोंको
शोमायुक्त
करता रहा। (यस्य शप्मात्) जिसके यलसे (रोदसी।)
चुलोक और पृथ्वी लोक (अभ्यसेता) कांपती है (स.) यही
देव, हे (जनासः) लोगो!(नृम्णस्य मना) मानसिक शकिक
महत्त्वसे युक्त (इन्द्र ) प्रभु है ।
भावार्थ-आदिदेव परमेश्वर पहलेसेही महती मानस शक्तिसे
युक्त है और अपने प्रशंसनीय कर्मसे संपूर्ण देवताओंको सशी-
मित करता है । इसका वल इतना है कि उसके भय धावापृथिवी
मीकांपते हैं। लोगो! यही सब जगत् का एक प्रभु
और यही सबसे अधिक समर्थ है।
-
यस्मान्न ऋते विजयन्ते जनासो यं युद्धधमाना अयसे हवन्ते।।
यो विध्यस्य प्रतिमानं यमव यो अच्युतच्यत्स जनास इन्द्रः॥
झ.२।१२॥९
अन्यय और अर्थ-दे (जनासः) लोगो ! (यम्मान प्रते) जिसके
(४४) बिना (जनासः न विजयन्ते ) लोग विजय प्राप्त नहीं कर सकते, (युद्धधमानाः) लडते हुप ( अवसे) रक्षा के लिये (यं हवन्ते) जिसकी प्रार्थना करते हैं और (यः) जो (विश्वस्य प्रति मानं बभूव) विश्वका नमूना हुआ है तथा जो (अच्युत-व्युत्) न हिलने वालों कोभी हिला देनेकी शक्ति रखता है, हे लोगोयही इन्द्र है। भावार्थ-- परमेश्वरकी कृपा न हुई तो लोगोंका कभी विजय नहीं हो सकता, इसलिये युद्ध के समय सय लोग उसी की प्रार्थना मनोभावनामे करते हैं, जो प्रभु जगत् बनने के लिये आदर्शरूप हुआ वह इतना समर्थ है कि वह बड़े प्रभावशालियों को भी हिला देता है, परतु उसको हिलाने वाला कोई नहीं है । अस्माकमग्ने मप्रयत्सु धारयानामि क्षत्रमजरं मीर्यम् । वयं जयेम शतिनं सहस्रिणं वैश्वानर वाजमने तयोतिभिः । ऋ.६।८।६ अन्वय के साथ अर्थ-हे (वैश्वानर अग्न)विश्वके संचालक प्रकाश देनेवाले देव ! (अम्माकं मघासु) हमारे धनिकों में (सु-वीर्य) उत्तम वीरता से युक्त(अ-नामिकभी न नम्र होने वाला (अ-जर क्षनं) कभी क्षोण न होने वाला क्षात्रा तेज (धारय) धारण कर तय अतिभिः)तरी रक्षा शक्तियोंसे (घा) बल प्राप्त (वयं) हम सब (शतिनं सहस्रिणं) सौ और हजारों सैनिकों के साथ हमला करनेवाले शत्रु को (जयेम) पराजित करेंगे। भावार्थ-हे जगत के संचालक प्रभु! हमारे में जो धनी हैं, उनमें उत्तम शौर्य वीर्य, धैर्य, स्थापन कर अर्थात् धनी लोगशूर हो और डरपोक न हो, कभी किसीले घे न डरें और अपनी रक्षा करने में ये समर्थ हो । तेरी रक्षाओंसे सुरक्षित हो कर ही हम बलवान् यमेंगे और सैन्यके साथ हमपर हमला करनेवाले शत्रु करके यह
अ
-
'ओको भी परास्त करेंगे।
सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते ।
त्वाममि प्र णोनुमो जेतारमपराजितम् ॥ ऋ. ११९११२
अर्ध - हे (शवस: पते इन्द्र) बल के स्वामी प्रभो ! (ते
सख्ये ) तेरी मित्रता हम (वाजिनः) बलवान् होने के कारण
(मा भेम) किसीसे भी नहीं डरते । तू (जेतार) विजयी और
पराजितं) कमी पराजित न होनेवाला है इसलिये ( त्यां
अभि प्र णोनुमः) तुझे ही नमन करते हैं ।
भावार्थ ..हे सर्व समर्थ प्रभो। सेरी मित्रतासे हम घलशाली
होनेके कारण हम किमी नहीं डरेंगे। क्यों कि तु सदा विजयी
हो और तुम्हारा पराजय कभी नहीं होता। इसलिये हम तेरी ही
शरण आते हैं, तेरी ही भक्ति करते हैं और तुझे छोडकर किसी
अन्यकी उपासना नहीं करते।
सूचना
पाठक इस प्रकार मंत्रओका अर्थ करें। हरएक मंत्र फण्ठ करें,
और उसके पद पदार्थ अन्वय और भावार्थ स्वयं करनेका यत्न
करें। जहां समझमें न आवे वहाँ ऊपर दिये अर्थकी सहायता लें।
इस प्रकार करने से उनकी प्रगति घेदविद्यामें शीघ्र होगी।
पाठ ११
(म. भा. द्रोणपर्व अ.३६)
सञ्जय उवाच।
सौभद्रस्तद्वचः श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः ।
अचोदयत यन्तारं द्रोणानीफाय भारत ॥१॥
तेन संचोधमानस्तु याहि याईति सारथिः ।
प्रत्युवाच ततो राजनभिमन्युमिदं वचः॥२॥
अतिभारोग्यमायमनाहितस्वयि पाण्डवै । सम्प्रचार्य क्षण पद्धया ततस्व योद्धमर्हसि ॥ ३ ॥ आचार्यों हि उत्तीद्रोण परमास्त्रे वृतश्रम | अत्यन्तसुरासपद्धस्त्व चाऽयुद्धविशारद ॥४॥ तताऽभिमन्य प्रहसन्साशि वाक्यमन्त्रीत् । सारथ को न्यय दाण समग्र क्षत्रमेव वा ॥५॥ एरापतगत शक सहामरगणैरहम् । अथवा रुद्रमीशान सर्वभूतगणार्चितम ॥ योधयेय रपामखेन स क्षध विम्मय ॥ ६॥ न भमेतद्विपत्सैन्य कलामहति पोडशीम् । अपि विश्वजित विष्णु मातुल प्राप्य सूतज ॥७॥ पितर धाजन य द्धन भीमामपयास्यति । अभिमन्युश्च तावाच कदीरत्य सारथे ॥ ८॥ याहीत्यवानवादन दाणानीकाय मा चिरम् ॥ स जय उवाच ह मारत! धीमता बुद्धिमतो धर्मराजस्य तद्वच বলেন অন্য মঃ নমঃ। যা রাখিল নাৰীক্ষায় होणस्य सैन्याय अचादयन प्रेरितवान |॥ १॥ तेन द्रौपदी पुत्र अभिम युना " याहि याहि " गछ गछ इति सन्धमान सप्रेय- माण सारथिस्तु, ह राजन् ! तत तदनतर इद चव इद बचन अभिमन्यु मयुयार ॥ ह आयुष्मन् अभिमन्यो । पाण्डवैस्त्वयि अय अतिमा आहित स्थापित । बुद्धया क्षण समधार्य विचार्य तत तदनतर व बाई अहसि ॥३॥ हि आचार्य द्रोण हनी एतपाय परमास्थच एनश्रम । सच मयुद्धविशारद ने युद्धविशारद अत्यतसपसंद्ध च ॥ ८॥ ततोऽभिमन्यु प्रहसन सारयिं इद पायय अश्यात् । हे मारथ ! का नु अय द्राण ! ममप्र सपूर्ण माय भविश्रय या ॥५॥ ऐरायतगत अमरगणे
(४७)
'सह शकं इन्द्रं वा, अथवा सर्व भूतगणार्चितं सर्वभूतपूजितं
ईशानं रुद्र वा रणमुखे योधयेयम्। अद्य क्षत्रे में विस्मयो न ॥६॥
एतत् द्विपत्सैन्यं शत्रुसैन्यं मम पोडशी कलां न अर्हति। हे सूतज!
मातुलं विश्वजितं विष्णुं प्राप्य ॥ ७ ॥ अपि पितरं अर्जुनं चाऽपि
प्राप्य मां भीःन उपयास्यति॥ अभिमन्यः च तां सारथेः वाचं कद-
थीहत्य ॥८॥ "द्रोणानीकाय याहि, मा चिरं" इत्येव पनं अवधीत्।
ततः संनोदयामास हयानाश निहायनान् ॥ ९॥
नाति हृष्टमनाः सूतो हेमभाण्डपरिच्छदान् ।
ते मेषिताः सुमित्रण द्रोणानीकाय वाजिनः ॥ १० ॥
द्रोणमभ्यद्रवन् राजन् महावेगपराक्रमम् ।
तमुद्रीक्ष्य तथा यान्नं सर्चे द्रोणपुरोगमाः ॥
अभ्यवर्तन्त कौरव्याः पाण्डवाश्च तमन्ययुः॥ ११ ॥
ते विंशतिपदे यत्ताः संग्रहारं प्रचक्रिरे ।
आसीद्गांग इयावर्ती मुहूर्तमुदधाविव ॥ १२॥
शूराणां युद्धयमानानां निघ्नतामितरेतरम् ।
संग्रामस्तुमुलो राजन्प्रावर्तत सुदारुणः ॥ १३ ॥
प्रचर्न माने संग्रामे तस्मिन्नतिभयङ्करे ।
द्रोणस्य मिषतो व्यूह भित्या प्राविशदार्जनिः ॥ १५ ॥
तं प्रविष्ट विनिघ्नन्तं शत्रुसंघान्महाबलम् ।
इस्त्यश्वरथपत्योधाः परिवरुदायुधाः ॥ १६ ॥
नाना चादिनिनदैः वंडितोष्टार्जितः ।
हुंकारैः सिंहनादैश्च तिष्ठ तिप्टेति निस्वनैः ॥ १७ ॥
घोरहलहलाशब्देमांगास्तिहि मामिति ।
असायहममिति प्रबदन्ती म्हुमुहुः ॥ १८ ॥
वृहितैः सिजितहासः करनेमिस्वनैरपि ।
सनादयन्तो घसुधामभिदुद्धुराज निम् ॥ १९ ॥
(४८)
तेषामापततां वीरः शीघ्रयोर्धा महायल।
क्षिप्रास्नो न्यवधीद्राजन्मर्मशो मर्मभेदिभिः ॥२०॥
ते हन्यमान विवशा नानालिंगैः शितैः शरैः।
अभिपेतुः सुबहुशः शलमा इव पावकम् ॥ २१ ॥
ततः सूतो हेमभाण्डपरिच्छदान् सुवर्णालंकारयुक्तान् निहाय-
नान त्रिवर्षीयान् हयान् अध्यान आश संनोदयामास । सुमित्रेण
सारथिना द्रोणानीकाय प्रेषितास्ते वाजिनः अश्वाः ॥ १० ॥ हे
राजन! महावेगपराक्रम द्रोणं अभ्यद्रयन्। तथा यान्तं तं अभिमन्यु
उद्धीक्ष्य दृष्ट्या, सर्वे द्रोणपुरोगमाः तं अभ्यवतन्त, पाण्डवाश्च तं
अन्ययुः ।। १९ ॥ ते विंशतिपदे यत्ताः संयत्ता संग्रहारं प्रचक्रिरे ।
उदधौ समद्रे गांगः आवर्त इव मुहूर्त आसीत्॥१शाशराणां युद्धद्य-
मानानां इतरेतरं निधनता, हे राजन् ! सुदारुणः तुमलः संग्राम
प्रावर्तत ॥ १४ ॥ तस्मिन् अतिभयंकरे संग्रामे प्रवर्तमाने द्रोणस्य
मिपतः पश्यतः एव आज निः अभिमन्युः व्यूह भित्त्वा अभ्यन्तरं
प्राविशत् ॥ १५ ॥ तं महायलं व्यहमध्ये प्रविष्ट शत्रुसंधान विनि-
नन्तं उदायुधाः उद्यतायुधाः हस्त्यश्यरधपत्यौघाः परियनुः
परितः यः ॥१६॥ नानावादित्रनिःस्वनैः श्वेडितोत्कृष्टर्जितैः
गर्जनः हुंकार: सिंहनादःच"तिष्ठः तिष्ठ" इति नि:स्वनैः ॥१७॥
धोरः हलहला शब्दैः " मा गाः, तिष्ठ, मां पहि, अमित्र ! असो
अहं" इति मुहुः मुहुः वारंवार प्रवदन्तः ॥१८॥ यहितः सृजितः
हासः करनेमिस्वनैरपि वसुधां संनादयन्तः आज नि अनि
दुद्युः॥ १९॥ शीघ्रयोधी महायलो धीरः क्षिप्रास्त्रः अभिमन्युः।
राजन् । यद्धमर्मशः अभिमन्युः मर्मभेदिभिः नानालिंगैः शरैः
उगपततिपां न्ययधीत् ॥ २० ॥ नानालिंग. शितः शरैः वियशा,
इन्यमानाम्ने धीराः पावकं शलभा व सुयशः अमिपेतुः॥२१॥
-
संस्कृत पाठ माला।
पुस्तकों का मूल्य म. आ. से ३) रु. और वी.पी से ४)ह,
प्रति भाग का मूल्य ।-) पांच आने और डा. व्य:-) एक माना ।
अत्यंतसुगमरीतिसे संस्कृत भाषाका अध्ययन करनेकी अपर्व पद्धति
इस पद्धतिको विशेषता यह है-
१ प्रथम द्वितीय और तृतीय भाग ।
न भागोम संस्कृत के साथ साधारण परिचय करादिया गया है।
२ चतुर्थ भाग।
इस चतुर्थ भागमें संधि विचार बताया है ।
३ पंचम और षष्ठ भाग।
इन दो भागों में संस्कृत के साथ विशेष परिचय कराया गया है।
४ सप्तम से दशम भाग।
इन चार भागों में पुल्लिता, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंगी नामोंके
रूप बनानेकी विधि यताई है।
५पकादश भाग।
इस भागमें " सर्वनाम के रूप बताये हैं।
६द्वादश भाग।
इस भागमें समासोका विचार किया है।
७ तेरहसे अठारहवें भाग तकके भाग ।
इन छ: भागों में क्रियापद बिचार की पाठविधि बताई है।
उनीलसे चोचीसचे भागतकके ६ भाग।
इन छ: भागों में बेदके साथ परिचय कराया है।
'अर्थात् जो लोग इस पद्धतिसे अभ्ययन करेंगे उन को अलग
परिश्रमसे बड़ा लाभ हो सकता है।
स्वाध्याय मंडल, आँध (जि. सातारा)
महाभारता (हिंदी-भाषा-भाष्य-समंत) तैयार हैं। (१) आदिपर्व! पृष्ठ संख्या ११२५ मूल्य म. आ.से६) (२) सभापर्व । पृष्ठ संख्या ३५६ मूल्य म. आ. सेर) ६ (३) वनपर्व । पृष्ठ संख्या १५३८ मूल्य म. आ. सेट) (४) विराटपर्व | पृष्ठ संख्या ३०६ मूल्य म. आ. से, (५) उद्योगपर्व । पृष्ठ संख्या ९५३ मूल्य म.आसे५) ई (६) भीमपर्व । पृष्ठ संख्या ८०० म. म. आ. से ४) है. [७] महाभारत समालोचना। १ प्रथम माग । मू म. आरसे ॥) पी. पी से Ha)आने । २ द्वितीय माग | मू.म.आईरसे) पी. पी से 1)आने । महाभारत के स्थायी प्रातकोंफे लिये १२०० पृष्ठोका)क.मल्प होगा। WANI FU- मुद्रक तथा प्रकाशक धी.दा.सातपळेकर भारतमुद्रणालय- स्वाध्याय मंडल, आँध (जि. सातारा)
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THEIREE:
अंक
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संस्कृत पाठ माला।
(संस्कृत भाषाका अध्ययन करनेका सुगम उपाय)
भाग इक्कीसवाँ।
ពីទីទី
ទីបីឱ្យក្នុងវិនមិទី៦ចំងមិន
लेखक और प्रकाशक,
श्रीपाद दामोदर सातवळेकर,
स्वाध्याय मंडल, औंध (जि. सातारा)
प्रथम आपति.
'संघद् १९८४, शक १८४९, सन१९२७
मूल्य पांच आने
NagaMBREDWARDHA
निरुक्ति।
घेदमंत्रों का मनन करने के समय वैदिक शब्दों की निरुक्ति
जानने की आवश्यकता होती है। यह निरुक्तिका विषय अब इस
आगे घताना है। यदि पाठक इन स्थानों में दिये हुए रियम
और उदाहरण मननपूर्वक पढेंगे तो उनको वैदिक शब्दीकी
निरुक्तिका उत्तम ज्ञान हो सकता है । इसलिये आशा है कि पाठक
इस सुगम पाठविधि से लाम उठावेंगे।
निवेदक.
स्वाध्यायमंडल
आँध (जि. सातारा
९।१२। १७
श्रीपाद दामोदर सातधळकर
मुद्रक नया प्रकाशक- श्रीपाद दामोदर सातवळेकर,
भारत मुद्रणालय, म्याध्याय मंडल, आंध (जि. सातारा)
संस्कृत-पाठ-माला। भाग इक्कीसा। पाठ १ और गा शब्दोंकी निरुक्ति। वैदिक पदोकी निरुक्ति करने के लिये वह पद किस धातुसे यना है यह जाननेकी आवश्यकता है। धातुके अक्षरोकी समानता पदमें देखनेसे प्रायः पता लग सकता है कि यह शब्द इस धातुसे धना है। जैसा- "गौ" शब्द लीजिये । इस में "ग" अक्षर है वह “गम् " धातुमें है, इसलिये अनुमान हो सकता है कि यह पद गम् धातुसे हुआ है। दूसरा गति अर्थ वाला धातुभी इसमें हो सकता है। इसलिये " गच्छति इति गौः" ऐसा गो पदका निर्वचन करते ।" जो गतिमान है "यह इसका अर्थ है, इस पदके अर्थ- गाय, वाणी, भूमि, सूर्य किरणें, सूर्य, चन्द्र, इंद्रियां आदि अनेक चंदमें आते हैं, सममें भिन्न भिन्न प्रकारको गति होती ही है। उदा- हरण देखिये- आयं गौः पृथिरक्रमीत् । ग्द. १०११८८१ " (आय) यह (गौः) भूमि (पृभिः) अंतरिक्ष में (अक्रमीत्) जाती है। इस मंत्री गौ शब्द पृथ्वीयात्रफ है और यह पृथ्वीको गतिका सूचक है । तथा- ।
४ मया गावो गोपतिना सचध्वमयं वो गोष्ठ इह पोषयिष्णुः॥ ऋग्वेद ३।१४।६ 'हे (गायः) गौवो ! (मया गोपतिना)मुझ गोपालके साथ (सच, ) मिलकर रहो, (इह अयं) यहां यह (पोपयिष्णुः) पालन करनेवाली ( या गोष्टः) तुम्हारी गोशाला है।" यहां गो शब्द (अर्थात् गावः शब्द )गाय का वाचक है, परंतु अलंकार से इन्द्रिय पायक भी होना संभव है। इस प्रकार अन्यान्य अर्थों के उदाहरण बेदमें अनेक मिल सकते हैं। पदमें कईवार " अंशके लिये पूर्णका प्रयोग किया जाता है। अर्थात् "गौ " शब्दका प्रयोग गौसे उत्पन्न होने वाले किसी भी पदार्थ के लिये होता है। यह विषय बडा गहन है तथापि संक्षेप से यहां देखिए- "के लिये निम्नलिखित मंत्र में है, देखिये- गोभिःश्रीणीत मत्सरं ऋ.९४६।४ '(गोमिः) गायके द्ध के साथ (धीणीत) पकाओ (मत्सर) सोमरसको।" अर्थात् गायका दूध लेकर उसमें सोम रस और दोनोंको साथ साथ पकानो। इसी मंत्र "मत्सर "शब्द सोम रसका वाचक है, दूसरा अर्थ लोम है, वह यहां अभीष्ट नहीं है। मत्सर शाद"मद्" (हपिन होना)इस धातुसे बनता है। उक्त प्रकार " गो " शब्द, "मायका दूध, दही, मक्खन, धो. धर्म, चर्मसे धनी रसियां" आदिके लिये प्रयुक्त होता है, क्योंकि ये लय पदार्य गो से बनते हैं। देखिये इस के उदाहरण- अंगुं दुहन्तो अभ्यासते गवि । ऋग्वेद.१०। ९४९ (अ) सोमका (दुहन्तः ) रस निचोहनवाले (गयि) धर्मपर (अध्यासत) येटते है।" यहां "गो" शब्द का अर्थ "मी" शब्द शब्द "गायके दूध" डाली है, मत्सर का ।
चर्म अपवा चर्म है। तथा और देखिये - गोभिः सनद्धी असि यी यस्य । कम्वेद. ६४७।२६ “(गोमिः ) गोचर्म को रसियों से (सन्नद्धः ) यंधा हुआ रय है इससे (घोळयस्य ) त्दढ बनो" यहां गो शब्दका अर्थ मि से बनी हुई रसी है। इसी प्रकार गोदके अनेक अर्थ घेदमें होते हैं गायसे जितने को पदार्थ बनते हैं उन सयका वाचक एक गौ शब्द है। धनुष्य की डोरी चर्मकी तांत से पनती है। इसलिये उसका नाम भी गौ है । इस प्रकार अनुसंधानसे जानना चाहिये । दो धातुसे बने शब्द। कई शब्द एक धातु से बनते हैं, उसी प्रकार कई शब्द दो अथवा अधिक धातुओंसे भी यनते हैं अथवा वैसे सिद्ध किये जा सकते हैं देखिए- "हिरण्य" शब्द है, इसमें दो भागों की कल्पना हो सकती है। “हिरण्य" इसमे " रण्य"पद "रम- णीय " पदका संक्षिप्त रूप होगा, देखिये- रमणीय, रमणीय. रम्ण्य, रण्य, इस दंगसे यह रण्य' पद रमणीय पद का संक्षिप्त रूप स्पष्ट प्रतीत होता है, इस लिये यह "रम्" धातुसे सिद्ध दुआ मानना योग्य है । हि" अथवा " हिर" हिर्" पद "ह" धातुसे होना संभवनीय । हृदय शब्द का मापामें "हिर्दय" भी कई लोग कहते हैं उसमें दय " हटाया जाय तो "हिर" शेष रह जाता है। यह हिर - रण्य - हिरण्य शब्द इस प्रकार बना है। हृदय के लिये जो रमणीय लगता है यह हिरण्य है यद धन का नाम है। धन, दौलत, संपत्ति आदि हरएक मनुम्यके हृदयको रमणीय लगती है, इसलिये धनका यह नाम है। - "
६
"
" धातुका अर्थ हरण करना भी है, एक स्थानसे हरम
करके जो दूसरे स्थानपर लिया जा सकता है वह हिरण्य होता
। धन एकके पाससे दूसरे के पास जाता रहता है इस लिये धन
को हिरण्य कहते हैं, इसका उदाहरण देखिये..
हिरण्यपाणिमूनये सवितारमुपह्वये ॥
'(हिरण्य-पाणि) सवर्ण के समान चमकदार हायोसे
अर्थात् किरणोंसे युक्त ( सथितार) सूर्य की अपनी (ऊतये)
रक्षा होने के लिये (उपवये )प्रार्थना करते हैं।" यहां हिरण
शन्द घन रूपी सुवर्ण के समान चमकदार इस अर्थमें प्रयुक्त है।
इस प्रकार पाउक शब्दोंकी व्युत्पत्ति जाने ।
म.१।२२१५
वा. यजु. ३६९
पाठ२
इस पाठ में निम्न लिखित मंत्रोंका अध्ययन कीजिये-
६ नो मित्रः शं चरुणः शं नो भवत्वर्यमा ।
शं न इन्द्रो वृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुकमः ॥
(मित्रः) सर का मित्र ईश्वर (नः शं) हम सबको कल्याणकारी
होवे । (वरुणः) सबसे श्रेष्ठ ईश्वर (0) कल्याण कार्ग होवे।
(अर्यमा ) न्यायकारी ईश्वर (न) हम सबको कल्याणकारी
होवे। (इन्द्रः ) परम ऐश्वर्यवान् प्रभु (मासं) हम सबका
कल्याण कारी होवे ।। (बृहस्पतिः) बडी वाणीका स्वामी ईश्वर
(२) हमारा कल्याणकर्ता हो और ( उरुक्रमः विष्णुः) महा
पराक्रमी व्यापक ईश्वर (नःश)हमारा कल्याणकर्ता होवे ।
शं नो बातः पातां शं नस्तपतु सूर्यः ।
शं नः कनिदद्देवः पर्जन्यो अमिवर्पत ॥या यज. ३६।१०
(धातः) घायु (न) हम सपके लिये कल्याण कारी
होकर (पषता) बहता रहे । (सूर्यः) सूर्य (न:) हम सय
करे।
लिये (शं तपतु) कल्याण कारक होकर तपना रहे । (कनिक्रदद)
गर्जना करनेवाला:( पर्जन्यः देवः) मेघराज देव (नः) हम सब
के लिये (शं अभिवर्षतु) कल्याण करने वाली वृष्टि का घर्षाव
अहानि शं भवन्तु नःश रात्रीः प्रति धीयताम् ।
शं न इन्द्राग्नी भवतामचोभिः शं न इन्द्रावरुणा रातहव्या।
शं न इन्द्रापूपणा वाजसातौ शमिन्द्रासोमा सुविताय शंयोः॥
वा. यजु.३६ । ११
(मः) हम सयके लिये ( (अहानि शं भवन्तु) दिन कल्याण
कारक हो । (रात्रीः शं प्रतिधीयतां) रात्री का समय हम सबके
लिये कल्याण को धारण करे। (अवोभिः) सब प्रकार के रक्षणों
के साथ ( इन्द्राग्नी) ऐश्वर्य वान् और तेजस्वी (नः शं भवतां)
हम सबके लिये कल्याण कारक हो । (रातहव्यौ) अन्न देनेवाले
(इन्द्रावरुणौ) ऐश्वर्यवान और श्रेष्ठ (नः शं) हम सबका कल्याण
करें। (इंद्रापूषणो) ऐश्वर्य वान् और पोषणकर्ता (वाजसातौ)
अन्नके दानकै समय (न:शं) हम सबका कल्याणकारी
(इन्द्रासोमौ) ऐश्वर्यवान् और विद्वान् (सुविताय) उत्तम
गति के लिये और (शं योः) शांतिसुख और दुःख प्रतिकारके
लिये सहायक पर्ने । अर्थात् हरएक समय और हरएक शक्ति
हम सब के लिये लाभदायक बने ।
अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम् ।
शतं भवास्यूतिभिः॥
क्र.४॥३१॥३
हे ईश्वर! तू (नः) हम सबका, (सखीनां) सय मित्रजनों
का और (जरितॄणां ) सब उपासकोका (शतं अतिभिः) सैकड़ों
रक्षणोंके द्वारा
(अभि सु
अविता) सय प्रकार से उत्तम रक्षक
(भवसि) होता है ।
८
।
हम सयका, मिनों और उपासकों का तू सैकडों प्रकारों से
अत्यत उत्तम रक्षण करता है । प्रभो! तुम्हारे जैसा दूसरा
कोई
मी रक्षक नहीं है । तेरे रक्षा साधन अनत है और रक्षा मार्ग
भी अनत है।
अग्ने त्य ना अन्तम उत त्राता शिवो भवा वरुथ्य ।
घसुरग्निसुश्रवा अच्छा नक्षि धमत्तम रयिंदा॥ ० ५।२४।१
ह ( अग्ने ) तेजस्वी ईश्वर ! (न स्व अन्तम ) हमारे लिये
तही समीप हो । इसलिये तू हमारा (प्राता) रक्षक (शिव )
कल्याणकता और (वाथ्य ) श्रेष्ठ हो । तू (अग्नि) तेजस्वी
(वसु ) सबका निवासक (बसनया ) निवास करने के योग्य
अनादि देनेवाला (अच्छा नक्षि) हमें उत्तम प्रकार प्राप्त हो ।
और हमें (धुमत्तम) उत्तम तेजस्वी ( रयिं दा )धन दो।
परमेश्वर ही हम लयका अत्यत समीप है। उससे अधिक समीप
और कोई नहीं है, यही सयका रक्षक, कल्याण करने वाला
और सयको भ्रष्ट प्राप्तव्य है। वही सयकी
सुरक्षा करता
सरका पोषण करता है। यह हम सयको प्राप्त हो और हमें उत्तम
धन देधे।
स्या यन्ति क्षितय पथिल्या त्या राय उगयासों जनानाम् ॥
व पावा तरणे त्यो म पिता माता सदमि मानपाणाम् ।
है और
देयर। (क्षितय) पृथ्वीपर रहने पाले मनुष्य (स्या यर्धन्ति)
तुम पढाते है, तेरी महिमा पठाते हैं। (जनानां) मनुष्यों के
उमयामा गया) दोनों प्रकार धन मा तेरी महिमा प्रशासित
परत। तुमदी (प्राता) मातार दो और (तरण चय)
दुयम सेर जान लिय (भ)याय हा नया नुमहा (मनुष्याणा)
मनुष्योरा पिता माना आदि (मय इन्) माहीम दी हो।
९ हे ईश्वर ! सय शानी जारी महिमा फैला रहे है, सय लोगों का स्थूल सूक्ष्म धन नहीं देता है, सयको दापसे पार होने के लेये तेरा ही मान मात करने योग्य है क्यो कि तूही सय मनुष्यका माई, माता, पिता आदि संबंधी हो । तं सभीनीस्तयो यूपयानि पास्यानि नियुतः सथुरिन्द्रम् ॥ समुद्रं न सिंधव उपशुमा उपचसं गिर आविशन्ति । (तं इन्द) उस प्रभुके पास (तपः सधीची:) रक्षक शक्तियां रहती हैं तथा (पृप्पयानि पास्पानि ) उत्साहवर्धक शक्तियों (नियुतः ) साथ साथ नियुक्त होकर (सधुः) सेवा करती हैं । (निश्वः समुन) नदियां जिस रीतिसे समुद्रको प्राश होती हैं। उसी प्रकार ( उपशुप्मा गिरः ) यलसे युक्त स्तुतिप्रार्थना- पाली याणी (उमय्यचर्स) सर्वयापक ईश्वर के पास (आ विशन्ति ) पहुंचती है। परमात्माके पास सब प्रकारका संरक्षक सामथ्र्य है, अनंत पल भी यहां ही है। हरएक मनुष्य अपनी पाणीसे उसीकी प्रार्थना करता है अथवा हरएक मनुष्यको उसी की प्रार्थना करना चाहिये । किसीमी मापाद्वारा और कहां भी रहकर की हुई प्रार्थना पूर्ण रीतिसे उसीके पास पहुंचती है। सूचना। इस पाटमें आये हुए देवताओंके अनेक नाम पकही भरके वाचक होते हैं । उस देवताका पोध करते हुए एक अद्वितीय परमेश्वरके वाचक होते हैं क्यों कि " एक ही सद्वस्तु का वर्णन शानी लोग अनेक नामोसे करते हैं" यह बेदके मंत्रद्वारा ही स्पष्ट किया गया है।
पाठ३
शब्दोंकी निरुक्ति।
समुद्र
" शब्दमें " सं+उत्+द्र" ये तीन विभाग हैं इनका
अर्थ-(सं) मिलकर (उत् ) ऊपर (2) गति करना है। जल
के अणु परस्पर मिलकर एकरूप होकर ऊपर उठने के लिये गति
करते हैं। जिन लोगोंने समुद्र देखा होगा उनको समुद्रकी इस
गतिका ज्ञान हो सकता है । समुद्र का जल स्थिर नहीं होता
परंतु लहरों के द्वारा सदा हिलता रहता है यही अर्थ इस शब्दमे
है। यहां सं उत् ये दो उपसर्ग हैं और द्र धात है जिसका अर्थ
गति है।
इसीकी दूसरी व्युत्पत्ति
सं+मुद्र" है, इसमें (सं) एक
होकर (मुद) आनंद (२) देता है । समुद्र में जल के
में मिलकर देखने वाले को आनंद देते हैं। यहां
उपसर्गपूर्वक " मुद्" ( आनंदित होना) धातुसे बना है ।
इसकी तीसरी व्युत्पत्ति "सं+उन्द " (भिगोना) इस धानु
की जाती है इसका अर्थ (सं) उत्तम रीतिसे (उनत्ति)ज
भिगोता है । समुद्र सयको भिगो सकता है या भिगोता है क्योति
उसमें अपरंपार जल होनेसे भिगोनेका कार्यकरने में यह समर्थ है।
उदाहरण---
समुद्रमय जग्मुरापः॥
"(आप) जल ( समुद्रं ) जलनिधिके प्रति (अब जग्मुः)
पहुंचे ।"
अणु आपस
सं
समुद्र शब्द
ऋ.१।३२१२
आदिश्य सद आ + दा" (लेना, स्वीकार करना)
धातुसे थमता है." मादत्त इति आदित्यः" (जो लेता है यह
आदित्य है। आदान अर्थात् स्वीकार करनेका धर्म इसमें होता है। इसके विविध अर्थ देखिये १ आदत्ते रसान्जलो अथवा रसोका आदान करता हे अर्थात् शोपण करता है। सूर्य जरादि रस का आकर्षण करता है। २ आदत्ते मास-तेज का आदान करता है, किसी भी दूसरे तेजस्वी पदार्थका तेज खींचता है, इसलिये उसकीप्रमा कम हो जाती है। इसका उदाहरण देखिय- अथावयमादित्य व ते तवानागसो अदितये स्याम ॥ मुग्वेद १।२४।१ "हे (आदित्य )सूर्य ! ( अथ) अब (वय ) हम सब (तव यते ) तेरे प्रतमें रह कर ( अन् + आगस ) निष्पाप होते हुए (अदितये) अखडित मुक्तिकं लिय योग्य ( स्याम ) होंगे।' . 61 वत्र " शब्द "" धातुसे बनता है, आवरण करता है, घेरला है, चारों ओर से घेर लेता है उसका नाम वृक्ष है । प्राय वेदमें यह शब्द मेघ वाचक है क्यों कि वह आकाश में आकर घेरवा है, तथापि चारों ओरसे घेग्नेवाला शभु दुष्ट विकार आदि अनेक अर्थ में आता है, इसका उदाहरण यह है- अपा बिलमपिहित यदासीनं जघन्दा अप तदवार ॥ ऋ० ११३२१११ (यत् )जो (अपा बिल)जल के निकलनेका द्वार (अपि- हित)दका हुआ था उसको खोलने के लिये (वत्र जघन्वान्) मेधको मार कर (तत् अपचार ) उसे खोल दिया। यहा मेधको मार कर जल के प्रवाह मुक्त करनेका वर्णन है । अर्थात् " से " " शक्ति इसमें रहती है इसी लिये इसको आत्मा कहते हैं। इससे आत्मा का अर्थ "संचालक "होता है। (१०) वेदमें शब्द बननेके समय धातु के अक्षरोंमें उलट पुलट भी हो जाता है जैसे- हिंस्" (हिंसा करना) इस धातु सिंह शब्द धनता है जिसका अर्थ “हिंसक प्राणी है। 'हिस्" इस धातु के व्यंजन के स्थान बदले है और “सिंह' शम्द बना है। मापामें भी चाकू के लिये काच." "बिलकुल के लिये "कुल- यिल " आदि अनेक शब्द इसी प्रकार आदि और अंतका स्थान विपर्यय होकर यने हैं। इसी प्रकार संस्कृत शब्दों के धननेमें भी होता है। इस प्रकार अनुसंधान करनेसे कई शब्दोमें में इसी प्रकार का साधर्म्य दिखाई देगा। 1
यं मर्त्यः पुरुस्पृहं विदद्विश्वस्य धायसे ।
प्रस्वादनं पितनामस्ततार्ति चिदायवे ॥.५।७।६
(मर्त्यः) मयं मनुष्य (पं) जिस ईश्वर को (पुरुस्पृह) अन्यंत
प्रशंसनीय (विश्वस्य धायसे)सब विश्वका धारण करनेवाला
(पितूनां प्रस्वादनं ) अन्नोको मीठा पनानेषाला तथा (आयवे)
मनुष्य मात्रके लिये ( अस्तताति) गृहके समान आश्रय रूप
(विदत् ) जानता है।
मनुष्य उस ईश्वर को उपास्य, जगत् का धारक. अन्न को रुची
अर्थात् उत्तम स्वाद देने वाला और मनुष्योंका एक मात्र आश्रय
जानकर उसकी उत्तम उपासना करे और उस ईश्वरको अपने
अंदर पेसा ही
अनुभव
करे अथवा मनन से उसके उक्त गुण
जाननेका यत्न करे।
स वज्रभृदस्युहा भीम उग्रः सहस्रनेता शतनीय कम्वा ।
चनीपो न शवसा पाञ्चजन्यो मरुत्वानो भविंद्र ऊती।
.१।१००। १२
(सः) वह ( मरुत्वान् इन्द्रः ) प्राणशकिसे युक्त प्रमु
(बज्रभृन् ) शस्त्र धारी, (दस्युहा) शत्रुका नाश करनेवाला,
(भीमा) भयंकर उप्र, (सहस्रचेताः) सहस्रों प्रकारके शानोसे
युफ्त, (शतनीयः) बहुत प्रकारसे जगत को चलानेवाला, (कन्या)
प्रकाशमान (चम्रोपान)रसयुफ्तके समान सर्वत्र एक रस,
(शवसा ) पलसे (पांचजन्यः) पंचजनोंका हितकर्ता प्रभु(नः
ऊती भवतु ) हम सपका रक्षक हो।
उन्न प्रकार विविध शक्तियों से युक्त प्रभुको रक्षामें रहनेसे
दो सय सुरक्षित रह सकते है।
सत्रामदासस्तव विश्वजन्या सत्रासयोऽध ये पार्थिवासः ।
सत्रा घाजानाममयो विभक्ता यद्देवेषु धारयथा असुर्यम् ।
मा.६।३६१
हे ईश्वर ! (तब मदासः) तेरे आनंद (सत्रा विश्वजन्याः)
सच मुच सब जनोंके हितकारी हैं, (अध्र) और (ये पार्थिवासः
रायः) जो पृथ्वीपर के धन हैं, वेभी सबको लाभकारी है। तू
(वाजानां विभक्ता)तूं धनौका विभाजक (समा अभवः)सच,
मुच हुआ है और न ही (देवेष असुय) प्राणोका बल (धारयया)
धारण करता है।
परमेश्वरके जो आत्मिक और अलौकिक आनंद है वे सचमुच
सप लोगोंके हितकारी है। यही ईश्वर सयको यथा योग्य रीतिसे
धनौका विभाग करता है और यही सूर्यादि देवताओं में उत्तम
यल स्थापन करता है।
कविमग्निमुपस्तुहि सत्यधर्माणमध्यरे।
देवममीयधातनम् ॥
०१।१२।७
(अध्वरे ) यश में सत्कर्म करने के समय (अमीव-चातनं)
'रोग दूर करने वाले (सत्य-धर्माण ) सत्य नियम पालन करने
थाले, (कवि)ववि (नानि दे ) तेजस्वी परमात्मदेव की ही
(स्तुति) प्रशंसा कर।
परमात्म देय आरोग्य दाता, मन्य नियमोका पालक.
अर्यात साम्दका प्रवर्तक और अत्यंत तेजस्वी है. इसीलिये
यह स्तुति करने योग्य है। उसकी स्तुति करने उपासक के अंदर
तेजयिता परती।
समान नीलं पृषणों पमानासम्मग्मिर मदिषा अग्र्यतीभिः।
मासम्म परं कथयो नि पोति गुदा नामानि बधिर पगणि॥
ना.१०२
कवि
(वृपणः ) बलवान् ( महिषाः) वडी इच्छा धारण करनेवाले, (अर्यतीभिः वसानाः)चालक शक्ति के साथ रहनेवाले सज्जन समानं नील)समान एक आश्रयस्थान को (संजग्मिरे ) पक होकर पहुंचते हैं । (कथयः) ज्ञानी लोग (ऋतस्य पदं) सत्यके स्थानका (नि पान्ति)संरक्षण करते है और (गुहा) बुद्धिम (पराणि नामानि) श्रेष्ठ नामोंको (दधिरे ) धारण करते हैं। श्रेष्ठ मनुष्य अपनी प्रयल इच्छा शक्ति के साथ उस एक ईश्वर के आश्रय स्थानको प्राप्त होते हैं । ज्ञानी लोग सदा सस्यका ग्रहण और असत्यका त्याग करते हैं । इसलिये हरपक की बुद्धिमें सदा श्रेष्ठ विचार धारण करके अपने आपको श्रेष्ठ धनाना चाहिये। ऋतस्य हि वर्तनयः सुजातमिपो वाजाय प्रदिवः सचन्ते । अधीवासं सोदसी पावसाने घृतैरन्नैर्वावृधाते मधूनाम् ॥ ऋ. १०॥५॥४ (भरतस्य ) सत्यके (म-दिवः धर्तनया) अत्यंत तेजस्वी सनातन मार्ग (इपः वाजाय) मनकी इच्छा और अन्न के लिये. । सचन्ते) सहाय्य करते हैं। (रोदसी) द्युलोक और पृथ्वी (सुजातं) उत्तम प्रसिद्ध (अधिवास) सर्व व्यापक को (पावसाने) पसाते हैं। (घृतः) घी और (मधूनां अनः) माधुर्ययुक्त अन्नों के द्वारा (घावृधात) सब को पुष्ट करते हैं। सनातन सत्य धर्म मार्ग का आक्रमण करनेस सप मनुस्यों के मनोगत पूर्ण होते हैं, और इसी ढंगसे सय लोग घलवान भी यन सकते हैं। क्यों कि प्रसिद्ध ईश्वर सर्व व्यापक है और यह सप को घी अन्न आदि द्वारा पुर पनाता है, इसलिये उसकी उपासना से सपको पल प्राप्त होता है। २
+१०।15
व्याम) अत्यत विस्तत आकाशम (सत्च) तीनों काला
एक जैसा रहने वाला अविकारी शात्मतत्व और (अ सत्व)
उस आत्मासे मिन्न पदार्थ ऐसे दो पदार्थ थे । इस (पूर्व आयुनि)
पूर्व अवस्थामें (हन ) निश्चयसे हम सरके अदर (ऋतस्य
असच्च सच्च परमे व्योमन्दक्षस्य जन्मन्नटितरुपस्थे ।
अग्निहं न प्रथमजा तस्य पूर्व आयुनि वृपभश्च धेनु ।
(दक्षस्य जन्मन् ) बल्की उत्पत्तिके समय (अ-दिते )
अविनाशी मून प्रकृतिके (उपस्ये) समीपके स्थानपर (परने
प्रथमजा ) सत्य धर्मका पहिला प्रवर्तक (अग्नि ) तजस्वी
ईश्वर प्रकाशित
हुआ जिसके साथ (वृषम ) बलवान आत्मा
और (धेनु )कामधेनु अर्थात बुद्धि थी।
प्रकृति और ईश्वर अनादिकालसे है। ईश्वर प्रकृति में घलका
सगर करता है । वहा सत्य धर्मका पहिला प्रवर्तक है। बल
पोषण शक्ति, यलपान आत्मा और सुबुद्धि, ये सब परमेश्वरके
साथ रहते हैं। अर्थात परमेश्वरसे सबको वल प्राप्त होता है।
और परमात्मा से उत्तम पल प्राप्त होकर ही सब अपना
योग्य रीतिस करनेमें सफलता और सुफलता प्राप्त करते हैं ।
यमादन प्रथमजा म्नस्य प्रजापतिस्तपसा ब्रह्मणेऽपचन्
यो लोकाना विधति मिरेपानीदनेनानि तराणि मृत्युमा।
अथर्व०४।३.११
और
कार्य
-
मान है, उसके (तेन ओदनेन) पकाये उस सृष्टिरूपी चावलोसे हम
(मृत्यु अतितराणि ) मृत्यु के पार होते हैं ।
परमेश्वरने इस विश्व की हंडीमें सृष्टि रूपी अन्नका पाक किया है,
इसके बनने के लिये उसने अपनी ही उष्णता लगाई और अपने
तेजसे यह अन्न उसने सिद्ध किया है। वह ईश्वर लोकोंका धारक
और सब लटिके मध्य में वर्तमान है। उसका यह अन्न सेवन
करता हुआ और उससे यल प्राप्त करता हुआ मैं मृत्यु के परे
जाऊंगा।
सूचना-पाठक इस प्रकार मंत्रोका अभ्यास और अर्थ का
मनन करें।
पाट५
।
शब्दानुकरण से भी कई शब्द बनते हैं जैसे-कौवा "कों का"
सन्द करता है इसलिये उस कौवेका नाम संस्कृतमें " काक
हुआ है। यह केवळ उस कौवेके शब्दका अनुकरण ही है । इसी
मकार टिटिभ पक्षी " टिट् टिट् " ऐसा शब्द करता है इस लिये
उसका यह नाम हुआ है।
औपमन्यव नामक चैय्याकरणाचार्य का मत है कि ये शब्द भी
इस प्रकार केवल शब्दानुकरणसे नहीं यने हैं परंतु इनका मी
यौगिक अर्थ है। परंतु कई अन्य आचार्य ऐसे शब्दों को केवल
शादानुकरण ही मानते हैं। इस विषय में प्रायः सर्वसंमत निरुक्ति
के नियम ये हैं-
(१) जिन पदोंमें स्वर धान प्रत्यय आदि स्पष्ट प्रतीत होते हो
उनकी निरुक्ति व्याकरणोक्त रोतिसे ही करनी योग्य है। जैसा-
दिय् धातु + अ प्रत्यय-य
शद्र सिद्ध हुआ। यह स्पष्ट
व्युत्पत्ति है।
-
२० नहीं दिखाई देता है वहां वर्ण की समानतासे योग्य धातु की अक्षर और वर्ण की समानतासे जो निर्वचन करने का ढंग (२) जहां पूर्वोक्त प्रकार व्याकरण की स्पष्ट रीति से शब्द की व्युत्पत्ति नहीं दिखाई देती है वहां अर्थ की प्रधानता मानकर अर्थफे अनुसार धातु आदिकी कल्पना करके पदको निक्ति तथा अर्थ करना चाहिये । जैसा “नि गम्" धातुसे " निघण्टु' शब्द बनाना है, यहां स्पष्ट धातु नहीं है। (३) जहां अर्थ की भी समानता नहीं है और धातु भी स्पष्ट कल्पना करके अर्थ करना चाहिये- जैसा गम् शब्द बनाया । यहां केवल "" अक्षर की हो समानता है, इस में गम् धातु स्पष्ट है और न अन्य कोई धातु । " धातुसे "" है उस विषय में निम्न लियान में रखने योग्य 'प्र+दा" धातु से "त है। वास्तविक । १ धातु के आदि अक्षर का अवशेष-जैसा प्रत्यय होकर "प्रत्त' रूप होता है। इसमें दा धातुके आदि अक्षर द का अप्रशंप" द्+तन्त्त हुआ प्रदात 'रूप होना चाहिये था परंतु पैसा नहीं होता। यह उदाहरण इस नियम का है। २ आदि अक्षर का लोप- जैसे धातु “ अस् " है उसके प्रथम अक्षरमा लोप होकर "म्न:, सन्ति" आदि रूपयनते है। ३ कई पदोंमें धातु के अंत्य अक्षरका लोप होता है जैसे 'गम्' धातुमे त्वा प्रत्यय लगकर रूप होता है। ४ का उपान्त्य या मध्यावर का लोप होता है जैसे-गम् धातु "जगमतः" पदोना चाहिये था, परंतु घेसान होकर "जन्मनु" ना है. यहां गम्" धातुफ मध्यम अपर्णका लोप होता है जिस म्या से - बने है। अअथवा "का दीर्घ हुआ। " अक्षर का लोप हुआ। पननेक स्थानपर "सिकता" घनता है। सूत् धातुसे क यगने के २१ गम् का ग्म् बना और जग्मतुः, जग्मुः आदि गम् धातु के रूप ५कई पदों में उपान्य अक्षर की वृद्धि होती है। जैसे-"राजन्" सद का रूप "राजा" होता है, " दण्डिन् " शब्द का दण्डी रूप होता है। यहां अन्त्य न का लोप हुआ और उपान्त्य ६ कहीं किसी अक्षर का लोप हो जाता है। जैसे-" याच (याचना करना) इस धातुका वेद में रूप " यामि " होता है और " याचामि "नहीं होता। बीच के तत्त्वा यामि " (ऋ० २२४३११) इस मंत्रमें यामि शब्द याचामि" शब्द के लिये आया है। ७ कई शब्दों में दो वर्षों का भी लोप हो जाता है जैसे " त्रि+ अच् " इस से “ तृच्" बनता है। यहां त्रिके +इ अर्थात् "रि" का लोप होकर फेवल " त्+ऋच्" मिलकर तृच् हुआ है। ८ किसी शब्दमें आदि अक्षर का विपर्यय होता है जैसे • 'द्युत्' धातु से “धोतिष् " शब्द बनने के स्थानपर "ज्योतिप्" शब्द धनता है। हन् धातुसे "धन" शब्द बनता है। मिद् धातुसे 'बिन्दु' शब्द होता है। ९किसी शब्दमै अक्षरोंके स्थानमें पदल हो जाता है अर्थात् आदि अक्षर अन्त में और अंत अक्षर आदिमें हो जाता है जैसे- मुज् घातसे " सर्जु " शद पनना चाहिये परंतु " रज्जु है। सर्जका रस्जु पनकर मन्जु होता है । कस् धातुसे कसिता - -- " बनता । स्थानपर "त" पनता है।
२२ १० किसी शब्दमै अन्त्य अक्षर का विपर्यय हो जाता है, जैसे. मिह धातसे " मेघ," यह धातुसे "ओध," गाह् धातुसे "गाध शब्द बनते हैं, यहा धातु के अन्तिम हकारके स्थानपर अन्य अक्षर हुआ है ।इसी प्रकार यह् धातु से "व" बनता है, मद् धातुसे मधु बनता है। ११ कहीं नया अक्षर बीचमें घुस जाता है जैसे - अस्(क्षेपण) धातुसे " आस्थत् " बनता है। यहा बीचमेंस्कार घुसा है। निया- रण अर्थ के र (वार) धातुसे द्वार बनता है इसमें दकार बीचमै घुसा है। ये नियम पाठक ध्यान में धारण करेंगे तो उनको शब्दोंकी सिद्धिके विषय में उत्तम शान हो सकता है। क्योंकि इन नियमों के अनुसार ही प्राय सब शन्दोंकी व्युत्पत्ति सिद्ध की जाती है । पाठक इन नियमोका स्य मनन करें और वैदिक शब्दों में इन नियमों के कार्य का अनुभव करें। ये अपर साधारण नियम दिये हैं, परंतु और भी कुछ विशेष नियम है जिनमें धातुका रूप ही यदल जाता है ऐसे नियम देखिये - १२ संप्रसारण होता है । धातुके यर ल य इन अक्षरोंके स्थान परमल उहति है, इसका नाम सप्रसारण है-जैसे "यज धातुसे " इटि " शब्द होता है तथा " इटवान्, दृष्ट्वा इष्ट' आदि शाद यनते हैं, यहा यकार के स्थान में इकार हुआ है । अय् पातु पकार म्यानपर उकार होगर "अति "शद रक्षा अर्थम पनता है । अय् धातुसे "पृथु 'शम्द होता है । यदा रकार के स्थानपर ऋकार दुभा । इसी प्रकार प्रद् धातुसे “मृदु" सद - आदे।
" । परमात्मायेइसके अर्थ है। इसी प्रकार अर्थ करने में ૨૨. १३ दो शब्दोंके मेल से कई शब्दबनते हैं जैसाघेद का "पुरुष" शब्द है यद्यपि यह समास प्रतीत नहीं होता है तथापियह आरंभ में समास ही है. देखिये-पुरुष, (पुर-उप, पुर-यस, पुरि-वस, पुरि-उप ) अर्थात् जो पूरी नगरी में बसता है, रहता है, यासोता है घर पुरुष कहलाता है । यह शब्द "पुर वस" इन दो शब्दों से बना है, और वस के धकारका उ बन कर पुर+उप-पक्ष्प" ऐसा शब्द हुआ। इसका उदाहरण देखिये- वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्वम् ॥ ऋग्वेद ॥ वृक्षके समान स्तब्ध होकर (दिपि) धुलोकमे (एक) एक (तिनि) ठहरता है (तेन पुरुषेण इदं सर्व) उसमें आत्मा ने यह सब (पूर्ण) परिपूर्ण हुआ है।" इस मंत्रमें पुरुष शब्द आत्मा अर्थ में आया है। नगर निवासी मनुष्य इस अर्थ में भी पुरुप शब्दका प्रयोग होता है । देहनिवासी यह भी इसका अर्थ है । इस प्रकार मर्यादा के न्यूनाधिक होने से पुरुष शब्दक अनेक अर्थ हो सकते हैं । अर्थात् शरीर रूपी पुरी में रहने वाला जीवात्मा, नगर रूपी पुरीमें रहने वाला नागरिक मनप्य, जगत् रूपी पुरीमें रहने- याला परमात्मा इत्यादि अनेक प्रकार से अनेक अर्थ "पुरुष 'शब्द के होते हैं। वेदके शब्दोको क्षेत्र के अनुमार देखना होता है यह बात विशेष है। कई शब्द ऐसे हैं कि जो क्षेत्रके विस्तार से भिन्न अर्थ बताने जैसा देखिये इन्द्र शब्द है, शरीरके क्षेत्रमें रहनेवाला जीवात्मा, राष्ट्रके क्षेत्रमें रहने वाला राजा और जगत् के क्षेत्रमें रहने वाला " ॥ पाठ६ इस पाठमें निम्नलिखित मंत्रोंका अभ्यास कीजिये- इळा सरस्वती मही तिनो देवीर्मयोभुवः । धर्हिः सीदन्त्यनिधः ॥ ऋ. १।। १३२९ (इळा ) मातृभाषा, (सरस्वती) मातृसभ्यता और (मही) मातृभूमि ये (तिम्रा देवाः) तीन देवताएं (मयोभुवः) कल्याण करनेवाली हैं । इसलिये ये तीनों देवताएं (घर्हिः) अंतःकरण में (अ-निधः) न भूलते हुए (मीदन्त)बैठे। इला " शब्द भाषा पाचक है, इळा और इडाये दोनों शब्द इल " धातुसे बने हैं । इडा अधया इला शब्दके अर्थ बहुत त है परंतु यहाँ भाषा अर्थ अपेक्षित है। अर्थ स्पष्ट होने के लिये यहां पूर्वोक्त मंधक अर्थम " मातृभाषा "ऐसा अर्थ लिया है। जो जिन लोगों की जन्म भाषा होती है वह उनकी मातृभाषा कही जाती "सरस्वती" अर्थ (सरस् ) प्रघाहसे युक्त है। अनादि प्रवाहसे गुरुशिष्यपरंपराद्वारा जो विद्याको संस्कृति और सभ्यता आती है, उस प्रवाहमयी सभ्यताका नाम सरस्वती है। "मही" शब्द भूमिका याचक है अर्थात् इसका अर्थ यहां मातृ- भूमि ही अभीर है। ये तीनों देवियां हरएक मनुष्य के लिये उपासना करने के योग्य इन तीन देवियों के उपासक रायके अंदर जितने अधिक होगे उतना गएका अधिक अभ्युदय निःसंदेह होगा। इसलिये छेदका फहना है कि इन देवियोंक लिये योग्य स्थान हरपक के हमय में मिलमा चाहिये। ये तीनदेवियां कल्याण करनेवाली इसलिये हरएक मनुष्य मममें इन विषयमें मादर धारण करें और इन के लिये अपना तन मन धन अपंग करे। शध्दका मूल मारती गृणाना ॥ तिम्रो देवीबहिरेदं सदन्तामिडा सरस्वती मही । अथर्य. ५। ७१९ तिम्रो देवीर्य हिरेदं सदनिवडा सरस्वती भारती। मही गृणाना। वा. यजु. २७। १९ (इडा) चाणी, (सरस्वती) विद्या और (मही भारती) भरण- की भूमि ये (तिस्रः देवी) तीन देवतायें (गृणाना)प्रशंसित होती हुई (बहिः सदन्तां) मनके अंदर चैट । अर्थात् इनके लिये मनके अंदर योग्य आदर का स्थान हो। सरस्वती साधयन्ती धियं न इला देवी भारती विश्वतूर्तिः ॥ तिम्रो देवीः स्वधया बहिरे दमच्छिन्द्रं यान्तु शरणं निपद्य ॥ क.२।३1८ (नःघियं साधयन्ती) हमारी बुद्धियोंका साधन करनेवाली (सरस्वती) विद्या, (इळा ) मातृभाषा, तथा (विध्यततिः मारतो)सबसे विशेष मातृभूमि ये (तिस्ना देवीः) तीन देवियां (स्व-धया) अपनी धारणा शक्ति के साथ ( इदं वर्हिः) यह यक्षस्थान अर्थात यह मन अपना (शरणं निषद्य) आश्रय देकर (अ-छिद्र) दोषरहित रीति से (पान्तु)सुरक्षित करें । विद्या, भाषा और मातृभूमि ये तीन देवियां घडी शक्तिशाली । अपनी शक्तिसे हमें आश्रय देकर हमारेसे यह हमारा शत सांवत्सरिक यज्ञ पूर्ण करावें । अर्थात् हमारी पूर्ण आयुनक इन तीन देवियोंकी भक्ति हमारेले होती रहे। आमारती भारतीभिः सजोषा इळा देवैर्मनुप्यभिरग्निः । सरस्वती सारस्वते भिरक् तिनो देवीर्वहिरेदं सदन्त ।। (भारतीमिः भारती) भारतीके अर्थात् भूमिकी उपरकी जनता के साथ मातृभुमि (देवैः मनुष्यैः इळा ) दिव्य मनुष्यों के ३.७।२।८
२८
पोपक के समान (नः) हमारे लिये (सनि रद) धनादि भोग दे।
सरस्वती विद्यादेवीसे अनेकानेक धन प्राप्त होते हैं । विद्यासही
सुख साधन बढते रहते हैं। तथा वैयक्तिक और सामुदायिक
उन्नति भी विद्याकै बढने से हो सकती है।
यस्या अनंतो अझतस्त्वेपश्चरिष्णुरर्णवः ।
अमश्चरति रोरुवत् ।।
ऋ०६।६१।८
(यस्याः ) जिस विद्याका (अनन्तः) अंतरहित (अ हरुतः)
अकुटिल सीधा, (चरिष्णुः ) आगे बढनेवाला (अर्णवः) समुद्र
के समान गंभीर (रोरुवत् ) शब्दमय (त्येषः) तेजस्वी (अमः)
सामर्थ्य (चरति) फैल रहा है।
इस जगत् में विद्याका वेग पैसा बढ रहा है कि उसका कोई
अंत नहीं है, जो सीधा बढने वाला, गंभीर, तेजस्वी और धडा
प्रभावशाली है। इसलिये इस विद्याके वेग को अपने अनुकूल
बनाना, तथा स्वयं उप्त ज्ञानके वेगसे वेगवान बनना चाहिये।
सूचना-विद्या प्रशंसाकं ये मंत्र पढ़ें, अर्थ का मनन करें और
उसपर यहुत विचार करें।
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चर्म शब्द
चर
"
"
"अंशु " नाम सोमका है। सामवल्लि या विशेषतः सोम रस
का यह नाम है । यह शब्द “ अश्+ शं" इन दो शब्दोंसे बनाया
जाता है (अशनाय शं भवति) अशन अर्थात् खाने के लिये शं
अर्थात् हितकारी होता है । इस का उदाहरण यह है-
अंशुं दुहन्तो अध्यासते गवि ॥ ऋ. १०।९४।९
"(अंशु) सोमका (दुहन्तः) रस निकालनेवाले (गवि) चर्म
पर (अध्यासते)बैठने हैं । " यहां अंशु शब्दका प्रयोग सोम
अर्थ में किया है । भक्षण करनेसे आनंद देनेवाला इसअर्थ में यह
शब्द यहां है।
(चलना) धातुसे बनता है, शरीरके
संपूर्ण बाह्य भागपर यद चलता है, जाता है या फैलता है ।
वृक्ष शब्द पश्च " (छेदन करना ) इस धातु से बना है जो
छेदा जाता है अथवा जिससे शत्रुको छेदा जाता है इस अर्थ में
यह शब्द बनता है । पहिले अर्थ में वृक्ष अर्थ और दूसरे अर्थ में
लकड़ीसे बननेवाला धनुष्य अर्थ है इस दूसरे अर्थका उदाहरण
देखिये-
वृक्षे वृक्षे नियता मीमयगौरततो चयः
प्रपतापूरपाद.॥ ऋग्वेद. १०१२७ १२२
"(वृक्षे वृक्षे ) प्रत्येक धनुष्य पर (नियता ) चढाई या तनी
हुई (गौः) चर्म से धनी डोरी (अमीमयत् ) शब्द करती है
और (पुरुषादः) मनुष्यको खानेवाले (वयः) पक्षियों के सदृश
वार्णोको (प्रपतान्) फेंकती हैं."
यहां तीन शब्द मनन करने योग्य है-
१वृक्ष- लकडीसे बना धनुष्य
२ गौ- गोचर्मसे बनी धनुष्यकी डोरी
३ वय:-पक्षियों के पंख लगे बाण
३० यहां मूल शब्द ही उससे बने हुए पदार्थ के लिये प्रयुक्त हुआ वृक्ष शब्द खटिया, मंचक, मेज इस अर्थ में भी वेदमें प्रयुक्त है क्योंकि वृक्षकी लकडीसे ये पदार्थ बनते हैं। वेद की यह विशेषता पाठकों को ध्यानमें धारण करनी चाहिये । अंश के लिये पूर्णका प्रयोग वेदमें बहुत स्थानपर होता है और उसके ये उत्तम उदा- हरण हैं। याणपर पक्षियों के पंख लगते हैं इस लिये पक्षियोंका एक अंग वाणोपर लगता है इस कारण वाणोफेलिये पक्षिवाचक शब्द का प्रयोग होता है। इसी प्रकार गोधर्मसे धनुष्यकी ज्या दोरी बनती है इसलिये ज्या के लिये गो शब्दका प्रयोग होता है, दूध गौ से मिलता है इस लिये दूधके लिये गो शब्दका उपयोग होता है। इसी प्रकार पाठक विचार करके जाने । " निति " शब्द पृथ्वीका पाचक है क्यों कि यह (नि+रम= निरमयति) मनुष्यादि प्राणियों को पारंवार रममाण करती है, इससे प्राप्त होने वाले फलों या फुलोसे प्राणिमात्र रममाण होते "निर्मति" शब्दका दूसरा अर्थ "कष्ट, दुर्गति, युरी अवस्था" आदि प्रकार होता है। यह शब्द उपरोक्त शब्द से भिन्न शब्द है। यह शब्द निर+अच्छ" (कप्ट प्राप्त होना) इस धातुसे बनता है । पाठक यहां देखें कि यद्यपि ये दोनों शब्द एक जैसे दोसते हैं तथापि इनके बनने में कितना अंतर है और इनके अर्थ में भी कितना भेद हैं । वस्तुतः ये दो शब्द एक दूसरे से भिन्न ही । " अंतरिक्ष शब्द मध्य अवकाश अंतरिक्ष लोक का चायक है (अंतरि) धीचमें (क्ष)निवास देनेवाला । क्षि धातु निवास करनेके अर्थ में है । यह शब्द पृथ्वी और सूर्यके यीच के स्थान का याचक है। यह लोक अपने अंदर (अंतरि) अनेक पदार्थोंको क्षम्यान देता है यह इसका अर्थ है। - ३१ १ तन "शंतन " शब्द "शं+तनु" इन दो शब्दोंके योगसे धना है, (शं) सुखको जो (तन) फैलाता है। धातु फैलाने के अर्थमें है। इसका दूसरा भी अर्थ होता है, (शं) सुख है (तनु) शरीरमें जिसः अथवा शरीरसे जो सुखी है। इस रीतिसे शब्द सिद्ध करनेमें तन् धातसे यह शब्द नहीं धना, परंतु दो शब्दोंका समास हुआ है। पाठक पूर्व शब्दसे इस शब्द की तुलना करें। । होने के कारण पुरोहित' शब्दमें दो शब्द हैं । "पुरः + हितः । इसका अर्थ (पुरः) आगे अग्र भागमें (हितः) रखा हुआ। सब कार्य में जिसको आगे रखा जाता है। सः" शब्दके वेदमें अनेक अर्थ हैं, परंतु उसका"आदित्य" भी एक प्रधान अर्थ है । (सु + अ = स्वर् = स्वः) ये दो शब्द इसमें हैं । (स) उत्तम प्रकारकी (अर् ) गति से युक्त शब्द आदित्य वाचक होता है। इसी प्रकार शोभन गतिसे युक्त पदार्थीका यह नाम हो सकता है। इसीप्रकार दूसरा अर्थ " सु + ईरण: " अर्थात् उत्तम प्रकार से दूर करनेवाला. सूर्य अंधकारको दूर करता है, इसलिये उसका चाचक यह शब्द है। शब्द सूर्य वाचक है । नायक शब्द के मध्य यकार को उडानेसे " नाक" शब्द होता है अर्थात् यह नायक अर्थमें है । सूर्य अपनी ग्रहमाला का नायक होने से इसका यह नाम है। अर्थ न + अ + क " इसप्रकार व्युत्पत्तिसे बनता । क शब्द सुखवाचक है । अक शब्द दुःख वाचक वना, फिर उसका नकारने निषेध किया, इससे न + अक (नाक) शब्द सुख वाचक बना । यह सूर्य सपके सुख का हेतु है इसलिये इस का यह नाम है। नाक - इसका दूसरा ३२ " काटा " . " दिशा" शब्द "दिश् ' धातुसे बना है, दिशा बताने का भाव इसमें है। " काटा "शब्द भी दिशा वाचक है, (फ्रान्त्वा स्थिताः) उलांघकर ठहरती है, जितना भी आगे देखा जाय उतनी आगे भी वही दिशा रहती ही है, सब मर्यादा को उल्लांघकर वह रहती है इसलिये उसका यह नाम है। सूर्यका भी नाम है इसलिये कि यह सबको उल्लांघ कर ठहरता है। इसीप्रकार अन्यान्य पदार्थोका नाम काष्ठा होता है । जिनमें उक्त गुण होगा! "शरीर " शब्द "शु ' (हिंमा करना) इस धातुसे बनता है। शरीर नष्ट होता रहना है, क्षीण होता रहता है इस अर्थ का यह धातु इसमें है। शब्द अंधकार वाचक है, यह अंधकार फैला हुआ होता है, इसलिये "तन्" (फैलना) इस धातुसे यह शब्द बनता है, जो एकदम सत्र फैल जाता है। दास " शब्द "दस '(क्षयको प्राप्त होना) इस भातुसे बनता है । जो दुए कर्मों द्वारा अपना नाश करता है यह दास सन्द द्वारा योधित होता है। गुलाम, हीन, दस्य आदि जो हीन फर्ममें रमता है और अपने हीन कोद्वारा अपना नाश करता उसका यह नाम है। सूचना। पाठक इस प्रकार येदिक माग्दोंके अर्थ देखें और उनकी व्युत्पत्ति करनेका विधि जाने । इस पुस्तक का वाग्दों की व्युत्पत्तियां और निरुक्तियां दी हैं. इनका विचार पूर्वक मनन करनेमे पाठकों को यह पात डात हो सकती है। तमः , पाठ ८ - इस गारमें निम्न लिसित मंत्री का अध्ययन कीजिये- सरस्थती देवयन्तो यन्ते सरस्वतीमधरे तायमाने । सरस्वती सुकृतो अद्वयात सरस्वती दाशुषे वार्य दात् ॥ देवयन्तः) देवता धननेकी इच्छा करने वाले (सरस्वती) विद्यादेवी को (इयन्ते) बलाते हैं, प्राप्त करते हैं। (अध्वरे तायः माने ) पर फैलानक समय (सरस्वती) विद्यादेवी की उपासना होती है। (स-कृतः) अरुला कर्म करने वाले (सरस्वती अइयत्त) विद्या देवी को ही पुकारते हैं। यह सरस्वती अर्थात् विद्यादेवी (दाशुषे ) दाताको (पार्य दात् ) सामर्थ्य देती है। उक्त अवस्थाओं में विद्यादेवी की उपासना लोग करते हैं। विद्यासे पल बढता है और सब उन्नति और पुरुषार्थ करना मनुष्य के लिये स्कर होता है । इस लिये हरएक मनुष्यको अपने अंदर विद्याका बल बढाना चाहिये । शानसं अपने सय रुखसाधन परि- पूर्ण करने चाहिये। (अथर्व- १२११) वैदिक धर्म " में राष्ट्रीय भावना और सार्वजनिक हित की कल्पना प्रमुख होने के कारण “ मातृभूमि " के विषय में अत्यन्त आदर का भाव होना स्वाभाविक ही है। अथर्व घेदमें एक "वैदिक राष्ट्रीय-गीत " अथवा मातृभूषिका सूक्त " इसी मातृभूमि की भक्तिका द्योतक प्रसिद्ध है सूक्त कारोंने इसका विनियोग निम्नधकार किया है- " ३ ३ (१)ग्राम पत्तनादि रक्षणायें। (२) पुष्टिकाम , कृषिकाम , ब्रीहियवानकाम , पुत्रधनादि काम , मणिहिरण्यादिकाम , पथिवीमहाशातिकाम , भूमिकाम पृथियौं उपतिष्ठते। (अथर्य सा० भा०) "(१) ग्राम पत्तन नगर राष्ट्र आदिकी रक्षा के समय, तथा (२) पुष्टि इपि,धनधान्य आदिकी प्राप्तिक प्रयत्न करने के समय, भूमिकी प्राप्तिके लिये प्रयल करने के समय तथा मातृभूमि जिस ममय अशाति होती है, उस समय देश में पुन शान्ति प्रस्थापित करने के अवसर पर इस "भूमि सूक्त " का पाठ किया जाता है। इस लिये हा एक वैदिक धर्मी को इस सूक्त का अध्ययन तथा मनन करना आवश्यक है। इस सूक्तके कई मंत्र यहा दिये जाते हैं। सत्य यहदनमुन दाक्षा तो ब्रह्म यज्ञ पृथिवीं धारयन्ति । सा ना भूतस्य भन्यस्य परयुलं रोक पृथिरी न कृणोतु ॥ १॥ (सत्य) सत्य, (यहत् ) पर, (मल) न्याय्य व्यवहार (उन्न भान तेज, (दौसा) दक्षता (तप) इन्द्र सहन करनेकी शकि (ग्रल) धान (यस ) सत्कार सगति दानात्मक शुम कर्म, ये. आट गुण (पृथिों) मानभूमि का (धारयन्ति) धारण करते हैं। (सा) यद (R) हमारी (पृथ्या) मातभूमि, जो हमारे (भूतस्य) मत और ( मध्यस्य ) भविष्य तथा वर्तमान अवस्था की (परना) पाग्न करने वाली है, यह (A) हमारे लिय (उर भार) विस्तृत मान (रणोत) कर। मातभूमि की स्वतत्रताका लक्षण जिन श्रेष्ठ सहोस होता है ये आठ गुण य है- (1) मयनिष्टा (0)यर सर्धन, (३) न्याय्य स्ययदार, (७) क्षात्र नप, (.)नंध्य दक्षता, (६) दात उग्ण महन करन को शनि (७) शान आध्यात्मिक,
।
साधिभौतिक और आधिदैविक-ज्ञान तथा विधान, और (८)
श्रेष्ठों का सत्कार, आपस को पता और अनायों की सहायता
करने के लिये आवश्यक कर्तव्य कर्म करना। इन गुणों से अर्थात्
ये गुण जनातमें घढनेसे-मातृभूमि का धारण होता है । इन गुणों
से जिस मातृभूमिका धारण हुआ है, ऐसी मातृभूमि यहां के
लोगोंके भूत भविष्य और वर्तमान कालीन अवस्था का संरक्षण
करती है । और वहां के लोगों को अपने देशमे जितना चाहिये
उतना विस्तृत स्थान, अर्थात् फैलाने के लिये स्थान देती है ।
तात्पर्य यह है कि उक्त आठ गुणों से मातृभूमि की स्वतंत्रता
का संरक्षण हो और अपने देशमें हरएक को अपने विस्तार के
लिये पर्याप्त विस्तृत क्षेत्र प्राह हो ॥ १ ॥
असंपाधं मध्यतो मानयानां यस्या उद्धवः प्रचतः समं बहु ।
नाना बी ओषधीयर्या विभर्ति पृथिवी नः प्रथतांराध्यताम॥२॥
(यस्याः ) जिस मातभूमिफे (मानवाना ) मननशील मनुष्यो
के (मभ्यतः । अंदर (उत्-वत ) उच्चता और (प्र-चतः)
नीचता तथा (समं ) समता के विषयमें (बहु) बहुत ही (अ-
सं-बाधं निरता है। और (या)जो (नाना वीर्या ओपी)
नाना प्रकारके वीर्यासे युक्त औषधियों को (विभर्ति) धारण
पोषण करती है, (नः पृथियो ) यह हमारी मातृभूमि (नः
मथतां) हमारी कौतिका (राध्यतi) साधन हो ।
जिस हमारे राष्ट्र के विचारशील मनुष्यों में परस्पर द्रोहमाव
नहीं है प्रत्युत्त उनमें पूर्ण ऐक्यभाव है, और उनमें उच्चता,नीचता
और समता के विषय के कोई झगड़े नहीं हैं। तथाजो हमारी
मातृभूमि विविध गुणों से युक्त अनन्त औषधिवनस्पतियों को
उपजाती है, यह हमारी मातृभूमि हमारे यश को फैलाने के लिये
कारणीभूत हो ॥२॥
३६ यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टयः सं बमूवः। यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत् सा नोभूमिःपूर्वपेये दधातु ॥३॥ (यस्यां) जिसमें समुद्र (उत ) और (सिन्धुः) नदी तथा आपः ) जलाशय बहुत है और (यस्यां जिसमें (कृष्टयः) खेतियां ( अन्नं ) अन्न की (सं बभूवुः) उत्पत्ति करती हैं (यस्यां) जिसपर (इदं प्राणत्)यह श्वास लेने और (पजत्) हलचल करने वाला प्राणिजात (जिन्यति) चलता फिरता है, (सा) व (भूमिः) हमारी मातृभमि (न: ) हमको (पूर्व पेये) पूर्ण पेय अर्थात् समस्त खानपान के पदार्थ (दधातु)दे । जिस हमारी मातृभूमि में समुद्र, नद, नदियां, तालाब, कूप, झील, झरने आदि यद्भुत हैं, उनके जलसे सय कृषीवल अनेक प्रकार को खेतियां करके जहां विविध धान्यादि उत्पन्न करते है। तथा उस अन्न और पान कासेवन कर अनेक उत्तम उत्तम प्राणी जहां आनन्द से रहते हैं यह हमारी मातृभूमि उत्तम सानपान हमें देती रहे । अर्थात पेसा कभी न हो कि हमारी मातृभूमि से उत्पन्न हुए अनसे दूसरे पुष्ट होते रहे और हमको खाने को कुछ भी नमिले ॥३॥ यस्यां यतनः प्रदिशः पृथिव्या यस्यामनं एटयः संयम्युः। या विभर्ति पहुधा प्राणदेजन् सा नो भूमिगोप्यप्याने वधाता॥ (यस्याः प्रविश्याः) जिस मातृभूमि की (घम्नः प्रदिशः) घागें दिशाओं में (पथ्यः) विविध पेतियां (यस्यां ) जिसमें (a) अन्न को (मं यम्युः ) जापान करती हैं और उससे (या) जो भूमि (गजन प्राणत) घूमनेयाले प्राणिमात्र को (य-धा) वहन प्रकार में (विमति ) पुष्ट करनी (मा) (नो भूमि) मार्ग मातमि में (गापु) गौओं में और (अग्ने मणि) अप्रमे भी (धात ) पारे।
३७
जिस हमारी मातृभूमि में चारों दिशाओं में खेती से विविध
प्रकार का अन्न उत्पन्न होता है, जिस को खा कर सा प्राणिमात्र
घर पुष्ट होते हैं और आनन्द से जिस पर विचरते हैं। वह भूमि
हमें विपुल अन्न और गौय देनेवाली होवे । अर्थात् हम सदा
अन्न और गौवों के बीच मातृभूमि की कृपासे रहें। ऐसा कभी
न हो कि हमारी मातृभूमि की गांवों का दूध और कृषि से उत्पन्न
हुआ अन्न दूसरे ही ले जाय और हम बंचित हो रहे ॥४॥
यस्यां पूर्व पूर्वजना चि चक्रिरे यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन् ।
गयामश्वानां वयसाय विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु ॥५॥
(यस्या) जिस मातृभूमि में हमारे (पू) प्राचीन (पूर्व जना)
पूर्वजों ने (विचकिर विविध कर्तव्य किये ये और (पस्या)
जिस में (देवाः देयों ने (असुरान ) असुरों को (सभ्यपत.
पन्) हराया था। तथा जो (ग) गौओं, (अश्वानां) घोडों
(चयपसः) और पक्षियों का (विस्था) विशेष निवास स्थान
है, वह (नः पृथियो) मारो मातृभूमि हमें (भग ) ऐश्वर्य
और (चर्च)ज (दधातु )देवे।
जिस मातृभूमि में हमारे प्राचीन पूर्याने विविध प्रकार के
पराकम किये थे, जिसमें सजनों ने दुओं का परामद किया था
और जिसमें गौवे, घोडे तथा अन्य पशुपक्षी मी आनन्द में रहते
है, यह हमारी आश्रयदायी मातृभूमि हमें ऐश्वर्य और तेज देने
विरमरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्ययक्षा जगतो निवेशनी ।
चैत्यानर पिरती भूमिरम्निमिन्दवृषमा द्रविणे नो दधातु ॥६॥
(विशे-भरा) सप की पोपण करनेवाली, (समधानी)
रलों की खान, (प्रतिष्ठा)सप का आधार, (हिरण्य यशाः)
जिसके अन्दर सुपर्ण है, (जगतः नियेशनी) प्राणियों का निपात
पाली छोये ॥५॥
३ "बिल" अर्थात दिन और रात्री अपने विरुद्ध पाठ ९ पणि, शब्द यनियेका वाचक है, यह पण " (व्यवहार करना) इस धातुसे बनता है । " वणिक" शब्द भी उसी पणि शब्द का ही रूप है । पणि- पणिक वणिक चणिक इस प्रकार इस की उत्पत्ति है । (पण्यं नेनेक्ति) बेचने के पदार्थ नित्य ले जाता है। इसलिये उसको पणिक् कहते हैं । शब्द की उत्पत्ति बडी विचिना है।" | "भृ" (भरण करना) इस धातुसे " भर " शब्द बनता है । भर भल- भिल. बिल इस प्रकार अंतमें बिल शब्द बना । म अक्षर का व बनता है और अकार का इ भी बनता है। कृष्ण " शब्द कृप धातुसे बना है। जिसमें कर्षण अथवा निकृष्टता होती है उस वर्णका नाम कृष्ण (काला) है। अह. शब्द दिनवाचक है ( उपाहन्ति अस्मिन् कर्मणि) इस दिनमें सब कर्म किये जाते हैं। अ+हर शब्द में यहाँ "आम्ह' धातकी कल्पना की है। इन दोनों शब्दों के उदाहरण के लिये निम्म लिखित मंत्र देखिये- अहश्च कृष्णमहर्जुनं च विवर्तेते रजसी वैधाभिः॥ ("कृष्णं अहः च ) काला दिन अर्थात् रात्रो और (अर्जुन अहःच) श्येत दिन अर्थात् दिन ये दोनों (रजसी) शोभाया (घेद्यामिः) ज्ञातव्य निज प्रकृति के साथ (वियर्तेते) सदा विरुद्ध गुणों से युक्त है। र और ल का अमेद होना है। घेदमें यह नियम यहुत स्थानों में दिखाई देता है जैसा मेघवाचक "उपर, उपल" ये शाद लीजिये। ऋ०६।९।१ इन्द्रसे जिसपर वृष्टि होती है, ऐसी हमारी (भूमिः) मातृभूमि ૩૮ कराने वाली, (वैश्वानरं ) सय मनुष्य समूह रूप ( अन्नि) अग्निका (यिनती) धारण पोषण करनेवाली और (इन्द्र वृषभा) (नः) हमको (दविणे ) धन और बल के बीचमै (दधातु) रखें। जो हमारी मातृभूमि सब प्रकारके रल, सोना, चांदी आदि की खान है, सब प्रकार के खान पान देकर जो सब प्राणियों का पोषण कर रही है.मनुष्यसमुदायापी राष्ट्रीय अनिको जो जगाती है और जहां स्वयं इन्द्र ही वृष्टि करता है वह हमारी श्रेष्ठ मातृभूमि हमें सब प्रकारके घनों के बीच में रखे ॥ ६ ॥ याँ रक्षत्यस्वप्ना विश्वदानी देवा भूमि पृथिवीमप्रमादम् । लामो मधु प्रियं दुहामघो उसनु वर्चसा ॥ ७ ॥ (विश्य दानी ) सब कुछ देनेवाली (यां पृथिवी भूमि) जिस विस्तृत मातृभूमि की (अ-स्थानाः) सुस्ती न करने वाले (देयाः) देवता लोग (अ-माद) प्रमाद रहित होकर(रसन्ति) रक्षा करते हैं, (सा) यह (ना) हमको (प्रियं मघ) प्रिय मधु (दुहां ) देती रहे (अयो) और (वर्चसा ) तेजके साथ सतु) यढाये। जिम हमारी मातृभूमि की रक्षा कानी और तर पुरुष प्रमादः रहिम होकर और मुन्नी को छोटकर करते आये हैं, यह हम सब कुछ देनयाली मातृभूमि सदा हमारे लिये मीठे मीठे पदार्थ देती और मारा और पल पदाता
.
पाठ ९
पणि " शब्द बनियेका वाचक है, यह पण "
" (व्यवहार
करना) इस धातुसे बनता है। " वणिक् " शब्द भी उसी पणि
शब्द का ही रूप है। पणि- पणिक- यणिक यणिक इस प्रकार इस
की उत्पत्ति है । (पण्यं मेनेक्ति) बेचनेके पदार्थ नित्य ले जाता है।
इसलिये उसको वणिक कहते हैं ।
"बिल " शब्द की उत्पत्ति बडी विकिा है । "भृ" (भरण
करना) इस धातुसे "भर " शब्द बनता है। भर भल भिल.
बिल इस प्रकार अंतमें पिल शब्द बना । म अक्षर का य यनता
है और अकार का इ भी बनता है।
कृष्ण " शब्द कृष् धातुसे बना है। जिसमें कर्षण अथया
निएता होती है उस वर्णका नाम कृष्ण (काला) है।
अह. " शब्द दिनवाचक है ( उपाहन्ति अस्मिन् कर्मणि)
रस दिनमें सब कर्म किये जाते हैं। अ+हर शब्द में यहां "आ ह'
धातुकी कल्पना की है। इन दोनों शब्दों के उदाहरण के लिये
निम्म लिखित मंत्र देखिये-
अहश्च कृष्णमहर्जुनं च विद्यतेते रजसी वेधाभिः॥
ऋ०६।९।१
("कृष्णं अहः च) काला विन अर्थात् रात्रो और ( अर्जुन
आहः च) श्वेत दिन अर्थात् दिन ये दोनों (रजसी) शोमा पाले
(पेधामिः)शातव्य निज प्रकृति के साथ (विवर्तेते) सदा विरुद्ध
मायके साथ रहते हैं । " अर्थात दिन और राती अपने विरुद्ध
गुणों से युक्त है।
र और ल का अभेद होना है। वेदमें यह नियम बहुत स्थानों में
दिखाई देता है जैसा मेघवावक "उपर, उपल"ये शब्द लीजिये।
"
। र के स्थानपर ल हुआ है। वास्तवमें उपल शब्द पत्थरका वाचक है। मेघोंसे ओले (पत्थर जैस) गिरते है इस लिये मघोंका ही यह नाम हुआ। उपर " शब्द में 'उपरम्" धातु है । जिस में लोग रमते हैं, जिसकी शोभा देखकर जन रमते हैं उसकानाम उपर "(मेघ) है। प्रथम शब्दकी भी उत्पत्ति देखिये प्रष्टतम प्रतम प्रथम इस प्रकार बीचके दो अक्षर लुप्त हो गये हैं और तके स्थानपर थ हुआ " 4 शुप्म" शब्द बलवाचक है, "शप " (शोषण करना)इस धातुसे बनता है । बल से शत्रु की शक्ति शुष्क की जाती है । सानु" शब्द पर्वत शिखर का याचक है, इसकी निरुक्ति ऐसी है । ( स + उत् + गुन्न) समुनुन-समुनु-सन्नु सानु मूल शब्द का संक्षिप्तरूप इस प्रकार बना। समुन्नन्न शब्द का अर्थ अत्यत उच्च स्थान, " यही सानु शब्दका अर्थ है। पार" शब्द का ही रूप है, पर शब्द का अर्थ परला है। "मुहूर्त शब्द कुच्छ कार का पाचक है, इसकी उत्पति"मुटु । मनु" मुहु+ऋतु- मुहर्त " यह है । मनुका अर्थ कालनिमाग है, चारवार होने वाला काल विभाग मुहूर्त कहलाता है। कल् ' (गती) धातुसे बनता है। यह समय सदा चल रहा है इसलिये इसको कार कहते हैं। कल् धातुका नाश भी है। काल सयका संहार करता है इसलिये उसका यह नाम। "पाणि 'शब्द हाथ का याचक है । पण धातु व्यवहार काम काशबाना आदिका याचक है। इससे पाणि शाद प्रनता है। हाप पाम काज पिया जाता है इसलिये यह नाम सार्य है। " “ दाद
"
अपत्य
पथ, पन्था " शब्द मार्ग वाचक हे, पत् अथवा पथ् धातुसे
यह बनता है, पावसे चला जाता है, एक स्थानसे दूसरे स्थानतक
पहुंचाता है, इसलिये इसका यह नाम हुआ है। .
शब्द में (अ+पत्य) ये दा शब्द हैं। अपतन
अर्थात् जिससे पतन नहीं होता, कुलका अधःपात जिससे नहीं
होता, उसका नाम अपत्य अर्थात् संतान है ।
'दुहिता " शब्द पुत्रीका वाचक है, "दूरे+हिता
दूर+हिता" अर्थात्
दूर रहने पर हितकारी यह इसका आशय है । दूरहिता- दुर्हिता-
दुहिता इस प्रकार इसकी निरुक्ति है।
श्मशान "शब्द प्रेतदाह करने के स्थान का वाचक है इस में
दमशान ये दो शब्द है । म शब शरीर वाचक और शान शन्द
शयन वाचक है। जहां शरीर अंतमें शगन करता है उस स्थानका
याचक यह शब्द है।
मधु" शब्द यालोका पाचक, दाढीमंछका घाचक है। इस
का अर्थ (इम+शु) म अर्थात् शरीरमें श्रित अर्थात् जो आश्रित
है, शरीरकेमाश्रयसे जो रहता है, उसका नाम मधु है।
"लोम " शब्द घालका वाचक है। यह "लु '(काटना)हम
धातुसे बना है । जो काटे जाते हैं उनका नाम लोम है।
"जामि' शब्द यहिनका याचक है, "जन्" (उत्पन्न करना)
इस धातुसे यह शब्द पनता है। इसमें पति प्रको उत्पन्न करता है।
निपाद " शम्द पंचम वर्णका याचक है, "नि+पद" (नीचे
पैठना)इस धातुसे रसकी उत्पत्ति है, सबसे नीचे पैठनेफा अधिः
कारी यह है। आर्य धर्म में पांच जन है, उसका वर्णन निम्नलिखित
मंत्रमें पाठक देरी-
यत्पांचजन्यया विशेन्द्र घोपा असृसत ।
अस्तृणाद पहणा विपोज्यों मानस्य स क्षयःn ऋ० ८४६३ ।
।
४२ " अन्न " बल" (यत् ) जी (पांचजन्यया विशा) पांचों जनोंके समूहरूप प्रजासे (इन्दे) राजाके लिये (घोपा असृक्षत) शब्द निकलते हैं तब (सः विपः) वह बुद्धिमान. (अर्यः) समर्थ श्रेष्ठ, (मानस्य क्षयः ) संमान का अधिष्ठाता राजा (बर्हणा अस्तृणात् ) अपने सामर्थ्य से शत्रुओं को दूर करता है। इसमें पंच जनोंका वर्णन है और पंचजनों की शक्तिका मी वर्णन इसमें है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र और निषाद ये पंचजन है। इनकी सहायता राजाके लिये मिलनी वाहिये। यह भाव उक्त मंत्रमें है। शब्द " अद् " (साना) इस धातुसे बना है । जो साया जाता है उसका नाम अन्न है। शन्द शक्तिका याचक है । यह "भृ" (धारणपोषण करना) इस धातुसे बनता है। भृ धातुसे भर शब्द बनता है और उससे भर-घर-घल इस प्रकार रूपान्तर को प्राप्त होता है। शन्द इव्य अथवा संपत्ति का पावक है। यह शन्द तपंण अर्थवाली "घि " अथवा "धन्" धातुसे बना है। जिससे तृप्ति होती है, जिससे धन्यता प्रतीत होती है उसका नाम धन है। क्षिप्र"शन्द शीघ्रताका वाचक है, इसका माम्य "सं- शन्द्र ध है। । समयको संक्षिप्त रूपमें लानेका नामही शीघ्रता करना है। यह' शन्द प्रसिद्ध है, यह प्रमु "शब्दकं साय संबंधित है। प्रम पम पटु यहु इस प्रकार यह शन्द बन गया। गृह' शब्द घरका याचक है यह प्रह" (लेना) धातु से यना है । (गृहानि इति गृह)जो फुटयियोको लेता है उसका नाम घर है। 'सुरा 'शरद सय जानते ही है। (सु) उत्तम प्रकारसे (प) धन क्षिप्त" के साथ " 1 " सूचना। पाठ १० यस्यामाप परिचरा: समानोरहोरात्र अप्रमादं क्षरन्ति । रंद्रिय जिससे रहता है उसका नाम सुख है। जिससे इंद्रियों को आराम होता है। इस प्रकार पाठक शब्दोकी व्युत्पत्तियां देखें और अनुभव करें कि यौगिक अर्थ इस रीतिसे देखे जाते हैं। यार्णवेऽधि सलिलमन आसीयां मायाभिरविधरम्मनीषिणः । यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः॥ सा नो भूमिस्त्विर्षि चलं राष्ट्रं दधातूत्तमे ॥ ८ ॥ (अग्रे )प्रारंभ में (या)जो ( अर्णवे)समुद्र के (अधि) अपर (सलिलं ) जलरूप (आसीत् ) थी। और (मनीषिणः बुद्धिमान् लोग (मायाभिः) बुद्धि और कशलता आदि से (यां) जिस की (अन्यचरन् ) सेवा करते आये है (यस्याः पृथिव्याः हृदयं ) जिस पृथ्वीका हृदय (परमे व्योमन् ) बड़े आकाश (सत्येन आवृतम् ) सत्य से आवृत होने के कारण ( अ-मतं) अमृतरूप है । (सा) वह (नः) हमारी (भूमिः) मातृभूमि हमारे उत्तमे राष्ट्र) उत्तम राष्ट्र में (स्विपि) तेज और (बलं ) बल प्रारंभमें जो समुद्र के बीच में थी, जिसका यीचका भाग भी सत्य आत्मा से व्याप्त है, जिस की सेवा हानी लोग बुद्धि से और कुशलता से करते आये हैं, यह मातृभूमि हमारे श्रेष्ठ राष्ट्रमे उत्तम तेजस्थिता और पल की वृद्धि करे॥८॥ ) धातु)धारण करें। सानो भूपिरिधारा पयो द्हामयो उझनु यर्वसा" । पाठ ११ भूम्यां देवेभ्यो ददति यश हव्यमरं कृतम् । भूम्यां मनुप्या जिन्यंति स्वघयानेन मत्याः ॥ सानोममिःप्राणमायर्दधातु जरदष्टिमा पृथिवी कृणोतु ॥२२॥ (भूम्यां ) हमारी मातृभूमि में (देवेभ्यः) अग्न्यादि देवों के लिये (अरंकन ) सुसंस्कृत किये हुए (हन्यं) हवनीय पदार्थों का ( यई ) या ( ददति ) करते हैं । इसी (भूम्यां) भूमिपर (माः मनुष्याः) मरण धर्म वाले मनुष्य ( स्थ-धया) अपनी धारणा शक्तिसे और अन से (जिन्यन्ति) जीवित रहते हैं। इस प्रकार की (सा)यह (नः पृयिनी भूमिः) हमारी विस्तृत मातृ भूमि हमारे लिये (प्राणं) प्राण का यल, (आयुः) दीर्घ आयु (दधातु ) देये और (मा) मुझे (जरदष्टिं) वृद्ध अर्थात् अति दीर्घ आयुसे युक्त (कृणोतु ) करे॥ जिस भूमिमें देवों के प्रीत्यर्य यश्याग और इटियां करते हैं और जहां सब मनुष्य उत्तम अन्न का मोग करके अपनी निज धारणा शक्ति से उन्नत होते रहते हैं, यह हमारी मातृभूमि हमारे लिये आयु आरोग्य और दीर्घ जीरन तथा यल दे । शिला भूमि रमा पांसुः पा भूमि. संधृता धृता।) तस्यै हिरण्यपक्षसे पृथिन्या अकरं नमः॥ २६ ॥ (शिला) शिला ( अक्ष्मा) परयर तथा (पांसुः) धूलिरूप यह (भूमिः) मातृभूमि है। (सा) उत्तका (सं-घृता)इतम मैतिसे धारण होने पर ही यह (धृता) समरक्षित होती है । (नस्ये) उम (हिरण्य-पक्षमे) अपने अन्दर मुर्ण धारण ४७ करनेवाली (पृथिव्यै ) मातृभूमि के लिये मैं (नमः) नमन (अफरं) करता हूं। जिस में मिट्टी, पत्थर, शिला आदि हैं और सोना चांदी आदि खनिज पदार्थ भी विपुल हैं वह हमारी मातृभूमि है। इसका प्रथम मंत्रोक्त आठ गुणों से उत्तम प्रकार धारण होने से ही इसकी स्व . तंत्रताको रक्षा होती है । इस लिये इस प्रकारको वंदनीय मातृ.. भूमि के लिये मेरा प्रणाम है। यस्यां वृक्षा वानस्पत्या ध्रुवास्तिष्ठन्ति विवहा । पृथिवीं विश्वधायसं धृतामच्छावदामसि ॥ २७ ॥ (यस्यां) जिसमें (वानस्पत्याः वृक्षाः ) वनस्पतियां और वृक्ष (विश्वहा ) सदा (ध्रुवाः) स्थिर (तिष्ठन्ति ) रहते हैं। उस (विश्व धायसं) सब को धारण करनेवाली और जिसका हमने (धृतां) धारण किया है ऐसी (पृथिवीं) मातृभूमिका (अच्छ आवदामसि ) हम स्वागत करते हैं। जिस हमारी मातृभूमि में वृक्ष, वनस्पतियां और विविध औषधि यां सदा फूलती और फलती है, जो हम सब का धारण कर रही है और हम सब (प्रथम मंत्रोक्त आठ गुणों के द्वारा) जिसका धारण कर रहे हैं, अर्थात् जिसकी स्वतंत्रता की रक्षा कर रहे हैं, उस चंदनीय मातृभूमि का हम सय स्वागत करते हैं । उदीराणा उतासीनास्तिष्ठन्ला प्रशामन्तः। पद्भ्यां दक्षिणसव्याभ्यां मा व्यथिम्मति भूम्याम् । (उदोराणाः) उठते हुए, ( उत आसीनाः) और बैठे हुए, (तिष्ठन्तः)खहे होते हुप, तथा (ऋामन्तः) चलते फिरते और दौडते हुप (दक्षिण-सव्याभ्यां) सीधे और यांएं (पद्यां) पारों से (मम्यां) भूमि में (मा व्यथिप्मदि)न कष्ट उत्पन्न करें। हमारी हरएकप्रकारकी हलचल कट उत्पन्न करनेवाली नहो। ॥
विमृग्य पृथिवीमा पदामि क्षमा भूमिं ब्रह्मणा वायुधाना पुट गिनतीमत्रभागं धृतं स्वाभि नि पोदेम भूमे ॥२९ (वि-मम्बरी)विशेष खोज करने के योग्य, (ब्रह्मणा) ज्ञा जिसको ( वावधानां ) वृद्धि होती है, (जे) बलकारक ( पुष्टिकारक (घृतं अनभागं)धी और अन्न आदि भोग्य प. (विनती) धारण करने वाली, (क्षमा) निवास करने ये (पृथिवीं) विस्तृत (भूमि ) मानभूमि की मैं ( आ वदामि प्रार्थना करता हूं कि हे (भूमे) मातृभूमि' (त्या) तुझपर (अ नि पोदेम) हम सब वैठे। हमारी भूमि अत्यंत उत्तम है, ३म लिये उसको अनेक प्रकार खोज होनी चाहिये । खोज करके उसका अधिकाधिक उपयं करकं अन्नपेयादि भोग्य पदार्थ विशेष प्रकारसे प्राप्त करके ह अपना घल, पटि, शक्ति और अन्य प्रकारका तेज बढायेंगे और अधिक विस्तृत प्रदेश प्राप्त करके आनंदसे बढ़ेंगे। शुद्धान आपस्तन्ये क्षरन्तु यो नः सेदुरप्रिये तं निदध्मः । पवित्रण पृथिवि मोत् पुनामि ॥३०॥ हे (पृथिवि ) मातृभूमि ! (शुद्धा आप') शुद्ध निर्मल जल (नः तन्धे ) हमारे शरीर के लिये (क्षन्तु ) यहता रहे (यः ) जो (नासेदुः)हमारा नाश करने का यल करेगा (त उस दुपको हम (प्रिये ) अप्रियता में (निन्दम रखेंग, में (मां) अपने आप को (पविण) पवित्रता से (उत् पुनामि) उत्तम पवित्रता करता हूं। में सदा शुद्ध जल प्राश ता रहे और जल आदिर्स हमारे शरीररित्र होते रहे । इम शुस, मरल और भ्रष्ट आचार और विचारों से अपने आपको सदा पवित्र यनायेंगे। और जो शत्रु हमाग नाश करने का यत्न करेगा उसको हम योग्य दण्ड देंगे।
संस्कृत पाठ माला।
बारह पुस्तकोंका मूल्य म. आ. सं ३) रु. और वी.पी से४)ह.
प्रति भाग का मूल्य 1- ) पांच आने और डा. व्य.-) एक आना।
अत्यंत सुगमरीतिसे संस्कृत भाषाका अध्ययन करनेकी अपर्व पद्धति
इस पद्धतिकी विशेषता यह है-
१ प्रथम द्वितीय और नृतीय भाग।
इन भागों में संस्कृत के साथ साधारण परिचय करा दिया गया हे।
२ चतुर्थ भाग।
इस चतुर्थ भागमें संधि विचार बताया है।
३पंचम और पष्ठ माग।
इन दो भागों में संस्कृतके साथ विशेष परिचय कराया गया है।
४सप्तम से दशम भाग।
इन चार भागोंमें पलिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंगी नामों के
रूप धनानेकी विधि यताई है।
५पकादश माग।
इस भागमें "सर्वनाम " के रूप बताये हैं।
६ द्वादश भाग।
इस भागमें समासोका विचार किया है।
रहसे अठारहवें भाग तक ६ भाग।
इन छ: भागों में क्रियापद विचार की पाठविधि बताई है।
८ उन्नीस चौयासवे भागतकके भाग।
इन छ: मागोंमें येदके साथ परिचय कराया है।
अर्थात् जो लोग इस पद्धतिसे अध्ययन करेंगे उन को अन्य
परिभमसे बडा लाम हो सकता है।
मायाय मंडल, आध (जि. सातारा)
महाभारता (हिंदी भाषा भाष्य समेत), (१) आदिपर्व। पृष्ट संख्या, १२५ मूल्य,म. आ. से६) रू. (२) सभापर्व | पृष्ठ संख्या ३५६ मुल्य मां, सेर) रु. (३) वनपर्व । पृष्ठ संश्या १५३८ मूल्य म. आ. सेट) (४) विराटपर्व । पृष्ठे संख्या ३०६ मूल्य म, आ. से)ह. (५) उद्योगपर्व । पेट संख्या ९५३ मूल्य मा.से) . (६) भीष्मपर्व ।. संख्या ८०० म. म. ओ. से ई) रु. [७] महाभारत. समालोचना। प्रथम भाग में. आईरेसे।। पी. पी से आने । २ द्वितीय भाग । मू. म. आर्डरसे ॥ ) पी. पी. से.)आने । महाभारत के स्थायी ग्राहकों के लिये १९०० पृष्ठोंकाइ)क. मूल्य होगा। दा. सातवळेकर, भारतमुद्रणालय- स्वाध्याय मेरल, आध (जि. सातारा) मुद्रक तथा प्रकाशक-