Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Span Ka Itihaas
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The Hint Historical Primera Sines No 6
॥
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संचिप्त इतिहास-माला संख्या ६
"इतिहास निज अरु अन्य देशन के रचहु ततकाल" (हिन्दी अपील) ।
"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।"
स्पेन का इतिहास *
लेखक
प० चन्द्रमनोहर मिश्र
सम्पादक
पण्डित श्यामविहारी मिश्र एम० ए०
तथा
पण्डित शुकदेवविहारी मिश्र बी० ए०
सहायक सम्पादक
पगिडत सोमेश्वर दत्त शुक्छ बी० ए०
प्रकाशक
इंडियन प्रेस, प्रयाग
सर्वाधिकार रक्षित है]
[मूल्या
Printed and published by Apurrn Krishna Bose,
at the Indian Press, Allahnbnd
All rights reserved
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विषय-सूची
क
पृष्ठ
U
३
विषय
अ सम्पादकीय भूमिका
ई लेपक का वक्तव्य
उ हमारा वक्तव्य
१ भोगोलिक वृचान्त
२ मनुष्य चरित्र एव अन्य बातें
३ प्रारम्भिक इतिहास और रोम का राज्य
३ रोम का अस्त तथा गाथ लोगों का उदय
अरब का आक्रमण तथा ऐतिहासिक वृत्तान्त की कमी
६ गोमेद वश
७ ईसाई मतावलम्बी राजवश
८ मुसल्मानो का अध पतन
। ९ कैस्टाइल के राजा लोग
१० आरागन के राजा लोग
११ फर्जीने ड और इसाबेला
१२ हैप्सबर्ग वश
१३ इग्लैंड से भारी जल-युद्ध
१४ फिलिप तृतीय और चतुर्थ एव चार्ल्स द्वितीय
१५ बूबी वश
६ चार्ल्स तृतीय मोर चार्ल्स चतुर्थ
३०
३२
६७
-
(२)
विषय
पृ
१७ नेपोलियन का आक्रमण और पूरी वश के शेप राजा लोग ७
१८ रानी क्रिश्चीना की अध्यक्षता
१९ स्पेन देश का साहित्य
२० अल्फोंजो त्रयोदश
२१ देश की वर्तमान अवस्था
परिशिष्ट
विशिष्ट नामो की सूची
९६-९॥
सम्पादकीय भूमिका मारा बहुत दिनों से विचार था कि यदि हिन्दी में ह पृथ्वी के सभी मुख्य मुख्य देशो का सक्षिप्त इनि- HTRA हास प्रकाशित हो जाता तो देश का बहुत बड़ा उपकार होता और हिन्दी जाननेवाले महाशयो का दृष्टि क्षेत्र बहुन कुछ विस्तृत हो जाता। अवश्य ही हमारे यहाँ इतिहास का एकदम प्रभाव नहीं है पर इस ओर हमारे लेखकगणों का सदा से बहुत कम ध्यान रहा है, ऐसा मानने में कदाचित कोई भी महाशय विशेष हठ न करेंगे । इसका फल यह दुमा कि केवल सस्कृत एवं हिन्दी जाननेवाले अपने देश का भी वृत्तान्त बहुत ही कम जान सकते हैं और पृथ्वी के अन्य प्रभावशाली देशों के हाल जानने से वे नितान्त वंचित रह जाते है यहाँ तक कि अधिकाश लोगों को ऐसे देशों के नाम तक नहीं ज्ञात होते ! यह दशा कैसी शोचनीय है सो लिखने की विशेष आवश्यकता नहीं। यही कारण है कि हमारे यहाँ के लोग जानते ही नहीं कि किन किन कारणों से देशों एवं राष्ट्रों का अभ्युदय एव अध पतन होता है, कौन बातें और रीतियाँ उत्तम पव कौन निकृष्ट हैं, किस प्रकार के आचार विचार से देश और जाति को लाम पहुँच सकता है और किससे हानि ही हानि सम्भव है, किन किन कारणों से किन किन देशों का उद्भव हुआ और उन कारणों को इतिहास से शिक्षा। . याथातथ्य अथवा समुचित परिवर्तन के साथ हम अपने देश एव जाति में कैसे उपस्थित कर सकते हैं, किसचाल ढाल पर चलने से किन किन देशों एव जातियों अथवा राष्ट्रों को क्या हानि पहुँची अथवा उनका कैसे ह्रास या सर्वनाश हो गया और हम में वे अथवा वैसी ही बुराई की चाल ढालें हैं या नहीं और यदि हैं तो हम उनको फैसे हटा सकते हैं इत्यादि, इत्यादि ऐसे ही सैकडो बडे ही महत्त्व के प्रश्न है कि जिन पर ध्यान देने से हमारा हित होगा एव जिन्हें अलग छोड देने से हमारी न जाने क्या क्या दुर्दशा या सव- नाश तक हो सकता है। पेसे प्रश्नों पर ध्यान देने की पात्रता हम में तभी आ सकती है जब हम ससार के सभी ऐसे देशों का इतिहास जान लें कि जो आज दिन उच्च दशा में हैं अथवा पूर्व काल में रहे हैं, पर जो देश अपनी असावधानी से बिलकुल मिट्टी में मिल गये हैं । कुछ जातियां ऐसी भी हैं जो अपनी मूर्खता के कारण इस "असार" ससार से कूच कर बिलकुल निर्मूल हो गई अथवा ऐसी भयानक अधोगति को प्राप्त हो गई उनका पुनरुत्थान असम्भव हो गया है। ऐसी जातियों का पूर्ण वृत्तान्त जान लेना, उनकी त्रुटिया को भली भांति समझ कर उन पर मनन करना, और अपनी जाति से उन्हें हटाने का पूर्ण प्रयत्न करना प्रत्येक समझदार मनुष्य का आवश्यक कर्तव्य है। पर केवल हिन्दी जाननेवाले इतिहास-ग्रन्थों के अभाव से इस पवित्र कर्तव्य के पालन करने में नितान्त असमर्थ हैं। दूर की बात जाने दीजिए। उदाहरणार्थ घेचारे शूद्रों एव हिन्दुओं की नीचातिनीच जातियों पर ही दृष्टि दीजिए । इस बीसवीं नोचातिनीच जातियाँ" और शुद्र। शताब्दी में ऐसा माननेवाले बहुत न मिलेंगे कि ईश्वर ने ही इन "नीच" जातियों को सदा के लिए नीच बना दिया है और यह कर आज्ञा दे दी है कि वे दो, चार, छ , दस, बीस, पचास पुरतो तक नहीं बरन् अनन्त काल तक, लाखों करोडों पीढियों बीतने पर भी, सदा के लिए नीच ही बनी रहें और उन्हें उन्नति करने का कभी अवसर ही न प्राप्त हो । न्यायशील ईश्वर पर ऐसा कलंक लगाना नितान्त अनुचित है। कुछ महाशय कहने लगेंगे कि ईश्वर ने किसी को भी अनन्त काल के लिए नीच बने रहने की आशा नहीं दी है। आत्माओं की नीचातिनीच योनियों से लेकर कम से उच्चातिउच्च पद पर स्वकर्मानुसार पहुँचने का उसने यह प्रबन्ध किया है कि अच्छे कर्म करनेसे भंगी, चमार और हलालखोर तक दूसरे जन्म में श्रेष्ठतर जातियों में उत्पन्न हो सकते हैं और इसी भांति धोरे धीरे उन्नति करते करते ब्राह्मण योनि तक प्राप्त कर सकते हैं। इसका उत्तर हम यह देते हैं कि इस तर्क के अनुसार ब्राह्मण एव हिन्दुओं की अन्य उच्च जातियों को भी उन्नति करने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि कर्म के जोर से वे दूसरे जन्म में अंगरेजों अथवा अन्य प्रभावशाली जातियों (यथा जर्मन, जापानी इत्यादि) में उत्पन्न हो सकते हैं। प्रश्न तो यह है कि हमारी हिन्दू जाति कभी पूर्ण उन्नति करे या नहीं ? शायद कोई भी हिन्दू यह न कहेगा कि हिन्दुओं की उन्नति न हो, बरन् ये लोग दूसरे जन्म में यारोपियन, जापानी, या अमेरिकन है। । इसी भांति धेचारी"नीच"जातियों को भी इसी जन्म में क्यों उन्नति न करनी चाहिए ? इतिहास से यह ऐसी जातियों की अवनति से हानि। सपमाण सिद्ध हो चुका है कि ये "नीच" जातियाँ पहले यहाँ राज करती थीं और हमारे पूर्व पुरुष पार्यो ने तियत के आस पास मध्य एशिया के किसी स्थान से अथवा अपने "आर्किक होम" से आकर इन पर आक्रमण किया और धीरे धीरे इनका सारा देश विजय कर लिया। तत्पश्चात् इनको पढने एवं उन्नति के अन्य सभी मागे से चचित कर उन्होंने शनै शनै इन्हें ऐसा नीचातिनीच बना दिया कि अब इनमें से अधिकांश लोगों की गणना मनुष्यों में करना व्यर्थ है। हमारी समझ में भारत-चर्प की मनुप्य-गणना में ऐसे मनुष्यों की गिनती करना ही ठीक नहीं पौर तब जान पडेगा कि यहाँ की जनसंख्या जो इकतीस करोड कहलाती है वह एकदम भ्रममूलक और अशुद्ध है। एक तो यहाँ स्त्री-शिक्षा के प्रभाव से जनसख्या का अद्धीश अलग ही छोड़ देना चाहिए और फिर इन बेचारी पशुवत् जातियो एव अन्य जातियों के पशुवत् मनुष्यो को गणना के बाहर कर देने से इस देश की आबादी सपा अथवा डेढ करोड़ मात्र की रह जावेगी और प्राय. यही संख्या यहाँ के पढे लिखे लोगो की है क्योंकि पुरुषों में यहाँ प्राय. ११ सैकडे, एव स्त्रियों में केवल 2 सैकडे अर्थात् हजार पीछे ७३ मात्र की सख्या "त,' "म," कर लेने वाले मनुष्यों की है। शिव! शिव ! भलाअधकारका कहीं पता है !!! अस्तु, यह बेचारी नीचाति- नीच जातियाँ भी क्या अब कभी पूर्ण उन्नति कर सकेंगी? शायद कभी नहीं। शहरों में इतना विशेष अन्तर नहीं जान पडता, पर गांव में आर्य जातियों और अनार्यों में मनुष्य और पशु का सा भेद पाया जाता है । शताब्दियों से मार खाते खाते और ज उठाते उठाते इल हानि का हिन्दू जाति पर प्रभाव । "नीचातिनीच" जातियों ऐसी निर्जीव हो गई हैं कि कुछ कहते नहीं धनता । केवल एक ब्राह्मण या क्षत्रिय अगर पचास चमारो को भी साथ ही साथ मार चले तो भी बेचारे चमारो से सिवा हाय हाय करने एवं इधर उधर भागने के और कुछ भी न बन पडे । सो यद्यपि आर्य जाति प्राय एक हजार वर्ष से पददलित और पराधीन हो रही है तो भी उसका दवदवा • अब तक "नोच" जातियों पर कई प्रशों में जैसा का तेसा वर्तमान है। हम भली भांति जानते हैं कि वहुनेरे कट्टर विचागे के लोग ये बातें सुनकर भौ चढाने और कहने लगेंगे कि "इन लेखकों को क्या यही अभीष्ट है कि चमार प्राहाणा और ठाकुरो को जूतों से पोटें?" इसके उत्तर में हमारा सविनय निवेदन है कि हमारा यह अभीष्ट नहीं, परन्तु हम लोग ही येचारे चमारो को क्यों सतावे ? कदाचित् इसी के बदले, "जो जस करै सो तस फल चाखा" के अनुसार हम लोगो के साथ भी अन्य देशों की प्रबल जातियों कर वर्ताव कर रही हो । दासवाल, नेटाल, आस्ट्रेलिया इत्यादि अनेक देशों में हम लोगों कात्यासम्मान होता ह सो इतिहास और समाचार-पत्र-प्रेमियों से छिपा नहीं है। यहाँ हम लोगों के साथ उससे भी नोचतर बर्ताव किया जाता है जैसा हम बेचारे चमारों के साथ करते हैं। सच पूछिए तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ? न्यायशील अंगरेजी जाति को छोड यदि भारतवर्ष पर किसी अन्य ऐसीही प्रवल जाति का अधिकार होता तो कदाचित् कुछ दिनो में हमारी प्राचीन आर्य जाति भी धीरे धीरे चमारों की ही दशा को पहुँच जाती । अँगरेजों ने हम लोगो . - Prestige अधोगति से बचने के उपाय । के लिए शिक्षा का विशाल द्वार खोलकर हमें यह अवसर दे दिया है कि हम ऐसी शोचनीय दशा से बचें। पर जो जाति अपनी उन्नति करने में आप ही चेष्टा न करे उसे कोई भी उच्च नहीं बना सकता । इसी कारण हमारी समझ में अब भी बहुत सम्भव है कि समस्त हिन्दू जाति की वही दशा हो जावे जो वेचारे कोल, गोड, सन्धाल, भगी, पंचम, कजड, चमार इत्यादिकों की आज दिन है और कदाचित् सदा रहेगी । क्या कोई भी कहेगा कि ये "नीच" जातियाँ अब किसी विचार-कोटि में आनेवाले समय के भीतर ससार की उच्च जातियों के साथ अपना स्थान ले सकेगी? वैसेही यदि हिन्दू जाति भी सावधान होकर पमडूक वाली बाते एक किनारे रख अपनो उन्नति में इतिहास-सिद्ध उद्योगो द्वारा शीघ्र तत्पर न हो जायगो तो कोई आश्चर्य नहीं जो वह किसी दिन इन्हीं नीचा- तिनोच जातियों के पद को प्राप्त हो जाये !! इस भयावनी दशा से बचने का उपाय यही है कि ससार के इतिहास पर ध्यानपूर्वक मनन कर हम लोग अपनी त्रुटियों और बुराइयों को हटावे तथा धीरे धीरे वर्तमान राम-राज्य में अपनी पूर्ण उन्नति कर ले । इस पवित्र उद्देश्य के फलीभूत होने में यदि यह इतिहास माला कुछ भी सहायक हुई तो इससे सम्बन्ध रसने वाले हम सभी लोग क्या लेखक, क्या सम्पादक, क्या प्रकाशक, अपने को धन्य मानेंगे। इतिहास से क्या क्या लाभ होते हैं उनका उल्लेख करने से भूमिका का विस्तार बहुत बढ जायगा। सक्षिप्त रूप से ऊपर जो कुछ 'लिखा जा चुका है उसके अतिरिक्त इतिहास से एक तो मनोरजन . - इतिहास से अनुभव की वृद्धि । खूब होता है। दूसरे आदमी का अनुभव घेहद बढ जाता है। तीसरे उसे भली भांति ज्ञात हो जाता है कि मैं जो कुछ अपने ही आस पास देखता रहा हूँ और जिसे ही में ससार समझता था वह चास्तव में गूलर फल का ही ससार कहा जा सकता है। चौथे उसका अधकार जनित अभिमान छूट जाता है । पाँचवो उसका कट्टरपन भी पूर्णतया घिस जाता है, क्योंकि उसे ज्ञात हो जाता है कि ससार की प्रायः सभी जातियाँ अपनेही धर्म एव विश्वास को, अपनेही रीतिरवाजे एव पहिनाव, चाल, ढाल इत्यादि को सदा से सर्वश्रेष्ठ मानती आई है और आज तक मानती जाती है, यद्यपि यह सम्भव नहीं कि सभी धर्म, विश्वास, रीति या चाल सर्वोत्तम हो सके और सम्भव है कि निप्पक्षपात होकर मनन करने से विदित हो जाय कि हमारी ही सभी बातें ससार भर में सर्वोच्च न ठहरें वरन् कुछ अन्य जातियो की शायद सभी, अथवा कम से बातें हम से श्रेष्टतर है। ध्यान रहे कि जैसे हम यह सुन कर चिढ सकते हैं कि हमारे आचार, विचार, धर्म, विश्वास, पहि- नाव, ओढाव, रस्म, रवाजे सर्वोत्तम नहीं है उसी भाँति अन्य जातियों के कट्टर पार अनुभवशून्य लोग भी यह सुन कर जामे से बाहर हो सकते हैं कि ससार में किसी जाति की रीतियां उनसे उत्तमतर हैं। जैसे हम अन्य जातियों को नापाक और पतित समझते है वैसेही बहुतेरी उच्च जातियाँ हमें नीच, घृणित अर्द्धसभ्य कहती है । जैसे हम अन्य जातियों का छुआ हुआ भोजन नहीं पाते चैसेहो कुछ अन्य जातियों हमें छू जाने तक में अपना परम अपमान समझती हैं। जैसे हम जानते हैं कि लडको के कान नाक छेद, कम कुछ
इस इतिहासमाला की आवश्यकता-उसका क्रम ।
उनमें सोने की बॉलियां डाल देना, तथा उनके हाथ पैरों में चाँदी
की वेडियाँ पहिनाना परमावश्यक है चैसेही कुछ अन्य सभ्य कहाने
वाली जातियां अपने प्रग गोदना, पैर छोटे करने के लिए लियो को
बचपन से ही पीतल के जूते पहना कर लुजी कर देना और ऐसी
ही अनेक हास्यास्पद रवाजो का प्रचलित रखना सभ्यता की
सामग्री समझती हैं । निदान कहाँ तक लिखे , इतिहास पढने से
अनेकानेक लाभ है और इसका अधिकाधिक प्रचार करना प्रत्येक
देश पव जातिहितैषी का पवित्र कर्तव्य है। हमारी समझ में यदि
हिन्दी-पठित समाज का दशमांश भी पृथ्वी के प्रभावशाली देशी
का इतिहास जान ले तो इस अभागे देश, तथा इस बृहत् एच
किसी समय में परमोच्च, परन्तु अब अधोगति-प्राप्त प्राचीन और
पवित्र आर्य (हिन्दू) जाति का पूर्ण उपकार एव पुनरुत्थान होना
अब भी सम्भव है, नहीं तो ऐसी महत्वपूर्ण और परमविस्तृत
जाति का अंगरेजी राम-राज्य में भी न जाने कैसा बुरा हाल अथवा
सर्वनाश तक हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं !
इस इतिहास-मालामे निम्नलिखित देशों काहाल लिखा जायगा.-
१ भारतवर्ष (हिन्दुस्तान)।
८ अफरीका के राज्य तथा
२ मिश्र अर्थात् इजिपृ।
आस्ट्रेलिया ।
३ ग्रोस अर्थात् यूनान ।
४ इटली अर्थात् रोमन प्रदेश । १० पुर्तगाल।
५चीन।
११ हालैंड डेन्मार्क व स्विटजर
६टरकी।
७ फारस, अरब, च अफ़गानि १२ आस्ट्रिया।
१३ स्वीडेन और नारवे।
९स्पेन ।
लैंड।
१८ सयुक्त --- च १ इतिहासमाला का ब्योरा । १४ इगल्ड अर्थात् ग्रेट ब्रिटेन । रियासते-अमेरिका १५ जापान। १९ फ्रांस अर्थात् फरासीस। १६ जर्मनी। '२० पृथ्वी के अन्य देश । १७ रूस अर्थात् रशिया । ये पुस्तके ऊपर लिखे अथवा किसी प्रम-विशेप से नहीं प्रकाशित होगी वरन् सुभीते के अनुसार निकलती रहेंगी। ऊपर की सूची में नम्बर इस हिसाब से लगाये गये हैं कि न०१-५तक वे देश हैं जिनकी सभ्यता एव उन्नत दशा किसी समय में बहुत बढी चढी थी परन्तु अब सिवा न० ४ के और सभी का बुरा हाल है, तथा उसकी दशा भी पहले के देखते अब बहुत मन्द है। नं०६ से १३ तक के देशों की सभ्यता वैसी प्राचीन नहीं पर घीच में उनकी भी अच्छी उन्नति हुई थी और कतिपय अब भी भली चगी दशा में हैं । न० १४-१९ के देश इस समय पूर्ण प्रतिभाशाली हैं, एवं न० २० में पृथ्वी के उन शेष देशों का हाल लिखा जायगा जिन्होंने ससार के इतिहास में कभी कुछ भी योग दिया है। सम्भव है कि इस इतिहास-माला में २० के बदले २२-२३ पुष्प Dथ दिये जायें, क्योंकि ससार के धर्मों की बाबत शायद एक जिल्द लिखने की आवश्यकता हो और एक जिल्द में समस्त देशों का सगठित इतिहास लिखना पड़े। अब तक इस "सक्षिप्त इतिहास माला" के ५अन्य प्रकाशित हो चुके हैं ( अर्थात् जर्मनी, फ्रांस, रूस, इगलैंड एव जापान के इतिहास), और यह छठा स्पेन का इतिहास भी निकल रहा है । जिस उत्साह के साथ हिन्दी पठित समाज ने हमारा
हमारा सकल्प)-
आदर पर गौरव बढाया है उसके लिए हम उस के चिर
बाधित रहेंगे। ऐसा प्रोत्साहन पाकर हमारा चित्त प्रफुल्लित हुआ
है और हम ने सकल्प किया है कि यथासाध्य यह इतिहास-माला
अब शीघ्रही सम्पूर्ण की जाकर हिन्दी-सेवियों के गले में पड
सके।
लखनऊ,
१७-१-१९१४ ।
श्यामविहारी मिश्र,
शुकदेवविहारी मिश्र।
.
लेखक का वक्तव्य।
"पल्लवित फूलत नवलनित ससार विटप नमामहे"।
तिहास मात्र इस मूल मत्र का कीर्तन किया करता
है। सूर्य जो प्रज्वलित होता हुआ मध्याह्न
तक सिर पर आ गया है तो अब वह उसी
प्रकार क्रमश शीतल होता हुआ रसातल को चला जायगा।
"तुलसी है धरा को प्रभाव यही जो फरा सो भरा जो बरा सो
पुताना" । ससार के चक्र-रूपी भ्रमण में पड कर इस नियम का
उत्लघन करना असंभव है। तो फिर किसी देश जाति तथा वश
का अभ्युदय पोर अधःपतन होना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं
है। ऐसे ही स्पेन राज्य का किसी समय हर विषय में इस भूमडल
के शिखर पर चढ कर नीचे गिर जाना भी उक्त नियम का प्रतिपादन
कर रहा है।
किसी नियम को केवल "नियम' ही समझ रखना बडी
बुद्धिमानी का काम नहीं है। जैसे प्रात काल हुआ, तो चन्द्र
अस्त हो जायगा और सूय उदय होगा ऐसा मान बैठना कुछ
विशेष बुद्धि से सबंध नहीं रखता । चरन् सवेरा क्यों हुआ, सूर्यो-
दय किस प्रकार होगा, चद्र क्यों मलिन हो जायगा इत्यादि बातों
के सौजने वाले ही बुद्धिमान् पौर प्रभावशाली कहे जाते है।
इसी प्रकार इतिहास प्रेमी इस बात के जानने की अभिलाप करते हैं
कि अमुक देश व जाति का यो और कैसे अभ्युदय और अधः-
1
३
स्पेन का इतिहास ।
पतन हुआ १ इस ज्ञानरूपी पट के दर्शन के लिए इतिहास
ही नेत्र हैं।
स्पेन के इतिहास में विशेष ध्यानाकर्षक बातें ये है :(१)
स्पेन एक महान् विभवशालो पद पर पहुंच कर
अचानक साधारण श्रेणी से भी गिर जाता है (२)
जब से इतिहास का पता चलता है, यहाँ के किसी
प्राचीन निवासी की प्रभावशाली
प्रभावशाली राजाओं में
गणना नहीं देखी गई, अन्य देश वाले ही विजय
कर राज्य स्थापित करते रहे। (३) इस स्थान में शांति
रूपी वृक्ष भलीभॉति फूलते फलते नहीं देख पड़ा
अथवा यों कहिए कि शांति की अपेक्षा अशांति
अधिकतर दृष्टिगोचर होती है ।
पाठको की सुगमता के हेतु इस इतिहास के भाव को हम
एक उदाहरण में दिखलाते हैं । स्पेन बहुत बाता में भारतवर्ष के
सहश है
(१) भूगोलादिक विषय में दोनों प्रायद्वीप हैं । इसके एक और
अगम हिमालय एव उसके एक पोर दुभध पेरीनीज है ।
(२) उपज में दोनो स्थान सहज ही सपूर्ण हैं। यदि योग्य
प्रयोग और प्रबंध किया जाय तो दूसरे देश का मुँह ताकना न
पडे । अन्न जल से लेकर सोना चांदी आदि तक हर भाँति के
लेखक का वक्तव्य।
पदार्थ उपस्थित हैं, और आवश्यकतानुसार नाना प्रकार की
जरूरी वस्तुए वनाई जा सकती है।
(१) धर्म-सबध में दोनो स्यानो की पूर्ण तुलना है। जब
तक धर्म का पालन धर्म रीति से होता रहा, तब तक भारतवर्ष
की गौरव ज्योति पर मलिनता न आसकी । पुन मुसलमानी समय
में भी नीतिप्रेमी अकबर की सहनशीलता प्रकट ही है। इसी
प्रकार स्पेन में हेनिवाल आदि का समय देखिए । फिर अरबवालों
का अभ्युदय देखिए अथवा अन्य मुसलमानी व ईसाई राज्यों के
अकुर से पूर्ण वृद्धि तक दृष्टि डालिए ।
(४) जन धर्म धर्म-पथ त्याग एक कहर मजहबी जोश में
आ गया अर्थात् अधम के तुल्य हो गया तब वह सारी उन्नति
ले रसातल धस गया है। उसी अकबर के विस्तृत राज्य पर
उसी धर्म का अनुयायो पारगजेब बंटा, परन्तु जब उसधर्म ने उक्त
कट्टर रूप धारण किया तो परिणाम क्या पूछना है ? इसी प्रकार
ज्यूज पर अत्याचार और उसका फल, गोथ वश का
ग्रत,
रोगो की दशा, फिालप (२) व (३) के
व्यवहार और अनुपम आरमेडा का आश्चर्यजनक सर्वनाश
देखिए ।
यदि यहाँ (भारतवर्ष में) निर्मियों की दृष्टि से छ्न लगती
थी, काफिरों पर सिराज लगता था, उनको उच्च पद नहीं दिया
जाता था, 'बरजोरी' धर्म ग्रहण कराया जाना था, व जीवित पुरुप
गडवा दिये जाते थे तथा किताबें जलवा दी जानों थो, तो स्पेन में
भी विधर्मी प्रजा से घृणा थी, उन पर टैक्स लगता था, उनको
अरब
२
स्पेन का इतिहास। कोई अधिकार नहीं दिया जाता था, सब को मुसलमानी (खतना) करानी पडती थी, (फिर समय के फेर से ) कोई मुसलमान अपनी रस नहीं मना सकता था । मुसलमान और ज्यूज विधर्मी होने के कारण देश से निकाल दिये गये । यदि कोई विधर्मी की रक्षा करे अथवा राज्य-धर्म ग्रहण कर पुन न्याग दे, तो उसे शूली दंड दिया जाता था। स्पेन में पुस्तको का जलाना ही न था वरन पुस्तक के स्वामी को आयु पर्यत दासत्व भोगना पडता था। - (५) मुसलमानी राज्य दोनों स्थानों में एक ही भाँति निर्बल हुआ । यहाँ जो कोई आक्रमण कर अदर आगया, वही दिल्ली-पति को दलन कर शाहशाह बन गया। राजच्युत शाही घराने वाले इधर उधर मारने खाने लगे और जीविका के हेतु कहीं छोरी माटी रियासत बना कर निर्वाह करने लगे। स्पेन में भी वैसीहीदशा थी। जिस तरह पटवा किसी सुमिरनी को पोहता है तेत एक गुरिया दुसरे गुरिया को सकेल एक पोर कर देता है और शेष धागे में अपना ही अधिकार समझ स्वच्छंद सरकती है, दूसरी गुरिया उसको भी शीघ्र उसी भाँति एक कोने में दाब देती है, इस तरह सुमरनी गुरियो से ठसाठस भर जाती हे और प्रत्येक गुरिया के पास केवल उसकी नाप भर ही धागा रह जाता है, ठीक उसी प्रकार स्पेन और हिंदोस्तानरूपी धागे मुसलमानी समयरूपी पटवा के हाथ से राज्यच्युन-शाहों की रियासतरूपी गुरियों से ठसाठस पिरो दिया गया था।
लेखक का वक्तव्य।
(६) मुसलमानो के अधिकार से दोनो देश ईसाइयों के हाथ
गये और माय एक ही रूप से गये । जब मुसलमानी राज्य का
डामाडोल होने लगा, तभी ईसाई रियासतो ने जड पकडी और
उनकी निर्बलता पर इनकी सबलता सदैव निर्भर रही।
हम अपने इतिहास की त्रुटिया के सवध में पाठकों से यहाँ
कुछ निवेदन कर देना आवश्यक समझते हैं
(१) प्रम में कहीं कहीं इतिहास-शून्यता प्रकट होती है,
अर्थात् शताब्दियाँ की शताब्दियाँ दो एक पृष्ठ में समाप्त कर दी
गई है। इसका कारण लेखक का आलस्य नहीं, वरन्
इतिहासाभाव है-वहाँ के इतिहास ही का पता नहीं है।
(२) कुछ दूर चलकर ऐसी श्रुटि कदाचित् पुनः दृष्टिगोचर हो,
जिस समय यह राज्य अनेक रियासतों में विभाजित हो गया था,
तब प्रत्येक पराक्रमी पुरुष अपनी रियासत में राजाधिराज बन बैठा
था। स्वनत्र हा ये लोग "अपनी अपनी ढफली और अपना अपना
राग" गा रहे थे । अब ध्यान दीजिए कि इन डेढ डेटः ई टे की
मस्जिदों का कैसे हिसाब हो सकता है ? यदि लिखने का प्रयत्न
भी किया जाय, तो ऐसे सक्षिप्त प्रथ में इन सूक्ष्म बातो के लिए
स्थानामाव है।
सम्बन अरसठ जानिए, तेहि पूर्वार्ध उनीस ।
जन्म अष्टिमी जगत सिधि, जन्म लीन जगदीस ॥
साहित के सचार हित, यह 'इस्पेन' सदर्प।
श्याम नाम शिरमौर पर, सादर चरन समर्प।
चंद्रमनोहर मिश्रा
हमारा वक्तव्य । RDRROभापाप्रेमियों के हाथ में इस स्पेन के इतिहास को मा समर्पण करने में हमें बड़ा हर्ष होता है। हमें NANER आशा है कि अपनी स्वाभाविक उदारता का परि- चय देते हुए हिन्दी पटित समाज इस पुस्तक को भी अपना कर हमारे उत्साह को दूना करेगा। फ्रांस तो पूरे तौर से ही प्रजासत्तात्मक राज्य है, परन्तु इग्लै ड और जर्मनी इत्यादि राज्यों के भी देखते हुए स्पेन में इस बीसवीं शताब्दी में और उसके योरोप में होते हुए भी आनुप गिक दृष्टि से राजा के अधिकार कुछ अधिक विस्तृत और प्रजा के स्वत्व विशेषतया परिमित हैं । साधारणतया देखने से यह जरूर आश्चर्य- जनक विषय है कि यद्यपि यह देश उस योगेप महाद्वीप का अश है जिसका समस्त वायुमण्डल उचित और नियमित स्वतन्त्रता के प्रवल वेग और प्रजा के सारे राजनैतिक स्वत्ता की सुगन्धि से भरा हुआ है, तथापि वह शासन-प्रथा में प्राय पुरानी लकीर का ही फकीर है-- अन्य पाश्चात्य राज्यों से अर्वाचीन शासन-प्रणाली के आनन्दो का उपभोग करने में वह कोसो पीछे है। इस दशा में भी इस में सन्देह नहीं कि कुल मिला कर स्पेन की शासन-रीति अच्छी ही है और वहाँ के निवासियो को अनेक स्वत्व प्राप्त हैं एव उन्हें देश के कल्याण को अपना ही कल्याण समझ कर उसको अपने विचारों से प्रबल बनाने के लिए अनेक अवसर दिये जाते हैं।
हमारा वक्तव्य। पहले पहल चे अपने यहाँ की पचायते में ही शासन करना सीखते हैं, और फिर उनके लिए प्रादेशिक पार्लीमेंट का रास्ता खुला हुआ है जो प्राय स्वाधीन हैं । अनन्तर उनके प्रतिनिधि देश भर की चिराट् सभा कोटेंस के दूसरे अश कांग्रेस में जाकर बैठते और देश हित के उपाय को सोचकर राजा, मन्त्रि-समिति, पव सिनेट के सदस्यों को सभी बाते में परामर्श देने हैं और बहुत सी बातो में इनकी चल भी जाती है, परन्तु हम जहाँ तक सम- झते है इग्लैंड और जर्मनी की शासन-सभाओं के सर्वसाधारण के प्रतिनिधियों की तरह ये बहुत ज्यादा जोर देकर अपने मन्तव्यों का प्रबल प्रभाव पैदा करने के लिए पूर्णरूप से अधिकारी नहीं हैं- ये परामर्श मात्र देते, पर वे अपने नियमित स्वत्वों की दृढता से दृढ होकर यह कहते है कि नहीं, ऐसा ही होगा। बस, इतनी बात में अभी जर्मनी एव इग्ले डार स्पेन की शासन प्रथा में भेद है। चित्त में यह प्रश्न जरूर उठता है कि किस कारण से योरोप की सर्वयापिनी स्वतन्त्रता-सरिता की स्वच्छ धारा वहाँ के प्राय सब देशो में यह कर भी स्पेन को पूरे तोर से हरा भरा न कर सकी,जब उसी नियमित स्वतन्त्रता के प्रताप से जर्मनी, इंग्लैड, फास, इटली, स्विजर लै ड इत्यादि देश आनन्द से हरे भरे और राजनैतिक स्वत्वों से सींचे गये प्रजापारिजात से नन्दन- वन हो रहे हैं और अतुल एव अटल व्यापार की अपरिमित प्रभुता से इन्द्रलोक को भी इसी ससार में खोंच लाने के उद्योग में हैं, तब यह उत्तम जलवायुवाला पहाडी देश क्यों आज भी कुछ नीरसता और शुष्कता धारण किये हुए है ? क्यों यहाँ का शासन ।
स्पेन का इतिहास। . अपने क्षेत्र में हरियाली से नहीं लहलहा रहा है ? और क्यों व्यापार-कोकिल का मधुरगान इसके जीवन को सुखमय नहीं बना रहा है। प्रकृति का नियम है कि यदि उसका विकास-उत्पत्ति और पापण-शक्तियों किसी कृत्रिम पर अनुचित उपाय से न रोक दी जाय, तो वह अपने आप प्रत्येक देश और जाति को ऊपर उठाने में-उसे उन्नत करने में-यन करती रहती है। स्पेन को भी प्रकृति ने पूरी सहायता दी होती, यदि यहाँ पर कट्टर और भयकर धर्मान्धता ने अपना अड्डा न जमा लिया होता, यदि धर्म के नाम पर मूर्यो की तरह मर कर और असरय प्राणियों का नाश और अतुल सम्पत्ति का अपहरण कर के इसने और लोगो की शान्ति और उनका सुख लूट कर अपनी शान्ति और अपना सुख भी साथही में न लुटा दिया होता! । यदि स्पेन रामवासी कैथोलिक मत के जगद्गुरु पोप के बहुत समीप होने से आँखे बन्द किये हुए उसका उपासक बनने के साथ ही अपनी बुद्धि को ठीक रखता, दया को विसार कर धर्म के नाम से अधर्म न करता और ससार के प्राणियों को अपना भाई समझ कर उन पर भयानक रूप से न टूट पडता, तो स्पेन में अशान्ति की प्राग न जलती रहती, उसका सुख न लुट जाता, उसका व्यव- साय-शरीर एक पेर का न रह जाता, उसका साहित्य बिल्कुल निर्वल न होता और आज यह भी ससार के होड में उचित वेग से दौडता हुआ दिखाई देता । इसी धर्मान्धता के कीचड ने स्वतन्त्रता के बहते हुए साफ पानी को गॅदला एच .
हमाग वक्तव्य।
Din
दुर्गन्धियुक्त कर दिया, जिससे कि सारे स्पेन का वायुमण्डल
जर्मनी एव इग्लैंड के समान पारोग्यवर्धक नहीं दिखाई देता है।
यहाँ पर चौदहवीं शताब्दी तक तो विदेशियों के आक्रमण
होते रहे और उसके बाद आन्तरिक समर की अविधान्त खटपट
से काना के पर्दे फाड दिये । यह उचित था कि कम से कम
फोनड एव इसाला (१४७९-१५१६ ) के समय से तो यहाँ पर
शान्ति का स्थापन करके लोग देश कल्याण के उपाय सोचते,
परन्तु ठीक उसके विरुद्ध उसी समय से कैथोलिक मत के सिवा
और मतवालों का सर्वनाश करने के लिए "इक्विजिशन" नामक
प्राण सहारक न्यायालय (या अन्यायालय १) की स्थापना की
गई । यह प्राणघातक ग्रन्त्र धर्मान्धता का पहला मौरस सन्तान
या, इसने दिना दिन अपना सिर ऊँचा किया और शिव जी के
तीसरे नेत्र की तरह जिधर दृष्टि उठाई उसी तरफ अपनी प्रचड
ज्वाला से सभी का भस्म कर दिया। इस घोर अत्याचार के होते
हुए भी प्रकृति देवी की कृपा से पेन को उन्नति प्रसाद कुछ कुछ
मिलता रहा पार सुअवसर पाकर चार्ल्स प्रथम ( १५१६-५८)
के राजत्वकाल में यह देश सारे यारोप का सिरताज बना।
झ्या शक्ति, क्या धन और क्या विद्या सभी बातों में यह उस समय
बढा चढा था-यही समय यहाँ का स्वर्णकाल कहा जाता है।
यदि अब भी इस देश ने आँखें खोलकर अपनी निर्दयता और
धर्मान्धता पर पछतावा किया होता, तो यह निस्सन्देह साहल
जाता और इस के स्वतन्त्रता निर्भर की स्फटिक मणि के समान
स्वच्छ जलधारा मलिन न होती, परन्तु यह अपने अभिमान में
.
स्पेन का इतिहास। चूर था और इसने विवेक से हाथ धो डाले थे । यह अपनी धुन में लगा हुआ था और इसका विचित्र धर्म-प्रेम प्राय सभी योरोप को पीडित किये हुए था। हम यह मानते है कि योरोप के गैर देशों में भी धर्म की ओट से पापियो ने दुष्टता की और घोर उपद्रव पव मार काट भी मचाई परन्तु इसमें सन्देह नहीं कि स्पेन उन सब से बहुत आगे बढा हुआ था। १५८८ में भयानक नौका समूह या आहा की तेयारी के समय तक इसका विभव अपने सब से ऊँचे तारे तक पहुँच कर फिर धीरे धीरे नीचे को गिरने लगा जिस “आमडा" को भेज कर स्पेन यह विचार रहा था कि उसके द्वारा अंगरेजों को एकदम चकनाचूर करदे *"उसी की तबाही मानो देश के अधपतन का मूल-सूत्र बन गई । "प्रार्मेडा" के सर्वनाश से प्रकृति ने इसके नेत्र स्नाले, परन्तु तब भी यह आँखे मलता ही रहा और अपनी बेसमझी से पूर्णतया दूर न हुआ-इसमें सन्देह नहीं कि इसी समय से अधार्मिक अत्याचारों में बहुन कुछ कमी पड़ गई थी और फिर काल पाकर ये शान्त भी होगये, परन्तु जब मौका हाथ से निकल जाता है, तब कुछ बनाये नहीं बनता। जो मनुष्य पहले ही से सचेत हो जाय और अपनी खराबी को ठीक समय पर दूर करदे, वही बुद्धिमान है और वही अपना, अपने देश और अपनी जाति का कल्याण कर सकता है। घार धार्मिक अत्याचारों से स्पेन के लोग कुछ कठोर-हृदय और लडाकू अवश्य होगये थे, इसलिए उन्नीसवों सदी में पोप के *To crush these impudent Islanders once for all हमारा वक्तव्य। भयकर आडम्बरों की ज्वाला से कुछ दूर होने पर भी ये शान्ति- पूर्वक न बैठ सके । झगडा फसाद और लडाई टंटा होता ही रहा। यही विशेष कारण है जिससे इग्लैंड एव जर्मनी के साथ दूसरी ओर तराजू में बैठ कर इस देश का पल्ला ऊपर को बहुत ज्यादा उठ जाता है। वर्तमान काल में और देशों को आगे बहुत वढा हुआ देख कर इन्हें भी होश आया और उचित रीति से इन्होंने काम करना शुरू किया है। आदि से लेकर अन्त तक लडते ही रहने का यह फल है कि आज स्पेन में १०० में ६० से भी ज्यादा पुरुष बिल्कुल अपढ़ है। जहाँ विद्या ही नहीं, वहाँ और चमत्कारी का नाम तक सुनने में नहीं आसकता। विद्या का फैलाव आदमी चैन से ही यैठने पर कर पाता है। हजारों वर्ष तक धर्मान्ध रहकर और शान्ति- रूपी वृक्ष को जड से उस्बाड और फेक कर, इस देश ने अपनी सब समृद्धि गॅवादी और अब अपनी प्रचण्ड मूर्खता के बुरे परिणामों से अपने स्वत्वों को परिमित, शासन प्रथा को अनुन्नन, धर्म को निर्द- यता मालिन्य, विद्या को स्वल्प और व्यवसाय को निर्बल देखकर इसे सूझी है कि हमें भी ससार में शक्तिमान बनना चाहिए, नहीं तो विकास सिद्धान्त के अनुकूल एक न एक दिन जल्दी ही दुनिया से मारे और कुचिले जाकर मिट जाना पडेगा-यहाँ तक कि नामा निशान भी न बाकी रहेगा। हम भारतवासियो के लिए स्पेन का इतिहास एक बढिया उदाहरण है । क्या हमारे हिन्दू और मुसल्मान भाई, सनातनधर्मी मौर आर्य समाजी, ईसाई पार जैनी इत्यादि इस इतिहास को पढ कर भी धर्म के नाम से लडाई लडने और शास्त्रार्थ करने का स्पेन का इतिहास। स्वभाव एकदम न छोड देंगे ? क्या स्पेन की दशा को देख कर आज भी कोरी विवादशीलना में अपना समय नष्ट करने का साहस उन्हें होना चाहिए ? क्या अब भी अपने वार्षिक अधि. चशना के समय धर्म का डंका बजाकर हमें शका-समाधान के बहाने से अपने अन्य मतावलम्बी भाईयो का उपहास करते हुए सचमुच अपना ही उपहास करना चाहिए १ क्या इस समय भी इस बात की ज़रूरत है कि वे विद्वान् लोग, परन्तु स्पेनवासियो की तरह अदूरदर्शी और धर्मान्ध महात्मा जो उपदेशक होने का व्रत धारण करके अपने और भाइयो की दिल्लगी उडाना ही अपनी विजय और अपना परम कर्तव्य समझते है, अपने उसी अनुचित काम में लगाये रक्खे जायें ? क्या विवादशीलता को बढा कर हम भाई से ही भाई को पवित्र धर्म का नाम लेकर नहीं लडा रहे है ? क्या हमारे धार्मिक वार्षिक अधिवेशनी की वह त्रुटिपूर्ण प्रथा, जो विवाद की आग को भडकाती और उपहास के निप को फेलाती है, पूरे तौर से शोचनीय नहीं है? क्या इस धर्म के नाम से बेसमझी के कामों में पड़ कर अपने ही पैरों पर अपने आप कुल्हाडी चलाना हमारे लिए उचित है ? क्या ऐसे “धर्मोपदेश" पर हमें वह द्रव्य नष्ट करना चाहिए जो हम अनायास विद्या के प्रचार में व्यय कर सकते हैं ? और क्या हमें आँखें खोल कर अब भी यह न विचारना चाहिए कि अपना अमूल्य समय, परिश्रम से कमाया हुआ धन और थोडी सा बची हुई शक्ति यदि हम धर्म के नाम से विवादों में न खोकर प्रति वर्ष कम से कम दो चार ही नये स्कृल जिनमें शिक्षा मुक्त दीजाती हो खोलना शुरू करदें, तो हम अपना परमकल्याग कर सकते हैं?
हमारा वक्तव्य । pin इन सब प्रश्नों का हमें विश्वास है हमारे शिक्षित भाई पूर्ण- तया मनन करेंगे और उचित रीति से काम करके अपने को सव तरह से उन्नतिशील बनावेंगे। हम चाहते हैं कि मनुष्य धर्मपरायण और धर्मभीरु हो न कि धर्मदम्भी और धर्मान्ध-ये उसे अपनी उन्नति का सच्चा सहायक और उत्तम बल बनावें न कि अवनति को खुला रास्ता और निर्द- यता का सचारक । सच्चा धर्मात्मा पुरुप वही है जो अपना कर्तव्य उचित रीति से पालन करते हुए अपने देश हित और जाति हित के विचारों में तन्मय हो जाता है । समय अब भी हमारे हाथ में है। हमारे पास धन और शक्ति भी है, उधर न्यायपरायण अँगरेज सरकार सहायता करने के लिए हमारी पीट पर हाथ रक्खे हुए है और सब तरह से विद्याप्रचार में सहायता दे रही है । यदि इस पर भी हम न चेते तो किस का दोप है ? भारतवर्ष के लिए वर्तमान समय उस की परीक्षा का है । यदि वह चाहे तो पूर्ण उन्नति कर सकता है पर जरा सा भी विगाड होने से फिर रसातल तक हम लोगो का पता न लगेगा। यह कभी न सोचना चाहिए कि साधारणतया हँसी मस्परापन के साथ आय समाजिया और सनातनधमियो का १० मिनट का शास्त्रार्थ बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं रखता, थोडी सी भी बात का अन्त में हमारे भाग्य और हमारे देश और जाति पर बडा मारी असर होता है। यदि हमें भारतवर्ष की उन्नति सच्चे हृदय से करनी है , तो हमें आपस के सन्न झगडे चिल्कुल छोड कर एक छोटे से भी छोटा काम और छोटी से भी छोटी बात सर्वदा इसी पवित्र विचार के
स्पेन का इतिहास
साथ सोच समझकर करना या मुंह से निकालना चाहिए कि वह
हम सब को वास्तव में जन्मभूमि को उन्नत बनाने में सहायता दे
सके न कि उसे और भी अधिक गिरा दे। इस अवस्था में सब
झझट छोड कर विद्या को अपनी शक्ति भर फैलाने का यत्न
करना प्रत्येक भारत-सन्तान, हिन्दू, मुसलमान या ईसाई
का परम पवित्र कर्तव्य है। प्रत्येक भारतवासी को शिक्षित करके
ही हम अपने देश एव जाति का सिर ऊँचा कर सकते हैं, तभी
हमारी सच्ची उन्नति होगी, तभी हमारा सच्चा कल्याण होगा और
तभी हमारा सोया हुआ गोरच फिर पूरे तौर से हमारे हाथ
लगेगा-अस्तु ।
इसके बाद यथासम्भव शीघ्र ही “ अमेरिका की सयुक
रियासत के इतिहास को प्रकाशित करने का निश्चय हो
चुका है। उसे विशेष रूप से रोचक एव उपयोगी बनाने के लिए
अमेरिका-वासियों के ही द्वारा लिखी हुई कई एक गौरव-पूर्ण
पुस्तको का भी अवलोकन किया जायगा।
सीतापुर अवध
शनिवार कार्तिक शुक्ल ३स० १९७०
सोमेश्वरदत्त शुक्ला
ता०१ नवम्बर १९१३
* United States of America
स्पेन का इतिहास १-भौगोलिक वृत्तान्त । AHMEन योरोप के दक्षिण पश्चिम भाग में एक प्राय पहाड़ी स्पे देश है। विस्तार में यह अपने यहाँ के सम्मि- लित सूचा बगाल और आगरा के समान है, बम्बई के हाते के प्राय बरावर इसकी जन सख्या १,९५,८८,६८८ है । स्वयं स्पेन का क्षेत्रफल १९००५० वर्ग मील हे और अपने केनारी और बेलीरिक द्वीपो को मिला कर यह १९४, ७८३ वर्ग मील है । पहले यह भूमि १३ सूरों में बॅटी हुई थी। सन् १८३३ से यह ४९ प्रान्ती में विभक्त कर दी गई, जिनमें से ४७ पास स्पेन में हैं। स्पेन तीन तरफ प्राकृतिक सीमा से घिरा हुआ है। इसके उत्तर में विस्के की खाड़ी और फ्रांस, दक्षिण में मेडिटरेनियन समुद्र, पूर्व में मेडिटरेनियन समुद्र तथा फ्रास, र पश्चिम में पुर्तगाल है। इसका उत्तरी किनारा बहुत ऊँचा पथरीला और अमड नाभड है । इससे वहाँ अनेक बोह और कदरायें बनी हुई है, जो कि अच्छे पार सुरक्षित बदरगाहों का काम देती है । इसके पश्चिमी किनारे का दृश्य अपूर्व हे, वह जित्राल्टर तक निपठा, फिर रासपलो तक पहाड़ी, उसके बाद नीचा, और इसी भाति -
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मनुष्य-चरित्र एव अन्य वाते । ३ है। यहाँ के खास शहर मैड्रिड (राजधानी), बारसिलोना, वेलेंशिया, अलीकात, सेवील, मलागा, कारडोवा, ग्रेनडा, टोलेडो, सैलामाका, सरगोसा, केडीज, जिब्राल्टर और अल्मेदन है। २-मनुष्य-चरित्र एवं अन्य वातें। किसी स्थान के निवासियों का स्वभाव वहाँ के जलवायु तथा स्थान-सबपी बातो पर विशेषतया निर्भर होता है। स्पेन के पहाड़ी मुल्क होने के कारण इस में आने जाने का सिलसिला कठिन है, इसलिए भीतरी स्पेन के लोग बाहरी एवं किनारे पर के निवासियों से अपरिचित से रहते हैं । ऐसे ही ज्यों यों अदर जाइए, त्यो त्यो सभ्यता की मात्रा घटती हुई मिलेगी । कुछ लोग पहाडी और जगली है । तट पर के निवासी सब तरह से बाहरी दुनिया से सबध रखते रहे हैं, इसलिए उनकी प्रकृति में सदैव परिवर्तन होता रहा । ये लोग सीधे और सभ्य ह । स्पेन देश के लोग प्रायः गभीर, घमडी एव आलसी होते है। ये लैटिन और अरबी के मेल से बनी हुई भाषा बोलते हैं । यहाँ की खेती की हालत हमारे भारतवर्ष से बहुत कुछ मिलती है । सन् १८७७ में यहाँ के ७३ फी सदी आदमी इसी पेशे पर निर्भर थे। पहले के देखते यहाँ की उपज कम हो गई है, यहाँ के मोजार बहुत भह होते थे, पर अब स्खेती के लिए नई कलो का प्रचार होने लगा है। लोग काश्तकारी पर अब विशेष ध्यान देते है। ये स्नेती बहुधा ताला के निकट करते है, वहीं पर अच्छी .
२ स्पेन का इतिहास। सिरे तक ऊँचा नीचा चला गया है। इस और अच्छे बंदरगाहो का अभाव है। पीरिनीज पहाड की श्रेणी स्पेन को मास से अलग करती है। स्पेन का मध्य भाग बडा उच्च समस्थल है। एक पहाडी से इसके दो भाग हो गये हैं। उत्तरी भाग समुद्र की सतह से २७०० और दक्षिणी ३६०० फीट ऊँचा है। स्पेन की शेष भूमि का भी दृश्य अनोखा है। कहीं सफेद कोह की भांति ऊँचे बर्फ से ढकी हुई चोटीवाले पर्वत है, जिनके समीप में नीचे बहुधा उपजाक और लये चौडे मैदान होते है, और कहीं उमड़े हुए समस्थल हैं जिनमें कुछ बिलकुल उजाड और कुछ आबाद है, जहाँ खेती भी होती है और नहरे बह रही है । केंटानियन, पीरिनीज और सीरा नेवादा यहाँ के विख्यात पहाड, टागस, ग्वाडियाना, ड्यूरो, इम्रो तथा ग्वाडलकिबरा नदियाँ और अलबुफेरा, मारमेन एव लगुनादलाजडा झीलें हैं। इन ऊँचे पहाडा एव नीचे मैदानों के कारण स्पेन का एक भाग दूसरे भाग से प्राय किसी बात में समानता नहीं रयता अर्थात् पृथक पृथक स्थाना की पृथक् पृथक् पेदावार और जल वायु है। उत्तर तथा उत्तरी किनारे की आव हवा तर है। वहाँ वर्षा बहुत होती है। उच्चसमस्थल मेसेटा की आब हवा बहुत विकट है और वहाँ वर्षा बहुत कम होती है। पूर्वी व पश्चिमी किनारो पर मेडिटरे- नियन समुद्र का असर है। इसी भाँति प्रत्येक स्थान की पैदावार भी अलग अलग है । मेसेटा में वृक्ष होते ही नहीं और इसपार्टी नाम की घास विशेषतया उगती।
मनुष्य-चरित्र एव अन्य वाते । ३ है। यहाँ के खास शहर मैड्रिड (राजधानी), बारसिलोना, वेलेंशिया, अलीकांत, सेवील, मलागा, कारडोवा, ग्रेनडा टोलेडो, सैलामाका, सरगोसा, केडीज, जिवाल्टर और अल्मेदन है। २-मनुष्य-चरित्र एवं अन्य वातें। किसी स्थान के निवासियों का स्वभाव वहाँ के जलवायु तथा स्थान-सबधी बात पर विशेषतया निर्भर होता है। स्पेन के पहाड़ी मुस्क होने के कारण इस में आने जाने का सिलसिला कठिन है, इसलिए भीतरी स्पेन के लोग बाहरी एवं किनारे पर के निवासियों से अपरिचित से रहते हैं। ऐसे ही ज्यो त्यो अदर जाइए, त्यो त्यो सभ्यता की मात्रा घटती हुई मिलेगी। कुछ लोग पहाडी और जगली हैं । तट पर के निवासी सब तरह से बाहरी दुनिया से सबध रखते रहे है, इसलिए उनकी प्रकृति में सदैव परिवर्तन होता रहा । ये लोग सीधे और सभ्य हे । स्पेन देश के लोग प्रायः गभीर, घमडी एन आलसी होते है। ये लैटिन और अरवी के मेल से बनी हुई भाषा बोलते हैं । यहाँ की खेती की हालत हमारे भारतवर्ष से बहुत कुछ मिलती है। सन् १८७७ में यहाँ के ७३ फी सदी आदमी इसी पेशे पर निर्भर थे। पहले के देखते यहाँ की उपज कम हो गई है, यहाँ के ओजार बहुत भद्दे होते थे, पर अब स्नेती के लिए नई कलो का प्रचार होने लगा है। लोग काश्तकारी पर अब विशेष ध्यान देते है। ये खेती बहुधा ताला के निकट करते है, वहीं पर अच्छी स्पेन का इतिहास। फसल भी होती है। ये भूसा आदि खेतो में छोड़ देते हैं, वही स्वाद का काम देता है । विशेषतया खाने वाले पदार्थ बोये जाते. जिनमें गेहूँ और जो मुख्य है। जई, राई, ज्वार इत्यादि और भी अनेक अनाज यहाँ पेदा होते हैं। मटर, लोविया मौर सेम फलो में गिने जाते हैं। लहसुन, प्याज इत्यादि यहाँ की सास और प्यारी तरकारियों है। इसी तरह बैंगन और मिर्च भी चाय के साथ खाई जाती हैं। इनके सिवा रुई, सन और ऊख की खेती यहाँ बहुतायत से की जाती है। जेतून, सेव, केला, नाशपाती, अजीर, असरोट, छोहारा, अनार आदि फल भी यहाँ पैदा होते हैं। घोड़े, खञ्चर, गधे, भेड, बकरी, ऊँट इत्यादि इस देश के मुख्य पालू जानवर हैं, यहाँ के पशुओं में घोडे और खच्चर विशेष विख्यात हैं। सरकार घोडे पर भी खेती की तरह ध्यान देती है और उनकी नस्ल की रक्षा करती है। यहाँ मधु मरखी और रेशम के कीडे भी पाले जाते हैं धातुओं की अधिकता में योरोप का कोई और देश इससे समता नहीं कर सकता। यहाँ सोना, चांदी, पारा, तांबा, सीसा, लोहा, नमक, कोयला इत्यादि (इनमें भी विशेषतया न० २३ एव ४) बहुतायत से पाये जाते हैं। शराब, अगूर, किशमिश, मछलियाँ, जैतून का तेल, शकर, ऊन, रेशम, रुई, सोना और चांदी स्पेन अपने यहाँ से अमेरिका एव मास इत्यादि देशो को भेजता है। - प्रारभिक इतिहास और रोम का राज्य । ३-प्रारंभिक इतिहास और रोम का राज्य । स्पेन क्या था गैर कैसा था यह पहले कोई नहीं जानता था। मेडिटरेनियन समुद्र के किनारे की भूमि को यूनानी लोग आइवेरिया कहते थे । उसका आंतरिक भाग उनके लिए एक आश्चर्यजनक भूखड था। कहा जाता है कि हरक्यूलीज के चिह्न वहाँ मौजूद हैं। समुद्र के किनारे पर दो शिलाये है जो "हरक्यूलीज़ स्तम्भ'' के नाम से विख्यात है। यूनान देशवाले इसे पृथ्वी का प्रत समझते थे। हरक्यूलीज़ यूनानियों का युद्ध देवता था। यहाँ पहले पहल फिनीशियन लोग आये जो कि एशिया माइनर के व्यापारी थे। ईसा से लगभग ७०० वर्ष पूर्व इन लोगो ने यहाँ एक आध गाँव बसाये। इसी समय यूनानियों से उनका प्रथम परिचय हुआ। इन विद्वानाने स्पेन के भूगोल को जानने की चेष्टा की, पर उसका ठीक ठीक पता प्रथम प्यूनिक सग्राम से चला। ईसा से प्राय २५० वर्ष पूर्व अफरीका के कार्थजवासियो ने आइबेरिया पर अपना आनक जमाया, हैनिवाल के पिता हैमिलकर वारकर ने वहाँ प्रभुत्व और सुअवसर देख स्पेन में पक कार्थेज राज्य स्थापित करना चाहा। इस विचार से यह विना अपनी सरकार की मदद के जिब्राल्टर के पार उतर गया। इस साहसी मनुप्य ने बहादुर स्पेनियो की एक सेना वनाई। इनकी सहायता से उसने अपने राज्य को स्पेन के मध्य भाग में फैलाया। ३ ६ स्पेन का इतिहास। इसने उनको सच्चा अनुयायी बनाने के लिए अपने फौजी जवानों के विवाह वहीं की युवतियो से कस दिये और स्वय अपने पुत्र हैनिवाल का ब्याह एक स्पेन की रमणी से किया। इन बातो से वह स्पेनियों का प्रेमपात्र बन गया। ईसा से २८८ वर्ष पूर्व इसका कालान्त हुआ। इसके बाद सात वर्ष तक इसका दामाद हेस्डूबाल राज-काज करता रहा । इस राज्य और रोम राज्य की सीमा इस समय इनो नदी थी। अनन्तर हेनिवाल ने पूर्ण दो वर्ष युद्ध करके समस्त जातियों को जीत लिया, और स्पेन भर में अपना अकटक राज्य स्थापित कर दिया। अब दो सेनापति जो भाई भाई थे प्रथम बार रोम की फोज लेकर स्पेन में आये । छ वर्ष तक घोर युद्ध होने के बाद दोनों भाइयो की हार और मृत्यु है।गई ! २१० बी० सी० में छोटे भाई के ज्येष्ठ पुत्र एफिकेनस ने नये कार्थेज को ले लिया। इसने शत्रु- मडला को निबेल करके पाँच ही वर्ष में उसे स्पेन से मार भगाया। स्पेन के दक्षिण लोग कुछ सीधे और सभ्य थे, इसलिए साधहाँ वास्तव में इनका कुछ प्रभाव हो गया, लेकिन भीतरी देश के वासियो पर शासन जमाना कठिन था, क्योकि एक तो देश ही जगली और पहाडी था और दूसरे वहाँ के लोग लडाका होते थे। ये आतरिक स्पेन के निवासीसेल्टिबरीया दिबरी कहलाते थे, ये रोग विश्वास घाती और उत्पाती होते थे। ये कभी रोम के सहायक बनते और कभी उसके शत्रु, इस मोतिये अनेक उपद्रव मचाते और रोम केनाको दम रखते थे । रोम दो जातियों का परस्पर मित्र भाव नहीं दे सकता प्रारभिक इतिहास और रोम का राज्य । ७ था। केल्टिबेरी जाति ने १९५ वी० सी० में बलवा कर दिया। रोमी गवर्नर ज्येष्ठ केटो ने इनको पछाडा और इनसे सब हथियार ले लिये तथा सब किलो के तोड दिये जाने का हुक्म दे दिया। ग्रेक्ची पूर्वी स्पेन का शासक था । इस के पिता ग्रेकस ने ११९ वी० सी० में केल्टिबेरी जाति से युद्ध ठान दिया। इसने अपनी विजय बारा के प्रवाह में १०३ नगर छीन लिये और करीब करीब पश्चिमी हद्द तक इसका ड का बज गया। यह जैसा युद्ध में वीर था वैसा ही नीति में निपुण था। यह प्रजा का शुभचिन्तक पव दयाशील भी था। जब यह पुर्तगाल के समीप पहुँचा, तब वहाँ इसकी दाल न गली। इधर एक जगह के जीतने पर ज्यों ही यह दूसरी ओर मुंह करता, त्योंही वह स्थान हाथ से जाता रहता था। बी० सी० १५४ में रोम ने यहाँ एक बुरी शिकस्त खाई। कैल्टिबरी ने भी इस समय रोम को येदम समझ अपना हाथ साफ किया । इन्होंने एक नगर के समस्त रोमनिवासियों को एक साथ ही कल कर दिया। क्लाडियस मारसलेस ने वी० सी० १५२ में इसका बदला लिया। इसका बर्ताव प्रजा पर बहुन प्रसन्नोपजनक था। शायद उपर्युक्त विकट निर्दयता ही इसका कारण थी । नवीन शासक के अनुचित पीर असह्य अत्याचार के कारण स्पेन की प्रजा फा प्राप फिर प्रचड हुआ। केल्टिबरी की सहायता से प्रजा ने सात साल तक रोम की सेना को सूत्र काटा और मारा । यह जान पड़ता था कि रोम का अस्त होने वाला है । एक समय ८ स्पेन का इतिहास। , प्रजा ने रोम के एक सर्दार से वचन ले लिये थे कि रोमनिवासी इस प्रात में अब शासन करने का विचार न करेंगे, पर केल्टिबरी ने अपने सरदार के साथ विश्वासघात किया और उसे दुश्मन के हाथ दे दिया। बो०सी० १४१ में रोमियो ने इनके प्रधान नगर एव दुर्ग को घेर लिया, परन्तु साल भर पड़े रहने से इनकी फौज नष्ट और हताश होने लगी। भोजन तक का मिलना मुश्किल था, तब ये लोग अपने असहाय पार रोगी साथिया को छोड कर माग गये। रोम के लिए यह बडो लज्जा की बात थी। फिर भी बी०सी० १३३ में छोटे सीपियो ने उक्त स्थान को ले लिया और जनियस बेटस ने पश्चिमी प्रांत को जीत लिया। अब बहुत समय के लिए राम को निष्कटक गज्य मिला और उत्तरी भाग को छोड जो इनके अधिकार में नहीं था, शेप स्पेन में शाति फैलने लगी। कई नये नगर बसाये गये। लैटिन स्पेन चालो की भाषा हो रही थी, और वाणिज्य में वृद्धि होने लगी। अब सरकारी प्रबन्ध ठीक था। चोरी, डाकुओं और समुद्री लुटेरो से रक्षा के उपाय किये गये। इस सब शांतिमय सुस्न-सगठन का यदि असली कारण देखा जाय तो वह रोमवालो का सुप्रबन्ध था । ये प्रजा के साथ मित्रता और प्रेम का वर्ताव रखते थे। किसी किसी शहर को तो रोम के सिक्के बनाने का भी हक मिल गया था। ये प्रजा से बंधा हुआ लगान और फौजी काम लेते थे। इन दो बातो के सिवा स्पेन को किसी तरह की अडचन प्रारभिक इतिहास और स्पेन का राज्य । नधी, और प्रजा पूर्णरूप से प्रसन्न थो। हर तरह से उन्नति हो रही थी, परन्तु ये बाते वास्तव में मेडिटरेनियन समुद्र के किनारे ही के शहरो में थीं। बी० सी० १०५ में फिर गेमियों पर हमला हुआ। दो रोमी सर्दारों की फौजें जड स साफ कर दी गई । स्पेन में बडो निर्दयता से लूट मार हुई । रोम के लोग बहुत धबड़ा गये थे पर केल्टिबरी इनके सहायक हुए । बी०सी० ९७-६ में केल्टिबरी का भी रोमियो पर प्रचण्ड आक्रमण हुआ। सेरटोरियस केल्टिवरी जाति का सरदार था। यह हेनिवाल की टकर का नामी आदमी था और सात साल तक वीर सैनिकों का मोर्चा मारता रहा। देश की स्वतत्रता इस का मूल मत्र था जो इस ने प्राप्त सी करली थी। यह वडा साहसी और चतुर था। इस ने स्पेनिया के चित्त को स्वोंच कर उनको अपनी मुट्ठी में कर लिया था। इस के युद्ध से रोम का धन एव पराक्रम बहुत कम हो गया । बी०सी०७१ में पाम्पे ने स्पेन को फिर जीत कर अपनी हार का धचा धो डाला । अब की बार कठोरता से शासन शुरू किया गया पौर स्पेन को वह स्वाधीनता नहीं दी गई । दश वर्ष पश्चात् सीज़र महान् ने पश्चिमी स्पेन की ओर मुंह किया, और विजय करने के विचार से प्रस्थान भी कर दिया । पर अन्य कारणों से उस समय इसे अवकाश न मिला । बी०सी० ४९ में पूर्वो स्पेन में आपस की फूट
स्पेन का इतिहास।
के कारण इस को वहाँ जाना पड़ा और पाम्पे के सरदारा से
लडकर इसने विजय प्राप्त की । चार वर्ष बाद इसने फिर पश्चिम
की ओर ध्यान दिया। कारडोवा के समीप शत्रुवृद को परास्त
करके यह राजा बना।
महाराज आगस्टस ने उत्तरी भाग पराजित करने का वीडा
उठाकर बी०सी० २७ में इस प्रश पर हमला किया। नगरो एवं ग्रामो
को जीतता हुआ आर विजित स्थान में अपने फौजी जवान छाडना
हुआ यह दूसरे तर पर पहुँच गया । इसने अपने सचिव की
सहायता से आठ साल में पूरी विजय प्राप्त की। उस समय
बहुतेरे नगर इसी के नाम से बसे थे।
अब ४०० वर्ष तक यहाँ कुशल और शाति रही। २५६ ई० में
पूर्व की ओर से इस राज्य पर एक आक्रमण हुप्रा । इसके सिया
और कोई ऐतिहासिक युद्ध नहीं हुआ। इस समय में सरकारी
मबन्ध में बहुत कुछ परिवर्तन हुए ।
४-रोम का अस्त तथा गाथ लोगों का उदय ।
चौथी शताब्दी के प्रत में रोम की स्पेनदेशीय रियासत
खूब फली फूली थी, परन्तु पाँचवों सदी के आरम्भ ही से इस
पर आक्रमण होने लगे । ४०९ ई० में उधर अलरिक ने रोम
को लूट लिया और इधर जर्मनी की और की जगली जातियों ने
स्पेन पर
से लूट मार फी। स्पेन
जैसी
उतनी ही बरबादी उस
--
रोम का अस्त तथा गाथ लोगों का उदय । - पर आई । ४०१ से ४१३ सक स्पेन और फ्रांस में बहुत कुछ उलट फेर होते रहे । इसी समय काटेस्टाइन नामक सरदार ने जबरदस्ती अपना कब्जा इस पर करलिया । शीघ्र ही इसके एक जगी सिपह सालार जिरोटियस ने वलवा किया और उससे राज्य को छीन लिया। कुछ समय बाद इसकी भी वहीं गति दुई। फौज बागी हो गई। यह कुछ सिपाही लेकर स्पेन में जा छिपा । ( आधी रात के समय बागो लोग इस पर चढ आये और उन्होंने । इसके मकान को घेर लिया। इसके थोडे से वफादार आदमियो र ने चार सग्राम करके तारों से ३०० बागियों को मार डाला। । ऐसे ही लडने का सामान समाप्त हो गया। यह अपनी प्यारी पली को छोड कर भाग न सका। तब चारों ओर से मकान में । आग लगा दी गई। इस पर इसने आत्मघात का विचार किया। । उसकी वीर धर्मपत्नी ने कहा कि मैं आपके बाद इस ससार में * प्लश और लजा की पात्र बनना नहीं चाहती। ऐसा कहकर उसने अपना कठ पति के कुठार पर रख दिया, पति भी कटारी मार के मर गया। ४१४ में अटौलफस ज गली जातिया से सामना करने को रुपेन पहुँचा । यह पश्चिमी गोध वश का था, जो कि वाटिक के किनारे पर जर्मनी के उत्तर में रहता था। अटौलफस युद्ध करने के पूर्व ही चल बसा । ४१५ में लिया गद्दी पर बैठा। यह युद्धप्रिय और लालची था। इसने रोम के बादशाह फोनोरियस से सलाह कर के तीन वर्ष में उपयुक्त जगली जातियों को परास्त -- - १२ स्पेन का इतिहास कर के निकाल दिया। अब स्पेन रोम के अधिकार में नाममात्र को रह गया। इन गाथ लोगो का शासन स्पेन में प्राय. ४१८-७११ ईसी तक रहा। टूलज़ इनका राजगृह था और टोलेडो इनकी राजधानी थी, इनका रोम से कभी भाई का, कभी नोकर का और कभी शत्रु का भाव रहता था। सो वर्ष तक इनके राज्य की जड कमजोर रही । इसका कारण उत्तरी जगली जातियो का बल था। इन्हीं के समय में ईसाई मत फैला । ये कैथोलिक मतावलम्बी थे। रोम का पोप इनका धर्मगुरु था। स्पेन का इस मत का सब से अधिक पक्षपाती होना यहाँ की अनेक ऐतिहासिक बाता का मूल कारण हुआ । इस समय तक स्पेन में साहित्य कुछ भी न था। यूनानी दर्शनशास्त्र दक्षिण में सब से बढकर शिक्षा की श्रेणी समझा जाता था। बेलिया के समय में राज्य स्थायी न हुआ था। सन् ४२८ में स्खुवी और बैंडल जातियों ने रोम और गाय की मिली हुई फौज को नष्ट करके और उत्तर से दक्षिण की ओर लूटते मारते एव अच्छे अच्छे शहर बरबाद करते हुए एफ्रिका में पदार्पण किया। ये जातियाँ जब तक जीवित रही, तब तक इन्होंने दक्षिण स्पेन के सभ्य वासियों के नाको दम रक्त्रा। इन दीन लोगों की प्रार्थना पर रोम से गाथिक-नरेश थियोडोरिक द्वितीय स्पेन भेजा गया, यह एलरिक का पोता था, इसने ४५६ में पोरिनोज पार कर स्खुवी लोगों को परास्त किया । अब स्खुवी केवल गेलेशिया ही - रोम का अस्त तया गाथ लोगो का उदय । १३ रह गये और वह सूबा भी गाध के मानहत या। इस नरेश का यहाँ प्रवेश मान राम का स्पेन से हाथ धो बैठना था। यह स्पेन का राजा बन बैठा और धीरे धीरे अपनी रियासत बढाता इसके पीछे ४६६ ई० में इसका भाई यूरिक गद्दी पर बैठा। शायद इसने थियोडोरिक को विप दे दिया था। यह रोम से बिलकुल अलग होकर स्वतत्र बन गया । इस वीर पुरुष ने पश्चिमी सिरे नक विजय करके अपना झडा फहरा दिया । इमने यहाँ कानून स्थिर किया और इसके पीछे २० वर्ष बाद एलिरिक द्वितीय गद्दी पर बैठा । इसने उस कानून को सब पों में पूरा किया और रोम की शासन-प्रथा का प्रचार किया। लियोनिफिल्ड ही के समय में यहाँ ईसाई मत का प्रवेश हुआ। लगभग ५०० ई० के प्राय सारी प्रजा ने इस मत को सहर्ष स्वीकार कर लिया, परन्तु राजा व रानी ने ऐसा नहीं किया, और अपना सेरियन मन स्थिर रखा जिसके अनुसार ईसा मनुष्यो से श्रेष्टतर, परन्तु ईश्वर के सामने महा तुच्छ समझे जाते थे । हरमेनेगिल्ड राजा का ज्येष्ठ पुत्र था। अपनी नय विग- हिता पत्नी के साथ उसने रोमन कैथोलिक मत ग्रहण किया। इस पर इसके माता पर पिता इन दोनो के साथ बहुत बुरा बर्ताव करके इनके परलोकवास के कारण हुए । इस अत्यन्त कर कर्म के अमिट कलक में सनकर लियोनिफिल्ड सन् ५८६ में चल बसा।
स्पेन का इतिहास ।
इसका द्वितीय पुत्र रिकार्ड गद्दी पर तीन वर्ष के लिए
बैठा । यह पहला ईसाई राजा था । इसके समय में मजहबी
जोश
खूब
फैला। यह पुराना मत नाश करने और कैथोलिक
मत फैलाने पर उद्यत हुआ। यह सब को अपने मत में अपनी
भाति कट्टर बनाना चाहता था। इसने सैरियन लोगो की धर्म
पुस्तके भस्म करवा दी और उनके पुजारियो एव पुरोहिता को
भी धमकाया। इस कट्टरपने से उसके धर्मगुरु पोप तो प्रसन्न
हुए पर यहूदी लोगो पर तबाही आई, जिसके कारण अनेक उपद्रव
उठ खडे हुए।
गाथवश में वीरे धीरे राजबल बहुत मन्द पड गया था।
इनके समय में युवराज नियत होने में प्राय. युद्ध हुआ करते थे।
धार्मिक अत्याचारो से प्रजा में अशान्ति फैली तथा प्रबन्ध बहुत
ढीला हो गया। गजा और प्रजा पहले से ही एक दूसरे को
विदेशो समझते थे । यह भाव अत्याचार से अधिकतर प्रबल हो
गया। इन सब बातो ने राज्य को और भी तबाह कर दिया।
गायों के अन्तिम काल का इतिहास पूरे तोर से नहीं मिलता है ।
५---अरब का अाक्रमण तथा ऐतिहासिक
वृत्तान्त की कमी।
अफ्रीका के गवर्नर
मूसा
ने ७१० में लूटने की नियत से
एक फौज स्पेन को भेजी। इधर मुल्की फूट तथा निर्बलता के
कारण उसके रोकने का कोई प्रबध न हुआ। फौज जिघ्राल्टर में
अरब का आक्रमण तथा ऐतिहासिक वृत्तान्त की कमी।
उतरी और लूट मार के बाद लौट गई । स्पेन वालो के इस
कुप्रबन्ध को देख कर मूसा ने ७११ में एक फौज तारीक के
सेनापतित्व में वहाँ को फिर भेजी । इसने अतिम राजा
राडेरिक को परास्त किया और अपने को वहाँ का राजा बनाया।
इस बात पर मूसा ने स्वथ स्पेन आकर तारीक को कैद किया ।
अन्त में जब इसके विना काम न चल सका तब उसने इसे छोड
दिया। उत्तरी भाग को छोड़ कर शेष देश चार वर्ष में जीना गया।
मूसा का गुरू खलीफा वालिद इसके इस गौरव को न देख
सका और इसे दमसकस वगैरह को खुला भेजा। इसके पहुंचते
ही पलीफा की मृत्यु हो गई। सुलेमान की अप्रसन्नता से
मूसा
को ममा की यात्रा करनी पड़ी। मार्ग में हताश होकर
इसने प्राण त्याग दिये । इसके बाद इसके लड़के अपने पिता के
शोक से राज काज ठीक तोर से न चला सके।
मूसा के बाद आधी शताब्दी का कोई पूरा ऐतिहासिक पता
नहीं मिलता । कुछ रईस लोग नित नये नरेश बनाये जाते और
फिर गद्दी से उतारे जाते थे, इनके अध पतन का मुख्य कारण
वही है जो हिन्दुस्तान में मुसलमानी राज्य का था। यद्यपि विजयी
और पराजित एक ही मत के थे, तथापि जातिभेद से एक दूसरे
से ईर्ष्या रखते थे। हर एक राजा आते ही अपना एक अलग राज्य
स्थापित करने का सकल्प कर लेता था। इससे मुल्क कई राज्यों
में बँट गया। इस पर भी अफरीका के नरेश का कथन था कि
स्पेन का इतिहास यह भूमि हमारे पूर्वजा की जीती हुई है, इस कारण से गवर्नर बनाने का अधिकार हमों को है। उधर खलीफा साहब अपनी ढाई चावल की पिचडी अलग ही पकाते थे। उनको अपने धार्मिक पद का बल था । वह अपनी प्रोर से रईस चुनना चाहते थे, बेकार रईस लोग अपने जीवन-निर्वाह के लिए स्पेन के भीतर रियासते बनाते चले जाते थे । अब राज्य की दशा विलकुल खराब थी। परिणाम यह हुआ कि ईसाइयों को अवकाश मिला और उन्होंने भविष्य के लिए एक राज्य की जड जमाली । इस भॉति देश में कुछ दिनो में दो राज्य स्थापित हो गये। नये शासन के विचार से प्रजा का बर्तान पहले बहुत अच्छा था । पुराने अफसरों से सरकारी काम चलना था । किसान खेती का काम करते थे। किसी की रीति-रवाज से कुछ प्रयोजन न था । यहूदी लोग आन द से वास करते थे। आय तथा कुलीनता के अनुसार उन लोगो से जो "काफिर" मत के न थे खास टैक्स लिया जाता था। समय के साथ साथ ज्यों ज्यों मुसल्मानी राज्य पुष्ट होने लगा, त्यों त्यों वे अपने मत और नियमो को प्रयोग में लाने लगे। औरंगजेब की तरह कई कानून पास कर दिये जिन के अनुसार मुसलमान होना सबके लिए आवश्यक हुआ बाहे वे यहूदी हो या ईसाई । यदि कोई मुसलमान होकर फिर वह स्वय याकोई उसके वेशवाला अपना मन बदलना चाहता था तो उसे शूली दी जाती थी। इनके सिवा और भी कई एक ऐसी ही बाते थी, जैसे जो मुसलमान नहीं है उनका उच्च सरकारी नौकरियो से वचित रहना
७
ओमेद वश।
इत्यादि । इन बातो से प्रजा में प्रबल अशान्ति हुई और राज बल
दिना दिन घटने लगा।
६-श्रोमेद वंश ।
इस मुसलमानी राज्य की जर्जर नौका इवनेही वाली थी
कि
अव्दल रहमान नाम के एक वीर रईस ने उसको |उबार
लिया । अवसिद व श ने इस रहमान के घराने को समूल नष्ट कर
दिया था। यह अपने साहस और चतुरता से अपने प्राण बचा सका।
लोगों की सहायता से इसने शत्रु वश से अपना बदला चुकाया
और स्वय गद्दी पर बैठा। इसने धर्मगुरु स्खलीफों से सबन्ध तोड
दिया। इसका समय विशेष कर मुल्क जीनने तथा घेरियों के
उपद्रवों को शात करने में बीता।
७८६ में बलयो से छुटकारा पाके इसने दो वर्ष तक पूर्ण शाति
से राज्य किया और कारडोघा में एक मस्जिद बनवाई । ७८८ में
अपने तृतीय पुत्र हिसाम को अपना उत्तराधिकारी
बना गया।
हिसाम ( ७८८ -९६ )। इसके दोनों ज्येष्ठ भाई भी गद्दी के
अभिलापो थे पर इसके सामने उन की दाल न गली । इसने राज्य
बढाने का प्रयत्न किया, परन्तु इसे कुछ सफलता न प्राप्त हुई।
इसने अपने पिता की मस्जिद को पूरा वनवा दिया और इसलामी
शिक्षा का प्रचार किया।
मरते समय
।
स्पेन का इतिहास। अलहिकम (७९६-८२२) । यह अपने पिता हिसाम के प्रतिकूल था ! यह आनन्द भोगने ही को जीवन का सार समझता था और कुगन और रोजा कुछ नहीं मानता था । मुसलमानों के पुरोहिन इस से नाराज रहा करते थे। यह वडामायावी और निर्दयी था । पुरोहित (फकीरों) ने अनेक बल वे किये । टोलेडो में विम्राट् हुआ उसको इसने शान्त किया। ८०७ में इसने वहाँ के रईसो को अपने यहाँ के एक उत्सव में निमत्रित पिया। इन भलेमानस को इसने एक कमरे में विठलाया जहाँ कुछ हथियारबन्द लोग छिपा रखने गये थे। इसने उनके द्वाग ७०० मनुष्यों का खून एक दम करा डाला और इस नरद टोलेडो नगर सरदार और मुस्त्रियो से हीन हो गया । इसी भांति ८१४ में दूसरी घटना हुई । इसके सिपाही ने एक लोहार को मारा इस पर कारडोवा में गदर मच गया। यह अपनी चतुरता से बागियों के हाथ से निकल गया। वैर को पूरा करने के लिए इसने शहर में आग लगवा दी। बागी तन मन से माल असबाब बचाने में लग गये। इसने धोखे से उसी समय हमला कर के सारे नगर- निवासियों को देश से निकाल दिया। अब्दुल रहमान द्वितीय (८२२-५२) । यह बडा सीधा और भला आदमी था। इसके समय में मजहबी जोश जोरों पर था। ईसाइयो ने कलह मचा रक्खा था, यहाँ तक कि वे मुहम्मद पर भी खुले मैदान प्राक्षेप करने लगे, परन्तु ग्यारह आदमियों को शूली मिलते ही यह गडबड शान हो गया। मुहम्मद (८५२-८६) । यह अपने पुरखो की अपेक्षा कठोर और कम बुद्धिवाला था। इसने मुसल्मानी जोश में टोलेडो के बडे
प्रोमेद वश ।
महन्त को फांसी देदी । इस प्रकार धार्मिक सहनशीलता उठ गई
मार इस्लाम धर्म के न मानने वालों के साथ कडा बर्ताव होने
था
यह पीडित
ईसाई राज्य की स्थापना का हाल तो हम अभी कह ही चुके
हैं, इस समय एक तीसरा राज्य और स्थापित हो गया। गाथिक
घराने का एक भूसा नामक पुरुप उन्नति की इच्छा से मुसल्मान
हो गया। उसने क्रमश शक्तिमान् होकर एक तीसरा राज्य अलग
स्थापित कर दिया। ८६२ में इसकी मृत्यु होने पर इसके पुत्रों और
ईसाईनरश ने अमीर को बहुत सताया । मूसा के पुत्र
ओमर हफसू का
विप्लव भयकर
इसने
अडुलेसिया में अपना रोष जमाया था ।
काफिरों की रक्षा करता था, इसका बर्तान रुसा पर भला
था । अमीर की उसके सामने कुछ नहीं चलती थी। अमीर से
इसका आतक कहीं अधिक हो गया। सब लोग बिल्कुल निर्भय
रहते और अपना काम करते थे।
मोधिर (८८६-८८) । यह मुहम्मद का पुत्र था, पार
बहादुर पार वीर था, परन्तु इसका थोडा जीवन ओमर के
उपद्रव में समाप्त हो गया।
इसके बाद इसका भाई अब्दुल्ला (८८८-९०२) गद्दी पर
पेठा । इस समय राय में घोर विद्रोह फैल रहा था। अब अरब
सरदार भी अलग विगड रहे थे। अब्दुल्ला ने इनसे डर कर इब्र
२०
स्पेन का इतिहास
।
हफसूं की रेजियो का राज्य दे दिया, पर शाहशाह की
पदवी अपने ही हाथ में रक्खी । परिणाम यह हुआ कि इसके
वश के लोग भी इससे नाराज हो गये । अब तो अरब सरदारों
की बन पडी। अमीर की हिम्मत टूट गई । वे राज्य दवाते ही चले
आते थे। राज्य विलकुल शिथिल दशा में था, परन्तु ८९० में
अब्दुल्ला का सितारा फिर चमका । अपनी सेना को बढा कर
और उसमें एका पैदा करके इसने इन हफ़सू को हराया और राज्य
धीरे धीरे उसके मृत्यु काल तक बढता ही गया।
इसका पुत्र अब्दुल रहमान तृतीय (९१२-६१) रईसो
में शिरोमणि समझा जाता है । इसने खलीफा का पद प्राप्त किया,
देश की बिगड़ी दशा सँभालने के लिए कोप को बढाया और
कृषि, वाणिज्य तथा अन्य उन्नतिकारी विभागो को उच्च श्रेणी पर
पहुँचा दिया। इसने जहाज और एक उत्तम सेना सजाई जिससे
फातिमा वशी लोगो एव उत्तरी ईसाइयो को इसने परास्त किया।
फातिमा वश के लोग अफ्रिका में अपना राज्य दृढ कर रहे थे । यह
निश्चय या कि ज्यो ही वे इस कार्य को समाप्त कर पायेंगे, त्यों
ही वे स्पेन की ओर मुंह फेरेंगे। अब्दुल रहमान ने इनके शत्रुओ
से मेल कर लिया और उन्हें सहायता भी दी। इस प्रकार जिया
ल्टर का नाका इसने अपने अधिकार में कर लिया।
उत्तर में ईसाई लोग धमकाते चले आते थे। ९९८ में अमीर ने
एक उत्तम सेना तैयार की मार सेंको, अल्फोंजो तृतीय एव उसके
पुत्र प्रारडोनो
ही मैदान में
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ग
मोमेद वश। २१ पछाडा, परन्तु फिर भी इन विकट वैरियों का मन कुछ भी न मेला हुआ । ९२१ में आरडोनो द्वितीय अमीर के राज्य में घुस आया । ९२३ में सेंको ने अमीर से विग्यूरा छीन लिया । अमीर का यह सकट शत्रुओं के जीवन के साथ ही समाप्त हुआ । आरडोनो के बाद ईसाइयो की उन्मत्तना कुछ काल के लिए कम हो गई , असहाय होने से सेंको की पत्नी ने सलीफा को सम्राट मान लिया। ९३९ में यह फिर ईसाइयो में द्वितीय रोमियों से हार गया। ९६० में राज्यच्युत सेंको को अमीर ने लियोन की गद्दी पर बैठाया इस महान कार्य के बाद ही ९६१ में यह परलोकवासी छुआ। इसने ऊँचे ऊँचे ओहदे विदेशी स्लाव लोगों को दिये थे, इसलिए अरबी लोग उन पदो से वचित रहने के कारण इससे दिक रहते थे। अलहकम द्वितीय (९६१-९७६)। यह साहित्यसेवी था । इसके पुस्तकालय में चार लास्त्र पुस्तके थी, उनमें से बहुतों का इसने अध्ययन किया एवं उन पर टीकाएँ लिखी या लिनवाई । राजनीति की ओर इसका कम ध्यान था और युद्ध इसे अप्रिय था, यहाँ तक कि सेंको के सन्धि की प्रतिज्ञा को भग करने पर इसने एक बार युद्ध ठाना, परन्तु शीघ्र ही उससे हाथ खींच लिया। इव्रअबी-अमीरया अलमंसूर एक राजा के माननीय कुटुम्ब की सतान था। इसे बचपन से यह सुझा दिया गया था कि तेरे भाग्य में राजपद लिखा है । इसने अपनी चतुरता तथा खलीफा- । इन सोम के अच्छे बर्ताव से शीघ्र ही उन्नति की, और अमीर के अत समय तक उच्चपद प्राप्त किया । कहा जाता है कि रानी सोभ । इसकी उपपत्नी थी। T
૨૨
स्पेन का इतिहास
हिसाम (९७६-१०१३)। यह इस समय १० वर्ष का में
प्रजा को तत्कालीन मंत्री मुशफी का प्रधान रहना पसदन
इसलिए हिसाम का चचा मुधिर मन्त्री बनाया गया । अमीर स्व
मेव यह पद चाहता था । भाग्यवश राजमाता सोम भी उस
शुभचिन्तक हो गई थी। इससे इसकी मनोकामना फलती च
जाती थी । इसने दूरदर्शिता के साथ ऐसे दाँवपेच ठीक कर रख
थे कि बादशाही इसी के घर का स्वत्व हो जाय।
इसने मुधिर को मरवा डाला । हिसाम नाम मात्र =
खलीफा था। मुशफी धन-सम्बन्धी कपट के अभियोग में निका
दिया गया। आमिर ने अवोध खलीफा को एक उत्तम मह
में रक्त्रा, जो वास्तव में कैदखाना था। उसे कोई शिक्षा न
गई और वह निपट नादान रहा । ऊँचे ऊँचे ओहदे विदेशियों में
दिये गये, जिससे राजवशी विद्रोही पुरुष निर्बल हो गये।
९८१ में इसने राविरो तृतीय को एक घोर सग्राम में हराय
और उसके दो परगने ले लिये । अब इसने अपना नाम अलमंसू
रस्वा । ९८५ में इसने केटलोनिया पर चढाई की, जो फरासी
सियों के अधिकार में था। इसने बारसिलोना लूट लिया, ९८
में भयकर धावा करके राविरो की रियासत छीन ली और कि
का विध्वस करवा दिया। केवल विजय-चिन्ह के लिए ए.
फाटकमात्र छोड दिया।
। मोमेद यश। ૨૨ इतने में रानी सोम से इसकी अनबन हो गई, और उसने इसके निकाल देने का प्रयत किया । सोम ने अपने पुत्र हिसाम को समझा बुझा कर सीधा किया, पर यह पहले ही से हाथ कटा चुका था, क्योंकि उसने अपने सब अधिकार अलमंसूर को लिख दिये थे। आमिर की चारो ओर विजय हो रही थी और लोग इसके आतक से थर्राने लगे थे। यह रण-क्षेत्र में कभी नहीं हारा पर सभी लोगों के दाँत न करता रहा । इसने पुल पार सडके भी बनवाई । यह कुछ अध्ययन भी करता था । लोग इसे धर्मप्रिय समझते थे। केवल पलीफा का पद तो इसे नहीं मिला बाकी सब तरह राजसी आनन्द भाग के बाद १००२ ई० में यह परलोक- वासी हुआ। इसके बाद कोई पराक्रमी राजा नहीं हुआ और थोडे ही समय में अनेक अप गुद्धि राजा हुए, जो राज्य के वृक्ष की जड को ही काटते चले गये । अब इसका पुत्र अब्दुल मलिक मुजफ्फर ( १००२-८) मत्री हुआ और कुछ कुछ पिता ही का अनुसरण करता रहा । अन- न्तर इसका भाई अदुल रहमान उस पद पर नियत हुआ, परन्तु मुसलमान लोग इसे शराबी होने तथा इसकी माता के पहले ईसाई होने के कारण नहीं चाहते थे। इस से यह अन्त में निकाल दिया गया। अब्दुलरहमान तृतीय के प्रपात्र मुहम्मद ने इस समय बलवा किया। इस ने खलीफा को कैद कर लिया । मुहम्मद ૨૪ स्पेन का इतिहास . प्रधान मन्त्री के पद से सतुष्ट न हुआ। इसने खलीफा को एक अगम्य कारागार में डाल कर विल्कुल उसी स्वरूप के एक ईसाई का मृतक शरीर मनुष्यो को दिखा दिया और इस तरह पलीफा की मौत कीप्रतीति करवा के इसने अपने को उस पद पर बिठाया। कहर मुसलमान इसके पक्ष में थे, इनके लिए इसने अफसरों में अनेक तबदीलियों की । इस पर जङ्गी जवान बिगड उठे, और उन्हों ने ओमेद वश के एक सुलेमान नामक पुरुष का झडा फह राया । १००९ ई० में अलमहदी लडाई में हार गया । तब इसने हाशिम को जीवित दिखा के अपना मतलब बनाना चाहा, परन्तु सफलता न हुई । अनन्तर हाशिम हस को लेट गया । ईसाइयों की मदद से मोहम्मद फिर एक बार लड़ा, पर फिर भी परा- जित हुआ। इस बीच हब्स से लौट कर हाशिम गद्दी पर बैठा और मोहम्मद राजा के सामने मारा गया, परन्तु १०१३ में सुलेमान ने राज्य छीन लिया और पराजित राजा कहाँ चला गया । अब सुलेमाम(१०१३-१६) पलीफा हुआ। लोग इससे अप्र- ''सन्न थे । इधर उधर के शासको ने अपने अधिकार बहुत कुछ जाये । स्लाव जाति के विदेशी राज्य कर्मचारी इमके शत्रु अली का दामाद अलीहमूद और खैरखां इस से लडने को उद्यत हुए । बेरबेर जाति स्वदेशानुराग के कारण सुलेमान की शत्रु और अली की सहायक हो गई । १०१६ में सुलेमान राज्य- ध्युत हुआ ! १०१७ में किसी ने स्नान करते समय उसे मार डाला।
ईसाईमतावलम्बी राजधश ।
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अब अली पलीफा और खैर खां प्रधान मत्री हुआ। खैर
खा इस बात से भी असतुष्ट रहा । वह ओमेद वशी राजा होना
चाहता था, इसलिए उसने अब्दुल रहमान तृतीय के पौत्र
अब्दुल रहमान चतुर्थ (१९१७-२३) को गद्दी पर बिठाया।
इस के पाँचौ वर्ष अली के पुत्र के साथ झगडो में बीत गये ।
प्रत में लडाई ही में यह काम आया।
उक्त महदी का भाई अब्दुल रहमान अब पञ्चम राजा
हुआ । यह दो ही महीने शासन करके मर गया । मुहम्मद अब्दुल
रहमान (१०२३२५) उस का उत्तराधिकारी हुआ । अनन्तर
यहिया (१०२५-३१) उसको निकाल के खुद खलीफा बन गया।
शीघ्र ही बागियों ने इसको भी मार गिराया । अब मुरतजा के
भाई हिसाम तृतीय ने (१०३१-३६) राज्य-भार हाथ में लिया।
इस समय सब राज्यकर वद हो गये थे, जैसे हो सका, तैसे इसने
भी पाँच वर्ष तक आनन्द से सरगोसा में विताये, इसी के साथ इस
घराने का अन्त हो गया। इन सब उलट फेरों का परिणाम यह हुआ
कि ईसाईयों को अपना प्रभुत्व बढाने का अच्छा मौका हाथ लगा।
७-ईसाईमतावलम्बी राजवंश ।
सिगाधिक जाति के पेलयो नामक एक कार्य कुशल
पुरुष
ने
कुछ सिपाही लेकर कावडाग के पर्वत की कदराओं में
मासन जमाया। जिन लोगो को अमीर का शासन असह्य था,
J
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स्पेन का इतिहास।
उनको इस स्थान में आश्रय मिलता था, इस तरह से इनकी वृद्धि
होती चली गई। अब्दुल रहमान की राजगहो के झमेले में
इसके पात्र अलफाजो प्रथम ने रियासत की नीव डाली ।
धीरे धीरे उन्नति होती गई । इसने बेर बेर जाति को हराया।
इसके पुत्र फूला प्रथम (७६६-७५) ने प्रोविदो को राजधानी
बनाया। थोडे दिनो में इस को किसी ने मारडाला। इस के पीछे
इसका चचेरा भाई ओरोलया तथा भतीजा सैलो गद्दी पर बैठे।
ये अब्दुल रहमान के शरणागत हो गये । सैलो के पश्चात्
अलफ़ाजो द्वितीय (७८४-८४२) गद्दी पर बैठाया गया । यह
अलफाजो शुद्ध कहलाता था, इसके समय में राज्य दृढ हो
गया । पश्चिम में छ वर्ष तक अलफाजो प्रथम का अविवा-
हिता स्त्री से पुत्र राज्य करता रहा।
इसी समय एक दूसरी किस्तानी रियासत स्थापित हो गई।
अलहकम के शत्रु ओ ने बार्सीलोना के चार्लस से सहायता
ली, उसने अपने पुत्र लुई को भेज दिया । इसने एक साल में इब्रो
तक सब भूमि ले ली। कुछ कारण से वह ८०१ में लौट गया
परन्तु इम्रो पर एक बेरा नामी योग्य पुरुप छोडता गया, जिसने
राज्य पर आँच न आने दी।
चार्लस के परलोकवासी होने पर उसकी बारसिलोना
नामक रियासत का बेरा अधिकारी हुआ, परन्तु इसका देश
ईसाईमतावलम्बी राजवश। निकाला हो गया और वेर्नहार्ड रियासत का स्वामी बन गया। दैवयोग से इसका भी देश निकाला हुआ और यह मार भी डाला गया। अत में नवीं शताब्दी के परार्ध भाग में यह रियासत विलफिउ को मिली। इस की मौत के उपरात ९०७ से यह रियासत इसके घर की जागीर हो गई। फिर धीरे धीरे वह बढ़ती चली गई। अलफ़ांजो द्वितीय के बाद राविरो प्रथम ( ८४२-५०) तथा पारडोनो प्रथम { ८५०-६६) सदामध्यस्पेन के झगडे ही में निमग्न रहे। अलफांजो तृतीय महान् (८६६-९१०) के समय में राज्य की उन्नति हुई । इसने प्रोविडोछोडा लिया और उसे अपनी राजधानी बनाया | मत समय इसने अपनी रियासत अपने तीनों पुत्रों में बांट दी । ९३१ में राविरो द्वितीय ने फिर रिया- सन एकत्रित करली । यह चतुर और पराक्रमी था। आरडोनो तृतीय (१५०-५७) अपने पिता का अनुसरण करना चाहता था, परन्तु इसका ससुर और भाई सेको इसके कटक हो गये । सेको प्रथम (९५७-६६) ने खलीफा से मित्रता करली । राविरो तृतीय (९६६-८२)के दुष्ट दरबारियों ने इसको राज- सिंहासन से उतार के इसके चवा बेरमुडो द्वितीय (९८२--१९) को गही पर बिठाया । यह अत्यंत भोला भाला मनुष्य था । इसके पुत्र अलफांजो पंचम (९९९-१०२८) ने रियासत बड़ी ૨૮ स्पेन का इतिहास। बुरी दशा में पाई। इसने अपनी लियाकत से पिता के इस फलक को मिटा दिया । यह नीतिज्ञ था । इसका पुत्र वेरमुडो तृतीय एक सग्राम में सेत आया। दशवीं शताब्दी के अत में स्खुवी जाति ने उत्तर में विस्के-खाल के समीप नवेर नामक एक चौथी रियासतसडी की। सेंको इसका सस्थापक था। विस्केपाल के पहाडी स्थान होने के कारण शत्रुओं की शंका नहीं रहती थी । जैसे ग्रारों की अवनति होती जाती थी, तैसे ही यह निर्भय होता जाता था। इसके पुत्र सैंको महान् (९७०-१०३५) ने गरसिया की वहन से शादी करली थी। इसके साले के मार डाले जाने पर इसे घेरमुडो पर चढाई करने का बहाना मिल गया, और एक घोर सग्राम में विजय पा के इसने बहुत कुछ लाभ उठाया। कुछ दहेज के रूपसे और कुछ अपने पराक्रम से इसने रियासत खब बढाई । अत समय इसने राज्य को अपने चार पुत्रों में बाँट दिया । इस अवसर को पाके घेरमुडोने अपने पहले प्रभुत्व की अभिलाप की और युद्ध ठाना, परन्तु वह स्वय ही लड़ाई में काम आया। फिर इन भाइयों में बडी लडाई छिड गई । परिणाम यह हुआ कि फर्डिने ड और राविरो के आधिपत्य में केस्टाइल और आरागन की दो रियासतें शेष रह गई । फरडिनेंड प्रधम (१०३७-६७) ने नाश को प्राप्त मुसलमानी राज्य का बहुत कुछ भाग ले लिया और अमीर भी इस के शरण में आ गया । इसने मरते समय अपना राज्य तीन पुत्रों में वॉट दिया, तब भी फूट एव वैर ने पीछा न छोडा । सन् १०७२ में अलफ़ांजों चतुर्थ ने उसे सम्मिलित किया ।
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ईसाईमतावलम्बी राजवश ।
। राविरी प्रथम (१०३५-६३) मूअर जाति क लोगों के झमेले में
। पड गया। इस के पुत्र सेंको राविरो (१०६३--९४) ने अलफांजी
पष्ट की सहायता से नवेर जीत लिया , और आपस में इस
• देश का आधा राज्य बाँट लिया। इस के वाद पेड़ो ( १०९४-११४ )
! तथा अलफांजो प्रथम ( १९०४-११३६ ) ने सरगोसा इत्यादि
ले लिये | अब सरगोसा आरागन रियासत की राजधानी
। हुआ।
स्थान
इस समय पोप ग्रेगोरी सप्तम के धार्मिक उत्साह सागर ने
ऐसी बेढब लहर ली की सारा स्पेन उस में शरायोर हो गया। आज
से स्पेन रोमन कैथोलिक मत का कट्टर अनुयायी हुआ।
केस्टाइल के अलफांजो पष्ठ ने अच्छो उन्नति की और
महाराजाधिराज का पद प्राप्त कर लिया। इसका बुढापा शोचनीय
रहा। ११०८ में इसका एकलौता पुत्र से को लड़ाई में मारा
गया। १९०९ में यह स्त्रय परलोक को सिधारा।
अब इसकी पुत्री उरका सम्राझी हुई । यह विधवा थी। दोनो
रियासते सम्मिलित करने के हेतु इसकी सगाई आरागन के
अलफाजो प्रथम के साथ की गई। उरका अपने प्रथम
पति से उत्पन्न पुत्र अलफांजो सप्तम को सम्राट् बनाना चाहती
थी, इसलिए उसने केस्टाइल के प्रधान पुरुषों को भडकाया ।
में फल यह हुआ कि दोनो रियासते फिर अलग हो गई ।
प्रत
३०
स्पेन का इतिहास।
अलफ़ांजो मुअरी को अपने अधिकार में लाना चाहता था।
परन्तु ११३४ में यह पराजित होगया । यह इसी शोक से मर गया।
इसने अपना राज्य धर्म के लिए सकल्प कर दिया था। रियाया
ने इसे अस्वीकार किया और इसके भाई राविरो द्वितीय (१९३४-
३७) को महन्ती के पद से बुलाकर उसे राजमुकुट पहना दिया ।
इसने अपनी दो वर्ष की कन्या पेट्रोनिला की सगाई घेरेगर चतुर्थ
के साथ करके पुन साधुमठ में वास किया । इस कन्या के पुत्र
अलफाजों द्वितीय के समय (११६२ ) से कैटेलोनिया और आरागन
नामक रियासतें सदैव के लिए सम्मिलित हो गई ।
अब केस्टाइल और पारागन ईसाई राजाओं की मुख्य रियासते
रही, जो पीछे से फर्डिनेंड और इसैवेला के समय में एक में
मिली।
८-मुसलमानों का अधःपतन ।
मुसलमानी राज्य के नष्ट होते ही अनेक छोटी छोटी रियासते
सड़ी हो गई । इन सब में सेविल प्रधान थी। इसका रईस
अलमोतमिदथा। इस पर भी अलफाजो पष्ठ ने धावा किया । यह
अमीर अलफ़ाजो का आगमन देख कर डरा और रक्षा के लिए इसने
मोराको के महाराज यूसुफ तशी की शरण ली । इधर
अलफांजो ने भी आरागन इत्यादि से एका कर लिया। फिर भी
सन् १०८६ में इस ८० वर्ष के वुड्ढे यूसुफ ने जल्लाक की लड़ाई
सुसल्मानो का अध पतन। में ईसाइयों को पूर्ण पराजय दी। अलफ़ीज़ो को जान बचाना मुश्किल हो गया। इसी अतर में यूसुफ के ज्येष्ठ पुत्र की मौत हो गई और यह अफ्रीका लौट गया। अलफाजो ने सुअवसर पाके फिर आक्रमण किया और मरसिया और अलमेरिया को घेर लिया। इधर यूसुफ मराको पहुँचा और १०९० में पुनरपि स्पेन को आया । इसने केवल ईसाइयो से भिडना ठीक न समझा और पहले अमीर मोतमिद ही को निकाल बाहर किया। यह चेचारा भागता फिरा और सहारा हूँढता रहा पर किसी ने भी न सुनी, पत में वह पफ्रिकेनस के हाथ आया और कारागार में छोड़ दिया गया। ईसाइयों की ओर रुई दिबाज़ कम्पीउर नामी एक धुरधर वीर हो गया है, यह दिसिड के नाम से प्रख्यात था । १०९४ में इसने वेलेंसियाकी विजय प्राप्त की थी, परन्तु यह १०९९ में काल- अस्त हुआ। यूसुफ ने अवसर पाके चेले सिया भी कुब्जे में की, थोड़े ही समय में इसने खडित रियासत को पुन एकत्र किया, परन्तु ११०३ में यह अपने पुत्र को सारे अधिकार दे कर जन्मभूमि को लौट गया और ११०६ में इसने शरीर छोडा। इस समय मु० अब्दुल्ला नाम का एक पुरुष अरम से पफ्रिका में आया। यह महदी के नाम से विख्यात था। इसने अल्मुहेद नाम की एक नई प्रणली निकाली, इसके उपरांत ३४ स्पेन का इतिहास। यफ था। इसने सलमका के विश्वविद्यालय को पैरिस एव आक्स फोर्ड यूनीवर्सिटी के मुकाबिले को पहुंचा दिया। ईसाई और अरबी शास्त्री इसके दरबार में रहा करते थे । इसने सीटपर्तिदस" नामक एक उत्तम न्यायशास्त्र रचा था, जिसका उचित प्रयोग १३४८ से हुआ। इसे एक समय रोमाधीश होने तथा ऐश्वर्य बढाने की सूझी। इस कारण इसने राजा चुनने वालो को रिश्वत दी और दरबार भी उसी प्रकार उत्तम रीति से सजवाया। रुपये का खर्च ज्यादा होने से इसने कर बढ़ा दिया और सिक्के भी वास्त विक मूल्य से अधिक कीमत पर चलाये । १२७५ में मूअरो से सग्राम में इसका ज्येष्ठ पुत्र काम आ गया । पुराने रिवाज के मुनाविक राजा का दूसरा पुत्र सैको युवराज वनाया गया। इसकी पत्नी इगनो अपने पुत्र फार्डनेंड फाराज तिलक चाहती थी , उसके भाई भी अपने भांजे की सहायता को उपस्थित हुए। । इसो अवसर पर अल्फोंसो दशम और उसके पुत्र में अनबन हो गई । इस विरोध से इसके अनेक छोटे भाइयों तथा मूअर लेागो ने लाभ उठाया। जिसका फल सैंको चतुर्थ ( १२८४-९५) को भोगना पडा । समस्त रियासत बट कर छिन्न भिन्न हो गई । सेंको की मौत के बाद इस रियासन की और भी दुर्दशा हुई जब कि एक अबूझ बालक फर्डिनेंड चतुर्थ (१२९५-१३१२) के सिर पर यह राज्यभार पडा । इसकी नाबालिगी में इसकी माता सँको के वचनानुकूल राजकाज करती रही । इस अबला के हाथ राज्य- प्रबन्ध को देख अनेक राज्यलोभी घिर आये। एक ओर से इसका कैस्टाइल के राजा लोग। देवर जान और दूसरी ओर से इसका छोटापुत्र अलफोजों अपने मामा फ्रासाधीश तृतीयफिलिप के बाहुबल से गया। पीछे से पोप ने कहा कि मैंको का व्याह नियम के विरुद्ध हुआ था, इसलिए फर्डिनेंड को कोई अधिकार ही नहीं है। फिर भी इस स्त्री ने अपनी बुद्धिमानी के प्रभाव से अपना मतलब बनाया । यह कभी स्वय दब जाती थी, और कभी युद्ध करने को उद्यत हो धमकाती थी । ऐसी ही माया से यह काम निकालती रही। पुत्र के बालिग होते ही इसने सब राज्य कुशलपूर्वक उसके हाथ में दे दिया। फटनेंड चतुर्थ कठोर हृदय पुरुप था, इसलिए इसके गद्दी पर बैठते ही फिर विद्रोह की सभावना हुई, पर १३०५ में केभिली में सुलह हो गई । इस सन्धि के अनुसार इसने थोडी सी भूमि अलफोंजो को प्रदान कर दी, जिसका पुत्र यहाँ आकर बसा और जिससे मेडिना सिडोनिमा वश चला। इसके वर्ताव के कारण राज्य में कभी शान्ति न रही। इसने दो बार प्रण किया था कि बिना पूर्ण परीक्षा किसी को राजदड न दिया जायगा फिर भी इसने बिना किसी से पूछे और जाँच दो भाइयों को प्राण-दड दे दिया। इसी परकिसी ने इसको रात्रि में सोते समय सदा के लिए सुला दिया । इस समय इसका पुत्र अलफांजो ग्यारहवा ( १३१२-५० ) केवल दो वर्ष का बालक था । गत राजा के भाई डान पेड्रो और चचा डान जान में उसके वली बनने के बारे में झगडा हो गया। तीन वर्षे किसी का शासन ही न रहा । सवको अपनी अपनी पड़ गई । प्राणरक्षा के हेतु चे राजा को अविला के गिरजा स्पेन का इतिहास। घर में भगा ले गये। पडोसी राजा लोग अरक्षित राज्य की ओर अपने हाथ फैलाने लगे। अत में पाप और सैको चतुर्थ की पत्नी ने दोनों में सुलह करा दी। पेड्रो को पूरबी एवं दक्षिणी प्रान्त और जोन को उत्तरी और पश्चिमी सूवे मिले। रईस प्रनाडा से युद्ध करने में ये दोनो मारे गये । अलफ़ांजो बडा कठोर और निर्दयी था । इसने अपने चचेरे भाई को निमंत्रण के बहाने बोला कर मार डाला । अलफोंजों दशम के समय से राजा के कर लगाने के कारण अशान्ति चली आती थी। वह अशान्ति समय के साथ बढती गई । इसे शान्त करने को १३२८ में इसने दो कानून बनाये । इन कानून से कोरटेस नामक एक कार्यकारिणी सभा बनी, जिसे अनेक अधिकार मिले । इसमें पादडी, रईस लोग और जनसमुदाय के प्रतिनिधि रहते थे। इन प्रतिनिधियों को शहर की शासन- सभाओ के मैजिस्ट्रेट लोग चुनते थे। राजा ने यह नियम किया कि (१) राज्य के सब प्रधान कार्य इस समाज की सम्मति से किये जाय और (२) राजा बिना इस की सलाह के कोई कर न बाँचेगा । इतना अधिकार देकर भी यह निर्भय रहता था, क्योंकि चुनने का काम मजिस्ट्रेट का था, इसलिए नगरनिवासी उसी की तरफ़ हुआ करते थे और रईस लोग कुछ करही नहीं सकते थे। इस सभा से युद्ध-व्यय के लिए इसने हर एक पुरुप की मालियत का बीसवाँ अश पाने की सम्मति ले ली - पुर्तगाल-नरेश की पुत्री के साथ विवाह करने के प्रयोजन से इसने अपनी प्रथम पत्नी को छोड दिया । दूसरा विवाह त हुआ, . - कैस्टाइल के राजा लॉग । परन्तु यह एक और परम सुन्दरी रमणी के प्रेम में फैमा था, अत: इसने दूसरी पतो के भी दूर करने का प्रयत्न किया। तब दोनो पत्नियों के पिताओं ने इस पर अस्त्र गहे । दो वर्ष (१३३५-७) के बाद बड़ी कठिनता से इसने उनको शान्त तो कर पाया, पर इसे पुर्तगाल की राजकुमारी को रानी बनाना हो पड़ा। यह सुलह बहुत ही सामयिक हुई क्योंकि १३३९ में . फेज का रईस अबुल हकम जिब्राल्टर पार कर स्पेन पर चढ आया। अनडा के रईस ने इसे राजाधिराज माना। १३४० में इसने मूगे को सलेडो नदी के तट पर परास्त किया, परन्तु फिर यह अफ्रीकालैट गया ग्रनडा और अफ्रीका का सम्बन्धभग करने के लिए अलफाजो ने १३५० में जिब्राल्टर घेर लिया, परन्तु प्रयोजन सिद्ध होने के प्रथम ही यह प्लग-रोग से पीडित होकर चल पसा। पेड्रो प्रथम ( १३५०-६९) । यह क्रूरता में अपने पिता से पाँच पैग आगे था, अत इसका नाम पेड्रो "निर्दयो" पडा । इसने कुछ अत्याचार तो रईस को निर्बल करने के विचार से किये, पर विशेषतया यह उसका स्वभाव ही था । यह १६ वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठा । इसकी माता ने सातिया-डाह से राजा के हाथों से एलीनर दि गुजमैन को कैद में मरवा डाला । मैरिया नाम्नी एक महिला से पेड्रो अपना विवाह पका कर चुका था, पर फरासीसियों से मेल करने की दृष्टि से इसने ब्लांश
स्पेन का इतिहास।
से विवाह कर लिया। इस पर इसके एक मित्र अलफांजो त
अन्य रईसों ने कलह उठाया, जिस को इसने कठोरता से शा
किया । लाश के रहते ही यह एक और स्त्री पर आसक होकर उ
भी अपनी पत्नी बनाना चाहता था, लेकिन फिर मैरिया की में
इसका मन फिर गया। इस पर पोप और फ्रास-नरेश ने झग
किया और उन्होंने पेड्रो को घेर लिया। इस ने अपनी रक्षा के लि
ब्लाश को धर्मपत्नी माना और शिकार खेलने के बहाने से य
एक दिन घेरे से निकल गया, और ( १३५५-६) शत्रुओं
बदला चुकाने में भी समर्थ हुआ।
१३५६ में इसकी आरागन से लडाई छिड गई, जो इस
जीवन-काल भर होती रही। एलीनार का ज्येष्ठ पुत्र हेनरी अ
गन की मदद पर था । रईस लोग यद्यपि इससे नाराज थे पर प्रः
पर इसका नन्न भाव रहता था, अतः रईस इसका कुछ .
न बना सके। इधर मौका पाकर इसने लाश को मरवा डाला पै
१६६२ में शपथ खा कर मैरिमा को रानी बनाया।
हेनरी १३६५ में फ्रास की सहायता से एक बड़ी सेना ले व
चढ आया। इस समय फ्रास और अगरेजों में युद्ध हो रहा था
पेड्रो अँगरेजों का साथी बना और १३६७ में अंगरेजों की सहायर
से इसने नजेरा की लड़ाई में विजय पाई। हेनरी
उसका सैनिक बर्चा कैद कर लिया गया। इतने ही में अंगरे
दल में ज्वर-रोग का प्रवेश हुआ तथा अन्य कारणों से उस द
का सेनापति राजपुत्र ब्लैक सिवापस चला गया। इसी अवस
भाग गया
- कैस्टाइल के राजा लोग। पर हेनरी ने फिर फौज लेकर १३६९ में मांटील की लड़ाई में निजय पाई और पेड़ो को मार ही डाला । पेड्रो के एक पुत्र और दो पुत्रियाँ थों । बालक बचपन ही में मर चुका था। बालिकायें ब्लेक प्रिस के भाइयों को विवाह दी गई । हेनरी द्वितीय (१३६९-७९) । यह न तो पिता के नाते से पार न पनो के सम्बन्ध से राजपद का अधिकारी था, पर पीडित प्रजा ने इसे प्रसन्नता से राजा चुना, इस पर पुर्तगाल के पेड्रो प्रथम ने अपनी दादी की ओर से स्वत्व प्रकट किया, और जान ने अपनी स्त्री की ओर से । पेड्रो ने विजय प्राप्ति को अपनी शक्ति के बाहर समझकर और जान को अधिकारी अड्डोकार करके अंगरेजों से मेल किया। इस पर फ्रास ने उपयुक्त विजयी हेनरी की सहायता की, उसने तुरन्त पुर्तगाल पर हमला करके राजधानी लिस्बन को घेर लिया । पेड़ो को सुलह करनी पड़ी। दो वर्ष बाद हेनरी ने आरागन से भी सधि कर ली। जान प्रथम (१३७९-२०) । इस का राजत्वकाल पुर्तगाल से झगडा ही में पूरा हो गया । १३८३ में पुर्तगाल और केस्टाइल में वधिहुई । अब फर्डिनेंड की बेटी बीट्रिक्स की सगाई केस्टाइल नरेश के पुत्र के साथ तै हुई, और यह भी तै हुआ कि इस राजकुमारी की सतान को राज्यपद मिलेगा। कुछ मास के बाद फर्डिनड की मौत हो गई और उसकी पत्नो पुर्तगाल की अध्यक्षा धनी, पुर्तगाल वालों ने गत नरेश के भाई जान को राजा बनाया। । - H -
स्पेन का इतिहास !
१३८४ में जान प्रथम ने लिस्बन घेर लिया, परन्तु पाँच महीने
के व्यर्थ परिश्रम के बाद वह पुर्तगाल से लौट आया । इगलिस्तान
का जान पुर्तगाल के पक्ष पर था। १३८५ में एजुबरोटा की
ललाई में पुर्तगाल ने फेस्टाइल को परास्त किया । १३८७ में
घेट के जान पर जान प्रथम में सधि।हो गई । इस के पीछे भी
पुर्तगाल से झगडा चिर काल तक स्थिर रहा । ।
हेनरी तृतीय (१३९०-१४०६) । यह अपने ग्यारहवें वर्ष ही
सिहासनारूढ हुआ। गत राजा के नियमों के अनुसार राजकाज
वडी समा पर निर्भर रहा। इस समय पादड़ी एव रईस बहुत
बलवान हो गये और नाना भांति के नये उपद्व उत्पन्न होने लगे।
१३९३ में इसने राज्यप्रबध अपने हाथ में लेकर बड़ी चतुरता,
और वीरता से बखेडियों को शात किया, और पडोसी रईसो से
अपनी छिनी हुई जमीन भी लेली। इसके राज्य में कोई बाहरी
- झगडे नहीं हुए क्योंकि इंग्लैंड और पुर्तगालनरेश इसके सम्बन्धी
थे। २७ वर्ष की अवस्था में इसका शरीरान्त हुआ।
जान द्वितीय (१३०६-१४५४)। यह अभी ३ वर्ष का बालक
था और उसका चचा फार्डनेंड राज काज चलाता था । इसने
लोगों से एटीक्वेरा ले लिया । १४१७ में इस की माता की
मौत हो गई। तब जोन के ऊपर राज भार पडा। यह बडा आलसी
पौर अयोग्य पुरुष था। इसने सारा भार अलवरो पर
छोड़ दिया। इस राजमत्री ने रईसों के आक्रमणों को अपनी वीरता
और चतुरता से दमन किया और राज्य पर वार न आने दिया।
"
- कैस्टाल के राजा लोग। जान की दूमरीस्त्री इसैवेला ने कुपित हो कर इसे निकलवा दिया। मन में इसे प्राण दड मिला। १४९३ में एक वर्ष बाद यह राजा भी मरगया। हेनरी चतुर्थ बल और बुद्धि का वैरी था। इसका उपनाम "अशक्त' था। इसका मित्र मारस्विस आफ विलेना मन्त्री था। हेनरी का व्याह पुर्तगालनरेश की पुत्री ज्वाना से हुआ। उपयुक्त मारकिस के स्थान पर अब 'बेल्टन दिला क्यूला' नियत हुआ । यद्यपि शासन में कोई कठोरता न थी तब मो प्रजा पर इनका प्रभुत्व न रहा और गदर सा मच गया। १४६५ में मारकिस और केरिलो के कारण बलवा शात हो गया। बागियों ने राजा की एक प्रतिमा बनाई और उस के राज्यच्युति के सब सस्कार किये। उसका भाई अलफांजो राजा बनाया गया । यह १४६८ में मारा गया। तब इसकी बहिन इसाबेला, रानी हुई। इसने चतुराई से कहा कि में अपने बड़े भाई से लडना नहीं चाहती । इस प्रकार सधि हो गई । इसाबेला को युवराज्ञी का पद मिला ! राजपुत्री के मामा ने अपनी भांजी के लिए बड़ा प्रयत्न किया पर कुछ भी न हो सका। हेनरी के बाद इसैरेला हो गद्दी पर बैठी। इसने पारागन-नरेश फडिनड से अपना विवाह कर लिया। इस सम्बन्ध से स्पेन में एक नवीन सृष्टि ली गई। M *Ash- उसका चचा नाराश्य अपने बेटोम बाँट देना चाहता छोड़ दिया। इस राजमत्री ने रईसा के आक्रमण और से सिसली पर । स्पेन का इतिहास १०-पारागन के राजा लोग। (१२१३-१४७९) । अलफोंसो 'द्वतीय के वाद पेड्रो प्रथम (११९६-९२१३ ) से प्रजा अप्रसन्न हो गई थी। प्रथम कारण यह था कि इसने गद्दी पर बैठने के समय पोप को न माना था और दूसरे इसने प्रजा पर कर बढा दिया था। सब ने एका कर लिया और इसको कर घटाना पडा, इस तेरहवीं सदी से ईसामसीह की जन्मभूमि जेरुशलेम को बचाने के लिए क्रूसेड नामक युद्ध की वायु बडे वेग से यह रही थी। इसने भी उसी में अपने प्राण खोये। जेम्स प्रयम (१२१३--१२७६) । इसने केटोलोनिया के चतुर मलाहों की मदद से वेलेरिक द्वीपों को (१२२९-३३) ले लिया। यह द्वीप-समूह मुसलमानों और समुद्री डाकुप्रो का दुर्ग था जो कि ईसाई रियासतो के सैनिक थे। जेम्स ने १२३८ में वेलें सिया को विजय क्यिा, और २२६६ में मरासिया जीत कर अलफासो "बुद्धि दी। अब मुअर रियासतों में केवल मनहा ही भर लोगों से एटीक्वेरा ले लिए 'पनेक उपद से. सामना करना पड़ा, मौत हो गई। तब जोन के ऊपर राज. और अयोग्य पुरुष था। इसने सारा को प्राप्त हुया ! . . का परलोकवास हो जाने से . और चतुरता से दमन किया और राज्य पर वार . है.अनुयायी अल- पारागन के राजा लोग। । फोसो तृतीय दोनों की आयु ज्यादातर इसी झगड़े में समाप्त हो गई । १२८३ में यह द्वीप इनके हाथ मा गया । नेपल्स नरेशो के गडबड से यह कुछ भी न दबा । प्रजा ने पेड़ो को हथियार-चन्द 3 सिपाहियों की आवश्यकता देखकर अपना मन्तव्य सिद्ध कर लिया और सार्वजनिक स्वत्वो की मजूरी इससे ले ली । इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि गजा अपनी प्रजा के साथ निर्दयना का व्यवहार न कर सके। यह नियम वास्तव में फलदायक हुआ। अलफोसो तृतीय (१२८५-९१)। इसने एक और ऐसा ही । स्वत्व १२८७ में दिया जो कि उतना ही उत्तम था। "ऐक्य के अधिकार" की मजूरी होने पर प्रजा को अपनी स्वाधीनता के बहाने से राजा पर प्रस्न गहने का साहस मिला। इसके भाई जेम्स द्वितीय (१२९१-१३२७) ने सिसिली अपने छोटे भाई फेडरिक को देदी । १३१९ में इसने आरागन केटलोनिया और वेलेंशिया नामक सूत्रों को मिला कर एक राज्य : स्थापित किया। अलफ़ेसो चतुर्थ (१३२७--३६) । इसने अपनी दूसरी स्त्री तथा उसके पुत्रों के लिए कुछ भूमि अलग करदी और वास्तव में ऊपर कहे गये प्रवन्ध को रद कर दिया । यह वात आगामी आपत्तियों का अकुर थी। पेड्रो चतुर्थ (१३३६-८७) । इसने पिता के संकल्प को न मान कर अपनी सौतेली मा पौर भाइयों से जमीन ले ली। इस पर इसके मामा अलफोंसों एकादश ने अपनी बहन एव भानों का पक्ष 14 ४८ स्पेन का इतिहास। । म हेनरी चतुर्थ के बाद कैस्टाइल की रियासत इसाला के नाम : हो गई थी क्योंकि लोग उसकी पुत्री ज्वाना को दुधा समझते थे। केस्टाइल के रईसों ने इस पर बलवा किया । ज्वाना का मामा पुर्तगालनरेश अलफोंसो पचम भी अपनी भाजी का पक्ष ले के । उन्हों से मिल गया । १४७६ में टोरो स्थान में ये लोग हारे और अलफासो .फ्राम को भाग गया। फ्रास से मददं मिलने की इसे बडी प्राशा थी पर सधि के प्रतिकृल झास कुछ नहीं कर सकता था। अलफोंसी ने निराश होकर १४७८ में लिसबन की सधि कर ली। इस तरह अभागिनी भांजी का राज्य पर स्वत्व जाता रहा । १४७९ में जान द्वितीय की मृत्यु हो गई, और फडोंनेड को आरा- गन का आसन मिला। इस समय आरागन और कैस्टाइल दोनों का सम्मिलन हो गया। अभी दोनों राज्यों के नियम अलग ही अलग रहे, परन्तु धीरे धीरे ये एक दूसरे में पूरे तार से मिल गये । इस । समय बहुत से शासन-सुधार भी हुए । राजा और रानी दोनों ही का कहर कैथोलिक मत था। इसी समय में ऐसे लोगो पर जो रोमन कैथोलिक मत नहीं मानते थे मुकदमा चलाने और उन्हें दड देने के लिए "इक्विजी- शन" नामक अदालत स्थापित की गई । इस के साथ ही "होली आफिस" या "पवित्र कार्यालय" की भी सृष्टि हुई। उसकी पहली आशा से हजारों यहूदिया को फांसी देदी गई और १४९२ में वे सब स्पेन से निकाल दिये गये। इससे देश के व्यापार को बहुत हानि पहुँची। इस राजा ने प्राय. सब प्रायद्वीप पर शासन जमा लिया। इसने १४९२ में प्रनडा ले लिया । १५ वी शताब्दी में मूर लोगो का, वश , फीनहौर इसाबेला। समाप्त हो गया और उन में से कुछ देश से निकाल दिये गये। शेप ने ईसाई मत स्वीकार कर लिया। स्पेन का कुछ भाग फ्रास के अधिकार में था, वह भी इसने १४९३ में छीन लिया । अब पुर्तगाल को छोड कर समस्त प्रायद्वीप पर इसका राज्य था। स्पेन के सिवा इस ने दूर दूर स्थानों में उपनिवेश बसाये और राज्य को बढाया । इस समय समुद्री खोज तथा परिभ्रमण का बडा जोश था। यह प्रायद्वीप इस बात में सर्वश्रेष्ठ था। केनारी द्वीपादि इसी भाति स्पेन के हाथ लगे। स्वनामधन्य कोलम्बस की विख्यात यात्रा इसी समय में हुई और यह इसाबेला ही की अनुमति से हुई थी। इटली से भी स्पेन राज्य का कुछ सवध था, और इस समय का नेपल्स नरेश अन्यायी था। फर्डीने ड नेपल्स पर अपना स्वत्व समझता था, उधर झासराज वहाँ अपना अधिकार जमाने आ रहा था। दोनों दलों का जमघट हो गया । फोंने ड ने फरासी- सियों को मार भगाया और १५०४ में नेपल्स नरेश को निकाल कर वहाँ अपना शासन जमाया। इसी साल में फर्जीनैंड की स्त्री की मृत्यु हो गई । इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ समय के लिए इस राज्य का सम्मिलन हगमगा गया । इसके कारण ये थे.-(१) फर्जीलैंड और इसाबेला का सवध होने पर भी प्रजा दोनों रियासतों को अलग ही अलग मानती रही, (२)प्रजा फर्डीनै ड से प्रसन्नन थी , (३) र १४९७ में । इसायेला के पुत्र का देहांत हो चुका था। 4 -
r
५०
स्पेन का इतिहास।
केस्टाइल पर इसाबेला के बाद पुर्तगाल की ज्वाना का हक था,
पर यह पागल होगई थी और इसका पुत्र बिलकुल बच्चा था, इस
से इसका पति फिलिप उसका अधिकारी हुआ ।
१५०६ में फर्डीनड ने दूसरा विवाह फ्रास के लुई द्वादश
की भतीजी से कर लिया। जिससे अनायास ही नेपल्स इसका हो
गया। इसने सहर्प कैस्टाइल को छोड़ दिया और आरागन एवं
नेपल्स से ही सतोप रक्खा, परतु शीघ्र ही फिलिप का शरीरांत हो
गया । यहाँ के बड़े महन्त की कृपा से फड नड ही अब कैस्टाइल
का प्रबंधकर्ता बनाया गया । ज्वाना पतिवियोग से विल्कुल
मर्माहत थी और राज काज में कुछ भी नहीं बोलती थी।
फर्डीनेड इस समय की राजनीति पर विशेष ध्यान देताथा। यह
रोम के पोप द्वारा स्थापित पवित्र सस्था का सदस्य बना और फ्रांस
से नवेर को जीत लिया-जो यहाँ से दहेज में फ्रांस को मिला था।
१५१५ में नर भी केस्टाइल राज्य में जोड़ दिया गया। एक साल
बाद मरते समय यह आरागन ज्वाना को देगया और चार्लस को
दोनों राज्यों का सचालक बना गया।
१२-हैप्सवर्ग वंश ।
(१५१६-१७००)।
इस समय स्पेन की दशा कुछ अच्छो न थी। कैस्टाइल और
आरागन अलग अलग रियासते समझी जाती थी। उस पर भी
हैप्सर्ग वशः पारागन तीन सूत्रों में बटा हुआथा जो अपने को एक दूसरे से पृथक समझते थे. इधर फ्रांस नवेर पौर नेपल्स पर दृष्टि लगाये हुए था, तथापि भविष्य में दो शताब्दियों तक स्पेन का सितारा ऐसा चमका कि यह योरोप में सर्वोत्तम राज्य समझा जाने लगा। इन्हीं दे। सदियों के अन्त में इस देश का उत्तम से मध्यम श्रेणी में पतन भी हुआ और फिर यह पूर्व दशा को न पासका। चार्लस प्रथम (१५१६-१८)।यह नीदर लै ड्स में पैदा हुआ था। वहीं इस का पालन पोपण भी हुआ था । १५०५ में यह रियासत इसने अपने पिता से पाई थी । १५१७ में स्पेन इस को मिला । यह न तो स्पेन की भाषा और नरीति भातिसेही परिचित था। इसके मन्त्रों पर मित्र सब वहीं के थे जिन को स्पेन की भलाई का कुछ ध्यान न था। लोग उन को लोभी और स्वार्थो कहते थे। चार्लस अपनी माता को अलग कर के राज्यपद चाहता था। पारागन वाले इस पर विगड उठे पर कैस्टाइल में बड़े महन्त के. प्रयत से कार्य सिद्ध हो गया। इसी भांति उक्त महन्त ने कई उपकार चालस के साथ क्येि । इसने नवेर की चढाई से फरासी सियो को मार भगाया और वहाँ के निवासियों के उपद्रव के भय से पहाडी दुर्गों को नष्ट कर दिया। १५१९ में इसे जर्मनी का राज्य भी मिला । इस समय यही योरोप में सबसे अधिक शक्तिमान् राजा था। *जर्मनी के इतिहास के ३२ पृष्ठ पर देखिए । .
स्पेन का इतिहास ।
जब कैस्टाइल वासियो ने देखा कि उनका धन चार्लस के
लचे चौडे राज्य के सँभालने में उडाया जा रहा है, तब उन लोगों
ने असन्ताप प्रकट किया । चार्लस ने चतुराई के साथ इस उल
झन को सुलझाया क्योंकि इस समय में वह जर्मनी के लिए सेना
ज्यादि ठीक करने में लगा था।
उसने नगरों के अफसरों की एक सभा की और जो लोग
उसके विरुद्ध थे, उन्हें उस में शामिल न किया। उसके द्वारा अपना
मतव्य सिद्ध कर के यह जर्मनी चला गया और रियासत को
रईस और प्रबन्धकर्ताओं के सिपुर्द कर गया ।
टोलडोवासियो ने "होली जटा" या "पवित्र सयोग" नामक
एक सभा पविला में स्थापित की। "ज्वान दि पेडिला"
मुखिया था। इसने बलवा करके रियासत के अध्यक्षों को पराजित
किया और ज्वाना को कैद कर लिया । यह चाहता था कि वह
स्वयम् ज्वाना के नाम से राज्य करना शुरू करे, पर ज्वाना
ने यह बात स्वीकार न की, इसलिए चार्लस ही स्पेन का राजा
रहा और बागियों का जोश ठढा हो गया ।
रईसो और सर्वसाधारण लोगों में अनबन थी, इसने एक को
दूसरे से भिडा दिया और इस तरह विद्रोहियों का नाश
किया।
इस समय प्राय: स्पेन ही योरोप का राजा था। इस चार्लस
प्रथम का आतंक मेक्सिको, पेरू, एफ्रिका आदि स्थानों में फैला
हुआ था। १५३८ में इसने फ्रास से सधि करली पौर निर्भय हो
गया। इसने प्रजा को पूरा पूरा गुलाम बना लिया था। कैस्टाइल के
उसका
.
गा
इंगलैंड से भारी जल-युद्ध ।
रईसों को प्रतिकूल समझ कर इसने उनको दर्बार से निकाल
दिया। इससे दर्बार में साधारण पुरुष ही रह गये, जिनकी संख्या
बहुत कम हो गई थी, इसलिए चार्लस और सभा का मत एक
था। जीवन के कठिन परिश्रम के कारण तथा जर्मनी में असफलता
से उसने प्रतिम दो वर्षों के लिए सब बातें त्याग दी पौर १५५८ में
परलोकवासी हुआ।
---
१३-इंगलैड से भारी जल-युद्ध ।
(१५५८-१५९८)।
इस समय हैप्सवर्ग वश के दो भाग हो गये। चार्लस के भाई
फर्डीनेंड ने आस्ट्रिया का राज्य और स्पेन को उसके एकलौते पुत्र
फिलिप ने पाया।
फिलिप द्वितीय (१५५८-२८)। यह औरो के देखते ज्यादातर
स्पेनजातीय था। अन्य देशों में इस ने कोई भी विजय नहीं प्राप्त
की, पर स्पेन में अनेक आदोलन करता रहा । कैस्टाइल में इसका
निघास रहता था, इसलिए इस सूघे पर इसका विशेष ध्यान
रहना स्वाभाविक ही था । अन्य सूवे समीप न होने से थोडा बहुत
सुखी थे, परन्तु इनमें एका न था, इसलिए एक सूबे पर अपना
आतक जमाने के लिए वह दूसरे सूबे की सहायता ले लेता था।
फिलिप ने अपनी राजधानी मेडि नगर को बनाया । माता
की ओर से इसका अधिकार पुर्तगाल पर भी पहुँचता था । १५८०
६
- स्पेन का इतिहास। . में इसने उसे भी ले लिया। इस देश का प्रबन्ध करते समय इसने बहुत से पुर्तगालियों को निकाल कर वहॉ स्पेनियों को बसाया। इन दोनों में सहानुभूति का होना असम्भव मात्र था । फिलिप और उसके मत्री एन्टोनियो पेरेज़ में राजनैतिक मामलो में कुछ अनबन हो गई। वह चतुरता से आरागन भाग गया, परन्तु फिलिप ने उसे १५९० में पकडवा मँगाया और मरवा डाला। इसने ऐंटोनियो के सहायकों की भी अपने फौजी सवारों से खबर ली। इस तरह उसने प्रजा पर अपना पूरा रोब जमा लिया। कोई भी सिर न उठा सकता था। इसने सरगौसा में राजकीय सेना रक्खी पौर स्पेन को विद्रोहों से निर्भय कर दिया। इस समय स्पेन का पराक्रम गौर साहस असामान्य समझा जाता था। इसका प्रताप इसके विस्तृत राज्य से प्रतीत होता था। स्पेन के लोग कहर कैथालिक-धर्मावलम्बी थे । इनकी इन्क्विजिशन नामक अदालत दिना दिन जोर पकडती जाती थी। इसी समय सुप्रसिद्ध मार्टिन ल्यूथर के अनुयायी प्रोटेस्टेंट लोग नवीन विशुद्ध मत स्वीकार करके कैथोलिक मत के प्रधान पोप के पाखडों से पीछा छुड़ा रहे थे । अपने मत को बढाने तथा प्रोटेस्टैटों का नाश करने के लिए चार्लस पंचम ने उपयुक अदालत के साथ "पवित्र कार्यालय" भी स्थापित किया था। उस बीज का वृक्ष अब तैयार हुआ । इस कार्यालय की यह आशा थी कि यदि किसी जनसमूह में या जहाजों में कही पर कोई भी चिन्हें अन्य मतावलंबी होने का पाया जाये तो - इगलैंड से भारी जल युद्ध । उन्हें जन्म भर गुलामी भागनी पड़े तथा उन जहाजों का कुल माल च असबाब जब्त कर लिया जाय । यह राजनैतिक अस्त्र धर्म की रही के पीछे से फिलिप के हाथ में पोप के बल से जोर पकड कर अपना काम कर रहा था, हजारों साहसी फरासीसी एव अंगरेज लोग दिनों दिन इस के पजे में आकर अपने प्राण खाते थे। स्काटलैंड की रानी मेरी इस समय इगलै ड के कैदखाने में पड़ी थी। यह भी कैथालिक मत की थी। उधर अंगरेज लोग अपने मजहबी जोश में थे। स्पेन यह वाहता था कि राजा कैथोलिक हो, तो प्रजा भी विशेषत उसी मत को ग्रहण करे। इस विचार से स्पेन ने मेरी का पक्ष लिया और इंगलै ड पर एक प्रचण्ड आक्रमण करने के लिए गुप्त रूपसे प्रकाण्ड प्रयन शुरू किये । फिलिप नेएक बडा भयानक जहाज़ों का वेडा तैयार किया। इस में सैकड़ों बडे बडे जहाज, असख्य योद्धा और अपरिमित भोजन-सामग्री थी, परन्तु इस का मुख्य हाकिम निरा मूर्य था। हाकिंस नामक एक अंगरेज व्यापारी भी "इन्किजिशन" न्यायालय की आँच से झुलस चुका था। उसने अपनी विलक्षण बुद्धि तथा पराक्रम से पूरा बदला निकाला । भेद ही भेद स्पेन के सारे छिद्र जान कर इसने और विख्यात ड्रेक ने कई बार स्पेन को दिक किया और उसके नाक दम कर दिया। १५८८ में जब प्रकाण्ड नौका-समूह ने प्रस्थान किया, तब इग्लै ड की रानी एलिजेयेथ के पास इस समय ऐसी कोई युक्ति न थी कि चह अपने देश को इतने भयकर आक्रमण से बचाए। विपम
स्पेन का इतिहास।
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समुद्री युद्ध ठन गया और साहसी अगरेज जहाजियो ने और कुल
देश ने पलीजवेथ की मदद की।
.
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स्पेन देशीय नौकासमूह का प्रबन्ध और शासन बिल्कुल
खराब था। इधर मोविशर, गिलबर्ट एवं ड्रेक इत्यादि अत्यन्त ।
चतुर एवं पराक्रमी और सामुद्रिक जीवन में बहुत निपुण थे।
बुद्धिमानी के साथ इन थोडे से अगरेज नाविको ने स्पेन के प्रचड
जहाजी बेडे को तितर बितर कर दिया। ईश्वर ने भी इस समय
इंगलैंड की सहायता की। एक बड़ी भारी आँधी चल पड़ी और
स्पेन का सारा नौकासमूह बिल्कुल तहस नहस हो गया । यदि
यह दैवी आपत्ति स्पेन के विरुद्ध न उठ पडती तो वास्तव में इंग्लै ड
को जीतने के लिए इसे बहुत कुछ आशा हो सकती थी । इस
नौका-समूह के सर्वनाश से स्पेन को बहुत कुछ चोट पहुंची।
इस करारी हार से स्पेन की प्रभुता में पूरा बहा लग गया
और आज ही से इस राज्य ने अवनति के मार्ग पर पैर रक्खा।
फिलिप पर पूरी ग्रह दशा थी। आरमेडा के साथ असख्य धन
और प्रामियो का नाश हुआ । इधर स्पेन की प्रजा टैक्सों की
अधिकता से पीडित होकर हाहाकार मचा रही थी । इस महा-
राज्य का सगठन अब टूटना ही चाहता था। फिलिप यह कलंक
का टीका दूसरों के लिए छोड कर १५९८ में चल बसा।
-
५७ फिलिप तृतीय और चतुर्थ एव चास द्वितीय । १४-फ़िलिप तृतीय और चतुर्थ एवं चार्ल्स द्वितीय । (१५९८-१७००)। फिलिप तृतीय (१५९८-१६२१)। इस पर पादडियों और पट रानियों का पूरा प्रभाव था । यह अच्छे विचार वाला था। इसको धर्मसम्बन्धी रीतियों के कारण प्रबन्ध करने का समय ही न मिलता था, इसलिए उसने सारा राज्यभार लारमा के तअल्लुफ- दार के हाथ में दे दिया। जिसे राजकीय प्रवन्ध के लिए कभी फुरसत ही न हो, उसे भला कौन "सुयोग्य" कह सकता है। यह फिलिप २१ वर्ष की अवस्था में गद्दी पर बैठा । १६०१ में विस्के वालो पर एक नया राजकर लगाया गया। वहाँ के प्रधान पुरुषो ने इसे अपनी स्वतत्रता का बाधक समझा और दूसरा राजा चुनने की धमकी दी। इससे फ़िलिप डर गया पर अपनी आक्षा वापस लेली। यह अपने धर्म में इतना कहर था कि इसे काफिर प्रजा के होने की अपेक्षा प्रजा का न होना ही स्वीकार था । इसने हुक्म दे दिया कि कोई पुरुष फारसी न बोले और न लिखे तथा कोई मुसलमान अपने रसोरिवाज न काम में लाये। इस बात पर उन लोगो ने कुछ अशाति प्रकट की। धमकाये जाने पर बहुतेरे शात हो गये और शेप पकड कर अफ्रीका भेज दिये गये । फिलिप तृतीय को इतने पर भी तृप्ति न हुई और १६०९ में इसने यह आक्षा दी कि तीन दिन के अन्दर कोई भी मुअर या
स्पेन का इतिहास
और वास्तव
में उन
मुसल्मान स्पेन में न रह जाय, यदि कोई रह जायगा अथवा रख
लिया जायगा, तो उसे प्राण दण्ड दिया जायेगा।
राजा की आशा ने स्पेन को सदेव के लिए शोचनीय अवस्था
में डाल दिया। स्पेनियों ने खेती आदि को नीच कर्म समझ कर मुअर
लोगों के मत्ये छोड़ दिया था। देश की कारीगरी, खेती और
व्यवसाय सब इन्हीं लोगों के हाथ में था,
लोगों
ने उन्नति भी की थी। इस तरह कारोबार को बहुत हानि पहुँची
और उसका व्यापार-रूपी अग निर्बल ही होता गया।
व्यवसाय का लोप हो जाने से स्पेन को अन्य देशो से सम्बन्ध
करना पड़ा । इंगलैंड, फ्रास, आस्ट्रिया और स्पेन में सन्धि हो
गई थी, इसलिए स्पेन राज्य इस समय फिर थोडा बहुत हद
हुआ, परन्तु मजहबी जोश फिर जगा । १६१८ में लारमा के तम
ल्लुकदार ने अपना पद त्याग दिया और उजेदा का ताल्लुकदार
उसका पुत्र उस जगह पर नियत किया गया । इसी समय
से तीस साल का समाम शुरू हुआ । १६१८ में राज
विद्रोह हुआ । १६२० में फ़िलिप ने फ्रांस-राज फर्डीनड की
सेना की पूरी सहायता की । इसकी मदद से आस्ट्रिया में "हाइट
हिल" आदि में इसने कई मैदान जीते ।
।
फिलिप अपनी पुत्री को फ्रेडरिक पचम के जामाता जेम्स
प्रथम के पुत्र को देना चाहता था और वर्तमान युद्ध से इस
विचार और द्रव्य के नाश को देखकर वह इस सग्राम से अपना
हाथ खोचना ही चाहता था, पर १६२१ में उसकी मृत्यु हो गई ।
फिलिप तृतीय और चतुर्थ एवं चार्ल्स द्वितीय । इसके समय में स्पेन का साहित्य एक अच्छी श्रेणी में था। "डानक्किहोटी" नामक हास्यरस-पूर्ण उपन्यास का लेखक सरवै- न्टोज इसी समय में यहाँ हुआ । इसके सिवा लोपडिवेगा, केलेरन पौर वलेजकज आदि और प्रसिद्ध लेखक थे। फिलिप चतुर्थ (१६२१-६५)। यह पिता की भांति राजकाज से . दूर रहता था, जो समय इसका पिता पूजापाठ में बिताता था, उसे यह शिकार पार खेल तमाशे में। उसके मन्त्री ओलिवेरस के हाथ में सब काम था। मोलिवेरस बडा यतशील पुरुष था, यह फिलिप द्वितीय की नीति का अनुसरण करके स्पेन को फिर ऊँचे पद पर" पहुँचाने का उद्योग कर रहा था, परन्तु फ्रांस के रिशलिये के सामने इसकी बुद्धि चकराती थी। इसने अपने देश के बल का कुछ भी विचार न किया और योरोप की अन्य शक्तियों के समूह में सहसा घुस पडा । १६२१ में युद्ध आरम्भ हो गया। सात वर्ष बाद डच लोगों ने स्पेन के द्रव्य से परिपूर्ण जहाजों को लूट लिया, और इस देश से मलाका, लका, जावा इत्यादि द्वोप भी छीन लिये । निदर लैंड का उत्तरी भाग लेना तो दूर रहा स्पेन के लिए दक्षिणी भाग की रक्षा भी कठिन हो गई। इधर रिशलिये विजय करता हुआ इटली पहुँचा । इससे वहाँ भी स्पेन का मएच डगमगाने लगा, उधर जर्मनी का गुस्टवस अहाल्फस मी स्पेन से जल रहा था। . इस पुस्तक माला के फ्रास इतिहास के ५० पृष्ठ से मुकाविज्ञा पीगिए । इस माला के जर्मन इतिहास के ३५ पृष्ट से मुकाविला कीजिए।
के
स्पेन का इतिहास।।
शीघ्र ही रिशलिये ने निदरलैंडस और इटली से स्पेन का
सबन्ध तोड दिया और अपना प्रताप इटली में फैला दिया। इस
ने हालैंड देश से संधि करली । यहाँ स्वय स्पेन में अनेक उपद्रव
उत्पन्न हो गये और स्पेन के सामुद्रिक बल पर पानी फिर गया।
अब ओलिवेरस को बाहरी झंझट को छोड़ कर अपना राज्य
सम्हालने की सूझी। यह पृथक पृथक् प्रातो को पृथक् पृथक् कानूनों
तथा प्रधान पुरुषों को दूर करके केवल सम्राट को शिरमौर
बनाने और एक कानून के प्रचार का प्रबंध करने में लगा।
इसने १६४० में एक कानून निश्चित कराया कि कुछ समय
लिए स्पेन के सब सुडौल और बलवान् लोगों को सेना में
अनिवार्य रूप से काम करना चाहिए। इस पर रिशलिये की
मन्त्रण से विप्लव हुआ । पुर्तगाल में भी यही हाल हुआ
और
राजघराने का एक मुख्य पुरुष जान नगजा वहाँ का राजा बनाया
गया । १६४३ में ओलिवेरस को अपना पद त्यागना पडा और
फिलिप ने सारा भार अपने सिर लिया।
१६४२ में रिशलिये की मौत से फरासीसियों की जीत में
कुछ भी अन्तर न पड़ा। १६४३ में 'ऑव्हियाँ' ने राक्रोप्रा में
विख्यात विजय प्राप्त की। इधर लाचार होकर स्पेन को हालैंड
से सधि करनी पड़ी।
अब फ्रासको छोड कर सब जगह शाति थी। ऑड़ियाँ
स्पेन का प्रधान सेनापति हो गया । इसने निदरलैंडस, का बहुत
कुछ प्रश फ्रांस से ले लिया और केटेलस को भी अपने
तहत
में
फ़िलिप तृतीय और चतुर्थ एवाचार्ल्स द्वितीय । लाया । तब भी स्पेन की प्राचीन युद्धशैली गुस्टवस अडारफ़स के प्रचलित नवीन उपायों का सामना नहीं कर सकती थी। इन शक्तियों को शिथिल दशा में पाकर इगलैंड को अच्छा अवसर मिला, मतलब बनाने के लिए वहाँ के पचायती राज्य के अधिष्ठाता काम्वेल ने फ्रास को सहायता दी और डनकिक इत्यादि स्थान पाये । इस समय स्पेन की सफलता असमय थी। १६५९ में स्पेन और फ्रास में पेरेनीज की सधि हुई और यही पहाड दोनो राज्यो की सीमा नियत हुआ। फ्रास ने निदरलैंडस पाया पौर ऑजियों के रईस को क्षमा प्रदान की। केटेलोनिया का सूबा स्पेन को मिला। इस सधि से फ्रांस पुर्तगाल को सहायता नहीं दे सकता था, परतु लुई चतुर्दश ने पुर्तगाल वालों को छिप कर सहायता दी। १६६३ में एक फ्रेंच जनरल ने आस्ट्रिया के डान जान को हरा दिया और १६६५ में स्पेन की सेना को विला विसियासा के मैदान में परास्त किया। पीडित अवस्था में फिलिप इसी साल वग को सिधारा। चार्लस द्वितीय ( १६६५-१७०० ) । यह अभी ४ वर्ष का था। उस की माता मेरिया एक खास सभा द्वारा कार्यनेत्री नियत की गई थी। फादर निदर्ड इसका चतुर और अनुभव- शील मत्री था । इसने विशेषत राज्य के दोषों की पोर ध्यान दिया, कर्मचारियों के मासिक वेतन नियत किये और व्यापार की बाधायें दूर की। लुई चतुर्दश अपनी पत्नी के नाते से निदरलैंडस की रिया- सत पर अधिकार चाहता था। स्पेन ने इससे इन्कार किया। इस * ६२ स्पेन का इतिहास। पर फ्रास ने कई सूबे लूट लिये। १६६८ मैं आइला-शपेल की सधि हो गई। फ्लैंडर्स का कुछ भाग फ्रास को मिला और पुर्त- गाल स्वतत्र हो गया। वर्तमान मत्री फादर निदर्ड 'स्टीरिआ' का वासी था। स्पेनी रईस इससे वैर रखते थे। इन सबने एका कर के आस्ट्रिया के डानजान को मुखिया बनाया। परिणाम यह हुआ कि फ़ादर निदर्ड निकाल दिया गया। १६७२ में रानी ने 'फरनँडा वेलेजुएला' को मत्री स्वीकृत किया और उसे रईसी का पद प्रदान किया। रईस लोग फिर नाराज हो गये और रानी को निकाल के डान जोन को अध्यक्ष बनाया। जान ने फ्रांस से मेल करने के लिए चार्लस का विवाह वहीं ठीक किया। इधर लुई चतुर्दश हालैंड पर आक्र मण कर चुका था। १६७९ में निमग्वा की सधि हो गई, जिससे फ्रास को सब तरह से फायदा रहा । जान नैराश्य की आग से जलकर शीघ्र ही परलोकवासी हुआ। चार्लस द्वितीय अब स्वतत्र हो गया। बचपन से ही इसका स्वाथ्य पराब था । यह जैसा शरीर में बलहीन था वैसा ही बुद्धि से खाली था। १६८० में मेडिना सेली मत्री नियत हुआ, चार्लस की निर्वलता से पूरा लाभ उठाया। वह इस पर आतक ही जमाता रहा। कई एक स्थान इसने अनायास छीन लिये। १६८५ में मेडिना ने अपने पद को त्याग दिया। नवीन मंत्री ने आस्ट्रिया से मिल के फ्रांस पर आक्रमण करना चाहा, परन्तु तब भी फ्रास ने स्पेन को नीचा ही दिखाया। १६९७ में रिस्टिक की सधि से शांति स्थापित हुई। - लुई चतुर्दश ने दूर्वा पश। अब स्पेन के उत्तराधिकार के बारे में तनायें होने लगी। चार्लस ने बवेरिया के राजकुमार जोजेफ फर्जीलैंड को अपना उत्तराधिकारी बनाया । लुई अलग ही अपना दांव लगाये बैठा था। यह अपनी कूटनीति सोचही रहा था कि जोजेफ राजकुमार की मृत्यु हो गई । इधर लुई ने पोप तथा स्पेन के प्रभावशाली पुरुषो को मिला लिया था। बुड्ढे चार्लस को लाचार होकर १७०० मैं लुई के पौध फिलिप को अपना उत्तराधिकारी मानना पडा, केवल इस शर्त के साथ कि यह फिर फ्रांस राज्यासन का अधिकारी न रहेगा। १५--चूवा वंश । स्पेन को निर्बल दशा में देख कर योरोप के अन्य राज्य इस पर अपना अधिकार जमाने के लिए ललचा रहे थे। इनके चित्त में यह भास रहा था कि जो अपने पराक्रम से इस देश को या दवाचे यह उसी का हो जाएगा। १७०१ में "बडे ऐक्य" नामक अभिमन्त्रण के अनुसार स्पेन के कुछ सूर्य आस्ट्रिया को और स्पेनी रियासत के सामुद्रिक सुविधा के कुछ स्थान फ्रांस को मिलना चाहिए थे। १७०३मे पुर्तगाल भी उक्त सधि में मिल गया और १७०५ में फिलिप को स्पेन की राजधानी मेड्रिड से निकाल कर आस्ट्रिया के उत्तराधिकारी को चार्लस तृतीय के नाम से आभूषित करके यहाँ की राजग पर बिठाया। १७०६ में फिलिप जि जीता । १७१० में चार्लस स्पेन का इतिहास। उसी भौति राजा हुआ और हटाभी दिया गया । १७११ में यह सधि टूट गई, और इंगलैंड, फ्रांस, हालैंड और स्पेन में यूटे की सधि हुई। इससे कुछ सूबे स्पेन से निकल गये और इगलैंड को विशेष लाभ रहा। फिलिप (१७००-४३) । यह सकीर्ण हृदय था। इसकी प्रथम स्त्रो १७१४ में दो पुत्र छोड कर मर गई। इसका दूसरा विवाह पारमा-नरेश की भतीजी एलिजबेथ से हुआ । इस रानी ने उसे अपना पूरा दास बना लिया था। उचित रीति से प्रथम पली के पुत्र राज्याधिकारी थे। अपनी सतान का तिरस्कार देख कर एलिजवेथ ने त्रिया-चरित्र फैलाया। अलबेरोनी एक माली का पुत्र था और यह स्पेन में एक रसोइया तथा मसखरे की हैसियत में आया था। एलिजबेथ का विवाह इसी ने कराया था, इसी कारण यह सचिव पद पर पहुंचा। बाणिज्य, व्यापार और सैनिक विभागों में इसने सुधार किये, पर स्पेन की समुद्रीय शक्ति पर इसका विशेष ध्यान था । इसकी प्रतिक्षा थी कि पाँच वर्ष की शाति में मैं स्पेन को फिर पहले वाली ऊँची दशा को पहुंचा दूंगा । ये पाँच वर्प पचास युग के सदृश हो गये । १७१७ में फ्रांस, हालैंड और इङ्गलैंड में स्पेन के विरुद्ध "तीन शक्तियों का अभिमन्त्रण" हुआ । १७१८ में प्राष्ट्रिया भी उनसे मिल गया और ऐडमिरल बिग ने स्पेन को एक समुद्री लडाई में हराया। अलबेरोनी ने इकलैंड पर कई ओर से हमला फरना चाहा, पर सब प्रयत्न निष्फल हो गये। इतनाही नहीं, अङ्करेजों
दूर्वा वंश।
ने इन के जहाज किनारे पर जला भी दिये । १७१९ में अलबे-
रोनी को देश निकाला हो गया । अव स्पेन को सुलह करनी पड़ी
पार यूटे सधि की सब शर्त माननी पडी। कुछ रियासत दूसरी
रानी के पुत्रों को भी मिली।
फिलिप ने फ्रास से मेल कर लिया। इसने अपने ज्येष्ठ पुत्र
का विवाह मास के अध्यक्ष की कन्या से किया और अपनी पुत्री
का भी व्याह लुई पचदश से तै कर लिया था। उसी समय में
अध्यक्ष की मृत्यु हो गई। कुछ काल के लिए फिलिप ने सब
काम अपने
पुत्र के सिपुर्द करके राज्य से अपना सबन्ध तोड
दिया। इससे फिलिप यह समझता था कि पचदश लुई
की मृत्यु होने से उसका पुत्र या पुत्री फ्रांसराज्य की अधिकारिणी
होगी और तब मौके से वह स्वय दोनों देशों का राजा बन
जावेगा।
रिपर्डी नामक एक साहसी पुरुप ने रानी से यह कहा कि
आस्ट्रिया से सधि करके काम निकल सकता है। ऐसा करने
पर फ्रांप से विगाड होगया। उन्होंने राजकुमारी को स्पेन वापस
भेज दिया और लुई का विवाह अन्यत्र ही कर लिया। १७२५ में
जाके सधि हुई और तब सब झगडे समाप्त हुए ।
अब रिपडी प्रधान मंत्री बनाया गया, परन्तु इस पद को
पाकर वह इतना मदाध हो गया कि अन्त में उसे भी देश से निकाल
देना पड़ा। अनन्तर वह मुसलमान हो गया और १७३७ में मर
.
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स्पेन का इतिहास गया । १७२९ में सेवील की सधि हुई इससे एलिजबेथ का ज्येष्ठ पुत्र पारमा रियासत का उत्तराधिकारी निश्चित हुआ। स्पेन का दॉत आस्ट्रिया पर था। इस कारण उसने १७३३ में छिपकर फ्रांस से संधि की । फ्रास ने।इन झगड़े से कुछ भी लाभ न पाकर १७३५ में आस्ट्रिया से सधि कर ली। फ्रांस के बल से स्पेन इगलैंड से बदला लेना चाहता।था। इसने (स्पेन ) अगरेजों के साथ बहुत अत्याचार किये । १७३९ में इंगलैंड भी जगा और इसने स्पेन को परास्त किया । फिर फिलिप को सदा नीचा ही देखना पडा और १७४३ में यह परलोकगामी हुआ। अब फिलिप की पहली रानी का पुत्र फर्जीने ड पाठ (१७४३-५९) गद्दी पर बैठा। दूसरी रानी ने अपने पुत्रों की भलाई के लिए अनेक झगडों के बीज वो रक्खे थे । फोंने ड को क्या पड़ी थी कि सौतेले भाइयों के लिए देश भर के झंझट मोल लेता फिरे । उसने उनका कुछ भी विचार न किया। इससे रानी हताश हो कर एकांतवास करने लगी। यद्यपि फटनेंड ने अपने भाइयों के लिए कोई युद्ध नहीं किये, पर वह इतना अवश्य समझता था कि भाई को कुछ भी रिया सत न मिलना स्पेन की मानहानि है। १७४२ में आई-ला-शपेल की संधि हुई और उसके सौतेले भाई डान फिलिप को पारमा इत्यादि सूबे मिले । इसमें शर्त यह थी कि यदि डान फिलिप का वश किसी समय समाप्त हो जाय तो यह रियासत फिर आस्ट्रिया में मिल जायगी। " चार्ल्स तृतीय और चार्ल्स चतुर्थ । अपने पिता की भांति फर्डीनड कमजोर था । यह व्यर्थ विवादों से अपने प्रानन्द में बाधा नहीं आने देता था। २७५६ में सात साल वाले सग्राम में लडने वाली शक्तियाँ इसे अपनी अपनी और मिलाना चाहती थीं, पर यह उदासीन रहा। इस समय की शान्ति का यह प्रभाव हुआ कि अनेक युद्धों से शीर्ण प्रजा फिर चैतन्य होने लगी। ५ १६-चार्लस तृतीय और चार्ल्स चतुर्थ । ( १७५९-१८०८)। १७६५ में स्पेन और आस्ट्रिया में जो सन्धि हुई थी उससे रानी के बड़े पुन डान कार्लो को सिसिली के दाना द्वीपों का राज्य मिला था। १७५९ में यह चार्लस तृतीय ( १७५९-८८) के नाम से गद्दी पर बैठा। यह इगलैंड से अपना बदला लेना चाहता था, अत १७६१ में इसने फ्रांस से मेल कर लिया। पिट इगलैण्ड का महामन्त्री स्पेन की चालाकी समझ गया और इसने अपने देश की सामुद्रिक शक्ति को बढाया। १७६२ में अँगरेजों ने पुर्तगाल पर चढाई की और दोनों राज्यों की सम्मिलित सेना को मैदान में पराजित किया। १७६३ में पैरिस की सन्धि हुई । फ्रांस को विशेष हानि रही और स्पेन का उद्देश विल्कुल सिद्ध न हुआ । स्पेन और पुर्तगाल से अमेरिका के बारे में झगडा हो रहा था, पर राजा जोजेफ की मृत्यु से १७७७-८ में संधि हुई जिससे . . स्पेन का इतिहास। पुर्तगाल ने सदा के लिए स्पेन का शुभचिंतक बना रहना स्वीकार किया। यह सब स्पेन के मन्त्री फ्लोरिडा ब्लांका की चतु- रता थी। प्रायः सभी शक्तियों इस समय इंगलैंड से असन्तुष्ट थीं। पुराना वैरभाव निकालने के लिए स्पेन को यह अच्छा अवकाश मिला । स्पेन ने मिनारका द्वीप ले लिया और अँगरेजों के बन्दरगाह जिब्राल्टर को भी घेर लिया। इंगलै ड अपनी समुद्री प्रतिष्ठा के भंग हो जाने के भय में था, परन्तु अन्य शक्तियाँ एक दूसरे के प्रतिकूल थी, इससे १७८२ में अगरेजों ने एक एक को हराया। १७८३ में वर्साइ की सधि हुई। चार्लस को लाचार होकर जिब्राल्टर छोड देना पड़ा। इसने गिर्जाघरो को जमीन देने की मनादी 'करदी और मठ कम करा दिये । इसने "इन्विजिशन" नामक न्यायालय को अपने हाथ में कर लिया और व्यापार की बडी उन्नति की। इसने नहरें बनवाई गौर खेती की तरक्की की। इस समय आबादी की दूनी बढती हुई । यह सब चार्लस के मत्रियों के उत्तम प्रबन्ध का फल था । इस सम्बन्ध में डी' आर्नडा का नाम विशेषतया स्मरणीय है। यद्यपि यहाँ इस समय में बहुत से सुधार हुए, तथापि पहली दशा के देखते बहुत कुछ अन्तर था क्योंकि लोग अब भी आलसी और मूढविश्वासी थे । १७८८ में चार्लस के जीवन का अन्त हुआ। पब चार्लस चतुर्थ (१७८८-१८०८) राजा हुआ । स्पेन को अपना पुराना बड़प्पन पाने के लिए समुद्री शक्ति की विशेष आवश्य- कता थी । इसके सिवा. कार्लस के लिए अँगरेजो को परास्त चार्ल्स तृतीय पौर चार्ल्स चतुर्थ । रना भी आवश्यक था | उनसे अकेले सामना करना स्पेन की कि के बाहर था। सहायता की आशा केवल मास से ही थी, रन्तु वहाँ विषम विभ्राट् फैला हुआ था , इसलिए मत्री फ्लोरिडा ब्लांका ने यह सोचा कि यदि विद्रोह शांत होजाय, । कार्य सिद्ध हो । इस उद्योग के लिए रुपया और लडाई लडने की पावश्यकता थी। रुपये के खर्च से रानी सफा होगई और १७१२ ब्लांका को निकाल कर उसने डी'पार्नडा को मन्त्री बनाया। इस समय जो रानी तथा चार्लस की खुशामद करता था सके लिए यहाँ कुशल थी, परन्तु डी' पार्नडा स्पष्टवक्ता था, ससे इसको भी अपनी जगह से घटना पडा । अब रानी ने अपने मेत्र गोडाय को मत्री बनाया। यह राजा चार्लस का भी हलगा और पूरा गँवार था। १७९३ में फ्रास के राजा लुई को विद्रोहकारियों ने फांसी दी। इस चार्लस ने यहाँ से विभ्राट् को समाप्त करने के लिए फ्रास को सेना भेजी । प्रबन्ध की खराबी के कारण स्पेन की बडी दुर्दशा दुई । स्पेन वालों को यह बडा बुरा मालूम हुआ । स्पेन में भी विद्रोह उठ पडा । अब फ्रास ने उल्टा स्पेन पर आघात किया। अन्त में बेसल की सधि हुई। इससे स्पेन को कोई विशेष हानि नहीं हुई। १७९६ में स्पेन और फ्रांस में सधि हुई जिससे एक ने दूसरे की युद्ध में सहायता करने की प्रतिज्ञा की । इनकी सम्मिलित सेना को अंगरेजों ने सेंट विनसेंट की लड़ाई में हराया। इससे स्पेन की बहुत हानि हुई। सरकारी खजाना समाप्त होगया था और आय ७ स्पेन का इतिहास, के रास्ते भी बन्द होगये थे। अगरेजों ने मौका देख कर स्पेन की प्रजा को य ब भडकाया। गोडाय ने यह देखकर कि अपने बनाये अब कुछ नहीं बनना है, मन्त्रित्व का पद और दो आदमियों के लिए साली कर दिया। उनमें से एक का स्वास्थ्य विष के प्रयोग से बरबाद कर दिया गया था, इससे दूसरे को मन्त्रित्व का भार मिला। पहले पुरुप के स्थान में एक कैबलबो नामक उत्साही मुधा रक नियत किया गया । बोनापार्ट के अभ्युदय तक यहाँ कुछ शाति रही। कुछ समय बाद गोडाय रानी की कृपा से फिर अपने पहले पद पर पहुँच गया । स्पेन इस समय फ्रास के अधीन हो रहा था। १८०१ में नेपोलियन की ओर से स्पेन को पुर्तगाल से लडना पडा। गोडाय सेनापति होकर गया था। वहाँ इसने अपनी ओर से सधि करली । नेपोलियन इसकी अनुचित स्वतंत्रता से इस पर नाराज़ हुआ और उसने इस सधि को न माना। इतनाही नहीं, वरन् अङ्रेजों से संधि करने के समय नेपोलियन ने स्पेनीय राज्य के कई सूबे वेपूछे बताये दे दिये और स्पेन चूं तक न कर सका। तीन वर्ष के लिए स्पेन में शान्ति रही और यह धीरे धीरे फिर पोप के जाल में फंसने लगा। १८०३ में बोनापार्ट को धन की आवश्यकता हुई तब उसने स्पेन के साथ एक नई सधि की और उससे प्रायः २३७५००) की मासिक सहायता देने का वचन ले लिया। अब स्पेन और भी आपत्ति में पड़ा। इसकी शेष समुद्री शक्ति ट्राफलगर इत्यादि सग्रामों में समाप्त हो गई।
नेपोलियन का आक्रमणे और दूर्वा वंश के शेप राजा लोग । ७१
स्पेन के राजकुमार का विवाह नेपल्स नरेश के यहाँ हुआ
था । इससे नेपोलियन नाराज था। इसकी स्त्री की मृत्यु हो गई
और इसने अपना दूसरा विवाह बोनापार्ट की बेटी से छिपकर
पका कर लिया। गोडाय को यह भेद मालूम हो गया और उसने
यह हाल चार्लस से कह दिया । गोडाय चाहता था कि राजकुमार
कैद कर लिया जाय । नेपोलियन स्पेन को लेना ही चाहता था
और इस अवसर को पाकर उसने राजकुमार की सहायता के
बहाने से (१८०८) स्पेन को सेना भेजी। राजा और राजमन्त्री
डर कर भाग खड़े हुए।
१७-नेपोलियन का आक्रमण और बूवा
वंश के शेष राजा लोग।
नेपोलियन ने आते ही स्पेन पर अधिकार जमा लिया। उसे
इतना अवकाश न या कि स्य इस राज्य का प्रबन्ध करे। पर
वह यह चाहता था कि राज्य उसके हाथ से न जाय तथा ऐसा
प्रबन्ध भी न हो जिससे निर्दयता एव अनीति वहाँ आकर अपना
अहा जमावे, इसलिए उसने पिता, पुत्र और मत्री को पकडवा
मंगाया और उन्हें दरबार में अपने सामने खडा करके पूछा कि
क्या पिता को राज्य देना चाहिए ? चार्लस के इनकार करने पर
उसने अपनी इच्छानुकूल अपने भाई जोजेफ बोनापार्ट को
यहाँ का राजा बना दिया।
स्पेन का इतिहास स्पेनवालो ने इस पर बड़ा गडबड किया और लडाइयों की भरमार से फरासीसिया के नार्को दम कर दिया । जोजेफ के यहाँ चार महीने भी रहना कठिन हो गया और उसे लाचार होकर भागना पड़ा । तब चार्लस का पुत्र फर्डीनड राजा बनाया गया और ३४ प्रतिनिधियों की एक कार्यकारिणी समिति सठित की गई। स्पेनिया में शूरता की कमी नथी पर इनमें उचित नियम और सग- ठित बल का अभाव था, इसलिप नेपोलियन के आते ही सब झगडा शांत हो गया। जोजेफ फिर गद्दी पर बैठा । यह स्वतत्र राज्य करना चाहता था, परन्तु नेपोलियन स्पेन को अपने बड़े भारी राज्य का पक अश मात्र बनाने वाला था। इधर फ्रेंच लोगो ही में अनबन हो उठी और पुर्तगाल में वीर वेलिंगटन का तअल्लुकदार डटा हुआ था। १८१० मैं अपराजित स्पेन ने एक अपना स्वतंत्र राज्य पृथक स्थापित किया। केडीज उसकी राजधानी हुई। सुधारको को यह अच्छा अवसर हाथ लगा। "इन्क्विजिशन" नामक अदालत तोड दी गई । प्रेस को स्वतत्रता मिली। पादरियों की रियासते युद्धव्यय के लिए जन्त करली गई । रईस और पादरी इस बात के विरुद्ध थे। १८१२ में वेलिंगटन मेड्रिड पहुंच गया। जोजेफ को वेलेन्शिया भागना पडा । १८१३ में विटोरिया के मैदान में वेलिंगटन ने एक और विजय प्राप्त की पौर जोजेफ स्पेन छोड कर भाग गया।
नेपोलियन का आक्रमण और पूर्वा वश के शेष राजा लोग । ७३ फटनेंड सप्तम ( १८१४-३३)। यह अब नेपोलियन से छूट कर मेड्रिड लौट आया और राजा बनाया गया । यह राजनीति बिलकुल न जानता था और झूठा, घमडी और व्यभिचारी था। गद्दी पर बैठते ही इसने अपने पहले के विचारों को छोड़ दिया। इसके समय में रईसों पर कर माफ कर दिया गया। महन्तो की गद्दियों स्थापित हो गई । “इन्किजिशन" की स्थापना फिर हुई । स्वतत्र दल वालो पर अत्याचार होने लगे। छ वर्ष स्पेन का यही हाल रहा । १८१९ में फटनेंड को फ्लोरिडा अमेरिका के हाथ बेंचना पडा । इन सब बातो से स्पेन में विद्रोह फैलने लगा । गुप्त सभायें स्थापित होने लगी। १८२० में केडिज में बलवा हुआ । राजा यद्यपि वीर था, पर उसके साथी कायर थे, इससे राजा को हथियार रख देने पडे और उसके पक्ष के लोग कार्य- कारिणी सभा से निकाल दिये गये इस तरह स्वतत्र प्रतिनिधियो का प्रवेश इस सभा में हुआ। इसकी आशा से “इन्किजिशन"न्याया- लय फिर तोडा गया। गिर्जाघरो का कर माफ हो गया, प्रेस को स्वतत्रता मिली और सभाये खुलना प्रारम्भ हो गई । इससे सर्वसाधारण के प्रतिनिधियों की पूरी जीत हुई । १८२२ में इन्होंने केडीज के विद्रोह के नेता रोगो को अपना सभापति चुना । "पवित्र अभिमन्त्रण' ने स्पेन से अपने यहाँ पुराना प्रबन्ध कायम रखने का आग्रह किया, परन्तु इसने न माना । तब फ्रांस एक लाख सैनिक लेकर चढ आया और इसे पराजित किया। फोंनड मौका पाते ही शासन करने लगा पौर इसने पुरानी बातों का प्रचार फिर किया । । M
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स्पेन का इतिहास।
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इसके अतिम दिन आनन्द से बीते । १८२९ में इसका विवाह
नेपल्स की मैरिया क्रिश्चीना से हुआ। इन दोनो से इसेला
नामक एक सुन्दरी पुत्री उत्पन्न हुई।
१८३३ में फर्जीनेड का देहान्त हो गया और इसाबेला
स्पेन की रानी हुई । १८४० तक इसकी माता अध्यक्ष रही, इसके
वादघद फांस को चली गई मौर एस्पार्टगे नामक एक वीर
सेनापति उस पद पर नियत किया गया । इसकी बढती
देख के अन्य सेनापति इससे द्रोह मानने लगे, अतएव यह भी
अपनी जगह पर बहुन दिनों तक न ठहर सका । १८४३ में वह
देश से निकाल दिया गया । इसाबेला के वयस्क होने पर उसकी
माता स्पेन को लौट आई । इसाबेला की सगाई उसके चचेरे भाई
सिस् से हुई।
इसाबेला द्वितीय (१८३३-७०) से प्रजा अप्रसन्न रहती थी।
इसका राजत्वकाल नाना प्रकार के झगड़ों और जाल व फरेबों
का घर बन गया था। इसका कारण विशेषतया इसका अस.
न्तोषजनक आचरण था । १८६६ में इसने कुछ स्वतत्र पक्ष
वालों को देश से निकाल दिया। १८६८ में इन लोगों ने स्पेन में
विद्रोह का झन्डा खड़ा किया। सर्वसाधारगा ने इन लोगों से
सहानुभूति प्रकट की और इनकी सहायता की । इसायेला को
भाग कर फ्रॉस में जाकर छिपना पड़ा।
लोगों ने १८७० में अश्रोस्टा के अमेयज को सेनेट एवं चैम्बर
का राजा चुना । दो सभाये स्थापित की गई । राजा को
इन सभाओं की सम्मति के अनुकूल काम करना पडता था।
रानी क्रिश्चिना की अध्यक्षता ।
इस तरह वह बहुत दिनों तक काम को न चला सका और १८७३
में इसने इस पद को त्याग दिया।
इसके उपरान्त स्पेन का शासन कुछ समय के लिए एक
स्वाधीन सभा के हाथ में रहा । इस प्रबन्ध से प्रज्ञा असन्तुष्ट रही
और आन्तरिक विवाद होने लगे । सेना की सहायता से विद्रोह का
दमन कर दिया गया, फिर भी पूर्ण शान्ति न हुई।
शासन करने के लिए एक तरह से एक राजा की आवश्यकता
थी। इससे अब अलफॉसो द्वादश ( १८७४-८५) को राज्यासन
दिया गया। यह उपर्युक्त इसाला का पुत्र था। अलफोंमो का प्रथम
उद्देश्य यह था कि राज्य में शान्ति पौर उन्नति हो । इस सकल्प को
वह पूरा न कर पाया और बीच ही में काल कवलिन हुआ ।
अनन्तर इसकी विधवा स्त्री क्रिश्चीना स्पेन की शासनकर्ती रही।
१७ मई सन् १८८६ में इसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसको प्रजा ने
सहर्प अपना राजा स्वीकार किया।
।
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१८-रानी क्रिश्चिना की अध्यक्षता।
(१८८६-१९०२)।
राज्य के प्रवन्ध के लिए १८७६ में एक सगठन तैयार किया
गया था । उसके अनुकूल वालक राजा की माता क्रिश्चिना
अध्यक्षा बनाई गई और कार्यकारिणी सभा को जिसमें कि उस समय
के सनातन दल के मुख्य पुरुष मार्शल कैम्पो और कैनोवास
डेल कैस्टिला मौजूद थे, शान्तिपूर्वक पूरे तोर से चलाती रही।
७६ स्पेन का इतिहास। नये विज्ञान, नई ज्योति और नये विचारों की लहरों ने सारे राज्य में तहलका मचा दिया था और पुराने ढरे के शासन से उत्तम रीति पर काम चलते हुए नहीं दिखाई देता था, इसलिए कैनोवास ने रानी क्रिश्चिना को यह सलाह दी कि उदार दल के नेता सैगास्टा को बुला कर नई मन्त्रिसमिति बनाई जाय और देश की नई रोशनी को ध्यान में रखते हुए उसका उचित शासन किया जाय। सैगास्टा बडा ही चतुर, अनुभवशील और महान पुरुष था। यह निम्राट के विल्कुल विरुद्ध और चैकासिक उन्नति के पूरे तार से पक्ष में था-इसकी नीति यह थी कि उन्नत प्रजा की ऊँची ऊँची अभिलापों पर पूरा ध्यान देकर उन्हें सब तरह से राज्य के प्रबन्ध में स्वत्व दिये जाये और उनकी उचित बात मानी जाय, परन्तु यदि वे इन बातों के लिए उद्दडता करें और अशान्ति फैलावे , ता वे सब तरह दबाये जायें और सांगठनिक राजसभा में किसी प्रकार से कोई निर्बलता न आने पावे । इसी विचार से कुछ समय तक । इस बुद्धिमान् मन्त्री ने कैनोवास के साथ मिल कर काम किया। शीघ्र ही इसने अपने उदार दल के कई पक विद्वान् और प्रबल आदमी इकट्ठा करके अपनी मन्त्रि समिति तैयार की। इन लोगों ने “केर्टीस' नामक स्पेन की बड़ी सभा का एक अधिवेशन किया और उसमें सनातनी दल के नेता कैनोवास के यत्न से सभी लोगों ने उचित रीति से सम्मति देकर और बिना किसी प्रकार का गडबड किये राज्य प्रबन्ध के उद्योग किये । सैगास्टा ने देश की शान्ति और सुख पर पूरा ध्यान दिया और अन्य देशों के साथ अपना सम्बन्ध ठीक करता रहा । इसी समय प्रजासत्तात्मक - रानी क्रिश्चिना की अध्यक्षता। राज्य के चाहने वाले लोगों ने विद्रोह किया, परन्तु वे कठोरता के साथ शान्त कर दिये गये। रानी क्रिश्चिना क्ट्टर कैथोलिक मत की थी। इसने सब तरह पोप के बड़प्पन को माना और अपने देश पर उसका अधिकार स्थापित रक्खा । इसका परिणाम यह हुआ कि पोप ने भी सभी जरूरी स्थानों में रानी का पूरा पक्ष लिया और उस पर अपना हाथ बनाये रक्ता, देश में भी कैथोलिक मत के नये नये गिजें बनने लगे और महन्त लोगो का जोर दिखाई पडने लगा। रोम के पोप की इस कृपा के सिवा योरोप के सब राजा लोग रानो क्रिश्चिना से पूरा हित मानते थे। चतुर सैगास्टा ने कई एक सुधार किये । इसने कुल राज्य के और उसके सूत्रों के भिन्न भिन्न शासन नियमों को इकट्ठा और पुष्ट करने के लिए एक बड़ा कानून तयार किया । बहुन से मुकद्दमो में पचा की सहायता से फैसला करने की रीति चलाई गई । सार्वजनिक सभा और उनके अधिवेशन, छापेखाने की स्वतन्त्रता और प्रजा के स्वत्यो को ठोक पौर नियमित करने के लिए नये नये कानून प्रचलित किये गये । इन सब में प्रजा के साथ पूरी उदारता पार सहनशीलता की गई। इन पर नई ज्योति और उसकी ऊँची अभिलापों के स्वीकार करने की मोहर साफ तौर से लगी हुई थी। व्यापार-सम्बन्धी उन्नति को पूरी सहायता देने के लिए कई एक सन्धियां की गई, जिनसे कि स्पेन देश के व्यवसाय को दिनदूनी रात चौगुनी तरक्की करने का मौका मिला। चुगी लेने के कानून में भी बहुत से परिवर्तन है किये गये।
७८ स्पेन का इतिहास। ऊपर लिखे हुए सुधारों पर मानों मुकुट रखते हुए सैगास्टा ने देश में प्रजा के स्वत्वो को बढाने के लिए "सफरोज विल" (लोगों के वोट या सम्मति देने के अधिकारों को ज्यादा करने के लिए कानून का मस्विदा),१८९० में कोर्टीस और काग्रेस में पेश किया । इस मस्विदे को इन दोनों शासन समाओं ने पास भी कर दिया। इस पर सनातनी दल वाले बहुत ज्यादा बिगड उठे और उसी साल रानी क्रिश्चिना ने कैनोवासको फिर बुलाकर अनुदार दल की नई मन्त्रि-समिति तैयार कराई। इस ने आते ही आते व्यापार-सम्बन्धी नीति में हेर फेर करके कुछ सन्धियों की उपेक्षा की और बाहरी माल पर चुंगी फिर ज्यादा कर दी, जिससे कि देश के व्यवसाय को बड़ा धक्का पहुँचा। जब इस के चलाये उचित रीति से काम न चला, तब फिर सैगास्टा ही को बुलाना आवश्यक जान पडा। इस नये शासन के आरम्भ ही में मुराको और अमेरिका के समीप क्यूबा द्वीप का झगडा उठ खडा हुआ। पहले विवाद को तो सैगास्टा ने मुराको के सुल्तान से शान्ति बनाये रखने की प्रतिज्ञा लेकर समाप्त किया, परन्तु दूसरा भयकर रूप धारण करता गया। कारण यह था कि क्यूबा निवासी एक बारगी स्वराज्य चाहते थे और स्पेन उन्हें धीरे धीरे स्वत्व देना चाहता था । क्यूबा वालों ने इस पर लडाई झगडा भी किया, तब यहाँ से सेना को भेज कर उन्हें शान्त करना पड़ा। इधर स्पेन ही में सेना ने कुछ खास बातो के लिए अपना अनुचित जोर दिखाना चाहा-जैसे यदि कोई समाचार पत्र सेना की निन्दा लिखता, तो उसके सिपाही लोग - रानी क्रिश्चिना की अध्यक्षता । कानून की कुछ भी परवा न करके उसके छापेखाने और दफ्तर पर हमला कर बैठतेथे इत्यादि-पौर सैगास्टा इस सैनिक उच्छट्सलता को बिल्कुल नापसन्द करता था । जब अपनी नीति को वह कई कारणों से पूर्णतया काम में न लासका, उसने तुरन्त कैनोवास के लिए अपना स्थान खाली कर दिया। इधर क्यूबा वाले मामले में अमेरिका देश ( सयुक्त रियासते ) अपना हाथ डालता जाता था और इसी समय वहाँ से यह समाचार आया कि स्पेन को क्यूबा निवासियों को सब स्वत्व अवश्य देने चाहिए, ताकि वहाँ की अशान्ति दूर हो और बहुत समीप होने से अमेरिका के काम में कुछ बाधा न पडे । इस दशा में सनातनी दल के मत्री लोग प्रबन्ध न चला सके और सैगास्टा को फिर काम पर लौटना पड़ा । स्पेनचासो क्यूबा पर अपना स्वत्व छोडने को तैयार न थे, उधर अमेरिका इस मामले को उचित रीति से खत्म करने के लिए दबाव डाल रहा था। परिणाम यह हुआ कि दोनों और में इस देश को क्यूबा और अपने कई एक और द्वीपो से हाथ धोना पड़ा। उपर्युक्त लड़ाई से स्पेन ने सिर्फ नीचा ही न देखा, घरन् बहुत कुछ हानि भी उठाई । इधर इस पर ऋण भी बहुत हो गया था। इस कारण से आय व्यय के लेखे में सुधार करने की जरूरत पड़ी और कुछ नये नये टैक्सी का भी विचार किया गया, परन्तु प्रजा गत सग्राम पर उसके परिणाम से वैसे ही दुखित थी, इन नये प्रस्तावों से वह पोर भी प्रशान्त हुई। प्रजा यह चाहती थी कि में घोर युद्ध हुआ अन्त - । स्पेन का इतिहास । जातीय व्यय में कमी फर के देश की आमदनी पुष्ट की जाय और नये कर न बॉधे जावे । उदार दल से लोग कुछ अप्रसन्न थे, इस कारण से सिलवेला को मन्त्री बनाकर सुयोग्य विलावर्डी को आयविभाग का काम सौंपा गया । इसने अनेक आर्थिक सुधार करके पहले ही साल ४३ करोड रुपये की बचत दिखाई, परन्तु इसके मितव्ययी होने के कारण सेना विभाग वाले इस पर कुछ नाराज होगये थे और अत में इसे अपना काम छोडना पडा। सिलवेला अब अकेले होने से कुछ न कर पाया और सैगास्टा ने फिर काम शुरू किया। १९०२ तक इसी तरह उदार और सनातनी दलों के लोगों की विवादशीलता के कारण मत्रिमण्डल में कई वार परिवर्तन हुए । इस समय उन पादरियो और धार्मिक सस्थानों से जो व्यापार करने लगी थी टैक्स लेने का प्रयत्न किया गया और कई एक गर्म दल के नेता जो देश में गडबड कर रहे थे शान्त किये गये। १६-स्पेन देश का साहित्य । बारहवीं शताब्दी के पहले की बनी हुई किसी पुस्तक का पता यहाँ नही चलता है। जैसा कि प्रकृति का नियम है पहले पहल इस देश में भी कविता का ही प्रारम्भ हुआ। बहुत आरम्भिक दशा में कवि लोग राजामों और उनके प्रसिद्ध सग्रामों की बडाई करने के लिए गद्य रचा करते थे। १३ वीं सदी से धार्मिक और नैतिक स्पेन देश का साहित्य। कविता का जन्म हुआ। गान्जैलो डी बसियो इस समय का उत्तम कवि था। १४ वीं शताब्दी में जुमान रुइज़ नामक बड़ाही प्रतिभाशाली कवि हुआ, इसने रमणी एव प्रेम इन दो विपयों पर नवीन रीति से पुस्तकें लिखी हैं। १५ वी सदी से कवियों ने राजा से आश्रय पाकर "दरबारी" कविता की सृष्टि की, इसमें रूपक वर्णन के लिए रुचि साफ झलकती है और इटली देश के साहित्य का प्रभाव इस पर बहुत कुछ पड़ा है। इसके बाद गाने योग्य कवितायें तैयार हुई । लोप डी वैगा, गांगोरा और केवेडो इस समय के मुख्य कवि हैं । ये लोग मॅडौमा कविता के लिखने में भी बहुत सिद्धहस्त थे। १७ वीं सदी की समाप्ति से यहाँ पर नई बातो के लिखने की शक्ति बहुत कम पड गई पौर मास के साहित्य का अनुकरण विशेषतया आरम्भ किया गया, तथापि डीगो गानजालेज (१७३३-१७९५) और जासे इग्लेसियस डीला कैसा (१७४८-१७६१) अच्छे कवि थे। यहाँ पर नाटको का प्रारम्भ पहले पहल गिर्जाघरों के धार्मिक सेलो से हुआ । किसी त्यौहार क होने पर पादरी लोग नाटक खेलवाते थे । इनमें धीरे धीरे उन्नति होती चली आई और १७ वीं शताब्दी से साधारण जीवन- सम्बन्धी नाटक भी तैयार किये गये। १९ों सदी में नेटान डीलो हरेरस नामी नाटककार हुआ, इसने १०० के ऊपर सुखान्त नाटक लिखे हैं। सेराफिन आल्वारेज क्विन्टेरो (१८७१--> स्पेन का इतिहास । । और जोआक्किन (१८७३,) इस समय के उत्तम नाटककार और सालेडार रुएडा ( १८५७-) विसेंटी मेडिना ( १८६६-) पोर जोजे मरिया गैब्रियल इगालॉ ( मृत्यु १९०५) उत्कृष्ट कवि हैं। १५ वीं शताब्दी तक यहाँ के लोग उपन्यासों को कथा की तरह जवानी कहा और सुना करते थे। इस के बाद इन के लिखने की आयोजना हुई । हमारे साहित्य के पचतन्त्र नामक ग्रन्थ का अरबी में "कलैला दग्ना" नाम से अनुवाद हो चुका था, उससे स्पैनिश भाषा में भी १३ वीं शताब्दी में अनुवाद कर लिया गया। इसी तरह से कुछ और भी कथाओं के अनुवाद किये गये थे । इधर १३-१६ वी सदी तक कुछ राजा लोगो ने भी अपने राजत्व काल का हाल लिखवाना शुरू कर दिया था। इन बातो से गद्य लिखने में बहुत कुछ उत्तेजना मिलती जाती थी। १६ वीं और १७ वीं सदी ही में स्पेन के साहित्य का स्वर्णकाल है और इसके बाद ही यहाँ की प्रतिभा में कुछ कुछ अवनति होने लगी। स्वर्णकाल में लोप डी वैगा, सानाजारो माटेओ आलेमान और सर्वाटीज बहुनही नामी और उत्तम लेखक हुए हैं । अनन्तर मैनुएल फ.डीज इगान्जालेज (मृ० १८८८ ) और जोजे मैरिया डी पेरेडा उत्तम उपन्यास- कार हुए और वर्तमान समय में लुई कालोमा (१८५१ -२ विसैंटी ब्लास्को इबानेज़ ( १८६६,) और स्पेन देश का साहित्य । मार्टीनेज सिएरा (१८८२--) साहित्य की इस शाखा के अच्छे सहायक हैं। स्पेन साहित्य अभी इतिहास से प्राय साली हे । यहाँ के विद्वानों का स्वभाव इतिहास के लिए मसाला इकट्ठा करने का ज्यादा है पर उसके तैयार करने का कम है। जो पुराने हालात कुछ राजाओं के समय में पहले लिखे गये थे, उन्हों को एकत्र करके पुस्तकें छापने का यत किया गया है। इसके सिवा फैन्सिस्को कार्डे- नास ( १८१६-१८९८ ) पोर सीज़ारेओ फर्नाडीज़ डूरो ( १८३०-१९०७) इत्यादि ने कुछ उत्तम ऐतिहासिक ग्रन्थ लिखे है। फैन्सिस्को राड्रीग्वज़ मैरीन (१८५५--) पौर अडोल्फो बानिला इ सॉ मार्टीन आदि वर्तमान उत्तम इति- हास-लेखक हैं। यहाँ दर्शनशास्त्र की पुस्तकों की कमी है । १६वीं और १७ वी सदी में अफलातून और अरस्तू की पुस्तकों के अनुवाद या अनुकरण किये गये थे, तब से अब तक भी यह साहित्यशास्त्रा वैसी ही खाली चली आती है। १६ वीं सदी में यह रीति थी कि बड़े बड़े और रोचक पत्र छपवाकर सर्वसाधारण को नई नई बातें सिखाई जावें और उन्हीं के द्वारा शासन में सुधार करने के प्रस्ताव भी किये जाए। ऐंटोनियो डी ग्वीवरा-( मृ० ११५४४ ) अच्छा पत्र-लेखक था। :
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स्पेन का इतिहास
ने सख्ती के साथ इस विद्रोह को ठंढा किया और उसके नेता को
गोली से मरवा दिया। इस बात पर "कोर्टस' के सदस्यों ने
अपनी प्रबल अप्रसन्नता प्रकट की। आकोबर १९०९ में मौरा
ने अपने पद से इस्तेफा दे दिया।
एक वर्ष तक मोरे ने मन्त्रित्व का काम चलाया और वह देश
को शान्त करने के यल में रहा । १९१० में नई शासन-समा
(कोस ) का चुनाव हुआ और इसमें उदार दल वालों की अधि-
कना रही। इस कारण से कैनालेजास के हाथ में शासन भार
आया । इसने कई एक सुयोग्य उदार दल के लोग एकत्र करके
अपनी शासन समिति बनाई और स्वयमेव उसका सभापति हुआ।
इस समय से रोम के पोप के साथ कई एक बातो पर झगडा
शुरू हुआ । यहाँ की शासन-सभा इस बात के फेर में है कि अपने
देश के धर्म-सम्बन्धी मामलों में अपना ही सिर ऊँचा रहे और
पोप और उसकी अदालत की शक्ति कम हो जाय ! धार्मिक मामले
भले ही पोप के हाथ रहें, परन्तु अन्य समस्त शासन-सम्बन्धी
काम "कार्टस" नामक यहाँ की पालीमेंट ही निश्चित किया करे !
यह विवाद अब तक समाप्त नहीं हुआ है और पालीमेंट अपना
बल बढाती चली आ रही है। आज कल एक नया कानून
किया जारहा है जिससे पादड़ी लोगो की शक्ति के बहुत कुछ
परिमित होने की सम्भावना है।
दिसम्बर १९१२ में नई मन्त्रि समिति तैयार की गई और
काउंट रोमैनोज उसके सभापति और मुख्य मन्त्री बने । देश के
कुल शासन का काम इसी समिति के हाथ में है। २८ आक्टोबर
तैयार.
।
देश की वर्तमान अवस्था । १९१३ को यह समाचार आया था कि उदार दल में कुछ अनबन हो जाने से महामन्त्री काउट रोमैनोज ने इस्तफा दे दिया। उनके स्थान में सनातनी दल के नेता मौरा के फिर नियत किये जाने की सम्भावनाथी । अगस्त १९१४ के योरोपदेशीय महाभारत में जो बड़े भयानकरूप से फ्रांस, बेल्जियम, रूस, इग्लैड एव जापान तथा जर्मनी एव आस्ट्रिया में हो रहा है इस देश ने किसी की भी ओर से लडना नहीं शुरू किया है और पूर्णतया तटस्थ है। २१-देश की वर्तमान अवस्था । (१९१४)। खास स्पेन देश, बेलियरिक और कैनेरी द्वीप पौर अफरीका के कुछ उपनिवेश मिलकर स्पेन राज्य कहलाते हैं । १९१३ के आय व्यय के लेख के अनुकूल इस राज्य की आम- दनी ६२४२७०७५५) और खर्च ६१२१६०४५०) है । सन् १९११ में बाहर से प्राय ५५ करोड ३३ लाख रुपये का माल यहाँ आया पौर प्राय ५५ करोड १ लाख का माल इस देश से और मुल्कों को भेजा गया। सन् १९१२ में यहाँ ९,१७९ मील रेलवे लाईन थी। विना तार की सहायता के भी तडित् समाचार भेजने के लिए स्पेन में प्रवन्ध होगया है। जून १९११ के कानून के अनुकूल इस राज्य के समस्त निवा- सियों को मजबूरन १८ साल तक कम या ज्यादा फोज में काम करना पडता है।३ साल, तक-परन्तु बहुधा २ ही साल के
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