Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Prakrit Vimarsh

Agarwal,saryu Prasad · 2012/08

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दो शब्द लखनऊ २८६-५३ जब मैं लखनऊ विश्वविद्यालय का वाइस-चांसलर था तव एम० ए० क्लास के हिन्दी के विद्यार्थियो को प्राकृत भाषा पढाया करता था । विषय के अध्ययन में विद्यार्थियो को बडो असुविधा होती थी क्योकि कोई अच्छी पाठ्य-पुस्तक न थी। डाक्टर उलनर की अग्रेजी पुस्तक An Introduction to Prakrit अप्राप्य हो चुकी थी। उसका भाषानुवाद भी नहीं मिलता था। प्रत हिन्दी विभाग के प्राध्यापक डॉ० सरयूप्रसाद अग्रवाल के सम्मुख मैने यह सुझाव रखा कि वह इस विषय पर एक पुस्तक लिखें । उन्होने मरे प्रस्ताव को बहुत पसन्द किया और यह प्राशा दिलाई कि वह इस काम को हाथ में लेंगे। मुझे यह जान कर वडी प्रसन्नता हुई कि उन्होने इस कमी को पूरा कर दिया है और उनी पुस्तक विश्वविद्यालय को प्रोर से प्रकाशित हो गई है। डॉ. अग्रवाल ने बड़े परिश्रम से इस ग्रन्थ की रचना की है। वह बधाई के पात्र है क्योकि उन्होने एक बडी कमी को पूरा किया है। यत्र-तत्र अशुद्धियां रह गई है। प्राशा है कि दूसरे संस्करण में यह ठीक कर ली जायेंगी। श्री प्राचार्य नरेन्द्र देव, एम० ए०, एल एल्० बी०, डी० लिट्। उपकुलपति, काशी विश्वविद्यालय नरेन्द्र देव ।

वक्तव्य लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी-विभाग द्वारा किये जाने वाले साहित्यिक और सास्कृतिक अनुसधान-कार्य को 'लखनऊ विश्वविद्यालय- प्रकाशन' के रूप में हम “सेठ भोलाराम सेक्सरिया स्मारक ग्रथमाला" के अन्तर्गत प्रस्तुत कर रहे है । इसमें कई उच्चकोटि के गवेषणापूर्ण वृहदाकार ग्रथो का प्रकाशन हो चुका है, जो कि पी-एच० डी० उपाधि के लिए स्वीकृत है । इन खोज ग्रथो के अतिरिक्त महत्वपूर्ण एव विद्याथियो के लिए आवश्यक प्रयो का प्रकाशन हमारे विभाग के अध्यापक समय-समय पर करते रहते है जिन्हें हम 'सेठ केशवदेव सेक्सरिया- स्मारक ग्रयमाला' के रूप में प्रस्तुत कर रहे है । इन समस्त ग्रयो को प्रकाशित करने के लिए हम श्री शुभकरण जी सेक्स रिया के परम आभारी है जिन्होने अपने स्वर्गीय पिता और लघुभ्राता का चिरस्थायी स्मारक बनाने के हेतु प्रथमालानी के लिए 'पावश्यक निधि प्रदान की है। उनका यह कार्य अनुकरणीय है। प्रस्तुत पुस्तक 'सेठ केशवदेव सेक्सरिया-स्मारक-प्रथमाला' का प्रथम पुष्प है। भापा-विकाम की शृखला में उत्तर भारतवर्ष की प्राकृत भाषाए सस्तृत और माधुनिर आर्य भापानो के बीच की कडी है। हिन्दी तथा अन्य प्रामुनिर भाषामो के पारस्परिक सम्बन्ध और भापा-विज्ञान की दृष्टि से उनकी जानकारी के लिये विविध प्रानो का अध्ययन अत्यावश्यक है।

विश्वविद्यालयो में हिन्दी के साथ पालि, प्राकृत, तथा अपनाया भी मध्ययन भारम्भ हो गया है । परन्तु हिन्दी में प्रभी प्राकृत-भापा के व्यावरण और उसके इतिहास सम्बन्धी प्रयो की बहुत कमी है । पालि और अपभ्रश पर तो कुछ पुस्तकें प्रकाशित भी हुई है परन्तु प्रधान प्राकृतो-शौरसेनी, महाराष्ट्री, अधं मागधी, पैशाची प्रादि, और उनके साथ पालि, शिलालेसी प्राकृत आदि के तुलनात्मक अध्ययन के रूप में कोई गम्भीर हिन्दी ग्रन्थ अभी तक उपलब्ध नहीं है । हप का विषय है कि हमारे विभाग के प्राध्यापन डॉ० सरयू प्रसाद अग्रवाल ने इस प्रभाव का अनुभव कर उसकी पूर्ति का प्रयास किया है। प्रस्तुत ग्रथ, 'प्राकृत विमग,' डॉ० अग्रवान वे विस्तृत अध्ययन वा परिणाम है। बी० ए० और एम० ए० के विद्यार्थियों को भापा विज्ञान, पालि तथा प्राकृत के अध्यापन से उन्हें इस विषय में जो अनुभव प्राप्त हुए है उनका इसमें पूरा पूरा उपयोग हुअा है, यह मेरा विश्वास है । आशा है कि यह पुस्तक विद्यार्थियो की प्रावश्यकतामा की पूर्ति करेगी और उनमें प्राकृत भाषामों के अध्ययन की रुचि उत्पन्न करेगी। डॉ. दीनदयाल गुप्त, एम० ए०, डी. लिट. प्रोफेसर तथा अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय दीनदयालु गुप्त विषय-सूची पहला अध्याय-पृष्ठ १-५४ 'प्राकृत'-व्युत्पत्ति और विवेचन (१-५), प्राकृत भाषाओं का वर्गीकरण (५-६), प्राकृत वय्याकरण (६-१०), प्राकृत-धम्मपद (१०-११), निया-प्राकृत (११-१२), शिलालेखी प्राकृत (१२-१६), नाटकीय प्राकृतें (१६.२२), पालि ( २२-३६ ), साहित्यिक प्राकृतें- माहाराष्ट्री प्राकृत ( ३६-४१), शौरसेनी प्राकृत ( ४१-४४), अर्ध- मागधी प्राकृत (४४-४६), पैशाची प्राकृत (४६-५२), अपभ्रंश (५२-५४) दूसरा अध्याय-पृष्ठ ५५-९४ प्राकृत की सामान्य विशेषताएँ (५५-५८ ), संस्कृत में प्राकृत- अंश (५८-६३), प्राकृत शब्द-समूह (६३-६७), शिलालेपो प्राकृत (६७) पश्चिमोत्तरी समूह (६८६६), दक्षिण-पश्चिमी समूह (६६७०), मध्यपूर्वी समूह ( ७०-७१), पूर्वी समूह (७१-७२ ), निया प्राकृत ( ७२-७५), माहाराष्ट्री प्राकृत ( ७५-७६ ), शौरसेनी प्राकृत (७६८०), मागधी प्राकृत (८१-८५), अर्धमागधी प्राकृत (८६-८७), पैशाची प्राकृत (८७-६६ ), अपभ्रंश (६३६४) तीसरा अध्याय-पृष्ठ ९५-१३६ प्राकृत की ध्वनि संबंधी विशेषताएँ (६५-६६), स्वर-विकास (६६-१०२), असंयुक्त व्यंजनों का विकास ( १०२-११०), संयुक्त व्यंजनों का विकास (१११-१२६ ), अपभ्रंश ( १३२-१३६ ) ।

[ २ ] चौथा अध्याय-पृष्ठ १३७-२०१ प्राकृत के पद-रूपों का विकास ( १३७-२०१), पालि-संशा, सर्वनाम श्रादि का रूप-विकास ( १३८-१५३), मुख्य प्राकृतों के संशा रूपों का विकास (१५३-१६६ ), मुख्य प्राकृतों के सर्वनामों का रूप विकास ( १६६-१८० ), संख्यावाचक रूपों का विकास (१८ १६२), अपश के संज्ञा रूपों का विकास ( १६२-२०१) -- " " " " " पाँचवों अध्याय--पृष्ठ २०२-२२८ प्राकृत के क्रिया पदो का विकास (२०२), पाति के निया-रूपों का विकास (२०३-२०७), मुख्य प्राकृतों के क्रिया-पदों का विकास (२०७-२२०), अपभ्रश के क्रिया रूपों का विकास ( २२०-२२८). चयनिका उद्धरण सं०१ माहाराष्ट्री गाथासप्तशती ૨ वजालग्गं ३ रावणवहीं गउडवहो कंसबहो १६-२० कपूर मंजरी २०.२४ ७ बैन समराहच्चकहा २४-२८ कमुक्-शिलालेस २८-३४ अभिज्ञान शाकुंतलम् ३४-३६ कपूर मंजरी ११ मृच्छकटिक १२ ४६-५२ ७१३ रत्नावली ५३-५६ . " " " " " " " "" " " ९ शौरसेनी " " " " " " " " ". (ढकी) "१८ अर्धमागधी " [ ३ ] उदरप सं०१४ जैन शौरसेनी समयसार ५७६३ मागधी मृच्छकटिक ६३.६८ १, १६ मागधी (शाकारी) अभिज्ञान शांकुतलम् ६८-७४ मृच्छकरिक ७५-८२ उयासगदसायो ६२-६० १६ भीज्ञानाधर्मकथानम् ६०६६ शिलालेखी प्राकृत उद्धरण सं०२० प्राकृत धम्मपद मगवग्ग ६७१०१ " २१ अशोकी प्राकृत पाठशिलालेख १०१-१०६ श्रनुक्रमणिका-पृष्ठ १-१२ सहायक-ग्रन्थ सूची-पृष्ठ १-२ शुद्धि-पन " " .

संकेत-चिह्न अका०- मा०- ०प्रा०- याल.-- इका०- उका०- उ० पु०- उदा.--- एक- का०- च०- ०- यकारान्त अर्धमागधी अशोकी प्राकृत श्रालपन (सवोधन) इकारान्त उकारान्त उत्तम पुरुष उदाहरण एकवचन काण्ड चतुथा जैन तृतीया द्विताया नपुसकलिंग परिच्छेद प्रा०प्र०- प्रेरणा- फुट०- बहु०- म.पु. भविष्यः- भूत मा०- माहा०-- मोगल्ल०- ला०- वर्तमान विधिः- प्राकृत प्रकाश प्रेरणार्थक फुटनोट बहुवचन मध्यम पुरुष भविष्यकाल भूतवाल मागधी माहाराष्ट्रो मोग्गल्लान लाटी वर्तमान काल विधिलिङ्ग व्याकरण शौरसेनी पष्ठी सप्तमी सवोधन स्त्रीलिंग पुलिंग ०- व्या०- शौ०- द्वि०- नपु० परि पा0- प०- पाद स०- स.-- प्र०- स्त्री०- पश्चमी प्रथमा प्रथम पुरुष प्राकृत पु०- प्रा०- पहला अध्याय 'प्राकृत'–व्युत्पत्ति और विवेचन भारतीय यार्य भापायों का प्राचीन रूप संस्कृत, मध्यकालीन रूप प्राकृत और श्राधुनिक रूप भाषा के नाम से कहा गया है। प्राचीन भार्य भापा का समय लगभग १६०० ई० पू० से ६०० ई० पू०, मध्यकालीन का लगभग ६०० ई०पू० से १००० ई० यौर याधुनिक का लगभग १००० ई० के अनंतर से माना जाता है। प्राचीन वार्य भाषा के अतर्गत संस्कृत व्यापक भापा रही परन्तु भाषा की दृष्टि से संस्कृत से भी प्राचीनतर रूप वैदिक अथवा छान्दस् का है, जिसमे चारों वेद-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, वैदिक सहिताएँ, उपनिपद, ब्राह्मणग्रंथ आदि रच- नाएँ सग्रहीत हैं। वैदिक रचनायों में भाषासबंधी पार्थक्य का कुछ याभास मिलता है, जिस याधार पर यह निश्चित होता है कि उस काल में प्रचलित प्राचीन यार्य भाषा की अनेक वोलियाँ-उदीच्य, मध्य देशीय, प्राच्य यादि थीं और उन्हीं का साहित्यिक रूप वेद ग्रंथों में प्रयुक्त होने के कारण वैदिक नाम से प्रचलित हुया। मध्यकालीन मार्य भाषायो अथवा प्राकृतों का याधार यही विभिन्न बोलियों वही जा सकती हैं। छन्दस् भाषा और कुछ काल वाद विकसित लौशिक [[पा-संस्कृत में बहुत अन्तर नहीं मिलता । छान्दस् के कुछ स्वच्छद प्रयोगों को संस्कृत' के रूप में वय्याकरणों ने निश्चित कर दिया। इसमें पाणिनि का प्रमुस योग माना जाता है और संस्कृत-व्याकरण की सर्वश्रेष्ठ रचना श्रष्टाध्यायी उसी की कृति है।

इस प्रकार स्व छद प्रयोगों के लोप होने पर ग्रार्य भाषा न लावक- मध्यकालीन रूप पाहत का विकास होना प्रारभ हुया । परन्तु इन प्राकृतों ने प्राचीन यौर प्राचीनतर यार्य भाषा की विशेषतायो को ही अपने विकास का मुरग साधार बनाया । इसीलिय सस्कृत तथा प्राकृत के चय्याकरणों ने प्राकृत' क विकास और विश्लेषण में सस्कृत भाषा का हा उसका अाधार माना है। पिशेल ने यह स्पष्ट किया है कि कुछ वय्यावरण 'प्राकृत' शब्द व विश्लेषण-प्राक+कृत्त-पहले धनी भाषा के याधार पर इसे सस्कृत सभी प्राचीनतर मानते है । रुद्रट कृत काव्यालकार पालोचक नमिसाधु ने शिक्षिता की परिमार्जित मापा संस्कृत को छोडकर सर्वसाधारण लोगों म प्रचलित और व्याकरण व्यादि नियमों स रहित स्वाभाविक वचन व्यापार को प्राकृत भाषाओं का मूल अाधार माना है.--'प्राकृतेति । सबलजगज्ज तूना व्याकरणादि भिरमाहितसस्कार सहजो बचन व्यापार प्रकृति तन भव सैव वा प्राकृतम ।" इस प्रकार 'प्राकृत' स्यामाविक रूप म विकसित अपार माजित भाषायों का एक अलग समूह माना जा सकता है । 'प्रहात' या श्याशय यदि साभाविक श्रथवा नेसागिक विकास रा लिया जाय तो भी प्राकृत भाषाया की प्रकृति के मूल म कोई न कोई भाषा अवश्य रोगी सका श्राधार लकर प्राकृतों का विकास हुना, वह भाषा सस्कृत माना गइ है । पर तु अनर वय्याकरणों का उत्त अर्य म सस्कृत स प्राशय भारतीय प्राचीन आर्य भाषा स ही हो सकता है निसम उसका प्राचीनतर साहाया रूप दिव और उसक अनतर प्रचलित लोक भापासप-सम्मिलित है। इस प्रकार सरहत भापा या अाधार लवर शिमन याला श्रीर शिविध स्थाना का भाषाएँ अगर जास्त रूपों म पाहु प्राधा या सरहन स सबध योतन परान लिय वयापरणा - पइ टल्लप दिन है। हिंदवमाण' न 'पाग्भट्टालपार टीना' म सत्वृच साभारावर रूप से प्रारत का विधारा दिया है- । । [ ३ ] 'प्रकृते सस्कृतात् आगतम् प्राकृतम् ।" 'प्राकृत-सजीवनी' में सस्कृत को प्राकृत की योनि माना गया है—'प्राकृतस्य तु सर्वमेव सस्कृत योनि ।" काव्यादर्श की प्रेमचन्द्रनवागीश' कृत टीका म संस्कृत के प्रकृत र प से प्राकृत को उत्पन्न दिया गया है-"संस्कृत रुपाया प्रकृते उत्पन्नत्वात प्राकृतम् ।" 'प्राकृत चन्द्रिका' के आधार पर पेटर्सन ने सस्कृत को ही प्राकृत का प्रकृत रूप माना है.-'प्रकृति- सस्कृतम' (तन भवत्वात् प्राकृत स्मृतम)। 'पडभाषा चन्द्रिका' में 'नरसिह' ने सस्कृत के प्रकृत रूप प विकार से प्राकृत की उत्पत्ति सिद्ध की है-'प्रकृते सस्कृताया तु विकृति 'प्राकृती मता।' 'वासुदेव' ने प्राकृतसम' म इसी मत को स्वीकार किया है। प्रसिद्ध वय्याकरण हेमचन्द्र ने भी इसकी पुष्टि—'प्रकृति संस्कृतम तनभवम तत भागतम् था प्राकृतम' कहकर की है । 'मार्कएन्य' ने 'प्राकृत सर्वस्य' म सस्कृत का प्रकृति मानकर उसी से प्राकृत का विकास दिया है.--प्रकृति सस्कृतम् तत्रभवम प्राकृतम उच्यते ।' 'नारायण' ने 'रसिक्सर्वस्व' म प्राकृत और अपभ्र श दोनो को ही संस्कृत के ग्राधार पर विकसित माना है—'सस्कृतात प्राकृतम इप्टम् ततोऽपभ्रशभाषाणम् ।' 'धनिक' ने 'दशरूप' में प्रकृत रूप से प्राकृत का विकास और सस्कृत को उसकी प्रकृति माना है-'प्रकृते प्रागतम प्राकृतम प्रकृति संस्कृतम् 'शकर' ने 'शाकुतलम्' म सस्कृत से विकसित प्राकृत को श्रेष्ठ और फिर उससे, अपभ्र श का विकास दिया है--'सस्कृतात प्राकृतम श्रेष्ठम् ततोपभ्रशभापणम ।' इस प्रकार उक्त मता से स्पष्ट होता है । कि सस्कृत का ही आधार लेकर प्राकृत भाषायों का विकास हुया। पहले पहा ही जा चुका है कि सस्कृत को रूढ अर्थ म लेने स प्राकृत की उक्त व्यारयाएँ अपामाणिक और असगत ही होंगी क्योंकि प्राकृत भापायों - स्वरूप-- गठन को देखने से यह सिद्ध नहीं होता । 'प्रकृति' का ग्राशय स्वभाव श्रथवा जनसाधारण से भी लिया जाता है। इसीलिये हरिगोविंददास ४ विम्मचन्द शेठ ने 'प्राकृत्या स्वभावेन सिद्ध प्राक्तम्' अथवा 'प्रकृतीना, साधारणजनानाम् इद प्राकृतम्' के द्वारा प्राकृत की व्याख्या की है। महाकपि वाक्पत्तिराज ने अपने गउडवहो' नामक महाकाव्य में प्राकृत के पिपास ये सबध में व्यक्त किया है कि प्राकृत में ही सय भाषाएँ प्रवेश करती हैं और इसी पाकृत से ही सब भाषाएँ निकली है। जैसे जल समुद्र में प्रवेश करता है और समुद्र से ही (भाप के रूप म) फिर बाहर जाता है। अर्थात् मस्कृत यादि भाषाएँ प्राकृत रूप के आधार पर ही विकसित हुई हैं और मूल भाषा प्राकृत है । सचित रूप में प्राकृत शब्द भाषा के थर्थ में और व्यापक अर्थ मे रूप वी स्वाभाचियता के लिये ग्रहण किया जा सकता है । भाषा के विकास की दृष्टि से भा 'प्राकृत' का समुचित अर्थ ही लिया जाता है क्योंकि ६०० ई० पृ० से लेकर १००० ई० तक की सभी भाषाएँ प्राकृत ने नाम से कही गद है जिन्हे 'यारभिक प्राकृत', 'मध्यकालीन प्राकृत' और 'उत्तरकालीन माकृत' के नाम से विभाजित क्यिा गया है। यारंभिक पाहत ये प्रतर्गत पालि और शिलालेसी प्राकृत अथवा लेण प्रायत, मव्यथालीन प्राकृत के श्रतर्गन माहाराष्ट्री', 'शौरसेनी', मागधी', 'अर्ध मागधी', पैशाची' ग्यादि और उत्तरकालीन पे अन्तर्गत 'नागर', 'उप- नागर', 'घाचदत्रादि अपयश भाषाओं की गणना की जाती है। परन्तु और भी अधिक मंचित रूप में कुछ लोगों ने मध्यकालीन प्रायतों पी ही गणना माहित्यिय प्राकृत भाषाओं के रूप में की है। संस्कृत भाषा की सयापस्ता प्राचीन काल में तो रही ही परन्तु माद में भी उसका यथट प्रभाव बना रहा । परन्तु एक पाल ऐमा श्वाया जय रि सरग या व्यवहार सामान्य जनता म नहीं रह गया। प्रथम पशोर प शिलालयों तथा सिओं पर सस्कृत स भिन प्राकृत भारत युद्ध उदाहरण मिलते है और साथ ही धार्मिक ग्रंथों की १मयमामो म पाया विमति को पतनि धापासी। एति ममुरं दिय गति सादरामो चिय अना॥

[५] प्रास्तों ( पालि और अर्धमागधी) में भी उस काल का संपन साहित्य उपलब्ध होता है। सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक तथ्यों का जितना पारचय उक्त प्राकृतों से मिल सस्ता है उतना उस काल में प्रचलित सरकृत भाषा से नहीं मिलता । उस काल म उक्त प्राकृत जन-सामान्य की भाषाएँ था, सस्कृत जनता की भाषा नहीं रह गई थी। सस्कृत भाषा का परिष्कार प्रातिशारयों के समय से लेकर यष्टाध्यायी' और 'महाभाष्य के समय तक वरापर होता रहा और वह जनसाधारण की भाषा न रह कर सीमित समुदाय की भाषा हो गई थी। प्राचीन ग्रार्य भाषा की विविध वालियों-~-'उदीच्य', 'प्राच्य', 'मध्यदेशी' यादि जो माग्वेद काल से ही प्रचलित थीं वे सस्कृत के विकास के समय म भी विविध क्षेत्रों में प्रच- लित थी और फिर उन्हीं क्षेत्रों म विभिन प्राकृत रूपों का विकास हुया तथा इनका प्रचार तब तक वना रहा जब तक कि याधुनिक अार्य भाषायो का विकास उनके ग्राधार पर नहीं हो गया । प्राकृत भाषाओं का वर्गीकरण प्राकृत भापायों का वर्गीकरण अनेक रूपों में किया गया धामिक प्राकृतो के अंतर्गत वौद्ध ग्रथों की भाषा ‘पालि', प्राचीन जैन- सूत्रों की भाषा 'अर्धमागधी' जिसे 'पाप' भी कहते हैं, जैन माहाराणी, जैन शौरसेनी और 'अपभ्र श' भाषाओं की गणना की गइ ह । साहित्यिक प्रास्तों के अन्तर्गत 'माहारापी', 'शौरसना', मागधो, 'पैशची' और 'यपम्र श' तथा उसके अनेक भेद रखे गय हैं। नाटकीय प्राकृतों से तर्गत सस्कृत नाटकों में प्रयुक्त 'माहाराष्पी', शौरसेनी,मागधी तथा उसर अनेक भेद, अश्श्योप के नाटों म प्रयुक्त 'प्राचीन अर्धमागधी' भाषाएँ रखी गइ हैं। वय्याकरणा के द्वारा वणित प्राकृतों म माहाराम, शौरसेनी, मागधी, पैशाची, चूलिका पैशाची, अपभ्रश और प्राकृत को अनेक पिभापायों की गणना का गइ है। इनम काव्यशास्त्र तथा सगीत सवधी रचनाएँ भी सम्मिलित हैं। उदाहरण के लिये भद्रट' के 'काव्या- है N लपार' पर 'नमिसाधु' की टीका, भरत वृत नाट्यशास्त्र अथवा गीतालंकार यादि । भारतेलर प्राकृत के अंतर्गत प्राक्त धम्मपद' की भाषा जिनके कुछ लेस सोतान प्रदेश मे सरोष्ठा लिपि में उपलब्ध हुए, मध्यएशिया में उपलब्ध लेसों की निया' योर 'पोतानी' प्राकृतें रसी गई है । शिलालेखी प्राकृत क अतर्गत ब्राह्मी और सरोष्ठी लिपियों में भारत और सिहल में उपलब्ध अशोक के समय और उसके बाद की स्तभो, शिलालेरजो ग्रादि की भाषा रखी गई है । इन यतर्गत सिक्को तथा तौवे भी प्लेटो पर उपलब्ध मापा की गणना भी की जाती है । 'विस्त सस्कृत' (Popular Sanskrit )--हिन्दू, बौद्ध और जैन ग्रथो म उपलब्ध प्राचीन मार्य भाषा का यह प्राकृत रूप है जो उस कार म प्रचलित हुया जव सस्कृत व्याकरणिक नियमा म विल्कुल जक्ड़ दी गई थी। प्राकृत के उपर्युक्त सभी विभाजनों का सदिप्त विवरगा यहाँ पर अपेक्षित है । परन्तु साहित्यिक प्राकृता के श्चतिरिक्त धामिक प्राकृतों म पानि, अर्धमागधी, जैन माहाराष्टी, जैन शौरसेनी, नाटकीय प्राकृतें, वय्याकरणी व द्वारा णित प्राकृतों यादि की विशेषतान्यो काही विल सदिप्त विवरण यहाँ पर दिया जायेगा। प्रात्त-घग्याकरण प्राचीनतम प्राकृत व्याकरण प्राकृत प्रकाश के रचयिता 'पररुचि' ने माहाराणी, पैशाची, मागधी और शरमेनी का उल्लेख किया है। 'हेमचन्द्र' ने इन चारो अतिरिक्त 'लिगा पैशाचिस','या' (अर्ध मागधी) और अपभ्र श का भी उल्लप क्यिा हे । त्रिविक्रम', 'लक्ष्मीधर', 'सिहरान, नरसिंह' यादि ने हेमचन्द्र क रिभानन का अनुसरण क्यिा हैदनम क्वल निपिनम व अतिरत शेषन 'यार्प' को छोड़ दिया है। दन छ भाषाओं-माहाराट', 'शौरसेनी', 'मागधी', 'पशाची', 'जूलिया पैराची' और 'अपम श' को “इभापा' के नाम से भी कहा । । । [ ७ गया है। मार्कण्डेय ने इन छ: के स्थान पर सोलह भाषायों का उल्लेख किया है। उनके अनुसार प्राकृतों को भापा, विभाषा, अपभ्रंश और पैशाच चार वर्गों में बाँटा गया है। भाषा के थंतर्गत माहाराष्ट्री, शौरसेनी, प्रान्या, श्रावन्ती, मागधी, दाक्षिणात्य एवं वाहीनी विभाषा के अंतर्गत शाकारी, चाण्डाली, शावरी, याभीरिकी, ढकी, मुख्य रूप हे, योड़ो और द्राविड़ी विभाषाएँ नहीं मानी गई है, अपभ्रंश के २७ रूपो को नागर, उपनागर और ब्राचड में और ११ पेशाची विभाषायों को फैक्य', 'शौरसेन' और 'पाञ्चाल' तीन रूपों मे गणना की गई है। रामतर्कपागोश' और पुरुषोत्तम' ने भी मार्कण्डेय के उक्त विभाजन का समर्थन किया है। समस्त प्राकृत भाषाओं में माहाराष्ट्री' प्राकृत को ही सर्वोच्च माना जाता है। याचार्य दण्टी ने 'काव्यादर्श' म इसकी उत्कृष्टता का उल्लेख इस प्रकार किया हे—माहाराष्ट्रथया भाषाम् प्रकृष्टम् प्राकृतम् विदुः यान विद्वानों के द्वारा प्राकृतों मे माहाराष्ट्री भाषा उच्च मानी गई हे । संस्कृत के मनिक्ट होने के कारण माहाराष्पी को ही सव प्राकृतों का अाधार माना जाता रहा है। इसीलिये भारतीय बय्याकरणों ने माहाराष्ट्री प्राकृत को ही सर्वप्रथम स्थान दिया है। 'वररुचि' ने प्राकृत-प्रकाश मे माहाराष्ट्री को ही प्रमुख स्थान दिया है। अन्न प्रकृतों की कुछ विशेषताएँ देकर शेष को माहाराष्ट्री के सदृश लिस दिया है—शेष माहाराष्ट्रीवत् । 'पररुचि ने अपनश भाषा का उल्लेख प्राकृन-प्रकाश में नहीं दिया है। प्लेसन' ( Lassen) के मतानुमार अपभ्रश वररुचि से पूर्व प्रचलित भाषा थी परन्तु 'पिशेल', 'प्ला' आदि विद्वान उक्त मत से सहमत नहीं है । 'नभिसाधु' ने काव्यालंकार में संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रश तीनों को भिन्न रूप में दिया है—"यद् उपतम् के चित् यया प्राप्तम् सस्कृतम् चतद् अपभ्रश इति निघा।" प्राय: लोगों ने तीनों को यलग-अलग ही स्वीकार किया है। 'दण्डी' ने काव्यादर्श में [८] साहित्यिक और जन-भाषा के अलग-अलग रूप दिये है। संस्कृत,. प्राकृत, अपभ्रश मे लिखे हुए अलग-अलग काव्य और इनमें से किसी दो में लिसा काव्य मिथ' रूप के नाम से दिया गया है । दण्डी ने काव्य में व्यवहृत भाभीर और धर्म-सूत्रो की भाषा को अपभ्रश माना है। शास्त्रीय दृष्टि से अपनश को संस्कृत से भिन्न माना गया है। मार्कण्डेय ने ग्रामीरों की भाषा अाभीरिकी की गणना विभाषा और अपनश के अन्तर्गत की है जिसके २६ प्रकार दिये गये हैं- पांचाल, मालव, गौड़, गोड़, कलिंग, कर्नाटक; द्राविड, गुर्जर आदि । अपनश इस प्रकार आर्य और पायेंतर की जन-भाषा के रूप में भी मानी गई है। 'रामतर्फवागीश' के मतानुसार नाटक मे व्यवहृत विभाषा को अपभ्रंश कहना ठीक नहीं है । अपभ्रंश उन्हीं भापायों को कहना चाहिये जिनको जनता बोलने में प्रयुक्त करे । मागधी का साहिलिक रूप भाषा है और मौसिक रूप अपभ्रंश । रविकर' ने अपभ्रश के दो रूप दिये है.--एक का विकास साहित्यिक प्राकृत के अाधार पर हुना परन्तु विभक्ति, समास, शब्द-विन्यास श्रादि की दृष्टि से वह भिन्न है और दूसरी देशी भाषा का रूप है। वाग्भट्ट ने पारमा लंकार' में चार भापायों का उल्लेख किया है.--संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश श्रोर भूतभारित (पेशाची) और इनमे अपनश शुद्ध भाषा मानी गई है- "अपभ्रशा. सुपच शुद्धम् तत्तदेशेषुभाषितम् ।" अलंकार तिलक मे तर याम्म' (Younger Vagbhatta) ने संस्कृत, माकृत, अपभ्रश और ग्राभ्यभाषा की भिन्नता स्पष्ट की है। इस प्रकार संस्कृत, पारन और थपभ्रंश मिन प्रकार की भाषाएँ कही जा सस्ती है । संस्कृत को प्राचीन श्रार्य भाषा का प्रतिनिधि रूप में मान पर ही प्रास्तों या संबंध उसमे जोड़ा गया है अन्यथा लौकिक संसत जिसमें याय, नाटक श्रादि मभी रचनाएँ लिपी गई और साहिसिक प्रारते दोनों ही वैदिक संस्कृत की उपज हैं। श्रन्तर यंबल है -- [] इतना ही है कि लौकिक संस्कृत अकेली भाषा थी जो वैदिक से प्रभावित हुई और प्राकृत के विविध रूप थे जो वैदिक की विशेषताओं | को लेकर विकसित हुए परन्तु उनका सबध वैदिक से उतना ही है जितना सस्कृत का । अतएव लौकिक सस्कृत और प्राकृतों में भाषा विकास की दृष्टि से बनवत् सवध स्थिर क्यिा जा सकता जैसा कि पहले कहा जा चुमा है कि प्राकृत प्रकाश प्राकृत भाषायों का प्राचीनतम रचना है। उक्त प्रथ पर 'मनोरमा' नाम से भामह' का प्राचीनतम टीका है । इसके अतिरिक्त वसन्तराज की टीका प्राकृत सजाविना', सदानद की टीका प्राकृत सुबोधिनी' भी प्रसिद्ध है । प्राकृत मबरी' नाम की एक पद्यात्मक टीका भी ह । नारायण विद्याविनोद का मदीश्वर रचित सक्षिप्तसार पर लिसी टीका प्राकृतपाद अव प्राकृतप्रकाश' पर की हुइ टीका मानी जाती है क्याकि इसम सन्निविष्ट छ परिच्छेद प्राकृत प्रकाश के सात परिच्छेदों से बिल्कुल मिलते हैं । प्राकृतव्याकरणाम चरन कृत 'प्राकृतलदण' भी अत्यत प्राचीन मानी है । इसम माहाराष्ट्री और जन प्राकृतो—अर्धमागधी, नशौरसेनी, जैन माहाराष्टी का उल्लस किया गया है। हेमचन्द्र रचित 'प्राकृत व्याकरण'—सिद्ध हेमचन्द्र के नाम से पूर्ण और प्रसिद्ध व्याकरण है। हमचन्द्र ने स्वय हा वृहत् और लघु वृत्तियों म अपने व्याकरण की टीका प्रस्तुत की है। लघुवात्त प्रकाशिका' के नाम स मिलती है। उदयसौभाग्यगणिन् क द्वारा प्रकाशिका' पर की हुइ एक टीका हम प्राकृतवृत्तिदुरिढका' अथवा 'व्युत्पत्तिपाद' मिलती है। हमचन्द्र काठमें परिच्छेद पर नरेन्द्र चन्द्रसूरि रचित प्राकृत प्रबोध टीका उपलब्ध होती है। हेमचन्द्र की भाँति प्रमदीश्वर ने 'साक्षप्तसार' नामक संस्कृत व्याकरण लिसा जिसका पाठवाँ परिच्छेद 'प्राकृत व्याकरण' है। उसने वररुचि का ही प्राय अनुसरण किया है। उसका कोल हेमचन्द्र और वोधदेव र बीच १२ वी १३ वीं शताब्दी के वीच माना जाता है। पूवा सम्प्रदाय के प्राकृत वय्याकरण म पुरुषोत्तम, रामशर्मन और ।

[१०] 'मार्यरडेय आदि मुख्य माने जाते है। पुरुषोत्तमदेव रचित 'प्राकृता- नुशासन' की केवल एक हस्तलिपित प्रति १२६५ ई० वी रचित साटमण्ड, नेपाल के पुस्तकालय में नेवारी लिपि में उपलब्ध हुई है। रामशर्मन तवागीश रचित 'प्रावृत कल्पतर' की एक हस्तलिखित प्रति १६८६ ई० की मिली है। मार्कण्डेय रचित प्राकृत सरस्व रक्त दोनः रचनायो को यपक्षा अधिक ज्ञात है। उसका समय सनहीं शताब्दी का उत्तरकाल माना जाता है। 'अरिविक्रम' का प्राकृत व्याकरण हेमचन्द्र के व्याकरण ३ अनु मरण पर रचित हे । रचमिता का सगम १३वीं शताब्दी के लगभग है। पश्चिमी सप्रदाय के प्राकृत यय्याकरणों में त्रिविक्रम प्रमुख हैं और सिहरान, लक्ष्मीधर अन्य प्रतिनिधि है । सिहराज रचित मारतरूपा बतार और लक्ष्मीधर रचित प-भाषा-चन्द्रिका रचनाएँ है । अप्पन दीक्षित रचित मान मशिदीप भी उक्त संप्रदाय की रचना है। इसी के प्रतर्गन शुभचन्द्र रचित 'शब्द चिन्तामणि' भी है। काइ रारण रचित प्राकृत कामधेनु यथा प्राकृत लंकेश्वर' और कृष्ण पगिडत यथवा शेषकृष्ण रचित 'प्राकृतचन्द्रिका' का भी उल्लेख मिलता है। इस प्रकार अनेक प्राकृत वय्याकरणों द्वारा प्राकृत भाषायों पर यथेष्ट प्रकाश पड़ता है। यह अश्य है कि प्राय सभी वय्याकरणों ने प्राक्ता का सबध लौकिक संस्थत से ही स्थिर किंगा है, वैदिक से नहा । यद्यपि प्राकृत भाषाया का लौकिक सस्कृत को थपेक्षा पैदिक से ही सच यधिक स्वाभाविक माना गया है। मारत धम्मपद पोतान में सरोठा तिपि म १८८२ इ० म मासीसी यानी 'एम० इल द रॉ' (H. Dutrelul de Rbine) के द्वारा कुछ महत्व- पूर्ण लेख प्राप्त हुए । म्मो विद्वान 'डी० योल्डेनवर्ग' ( (D. Oldenburg) ने उन लेनों का स्पष्टीकरण किया और प्रासीसी [ ११ । विद्वान 'ई. सेनार्ट' (E. Senart) ने उसे १८६७ ई० में पूर्व संपादित लेसों के अंश के रूप में सिद्ध किया और फिर अंग्रेज तथा भारतीय विद्वानों ने भी इस योर धान दिया और उसका एक संस्करण क्लात्ता विश्वविद्यालय से 'पी० एम० वरूया' और 'एस० मिना' ने मन् १९२१ मे 'प्राकृत धम्मपद' के नाम से प्रकाशित किया। दसकी भाषा पश्चिमोत्तर प्रदेश की वोलियो से, मिलती है । 'ज्यूल्स उनाक' (Jules Bloch) ने 'सरोठी धम्मपद' की धनि संबंधी तथा अन्य विशेषतायो क ग्राधार पर यह निष्कर्ष निराला कि इसका मल भारतवर्ष म ही लिखा गया था । सरोष्टी यक्षरों में होने के कारण इसका नाम रोष्ठी धम्मपद' पट गया। यद्यपि भाषा की दृष्टि से उसका नाम 'प्राकृत-धम्मपद' अधिक उपयुक्त पहा जायेगा। उक्त उपलब्ध ग्रन्थ के यारह वगों ( परिच्छेद ) २३२ छदो का संग्रह मिलता है। इसका रचनाकाल २०० ई० के लगभग याँगा गया है। निया-प्राकृत 'सर गोरेल स्टेइन' (Sir Aurel Stein) ने चीनी तुर्किस्तान में कई गरोठो लेगों या अनुसंधान क्यिा । स्टेइन ने तीन बार की याताया-पहली १६००-१६०१ ई०, दृमरी १६०६-१६०७ और तीसरी ६१३.१६१४, में निया प्रदेश मे अनेक लेखों को प्राप्त पिया और इनका मंपादन ए० एन० व्यायर, ई० जे. रसन्, ३० सेना ने मनश. १९२० ०, १९२७ १० और १६२६ २० में गरोठा शिनालेख (Kharosthi Juscriptions) पे नान मरिया । मन् ११३७० म 'टा० वरो' (1. Turro) ने प्रशाशा टिप्पणी म इन लयों का पिसी भारतीय प्रायन म, जो शनशन' प्रदेश पानामरी गताब्दा म रागीय भाषा थो, लिग ग्या यशाया | नरि अधिारा सभी लेग निया प्रदेश में उपलब्ध हुए मिलियन प्रापत' नाम स कहा गया है। इन भाग या मूल स्थान भारा या पश्चिमोत्तर प्रदेश-संभवत. पेशावर पं. यासपास गाना । [१२ ] गया है। क्योंकि इसकी भाषा का संवध पूर्व उल्लिखित सरोठी- धम्मपद यौर अशोक के पश्चिमोत्तर प्रदेश के सरोष्ठी शिलालेसों की भाषा से है। उक्त लेखों म राजा की शोर से जिलाधीशों को श्रादेश, का विक्रय सबधी पत्र, निजीपन तथा अनेक प्रकार को सूचियाँ उपलब्ध हैं। इसकी भाषा की एक विशेषता यह है कि दीर्घस्वरों, अन्य स्वरों और सपोप ऊष्म ध्वनियों के लिये जिनका प्रयोग भारतीय प्रावृतों म नहीं होता लिपि चिह्न मिलते है । 'निया प्राकृत' पर इरानी, तोरनारी और मगोली भापायों का पर्याप्त प्रभाव मिलता है। इसका उद्भव दाल तीसरा शताब्दी माना गया है। । शिलालेसी प्राकृत प्रारभिक और प्राचीन प्राकृतो में पालि और शिलालेखों की भाषा की गणना होती है। और ३०० इ० पू० के कुछ शिलालेस भी महत्वपूर्ण है। इनमें उत्तर वगाल का महास्थान का शिलालेग्न (Mahasthan Stone Plaque Inscription ), मध्य- भारत का जोगीमार गुफा लेख (Jogimara cave Inserup tion), पश्चिमोत्तर विहार का सोहगौरा कॉपर प्लेट लेस (Sobgaura copper plate Inseraption), ग्वालियर का बेसनगर स्तम लेग ( Besnager Pillar Inscription ) पश्चिमोत्तर भारत का सरोष्टी में शिन्नाट कॉसमेट लेस (Sbinkot cashot Inscription ) उड़ीसा का हाथीगुम्फा लेख यादि मुख्य हैं। अशोक ने अधिकाश शिलालेख ब्राही लिपि म ही मिलते हैं। गरोष्ठी लिपि में शाहाबाजगढी और मानमेहरा के शिलालेख मिलते हैं। यशोक का धर्मलिपियाँ छ रूपा में पिमानित की गई है। शिला लेकर अन्तर्गत परोष्ठी अक्षरों म शाहाबानगडी, और मानसहरा और बाली लिपि में गिरिनार, कालसी, धौली, औगढ और सोपार के लेस ६। ला शिलालेप (Minor Rock Edicts) के अन्तर्गत रूप 1 . । १३ । नाथ, सहसराम, वेस्ट, ब्रह्मगिरि, सिद्धापुर, जटिंग रामेश्वर, मस्ती, कोपवाल, येरै गुड़ि के लेख हैं। स्तम्भ-लेस (Pillar Ediots) दिल्ली- तोपरा, दिल्ली, मिरत, इलाहावाद, कौशाम्बी, रधिरा और मथिया और रामपूर्वा के लेप हैं। लघु स्तंभ लेख ( Minor Pillar Edicts) सारनाथ, साँची, इलाहावाद, कौशाम्बी में मिलते है। स्तंभ दान लेस (Pillar Dedication) रुम्मिन्देद और नेपाल के नीगलिय स्थानों में मिले हैं। लेणलेस (Cave Inscriptions) गया निले के वरावार और नागार्जुन गुफात्रों में उपलब्ध हुए हैं। इस प्रकार अशोक के शिलालेख भारत ने चार भागों का प्रतिनिधित्व फरते है-पश्चिमोत्तरी समूह ( उदीन्य ), दक्षिण-पश्चिमी समूह (प्रतीच), मध्य पूवा सनूह (प्राच्य-मध्य) और पृषी समृह (माच्य) । पिशेल ने स्पष्ट किया है कि सेनार्ट ने अशोर के धर्मलिपियों की भाषा शिलालेखी प्राकृत (Prakrit Monumental) के नाम से दी है। परंतु यह नाम भामय है क्योंकि इससे भाषा की कृत्रिमता का बोध होता है। कि अधिकाश रिलालेस गुमानों में मिलते हैं इसलिये पिरोल ने इनयो लयन > लेण विभाषा को संज्ञा दी है। इसी प्रकार या एप शब्द लाट (स्तंभ)< लहिर यष्टि भी है, क्योकि यशाप के लेख अनेक लाटों पर मिनते हैं इसलिये दमे 'लाटपिभाषा' भी पा गा है। दन लेनो की भाषा का संस्कृत के विकास से सीधा सम्बन्ध नहीं है। नयी विशेषताएँ अधिकाश म्प में प्राकृत से ही मिलती हैं इसलिए इनकी गणना प्राप्त सार के अन्तर्गत ही को जाती है। प्रशोर प्रतिरिका मामी थारों में घन्च शिलालेप भी मिलते ६ो भारत के विभिन्न भागों पालों से सम्बन्ध रखते हैं। ये अधिकतर ३००१०१० मे ४०० १० ना तुल पी संगमा २००० के लगभग रोगी। मुछ तो पाफो लम्चे थोर बुध देवल एकही पशि के मिलते हैं।मगारपेन हाथी गुमा लेस, उदयगिरि और [ १४ ] रखण्डगिरि के शिलालेप', पश्चिमीभारत के यान्त्रमश के राजायो के शिलालेख प्रसिद्ध और बडे याकार क है। प्राकृत के उपलब्ध शिलालेखो ये अन्तर्गत पल्लवश के राजा शिष स्कद वमन एव युपराज विजयसुद्धवर्मन क दान-वर्णन, 'करमुक' का शिलालेख, सोमदेव कृत 'नलित विग्रहराज' नाटक ये कुछ यश की भी गणना की जाती है । अहलर', 'ल्युमेन', 'पिशेल' ने इनका उल्लेन रिया है । इनको पल्लर ग्रान्ट' (Pallava Grant) के नाम स कहा गया है। क्युक का शिलालेख जैन माहाराष्ट्र प्रापन में है । ललितविग्रह राज नाटक के अशा म माहाराष्मी शौरसनी पोर मागधी तीना प्रावृतें मिलती है परन्तु हेमचन्द्र द्वारा निर्देशित शौरसनी, मागधी की उछ विशेषताएँ मिन रूप म मिलती हैं । स्टेनकोनो (Stenkonow) ने इस स्पष्ट किया है। उदा० शौर० दूण > ऊण, माहा० य्येवर जेन ये रूप सोमदव द्वारा सय ही व्याहृत किये गये होंगे क्योकि इनकी पुनरुक्ति बराबर मिलती है और यह उत्कीर्णक की गलती नहीं हो सकती। सिंहलद्वीप के शिलालेय १०० ई. पृ० से लेकर ३०० इ. तक के उपलब्ध होते है निनका साम्य मध्यपूरी समूह से स्थिर दिया गया है। गुफा अथवा प्रस्तर लेख ही इनम प्रसिद्ध हैं 1 गुफा एव शिला लेख सपूर्ण द्वीप म पाये जाते हैं और प्रस्तर लेन तालाबो के पास मिलते हैं और उनमें तालाबों का मन्दिर के लिये दान का वर्णन मिलता है । 'गाइगर' (Genger ) ने इसे 'सिहाली प्राकृत' का नाम दिया है। परोप्टो अक्षरों म अशोक के अतिरिक्त पाये जाने वाले शिलालेख पश्चिमोत्तर प्रदेश के हैं। दो शिलालेय काँगरा क है निनम चरोष्ठी के साथ ब्राह्मी लिपि का भी प्रयोग किया गया है। मथुरा का एक प्रसिद्ध शिलालेख मरोष्ठी म मिलता है यद्यपि उस प्रदेश की लिपि ब्राह्मी है। इसी प्रकार पाना का एक शिलालेख है। फिर भा पश्चिमोत्तर प्रदेश ही सरोष्ठी के शिलालेजों का उपयुक्त स्थान माना गया है । उक्त शिलालेख विभिन प्रकार के पदार्थों पर मिलते हैं। जैसे पत्थर, । । १५ ] चट्टान, सोने, चाँदी, ताँवा पे पत्तर, सील, मूर्तियों के याधार, मिट्टी क वर्तन, ईंट यादि। परन्तु इन सभी भारतीय शिलालेखों की वापक्षा अशोक के लेख काफी बडे आकार के प्रोर महत्वपूर्ण हैं और इनकी गणना दारा के प्राचीन फारसा' के शिलालेखों व सदृश ही की जाती है। मध्यकालीन पार्य भाषायो अथवा प्राकृत या उल्लेख भारतीय ग्रारभिक सिकों पर भी मलता है। इन सिको म कुछ सिम्र तो लेखपूर्ण ( Inscribed ) और कुछ सिक्न लेसरहित ( uninscribed) है। लेसराहत सिक्को के अन्तर्गत पश्चिमोत्तर भारत के चाँदी और ताव के सिके है और लेसपूर्ण लिकों के अन्तर्गत ग्रीक, ब्राह्मी, सरोष्ठी और प्रारम्भिक नागरी लिपि में प्राप्त सोने, चाँदी और तोच पे सिके हैं। भाषा की दृष्टि से दूसरे प्रकार के लेस ही महत्वपूर्ण हैं और ये भारत के विभिन्न भागों म ३०० ई० के बाद से मिलते है । 'धर्मपाल' का लगभग ३०० ३० पू० पा प्राचीन भारतीय सफा मध्यप्रदेश 7 सागर जिले म एराम (Tran) म उपलब्ध हुया है । इस पर मामा लिपि म धमपालस' ('धर्मपालस्य' ) लिसा मिलता है। सरोष्ठी योर ग्रीक म टेमेट्रिश्यक तौर के सिक्के मिलते हैं । सराष्टी म 'महरजस अपरिजितस दिम' लिजा मिलता है । इस प्रकार प्रास्ता २ धनि पिवनन पी हार स इन सिकों का भी कम महत्व रहा है। परले पहा जा चुरादिप्राकृत भायात्रों 7 पन्तगत गाथा' की मापा यथवा संघाकृत रूप कामी गणना की जाती है । सस्कृत ममाहत की विशपतानोरा समावश रान र कारए शुर भाषा का रूप यदल गया। सएन र इस रूप म बौद्ध, जैन तथा पुराणों की रचनाएँ उप लब्ध होती है। प्रासीसी गिद्वान 'ममार्ट' स द्वारा तीन भागों म सपादित महावस्तुप उपलब्ध होने में गाथा पी भात का ध्यान सरल हो गया। सद्भर्म पुररी, ललितविस्तर, जातप माला, अपदानशतक रचनाएँ [ १६ ॥ इसी भाषा में हैं जिनका यध्ययन अमरीका के पिद्वान प्रकलिन् एज र्टन (Franklin Ldgertan) न किया है। मुवर्ण-भाषोत्तम सूत्र भी इसी प्रकार की रचना है। डॉ० ए० एन० उपाध्ये द्वारा सपादित धाराङ्गचरित और श्री मुल्कराज जैन द्वारा संपादित चित्त सन पद्मावती चरित' की भूमिका म दस भाप्य या उल्लेस किया गया है। सवप्रथम अमरीका के ही विद्वान मारिस ब्लूमफील्ड न जैन ग्रथा म प्रयुक्त इस भाषा की योर सस्त क्यिा । जैन ग्रयों की कहा नियों तथा अन्य प्रकार की रचनायों को सर्वसाधारण को सभवत समझान क लिय दस भाषा का याश्रय लिया गया है । इसा प्रकार रामायण, महाभारत तथा पुराणों का सस्कृत भाषा म अनेक ऐसे ही प्रयोग मिलते है ना प्राकृत भापा की विशेषताओं से सवध रगत हैं। प्राकत व शब्दों और रूपाक प्रयोग शुद्ध सस्कृत के रूप को बदल. दो हैं । भण्डारकर अॉरियण्टल रिस र इन्स्टीट्यूट, पृना द्वारा प्रया शित भाभारत क सस्करण म अथ की संस्कृत भाषा का वैज्ञानिक ढग स विवचन मिलता है और उसी ये याधार पर प्राकृत की विशेष ताया क समावश की भी पर्यान जानकारी हो जाती है। यतएव उक्त प्रथों द्वारा सस्कृत भाषा पर भी प्रावृत्त के प्रभाव पा यथेष्ट परिचय मिल जाता है। नाटकीय प्राकृतें वैसा पहने कहा जा चुका है कि संस्कृत नाटकों म प्राकृतो का प्रयाग पर्याप्त माना म मिाता है और यह परपरा अत्य त प्राचीन मानी जाती है। नाश्यशास्त्र, दशरूप और साहित्यदर्पण के अनुसार उच्च श्रेणी क पुरुष और महिलाएँ, भिनुणी, यग्रमहिषी, रानमत्रियों की मुपुनियाँ, महिला कलाकार आदि कद्वारा सस्कृत का व्यवहार होता था और अन्य स्त्री वर्ग, अप्सराया आदि म प्राकृत का प्रयोग मिलता है। अग्रमहिपी भी प्राकृत का प्रयोग करती है। गणिका की भाषा के सवध म निम्न । लिखित उल्लेख मिलता है.-"गणिया घउसट्ठि कला पण्डिया घउसद्धि गणिया गुणोववेया अठारह सदेसी भाषाविसारया।" नायाधम्मक्हा, विवागसून, कुमार-संभाव, सरस्वती मे दो भाषाओं का प्रयोग हुआ है। शिव का क्थन संस्कृत और पार्वती का प्राकृत में मिलता है। राजशेपर की कर्पूरमजरी में भी सस्कृत यौर प्राकृत दोनो का प्रयोग हुया है। मृच्छकटिक म विदूषक कहता है कि दो वस्तुएँ हास्य को उत्पन करती हैं। एक तो क्सिी स्त्री के द्वारा संस्कृत भापा का प्रयोग और दूसरे किसी पुरुष के द्वारा धीमे स्वर मे गान । सूनधार बाद में जो विदूपक का भी, कार्य करता है, संस्कृत का व्यवहार करता है परन्तु ज्यो ही वह स्त्रियों को सम्बोधित करता है तो यह प्राकृत का प्रयोग करने लगता है। पृथ्वीधर मे स्त्रियों की भाषा प्राकृत स्वीकार नहीं की है-"स्त्रीषु न प्राकृतम् वदेत ।" परन्तु तथ्य यह है कि स्त्रियों की भाषा प्राकृत है । इसे प्राय. सभी वय्यापरणों ने स्वीकार किया है परन्तु वे संस्कृत भी बोलती है और समझती हैं। पिशेल के अनुसार चिद्धशालभञ्जिका में विचक्षणा, मालती-माधव में मालती, प्रसन्नराधन में लगिका और सीता सम्कृत भाषा मे गीतों का गान करती हैं। अनपराघव में कलहंसिका, मलिकामास्तम् मे सुभद्रा, मल्लिका, नवमालिका, सारसिका, कालिन्दी सस्कृत भाषा म वार्तालाप और गान दोनो करती है। पुष्प भी वार्तालाप में तो प्राकृत का प्रयोग करते हैं, परन्तु गीत संस्कृत में गाते है। क्सघ म द्वारपाल, धरण्य में नापित नादि । जीवानंदन में धारणा प्राकृत या प्रयोग करती है परन्तु तपस्थिनी के रूप में यह संस्कृत म' वार्तालाप करती है। इसी प्रकार मुद्राराक्षम में राक्षस राजमवी से संस्कृत में वार्तालाप करता है सर्वप्रथम अश्वघोष के नाटकों में जिसरा रचनाकाल १०० १० माना जाता है और जो मध्यएशिम से उपलब्ध और जर्मन विद्वान 'ल्डर्स' (Luders)द्वारा संपादित हुथा, प्राकृत भाषायों का 4 ( १८ । प्रयाग मिलता है। नाटक की भाषा श्रवाचीन नाटकों का अपना सत्यत प्राचीन हे । 'ल्युटर्स ने नाटक म प्रयुक्त प्राकृतों के तीन रूप दिय है - दृष्ट की भाषा प्राचीन मागधी, गणिका और पिदूपक की भाषा प्राचीन शोरसेनी और गोभम तापस की भाषा को प्रापान अध मागधी। इनकी भाषा का रूप अशोकी प्राकृत स भी मिला है। दुए की भाषा प्राचीन मागधी म र > ल, प, स >श,- >ए, अह > ग्रहक, पाठी एक-दो भाषा सबधी मिशपत्ताएँ मिलता है। गणिका और विदृपक की भाषा प्राचीन और शौरसनी म-य 7 श्रो 'भ्य ,-> अ , अ>इ, व्य > > पन्, पृचा > करिय, भवान् > भवाम् अादि उदाहरण और सनी भाषा में हैं। गोभम तापस की भाषा मध्यपूर्वीसमूह अथवा प्राचीन अर्ध मागधी म र >ल,--> -यो, श का अभाव- क-श्राफ, इक मययों का व्यापक प्रयोग मिलता है । अश्वघोष र अनतर भाम र नाटकों म प्रयुक्त प्राक्त प्रारमिक रूप म मानी जाती है। इसकी हस्तलिसि प्रतियाँ अधिक्तर दक्षिण भारत म मिली हैं। इसीलिये दक्षिण की लिपियों म प्राकृत भाषा अत्यत प्राचीन सी लगती है। परतु प्राकता व य ययन के लिय मृछ फाटक नाटक का अधिक महत्व है, जिसरे लेखक शूद्रक माने गये है। सस्कृत नाटकों म प्राकृता के प्रयोग की परपरा ११०० इ० तक ता बिल्कुल स्वाभाविक रूप म मिलती है क्योकि तव तक प्राकृता का व्यापक प्रयाग जनसाधारण म प्रचलित था पर तु ११ वा शताब्दी अनतर रचे हुए नाटकों म भी यहा का १७ वा शताब्दी के नाटकों म भी सस्कृत नाटका म प्राकृता का प्रयोग का पशास्त्रिया योर वय्याकरणा द्वारा निदाशत नियमा क अनुसार ही पहा जायगा । अश्वघाप, भास शूद्रक, काालदास यादि ने ता अपन नाटको म लौक्कि व्यवहार के कारण ही विविध पात्रों के अनुसार प्राकृत भाषा का प्रयाग क्यिा होगा परतु वाद म वही नाटकोपी भाषा का एक नियामत रूप बन गया। नाटका म प्रयुक्त औरसनी क । + [ २६ ] दो प्रधान रूप प्रान्या और यावन्ती, दाक्षिणात्य निश्चित किये गये हे। मृच्छकटिक म पृथ्वीधर के अनुसार विदूषक प्राच्चा का प्रयोग करता है। वीरक यावन्ती का व्यवहार करता है। पिशल के अनुसार दक्षिण निवासी चन्दनक दाक्षिणात्य का प्रयोग करता है। इसी में राजा का साला शाकार, स्थावरक कुभीलक, वर्धमानक, चाण्डाल यादि मागधी का प्रयोग करते हैं शाकार मागधी की एक विभाषा शाकारी का प्रयोग करता है, माधुर ढक्की का और चाडाल चाडाली का । शकुन्तला म मछुए, पुलिस कर्मचारी, सर्वदमन मागधी का प्रयोग करते हैं। मागधी का प्रयोग प्राय निम्नश्रेणी क व्यक्तियों तथा वौने, निदेशी, जैन भिक्षु अादि क द्वारा मिलता है। इसी प्रकार शौरसेनी सस्कृत नाटकों में महिलायो, शिशुयो, नपुसको, ज्योतिषियों, विक्षिप्त, अस्वस्थ श्रादि लोगों की भापा है। माहाराष्ट्री का उपयोग गीतों के लिय किया गया है। परन्तु विविध पानों द्वारा गद्य की भाषा मागधी और शौरसेनी क प्रयोग म वय्याकरणो तथा विद्वानों में पर्याप्त मत भेद मिलता है । भरत और साहित्य दर्पणकार के अनुसार जो व्यक्ति हरम स सम्वद्ध होते है उनकी भाषा मागधी होता है । जस नपुसक, किरात, म्लेक्ष, ग्राभीर, शाकार श्रादि । दशरूप तथा सरस्वता-कठाभरण के अनुसार मागधी का प्रयोग पिशाच तथा निम्नकोटि यौर निम्न पेशे के व्यक्ति करते हैं । मृच्छकटिक म चारुदत्त के शिशु और शाकतलम् म शंकुतला 7 पुत्र की भाषा यय्याकरणों के अनुसार निर्देशित श र सेनी न होकर मागधी है। परन्तु प्रबोधचद्रोदय म चावाक के पुरुष, उड़ीसा क दूत, दिगवर जैन, मुद्रारारक्षस म अनुचर, जैनभिक्षु, दून समिद्धार्थक, चाटाल की भाषा वय्यारणा द्वारा निर्देशित मागधी ही है। यद्यपि अन्य वेष म उनम से कुछ पान शौरसेनी का भी प्रयोग करते हैं । ललित विग्रहरान नाटक म भाट, गुप्तचर मागधी क अतिरिक्त शौरसेनी में भी वार्तालाप करते हैं । पणीसहार म राक्षस और राक्षसी, मल्लिकामोद में ।

U [२०] महायत, नागानद, चैतन्य चन्द्रोदय में अनुचर, चएटकौशिक में चाडाल, धूर्त-समागम में नाई, हास्यार्णव म चारहिंसर, कसबध म कुवढा, अमृतोदय म जनभितु मागधी भाषा का ही प्रयोग करते हैं। इस प्रकार सस्कृत व प्राय सभी नाटकों में एक-दो को छोड़ कर सभी पान वय्याकरणों द्वारा निर्देशित मारत भाषा का ही प्रयोग करते है । जो कुछ कहीं पर भद मिलता भी है वह शौरसेनी के प्रभाव के कारण अथवा प्रथों म पाठ भेद के कारण माना गया है। मन्छकटिक नाटय' म प्रयुक्त शाकारी को पृथ्वीवर ने अपनश पा रूप माना है परन्तु क्रमदीश्वर, रामतर्फवागीश, माण्टेय, साहित्य दर्पणकार, भरत, लेसन (Lassen) यादि ने उसे मागधी की एक विभापा निश्चित का है। माफ्राटेय ने स्पष्ट रूप से कहा है-~मागद्धया: शाकारी । (साध्यतीति शेय ) । पृथ्वीधर के अनुसार इस विभाषा में तालव्य व्यजनों ने पूर्व-य का बहुत सी हस्य उच्चारण सम्मिलित रहता है और यह विशेषता मागवी और नाचट अपभ्रश दोनी की है। पष्ठी एक० म--याह, सप्तमी एक०-अहिं, सवोधन वहु०-याहो रूप भी अपन श में मिलते हैं। यतएव पृथ्वीधर का वर्गीकरण रित्तुल निराधार नहा है। इसी प्रकार चाडाली को मागधी और शौरसेनी दोनों से सबधित क्यिा जाता है परन्तु लेरोन के अनुसार यह मागधी का ही एक रूप है। मार्कण्डेय ने चांगली से शाकारी का विकास माना है और उसे ही शौरसेनी और मागधी से भी संबंधित किया है । मार्कण्टेय के अनुसार वाह्नीकी भी मागधी का ही एक रूप है अन्य लोगों ने उसे पिशाच देश की भाषा से सबधित किया है। वस्तुत यह कहा जा सकता है कि मागधी कोई एक भाषा नहीं थी वरन् वह अनेक विभाधा रूपो म प्रचलित भाषा थी। मृन्धकरिक में गणिका के सरक्षक तथा उसरे साथियों की भाषा ढकी है। यह ढक्की विभाषा पूवा वगाल के ढाका प्रदेश को विभाषा मानी गइ हे ! पृथ्या धर ने ढकी को शाकारी, चाडाली, शावरी के सदृश ही अपभ्रंश से ।

- [ २१ ] संवद्ध किया है। कुछ लोगों के मतानुसार यह मागधी और अपनश के बीच की स्थिति की सान्ध्य भाषा है । पृथ्वीधर के अनुसार यह लकार और शकार युक्त विभाषा थी—'लकारस्य ढक्क विभाषा संस्कृत प्रायत्वे दन्य तालव्य शकारद्वय युक्ता।' उदा०-र)ल, स, प>श । हस्तलिखित प्रतियों में ये शुद्ध रूप मिलते हैं-'रुद्ध लुधु', 'कुरुकुरुकुलुवुलु', 'धारयति>धालेदि', 'पुरुष:>पुलिशे' । अतएव ध्वनियों के ये रूप इसका संबंध मागधी से स्थापित करते हैं। इसके पद-विकास में-अ:>-उ रूप का प्रयोग अपभ्रंश के सदृश हुया है। कुछ प्रतियों में , माथुलु शब्दो के स्थान पर वद्धो, माथुरु मिलते हैं। ये विशेषताएँ ढकी के प्रतिकूल हैं । परन्तु अधिक प्रामाणिक रचनाओं के अभाव में उक्त विभाषा का कोई निश्चित रूप स्थिर करना संभव नहीं है शौरसेनी की एक विभाषा 'अवन्तिका' का प्रयोग मृच्छकटिक में जमा कि पहले कहा जा चुका है, पुलिस पदाधिकारी वीरक, चन्दक अादि करते हैं। इसमें र,"स' ध्वनियों तथा लोकोक्ति न्यादि का बाहुल्य मिलता है। पृथ्वीधर ने उसे इस प्रकार स्पष्ट किया है-'शौरसेनी अवन्तिजा प्राच्य एतासु दन्त्य सकारता । तत्रावन्तिजा रेफवतो लोकोक्ति बहुला।' लेसेन के अनुसार अवन्तिका मथुरा की भाषा थी।मार्कण्डेय और क्रमदीश्वर के अनुसार यह माहाराष्ट्री और शौरसेनी का मिश्रित रूप था, जिसे इस प्रकार दिया गया है-"पावन्तो स्यात् माहाराष्ट्री शौरसेन्याः तु संस्कृ- तात् । अन्ययोः संस्काराद् प्रावन्ती भाषा सिद्धास्यात् । संस्कारश्च केचस्मिन् एव वाक्पे बोद्धव्यः ।" परन्तु चन्दनक की भाषा को अवन्तिका के नाम से नहीं कहा जा सकता जैसा कि उसके एक कयन से स्पष्ट होता है-- "वप्रम दविक्षनता प्रव्वत भासिणो म्लेच्छनातीनाम् भनेक देशभापा विज्ञायथेष्टम् मन्त्रयामः" । उसके उक्त कयन से किसी दक्षिण भापा का निर्देश होता है, अतएव यह भाषा अवन्तिका से भिन्न है । इसे दादि- णात्य भी कहा गया है । लेसेन ने मृच्छकटिक के अशात पान खिलाड़ी की भापा दाक्षिणात्य और शाकुंतलम् में पुलिस पदाधिकारी की भाषा [ २२ ] मे दाक्षिणात्य की विशेषताएँ मानी है। परन्तु सिलाड़ी वी भाषा ढकी है और शाक्तलम् में पुलिस पदाधिकारी की भाषा साधारण शौरसेनी है । हस्तलिखित प्रतियों में महाप्राण व्यंजनों के द्वित्व रूप को देसकर पिशेल ने भी पहले इसे दादिणात्य की विशेषता स्वीकार की थी, परन्तु बाद में उसने इसे लिपिदोप का कारण माना । श्रतएव यह कहा जा सक्ता है कि अवन्तिका यौर दाक्षिणात्य का मुख्य आधार शौरसेनी प्राकृत है, कोई अन्य प्राकृत नहीं। प्रारंभिक प्राकृत में पालि और शिलालेसी प्राकृत भाषाएँ मुख्य मानो गई हैं। शिलालेसी प्राकृत के विविध रूपो की गणना, जिनका परिचय पहले दिया जा चुका है, साहित्यिक प्राकृत के अतर्गत नहीं की जाती परन्तु पालि साहित्यिक भाषा मानी गई है और उसका 'साहित्य प्राय वौद्ध धर्म संवधी साहित्य ही है । परन्तु सकुचित अर्थ में पाकृत साहित्य के अंतर्गत पालि साहित्य नहीं रसा गया है। पालि पालि' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग धार्मिक ग्रन्थ अथवा 'बुद्ध-बचन' की पक्ति' के अर्थ में मिलता है और बाद में 'पालि' का अर्थ बदल कर भाषा विशेष के लिये हो गया। 'तिपिटक' व पंक्तियों में परि- याय' शब्द का उल्लेख 'रेसा' के अर्थ में हुया है और अशोक के शिला- लेसों में यही 'पलियाय' सामान्य प्रयोग से पालियाय' और तदनंतर उसी का लघु रूप पालि' भाषा के लिये प्रचलित हो गया । इस प्रकार पालि शब्द प्रारमिक अवस्था में भाषा के लिये प्रयुक्त न होकर धार्मिक ग्रंथ अथवा बुद्धवर्चन की पंक्ति के लिये होता था। पालि भाषा में सग्रहीत तिपिटक साहित्य की भाषा का मूल क्षेत्र कहाँ था और किस मूलभाषा के अाधार पर उसका विकास हुआ, इस पर पाश्चात्य तथा भारतीय विद्वानो ने अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत किये हैं प्राचीन भारतीय बौद्ध धर्मावलम्बियों के मतानुसार पालि मागधी [ २३ ] भाषा ही है और यही मूलभाषा है । परन्तु पालि में मागधी के श, ल, प्रथमा एक पचन-ए ग्रादि के रूपों की व्यापकता नहीं मिलती इसलिये पालि मागधी का पर्याय रूप नहीं माना जाता। वेस्टरगार्ड (Westergaard ), इ० कुहून (E. Kuhn) ने और यार. यो. क (RO Franke) ने पालि को उज्जयिनी की विभाषा इसलिने माना ह क्योंकि वह यशोकी गिरिनार (गुजरात) के शिलालेख के सदृश है । गोल्डेनवर्ग (DIdenburg) ने 'पालि' को सण्डगिरि के शिलालेस के याधार पर कलिग प्रदेश की भापा स्वीकार की है। विन्टिश (IVindisb), गाइगर (Genger), रिसडेविड्स (Rhysdavids) बादि विद्वानों ने पालि को मागधी का एक रूप माना है रिसटेविड्स ( Rhyadavids) ने उस कोशल प्रदेश की भाषा माना है। क्योंकि युद्ध ने अपने को कौशल सत्तिय कहा है। उसी रूप म बुद्ध ने अपने उपदेश दिये थ और वह रूप यद्यपि जन भाषा का रूप नहीं था परन्तु वह अनेक विभाषायों का मिश्रित रूप था और भिन्न भिन्न स्थानों के लोग उसका प्रयोग अपनी स्थानीय विशेषतायों के साथ करते थे ! ल्युटर्स ( Luders) ने उस रूप का मूल अाधार पुरानी अर्धमागवी माना है और इसी मत को अधिक प्रश्रय दिया गया हे । चूमि गौतम बुद्ध के उपदेश अनेक वर्षों के उपरान्त लिपिवद्ध रिये गये और यह कार्य राजगृह म ४८५ ई० पूर्व के लगभग प्रथम युद्ध महासम्मेलन 7 अवसर पर मोग्गल्तान + द्वारा किया गया जो बनारस सस्कृत बहुला क्षेत्र का निवासी था इसलिए बुद्धवचन की मूलभाषा सस्कृत निष्ठ और स्छ परिवर्तित रूप म हो गई। इसीलिये पालि भाषा को मिश्रित भाषा (Kuntsprache) का रूप माना जाता है। 'बुद्ध वचन' का संग्रह 'तिपिटक' (त्रिपिटक ) मुत्तपिटक', 'विनय पिटक', 'यभिधम्मपिटय' नाम से उपलब्ध होता है । कहा जाता है कि ४८५ ई० पृ० म गौतमबुद्ध के निर्माण के कुछ सप्ताह बाद ही प्रथम [२४ ] महासम्मेलन' में 'मुनपिटक' और दूसरे पिटक का अधिराश रूप संग्रहीत किया गया। 'दूसरा महासम्मेलन' वैशाली में १०० वर्ष के उपरांत और तीसरा महासम्मेलन' अशोक की संरक्षा में पाटलिपुन में हुया और अनुमान किया जाता है कि इस महासम्मेलन तक संपूर्ण 'बुद्धवचन' पा संग्रह कर लिया गया था । 'मुत्तपिटक' मे बुद्ध-धर्म की विशेषताएँ अनेक ग्रन्थो में अधिकतर संवाद के रूप में मिलती है। इनका विभाजन पाँच निकायों के रूप में मिलता है। विनयपिटक में संघ के नियमों का अनुशासन संबंधी वृत्तात, मिनु और भिक्षुणियों के दैनिक जीवन संबंधी आदेश यादि का संग्रह किया गया है। अभिधम्म पिटक मे चौद्ध धर्म के सिद्धातो का गभीर विवेचन उपलब्ध होता है । शुद्ध-वचन अथवा तिपिटक का विभाजन ६ मङ्गों में भी मिलता है.-- 'मुत्त', शेय्य', 'वेश्याकरण', 'गाथा', 'उदान', 'इतिवृत्तक', 'जात', 'ग्रभुत्तधम्म', वेदल्ल'। तिपिटक' के विविध ग्रन्थों का विभाजन उक्त विषय फेअनुसार सार्थक सिद्ध होता है। उक्त विभाजन मे 'मुत्त' से याशय गौतम बुद्ध के संवादों और सुत्तनिपात' के कुछ अंशों से है । गद्य और पद्य वा मिश्रित रूप शेय्य' कहलाता है। धेय्याकरण' मे 'यभिधम्म' और बुछ अन्य रचनाओं का संग्रह है | गाथा में पूर्ण पद्यात्मक अंश के रूप हैं और उदान में गौतम बुद्ध की गंभीर विवेचना छंदों में है। 'इतितक' में गौतमबुद्ध द्वारा कथित कथात्रो का संग्रह है, जातक मे गौतम बुद्ध की पूर्व जन्म कथायो का विवरण मिलता है । 'अब्भुतधम्म में अलौकिक शक्तियों का उल्लेख है और वेदल्ल में प्रश्नोत्तर के रूप मे बुद्ध के उपदेशों का संग्रह है। 'विनयपिटक' मे बुद्धसंघ के अनुशासन संबंधी नियमो का विस्तार मिलता है । इसके अन्तर्गत मुत्तविभंग (महाविभंग, भिक्खुणीविभंग), रबन्धक ( महावग्ग, उल्लवग्ग), परिवार अथवा परिवारपाठ मुरत रचनाएँ हैं। विनयपिटक का मुख्य श्याधार प्राचीन रचना 'पाटि- मोक्स' है जिसमें नियमों के उल्लंघन आदि और उसके फलस्वरूप संघ । [ २५ ] से बहियार का विवरण दिया गया है और मुत्तविभंग उक्त रचना के टोका रूप में ही मानी जाती है। महानिभंग में बौद्ध भिन्तुओं का पाठ परिच्छेदों में याठ प्रकार के उल्लयनों का विस्तार से और भिक्खुणी- विभंग मे सक्षेप में बौद्ध भिक्षुणियो के उल्लवन का वर्णन मिलता है । सन्धक सुत्त विभग रचना का पूरक माना गया है। इसमें जीवन रे नित्य यावश्यक नियमों के पालन श्रादि का विवरण दिया गया हे । महावग्ग के दस विभागो म सम्वोधिकाल से बनारस मे प्रथमसघ के स्थापन, संघ म प्रवेश, उपोसथ, उत्सप, यावश्यक नियम यादि का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है। चुल्लपग्ग महावग्ग का पूरक है। चुल्लवग्ग के अंत मे ११ १२ गधकों में प्रथम दो वौद्ध महा- सम्मेलन का विवरण मिलता है। पिनयपिटक क अतर्गत परिवार सिहलद्वीप की एक सिंहाली भिन्तु का रचना मानी जाती है। उसके १९ विभागों म अभिधम्म-पिटक के सदृश ही प्रश्नात्तर रूप म चिनय पिटक के उक्त ग्रन्थों म उल्लिखित विषय की तालिका दी गई है। 'मुत्तपिटक' म बौद्ध धर्म के सिद्धातो और बुद्ध के प्रारभिक शिष्यों का वर्णन मिलता है । 'सुत्तपिटक' क अतर्गत पाच निकाय (सग्रहप्रथ) 'दीघनिकाय', 'मज्झिमनिकाय', 'सयुत्तनिकाय', 'गुत्तरनिकाय', 'खुद्दक निकाय' दिये गये हैं। 'दीघनिकाय' म ३४ दार्घ सूत्रों का संग्रह है जिसम प्रत्येक सूत्र विसी न किसी सिद्धात का विवचन एक स्वतत्र पथ के रूप म हुआ है। 'दीघनिकाय' का विभाजन तीन पुस्तकों के रूप म मिलता है। पहली पुस्तक के सपूर्ण, दूसरी और तीसरी पुस्तकों के भी यनेक सूत्र गद्य म ही हैं और दूसरी तीसरी पुस्तको के अधिकाश मून गद्य पद्य मिश्रित हैं । पहली पुस्तक म 'सील' (शील) समाधि', 'पन्या' (प्रज्ञा) रूपों का वर्णन है। इसे 'सीलरान्धपग्ग' के नाम स भी दिया गया है जिसमें १-१३ सूत्रों का संग्रह है। दूसरी पुस्तक महावग्ग' में १४- २३ मत्र और तीसरी पुस्तक 'पाटिक्नग्ग' म २४ ३४ सूत्र हैं। 'महा- - [ २६ । वम्म म ही बोद्धधर्म का बाह्मण धर्म से सबंध तथा बौद्धधर्म की विशेष तायों, निर्वाण यादि पिस्तार से वर्णन मिलता है। मझिमनिकाय' म मध्यम श्रारार र विविध विषयक सूनों का साह है। इसम बुद्ध र १५२ सभापणों और सपादों का सूत्र रूप में संग्रह पहले समूह मृलपरणास म १५०, दूसर समृह मज्झिम परणास में ५१ १०० और तीसरे समूह उपरिपरणास म १०१ १५२ सूनों का संग्रह किया गया है । 'सयुत्त निकाय में सभी विषय सबधी सूनो का मग्रह है। इसीलिय इस सयुत्त' नाम स पहा गया है। देवता सयुत्त म अनेक देवतालों सबध को उक्तियाँ है, मार-सयुत्त में कामदेव रे सवध के २५ सून हे । प्रत्येक म किस प्रकार कामदेव सिद्धार्थ अथवा उनके शिष्यों को मोहित करन का प्रयत्न करता है उसका विवरण है। इसी प्रकार भिक्खुणी सयुत्त के दस, सूनों में भिन्तुणियों को कामदेव द्वारा मोहित किये जाने का वर्णन है। इसी प्रकार 'परससयुत्त', सारिपुत्त सयुत्त, निदानसयुत्त, समाधिसयुत्त, मोग्गल्लान सयुत्त, सक्क सयुत्त, सच्च-सयुत्त यादि का सग्रह मिलता है। सच्च सयुत्त में ही प्रसिद्ध उपदेश 'धम्म- चक्क पवत्तन सुत्त' का उल्लेख है। कुल सयुत्तों की संख्या ५६ और उनम वर्णित सूत्री की सग्या २८८९ है। इनका विभाजन पाँच विभागों (वग्ग) म भी मिलता है। अगत्तर निकाय के प्राय २३०८ सूत्रों को ११ विभागो ( निपात ) म विभाजित क्यिा गया है। विभाजन की विशता यह है कि एक विभाग म एक ही सख्या से सबधित विषय का उल्लेस, दूसर विभाग मे दो से सबधित विषय का उल्लेख मिलता हे । उदाहरण क लिये मुन्दर और असुन्दर दो प्रकार की वस्तुएं, बन म रहने के दो कारण विरोप, दो प्रकार के बुद्ध पिशप ग्रादि, इसी प्रकार तीसरे विभाग म तीन की संख्या से सबधित विषय का वर्णन हुअा है। उदाहरण के लिये कर्म, वचन और विचार, इश्वर क तीन दूत-वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु, तीन प्रकार की वस्तुएँ जो स्त्रियों को नर्क में ले जाती हैं यादि । ११ विभागों को अनेक सडों ।

- [२७] ( वाग) में बाँटा गया है और एक सण्ड में अधिक से अधिक २६२ और कम से कम ७ मूनों का संग्रह मिलता है। प्रत्येक विभाग में अलग- अलग विषय के अनुसार सण्ड रूप में मूनों का संग्रह क्यिा गया हे। उदाहरण के लिये एक निपात के पहले सण्ड में १० सून पति पत्नी के संबंध परं दिये गये है, इसी प्रकार एक निपात के १४ वें खण्ड में ८० सूनों में प्रसिद्ध भिक्षु और भिक्षुणियों का वर्णन हुया है। 'खुदक' (तुद्रक) निकाय में सक्षिप्त सूत्रों का संग्रह मिलता है। बुद्दक निकाय के अन्तर्गत-खुद्दपाठ, धम्मपद, उदान, इतिवृत्तक, मुत्त निपात, विमानरत्यु, पतपत्यु, थेरगाथा, थेरीगाथा, जातक, निद्देस, पटिसभिदामग्ग, यपादान, बुद्धाश, चरियापिटक नामक १५ ग्रंथों का सग्रह दिया गया है । 'खुदक-पाठ' मे : सक्षिप्त सूनों का संग्रह है जो प्रार्थना पुस्तक के रूप में नित्य पाठ व हेनु मानी गई है। इनमें धार्मिक विश्वास, याजा, शरीर के ३२ अंगों, मगल यादि विषयों के अतिरिक्त मृतो की यात्मानो तथा सिंहल, स्याम प्रदेशो में शवदाह के यसर पर गान सवधी सूत्रों का भी संग्रह मिलता है । 'धम्मपद' में बौद्ध धर्म के सिद्धातों का विस्तृत उल्नेय ४२३ छदों में विषय के अनुसार २६ विभागो ( वग्ग ) में हुया है। प्रत्येकवर्ग मे १० से लेकर २० छौंदो का संग्रह मिलता है। धम्मपद के अधिकाश छन्दों का उल्नेग्न अन्य बौद्धिक ग्रंथों मे भी हुआ है और यह अनुमान किया जाता है कि सग्रहकर्ता ने विविध बौद्ध ग्रंथों एव तत्कालीन उपलब्ध भारतीय साहित्य महाभारत, पचतन्न, जैन ग्रंथ यादि से धम्मपद के छदो का संग्रह किया होगा । 'उदान' में छदों के साथ कथाओं या उल्लेख मिलता है | ८२ स्थायों को ८ वर्गों में, प्रत्येक मे लगभग- १० सूत्र के अनुसार, विभानित क्यिा गया है। गौतम बुद्ध के द्वारा ही संपूर्ण स्थानों को भी कहा गया यह प्रामाणिक नहीं माना जाता । क्योंकि उनमें अनेक क्याएँ असंभव और असंगत सी जान पड़ती [२] हैं। इतियुत्तक में भी गद्य और पद्य का प्रयोग मिलता है। एक ही विषय का विवेचन गद्य और पद्य दोनों में किया गया है अथवा उसो विषय को पहले पद्य मे फिर गद्य में दिया गया है। इस प्रकार पूर्ण ग्रंथ में ११२ कथानो का संग्रह हुया है। उक्त ग्रंथ मे गौतम बुद्ध द्वारा नैतिक विषय पर कहे गये क्थन मिलते है। मुत्तनिपात में गौतमबुद्ध के कुछ मूल उपदेश विभागों के रूप में संग्रहीत है । इसलिये प्राचीनता की दृष्टि से इस ग्रंथ का महत्व है। उक्त ग्रंथ का विभाजन ५ विभागों में हुया है । पहले चार विभागों-उरगनग्ग, चूलवग्ग, महावग्ग, अकाग्ग में ५४ कवितायो का संग्रह है और पाचवें विभाग पारायणवग्ग में एक लम्बी कविता १८ एण्डो में विभाजित मिलती है । अहवग्ग और पारायणवग्ग का उल्लेख अन्य बौद्धिक अर्थों में भी किया गया है। 'धम्मपद' के अनतर 'सुत्तनिपात' ही बौद्ध- धम की अनेक लोगो के द्वारा उल्लिसित प्रसिद्ध रचना है । 'विमान- वत्यु' और 'पेतवत्यु' प्राचीन रचनाएँ नहा मानो जाता। इनका संग्रह तीसरे बौद्ध महासम्मेलन के कुछ समय पूर्व ही माना जाता है । 'विमान- क्यु' में देवतायो के विशद महलो का वर्णन है जिनमे वे अपने पूर्व जीवन में अच्छे कमों के करने के फलस्वरूप ही पहुँच मरे है। उक्त प्रथ मे ८३ स्थायी को विभागों में बाँटा गया है। प्रेतवत्यु' में अविकल प्राशियों का अपने जीवन काल में किये हुए पापो का फल दिखाया गया है। प्रथम ५१ क्यायो को चार विभागों मे दिया गया है। 'धेर गाया' और 'येरी गाथा रचनाएं छन्दो में संग्रहीत मिलती है। इनमें भिनु योर मिक्षणियों के प्रशसात्मक उल्लेस दिये गये हैं। येरगाथा के १२७६ छदो को १०७ कविताओं और थेरीगाथा के ५२२ छदी को ७३ कवितायों में विभाजित क्यिा गया है। इनका रचनाकाल ५०० ई. के लगभग माना जाता है। उक्त ग्रंथो मे कवितायो के अतिरिक्त जो कथायों का संग्रह मिलता है वह यप्रामाणिक माना जाता है।

काल १२वीं शतान्दी माना जाता है परन्तु रचयिता का कुछ पता रक्सित' का 'जिनलंकार (१७ वीं शताब्दी) रचनाएँ भी प्रसिद्ध है। पर रचित टीका वंसत्यपकासिनी' का विशेष महत्व है। इसका रचना [ ३४ ] के रचयिता 'यनुरुद्ध' यादि टीकाकारों का भी उल्लेस मिलता है। महानामत महावंस सिंहलद्वीप की बौद्धपरंपरा का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। तीसरे काल मे १२वीं शताब्दी के लगभग सिंहलद्वीप के परकम- बाहु (प्रथम) के शासन काल में कहा जाता है कि थेरमहावस्सप ने बुद्ध- घोप की यहकयात्रों का माधभापा में टीकाग्रथ के रचना हेतु एक सभा (Council) श्रामत्रित की और समन्तपासादिका' पर 'सारत्यदीपनी', 'सुमंगलविलासिनी' पर 'पठम सारत्थमजूमा', 'पपञ्चपूदनी' पर 'दुतिय- सारत्थमजूसा', 'सारत्यपकासिनी' पर 'ततिय सारत्थमजूमा', मनोरथ- पूरणी' पर 'चतुत्थ सारत्थमजूसा', अहसालिनी पर 'पठम परमत्थपका- सिनी', संगोहविनोदिनी पर 'दुत्तिय परमत्यपका सिनी', पंचप्पकरणह- कथा पर ततिय परमत्यपकासिनी' टीकाएँ लिखी गई । उक्त टीकाओं मे सारिपुत्त की सारत्थदीपनी टीका सुरक्षित मिलती है । सारिपुत्त के शिष्यों में खुसिनया टीका' के रचयिता संघरसित', सावितरणों की टीका विनयस्थमजूसा के रचयिता 'युद्धनाग', 'मूलसिक्स' अभिनन- टीका यादि १८ ग्रंथों के रचयिता 'वाचिरसर, अभिधम्मत्थ विभारनी टीका के रचयिता सुमंगल थादि का भी उल्लेख मिलता है। इनके अतिरिक्त सारिपुत्त की शिष्य-मंडली मे 'सद्धम्मजोतिपाल' का उल्लेय मिलता है जिन्होंने विनयपिटक पर विनयसमुत्थान-दीपनी, पाटिमोरा- पिसोधनी, विनयगूटत्थदीपनी, 'अभिधम्म' पर प्रसिद्ध रचना 'अभि- धमत्थसंघससेप' टीका श्रादि ग्रन्थ लिखे। धम्मकित्ति वा धातुवश (१३ वीं शताब्दी) 'वाचिस्सर' का निदानकथा, समन्तपासादिया, महावंश के श्राधार पर रचित 'यूपवंश' टीका ( १३वीं शताब्दी ) 'बुद्ध- सिंहल द्वीप की बौद्ध धर्म परपरा को पूर्ण जानकारी के लिये 'महावंश' नहीं चलता।

4 । [३०] पूर्व और अधिकांश जातको से पाँचवीं और छठी शताब्दी की सभ्यता का मूल्यांकन ती संभव है ही। निद्दे स ( निर्देश) मुत्तनिपात के कुछ विभागों की धारया है। इसका विभाजन महानिद्देस' और 'चुल्लनिदेस' दोन्पों में मिलता है।। इनमें बौद्ध धर्म के सिद्धांतों की व्याख्या के साथ एक-एक सैद्धान्तिक शब्द के अनेक पर्यायवाची शब्द भी दिये गये है। साथ ही उक्त ग्रंथों में इन पर्यायवाची शब्दों की पुनुरुक्ति भी मिलती है। विन्टरनित्स ( Winternatz ) के क्थनानुसार संभवत: बाद में रचित पालि शब्दकोशों का मुख्य आधार उक्त प्रथ की शब्द-सूची हो सकती है। 'पटिसमिदामग्गा रचना का विभाजन तीन विभागो मे मिलता है और प्रत्येक विभाग में बौद्ध-धर्म के किसी न किसी सिद्धात से संबंक्त्ति दस कथायी का संग्रह हैं । 'यभिधम्म' ग्रंथों के सदृश उक्त ग्रंथ प्रश्नोत्तर रूप में मिलता है । जातक के सदृश ही अवदान मे बौद्ध- धर्म के भिक्षुओं के पूर्व जन्मो के विशुद्ध कृत्यों का विवरण मिलता है। ग्रंथ का मुख्य अंश 'थेर (भिक्षु) अवदान' है । इसके ५५ विभाग है और प्रत्येक विभाग में १० अवदानो का संग्रह हे । 'धेरी (भिक्षु णी) श्रवदान' के चार विभाग हैं और प्रत्येक विभाग में १० अवदानो को रखा गया है । अवदान खुदकनिकाय' की प्राचीन रचना नहीं मानी जाती । 'बुद्ध वंश' के २८ विभागो में गौतमबुद्ध के द्वारा इन के पूर्व प्राचीन कल्पों में उत्पन्न २४ बुद्धो का वर्णन दिया गया है और प्रत्येक कया में गौतम ने अपने पूर्व बुद्ध रूप का क्सिी न किसी क्था के साथ उल्लेख किया है । "खुद्दक-निकाय' की अन्तिम रचना 'चरियापिटक' मानी जाती है। इस ग्रंथ मे ३५ जातको के अंशो का पद्य में संग्रह है जिसमे गौतमबुद्ध ने दस पारामितायो (पूर्णता प्राप्ति के साधन ) का उल्लेख किया है। इनको साधना युद्धन प्राप्त करने के पूर्य आवश्यक होती है । निन्टरनित्स ने उक्त ग्रंथ को किसी प्रभृति बौद्ध भिक्ष, की रचना मानी है जो [ ३१ ] एक उत्कृष्ट कवि भी था। इस प्रकार 'सुत्त-पिटक, के अन्तर्गत पाँच निकायों के सभी ग्रंथ 'बुद्ध-वचन' केवल इसी रूप में माने जा सकते हैं कि उनमें बौद्ध-धर्म के सिद्धातों का सन्निवेश है परन्तु उनके रचयितानो के सबंध में काफी मतभेद है। कुछ ही रचनाएँ गौतम बुद्ध के द्वारा कथित मानी गई हैं। 'अभिधम्म पिटक' का ग्राशय 'उच्च-धर्म' से है.और इसीलिये इसका अर्थ 'दर्शन' से भी लिया जाता है। इस प्रकार 'अभिधम्म- पिटक' के ग्रंथों में सुत्तपिटक' की अपेक्षा बौद्ध-धर्म की विद्वत्तापूर्ण विशद व्याख्या मिलती है । वास्तव मे यह 'मुत्त-पिटक' को पूर्ण बनाता है । 'अभिधम्म पिटक' के अन्तर्गत धम्मसंगणि, विभंग, क्थावत्थु, पुग्गल पञ्जाति, धातुकथा, यमक, पानप्पकरण (महा. पटठान ) सात ग्रंथ दिये गये हैं 1 धम्मसंगणि मै धर्म की परिभाषा, वर्गीकरण तथा याध्यात्मिक तत्वों की व्याख्या दी गई है। विभंग में 'वर्गीकरण' की प्रधानता है और यह धम्मसंगणि को पूर्ण बनाता है। कथावत्यु की रचना 'तिस्स मोरगलिपुत्त द्वारा मानी जाती है । उक्त पुस्तक में २३ विभाग हैं और प्रत्येक में ८ से १२ प्रश्नोत्तरी का संग्रह मिलता है । इनमें बौद्ध-धर्म के संबंध में मिथ्या विश्वास श्रादि का निवारण और खंडन किया गया है। पुग्गल पाति मे प्रश्नोत्तर के रूप में विभिन्न व्यक्तियों का वर्णन है। इसका सवध मुत्तपिटक', 'दीघनिकाय', अंगुत्तरनिकाय से अधिक माना गया है। धातु-कथा १४ परिन्छेदों में प्रश्नोत्तर रूप में विभाजित है और इनमें याध्यात्मिक तत्त्वों का विवेचन और उनके परस्पर सबंध का उल्लेस हुआ है । यमक' का श्राशय दो प्रकार के प्रश्नों की पुस्तक से है क्योकि प्रत्येक प्रश्न का उत्तर तार्किक दृष्टि से दो रूपों में प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक साधारण लोगों के लिये बोधगम्य नहीं है इसीलिये अभिधम्म- पिटक के ग्रंथों में इसका स्थान वाद में श्राता है। अभिधम्मपिटक की अंतिम रचना 'पहारप्पकरण भी क्लिष्ट रचना .

- [ ३२ ] हैऔर चूंकि पुस्तक आकार में बड़ी है इसीलिये इसे 'महापटठान नाम से भी दिया गया है । संपूर्ण ग्रंथ में शारीरिक और यात्मिक २४ प्रकार के संबंधों का अनुसंधानपूर्ण ढंग से वर्णन किया गया है । इसमें कर्ता और कर्म, शासक और शासित रूप में उक्त संबंध निर्वाह को दिया गया है । श्रीमती रिसडे विड्स भी जिन्होंने अभिधम्मपिटक' या अनेक वर्षों तक गहन अध्ययन किया था अंत में उक्त ग्रंथों की क्लिष्टता का उल्लेख करते हुए कहती हैं कि पाश्चात्य मष्तिष्क के लिये ये ग्रंथ अत्यंत कठिन ही है और वे उन ग्रंथों की समस्याओं को ठीक से मुलझा सकी हैं इसका ये पूरा दावा नहीं करती। विवर श्राचार्य नरेन्द्र देव द्वारा रचित 'यभिधम्मकोप' का प्रकाशन - इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण होगा। बौद्ध धार्मिक ग्रंथ के अन्तर्गत एक अन्य पुस्तक 'परित' अथवा 'महापरित' के नाम से भी दी गई है जिसमें प्रचलित तांत्रिक आदि प्रयोगों का संग्रह है। सिहल द्वीप और ब्रह्मा में इसका अब भी समादर होता है। इनका प्रयोग नवगृहनिर्माण, मृत्यु, अस्वस्थता श्रादि के अवसरों पर किया जाता है । पुस्तक में २८ विभाग हैं जिनमें से सात "खुद्ध पाठ' से लिये गये हैं। इसका रचना-काल संदिग्ध है । 'मिलिन्द- पह' के 'एफ उल्लेस से पता चलता है कि गौतमबुद्ध ने स्वयं परिन' या शिक्षण किया था। 'पालि' साहित्य के अन्तर्गत अनेक टीकाएँ भी 'यटठकथायों के रूप में मिलती है। ये घटठक्थाएँ सिंहल द्वीप में ही प्राय: लिपी गई। पवल एक ग्रंथ 'मिलिन्द-पम्ह' की रचना पश्चिमोत्तर प्रदेश में मानी जाती है। इसमें राजा मिलिन्द (King Menander ) के प्रश्नों योर 'नागसेन' नामक बौद्धभितु के द्वारा उनके उत्तर या संग्रह है। मंदाद के रूप में बौद्धधर्म के सिद्धातों की मुन्दर व्याख्या उक्त ग्रंथ में मिलती है। 'चौर प्रयों के सब से बड़े टीपावार मुस्पोप माने जाते है और 1 . .

1 - [ ३३ ] जुद्धघोप के पूर्व रचित 'नेत्तिप्पकरण', पेटकोपदेश', 'सुत्तसघ' आदि अथ टीका रूप में न होकर ब्रह्मा प्रदेश म मूल वौद्ध अथ के रूप में माने जात है । परन्तु बुद्धघोप क पूर्व रचित 'द्वीपवश', मुत्तपिटक की टीका 'महापठकथा', अभिधम्म की 'महापच्चरी', विनय की 'पुरुन्दी' का उल्लेस मिलता है। टीका ग्रथ का यह पहला काल माना जाता है। ५वी इ० म युद्धघाप के ही टीका ग्रथों स लेकर ११वी इ० तक दूसरा काल और १२वा इ० से याधुनिक काल के टीका ग्रथों का तीसरा काल माना जाता है। दूसरे काल में बुझ्घोष ने 'विनय पिटक' पर 'समन्तपासादिका', 'पातिमोरव' पर 'कवाचितरणी', 'सुत्तपिटक' के 'दीघनिकाय' पर 'सुमगलविलासिनी', 'मनिमम निकाय' पर 'पपज सुदनी', 'सयुत्त निकाय' पर 'सारत्यपकासिनी', 'गुत्तरनिकाय' पर 'मनोरथपूरणी', 'खुद्दकनिकाय' सख्या १-५ पर 'परमत्थजोतिका', 'अभिधम्मपिटक' के 'धम्मसगणि' पर 'अत्यसालिनी', 'विभग' पर 'समोहविनोदिनी' और अन्य सख्या ३,४,५,६,७नामक ग्रयों पर 'पञ्चप्पकरणहकथा' टीका ग्रथो की रचना की। 'नातकों' पर रचित टीका जातकहवराणना और धम्मपद पर धम्मपदहक्था की रचनाएँ भी बुद्धघोष ने लिसी यह निश्चित नहीं है। बुद्धघोष के ही समकालीन 'बुद्धदत्त' ने बुद्धवश की टीका 'मधुरत्थ विलासिना', 'विनय' पर 'विनयविनिच्चय' यादि के रचयिता माने जाते हैं। 'यभिधम्म' पर प्राचीनतम टीका यानद कृत अभिधम्म मूल टीका मानी जाती है । धम्मपाल विशुद्धभाग, नेत्ति यादि के अतिरिक्त खुद्दक निकाय के उन ग्रथों क भी टीकाकार माने जाते हैं जिन पर उद्धघोष ने टीकाएँ नहा लिसी थीं और उनका टीका ग्रथ परमत्यदीपनी है। प्राचीन टीकाकारों ने सच्चसखेप' के रचयिता 'चुल्ल धम्मपाल', निदेस' की टीका 'सद्धम्मपजोतिका' के रचपिता 'उपसेन', पटिसभिदामग्ग' को टीका सद्धम्मप्पकासिनी के रचयिता 'महानाम', महाविच्छेदनी, विमति छेदनी के रचायता 'क्रसप', समन्तपासादिका की टीका वजिरबुद्धि' के रचयिता वजिरबुद्धि', 'अभिधम्महसघ परमत्यविनिच्चय' आदि , - [ ३४ ] के रचयिता अनुरुद्ध यादि टीकाकारों का भी उल्लेख मिलता है। महानामत महावंस सिंहलद्वीप की बौद्धपरंपरा का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। तीसरे काल मे १२वीं शताब्दी के लगभग सिंहलद्वीप के 'परकम- वाहु (प्रथम) के शासन काल मे कहा जाता है कि थेरमहावस्तप' ने बुद्ध- घोष की अट्ठकथायों का मागधभाषा मे टीकाग्रंथ के रचना हेतु एक सभा (Council) आमंत्रित की और 'समन्तपासादिका' पर 'सारत्थदीपनी', 'मुमंगलविलासिनी' पर 'पठम-सारत्थमजूसा', 'पपञ्चसूदनी' पर 'दुतिय- सारत्यमंजूसा', 'सारस्थपकासिनी' पर 'ततिय सारत्थमंजूसा', 'मनोरथ- पूरणी' पर 'चतुत्य सारत्यमंजूमा', असालिनी पर 'पठम परमत्थपका- सिनी', संमोदपिनोदिनी पर 'दुतिय परमथपकासिनी', पंचप्पकरण- पथा पर ततिय परमत्थपकातिनी टीकाएँ लिखी गई। उक्त टीकायों मे सारिपुत की सारत्थदीपनी टीका सुरक्षित मिलती है । सारिपुत्त के शिष्यों में 'खुद्द सिरसा टीका' के रचयिता 'संघरक्खित', सावितरणी की टीका विनयत्थमंजूसा के रचपिता बुद्धनाग', 'मूलसिक्स' अभिनव- टीका आदि १८ ग्रंथों के रचयिता 'याचिस्सर', अभिधम्मत्थरिभारनी टीका के रचयिता मुमंगल आदि का भी उल्लेख मिलता है। इनके अतिरिक्त सारिपुत्त की शिष्य-मंटली में 'सद्धम्मजोतिपाल' का उल्लेख मिलता है जिन्होंने विनयपिटक पर नियसमुत्थान-दीपनी, पाटिमोवरा- विमोधनी, विनयगृढत्यदीपनी, 'यभिधम्म' पर प्रसिद्ध रचना 'अमि- धम्मत्यसंसंखेय टीका श्रादि ग्रन्थ लिखे। धमकित्ति वा धातुवंश (१३ वीं शताब्दी) चाचिस्सर' का निदानकथा, समन्तपासादिका, महावंश के आधार पर रचित 'थूपवंश' टीका ( १३वीं शताब्दी) शुद्ध- रमित' का 'जिनलंकार' (१७ वीं शताब्दी ) रचनाएँ भी प्रसिद्ध है। सिंहल-दीप की बौद्ध-धर्म परंपरा की पूर्ण जानकारी के लिये महावंश' पर रचित टीका सत्यपकासिनी' या विशेष महत्व है। इसया रचना याल १श्यौं शताब्दी माना जाता है परन्तु रचयिता का बुछ पता नहीं चलता। - [ ३५ । 'महावंश' की कथा का विस्तार 'चूलवंश' मे मिलता है जिसमें सिंहलद्वीप के बाद का भी पूर्ण इतिहास संकलित किया गया है और इसके रचयिता धेर धम्मकित्ति' माने जाते है। १८ वीं शताब्दी के उत्तरकाल में राजा कित्तिसिरिने महावंश के तीसरे भाग मे अपने समय तक की बौद्धिक परंपरा का उल्लेख कराया और महावंश के इसी भाग के अंत में सिहलद्वीप मे यंग्रेजों के यागमन का उल्लेख भी मिलता है। १३ वीं और १४ वीं शताब्दी में सिद्धत्य रचित सारसंघ, धम्मकित्ति 'महासामिन रचित' सद्धम्मसंध, मेधंकर कृत लोकप्पदीप- सार, 'महामंगल' रचित बुद्धघोसुम्पत्ति अादि प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। १५वीं शताब्दी और उसके अनंतर के ब्रह्मी भिक्षुयो की अभिधम्म पर लिखी रचनाएँ प्रमुख रूप मे मिलती हैं । 'यरियवंश' रचित मणिसारमंजूसा, मणिदीप, जातकविसोधन, 'सद्धम्मपालसिरि' रचित नेत्ति-भावनी, सीलवंस रचित बुद्धालंकार आदि रचनाएँ उल्लेखनीय हैं। १६ वीं शताब्दी मे 'सद्धम्मालंकार' रचित पट्ठानदीपनी, 'महानाम' कृत मूल टीका पर रचित मधुसारत्थ दीपनी अादि १७ वीं शताब्दी में तिपिटका. लंकार' रचित वीसतिवएणना, यसवडढनवत्यु, विनयलंकार, 'तिलोकगुरु' रचित धातुकथाटीकवएणना, धातुकथा अनुटीकावएणना, यमकवएणना, पहानवपणना, महाकस्सप' रचित अभिधम्मत्थगण्ठिपद आदि, १८ वी शताब्दी में 'याणाभिवंस कृत' नेत्ति पर रचित टीका पेटकालंकार, राजाधिराज विलासिनी आदि रचनाएँ प्रसिद्ध हैं। १८ वीं शताब्दी की रचनाओं में नलाटधातुवंस, छसिधातुवंस, -संदेसकथा, सीमाविवादविनिच्चयकथा, गंधवंस जिसमें ब्रह्मा की बौद्धिक रचनाओं और रचनाकारों, तीनों बौद्ध महासम्मेलनों में महाकच्यायन के अतिरिक्त बुद्धवचन के संग्रहकर्तायों यादि का उल्लेख दिया गया है, पञ्जसामी कृत सासनवंस जिसमें भारत तथा अन्य देशों में चौद्धधर्म के प्रचार और विस्तार का वर्णन है, आदि रचनाएँ महत्वपूर्ण है। , , । ३६ , पालि का व्याकरण साहित्य भी संपन है । व्याकरणिक रचनायों को तीन समूह में बाटा गया है। पहले समूह के 'कन्चायन-शासा' की कच्चायन व्याकरण और उसको टोका बालावतार, रूपसिद्धि यादि, दूसरे समूह में 'मोग्गल्लान व्याकरण', पयोगसिद्धि, पद-साधना यादि, तीसरे समूह म 'सद्दनीति', चुल्लसद्दनीति अादि रचनाएं मुख्य है। 'कच्चायन शासा' के ग्रथो म न्यास टीका, मुत्तनिदेस टीका, वाक्य- रचना पर लिखित सवधचिन्ता अथ 'सद्धम्मसिरि' वृत सदत्थभेद चिन्ता, सधिवप्प, कच्चायनवरगना आदि रचनाओं का उल्लेख मिलता है। 'मोग्गल्लान शारया' में उक्त रचनायो के अतिरिक्त मोग्गल्लान पंचिकापदीप जो मोरगल्लान की पचिका की टीका है, प्रसिद्ध रचना है। पच्चायन शासा की अपेक्षा इस शाखा का अधिक महत्व माना गया है। तीसरी शामा सद्दनीति के रचयिता 'यग्गवंस' की रचना सिंहल- द्वीप का महत्वपूर्ण व्याकरण अथ माना जाता है। पार० श्रो० प्रैक ने स्पष्ट क्यिा है कि उक्त रचना कच्चायन शासा से सबंधित है। सद्दनीति का प्रथम श्रठारह अध्याय महासद्दनीति और १६ से २७ अध्याय चुल्ल सद्दनौति कहलाता है। उक्त रचना मोग्गल्लान शारया के पूर्व की मानी गई है। सस्कृत अमरकोप वे सहश पालि शब्द मोषों की प्राचीन रचना प्रसिद्ध वयाकरण से भिन्न मोग्गल्लान कृत अभिधम्मपदीपिका है। याचार्य नरेन्द्रदेव कृत श्रभिधम्मकोप का पहले उल्लेस किया ही जा चुका है। शब्द धातु सरधी रचना यों में धातु-मनूमा, धातुपाट, धावत्यदीपनी यादि मुग्य है। पालि पान्य शास्त्र सम्बधी रचनायों में अलकार पर 'सरररिसत' कृत सुमोघालकार, छद पर 'पुत्तोदय' यादि प्रसिद्ध मय है। साहित्यिक प्रारत-माहाराष्ट्री प्राकृत साहित्यिक मावों क अन्तर्गत माहाराष्पी, शौरसेनी, मागवी, [ ३७ ] अर्धमागधी, पैशाची की गणना की जाती है । माहाराष्ट्री 'स्टैंडर्ड' प्राकृत मानी जाती है । ध्वनिपरिवर्तन की दृष्टि से माहाराष्ट्री सब से बढकर है। इसका मूल विस्तार माहाराष्ट्र प्रदेश में हुआ और बाद में इसका प्रयोगा अन्य क्षेत्रों में भी होने लगा। प्राकृत वय्याकरणों ने माहाराष्ट्री को ही मूल मान कर उसका विस्तार से वर्णन किया है और अन्य प्राकृतों को उसी- प्राकृत के सदृश बताकर कुछ भिन्न विशेषनाएँ अलग-अलग दे दी हैं। माहा राष्ट्रीप्राकृत में स्वरमध्यवर्ती व्यंजन का लोप अत्यधिक हुआ है। इसीलिये शब्दों में संयुक्त स्वर के व्यापक प्रयोग मिलते हैं और सरों की इसी अधि कता के कारण माहाराष्ट्री का प्रयोग गीत-काव्य के लिये व्यापक हो गया। पहले कहा जा चुका है कि संस्कृत नाटकों के गीत माहाराष्ट्री प्राकृत में मिलते हैं और प्राकृत-गद्य शौरसेनी एवं मागधी और उनकी विभाषायों में मिलता है। माहाराष्ट्री के गीतिकाव्य के ग्रंथों में हाल' रचित गाहा-सत्तसई सव से प्रसिद्ध रचना है। गाहासत्तसई किसी एक कवि की रचना न होकर अनेक कवियों के गीतों का संग्रहीत रूप माना जाता है । सत्तसई पर लिपी टीकायो में उन कवियों के नामों के उल्लेख भी मिलते हैं। टीकाकारों ने ११२ नामों से लेकर ३८४ नाम तक दिये हैं और प्रत्येक कवि के द्वारा रचित गीतों में भी पर्याप्त मतभेद मिलता है। इनका रचनाकाल ३०० ई. से लेकर ७०० तक माना गया है । सत्तसई का अंग्रेजी में १-३७० छंदों का प्रथम प्रकाशन वेवर के द्वारा १८७० ई० में 'सप्तशतकम्' के नाम से किया गया इमके अनंतर १८८१ ई० में उसका अनुवाद जर्मन-भाषा में हुआ। वेवर ने अंग्रेजी के प्रकाशन में भुवनपाल की टीका का उल्लेस किया है। तदनन्तर दुर्गाप्रसाद, काशिनाथ पांडुरंग द्वारा गाथा-सप्तशती तथा उस पर गंगाधर भट्ट की टीका १८८६ ई० में प्रकाशित हुई । वेवर ने इसका प्रारंभिक संग्रह-काल ३०० ई० दिया है परन्तु उसे ७०० ई० के पूर्व माना है। यह अनुमान किया जाता है कि सत्तसई के प्रत्येक छंद में कवि के नाम की छाप थी जिसका कालान्तर में लोप हो गया।

- - पिशेल ने इसके रचयिता को हाल अथवा सातवाहन माना है। राज- शेखर की कर्पूरमंजरी में हरिउढ़ ( हरिवृद्ध), पोट्टिस आदि कवियों का उल्लेख पाया है। इसके अतिरिक्त नंदिउढ ढ (नदिवृद्ध), हाल, पालित्तत्र, चम्पराअ, मलग्रसेहर ( मलयशेपर ) का भी उल्लेख मिलता है । भुवनपाल ने इनमें से पालिनअ' को दस छंदों का रचयिता लिया है । यह पालिता' येवर द्वारा उल्लिखित पादलिप्ताचार्य हैं. जिनको हेमचन्द्र ने एक देशी-शास्त्र का रचयिता माना है । भुवनपाल के अनुसार सत्तसई के २२०-३६६ छंदों के रचयिता देवराज है जिसका उल्लेस हेमचंद्र के देशी-नाममाला' में हुया है । सत्तसई के कुछ छंदों का रचयिता अभिमान चिन्ह को भी बताया जाता है माहाराष्ट्री प्राकृत का दूसरा महत्त्वपूर्ण संग्रह-ग्रंथ 'जयवल्लभ' रचित "पज्जालग्ग है । वाजलर के एक छन्द से स्पष्ट होता है कि विविध कविणे के द्वारा विरचित कविताची का संग्रह जयवल्लभ ने किया- विविका विरइयाणं गाहाणं वरकुलाणि घेत्तण रइयं वालग्गं चिहिणा जयवल्लहं नाम । जयवल्लभ श्वेतांबर जैन थे । उक्त ग्रंथ के ४८ परिन्छेदों में ७६५ धंदों का संग्रह मिलता है। इसके कुछ छंद सत्तसई से माम रयते हैं । इम संग्रह की संस्कृत छाया १३३६ ३० मे रत्नदेव के द्वारा लिपी मिलती है। नालाग के ६७ छंद वेवर द्वारा प्रकाशित सत्तसई के परिशिष्ट भाग में, हेमचन्द्र की 'दशरूप' की टीका मे, ग्याव्य-प्रकाश', 'साहित्य-दर्पण' में मिलते है । ३२द सत्तसई के अन्य विभिन्न संग्रहों से प्राप्त होते हैं। शेप ३५ छंद धन्यालोक, सय्यक के श्रिलंकार-सा जयश्य के 'अलंकार-विमर्शिनी', मोमेश्वर के काव्या- दर्श' 'जयंत' के 'काव्य प्रकाश दीपिका', 'अलवार-रत्नाकर' धादि काव्य-शास्त्र के ग्रंथों में मिलते हैं। इनमें से कई छंदों का उल्लेख 'श्रानंद. यर्धनाचार्य ने ध्वन्यालोक' के 'विषमयाणलीला' काव्य में किया है। इन दो का बुछ संग्रह भोजदेव कृत 'सरस्वती-कंटाभरण' में भी [४०] तथा संख्या की दृष्टि से एक दूसरे से कुछ भिन्न है। हरिपाल की टीका म केवल तीन प्रधान प्रकरण याये है । इसलिये वह 'गउडयधसार टीका' कहलाता है । ग्रंथ हरिपाल तथा शंकर पाडुरंग पण्डित द्वारा संपादित क्यिा गया है। वाक्पतिराज की दूसरी रचना 'महुमह- निय' का उल्लेख पहले हो चुका है। इसके एक छन्द का उल्लेस अभिनवगुप्ताचार्य के धन्यालोक और दो का सरस्वती कठाभरण में मिलता है तथा अन्य काध्य-शास्त्र के ग्रथों में मिलती हैं। जैन हस्तलिखित प्रतियों में ही उपलब्ध होने के कारण इसका उल्लेख्य भुवनपाल की टीका में भी मिलता है। माहाराष्ट्री प्राकृत की एक काव्य रचना रामपाणिवाद रचित कंसवहो है जिसका प्रकाशन डॉ० ए० एन० उपाध्ये, ने १६४० ई० में क्यिा है । चूँकि महाराष्टी माहत का व्या- पक प्रयोग गीति-काव्य न्यथवा महाकाम के लिये होता था इसलिये यह स्वाभाविक है कि अनेक रचनाएँ उक्त भाषा मे लिखी गई होंगी परन्तु या वे काल कालित हो गई या अभी तक उनकी सोन नहीं हो सकी है । यद्यपि माहाराष्ट्री का काव्य-साहित्य काफी भरा पूरा होना चाहिये क्योंक व्यपने काल की यह व्यापक भापा थी। 'हरमन जकोबी' (Hermann Jacobi) ने बुध बुद्ध, जैन ग्रंथों पी भाषा जैन माहाराष्ट्री और जैन शौरसेनी के नाम से दी है। माहाराष्ी पायन में पाव्य ग्रंथों का उल्लेस तो ऊपर किया गया परन्तु गद्य रूप म उसका प्रयोग श्वेतावर जैन के धार्मिक साहित्य में हुया है। इनमें अविनाशत कहानियों का संग्रह है। सबसे अधिक मन्त्वपूर्ण सग्रह 'यारश्यक' ग्रंय म मिलता है। दूसरी तीसरी शताब्दी म रिमलमूरि रचित 'पउमचरिय' की भी यही भाषा है। इस भारा का प्राचीनतर रूप कुछ चुनिका, कथानकों, और संघ- दास के 'धामुदेव गिद' में मिलता है। इस भाषा में 'निजुत्तियों का श्रायां छन्दों में सक्षिप्त महत्त्वपूर्ण व्याख्याएँ मिलती हैं। है। सन् १३२६-१३३१ के बीच जिनप्रभुमूरि रचित 'तीर्य कल्प' [ ४१ ] में उक्त भाषा के नमूने मिलते हैं। पाठवीं शताब्दी में हरिभद्र ने 'समरैच्चरहा' के पद्य भाग में जैन मादाराष्ट्री का प्रयोग किया है । धर्मदास का उपएसमाला' में जैन माहाराष्ठी के ही एक रूप का प्रयोग किया गया है । ८६१ इ० में घटवाल 'जोयपुर' म उपलव्य कुक सरदार द्वारा एक जैन मन्दिर की स्थापना सवधी शिलालेस में भी उक्त भाषा का प्रयोग है । 'कालकाचार्य क्थान', 'मृपभपञ्चाशिका', 'द्वारापती' यादि रचनाएँ भी जेन माहाराष्ट्री की उदाहरण हैं। इस प्रकार दूसरी तीसरी शताब्दी स लेकर लगभग चौदहवीं शताब्दी तक उक्त भाषा का जैन प्रथों म प्रयोग बराबर किया जाता रहा । शारसेनी प्राकृत शौरसेनी प्राकृत स्वतन अथ अभी तक उपलब्ध नहीं हो सके है। सस्कृत नाटना म मयुक्र गद्य भाषा अविकाशत शौरसेनी ही है निसका निर्दश पहले हो मा हे। यह सूरशेन जनपद की भाषा थी निसनी राजधानी मथुरा थी । नाट्य शास्त्र ६ अनुसार नाटक की नापिका और उसकी सहेलियों, साहित्यदर्पण के श्यनुसार उच्चवर्ग की स्त्रियों, दशम्प के अनुसार स्त्रिों की यह भाषा है। इसके अति- रित ऊँची स्थिति का दासियों, वालय, नपुसक श्रादि द्वारा भी शौरमेनी पा प्रयोग मिलता है। भरत, विश्वनाथ योर पृथ्वीधर के अनुसार विदूषको पी मी यही भाषा थी परन्तु मारय ने मिर्पयों पी भाषा प्रान्च स्थिर की है । मायरटय ने भरन का उल्लेख करते हुए 'प्राच' की उत्पत्ति शौरस्नी स दी है-प्राच्या सिद्धिः औरसेन्या । विदृपप द्वारा ही ही नो' प्रयोग को हेमचन्द्र ने शौरमेनी स सबंधिा किया है जैसा इस क्यन से स्पष्ट है.-"हीही पिपरस्प, हो माहै विस्मय निदे।" परचि औरम्नी या मृल श्राधार सस्सा भारा दा है। उसने नियमों का भी उल्लेख किया है जो भाषा में समझने में सहायक हो सकते है और भाषा के ।

[ ४२ ] शेष नियमों को माहाराष्ट्री के सदृश लिसा है । प्राय: संस्कृत नाटकों के संस्करण भाषा की दृष्टि से भ्रष्ट रूप में मिलते हैं। मालती- माधव, मुद्राराक्षस, मालविकाग्निमिन यादि के ऐसे ही संस्करण मिलते है। मालविकाग्नि के संस्करण का पाठ अपेक्षाकृत शुद्ध है और पिशेल ने भाषा की विशेषतायो के लिये इसी को साधार बनाया है । कुछ संस्करणों मे तो एक ही वाक्य में कई प्राकृत भापानों का मिश्रित रूप मिलता है। कालेपकुतूहल के-'भो कि ति तुये हक्कारिदो हगे मनख एण्हिम्मे 'हक्कारिदो-शौरसेनी, 'हगे-मागधी, और 'एण्हिम्' माहाराष्ट्री है । एक ही छन्द मे मुकुन्दानन्द भाण ने शौर० यदुय और माहा. काऊण का एक साथ प्रयोग किया है । संभव है यह संस्करणों के पाठभेद के कारण हो या भाषा के ये स्वाभाविक प्रयोग हो । सोमदेव, राजशेपर तथा केनो (Konow ) द्वारा संपादित कर्पूरमजरी में यह अन्तर पाठभेद के कारण नहीं है क्योंकि वही प्रयोग बाल रामायण और विद्धशालभञ्जिका मे भी मिलते हैं। शातलम् और रिमोर्वशी के पाठ में ऐसा ही अन्तर मिलता है, परन्तु इनके होते हुए भी उनमें शौरसेनी का रूप अलग किया जा सस्ता है। शौरंगनी प्राकृत की स्वतंत्र रचनाएँ तो उपलब्ध नहीं होती परन्तु जैन शौरसेनी में दिगंवर संप्रदाय के ग्रंथ उपलब्ध होते है । वैसे तो अर्धमागधी ही जैन ग्रंथों की मुख्य भाषा है परन्तु दिगंवर संप्रदाय को कुछ रचनाओं मे शौरसेनी की अधिकाश विशेषताएँ उपलब्ध होती है इसीलिये उसे जैन शौरसेनी भाषा का रूप माना गया है। युछ युरोपीय विद्वानों ने इसे दिगरी थादि नामों से दिया है जो बहुत ठोर नहा जान पड़ता । प्रथम शताब्दी में 'कुन्नन्दाचार्य' रचित ‘पश्यणसार जैन शौरसेनी को प्रारभिक प्रसिद्ध रचना है। कुन्दकुन्दा- चार्य या प्राय: सभी रचनाएँ इसी भाषा में है। इसके अतिरिक्त गराचार्य रचित मूलाचार, कार्तिकेय स्वामी' रचित 'यत्तिगेयागुपैसा' [ ४३ ] अादि तथा कुन्कुन्दाचार्य को 'छप्पा हुड', 'समयसार', 'पञ्चत्यिकाय' रचनाएँ जेन शौरसेनी मे ही उपलब्ध होती है। परन्तु प्रामाणिक ग्रंथों एवं हस्तलिखित प्रतियो के प्राप्त न होने से उक्त भाषा के महत्त्व और भारतीय यार्य भाषायों के विकास में उसकी उपयोगिता का ठीक-ठीक निर्धारण नहीं हो पाता। परन्तु पिशेल का अनुमान कि इस भाषा का विकास दक्षिण भारत में हुया होगा, ठीक जान पड़ता है क्योंकि उत्तर भारत में प्रचलित अन्य प्राकृतो की देशी विशेषताएँ उसमें उपलब्ध नहीं होती । सभव हे अधिक रचनायो के उपलब्ध होने से उक्त भाषा पर अधिक प्रकाश पड सके। मागधी प्राकृत नाटकीय प्राकृतो के प्रसग में मागधी प्राकृत का वर्णन पहले हो चुका है। शौरसनी के सदृश ही मागधी प्राकृत मे भी कोई स्वतंत्र रचना उपलब्ध नहीं होती, केवल नाटकों में हो उसका प्रयोग विभिन्न विभाषायो सहित मिलता है जिसका उल्लेस विस्तारपूर्वक पहले हो चुका है । प्राय मागधी और अर्धमागधी में पाश्चात्य विद्वानों तथा जैन और बौद्ध धर्मावलम्बियों ने अधिक पार्थक्य नहीं रखा है। कोलक ने जैन संप्रदाय की भाषा मागधी दी है और उनके अनुसार यह काव्य और नाटक की भापा से भिन्न और इसका विकास संस्कृत के अाधार पर 'पालि' के सदृश ही है। 'लेसेन' के अनुसार वह माहाराष्ट्री से मिलती है। 'होफर' के अनुसार जैन ग्रंथो की भाषा साधारण प्राकृत से कुछ नहीं मिलती फिर भी वह साधारण प्राकृत से बिल्कुल भिन्न नहा है। जकोबी के अनुसार उसकी भाषा प्राचीन माहाराष्ट्री कही जा सकती है और वह पालि के सदृश ही है तथा वह पालि की अपेक्षा पूर्वतर भाषा है । वेवर ने अर्धमागधी और माहाराष्ट्री को एक दूसरे से सबधित माना है और पालि से उसे अलग रसा है और जकोबी के अनुसार ही उसे पालि - । [ ४४ ] से पूर्व की भाषा स्वीकार किया है । उसका संबंध माहाराष्ट्री की अपेक्षा उत्कीर्ण लेखो की प्राच्य समूह की भाषा से जोड़ा गया है। अर्धमागधी माहाराष्ट्री के पृषी क्षेत्र की भाषा कही गई है परन्तु देवर्दिधगणिन् के शासन मे वल्लभि पोसिन अथवा स्कन्दिलाचार्य की संरक्षा में मथुरा कौन्सिल से व प्रभावित होकर पश्चिमी भाषा के सदृश जान पड़ती है । वल्लभि से उस पर माहाराष्ट्री का प्रभाव यधिक नहीं जान पड़ता क्योकि अर्धमागधी के स्वरूप मे कोई मूल परिवर्तन नहीं हुया । माहा. राष्पी से भिन्न विशेषताएँ अर्धमागधी में पर्याप्त मिलती है । जैसे तालन्य ध्वनियों के स्थान पर दन्त्य का प्रयोग, व्यजन-संधि का प्रयोग- विभक्तियो की भिन्नता–उदा०-चतुर्थी-ताए, तृतीया एक०-'सा', सप्तमी एक० -म्सि', क्रिया विभक्तियों चाणम्,-चाण, याणम्, याण । इन प्रयोगों से स्पष्ट हो जाता है कि जन ग्रथो की अर्धमागधी और माहाराष्ट्री प्राकृत परस्पर भिन्न भाषाएँ हैं । साहित्यिक रूप धारण करने पर अन्य प्राकृतों माहाराप्पी के सदृश उसमे व्यजन पा लोप मिलने लगता है जिससे उसके संबंध का भ्रम माहाराष्पी से हो जाता है परन्तु प्रथमा एक०-ए विभक्ति को विशेषता उसके पार्थक्य को बनाए रखती है। अर्धमागधी प्राकृत जैन ग्रथों म अर्धमागधी अथवा 'यार्प भाषा' का उल्लेस कई स्थलों पर मिलता है। इसका परिचय स्वयं महावीर स्वामी ने समवायग सुत्त में इस प्रकार दिया है- "भगवम् च णम् अदधमागहीये भाषाये धम्मम् प्राइक्खइ सा विय णम् अदधभागही भाषा भासिज्जमाणी तेसि सर्वेसि प्रारियाम् प्रणारियाणन पुप्पय च उप्पय मिय पसु पक्खि सरी सिवाणम् अप्प- पणो हियसि वसुहदाय सार्वइयाम् सर्वतोवाचम् भासत्ताये परिणामद ।" वाग्भट्टालकार-तिलक मे भी उसका इस प्रकार उल्लेख मिलता है- [ ४५ ] सर्वाधमागधीम् सर्वभाषासु परिणमिनीय सविनइम् प्रणिदध्महे । महावीर स्वामी ने अर्धमागधी में ही अपने उपदेशों का प्रचार किया इसका उल्लेख समवायगसुत्त, प्रोववयसुत्त में हुअा है-"तये णम् समणे भगवम् महावीरे अद्घभागहाये भाषाये भासह " अभयदेव ने 'उवासगदसायो' और मलयगिरि ने 'सुरिय पएणत्ति' इसी तथ्य का उल्लेख किया है। हेमचन्द्र के एक प्राचीन उद्धरण से भी स्पष्ट होता है कि प्राचीन जैन सून अर्धमागधी में ही लिखे गये- 'पोराणम् अद्घमागह भाषा निययम्हवइ सुत्तम्' परन्तु मागधी के नियमों से हो अर्धमागधी सर्वत्र बद्ध नहीं है । दसवेयालिय मुत्त के एक कथन से यह स्पष्ट हो जाता है— से तारि से दुक्खसहेजिइन्दिये। मागधी मे यही रूप इस प्रकार है—'शेतालिशे दुम्सशहे मिनिन्दिये । इस प्रकार मागधी और अर्ध मागधी में भी काफी अंतर है। अभय- देव ने समवयांग सुत्त तथा उवासग दसायो मे इसे इस प्रकार स्पष्ट किया है- "अर्धमागधी भाषा यस्यम् रसोर लशी मागध्याम् इत्यादिकम् मागध भाषा लक्षणम् परिपूर्णम् नास्ति।" अर्धमागधी प्राकृत के गद्य और पद्य रूपों में कुछ अन्तर मिलता है। अर्धमागधी के रूप में प्रथमा एकo-ए मिलता है परन्तु सूयगडाग- मुत्त, उत्तरज्झायण-सुत, दसवेयालिय मुत पद्य रचनाओं में प्रथमा एक०-यो मिलता है। यही रूप माहाराष्ट्री से कुछ साम्य रसता है। क्रम्दीश्वर ने माहाराष्ट्री और अर्धमागधी मिश्रित एक तीसरे रूप का उल्लेन किया है। पालि में भी गद्य और पद्य दोनो के रूपो में कुछ यंतर मिलता है परन्तु दोनो को पालि नाम से ही कहा जाता है। इसी प्रसार जैन ग्रंथों की गद्य और पद्य की भाषा को समझना चाहिये । नाट्यशास्त्र में सात भाषायों में अर्धमागधी के साथ मागधी, श्रावन्ती, प्राचे, शौरसेनी, बाहलीका, दाक्षिणत्या भापाएँ दी है। ।

साहित्य दर्पण मे अर्धमागधी चरों, राजपुत्रों, सेठों की भाषा कही गई है-"चेटानाम् राजपुत्राणाम् श्रेष्ठिनाम् चार्धमागधी।" मार्कण्डेय ने संस्कृत नाटकों म मागधी का ही प्रयोग माना है, यर्धमागधी का नहीं । परन्तु 'लेसेन' ने मुद्राराक्षस, प्रबोधचन्द्रोदय में क्षपणक, जीव- सिद्धि, नाई और धूर्त पानों के द्वारा अर्धमागधी का प्रयोग माना है टीकाकार दुण्डिराज ने इसे थोड़ा स्पष्ट किया है.--'क्षपणको जनाकृतः।' जीवसिद्धि की भाषा मे-प्रथमा एक०-ए (कुविदे, हगे, शावगे, भदन्ते ), नपु० अक्सिणे, एक्सत्ते, क>ग उदा.--शायगाणाम् श्रादि रूप मिलते हैं । परन्तु प्रामाणिक ग्रन्थों के अभाव मे निश्चित् रूप से उस सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा जा सकता। भारतीय वय्याकरणों ने जैन ग्रंथों की भाषा को 'यार्प' के नाम से भी कहा है । त्रिविक्रम ने आर्य और देश्य दोनो का अपने व्याकरण में उल्लेख नहीं किया है क्योंकि वे सर्वसुलभ स्वाभाविक भाषाएँ थीं। वह संस्कृत के नियमों से बर नहीं हैं, रूटियों उनकी श्राधार हैं- "रूढात्वात्' । वह अपने नियमो का स्वतन्त्र रूप से विकास करती है- "स्वतन्य वाच् य भूयसा । तवागीश ने दण्डी के काव्यादर्श के श्राधार पर प्राकृतों के दो भेद किये हैं । एक का विकास 'यार्प' से हुया और दूसरी पार्ष' के मदृश है-"प्रात्यम् प्रार्षतुल्यम् च द्विविधम्- प्राकृतम् विदु ।" जैन धर्मावलम्बी अपनी धार्मिक रचनायों की सर्व- प्राचीनता और उस काल में सर्वजन मुलभ स्वाभाविक्ता के कारण ही उसे 'या' रूप में मानते हैं और उस पार्यो और देवताओं की यादि भाषा भी कहते हैं-"प्राकृत अरिस ययणे सिद्धम्, देवाणम् प्रद्ध- मागहोवाणी।" अर्धमागधी में जैन साहित्य की निम्नलिसित रचनाएँ उपलब्ध होती हैं-(१) 'यंग'-उनकी संख्या १२ है-श्राचार, सूयगड, ठाण, समवाय, विवाहपरपति, नायाधम्मकहरायो, उवासगदसायो, थन्तगड- सायो, अणुत्तरोपवाइयदसायो, पाहायागर गेम, विवागस्य, दिहियाय - [ ४७ ] (२) उपा'ग-इनकी भी संख्या बारह हे—उववैय, रायपसेणइज्ज, जीवा- भिगम्, पन्नवणा, सूरपरणत्ति, जम्बुद्दीपप्परगत्ति, चन्दपएणत्ति, निर- यावलियावो, कप्पडिसियायो, पुफियायो,पुफ्फचूलायो, वण्हिदसायो। (३) पइराण'-इनकी संख्या दस है। इनमें कोई कम नहीं मिलता 'परंतु विषय के अनुसार इनका निम्नलिसित विभाजन मिलता है- चउसरण, भत्तपरिणा, सथार, ग्राउरपच्चरसाण, महापच्चक्खाण, चन्दाविज्झय गणिविजा, तादुलवेयालिय, देविन्दत्थय बीरत्थय । (४) "छेयसुत्त' ये छ. हैं—यायारदसायो, वप्प, ववहार, निसीह, महानिसीह, पंचक्प्प । पंचक्प्प के स्थान पर जिनभद्र ने 'जीयकप्प' को उल्लेख किया है । (५) नन्दी पोर अणुयोगदारि स्वतन्त्र रचनाएँ है । 'मूलसुत्त'-इनको सस्था ४ है । उत्तरज्झाया अथवा उत्तरज्झयण, दसवेयालिय अवस्सयनिज्जुति, छनिज्जति । उक्त रचनाओं में दिहि- वाय अंग प्राप्त नहीं होता। उसके प्रसगो के उल्लेस अन्य रचनाओं मे मिलते हैं। इस प्रकार कुल ग्रंथो की संख्या ४५ है । परन्तु इनकी संख्या ४५ ५० के बीच शाँकी गई है। श्वेतावर जैनियों के अनुसार महावीर स्वामी के द्वारा अपने पहले शिष्यों-गणधरों को सर्वप्रथम दिया हुअा प्रारंभिक उपदेश १४ 'पुचों' में संग्रहीत था। चद्रगुप्त मौर्य के समय में जैन सप्रदाय का अध्यक्ष थेर भद्रभाहु था और निरंतर १२ वर्षों के अकाल के कारण वह दक्षिण भारत चला गया और स्थूलभद्र अन्तिम भिन्तु जिसको १४ पुलों का ज्ञान था, संप्रदाय का अध्यक्ष हुश्रा , परन्तु बाद में 'पुयों' का स्मरण रखने वाले जय प्राय सभी भितुओं का अंत होने लगा और उन रचनाओं के विनष्ट होने की पूर्ण संभावना थी तो पाटलिपुन में एक सम्मेलन बुलाया गया जिसमें ११ अंगों का संपादन क्यिा गया और १४ 'पुब्बों' वा अवशिष्ट रूप १२वें भंग 'दिहियाय' के नाम से संग्रहीत हुश्रा । वदनंतर पहले चले गये और यहीं रुके हुए जैनियों में फिर संघर्ष शुरू हुप्रा और पहले वाले अपनी वेश-भूषा' के कारण श्वेतावर' .

V और बाद वाले दिगंबर' कहलाये। जैनमतावलंबियों का दूसरा सम्मे-- लन, पाँचवीं शताब्दी के अंत अथवा छठी शताब्दी के प्रारंभ में धार्मिक ग्रंथों का संग्रह और उनको लिपिबद्ध करने के लिये देवढिड (देवर्धिगण क्षमाश्रमण) की अध्यक्षता में हुआ और तब तक १२वें अग दिध्याय का लोप हो चुका था। अतएव श्वेताबर सप्रदाय के साहित्य की प्राचीनता ५०० ई० से पूर्व नहीं बाकी जाती। यह अवश्य है कि महावीर स्वामी के उपदेश ही इन रचनायो के मुख्य श्राधार हैं। अश्वघोष के नाटकों में प्राप्त अर्धमागधी प्राकृत श्वेतावर जैन साहित्य की अपेक्षा प्राचीनतर कही गई है । यह ८०० ई० की भाषा है । इस समुदाय के लोगों का अनुमान है कि 'सुहम्म' ने महावीर स्वामी के उपदेशों को अगों और उपागो का संग्रह किया। कुछ रचनाएँ अन्य लोगों के द्वारा भी संग्रहीत मानी जाती हैं। उदाहरण के लिये चौथे उपाग 'पन्नवण' के संग्रहकर्ता 'अज्जसाम', पिंडनिज्जुत्ति के 'भद्रभाई', दस- वेयालिय के 'सेजंभव', नन्दी के 'देवडिद' माने जाते हैं । वल्लभी- सम्मेलन के अनतर अर्धमागधी प्राकृत साप्रदायिक साहित्यिक भाषा नहीं रह गई थी। इसके बाद सस्कृत अथवा प्राकृतों से विकसित अप- अश भाषा का प्रयोग किया जाने लगा था। भाषा की दृष्टि से श्वेतारर ताहित्य में आयारगसुत्त, समरायाग, उवासगदसाश्रो, धिवागसुय, विवाहपएणति और सूयगडागसुत्त महत्व- पूर्ण गन्थ हैं। व्याकरण की दृष्टि से श्रोववैयसुत्त, निरयावलियानो, चेदमुत उपयोगी है। उक्त प्रयो में शब्दों की पुनरुक्ति होने से उनके अशुद्ध रूपों का समाधान हो जाता है। इस प्रकार अर्धमागधी प्राकृत साहित्यिक भाषा की दृष्टि से अपना विशेष महत्व रसती है। स्टीवेन्सन ने कल्पसूत्र' म अर्धमागधी के सम्बन्ध में बहुत कम और यही कहीं विशेषताओं का ठीक निरूपण नहीं किया है । होफर ने अपेक्षाकृत अधिक सूचना दी है। वेबर ने भगवती (विग्रह पएणति) भंग में जैन हस्तलिखित प्रयों की लिपि पर भाषा सम्बन्धी अन्य - [ ४६ ], विशेषताओं के साथ प्रकाश डाला है | जकोवी ने 'यायारंगसुत्त' में अर्धमागधी और पालि का तुलनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया है। माहा- राष्ट्री प्राकृत के अनंतर अर्धमागधी प्राकृत का ही साहित्य सम्पन्न रूप में मिलता है और इसीलिये उपलब्ध साहित्य के आधार पर ही अर्ध- मागधी का व्याकरणिक अध्ययन भी संभव हो सका। . -- पैशाची प्राकृत पैशाची प्राकृत एक प्राचीन विभाषा मानी जाती है । वररुचि ने प्राचीनतम प्राकृत व्याकरण मे इसे पैशाची, क्रमदीश्वर ने वाग्भट्टा- लंकार में इसे पैशाचिक, नमिसाधु और उद्भट ने पैशाचिका और पैशाचिकी नाम से दिया है। हेमचन्द्र ने अपने प्राकृत व्याकरण में पैशाची के साथ चूलिका पैशाची का भी उल्लेख किया है । त्रिविक्रम और सिंहराज ने हेमचन्द्र के सदृश ही पैशाची की विभापा चूलिका- पैशाची या उल्लेख किया है। प्राकृत-सर्वस्व मे किसी अज्ञात लेखक ने पैशाची के ११ भेद दिये हैं जिसका उल्लेस इस कथन में मिलता है- "काञ्चिदेशीय पाण्डेय च पाञ्चाल गौड़ भागधम् याचड़म् दाक्षिणात्यम् च शौरसेनम् च कैफयम् शावरम् द्राविडम् चव एकादश पिशाचिकाः।" पुरुषोत्तम के अनुसरण पर मार्कण्डेय ने पैशाची के तीन भेद दिये हैं- कैकय पैशाचिक, शौरसेन पैशाचिक, और पांचाल पैशाचिक- जिसका उल्लेख इस प्रकार अाया है-"कैकयम् शौरसेनम् च पाञ्चालम् इति च त्रिधा । पंशाच्यो नागर यस्मात् तेनापि अन्या न लक्षिताः ।" कैकेय पैशाचिक प्राचीन विभापा है। मिश्रित संस्कृत और शौरसेनी का यह एक विकृत रूप है— "सस्कृत शौरसेन्योर् विकृतिः।" शौरसेन पैशाचिक स्टैडड विभाषा है और इसका सम्बन्ध मागधी से है । उदा.- >ल, प, स् > शु,, एक-६ >श्च , त्य् >श्त् , ष्ट रेट, अकारात मे प्रथमा एक० और द्वितीया एक. की विभक्तियों का वैकल्पिक रूप से लोप आदि इसकी कुछ विशेषताएँ हैं।

। । [ ५० ] पांचाल पैशाची तथा उसके अन्य रूप अल्प भेद के साथ लोक-व्यवहार के लिये प्रचलित थे-पाज्वालादयः स्वल्पसेदा लोकतः।" इसकी प्रधान विशेषता ल >र का प्रयोग है-लकारस्य रेफः ।" प्लेसेन' ने पैशाची के मागध, प्राचड़ और पैशाचिक भेद का उल्लेप किया है । 'लक्ष्मीधर' के अनुसार पैशाची नाम पिशाच प्रदेश के आधार पर पडा । महाभारत में पिशाच जाति का उल्लेख मिलता है । यहाँ पिशाच से याशय राक्षसवर्ग से है । प्राकृत- प्रकाश की टीया मे वाग्भट्ट ने-'पिशाचानाम् भाषा पैशाची" का उल्लेख किया है । राक्षसवर्ग की भाषा होने के कारण 'काव्यादर्श', 'सरस्वती पठाभरण', 'कथा सरित्सागर' मे इसे भूत भाषा, वाग्भट्टालंकार में भूतभाषित और वालरामायण मे भूतवचन के नाम से कहा गया है । पिशेल के अनुसार पैशाची नाम पिशाच प्रदेश के रहनेवाले पिशाच जाति की भाषा के लिये पड़ गया । दशरूप के अनुसार निम्नवर्ग के लोग पैशाची का व्यवहार करते थे। भोजदेव ने 'सरस्वती' में उच्च- वर्ग के लोगों को पैशाची का प्रयोग करने के लिये निषेध किया है- "नात्युत्तम पात्र प्रयोज्या पैशाची शुद्धा।" सरस्वती कटाभरण के अनुसार उच्चवर्ग के लोगों के द्वारा पैशाची का संस्कृत मिश्रित रूप व्यवहत होता था। वररुचि ने पैशाची का अाधार शौरसेनी प्राकृत दिया है। हेमचन्द्र ने पनिमबंधी विशेषताओं के कारण इसे संस्कृत, पालि और पल्लवग्राण्ट भापायों से संबंधित किया है। ग्रियर्सन के अनुसार पैशाची विभाषाओं का प्रभाव पालि के रूपों पर अत्यधिक इसलिये था कि प्राचीन पाल में तक्षशिला बौद्ध विश्वविद्यालय उस क्षेत्र में स्थापित था जहाँ पी भाषा कयी पैशाची थी और पालि पर पश्चिमोत्तर, दक्षिण भारत श्रादि की विभाषायों का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही था । पैशाची में गुणाढ्य की प्रसिद्ध रचना 'बृहत् क्या' का उल्लेस मिलता है परन्तु मूल ग्रंथ उपलब्ध नहीं होता, उसके अंश सोमदेव .

। । [१] चिरचित कथा सरित्सागर और क्षेमेन्द्र विरचित 'वृहत्कथा-मञ्जरी गे' मिलते हैं । जर्मन विद्वान् लुडविग अल्सडोर्फ (Ludwig Alsdorf) ने वृहत्कथा का प्रभाव जैन कथा साहिय विशेष रूप से संघदास की वासुदेव हिण्डि पर सिद्ध किया है। हम्मीरमदमर्दन और मोहराजयराजय सस्कृत नाटको मे कुछ पानो की भाषा पैशाची है। दण्डी ने भी गुणाढ्य की वृहत्कथा का उल्लेख किया है और इसका प्राचीन संस्कृतानुवाद बुद्धस्वामी विरचित बृहत्कथा श्लोक- सग्रह के नाम से मिलता है। जैन-ग्रंय वासुदेवहिण्डि के अनुसार उक्त ग्रंथ का रचना काल ६०० ई० के पूर्व ही माना गया है । गुणाढ्य को सातवाहन का समकालीन भी कहा गया है । और यह समय १०० ई० का है। बुलर ने यही समय (१००-२०० ई०) बृहत्क्था की रचना का माना है। इस प्रकार १०० ई० से ६०० ई० के बीच क्सिी समय बृहत्कथा का रचनाकाल माना जा सकता है। हार्नली के अनुसार पैशाची थार्य भापा थी जिसका प्रयोग द्रविड लोग भी करते थे । सेनार्ट ने हानली के इस कथन को अस्वीकार किया है। दक्षिण भारत तथा पश्चिमोतर प्रदेश के कुछ शिलालेखों में पैशाची ची विशेषताएँ अवश्य मिलती हैं। परन्तु यह आर्य भाषाओं पर ईरानी और द्राविड़ भाषाओं के प्रभाव के कारण संभव माना जा सम्ता है क्योकि किसी भी आर्य भाषा मे शाहावाजगढी की शिलालेसी प्राकृत को छोड़ कर सघोप महाप्राण व्यंजन अघोप अल्पप्राण के रूप में नहीं मिलते । ददी, काफिर, जिप्सी में भी यह परिवर्तन मिलता है। इसलिये पैशाची का क्षेत्र पश्चिमोत्तर प्रदेश ही जान पड़ता है । परन्तु पैशाची वेवल उसी प्रदेश मे सीमित नहीं रही । पैशाची अपनी विभाषाओं सहित देश के मध्य प्रदेश तथा अन्य भागो में बोली जाती थी। पिशेल के अनुसार पैशाची अपनी विशेषताओं के कारण संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश के अतिरिक्त एक चौये प्रकार की भाषा मानी जा सकती है ।पहले कहा ही जा चुका है कि इसके ।

। [ ५२ ] उदाहरण क्या सरित्सागर, वृहत्कथा मजरी, बाल रामायण, वाग्भट्टा लकार, हेमचन्द्र के ग्रथ यादि मे मिलते है। इसे ग्राम्य भापा के नाम से भी कहा गया है जिसमें वाग्भट्ट ने भीम काव्य' नामक रचना लिसी। पिशेल के अनुसार गौतम बुद्ध के निर्वाण के ११६ वर्ष बाद चार जातिया के स्थगिरा ने चार विभिन्न भाषाया मे-सस्कृत, प्राकृत, अपभ्र श, पैशाची में अपने प्रवचन प्रस्तुत क्येि । वैभाषिक के चार. प्रमुस सप्रदायों म एक ने पैशाची भाषा का प्रयोग किया। वय्याकरणो के द्वारा अल्प और अपर्याप्त सूचना होने के कारण और प्राचीन मूल अय के उपलब्ध न होने स पैशाची भाषा के सबध में विस्तृत विवेचन सभव नहा हो सका है। केवल प्राक्तत वय्याकरणो और सस्कृत काव्य शास्त्रियों के अल्प उल्लेखों और प्रसगों पर ही सतोष करना पड़ता है। वाद के वय्याकरणों को तो भाषा सवधी प्राचीन जानकारी भी सभव नहीं थी इसलिये उनके उल्लेस विरोधमूलक भी हैं। अपभ्रंश साहित्यिक प्राकृतो के अनतर उनके समकक्ष ही प्रचलित लोक- व्यावहारिक भाषों का साहित्यिक रूप विविध अपभ शों के नाम से प्रचलित हुया । अपभ्रंश शब्द का यारभिक प्रयोग सग्रहकार व्याडि के वार्तिक, दरानी के काव्यादर्श तथा पतजलिये महाभाष्य मे मिलता है जिनम सस्कृत यो प्रवृति (मूल ) और अपभ्रंश को उसका विकसित रूप अथवा विकृत शब्द के अर्थ में माना गया है। दडी ने सस्कृत में अपन श शब्दों की सतर सत्ता दी है । भाषा के अर्थ में भी अपभ्रंश का उल्लेस प्राचीन है । प्राकृत यय्याकरण चण्ड ने प्राकृत-लक्षण, भामह के काव्यालकार, दण्डी के काव्यादर्श म अपभ्र श भाषा का उल्लेस मिलता है और इन भी पूर्व भरत कृत नान्यशास्त्र में सस्कृत तथा देशी शब्दों से भिन्न भारा को 'विभ्रष्ट' अथवा यामीरोक्ति नाम से दिया । गया है । रुद्रट ने काव्यालयार में संस्कृत, प्राकृत के अनतर लोभापा । [ ५३ ] अपनश के भेदों का उल्लेख किया है। फिर पुरुषोत्तमदेव ने प्राकृता- -नुशासन तथा हेमचन्द्र ने प्राकृत व्याकरण में अपनश को शिष्ट समाज की भी भाषा के रूप में दिया है। अपनश का प्राचीनतम उल्लेस भरत के 'नाट्य-शास्त्र में मिलता है । परन्तु वह कुछ अस्पष्ट रूप मे ही है। तदनंतर कालिदास के विक्रमोर्वशीय नाटक के चौथे अंक में अपभ्रंश के कुछ उदाहरण मिलते हैं । प्राकृतपिंगल, हेमचन्द्र द्वारा रचित व्याकरण के आठवें अध्याय के चौथे पाद में ३२६ से ४४६ संख्या के दोहे, कुमारपाल-चरित के श्राठवें सर्ग मे १४-८२ संख्या के दोहे, अपभ्रश भाषा के उदाहरण माने गये है। कालकाचार्यकहा, द्वारावती, अलंकार-ग्रन्थ सरस्वती कंठामरण, दशरूप तथा ध्वन्यालोक के टीका ग्रन्थों तथा बेतालपञ्चविंशतिका, सिंहासनद्वात्रिंशिका मे कुछ छंदो में अपनश का प्रयोग हुआ है । पश्चिमी अपभश के ग्रन्थ जैनमतावलंबी जोइंदु ( योगीन्दु ) रचित परमात्मप्रकाश और योगसार से पूर्वी अपभ्रंश को 'क्राहदोहा-कोश माने जाते हैं। चौरासी सिद्धो मे काण्ह या कारहपा (कृष्णापाद ) की गणना होती है। दिगंवर-जैन नयनन्दिन रचित आराधना, 'सयायधम्म दोहा' तथा मुनि रामसिह रचित 'पाहुइ दोहा' भी जैन धार्मिक रचनाएं है। उक्त जैन ग्रन्थों मे वीर, शृंगार की फुटकर रचनाएँ भी उपलब्ध होती हैं, जिनमें वीर और शृंगार के सभी पक्षों का सुन्दर समन्वय हुया है । अपभ्रंश रचनाएँ अधिक्तर जैन-मत से संबंधित है परन्तु कुछ स्वतन्त्र ग्रन्थ भी मिलते हैं। सोमप्रभु रचित कुमारपाल- प्रतिबोध १९६५ ई. के लगभग की रचना मानी जाती है।' रत्नमणि गणिन् रचित 'उपदेश तरङ्गिणी' में अपनश का प्रयोग मिलता है । प्रवंध-चिन्तामणि ११ वीं शताब्दी के लगभग की रचना मानी जाती है । इसमें राजा मुन्ज का श्राख्यान अधिकाशत: वर्णित है। कुछ लोग मुंज को ही इसका भापा भाषा ५४ ] रचयिता भी मानते हैं । अपभ्रंश की कुछ फुटकर रचनाएँ दाहिलरिचत पउम सिरि चरित्र, वरदत्त रचित पहरसामि चरिउ, रत्नप्रभा रचित अन्तरग सन्धि, देचद्र रचित मुलसाख्यान, जयदेवगणिन् रचित भावनासयि शादि भी उपलब्ध होती हैं | अद्धहमाण (अब्दुलरहमान) कसनेस रास' (सदेश रासक) का समय १०१०३० माना गया है जिसमे एक विरहिणी नायिका की उक्तियाँ सग्रहीत हैं और साथ मे पट मातुवर्णन भी मिलता है। महेश्वर सरि द्वारा रचित सजममञ्जरी में ३५ दोही का सग्रह मिलता है । उक्त ग्रन्थ पर हेमहससूरि द्वारा लिखी हुई टीका भी महत्वपूर्ण मानी गई है। इसका रचनाकाल १५०५ ई० के पूर्व माना जाता है। उक्त मुस्तक रचनाओं के अतिरिक्त अपभ्रंश भाषा में प्रबन्ध रचनाएँ भी उपलब्ध होती हैं । स्वयभू कृत रामायण-'पउमचरिउ' (पद्मचरित), पुष्पदत कृत 'जसहर चरिउ' (यशोधर चरित), णाय बुमारचरिउ' (नागकुमार चरित), महापुराण' अथवा तिसहि महापुरिस- गुणालपार, 'वनकामर' कृत 'परकरहु चरिउ' ( करकंटु चरित), हरिभद्रकृत 'सनत्कुमार चरित', नेमिनाहचरिउ' (नेमिनाथ चरित), धनपाल कृत 'भविसयत्तकहा' (भविष्यदत्त कथा), श्रादि ऐसी ही रचनाएँ हैं। इनमें कुछ राड काव्य हैं और कुछ महाकाव्य हैं। 'पउम चरिउ', भविसयत्तरहा' उत्कृष्ट महाकाव्य माने जाते हैं। इनमें तत्कालीन सामानिक दशाश्यों का महत्वपूर्ण चिनण मिलता है। अपभ्रंश भाषाओं की रचनाएँ छठी शताब्दी से लेकर लगभग १४ वा शताब्दी तक लिसी जाती रहीं । श्रतएव अपभ्रश का साहित्य अत्यधिक संपर होना चाहिये परन्तु अभी तक सपूर्ण रचनायों के उपलब्ध न होने के कारण कुछ ही रचनामों से सतोष करना पड़ता है और जो रचनाएँ मिल सकी हैं यह भी अनेक भारतीय तया पाश्चात्य विदानों के अथक परिश्रम का परिणाम है। सभव है भविष्य में अपभ्र श की लुप्त सामग्री का और विशद अश भी प्रकारा में श्रा सके। । ।

[५६ । अशोकी प्राकृत में लगभग ३०० ई० पू० से मिलने लगता है परन्तु ४०० ई० तक उक्त धनि संबंधी विशेषताओं का पूर्ण विकास हो जाता है। अघोष व्यंजन के सघोष और इस प्रकार पिकसित महाप्राण व्यंजन का हकार रूप में परिवर्तित होने के बीच उनका अप्म संघों रूप भी मिलता है। पश्चिमोत्तर तथा मध्यएशिया के भापा समूहों में उक्त परिवर्तन के उदाहरण उपलब्ध होते हैं। शब्द के यंत मे व्यंजनों का प्रायः लोप मिलता है। अन्त्य अनुनासिक व्यंजन-न्, म प्राय: अनुस्वार के रूप मे स्थिर मिलते हैं। विसर्ग का भी परिवर्तन हो जाता है। इसका शब्द के अन्त मे-यो,-ए अथवा समीकृत रूप हो नाता हे । ऊप्म पनियों-श, प, स पश्चिमोत्तर सनूह को प्राकृतो मे चुछ काल तक तो सुरक्षित रहे । फिर इनका भी परिवर्तन 'श' अथवा 'स' रूप मे हो जाता है। 'न' का विकास भी अधिकाशत: 'ण' के रूप में मिलता है। परन्तु-न और-ण का अंतर घहुत कुछ लिपि-निशेषता के कारण भी माना गया है। धनि परि- वर्तनों में संयुक्त व्यंजन का विकास भी प्राकृतों के यारंभिक काल से ही मिलता है । ऊप्म व्यंजन के साथ दो अथवा तीन व्यंजनो के संयुक्त रूप का परिवर्तन पहले हुया और फिर अन्य प्रकार के संयुक्त व्यंजनो का रूप भी बदल गया । पश्चिमोत्तर-समूह को प्रारंभिक प्राकृत मे संयुक्त व्यंजनों का रूप अन्य प्राकृतो की अपेक्षा दीर्घ काल तक स्थिर मिलता है और प्राच्य में इसका परिवर्तन सबसे पहले प्रारंभ हुया । शब्द के प्रारंभ में प्रयुक्त संयुक्त व्यंजनो में से एक व्यंजन का लाप हो जाता है अथवा उनके वीच मे कोई स्वर डाल कर 'स्वरभक्ति' के रूप में उनको विभक्त कर दिया गया। शब्द के मध्य में प्रयुक्त संयुक्त-व्यं- जनो को 'समीकरण' के द्वारा परस्पर एक दूसरे के समान कर लिया गया। इसी प्रकार संयुक्त व्यंजनो मे धनिविपर्यय के द्वारा शब्द में व्यंजनों का स्थान परिवर्तन भी हो जाता है। उक्त परिवर्तनों के अतिरिक्त शब्दो के मूल और संयुक्त व्यंजनो का किसी दूसरे मूल व्यंजन । [ ५८] सम्मिलित हो गया । परस्मैपद के अनुसार की यात्मने-पद के रूप का भी प्रयोग होने लगा। मियायों के प्रकारात और एकारात रूप ही शेष रह गये। भ्वादि गण के धातुओं की अन्य गणो की धातुओं की अपेक्षा व्यापकता मिलती है। प्राचीन आर्य भाषा मे काल-रचना दस लकारी के रूप में विभाजित थी परन्तु प्राकृती में वर्तमान के लिये 'लट', भविष्य के लिये 'लूट', भूतकाल के लिये लुग' और इनके अतिरिक्त श्राशा का एक रूप 'लोट' और इच्छा, अभिलाया, याशीवाद यादि को व्यक्त करने के लिये निधिलिंग का व्यापक प्रयोग मिलता है। प्राकृत भाषायो का उद्भव काल जैसा पहले बताया जा चुका है लगभग ६०० ई० पू० से प्रारभ हुया योर यही समय प्राचीन फारसी के विकास का भी है। सभवत इसी कारण ईरानी भाषा प्राचीन पारसी और प्राकृत की विशेषताएँ बहुत कुछ समान रूप में मिलती हैं। ध्वनि-परिवर्तन, द्विवचन का लोप, विभक्तियो का एकी- करण, परसों का विकास, काल के भेदो में एकीकरण यादि विशेष- ताएँ प्राचीन फारसी और प्राकृत में समान हैं । स्थान भेद के होने पर भी कालसाम्य होने के कारण विभिन भाषायो के विकास में यदि. समानता मिले तो अाश्चर्य ही क्या है क्योकि भाषायो का विकास तो स्वाभाविक ढंग पर होता है, इसे भाषाविज्ञानी भी प्राय. स्वीकार करते हैं संस्कृत में प्राकृत-अंश प्राक्त भापा की विशेषतायो का विकास भाषा का स्वाभाविक विकास है । इसलिये वे विशेषताएँ प्राचीन आर्य भाषा अथवा याधुनिक आर्य भापायों में भी उपलब्ध होती हैं । ज्यूल्स 'ब्लाय' ने सन् १९२८ मे अपने फर्लाग के व्याख्यानो म प्राचीन ग्रार्य भापा पर प्राकृत-प्रभाव को स्पष्ट किया है। प्राचीन यार्य भाषा का कोई एक रूप नहा था। वह विभिन प्रदेशों म अनेक रूपों म प्रचलित थी। डॉ. एस्० एम० को । '-क्ट [ ५६ ] प्राचीन आर्य भाषा पर प्राकृत-प्रभाव भापामयता' के नाम से दिया है । ऋग्वेद की भाषा मे ही ये प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। ध्वनिसंबंधी विशेषतायो में-2 /--उदा० शिथिर < शृथिर, कुरु, कुपुर कृणु कृत (कुठ मिलते हैं। प्राकृत मे ऋ (अ, इ, उ तथा साथ में कभी 'र' ध्वनि भी रहती हैं। संस्कृत मे इनका यही विकास मिलता है। उदा-भृत( भट, कृत-<उत्क्ट और वैदिक विक्ट में- भू-> अकुटि । इसी प्रकार शृङस् > शिघ (सँघना) समृद्ध > संइद्ध, क्रोष्ट> क्रोष्टु (गीदड ), ऋषभ> लुपभ, वृक्ष> रुक्ष । इसी प्रकार -र > -ल-अङ्गार> दंगाल और अ->-ए, गृह > गेह, प्राकृत मे ऐ, श्री > ए, यो मिलते है। वेदों, ब्राह्मण-ग्रंथों, सूत्रों आदि मे प्राकृत के सदृश ही परिवर्तन पाये जाते हैं । उदा. वैदिक-अस्मै > तै० वा. अत्मे, तै० वा. कैवर्त> फेवर्त, औषधीषु > औषधीषु, ऋग्वेद गमध्यै> गमध्ये, वोढवै> वोढवे यादि। दीर्घ स्वर के स्थान पर हस्व स्वर का उदाहरण जकोवी यादि विद्वानों ने दिया है। उदा० अगार> यागार, सलिन > सलीन यादि, दीर्घ के स्थान पर हस्व उदा० रोदसीप्रा> रोदसिमा, अमान> अंमन-ऋग्वेद । प्राकृत में-अय>-ए मिलता है। वैदिक जयधा> त्रेधा, श्रयणि > श्रेणि। इसी प्रकार-अव> -त्रो उदा० उपवसथ> गाथा-पोषध, लवणतृण> लोणतृण ( एक प्रकार की घास ), लवण-> लोणार, श्रवण> श्रोण, श्रवत्य:> श्रोत्याः । संस्कृत में प्राकृत के सदृश सयुक्त व्यंजन का स्वरभक्ति' रूप भी हो जाता है । उदा० पूर्प> पुरुष, ३दिक साहित्य में भी ऐसे प्रयोग मिलते हैं । उदा० सहयय.> सहस्त्रियः, स्वर्ग.> सुवर्ग: ( तैत्तिरीयसंहिता ) तन्य: > तनुवः, स्व: > मुर: ( तैत्तिरीय श्रारण्यक ) । इसी प्रकार श्यादि स्वरागम भी प्राकृत के सदृश ही मिलता है। उदा० >इली-(गया)। संस्कृत के व्यंजनों पर भी - 1 [ ६० ] प्राकृत का प्रभाव दृष्टिगत होता है। उदाहरण के लिये अघोष के स्थान पर सघोष रूप मिलता है। जैसे, कुल्फ>गुल्फ (छुट्टी), वर्तगर्त (गडढा), तटाव> तडाग (झील, समुद्र), लिपिकार>लिविकार, अर्भक (छोटा)> अर्भग (युक्क), ऋत्य > उड्य (चन्द्रमा) यादि । इसी प्रकार घोष के स्थान पर अघोष रूप मिलता है जो पैशाची प्राकृत की विशेषता है। उदा० विभीदक > पिभीतक, इन्ग > पि इक (इधर उधर घूमना), वण्ड>पएन, स्फिग> स्फिर । पैदिक क उक्त उदाहरणों म सघोष व्यजन ब्राह्मण, सून, सस्कृत ग्रयों म अघोष के रूप म मिलते है। कुछ उदाहरणों म अल्पप्राण व्यजन महाप्राण ध्यान के रूप म मिलता है। उदा० वैदिक गुप्पित> स० गुफ (बुनना) 1 श्रघोष महाप्राण व्यसन सघोष महाप्राण म बदल जाता है। उदा० नाथित> नाधित, मथुरा > मधुरा, शृगाणिका> सिगारिएका (यौन) । प्राकृत शब्दों म अन्त्य व्यजनों का लोप हो जाता है । वैदिव म इसर उदाहरण मिलते है। उदा० पश्चात् > पश्चा (अथर्व सहिता), उच्चात् > उच्चा (तैत्तिरीय सहिता), नीचात् > नीचा प्राकृत के सदश सस्कृत म सयुक्त व्यजनों के समीकृत रूप भी 'मिलते हैं। उदा० चित्कणकन्य> चिक्कणकन्थ ( स्थान का नाम ) सज्य >सज (तय्यार), सज्यते> सजति, रज्य>लज ( लाल ) मल्य > मल्ल, नल्न > नल्ल ( फलान )। इसी प्रकार संस्कृत म सयुक व्यजनों के स्थान पर अन्य प्रकार क संयुकृ व्यजनों का प्रयोग भी मिनता है। उदा० सक्ष> च, छ, उदा० च्छ परिक्षित>परिच्छत, परिक्षर>परिच्छव, क्षयर (छीक- अशुभसूचक), तुर>हुरिका ( चाकू ), कदा > इच्छा, अक्ष> यच्छ, लक्षण> लछन, उत्सन> उच्छन (विनष्ट), उत्सादन> उच्छादन (सफाइ), मस्य> मच्छ, वत्स> बच्छ। इसी प्रकार सयुक्त व्यजन-द्य > ज्य उदा य त > ज्योति । प्राकृत , । [६१ ] में स्वरमध्यवती दन्त व्यंजन अथवा दन्त व्यंजन के साथ-र् या-ल के प्रयोग होने पर उसका मूर्धन्य रूप हो जाता है। संस्कृत में इसके अनेक उदाहरण मिलते है । पहले कृत >-कट का उदाहरण दिया जा मुका है । अन्य उदाहरणकर्त-> काट (गड्ढा), कृत (बुनना)> क्ट ( चटाई), द>-ड। उदा:दुर्दभ> दूटभ ( वाज- सनेविसंहिता), पुरोदाश> पुरोटाश (शुक्लयजु० प्रातिशास्त्र) ऋध- ( वढना )> ाढय ( सवृद्ध ), ग्रन्यति, प्रथति> गुण्ठयति नृत्यति > नटति । इसी प्रकार-यात (दुसी) > यह, कृन्तति> कुट्टयति (कुचलता है)। परन्तु प्राचीन आर्य भाषा में उक्त ढंग पर जैसा मूर्धन्य ध्वनियों का विकास मिलता है वैसा अन्य भारोपीय भाषाओं में नहीं मिलता । उदाहरण वैदिक में 'कटुक' है परन्तु लिथुएनी में 'फ्र्तुस्' ही है । फौरतुनेतोर के मतानुसार अन्य भारोपीय भाषाओं के शब्दों मे दन्त के पूर्व यदि-ल पनि का प्रयोग होता है तो भारतीय प्राचीन भार्ग मे उसया मूर्धन्य में विकास हो जाता है। उदा-वैदिक सण्ड., ग्रीक क्लदरोस् (kladaros ), लियुएनी सेल्देति (Skeldideti)। परन्तु वैदिक में जिसका प्रयोग पहले होता था उसी को प्राकृत ने मुरक्षित रसा और अर्वाचीन संस्कृत में प्राकृत के प्रभाव मे पुन: उसका प्रयोग मिलने लगता है । इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्राचीन यार्य भाषा में जहाँ मूर्धन्य या प्रयोग मिलता है और वह उस नियम के अनुसार सिद्ध नहीं होते यह प्राकृत के परंपरिन रूप यथा प्राकृत मे उपलब्ध अनार्य भाषाओं के प्रभार के कारण माने गये हैं। मागधी प्राकृत पी पिरोसा के अनुसार-जय का भी उदाहरण संस्कृत म मिलता है। उदा • जामा > यामात, जामि->यामि। इसी प्रार-य और-न में भी परस्पर परिवर्तन प्राकृत पी विशेषता है जो संस्थत म भी मिलता है। उदा०-यातमागे> याती, मनापी> मनायी, धान्याम> अनपाय !

- प [ ६२ ] प्राकृत म महाप्राण व्यंजन का विकास 'ह' के रूप में मिलता है। संस्कृत में स> ह,-घ> -ह, -ध> -द, -भ>-ह यादि के उदाहरण मिलते हैं । उदा०–सरनायम् > सहाय-,शंसाण > सिंहाणक- (याँप ), मुग > मुह, प्राकृत प्रभाव से विकसित मीड., सैल > हेल-त्यादि । इसी प्रकार अर्ध > ग्रई का विकास । प्रतिसंधाय> प्रतिसहाय (गोपथवा०), धित> हित, रुधिर> रोहित, लोहित, फभ > काह, लुभ > लुह (इच्छा करना ), श्रम्भ> अहं- ( विश्वास करना) । इसी प्रकार सस्कृत हाव भाव मे भाव> हाव का विकास और फिर प्राकृत के प्रभाव से उसका प्रयोग संस्कृत में मिलता है। सस्कृत पर प्राकृत का अत्यधिक प्रभाव 'गाथा' म मिलता है यौर उसमें सस्कृत का शुद्ध रूप नहीं मिलता। चौद्ध, जैन और पुराण यादि कुछ ग्रथों में इसका प्रयोग मिलता है, जिसका विवेचन पहले विकृत - संस्कृत के अंतर्गन किया जा चुका है । प्राकृत में अकारात पु० प्रथमा एक० में-यो होता है। वैदिक में भी सवत्सरो अजायत (ऋग्वेदसंहिता), मो चित् मिलता है । माकृत तृतीया वहु०-देवेहि, जेटठेहि यादि रूप वैदिक देवेभि. ज्येष्ठेमि रूपों से ही संबंधित हैं। पाणिनि ने चतुथी के स्थान पर पष्ठी के प्रयोग का उल्लेख किया है-चतुथ्यर्थे वहुल छन्दसि । प्राकृत पचमी एक० में देवा, घच्छा अादि के सदृश वैदिक उच्चा, नीचा, पश्चा रूप मिलते हैं। प्राकृत द्वितीया बहु० में बदल जाते हैं । वैदिक मे इन्द्रा- वरुणौ > इन्द्रावरुणा, मिनावरुणौ >मित्रावरुणा यादि रूप उपलब्ध होते हैं । इसी प्रकार प्राकृत के पद-विकास मे विभक्तियों का एकीकरण सादृश्य के कारण मिलता है और वही सादृश्य की भावना एस्कृत के पद विकास में भी निहित है क्योंकि स्वरात और व्यजनात रूपों के एक वचन, द्विवचन, वहुवचन और तीनो लिंगों में पुलिंग, स्त्रीलिंग नपुंसक लिंग की अनेक विभक्तियाँ समान रूप में भी मिलती हैं । नपुसक में तृतीया से सप्तमी तक के रूप प्राय: पुलिंग के समान - है मालाया, दास्या, [ ६३ ] मिलते हैं। संस्कृत के पद विकास म भा सादृश्य का प्रभार पड़ा पुलिंग क प्रकारात म द्विवचन के तृ०, च०, प० में नपभ्याम् , प०, स० म पम्य इसारात में एक० ५० ५० क्व, द्वि० तृ० २०, ५० 7 पारिमाम्, ५० स० र क्यो यहु० च० प० र फरिभ्य समान रूप मिलते हैं। मस्कृत स्त्रीलिंग के रूपों म पान क. सदृश कुछ अधिक सादृश्य का प्रभाव मिलता है। ग्रापारात, इकारान्त में प, प. का दि० तृ० च०, प० म मालाभ्याम् दासीभ्याम् और बहुवचन म च० प० क मालाम्य और दासीम्य समान रूप पाय जाते है। इस प्रकार सादृश्य का प्रभाव तसा प्राकृत भाषाओं पी विभक्तियों पिकास म मिलता है वैसा ही प्रभाव प्राचीन यार्य भाषा की विभक्तियों व विकास म भी दृप्रिगत हाता है । अतएव मादृश्य और प्रसनलाधर ग्रादिप पारण निसरफर भारत भागों का विभिन्न रूपा से रियारा हुया बहा छ यहा प्रभाव प्राचीन श्रार्य भाषा मस्कृत ये उदाहरणों मभी दिसाइ पड़ता है । भाषा प निवास में राहत और स्वाभाविप प्रतिषौ मर्दैव पार्य करती रहती है या परले स्पष्ट किया ही ला रा है। मारत शर-समूह शिविध प्रापर भापाथों प शन्द-सन्हम भी पापा ममानना मिलती देशोरि सभी प्रारतोंथा उदाम और विकास प्राचीन आर्य भाग पेदिप श्रया लारचरतार में प्रचलिन प्राचीन भार्य यालियों श्राधार पर या सामान मी वायतरारा अन उदाहरण पिला यशाप रस पियम गुप मामद भी है। य श द्वार अथवा अगर (प्रॉस्टिर) परिपार ६ मा आव। प्रार भागों में भी तरतुमार उन घर पा शिकार मिला है, तापिसो प्रचार प्रस्वाभारिप ना पा जायण । रमा थनिरिक सनी मारायो अप देशीरन्द मी मिला है निराकास स्थानाप नियमवायों [६४ ] से सम्बद्ध होता है। प्राकृतों में भी इन देशी शब्दों की कमी नहीं है। भारतीय वय्याकरणों तथा श्राचार्यों द्वारा प्राकृत शब्द- समूह को तीन भागों म विभानित किया गया है-१ सस्कृत तत्सम अथवा तत्सम, २ सस्कृत भाव अथवा तद्भव, ३. देश्य श्रथया देशी । वाग्भहालकार में तत्सम को 'तत्तल्य', की सजा दी गई है । उक्त तद्भव' शब्द का प्रयोग निधिम्म, मार्कण्डेय, दण्डी, धनिक ने क्यिा है यौर उसी के लिये संस्कृत योनि अथवा विभ्रष्ट पा प्रयोग भारतीय नाग्य-शास्त्र म मिलता है। उक्त 'देव' का उल्लेख निविक्रम, मार्कण्डेय, वाग्भट्ट ने और 'देशी' का दण्डी धनिक ने क्या है। यही देशी प्रसिद्ध अथवा देशी मत के नाम से भारतीय नाट्यशास्त्र म प्रयुक्त हुया है। तद्भव शब्दों में भी दो भेद किये गये हैं--साध्यमान सस्कृत भाच और सिद्धमान सस्कृत भाव | पहले के अन्तर्गत संस्कत के आधार पर विकसित प्रत्यय अथवा विभक्तिरहित शब्द अाते हैं। चीम्स ( Beams ) ने ऐसे शब्दों को प्रारभिक तद्भव शब्द कहा है और ये प्राकृत के स्वतन्न शब्द हे । दूसरे के अन्तर्गत सस्कृत के शब्द व है जो प्रत्यय और विभक्ति साथ प्राकृत मे प्रयुक्त होते है । उदा०-वन्दित्या> अमा० वन्दित्ता । सस्कृत वय्याकरणों ने अपने सस्कृत भाषा ज्ञान और प्रतिभा के आधार पर प्राकृत के एक ही शब्द को देशी और दूसरे ने तद्भव अथवा तत्सम व नाम से दिया है । हेमचन्द्र ने 'देशी नाममाला' ग्रन्थ म इस पर विस्तार स विवचन प्रस्तुत क्यिा है । इसी प्रकार कुछ समास हैं जिनक शब्द तो सस्कृत सदृश है परन्तु उनके अर्थ सस्कृत से भिन हैं। उदा-अक्षिपतन> अच्छिवटणम् , सप्ताविंशति द्योतन> सत्तविसमजोग्रणो । अनेक प्राकृत शब्द ऐम है जिनका सस्कृत धातुओं से कोई सवध नहीं जोड़ा जा सकता परन्तु उनको वैसा जोडने का प्रयास किया गया है । और ऐसे अनेक देशी शब्द धात्वादेश के ।

। नाम से यहे गये हैं। उनका महत्व है क्योंकि आधुनिक यार्य भाषाओं का सवध उनसे जुड़ जाता है परन्तु हेमचन्द्र ने संस्कृत से उन शब्दों का सबध जोडा है और वे उन्हें देशी नहीं मानते। देशी शब्दो को सस्सत शब्द-कोश में 'धातुपाठ' के नाम से भी रखा गया है। उन देशी शब्दों में देश के अतिरिक्त यार्य और अनार्य शब्दों का भी समर कर लिया गया है। जिन शब्दों का व्याकरणिक नियमों से सिद्ध नहीं होता अथवा सस्कृत शब्द-कोश में उसी अर्थ में नहा मिलते उन सभी को देशी की सजा हेमचन्द्र ने दी है। यद्यपि भाषा-विकास का दृष्टि स वे स्थानीय विशेषतायों के याधार पर विससित नहीं हुए वरन् उनत भाषायों के शब्द ही पनि परिवर्तन और प्रयोग विशेष के कारण देशी मान लिये गये । उदाहरण के लिये 'श्रमणिग्गमो' शब्द चन्द्र के अर्थ में मिलता है, जो सस्कृत का 'श्रमृतनिर्गम' ही है, चूंकि यह सस्कृत शब्द कोश में नहीं मिलता इसलिये देशी शब्द माना गया है। देशीनाममाला में अनेक शब्द द्राविड़, फारसी और अरवी भापायों के भी है। हेमचन्द्र ने वैसे अपने पूर्व वे वय्यावरणों के द्वारा निर्देशित देशी शब्दों को सस्कृत के श्रतर्गत भी माना है क्योंकि उनकी व्युत्पति सस्कृत से सिद्ध होती है। हेमचन्द्र ने देशीनाममाला में शब्दों को प्रकारादि कम से दिया है जिससे कोई भ्रम उत्पन्न नहीं होता। हेमचन्द्र ने जैसा परले बन गया है, अपने द्वारा ही निर्देशित देशी-शन्दों के नियम या सर्वत्र पालन नहीं दिया है । एक शब्द यो एक स्थान पर देशी और पिर उसी को दूसरे स्थान पर सस्कृत से मयंधित दिखाया है। उदाहरण प लिये टोला (पाली), हनुश्र, अदनारा, येरो शन्द लगु, अदाग डोला, स्परिर प्रागाव्यावरण म संस्कृत श्रीर देशोनामामाला में देशी माने गये हैं। इसी प्रकार धनपाल ने सरनिरा पाइथलन्छी को देशी-शाल गना है। यपि उमने तत्मन पर सदर सन्दों पी सम्मा ही अधिर मिराती है । अतएर प्रापा शम्द-सा पे थधिमा सन्द पदर, 1 [ ६७ ] स्थानों पर उससे अपना विरोध प्रक्ट किया है। हेमचंद्र की देशी. नाममाला ग्रंथ इस प्रकार प्राकृत के देशी, अर्धतत्सम यादि शब्दों का महत्वपूर्ण सग्रह कहा जा सकता है, जो पूर्ववती रचयिताओं के विवेचन के साथ उपलब्ध होती है। पाइयलन्छी-नाममाला का सपादन चिन्नमविजय मुनि पे द्वारा किस गया है जिसमें शब्दों का तमम रूप अथवा उनका शाब्दिक अर्थ प्रत्येव पृष्ठ के यत में पाद- टिप्पणी के रूप म दे दिया गया है। हेमचद्र कृत देशीनाममाला पा सपादन यार. पिशेल के द्वारा और उसी के परिशिष्ट भाग म देशीनाममाला म प्रयुक्त देशी शब्दो का शब्द-कोश, संस्कृत, अंग्रेजी अर्थों और रूपात्मक उल्लेखों के साथ डॉ० बूहलर के द्वारा किया गया है। प्राकृत-शब्दोश का एक गृहत् रूप 'पाइयसद्दमहराण' (मारतशब्द-महार्णव ) के नाम से सेठ हरगोविन्ददास द्वारा चार सरदों में हिंदी श्रों तया रूपात्मक विचन के साथ मिलता है। वर कोश प्रायन-शब्दसमूह की दृष्टि से अत्यत महत्वपूर्ण यहा जा सकता है। श्राचार्य नरेन्द्रदेव रचित पूर्व निर्देशित अभिधम्म कोश भी इस तेन में महत्वपूर्ण रनना है शिनालेसी प्राप्त यशोर परिलालेखों की भाषा प्रारंभिप प्राव को उदाहरण है और पैसा पहले पा जा चुपा है, उनी भाग को चार रूपों में विभाजित किया गया है-पश्चिमोत्तरा, ददिरा पश्चिमी, मध्यपूना और पूर्गी । पश्चिमोत्तर सनर ६ अन्तर्गत मामूहिक दृष्टि शाहाबाऊ- गदी पी भाषा मानसहरा पी श्रपदा अधिप प्रामाएिप है कायि गानटरा पी भाषा पर मनायी समूह की मारा पा प्रभार भी दृष्टिगत गा। मानसेहरा म प्रपमा एफ. या>-ए म्प, महामार भ>६ मंजन मिलता है, ना पसिनाची पी मामान विषाएँ नहीं है। उदा० गग.> मुगो (स.), निगे (ग्गन)।

पश्चिमोत्तरी समूह पश्चिमोत्तरी वी पनि सबधी विशेषताओं में प्र> रिसर और. थागे का दन्त व्यजन मूर्धन्य में परिवर्तित हो जाते हैं परन्तु मानगेहरा में यह परिवर्तन नहीं मिलता। उदा० ऋत, मृग मृद्धेषु, गृद्धि> प्रमश क्टि, निग, अग युप्रेम, बुदुधेनु, प्रद्धि,। -क्ष> न्छ । उदा० माक्ष> मोछ परन्तु क्ष> म उदा० मुद्र>मुद्र, खुद (मान)। -स्म, स> स्प उदा. सप्तमी एक-स्मिन>-स्पि. उदा० विनीतस्मिन> पिनितस्पि, स्वामिन > स्पमिरेन । यदि सयुक्त व्यजन मेर ध्यनि हो तो उसका परिवर्तन नहीं होता। उदा. धर्म>भ्रम, दर्शन> ट्रेशन। यदि सयुक्त व्यजन म स ध्वनि हो तो उसका समीकरण और नागे के दन्त व्यनन का विकल्प से मूर्धन्य रूप हो जाता है । उदा. गृहस्थ> ग्रहस्थ, अष्ट> अठ (मान०), अस्त (शाहा०)। पश्चि भोत्तरी म दन्त व्यजनों का मूर्धन्य रूप में विकास अधिक मिलता है । उदा० अर्थ> अठर, गयोदश>नेडश (मान०) त्रैदस (गि० ) औषधानि>योपढनि (शाह०, मान०), श्रोसधानि (का०, धौ. जो०)। टॉ० सुकुमार सेन क मतानुसार शाहावाजगढी की भाषा मे मूर्धन्य धनियाँ सभवत वत्सर्य प्रकार की थीं इसीलिये दन्त और मूर्धन्य में कोई भेद नहीं मिलता। पश्चिमात्तरी में दोनों रूप मिलते हैं उदा०-ले ठम् और स्रेस्तमति, अठवप और अस्तवप । शब्द में क्सिी व्यजन के बाद यदि-य हो तो उसका समीकरण कर लिया जाता है। उदा० कल्याण> क्लण, वर्तव्य> क्टव । मानसेहरा मे कभी कभी साधारणीकरण नहीं होता । उदा० एकत्य > (शाह) एकतिए,, (मान०) एकतिय (कुछ)। शब्द म अनुनासिक व्यजन के साथ प्रयुक्त-य और ज्ञ का ज्ज हो जाता है । उदा० अन्य > अञ्च परन्तु मान० में अगत्त, पुन्यम् > पुथ, परन्तु पुरण (मान०) ज्ञानम् > अान । ।

- [ ६६ ] शब्द के मध्य में प्रयुक्त ह का प्राय: लोप हो जाता है । उदा. इह> इअ, ब्राह्मण> ब्रमण, (शाह) वमण (मान०)। पश्चि- मोत्तरी में प्रथमा एक० मे अ.>-यो और कर्तृवाचक सजा,मे-त्या> स्वी रूप मिलते हैं । उदा० दर्शधित्वा> दर्शयित्वी, द्रसेति । दक्षिण पश्चिमी समूह दक्षिण पश्चिमी समूह की भाषा का प्रतिनिधित्व, जैसा पहले बताया जा चुका है जूनागढ़ और गुजरात के गिरिनार शिलालेस की भाषा करती है । वह वैदिक, लौकिक संस्कृत श्रोर पालि से निकट सबंध रसती है। इसके अंतर्गत संयुक्त व्यंजन के स धनि का लोप नहीं होता। उदा० अस्ति, हस्ति, सष्टि परन्तु स्त्री> इथी रूप भी मिलता है | शब्दों में क्ष> च्छ पश्चिमोत्तरी के सदृश मिलता । उदा० क्षुद्र >-छुद, वृक्ष> बछा परन्तु स्त्रीअध्यक्ष> इथीभरस रूप भी मिलता है। सयुक्त व्यजन के - ध्वनि का वैकल्पिक लोप मिलता है। उदा० अतिक्रान्तम् > अतिमातं, प्रतिकातं, नि> नी, ती, सर्व> सर्व, सव । संयुक्त व्यंजन मे -व्य के अतिरिक्त अन्य -य का समीकरण हो जाता है। उदा० कल्याण>कलान, परन्तु कर्तव्य>क्त्तव्य, मृगव्या > मगव्या रूप भी मिलते है । शब्द में 'व' ध्वनि के वाद प्रयुक्त 'मृ स्वर का 'श्र और स्वर में परिवर्तन हो जाता है। उदा. वृत्त> वुत परन्तु मार्ग> मग, मत, दृढ>दढ में -ऋ> य म परिवर्तन मिलता है । संयुक्त व्यंजन-त्व, -म >-स्प, द्व> ब्द । उदा० चत्वार >चत्पारो, यात्म>यात्प, द्वादश>द्वादस परन्नु 'द्वे' और 'दो' रूप भी मिलते हैं। डॉ. सुकुमार सेन के अनुसार /स्था धातु का भारत- ईरानी में / स्ता होता है परन्तु इस संयुक्त व्यंजन की एक ध्वनि का मूर्धन्य रूप हो जाता है । उदा० स्थिता>स्ठिता, तिष्ठत:> लिष्टतरे, सप्तमी एक. -स्म>-म्ह। उदा. हिमन> - [७] हि, तस्मिन>तम्हि । यात्मने पद के रूप भी स्थिर मिलते हैं। ग्रस धातु का अ-सर विधि लिंग म स्थिर रहता है। उदा० स्यात् ( अस्पत)>यस (अस्सा), अस्यु >यसु । भरति' और 'होति' दोनों का प्रयोग मिलता है। कुछ पिशप शब्द इस भाषा म द्रष्टव्य हैं। उदा. पन्थ< पथ और मग<मार्ग, यारिस, तारिस और यादिस, तादिस< यादृश् , तादृश् , महिटा,<महिला, पमति ( दसति, देसति)< पश्यति । मध्यपूर्वी समूह मध्य पूवा की भाषा के अंतर्गत जैसा पहले कहा जा चुका है काल्सो का शिलालेस, तोपरा स्तभ लेस, जोगीमार गुफालेस यादि की गणना की जाती है । प्राय समूह की भाषा के सदृश र>-न, श, प के प्रयोग, प्रथमा एक० अ>-ए रूप मिलते हैं। अन्य धनि संवधी विशेषताया में हर स्वर का प्रयोग दीर्घ सर के रूप में याहाहा, लोक्स्य>लोक्सा। क और थी प्रत्ययो के प्रयोग और ये क्य और क्यी के रूप में मिलते हैं। उदा० जातिनातिक्य, क्रोशिक>यढकोसिक्य, दासिकी> देवदसिक्यि । श, प> स मिलता है। शब्द के मध्य० श्रो>-ए । उदा० करोति> क्लेति । शब्द में प्रयुक्त सयुक्त व्यजन के र, स, प ध्वनियों का प्राय लोप हो जाता है। उदा० अष्ट>ठ, अर्थ, सर्व>सर । शब्द म त्, म पे बाद प्रयुक्त य का इय् परन्तु उसका पूर्व में द,-ल व होने पर समाकरण हो जाता है। उदा. वर्तव्य> क्टविय, मध्य>मन्म, परन्तु उद्यान>उयान, कल्याण>क्यान और त्य>च, उदा० सत्य>सचे । सयुक व्यजन स्म एम् >फ । उदा. तुष्म>तुफे, अस्माकम् >अफाक, य तस्मात् , एतस्मात् > येतफा । सयुकृ व्यजन क्ष> क्ख, या उदा० माक्ष> मोरक, सुद> खुद।

स्वरमध्यरती -क का घोप-रूप में विकास मिलता है। उदा. कृत्य> अधिगिच्य, लोकम् > लोग। क्रिया / भू का विकास सदैव / रूप में होता है। सप्तमी एक-स्मिन>-स्सि, सि का प्रयोग होता है - - पूर्वी समूह पूर्वी समूह की भाषायो के अंतर्गत घौली, जोगढ के शिला-लेस, संपूर्ण लघु शिलालेस और स्तंभ-लेस, मौर्य राजायो के गुफा लेस, महास्थान का शिलालेस, सोहगोरा का ताम्रपत्र लेंस, सारवेल और उनकी रानियो के हाथी गुफालेस आदि की गणना की गई है । पूर्वी की विशेषताओं मे-य:> -ए, । उदा० राजा> लाजा, मयूरः> मजुला । संयुक्त व्यंजन में प्रयुक्त 'र' और 'श', 'स' का परिवर्तन समीकरण में हो जाता है। उदा. सर्वन>रावत ( सन्यत्त ), अस्ति> अथि, (अस्थि )। सयुक्त व्यजन के बाद प्रयुक्त य,-ब>-इय,-उव हो जाता है। उदा० द्वादश> दुवादस, कर्तव्य>कटविय परन्तु ल्य>-य्य । उदा० क्ल्यान> क्यान ( क्य्यान ) । यह > हवं (अहक) रूप मिलता है। सप्तमी एक. स्मिन>.सि,-स्सि मिलता है। उदा० धर्मस्मिन> धम्मसि धम्मस्ति, तस्मिन> तीस, तस्सि। कृदत का प्रत्यय -नु, त्वा । उदा० अरभित्वा> यालभितु, पारभित्पा ( दक्षिण पश्चिमी ). अरभिति ( पश्चिमोत्तरी)। सिंहलद्वीप के शिलालेखो की भाषा की अधिकाश विशेषताएँ मध्यपूर्वी समूह की भाषा के सदृश मिलती है। कुछ मिन विशेषतायो में प्रथमा एक० .ए>-६, सप्तमी एक-सि> हि, षष्ठी एक. में अपभ्रश के सदृश स> हे और कभी-कभी प> श रूप मिलते हैं जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि अश्वघोष के नाटक की भाषा प्रारमिक प्राकृत की उदाहरण है क्योंकि-उपलब्ध रचना १०० [७२ ] ई. के लगभग की है योर इसमें तीन पात्रों की रिभाषाएँ मिन भिन्न प्रकार की मिलती है । 'दुष्ट' की भाषा प्राचीन मागधी है जिसम र>ल, स, प> श, श्र>ए उदा० कारणात् >पालना, वृत्त > युत्ते, परोमि> फ्लेमि । इसा अतिरिक्त श्रहे> यहक और पष्ठी एक० में हो विभक्ति का प्रयोग मिलता है। उदा० माक्टहा। गणिका और पिदूपक की विभाषा प्राचीन शौरसेनी है जिसमें अ> यो मिलता है। उदा० दुष्कर > दुक्करो, न्य, ज्ञ> । उदा० हन्यन्तु,> जन्तु, यकृतज्ञ> अकितन, व्य> । उदा० धारयितव्यो ।-> स । उदा. साक्षी> सबरी, प्रेक्ष्यामि> पपरसााम, वर्तमानकालिक कृदत-मान प्रत्यय या प्रयोग स्थिर मिलता है। उदा० मुञ्जमानो, पाटयमानो यादि । इसी प्रकार कुछ विशेष परिवर्तन त्वम् > तुव (प्राचीन पारसी तुगम् ), सलु,>खु, भवान् > भवा, कृत्या> करिय, कुरुथ> क्रोथ यादि। गोभम की विभाषा मध्यपूचा अथवा ल्युडर्स के अनुसार प्राचीन अर्धमागधी कही गई है जिसम र>ल, य>यो और 'श' का अभाव होता है। क, याक, इक श्यादि प्रत्ययों का अधिक प्रयोग मिलता है। उदा० क्लमोदनाक, पाण्टलाक< पाएइर यादि । । " . निया प्राकृत सर पारेल स्टेइन द्वारा उपलब्ध मध्यएरिया के सरोष्ठी लेगों की भाषा निया प्राकृत का उल्लेरस पहले हो चुका है | इस निया प्रक्ति के अन्तर्गत य या, ये>इ मिलता है। उदा० समादाय> समदि, भावये>भवइ, मूल्य>भूलि, ऐश्वर्य> एश्वरि । मध्य ए> इ का प्रयोग होता है 1 उदा० इमे> इमि, उपेत > उवितो, क्षेत्र> छ इन। अन्त अ> उ का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है । उदा० प्रात > प्रतु । स्वरमध्यवर्ता स्पर्श ऊष्म और स्पर्श सघपा अघोष व्यजन सघोष म बदल जाते हैं। ऊप्म अतिरिक्त अन्य व्यजन का लोप और उसके स्थान [७३ ] पर-इ या य क प्रयोग मिलते हैं। उदा० यथा>यधा, सन्तिके> सदिइ, त्वचा> त्वया, प्रथम>पढम, अवकाश> अवगजन्य, कोटि->कोडि, गोचरे>गोयरि, भोजन>भोयंन । यदि संयुक्त व्यंजन में अनुनासिक अथवा कोई ऊप्म ध्वनि सन्निविष्ट हो तो अघोष व्यंजन सघोष का रूप ले लेता है। उदा० पञ्च>पज, सिञ्च>सिज, सम्पन्न->सवन्नो, दुष्प्रकृति>दुवकति, संस्कार>सघर, अन्तर> अदर, हन्ति>हदि आदि। सघोष के स्थान पर अघोष के भी कुछ उदाहरण मिलते हैं। उदा. चिराग>विरकु, समागता >समक्त, विगाह्म>विकय, योग>योक, ग्लान'>किलने, दण्ड > तएट-- भोग>योग यादि । महाप्राण व्यजनो के स्थान पर अल्पप्राण व्यंजनों का प्रयोग ईरानी और अनार्य भापायो के प्रभाव का कारण भाना गया है। उदा० भूमि>बूम, -धनानाम् >तनना। शब्द में विसर्ग के अनंतर 'स' और स्वतन रूप से 'क्ष' का परिवर्तन ह मे मिलता है। उदा० दु.स>दुइ, अनपेक्षिण:>अनवेहिनो, अपेक्ष> अवेह यादि । शब्द में सघोष ऊष्म ध्वनि रूप मे उच्चारण के कारण-ध के स्थान पर ऊष्म व्यजन का प्रयोग मिलता है। उदा-० मधुर>मसुरु, गाथानाम् >गशन, शिथिल>शिथिल, मधु>मसु, अधिमाना> असिमन यादि । तीनो ऊष्म घनियो श, ष, स का प्रयोग होता है परन्तु इनमें 'स' का प्रयोग अधिक व्यापक मिलता है । सघोष ऊष्म ध्वनि ज का स, झलिसित रूप मिलता है । शब्दो में ऋ के स्थान पर अ, इ, उ, रु, रि का विकास मिलता है। उदा. मृत >मुतु, सवृत.> सव्वतो, स्मृति>स्वति, वृद्ध>निढ, कृत>किड, पृन्छितव्य-> गुछिदवो यादि। संयुक्त व्यंजन में यदि -,-ल सनिविष्ट हों तो उनका परिवर्तन नहीं होता। उदा० प्राप्णोति >प्रनोदि, कीर्ति कीति धर्म>धर्म, धम, मार्ग>मर्ग, परिव्रजति>परिप्रयति, दीर्घम् >द्रिघम्, मैन-> . ।

- . [ ७४ ] मेत्र आदि । संयुक्त व्यंजन के एक अनुनासिक पनि में दूसरी निरनु- नासिक धनि का समीकरण हो जाता है। उदा० पण्डित>पणिदो, दण्ड>दण, प्राप्णोति>प्रणोदि, गम्भीर>गमिर, कुञ्जर > कुञ्जरु, प्रशा>प्रत्र, शून्य>शुज, विज्ञप्ति> पिनति अादि । संयुक्त व्यं- जन -अ>-य का परिवर्तन मिलता है । उदा० श्रवक>पवक, श्मश्र>मपु । संयुक्त व्यंजन म, ग्र, न, द्र,प्र, व्र, , स्त् का प्रयोग स्थिर रहता है । उदा० त्रिभि.>निहि, प्रियाप्रिय>प्रियमिश्र, संभ्रय> सभ्रम यादि। संयुक्त व्यंजन -ष्ट, -ठ का समीकृत रूप हो जाता है । उदा० श्रेष्ठ: >शेठो, दृष्टि >दिठि, ज्येष्ठ >जेठ यादि ।। स्थाधातु में -स्थ>- मिलता है । उदा० स्थान-<ठणेहि, उत्स्थान> उठन, काष्ठ>कठ, उष्ट्र>उठ। सयुक्त व्यजन मे यदि ऊप्म ध्वनि निहित हो ता उसका परिवर्तन नहीं होता। उदा० अस्ति > अस्ति, वत्स>वत्स यादि । द्वितीया एकo-म् विभक्ति और प्रथमा एक०-स का लोप मिलता है। द्विवचन का प्रयोग केवल दो उदाहरणों में मिलता है। उदा० पदेभ्याम् और पदेयो। पष्ठी एक० का रूप -यस विभक्तियुक्त मिलता है। क्रियायो की काल-रचना में वर्तमान निश्चयार्थ, साजा, विधि, भविष्य निश्चयार्थ, यादि के रूप मिलते हैं। वर्तमान, विधिलिंग के रूप यशोकी प्राकृत के सदृश मिलते हैं। उदा० करेयसि, रेयति, स्यति, अशोकी प्राकृत म अपरेयति, सियति श्रादि रूप मिलते है । भूतकाल का विकास कर्मपाच्य कृदन्त में प्रथम पु० बहु० मे न्ति और उत्तम पु०, मध्यम पु० म वर्तमान निश्चयार्थ कर्तृवाच्य / अस् के सदृश विभक्ति रूपों को जोड कर क्यिा जाता है। उदा० श्रुतोस्मि > भुतेमि, श्रुत स्म > श्रुतम, दत्तोसि> दितेसि यादि । कर्तृवाचक संज्ञा का विकास पश्चिमोत्तर अशोकी प्राकृत के सदृश स्वी, -त्वा और -इ प्रत्ययों के योग से होता है। उदा० श्रुनिति, अमुछिति ।

- [ ७५ ] पूर्वकालिक कृदन्त का विकास प्रियार्थक संज्ञा -अन् के चतुर्थी एक० के रूप से होता है। उदा० गच्छनाय > गच्छंनए, देयंनए । कुछ रूप -तुमन् में भी मिलते हैं। उदा०. To-कर्तु और करंनए, विसजिदु और सिर्जनए। माहाराष्ट्री प्राकृत संकुचित दृष्टि से साहित्यिक प्राकृतों में माहाराष्ट्री, शौरसेनी, अर्ध- मागधी, मागधी और पैशाची की गणना की जाती है । जैसा पहले नहा जा चुका है कि माहाराष्ट्री प्राकृत को ही वय्याकरणों ने प्रधान भापा मान कर उसके श्राधार पर अन्य प्राकृतों का वर्णन किया हे । वररुचि ने प्राकृतप्रकाश और हेमचद्र ने प्राकृत व्याकरण मे माहाराष्ट्री प्राकृत की विशेषताओं को अलग से नहीं दिया है घरन् माहाराष्ट्री को ही मुख्य भाषा मान कर सपूर्ण प्राकृत व्याकरण का विस्तार दिया है और शौरसेनी, मागधी, पैशाची ग्रादि की विशेषताओं का विवेचन चन्तग से प्रस्तुत किया है । उस काल मे माहाराष्ट्री स्टैडर्ड' प्राकृत थी। इस प्राकृत की मुरय विशेषतान्यो के अतर्गत स्वरमध्यवती अल्पप्राण व्यजनो कालोप यौर घोष महाप्राण व्यंजन का -ह में परिवर्तन मिलता है। उदा० प्राकृत>पाउन, कृति>कइ, कपि>क्द, क्थम् > कह, कया >कहा । शब्दों के अल्पप्राण व्यंजन का महाप्राण रूप योर फिर उसका -ह में परिवर्तन मिलता है। उदा०-स्फटिक> *स्फटिस> फळिह, भरत> भरथ > भरइ । प्रारंभिक प्राकृत मागधी यौर अर्धमागधी के सदृश स्वरमध्यता स के स्थान पर प्राय -ह का प्रयोग मिलता है । उदा० पापाण > पाहाण, तस्य > ताह, अनुदिवसम् >अणुदिग्रह, श्रत्मन् >अप्पा मिलता है। शौर०, माग० में 'अत्ता' पाया जाता है। क्रिया-विशेषण की विभक्ति वाहि का प्रयोग पंचमी एक के लिये मिलता है । उदा. दुराहि, मूलाहि । परन्तु कुछ रूपों में पंचमी एक. का पुराना रूप भी मिलता है।" ।

[७७ । -- - गत>गद । परन्तु कुछ शब्दों में उक्त परिवर्तन नहीं भी मिलता और उनके स्थान पर भिन्न धनियो का परिवर्तन मिलता है । जैसे-त > ड. उदा. व्यापृत>वावुडो, पुन>पुड्डो । 'ब्रह्मण्य', 'विज', 'यज्ञ,' क्रिन्यका' शब्दों में सयुक्त व्यजन व्य, ज्ञ, न्य के स्थान पर वैकल्पिक रूप में 'ज' का प्रयोग मिलता है। उदा. ब्रह्मण्य > बम्हन, ब्रम्हराण, विज्ञ >मिजो, विणणा, यश> जञो, जएगो, कन्यका > काका, करणका अादि । सर्वज्ञ शब्द म श और 'इङ्गित' मेन के स्थान ए मिलता है। उदा० सर्वज्ञ> सव्वएणो, इङ्गित> इरिणदो । सयुक्त व्यजन र्य > य्य का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है अन्यथा माहाराष्ट्री के सदृश ज रूप ही मिलता है। 'क्ष'>क्स । उदा. कुति> कुक्सि, इनु > इक्खु यादि । 'स्त्री' शब्द के स्थान पर "इत्थी'५ और एव>ज्जेव,६ इब>विय, आश्चर्य>यच्छरिअर हो जाता है। पूर्वकालिक कृदन्त का प्रत्यय-क्वा<-इ,-य मिलता है। उदा. गत्वा>करिय, गत्वा> गमिश्र, पढिला>पढिय, भूत्वा > भविय। -कत्वा > दूण रूप भी मिलता है। उदा. सूत्रसख्या ३ द्वादश परि० To so ७ " १ "२६१ ची. पा० प्रा.व्या १. व्यावृते । पुत्रेऽवि क्वचित २ ब्रह्मण्य-विश-यज्ञकन्यकाना च्यश-न्याना नोवा ३ सर्वशक्षितयो ४ नवा यो रय ५ स्त्रिायामित्थी ६ एवस्य ज्जेम्व ७ विस्यविध आश्चर्यस्याच्छरित्र ६तम १०. क्त्व इय दूणौ थत सख्या २२ द्वादश परिक ЯҢо до " " " 5 " " "६ . " २७१ चौथा पाद प्रा० व्याक [ ७८ ] भूत्वा > भोइण, पठित्वा > पठिदूण। कृऔर /गम धातुओं में -रत्या>हुन मिलता है। उदा० कृत्या> गद्य, गत्वा> गद्य । हेमचन्द्र ने इसका विकास दुथ रूप में दिया है। उदा० कृत्वा >पन, गत्या>गडुन । धातु /दा का विभातियों के जुड़ने के पूर्व वर्तमान में 'दे' रूप हो जाता है। उदा० ददाति >देदि, ददातु>देदु और भविष्य में 'दइरस' हो जाता है । दास्यामि> दहस्स, प्रथम बहु (स), द्वितीया बहु० (शस) के नपुंसक रूपो में णि का वैकल्पिक प्रयोग और पूर्व का स्वर दीर्घ हो जाता है। उदा०-जलानि, जलाई, वणारिण, वणाई। संस्कृत के जिन शब्दों के अन्त में -न् और उसके पूर्व क प्रत्यय का योग हो उनका संबोधन एक० में ना हो जाता है और जिनमे -क प्रत्यय का योग नहीं होता उनके अन्त न का अनुस्वार रूप हो जाता है ।" उदा० क चुकिन् , मुसिन् > कल्चुइया, मुहिया, परन्तु राजन् > राय, विजयवर्मन् > विजयवम्म । 'भवत्' वर्त- मानकालिक कृदंत और भगवत्' का भी ऐसा ही विकास मिलता है और प्रथमा एक० में भी इनका अनुस्वार रूप मिलता है। उदा: भवं, भगवतं ( भगवं)। कृ धातु का विभक्तियों के जुड़ने के पूर्व 'कर' रूप हो जाता है। उदा० करोति> करोदि, करेदि, करिष्यामि> करिस । -स्था १. कृगमोदुमः द्वादश परि० चौथापद २. ददातेदश्स्स ल टि दादश परि० ३. णिजश्शसीक्लिीव स्वरदीपश्च ४, आ आमन्त्रये सौ वेनो न. ५.मोवा ६. भवद्भगवताः ७.कृनः करः द्वादश परि० सू० स० १० प्रा०प्र० कृगमी उदुम २७२ प्रा. व्या० " " १४ प्रा०प्र० " चौथा पाद प्राकृत व्याकरण २६३ २६४ २६५ " " " " प्रा.व्या.

- [ ७६ ] धातु का विभक्तियों के पूर्व 'चिह' रूप हो जाता है। उदा० तिष्ठति> चिहदि, स्थास्यामि> चिहिस्स, / स्मृ धातु का 'सुमर' रूप हो जाता है। उदा० स्मरति> सुमरेदि, स्मृत्वा> सुमरिन । दृश धातु के स्थान पर 'पास' मिलता है। उदा० पश्यति> पेस्सदि, दृष्टवा> पविसय । अस धातु का 'श्रच्छ' रूपामलता है । उदा० सान्त> अच्छन्ति । परन्तु प्रथम पु० एक० वर्तमानकाल मे /ग्रस् का 'अत्थि' रूप मिलता है ।५ उदा० अस्ति>अस्थि । भविष्यकाल उत्तम पु० एक० न -स्स' और वैकल्पिक रूप में पूर्व का स्वर दी मिलता है । उदा. गमिष्यामि> गमिस्स, गमीस, भविष्यामि>.भनि- स्स, भवीस, करिष्यामि> करिस्स, करीस । भविष्यकाल में स्सि', 'स्स' रूप मिलते हैं, माहाराष्ट्र के सदृश-'हि' या 'ह' नहीं मिलता है। उदा० भविस्सदि, पठिस्सिदि । शौरसनी में कपल परस्मैपद की विभक्तियों का प्रयोग होता है, यात्मने का नहीं । उदा० नियते> करी- अदि, गम्यते> गमी यदि। शौररोनी की उपयुक्त विशेषताओं के यतिरिक्त अन्य सामान्य विशेषताएँ माहासष्मी प्राकृत के सदृश ही मिलती हैं। इसका उल्लेख वररुचि ने किया है। हेमचन्द्र ने भी इसे प्रधान प्राकृत के सदृश माना है। , । प्राति-प्रकाश " " " . " " " . U १ स्थश्चिट्ठ सत्र स०१६ द्वा.परि. २ रमरते सुमर ३ दृशे पेक्ख १८ ४ अस्तेरन्छ १६ ५.तिपाश्थि २० ६ भविष्यतिमिपा रस दा स्वरदीर्घश्च २१ ७ भविष्यति रिस २७५ चौथा पाद ८ धातो वक्त कर्ममु परस्मैपदम् २७ दादश परिक ६ रोष महाराष्ट्रीवत् ३२ १०. शेष प्राकृतवत् २८६ " " " " प्रा०या० प्रा०प्र० चौथा पाद " प्रा०म्या. " m [२०] पुरुषोत्तमदेव ने प्राकृतानुशासन में टक देशी-विभाषा का उल्लेस किया है और उसे सस्कृत और शौरसेनी का मिश्रित रूप माना है।' इसम अफरात के लिये आरान्त का बाहुल्य मिलता है। अवारात तृतीया एक (टा) एन् > ए, एण का वैकल्पिर प्रयोग, पचमी बहु०.भ्यस् > ह, हु, हिन्तो के वैकल्पिक प्रयोग मिलते हैं तथा षष्ठी बहु० याम्प और हुँ' का प्रयोग सर्वनाम के लिये भी होता है । 'त्वम्' और 'यहम्' के लिये क्रमश 'तुङ्ग' और 'हम' शब्दों के प्रयोग मिलते हैं | यथा' और 'तथा' पे लिये क्रमश 'जिध' और 'तिध' शब्द पाये जाते हैं। हरिश्चन्द्र वय्या करण के अनुसार टक्क देशी भाषा का सम्बन्ध अपभ्रश से है, प्राकृत से नहीं । शौरसेनी का एक भेद जैन-शौरसेनी के नाम से भी दिया गया है जिसमें दिगम्बर सप्रदाय की कुछ जैन रचनाएँ उपलब्ध होती हैं। यह पहले कहा ही जा चुका है कि जैन प्रथो की मापा प्राचीन अर्धमागधी थी जिसका माहाराष्ट्री से घनिष्ठ सम्बन्ध था। चूंकि इसमें शौर सेनी के साथ त>द, थ> ध और प्रथमा एक० म-ए> श्रो विभक्ति के रूप मिलते हैं इसलिये उक्त ग्रन्थों की भाषा को जैन शौर. सेनी के नाम से दिया जाता है और जैन माहाराष्ट्री की अपेक्षा यह रूप अधिक प्राचीन माना गया है। १ सस्कृत शौरसेन्यो सूत्र १ (क) प्राकृत्तानुशासन २ उन्हुलम् ३ एन्चटान्तस्य ४ सुभ्यमोह हुञ्च ५. प्रामो वा ६ वा (सर्वादिषु च) ७ (वमह समार्थेषु तुन इम - यथातथोजिथतिधी हरिश्चन्द्ररित्वमा रक्कभाषा- मपन शभिच्छति ने परि०१६ " २ " " " " "" " " " " " 3 " प्राकृतम्, १० " E१. मागधी-प्राकृत वय्याकरणों ने मागधी प्राकृत का मुख्य आधार शौरसेनी प्राकृत दिया है। परन्तु मागधी की कुछ भिन्न विशेषताएँ भी हैं। मूल व्यंजन प, स> श२, र> ल, ज> य४ व्यंजनो के प्रयोग मिलते हैं । उदा० पुरुष:> पुलिशे, विलास> विलाश, सारस:> शालशें, राजा> राया। संयुक्त व्यंजन र्य,-र्ज>-य्य मिलता है। कुछ उदाहरणो मे-ज>ञ भी मिलता है । उदा० कार्य> कय्य, दुर्जन> दुय्यण परन्तु वर्जति> वदि। संयुक्त व्यंजन-क्ष> स्क-और -ख,७.च्छ>श्च', ध्य>-य्य, य रूप पाये जाते हैं । हेमचन्द्र ने अपने प्राकृत व्याकरण मे मागधी मे प्रयुक्त संयुक्त व्यंजनों का विकास सूत्र-संख्या २८६-२६८ मे दिया है। उदा० दक्ष> दस्क, राक्षस> लस्कश, प्रेक्षति> पेस्कदि, क्षयजलधरा > सययलहला, गन्छ> गश्च, पृच्छयति> पुश्चदि, अद्य> अय्य, विद्या>,विय्या श्रादि । संयुक्त व्यंजन -न्य, -गय,-ज्ञ, ज का मागधी मे ञ हो जाता है ।'' उदा० अन्य> अञ, सामान्य> शामञ्ज, कन्यका> कञ्जका, पुण्य> पुज, प्रजा> पा, सर्वज्ञ> सव्वज, सूत्र संख्या ૨ परि०११ प्रा०प्र० " १. प्रकृतिः शौरसेनी २. पसोःशः ३. रसोल शौ ४.जी: य. ५.यज योरर्य- ३ २८म " भाज्या " चौथापाद परि०११ . ४ प्रा०प्र० . ७ . " ब्रजी जा २६४ " चौथापाद परि०१२ द मा०व्या. प्रा०प्र० भा०व्या. २६७ चौथापाद " ६.शस्य स्क: स्कः प्रेताचरो. राध्यक ८. छस्य श्चोनादौ ६.ज घयायः १०.न्य-एयश-जा भः " " २६६ २६५ ૨૨ २६३ " प्रा.भ्या.

- [ २ ] अशा> अवला, असली> यजली, धनंजय> घणलए थादि । सयुक्त व्यजन-रथ और र्थ का स्त रूप मिलता है। उदा. उपस्थित> उपस्तिद, अर्थवती>यस्तवदी । मागधी सरनाम 'अस्मद्' का प्रथमा० एक ( मु) मे हगे, रक, अहः हो जाता है। हेमचन्द्र ने अहे, ययं दोगों के स्थान पर 'हो' रूप दिया है।' उदा० ग्रहम् > हवं, हगे, यह, वय सप्राप्तौ> हगे शयत्ता । पष्ठी एक० (डस्) में वैयल्पिक रूप से ह और पूर्व या स्वर दीर्घ मिलता है । हेमचद्र ने इसे एक० में पार और- यह म यौह दिया है। उदा० पुरुषस्य> पुलिशाह, पुलिशश्श, ईदृशस्य> एलिशाह, सज्ननानाम्> शय्यणाहूँ। प्रथमा एक ० (-सु में भूतकालिक कृदन्त बत से बने हुए शब्दों में विभक्ति का या तो लोप हो जाता है या उसके स्थान पर -3 का प्रयोग मिलता है । उदा० हसित> हशिट, हशिदि । श्रकारात शब्दों के प्रथमा एक० (मु) का अन्त- श्र> इ,-ए मिलते हैं। हेमचन्द्र ने पुलिंग प्रकारात प्रथमा एक० का -ए रूप में विकास माना है। उदा. एप राजा> एशिलाया, एप पुरुष > एशे पुलिशे, भेष> भेश। सबोधन में अकारान्त शब्द का अन्त्य स्पर दीर्घ हो जाता है। उदाहे पुरुष> पुलिशा। वर्तमानकालिक इदत -वत का // / गम् धातुत्रों १ स्थथयोस्त चौथा० प्रा० व्या. अस्मद सौ के हगे महके ३ मह वयमोईगे चौथापाद प्रा० च्या ४ सो हो वा दीर्घश्च परि०१२ ५ अवर्णाद्वा डसो हाद चौथापाद प्रा. श्या० तान्तादुश्च अत देतौ लुक च अत एत्सौ पुति मागध्याम् , चौथा पाद प्रा. व्या० श्रदीर्घ सम्बुद्धो परि० १२ प्रा० म. सूत्र सख्या २६१ ६ " २ परि०१२ ЯТо Яo . प्रा०प्र० २६६ ६ परि० १२ प्रा०प्र० १० . २८७ ८ [ २३ । के बाद-ड रूप हो जाता है। उदा० कृत> कडे, मृत> मडे, गत>. गटे । पूर्वकालिक कृदंत के प्रत्यय क्त्वा के स्थान पर -दाणि रूप भी मिलता है। उदा० कृत्वा मागत:> करिदाणि यायडे । मागधी में कुछ शब्दों का विशेष परिवर्तन मिलता है। उदा. हृदय> हडक्र, तिष्ठ चिष्ठ (शौरसेनी) > चिप्ठ, शृगाल> शिवालक, शिव्याले, शिवाला रूप मिलते हैं। जैसा पहले कहा जा चुका है कि मागधी का अाधार वय्याकरणों ने शौरसेनी प्रावृत दिया है । हेमचन्द्र ने भी मागधी की भिन्न विशेषतायों को सूत्र संख्या २८७ से ३०१ में दे कर अंत में उसे शौरसेनी के सदृश माना है । प्राकृत भाषायों के विवरण प्रसंग में पहले मागधी की शाकारी, चाडाली, ढकी यादि विभाषाओं का उल्लेख किया जा चुका है। इनकी विशेषताएँ मायः मागधी के सदृश हो हैं इसीलिये इनको मागधी के अन्तर्गत रखा गया है। इनकी कछ भिन्न विशेषताएँ भी मिलती हैं परन्तु वह नगण्य हैं। ढको को ग्रियर्सन ने टाकी' के नाम से भी दिया है क्योंकि उनके अनुसार वह स्यालकोट के टक्क प्रदेश की भाषा थी। परन्तु ढकी को मागधी के पूर्वी प्रदेश ढाका की विभाश, के रूप मे और टाकी विभाषा को शौरसेनी के अंतर्गत ही माना जाता है। जिसका उल्लेख टक्की के नाम से पहले किया जा चुका सूत्रसं० परि०१२ - प्रा००. . . १६ ६ 11 . " " २. न मृङ गमां तस्य : २. वो दापि ३. हदस्य हक्कः ४. चिट्ठस्य चिः तिष्ठश्चिष्टः गगालरय शिभाला शिमाले शिमालकाः ६. शेषं शौरसेनीवन् . २९६ चौथा पाद प्रा०व्या० ४ परि०१२ मा०8. चौथा पाद,, प्रा. ध्या. ३०२ [ २४ ] शाकारी विभाषा को प्राकृतानुशासन म पुरुषोत्तमदेव ने अक्रम, निरो- धात्मक, सुन्दर भावो स रहित पुनुरुक्ति, अशुद्ध उपमायों से युक्त तथा न्यायसगत गुण से रहित भाषा माना है।' शाकारी की अधिकाश विशेषताएँ तो मागधी के सदृश ही है-मागध्या शाकारी (साध्यतीति शेष ) इसका उल्लेरा पहले हो चुका है । परन्तु कुछ विशेषताएँ भिन रूप में भी मिलती है । इस विभाषा म तालव्य व्यनना क पूर्व य का उच्चारण होता है और यह इतने हस्प रूप म रहता हे कि छद-रचना में कोई अतर उपस्थित नहा करता । उदा० तिष्ट> चिष्ट, विचष्ठ । इसम पप्ठी एक०म याह विभक्ति का प्रयोग मिलता है। उदा० चारुदत्स्य> चालुदत्ताह । सप्तमी एक० अहि, सयोधन बहु० ग्राहो क भा प्रयोग मिलते हैं । उदा० प्रवहणे> पव- हणाहि, यास > ग्राहो । पिशेल क अनुसार उक्त विभक्तियाँ अपभ्र श म भी मिलती है । ध्वान संबंधी विशेषता यो म क्ष>श्च ,श्क के यतिरिक्त का प्रयोग 'दुष्प्रेक्ष' और 'सहक्ष' शब्दों में मिलता है । -ष्ट>-श्च हो जाता है । इव>-य का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है । क् प्रत्यय का अधिक प्रयोग होता है। शब्दा म वणों का लोप, यागम यादि हो जाता है। सजा, क्रिया यादि के रूप विकास म विभक्तियों का परिवर्तन और लोप मिलता है। चाण्डाली विभाषा भी मागधी का एक विकृत रूप माना जाता १ भपार्थमनमध्यर्थ पुनरुक्त इतोपमम् । न्यायकार्यादि व सन शकार वचन् भवेत् ||१४|| प्राकृतानुशासन-परिच्छेद १३ २ दुप्रेक्षसदृत्तयो चस्प क्सो वा-- सूत्र सस्था २ परि० १३ प्राकृतानुशासन. ३ एट ४ इवस्य एवश्च ८ कबाहुल्यम् ६ लोपागम विकारश्च वर्णाना बालम " भ्यत्ययश्च मुपतिटरवराणाम् स्वादलुई। वस " " " ८ . " ६ " " ७ 1 " १२ [ ८५] है।' इसमे प्रथमा एक० मे अकारांत शब्दों में -ए और यो दोनों के प्रयोग होते हैं । षष्ठी एक० मे -श्श विभक्ति मिलती है।3 सप्तमी एक० मे -म्मि का वैकल्पिक प्रयोग होता है।४ संयुक्त व्यंजन -ट्ट का परिवर्तन कभी-कभी नहीं होता। इव>-व का वैकल्पिक प्रयोग 'मिलता है। - क्त्वा' प्रत्यय के स्थान पर 'इय' हो जाता है।" 'चाण्डाली रिभाषा में अशिष्ट अथवा ग्राम्य-प्रयोग का बाहुल्य मिलता है। शावरी विभाषा भी मागधी का एक विकारी रूप है। उसमे क्स> श्च मिलता है, -श्क नहीं । उदा० पेक्ष> पेप, पेश्च । अहं> हके, ह हो जाता है । १० प्रथमा एक० मे. ए और इ का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है और कभी इसका लोप भी हो जाता है।'' संबोधन में का प्रत्यय का प्रयोग अनादर के भाव को दिखाने के लिये होता है। चादाली में देशो प्रयोग भी मिलते हैं 113 सूत्र सं. १ (क) परि० १४ प्राकृतानुशामन ૨ " " " ३ ४ " " ५ " " ७ " " ८ " " " १. मागधी विकृतिः २. अतः सो(सा) वोदेतो ३.उसःशः ४ म्मिश्च है: 2. हः प्रकृत्या वा ६. श्वस्य वच्च (श्च) ७ क्त्वस्य (क) ८. माभ्योक्तयो (व) कुलम् ६. पेक्रयश्च: २०. भामय के २१. ॐ सिटि (एदितौ)सौ च सो सुई च १२ का सम्पदे नि (नि) यमगौरवे १३.प्रापोदेशीत: ६ २ " " " " ४ " . ५ " " ६ " " ७ .. .

[६ ] अर्धमागधी प्राकृत अर्धमागधी भाषा में कुछ विशेषताएँ मागधी की हैं और कुछ माहाराष्ट्री की और इस प्रकार यह मागधी और माहाराष्ट्री से भिन्नता भी रखती है । अर्धमागधी के गद्य और पद्य की भाषा एक सी नहीं मिलती है इसका निर्देश पहले क्यिा ही जा चुका है। प्रथमा एक० -अ: के लिए गद्य में प्राय. ए और पद्य मे-यो मिलता है। र> ल और स>श मागधी की विशेषताएँ भी इसमे सर्वन नहीं मिलता अभयदेव ने समस्यागसुत्त तथा आसगदसान्यो में इसे उस प्रकार स्पष्ट पिया है-"अर्धमागधी भाषा यस्याम् रसौर लशी मागध्याम् इत्यादिकम् मागधभाषा लक्षणम् परिपूर्णम् नास्ति ।" परन्तु प्रयमा एक. एकरात रूप शावगे, भदन्ते श्रादि, क> ग के प्रयोग-उदा० अशोक> असोग, श्रावक> सावग अादि, पष्ठी एक० तव, मवो धन एक० का श्राकारात, रूप र> ल, स>प के वैकल्पिक प्रयोग मागधी के सदृश ही इसमे भी पाये जाते हैं। अर्धमागधी में सरमध्यवती व्यजनों के लोप होने पर 'य' की थपश्रुति व्यापक रूप में मिलती हैं । उदा० स्थित, > ठिय, सागर> सायर यादि। दन्त्य व्यजनों का विकास मूर्धन्य के रूप में अर्धमागधी की सामान्य विशेषता है। स्वरमध्यवती सघोष व्यंजन का लोप प्राय. नहीं होता। उदा० लोक- स्मिन् > लोगंसि । संयुक्त व्यंजन के समीकृत रूप में एक व्यंजन का लोप और पूर्व का स्वर दीर्घ मिलता है। उदा० वर्ष> वस्स-यास । अशोकी प्राकृत में भी इसका प्रयोग मिलता है। संयुक्त व्यजन -स्म> -यंस । उदा० अस्मि> असि, स्मिन >-यसि । संस्कृत कृदंत-स्वा> ता, ताणं, त्य> चा, च्चाणं याणं । पर्तृवाचक संज्ञा--स्वया (वैदिक) और -तन्य रूपों के प्रयोग होते हैं। मियार्थक संज्ञा चतुर्थी एक० में -त्व का प्रयोग पूर्वकालिक के सहश होता है। उदातुम् > काउम, गच्छिताय> गच्छित्तए । पूर्वकालिक निया के प्रयोग- दु, इत्तु [८७ ] भी मिलते हैं। उदा. कृत्वा >कट्ट, अपहृत्य> अवहट्टु, श्रुत्वा> सुणित्तु, जात्वा> जाणितु आदि । अर्धमागधी की विशेषताएँ माहाराष्ट्री में कुछ भिन्न भी मिलती हैं। डॉ० ए० सी० वूल्नर ने इनका उल्लेख किया है। -एव और अवि के पूर्व -अम्->-याम्, 'दत्तिवा' शब्द मे और प्लुत सर के परे इति> -इ हो जाता है। प्रति' के -द का लोप मिलता है। प्रत्युत्पन्न> पडुप्पन्न । चवर्ग वर्णों के स्थान पर तवर्ग मिलता है। उदा० चिक्त्सिा> तेइच्छा अहा> यथा हो जाता है। संधि व्यंजनों का भी प्रयोग मिलता है। उदा० धिग अस्तु> घिरत्यु, अङ्गमङ्गम्मि> अङ्गेऽम् । इस प्रकार अर्ध- मागधी प्राकृत मागधी और माहाराष्ट्री से कुछ समानता रखने के साथ निजी विशेषताएँ भी प्रदर्शित करती है। पैशाची प्राकृत वररुचि ने प्राकृत प्रकाश के दसवे परिच्छेद में पैशाची की विशेषतायों का उल्लेरा किया है। हेमचंद्र ने प्राकृत-व्याकरण के चौथे पाद मे ३०३ से ३२४ सूत्रों मे पैशाची और ३२५ से ३२८ सूतों में उसकी विभाषा चूलिका-पैशाची का वर्णन किया है। वररुचि ने पैशाची का श्राधार शौरसेनी माकृत स्वीकार किया है। इसमें वर्ग के तीसरे और चौथे ( सघोष ) मध्यवर्ती मूल व्यंजन पहले और दूसरे ( अघोर ) होजाते हैं। उदा-० गगन> गकनं, मेघः> मेसो, राजा> राचा माधव:> माथपो, गोविन्द:> गोपिन्तो, केशय:> के सयोग्रादि । इसी प्रकार दव> पिय ।' उदा०-कमलं इव मुसं> परि०१० प्रा.प्र. १.प्रकृतिः शौरसेनी शुक्ष सं.२ २. वर्गाणा तृतीय चतुर्थयोरयुभोर- नापोरायो ३ तदोस्त: २.पस्य पिक " " चीया पाद परि०१. माया. प्रा.प्र. . ४ [ २ ] कमल पिव मुस । मूल व्यजन ण>न।' उदा . तरुणी> तलुनी, ल>ळ २, उदा ० शील> सीळं, कुल> कुळ , जल> जळ, सलिल > सळिळ', कमल> कमळ', श, प>स उदा० शोभति> सोभति, शन > सक्को, विषम> विसमो श्रादि रूप मिलते हैं। सयुक्त व्यजन -ष्ट >सट ४ उदा. क्ष्ट> क्सट । स्न> -सन । उदा० स्नान> सनान, स्नेह>सनेहो । र्य>- रिय, रिन । उदा० भार्या> भारिया, -ज्ञ> अ । उदा० सर्वज्ञ> सव्वञ्चो, विज्ञात> मिजातो । का, व्य >ञ । उदा० पुण्य> पुचर्य ज > च । उदा० कार्य> कच्च। 'राजन् के रूप-विकास में ज्ञ सयुक्त व्यजन का वैकल्पिक रूप म 'चिन्' भी मिलता है । " उदा० । राज्ञा>राचियो, राज्ञ > राचियो । वररुचि के अनुसार तृतीया एक० (टा), पचमी एक. (हास), पष्ठी एक (डस् ), सप्तमी एक. (दि) म राजन् > राचिका वैकल्पिक ७ उदा० प्रा०या० " ३०६ चौ० पाद चौपाद चौ० पाद " , ३०६ परि०१० " प्रा०प्र० १बीन सूसख्या ५ योन २ लोल ३ श-यो स ४ एस्प सट ५. स्नस्य सन थेरनष्टा रिय सिन सटा कृचित् ६. यस्परिम यग्नी रियसिन रूट क्वचित् ७पस्यय ६ स्न्यायांन्यस्य १० ७ " चौथापाद मा.न्या मा०प्र० परि० दशम् चौथा पाद परि० दशम् . मा.पा. प्रा.प्र. " १.. राजा चिन् .३०४ चौथापा प्रारत व्याकरण [१०] से कुछ भिन्न विशेषताएँ दी हैं। वर्ण के तीसरे और चौथे व्यंजन ममशः पहले और दूसरे हो जाते हैं। उदा० नगरम्> नकर, गिरि- तटम् > किरि तट, मेध.> मेसो, धर्मो> सम्मो, राजा> राचा, निर्भर> निच्छर, जीमूत.> चीमूतो, तडागम् > तटाक, गाठम् > काठं, मदन > मतनो, दामादेर> तामोतर, मधुरम् > मथुरं, बालक >पालको, रभस > रफसो, भगवती> फरक्ती यादि । परन्तु कुछ विद्वानों के अनुसार तृतीय और चतुर्थ वर्ण यदि शब्द के प्रारम में प्रयुक्त हों अथवा / युज धातु से बने शब्द हों तो उनमे उक्त परिवर्तन नहीं होता ।२ उदा० नियोजितम् >नियोजितं, बालक. > बालको, दामोदर:> दामोतरो, डमरुक > डमरुको, भगवती> भक्ती । व्यजन र> ल का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा० गौरी> गोली, रुद्र> लु यादि। शेष रूप हेमचन्द्र पैशाची के सदृश ही दिये हैं। पुरुषोत्तमदेव ने प्राकृतानुशासन में पैशाची को तीन उपभाषाएँ कैकय, शौरसेन पाञ्चाल दी हैं । कैक्य पैशाची संस्कृत शौरसेनी के अाधार पर विकसित मानी गई है। इसमें मूल अघोष व्यंजन क, च, ट, त, प का प्रयोग प्रमश. ग, ज, ड, द, व सघोष रूपों में मिलता है। श्रघोष महाप्राण व्यजन, स, छ, ठ, थ, फ के स्थान पर सघोप महाप्राण व्यजन क्रमश ध, झ, ढ, ध, म मिलते हैं 10 कभी- १. चूलिका पैशाचिके तृतीय तुर्थयार व द्वितीयौ सूत्रस० ३२५ चौथा पाद २ नादि युज्योरन्येपाम् ३. रस्य लोवा ४ शेष प्राग्वत् ५ संस्कृत शौरसेन्योविकृति परि०१६ प्राकृतानुशासन ६. भयुक्त (नजदबाना कचटतपावलम् ७ पम पमानासहठयकाः प्रा० च्या " " " " ३२७ ३२६ ३२८ ३ T " " " " ४ " . " " [६१ ] कभी क, ख, च, ८, त, थ, प और फ का लोप या परिवर्तन नहीं होता।' मूल व्यंजन ब>न हो जाता है। संयुक्त व्यंजनों का स्वरभक्ति द्वारा विभाजन भी मिलता है। संयुक्त व्यंजन -न्य, -ज, -एम् >ज्ज हो जाता है । पदम> परसम, सूदन> सुसम मिलता है । विस्मय> पिसुमय , गृहं> विहवं ७, हृदयं> हिरयकं ८ इव> पिप, क्यचित् > कुपचि' शब्द मिलते हैं । पूर्वकालिक कृन्दत -क्त्वा प्रत्यय के स्थान पर- तूनं प्रत्यय मिलता है।' तृतीरा एक० (टा), पंचमी एक० (इति), पष्टो एक० ( इस्), सप्तमी एक. (डि) में राजन्> राचि का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है।६२ उदा० राचिना, रजा, राचिनो, रओ, राचिनि> रन्जि । 'यू' के स्थान पर 'नुप्फे' और 'पर्य' के लिये 'अफे' शब्दों के प्रयोग मिलते हैं।७ / भू धातु का विकास हु' और 'हुय' रूपों में होता है।४ . सूत्रस ०९ परि० २६ १. कखघटठतथपक (1) प्रकृत्या कखादीना चान्यत्र प्राकृतानुशासन ७ . ." ८ " " " . ६ १० ११ " " " " " ३ युक्ताना विकर्षः ४.न्याएयानां म. ५. पचममदमयो. पसम सुसमो ६ विस्मयस्य पिमुमत्र ७. गृहस्य हिक्म् ८.हृदयस्य हिरपकन् ६वस्य पिव १. काचिन् कुपचि ११ मत्वातून १२ र सिरादिषु राजे राचिर्वा १७. सूर्य वयार्थ तुकै प्रच १४. भरहों की . " " , २२ " . . N २३ २४ .

[२] शौरसेनी पैशाची में मूल व्यंजन र> ल, स, प> श हो जाता है।' चवर्ग व्यंजन माहाराष्ट्री और शौरसेनी की भाँति दन्त्य न होकर शुद्ध तालव्य होते हैं। संयुक्त व्यंजन -ज्ञ> श्क, च्छ>-श्च, स्थ> श्त्,५ -प्ट> श्तः । उदा० तिष्ठति, चिटठदि शौर० > चिश्तदि, स्त>-4 रूप मिलते हैं । 'कृत', 'मृत' और 'गत' का परिवर्तन क्रमश. कड, मड, और गड में मिलता है । अधुना> हुणा पाया जाता । यकारात शब्दों के प्रथमा एक० में -ए रूप मिलता है। उदा० मानुपे । द्वितीया एक. मे- अम् के स्थान पर -ए का वैकल्पिक प्रयोग होता है। कभी द्वितीया एक० -अम् विभक्ति का लोप भी मिलता है ।१२ शौरसेनी पैशाची ने शेष रूप माहाराष्ट्री अथवा कुछ वय्याकरणों के अनुसार मागधी के सदृश होते हैं। पाचाल तथा अन्य पैशाची की रिभाषायो के रूप सामान्य पैशाची अथवा शौरसेन पैशाची से बहुत ही अल्प भेद रखते हैं। सूत्रसं० २ परि०२० प्राकृतानुशासन १ रोल पसोरा: ३ " " ४ " " ५ . १ " " " . ८ . " 1. ६ " २.चुयरतालग्य ३.धस्यश्क: ४दस्य रचः ५.थरयत ६ रतस्य एाविकृति ए ७.लस्य यत्येके ८.कृत मृगताना महगडाः ६ अधुनादेरणादय. १०. भदन्तात् सोरेत् ११ भामो पा १२ कप १३. रोप प्राकृताव १४. पायावास्य. स्वरुपनेता सोहनः " १२ . " " " " " " U १८ + [३] पांचाल पैशाची में ल> और अन्य विशेषताएँ शौरसेन पैशाची के सदृश होती हैं। । अपभ्रंश हेमचन्द्र ने अपने प्राकृत व्याकरण मे अपभ्रश मापा के जिस रूप की विशेषतायो का उल्लेस किया है वह पय्याकरणों के द्वारा उल्लिखित नागरिका ( नागर) अपभ्रंश अथवा पश्चिमी अपभ्रंश का ही रूप कहा जा सकता है । प्राकृतानुशासन और प्राकृत-सर्वस्व की नागरिका अथवा नागर अपभ्रश की विशेषताएँ हेमचन्द्र द्वारा वर्णित अपन'श से अधिकाशत: मिलती हैं । मध्यकालीन प्राकृतों के साथ उत्तरकालीन प्राकृत अपभ्रश की ध्वनि सम्बन्धी विशेषतायों और व्याकरण आदि को कुछ विस्तार के साथ पागे ध्वनि-प्रकरण और रूप विकास के अन्तर्गत दिया गया है। यहाँ पर अपभ्रंश के भेदो की कतिपय विशेष- ताएँ ही उल्लिसित हैं । पुरुषोत्तमदेव तथा मार्कण्टेय ने अपभ्रंश के उपनागर, बाचड़ यादि रूपों का भी उल्लेख किया है। उपनागर अपभ्रश को नागर और वाचड़ का मिश्रित रूप माना जाता है।" अपभ्रश के पाञ्चाल, वैदी, लाटी, बोडी, कैकेयी, गौड़ी, ढकी श्रादि विभाषानो का भी उल्लेस मिलता है, जिनका विकास लोक- व्यावहारिक रूप के अनुसार माना गया है । वैदभी में -उल्ल प्रत्यय का अधिक प्रयोग होता है। लाटी में सम्बोधन शब्दों यी अधिक्ता मिलती है । लाटो और गोड़ी में -ह, और -श्रो प्रत्ययों १६ परि०१८ मातानुशासन २० " " १. लकारास्य रेफ सूत्र सं. २. शेष पूम्बवन्नेयम् ३. दयोः साइर्यात् ४. उल्लप्राया बेदमी ५. सम्बोधन( शब्दमस्या लाटी " " 9 " " . . " [ ६४ ] . का वाहुल्य होता है । कैकेयी में शब्दों की पुनरुक्ति मिलती है। गौड़ी मे समास पदों की विशेषता पाई जाती है। वाचड़ अपभ्रंश में प, स >श मिलता है, भृत्य शब्द को छोड़कर र' और ऋकार ध्वनियों में कोई परिवर्तन नहीं होता।" इसमे चवर्ग (तालव्य ) ध्वनियाँ माहाराष्ट्री और शौरसेनी प्राकृत के सदृश दन्त्य-तालव्य न होकर शुद्ध तालव्य होती हैं। त् और ध ध्वनियों का स्पष्ट उच्चारण नहीं मिलता।" शब्द के अादि में प्रयुक्त -त् यौ ड के स्थान पर ट् और द् क्रमश: मिलते हैं। खण्ड > खण्ड १, एव > जे, जि, ",भू के स्थान पर यदि वह प्र-के वाद हो तो भो' रूप हो जाता है,"क्त के पूर्व /भू धातु का रूप सुरक्षित रहता है ।१२/व्रज धातु के स्थान पर वन मिलता है। 3 वृष> वह होता है।४ प्राचड़ का शेष रूप अपभ्रश के लौकिक (परंपरित ) रूप के सदृश ही कहा गया है।५ " " .. " " " २ " . " ४ " " ५ . १. इकारौकार प्रायो लट्टी (मायोडो) स्त्र सं० २० परि० १८ प्राकृतानुशासन २. सवीमाप्रायौ कैकेयी २१ ३. ऋसमा (बहुममासा ) गोडी २२ ४. पसोशः ५. रतौ प्रत्याभृत्यवर्जन ३ ६. चवर्गः स्पष्टतालव्या ', ७. तधी पारी ८. पदादौ तच्योः रदी च ६. सण्डस्यखण्डः १०. जि चैवरय ११. भवतो आद ६ २२. के मः १३. प्रवन १४. पेया १२ २५. रोपं प्रयोगात् " ६ 1. " " ७ " " " " " १० " " " . १ " " तीसरा अध्याय प्राकृत की ध्वनि संबंधी विशेपताएँ भारतीय प्राचीन ग्रार्य भाषा-वैदिक की वोलियों का उल्लेस पहले हो ही चुका है। इन बोलियों के स्वरों तथा पद रूपों की विभिन्न स्थानीय विशेषतायो को लिये हुए अनेक प्राकृत रूपों का विकास हुया । प्राकृत भापायों की पहली स्थिति-पालि तथा यशोकी अथवा शिलालेसी प्राकृत में मुख्य प्राकृतों की अपेक्षा क्म परिवर्तन मिलते हैं। प्रारंभिक स्थिति पालि में वैदिक सरो का परिवर्तन पर्याप्त रूप में मिलने लगता है। उदा० ऋ> थ, इ, उ, ए और व्यंजन-रूप र, क का भी विकास हो जाता है । उदा० कृपण> कपण, कृषि> कसि, ऋषि>इसि, ऋण दण, तृण> तिण, ऋतु> उतु, वृषभ> उसम, गृह> गेह, वृक्ष >रुक्स, वृहत् बहा, ऐश्वर्य>इस्सरिय । संस्कृत संयुक्त स्यर ऐ, श्रौ का पालि में परिवर्तन हो जाता है। उनके स्थान पर क्रमश: ए, श्रो रूप मिलते हैं । उदा० मैत्री> मेत्ती, श्रौषध> श्रोषध, श्री>उ भी मिलता है । उदा. श्रौत्सुक्यं>उस्सुक्कं । संयुक्त व्यंजनों और अनुस्वार के पूर्व दीर्घ स्वरों पा प्रायः हस्त्र रूप होजाता है। उदा० कार्य> पत्र, लता> लतं । पालि में स्वरों या परस्पर व्यत्यय भी पर्याप्त मात्रा में मिलता है। उदा० ->-यस्य>किस्स, तमिया>तिमिस्सा, थ> उ• उदा. सध:> सग्छ, उन्मबति>उम्मुमति, श्र>ए। उदा० थर>एत्य, फल्गु>फेल्ग, शय्या>मेजा, श्र>यो। उदा. ।

[ ६६ । सम्मर्ष> सम्मोस । पा>ए । उदा० प्रातीहार> पाटिहेर। इ>अ। उदा० पृथिवी> पठवी, गृहिणी> घरणी। इ>उ। उदा० गैरिक) गेरुक, इ>ए। उदा० विहिंसा>विहेसा । ई> या उदा. कौसीध> कोसज। ई>या। उदा० तिरश्चीन>तिरचान।ई>उ। उदा०मीडा> खेला, ई>उ । उदा० प्ठीव >टुभ, उ>अ। उदा० मुकुलं>मलं स्फुरति>फरति । उ>इ । उदा० पुरुष. > पुरिसो । उ>ए । उदा० डुण्डुभ > देड्डुभो । उ> श्रो। उदा० पामुख्यं> पामे वसं, पुस्तक> पोत्थक । ऊ>अ । उदा० कूर्पर:>प्परो, अ>या । उदा० अकटि> भाकुटि, अ> इ। उदा० भूय > भिय्यो । ऊ > यो। उदा० ऊर्ज> श्रोज, ए>अ । उदा. म्लेच्छ> मिलक्स, ए>या। उदा० केयूर> कायूर, ए >द । उदा० महेन्द्र > महिन्द, ए> श्रो। उदा० द्वेष > दोसो, यो> उ। उदा० होतं> हुत्तं, ज्योत्स्ना>जुराहा, द्रोह>दुह । मूल स्वर ए>ऍ, पो>यों हो जाता है। उदा० प्रेम>म्म,योष्ठ> थोष्ठ । सधि स्वर अय>-ए और -यव>यो मिलता है। उदा० जयति> जेति, अवधि>योधि, भवति> होति, लवण> लोण । मुख्य प्राकृतों में भी ध्वनि-परिवर्तन जितना माहाराष्ट्री प्राकृत मे मिलता है उतना किसी और प्राकृत में नहीं मिलता। यह परिवर्तन भी अधिक्तर ध्वनि लोप प्रकार का ही है। इसमे सर और व्यंजन दोनों का ही लोप मिलता है। परन्तु सभी प्राकृत भाषायों की यह सामान्य विशेषता है कि उनमे वैदिक स्वरो के परिवर्तन तथा लोप किसी न किसी रूप में समान ढंग से हुए है। प्राकृत के यय्याकरणों ने इस स्वर विकास को सून रूप में विस्तार- पूर्वक दिया है । जैसा पहले कहा जा चुका है कि प्राकृत व्याकरणों में वररुचि कृत प्राकृत प्रकाश और हेमचन्द्र कृत प्राकृत व्याकरण प्राचीन और महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं। इसलिये विविध नियमित रूपों की व्याख्या के साथ-साथ पाद-टिप्पणी मे उक्त ग्रंथो से तत्संबंधी सूनों का भी निर्देश कर दिया गया है।

[६७ ॥ वैदिक के ऋ, ऋ, तृ और अन्य मूल स्वरों तथा संधि स्वर-ऐ, ग्री के निम्नलिखित परिवर्तन प्राकृत में मिलते है। प्राकृत शब्दों में वैदिक स्वर ऋ के स्थान पर रि, रु व्यंजन पाये जाते है। उदा० ऋ> रि', ऋण>:रिण, ऋद्धि> रिद्धि, ऋषि> रिसि । यह परिवर्तन प्राय: शब्द के यारंभ में मिलता है परन्तु कभी-कभी शब्द के मध्य में संयुक्त व्यंजन के साथ भी उक्त स्वर का परिवर्तन मिलता है। उदा० ईदृश: > एरिसो, सदृश:> सरिसो, कीदृश:> केरिसो, तादृशः> तारिसो। ऋ> उदा० वृक्ष> रुखसो, ऋषि> रुसि । शब्द के यादि तथा मध्य दोनों में ऋ स्वर के परिवर्तन अ, इ, उ स्वरों के रूप में मिलते हैं। उदा० ऋ> अरे, तृण> तण, धृण > धणा, कृत> कद (शौ०), कन (माहा० ), कृष्ण> कराह, ऋण> अण । ऋ> इ५ -ऋषि> इसि, कृपण>किविण, हृदय> हिमश्र, शृङ्गार> सिंगार, मृगाङ्क>मिश्रक, दृष्टि> दिटिठ, भर्तृ- दारक> भट्टिदारस, कृपा>किवा ।> उ, ऋतु> उदु, मृणाल> भुणाल, पृथ्वी > पुहवी, ऋजु > उज्जु, जामातृफ > जामादुय । दीर्घ -के स्थान पर दीर्घ स्वर -ई, ऊ मिलते हैं | वैदिक स्वर-लु प्र. परि. मा०प्रकाश सूत्र सं०३० १४० " " " म्या प्र० " १४२ ज्या. " १ मयुक्तस्य रित रि:केवलस्य २. क्वचिद् युक्तस्यापि घरा: विवष टक्सका ६. वनरर्वा ४. प्रातोऽत् तोत ५. इद् ऋष्यादिषु प्र. . " " " पाद परिक पाद परि परिक पाद परि पा. पी० पाद " " " भ्या० प्रक २७ १२६ २८ १२८ २६ १३१ . " ग्या. " " इत् पादी प्र. . ६.३६ स्वादिषु उदेला प्या. " .

[८] के स्थान पर इलि, लि, श्रमिलते है । उदा० कतृप्त> किलित्त ।' वैदिक सन्धिस्वर ऐ, औ> ए, श्री मूलस्वर मिलते हैं । उदा० ऐ> ए| शैल> सेल, ऐतिहासिक> एदिहासिय, वैद्य> वेन्न । सधिस्वर ऐ> सयुक्तस्वर सदर, दैत्य> दइच्च, भैरव> भइरन, दैव> दइव, औ> यो, कौमुदी> कामुई (माहा०) कोमुदी (शौ०), यौवन > जोपण। सधिस्वर यो > सयुक्तस्वर याउ । पौरुष> पउरुस, कौरव> कउरष, पौर> पउर । यह परिवर्तन माहाराट्री तथा कुछ उप प्राकृतों म ही मिलता है, शौरसेनी और मागधी प्राकृतों में नहीं मिलता। शब्द म सयुक्त व्यजन के पूर्व हस्व स्वर तथा असयुक्त व्यजन के पूर्व दीर्घ स्वर का प्रयोग प्राय सभी प्राकृत भाषायो की विशेषता है । से शौरसेनी और मागधी की अपेक्षा माहाराष्ट्री, अर्धमागधी में यह प्रवृत्ति अधिक मिलती है। उदा० मनुष्य> मगुस्स (शौ० ) मणस (माहा०), अश्व >यस्स (शौ०) यास (माहा०), उत्सव>उसव (शौ०, माहा०) । जिह्वा> जाहा, मार्ग> मग्ग, वर्ष> वत्स, यास | कभी कभी सयुक्त व्यजन के पूर्व दीर्घवर की अपेक्षा सानुस्वार स्वर भी मिलता है। उदा० अश्रु>यमु, स्पर्श>फस, दर्शन>दसण। १ लुत क्लुप्त इलि प्र० परि० न त इलि क्लृप्त क्लुन्ने २. देत एत सूत्रस. ३३ १४५ प्रा०म० व्या. पा० " " परि प्र० , १४८ व्या. ३ देश्यादिश्वर भइत्यादीच प प्र० aro परिक पा० परिक . व्या. ५ौत मोत् मौत भोन् " प्र० " पा. व्या. ४२ परि. . . ५.पोरादिवउ भउ पौरादौच मिनियोश्च जिहारित्रिशदिरातो त्या " १६२ ग्या. " पा० , परि. पा. प्र. દર ग्या. - [] कुछ शब्दों में संयुक्त व्यंजन के अनुनासिक स्वर का लोप हो कर पूर्व का स्वर दीर्घ मिलता है । उदा० दंष्ट> दाद, सिंह> सीह । कभी-कभी असंयुक्त व्यंजन के पूर्व दीर्घ स्वर हस्व और चाद वाले व्यंजन ' का द्वित्व-रूप हो जाता है। उदा० तैल> तेल्ल, प्रेम> पैम्म, एवम् > एव्यं, यौरन> जो व्वण, शौरसेनी मे एव> जेव, जेन्न । हस्व स्वर के बाद में यह - ज्जेन, -ज्जेव्व हो जाता है। प्राकृत भापात्रों के शब्दों में प्रयुक्त एक स्वर के स्थान पर दूसरे स्वर का प्रयोग भी मिलता है। इसे स्वर-व्यत्यय का उदाहरण कहा जा सकता है। उदा. > इ. ईपत् > इसि, पा>पिक, वेतस> वेडिस, व्यजन> विश्रण, मृदंग>मुइंग, अंगार>इंगाल, ललाट>णिडाल, तस्य> तिरस, मध्यम> मन्भिन (माहा.), मझम (शौ०)। श्र>उ । माहाराष्ट्री और अर्धमागधी में यह परिवर्तन अधिक मिलता है। उदा० प्रलोक्यति>पुलोएदि । सर्वश>सवण्णु । अ>-ए२,उदा० शय्या> सेना, सौन्दर्य>सुन्दर, प्रयोदश>तेरह, श्राश्च> श्रन्छर, चल्लि>वेल्लिाया> श्र'- तथा>तर, यथा>जह, प्रास्त>पउथ, उत्सतादि>उक्पयं । श्रा> या प्रयोग विकल्प से मिलता है। १दवत् परव-स्वाम-पतस-पमन मृदंगारे विपरि पावणार-मलाटेवा मनकामे दितीयस्य वादी २. ए रावादिषु ५ मि.परि. मा.प्र. पदय्यादी ३. भर मावो पारि दिपरि শীদার सापु साता प्रा.प्र. प्राध्या. " ४० प्र.पा. . ५७ " १. प्रा. " " ४ प्रा. " प्र.1.

[१०] उदा० सदा>सइ, तदा>तइ, जल्पाम:> जम्पिमो ( माहा.)। इ> श्र' पृथ्वी>पुहवी, हरिद्रालद्दा, पृथ्वी>पुहुई, प्रतिश्रुत> पडंसुया श्रादि । इ> उर-दक्षि>इच्छु (माहा०), वृश्चिक>विन्छ, इ>ए3- एत्था >इत्था, पिड> पेण्ड, विष्णु>वेण्हु । ई>ए४.नीड> नेड, कीदृश>केरिस, ईदृश> एरिस । उ> अ५, मुकुल>मउल, गुरुक> गरुन । उ>इ, पुरुष>पुरिस, भ्रकुटि>भिउडी, उ>यो, पुष्कर> पोखर, पुस्तक>पोत्थय, मुग्दर>मोग्गर । ऊ> अ। दुकूल> दुअल्ल । क>ए, नूपुर>नेउर, मूल्य>मोल्ल, ताम्बूल>तम्बोल । ए> इ,"-वेदना>वियना, देवर>दियर, एतेन> एतिना, मैनेय>मित्तेश्च । सूत्र स० १३ दि० परि० प्रा० प्र० १. भय पथि हरिद्रा पृथिवीपु पाधि पृथ्वी प्रतियन्मूपिक हरिद्राविभीतकेष्वत् २. सद् इक्षुवृश्चिकयो ३. इत एत पिएडसमेषु . " प्रा० " . . " " " ५.एन'नीटर पाड़ कीदृशेदृशेषु ५. मन मुकुटा दिपु उतो मुकुलादिष्वत ६. इत् पुरुसेरो पुसेरो. " भ्र कुंटी Ce प्र०प० ध्या १५ दि० परि० १२ " प्र० पा० व्या. २६ दि.परि प्र० २२ दि० परि० १०७ प्र० पा० व्या. २३ दि.परि० प्रा० प्र० ११० प्र० पा० व्या० १११ २० दि० परि० प्र० प्र० पा० व्या. २८ दि० परि० प्र० १५६ ध्या० २५ दि० परि० प्र० १२३ Яо что ध्या० २४ दि.परिक " प्र. १४१ म. पा. म्या. " , " ७ मत तुण्ड स्पेषु प्रोत्सयोगे ८. अद् इल्ले वा लस्यदित्वमू दूकुले वासश्च दि. ६. एन् नूपुरै . " " पा० " देत नपुरे का १. एत इद वेदना देवरयो एत या वेदना चटा देवर कैसरे [१०१ ] ऐ> इ।' सैन्धव> सिन्धव, शैन्य> सिन, ऐश्वर्य> इस्सरिय, ऐ> ई। वैर्य> धीर, एकैक> इकीक, एकीर २ श्रो> .. का विकल्प से प्रयोग मिलता है। उदा० प्रकोष्ठ> पठनो । द्वित्व व्यजन के पूर्व यो> उ हो जाता है। उदा. अन्योन्य> अण्णुरण, अरणोएग( माहा०), एकोनपिशति> एकुनवीस । यौ> था, उदा० गौरप> गारस, पोलिन्द> पारिंद, यौ> उ, उदा० सौन्दर्य> सुन्दर, शौंड> सुड, दौसारिक> दुव्यारिन । श्रय > यो", उदा० लवण>लोण, नरमालिया> गोमालिया। श्रय> यो', उदा० मयूर>मोर (मऊर), मयस>मोह (मऊ)। शब्द में नु ने पूर्व, 'श्र' के योग मे 'यो' का विकास मिलता है। उदा० चतुथा> चो थी (चउत्यो), चतुर्दशी> चोदही (चउद्दही)। श्रय> ए, उदा० - . १. त मन्धी प्रा०प्र० इतरोधवशनर १४६ त्या. " २ विधेय सूत्र स. ३८ परि प्र.पा. ३६ पिरि प्र.पा. ४० म. परि. " प्र. " "मकारा " " पा. " प्र. पार ४३ दि० परि. प० पाद दिपार म. पाः ध्या. म. ३, भोतो वा प्रकोष्ठेप व ४ मोतीदादीप प्रकोष्ठातोपहिरो पदना मनोहर सरोतोच ५ माघ गौरी मच गौरव ६ उम्मेदादिपु उमौरी ७ लानामहिमस्योरेन मदर मयूयायोमर्यादा ६ अनुदा परपोरगुना न मामा-मनुव चतुर्थ- पर-मोर-मार मी समभूप . भ्या० M ७ Vinya ६ C . 1632 ---- - । , [१०२] कथयतु> कधेदु । दीर्घ ई> हस्व इ', उदा० पानीय> पाणिया, अलीक> अलिक, तृतीय> तदश, द्वितीय> दुइय, गभीर> गहिर, इदानी> दाणि । दीर्घ ऊ> ह्रस्व उ ।उदा० मधूक>महुअ, कौतूहल> कोउहल । प्राकृत के शब्दों में स्वरों के परिवर्तन के अति- रिक्त स्वर -लोप के भी उदाहरण मिलते है। यह लोप यादि, मध्य, और अन्त्य प्रकार का होता है। उदा० अरण्य>रएणं', अपि> पि, वि, थहं> हकं मे अ स्वर का लोप हुआ है। इदानीं> दाणि, इव, एव> व, इति>ति यादि में इ सर का लोप, उपक्सथ,>पोसथ, उदक> दग, एनं> एं में उ, और ए का लोप मिलता है। असंयुक्त व्यंजनों का विकास प्राचीन यार्य-भाषा में असंयुक्त और संयुक्त दोनों प्रकार के व्यंजनों का व्यापक प्रयोग किया जाता था। असंयुक्त व्यंजनों की संख्या उन्तालीस थी। परन्तु मध्यकालीन आर्य भापायों में ये सभी व्यजन मुरक्षित नहीं रहे। इनमे से संस्कृत शब्दों के मध्य में प्रयुक्त कुछ व्यंजनो का या तो लोप हो गया या उनका परिवर्तन कर दिया गया। यह अपश्य है कि अधिकांश व्यंजन ज्यों के त्यों प्रयुक्त होते रहे उनमे रिसों प्रकार वा परिवर्तन नहीं हुआ । यहाँ पर कुछ संयुक्त व्यंजनों के लोप और परिवर्तन का ही संक्षिप्त विवरण दिया जायगा । पालि में संस्कृत के मूल और संयुक्त व्यंजनों के परिवर्तन तथा लोप के अनेक उदाहरण मिलते है। सरमध्यवतीं अयोष व्यंजन । प्र० भ्या १.दईल. पानीय दिषु पानीयादिषित २. उद् स्तो मधूके कुतूहले वा हरवृश्च दि. परि० प्रा० प्र० लि. परि " सूत्र सं० १८ १०१ २४ ११७ प्र० " भ्यास ४ दि. परि० भ० " " ३. लोपोऽरण्ये ४.वेलोपः 1

[ १०३ ]
सघोष, महाप्राण व्यंजन प्राय: हकार के रूप में विकसित मिलते
है। परन्तु सघोष के स्थान पर अयोर और महाप्राण के लिये
अल्पप्राण व्यंजनों के प्रोग भी पालि मे यत्र-तत्र मिल जाते हैं।
विसर्ग का भी पालि मे प्रायः -यो रूप हो जाता । अधोर के स्थान
पर सघोष के कुछ उदाहरण ये हैं-क>ग, उदा. मूकः > मूगो,
च>ज, लकुचं> लॉज, ट> ड । उदा० लेष्टु>लेड्डु, त> द ।
उदा. रितस्तिः>पिदथि। सघोष के स्थान पर अयोर व्यंजन
के भी अल्प प्रयोग मिलते हैं । ग> क | उदा० भृङ्गार> भिकारो,
प्राजयति> पाचेति, द> त । उदा० कुसीद:> कुसीतो, ब> प।
उदा० अलाउ> अलापु । अल्पप्राण व्यंजनों का महामाण-रूप हो
जाता है । ग>घ । उदा० गृहं> पर | ट> ठ। उदा० पएटकं>
पाठक। त>य । उदा. तुमः> थुसो, प>फ । उदा० पलितः>
फलितो । घ>ह, प्राधुणः> पाहुणो । म> ह । उदा० प्रभरति>
पहोति । फ> प, उदा० स्फोटयति> पोठेति ।
पालि शब्दों में प्रयुक्त मूल व्यंजनों या परस्पर व्यत्यय भी
मिलता है। उदा. फ> ट। उदा० करोलं> टामोलं, क>
य, य, उदा० स्वक> सर्प, लाचं> लजं, च> त । उदा०
निरित्सा> तिकिच्छा, ज> द। उदा० ज्योस्ना> दोसिना,
a> य, उदा नि>नियं । ट> ल । उदा० स्फटिक> फकि,
">न । उदा० चिरेण> चिरेन, त>ट । उदा० चौर> चटफ,
श्रात:> टो, प्रति> पटि, ट>ळ । गेट> गेळ ,य>ल ।
उदा. मिथिल> सठिल, प्रषि> गरिट, २ >ळ, ट। उदा०
दोर > दोहळ, दोहल, उदार > उदार, द> । उदा.
दंश >tयो, द> य । उदा० रादित: > पापितो, प>ल । उदा.
गोषिपा> गोलिफा, न>ए अपनतं> श्रोए, न> ल। एन:>
एलं, प> फ। उदा. पिपीशक:> शिपिल्लको, म> ५ ( उदा.
अभिप्रेत >अपितो, प> य| उदात्यामुष> चाप, >स,
।
,

। [ १०४] उदा० गवयः > गजो, य> ल । उदा० यष्टि > लटिठ, य > ह उदा० रणंजयः> रणंजहो, र> ल । उदा० रुद्र > लुइ, रोम > लोम, ल >न । उदा० ललाट> नलाटं, श> छ। उदा० शरः> छयो, श> इ। उदा शाकं> डाकं, प> छ । उदा० पष्ठ:>छठो, प> ढ, उदा० अाकर्षणं> याक्ड्ढनं । ह> ध, भ । उदा० इह> इध, गहर> गटभर। मुख्य प्राकृतो में शब्द के मध्य में प्रयुक्त क, ग, च, ज, त, द, प, व, य, व का प्रायः लोप हो जाता है। उदा० मुकुल>मउल, नकुल> उलं, काक>,वाय, सागर>सायर, नगर> एयर वचन > वअणं, सूची> सूई, गज> गय, रजत > रयद कृत> क्य, मद>मन्य, कपि> कइ, पिपुल> पिउल, नयन> गयणं, जीर> जीश्र, दिवस>दियहो, अलाबू>अलाऊ। उपर्युक्त वर्णों के अतिरिक्ति शब्दों के मध्य में प्रयुक्त पछ अन्य व्यंजनों के भी परिवर्तन मिलते है। -म व्यंजन का लोप मिलता है। उदा० यमुना>जउँणा, चामुन्डा> चाउँण्डा, कामुक > पाउँन यादि । शब्दों के मध्य में प्रयुक्त व्यंजनो या परिवर्तन भी प्राकृत भाषायों की एक सामान्य विशेषता है। कुछ शब्दो मे -क या परिवर्तन अनेक व्यंजना- रूपों में हुआ है। उदा० क> ह 13 उदा० स्फटिक > पत्रिहो, नियप > णिहसो, १ क-ग-च-जत-द-प-य-वा प्रायोलोप खूष सं. २ परि.२ प्रा० प्र० प्र.पा. " " या " " " २३७ ३ परि०२ प्र० बोकः २. यमुनायो यस्य च यमुना-चामुण्डा कामुकाति मुक्तके मोनुनामिकश्च ३. स्फटिक निकपचिपुरेषु कस्य । निकारकटिक चिकुरे पुण कर काले कः सोपुष्प व्या० ४ भ० पा० परि०२ प्र.पा. " व्या . " [ १०५ ] चिकुर> चिहुर, क> स। उदा. कुब्ज> खुज्ज, कपर> सम्पर, कभ', उदा० शीकर> सोभर । क>मरे,उदा० चंद्रिका चन्द्रिमा । इसी प्रकार त व्यंजन का परिवर्तन अनेक व्यंजन-रूपों में मिलता है । उदा० त> द३-उदा० ऋतु> उदु, रजत> रपदं, धागत> यायप्रद, मुकृति> मुहदी। उक्त पनि परिवर्तन शौरसेनी प्राकृत की प्रमुख विशेषता है। इसी प्रकार थ> ध का विकास भी प्रमिक रूप में मिलता है । उदा० यथा> जधा, कथयतु>कधेदुः । शिलालेगी प्राकृत में भी यह परिवर्तन मिलता है । उदा. सात्तवाहन>सादवान। त>उ उदा० प्रति>पडि, वेतस>वेडिसो, पताका>पडामा प्रतिच्छन्द:> पडिच्छन्दो । त>ह-सति>वसही, भरत> भरहो, त> '-उदा० गर्भित> गम्भिणं, ऐरावत> एरापणो। प्राकृत शब्दों में -द व्यंजन का विकास भी अन्य व्यंजन-रूपों मे हुया है । उदा० द> लप, उदा. प्रदीप्त>> पलित्त, कदम्ब> पलम्बो, क्षसं. ५ प्रा०प्र० १ शीकरे मः शीकरे महीना २ चन्द्रिकायामः " ." ध्या. परि०२ म०पाद परिक 4.पा. ६ प्र० . " " था. .. ७ " म. भ्या. भ.पा. परि०२ ६ . Fo ३ पारवादिपु तोदा ४ प्रतिवेतम पनाकामुर प्रत्यादी ५. पमति भरत यो: १.गमिः गभिजातिमुको ७ परापो S.Hष कदमदोरदोतः प्रीरि-गोरस १.८ . to ६० पto परि०२ . Fo " " . २११ पापाo . . पा० [१०६ ] दोहद>दोहलो, द>र-उदा० गद्गद>गग्गर । संख्यावाचक शब्दों में भी उक्त परिवर्तन उपलब्ध होता है। उदा० एकादश> एया- रह, द्वादश>बारह, त्रयोदश>तेरह, अष्टादश>अठारह । परन्तु यह परिवर्तन संख्यावाचक शब्दो मे संयुक्त व्यंजन के साथ प्रयुक्त -द का नहीं मिलता । उदा० चतुर्दश> चउद्दह । इसी प्रकार शब्द के मध्य में प्रयुक्त -प वर्ण का परिवर्तन कई व्यंजन-रूपो में हुया है। उदा. प> १३, उदा० शाप> सावो, शपथ> सवहो । परन्तु शब्द के मध्य में प्रयुक्त -प का प्राय: लोप भी हो जाता है । प> म४ उदा. यापीड> थामेलो। -य ध्वनि के स्थान पर -ज्ज, ह व्यंजनी के प्रयोग मिलते हैं।' उदा० उत्तरीय> उत्तरिज, करनीय> करणिज्जं, छाया>छाहा, व> म , उदा० कबन्ध>कमन्धो, ८>ड", उदा० नट> शडो, विटप> सूत्र संख्या १३ परि०२ प्रा०प्र " " २१६ " १ गद्गदेर २.संख्याया संख्या-गद्दे : ३. पोवः पोवा ४ अपीडे मः नीपापीहेमो वा ५. उत्तरीयानीययोों वा व्या Fo " " " २३१ " प्र०पी० परि०२ प्र० पी० परि०२ प्र० पाo परि०२ प्र० पाद व्या Яo " २३४ व्या . " पादेयों जः . २४५ " ध्या. परि०२ म. '" २४६ भ० पाद ध्याo. दाया या छायायां होकान्तौ वा ७. करन्धयोमः म-यो ८.टी Яo भ्या- " " २३६ परि०२ प्रथम पाद परि०२ प्र० पाद " म.. " " १६५ "म्या . । २०७] विडयो, कटु>कडु, ट>', उदा० सटा>सदा, शक्ट> स-अढो, कैटभ>वेढवो, ट>ल२, उदा० स्फटिक>फलिहो, ड>ल, उदा तडागतलाय, दाडिम्ब> डालिम, > ढ", उदा० मठ>मढ, जर> जढरं, कठोर> कठोरं, ठ> ल्ल५, उदा० अंकोठ> अंकोल्लो, फ>म, उदा० शेफालिका>रोमालिया, शरी>सभरी । उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि सस्कृत शब्दो के मध्य में प्रयुक्त कुछ व्यंजनों के स्थान पर प्राकृत शब्दों में भिन्न व्यंजनो को प्रयोग मिलते है । यसंयुक्त व्यंजनों में से कुछ व्यंजन ऐसे भी हैं जिनका विल्कुल रूप-परिवर्तन तो नहीं होता परन्तु लुप्त-धनि के स्थान पर उसका एक यश प्रायः वर्तमान रहता है। इस प्रकार के उदाहरण कुछ महाप्राण व्यंजनों के ही मिलते हैं, जिनके स्थान पर केवल - भान सुरक्षित रहती है। उदाहरण के लिये स, प, थ, घ, म> का विकास मिलता है। उदा० मुस> मेसला> महला, मेर> मेहो, गाथा) गाहा, यथा> जहा, १. सटा राकट कैटमेयु.. सटा-राकट वेटभेद १६६ प्र.९द १.स्फटिकल: परि०२ प्र. पार परि.२ प्र० पर मुर, सूत्र.स. २१ परि. २ मा 4 " भ्य1० Fo भ्या " " ३ग्य च " २२ १६७ २३ २०१ २४ १६E " ध्या मको " " म. पार परि. २ प्रकार परि.२ प्र. पार " ७स-प-कमा . १७ . म्दा- " [१०] राधा> राहा, वधिर> पहिरो, सभा> सहा। परन्तु कुछ शब्दों में इस प्रकार का परिवर्तन नहीं पाया जाता । उदा. प्रवर> पसलो, प्रलच> पलघणो, अधार> अधीरो । सस्कृत शब्दों में थ, ध के स्थान पर प्राकृत में ढ का प्रयोग मिलता है। उदा० प्रथम> पढयो, शिथिल > सिदिलो, ग्रौषध> योमुढ़ , इसी प्रकार भ> व उदा० कैटभ वेढयो मृपभदत्त> उपक्दात म>ब, उदा० अभय अवय । महाप्राण ध्यजनों के महाप्राण त्व का लोप द्राविड़ी और ईरानी प्रभाव के फलस्वरूप माना जाता है। इसी प्रकार र> ल. उदा० हरिद्रा> हलद्दा, चरण> चलो, मुसर> मुहलो, करुण> कलुण, अङ्ग री> यङ्ग ली, अङ्गार> इङ्गालो, सुकुमार>मोमालो (सुउमालो), र>ल का प्रयोग जिसका निर्देश पहले प्राकृत भाषाओं की विशेषता क अंतर्गत हो चुरा है मागधी प्राकृत की एक प्रधान विशेषता है । सस्कृत व्याकरणो में भी रलयोर भेद' सूत्र काफी व्यापक है। उदा. रोहित> लाहित, रोम> लोम, किर> किल । उपयुक्त उदाहरणों में प्राय ऐसे असयुक्त पतनों का परि वर्तन संवध म परिचय दिया गया जो शब्द क मध्य में प्रयुक्त होते है। शब्द म प्रयुक्त श्रारभिक बननों का भी परिवर्तन मिलता है । यहाँ पर इस परिवर्तन के कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जायेंगे। उदा० य> ज,४ उदा० य>ि जही, यश > १ प्रथम शिथिल निपधेपुढे द्वि.परि. मैथि शिथिर शिथिल प्रथमेयस्य द २ मे भी व परि०२ कैरमे मो व ३ हरिद्रादीना रोल हरिद्रा दौल ४ भादेयाज भादेयों ज मा०प्र० सूत्रस० २८ २१ २६ प्र.पा. प्रा. व्या० प्रा०प्र० २४० प्र.पा. परि०२ Яo Чto इरि०२ ०पा० प्रा० च्या. प्रा०प्र० प्रा० च्या २५४ ३१ २४५ प्रा० प्र. प्रा०च्या.

, [१०६-] जसो। अशोकी प्राकृत में य>अ स्वर शेप मिलता है। उदा० यावत् > याव, यथा>अथ, य> ल, उदा० यष्टि> लही। क> चर उदा. किरात> चिलात । तामिल में केरल> चेर मिलता है । क>स, उदा० कुब्ज> खुज्जो, बुञ्ज । >खुञ्ज । इसी प्रकार थल्पमाण व्यंजन के स्थान पर महाप्राण व्यंजन के अन्य उदाहरण भी मिलते हैं । उदा. दण्ड>धडु, दिवस>धिवझ, चिन्हित>छिनिद. दुहिता> धुदा, धिता। द>ड, उदा० दोला>डोला, दण्ड>डण्डो,दशन> डसहो । शब्द के मध्य में भी प्रयुक्त द>ड का विकास मिलता है। उदा. उदार> उडाल, द्वादश> दुवाडस, दोहद> दोहट, कदन> करा, दर्भ> भो, दाह> डाह । प>फ. उदा० परु प> फल्सो, परिध>फलिहो, परिसा> फलिहा, पनस> फणसो।' व>भ. उदा. पिसिनी> भिसिणी, म> २, उदा. मन्मय>यम्महो, प्रा०प्र० प्रा.दा. प्रा.प्र. परि.२ प्र.पा. परि०२ प्र.पा. परि०२ प्र० पार परि०२ मा.न्या. मा० RO . प्राध्या. भा०प्र० १ यष्टयां लः सूत्र सं० ३२ यष्टयो ल: २. किरातचः ३३ किरात: १८३ ३. दुम्जे स. कुम्म-फरकीले कसो पुष्पे १५॥ १.दोलादप दराने दरान ददग्ध दोला दए दर-दार दम दमकमान दोदेदोषा: २१७ ५. परुष परिपरिसगुफा पाटि पात्र परिपपरिया पनस परिम: २१२ १.पनमेऽपि ७.मियाभः २६ .८.भन्म: २४२ प्र.पा. परि.२ प्रा.पा. प्रा०म० प्र.पा. . म.पी. " " U 4 " तर.. प्रा.प्र. 51 .. प्र ..

[११०] ण' उदा० लाहलो > णाहलो, लंगलं >णंगलं, लंगूलं> शंगूलं । संस्कृत भी ऊम ध्वनियों -य,श,स का परिवर्तन प्राकृत में -छ व्यंजन के रूप में मिलता है। उदा० पष्ठी>छट्ठी, पण्मुस>छम्मुहो, शावक) छाययो, सप्तपर्ण> छत्तिवरणो, पटपद> छप्पयो । अशोकी प्राकृत में -श के स्थान पर च का विकास भी मिलता है। उदा० शान्तमूल> चातमूल, शान्तिश्री>चातिसिरि । न>ण, उदा. नदी>णई। शब्द के मध्य में प्रयुक्त न का विकास सर्वत्र-ण के रूप में मिलता है। उदा० कनक> क्णय, वचन> वयणं, मानुप> माणुसो। इसी प्रकार -श, प> स मिलता है । उदा० शब्द> सद्दो, पण्ड> सरढो । शब्द के मध्य में प्रयुक्त -श-ए का •स ही मिलता है। उदा० निशा>णिसा, वृषभ> वमहो, क्याय> क्सायं । इसका उल्लेस पहले ही हो चुका है कि मागधी प्राकृत में प, स के लिये सर्वन -श ही मिलता है। श> ह५ उदा० शक्तिश्री > कुसिरि । शब्द के मध्य में भी यही परिवर्तन मिलता है। उदा० दश> दह, एकादश> एयारद, स> ह। उदा० दिवस> दिग्रह, संघ> हंघ । १.लोहले पः सूत्र सं० ४० परि०२ प्रा० प्र० लाल लागल लागले वादेर्णः २. पट शावक सप्तपर्णाना छः पट-शमी शाव-मुधा सप्तपणेवादेरठः ३. नो यः सर्वत्र प्र.पा. " " घ्या. प्र० परि०२ " प्र.पा. म्या. " . नोपः २६५ જર २२८ ४३ २९० ४४ " प्र० व्या. प्र. परि०२ प्र.पा. परि०२ प्र.पा. परि०२ " ४.रापोस: सोस ५. दराादिषुः दरा-पापायी दिवसे सस्य " व्या. म० " २६२ प्र.पा. म्या . परि०२ " प्र. . दिवसे सः " २६२ प्र.पा. ध्या. " [ १११] संयुक्त व्यंजनों का विकास प्राचीन आर्यभाषा के शब्दों में संयुक्त स्वरों की संख्या तो सीमित थी परन्तु संयुक्त व्यंजनों के प्रयोग का कोई सीमित-रूप नहीं था। शब्द के यादि अथवा मध में कोई भी दो व्यंजन संयुक्त- व्यंजन के रूप में प्रयुक्त हो सकते थे। परन्तु प्राकृत भाषाओं में संयुक्त व्यंजनों का यह व्यापक प्रयोग नहीं मिलता । उनका परिवर्तन या तो समीकृत व्यंजन के रूप में हो गया, अथवा उनमे से किसी एक व्यंजन या लोप पर दिया गया या 'स्वरभक्ति' के द्वारा उनको विभक्त कर दिया गया। यहाँ पर ऐसे ही संयुक्त व्यंजनों के विकास का संक्षिप्त परिचय दिया जायगा। संस्कृत के संयुक्त व्यंजनों का पालि मे प्रायः समीकृत-रूप मिलता है श्रथवा संयुक्त व्यंजन के दोनों वणों में से पहले किसी एक या परिवर्तन और फिर उनका स्थान-विपर्यय कर दिया गया। संयुक्त व्यंजनों में से किसी एक वर्ण का प्राय: लोप शयया संयुक्त-व्यजन के बीच में क्सिी स्वर के प्रयोग से उसे रिभक्त पर दिया गया। इस परि- पर्तन को स्वरभक्ति (Anaptyxis) कहते हैं । उदा० मर्यादा>मरि- यादा, पद्म>यजिर, द्वाद>हिलाद, स्नेह>सिनेह, ही>हिरी, क्लेश >पिलेश । संयुक्त व्यंजन के दोनों यों का स्थान-परिवर्तन पनि-विप- येय ( Metathesis) पहलाता है । उदा० फरेण>पर, मशक> मक्स । संयुक्त व्यंजन फे दोनों घणों में से यदि पोई ऊष्मपर्ण होतो उसया र में परिवर्तन और फिर स्थान-परिपर्सन होता है। उदा. तृष्णा> तरदा, स्नान>नहान, मीन> गिम, स्मित> हित, थारप> अन्धरिय, अन्धेर, प्रश्न> पर, युप्मे> नुम्हे, घरमार्फ> अहार्फ, 'विष्णु>येए । संयुन मांजन में सफे. साप पोई अनुनामिफ व्यंजन -न, म, परो तो भी स्थान परिपन्न हो जाता है। उदा. ine >चिन्र, साRE>सापन्द, नि> गिग, प्रारम>शरय, जिका जिम्हा | संपुस्तममनों के दो मिस यों का पदि समाप हो जाता स्पर्श> फस्स, [११२]] है तो उसे समीकरण ( Assimilation ) कहते है । जव संयुक्त व्यंजन का पहला व्यंजन बाद वाले व्यंजन को अपने सदृश कर लेता है तो उसे पुरोगामी समीकरण (Progressive Assimilation) कहते है । उदा० उद्विग्न> उविग्ग, शुक्ल सुक्क, चत्वारः > चत्तारो, स्वप्न> सोप्प और जब वाद का वर्ण पहले वर्ण को अपने सदृश कर लेता है तो उसे पश्चगामी समीकरण (Regressive Assimilation) कहते हैं । उदा० वल्क> वक्क, उर्मि> उम्मि, उन्मूल्यति> उम्मूलेति । रेफ के साथ व य, ल, भ वर्णों का पश्चगामी समीकरण होता है । उदा० आर्य> अय्य, निर्याति> निय्याति, निर्यामि>निय्याम, सर्वसव्व । ऊष्म ध्वनि के साथ य, र, व यादि के होने पर पुरोगामी समीकरण होता है । उदा० मिश्र>मिरस, अवश्यं> अवरसं, अश्व> अरस, श्वेत7 सेत । शब्द में दो समान ध्वनियों के विभिन्न रूप भी हो जाते है। इसे विषमीकरण (Dissimi- Jation ) कहते हैं। उदा. पिपीलिका>किपिल्लिका, चिकित्सति> तिकिन्छति । संयुक्त व्यंजन के किसी एक वर्ण का प्राय: लोप भी हो जाता है। यह लोप शब्द के प्रारम्भ और मध्य दोनों में मिलता है। शब्द के श्रारंभ में किसी व्यंजन के लोप को श्रादि-वर्ण लोप (Apocope) कहते हैं। उदा० स्थान> ठगन, स्थूल> थूल, ज्ञान>यान, स्खलित> खलित, स्फटिक> फटिक | शब्द के मध्य में प्रयुक्त संयुक्त व्यंजन का वर्ण-लोप मध्यव्यंजन-लोप (Syncope) कहलाता है। उदा० द्विज> दिज, द्वादश> वारस । कभी संयुक्त व्यंजन के स्थान पर किसी एक नये वर्ण का प्रयोग मिलता है। उदा० द्युति> जुति, क्षुद्रः> खुद्दी, त्याग:> चागो, ध्यानं > भानं, न्याय:> जायो, व्यतिक्रम> वितिक्पमो, स्वन्धः > सन्धो, स्पन्द:> फन्दो। कभी-कभी संयुक्त व्यंजनों के दोनों वर्णो अथवा एक वर्ण का परिवर्तन हो जाता है । उदा० गृत्य> नच, सत्य> सच्च, शून्य> सूज, श्राश्चर्य> अच्छरिय, अर्थ> श्रह, अप्सरा> अच्छा, पुप्प>पुप्फ, पुस्तक> पोत्यक । , [ ११३ ] मुख्य प्राकृतों के शब्दों में प्रयुक्त संयुक्त व्यंजन के प्रथम वर्ण -क, ग, ड,-त, प,-श,-स का लोप और वाद वाले शेष वर्ण का द्वित्व-रूप हो जाता है। इसे उपरिलोप-विधि कहा गया है । द्वित्व रूप में प्रत्येक वर्ग के दूसरे और चौथे वर्ण के साथ क्रमश: पहले और तीसरे वर्णों का प्रयोग किया जाता है। यदि संयुक्त व्यंजन का प्रयोग शब्द के अादि में हो और उसका एक वर्ण र अथवा -ह हो तो द्वित्व-रूप का विकास नहीं होता । उक्त वणों के कुछ परिवर्तन ये है उदा० भक्ता> भत्त, मुग्ध> मुखो, सहग> सग्गो, उत्पलं> उम्पल, मुग्द> मुग्ग, सुप्त> सुत्तो, गोष्ठी> गोडी। संयुक्त व्यंजन के अंत का वर्ण यदि -म, -न, -य हो तो उनका लोप हो जाता है और शेष वर्ण का द्वित्व-रूप हो जाता है । इसे अधोलोप-विधि माना गया है । उदाहरण शुप्म> सोरस, रश्मि> रस्सी, युग्म> जुग्गं, नग्न> एग्गो, सौम्य> सोम्मो, योग्य> जोग्गो। संयुक्त व्यंजन में प्रयुक्त अंतस्थ वर्णो-र, ल, व प्रथया व वर्णों का भी प्राय, लोप हो जाता है और शेष वर्ण का द्वित्व-रूप हो जाता है। उदा- वल्फ्ल> वक्कल, लुब्धक> लुचो, पा> पिरकं, (पक्क), शक्र> सको, स्वयं> सयं, पल्प> पल्लं, कायं> व्यं । संयुक्त व्यंजन न्द्र मेर का वैकल्पिक लोप मिलता है। उदा० द्रोह> द्रोहो, दोहो, चन्द्र> चन्द्रो, नन्दो, रुद्र> रुद्रो, रुद्दो। १.उपरि लोप कगट-त-द-प-व-साम सूत्रस०१ त.परि० प्रा०प्र० कन्ग-ट-३-३-द-प-श-प-स.-पावं लक् ७७ दि. पा. १. मधो मान-याम् तृ. परि० प्रा०प्र० अधोमान-याम् ७८ द्वि० पा० ३ सर्वत्र ल-व राम ३ १० परि० प्रा०प्र. सर्वप्र-ल-वरामवन्द्र ७६ दि.पा० प्रा० च्या. ४ तु.परि. प्रा०प्र० रोना . प्रा० च्या " २ प्रा०च्या. " " " CO दि.पा. प्रा.च्या.

[११४ ] 'सर्वज्ञ' शब्द में प्रयुक्त संयुक्त व्यंजन -ज्ञ का लोप हो जाता है। और उसके स्थान पर -ज्ज, झ, का प्रयोग मिलता है। उदा०. सर्वज्ञ> सयज्जो, इगितज्ञ> इगिज्जो, विज्ञ> विजो (शौर०) मागधी और पैशाची मे-जअ हो जाता है। शब्दों में प्रयुक्त संयुक्त व्यंजनों के स्थान पर अन्य समीकृत व्यंजनों के प्रयोग भी मिलते हैं। उदाहरण -प्ट>-ह-उदा० यष्टि> लही, दृष्टि> दिही । स्थ>-g३, उदा० अस्थि> अडी । स्त> -त्य. उदा० हस्त> हत्थो, समस्त> समत्यो, वस्तु> वत्थु । बुछ शब्दों में -स्त>-स्य का प्रयोग नहीं भी मिलता ५ उदा० स्तम्ब> सम्ब।" स्त> स, उदा० स्तम्भः) सम्भो ।-स्थ>-स", उदा० स्थाण>साणु । स्फ> स', उदा० स्फोटक> रसोइयो । इसी प्रकार -र्य,-य्य,न्य के स्थान पर -ज का प्रयोग मिलता है। उदा० कार्य> कज्ज, शय्या> , . सूत्र सं. ५ ५३ १० १. सर्व तुल्येषु नः सोमः २.एस्य टस्यानुष्ट्रेटासंद ३.मस्थिनि स्थि विसंगुले ४. स्तरयः ५ न स्तम्भ स्तस्य योसमरत-स्तम्बे ६.रतम्भे : स्तम्भ स्त्रीवा ७. स्पारणावहरे स्थाणावहरे " तृ०५रि० प्रा०प्र० वि०पा० प्रा.व्या. तृ० परि० प्रा०प्र० दि० पा० प्रा०मा० परिस भा०० दि० पा० प्रा०या० तृ० परि० प्रा०प्र० ३४ ११ ३२ १२ १३ " " " १४ ८ . १५ दि० पाद प्रा.८० तृ० परि० प्रा०प्र० दि० पा० प्रा० ध्य. तृ.परि० प्रा०प्र० दि. पा० प्रा० न्या. तु. परि० प्रा०प्र० दि.या० मध्या. तु० परि० प्रा०प्र० " ८. स्फोटके " " ६ बटाटे .६.५ शय्याभिमन्युपुजः .

[११५]] सेज्जा, अभिमन्यु> अहिमज्जू । मागधी प्राकृत मे-2> -य्य, न्य> -ज्ब का विकास मिलता है। पैशाची में भी न्य > जन का प्रयोग मिलता है । उदा० कार्य > कय्य, कन्या > कञा । सस्कृत के सूर्य, धैर्य, सौन्दर्य, श्राश्चर्य, पर्यन्त मे 4 के स्थान पर र का परिवर्तन मिलता है। उदा० तूर्य> नं, धर्य>धीर, सौन्दर्य > मुन्देरं, श्राश्चर्य > अच्छेरं, पर्यन्त > पेरन्तं । शौरसेनी में ग्राश्चर्य का अच्छरियं रूप मिलता है। संस्कृत शब्द सूर्य में -र्य के स्थान पर -र का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा०-सूर्य > सूरो, मुज्जो। इसी प्रकार चौर्य आदि शब्दों में र्य के लिये -रियं का प्रयोग मिलता है । उदा० -चौर्य> चोरिनं, वीर्य > वीर्ययं, शौर्य > सोरियं, श्राश्चर्य> श्रन्छरियं । यह परिवर्तन पैशाची प्राकृत की एक सामान्य विशेषता है। उदा० श्रार्य> अरिय । इसी प्रकार कुछ शब्दों में र्य का विवास -ल वर्ग के रूप में हुआ है। उदा० पर्यस्त > पल्लत्यं, पर्याण > पल्लाण, सौमार्य> सोअमल्लं । इसी प्रकार ->-५, उदा० कैवर्तक> थे- घय्य यो जो प्रा०श्या . P सूक्ष सं. २४ दि० पा० २५ १८ तृ० परि. " ३ दि.पा. भभिमन्यो जम्जीवा १. तूर्य-धैर्य सौन्दर्याश्चर्य पर्य-नेपुर: मामवयं त्ये सौन्दर्य-शौण्डीयों रः धेवा २, सूदा .. प्रा०प्र० प्रा.न्या. ॥ " का M ३. पौर्य सनेषु रिभ भारनय ४. पर्यत पर्याय सौगुमापु सः पर्दन पर्याप सौकुमाः 18 तृतीय परि० प्रा०प्र० ४६ द्वितीय पाद Soया. मु.परि मा०प्र० १९ दिपार प्रा. या ए.परि. प्रा०प्र० १८ कि.पाद प्रा. या , २१ १० परि. " १. प - [११६ ] हो, नर्तकी>नई । धूर्त में-तं का ट नहीं होता। ->२ उदा० पत्तन> पट्टणं । शब्दों में के स्थान पर -ट का विकास सर्वन नही मिलता है। इसके अनेक अपवाद मिलते हैं-उदा० धूर्त> धूत्तो, कीर्ति> किती, वर्तमान> वत्तमाण, वार्ता>वत्ता, वर्तिका>पत्तिया, भात > अत्तो, तरी> कत्तरी, मू>ि मुत्ती । इस प्रकार-त का या तो समीकृत रुप त का द्विल्य हो जाता है या -र का लोप हो कर फेवल -त वच रहता है। त >-ड,४ उदा० गत > गड्डो, द >ड, उदा० गर्दभ>गनुहो, संमद> संमड्डो, वितर्दि> विश्वड्डी, विधर्दि> विछड्डी। कुछ शब्दों में -त्य, -थ्य, -द्य के स्थान पर क्रमश: च, छ और ज वर्गों के प्रयोग मिलते हैं ।" उदा० सत्य > सच्च, नित्य> शिव, मिथ्या > मिच्छा, विद्या> विज्जा, वैद्य> वेज्ज । संस्कृत शब्दों में प्रयुक्त संयुक्त व्यंजन -थ्य, हर के स्थान पर प्राकृती में-झ का विकास मिलता है। उदा०मध्य > मझ, अध्याय> अन्झानो, गुह्यक > गुज्झयो, सह्य > सकं । 'सह्य" सूत्र में २४ ३० तृ. परि० १. नभूतादिषु तस्या धूर्तादो २. परीने मा. प्र. दि प्रा०या० " ३. गचेंड P " - २५ ३५ २६ kिo पाद प्राण्या- " " " दि. पाद प्रा० भ्या. गत: ४. गईम समदं वितदि विदिपुर्दस्य संभ विवाद विष्ट पददिकपद- मदित बस्य गर्दभवा ५.त्य-म्यपांच- त्यो चाये साहय योमः Bारमध्यसभः " २७ त० परिक प्रा०प्र० " २८ स.परि. दि० पान प्रा. ध्या प्रा.प्र. प्राध्या .

के स्थान । ११७] का ध्वनि - विपर्यय के अनुसार 'सह' रूप भी अशोकी- प्राकृत में मिलता है। इसी प्रकार संयुक्त व्यंजन-क, स्क-द पर-स का विकास हुया है । उदा.-पुष्कर> पोक्सरो । स्वन्द> सन्दो, स्कन्ध> पन्दो, क्षत> पदो, भास्कर> भामरो। संयुक्त व्यंजन-क्ष के स्थान पर छका प्रयोग भी मिलता है। उदा०-यक्षि> अच्छी, लक्ष्मी> लच्छी, क्षीर,> छोरं, तुब्धो> छुद्धो, नार> छारं, मक्षिका> मन्छिया, तर> हरं । कुछ शब्दों में - संयुक्त व्यंजन के स्थान पर -छ का वैकल्पिक रूप में विकास मिलता है । उदा० नमा> छमा, समा, वृक्ष> यच्छो, कामो, क्षण> छण, पणं । यहाँ पर उपयुक्त शब्दों में-द> छ के अतिरिक्त स या प्रयोग भी मिलता है। इसी प्रकार संयुक्त व्यजन -प्म के स्थान पर-म्ह संयुक्ताव्यंजन का विकास मिलता है । उदा. ग्रीष्म> गिम्हो, उप्मन् > उम्दा, विस्मय> विम्यो, यस्माकं> श्रम्हाक। उक्त परिवर्तन स, प>ह और फिर उसका घनि-विपश्य हो जाने के कारण होना होगा। कुछ शब्दो में सयुक्तव्यंजन-स-स्न,-ए, दण, पन के स्थान पर -एर पा विपास मिलता है। उदा० पहि> वराही, ज,> जगहु, २६ तृतीय परि० " ए-नितु ममी मा.प्र. प्रा.पा. दिलीप पाद ३ " ४ . २. भरमालपुर . तृतीय ARO " प्रा०प्र० भा०मा० सनीय RO प्रा०० दिप . प्रा.मा. " 1.मा परेका एमापी १८ १६ ५. मामिल सपना २.६, ८, ९ की हरी El.ru नि AR sto10 -[ ११८] तीक्ष्ण> तेरहं, प्रश्न> परहे, स्नपन> रहवणं । इसी प्रकार ह> न्ध', उदा० चिह्न> चिन्ध, -प>फ, उदा० पुष> पुष्फ, शष्प> सप्फ, निष्पात> निप्फायो। शब्द के अादि, मध्य अथवा अंत में प्रयुक्त संयुक्त व्यंजन में -स्प का विकास-फ वर्ण मे हुया है। उदा० स्पर्श> फंसो, स्पन्दन,> फन्दनं, स्पष्ट> फडो, वृहस्पति> भयप्फई। इसी प्रकार -स्प के स्थान पर -सि का विकास भी मिलता है, उदा० प्रतिस्पर्दिन् > पाडिसिद्धी. -प>-ह,५ उदा. वाष्प> वाहो (अश्व )-H> ह, उदा. कार्षापण> काहावणो। शब्दों में प्रयुक्त संयुक्त व्यंजन श्च,स,-प्स के स्थान पर -छ का विकास मिलता है। उदा० पश्चिम> पच्छिम, याश्चर्य> अच्छेरं, वत्स> वच्छो, लिप्स> लिच्छा, जुगुप्सा> जुगुच्छा, पश्चात् पच्छा अप्सरा> अच्छा । श्च> ञ्छ, उदा० मृश्चिक> पिञ्छुयो । कुछ शब्दों में- रस के स्थान पर-छ का प्रयोग नहीं " तृ०१रि० " . . सूक्ष्म-श्न-प्ण स्न छ-हण पणा एहः सूत्र सं०७५ १. चिहन्ध. २ पस्य फ. प स्पयोः फा ३. स्पस्य सर्वत्र स्थिनरय स्प-रपयो फ ४. सिच ३७ ५. याप्पेऽणि ः याप्पे हो युधि • परि दि० परि० प्र० प्र० प्र० त. परिon प्र० ध्यान मा०प्र० वि०पार प्रा०च्या० तृ० . प्रा०प्र. प्रा०प्र० दि० पाद प्रा० न्या. त. परि० प्रा०प्र० दिपाद प्रा० च्या त.पी. प्रा. प्र. तृ० परि० ६. कापिणे " ७.श्चममा ८. पृश्चिके न्द परिचय ३०५ वा " ४१ १६ विपदमा भ्या० , १] मिलता है। उदा. उत्सुक>उस्मुयो, उत्सा> उस्सयो ।-ममर उदा. जन्मन् > जम्मो, मन्मय) वम्महो । कुछ शब्दों म-म्न, 1,-अ के स्थान पर •ण का विकास मिलता है। उदा०, प्रद्युम्म> पन्नएको, यश> जएगो, विज्ञान>पिरणाण, पञ्चाशत् >परणासा, ज्ञान>णाण, निम्न> गिरण, त>-ट, उदा० तालवृन्त> तालवेण्ट, -g५ उदा० भिन्दिपाल>भिण्डियालो, ह>भ, , उदा० विहल >मलो, पहिलो, स्म> प, त, उदा० यात्मन् >अप्पा, श्रत्ता । सयुक्त व्यजन कमरे स्थान पर -प का प्रयोग मिलता है। उदा० रुक्मिणी>गप्पिणी । शब्दों म संयुक्त व्यजन के एम वर्ण थे लोप हाने पर शेर वर्ण का द्वित्व रूप हो जाता है परन्तु यदि यह शेष वर्ण ह अथवा र हा यथा यह शेष वर्ण शब्द ने श्रारम में हो तो उसका द्वित्व नहीं होता ।' उदा० मुक्त> भुन, अग्नि> पारगी, , मत्युकोत् सवयो २ मोम ४३ स. परि. सू० स०४२ १. परिक संपाद प्रा०प्र० प्रा.प्र. मा०या० प्रा.प्र. प्राध्या. " " त० परिक ३ गमपञ्चाशा पञ्चदशेपुए गोणं पस्यास्पदरा दसे ४ ४२ ४३ ४. दिपार १० परिक " हि.पा स.परि. दि.पा. प्राक दा. द्रा.प्र. ५ मिनिपाने पर कररिका मिहिपाने ए. REरे भदौबा . प्रा.दा. . ४३ परि० Яo Яo " ५३ Pro Tiu दादा. 4 विकीपर ७ मनि १० परि० . प्राध्या. ८.माय 4.प्र. A.दा. 1. EMRAPARमारी अनवर " है [ १२०] मार्ग> मग्गो, दृष्टि> दिठी, स्तवक> थवश्रो, स्तम्भ> सम्भो । सयुक्त व्यजन का शेष वर्ण यदि वर्ग का दूसरा अथवा चौथा महाप्राण व्यजन हो, तो उसी वर्ग के अल्पप्राण वर्ण के साथ उसका द्वित्त रूप हो जाता है। उदा. व्याख्यान> वक्साण, अर्ध> अधो, मूर्खा> मुच्छा, निझर> निझरो, लुब्ध> लुद्धो, निर्भर> निभरो, दृष्टि> दिदी । कुछ शब्दो में प्रयुक्त मध्य व्यजन का भी द्वित्व रूप हो जाता है। इसे स्वत द्विरुक्ति (Spontaneons- Reduplication) का उदाहरण कहा जा सकता है। उदा० नीड>णेड्ड, नील> एल्ल, स्रोत> सोत्त, प्रेमन् > गम् , मजुक्> उनुग्यो, जनक> जगणयो, यौवन> जोव्यण, जानु> जागणु । सयुक्त व्यजन म के स्थान पर-म्ब का प्रयोग मिलता है। उदा. पाम्र> अभ्य, ताम्र> तम्ब । शब्द में प्रयुक्त व्यजन -र, ह का द्वित्व नहीं होता । उदा० धैर्य> धीर, तूर्य> तूर, जिह्वा> जीहा । शब्द म प्रयुक्त सयुक्त व्यजन ज्ञ के पूर्व यदि या यव्यय का प्रयोग हो तो उसका विकास ण रूप में होता है। उदा. याज्ञा> श्राणा, अानप्ति> यापत्ती । यदि कोई अन्य अव्यय पूर्व में हो तो उक्त परिवर्तन नहीं मिलता । उदा० सज्ञा> सराणा, प्रज्ञा> परणा । . " १ वर्गपु युज पूर्व सूत्र स०५१ परि०३ प्रा०प्र० द्वितीय तुर्ययोरु परि पूर्व ६० पाद २ प्र०या० उक्त सूत्र में युन का पाराय वर्णमाला के दूसरे और चौथे वर्ण से होता है। २ नागपु सूत्र स० परि०३ प्रा०प्र० ३ भान ताम्र यो ताम्र-म्ब प्रा.व्या ४ नरहो १४ ६३ पाद२ प्रा.व्या. ५.भादौनस्य प्रा०प्र० होम ८३ पाद२ मा०या० " " " परि०३ [१२१ ] पास्त शब्दों मे अनुस्वार के बाद प्रयुक्त वर्ण का द्वित्व नहीं होता है।' उदा० सत्रात > सकन्तो, सन्ध्या > समा | समास पदों में वर्ण- लोप हो अथवा किसी अन्य वर्ण का परिवर्तन हो तो द्वित्व का विकास वैकल्पिक रूप में होता है। २ उदा० नदीग्राम > गदग्गम, एइगामो, कुसुगप्रवर > युसुप्पयरो युमुमपयरो, देवस्तुति > देवत्युई, देवथुइ । इसी प्रकार शब्द में प्रयुक्त मध्य-व्यजन का विकल्प से द्वित्व -रूप होता है। उदा. सेना>सेव्या, सेना, एक> एक, एक, नस > सम, सहो, देव देव्य, दक्ष्य, त्रैलोक्य > तेलोट्य, निहित> णिहित्त, निहियोणि। उपयुक्त उदाहरणों से स्पप है कि संयुक्त व्यनन के मिसी एक वर्ण अथा दोनों वों के लाप और उनसे स्थान पर शेष द्विल्य श्रथवा कोई नय सयुक्त व्यनन या श्रादेश हो जाता है अथवा सयुक्त व्यजन का पनि विपर्यय हो जाता है। उस परिवर्तनों 4 यतिरित संयुक्त पजन था विभाजन भी कर दिया गया है। इसे घरभक्ति के नाम से कहा जाता है क्योकि पिसी सर को ही बीच म साल पर सयुक व्यजन ये दोनों वणों को विभक्त किया जाता है। मयुम वजन वा पहला चर्प अमें सर का थभार होता है, पर याद वाले वर्य पे सर को थपना लेता है। उदा. निट > पिलि. १ न विन्दुपरे सुन मस्या तृतीय परिप्पर प्रा.म. २ समालेका ५ २ मा पुष मा तिीय वर्ण का - " E3 प्रा. " रि ९ ०० " . प्रा.प्र. 40 प्र . E रिन पिारा १. सापूसा .[१२२] श्लिष्ट > सिलिह, रत्न > रदणं, क्रिया > किरिया, शाङ्ग > सारङ्गो । कृष्ण शब्द मे प्ण सयुक्त व्यंजन का विकास वैकल्पिक रूप में मिलता है ।' उदा० कृष्ण कण्हो,कसनो। कुछ शब्दों मे संयुक्त व्यंजन के विभाजन मे द स्वर का प्रयोग मिलता है ।। उदा० श्री > सिरी, ही> हिरी, क्रोत> किरीतो, क्लान्त> किलन्तो, क्लेश> किलेसो, म्लान > मिलाण, स्वप्न> सिविणो, स्पर्श>फरिसो, हर्ष> हरिसो, अर्ह> अरिहो, गर्ह> गरिहो । कुछ शब्दों मे संयुक्त व्यंजन का विभा- जिन अ स्वर के द्वारा मिलता है ।३ उदा० क्षमा > समा, श्लाध्य > सलाहा । स्नेह शब्द में सयुक्त व्यजन का विभाजन वैकल्पिक रूप में मिलता है। उदा० स्नेह>सनेहो, णेहो। कुछ शब्दों मे व्यंजन का विभा- जन-उ सर के द्वारा होता है। उदा० पद्य> पउम, तन्वी> तनुई, ली > लहुई, गुग > गुरुह । सयुक्त व्यंजन के विभाजन मे -ई सर का भी प्रयोग होता है। ज्या > जी ग्रा। सन्धि रूप में प्रयुक्त स्वरों के परिवर्तन और लोप के भी मा०प्र० द्वितीय पाद . प्राध्या- तृतीय परि० प्रा०प्र० " १ कृष्णेवा सत्र सं०६१ तृतीय परि० कृष्णे वर्षेवा २.सीहो कोत क्लान्त-जलेश म्लान स्वप्न रपर्श हपहि-गहेंषु ६२ ६-योहोरस्न क्रिया दिटयारिवत् १०४ द्वितीय पाद ३ मधमाश्लाघको तृतीय परिक चमारलाधा रत्नेन्श्यल्पजनात् "१०१ द्वितीय पाद ४. स्नेहे वा तृतीय परि० स्नेहाप्रयोवा १२ द्वितय पाद ५. पद्मतन्यो समेषु तृतीय परि० पद्म पदम मूखदारे वा द्वितीय पाद तन्वीतुल्येष ५. न्यायामी ६९ तृतीय परि० " ११५ दिशीय पाद प्रा०च्या प्रा०प्र० प्रा० स्या- Хто ло प्रा०व्या. प्रा०प्र० " प्रा०व्या "१३ " " glo So प्रा०या० [.१२३] अनेक उदाहरण मिलते हैं।' सन्धि अथवा समास रूप में प्रयुक्त स्वरों के कुछ परिवर्तन ये हे । उदा० यमुनातट >जउण्ड, जउणायड, नदीजल> पदजलं, ईजला, सरोरुह>सरोरुहं, सररुहा नमस्कार> णमझारो, गमेक्कारो, महेन्द्र>महिन्दो, सोऽयं> सोयं, सोयग्र, शिरोरोगं> सिरोरोयो, सिररोयो । स्वर लोप के उदाहरण भी पर्याप्त माना में मिलते हैं। उदा० राजमुल> राउलं, रामउलं, तराई> तुहद्धं तुह्यद्धं, ममा > महद्धं, महअद्धं, पादपतन > पावउणं, पायवउण, पादपीठ> पापीठं, पायपीठं, चद्रकला> चंदला, चंद- अला । सहकार>सहारो, सहयारो। अतएव सन्धि अथवा समास रूपों में दीर्घ स्वर के स्थान पर हस्वस्वर -या>-य, यो>-उ,-ए>-द श्रादि अथवा प्रयुक्त स्वरों में पूर्व स्वर का लोप हो जाता है। इसी प्रकार शब्दों के मध्य में प्रयुक्त व्यंजनों और अक्षरों में से किसी एक व्यंजन अथवा अक्षर का लोप हो जाता है । उदा.उदुम्बरं> उम्बरं में दु अक्षर का लोप हो गया है । कालायस शब्द में -य का वैकल्प से लोप मिलता है। उदा०कालायस) कालासं, कालाअसं, भाजन शब्द में ज का वैकल्पिक लोप मिलता है। उदा०भाजन, भाणं,भाअणं, यावत् श्रादि शब्दों मेंय का भी वैकल्पिक लोप होता है। उदा०यावत् > जा, जार, तावत् >त. गाय, पारात>पारायो, पारावो, जीवित>जीश्र, जीवियं, एवं> एथ, एन । प्राकृत में शब्दों के थन्त्य ध्यंजन का लोप बरावर मिलता है । उदा० यशस् >जशो, नभस् > हं, सरस् > सरो, पर्मन् > कम्मो, यावत् > जाय, पश्चात् >पन्छा, मरुत्>मरू, चतुर्थ परिच्दर प्रा०० २ "" " ३ १. सन्चाव चाम-ज लोप विशेषा बहुनम् सूत्र स०१ २. दुपारदोलो ३. कामायासे परय वा ४. मानने अग्य ५ यावादिषु बग्य परवायल " M ४ " " " १ " " P H [१२४ ] ‘चन्द्रमस>चन्दमो, इन्द्रजित्>इन्दई। स्त्रीवाचक शब्दों के अन्त में-या दीर्घ स्वर का प्रयोग होता है। उदा० सरित् > सरिश्रा, प्रतिपत् > पडिवया, याच > यात्रा । स्त्रीवाचक शब्दों के अन्त -र का प्रयोग-रा रूप में मिलाता है । उदा० धुर्> धुरा, गिर> गिरा। परन्तु विद्युत शब्द में -या का प्रयोग नहीं होता। उदा० विद्य त> विजू । शरद् शब्द में अन्त -द् के स्थान पर-द का प्रयोग होता है। उदा. शरद्>सरदो । दिक और प्रावृष् शब्दो के यन्त व्यंजन के स्थान पर -स का प्रयोग होता है। उदा० दिक > दिसा, प्रावृप् > पाउसो । शब्दों के अन्त -म का विकास अनुस्वार के रूप में मिलता है।' उदा० वृक्षम् > वच्छं, भद्रम् > भई । यदि शब्द के अन्त में प्रयुक्त-म के अनतर कोई स्वर हो तो-म का उक्त विकास वैकल्पिक रूप में होता है। 'उदा०। फलम् अपहरति>फलं अवहरइ, फलमवहरइ, किमेतत् >किमेदं, किएदं । शब्द अन्त में प्रयुक्त -न और -3 के अनंतर यदि कोई व्यंजन हो तो उसका विकास अनुस्वार अथवा -म के रूप में मिलता है। उदा० विन्थ्य> विझो, विमझो, वश्चणीय> वंचणीय, वम्य- णीयं । हेमचन्द्र ने, डब, ण, न का विकास केवल अनुस्वार रूप में हो माना है। उदा. पराड मुग> परंमुहो, कञ्चुक>चुनो, पण- मुग्य:> छंमुहो, सन्ध्या> संझा । वक्र थादि शब्दों में संयुक्त व्यंजन D १. सियामा सूत्र संक्या ७ च० परि० प्रा०प्र० " ८ ६ " " " " ११ 1" १ ३. न विद्यानि ४. शरदोदः ५. दिक प्रवृपोः सः १. यो विगत ७. मचियरत ८. नमोई लि ६.र-म-ए-नौ जने १३ " " " १३ " " " २५ प्र०पाद Roया.

[ १२५ के पूर्व अनुस्वार का प्रयोग मिलता है। उदा०यक्र> यंकं, ह्रस्व> हसो, अश्रु> अंस, श्मश्रु> मंगू, मस्त>मंथ, दर्शन> दसण, स्पर्श>फैसो, वर्ण>णो, अ> अंसो, प्रतिश्रुत>पटिमुदं । मास यादि शब्दों में अनुस्वार-का विकास वैकल्पिक रूप में होता है ।२ उदा० मात>मंसं, मासं, कथं>महं, कह, ननम् >jणं,,पूण, तस्मिन् >तहिं, तहि । तृतीया बहु०, सप्तमी बहु० नपु० प्रथमा बहु० में भी किया अनुस्वार का प्रयोग जाता है । उदा० वृक्ष:>वच्छेहि, घन्छेहि, वृद्धेपु>पच्छेसु, वच्छेमु,बनानि>षणाई, वणाइ । शब्दमें ह, श, प, सव्यंजनों के अतिरिक्त यदि कोई अन्य व्यंजन अनुस्वार के वाद हो तो उसम तद्वर्गीय अनुनासिक व्यंजन में परिवर्तन वैकल्पिक होता है। उदा० x राहा>संका, सङ्का, शइस>संसो, सड्सो, चिन्दु>बिंदु, पिन्दु, अयं- चन्द्रः> श्रञ्चछो, अनचन्दो, इयं नदी> इयएगई, इशंगई। ह, श, प, स के बाद में होने पर अनुस्वार का ही प्रयोग होता है। उदा. अंश>अंसो। समास पदों में श्रव और -अप या विकास वैकल्पिर रूप में यो मिलता है। उदा० श्रमदास>श्रोहासो, श्रवहासो, अपसारित> थोसारियं, श्रावसरिश्र 1 युछ शब्दों के अंत में अथा मध्य में पिसी जनधी थागम कर दिया जाता है और ऐसा परने से मूल • सन्द में फिगी प्रकार या अर्थ परिवर्तन नहीं होता। निम्नलिखित शब्द में -म- पा श्रागम हुया है। उदा० पम> पदुमयं, पदुम । मियत् और पीर सन्दों पे अन्त में - अक्षर 1. कादि गुरगं.१५ परिम् २.मामालिया २.५दिसगरम. समय का मारा,रा, प. पRiR शेर शंयन RTO 4. . " पर. 4.40 २५ (८) . " M . । १२६] का आगम हुया है ।' उदा० विद्युत् > विजः, विज ली, पीत> पोललं, पीयं । क्रमदीश्वर के अनुसार पीत शब्द के अंत में -व अक्षर का भी यागम होता है। उदा० पीत> पीअवं। 'वृन्द' शब्द में -4 के अनतर -र का श्रागम वैकल्पिक है। उदा० वृन्द> अन्द, बन्द करेणु शब्द में स्थिति-परिवृत्ति ( वर्णविपर्यय ) मिलता है। उदा० करेणु> कणेरु, बालान शब्द मे -ल और -न वर्णों का व्यत्यय हो जाता है। उदा० यालान> प्राणालं । इसी प्रकार -र और -य वों का व्यत्यय कुछ शब्दों से मिलता है। उदा० धर्म> भ्रम, पूर्व> ध्रुव, पार्षद> प्रपंड । बृहस्पति शब्द में च और -ह के स्थान पर भ और -श्र का परिवर्तन मिलता है। उदा० बृहस्पति> भ, अप्पुई । यहाँ -ह फे महामारणल का प्रभाव पूर्व व्यंजन -व पर जान पड़ता है। मलिन शब्द में- लि और -न के स्थान पर क्रमशः -१ और -ल वैकल्पिक परिवर्तन लिसता है । -मलिन> महलं, मलिणं । गृह शब्द का विकास 'घर' के रूप में मिलता है परन्तु पति शब्द . बाद में होने पर ऐसा नहीं होता। उदा. गृह> घर परन्तु गृहपति> गहपई, गहवई । अपभ्रंश साहित्यिक प्राकृत भाषायों की अपेक्षा अपभ्रंश भाषाओं में वनि- ५० परि भा०प्र० 11 " " १. विपुत् पीताभ्या लः शुष सं०१ २.पीतादरच २६ (क) २७ ४. करेएषा रणोस्पिति परिवृत्तिः, २८ ५.मालाने सयोः २६ १.पारपती रहोमंत्री ७. ममिने सिगौरिसीवा " गरीsa " " " " . " . [ १२७ ] परिवर्तन और पद-विकास अपेक्षाकृत अधिक विकसित रूप में मिलते हैं। हेमचंद्र ने प्राकृत-व्याकरण के चौथे पाद में अपभ्रंश की विशेष- तात्रों का वर्णन सूत्र सं.३२६ से ४४६ में किया है । हेमचंद्र द्वारा वर्णित अपनश का यह रूप व्यापक और सर्वप्रचलित माना गया है जिसे नागर अथवा पश्चिमी अपभ्रंश के नाम से कहा जा सकता है। इसी को शौरसेनी अपनश भी कहा गया है। परन्तु शौरसेनी अपभ्रंश शौरसेनी प्राकृत के अतिरिक्त कुछ और व्यापक क्षेत्र की भाषा मानी गई है। मार्कण्डेय ने प्राकृतसर्वस्व में अपभ्रंश के २७ भेदों का उल्लेख किया है। परन्तु वे संभवत: उसके लोकप्रचलित रूप थे और कुछ शैली-मेद के साथ व्यापक हो गये थे । साहित्यिक दृष्टि से वय्याकरणों के द्वारा उनके तीन भेद नागर, उपनागर और वाचद किये गये हैं। इनमें नागर रूप ही सर्वप्रतीप्ठित रूप था । अपाश के तीन भेद पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी नाम से भी किये गये है परन्तु पश्चिमी और पूर्वी भेद तो विशेषताओं की दृष्टि मे मान्य है, दक्षिणी भेद को पश्चिमी या एक शैली रूप माना जाता है। यहाँ पर अपभ्रश की ध्वनि संबंधी विशेषतायों को हेमचन्द्र के प्राकृत- व्याकरण के पार पर मुख्यतया दिया गया है। ये परिवर्तन स्त्र सं० ३२९ तथा ३६६-३६६,४१०-४१२ में मिलते हैं। अपभ्रश शब्दों में एक स्वर के लिये विविष स्वरों या प्रयोग मिलता है। अपभश में शौरसेनी श्रादि प्राकृतों के सदृश ही कुछ . 1. मोतार मापनगर नागरी वावरोवस्य पामचाल रा मालर रयः। गोरेर परिवारय पास्य कौन्तम सरला । कलिकन माय कालाटिका चावगीराः । मददेशीय पुरम भैरम्या, सप्त- पिरापपरा तासादिपमे। प्राक्त ख, १. २. गागरो पापहरगोपनागररमेनिया, Hः परपुरमतवान पुष: मः॥ २.सरात प्राय परी सा: ६ म..: . मा० ." [ १२८] भिन्नता के साथ स्वरों का प्रयोग होता है । उदा. कश्चित् > कन्चु, काच्च, वेणी> वेण, वीण, बाहु> वाह, वाही, पृष्ठ> पहि, पिडि, पुहि, तृण> ननु, तिणु, सुकृतम् > सुकिदु, मुकिउ, सुकृद । ऋ> ए, अर, रि, उदा० गृह, गेहु, कृ> अ, इ उ,—कृत> कर, ऋषि> रिसि, लेखा> लिह, लौह, लेह, औ>-श्रो, अउ, उ, उदा० गौरी>. गउरी, गौरी, गौरव> गउरव, रौद्र > रउद, सौख्य> सुक्ख । अप- अंश में ए, यो का हस उच्चारण भी होता है। और प्रत्येक छौंद के अंतिम पद में प्रयुक्त अन्य उं, है, हिं, ९ का भी हस्व उच्चारण होता है । उदा० मुधि चिन्तिज्जइ माणु (३६६-२), तमु हउँ कलिजुगि दुल्लहहो (' ३३८-१), अन्न जु नुच्छउँ तह घणहे ( ३५०-१), ददउ घडायइ वणि तरुहुँ (३४०-१), खग्ग विसाहिउ जहिं लहहूँ (३८६-१), तण्हें तइजी भनि नवि (८३०-१) । संयुक्त व्यंजन के पूर्व दीर्घ स्वर हस्व हो जाता है । उदा० श्राख्यान> अरसाण, याग्नेय> अग्गेय, यार्या> अज्जा यादि । स्त्रीलिंग याकारांत का हस्य रूप हो जाता है। उदा० क्मला> कमल, बाला> वाल यादि । शब्द के प्रारंभ में सरलोप के भी उदाहरण मिलते हैं। उदा. थरष> रएण, अरविन्द> रविन्द, अंहकार हउँ, उपविष्ट> वइह श्रादि । शब्दों में अक्षरलोप भी हो जाता है। उदा० एवमेन > एमेव, भविष्यदत्त> भविसवत्त ।५ मध्यवर्ती व्यंजन फा लोप और श्रवशिष्ट सर -श्र के स्थान पर .स अथवा -य की अपश्रुति (Ablaut) मिलती है। उदा. अनेक> अणेय, श्रन्धकार> अंधयार, लोफ> लोय, अनुराग>श्रणुराय, कंचुकम> कंचुय, उदय > उयय, चिस्तयति> चितवद यादि । शब्द में स्यर के बाद प्रयुक्त मध्ययती असंयुक्त व्यंजन क, प, त, य, प, फ, के स्थान पर प्राप: । . सूत्रसं. ४१. च. पादप्रा.न्या. 1. कादि स्थैदोवोरञ्चार लापपम् २ मा रिकाम्याम भ । [ १२६ ] ग, ध, द, ध, व, म व्यंजन मिलते हैं। उदा० पिच्छोह गरु < विक्षोभकरं, कइभवं <कटाक्ष, सुध< मुस, सुवधु< शपथं, कधिदुर कथितं, समलउं< सफलं । मध्यवती असंयुक्त व्यंजन -म> - वा वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा. कमल > क्लु, अमर > भाँर, ग्राम > गाँर, यावत्- जिम > जिन, जेय, तावत्-तिम > ति, ते। शब्दों में प्रयुक्त संयुक्त व्यंजन में दूसरा वर्ण यदि रेफ हो तो उसका विकल्प से लोप मिलता है। ३ उदा. प्रियेण> पियेण ( ३७६-२), सर्यानण> सव्वङ्गे ( ३६६-४ ) । शब्द में संयुक्त व्यंजन के किसी एक वर्ष के लिये रेफ का प्रयोग भी मिलता है । उदा. व्यास> मासु ( ३६६.१)। पुरुषोत्तमदेव ने प्राकृतानुशासन में नागर यपभ्रश के अंतर्गत कुछ और धनि परिवर्तन दिये हैं जो हेमचन्द्र द्वारा वर्णित थपम'श के सामान्यरूप के अंतर्गत माने जा सकते हैं। न अादि शब्दों में मा> -इ हो जाता है। यो>यौ उदा. पौरप>पउरस मिलता है।' छंद फे. बंधान में दीर्घ पर हस्य हो जाता है। स्वरमध्यती व्यंजन र, ग, च, ज, त, द, प, च, य और य के स्थान पर सर-रूप मिलते है।स, घ, थ, भ का विकास -र में मिलता है। १. मनादी स्वरादमयुकाना करत य.प. ग,पद-ब-ब-मा. २. मोनुनामिको यौवा ३. पाचोरोल १. मनोर याचित २९६ २. शाद. मान इत्वम् १०५०१७ प्राणानशामन १.3, पोलादपु ७. गुरुवार दोपरा ८.ग: स्परविरोरा च.पाद प्रा.या . " " ३९८ .. . . . . " " .. . . १ . " 4 ८ " [ १३०] उदा० दुःस> दुह, नख> नह, मुस> मुह, ससि> सहि, सुख> मुह, योष> ग्रोह, दीर्घ> दीहर, अथ> अह, कथा > वह, अधर> शहर, धर्म> हम्म, मुक्ताफल>मुत्ताहल, स्वभाव> सहाव यादि । व्यंजन परिवर्तन श, प> स', य>ज२, न> ण' । उदा० शत्>सय, शोभा> सोह, यमुना>जउणा, पर्याप्त> पज्जत्त । संयुक्त व्यंजन यदि शब्द के प्रारंभ में होता है तो प्राय: दूसरे वर्ण का लोप हो जाता है अथवा उसका स्वर भक्ति का रूप हो जाता है। उदा० त्याग> चाय, क्य> क्य, द्रुम> दुम, प्रकाश> पयास, प्रेम> पिम्म, दीप> दीय, क्रिया> किरिया, श्री> सिरी, क्लेश> क्लेिस यादि । संयुक्त व्यंजन के पहले वर्ण के लोप के भी उदाहरण मिलते हैं। उदा० स्क्भ, > संभ, स्तन>थण स्पर्श > फंस, स्फटिक) फडिय। संयुक्त व्यंजनो का समीकरण रूप पालि, प्राकृत के सदृश ही अपभ्रश मे भी मिलता है। उदा० युक्त> जुत्त, रक्त> रत्त, श्रघ> अज, उत्पन्न:> उप्पणु, मिन> मित्तु, समुज्वल> समुज्जल, अन्य> अन्न, दुर्लभ> दुल्लह, दुर्गम> दुग्गम यादि । शब्दों में संयुक्त व्यंजन के स्थान पर विभिन्न व्यंजनो का भी प्रयोग मिलता है। उदा०-ज्ञ> -ण, उदा० अाशा> श्याण, ज्ञान> नाण, -> -स, झ, उदा० अन्तरिक्ष> अन्तरिक्स, क्षीण> झीण, ध्य, -व> -झ उदा० ध्यान> झाण, सन्ध्या> सझा. धनि>भुणि । प्स, >-स > छ, उदा० अप्सरा> मच्छरा, मत्सर> मच्छर, मत्स्य> मछ। संयुक्त व्यंजन के किसी एक वर्ण के लोप होने पर पूर्व अक्षर का अनुस्वार-रूप हो जाता है । उदा० श्नश्रु> अमु, जल्पति जंपद, दर्शन>दसण, वा>यंक यादि । अपभ्रश मे यापद्, विपद्, संपद् शब्दों में-द>-इ हो जाता सूत्र सं. १.शरोसः २.यस्य : २ परि० १७ मारतानुशासन ३ " " . " ४ " [ १३१ ] है।' उदा० अापद् > आवइ, विपद् > विवइ, संपद् > संपर ( ३३५-१) । क्थ, यथा, तथा शब्दों के स्थान पर केम ( वे), किम (किन), रि, विध, जेम (जे), जिम (जिय), जिह, जिध, तेम (तेज), तिम (ति), तिह, तिथ (४०१-१५) (३४४-१) रूप मिलते हैं। यादृश, तादृश, कादृश और ईदृश के स्थान पर जेहु, तेहु, केतु और एटु (४०२ १) रूप मिलते हैं 13 यादृश यादि शब्दों के अत में जब - सर होता है तो उन प जइसो, तइसी, कइसो और अइसो मिलते हैं। यत्र और तत्र शब्दों के लिये अपभ्रंश में जेत्यु, जेनु, जत्रु और तेत्यु, तत्तु शब्द प्रयुक्त होते हैं । इसी प्रकार अन>एत्यु और कुन> क्त्यु शब्द मिलते हैं (४०४ १) । यावत् > जाम (जावें), जाउँ, जामहि, नारत् > ताम (तानं ), ताउँ, तामहिं (४०६-१-३) रूप पाये जाते है। यावत् > जेंवड, जेत्तुल, तावत>तेरड, तेत्तुल । (४०७ १) ये प्रयोग विकल्प से मिलते हैं । इदम् > एयडु, एतुलो, किम् > केवडु, केतुला रूप मिलते है ।' 'परस्पर' शब्द में यादि स्वरागम का प्रयोग मिलता है। उदा० पररपरं>अवरोप्पर (४०६ १) अपभ्रंश म शब्दों के सजातीय स्वरों का एकादेश हो जाता है । उदा० भण्डार<भाण्डागार, उपहाल< उष्णकाल । १ अपादिप मरदा दह २.कथ यथा तथा थारेमेमेदेवा द्वित ३ यादृक्ताहकोहगीता दादेह. ता इस ५ यत्र-तत्रयोस्रस्य डिदेस्वत्यु २. पत्थु कुत्रा ७. यावचायतीदिम उमहि ८.वायरदोती वर ६.वैद किमोदि २०. परस्पररयादिर । च.पा. प्रा.व्या. " ४०१ " ૪૦૨ " " ४०३ ४०४ " " ४०५ " " " " ४०६ ४०७ ४०८ ४०१ " - .

[१३२] सन्धि-विवेचन भाषा के समास पदो में पहले शब्द की अन्त्य ध्वनि और अगले शब्द की यादि धनि के योग से सन्धि का विकास होता है। भाषr के साहित्यिक रूप में सन्धि का प्रयोग अधिक दृष्टिगत होता है। भाषा के लोक व्यावहारिक रूप मे सन्धि का अपेक्षाकृत कम प्रयोग मिलता है। साहित्यिक और लोक-व्यावहारिक भाषायो में संधि- प्रयोग के द्वारा मापा के मूल रूप मे बुद्ध अन्तर भी हो जाता है संस्कृत में संधि-रूपों का व्यापक प्रयोग हुआ है । प्राकृत भाषायी में सधि के कुछ प्रयोग संस्कृत के सदृश और कुछ नये मिलते हैं। सन्धि का प्रारभिक रूप सन्धि-स्वरों -ए, श्री का विकास माना जा सकता है । सस्कृत सधि में प्राय. पहले शब्द के अन्त्य स्वर का परिवर्तन अगले शन्द के आदि स्वर की अपेक्षा अधिक हुआ है। उसका उदाहरण वैदिक सधि स्वर श्रा+इ>ऐ, या+उ> यौ पा विकसित रूप श्र+इ>ऐ, अ+उ>ी माना गया है । पालि, प्राकृत में पहले शब्द के अन्त्य स्वर का प्राय. लोप हो जाता है उदा० नर + इन्द्र > नरिन्द, णरिन्द, गज + इन्द्र > गइन्द (माहा.)। प्राकृत के संधि रूपी की यह विशेषता है वि जव श्रगले शब्द वा यादि स्वर दीर्घ हो अथवा अपने स्थान विशेप के पारण महत्वपूर्ण हो तो पहले शब्द के अन्त्य स्वर का लोप हो जाता है। प्राकृन की ध्वनि संवधी निशेषतायों के अन्तर्गत ऐसे अनेक शब्दों और सम पदों का उल्लेख किया गया है जो सन्धि रूप उदाहरण माने जा सकते है । प्राक्त शब्दों में सयुक्तसर पे प्रयोग का निर्देश पर ले किया बा चुरा है। उनमे सरमध्ययती व्यंजन पे लोप होने पर अपशिष्ट स्वरों की संधि नहीं होती। प्राकृत एक ही शब्द में दो स्वरों या अलग अलग प्रयोग संभरया परन्तु संस्कृत में इस प्रकार की स्थिति नहीं मिलती 1 मावृत भापायों में सन्धि रूपो को सर संधि और व्यजन- [१३३ ] संधि इन दो रूपों में विभाजित किया गया है। पान्ति में एक तीसरे प्रकार की निग्गहीत (अनुस्वार ) सन्धि का भी उल्लेख मिलता है। परन्तु यह सर-सन्धि का ही एक रूप माना जाता है। इसमें दो शब्दों का संधि-रूप में प्रयुक्त होने पर वही अनुस्वार का यागम और वही लोप हो जाता है । उदा० चरखु+उदपादि,>चम्मुं उदपादि, त+सणे> तरवणे, बुद्दान सासन >मुद्दान शासनं, गन्तुं+कामो>गन्तुमामो । पहले शब्द के अनुस्वरात होने पर अगले शब्द के न्यादि सर का विकल्प से लोप मिलता है। उदा. त्यं+असि> सि, इदं+यपि > इदम्पि। अगले शब्द के यादि मे यदि कोई वगाय व्यंजन हो तो पहले शब्द का अनुस्वरात रूप यही नहीं उसी वर्ग के यनुनासिक व्यंग्न में बदल जाता है । उदा० त नरोति> तहरोति, त+ठानं>तराठानं । पालि में पहले शब्द के अन्त सर के बाद कोई सर हो तो पूर्व स्वर का लोप हो जाता है। उदा० यस्स+इन्द्रियाशि> यस्सिंद्रियाणि । कभी- कभी पर स्वर का भी लोप मिलता है। उदा. सो+अपि>सोपि, ततो+एवजतोर। कभी दोनों सरों में से रिसी का भी लोप नहीं होता । उदा० लता+इय>लताइव। पालि, प्राकृत में परले शब्द के अन्त्य स्वर और अगले शब्द के यादि स्वर में संस्कृत के सदृश सन्धि मिलती है। उदा० वाम+ उ> यामोय, तस्स+इदं तमंद (पालि), क्लेश+अनल> क्लेिसा- एल (शी.), रायसि ( राज)> राएसि, एग+म> एगोरु (श्रमा०)। उनः सन्धि या प्रयाग भी नरी भी मिलता । उदा० वसन्तोत्मोपायन>यगन्नुस्मरणातए, अप्पउदग (श्रमा०)। पहले या अन्य सर यदि रहो और अगोवाद या पूर्व सर इन योई शन्न भिन सरही तो गंगन के समान पालि और प्राममन्ति प मिलता है। उदा० शि+परग-रत्म्म> माग, धागां> सागतं, घावनाप्रपाल, पर्वात >पनन । यदि अगो रन्द पा प्रादि सरद, -7 और उसके. पाद ।

जाता [१३४] संयुक्त व्यंजन हो तो पहले शब्द के अन्य -य और -या स्वर का लोप हो जाता है । उदा० वसन्तोत्सव > वसन्तूसव, नीलोत्पल> नीलुप्पल, राय+रईसर>राईसर, एग+इंदिय>एगिदिय (श्रमा० , रयण+उजल> रयणुजल, महोत्सव> महूसर, तहा+एव> तहेर, महा+योसहि > मोसहि ( यमा० ) । पहले निर्देश क्यिा जा चुका है कि अगले शब्द के यादि और पहले के अन्त्य स्वरों की सन्धि हो जाती है परन्तु इस सन्धि-रूप में प्राकृत के अगले शब्द के यादि स्वर के अनंतर यसंयुक्त व्यंजन का भी प्रयोग प्रायः पाया है प्राकृत मेघरमध्यवर्ती व्यंजन के लोप होने पर पास-पास याने वाले अवशिष्ट स्वरों का प्रायः सन्धि-रूप नहीं होता परन्तु पहले और अगले शब्दों में समान स्वरों के होने पर कभी-कभी उनका दीर्घ रूप हो जाता जाता है । उदा० पायादक ( पादातिर )> पादक, उद्वर>उंबर । युछ शब्दों में श्र और या के साथ इ, उ वा योग मिलता है। थइर (स्थविर)>थेर, चतुर्दश>चोदस, पउम ( पद्य )> पोम्म (माहा०)। अन्य प्रकार शब्दों में भी दोनों स्वरों का योग दीर्घस्वर के रूप में मिलता है। उदा० घर+अधम्म > धम्नाधम्म, फिन्च (कृत्य )+ अपिच (अकृत्य )> फिच्चाविच्च, धम्मक्हा+अवसाण > धम्मक् हावसाण, मुणि+ईसर>मुणीसर, बहु+उदग>यहूदग (अमा॰) । समास रूपों में भी इस प्रकार की सन्धि मिलती है । उदा० कुंभवार > कुंभार, धर्मकार>यम्मार, चापाक>काय, देवल> देउल, राजकुल> लाउल (मा.), मुरमार>गूमाल, स्पधावार>संधार (प्रमा)। यार में प्रयुक्त पदों म प्राय. सन्धि या प्रयोग नहीं मिलता । उदा. एगे श्रार, एयायो अजायो । परन्तु न ये पाद यदि कोई स्वर हो तो उग सर को न के साथ सन्धि हो जाती है। उदा० नास्ति > नत्यि, गातिदूरे>णादिदूरे, अनारंभ> नारंभ :

। । १३५ 1 पालि, प्राकृत में व्यंजन-संधि का संस्कृत के सदृश कोई व्यापक रूप नहीं मिलता क्योंकि उक्त भाषाओं में शब्द के अन्त्य व्यंजन का प्राय. लोप हो गया है। परन्तु पहले शब्द के अन्त्य व्यंजन का अगले शब्द के अादि स्वर के पूर्व लोप नहीं होता । उदा० न्यदस्ति> जदत्थि, पुनुरुक्त>पुणरुत्त, पुनरपि>पुणरवि ( यमा०)। दुर् और निर् उपसर्गों के अन्त्य व्यंजन का भी लोप नहीं होता। उदा० दुरतिम्म> दुरदकम, निरन्तर>णिरन्तर । समास पदो में पहले शब्द के अन्य व्यंजन का अगले 'शब्द के यादि व्यंजन के साथ समीकरण हो जाता है। उदा. दुश्चरित> दुच्चरिय, दुर्लभ> दुल्लह, दुसह > दुस्सह, दूसह । समास शब्दों में यदि किसी वर्ग का चौथा या दूसरा वर्ण हो तो सन्धि होने पर उसी वर्ग का तीसरा या पहला वर्ण हो जाता है। पालि में इसका प्रयोग यधिक मिलता है उदा० सेत+ छत्तं > सेतन्छत्तं, नि+ठान> निठानं । प्राकृन में भी इसका उदा- हरण मिलता है। उदा० प्रादुर्भाव> पाउन्भार (श्रमा०)। पहले शब्द के अन्त्य स्वर के अनंतर यदि कोई व्यंजन हो तो उसका व्यंजन द्वित्व रूप हो जाता है। उदा० प + गहो > परगहो, दु + कतं > दुक्कत, दुक्कटं (पालि)। प्राय: दो शब्दों के मध्य में पिसी विशेष धनि के प्रयोग से भी सन्धि का विकास मिलता है। इस दिशेर पनि को सन्धि-व्यंजन का नाम दिया गया है। उक्त सन्धि व्यंजनों में म, य, र के उदाहरण मिलते हैं। यह अनुमान किया गया है कि समरत. उक्त म, र सन्धि- व्यजन संस्कृन के कुछ मूल शब्दों में नियमित रूप से प्रयुक्त होते थे परन्तु बाद में वे अन्य शब्दों के लिये भी प्रयुक्त कर लिये गये ।' का योग सन्धि व्यंजन के लिये प्राय.'किरा जाता है। उदा० एकरम (एकमेकम् )> एक्मे, (माहा.) एगएग> - [ १३६ ] एगमेग (अमा० ), गोण+श्राई (गपादय.)> गोणमाई, यारिय । यणारिय> सारियमणारिय (समा० ) । इसी प्रकार य, र का भी योग किया जाता है। उदा० दु+ अंगुल> दुर्यगुल, तु+असाए> सुयक्साए ( अमा०)। बि+यत्थु ( धिग् यस्तु )> धिरत्यु, सिहि + इव> सिहिरिन, दु+यगुल > दुरगुल (अमा०)। वस्तुत. उक्त उदाहरणो में दो शब्दों के मध्य में म, य, र के प्रयोग द्वारा सन्धि का निषेध किया गया है यपनश भाषायों में भी सन्धियों का नियमन सामान्यत प्राकृत भाषा के सधि-सिद्धान्तों के ही अनुसार हुया है। अपनश के धनि-- परिवर्तन का पिवेचन करते समय पूर्व-पृष्ठा में कुछ ऐसे उदाहरण आये हैं जो कि अपभ्रश को सधियों के उदाहरण के रूप म गृहोत हों सकते हैं।

चौथा अध्याय . प्राकृत के पद-रुपो का विकास प्राचीन यार्य भाषा में सशा, सर्वनाम श्रादि के रूपों का विकास बहुत ही सपन थोर विविध प्रकार पा था। सभी शब्दों के स्वरात और व्याजतात रूपों या विकास एक वचन, द्विवचन, बहुरचन या प्रथमा से सयोधन तक यी विभक्तियों के अनेनार्थ रूपों में होता था। परन्तु प्राकृत भाषायों में यह विविधता स्थिर नहीं रही। विभिन रूपों के धिास में एकीकरण तथा सरलीकरण पालाश्रय लिया गया। शन्दों ये अन्य व्यजनों या अधिकाशत लोप हो गया इसलिये व्यंजनान्तरूप भी प्राय सरात ये सदृश ही हो गये और विविध स्वरात म्पों में श्रन्त्य- दीर्घ स्वरों य इस्य हो जाने के कारण भी रूपों में कमी हो गई । इस प्रपार पुलिंग के अन्तर्गत पाल अमगरात, दयारात और उकारान्त, स्त्रीलिंग ये अन्तर्गत श्रापारान्त, ईयारान्न और प्रसारात, नपुसक- लिंग ये अन्तर्गत अपारान्त रूप ही रंग छिलते पनि परिवर्तन और म प द्वारा विविध रूपों पा विराग बहा सरल पर लिए गया था। रूपों की जटिलता या प्राय लोप हो गया था। सशा, मगाम थादि प द्विानन पे प्रयोग यमन ५ रूपों में सम्मिलिाहो गएप.. यह दोनों में नया भितिलिप माप पपनस्य रचना TH.६१ परि. मा.प्र.

। [१३८ ] 'पष्ठी का प्रयोग किया जाने लगा और इस प्रकार द्विवचन और चतुर्थी विभक्ति का लोप हो गया । केवल पालि और शिलाले सो प्राकृत में चतुर्थी विभक्ति के एक बचन का भिन्न प्रयोग मिलता है। प्राचीन घय्याकरणों के द्वारा लिखे हुए पालि व्याकरण के ग्रन्थ मिलते हैं। कुछ प्राचीन व्याकरण-ग्रंथों मे कच्चान, मोग्गल्लान, अग्ग- बंश की कृतियाँ मुख्य हैं। इनके अतिरिक्त महानिरुत्ति, निरुति-पिटक, कारिका, सम्बन्ध चिन्ता यादि व्याकरण-ग्रंथ भी उपलब्ध होते हैं। परन्तु इसमे मोरगल्लान-व्याकरण को ही सबसे अधिक महत्व दिया गया है क्योकि ग्रन्थ मे सूत्रों की वृत्ति और उनकी व्याख्या वय्याकरण के द्वारा स्वयं दी गई है। अतएव यह व्याकरण-ग्रंथ पूर्ण और पुष्ट माना जाता है । भिन्तु जगदीश काश्यप ने अपने पालि महाव्याकरण में उक्त व्याकरण का अाधार लिया है। यहाँ पर उक्त ग्रन्थ में उद्धृत मोग्गल्लान व्याकरण के सूत्रों के आधार पर पालि-भाषा का रूप- विकास दिया गया है । संज्ञा,सर्वनाम ग्रादि रूपों में निम्नलिसित प्रत्ययों का प्रयोग होता है। पठमा एक०, वहु० मे सि -यो, बालपन (संबोधन ) मे ग यो, दुतिया एक०, बहु. में यं -यो, ततिया एक०, बहु० मे ना -हि, चतुत्थी, छठी एक० बहु० मे स -नं, पंचमी एक०, वहु० में स्मा •हि, सत्तमी एक०, बहु० में स्मिं •सु के प्रयोग मिलते हैं । पुलिंग अकारान्त में -सि > ओ का प्रयोग होता है। उदा. बुद्ध+यो > बुद्धो । उक्त प्रयोग मे कभी-कभी .ए का प्रयोग भी मिलता है। उदा० वनप्पगुम्मे। पु० यका०, प्र० बहु० (यो) में १. चतुथ्यों पाठी पत्र सं०६४ परि०६ २ नाम रमा सियो यो नाहिसनं म्मादि सनं स्मिंसु मोग्गलान ध्या ३. मिस्सो ४.वरचे पा . प्रा०प० १ काएट २ " " ११२ ." " [१४० प० स० एक० ब? बुद्धो (बुद्ध) बुद्धा बुद्धं बुद्धे बुद्धेन बुद्धेहि, बुद्धेभि बुद्धाय, बुद्धस्स बुद्धानं पं. बुद्धा, बुद्धम्हा, बुद्धस्मा बुद्धेहि, बुद्धमि युद्धस्स बुद्धानं बुद्धे, बुद्धम्हि, बुदस्मि बुद्धेसु याल. बुद्ध, बुद्धा बुद्धा नपुसक लिंग अकारात प्र० एक० (सि) में अं, प्र० वर. मे-टा>-या, -यो> -नि का प्रयोग मिलता है। उदा० फलं, फला, "फलानि । द्वि. बहु० मे-नि के अतिरिक्त-ए रूप का भी प्रयोग होता है। • फले, फलानि । शेष रूप पुलिंग बुद्ध के समान पाये जाते है। अकारात नपु. का रूप इस प्रकार होगा- एक० बहु० फलं फलानि फले, फलानि । शेष रूप पुलिंग के सदृश होते हैं। पुलिंग इकारात, ईकारात, उकारात, अकारात बहु० मे -यो या वैकल्पिक रूप में लोप हो जाता है और मूल शब्द का अंत्य हस्व स्वर दी हो जाता है। उदा० मुनी, अट्ठी, दण्डी, श्रायू । यो विभक्ति के पूर्व संज्ञा के यत्य -उ > -अ हो जाता है। उदा. मुनरो, मिसनो । च. प. कः में (स) में -नो का वैकल्पिक योग १ भनपुमके सूत्रसं० ११३ मोगल्लान व्या. २.नीन वा उदा. प. पला, " . ३. लोपो " " ४ यो मुभिरम पुमे . " ईका०, - [१४१ ] रमिलता है। उदा. मुनिनो, दण्डिनो, मिक्खुनो। पुलिग इका०, उका०, अवा० (स्मा) में ना पा वैकल्पिक प्रयोग होता है। उदा० मुनिना,दण्डिना, दण्डिस्मा, भिक्खुना,भिक्खुस्मा । पुलिंग श्वा०, ईका०, उका०, ऊका में -सु, -न तथा -हि विभक्तियों के पूर्व संशा के यंत्य हस्य स्वर का दीर्घ रूप हो जाता है । उदा० मुनीस, मुनीन, मुनीहि, भिक्खूसु भिक्खून, भिक्रसूहि अादि । नपु० इका० इका०, उका०, ऊका० (यो) मे -नि का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। ग्रटठीनि, अायूनि यादि। पुलिंग उका ऊका मे प्र. द्वि० बहु० में यो>यो हो जाता है। उदा०भिक्सको, -सयम्भूयो । संबोधन में पु० उका० प्र० बहु० पें यो>वे, वो मिलता है। हे भिक्सवे, भिक्सयो । पुलिंग ईका०प्र० बहु. यो>नो, द्वि० बहु० यो> ने, नो हो जाता है। उदा.दण्डिनो, दण्डिने । पुलिंग ईका० द्वि० एक. में य> नं का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा० दण्डिनं, दण्डिं पु० ईका० सप्तमी एक० -स्मि का विकल्प से -नि हो जाता है। उदा. दण्डिनि । दण्डिस्मिं । पु०, नपु०, स्त्री० में संबोधन एक० मे कुछ रूपों को छोड़कर अन्त्य दीर्घ स्वर हुस्व हो जाता है। उदा. दण्डि, इत्थि, वधु, सयम्भु । पुलिंग ऊकारात मे प्र० द्वि० बहु० यो>नो का वैकल्पिक रूप मिलता है। उदा० सब्बञ्जनो, विदुनो। पुलिंग योकारान्त गो का प्र० एक० -सि, तृ० पं० बहु० हि,५० बहु० -नं. १.झला सरसनो सूत्र स मोग्गल्लान व्या० २नारमा रस ३ मुन हिम ४.मला वा ५. ला योन पो पुमे ६ देबो सु लम्स ७. नझी तो ८. स्मि नो नि ७६ ६.गेवा १०. कूतो । ८३ दाङ २ . " " ६१ " " " " १ ८५ " २४ " " " " " ८७ " .

[ १४२] सबोधन एक० ग के अतिरिक्त अन्य विभक्तियों के पूर्व गाव, गय रूप हो जाता है। उदा० प्र० द्वि० बहु० गाव, गवो यादि । पुलिंग योरा० गो में द्वि० एक० -य के जुड़ने पर गानु का वैकल्पिक प्रयोग भी होता है । उदा० गावु । तृताया एक० ना का विकल्प से या होता है। उदा० गावा । च० प एफ० म गो+ स> गर मिलता है।५ पष्ठी वहु० म गो+न>गुन, गर, गोन रूप मिलते है ।४ स० बहु. में मु के पूर्व गो> गाव, गर हो जाता है। उदा० गावेमु । अस्तु, पुलिग और नपुसक इकारान्त, ईकारात उकारान्त, अका- रान्त, योकारान्त का रूप विकास निम्नलिसित होगा- पु० इवा. मुनि- बहु० प० मुनि मुनी, मुनयो दु. मुनि " त. मुनिना मुनीहि, मुनीमि प० मुनिना, मुनिम्हा, मुनिस्मा छ० मुनिनो, मुनिस्स मुनीन स० मुनिम्हि, मुनिस्मि मुनिसु, मुनीमु याल. मुनि, मुनी मुनी, मुनयो नपु० इया. यहि>यस्थि- 40 यहि ग्रहोनि, यही १ गो स्मा ग भिदिन मुगा वगया सूत स० ६६ काण्ड २ मा रिह ३ नास्मा ४ गयसेन ५ गुन चनना मोग्गल्लान व्या . ७४ " " " " " " " [१४३ । " " भिक्खून प० एक्० बहु दु० अटिठ अहीनि, यही • शेष रूप पुलिग इकारान्त मुनि के समान होंगे। पु० उका० भिक्खु <भित्तु-- प. भिक्खु भिक्खू, भिक्सो दु. भिक्खु भिरा, भिक्सो त० भिक्खुना मिक्स्वहि, भिरसूमि प० भिक्खुस्मा, भिक्खुम्हा छ. भिक्खुनो, भिक्खुस्स स० मिाखुस्मि, भिक्खुम्हि भिक्खुसु, भिक्खून अान० भिक्खु भिक्खू , भिक्सवे, भिक्सनो नपु० उका० श्रायु- यायु अायूनि, प्रायू दु. श्रायु याल. श्रायु शेष रूप पुलिग उकारात के सदृश होते हैं। पु० ईका. दण्डी- प० दण्डी दण्डी, दण्डिनो दु. दण्डिन, दरिंड दण्डिने त० दरिइना दण्डीहि, दण्डीभि प० दण्डिस्मा, दण्टिम्हा छ. दण्डिनो दण्डिस्स दण्डिनि, दण्डिस्मि दण्डिसु, दण्डीमु दरिम्हि, दण्डीन थाल. दण्डि, दण्डी दण्डी, दण्डिनो "नपु० ईका• सुखकारी- सुसकारि मुसकारीनि, मुसकारी " " " " " " स० ५० [ १४४ ] " ". " एक० वर दु० मुसकारि याल० सुसकारि शेष रूप पु० ईकारात के सदृश मिलते हैं। पु० अका० विदू<विदु- प० विदू विदू, विदुनो दु० पिदु त० विदुना विदूहि, विदूमि प० विदुस्मा, विदुम्हा छ० विदुनो, विदुरा विदून स० विदुम्हि, विदुस्मि यात. पिदु जिदू, विदुनो नपु० य० सयम्भू <स्वयम्भू- प० सयम्भु सयम्भु, सयम्भुनि पु० सपम्म श्राल. सयम्भु शेत्र रूप पुलिग ऊयारान्त के समान होते है। पु० योका. गो--- गयो, गायो हु० गार, गाय, गवं त० गावेन, गवेन, गारा, गना गोहि, गोमि पं० गा, गारा, गायत्मा, गारम्हा गवस्मा, गरम्हा गायरस, गररस, गवं गवं, गुन्न, गोन स० गारम्दि, गारस्मि, गायेम, गवेग, गोन गवम्दि, गयस्मि, गावे, गये श्राल. गो गायो, गये " " प. " " "" एक० " [१४५] नपु० यो चित्तगो (विचित्र गायों वाला) बहु ५० चिचगु चित्तगू, चित्तगूनि पु० चित्तगुं पाल. चित्तगु शेष रूप पुलिंग मोकारांत के सदृश पाये जाते हैं । व्यंजनांत पुलिंग शब्द यात्मन् >यत्त का सप्तमी बहु० -सु तथा तृ० पं० -वहु० को विभक्ति -हिं के पूर्व विकल्प से अत्तन और यातुमन हो जाता है।' उदा. अत्तनेसु, अत्तेमु, यातुमनेसु, थातुर्ममु, अत्तनेहि, अत्तेहि, यातु- मनेहि, यातुमेहि । उक्त शब्द मे च०, प० एक० (-स) की विभक्ति का विकल्प से -नो रूप मिलता है। उदा. अत्तनो, यत्तस्स, श्रातुमनो, यातुमस्स । राजन् आदि शब्द में प्र० एक० (-सि) में -या रूप मिलता है।' उदा० राजा । उक्त शब्द के प्र० बहु०, द्वि. बहु० (-यो ) मे -पान रूप हो जाता है। उदा. राजानो। द्वि० एक० (-S) में विकल्प से न मिलता है ।५ उदा. राजानं । तृ. एक० (-ना) और पं० एक० (-स्मा) में राज> रा रूप हो जाता है । तु. एक में राज के लिये विकल्प से राजि होता है। उदा० राजिना । सममी बहु० (-सु) प० वहु० (नं) तृ० पं० पहु० (-हि ) मे सूत्र सं० १६७ का०२ मोग्गा व्या. . " " . . १. सुहि सुनक २.नी चातुमा ३. राजादि युवा दिवा ४.यो न मानो ५.वामान A.ना स्मासुरज्या 1७, राज सिनामित " " " १५८ १५७ २२४ १२५ " ." " " " राज के ६ १४६ ] राज का वैकल्पिक प्रयोग राजू मिलता है ।। उदा० राजू सु, राजूनं, राजूहि । चनुथी, पष्ठी एक० (स ) म रो, रज्जास्स, रजिनो रूप मिलते हैं। च० प० बहु० (-न) के साथ राज का रूप रजं होता है। • सप्तमी एक० (-स्मि) में राज के रओ, रजिनि रूप होते है।४ पुलिग रूपो में -वन्तु और मन्तु प्रत्ययात शब्द मी मिलते है । सकारात गौर याकारात शब्दों के बाद -धन्तु प्रत्यय और भिन्न स्वरात शब्दों के बाद -मन्तु प्रत्यय का योग होता है। उदा० गुणवन्तु (गुणवाला), गतिमन्टु (गतिवाला)। प्र० एक० (-सि) मे -न्तु> या हे जाता है। उदा० गुणवा । प्रथमा बहु० (यो) मे विकल्प से -न्तो होता है। उदा० गुण- वन्तो, गुणवन्ता, दि बहु ० (-यो)तृ• एक(-ना) घ० बहु० (-नं) यादि में न्तु >न्त और टा>टे-ए हो जाता है ।' उदा० गुणवन्ता, गुण- वन्ते, गुणवन्तं, गुणवन्तेन श्रादि । प्र०एक ० (-स)प० एक ० (-स्मा) स. एक० (-स्मिं) तृ. एक० (-ना) के साथ -स्तु, न्त का प्रमश: तो, -ता, -ति तथा -ता रूप मिलते है। उदा० गुणवतो, गुणवता, गुणवता, गुणवति । च० ५० बहु नं के साथ विकल्प से -न्त, -न्तु का -तं हो जाता है। उदा. गुणवतं । संबोधन एक० में -न्त -न्तु के न्य, -या, - रूप सूने स० काण्ड २ भोग्गलान न्या. " " १.ख्यो अस्स राजिनी से ई.राजस्थ रज ४. स्मि मिह रउने राजिनि " १२५ २२ २२३ २२६ १५३ " " " " " " " ५.न्त र मन्ती यो दि परमे ७ वादोन्तु रमा र तोता तिता सरमा रिमनी में ६.सं२ मि " " ६३ २१६ २१८ . , प० श्वत्ता, अचानो " [१४७] होते हैं। उदा०भी गुणव, गुणवा, गुणवं । नपुंसक लिंग मे प्र० एक० में न्तु >-अं, न्तं हो जाता है ।२ उदा० गुणवं कुलं, गुणयन्तं कुलं । स्त्रीलिंग में -वन्तु >-बती, -पन्ती तथा मन्तु >मती, मन्ती होता है। उदा० गुणवती, गुणयन्ती । अतएव कुछ पुलिग व्यंजनांत रूप इस प्रकार होंगे- अत्तरयात्मन एक. वहु० यत्ता १० अत्तानं, यत्तं अत्ते, त० यत्तेन, अत्तना अहि, अभि, अत्तनेहि, अत्तनेमि पं० यत्सना, अचस्मा,अत्तम्हा च. छ. अत्तनो, अत्तस्स अत्ताने स० अत्तनि, अतस्मिं, थतनेसु, अत्तेमु अत्तम्हि, अते नाल. यत्त, अत्ता राज<राजन- राजा राजानो दु. राजानं, राज राजानो त. रा, राजेन, राजिना राजेहि, राजेमि, राजूहि, राजूभि रजा, राजम्हा, राजस्मा च० छ० रखो, रज्जत्स, राजिनो, राजस्स र, राजानं, रानून स० रने, राजिनि, राजस्मिं, १.८टा मंगे सूत्रसं० २२० काण्ड २ मोग्गा०या० २ नपुंसके यत्ता, अत्तानो प० राजा, प. " " १५४ रामु, राजेगु राजा, राजानो " [१४] राजम्हि थाल. राज, राजा गुणवन्तु- प० गुणा गुणपन्तो, गुणचन्ता दु० गुणयन्तं गुणयन्त त. गुगवता, गुणरन्तेन गुणवन्नेहि, गुण मन्तेमि प० गुणावता गुणपन्तस्मा, गुणवन्तता च०६० गुणरतो, गुणवन्तस्स गुणवत, गुणन्तानं म० गुणपति, गुगवन्ते, गुणवन्तस्मि, गुणनन्तम्हि गुणरन्तेमु थाल० गुण्य, गुणव, गुणवा गुणवन्तो, रणवन्ता -तु प्रत्ययात पुलिंग शब्दों का रूप पिकास य धिकाशत अन्य पुलिंग सामान्य रूपों के सदृश ही होता है । कुछ रूप भिन होते हैं। प्रयमा एक-ति म-नु अन्त्य स्वर के स्थान पर -या हो जाता है। उदा. दाता, पिता, माता यादि । च०, प० एक-स के अतिरिक्त अन्य विभक्तियों में -तु के अन्य स्वर का -पार (-या) हो जाता है। उदा० दातारो, पितरो, दातारा, पितरा यादि । उक्त प्रयाग में यार रूप के वाद प्र० द्वि० बहु० यो> या होता है। उदा० दातारो, पितरो। द्वि० बहु० -यो>•ए भी हो जाता है। उदा० दातारो, दातारे। -पार के बाद तृतीया एक० -ना और पचमी एक० -स्मा के स्थान पर -या मिलता है ।" उदा. दातारा, पितरा । -यार के बाद सप्तमी १.स्तु पिता दोन मा सिम्हि सूत्र स० ५६ काण्ड २ मोग्ग० व्याकरण २ तु पितादीनम से ३.भार डरमा ४. टोटे वा ५. टिटाना रमानं . १६४ " " " " " १७४ १७५ . " - १४] एक० -स्मि> इ और यार का हख रूप-अर-हो जाता है ।। उदा. दातरि। चतुर्थी, पष्ठी 'एक० -स में विभक्ति का वैकल्पिक लोप भी मिलता है। उदा० दातु, पितु । चतुर्थी, पण्डी बहु० (नं) में अन्त्य स्वर का विकल्प से -पार हो जाता। उदा० दातारानं, दातानं, पितरानं, पितुन्नं । उक्त विभक्ति मे पिकल्प से -पार>-या भी मिलता है। उदा० दातानं, दानूनं, पितानं, पितुन । सप्तमी बहु० (सु, तृ० पं बहु०)-हि मे विकल्प से -धार मिलता है। उदा० दातारेसु, दातुसु, पितरेसु, पिनुसु, दातारेहि, दाहि, पितरेहि, पिहिं । संवोधन एक० मे -तु के अन्य स्वर का - और या हो जाता है। उदा० भी दात, दाता, भो पित, पिता। पितु, मातु श्रादि शब्दो में जहाँ अन्त्य घर का जहाँ -बार होता है -यर हो जाता है। उदा. पितरो, पितरं, मातरो, मातरं । कुछ •तु प्रत्ययात शब्दों के रूप इस प्रकार होंगे- दातु<दातृ एक. बहु० दातासे दु० दाताई दातारो, दातारे त. दातारा दातारेहि,दातारेभि, दाहि, दानि परदाता , " " मोग्ग ध्या० च. छ. दातु, दातुनो दातुस्स दातारानं, दातानं दातरि दातारेमु, दातुम श्याल० दात, दाता दातारो १.टिस्मिनी, सूत्र स. १७६, काय २ २. रस्सा रह स्लोपो ४. नहिया ५. मुहिरवा रह ६.गेमच ७. पितादीनमनरवादीन १७६ " " " " " * " " . दु० पितरं " " . १५० 'पितु> पितृ- एक० बहु० प० पिता पितरो पितरे त० पितरा पितरेहि, पितरेभि, पिनूहि, पितृभि पं० च० छ० पितु, पितुनो, पितुस्स पितरानं, पितानं, पितून स० पितरि पितरेसु, पितूसु श्रा०ल. पित, पिता पितरी पालि में स्त्रीलिग के साकारात, दकारात, ईकारात, उकारांत और ऊकारात रूप मिलते हैं। श्राकारात मे प्र० एक.-सि, संवोधन एक०ग के प्रत्ययों का लोप हो जाता है। उदा. लता प्र. बहु०, द्वि० बहु० की विभक्तियों का स्त्रीलिंग के सभी रूपों में विकल्प से लोप मिलता है ।२ उदा० लता, लतायो, रत्ती, रत्तियो, इत्थी, इथियो, धेनु, धेनुया, वधू, यधुयो । स्त्रीलिग के एक वचन के सभी रूपों मे -य अथवा-या का प्रयोग होता है । उदा. लताय, रत्तिया श्रादि । स्त्रीलिंग मे सप्तमी एक-स्मिं का विकल्प से -यं मिलता है। उदा. लतायं, लताय, रत्तियं, रत्तिया न्यादि । संयोधन एक. मे विकल्प से -ए रूप होता है। उदा. हे लते, लता। स्त्रीवाचक शब्दों में यकार बाद में हो तो अन्त्य -इ, ई का विकल्प से लोप मिलता है। उदा. रत्यो, रत्या, रत्यं । सप्तमी एक० १. गसीनं सूत सं० ११६ काण्ड २ मोग्गल्लान व्याकरण २. जन्तु हे त्वी धपेहि वा ३. धपने कस्मि नादीनं यया - । " . " " " १०५ " ६२ ५. घनझादितो ये २. ये परिसदएप रस . " १५१ ] -स्मिं मे रत्ति आदि शब्दों के बाद -यो होता है। उदा.-रत्तो, रतियं । स्त्रीराचक ईकारात शब्द के वाद -यं का विकल्प से -यं हो जाता है।' उदा० दत्थियं, इथि । स्त्रीवाचक एक. रे सभी रूपों में प्राकारात और योकारात शब्दों को छोड़ कर शेप में दीर्घ स्वर ह्रस्व हो जाता है । उदा० इत्थिं, इत्यिया, इथियो, वधुं, वधुया, वधुयो यादि । स्त्रीलिंग के उक्त रूपो का विकास निम्नलिसित होगा- लता- बहु० प. एक० लता लतं लताय लता, लतायो दु० " लताहि, लताभि पं० " " च०छ० " लतायं लतानं लतासु लतायो " १ लता, यार. लते रत्तिररानि- रत्ती, रत्तियो, रत्यो प० रत्ति दु० रत्ति " " रत्तीहि, रत्तीमि " " " " रत्तिया, रत्या पं. च० छ० स. रत्तियं, रत्यं, रत्ति, रत्तो याल. रत्ति " परत्तीन रत्तीसु, रत्तिनु रची, रत्तियो, रत्यो सूत्र सं०१७ रड २ मोग्ग व्या १. रस्यादोहिटो स्मिनो २. यंपीतो ३. यो सुमधोनं " H - [१५२ इत्यी स्त्री- एक० प० इत्थी दु. इत्यियं, इत्थिं त० इत्थिया पं० यह इत्यो, इथियो " इत्थीहि, इत्यो मि " च० छ. " इस्थियं धेनु- याल. इत्यि प० धेनु दु. धेनुं त० धेनुया पं० इत्थीनं इत्योसु इत्थी, इथियो धेनू , धेनुयो धेनू, धेनुयो धेनूहि, धेनूमि " च. छ. धेनून " धनुर्य स० थाल. धेनु धेनूमु धेनू , धेनुयो वधू-- वधू, वधुयो " प० वधू पु. वधु वधुया पं० च० छ. वधूहि, यधूमि " " " " वधुयं वधूनं वधूसु वधू, वधुयो थाल. यधु मातु <मातृ-- प० दु० मातरं त० माता मातरो मातरे, मातरो मातरेहि, मातरेमि मातुया [ १५३] एक० पं० मातुया बहु० मातरेहि, मातरेमि मातरानं, मातानं, मातूनं. च.छ. " स० मातरि मातरेसु, मातुसु मातरो याल. मात, माता मुख्य प्राकृतों में पालि की अपेक्षा संज्ञा आदि रूपों के विकास में सादृश्य पा प्रभाव कुछ और व्यापक रूप में मिलता है। पुलिंग अकारात शब्द प्रथमा एक० (-मु) मे -यो का प्रयोग मिलता है। उदा. वृत: > वच्छो, काम: > धामो । पु० अका० प्रथमा बहु० और द्वितीया बहु० ( क्रमश: जश और शस) की विभक्तियों का लोप हो जाता है। उदा. वृक्षाः > वच्छा, वृक्षान् > वच्छे । संभवत: प्रथमा बहु० और द्वितीया बहु. में अन्तर रसने के लिये एक का रूप तो वच्छा ही रहा और दूसरे का वच्छे हो गया । पु० अका० द्वितीया एक० (-यम् ) की विभक्ति का लोप हो जाता है। उदा० वृक्षम् >वच्छं पु० अ० तृतीया एक० (-टा) और पष्ठी बहु० (-याम् ) की विभक्तियों के स्थान पर-ण का प्रयोग मिलता है। उदा० वृदेण>वच्छेण, वृक्षाणां> वच्छाण । पु० अका. तृतीया सूत्र सं०१ प्रा०प्र० व्या. " १ त प्रोत सोः अतः सेडों: २.जश शसोलापः जस शसोलुक ३. भतोऽमः २ २ ४ परि० ५ त० पाद परि०५ त. पाह परि०५ प्र० " व्या.. " " भ. " . प्रमोरय ५ तपाद व्या० " ४ परि०५ " १. टामोर्णः टा आमोए: " ४. पाद " म्या . [ १५ बहु० (भिस् ) को विभक्ति के लिये हिँ य -हि पा प्रयोग हुया है।' उदा. धृते:पन्देहि, यच्छेहि । इसी का योग पुलिंग इका. उया०, स्त्री० श्रया०, इका०. ऊया. थोर संख्यावाचक शब्दों में होता है। उदा० नग्गीटिं, याऊहिं, मालाहिं, गईहि, यहिं, दोरिं, तीहि, चयहि यादि। पु० यया. पंचमी एफ. (८)सि पो रिभक्ति ये लिये-श्रा., दो, -दु, हि के प्रयोग मिलते हैं। उदा. क्षात् अच्छा, बन्धादी, बच्छाद, वन्याहि । पु० श्रयाः पंचमी यहु (-भ्यस् ) की विभक्ति के लिये-हिन्तो, मुन्तो के प्रयोग हुए हैं। उदा० तेभ्य:> यच्छाहिन्तो, बच्छासुन्तो । पालि और शिलालेसी प्राकृत में यह विकास नहीं मिलता । -भ्यस ये पूर्व श्रकार वैकल्पिक रूप में दीर्घ सर में बदल जाता है। वच्याहिन्तो, पच्छेहितो। पु० या० पष्ठी एय० (टस ) की रिभक्ति के लिये -स्स का विकास मिलता है। उदा० मृक्षस्य> बन्छस्स । पु. श्रया. सप्तमी ६.१०-डी की विभक्ति का विकास -ए और -म्मि में हुश्रा है। उदा० परि.५ STO प्र० ध्या० " तृ० पाद " परि०६ " . Яo ६ . ." " त. पाद . व्या. " ..भिसोहि सूत्र संरया भिसाहिहिदि ২ চনৰ ३ ङसेरा-दो-दु-हय. डसेस् तो दो-दुदि हिन्तो लुक ४ भ्यतो हिन्तो मुन्तो भ्यसस तो दो दु हि हिन्तो मुन्तो ५ भ्यसि वा ६ सो डस बस स्स ७ परि०६ प्र० " IN १ ६ न० पाद घ्या. . " " " प्र० " " परि०५ त० पाद परि०५ तृ० पाद व्या० Ата Яo " डेम्मि ११ प्रा.व्या.

वृक्ष > यच्छे, बच्छम्मि । पु० अका. सप्तमी बहु• (सुप् ) का विमास -सु रूप में मिलता है ।। उदा. वृक्ष> वच्छेषु, बच्चेतुं । पु० अका. प्रथमा बहु. जस द्वितीया यहु० शस, पंचमी एक० (इसि,) पष्ठी बहु० (-ग्राम् ) में -या का योग हो जाता है। उदा. वृता>वन्छा, वृक्षान् >यच्छा, वृक्षात् > वच्छादो, वच्छादु> बन्द्राहि, वृक्षाणाम् > पन्छाण, पन्छाए । पु० अका. पष्ठो एक०, सप्तमी एक० की विभक्तियों को छोड़ कर शेष में संज्ञायों के थन्त्य -य के लिये -ए का प्रयोग मिलता है।३ उदा. वृतान) यन्छे, वृक्षण> वच्छेण, वृक्ष:> वन्छेहि, यच्छेहि, वृक्षेषु> यन्छेनु । पु० श्रका० शब्द में पंचमो एक० (डसि) और सप्तमी एक दि. के पूर्व संगा के अन्त - का लोप हो जाता है। उदा. वृतात् > वन्या, गृ> वन्छे । श्रतएव प्राकृत में पुलिंग अकारान्त का रूप-विकास इस प्रकार होगा- यन्छ>वृक्ष एक पचन द्विवचन घच्छो यन्छा यछं यन्थे, कन्या चन्देश यन्देहि, बन्देहि चन्चादो, वन्छादु, यन्याहिन्तो, यन्छानुन्ती, पन्याहि, यन्या वन्देहिन्तो, यन्दमुंतो वन्दरस यन्याग, यदाएं एकमया १० परि. २. जरा-राम हरप गुरपं. पशाम रमि-से-कोनामि,, ४० पार २. एप एप्पस्टिम राकर न. पा. मिमगृषि ४. सतिमिरदोषार: परि.५ प. ०५० प्र.40 " " १२ १२ . मा.. प्र.प्र. . १४ F.दा. . . १३ प्रा.प्र.

। १५६ J स० . एक० बहु वच्छे, यच्छम्मि वच्छेमु, वच्छेसु वच्छ यच्छा इकारांत और उपारान्त शब्दों में द्वितीया बहु० ( शस् ) में -गो का योग मिलता है ।' उदा० अग्रीन् अग्गिणो, वायून् >वाउणो । इका० और उका० शब्दों में षष्ठी एफ० (-टस् ) का विकास भीणों में हुश्रा है। उदा० अग्ने:>यरिंगणो, अग्सिस्स, वायो:बाउणो, बाउस्स । इका. और उका० शब्दों में प्रथमा बहु० ( जस ) में -यो. और णो मिलते हैं। उदा० अग्नयः>यग्गीयो, अग्गिणो, वायवः> वाउन्यो, वाउणो । नपुसक लिंग में भी यही प्रयोग मिलता है । इका. और उका० शब्दों मे तृतीया एक० (-टा) में -णा का विकास हुआ है । उदा० अग्निना> अग्गिणा, वायुना> वाउणा । इका और उका० शब्दों में प्रथमा एक० (सु), तृतीया वहु० (मिस ), सप्तमी व९० में पूर्व स्वर दीर्घ हो जाता है। उदा० अग्नि: > अग्गी, वायु:> याऊ, अग्निभिः > अग्गीहि, अग्गीहि, वायुभि:> वाऊहिं, घाऊहि, अग्निपु> अग्गीसु, वायुषु> वाकमु । नपुसंक लिंग में भी ये ही रूप मिलते हैं। उदा० गिरी, बुद्धी, तरू। सूत्र सं०१४ परि०५ Ato म० १. इदुतोः शसो पो २. इसो वा " " " २३ सिडसो पुक्कोचे वा ३ जसश्च श्रो यत्वम् 7.पा. प्रा०व्या० परि०५ प्रा० प्र० प्रा.व्या. २२ तु० पा० परि०५ " मा०प्र० ૨૪ तु० पा० जस शसोषों वा ४.टाणा टोगा ५.सुभिस सुप्सु दीर्घ . अक्लीवे सौ ८. सुतो दीर्घः परि०५ मा० ध्या० प्रा०प्र० प्रा० च्या.. १६ १० पा० त.पा.- " प्राoया.

[ १५७ ] जव कि प्रथमा एक० की विभक्ति (सु) संबोधन के लिये प्रयुक्त होती है तो -यो, कोई दीर्घ स्वर और अनुस्वार का प्रयोग नहीं किया जाता ।' उदा० हे वच्छ, हे अग्गि, हे वाऊ, हे वण, हे दिहि, हे महु, हे मिला सिणि । इयारात और उकारात संज्ञाओं में सप्तमी एक० (दि), पंचमी एक० (डसि) में -ए और -श्रा का क्रमश: प्रयोग नहीं मिलता !२ उदा० अग्नौ > अग्गिम्मि, यायौ > चाउम्मि, अग्ने:> अग्गीदो, अम्गीद, अग्गोहि, पायो:> वाऊदो, वाऊदु वाकहि । इकारान्त और उकारान्त संज्ञायों के अन्य स्तर के लिये यदि पंचमी बहु० (भ्यस् ) की विभक्ति बाद में हो तो -ए का प्रयोग नहीं होता। उदा० अग्निभ्न: > अग्गीहिन्तो, अग्गीसुन्तो,. वायुभ्यः > वाउहिन्तो, वाऊतुन्तो। श्रतएर पुलिंग इकरान्त और उधारान्त का रूप-विकास निम्नलिखित होगा- थग्गि<यग्नि एकवचन बहुवचन प्र० श्रग्गी थग्गी, अम्गीयो, अग्गिणो, अग्गयो द्वि० श्ररिंग अग्गियो तृ० अग्गिा श्रग्गीहिं श्रग्गीहि पं० श्रग्गीदो अग्गी, अग्गीहि, श्रग्गीहिन्तो, अग्गीसुतो च०५० अग्गिरम,अग्गियो, श्रग्गयो अम्गीणं, अग्गीय श्रग्गिम्मि श्रग्गीन, अग्गीनु मं० अग्गि, अग्गी, अग्गिीयो, अग्गियो, अग्गयो याउम. याऊ याऊ, याऊथो, वाउणो, वाथयो दि० यार्ड पाउदो १.नामन्त्री साविस पिन्दर एव सं.२३ परि०५ १. मरिस्पोरताकी परिष्देश र प्रा. प्या. स० भा.प्र. " २.९भ्यामि " प्रा.प्र.

१५ -- एकवचन 'बहुवचन चाउरणा पाऊहिं, याऊहि पं० याऊदो, वाऊदु, बाऊहि घाऊहिन्तो, पाऊसन्तो च० ५० पाउणो, पाउस्त, वाथयो वाऊणं, वाउए स० याउम्मि याऊसु, वाऊस सं० याउ पाऊ, वाउगणो, वाऊयो, वायत्र्यो स्त्रीवाचक संज्ञायो के द्वितीया यहु. (शस् ) मे -उ और -यो वा प्रयोग मिलता है। उदा० माला:> मालाथो, मालाउ,. नदी > नईश्रो, नईउ, :> पहूयो, यहूउ । नीनाचक संज्ञायों में प्रथमा बहु. (जस) में यो के वैकल्पिक प्रयोग मिलते हैं। उदा० माला:> मालानी, मालाउ, नद्य.>णईयो, गईउ, णई । स्त्री- वाचक संजाओं में द्वितीया एक० (-अम् ) की विभक्ति के पूर्व दीर्घ स्यर हस्स हो जाता है। उदा० मालाम् >मालं,नदीम् >णई,बधूम् >बहु। स्त्रीवाचक संज्ञाओं मे तृतीया एक. (टा) पष्ठी एक० (डस) सप्तमी एक० (णि) की विभक्तियों के स्थान पर इ,-ए, -अ और-या के प्रयोग मिलते है। उदा० नद्या, नद्याः, नद्याम् > गईइ, एईए, गईश्र, गईश्वा । परन्तु स्त्रीलिंग की याकारात संजानो मे -श्र और -या के प्रयोग नहीं मिलते। उदा० मालया, मालायाः, मालायाम> मालाइ,. मालाए, मालाउ । स्त्रीवाचक थाकारांत संज्ञानी में अन्त्य वर्ण श्या १. स्त्रिया शस उदोती सूष सं० २६ परि०५ स्त्रियामुदौतौ वा तृ पाद २. जसोबा परि०५ ३. ममिहस्वः हस्वामि १० पाद ४. या इस डोनाम इदे ददातः, टास् डेर दादिदेवातुड से, मा.न्या २: नातोऽदाती- परि०५ प्राच्या २७ प्रा०प्र० प्रा. व्या प्रा०प्र० " " २१ " प्रा० व्या ३६ २२ परि०५ प्रा०प्र० तरिक २९ २३ " मा०म० अनात भात ४० पा० .

। १५६ और ई का अनियमित विपर्यय मिलता है। उदा० सहमाना>सहमाणा, सहमाणी, हरिद्रा> हलद्दा, हलद्दी, सूर्पनखा > सुप्पणहा, सुप्पणही, छाया> छाहा, छाही । पुलिंग रूपा में भी यह परिवर्तन मिलता है। उदा० हसमाणी, हसमाणा । स्त्रीवाचक याकारात संज्ञाओं की सवोधन विभक्ति में प्रथमा एक० -श्रा के स्थान पर-ए हो जाता है। उदा० हे माले । स्त्रीवाचक ईकारात और ऊकारान्त संज्ञायों का संबोधन विभक्ति में ई और -ऊ का हस्व रूप होजाता है 13 उदा० हे नइ, हे बहु। नपुसकसूचक सज्ञायो म प्रथमा एक वचन (सु) के पूर्व अन्त्य स्वर दीर्घ नहीं होता । उदा० दधि> दहि, मधु> महे', हविस्> हर्षि । नपुसक्सूचक सज्ञायों में प्रथमा वहु० ( जस् ), द्वितीया बहु० ( शस् )में -इ का प्रयोग होता है और पूर्व का स्वर दीर्घ हो जाता है।" उदा० वनानि> वरणाद, दधीनि> दहीइ, मधूनि> महूइ । नपुसक- सूचक सज्ञायो म प्रथमा एक० (सु) मे अनुस्वार का प्रयोग होता । उदा० वण, दहि, महु । अतएव स्त्रीवाचक संज्ञानी ईकारान्त, अकारात, याकारात तथा नपुसकसूचक अकारात का रूप- विकास प्राकृत भाषायो में इस प्रकार होगा- नदी> गइ एक. वहु० एईयो, गईउ, गई १. श्रादीती बहुलम् परि०५ प्रत्यये डोन वा २.स्त्रियामात एत वापए तृ० पाद ३. इदूतो स्व परि०५ प्र० गई प्रा०प्र० सूक्ष सख्या २४ ३० तृ० पा० मा०व्या० प्रा. परिक " २८ ४१ २६ " प्रा०या० प्रा०प्र० प्रा.व्या. मा०प्र० ४२ तृ० पाद . " २८ M ४.न नपुमके ५ हज जम् शसोर दीपश्च इ सोबिन्दुनैसके " " २६ ३. " ." " [१६०] एक वहु० द्वि० गई ईओ, राईउ, राई तृ० एईद, राईय, राईया, য, যার गईहि, एईहि पं. एईदो एईदु, एईहि, एइई राईहिन्तो, गाईय, पईया, एईउ रासुन्तो च०,५० गईइ, मईया, गईथ, राईया, गईणं, गईण যাও যাহ स० गईइ, एईस, गईश्या, गदए যন্ত, যাই गर्दउ सं० राइ गईश्री, गईड, राई माला माता माला, मालायो, माल द्वि० मालं त० मालाय, मालाद, मालाए मालाहि, मालाहि पं० मालाश्य, भाला, मालाए मालत्तो, मालाथो, मालाङ मालतो, मालाओ, मालाउ मालाहिन्तो, मालासुन्तो मालाहितो च०प० मालाय, मालाइ, मालाए माताण, मालाएं मालासु, मालासुं श्र० माले, माला माला, मालाओ, गालाउ यधू> बहू प्र० वह द्वि० रहे तृ० यहई, यहू, पहूया वहूप, यहूउ यहहि यहूहि . " स० " . वहूत्रो, वहट, वह चहूथो, यहउ, वह -- [ १३१ .] . " " " तृ० वणेण एक वचन बहु वचन पं० बहूदो, यहूदु, बहुअ, वहूहि, वहूहिन्तो, वहूसुन्तो वहूओ, वहूए वहूउ घ. वहूई, वहू, यहूया, वहूए वहूणं, वहूण वहूउ स० वहूई, वहूथ, वहूया, वहूंए वहूसु, वहूसं वहुउ सं० बहु वहूयो, बहूउ, वह वन (नपु०)> वण प्र० वर्ण वणाई, वणाइ. द्वि० वणेहिं, वणेहि प० घणादो, वणादु, वणाहि यणासुन्तो, वणेसुतो, वणाहिन्तो, वणेहिन्तो वएस्स वणाएं, वणाण स० वणे, वणम्मि वणेमु सं० वण वणाई, यणाद, वणाई संस्कृत ऋकारान्त शब्दों में विभक्तियों (सुप्) के पूर्व- का विकास -पार मिलता है ।' उदा० भर्तृ > भतार, भत्तारो, भचारे । मातृ शब्द के - का विकास -श्रा मिलता है और इसका रूप-विकास स्त्रीवाचक श्राकारांत रूप के सदृश होता है । उदा० मातृ >माया, मातरम् > मायं, मात्रा, मातुः । मातरि माधाह, मायाए, मायाउ । ऋकारान्त शब्दों में मयमा १.शत भारः सुपि सूत्र संख्या ३१ तृ० पाद २. मातुरात् प्र. भाभरा माता तपाद प० परि०५ मा०प्र० भारः स्यादौ " "ध्या ३२ परि०५ . " " M + , [१६२ ] यहु० (जस), द्वितीया पहु० (शस) तृतीया एक. (या). पाठी एक० (स), सप्तमी बहु० (मुप) में प्र>3 का प्रयोग मिलता है। उदा० भर्तु भर्तार:>भत्तुणो,भन् >भत्तुणो, भत्तारे,भा>भत्तुणा, भत्तारेण, भर्तुः>भत्तुणो, भत्तारस, भर्तृपु>भत्तुसु, भत्तारेसु । प्रमदीश्वर के अनुसार उक्त विभक्तियों में भर्तृ> भहि हो जाता है। पितृ, भ्रातृ और जामातृ शब्दों में विभक्तियों से जुड़ने के पूर्व > श्रा हो जाता है। उदा० पितरम् > पियर, पिता > पियरेण, भातरम् > भायर भाना > भायरेश, जामातरम् >जामायर, जामाता >जागाअरेण । पितृ, भ्रातृ, जामातृ शब्दों में प्रथमा एक. (मु) मे->.या का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा. पितृ, पिता> पिया, पिरो, भाता> भाया, भाअरो, जागातृ, जामाता> जामा श्रा, जमाअरो। थतएव पुलिग अकारान्त का रूप-विकास इस प्रकार होगा-- भतृ- एक० बहु० प्र० भत्तारो भत्तारा, भत्तुणो, भत् , भट्टियो द्वि० भत्तारं भत्तारो, भत्तुणो, भत्त, भट्टिको तृ० भत्तारेण, भत्तुणा, भट्टिणा भत्तारेहि, भत्तारेहि पं० भत्तारादो, भत्तारादु, भत्ताराहि भत्ताराहिन्तो, भत्तारासुन्तो प० भत्तारस्त, भत्तुस्स, भत्तुणो, भटियो भत्ताराणं, भत्ताराण स० मत्तारे, भत्तारम्मि भत्तारेसु, भत्तारेतुं, भत्तसु भत्तसं सं० भत्तार भत्तारा, भत्तुणो, भत्त, भेटियो १. उर जश् टाइस् सुप्स वा सूत्र संख्या ३३ त मुदस्यभौमु वा २ पितृ भातृ जामातृणामः नाम्यर ३ पाच सौ मासीन वा , परि०५ प्रा० प्र० ४४ ३४ तू. पाद भ्याo " परि.५ प्र० ० पाद व्या० ३५ परि०५ प्र० " त० पाद " व्या.

7 प० [१६३ 3 प्रात- एक वचन बहु वचन भाया, भायरो भायरा द्वि० भायर भाअरे भायरेण भाअरेहिं, भामरेहि भायारादोभानरादु,भाराहि भाअराहिन्तो, भाअरासुन्तो भायरस्स भायराण, भाअराण भायरे, भारम्मि भाअरेसु, माअरेसु सं० भाग्य, भायर, भायरा ऋकारान्त शब्दों का विकास स्त्रीवाचक श्राकारात के सदृश होता है । व्यंजनात राजन् शब्द के प्रथमा एक० (सु) में अन्> श्रा का प्रयोग मिलता है। उदा. राजन्- राजा> राया। संबोधन में राजन् में अनुस्यार का वैकल्पिक प्रयोग होता है। उदा० हे राधे, हे राय । राजन् शब्द में प्रथमा वहु० (जस् ), द्वितीया बहु० (शस् ), पष्ठी एक० (इस् ) रगणो के लिये-णो का प्रयोग होता है। उदा० राजानः> रायाणो, राज्ञ:> राग्राणो, राज्ञ:> राइणो । क्रमदीश्वर के अनुसार -णो का वैकल्पिक प्रयोग होता है। उदा० राजानः > राहणो, राया । राज्ञः > राइणो, रामाणे, राज्ञ. > रामस्स । राजन् शब्द में द्वितीया बहु० (शस् ) में -ए का वैकल्पिक प्रयोग किया जाता है। उदा० राज्ञः> राए, राइणो, रामाणे, रायाणो । राजन् शब्द में षष्ठी बहु० (श्राम् ) के लिये एं का प्रयोग मिलता है। उदा १.रावरच सूत्र संख्या ३१ . परि प्रा०प्र० " तृ. पाद " प्या. परि०५ " २.मामात्रणेवा बिन्दु ३. जरा शस इसाणो ८.सि, हसायो " " . असूरास् " ३८ ५० २६ ४० तृ० पाद "म्या परि०५ 4. मामोई .

. . 1१६४ ] राशाम् > राश्राएं। राजन् में तृतीया एक. (स) में -ए। का प्रयोग होता है। उदा० राशा> राहणा, रपणा । राजन् में पष्ठी ऐक० (टस्) और तृतीया ऐक० (टा) के अन्त्य व्यंजन का या तो लोप हो जाता है या वैकल्पिक रूप से उसका द्वित्य हो जाता है । उदा० राज्ञ:> राहणो, रगणो, राज्ञा> राहणा, रगणा । 'राजन् के श्रन्त्य व्यंजन का यदि द्वित्व नहीं होता तो तृतीया एक० (टा० ) और पष्ठी एक० (इस् ) के पूर्व - पा योग हो जाता है। उदा० राज्ञा> राहणा, राश:> राइयो । राजन् में पष्ठी एक० (डस् ) के थतिरिक्त अन्य विभक्तियों में भी हो या पं हो तो ->-य जाता है। उदा० राश:>राश्राणो, राशम> रायाणं । अन्य विभक्तियों में राजन् का विकास पुलिंग श्रकारात के सदृश होता है । अस्तु, राजन् का रूप विकास निम्नलिखित होगा- एक० बहु० राया रायाणो, राया द्वि० राय रायाणो राए, रामाणे तृ० राहणा, राणा রছি, যদি पं० राणा, रामादो, रामादु, राथाहिन्तो, राधासुन्तो, राश्राहि राएहिन्तो, राएसुन्तो प० राइणो, रगणो, राणो, रायस्स राथण, राश्राए राए, राअम्मि राएसुं, राए सं० राय, राय रायाणो, राया सूर सं०४१ टोया तृ० पाद २. डसश्च द्वित्त्वं वानरयलोपश्च परि०५ ३. इद दिवे इएममामा तृ. पाद १. आपोरामोरं इति परि०५ इर्मस्य णो णा , तृ० पाद प्र० स० १.टापा परि०५ Ято प्र० व्यात " " ४२ . प्र० . " ४३ ५३ " "व्याo . प्र० ५२ . "व्या.

[१६५] यात्मन् शब्द का विकास अप्पाणमिलता है। अप्पाणो, थप्पा, यत्ता यादि । यात्मन् शब्द का परिवर्तन जब अप्पाण रूप में नहीं होता तो उसका रूप विकास राजन् के सदृश होता है परन्तु इसमे विभक्ति के पूर्व -ई या योग या अन्त्य व्यंजन का द्वित्व नहीं होता । यप्पण का रूप विकास पु० श्रकारात के सदृश होता है। ब्रह्मन् थादि शब्दों का रूप विकास भी यात्मन् के सदृश होता है। उदा० ब्रह्मन् > वहा, ब्रह्माणो, युवन् > जुवा, जुगाणो, अध्वन् > श्रद्धा, श्रद्धाणो। यात्मन् (यत्ता, अप्पा) शब्द का रूप-विकास इस प्रकार होगा- एक० बहु० प्र. अत्ता, अप्पा, अप्पाणो यत्ता, यताणो, अप्पा, अप्पाणो, थप्पाणा दि, यत्तं, अप्प, अप्पा अप्पागो, अप्पाणे, थप्पासा तृ. यत्तणा, थप्पणा, श्रप्पाणेण श्रत्तेहिं, यत्तेहि, अपेरि, अप्पेरि, अप्पाणेहि, अप्पाणेहि प. श्यत्ता, थत्तादो, श्रत्तादु, श्रचाहिन्तो, अत्तासुन्तो, अप्पा. अत्ताहि, अप्पा, अप्पाणहि, हिन्तो, अप्पामुन्तो, अप्पाणा- अप्पादो, यप्पादु, थप्पादि, हिन्तो, अप्पाणामुन्तो, श्रप्पाणे श्रप्पाणा, अप्पाणादो, अप्पाणंदु हिन्तो, अप्पाणेमुन्तो ५० थत्तरस, यत्तणो, श्रप्परस, यताण, थत्ताण, अप्पाणं, शप्पयो, अप्पाणस्स थप्पारण, अप्पाणाण, थप्पाणारा म. श्रत्ते, अत्तम्मि, अप्प, अप्पम्मि, अतेसु, थत्तेमु, अप्पेसु, श्रप्पेमु, यप्पागो, श्रप्पायम्मि थप्पाणेसु, अप्पाणेमु परि०३ प्रा०प्र. . M " मरमनोलोरा मास.५५ २पिमरानपरनारों पुग्दा मागो रामा ३.मारमा नृ० पार "या. परि०५ प्रत । [१६६ ] एक वचन बहु वचन सं, अत्तं, अत्त, अप्पं, श्रम्प, थत्ता, अत्ताणो, अप्पा, अप्पाणणे, श्रप्पाण अप्पाणा 'सर्वनाम और संख्यावाचक शब्दों का रूप-विकास- प्राकृत में संशा के विभिन्न रूपों में ध्वनि-परिवर्तन और सादृश्य. के कारण जो सरलता प्राप्त होती है वह सर्वनाम श्रादि रूप के विकास में भी मिलती है। उनमें बहुत अधिक भिन्नता नहीं मिलती। संस्कृत की जिन विभक्तियों का योग संज्ञा रूपों में होता है प्राय: उन्हीं का योग सर्वनाम श्रादि रूपों में भी पाया जाता है। इसीलिये संज्ञा, सर्वनाम श्रादि रूपों में पर्याप्त समानता मिलती है। प्रारंभिक प्राकृत पालि में सर्वनामों का रूप-विकास संज्ञा-रूपों के सदृश होता है। कुछ ही रूपों की विभिन्नता मिलती है। पुरुष- याचक सर्वनामों में उत्तम पु०, मध्यम पु० के प्रयोग तीनों लिंगों में समान होते हैं। उत्तम पु० नम्ह ( अहं) का प्रथमा एक० (सि) में अहं रूप होता है।' प्र. बहु० यो में मयं स्मा, अम्हे रूप मिलते हैं। प्रथमा से लेकर चतुर्थी और पष्ठी पहु.. में अम्ह का णो और तुम्ह ( मध्यम पु०) का वो रूप होता है । तृ० एक० ना और च० प० एक० (स) में अम्ह का 'मे' और . तुम्ह का 'ते' विकल्प से मिलता है। द्वि. एका० ( अं) में श्रम्ह का मं, ममं और 'तुम्ह' का (तं, तवं) होता है ।५ द्वितीया बहु (यो) श्रम्ह का अम्हं, अम्हाक, अम्हे और तुम्ह के तुम्हें तुम्हाक, १ सि म्हह सूत्र संख्या २१३ काण्ड २ मोग्गल्लान ज्यान २.मय मस्माम्द स्स ३ योनं विस्व पञ्चम्या पोनो २३५ ४.ते मे ना से २३६ ५ भम्हितं मं तवं मम २२६ २११ " " . " " " , [१६७ ] तुम्हे मिलते हैं। तृतीया० एक० (-ना), पंचमी एक० (-स्मा) में अम्ह का मया' और तुम्हे का तया होता है । चतुर्थी, पष्ठी एक० (स) अम्ह का 'मम, मय्ह', तुम्ह का 'तय, तुम्हं' मिलता है। चतुर्थी, पष्ठी बहु० (-स, नं) में अम्ह का अस्माकं, अम्हाकं, मर्म, मम होते हैं। पष्ठी यहु. में श्रम्ह का थम्हं, श्रम्हा, तुम्ह का तुम्हं, तुम्हाकं मिलते हैं १५ सप्तमी एक० (-स्मिं) में श्रम्ह का मयि और तुम्ह का तयि हो जाता है। सप्तमी बहु० (-मु) में श्रम्ह का वैकल्पिक प्रयोग अस्मा मिलता है। उदा० अस्मासु, अस्मामु। प्र० एक० (-सि) और द्वि० एक० (-अं) में तुम्ह का त्वं, तुवं मिलते हैं । तुम्ह के तया और तयि के (-त>-त्व ) वैकल्पिक प्रयोग उदा. त्वया, तया, त्वयि, तयि। तुम्ह का पंचमी एक -स्मा> -म्हा मिलता है। प्रथम पुरुष सर्वनामों के दो रूप दूरवर्ती अमु (यह) और पार्श्ववती एत, इम ( यह) निश्चयवाचक सर्वनामों के अनुसार मिलते हैं और इनके रूप तीनों लिंगों में कुछ भिन्न होते हैं। द्वितीया विभक्ति में इन, एत का न रूप हो जाता है। "-सं,-स्सा, का०२ मोग्ग भ्या० " " " " " " . दुतिये योमिय सूत्र सं० २३३ २.ना रमा मतया मया २३० ३ तव मम तुम्ह मई से २३१ ४ नं से स्वरमा मम २१२ ५.ई.सकनधि २३२ स्मि मि तुम्हा म्हानं तयि मयि २२८ ७.सुम्दागहरसा रमा २०५ ८.सुम्द स तुर्व स्वमसि ६.तया तयो नववा तम्म २१५ १०.रमा बिमा 1. मैदान मैना न्यादे से दुनिया १६६ " . " " . " .. " " " " " .

[१६] रसाय के पूर्व एत, हम ग्रादि के अन्त्य स्वर-अ>- मिलता है।' उदा० एतिस्सं, एतिस्सा, एतिस्साय श्रादि । पुलिंग तथा स्त्री० में -प्र० एफ० (सि) में इम>अयं हो जाता है। उदा० अयं पुरिसो, वयं इत्थी, पु० तथा नपं० में तृ० एक० (ना) में इम>अन, इमि मिलता है। उदा० अनेन, इमिना । पु० तथा नपुं० में सप्तमी बहु० (सु)- ५० बहु० (नं.), तृ० पं० बहु० (हि) में इम>-ए का वैकल्पिक प्रयोग किया जाता है। उदा० एसु, इमेसु, एसं इमसं, एहि, इमेहि । पु. एक० (सि), द्वि० एक० (अं) में इग> इदं का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। पुलिंग तथा स्त्री० में प्र.. एक० (सि) में श्रमु>असु होता है। उदा० असु पुरिसो, असु इत्थी । उक्त प्रयोग में-क के बागम होने पर भी अमु>असु मिलता है।" उदा० असुको, अमुको, सुका, अमुमा श्रादि । पुलिग में प्र. द्वि० बहु०-यो का अमु के बाद लोप मिलता है। उदा० अमू पुरिसा चतुर्थों एक० (स) में अमु में-नो विभक्ति का प्रयोग नहीं होता। उदा० यमुरस । नपुं० मे प्र० एक० (सि,) द्वि० एक (अं) मे अमु> पहुंका वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। अस्तु, पुरुषवाचक सर्वनाम के रूपों का विकास निम्नलिखित होगा- १. स्सस्सस्सास्थि तरे कुन्नेतिमा न मि सूत सं० ५४ का०२ मोग्ग० म्या० २. सि म्ह नपुंसक स्सा यं १२६ ३. ना म्ह निमि ४. श्म स्सा निस्थिय ? ५इम रिसद वा ६. मरसा मुस्त ७. केवा ८. लोपो मुस्मा ६. न नो सस्स १०, असुस्सा " " " " . "" " " " १२७ २०३ १३१ १३२ " " " " " " " २०४ " -- पु० मं, मम मया, मे " " [१६६ ] अम्ह (अस्मद्)- एक० बहु. प. अहं मयं, अस्मा, अम्हे, नो अम्हं, अम्हाक, अम्हे, नो त० अम्हेहि, अम्हेभि, नो पं० मया छ. मम, मय्हं, अम्हं, श्रम्हाक, अम्हं, अम्हे, नो ममं, मे स० मयि अस्मासु, अम्हेसु तुम्ह (युष्मद्)- प० त्वं, तुवं तुम्हे, वो पु० तं, तवं, त्वं तुवं त. स्वया, तया, ते तुम्हेहि, तुम्हेभि, वो पं० छ तव, तुम्हं, तुम्हें, ते तुम्हाकं, तुम्हे, वो सं० त्वयि, तयि तुम्हेगु एत (एतद्) पु० प० एसो एते दु. एतं, एनं त. एतेन एतेहि, एतेभि पं० एतम्हा, एतस्या, एतस्स एतेसं, एतेसानं स. एतम्हि, एतस्मि एतेसु एन (एतद्) -न ५०, दु. पतं एते, एनानि शेष रूप पुलिंग एत के सदृश होते हैं। "" ,तुम्हं, तुम्हांक " त्वम्हा " - [१७] एत-( तद्) स्नी. एक. प० एसा बहु एता, एतायो दु० एतं " तक एताय एताहि, एतामि " " एतिस्साय, एतिस्सा एतासं, एतासानं स० एतिरस, एतस्सं, एतासं एतासु (इदम्) पु० पं० श्रयं इमे दु. इगं " त. अनेन, इमिना एहि, एमि, इमेहि, इमेमि पं० यस्मा, इमस्मा, इमम्हा छ० अस्मा, इमस्स एस, एसानं, इमेस, इमेसान स० अस्मिं, इमस्मिं, मन्दि एमु, इमेसु इम-नपु० प० दु० इदं, इमं इमे, इमानि शेष रूप पुलिंग इम के सदृश होते हैं। इम (इदम् ) स्त्री० प. अयं दु० इमं इमाय इमाहि, इमामि इमा, इमायो " त. छ. ", अस्साय, अस्सा, इमिस्साय, इमिस्सा इमासं, इमासानं स० अस्सं, दमिस्स, इमासं इमासु अमु (अदस् )-पु० प० यसु, यमु दु० अमु श्रमू, अमुयो " - " " अमू, [ १७१ ] त० यमुना अमूहि, अभूमि . पं० "थमुम्हा, अमुस्मा छ० श्रमुस्स, अमुनो अमूसं, अमूसान. स० अमुम्हि, अमुस्मि श्रमूसु श्रम (अदस् ) नपुं० प. दु० अदु, अमुं अमू, अमूनि शेष रूप पुलिंग अमु के सदृश होते हैं। श्रम (श्रदस् ) स्त्री० प० असु, अमु अमुयो दु० अ त० यमुया यमूहि, अमूभि पं० यमुस्सा अमूसं, अमूसानं स० अमुरसं, अमुयं श्रमूस सर्व श्यादि के प्रथमा बहु० ( जस् ) में ए का प्रयोग मिलता है। उदा० सर्वे> सव्वे, ये> जे, ते > ते, के> के, कतरे> कदरे।। सर्व अादि के सप्तमी एक० (-डि) में स्सि, -म्मि, -स्य विभक्तियों का प्रयोग मिलता है । उदा. सर्वस्मिन> सबरिसं, सव्वम्मि, सव्यत्य, इतरस्मिन् > इअररिसं, इयरम्मि, इअरत्य । इदम् , एतद्, किम., यद्, तद् शब्दों में तृतीया एक० (टा ) में वैकल्पिक रूप से -इणा का प्रयोग होता है। उदा. अनेन> " " " " - सूत्र संख्या १ परिच्छेद मा०प्र० १ सदिर्जस एवम् अतः सदिजेंसिः २. हे रिस-म्मि-त्या: ध्या. १० पाद "" " २ परि०५ " प्र. ३. उदमेत लियचद्मयश दया या ३ परि०६ १०- [ १७२ ] इमिया, हमेण, एतेन> एदिणा, एदेण; 'फेन> फिणा, येत्य, येन> जिणा, जेण, तेन> तिण, तेए । इदम् श्रादि शन्दों फे पप्ठी बहु० (-याम् ) में वैकल्पिक रूप से एसिपा प्रपोग मिलता है।' उदा० एपाम> इमैसि, इमाण, एतेषाम्> एदेसि, एदाण, केपाम> केति, काण, येपाम> जेसिं, जागा, तेपाम> तेसिं, ताण । किम् , यद् और तद् शब्दों में पष्ठी एक० (इस् ) में वैकल्पिक रूप से -यास का योग पाया जाता है। उदा० कस्य> कास, करस, यस्य, जात, जस्स, तस्म> तास, तस्स । किम् , यद् और तद् शब्दों के स्त्रीवाचक रूपों में पष्ठी एक० (इस् ) में -स्सा का प्रयोग हुया है। उदा० कस्या:> किस्सा, ( कीसे, कीया, कीए, कीय, कोह, कोउ)। यस्या:> जिस्सा, (जीसे, जीश्रा, जीए, जीश्र, जीइ, जीउ), तस्याः> तिस्सा, ( तीसे, तीया, तीए, तीश्र, तीइ, तीउ)। किम् , यद् और तद् शब्दों के सप्तमी एक० (टि) में बैकल्पिक रूप से -हिं का प्रयोग मिलता है। उदा० कस्मिन् > कहि, ( कस्सि, कम्मि, कत्य ) । यस्सिन् > जहिं (जरिंस, जम्मि, जत्थ ), तस्मिन > तहिं, तम्सि, तमिल, तत्य)। उपर्युक्त किम् , यद् और तद् शब्दों का समयवाची अर्थ में सप्तमी एक० (डि ) में वैकल्पिक रूप से याहे और -इया का सूत्र सं०४ परि०६ तृ० पाद प्रा०प्र० व्या० १.आम एमि मामो हैसिं २.कियत्तमयो इस पास: किंतद्भयोडसः ३.६मयः स्मा से द्मयः रस से " ५ ६३ ६ " प्र. तृ. पाद परि०६ त० पाद परि०६ व्या. ७ प्र० . नवानिदमेहदो हि ३० " १. पार व्या.

[१७३] प्रयोग मिलता है। उदा. कहा> काहे, कइया, काह, यदा> जाहे, जइया, जहिं, तदा> ताहे, तइया, तहिं । उपर्यत सर्वनामों में पंचमी एक० (डसि ) में -तो और -दो का प्रयोग होता है । उदा० कस्मात् > कत्तो, कदो, यस्मात् > जत्ती, जदो, तस्मात् > तत्तो, तदो। तद् सर्वनाम के पंचमी एक० (डसि) में वैकल्पिक रूप से -श्रो का योग .होता है। उदा० तत्> तो, तत्तो, तदौ ।उक्त सर्वनाम तद् में पष्ठी एक० (डस्) मे वैकल्पिक रूप से "से का विकास मिलता है। उदा० तस्य, तस्याः> से, पुल्लिग में तास, तस्स रूप भी मिलते है । तद् शब्द में षष्ठी बहु० (-श्राम) में वैकल्पिक रूप से 'सि' का प्रयोग होता है। उदा. तोपा, तासां> सि, ताण, ताणं, तेसिं। हेमचन्द्र ने उक्त प्रयोग का उल्लेख इद्म, एतद्, तद् के सब लिगों में किया है । किम् सर्वनाम का विभक्तियों के जुड़ने के पूर्व -क रूप हो जाता है। उदा० को, के, केण, केहिं । इदम् सर्वनाम का विभक्तियों के जुड़ने के पूर्व इम रूप हो जाता प्रा०प्र० सूत्र संख्या ८ परिच्छेद तृ० पाद ६ "म्या० परि०६ " म. " १.भाहे इश्रा काले है.हि डाला इग्रा काले '२.तो दो ङसेः ३. तदोश्च तदो दोः ४. इसा से ईमयः स्सा से ५. मामा सिं " तृ० पाद या. " ११ परि०६ " प्र० ४० पाद " ध्या० १२ परि० प्र० किम-कः " " १३ ७१ ६८ "प्या. " न्या. किमः कस्त्र तसौश्च किमो डियो-डीसी तपाद " " व्या- । [ १५४ ] है। और पंचमी बहु० (भ्यस् ) में -इणा जड़ जाता है | उदा. इमो इमे, इमेण, इमेहि, इमिणा, एदिशा, क्णिा, जिणा, तिणा। इदम् सर्वनाम का पष्ठी एक-स्स और सप्तमी एक-स्सि के पूर्व वैकल्पिक रूप से - मिलता है। उदा० श्रस्य> अस्स, इमस्स अस्मिन् > अस्सि, इमस्मिं । इदम् सर्वनाम में सप्तमी एक. (दि) में वैकल्पिक रूप से-इ का योग हुया है। उदा० अस्मिन् > इइ, अस्सि, इमर्सि, इमम्मि । इमत्थ रूप का प्रयोग नहीं होता। सप्तमी एक० (डि ) मे इदम् का -त्य रूप नहीं मिलता है। इदम् सर्वनाम का प्रथमा एक० (सु) द्वितीया एक० (अम् ) का नपुसक लिंग में विभक्तियों के जुड़ने के पूर्व इदम् इणम और इणमो रूप हो जाता है। एतद् सर्वनाम का प्रथमा एक० (सु) में -यो का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा० एपः>एस, एसो। एतद् सर्वनाम का पंचमी एक० (डसि ) में वैकल्पिक रूप से -तो का योग होता है। उदा० एतस्मात् >एतो, एदादो, एदादु, एदाहि। एतद् शब्द में -त १. इदम, इम सूत्र सख्या १४ परि प्रा.भ. " " तपाद व्या. " ६६ तृ. पाद या. इदमेतल्कि-यत्त गयी जिया २ सि स्सिमोरदा स्सि-स्सयोरयत् परिक प्र० व्या. ७४ तृ० पाद . परि०६ . " म. मेन। नस्थ १३ ७५ " त० पाद व्या. परि०६ " प्र. " तृ० पाद गच्या " प्र. १. नपुसके स्वभौरिदमिणमियमो क्लीवे स्यमेददामियमोच ६. एतद सावोव वा परि०३ तू. पाद सरि०६ " ७६ १६ व्या. " भ. " ७.चोट से " २० U चैतदौ उसस्तीचाहे " ८२ त. पाद भ्या० .

[ १७५] का-तो और-त्य के पूर्व लोप हो जाता है। उदा० एतस्मात् > एत्तो, एतस्मिन>एत्य । तद् और एतद् का पुलिंग और स्त्रीलिंग मे-त के स्थान पर-स का प्रयोग थमा एक० की विमक्ति (सु) के पूर्ण होता है। उदा० स: पुरुष>सो पुरिसो, सा-महिला>सा- महिला, एसो, एस, एसा । हेमचन्द्र के अनुसार नपुंसक लिंग में भी स का रूप मिलता है। अदस सर्वनाम के -द के लिये-मु का प्रयोग विभक्तियों के जुड़ने के पूर्व मिलता है और इसका विकास उकारान्त संशा के अनुसार होता है। उदा० असौ पुरुष:>यमू पुरिसो, असो महिला>अमू महिला, श्रमी पुरुषा:>अभूयो पुरिसा, अमूः महिला:>अमूत्रो महिलाश्रो। अदः वनम् >य, वणं, अनूनि वनानि>श्रमुई वणाइ । अदस् सर्वनाम के-द के लिये प्रयमा एक० (मु) मे वैकल्पिक रूप से सभी लिंगों में,-ह का योग मिलता है।" उदा० श्रह पुरिसो, श्रह महिला, अह यणां । अदस् का सप्तमी एक. (दि) में इयम्मि, अयम्मि रूप मिलता है। उपर्युक सर्वनामों के पुलिंग स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंगों के रूप इस प्रकार होंगे- सर्व>सय-पुलिंग- एक. बहु सव्यो १.सोल्ययोस्वलोपः सूत्र सं० २१ पेच तस्य सुरु २. देवदोः सः सावनपुंसके परि०१ ५ वरचसोहोरे ह. पाद .४ पदसोदो मुः परि६ . सम्बे परि०६ प्राot. " तृ० पाद प्या. ८३ ૨૨ . प्र. " " " म्या २३ भ० मुः स्याती " ८८ ६. पार प्पा २४ पति " ५.रच सौ बादसो दस्य होनताम् १. मापौवा ८७ " [ १७६ ] बहु वचन " एकवचन द्वि० सव्यं सचे तृ. सव्वेए सब्वेहि, सन्धेहि प. सम्बादो, सबादु, सव्याहि सन्याहिन्नो सन्त्रासुन्तो प. सव्वस्स सव्याण, सञ्चाण स० सव्वस्सि, सव्यम्मि, सव्वेसु, सव्वेसु सुव्यस्थ सम्व-स्त्रीलिंग प्र० सव्या सव्यायो, सव्वाउ, सन्या द्वि० सव्य त० सम्वाद, सवाए सव्याहि, सब्वाहि प० सव्वादो, सव्याहि सव्वाहिन्तो सव्वासुन्ती सवारि प० सव्वाइ, सवाए सव्वारा स० सव्वास, सव्यामु " " " सव्वाण, " सव्व नपु० प्र०, सव द्वि० सवाइ, सव्वाइ, सध्याणि शेष रूप पुलिंग के सदृश विकसित होते हैं। इदम् (इम) पुलिंग- प्र० इमो इमे द्वि० इर्म तृ० इमेण, इमिणा इमेहि, इमेहि प० इमादो, इमादु, इमाहि इमाहिन्तो इमासुन्तो इमस्स, थस्स इमाण, इमाण, मेसि इमस्सि, इमम्मि, दमेसु, इमेसु अस्सि, इइ च०५० .

प्र० [ १७७ ] इमा (इदम्)- स्त्रीलिंग एक० बहु० इमा इमायो, इमाउ, इमा द्वि० १० इमाइ, इमाए इमाहि, इमाहि शेष रूप स्त्रीलिंग सर्व के अनुसार विकसित होते हैं। इम (इदम्)-नपु० प्र. द्वि० इदं, इणं, इणमो इमाइ, इमाइ, इमाणि शेष रूप पुलिंग के सदृश होते हैं। किम्-पुलिंग प्र० को के द्वि० कं ४० फेण, किया केहि, फेहिं पं० कदो, कत्तो काहिन्तो, कासुन्ती प० कस्स, कास काणं, काण, केसि स० कस्सिं, कम्मि, कत्य, केसु, केसुं कहि, कस्सि किम् - स्त्रीलिंग कायो, काउ, कीश्रो, कीउ द्वि० के तृ०, कीणा, काए, काइ, काहिं, काहि, कीहिं, कीहि कीए, कोइ, की, कीया पं० कादो, कादु, कादो काहिन्तो, कासुंतो, कीहिन्तो, कीदु, कोण कोसुन्तो कस्सा, किरसा, पासे, कासां, केसि, कासिं, काणं, कीसे, कीए, कीइ, पाण, कीणं, कीय कीय, कीया, काइ, काए का प० [ १५० ] " प. एक. बहु० पाए, काइ, कीए, कोइ, पासु, मासु, पी, पीसु कीया, पीथ पाहे, पाया पिम् - नपु० प० द्वि० के पाई, काइ, पाणि शेष रूप पुलिंग के सदृश विकसित होते है। यद्-पुलिंग स्त्रीलिंग जो जे द्वि० सं तृ० जेण, जिया जेहिं, जेहि पं० जेतो, जदो जाहिन्तो, जासुन्तो जस्स, जास जाण, जाण, जेसि स० जरिंस, जम्मि, जत्थ, जेसु, जेमु जहि, जाहे, जइबा, जस्सि यद्-स्नीलिग जा जायरे, जाउ, जीबरे, जीउ द्वि० ज तृ. जीणा, जाए, जाइ, जीइ जाहि, जाहि, जीहिं, जीहि जीए, जीश्र, जीया पं० जादो, जादु, जीदो, जीदु जाहिन्तो, जीसुन्तो, जीहिन्तो, जीसुन्तो जस्सा,जिस्स, जासे, जीसे, जीए, जासा, जेसि, जाति, जीसि, जीद, जीश्र,जीया, जाइ , जाए जाणं, जाण, जीणं, जीणा, जाए, जाइ,जीए, जीइ, जीय, जासु, जानु, जी, जीमु जीया, जाहे, जया . प० [ १७६-] यद्-नपुं० एक० बहु० प्र० द्वि० जं जाई, जाइ, जाणि शेष रूप पुलिंग के सदृश विकसित होते हैं। तद्-पुलिंग एक० वहु० सो द्वि० तं तृ० तेण, तिणा पं० तत्तो, तदो, तो ताहिन्तो, तासुन्तो से तेसिं, ताणं प्र. हिं, तेहि तस्स, तास, वाण, सि तेसु', तेतु स० तस्सिं, तम्मि, तत्य, तर्हि, ताहे, तइया, तस्सि एक० बहु० विद्-स्त्रीलिंग " सा ताश्री, ताउ, तीयो, तीउ द्वि० तं ताइ, ताए, तीए, तीइ ताहिं, ताहि, तीहि, तीहि तीय, वीया, तीणा पं० तादो, तादु, तीदो, तीदु ताहिन्तो, तामुन्ती, तीहिन्तो तीसुन्तो तस्सा, तिस्सा, तासे, तीसे, ताए, तासां, तेसि, तासि, तीसिं, ताद, तीए, तीइ, तीन, ताणं, ताण, तीणं, तीया, से तिए, सिं स. ताए, ताइ, तीए, तीइ, तीय, तासं, वासु, तीसु, तीसु तीया, ताहे, तइया एक० एस, एसो प० [१०] एतद्-नपुं०, वहु. प्र० द्वि० नं ताई, ताइ, ताणि शेष रूप पुलिंग के सदृश मिलते हैं। एतद्-पुलिंग प्र० एदे द्वि० एर्द तृ० एदेण, एदिणा एदेहि, एदेहि यं० एत्तो, एदादो, एदादु, एदहि एदाहिन्तो, एदासुन्तो एदरस एदेसि, एदाणं, एदाण स० एदस्सिं, एदम्मि, एत्य, एदेमु, एदेसु इत्थ एतद्-नीलिंग प्र० एसा एदानो, एदाउ द्वि० एदाइ, एदाए एदाहि, एदाहिं शेष रूप सर्व, इदम् (स्त्री० ) के सदृश प्रयुक्त होते हैं । एतद्-नपुं० द्वि० एवं एदाई, एदाइ, एदाणि शेष रूप पुर्लिंग के समान गिलते हैं। अदस-पुलिंग प्र० अम्, यह भूयो, अमुणो अम्, अमुणो, अमू तृ० अमुण अमूहि, अमूहि पं० श्रमूदो, अमूदु, अमूहि श्रमूहिन्तो, श्रमसुन्तो प० अमुणो, अमुस्स अमूणं, अमूण स० अमुस्सिं, श्रमम्मि, श्रमूस, अमुसु यमुत्थ प्र० द्वि० अमु [११] अदस-स्त्रीलिंग एक० बहु० अमूयो, अमूउ, अमू प्र० अमू , अह द्वि० अमुं प० स० प्र० तृ० अनूए अनूद, अमूथ, अमूया अमूहि, अमूहि , अमूदो, अमूदु, अमूहि अमूहिन्तो, अमूमुन्तो प० अमूए, अमूह, अमूग, अमूया अमूणं, अमूण अमृमुं, अमूम अदसू-नपुं० यह, अम अमूई, अमूइ, अमूणि द्वि० श्र, अमूइ, अमूणि शेष रूप पुलिंग के समान मिलते हैं। पुरुषवाचक सर्वनामों का रूप-विकास प्राकृत-प्रकाश में सूत्र संख्या २६-५३ में मिलता है। एक पद के लिये अनेक रूपों के प्रयोग मिलते हैं। युष्मद् के प्रथमा एक वचन (सु) में तं, तुम और हेमचन्द्र के अनुसार तुं, तुवं, तुह का विकास मिलता है। युष्मद् के द्वितीया एक वचन (अम्) में तुं, तुम, तं के प्रयोग मिलते हैं।' युष्मद् के प्रथमा बहुवचन (जस्) परिच्छेद प्रा० प्र. सूत्र सं०२५ २६ है " १.पदस्थ २. युष्मदरतं तुम युष्मदस्त तु, तुवं, तुह, तुम सिना ३.तं चामि तं तुं तुम तुर्व तुह तुमे तएममा ६० तृ० पाद व्या. २७ परि०६ भ. " દ १० पाद च्या .

[१८२] में तुझे और तुम्हे का विकास हुया है।' युष्मद् के द्वितीया बहुवचन (शस ) मैं तुझे, तुम्हे और वो के प्रयोग मिलते हैं। युष्मद् के तृतीया एक वचन (टा) और युष्मद् के सप्तमी एक वचन (डि) में क्रमश: त्वया, अयि> तइ, तए, तुमए, तुये के प्रयोग मिलते हैं । युप्मद् के पष्ठी एक वचन (डस्) में ते> तुमो, तुद तुझ, तुम्ह, तुम्ग का प्रयोग मिलता है। प्रमदीसर के अनुसार तुव, नुम्म के प्रयोग भी होते है। भारतीय वय्याकरणों के अनुसार तृतीया एक०-याट का रूप पाश्चात्य वय्याकरणों के द्वारा निर्देशित-या है। युष्मद् के तृतीया एक० (याड) मे त्वया> ते और युष्मद् के पष्ठी एक० (डम्) में तष> ते मिलते हैं। युष्मद् के तृतीया एक० (बाड) में त्वया>तुयाइ पा वैकल्पिक प्रयोग मिलता है । युष्मद के तृतीया बहु० (भिस्) में युष्माभि:> नुज्मेटिं, १. तुझे तुम्हे जसि सूत संख्या २८ परि०६ भे तुम्भे तुम तुम्ह तुम्हे उव्हे जसा पाद २.वो च शसि २६ परि०६ २. टाइयोरतइ तए तुमए तुये तुमे तुमए तुभाइ तइ तए हिना ४. डसि तुमो तुह तुझ तुम्ह तुम्मा तस्तुब तुम तुथ तुम्मा डसौ ५. भाडि च ते दे ३२ परि०६ भे दि दे ते तइ तए तुम तुमइ तुमए तुमे तुमाद टा ६४ तृ. पाद तह तु ते तुम्ई तुह तुहं तुव तुम तुमे तुमो तुमाद दिदै ३ ए तभोग्मोरहा हसा ६६ त. पाद २. तुमार च ३३ परि०६ प्रा०प्र० " ६१ तुः "व्या प्रत " " " " १०१ तृ० पाद "व्या ३. परि०६ " प्र. व्या. " " " व्या० " " " . प्र [ १८३ ]] तुम्हेहि, तुम्हहि के प्रयोग मिलते हैं। क्रमदीसर के अनुसार तुम्मेहि, तुम्मेहि का विकास तुम्हेहिं या तुम्हेहि के आधार पर हुआ है इसलिये तुज्भेहि, तुम्हेहि के अनुस्वार रहित रूप के भी प्रयोग होते हैं। युष्मद् के पंचमी एक. ( डसि ) मे तत्तो, तदत्तो, तुमादो, तुमादु, तुमाहि रूप मिलते है। युष्मद् के पंचमी बहु. में युष्मद > तुम्हाहिन्तो, तुम्हासुन्तो रूप मिलते हैं। युष्मद के पष्ठी बहु. में युप्माकम् , व: > वो, तुज्माणं तुम्हाणं का प्रयोग होता है। युगद् के सप्तमी एक० (डि) में तुमम्मि का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है ।५ क्रमदीयर के अनुसार तुमम्मि.और तुमस्सि दोनों रूप मिलते है । युष्मद् के सप्तमी बहु० (सुप) में युष्मासु > तुझे, तुम्हेसु रूप मिलते है। अतएव मध्यम पुरुष सर्वनाम युष्मद् का रूप पिकास इस प्रकार होगा- युष्मद- वहु. प्र० त्वं, तुवं तुम्हे । एक० प्रा०म० " "च्याo . " प्र० . १. तुझेहिं तुम्हेहिं तुम्मेहिं मिसि सूत्र संख्या ३४ परि०५ भै तुम्मेहिं उज्नेहिं उम्हेहिं तुम्हेहिं उम्हेहिं भिसा ६५ तृ. पाद २. सौ तत्तौ ताचो तुमादो तुमादु तुमाहि ३५ परि०६ ३ तुम्हाहिन्तो तुम्हासुन्तो भ्यसि ४. यो तुझाण तुम्हाणमामि तबो मे तुम्भं तुम्भाण तुवाय तुमाण तुहाण उम्झाए श्रामा १०० ४० पाद ५. कौतुमम्मि ३८ परि०६ तु तुव तुम तुम तुम्भा दौ १०२त. पाद ६. तुझमु तुम्हेमु सुपि ३६ परि०६ " " " " न्या. प्र० व्या. प्र० " " [२८४3 बहु द्वि० तं, तवं, खं तुम्हाक, तुम्हे तृ० वया, तया तुम्हेहि, तुम्हेभि पं० प० तय, तुम्ह, तुम्हं तुम्हा, तुम्हें स० स्वयि, तयि तुम्हे उत्तम पुरुष सर्वनाम अस्मद् का प्रथमा एक० (सु) में यहम् > हं, यह, अयं रूप मिलते हैं। मागधी में यह के विकसित रूप हके, हगे, यहके और तृतीया मे हक मिलते हैं। अस्मद् के द्वितीया एक० (यम् ) में माम् > अहम्मि और प्रयमा एक० मे भी ग्रहम् > अहम्मि मिलता है ।२ हेमचन्द्र के अनुसार णे, णं, मि, यम्मि श्रम्ह, मम्ह ग्रादि रूप मिलते हैं। अस्मद् के द्वितीया एक० (अम्) में माम् , मा > म, ममं का विकास मिलता है।' अस्मद् के प्रथमा बहु० (जस् ) में वयम् और अस्मद् के द्वितीया बहु. ( शस्) में अस्मान् , न: > अम्हे का प्रयोग मिलता है ।। हेमचन्द्र ने अम्हो, अम्ह, णे रूप भी दिये है। अस्मद् के द्वितीया बहु० (शस्) में अस्मान् , नः>शो का प्रयोग १. मस्मदो इमहमहयं सौ सूत्र संख्या ४० परि०१ अस्मदी मिअश्मिभम्हि द अह अहयं सिना १०५ तृ० पाद २अहम्मिरभिच ४१ परि०६ प्रा०प्र० 4. " " " येणं मिमम्मि अम्द माह म मर्म मिम अह भमा ४.भम्हे जशप्तो अम्दे भरतो अम्हणेशमा व्या. प्राव १०७ तृ०पा० ४३ परि०६ १०८, तृ० पा० १०३ " व्या. " " [१५] मिलता है। हेमचन्द ने णे का प्रयोग भी दिया है। अस्मद् के तृतीया एक० (बाड) में मया> मे, ममाइ के प्रयोग मिलते हैं। हेमचन्द्र ने मि, ममा, ममए, मइ, मए, मयाइ, णे के भी उदाहरण दिये हैं। अशोकी प्राकृत में ममया, ममिया रूप मिलते हैं। अस्मद् के सप्तमी एक० और तृतीया एक० में प्रमशः मयि > मइ और मया > ममए के प्रयोग मिलते हैं 13 अस्मद् के तृतीया बहु० भिस् में अस्माभिः>अम्टेहि का प्रयोग मिलता है। क्रमदीश्वर के अनुसार अम्हेहिं का अनुस्वार रहित रूप ही मिलता है । हेमचन्द्र ने अम्हाहि, अम्ह, ऐ रूप भी दिये हैं । अस्मद् के पंचमी एक० (टसि) मे मत्> मत्तो, महत्तो, ममादो, ममादु, ममाहि रूप मिलते हैं। हेमचन्द्र ने ममत्तो, मज्झत्तो रूप भी साथ में दिये हैं । अस्मद् के पंचमी बहु० (भ्यस ) मे अस्मत् > अम्हाहिन्ती, अम्हासुन्तो रूप मिलते हैं। हेमचन्द्र ने ममाहिन्तो, ममासुन्तो अादि रूप भी दिये हैं । अस्मद् के पष्ठी एक. मे मम, मे> मे, मम, 'मह, मझ रूपों का । परि०६ Я10 Яo " " " " " १० पाद व्या, " परि०६ " १.पी शासि सूत्र सं०४४ २ श्राहिमें ममा ३ डी च मइ मए मि मे मम ममए ममाद मइभए भयारणेस १०६ ४. श्रम्हहि मिति अम्दे हि अम्हाहि अम्ह अम्हे पेभिमा ११० ५. मचो मरतो ममादो ममदु ममाहिमो मह मम मंद मउभा इसी ६. अम्हाहिन्तो मम्हासुन्ती भ्यसि ४६ ममाम्बी भ्यसि ११२ तृ० पद , ध्यान 4o " तृ० पाद न्य. " परि०६ " प्र० " तृ. पाद न्या. " [१८६] प्रयोग होता है। मध्यएशिया के लेसों में महिय रूप मिलता है। मद्य > मज्झ> महि, मरिय संभावित रूप हो सकते हैं। हेमचन्द्र ने महं, मझ, अम्र, अम् रूप साथ में और दिये हैं। अस्मद् के पप्ठो बहु० (ग्राम) में अस्माकम्, न:> यहाणं, श्रम्हे, श्रम्ह, मझ, णो रूपों के प्रयोग मिलते है। कुछ हस्तलिखित प्रतियों में शी> णे मिलता है। प्रमदीवर के अनुसार मज्म रूप नहीं होता। हेमचन्द्र ने णो, णे, मज्झ, अम्ह, अन्हें, अम्हे, श्रम्हो, यग्राण, ममाण और महाण रूप भी दिये है। अस्मद् के सप्तमी एक० (दि) में मयि> ममम्मि रूप मिलता है। ममदीश्वर के अनुसार ममरिंग रूप भी होता है। हेमचन्द्र ने अम्हम्मि, महम्मि, मझम्मि रूप भी दिये हैं । अस्मद् के सप्तमी बहु० ( सुपू) मे श्रमामु> श्रम्हेमु रूप का प्रयोग होता है। हेमचन्द्र ने ममेमु, ममस, मन्झेमु, अम्सु, महेसु, महसु, मज्मसु रूप और दिये हैं। अतएव उत्तमपुरुप अस्मद् सर्वनाम का रूप-विकास इस प्रकार होगा। एक० व० अस्मद् प० ग्रह, हं, ग्रहयं, अम्मि, मि श्रम्हे, यम (शौर०) १,मे मम मह मज्म इति सूब सं० परि०६ मे मह मम मह मह माझ मझ भम्ह अम्ह इस २. मज्मणो अम्द सम्हाएमम्हे मामि णे णो मज्म अह अम्हं अम्हे अम्दो अम्दाए ममाण महाए मज्माण प्रामा ३ ममम्मि डौ अम्ह मम मइ मज्झाङी त० पाद ५. अम्हेसु सुपि सुपि १९७ Яo Я. " ११३ १० पाद "पाव परि०६ प्र० " त० पाद "व्या ५२ परि०६ " म. " व्या परि०६ " 50 " तृ० पद ध्या m [१८७] एक. द्वि० मं, ममं, अहम्मि, मि तृ० मे, मए, मइ, ममाइ पं० मत्तो, महत्तो, ममादो. ममादु, ममाइ प० मे, मम, मह, मज्क बहु. यम्हे, गो, णे श्वम्हेहि, अम्हेहि अम्हाहिन्तो, अम्हामुन्तो णो, अम्ह, यहाणं, अम्हे. मज्ञ, यम्हो . स० मइ, ममम्मि, ममस्सि अम्हेसु हेमचन्द्र ने संज्ञा यादि रूपो के विकास के यनंतर तृतीय पाद में सून सं० १३१-१३७ में प्राकृत की वाक्य-रचना की कुछ विशेषताएँ भी दी हैं। चतुर्थी एक. बहु० के लिये पष्ठी एक. बहु० पा प्रयोग होता है। उदा० मुणिरस, मुणीण, देवस्स, देवाण । अका- रात च० एक मे इसका वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा० देवत्स, देवाय परन्तु बहुवचन में वही प्रयोग होता है। देवाण। वध शब्द मे अकारात के बाद चतुर्थी एक. मे-याइ और षष्ठी विभक्ति में वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा. वहाइ, वहस्स, वहाय । द्वितीया, तृतीया अादि के स्थान पर भी पष्ठी का प्रयोग कभी कभी होता है। उदा० घणस्स, लद्धो (द्वि०) चोरस्स वीहई (तृ०) श्रादि । द्वितीया, तृतीया के स्थान पर सप्तमी का भी प्रयोग मिलता है। उदा. गामे घसामि, नयरेन जामि (द्वि०), मइ वेपिरीय मलियाई, तिसु तेसु अलकिया पुहवी (तृ.)। पचमी के स्थान पर भी प्रायः त० पार प्रा०या० " " " १ चतुर्या षष्ठी २ तादयंडा ३. वधाडावरच वा ४. क्वचिद् द्वितीयदे: ५ द्वितीया तृतीययोः सप्तमी सूत्र सं० १३१ १३२ १३३ १३४ १३५ " " " " " " " [१] तृतीया और सप्तमी का प्रयोग होता है। उदा० चौरेण बहिइ अन्तेउरे रमिउमागयो राया । सप्तमी के लिये कभी कभी द्वितीया का प्रयोग मिलता है ।२ उदा. विज्जुज्जोयं भरह रति। अर्धमागधी में सप्तमी के लिये तृतीया का प्रयोग पाया जाता है। उदा० तेणं पालेणं, तेणं समएणं । प्रथमा के स्थान पर प्राय. द्वितीया का प्रयोग होता है । उदा० चववीस पि जिणपरा। संख्यावाचक शब्दों का रूप-विकास भी संज्ञा यादि के सदृश ही होता है । सज्ञा, सर्वनाम रूपों में जिन विभक्तियों का योग होता है प्राय. उन्ही का प्रयोग सख्यावाचक शब्दों के विकास के लिये भी किया जाता है । संख्यावाचक शब्द एक का विकास एकवचन मे एक्क, एग रूप में पाया जाता है। शेष का प्रयोग बहुवचन के अनुसार होता है। सख्यायाचक शब्द द्वि का विकास विभक्तियों के जुड़ने के पूर्व दो या वे के रूप मे मिलता है। उदा० द्वाभ्याम् >दोहि, द्वयो >दोस । हेमचन्द्र ने प्र. द्वि० बहु० में दुवे, दोरिण, वेरिण रूप दिये हैं। संख्या- वाचक शब्द तृ का परिवर्तन विभक्तियों के जुडने के पूर्व 'ति' रूप में मिलता है और इसका रूप विकास-इकारान्त संज्ञा के अनुसार होता है । उदा० निमि.> तीहिं, नियु> तीसु । त्रि के प्रथमा बहु० (जस्) के ज्य:, द्विताया बहु० (शस्) के नीन् > तिरिण का विकास मिलता है। द्वि के प्रथमा वहु० ( जस् ) द्वौ, द्वितीया बहु० (शस् ) । १ पचम्यास्ततीया च २, सप्तम्या द्वितीया सून स० १३६ नृ० पाद प्रा.पा. " ३६दों परि०६ . गिण वा " " " " तृ० पाद व्या. दुवै दौरिण वे हिण च जस् शसा ११६ १२० ५५ " " s परि०६ प्र० " [ १८६] का प्रयोग वैकल्पिक रूप मे दुवे और दोणि मिलता है। उदा.. दौ> दुवे, दोणि, स्त्रीलिग, नपु० में दे> दुवे, दोणि । चतुर् के प्रथमा बहु० चत्वार: और द्वितीया बहु० चत्वार: के लिये चत्तारो और चत्तारि रूप मिलते है । उदा. चत्वार. >चत्तारो, चत्तारि । हेमचन्द्र ने पु० बहु० में चउरों रूप भी दिया है। स्त्रीलिंग चतस्त्रः, नपु० चत्वारि > चत्तारो, चत्तारि, षष्ठी बहु०- ( आम् ) द्वि, तृ और चतुर् शब्दों के बाद एहं का प्रयोग होता है । उ }, यो:> दोण्हं, व्यणाम, तिसणाम् > तिरह, चतुर्णाम्, चतराणाम् > चतुण्डं, चउरह । क्रमदीश्वर के अनुसार दोरहं में अनुस्वार नहीं होता। हेमचंद्र ने भी साथ में बिना अनुस्वार के रूप के उदाहरण दिये है। दोण्ह, तिरह श्रादि । कुछ संख्यावाचक शब्दो का रूप-विकास निम्नलिखित होगा--- द्वि०- बहु० दो, दुवे, दोणि, वेरिण द्वि० तृ. दोहिं, वेहि दोहिन्तो, दोसुन्तो, वेहिन्तो, वेमुन्तो दोण्हं, वेण्हं, दोपह, वेगह प्र० " प० प० स० दोसु, वेसु सूत्र सं० ५६ १२१ १.तिरिण जरासरभ्याम् स्तिरिए: २. चतुरश्चत्तारो चत्तारि चतुरश्चत्तारो चउरो चत्तारि ३ एषामामो एई संख्याया मामी रह एई परि० प्रा० प्र. तृ. पाद प्र० " परि०६ " तृ. पाद ध्या. " १२२ ५६ १२३ परि०६ " " तृ० पाद ध्या.

[१०] स्त्री० " " चतुर-- वहु. দিঘি चत्तारो, चउरो, चत्तारि द्वि० तृ. तीहिं चतूहि, चतूहि, चऊहिं, चऊहि तीहिन्तो, तीमुन्तो चत्सुन्तो, चतूहिन्तो, चऊसुन्तो, चऊहिन्तो तिरह, तिरह चतुरहं, चउपह, चतुरह, चउराह तीसु चन्सु, चय पट- पुलिंग पुलिंग स्त्री० प्र. पञ्च पञ्चा छ छायो द्वि० त. पञ्चहिं पच्चाहिं छहिं प० पञ्चगणं, पञ्चण्हं छरणं स० पञ्चसु. पञ्चसु पञ्चासु छसु सप्तम्- अष्टमू- सत्त अढ, यह द्वि. सत्तहिं अहि सत्तरह अठ्ठएई, अट्ठरह स० सत्तम अट्ठम् नवम्- दशम्- प्र० गव दस, दह द्वि० ४० वहिं दसहिं, दसहि, दशेहिं णवरह, णवण्ह दसान, दसरहं, दसरह, दशान गवसु दससु छाहिं " " प० प.

(अमा०, [११] संस्कृत की संख्यायों का प्राकृत में निम्नलिखित रूप उपलब्ध होता है- एकादश> एकारस, इक्कारस (अमा० ), एयारह (माहा०।। द्वादश > दुवादस (अ० प्रा० ), वारस, दुवालस (अमा०), धारह ( माहा.) । योदश > दस ( श्र० प्रा० ), तेरस, तेरह । चतुर्दश > चौदस, चोद्दस, चोदह । पंचदश > पराणरस जै. • माहा०) पोडस >सोलस, सोळस । सप्तदश>सत्तरस । श्रष्टदश् > अवारस । एकोनविंशति, ऊनविंशति> एगुणवीस, अउणवीसं । विंशति> वीसं, वीसा, वीसई, वीसइ । एकविंशति> एककवीसह, द्वाविंशति> बावीसं। निविंशति > तेवीसं । चतु- विशति> चउव्धीसं । पंचविंशति> पणवीस, पणुवीसं, पनुवीसा- (हि) । पड्विंशति> छपीसं । सप्तविंशति> सत्तपीसं, सत्ताविसं, सत्तावीसा । अष्टविंशति> अट्ठावीसं अट्ठावीसा । एकोनत्रिंशत् , ऊननिशत् > उणतीसं, उणतीमइ, निंशत् > तीसं, तीसा । एक- त्रिंशत् > एक्क्तीसं, इक्कतीसं । द्वात्रिंशत् > बत्तीसं, बत्तीसा, (दो सोळह -माहा.) । नित्रिंशत् > तेत्तीसं, तायत्तीसा, तावत्तीसयं (श्रमा० ) चतुर्निशत् > चोत्तीसं । पंचनिशत् > पणतीसं । पनिंशत् > छत्तीसं, छत्तीसा । सप्तत्रिशत् > सत्ततीसं । अष्ट- निशत > अठतीसा, अठतीसं । ऊनचत्वारिंशत् > उण- तालीसं, उपचत्तालीसा । चत्वारिंशत् > चत्तालीसा, चत्तालीस, चालीसा । एकचत्वारिशत् > एक्क्चत्तालीसा, इकतालीसं। द्वाचत्वारिंशत् > वायालीसं । निचत्वारिंशत् > तेतालीसा, तेता- लीसं । चतुर्चत्वारिंशत् > चौतालीसा, चौवालीसा । पंचचत्वारिं- शत् > पणचालीस, पणचालीसं, पनतालीसा । पटचत्वारिंशत् > छत्तालीसं, छच्चतालीसा | सप्तचत्वारिंशत् > सत्तालीसं, सत्तअत्तालीसं । श्रष्टचत्वारिंशत् > श्रटठ्यतालीसं । ऊनपंचाशत् > उपपंचासा, उपचासा । पंचाशत् > परययासं, परणासा, । पष्टि > सटिठ, [१२] सछि । सप्तति > सत्तिरि (अमा०), सयरी । श्रशीति > असी, असिइ । नवति> नउई, नउइ, नचए । शत> सद, सय, सय (अमा॰) । सहस्न, सहस्र> सहस (अ.प्रा.), सहस्स लक्ष> लक्स, सतसहस्र, सयसहस्स (य० प्रा०), कोटि> कोहि, कोड़ी । प्रम- संख्यावाचक (Ordinals) -प्रथम> पढम, पढमइल (अमा०) पढिाल पठिल्ल, पथिल्ल । द्वितीय>दुईश्र, दुइय, दुइय (अमा०), वीय । । तृतीय तइन, ततिय (अ० प्रा०), चतुर्थ> चउत्थ, चउत्थ, चदुत्थ, चउद ।। पञ्चम् >पञ्चम (पञ्चमा-स्त्री०), पप्टम् >छह-छहा (श्रमा०स्त्री०)। सप्तम् > सतम, सातम (ला. प्रा०) अष्ठम् > अठम (ला. प्रा.) अहम-अहमी (स्नी०), नवम् > एवम । दशम् > दसम (ला० प्रा०) दसम, दसमी (स्त्री.) । प्राकृत मे क्रमसंख्यावाचक प्रत्यय-म का प्रयोग उक्त रूपों में व्यापक पाया जाता है। उदा. द्वादशम् > वारसम्. दुवालसम (श्रमा०), त्रयोदशम् > तेरसम (ला० प्रा०), चतुर्दशम् > चउद्दसम (अमा०), पंचदशम् > पन्नरसम, पोडसम् > सोलसम, विशतिम > वीसइग (अगा.), त्रिशतम् > तिशतिग (ला० प्रा०)। चत्वारिशंतम् >चत्तालीसइम् । सप्ततिम् > सततिम (ला० प्रा०)। अशीतिम् >असिइम (ला०प्रा०) । शतम् > सतम । अपूर्ण संख्या-वाचक (Fractional) पाद, पादिफ>पाय पाय। अर्द्ध> अड्द, अद्ध, दिवड्ढ (अमा०), द्वयर्द्ध>दिवडद, दिअड्ढ । अर्ध-तृतीय> अढतीय, अड्ढाइज (श्रमा०) ! अर्धतुर्थ> अद्धउत्थ, अड्ढअट्ठ अर्धवष्ठ>अद्वछठ, सपाद>सवान । सार्द्ध>अड्ढ । पादोन>पायोन, पाउन । अपभ्रंश मुख्य प्राकतो की अपेक्षा अपभ्रंश के संज्ञा, सर्वनाम श्रादि के रूपों में और भी सरलता मिलती है। हेमचन्द्र ने संज्ञा, सर्वनाम श्रादि का विकास सूत्र-सं० ३३०-३८.१ में दिया है। विविध रूपों के उदाहरणों के अनंतर [१६३ । कोष्ठकों में सूत्र-संख्या और छंद-संख्या का भी निर्देश कर दिया गया है। विभक्तियों के जुड़ने के पूर्व शब्द का अन्त्य स्वर । दीर्घ अथवा हस्व हो जाता है। उदा० प्रथमा श्यामल:>सामाला, धन्या > धण, सुवर्ण रेसा > मुवएणरेह (३३०-१), संबोधन में दीर्घ > दीहा (३३०-२८)। प्रथमा बहु० अश्वः-घोडक > घोडा (३३०-४)। प्रथमा, द्वितीया एक० (सि, अम् ) की विभक्तियों के पूर्व शब्द के अन्त्य -श्र>-उ हो जाता है। उदा० प्र० एक० दशमुख:> दहमुहु, भयंकर: > भयंकरु, शंकर: > संकर, निर्गत.> णिग्गउ, द्वि० एक चतुर्मुस> चउमुहु, परमुसं> छुमुंहु ( ३३१-१)। पुलिगं शब्दों के अन्य > यो का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा० या । > जो, म: > सो ( ३३२-१)। नपुसक लिंग में -उ खर होता है। उदा० अड->अगगु, मुखकमल>मुहकमलु (३३२.२)। तृतीया एक० में शब्द के अन्त्य -अ> ए रूप मिलता है। उदा० दयितेन>दइएँ, गणयन्त्वा:> गणन्तिएँ, नखेन>नहेण ( ३३३-१-)। सप्तमी एक० में शब्द के अन्त्य ->द, ए पाया जाता है। उदा० तले > तलि । .. तृतीया बहु० ( भिस ) में शब्द के अन्त्य स्वर अ> एका थैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा. गुणे: > गुणहिं, लः > लखेहि (३३५.१)। पंचमी एक० (डसि) में अ> -हे, हु रूप मिलते हैं। उदा० वृक्षात् > वच्छहे , वच्छ (३३६-१)। पंचमी बहु. च.पाद प्राध्या. , स्यादौ दी हस्ती २ स्यमोरस्मैत् ३. सौ पुस्योदा सुत्र स०६३० ३३१ ३३२ ३३३ " " " " " " गा . " . . ५ दिनेच १.भिस्येता " " ३३३ " " [ १६४] (भ्यस् ) मे ->हुँ मिलता है। उदा० गिरिशृङ्गभ्य:> गिरि- सिङ्गहुँ ( ३३७-१ ) । पष्ठी एक (डस् ) मे -> -सु, हो, स्सु रूप होते हैं। उदा० परस्य > परस्सु, तस्य> तसु, दुर्लभस्य> दुल्लहहो, सुजनस्य >मुश्रणस्सु ( ३३८-१) । पष्ठी बहु० (याम् ) में अकारांत शब्दों के लिये हुँ रूप का योग होता है 13 उदा० तृणानां>तण] (३३६-१)। इकारांत, उकारांत शब्दों के पष्ठी बहु० मे हु और हँ के प्रयोग मिलते है । उदा० तरुणां>तरहुँ, शकुनीनां> सउरिण] ( ३४०-१)। सप्तमी एक० में भी हुँ का प्रयोग मिलता है । उदा० द्वर्यादिशो > दुहुँदिसिहि ( ३४०-२) । इकारान्त और उकारांत शब्दों में पंचमी एक (डसि), पंचमी बहु० (भ्यस् ) और सप्तमी एक० (टी.) मे प्रमश: -हे, हूँ और हि के प्रयोग होते है।" उदा० गिरेः >गिरिहे, तरो:>तरुहे, तरुभ्य:>तरु?, स्वामि भ्यः > सामिहुँ, क्लौ > कलिहि ( ३४११ ३) । अकारांत शब्दों में तृतीया एक० मे एकार के साथ -ए यथवा यनु- खार का प्रयोग मिलता है। उदा० दयित> दइएँ, परसन्त> परसन्तेण ( ३३३-१.) । इवारात यौर उकारात शब्दों के तृतीया एक० मे .ऍ, -ण अथवा अनुस्वार होता है ।" उदा० यग्निना> अग्गिएं, यातेन> वाएँ, अग्निना> अग्गिं ( ३४३.१), अग्निना> अग्गिण ( ३४३-२ ) । प्रथमा और द्वितीया एक० बहु० (शस्) सु- । च.पा. Soया. " " . . , भ्योस ? सूत्रसं० ३३७ २. म सु-हो रसः ३३८ ३. भामोई ४.दुद्मयाम् ३४० ५. रसिभ्यम, टीना देइयः, ६ भट्टी पानुरवारी ३४२ ७.९ चैदुतः ३४३ " " " . " " " . [ १६५ ] अम् , जस्) की विभक्तियों का प्राय: लोप मिलता है'।' उदा० अश्वा:> छोड़ा, निशिता:>निसिया, खड्गा:>खग्ग (३३०-४), यक्रिमाणं> बंकिम, निजकशरान् > नियय-सर (३४४-१) । पष्ठी की विभक्तियों का भी प्राय: लोप हो जाता है। उदा० गजानाम् >गय (३४५-१)। संवोधन बहु. में संज्ञा-रूपों के साथ हो का योग होता है । उदा० हे तरुण: > तरुणाहो, हे तरुण्य:> तरुणिहो (३४६-१)। सप्तमी बहु. ( सुप) और तृतीया बहु० ( मिस ) में हिं का योग मिलता है। उदा० गुणैः > गुणहिं ( ३३५-१ ), निपु मागेंj> तिहिं मग्गे हिं (३४७-१) । स्त्रीलिंग के रूपों में प्रथमा और द्वितीया बहु० और -यो के प्रयोग मिलते हैं। उदा० अडगुल्य: > अङ्गलिउ, जर्जरिताः > जजरियाउ ( ३३३-१ ) । विलासिनी:>मुन्दरसव्याङ्गाउ विलसिणीयों ( ३४८-१) । स्त्रीवाचक शब्दों में तृतीया एक० ( टा) में -ए का प्रयोग होता है । उदा. चन्द्रिकया> चन्दिमएँ ( ३४६-१), मरकतकान्त्या> मरगय- कन्तिएँ ( ३४६-२)। पंचमी और पष्ठी एक० (डस, डसि ) में स्त्री- वाचक संज्ञायों के साथ -हे का योग मिलता है। उदा० मध्यायाः> मन्महे, जल्पनशीलायाः > जम्पिरहे, रोमावल्या:> रोमावलिहे, रागाय:> रायहे आदि ( ३५०-१), बालाया:>यालहे ( ३५००२)। स्त्रीवाचक संज्ञाओं के पंचमी और षष्ठी बहु० (भ्यस् , आम् ) में सुन्दर सर्वाङ्गी सूत्र सं० ३४४ च०प० प्रा० प्या. " " १ स्यम् जस-शसा लुक् २.पष्टयाः ३.आमन्व्ये जसो हो ४. भिरमपोहिं ५. स्त्रियां जस् शप्तोरदोत् " " ३४७ " " U " ३ " " ७. रसदस्यो " - [१६६ ] -टु का प्रयोग मिलता है।' उदा० वयस्याभ्य , घयस्याना - चयसिनहु । स्त्रीवाचक सज्ञाओं के सप्तमी एक० (डि ) मे -हि होता है । उदा० माया > महिहि । नपुसक सज्ञा रूपों के प्रथमा और द्वितीया बहु० (जस शस् ) में ह का प्रयोग होता है। उदा० क्मलानि> क्मलहें, अलिकुलानि> अलिउलट्, करिगण्टानि > करिगण्डाइ ( ३५३१)। नपु सक अकारात रूपों के प्रथमा और द्वितीया एकः ( सु, अम् ) में उ का प्रयोग मिलता है। उदा. तुच्छक> तुच्छउ ( ३५०-१), भग्नक > भग्गउ, प्रसृतक > पसरियठ ( ३५४ १)। उक्त नियों के अनुसार अपभ्र श में सज्ञा के पुलिग, स्त्रीलिग तथा नपु सक लिग के रूपों का विकास इस प्रकार होगा--- देव- पु०यका एक० बहु म. देव, देवा, देवु, देवो देव, देवा द्वि० देव, देवा, देवु तृ. देवे, देव, देवेण देवेहि, देवहि प. देवहे, देवहु प० देव, देवसु, देवस्सु, देवहो, देवह देव, देवहँ स. देवे, देवि देवहिं स देव, देवा, देव, देवो देव, देवा, देवहो गिरि---पुलिंग इवा. प्र० गिरि, गिरी गिरि, गिरी * देव 4.पा. प्रा.व्या. . १.भ्यसामो २ टेहि ३, क्लीने जस शसोkि ४,कान्तस्यातर स्यमो सूत्र सं. ३५१ ३१२ ३५३ ३५४ " 7 " " " । . - [ १६७ ]..। एक. बहु० • द्वि. गिरि, गिरी गिरि, गिरी त० । गिरिएँ; गिरिण, गिरि गिरिहि चं. गिरिहे गिरिहुँ प. गिरि, गिरिहे गिरि, गिरिहें, गिरिहुँ सं० गिरिहि गिरिहुँ सं० गिरि, गिरी गिरि, गिरी, गिरिहो पुलिंग उकारांत रूपों का विकास इकारांत के सदृश होता है। नपुंसकलिंग व्यकारांत, इकारांत, उकारांत-कमल, वारि, मधु! प्र० द्वि० बमल, कमला कमल, कमला, कमलइ, कमलाई वारि, वारी वारि, वारी, वारिद, वारीई महु, महु महु, महु, महुई, महूइ शेष रूप पुलिग के सदृश होते हैं। नपुसक संशा फे व्यंजनांत,क-नुच्छक प्र० द्वि० तुच्छउँ। शेष रूप नपुंसक थकारांत कमज्ञ के सहरा होते हैं। मुग्धा> मुद्धा स्त्रीलिंग अका. मुख, मुखा मुद्धाऊ, मुदायो दि. मुखए (मुद) मुहि पं. मुद्धः (मुहि) मुखर म. मुदहि मुहि मुद्ध, मुसा, मुदतो, मुदाहो स्वीगरफरफारान्त मति, इकारान्त सप्यो, उपरान्त य५ गा रूप-सिम भी उत थाशरान्त मुना थे. सारा होता है। " " " से. मुख, मुदा । [१८] सर्वनाम के रूपों का विकास प्राय सज्ञा के सदृश ही होता है परन्तु कुछ रूपों में भिन्नता भी मिलती है। अकारान्त सर्वनामों , पचमी एक० (डस्) में हाँ का प्रयोग होता है। उदा० यस्मात् > जहाँ, कस्मात् > कहाँ, तस्मात् > तहाँ । पचमी एक० में किम् के स्थान पर विहे रूप मिलता है ।२ उदा० कस्माद> विहे, तस्या > तहे ( ३५६१)। अकारान्त सर्वनामों के सप्तमी एक० म हि का प्रयोग होता है। उदा० यन, यस्मिन् जहि, तन, तस्मिन् >तहि (३५७ १), एकस्मिन् > एकहि, अन्यस्मिन् > अन्नहिं ( ३५७ ३ ), क> हिं ( ३५७ ४)। यत्, तत्, किम सर्वनामों के अकारान्त रूपों के पष्ठी एक० में यासु का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा यस्य (यस्मै/> जासु, तस्य>तासु (३५८१), कस्य> कासु (३५८२)। यत्, नत्, विम् स्त्रीवाचक रूपों के पप्ठी एक० में अहे का योग वैकल्पिक रूप म मिलता है। उदा यस्या कृते> जह रेउ, तस्या कृते> तहे रेउ, क्स्या इते> कहे करेउ, यत् और तत् का प्रथमा और द्वित्तीया एक० (सु, थम् ) म प्रमश ६, प्रका वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा० यत् तद् रणे करोति> ध्रु, न रणि करदि (३६००१) । इदम् के नपुसक रूप घे प्रथमा, द्वितीया एक० (मु अम्) में इमु रूप होता है। उदा० इद कुलम>इमु कुलु। एतद् स्त्रीलिंग का प्रथमा और द्वितीया एक० म एह और पुलिग का एहो और नपुसक का एहु रूप हो जाता है। उदा० एपा- १ सदिड सेहो सूत्र स०३८ २ किमोरिवा च०पाद प्रा० ध्या० " " ३५६ ३५७ ३५८ ३५० " . " F ४ पस्किम्यो तो अमुन या ५ स्त्रिया उद्दे ६ यत्तद स्यमोप्रध्रुप ७दम इभु कमी ८ एतर स्त्री पु-क्लीरे एह एहो-एए, " .

[ १६८ ] कुमारी>एहकुमारी, एप: नर:> एहो नरू, एतत् मनोरय>एहु मणोरह ( ३६२-१) । एतद् का प्रथमा और द्वितीना बहु० में एइ रूप होना है। उदा एते> ऐइ ( ३३०-४) । अदस् फा प्रथमा और द्वितीया यहु. (जस्, शस्) में श्रोइ रूप मिलता है। उदा. श्रमूनि> योद (३६४-१)। इदम का विभक्तियों के पूर्व पाय रूप मिलता है। उदा० मानि> श्रायहँ (३६५-१), एतेन> आएण ( ३६५-२), अस्य> पायहो ( ३६५-३)। सर्व या विभक्तियों के पूर्व साह रूप का वैकल्पिक प्रयोग होता है। उदा० सर्व.> साहु (३६६-१, ३४९-१)। किम् रयान पर पाएँ और करण या वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा० >िपाइँ ( ३६७.१, ३५०-२)। वेन>करणेण (३६७-२)। युप्मद् पा प्रथमा एक० (सु) मे नुहुँ पा प्रयोग होता है। उदा० ब> नु ( ३६८१) । उक्त सर्वनाम का प्रथमा और द्वितीया यहु० (जस, शस् ) मे तुम्हें और तुम्हदं रूप मिलते हैं। उदा० युष्मे> तुम्हे, युरमा> तुम्ह । नृतीया एक० (टा), सप्तमी एक० पर० (टि), दि० एक० (अन्) मे पर, तदं रूप मिलने हैं। उदा. त्यया> पर (३०७.१) । लया> त ( ३७०-२), त्वपि> पर (३७०३), व> पk ( ३००.१ )। तृतीरा बहु० (भिस्) नम राम. एस सं०३६३ मा.पा. . 1. . " , म ४. मोरा 1.पिनको वा " " . " " " ३E . " " प [२०० में तुम्हेहिं रूप हो जाता है। उदा. युष्माभिः> तुम्हेहिं ( ३७१-१) पंचमी और षष्ठी एक० (डेसि, डस ) में तउ, तुझ, तुध रूप मिलते हैं। उदा० तब> तउ, तुज्झ, तुध (३७२-१) । पंचमी और पष्ठी बहु. ( भ्यस, ग्राम ) मैं तुम्हहं रूप होता है । सप्तमी बहु० ( सुप् ) मे तुम्हासु रूप मिलता है। उदा० सर्वनाम अस्मद् का उत्तम पुरुष प्रथमा एफ० मे हउँ रूप होता है।" उदा० .यह> हउँ (३३८-१) । उक्त सर्वनाम का प्रथमा द्वि० बहु० ( जस, शस् ) मे अम्हे और अम्हई रूप होते हैं । उदा० वयं> अम्हे. (३७६-१-२) तृतीया एक० ( टा), द्वितीया एक० (अम् ), सप्तमी एक० (दि) में 'मई' रूप मिलता' है । उदा० मया > मई ( ३७७-१), मम> माँ (३४०-४) । तृतीया वहु० ( मिस्) में अम्हेहि होता है। उदा. 'अस्माभिः> अम्हेहिं ( ३७१-१ ) पंचमी, पष्ठी एक० ( डसि, डस् ) मे महु, ममु दोनों रूप मिलते हैं। उदाः मम > महु ( ३६६-१), माम > मज्मु (३७६-२ । पंचमी, षष्ठी बहु० (भ्यस् , अाम् ) में अम्हई रूप गिलता है। • उदा० अस्माकं > अम्हई, अस्मदीया: > अम्हई ( ३७६-२ ) । सप्तमी बहु० (मुप् ) मे अम्हामु रूप होता है।' , भिसा तुम्देहि सूत्र सं० ३७१ २ डसि डरभ्यां तउ तुम तुघ २. भ्ययामाभ्या तुम्हह ३७३ ४.तुम्हास सुपा ५. सावरमादो हर ९ जस शसोरम्हे भन्दा ३७६ ७. या व्यमा म ८.भम्हेहिं भिसा ६ मा मग्मु सिइस्भ्याम् १०. भम्हई भ्यसाभ्याम् ११.मुपा अम्हास १ च० पाद भा० घ्या. ३७२ " " " " " " " " " " ३७८ ३७६ . ." .

[२०१ ] उदा० अरमासु स्थितं > अम्हासु ठियं । अस्तु, अस्मद् और युष्मद् पुरुषवाचक सर्वनामों का रूपविकास निम्नलिसित होगा- अस्मद्-- बहु० श्रम्हे, श्रम्ह द्वि० महँ अम्हेहि मह, मन्मु श्रम्हहें एक० " " प. " मर अम्हामु युप्मद- तुम्हे, तुम्ह दि० पर, तद " तुम्हार तुम्ह पं० राउ, मुग्म, तुध (तुह) " तुम्हा पाँचवाँ अध्याय प्राकृत में क्रिया पदों का विकास । प्राकृत में क्रिया आदि रूपों के विकास में सादृश्य का प्रभाव सज्ञा आदि रूपों की अपेक्षा और भी अधिक व्यापक रूप में मिलता है। द्विवचन का लोप, कर्तृवाच्य और कर्म वाच्य के रूपों का प्राय एकीकरण, अात्मनेपद के रूपों का हास, विविध काल रूपो म अनुरूपता, किया के विभिन धातु रूपों में धनि परिवर्तन के कारण समानता आदि प्राकृत के क्रिया विकास की कुछ मुख्य विशेषताएँ हैं । सस्कृत धातुएँ ६ गणो म विभाजित था-भ्वादि, रुधादि, दिवादि, तुदादि, ज्यादि.. क्यादि, स्वादि, तनादि, चुरादि । इन गणों के अनुसार ही विभ-- क्तियों के जुड़ने के पूर्व धातु में परिवर्तन होता था। परन्तु इन सव में म्यादि रूप की ही व्यापकता प्राकृत के क्रिया पदों के विकास में मिलती है। काल रचना मे लट् (वर्तमान), लोट् (आशा) विधि, लुट् (भविष्य) रूप के ही अधिक प्रयोग मिलते हैं। वर्तमान का प्रयोग सभी कालो और विधि का प्रयोग सभी कालों और याच्यों के लिये मिलता है । सस्कृत के लड् ( भूत), लुङ, लुट (भविष्य), याशीलिंग, लिट , लुङ् (भूत) के प्रयोग मुख्य प्राकृतों में प्राय नहीं मिलते हैं। सहायक क्रियाओं के साथ कृदन्त रूपों का व्यवहार अधिक मिलता है। अतएव सादृश्य और भनि विकास के कारण प्रिया के रूप अधिक सरल हो गये थे।

प. पु. म.पु० उ० पु० भवाम, होम [ २०३] पालि में प्रिया के रूपों का विकास संस्कृत की अपेक्षा अल्प या सरल रूपों में पाया जाता है क्योकि संज्ञा यादि के सहश द्विवचन का लोप, विविध काल भेदों का एकीकरण, परस्मैपद और स्वादि गण के रूपों की सर्वव्यापकता मिलती है। परन्तु उदाहरण के तौर पर परस्मैपद रूपों के साथ यात्मने पद का भी उल्लेस कर दिया गया है । वर्तमान काल (लट)' में / (भू) (होना) का रूप-विकास निम्नलिखित होगा-- एक. बहु. / भू-परस्मैपद- भवति, होति भवन्ति, होन्ति भवसि, होसि भवय, होय भवामि, होमि श्रात्मनेपद - भवते भवन्ते भरसे भरव्हे भवे भयम्हे भूतकाल में प्राय. दो रूप परिसमापयर्थक भूत (लड) और श्रनद्यतनभूत ( लुम) व्यापक मिलते हैं। लड् २ का निम्नलिसित रूप-विकास होगा- / भू-परस्मैपद- बहु प. पु. भवि, थवा, भषि अभई, अभयु, भयु म. पु. श्रभयो, अहरो, भयो यमयत्य, थापत्य, भरत्य उ. पु० श्रषि, श्रभर, भवि अभवम्हा, नहुषम्हा, भयम्हा १.अपम ने मन्ति, मिय, मिम तेने.सीएदे सूत्र सं०१ २. भूते, अपमा, 53, सरी एक० मोग्गलम्या- ४ +U अभव्हं, . , - 1 . [२०४] -यात्मनेपद- एक० बहु० ग्रभवा अभयू यभवसे यभव यमम्हे उक्त रूप मे लड के अतिरिक्त लुंग यादि मे धातु से पूर्व - का विकल्प से अागम हो जाता है। उक्त रूप .और लुंग आदि मे श्रा, ई, उ, म्हा, स्सा, रस म्हा के इस रूप का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है ।। उदा. अभवु, अभविम्ह, अभविस्स, अभविस्सम्ह । लुंग' का रूप- विकास इस प्रकार होगा- /भू परस्मैपद एक. बहु० प० पु० अभया, भवा, अभय श्रम, श्रम म० पु० अभवो, भयो अभवत्थ, भवस्थ, अभयुत्थ उ० पु० अभव, अभवं यभवम्हा, भवम्हा, अभवुम्हा थात्मनेपद- अभवत्थ भयत्) अभवसे अभवम्ह अभावि अभवम्हसे भविष्य काल मे लूट के रूप ही व्यापक मिलते हैं। इसका रूपविकास इस प्रकार होगा- १ भाई सादि स्वत्र वा सूत्र स० का०६ मोग्ग० ध्या. २. आई मम्हा स्सा स्तम्हाने वा ३. अनजतने भाऊ, श्रोत्य, अम्हा स्य त्यु, सेन्द, इंद्र से ४, भविस्सति रसति रसन्ति, स्ससि रमामि स्ताम रसनेस्सन्ते, " स्ससे रसग्ने, रस रसाहे १५ " " " " ५ " रसथ, २ " " प० पु. म. पु० ३० पु. [0] भू परस्मैपद- एक. भविसति भविस्सन्ति भविससि भविस्सथ भपिस्सामि भरिस्साम श्रात्मनेपद- भपिस्सते भरिस्सन्ते भघिस्ससे भविस्सव्हे भविस्सं भनिस्माम्हे रिधि लिंग' का रूप निम्नलिखित होगा-- /भू परस्मैपद--- प.पु० भरे, भयेय्य भवेयुं, भयं भवेय्यासि भवेप्याय 3. पु० भय्यामि भवेय्याम यात्मनेपद- भय भवरं भयो भवेय्यव्हो भवेयं भषेप्याम्द उक्त प्रयोग में -एभ्यं, एभ्यासि, एभ्यं मा रिफ्ल्प से ए रूप भी होता है। एप् प्रत्यय का पिरल्प से - और एभ्याम या पिस्प र एमुम्प होना है।" परेय, मसि, एप्दाप, मि, राम, भूम. पोस्याहो Grent म० पु. " " " . trahra प० पु० म० पु० [२०६) याज्ञा ( लोट ) ' का रूप इस प्रकार होगा- एक० बह. भवतु भवन्तु भवाहि, भव भवथ भवामि भवाम आत्मनेपद- भवतं भवन्त भवस्सु भवन्हो भवे भवामसे उक्त प्रयोग म हि, मि, में प्रत्ययो से पूर्व अ> या हो जाता हे । उदा० भवाहि । उक्त रूप में यकार के बाद -हि का विकल्प से लोप मिलता है। उदा. भव । पालि म कृदन्त रूपों का भी प्रयोग संस्कृत के सदृश ही होता है। भाववाच्य योर कर्मवाच्य में धातु के अनन्तर तव्य और अनीय प्रत्ययो का प्रयोग होता है। उदा. मया हसितव्य, मया हसनीय । उक्त प्रयोग में ध्यण् प्रत्यय का भी योग मिलता है जिसका अवशिष्ट रूप य होता है । -ध्यण प्रत्यय का योग होने पर यकारात धातु का एकार रूप हो जाता है। उदा० धनि केहि दलिदान दान देय्य । विशेषण के सदृश भी उक्त प्रत्ययों का प्रयोग मिलता है । उदा० दानीयो ब्राह्मणो, सिनानिय भुरण। उक्त प्रत्ययों के योग होने पर इकारात और उकारात धातुओं का सूत्र सं०१० काण्ड६ मोग्ग० ग्या० " " १ तु भन्तु हिथ, मिमा, त अन्त रमुव्हो, एश्रामसे २ हिमिदैव रस ३. हिस्स तो लोपो ४ भावकम्मसु तम्बानीया ५ध्यय ६.भास्सेच " ४८ " २७ " २८ २६ " , [२०७४ श्रमशः एकार और योगर हो जाता है। उदा० चेतवं, चयनीयं, चेय्यं, सोतव्यं । निमत्तार्थक प्रत्यय -तुं, -ताये, तवे मिलते हैं। उदा० कातुं गच्छात, कनाये गन्छति, कातवे गच्छति । -तुं, नून, -तव्य, तवे प्रत्यय के योग होने पर / कृ धातु का कर > पार हो जाता है।' उदा० कागरे। रुध थादि धानुयों में अन्त्य स्वर के उपरांत विभक्ति जुड़ने के पूर्व - प्रत्यय का पागम हो जाता है। उदा० रुन्धितुं, मितु । पूर्व शालिक मृदंत तून, -वृवान, कला के रूप मिलते हैं। उदा. सो सोतून याति, सो मुत्वान याति, सो मुत्वा याति । धातु के समान रूप होने पर -त्या के रथान पर प्य और घ> य, सुं, यान होते हैं। उदा० अभिभूप ( अनिभरिला ), श्रमिछु ( अभिहरित्वा ), अनुमोदियान ( अनुमोदित्वा )। इसी प्रकार -सरा के लिये च, न यादि प्रत्रयों का भी योग मिलना है। मुरत मारतों में पद धानु पा. प्रथम पु० एक. प्रात्मनेपद त और प्रथम पु० एक० परस्मैपद -ति के स्थान पर ममशः - और -ए पा विम मिलता है। उदा० पठति, पटने> पठर, पटए । मध्यम पुरम एम० यात्मगेपद -थाम और ममम पु० एक० परस्मैपद ८२ कर मेमाच्या. १.सुगरमनपये २.गाव मारे मस्ति शिपाया ३.नता मुरा, परमादरे " ११६११ . " " ६३ ..पुकाने ..मोकामदाना 1 . 4०५० नसायी ९ १.१३ [ २०८] सिय के लिये सि और -से के प्रयोग मिलते हैं। उदा० पठसि, पठसे> पठसि, पठसे । उत्तम पुरुष एक० गात्मने पद -इह और उत्तम पु० एक. परस्मैपद -मिय के स्थान पर -मि का प्रयोग मिलता है ।२ उदा. पठामि, पठे> पठामि | वर्तमान काल प्रथम पुरुष वहुवचन में -न्ति, मध्यम पुरुष में-इ और -इत्था और उत्तम पुरुष में -मो,-मु और म मिलते हैं । उदा० पठन्ति> पठन्ति, पठय> पठइ, पठित्था, पठाम> पठामो पठामु, पठामो । अमदीश्वर के अनुसार -इत्थ की यपेक्षा -थ का ही प्रयोग होता है। उपयुक्त रूपों में प्रथम पु० एक. यात्मनेपद मे और मध्यम पु० .एक. यात्मनेपद में -से का प्रयोग केवल यकारात रूपों में ही मिलता है। उदा० रमए, पठए, रमसे, पठसे परन्तु होइ का होए और होसि होता है, होए, होसे नहीं होता। मध्यम पुरुष एक- के रूपो म था और सिप के. प्रयोग होने पर अस् धातु का लोप हो जाता है। उदा० मुम असि> सुत्तोसि । अशोक के लेखों में सन्ति और पा अव्यय के लिये अस्ति का प्रयोग मिलता है वचन - प्रा०प्र० "पा. सत्र सं० २ परि०७ , १४० तपाद ३ परि०७ १४१ तृ० पाद "म. गया. " ४ परि०७ . १४२ " व्या- १ थास्सियो सिसे नितीवस्य सिसे २ इमिपोमि तृतीयस्य मि ३ मित-इस्थ-मी मु-मा-बापु बहुम्पाद्यस्यग्नि ते हरे मध्यमस्येत्या हची तृतीयस्य मो-मु-मा ४ मत एसे भत एवैच मे ५.मस्तेलोप सिनारते सि . " " . प्र. व्या 1 परि०७ in १४५ तृ० पाद ६ परि०७ १४१ तृ• दाद . " " " म्या- A [२०] यस धातु के लोप होने पर-मि, मो, मु, म प्रत्ययों में -म् के अनंतर १ का प्रयोग मिलता है। उदा० गत: यस्मि> गयोम्हि, गता:- स्म> गयम्हो, गयम्, गयम्ह । भार-याच और कर्मवाच्य की विभक्ति -यक के लिये -ईय और ज का प्रयाग मिलता है। उदा. पक्ष्यते> पठीयइ, पठि- जद । जब कि धातु के यन्त्य व्यंजन का द्वित्व रूप हो जाता है तो •यक पे स्थान पर -ईश्न और इज रूप नहीं मिलते। उदा० । दृस्यते>हस्सद, गम्यतेऽगम्मद। /गम् धातु में जब अन्त्य व्यंजन का द्वित्व नहीं होता तो उक्त प्रयोग मिलते हैं । उदा० गमीयद, गमिज्जर। वर्तमान कालिय दंत शत और शानच के लिये -न्त और माण प्रत्यय जुड़ते है। उदा० पठन्, पटमान > पठन्तो, पठ- भाणो, हसन्, हसमान्> हसन्ता, हसमायो। स्त्रीवाचक शब्दो म शतृ और शानच के लिये न्त, माण के अतिरिक्त -ई का भी योग मिलता है। उदा० हसन्ता > रसाई, रसन्ती, समाणा, येयमाण> वेरई, वेपन्ती, वेरमाणा । हेमचन्द्र के अनुसार समाणी रूप भी मिलता है। वर्तमान सालिक रूपों में धातु के अनन्तर हि क योग से भविष्य - पाल के रूप बनाये जाते हैं। १.मिनीमुमान मयो हरप निमो मोहिमोग्दादा १४० सृ० पार २. मानो ८ परि०७ मारपस्य १६. नृ. पाद ३. नरपरि है परि.७ ४.म्त-मातीमान-शानको. ममापी, रामानरा. .10.2017. पार पत्रिम ११ परि०७ १.in ११ परि.७ भरिपnिe. ९. पार सूस . प०ि७ प्रा.प्र. भ्या० " " प्र. " . " " " भ्या . त . १-२ न. पाद १. . " " D [२११ 3 द्रशामि> दन्छं, वैयामि> वेच्छं। मदीशर के अनुसार विदि और उसका विकसित रूप वेन्छ नहीं मिलता। उसके अनुसार मोदामि> मोन्छ, भोक्ष्यामि> भोच्छ भी मिलते हैं। भविष्यकाल के सभी पुरुषों में श्रु यादि का परिवर्तन सोन्छ यादि मे होता है परन्तु अनुस्वार का परावर थोर दि का वैकल्पिक रूप से लोप रो जाता है। उदा० श्रीप्यति> सोच्छिद, सोच्छिहिट श्रोष्यन्ति> मोन्छिहिन्ति, मोन्धिन्ति, श्रोस्यसि>मोच्छिसि, सोच्छिहिसि,श्रोप्यथ> सोन्छित्था, सोच्छिहित्या, श्रीप्यामि> सोच्छिमि, सोच्चिहिमि, भोप्याम > सोन्छिमो, सोच्चिहियो । दमी प्रकार में और धातुओं पा भी पियास होता है। उदा० योन्छिद, योन्धिहिह श्रादि ।मदीशर ये अनुसार सोन्छद, सोन्छहिमि, सोच्छेसि, सोछिन्ति, सोन्छिहिन्ति रूप भी मिलते हैं। विधि और लोट रूप के एक० में प्रथम पु०. मध्यम पुर और उत्तम पु० के लिए प्रमश. •उ, -मु, मु का प्रयोग "रोता है। उदा. हसतु> रमत, इस > हसमु, हसानि > हसामु, (राम)। हेमनन्द्र पे श्रनुसार -रि पे साथ -मु का प्रयोग भी होता है। उदा० देहि, देमु । ययारान्त धातुश्री में ये दोनों रूप मिलते है उदा० मेनामु, रसेनरि। रिधि, और लोट म्पों पे बहमें प्रथम पुस, मध्यम पु० धौर उनम पु.ये लिए ममशः न्नु, र और मोम्प मिलने । उदा०सन्तु>सन्तु, हसथ> Tr,rमाम>सामो। १.भमादीनां विषप्पनुमापन गिरना मोरमा दिपुरिया, २ मा विभाहिरकारने परि०७ मुम यानि परि.७ प्र. H. " - १. पास " परि०७ RO ..गुष्मागर 41ो . १३९ म.पर स " , [२१२] वर्तमान काल (लट ) यौर भविष्य काल (लुट् ) तथा लोट यादि में ज, -जा के वैकल्पिक प्रयोग मिलते हैं। उदा० भवति> होज, होजा, होइ, हसति> हसेज, हसेज्जा, हसद, भविष्यति> होज, होज्जा, होहिइ, भवतु> होज, होजा, होउ। वर्तमान काल, भविष्य- काल और यानादिक रूपों में धातु और विभक्ति के मध्य में ज और -जा के वैकल्पिक प्रयोग मिलते हैं ।२ उदा० भवति> होजइ, होजाद, भविष्यति> होजहिद, होजाहिद, भवतु> होजउ, होजाउ । हेमचन्द्र ' के अनुसार भवति, भवेत, भवतु, अभवतभर, अभूत, वभून, भूयात, भविता, भरिपति रूपो के लिये होज और होजा के प्रयोग मिलते है। स्वरान्त धातुयो में -ज और-जा के प्रयोग धातु और विभक्ति के बीच वरावर मिलते है। हेमचन्द्र ने होजइ, होजे और विधि में होनाद रूप दिये है । पेवल स्वरान्त धातुयो में विभक्ति और धातु के वीच -जौर -जा का योग होता है और यह एकाक्षर रूप होता है। व्यंजनात धातुओं म घर के योग से द्वयदर रूप हो जाते है । उदा. हम> हस-इसई, वर>तुवर-तुवरइ । भूतकाल (लड श्रादि ) में धातु के अनंतर ईन्य या प्रयोग होता है। उदा० .व्यभवतू > एपीअ, यह सन् > इसीय । हेमचन्द्र ने सरात रूपों में- हा, -हीय और व्यंजनात रूपों में -ईन का प्रयोग दिया है । उदा० कार', काहीय, हुयीय यादि । भूतकाल ( ल , लुट् , लिट् ) के लिये । परि०७ मा० म. . १. पाद , उदा. १.५तमान भविष्यदनयतनयोज- उजापा सूत्र संख्या २० वर्तमाना-मविघयोश्च ज नाका, २. मध्येच मध्येच स्वरामादा ३ नानकाचः ४. भूने २३ परि०७ * . . . पार २२ परि०७ प्रा. " " U - [२१३ ] एकातर धातुओं में होय का प्रयोग क्यिा जाता है। उदा० अकरोत, अकापीत, चकार> काहीय, अभूत् , अभवत् , बभूव> होहीय। भूतकाल के प्रथम पु० एक० में /अस धातु का याति और क्रमदीश्वर के अनुसार श्रासी रूप मिलते हैं। उदा० यासीत् > यासि, यासी । हेमचन्द्र ने सभी पुरुषों और वचनों में यासि और अहोसि रूप दिये। प्रेरणार्थक रूपों (णिजन्त) में धातु के पहले अक्षर के श्रन्त्य -य> या हो जाता है। उदा० वारयति> कारेद, हासय> हारोह । प्रेरणार्थप रूपों ( शिजन्त ) में -यावे का प्रयोग भी मिलता है। उदा. हासयति>हसायेद, हासेद । हेमचन्द्र ने -६,-ए, श्राप और याये रूप दिये है । उदा० दरिसइ, कारेद, करावद, परावेइ । पर्म और भाव याच्य के प्रयोग में भूतवालिक कृदन्त-क्त के स्थान पर-प्रापि का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा० पारित> कदानिय, पारिश्र, रासित> हसापियं, हासिम, कार्यते>कराविजद्द, कारिजइ, हास्यते>सानिमद, हासिबद । मन्मदीयर के अनुसार दासानियं भी मिलता है । भारपाय श्रादि तथा-पिच के लिये -क रूपों मे-ए-और याये फे. प्रयोग नहीं मिलते। उदा० पारित> पारिश्र, परापिy, पार्यते> पारिजद, फरापिजद । वर्तमान काल उत्तम पु० एक० में -मि के पूर्व अफारात धातुओं के अन्त श्र के स्थान पर वैकल्पिक . सूस २४ परि०७ मा०प्र० १.पाचोम मीदोभूमावस्य १० या " " . . परि.७ " प७ि 1 RARE भायेगा भतार मासेमार २६ " H . * . [२१४ ] रूप से या मिलता है। उदा. हसामि, हसमि, हसेमि । हेमचन्द्र ने भी जाणामि, जाणमि, हसा मि, हसमि आदि रूप दिये है। वर्तमान. फाल के उत्तम पु० बहु० मे अन्त्य य के स्थान पर -द और -श्रा मिलते हैं। उदा० हसिमो, हसामो, हसिमु, हसामु । भूतकालिक कृदन्त के प्रत्यय क्त के पूर्व धातु के अन्त्य के लिये ३ का प्रयोग होता हे । उदा० हसित> हसिन, पठित> पठिय। क्रियार्थक सज्ञा के प्रत्यय क्त्या, तुमुन और भविष्य कृदन्त के प्रत्ययों तव्य का योग होने पर - धातुयों के अन्त्य - अ के स्थान पर - ए का विकास मिलता है। उदा० हसित्वा > हसेऊण, हसिऊण । हसितु > हसेउ, हसिउ । हसितव्य > हसेअध्य, हसियव्य, हसिप्यति> हसेहिइ, हसिहिइ, हसिष्यन्ति> हसेहिन्ति, हसिहिन्ति । क्सिी भी काल और पुरुष में धातु के अन्त्य य के स्थान पर -ए का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है ।५ उदा० हसति> हसेद, हसइ, हसतु> हसेड, हसउ। हेमचन्द्र ने वर्तमान शतृ यादि रूप म अ> -ए दिया है। उदा० हसेन्तो, हसन्तो यादि । हेमचन्द्र ने -जा, रे पूर्व अ>ए दिया है। उदा. हसेजा, हसेज, होज्जा, होज । १तमा मिपि वा परि०७ . न प्रा०प्र० मौ था सूतस ३० १६४ ध्या. " so २च्च बहुपु इच्च मोगु मे वा व्या. , . परि०७ त० पाद परि०७ पाद प , ध्या . ४ एच क्त्वातुमुन्तव्य- भविष्यासु एच क्लातुम् तव्य भविष्यत्म परि०७ भ० तपाद था. 1 ५ लावा प्र. मतमाना पंचमी शतृपु या परि०७ त. पाद क्य. ६.जाने १18 " .

एक० उ० पु. [२१५] ममदीश्वर के अनुसार हसेसन्तो, हसन्तो, हसेमाणी, हसमाणी, भुवन्तं भुवेन्तं रूप मिलते हैं। संस्कृत के विविध गणों की अपेक्षा प्राकृत में केवल दो गया-अगण और एगण के प्रयोग मिलते है । इनमें भी अगण रूप ही व्यापक है। नाम धातुओं तथा कुछ अन्य शब्दों में एगण रूप मिलता है, परन्तु दोनी गणों में विभक्तियों का प्रयोग प्राय: समान होता है। एगण- फय>कध (शौ०), कह (माहा०) का उदाहरण निम्नलिखित है- लट् ( वर्तमान) बहु. प्र. पु. क्धेदि, हेद कधेन्ति, कहन्ति म० पु० क्धेसि, कहेद कंधेध, कहेह पधेमि, कमि कधेमो, फहमो Jहस धानु पा विकास विविध कालो और पुरुषों अनुसार निम्नलिखित होगा- खट् ( यर्नमान ) एक० य? हमा, रमए, हसेद, हसेज, हसेना हसन्ति, हसेन्ति म. समि, हमेलि, इससे हसेह, हसेत्था, हमेय, हसर, हसिन्या, हमथ उ. मानि, हममि, गेमि हंगमु, हसनो, हमेम, हसान, हमाना, रमान, हमिनो, सिमु, हसिम कोट (मान) मर, मेउ, हगन, मंत्रा मिन्नु, मेनु मगु.रमनु उ० मिन, हंसमु मामो, हगेगो हसमो. म.

[२१६ ] विधिलिंग- विधिलिड का प्रयोग अमा०, जै. माहा० में अधिक होता है, माहाराट्री तथा अन्य प्राकृतो में कम होता है। इसके व्यापक रूप संस्कृत्त दिवादिगण के प्रत्यय -यात् -यास, -याम् से सबंधित है । उदा.- एक. बहु० प्र० पु० पज्जा, वज्ज बट्टेज्जा, वडेज म० पु० पट्टेवासि, वट्टेजसि, यहेज्जासु, • वरुनाइ, बज्जइ घटेज्जसु, वे?जाहि, वडेज्जहि उ० पु० वट्टेज्जा, बट्टेज वज्जाम विधिलिंग के कुछ प्रयोग शौरसेनी आदि प्राकृतों में संस्कृत के भ्वादि गण के प्रत्यय -एत्, -एस् , -एयम् के सदृश मिलते हैं। उदा.- एक० बहु प्र. पु. बहे यो " म.पु. उ० पु. वय " लट् ( भविष्य ) प्र० हसिस्सदि, हसिरसद (माहा०) हसिस्सन्ति इसिहिन्ति (अमा०), रसेहिह, हतेहिन्ति हसिदिइ (थमा०), हसेज, हसेजा म. हसिस्ससि हसिहिसि (माहा०, हसिस्सध, हसिरसह (माहा०) श्रमा०), हसिहिस हसिहित्या, हसिहिह, हसिथि उ. हसिस्स, हसेस्स, हसिरसामि हसिहिस्सा, हसिहित्या, हसे. (श्रमा०) हसिहि मि, हसेहिमि, हित्या, हरीहिस्सा, हसि हिमो, हसेहामि, हसेस्सामि हसिरसामो, हसिहामो, हसे- हिमो, हसेस्सामो, रसहामो [२१७ 3 म० लइ (भूत का० ) बहु० प्र. असि, यत्र थिहुम्हा, यहुवम्हा, अहुवाम अपुच्छसि, पुच्छित्यो, यहुमत्य प्र० यासी, ग्रासि यासु, अभाविसु (श्रमा०) श्रासीत् > ग्रासी का प्रयोग भूतकाल क सभी पुरुषों और वचनों में मिलता है। लुग (भूत का.). पु० ग्रहोसि, गहुँ, थहवम्हा, अम्हा यह अहुपत्थ हात्य (श्रमा०), बहू, उहुँ, अहेसु श्र, अहू, ग्रहोसि प्र० एक० बहु लट् प्र. होह होन्ति म. होमि होय, होह उ. होमि होमु, होम, होमो लोट म० होउ होन्तु म. दोमु, होहि होह होमो लूट प्र. होहित होहिन्ति म. होहिमि, होहि से हाहिह, होहित्या, होहिय उ० होस्म होहामि, होरसामि, होहिमि रोरसामो,दोहामो, होहिमो, होहिस्सा, होहित्या, होरसामु, होहानु,होहिम, होरसाम, होहान, होहिम ल-० होतोय, हुरीर उ. होम [२१८ ] /अस् -लट म. यस्थि म. सि, अत्यि उ० म्हि, यस्थि लइ. म. असि, पासी, यहोसि सन्ति, अत्यि हे,त्या, अस्थि म्हो, म्हु, म्ह, यत्यि यासि, ग्रहोसि म. " उ० " . शासी, यहोसि के प्रयोग सभी पुरुषों और वचनों मे समान मिलते हैं। प्राकृत में कर्मवाच्य के रूप धातु के अनंतर -ज, -इय जोड़ने से बनते हैं। उदा० 9/हस्./गम्हसिज्जइ, गमिन्जइ (माहा०), हसीयदि, गमीयदि (शौ०), प्र. पु. पुन्छीअदि (शौ०), पुन्छिनइ (माहा०) म. पु० पुच्छोयसि (शौर०) पुच्छिजसि (माहा०), उ• पु० पुच्छोयामि (शौ०) पुच्छिज्जामि (माहा.)। प्रेरणार्थक रूप अपारात धातु के अनतर -व्यय > -ए के योग से बनाया जाता है। -उदा० हासेर < हासयति, कारेति र कारयति । याकारात धातुओं में सस्कृत -पय> वे हो जाता है। उदा. निर्यापयति >णियावेदि और इसी ढग पर अन्य धातुओं में भी धातु के अनतर -या लगाकर-वे जोड़ दिया जाता है । उदा० पृच्छयते>पुच्छावेदि, हसावेइ, हासावेइ । प्राय क्त्यात प्रत्यय के लिये शौ० मे -दूण, माहा०, मा० मे -ऊण, अमा० में त्ता, -ताणं प्रत्यय मिलते हैं -उदा० हसेऊण, रसिऊण या रूप हसिदूरण ( शौ० ), हसित्ता ( अमा०), दुध < कृया, क्यान्त प्रत्यय गद्य < गला | भूतकालिक कृदत क्त का रूप हसिय, प्रेरणार्थक रुप हासियं, हसानिय, हसेउं हसिउं ( शौ० ), तुमुन प्रत्ययात रुप हसिद् गन्तु, गमिदु, गच्छिदु (शौ०), कारिदु, कादु, काउ, तव्यान्त रूप हसेश्रव्य, हसियव्वं मिलते हैं। , [२१६ ] शत यौर शानच कृदन्ती के पर्तृवाच्य में निम्नलिसित प्रयोग मिलते हैं। शतृ ने पुलिग वर्तमान रूपों में हसन्तो, हसेन्तो, स्त्रीलिग में इसई, हसन्ती, पुलिंग भविष्य मे हसिस्सिन्तो, स्त्री० म हसिरसन्ता, नप० म हसिस्सत मिलते है । शानच क वर्तमान पु० रूपों म हसमायो समाणो, स्त्री० म हसमाणी, नपु. में हसमाण, भविष्य पु० म हसि समाणो, स्त्री. हसिस्तमाणी नपु ० हसिस्समाण के प्रयोग होते हैं। उक्त कृदन्तों का फर्म वाच्य म इस प्रकार प्रयोग मिलता है-- वर्तमान--सीयन्ती (शौ०), हसिग्नन्तो (माहा.), हसिन्जमाणे (श्रमा०)। भूत-इसिदो (शौ०), रसियो ( माहा.) । भविष्य---हप्सिदमो ( शौ० ), हसियव्यो (माहा० ), हसणीयो (शौ०), हमणिनी (माहा०) । मातों म थुछ ऐम रूप भी मिलते है जो सस्कृत रे वय्याकरणों के द्वारा निर्धारित नियमों र श्रनुसार सिद्ध नहीं होते। वे रुप सरहत श दो पायाधार लेकर अनियमित रूप म विकसित माने गये है। इन असाध रण म्पा पो गरीमान्त' गम से ए०सी० वृल्लर ने दी है। विभिन मारतो म इन शान्त रूपों का प्रयोग कृदन्त के अति रिक विशेषण र अर्थ म भी हुया है। उनके कुछ म्प य है यारत< धारन्ध, पिए, (शौर०), पथ ( गाहा०), क्य (श्रमा०) <a, मिलिह< लिए, पित्त, >दिन, ठिग्न ( माहा.), टिद (शो.) <रिया, पइरश > प्ररोग, पडियण < प्रतिपन, पिएणत< विप्न प्रादि वाहन विविध रालम्पों ममी इन साधारण रूपों पा प्रयाग निनना है। उदा. वर्तमान काल यप्र० पु. एम. नगारमाति, भाति, भादि< विभाति, ठार< तिष्ठति यादि। मलि २ मार (महा), दाह <दन (मास)।

[२०] कर्मवाच्य म भी ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं। गुजदि < युज्यते, गम्मइ< गम्यते । इसी प्रकार प्रा. सजइ, सिप्पद, लभइ, मुच्चइ, बुच्चइ आदि रूप क्रमश साद्, /क्षिप् , लिम, /मुच, विच सस्कृत धातुश्नों से सबंधित हैं। अन्य रूप घेप्पद <गृह्यते, लिभइ< लिहाते यादि अप्रचलित धातुयों से विकसित हैं। वर्तमानकाल में अस्थि रूप का विकास अस्ति और भूतवाल के ग्रासी रूप का सवध सस्कृत यासीत् से है। इनका प्रयोग सब पुरुपों और वचना में समान मिलता है । अतएव प्राकृत म उक्त लान्त प्रयोग प्राय सस्कृत धातुया से ही सबधित है परन्तु ध्वनि परिवर्तन और सादृश्य ५ कारण ये रूप सस्कृत के व्याकरणिक नियमा से सिद्ध नहीं होते इसीलिये उन्हें असाधारण प्रयोग कहा गया है। 1 अपभ्रश अपभ्र श म क्रिया के रूपों का विकास शौरसेनी, माहाराष्ट्री प्राकृतों के सदृश ही मिलता है परन्तु वर्तमान अाज्ञा के मध्यम पु० एव० और भविष्य मे कुछ अन्य रूपो का भी व्यवहार होता है। हेमचद्र ने इन विशेष रूपों का निर्देश सून सख्या ३८२ ३८८ मे क्यिा है। वर्तमान काल के प्रथम पु० बहु० मे हिं का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा० धरत > धरहि, बुरुत > करहि, शोभन्ते> सहहि ( २८२ १ । मध्यम पु० एक० में हि का वैकल्पिक प्रयोग होता है। उदा. रोदिपि> रूयहि (३८३ १), लभसे> लहहि ( ३८३.२), दद्या > दिजहि (३८३३)। वर्तमान काल के मध्यम पुरुप बहु० में हु रूप का योग मिलता है। उदा० इच्छय> इच्छह ( ३८४१)। उत्तम हिं न वा घ. पाद प्रा०या० १ रयादेराध त्रयस्य सबधिनी सूत्र स०३८२ २ मध्य त्रयस्याद्यस्य हि ३ बहुते ३८४ " . , . । २२२ ] पु० एक० में -उँ का प्रयोग वैकल्पिक रूप में होता है। उदा. कामि काढउँ ( ३८५-१), करोमि > क्विउँ (३३८-१) । उत्तम पुरुष बहु. में हुँ का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है । उदा० याम:> जाहुँ, लभामहे> लहुँ, पलाम> बला? (३८६-१)। श्राशार्थ (लोट ) मध्यम पु० एक० में -द, -3, -ए के वैकल्पिक प्रयोग मिलते है। उदा० स्मर> मुमरि (३८७-१), विलम्बस्व> पिलमु (३८७-२) । बुरु>सरे (३८७-३) । भविष्य काल में न्य (प)> -स रूप होता है। उदा० भविष्यति> होसइ (१८८-१) । पाश में जिय' क्रियापद के स्थान पर 'कीमु' का चैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदा० क्रिये> कीनु (३८६-१) । वर्तमान काल मे / भू धातु या 'टुच्च' रूप मिलता है। उदा० प्रभवति> पहुबह (३६०-१)। धातु के प्रपद रूप का वैकल्पिक प्रयोग होता है। उदा० घेत गुभाषित किंचित् > वह सहासिउकिचि, उचा> बोधि, प्रोप्पिणु रूप भी मिलते हैं। (३६१-१) । बिज धातु पा रिपास 'युन' रूप में पाया जाता है। उदा. मजति> धुन प्रजिल्या> युने (प्पिण)| Vा धानु के स्थान पर अस्म' या प्रयोग मिलता है। उदा० पश्यति (दृश्येत) > प्रत्सदि ग्रह धातु या पिकात 'ए' रूप में होता है। उदा. पट. १.मय यस्यायस्य २. पारे २.रिपोरिदेव ४. वायति यस्य सः सस्पा ३८५ च० पद प्रा०या० " " " " " " .. " " " ६.मुर: पातीप: ७. भागे पोरा . " " " " . . ६.रोःप्राम १०.मी १६ . " [२२२] गृहीत्वा प्रतम् > पठगण्हेप्पिणु व्रतु । अपभ्र श में छोल्ल आदि देशी शब्द संस्कृत तत् ग्रादि के अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं। उदा० अतक्षिष्यतः > छोल्लिजन्तु (३६५-१), सतप्त>झलकियउ (३६५२), अनुगम्य > अभडवचिउ (१६५. ३) शल्यायते> खुटुइ, गर्जति > पुडुक्द, (३६५ ४), भक्त> भजिउ ( ३६५ ५ ), पैतृकी> वप्पीकी श्रामभ्यते>चम्पिजइ (३६५ ६), शब्दायते> उदअई ( ३६५७)। अपभ्र श शब्दा मे म्ह> म्म का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। उदाब्रह्मन् > वम्म (४१२ १), यादृश > ग्रनाइस योर अपराइस के रूप मिलते हैं 13 'प्राय' शब्द के चार रूप प्राउ, प्राइव, प्रादम्य, पग्गिम पाये जाते हैं। उदा० प्राय > प्राउ (४१४ १) प्रायो>प्राइव (४१४२), प्राय > प्राइम्ब ( ४१४३), प्राय > परिगम्ब (४१४ ४)। अपभ्र श मे 'अन्यथा' शब्द के लिये वैकल्पिक रूप म 'अनु' उपलब्ध होता है। उदा० अन्यथा> श्रनु (४१५ १)। अनु कुत शब्द के लिये क्उ, कहन्तिहु रूप मिलते हैं। उदा. कुत >कउ (४१६ १), कुत > वहन्तिहु (४१५-१) । तत, तदा शब्दों के स्थान पर 'ता' रूप मिलता है। उदा० तद, तत > तो ( ३७६२)। एव, पर, सम, ध्रुव, मा, मनाक शब्दों के स्थान पर प्रमश- च०पाद प्रा०व्या. " " तथ्यादीना छोल्लादय स्त्रस० ३६५ २ म्हो म्भी वा ४१२ ३ अन्याशोन्नाइसाराइसौ ४१३ ४ प्रायम प्राउप्राइव-प्राइम्व पग्गिम्बा ४१४ ५ वाम्ययोन ४१५ ६ कुतम कर कहन्तिहु ७ ततस्तदोस्तो " " " " D , ..

[२२३] एम्प, पर, समाणु, ब्रुनु, मे, मणाउं रूप उपलब्ध होते हैं।' उदा० एवम् > एम्ब (४१८-१), पर> पर (३३५१), सयम् > समाणु (४१८-२), ध्रुवम् > भ्रषु (४१८३), मा> म (३८५१), मनाप > गणाउँ (४१८६) । क्लि, अथवा, दिवा, सह, नहे शब्दा के स्थान पर क्रमश किर, ग्राइ, दिवे, सह, नाहिं रूपों के प्रयोग मिलते है। उदा० क्लि> किर (४१६-१), अथवा न सुनशामा मेप दोष> यह न मुरसह एह सोडि, दिवसे> दिवि ( ३६६-१), सह> सहुँ ( ४१६-३), नहि> नाहिं ( ४१६-४), पश्चात् , एवम् , एव, इदानीम् , प्रत्युत, इत शब्दों के लिये प्रमश पन्छह, एम्वइ, जि, एम्बहि, पच्चलिउ, एत्तहे रूप प्रयुक्त होते हैं। उदा० पश्चात् > पच्छद ( ३६२-१), एवम् , एव>एम्बई ( ३३२-२), एच>जि ( ४२२० १), इदानीम् >एम्यहि (४२०-२) प्रत्युत> पन्यलिउ । ( ४२०३ ), इत > एतहे ( ४१६-४ ) । विपराग, उक्त, पद्मन शब्दों के स्थान पर प्रमश पुन, वुत्त, चिन्न रूपों का प्रयोग होता है। उदा. विषएण>घुग्न (४२१-१), उम > पुन (४२११), यमनी > पिच (१५० १) । अपम श म देशी शब्दों के भी प्रयोग मिलते हैं जिनके लिये संस्कृत म सहरा म्प पाय जाते हैं। संस्कृत 'शीम' आदि शन्दों के पहिल्ल १६ परं समभुषमा मनार सूत्र स म पर समानुभुपु ४१८ च. पाद प्रा.मा. ४18 " . २ सिपाया दिवा मानदे कि NS दिम नाहि १ मारने समMEEt नरनिए दिसामगो कुन्नर. ४१. १ " [ २२४ ] D (" 3D D यादि रूप होते हैं। उदा० शीघ्र = वहिल्लउ (४२२१), झकट = घघल, कलहा = घड्वलइ (४२१२), ससर्ग = विद्यालु ( ४२२३ ), भय = द्रवक्उ (४२२४), यात्मीय =थप्पणउ (३५० २), दृष्टि देहि {४२२ ५), गाढम् = निच्चद् (४२२-६), यसाधारण यसडू ढल (४२२ ७), कौतुकेन-गुड्डेण (४२२-८), प्रीडा = खेड्डय (४२२९), रम्या = रवरा ( ४२२-१०), अद्भुत = ठकरि ( (४२२ ११) हे ससी = हेल्लि (३७६१), पृथक्पृथक् = अनुप (४२२ १२), मूढ नालिउ ( ४२२-१३ ), अयस्सन्द =दइयडउ (४२२-१४), सवधिना = फेरऐ (४२२-१५), माभैपी मब्भीसडी (४२२ १६), यद्यद् दृष्ट तत्तत् = जाइहिमा । उदा० यद् दृप तस्मिन् > जाइहिए ( ४२२ १७), हुहुरु, घुग्घ यादि शब्द प्रमश, शब्दानुकरण और चेष्टानुकरण क रूप में मिलते है ।२ उदा० हुहुरु शब्द कृत्या> हुहुरुत्ति (४२३-१), पसरत्क शब्द कृत्वा = कसरकेहि, पुट शब्द कृत्या=हुएटहिं, मकद पुग्विउ=मर्कट चेष्टा ( ४२३-३ ), उत्थानो- परेशनम् = उहाइस ( ४२३ ४ ) । घइम् शब्द का प्रयोग अनर्थयूचर अर्थ म होता है। उदा० नून विपरीता बुद्धि' भवति विनाशस्त्रकाले =घइ पिचरीरी युद्धडी होइ रिणासहों चालि (४२४ १)। अपभ्र श में कुछ शब्दा के प्रयोग विशेष प्रकार के मिलते हैं । 'तात्' चतुर्थी सूचक शब्द के लिये केहिं, तेहि, रेसि, रेसिं, गणेण शब्द मिलते हैं । उदा० ते> वेटिं, रेसि (४२५१), कृते> तरेण ( ३६६ १)। पुा, विना शब्दों में श्रत्य में उ च०पाद मा.न्या. " १प्रवदिस्लादय सुत्रस०४१२ २ गुम्यादय रम चैरा নবী ४२३ ३ पश्मादयोनका ४२४ १ तायर हिरमि रेसि- বঃ ४२५ " " [२२५] प्रत्यय का योग होता है। उदा० पुनः> पुणु (४२६-१), विना> विणु (३८६-१) । अवश्यम् शब्द का विकास अन्त्य -एँ और अन्य-य रूप में मिलता है। उदा० अवश्यं> अवसे (४२७-१), अवश्य श्रवस (३७६-२) । एकश: शब्द के लिये अन्त्य -इ प्रत्यय युक्त रूप मिलता है। उदा० एकश:> एकसि (४२८-१) | अपभ्रश के कुछ शब्दों में -डा, -डुल्ल प्रत्ययों का योग मिलता है। उदा० द्वौ दोपौ> ने दोपडा (३७६-१), एक कुटी पञ्चभि:> एक कुडुल्ली पश्चहिं (३२२-१२) । वर्तमान काल के स्त्रीलिंग के रूपों में शब्द के अन्त में-डी प्रत्यय का योग होता है।५ उदा. गौरी> गोरडी (४३१-१) । वर्तमान काल के स्त्रीलिंग रूपों में -डा, डि प्रत्ययों का भी योग होता है। उदा. वार्ता> वत्तडी, धूलि:> धूलडिया (४३२-१)। अकारान्त शब्दों में -डा प्रत्यय का रूप डि, डइ मिलता है। उदा० धूलिरपि न दृष्टा>धूलडिया वि न दिड (४३२-१), ध्वनिः कर्णे प्रविष्ट:> भुणि कन्नडइ पद६ (४३२-१)। अपभ्रंश में संबंधवाची प्रत्ययों -इल्ल, उल्ल का प्रयोग अधिक मिलता है। युष्मद् आदि शब्दों में-ईय प्रत्यय का -यार रूप हो जाता है। उदा० युष्मदीयेन नुहारेण (४३४-१), अस्माकं> अम्हारा (३४५-१), भागनि अस्मदीयः कान्तः> बहिणि महारा कन्तु (३५१-१) । इदं, कि श्रादि १. पुनर्विनः रवा दुः भवश्यमो ३. एकरामो हि ४.म-दर-दुल्लाः स्वाधिक-क. - पत्र सं. ४२१ प्य०पाद प्राध्या. " ४२७ . " " " ." " " ५. स्त्रिया तरन्ताही ६. भान्नानाडा ४२६ ४३१ ५३२ . " " ७.मस्ये? ८. युप्मारीपरप पर ।

. - [२२८ ] एक० बहु म० पु० करहिं, करसि करहु, करह उ० पु० करउं, करिमि करहुँ, करिमु ग्लोट (आशा) में मध्यम पु० एक० में करि, करु, करे रूप मिलते हैं विधि प्र. पु. करिजउ करिजंतु, करिजहुँ म० पु० करिजहि, करिजइ करिजहु उ० पु० करिजउं किजउं लूट (भविष्य ) प्र. पु० करेसइ, करेहइ करेसहि, करहिंति म० पु. करेसहि, करेससि, करेसहु, करेसहो करीहिसी उ. पु. करेसमि करीहिमी, करिमु करेसहुँ कृदंत-वर्तमानकालिक कृदंत पुलिंग में -अंत, -माण, स्त्रीलिंग में अंती प्रत्ययों का योग होता है। उदा. पु० चलंत, भमरा, पविस्माण, वट्टमाण, स्त्री० चलंती, भमंती। भूतकालिककृदंत के लिये इअ, -इउ, -इय, दयौ, -इश्रश्न, इश्यो प्रत्ययों का योग होता है। उदा० किय, किय, गण, गय, हुश्य श्रादि । भविष्यवालिक कृदंत के लिये -इएव्यउं, एव्यउं, -एवा, एच प्रत्ययों का योग मिलता है। उदा० मरिएव्यउं, सहेवर्ड, जागेवा । क्रियार्थक संशा के लिये एव,श्रण, -यणह, -यणहिं, एप्पि, •एप्पिगु, -एपि, एविणु प्रत्ययों का योग किया जाता है । उदा. देव, करण, भुजणहं, भुजंणहि, जेप्पि, जेप्पिणु, पालेवि, लेविणु पूर्व- मालिक क्रिया के लिये , उ, इथि, -अयि, -एप्पि, एप्पणु, एपि, -एविणु प्रत्ययों का प्रयोग होता है। उदा० परि, करिउ, फरिवि, करगि, कोप्पि, कोप्पिणु, करेवि, करेपिणु । मेरणार्थक रूप पा प्रत्ययों के योग से बनते हैं-उदा. विएणवर, , चिन्तयद, बोल्लावर थादि। -श्रय,-याय, चयनिका उद्धरण संख्या-१ हाराष्ट्री गाथासप्तशती १. अमिय पाउयकव्यं: पहिउं सोउं3 अ जे ण आणन्ति कामरस तत्त तन्ति कुणन्ति ते कहं ण लजन्ति ॥२१॥ २. गिम्हः दयग्गिमसि मलिआई दीसन्ति विज्मासिंहराई श्रासुमु पउत्थवइए न होन्ति नव पाउसम्भाई ॥७०१।। १-१. प्राकृतकाव्यं-द्वि० एक० नपुं० । २. पठितुं-/प, तुमुन् प्रत्यय, पढना । ३. श्रोतु-/श्रु,तुमुन् प्रत्यय, सुनना। ४. च-अव्यय । ५. जानन्ति- ज्ञा प्र० पु० बहु० वर्तमान० जानते हैं ६. कामस्य-५० एक० नपुं० । ७. तंत्री देशी० सं० चिन्ता, द्वि० एका स्त्री०।८.कुर्वन्ति-/ कृ-प्र० पु. व. वर्तमान ॥६. ल जन्ते, /लज-प्रथम पु. वहु० वर्तमान०, लज्जित होते है। २-१. ग्रीष्मे-म> म्ह घनिविर्यय, सप्तमी० एक. नपुं० । २. दृश्यन्ते- Vश-प्र. पु. बहुवर्तमान । ३. रिन्थ्यशिखराणि-प्र. बहु० नपुं० । ४. याससिहि-/श्वस-म० पु. एक. प्राज्ञा० । प्रोपितपतिके- सं० एक स्त्री. १६. भवन्ति-भू-प्र. पु० ब० वर्तगान ।

-[२२६ ] शब्दों में -एत्तुल प्रत्यय का योग मिलता है। उदा० इदं> एतुलो, कि केत्तुलो, यत् > जेतुलो, तत् > तेत्तुलो, एत्> एत्तुलो। अन, तर यादि शब्दों में अन्त्य -त्र के स्थान पर -तहें प्रत्यय का योग हो जाता है। उदा. अ> एत्तहें, तंत्र> तेत्तहे (४३६-१) । शब्दो के -त्व, -तल प्रत्यपों का .पण, -तण रूप मिलते हैं। उदा. महत्वस्य कृते> वड्डत्तणही तणेण, महत्वं पुन: प्राप्यते> वड्डप्पणु परिपाविनइ (३६६-१), -तव्य प्रत्यय के लिये अपभ्रश में -इए.पउँ, -ए-वउँ, एवा रूपो का प्रयोग होता है। उदा० मर्तव्यं> मरिए व्वउँ (४३८-१), सोढव्यं, सहेव्वउँ (४३८-२), जागरितव्यं> जग्गेवा (४३८-३)। क्त्या प्रत्यय के स्थान पर अपभ्रंश मे -इ, इउ, इवि,-अघि रूप मिलते हैं । उदा० मारयित्वा > मारि (४३६.१), गजघटा:- भडक्यात:> गयघड मजिउ जन्ति ( ३६५-५ ), द्वौ करौ चुम्बित्वा जीवम् > वे कर चुम्बिवि जीउ (४३६-२), विच्छोट्य> विछोडवि (४३६-३)। क्त्वा प्रत्यय के लिये -एप्पि, -एप्पिणु, -एवि,-एपिणु रूप भी मिलते हैं। उदा. जित्या> जेप्पि, दत्वा> देप्पिणु, लात्या> लेबि, ध्याला> झाएविणु (४४०-१)। -तुम् प्रत्यय का -एवं, -अण, -अणह, -श्रणाहिं, -एप्पि, एप्पिणु, -एवि, एविणु रूप मिलते हैं। उदा. दातुं> देवं, कर्तु > करण, भोक्तुं> भुजणह, भुजणहिं (४४१ १), जेतुं> जेप्पि, त्यक्त्तुं> चएप्पिणु, लातुं> लेविणु, पाल- यितुम> पालेवि, (४४१.२)। गम् धातु का विकास इप्पणु, एप्पिणु , च. पाद प्राoया " " " " . १. मतो तुलः सूत्र सं० ४३५ २, रथ देतदे ४६६ ३. व तलो: पपः ४ तव्यस्य इए बउँ एप एवा ४३८ ५. स्व-उ-इविभवयः १.एण्यापिण्वेष्येविणव: ४४० ७. तुम एवमपापक्षमाहिए ४१ " " IN " P "" " " " का -[ २२७.] प्रत्यय युक्त मिलता है। उदा० गत्वा> गम्मिशु (४४२-१), गला >गमेप्पिणु (४४३-२)। -तृनः प्रत्यय याय रूप होता है। उदा० मारयित्वा> मारणउ, कथयिता> वोल्जाउ, वाद- पिता> वज्जएउ, भाषिता> भयणउ (४४३-१)। इव' शब्द के. लिये नं, नउ, नाइ, नावद, जणि, जणु छ: रूप मिलते हैं।' उदा० इव> नं (३८२-१), इव> एउ (४४४१), दव> नाइ (४४४-२) इब> नावइ (४४४-३), इव> जणि (४४४-१) इव>जणु (४०१-३)। अपभ्रंश में लिग रूपों का व्यत्यय भी मिलता है। पुलिंग का नपुंसक में प्रयोग होता है। उदा० गजानां कुम्भान् दारयन्तम् > गय कुम्भई दारन्तु (३४५.१)। नपुंसक के लिये पुलिंग का प्रयोग होता है । उदा० अभ्राणि लग्नानि पर्वतेषु> अब्मा लग्गा डुगरिहिं (४४५-१), नपुंसक का स्त्रीलिंग में भी प्रयोग मिलता है उदा. पादे विलग्नं अन्वं> पाई चिलागी अन्त्रडी (४४५-२) स्त्रीलिंग का नपुंसक के लिये प्रयोग होता है। उदा० पुनः शाखा: मोटयन्ति> पुणु डालहँ मोडन्ति (४४५-३)। अपभ्रंश में शौरसेनी प्राकृत की कुछ ध्वनि संबंधी विशेषताएँ द्रष्टव्य हैं। उदा. विनिर्यापितम् >विणि म्मिविदु, कृतं > किदु, रत्या: > रदिए, विहितं > विहिदु यादि । अतएव अपभ्रश में क्रिया रूपों का विकास निम्नलिखित होगा- लट (वर्तमान) / कृ (कर.)। एक० बहु० म. पु० करइ, करंद करहिं, करति १. गमेरेपियवेण्योरेलुग वा सूत्र सं० ४१ प्रा.घ्या. ४४३ " " १.तृनौरा म ३.पानउ.नार-नावर अपि, बएवः सिलामतन्त्रम् ५.शौरसेनीवत् " ४. ४४५ " " ४ - 3 [ २ ] ३. वसई' जहिं चेत्र खलो पोसिजन्तो सिणेहदाणेहि तं चेत्र आलअं दीअश्रो व्यअइरेण . मइलेइ ॥३५-२|| • ४. सच्चं भामि भरणे हिअमिर पुरणे तडम्मि तावीए अज, वि तत्थ कुडङ्ग णिवडइ दिट्ठी तह च्चे ॥३६-३।। ५. अउलीणो' दो मुहओ ता महुरो भोत्रण मुहे जाव' मुरनो', व्य खलो जिएणम्मि भोषणे विरसमारसइ५ ॥५३-३॥ ६. जह' जह उव्वहइ२ यहू णवजोवण मणहराई अङ्गाई तह तह से५ तणुश्राअइ मझो दइयो अ. पडिवक्खो ॥२-२॥ ४७. वसणम्मि' अणुव्विग्गा विवम्मिं श्रगव्विश्रा भए धीरा। होन्ति अहिएणसहावार समेसु विसमेसु सप्पुरिसा ।।८०-४|| ३-१. वसति-/वस प्र. पु. एक० वर्तमान । २ यत्र । ३. पोप्यमाण: /पुप्- शानच-वर्तमान प्रेरणा । ४. स्नेहदानैः-तृ० बहु• नपुं० । ५. इव-यव्यय । ६. मलिनयति-प्र० पु. एक० वर्तमान । ४-१. सत्यं-द्वि० एक० नपुं० । २. स्थितास्मि /स्था - उत्तम पु० एक. वर्तमान 10 | ३. तटे-सप्तमी० एक. नपुं० । ४. निपतति- पत्, उपसर्ग-प्र. पु. एक. वर्तमान । ५---१. श्रकुलीन:-प्र० एक० पु० । २ यावत्-अन्य व्यंजन-लोप अव्यय । ४. जीर्णे सप्तमी० एक० नपुं० । ५. मारसति-/मार-प्र० पु० एफ. ६-१. यथा-अव्यय २. उदहते / यह, उत्-उपसर्ग, प्रथम पु० एक. वर्तमान । ४. नवयौवनमनोहरअगानि-प्र० बहु० नपुं०। ४. तथाः अव्यय । ५. तस्याः, तद्-सर्वनाम प० एक० स्त्री०१६. प्रतिपक्ष:-प्र० एक० नपुं०। ७-१. व्यस्ने सप्तमी० एक. नपुं० । २. अभिन्नस्वभावा::प्र. बहु० पु०। ३. समेघु-सप्तमी० बहु० नपुं० १४. सत्पुरुषा:, प्र० बहु• पु० । . नि वर्तमान। 7 . [३] . मालइ कुसुमाई' कुलुचिऊण मा जाणि णिव्वुत्रो सिसिरो काअव्वा अज्जवि णिग्गुणाणं कुन्दाणं वि समद्धी ॥२६-शा कत्थ' गर रइबिम्बं: कत्थ पणट्ठाओ चन्दताराओ गणे' वलाअपन्तिं कालो होरं व कड्ढेइ ।।३५-५।। .रोवन्ति' व्व अरणे दूसहर रइकिरण फंस संतत्ता अइतारझिल्लि विरुएहिं पाअवा" गिम्हमज्मदणे ॥६४-५॥ २. मअणग्गिणो' व्व धूमं मोहणपिच्छि व लोअदिट्ठीए' जोव्वण धनं व मुद्धा वहइ सुअन्धं चिउरभारं ।।७२-६।। २. गम्मिहिसि' तस्स पासं सुन्दरि मा तुरा वड्ढउ मिश्रको' दुद्धे दुद्धं मिश्र चन्दिआइ को पेच्छइ. मुहं दे ॥ ७७ ॥ १ . -- ८--१. युसुमानि-प्र० बहु० नपुं० । २. देशी-कुलुञ्च-सं० दह-जलाना, -क्त्वा, प्रत्यय-अर्धमागधी तूण, शौर०-दूण-माहा०-ऊण । ३. निर्गुणणा- पठी. बहु० पु० । ४ कुन्दानाम्-प० बहु० नपुं। ६-१, कुत्र । २. गतं-/गम-कृ प्रत्यय भूतकालिक कृदन्त । ३. रविविम्बं. प्र. पुं० एक० नपुं० नपुं०४. प्रणप्ट:-/नश क प्रत्यय भूतकालिक कृदन्त । ५.कर्षति-/कृप-प्र० पु० प्र० एक० ऐक. वर्तमान । १०-१. सदन्ति- द प्र. पु. बहु० वर्तमान० १२. दुःसह । ३. स्पर्श । ४. विरुतैः-४० बहु० नपुं० । ५. पादपाः, प्र० बटु० नपं०१६. ग्रीष्ममध्या, सप्तमी० एक० नपुं० । ११-१. मंदनाग्ने:, पंचमी एक० रवी० १२. लोकदृष्टे., पंचमी० एका स्त्री. ३. ध्वज-द्वि० ९क० नपुं० । १२-१. गमिप्यसि-/गम्-मध्यम पु० एक० भविष्य०१२. मृगाङ्कः-प्र० एक. पु० । ३. दुग्धे-स० एक. नपुं०।४. चन्द्रिवायां-सप्तमी० एक० स्त्री० । ५. प्रेक्षते -प्र-उपसर्ग-/ईत्-प्र. पु. एफ. वर्तमान ।

खलः [४] १३. जे जे गुणिणो जे जे अ चाइणो' जे विडड्ढविण्णाणा दारिद्द रे विअक्खण ताण तुमं साणुरायोसि ॥७१-७/ १४. उन' सिन्धव पव्या सच्छहाइ धुतूलपुञ्जसरिसाई' सोहन्ति सुअणु मुक्कोअआई५ सरए सिअब्भाइ ॥७६-७। संस्कृत-छाया १-अमृतं प्राकृतकाव्यं पठितु श्रोतु च ये न जानन्ति कामस्य तत्त्वचिन्तां कुर्वन्ति ते कथं न लजन्ते ॥ २-ग्रीष्मे दवाग्निमपी मलितानि दृश्यन्ते विन्ध्यशिखराणि आश्वसिहि प्रोपितपतिके न भवन्ति नव प्रावृडभ्राणि ।। ३-वसति यत्र व पोप्यमाणः स्नेहदानः तमेवालयं दीपक इवाचिरेण मलिनयति ॥ ४-सत्यं भरणामि भरणे स्थितास्मि पुण्ये तटे ताप्याः अद्यापि तत्र निकुञ्ज निपतति दृष्टिस्तथैव ।। ५-अकुलीनो द्विमुखस्तावन्मधुरो भोजनं मुसे यावत् मुरज इव खलो जीणे भोजने विरसमारसति ।। ६-यथा यथोद्वहते वधूनवयौवनमनोहराण्यगानि तथा तथा तस्यास्तनूयते मध्यो दयितश्च प्रतिपक्षः।। --व्यसनेऽनुद्विग्ना विभवेऽगर्विता. भये धीराः भवन्त्यभिन्न स्वभावा. समेपु विपमेपु ससुरुषाः ।। १३-१. त्यागिन:-म० एक. पु० । २. विदग्धविज्ञानाः, प्र. पटु नपं । तेषा, प० एकपु०। १४-१. देशी अव्यय-सं० पश्य-देसो। २. सदृक्षाणि-निर्मज्ञ । सहशानि समान । ४. शोमन्ते-५० ० बहु० वर्तमान । ५. मुक्तोदवानि- पर नपुं० १ ६, सितामाणि/प्र.चमपना, प्र. व. नपुं०। ने ७

[५]
-मालती कुमुमानि दग्या मा जानीहि निवृत: शिशरः
कर्तव्याद्यापि निर्गुणानां कुन्दानामपि समृद्धिः॥
१-पुत्र गतं रविविम्वं
कुत्र प्रगष्टाश्चन्द्रतारकाः
गगने बलाकापंक्ति कालो होरामिवाकर्पति॥
१०-दन्तीयारण्ये दुःसह रविकिरण स्पर्श संतप्ताः
अतितारमिल्लो विरतैः पादपाः ग्रोप्ममध्याद ।।
११- मदनाग्नेरिख • धूम मोहनपिच्छिकामिय लोकदष्टेः
योयन ध्यानमिव मुग्धा वहति मुगन्धं चिकुरभारम् ॥
१२--गमिप्यसि तस्य पार्श्व सुन्दरि मा स्वरस्य वर्धतां मृगाः
दुग्धे दुग्धमिव चन्द्रिकायां कः प्रेक्षते मुखं ते॥
१५-ये ये गुणिनो ये ये च त्यगिनो ये विदग्धविज्ञानाः
दारिद्रय रे विचक्षण तेषां त्वं सानुरागमसि ।।
१४-परय सैन्धवपर्यत सदृक्षाणि धूनतूलं पुल सहशानि
शोमन्ते मुतनु मुफोदकानि शरदि सिताप्राणि ।।
उद्धरण सं०-२
माहाराष्ट्री
पसालगं
१. देमियमरपलो मारपसरछन्द संठियं ललियं
पुयियापायरत्यं যান
पढेयच्या
1-1.नी पनीर मसभरिपालिस परवना माहिये।

- । [ ६ ] २. दिढलोहसङ्कलाण' अन्नण' ,वि. विविहपासबन्धारणं ताणं चिय अहिययरं वायाबन्ध कुलीणरस५॥७६-२ मितवजा. . ३. अप्पहियं कायव्वं जइ सकइ परहियं च कायव्वं अप्पहिययरहियाणं3 अप्पाहियं चेव कायव्वं ॥३॥ नीतिवज्जा ४. प्रारम्भो जस्स. इमो आसन्नासाससोसिय सरीरो परिणामो कह होसइ२ न याणिमो तस्स पेम्मरस ॥३३-१॥ पेम्मवज्जा ५. माणम्मि' तम्मि किजइ जो जाणइ विरहवेयणादुक्खं अणरसिय निव्विसेसे किं कीरइ पत्थरे मारो ।।३-६३॥ मानवजा ६. उपहुएहा रणरण्या दुप्पेच्छा दूसहा दूरालोया' संवच्छरसयसरिसा पियविरहे दुग्गमा दियहा ॥३-८४॥ विरहवजा २-१. शृङ्खलाना:-प० बहु० नपुं० । २. अन्याना:-प० बहु० अन्यत् सर्वनाम । ३. विविधपाशवन्धाना-प. बहु० नपुं० ।४. तेषां-प० बहु० पुं० तद्-सर्वनाम । ५. कुलीनस्य-पष्ठी०.एक. पुं० । ३-१. शक्यते-/शक-प्र० पु० एक. वर्तमान० २. कर्तव्यं-/कृ-तव्ययान्त प्रत्यय भविष्यकालिक कृदन्त । ३. चरहितानाम्-५० बहु० नपुं०। ४. अात्महितं-द्वि० एक० नपुं० । ४-१. यस्य-५० एक० न० यद्-सर्वनाम । २. भविष्यति-भू-प्र० पु. एक. भविष्य० । ३ प्रेमस्य-प० एक. नपुं० । ५-१. माने-स० एक० नपुं० २. क्रियते-प. पु. एक. वर्तमान । ६-१. दुरालोकाः- दुर्-उपसर्ग, प्रथमा० बहु• नपुं० । २. दिवसा:-प्रथमा यहु नपुं०।

घसतवज्जा १०. भग्गो पाउसबज्जा ७.विसहरविसम्गिससम्गदूसियो डहइ. चन्दणो डहउर 2. पियविरहे. महचोज अमयमओ ज ससी डहइ ॥३८॥ विरहवजा -८ किं वरइ' तुरियतुरिय अलिउलघणवम्मलो य सह्यारो पहिश्राणर विणासासकिय व्व लच्छी वसन्तस्स ।। ६३६ ।। १. अपरेण तवइ' सूरो सूरेण य ताविया तवइ रेणु सूरेणऽपरेण पुणो दोहिंपि हु. तारिया! पुहयो ।। ६४२ ।। गिम्हवजा गिम्हप्पसरो मेहा गजन्ति' लद्धसंमाणा -मोरेहि नि उग्युट पाउसराया चिरं जयउ ॥ ६४६ ॥ ११.सुसइ' व पट् न वहन्ति निझरा वरहिणोन नयन्ति' तनुयायन्ति एईयो अत्यभिए पाउसनरिन्दे ॥६५३॥ शरदज्जा ७-१. ददति /दह-म० पु. एक. वर्तमान । २. दहनु प्र० पु० एक. विधि रिया । ३. महदाश्चर्य-म० एक० नपु० । परोति-/-१० पु० एक. वर्तमान० । २. पथिकानां-य. यह पु० । ३. इक अव्यय ४. यसन्तस्य-य० एक. नपुं। ९-१. तपति-/उपम० पु० एप० वर्तमान० । २. सूर्यण-नृ० एक० पु० । ३. तापित त प्रत्यय, वर्तमान पदन्त, प्रेरणा०।४. दाभ्याम्-तृ बहु मनागप.मारत में दिवचन का प्रयोग पहुवचन पे सहरा होता है । १०-१. गर्जन्ति- गि,म० पु० या वर्तमान० २, मयूरे -नृ० या• पुलिंग २. उसट प्रत्यय पर्तमान० पदन्त । ४. जयतु /जि प्र० पुस एप.रिधि ११-१. गुमशी-शु-० पु. एय. पर्तमान० । २. यहन्ति वाम. पु• गर• पर्दमान. ३. नरपति नतु प्र. पु. बा. पर्तमान नियों . प्र..सी।

-- M १ [ 5 ] १२.जाणिजइ' न उ पियमपिमं पि लोयाण' तम्मि 'हेमन्ते सुयगसमागम वऽग्गी निच्चं निच्चं सुहावेइ ॥६५॥ हेमन्तवना १३. वधूययलक्खणथूसराउ, दीसन्ति फरुसलुक्खाओ उय२ सिसिरवायलइया अलविणा दीणपुरिस व्व ॥६५७|| सिसिरवजा १४. एक्केण विरणा पियमाणुसेण सम्भावनेहभरिएणं जणसङ्घला वि पुहवी अव्वो रणं२ व पडिहाइ ॥७८१॥ पियोल्लासपज्जा संस्कृत-छाया १. देशीशब्दपर्यस्तं मधुरातरच्छन्दः संस्थित ललित प्रकटार्थ प्राकृतकाव्यं पठनीयं ।। २. दृढ लोहशङ्खलेभ्योऽन्येभ्योऽपि विविधपाशबन्धेभ्यः तेभ्य एवाधिकतरं वाग्बन्धनं कुलीनस्य । ३. आत्महितं कर्तव्यं यदि शक्य परहितं च .कर्तव्यं श्रात्महितपरहितयोरात्महित चैव यस्येदृश श्रासन्नाश्वासशोपित शरीरः परिणाम: कथं भविष्यति न जानीमस्तस्य प्रेम्नः ।। १२-१. ज्ञायते-/ज्ञा-प्र. पु० एक. वर्तमान प्रेरणार्थक० २. लोपानां प. बहु• पु० । ३. मुखापयति / मुस-नाम धातु, प्र. पु..एक. वर्तमान प्रेरणार्थक०। १३-१. दृश्यन्ते दृश-प० पु० बहु० वर्तमान० २. देशी इन्द पश्य-देखो। ४-१. एकेन-त. एक० संख्या० २. अरण्यं प्र० एक० नपुं० । प्रतिभाति: प्रति-उपसर्ग,/भा-प्र० ० एक. वर्तमान०, दिखाई पड़ती है। स्फुट विकट कतंत्र्यं ॥ ४. आरम्भो . .

दिवसा ।।
चन्दनो दहतु
[]
५. माने तस्मिन् क्रियते यो जानाति विरहवेदनादु.सं
अरसिकनिर्विशेपे किं क्रियते प्ररतरे मान ।
६. उप्णोष्णा रणरणका दुष्प्रेक्ष्या दु:सहा दुरालोकाः
संवत्सरशतसद्दक्षाः प्रियविरहे दुर्गमा
७. विषधरविपाग्निसंसर्ग दूपितो दहति
प्रिय विरहे महदाश्चर्यममृतमयो यच्छशी दहति ।।
८.किं करोति त्वरितत्वरितमलिकुनधन शब्दश्च सहकार
पथिकाना विनाशाशङ्कितेव लक्ष्मीर्चसन्तस्य ।।
६. अपरेण तपति सूर्य सूर्येण च तापिता तपति रेगु.
सूर्येणापरेण पुनराभ्यामाप सलु
तापिता पृथिवी ॥
१०.भग्नो श्रीमप्रसरो मेधा गर्जन्ति
सन्मान
मयूरैरप्युघुटं प्राडाजश्चिरं
११.शुप्यतीव पङ्क न वहन्ति निर्मरा यहिणो न नृत्यन्ति
तनुपायन्ते नद्योऽस्तमिते प्रायट्कालनरेन्द्र ॥
१२. शायते न तु प्रियमप्रियमपि लोकानां तरिमन्हमन्ते
मुजनसमागम इवाग्निर्नित्यं नित्यं मुसापयति ।
१३. अवधूतालवणधूसरादृश्यन्तेपरुपरुक्षा.
पश्य शिशिरवातपरिहिंता अलक्षणानि दीनपुरुपादव ।।
विना प्रियमानुपेण सद्भावस्नेहमतेन
, पृळ्यहोऽरएयमिय
लम
जयतु ॥
१४. एवेन
..जनसङ्कलापि
प्रतिमाति ।।

- उद्धरण सं०-३ माहाराष्ट्री रावणवहो १. पजत' सलिल धोएर दूरालोकन्तणिम्मले गणनले अचासरणं व ठि" विमुक परमाअपाअर्ड ससिचिम्बम् ।।२५-१|| २. जो लहिजड़ रइणा जोवि खविजइ खाणलेण वि बहुसो कह सो उइश्र परिहओदुत्तारो ति पवाण भएणउ उपही ।।२५-३॥ ३. इन अस्थिरसामत्थे अएणस्स वि परिश्रणम्मि' को पासडयोर तत्थ विरामदहमुहो तस्स ठिो एस पडिहडो मम भुओ५३-३॥ ४. एवरि' सुमित्तातणो आसान्तो गुरुस्स पिचर बलम् ण अचिन्तेइ ण जम्पइ3 उअहि.सदसाणणं तणं व गणेन्तो ॥१५-४॥ ५. रहुणाहस्स वि दिट्ठी वाणरवईणो' फुरन्तर विदुम अम्बम् वअ ययाहि चला कमलं कमलाहिण भमरपन्ति व्य गा॥१६-४॥ १-१. पर्याप्त परिउपसर्ग:/श्राप-विशेषण २. धौते-सप्तमी० एक० नपु० । ३. गगन-तले-सप्तमी० एफ० नपं०। ४. अत्यासन-श्रति उपसर्ग ग्राड / सद्-क्त-प्रत्यय वर्तमान० कॅदन्त । ५. स्थित-भूत• कृदन्त । ६. पुरभागप्रकट-वर्तमान० कृदन्त । २-१. इप्यते चप्प. पु. एक. वर्तगान, कर्मवाच्य-नाश करता है २. क्षयानलेन-तृ० एक० नपं• अग्नि के द्वारा विनाश । ३. प्लयगाना- प्लय-बन्दर, पाठी वह पुलिंग, ४. /भण-बहना उत्तम पु० एक. वर्तमान०१५, उदधिःप्र० एफ० पु० । २-१. परिजने-सप्तमी० एक० पु० । २. श्रासहः-: श्राइ- सक्ष-श्रचं प्रत्यय । ३. स्थित- भूत दन्त । ४, प्रतिभटो-म० एक० पु.। ४-~१. धनंतरं अव्यय, बाद में। ३. निजक-फ-प्रत्यय-स्वार्थे । ३. जल्पति. जिल्प-प्रथम पु० एक० वर्तमान { ४. गणयन् /गण-गिनना- पत- मान कृढ़ता ५-१, पानरपते:-प० बहु० पु० । २. स्फुरत क्त-प्रत्यय वर्तमानकानिक फदंत। ३. पदनात्-पंचमी. एक. न. ४. कमलाद-पंचमी एका - नई० । ५. गता भूत. कृदन्त स्त्री. न..

[११]
६.सुद्धसहावेण फुड फुरन्त पजत्तगुणमऊहेण तुमे
चन्देण व णिअनमो3 कलुसो वि पसाहिओ णिसापरवंसो
॥६१-२।।
७.णिन्दइ मिअङ्ककिरणे खिजइ' कुसुमाउहे जुउन्छइ रमणि
मीणो वि णवर मिन्नइ जीवेज पिएत्ति मारुईपुच्छन्तो ।।५-१॥
८.धीरेत्ति संठविजह' मुन्छिनइर मणपेलवेत्ति गणेन्तो
धरइपियत्ति धरिजइ' विश्रोअतगुणं त्ति प्रामुअइ अगाई।।५।।
१. सरमुह विसमप्पलिया रणमन्त' धणुकोडिविप्फुरन्ततच्छाया
गजइ पढिजन्ता' जीग्रासद्दगहिर रसन्ति रविथरा ।।२६-शा
२०.विसमेण पाइ' विसमं महीधर गुरुकेण समरसाहस गरुय
दूरत्येण वि भिएण सूलेण व सेउणा' दसाणणहिननं ॥८
६-१. स्फुट । २. पर्याप्तगुणमयूमेन तृतीया० एक० नपु० । निजक् मृग..
प्रथमा० एक० पु० । ४. प्रसाधितो / साध्य क-प्रत्यय भूत० युदंत, यस
में पिपा।
७-१. सिद्यो/सिद्-उपालंभ परना, प्रथम पु. एफ. वर्तमानः ।
२. जुगुप्सने /जुगुप्स घृया परना, प्रथम पु० एफ. वर्तमान ।
३. क्षीपते वीर म०पु० एफ. वर्तमान० । ४. पृच्छन्./पुन्छ
पर्तमान दत।
८-१. सस्थाप्यते प्र. पु. एफ. वर्तमान० फर्मवाय । २. मूर्खने -अ. पु०-
एप० पर्तमान । भियते /निप्र.पु. एफ. वर्तमान पत वाय।
३. ग्रानति, मुग-पोपना प्र० पु० एक. यर्नमान ।
६-१. नमा-/नम् रतनान० पदत २. शया, शा. प्रथम पु० एफ.
यतमान पर्मरार १३.परमाया पशानन् प्रत्यप,
पर्तमानरानिक
पर्दत, मोलिंग, फर्ममार
१०-१. प्राम। २. सेगुना-१० एक. पु.। ३. दाननहदपन-म०

-
[१२]
११. साहसुजच्चित्र' पठम दृढण अहं इस महिम्मि णिसण्णा
सच्चिय मोहुम्मिल्ला पेच्छामि श्रण पुणोधरेमिश्र जीन
॥ १०३-११॥
२२ एवरि सो रहुवइण' वार वारेण चन्दहासच्छिण्णो
एक्वेण सरेण लुओ एकमुहो दहमुहस्स मुहसघालो ||७६-१२॥
१३ घेत्त ण जणतण कञ्चलठ्ठि हुअवहम्मि विसुद्ध
पत्तो पुरि रहुवई' काउ' भरहस्स सफल अणुरा ||६४-१।।
सस्कृत छाया
१ पर्याप्त सलिल धौते दूरालोक्यमान निर्मले गगनतले
अत्यासन्नमिव स्थित विमुक्त परभागप्रकट शशिबिम्बम् ॥
२ यो लजयते रविणा योऽपि तप्यते क्षयानलेनापि बहुश
कथ स उदित परिमयो दुस्तार इति लवगाना भख्यतामुदधि ।
३ इत्यस्थिरसामध्येऽन्यस्यापि परिजने
फोभासङ्ग
तनापि नाम दशमुखरतस्य स्थित एप प्रतिभटोमम भुज ॥
४ अनन्तर सुमिनातनयोऽध्यवस्थन्गुरोनिजक च धलम्
न च चिन्तयति न जल्पत्युदधि सदृशानन तृणमिव गणयन्
५ रघुनाथस्यापि दृष्टिवर्निरपते स्फुरद्विद्रुमाताम्रम्
वदन वदनाच्चला कमल कमलाद् भ्रमर पतिरिव गता।
११-१. एक्स्यव्यय २. दृष्टया /इश क्त्वा प्रत्यय, सर्वधपूचक कृदत
३ मोहोन्मीलिता-प्र० एक० स्त्री० विशेषण । ४. पश्यामि /इन् उत्तम
पु० एक. वर्तमान।
१२-१. रघुपतिना तृतीया० एक वचन, पुलिंग।
१३-१. यहोत्या /ग्रह सरधसूचक कृदत । २. जनवतनया, दि० एक.
मी.। ३. प्राप्त है प्रत्यय भूत० युदंर । ४. रघुपति या एक.पु.।
५. फतु /-नुमुन् प्रत्यय, त्रियार्थक सग।

त्वया . ८.धीरेति [ १३ ] ६.शुद्धस्वभावेन स्फुरत्पर्याप्तगुणमयूखेन चन्द्रेणेव निजकमृगः कलुपोऽपि प्रसाधितो निशाचरवंशः ।। ७.निन्दति मृगाङ्क किरणान्खिद्यते कुसुमायुधे जुगुप्सते रजनीम् क्षीणोऽपि केवलं क्षीयते जीवेत् प्रियेति मारुतिं पृच्छन् ।। संस्थाप्यते मूर्खते मदनपेलवेति गणयन् घियते प्रियेति ध्रियते वियोग तनु केल्यामुश्चत्यगानि ॥ - ६.शरमुस विपम फलिता नमद्धनुःकोटि विस्फुरच्छायाः ज्ञायते कृष्णमाणा जीवाशब्द गभीरं रसन्ति रविकराः ।। १०. विपमेण प्रकृति विपमं महीधर गुरुकेरण समरसाहस गुरुकम दूरस्थेनापि भिन्नं शूलेनेव सेतुना दशाननहृदयम् ।। येव प्रथमं दृष्ट्वाहमिदं मह्यां निपएणा सैव मोहोन्मीलिता पश्यामि चैतत्पुनधरियामि च जीवम् ।।. १२. अनन्तरं च स रघुपतिना वारं वारं चन्द्रहासच्छिन्नः एफेन शरेण लून एक मुगो दशमुखस्य मुससंघातः ।। १३. गृहीत्या जनकतनयां काश्चनयष्टिमिव हुतवह विशुद्धाम् . प्रातः पुरी रघुपतिः फतु भरतस्य सफलमनुरागम ॥. ११. शांधि उद्धरण सं०-४ माहारान्ट्री गउडवहो २.नियदइ' परोपरायण .मुहलमणिमसरी फरणकरालो गगणादि यियुद्ध बिटुयो मुरपायय पल्लयुप्पीलो ॥१३॥ दिग्विजय प्रग्यानयन 1-1. निपानि./पार-प. पु. ए. गर्वनान । २. गगना-पंचमी. ए.परनन, पु.। ४. गिभून: नि मला, मा. पदना।

. [१४ ] २. किंपि' विकम्पिय गिम्हा अवराहुक्कण्ठसालसं मउरा हरिय वणराइ सुहया , उद्देसा, देन्ति उक्कण्ठं ॥३५॥ ग्रीष्मवर्णन ३. वेवइ' सरणागय विसहरिन्द फरणवलय कलिय · चलणग्गो कुवियर गरिन्द विसन्जियः सुयाहिरुलोन्य सुरणाहो ॥४-३|| जनमेजययज्ञवर्णन ४. इह सोहन्ति दरुम्मिल्लं' किसलयायम्बिरच्छि वत्ताइ २ पाविय पड़ियोहाइव. सिसिर पमुत्ताइ रणाइ ॥६००।। वसन्तवर्णन ५ दीहर । हेमन्त णिसा णिरन्तरुप्पएण चाववाचारो जियलक्खो मा इर मायम्मि: - कुसुमाउहो होउ ॥६०३। ६. इय' मयासवर वियसन्त' वहल कीलारसो सुहावेइ एयस्स पणइ भवणेसु एवविलासो पिया सत्यो॥३७॥ वैरिवनितावर्णन २-१. मि यपि । २, ददाति /दा-प्र. पु. एक. वर्तमानः । ३-१. वेपते /वेप-काँपना-प्रथम पुरुष एक. वर्तमान० | २. कुपितो क्त-प्रत्यय वर्तमान कृदन्त । ३. विसृष्टः- सृज-भूतकालिक कृदंत । ४-१. देशी शब्द सं० समुन्मीलिता:-धनी-विशेषण | २, पत्राणि- म. बहु० नपुं० । ३. प्रसुप्तानि-प्र० बहु० नपुं० । ४. अरण्यानि-प्र. बहु० नपुं०। भू--१. व्यापारो-याएक० नपुं० । २. माधवे-सप्तमी०एक० पुं० । भवतु / भू-प्र० पु. एक विधि। ६-१. इति-अव्यय । २. मदनोत्सव, माकृत में संस्कृत के सदृश सन्धिप्रयोग सर्वत्र नहीं मिलता। ३. प्रा. विश्रसन्त, विश्वसन्तमाए, सं. विकसत्- वर्तमानकालिफ कृदंत । ४, सुसपति-1 मुसाय. प्रथम पु० एफ. वर्तमान .

[१५ ] ७. लहु विसय भाव पडिसिद्ध' पसर संभावण पडिक्सलिया अस्स समत्तावि गुणा चिरमसमत्तव्य दीसन्ति ॥३८॥ ८. परिवार. दुजणाई पहु पिसुणाईपि होन्ति' गोहाई उहइ खलाई तहच्चिय कमेण विसमाई भएणेत्था ।।५५|| धिक्संसारवर्णन १.अहियाराएलकुण्डम्बमण्डलं ताव णं समक्कम तिमिरं कुलमिव ताराफरण रयणर यहं विसहराण ।।१०७१।। यशोवर्मन-महात्म्यवर्णन १०.गवटें दूरएण्य' संज्मापरिवेस परियरं.. सहइर अहिणव पाडवन्धायम्बविम्ब वियडावडच्छार्य ।।१०६६।। संध्यावर्णन संस्कृत-छाया १.निपतति परस्परापतनमुसरमणिमञ्जरी कणोत्करालो নাথি विधूत: मुरपादपपल्लवोत्पीडः॥ २.किमपि विकम्पितमीप्मा अपराहोत्कण्ठ सालस मयूग हरित वनराजि मुभगा उद्देशा ददत्युत्कण्ठाम् ।। ७-१. प्रतिसिद्ध प्रति-उपसर्ग /सिध-त-प्रत्यय । २. प्रतिस्रालिता-प्र० एक.. स्त्री। ३. सन्न. /श-प्रयम पु० बहु० यर्तमान । ८-१. भयन्ति- भू-थम पु ०० पर्तमान । १-१.समामामति-राम् उपसर्ग/कम-प्रथम पु० एक.. वर्तमान प्रेरणार्यक । २. रत्न-स्वरभक्ति और-य अपश्रुति-पनि परिवर्तन । • १०-१. शोभते प्रथम पु० एफ. वर्तमान ।

1-
[ १६ ].
३. वेपते शरणागत विपंधरेन्द्र, फणावलय कलित चरणापः
कुपितो नरेन्द्रो विसृष्टः नुचि अधिरुड इव सुरनाथः ।।
४. इह शोभन्ते • समुन्मीलिताः किसलया आताभ्राण्यक्षिपत्राणि
प्राप्त प्रति 'बोधनीव शिशिर, प्रसुप्तान्यरंण्यानि ॥
५. दीर्घ हमन्त निशा निरन्तरोत्पन्न चापव्यापारी
जितलक्ष्यः मा फिल माधने कुसुमायुधो भवतु ॥
६. इति मदनोत्सव विकसद्वहल क्रीडारस: सुखयति :
तस्य प्रणयिभवनेषु नव विलासः प्रियासार्थः ।।
७. लघु विपय भाव प्रतिपिद्धप्रसर संभावना प्रतिस्सलिता
समाप्ता अपि गुणश्चिरम, इव दृश्यन्ते ।।
८. परिवार दुर्जनानि प्रभु पिशुनानि , भनन्ति गृहाणि
उभय सलानि तथैव एतानि क्रमेण विपमाणि मन्येथा.॥
६. अभिचारानल कुण्डताम्रमण्डलं तावत् एतं समाक्रामति
तिमिरं कुलम् इव ताराफरणरत्नयहं विपधराणाम् ।।
१०. नभपृष्ठः दूरोन्नतसंध्यापरिवेपपरिकरं शोभते
अभिनव प्रतिबन्धाताम्रविम्ब विकटावटछायम् ।।
यस्य
उद्धरण सं०-५
माहाराष्ट्री
कंसवहो
१.णिरत्य संगा णिमंतपंथया' जमादि लोअब्भसणुव्भड रसमा
चिरं विइएणतिर तवोहणा विजं स दिहिए मज्मसि दिहिगोअरो
॥१६॥ प्र० स०
१-१, निगमान्तपान्या, प्र. यहु० पु.। २. पिचिन्यन्ति पि-उपसर्ग
/चिनु, प्रथम पु० बहु० वर्तमान० फूल यादि चुनते हैं।

17
.
२. नियं जियं मे णणेहि जेहिदे सुजान संदेर गुणेक्कमंदिरं.
पसरण पुरणामय मोह सच्छदं मुहं - पहासुजलमज पिजए।
।। १७ । प्र० स०
३. अहं पुड,काहिइ साहसं जइ क्सयस जाहिइ पाडो जणो
समिद्वमग्गिं गसिउं५ समुठिनो ण डझए कि सलहाण संचओ
॥ २६॥ प्र०स०
४. विमुद्र सोले विमच्छल कमोण को चि अम्हे' छिविउ पअभइ'
पहम्मि तारा णिश्ररे समुनले णिसंधारो मइलेइ किं भण
॥३०॥ प्र० स०
५. भुवन्ति गोरड्ढण सेल मेहला विलंविउग्गजिन विजुला घणा
इमाण रणो माणविशोगुम्मुहा जहिं२ जइन्छागय पीढमद्दया
॥४६॥ प्र० स०
२-१. नयनाभ्या-नृ० पर० नपुं० । २ याम्या-तृ० बहु० नपुं० । सहरां,
श्रमय । ४ मा -दि० एक० नपुं० ।५ पीयते- /पा प्रथम पु० एक.
वर्तमान० श्रात्मनेपद्, पीते हैं।
३-१. परिप्पति- प्रियम० पु० एप० पिप्प २ चायं दि० एक.
नपुं० । ३ सयं । ४ यास्यति- /यापय प्रथम पु० एप. भविषः।
५ ममि. /प्रस्तुमुन् प्रत्यय । ६ दसते- दह-प्रथम पु० एफ.
पमान वात्मनेपद, उलाता है।
४-१. परमान्-धरमद-सनाम प्रथमा० यापनन पु०। २ देशी शन्द
सं० सई /रा नमन् प्रलप । ३ प्रगल्भतेच उपमर्ग/गल्भ-प्रयन
पु० एम०पांमान । ४ मालनी प्रथम पु. एफ. मनमान।
.५-१. थमम् प्रपन पु. मा. नागाल । २ पस्मिन्-पद-सानाम

.१5.] ६. समन्थ लोअस्स. पास' हेदुणो• तमप्पवंचस्स णिरासारिणो पडिप्पाणं पडिवालएहसे' सरोइणीओ व सहस्स ररिसंणो 118|प्र० स० ७. विप्रोअसोउम्हलगिम्हताविअंवइस्र्थिासंस्थअचादईउलं' वयंवुधाराहि मुसीअलाहि । सो मुहावए . माहवदूध वारियो ॥६०॥प्र० स० ८. सिणिद्ध' घणकुंतलप्फुरिन मोर पिछचिए। सिरीअपइणो सिरे सुरकरचलुन्मुचित्रा भमंत भमरावली कलअलेहिवाालिया सुरदृ कुसुमच्छडा पडइ. दाव देवाला ।। ५७ ।। ४० स० ६.णचंति एफुडमच्छरा हपह सेच्छं मिहोमच्छरा दिव्या दुहिणो धणंति' गहिरं सग्गाणिलुग्गृरिश्रा कडायटोझर दिसादोग्घट्ट- थटुम्भडप्पपुज्जत पमोअवंहिअ महाघोसेहि वीसभरा।।५।स० १०. रासपीलासु चीला विश्रल वनवहू णेत्त कंदोह माला पालं वालं किंदगो मउहसियसुहासित्त वत्तदु वियो संगा अंतो पडतो सरस अरमिमो संचरंतो सभेतो सव्यासु दिक्खु दिक्सिजइसअल श्रेणणंदणोणंदणोदे ॥४शाच०स० पुण्ण भिएण ६-१. हेतो:-पंचमी० एक. नपुं० ।२ प्रतिप्रयाण-प्र० एक. नपुं० । उरश्मे:-पंचमी० एक० स्त्री० । ७-१. चातकीयुलं-प्र० एफ. नपुं० । २ मुरायामास-मु-उपसर्ग /भा म. पु० एक. भूत.। ८-१. स्निग्ध । २ श्रपतत्पत्-प्रथम यु. एक० भूतकाल । ६-१.यध्वनन्-म०पु० एक० भूतकाल । २०-१. अश्यत्-शि-प्रथम पुरुष एफ. भूतवाल, कर्मवाच्य [१६] ११. श्राणाइअोधणुह जगण छलेण एसो कंसेण तेण धुवमत्तणिवहणत्य साहन्गसंघरिस संघडिओहिवरहोसुएणी करेइ 'तरसचित्र किणं कसं ॥४५॥च०स० । . संस्कृत-छाया १. निरस्तसगा निगमान्तपान्या यमादि योगाभ्यसनोद्भट श्रमाः चिरविचिन्वन्ति तपोधना अपि यं स दिष्ट्रया ममासि दृष्टिगोचरः ।। २. जितं जितं मे नयनाभ्यां याभ्यां तव सुजात सौन्दर्य गुणैक मन्दिरम् प्रसन्न पूर्णामृत मयूस सदृशं मुसं प्रहप्सोज्जवलमद्य पीयते ।। ३. अहं पुटं करिष्यति साहसं यदि क्षयं स्वयं यास्यति माहतो जनः समिद्धमग्नि प्रसितु समुत्थितो न दह्यते किं शलमानां संचयः ।। ४. पिशुद्धशीलान् विमद छल क्रमो न कोऽप्यस्मान् प्र प्रगल्भते नभसि तायनिकरान्समुज्ज्वलान् निशान्धकारो मलिनयति किं भण।। ५.यमवन् गोवर्धन शेल मेसला विलम्बिततोगर्जित विद्यतो घनाः प्रासां नो मान विनोदनोन्मुसा यस्मिन् यदृच्छागत पीठमर्दाः ।। ६.समस्त लोकस्य प्रकाश हेतोः तमः प्रपश्वस्य निरासकारिण: प्रति प्रयाणं प्रति पालयतास्य सरोजिन्य इव सहन रश्मः।। ७.वियोगशोकोष्मलमीप्मतापितं अजस्त्रीसायेचातकीकुलम् ययोऽयुधाराभिः मुशीतलामि: स मुग्पयामास माधवदूतवारिदः ।। ८. स्निग्धपन पुन्तल सुरित मयूरपियाचिते प्रियः पत्युः शिरसि मुर फरावलोन्मुषा भ्रमभ्रमरापली फलफलैचालिता मुद पमुमच्छटा अपतत् तावत्यालमत् ॥५७|| ११-१. करोति-पपम पु. एफ. पर्वमान ।

। [.१८ ६.समन्य लोअस्स. पत्रास दुणो' तमापवंचस्स णिरासारिणो परिपमाणंर पडिवालएहसे सरोइणीयो व सहस्स रस्सियो' ||५||० स० ७.वियोअसोउम्हलगिम्हताविअंवइथिंआसंस्थअचादईउलं' “वअंबुधाराहि मुसीअलाहि सो मुहावए। माहवदूध वारिश्रो ॥६०॥प्र० स० ८. सिणिद्ध' घणाकुंतलप्फुरिश्र मोर पिछंचिए सिरीअपइणो सिरे, सुरकरंचलुन्मुचित्रा ममंत भमरावली कलअलेहिवाआलिआ सुरट्ट उन्मुमच्छडा पडइ! दाय देवाला ॥ ५७ ॥ ४० स० १. पच्चंति पुडमच्छरा पर पहं सेच्छ मिहोमच्छरा दिव्या दुदुहिणो धपति' गहिरं सग्गाणिलुग्गरिमा पुरणा भिएण कडावडोझर दिसादोग्घट्ट- थटुटभडप्पापुजत पमोअहिअ महाघोसेहि वीसंभरा ॥८॥-स. १०. रासपीलासु वीला विल वनबहू णेत्त कंदो माला पालं वालं किंदगो मउहसिअसुहासित्त वत्त दु बिंबो संगा अंतो पडतो सरस अरमिमो संचरंतो सयंतो सव्वासु दिक्खु दिक्सिजइ सलणाणंदणोणंदणोदे।।४ाच०स० ६-१. हेतो:-पंचमी० एफ० नपुं० १२ प्रतिप्रयाणं प्र० एष. नपुं० । रश्मे:-पंचमी० एक० स्वी। ७-१. चातकीबुलं-प्र० एम० नपुं० । २ सुसयामास सु-उपसर्ग /भा प्र० पु० एक. भूत.। स्निग्ध । २ श्रपतत्-पत् प्रथम पु० ए० भूतकाल । ६-१.थयनन्-प्र० पु.एक. भूतकाल । २०-१. अदृश्यत्./श:प्रथम पुरुष एफ० भूतकाल, कर्मवाच्य [ १६ । ११. प्राणाइश्रो धणुह जएण छलेण एसो कंसेण तेण धुवमणियहणत्य साहग्गसंघरिस संघडिअोहिवण्होमुएणी करेड 'तरसचित्रणिं कसं ॥४५॥ च०स० संस्कृत-छाया १.निरस्तसगा निगमान्तपान्था यमादि योगाभ्यसनोद्भट श्रमाः चिरविचिन्वन्ति तपोधना अपि यं स दिष्ट्रया ममासि दृष्टिगोचरः ।। २. जितं जितं मे नयनाभ्यां याभ्यां तव सुजात सौन्दर्य गुणैक मन्दिरम् प्रसन्न पूर्णामृत मयूस सदृशं मुसं ग्रहप्सोज्जवलमद्य पीयते ।। ३. अहं स्फुटं करिष्यति साहसं यदि क्षयं स्वयं यास्यति प्रारूवो जनः समिद्धमग्नि प्रसितु समुत्थितो न दह्यते किं शलभानां संचयः ।। ४. विशुद्धशीलान् विमद छल क्रमो न कोऽप्यस्मान् टु प्रगल्भते नभसि तारानिकरान्समुज्ज्वलान् निशान्धकारो मलिनयति किं भण।। ५. अमवन् गोवर्धन शैल मेसला विलम्बिततोगर्जित विद्यतो धनाः श्रासां नो मान विनोदनोन्मुसा यस्मिन् यदृच्छागत पीठमः ।। ६. समस्त लोकस्य प्रकाश इंतोः तमः प्रपञ्चस्य निरासकारिणः प्रति प्रयाणं प्रति पालयतास्य सरोजिन्य इव सहस्र रस्मः। ७.वियोगशोकोमलप्रीप्मतापितं अजस्त्रीसाथेचातकीकुलम् यचोऽन्धाराभिः मुशीतलामि: स मुसयामास माधवदूतवारिदः ।। ८.स्निग्धपन पुन्तल सुरित मयूरपिञ्छाचिते श्रियः पत्युः शिरसि मुर कराञ्चलोन्मुक्ता भ्रमभ्रमरावली फलस्लर्वाचालिता मुटु पनुमच्छटा अपतत् तावरे वालमत् ॥७॥ ११-१. फरोनि. -अपन पु० एक. वर्तमान ।

कटावट [ २० ] ६. अनृत्यत् स्फुटमत्सरसोनभ. पथे स्वेच्छं मिथोमत्सरा दिव्या दुन्दुभयो श्रध्वनन् गंभीर स्वर्गानिलोद्गुण. पूर्णभिन्न निरं दिग्गज सार्थोद्भट प्रस्फूर्जत्यमोदवृहितं महाघोपैविश्वंभरा ॥ १०. रासक्रीडासु क्रीडाविकलत्रजवधू नेत्रन्दी बरमाला प्रालाम्बालकृतागो मृदुहसिमुधासिक्तवक्त्रन्दुबिम्ब: संगायन्नटन् सरसतरमयं संचरन्छयान: सर्वासु दिक्षु अदृश्यत सकल जनानन्दनो नन्दनस्ते ।। ११. पानायितो धनुर्यज्ञन्छलेनैप कंसेन तेन ध्रुवमात्मनिबर्हणार्थम् शासाग्रसंघर्प संघटितेहि वलि. शून्यीकरोति तरसैवहि कि न वृक्षम्।। . कर्पूरमंजरी उद्धरण सं०--६ माहाराष्ट्री १. इसारोसप्पसादापरणदिसु बहुसो सग्गगङ्गाजलेहि २ आमूलं पूरिदाए तुहिणबरकरुपसिप्पीन रद्दो जोहामुत्ताहलिल्ल पदमउलिणिहित्तग्गत्येहिं दोहिं। अग्धं सिग्य व देन्तो अदि गिरिसुनापाअपरहाणं ॥४॥प्र० स० २. परसा सफलवन्धा पाउअवन्धो पि होइ' सुउमारो पुरुममहिलाण लेत्तिनमिहन्तरं तेनिथ मिमाण ॥८॥१० स० १-~१. प्रतिपु २० बहु • नपु० । २ जलेः १० ब० नपु० । ३नरस्ताभ्यां-तृ० बा० नपु० द्वाभ्याम्-तृ० बहु० नपु० संख्या० उक्त प्रयोग बहुवचन में मिलते ६ क्योंकि प्राकृत में द्विवचन नहीं होता । ५ ददात दा-शत- प्रत्यय, वर्तमान० कृदन्त । २-१. भवनि- भू-प्र० पु० एस० वर्तमान० । २ श्रमुयो. अदस् सर्व स० दि. नपु०॥

[१]
३ पदं वासर जीवपिण्डसरिसं चण्डंसुणो मण्डल
को जाणादि कहिं पि सम्पदि गद पत्तम्मि कालन्तरे
जादा किं च इयं पि दीहविरहा सोएणर णहे गदे
मुच्छामुद्दिदलोअणे व्य गलिणी मीलान्तापकरुहा ।।३।। प्र० सं०
४.रणीसासा हारजठ्ठ सरिसपसरणा चन्दणफोडकारी
चण्डो देहस्स दाहो सुमरण सरिसीहाससोहा मुहम्मि'
अङ्गागरे पण्डुमायो दिवहससि कला कोमलो किं च तीए:
णिचं वाहप्पवाहातुहसुहश्र किदे होन्ति कुल्लाहिं तुल्ला।।१०॥द्वि०स०
५. पर जोरहा उपहा गरलसरिसो चन्दणरमो
खदक्सारो हारो रथणिपवरणा देहतवणा
मुणाली वाणाली जलइ' श्र जलद्दा तगुलदा
परिहा ज दिढा कमलवण सा मुणपणा ॥११॥ द्वि० स०
६. उन्चेहिंगोउरोहि
धवलधयडाडम्बरिल्लावलीहि
घण्टाहिंविन्दुरिल्ला मुरतरुरिणविमाणाणुरूप लहन्तार
पाश्रारं लवश्रन्ती कुणइ रश्रवसा उएणमन्ती रणमन्ती ५
पन्ति जन्ति श्रदोला जणमणहरण कट्टणुपट्टणेहिं ॥३।। द्वि-स०
३--१. जानाति- /शाप्र० पु. एक. वर्तमान अयोष त> सघोष द
या प्रयोग शौरसेनी की मुख्य विशेषता है ) शोन तृ० एक० नपु० ।
४-१. मुग्ने मतमी० एक. नपु०१२ अनाना प. बहु० नपु० । ३ नस्या -
१० एक स्थी. तद् सर्वनाम । ४ भयो त-प्र. पु० बहु वर्तमान ।
५-१. गलतिः बल प्र० पु० एक. वर्तमान० जलता है।
६-१. गोपुरेभि.-नृतीया बहु० गपु० । २ लभन्ती / लमन्वनमानवृदन्त
स्त्री० 1 ३ लद्धयन्ती-शन प्रत्यय, पर्तमान० कृदन्त स्त्री० । ४ करोति-
T-प. पु. एप. वर्तमान०, प्राचीन पारसी ये सदश वर->
Tण का प्रयोग माहाराष्ट्री माइत की भी रिशेषता है। ५ नमन्ती-
निम्न मारय, यर्तमान मृदन्त. स्त्री०।

[२२]
७.रणन्त' मणिणेउर झणमणन्त हारच्छडं
करणकरिणदकिङ्किणी मुहर मेहलाडम्बरं
विलोल बलावली जणिदमञ्जुसिखारवं
ण करस मणमोहणं ससिमुहीअ' हिन्दोलणं ॥३२॥ द्वि० स०
८. कोए' वि संघडदिर कस्स वि पेग्मगराठी
एमे इत्थ ण हु कारणमत्थि रूग्रं
चङ्गत्तणं पुणु महिनदि यं तहिं पि
ता दिजाए४ पिसुणलोअमुहेसु मुद्दा ॥६॥ तृ० स०
६. सत्यो णन्ददु' सजणाणं सलो वग्गो खलाणं पुणो
रिणच सिज्जद' होदु' बह्मणजणो सच्चासिहो सव्वदा
मेहो मुश्चदु संचिदं वि सलिलं सस्सोचिरं भूले
लोओ लोहपरम्मुहोणुदिअहं धम्मे मई भोदु अ॥२२।। च० स०
संस्कृत-छाया
१. ईर्ष्यारोपप्रसादप्रणतिपु बहुशःस्वर्गगङ्गाजलै
मूलं पूरितयातुहिनकरकलारुप्यशुक्त्यारुद्रः
ज्योतस्नामुक्ताफलाढ्यं नतमोलिनिहिताभ्यामग्रहस्ताभ्यां
द्वाभ्यामध्ये शीघ्रमिव ददजयति गिरिसुतापादपङ्करहयोः ।।
७-१ रणत-शत, वर्तमान० कृदन्त नपुं०।२ मणिनूपुर-प्र० एक. नपुं० ।
३ शशिमुख्या-तृ० एक. पुलिंग।
८-१ क्याचित् । २ संघटते-प्र० पु. एक. वर्नमान०, 1 ३ एकमेव
४ दीयते-/दा-प्र० पु. एक. वर्तमान कर्मवाच्य ।
६-१ नन्दनु-प्र. पु. एक. वर्तमान शिपिं०१२ सजनानां-प. बहु० पु० ।
३ विद्यतु-प० पु० एक. वर्तमान विधि०१४ भवतु-प. पु. एक
वर्तमान० विधि. ५ मुञ्चनु:/मुन्न प्र. पु. एक. वर्तमान निधि० ।

उष्ण क्षारो [ २३ ] २. परुपा संस्कृतगुम्फाः प्राकृतगुम्फोऽपि भवति सुकुमारः पुरुपमहिलानां यावदिहान्तरं तावत् अमुयोः । ३. एतद्वासर जीवपिण्डसदृशं चण्डाशोमण्डलं को जानाति कापि संप्रति गतमेतस्मिन् कालान्तरे जाता किं चेयमपि दीर्घधिरहा शोकेन नाथे गते मूछी मुद्रितलोचनैव नलिनी मीलत्पङ्केरुहा ।। ४.नि श्वासा हारयष्टि सदृश प्रसरणाश्चन्दन. स्फोटकारी चन्द्रो देहस्य दाहः स्मरणसदृशी हासशोभा मुसे अङ्गानां पाण्डुभावो दिवसशशिकलाकोमल. किं च तस्या वाप्पप्रवाहास्तव सुभगकृते भवन्ति कुल्याभिस्तुल्याः ।। ५.परं ज्योतस्ना गरलसहशचन्दनरसः क्षत हारो रजनिपवना देहतपनाः मृणाली वाणाली ज्वलति च" जला तनुलता परिष्टा यघटा कमलवदना सा सुनयना ॥ ६. उच्चेपुगोपुरेपुधवलध्वजपटाडम्वर वहलावलोपु घण्टाभिर्विद्राणसुरतरुणिविमानानुरूपं वहन्ती प्राकार लड्डयन्ती करोति रथवशादुन्नमन्तीनमन्ती श्रायान्ती यान्ती च दोलाजन मनोहरण कर्पणोकर्पणैः । ७: रणन्मणिन्पुरमणमरणायमानहारन्छट कलकरिणतकिङ्किणीमुसस्मेसलाडम्बरम् विलोलवलयावलीजनितम शिक्षारख न रस्य मनोमोहन शशिमुरयाहिन्दोलनम्।। ८. कयाचित्संघटते स्यापि प्रेमप्रन्थि- रेवमेव तर न सलु कारणमस्ति रूपम् घनत्व यत्तगापि पिशुनालोकारपुमुद्र . पुन ग्यते नदयते.

[ २४ ] १. सार्थो नन्ददु सज्जनानां सकलोवर्गः खलानां पुन- ।. नित्यं खिद्यतु भवतु ब्राह्मणजन: सत्याशी: सर्वदा। मेघो मुञ्चतु संचितमपि सलिलं सस्योचिंत भूतले लोको लोभपराइमुखोऽनुदिवसं धर्मे मतिर्भवतु च॥ । उद्धरण सं0--७ जैनमाहाराष्ट्री समराहच्चकहा (वीओ भवो) अस्थि इहेच जम्बुद्दीचे दीये अवर विदेहे खेत्ते अपरिमियगुण- निहाण तियसपुरवराणुगारि उजाणारामभूसियं समत्थमेइणितिलय- भूयं जयउरं नामनयर ति । नत्थ सुरुयो उज्जलनेवत्थो कलापियक्षको लज्जालुओ महिलायणो जत्थ य परदार परिभोमि भूओ, परदव्वा- वहरणंमि संकुचियहत्थो परोपयारकरणेकतल्लिच्छो पुरिसवग्गो। य निसियनिकड्ढियासिनिद्दलियदरियरिउहन्थिमत्थउच्छ- लियवहल रुहिरारत्तमुत्ताहलकुसुमपयरचि यसमरभूमिभाश्रो राया नामेण पुरिसदत्तो ति। देवी य से सयलन्तेउरपहाणा सिरिकन्ता नाम । सो इमाए५ सह निरुवमे भीए भुञ्जिए। इअो य सो चन्दाण- एविमाणहिवई देवो अहाउयं पालिऊण तयो चुत्रो सिरिफन्ताए गम्भे उवयनो ति। दिट्ठो व पाए सुविणयंमि तीए चैव रयणीए निद्धमसिदिसिहाजाल सरिसकेसरसटाभार भामुरो विमल फलिह- मणिसिला निहसहसहारधवलो श्रापिङ्गलसुपसन्तलोयाणो मियङ्कले- १ नगर-प्र० एक० नपुं०-1>-थ (माहा.)-य (श्रमा०)।२ भोगे- स० एक. नपुं०। ३ च-यव्यय | ४ यस्य-५० एक० पु०। ५ अनया-तृ० एक. स्त्री०, इदं-सर्वनाम ! ६ भुञ्ज-प्र० पु० एक. भूत०१७ यथाभूतं.. भूत. कृदंत । ८ उत्पन्न:-भूत० कृदन्त ।

५] हासरिसनिग्गयदाढो पिहुलमणहरवच्छत्यलो अइतणुयमज्ममाश्रो सुवट्टियकढिएकडियढो श्रापलियदोहलङ्ग लो सुपइटिषोरुसठाणो, किं वहुणा, सव्वङ्गसुन्दराहिरामो सीहकिसोरगो वयणेणमुयर पविसमायो'• त्ति । पासिऊरण य त सुहविउद्धाए जहाविहिणा सिट्ठो दइयस्स तेण भणिय | अणेयसामन्त पणिवइय चलण जुयलो महाराय सदृस्स निवासट्ठाण पुत्तो ते भविस्सइ११। तो सा त पडिसुणेऊण जहासुह चिट्ठइ१२ | पत्ते य उचियकाले महा पुरिसगन्माणु भावेण जाओ' 3 से टोहलो ४ | जहा देमि सव्वसणाणम''भयदाण, दीणा णाहकिरणाण च इस्सरिय१६ सपय, जइणाण १७ च उवट्ठम्भदाण , सज्वाययणाण च करमि पूयति । निवेइओ य दमो१९ तीए भत्तारस्स अमहिय जाय हरिसेण सयाडिओ'१ तेरण। तस्स सपायरोण जाओ महापमोश्रो जणवयाण 2 | अवि च सव्वच्चिय धन्नाण होइ अवस्था परोवयाराए वालससिरस व उदो जणस्स भुवण पयासेइ ॥११८।। तो जहासुहेण धन्मनिरयाए परोवयार सपायरणेण सुलद्धजम्माए अइ- घन्तानव मासा अट्ठभराइन्दिया२४१ तो पसत्थे तिहिकरत्त मुहुत्तजोए सुकुमालपाणिपाय सयलजणमनोरहहिं देवी सिरिफन्ता दारय पसूय त्ति । . १० प्रविश्यमाण शानयमत्यय, भूत० कृदन्त।११ भविष्यति प्र० पु० एक० भविष्य० । १२ तिष्ठति प्र० पु. एक. वर्तमान तिष्ठ> चिटठ (मा०, अमा०) । १३ जात क्त प्रयय, भूत-कृदन्त । १४ दोहद गर्भिणी की इच्छा । १५ सर्वसत्वाना-य० बहु० पु०, सब प्रणियों को। १६ ऐश्वर्य- द्वि० एक० नपु० १७ यतिजनाना प. वहु० पु. 1 १८ पून द्वि० एक. पु० । १६ दम प्र० एक. नपु० इदम्-सर्वनाम | २० श्रभ्यधिक-विशेषण । २१ सपादित क्त प्रत्यय, भूत. कृदन्त फर्मवाच्य । २२ जनपदाना १० बहु० नपु० । २२ अतितान्त क्त प्रत्यय भूतकाल.. कृदन्त, बीत गय । २४ अधष्टिरारिदिवसा -प्र. बहु० नपु०। नपु० निवेइलो रनो सुहंकरियाभिहाणाए दसियाए पुत्तजम्मो परितुट्ठो राया, दिन्न' च तीए परिश्रोसियं। काराविया च बन्धणमोयगाइयं करणिज्जं पवत्तो य नयरे महाणान्दो नयरिमग्गा, पसमाविश्रो रो कुङ्कमजलेण, विप्पइएणाई रुस्टन्तमहुयरसणाहाई विचित्तकुसुमाई', कयानो हट्टभव एसोहायो, पहभवणेसु समाहयाई, सहरिसं च नच्चियं रायजणनागरेहिं ति । एवं च पइदिण महामहन्तमाणन्दसोक्खमणुहंघन्ताण अइफन्तो पढममासो। पइट्ठावियं च से नाम वालस्स सुवित्तयदसणनिमित्तण सीहोति । सो य विसिट पुण्णाफलमणुहवन्तो अभग्गमाणपसरं पणईण मरणोरहेहिं पयाणपुरणेण। जोव्वणमणुवमसोहं कलाकलावंपरिवठियच्छायं जणमणतयणा चन्दो व्व कमेण संपत्तो ॥११॥ संस्कृत छाया-- अस्ति इहैव जम्यूद्वीपे द्वीपे श्रपरविदेहे क्षेत्रे अपरिमितगुणनिधानं त्रिदशपुरवरानुकारि उद्यानारामभूपितं समस्त मेदनीतिलफभूतं जयपुरं नाम नगरं इति। यत्र स्वरूप: उज्जवलनेपथ्यः कलाविचक्षणः लजालु: महिलागणः, यत्र च परदारपरिभोंग क्लीवः, परछिद्रायलोके अन्धः, परापवादभापणे मूकः, पदव्यापहरणे संकुचितहस्तः, परोपकारकरणपरः तल्लक्ष्यः पुरुषवर्गः। तत्र च निशितनिष्कृयासिनिर्दलितद् त रिपुहस्ति- मरतकोत्सवयद्दलरुधिरारक्तमुक्ताफलकुसुमप्रकरार्चितसमरभूमिमागः राजा नामे पुरुपदत्तः इति । देवी च यस्य सफलान्तःपुरप्रधाना श्रीकान्ता नाम । सः अनया सहनिरुपमं भोग अभुनक । इत: च सः चन्द्रान- नविमानाधिपति: देवः यथाभूतं प्राप्वा ततः चुत:श्रीकान्तायाः गर्भ उत्पन्न: १ फारिन:- प्रत्यय-भूत. मृदन्त, प्रेरणा ॥ २ रज-म० एक नपं । ३ मुमानि-प्र. बहु० नपं । ४ प्रतिदिवसं द्वि०० एफ० । * । [ २७ ] इति । दृष्टः च अनया स्वप्ने तस्याः चैव रजन्यां निधूमेशिखिशिखाजाल सदृशकेसरसटाभारभासुरः विमलरफटिकमणिशिलानिकप हंसधार- धवल: प्रापिंगल सुप्रसन्नलोचनः मृगाङ्कलेखासदृशनिर्गतदंष्ट्रः पृथुल- मनोहरवक्षस्थलः अतितनुमध्यभागः सुवर्तुल कठिन कटितट: प्रावलित- दीर्घलाड़ लः सुप्रतिष्ठितउरुसंस्थानः, कि बहुना, सर्वांगसुन्दराभिरामः सिंहकिशोरक: बदनेन उदरं प्रविशमाणः इति । दृष्ट्वा च तं सुखंविवि- दया यथाविधिना शिष्टः दयितस्य । तेन भणितं । अनेकसामन्त प्रणिप- तितं चरणजुगल. महाराय शब्दस्य निवासस्थानं पुत्रः ते भविष्यति । तत: एपां तत प्रतिश्रुत्य यथासुखं तिष्ठति । प्राप्ते च उचितकाले महा- पुरुष गर्भानुभावेन जात: अस्याः दोहदः । यथा दास्यामि सर्वसत्त्वानां अभयदानं दीनानाथकृपणानां च करोमि पूजं इति । निवेदितं च इमं तया भर्तारस्य । अभ्यधिकजातहण संपादितः तेन । तस्य संपादनेन जातः महाप्रमोदः जनपदानां । अपि च- सर्व नित्य धनानां भवति अवस्था परोपकराय बालशशेः इव उदक: जनस्य भुवनं प्रकाशयति ।। १२८ ।। ततः यथासुखेन धर्मनिर्यात: परोपकारसंपादनेन सुलब्धजन्मया अतिक्रान्ता नवमासा अधष्टिरात्रिदिवसाः तत: प्रशस्त तिथिकारण- मुहूर्त योगे सुकुमारपाणिपादं सकलजनमनोहरं देवी श्रीकान्ता दारकं प्रसूतवती इति । निवेदितः राजा शुभंकराभिधानया दास्या पुत्रजन्म:, परितुष्टः राजा, दत्त च तस्यै पारितोपिकं । कारितं च बन्धनमोक्षणादिकं कारयितुम् प्रवृत्त: च नगरे महानन्द, शोमायिताः नगरमार्गाः, प्रशमा- यित: रजः कुकमजलेन, विप्रकीर्णानि इवन् मधुकरसनाथानि विचित्र कुसुमानि, कारित: हाटभवनशोभाः, पथभवनेषु समाहतानि मंगलतूर्णानि, सहर्पचनर्तितं राजजननागरैः इति । एवं च प्रतिदिवसं महामहान्तमानन्द- सुसमनुभवन्तानां अतिक्रान्तः प्रथममासः । प्रतिष्ठापित च तस्य नाम वालस्य स्वप्न दर्शननिमित्त न सह इति । सः च विशिष्टं पुण्यफलमनु- भवन् अभाग्यमानप्रसरं प्रणयिणं मनोरथैः प्रदानपुन्येन- [२८] योवनमनुपमशोभ कलाकलापपरिवर्धित छाय जनमननयनानन्द चन्द्र इव क्रमेण सप्राप्त ॥ ११९ ।। उद्धरण सं०- कक्कुक शिलालेख जैन-महाराष्ट्री १-श्री समायवग्गमग पढम सयलाण' कारण देव णीसेस दुरिअदलण परम गुरु णमह जिरणनाह ॥१॥ २-रहुतिलो पडिहारो'पासीसिरि लक्सणोत्ति रामरस तेण पडिहार वसो समुएणइ ५ एत्य सम्पत्तो ३-विप्पो हरिअन्दो भज्जा' असि त्ति सत्तिमा भद्दा ताण सुश्रो उप्पणो चोरो सिरि रजिलो एस्थ ॥३॥ ४- अस्स वि णरहड' णमो जाओ' सिरि णाडो त्ति एयरस अस्स वि तणाश्रो तायो५ तस्स वि जसवद्धणो जानो ॥४॥ ५-अस्स वि चन्दुअरणामो उप्पएणो सिल्लुशोवि एअरस झोटो भिल्नुअरस तणुप्रो अस्स वि सिरि भिल्लुयो चाई ।।५।। १.१ स्वर्गापवर्गमार्गम् द्वि० एक० नपु० । २ सकलानाम् प० ब० नपु० । ३ नि रापदुरित-सपूर्ण पाप । ४ नमद / नमस् प्रणाम करना-मध्यम पु० बहु० । २१ प्रतिहार -द्वारपाल । २ श्रासात्- स-प्र. पु. एक. भूत। ३ श्री-स्वरभक्ति का उदाहरण।४ तन तृ० एक० पु०। ५ समुनतिम् दि० एक. नपु०।६ सम्मान - प्रत्यय-वर्तमान० कृदन्त । ३.१ भार्या । २ तान द्वि० पहु० पु० । ३ उत्पन्न । ४ नरमहा २ जात, प्रत्यय भूत. वृदन्त । ३ नागभह । ४ तनय २० एप. पु.१५ ताट । ६ यशोवर्धन --१० एक. पु ५ । चन्दुव । २ शिल्लुप । ३ झार १४ भिल्लुष ।

उप्पणो शाः [२६] ६–सिरि भिल्लु अस्स तणुश्रो सिरिकको गुरुगुणेहि गारविश्रो अस्स वि काकुथ नामो दुल्लहदेवीए -ईसिविश्राम' हसिश्र, महुरं भजिय, पलोइअर सोम्म एमयं जस्स ण दीण रो (सो) थेयो थिरा मैत्ती ॥७॥ -णो जम्पियं, ण हसियं, ण कयं,' ण पलोइग्रं,ण संभरियर ण थियं, ण परिभमि जेण जणे कन्ज परिहीण ॥८॥ १-मुत्था' दुत्थर वि पया अहमा तह उत्तिमा वि सोरसेण५ जणि व्व जेण धारिया णिच्चं णिय मण्डले सव्या ॥६॥ १०- उपरोह' राश्रमच्छर लोहेहि इ१ णायवजिये जेण ण को दोएह विसेसो यवहारे कवि मण्यं पि ॥१०॥ ६.१-गुरगुरणे:-तृ० पा० नपुं०-उदात्त गुणों से युक्त। ३ गौररित:- अत्यना प्रतिष्ठित ३ । दुर्लभदेवीयाः, तृ० एफ. स्त्री० । ७.१-पद् पिलासम्-थधविकसित । २ प्रलोक्ति-नितरन । ३ वोर:- श्रल्प । ४ स्थिरः स्यायो। ८.१-पनम् भूतकालिक पृदन्त । २ संस्मृतम्/ रमरमरण रसना, क. प्रवर भूतगदन्त । ३ परिभमिाम प्रत्यय भूत० युदन्त, पर्यटन किया । ४ जनान् दि० २० पु. । ५ पार्य-परिहानम् दि० एस० न। ६.१-रा:-म० मा० पु. पिरोरा, धनी ।२ दुस्था:-निधन ।३ प्रजा । ४ गधमा । ५ मोगराएप० न०१६ जननी । ७।८ निम्। निजम ले गएफ००, अपने राज्य में । १० सन्-िदिपा गए। १०.१-उपरोश (परोप) ३।२ लोभ.न. पा० नए । ३ इति । ४ार -५ तामसभा दन्त १६ माहार-स. एफ. नई ! ७ मना घर ।

६ २१-दिश्रवर' दिएणाणुज्जर जेण जण रञ्जिमण सयलं पि हिमच्छरेण जणि दुट्टाण५ विदण्डरिगट्टवरण ॥११॥ १२ - धण रिद्ध समिद्वाण विपउराण निकरस्स अमहिनं लक्स सयं च सरिसन्तणं च तह जेण दिट्ठाई ॥१२॥ १३-एव जोव्यण रूअपसाहिएण' सिंगारगुण गरुम्कण' जणवय णिज्जमलज्ज लेण जणे णेय संचरि५ ॥१३॥ १४-वालाण' गुरु तरुणाण सही तह गयवयाण तणो व्व इय सुचरिएहि णिच्यं जेण जणो पालिश्रो सव्यो ॥१४॥ १५--जेण णमन्तरण सयां सम्माण गुणथुई कुणन्तेण जंपन्तेण य ललिग्रं दिएण पणईण धण-निवहं ॥१५॥ ११. १-द्विजयर । २ दत्तानुज्ञा द्वि० एक स्त्री०, दी हुई सम्मति को। ३ रञ्जित्वाक्त्वा प्रत्यय । ४ नि.मत्सरेन-तृ० एक नपुं०। ५ दुष्टानाम्- प० बहु-पु० । ६ नि.त्यापनमो-द्रि०एक० नपुं-नियन्त्रण को । १२. १--ऋद्धसमृद्धाणां-पायहु० नपुं०१२ पौराण-प० बटु.पु. १ ३ निजक- रस्थ प० एक. पु०। ४ अभ्यधिक । ५ लक्षम् । ६ शतम्। ७ सदशलम्- इसी तरह । ८ दृष्यानि-प्र. बहु० नपुं० । १३.१--रूपप्रसाधितेन-तृ० एक० नपुं-रूप से. अलंकृत । २ गुरुकेन- तृ० एक० नपुं० । ३ निन्द्यमल जां-द्वि० एक० नपुं०। ४ नैव । ५ संचरित क्त-प्रत्यय भूत० कृदन्त । २४.१- बालकानाम्-५० बहु० पु० । २ तरुणानाम्-५० बहु० पु०॥ ३ गतवयानाम् प० बहु० पु. बूढों का। ४ इति । ५ सुचरितैः-तृक बहु०-नपुं० सदाचार से। १५.१-सदा । २ । गुणस्तुति द्वि० एक० न० । ३ प्रणपिणं-द्वि० एकल पु. १ ४ धननिवहं-द्वि० एक.न,' समूह को। *, [ ३१ ] १६-मस्माड - वल्ल - तमणी - परिश्रका - अज्ज - गुज्जरत्तासु जरिणो जेन जणाण सच्चरिश्रगुणेहि अणुराओ ॥१६॥ १४-गहिऊरण' गोहणाई गिरिम्मि जालाउ (ला) श्रो पल्लीयो। जणियायो जेण विसमे बडणाणय-मण्डले पयडं ॥ १७ ॥ १५-पीलुत्पल दल-गन्धा रम्मा मायन्द-महुप्र विन्देहि वरइच्छु पएणच्छएण एसा भूमी फया जेण ॥ १८ ॥ २९-यरिस-सामु श्रणवमुं अट्ठारसमग्गलेसु चेत्तरिम सत्ते बिहुहत्ये बुद्वारे धवल वीश्राए॥१६॥ २.-सिरिफरकुरण हट्ट महाजण विप पयइ वणि बहुलं रोहिन्सफूश्य गामे णिवेसि यं कित्ति-विद्धीप ॥ २० ॥ २१-महोप्ररम्मि एक्को, चौथो रोहिन्सकूत्र-गामम्मि जेण जसरस व पुंजा गर' त्थम्भा समुत्थविधा ।। २१ ।। २२-तेण सिरिफरकुरण जिरणम्स देवस्स दुरित्र-णिदलण कारवियं अचलमिमं भवण भत्तीए मुहंजयायं ।। २२ ।। १६-१-जनितः, -प्रत्यय-भूत पदन्त । २ जनानाम् प० यहु० पु. १३ सय- रितगुग:त. या० न। १७-१. गहित्या-त्या प्रत्यय-पूर्वयालिफ दन्त । २. गोधनानि-दिल बहु० ग' । ३. गिरियो: मप्तमी० एक. पु० । ४. पल्लीरा:-पं० ए० नपुंक, झोपड़ी रो। १८-१, नीलोत्पल (नील+उत्पल ) उक्त उदाहरण से स्पष्ट है कि संस्कृत के सश सभापमान में सर्वत्र नहीं मिलता। २. पन्दैः-. बहु० न० । २.-१. निशित- प्रत्यप, मा. पन्त । २. कीर्तिपरिच० एक न, पशमनाने के लिये। २१-१.दो-तिक दिवनन, संभावाचा । २२-१. मारिगमलमाय भूतगलिफ पदन्त, मेराक रसाया। .

[३२] २३-अप्पिश्रमेयं भवर्ण सिद्धस्स गणेसरस्स गच्छम्मि तह सन्त जम्व-अम्बय-वणि, भाउड-पमुह गोट्ठीए२ ॥ २३ ॥ " संस्कृत-छाया, श्रोम् स्वर्गापवर्गमार्ग प्रथमं सकलानां कारणं देवम् निःशेप दुरत दलनं परमगुरु नमथ जिननाथम् ॥१॥ रघुतिलकः प्रतिहारः आसीत् श्री लक्ष्मणः इति रामस्य तेव प्रतिहारवंशः समुन्नति अत्र सम्प्राप्तः ॥२॥ विप्रः हरिश्चन्द्रः भार्या आसीत् इति क्षत्रिया भद्रा तस्याः सुतः उत्पन्नः धीरः श्री रजिलः यत्र ॥ ३॥ अस्यापि नरभट्ट नामः जातः श्रीनागभट्टः इति एतस्य अस्यापि तनयः ताट: तस्यापि यशोवर्धनः जातः ॥ ४ ॥ अस्यापि चन्दुक नामः उत्पन्नः शिल्लुकः अपि एतस्य मोट: इति तस्य ' तनयः अस्यापि श्री भिल्लुक: त्यागी ॥५॥ श्री मिल्लुकस्य तनयः श्री काकुक गुरुगुणे : गौरवितः अस्यापि कक्कुरु नामः दुर्लभदेव्याः उत्पन्न: ॥ ६ ॥ ईपद्विलासं हसितं मधुरं भणितं प्रलोकितं सौम्यम् नमतं "यस्य न दीनं रोप: स्तोक. स्थिर: मैत्री ॥७॥ न जल्पित न हसित न कृतं न प्रलोकितं न संस्मृतम् न स्थितं न परिभ्रमित येन जनस्य कार्य परिहानम् ।।८।। स्वस्थाः दुःस्था. अपि प्रजा अधमा तथा उत्तमा अपि सौख्येन जननीव येन धारित: नित्यं निजमण्डले सर्वान् ॥६॥ उपरोध रागमत्सरलोभः इति न्यायवर्जितं येन न कृतः द्वौ विशेष व्यवहारे कोऽपि मनागं अपि ॥१०॥ २३-१. गच्छे-सप्तमी० एक० न०, वंश में । २. गौष्ठियै-च० एक० नपुं गोष्ठी के लिये।

[३३ ]
द्विजवरदत्तानुतां येन जनं रञ्जित्वा सकल अपि
नि:मत्सरेन जनितं दुष्टानां अपि दण्ड निःस्थापनम् ।। ११ ॥
धन ऋद्धसमृद्धानां अपि पौराणां निजकरस्य अभ्यधिकम्
लक्षं शतं च सदृशत्वम् च तथा, येन दृष्टानि ॥ १२ ॥
नवयौवन रुपप्रमाधितेन शृंगार गुरुगुरुकेन
जनपद निंद्यमलज्जं येन जने नैव संचरितम ॥ १३ ॥
वालानां गुरुः तरुणानां ससा तथा गतवयानां तनयः
इति मुचरितैः नित्यं येन जनः परिपालित: सर्वः ॥ १४ ॥
येन नमन्तेन सदासन्मानं गुणस्तुतिं कुर्वन्तेन
अल्पतेन च ललित दत्त प्रणयिणां धननिवहं ।। १५ ।।
मरूमाड वल्लतमणी पर्यकाः
अद्य गुजरातेपु
जनित: येन जनानां सच्चरितगुण: , अनुरागः ॥ १६ ।।
गृहीत्वा गोधनानि
पल्लीतः
जनितः येन विपमे यटनानकमण्डले प्रस्ट ॥ १७ ॥
नीलोत्पल्ल दलगन्धा: रम्याः माकन्द मधुकवृत्तः
वरश्न पत्राच्छन्न एपाः भूमि कृता
यर्पशनेषु
नवअादशार्गलेपु
नक्षत्रे विधुदने बुधवारे
श्री क्यफुकेन हाट महाजन विष पदाति वणिकबहुलं
रोहिन्सरूपमा निवेशित फीति वृद्विये ॥ २०॥
मझोरे एफ: द्वितीयः रोहिन्मरूपमामे
पेन यशस्य इव पुजं द्वौ स्तम्भी समुत्थापिती ॥ २१ ॥
श्री फरकुकेन जिनम्य दुरितनिर्दलनम्
पारित चलमिदं भनन मक्या मुराजननम् ।। २२।।
गिरी ज्वालाकुल:
.
येन ॥ १८॥
4
धवल
द्वितीयां ॥ १६ ॥

[ ३४ ] अर्पितं एनं भवन सिद्धस्य धनेश्वरस्य गच्छे तथा सन्त जम्व अभ्यय पणिक भाकुट प्रमुख गोष्ठियै ॥ २३ ।। - उद्धरण सं0- शौरसेनी अभिज्ञान शाकुन्तलम् (चतुर्थोऽङ्कः) (ततः प्रविशतः कुमुमायचयं नाट्यन्तो सख्यो) अनुसूया-पियंवदे,' जइ वि गन्धव्वेण विहिण णिव्वुत्तकल्लणा सउन्दला अगुरुपभत्तु गामिणी संवुत्तेति निव्वुर्द मे हिअश्र, तह वि एत्तियं चिन्तणिज्ज। प्रियंवदा कह चित्र। अनुसूया-अज सो राएसीइटिं५ परिसमाविन इसीहिविसजिलो अत्तणो णअर पविसिप अन्तेउरसमागदो इदोगदं वुत्तन्तं सुमरदि वाण वेत्ति । प्रियंवदा-वीसद्धा होहि । ण तादिसा आकिदिविसेसा गुणविरो- हिणो होन्ति । तादो दाणिं इम वुत्तन्तं सुणिग्रंण आणे किं पडिवजिस्सदि त्ति । अनुसूया-जह अहं दवखामि०, तह तस्स अणुमदं भवे । १. प्रियंवदे--सबोधन, स्त्री० । २, गान्धर्वेण विधिना-तृ० एक नपुं०, गान्धर्व विधि से। ३. संवृत्तेति-/ वृत् प्र० पु० एक. वर्तमान । ४. चिन्तनीयम्-अनीयर-प्रत्यय । ५. राजपिरिष्टिं-द्वि० एक. नपु०, राजर्षियज्ञ को । ६. स्मरति-/ स्मृ-प्र. पु. एक० वर्तमान० १७. वेति-वा। इति -विकल्पसूचक अव्यय । ८. श्रुत्वा-संबंधसूचक कृदन्त, इसमें-इश्र प्रत्यय का भी योग मिलता है |६. प्रतिपत्स्यत-म० पु. एक. भविष्य १०. पश्यामि-उ० पु० एक. वर्तमान०, प्राकृत-दक्ख-देशी, हिं० देख- [ ३५ ] प्रियंवदा-यह विय। अनुसूया-गुणवदे करणया पडिवादणिज्ज' एतिदाव पठमो संकापो । तं अइ देव्य एत्र्य संपादेदिणं अप्पासेण: किदत्यो गुरुयो। प्रियंवदा-(पुप्पभाजन विलोक्य) सहि, अवइदाई बलिकम्म. पज्जताई युमुमाई। अनुसूया-रण सहीप सउन्दलाए सोहग्गदेवश्रां श्रच्चणीया । प्रियंवदा-जुजदि। (इति तदेव कारमेते)। ( नेपथ्य में कुछ ध्वनि होती है) अनुम्या-(कर्णदत्त्वा ) सहि, अदिधीण" विश्रा णिवेदिद। प्रियंवदा-ग उडलसरिणहिदा सउन्दला (आत्मगतम )। श्रज्ज टण दिपण असणिहिदा। अनुसूया-होदु । अले पत्तियहि कुसुमेहिं । ( इति प्रस्थिते)।' (नेपथ्य मे दुर्वासा ऋपि द्वारा शकुन्तला को दिये गये शाप को मुनकर।) प्रियंवदा-हदी । अप्पिय एल्य संवृत्त । कस्मि पि पूधाम् अवरधा मुण्णाहिशप्रा मउन्दला। (पुरोऽलोक्य ) ण हु जस्मिा कम्मि १. प्रतिपादनीयं-अनीयर प्रत्यम । २. अप्रपारोन-२० एक. न', मिना प्रयास मे ३. अनितानि-. बहु• नपुं० न> .६ या प्रयोग शौरंगनी पो निशाना है। ४. युपते-/ युज पु. एफ. पर्तमान । ५. अतिधीनाम्-4. व. पुलिंग. । 7-मार। ७. निहिना--पर प्र. पु. एस. श्री. भूग. मला ८. पता-पप. म.। ६. मशान मरय, भून. मन। १.. फरिमा-ग. एफ. न, किम्-मानाम । ११. परिम- स० एस० गमन-मनाम।

. [३८] प्रिय-कथमिव । अनु०-अद्य स राजपिरिष्टिं परिसमाप्य ऋपिभिविसर्जित आत्मानी नगरं प्रविश्यान्तः पुरसमागत इतोगतं वृत्तान्तं स्मरति पान वेति । प्रिय-विस्रधा भव । न तादृशा श्राकृतिविशेषा गुणविरोधिनो भवन्ति । तात इदानीमिमं वृत्तान्तं श्रुत्या न जाने किं प्रतिपत्स्यत इति । अनु०-यथाहं पश्यामि, तथा तस्यानुमतं भवेत् । प्रिय०-कथमिव । अनु०-गुणवते कन्यका प्रतिपादनीयेत्ययं सावप्रथमः संकल्पः । तं यदि देवमेव संपादयति नन्वप्रयासेन कृतार्थो गुरुजनः । प्रियं०-ससि, अवचितानि वलिकर्मपर्याप्तानि कुमुमानि । अनु० fo-ननु सख्याः शकुन्तलाया: सौभाग्य देवतार्चनीया। प्रियं०-युज्यते। अनु०-सरिस, अंतिथीनामिव निवेदितम् । प्रिय.-ननूटजसंनिहिता शकुन्तला । अद्य पुनह दयेनासंनिहिता। अनु०-भवतु अलमेतावद्भिः कुसुमैः । प्रियः —हा धिक । अप्रियमेव संवृत्तम् । कस्मिन्नपि पूजाहेऽपराद्धा शून्यहृदया शकुन्तलो । न खलु यस्मिन्करिमन्नपि । एप दुर्वासाः सुलभकोपो महर्पिः । तथा शप्या वेगवलोत्फुलाया दुर्वारया गत्या प्रतिनिवृत्तः । कोऽन्यो हुतवहादग्धुं प्रभवति । अनु०-गच्छ । पादयोः प्रणम्य निवर्तयैनं यावदहमदिकमुप- कल्पयामि। प्रिय-तथा। अनु-अहो। आवेग स्खलितया गत्या प्रभ्रष्टं ममानहरतायुप्प- भाजनम् । प्रिय–सखि, प्रकृतिवक्रः स करयानुनय प्रतिगृह्णाति । किमपि पुनः सानुक्रोशः कृतः। अन-तस्मिन्बतदपि । कथय । .

प्रिय Toयदा निवर्तितुं नेच्छति तदा विज्ञापितो मया । भगवन् ,
प्रथम इति प्रेक्ष्याविज्ञाततयः प्रभावस्य दुहितृजनस्य भगवतकोऽपराधो
मर्पितव्य इति ।
अनु० -ततस्ततः ।
प्रिय०-ततो मे वचनमन्यथाभवितुं नार्हति । किंत्वमिज्ञानाभरण-.
दर्शनेव शापोनिवर्तिप्यन इति मन्त्रयन्वयमन्तर्हितः ।
अनु०-शस्यमिदानीमाश्यासयितुम् । अस्ति तेन राजर्पिणा
संप्रस्थितेन स्वनामधेयागितमगरीयकं स्मरणीयमिति संयं पिनद्धम् ।
तस्मिन्वाधीनोपाया शकुन्तला भविष्यति ।
प्रिय०–ससि, गहि । देवकार्य तावन्नियतयावः । अनसूये, पश्य
तावत् । वामहस्नोपहितवदना लिसितेव प्रिय सखी । भगतया
चिन्तयात्मानमपि नेपा विभावयति । किं पुनरागन्तुकम् ।
अनुप्रियंवदे, द्वयोरेव ननु नौ मुस एप वृत्तान्तस्तिष्ठतु । रक्षितव्या
मनु प्रकृतिपेलवा प्रियसखी।
प्रिय०-को नामोणोदकेन नवमालिश सिञ्चति ।
उद्धरण सं०.१०
कपूरमन्जरी
शौरसेनी
(प्रविश्य )
मारहित्य (पुरोबिनोस्य;सी महारायो पुणो मरगदपुराव्य
गदो। पदली घरं अ अगुप हो ।' ता अगदी गदुम देवोविएगावदं ।'
यिएण्येमि
१. अमीर:-अनु, म + उप रिग भूनपालिक कृदन्त ।
२.विपिन-रि-उपसर्ग /परक प्रारम, भून, पदन ।
३. वि.
पनि-गगन पु. एस. पमान।
am-m

-- रूपयति)। [ ३६ ] पि। एसो दुव्वासो सुलहकोवो महेसी। तह सविना घेअबलपुल्लाए दुव्याराए गईए पडिणिवुत्तो । को अण्णो हुदयहादो दहिदुर पहवदि । } अनुसूया-गन्छ । पादेसु पणमिश्र णिवत्तेहि " जाप अहं श्रुग्योदय उपकपेमि। प्रियंवदा-तह । (इति निष्कान्ता)। अनुसूया-(पदान्तरे स्सलितं निरूप्य ) श्रव्यो। आवेअस्स- लिदाए गईए पत्र्भट्ट मे अगहत्थादो पुप्फभाषणं । ( इति पुप्पोचयं प्रियंवदा-सहि, पकिदिवको सो कस्स अणुण पडिगेएहदि । कि वि उण सागुकोसो किदो। अनुसूया-(सरिमतम् ) तरिस बहु एवं पि ! कहेहि ।' प्रियंवदा-जदा रिणवत्तिदु ण इच्छदि तदा विविदो भए । भयवं, पठम त्ति पेक्सिन अविण्णादतवप्पहायरस दुहिदु जरणस्स भअवदा एका अवराहो मरिसिदब्यो त्ति। अनुसूया-तदोतदो। प्रियंवदा-तटो में वरण अएणहाभविद् णारिहदि । किंदु अहिएणारणाभरपदसणेण" सायो शिवत्तिरसदि१२ त्ति मन्तअन्तो सअं अन्तरिहिदो। . कथय-- १. शप्या-क्या प्रत्यय, संबंधसूचक कृदन्त, शाप देकर । २. दग्धु-तुमुन् प्रत्यय । ३. प्रभवति-प्र० पु० एक वर्तमान० । ४. निवर्तय -- म० पु० एक. विधि० वर्तमान । ५. नूनं- अव्यय । ६. अहो-दु:ससूचक अव्यय । ७. प्रतिग्रहणाति-प्रति+/ग्रह-प्र० पु० एक० वर्तमान । म० पु० एक. विधि० वर्तमान० । ६. मर्पितव्यं तव्यान्त प्रत्यय । १०. नार्हति-न+ग्रहति /अह-योग्य होना -प्र. पु० एक. । वर्तमान । ११. अभिज्ञानाभरणदर्शनेन-तृ० एक० नपुं०, स्मरण हेतु दिये हुए श्राभूषण को देखनेते। १२. निवर्तिप्यत् --म० पु० एक. भविष्य० ।

[ ३७ ] अनुसूया-सरकं दाणिं अस्ससिटु। अस्थि तेण राएसिणा संप- थिदेण सणामहेअङ्किर श्रङ्ग लोअयं मुमरणीयं त्ति स पिणद्धं । तस्सिं साहीणोवाया सउन्दला भविस्सदि । प्रियंवदा-सहि. एहि । देवकों दाव णिवत्तह्म । (इति परिक्रामतः) प्रियंवदा--(विलोक्य ) अणमूए, पेखि दाव । वामहत्थोवहिद- वश्रणा श्रालिहिदा विश्व पिथसही। भत्तु गदाए चिन्दाए अत्ताण पि गा एसा विभावेदिय । किं उण आयन्तु। अनुसूया-पिवदे, दुबे एव्य ण णो मुहे एसो युत्तन्तो चिट्ठदु । रस्सिदव्या क्यु पकिदिपेलवा पिअसही। प्रियंवदा-को रणाम उपहोदारण' णोमालिथं सिञ्चोदि । (इत्युभे निष्क्रान्ते)। - संस्कृत छाया अनु:-प्रियंवदे, अद्यापि गान्धर्वण विधिना नितमल्याणा शान्तलानुरूपम गामिनी संवृत्तेति निवृत में दृदयम् , तथाप्येताव- चिन्तनीयम् । १. पारससपिनुम- शिस, तुमुन्-प्रत्यय । २, सनामधेाहितमरी- पर-नि एप० न०, अपने नाम की अंकिन पी हुई भंगूठी फो। स्मरणीयं-अनीयर -17। १. निर्तिवार:-२० पु० दि० वर्तमान । ५. भिाग्यनि-प्र. पु. एफ. वर्तमानः । ६.दयो.-10 व० सं० । ५. तिष्ठति-प्र. पु. प. वर्तमान । ८. रविना रखतम. व प्रवर। ६. ठप्पोदन--1. एप. नपुं०, गरम अल से। मिति-सिएम. पु: एए० पर्तमान०, सारती है। m

.
[४०]
(उपसृत्य ) जअदु जअदु देवो । देवी एवं विएणवेदि जधा संमा-
समए जूयं मए परिणेदव्या ति।
विदूपक-भोदि कि एदं अकालकोहएडपडण ।'
राजा-सारङ्गिए, सव्वं वित्थरेण कधेहि ।
सारङ्गिका-एदं विएणवीअदि । अन्तरादिषन्तचउदृसीदिअहे देवीए
पोम्पराअमणिमई गोरिं यदुन भइरवाणन्देन पडिट्ठा-
विदा ।' सनं च दिक्सा गहिदा। तदा ताए विएणत्तो जोईसरो गुरु-
दक्खिणिमित्त । भरिणदं च तेण । जादि अवरसं गुरुदक्षिणा दाव्वाता
एसा दीअदु महाराअस्स । तदो देवीए विएणत्त श्रादिसदि भन्नवं ।
पुणो वि उल्लविदं तेण । अस्थि लाटदेशे चण्डसेणो णाम
रामा । तस्स दुहिदा घणसारमन्जरी णाम । सा देवएणएहिं प्राइट्ठा
चक्कट्टिपरिणी भविस्सदि ति । तदो महाराअस्स परिणविदव्या
तेण गुरुदक्खिणा दिण्णा मोदि । भत्ता वि चक्कट्टि कहो
होदि । तदो देवीए विहसि भरिणदं जं आणवेदि मानव तं कीरदि । अहं
च विएणविदु४ पेसिदा । गुरुस्स गुरुदस्सिणाणिमित्त ।
विदूषकः (विहस्य )-एदं त संविधाणयं सीसे सपो देसान्तरे
वेजो। इह अज्ज विवाहो । लाडदेसे घणसारमारी।
४. जयतु जयतु म. पु. एका विधि० वर्तमान । ५. यूयं-प्र. बहु
पु०- युष्मद्, सर्वनाम ।
६. परि+/णायय् तव्यान्त प्रत्यय, कृदन्त ।
७. अकालकूष्माण्डपतनं-ल्युट प्रत्यय, दन्त, नपुं० १८. अतिप्रान्तं प्रत्यय
क प्रत्यय, भूत. कृदन्त । ६. पद्मरागमणिमयी प्र० एक. नपु० । १०.
भैरवानन्देन-तृ० एक
११. प्रतिष्ठापिता-स-प्रत्यय, भूत.
कृदन्त, स्त्री०। १२. उत्+/लप कहना-क्त प्रत्यय, प्र. पु० एक०
गत• कृदन्त । १३. भविष्यति-भू प्रथम पु० एक. भविष्य.
१४. विज्ञापयितुं-तुमुन् प्रत्यय ।

ता अज्ज [४१ ] राजा--किं ते भइरवाणन्दस्स पहावो ण पञ्चक्खो। कहिं संपदं भइरवाणन्दो। सारगिका-देवीएकारिद पमदुजाणस्स मज्मट्टिदेवडतस्मूले. चामुण्डाअदणे भइरवाणन्दो देवी आगमिस्सदि दक्खिरणाविहिदी विवाहो । ता इह जेव देवेण ठातव्वं कोहल परो ( इति परिक्रम्य निकान्ता)। राजा-वयस्स सव्वं पदं भइरवाणन्दम्स विश्रम्भिदं ति तमि ।। विदूषक:—एवं णेदं । ण हु मअलञ्छणमन्तरेण अएणो मिअङ्कमणि पुत्तलियं पस्सवएदि । ण हु सरअसमीरमन्तरेण सेहालिया कुसुमुकरं विकासेदि। (प्रविष्य) भैरवानन्दःइअंसा बडतरु मूले णिन्भएणस्स सुरगादुार- स्सस पिधाणं चामुण्डा । (तां चामुण्डा हस्तेन प्रणम्य)। (प्रविश्योपविश्य च ) अजवि ण णिग्गदि मुरगादुवारण कापूरमञ्जरी। (ततः प्रविशति सुरङ्गाद्वारोद्घाटन नाटितकेन कर्पूरमञ्जरी)। कर्पूरमञ्जरी-भअयं पणमिक्षसि ।। भैरवानन्दः-पुत्ति उइदं वरं लह ।' इह जेव उपविसम् । ( कर्परमञ्जरी उपविशति)। . १. वैद्य:--प्र. एफ० पु.। २. तर्कयामि-/तर्क-उत्तम पु० एक. वर्तमान १०। ३. प्रस्वेदयति-प्र+/स्वेद प्र. पु० एक. वर्तमान। ४. विकासयति-प्रथम पु० एक.. वर्तमानः । ५. निर्ग-च्छति-निर उपसर्ग गम्-प्रथम पु. एक० वर्तमान०, वाहर निकलता है। ६. प्रयम्पमे-प्र-उपसर्ग / नम्-उत्तम. पु. एक. वर्तमान. कर्मवाच्य ७. लभस्व-लम-माप्त करना-मध्यम पु• एक. विधिः । ।

[ ४२ ] संस्कृत-छाया सार-एप महाराज: मरकतपुञ्जातः कदलीगृहं चानुपविष्टः । तदप्रतो गत्वा देवी विज्ञापितं विज्ञापयामि । जयतु जयतु देवः । देवीदं विज्ञापयति यथा संध्यासमये यूयं मया परिणेतव्याः । विदू.-भोः, किमेतदकालकूष्माण्डपतनम् । राजा-सारङ्गिके, सर्व विस्तरेण कथय । सार०-एवं विज्ञाप्यते, अनन्तरातिप्रान्त चतुर्दशीदिवसे देव्या पद्मरागमणिमयी गौरीकृत्वा भैरवानन्देन प्रतिष्ठापिता । स्वयं च दीक्षा गृहीता । ततस्तया विज्ञातो योगीश्वरो गुरुदक्षिणानिमित्तम । भणितं च तेन यद्यवश्यं गुरुदक्षिणा दातव्या तदेषा दीयतां महाराजस्य । ततो देव्या विज्ञप्तं यदादिशति' भगवान् । पुनरप्युल्लपितं तेन । अरत्यत्र लाट- देशे चण्डसेनो नाम राजा । तस्य दुहिता घनसारमञ्जरी नाम । सा दैवरादिष्टा एपा चक्रवर्तिगृहिणी भविष्यतीति । ततो महाराजस्य परि- ऐतव्या । तेन गुरुदक्षिणा दत्ता भवति । विदू०-एततसंविधानकं शीर्प सपों देशान्तरे वैद्यः । इहाध विवाहो लाटदेशे धनसारमञ्जरो। राजा-किं ते भैरवानन्दस्य प्रभावो न प्रत्यक्षः। कुन सांप्रत भैरवानन्दः। -देवीकारितप्रमदोद्यानस्य मध्यस्थितवटतरुमूले चामुण्डायतने भैरवानन्दो देवी चागमिष्यति । तदद्य दक्षिणविहित. कौतूहलपरो विवाहः। तदिहव देवेन स्थातव्यम् । राजा-ययस्य, सर्वमेत रवानन्दस्य विजृम्भितमिति तर्कयामि । विदू०-एवमेतत्। नसलु मृगलाञ्छनमन्तरेणन्यो मृगाङ्कमणिपुत्तली प्रस्वेदयति । नखलु शरत्समीरमन्तरेण शेफालिकाकुमुमोत्करं विकासयति । भैरया-इयं सा वटतरुमूले निष्कान्तस्य सुरङ्गाद्वारस्य पिधानं चा- मुण्डा । अद्यापि न निर्गच्छति सुरगाद्वारेण कपरमञ्जरी। कर्पूर०- -भगवन् , प्रणम्यसे।, सार-

[४३ ]
भैरवा -पुत्रि, उचितं वरं लभस्व । इहैवोपविश ।
उद्धरण सं०-११
शौरसेनी
मृच्छकटिक
(चतुर्थोक-ततः प्रविशति चेटी)
चेटी-आणत्तम्हि अत्ताप अज्ज अाए सश्रासं गन्तु । एसा अज्जमा
चित्तफलपणिसएणदिट्टीमदणियाए महकिपि मन्तअन्ती चिट्ठदि ।'
ता जाय उपसप्पमि।
(ततः प्रविशति ययानिदिष्टा वसन्त मदनिका च)। (इति परिक्रामति)।
घसन्तसेना--हथे। मदणिण श्रवि सुसदिसी इयं चित्ताकिदी श्रज्ज
चारुदत्तरस।
मदनिका-गुसदिसी।
यसन्तमेना--कधं तुमं जाणासि ।
मदनिका नेण अजा मुसिरिणद्धा दिट्टीगुलग्गा।
यमनसेना-हजे किं वेसवासदस्मिरणेण मणिए व्यं भणमि ।
मदनिका-अन्ना कि जो जेय जणो मे पडियमदि सो ज्जेव
अलीप्रदपिराणों मोदि।
--
१. तिष्ठगि/श्या-मगन पु. एफ यामान बेटता है। गौरंगनी में
a> का शिग परिवर्तन मिलता है। २. उपमर्पमि-उप-उपसर्ग
[प-उतम पु. एफ. पर्तनाना, नाता है। . इसे यादानान
. भएमपन पु. एक.. पमान ।

[ ४४ ] बसन्तसेना-हजेणाणापुरिससङ्गण वेसाजणोअलीअक्खिएणो। मदनिका-जदो दाच अजाए दिट्टी इध अभिस्मदि हिअधे भोदि । तस्स कारण किं पुच्छीअदि ।' बसन्तसेना-हम्ने सहीअणादो' उवहसणीयदं रक्खामि । मदनिका- अजए एव्यं ऐदं । सही अगचित्तागुवत्ती अबला- अणो भोदि। प्रथमाचेटी ( उपसृत्य )-अजए अत्ता प्राणवेदि गहिदावाएढण पक्खदुवारए सज्ज पवहण । ता गच्चेति । वसन्तसेना-हजे कि अज चारुदत्तो मं इस्सदि। चेटी–अज्ञाए जेण पवहणेण सहसुवरणदससाहस्सिो अलङ्कारो अगुप्पेसिदो।" वसन्तसेना-को उण' सो। चेटी-एसो ब्जेव रासालो संठाणो।' वसंतसेना (सक्रोधम् )--श्रवेहि मा पुणो एवं भणिस्ससि ।' चेटी - पसीददु पेसीददु अज्ञया । संदेसेण म्हि पेसिदा। वसन्तसेना-अहं संदेरास्स ज्जेय कुप्पामि ।' चेदी-ता किं ति अत्तं विएणाविस्सं।" जायेगा। १. पृच्छयते /पूछ-प्रथरा पु० एक. वर्तमान०, कर्मवाच्य । २. सखी- जनात्-पंचमी एक० स्त्रीलिग० । ३. रक्षामि- उत्तम पु० एक. वर्तमान । ४. नयिनेष्यति- नि प्रथम पु० एक. भविष्य. प्रेरणार्थक-ले ५. श्रनुप्रेति:-क्त प्रत्यय, भूतकालिक कृदन्त, पीछे से भेजा। ६. पुन:-यव्यय। ७. संस्थान.- भूतकालिक कृदन्त । ८. अपेहि-अप- उपसर्ग /इ मध्यम पु० एक० अाशा हटो। ६. भणियसि-/ भण-मध्यम पु०, एक०, भविष्य० । १०. दुप्यामि-/ कुप्-उत्तम पु० एक. वर्तमान । ११. विज्ञापयिष्यामि- / ज्ञापय-उत्तम पु० एक. भविष्य, प्रेरणार्थक० ! , [४५ ] वसंतसेना--एव्वं विएणविदव्या' जइ म जीन्ती इच्छसि ता एव्यं ण पुणो श्रहं अत्ताए आणविदव्या ।। चेटी--- -जधा दे रोअदि । (इति निष्कान्ता)। ...... संस्कृत-छाया चेटी-याज्ञप्तास्म्यार्यया अद्य 'सकाशं गन्तुम् । एपार्या चित्र- फलक निपएपद्दिष्टर्मदनिकया सह किमपि मन्त्रयन्ती तिष्ठति । तद्याव- दुपसमि। वसन्त-हजे मदनिके अपि मुसदृशीयं चित्ताकृतिरार्य चारुदत्तस्य । मद०-सुसहशी। वसन्त०-कथं त्वं जानासि । मद येनार्याय: मुस्निग्धा दृष्टिरनुलग्ना । वसन्त०-हजे किं वेशवासदाक्षिण्येन मदनिके एवं मणसि । मद-पायें कि य एव जनो वेशे प्रतिवसति स एयालीकदाक्षिण्यो भवति । वसन्त-हजे नानापुरुपसनन वेश्याजनो लीकदाक्षिण्यो भवति । मद-यतस्तावदार्याया दृष्टिरिहाभिरमति हृदयं भवति च तस्य- कारणं किं पृच्छयते। वसन्त-हजे सरसी जनादुपहसनीयतां रक्षामि । मद-आर्य एवं नेदम । ससीजनचित्तानुबय॑वलाजनोभवितः। चटो-यार्य माताज्ञापयति गृहीतावगुण्टनं पक्षद्वारे सज्ज प्रवद- गम् । तत् गच्छेति। १.पिपरिया-तम्बान्त परप, पदन्त । २. श्राशापितमा-सपान्त प्रत्यय, परन्त । २. रोचने-/ च-अपग पु० एफ. पतंमाना, रुचता है।

[ ४६ ] बसन्त०-हजे किमार्य चारु दत्तो मां नयिनेष्यति । चेटी-आर्ये येन प्रवहणेन सह मुवर्णदशसाहस्निकोलंकारोनुप्रेपितः । बसन्त०-कःपुनः सः। चेटी-एप व राजश्याल संस्थानः । वसन्त-अपेहि मा पुनरेव भणिप्यसि । चेटो-प्रसीदतु प्रसीदत्यार्या । संदेशेनास्मि प्रेसिता। वसन्त-अहं संदेशस्यैव कुण्यामि । चेटी०-तत्किमित्यत्तं विज्ञापयिष्यामि। वसन्त-एवं पिज्ञापयितव्या यदि मां जीवन्तीम् इच्छसि । तत् र न पुनः अहं....." आज्ञापयितव्या। चेटी-यथा ते रोचते। उद्धरण सं०-१२ शौरसेनी मृच्छकटिक (पप्ठोङ्क-ततः प्रविशति चेटी )। चेटी—कंध अज वि अज्जा ण विवुज्झदि ।' भोदु । पविसिब 'पडिबोधइस्सं । (इति नाट्येन परिक्रामति) (ततः प्रविशत्याच्छादित शरीरा प्रसुप्ता वसन्तसेना।) चेटी-(निरुप्य) उत्थेदु उत्येदु अजा । पभादं संवुत्त । १. विबुध्यते-वि उपसर्ग बुध-प्रथम पु० एक. वर्तमान, जागती २. प्रविश्य-वर्तमानकालिक कृदन्त, प्रवेश करके। यिष्यामि-प्रति-उपसर्ग बुध- उत्तम पु०. एक० भविष्य. प्रेरणार्थक०,. जगाऊँगी। ४. उत्तिष्ठतु उत्तिष्ठतु-/स्था-मध्यम पु० एक. विधिः । ३. प्रतिबोध-

[४७ ]
वसन्तमेना (प्रतिबुध्य) कथं रत्ति जेव्य पभादं संयुत्त ।
चेटी-श्रम्हाणं। एसो पभादो । अजाए उण रत्ति लेव्य ।
बसन्तसेना--हजे कहिं उण तुम्हाणं जूदिरो।
चेटी-यजए. वड्डुमाणग्रं समादिसि पुष्फकरण्डअं जिएणु-
ज्जाणं ३ गदो बजे चाम्हत्तो।
पसंतसेना-कि समादिसिन।
चेटी-जोगहि रादीप पवहणं । वसन्तसेना गच्छदुत्ति ।।
यसन्तमेना-हब्जे कहिं माए गन्तव्यं।
चेटी-अजाए जहिं चारदत्तो।
पसंतमेना-(चंटी परिव्यज्य ) हम्जे मुठदु ण णिज्माइदो.
रादीप । ता अन्न पराग्यं पेस्पिरसं। हमने कि पविद्या श्रहं इह
अमन्तरपदम्मालयं ।
पट:- पयलं अन्भन्तरचदुरसालयं सव्वजएस्स वि हिअर्थ
पविहा
पमन्नमेना-अपि संतापदि चारुदत्तरस परिश्रयो ।
पेटी-मन्तस्पिरमदि।।
यसनमेना-फदा।
पेटी- जदौ नया गमिामदि।
१. परमापरयार. पु. परम-सर्वनाम । २. ममादिसराम
दिग-बाग परना-मयंध० पदना। ३, जीणोंपानं-दिनीया. एम.
नई. TT में रादा मा मजिप मंगल में पापिही मित रूप में
from ... गया. गम्-माम पु. एफ. रिधि. यान
...
मुरलिपिमा । ६. गसम्ममा गम् नमान्न मार,
७. निम-निरसन प्राप ८.क्षिणे
म. - पु. ए. लि... मन्वारा-VT.
अपम ए.एम.

.[४] वसंतसेना-तदो मए पठम सन्तप्पिदव्यं । (सानुनयम) हुन गेह एवं रश्रणावलि । मम यहिणियाए अनाधूदाए गदुअर समप्पेहि । भणिदध्वं च अहं सिरि चारुदत्तरस गुणणिजिदा दासी तदा तुम्हाणं पि । ता एसा तुह जव्य कण्ठाहरणं भोदु रअणावली। चेटी -अज्जा कुप्पिस्सदि चारुदत्तो अजाए दाव । वसंतसेना-गच्छ ण कुप्पिस्सदि। चेटी-(गृहीत्वा )जं पाणवेसि ।' (इति निष्कम्य पुनः प्रविशति) चेटी-अजए भणादि अन्ना धूदा। अंजउत्तण तुम्हाणं पसादी- कदा । ण जुत्तं मम एवं गेलिदु। अजउत्तो जव्य मम आहरणविसेसो त्ति जाणादु भोदी (ततः प्रविशति दारकं गृहीत्वा-रदनिका) रदनिका-एहि वच्छ सअडिआए कोलम्ह।" दारकः ( सकरुणम् )--रदनिए किं मम गदाए मट्टिासअडिआए। तनव्व सोवणसअडियंदेहि। रदनिका--(सनिर्वेदं निश्वस्य ) जाद कुदो अम्हाणं सुवरणवव- हारो। तादस्स पुणो वि रिद्धीए सुवासयडिआए कीलिस्ससि । ता . १. सन्तप्तव्यम्-तव्यान्त प्रत्यय । २. गत्वा-/गम्-क्त्वा प्रत्यय-संबंध- सूचक कृदन्त । ३. अाज्ञापयसि-मध्यम पु० एक. वर्तमान प्रेरणार्थका । ४. भवत्--युष्मद् सर्वनाम-याप, स्त्रीलिंग-भवती । ५. क्रीडाम:- /क्रीड मध्यम पुरुष वहु०, वर्तमान, प्राकृत मे सं० द्वि० के प्रयोग बहुवचन के सदृश है । ६. मृतिकाशकटिकया-तृ० एक० नपुं०१७. दा-देना- मध्यम पु० एक. वर्तमान० । ८. क्रीडिष्यसि-मध्यम पु० एक भविष्य.. .-खेलोगे ।

[४] जाव विणोदेमि । अनावसन्तसेणाए समीवं उवसप्पिस्सं ।' र उपसृत्य प्रज्जए पणमामि । वसन्तसेना-रदणिए सायद दे। करस उण अयंदारो अण- लंकिनसरीरो वि चन्द मुहो आणन्देदि मम हिनधे । रदनिका-एसो क्खु अज चारुदत्तस्स पुत्तो रोहसेणो णाम । वसन्तसेना--(वाहूप्रसार्य )--एहि मे पुत्तन अलिग (इत्यके. उपवेश्य ) । अणुकिदं अणेन पिदुणो रुवं । रदनिका-ण केवलं स्वं सील पि तस्केमि । एदिणा श्रज्जचारु पत्ताणश्यं विणोदेदि। यसन्तसेना [-ध किं णिमित्त एसो रोअदि । रदनिका--दिणा पडिवेसिथगहवडदारअकेरियाए सुवरणस- अडियाग कोलिदं । तेण असाणीदा। तदो उण तं मग्गन्तस्स५ मए इयं मट्टियासप्रडिया कदुथ दिएणा । तदो भणादि रदणिए कि मम पदाए मट्टियासअडिआए। तं ज्ञव सोपएण सअडियं देहि ति। वसंत-हद्धी हद्धी, अमं पिणाम परसम्पत्ती सन्तप्पदि । म- 'अवं फअन्त पोपसरवत्तपडिदजलबिन्दुसरिसेहि' कीलसि तुम पुरि समाअधेहि । ( इति सारना)। बाद मा रोद । सोत्रणासयडियाए पीलिरससि । . . १. उपसपिंप्यागि-उप+/सप-उसन पु० एफ०, भविष०, पलनी है। २. सागतं-भून. पृदन्त पा संगा रूप । ३. एतेन–२० एए. पु. एतद्- सपनान् । ४. पानीमा-नी-मे श्राना भूतकानिफ दन्त, प्रेरणार्थक. ५. देशी-मांगना-मस्वरूप-वाचत:-पर्तमान पदन्त । ६. गुगर्णाटियाम्-दिवीn० एक. न.। ७. हा पिक हा पिर-शोक- ८. परसपत्पा-पंचनी मिति, एफ. नपुं०। ८ *गारी:- जीएफ. । नी।

[ ५२ ] रद०-एप सल्वार्य चारुदत्तस्य पुत्रो रोहसेनो नाम । वसन्तक-एहि मे पुत्रक यालिङ्ग । अनुतमनेन पितृरूपम् । रद०-न केवलं रुपं शीलमपि तर्कयामि । एतेनार्य चारुदत्त श्रात्मानं विनोदयति । वसन्त्र-अथ किं निमित्तमेप रोदिति । -एतेन प्रतिवेशिकगृहपतिदारककृतया सुवर्णशकटिकया क्रीडितम् तेन च सानीता । तत. पुनस्ता याचत: मया इयं मृत्तिकाशक टिका कृत्वा दत्ता । तदा भणति रनिके कि मयतया मृत्तिकाशकटिक्या। तामेव सुवर्णशकटिकां देहीति। वसन्त-हा विक हा धिक, अयमपि नाम पर संपत्त्या संतप्यते । भगवन्कृतान्त, पुष्कर-पत्र पतितेजलविन्दुसदृशै. क्रीडसि वं पुरुषमाग- धेय. । तात मा रोदिहि । सुवर्णशकटिकया क्रीडिष्यसि । दारक:-रदनिके कैपा। वसन्त--ते पितुर्गुणनिर्जिता दासी । रद-तात, आर्य ते जननी भवति । दारक-रनिके अलीकं त्वं भणसि । यस्रस्माकमार्याजननी, तत्कीस अलंकृता। बसन्तः--तात मुग्धेन मुसे नातिकरुण मन्त्रयसि । एपेदानी ते जननी संवृता । तद्गृहाणैतमलंकार । सुवर्णशकटिकाम् घडावेहि कारय । दारक-अपेहि गृहीप्यामि । रोदसि त्वम् । वसन्तः-तात न रोदिष्यामि । गच्छ, क्रीड! तात कारय सुवर्ण- शकटिकाम् । ।

[ ५३ ] उद्धरण सं०-१३ शौरसेनी रलावली (चतुर्थोऽङ्क) (ततः प्रतिशति रत्नमालामादाय सास्रा सुसंगता)। मुसंगता-(सकरुण नि:श्वस्य) हा पिअसहि सारिए।' हा लज्जालुए ! हा सहीगणवच्छले ! हा उदारसीले ! हा सोम्मदंसणे ! कर्हि गदासि । देहि मे पडिवणं । (इति रोदिति ।) (ऊर्वमवलोक्य निश्वस्य घ)ह हो देव्यहदश्र। अकरुण । असामएणरूवसोहा तादिसी तुए जइ गिम्मिदाता कसि उण ईदिसं अवत्यन्तरं पाविदा । इयं च रअणमाला जीविदणियसाए ताए कस्सवि वह्मणस्स हत्थे पडिबादेसुत्ति भरिणश्र मम हत्थे समप्पिदा । ता जाय कपि वह्मरणं अरणेसामि। (नेपथ्यभिमुसमव- * लोम्य ) अए । यहं पसोयम्बु बह्मणो यसन्तश्रो इध एव श्राअच्छदि । ता इमरिमं एव्य पडियादइस्सं । (ततः प्रविशति हप्टो वसन्तकः)। वसन्तक-ही ही भो भोः। 'अज्ज क्लु पिप्रावनस्सेण पसादि- दाएतत्त भोदीऐ वासवदत्ताए. वाणदो मोचित्र सहत्यदिएणेहि मोद- अलड्दुग्राहि उदरं मे मुपूरिदं फिदं । अण्णं च । एदं पट्टमुअजुअलं करणाभरणं अ दिएणं । ता दाणिं पियवनस्सा (इति परिक्रमति ) । १. पिरममि सागरिप-संबोधन, स्रो० । २. गताऽसि-गता-भूत. इदन्त-स्त्री, प्रसि-स-म० पु० एक० पर्तमानः । ३. प्रापिता- प्रस-भूगपालिफ इदन्त, प्रेरणार्थक । ४. अन्तिप्पामि-/ ईए- उत्तम० पु० एम० महिपा ५ प्रतिपादपियामि-उत्तम० पु० एम० भविप्पा । ...६.ही हो।भो भो विक द्वारा प्रयुक्त संबोधन पा रूप। ७. श्त- भूतपातिक प्रदन्त । ८. प्रेलिये-उत्तम. पु. एफ., भविष्य। । जाय + [ ५० ] ". दारक:-रदरिगए का एसा। वसंत-दे पिदुणो' गुणणिज्जिदा दासी। रदनिका-जाद अजया दे जगणी भोदि। जणी ता कीस अलविदा। वसंत-जाद मुद्धेण मुहण अदिकरुण मन्तेसिर एसा दाणि दे जगणी संवुत्ता । ता गेल एवं अलवारअं। सोवएणा सअडिअंधडा- वेहि। दारकः--श्रयेहि । ए गेलिस्सं । रोदसि तुमं । बसंत० ( अश्रूणि प्रमृज्य )-जाद गए रोदिरसं । गच्छ कोल ! (अलंकारै मृच्छकटिकां पूरयित्वा)। जाद कारेहि५ सोवष्णसअडिअं इति दारकमादाय निष्क्रान्ता रदनिका । संस्कृत-छाया चेटी-कथमद्याप्यार्या न विवुध्यते । भवतु, प्रविश्य प्रतिबोध- 'यिष्यामि । उत्तिष्ठतु उतिष्ठत्वार्या प्रभातं संवृतम् । वसन्त-कथं रात्रिरेव प्रभातं संवृतम । चेटी-अस्माकमेप प्रभातः । आर्यायाः पुना रात्रिरेव। बसन्त० -हजे कुत्र पुनयुप्माकं द्यूतकरः । चेटी-आर्य वर्धमानकं समदिश्य पुष्पकरकरण्डकं जीर्णोद्यानं गतः आर्य चारुदत्तः । बसन्त०---किं समादिश्य । १. पितु:-पंचमी० एक. पुलिंग । २, म त्रयसि /मन्त्र-मध्यम पु. एक. वर्तमान ३. गृहाण-/ग्रह-मध्यम पु• एक निधि 1. ४, घट-बनाना-मध्यम पु० एक. विधि० ५. कारय-/कृ-मध्यम पु- एक विधि प्ररणार्थक।

[ ५१ चेटी-योजय रात्री प्रवहणम् । बसन्तसेना गच्छत्विति । वसन्त०-हजे कुत्रमया गन्तव्यम् । चेटी—ार्य यत्र चारुदत्तः । वसन्त-हब्जे मुष्ठु न निातो रात्री। तदद्य प्रत्यक्ष प्रेक्षिष्ये । हजे किं प्रविष्ठाहमिहाभ्यन्तरं चतुःशालम् । चेटी- न केवलमम्यन्तर चतुःशालं सर्वजनस्यापि हृदयं प्रविष्टा । वसन्त-अपि संतप्यते चारुदत्तस्य परिजनः । चेटी-संतपत्यते। बसन्त०-कदा। चेटी-यदार्या गमिष्यति । वसन्त०-तदा मया प्रथमं संतप्तव्यम् । हज्जे गृहाणी तां रत्नाव लीम् । मम भगिन्या आर्या धूताय गत्वा समर्पय । भणितव्यं च अहं श्री चारुदत्तस्य गुणनिर्जिता दासी तदा युष्माकमपि । तदेपा तवैव कण्ठा- भरणं भवतु रत्नावली। चेटी-आर्ये कुपियति चारुदत्त आर्यायै तावत् । बसन्त०-च्छ । न कुपिप्यति । चेटी-गृहीत्येति । यदाज्ञापयसि । आर्ये भणत्यार्या द्यूता । आर्य- पुत्रण युप्माकं प्रसादीकृता । न युक्तं ममैतां गृहीतुम् । आर्यपुत्र एव ममाभरणविशेष इति जानातु भवती । रद-एहि वत्स शकटिकया क्रीडावः । दारफ०-रदनिके किं ममैतया मृत्तिकाशकटिकया। तामेय सुवर्ण शकटिकां देहि । रद-तात कुतो अस्माकं सुवर्णव्यवहारः । तातस्य पुनरपि ऋद्धया सुवर्णराकटिकयां क्रीडिष्यसि । तद्यावद्विनोन्याम्येनम् । आर्यावसन्त- सेनायाः समीपमुपर्पिप्यामि । आर्य प्रणमामि । वसन्त० -दनिके स्वागतं ते। कस्य पुनरयं दारकोनलंकृत शरीरो. ऽपि चन्द्रमुस थानन्दयति मम हृदयम् ।

।
[ ५६ ]
तत्रमवत्या वासवदत्तया बन्धनान्मोचयित्वा स्वहस्तदत्त र्मोदकलड्डुकैरुदर
मे सुपूरितं कृतम् । अन्यच्च । एतत्पट्टांशुकयुगलं कर्णाभरण' चे दत्तम् ।
तद्यावदिदानी । प्रियवस्यं प्रेक्षिष्ये ।
सुसं०-आर्य वसन्तक । तिष्ठ तावत्त्वं मुहुर्तम् ।
वस.--कथं सुसंगता । सुसंगते । अत्र किं निमित्त रुद्यते । न खलु
सागरिकाया अत्याहितं किमपि संवृत्तम् ।
सुसं०-एतदेव निवेदयितुकामा । सा खलु तपस्विनी देन्योज्जयिनी
नीतेति प्रवादं कृत्वोपस्थितेऽधराने न ज्ञायते कुत्र नीतेति ।
वस-हा भवति सागरिके ! हा असामान्यरूपशोभे! हा मृदु
भापिण! प्रतिनिघृणमिदानी देव्या कृतम । ततस्ततः ।
मुसं०-एपा रनमाला तया जीवितनिराशयार्यवसन्तस्य हस्ते
प्रतिपादयेत्युक्त्वा मम हस्ते समर्पिता। तन्ननु गृहणात्वार्य एताम् ।
वस०-भवति । न म ईदृशे प्रस्ताव एतद्वोदु हस्तः प्रसरति ।
मुसं०–तस्या एवानुग्रहं कुर्वन्नङ्गीकरोत्येतदार्यः।
वस०- अथवा । उपनय । येनैतयैव सागरिकाविरहकुण्ठितं प्रिय.
वयस्यं विनोदयामि । भवति । फुतः पुनरीदृशस्यालंकारस्य समागमः ।
सुसं०--आर्य मयापि सा फौतूहलेन पृष्टाऽऽसीत् ।
बस-ततस्तया किं भणितम् ।
मुसं०-
-ततः सोय प्रेक्ष्य दीर्घ निश्वस्य । सुसंगते किमिदानी
तवानया कथयेति भणित्वा रोदितु प्रवृत्ता।
वस-ननु कथितमेव तया । सामान्यजनदुर्लभेनानेन परिच्छदेन
सर्वथा महामिजनसमुत्पन्नया तया भवितव्यम् । सुसंगते । प्रियवयस्य
इदानी कुत्र।
मुसं०-आर्य एप सलु भर्ता देवोभवनतो निष्कम्य स्फटिकशिला-
मण्डपं गतः । तद्गच्छत्वार्यः । अहमपि पासयदत्तायाः परिचारिणी
.
मविप्यामि।

[ ५७ ] उद्धरण सं०-१४ जैन-शौरसेनी समयसार (तृतीय परि-पर्म) १---जाव ण वेदि। विसेसं तरं तु श्रादासवाण दोह रणपि अण्णाणी साय दु सो कोधादिसु बट्टः जीवो ॥४॥ २-कोधादिसु घट्टतरस तस्स कम्मरस संचयो होदि जीवम्सेवं वंयो भणिदो सलु सव्वदरसीहिं ॥७॥ --अइया इमेण जीवण अापरणो' श्रासवाण' य तहेव णादं होदि विसेसंतरं तु तइया ए चंयो से ||७|| ४-गादूण' श्रासवारण अमुचित्त च विवरीय' भाव च दुस्सस्स पारणं नि य तदो गियत्रिं कुणदि जीवो ॥७॥ ५--अहमिको गनु मुद्धो य जिम्ममो गाणदसणसमग्गो' तमि ठिदो तचित्तो सव्ये एदे सयं गमि' || १-१. पेति /विद्, प्र० पु. एक वर्तमान०-जानता है। २. यो:-५० ना. संबापाए । ३. पनते. / न-म० पु. एक. वर्तमान । ४. जी- मत्यय-भूत. पदन्त मयमा० एफ. पुलिंग। २-१. मशित:/भर मापप-वर्तमान प्रदत। २.सदाशिमि: ३-१. धामणः-१० प. पु०।२. थामगारांना बा० पु.। ४-१. गाग-गंधालय पदन्त । २. विपरी-शिरप-न>-य-य- मागीविता अ.पर-पु. एफ. पर्नेमानः । ५-१. तस्मिन्-मपानी. एर. पु.। २. नमामिनी-उचम पु- एक. सन [५४ ] सुसंगता (रुदती सहसोपसृत्य )-अज वसन्त । चिट्ट दाब, तुम मुहत्त । वसन्तक ( दृष्ट्वा )-कधं सुसंगदा । सुसंगदे । एत्थ किं णिमित्त रोदीअदि । रण क्वु सायरिआए अच्चारिदं किंपि संवुत्तम । सुसंगता-ऐदं जेव्य रिणवेदइदकामा । सा क्खु तवस्सिणो देवोए उज्जइणि णीदेत्ति पवादं कटुअ उवस्थिदे अद्यरत्त ण जाणीअदिर कहिणीदेत्ति। वसन्तक ( सोद्वेगम् ) हा भोदि सारिए ! हा असामायणरूव- सोहं ! हा मिदुभासिणि । अदिणिग्विणं दाणि देवीए किदम् । सदो तदो। सुसंगता-एसा रश्रणमाला ताए जीविदणिरासाए अजवसन्तअस्स हत्थे पडिवादेसित्ति भरिण मम हत्थे समप्पिदा । ता एवं गेरहदु अन्नो एवम् । वसन्तक (सान सकरुणं कर्ण पिधाय )-भोदि णं मम ईदिसे पत्थाये एवं योदुहत्यो पसरदि । ( इत्युभौरदत्तः)। सुसंगता (असलि पवा )-ताए एव्य अणुग्गहें करन्तो अङ्गीकरेषु एवं श्रजो। वसन्तक (विचिन्त्य)-अहया । उवणेहि । जेण इमाए जेव्य सामरिया विरहकुएिरदं पिययश्रस्सं विलोदेसि । (मुसंगता वसन्तकस्य हस्ते रत्नमालां ददाति )। घसन्तक (गृहीत्या निरुप्प सविस्मयम )--भोदि कुदो उण ईदिसस्स अलंकाररस समागमो। १. रुयते --० पु. एफ. वर्तमान०, कर्मवाच्य । Vा–४० पु० एम०. वर्तमान० पर्मवाच्य । ३. ननु--श्यध्यय। ग्रहणातु-मध्यम० पु. एफ. विधि०। ५. उपनय-नी-मध्यम पु० विधिः। ६. पिनोदयामि उत्तम. १ एफ. वर्तमान। २. शायते- . [ ५५ ] सुसंगता [-यज मावि सा कोदूहलेण पुच्छिदा असि। वसन्तक-तदा ताए कि भणिदं ।। सुसंगता-तदो सा उद्धं पेरिख दीहं हिस्ससिय । सुसंगदे । किं दाणिं तुह इमाए कवाए त्ति भणि रोदिदु पउत्ता। वसन्तक-णं कधिदं एव्व ताए । सामण्णदुल्लहेण इमिणा परिच्छदेण सब्वधा महाभिजणसमुप्पएणाए होटव्यं ।“ सुसंगदे। पिव- अस्सोदाणिं कहि। मुसंगता-अजामो क्खु भट्टा देवीभवणदो णिकमित्र फडिअसिला- मण्डवं गदो। ता गच्छदु अज्जो। अहवि देवीए वासवदत्ताए परिचारिणी भविस्सं। संस्कृत-छाया सुसं०-हा प्रियसखि सांगरिके ! हा लज्जालुके ! हा सखीगण- वत्सले ! हा उदारशीले ! हा सीम्यदर्शने ! कुत्र गताऽसि । देहि में प्रति- वचनम् । हं हो दैवहतक । अकरुण। सामान्यरूपशोभा तादशी त्वया यदि निर्मिता तत्कस्मात्सुनरीदशभवस्थान्तरं प्रापिता । इयं च रनमाला जीवितनिराशया तया कस्यापि ब्राह्मणस्य हस्ते प्रतिपादयेति भणित्वा मम हस्ते समर्पिता । तद्यावकमपि ब्राह्मणमन्यिष्यामि । अये। कथमेप खतु मारणो वसन्तक इहवागच्छति । तदस्मै एव प्रतिपादयिप्यामि। वस-दी ही । भो भोः। अद्य सनु प्रियवयस्येन प्रसादितया १. भागतंस प्रत्यय, भूत० कृदंत । २. अनया--४० एक० नपुं० । ३. कथितं- प्रत्यय, भूतकालिक कृदन्त । ४. त्वया-मध्यम पु० तृ० एक० युष्मद् सर्वनाम। ५. भवितन्यम्--तत्यान्त प्रत्यय, भरिष्यकालिक रंग । ६. गा: भूतकालिक. कृदन्त । ७. गन्धत-मध्यम पु० एक. वर्तवान, रिषिः। 1 [ ५८ ] ६–जीवणिवद्धा एदे अधुव' अणिया तहा असरणा य दुक्सा दुक्खफलाणि य रणादृण णियत्तदे तेसु ||७|| ५७-कम्मस्स य परिणामं णोकम्मरस य तहेव परिणाम ण करेदि पदमादा जो जाणदि सो हवदि गाणी ।। ८-कत्ता आदा भणिदोण य कत्ता केण सो उवाएण धम्मादी२ परिमाणे जो जाणादि सो हदि गाणी ॥२॥ -वि परिणमदि ण गिह णदि उपजदि ण परदव्यपज्जाए गणाणी जाणंतो वि हु पुग्गलकम्मं अणेयः विहं ।।२।। १०-गवि परिणमदि ण गिहणदि उप्पाद ण परदव्यपज्जाए पाणी जाणतो' विहु सगपरिणाम अणेय विहं ।।३।। ११- एवि परिणामदि णं गिह रणदि उप्पज्जदि' णं परदव्यपज्जाए যার্থী जणतो वि हु पुग्गलकम्मफल भणतं ॥४॥ १२-एयि परिणमदि ण गिह दि उप्पज्जदि ण परदव्यपज्जाए ग्गलदव्य पि तहापरिणमदि सएहि। भावेहि' ||५|| ६-१. अध्रया-अस्थिर । २. दुःसानि:-द्वि० बहु० गपु० । ३. निवतते- नि-उपसर्ग, प्र० पु० एफ० वर्तमान० | ४. तेषु-सप्तमी० बटु० पु० 'ते' के अनतर विषयेषु' पद का अद्याहार होगा। ८-१. श्रात्मा-प्रथमा० एक० पुलिंग। २. धर्मादीन् परिणामान्-द्वि० बहु पु० २, शानी प्र० एक.पु.॥ 8-१. परिणमति-प्र० प्र० एक. वर्तमान० २. अनेक--4>-थ-य, अर्धमागधी की विशेषता। १०-१. जानन्त-शतृ प्रत्यय पर्तमान० कृदंत । २. स्यकपरिणाम-द्वि० एक० पु०-अपने विचारों को। ११-१. उत्यते प्र० पु० एक. वर्तमान० २. पुद्गलफ्र्मफलमगतं-द्वि० एम० नपुं०-सांसारिक कर्मों के अनेक फलों को। १२~१. स्वयः-त० यह स्व-सर्वनाम । २, भावैः-४० वा. प० । - [६] १३--जीविपरिणामहेदु कम्मत्तं पुग्गला' परिणमा पुग्गल कम्मणिमित्तं तव जीवो वि परिणमदि ।।६।। १४-णवि कुत्र्यदि कम्मगुणे जीवो क्म्म तहव जीवगुणे यण्णोण णिमितेण दु परिणाम जाण दोरहं पि ||७|| १५-एदेण कारणेण टु कत्ता आटा सऐण भावेण पुग्गलक्म्मकदाण' ण दु कत्ता सव्वभावाणं || १६-गिन्छयणयस्स एव आदा अप्पाणमेव हि करेदि वेदयदि पुणो त चेव जाण अत्ता दु अत्ताण ||६|| १७–ववहारस्स दु श्रादा पुग्गलकम्म करेदि अणेय विहं तं चेव य वेदयदे पुगलफम्म अरणेय विहं ॥६०|| २८-जदि पुग्गलसम्ममिरएं कुचदि त चेव चेदयदि प्रादा दोकिरियावादिता२ पसजदि 13 सम्मं जिावमद ।।६।। २६-जह्मा' दु अत्तभावं च दोषि कुबति तेण टु मिन्छादिट्टी' दोफिरियावादिणो होति ॥२॥ १३-१. पुद्गला -प्र० पु. पु०, सासारिक वस्तुएँ । १४-१. कर्मगुणान्-द्वि०बहु०पु० २. जानीहि-ज्ञा-म०पु०एकटवर्तमान। १५-१. पुद्गलमत्ताना-५० बहु० पु०, सासारिक कृत्यों को करनेगले पु० २. सर्वभावाना-५० बहु० पु०, सब भावों (परिवर्तनो) का। १६-१. वेदयते /विद् प्र० पु० एक० वर्तमान०-जानता है। १८--१. द्वितियावादित्व-प्र०एव नपु०,विरोधी क्रिया को बताने का भाव । २.प्रसाति 1-प्र+/सृज-प्र० पु. एक. वर्तमान०-उत्पन करता है। १६-१. यस्मात्----रम >-म्ह घनिविपर्याय, प० एक • नपु०, यद् सर्व- २. मिय्यादृष्टयो 4. बहु. पु०, मिथ्या दृष्टि का। द्विक्रियावादिनो-प्र. बहु० पु०, विरोधी विचारवाले। नाम। ३.

२२-- [ ६०] २०-पोग्गलकम्मरिणमित्तं जह श्रादा कुरणदिर अप्पणो भावं पोग्गलकम्मणिमित्त तह वेदेदि अप्पणो भावं ॥३॥ २१--मिच्छत्तं पुण दुविहं जीवमजीवं तहेव अएगाणं अविरदि जोगो मोहो कोधादीया इमे' मावा ॥४॥ -पोग्गलकम्म मिच्छ जोगो अविरदि अण्णाणमजीवं उपभोगो' श्रएणाण अविरदि मिच्छत जीवो दु ॥६॥ २३-उवओगस्स अाइ' परिणामा तिएणमोहजुत्तस्स मिन्छत्तं अण्णाणं अविरदि भावो या णादव्यो ॥६६।। २४--एदेसु य उवयोगो तिविहो' सुद्धो णिरंजणो भावो जं सो करेदि भाव उवयोगो तस्स सो कत्ता || २५--जं कुरणदि भावमादा कत्ता सो होदि तस्स भावस्स कम्मत्तं परिणामदे तह्मि सयं पोग्गलं दध्वं ॥८॥ २६-परमप्पाण फुयदि अप्पारणं पि य परं करंतो सो अएणाणमओ जीवो कमाणं' कारगोर होदि ॥६॥ २७-परमप्पारणामकुची अप्पाणं पि य परं अकुन्वतो' सोणाणमयो जीवो क्माणमकारगो होदि ॥१००|| २०-१. पुद्गलकर्म निमि-सामारिफ फर्म की सहायता से । २. करोति- प्र. पु.एक • वर्तमान। २१-१. इम-प्र० ब० पु० । २. भावा-प्र० ब० पु०॥ २२-१. उपयोग.-निरतर योध। २३ -१.थनादय. .-पंचमी एक. पु०- अनादि समय से। २. ज्ञातव्य- तव्यान्त प्रत्यय, भविष्यकालिक कृदन्त । २४-१. विविध –तीन विधियों-( मिप्पा विश्वास, मिथ्या शान और मिथ्या वर्म)। २६-धर्मणा-१० बहु• नपु० । २. पारस करने वाला - >-ग,-य अर्धमागधी की विशेषता। २७-१. अकुर्वन् - वर्तमानकालिप कृदन्त-न करते हुए । २. कर्मणाय- कारयो-पाम पो न करनेवाला।

"
च तथैव
[ ६१ ।
संस्कृत-छाया
२-यावन्न वेचि
विशेषांतरं त्वात्मस्रवयोयोरपि
अज्ञानी तावत्स क्रोधादिपु वर्त्तते जीवः ।।
२-क्रोधादिपु वर्तमानस्य तस्य कर्मणः संचयो भवति
जीवत्यैयं बंधो भणित: खलु सर्व दर्शिभिः ।।
३--यदानेन जीवनात्मनः प्रास्रवाणां
ज्ञातं भवति विशेषांतरं तु तदा न बंधस्तस्य ।।
४--ज्ञात्वा यास्रयाणामशुचित्वं च विपरीत भावं च
दुःखस्य कारणनीति च ततो निवृत्तिं करोति जीचः ।।
५--श्रहमेकः खलु शुद्धश्च निर्ममतः ज्ञानदर्शन समप्र.
वस्मिन् स्थितस्तचित्तः सर्वानेतान् क्षयं नयामि ।।
६-जीवनिबद्धा एते अध्रुवा अनित्यास्तथा अशरणाश्च
दुःसानि दुःसफलानि च ज्ञात्वा निवर्तते तेपु (विपयेषु) ।
-कर्मणश्च परिणामं नो कर्मणाश्च तथैव परिणाम
न करोत्येनमात्मा यो जानाति स भवति ज्ञानी ॥
-फर्ता प्रात्मा मणित: ण च केन स उपायेन
धर्मादीन् परिणामान यो जानाति स भवति ज्ञानी ।
-नापि परिणमति न गृह्णत्युत्पद्यते न पदव्यपर्याये
ज्ञानी जाननापि सेनु पुद्गलकर्मानेकविधम् ।।
१०-नापि परिणमति न गृह णमुत्पद्यते न पदव्यपर्याये
ज्ञानी जाननपि सलुस्यकपरिणाममनेकविधम् ।।
+११-नापि परिणमति न गृह णात्युपद्यते न पदव्यपर्याये
मानी जाननपि संलुपुद्गलकर्म पलमनंतम् ॥

[]
१२-नापि परिणमति न गृह्णात्युत्पद्यते न परद्रव्यपयायेण
पुद्गल द्रव्यमपि तथा परिणमति स्वकै वैः॥
१३-जीवपरिणामहेतु कर्मत्व
पुद्गला. परिणमन्ति
पुद्गलकर्मनिमित्तं तथैव जीवोऽपि परिणमति ।।
१४-नापि करोति क्मगुणान् जीव. कर्म तथैव जीवगुणान्
अन्योन्य निमित्तन तु परिणामं जीनीहि द्वयोरपि ।
१५-एतेन कारणेन तु कर्ता आत्मा स्वकेन भावेन
पुद्गलकर्मकृतानां न तु कर्ता सर्वभावानाम् ।।
१६-निश्चय
नयस्यैवमात्मानमेव हि करोति
वेदयते पुनरतं चैव जानीहि आत्मा त्वात्मानम् ।।
१५-व्यवहारस्य त्वात्मा पुद्गलकर्म करोति नैकविधम्
तच्चैव पुनर्वेदयते पुद्गलकर्म नैक विधम् ।।
१८-यदि पुद्गलकर्मेदं करोति तच्चैव वेदयते श्रात्मा
द्विक्रिया वादित्त्व प्रखजति सम्यक् जिनावमतम् ॥
१६-यस्मात्यात्मभावं पुद्गलभावं च द्वायपि कुर्वति
तेन तु मिध्या दृष्टयो द्विक्रियावादिनों भवन्ति ।।
२०-पुद्गलकर्म निमित्तं यथात्मा करोति श्रात्मनः भावम्
पुद्गलकर्म निमित्त तथा वेदयति श्रात्मनो भावम् ।।
२१-मिथ्यात्वं पुनद्विविधं जीयोऽजीवस्तथैव ज्ञानम्
अविरतियोगो मोहं क्रोधाद्या इमे भाषाः ।।
२२-पुद्गलकर्म मिथ्यात्वं योगोऽपिरति जानमजीवः
उपयोगोऽज्ञानमविरति मिथ्यात्वं प जीवस्तु ॥
२३-उपयोगस्यानादयः
परिणामात्रयो मोहयुक्तम्य
मिथ्यात्वमजानमविरति मावश्चेति
मातव्यः।।

भवति ॥ च २४-एतेषु चोपयोगसिविधः शुद्धो निरंजनोभावः यं स करोति भावमुपयोगस्तस्य स कर्ता॥ २५-यं करोति भावभावमा कर्ता स भवति तस्य भावस्य कर्मत्वं परिणमते तस्मिन् स्वयं पुद्गल द्रव्यम् ।। २६-परमात्मनं दुर्वन्नात्मानमपि च पर कुर्वन् स: अज्ञानमयो जीवः कर्मणां कारको २५-परमात्मानमर्वनात्मानमपि परम कुर्वन् स जानमयो जोवः कर्मणामकारको भवति ।। उद्धरण सं०-१५ मागधी (शाकारी) मृच्छकटिक शकार (सहपम) मशेग' तिम्खाविलफेरण भत्ते शाफेण शूपेण शमच्छोण भुत्तमए अत्तण अश्श गेंह शालिश फूलेण गुलोदणेण ।। (कर्ण दत्त्या) भिएण केशरमहरणाप चाण्डाल याआए' लराजोए । जधाश्र एशे उरकालिदे यमडिण्डिमश पेडहाणं श्र शुणीअदि राधा समि दलिहचालुदत्ताके यग्भट्टाणं गीअदिति । ता पेरिस- शं । शत्तु विणाशे गाम महन्ते हलप.श्श पलिदोशे होदि । शुद्ध श्रमा 4 १. गारोन-तृतीपा० एप० म०। २. भारत:-प्रयमा० एच० पु०- म>श, य:>.ए. मागधी मापन पी मुख्य विशेषताएँ हैं। ३. याचायाः अपन म० एए. बी०। ४. सरम रोगः। ५. भरते-/U. प्रथम पु. एक, पर्नभान यमान। ६. यसरपानं-दितीया• एप. न । 10. प्रेरियान-+- उन पु० एप. भारता.दयर- पसो. एप...

[ ६४ ] जे वि किल शत्तु वावादअन्त' पेक्सदि२ तश्श अण्णश्शिं जमन्तले 'अक्खिलोगे ण होदि । मए क्खु विशगण्ठिगन्मपविश्टेण वित्र कीड- एण किं पि अन्तलं मग्गमारणेण उत्पाडिदे ताह दलिद्द-चालुदत्ताह विणाशे। शम्पदं अत्तण केलिकाए पाशाद वालग्ग-पदोलिकाए अहि लुहिअ अत्तणो पलकमं५ पेक्सामि । (तथा कृत्या दृष्ट्वा च)। ही ही एदाह दलिद्दचालुदत्ताह वझ णीप्रमाणाह एशे वड्ढे जणशम्मद्दे। जं वेलं अम्हालिशे पवले वलमणुश्शे वझ रणीअदि त वेलं कीदिशं भवे । (निरीक्ष्य ) कधं एशे शे रणववलइके विय मण्डिदे दस्सिणं दिशं रणीअदि । अध कि णिमित्तं ममकेलिकाए पाशादबालग्गपदोलि- काए शमीचे घोशणा रिणवडिदा रिणवालिदा श्र। (विलोक्य ) कधं थावलके, चेडे वि गास्थि इध । मा णाम तेरण इदो गदुध मन्तभेदे कडे १० भविश्शदि । ता जाव णं अएणेशामि ।। चेट: (टप्ट्या)-भश्टालका, एशे शे श्रागडे । चाण्डालो-योशलध देध मागं दालं ढकेध होध तुण्हीया अविण अतिक्स विशाणे दुवइल्ले इदो एदि । ४ १. व्यापाद्यमानं–व्या+ /पादय- वर्तमानकालिक कृदन्त, मारे जाते हुए। २. प्रेक्ष्यति-प्र० पु० एक० वर्तमान० । ३. थक्षिरोग:-प्र० एक. नपु० पु० । ४. उत्पादित:-उत् +पादयः क्त-प्रत्यय भूत० कृदन्त । ५. पराक्रम-र-> -ल द्वि० एक० पु० । ६. नीयमानस्य-५० एक. नपुं०। ७. भवेत्-/ प्र० पु. एक पर्तमान०1८. निपतिता- नि+/पत् भूत० कृदन्त स्त्री०६. क्य-श्रव्यय । १०. कृतो- प्रत्यय, भूतवालिक दन्त । ११. अन्वेषयामि-अनु+/३५ -सोजना, उत्तम. पु. एक० भरिप्य० । १२. श्रागत्-क प्रत्यय, यर्तमान० कृदन्त । १३. मार्गदार-द्वितीया० एक. नपुं० । १४. तुप्णीका:-० ब९० पु० त्प्णीम्, मौन।

[ ६५ ]
शकार:-अले अले, अन्तलं अन्तलं देध । (उपसृत्य)। पुश्थका
सवलका' चेडा, एहि गच्छम्ह ।।
चेट:-ही भणज्ज, वशन्तशेणिनं मालिअ ण पलितुश्टेशि। शम्पदं
रणइजणकप्पपादयं अज चालुदत्त मालइदुवपशिदेशि ।।
शकार:-ण हि लअणकुम्भशलिशे हग्गे इश्थिग्रं वावादेमि ।
सर्वे-ग्रहो, तुए मारिदा, ण अन्न चारुदत्तरेण ।
शकार:-के एवं भणादि ।
सर्वे-(चेटमुद्दिश्य)-रणं एसो साहू ।
शकार:-(अपवार्यसमयम् )-अविदमादिके ।५ कधं यावलके चेडे
शुश्छु ण म शञ्जदे । एशे क्खु मम अकन्नरश शम्सी । (विचिन्त्य)।
एव्य दाय कलइश्श । (प्रकाशम् ) अलिअं भश्टालका हो एशे चेडे
शुवरण चोलिपाए मए गहिदे, पिश्टिदे, मालिदे, बद्धे श्रता
किदवेले पशेज भणादि कि शव्वं शच्चं । (अपवारितकेन चेटस्य कटकं
प्रचन्चति ) म्वरेकम् पुश्थका थावलका चेडा, एढं गेरिहश्र एणधा'
भणाहि ।
• चेटः । गृहीत्वा )-पेपराध पेस्पध भश्टालका : हो, शुवएण्ण मं
पलोभेदि ।
शकारः (क्टकमान्छिद्य)-शे शे शुवएणके जरश काल
णादो• मए यः । "(सक्रोधम्)। होचाण्डाला, मए वसु एशे
१. पुरक रयापरफ-सम्बोधन । २. गच्छाय:- मध्यम पु० ब० वर्त.
मानः । ३. परितुष्टोमि-परि+/नुप-मध्यम० पु. एफ. वर्तमान |
यामितोसि-/ पहना, मध्यम पु० एफ. वर्तमान०। ५. विषाद.
खूनप-अध्यन
६. करिष्यामि--/-उत्तम पु. एक. मषिप्य ।
८. भण-मध्यन पु० एक. वर्तमान प्रामाः ।
"१. पस्प-10 एक. पु०। १०. धारणात्-पंचनी एक. पु०॥ ११.
मरा-मथ म. पु. एप. पु. । १२. सन्मानपूर्ण मबोधनपूचक मप।
७.धन्यथा-व्ययप।

! ६६ ] शुवएणभण्डाले णिउत्ते शुवरणं पोलअन्ते मालिदे, पिश्टिदे ता जदिए पत्तियायव ता पिस्टिं दाव पेक्खध । चाण्डाली (दृष्ट्वा ) शोहरणं भरणादि । विद्वत्ते२ चेडे किं प्पडवदि। चेट:-ही मादिके इंदिशे दाशभावे जं शचं कपि रण 4 अदि । (करुणम् )-अन्न चालुदत्त, पत्तिके मे विहवे । (इति पादयोः पा संस्कृत-छाया श०-मांसेन तिक्ताम्लेन (भक्तमोदनः ) शाकेन सूपेन समस्यफेन मुफ्त मयात्मनो गेहे शाले फूलेण गुडीदनेन । चांडलवाचाया: स्वर- संयोगः । यथा चैप उर कालिदे ( उद्गीतो) वध्यडिण्डिम शब पट- हानां व श्रयते तथा तयामि दरिद्र चारुदत्तको ययस्थानं नीयत इति । तत्पेक्षिपये शन विनाशो नाम महान् हृदयस्य परिनोपो भवति । श्रुतं च मया योपि किल शत्रु व्यापाद्यमान पश्यति । तस्यान्यरिमडः न्मान्तरे निरोगो न भवति । मया गनु विपपन्थि, गर्भप्रविष्टेनेव फोटकेन फिमध्यन्नरं मार्ग माणेनोत्पादितः तस्य दरिद्र धामदत्तस्य विनाशः । (माम्नतम)।आत्मीयायाम् । प्रासादयालाग्र प्रतालिकायामधिल यात्मनः पराममं पश्यामि । हो वितः । एतत्तग्य दद्धि पारुदत्तम्य यथं नीयमानम्येष वृद्धो। जनममदः येतं यस्यां पलायामरमाइश: प्रयरो परमानुपी पध्यं नीयते तस्यां येलायां कीदृशं भवेत् । यो म १.पिदिनमाहित/feप-पीटना, प्रत्यय, यां २. गि:-fr+-/प, नपा द्या, विशेषण ! ..मगी गरम होना, अपम पु.एक. पमान | Y.मि+ प्रपम पु. एर. पर्तमान। --

.
[ ६७ ]
नपरली इस मण्डिनो दक्षिणा दिश नीयते । अथ कि निमित्त
मढीयाया प्रासाद बालाप्रप्रतोलिझाया समीपे घोपमा निपतिता
निवारिता च।
कथ स्थायरक चेटोपि नाम्तीट। मा नाम तेनेतो गत्वा मन्त्रभेट
तो भविष्यति । तयारटेनमन्येपयामि ।
चे-मट्टारसा , प स श्रागत ।
चाण्डा०-'प्रपसरत ददत मार्ग द्वार पिन्धत भरत तुष्णीश
अविनयतीच्ण विपाणो पुष्टरलाई इत पति ।
श.--अरे अरे, 'अन्तरमन्तरं ददत । पुनर स्थापग्क चेट, पहि
गन्छाच ।
०--ही अनार्य, वसन्तमेनिस मारयित्वा न परितुप्टोमि ।
माग्रत प्रणयिजनकपपाटपमार्यचास्तदत्त मारचितु व्ययमितोसि ।
श-नहि रत्नकुम्मसहशोह स्त्रिय व्यापादयामि ।
मा-अहो, त्यया मागिता । नार्यचामत्तेन ।
श०-फण्यं भरगति।
संय-नन्धुप साधु ।
श:-अनिटमाहिये क्य ग्यावरण चेट मुष्ट न मा सयन ।
पप गनु ममापार्यस्य माती। बनायत्तरिष्यामि । अन्नीर मिया ।
भट्टारमा ।हो प्राो। एप पेट मुवर्ग चोरिया | मया गाडीवस्ताटितो
मारिती परम । नायर यानि किमयं मत्यम । वेग्म ।
पुरक म्यापरए पेट, गृहीन्यान्यया मण।
पेट-पश्यन महारषा पदो, मुयन मा प्रलोभपति ।
श.-नुपरगर यर पारणाय मया यो पारटाला,
मया गयप मुपएंमारदार निपुर मुपग पोग्यन्मारिननादि।
रादिप्रत्ययस्य सया पृष्ट सापसरप।।
गोमा भणीदिनरपेट नि प्रावि।
.

। ६६ ] शुधएणभण्डाले णिउत्ते शुवएणं चोलअन्ते मालिदे, पिश्टिदे। ता जदि रण पत्तिायध ता पिटि दाव पेक्खध । चाण्डालो ( दृष्ट्वा ) शोहणं भणदि । विडत्ते चेडे किं ण पडवदि । चेट:-ही मादिके इंदिशे दाशभावे जं शचं कपि ण पत्तिा- अदि । (करुणम् )-अज चालुदत्त, एतिके मे विहवे । (इति पादयोः पतति)। । संस्कृत-छाया श०-मांसेन तिक्ताम्लेन (भक्तमोदन: ) शाकेन सूपेन समत्स्यकेन मुक्त मयात्मनो गेहे शाले कूलेण गुडौदनेन । चांडलवाचायाः स्वर- संयोगः । यथा चैप उर कालिदे ( उद्गीतो) यध्यष्डिण्डिम शब्द पट- हानां व भूयते तथा तर्कयामि दरिद्र चारुदत्तको घध्यस्थानं नीयत इति । तत्प्रेक्षिष्ये शत्रु विनाशो नाम महान् हृदयस्य परितोपो भवति । श्रुतं च मया योपि किल शत्रु व्यापाद्यमानं पश्यति । तस्यान्यस्मिः न्मान्तरे क्षिरोगो न भवति । मया खलु विपप्रन्थि. गर्भप्रविष्टेनेव कीटकेन किमध्यन्तरं मार्ग माणेनोत्पादितः तस्य दरिद्र चारुदत्तस्य विनाशः । (साम्प्रतम ) आत्मीयायाम् । प्रासादवालाम प्रतोलिकायामधिरु ह्यात्मनः पराक्रमं पश्यामि । ही वित। एततस्य दरिद्र चारुदत्तस्य वधं नीयमानस्यैप वृद्धो । जनसंमर्दः । जेवेलं यस्यां चलायामरमादृशः प्रवरो वरमानुपो वध्यं नीयते तस्यां वेलायां कीदृशं भवेत् । कथमेप स १. पिहिता-सं-ताडित:- पिट्य-पीटना, क प्रत्यय, वर्तमान० कृदन्त ! २. नितम:-पि+/तम्, तपा हुआ, विशेषण । ३. प्रतपति-प्रतिपू गरम होना, प्रथम पु० एक० वर्तमानः । ४. किम् + श्रपि । ५. प्रत्याप्ते-- प्रथम पु० एक. यर्तमानः ।

[ ६७ ]
नरवलीपर्द इस मण्डितो दक्षिणा दिश नीयते । श्रथ कि निमित्त
'मदीयाया प्रासाद वालाग्रप्रतोलिकाया समीये घोषणा निपतिता
निवारिता च ।
क्थ स्थायरक चेटोपि नाम्तीह। मा नाम तेनेतो गत्वा मन्त्रभेद
कृतो भविप्यति । तयारटेनमन्वेपयामि ।
चे०-महारका , एप स ागत ।
चाण्डा०-'प्रपसरत दढत मार्ग द्वार पिदधत भवत तुप्णीमा.
अविनयतीपण विपाणो पुष्टरलोच इत गति ।
श.--अरे अरे, 'अन्तरमन्तरं ददत । पुरक स्थावरक चेट, पहि
गच्छा।
०--ही अनार्य, वसन्तमेनिका मारयित्वा न परितुष्टोसि ।
माग्रत प्रणयिजनकल्पपादपमार्यचारुदत्त मारचित अयसितोसि ।
रा-नहि रत्नकुम्भसदृशोह स्त्रिय व्यापादयामि ।
मर्च-अहो, त्वया मारिता । नार्यचामत्तेन ।
श-क एवं भगति।
।
.
मर्व-नन्येप साधु ।
।
श:-अपिदमादिये पय म्याररक चेट मुलु न मया मयत ।
पप बनु गगापार्यस्य मानी। ण्व तायररिष्यामि । 'प्रलीस मिथ्या ।
महारया । दोधाो। गप पेट मुवर्णयोरिफाया । मया गृहीतम्नाटितो
मारितो पखरच । सहायर यद्भगति मियं मत्यम। स्रम ।
पुत्रफ स्थायरस चेट, सद्गृहीन्यान्यया भण।
पेट-परया महारणा अहो, मुपर्णेन मा प्रलोभयनि ।
श.-मुयार या कारणाय मया पर पारदाना,
गया गल्येप मुराणमा तारे नियुषतः मुपगं योग्यन्मारिनम्नादिन ।
सादिप्रययध्य गया पृष्ट सापपरया।
पारटागोमा मणी पिगनरपेट हिन मनपति।

[ ६८ ]
चेटही मादिके सेदे ईदृशो दासभावो यत्सत्यकमपि न प्रनगा.
प्यते । आर्य चारुदत्त, एतावान्मे विभव ।
।
उद्धरण सं०-१६
मागधी
अभिज्ञान शाकुन्तलम्
-
(अङ्कावतार:)-
रक्षिणी (पुरुप ताडयित्या )-अले कुम्भिलया।' कधेहि र कहि
तुए एशे महामणिभाशुले उक्किएणणामाक्सले लाअकीए अङ्ग लीअए
शमाशादिदे।
पुस्प (भीतिनाटितन)-पशीदन्तु पशीदन्तु मे भावमिश्शे ।
ण हागे ईदिशश्श अकजश्शकालके।
एक --किएणु क्तु शोहणे वझरणे शित्ति कदुध लज्जादे परि-
गगह दिएणे।
पुरप --शुगुध दाय, हग्गे क्खु शम्मावदालगाशी धीवले ।
द्वितीय:--अले पाश्रच्चले ।' किं तुमं श्रहोहिं वशदि जादि च
पुन्छीप्रशि।"
१. यरे दुभिलक-संबोधन । २. कथय-/फथय करना मध्यम पु०
एक. यामा। ३. त्यया-मध्यम पु० एक. पु०, युष्मद सर्वनाम |
उत्तीर्णनामातरम्--द्वितीया. एक. नपुं । ५. समासादितम् समा+!
/सादय प्राप्त परना त प्रत्यय, भूत• कृदन्त । ६. प्रसीदन्नु प्रसीदन्तु प्र+
सिद्-प्रसन्न होना मध्यम पु० यह विधि०। ७. ग्रह-उत्तम पु० एक. पु०,
अस्मद् सनिाम 1८. सि./अस होना-म• पु० ए० वर्शमान० 18. पाटघर,
संबोधन, गोर। १० अरमाभि-पु० तृतीया या० पु०, अरमद् सर्वनाम ।
११. न्य-~/ पृछना मध्यम पु० बर.. यर्तमान० पगाच्या

[ ६६ ] नागरक श्याल --सूत्रअ । कधेदु सव्व अणुक्मेण, मा अन्तरा पडिबन्धेन।' उभोज आयुत्ते आणटि २ लवेहि ले। धीव-शो हागे जाल वलिश पहुदिहिं मच्छबन्धणो वापहि कुडुम्वभलण क्लेमि। 'नाग० (निहस्य)-विमुद्धो दाणिं से आजीवो। वीव०--भट्टके । मा एव भरण । शहजे क्लि जे पिणिन्दिदे ण हुशे कम्म विरजणीअए" पशु मालणकम्मदालुणे अणुक्म्पामिदु केवि शोत्तिए ॥ नाग० --तदो तदो। धोव०--करिश' • दि अशे मए लोहिदमच्छके पाविदे' तदो सण्डशो कप्पिदे।२ । जाव तश्श उद्दलभ्भन्तले पेक्सामि दाब एशे महालअणमाशुले अङ्ग लीअए पेक्सिदे,१३ पन्चा ध विक्अत्य दश- अन्ते।४ जेव गहिदे भावमिश्शेहि । पत्तिके दाव एदश्श आगमे । अध म मालेध कुधवा। नाग० ( अङ्गु रीयकमाघ्राय )—जालुअ । मन्छो उदलमन्तलग- . १ प्रतिवधान-प्रति+/वाध रोकना मध्यम पु० बहु० याज्ञा० । २ अाज्ञापयति अ+/ज्ञपय-आदेश देना, प्रयस० पु० एक. वर्तमान प्रेरणा० ३ लप लप कहना मध्यम पु० एक० वर्तमान । ४ उपायें तृतीया. एक० पु०। ५ क्रामि उत्तम पु०एक०, वर्तमान । ६ इदानीम् ७ पिपर्ननीय पि + / वन्य परित्याग करना-वृदत । ८ कोऽपि कोइ । ६. श्रोत्रिय प्र० एक. पुलिंग । १०. एकस्मिन सप्तमी एक. सरया०॥ ११ प्राप्त भूत. कृदन्त । १२. कल्प्ति /क्प काटना जान-प्रत्यय भूत कृदन्न । १३ प्रेक्षित क्त प्रत्यय भून० कृदत । १४. दर्शयन् दर्शा दिवा, वर्नमान० वृदत । व्यय .

[७]
दोतिथि सन्देहो, जदो अयं आमिसगन्धो वाादि । आगमो दाणि
एदस्स एसो विमरिसिदव्यो' ता एध लाउलंब्जेव गच्छर।
रक्षिणी (धीवरं प्रति)-
गच्छ ले गण्डिच्छेदन ! गच्छ । (इति परिक्रामन्ति )।
नाग०-सूअश्र! इध गोउनदयाले अाप मत्ता पडिपालेव मं,
जाव लाअउलं पवेसिग्रंणिकमामि ।
उभी०-पविशदु प्रावुत्ते शामिप्पशादत्यं । ( नाग०-परिक्रम्य
निप्कान्तः)।
मूच०-जालुअ ! चिलाश्रदिप क्धु श्रावुत्ते ।
जालु०-णं अवशलोवशप्पणीया राप्राणो होन्ति ।
सूच०-फुल्लन्ति मे अगहत्था इमं गण्ठिच्छेदमंचावादिदु।
धीव-गालिहदि भावे अथालएमालके भविदु।
जालु (विलोम्य)-शे थहमारणं इश्शले पत्ते गेलिय लाप्रशाशएं
श्राअच्छदि । शम्पदं एशे शउलाणं मुहं पेस्खन, श्रहवा गिद्धशि-
श्रालणं बली हो ।
नाग०--(प्रविश्य)-सिग्घं सिग्धं गदं ।
धीव To-हा हदोमि । ( इति विपादं नाटयति)।
१. विमव्य:-वि+/श- विचारना, भविष्यवालिक कृदंत ।
२. माम् वि० एक०-५०, अस्मद् सर्वनाम ३. निप्पमामि नि+/कम्-
उत्तम पु० एक. वर्तमान । ४. देशीशब्द-भगिनीपति (बीई)।
५. चिरसी / चिरम् विलम्ब करना, प्रथम पु० एफ. वर्तम्पन०, शौरसेनी.
चिरदि । ६. स्फुरतः स्फुर-फरफ्ना प्रथम पु. वह वर्तमान० संस्कृत
द्विाचन कप का प्राकृत
राश प्रयोग होता है।
७. अनि-यह-अम्ट, विशेषण 1 ८. स्वालाना-ठी ब. पु.
अपने वंश वालों।।
म वह

नाग०--
[ ७१ ]
-मुञ्चध जालोवजीविणं । उववरणे से अङ्ग लिअस्स आगमे
"अहमशामिणा जाव कधिदं।
सूचः-जहा भारस्वेदि भावुत्ते । जमवशदि गदुध पडिणिउत्ते।
क्खु एशे।
(इति धीवरं बन्धनान्मोचयति ) ।
धीव-भट्टके ! शम्पदं तुह केलके२ मे जोविदे। ( इति पादयोः
यति)।
नागः-उठेहि, एसे भट्टिणा अगुलीअमुल्लसम्मिदे,पारिदोसिए
दे पसादीकिदे, तो गेम एदं।
(इति धीवराय करकं ददाति)।
धीव० ( सहर्प सप्रणामश्च प्रतिगृह्य )-अगुग्गहीदोसि ।।
जालु-शे क्खु रगणा तधा अगुग्गहीदे, जथा शुलादो ओदा-
लिअ हत्थिक्खन्धे शमालोविदे ।
सूच०-श्रावुत्ते ! पालितोशिएण जाणामि महालिहलदणे अङ्ग ली-
श्रएण शामिणो बहुमदेण होदव्यं ।'
नाग०- तस्सिं भट्टिणो महालिहलदणं त्ति कदुश्य परिदोसो।
एत्ति उण तक्कैमि।
उभौ०-कि उण।
नाग-तरस दसणेरण भट्टिण कोवि अहिमदो जनो सुमरिरोत्ति
जदो मुहत्तग्रं पइदि गम्भीरोवि पज्जुस्सुअमणा प्रासी।
१.प्रतिनिवृत्तः-प्रति+नि- /वृत्-पीछे लौटना- प्रत्यय-वर्तमान कृदन्त ।
२. फेरक:-कीतिक संवन्धमूनक विशेषण । ३, अनुग्रहीतोऽस्मि-यस्मि>
अहि- श्रस उत्तम पु० एक. वर्तमान 1 ४. राज्ञा–४० एक० पु० । ५.
अवतार्य-(श्रयतारित )-उतारा हुअा- विशेषण । ६. भवितव्यम्-
a/भू-होना-भविष्य० कृदन्त । ७. अभिमता--इष्ट (यांछित), विशेपए।
८. प्रकृति-प्र. एक स्त्री।

पश्यति । [ ७२ ] सूच०-दोसिदे शोहदे पदाणि भट्टा आयुत्तण । जालु०--ण भणेमि इमश्श मन्छशत्तुणो किदे। (इति धीवरमसूयया जालु०-धीवल । महत्तले शम्पदं ब्रह्माण पिअवअशके शवुत्तशि कादम्बती शक्खिके क्खु पठम शोहिदे। इच्छीअदि । २ता पहि, शुण्डि श्रालयं ज्जेव गच्छा। (इति निष्क्रान्ता सर्वे)। संस्कृत छाया एक- रक्षिणी-अरे कुम्भिलक । कथय कुन त्वया एतन्महामणिभासुर- मुत्कीर्णनामाक्षर राजकीयमडगुरीयकं समासादितम् । पुरुष -~-प्रसीदन्तु प्रसीदन्तु मे भाव मिला । नाहमीदशस्य अकार्य- स्य कारक। -किन्नु खलु शोभनो ब्राह्मणोऽसीति कृत्या राज्ञा ते परि- गृहो दत्त । पुरुष-शृणुत, तावत्, अह सलु शकावतारवासी धीवर । द्वि०- अरे पाटच्चर, कि त्वमस्माभिर्वसांत जातिञ्च पृच्छयसे। नाग०~-सूचक, कथयतु सर्वमनुक्रमेण, मा अन्तरा प्रतिबधान। उभी-यदावुत्त प्राज्ञापयति, लप रे। धोव--सोऽह जाल वडिशप्रभृतिभिर्मत्स्यवन्धनोपायै फुटुम्बभरण करोमि। १. सौहृदम् द्वि० एक० पु०-मित्रता । २. इष्यते /इय-इच्छा करना प्रथम पु० एक. वर्तमान० कर्मवाच्य । ३ एहि-~ग्रा+ इ थाना-मध्यम पु. एक. थाज्ञा० ४. गच्छाम /गम् उ० पु० यदु, वर्तमान ।

. [ ७३ ] नाग०-विशुद्ध इदानीमस्य आजीवकः । धीव०-भाः । मा एवं भण- सहजं किल यद्विनिन्दितं न तु तत् कर्म विवर्जनीयकम् पशुमारण-कर्मदारुण: अंनुकम्पामृदुकोऽपि श्रोत्रियः ।। नागल-ततस्ततः। धीव०-एकस्मिन् दिवसे मया रोहितमत्स्यक: प्राप्तः ततः पण्डशः कल्पितः । यावत् तस्य उदराभ्यन्तरे प्रेक्ष, तावदेतन्महारत्नभासुरम् अडगु- रीयकं प्रेक्षितम, पश्चादिह विक्रयार्थ दर्शयन्नव गृहीतो भावमित्रैः । एतावान तावदेतस्य आगमः । अथ मां मारयत कुट्टयत वा। नाग.-जालुक! मत्स्योदराभ्यन्तरगतमिति नास्ति सन्देहः, यतः श्रयमामिप गन्य। वाति । बागम इदानीमेयस्यैप विमळव्यः, तदेत राजकुलमेव गच्छामः। रक्षिणी--च्छ रे प्रन्थिच्छेदक ! गच्छ । नाग- सूचक ! इहगोपुरद्वारे अप्रमत्तो प्रतिपालयत माम्, यावत् राजकुलं प्रविश्य निष्क्रमामि । उभौ-प्रविशतु आवुत्तः स्वामिप्रासादार्थम् । मूच०-जालुक ! चिरयति खल्यावुत्तः । जालु०-ननु अवसरोपसर्पणीया राजानो भवन्ति । सूच०-फुरतो में श्रप्रहस्तो इमं प्रन्थिच्छेदकं व्यापादयितुम् । धोव०-नाईति भावः अकारणमारको भवितुम् । जालु०-एप: अस्माकमीश्वरः । पन्न गृहीत्वा राजशासनमागच्छति साम्प्रतमेप स्वकुल्याना मुखं प्रेक्षताम्, अथवा गृद्वशृगालानां बलिर्भवतु। नाग०--शीघ्र शीघ्रमेतम् ।

- [७४ ] धीव०-हा हतोस्मि। नाग०-मुञ्चत जालोपजीविनम् । उत्पन्न अस्य अड्गुलीयकस्य आगम अस्मत्स्यामिना यावत् कथितम् । सूत्र०-यथा श्राज्ञायपति श्रावुत्त । यमवसतिं गत्वा प्रतिनिवृत्त खल्वेप । धीव.-साम्प्रत तब क्रीतक मे जीवितम् । नाग०--उत्तिष्ठ, एतत् भर्ता अगुरीयमूल्यसम्मित पारितोपिकेन प्रसादीकृत, तत् गृहाए इदम् । धीव.-अनुगृहीतोऽस्मि जालु०-एप खलु राज्ञा तथा अनुग्रहीत , यथा शूलावताय॑ हस्ति- स्कन्धे समारोपित । सूच०-श्रावुत्त । परितोपिकेण जानामि महारत्नेन श्रङ्ग रीयकरण स्वामिनो बहुमतेन भवितव्यम् । नाग०,-न तस्मिन् भत्तु महार्हरत्नमिति कृत्वा परितोष । एतत् पुन- स्तर्कयामि उभो-किं पुन। नाग०-तस्य दर्शनेन भर्ता कोऽप्यभिमतो जन स्मृत इति, यतो मुहूर्त प्रकृति गम्भारोऽपि पय॑त्सुकमना श्रासीत् । सूच०-तोषित शोचितञ्चदानी भ" श्रावुत्तेन । जालु- -मनु भरणामि अस्य मत्स्यशनो कृते । धीव-भट्टारक । इत अर्ध युष्माकमपि सुरामूल्य भवतु । जालु.--धीवर । महत्तर साम्प्रतमरमाक प्रियवादस्य सवृत्तोऽसि । कादम्बरीसाक्षिक सलु प्रथम सौहदमिष्यते, तदेहि शौण्डिकालयमेव, 4 गच्छाम ।

उद्धरण सं०-१७ (मागधी-दकी) मृच्छकटिक - (द्वितीयोङ्क)-- (नेपथ्य)-श्रले भट्टा दश सुवएणाह' लुद्ध जूदकरु पपलीणु पपलीणु । ता गेह ण गेह ण चिट्ट चिट्ठ, दूलात् पदिट्टोसि। (प्रतिश्यापटीक्षण संभ्रान्तः)। संवाहक:-कश्टे एशे जूदिअलभाये । हीमाणहे. णववन्धरणमुकापुए वित्र गद्दहीए हा ताडिदोलि गट्टह ए अगलायमुपाए विश्र शत्तीए घुडुको विय घादि दोह्मि शत्तीए ॥ १॥ लेखवावडहि अयं शहियं दश्टूण मत्ति पब्भश्टे एरिह मग्गणिवडिदे कं गु हु शलणं पयजामि ॥२॥ ता जाव गदे शहिअजूदिला अण्णदो में अण्णेशन्ति ताव इदो विप्पडीवेहिं५ पादेहिं एवं शुएणदेउलं पविशिश्र देवी विश्शं । (यहुविधं नाट्यं कृत्वा तथा स्थित. । ततः प्रविशति माथुरो धतक्रश्च)। माथुर:-अले भट्टा दशमुवएगाह लद्ध जूदिकर पपलीणु पपलीगु । गेहाण गे हाण चिट्ट चिट दूलात् पदिहोमि । तकरः :- जइ वचसि पापालं इन्दं सलणं च सम्पदं जासि सहिभं यजिन एयरहो नि रस्मि तरइ ।। ३ ।। १. मुरर्णय प० एक पु० । २. प्रपलापिन- प्रपलायित:- भूत. दन्तः। ३. संवोधन। ४. थन्यिप्पा:-अनु+प्रपु. दि. वर्तमानः । ५. विपरीताम्मा-० दि० पु० । पादाम्यान-7 दि० पु० पर पहले परा ही जा चुगाई पि संरएत दि० प्रासामे यारो नाता है। १६. मजसि- मिज.म. पु. एफ. वर्तमान । ७. शानोति- शाम पु. पाः यतमाना [ ७६ ] माथुर.-कहिं कहिं सुसहिअविप्पलन्भया' पलासि ले भअपलि- वेविदगा। पदे पदे समविसमं सलन्तया कुलं जसं अइकसणं कलेन्ता ॥४॥ द्यूतकर - ( पदं वीक्ष्य ) एसो वजदि । इअं पणट्टा पदवी। माथुर -(आलोक्य, सवितर्कम् ) अले विप्पटीवु पादू । पडिमा- शुएणु देउलु। (विचिन्त्य ) धुत्तु जुद्विअरु विपदीवेहिं पादेहि देउलं पविठ्ठ। द्यूतकर.-ता अणुसरेम्ह । माथुर --एव्वं भोदु। (उभौ देवकुलप्रवेशं निरूपयत । दृष्ट्वा- न्योन्यं संज्ञाप्य )। द्यूतकर --कधं कट्ठमयी पडिमा । माथुर -अले ण हुण हुशेलप्पडिमा। ( इति बहुविध चालयति )। संज्ञाप्य च व्यं भोदु । एहि जूदं किलेम्ह । (बहुविधं द्यूतं क्रीडत.)। संवाहक (धूतेन्छाविकारसंवरणं वहुविधं कृत्वा )-(स्वगतम् अले-कत्ताशद्दे रिगएणणअश्श हत्लइ हडकं मणुश्शश्श ढ छाशद्देव्य णडाधिपश्शं पभट्टलज्जरश ॥५॥ जाणमि रण कीनिश्शं शुमेलुशिहलपडणशरिणहं जूर्य तह बिटु कोइलमहुले कत्ताशद्दे मणं हलदि५ ॥६॥ धूतकर -मम पाठे मम पाठे। १. मुसभिकविप्रलभर । २.कुर्वन्–वर्तमान• वृदन्त । ३. अनुसरावः- उत्तम पु० दि० वर्तमान | परन्तु सस्कृत रूप श्रनुसराम, होगा। क्योंकि प्राकृत द्वि० सस्थत यहु में बदल जाता है। ४. प्रप्रष्ट राज्यस्य-५० एफ. पु०। ५. हरति-/हप्र० पु. एक. वर्तमान ।

.
[ ७७ ]
मथुर:-रण हु' मम पाठे मम पाठे।
संवाहकः (अन्यतः सहसोप्सृत्य)--ण मम पाठे।
द्य तकरः-लद्धे गोहे ।
माथुरः ( गृहीत्वा)- अले पेटेण्डा गहीदोसि । पअच्छ' तं दश
सुबएणं ।
संवाहक:-अज दइश्शं।
मथुर:-अहुरणा पअच्छ।
संवाहक -- दहश्शं पशादं कलेहि ।
माथुर:-अले ए संपदं पप्रच्छ ।
संवाहकः ---शिलु५ पडदि । ( इति भूमी पतति । उभौ बहुविध
ताडयतः)।
माथुर:-एमु तुमं हु जूदिअस्मण्डलीए पद्धोसि ।
संवाहकः (उत्थाय सविपादम)-कधं जूदिअलमण्डलीए वद्धोम्हि ।
ही एही अम्हाणं जूदिअलाणं अलवणीए शामए । ता कुदो दइश्शं ।
माथुर:- अले गन्यु कुलु कुलु।
संवाहक:-एव्यं कलेमि । (घुतकरमुपस्पृश्य ) अद्ध ते देमि ।
द्यतकर:-एवं भोदु ।
अद्ध में मुञ्चदु।
१. पलु अव्यय । २. ग्रहीतोसि-गृहीत / ग्रह-यत प्रत्यप-वर्तमान० कृदन्त,
श्रमि- /श्रस् मध्यम पु० एक. वर्तमान० ३. प्रपन्छ-म० पु. एक.
श्रागा० । ४. दास्यामि /दा- उत्तम पु० एक० पर्तमान० ५. शिर:-प्र.
पु. एफ. पु. । ६. पतति / पत्-१० पु. एफ. वर्तमान
७. पतकरमण्डल्या-तृ० एक. पु० । ८. श्रल हनीय:-अनीयर प्रत्यय ।
4. गण्ड,- प्र. एफ. पु० । १०. कृत: मृत: भूत दन्त । ओ>
ससी की विशेषता है-

[ * ]
संवाहक:-(सभिकमुपसृत्य )-प्रद्धश्श गन्यु कलेमि । अद्धं पि मे
अजो मुञ्चटु ।
माथुर:--को दोसु' एवं भोदु ।
संवाहक: (प्रकाशम)-ग्रज अतुए मुक्के ।'
माथुर:-मुक्के।
संवाहतः (धु तकरं प्रति)-अत्ते तुए वि मुक्के ।
द्यतकर:-मुक्कै।
संवाहक:-सम्पई गमिश्शं।
माथुरः-पअच्छते दशमुवरणं । कहिं गच्छसि।
संवाहक-पेक्खध पेक्खध भश्टाला हा सम्पदं जेव्व एकाह श्रद्धे
गन्थु कडे । अवलाह अद्धे मुके । तहवि मं अवलं शम्पदं जेव्व मग्गइ ।
माथुर: (गृहीत्वा )-धुत्तु माथुरु' अहं पिउणु । एहिं ए अहं
धुत्ति जामि । ता पप्रच्छ तं पदण्डा सव्यं सुवरणं सम्पदं ।
संवाहक-कुदो दइश्शं।
माथुर:-पिदरं, विकिणि पअच्छ।
संवाहकः--कुदो मे पिदा।
माथुर:-मादरं विकिणि पच्छ ।
संवाहक-कुदो मे मादा।
माधुर-अपाणं विकिणि पप्रच्छ ।
१. दोपः-प्र० एक. पु०। २. मुक्तम्-क्त प्रत्यय, भूत० कृदन्त ।
३. प्रेक्ष्यध्वं प्रेक्ष्यध्वं-मध्यम पु० एक. वर्तमान ! ३. अपरस्य-प०
।एक० पु०। ५.धूर्तो माथुर: प्र० एक. पु०। ६. निपुण:-प्र० एक०
पु., श्रो>-उ ढक्की की मुख्य विशेषता है। यह परिवर्तन अपनश भाषाओं
व्यापक हो जाता है ।७. विक्रिय-वर्तमान कृदन्त ।।

[ ७६] वाहक-कलेध पशादं । ध म लाजमगं । माथुर-पशरु पशरु । संवाहक-एव्यं भोदु । ( परिक्रामति )-अजा किणिध में इमश्श शहिअश्श हत्यादो दशेहिं सुवएणकेहि । ( दृष्ट्या आकाशे ) किं भणाध । किं कलइस्ससि त्ति । गेहे दे कम्मकले हुविश्शं । कधं अदइन पडिवअण गदे । भोदु एव्वं । इमं अएण भणइश्शं । ( पुनस्तदेव- पठति ) कधं एशे विमं अवधोलोअप गदे । आः अज चालुदत्तश्श विहवे विहडिदे एशे यट्ठामि मन्दभाए । माथुरः--ण देहि। संवाहकः-कुदो दइश्शं । ( इति पतति ) माथुरः कर्पति । संवाहक-अजा पलित्ताअधन. संस्कृत-छाया अरे भट्टा दशसुवर्णस्य रुद्वः द्य तकरः प्रपलायितः प्रपलायितः । तत् हाण गृहाण तिष्ठ तिष्ठ । दूरात् प्रदृष्ठोसि। संवाहक:-कष्ट एव तकरभावः । हीमाणहे-- नववन्धनमुक्तयेव गर्दभ्या हा ताडितोस्मि गर्दभ्या अगराजमुक्तयेव शक्त्या घटोत्कच इव घातितोस्मि शस्त्या ॥१॥ लेखकळ्यातहृदयं समिकं दृष्ट्वा झटिति प्रभ्रष्ट: इदानी मार्गनिपतित: कं गु खलु शरणं प्रत्रजामि ॥२॥ २. प्रसर्य प्रसर्य-म० पु. ४ १. नयतं /नी म. पु० एक. वर्तमानः । एक. वर्तमान आशा० । ३. भणत--मध्यम पु० एफ. वर्तमान । --उत्तम पु० एक. भविष्य० । ५ अवधीर्य-वर्तमानकृदन्द । ६. याः-खेद-सूचक अव्यय । ७. परित्रायतध्वं--म० पु० एक. मान। भविष्यामि- [0] तत् यावत्एतौ समिकद्यतकरावम्यतो मामन्विष्यतः। तावदितो विपरीताभ्यां पादाभ्यामेतच्छून्यं देवकुलं प्रविश्य देवी भविष्यामि । माथुर:- अरे भट्टा दशसुवर्णस्य रुद्वो चूतकरः प्रपलायित: । गृहाण गृहाण तिष्ट विष्ठ । दूराप्रष्टोसि । द्यूतकर:-यदि व्रजसि पातालामिन्द्रं शरणं च सांप्रतं यासि सभिकं वर्जयित्वैकं रुद्रोपि न रक्षित तरइ (शक्नोति) ॥३॥ माथुरः-कुत्रं कुत्र ससभिकविविप्रलम्भक पलायसे रे भयपरिवेपिताङ्गक पदे पदे समविपमं खलन्ता रखलन् कुलं यशोतिकृष्ण कुर्वन् ॥४॥ द्यूतकर:-एव व्रजति । इयं प्रनष्टा पदवी । माथुर:-अरे विप्रतीपी पादौ । प्रतिमाशून्य देवकुलम् ! धूर्तो धूतकरो विप्रतीपपादाभ्यां देवकुलं प्रविष्टः। ध तकरः-ततोनुसरावः। माथुर:-एवं भवतु। -कथं कष्टमयी प्रतिमा । माथुर:-अरे न खलु शैलप्रतिमा एवं भवतु । एहि द्यूत क्रीडावः । संवा०–अरे-कर्त्ताशब्दो निर्माणकस्य हरति हृदयं मनुष्यस्य ढकाशब्द इव नराधिपस्य प्रभ्रष्टराज्यस्य ॥५॥ जानामि न कीडिप्यामि सुमेरुशिखर पतनसंनिभं द्यूतम् तथापि सलु कोकिलमधुरः कर्त्ताशब्दो मनोहरति ॥ ६॥ धू त०---मम पाठः मम पाठः। माथु० -नसलु मम पाठः मम पाठः। संवा०-ननु मम पाठः। त०-लन्धः गोहः (पुरुषः)। माथु०-अरे प्रेदण्डा लुप्तदण्डक गृहीतोसि । प्रयच्छ तदशमुवर्णम्। संवा०-अद्य दास्यामि। माथु०-अधुना प्रयच्छ। द्यत०- .

3: [१] संवा०-दास्यामि प्रसाद कुरु। माथु०-अरे ननु सांप्रतं प्रयच्छ । संवा-शिरः पतति । माथुल-एप त्वं खलु धतकरमण्डल्या बद्धोसि । संवा.-कथं तकरमण्डल्या बद्धोस्मि । एपोस्माकं घ तकराण्यंगलङ्घ- नीय: समयः । तत्कुतो दारयामि । माथु०-अरे गएथु ( गएड:) । कृतः कृतः । संवा---एवं करोमि । अर्धे ते ददामि । अर्थ मे मुञ्चतु । चूत०-एवं भवतु। संवा०-अर्धस्य गन्थु ( गएडं लग्नकम् ) करोमि । अर्धमपि । मह्यामार्यो मुञ्चतु। द्यत०- माथु०-को दोपः । एवं भवतु । संवा ०-आर्य अर्ध त्वया मुक्तम् । माथ०-मुक्तम् । संवा-अर्ध त्वयापि मुक्तम् । -मुक्तम् । संवा०-सांप्रत गमिष्यामि। माथु०-प्रयच्छ तद्दशसुवर्णम् । कुत्र गच्छसि । संवा-प्रेक्षध्वं प्रेक्षध्वं भट्टारकाः । हा सांप्रतमेव एकस्य अर्ध गण्डः झतः श्रपरस्य अर्थ मुक्तम् । तथापि माम् अपर सांप्रतम् एवं याचत । माथु०-धूर्ती माथुरोहं निपुणः । अत्र नाहं धूर्तयामि । ततः प्रयच्छ तोदएडया लुभदण्डकं सर्व मुवणं सांप्रतम् । संवा०-कुतो दास्यामि । माथु०-~-पितरं विक्रीय प्रयच्छ । संवा०--कुतो मे पिता। माथु. o-मातर विक्रीय प्रयच्छा •संवाबुतो मे माता।

[ २ ] माथु०-आत्मानं विक्रीय प्रयच्छ । संवा-कुरुतं प्रसादम । नयतं मां राजमार्गम् । माथु०-प्रसर्य प्रसर्ग। संवा०--एव भवतु । श्रार्याः कोणीध्वं मामस्य समिकस्य हस्तादशभिः मुवर्णकैः कि भरणत । किं करिष्यसि इति । गेहे ते कर्मकरी भविष्यामि । कथम् अदत्त्वा प्रतिवचनं गतः । भवतु एव । इमम् अन्यं भविष्यामि । कथम् एपो श्रादि माम् अवधीर्य गतः । श्राः थार्य चारुदत्तस्य विमवे विघटित एप वर्धे मन्दभाग्यः । माथु०-ननु देहि। संवा०—कुत्तो दास्यामि । आर्याः परित्रायतध्वं । उद्धरण सं०-१८ अर्धमागधी उवासगदसाओ ( सातये अध्याय से)- पोलासपुरे नामं नयरे,' सहस्सम्बवणे उज्जणे जियसतूराया। तत्य णं पोलासपुरे नयरे सदालपुत्ते नाम कुम्भकारे आजी- विनोयासए५ परिवसइ । अजीविय-समयसि लट्ठ गहिय? पुच्छियह विणिच्छिय?१० अभिगय ११ अहि-भिजपेमागुरागरते ८ . १. नगरे-स० एक० पु. । २. सहस्राम्रबने-स० एक. नपुं०। ३. उपाने-स० एक. "पु०। ४. नूनं-निश्चयबोधक अव्यय । श्राजीविकोपासकः-प्र० एक० पु०, थाजीविकों का उपासक । विक समये-समय-मत, सिद्धांत-सप्तमी एक. पु.। ७. लब्धार्थ:/लन्ध- प्राप्त करना। ८. गूढार्थ:-ग्रहण कर । ६. पृष्टार्थ:- :-पूछ कर । विनिश्चत्यार्थ:-अर्थ का निश्चय कर । ११. अभिगतार्थः -पारंगत होकर। ६. श्राजि- ५ [२३] ज्य अयम् अाउसो, श्राजीविय-समए अट्ठ' अयं परम? २ सेसे "अण्डे । ति बाजिविय-समएणं-अप्पाणं भावमाणे विहरइ । तस्स णं सदालपुत्तस्स आजीवियोवासगरस एका हिरएण-कोडी, निहाण-पउत्ता, एका वढि पउचा, पवित्थर पउत्ता एके वए दस-गो-साहस्सिएण वएणं ।' तस्स एं सद्दालपुत्तस्स , बाजीवियोवासगस्त अग्गिमित्ता नाम भारिया होत्या तस्स णं सद्दालपुत्तस्स आजीविरोधासगस्स पोलासपुरस्स नयरस्स चहिया पञ्चकुम्भकारावणसया'• होत्या। तत्थ ण ववे पुरिसा दिएणभइ१२ भत्ता यणा कल्लाकलिं वहवे करए य बारए. य पिहडए। य पडए यं श्रद्ध-घडए य कलसए य अलिजरए१९ य जम्बूलए य उहियायो" य करेन्ति, अन्ने य से वहवे पुरिसा दिएण- भइभत्त वेयणाकल्लाकल्लिं तेहिं बहूर्हि करएहिं जाव उद्वियाहि य रायमग्गॅसि वित्तिं कप्पेमाणा२१ यिहरन्ति । १. अर्थ:-मृत्य। २. परमार्थ.। ३. अनर्थ: यसत्य । ४. /भानय-चिन्तन करना--वर्तमान कालिक कृदन्त। ५. कोटि-फरोड़। ६.निधान-प्रयुक्ता- स्थापना में लगाना। ७. विधिन्--बढनेवाला-व्याज । ८. प्रविस्तर- जागीर । ६.जाणाम् प० वहु० पु०-समूह । १०. आपण-दुकान। ११. यहु-अनेक । १२. मृति:-भाड़ा । १३. मक्त-भोजन । १४. वेतन । १५. कल्यं कल्यम्-प्रत्येक प्रातः । १६. करवान-द्वि० बहु• पुल-गड्डुवा । २७. करकान्-दि. बहु• पु०-वर्तन। १८. पिठरकान्-द्वि० बहु० पु०, १६,श्रलिजाण-द्वि० बहु० पु०, पानी रखने का भझझर । उष्ट्रिकान्--द्वि० बहु० पु०, बड़े-बड़े मटके २१. क्रियमाणः-शानच प्रत्यय, वर्तमानकालिक कृदन्त । याती। २०. जम्बूलकान्, [८४.] तए' ण से सद्दालपुत्ते श्राजीवियोवासए अन्नया कयाइ' पुन्वाव: रएहकाल सनयंसि जेणेव असोग-वणिया तेणेव उवागच्छइ, त्ता गोसालस्स मदलिपुत्तस्स अन्तियं धम्म-पएणत्ति उयसपजिताएं। विहरइ । तए णं तस्स सद्दालपुत्तस्स श्राजीवियोवागरस एगे देवे अन्तियं पाउन्भवित्था ।' तए रणं से देवे अन्तलिक्ख - पडि. वरणे सीखसिणियाई जाव परिहिए सद्दालपुत्तं श्राजीवियो-वासयं एवं क्यासी-एहिइ णं, देवाणुप्पिया-कल्ल इहं महामाहणे उप्पन-पाण- दसणधरे तीय पच्चुपन्नम् १ अरणागत-जाणए अरहा जिणे केवली सव्वएणू सव्वदरिसी तेलोक-बहिया महिय' पूइए, सदेवमणुयासुरस्स लोगस्स अच्चणिज्जे वन्दरिणजे सकारणिज्जे सम्माणिज्जे कल्लाणं मगलं देवयं चेइयं जाव१४ पजुवासणिजे ५ तच्चकम्मसम्पया१६ सम्पउत्ते। तणं तुम वन्देजाहि जाव पज्जुवासेजाहि, पाडिहारिएणं ७ पीढफलगसि. जासंथारएणं १८ उनिमन्तेजाहि । दोच्च पि तच्चं. पि एवं घयइ, ता जामेव दिसं पाउन्भूए तामेव दिसं पडिगए। तए ण से सद्दालपुत्ते श्राजीवियोवासए इमीसे कहाए लद्ध? १. तत:-अव्यय, बाद में। २. अन्यदा-अव्यय, किसी समय में। ३. कदाचित्-यव्यय । ४. पूर्वापराहवाल । ५. उपागच्छति-उप+या+ -/गम्-प्रथम पु० एक. वर्तमाना, गत्वा, त्ता-( क्त्वा-पूर्वकालिक कृदन्त- ६. उपसंपादयित्वा--संबंधसूचक कृदन्त, प्राप्त ७. प्रादुर्+भ---प्र० पु० एक० भूत० वृदत। ८.प्रतिपन:-आश्रित-विशेषण। ६, वच-कहना-प्र० पु० एक० भूतः । १०. अतीत~यादिस्वर लोप, त>-अ,-य (श्रमा०)। ११. प्रत्युत्पन्न:-वर्तमान० कृदत। १२. विलोक्ति- —देखा हुआ-विशेषण । महित. संस्कृत-विशेषण । १४. पवित। १५. पर्युपासन, उपासना । १६. तथ्य (तत्व). १७. प्रातिहारिक-हमेशा तय्यार । १८. संस्तार--साधु वा वासस्थान । २६. द्वितीयं । २०. तृतीयं । जाकर । करके । १३. देशी [५] समाणे एवं रालु समणे भगवं महावीरे जाव विहरइ, तं गच्छामिण समण भगवं महायोर बन्दामि जाव पज्जुवासामि, एवं संपेहेइ, ' -त्ता रहाण जाव पायन्चित्ते मुद्धप्पारेसाई२ जाय अप्पमहापाभरणलकिय गरेस मणुरस वगुराः परिगर साम्रो गिहाओ पडिणिसभइ, ता- पोलासपुरं नयरं मम ममेण निगच्छइता जेणेव सहस्सम्बवणे उजाणे जेणेव समणे भगवं महावीरे नेणेव उवागच्छइ, ता तिपयुत्तो श्रायाहिण' पग्राहिण करेइ, ·ता बन्दइ नमसइ,ता जाव पज्जुवासइ। तए ण से सदालपुत्ते श्राजीविओवासए अन्नया कयाइ वायाययं कोलालभण्डं यन्तोसालाहितो. पहिया गीगड, ता प्रायसि दलयइ । तप रण समणे भग, महावीर सद्दालपुत्तं आजीवि- श्रीवासय एव वयासी - 'सहालपुत्ता एस ए कोलाल-मण्डे को ?" ताण से सद्दालपुत्ते आजीवियोवासए समण भगवं महावीर एवं ययासी-एस ए भन्ते पुन्धि मट्टिया आसी तो पच्छा उदएणं निमि- बइ,-चा छारेण य करिसेण" एगयो मीसिजइ,१२-ता चस्के आरो- . १. सप्रेक्षते- सम्+ / क्ष-प्र. पु० एक. वर्तमान०, देखता है, इष्टवा, तापूर्णकालिक कृदन्त-देसकर । २.शुद्धात्मा वैधिकाशि-पपिन शरीर को सजाने योग्य वस्त्र । ३. वागुरः, ग्र०एक. पु०, समुदाय । ४. स्वर ,स्व सर्वनाम । ५, गिरत्यः ( निष्लवैदिक )-तिगुना । ६. श्रादक्षिणं प्रदक्षि- गम्-द्वि० एक० नपुं०, दक्षिण पार्श्व से प्रदक्षिणा । ७. वात्स्यातपम्- धूप और हया में मुसाये हुए।८, शालाभि, प. बहु० स्त्री०, शला-घर से। ६. यातपे-स० एक० पु०, सूर्य की गर्मी में। १०. ददाति /दा- पु० एफ० वर्तमान०, देता है। ११. करीपेण-7. एकनपु०, सूखे गोबर से। १२. नि+/मृज-निमजन करना-प्र० पु. ऐक. वर्तमान. मयम कर्मवाच्य ।

- [ ८६ ] हिजइ, तो बहवे करगा,च जाब उठ्ठियारो य कजन्ति । तए, रणं समणे भगवं महावीरे सद्दालपुत्तं श्राजीवियोवासयं एवं वयासी- सद्दालपुत्ता, एस ण कोलालभएडे किं उट्ठाणेण जाव पुरिसफारपर- कमेण' कनन्ति, उदाहुर अणुट्ठाणेण जाय अपुरिसक्कारपर- क्फमेण कन्जन्ति । तए ण से सहालपुत्त श्राजीवियोवासए समण भगवं महावीरं एवं व्यासी - भन्ते अणुट्ठाणेण जाव अपुरिसकारपरफमेण, नस्थि उठाणे इ वा जाय परकमे इ वा, नियया सव्वभावा । तए ण समणे भगवं महावीरे सद्दालपुत्तं श्राजीविओवासयं एवं वयासी-सदालपुत्ता, जइ णं तुम्भं के पुरिसे वायाहयं वा पक- ल्लयं वा कोलालभण्डं अवहरेजा ' वा विविखरेज्जा' वा अग्गि- मित्ताए वा भारियाए सद्धि विउलाई भोगभोगाई भुब्जमाणे विहरेजा, तस्स ण तुमं पुरिसस्स कि दण्डं वत्तेज्जासि' ? भन्ते अहं ण तं पुरिसं आश्रोसेज्जा'२ वा हरणेज्जा' वन्धेज्जा'४ वा महेज्जा १५ वा उत्पन्न १. पुरुषात्कारपराक्रमेण-तृ० एक. पुरुषार्थ और प्रयल से । २. उताहो-अव्यय, अथवा । ३. श्रनुत्यानेन-तृ० एक० होने से । ४. क्रिमन्ते-4. पु. एक. वर्तमानः । अव्यय-जैन-माहाराष्टी की विशेषता--पूर्व अक्षर के लोप होने पर ति यच रहता है परन्तु कुछ उदाहरणों में शब्द में माद के अक्षर का लोप हो जाता है और केवल पूर्व अक्षर इ. का प्रयोग मिलता है। ६. नियत्या- तृ. एक. पु०॥ ७. कदाचित्-अव्यय । ८. परत प्रत्यय । ६. अपहरेत् - Wi० पु. एक० वर्तमान० विधिः । १०. विकिरेत्-प्र. पु. एक. वर्तमान विधि ११. निरर्तयसि /वृत्-म० पु० 'एक० भून. । १२. अाक्रोशयामि /मश उ० पु. एफ. वर्तमान०1१३. हन्मि-हिन्- उ. पु० एक. वर्तमान १४. यन्धामि./बन्ध-उ.पु. एफ. वर्तमान १५. मना मि-/मन्य-उ० पु. एक. वर्तमान ।

[७] तज्जेजा' वा तालेज्जारे या निच्छे डेज्जा वा निभच्छेज्जा या "अकाले येव जीवियाओ ववरोवेजा। सदालपुत्ता, नो खलु तुम्भ केइ पुरिसे वायाहयं था पर लय वा को- लालभंड अवहरइ वा जाव परिवेइ वा अग्गिमित्ताए वा भारियाए सद्धि विउलाई भोगमोगाई भुञ्जमाणे विहरइ । नो वा तुमं तं पुरिसं श्राश्रोसेजसि वा हणेजसि वा जाव अकाले चेव जीवियायो ववरो- घेजसि । ज नथि उठाणे इ वा जाव परकमे इ वा नियया-सव्य- भावा । अह ण, तुम्भ केइ पुरिसे वायाहयं जाव परिवेइ' वा अग्गिमित्ताए वा जाव विहरइ, तुमं वा तं पुरिसं आश्रोसेसि वा जाव यवरोवेसि । तो वदसि नत्यि उहाणे इ वा जाय नियया सव्वभावा, त ते मिच्छा। 'एत्य-रसे सद्दालपुत्ते आजीवियोवासए सम्बुद्धे ॥ संस्कृत-छाया पोलासपुरे नाम नगरे सहस्राम्रवने उद्याने जितशत्रु गजा। तत्र नूनं पोलासपुरे नगरे शब्दालपुत्रः नाम कुम्भकार: आजीविकोपासकः परिवसति । श्राजीविकसमये लब्धार्थः गृहीताथः पृष्टार्थः विनिश्चितार्थः अभिगनार्थः अस्थिमजाप्रेमानुरागरत: च अयं श्रायुष्मान, आजीविक- समयार्थ. श्रयं परमार्थः शेप अनर्थः इति । श्राजीविकसमयेन आत्मानं भायमानं विहरति । तम्य नूनं शब्दालपुत्रस्य भाजीविकोपा- १. तर्जयामि तर्ज- उ० पु. एक० वर्तमान० । २. ताडयामि- Vताइ-उ० पु० एक. वर्तमान० ३. निश्छोटयामि में-3. पु. एक० पर्त- मान, निर्भयामि.उ. पु. एफ. वर्तमानः। ५. व्यपरोपयामि उ. पु. एफ. वर्तमानः । ६. परिस्थापयति-/स्था प्र. एक. वर्तमानः।

[ ] सकस्य एकः हिरण्यकोटि: निधानप्रयुत्तः एक: वृद्धिं प्रयुत्तः एकः प्रवि- स्तर च प्रयुत्त. एक: व्रज: दशगोसहस्राणां व्रजाणां तस्य नूनं शब्दाल- पुत्रस्य आजीविकोपासकस्य अग्निमित्रा नाम्नी भार्या आसीत्। तस्य नूनं शब्दालपुत्रस्य आजीविकोपासकस्य पोलासपुरस्य नगरस्य बहिः पञ्च- कुम्भकारापणशताः आसन् । तत्र नूनं वयः पुरुषाः दत्तभृत्तिभक्तवेतनाः कल्यकल्यं वहवः करकान् च धारकान् च पिढरकान् च घटकान च अर्धघटकान् च कलशान् च अलिम्जरान् च जम्बूलयान च उष्ट्रियान करोति, अन्यदा च यस्य वहयः पुरुषाः दत्तभृत्तिभक्तवेतना: कल्यंकल्यं तै: वहूभिः करकेभिः च यावत् उष्ट्रिकाभिः च राजमार्गे वित्ति क्रियमाण: विहरन्ति । ततः नूनं स: शब्दालपुत्रः श्राजीविकोपासक: अन्यदा कदाचित् पूर्वापराहकालसमये, यत्र व अशोकवनिका तत्रच उपागच्छति, गत्वा गोसालस्य मदलिपुत्रस्य अन्तिकं धर्मप्रज्ञप्तिं उपसंपादयित्वा विहरति । ततः नूनं तस्य शब्दालपुत्रस्य आजीविकोपासकस्य एकः देवः अन्तिक प्रादुर्भूतः । तदा नूनं सः देवः अन्तरिक्ष प्रतिपन्नः सकिङ्करिणतानि यावत् परिधृत: शब्दालपुत्र आजीविकोपासकं एवं अवादीत्—'एष्यति नूनं देयानुप्रिय, कल्यं इहं महामाहन: उत्पन्नज्ञानदर्शनधर अतीत प्रत्युत्पन्नम् अनागतज्ञान: अॉजिनकेवली सर्वज्ञ सर्वदर्शी त्रैलोक्यवहितमहित पूजित: सदेवमनुप्यासुरस्य लोकस्य अर्थनीय: वन्दनीयः सत्कारणीयः सन्माननीयः कल्याण मगलं दैवतं चैत्यं यावत् पर्युपासनीयः। तथ्यकर्म- संपत्ति सम्प्रयुक्तः । तं नूनं त्वं वन्देः यायत् प्रत्युपासे: प्रातिहारिकेन पीढफलकशय्यासंस्तारेन उपनिमन्त्रः। द्वितीयं अपि तृतीयं अपि एवं अयादीत् , वदित्वा याम् एव दिशं प्रादुर्भूतः ताम् एव दिशं प्रतिगतः । तत: नूनं स: शब्दालपुत्र. आजीविकोपासक: इमां कथा लब्धार्थः समान: ? एवं सलु, श्रमण भगवान् महावारः यावत् विहरति, तं गच्छामि । नूनं श्रमणं भगवन्तं महावीरं वदामि यावत्' पर्युपासामि । एवं संप्रेक्षते, संप्रेक्ष्य स्नायित्या यावत् प्रायश्चित्त शुद्धामावपिकाशि [] यावत् अल्पमहा_भरणालंकृतशरीर: {मनुष्यवागुरापरिगत:- स्वत: गृहातः प्रतिनिष्कमति, प्रतिनिष्क्रम्य पोलासपुरं नगरं मध्यं प्राप्य) मध्येनं निर्गच्छति, गत्वा यत्रव सहस्रानवने उद्याने यत्रैव श्रमण भगवान् महावीरः तत्र व उपागच्छति, गत्वा त्रिःकृत्त्व: आदक्षिणप्रदक्षिणम् करोति, कृत्वा वन्दति नमस्यति, नत्त्वा यावत् पर्युपासते। ततः नूनं स: शब्दालपुत्रः आजीविकोपासक: अन्यदा कदाचित् वाताहतं इदं कौलालभाण्ड अन्त:शालायाः वहिः नयति, नीत्या आतपे ददाति । ततः नूनं श्रमण भगवान् महावीरः शब्दालपुत्र' श्राजीविकोपासकं एवं अवादीत्-शब्दालपुत्र, एप: नूनं कोलालमाण्डः कुतः ? ततः नूनं स: शब्दालपुत्रः आजीविकोपासक: श्रमगा भगवन्तं एवं अयादीत-एप: नूनं भदन्ते पूर्व मृत्तिका आसीत्, तत् पश्चात् उर्फ निमिजति, निमयि- जित्वा तारेण च करीपेण च एकत: मिनयति, मिश्यित्वा चक्र आरो- हयति, ततः वह्वः करकाः च यावत् उष्ट्रिकाः च क्रियन्ते । ततः नूनं श्रमण भगवान महावीरः शब्दालपुत्र प्राजीविकोपासक एवं श्रवादीत्-शब्दालपुत्र, एप: नूनं कोलालमाण्डः किं उत्थानेन यावत् पुरुषकार-पराक्रमभिः क्रियन्ते, उताहो अनुत्थानेन यावत् अपुरुष- कारपराक्रमभिः क्रियन्ते । तत: नूनं स: शब्दालपुत्र: श्राजीविकोपासकः श्रमण भगवन्तं महावीर एव अवादीन् मदन्ते अनुष्ठानेन यावत् अपुरुषाकारपराक्रमेन नास्त: उत्थाने इति वा यावत् पराक्रम इति वा नियत्या सर्वभावाः । तन: नूनं श्रमण भगवान महावीरः शब्दालपुन श्राजीविकोपासक भाव अबादीत्-शब्दालपुत्र यदि नूनं तव कश्चित्पुरुषः वाताहतं वा पक्ष वा कौलालभाण्डं अपहरेत् या विकिरेन् वा अग्निमित्रायै या भार्याय साधं विपुलानि भोगभोगान् भुञ्जमाणः विहरेत् । तस्य नूनं त्वं पुरुपस्य किं दण्डं निवर्तयसि ? भदन्ते, प्रह नूनं तं पुरुष आक्रोशयामि वा हन्मि वा बन्धामि या मध्नामि 1 [१०] वा तर्जयामि वा ताडयामि वा निश्छोट्यामि वा निर्मर्स्यामि वा अकाले चैव जीवितात् वा व्यपरोपयामि । शब्दालपुत्र, न खलु तव कश्चित् पुरुषः वाताहतंवा पक' वा कौलाल- भाण्डं अपहरति वा यावत् परिस्थापयति अग्निमिनायै वा भार्यायै सार्ध विपुलानि भोगभोगानि भुञ्जमाण: विहरति । नो वा त्वं तं पुरुपं आक्रो- शयसि वा हन्सि वा यावत् अकाले चैव जीवितात् व्यपरोपयसि । यदि नास्ति उत्थानः इति वा यावत् पराक्रमं इति वा नियत्या सर्व भावा. अहं नूनं तव कश्चिन् पुरुष: वाताहतं यावत् परिस्थापयति वा अग्नि- मित्रायै वा यावत् विहरति, वं या तं पुरुपं आक्रोशयसिया यावत् व्यप- रोपयसि । ततः यं वदसि नास्ति उत्थान: इति वा यावत् नियत्या सर्व- भावाः तं ते मिथ्या। यत्र नूनं तेन शब्दालपुत्रः श्राजीविकोपासकः सम्बुद्धः । उद्धरण सं०-१६ अर्ध-मागधी श्रीज्ञाताधर्मकथाह्नम् ( अध्ययनम्-४ ) दुवे कुम्मा- तेणं कालेणं तेणं समएणं' वाणारसी नाम नयरी होत्था । तीसे णं याणारसौए नयरीए पहिया उत्तरपुरथिमे दिसिभागे गंगाए महानदीए मयंगतीरहहे नाम दह' होत्था,अणुपुत्वमुजायवाप गंभीर- सीयलजले, अच्छविमलसलिलपलिच्छन्ने सपनपत्तपुरफपलासे, उप्पल पउमकुमुय-नलिण-सुभग सोगंधिय पुंडरीय-महापुंडरीय- १. तेन पालेन तेन समयेन-तृतीया विभक्ति के द्वारा यहाँ पर सतगी का अबोध कराया गया है। २.भवति- भू-प्र. पु० एक. वर्तमान। ३. द्रहः- म० एक. पु-बड़ा जलाराष। ४. यहूरपल्ल-विशेषण।

[१] सयपत्त' सहसपत्त केसरपुष्फोचिए, पासादीए दरिसरिणजे अभिरूवे, पडिस्वे। . 3 तस्थ णं वहूर्ण मच्छाण य कच्छमाण य गाहाण य मगराण य सुसुमाराण य सइयाण य साहस्सियाण य सयसाहस्सियाण य जूहाई निमयाई निरुविग्गाई५ सुहंमुहेणं अभिरममाणगाति अभिरममाण- गाति विहरति । तस्स णं मयंगतोरदहस्स अदूरसांमते एत्य णं महं एगे मालुयाकच्छए होत्या। तत्य णं दुये पावसियालगार परिवसति, पावा, चंडा, रोदा २, तल्लिच्छा साहसिया, लोहितपाणी, आमिसत्थी,१ . अमिसाहारा, आमिसप्पिया, आमिसलोला, श्रामिसं गवेसमाणौ रतिवियालचारिणो दिया पच्छन्न चावि चिंति।" तते ण तानो मयंगतीरदहातो अन्यया कदाइ सूरियंसि चिरत्थ- मियंसिर, लुलियाएसंझाए, पविरलमाणुसंसि विसंतपडि-णिसंतसि समारण सि दुवे कुम्मगा आहारत्थी आहारंगवेसमाणा सणियं सणिय। उत्तरंति, तस्सेव मयंगतीरदहस्स परिपेरतेण सव्वतो समंता४ परि- घोलेमाणा५ परिघोलेमाणा विर्ति कापेमाणा विहरति । यणतरं च णं ते पावसियालगा आहारत्थी श्राहारं गधेसमारण मालुयाकच्छयाओ.पडिनिक्खमति, पडिनिक्खमित्ता जेणेव मयंगतीरे दहे. १. रातपन । २. प्रासादित:-वर्तमान० कृदन्त । ३. दर्शनीय:-अनीयर् प्रत्यय । श्रर्धमागधी में - 9:>-ए का प्रयोग मिलता है। ४. मत्स्यानां- १० बहु० पु० । ५. निविग्नानि-म० बहु • नपुं०। ६, अभिरममाए- कानि-खेलते हुए । ७. पापगाली--प्र० द्वि. पु.शृगाल> सिबाल-श्रमा० सियाल । ८. पापो-प्र. वि. पु. ६, तल्लिप्सौ.- प्र. द्वि० पु०॥ १०. श्रामीयार्थिनी-मांस श्रादि के लिये। ११.. तिष्ठतः /स्था - प्र. पु. दि० वर्त० । १२. चिरास्तमिते--स० एक. नपुं०। १३. शनैः शनै--धीरे-धीरे । १४. समंतात्-पं० एक० पु.॥ १५. परिपूर्णमाण:-- शानच प्रत्यय, वर्तमान कृदन्त, डरते कॉपते हुए।

[२] तेणेव उवागन्छति, उवागच्छित्ता तस्लेव मयंगतीरदहस्स परिपेरतेणं परिघोलेमाणा परिघोलेमाणा वित्तिं कप्पेमारणा विहरति । तते णं ते पावसियाला ते कुम्मए पासंति', पासित्ता जेणेव ते कुम्भए तेणेव पहारेत्य गमणाए ! तते णं ते कुम्मगा ते पावसियालए एजमाणे पासंति, पासित्ता भीता, तत्था, तसिया, उव्बिम्गा, संजातभया हत्थे य पादेय -गीवाए य सएहि सपहिं काएहिं साहरंति, साहरित्ता निच्चला, निष्फंदा तुसिणिया संचिट्ठति। तते णं ते पावसियालया जेणेव ते कुम्मगा तेणेव उवागच्छंति, उवागच्छित्ता ते कुम्मगा सव्यतो समंता उन्यतेति, परियज्ञेति, आसारेंति, संसारेंति, चालेंति, घट्टति, फंति, खोभेति, नहेंहि आलं- 'पंति, दंतेहि य अक्खोडेंति, नो चेव णं संचाएंति तेसि कुम्मगाणं सरीरस श्रावाह'वा पबाहं वा घाबाहं वा उपाएत्तए छविच्छेयं वा करेत्तए । तते रणं ते पावसियालया एए कुम्मए दोच्चं पि तच्चं पि सव्वतो समंता उव्यतेति"जाव नो चेव णं संचाएंति करित्तए । ताहे संता, तंता, परितंता, निम्विन्ना समारणा सरिणयं सणियं पञ्चोसकोति, गगंतमवकमंति, निच्चला निष्फंदा तुसिणीया संचिट्ठति । तत्य रणं एगे कुमग्गे ते पावसियालए चिरंगते दूरंगए जाणित्ता सरिणय सणियं एगं पायं निच्छुभति । तते णं ते पावसियालया तेणं कुम्मएणं सरिणयं सणियं एगं पार्य नीणियंपासंति, पासित्ता तार उकिटाए गईए सिग्घ, चवल, तुरियं," चंडं, वेगितं रणव से पुम्मए तेणेव १. पश्यत:-प्र. पु०.द्वि० वर्तमान० । २. गती-प्र० पु० द्वि० भूतः । ३. एप्यमाणो-वर्तमान० कृदन्त । ४. संतिष्ठत:--प्र० पु० द्वि० वर्तमान । ५. उपवतेते- पु० द्वि. वर्तमान०। ६. थानोदयत:--प्र. पु० दि० वर्तमान ७. उत्पाद्य-संबंधसूचक कृदन्त । ८. अकुरुताम्-प्र. पु० द्वि० भूत० । ६. निस्तोभति-/स्तुभ-म० पु० एक. वर्तमान । १०. चपलं। ११. त्वरितं। 1-प्र० [ ३ ] उवागन्छंति, उवागच्छित्ता तस्स णं कुम्मगस्स तं पायं नहिं पालुं-- पंति,' दंतेहिं अक्खोडेंति, ततो पच्छा मंसं च सोणियं च आहारति, श्राहरित्ता तं कुम्मगं सब्बत्तो समंता उच्यतेति-जाव नो चेव ण संचाएंति करेत्तए, ताहे दोच्चं पि अवकमंति । एवं चत्तारि वि पाया जाय सणियं सरिणयं गोवं णोणेति । तते ण ते पावसियालगा तेणं कुम्मदणं गीयं णोणियं पासंति, पासित्ता सिग्धं सिग्धं चवलं, तुरियं, चंडं नहेहि दंतेहि कवालं विहाडेतिर, विहाडित्ता तं कुम्मगं जीवियाओ ववरोति, ववरोवित्ता मंसं च सोणियं च आहारति । एवामेव५ समणाउसोजो श्रम्ह निग्गंथो वा निग्गंथोवा पायरियउव- ज्मायाणं अंतिए पतिए समाणे पंच य से इंदियाई अगुत्ताइं भवंति, से णं इह भवे चेव वहुणं समणाणं बहूर्ण समणीणं सावगाणं होलणिजे, पर लोगे विय ण आगच्छति पहूण दंडणाण, संसारकंतारं प्रागुपरिय- । दृति, जहा से कुम्मए श्रगुत्तिदिए । तते ण ते पावसियालगा जेणेव से . दोच्चए कुम्मए तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता तं कुम्मगं सव्वतो समंता उब्बतेंति...जाव दंतेहि अक्खुडति""जाय नो चेव ॥ संचाएंति करेत्तए। तते एते पावसियालगा पि तच्चापि "जाव नो संचाएंति तस्स कुम्मगरस किंचि आवाह वा विवाह वा "जाव छविच्छेयं वा करेत्तए, ताहे संताप, तता' • परितंता, निम्विन्ना समाणा जामेव दिसि पाउन्भूत्रा सामेव दिसि पडिगया । तते णं से कुम्मए ते पावसियालय चिरगए दूर- गए जाणित्ता सणियं सणियं गीय नेणेति, नेणेत्ता दिसावलोयं करेइ, १. पालुपंत:-प. पु. द्वि० वर्तमान । २. गन्छति-प्र. पु. एक. वर्तमान० 1 ३. विपाटयत...प्र. पु. द्वि० वर्तमान० | ४. व्यपरो- परत:-प्र. पु. द्वि. वर्तमान । ५. एवमर-यव्यय । ६. श्रमणायुष्मन्- संवोधन । ७. समानः । ८. हेलया-निरादर करना । ६.श्रान्ती-प्रा द्वि० पु० । १०. तान्ती-प्र० दि० पु० । 1 [६४ करिता जमगसमगं' चत्तारि वि पादे नीति, नोरणेत्ता ताए उकिट्ठाए कुम्गगईए वीईवयमाणे वोईवयमाणे जेणेव मयंगतीरहहे तेणेव उवा- गच्छइ, उवागच्छित्ता मित्तनातिनियगसयणसंबंधिपरियणेण सद्धि अभिसमन्नागए यावि होत्था। एवामेव समणाउसो! जो अम्हें समणो वा समणी वा पंच से इंदि- याति गुत्ताति भवंति से ण इह भवे अञ्चणिजे ४ जहा उ से कुम्मा -गुतिदिए । संस्कृत-छाया क तेन कालेन तेन समयेन वारणारसी नाम नगरी श्रासीत् । तस्याः नूनं वारणारस्याः नगरया: वहिः उत्तरपूर्वे दिसिभागे गंगायां महानद्यां मतंगतीरद्रह नामद्रहः श्रासीत्-अनुपूर्वसुजातवमगंभीर- सीतलजल:, अच्छविमलसलिलपरिच्छन्नः संछन्नपत्रपुष्पपलाशः वहूत्पल्लपद्मकुसुमनलिनसुभगसुगन्धितपुण्डरीकशतपत्रसहस्रपत्र केसर- पुप्पोपचित:, प्रासादितः दर्शनीय: अभिरूपः प्रतिरूपः । तत: नूनं वहूनां मत्स्यानां च कश्यपानां च माहानां च मकराणां चशिशुमाराणां च शतिकारणां च सहस्राणा च शतसहस्राणां च यूथानि निर्भयानि निद्विग्नानि सुखं सुखेन अभिरममाणकानि-अभिरममाण- कानि विहरतः । तस्य नूनं मतंगतीरदहस्य अदूरसामंते अत्र नूनं मह्य एकमालुकाकच्छकः आसीत् । तत: नूनं द्वौ पापशृगाली परिवसतः पापो, चण्डौ, रौद्रो, तल्लिप्सी, साहसिकौ, रोहितपाणी, आमिपार्थिनी, आमिपाहारी, श्रामिपप्रियौ, श्रामिपलोलो, आमिषं गवेपमाणो रात्रि- १. यमनसमग्रं--देशी० थव्यय, एक साथ में । २. व्यतिग्रज. मायः-शानच् प्रत्यय, वर्त• कृदन्त । ३, सार्ध । ४. अर्चनीयः-- अनीयर प्रत्यय ।

। [५] विडालचारिणो दिवाप्रच्छन्नं चापि तिष्ठतः, तत: नूनं तापः मतंग * तौरद्रहात: अन्यदा कदाचित् सूर्य चिरास्तमिने लुलितायांसन्ध्यां प्रविरल- मानुपे. निशांतप्रतिनिशांते समाने द्वौ कूर्मको श्राहार्थिनी अाहारं गवेप- माणौ शनैः शनै: उत्तरतः तस्यैव मतंगतोरदहस्य परिपर्यन्तेन सर्वतः समन्तात् परिपूर्णमाणौ परिघूर्णमाणौ वृत्ति क्रियमाणो विहरतः । तदनन्तरं च नूनं तौ पापशृगालौ श्रार्थिनौ श्राहारं गवेपमाणौ मालुकाकच्छात: प्रतिनिष्क्रमन्तः, प्रतिनिष्क्रम्य यत्रैव मतंगतीरदहः तवैव उपागच्छतः, उपागम्य तस्यैव मत्तंगतीरदहस्य परिपर्यन्तेन परि- घूर्ण माणी परिपूर्ण माणौ वृति क्रियमाणी विहरतः । तत: नूनं तो पापशृगालो तो कूर्मको पश्यतः, दृष्ट्वा यत्र व तौ कूर्मको तत्र व प्रहारार्थ गती। तत: नूनं तो कूर्मकौ तौ पापमुगाली एष्यमाणौ पश्यतः, दृष्ट्या भीती, वस्ती, तसितो, उद्विग्नी संजातमयौ हस्तौ च पादौ ग्रीवो चस्वकं स्वकं कायौं संहरतः, संहरित्य निश्चली, निःस्पन्दौ संतिष्ठतः । तत: नूनं तो पापगालो यत्रच तौ फर्मको तत्रैव उपागच्छतः, उपागम्य तो कूर्मको सर्वतः समन्तात् उपवतेते. परिवर्तते थासारतः, संसरत: चलतः, घट्टते, स्फालेतेः, क्षोभयतः नखैः थालुपंत: दन्तैः च प्राक्षोदयतः न चैव नूनं संशक्नुतः तस्मिन् कूर्मको शरीरस्य आबाधं वा व्याबाधं या उत्पाद्य छविच्छेद चा अकुरुताम् । तत: नून तो पापशृगाली एनौ कूर्मको द्वितीय अपि तृतीयं अपि सर्वतः यावत् नः चैव नूनं संशक्नुतः (तावत्। अकुरुताम् । तथैव प्रान्ती परितान्तौ निर्विग्नौ समानी शनैः शनैः प्रति- संशक्नुतः एकान्तमवकामतः निश्चलौ निस्पन्दौ तूष्णीं संतिष्ठतः । मतः नून एकः कूर्मक: तो पापशृगालको चिरंगतौ दूरंगती ज्ञात्वा शनैः निस्तोभति । तत: नूनं तो पापशृगालो २ पूर्मकम् शनैः शनैः एकेन पादेन नीतं पश्यतः, दृष्ट्वा ते उत्थित्वा गतः शीघ', चपलं, त्वरितं, चंड, वेगितं, यौव स: कूर्मक: क्व उपा- गच्छतः, उपागम्य तस्य नूनं कूर्मकस्य ते पाई नखैः आलुपतः देत: समन्तात् उपवतेते- शनैः एक [ ६६ ] आक्षोदयतः, तत: पश्चात् मांसं च श्रोणितं च श्राहरतः, अाहत्य तं कूर्मकं सर्वतः समन्तात उपवर्तेते" यावत् न चैव नूनं संशक्नुतः (तावत्) अकुरुताम्, तथैव द्वितीयं अपि अपक्रामत: । एवं चत्वारः अपि पादौ यावत् शनैः शनैः ग्रीवां नयतः। तत: नूनं तो पापशृगालौ तं कूर्मकं प्रीवया नीतं पश्यतः, दृष्ट्वा शीघ्र, चपलं, त्वरितं, चण्डं नखैः दंतैः कपालं विपाटयतः, विपाट्य कूर्मक जीवितात व्यपरोपयतः, व्यपरोपयित्वा मांसं च श्रोणितं च श्राहरतः । 'एवमेव श्रमणायुप्मन्-य: अस्माकं निर्गन्थः वा निम्रन्थी वा आचा- योपाध्यानाम् अंतिके प्रबजित: समानः पञ्च च तस्य इन्द्रियाणि अगुप्तानि भवन्ति, तस्य नूनं इह भवे चैव वहूनां श्रमणाणां बहूनां श्रमणीणां श्रावकानां श्राविकानां हेलया परलोके अपि च नूनं आग- च्छति बहूनि दण्डनानि, संसारकान्तारं अनुपर्यटति तथा सः कूर्मकः अगुप्तेन्द्रियः ततः नूनं तो पापशृगालो यत्र व तस्य द्वितीयः कूर्मकः तत्र व उपागच्छतः, उपगम्य तं कूर्मकं सर्वत: समन्तात् उपवर्तेते. यावत् दंतैः श्राक्षोदयत: यावत् नः चैव नूनं संशक्नुत: (तावत् ) अकुरुताम् तत: नूनं तो पापशृगालौ अपि तृतीयं अपि यावत् नः संशानुन: तस्य कूर्मकस्य किंचित् श्राबाधं वा विवाधं या ..........."यावत् छविच्छेद वा अकुरुताम् । तौ श्रान्ती तान्तौ परितान्ती निर्विग्नी समानौ यामेव दिशं प्रादूर्भूतः तामेव दिशं प्रतिगतौ । तत: नूनं सः धर्मक: तो पापशृगाली चिरंगती दूरंगतो ज्ञात्वा शनैः शनैः प्रीवां नयतः, नात्वा दिशावलोकं करोति, करया यमप्रसमम चत्वारः अपि पादाः नयतः, नीत्या उत्थाय कूर्मकः व्यतिबजमाणः न्यतिव्रजमाण: यत्र व मतंगतीरदहः तत्रैव उपागच्छतः,उपागम्य मित्रज्ञाति- निजस्वजनपरिजनानां साध अभिसमन्वागतो यापि भवतः । 'एवमेव श्रमणायुप्मान-य. अस्माकं श्रमण: वा श्रमणी चा पञ्च अस्य इंद्रियाणि गुप्तानि भवन्ति स: नूनं इह भवे अर्चनीयः यथा तु सा- फर्मकः गुप्तेन्द्रियः।

[७] उद्धरण सं-२० भाकृत-धम्मपद मगवग्ग १-(उ) जुनो' नमो सो मगु अभय नमु स५ दिशः रधो अकुयनो नमु धमत्रकेहि सहतो.॥ २-हिरि' तस' वर स्मति परिवरन धमह' सरधि ब्रोमि समेदिठि पुरेजय.॥ १-१. ऋजुक:> उजुको (पालि) प्र० एक० पु.-~~सीधा । २. नामो (पालि), धम्मपद की भाषा मे दीर्घ सरो ने प्रयोग का अभाव है इसलिये नामो> नमो मिलता है। ३. मार्ग >मग्गो (पालि,>मगु प्र० एक० पु. में -अं विभक्ति का प्रयोग होता है परन्तु उ का वैकल्पिक प्रयोग मिलता है। ४. अभया (पालि), प्र० एक०स्त्री०, भयरहित । ५. स >सो (पालि) प्र. एक.पु० तद् सर० । ६. दिशा>दिसा(पालि)तालन्य श वा प्रयोग संस्कृत और अशोकी प्राकृत (शाहबाजगढी, मनसेहरा) के सदृश सुरक्षित रहता है। ७. रस >रथो (पालि)-प्र० एक० पु०-य> ध का प्रयोग द्रष्टव्य है । ८. अजन कुजनो (पालि), (अयानो पालि सराव त्य)- शन्दरहित । १. धर्मचक्रे >धम्मचक्ने हि ( पालि ) (सं० धर्मत.> धम्मतक्येहि, पालि), -तर्क>ता-व्वनिविपर्यय के अनुसार ), तृ० व९० पु० । १०. सयुक्त.>संयुत्तों (पालि), सहितो, महितो, सहतो-जुड़ा हुआ। २-१. ही> हिरी सरभक्ति का उदाहरण, लज्जा । २. तस्य>तस्स (पालि)। ३. अप+ पालम्ब > अपालम्बो (पालि)-न>र, म्य>-म का प्रयोग। ४. स्मृति । ५. परि + वारण-गर्धन्य धनि का ६. धर्मम + अहधम्माह (पालि)-धम्मपद की भाषा मे संयुक्त व्यंजनों का प्रभाव मिलता है। सं. और पालि श्र>-उ का प्रयोग । ७. सार्थिम् >सार्थि । ८, ब्रवीमि>व्र मि-30 पु०, एक. वर्तमान, । -अव> श्रो। ६. समयव दृष्टि सम्मादिहि (पालि), समे< समयक 1 १०. पुरेजात.>पुरे जवं (पालि)। श्रभार।

३-यस एतदिशा यन गेहिपरवइतस पर स वि५ एतिन यनेन निवनसेव सतिए॥ ४-सुप्रउधु' प्रउमतिर इमि गोतमपवक येष५ दिव य रति च निच बुधकतर स्मति ॥ ५-सुप्रउधु प्रउझति इमि गोतमपक्क येप दिय य रति च निच धमकत' स्मति ॥ ६-सुप्रउधु प्रउमति इमि गोतमपवक येप दिव य इति च निच संघकत स्मति ।। ७-सुप्रधु प्रउझति गोतमपवक येप दिव य रति च निप कयकत' स्मति ॥ इमि ७. ३----१. यस्य>यरस (पालि)। २. एतादृशम् >एतादि (पालि)। ३. यानम् >यानं । ४. गृहणोपप्रजितस्य चा>गिहिन्ते पन्धजितरस वा (पालि) गृहणो में वृ>-प्र>-पर-स्वर-भक्ति का उदाहरण । ५. वै>' वे (पालि) वास्तव में। ६. एतेन>एतिन, तु. एक० पु० ॥ निर्वाणस्य+एय>निम्नस्सेब (पालि)।८, सन्तिके संतिक-यास में । ४-१. सुप्रग्रुद्धम् >मुप्पमुदं-दि० एफ० पु०, संयुक्त व्यंजन एकापार हो जाता है । २. प्रबुध्यन्ते>पयुज्झन्ति (पालि)-न्ति>.ति प्र० पु० पहु० वर्तमान० । ३. इम>हमे (पालि)। ४. गौतमभावफा:> गोतमसावका (पालि)। ५ येषां>येसं (पालि), ६. दिवा>-दिवा (पालि) । ७. रात्रिरत्ती (पालि)। ८. नित्यम् <निच्चं, त्य> च>च, भ्य>झ>- (प्रउमति )। ६. बुद्धगता:> बुद्धगता (पालि)ग>-फ। १०. स्मृति । ५-१. धर्मगता:>धम्मगता (पालि) । ६-१. संपगता:>संघगता (पालि)। ७-१. पायगा:> फायगता (पालि)।

[६]
5-सुप्रउधु प्रउभति इमि गोतमपवक
येप दिव य रति च अहिंसइ रतो' मनो' ।।
सुमधु
प्रउमति इमि गोतमपवक
येप दिव य रति च भमनइ. रतो मनो।।
२०-सवि' सघरअनिच' ति यद प्रनय पशति
सद निवनति दुख एपो मगु विशोधि
११ –सवि सघर दुख ति यद प्रमए' प्रधतिर
सद् निविनति दुख एपो मगु विशोधिय॥
१२-सवि धम अनत्म धम अनत्म' ति यद पशति चछुमर
तद् निविनति दुख एपो मगो विशोधिध ॥
-
९-१, अहिंसायाम् >यहिंसाय (पालि)। २. रत:>रतो। ३. मनस:>
मनो (पाति)।
९-१. भावनायाम् >भावनायं (पालि), सप्तमी एक० स्त्री०, भावना में,
a>-म का परिवर्तन द्रष्टव्य है।
१०-१. सर्व>सब्बे (पालि), प्र. बहु० पु० । २. संस्कारा:>सङ्घारा-(पालि),
प्र. बहु• पु० । ३. अनित्या:>अनिच्चा (पालि),प्र० बहु० पु० ।
४. यदा (पालि)। ५. पञ्चाल (पालि)। ६. पश्यति मत्सति-प्र०
पु० एक. वर्तमानः । ७. तदा (पालि)। ८, निर्विन्दन्ते>
निम्विन्दति (पालि)-१० पु. एक० वर्तमान० ।
२१-१. प्रशाय नएक० पु० । २. ग्रन्थति (अप्नाति /प्रथ)-प्र० पु.
एक. वर्तमान।
१२-१. अनात्मा>धनत्ता (पालि)। २. चतुष्मान् >चरखना (पालि),
३, मार्ग:--प्र. एक० पु.॥
नेवाला।

[१०] १३--मगन' अठगिसोर शेठो सचन चउरि पद विरकु शोठो धमन प्रनभुतन चनुम' । संस्कृत-छाया धर्मचक: संयुक्तः ॥ १-जुक: नामः सः मार्गः अभया नाम: स:. दिशा रथः अफुजनः नामः २-ही तस्य अपालम्भः स्मृति स परिनिवारणं धर्माह सार्थि 'प्रवीमि समयकदृष्टिपुरजातः ।। ३-यस्य एतादृशं यानं गृहणो -प्रबजितस्य इच सः अपि एतेन यानेन निर्वाणस्य एव सन्तिके ।। ४--सप्रबुद्धं प्रयुध्यन्ते इमे गौतमश्रावक: येषां दिया च रात्रि च नित्यं बुद्धगताः स्मृति ।। ५-सप्रबुद्ध प्रधुभ्यन्ते गौतमश्रावकः येषां दिवा च रात्रि च नित्यं धर्मगता: स्मृति ॥ ६-सुप्रबुद्धं प्रबुध्यन्ते इमे गौतमश्नावकः येपा दिवा च गत्रि च नित्यं संघगताः स्मृति ।। परन्तु अर्थ- १३---१. मार्गाना>मग्गानं (पालि) -40 बह. बोध मामी के अनुसार होगा, मार्गों अष्टाङ्गियाः (अठ+अङ्गिका: >अगिको। ३. श्रेष्ठ: > सेठो (पालि) । ४. सत्यानाम् >सच्चानं (पालि)-५० बटु० पु० । ५. चत्वारि>चारि, चतुरो (पालि)। ६. पदानि> पदा--प्र० व९० नप० । ७. विराग.>पिरागो (पालि) । ८. प्राणभूतानाम् >पाणभूतनं (पालि)-१०वह. पु०,६.दुष्मान >चारमा(पालि) सहश प्रयोगा'

[११]
७--सुप्रबुद्धं प्रबुध्यन्ते इमे गौतमश्रावकः
येषां दिवा च रात्रि च नित्य कायगताः स्मृति ।।
-सुप्रबुद्ध प्रबुध्यन्ते इमे गौतमश्नावक:
येषां दिया च रात्रि च अहिंसायां रत: मनः ।।
६ सुप्रबुद्ध प्रबुध्यन्ते इमे गोतमश्रावक:
येपां दिवा च रात्रि च भावनायां रत: मनः ।।
१५-सवें संस्काराः अनित्या इति यदा प्रज्ञया पश्यति
तदा निर्विन्दन्ते दुःसे एप: मार्ग: विशुद्धया ।।
२१-सर्वे संस्कारा: दुःखा इति यदा प्रज्ञाय ग्रन्थति
तदा निर्बिन्दन्ते दुःखे गपः मार्गः विशुद्धया ।।
१२-मर्वे धर्माः अनात्मेति यदा पश्यति चतुप्मान्
तदा निर्विन्दन्ते दुःसे एप. मार्ग: विशुद्धया ।
१३-~मागरण अष्टाडिमा श्रेष्ठः सत्यानां चत्वारि पदागि
विराग: श्रेष्ठः धारणां प्राणभूतानां चतुप्मान् ॥
उद्धरण सं०-२१
अशोकी प्राकृत
पाठ-शिलालेख
गि. देवानं' नि- पियदसि राजा एवं आह-२ प्रतिकातं
१. देवानाम्-१० वटु० पु०, देवताओं का। २. श्राह-प. पु.एस.
चनमान०, यहता है। ३. अतिनान्तम-भूत. कृदन्न, व्यतीत हो गया है।

Ju A श्रा [१०] का० देवान पिये पियसि लाजार हेवः श्राहा ४ अतिक्त धौ० देवान पिये पियासी लाजा हंव आहा अतिकत जी० न पिये पियसि लाजा देव श्राहा अतिकत शा० देवन प्रियो प्रियदशि" रय अहति अतिक्रत मा० देवन प्रिये प्रियदशि रज ग्व अतिकत गि० शतर न भूतपूर्व सय ल अथकमे व पटिरेदना का अतल नो हुतपुलुवे सय क्ल अठकमे वा पटिवेदना धौ० अतल नो हुतपुलुघे सब क्ल अथक्मे व पटिरोदना जी० अतल नो हुतपुलुवे सब क्ल अठक्मे व पटिवेदना शा० अतर न भुतय सत्र कल अथक्रम व परिवेदन अतर नो हुतप्रवे सर क्ल अथक्रमे व पटिरोदन मया एव कट' । सवे काले भुजमानस का० ममया देय क्टे । सव काल अदमनसा ममया (काल) (मी) नस ममया कट सय काल मा० गि० वा त वा घौर व जो० व कटे । सव . . १ प्रिय प्र० एक० पु. का. धौ० जी० पूबा रूपों म अ>-ए मिलता है । २ राजा प्र• एक. पु० पूवा रूपों म र> ल का प्रयोग हुअा है । ३ एव, ए>ह-यह रूप सभवत प्रकीर्ण लेस की अशुद्धि के कारण मिलता है। ४ अाह अन्य रूपा में श्राहा रूप प्रकार्ण लेस की अशुद्धि के कारण है। ५ प्रियदर्शी शि> दशा सरोष्ठी लिपिदाप के कारण र व्यजन का विपर्यय मिलता है। ६ श्राह> अह-दीर्घ स्वर के अभाव कारण। ७ प्रतिवेदना तृ० एक. स्त्री० । ८ प्रतिवदना शाह. मानक के लेखों म दीर्घ स्वर श्रा का लिापचिह्न नहा मिलता। ६ कृत भूतकालिक कृदन्त त>-ट का ध्वनि परिवर्तन । १० भुजानस्य /भुञ्ज । ११. अदत्त अद्त प्रत्यय तं [१०३] एवं किटं । सत्र' कलं एवं फिटं। सत्र कल मय अशमनस प्रशतस मा० व त मय . .. गि० मे., ओरोधनंहि गभागारंहि' वचम्हि व विनीतम्हि च का० मे.. ओलोधनसि गभागालसि वचसि विनितसि धौ० मे अंते पोलोधनसि गभागालसि वं (चसि) " (वि) नीतसि " जी० मे अंते अोलोधनसि गभागालसि वचसि विनीतसि शा० मे.. अोरोधनस्यि प्रभगरस्यि वचस्यि विनितस्यि मा० मे ओरोधने प्रभगरसि अचस्यि चिनिस्यि .. .. .. .... .. ... .... .. जनस ... .. .. .... ... ... । .. गि० उयानेसु च सवन पटिवेदिका स्टिता अथे मे जनस का० उयानास सवता पटिवेदका अठ जनसा धौ. उयानि (सिच) सवत पटिवेदका जनस जो० उयानास च सवत परिवेदका शा. उयनस्यि सनत्र पट्रिवेदक अठं जनस मा० उयनस्यि सवत्र परिवेदक जनस गि पटिवेदेथ इति । सर्वत्र च जनस अथे करोमि पटिवेदेतु में., । सयता " जनसा अठं कछामि हरू । धौ० श्रठ पटिवेदयंतु मे ति । सवत च जनस श्रठ कलामि हक । १. परोपने सप्तमी० एक. नपुं०- शंत.पुर में । २. गर्भागारे-स एक. पु० शयन-गृह में । ३. चर्चेसि-शौचालय में, पागतर वनम्हि /ग्रज. स. एक. नपुं०, सड़क पर । ४. विनीते-स. एफ. नपुं०, गाड़ी पर। ५. उद्यानेषु-सप्तमी०एफ० नपुं०-उपयन में। ६. स्थिता:-क प्रत्यय वर्तमान वृदन्त, स्थापित किया है। ७. श्रर्य। ८. प्रतिवेदयन्तु/विद् प्र. पु. मा. वर्तमान० विधि, सूचित करें। ६. जनस्य-य. एक. पु.-मनुष्य (प्रजा)या। का ...

. अठ करो . . . गि० य च व . [ १०४] जो० अठ पाटवेदयतु म। ति सवत च जनस शा० परिवेदेतु मे। सनर च जनस मा. पटिवेदेतु मे। सनन च जनस अन करोमि यह। च किंचि मुसतो श्रापयामि स्वय दापका चा का य पि चा विछि मुसते पानपयामि हक दापक वा धोक अपि च किंछि मुसते भानपयामि दापक वा जी० अपि च किंछि मुसते श्रानपयामि दापक वा शा. यपि च किचि मुसतो अणपयामि यह दपक मा० य पि किचि मुसति अणपेमि ग्रह टपक गि० स्रावापर्क वा य व पुन महामातमु आचायिक का० सावक वा ये वा पुना महामातेहि अतियायिके महामानेहि, अतिश्परिपके वा ए वा महामातेहि अतियायिके श्रवक व य व पुन महमान अचयिक मा० व य व पुन महमेनहि अचयिके गि० आरोपित भवति ताय अथायविवादो निभती व सतो श्रा पित होति ताये ठाये विवादे निभति वा सत धौ० भालोपित होति तसि पठसि विवादे निभती वा सत जी० आलोपिते होति तसि अठसि विवादे शा० आरोपित मोति तये अठये विपदे सत १ अाज्ञापयामि उ० पु. एक. वर्तमान०, प्रेरणार्थकः । २दापक द्वि० एक. पु.। ३ श्रावक द्वि० एक. पु० ४ श्रात्ययिक द्वि० एक. पु० । ५ श्रावक द्वि० एक० पु० । पहले कहा जा चुका है कि शाह. मान के लेखों में लिपिदोष के कारण दीर्घ स्वर का प्रयोग नहीं मिलता । ६ पारोपित के प्रत्यय भूत• कृद त । ७ अर्याय च. एक. पु० अर्थ ८ निक्षिप्ती-उपस्थित हो । जी० सारक शा श्रवक लिये।

गि. परिसायं श्रानंतरं H [ २०५] मा० आरोपित भोति तये अथये विवदे निमति व संत पटिवेदेत मे " सर्वत्र सर्वे काले। का० पलिसाये अनंतलियेना पटि... विये मे सवता सर्व काल। पौ० पलिसाय थानंतलियं पटिवेदेत विये मे ति सवतं सर्व कालं । जौ० लिसाय अनंतलियं पटिवेदेत विये मे ति सवत सवं कालं शा. परिपये अनंतरियेन पट्रियेदेत वो मे सवत्र सत्र कालं मा० परिपये अनंतलियेन पटिवेदित थिये मे सवन सत्र कल। .. .. गि एवं मया ध मे जी० 'पं एवं एवं श्रापित । नास्ति हि मे तोसो श्रानपयिते ममया । नत्थि५ हि मे दोसे अनुसथे । नथि (हि मे) (तो)से अनुसथे । नथि हि मे तोसे अरणपितं मय । नस्ति हि मे तोपो अणपित मय । नस्ति हि मे तोपे मार गि उम्टानम्हि का० व उठानसा च। कतटवमते हि में चा। कटवियमुते हि में च। कटवियमते हि में धी० उठान)सि अथसंतीरणाय अठसंतिलनाये अठसंतीलनाय श्रठसंतीलनाय श्रठसतिरण्ये अथसंतिरणये जी० उठानसि ...... च। कटवमत शार उठनसि मा० उठनसि हि में च । क्टवियमते हि में भविष्यकालिक कृदन्त । १. परिपदा । २. यान्त्येण-गृ० एक. नपुं० 1 ३. प्रतिवेदयितव्यं. ४. श्राशापितं- भूत० कृदन्त। ५. नास्ति-न+ अस्ति- असम पु० एक० वर्तमान०। ६. तोर::प्र० एक. पु., :> ए-पूर्वी रूपों की विशेषता है। ७. उत्याने- स० एक. नपुं०-परिश्रम में। ८. अर्थसंतरराय-तृ. एक. नपुं-राजकाज से! ६. पर्तव्यमा ।

पुना एसे [१०६ ] गि० सर्वलोकहितं । तस' च पुन एस' मूले उस्टानं का० सवलोकहिते । तसा मुले उठाने घो० सवलोकहिते । तस च पन इयं मूले उठाने जी० सवलोकहिते । पन इयं मूले उठाने शा० सबलोकहितं । मुलं एत्र उथनं मा० सत्रलोकहिते। मुले च तस तस .... 락 तस चु पुन एपे उठने ... गि का० धो० जौ० च अथसंतीरणा अठसतिलना व अंठसंतोलना च अठसंतीलना अठसंतिरण अथसतिरण च नास्ति हि कमंतरं सर्वलोक चा नथि हि कंमतला सवलोक च नथि हि कंमत सवलो(क) च नथि हि कंमतला सवलोक च नस्ति हि क्रमतरं सवलोक च नस्ति हि क्रमतर सत्रलोक ... शा० मा० ... गि० हितत्या"। य च किंचि पराक्रमामि श्रहं किंति. भूतानं का० हितेना । यं च किचि पलकमामि हकं • किति भूतानं धौ० हितेन | अंच "छि पलकमामि हकं किंति भूतानं जौ० हितेन । अंच किचि पलकमामि हकं शा० हितेन । यं च किचि परक्रममि किति भुतनं मा० हितेन । यं च किचि पराक्रममि अहं किति भुतनं ... .... ... १. तस्य-प० एक. नपुं०, उसका। २. एतत् । ३. मूल:-प्र० एक० पु. 1 ४. उत्थानं-ल्युट प्रत्यय । ५. अर्थसंतरण-ल्युट-प्रत्यय । ६. कर्मानन्तरं । ७. हितात्-(हितेन)। ८. पराक्रमे-उ० पु० एक. वर्तमानः। ६, भूतानां-५० बहु• पुलिग । १०. यहं--उ० पु. एक. पु० अस्मद् सर्वनाम-पूर्वी भाषा रूपों में हकं> हउ (अाधुनिक पूर्व हिन्दी में) मिलता है।

गि० आनंण' गद्देयं 'का० अननिय येह" धौ. प्रा(न)निय येह जौ० नानिय येह शा० अनरिणय व्रव्य मा० अनणिय येह [ १०७ ] च नानि सुसापयामि ति हिद च कानि सुखायामि ति हिद च कानि सुसयामि ति हिद च कानि सुसयामि सुसयाम सुसमि .. . 1 .. गि० परमा च स्वर्ग का. पलत चा खग धी० परन्ता च वग जी० पलत च स्वग परत्र च स्यग मा० परत्र च स्यन आराधयतु । त एताय अथाय आलाधयितु से एताये ठाये (आ)लाधयतु ति। एताये आलाधयतु ति एताये अठाये अरघेतु एतये अठये अरधंतु ति । से एतये अथूये - । . गि० अय धमलिपि लेखापिता' किति चिर तिस्टेय. होतु का० च्य धमलिपि लेखिता चिल ठितिस्या होतु घी य धमलिपी लिसिता चिल ठिती होतु जी० इय धमलिपी लिसिता चिल ठितिस्या होतु शा. अयि भ्रम दिपिस्त चिर थितिक मोतु मा० इय ध्रमदिपि लिसित चिर ठिति होतु १. श्रागृपय-उऋण होना । २ गच्छेय । ३. पाश्चित् । ४. मुग्पयामि---3. पु० एक. वर्तमान प्रेरणार्थव । ५. गन्छेय । ६. प्रवेय। ७. श्राराधयन्तु-उ० पु. एक० वर्तमान निराध०। ८. तत.। ६. लेपिता--प्र० पु० एम० भूत, प्रेरणार्थक० । १०. स्थितिका ! m गि० तथा प्रपोत्रा च च मे च में तथा .... 4. का चोर तथा च [१०] पुत्रा' पोता च पुतदालेर च पुता पपोता में ..पोता में पुत्र नतरो पुन नतरे .. जी० ... तथ च .... .. मा० तथ च .. .. गि० अनुवतरां सवलोकहिताय । दुकरं चु इदं अनत का० पलकमातु सवलोकहिताये । दुकले च इयं अनत धौ० पलकमंतु (सच)..कहिताये। दुकले च जी० पलकमंतु सबलोकहिताये। दुकले चु इयं अंनत शा० परक्रमंतु सवलोकहितये । दुकर चु सो इयं अखत्र मा० परक्रमते सबलोकहिताये। दुकरे चु सो इयं अंनत . अबन्न गि० अगेन का० अगेना घौ० अगेन जो० अगेन शा० अमे मा० अमन पराक्रमेन' । पलफमेना पलकमेन पलकमेन परक्रमेन परक्रमेन १. पुना:-प्र० बहु० पु० । २. पुनदार | ३. नप्त-नाती । ४. पराक्रमन्ता-पराक्रम करें। ५. अन्यत्र । ६.अग्रयात्। प्रमात्-पं. एक. पु०-पराक्रम से ७. परा- ।

[ १०६] संस्कृत-छाया देवानां प्रिय: प्रियदर्शी राजा एवम् आह-अतिक्रान्तं अन्तरं न भूतपूर्व सर्व कालम् अर्थ कर्म का प्रतिवेदना वा। तत् मया एव कृतं सर्व कालं अदत: (भुजानस्य अश्नतः वा ) मे अवरोधने, गर्भागारे, वर्चसि, विनीते, उद्याने सर्वत्र प्रतिवेदकाः स्थिताः अर्थ जनस्य प्रतिवेदयन्तु में इति सर्वत्र जनस्य अर्थ करिप्यामि (करोमि ) अहम । यत थपि च किंचित मुसतः आनापयामि अहं ढापकं वा श्रावकं वा यत वा पुनः महामात्रे पु प्रात्ययिक थारोपितं भवति तस्मै अर्थाय विवादे निक्षिप्ती वा सत्यां परिपदां अानन्तर्येण प्रतिवेदयितव्यं मे सर्वत्र सर्वकालम, एवं श्राज्ञापितं मया । नास्ति हि मे नोप: उत्याने अर्थसन्तरणाय च । कर्तव्य- मतं हि मे सर्वलोकहितम् । तस्य च पुन. एतत मूलम् उत्थानं अर्थसंतरणं च । नास्ति हि कर्मान्तरं सर्वलोकहितात् । यत च किंचित् पराक्रमे अहं, किमिति, भूतानां आनृण्यं दया (गच्छेयं बजेयं वा ) इह च कांश्चित् सुसयामि परन च स्वर्ग आराधयंतु(ते) इति । तत् एतस्मै अर्थाय इयं धर्मलिपि. लेसिता किमिति, चिर स्थितिका भवतु तथा च मे पुत्रदारं पौत्राः प्रपौत्राः च पराक्रमन्तां सर्वलोकहिताय । दुष्करं च सलु इदं अन्यत्र अप्रयात् पराक्रमोत् । ।

अनुक्रमणिका लेखक पृष्ठ लेखक पृष्ठ ३६, १३८ एस० मित्रा ४८ उद्भट ५३ उपसेन अग्गवंस ११ अजसाम ४६ पद्धहमाण ३३ अनुरुद्ध ३४ ओल्डेनवर्ग २३ अप्पयदीक्षित १० कक्कुक १४,४१ अमयदेव ४५,८६ कनकामर ५३ अभिनवगुप्ताचार्य ४० कस्सप ३३ अभिमानचिह्न ३८,६६ कागदपा ५२ अरियवंश ३५ कार्तिकेय स्वामी ४२ अरिविक्रम १० कान्तिदेव ३६ अशोक ४, ६ कालिदास १८,३६,५३ आचार्य नरेन्द्रदेव कित्तिसिरि ३२, ३६ ३५ श्रानन्दवर्धनाचार्य ३८ कुन्दकुन्दाचार्य ४२,४३ यापाभिवंस ३५ कोलमक थार. ओक २३,३६ कृष्ण पण्डित १० २३ क्रमदीश्यर १, २१, ४५,४१, १२६ ६० सेनार्ट १२,५१ १८२,१८३,१८६, २१३ ए. एम० च्यायर ११ गंगाधर मह ए. पन्० उपाध्ये, डॉ० १६, १० गाइगर १३, १४ पम् दुगु इल दरौं १० प्रियर्सन ५०,५ एस. एम्. फोटॉक বান ५०,५१ .

[२] लेखक पृष्ठ लेखक ६,५२ धनिक ३८ धमकित्ति ३८ धर्मदास ३६ धर्मपाल गोपाल ६६ द्रोण गौतमबुद्ध धनपाल ५३,६५ चण्ड ३, ६४ चम्पयरात्र ३४, ३५ चुल्ल धम्मपाल ३३ धम्मकित्ति महासामिन ज्यूल्स व्लास ७,११,५८ जयरथ ३३ धम्मपाल ३८ जयवल्लभ ज्वलनमित्र जयंत ३८ नंदिउड्ढ जिनप्रमुसूरि ४० नंदियद्ध जोइन्दु ५२ नमिसाधु २,६,७,४६ जे० रेप्सन ११ नरसिंह ३,६ टी० बरो १२ नागसेन ३२ टोश्रोल्डेनवर्ग १० नारायण ३ दुण्डिराज ४६ पञ्चसामी तिपिटियालगर पतंजलि तिरसमोग्गलिपुत्त ३१ परक्यमयाद(प्रथम) तिलोरगम परय ३५ त्रिविक्रम ६, १०, ४६,४६, ६४ दण्डी७,८,३६,४६,५१,५२, ६४ प्रपरसेन ३६,४० दुर्गाप्रमाद पाशीनाथ पांडुरंग पृथ्वीधर ३७,४० पाणिनि देपटिद ४८ पादलिप्तापार्य অািবিন ४४ पॉलकोल्ट शिमिट ३६ परवर्ती याग्मह .

[३] लेखक पृष्ठ लेखक ३० महानाम बाण पालित्त ३८ भुवनपाल पिशेल २,७,१७, १६, २२, ४२ मोग्गल्लान ६३, १३८ ४३,४८,५१ ५२, ६७ भोजदेव ३८, ५० पुरुषोत्तम ७, ८, १०,४६, ५३, ८० भद्रभाहु ४७,४८ ८४,१०,११६ मलयगिरि पुष्पदंत ५३ मलयसेपर पेटर्सन ३ महाकच्चायन ३५, १३८ प्रेमचन्द तर्कवागीश ३ महाकस्सर्प ३४, ३५ पोट्टिस ३३, ३४, ३५ फ्रैंकलिन एजर्टन महामंगल १६ ३६ महावीर स्वामी ४४, ४५, ४७, ४८ बी० एम० बरुआ ११ मार्कण्डेय ३,७,८,१०, २०, २१ बीम्स ६४ ४१, ४६,४६,६४,६३, १२७ बुद्धघोप ३२, ३३, ३४ मॉरिस ब्लूमफील्ड १६ बुद्धदत्त ३३ मिलिन्द (राजा) बुद्धनाग ३४ मुनिरामसिंह बुद्धस्वामी ५१ मुल्कराज जैन १६ बुहलर ५१, ६७ मधंकर बोधदेय ६ रत्नदेव मरत ६,२०,४१, ५२ रविकर भवभूति १७,४२, ३८,३६ ६,५२ रामतर्कवागीश ५,८,२०,४६ मास १८, ३६ रामदास ३६ १३ रामपाणिवाद ३६ राजशेयर मामह [४] पृष्ठ लेखक लेखक २३ ३६ ३२ ३६ १० ६. ३४ रावण १. वेस्टरगाड रामशर्मन ६,१० शंकर राहुलक ६६ शिवदत्त रिस्टेविड्स २३ श्रीमती रिरडेविड्स रुय्यक ३८ श्री हर्ष २, ५,५२ शूद्रक लक्ष्मीधर ६,१०,५० शेपकृष्ण ल्यूडर्स १७, १८, २३ सदानंद लुडविग अल्सडोर्फ ५१ सद्धमजोतिपाल लेसैन , २०, २१, ४३, ४६, ५० सद्धम्मालंकार वजिरबुद्धि ३३ सद्धमपालसिरि वट्टकेराचार्य ४२ सद्धमसिरि वररुचि ६,७,४१, ४६, ५०,७६ संघदास ७E, RE,६६ संघरक्सित वसंतराज ६ समरिपुत्त व्याडि सर ओरेल स्टेइन यापतिराज ४, ३६, ४० सर्वसेन वारमट्ट ८,५०,५२, ६४ स्कन्दिलाचार्य चाच्चिसर ३४ स्टीवेन्सन यासुदेव ३ स्टेनकोनो विक्रम विजयमुनि ६५ स्टेस्वर्ग विण्डिश २३ स्थूलभद्र विमनसूरि ४० स्वयंभू विश्वनाथ ४१ सातवाहन येवर ४७, ४८ सिंहदेव मणि ४०,५१ ३४,३६ ३४ ४४ १४,४२ ३६ + LA . अमृतोदय १ [६] रचनाएँ पृष्ठ रचनाएँ २० कहावितरणी ३३,३४ श्रलंकार तिलक ८४४ कचायन वएपना अलंकार रत्नाकर ३८ करह दोहा कोश अलंकार विमर्शिनी ३८ कत्तिगेयाणु पेक्खा ४२ अलकार सर्वस्व ३८ कथासरित् सागर ५०,५१,५२ अवदान शतक १ कथावत्थु ३१ अवारसयनिज्जुति ४७ कंस वध १७,२० अष्टाध्यायी कंसवहो अरुप्रोगादार ४७ कप्प श्राउरपंचक्साण कप्प वडिंसियाओ आचार ४६,४८४६ करकण्ड चरिउ प्राचारदसायो ४४ कपूर मञ्जरी १७,३८,४२ आवश्यक कल्पसूत्र ४८ इतिवृत्तक २७२४ कारिका १३८ ईसप की कहानियाँ २४ कालकाचार्य कथानक उत्तरज्मायण सुत्त ४५,४७ ४२ उदान २४,२७ काव्यादर्श ३,७,३८,३६,४६,५०,५२ सपांग काव्यप्रकाश उपरिपरणास २६ काव्य प्रकाश दीपिका । ३८ उवएसमाला ४१ घुमारपाल प्रतियोध उवासगदसाप्रो ४५,४६,४८८६ कुमारसंभव ४५,४८ कुरुन्दी ३३ प्रोपनिन्जुत्ति सन्धक २४,२५२ अंगुत्तर निकाय २५,२६,३१,३३ सरोष्टी धम्मपद मंग ४६ सुरफ निकाय २५.२७,३०,३३ . कालेप कुतूहल ओक्वेय सुत्त रचनाएं पृष्ट रचनाएँ पृष्ठ + खुद्दक पाठ २७,३२ जातक विसोधना ३५ खुद्दसिक्खा टीका ३४ जिनलंकार ३४ गउडवहो ४,३६ जोयकप्प ४७ गउडवधसार टीका ४० जीवानंदन गणिविज्जा णयकुमार चरिउ गंधवंस ३५ ततिय परमत्यपकासिनी ३४ गाथा २४ ततिय सारत्थमंजूसा ३४ गाहासत्तसई ३७, ३८ तांदुलवेयालिय गीतालंकार ६ तिपिटक २८,४४ गेय्य २४ तीर्थ कल्प चउसरण धेरगाथा २७ चएडकौशिक थेरीगाथा २० चतुत्य सारस्थ मंजूसा ३४ छसधातुवंस ३५ ४७ दसवेयालियमुत्त गरिया पिटक २७,३० दशरूप ३,१६,१६,५० चित्रसेन पद्मावती चरित १६ दशरूप टीका ३६ द्वारायती ४१ ४. दिहियाय चैतन्य गन्द्रोदय २० दीप निकाय २४,३१,३ पनि जुति ४७ द्वीप यंश पापादुड ४३ दुतिय परमत्यपकासिनी प्यमुत्त ४७ देविन्दत्यय ५३ दशीकोश जातक माला २४.२१.३०,२३ देशीनाम माला जातपट वएपना धम्मपदहस्या मातफमाला धम्मपद २७३ चन्दा विग्मय घुल्ल सहनीति घेद मुत्त जसहर परित घातु वंश [८] रचनाएँ पृष्ठ रचनाएँ पृष्ठ धम्म संगणि ३१,३३ पइएण ४७ ध्वन्यालोक ३८,४० पउम चरिय ४०,५३ धातुकथा ३१ पञ्चकाय धातुकथा अनुटीका वएणना ३५ पश्चिंत्य काय ४३ धातुकथा टीका वएणना ३५ पञ्चप्पकरणठ कथा ३३, ३४ धात्वत्थ दीपनी पञ्च तंत्र २६ धातु पाठ ३६ पट्ठानप्पकरण (महापठान) धातु मंजूसा ३६ ३१, ३२ ३४ पपञ्चसुदनी ३३, ३४ धूर्त समागम परमत्थ जोतिका ३३ नन्दी ४७,४८ पट्टान दीपनी नलाट धातुवंस ३५ पट्टान वाना परियार २४ नाट्य शास्त्र ६, १६, ४५, ५२, ५३ परिवार पाठ २४ ६४ ३२ नायाधम्म कहांओ पठम परमत्थपकासिनी ३४ नारायण विद्या विनोद ६ पाहावागरणेम ४६ निस २७, ३०, ३३ पन्नवण निदानकथा ३४ पठम सारत्य मंजूसा निरगावलियावो ४७, ४२ पद साधना निरुति पिटक १३८ पयोगसिद्धि निसीह ४७ पटिसंभिदामम्ग नेत्तिपकरण परमत्य दीपनी नेत्रमावनी परमत्य विनिच्चय नेमिनाह परिउ ४३ परमात्म प्रकाश ५३ न्यास टीका . . परित्त (महापरित्त) २५, ३३ [] रचनाएं पृष्ठ रचनाएँ पवयए सार ४२ पाइअलच्छी प्रकाशिका १ पाइअलच्छी नाममाला प्रवन्ध चिन्तामणि पाउड दोहा प्रमोध चन्द्रोदय १६,४६ पाटिक वग्ग २५ प्राकृतानुशासन १०, ५३, ८०,८४ पाटिमोक्स विसोधिनी १०,६३, १२७ पालि महाव्याकरण १३८ प्राकृत कल्पतरु १. पाटिमोक्स प्राकृत कामधेनु १० पिडनिति प्राकृत चन्द्रिका ३, १० पुग्गलपनति ३१ प्राकृत धम्मपद पुष्पचूलाश्रो प्राकृत प्रकाश ७, ६, ७५,७६, ६६ पुफियानो पुथ्य प्राकृत प्रयोष टोका पुराण १६,२६. पेटकोपदेश प्राकृत पाद ३३ पेटकालंकार प्राकृत मंजरी पेतवत्यु २७. माछत मणिदीप १० पालरामायण ४८,५,५२ मातरूपावतार पालायतार प्राफरालंकेश्वर २० माझए अन्य भारत लतग ६,५२ पारदरित भापत व्यापरण ६, १० ५३, ७५, युद्धपोमुप्पत्ति ७६.८७, ६३, ६६, १२७ बुद्धालंपार मादत संजीवनी সুমা प्राशन सर्यम् . मगपती भंग प्रास सर्यस्य १.१३ १७ भपिमयत पदा प्राधम गुपोधिनी ६ मिग्नुणी पिभंग २४,२ ६ ६ ४२ मधुरत्य विलासिनी (१० ] रचनाएँ पृष्ठ रचनाएँ भीमकाव्य ५२ महुमहवित्र ३१, मोग्गलान पंचिका पदीप ३६ मायाधम्मकहा विवागसुत्त मोग्गलान व्याकरण ३६, ११८ मालती माधव मोहराज पराजय ५१ मालविकाग्निमित्र मभिम निकाय २५, २६, ३३ मिलिन्द पन्ह मझिम पपणास २६ मुद्राराक्षस १७,१६, ४६, ४२ मणिदीप ३५ मूलाचार मणिसार मंजूसा ३५ मूलपण्णास २६ भत्त परिएमा ४७ मूल सिक्खा ३४ ३३ मूल सुत्त मनोरथ पूरणी ३३, ३४ मृच्छकटिक १७, १६, २१ मनोरमा ६ यजुवद -मधुसारथ दीपनी ३५ यमक ३१ मल्लिकामोद यमक परगना ३५ महाअठ्ठ कथा ३३ योगसार महानिरुत्ति १३८ रसिक सर्वस्व ३ महानिसीह ४७ रामायण महापच्चरी ३३ राजाधिराज विलासिती महापच्चक्खाण १७ रायपसेसाइज महाभारत १६ रावणरहो ३६ महाभाष्य ५ रूपसिद्धि महापग २४,२५ ऋग्वेद महास ३४, ३५ ऋपम पञ्चाशिका महाविच्छेदनी ३३ ललित विमहराज नाटक महाविमंग २४ ललित विस्तर ३६ १ १४.११७ [ ११ ] लोकप्पदीपसार वजालन बजिर बुद्धि चम्हि दसानो वंसस्थ पकासिनी वय्याकरण चवहार व्युत्पत्तिवाद वाग्मट्टालंकार वृहत्कथा मञ्जरी रचनाएँ पृष्ठ रचनाएँ ३५ विवाह पएणति ३८ विषमवारण लीला ३३ वीरत्थय वीसति वएपना वुत्तोदय ३४ वेणीसंहार १६ वेदल्ल २४ ६ वृहत्कथा ८,४६,५० याग्भट्टालंकार टीका २ वार्तिक वृहत्कथा श्लोक संपह वासुदेवहिण्डि ४२, ५३ शब्द चिन्तामणि विक्रमोर्वशी ४०,५१ शाकुंतलम् ३, १६, २१, २२,४२ विद्धाल भन्जिका १७,४२ पडभापा चन्द्रिका ३,१० विन्टरनित्स सच्च संखेप विनयगृहस्थ दीपनी सदत्य भेचिन्ता ३६ विनयत्य मंजूसा ३४ सद्धर्म पुण्डरीक विनय पिटक २३, २४, २५.३३, ३४ सद्धम्मप्पकासिनी विनयलंकार ३५ सयन्म संघ विनय चिनिष्चय ३३ सद्धनीति ३३ विनयसमुत्थान दीपनी दीका १४ संथार विमंग ३१, ३३ संदेश फया विमति छेदनी ३३ संधि काप विमानपत्यु २७ सम्मोह विमोदिनी ३३, ३४ ४६.४० संबंध चिंता वियाग सूत्र ५३ सुत्त समरैच्च कहा [१२] रचनाएँ पृष्ठ रचनाएँ पृष्ठ संयुत्तनिकाय २५, २६, ३३ सीलखन्ध वग्ग २५ संक्षिप्तसार ६ सुत्त निद्देश टीका सनत्कुमार चरित २४, ३४ समन्त पासादिका ३३, ३४ सुच निपात २४, २७ समय सार ४३ सुत्त पिटक २३, २४, २५, ३१, ३३ ४१ सुत्त संघ समवायंगसुत्त ४४,४५,४६, ८४, सुत्त विभंग २४,२५ ८६ सुमङ्गल विलासिनी ३३, ३४ सप्तशतकम् ३७ सुबोधालंकार सरस्वती १७,५७ सुरिय पएणति ४५ सरस्वती कंठाभरण १६, ३८,४०,५० सुवर्ण भापोत्तम सूत्र १६ सामवेद १ सूयगडागसुत्त ४५,४६,४८ सारत्य दीपनी ३४ सेतु बंध ३६ सारत्थ दीपनी टीका ३४ सेतु सरणि ३६ सारस्थ पकासिनी ३३, ३४ हम्मीर मदमदन सासनवंस ३५ हर्षचरित सावयधम्म दोहा ५३ हरि विनय ३६ साहित्य दर्पण १६, ३८, ४५ हास्यार्णव २० सीमा विवादविनिच्चय कथा ३५ हेमप्राकृततिदुण्डिका सहायक-ग्रन्थ सूची अंग्रेजी-- १. ऑरिजिन ऐन्ड डेवलेपमेन्ट प्राव बंगाली लैंग्वेज-डॉ सुनीति- कुमार चाटुा * २. इन्ट्राडक्शन टु प्राकृत-डॉ० ए० सी० वूल्लर, १६३६ ३. इन्डो आर्यन ऐन्ड हिन्दी-डॉ० मुनीतिकुमार चाटुा ४, ऐन इन्ट्रोडक्शन टु प्राकृत ग्रामर-डॉ. दिनेशचन्द्रसेन ५. ऐन इन्द्राडक्शन टु अर्धमागधी-डॉ. ए. एम्. घटगे, १९४१ ६. श्रोल्ड परशियन इन्सक्रिप्शंस, डॉ० सुकुमारसेन १६४१ ७. कम्परेटिव ग्रामर श्राव दि मिडिल इन्डो ग्रार्थन-डॉ. मुकुमारसेन, १९५१ ८. पालि लिटरेचर ऐन्ड लैंग्वेज- ( विल्हेल्म गाइगर) अनु. डॉ० वटकृष्णघोप, १९४३ ६. प्राकृत लेंग्वेजेज़ एन्ड देयर कन्ट्रीन्युशन टु इन्डियन कल्चर- डॉ० एस० एम्. को, १६४५ १०. प्राकृत धम्मपद-संपादक-डॉ. वेनीमाधव वरुया, शैलेन्द्रनाथ मिना, १६२१ २१. हिस्ट्री श्राव् इन्डियन लिट्रेचर-मॉरिस विन्टरनित्स, भाग २, १६३३ जर्मन- १. प्रमाटिक डेर प्राकृत स्पाखेन-डॉ. रिचार्ड पिशेल प्राकृत- १. कंसवहो ( रामपाणिवाद) डॉ. ए. एन्. उपाध्ये, १६४० २. गउपवहो (यास्पतिराज पांडुरंग पण्डित-१६२७ ३. गाहासचसई (हाल गंगाधर मह, १६११ ५ ७. १० [ २ ] ४. दशीनाममाला (हेमचन्द्र ) थार. पिशेल, १६३२ भवितयत्त कहा- ( धनपाल ) गायकवाड शॉरियन्टल सिरोग, २० स० सी० डी० दलाल, पाडुरग दामोदर गुणे, १९२३ ६ पाइअलन्छी नाममाला-( धनपाल ) प्राकृत प्रकाश (वररुचि) डॉ० पी० एल० वैद्य, १६३१ ८. प्राकृत-लक्षण ( चण्ड), हार्नली, १८८० ६. प्राकृत व्याकरण ( शब्दानुशासन हेमचद्र ), बाम्बे संस्कृत ऐन्द्र प्राकृत सिरीन,६०, १६३६ रापणवहो (प्रवरसेन )-रामदास भूपति, १८९५ ११. वज्जालग्ग ( जयवल्लभ )-स० जूलियस लेबर, १६४४ १२ समराइचय हा ( हरिभद्र)-डॉ. हरमन जकोबी, १९२६ सस्कृत- अभिज्ञान शाकुतलम् (पातिदास), स० नारायण बालकृष्ण गोडबोले, १६१६ २ कर्पूरमजरी ( राजशेषर), स० चासुदेव, १६२७ ई. ३. मृच्छकटिकम् ( शूद्रक) नारायण बालकृष्ण गोडबोले, १८६६ ४. रत्नावली-श्रीहर्ष देव, १६१८ ५ स्वप्नवासवदत्तम् (मास), श्री जगनाय शास्त्री, स० २००२ हिन्दी-- १. अशोक ये धर्मलेस, जनार्दन मह. सवत् १९८० निनागम क्या सग्रह, अध्यापन वेचरदास दोशी, १६४० पाइय सह महरणच, भाग १४, गोपिन्ददास सठ पालि महाव्यावरण भिक्षु जगदीश काश्यप, १६४० ५. पालि-अयोध प० श्राद्यादच ठाकुर प्राकृत प्रवेशिका (अनु० )-डा० पनारसीदाय जा हिन्दी में अपम श का योग श्री नामपरसिद, १६५२ १ २ ३ Y ८ शुद्ध . [ २ ] पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध |पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध ६२ २० द्वितीया द्विवचन ,फुट०१ व्यातृते व्याहते ४ काविभ्याम् कविभ्याम् ७८ ७१ भोइण "११ प्रयनलाघव प्रयत्नलाघव २ गदुन्ग्र ६४ ५ तत्तल्य . तत्तुल्य ७६ "५ सान्त सन्ति दण्डी और८० है ६५ ६ का का रूप ७ उस व्युत्पत्ति ६ अङ्गेऽम अङ्ग अङ्गे ६६ १४ अपने अपना ७ देड्डुभो डुगडुभो १ " हदण्डी " १६ व्युत्पति १४ गोष्ठ शॉट " ४ होती " १० किया " " " थान . "२० उसका १ की का १०८ १६ का के होता १७ संबंध के संबंध दिया ११० ३ भी की की ११२ २२ द्यति धु ति ६८ २५ पुज (११५ ५ धर्य जानं "फुट० १,४श्या० न्या. व्याप ७० १७ देवदासिस्यि देवदासिक्यी ११६ ११ अथवा और उसके १२० ५ अध्धो ८ सोहगोरा सोहगौर, अधो ७१ १२२ १० उसू "१६ कल्यान कल्याए १२३ १ तुम्हहि तुम्हेहि x विकल्प ७३ १५ दुई १२४ ४ मिलाता मिलना ७४ श्रावक ८ संभ्रय संभ्रम १२५ २ अंस ग्रंमु ७५ २० भरद भरह ६ किया x ७७ ६ वल्पिक थैकल्पिक १२६ १३ -ल -ल का "१५ गत्या वृत्ता लिरसता मिलता " १५ कि १४ वैकल्प ६ श्रवक " " पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध "" ८ " " " ७ " ८ शुद्ध [पृष्ठ पंक्ति शुद्ध शुद्ध ११ त्यगिनो त्यागिनो १ मण्डल मण्डलं १ यन्त्रण গান্য २ पत्तम्मि एतम्मि " फुट० २ नपुं पु० ५ हारजटठ हारतहि २० लोयाणे लोयणो १० /२५ ६ सहस्स सहस्स फुट० ६ न. पु. २६ १ दसियाए दासियाए १५ शक्य शम्यते ३ महागान्दो महाणन्दो E ४ दिवसा दिवसाः फुट० २ प्र० पु० १६ सन्मान: सन्मानाः २७ ५लाड़ल लाडल सजनसङ्कलापि जनसङ्कलारि२८ ५सग्गायवररसरमापवरग १० ५ /क्षप् क्षिप् १२ तणायो तणयो "फुट०१६ नपुं० २६ ३ मजिय भणियं ११, १ नपुं० पु० दुल्या १३ १५ विशुद्धाम् विशुद्धम् सौक्खेण सोवखेण १४पुट०७ नपुं० पु० 2. फुट०१४ नपुं० एतस्य ३० ८ णिच्यं णिचं ६ दिष्ट्या ३० दृष्ट्या १० गुणथुई गुणथुई २०फुट०५ श्रमुयोः तेषु ३ नि:स्थापनम्गे नि:स्थापनम् ३१ ६ अदस तद १४ मुहंजयायं सुहजण्यं १ द्वि० फुट० ४ नपुं० स्त्री० १६ एन्ति जन्ति एन्तीजन्ती ७ तेव २ तावत् तेषु ,,फुट० १ नपुं. श्रमुयोः तायत् स्त्री १ नन्ददु नन्दतु ३४फुट०२ " ७दुत्य तस्य " २११ बहु " "" " पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध " १२ भएते " शुद्ध अलियं तुम भणसिजद अम्हाण ८ श्रात्मानो प्रात्मनो अजय ३ वान घान पृष्ठ पंक्ति प्रशुद्ध १८ -फुलाया -फुल्लया ५१ २३०- चेटी ३६ ६ निवर्तिध्यत निवर्तिप्यति ५३ १४ पियाय पिश्रय ६ विस्तरेण विस्तारेण ५४ १६ विणोदेसि विणोदेमिः १७ प्रत्यक्षः प्रत्यक्षः भवणदो भवणादो. ७ उपसम्पमि उपसम्पामि ५७फुट० ३ क्त प्रत्यय फुट० २३ त भूत० कृदन्त ४ १ अंत में मोदि স্বর २ श्रभित्मदि श्रभिश्मति ५६ फुट ८ विपर्याय विपर्यय १७ विराणाविरसं विएणविरस स्त्री० , फुट.३/नि १६ च ४ श्रगुप्रेतिः अनुप्रेषितः ६२ १ पयायेण पर्यायण श्रार्या ५ कम कर्म ४६ १ पिशापवि- विमापपि ६ निमितन निमित्तेन मात्रा जीनीहि जानीदि यड्ढ १६ एएयो हरयोः १० मुठद्ध २६ शनम् গয়ানম २१ शानन् प्रसानम् ve ६ अलिङ्ग थालिग ७ परम पुरं परमपुर नारुदत्तों गट. १ न. १७ समाधा सभाध. ६५, ३ पासितोमि प्यासितोरि सपुर.६ न. खो ५ प्रारंभ में दारफ যাক বেবিং, च की " " " १. मुरतं " " " " " " " ६ गेम " मुष्ठ पंक्ति माद्ध परत पंक्ति प्रशुद्ध शुद्ध १५ तस्यान्य तस्यान्य ११ महाभायों मह्यमार्यो १६ दिरोगो क्षिरोगों ८२ ३ प्रसर्य प्रसूर्य प्रसर्प प्रसर्प १८ श्रात्मीयायानम् अात्मीयायानम् ४ समिकस्य समिक्स्य १६ एततस्य एतस्य ६ भविष्यामि भणियामि ६७ १२ चारुददतं चारुदत्तं ७ यादि अपि " मारचितु मारयितुं १७ अभिगय अभिगयठे २० स्वैरम् स्वरैकम् ६ सीसङ्किणि ससिसिणि ६६ १३ माशुले भाशुले ४ रारेस सरीरे ,,फुट ५ विवर्जनीय विवर्जनीयक ८८ १,२ प्रयुत्तः प्रयुक्तः १५ सक्डिकाण सकिडिकशि ७३ २२ स्वकुल्याना स्वकुलाना ९ २० नास्त: नास्ति ७५ ८ गहहए गद्दहीए र १० गाणी -माणा ६ युडको घुड्डुको ६३ १२ श्राणु গন্তু ७६ पपि E८ ७६ १६ ण्डाधिपश्शं शडाधिवश्श EE १८ विहुं वि ६ धमथनत्म एशे १०० १ अठगिसो अठगियो शमए २ शोठी शेठो ७६ घड्दामि १०२ ७ फलं कालं समिक १०३ ११ (सिच) तिच) १, धत करोमि " ६ एप १०५ १ थारोपित अरोपित १० घूतकरी है परचा पलत १४ कामयी पाष्ठमयी १६ ठितिस्या ठित्तीक •८२ ५ कराय- कराणा- १०६ ११ धम्जन अंवत्र ७ पविह ७ दुख दुस ति . . " x ७७ ग " १४ एहो "शामए ८वहामि २८ समिक पद "चत १०४ २ करो चतकरो १०७ "

Prakrit Vimarsh

Author
Agarwal,saryu Prasad
Title
Prakrit Vimarsh
File name
Prakrit Vimarsh
Text
OCR done
Citation
1952
Published
2012/08
Publisher
Lucknow.,vishvavidyalaya
Language
Sanskrit
Pages
357
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313307
Barcode
99999990322007.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
FlfPYBtmoik
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