Sanmati Library, Jaipur
Shriramcharitmanas (lankakand)
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॥ सत्यं शिवं सुन्दरम् ॥
श्रीमद्गोखामी तुलसोदासजो विरचित
श्रीरामचरितमानस
[लङ्काकाण्ड ]
(सटीक)
Cahanezaar
टीकाकार—हनुमानप्रसाद पोद्दार
मुद्रक तथा प्रकाशन
मोतीलाल जालान
गीताप्रेस, गोरखपुर
सं०
सं०
सं०
२०१८
से २०३०
तक ३०,०००
२०३१
पाँचवाँ
२०३४
छठाँ
संस्करण १५,०००
कुल ५०,०००
पालाकालय पचास हजार
पता-गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस (गोरखपुर)
॥ श्रीहरिः ॥ विषय-सूची विषय पृष्ठ-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या ... ... १-मङ्गलाचरण ७३९ ११-युद्धारम्भ ७७८ २-नल नीलद्वारा पुल बाँधना, १२-माल्यवान्का रावणको समझाना ७८४ श्रीरामजीद्वारा श्रीरामेश्वरकी १३-लक्ष्मण-मेघनाद-युद्ध, लक्ष्मण- स्थापना ७४१ जीको शक्ति लगना ७८६ ३--श्रीरामजीका सेनासहित समुद्र १४-हनुमान्जीका सुषेण वैद्यको पार उतरना, सुबेलपर्वतपर लाना एवं सब्जीवनीके लिये निवास, रावणकी व्याकुलता ७४३ जाना, कालनेमि-रावण-संवाद, मकरी-उद्धार, कालनेमि-उद्धार ७९० ४---रावगको मन्दोदरीका समझाना, १५-भरतजीके वाणसे हनुमान्का रावण-प्रहस्त-संवाद ७४४ मूञ्छित होना, भरत-हनुमान्- ५-सुवेलपर श्रीरामजीकी झाँकी संवाद ७९२ और चन्द्रोदयंवर्णन ७४९ १६-श्रीरामजीकी प्रलाप-लीला, ६-श्रीरामजीके बाणसे रावणके हनुमान्जीका लौटना, लक्ष्मण- ७५१ जीका उठ बैठना ७९४ ७-मन्दोदरीका फिर रावणको १७-रावणका कुम्भकर्णको जगाना, समझाना और श्रीरामकी कुम्भकर्णका रावणको उपदेश महिमा कहना ७५२ और विभीषण-कुम्भकर्ण-संवाद ७९६ ८-अङ्गदजीका लङ्का जाना और १८-कुम्भकर्ण-युद्ध और उसकी रावणकी सभामें अनद-रावण- परमगति ७९८ संवाद ७५५ | १९-मेघनादका युद्ध, रामजीका ९-रावणको पुनः मन्दोदरीका लीलासे नागपाशमें बँधना ८०६ समझाना ७७३ | २०-मेघनाद-यज्ञ-विध्वंस, युद्ध और ०-अङ्गद-राम-संवाद ७७५ मेघनाद-उद्धार ८०९ रा०स० लं०१७- मुकुट-छत्रादिका गिरना ... ... ...
(४) विषय पृष्ठ-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या ... ... ८१८ ३२-हनुमान्जीका ... २१-रावणका युद्धके लिये प्रस्थान ३०-मन्दोदरी-विलाप, रावणकी ' और श्रीरामजीका विजय-रथ अन्त्येष्टि-क्रिया ८४३ तथा वानर-राक्षसोंका युद्ध ८१३ | ३५-विभीषणका राज्याभिषेक ८४६ २२-लक्ष्मण-रावण युद्ध सीताजीको २३-रावण-मूर्छा, रावण-यज्ञ- कुशल सुनाना, सीताजीका विध्वंस, राम-रावण-युद्ध ८१९ आगमन और अग्निपरीक्षा ... ८४५ २४-इन्द्रका श्रीरामजीके लिये रथ ३३-देवताओंकी स्तुति, इन्द्रकी भेजना, राम-रावण युद्ध ८२५ अमृतवर्षा ८५० २५-रावणका विभीपणपर शक्ति ३४-विभीषणकी प्रार्थना, श्रीराम छोड़ना, रामजीका शक्तिको जीके द्वारा भरतजीकी प्रेम- अपने ऊपर लेना, विभीषण- दशाका वर्णन, शीघ्र अयोध्या रावण-युद्ध ८३० पहुँचानेका अनुरोध २६-रावण-हनुमान्-युद्ध, रावणका ३५-विभीपणका वस्त्राभूषण माया रचना, रामजीद्वारा बरसाना और वानर-भालुओं- माया-नाश ८३१ का उन्हें पहनना २७-घोर युद्ध, रावणकी मूर्छा ८३४ | ३६-पुष्पक विमानपर चढ़कर २८-त्रिजटा-सीता-संवाद ८३६ श्रीसीतारामजीका अवधके. २९-राम-रावण युद्धा रावण-वधा 'सर्वत्र जयध्वनि ८४० ३७-श्रीरामचरित्रकी महिमा ... ... लिये प्रस्थान ... ८६ श्रीगणेशाय नमः श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीरामचरितमानस षष्ठ सोपान लंकाकाण्ड श्लोक रामं कामारिलेव्यं भवभयहरणं कालमत्तभसिंह योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम् । मायातीत सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेव वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुशिरूपम् ॥ १ ॥ कामदेवके शत्रु शिवजीके सेव्य, भव (जन्म-मृत्यु ) के भयको हरनेवाले, कालरूपी मतवाले हाथीके लिये सिंहके समान, योगियोंके खामी ( योगीश्वर), शानके द्वारा जानने योग्य, गुणोंकी निधि, अजेय, निर्गुण, निर्विकार, मायासे परे, देवताओं के स्वामी, दुष्टोंके वधर्मे तत्पर, ब्राह्मणवृन्दके एकमात्र देवता ( रक्षक), जलवाले मेघके समान सुन्दर श्याम, कमलके-से नेत्रवाले, पृथ्वीपति ( राजा ) के रूपमें परमदेव श्रीरामजीकी में वन्दना करता हूँ ॥१॥ शह्येन्द्राभमतीवसुन्दरतर्नु शार्दूलचर्माम्बरं कालव्यालकरालभूषणधरं गङ्गाशशाङ्कप्रियम् । काशीशं कलिफल्मपौषशमनं कल्याणकल्पद्रुम नौमीड्यं गिरिजापति गुणनिधि कन्दर्पहं शङ्करम् ॥ २॥ शङ्ख और चन्द्रमाकी-सी कान्तिके अत्यन्त सुन्दर शरीरवाले, व्याघ्रचर्मके वस्त्रवाले, कालके समान [अथवा काले रंगके ] भयानक साँका भूषण धारण करनेवाले, गङ्गा और चन्द्रमाके प्रेमी, काशीपति, कलियुगके पापसमूहका नाश करनेवाले, कल्याणके " ७४० सतां शम्भुः * रामचरितमानस * कल्पवृक्ष, गुणों के निधान और कामदेवको भस्म करनेवाले पार्वतीपति वन्दनीय भीशंकरजीदो मैं नमस्कार करता हूँ ॥२॥ यो ददाति कैवल्यमपि दुर्लभम् । खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शङ्करः शं तनोतु मे ॥ ३ ॥ जो सत्पुरुषोंको अत्यन्त दुर्लभ कैवल्यमुक्तितक दे डालते हैं और जो दुष्टौंको दण्ड देनेवाले हैं, वे कल्याणकारी श्रीशम्भु मेरे कल्याणका विस्तार करें ॥ ३ ॥ दो०-लव निमेष परमानु जुग वरष कलप सर चंड। भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड ॥ दव, निमेष, परमाणु, वर्ष, युग और कल्प-जिनके प्रचण्ड वाण हैं और काल जिनका धनुष है, हे मन ! तू उन श्रीरामजीको क्यों नहीं भजता ? सो०-सिंधु वचन सुनि राम सचिव वोलि प्रभु अस कहेउ । अव विलंबु केहि काम करहु सेतु उतरै कटकु ॥ समुद्रके वचन सुनकर प्रभु श्रीरामजीने मन्नियोंको बुलाकर ऐसा कहा-अब विलम्ब किसलिये हो रहा है ? सेतु (पुल) तैयार करो, जिसमें सेना उतरे । सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह। नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरहि ॥ जाम्बवान्ने हाथ जोड़कर कहा-हे सूर्यकुलके वजास्वरूप ( कीर्तिको बढ़ाने- पाने ) श्रीरामजी ! सुनिये ! हे नाथ ! [ सबसे बड़ा] सेतु तो आपका नाम ही है, जिसपर चढ़कर (जिसका आश्रय लेकर ) मनुष्य संसाररूपी समुद्रसे पार हो जाते हैं। चौ०-यह लघु जलधि तरत कति बारा । अस सुनि पुनि कह पवनमारा ॥ प्रभु प्रताप बड़वानल भारी। सोपेउ प्रथम पयोनिधि वारी ॥ १ ॥ फिर यह छोटा-सा समुद्र पार करनेमें कितनी देर लगेगी ? ऐसा सुनकर फिर पवनकुमार श्रीहनुमानजीने कहा-प्रभुका प्रताप भारी बड़वानल ( समुद्रको आग.) के समान है। इसने पहले समुद्रके जलको सोख लिया था ॥ १ ॥ तव रिपु नारि रुदन जल धारा । भरेउ बहोरि भयड तेहिं सारा॥ सुनि अति उकुति पवनसुत केरी । हरणे कपि खुपति तन हेरी॥ २ ॥ परंतु आपके शत्रुओंकी स्त्रियोंके आँसुओंकी धारासे यह फिर भर गया और उसीसे बारा भी हो गया। हनुमान्जीकी यह अत्युक्ति (अलङ्कारपूर्ण युक्ति) तुनकर वानर श्रीरघुनाथजीकी ओर देखकर हर्षित हो गये ॥२॥ जामवंत बोले दोउ भाई। नल नीलहि सब क्या सुनाई ।। राम प्रताप सुमिरि मन माहीं । करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं ॥ ३ ॥ माम्बवान्ने नल-नील दोनों भाइयोंको बुलाकर उन्हें सारी कथा कह सुनायो . ।
। . धावहु मर्कट *लंकाकाण्ड * [और कहा- मनमें श्रीरामजीके प्रतापको स्मरण करके सेतु तैयार करो, [रामप्रतापसे] कुछ भी परिश्रम नहीं होगा ॥३॥ बोलि लिए कपि निकर बहोरी । सकल सुनहु बिनती कछु मोरी। राम चरन पंकज उर धरहू । कौतुक एक भालु कपि करहू ॥ ४ ॥ फिर वानरोंके समूहको बुला लिया [और कहा- आप सब लोग मेरी कुछ विनती सुनिये । अपने हृदयमें श्रीरामजीके चरण-कमलोंको धारण कर लीजिये और सब भालू और वानर एक खेल कीजिये ॥ ४ ॥ मर्कट विकट वख्या । आनहु बिटप गिरिन्ह के जूया ॥ सुनि कपि भालु चले करि हुहा । जय रघुबीर प्रताप समूहा ॥ ५ ॥ विकट वानरोंके समूह (आप) दौड़ जाइये और वृक्षों तथा पर्वतोंके समूहोंको उखाड़ लाइये । यह सुनकर वानर और भालू हूह ( हुंकार ) करके और श्रीरघुनाथजीके प्रताप-समूहकी [ अथवा प्रतापके पुञ्ज श्रीरामजीकी ] जय पुकारते हुए चले ॥५॥ दो०-अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ। आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ ॥ १॥ बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वतों और वृक्षोंको खेलकी तरह ही [उखाड़कर] उठा लेते हैं और ला-लाकर नल-नीलको देते हैं। वे अच्छी तरह गढ़कर [सुन्दर ] सेतु बनाते हैं ॥२॥ चौ० सैल विसाल आनि कपि देहीं । कंदुक इव नल नील ते लेही ॥ देखि सेतु अति सुंदर रचना । बिहसि कृपानिधि चोले बचना ॥ १ ॥ वानर बड़े-बड़े पहाड़ ला-लाकर देते हैं और नल-नील उन्हें गेंदकी तरह ले लेते हैं । सेतुको अत्यन्त सुन्दर रचना देखकर कृपासिन्धु श्रीरामजी हँसकर वचन बोले-॥२॥ परम रम्य उत्तम यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहिं बरनी। करिहउँ इहाँ संभु थापना । मोरे हृदय परम कलपना ॥ २॥ यह ( यहाँकी) भूमि परम रमणीय और उत्तम है । इसकी असीम महिमा वर्णन नहीं की जा सकती। मैं यहाँ शिवजीकी स्थापना करूँगा । मेरे हृदयमें यह महान् संकल्प है॥२॥ सुनि कणीस बहु दूत पठाए । मुनिवर सकल बोलि ले भाए ॥ लिंग थापि विधिवत करि पूजा । सिव समान प्रिय मोहि न दूजा ॥ ३ ॥ श्रीरामजीके वचन सुनकर वानरराज सुग्रोषने बहुत-से दूत भेजे, जो सब श्रेष्ठ मुनियोंको बुलाकर ले आये । शिवलिङ्गकी स्थापना करके विधिपूर्वक उसका पूजन किया। [फिर भगवान् बोले-] शिवजीके समान मुझको दूसरा कोई प्रिय नहीं है ॥ ३ ॥ सिव द्रोही मम भगत कहावा । सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा ॥ संकर बिमुख भगति चह मोरी । सो नारको मूढ़ मति घोरी ॥४॥ ।
*रामचरितमानस लो शिवसे द्रोह रखता है और गेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्नमें भी मुझे नहीं पाता | शंकरजीसे विमुख होकर ( विरोध करके ) जो मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी, मूर्ख और अल्पबुद्धि है ॥ ४ ॥ दो--संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास। ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ वास ॥ २॥ जिनको शंकरजी प्रिय है, परंतु जो मेरे द्रोही है, एवं जो शिवजीके द्रोही हैं और मेरे दास [ बनना चाहते हैं, वे मनुष्य कल्यभर घोर नरकमें निवास करते हैं ॥ २ ॥ चौ०-जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं । ते तनुतनिमम लोक सिधरिहहिं । जो गंगाजलु आनि ददाइहि । सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि ॥ १ ॥ जो मनुष्य [ मेरे स्थापित किये हुए इन ] रामेश्वरजीका दर्शन करेंगे, वे शरीर छोड़कर मेरे लोकको जायगे । और जो गाजल लाकर इनपर चढ़ावेगा, वह मनुष्य सायुज्य मुक्ति पावेगा ( अर्थात् मेरे साथ एक हो जायगा) ॥ १ ॥ होइ अकाम जो टल तजि सेइहि । भगति मोरि तेहि संकर देइहि ॥ मम कृत सेतु जो दरसनु करिही । सो बिनु श्रम भवसागर तरिही ॥ २॥ जो छल छोड़कर और निष्काम होकर श्रीरामेश्वरजीकी सेवा करेंगे, उन्हें शंकरजी मेरी भक्ति देंगे। और जो मेरे बनाये सेतुका दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्रसे तर जायगा ॥२॥ राम वचन सब के जिय भाए । मुनिवर निज निज आश्रम आए । गिरिजा रघुपति के यह रीती । संतत करहिं प्रनत पर प्रीती ॥ ३ ॥ श्रीरामजीके वचन सबके मनको अच्छे लगे । तदनन्तर वे श्रेष्ठ मुनि अपने-अपने आश्रमोंको लौट आये । [ शिवजी कहते हैं-] हे पार्वती ! श्रीरघुनाथजीकी यह रीति है कि वे शरणागतपर सदा प्रीति करते हैं ॥ ३ ॥ बाँधा सेतु नील नल नागर । राम कृपाँ जसु भयउ उजागर ॥ बूढहिं मानहि चोरष्टिं जेई भए उपल बोहित सम तेई ॥ ४ ॥ चतुर नल और नीलने सेतु बाँधा । श्रीरामजीकी कृपासे उनका यह [ उज्ज्वल ] यश सर्वत्र फैल गया । जो पत्थर आप डूबते हैं और दूसरोंको डुवा देते हैं, वे ही जहाजके समान [ स्वयं तैरनेवाले और दूसरोंको पार ले जानेवाले ] हो गये ॥ ४ ॥ महिमा यह न जलधि कइ वरनी । पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी ॥ ५ ॥ यह न तो समुद्रकी महिमा वर्णन की गयो है, न पत्थरोंका गुण है और न वानरोंकी ही कोई करामात है ॥ ५ ॥ दोo-श्री रघुवीर प्रताप ते सिंधु : :: ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन ॥ ३ ॥ तरे पापान ।
- *लंकाकाण्ड * श्रीरघुवीरके प्रतापसे पत्थर भी समुद्रपर तैर गये । ऐसे श्रीरामजीको छोड़कर जी किसी दूसरे स्वामीको जाकर भजते हैं, वे [ निश्चय ही ] मन्दबुद्धि हैं ॥ ३ ॥ चौ०-चाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा । देखि कृपानिधि के मन मावा ॥ चली सेन कछु बरनि न जाई । गहि मर्कट भट समुदाई ॥ १ ॥ नल-नीलने सेतु बाँधकर उसे बहुत मजबूत बनाया । देखनेपर वह कृपानिधान श्रीरामजीके मनको [ बहुत ही ] अच्छा लगा । सेना चली, जिसका कुछ वर्णन नहीं हो सकता । योद्धा वानरोंके समुदाय गरज रहे हैं ॥ १ ॥ सेतुबंध लिंग चदि रघुराई । चितव कृपाल सिंधु बहुताई ॥ देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा । प्रगट भए सब जलचर वृंदा ॥ २ ॥ कृपालु श्रीरघुनाथजी सेतुबन्धके तटपर चढ़कर समुद्रका विस्तार देखने लगे। करुणाकन्द (करुणाके मूल ) प्रभुके दर्शनके लिये सब जलचरोंके समूह प्रकट हो गये (जलके ऊपर निकल आये) ॥२॥ मकर नक नाना झप व्याला | सत जोजन तन परम बिसाला ॥ अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं। एकन्द के डर तेपि डेराहीं ॥ ३ ॥ बहुत तरहके मगर, नाक (घड़ियाल), मच्छ और सर्प थे, जिनके सौ-सौ योजनके बहुत बड़े विशाल शरीर थे । कुछ ऐसे भी जन्तु थे, जो उनको भी खा जाय । किसी- किसीके डरसे तो वे भी डर रहे थे ॥ ३ ॥ प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे । मन हरषित सब भए सुखारे ॥ तिन्ह की ओट न देखिभ बारी । मगन भए हरि रूप निहारी ॥ ४ ॥ वे सब [वैर-विरोध भूलकर ] प्रभुके दर्शन कर रहे हैं, हटानेसे भी नहीं हटते । सबके मन हर्पित है, सब सुखी हो गये। उनकी आड़के कारण जल नहीं दिखायी पड़ता। वे सब भगवान्का रूप देखकर [ आनन्द और प्रेममें ] मग्न हो गये ॥ ४ ॥ चला कटकु प्रभु आयसु पाई । को कहि सक कपि दल बिपुलाई ॥ ५ ॥ ... प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर सेना चली । वानर सेनाकी विपुलता (अत्यधिक संख्या) को कौन कह सकता है ? ॥ ५॥ दो०-सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं। अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहि॥ ४॥ सेतुबंधपर बड़ी भीड़ हो गयी, इससे कुछ वानर आकाशमार्गसे उड़ने लगे और दूसरे [ कितने ही ] जलचर जीवोंपर चढ़-चढ़कर पार जा रहे हैं ॥ ४ ॥ चौ०-अस कौतुक विलोकि द्वौ भाई । बिहसि चले कृपाल रघुराई । सेन सहित उतरे रघुबीरा । कहि न जाइ कपि जूथप भीरा ॥ १ ॥ कृपालु रघुनाथजी [ तथा लक्ष्मणजी ] दोनों भाई ऐसा कौतुक देखकर हँसते हुए
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*रामचरितमानस
चले। श्रीरघुवीर सेनासहित समुद्रके पार हो गये । वानरों और उनके सेनापतियोंकी भीड़
कही नहीं जा सकती ॥१॥
सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा । सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा॥
खाहु जाइ फल मूल सुहाए । सुनत भालु कपि जहं तह धाए ॥ २॥
प्रभुने समुद्र के पार डेरा डाला और सब वानरोंको आज्ञा दी कि तुम जाकर सुन्दर
फल-मूल खाओ। यह सुनते ही रीछ-बानर जहाँ-तहाँ दौड़ पड़े ॥ २॥
सब तरु फरे राम हित लागी। रितु भरु कुरितुकाल गति त्यागी ॥
खाहि मधुर फल विटप हलावहिं । लंका सन्सुख सिखर चलावहिं ॥ ३ ॥
श्रीरामजीके हित ( सेवा ) के लिये सत्र वृक्ष ऋतु कुऋतु-समयकी गतिको
छोड़कर फल उठे। वानर-भालू मीठे-मोठे फल खा रहे हैं, वृक्षाको हिला रहे हैं और
पर्वतोंके शिखरोको लडाकी ओर फेंक रहे हैं ॥ ३ ॥
जह कहुँ फिरत निसाचर पाहिं । घेरि सकल बहु नाच नचावहिं ।
दसनन्हि काटि नासिका काना । कहि प्रभु सुजसु देहिं तक जाना ॥ ४ ॥
घूमते-फिरते जहाँ कहीं किसी राक्षसको पा जाते हैं तो सब उसे घेरकर खूब नाच
नचाते हैं और दाँतोसे उसके नाक कान काटकर प्रभुका सुयश कहकर [ अथवा
कइलाकर ] तब उसे जाने देते हैं ॥ ४ ॥
जिन्ह कर नासा कान निपाता । तिन्ह रावनहि कही सब बाता ॥
सुनत श्रवन बारिधि बंधाना । दस मुख बोलि उठा अकुलाना ॥ ५ ॥
जिन राक्षसोंके नाक और कान काट डाले गये, उन्होंने रावणसे सर्व समाचार
कहा । समुद्र [पर सेतु ] का बाँधा जाना कानोंसे सुनते ही रावण धवड़ाकर दसों मुखोंसे
बोल उठा--॥ ५॥
दो-चाँध्यो वननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु वारीस।
सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस ॥ ५॥
वननिधि, नीरनिधि, जलधि, सिंधु, वारीश, तोयनिधि, कंपति, उदधि, पयोधि,
नदीशको क्या सचमुच ही बाँध लिया ? ॥५॥
चौ०-निज विकलता विचारि वहोती । विहसि गयउ गृह करि भय भोरी॥
मंदोदरी सुन्यो प्रभु आयो । कौतुकहीं पायोधि बँधायो॥ १ ॥
फिर अपनी व्याकुलताको समझकर [ ऊपरसे ] हँसता हुआ, भयको भुलाकर,
रावण महलको गया । [ जब ] मन्दोदरीने सुना कि प्रभु श्रीरामजी आ गये हैं और
उन्होंने खेलमें ही समुद्रको बंधवा लिया है, ॥१॥
कर गहि पतिहि भवन निज आनी । बोली परम मनोहर वाची ॥
चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा । सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा ॥२॥
* लंकाकाण्ड * तब] वह हाथ पकड़कर, पतिको अपने महलमें लाकर परम मनोहर वाणी बोली । चरणोंमें सिर नवाकर उसने अपना आँचल पसारा और कहा हे प्रियतम ! क्रोध त्यागकर मेरा वचन सुनिये ॥ २॥ नाध बयरु कीजे ताही सों। बुधि बल सकिम जीति जाही सों। तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा । खलु खद्योत दिनकरहि जैसा ॥ ३ ॥ हे नाथ ! वैर उसीके साथ करना चाहिये जिससे बुद्धि और बलके द्वारा जीत सके । आपमें और श्रीरघुनाथजीमें निश्चय ही कैसा अन्तर है, जैसा जुगनू और सूर्यमें ! ॥३॥ अति बल मधु कैटभ जेहिं मारे। महावीर दितिसुत संघारे॥ जेहिं वलि बाँधि सहसभुज मारा । सोइ अवतरेउ हरन महि भारा ॥ ४ ॥ जिन्होंने [विष्णुरूपसे ] अत्यन्त बलवान् मधु और कैटभ [ दैत्य ] मारे और [वाराह और नृसिंहरूपसे ] महान् शूरवीर दितिके पुत्रों (हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु) का संहार किया, जिन्होंने वामनरूपसे ] बलिको बाँधा और [ परशुरामरूपसे सहलवाहुको मारा, वे ही [भगवान् ] पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये [रामरूपमें अवतीर्ण (प्रकट) हुए हैं। ॥४॥ तासु विरोध न कीजिभ नाथा। काल करम जिव जाके हाथा ॥ ५ ॥ हे नाथ ! उनका विरोध न कीजिये, जिनके हाथमें काल, कर्म और जीव सभी हैं ॥५॥ दो-रामहि सौपि जानकी नाइ कमल पद माथ । सुत कहुँ राज समर्पि धन जाइ भजिअ रघुनाथ ॥ ६ ॥ [श्रीरामजीके ] चरणकमलों में सिर नवाकर (उनकी शरणमें जाकर ) उनको जानकीजी सौंप दीजिये और आप पुत्रको राज्य देकर वनमें जाकर श्रीरघुनाथजीका भजन कीजिये ||६॥ दीनदयाल रघुराई । बाघउ सनमुख गएँ न खाई ॥ चाहिम करन सो सब करि बीते । तुम्ह सुर असुर चराचर जीते ॥ १ ॥ हे नाथ ! श्रीरघुनाथजी तो दीनोंपर दया करनेवाले हैं। सम्मुख ( शरण) जाने- पर तो वाघ भी नहीं खाता| आपको जो कुछ करना चाहिये था, वह सब आप कर चुके। आपने देवता, राक्षस तथा चर-अचर सभीको जीत लिया ॥१॥ संत कहहिं असि नीति दसानन । चौथपन जाइहि नृप कानन ॥ तासु भजनु कीजिम तह भर्ता । जो कर्ता पालक संहा ॥ २॥ हे दशमुख ! संतजन ऐसी नीति कहते हैं कि चौथेपन (बुढ़ापे ) में राजाको वनमें चला जाना चाहिये । हे स्वामी ! वहाँ (वनमें ) आप उनका भजन कीजिये, नो टिके रचनेवाले, पालनेवाले और संहार करनेवाले हैं ॥२॥ चौ०-नाथ ७४६ * रामचरितमानस * सोइ रघुबीर प्रनत अनुरागी । भजहु नाथ ममता सव त्यागी । मुनिबर जतनु करहिं जैहि लागी। भूप राजु तजि होहिं विरागी ॥ ३ ॥ हे नाथ ! आप विषयोंकी सारी ममता छोड़कर उन्हीं शरणागतपर प्रेम करनेवाले भगवान्का भजन कीजिये । जिनके लिये श्रेष्ठ मुनि साधन करते हैं और राजा राज्य छोड़कर वैरागी हो जाते हैं--||३|| सोइ कोसलाधीस रघुराया । आयउ करन तोहि पर दाया ॥ जौं पिय मानहु मोर सिखावन । सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन ॥ ४ ॥ वही कोसलाधीश श्रीरघुनाथजी आपपर दया करने आये हैं। हे प्रियतम ! यदि आप मेरी सीख मान लेंगे, तो आपका अत्यन्त पवित्र और सुन्दर यश तीनों लोकोंमें फैल जायगा ॥ ४ ॥ दो०-अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात । नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात ॥ ७॥ ऐसा कहकर, नेत्रोंमें [ करुणाका ] जल भरकर और पतिके चरण पकड़कर काँपते हुए शरीरसे मन्दोदरीने कहा-हे नाथ ! श्रीरघुनाथजीका भजन कीजिये, जिससे मेरा सुहाग अचल हो जाय ॥ ७ ॥ चौ० o-तब रावन मयसुता उठाई । कहै लाग खल निज प्रभुताई ॥ सुनु ते प्रिया वृथा भय माना । जग जोधा को मोहि समाना ॥ १ ॥ तब रावणने मन्दोदरीको उठाया और वह दुष्ट उससे अपनी प्रभुता कहने लगा-हे प्रिये ! सुन, तूने व्यर्थ ही भय मान रखा है। बता तो जगत्में मेरे समान योद्धा है कौन ? ॥१॥ बरुन कुबेर पवन जम काला । भुज बल जिते सकल दिगपाला॥ देव दनुज नर सब बस मोरें। कवन हेतु उपजा भय तोरें ॥ २॥ वरुण, कुबेर, पवन, यमराज आदि सभी दिक्पालोको तथा कालको भी मैंने अपनी भुजाओंके बलसे जीत रक्खा है । देवता, दानव और मनुष्य सभी मेरे वशमें हैं । फिर तुझको यह भय किस कारण उत्पन्न हो गया ? ॥ २॥ नाना विधि तेहि कहेसि बुझाई। सभाँ बहोरि बैठ सो जाई ॥ . मंदोदरी हृदय अस जाना। काल बस्य उपजा अभिमाना ॥ ३ ॥ मन्दोदरीने उसे बहुत तरहसे समझाकर कहा [किंतु रावणने उसकी एक भी बात न सुनी] और वह फिर सभामें जाकर बैठ गया । मन्दोदरीने हृदयमें ऐसा जान लिया कि कालके वश होनेसे पतिको अभिमान हो गया है ॥ ३ ॥ सभाँ आइ मंत्रिन्ह तेहिं बूझा । करब कवन बिधि रिपु से जूझा ॥ कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा । बार बार प्रभु पूलहु काहा ॥..... द
* लंकाकाण्ड
७४७
सभामें आकर उसने मन्त्रियोंसे पूछा कि शत्रुके साथ किस प्रकारसे युद्ध करना
होगा-१ मन्त्री कहने लगे हे राक्षसोंके नाथ ! हे प्रभु ! सुनिये, आप बार-बार क्या
पूछते हैं ? ॥ ४ ॥
कहहु कवन भय करिम विचारा । नर कपि भालु महार हमारा ॥ ५ ॥
कहिये तो [ ऐसा ] कौन-सा बड़ा भय है, जिसका विचार किया जाय ? (भयकी
बात ही क्या है ? ) मनुष्य और वानर-भालू तो हमारे भोजन [ की सामग्री ] हैं ॥५॥
दो-सव के वचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि ।
नीति विरोध न करिअ प्रभु मंत्रिन्ह मति अति थोरि ॥८॥
कानोंसे सबके वचन सुनकर [ रावणका पुत्र ] प्रहस्त हाथ जोड़कर कहने लगा-
हे प्रभु ! नीतिके विरुद्ध कुछ भीनहीं करना चाहिये, मन्त्रियों में बहुत ही थोड़ी बुद्धि है॥८॥
चौ०-कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती । नाथ न पूर आव एहि भाँती ॥
वारिधि नाघि एक कपि आवा । तासु चरित मन महुँ सबु गावा ॥ १ ॥
ये सभी मूर्ख (खुशामदी) मन्त्री ठकुरसुहाती (मुँहदेखी) कह रहे हैं । हे
नाथ ! इस प्रकारकी बातोंसे पूरा नहीं पड़ेगा। एक ही बंदर समुद्र लाँधकर आया
था । उसका चरित्र सब लोग अब भी मन-ही-मन गाया करते हैं ( स्मरण किया
करते हैं)! ॥ १॥
छुधा न रही तुम्हहि तब काहू । जारत नगरु कस न धरि खाहू ॥
सुनत नोक आगें दुख पावा । सचिवन असमत प्रभुहि सुनावा ॥ २ ॥
उस समय तुमलोगोंमेंसे किसीको भूख न थी ? [ बंदर तो तुम्हारा भोजन ही
है, फिर ] नगर जलाते समय उसे पकड़कर क्यों नहीं खा लिया ? इन मन्त्रियोंने
स्वामी (आप) को ऐसी सम्मति सुनायी है जो सुनने में अच्छी है, पर जिससे आगे
चलकर दुःख पाना होगा। २॥
जेहिं बारीस बँधायउ हेला । उतरेड सेन समेत सुबेला ।।
सो भनु मनुज खान हम भाई । बचन कहहिं सब गाल फुलाई ॥३॥
जिसने खेल-ही-खेलमें समुद्र बँधा लिया और जो सेनासहित सुबेल पर्वतपर आ
उतरा । हे भाई 1 कहो वह मनुष्य है, जिसे कहते हो कि हम खा लेंगे १ सब गाल
फुला-फुलाकर ( पागलोंकी तरह ) वचन कह रहे हैं ! |॥३॥
तात बचन मम सुनु अति आदर । जनि मन गुनहु मोहि करि कादर ॥
प्रिय वानी जे सुनहिं जे कहहीं। ऐसे नर निकाय जग अहहीं ॥ ४ ॥
हे तात ! मेरे वचनोंको बहुत आदरसे (बड़े गौरसे) सुनिये । मुझे मनमें
कायर न समझ लीजियेगा ! जगत्में ऐसे मनुष्य झुंड-के-झुंड ( बहुत अधिक ) हैं, जो
प्यारी (मुँहपर मीठी लगनेवाली) वात ही सुनते और कहते हैं ॥ ४॥
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* रामचरितमानस *
बचन परम हित सुनत कठोरे। सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु योरे ॥
प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती । सीता देइ करहु पुनि प्रीती ॥ ५ ॥
हे प्रभो ! सुननेमें कठोर परंतु [ परिणाममें ] परम हितकारी वचन जो सुनते
और कहते हैं, वे मनुष्य बहुत ही थोड़े हैं । नीति सुनिये, [ उसके अनुसार ] पहले दूत
भेजिये और [ फिर ] सीताको देकर श्रीरामजीसे प्रीति ( मेल) कर लीजिये ॥ ५ ॥
दो-नारि पाइ फिरि जाहिं जौ तौ न यढ़ाइअ रारि ।
नाहि त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि ॥ ९ ॥
यदि वे स्त्री पाकर लौट जाय, तब तो [ व्यर्थ ] झगड़ा न बढ़ाइये। नहीं तो (यदि
न फिरें तो) हे तात! सम्मुख युद्ध-भूमिमें उनसे हठपूर्वक (डटकर)मार-काट कीजिये ॥९॥
चौ०
o-यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा । उभय प्रकार सुजसु जग तोरा ।।
सुत सन कह दसकंठ रिसाई । असि मति सठ केहि सोहि सिखाई ॥१॥
हे प्रभो! यदि आप मेरी यह सम्मति मानेंगे, तो जगत्में दोनों ही प्रकारसे आपका
सुयश होगा | रावणने गुस्सेमें भरकर पुत्रसे कहा-अरे मूर्ख ! तुझे ऐसी बुद्धि किसने
सिखायी ? ॥ १॥
अबही ते उर संसय होई । बेनुमूल सुत भयहु घमोई ।।
सुनि पितु गिरा परुष अति थोरा । चला भवन कहि बचन कठोरा ॥ २ ॥
अभीसे हृदयमें सन्देह (भय ) हो रहा है ? हे पुत्र ! तू तो बाँसकी जड़में
घमोई हुआ (तू मेरे वंशके अनुकूल या अनुरूप नहीं हुआ)। पिताकी अत्यन्त धोर
और कठोर वाणी सुनकर प्रहस्त ये कड़े वचन कहता हुआ घरको चला गया ॥२॥
हित मत तोहि न लागत केसे । काल विवस कहुँ भेषज जैसें ॥
संध्या समय जानि दससीसा । भवन चलेउ निरखत भुज बीसा ॥ ३ ॥
हितकी सलाह आपको कैसे नहीं लगती (आपपर कैसे असर नहीं करती)
जैसे
मृत्युके वश हुए [ रोगी ] को दवा नहीं लगती। सन्ध्याका समय जानकर रावण अपनी
बीसों भुजाओंको देखता हुआ महलको चला ॥ ३ ॥
लंका सिखर उपर भागारा । अति बिचित्र तह होइ अखारा ॥
बैठ जाइ तेहिं मंदिर रावन । लागे किंनर गुन गन गावन ॥ ४ ॥
लङ्काकी चोटीपर एक अत्यन्त विचित्र महल था । वहाँ नाच-गानका अखाड़ा
जमता था । रावण उस महलमें जाकर बैठ गया।किन्नर उसके गुण-समूहोंको गाने लगे ॥४॥
वाजहिं ताल पसाउज वीना । नृत्य करहिं अपछरा प्रवीना ॥ ५ ॥
ताल ( करताल ), पखावज ( मृदंग) और वीणा बज रहे हैं । नृत्यमें प्रवीण
अप्सराएँ नाच रही है ॥ ५॥
* लंकाकाण्ड दो०-सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास। परम प्रवल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास ॥१०॥ वह निरन्तर सैकड़ों इन्द्रोंके समान भोग-विलास करता रहता है । यद्यपि [श्री- रामजी-सरीखा ] अत्यन्त प्रबल शत्रु सिरपर है, फिर भी उसको न तो चिन्ता है और न डर ही है ॥१०॥ चौ०-यहाँ सुबेल सैल रघुबीरा । उतरे सेन सहित अति भीरा ॥ सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुन बिसेषी ॥ १ ॥ यहाँ श्रीरघुवीर सुबेलपर्वतपर सेनाकी बड़ी भीड़ ( बड़े समूह ) के साथ उतरे । पर्वतका एक बहुत ऊँचा, परम रमणीय, समतल और विशेषरूपसे उज्ज्वल शिखर देखकर-॥१॥ तह तह किसलय सुमन सुहाए । लछिमन रचि निज हाथ ढसाए । ता पर रुचिर मृदुल मृगछाला । तेहिं आसन आसीन कृपाला ॥२॥ वहाँ लक्ष्मणजीने वृक्षोंके कोमल पत्ते और सुन्दर फूल अपने हाथोंसे सजाकर बिछा दिये । उसपर सुन्दर और कोमल मृगछाला बिछा दी। उसी आसनपर कृपालु श्रीरामजी विराजमान थे॥२॥ प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा । बाम दहिन दिसि चाप निषंगा ॥ दुहुँ कर कमल सुधारत बाना । कह लंकेस मंत्र लगि काना ॥ ३ ॥ प्रभु श्रीरामजी वानरराज सुग्रीवकी गोदमें अपना सिर रखे हैं। उनके बायीं ओर धनुष तथा दाहिनी ओर तरकस [ रक्खा ] है । वे अपने दोनों कर-कमलों से बाण सुधार रहे हैं, विभीषणजी कानोंसे लगकर सलाह कर रहे हैं ॥३॥ बड़भागी अंगद हनुमाना । चरन कमल चापत बिधि नाना ॥ प्रभु पाछे लछिमन बीरासन । कटि निषंग कर बान सरासन ॥ ४ ॥ परम भाग्यशाली अंगद और हनुमान अनेकों प्रकारसे प्रमुके चरणकमलोंको दबा रहे हैं । लक्ष्मणजी कमरमें तरकस कसे और हाथोंमें धनुष-बाण लिये वीरासनसे प्रभुके पीछे सुशोभित हैं ॥ ४ ॥ दो-पहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन । धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन ॥११(क)। इस प्रकार कृपा, रूप ( सौन्दर्य ) और गुणोंके धाम श्रीरामजी विराजमान हैं। वे मनुष्य धन्य हैं, जो सदा इस ध्यानमें लौ लगाये रहते हैं ॥ ११ (क)॥ पूरब दिसा विलोकि प्रभु देखा उदित मयंक । कहत सवहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक ॥११(ख)॥ पूर्व विशाकी ओर देखकर प्रभु श्रीराम ने चन्द्रमाको उदय हुआ देखा । तब वे , -- ७५० * रामचरितमानस सबसे कहने लगे-चन्द्रमाको तो देखो । कैसा सिंहके समान निडर है ! ॥ ११ (ख)॥ चौ०-पूरव दिसि गिरिगुहा निवासी । परम प्रताप तेज बल रासी ॥ मत्त , नाग तम, कुंभ बिदारी । ससि केसरी गगन वन, चारी ॥ १ ॥ पूर्व दिशारूपी पर्वतकी गुफामें रहनेवाला, अत्यन्त प्रताप, तेज और बलकी राशि यह चन्द्रमारूपी सिंह अन्धकाररूपी मतवाले हाथीके मस्तकको विदीर्ण करके आकाशरूपी वनमें निर्भय विचर रहा है ॥ १॥ बिथुरे नभ मुकुताहल तारा । निसि सुंदरी केर सिंगारा ॥ कह प्रभु ससि महुँ मैचकताई । कहहु काह निज निज मति भाई ॥ २ ॥ आकाशमें बिखरे हुए तारे मोतियों के समान हैं, जो रात्रिरूपी सुन्दर स्त्रीके शृङ्गार हैं। प्रभुने कहा-भाइयो ! चन्द्रमामें जो कालापन है, वह क्या है ? अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार कहो ॥ २॥ कह सुग्रीव सुनहु रघुराई । ससि महुँ प्रगट भूमि के झाँई ॥ मारेउ राहु ससिहि कह कोई । उर महँ परी स्यामता सोई ॥ ३ ॥ सुग्रीवने कहा-हे रघुनाथजी! सुनिये । चन्द्रमा पृथ्वीकी छाया दिखायी दे रही है। किसीने कहा-चन्द्रमाको राहुने मारा था । वही [चोटका ] काला दाग' हृदयपर पड़ा हुआ है ॥ ३॥ कोउ कह जब विधि रति मुख कीन्हा । सार भाग ससि कर हरि लीन्हा॥ छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं । तेहि मग देखिअ नभ परिचाहीं ॥ ४ ॥ कोई कहता है-जब ब्रह्माने [ कामदेवकी स्त्री रतिका मुख बनाया, तब उसने चन्द्रमाका सार भाग निकाल लिया [ जिससे रतिका मुख तो परम सुन्दर बन गया, परंतु चन्द्रमाके हृदयमें छेद हो गया ] ! वही छेद चन्द्रमाके हृदयमें वर्तमान है, जिसकी राहसे आकाशकी काली छाया उसमें दिखायी पड़ती है ॥ ४ ॥ प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा । अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा ॥ बिष संजुत कर निकर पसारी । जारत बिरहवंत नर नारी ॥ ५ ॥ प्रभु श्रीरामजीने कहा-विप चन्द्रमाका बहुत प्यारा भाई है। इसीसे. उसने. विपको अपने हृदयमें स्थान दे रक्खा है। विषयुक्त अपने किरणसमूहको फैलाकर.वह वियोगी नर-नारियोंको जलाता रहता है ॥ ५ ॥ दो-कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हार प्रिय दास। - तव मूरति विधु उर वसति सोइ स्यामता अभास ॥१२(क)॥ हनुमान्जीने कहा-हे प्रभो ! सुनिये, चन्द्रमा आपका प्रिय दास है। आपकी सुन्दर श्याम मूर्ति चन्द्रमाके हृदयमें बसती है। वही श्यामताको झलक चन्द्रमामें है ।। १२ (क)। नवाह्नपारायण, सातवाँ विश्राम .. * लंकाकाण्ड पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान । दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान ॥ १२ (ख)॥ पवनपुत्र हनुमानजीके वचन सुनकर सुजान श्रीरामजी हँसे । फिर दक्षिणकी ओर देखकर कृपानिधान प्रभु बोले-|| १२ (ख)॥ चौ०-देखु बिभीषन दच्छिन आसा । धन घमंड दामिनी बिलासा ॥ मधुर मधुर गरजइ धन घोरा । होइ बृष्टि जनि उपल कोरा ॥ १ ॥ हे विभीषण ! दक्षिण दिशाकी ओर देखो, बादल कैसा घुमड़ रहा है और बिजली चमक रही है। भयानक बादल मीठे-मीठे ( हल्के-हल्के ) स्वरसे गरज रहा है । कहीं कठोर ओलोकी वर्षा न हो ॥ १॥ कहत बिभीषन सुनहु कृपाला । होइन तड़ित न बारिद माला । लंका सिखर उपर आगारा । तह दसकंधर देख अखारा ॥ २ ॥ विभीषण बोले-हे कृपालु ! सुनिये, यह न तो बिजली है, न बादलोंकी घटा । लङ्काकी चोटीपर एक महल है । दशग्रीव रावण वहाँ [ नाच-गानका ] अखाड़ा देख रहा है ।॥ २॥ मेघडंबर सिर धारी । सोइ जनु जलद घटा अति कारी ॥ मंदोदरी ताटका । सोइ प्रभु जनु दामिनी दमका ।। ३ ॥ रावणने सिरपर मेघडंबर (बादलोंके डंबर-जैसा विशाल और काला ) छत्र धारण कर रक्खा है । वही मानो बादलोंकी अत्यन्त काली घटा है। मन्दोदरीके कानोंमें जो कर्णफूल हिल रहे हैं, हे प्रभो ! वही मानो बिजली चमक रही है ॥ ३ ॥ बाजहिं ताल मृदंग अनूपा । सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा ॥ प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना । चाप बदाइ बान संधाना ॥४॥ हे देवताओंके सम्राट ! सुनिये, अनुपम ताल और मृदंग बज रहे हैं । वही मधुर [गर्जन ] ध्वनि है । रावणका अभिमान समझकर प्रभु मुसकराये। उन्होंने धनुष चढ़ाकर उसपर बाणका सन्धान किया ॥ ४ ॥ दो०-छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं वान । सव के देखत महि परे .मरमु न कोऊ जान ॥ १३(क)॥ और एक ही बाणसे [ रावणके ] छत्र-मुकुट और [ मन्दोदरीके ] कर्णफूल काट गिराये। सबके देखते-देखते वे जमीनपर आ पड़े, पर इसका भेद (कारण) किसीने नहीं जाना ॥ १३ (क)॥ अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग। रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग ॥१३(ख)। ऐसा चमत्कार करके श्रीरामजीका वाण [वापस] आकर[फिर] तरकसमें जा घुसा। श्रवन .
७५३ * रामचरितमानस यह महान् रस-भंग (रंगमें मंग) देखकर रावणकी सारी सभा भयभीत हो गयी॥१३ (ख)॥ चौ०-कंप न भूमि न मस्त बिसेषा । अस्त्र सत्र कछु नयन न देखा ॥ सोचहिं सब निज हृदय मझारी । असगुन भयउ भयंकर भारी ॥१॥ न भूकम्प हुआ, न बहुत जोरकी हवा (आँधी) चली । न कोई अस्त्र-शस्त्र ही नेत्रोंसे देखे । [ फिर ये छत्र, मुकुट और कर्णफूल कैसे कटकर गिर पड़े ?] सभी अपने- अपने हृदयमें सोच रहे हैं कि यह बड़ा भयंकर अपशकुन हुआ ॥१॥ दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि वचन कह जुगुति बनाई ॥ सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही ॥ २ ॥ सभाको भयभीत देखकर रावणने हँसकर युक्ति रचकर ये वचन कहे-सिरोंका गिरना भी जिसके लिये निरन्तर शुभ होता रहा है, उसके लिये मुकुटका गिरना अपशकुन कैसा १ ॥२॥ सयन करहु निज निज गृह जाई । गवने भवन सकल सिर नाई॥ मंदोदरी सोच उर बसेऊ । जब ते श्रवनपुर महि खसेऊ॥ ३ ॥ अपने-अपने घर जाकर सो रहो [डरनेकी कोई बात नहीं है। तब सब लोग सिर नवाकर घर गये । जबसे कर्णफूल पृथ्वीपर गिरा, तबसे मन्दोदरीके हृदयमें सोच बस गया ॥३॥ सजल नयन कह जुग कर जोरी । सुनहु प्रानपति बिनती मोरी ॥ कंत राम बिरोध परिहरहू । जानि मनुज जनि हठ मन धरहू ॥ ४ ॥ नेत्रोंमें जल भरकर, दोनों हाथ जोड़कर वह [ रावणसे ] कहने लगी है प्राणनाथ ! मेरी विनती सुनिये । हे प्रियतम ! श्रीरामसे विरोध छोड़ दीजिये। उन्हें मनुष्य जानकर मनमें हठ न पकड़े रहिये ॥४॥ दो-विखरूप रघुवंस मनि करहु वचन बिखासु । लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु ॥१४॥ मेरे इन वचनोंपर विश्वास कीजिये कि वे रघुकुलके शिरोमणि श्रीरामचन्द्रजी विश्वरूप हैं—( यह सारा विश्व उन्हींका रूप है। ) वेद जिनके अङ्ग अङ्गमें लोकोंकी कल्पना करते हैं ॥ १४ ॥ चौ०-पद पाताल सीस अज धामा । अपर लोक अंग अंग विश्रामा । भृकुटि बिलास भयंकर काला । नयन दिवाकर कच धन माला ॥ १ ॥ पाताल [जिन विश्वरूप भगवान्का ] चरण है, ब्रह्मलोक सिर है, अन्य (बीचके सब) लोकोंका विश्राम (स्थिति ) जिनके अन्य भिन्न-भिन्न अङ्गोंपर है। भयंकर काल जिनका भूकुटि-संचालन (भौंहोंका चलना) है । सूर्य नेत्र है, बादलोंका समूह बाल है॥१॥ जासु अखिनीकुमारा । निसि अरु दिवस निमेष अपारा ॥ श्रवन दिसा दस बेद नस्त्रानी । भारत स्वास निगम निज बानी ॥२॥ घ्रान . । * लंकाकाण्ड * अश्विनीकुमार जिनकी नासिका है। रात और दिन जिनके अपार निमेष ( पलक मारना और खोलना) हैं। दसों दिशाएँ कान हैं, वेद ऐसा कहते हैं । वायु श्वास है और बेद जिनकी अपनी वाणी है ॥२॥ अधर लोभ जम दसन कराला । माया हास बाहु दिगपाला ॥ आनन अनल अंबुपति जीहा । उतपति पालन प्रलय समोहा ॥ ३ ॥ लोभ जिनका अधर (होठ ) है, यमराज भयानक दाँत है । माया हँसी है, दिक्पाल भुजाएँ हैं । अग्नि मुख है, वरुण जीभ है, उत्पत्ति पालन और प्रलय जिनकी चेष्टा ( क्रिया) है ॥३॥ रोम राजि अष्टादस भारा । अस्थि सैल सरिता नस जारा । उदर उदधि अधगो जातना । जगमय प्रभु का बहु कलपना ॥ ४ ॥ अठारह प्रकारकी असंख्य वनस्पतियाँ जिनकी रोमावली हैं, पर्वत अस्थियाँ हैं। नदियाँ नोंका जाल है, समुद्र पेट है और नरक जिनकी नीचेकी इन्द्रियाँ हैं। इस प्रकार प्रभु विश्वमय है, अधिक कल्पना (ऊहापोह ) क्या की जाय ? ॥ ४ ॥ दो-अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान । मनुज वास सचराचर भगवान ॥१५(क)॥ शिव जिनका अहंकार हैं, ब्रह्मा बुद्धि हैं, चन्द्रमा मन हैं और महान् (विष्णु) ही चिच हैं। उन्हीं चराचररूप भगवान् श्रीरामजीने मनुष्यरूपमें निवास किया है ।। १५(क)। अस विचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन वयरु विहाइ । प्रीति करहु रघुवीर पद मम अहिवात न जाइ ॥१५(ख)। हे प्राणपति ! सुनिये, ऐसा विचारकर प्रभुसे वैर छोड़कर श्रीरघुवीरके चरणों में प्रेम कीजिये, जिससे मेरा सुहाग न जाय ॥ १५ (ख)॥ चौ०-बिहसा नारि वचन सुनि काना । अहो मोह महिमा बलवाना ॥ नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं ॥ १ ॥ पत्नीके वचन कानोंसे सुनकर रावण खूप हँसा और बोला- अहो ! मोह (अशान) की महिमा बड़ी बलवान् है । स्त्रीका खभाव सब सत्य ही कहते है कि उसके हृदयमें आठ अवगुण सदा रहते हैं-॥१॥ साहस अनृत चपलता माया । भय अविवेक असौच अदाया । रिपु कर रूप सकल से गावा । अति बिसाल भय मोहि सुनावा ॥ २ ॥ साहस, झूठ, चञ्चलता माया (छल ), भय (उरपोकपन), अविवेक ( मूर्खता), अपवित्रता और निर्दयता । तूने शत्रुका समग्र (विराट् ) रूप गाया और मुझे उसका बड़ा भारी भय सुनाया ॥२॥ रा० स०४८- ७५४ * रामचरितमानस सो सब प्रिया सहज वस मोरें । समुझि परा प्रसाद अब तोरें । जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई । एहि विधि कहहु मोरि प्रभुताई ॥ ३ ॥ है प्रिये ! वह सब ( यह चराचर विश्व तो) स्वभावसे ही मेरे वशमें है । तेरी कपासे मुझे यह अब समझ पड़ा । हे प्रिये ! तेरी चतुराई में जान गया। तू इस प्रकार (इसी बहाने ) मेरी प्रभुताका बखान कर रही है ॥ ३ ॥ तव वतकही गूढ मृगलोचनि । समुझतसुखद सुनत भय मोचनि ।। मंदोदरि मन महुँ अस ठयऊ । पियहि फालयस मतिभ्रम भयक ॥ ४ ॥ हे मृगनयनी! तेरी बातें बड़ी गूढ़ (रहस्यभरी) है, समझनेपर सुख देनेवाली और सुननेसे भय छुड़ानेवाली हैं । मन्दोदरीने मनमें ऐसा निश्चय कर लिया कि पतिको कालवश मतिभ्रम हो गया है ।। ४ ।। दो-एहि विधि करत विनोद वहु प्रात प्रगट दसकंध । सहज असंक लंकपति सभाँ गयट मद अंध ॥१६(क)। इस प्रकार [अज्ञानवश ] बहुत-से विनोद करते हुए रावणको तवेरा हो गया। तब स्वभावसे ही निडर और घमंडमें अंधा लङ्कापति सभामें गया ॥ १६ (क)| सो०-फूलइ फरइ न वेत जदपि सुधा वरपहिं जलद । मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं विरंचि सम ॥ १६(ख)॥ यद्यपि बादल अमृत-सा जल बरसाते हैं, तो भी वेत फूलता-फलता नहीं । इत्ती प्रकार चाहे ब्रह्माके समान भी ज्ञानी गुरु मिलें, तो भी मूर्खके हृदयमें चेत ( ज्ञान) नहीं होता ॥ १६ (ख)॥ चौ०-इहाँ प्रात जागे घुराई । पूटा मत सब सचिव योलाई ॥ कहहु वैगि का करिअ उपाई । जामवंत कह पद सिरु नाई ॥ १ ॥ यहाँ (सुवेल पर्वतपर ) प्रातःकाल श्रीरघुनाथजी जागे और उन्होंने सब मन्त्रियों को बुलाकर सलाह पूछी कि शीघ्र बताइये, अब क्या उपाय करना चाहिये ? जाम्यवान्ने श्रीरामजीके चरणों में सिर नवाकर कहा- १ ॥ सुनु सर्वग्य सकल उर वासी । बुधि बल तेज धर्म गुन रासी ॥ मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा । दूत पठाइ बालिकुमारा ॥ २॥ हे सर्वज्ञ ( सब कुछ जाननेवाले) ! हे सबके हृदयमें बसनेवाले ( अन्तयांमी)! है वुद्धि, वल, तेज, धर्म और गुणोंकी राशि ! सुनिये । मैं अपनी बुद्धि के अनुसार सलाह देता हूँ कि बालिकुमार अंगदको दूत बनाकर मेजा जाय ॥ २ ॥ नीक मंत्र सव के मन माना । अंगद सन कह कृपानिधाना ।। बालितनय बुधि वल गुन धामा । लंका जाहु तात मम कामा ॥ ३ ॥ यह अच्छी सलाह सबके मनमें ऊँच गयी । कृपाके निधान श्रीरामजीने अंगदते .
* लंकाकाण्ड * ७५५' कहा-हे बल, बुद्धि और गुणोंके धाम बालिपुत्र ! हे तात ! तुम मेरे कामके लिये लङ्का जाओ ।।३॥ बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ । परम चतुर मैं जानत अहऊँ । काजु हमार तासु हित होई । रिपु सन करेहु बतकही सोई ॥ ४ ॥ तुमको बहुत समझाकर क्या कहूँ ? मैं जानता हूँ, तुम परम चतुर हो । शत्रुसे वही बातचीत करना, जिससे हमारा काम हो और उसका कल्याण हो ॥ ४ ॥ सो०--प्रभु अग्या धरि सीस चरन यदि अंगद उठेउ । सोई गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु ॥१७(क)॥ प्रभुको आशा सिर चढ़ाकर और उनके चरणोंकी वन्दना करके अंगदजी उठे [और बोले- हे भगवान् श्रीरामजी ! आप जिसपर कृपा करें, वही गुणोंका समुद्र हो जाता है ।। १७ (क)॥ खयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियड । अस विचारि जुवराज तन पुलकित हरषित हियउ ॥१७(ख)। खामीके सब कार्य अपने-आप सिद्ध हैं, यह तो प्रभुने मुझको आदर दिया है [जो मुझे अपने कार्य पर भेज रहे हैं ] | ऐसा विचारकर युवराज अंगदका हृदय हर्षित और शरीर पुलकित हो गया ॥ १७ (ख) ॥ चौ०-बंदि चरन उर धरि प्रभुताई । अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई ॥ प्रभु प्रताप उर सहज असंका । रन बाँकुरा बालिसुत बंका ॥ १ ॥ चरणोंकी वन्दना करके और भगवान्की प्रभुता हृदयमें धरकर अंगद सबको सिर नवाकर चले । प्रभुके प्रतापको हृदयमै धारण किये हुए रणबांकुरे वीर बालिपुत्र स्वाभाविक ही निर्मय हैं ॥१॥ पुर पैठत रावन बेटा । खेलत रहा सो होइ गै भेटा ॥ बातहिं बात करष बढ़ि आई । झुगल अतुल बल पुनि तरुनाई ॥ २ ॥ लडामें प्रवेश करते ही रावणके पुत्रसे भेंट हो गयी, जो वहाँ खेल रहा था। बातों-ही-बातोंमें दोनोंमें झगड़ा बढ़ गया क्योंकि ] दोनों ही अतुलनीय बलवान् थे और फिर दोनोंकी युवावस्था थी ॥२॥ तेहिं अंगद कहुँ लात उठाई। गहि पद पटकेड भूमि भवाँई॥ निसिचर निकर देखि भट भारी । जहँ तह चले न सकहिं पुकारी ॥ ३ ॥ उसने अंगदपर लात उठायी । अंगदने [वही] पैर पकड़कर उसे घुमाकर अमीनपर दे पटका (मार गिराया)। राक्षसके समूह भारी योद्धा देखकर जहाँ-तहाँ [ भाग चले, वे डरके मारे पुकार भी न मचा सके ॥ ३॥ कर . ७५६ * रामचरितमानस एक एक सन मरमु न कहहीं । समुझि तासु वध चुप करि रहहीं॥ भयउ फोलाहल नगर मझारी । आवा फपि लंका जेहिं जारी॥ ४ ॥ एक दूसरेको मर्म (असली बात ) नहीं बतलाते, उस ( रावणके पुत्र ) का वध समझकर सब चुप मारकर रह जाते हैं। [रावणपुत्रकी मृत्यु जानकर और राक्षसोको भयके मारे भागते देखकर ] नगरभरमें कोलाहल मच गया कि जिसने लया जलायी थी, वही वानर फिर आ गया है ॥ ४ ॥ अब धौ कहा करिहि करतारा । अति समीत सब करहिं विचारा॥ विनु पूछे मगु देहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोइ लाइ सुखाई ॥ ५ ॥ सब अत्यन्त भयभीत होकर विचार करने लगे कि विधाता अब न जाने क्या करेगा । वे विना पूछे ही अंगदको [ रावणके दरवारकी ] राह यता देते हैं । जिसे ही वे देखते हैं, वही डरके मारे सूख जाता है ॥५॥ दो०-गयउ सभा दरवार तब सुमिरि राम पद कंज। सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज ॥ १८ ॥ श्रीरामजीके चरणकमलोंका स्मरण करके अंगद रावणको सभाके द्वारपर गये। और वे धीर, वीर और बलकी राशि अंगद सिंहकी-सी ऐंड (शान) से इधर-उधर देखने लगे।॥ १८॥ चौ०-तुरत निसाचर एक पठावा । समाचार रावनहि सुनत बिहँसि बोला इससीसा । आनहु बोलि कहाँ कर कोसा ॥ १ ॥ तुरंत ही उन्होंने एक राक्षसको भेजा और रावणको अपने आनेका समाचार सूचित किया । सुनते ही रावण हँसकर बोला-बुला लाओ, [ देखें ] कहाँका वंदर है ॥ १ ॥ आयसु पाइ दूत बहु धाए । कपिकुंजरहि बोलि ले आए ॥ अंगद दीख दसानन वैसें । सहित प्रान फज्जलगिरि जैसे ॥ २ ॥ आज्ञा पाकर बहुत-से दूत दौड़े और वानरोंमें हाथीके समान अंगदको बुला लाये । अंगदने रावणको ऐसे बैठे हुए देखा जैते कोई प्राणयुक्त (सजीव ) काजल्का पहाड़ हो! ॥२॥ भुला बिटप सिर संग समाना । रोमावली लता जनु नाना । मुख नासिका नयन अरु माना । गिरि कंदरा खोह अनुमाना ॥ ३ ॥ भुजाएँ वृोंके और सिर पर्वतोंके शिखरोंके समान हैं। रोमावली मानो बहुत-सी लताएँ हैं। मुंह, नाक, नेत्र और कान-पर्वतकी कन्दराओं और खोहोंके बराबर हैं ॥३॥ गयउ समाँ मन नेकन मुरा । बालितनय अतिबल बाँकुरा ॥ उठे सभासद कपि कहुँ देखी । रावन उर भा क्रोध विसपी॥ ४ ॥ अत्यन्त बलवान् बाँके वीर बालिपुत्र अंगद सभामें गये, वे मनमें जरा भी नहीं जनावा॥
जूथ महुँ । * लंकाकाण्ड * झिझके । अंगदको देखते ही सब सभासद् उठ खड़े हुए। यह देखकर रावणके हृदयमें बड़ा क्रोध हुआ ॥ ४ ॥ दो०-जथा मत्त गज पंचानन चलि जाइ। राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ ॥ १९ ॥ जैसे मतवाले हाथियोंके झुंडमें सिंह [ निःशंक होकर चला जाता है, वैसे ही श्रीरामजीके प्रतापका हृदयमें स्मरण करके वे [निर्भय ] सभामें सिर नवाकर बैठ गये ॥ १९ ॥ चौ०-कह दसकंठ फवन ते बंदर । मैं रघुवीर दूत दूत दसकंधर ॥ मम जनफहि तोहि रही मिताई । तव हित फारन आयउँ भाई ॥ १ ॥ रावणने कहा-अरे बंदर ! तू कौन है ? [ अंगदने कहा-] हे दशग्रीव ! मैं श्रीरघुवीरका दूत हूँ। मेरे पितासे और तुमसे मित्रता थी । इसलिये हे भाई ! मैं तुम्हारी भलाईके लिये ही आया हूँ ॥१॥ उत्तम कुल पुलस्ति फर नाती । सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती ॥ - बर पायहु कीन्हेहु सब काजा । जीतेहु लोकपाल सब राजा ॥ २॥ तुम्हारा उत्तम कुल है, पुलस्त्य ऋषिके तुम पौत्र हो । शिवजीकी और ब्रह्माजीकी मने बहुत प्रकारसे पूजा की है । उनसे वर पाये हैं और सब काम सिद्ध किये हैं। शेकपालों और सब राजाओंको तुमने जीत लिया है ।॥ २॥ नृप अभिमान मोह बस किंवा । हरि आनिहु सीता जगदंबा । अव सुभ कहा सुनहु तुम्ह भोरा । सब अपराध मिहि प्रभु तोरा ॥ ३ ॥ राजमदसे या मोहवश तुम जगजननी सीताजीको हर लाये हो । अब, तुम मेरे शुभ वचन ( मेरी हितभरी सलाह ) सुनो । ( उसके अनुसार चलनेसे ) प्रभु श्रीरामजी तुम्हारे सब अपराध क्षमा कर देंगे ।। ३ ।। दसन गहहु तन कंठ कुठारी । परिजन सहित संग निज नारी ॥ सादर जनकसुता फरि आगें । एहि विधि चलहु सकल भय त्यागें ॥४॥ दाँतोंमें तिनका दबाओ, गलेमें कुल्हाड़ी डालो और कुटुम्बियोंसहित अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर आदरपूर्वक जानकीजीको आगे करके, इस प्रकार सब भय छोड़कर चलो-॥४॥ दो-प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि । आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि ॥ २०॥ और हे शरणागतके पालन करनेवाले रघुवंशशिरोमणि श्रीरामजी ! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये । [इस प्रकार आर्त प्रार्थना करो । ] आर्त पुकार सुनते ही 'प्रभु तुमको निर्भय कर देंगे ॥२०॥ ।
* रामचरितमानस *
चौ०-रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी।
कहु निज नाम जनक कर भाई । केहि नाते मानिऐ मिताई ॥ १ ॥
[ रावणने कहा-] अरे वंदरके बच्चे ! सँभालकर बोल ! मूर्ख ! मुझ देवताओं
शत्रुको तूने जाना नहीं ? अरे भाई ! अपना और अपने बापका नाम तो वता । किर
नातेसे मित्रता मानता है ? ॥१॥
अंगद नाम बालि कर बेटा । तासौ कबहुँ भई ही भेटा ॥
अंगद बचन सुनत सकुचाना । रहा बालि वानर मैं जाना ॥ २ ॥
[अंगदने कहा-] मेरा नाम अंगद है, मैं बालिका पुत्र हूँ। उनसे कभ
तुम्हारी मेंट हुई थी ? अंगदका वचन सुनते ही रावण कुछ सकुचा गया [ और बोला-
हाँ, मैं जान गया ( मुझे याद आ गया ), बालि नामका एक वंदर था ॥२॥
अंगद तहीं बालि कर बालक । उपजेहु बंस अनल कुल घालक ।
गर्भ न गयहु व्यर्थ तुम्ह जायहु । निज मुख तापस दूत कहायहु ॥ ३ ॥
अरे अंगद ! त् ही वालिका लड़का है ? अरे कुलनाशक ! तू तो अपने कुलरू
बाँसके लिये अग्निल्प ही पैदा हुआ! गर्ममें ही क्यों न नष्ट हो गया ? तू व्यर्थ ही पैद
हुआ, जो अपने ही मुँहसे तपस्वियोंका दूत कहलाया ! ॥ ३ ॥
अब कहु कुसल वालि कहँ अहई । विहसि वचन तव अंगद कहई ।
दिन दस गएँ वालि पहिं जाई। बूझेहु कुसल सखा उर लाई ॥ ४ ॥
अत्र वालिकी कुशल तो बता, वह [आजकल ] कहाँ है ? तब अंगदने हँसक
कहा-दस (कुछ ) दिन बीतनेपर [खयं ही ] वालिके पास जाकर, अपने मित्र
हृदयसे लगाकर, उसीसे कुशल पूछ लेना ॥४॥
राम विरोध कुसल जति होई । सो सव तोहि सुनाइहि सोई॥
सुनु सठ भेद होइ मन ताकें । श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाकें ॥ ५ ॥
श्रीरामजीते विरोध करनेपर जैसी कुशल होती है, वह सब तुमको वे तुनावेंगे
हे मूर्ख ! सुन, भेद उसीके मनमें पड़ सकता है, ( मेदनीति उत्तीपर अपना प्रभार
डाल सकती है ) जिसके हृदयमें श्रीरघुवीर न हों ।। ५ ॥
दो-हम कुल बालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस ।
अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव वीस ॥ २१ ॥
सच है, मैं तो कुलका नाश करनेवाला हूँ और हे रावण ! तुम कुलके रहर
हो ! अंधे-बहरे भी ऐसी बात नहीं कहते, तुम्हारे तो वीस नेत्र और वीस कान हैं ! ॥२१॥
चौ०-सिव विरंचि सुर मुनि समुदाई । चाहत जासु चरन सेवकाई ॥
तासु दूत होइ हम कुल वोरा । अइसिहुँ मति उर विहर न तोरा.॥ १ ॥
जरा * लंकाकाण्ड शिव, ब्रह्मा [आदि] देवता और मुनियों के समुदाय जिनके चरणों की सेवा [ करना ] चाहते हैं, उनका दूत होकर मैंने कुलको हुआ दिया ? अरे ! ऐसी बुद्धि । होनेपर भी तुम्हारा हृदय फट नहीं जाता ? ॥१॥ सुनि कठोर बानी कपि केरी । कहत दसानन नयन तरेरी ॥ खल तव कठिन बचन सब सहऊँ । नीति धर्म मैं जानत अहऊँ ॥ २ ॥ वानर (अंगद ) की कठोर वाणी सुनकर रावण आँखें तरेरकर ( तिरछी करके) योल-अरे दुष्ट ! मैं तेरे सब कठोर वचन इसीलिये सह रहा हूँ कि मैं नीति और धर्मको जानता हूँ ( उन्हींकी रक्षा कर रहा हूँ)॥२॥ कह कपि धर्मसीलता तोरी । हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी ।। देखी नयन दूत रखवारी । बूढ़ि न मरहु धर्म व्रतधारी ॥ ३ ॥ अंगदने कहा--तुम्हारी धर्मशीलता मैंने भी सुनी है। [ वह यह कि ] तुमने परायी श्रीकी चोरी की है और दूतकी रक्षाकी बात तो अपनी आँखोंसे देख ली । ऐसे धर्मके प्रतको धारण (पालन ) करनेवाले तुम डूबकर मर नहीं जाते ! ॥ ३ ॥ कान नाक बिनु भगिनि निहारी । छमा कीन्हि तुम्ह धर्म विचारी ॥ धर्मसीलता तब जागी । पावा दरसु हमहुँ बड़भागी ॥४॥ नाक-कानसे रहित बहिनको देखकर तुमने धर्म विचारकर ही तो क्षमा कर दिया था। तुम्हारी धर्मशीलता जग-जाहिर है । मैं भी बड़ा भाग्यवान् हूँ, जो मैंने तुम्हारा दर्शन पाया ॥ ४॥ दो---जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ विलोकु मम वाहु । लोकपाल वल विपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु ॥२२(क)। [ रावणने कहा- अरे जड जन्तु वानर ! व्यर्थ वक्र-बक न कर, अरे मूर्ख ! मेरी भुजाएँ तो देख । ये सब लोकपालोंके विशाल बलरूपी चन्द्रमाको असनेके लिये राहु हैं ।। २२ (क)॥ पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि वास । सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास ॥२२(ख)। फिर [ तूने सुना ही होगा कि ] आकाशरूपी तालावमें मेरी भुजाओंरूपी कमलोंपर बसकर शिवजीसहित कैलास हंसके समान शोभाको प्राप्त हुआ था ! ! २२ (ख)॥ चौ०-तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद । मोसन भिरिहि कवन जोधाबद ॥ तव प्रभु नारि विरह बलहीना । अनुज तासु दुख दुखी मलीना ॥ १ ॥ अरे अंगद ! सुन, तेरी सेनामें बता ऐसा कौन योद्धा है, जो मुझसे भिड़ सकेगा।
७६० * रामचरितमानस * तेरा मालिक तो स्त्रीके वियोगमें बलहीन हो रहा है और उसका छोटा भाई उसके दुःखसे दुखी और उदास है ॥ १॥ तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ । अनुज हमार भीरु अति सोऊ ॥ जामवंत मंत्री अति बूढ़ा । सो कि होइ अब समरारूदा ॥ २ ॥ तुम और सुग्रीव, दोनों [नदो] तटके वृक्ष हो! [ रहा ] मेरा छोटा भाई विभीषण, [ सो ] वह भी बड़ा डरपोक है । मन्त्री जाम्बवान् बहुत बूढा है । वह अब लड़ाईमें क्या चढ़ (उद्यत हो ) सकता है ? ॥ २ ॥ सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला । है कपि एक महा बलसीला ॥ आवा प्रथम नगर जेहिं जारा । सुनत वचन कह वालिकुमारा ॥ ३ ॥ नलनील तो शिल्प-कर्म जानते हैं (वे लड़ना क्या जाने)! हाँ, एक वानर जरूर महान् बलवान है, जो पहले आया था और जिसने लडा जलायी थी। यह वचन तुनते ही वालिपुत्र अंगदने कहा--॥ ३ ॥ सत्य वचन कहु निसिचर नाहा । साँचेहुँ कोस कीन्ह पुर दाहा॥ रावन नगर अल्प कपि दहई । सुनि अस वचन सत्य को कहई ॥ ४ ॥ हे राक्षसराज ! सच्ची बात कहो; क्या उस वानरने सचमुच तुम्हारा नगर जला दिया ? रावण [जैसे जगद्विजयी योद्धा ] का नगर एक छोटे से वानरने जला दिया। ऐसे वचन सुनकर उन्हें सत्य कौन कहेगा ? ||४|| जो अति सुभट सराहेहु रावन । सो सुग्रीव केर लघु धावन ॥ चलइ बहुत सो बोर न होई । पठवा खबरि लेन हम सोई॥ ५ ॥ हे रावण ! जिसको नुमने बहुत बड़ा योद्धा कहकर सराहा है, वह तो सुग्रीवका एक छोट-सा दौड़कर चलनेवाला हरकारा है । वह बहुत चलता है, वीर नहीं है। उसको तो हमने [ केवल ] खवर लेने के लिये भेजा था ॥५॥ दो सत्य नगरु कपि जारेउ विनु प्रभु आयसु पाइ। फिरिन गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ ॥२३(क)॥ क्या सचमुच ही उस वानरने प्रभुकी आज्ञा पाये बिना ही तुम्हारा नगर जला डाला ? मालूम होता है, इसी डरसे वह लौटकर सुग्रीवके पास नहीं गया और कहीं छिप रहा! ।। २३ (क)। सत्य कहहि दसकंठ सव मोहि न सुनि कछु कोह । कोउ न हमार कटक अस तो सन लरत जो सोह ॥ २३(ख)॥ है रावण! तुम सब सत्य ही कहते हो, मुझे सुनकर कुछ भी क्रोध नहीं है। सच- मुच हमारी सेनामें कोई भी ऐसा नहीं है, जो तुमसे लड़नेमें शोभा पाये ।। २३ (ख)॥
* लंकाकाण्ड*
७६१
प्रीति विरोध समान सन करिअ नीति असि आहि ।
जो मृगपति वध मेडुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि ॥ २३ (ग)।
प्रीति और वैर बराबरीवालेसे ही करना चाहिये, नीति ऐसी ही है। सिंह यदि
मेढकोको मारे तो क्या उसे कोई भला कहेगा ?॥ २३ ॥ (ग)॥
जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि वधे पड़ दोप।
तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोप ॥ २३ (घ)।
यद्यपि तुम्हें मारनेमें श्रीरामजीकी लघुता है और बड़ा दोष भी है तथापि हे
रावण ! सुनो, क्षत्रिय जातिका क्रोध बड़ा कठिन होता है ।। २३ (घ)॥
वक्र उक्ति धनु वचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस ।
प्रतिउत्तर ससिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस ॥ २३ (ङ)॥
वक्रोक्तिरूपी धनुषसे वचनरूपी बाण मारकर अंगदने शत्रुका हृदय जला दिया।
वीर रावण उन बाणों को मानो प्रत्युत्तररूपी सड़सियोंसे निकाल रहा है ॥ २३ (क)॥
हँसि वोलेउ दसमौलि तव कपि कर बड़ गुन एक ।
जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक ॥ २३ (च)॥
तव रावण हँसकर बोला-बंदरमें यह एक बड़ा गुण है कि जो उसे पालता है,
उसका वह अनेकों उपायोसे भला करनेकी चेष्टा करता है || २३ (च)॥
o-धन्य कीस जो निज प्रभु काजा । जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा ॥
नाचि कूदि करि लोग रिझाई । पति हित करइ धर्म निपुनाई ॥ १ ॥
वंदरको धन्य है, जो अपने मालिकके लिये लाज छोड़कर जहाँ-तहाँ नाचता है।
नाच-कूदकर लोगोंको रिझाकर, मालिकका हित करता है । यह उसके धर्मकी
निपुणता है ॥१॥
अंगद स्वामिभक्त तव जाती । प्रभुगुनकसनकहसिएहि भाँती॥
मैं गुन गाहक परम सुजाना । तव कटु स्टनि करउँ नहिं काना ॥२॥
हे अंगद ! तेरी जाति स्वामिभक्त है। फिर भला ] तू अपने मालिकके गुण इस
प्रकार कैसे न बखानेगा ? मैं गुणग्राहक ( गुणोंका आदर करनेवाला) और परम सुजान
(समझदार) हूँ, इसीसे तेरी जली-कटी बक-बकपर कान (ध्यान) नहीं देता ॥२॥
कह कपि तव गुन गाहकताई । सत्य पवनसुत मोहि सुनाई ॥
बन विधंसि सुत वधि पुर जारा । तदपिन तेहिं कछु कृत अपकारा ॥ ३ ॥
अंगदने कहा--तुम्हारी सच्ची गुणग्राहकता तो मुझे हनुमान्ने सुनायी थी। उसने
अशोकवनको विध्वंस (तहस-नहस ) करके तुम्हारे पुत्रको मारकर नगरको जला दिया
था । तो भी [तुमने अपनी गुणग्राहकताके कारण यही समझा कि ] उसने तुम्हारा
कुछ भी अपकार नहीं किया ॥३॥
देखेंउँ आइ
।
७६२
* रामचरितमानस *
सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई । दसकंधर मैं कोन्हि दिठाई ।।
जो
कछु
कपि भाषा । तुम्हरें लाज न रोष न भाखा ॥ ४ ॥
तुम्हारा वही सुन्दर स्वभाव विचारकर, हे दशग्रीव | मैंने कुछ धृष्टता की है।
हनुमान्ने जो कुछ कहा था, उसे आकर मैंने प्रत्यक्ष देख लिया कि तुम्हें न लजा है,
न क्रोध है और न चिढ़ है।॥ ४ ॥
जौं असि मति पितु खाए कीसा । कहि अस बचन हंसा दससीसा ॥
पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही । अवहीं समुझि परा कछु मोही ॥ ५ ॥
इरावण बोला- अरे वानर ! जब तेरी ऐसी बुद्धि है तभी तो तू वापको खा
गया। ऐसा वचन कहकर रावण हँसा । अंगदने कहा-पिताको खाकर फिर तुमको भी
खा डालता । परंतु अभी तुरंत कुछ और ही बात मेरी समझमें आ गयी ! ॥ ५ ॥
बालि बिमल जस भाजन जानी । हतउँ न तोहि अधम अभिमानी ।।
रावन रावन जग केते । मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते ॥ ६ ॥
अरे नीच अभिमानी ! बालिके निर्मल यशका पात्र ( कारण ) जानकर तुम्हें मैं
नहीं मारता । रावण ! यह तो बता कि जगत्में कितने रावण हैं ? मैंने जितने रावण
अपने कानोंसे सुन रक्खे हैं, उन्हें सुन---॥६॥
बलिहि जितन एक गयउ पताला । राखेड बाँधि सिसुन्ह हयसाला ||
खेलहि बालक मारहिं जाई । दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई।॥ ७ ॥
एक रावण तो बलिको जीतने पातालमें गया था, तब बच्चोंने उसे धुड़सालमें
बाँध रक्खा । बालक खेलते थे और जा-जाकर उसे मारते थे। वलिको दया लगी, तब
उन्होंने उसे छुड़ा दिया ॥ ७ ॥
एक बहोरि सहसभुज देखा । धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा ॥
कौतुक लागि भवन लै आवा । सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा ॥ ८ ॥
फिर एक रावणको सहस्रबाहुने देखा और उसने दौड़कर उसको एक विशेष
प्रकारके ( विचित्र) जन्तुकी तरह [ समझकर] पकड़ लिया। तमाशेके लिये वह उसे
घर ले आया । तब पुलस्त्य मुनिने जाकर उसे छुड़ाया ॥ ८॥
दो०-एक कहत मोहि सकुच अति रहा वालि की काँख ।
इन्ह महुँ रावन ते कवन सत्य घदहि तजि माख ॥ २४ ॥ .
एक रावणकी बात कहने में तो मुझे बड़ा संकोच हो रहा है-चह [ बहुत
दिनोंतक ] बालिकी काँखमें रहा था । इनमेंसे तुम कौन-से रावण हो ? खीझना छोड़कर
सच-सच बताओ ॥ २४ ॥
चौ०-सुनु सङ सोइ रावन बलसीला । हरगिरि जान जासु भुज लीला ॥
जान उमापति जासु सुराई । पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई ॥ १ ॥
लंकाकाण्ड
७६३
[ रावणने कहा-] अरे मूर्ख ! सुन, मैं वही बलवान् गवण हूँ, जिसकी भुजाओंकी
लीला ( करामात ) कैलास पर्वत जानता है । जिसकी शूरता उमापति महादेवजी जानते
हैं, जिन्हें अपने सिररूपी पुष्प चढ़ा-चढ़ाकर मैंने पूजा था ॥ १ ॥
सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित यार त्रिपुरारी ॥
भुज विक्रम जानहिं दिगपाला । सठ अजहूँ जिन्ह के उर साला ॥ २॥
सिररूपी कमलोंको अपने हाथोंसे उतार-उतारकर मैंने अगणित वार त्रिपुरारि
शिवजीकी पूजा की है । अरे मूर्ख ! मेरी भुजाओंका पराक्रम दिक्पाल जानते हैं, जिनके
हृदयमें वह आज भी चुभ रहा है ॥२॥
जानहि दिग्गज उर कठिनाई । जव जव भिरउँ जाइ चरिआई ॥
जिन्ह के दसन फराल न फूटे । उर लागत मूलक इव टूटे ॥ ३ ॥
दिग्गज (दिशाओंके हाथी) मेरी छातीकी कठोरताको जानते हैं। जिनके भयानक
दाँत, जब-जब जाकर मैं उनसे जबरदस्ती भिड़ा, मेरी छातीमें कभी नहीं फूटे (अपना चिह्न
भी नहीं बना सके), बल्कि मेरी छातीसे लगते ही वे मूलीकी तरह टूट गये ॥ ३॥
जासु चलत डोलति इमि धरनी । चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी ॥
सोइ रावन जग विदित प्रतापी । सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी ॥ ४ ॥
जिसके चलते समय पृथ्वी इस प्रकार हिलती है, जैसे मतवाले हाथीके चढ़ते समय
छोटी नाव । मैं वही जगप्रसिद्ध प्रतापी रावण हूँ | अरे झूठी बकवाद करनेवाले ! क्या
तूने मुझको कानोंसे कभी नहीं सुना ? ॥ ४ ॥
दो-तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि वखान ।
रे कपि वर्वर खर्व खल अव जाना तय ग्यान ॥ २५ ॥
उस (महान् प्रतापी और जगप्रसिद्ध रावणको (मुझे)तू छोटा कहता है और मनुष्यकी
बड़ाई करता है ? अरे दुष्ट, असभ्य, तुच्छ वंदर ! अब मैंने तेरा ज्ञान जान लिया।॥ २५ ॥
चौ-सुनि अंगद सोप कह बानी । बोलु सँभारि अधम अभिमानी ॥
सहसवाहु भुज गहन भपा । दहन अनल लम जासु कुठारा ॥ १ ॥
रावणके ये वचन सुनकर अंगद क्रोधसहित वचन बोले---अरे नीच अभिमानी !
सँभालकर ( सोच-समझकर ) बोल । जिनका फरता सहस्रबाहुकी भुजाओंरूपी अपार
वनको जलानेके लिये अनिके समान था, ॥१॥
जासु परसु सागर खर धारा । बूढ़े नृप अगनित बहु बारा ॥
तासु गर्ब जेहि देखत भागा । सो नर क्यों दससील अभागा ॥२॥
जिनके फरसारूपी समुद्रकी तीन धारामें अनगिनत राजा अनेकों वार डूब गये,
उन परशुरामजीका गर्व जिन्हें देखते ही भाग गयाअरे अभागे दशशीश! वे मनुष्य
क्योंकर हैं ?॥२॥
७६४ * रामचरितमानस राम मनुज कल रे सठ दंगा । धन्दी कामु नदी पुनि गंगा ॥ पतु सुरधेनु कल्पतरु लखा ! अन्न दान अरु रस पीयूया ॥ ३ ॥ क्यों रे मूर्ख उद्दण्ड ! श्रीरामचन्द्रजी मनुष्य है ? कामदेव भी क्या धनुधारी है ? और गहाजी त्या नदी है ? कामधेनु क्या पशु है? और कल्पवृक्ष क्या पेड़ है ? अन्न भी क्या दान है ? और अमृत क्या रत है १ ॥३॥ वैनतेय खग अहि सहसानन । चिंतामनि पुनि उपल दसानन ॥ सुनु मति मंद लोग वैकुंठा । लाभ कि रघुपति नगति भईटी ॥ ४ ॥ गड़नी क्या पक्षी हैं ? शेषजी क्या सर्प है ? अरे रावन ! चिन्तामणि भी क्या पत्थर है ? अरे ओ मूर्ख ! तुन, वैकुण्ठ भी क्या लोक है ? और श्रीरघुनाथजीको अखण्ड भकि क्या [ और लाभों जैसा ही ] लभ है! |॥ ४ ॥ दो०-सेन सहित तव मान मथि वन उजारि पुर जारि । कस रे लठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि ॥ २६ ॥ तेनासमेत तेरा नान मथकर, अशोकवनको उजाड़कर, नगरको बलाकर और तेरे पुत्रको मारकर जो लौट गये [तु उनका कुछ भी न बिगाड़ सका क्यों रे दुष्ट ! वे हनुमानजी क्या वानर हैं ? ॥ २६ ॥ चौ -सुनु रावन परिहरि चतुराई । भजति न कृपासिंधु खुराई ॥ जौं खल भएसि राम कर द्रोही । ब्रह्मा जसक राति न तोही। अरे रावग ! चतुराई ( कपट) छोड़कर दुन । माके समुद्र श्रीरसुनायीका तू भजन क्यों नहीं करता ? अरे दुष्ट ! यदि त् श्रीरामजीका वैरी हुआ तो तुझे ब्रझा और न्द्र भी नहीं बचा सकेंगे ॥१॥ मूढ़ वृथा अनि नारसि गाला । राम बयर अस होइहि हाला ॥ तव सिर निकर ऋपिन्ह के आगे। परिहहिं धरनि राम सर लागें ॥ २॥ हे नूद ! व्यर्थ गाल न मार (डींग न हाँक ) श्रीरानजीते वैर कलेपर तेय ऐसा हाल होगा कि तेरे तिर तनहू श्रीरामजीके बाग लगते ही वानरोंके आगे पृथ्वीपर पड़ेंगे ॥२॥ ते तव सिर झुक सम नाना । खलिहहिं भालु कीस चौगाना जबहिं समर कोपिहि खुनायक । बुटिहहिं अति कराल बहु लायक ॥ ३ ॥ और रीछ-वानर तेरे उन गेंदके सनान अनेकों सिरोंसे चौगान खेलेंगे । जब श्रीरघुनाथजी युद्धमें कोप करेंगे और उनके अत्यन्त तीक्ष्ण बहुत-से बाग छूटेंगे || ३ ॥ तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा । अस विचारि भजु राम उदारा ।। सुनत रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा ॥ ४ ॥ तब क्या तेरा ऐसा गाल चलेगा? ऐसा विचारकर उदार (कमालु) श्रीरानवीको वचन
* लंकाकाण्ड *
७६५
भज । अंगदके ये वचन सुनकर रावण बहुत अधिक जल उठा। मानो जलती हुई
प्रचण्ड अग्निमें घी पड़ गया हो ॥ ४॥
दो०-कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सकारि ।
मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि ॥२७॥
[ वह बोला-अरे मूर्ख ! ] कुम्भकर्ण ऐसा मेरा भाई है, इन्द्रका शत्रु सुप्रसिद्ध
मेघनाद मेरा पुत्र है ! और मेरा पराक्रम तो तूने सुना ही नहीं कि मैंने सम्पूर्ण जड़-
चेतन जगत्को जीत लिया है ! ॥ २७ ॥
चौ०-सठ साखामृग जोरि सहाई । बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई ॥
नाघहिं खग अनेक बारीसा । सूर न होहिं ते सुनु सव कीसा ॥ १ ॥
रे दुष्ट | वानरोंकी सहायता जोड़कर रामने समुद्र बाँध लिया बस, यही उसकी
प्रभुता है । समुद्रको तो अनेकों पक्षी भी लाँघ जाते हैं । पर इसीसे वे सभी शूरवीर नहीं
हो जाते | अरे मूर्ख बंदर ! सुन-॥१॥
'मम भुज सागर बल जल पूरा । जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा ॥
बीस पयोधि अगाध अपारा । को अल बीर जो पाइहि पारा ॥ २ ॥
मेरी एक-एक भुजारूपी समुद्र बलरूपी जलसे पूर्ण है, जिसमें बहुत-से शूरवीर
देवता और मनुष्य डूब चुके हैं । [ वता, ] कौन ऐसा शूरवीर है जो मेरे इन अथाह
और अपार बीस समुद्रोंका पार पा जायगा ॥२॥
दिगपालन्ह मैं नीर भरावा । भूप सुजस खल मोहि सुनावा ॥
जौं पै समर सुभट तव नाथा । पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा ॥ ३ ॥
अरे दुष्ट ! मैंने दिक्पालोंतकसे जल भरवाया और तू एक राजाका मुझे सुयश
सुनाता है। यदि तेरा मालिक, जिसकी गुणगाथा तू बार-बार कह रहा है, संग्राममें
लड़नेवाला योद्धा है-|| ३ ।।
तो बसीठ पठवत केहि काजा । रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा ॥
हरगिरि मथन निरखु मम बाहू । पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू ॥ ४ ॥
तो [ फिर ] वह दूत किंसलिये भेजता है । शत्रुसे प्रीति ( सन्धि ) करते उसे
लाज नहीं आती ? [ पहले ] कैलासका मथन करनेवाली मेरी भुजाओंको देख । फिर
अरे मूर्ख वानर ! अपने मालिककी सराहना करना ॥ ४ ॥
दो०- सूर कवन रावन सरिस स्खकर काटि जेहिं सीस।
हुने अनल अति हरष बहु वार साखि गौरीस ॥२८॥
रावणके समान शूरवीर कौन है ? जिसने अपने ही हाथोंसे सिर काट-काटकर
अत्यन्त हर्षके साथ बहुत बार उन्हें अग्निमें होम दिया । स्वयं गौरीपति शिवजी
इस बातके साक्षी हैं ॥ २८ ॥
७६६ रामचरितमानस चौल-जरत बिलोकेउँ जहि कपाला । विधि के लिखे अंक निज भाला ॥ नर के कर आपन बध बाँची । हसेउ जानि विधि गिरा असाँची ॥ १ ॥ मस्तकोंके जलते समय जब मैंने अपने ललाटॉपर लिखे हुए विधाताके अक्षर देखे, तब मनुष्यके हायसे अपनी मृत्यु होना बाँचकर, विधाताकी वाणी (लेखको) असत्य जानकर मैं हँसा ॥१॥ सोउ मन समुझि त्रास नहिं मारें। लिखा विरंचि जरठ मति भोरें ।। भान वीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागें ॥ २ ॥ उस वातको समझकर ( स्मरण करके ) भी मेरे मनमें डर नहीं है। क्योंकि मैं समझता हूँ कि ] बूढ़े ब्रह्माने बुद्धिभ्रमसे ऐसा लिख दिया है । अरे मूर्ख ! तू लना और मर्यादा छोड़कर मेरे आगे वार-बार दूसरे वीरका बल कहता है ! ||२|| कह अंगद सलन जग माहीं। रावन तोहि समान कोड नाहीं॥ लाजवंत तव सहन सुभाऊ । निज मुखनिज गुन कहसिन काज ३ ॥ अंगदने कहा- अरे रावण ! तेरे समान लबावान् जगत्में कोई नहीं है । लजा- शीलता तो तेरा सहज स्वभाव ही है। तु अपने मुँहसे अपने गुण कभी नहीं कहता ॥३॥ सिर अरु सैल कया चित रही। ताते चार बीस ते कही सो भुज बल राखेहु उर धाली । जीतेहु सहसवाहु बलि वाली ॥ ४ ॥ सिर काटने और कैलास उठानेकी कथा चित्तमें चढ़ी हुई थी, इससे तूने उसे बीसों बार कहा । भुजाओंके उस वलको तो तूने हृदयमें ही टाल (छिपा) रक्खा है, जिससे तूने सहस्रबाहु, बलि और वालिको जीता था ।। ४ ।। सुनु मतिमंद देहि अब पूरा ! कार्ट सीस कि होइन सूरा ॥ इंदनालि कहुँ कहिम न बीरा । काटइ निज कर सकल सरीरा ॥ ५ ॥ अरे मन्दबुद्धि ! सुन, अब यस कर । सिर काटनेसे भी क्या कोई शूरवीर हो जाता है ? इन्द्रजाल रचनेवालेको वीर नहीं कहा जाता, यद्यपि वह अपने ही हाथों अपना सारा शरीर काट डालता है।॥ ५॥ दो०-जरहिं पतंग मोह बस भार वहहिं खर बंद । ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद ॥ २९ ॥ अरे मन्दबुद्धि ! समझकर देख, पतंगे मोहवश आगर्भ जल मरते हैं, गदहोंके झुंड बोझ लादकर चलते हैं, पर इस कारण वे शूरवीर नहीं कहलाते || २९ ॥ चौ०-अब जनि यतबहाव खल करही । सुनुभम वचन मान परिहरही । दसमुख मैं ने असीठी आयउँ । अस विनारि रघुवीर पठायउँ ॥ १ ॥ अरे दुष्ट ! अव यतबढ़ाव मत कर मेरा वचन सुन और अभिमान त्याग दे।
* लंकाकाण्ड * ७६७ हे दशमुख ! मैं दूतकी तरह [ सन्धि करने ] नहीं आया हूँ | श्रीरघुवीरने ऐसा विचारकर मुझे भेजा है-॥१॥ बार बार अस कहइ कृपाला । नहिं गजारि जसु बधे सुकाला॥ मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरै । सहे। कठोर वचन सठ तेरे ॥ २ ॥ कृपालु श्रीरामजी बार-बार ऐसा कहते हैं कि स्यारके मारनेसे सिंहको यश नहीं मिलता । अरे मूर्ख ! प्रभुके [ उन ] वचनोंको मनमें समझकर ( याद करके ) ही मैंने तेरे कठोर वचन सहे है ॥ २॥ नाहिं त करि मुख भंजन तोरा । ले जातेउँ सीतहि बरजोरा ।। जानेउँ तव बल अधम सुरारी । सूनें हरि आनिहि परनारी ॥ ३ ॥ नहीं तो तेरे मुँह तोड़कर मैं सीताजीको जबरदस्ती ले जाता । अरेअधम ! देवताओंके शत्रु ! तेरा बल तो मैंने तभी जान लिया, जब तू सूनेमें परायी स्त्रीको हर (चुरा) लाया ॥३॥ ते निसिचर पति गर्व बहुता । मैं रघुपति सेवक कर दूता ॥ जौं न राम अपमानहिं दरऊँ। तोहि देखत अस कौतुक करॐ॥ ४ ॥ तू राक्षसोंका राजा और बड़ा अभिमानी है, परंतु मैं तो श्रीरघुनाथजीके सेवक (सुग्रीव ) का दूत ( सेवकका भी सेवक ) हूँ। यदि मैं श्रीरामजीके अपमानसे न डरूँ तो तेरे देखते-देखते ऐसा तमाशा करूँ कि---|| ४ ॥ दो०-तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ। तव जुवतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ ॥३०॥ तुझे जमीनपर पटककर, तेरी सेनाका संहार कर और तेरे गाँवको चौपट [नष्ट-भ्रष्ट] करके अरे मूर्ख ! तेरी युक्ती स्त्रियोसहित जानकीजीको ले जाऊँ ।। ३० ॥ चौ०-जौं अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधैं नहिं कछु मनुसाई ॥ कौल काम बस कृपिन विमूढ़ा । अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा ॥ १ ॥ यदि ऐसा कर तो भी इसमें कोई बड़ाई नहीं है । मरे हुएको मारनेमें कुछ भी पुरुषत्व ( बहादुरी) नहीं है । वाममार्गी, कामी, कंजूस, अत्यन्त मूढ़, अति दरिद्र, बदनाम, बहुत बूढ़ा ॥१॥ सदा रोगबस संतत क्रोधी। विप्नु विमुख श्रुति संत विरोधी ।। तनु पोषक निंदक अध खानी । जीवत सव सम चौदह प्रानी ॥ २॥. नित्यका रोगी, निरन्तर क्रोधयुक्त रहनेवाला, भगवान् विष्णुसे विमुख, वेद और संतोका विरोधी, अपना ही शरीर पोषण करनेवाला, परायी निन्दा करनेवाला और पापको खान (महान् पापी) ये चौदह प्राणी जीते ही मुरदेके समान हैं ॥ २ ॥ अस विचारि खल बधउँ न तोही । भव जनि रिस उपजावसि मोही॥ सुनि सकोप कह निसिचर नाथा । अधर दसन दसि मीजत हाथा ॥ ३ ॥ . . - ७६८ * रामचरितमानस * अरे दुष्ट ! ऐसा विचारकर मैं तुझे नहीं मारता । अब तू मुझमें क्रोध न पैदा कर (मुझे गुस्सा न दिला)। अंगदके वचन सुनकर राक्षसराज रावण दाँतोंसे होंठ काटकर, क्रोधित होकर हाथ मलता हुआ बोला-|॥ ३ ॥ रे कपि अधम मरन अब चहसी। छोटे घदन बात यदि कहसी।। कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें। बल प्रताप बुधि तेज न ताकें ॥ ४ ॥ अरे नीच बंदर ! अव तू मरना ही चाहता है। इसीसे छोटे मुँह बड़ी बात कहता है । अरे मूर्ख वंदर ! तू जिसके वलपर कड्डए वचन बक रहा है, उसमें बल, प्रताप, बुद्धि अथवा तेज कुछ भी नहीं है ॥४॥ दो-अगुल अमान जानि तेहि दीन्ह पिता वनवास । सो दुख अरु जुयती विरह पुनि निसि दिन मम बास ॥३१(क)॥ उसे गुणहीन और मानहीन समझकर ही तो पिताने वनवास दे दिया। उसे एक तो यह ( उसका ) दुःख, उसपर युवती स्त्रीका विरह और फिर रात-दिन मेरा डर बना रहता है ।। ३१ (क) ॥ जिन्ह के बल कर गर्व तोहि अइसे मनुज अनेक । खाहि निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक ॥३१ (ख)॥ जिनके बलका तुझे गर्व है, ऐसे अनेकों मनुष्योंको तो राक्षस रात-दिन खाया करते हैं । अरे मूढ़ ! जिद्द छोड़कर समझ ( विचार कर ) ॥ ३१ (ख)॥ चौ०-जब तेहिं कीन्हि राम के निंदा । क्रोधवंत अति भयउ कपिदा॥ हरि हर निंदा सुनइ जो काना । होइ पाप गोघात समाना ॥ १ ॥ जब उसने श्रीरामजीकी निन्दा की, तब तो कपिश्रेष्ठ अंगद अत्यन्त क्रोधित हुए। क्योंकि [शास्त्र ऐसा कहते हैं कि ] जो अपने कानोंसे भगवान् विष्णु और शिवकी निन्दा सुनता है, उसे गोवधके समान पाप होता है ॥१॥ कपिकुंजर भारी । दुहु भुजदंड तमकि महि मारी। डोलत धरनि सभासद खसे । चले भाजि भय मारुत असे ॥ २ ॥ वानरश्रेष्ठ अंगद बहुत जोरसे कटकटाये ( शब्द किया) और उन्होंने तमककर (जोरसे) अपने दोनों भुजदण्डोंको पृथ्वीपर दे मारा । पृथ्वी हिलने लगीजिससे बैठे हुए ] सभासद् गिर पड़े और भयरूपी पवन ( भूत ) से ग्रस्त होकर भाग चले ।।२।। गिरत संभारि उठा दसकंधर । भूतल परे मुकुट अति सुंदर ॥ कछु तेहिं ले निज सिरन्हि संवारे । कछु अंगद प्रभु पास पबारे ॥ ३ ॥ रावण गिरते-गिरते सँभलकर उठा । उसके अत्यन्त सुन्दर मुकुट पृथ्वीपर गिर पड़े। कुछ तो उसने उठाकर अपने सिरोंपर सुधारकर रख लिया और कुछ अंगदने उठाकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके पास फेंक दिये ॥ ३ ॥ कटकटान * लंकाकाण्ड * ७६९ आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लुक परन बिधि लागे । को रावन करि कोप चलाए । कुलिस चारि आवत अति धाए ॥ ४॥ मुकुटाको आते देखकर वानर भागे। [ सोचने लगे] विधाता ! क्या दिनमें ही उल्कापात होने लगा (तारे टूटकर गिरने लगे) अथवा क्या रावगने क्रोध करके चार वन चलाये है, जो बड़े धायेके साथ ( वेगसे ) आ रहे हैं? ॥४॥ कह प्रभु हँसि जनि हृदय ढेराहु । लक न असनि केतु नहिं राहु ॥ ए किरीट दसकंधर केरे । आवत यालितनय के प्रेरे ॥ ५ ॥ प्रभुने [ उनसे ] हँसकर कहा-मनमें डरो नहीं । ये न उल्का हैं, न वन है और न केतु या राहु ही हैं । अरे भाई ! ये तो रावगके मुकुट हैं, जो बालिपुत्र अंगदके के हुए आ रहे हैं ॥ ५॥ दो०-तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास । कौतुक देखहि भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास ॥ ३२(क)। पवनपुत्र श्रीहनुमानजीने उछलकर उनको हाथसे पकड़ लिया और लाकर प्रमुके पास रख दिया । रीछ और वानर तमाशा देखने लगे। उनका प्रकाश सूर्यके समान था ।। ३२ (क)॥ उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ। धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ ॥ ३२(ख)॥ वहाँ ( सभामें ) क्रोधयुक्त रावण सबसे क्रोधित होकर कहने लगा कि बंदरको पकड़ लो और पकड़कर मार डालो । अंगद यह सुनकर मुसकराने लगे ॥ ३२ (ख)॥ चौ०-एहि बधि बेगिसुभट सव धावहु । खाहु भालु कपिजहँ जहँ पावहु ॥ मर्याटहीन करहु महि जाई । जिअत धरहु तापस द्वौ भाई ॥ १ ॥ [रावण फिर बोला-] इसे मारकर सब योद्धा तुरंत दौड़ो और नहाँ-कहीं रोछ-वानरोको पाओ, वहीं खा डालो । पृथ्वीको बंदरोंसे रहित कर दो और जाकर दोनों तपस्वी भाइयों ( राम-लक्ष्मण ) को जीते-जी पकड़ लो ॥ १॥ पुनि सकोप बोलेड जुबराजा । गाल बजावत तोहि न लाजा ॥ मरु गर काटि निलज कुलपाती। बल विलोकिविहरति नहिं छाती ॥ २॥ [रावणके ये कोपभरे वचन सुनकर] तब युवराज अंगद क्रोधित होकर बोले- तुझे गाल बजाते लाज नहीं आती ? अरे निर्लज | अरे कुलनाशक ! गला काटकर (आत्महत्या करके) मर जा! मेरा बल देखकर भी क्या तेरी छाती नहीं फटती ॥२॥ रे त्रिय चोर कुमारग गामी । खल मल रासि मंदमति कामो॥ जल्पसि दुर्वादा । भएसि कालयस खल मनुजादा ॥ ३ ॥ सन्यपात रा० स०४९- ७७० * रामचरितमानस * अरे स्त्रीके चोर ! अरे कुमार्गपर चलनेवाले ! अरे दुष्ट, पापकी राशि, मन्दबुद्धि और कामी ! तू सन्निपातमें क्या दुर्वचन बक रहा है ? अरे दुष्ट राक्षस ! तू कालके पश हो गया है ? ॥३॥ याको फल पाचहिगो आगे। वानर भालु चपेटन्हि लागे। रामु मनुज बोलत असि बानी । गिरहिं न तच रसना अभिमानी ॥ ४ ॥ इसका फल तू आगे वानर और भालुओंके चपेटे लगनेपर पावेगा। राम मनुष्य है, ऐसा वचन बोलते ही, अरे अभिमानी ! तेरी जीमें नहीं गिर पड़ती है ||४|| गिरिहहिं रसना संसय नाहीं। सिरन्हि समेत समर महि माहीं ॥ ५॥ इसमें संदेह नहीं है कि तेरो जी) [अकेले नहीं वरं ] सिरों के साथ रणभूमिमें गिरंगी ॥५॥ सो०-सो नर क्यों दसकंध यालि बध्यो जेहिं एक सर । वीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़ ॥ ३३(क)। रे दशकन्ध ! जिसने एक ही बाणसे बालिको मार डाला, वह मनुष्य कैसे है ? अरे कुजाति, अरे जड ! बीस आँखें होनेपर भी तू अंधा है! तेरे जन्नको धिकार है ।। ३३(क)। तव सोनित की प्यास तृपित राम सायक निकर। तजउँ तोहि तेहि त्राल कटु जल्पक निसिचर अधम ॥ ३३(ख)॥ श्रीरामचन्द्रजीके बाणसमूह तेरे रक्तकी प्याससे प्यासे हैं। [वेप्याते ही रह जायेंगे] इस हरसे, अरे कड़वी यकवाद करनेवाले नीच राक्षस ! मैं तुझे छोड़ता हूँ ॥ ३३ (ख)। चौ०-मैं तव दसन तोरिबे लायक । आयसु मोहि न दीन्ह खुनायक ॥ भसि रिस होति दसड मुख तोरौं । लंका गहि समुन्द्र मह बोरौं ॥ १ ॥ मैं तेरे दाँत तोड़नेमें समर्थ हूँ, पर क्या करूँ? औरघुनाथजीने मुझे आज्ञा नहीं दी। ऐसा क्रोध आता है कि तेरे दसों मुँह तोड़ डालें और [ तेरी ] लक्षाको पकड़कर समुद्र में डुबा दू॥१ गूलरि फल समान तब लंका । बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका ।। मैं बानर फल खात न धारा । मायसु दीन्ह राम उदारा ॥ २ ॥ तेरी लङ्का गूलरके फलके समान है। तुम सब कीड़े उसके भीतर [ अज्ञानवश] निडर होकर बस रहे हो । मैं बंदर हूँ, मुझे इस फलको खाते क्या देर थी ? पर उदार (कृपाल) श्रीरामचन्द्रजीने वैसी आशा नहीं दी ॥२॥ जुगुति सुनत रावन मुसुकाई । मूढ़ सिखिहि कह बहुत झुठाई । पालि न कबहुँ गाल भस मारा । मिलि तपसिन्ह ते भएसि लवारा ॥ ३ ॥ अंगदकी युक्ति सुनकर रावण मुसकराया [ और बोला- अरे मूर्ख ! बहुत * लंकाकाण्ड * ७७१ पर बोलना तूने कहाँ सीखा १ वालिने तो कभी ऐसा गाल नहीं मारा । जान पड़ता है छ तपखियोंसे मिलकर लबार हो गया है ||३|| साँचेहुँ मैं लचार भुज बोहा । जौं न आरिउँ तब दस जोहा ॥ समुक्षि राम प्रताप कपि कोपा । सभा माझ पन करि पद रोपा ॥ ४ ॥ [ अंगदने कहा-] अरे वीस भुजावाले ! यदि तेरी दसों जीमें मैंने नहीं उखाड़ जो तो सचमुच मैं लबार ही हूँ। श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापको समझकर ( स्मरण करके) अंगद क्रोधित हो उठे और उन्होंने रावणकी सभामें प्रण करके ( दृढ़ताके साथ ) पर रोप दिया ।। ४ ।। जौं मम चरन सकसि सठ टारी । फिरहिं रामु सीता मैं हारी ।। सुनहु सुभट सब कह दससीसा । पद गहि धरनि पछारहु कीसा ॥ ५ ॥ और कहा- अरे मूर्ख ! यदि तू मेरा चरण हटा सके तो श्रीरामजी लौट जायगे, मैं सीताजीको हार गया । रावणने कहा है सब वीरो ! सुनो, पैर पकड़कर बंदरको पृथ्वीपर पछाड़ दो ।। ५ ।। इंद्रजीत भादिक बलवाना । हरपि उठे जहँ तह भट नाना ॥ सपटहिं करि घल विपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई॥६॥ इन्द्रजीत (मेघनाद) आदि अनेकों बलवान् योद्धा जहाँ-तहाँस हर्षित होकर उठे। वे पूरे बलसे बहुत-से उपाय करके झपटते हैं । पर पैर टलता नहीं, तब सिर नीचा करने फिर अपने-अपने स्थानपर जा बैठ जाते हैं ॥ ६ ॥ पुनि उठि झपटहिं सुर आराती। टरइ न कोस चरन एहि भाँती। पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी । मोह विटप नहिं सकहिं उपारी ॥ ७ ॥ [काकभुशुण्डिजी कहते हैं- वे देवताओंके शत्रु (राक्षस ) फिर उठकर शपटते हैं। परंतु हे सोके शत्रु गड़जी ! अंगदका चरण उनसे वैसे ही नहीं टलता जैसे कुयोगी (विषयी) पुरुष मोहरूपी वृक्षको नहीं उखाड़ सकते ॥ ७॥ दो-कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषा। झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ ॥ ३४(क)॥ करोड़ों वीर योद्धा, जो बलमें मेघनादके समान थे, हर्पित होकर उठे। वे बार- चार झपटते हैं, पर मानरका चरण नहीं उठता, तब लजाके मारे सिर नवाकर बैठ जाते हैं ॥ ३४ (क)॥ भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत रिपु मद भाग कोटि बिन ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग ॥३४(ख) जैसे करोड़ों विघ्न मानेपर भी संतकामननीतिको नहीं छोड़ता, वैसे हीवानर (अंगद)का
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७७२
* रामचरितमानस
चरण पृथ्वीको नहीं छोड़ता । यह देखकर शत्रु(रावण ) का मद दूर हो गया ||३४(ख) ॥
चौ०-कपि बल देखि सकल हिय हारे । उठा आयु कपिपरवार ।।
गहत चरन कह वालिकुमारा । मम पद गहें न तोर उबारा :
अंगदका बल देखकर सब हृदयमै हार गये । तर अंगदके ललकारनेपर रावण
खयं उठा । जब वह अंगदका चरण पकड़ने लगा तब वालिकुमार अंगदने कहा- मेर
चरण पकदनेसे तेग बचाव नहीं होगा!॥१॥
गहसि न राम चरन सठ जाई । सुनत फिरा मन अति सकुचाई ॥
भयउ तेजहत श्री सब गई । मध्य दिवस जिमि ससि सोहई ॥ ३॥
अरे मूर्ख ! तू जाकर श्रीरामजीके चरण क्यों नहीं पकड़ता ? यह तुनकर वा
मनमें बहुत ही सकुचाकर लौट गया। उसकी सारी श्री जाती रही । वह ऐसा तेजहीन हो
गया जैसे मध्याह्नमें चन्द्रमा दिखायी देता है ॥२॥
सिंघासन बैठेट सिर नाई । मानहुँ संपति सकल गवाई ॥
जगदातमा प्रानपति
रामा। तासुविमुख किमि लह वित्रामा ॥ ३ ॥
वह सिर नीचा करके सिंहासनपर जा बैठा। मानो सारी सम्पत्ति गवाकर बैठा
हो । श्रीरामचन्द्रजी जगत्भरके आत्मा और प्राणोंके स्वामी हैं। उनसे विमुख रहनेवाज
शान्ति कैसे पा सकता है? ॥३॥
उमा राम की भृकुटि बिलासा । होइ बिख पुनि पावइ नासा ॥
तुन ते कुलिस कुलिस तृन करई । तासु दूत पन कहु किमि टरई ॥ ४ ॥
[शिवजी कहते हैं- हे उमा ! जिन श्रीरामचन्द्रजीके भूविलास ( भौंहो
इशारे ) से विश्व उत्पन्न होता है और फिर नाशको प्राप्त होता है, जो तृणको वा मौर
पत्रको तृण पना देते हैं (अत्यन्त निर्बलको महान् प्रबल और महान् प्रबलको अत्यन्त
निर्बल कर देते हैं ), उनके दूतका प्रण, कहो कैसे टल सकता है ? |॥ ४ ॥
पुनि कपि कही नीवि बिधि नाना । मान न ताहि कालु निगराना ।
रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहिचल्यो बालि नृप जायो ॥ ५ ॥
फिर अंगदने अनेकों प्रकारसे नीति कही। पर रावणने नहीं माना, क्योंकि उसका
काळ निकट आ गया था । शत्रुके गर्वको चूर करके अंगदने उसको प्रभु श्रीरामचन्द्रजीका
सुयश सुनाया और फिर वह राजा वालिका पुत्र यह कहकर चल दिया-॥ ५ ॥
हती न खेत खेलाइ खेलाई । तोहि अवहिं का करौं बड़ाई ॥
प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा । सो सुनि रावन भयउ दुखारा । ३
रणभूमिमें तुझे खेला-खेलाकर न मा तबतक अभी [ पहलेसे ] क्या बड़ाई
करूँ। अंगदने पहले ही ( सभामें आनेसे पूर्व ही) उसके पुत्रको मार डाला था । वा
संवाद सुनकर रावण दुखी हो गया ॥ ६ ॥
*लंकाकाण्ड ७७३ जानुधान अंगद पन देखी । भय व्याकुल सब भए बिसेषी॥ ७॥ अंगदका प्रण[सफल] देखकर सब राक्षस भयले अत्यन्त ही व्याकुल हो गये ॥७॥ दो-रिपु बल धरपि हरपि कपि बालितनय बल पुंज । पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद केज ॥ ३५(क)॥ शत्रुके यस्का मर्दन कर, बल्की राशि वालिपुत्र अंगदजीने हर्पित होकर आकर श्रीरामचन्द्रजीले चरणकमल पकड़ लिये । उनका शरीर पुलकित है भौर नेत्रोंमें [पानन्दाशुओका ] जल भरा है ।। ३५ (क) । साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ विलखाइ। मंदोदरी रावनहि पहुरि पहुरि कहा समुझाइ ॥ ३५(ख)। संभ्या हो गयी जानकर दशग्रीव बिल्ललता हुआ (उदास होकर) महलमें गया । मन्दोदरीने रावणको समझाकर फिर कहा--11 ३५ (ख)॥ पो०-कंत अमुझि मन तजहु कुमतिही। सोइ न समर तुम्हहि रघुपतिही। रामानुज लघु रेखा सचाई । सोउ नहिं नाबहु असि मनुसाई ।। हे कान्त ! मनमें समझकर (विचारकर ) कुबुदिको छोड़ दो। मापसे और भीरघुनाथजीसे मुद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटे भाईने एक जरा-सी रेखा खींच दी थी, उसे भी आप नहीं सँव सके, ऐसा तो आपका पुरुपत्व है ॥ १ ॥ पिय तुम्ह ताहि जितव संग्रामा । जाके दूत केर यह कामा । कौतुक सिंधु नाधि तव लंका । आयउ फपि केहरी असंका ॥२॥ हे प्रियतम ! आप उन्हें संग्राममें जीत पायेंगे, जिनके दूतका ऐसा काम है । खेलसे ही समुद्र ढौंचकर वह वानरोंमें सिंह ( हनुमान् ) आपकी लठाम निर्भय चला आया ॥२॥ रखवारे हति विपिन उजारा । देखत तोहि अग्छ तेहिं मारा॥ जारि सफल पुर कीन्हेसि छारा । कहाँ रहा बल गर्ष तुम्हारा ॥३॥ रखवालोंको मारकर उसने अशोकवन उजाड़ डाला । आपके देखते-देखते उसने अध्यकुमारको मार डाला और सम्पूर्ण नगरको जलाकर राख कर दिया। उस समय मापके वलका गर्व कहाँ चला गया था ? ॥ ३ ॥ भत्र पति भूपा गाल जनि मारहु । मोर कहा कछु हृदय विचारहु ॥ पति खुपतिहि नृपति अनि मानहु । अग जग नाय अतुलयल जानहु ॥ ४ ॥ अब हे स्वामी ! झूठ (व्यर्थ ) गाल न मारिये (डींग न हॉकिये)। मेरे कहनेपर हृदयमें कुछ विचार कीजिये । हे पति ! आप श्रीरघुपतिको [ निरा] राजा मत समझिये, बल्कि अग-जगनाथ (चराचरक स्वामी) और अतुलनीय बलयान जानिये ॥४॥ मारीचा । तासु कहा नहिं मानेहि नीया ।। जनक सभा अगनित भूपाला । रहे तुम्हउ वल अतुल बिसाला ॥ ५॥ यान प्रताप जान । ७७४ *रामचरितमानस * श्रीरामजीके बाणका प्रताप तो नीच मारीच भी जानता था। परंतु आपने उसका कहना भी नहीं माना | जनककी सभामें अगणित राजागण । वहाँ विद्याज और अतुलनीय बलवाले आप भी थे ॥ ५ ॥ भंजि धनुष जानकी यिाही । तब संग्राम जितेहु किन ताही ।। सुरपति सुत जानइ बल थोरा । राखा जित ऑखि गहि फोरा ॥३॥ वहाँ शिवजीका धनुष तोड़कर श्रीरामजीने जानकीको व्याहा, तब आपने उनको संग्राममें क्यों नहीं जीता १ इन्द्रपुत्र जयन्त उनके बलको कुछ-कुछ जानता है। श्रीरामजीने पकड़कर, केवल उसकी एक आँख ही फोड़ दी और उसे जीवित ही छोड़ दिया ॥६॥ सूपनखा के गति तुम्ह देखी । तदपि हृदय नहिं लाज बिसेपी ॥ ७ ॥ शूर्पणखाकी दशा तो आपने देख ही ली। तो भी आपके हृदयमें [ उनसे लड़नेकी बात सोचते ] विशेष (कुछ भी) लजा नहीं आती ! ॥ ७ ॥ दो-वधि विराध खर दूषनहि लीलाँ हत्यो कबंध । वालि एक सर मारयो तेहि जानहु दसकंध ॥३६॥ जिन्होंने विराध और खर-दूषणको मारकर लोलासे ही कबन्धको भी मार डाला और जिन्होंने बालिफो एक ही बाणसे मार दिया, हे दशकन्ध ! आप उन्हें ( उनके महत्त्वको) समझिये ! ॥ ३६ ॥ चौ-जेहिं जलनाथ बंधायड हेला । उतरे प्रभु दल सहित सुवेला ॥ कारुनीक दिनकर कुल केत् । दूत पठायउ तव हित हेत् ॥ १ ॥ जिन्होंने खेलसे ही समुद्रको बँधा लिया और जो प्रभु सेनासहित सुबेल पर्वतपर उतर पड़े, उन सूर्यकुलके ध्वजास्वरूप (कीर्तिको बढ़ानेवाले) करुणामय भगवान्ने आपहीके हितके लिये दूत भेजा ॥ १ ॥ सभा माझ जेहिं तव बल मथा | करि बख्य महुँ मृगपति जथा ॥ अंगद हनुमत अनुचर जाके । रन बाँकुरे बोर अति बाँके ॥ २ ॥ जिसने बीच सभामें आकर आपके बलको उसी प्रकार मथ डाला जैसे हाथियों के झुंडमें आकर सिंह [ उसे छिन्न-भिन्न कर डालता है ] । रणमें बाँके अत्यन्त विकट वीर अंगद और हनुमान जिनके सेवक हैं, ॥ २ ॥ तेहि कह पिय पुनि पुनि नर कहहू । मुधा मान ममता मद बहहू ॥ अहह कंत कृत राम बिरोधा । फाल विबस मन उपज न वोधा ॥ ३ ॥ हे पति ! उन्हें आप बार-बार मनुष्य कहते हैं। आप व्यर्थ ही मान, ममता और मदका बोझा ढो रहे हैं। हा प्रियतम ! आपने श्रीरामजीसे विरोध कर लिया और कालके विशेष वश होनेसे आपके मनमें अब भी ज्ञान नहीं उत्पन्न होता ||३|| 1 । वैठ जाइ *लंकाकाण्ड ७७५ काल दंड गहि काहु न मारा । हरइ धर्म बल बुद्धि विचारा ॥ निकट काल जेहि चावत साई । तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाई काल दण्ड (लाठी) लेकर किसीको नहीं मारता । वह धर्म, बल, बुद्धि विचारको हर लेता है। हे स्वामी ! जिसका काल (मरण-समय) निकट आ जाता उसे आपहीको तरह भ्रम हो जाता है ॥ ४ ॥ दो०-दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु । कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ विमल जसु लेहु ॥३७॥ आपके दो पुत्र मारे गये और नगर जल गया। [जो हुआ सो हुआ] हे प्रियतम ! अब भी [ इस भूलकी] पूर्ति (समाप्ति) कर दीजिये ( श्रीरामजीसे वैर त्याग दीजिये); और हे नाथ कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीको भजकर निर्मल यश लीजिये ॥३७॥ चौ०-नारि पचन सुनि बिसिख समाना । सभाँ गयउ उठि होत विहाना ॥ सिंघासन फूली । अति अभिमान त्रास सब भूली ॥ १ ॥ बीके वाणके समान वचन सुनकर वह सवेरा होते ही उठकर सभामें चला गया और सारा भय भुलाकर अत्यन्त अभिमानमें फूलकर सिंहासनपर जा बैठा ॥१॥ इहाँ राम अंगदहि बोलावा । आइ चरन पंकज सिरु नावा ॥ आदर समीप समीप बैठारी । बोले विहसि कृपाल खरारी ॥२॥ यहाँ ( सुवेल पर्वतपर) श्रीरामजीने अंगदको बुलाया । उन्होंने आकर चरण. कमलों में सिर नवाया। बड़े आदरसे उन्हें पास बैठाकर खरके शत्रु कृपालु श्रीरामजी इसकर बोले ॥२॥ बालितनय कौतुक अति मोही । तात सत्य कहु पूछउँ तोही ॥ रावनु जातुधान कुल टीका । भुज बल अतुल जासु जग लीका ॥ ३॥ हे वालिके पुत्र ! मुझे बड़ा कौतूहल है । हे तात ! इसीसे मैं तुमसे पूछता हूँ, सत्य कहना । जो रावण राक्षसोंके कुलका तिलक है और जिसके अतुलनीय बाहुबलकी जगत्भरमें धाक है, ॥३॥ तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए । कहहु तात कवनी विधि पाए । सुनु सर्वग्य प्रनत सुखफारी । मुकुट न होहिं भूप गुन चारी ॥ ४ ॥ उसके चार मुकुट तुमने फेंके । हे वात ! बताओ, तुमने उनको किस प्रकारते पाया ? [ अंगदने कहा-] हे सर्वज्ञ ! हे शरणागतको सुख देनेवाले ! सुनिये । वे मुकुट नहीं है, वे तो राजाके चार गुण हैं ॥ ४ ॥ साम दान अरु दंड बिभेदा । नृप उर वसहि नाय कह बेदा ॥ नीति धर्म के चरन सुहाए । अस जिय जानि नाथ पहिं आए ॥ ५ ॥ अति आदर त -- .
७७६ *रामचरितमानस * हे नाय ! वेद कहते हैं कि साम, दान, दण्ड और भेद-ये चारों राजाके पुक्यमें बसते हैं । ये नीति-धर्मके चार सुन्दर चरण हैं। [किंतु रावणमें धर्मका अभाव है] ऐसा जोमें जानकर ये नाथके पास आ गये हैं ॥ ५ ॥ दो०-धर्महीन प्रभु पद विमुख काल विवस दससीस। तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस ॥ ३८(क)। दशशीश रावण धर्महीन, प्रमुके पदसे विमुख और कालके वशमें है। इसलिये हे कोसलरान ! सुनिये, वे गुण रावणको छोड़कर आपके पास आ गये हैं ॥ ३८ (क)॥ परम चतुरता श्रवन सुनि विहँसे रामु उदार। समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार ॥ ३८(ख)॥ अंगदकी परम चतुरता [पूर्ण उक्ति ] कानोंसे सुनकर उदार श्रीरामचन्द्रजी हँसने जगे, फिर वालिपुत्रने किलेके (लङ्काके) सब समाचार कहे ।। ३८ (ख)॥ चौ०-रिपु के समाचार जव पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए । लंका बाँके चारि दुआरा । केहि बिधि लागि करहु विचारा॥ ५ ॥ जब शत्रुके समाचार प्राप्त हो गये, तब श्रीरामचन्द्रजीने सव मन्त्रियोंको पास बुलाया [ और कहा-] लङ्काके चार बड़े विकट दरवाजे हैं। उनपर किस तरह भाक्रमण किया जाय, इसपर विचार करो ॥१॥ तब कपीस रिच्छेस विभीषन । सुमिरिहृदय दिनकर कुल भूषन ॥ करि विचार तिन्ह मंत्र दावा । चारि अनी कपि कटकु बनावा ॥ २ ॥ तव वानरराज सुग्रीव, ऋक्षपति जाम्बवान् और विभीषणने हृदयमें सूर्यकुलके भूपण श्रीरघुनाथजीका स्मरण किया और विचार करके उन्होंने कर्तव्य निश्चित किया। वानरोंकी सेनाके चार दल बनाये ॥२॥ जयाजोग सेनापति कीन्हे । थप सकल बोलि तब लीन्हे ॥ प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए । सुनि कपि सिंघनाद करि धाए ॥ ३ ॥ और उनके लिये यथायोग्य (जैसे चाहिये वैसे ) सेनापति नियुक्त किये। फिर सब यूथपतियोंको बुला लिया और प्रभुका प्रताप कहकर सबको समझाया, जिसे सुनकर वानर सिंहके समान गर्जना करके दौड़े ॥३॥ हरषित राम चरन सिर नावहिं । गहि गिरिसिखर बोर सवधावहिं ।। गजहिं तहिं भालु कपीसा । जय रघुबीर कोसलाधीसा ॥ ४ ॥ वे इषित होकर श्रीरामजीके चरणों में सिर नवाते हैं और पर्वतोंके शिखर ले-लेकर सब वीर दौड़ते हैं। कोसलराज श्रीरघुवीरजीकी जय हो पुकारते हुए भालू और वानर गरबते और ललकारते है॥४॥ ।
* लंकाकाण्ड * ७७७ जानत परम दुर्ग भति लंका । प्रभु प्रताप कपि चले असंका ॥ घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरो । मुखहिं निसान बजावहिं भेरी ॥ ५॥ लंकाको अत्यन्त श्रेष्ठ (अजेय) किला जानते हुए भी वानर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे निडर होकर चले । चारों ओरसे घिरी हुई वादलोंकी घटाकी तरह लंकाको चारों दिशाओंसे घेरकर वे मुँहसे ही डंके और भेरी बजाने लगे ॥ ५ ॥ दो०-जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव । गर्जहिं सिंघनाद कपि भालु महा यल सीव ॥ ३९ ॥ महान बलकी सीमा वे वानर-भालू सिंहके समान ऊँचे स्वरसे 'श्रीरामजीकी जय। मणजीकी जया, 'वानरराज सुग्रीवकी जय-ऐसी गर्जना करने लगे ॥ ३९ ॥ चौ०-लंकाँ भयउ फोलाहल भारी । सुना दसानन अति महफारी ॥ देखहु बनरन्ह केरि विठाई । बिहसि निसाचर सेन बोलाई ॥ १ ॥ लंकामें बड़ा भारी कोलाहल ( कोहराम ) मच गया । अत्यन्त अहंकारी रावणने उसे सुनकर कहा-वानरोंकी ढिठाई तो देखो ! यह कहते हुए हँसकर उसने राक्षसोंकी सेना बुलायी ॥१॥ आए कीस काल के प्रेरे । छुधावंत सब निसिचर मेरे ।। भस कहि अहहास सठ कीन्हा । गृह बैठे भहार विधि दीन्हा ॥२॥ बंदर कालकी प्रेरणासे चले आये हैं। मेरे राक्षस सभी भूखे हैं। विधाताने इन्हें घर बैठे भोजन भेज दिया । ऐसा कहकर उस मूखने अट्टहास किया (वह बड़े जोरसे ठहाका मारकर हँसा)॥२॥ सुभट सकल धारिहुँ दिसि जाहू । धरि धरि भालु कीस सब खाहू ॥ समा रावनहि अस अभिमाना । जिमि टिटिभ खग सूत उताना ॥ ३ ॥ [और बोला- हे वीरो ! सब लोग चारों दिशाओंमें जाओ और रीछ-वानर सयको पकड़-पकड़कर खाओ । [ शिवजी कहते हैं- हे उमा ! रावणको ऐसा अभिमान था, जैसे टिटिहिरी पक्षी पैर ऊपरकी ओर करके सोता है | मानो आकाशको थाम लेगा] ||३॥ च निसाचर भायसु मागी । गहि फर मिडिपाल पर साँगी । तोमर मुद्र परसु प्रचंता । सूल कृपान परिष गिरिखंडा ॥ ४ ॥ 'आशा माँगकर और हाथोंमें उत्तम भिदिपाल, साँगी (वरछी), तोमर, मुद्र, प्रचण्ड फरसे, शूल, दुधारी तलवार, परिघ और पहाड़ोंके टुकड़े लेकर राक्षस चले ॥४॥ जिभि भरुनोपल निकर निहारी। धावहिं सठ खग मांस अहारी॥ धोध भंग दुख तिन्हहि न सूक्षा । तिमि धाए मनुजाद अक्षा ॥ ५ ॥ जैसे मूर्ख मांसाहारी पक्षी लाल पत्थरोंका समूह देखकर उसपर टूट पड़ते हैं, [पत्थरों- ७७८ *रामचरितमानल* पर लगनेसे ] चोंच टूटनेका दुःख उन्हें नहीं सूझता, ते ही ये बेसमझ राक्षत दौड़े ॥ ५ ॥ दो-नानायुध सर चाप धर जातुधान बल वीर। कोद कँगूरन्हि चढ़ि गए होटि कोटि रनधीर ॥ ४० ॥ अनेक प्रकारके अन्न-पत्र और धनुष-बाग धारण किये जगेड़ों बलवान और रणधीर राक्षस वीर परकोटेके कँगूपर चढ़ गये ।। ४०॥ ची० कोट कॅगूरन्हि सोहहिं कैसे । मेह के संगनि जनु वन वैसे ॥ वाजहिं बोल निसान जुझाङ । सुनि धुनि होइनटन्दि मन चाऊ॥ १ ॥ वे परकोटेक कॅग्रोपर कैनै शोभित हो रहे हैं, मानो सुमेरक शिखरोंपर बादल बैठे हो । जुझाऊ ढोल और डंके आदि बज रहे हैं, [जिनकी ] ध्वनि सुनकर योद्धाओंके मनमें [लड़नेका ] चाव होता है ॥१॥ बाजहिं भेरि नफीरि अपारा । सुनि कादर उर जाहिं दरारा ॥ देखिन्ह बाइ कपिन्ह के ठहा। अति विसाल तनु भालु सुनहा ॥ २ ॥ अगणित नफीरी और भेरी बज रही है, [जिन्हें] सुनकर कायरोंके हृदय दरारें पड़ जाती है । उन्होंने जाकर अत्यन्त विशाल शरीरवाले महान योद्धा वानर और भालुओंके ठट्ट ( समूह) देखे ॥२॥ घावहिं गनहिं न अवघट घाटा पर्वत फोरि करहिं गहि बाटा ।। कटकटाहि कोटिन्ह भट गहिं । दसन ओड झाटहिं अति वहिं ॥ ३ ॥ [ देखा कि ] वे रीछ-वानर दौड़ते हैं। औरट (ऊँची-नीची, विकट ) वाटियाँको कुछ नहीं गिनते । पकड़कर पहाड़ोंको फोड़कर रास्ता बना लेते हैं। करोड़ो दादा घटकटाते और गरजते हैं। दाँताते ओंठ काटते और खूब इस्टने है ।। ३ ।। उत राधन इत राम दोहाई । जयति जयति जय परी लराई ।। निसिचर सिखर समूह दहावहिं । ऋदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं ॥ ५५ उपर रावणकी और इधर श्रीरामजीकी दोहाई बोली जा रही है। जब जया, जया की ध्वनि होते ही लड़ाई छिड़ गयी । राक्षस पहाड़ोंके देर-के-ढेर शिखरोंको फेंकते है । वानर कूदकर उन्हें पकड़ लेते हैं और वापस उन्हींकी और चलाते हैं ॥४॥ छं०-धरि कुधर खंड प्रचंड मर्कट भालु गढ़ पर डारहीं। झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत यहुरिपचारहीं। अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए। कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जलु गावत भए । प्रचण्ड वानर और भाल पर्वताके टुकड़े ले-लेकर किलेपर डालते हैं। वे झपटते हैं और राक्षसोंके पैर पकड़कर उन्हें पृथ्वीपर पटककर भाग चल्ते हैं और फिर लकारते है। बहुत ही चञ्चल और बड़े तेजखी वानर-भार बड़ी फुत्ति उछलकर किलपर चढ़-
*लंकाकाण्ड*
७७९
चढ़कर गये और जहाँ-तहाँ महलोंमें घुसकर श्रीरामजीका यश गाने लगे।
दो०-एदु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ ।
ऊपर आषु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ ॥ ४१ ॥
फिर एक-एक राक्षसको पकड़कर वे वानर भाग चले। ऊपर आप और नीचे
[राक्षस ] योद्धा-इस प्रकार वे [ किलेपरसे ] धरतीपर आ गिरते हैं ॥ ४१ ॥
चौ०-राम प्रताप प्रबल कपि जूथा । महिं निसिचर सुभट बख्था ।
चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तह बानर । जय रघुबीर प्रताप दिवाकर ॥ ५ ॥
श्रीरामजीके प्रतापसे प्रबल वानरोंके झुंड राक्षस योद्धाओंके समूह के समूह
योद्धाओंको मसल रहे हैं । वानर फिर जहाँ-तहाँ किलेपर चढ़ गये और प्रतापमें सूर्यके
समान श्रीरघुवीरकी जय बोलने लगे ॥ १ ॥
चले निसाचर निकर पराई। प्रबल पवन जिमि धन समुदाई ॥
हाहाकार
भयउ पुर भारी । रोहिं बालक आतुर नारी ॥ २ ॥
राक्षसोंके झुंड वैसे ही भाग चले, जैसे जोरकी हवा चलनेपर वादलोंके समूह
तितर-बितर हो जाते हैं । लंका नगरोमें बड़ा भारी हाहाकार मच गया। बालक, नियों
और रोगी | असमर्थताके कारण] रोने लगे ॥२॥
सब मिलि देहिं रावनहि गारी । राज करत एहिं मृत्यु हकारी ॥
निज दल बिचल सुनी तेहिं काना । फेरि सुभट लंकेस रिसाना ॥ ३ ॥
सब मिलकर रावणको गालियाँ देने लगे कि राज्य करते हुए इसने मृत्युको
बुला लिया। रावणने जब अपनी सेनाका विचलित होना कानोंसे सुना, तब [भागते हुए)
योद्धाओंको लौटाकर वह क्रोधित होकर बोला-1३॥
जो रन बिमुख सुना मैं काना । सो मैं हतब कराल रुपाना ॥
सर्वसु खाइ भोग करि नाना । समर भूमि भए वल्लभ माना ॥ ४ ॥
मैं जिसे रणसे पीठ देकर भागा हुआ अपने कानों सुनूँगा, उसे स्वयं भयान
दुधारी तलवारसे मारूँगा । मेरा सब कुछ खाया, भाँति-भाँतिके भोग किये और अब
रणभूमिमें प्राण प्यारे हो गये ॥४॥
उग्र बचन सुनि सकल डेराने । चले क्रोध करि सुभट लजाने ॥
सन्मुख भरन बीर के सोभा। तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा ॥ ५॥
रावणके उग्र ( कठोर) वचन सुनकर सब वीर डर गये और लजित होकर क्रोध
करफे युद्ध के लिये लौट चले । रणमें [ शत्रुके ] सम्मुख (सुद्ध करते हुए ) मरनेमें ही
वीरकी शोभा है । [ यह सोचकर ] तब उन्होंने प्राणों का लोभ छोड़ दिया ॥ ५ ॥
दो०-बहु आयुध धर सुभट सव भिरहि पचारि पचारि।
ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारि ॥ ४२ ॥
।
* रामचरितमानस *
बहुत-से अस्त्र-शस्त्र धारण किये सब वीर ललकार-ललकारकर भिड़ने लगे। उन्होंने
परिषों और त्रिशूलोंसे मार-मारकर सब रीछ-वानरोंको व्याकुल कर दिया ॥ ४२ ॥
o-भय आतुर कपि भागन लागे । जयपि उमा जीतिहहिं आगे ॥
फोउ कह कह अंगद हनुमंता । कह नल नील दुबिद बलवंता ॥ १ ॥
[शिवजी कहते हैं-] वानर भयातुर होकर ( डरके मारे घबड़ाकर ) भागने
लगे, यद्यपि हे उमा ! आगे चलकर [ वे ही ] जीतेंगे। कोई कहता है-अंगद, हनुमान्
कहाँ हैं । बलवान् नल, नील और द्विविद कहाँ हैं १ ॥१॥
निज दल बिकल सुना हनुमाना। पच्छिम द्वार रहा बलवाना ॥
मेघनाद तह करइ लराई। टूट न द्वार परम कठिनाई ॥ २ ॥
हनुमान्जीने जब अपने दलको विकल ( भयभीत ) हुआ सुना, उस समय वे
नुवान पश्चिम द्वारपर थे। वहाँ उनसे मेघनाद युद्ध कर रहा था । वह द्वार टूटता न
था, पड़ी भारी कठिनाई हो रही थी ॥२॥
पवनतनय मन भा अति क्रोधा । गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा ॥
दि लंक गढ़ ऊपर वा । गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा ॥ ३ ॥
तब पवनपुत्र हनुमान्जीके मनमें बड़ा भारी क्रोध हुआ। वे कालके समान योद्धा
बड़े जोरसे गरजे और कूदकर लंकाके किलेपर आ गये और पहाड़ लेकर मेघनादकी
योर दोड़े ॥३॥
भंजेउ स्थ सारथी निपाता । ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता ॥
दुसरें सूत पिकल तेहि जाना । स्यंदन घालि तुरत गृह आना ॥ ४ ॥
रथ तोड़ डाला, सारथिको मार गिराया और मेघनादकी छातीमें लात मारी,
दूसरा सारथि मेघनादको व्याकुल जानकर, उसे रथमें डालकर, तुरंत घर ले आया ॥ ४ ॥
दो०-अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल ।
रन बाँकुरा वालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल ॥ ४३ ॥
इधर अंगदने सुना कि पवनपुत्र हनुमान् किलेपर अकेले ही गये हैं, तो रणमें
बाँके यालिपुत्र वानरके खेलकी तरह उछलकर किलेपर चढ़ गये ॥ ४३ ॥
पी०-जुद्ध विरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर । राम प्रताप सुमिरि उर अंतर ॥
रावन भवन चढ़े द्वौ धाई। करहिं कोसलाधीस दोहाई ॥ १ ॥
युद्ध में शत्रुओं के विरुद्ध दोनों वानर झुद्ध हो गये । हृदयमें श्रीरामजीके प्रतापका
स्मरण करके दोनों दौड़कर रावणके महलपर जा चढ़े और कोसलराज श्रीरामजीकी
दुहाई वोलने लगे ॥ १ ॥
फलस सहित गहि भवनु दहावा । देखि निसाचरपति भय पावा ॥
नारि बूंद कर पीटहिं छाती । अब दुइ कपि आए उतपाती ॥ २ ॥
* लंकाकाण्ड * ७१ उन्होंने कलशसहित महलको पकड़कर ढहा दिया। यह देखकर राक्षसराज रावण डर गया । सव स्त्रियाँ हाथोंसे छाती पोटने लगों [ और कहने लगी-] अबकी बार दो उत्पाती वानर एक साथ ] आ गये ॥२॥ कपिलीला कार तिन्हहि डेरावहिं । रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं । पुनि कर गहि कंचन के खंभा । कहेन्हि फरिभ उतपात अरंभा ॥ २ ॥ वानरलीला करके (घुड़की देकर) दोनों उनको डराते हैं और श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर यश सुनाते हैं । फिर सोनेके खंभोंको हार्थोसे पकड़कर उन्होंने [ परस्पर ] कहा कि अब उत्सात आरम्भ किया जाय ॥३॥ गर्जि परे रिपु कटक मझारी । लागे मर्दै भुज बल भारी॥ काहुहि लात चपेटन्हि केहू । भजहु न रामहि सो फल लेहू ॥ ३. वे गर्जकर शत्रुकी सेनाके बीचमें कूद पड़े और अपने भारी भुजवलसे उसका मर्दन करने लगे। किसीको लातसे और किसीको थप्पड़से खबर लेते हैं [ और कहते हैं कि ] तुम श्रीरामजीको नहीं भजते, उसका यह फल लो ॥ ४ ॥ दो०--एक एक सौ मर्दहिं तोरि चलावहि मुंड । रावन आगे परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड ॥४४॥ एकको दूसरेसे [ रगड़कर ] मसल डालते हैं और सिरोंको तोड़कर फेंकते हैं। वे सिर जाकर रावणके सामने गिरते हैं और ऐसे फूटते है,मानो दहीके कूँड़े फूट रहे हों॥४॥ चौ०-महा महा मुखिआ जे पावहिं । ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं। कहइ विभीषनु तिन्ह के नामा । देहिं राम तिन्हहू निज धामा ॥ १ ॥ जिन बड़े-बड़े मुखियों (प्रधान सेनापतियों ) को पकड़ पाते हैं, उनके पैर पकड़- कर उन्हें प्रभुके पास फेंक देते हैं। विभीषणजी उनके नाम बतलाते हैं और श्रीरामजी उन्हें भी अपना धाम (परमपद ) दे देते हैं ॥ १॥ खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी। उमा राम मृदुचित करुनाकर । बयरभाव सुमिरत मोहि निसिचर ॥ ३॥ ब्राहाणोंका मांस खानेवाले वे नरभोजी दुष्ट राक्षस भी वह परमगति पावे । जिसकी योगी भी याचना किया करते हैं [ परंतु सहनमें नहीं पाते शिवजी कहो हैं-हे उमा ! श्रीरामजी बड़े ही कोमलहृदय और करुणाकी खान हैं। [ वे सोच हैं कि ] राक्षस मुझे वैरभावसे ही सही, स्मरण तो करते ही हैं ॥ २॥ देहि परम गति सो जिय जानी। अस कृपाल को कहहु भवानी॥ अस प्रभु सुनि नभजहिं अमत्यागी। नर मतिमंद ते परम अभागी ॥ ३ ॥ ऐसा हृदयमें जानकर वे उन्हें परमगति ( मोश्च ) देते हैं। हे भवानी ! कहो तो ऐसे कृपाल [और ] कौन हैं ? प्रभुका ऐसा खभाव सुनकर भी जो मनुष्य श्रम त्याग- - " * रामचरितमानस * कर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यन्त मन्दबुद्धि और परम भाग्यहीन हैं ॥ ३ ॥ अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा । फीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा ॥ लंका द्वौ कपि सोहाई कैसें । महिं सिंधु दुइ मंदर जैसें ॥ ४ ॥ श्रीरामजीने कहा कि अंगद और हनुमान् किले में घुस गये हैं। दोनों वानर लङ्कामें [विश्वंस करते ] कैसे शोभा देते हैं, जैसे दो मन्दराचल समुद्रको मथ रहे हों ॥ ४ ॥ दो-भुज वल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत । कूदे जुगल विगत श्रम आए जहँ भगवंत ॥ ४५ ॥ भुजाओंके बलसे शत्रुकी सेनाको कुचलकर और मसलकर, फिर दिनका अन्त होता देखकर हनुमान् और अंगद दोनों कूद पड़े और श्रम ( थकावट ) रहित होकर अहाँ आ गये, जहाँ भगवान् श्रीरामजी थे ॥ ४५ ॥ चौ०-प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए । देखि सुभट रघुपति मन भाए । राम कृपा करि जुगल निहारे । भए विगतश्रम परम सुखारे ॥ १ ॥ उन्होंने प्रभुके चरणकमलोंमें सिर नवाये । उत्तम योद्धाओंको देखकर श्रीरघुनाथ- जी मनमें बहुत प्रसन्न हुए। श्रीरामजीने कृपा करके दोनोंको देखा, जिससे वे श्रमरहित और परम सुखी हो गये ॥ १ ॥ गए जानि अंगद हनुमाना। फिरे भालु मर्कट भट नाना ॥ जातुधान प्रदोष बल पाई। धाए करि दससीस दोहाई ॥२॥ अंगद और हनुमान्को गये जानकर सभी भालू और वानर वीर लौट पड़े। राक्षसोंने प्रदोष ( सायं ) कालका बल पाकर रावणकी दुहाई देते हुए वानरोंपर धावा कियार निसिचर अनी देखि कपि फिरे । जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे ॥ द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी । लरत सुभट नहिं मानहिं हारी ॥ ३ ॥ राक्षसोंकी सेना आती देखकर वानर लौट पड़े और वे योद्धा जहाँ-तहाँ कटकटा- फर भिड़ गये। दोनों ही दल बड़े बलवान हैं । योद्धा ललकार-ललकारकर लड़ते हैं, कोई हार नहीं मानते ॥ ३ ॥ महाबीर निसिचर सब कारे । नाना बरन बलीमुख भारे॥ सबल जुगल दल समबल जोधा । कौतुक करत लरत फरि क्रोधा ॥ ४ ॥ सभी राक्षस महान् वीर और अत्यन्त काले हैं और वानर विशालकाय तथा अनेकों रंगोंके हैं। दोनों ही दल वलवान् है और समान बलवाले योद्धा हैं। वे क्रोध करके लड़ते हैं और खेल करते (वीरता दिखलाते) है ॥ ४ ॥ प्राबिट सरद पयोद घनेरे । लरत मनहुँ भारत के प्रेरे ॥ अनिए अकंपन अरु अतिकाया। विचलत सेन कीन्हि इन्ह माया ॥ ५ ॥ [ राक्षस और वानर युद्ध करते हुए ऐसे जान पड़ते हैं ] मानो क्रमशः वर्षा और * लंकाकाण्ड * ७८३ शरद् ऋतुके बहुत-से बादल पवनसे प्रेरित होकर लड़ रहे हों । अकंपन और अतिकाय इन सेनापतियोंने अपनी सेनाको विचलित होते देखकर माया की ॥ ५ ॥ भयउ निमिष महँ अति अँधिआरा । बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा ॥ ६ ॥ पलभरमै अत्यन्त अन्धकार हो गया। खून, पत्थर और राखकी वर्षा होने बगी॥६॥ दो-देखि निविड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार । एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार ॥ ४६ ॥ दसों दिशाओंमें अत्यन्त घना अन्धकार देखकर वानरोंकी सेनामें खलबली पड़ गयो । एकको एक (दूसरा) नहीं देख सकता और सब जहाँ-तहाँ पुकार कर रहे हैं ॥४६॥ चौ०-सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना । समाचार सब कहि समुझाए । सुनत कोपि कपिकुंजर धाए ॥ १ ॥ श्रीरघुनाथजी सब रहस्य जान गये। उन्होंने अंगद और हनुमानको बुला लिया और अब समाचार कहकर समझाया। सुनते ही वे दोनों कपिश्रेष्ठ क्रोध करके दौड़े ॥१॥ पुनि कृपाल हलि चाप चढ़ावा । पावक सायक सपदि चलावा ॥ भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं । ग्यान उदय जिमि संसय जाहीं ॥ २ ॥ फिर कृपालु श्रीरामजीने हँसकर धनुष चढ़ाया और तुरंत ही अग्निबाण चलाया, निरासे प्रकाश हो गया कहीं अँधेरा नहीं रह गया । जैसे ज्ञानके उदय होनेपर [सब प्रकारके ] संदेह दूर हो जाते हैं ॥२॥ भालु बलीसुख पाइ प्रकासा। धाए हरष बिगतश्रम बासा ।। हनुमान अंगद गाजे । हाँक सुनत रजनीचर भाजे ॥ ३ ॥ भालू और वानर प्रकाश पाकर श्रम और भयसे रहित तथा प्रसन्न होकर दौड़े। हनुमान् और अंगद रणमें गरज उठे । उनकी हाँक सुनते ही राक्षस भाग छूटे ॥ ३ ॥ भागत भट पटकहिं धरि धरनी । करहिं भालु कपि अद्भुत करनी ॥ गहि पद सारहिं सागर माहीं। मकर उरग शष धरि धरि खाहीं ॥ ४ ॥ भागते हुए राक्षस योद्धाओंको वानर और भालू पकड़कर पृथ्वीपर दे मारते हैं और भद्त ( आश्चर्यजनक ) करनी करते हैं ( युद्धकौशल दिखलाते हैं )। पैर पकड़कर उन्हें समुद्रमें डाल देते हैं । वहाँ मगर, साँप और मच्छ उन्हें पकड़-पकड़कर खा जागते है॥४॥ दो०-कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ । गर्जहिं भालु बलीमुख रिपुदल वल विचलाइ ॥४७॥ कुछ मारे गये, कुछ घायल हुए, कुछ भागकर गढ़पर चढ़ गये । अपने बलसे शत्रुदलको विचलित करके रीछ और वानर [ वीर ] गरज रहे हैं ।। ४७ ॥
- . * रामचरितमानस * चौ०-निसा जानि कपि चारिड अनी। आए जहाँ कोसला धनी ॥ राम कृपा करि चितवा सबही । भए विगतश्रम बानर तवही ॥ .. रात हुई जानकर वानरोंको चारों सेनाएँ ( टुकड़ियाँ ) वहाँ आयी, जहाँ कोसन- पति श्रीरामजी थे। श्रीरामजीने यो हो सबको कृपा करके देखा, त्यो ही ये वानर अम. रहित हो गये ॥१॥ उहाँ दसानन सचिव हँकारे । सब सन कहेसि सुभट जे मारे । आधा कटकु कपिन्ह संवारा । कहहु बेगि का करिअ बिचारा ॥ २॥ वहाँ [लङ्कामें ] रावणने मन्त्रियोंको बुलाया और जो योदा मारे गये थे, उन सबको सबसे बताया। [ उसने कहा--] वानरोंने आधी सेनाका संहार कर दिया । अब शीघ्र बताओ, क्या विचार ( उपाय ) करना चाहिये १ ॥२॥ माल्यवंत अति जरठ निसाचर । रावन मातु पिता मंत्री बर।। बोला बचन नीति अति पावन । सुनहु तात कछु मोर सिखावन ॥ ३ ॥ माल्यवंत [ नामका एक ] अत्यन्त बूढ़ा राक्षस था। वह रावणकी माताका पिता (अर्थात् उसका नाना) और श्रेष्ठ मन्त्री था। वह अत्यन्त पवित्र नीतिके वचन बोला-हे तात ! कुछ मेरी सीख भी सुनो--॥३॥ जब ते तुम्ह सीता हरि आनी । असगुन होहिं न जाहिं वखानी ॥ बेद पुरान जासु जसु गायो । राम विमुख काहुँ न सुख पायो ॥ ४ ॥ जबसे तुम सीताको हर लाये हो, तबसे इतने अपशकुन हो रहे हैं कि जो वर्णन नहीं किये जा सकते । वेद-पुराणोंने जिनका यश गाया है, उन श्रीरामसे विमुख होकर किसीने सुख नहीं पाया ॥४॥ दो -हिरन्याच्छ भ्राता कैटभ वलवान । जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान ॥ ४८(क)। भाई हिरण्यकशिपुसहित हिरण्याक्षको और बलवान् मधु-कैटभको जिन्होंने मारा था। वे ही कृपाके समुद्र भगवान् [ रामरूपसे ] अवतरित हुए हैं ।। ४८ (क)॥ मासपारायण, पचीसवाँ विश्राम कालरूप खल वन दहन गुनागार घनबोध । सिव विरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन विरोध ॥४८(स)॥ जो कालस्वरूप है, दुष्टोंके समूहरूपी वनको भल करनेवाले[अग्नि] हैं, गुणोंके धाम और ज्ञानधन है एवं शिवजी और ब्रह्माजी भी जिनकी सेवा करते हैं, उनसे वैर कैसा ? ॥४(ब)॥ देहु वैदेही । भजहु कृपानिधि परम सनेही ॥ ताके वचन बान सम लागे । करिआ मुह करि जाहि अभागे॥ ॥ सहित मधु चौ०-परिहरि वयरु * लंकाकाण्ड * ७८५ [अतः ] वैर छोड़कर उन्हें जानकीजीको दे दो और कृपानिधान परम स्नेही श्रीरामजीका भजन करो । रावणको उसके वचन बाणके समान लो। [वह बोला- अरे अभागे ! मुँह काला करके [ यहाँसे] निकल जा ॥१॥ बुद्ध भएसि न त मरतेउँ तोही । अव जनि नयन देखावसि मोही ।। तेहिं अपने मन अस अनुमाना । बध्यो चहत एहि कृपानिधाना ॥ २ ॥ तू बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुझे मार ही डालता । अब मेरी आँखोंको अपना मुँह न दिखला। रावणके ये वचन सुनकर उसने ( माल्यवान्ने ) अपने मनमें ऐसा अनुमान किया कि इते कृपानिधान श्रीरामजी अब मारना ही चाहते हैं ॥२॥ सो उठि गयउ कहत दुर्बादा । तब सकोप बोलेउ धननादा ॥ कौतुक प्रात देखिहु मोरा । करिहउँ बहुत कहौं का थोरा ॥ ३ ॥ वह रावणको दुर्वचन कहता हुआ उठकर चला गया । तब मेघनाद क्रोधपूर्वक योला-सबेरे मेरी करामात देखना । मैं बहुत कुछ करूँगा; थोड़ा क्या कहूँ १ (जो कुछ वर्णन करूँगा थोड़ा ही होगा)॥३॥ सुनि सुत बचन भरोसा आवा। प्रीति समेत अंक बैठावा ॥ करत विचार भयउ भिनुसारा । लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा ॥ ४ ॥ पुत्रके वचन सुनकर रावगको भरोसा आ गया। उसने प्रेमके साथ उसे गोदमें चैठा लिया। विचार करते-करते ही सबेरा हो गया । वानर फिर चारों दरवाजोंपर जा लगे ॥४॥ फोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ घेरा । नगर कोलाहल भयउ घनेरा ।। विविधायुध धर निसिचर धाए । गढ़ ते पर्वत सिखर ढहाए ॥ ५ ॥ वानरोंने क्रोध करके दुर्गम किलेको घेर लिया । नगरमें बहुत ही कोलाहल (शोर) मच गया । राक्षस बहुत तरहके अस्त्र-शस्त्र धारण करके दौड़े और उन्होंने किलेपरसे पहाड़ोंके शिखर ढहाये ॥५॥ छं.--ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह विविध बिधि गोला चले। घहरात जिमि पविपात. गर्जत जनु प्रलय के वादले॥ मर्कट विकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए । गहिसैलतेहि गढ़ पर चलावहिं जहँसोतहँ निसिचर हए॥ उन्होंने पर्वतोंके करोड़ों शिखर ढहाये, अनेक प्रकारसे गोले चलने लगे। वे गोले ऐसा घहराते हैं जैसे वज्रपात हुआ हो ( बिजली गिरी हो) और योद्धा ऐसे गरजते हैं मानो प्रलयकालके वादल हों । विकट वानर योद्धा भिड़ते हैं, कट जाते हैं (घायल हो जाते हैं), उनके शरीर जर्जर ( चलनी) हो जाते हैं, तब भी वे लटते नहीं (हिम्मत रा०स०५०- ७८६ * रामचरितमानस * नहीं हारते)। वे पहाड़ उठाकर उसे किलेपर फेंकते हैं। राक्षस जहाँ-के-तहाँ ( जो जहाँ होते हैं वहीं) मारे जाते हैं। दो-मेघनाद सुनि अवश अस गढ़ पुनि ठेका आइ । उतरप्यो वीर दुर्ग ते सन्मुख चल्यो बजाइ ॥ ४९ ॥ मेघनादने कानोंसे ऐसा सुना कि वानरोने आकर फिर किलेको घेर लिया है। तब वह वीर किलेसे उतरा और डंका बजाकर उनके सामने चला ॥ ४९ ।। चौ०-फहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता बसी सकल लोक विख्याता ॥ कह नल नील दुबिद सुग्रीवा । अंगद हनूमंत वल सींवा ॥ १ ॥ [मेघनादने पुकारकर कहा--] समस्त लोकोंमें प्रसिद्ध धनुर्धर कोसलाधीश दोनों भाई कहाँ है ? नल, नील, द्विविद, सुग्रीव और बलकी सीमा अंगद और हनुमान् कहाँ है ? ॥१॥ कहाँ बिभीषनु भ्रातारोही। आजु सहि हठि मारउँ ओही ॥ अस कहि कठिन वान संघाने । अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने ॥ २ ॥ भाईसे द्रोह करनेवाला विभीषण कहाँ है ? आज मैं सबको और उस दुष्टको तो इठपूर्वक (अवश्य ही) मासँगा। ऐसा कहकर उसने धनुषपर कठिन वाणोंका संधान किया और अत्यन्त क्रोध करके उसे कानतक खींचा ॥२॥ सर समूह सौ छाई लागा। जनु स्पच्छ धावहिं बहु नागा । जहँ तह परत देखिगहिं बानर । सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर ॥ ३ ॥ वह बाणोंके समूह छोड़ने लगा मानो बहुत-से पंखवाले साँप दौड़े जा रहे हों। यहाँ-तहाँवानर गिरते दिखायी पड़ने लगे। उस समय कोई भी उसके सामने न होसके ||३|| जहूँ तर भागि चले फपि रीछा। विसरी सबहि जुद्ध के ईछा ॥ सो कपि भालु न रन सह देखा। कीन्हेसि जेहि न मान अवसेषा ॥ ४ ॥ रीछ-वानर जहाँ तहाँ भाग चले । सबको युद्धकी इच्छा भूल गयी । रणभूमिमें ऐसा एक भी वानर या भालू नहीं दिखायी पड़ा, जिसको उसने प्राणमात्र अवशेष न कर दिया हो (अर्थात् जिसके केवल प्राणमात्र ही न बचे हों; बल, पुरुषार्थ सारा जाता न रहा हो) ॥४॥ दो०-दस दस सर सब मारेलि परे भूमि कपि वीर । सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद वल धीर॥५०॥ फिर उसने सबको दस-दस वाण मारे, वानर वीर पृथ्वीपर गिर पड़े। बलवान् और धीर मेघनाद सिंहके समान नाद करके गरजने लगा ॥५०॥ प्पो० देत्रि पवनसुत फटक विहाला । क्रोधवंत जनु धायउ काला ॥ महासक एक सुरत उपारा । अति रिस मेघनाद पर द्वारा ॥ १ ॥ ' ।
।
* लंकाकाण्ड *
७८७
सारी सेनाको बेहाल ( व्याकुल ) देखकर पवनपुत्र हनुमान् क्रोध करके ऐसे दौड़े
मानो स्वयं काल दौड़ा आता हो । उन्होंने तुरंत एक बड़ा भारी पहाड़ उखाड़ लिया
और बड़े ही क्रोधके साथ उसे मेघनादपर छोड़ा ॥१॥
मावत देखि गयउ नभ सोई । स्थ सारथी तुरग सब खोई ॥
बार बार पचार हनुमाना । निकट न आव मरमु सो जाना ॥ २ ॥
पहाड़को आते देखकर वह आकाशमें उड़ गया ।[उसके ] रथ, सारथि और
घोड़े सब नष्ट हो गये (चूर-चूर हो गये)। हनुमानजी उसे बार-बार ललकारते हैं,
पर वह निकट नहीं आता क्योंकि वह उनके बलका मर्म जानता था ॥२॥
रघुपति निकट गयउ घननादा । नाना भाँति करेसि दुर्वादा ॥
भस्न सख्ख आयुध सब द्वारे। कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे ॥ ३ ॥
[तब ] मेघनाद श्रीरघुनाथजीके पास गया और उसने [ उनके प्रति ] अनेकों
प्रकारके दुर्वचर्नीका प्रयोग किया । [ फिर ] उसने उनपर अस्त्र-शन तथा और सब
इथियार चलाये । प्रभुने खेलमें ही सबको काटकर अलग कर दिया ॥ ३ ॥
देखि प्रताप भूद खिसिआना । करै लाग माया विधि नाना ॥
जिमि कोउ करै गरुष से खेला । उरपावै गहि स्वल्प सपेला ॥ ४ ॥
श्रीरामजीका प्रताप ( सामर्थ्य ) देखकर वह मूर्ख लजित हो गया और अनेकों
प्रकारको माया करने लगा । जैसे कोई व्यक्ति छोटा-सा साँपका बच्चा हाथमें लेकर
गरदको डरावे और उससे खेल करे ॥४॥
दो०-जासु प्रबल माया बस सिव बिरंचि बढ़ छोट।
ताहि दिखावह निसिचर निज माया मति खोट ॥५१॥
शिवजी और ब्रह्माजीतक बड़े-छोटे [सभी] जिनकी अत्यन्त बलवान् मायाके वशमें
हैं नीचबुद्धि निशाचर उनको अपनी माया दिखलाता है ॥५१॥
चो ०-नभ चदि वरष विपुल अंगारा । महि ते प्रगट होहिं जलधारा ।।
नाना भाँति पिसाच पिसाची । मार काटु पुनि बोलहिं नाची ॥ १ ॥
आकाशमें [ ऊँचे ] चढ़कर वह बहुत-से अंगारे बरसाने लगा । पृथ्वीसे जलकी
घायएँ प्रकट होने लगी। अनेक प्रकारके पिशाच तथा पिशाचिनियाँ नाच-नाचकर
मारो, काटो की आवाज करने लगीं ॥१॥
बिष्टा पूय रुधिर कच । हाड़ा । बरषइ कबहुँ उपक बहु छापा ।
बरषि धूरि कीन्हेसि अधिभारा । सूझ न मापन हाय पसारा ॥ २ ॥
वह कभी तो विष्ठा, पीब, खून, बाल और हड़ियाँ वरसाता था और कभी बहुत-से
पत्थर फेंक देता था । फिर उसने धूल बरसाकर ऐसा अंधेरा कर दिया कि अपना ही
पिसारा हुआ हाथ नहीं सूझता था ॥२॥
७८८ * रामचरितमानस * कपि भकुलाने माया देखें । सब कर मरन बना एहि लेखें ।। कौतुक देखि राम मुसुकाने । भए सभीत सफल कपि जाने ॥ ३ ॥ माया देखकर वानर अकुला उठे । वे सोचने लगे कि इस हिसाबने ( इसी तरह रहा ) तो सबका मरण आ बना । यह कौतुक देखकर श्रीरामजी मुसकराये। उन्होंने जान लिया कि सब वानर भयभीत हो गये हैं।॥३॥ एक बान काटी सब माया । जिमि दिनकर हर तिमिर निचाया। कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके । भए प्रवल रन रहहिं न रोक ॥ १ ॥ तव श्रीरामजीने एक ही बाणते सारी माया काट डाली, जैते सूर्य अन्धकारके समूहको हर लेता है । तदनन्तर उन्होंने कृपाभरी दृष्टिमे वानर-भालुओंकी ओर देखा, [जिससे,] वे ऐसे प्रवल हो गये कि रणमें रोकनेपर भी नहीं सकते थे ॥४॥ दो०-आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ । लछिमन चले क्रुद्ध होइ वान सरासन हाथ ॥ ५२ ॥ श्रीरामजीसे आज्ञा माँगकर, अंगद आदि वानरोंके साथ हाथोंमें धनुष-बाप लिये हुए श्रीलक्ष्मणजी कुद्ध होकर चले ॥ ५२ ॥ चौ fo-छतज नयन उर वाहु विसाला | हिमगिरि निभ तजु फछु एक लाला॥ इहाँ दसानन सुभट पाए । नाना अन्न सस्त्र गहि धाए ॥ १ ॥ उनके लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुबाएँ हैं । हिमाचल पर्वतके समान उज्ज्वल ( गौरवर्ण) शरीर कुछ ललाई लिये हुए है । इधर रावणने भी बड़े-बड़े योद्धा भेजे, जो अनेकों अन्न-शन लेकर दौड़े ॥१॥ भूधर नख चिटपायुध धारी । धाए कपि जय राम पुकारी ॥ भिरे सकल जोरिहि सन जोरी । इत उत जय इच्छा नहिं थोरी ॥ २ ॥ पर्वत, नख और वृक्षल्पी हथियार धारण किये हुए वानर श्रीरानचन्द्रजीकी डया गुकारकर दौड़े। वानर और राशन सब बोड़ी-से-जोड़ी भिड़ गये। इधर और उपर दोन। और जयकी इच्छा कम न थी (अर्थात् प्रबल थी) ॥२॥ मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह फाटहिं । पि जयसील मारि पुनि हाटहिं ।। मार मार धर धरु धरु मारू सील तोरि गहि भुजा उपार ॥ ३ ॥ वानर उनको चूंसों और लातोसे मारते हैं, दाँतोते काटते हैं । विजयशील वान्ट उन्हें मारकर फिर डाँटते भी हैं । मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़कर मार दो, लिए, तोड़ दो और भुजाएँ पकड़कर उखाड़ लो ॥ ३ ॥ असि रख पूरि रही नव वंदा । धावहिं जहँ तह रुंड प्रचंदा । देखहिं कौतुक नभ सुर बूंदा । कबहुँक बिसमय कबहुँ भनंदा । नवो खण्डोंमें ऐसी आवाब भर रही है । प्रचण्ड एण्ड (घड़) जहाँ-तहाँ दौर . २ - . चौ०-घायल * लंकाकाण्ड ७८९ रहे हैं। आकाशमें देवतागण यह कौतुक देख रहे हैं। उन्हें कभी खेद होता है और कभी भानन्द ॥४॥ दो-रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ । जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ ॥ ५३॥ खून गट्ठोंमें भर-भरकर जम गया है और उसपर धूल उड़कर पड़ रही है। [वह दृश्य ऐसा है ] मानो अंगारोंके ढेरोंपर राख छा रही हो ॥ ५३ ॥ वीर बिराजहि कैसे । कुसुमित किंसुक के तरु जैसे ॥ लछिमन मेघनाद द्वी जोधा । मिरहिं परसपर करि अति क्रोधा ॥ १ ॥ पायल वीर कैसे शोभित हैं, जैसे फूले हुए पलासके पेड़ । लक्ष्मण और मेघनाद दोनों योद्धा अत्यन्त क्रोध करके एक-दूसरेसे भिड़ते हैं ॥१॥ एकहि एफ सकइ नहिं जीती। निसिघर छल वल करइ अनीती ॥ क्रोधवंत तव भयउ अनंता । भंजेहु रथ सारथी तुरंता ॥ २ ॥ एक दूसरेको ( कोई किसीको) जीत नहीं सकता । राक्षस छल-बल (माया) और अनीति (अधर्म ) करता है, तब भगवान् अनन्तजी (लक्ष्मणजी ) क्रोधित हुए और उन्होंने तुरंत उसके रयको तोड़ डाला और सारथिको टुकड़े-टुकड़े कर दिये ॥२॥ नाना विधि प्रहार कर सेपा । राच्छस भयउ मान अवसेषा ॥ रावन सुत निज मन अनुमाना । संकठ भयउ हरिहि मम पाना ॥ ३ ॥ शेषजी ( लक्ष्मणजी) उसपर अनेक प्रकारसे प्रहार करने लगे । राक्षसके प्राणमात्र शेष रह गये । रावणपुत्र मेघनादने मनमें अनुमान किया कि अव तो प्राणसंकट आ बना, ये मेरे प्राण हर लेंगे ।। ३ ।। बीरघातिनी छाडिसि साँगी। तेजपुंज लछिमन उर लागी॥ मुरुला भई सक्ति के लागें । तव चलि गयउ निकट भय त्यागें ॥ ४ ॥ तब उसने वीरघातिनी शक्ति चलायी। वह तेजपूर्ण शक्ति लक्ष्मणजीकी छातीमें लगी। शक्तिके लगनेसे उन्हें मूर्छा आ गयी, तव मेघनाद भय छोड़कर उनके पास चला गया ॥४॥ दो०-मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ । जगदाधार सेप किमि उठे चले खिसिआइ ॥५४॥ मेवनादके समान सौ करोड़ (अगणित ) योद्धा उन्हें उठा रहे हैं। परंतु जगत्- आधार श्रीशेपजी ( लक्ष्मणजी) उनसे कैसे उठते ? तब वे लजाकर चले गये ।। ५४ ॥ चौ०-सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू । जारइ भुवन चारिदस भासू ॥ सक संग्राम जीति को ताही । सेवहिं सुर नर अग जग जाही ॥ १ ॥ [शिवजी कहते हैं-] हे गिरिजे ! सुनो, [प्रलयकालमें ] जिन ( शेषनाग) के
७९०
*रामचरितमानस
कोषकी अग्नि चौदहों भुवनोको तुरंत ही जला डालती है और देवता, मनुष्य तथा समस्त
चराचर [ जीव ] जिनकी सेवा करते हैं, उनको संग्राममें कौन जीत सकता है ? ॥१॥
यह कौव्हल जानइ सोई । जा पर कृपा राम के होई ॥
संध्या भइ फिरि द्वौ वाहनी । लगे संभारन निज निज अनी ॥ २ ॥
इस लीलाको वही जान सकता है, जिसपर श्रीरामजीकी कृपा हो । संध्या होनेपर
दोनों ओरकी सेनाएँ लौट पड़ी। सेनापति अपनी-अपनी सेनाएँ सँभालने लगे ॥२॥
व्यापक ब्रह्म अजित भुवनेवर । लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर ॥
तब लगि लै आयड हनुमाना । अनुज देखि प्रभु अति दुख माना ॥ ३ ॥
व्यापक, ब्रह्म, अजेय, सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके ईश्वर और करुणाकी खान श्रीरामचन्द्रजीने
पूछा--लक्ष्मण कहाँ है ? तबतक हनुमान उन्हें ले आये, छोटे भाईको [ इस दशामें ]
देखकर प्रभुने बहुत ही दुःख माना ॥३॥
जामवंत कह बैद सुषेना । लंका रहइ को पठई लेना ॥
धरि लघु रूप गयउ हनुमंता । भानेउ भवन समेत तुरंता ॥ ५ ॥
जाम्बवान्ने कहा-लवामें सुषेण वैद्य रहता है, उसे ले आनेके लिये किसको
भेजा जाय ! हनुमान्ली छोटा रूप धरकर गये और सुषेणको उसके घरसमेत तुरंत ही
उठा लाये ॥४॥
दो०-राम पदारविंद सिर नायड आइ सुषेन।
कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन ॥ ५५ ॥
सुषेणने आकर श्रीरामजीके चरणारविन्दोंमें सिर नवाया। उसने पर्वत और औषध-
का नाम बताया, [ और कहा कि ] हे पवनपुत्र ! ओषधि लेने बाभो ॥ ५५ ।।
चौ०-राम चरन सरसिज उर राखी । चला प्रभंजनसुत वल भाषी॥
उहाँ दूत एक मरमु जनावा । रावनु कालनेमि गृह आवा ॥ १ ॥
श्रीरामजीके चरणकमलोंको हृदयमें रखकर पवनपुत्र हनुमान्जी अपना बल
बखानकर (अर्थात् मैं अभी लिये आता हूँ, ऐसा कहकर ) चले । उधर एक गुप्तचरने
रावणको इस रहस्यकी खबर दी। तब रावण कालनेमिके घर आया ॥१॥
दसमुख कहा भरसु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिर धुना ॥
देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा । तासु पंथ को रोकन पारा ॥ २ ॥
रावणने उसको सारा मर्म (हाल ) बतलाया । कालनेमिने सुना और बार-बार
सिर पीटा (खेद प्रकट किया)। [उसने कहा-] तुम्हारे देखते-देखते जिसने नगर
जला डाला, उसका मार्ग कौन रोक सकता है ? ॥२॥
भजि रघुपति करु हित भापना । डाँइहु नाथ मृषा जल्पना ।
नौल कंज तनु सुंदर स्यामा । हृदय राखु लोचनामिरामा ॥ ३ ॥
*लंकाकाण्ड श्रीरघुनाथजीका भजन करके तुम अपना कल्याण करो। हे नाथ ! झूठी बकवाद छोड़ दो। नेत्रोंको आनन्द देनेवाले नीलकमलके समान सुन्दर श्याम शरीरको अपने हृदयमें स्खो॥३॥ मैं तें मोर मूदता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागु ॥ काल व्याल कर भच्छक जोई । सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई ॥ ४ ॥ मैं-तू ( भेद-भाव) और ममतारूपी मूढताको त्याग दो। महामोह (अशान) रूपी रात्रिमें सो रहे हो, सो जाग उठो । जो कालरूपी सर्पका भी भक्षक है, कहीं खप्न- में भी वह रणमें जीता जा सकता है ? ॥ ४ ॥ दो०-सुनि दसकंठ रिसान अति तेहि मन कीन्ह विचार। राम दूत कर मरों वरु यह खल रत मल भार ॥ ५६ ॥ उसकी ये बातें मुनकर रावण बहुत ही क्रोधित हुआ । तव कालनेमिने मनमें विचार किया कि [ इसके हाथसे मरनेकी अपेक्षा ] श्रीरामजीके दूतके हाथसे ही मरूँ तो अच्छा है । यह दुष्ट तो पापसमूहमें रत है ।। ५६ ॥ चौ० अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया । मारुतसुत देखा सुभ आश्रम । मुनिहि बूझि जल पियों जाइ श्रम ॥ ॥ वह मन-ही-मन ऐसा कहकर चला और उसने मार्गमें माया रची। तालाब, मन्दिर और मुन्दर बाग बनाया। हनुमान्जीने सुन्दर आश्रम देखकर सोचा कि मुनिसे पूछकर जल पी लूँ, जिससे थकावट दूर हो जाय ॥ १ ॥ राच्छस कपट बेप तह सोहा । मायापति दूतहि चह मोहा ॥ जाइ पवनसुत नायर माथा । लाग सो कहै राम गुन गाथा ॥ २ ॥ राक्षस वहाँ कपट[से मुनि ] का वेष बनाये विराजमान था । वह मूर्ख अपनी मायासे मायापतिके दूतको मोहित करना चाहता था। मारुतिने उसके पास जाकर मस्तक नवाया । वह श्रीरामजीके गुणोंकी कथा कहने लगा ॥२॥ होत महा रन रावन रामहि । जितिहहिं राम न संसय या महि ॥ इहाँ भएँ मैं देखउँ भाई । ग्यानदृष्टि बल मोहि अधिकाई ॥ ३ ॥ [वह बोला- रावण और राममें महान् युद्ध हो रहा है। रामजी जीतेंगे इसमें संदेह नहीं है । हे भाई! मैं यहाँ रहता हुआ ही सब देख रहा हूँ। मुझे ज्ञानदृष्टिका बहुत बड़ा बल है ॥३॥ मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल । कह कपि नहिं अघाउँ थोरै जल ॥ सर मजन फरि आतुर आवहु । दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु ॥ ४ ॥ हनुमानजीने उससे जल माँगा, तो उसने कमण्डलु दे दिया। हनुमानजीने ७२२ *रामचरितमानस कहा-थोड़े जलसे मैं तृप्त नहीं होनेका । तब वह बोला-तालाबमें स्नान करके तुरंत लौट आओ तो मैं तुम्हें दीक्षा दूं, जिससे तुम ज्ञान प्राप्त करो ॥ ४ ॥ दो०- सर पेठत कपि पद गहा मकरी तव अकुलान । मारी सोपरि दिव्य तनु चली गगन चढ़ि जान ॥ ५७ ॥ तालाबमें प्रवेश करते ही एक मगरीने अबुलाकर उसी समय हनुमान्जीका पैर पकड़ लिया। हनुमान्जीने उसे मार डाला । तब वह दिव्य देह धारण करके विमानपर चढ़कर आकाशको चली ॥ ५७ ॥ चौ०-कपि तव दरस भइउँ निष्पापा । मिटा तात मुनिबर कर सापा । मुनि न होइ यह निसिचर घोरा । भानहु सत्य वचन कपि मोरा ॥ १ ॥ [ उसने कहा- हे वानर ! मैं तुम्हारे दर्शनसे पापरहित हो गयी । हे तात! श्रेष्ठ मुनिका शाप मिट गया । हे कपि ! यह मुनि नहीं है, घोर निशाचर है । मेरा वचन सत्य मानो ॥१॥ मस फहि गई अपछरा जवहीं । निसिचर निकट गयउ कपितयहीं। कह झपि मुनि गुरदछिना लेहू । पाछे हमहि मंत्र तुम्ह देहू ॥ २ ॥ ऐसा कहकर ज्यों ही वह अप्सरा गयी, त्यों ही हनुमान्जी निशाचरके पास गये । हनुमान्जोने कहा-हे मुनि ! पहले गुरुदक्षिणा ले लीजिये । पीछे आप मुझे मन्त्र दीजियेगा ॥२॥ सिर लंगूर लपेटि पछारा। निज तनु प्रगटेसि मरती बारा॥ राम राम शहि छाडेसि पाना । सुनि मन हरपि चलेउ हनुमाना ॥ ३ ॥ हनुमान्जीने उसके सिरको पूँछमें लपेटकर उसे पछाड़ दिया । मरते समय उसने अपना ( राक्षसी) शरीर प्रकट किया । उसने राम-राम कहकर प्राग छोड़े । यह ( उसके मुंइसे राम-नामका उच्चारण ) सुनकर हनुमान्जी मनमें हर्षित होकर चले ।। ३ ।। देखा सैल न औषध चीन्हा । सहला कपि उपारितिरि लीन्हा॥ गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ । अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ ॥ ४ ॥ उन्होंने पर्वतको देखा, पर औषध न पहचान सके । तब हनुमान्जीने एकदमसे पर्वतको ही उखाड़ लिया। पर्वत लेकर हनुमानजी रातहीमें आकाशमार्गसे दौड़ चले और अयोध्यापुरीके ऊपर पहुँच गये ॥ ४ ॥ दो-देखा भरत बिसाल अति निसिचर मनं अनुमानि । बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि ॥ ५८ ॥ . भरतजीने आकाशमें अत्यन्त विशाल स्वरूप देखा, तब मनमें अनुमान किया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कानवक धनुषको खींचकर बिना फलका एक बाण मारा ||५८ ।
* लंकाकाण्ड * ७९३ चौ०-परेउ मुरुछि महि लागत सायक । सुमिरत राम राम रघुनायक ॥ सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए । कपि समीप अति आतुर आए ॥ १ ॥ बाग लगते ही हनुमान्जी राम, राम, रघुपतिका उच्चारण करते हुए मूछितः होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। प्रिय वचन ( रामनाम ) मुनकर भरतजी उठकर दौड़े और बड़ी उतावलीसे हनुमान्जीके पास आये ॥१॥ विकल विलोकि कीस उर लावा । जागत नहिं बहु भाँति जगाचा ॥ मुख मलीन मन भए दुखारी । कहत वचन भरि लोचन बारी ॥ २ ॥ हनुमानजीको व्याकुल देखकर उन्होंने हृदयसे लगा लिया । बहुत तरहसे जगाया, पर वे जागते न थे। तब भरतजीका मुख उदास हो गया। वे मनमें बड़े दुखी हुए और नेत्रोंमें [ विपादके आँसुओंका ] जल भरकर ये वचन बोले---|| २ ।। जेहिं विधिराम विमुखमोहि कीन्हा । तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा । जौं मोर मन बच अरु काया। प्रीति राम पद कमल अमाया ॥ ३ ॥ जिस विधाताने मुझे श्रीरामसे विमुख किया, उसीने फिर यह भयानक दुःख भी दिया। यदि मन, वचन और शरीरसे श्रीरामजीके चरणकमलोंमें मेरा निष्कपट प्रेम हो, ॥३॥ तौ कपि होउ विगत श्रम सूला । जौं मो पर रघुपति अनुकूला ॥ सुनत बचन उठि बैठ कपीसा । कहि जय जयति कोसलाधीसा ॥ ४ ॥ और यदि श्रीरघुनाथनी मुझपर प्रसन्न हों तो यह वानर थकावट और पीड़ासे रहित हो जाय । यह वचन सुनते ही कपिराज हनुमानजी कोसलपति श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जय हो कहते हुए उठ बैठे ॥ ४ ॥ सो०-लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल । प्रीति न हृदय समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक ॥ ५९ ॥ भरतीने वानर (हनुमानजी ) को हृदयसे लगा लिया, उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [आनन्द तथा प्रेमके आँसुओंका ] जल भर आया । रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजीका सरण करके भरतजीके हृदयमें प्रीति समाती न थी ।। ५९ ॥ चौल-तात कुसल कहु सुखनिधान की । सहित अनुज अरु मातु जानकी ।। कपि सब चरित समास बखाने । भए दुखी मन महुँ पछिताने ॥ १ ॥ [भरतजी बोले--- हे तात ! छोटे भाई लक्ष्मण तथा माता जानकीसहित सुख- निधान श्रीरामजीकी कुशल कहो । वानर ( हनुमान्जी) ने संक्षेपमें सब कथा कही । सुनकर भरतजी दुखी हुए और मनमें पछताने लगे ॥ १॥ अहह देव मैं कत जग जायउँ । प्रभु के एकहु काज न आयउँ ॥ जानि कुअवसरु मन धरि धीरा । पुनि कपि सन बोले बलबीरा ॥ २ ॥ . -- ७९४ * रामचरितमानस* हा देव! मैं जगत्में क्यों जन्मा १ प्रभुके एक भी काम न आया । फिर कुअवसर (विपरीत समय) जानकर मनमें धीरज धरकर बलवीर भरतजी हनुमान्जीसे बोले-॥२॥ तात गहरू होइहि तोहि जाता । काजु नसाइहि होत प्रभाता ॥ चढ़ मम सायक सैल समेता । पठवौँ तोहि जह कृपानिकेता ॥ ३ ॥ हे तात 1 तुमको जानेमें देर होगी और सवेरा होते ही काम बिगड़ जायगा । [ अतः ] तुम पर्वतसहित मेरे वाणपर चढ़ जाओ, मैं तुमको वहाँ भेज दूं जहाँ कृपाके धाम श्रीरामजी हैं॥३॥ सुनि कपि मन उपजा भभिमाना । मोरे भार चलिहि किमि वाना ॥ राम प्रभाव बिचारि बहोरी । बंदि चरन कह कपि कर जोरी ॥ ४ ॥ भरतजीकी यह बात सुनकर [ एक बार तो ] हनुमान्जीके मनमें अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझसे वाण कैसे चलेगा [किंतु] फिर श्रीरामचन्द्रजीके प्रभावका विचार करके वे भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोले-॥४॥ दो-तव प्रताप उर पखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत । अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत ॥ ६० (क)॥ हे नाथ ! हे प्रभो ! मैं आपका प्रताप हृदयमें रखकर तुरंत चला जाऊँगा । ऐसा कहकर आज्ञा पाकर और भरतजीके चरणोंको वन्दना करके हनुमान्जी चले ॥६० (क) ॥ भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार । मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार ॥ ६० (ख)॥ भरतजीके बाहुबल, शील (सुन्दर स्वभाव), गुण और प्रभुके चरणों में अपार प्रेमकी मन-ही-मन बारंबार सराहना करते हुए मारुति श्रीहनुमानजी चले जा रहे हैं। ६० (ख)॥ चौ०-उहाँ राम लछिमनहि निहारी । बोले बचन मनुज अनुसारी ॥ अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ । राम उठाइ अनुज उर लायउ॥ १ ॥ वहाँ लक्ष्मणजीको देखकर श्रीरामजी साधारण मनुष्योंके अनुसार ( समान) पचन बोले-आधी रात बीत चुकी, हनुमान नहीं आये । यह कहकर श्रीरामजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया ॥१॥ सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ । बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ ॥ मम हित लागि तजेहु पितु माता । सहेहु बिपिन हिम आतप बाता ॥ २ ॥ [और बोले- हे भाई ! तुम मुझे कभी दुखी नहीं देख सकते थे । तुम्हारा खभाव सदासे ही कोमल था। मेरे हितके लिये तुमने माता-पिताको भी छोड़ दिया और वनमें जाड़ा, गरमी और हवा सब सहन किया ।। २॥
* लंकाकाण्ड * ७९५ सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच विकलाई ॥ जौं जनतेउँ बन बंधु विछोहू । पिता वचन मनतेउँ नहिं ओहू ॥ ३ ॥ हे भाई ! वह प्रेम अव कहाँ है ? मेरे व्याकुलतापूर्ण वचन सुनकर उठते क्यों नहीं ? यदि मैं जानता कि वनमें भाईका विछोह होगा तो मैं पिताका वचन [ जिसका मानना मेरे लिये परम कर्तव्य था ] उसे भी न मानता ॥ ३ ॥ सुत बित नारि भवन परिवारा । होहिं जाहिं जग वारहिं बारा ॥ अस बिचारि जिय जागहु ताता । मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥ ४ ॥ पुत्र, धन, स्त्री घर और परिवार—ये जगत्में बार-बार होते और जाते हैं, परंतु जगत्में सहोदर भाई वार-बार नहीं मिलता । हृदयमें ऐसा विचारकर हे तात ! जागो ॥४॥ जथा पंख चिनु खग अति दीना । मनि चिनु फनि करिवर कर हीना ॥ अस मम जिवन बंधु दिनु तोही । जौं जड़ देव जिआ7 मोही ॥ ५ ॥ जैसे पंख विना पक्षी, मणि विना सर्प और सूंड बिना श्रेष्ठ हाथी अत्यन्त दीन हो जाते हैं । हे भाई ! यदि कहीं जड़ देव मुझे जीवित रखे तो तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी ऐसा ही होगा ॥ ५ ॥ जैहउँ अवध कौन मुहु लाई । नारि हेतु प्रिय भाइ गवाई ॥ वरु अपजस सहते जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं ॥ ६ ॥ स्त्रीके लिये प्यारे भाईको खोकर, मैं कौन-सा मुँह लेकर अवध नाऊँगा ? मैं जगत्में बदनामी भले ही सह लेता (कि राममें कुछ भी वीरता नहीं है, जो स्त्रीको खो बैठे)। स्त्रीकी हानिसे [इस हानिको देखते] कोई विशेष क्षति नहीं थी ॥ ६॥ अब अपलोकु सोकु सुत तौरा । सहिहि निठुर फठोर उर मोरा ॥ निज जननी के एक कुमारा । तात तासु तुम्ह प्रान अधारा ॥ ७ ॥ अव तो हे पुत्र | मेरा निष्ठुर और कठोर हृदय यह अपयश और तुम्हारा शोक दोनों ही सहन करेगा।हेतात! तुम अपनी माताके एक ही पुत्र और उसके प्राणाधार हो ॥७॥ सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी । सब विधि सुखद परम हित जानी ॥ उतर काह देहउँ तेहि जाई । उठिकिन मोहि सिखावहुभाई ॥ ८ ॥ सब प्रकारसे सुख देनेवाला और परम हितकारी जानकर उन्होंने तुम्हें हाथ 'पकड़कर मुझे सौंपा था । मैं अब जाकर उन्हें क्या उत्तर दूंगा ? हे भाई ! तुम उठकर मुझे सिखाते ( समझाते ) क्यों नहीं ? ॥८॥ बहु बिधि सोचत सोच विमोचन । स्रवत सलिल राजिव दल लोचन । एक अखंड रघुराई । नर गति भगत कृपाल देखाई ॥ ९ ॥ सोचसे छुड़ानेवाले श्रीरामजी बहुत प्रकारसे सोच कर रहे हैं । उनके कमलकी पंखुड़ीके समान नेत्रोंसे [ विषादके आँसुओंका ] जल वह रहा है । [ शिवजी कहते हैं- उमा
* रामचरितमानस*
हे उमा ! श्रीरघुनाथजी एक (अद्वितीय ) और अखण्ड (वियोगरहित ) हैं । भक्तोंपर
कृपा करनेवाले भगवान्ने [ लीला करके ] मनुष्यको दशा दिखलायी है |॥ ९ ॥
सो०--प्रभु प्रलाप सुनि कान विफल भए वानर निकर।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ वीर रस ॥ ६१ ॥
प्रभुके [ लीलाके लिये किये गये ] प्रलापको कानोंसे सुनकर वानरों के समूह
व्याकुल हो गये। [इतनेमें ही ] हनुमानजी आ गये, जैसे करुणरस [ के प्रसङ्ग] में
वीररस [का प्रसङ्ग] आ गया हो ॥ ६१ ॥
चौ०-हरपि राम भेटेउ हनुमाना । अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना ॥
तुरत बैद तब कीन्हि उपाई । उठि बैठे लछिमन हरपाई ॥ १ ॥
श्रीरामजी हर्षित होकर हनुमान्जीसे गले लगकर मिले । प्रभु परम सुजान
(चतुर) और अत्यन्त ही कृतश हैं । तब वैद्य (सुपेण) ने तुरंत उपाय किया, [ जिससे ]
लक्ष्मणजी हर्षित होकर उठ बैठे ॥ १॥
हृदय लाइ प्रभु भेटेउ भ्राता । हरपे सकल भालु कपि वाता॥
कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा । जेहि बिधि तवहिं ताहि लइआवा ॥ २ ॥
प्रभु भाईको हृदयसे लगाकर मिले । भालू और वानरोंके समूह सब हपित हो
गये । फिर हनुमान्जीने वैद्यको उसी प्रकार वहाँ पहुँचा दिया, जिस प्रकार वे उस वार
(पहले ) उसे ले आये थे ॥२॥
यह वृत्तांत दसानन सुनेऊ । अति विपाद पुनि पुनि सिर धुनेछ ।
व्याकुल कुंभकरन पहिं आवा । विविध जतन करि ताहि जगावा ॥ ३ ॥
यह समाचार जब रावणने सुना, तब उसने अत्यन्त विषादसे बार-बार सिर
पीटा । वह व्याकुल होकर कुम्भकर्णके पास गया और बहुत-से उपाय करके उसने
उसको जगाया ॥ ३ ॥
जागा निसिचर देखिअ कैसा । मानहुँ कालु देह धरि बैसा ॥
कुंभकरन बूझा कहु भाई । काहे तव मुख रहे सुखाई ॥ ४ ॥
कुम्भकर्ण जगा ( उठ बैठा)। वह कैसा दिखायी देता है, मानो स्वयं काल ही
शरीर धारण करके बैठा हो । कुम्भकर्णने पूछा-हे भाई ! कहो तो तुम्हारे मुख सूत्र
क्यों रहे हैं १ ॥ ४॥
कथा कही सब तेहिं अभिमानी । जेहि प्रकार सीता हरि आनी ॥
तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महा महा जोधा संघारे ॥ ५ ॥
उस अभिमानी (रायण) ने उससे जिस प्रकारसे वह सीताको हर लाया था
[ तबसे अवतककी ] सारी कथा कही | [ फिर कहा- हे तात ! वानरोंने सद
राक्षस मार डाले । बड़े-बड़े योद्धाओंका भी संहार कर डाला ॥ ५ ॥
* लंकाकाण्ड ७९७ दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी । भट अतिकाय अकंपन भारी ॥ अपर महोदर आदिक बीरा । परे समर महि सब रनधीरा ॥ ६ ॥ दुर्मुख, देवशत्रु ( देवान्तक ), मनुष्यभक्षक (नरान्तक), भारी योद्धा अतिकाय और अकम्पन तथा महोदर आदि दूसरे सभी रणधीर वीर रणभूमिमें मारे गये ॥ ६ ॥ दो०-सुनि दसकंधर वचन तय कुंभकरन विलखान । जगदंवा हरि आनि अव सठ चाहत कल्यान ॥ ६२ ॥ तब रावणके वचन सुनकर कुम्भकर्ण बिलखकर ( दुखी होकर ) बोला-अरे मूर्ख ! जगजननी जानकीको हर लाकर अब त् कल्याण चाहता है ? ॥ ६२॥ चौ०-भल न कीन्ह ते निसियर नाहा । अब मोहि आइ जगाएहि काहा ॥ अजहूँ तात त्यागि अभिमाना । भजहु राम होइहि कल्याना ॥ १ ॥ हे राक्षसराज ! तूने अच्छा नहीं किया। अब आकर मुझे क्या जगाया ? हे तात ! अव भी अभिमान छोड़कर श्रीरामजीको भजो तो कल्याण होगा ॥१॥ है दससीस मनुज रघुनायक । जाके हनूमान से हनूमान से पायक। अहह बंधु से फीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई ॥२॥ हे रावण ! जिनके हनुमान् सरीखे सेवक हैं, वे श्रीरघुनाथजी क्या मनुष्य हैं । हाय भाई ! तूने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया ॥२॥ कीन्हेहु प्रभु विरोध तेहि देवक । सिव विरंचि सुर जाके सेवक ॥ नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा । कहतेउँ तोहि समय निरवहा ॥ ३॥ हे स्वामी । तुमने उस परम देवताका विरोध किया, जिसके शिव, ब्रह्मा आदि देवता सेवक है । नारद मुनिने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं तुझसे कहता। पर अब तो समय जाता रहा ॥ ३ ॥ अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई । लोचन सुफल करौं मैं जाई ॥ स्याम गात सरसीरुह • लोचन । देखौं जाइ ताप त्रय मोचन ॥ ४ ॥ हे भाई! अब तो[अन्तिम बार अँकवार भरकर मुझसे मिल ले | मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ । तीनों ताोको छुड़ानेवाले श्यामशरीर, कमलनेत्र श्रीरामलीले जाकर दर्शन करूँ।।४।। दो०--राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक। रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक ॥ ३॥ श्रीरामचन्द्रजीके रूप और गुणोंको स्मरण करके वह एक क्षणके लिये प्रेममें मग्न हो गया। फिर रावणसे करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगवाये ॥ ६३ ॥ चौ०-महिप खाइ करि मदिरा पाना । गर्जा समाना । कुंभकरन दुर्मद रंगा । चला दुर्ग तजि सेन न संगा॥ ॥ । बज्राघात रन N * रामचरितमानस * मैंस खाकर और मदिरा पीकर वह वजयात (बिजली गिरने) के समान गरजा । मदसे चूर रणके उत्साहसे पूर्ण कुम्भकर्ण किला छोड़कर चला । सेना भी साथ नहीं ली ॥१॥ देखि बिभीषनु भागें आया । परेउ घरन निज नाम सुनायउ ।। अनुज उठाइ हृदय तेहि लायो । रघुपति भक्त जानि मन भायो॥ २ ॥ उसे देखकर विभीषण आगे आये और उसके चरणोंपर गिरकर अपना नाम सुनाया। छोटे भाईको उठाकर उसने हृदयसे लगा लिया और श्रीरघुनाथजीका भक्त मानकर वे उसके मनको प्रिय लगे ॥२॥ तात लात रावन मोहि मारा । कहत परम हित मंत्र विचारा ।। तेहिं गलानि रघुपति पहिं मायउँ । देखि दीन प्रभु के मन भायउँ ॥ ३ ॥ [विभीषणने कहा- हे तात | परम हितकर सलाह एवं विचार कहनेपर रावणने मुझे लात मारी | उसी ग्लानिके मारे मैं श्रीरघुनाथजीके पास चला आया । दीन देखकर प्रभुके मनको मैं [ बहुत ] प्रिय लगा ॥ ३ ॥ सुनु सुत भयउ कालबस रावन । सो कि मान अव परम सिखावन ।। धन्य धन्य ते धन्य विभीषन । भयहु तात निसिचर कुल भूपन ॥ ४ ॥ [कुम्भकर्णने कहा- हे पुत्र ! सुन, रावण तो कालके वश हो गया है (उसके सिरपर मृत्यु नाच रही है । वह क्या अब उत्तम शिक्षा मान सकता है। हे विभीषण ! तू घन्य है, धन्य है, धन्य है । हे तात ! तू राक्षसकुलका भूपण गया ॥ ४॥ बंधु बंसते कीन्द उजागर । भजेहु राम सोभा सुख सागर ॥ ५ ॥ हे भाई ! तूने अपने कुलको देदीप्यमान कर दिया, जो शोभा और मुखके समुद्र श्रीरामजीको भजा ॥ ५ ॥ दो०-वचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर । जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस वीर ॥ ६४॥ मन, वचन और कमसे कपट छोड़कर रणधीर श्रीरामजीका भजन करना । हे भाई ! मैं काल (मृत्यु) के वश हो गया हूँ, मुझे अपना-पराया नहीं सूझता। इसलिये अब तुम जाओ।। ६४॥ चौ०-बंधु वचन सुनि थला विभीपन । आयउ जहँ त्रैलोक विभूपन ॥ भूधराफार सरीरा । कुंभकरन आवत रनधीरा ॥ १ ॥ भाईके वचन सुनकर विभीपण लौट गये और वहाँ आये, जहाँ त्रिलोकीके भूषण भीरामजी थे। [विभीषणने कहा-] हे नाथ ! पर्वतके समान [विशाल ] देहवाला रणधीर कुम्भकर्णं आ रहा है ॥ १ ॥ हो नाथ * लंकाकाण्ड * एतना कपिन्ह सुना जब काना । फिलकिलाइ धाए बलवाना ॥ लिए उठाइ बिटप अरु भूधर । कटकटाइ दारहिं ता ऊपर ॥ २ ॥ वानरोंने जब कानोंसे इतना सुना, तब वे बलवान् किलकिलाकर हर्षध्वनि करके) दौड़े। वृक्ष और पर्वत [ उखाड़कर ] उठा लिये और [ क्रोधसे ] दाँत कटकटाकर उन्हें उसके ऊपर डालने लगे ॥२॥ कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा । करहिं भालु कपि एक एक बारा ॥ मुरथो न मनु तनु टरयो न टारयोजिमि गज मर्क फलनिको मारचो॥३॥ रीछ-वानर एक-एक बारमें ही करोड़ों पहाड़ोंके शिखगेसे उसपर प्रहार करते हैं। परंतु इससे न तो उसका मन ही मुड़ा ( विचलित हुआ) और न शरीर ही टाले टला, जैसे मदारके फलोंकी मारसे हाथीपर कुछ भी असर नहीं होता! ॥ ३ ॥ तब मारुतसुत मुठिका हन्यो । परयो धरनि म्याकुल सिर धुन्यो । पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता । घुर्मित भूतल परेड तुरंता ॥ ४ ॥ तब हनुमान्जीने उसे एक घुसा मारा, जिससे वह व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और सिर पीटने लगा। फिर उसने उठकर हनुमानजीको मारा । वे चक्कर खाकर तुरंत ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४॥ पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि । जहतह पटकि पटफि भट डारेसि ॥ चली बलीमुख सेन पराई । अतिभय त्रसित न कोउ समुहाई ॥ ५ ॥ फिर उसने नल नीलको पृथ्वीपर पछाड़ दिया और दूसरे योद्धाओंको भी जहाँ- तहाँ पटक-पटककर डाल दिया। वानरसेना भाग चली । सब अत्यन्त भयभीत हो गये। कोई सामने नहीं आता ॥ ५ ॥ दो०--अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव । काँख दावि कपिराज कहुँ चला अमित बल सीव ॥ ६५ ॥ सुग्रीवसमेत अंगदादि वानरोंको मूञ्छित करके फिर वह अपरिमित वलकी सीमा कुम्भकर्ण वानरराज सुग्रीवको काँखमें दावकर चला ॥ ६५ ॥ चौ०-उमा करत रघुपति नर लीला । खेलत गरुद जिमिअहिगन मीला॥ भृकुटि मंग जो कालहि खाई। ताहि कि सोहइ ऐसि लराई ॥१ ! शिवजी कहते हैं- हे उमा ! श्रीरघुनाथजी वैसे ही नरलीला कर रहे हैं, जैसे गरुड़ सोके समूहमें मिलकर खेलता हो । जो भौंहके इशारेमात्रसे (विना परिश्रमके) कालको भी खा जाता है, उसे कहीं ऐसी लड़ाई शोभा देती है ? ॥१॥ जग पावनि कीरति वितरिहहिं । गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिं । लागा॥ २॥ मुरुछा गइ मारतसुत जागा । सुग्रीवहि तब खोजन - * रामचरितमानस * भगवान् [ इसके द्वारा ] जगत्को पवित्र करनेवाली वह कीर्ति फैलायेगे जिसे गा-गाकर अनुष्य भवसागरसे तर जायँगे । मूर्छा जाती रही, तब मारुति हनुमान्जी जागे और फिर वे सुग्रीवको खोजने लगे ॥ २ ॥ सुग्रीवहु के मुरुछा बीती । निवुकि गयउ तेहि मृतक प्रतीती ॥ काटेसि दसन नासिका काना | गरजि अकास चलेउ तेहिं जाना ॥ ३ ॥ सुग्रीवकी भी मूर्छा दूर हुई, तब वे [ मुर्दे-से होकर ] खिसक गये ( काँखसे नीचे 'गिर पड़े ) । कुम्भकर्णने उनको मृतक जाना । उन्होंने कुम्भकर्ण के नाक-कान दाँतोंसे काट लिये और फिर गरजकर आकाशकी ओर चले, तब कुम्भकर्णने जाना ॥ ३ ॥ गहेउ चरन गहि भूमि पछारा । अति लाघवं उठि पुनि तेहिमारा ॥ पुनि आयउ प्रभु पहिं बलवाना । जयति जयति जय कृपानिधाना ॥ ४ ॥ उसने सुग्रीवका पैर पकड़कर उनको पृथ्वीपर पछाड़ दिया । फिर सुग्रीवने बड़ी फुर्तीसे उठकर उसको मारा और तब बलवान् सुग्रीव प्रभुके पास आये और बोले- 'कृपानिधान प्रभुकी जय हो, जय हो, जय हो ॥ ४ ॥ नाक कान काटे जिय जानी। फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी ॥ सहज भीम पुनि विनुश्रुति नासा । देखत कपि दल उपजी त्रासा ॥ ५ ॥ नाक-कान काटे गये, ऐसा मनमें जानकर बड़ी ग्लानि हुई और वह क्रोध करके लौटा। एक तो वह स्वभाव (आकृति ) से ही भयंकर था और फिर बिना नाक-कानका होनेसे और भी भयानक हो गया। उसे देखने ही वानरोंकी सेनामें भय उत्पन्न हो गया ॥५॥ दो०--जय जय जय रघुवंस मनि धाए कपि दै हह । एकहि बार तासु पर छाडेन्हि गिरि तरु जूह ॥ ६६ ॥ रघुवंशमणिकी जय हो, जय हो, जय हो, ऐसा पुकारकर वानर हूह करके दौड़े और सबने एक ही साथ उसपर पहाड़ और वृक्षोंके समूह छोड़े ॥ ६६ ॥ चौ०-कुंभकरन रन रंग विरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु कुद्धा । कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई । जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई ॥ १ ॥ रणके उत्साहमें कुम्भकर्ण विरुद्ध होकर उनके सामने ऐसा चला, मानो क्रोधित होकर काल ही आ रहा हो । वह करोड़-करोड़ वानरोंको एक साथ पकड़-पकड़कर खाने लगा ! [ वे उसके मुँहमें इस तरह घुसने लगे] मानो पर्वतकी गुफा टिड्डियाँ समा रही हो ॥१॥ कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा । कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा । मुख नासा श्रवनन्हि की बाटा । निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा ॥ २॥ करोड़ों ( वानरों) को पकड़कर उसने शरीरसे मसल डाला । करोड़ोंको हायोंसे मलकर पृथ्वीकी धूलमें मिला दिया । [ पेटमें गये हुए ] भालू और वानरोंके ठह-के-ठा । . * लंकाकाण्ड* उसके मुख, नाक और कानोंकी राहसे निकल-निकलकर भाग रहे हैं | रन मद मत्त निसाचर दर्पा । विस्व ग्रसिहि जनु एहि विधि अपो॥ मुरे सुनट सय फिरहिं न फेरे । सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे ॥ ३ ॥ रगके मदमें मत्त राक्षस कुम्भकर्ण इस प्रकार गर्वित हुआ, मानो विधाताने उसको सारा विश्व अर्पण कर दिया हो, और उसे वह ग्रास कर जायगा । सब योद्धा भाग खड़े हुए, व लौटाये भी नहीं लौटते । आँखोंसे उन्हें सूझ नहीं पड़ता और पुकारनेसे नुनते नहीं ॥३॥ कुंभकरन कपि फौज बिहारी । सुनि धाई रजनीचर धारी ॥ देखी राम विफल कटकाई। रिपु अनीक नाना विधि आई ॥ ४ ॥ कुम्भकर्णने वानर सेनाको निनर-बितर कर दिया । यह मुनकर राक्षस-सेना भी दौड़ी। श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि अपनी सेना व्याकुल है और शत्रुकी नाना प्रकारको सेना आ गयी है ॥ ४॥ सुग्रीव विभीपन अनुज सँभारेहु सैन । मैं देखउँ खल वल दलहि बोले राजिवनैन ॥ ६७ ॥ तब कमलनयन श्रीरामजी बोले हे सुग्रीव ! हे विभीषण ! और हे लक्ष्मण । सुनो, तुम सेनाको संभालना । मैं इस दुष्टके बल और सेनाको देखता हूँ ।। ६७ ॥ चौ०-कर सारंग साजि फटि भाया । अरि दल दलन चले रघुनाथा ॥ प्रथम कीन्हि प्रभु धनुप टकोरा । रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा ॥ १ ॥ हाथमें शाधिनुप और कमरमें तरकस सजकर श्रीरघुनाथजी शत्रुसेनाको दलन करने चले । प्रभुने पहले तो धनुपका टंकार किया, जिसकी भयानक आवाज सुनते ही रानुदल बहरा हो गया ॥ १ ॥ सत्यसंध छाँढ़े सर लच्छा । कालसर्प जन चले सपच्छा ॥ जहँ तहँ चले विपुल नाराचा । लगे कटन भट विकट पिसाचा ॥ २ ॥ फिर सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामजीने एक लाख बाण छोड़े। वे ऐसे चले, मानो पंखवाले काल-सर्प चले हो । जहाँ-तहाँ बहुत-से बाग चले, जिनसे भयंकर राक्षस योद्धा कटने लगे ॥२॥ कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक वीर होहिं सत खंडा ॥ घुमि बुर्मि घायल महि परहीं। उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं ॥ ३ ॥ उनके चरण, छाती, सिर और भुजदण्ड कट रहे हैं। बहुत-से वीरोंके सौ-सौ टुकड़े हो जाते हैं। घायल चकर खा-खाकर पृथ्वीपर पड़ रहे हैं । उत्तम योद्धा फिर संभलकर उठते और लड़ते हैं ॥३॥ लागत वान जलद जिमि गाजहिं । बहुतक देखि कठिन सर भाजहि ॥ एंड प्रचंड मुंड विनु धावहिं । धरु धरु मारु मारु धुनि गावहिं ॥ ४ ॥ रा०स०५१- ८०२ * रामचरितमानस बाण लगते ही वे मेघकी तरह गरजते हैं । बहुत-से तो कठिन बाणको देखकर ही भाग जाते हैं । बिना मुण्ड (सिर ) के प्रचण्ड रुण्ड (धड़ ) दौड़ रहे हैं और पकड़ो, पकड़ो, मारो, मारो का शब्द करते हुए गा (चिल्ला) रहे हैं ।। ४ ।। दो०-छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे विकट पिसाच । पुनि रघुवीर निपंग महुँ प्रविसे सव नाराच ॥ ६८ ॥ प्रभुके बाणोंने क्षणमात्रमें भयानक राक्षसोको काटकर रख दिया। फिर वे सब बाग लौटकर श्रीरघुनाथजीके तरकसमें घुस गये ॥ ६८ ॥ चौ०-भकरन मन दीख बिचारी । हति छन माझ निसाचर धारी ।। भा अति क्रुद्ध महावल वीरा । कियो मृगनायक नाद गभीरा ॥ १ ॥ कुम्भकर्णने मनमें विचारकर देखा कि श्रीरामजीने क्षगमात्रमें राक्षसी सेनाका संहार कर डाला । तब वह महाबली वीर अन्यन्त क्रोधित हुआ और उसने गम्भीर सिंहनाद किया ॥१॥ कोपि महीधर लेइ उपारी । डारइ जहँ मर्कट भट भारी ॥ आवत देखि सैल प्रभु भारे । सरन्हि काटि रज सम करि डारे ॥ २ ॥ वह क्रोध करके पर्वत उखाड़ लेता है और जहाँ भारी-भारी वानर योद्धा होते हैं, वहाँ डाल देता है । बड़े-बड़े पर्वतोंको आते देखकर प्रभुने उनको बागोंसे काटकर धूलके समान (चूर-चूर ) कर डाला ||२|| पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक । छाँड़े अति कराल बहु सायक ॥ तनु महुँ प्रबिसि निसरिसर जाहीं। जिमि दामिनि घन माझ समाहीं ॥ ३ ॥ फिर श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके धनुपको तानकर बहुत-से अत्यन्त भयानक वाग छोड़े । वे बाग कुम्भकर्णके शरीरमें घुसकर [ पीछेसे इस प्रकार ] निकल जाते हैं [कि उनका पता नहीं चलता ], जैसे बिजलियाँ बादलमें समा जाती हैं || ३ ॥ सोनित स्रवत सोह तन कारे । जनु कजल गिरि गेरु पनारे । बिकल बिलोकि भालु कपि धाए । विहंसा जयहिं निकट कपि आए ॥ ४ ॥ उसके काले शरीरसे रुधिर वहता हुआ ऐसी शोभा देता है, मानो काजलके पर्वतसे गेल्के पनाले बह रहे हों । उसे व्याकुल देखकर रीछ-वानर दौड़े। वे ज्यों ही निकट आये, त्यों ही वह हँसा. ॥ ४ ॥ दो०-महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस। महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दसलीस ॥ ६९ ॥ और बड़ा घोर शब्द करके गरजा तथा करोड़-करोड़ वानरोंको पकड़कर वह गजराजकी तरह उन्हें पृथ्वीपर पटकने लगा और रावणकी दुहाई देने लगा ।। ६९ ॥ 3
लंकाकाण्ड
८०३
चौल-भागे भालु बलीमुख जूया । वृकु विलोकि जिमि मेप बख्या ॥
चले भागि कपि भालु भवानी । विकल पुकारत आरत वानी ॥ १ ॥
यह देखकर रीछ-यानरोंके झुंड ऐसे भागे, जैसे भेड़ियेको देखकर भेड़ोंकझुंड !
[शिवजी कहते हैं- हे भवानी ! वानर-भालू व्याकुल होकर आर्तवाणीसे पुकारते
हुए भाग चले ॥१॥
यह निसिचर दुकाल सम अहई । कपिकुल देस परन अव चहई ॥
कृपा वारिधर राम सरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी ॥ २ ॥
[ ये कहने लगे-] यह राक्षस दुर्भिक्षक समान है, जो अब वानरकुलरूपी देशमें
पड़ना चाहता है । हे कृपारूपी जलके धारण करनेवाले मेघरूप श्रीराम ! हे खरके शत्रु !
हे शरणागतके दुःख हरनेवाले ! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ! ॥ २ ॥
सारुन बचन सुनत भगवाना । चले सुधारि सरासन बाना ॥
राम सेन निज पाठे घाली । चले सफोप महा वलसाली ॥ ३ ॥
करणाभरे वचन सुनते ही भगवान् धनुप-याण सुधारकर चले ! महाबलशाली
श्रीराम ने सेनाको अपने पीछे कर लिया और वे [ अकेले ] क्रोधपूर्वक चले
(आगे बंद) ॥३॥
खचि धनुप सर सत संघाने । छुटे तीर सरीर समाने॥
लागत सर धावा, रिस भरा । कुधर डगमगत डोलति धरा ॥ ४ ॥
उन्होंने धनुपको खींचकर सौ बाण संधान किये । बाग छूटे और उसके शरीरमें
समा गये । वाणोंके लगते ही वह क्रोधमें भरकर दौड़ा । उसके दौड़नेसे पर्वत डगमगाने
लो और पृथ्वी हिलने लगी ॥ ४ ॥
लीन्ह एक तेहिं सैल उपाटी । रघुकुलतिलक भुजा सोइ काटी ॥
धावा बाम बाहु गिरि धारी । प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी ॥ ५ ॥
उसने एक पर्वत उखाड़ लिया । रघुकुलतिलक श्रीरामजीने उसकी वह मुजा हो
काट दी । तब वह बायें हाथमें पर्वतको लेकर दौड़ा | प्रभुने उसकी वह भुना भी काट-
कर पृथ्वीपर गिरा दी ॥ ५ ॥
काटें भुजा सोह खल कैसा । पच्छहीन मंदर गिरि जैसा ।।
उन विलोकनि प्रभुहि बिलोका । असन चहत मानहुँ त्रैलोका ॥ ६ ॥
भुजाओंके कट जानेपर वह दुष्ट कैसी शोभा पाने लगा, जैसे बिना पंखका मन्दराचल
पहाड़ हो । उसने उग्र दृष्टिसे प्रभुको देखा, मानो तीनों लोकोंको निगल जाना
दो०-करि चिक्कार घोर अति धावा वदनु पसारि ।
गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि ॥ ७० ॥
चाहता हो ॥६॥
रामचरितमानस * वह बड़े जोरसे चिग्घाड़ करके मुंह फैलाकर दौड़ा । आकाशमें सिद्ध और देवता डरकर हा ! हा ! हा ! इस प्रकार पुकारने लगे ॥ ७० ॥ चौ०-सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो। बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ । तदपि महाबल भूमि न परेऊ ॥ १ ॥ करुणानिधान भगवान्ने देवताओंको भयभीत जाना । तब उन्होंने भनुपको कानतक तानकर राक्षसके मुखको बाणोंके समूहसे भर दिया तो भी वह महाबली पृथ्वीपर न गिरा ॥१॥ सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा । काल ग्रोन सजीव जनु भावा ॥ तब प्रभु फोपि तीन सर लीन्हा । धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा॥ २ ॥ मुखमें बाण भरे हुए वह [प्रभुके ] सामने दौड़ा । मानो कालरूपी सजीव तरकस ही आ रहा हो । तब प्रभुने क्रोध करके तीक्ष्ण बाग लिया और उसके सिरको धड़से अलग कर दिया ॥ २॥ सो सिर परेउ दसानन आगें। विकल भयउ जिमि फनि मनित्यागें। धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा । तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा ॥ ३ ॥ वह सिर रावणके आगे जा गिरा। उसे देखकर रावण ऐसा व्याकुल हुआ, जैसे मणिके छूट जानेपर सर्प । कुम्भकर्णका प्रचण्ड धड़ दौड़ा, जिससे पृथ्वी धंसी जाती थी। तब प्रभुने काटकर उसके दो टुकड़े कर दिये ॥३॥ परे भूमि जिमि नभ ते भूधर । हेठ दावि कपि भालु निसाचर ॥ तासु तेज प्रभु बदन समाना । सुर मुनि सहि अचंभव माना ॥ ४ ॥ वानर-भालू और निसाचरोंको अपने नीचे दबाते हुए वे दोनों टुकड़े पृथ्वीपर ऐसे पड़े जैसे आकाशसे दो पहाड़ गिरे हों । उसका तेज प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके मुखमें समा गया । [ यह देखकर ] देवता और मुनि सभीने आश्चर्य माना ॥ ४ ॥ सुर दुंदुभी बजावहिं हरपहिं । अस्तुति करहिं सुमन बहु बरपहिं ।। करि बिनती सुर सकल सिधाए । तेही समय देवरिषि आए ॥ ५ ॥ देवता नगाड़े बजाते, हर्पित होते और स्तुति करते हुए बहुत-से फूल बरसा रहे हैं । विनती करके सब देवता चले गये । उसी समय देवर्षि नारद आये ॥ ५ ॥ गगनोपरि हरि गुन गन गाए । रुचिर बीररस प्रभु मन भाए । बेगि हतहु खल कहि मुनि गए । राम समर महि सोभत भए ॥ ६ ॥ आकाशके ऊपरसे उन्होंने श्रीहरिके सुन्दर वीररसयुक्त गुणसमूहका गान किया। जो प्रभुके मनको बहुत ही भाया । मुनि यह कहकर चले गये कि अब दुष्ट रावणको शीघ्र मारिये । [ उस समय] श्रीरामचन्द्रजी रणभूमिमें आकर [अत्यन्त ] सुशोभित हुए ॥६॥ ES --- -------- * लंकाकाण्ड * ८०५ छ.-संग्राम भूमि विराज रघुपति अतुल वल कोसल धनी । श्रम विंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी॥ भुज जुगल फेरत सरसरासनभालु कपि चहु दिसि बने । कह दास तुलसीकहि नसकछवि सेप जेहि आनन घने ॥ अतुलनीय वलवाले कोसलपति श्रीरघुनाथजी रणभूमिमें सुशोभित है। मुखपर पसीनेकी बूंदें है। कमलके समान नेन कुछ लाल हो रहे हैं। शरीरपर रक्तके कण हैं, दोनों हार्थोसे धनुष-बाण फिरा रहे हैं। चारों ओर रीछ-वानर सुशोभित हैं । तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभुकी इस छविका वर्णन शेषजी भी नहीं कर सकते, जिनके बहुत-से (हजार ) मुख है। दो०-निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम । गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम ॥ ७१ ॥ [ शिवजी कहते हैं- हे गिरिजे ! कुम्भकर्ण, जो नीच राक्षस और पापकी खान था, उसे भी श्रीरामजीने अपना परमधाम दे दिया । अतः वे मनुष्य [ निश्चय ही ] मन्दबुद्धि हैं, जो उन श्रीरामजीको नहीं भजते ॥ ७१ ॥ चौ०-दिन के अंत फिरी द्वौ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम धनी ॥ राम कृपाँ कपि दल बल वादा । जिमि तृन पाइ लाग अति डादा ॥ १ ॥ दिनका अन्त होनेपर दोनों सेनाएँ लौट पड़ी। [आजके युद्ध में ] योद्धाओंको बड़ी थकावट हुई । परंतु श्रीरामजीको कृपासे वानरसेनाका बल उसी प्रकार बढ़ गया, जैसे घास पाकर अग्नि बहुत बढ़ जाती है ॥ १ ॥ छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती ॥ बहु विलाप दसकंधर फरई । बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई ॥ २ ॥ उधर राक्षस दिन-रात इस प्रकार घटते जा रहे हैं, जिस प्रकार अपने ही मुखसे कहनेपर पुण्य घट जाते हैं । रावण बहुत विलाप कर रहा है। बार-बार भाई (कुम्भकर्ण) का सिर कलेजेसे लगाता है ॥२॥ रोवहिं नारि हृदय हति पानी । तासु तेज बल बिपुल बखानी ॥ मेघनाद तेहि अवसर आयउ । कहि बहु कथा पिता समुझायड ॥ ३ ॥ स्त्रियाँ उसके बड़े भारी तेज और बलको बखान करके हाथोंसे छाती पीट-पीटकर रो रही है। उसी समय मेघनाद आया और उसने वहुत-सी कथाएँ कहकर पिताको समझाया ॥३॥ देखेहु कालि मोरि मनुसाई । अबहिं बहुत का करौं वड़ाई ।। इष्टदेव मैं बल · रथ पायउँ । सो बल तात न तोहि देखायउँ ॥ ४ ॥ [और कहा-] कल मेरा पुरुषार्थ देखियेगा । अभी बहुत बड़ाई क्या करूँ। ।
८०६ * रामचरितमानस * है तात ! मैंने अपने इष्टदेवसे जो बल और रथ पाया था, वह बल [ और रथ ] अबतक आपको नहीं दिग्बलाया था ॥ ४ ॥ एहि विधि जल्पत भयउ बिहाना । चहुँ दुआर लागे कपि नाना ॥ इत कपि भालु काल सम बीरा । उत रजनीचर अति रनधीरा ॥ ५ ॥ इस प्रकार डींग मारते हुए सवेरा हो गया । लंकाके चारों दरवाजोंपर बहुत-से वानर आ इटे। इधर कालके समान वीर वानर-भालू हैं और उधर अत्यन्त रणधीर राक्षस || ॥५॥ लरहिं सुभट निज निज जय हेतू । वरनि न जाइ समर खगकेतू ॥ ६ ॥ दोनों ओरके योद्धा अपनी-अपनी जयके लिये लड़ रहे हैं। हे गाड़! उनके युद्धका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥६॥ दो०-मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गया अकास। गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटोकहि त्रास ॥ ७२ ॥ मेघनाद उसी (पूर्वोक्त) मायामय रथपर चढ़कर आकाशमें चला गया और अट्टहास करके गरजा, जिससे वानरोंकी सेनामें भय छा गया ॥ ७२ ॥ चौ०-सक्ति सूल तरवारि कृपाना । अस्त्र सत्र कुलिसायुध नाना ॥ डारइ परसु परिघ पाषाना । लागेउ बृष्टि करै बहु वाना ॥ १ ॥ वह शक्ति, शूल, तलवार, कृपाण आदि अस्त्र, शस्त्र एवं वज्र आदि बहुत-से आयुध चलाने तथा फरसे, परिघ, पत्थर आदि डालने और बहुत-से बाणोंकी दृष्टि करने लगा ॥१॥ दस दिसि रहे वान नभ छाई । मानहुँ मघा मेघ झरि लाई ॥ धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना । जो मारइ.तेहि कोउ न जाना ॥ २ ॥ आकाशमें दसों दिशाओंमें वाण छा गये, मानो मघा नक्षत्रके वादलोंने झड़ी लगा दी हो। पकड़ो, पकड़ो, मारो ये शब्द कानोंसे सुनायी पड़ते हैं । पर जो मार रहा है उसे कोई नहीं जान पाता ॥२॥ गहि गिरि तरु अफास कपि धावहिं । देखहिं तेहि न दुखित फिरिआवहिं ।। अवघट घाट बाट गिरि कंदर । माया बल कीन्हेसि सर पंजर ॥ ३ ॥ पर्वत और वृक्षोंको लेकर वानर आकाशमें दौड़कर जाते हैं। पर उसे देख नहीं पाते, इससे दुखी होकर लौट आते हैं-मेघनादने मायाके वलसे अटपटी घाटियों, रास्तों और पर्वत-कन्दराओंको वाणोंके पिंजरे बना दिये ( वाणोंसे छा दिया) ॥ ३ ॥ जाहि कहाँ व्याकुल भए बंदर । सुरपति बंदि परे जनु मंदर ॥ मारुतसुत अंगद नल नीला । कीन्हेसि विकल सकल बलसीला ॥ ४ ॥ अब कहाँ जायें, यह सोचकर ( रास्ता न पाकर) वानर व्याकुल हो गये । मान
बाल पुस्तकालय
* लंकाकाण्ड*
पर्यंत इन्द्रको कैदमें पड़े हो । मेघनादने मारुति हनुमान, अंगद, नल और नील आदि
सभी बलवानोंको व्याकुल कर दिया ॥ ४ ॥
पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन । सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन ॥
पुनि रघुपति से जूझै लागा । सर छाँइइ होइ लागहि नागा ॥ ५ ॥
फिर उसने लक्ष्मणजी, मुग्रीव और विभीषणको बाणोंसे मारकर उनके शरीरोंको
चलनी कर दिया । फिर वह श्रीरघुनाथजीसे लड़ने लगा । वह जो बाण छोड़ता है, वे
साँप होकर लगते हैं ।।५॥
व्याल पास बस भए खरारी । स्ववस अनंत एक अधिकारी ।।
नट इव कपट चरित कर नाना । सदा स्वतंत्र एक भगवाना ॥ ६ ॥
जो स्वतन्त्र, अनन्त, एक (अखण्ड ) और निर्विकार है, वे खरके शत्रु श्रीरामजी
[ लीलासे ] नागपाशके वशमें हो गये ( उससे बँध गये)। श्रीरामचन्द्रजी सदा स्वतन्त्र,
एक (अद्वितीय) भगवान् है। वे नटकी तरह अनेकों प्रकारके दिखावटी चरित्र
करते हैं ॥६॥
रन सोभा लगि प्रभुहिं बंधायो । नागपास देवन्ह भय पायो ॥ ७ ॥
रणकी शोभाके लिये प्रभुने अपनेको नागपाशमें बंधा लियाः किंतु उससे
देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ ७ ॥
दो०-गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास ।
सो कि बंध तर आवइ व्यापक विख निवास ॥ ७३ ॥
शिवजी कहते हैं--] हे गिरिजे ! जिनका नाम जपकर मुनि भव (जन्म-
मृत्यु) की फाँसीको काट डालते हैं, वे सर्वव्यापक और विश्वनिवास ( विश्वके आधार )
प्रभु कहीं बन्धनमें आ सकते हैं? ॥ ७३ ॥
चौ०-चरित राम के सगुन भवानी । तर्फि न जाहिं बुद्धि बल बानी ॥
अस विचारि जे तग्य विरागी । रामहि भजहिं तक सब त्यागी ॥ १ ॥
हे भवानी ! श्रीरामजीकी इन सगुण लीलाओंके विषयमें बुद्धि और वाणीके बलसे
तर्क (निर्णय ) नहीं किया जा सकता । ऐसा विचारकर जो तत्त्वज्ञानी और विरक्त पुरुष
हैं, वे सब तर्क (शंका ) छोड़कर श्रीरामजीका भजन ही करते हैं ।। १ ।।
व्याकुल कटकु कीन्ह घननादा। पुनि भा प्रगट कहइ दुर्गादा ॥
जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा । सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा ॥ २ ॥
मेघनादने सेनाको व्याकुल कर दिया। फिर वह प्रकट हो गया और दुर्वचन
कहने लगा। इसपर जाम्बवान्ने कहा-अरे दुष्ट-! खड़ा रहा। यह सुनकर उसे बड़ा
क्रोध बढ़ा,॥ २ ॥
८०८ *रामचरितमानस बूढ़ जानि सठ छाँईउँ तोही । लागेसि अधम पचार मोही ॥ अस कहि तरल विसूल चलायो । जामवंत कर गहि सोइ धायो ॥ ३ ॥ अरे मूर्व ! मैंने बूढ़ा जानकर तुझको छोड़ दिया था। अरे अवम ! अब तू मुझीको ललकारने लगा है ? ऐसा कहकर उसने चमकता हुआ त्रिशूल चलाया। जाम्बवान् उसी निशूलको हाथसे पकड़कर दौड़ा ॥ ३ ॥ मारिसि मेघनाद के छाती । परा भूमि धुर्मित सुरघाती ॥ पुनि रिसान गहि चरन फिरायो । महि पठारि निज बल देखरायो ॥ ४ ॥ और उसे मेघनादकी छातीपर दे मारा । वह देवताओं का शत्रु चक्कर खाकर पृथ्वी- पर गिर पड़ा। जाम्बवान्ने फिर क्रोधमें भरकर पैर पकड़कर उसको घुमाया और पृथ्वी- पर पटककर उसे अपना बल दिखलाया ॥ ४ ॥ बर प्रसाद सो मरइ न मारा । तव गहि पद लंका पर डारा ॥ इहाँ देवरिपि गरुड़ पठायो । राम समीप सपदि सो आयो॥ ५ ॥ [किंतु ] वरदानके प्रतापसे वह मारे नहीं मरता। तब जाम्बवान्ने उसका पैर पकड़कर उसे लंकापर फेंक दिया । इधर देवर्षि नारदजीने गरुड़को भेजा। वे तुरंत ही श्रीरामजीके पास आ पहुँचे ॥ ५ ॥ दो०- खगपति सव धरि खाए माया नाग माया नाग वरूथ। माया विगत भए सव हरपे वानर जूथ ॥ ७४ (क)॥ पक्षिराज गरुड़जी सव माया-सौके समूहोंको पकड़कर खा गये । तब सव वानरों- के झुंड मायासे रहित होकर हर्षित हुए । ७४ (क)॥ गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ। चले तमीचर विकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ ॥ ७४ (ख)॥ पर्वत, वृक्ष, पत्थर और नख धारण किये वानर क्रोधित होकर दौड़े। निशाचर विशेष व्याकुल होकर भाग चले और भागकर किलेपर चढ़ गये ॥ ७४ (ख) ॥ चौ०-मेघनाद के मुरुछा जागी। पितहि विलोकि लाज अति लागी। तुरत गयउ गिरिवर कंदरा । करौं अजय मख अस मन धरा ॥ १ ॥ मेघनादकी मूर्छा छूटी, [तब] पिताको देखकर उसे बड़ी शर्म लगी। मैं अजय (अजेय होनेको ) यज्ञ कलें, ऐसा मनमें निश्चय करके वह तुरंत श्रेष्ठ पर्वतकी गुफामें चला गया ॥ १ ॥ इहाँ विभीषन मंत्र विचारा । सुनहु नाथ बल अतुल उदारा ॥ मेघनाद मख करइ अपावन । खल मायावी देव सतावन ॥ २ ॥ यहाँ विभीषणने यह सलाह विचारी [और श्रीरामचन्द्रजीसे कहा ] हे
* लंकाकाण्ड *
८०९
अतुलनीय बलवान् उदार प्रभो ! देवताओंको सतानेवाला दुष्ट, मायावी मेघनाद
अपवित्र यज्ञ कर रहा है ॥ २॥
जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि । नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि ।
सुनि रघुपति अतिसय सुख माना । बोले अंगदादि कपि नाना ॥ ३॥
हे प्रभो ! यदि वह यज्ञ सिद्ध हो पायेगा, तो हे नाथ ! फिर मेघनाद जल्दी जीता
न जा सकेगा। यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने बहुत सुख माना और अंगदादि बहुत-से
वानरोंको बुलाया [ और कहा- ॥३॥
लछिमन संग जाहु सब भाई । फरहु विधंस जग्य कर जाई ॥
तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही । देखि सभय सुर दुख अति मोही ॥ ४ ॥
हे भाइयो ! सब लोग लक्ष्मणके साथ जाओ और जाकर यज्ञको विध्वंस करो। हे
लक्ष्मण ! संग्राममें तुम उसे मारना। देवताओंको भयभीत देखकर मुझे बड़ा दुःख है ॥४॥
मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई । जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई ॥
जामवंत सुग्रीव बिभीषन । सेन समेत रहेहु तीनिउ जन ॥ ५ ॥
हे भाई ! सुनो, उसको ऐसे बल और बुद्धिके उपायसे मारना, जिससे निशाचरका
नाश हो । हे जाम्बवान्, सुग्रीव और विभीषण ! तुम तीनों जने सेनासमेत [ इनके ]
साथ रहना ॥ ५ ॥
जव रघुवीर दीन्हि अनुसासन । कटि निषंग कसि साजि सरासन ॥
प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा । बोले घन इव गिरा गंभीरा ॥ ६ ॥
[ इस प्रकार ] जब श्रीरघुवीरने आज्ञा दी, तब कमरमें तरकस कसकर और
धनुष सजाकर (चढ़ाकर ) रणवीर श्रीलक्ष्मगजी प्रभुके प्रतापको हृदयमें धारण करके
मेधके समान गम्भीर वाणी बोले-॥६॥
जौ तेहि आजु-वधे बिनु आवौं । तौ रघुपति सेवक न कहावौं ।
जौं सत संकर करहिं सहाई । तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई ॥ ७ ॥
यदि मैं आज उसे विना मारे आऊँ तो श्रीरघुनाथजीका सेवक न कहलाऊँ।
यदि सैकड़ों शंकर भी उसकी सहायता करें तो भी श्रीरघुवीरकी दुहाई है। आज मैं उसे
मार ही डालूँगा ।। ७॥
दो०- रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत ।
अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत ॥ ७५ ॥
श्रीरघुनाथजीके चरणों में सिर नवाकर शेषावतार श्रीलक्ष्मणजी तुरंत चले। उनके
साथ अंगद, नील, मयंद, नल और हनुमान् आदि उत्तम योद्धा थे ॥ ७५ ॥
चौ०-जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा । आहुति देत रुधिर अरु भैसा ॥
कीन्ह कपिन्ह सब जग्य विधंसा । जव न उठइ तब करहिं प्रसंसा ॥ १ ॥
* रामचरितमानस* वानरोंने जाकर देखा कि वह बैठा हुआ खून और मैंसेकी आहुति दे रहा है । वानरोंने सब यज्ञ विध्वंस कर दिया । फिर भी जब वह नहीं उठा, तब व उसकी प्रशंसा करने लगे ॥१॥ तदपि न उमइ धरेन्हि कच जाई। लातन्हि हति इति चले पराई । लै त्रिसूल धावा कपि भागे । आए जहँ रामानुज आगे ॥ २ ॥ इतनेपर भी वह न उठा. [ तब ] उन्होंने जाकर उसके बाल पकड़े और लातसि मार-मारकर वे भाग चले । वह त्रिशूल लेकर दौड़ा, तत्र वानर भागे और वहाँ आ गये जहाँ आगे लक्ष्मणजी खड़े थे॥२॥ आवा परम क्रोध कर मारा । गर्ज घोर रव वारहिं चारा ॥ कोपि मरुतसुत अंगद धाए । हति त्रिसूल उर धरनि गिराए ॥ ३ ॥ वह अत्यन्त क्रोधका मारा हुआ आया और बार-बार भयंकर शब्द करके गरजने लगा। मारुति (हनुमान् ) और अङ्गद क्रोध करके दौड़े । उसने छातीमें त्रिशूल मारकर दोनोंको धरतीपर गिरा दिया ॥३॥ प्रभु कह छाँदेसि सूल प्रचंडा । सर हृति कृत अनंत जुग खंडा॥ उठि बहोरि मारुति जुबराजा । हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा ॥४॥ फिर उसने प्रभु श्रीलक्ष्मणजीपर प्रचण्ड त्रिशूल छोड़ा। अनन्त ( श्रीलक्ष्मणजी) ने वाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये । हनुमानजी और युवराज अङ्गद फिर उठकर क्रोध करके उसे मारने लगे, पर उसे चोट न लगी ॥४॥ फिरे बीर रिपु मरइ न मारा । तब धावा करि घोर चिकारा ।। आवत देखि क्रुद्ध जनु काला । लछिमन छाड़े विसिख फराला ॥ ५ ॥ शत्रु (मेघनाद) मारे नहीं मरता, यह देखकर जब वीर लौटे, तब वह घोर चिग्वाड़ करके दौड़ा।उसे क्रुद्ध कालकी तरह आता देखकर लक्ष्मणजीने भयानक बाण छोड़े ॥५॥ देखेसि आवत पबि सम बाना । तुरत भयउ खल अंतरधाना ।। विविध वेप धरि करइ लराई । कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई ॥ ६ ॥ वज्रके समान बाणोंको आते देखकर वह दुष्ट तुरंत अन्तर्धान हो गया और फिर भाँति-भाँतिके रूप धारण करके युद्ध करने लगा। वह कभी प्रकट होता था और कभी छिप जाता था ॥ ६॥ देखि अजय रिपु डरपे कीसा । परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा ॥ लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा । एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा ॥ ७ ॥ शत्रुको पराजित न होता देखकर वानर डरे । तब सर्पराज शेपजी (लक्ष्मणजी) बहुत ही क्रोधित हुए । लक्ष्मण जीने मनमें यह विचार दृढ़ किया कि इस पापीको मैं
.
८११-
* लंकाकाण्ड *
बहुत खेला चुका [अब और अधिक खेलाना अच्छा नहीं, अब तो इसे समाप्त हो कर
देना चाहिये । ] ॥ ७ ॥
सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा । सर संधान कीन्ह करि दापा ॥
छाड़ा वान माझ उर लागा । मरती बार कपटु सब त्यागा ॥ ८॥
कोसलपति श्रीरामजीके प्रतापका स्मरण करके लक्ष्मणजीने वीरोचित दर्ष करके
बाणका संधान किया । बाण छोड़ते ही उसकी छातीके बीच में लगा । मरते समय उसने
सब कपट त्याग दिया ॥८॥
दो०--रामानुज कहूँ रामु कहँ अस कहि छाँडेसि प्रान ।
धन्य धन्य
तव जननी कह अंगद हनुमान ॥ ७६ ॥
रामके छोटे भाई लक्ष्मण कहाँ हैं ? राम कहाँ है ? ऐसा कहकर उसने प्राण
छोड़ दिये । अङ्गद और हनुमान् कहने लगे तेरी माता धन्य है, धन्य है, [जो तू
लक्ष्मणजीके हाथों मरा और मरते समय श्रीराम-लक्ष्मणको स्मरण करके तूने उनके
नामोंका उच्चारण किया ] ॥ ७६ ॥
चौ०-विनु प्रयास हनुमान उठायो । लंका द्वार राखि पुनि आयो ।
तासु मरन सुनि सुर गंधर्वा । चढ़ि बिमान आए नभ सर्वा ॥ १ ॥
हनुमान्जीने उसको बिना ही परिश्रमके उठा लिया और लङ्काके दरवाजेपर रखकर
वे लौट आये । उसका मरना सुनकर देवता और गन्धर्व आदि सब विमानोंपर चढ़कर
आकाशमें आये ॥ १॥
बरषि सुमन दुंदुभी वजावहिं । श्रीरघुनाथ विमल जसु गावहिं ॥
जय अनंत जय जगदाधारा । तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा ॥ २ ॥
वे फूल बरसाकर नगाड़े बजाते हैं और श्रीरघुनाथजीका निर्मल यश गाते हैं।
हे अनन्त ! भापकी जय हो । हे जगदाधार ! आपकी जय हो । हे प्रभो ! आपने सब
देवताओंका [ महान् विपत्तिसे] उद्धार किया ॥ २॥
अस्तुति करि सुर सिद्ध सिधाए । लछिमन कृपासिंधु पहिं आए।
सुत बध सुना दसानन जवहीं । मुरुछित भयउ परेउ महि तबहीं ॥ ३ ॥
देवता और सिद्ध स्तुति करके चले गये, तब लक्ष्मणजी कृपाके समुद्र श्रीरामजीके
पास आये । रावणने ज्यों ही पुत्रवधका समाचार सुना, त्यों ही वह मूछित होकर
पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३ ॥
मंदोदरी रुदन
कर भारी । उर ताड़न बहु भाँति पुकारी ॥
नगर लोग सब व्याकुल सोचा । सकल कहहिं. दसकंधर पोचा ॥ ४ ॥
मन्दोदरी छाती पीट-पीटकर और बहुत प्रकारसे पुकार-युकारकर बड़ा भारी विलाप
करने लगी। नगरके सब लोग शोकसे व्याकुल होगये। सभी रावणकों नीच कहने लगे ॥४॥
-- ८१२ * रामचरितमानस * दो-तव दसकंठ विविध विधि समुझाई सव नारि । नखर रूप जगत सब देखहु हृदयं विचारि ॥ ७७ ॥ तब रावणने सब स्त्रियोंको अनेकों प्रकारसे समझाया कि समस्त जगत्का मह (दृश्य ) रूप नाशवान् है, हृदयमें विचारकर देखो ॥ ७७ ॥ चौ०--तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन । आपुन मंद कथा सुभ पावन ॥ पर उपदेस कुसल बहुतेरे । जे आचरहिं ते नर न घनेरे ॥ १ ॥ रावणने उनको ज्ञानका उपदेश किया। वह म्वयं तो नीच है, पर उसकी कथा ( बातें ) शुभ और पवित्र है । दूसरोंको उपदेश देने में तो बहुत लोग निपुण होते हैं, पर ऐसे लोग अधिक नहीं हैं जो उपदेशके अनुसार आचरण भी करते हैं ॥ १ ॥ निसा सिरानि भयर भिनुसारा । लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा ॥ सुभट बोलाइ दसानन बोला । रन सन्मुख जा कर मन डोला ॥ २ ॥ रात बीत गयी, सबेरा हुआ। रीछ-वानर [ फिर ] चारों दरवाजोंपर जा डटे | योद्धाओको बुलाकर दशमुख रावणने कहा-लड़ाईमें शत्रुके सम्मुख जिसका मन डॉवाडोल हो, ॥२॥ सो अबहीं वरु जाउ पराई । संजुग बिमुख भएँ न भलाई ॥ निज भुज बल मैं वयरु बढ़ावा । देहउँ उतरु जो रिपु चदि आवा ॥ ३ ॥ अच्छा है वह अभी भाग जाय । युद्ध में जाकर विमुख होने (भागने ) में भलाई नहीं है । मैंने अपनी भुजाओंके बलपर वैर बढ़ाया है। जो शत्रु चढ़ आया है, उसको मैं [ अपने ही ] उत्तर दे लूँगा ॥ ३ ॥ अस कहि मरुत वेग स्थ साजा । बाजे सकल जुझाऊ बाजा ॥ चले बीर सब अतुलित बली । जनु काजल के आँधी चली ॥४॥ ऐसा कहकर उसने पवनके समान तेज चलनेवाला रथ सजाया। सारे जुझाऊ (लड़ाईके ) बाजे बजने लगे । सब अतुलनीय बलवान् वीर ऐसे चले मानो काजलकी आँधी चली हो ॥ ४॥ असगुन अमित होहिं तेहि काला । गनइ न भुंज वल गर्व विसाला ॥ ५ ॥ उस समय असंख्य अशकुन होने लगे । पर अपनी भुजाओंके वलका बड़ा गर्व होनेसे रावण उन्हें गिनता नहीं है ॥ ५ ॥ छं०-अति गर्व गनइ न सगुन असगुन नहिं आयुध हाथ ते । भट गिरत रथ ते वाजि गज चिरत भाजहि साथ ते ॥ गोमाय गीध कराल खर रव स्वान वोहिं अति घने । जनु कालदूत उलूक योहिं वचन परम भयावने ॥ अत्यन्त गर्वके कारण वह शंकुन-अशकुनका विचार नहीं करता। हथियार हाथोंसे । ,
* लंकाकाण्ड
८१३.
गिर रहे हैं । गोदा रयते गिर पड़ते हैं। घोड़े, हाथी माथ छोड़कर चिपाड़ते हुए भाग
जाते हैं। स्यार, गांध, कौए और गदहे शब्द कर रहे हैं। बहुत अधिक कुत्ते बोल रहे
है। उल्लू ऐसे अत्यन्त भयानक शब्द कर रहे है, मानो कालके दूत हों ( मृत्युका
संदेशा मुना रहे हो)।
दो-ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन विनाम ।
भूत द्रोह रत मोहवस राम बिमुख रति काम ॥ ७८ ॥
जो जीवों के द्रोहमें रत है, मोहके वश हो रहा है, रामविमुख है और कामासक्त है,
उसको क्या कभी स्वप्नमें भी सम्मत्ति, शुभ शकुन और नितकी शान्ति हो सकती है?||७८||
चौ०-चलेउ निसायर कटकु अपारा । चतुरंगिनी अनी बहु धारा ॥
विविधि भाँति वाहन रथ जाना । विपुल अरन पताक ध्वज नाना ॥ १ ॥
राक्षसोंकी अपार सेनाचली।चतुरंगिणी सेनाकी बहुत-सीटुकड़ियाँ हैं ।अनेकों प्रकार-
के वाहन, रथ और मवारियाँ हैं क्या बहुत-से रंगोंकी अनेकों पताकाएँ और ध्वजाएँ हैं ॥१॥
चले मत्त गज जूध घनेरे । प्राविट जलद मस्त जनु मेरे ॥
बरन बरन बिरदैत निकाया । समर सूर जानहिं बहु माया ॥ २ ॥
मतवाले हाथियों के बहुत से झुंड चले।मानो पवनसे प्रेरित हुए वर्षाऋतुके बादल
हो । रंग-बिरंगे बाना धारण करनेवाले वीरोंके समूह है, जो युद्धमें बड़े शूरवीर हैं
और बहुत प्रकारकी माया जानते हैं ।। २ ॥
अति विचित्र वाहिनी विराजी । वीर वसंत सेन जनु साजी ।।
चलत फटक दिगसिंधुर डगहीं। छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं ॥ ३ ॥
अत्यन्त विचित्र फौज शोभित है। मानो वीर वसन्तने सेना सजायी हो । सेनाके
चलनेसे दिशाओंके हाथी डिगने लगे, समुद्र क्षुभित हो गये और पर्वत डगमगाने लगे ॥३॥
उठी रेनु रवि गयउ छपाई । मरुत थकित वसुधा अकुलाई ॥
पनव निसान घोर रव चाहिं । प्रलय समय के धन जनु गाजहिं ॥ ४ ॥
इतनी धूल उड़ी कि सूर्य छिप गये । [फिर सहसा ] पवन रुक गया और पृथ्वी
अकुला उठी । ढोल और नगाड़े भीषण धनिमे बज रहे हैं, जैसे प्रलयकालके बादल
गरज रहे हो।॥ ४॥
भेरि नफीरि वाज सहनाई । मारू राग सुभट सुखदाई ॥
केहरि नाद वीर सब करहीं। निज निज बल पौरुप उच्चरहीं ॥ ५ ॥
भेरी, नफौरी (तुरही) और शहनाईमें योद्धाओं को सुख देनेवाला मारू राग बज
रहा है। सब वीर सिंहनाद करते हैं और अपने अपने बल-पौरुपका बखान कर रहे हैं ॥५॥
कहइ दसानन सुनहु सुभट्टा । मर्दहु भालु कपिन्ह के ठहा ॥
हो मारिहउँ भूप दो भाई । अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई ॥ ६ ॥
करते हैं। * रामचरितमानस * रावणने कहा-हे उत्तम योद्धाओ ! सुनो, तुम रीछ-वानरोंके ठट्टको मसल डालो । और मैं दोनों राज कुमार भाइयोंको मारूँगा । ऐसा कहकर उसने अपनी सेना सामने चलायी ॥६॥ यह सुधि सकल कपिन्ह जव पाई। धाए करि रघुबीर दोहाई ॥ ७ ॥ जब सब वानरोंने यह खबर पायी, तब वे श्रीरघुवीरकी दुहाई देते हुए दौड़े ॥७॥ छं०-धाए विसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते। मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बुंद नाना वान ते ॥ नख दसन सैल महाद्रुमायुध सवल संक न मानहीं। जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु वखानहीं॥ वे विशाल और कालके समान कराल वानर-भालू दौड़े। मानो पंखवाले पर्वतोंके समूह उड़ रहे हों। वे अनेक वर्गों के हैं। नख, दाँत, पर्वत और बड़े-बड़े वृक्ष ही उनके हथियार हैं । वे बड़े बलवान हैं और किसीका भी डर नहीं मानते । रावणरूपी मतवाले हाथीके लिये सिंहरूप श्रीरामजीका जय जयकार करके वे उनके सुन्दर यशका वखान दो०-दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि । मिरे वीर इत रामहि उत रावनहि वखानि ॥ ७९ ॥ दोनों ओरके योद्धा जय-जयकार करके अपनी-अपनी जोड़ी जान (चुन) कर. इधर श्रीरघुनाथजीका और उधर रावणका बखान करके परस्पर भिड़ गये ॥ ७९ ॥ चौ०-रावनु रथी विस्थ रघुबीरा । देखि विभीषन भयउ अधीरा ॥ अधिक प्रीति मन भा संदेहा | बंदि चरन कह सहित सनेहा ॥ १ ॥ गवणको रथपर और श्रीरघुवीरको विना रथके देखकर विभीषण अधीर हो गये । प्रेम अधिक होनेसे उनके मनमें संदेह हो गया [कि वे बिना रथके रावणको कैसे जीत सकेंगे ] ! श्रीरामजीके चरणोंकी वन्दना करके वे स्नेहपूर्वक कहने लगे ॥१॥ नाथ न रथ नहिं तन पद बाना । केहि बिधि जितब वीर बलवाना ।। सुनहु सखा कह कृपानिधाना । जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना ॥ २ ॥ हे नाथ ! आपके न रथ है, न तनकी रक्षा करनेवाला कवच है और न जूते ही हैं । वह बलवान् वीर रावण किस प्रकार जीता जायगा ? कृपानिधान श्रीरामजीने कहा- हे सखे ! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है ॥ २ ॥ सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥ वल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे ॥ ३ ॥ शौर्य और धैर्य. उस रथके पहिये हैं । सत्य और शील (सदाचार ) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं । वल, विवेक, दम (इन्द्रियोंकाः वयमें होना) और --
* लंकाकाण्ड *
परोपकार-ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समतारूपी डोरीसे रथमें जोड़े
हुए हैं ॥३॥
ईस भजनु सारथी सुजाना । विरति चर्म संतोष कृपाना ॥
दान परसु बुधि सति प्रचंडा । बर विग्यान कठिन कोदंडा ॥४॥
ईश्वरका भजन ही [ उस रथको चलानेवाला ] चतुर सारथि है। वैराग्य ढाल
है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन
धनुष है ॥ ४॥
अमल अचल मन ब्रोन समाना । सम जम नियम सिलीमुख नाना ।।
कवच अभेद विप्र गुर पूजा । एहि सम विजय उपाय न दूजा ॥ ५ ॥
निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर ) मन तरकसके समान है । शम
(मनका वशमें होना ),[अहिंसादि] यम और [ शौचादि ] नियम-ये बहुत-से वाण
हैं । वाहाणों और गुरुका पूजन अभेद्य कवच है । इसके समान विजयका दूसरा उपाय
नहीं है ॥ ५॥
सखा धर्ममय अस रथ जाकें । जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ॥ ६ ॥
हे सखे ! ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो उसके लिये जीतनेको कहीं शत्रु ही
नहीं है ॥ ६ ॥
दोल-महा अजय संसार रिपु जीति सकह सो वीर ।
जाके अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर ॥ ८०(क)॥
हे धीरद्धिवाले सखा ! सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार
(जन्म-मृत्यु ) रूपी महान् दुर्जय शत्रुको भी जीत सकता है [ रावणकी तो बात ही
क्या है ] || ८० (क)॥
सुनि प्रभु वचन विभीषन हरपि गहे पद कंज।
एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज ॥८० (ख)॥
प्रभुके वचन सुनकर विभीपणजीने हर्षित होकर उनके चरणकमल पकड़ लिये
[और कहा-] हे कृपा और सुखके समूह श्रीरामजी ! आपने इसी बहाने मुझे
[महान् ] उपदेश दिया ।। ८० (ख)॥
उत पचार दसकंधर इत
अंगद हनुमान।
लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन ॥ ८०(ग)।
उधरसे रावण ललकार रहा है और इधरसे अंगद और हनुमान् । राक्षस और
चैछ धानर अपने-अपने स्वामीकी दुहाई देकर लड़ रहे हैं ।। ८० (ग) ॥
चौ०-सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना । देखत रन नभ चड़े विमाना ॥
हमहू उमा रहे तेहिं संगा। देखत राम चरित. रन रंगा ॥ १ ॥
, * रामचरितमानस * ब्रह्मा आदि देवता और अनेकों सिद्ध तथा मुनि विमानोपर चढ़े हुए आकाशसे युद्ध देख रहे हैं। [शिवजी कहते हैं- हे उमा ! मैं भी उस समाजमें था और श्रीरामजीके रण-रंग ( रणोत्साह) की लीला देख रहा था ॥१॥ सुभट समर रस दुहु दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते॥ एक एक सन भिरहिं पचारहि । एकान्ह एक मदि महि पारहिं ॥ २ ॥ दोनों ओरके योद्धा रण-रसमें मतवाले हो रहे हैं। वानरोंको श्रीरामजीका बल है, इससे वे जयशील हैं ( जीत रहे हैं ) । एक दूसरेसे भिड़ते और ललकारते हैं और एक दूसरेको मसल-मसलकर पृथ्वीपर डाल देते हैं ॥ २ ॥ मारहिं कारहिं धरहिं पछारहिं । सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं ॥ उदर विदारहिं भुजा उपारहि । गहिपद अवनि पटकिभट डारहिं ॥ ३ ॥ वै मारते, काटते, पकड़ते और पछाड़ देते हैं और सिर तोड़कर उन्हीं सिरोंसे दूसरों- को मारते हैं । पेट फाड़ते हैं, भुजाएँ उखाड़ते हैं और योद्धाओंको पैर पकड़कर पृथ्वीपर पटक देते हैं ।। ३ ॥ निसिचर भट महि गाहिं भालू । ऊपर ढारि देहिं बहु बाल॥ वीर वलीमुख जुद्ध बिरुद्ध। देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्ध ॥ ४ ॥ राक्षस योद्धाओंको भालू पृथ्वीमें गाड़ देते हैं और ऊपरसे बहुत-सी बालू डाल देते हैं । युद्ध में शत्रुओंसे विरुद्ध हुए वीर वानर ऐसे दिखायी पड़ते हैं मानो बहुत-से क्रोधित काल हों॥४॥ छं०-ऋद्ध कृतांत समान कपि तन स्रवत सोनित राजहीं। महिं निसाचर कटक भट वलवंत घन जिमि गाजहीं॥ मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं । चिक्करहिं मर्कट भालु छल चल करहिं जेहिं खल छीजहीं॥ १ ॥ क्रोधित हुए कालके समान वे वानर खून बहते हुए शरीरोंसे शोभित हो रहे हैं । वे बलवान् वीर राक्षसोंकी सेनाके योद्धाओंको मसलते और मेघकी तरह गरजते हैं । डाँटकर चपेटसे मारते, दाँतोंसे काटकर लातोंसे पीस डालते हैं । वानर-भालू चिग्घाड़ते और ऐसा छल-बल करते हैं जिससे दुष्ट राक्षस नष्ट हो जाय ॥ १ ॥ धरि गाल फारहि उर विदारहि गल अँतावरि मेलहीं। महादपति जनु विविध तनु धरि समर अंगन खेलहीं। धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही। जय राम जो तन ते कुलिस कर कुलिसतेकर तन सही ॥ २ ॥ वे राक्षसोंके गाल पकड़कर फाड़ डालते हैं, छाती चीर डालते हैं और उनकी अंतड़ियाँ निकालकर गलेमें डाल लेते हैं। वे वानर ऐसे देख पड़ते हैं मानो प्रहादके चौ०-धायउ *लंकालाएइसकालय ८१७ स्वामी श्रीनृसिंह भगवान् अनेकों शरीर धारण करके युद्धके मैदानमें क्रीड़ा कर रहे हों। पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो आदि घोर शब्द आकाश और पृथ्वीमें भर (छा) गये हैं। श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो, जो सचमुच तृणसे वन और वनसे तृण कर देते हैं। (निर्बलको सबल और सबलको निर्बल कर देते हैं) ॥२॥ दो०--निज दल विचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप । रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप ॥ ८१ ॥ अपनी सेनाको विचलित होते हुए देखा, तब बीस भुजाओंमें दस धनुष लेकर रावण रथपर चढ़कर गर्व करके लौटो, लौटो' कहता हुआ चला || ८१ ॥ परम क्रुद्ध दसकंधर । सन्मुख चले हूह दै बंदर ॥ गहि कर पादप उपल पहारा । डारेन्हि ता पर एकहिं बारा ॥ १ ॥ रावण अत्यन्त क्रोधित होकर दौड़ा । वानर हुंकार करते हुए [ लड़नेके लिये ] उसके सामने चले । उन्होंने हाथों में वृक्ष, पत्थर और पहाड़ लेकर रावणपर एक ही साथ डाले ॥ १॥ लागहिं सैल बन तन तासू । खंड खंड होइ फूटहिं आसू ॥ चला न अचल रहा रथ रोपी । रन दुर्मद रावन अति कोपी ॥ २ ॥ पर्वत उसके वज्रतुल्य शरीरमें लगते ही तुरंत टुकड़े-टुकड़े होकर फूट जाते हैं । अत्यन्त क्रोधी रणोन्मत्त रावण रथ रोककर अचल खड़ा रहा, [ अपने स्थानसे ] जरा भी नहीं हिला ॥२॥ इत उत झपटि दपटि फपि जोधा । मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा ।। चले पराइ भालु कपि नाना । त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना ॥ ३ ॥ उसे बहुत ही क्रोध हुआ। वह इधरउधर झपटकर और डपटकर वानर योद्धाओंको मसलने लगा । अनेकों वानर-भालू हे अंगद ! हे हनुमान् ! रक्षा करो, रक्षा करो [ पुकारते हुए ] भाग चले ॥ ३ ॥ पाहि पाहि रघुबीर गोसाई । यह खल खाइ फाल की नाई ॥ तेहिं देखे फपि सकल पराने । दसहुँ चाप सायक संघाने ॥ ४ ॥ हे रघुवीर ! हे गोसाई ! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये । यह दुष्ट कालकी भाँति हमें खा रहा है । उसने देखा कि सब वानर भाग छूटे । तब [ रावणने ] दों धनुपोंपर बाण सन्धान किये ॥४॥ छं०-संधानि धनुसर निकर छाडेसि उरग जिमि उडि लागहीं। रहे पूरिसरधरनीगगन दिसि विदिसिकहँ कपिभागहीं। भयोअति कोलाहल विकल कपिदलभालुचोलहिआतुरे। रघुवीर करुना सिंधु आरतः बंध जन्नरच्छक हरे ॥ रा०स०५२- * रामचरितमानस उसने घनुषपर सन्धान करके बागोंके समूह छोड़े। वे वाण सपकी तरह उड़कर जा लगते थे। पृथ्वी, आकाश और दिशा-विदिशा सर्वत्र बाण भर रहे हैं । वानर भागें तो कहाँ १ अत्यन्त कोलाहल मच गया। वानरस्भालुओंकी सेना व्याकुल होकर आत- पुकार करने लगी-हे रघुवीर ! हे करुणासागर ! हे पीड़ितोंके बन्धु ! हे सेवकोंकी रक्षा करके उनके दुःख हरनेवाले हरि ! दो०-निज दल विकल देखि कटि कसि निपंग धनु हाथ । लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ ॥ ८२ ॥ अपनी सेनाको व्याकुल देखकर कमरमें तरकस कसकर और हायमें धनुष लेकर श्रीरघुनाथजीके चरणोपर मस्तक नवाकर लक्ष्मणजी क्रोधित होकर चले ॥ ८२ ।। चौल-रे खल का मारसि फपि भालू । मोहि बिलोकु तोर मैं कालू ॥ खोजत रहेउ तोहि सुतघाती । आजु निपाति जुड़ावउँ छाती ॥ १ ॥ [लक्ष्मणजीने पास जाकर कहा- अरे दुष्ट ! वानर-भालुओंको क्या मार रहा है ? मुझे देख, मैं तेरा काल हूँ ? [ रावणने कहा- अरे मेरे पुत्रके घातक ! मैं तुझीको हूँढ़ रहा था । आज तुझे मारकर [ अपनी] छाती ठंडी करूँगा ॥ १ ॥ अस कहि झाड़सि चान प्रचंडा । लछिमन किए सकल सत खंडा ॥ कोटिन्ह आयुध रावन हारे। तिल प्रवान करि काटि निवारे ॥२॥ ऐसा कहकर उसने प्रचण्ड वाण छोड़े। लक्ष्मणजीने सबके सैकड़ों टुकड़े कर डाले । रावणने करोड़ों अस्त्र-शब चलाये । लक्ष्मणजीने उनको तिल्के बराबर करके काटकर हटा दिया ।। २॥ पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा । स्यदनु भंजि सारथी मारा ॥ सत सत सर मारे दस भाला । गिरिसुंगन्ह जनुप्रविसहि व्याला॥ ३ ॥ फिर अपने बागोंसे [ उसपर ] ग्रहार किया और उसके रथको तोड़कर सारथिको मार डाला | [ रावणके ] दसों मस्तकोंमें सौ-सौ बाण मारे। वे सिरोंमें ऐते पैठ गये, मानो पहाड़के शिखरोंमें सर्प प्रवेश कर रहे हों ॥३॥ पुनि सत सर मारा उर माहीं। परेड धरनि तल सुधि कछु नाहीं । उडा प्रबल पुनि मुल्या जागी । छाडिसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी ॥ ४ ॥ फिर सौ बाण उसको छातीमें मारे । वह पृथ्वीपर गिर पड़ा, उसे कुछ भी होश न रहा । फिर मूर्छा छूटनेपर वह प्रवल रावण उठा और उसने वह शक्ति चलायी जो ब्रह्माबीने उसे दी थी॥४॥ छं०-सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही। परयोघीर विकल उठावदसमुख अतुल यलमहिमारही।
* लंकाकाण्ड * ८१९ ब्रह्मांड भवन बिराज जाके एक सिर जिमि रज कनी। तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी ॥ वह ब्रह्माकी दी हुई प्रचण्ड शक्ति लक्ष्मणजीके ठीक छातीमें लगी । वीर लक्ष्मणजी व्याकुल होकर गिर पड़े । तब रावण उन्हें उठाने लगा, पर उसके अतुलित बलकी महिमा यों ही रह गयी, (व्यर्थ हो गयी, वह उन्हें उठा न सका)। जिनके एक ही सिरपर ब्रह्माण्डरूपी भवन धूलके एक कणके समान विराजता है, उन्हें मूर्ख रावण उठाना चाहता है । वह तीनों भुवनोंके खामी लक्ष्मणजीको नहीं जानता। दो० देखि पवनसुत धायउ बोलत वचन कठोर। थावत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर ॥ ८३ ॥ यह देखकर पवनपुत्र हनुमानजी कठोर वचन बोलते हुए दौड़े । हनुमान्जीके आते ही रावणने उनपर अत्यन्त भयंकर घूसेका प्रहार किया ॥ ८३ ॥ चौ०-जानु टेकि कपि धूमि न गिरा । उठा सँभारि बहुत रिस भरा ॥ मुठिका एक ताहि कपि मारा । परेड सैल जनु यन्त्र प्रहारा ॥ १ ॥ हनुमान्जी घुटने टेककर रह गये, पृथ्वीपर गिरे नहीं और फिर क्रोधसे भरे हुए सभालकर उठे । हनुमान्जीने रावणको एक सा मारा | वह ऐसा गिर पड़ा, जैसे वज्रकी मारसे पर्वत गिरा हो ॥१॥ मुल्ला मै बहोरि सो जागा । कपि वल बिपुल सराहन लागा। धिग धिग मम पौरुष धिग मोही । जौं ते जिभत रहेसि सुरदोही ॥ २ ॥ मूर्छा मंग होनेपर फिर वह जगा और हनुमान्जीके बड़े भारी बलको सराहने लगा। [ हनुमान्जीने कहा- मेरे पौरुषको धिक्कार है, धिक्कार है और मुझे भी धिक्कार है, जो हे देवद्रोही! तू अब भी जीता रह गया ॥२॥ अस कहि लछिमन कहुँ कपिल्यायो । देखि दसानन बिसमय पायो । कह रघुबीर समुझु जिय भ्राता । तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता ॥ ३ ॥ ऐसा कहकर और लक्ष्मणजीको उठाकर हनुमानजी श्रीरघुनाथजीके पास ले आये। यह देखकर रावणको आश्चर्य हुआ। श्रीरघुवीरने [लक्ष्मणजीसे ] कहा-हे भाई ! हृदयमें समझो, तुम कालके भी भक्षक और देवताओंके रक्षक हो ॥ ३ ॥ सुनत बचन उठि बैठ कृपाला । गई गगन लो सकति कराला ॥ पुनि कोदंड बान गहि धाए । रिपु सन्मुख अति आतुर आए ॥ ४ ॥ ये वचन सुनते ही कृपालु लक्ष्मणजी उठ बैठे। वह कराल शक्ति आकाशको चली गयी। लक्ष्मणजी फिर धनुष-बाण लेकर दौड़े और बड़ी शीघ्रतासे शत्रुके सामने आ पहुँचे ॥४॥ छ-आतुर बहोरि विभंजि स्पंदन सूत हति व्याकुल कियो । गिरयो धरनिदसकंधर बिकलतरबान सतवेध्योहियो । - *रामचरितमानस सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका ले गयो । रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो । फिर उन्होंने बड़ी ही शीघ्रतासे रावणके रथको चूर-चूर कर और सारथिको मारकर उसे ( रावणको) व्याकुल कर दिया। सौ बाणोंसे उसका हृदय वेध दिया, जिससे रावण अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब दूसरा सारथि उसे स्थमैं डालकर तुरंत ही लङ्काको ले गया। प्रतापके समूह श्रीरघुवीरके भाई लक्ष्मणजीने फिर आकर प्रभुके चरणों में प्रणाम किया। दो-उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जन्य । राम विरोध विजय चह सठ हठ बस अति अग्य ॥ ८४ ॥ वहाँ (लङ्कामें ) रावण मूसेि जागकर कुछ यज्ञ करने लगा । वह मूर्ख और अत्यन्त अज्ञानी हठवश श्रीरधुनाथजीसे विरोध करके विजय चाहता है ।। ८४ !! चौ०-इहाँ विभीषन सव सुधि पाई। सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई ।। नाथ करइ रावन एक जागा । सिद्ध भएँ नहिं मरिहि अभागा ॥ १ ॥ यहाँ विभीषणजीने सब खवर पायी और तुरंत जाकर श्रीरघुनाथजीको कह सुनायी कि हे नाथ ! रावण एक यज्ञ कर रहा है। उसके सिद्ध होनेपर वह अभागा सहज ही नहीं मरेगा ॥१॥ पठवहु नाथ बेगि भट बंदर। करहिं विधंस आव दसकंधर ॥ प्रात होत प्रभु सुनट पठाए । हनुमदादि अंगद सब धाए ॥ २ ॥ हे नाथ ! तुरंत वानर योद्धाओंको भेजिये जो यज्ञका विध्वंस करें, जिससे रावण युद्धमें आवे । प्रातःकाल होते ही प्रभुने वीर योद्धाओंको भेजा । हनुमान् और अंगद आदि सब [प्रधान वीर ] दौड़े ॥ २ ॥ कौतुक कूदि चढ़े पि लंका । पैठे रावन भवन असंका ॥ जग्य करत जवहीं सो देखा । लपल पिन्ह मा क्रोध बिसेषा ॥ ३ ॥ वानर खेलते ही कूदकर लङ्कापर जा चढ़े और निर्भय रावणके महलमें जा घुसे । ज्यों ही उसको यज्ञ करते देखा, त्यों ही सब वानरोंको बहुत क्रोध हुआ ॥ ३ ॥ रन ते निलज भाजि गृह आवा । इहाँ आइ बक ध्यान लगावा ।। अस कहि अंगद मारा लाता | चितवन लठ स्वास्थ मन संता ॥ ४ ॥ [उन्होंने कहा- अरे ओ निर्लन्न ! रणभूमिसे घर भाग आया और यहाँ आकर बगुलेका-सा ध्यान लगाकर बैठा है ? ऐसा कहकर अंगदने लात मारी, पर उसने इनकी ओर देखा भी नहीं, उस दुष्टका मन स्वार्थमें अनुरक्त था ॥ ४) छं०---नहिचितवजव करिकोप कपिगहिदसमलातन्हमारहीं। धरि केस नारि निकारि बाहेर तेऽतिदीत पुकारहीं।।
* लंकाकाण्ड ८२१ तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन वानर डारई। एहि बीच कपिन्ह विधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई ॥ जब उसने नहीं देखा, तब वानर क्रोध करके उसे दाँतोंसे पकड़कर [ काटने और ] लातोंसे मारने लगे । स्त्रियोंको वाल पकड़कर घरसे बाहर घसीट लाये, वे अत्यन्त ही दीन होकर पुकारने लगीं। तब रावण कालके समान क्रोधित होकर उठा और वानरोंको पैर पकड़कर पटकने लगा। इसी बीचमें वानरोंने यज्ञ विध्वंस कर डाला, यह देखकर वह मनमें हारने लगा (निराश होने लगा)। दो०-जग्य विधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास । चलेउ निसाचर कुद्ध होइ त्यागि जिवन के आस ॥ ८५ ॥ यज्ञ विध्वंस करके सब चतुर वानर रघुनायजीके पास आ गये। तब रावण जीनेकी आशा छोड़कर क्रोधित होकर चला ॥८५ ॥ to-चलत होहिं अति असुभ भयंकर । बैठहिं गोध उड़ाइ सिरन्ह पर ॥ भयड झालबस काहु न माना । कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना ॥ १ ॥ चलते समय अत्यन्त भयंकर अमङ्गल (अपशकुन ) होने लगे । गीध उड़-उड़- कर उसके सिरोंपर बैठने लगे। किंतु वह कालके वश था, इससे किसी भी अपशकुनको नहीं मानता था । उसने कहा-युद्धका डंका बजाओ॥१॥ चली तमीचर अनी अपारा । बहु गज स्थ पदाति असवारा ॥ प्रभु सन्मुख धाए खल कैसें । सलभ समूह अनल कह जैसें ॥२॥ निशाचरोंकी अपार सेना चली । उसमें बहुत-से हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल हैं। वे दुष्ट प्रभुके सामने कैसे दौड़े, जैसे पतंगोंके समूह अमिकी ओर [जलनेके लिये दौड़ते हैं ॥२॥ इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही । दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही ॥ अब जनि राम खेलावहु एही । अतिसय दुखित होति बैदेही ॥ ३ ॥ इधर देवताओंने स्तुति की कि हे श्रीरामजी ! इसने हमको दारुण दुःख दिये हैं । अब आप इसे [ अधिक ] न खेलाइये, जानकीजी बहुत ही दुखी हो रही हैं ॥ ३ ॥ देव बचन सुनि प्रभु मुसुफाना । उठि रघुबीर सुधारे बाना । जटा जूट जूट दृढ़ बाँध माथे । सोहहिं सुमन बीच विच गाये ॥ ४ ॥ देवताओंके वचन सुनकर प्रभु मुसकराये | फिर श्रीरघुवीरने उठकर बाण सुधारे। मस्तकपर जटाओंके जूड़ेको कसकर बाँधे हुए हैं, उसके बीच-बीचमें पुष्प गूंथे हुए शोभित हो रहे हैं ॥ ४ ॥ भरुन नयन बारिद तनु स्यामा । अखिल लोक लोचनाभिरामा । कटि तट परिकर कस्यो निषंगा । कर कोदंड कठिन सारंगा ॥ ५ ॥ - ८२२ * रामचरितमानस लाल नेत्र और मेघके समान श्याम शरीखाले और सम्पूर्ण लोकोंके नेत्रोंको आनन्द देनेवाले हैं। प्रभुने कमरमें फेंटा तथा तरकस कस लिया और हाथमें कठोर . शार्ङ्गधनुष ले लिया ॥ ५ ॥ छं०-सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो। भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो । कह दास तुलसी जवहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे। ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे ॥ प्रभुने हाथमें शार्ङ्गधनुष लेकर कमरमें वाणोंकी खान (अक्षय ) सुन्दर तरंकस . कस लिया। उनके भुजदण्ड पुष्ट हैं और मनोहर चौड़ी छातीपर ब्राह्मण (भूगुजी) के चरणका चिह्न शोभित है। तुलसीदासजी कहते हैं, ज्यों ही प्रभु धनुष-बाण हायमें लेकर फिराने लगे, त्यों ही ब्रह्माण्ड, दिशाओंके हाथी, कच्छप, शेषजी, पृथ्वी, समुद्र और पर्वत सभी डगमगा उठे। दो०-सोभा देखि हरषि सुर वरपहिं सुमन अपार । . जय जय जय करुनानिधि छवि वल गुन आगार ॥ ८६ ॥ [भगवान्को ] शोभा देखकर देवता हर्षित होकर फूलोकी अपार वर्षा करने लगे। और शोभा, शक्ति और गुणोंके धाम करुणानिधान प्रभुकी जय हो, जय हो, लय हो[ ऐसा पुकारने लगे ॥८६॥ चौ०-एहीं बीच निसाचर अनी । कसमसात आई अति घनी ॥ देखि चले सन्मुख झपि भट्टा । प्रलयकाल के जनु धन घट्टा ॥ १ ॥ इसी बीचमें निशाचरोंकी अत्यन्त घनी सेना कसमसाती हुई ( आपसमें टकराती हुई ) आयो । उसे देखकर वानर योद्धा इस प्रकार [ उसके ] सामने चले, जैसे प्रलयकालके वादलोंके समूह हों ।। १ ॥ बहु कृपान तरवारि चमकहिं । जनु दह दिसि दामिनी दमकहिं ।। गज रथ तुरग चिकार कठोरा । गजेहिं मनहुँ बलाहक घोरा ॥ २ ॥ बहुत-से कृपाण और तलवारें चमक रही हैं, मानो दसों दिशाओंमें बिजलियाँ चमक रही हों । हाथी, रथ और घोड़ोंका कठोर चिग्घाड़ ऐसा लगता है, मानो बादल भयंकर गर्जन कर रहे हो ॥२॥ कपि लंगूर बिपुल नभ छाए । मनहुँ - इंद्रधनु उए सुहाए । उठ धूरि मानहुँ जलधारा । बान बुंद भै वृष्टि, अपारा ॥ ३ ॥ वानरोंकी बहुत-सी पूँछे आकाशमें छायी हुई हैं । [ वे ऐसी शोभा दे रही हैं ]. मानो सुन्दर इन्द्रधनुष उदय हुए हों । धूल ऐसी उठ रही है, मानो जलकी धारा हो।
लागत
*लंकाकाण्ड
८२३
याणरूपी बूंदोंकी अपार नृष्टि हुई ।। ३ ।।
दुहुँ दिसि पर्वत करहिं प्रहारा । वज्रपात जनु वारहिं बारा ॥
रघुपति कोपि पान झरि लाई। घायल भै निसिचर समुदाई ॥ ४ ॥
दोनों ओरसे योद्धा पर्वतोंका प्रहार करते हैं । मानो वारंवार वज्रपात हो रहा हो।
श्रीरघुनाथजीने क्रोध करके बाणोंकी झड़ी लगा दी, [जिससे ] राक्षसोंकी सेना घायल
हो गयी ॥ ४ ॥
बान बीर चिकरहीं । धुमि घुर्मि जहँ तह महि परहीं ॥
सवहिं सैल जनु निझर भारी । सोनित सरि कादर भयकारी ॥ ५ ॥
बाण लगते ही वीर चीत्कार फर उठते हैं और चकर खा-खाकर जहाँ-तहाँ पृथ्वीपर
गिर पड़ते हैं। उनके शरीरोंसे ऐसे खून बह रहा है, मानो पर्वतके भारी झरनोंसे जल
बह रहा हो । इस प्रकार डरपोकोंको भय उत्पन्न करनेवाली रुधिरकी नदी बह चली ॥५॥
छं०-कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी।
दोउ कुल दल रथ रेत चक्र अवर्त वहति भयावनी ॥
जलजंतु गज पदचर तुरग खर विविध वाहन को गने ।
सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने ॥
डरपोकोंको भय उपजानेवाली अत्यन्त अपवित्र रक्तकी नदी बह चली। दोनों
दल उसके दोनों किनारे हैं। रथ रेत है और पहिये मँवर हैं। वह नदी बहुत भयावनी
बह रही है। हाथी, पैदल, घोड़े, गदहे तथा अनेकों सवारियाँ ही, जिनकी गिनती कौन
करे, नदीके जलजन्तु हैं। वाण, शक्ति और तोमर सर्प हैं, धनुष तरतें हैं और ढाल
बहुत-से कछुवे हैं।
दो०-चीर परहिं जनु तीर तरु मजा वहु वह फेन ।
कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन ॥ ८७ ॥
वीर पृथ्वीपर इस तरह गिर रहे हैं, मानो नदी-किनारेके वृक्ष ढह रहे हों।
बहुत-सी मजा बह रही है, वही फेन है। डरपोक जहाँ इसे देखकर डरते हैं, वहाँ उत्तम
योद्धाओंके मनमें सुख होता है । ८७ ॥
चौ०-मजहिं भूत पिसाच बेताला । प्रमथ महा झोटिंग कराला ॥
काफ कंक लै भुजा उड़ाहीं । एक ते छीनि एक लै खाहीं ॥ १ ॥
भूत, पिशाच और वैताल, बड़े-बड़े झोटोंवाले महान् भयंकर झोटिंग और प्रमथ
(शिवगण ) उस नदीमें स्नान करते हैं। कौए और चील भुजाएँ लेकर उड़ते हैं और
एक दूसरेसे छीनकर खा जाते हैं ॥ १ ॥
एक कहहिं ऐसिड सौंघाई । सहु तुम्हार दरिद्र न जाई ॥
कहरत भट घायल तट गिरे । जहँ तह मनहुँ अर्धजल परे ॥ २ ॥
* रामचरितमानस * एक (कोई ) कहते हैं, अरे मूखों ! ऐसी सस्ती (बहुतायत ) है। फिर भी तुम्हारी दरिद्रता नहीं जाती ! घायल योद्धा तटपर पड़े कराह रहे हैं, मानो जहाँ-तहाँ अर्धजल ( वे व्यक्ति जो मरनेके समय आधे जलमें रक्खे जाते हैं ) पड़े हों ॥२॥ बैंचहि गीध आँत तट भए । जनु बंसी खेलत चित दए । बहु भट बहहिं बड़े खग जाहीं । जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं ॥ ३ ॥ गीध आँतें खींच रहे हैं, मानो मछलीमार नदी-तटपरसे चित्त लगाये हुए (ध्यानस्थ होकर ) बंसी खेल रहे हों ( बंसीसे मछली पकड़ रहे हों)। बहुत-से योद्धा बहे जा रहे हैं और पक्षी उनपर चढ़े चले जा रहे हैं, मानो वे नदीमें नावरि (नौकाक्रीडा) खेल जोगिनि भरि भरि खप्पर संचहिं । भूत पिसाच बधू नभ नंचहिं ॥ भट कपाल फरताल वनावहिं । चामुंडा नाना विधि गावहिं ॥ ४ ॥ योगिनियाँ खप्परों में भर-भरकर खून जमा कर रही हैं । भूत-पिशाचोंकी स्त्रियाँ आकाशमें नाच रही हैं। चामुण्डाएँ योद्धाओंको खोपड़ियोंका करताल बजा रही है और नाना प्रकारसे गा रही हैं ॥४॥ जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं । खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं ॥ कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं । सीप परे महि जय जय बोल्लहिं ॥ ५ ॥ गोदड़ोंके समूह कट-कट शब्द करते हुए मुर्दोको काटते, खाते, हुआँ-हुआँ करते और पेट भर जानेपर एक-दूसरेको डाँटते हैं। करोड़ों धड़ बिना सिरके घूम रहे हैं और सिर पृथ्वीपर पड़े जय-जय बोल रहे हैं ॥५॥ छं०-चोल्लहिं जो जय जय मुंड रंड' प्रचंड सिर विनु धावहीं। खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं॥ वानर निसाचर निकर मर्दहि राम वल दर्पित भए । संन्नाम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए ॥ मुण्ड (कटे सिर ) जय-जय बोलते हैं और प्रचण्ड रण्ड (धड़ ) विना सिरके दौड़ते हैं । पक्षी खोपड़ियोंमें उलझ-उलझकर परस्पर लड़े मरते हैं; उत्तम योद्धा दूसरे योद्धाओंको ढहा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजीके वलसे दर्पित हुए वानर राक्षसों के झुंडोंको मसले डालते हैं । श्रीरामजीके वाणसमूहोंसे भरे हुए योद्धा लड़ाईके मैदानमें सो रहे हैं। दो०--रावन हृदय विचारा भा निसिचर निसिचर संघार। मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार ॥ ८८ ॥ रावणने हृदयमें विचारा कि राक्षसोंका नाश हो गया है। मैं अकेला हूँ और वानर-भालू बहुत है, इसलिये मैं अब अपार माया रचूँ ॥ ८८ ॥ ।
रावन
माया
* लंकाकाण्ड *
८२५
चौ०-देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा ।।
सुरपति निज रथ तुरत पठाचा । हरष सहित मातलि लै आवा ॥ १ ॥
देवताओंने प्रभुको पैदल (विना सवारीके युद्ध करते ) देखा, तो उनके हृदयमें
बड़ा भारी शोभ (दुःख) उत्पन्न हुआ | [फिर क्या था] इन्द्रने तुरंत अपना रथ
भेज दिया। [ उसका सारथि ] मातलि हर्षके साथ उसे ले आया ।। १ ।।
तेज पुंज रथ दिव्य अनूपा । हरपि चढ़े कोसलपुर भूपा॥
चंचल तुरग मनोहर चारी । अजर अमर मन सम गतिकारी ॥ २ ॥
उस दिव्य, अनुपम और तेजके पुञ्ज (तेजोमय ) रथपर कोसलपुरीके राजा
श्रीरामचन्द्रजी हर्पित होकर चढ़े। उसमें चार चञ्चल, मनोहर, अजर, अमर और
मनकी गतिके समान शीघ्र चलनेवाले ( देवलोकके ) घोड़े जुते थे ॥ २ ॥
रथारूढ़ रघुनायहि
रघुनाथहि देखी । धाए कपि बलु पाइ बिसेषी ॥
सही न जाइ कपिन्ह के मारी । तब
विस्तारी ॥ ३॥
श्रीरघुनाथजीको रथपर चढ़े देखकर वानर विशेष बल पाकर दौड़े । वानरोंकी
मार सही नहीं जाती । तव रावणने माया फैलायी ॥ ३ ॥
सो माया रघुवीरहि बाँची । लछिमन कपिन्ह सौ मानी साँची।
देखी कपिन्ह निसाचर अनी । अनुज सहित बहु कोसलधनी ॥ ४ ॥
एक श्रीरघुवीरके ही वह माया नहीं लगी। सब वानरोंने और लक्ष्मणजीने भी
उस मायाको सच मान लिया । वानरोंने राक्षसी सेनामें भाई लक्ष्मणजीसहित बहुत-से
रामोंको देखा ॥४॥
छं०-बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे।
जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहँ सोतहँ चितवहिं खरे ॥
निज सेन चकित विलोकि हँसि सर चाप सजि कोसल धनी।
माया हरी हरि निमिप महुँ हरषी सकल मर्कट अनी ॥
बहुत-से राम-लक्ष्मण देखकर वानर-भालू मनमें मिथ्या डरसे बहुत ही डर गये।
लक्ष्मणजीसहित वे मानो चित्रलिखे-से जहाँ-के-तहाँ खड़े देखने लगे। अपनी सेनाको
आश्चर्यचकित देखकर कोसलपति भगवान् हरि ( दुःखोंके हरनेवाले श्रीरामजी) ने हँसकर
धनुषपर बाण चढ़ाकर, पलभरमें सारी माया हर ली । वानरोंकी सारी सेना हर्षित हो गयी।
दो०-यहुरि राम सव तन चितइ वोले बचन गंभीर।
द्वंदजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति वीर ॥ ८९ ॥
फिर भीरामजी सबकी ओर देखकर गम्भीर वचन बोले-हे वीरो। तुम सब
बहुत ही थक गये हो, इसलिये अब [ मेरा और रावणका ] द्वन्द्व युद्ध देखो ॥ ८९ ॥
तब लंकेस ८२६ * रामचरितमानस * चौ०-अस कहि रथ रघुनाथ चलावा । विन चरन पंकज सिरु नावा ॥ क्रोध उर छावा । गर्जत तजत सन्मुख धावा ॥ १ ॥ ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने ब्राह्मणों के चरण-कमलोंमें सिर नवाया और फिर स्थ चलाया । तब रावणके हृदयमें क्रोध छा गया और वह गरजता तथा ललकारता हुआ सामने दौड़ा ॥ १॥ जीतेहु जे भट संजुग माहीं। सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं ॥ रावन नाम जगत जस जाना । लोकप जाके बंदीखाना ॥ २ ॥ [ उसने कहा-] अरे तपस्वी ! सुनो, तुमने युद्ध में जिन योद्धाओंको जीता है, मैं उनके समान नहीं हूँ। मेरा नाम रावण है, मेरा यश सारा जगत् जानता है, लोक- पालतक जिसके कैदखानेमें पड़े हैं ॥ २॥ खर दूषन बिराध तुम्ह मारा । बधेहु व्याध इव बालि विचारा ॥ निसिचर निकर सुभट संघारेहु । कुंभकरन घननादहि मारेहु ॥ ३ ॥ तुमने खर, दूषण और विराधको मारा । बेचारे बालिका व्याधकी तरह वध किया । बड़े-बड़े राक्षस योद्धाओंके समूहका संहार किया और कुम्भकर्ण तथा मेघनाद- को भी मारा ॥३॥ आजु बयरु सत्रु लेउँ निवाही । जौं रन भूप भाजि नहिं जाही ।। भाजु फरउँ खलु काल हवाले । परेहु कठिन रावन के पाले ॥ ४ ॥ अरे राजा ! यदि तुम रणसे भाग न गये तो आज मैं [ वह ] सारा वैर निकाल लूंगा । आज मैं तुम्हें निश्चय ही कालके हवाले कर दूंगा | तुम कठिन रावणके पाले पड़े हो ॥ ४॥ सुनि दुर्बचन कालबस जाना । बिहसि बचन कह कृपानिधाना ॥ सत्य सत्य सब तव प्रभुताई । जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई॥५॥ रावणके दुर्वचन सुनकर और उसे कालवश जान कृपानिधान श्रीरामजीने हँसकर यह वचन कहा तुम्हारी सारी प्रभुता, जैसा तुम कहते हो, बिल्कुल सच है । पर अब व्यर्थ वकवाद न करो, अपना पुरुषार्थ दिखलाओ ॥ ५ ॥ छं०-जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा। संसार महँ पूरुप त्रिविध पाटल रसाल पनस समा ॥ एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं। एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न वागहीं। व्यर्थं वकवाद करके अपने सुन्दर यशका नाश न करो। क्षमा करना, तुम्हें नीति सुनाता हूँ, सुनो । संसारमें तीन प्रकारके पुरुष होते हैं. पाटल (गुलाब), आम और कटहलके समान । एक (पाटल) फूल देते हैं, एक (आम) फूल और फल , *लंकाकाण्ड * ८२७ दोनों देते हैं और एक ( कटहल ) में केवल फल ही लगते हैं । इसी प्रकार [ पुरुषोंमें ] एक कहते हैं [ करते नहीं ], दूसरे कहते और करते भी हैं और एक (तीसरे ) केवल करते हैं, पर वाणीसे कहते नहीं। दो-राम वचन सुनि विहंसा मोहि लिखावत ग्यान । बयरु करत नहिं तव डरे अब लागे प्रिय प्रान ॥२०॥ श्रीरामजीके वचन सुनकर वह खूब हँसा [ और बोला- मुझे ज्ञान सिखाते हो ? उस समय वैर करते तो नहीं डरे, अब प्राण प्यारे लग रहे हैं ॥ ९०॥ चौ०-कहि दुर्वचन कुन्द दसकंधर । कुलिस समान लाग छाँदै सर ॥ नानाकार सिलीमुख धाए । दिसि अरु विदिसि गगन महि छाए ॥ १ ॥ दुर्वचन कहकर रावण क्रुद्ध होकर वनके समान वाण छोड़ने लगा ।अनेको आकार- के बाण दौड़े और दिशा, विदिशा तथा आकाश और पृथ्वीमें सब जगह छा गये ॥ १॥ पावक सर छाँडेउ रघुबीरा । छन महुँ जरे निसाचर तीरा ॥ छादिसि तीन सक्ति खिसिआई। वान संग प्रभु फेरि चलाई ॥ २ ॥ श्रीरघुवीरने अग्निबाण छोड़ा.[जिससे ] रावणके सब वाण क्षणभरमें भस्म हो गये । तब उसने खिसियाकर तीक्ष्ण शक्ति छोड़ी। [ किंतु ] श्रीरामचन्द्रजीने उसको चाणके साथ वापस भेज दिया ॥२॥ कौटिन्ह चक्र त्रिसूल पबारै । बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारै ॥ निफल होहिं रावन सर कैसें । खल के सकल मनोरथ जैसें ॥ ३ ॥ वह करोड़ों चक्र और त्रिशूल चलाता है, परंतु प्रभु उन्हें बिना ही परिश्रम काटकर हटा देते हैं । रावणके वाण किस प्रकार निष्फल होते हैं, जैसे दुष्ट मनुष्यके सब मनोरथ ! ॥३॥ तव सत वान सारथी मारेसि । परेड भूमि जय राम पुकारेसि ।। राम कृपा करि सूत उठावा । तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा ॥ ४ ॥ तब उसने श्रीरामजीके सारथिको सौ बाण मारे । वह श्रीरामजीकी जय पुकार- कर पृथ्वीपर गिर पड़ा। श्रीरामजीने कृपा करके सारथिको उठाया । तब प्रभु अत्यन्त क्रोधको प्राप्त हुए ॥४॥ छं०–भए कुद्ध जुद्ध विरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे। कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे ॥ मंदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर से। चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे ॥ युद्ध में शत्रुके विरुद्ध श्रीरघुनाथजी क्रोधित हुए, तब तरकसमें बाण कसमसाने लगे (बाहर निकलनेको आतुर होने लगे)। उनके धनुषका अत्यन्त प्रचण्ड शब्द * रामचरितमानस ( टङ्कार ) सुनकर मनुष्यभक्षी सब राक्षस वातग्रस्त हो गये ( अत्यन्त भयभीत हो गये। मन्दोदरीका हृदय काँप उठा । समुद्र, कच्छप, पृथ्वी और पर्यत इर गये। दिशाओंके हाथी पृथ्वीको दाँतोंसे पकड़कर चिपाड़ने लगे । यह कौतुक देखकर देवता हँसे । दो-तानेउ चाप थवन लगि छाँड़े बिसिख कराल । राम मारगन गन चले लहलहात जनु व्याल ॥ ९१ ॥ धनुषको कानतक तानकर श्रीरामचन्द्रजीने भयानक बाण छोड़े। श्रीरामजीके बाणसमूह ऐसे चले मानो सर्प लहलहाते (लहराते ) हुए जा रहे हों ।। ९१ ॥ चौ०-चले बान सपच्छ जनु उरगा । प्रथमहिं हतेड सारथी तुरगा ॥ रथ बिजि हति केतु पताका । गर्जा अति अंतर बल थाका ॥ १ ॥ बाण ऐसे चले मानो पंखवाले सर्प उड़ रहे हों । उन्होंने पहले सारथि और घोड़ोंको मार डाला | फिर रथको चूर-चूर करके ध्वजा और पताकाओको गिरा दिया। तव रावण बड़े जोरसे गरजा, पर भीतरसे उसका बल थक गया था ॥१॥ तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना । अस्य सख छाँडेसि विधि नाना ॥ विफल होहिं सब उद्यम ताके । जिमि परद्रोह निरत मनसा के ॥ २ ॥ तुरंत दूसरे रथपर चढ़कर खिसियाकर उसने नानाप्रकारके अस्त्र-शस्त्र छोड़े। उसके सब उद्योग वैसे ही निष्फल हो रहे हैं, जैसे परद्रोहमें लगे हुए चिचवाले मनुष्यके होते हैं ॥२॥ तब रावन इस सूल चलावा । वाजि चारि महि मारि गिरावा ॥ तुरग उठाइ कोपि रघुनायक । बैंचि सरासन छाँड़े सायक ॥ ३ ॥ तब रावणने दस त्रिशूल चलाये और श्रीरामजीके चारों घोड़ोंको मारकर पृथ्वीपर गिरा दिया । घोड़ोंको उठाकर श्रीरघुनाथजीने कोध करके धनुष खींचकर वाण छोड़े ॥३॥ रावन सिर सरोज बनचारी । चलि रघुवीर सिलीमुख धारी ॥ दस दस वान भाल दस मारे । निसरि गए चले रुधिर पनारे ॥ ४ ॥ रावणके सिररूपी कमलवनमें विचरण करनेवाले श्रीरघुवीरके वाणरूपी भ्रमरोंकी पंक्ति चली। श्रीरामचन्द्रजीने उसके दसों सिरोंमें दस-दस बाण मारे, जो आर-पार हो गये और सिरोंसे रक्तके पनाले बह चले ॥४॥ स्रवत रुधिर धायर बलवाना । प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना । तीस तीर रघुवीर रघुवीर पवारे । भुजन्हि समेत सीस महि पारे ॥ ५ ॥ रुधिर बहते हुए ही बलवान् रावण दौड़ा । प्रमुने फिर धनुषपर बाण सन्धान किया । श्रीरघुवीरने तीस वाण मारे और बीसों भुजाओंसमेत दसों सिर काटकर पृथ्वी- पर गिरा दिये ॥ ५॥ काटवहीं पुनि भए नबीने । राम बहोरि भुजा सिर छीने ॥ प्रभु बहु बार वाहु सिर हए । फटत झटिति पुनि नूतन भए ॥ ६ ॥ .
- * लंकाकाण्ड [सिर और हाथ-] काटते ही फिर नये हो गये। श्रीरामजीने फिर भुजाओं और सिरोंको काट गिराया । इस तरह प्रभुने बहुत बार भुजाएँ और सिर काटे । परंतु काटवे ही वे तुरंत फिर नये हो गये ॥ ६ ॥ पुनि पुनि प्रभु कारत भुज सीसा । अति कौतुको कोसलाधीसा ॥ रहे छाइ नम सिर अरु याहू । मानहुँ अमित केतु अरु राहू ॥ ७ ॥ प्रभु बार-बार उसकी भुजा और सिरोंको काट रहे हैं क्योंकि कोसलपति श्रीरामजी बड़े कौतुकी है । आकाशमे सिर और बाहु ऐसे छा गये है, मानो असंख्य केतु और राहु हो ॥ ७ ॥ छं०-जनु राहु केतु अनेक नभ पथ सवत सोनित धावहीं। रघुवीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं ॥ एक एक सर सिर निफर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं। जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ तह विधुतुद पोहहीं ॥ मानो अनेकों राहु और केतु रुधिर बहाते हुए आकाशमार्गसे दौड़ रहे हों। श्रीरघुवीरकै प्रचण्ड बाणोंके [बार-बार] लगनेसे वे पृथ्वीपर गिरने नहीं पाते । एक- एक बागसे समूह-के-समूह सिर छिदे हुए आकाशमें उड़ते ऐसे शोभा दे रहे हैं, मानो सूर्यको किरणे क्रोध करके जहाँ-तहाँ राहुओंको पिरो रही हों। दो-जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होर्हि अपार । सेवत विषय विवध जिमि नित नित नूतन मार ॥ ९२ ॥ जैसे-जैसे प्रभु उसके सिरोंको काटते है, वैसे-ही-चैसे वे अपार होते जाते हैं। जैसे विषयों का सेवन करनेसे काम ( उन्हें भोगनेकी इच्छा) दिन-प्रति-दिन नया-नया बढ़ता जाता है ।। ९२ ॥ चौ०-दसमुख देखि सिरन्ह के बाढ़ी। विसरा मरन भई रिस गाढ़ी ।। गर्जेउ मूढ़ महा अभिमानी । धायउ इसहु सरासन तानी ॥ १ ॥ सिरोंकी बाढ़ देखकर रावणको अपना मरण भूल गया और बड़ा गहरा क्रोध हुआ। वह महान अभिमानी मूर्ख गरजा और दसों धनुषोंको तानकर दौड़ा ॥१॥ समर भूमि दसकंधर क्रोप्यो । बरवि वान रघुपति रथ तोप्यो । दंद एक रथ देखि न परेऊ । जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ ॥ २ ॥ रणभूमिमें रावणने क्रोध किया और बाण बरसाकर श्रीरघुनाथजीके रथको ढक दिया | एक दण्ड (घड़ी) तक रथ दिखलायी न पड़ा,मानो कुहरेमें सूर्य छिप गया हो ॥२॥ हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा । तब प्रभु कॉपि कारमुक लीन्हा ।। सर निवारि रिपु के सिर काटे। तेदिसि विदिसि गगन महि पाटे ॥ ३ ॥ जब देवताओंने हाहाकार किया, तब प्रभुने क्रोध करके धनुष उठाया और ८३० * रामचरितमानस शत्रुके बाणोंको हटाकर उन्होंने शत्रुके सिर काटे और उनसे दिशा, विदिशा, आकाश और पृथ्वी सबको पाट दिया ॥३॥ काटे सिर नभ मारग धावहिं । जय जय धुनि फरि भय उपजावहिं। कहूँ लछिमन सुग्रीव कपीसा । कह रघुवीर रघुवीर कोसलाधीसा ॥ ४ ॥ काटे हुए सिर आकाशमार्गसे दौड़ते हैं और जय-जयकी ध्वनि करके भय उत्पन्न करते हैं। 'लक्ष्मण और वानरराज सुग्रीव कहाँ हैं ? कोसलपति रघुवीर कहाँ हैं ॥४॥ छं-कहँ रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले। संधानि धनु रघुवंसमनि हँसि सरन्हि सिर वेधे भले ॥ सिर मालिका कर कालिका गहि बंद वृंदन्हि वहु मिली। करि रुधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम वट पूजन चली ॥ राम कहाँ हैं , यह कहकर सिके समूह दौड़े, उन्हें देखकर वानर माग चले । तब धनुष सन्धान करके रघुकुलमणि श्रीरामजीने हँसकर बाणोंसे उन सिरोंको भलीभाँति वेध डाला । हाथोंमें मुण्डोंकी मालाएँ लेकर, बहुत-सी कालिकाएँ झुंड-की-झुंड मिलकर इकट्ठी हुई और वे रुधिरकी नदीमें लान करके चली। मानो संग्रामरूपी वटवृक्षकी पूजा करने जा रही हो। दो०-पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड ! चली विभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड ॥ १३॥ फिर रावणने क्रोधित होकर प्रचण्ड शक्ति छोड़ी। वह विभीषणके सामने ऐसी चली जैसे काल ( यमराज ) का दण्ड हो ॥ ९३ ॥ चौ०-आवत देखि सक्ति अति धोरा । प्रनतारति भंजन पन मोरा ॥ तुरत विभीषन पाछे मेला । सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला ॥ १ ॥ अत्यन्त भयानक शक्तिको आती देख और यह विचारकर कि मेरा प्रण शरणागत- के दुःखका नाश करना है, श्रीरामजीने तुरंत ही विभीषणको पीछे कर लिया और सामने होकर वह शक्ति स्वयं सह ली ॥१॥ लागि सक्ति मुरुछा कछु भई । प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई ॥ देखि विभीषन प्रभु श्रम पायो । गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो॥ २ ॥ शक्ति लगनेसे उन्हें कुछ मूर्छा हो गयी। प्रभुने तो यह लीला की, पर देवताओंको व्याकुलता हुई । प्रभुको श्रम ( शारीरिक कष्ट ) प्राप्त हुआ देखकर विभीषण क्रोधित हो हाथमें गदा लेकर दौड़े ॥२॥ रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे । तें सुर नर मुनि नागविख्खे ॥ सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए । एक एक के कोटिन्ह पाए ॥ ३ ॥ [और बोले-] अरे अभागे ! मूर्ख, नीच, दुर्बुद्धि ! तूने देवता, मनुष्य, मुनि, .
।
* लंकाकाण्ड *
नाग सभीसे विरोध किया । तूने आदरसहित शिवजीको सिर चढ़ाये । इसीसे एक-एकके
बदले में करोड़ों पाये ॥ ३ ॥
तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो । अब तव कालु सीस पर नाच्यो ।
राम बिमुख सठ चहसि संपदा । अस कहि हनेसि माझ उर गदा ॥ ४ ॥
उसी कारणसे अरे दुष्ट ! त् अवतक बचा है। [ किंतु ] अब काल तेरे सिरपर
नाच रहा है । अरे मूर्ख ! त् रामविमुख होकर सम्पत्ति (सुख) चाहता है ? ऐसा
कहकर विभीषणने रावणकी छातीके बीचोबीच गदा मारी ॥४॥
छं०-उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि परयो।
दस बदन लोनित स्त्रवत पुनि संभारि धायो रिस भरयो॥
द्वौ भिरे अतिवल मल्लजुद्ध विरुद्ध एकु एकहि हनै ।
रघुवीर बल दर्पित विभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गर्ने ।
बीच छातीमें कठोर गदाकी घोर और कठिन चोट लगते ही वह पृथ्वीपर गिर
पड़ा। उसके दसों मुखोंसे रुधिर बहने लगा, वह अपनेको फिर सँभालकर क्रोध भरा
हुआ दौड़ा। दोनों अत्यन्त बलवान् योद्धा मिड़ गये और मल्लयुद्धमें एक-दूसरेके विरुद्ध
होकर मारने लगे । श्रीरघुवीरके बलसे गर्वित विभीषण उसको ( रावण-जैसे जगद्विजयी
योद्धाको ) पासंगके बराबर भी नहीं समझते।
दो०-उमा विभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ।
सो अव भिरत काल ज्यों श्रीरघुवीर प्रभाउ ॥ ९४ ॥
[शिवजी कहते हैं-हे उमा ! विभीषण क्या कभी रावणके सामने आँख
उठाकर भी देख सकता था ? परंतु अब वही कालके समान उससे भिड़ रहा है।
यह श्रीरघुवीरका ही प्रभाव है ।। ९४ ॥
चौ०-देखा अमित बिभीषनु भारी । धायउ हनूमान गिरि धारी ॥
रथ तुरंग सारथी निपाता । हृदय माझ तेहि मारेसि लाता ॥ १ ॥
विभीषणको बहुत ही थका हुआ देखकर हनुमानजी पर्वत धारण किये हुए दौड़े।
उन्होंने उस पर्वतसे रावणके रथ, घोड़े और सारथिका संहार कर डाला और उसके
सीनेपर लात मारी ॥१॥
ठाढ़ रहा अति कंपित गाता । गयउ विभीषनु जह जननाता ॥
पुनि रावन कपि हतेउ पचारी। चलेउ गगन कपि पूंछ पसारी ॥ २ ॥
रावण खड़ा रहा, पर उसका शरीर अत्यन्त काँपने लगा। विभीषण वहाँ गये जहाँ
सेवकोंके रक्षक श्रीरामजो थे। फिर रावणने ललकारकर हनुमान्जीको मारा । वे पूँछ
फैलाकर आकाशमें चले गये |॥२॥
। ૮૨૨ * रामचरितमानस * गहिसि पूंछ ऋपि सहित उड़ाना । पुनि फिरि मिरेड प्रबल हनुमाना। लरत अदास जुगल सम जोधा । एकहि एक हनत कर प्राधा ॥ ३ ॥ रावणने पूंछ पकड़ ली। हनुमानजी उसको साथ लिये हुए अपर उड़े । फिर लौटकर महाग्ल्वान हनुमानजी उतते भिड़ गये। दोनों समान योद्धा आकाशमें लड़ते हुए एक दूसरेको क्रोध करके मारने लो॥ ३ ॥ सोहहि नभ 20 बल बहु करही । बलगिरि सुमेरु जनु लरहीं । बुधि बल निसिचर परइ न पारयो । तब मालतुत प्रभु संभारयो ॥ ४ ॥ दोनों बहुत-ने दल-बल करते हुए आकाश में ऐसे शामित हो रहे है मानो कजलगिरि और सुनेव पर्वत लड़ रहे हो । जब बुद्धि और बल्ले रात गिराये न गिरा, तब मानति श्रीहनुमान्जाने प्रभुको मरण किया ।। ४ ॥ इं०-सँभारि श्रीरघुवीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो। महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहुँजय जय भन्यो । हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले । रन मत्त रावन सफल सुभट प्रचंड भुज वल दलमले ॥ श्रीरघुवीरका लरग करके धीर हनुमान्जीने ललकारकर रावणको मारा। वे दोनों पृथ्वीपर गिरते और फिर उठकर लड़ते हैं। देवताओंने दोनोंकी 'जय-अयः पुकाणे । हनुमान्जीपर संकट देखकर वानर-माल क्रोधादुर दोकर दौड़े। किंतु रण-नदमाठे रावणने सब योद्धाओंको अपने प्रचण्ड भुजाभोंक दलसे कुचल और मसल डाल ! रघुवीर पचारे धाए कीस प्रचंड। कपि बल प्रबल देलि तेहिं कीन्ह प्रगट पापंड ॥ ९५ ॥ तब श्रीरघुवीरके ललकारनेपर प्रचण्ड वीर वानर दौड़। वानरोके प्रवल दलको देखकर रावगने माया प्रकट की ।। ९५ ॥ एका । मुनि प्रगटे खल रूप अनका ॥ रघुपति कटक भालु कपि जेते । सह तह प्रगट दलानन तेते ॥1॥ गभरके लिये वह अदृश्य हो गया। फिर उत दुष्टने अनेकों रूप प्रकट किये। श्रीरघुनाथजीकी सेनामें जितने रीछ-वानर थे, उतने ही रावग जहाँ जहाँ (चारों ओर ) प्रकट हो गये ॥१॥ देखें ऋपिन्ह अमित इससीसा । वह तह मजे मालु अरु कीसा ।। भागे बानर धहि न धीरा । त्राहि त्राहि लछिमन खुबोरा ॥ २ ॥ वानरोंने अपरिमित राबग देखे । भान्नु और वानर सब जहाँ-तहाँ ( इधर-उधर) भाग चले । वानर धीरज नहीं घरते है लक्ष्मणजी ! हे रघुवीर ! वचाइके, बचाइय: यों पुकारते हुए वे भागे जा रहे हैं ।। २।। दो-तव चौ०-अंतरधान नबर . * लंकाकाण्ड ८३३ दह दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन । गर्जहिं घोर कठोर भयावन । डरे सकल सुर चले पराई । जय के भास तजहु अब भाई ॥ ३ ॥ दसों दिशाओंमें करोड़ों रावण दौड़ते हैं और धोर, कठोर, भयानक गर्जन कर रहे हैं । सब देवता डर गये और ऐसा कहते हुए भाग चले कि हे भाई ! अब जयकी आशा छोड़ दो! ॥ ३ ॥ सव सुर जिते एक दसकंधर । अव बहु भए तकहु गिरि कंदर ।। रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी । जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी ॥ ४ ॥ एक ही रावणने सब देवताओंको जीत लिया था, अब तो बहुत-से रावण हो गये हैं । इससे अब पहाड़की गुफाओंका आश्रय लो ( अर्थात् उनमें छिप रहो)। वहाँ ब्रा, शम्भु और शानी मुनि ही डटे रहे, जिन्होंने प्रभुकी कुछ महिमा जानी थी ॥४॥ छं०-जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे । चले विचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे ॥ हनुमंत अंगद नील नल अतिवल लरत रन बाँकुरे। महिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे ॥ जो प्रभुका प्रताप जानते थे, वे निर्मय डटे रहे । वानरोंने शत्रुओं (बहुत-से रावणों ) को सच्चा ही मान लिया । [ इससे सब वानर-भालू विचलित होकर हे कृपालु ! रक्षा कीजिये [ यो पुकारते हुए ] भयसे व्याकुल होकर भाग चले । अत्यन्त बलवान् रणबांकुरे हनुमान्जी, अङ्गद, नील और नल लड़ते हैं और कपटरूपी भूमिसे अङ्कुरकी भाँति उपजे हुए कोटि-कोटि योद्धा गवणोंको मसलते हैं। दो०-सुर वानर देखे विकल वानर देखें विकल हँस्यो कोसलाधीस । सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस ॥ ९६ ॥ देवताओं और वानरोंको विकल देखकर कोसलपति श्रीरामजी इसे और शा. धनुषपर एक वाण चढ़ाकर [ मायाके बने हुए ] सब रावणोंको मार डाला ॥ ९६ ॥ चौ०-प्रभु छन महुँ माया सब काटी । जिमि रवि उएँ जाहिं तम फाटी ॥ रावनु एकु देखि सुर हरपे । फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरपे ॥ १ ॥ प्रभुने क्षणभरमें सब माया काट डाली । जैसे सूर्यके उदय होते ही अन्धकारकी राशि फट जाती है ( नष्ट हो जाती है)। अब एक ही रावणको देखकर देवता हर्षित हुए और उन्होंने लौटकर प्रभुपर बहुत-से पुष्प बरसाये ॥१॥ भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे । फिरे एक एकन्ह तब टेरे॥ प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए । तरल तमकि संजुग महि आए ॥ २ ॥ श्रीरघुनाथजीने भुजा उठाकर सब वानरोंको लौटाया । तब वे एक दूसरेको पुकार- रा०स०५३- ,
* रामचरितमानस *
पुकारकर लौट आये। प्रभुका बल पाकर रीछ-वानर दौड़ पड़े । जल्दीसे कूदकर
वे रणभूमिमें आ गये ॥२॥
अस्तुति करत देवतन्हि देखें। भयउँ एक में इन्ह के लेखें ।।
सम्हु सदा तुम्ह मोर मरायल । अस कहि कोपि गगन पर धायल ॥ ३ ॥
देवताओंको श्रीरामजीकी स्तुति करते देखकर रावणने सोचा, ने इनकी समझने
एक हो गया। [ परंतु इन्हें यह पता नहीं कि इनके लिये मैं एक ही बहुत हूँ] और
कहा-अरे मूर्यो ! तुम तो सदाफे ही मेरे मरैल ( मेरी मार खानेवाले) हो । ऐना
कहकर वह क्रोध करके आकाशपर [ देवताओंकी ओर ] दौड़ा ॥ ३ ॥
हाहाकार करत सुर
करत सुर भागे । खलहु जाहु कह मोरे आगे ॥
देखि विकल सुर अंगद धायो । ऋदि चरन गहि भूमि गिरायो ॥ ४ ॥
देवता हाहाकार करते हुए भागे । [ रावणने कहा-] दुष्टो ! मेरे आगेते कहाँ
जा सकोगे १ देवताओंको व्याकुल देखकर अंगद दौड़े और उछलकर रावणका पैर पकड़-
कर [उन्होंने ] उसको पृथ्वीपर गिरा दिया |॥ ४ ॥
छ०-गहि भूमिपारयो लात मारयो वालिसुत प्रभु पहिं गयो।
संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो।
करि दाप चाप चढाइ दस संधानि सर बहु वरपई।
किए सकल भट घायल भयाकुलदेखि निजवल हरपई ॥
उसे पकड़कर पृथ्वीपर गिराकर लात मारकर यालिपुत्र अंगद प्रनुके पास चले
गये । रावण संभलकर उठा और बड़े भयंकर कठोर शब्दसे गरजने लगा । वह दई
करके दसों धनुष चढ़ाकर उनपर बहुत-से वाण मंधान करके बरसाने लगा। उसने सत्र
योद्धाओंको घायल और भयसे व्याकुल कर दिया और अपना यल देखकर वह हर्षित
होने लगा।
दो०- तव रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप ।
काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप ॥ ९७ ॥
तब श्रीरघुनाथजीने रावणके सिर, भुजाएँ, वाण और धनुष काट डाले। पर वे
फिर बहुत बढ़ गये, जैसे तीर्थमें किये हुए पाप बढ़ जाते हैं (कई गुना अधिक भयानक
फल उत्पन्न करते हैं)॥ ९७ ।।
चौ०-सिर भुल वाढि देखि रिपु फेरी । भालु कपिन्ह रिस भई बनेरी ॥
मरत न मूढ़ कटेहुँ भुज सीसा । धाए कोपि भालु भट कोसा ॥
शत्रुके सिर और भुजाओंकी बढ़ती देखकर रीछ-वानरोंको बहुत ही क्रोध हुआ।
यह मूर्ख भुजाओंके और सिरोंके कटनेपर भी नहीं मरता [ऐसा कहते हुए ] भाई
और वानर योद्धा क्रोध करके दौड़े ॥१॥
* लंकाकाण्ड * ८३५ वालितनय मारुति नल नीला । बानरराज दुविद बलसीला ॥ विटप महीधर करहिं प्रहारा । सोइ गिरितगहि कपिन्ह सोमारा॥ २ ॥ बालिपुत्र अंगद, मारति हनुमान्जी, नल, नील, वानरराज सुग्रीव और द्विविद आदि बलवान् उसपर वृक्ष और पर्वतॊका प्रहार करते हैं। वह उन्हों पर्वतों और वृक्षोंको पकड़कर यानरोंको मारता है ॥ २॥ एक नखन्हि रिपु वपुप बिहारी । भागि चलहिं एक लातन्ह मारी ।। तब नल नील सिरन्हि चढ़ि गयऊ। नखन्हि लिलार बिदारत भयऊ ॥ ३ ॥ कोई एक वानर नखोंसे शत्रुके शरीरको फाड़कर भाग जाते हैं, तो कोई उसे लातोंसे मारकर | तब नल और नील रावणके सिरोंपर चढ़ गये और नखोंसे उसके ललाटको फाड़ने लगे ॥ ३ ॥ रुधिर देखि विषाद उर भारी । तिन्हहि धरन कहुँ भुजा पसारी ॥ गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं । जनु जुग मधुप कमल वन चरहीं ॥ ४ ॥ खून देखकर उसे हृद्यमें बड़ा दुःख हुआ। उसने उनको पकड़नेके लिये हाथ फैलाये, पर वे पकड़में नहीं आते, हाथोंके ऊपर-ऊपर ही फिरते है । मानो दो भौरे कमलोंके वनमें विचरण कर रहे हों ॥ ४ ॥ कोपि कूदि द्वौ धरेसि वहोरी । महि पटकत भजे भुजा मरोरी ॥ पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे । सरन्हि मारि घायल कपि कीन्हे ॥ ५ ॥ तब उसने क्रोध करके उछलकर दोनोंको पकड़ लिया। पृथ्वीपर पटकते समय वे उसकी भुजाओंको मरोड़कर भाग छुटे । फिर उसने क्रोध करके हाथोंमें दसों धनुष लिये और वानरोंको वाणोंसे मारकर घायल कर दिया ॥ ५॥ हनुमदादि मुरुछित करि बंदर । पाइ प्रदोष हरप इसकंधर ॥ मुरुचित देखि सकल कपि वीरा । जामवंत धायड रनधीरा ॥ ६ ॥ हनुमान्जी आदि सव वानरोंको मुर्छित करके और संध्याका समय पाकर रावण हर्षित हुआ । समस्त वानर-वीरोंको मूर्छित देखकर रणधीर जाम्बवान् दौड़े ॥ ६ ॥ संग भालु भूधर तरु धारी। मारन लगे पचारि पचारी ॥ भयउ बुद्ध रावन बलबाना । गहि पद महि पटकइ भट नाना ॥ ७ ॥ जाम्बवान्के साथ जो भालू थे, वे पर्वत और वृक्ष धारण किये रावणको ललकार- ललकारकर मारने लगे । बलवान् रावण क्रोधित हुआ और पैर पकड़-पकड़कर वह अनेकों योद्धाओंको पृथ्वीपर पटकने लगा ॥७॥ देखि भालुपति निज दल धाता । कोपि माझ उर मारेसि लाता ॥ ८ ॥ जाम्बवान्ने अपने दलका विध्वंस देखकर क्रोध करकेरावणकी छातीमें लातमारी। ।
८३६ * रामचरितमानस * छं०-उर लात घात प्रचंड लागत विकल रथ ते महि परा। गहिभालुचीसहुँकर मनहुँकमलन्हि बसेनिसि मधुकरा। मुरुछित विलोकिवहोरिपद हतिभालुपतिप्रभुपहिं गयो। निसिजानिस्पंदन घालितेहि तवसूत जतनु करतभयो । छातीमें लातका प्रचण्ड आधात लगते ही रावण व्याकुल होकर रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसने बीसों हाथोंमें भालुओंको पकड़ रक्खा था। ऐसा जान पड़ता था ] मानो रात्रिके समय भौरे कमलों में बसे हुए हो । उसे मूर्छित देखकर, फिर लात मारकर भृक्षराज जाम्बवान् प्रभुके पास चले गये । रात्रि जानकर सारथि रावणको रथमें डालकर उसे होशमें लानेका उपाय करने लगा। दो मुरुछा विगत भालु कपि सव आए प्रभु पास । निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास ॥ ९८॥ मूर्छा दूर होनेपर सब रीछ-वानर प्रभुके पास आये । उधर सब राक्षसने बहुत ही भयभीत होकर रावणको घेर लिया || ९८ ॥ मासपारायण, छब्बीसवाँ विश्राम चौ० तेही निसि सीता पहिं जाई । त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई ॥ सिर भुज वाढ़ि सुनत रिपु केरी। सीता उर भइ वास घनेरी ॥ १ ॥ उसी रात त्रिजटाने सीताजीके पास जाकर उन्हें सब कया कह सुनायी । शत्रुके सिर और भुजाओंकी बढ़तीका संवाद सुनकर सीताजीके हृदयमें बड़ा भय हुआ ॥१॥ मुख मलीन उपजी मन चिंता । त्रिजटा सन बोली तब सीता || होइहि कहा कहसि किन माता । केहि विधि मरिहि विस्व दुखदाता ॥ २ ॥ [ उनका ] मुख उदास हो गया, मनमें चिन्ता उत्पन्न हो गयी। तब सीताजी विजटासे बोली-हे माता ! बताती क्यों नहीं ? क्या होगा ? सम्पूर्ण विश्वको दुःख देनेवाला यह किस प्रकार मरेगा ॥२॥ रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई । विधि विपरीत चरित सब करई ॥ मोर अभाग्य जिआवत ओही। जेहिं ही हरि पद कमल बिछोही॥ ३ ॥ श्रीरघुनाथजीके बाणोंसे सिर कटनेपर भी नहीं मरता। विधाता सारे चरित्र विपरीत (उलटे ) ही कर रहा है । [ सच बात तो यह है कि ] मेरा दुर्भाग्य ही उसे जिला रहा है, जिसने मुझे भगवान्के चरण-कमलोंसे अलग कर दिया है ॥ ३ ॥ जेहि कृत कपट कनक मृग झूठा । अजहुँ सो दैव मोहि पर रूठा ॥ जेहिं विधि मोहि दुख दुसह सहाए। लछिमन कहुँ कटु वचन कहाए ॥ ४ ॥ जिसने कपटका झूठा खर्णमृग बनाया था, वही दैव अव भी मुझपर रूठा हुआ
* लंकाकाण्ड *
८३७
है, जिस विधाताने मुझसे दुःसह दुःख सहन कराये और लक्ष्मणको कडुवे वचन कहलाये, ॥४॥
रघुपति बिरह सविष सर भारी । तकि तकि मार बार बहु मारी ॥
ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना । सोइ विधि ताहि जिआवन आना ॥ ५ ॥
जो श्रीरघुनाथजीके विरहरूपी बड़े विषैले बाणोंसे तक-तककर मुझे बहुत बार
मारकर, अब भी मार रहा है और ऐसे दुःखमें भी जो मेरे प्राणोंको रख रहा है, वही
विधाता उस ( रावण) को जिला रहा है, दूसरा कोई नहीं ॥ ५ ॥
बहु विधि कर विलाप जानकी । करि करि सुरति कृपानिधान की।
कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी । उर सर लागत मरइ सुरारी ॥ ६ ॥
कृपानिधान श्रीरामजीकी याद कर-करके जानकीजी बहुत प्रकारसे विलाप कर
रही हैं । त्रिजटाने कहा-हे राजकुमारी ! सुनो, देवताओंका शत्रु रावण हृदयमें बाय
लगते ही मर जायगा ॥ ६ ॥
प्रभु ताते उर हतइ न तेही । एहि के हृदय वसति बैदेही ॥ ७ ॥
परंतु प्रभु उसके हृदयमें बाण इसलिये नहीं मारते कि इसके हृदयमें जानकीजी
(आप) बसती हैं ॥७॥
छं.-एहि के हृदय बस जानकी जानकी उर मम यास है
मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है ॥
मुनि वचन हरप विषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटौँ कहा।
अव मरिहि रिपु एहि विधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा ॥
[वे यही सोचकर रह जाते हैं कि ] इसके हृदयमें जानकीका निवास है, जानकीके
हृदयमें मेरा निवास है और मेरे उदर में अनेकों भुवन है । अतः रावणके हृदयमें बाण
लगते ही सब भुवनोंका नाश हो जायगा । यह वचन सुनकर, सीताजीके मनमें अत्यन्त
हर्ष और विषाद हुआ देखकर बिजटाने फिर कहा-हे सुन्दरी ! महान् संदेहका त्याग
कर दो अब सुनो, शत्रु इस प्रकार मरेगा-
दो-काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान ।
तथ रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान ॥ ९९ ॥
सिरोंके बार-बार काटे जानेसे जब वह व्याकुल होजायगा और उसके हृदयसे तुम्हारा
ध्यान छूट जायगा, तब सुजान (अन्तर्यामी) श्रीरामजी रावणके हृदयमें बाण मारेंगे ॥१९॥
चौ-
o-अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि निजटा निज भवन सिधाई ॥
राम सुभाउ सुमिरि बैदेही। उपजी बिरह बिथा अति तेही ॥१॥
ऐसा कहकर और सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाकर फिर विजटा अपने घर
चली गयी। श्रीरामचन्द्रजीके स्वभावका स्मरण करके जानकीजीको अत्यन्त विरहन्यथा
उत्पन्न हुई ॥१॥
* रामचरितमानस *
निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती । जुग सम भई सिराति न शती ।।
करति बिलाप मनहिं मन भारी । राम बिरहँ जानकी दुखारी ॥ २ ॥
वे रात्रिकी और चन्द्रमाकी बहुत प्रकारसे निन्दा कर रही हैं [ और कह रही
हैं- रात युगके समान बड़ी हो गयी, वह बीतती ही नहीं। जानकोजी श्रीरामजीके
विरहमें दुखी होकर मन-ही-मन भारी विलाप कर रही हैं ॥२॥
जब अति भयउ विरह उर दाहू । फरकेड बाम नयन अरु बाहू ॥
सगुन बिचारि धरी मन धीरा । अव सिलिहहिं कृपाल रघुबीरा ॥ ३ ॥
जब विरहके मारे हृदयमें दारुण दाह हो गया, तव उनका वायाँ नेत्र और वाहु
फड़क उठे । शकुन समझकर उन्होंने मनमें धैर्य धारण किया कि अब कृपालु श्रीरघुवीर
अवश्य मिलेंगे ॥३॥
इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा । निज सारथि सन खीझन लागा ॥
सठ स्नभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही॥ ४ ॥
यहाँ आधी रातको रावण [ मूर्छासे ] जगा और अपने सारथिपर इष्ट होकर
कहने लगा-अरे मूर्ख ! तूने मुझे रणभूमिसे अलग कर दिया । अरे अधम ! अरे
मन्दबुद्धि ! तुझे धिक्कार है, धिकार है ! ॥ ४ ॥
तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा । भोरु भएँ स्थ चढ़ि पुनि धावा ॥
सुनि आगवनु दसानन केरा । फपि दल खरभर भयउ घनेरा ॥ ५ ॥
सारथिने चरण पकड़कर रावणको बहुत प्रकारसे समझाया। सबेरा होते ही वह स्थपर
चढ़कर फिर दौड़ा । रावणका आना सुनकर वानरोंकी सेनामें बड़ी खलबली मच गयी ॥५॥
जहँ तह भूधर पिटप उपारी | धाए कटकटाइ भट भारी ॥ ६ ॥
वे भारी योद्धा जहाँ तहाँ पर्वत और वृक्ष उखाड़कर [ क्रोधसे ] दाँत कटकटा-
कर दौड़े ॥६॥
छं०-धाए जो मर्कट विकट भालु कराल कर भूधर धरा।
अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा॥
विचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो ।
चहुँ दिसि चपेटन्हि मारिनखन्हि विदारितनु व्याकुलकियो ।
विकट और विकराल बानर-भालु हाथोंमें पर्वत लिये दौड़े। वे अत्यन्त कोष करके
प्रहार करते हैं। उनके मारनेसे राक्षस भाग चले । बलवान् वानने शत्रुकी सेनाको
विचलित करके फिर रावणको घेर लिया। चारों ओरसे चपेटे मारकर और नखोसे
शरीर विदीर्णकर वानरोंने उसको व्याकुल कर दिया ।
दो-देखि महा मर्कट प्रचल रावन कीन्ह विचार।
अंतरहित होइ निमिप महुँ कृत माया विस्तार ॥ १० ॥
* लंकाकाण्ड * ८३५ वानरोंको बड़ा ही प्रबल देखकर रावणने विचार किया और अन्तर्धान होकर क्षणभरमें उसने माया फैलायी।। १०० ॥ छं-जब कीन्ह तेहिं पापंड । भए प्रगट जंतु प्रचंड ॥ वेताल पिसाच । कर धरें धनु नाराच ॥ १ ॥ जब उसने पाखण्ड (माया) रचा, तब भयंकर जीव प्रकट हो गये । बेताल, भूत और पिशाच हाथोंमें धनुष-वाण लिये प्रकट हुए ॥१॥ जोगिनि गहें करवाल । एक हाथ मनुज कपाल ॥ करि सद्य सोनित पान । नाचहिं करहिं बहु गान ॥ २॥ योगिनियाँ एक हाथमें तलवार और दूसरे हाथमें मनुष्यकी खोपड़ी लिये ताजा खून पीकर नाचने और बहुत तरह के गीत गाने लगीं ॥ २ ॥ धरु मारु वोलहि घोर । रहि पूरि धुनि चहुँ ओर ॥ मुख बाइ धावहिं खान । तव लगे कीस परान ॥ ३॥ वे पकड़ो, मारो आदि घोर शब्द बोल रही हैं। चारों ओर ( सब दिशाओंमें) यह ध्वनि भर गयी। वे मुख फैलाकर खाने दौड़ती हैं। तब वानर भागने लगे ॥३॥ जहँ जाहिं मर्कट भागि । तहँ वरत देखहिं आगि ॥ भए विकल वानर भालु । पुनि लाग वरपै बालु ॥ ४ ॥ वानर भागकर जहाँ भी जाते हैं, वहीं आग जलती देखते हैं । वानर-भाल व्याकुल हो गये । फिर रावण बालू बरसाने लगा ॥४॥ जहँ तहँ थकित करि कोस । गर्जेउ बहुरि दससीस ॥ लछिमन कपीस समेत । भए सकल वीर अचेत ॥ ५ ॥ वानरोंको जहाँ-तहाँ थकित (शिथिल) कर रावण फिर गरजा । लक्ष्मणजी और सुग्रीवसहित सभी वीर अचेत हो गये ॥ ५ ॥ हा राम हा रघुनाथ । कहि सुभट मीजहिं हाथ ॥ पहि विधि सकल बल तोरि । तेहिं कीन्ह कपट वहोरि ॥ ६ ॥ हा राम ! हा रघुनाथ ! पुकारते हुए श्रेष्ठ योद्धा अपने हाथ मलते ( पछताते ) हैं । इस प्रकार सबका चल तोड़कर रावणने फिर दूसरी माया रची ॥ ६ ॥ प्रगटेलि विपुल हनुमान । धाए गहे पापान। घेरे जाइ। चहुँ दिसि वरूथ बनाइ ॥ ७॥ उसने बहुत-से हनुमान प्रकट किये, जो पत्थर लिये दौड़े। उन्होंने चारों ओर दल बनाकर श्रीरामचन्द्रजीको जा घेरा।॥ ७ ॥ मारह धरह, जनि जाइ । कटकटहिं पूँछ पूँछ उठाइ॥ दह दिसि लँगुर विराज । तेहिं मध्य कोसलराज॥८॥ तिन्ह रामु
* रामचरितमानल*
वे पूँछ उठाकर कटकटाते हुए पुकारने लगे, 'मारो, पकड़ो, जाने न पावे । उनके
लंगूर (पूंछ) दसों दिशाओंमें शोभा दे रहे हैं और उनके बीचमें कोसलराज श्रीरामजी हैं ||८||
छ तेहि मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही ।
जनु इंद्रधनुष अनेक की बर वारि तुंग तमालही ।।
प्रभु देखि.हरष विषाद उर सुर बदत जय जय जय करी।
रघुवीर एकहि तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी ॥ १ ॥
उनके बीचमें कोसलराजका सुन्दर श्याम शरीर ऐसी शोभा पा रहा है, मानो
ऊँचे तमाल वृक्षके लिये अनेक इन्द्रधनुषोंकी श्रेष्ठ बाड़ (घेरा) बनायी गयी हो । प्रभु-
को देखकर देवता हर्ष और विषादयुक्त हृदयसे 'जय, जय, जया ऐसा बोलने लगे । तब
श्रीरघुवीरने क्रोध करके एक ही बाणसे निमेषमात्रमें रावणकी सारी माया हर ली ॥ १ ॥
माया बिगत कपि भालु हरपे बिटप गिरि गहि सव फिरे।
सर निकर छाड़े राम रावन वाहु सिर पुनि गहि गिरे ॥
श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं।
सत सेष सारद निगम कवि तेउ तदपि पार न पावहीं ॥ २ ॥
माया दूर हो जानेपर वानर-भालू हर्पित हुए और वृक्ष तथा पर्वत ले-लेकर सब
लौट पड़े। श्रीरामजीने बाणों के समूह छोड़े, जिनसे रावणके हाथ और सिर फिर कट-
कटकर पृथ्वीपर गिर पड़े। श्रीरामजी और रावणके युद्धका चरित्र यदि सैकड़ों शेष,
सरस्वती, वेद और कविअनेक कल्पोंतक गाते रहें, तो वेभी उसका पार नहीं पा सकते ॥२॥
दो-ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास ।
जिमि निज वल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास ॥ १०२(क)।
उसी चरित्रके कुछ गुणगण मन्दबुद्धि तुलसीदासने कहे हैं, जैसे मक्खी भी अपने
पुरुषार्थके अनुसार आकाशमें उड़ती है ॥ १०१ (क) ||
काटे सिर भुज वार बहु मरत न भट लंकेल ।
प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस ॥१०१(ख)।
सिर और भुजाएँ बहुत बार काटी गयीं। फिर भी वीर रावण मरता नहीं । प्रभु
तो खेल कर रहे हैं। परंतु मुनि, सिद्ध, देवता उस क्लेशको देखकर (प्रभुको क्लेश
पाते समझकर ) व्याकुल हैं || १०१ (ख) ॥
चौ०-काटत वदहिं सीस समुदाई । जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई ॥
मरइन रिपुश्रमभय विसेषा । राम विभीषन तन
तब देखा ॥ १ ॥
काटते ही सिरोंका समूह बढ़ जाता है, जैसे प्रत्येक लाभपर लोभ बढ़ता है। शत्रु
मरता नहीं और परिश्रम बहुत हुआ। तब श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणकी ओर देखा ॥१॥
* लंकाकाण्ड *
८४१
उमा काल मर जाकी ईछा । सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा ।।
सुनु सरबग्य चराचर नायक । प्रनतपाल सुर मुनिसुखदायक ॥ २ ॥
[शिवजी कहते हैं-हे उमा ! जिसकी इच्छामात्रसे काल भी मर जाता है,
वही प्रभु सेवककी प्रीतिकी परीक्षा ले रहे हैं। [विभीषणजीने कहा- हे सर्वज्ञ! हे
चराचरके स्वामी.! हे शरणागतके पालन करनेवाले ! हे देवता और मुनियोंको सुख
देनेवाले! सुनिये-॥२॥
नाभिकुंड पियूष बस या । नाथ जित रावनु बल ताकें ।
सुनत बिभीषन बचन कृपाला । हरषि गहे कर बान कराला ॥ ३ ॥
इसके नामिकुण्डमें अमृतका निवास है। हे नाथ ! रावण उसीके बलपर जीता
है। विभीषणके वचन सुनते ही कृपालु श्रीरघुनाथजीने हर्षित होकर हाथमें विकराल
वाण लिये ॥ ३ ॥
असुभ होन लागे तब नाना । रोवहिं खर सृकाल बहु खाना ।।
बोलहिं खग जग आरति हेत् । प्रगट भए नभ जह तह केत् ॥ ४ ॥
उस समय नाना प्रकारके अशकुन होने लगे। बहुत-से गदहे, स्यार और कुत्ते
रोने लगे । जगत्के दुःख (अशुभ) को सूचित करनेके लिये पक्षी बोलने लगे। आकाशमें
जहाँ-तहाँ केतु (पुच्छल तारे) प्रकट हो गये ॥ ४ ॥
दस दिसि दाह होन अति लागा । भयउ परब बिनु रबि उपरागा ॥
मंदोदरि उर कंपति भारी। प्रतिमा स्वहिं नयन मग वारी ॥ ५ ॥
दसों दिशाओंमें अत्यन्त दाह होने लगा (आग लगने लगी)। बिना ही पर्व
(योग) के सूर्यग्रहण होने लगा | मन्दोदरीका हृदय बहुत कॉपने लगा। मूर्तियाँ नेत्र-
मार्गसे जल बहाने लगीं ॥ ५ ॥
छं० प्रतिमा रुदहि पविपात नभ अति वात वह डोलति मही।
वरहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही।
उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहिं जय जए।
सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए ।
मूर्तियाँ रोने लगी, आकाशसे वज्रपात होने लगे, अत्यन्त प्रचण्ड वायु बहने लगी,
पृथ्वी हिलने लगी, वादल रक्त, बाल और धूलिकी वर्षा करने लगे। इस प्रकार इतने
अधिक अमङ्गल होने लगे कि उनको कौन कह सकता है ? अपरिमित उत्पात देखकर
आकाशमें देवता व्याकुल होकर जय-जय पुकार उठे । देवताओंको भयभीत जानकर
कृपालु श्रीरघुनाथजी धनुषपर बाण संधान करने लगे।
दो०-बैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।
रघुनायक सायक चले
मानहुँ काल फनीस ॥ १०२ ॥
८४२ * रामचरितमानस * कानोंतक धनुषको खींचकर श्रीरघुनाथजीने इकतीस वाण छोड़े। वे श्रीरामचन्द्र- जीके बाण ऐसे चले, मानो कालसर्प हों ॥ १०२ ॥ चौल-सायक एक नाभि सर सोषा । अपर लगे भुज लिर करि रोया ।। लै सिर बाहु चले नाराचा । सिर भुज होन एंड महि नाचा ॥ १ ॥ एक याणने नाभिके अमृतकुण्डको सोख लिया । दूसरे तीस वाण कोप करके उसके सिरों और भुजाओंमें लगे । वाण सिरों और भुजाओंको लेकर चले । सिरों और नुजाओंसे रहित हण्ड (घड़) पृथ्वीपर नाचने लगा ॥ १ ॥ धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा । तव सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा ।। गजेंड मरत घोर रव भारी । कहाँ रामु रन हतौ पचारी ॥ २ ॥ धड़ प्रचण्ड वेगसे दौड़ता है, जिससे धरती धंसने लगी। तब प्रभुने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये। मरते समय रावण बड़े घोर शब्दसे गरजकर बोला-राम कहाँ है ? मैं ललकारकर उनको युद्धमें मारूँ! ॥२॥ डोली भूमि गिरत दसकंधर । छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर ।। धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई ॥ ३ ॥ रावणके गिरते ही पृथ्वी हिल गयो । समुद्र, नदियाँ, दिशाओंके हाथी और पर्वत ' क्षुब्ध हो उठे । रावण धड़के दोनों टुकड़ोंको फैलाकर भालू और वानरोंके सनुदायको दबाता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३ ॥ मंदोदरि आर्गे भुज सीसा । धरि सर चले जहाँ अगदीसा ।। प्रबिसे सय निषंग महुँ जाई । देखि सुरन्द दुंदुभी बजाई ॥ ४ ॥ रावणकी भुजाओं और सिरोंको मन्दोदरीके सामने रखकर रामबाण वहाँ चले, जहाँ जगदीश्वर श्रीरामजी थे । सब बाग जाकर तरकसमें प्रवेश कर गये । यह देखकर देवताओंने नगाड़े बजाये ।। ४ ।। तासु तेज समान प्रभु आनन । हरपे देखि संभु चतुरानन ॥ जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा । जय रघुवीर प्रबल भुजदंडा ॥ ५ ॥ रावणका तेज प्रभुके मुखमें समा गया। यह देखकर शिवजी और ब्रह्माजी हर्षित हुए । ब्रह्माण्डभरमें जय-जयकी ध्वनि भर गयी । प्रबल भुजदण्डॉवाले श्रीरघुवीरकी जय हो ॥५॥ घरपहिं सुमन देव मुनि वृंदा । जय कृपाल जय जयति मुकुंदा ॥ ६॥ देवता और मुनियों के समूह फूल बरसाते हैं और कहते हैं--कृपालुकी जय हो मुकुन्दकी जय हो, जय हो ! ॥ ६ ॥ छं०-जय कृपा कंद मुकुंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो। खल दल विदारन परम कारन कारुनीक सदा विभो ।
* लंकाकाण्ड सुर सुमन बरपहिं हरप संकुल वाज दुंदुभि गहगहीं। संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही॥१॥ हे कृपाके यान्द ! हे मोक्षदाता मुकुन्द ! हे [ राग-द्वेष, हर्ष-शोक, जन्म-मृत्यु आदि द्वन्दोंके हरनेवाले। हे शरणागतको सुख देनेवाले प्रभो ! हे दुष्ट-दलको विदीर्ण करनेवाले! हे कारणोंक भी परम कारण ! हे सदा करुणा करनेवाले । हे सर्वव्यापक विभो ! आपकी जय हो । देवता इपमें भरे हुए पुष्प वरणगते हैं, घमावम नगाड़े बन रहे हैं। रणभूमिमें श्रीरामचन्द्रजीके अङ्गोंने बहुत-से कामदेवोंकी शोभा प्राप्त की ॥ १ ॥ सिर जटा मुकुट प्रसून विच विच अति मनोहर राजहीं। जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उडुगन भ्राजहीं । भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने । जनु रायमुनी तमाल पर बैठी विपुल सुख आपने ॥ २ ॥ सिरपर जटाओंका मुकुट है, जिसके बीच-बीचमें अत्यन्त मनोहर पुष्प शोभा दे रहे है । मानो नीले पर्वतपर विजलीके समूहसहित नक्षन सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजी अपने भुजदण्डोंसे बाण और धनुष फिरा रहे हैं । शरीरपर रुधिरके कण अत्यन्त सुन्दर लगते हैं। मानो तमालके वृक्षपर बहुत-सी ललमुनियाँ चिड़ियों अपने महान् सुखमें मग्न हुई निश्चल बैठी हो ॥ २॥ दो-कृपादृष्टि करि वृष्टि प्रभु अभय किए सुर बुंद । भालु कीस सव हरपे जय सुख धाम मुकुंद ॥ १०३ ॥ प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने कृपादृष्टिकी वर्षा करके देवसमूहको निर्मय कर दिया। वानर- भालू सब हर्पित हुए और सुखधाम मुकुन्दकी जय हो, ऐसा पुकारने लगे ॥ १०३ ॥ चौ०-पति सिर देखत मंदोदरी । मुरुछित विकल धरनि खसि परी ॥ जुबति शृंद रोवत उठि धाई । तेहि उठाइ रावन पहिं आई॥ ॥ पतिके सिर देखते ही मन्दोदरी व्याकुल और मूञ्छित होकर धरतीपर गिर पड़ी। त्रियाँ रोती हुई उठ दौड़ी और उस (मन्दोदरी ) को उठाकर रावणके पास आयीं ॥ १ ॥ पति गति देखि ते करहिं पुकारा। छूटे फच नहिं बधुप संभारा ॥ उर ताड़ना करहिं विधि नाना । रोवत करहिं प्रताप बखाना ॥ २ ॥ पतिकी दशा देखकर वे पुकार-पुकारकर रोने लगी। उनके बाल खुल गये, देहकी सँभाल नहीं रही। वे अनेकों प्रकारसे छाती पीटती हैं और रोती हुई रावणके प्रतापका बखान करती है ॥२॥ तव बल नाथ ढोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी॥ सेप कमठ सहि सकहिं न भारा । सो तनु भूमि परेउ भरि चारा ॥ ३ ॥ [वे कहती हैं---] हे नाथ ! तुम्हारे बलसे पृथ्वी सदा काँपती रहती थी । अग्नि, * रामचरितमानस चन्द्रमा और सूर्य तुम्हारे सामने तेजहीन थे। शेष और कच्छप भी जिसका भार नहीं सह सकते थे, वही तुम्हारा शरीर आज धूलमें भरा हुआ पृथ्वीपर पड़ा है ॥ ३ ॥ वरुन कुवेर सुरेस समीरा । रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा ॥ भुजबल जितेहु काल जम माई। आजु परेहु अनाथ की नाई॥ ५ ॥ वरुण, कुवेर, इन्द्र और वायु, इनमेंसे किसीने भी रणमें तुम्हारे सामने धैर्य धारण नहीं किया। हे स्वामी ! नुमने अपने भुजबलते काल और यमराजको भी जीत लिया था। वही तुम आज अनाथकी तरह पड़े हो ॥४॥ जगत विदित तुम्हारि प्रभुताई । सुत परिजन बल बरनि न जाई॥ राम विमुख अस हाल तुम्हारा । रहा न फोड कुल रोवनिहारा ॥ ५ ॥ तुम्हारी प्रभुता जगत्भरमें प्रसिद्ध है । तुम्हारे पुत्रों और कुटुम्बियोंके बलका हाय ! वर्णन ही नहीं हो सकता । श्रीरामचन्द्रजीके विमुख होनेसे ही तुम्हारी ऐसी दुर्दशा हुई कि आज कुलमें कोई रोनेवाला भी न रह गया ॥ ५ ॥ तव बस विधि प्रपंच सव नाथा । समय दिसिप नित नावहिं माथा ।। अब तव सिर भुज जंबुफ खाहीं। राम बिमुख यह अनुचित नाहीं ॥ ६ ॥ हे नाथ ! विधाताकी सारी सृष्टि तुम्हारे क्शनें थी। लोकपाल सदा भयभीत होकर तुमको मस्तक नवाते थे। किंतु हाय ! अब तुम्हारे सिर और मुजाओंको गीदड़ खा रहे हैं । रामविमुखके लिये ऐसा होना अनुचित भी नहीं है ( अर्थात् उचित ही है)॥६॥ फाल बिबस पति कहा न माना । अग जग नाथु मनुज करि जाना ॥ ७ ॥ है पति ! कालके पूर्ण वशमें होनेसे तुमने [ किसीका ] कहना नहीं माना और चराचरके नाथ परमात्माको मनुष्य करके जाना ।। ७ ॥ छ.---जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं । जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं ॥ आजन्म ते परदोह रत पापौघमय तव तनु अयं । तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं ॥ दैत्यरूपी वनको जलानेके लिये अग्निखरूप साक्षात् श्रीहरिको तुमने मनुष्य करके जाना | शिव और ब्रह्मा आदि देवता जिनको नमस्कार करते हैं, उन करुणामय भगवान्को हे प्रियतम ! तुमने नहीं भजा । तुम्हारा यह शरीर जन्मसे ही दूसरोंसे द्रोह करनेमें तत्पर तथा पापसमूहमय रहा । इतनेपर भी जिन निर्विकार ब्रह्म श्रीरामजीने तुमको अपना धाम दिया. उनको मैं नमस्कार करती हूँ। दो-अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहि आन । जोगि श्रृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान ॥ १०४ ॥ .
लंकाकाण्ड
अदद ! नाग ! और नामजीक समान पाका समुद्र दूसरा कोई नहीं है, जिन
भागाने तुभयो दर गति दी जो मौगिसमाजही भी दुर्लभ ॥ १०४ ॥
चौर-मंदोदरी पचन सुनि काना। सुरगुनि सिद सबन्दिमुखमाना ।
अस माहेस नारद सनकादी। जे मुनिघर परमारथचादी ॥ १ ॥
मन्दोदरी वचन फानी मुनकर देवता, मुनि और सिद्ध तीने सुख माना ।
अशा मादेव, नारद और सनकादि तथा और भी जो परमार्थवादी (परमात्माके तत्त्वको
जानने और कानेवाले)श्रेष्ठ नुनि ये॥१॥
भरि लोचन रघुपतिहि निहारी । प्रेम मगन सय भए सुखारी ।।
रुदन करत देखी सर नारी । गयउ विभीपनु मन दुख भारी ॥ २ ॥
सभी औरघुनाथजीको नेत्र भरकर निरखकर प्रेममग्न हो गये और अत्यन्त
मुखो हुए । अपने घरफी सब प्रियाको रोती हुई देखकर विभीषणजीके मनमें बड़ा
भाये स हुआ और वे उनके पास गये ॥ २ ॥
पंधु दसा पिलोकि दुख कीन्हा । तब प्रभु अनुजहि आयसुदीन्हा ।
टिमन तेति बाहु विधि समुझायो । यहुरि विभीपन प्रभु पहिं आयो ॥ ३ ॥
उन्होंने भाईको दशा देखकर दुःख किया । तब प्रभु श्रीरामजीने छोटे भाईको
माना दी [कि जान्न विभीषणको धैर्य धाओ ] | लक्ष्मगजीने उन्हें बहुत प्रकारसे
समझाया | तब विभीषम प्रभुके पास लौट आये ॥३॥
उपाधि प्रभु साह विलोका । करहु क्रिया परिहरि सब सोका ॥
कोन्दि क्रिया प्रभु आयसु मानी। विधिपत देस फाल जिय आनी ॥ ४ ॥
प्रभुने उनको कृपापूर्ण दृष्टिसे देखा और कहा- सब शोक त्यागकर रावणकी
अन्त्येष्टि क्रिया करो। प्रभुको आशा मानकर और हृदयमै देश और कालका विचार
करके विभीषणजीने विधिपूर्वक सब क्रिया की ॥४॥
दो०---मंदोदरी आदि सब देव
सब देद तिलांजलि ताहि ।
भवन गई रघुपति गुन गन बरनत मन माहि ॥ १०५ ॥
मन्दोदरी आदि सर त्रियाँ उसे ( रावणको) तिलाजलि देकर मनमें श्रीरघुनाय.
जीके गुणसमूहका वर्णन करती हुई महलको गयीं ॥ १०५ ॥
चौ
s-आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो । कृपासिंधु तय अनुज बोलायो ।
तुम्ह कपीस अंगद नल नीला | जामवंत मारुति नयसीला ॥ १ ॥
सब मिलि जाहु चिनीपन साया । सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा ।
पिता वचन में नगर न आव। भापु सरिस कपि भनुज पठावउँ ॥ २ ॥
में *रामचरितमानस सब क्रिया-कर्म करनेके बाद विभीषणने आकर पुनः सिर नवाया । तब कृपाके समुद्र श्रीरामजीने छोटे भाई लक्ष्मणजीको बुलाया । श्रीरघुनाथजीने कहा कि तुम, वानर- राज सुग्रीव, अंगद, नल, नील, जाम्यवान् और मारुति-सब नीतिनिपुण लोग मिलकर विभीषणके साथ जाओ और उन्हें राजतिलक कर दो। पिताजीक वचनोंके कारण नगरमें नहीं आ सकता। पर अपने ही समान वानर और छोटे भाईको भेजता हूँ॥ १-२!! तुरत चले कपि सुनि प्रभु बचना । कीन्ही जाइ तिलक की रचना ।। सादर सिंहासन बैठारी । तिलक सारि अस्तुति अनुसारी ॥ ३ ॥ प्रभुके वचन सुनकर वानर तुरंत चले और उन्होंने जाकर राजतिलककी सारी व्यवस्था की। आदरके साथ विभीषणको सिंहासनपर बैठाकर राजतिलक किया और स्तुति की ॥ ३॥ जोरि पानि सबहीं सिर नाए । सहित विभीपन प्रभु पहिं आए। तब रघुबीर बोलि कपि लीन्हे । कहि प्रिय वचन सुखी सब कीन्हे ॥ ॥ सभीने हाथ जोड़कर उनको सिर नवाये । तदनन्तर विभीपणजीसहित सब प्रमुके पास आये । तब श्रीरघुवीरने वानरोंको बुला लिया और प्रिय वचन कहकर सबको सुखी किया ॥ ४ ॥ छ०–किए सुखी कहि वानी सुधा सम वल तुम्हारे रिपु हयो। पायो विभीपन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो । मोहि सहित सुभ कोरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं। संसार सिंधु अपार पार प्रयास विनु नर पाइह ॥ भगवान्ने अमृतके समान यह वाणी कहकर सबको सुखी किया कि तुम्हारे ही वलसे यह प्रबल शत्रु मारा गया और विभीषणने राज्य पाया। इसके कारण नुम्हारा यश तीनों लोकोंमें नित्य नया बना रहेगा । जो लोग मेरे सहित तुम्हारी शुभ कीर्तिको परम प्रेमके साथ गायेंगे, वे बिना ही परिश्रम इस अपार संसारसागरका पार पा जायँगे। के वचन श्रवन सुनि नहिं भवाहिं कपि पुंज । वार वार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज ॥ १०६ ॥ प्रभुके वचन कानोंसे सुनकर वानरसमूह तृप्त नहीं होते । वे सब बार-बार सिर नवाते हैं और चरणकमलोंको पकड़ते हैं ॥ १०६ ॥ चौ०-पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना । लंका जाहु कहेउ भगवाना ॥ समाचार जानकिहि सुनावहु । तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु ॥ १ ॥ फिर प्रभुने हनुमान्जीको बुला लिया । भगवान्ने कहा-तुम लंका जाओ! दो०-प्रभु
८४७
*लंकाकाण्ड *
मानकीको सब समाचार सुनाओ और उसका कुशल-समाचार लेकर तुम चले आओ ॥१॥
तब हनुमंत नगर महुँ आए । सुनि निसियरी निसाचर धाए ॥
बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही । जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही ॥ २ ॥
तव हनुमानजी नगरमें आये । यह सुनकर राक्षस-राक्षसी [ उनके सत्कार के लिये]
दौड़े । उन्होंने बहुत प्रकारसे हनुमान्जीकी पूजा की और फिर श्रीजानकीजीको दिखला
दिया ॥२॥
दूरिहि ते प्रनाम कपि कीन्हा । रघुपति दूत जानकी चीन्हा॥
फहहु तात
प्रभु कृपानिकेता । कुसल अनुज कपि सेन समेता ॥ ३ ॥
हनुमान्जीने [ सीताजीको] दूरसे ही प्रणाम किया। जानकीजीने पहचान लिया कि
यह वही श्रीरघुनाथजीका दूत है [ और पूछा-] हे तात ! कहो, कृपाके धाम मेरे प्रभु
छोटे भाई और वानरोंकी सेनासहित कुशलसे तो हैं ? ॥३॥
सब विधि कुसल कोसलाधीसा । मातु समर जीत्यो दससीसा ॥
अविचल राजु विभीषन पायो । सुनि कपि वचन हरप उर छायो ॥ ४ ॥
[ हनुमान्जीने कहा- हे माता ! कोसलपति श्रीरामजी सब प्रकारसे सकुशल
हैं । उन्होंने संग्राममै दस सिरवाले रावणको जीत लिया है और विभीषणने अचल राज्य
प्रास किया है । हनुमान्जीके वचन सुनकर सीताजीके हृदयमें हर्ष छा गया ॥ ४ ॥
छं०-अति हरप मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा।
का देउँ तोहि त्रैलोक महुँ कपि किमपि नहिं वानी समा॥
सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं ।
रन जीति रिपुदल वंधु जुत पस्यामि राममनामयं ॥
श्रीजानकीजीके हृदयमें अत्यन्त हर्ष हुआ। उनका शरीर पुलकित हो गया और
नेत्रोंमें [आनन्दाश्रुओंका] जल छा गया। वे बार-बार कहती हैं-हे हनुमान् ! मैं तुझे क्या
हूँ ! इस वाणी ( समाचार ) के समान तीनों लोकोंमै और कुछ भी नहीं है!
[ हनुमान्जीने कहा-] हे माता ! सुनिये, मैंने आज निःसंदेह सारे जगत्का राज्य पा
लिया, जो मैं रणमें शत्रुसेनाको जीतकर भाईसहित निर्विकार श्रीरामजीको देख रहा हूँ।
दो०- सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदय बसहुँ हनुमंत ।
सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत
समेत अनंत ॥१७॥
[ जानकीजीने कहा-] हे पुत्र ! सुन, समस्त सद्गुण तेरे हृदयमै बसे और
है हनुमान् ! शेष ( लक्ष्मणजी) सहित कोसलपति प्रभु सदा तुझपर प्रसन्न रहें ॥ १०७ ॥
चौ० -अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता । देखौं नयन स्याम मृदु गाता ॥
तब हनुमान राम पहिं जाई । जनकसुता के कुसल सुनाई ॥ १ ॥
Pa- * रामचरितमानस * हे तात ! अब तुम वही उपाय करो जिससे मैं इन नेत्रोंसे प्रभुके कोमल श्याम शरीर. के दर्शन करूँ। तब श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर हनुमान्जीने जानकीजीका कुशल- समाचार सुनाया ॥ १ ॥ सुनि संदेसु भानुकुलभूपन । योलि लिए जुबराज विभीषन । मारुतसुत के संग सिधाबहु । सादर जनकसुतहि लै आवहु ॥ २ ॥ सूर्यकुलभूपण श्रीरामजीने संदेश सुनकर युवराज अंगद और विभीषणको बुला लिया [ और कहा--] पवनपुत्र हनुमानके साथ जाओ और जानकीको आदरके साय ले आओ।॥ २॥ तुरतहि सकल गए जहँ सीता । सेवाह सब निसिचरी बिनीता ॥ वेगि विभीपन तिन्हहि सिखायो । तिन्ह बहु विधि मजन करवायो॥ ३ ॥ वे सब तुरंत ही वहाँ गये जहाँ सीताजी थीं। सब-की-सब राक्षसियाँ नम्रता. पूर्वक उनकी सेवा कर रही थीं। विभीषणजीने शीघ्र ही उन लोगोंको समझा दिया। उन्होंने बहुत प्रकारसे सीताजीको स्नान कराया, || ३ ॥ बहु प्रकार भूपन पहिराए । सिबिका रुचिरसाजि पुनि ल्याए । ता पर हरपि चढ़ी वैदेही । सुमिरि राम सुखधाम सनेही ॥ ४ ॥ बहुत प्रकारके गहने पहनाये और फिर वे एक सुन्दर पालकी सजाकर ले आये। सीताजी प्रसन्न होकर सुखके धाम प्रियतम श्रीरामजीका स्मरण करके उसपर हर्षके साथचढ़ी।४) बेतपानि रच्छक चहु पासा । चले सफल मन परम हुलासा ॥ देखन भालु कीस सव आए। रच्छक कोपि निवारन धाए ॥ ५ ॥ चारों ओर हार्थोंमें छड़ी लिये रक्षक चले । सबके मनोंमें परम उल्लास (उमंग) है। रीछ-बानर स्वदर्शन करनेके लिये आये, तब रक्षक क्रोध करके उनको रोकने दौड़े ॥५॥ कह रघुवीर कहा मम मानहु । सीतहि सखा पयादें आनहु ॥ देखहुँ कपि जननी की नाई। विहसि कहा रघुनाथ गोसाई ॥ ६ ॥ श्रीरघुवीरने कहा-मित्र ! मेरा कहना मानो और सीताको पैदल ले आओ, जिससे वानर उसको माताकी तरह देखें, गोसाई श्रीरामजीने हँसकर ऐसा कहा !!६ ॥ सुनि प्रमु बचन भालु कपि हरषे । नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरपे ॥ सीता प्रथम अनल महुँ राखी । प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी ॥ ७ ॥ प्रभुके वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो गये । आकाशसे देवताओंने बहुत-से फूल बरसाये । सीताजी [ के असली स्वरूप] को पहले अनिमें रखा था। अब । भीतरके साक्षी भगवान् उनको प्रकट करना चाहते हैं ॥ ७ ॥ - * लंकाकाण्ड * दो-तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्वाद । सुनत जातुधानी सब लागी करै विषाद ॥१०८॥ इसी कारण करुणाके भण्डार श्रीरामजीने लीलासे कुछ कड़े वचन कहे, जिन्हें सुनकर सब राक्षसियाँ विपाद करने लगीं ॥ १०८ ॥ चौ०-प्रभु के वचन सीस धरि सीता । बोली मन क्रम बचन पुनीता ॥ लछिमन होहु धरम के नेगी । पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी ॥ १ ॥ प्रमुके वचनोंको सिर चढ़ाकर मन, वचन और कर्मसे पवित्र श्रीसीताजी बोली-हे लक्ष्मण ! तुम मेरे धर्मके नेगी (धर्माचरणमें सहायक) बनो और तुरंत आग तैयार करो ॥१॥ सुनि लछिमन सीता के वानी। बिरह विवेक धरम निति सानी ॥ लोचन सजल जोरि फर दोऊ । प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ ॥ २ ॥ श्रीसीताजीकी विरह, विवेक, धर्म और नीतिसे सनी हुई वाणी सुनकर लक्ष्मणजीके नेत्रोंमें [ विषादके आँसुओंका ] जल भर आया ! वे दोनों हाथ जोड़े खड़े रहे । वे भी प्रभुसे कुछ कह नहीं सकते ॥ २ ॥ देखि राम रुख लछिमन धाए । पावक प्रगटि काठ बहु लाए ॥ पावक प्रबल देखि बैदेही । हृदय हरष नहिं भय कछु तेही ॥ ३ ॥ फिर श्रीरामजीका रुख देखकर लक्ष्मणजी दौड़े और आग तैयार करके बहुत-सी लकड़ी ले आये । अग्निको खूब बढ़ी हुई देखकर जानकीजीके हृदयमें हर्ष हुआ। उन्हें भय कुछ भी नहीं हुआ ॥३॥ जौं मन बच क्रम मम उर माहीं । तजि रघुबीर आन गति नाहीं ॥ तो कृसानु सब के गति जाना । मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना ॥ ४ ॥ [ सीताजीने लीलासे कहा- यदि मन, वचन और कमसे मेरे हृदयमें श्रीरघुवीर- को छोड़कर दूसरी गति ( अन्य किसीका आश्रय) नहीं है, तो अग्निदेव जो सबके मनकी गति जानते हैं, [ मेरे भी मनकी गति जानकर ] मेरे लिये चन्दनके समान शीतल हो जाय ॥ ४ ॥ छं-श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली । जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली। प्रतिक्वि अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे। प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देहि खरे ॥ १ ॥ प्रभु श्रीरामजीका स्मरण करके और जिनके चरण महादेवजीके द्वारा वन्दित हैं तथा जिनमें सीताजीकी अत्यन्त विशुद्ध प्रीति है, उन कोसलपतिकी जय बोलकर जानकीजी- रा०स०५४- .
८५० *रामचरितमानस ने चन्दनके समान शीतल हुई अग्निमे प्रवेश किया। प्रतिविम्ब (सीताजीकी छायामूर्ति) और उनका लौकिक कलंक प्रचण्ड अग्निमें जल गये । प्रभुके इन चरित्रोंको किसीने नहीं नाना । देवता, सिद्ध और मुनि सब आकाशमें खड़े देखते हैं।।१॥ धरि रूप पावक पानि गहिश्री सत्य श्रुति जगविदित जो। जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समपी आनि सो॥ सो राम वाम विभाग राजति चिर अति सोभाभली। नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली ॥ २ ॥ तव अग्मिने शरीर धारण करके वेदोंमें और बगतमें प्रसिद्ध वास्तविक श्री (सीताजी) का हाथ पकड़ उन्हें श्रीरामजीको वैसे ही समर्पित किया, जैसे क्षीरसागरने विष्णुभगवान्को लक्ष्मी समर्पित की थीं। वे सीताजी श्रीरामचन्द्रजीक वाम भागमें विराजित हुई। उनकी उत्तम शोभा अत्यन्त ही सुन्दर है, मानो नये खिले हुए नीले कमलके पास सोनेके कमलकी ऋली नुशोभित हो ॥ २ ॥ दो०-चरपहिं सुमन हरपि सुर वाजहिं गगन निसान । गावहिं किनर सुरवधू नाचहि चढ़ी विमान ॥१०९(क)। देवता हर्पित होकर फूल वरसाने लगे | आकाशमें डंके बजने लगे । किन्नर गाने लगे । विमानोपर चढ़ी अप्सराएँ नाचने लगीं ॥ १०९ (क) ॥ जनक सुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार । देखि भालु कपि हरपे जय रघुपति सुख सार ॥१०९(ख)। श्रीजानकीजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी अपरिमित और अपार शोभा देखकर रोछ-बानर इर्षित हो गये और सुखके सार श्रीरघुनाथजीकी जय बोलने लगे ||१०९ (ख)।। चौल-सब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिह नाई ।। आए स्वारथी । वचन कहहिं जनु परमारथी ॥ १ ॥ तब श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा पाकर इन्द्रका सारथि मातलि चरणों में सिर नवाकर [ रथ लेकर चला गया । तदनन्तर सदाकै स्वार्थी देवता आये। वे ऐसे वचन कह रहे है, मानो बड़े परमार्थी हो ॥१॥ दीन बंधु दयाल रखुराया। देव कीन्हि देवन्ह पर दाया । विख द्रोह रत ग्रह खल कामी । निज अघ गयड कुमारगगामी ॥ २ ॥ हे दीनबन्धु ! हे दयालु रघुराज ! हे परमदेव ! आपने देवताओंपर बड़ी दया की। विश्वके द्रोहमें तत्पर यह दुष्ट, कामी और कुमार्गपर चलनेवाला रावण अपने ही पापसे नष्ट हो. गया ॥२॥ । - मीन कमठ *लंकाकाण्ड तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी । सदा पार सहज उदासी ॥ अकल भगुन भज अनव अनामय । भजित पाहायसंक्ति करेनीमयप। ३ ॥ आप समरूप, ब्रह्मा, अविनाशी, नित्य एकरस, स्वमोसे ही उदासीन (शत्रु-मित्र- भावरहित ), अखण्ड, निर्गुण (मायिक गुणोंसे रहित ) अजम्मा निष्पाप, निर्विकार अजेय, अमोघशक्ति ( जिनकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती ) और दयामय है-॥ ३ ॥ नरहरी । वामन परसुराम बपु धरी ॥ जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो । नाना तनु धरि तुम्हई नसायो ॥ ४ ॥ आपने ही मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन और परशुरामके शरीर धारण किये । हे नाथ ! जब-जब देवताओंने दुःख पाया, तब-तब अनेकों शरीर धारण करके आपने ही उनका दुःख नाश किया ॥ ४॥ यह खल मलिन सदा सुरद्रोही । काम लोभ मद रत अति कोही ॥ अधम सिरोमनि तव पद पावा । यह हमरें मन बिसमय आवा ॥ ५ ॥ यह दुष्ट, मलिनहृदय, देवताओंका नित्य-शत्रु, काम, लोभ और मदके परायण तथा अत्यन्त क्रोधी था । ऐसे अधमोंके शिरोमणिने भी आपका परमपद पा लिया। इस यातका हमारे मन आश्चर्य हुआ ॥ ५ ॥ हम देवता परम अधिकारी । स्वारथ रत प्रभु भगति विसारी ॥ भव प्रवाह संतत हम परे । अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे ॥ ६ ॥ इम देवता श्रेष्ठ अधिकारी होकर भी स्वार्थपरायण हो आपकी भक्तिको भुलाकर निरन्तर भवसागरके प्रवाह (जन्म-मृत्युके चक्र ) में पड़े हैं । अब हे प्रभो ! हम आपकी शरणमें आ गये हैं, हमारी रक्षा कीजिये ॥ ६ ॥ दो०-फरि विनती सुर सिद्ध सव रहे जहँ तहँ कर जोरि । अति सप्रेम तन पुलकि विधि अस्तुति करत बहोरि ॥ ११० ॥ विनती करके देवता और सिद्ध सब जहाँ-के-तहाँ हाथ जोड़े खड़े रहे । तब अत्यन्त प्रेमसे पुलकित-शरीर होकर ब्रह्माजी स्तुति करने लगे-॥ ११० ॥ ई०-जय राम सदा सुखधाम हरे । रघुनायक सायक चाप धर ॥ भव वारन दारन सिंह प्रभो । गुनसागर नागरनाथ विभोर हे नित्य सुखधाम और [ दुःखोंको हरनेवाले ] हरि ! हे अपघाण धारण किये. हुए रधुनाथजी! आपकी जय हो! हे प्रभो! आप भव (जन्म-मरण) रूपी हाथीको विदीर्ण करनेके लिये सिंहके समान हैं । हे नाथ ! हे सर्वव्यापक आप गुणोंके समुद्रे और परम चतुर हैं ॥१॥ .... .
। । ८५२ * रामचरितमानस * तन काम अनेक अनूप छवी । गुन गावत सिद्धमुनींद्र कवी ॥ जसु पावन रावन नाग महा।खगनाथजथा करिकोप गहा॥ २ ॥ आपके शरीरकी अनेको कामदेवोंके समान, परंतु अनुपम छवि है। सिद्ध, मुनीश्वर और कवि आपके गुण गाते रहते हैं। आपका यश पवित्र है । आपने रावणरूपी महासर्पको गरुड़की तरह क्रोध करके पकड़ लिया ॥ २ ॥ जन रंजन भंजन सोक भयं । गतक्रोध सदा प्रभु योधमयं ॥ अवतार उदार अपार गुनं । महि भार विभंजन ग्यानधनं ॥ ३ ॥ हे प्रभो! आप सेवकोंको आनन्द देनेवाले, शोक और भयका नाश करनेवाले, सदा क्रोघरहित और नित्य ज्ञानस्वरूप हैं। आपका अवतार श्रेष्ठ, अपार, दिव्य गुणोंवाला, पृथ्वीका भार उतारनेवाला और ज्ञानका समूह है ॥ ३ ॥ अज व्यापकमेकमनादि सदा । करुनाकर रामनमामि मुदा॥ रघुबंस विभूषन दूषन हा । कृत भूप विभीषन दीन रहा ॥ ४ ॥ [किंतु अवतार लेनेपर भी] आप नित्य, अजन्मा, व्यापक, एक (अद्वितीय) और अनादि हैं । हे करुणाकी खान श्रीरामजी ! मैं आपको बड़े ही हर्षके साथ नमस्कार करता हूँ। हे खुकुलके आभूषण ! है दूषण राक्षसको मारनेवाले तथा समस्त दोषोंको इरनेवाले ! विभीषण दीन था, उसे आपने [लकाका ] राजा बना दिया ॥ ४ ॥ गुन ग्याननिधान अमान अजं । नितराम नमामि विभुं विरजं ॥ भुजदंड प्रचंड प्रताप वलं । खल वृंद निकंद महा कुसलं ॥ ५ ॥ हे गुण और ज्ञानके भण्डार ! हे मानरहित ! हे अजन्मा ! व्यापक और मायिक विकासे रहित श्रीराम ! मैं आपको निल्य नमस्कार करता हूँ। आपके भुजदण्डोंका प्रताप और बल प्रचण्ड है । दुष्टसमूहके नाश करने में आप परम निपुण हैं ॥५॥ विनु कारन दीन दयाल हितं । छविधामनमामि रमासहितं ॥ भव तारन कारन काज परं । मन संभव दारुन दोष हरं ॥ ६॥ हे बिना ही कारण दीनोंपर दया तथा उनका हित करनेवाले और शोभाके धाम! मैं श्रीजानकीजीसहित आपको नमस्कार करता हूँ। आप भवसागरसे तारनेवाले हैं, कारण- रूमा प्रकृति और कार्यरूप जगत् दोनोंसे परे है और मनसे उत्पन्न होनेवाले कठिन दोषों- को हरनेवाले हैं ।। ६ ॥ सर चाप मनोहर धोन धरं । जलजारुन लोचन भूपवरं। सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं । मद मार मुधा ममता समनं ॥ ७ ॥ आप मनोहर वाण, धनुप और तरकस धारण करनेवाले हैं। [ लाल ] कमलके * लंकाकाण्ड* ८५३ समान रक्तवर्ण आपके नेत्र हैं। आप राजाओं में श्रेष्ठ, सुखके मन्दिर, सुन्दर, श्री (लक्ष्मी- जी) के वल्लभ तथा मद (अहंकार), काम और झूठी ममताके नाश करनेवाले हैं ॥७॥ अनवद्य अखंड न गोचर गो । सवरूप सदा सव होइन गो॥ इति वेद वदति न दंतकथा । रवि आतप भिन्नमभिन्न जथा ॥ ८॥ आप अनिन्द्य या दोषरहित हैं, अखण्ड है, इन्द्रियोंके विषय नहीं हैं । सदा सर्व- रूप होते हुए भी आप वह सब कभी हुए ही नहीं, ऐसा वेद कहते हैं । यह [ कोई ] दन्तकथा ( कोरी कल्पना) नहीं है । जैसे सूर्य और सूर्यका प्रकाश अलग-अलग हैं और मग नहीं भी है, वैसे ही आप भी संसारसे भिन्न तथा अभिन्न दोनों ही हैं ॥ ८ ॥ कृतकृत्य विभो सब बानर ए । निरखंति तवानन सादर ए॥ धिग जीवन देव सरीर हरे । तव भक्ति विनाभव भूलि परे ॥ ९ ॥ हे व्यापक प्रभो। ये सब वानर कृतार्थरूप हैं, जो आदरपूर्वक ये आपका मुख देख रहे हैं।[और ] हे हरे ! हमारे [ अमर ] जीवन और देव (दिव्य ) शरीरको धिकार है, ओ हम आपकी भक्तिसे रहित हुए संसारमें (सांसारिक विषयोंमें ) भूले पड़े हैं ॥९॥ अब दीनदयाल दया करिऐ । मति मोरि विभेदकरी हरिणे ॥ जेहि ते विपरीत क्रिया करिऐ । दुख सोसुखमानिसुखीचरिऐ॥१०॥ हे दीनदयाल ! अब दया कीजिये और मेरी उस विभेद उत्पन्न करनेवाली बुद्धिको हर लीजिये, जिससे मैं विपरीत कर्म करता हूँ और जो दुःख है, उसे सुख मानकर आनन्दसे विचरता हूँ ॥ १० ॥ खल खंडन मंडन रम्य छमा । पद पंकज सेवित संभु उमा ॥ नृप नायक दे वरदानमिदं । चरनांबुज प्रेम सदा सुभदं ॥११॥ आप दुष्टोंका खण्डन करनेवाले और पृथ्वीके रमणीय आभूषण हैं । आपके चरण- कमल श्रीशिव-पार्वतीद्वारा सेवित है ? हे राजाओंके महाराज ! मुझे यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलोंमें सदा मेरा कल्याणदायक [अनन्य ] प्रेम हो ॥ ११ ॥ दो--विनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात । सोभासिंधु विलोकत लोचन नहीं लोचन नहीं अघात ॥१११ ॥ इस प्रकार ब्रह्माजीने अत्यन्त प्रेम-पुलकित शरीरसे विनती की । शोभाके समुद्र श्रीरामजीके दर्शन करते-करते उनके नेत्र तृप्त ही नहीं होते थे ॥ १११॥ चौ-तेहि अवसर दसरथ तहँ आए । तनय विलोकि नयन जल छाए । अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा । आसिरवाद पिता तब दीन्हा ॥ १ ॥ उसी समय दशरथजी वहाँ आये । पुत्र (श्रीरामजी) को देखकर उनके नेत्रोंमें
* रामचरितमानस
[प्रेमाश्रुओंका ] जल छा गया। छोटे भाई लक्ष्मगजीसहित प्रभुने उनकी वन्दना की और
तब पिताने उनको आशीर्वाद दिया ।। १॥
तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ । जीत्या अजय निसाचर राऊ।
सुनि सुत वचन प्रीति अति चाही । नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी ॥ २ ॥
[ श्रीरामजीने कहा- है तात ! यह सब आपके पुण्यों का प्रभाव है, जो मैंने
अजेय राक्षसराजको जीत लिया। पुत्रके वचन सुनकर उनकी प्रीति अत्यन्त बढ़ गयी।
नेत्रोंमें जल छा गया और रोमावली खड़ी हो गयी ॥२॥
रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना । चितइ पितहि दीन्हेउ बढ़ ग्याना॥
ताते उमा मोच्छ नहिं पायो । दसरथ भेद भगति मन लायो ॥ ३ ॥
श्रीरघुनाथजीने पहलेके ( जीवित-कालके) प्रेमको विचारकर, पिताकी ओर देखकर
ही उन्हें अपने स्वरूपका दृढ़ ज्ञान करा दिया । हे उमा ! दशरथजीने भेदभक्तिमें अपना
मन लगाया था, इसीसे उन्होंने [ कैवल्य ] मोक्ष नहीं पाया ॥ ३ ॥
सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं । तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥
बार बार करि प्रभुहि प्रनामा । दसरथ हरषि गए सुरधामा ॥ ४ ॥
[मायारहित सच्चिदानन्दमय स्वरूपभूत दिव्यगुणयुक्त ] सगुणस्वरूपकी उपासना
करनेवाले भक्त इस प्रकारका मोक्ष लेते भी नहीं । उनको श्रीरामजी अपनी भक्ति
देते हैं। प्रभुको [ इष्टबुद्धिसे ] बार-बार प्रणाम करके दशरथजी हर्षित होकर
देवलोकको चले गये ॥४॥
दो-अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस ।
सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस ॥ ११२ ॥
छोटे भाई लक्ष्मणजी और जानकीजीसहित परम कुशल प्रभु श्रीकोसलाधीशकी
शोभा देखकर देवराज इन्द्र मनमें हर्पित होकर स्तुति करने लगे.--॥ ११२ ।।
छं०-जय राम सोभा धाम । दायक प्रनत विश्राम।।
धृत बोन वर सर चाप । भुजदंड प्रवल प्रताप ॥ १ ॥
शोभाके धाम, शरणागतको विश्राम देनेवाले, श्रेष्ठ तरकस, धनुष और वाण धारण
किये हुए, प्रबल प्रतापी भुनदण्डोवाले श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो ! ॥१॥
जय दूधनारि खरारि । मर्दन
खरारि । मर्दन निसाचर धारि॥
यह दुष्ट मारेउ नाथ । भए देव सकल सनाथ ॥ २ ॥
हे खर और दूपणके शत्रु और राक्षसोंकी सेनाके मर्दन करनेवाले ! आपकी जय
हो । हे नाथ ! आपने इस दुष्टको मारा, जिससे सब देवता सनाथ ( सुरक्षित)
हो गये ॥२॥
*लंकाकाण्ड ८५५ जय हरन धरनी भार । महिमा उदार अपार॥ रायनारि कपाल । किए जातुधान विहाल ॥ ३ ॥ है भूमिका भार हरनेवाले ! हे अपार श्रेष्ठ महिमावाले! आपको जय हो । हे रावणके शत्रु ! है कृपालु ! आपकी जय हो। आपने राक्षसोंको बेहाल (तहस-नहत ) कर दिया ॥३॥ लंकेस अति वल गर्व । किए बस्य सुर गंधर्व ॥ मुनि सिद्ध नर खग नाग । हठि पंथ सब के लाग ॥ ४ ॥ लंकापति रावणको अपने बलका बहुत घमंड था। उसने देवता और गन्धर्व सभीको अपने वशमें कर लिया था और वह मुनि, सिद्ध, मनुष्य, पक्षी और नाग आदि सभीके हठपूर्वक ( हाथ धोकर ) पीछे पड़ गया था ॥ ४ ॥ परद्रोह रत रत अति दुष्ट । पायो सो फलु पापिष्ट ॥ अव सुनहु दीन दयाल । राजीव नयन विसाल ॥ ५॥ वह दूसरोंसे द्रोह करनेमें तत्पर और अत्यन्त दुष्ट था । उस पापीने वैसा ही फल पाया। अब हे दीनोंपर दया करनेवाले ! हे कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले ! सुनिये ॥५॥ मोहि रहा अति अभिमान । नहिं कोउ मोहि समान ॥ अव देखि प्रभु पद कंज । गत मान प्रद दुख पुंज ॥ ६ ॥ मुझे अत्यन्त अभिमान था कि मेरे समान कोई नहीं है, पर अब प्रभु (आप) के चरणकमलोंके दर्शन करनेसे दुःख-समूहका देनेवाला मेरा वह अभिमान जाता रहा ॥६॥ कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव । अव्यक्त जेहि श्रुति गाव ॥ मोहि भाव कोसल भूप । श्रीराम सगुन सरूप ॥ ७ ॥ कोई उन निर्गुण ब्रह्मका ध्यान करते हैं, जिन्हें वेद अव्यक्त ( निराकार) कहते हैं। परंतु हे रामजी ! मुझे तो आपका यह सगुण कोसलराज-स्वरूप ही प्रिय लगता है ॥७॥ वैदेहि अनुज समेत । मम हृदय : करहु निकेत ॥ मोहि जानिऐ निज दास ।दे भक्ति रमानिवास ॥ ८॥ श्रीजानकीजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित मेरे हृदयमें अपना घर बनाइये। हे रमानिवास ! मुझे अपना दास समझिये और अपनी भक्ति दीजिये ॥८॥ छं०-दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं । सुख धाम राम नमामि काम अनेक छवि रघुनायकं ॥
* रामचरितमानस सुर बूंद रंजन बंद भंजन मनुज तनु अतुलितबलं । ब्रह्मादि संकर सेव्य राम नमामि करुना कोमलं ॥ है रमानिवास ! हे शरणागतके भयको हरनेवाले और उसे सब प्रकारका सुख देनेवाले ! मुझे अपनी भक्ति दीजिये । हे सुखके धाम ! हे अनेकों कामदेवोंकी छबिवाले खुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे देवसमूहको आनन्द देनेवाले, [जन्म-मृत्यु, हर्ष-विषाद, सुख-दुःख आदि ] द्वन्द्वोंके नाश करनेवाले, मनुष्यशरीरधारी, अतुलनीय बलवाले, ब्रह्मा और शिव आदिसे सेवनीय, करुणासे कोमल श्रीरामजी ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। दो-अब करि कृपा विलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल । काह करौं सुनि प्रिय वचन बोले दीनदयाल ॥ ११३ ॥ हे कृपालु ! अब मेरी ओर कृपा करके ( कृपादृष्टिसे ) देखकर आशा दीजिये कि मैं स्या[सेवा] करूँ ? इन्द्रके ये प्रिय वचन सुनकर दीनदयालु श्रीरामजी बोले-॥११३॥ चौ०-सुनु सुरपति कपि भालु हमारे। परे भूमि निसिचरन्हि जे मारे ॥ मम हित लागि तजे इन्ह पाना । सकल जिआउ सुरेस सुजाना ॥ १ ॥ हे देवराज ! सुनो, हमारे वानर-भालू, जिन्हें निशाचरोंने मार डाला है, पृथ्वीपर पड़े हैं । इन्होंने मेरे हितके लिये अपना प्राण त्याग दिये । हे सुजान देवराज ! इन सबको जिला दो ॥१॥ सुनु खगेस प्रभु के यह बानी। अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी ॥ प्रभु सफ त्रिभुअन मारि जिआई। केवल सक्रहि दीन्हि · बड़ाई ॥ २ ॥ [काकभुशुण्डिजी कहते हैं-] हे गरुड़ ! सुनिये, प्रभुके ये वचन अत्यन्त गहन (गूढ़) हैं। ज्ञानी मुनि ही इन्हें जान सकते हैं। प्रभु श्रीरामजी त्रिलोकीको मारकर जिला सकते हैं । यहाँ तो उन्होंने केवल इन्द्रको बड़ाई दी है ॥२॥ सुधा बरषि कपि भाल जिनाए । हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए ॥ सुधावृष्टि भै दुहु दल ऊपर । जिए भालु कपि नहिं रजनीचर. ॥ ३ ॥ इन्द्रने अमृत बरसाकर वानर-भालुओंको जिला दिया । सब हर्षित होकर उठे और प्रभुके पास आये । अमृतकी वर्षा दोनों ही दलोंपर हुई । पर रीछ-वानर ही जीवित हुए, राक्षस नहीं। ॥३॥ रामाकार भए तिन्ह के मन । मुक्त भए छुटे भव बंधन ॥ सुर अंसिक सब कपि अरु रीछा । लिए सफल रघुपति की ईछा ॥ ४ ॥ क्योंकि राक्षसोंके मन तो मरते समय रामाकार हो गये थे। अतः वे मुक्त हो गये, .
* लंकाकाण्ड * ८५७ उनके भव-वन्धन टूट गये ! किंतु वानर और भालू तो सब देवांश (भगवान्की गला परिफर) थे। इसलिये वे सब श्रीरघुनाथजीकी इच्छासे जीवित हो गये ॥४॥ राम सरिस को दीन हितकारी । कीन्हे मुकुत निसाधर झारी॥ साल मल धाम काम रत रावन । गति पाई जो मुनियर पाव न ॥ ५ ॥ श्रीरामचन्द्रजीके समान दीनोंका हित करनेवाला कौन है ? जिन्होंने सारे रातोंको मुक्त कर दिया । दुष्ट, पापोंके घर और कामी रावणने भी वह गति पायी, जिसे भेष्ठ मुनि भी नहीं पाते ॥ ५ ॥ दो०-सुमन यरपि सप सुर चले चढ़ि चढ़ि रुचिर विमान | देखि सुअवसर प्रभु पहिं आयउ संभु सुजान ॥११४(क)। फूलोंकी वर्षा करके सब देवता सुन्दर विमानोंपर चढ़-चढ़कर चले। तब सुअवसर मानकर सुजान शिवजी प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके पास आये-॥ ११४ (क) ।। परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि वारि। पुलकित तन गदगद गिरौं विनय करत त्रिपुरारि ॥११४(ख)। और परम प्रेमसे दोनों हाथ जोड़कर, कमलके समान नेत्रोंमें जल भरकर पुलकित- शरीर और गद्गद वाणीसे निपुरारि शिवजी विनती करने लगे-॥ ११४ (ख)। 5.-मामभिरक्षय रघुकुल नायक । धृत वर चाप रुचिर कर सायक॥ मोह महा घन पटल प्रभंजन । संसय विपिन अनल सुर रंजन ॥१॥ हे रघुकुलके स्वामी ! सुन्दर हाथोंमें श्रेष्ठ धनुप और सुन्दर बाण धारण किये हुए आप मेरी रक्षा कीजिये । आप महामोहरूपी मेघसमूहके [ उड़ानेके लिये प्रचण्ड पवन है, संशयरूपी वनके [ भस्म करनेके ] लिये अग्नि हैं और देवताओंको आनन्द देनेवाले हैं ॥१॥ अगुनसगुन गुन मंदिर सुंदर । भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर ॥ काम क्रोध मद गज पंचानन । बसहु निरंतर जन मन कानन ॥२॥ आप निर्गुण, सगुण, दिव्य गुणोंके धाम और परम सुन्दर हैं । भ्रमरूपी अन्ध- कारके [ नाशके ] लिये प्रबल प्रतापी सूर्य हैं । काम, क्रोध और मदरूपी हाथियोंके [वध- के लिये सिंहके समान आप इस सेवकके मनरूपी वनमें निरन्तर निवास कीजिये ॥२॥ विपय मनोरथ पुंज कंज बन । प्रथल तुपार उदार पार मन ॥ भव चारिधि मंदर परमं दर । वारय तारय संसृति दुस्तर ॥३॥ विषयकामनाकि समूहरूपी कमलवनके [ नाशके लिये आप प्रवल पाला है, आप उदार और मनसे परे हैं । भवसागर [ को मथने] के लिये आप मन्दराचल । * रामचरितमानस * पर्वत हैं। आप हमारे परम भयको दूर कीजिय और हमें दुस्तर संसारसागरते पार कोचिये। स्याम गात राजीव विलोचन । दीन बंधु प्रनतारति मोचन ॥ अनुज जानकी सहित निरंतर । बसहु राम नृप मम उर अंतर ॥४॥ सुनि रंजन महि मंडल मंडन । तुलसिदासप्रसुत्रासविखंडन ॥ ५ ॥ हे श्यामसुन्दर-शरीर ! हे कमलनयन ! हे दीनबन्धु ! हे शरणागतको दुःखसे छुड़ानेवाले ! हे राजा रामचन्द्रली ! आप छोटे भाई लक्ष्मग और जानकीजीसहित निरन्तर मेरे हृदयके अंदर निवास कीजिये । आप मुनियोंको आनन्द देनेवाले, पृथ्वीमण्डलके भूषण, तुलसीदासके प्रभु और भयका नाश करनेवाले हैं ॥ ४-५ ॥ दो-नाथ जवहिं कोसलपुरी होइहि तिलक तुम्हार । कृपासिंधु मैं आउव देखन चरित उदार ॥ ११५ ॥ हे नाथ ! जब अयोध्यापुरीमें आपका राजतिलक होगा, तब हे कृपासागर ! मैं आपकी उदार लीला देखने आऊँगा ।। ११५ ॥ चौ०-करि दिनती जब संभु सिधाए । तब प्रभु निकट विभीषनुमाए । नाइ चरन सिरु कह मृदु वानी। बिनय सुनहु प्रभु सारंगपानी ॥ १ ॥ जब शिवजी विनती करके चले गये, तब विभीषणजी प्रभुके पास आये और चरणोंमें सिर नवाकर कोमल वाणीसे बोले-हे शाधिनुपके धारण करनेवाले प्रभो ! मेरी विनती सुनिये-1 १ ॥ सकुल सदल प्रभु रावन मारयो । पावन जल त्रिभुवन विस्तारयो । दीन मलीन हीन मति जाती । मो पर कृपा कोन्हि बहु भाँती ॥ २ ॥ आपने कुल और सेनासहित रावणका वध किया, त्रिभुवनमें अपना पवित्र यश फैलाया और मुझ दीन, पापी, बुद्धिहीन और जातिहीनपर बहुत प्रकारसे कृपा की ॥२॥ अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे । मजनु करिम समर श्रम छीजे ॥ देखि फोस मंदिर संपदा । देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा ॥ ३ ॥ अब हे प्रभु! इस दासके घरको पवित्र कीजिये और वहाँ चलकर त्नान कीजिये, जिससे युद्धकी थकावट दूर हो जाय । हे कृपालु ! खजाना, महल और सम्पत्तिका निरीक्षणकर प्रसन्नतापूर्वक वानरोंको दीजिये ॥३॥ सब विधि नाथ मोहि अपनाइभ । पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइ। सुनत वचन सुदु दीनदयाला । सजल भए' द्वौ नयन विसाला ॥ ४ ॥ हे नाथ ! मुझे सब प्रकारसे अपना लीजिये और फिर हे प्रभो ! मुझे साथ लेकर अयोध्यापुरीको पधारिये । विभीषणजीके कोमल वचन सुनते ही दीनदयालु प्रभुके दोनों
* लंकाकाण्ड
विशाल नाम [प्रेमाला जल भर आया ॥ ४ ॥
दो-तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचा सुगु भान ।
भरत दमा सुमिरत मोहि निमिप पाल्प लम जात ॥११६(क)।
[श्रीरामगीन कहा-- माई ! नुनो, तुम्हारा खजाना और घर सब मेरा ही
६, यह बात सन है । पर भरतकी दशा याद करके मुझे एक-एक पल कल्पके समान
बीत रहा ॥ ११६ (क) ॥
तापस वेप गात कस जपत निरंतर मोहि।
देखों वेगि सो जतनु कर सखा निहोरउँ नोहि ॥११६(ख)॥
तपस्वीके वेपमें कृश (दुबले) शरीरसे निरन्तर मेरा नाम-जप कर रहे हैं। हे
सखा ! वही उपाय करो, जिससे मैं जल्दी-से-जल्दी उन्हें देख सकें। मैं तुमसे निहोरा
( अनुरोध ) करता हूँ ॥ ११६ (ख) ॥
बीते अवधि जाउँ जौ जित न पावउँ वीर।
सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर ॥११६(ग)।
यदि अवधि बीत जानेपर जाता हूँ तो भाईको जीता न पाऊँगा । छोटे भाई
भरतजीकी प्रीतिका स्मरण करके प्रभुका शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है ॥ ११६ (ग)।
करेड कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहि।
पुनि मम धाम पाइहह जहाँ संत सब जाहि ॥११६(घ)।
[श्रीरामजीने फिर कहा-] हे विभीपण ! तुम कल्पभर राज्य करना, मनमें
मेरा निरन्तर सरण करते रहना । फिर तुम मेरे उस धामको पा जाओगे, जहाँ सब
संत जाते हैं ॥ ११६ (घ)।
चौ०-सुनत विभीषन बचन राम के। हरपि गहे पद कृपाधाम के ॥
वानर भालु सफल हरपाने । गहि प्रभु पद गुन विमल बखाने ॥ १ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके वचन सुनते ही विभीषणजीने हर्पित होकर कृपाके घाम
श्रीरामजीक चरण पकड़ लिये । सभी वानर-भालू हर्पित हो गये और प्रभुके चरण पकड़कर
उनके निर्मल गुणोंका बखान करने लगे ॥ १ ॥
बहुरि विभीषन भवन सिधायो । मनि गन क्सन बिमान भरायो ।
लै पुष्पफ प्रभु आगें राखा । हसि फरि कृपासिंधु तब भापा ॥ २ ॥
फिर विभीषणजी महलको गये और उन्होंने मणियों के समूहों ( रत्नों) से और
वस्त्रोंसे विमानको भर लिया। फिर उस पुष्पकविमानको लाकर प्रभुके सामने रक्खा । तब
कृपासागर श्रीरामजीने हँसकर कहा--॥२॥
- ८६० * रामचरितमानस * चढ़ि विमान सुनु सखा विभीषन । गगन जाइ बरयहु पट भूपन ।। नभ पर जाइ बिभीषन तवही । वरपि दिए मनि अंबर सयही ॥ ३ ॥ है सखा विभीषण ! सुनो, विमानपर चढ़कर, आकाशमें जाकर वस्त्रों और गहनोंको बरसा दो। तब (आज्ञा सुनते) ही विभीपणजीने आकाशमें जाकर सब मणियों और वस्त्रोंको बरसा दिया ॥३॥ जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेही । मनि मुख मेलि डारि ऋपि देहीं । हसे रामु श्री अनुज समेता । परम फौतुकी कृपा निकेता ॥ ४ ॥ जिसके मनको जो अच्छा लगता है, वह वही ले लेता है। मणियोंको मुँहमें लेकर वानर फिर उन्हें खानेकी चीज न समझकर उगल देते है। यह तमाशा देखकर परम विनोदी और कृपाके धाम श्रीरामजी सीताजी और लक्ष्मणजीसहित हँसने लगे ॥४॥ दो-मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह वेद । कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक विनोद ॥११७(क)। जिनको मुनि ध्यानमें भी नहीं पाते, जिन्हें वेद 'नेति-नेति' कहते हैं, वे ही कृपाके समुद्र श्रीरामजी वानरोंके साथ अनेकों प्रकारके विनोद कर रहे हैं ॥ ११७ (क)॥ उमा जोग जप दान तप नाना मख व्रत नेम। राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम ॥११७(ख)॥ [ शिवजी कहते हैं-] हे उमा ! अनेकों प्रकारके योग, जप, दान, तप, यज्ञ, प्रत और नियम करनेपर भी श्रीरामचन्द्रजी वैसी कृपा नहीं करते, जैसी अनन्य प्रेम होनेपर करते हैं ।। ११७ (ख)॥ चौ०-भालु कपिन्ह पट भूषन पाए । पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए ॥ नाना जिनस देखि सब कोसा । पुनि पुनि हँसत झोसलाधीसा ॥ १ ॥ भालुओं और वानरोंने कपड़े-गहने पाये और उन्हें पहन-पहनकर वे श्रीरघुनाथजीके पास आये। अनेकों जातियोंके वानरोंको देखकर कोसलपति श्रीरामजी बार-बार हँस रहे हैं ।।१।। चितइ सबन्हि पर कीन्ही दाया । बोले मृदुल बचन रघुराया । तुम्हरें बल मैं रावनु मारयो । तिलक विभीपन कह पुनि सारयो॥ २ ॥ श्रीरघुनाथजीने कृपादृष्टिसे देखकर सबपर दया की । फिर वे कोमल वचन बोले-हे भाइयो । तुम्हारे ही वलसे मैंने रावणको मारा और फिर विभीषणका राजतिलक किया ॥ २ ॥ निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू । सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि शाहू ॥ सुनत बचन प्रेमाकुल वानर । जोरि पानि बोले सब सादर ॥ ३ ॥ ।
* लंकाकाण्ड *
अब तुम सब अपने अपने घर जाओ । मेरा मरण करते रहना और किसीसे
डरना नहीं। ये वचन सुनते ही सब वानर प्रेममै विठ्ठल होकर हाथ जोड़कर आदर-
पूर्वक बोले-॥३॥
प्रभु जोइ कहहु तुम्हहि सब सोहा । हमरें होत वचन सुनि मोहा ॥
दीन जानि कपि किए समाथा । तुम्ह त्रैलोक ईस रघुनाथा ॥ ४ ॥
प्रभो! आप जो कुछ भी कहें, आपको सब सोहता है। पर आपके वचन सुनकर
इमको मोह होता है। हे रघुनाथजी ! आप तीनों लोकोंके ईश्वर है । हम वानरोंको दीन
जानकर ही आपने सनाथ ( कृतार्थ ) किया है ॥ ४ ॥
सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं । मसक कहूँ खगपति हित करहीं।
देखि गम ल्ख बानर रीछा । प्रेम मगन नहिं गृह के ईछा ॥ ५ ॥
प्रभुके [ ऐसे ] पचन सुनकर हम लाजके मारे मरे जा रहे हैं । कहीं मच्छर भी
गरुड़का हित कर सकते हैं? ओरामजीका रुख देखकर रीछ-वानर प्रेममें मग्न हो गये।
उनकी धर जानेकी इच्छा नहीं है ।। ५ ॥
दो०-प्रभु प्रेरित कपि भालु सय राम रूप उर राखि ।
हरप विपाद सहित चले विनय विविध विधि भापि ॥११८(क)।
परंतु प्रभुकी प्रेरणा (आशा) से सब वानर-भालू श्रीरामजीके रूपको हृदयमें
रखकर और अनेकों प्रकारसे विनती करके हर्ष और विपादसहित घरको चले ॥ ११८(क)।
कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान ।
सहित विभीपन अपर जे जूथप कपि बलवान ॥१९८(ख)।
वानरराज सुग्रीव, नील, भृक्षराज जाम्यवान्, अंगद, नल और हनुमान् तथा
'विभीषणसहित और जो बलवान् वानर सेनापति हैं, ॥ ११८ (ख) ॥
कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरिलोचन वारि।
सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि ॥१२(ग)
वे कुछ नहीं कह सकते प्रेमवश नेत्रोंमें जल भर-भरकर, नेत्रोंका पलक मारना
छोड़कर (टकटकी लगाये) सम्मुख होकर श्रीरामजीकी ओर देख रहे हैं ।। ११८(ग)।
चौ०-अतिसय प्रोति देखि रधुराई । लीन्हे सफल विमान चढ़ाई ॥
मन महुँ वित्र चरन सिरु नायो । उत्तर दिसिहि विमान पलायो ॥ १ ॥
श्रीरघुनाथजीने उनका अतिशय प्रेम देखकर सबको विमानपर चढ़ा लिया।
तदनन्तर मन-ही-मन विप्र-चरणोंमें सिर नवाकर उत्तर दिशाकी ओर विमान चलाया ॥१॥
चलत विमान फोलाहल होई। जय रघुवीर कहइ मनु कोई ॥
सिंहासन अति उच्च मनोहर । श्री समेत प्रभु बैठे ता पर ॥ २ ॥
८६२ * रामचरितमानस * विमानके चलते समय बड़ा शोर हो रहा है । सब कोई श्रीरघुवीरकी जय कह रहे हैं । विमानमें एक अत्यन्त ऊँचा मनोहर सिंहासन है। उसपर सीताजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी विराजमान हो गये ॥२॥ राजत रामु सहित भामिनी । मेरु संग जनु धन दामिनी । रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर । कीन्ही सुमन वृष्टि हरपे सुर ॥ ३ ॥ पत्नीसहित श्रीरामजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो सुमेरुके शिखरपर विजली-- सहित श्याम मेघ हो । सुन्दर विमान बड़ी शीघताते चला । देवता हर्पित और उन्होंने फूलोंकी वर्षा की ॥ ३ ॥ परम सुखद चलि विविध क्यारी । सागर सर सरि निर्मल बारी ॥ सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा । मन प्रसन्न निर्मल नभ भासा ॥ ४ ॥ अत्यन्त सुख देनेवाली तीन प्रकारकी (शीतल, मन्द, सुगन्धित ) वायु चलने कमी । समुद्र, तालाव और नदियोंका जल निर्मल हो गया। चारों ओर सुन्दर शकुन होने लगे। सबके मन प्रसन्न हैं, आकाश और दिशाएँ निर्मल हैं ॥ ४ ॥ कह रघुबीर देखु रन सीता । लछिमन इहाँ हत्यो इंद्रजीता ॥ हनूमान अंगद के मारे । रन महि परे निसाचर भारे ॥ ५ ॥ श्रीरघुवीरने कहा-हे तीते ! रणभूमि देखो । लक्ष्मणने यहाँ इन्द्रको जीतनेवाले मेघनादको मारा था । हनुमान् और अंगदके मारे हुए ये भारी-भारी निशाचर' रणभूमिमें पड़े हैं ॥ ५॥ कुंभकरन रावन द्वौ भाई । इहाँ हते सुर मुनि दुखदाई ॥ ६ ॥ देवताओं और मुनियोंको दुःख देनेवाले कुम्भकर्ण और रावण दोनों भाई यहाँ मारे गये। दो०- इहाँ सेतु वाँध्यों अरु थापेउँ सिव सुखधाम । सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम ॥११९(क)। मैंने यहाँ पुल बाँवा (बँधवाया) और सुखधाम श्रीशिवजीकी स्थापना की । तदनन्तर कृपानिधान श्रीरामजीने सीताजीसहित श्रीरामेश्वर महादेवको प्रणाम किया ॥११९ (क) जहँ जहँ कृपासिंधु वन कीन्ह वास विश्राम । सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम ॥११९(ख)। बनमें जहाँ-जहाँ करुणासागर श्रीरामचन्द्रजीने निवास और विश्राम किया थाके सब स्थान प्रभुने जानकीजीको दिखलाये और सबके नाम बतलाये ।। ११९ (ख)॥ चौ०-तुरत विमान तहाँ चलि आवा । दंडक बन जह परम सुहावा ।। कुंभजादि मुनिनायक नाना । गए रामु सब के अस्थाना ॥ १ ॥ '.
* लंकाकाण्ड विमान शीर ही वा चला आया जहाँ परम सुन्दर दण्डकवन था और अगस्त्य आदि बहुत-से मुनिराज रहते थे। श्रीरामजी इन सबके स्थानों में गये ॥१॥ सफल रिपिन्ह सन पाई असीसा | चित्रकूट आए जगदीसा ।। तह करि मुनिन्ह कैर संतोषा | चला बिमानु तहाँ ते चोखा ॥ २ ॥ सम्पूर्ण ऋषियोंसे आशीर्वाद पाकर जगदीश्वर श्रीरामजी चित्रकूट आये । वहाँ मुनियोंको संतुष्ट किया 1 [ फिर ] विमान वहाँसे आगे तेजीके साथ चला ॥२॥ पहुरि राम जानहिहि देखाई । जमुना कलि मल हरनि सुहाई पुनि देखी सुरसरी पुनीता । राम कहा प्रनाम कर सीता ॥ ३ ॥ फिर श्रीरामजीने जानकीजीको कलियुगके पापोंका हरण करनेवाली सुहावनी यमुनाजीके दर्शन कराये । फिर पवित्र गङ्गाजीके दर्शन किये । श्रीरामजीने कहा-हे. सीते! इन्हें प्रणाम करो ॥ ३ ॥ तीरथपति पुनि देखु प्रयागा । निरखत जन्म कोटि भघ भागा ॥ देख परम पावनि पुनि बेनी । हरनि सोक हरि लोक निसेनी ॥ ४ ॥ पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि । त्रिविध ताप भव रोग नसावनि ॥ ५ ॥ फिर तीर्थराज प्रयागको देखो, जिसके दर्शनसे ही करोड़ों जन्मोंके पाप भाग जाते. हैं। फिर परम पवित्र त्रिवेणीजीके दर्शन करो, जो शोकोंको हरनेवाली और श्रीहरिके परम घाम [ पहुँचने ] के लिये सीढ़ीके समान है। फिर अत्यन्त पवित्र अयोध्यापुरीके दर्शन करो, जो तीनों प्रकारके तापों और भव (आवागमनरूपी) रोगका नाश करनेवाली है ।। ४-५ ।। दो०-सीता सहित अवध कहुँ कीन्ह कृपाल प्रनाम । सजल नयन तन पुलकित पुनि पुनि हरषित राम ॥१२०(क)॥. यों कहकर कृपालु श्रीरामजीने सीताजीसहित अवधपुरीको प्रणाम किया । सजल. नेत्र और पुलकितशरीर होकर श्रीरामजी बार-बार हर्षित हो रहे हैं ॥ १२० (क) || पुनि प्रभु आइ त्रिबेनी हरपित मजनु कीन्ह । कपिन्ह सहित विप्रन्ह कहुँ दान विविध विधि दीन्ह ॥१२०(ख) फिर त्रिवेणी में आकर प्रभुने हर्पित होकर स्नान किया और वानरोंसहित ब्राह्मणोंको भनेकों प्रकारके दान दिये ।। १२० (ख)॥ चौ०-प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई । धरि बटु रूप अवधपुर जाई । भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु । समाचार तुम्ह आएहु ॥ १ ॥ तदनन्तर प्रभुने हनुमान्जीको समझाकर कहा-तुम ब्रह्मचारीका रूप धरकर अवधपुरीको जाओ! भरतको हमारी कुशल मुनानाऔर उनका समाचार लेकर चले आना ॥
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* लंकाकाण्ड * लगा लिया और अत्यन्त निकट बैठाकर कुशल पूछी । वह विनती करने लगा-आपके जो चरणकमल ब्रह्माजी और शंकरजीसे सेवित हैं, उनके दर्शन करके मैं अब सकुशल हूँ । हे सुखधाम ! हे पूर्णकाम श्रीरामजी ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ, नमस्कार करता हूँ ॥ १॥ सव भाँति अधम निपाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो । मतिमंद तुलसीदास सो प्रभु मोह बस विसराइयो । यह रावनारि चरित्र पावन राम पद रतिप्रद सदा। कामादिहर विग्यानकर सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा ॥ २ ॥ सब प्रकारसे नीच उस निपादको भगवान्ने भरतजीकी भाँति हृदयसे लगा लिया । तुलसीदासजो कहने -स मन्दबुद्धिने ( मैंने ) मोहवश उस प्रभुको भुल । दिया। रावणके शत्रुका य: पवित्र करनेवाला चरित्र सदा ही श्रीरामजीके चरणों में प्रीति उत्पन्न करनेवाला है। यह कामादि विकारोंका हरनेवाला और [ भगवान्के स्वरूपका ] विशेष शान उत्पन्न करनेवाला है । देवता, सिद्ध और मुनि आनन्दित होकर इसे गाते हैं ॥२॥ दो०-समर विजय रघुवीर के चरित जे सुनहि सुजान । विजय वियेक विभूति नित तिन्हहि देहि भगवाल ॥१२१(क)। जो सुजान लोग औरघुवोरको समरविजयसम्बन्धी लीलाको सुनते हैं, उसको भगवान् नित्य विजय, विवेक और विभूति ( ऐश्वर्य ) देते है ॥ १२१ (क) || यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु विचार। श्रीरघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार ॥१२१(ख)॥ अरे मन ! विचार करके देख ! यह कलिकाल पापोंका घर है। इसमें श्रीरघुनाथ- जीके नामको छोड़कर [ पापोंसे बचनेके लिये ] दूसरा कोई आधार नहीं है ॥ १२१ (ख)॥ मासपारायण, सत्ताईसवाँ विश्राम इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने षष्ठः सोपान समासही कलियुगके समस्त पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसमा यह छठा सोपान समाप्त हुआ ( लंकाकाण्ड समाप्त) ongsNut- रा० स०५५- …
सुरेश जन्मार जैन विषय-सूची Paga Suresh Kumar Jain Vigo परिमाया पाटियों व परिवर्तन तालिका से ix रेखागणित के कुछ पारिभाषिक शब्दों का अंग्रेजी अनुवाद x से xi संकेत एवं संक्षेप xii अध्याय 1-नवीन दशमलव मुन्ना-प्रणाली और मेट्रिक तौल माप 1-29 अध्याय -सरल समीकरण 24-98 अध्याय 3-सरल समीकरण सम्बन्धी प्रश्न 34-38 अध्याय 4-प्रथम धान द्विवर्ण समकालिक समीकरण 39-48 अध्याय 5-प्रथम धात द्विवर्ष समकालिक समीकरण सम्बन्धी प्रश्न 49-53 अध्याय 6-गुणनखण्डों द्वारा वर्गमूल 54-56 अध्याय 7-गुणनखण्डों द्वारा धनमूल 57-8 अध्याय 8-क तेश्य सूत्र और उनका प्रयोग 59-75 अध्याय 9-सरल गुणनखण्ड:- 76-96 KA+ KB+KO की जाति के गुणन- खएड (75) KA + KB+ RA+ RB की जाति के गुणनखंड (77),A' +2AB + B की जाति के गुणनखण्डं (79), A-B के जाति के गुणनखण्ड़ (88) . (2) . xe+PX+Qकी जाति के त्रिपदीय समूहों को गुणनखण्डों में परिणत करना (88), PX + Qx+ R की जाति के त्रिपदीय समूहों को गुणनखंडों में परिणत करना (98) अध्याय 10-सूत्रों का सरलीकरण में उपयोग 97-98 अध्याय 11-सरल वर्ग समीकरण 99-102 अध्याय 12-वर्गसमीकरण सम्बन्धी प्रश्न 103-106 जाँच-पत्र (खण्ड क) 107-112. अध्याय 13-वर्गमूल 113-119 .भाग की क्रिया द्वारा वर्गमूल निकालना (113) दशमलव का वर्गमूल ज्ञात करना (116) साधारण भिन्नों का वर्गमूल ज्ञात करना (118) अध्याय 14-अनुपात और समानुपात 120-129 अनुपात (1203, समानुरात (125) अध्याय 15-समय, मजदूरी और काम 130-144 समय और काम पर साधारण उदाहरण (130) समय और काम पर विशेष उदाहरण (137) अध्याय 16-समय और दूरी 145-166 अध्याय 17 औसत (मध्यम मान) 157-166 अध्याय 18 प्रतिशत 166-179 प्रतिशत पर साधारण उदाहरण. (166) प्रतिशत पर कुछ विशेष उदाहरण (174). .
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लियो हृदय लाइ कृपा निधान सुजान रायँ रमापती ।
बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती ॥
अव कुसल पद पंकज विलोकि विरंचि संकर सेव्य जे ।
सुख धाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते ॥
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पता-गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस (गोरखपुर)
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