Sanmati Library, Jaipur

Prasad Mandan

Jain, Bhagwandas · 2009/10

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प्राप्ति स्थान :-
बी. एस. शर्मा B. Se. विशारद
मोतीसिह मोमिया का रास्ता
यति श्यामलालजी का उपाश्रय
जयपुर (राजस्थान)
सर्वाधिकार प्रकाशक के स्वाधीन है।
प्रथमावृत्ति १०००
मुद्रक :
अजन्ता प्रिन्टर्स,
जौहरी बाजार, जयपुर।

प्रस्तावना . भारतीय प्राचीन स्थापत्यकला के सुन्दर कलामय देवालयो, राजमहलो, किलाप्रो, जलाशयो, यत्री और मनुष्यालयो प्रादि अनेक मनोहर रचनामो को देखकर अपना मन अतीव आनन्दित होता है । यही 'वास्तुशिल्प' है। वास्तु की उत्पत्ति के विषय मे अपराजितपृच्छा के सूत्र ५३ से ५५ तक मे विस्तार पूर्वक वर्णन लीखा है। उसका साराश यह कि प्राचीन समय मे अंधकासुर नाम के राक्षस का विनाश करने के लिये महादेव को सग्राम करना पडा । उसके परिश्रम से महादेवजी के कपाल मे से पसीना का एक विन्दु भूमि पर अग्निकुण्ड मे गिरा । इसके योग से वहा एक वडा भयकर विशालकाय भूत उत्पन्न हुआ, उसको देवोने पौधा पटक करके उसके विशालकाय शरीर के ऊपर पेंतालीश देव और पाठ देविया ऐसे कुल ५३ देव बैठ गये पौर निवास करने लगें । जिसे अप० सू० ५५ श्लो० १२ मे कहा है कि 'निवास. सर्वदेवाना वास्तु वै स्थानतो विदुः।' अर्थात् ये देवोका निवास होने से महाकाय भूत वास्तुपुरुष कहा जाता है। इसका वर्णन इसी प्रथ के पाठवें अध्याय मे श्लोक ६६ से ११४ तक किया गया है। यह प्रासाद मण्डन ग्रंथ शिल्पिवर्ग मे अधिक प्रशस्त है, इसके आधार पर प्राधुनिक सोमपुरा ब्राह्मण ज्ञातीय शिल्पिवर्ग देवालय बाधने का कार्य प्रपनी वंशपरपरा से करते पाये है । यही इस अथ की विशेष महत्वता है और देवालयो की मुख्य चौदह जाति बतलाई हैं ( देखो अध्या० १ श्लोक ६ठा का अनुवाद), इनमे से नागर जाति के देवालय बावने का यह प्रशस्त गंथ माना जाता है । इसमे देवालयो के गुणदोप और माप पूर्वक बाधने का सविस्तर वर्णन है। देवालय बनाने का महत्व- प्रासाद का अर्थ देवमदिर प्रथवा राजमहल होता है। उनमे से यह अथ देवमदिर के निर्माण विषय का है। इसको बनाने का कारण शास्त्रो मे लिखा है कि- "मुरालयो विभूत्यर्थ भूपणार्थ पुरस्य तु । नराणां भूक्तिमुक्त्यर्थ सत्यार्थ चैव सर्वदा।। लोकानां धर्महेतुश्च क्रीडाहेतुश्च स्वभुवाम् । कीर्तिरायुर्यशोऽर्थ च राज्ञा कल्याणकारकः ॥" अप० सू० ११५ मनुष्यो के ऐश्वर्य के लिये, नगर के भूषणरूप शृगार के लिये, मनुष्यो को अनेक प्रकार की भोग सामग्री को और मुक्तिपद को देनेवाला होनेसे, सब प्रकार की सत्यता की पूर्णता के लिये, मनुष्यो को धर्म का कारणभूत होने से, देवो को क्रीडा करने की भूमि होने से, कीति, आयुष्य भौर यश की वृद्धि के लिये मोर राजामो का कल्याण के लिये देवालय बनाया जाता है ।

२ सूत्रधार स्थपति- देवालय गृह आदि वास्तुशिल्प के काम करने वाले को सूत्रधार अथवा स्थपति कहा जाता है। चौदह राजलोक के देवोंने इकट्ट होकर शिवलिंग के आकारवाली महादेवजी की अनेक प्रकार से पूजा की, जिससे प्रासाद की चौदह जाति उत्पन्न हुई इन प्रत्येक मे चोरत, लंबचोरस, गोल, लबगोल और अष्टान (आठ कोना वाली) ये पाच पाकृतिषाले प्रासाद शिवजी के कयनानुसार ब्रह्माजी ने बनाये । इन प्रत्येक मे चौरस आकृति- वाले प्रासाद की ५८, लबचोरस प्रासाद की ३००, गोल प्रासाद की ५००, लंबगोल प्रासाद की १५० और अष्टास्त्र प्रासाद की ३५० जाति भेद हैं। इनमे मिश्र जाति के प्रासाद के ११२ भेद मिलाने से दो हजार जाति के प्रासाद होते है। इन प्रत्येक के पच्चीस पच्चीस भेद होने से पचास हजार भेद होते है। इन प्रत्येक को पाठ पाठ विमक्ति होने से कुल चार लाख भेद प्रासाद के होते है। इनका सविस्त वर्णन जानने वाले को शान्त्रकारने स्थपति ( सूत्रधार ) कहा है। प्रासाद की श्रेष्ठता- भारतीय संस्कृति मे प्रासाद का अत्यधिक प्रादर किया जाता है, इतना ही नहीं परन्तु पूजनीय भी माना जाता है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि प्रासाद को शिवलिंग का स्वरूप माना गया है । जैमे शिवलिंग को पीठिका है, वैसे प्रासाद को भी जगतीरूप पीठिका है। प्रासाद का जो चोरस भाग है, बह ब्रह्म भाग है, उसके ऊपर का जो अष्टान भाग है, वह विष्णुभाग है और उसके ऊपर का जो गोल शिखर का भाग है, वह साक्षाद शिवलिंग स्वरूप है । दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि प्रासाद के प्रत्येक अग और उपागो में देव और देवीयो का विन्यास करके देव प्रतिष्ठा के समय उसका अभिषेक किया जाता है। इसलिये प्रासाद सर्व देवमय बन जाता है। . तीसरा कारण यह भी हो सकता है कि-प्रासाद के मध्य भूतल से धारिणी शिला के ऊपर से एक नाली (जिसको शास्त्रकार योगनाल अथवा ब्रह्मनाल कहते है और आधुनिक शिल्पी पमनाल कहते हैं) देव के सिंहासन तक रखने का विधान है। इसका कारण यह माना जाता है कि प्रासाद के गर्भगृह के मध्य भाग से जलचर जीवी की आकृतिवाली धारणी नाम की शिलानीव मे. स्थापित की जाती है, उसके पर सुवर्ण प्रयवा चादी का कूर्म (कडूमा) रख कर योगनाल रखी जाती है। इसका कारण यह हो सकता है कि-यह धारणी शिला के ऊपर जलचर जीवो की प्राकृतियो होने से यह शिला क्षीर समुद्र में गंपशायी भगवान स्वरुप माना गया, इसके नाभिकमल से उत्पन्न हुआ कमलदंड स्वरूप योगनाल है, इसके ऊपर ब्रह्मा की उत्पत्ति स्वरूप प्रतिष्ठित देव है। इत्यादि कारणो से प्रासाद का अधिक आदर किय जाता है। प्रासाद के निर्माण का फल- "खशक्त्या काठमृदिष्टकाशैलधातुरत्नजम् । देवतायतनं कुर्याद् धर्मार्थकाममोक्षदम् ॥" अ० १. श्लो० ३३ अपनी शक्ति के अनुसार लकडी, मिट्टी, ई, पाषाण, धातु अथवा रत्न, इन पदार्थों मे से किसी भी एक पदार्प का देवालय बनावें तो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है । 'कोटिन तृणजे पुण्यं मृण्मये दशसङ्ग णम् . ऐष्टके शतकोटिघ्नं शैलेऽनन्त फल स्मृतम् ।।" अ० १ श्लो० ३५ देवालय घासका बनावें तो करोड गुना, माटीका बनावें तो दस करोड गुना, इट का बनावें तो सौ करोड़ गुना और पाषाणका बनावें चो अनत गुना फल मिलता है। वास्तुशिल्प के पाठ सूत्र वास्तु शिल्प के इमारती काम करने के लिये शिल्पीओ के पास मुख्य पाठ सूत्र पाये जाते है। उनमे प्रथम दृष्टिसूत्र, दूसरा हस्त (गज ) सूत्र, तीसरा मुज की रस्सी, चौथा सूत का डोरा, पाचवां अवलव, छट्ठा काट कोना, सातवा साधणी ( रेखल ) और पाठवा प्रकार है। इसका परिचय के लिये देखीये नीचे का रेखा चित्र। इनमे जो भूमि आदि वस्तुप्रो का नाप करने के लिये दूसरा हस्तसूत्र है, यह तीन प्रकार के माप का है । उसको जानने के लिये माप की तालीका इस प्रकार है- ८ परमाणु = १ केशान, ८ केशाग्न = १ लीक्षा ( लीख) ८ लीक्षा = १ जू, = १ यवोदर, ८ यवोदर = १ अंगुल, मात्रा, २ अंगुल -१ कला, गोलक, २४, ३ ११ मंगुल १ गोकर्ण १२ १ बिलाद, ताल, बित्ता, १४ -१ उद्दिष्ट, पाद, २१ १ रलि, = १ अरलि, हाथ, दो फुट का गज, ४२ अंगुल = १ किष्कु, -१ व्याम, पुरुष, = १ धनुष, नाडीयुग, १दड, ३० धनुष - १ नल्क, १००० २ कोस ४ गव्यूत - १ योजन, १ पर्व, B ४ ५ = १ मुष्टि, मूठी, -१ तल, १ करपादांगुली - १ दिष्टी, ७ = १ कोस 1. dow- - - तुणी, १ गव्यूत ८ - ६ १० १ प्रादेश १ शयताल - उपरोक्त जो पाठ यवोदरका एक अगुल माप लीखा है, यह तीन प्रकार का माना जाता है। जैसे- पाठ यवोदर का एक अंगुल यह ज्येष्ठ माप का, सात यवोदर का एक प्रयुल यह मध्यम माप का और छह यवोदर का एक प्रगुल यह कनिष्ठ मानका अंगुल माना जाता है। इन तीन प्रकार के अगुलो में से जिस २४ प्रगुल के नाप का हाथ बनाया जाय तो यह हाथ भी ज्येष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ मानका होता है। जैसे-पाठ यवोदर का एक प्रगुल, ऐसे २४ अगुल का एक ज्येष्ठ हाथ, सात यवोदर का एक प्रगुल, ऐमे

आठ प्रकार के सूत्र
2-हाथ
रुद्र
१-दृष्टि सूत्र
६-गुणियां
वायु *
३-मुंजकीडोरी ४-सूल कीडोरी अवलंब
विश्वकर्मा
8
अति
*-
-प्रकार
ब्रह्मा *
कान*
७-लेबल
वरुण-*-
सोम
*
विष्णु
जुब्लीब्लाकुजयपुर
वास्तुशिल्प के आठ सूत्र

५ २४ अंगुल का एक मध्यम हाथ और छह यवोदर का एक अंगुल, ऐसे २४ प्रगुल का एक कनिष्ठ हाथ माना जाता है। इन तीन प्रकार के हाथो मे से-गाव, नगर, वन, बगीचा, किला, कोस, योजन प्रादिका नाप ज्येष्ठ मान के हाथ से, 'प्रासाद ( राजमहल और देव मदिर), प्रतिमा, लिंग, जगतीपीठ मडप और सब प्रकार के मनुष्यो के घर ये सब मध्यम मान के हाथ से और सिंहासन, शय्या, बर्तन, छत्र, शस्त्र और सब प्रकार के वाहन आदि का नाप कनिष्ठमान के हाथ से नापने का विधान है। हाथ की बनावट- हाथ मे तीन तीन प्रगुल की एक २ पर्व रेखा माना है, उसके स्थान पर एक २ पुष्प की प्राकृति किया जाता है। ऐसे पाठ पर्व रेखा होती है । चौथी पर्व रेखा हाथ का मध्य भाग समझा जाता है, इस मध्य भाग से आगे पाचवी अगुल का दो भाग, आठवी प्रगुल का तीन भाग मोर वारहवी अगुल का चार भाग किया जाता है। माने है। हाय के प्रत्येक अगुल के कापा का एक २ देव है, जिसे २४ अगुल के २३ कापा होते हैं, इनके देवो के नाम राजवल्लभमडन अ० १ श्लो० ३६ मे लिखा है । परन्तु पर्व रेखा के पुष्प का आठ और एक पादि ऐसे नव देव मुस्य जैसे- 'रुद्रो वायुर्विश्वकर्मा हुताशो, ब्रह्मा कालस्तोयप सोमविष्णू ।' अर्थात् हाथ के प्राद्य भाग का देव रुद्र, प्रथम पुष्प का देव वायु, दूसरे पुष्प का देव विश्वकर्मा, तीसरे पुष्प का देव अग्नि, चौथे पुष्प का देव ब्रह्मा, पाचवें पुष्प का देव यम, छठे पुष्प का देव वरुण, सातवें पुष्प का देव सोम और पाठवे पुष्प का देव विष्णु है । इन नव देवो मे से कोई भी देव हाथ उठाते समय शिल्पी के हाथ से दव जाय तो अशुभ फलदायक माना है । इमलिये शिल्पीयो को हाथ के दो फूलो के बीच से उठना चाहिये । इसका फल समरागरण सूत्रधार मे लिखा है कि- हाथ (गज) को द और वायु देव के मध्य भाग से उठावें तो धन की प्राप्ति और कार्य की सिद्धि होवे । वायु और विश्वकर्मा देव के मध्य भाग से उठावें तो इच्छित फल की प्राप्ति होवे । विश्वकर्मा और अग्निदेव के मध्य भाग से उठावें तो काम अच्छी तरह पूर्ण होवे । अग्नि और ब्रह्मा देव के मध्य भाग से उठा तो पुत्र की प्राप्ति और कार्य की सिद्धि होवे । ब्रह्मा और यमदेव के मध्य भाग से उठायें तो शिल्पी की हानि होवे । यम और वरुण देव के मध्य भाग से उठावें तो मध्यम फलदायक जानना। वरुण और सोमदेव के मध्य भाग से उठावें तो मध्यम फल जानना । सोम और विष्णु देव के मध्य भाग से उठावे तो अनेक प्रकार की सुख समृद्धि होवे । १ समरागण सूत्रधार ग्रंथ मे ज्येष्ठ हाथ से नापने का लीखा है। २ देखो राजवल्लभमडन मध्याय १ श्लोक ३३ से ३६ तक ।

or इंच, फुट और गज आदिका नाप नीटीश साम्राज्य से हुआ है। इसलिये इसका प्रचार अभी तक चला आ रहा है । आधुनिक शिल्पी अगुल को एक इंच और हाथ को दो फुट मानकर के कार्य करते है । , ग्रंथकार- प्रासाद का निर्माण करने के लिये यह प्रासाद मंडन नाम का रुथ प्रखर विद्वान् 'मंडन' नाम के सूत्रधार ने मेवाड के महाराणा कुम्भकर्ण के समय रखा है। इस विषय मे विस्तारपूर्वक वर्णन सुप्रसिद्ध विद्वदल डॉ. वासुदेव गरणजी अग्रवाल अध्यक्ष-कला और वास्तुविभाग, काशी विश्वविद्यालय की लिखी हुई विस्तृत भूमिका है, इसमे विस्तार पूर्वक लिखा गया है। ग्रंथविषय- इस ग्रंथ मे पाठ अध्याय है । प्रथमाध्याय मे प्रासाद की १४ जाति, भूमि परीक्षा, खातमुहूर्त, वत्संचक्र, पाय, व्यय, नक्षत्र आदिका गणित, दिक्साधन, खातविधि कूर्ममान, धारिणी प्रादि शिला का नाप और देवालय वाधने का फल इत्यादि विषयो का वर्णन है। - शिल्पग्रंथो मे ध्रुव दिकसाधन- वास्तु व को उत्तर दिशा मान करके दिक्साधन करने का विधान है, वैज्ञानिक दिक्साधन यत्र जिसको कुतुबनुमा कहते हैं, इससे देखने से मालूम होता है कि ध्रुव ठीक उत्तर दिशा मे नही है, पश्चिम दिशा तरफ लगभग बीस डीग्री हटा हुआ मालूम होता है। जिसे ध्रुव को उत्तर दिशा मान करके दिशा का साधन किया जाय तो वास्तविक दिशा का ज्ञान नहीं होगा। परन्तु आधुनिक दिन मे दिक्साधन बारह अंगुल के माप वाला शकु से करने का विधान है। परन्तु सूर्य प्रतिदिन एक ही विन्दु के ऊपर उदय नही होता है । जिसे शकु की छाया मे विषमता होती है। इसलिये इसमे भी अमुक अंगो के सस्कार की आवश्यकता रहती है । एवं श्रवण, कृत्तिका, चित्रा और स्वाति नक्षत्र भी बराबर पूर्व दिशा मै उदय नहीं होते है, जिसे इससे भी वास्तविक दिशा का ज्ञान नही होता । इस दिक्साधन के बावत विचार किया जाय तो आधुनिक वैज्ञानिक दिक्साधन यंत्र द्वारा ही करना अधिक अच्छा रहेगा । शास्त्रो मे लिखे हुए प्रमाण उस समय बराबर होगे, परन्तु सेकडो वर्ष व्यतीत होनेसे नक्षन और तारानो की स्थिति में परिवर्तन होजाते हैं । सात मुहूर्त के बावत में पनाग वक्र देखा जाता है , उसमे भी अधिक मतमतावर है । कोई शास्त्र शेषनाग की स्थिति सृष्टि क्रम से मानते हैं तो कोई शास्त्र विलोम क्रम से मानते है। इसमे भी ज्योतिष शास्त्र और वास्तुशास्त्र मे बहूत मतातर है । इसका विशेष खुलासा मेरा अनुवादित राजवल्लभ भंडन ग्रंथ मे लिखा है। दूमरे अध्याय मे जगती (प्रासाद बनाने की मर्यादित भूमि ) का वर्णन है । तथा देवो के वाहन का म्यान मोर उमका उदय, जिन प्रामाद के मडप का क्रम, देव के सामने अन्य देव स्थापित करने का विषय, दिया ये देव, गियस्नानोदक का विवार, प्रदक्षिणा, परनाल और देवो के मायतनो का वर्णन है।

कितनैक आधुनिक शिल्पी जगती पीठ का वास्तविक स्वरूप को जानते है, ऐसा प्रतीत नहीं होता, क्योकि आजकल जो नवीन प्रासाद अथवा महाप्रासाद बनते हैं, उनमे जगती पीठ का प्रभाव ही मालुम होता है । ऐसा निराश्रय प्रासाद को शास्त्रकार उदयकारक नही मानते है । शिव स्नानजल-- शिवजी के स्नान का जल दृष्टिगोचर होने से एव उसका उल्लघन करने से दोष लगता है, ऐसा सनातन धर्माम्नाय है । जिसे शिवलिंग की पीठिका की नाली के नीचे चंडनाथ गण की स्थापना की जाती है । तब रनानजल चड गण के मुखमे जाकर वापस गिरता है, उसको उच्छिष्ट (जूग) मान लिया जाता है। ऐसा शिवस्नान जल का लाधन होजाय तो दोष नही माना जाता । चडनाथ गण की स्थापना मुझे किसी शिवालय मे देखने नही मिली यह वास्तु शास्त्र का प्रचार न होना समझना चाहिये । प्रथा नामिवेष-- एक देव के सामने दूसरे देव स्थापित किया जाय अथवा एक देवालय के सामने दूसरा देवालय बनवाया जाय तो उसको शास्त्रकार 'नाभिवेध' होना मानते है, यह अशुभ है, परतु स्वजातीय देव आपस मे सम्मुख हो तो नाभिवेष का दोप नही माना जाता। नाभिवेध के निषेध का कारण यह हो सकता है कि-एक देव का दर्शन करते हुए दर्शक की पीठ दूसरे देव के सामने रहती है । दूसरा कारण यह भी है कि देव की दृष्टि का अवरोप होना दोषित माना है। तीसरे अध्याय मे खरशिला, भिट्ट, पीठ, मडोवर (दीवार), देहली, द्वारमान, तथा त्रि, पच, सस और नवशाखा आदिका वर्णन है। आधुनिक कितनेक शिल्पी देवालय की पीठ छोटी रखते है, जिसे देवालय दवा हुआ मालूम होता है और पीठ मान से न्यून होने से वाहन का विनाश होना शास्त्रकार लिखते हैं, पीठ न्यून रखने के विषय मे दीपार्णव अथ की सम्पादकीय टीप्पनी पेज न० ५३ मे 'शास्त्रीयमान जो माया हो उसमे से भी फिर अद्धभाग के मान का पीठ बनाना लिखा है । यह तद्दन अशास्त्रीय मन कल्पित है । मेरुमंडोवर- - प्रासाद की दीवार मे दो जघा के ऊपर एक छज्जा होवे, उसको 'मेरुमंडोवर' कहा जाता है। क्षीरार्णव अथकार लिखते है कि मेरुमडोवर को बारह जघा और छह छज्जा बनाया जाता है, इस हिसाब से दो दो जघा के ऊपर एक एक छज्जा रखा जाता है ।' प्रस्तुत प्रथ मे प्रथम माल मे दो जघा और एक छज्जा, तथा दूसरे माल मे एक जघा और एक छज्जा बनाना लिखा है । इसी प्रकार पाबू के और राणकपुर के जिनालयो मे देखा जाता है । जयपुर प्रान्तीय आमेर मे जगत् शिरोमणि के मदिर में प्रत्येक जघा के ऊपर छज्जा रक्खा गया है । दीपार्णव मे प्राचीन देवालयो के तीन चार फोटू मे पीठ और छज्जा रहित लिखा है, यह नजर चूक से लिखा मालूम होता है । पीठ तो सबको हैं, और छज्जा का निर्गम नही होने से छज्जा हीन मालूम होता है।

उदुम्बर (देहली)- देवालय के द्वार की देहली और स्तंभ की कुम्भीगे की ऊंचाई मंडोवर के कुम्भा घर की ऊंचाई के उरावर ला लिखा है । परन्तु कभी बड़े प्रासादो में कुम्भा की ऊंचाई अधिक होती है, तो देहली की ऊंचाई भी अधिक होती है । ऐले समय मे देहली को नीचा उतारना शास्त्र में लिखा है। इस विषय मे मिल्पिनो में मतभेद चल रहा है । कोई मिल्पी कहते हैं कि-'देहली नीची की जाय तो उसके साप स्तंभ की कुम्मियां नी देहली के बराबर नीची की जाय' और कोई गिल्पी देहली नीची करते हैं, परन्तु स्तंभ की कुम्भिया नीची नही करते । इस मतभेद मै जो मिल्पी देहली के साय कुम्भियां भी नीची करता है, उसका मत मास्त्र की दृष्टि ने प्रामाणिक मालूम नहीं होता है । कारण अपराजित पृच्छा सूत्र १२६ श्लोक १ मे तो कुग्भीनो ने देहली नीची उतारता लिखते हैं. तो कुम्भीओ नीचे केने उतरे ? वैसे मीरागव मे तो स्पष्ट लिखा है कि-"उदुम्बरे हते (सते) कुम्भी स्तम्भ तु पूर्ववत् भवेत् ।" कभी देहली नीची किया जाय तो भी स्तंभ और उनकी कुम्भिया पहले के शास्त्रीय नाप के बराबर रखना चाहिये। इसने स्पष्ट मालूम होता है कि-जो मिलि देहली के साथ कुम्भीमो नीची करना मानते हैं-यह प्रामाणिक नहीं है । द्वार शाखा- द्वार की भासा के विषय मे भी गिल्पोमो में मतभेद मालूम होता है । स्तंभ शाखा के दोनो तरफ एज एक कोली बनाई जाती है, उनको शिल्परत्नाकर के सम्पादक शाखा मानते नहीं हैं और दीपार्णव के सम्पादक भाखा मानते हैं । देखो दीपाव पेज नं० २१ मे द्वारनाखा का रैला चित्र है। उसमे स्तंभ के दोनो तरफ की कोणियो को नास मान करके त्रिमाला द्वार को पंच शाखा द्वार लिखा है, एवं पेज नं० ३६८ और ३६६ के बीच में वारशाखा का ब्लोक छपा है, यह चित्र गिल्परत्नाकर का होने में बीच मे विनाखा बार छपा है और नीचे उसके खंडन रूप से पंच गाता द्वार लिखा है। इनीने स्पष्ट मालूम होता है कि संभ भाला की कोरियमो को दीपाव के सम्पादक नाना मानते हैं, जिसे उसके मत से नवशाखा वाला द्वार मे दो स्तंभ माना होने से तेरह मासा वाला द्वार माना जाय तो यह अगास्त्रीय हो जाता है। क्योकि मान्त्रकार संभ शाखा के दोनो तरफ कोरिण्या वनाना लिखते हैं, परन्तु उसको शाखा नहीं मानते । इसलिये स्तंभ की दोनो तरफ की कोरिण्यो को गाता मानने वाले शिल्पीनी का मत अनास्त्रीय होने से प्रामाणिक नहीं माना जाय । चतुर्य अध्ययन में मूत्ति और सिंहानन का नाप, गर्भगृह का नाप, देवों की दृष्टि, देवो का पद स्थान, उज्य गो का गम, रेखा विचार, शिखर विधान, आमलतार, कलश, शुकनाग, कोली मंडप का विधान, सुवर्णपुरुष की रचना, ध्वजाइंड का माप और उसका स्थान प्रादिका वर्णन है। देवदृष्टि स्थान- देवो की दृष्टि द्वार के कित विभाग में रखा जाय, इस विषय मे गिल्लियों में मतभेद है। कितनक गिल्ली गास्त्र में कहे हुए एक भाग में दृष्टि नहीं रखते, परन्नु कहा हुआ भाग और उसके ऊपर का भाग, इन दोनो माग की नंची में प्रांत की नीकी रखते हैं, जिने उनके हिसाब से एक भाग मे दृष्टि रखने का म्बंध नहीं मिलता। इसलिये शास्त्र के हिसाब मे दृष्टि स्थान न होने ने उसका मत प्रामाणिक नही माना जाता।

8 देवो के पदस्थान सबध में शास्त्रीय अनेक मत मतान्तर है। इन हरएक का साराश यह है कि 'दीवार से दूर रखकर मूर्ति को स्थापित करना चाहिये । दीवार से चीपका करके किसी भी देव की मूत्ति स्थापित नही करना चाहिये । इस विषय मे यह पंथकार मतमतान्तर को छोड करके गर्भगृह के ऊपर के पाट के आगे के भाग मे देवो को स्थापित करना लिखते है, यह वास्तविक है । रेखा- शिखर की ऊंचाई को गोलाई का निश्चय करने के लिये शिखर के नीचे के पायचे से ऊपर के स्कध तक जो लकीरे खीची जाती है, उसको रेखा कहते हैं । रेखामओ से शिखर निदोष बनता है । ऐसा शिल्पीवर्ग मे मान्यता है । मगर इस रेखा संवधी रहस्यमय ज्ञान लुप्त प्राय. हो गया है। जिसे इसका रहल मुझे मालूम नहीं हो सका, जोकि अनुवाद मे पृष्ठ न० ७७ मे एक रेखा चित्र दिया है, जिससे शिल्पिगरम मसापर विचार करके रेखा की वास्तविकता का निर्णय करेंगे तो वास्तु शास्त्र के इस विषय का प्रचार हो सकेगा ध्वजादंड- वास्तु शिल्पशास्त्र का विशेष अध्ययन न होने से शिल्पिगण ध्वजादड रखने का स्थान विस्मृतः होगये है, जिमे ये देवालय का निर्माण करते समय ध्वजादड को मामलसार मे स्थापन करते हैं, यह प्रामाणिक नही है । शास्त्र मे शिखर की ऊचाई का छह भाग करके ऊपर के छ? भाग का फिर चार भाग करके नीचे का एक भाग छोड देना, उसके ऊपर का तीसरे भाग मे ध्वजादड रखने का कलाबा बनाना लिखा है । देखो पेज न० ८६,६0 1 एव ध्वजादड को मजबूत रखने के लिये उसके साथ एक दडिका भी वववध करके रखी जाती है। यह प्रथा तो प्राय विलकुल लुस होगई है। शास्त्र मे ध्वजाधार का स्थान लिखा है, परन्तु शिल्पी ध्वजाधार का अर्थ ध्वजा को धारण करने वाला 'ध्वजपुरुप' ऐसा करते है, जिसे ध्वजादड रखने के स्थान पर ध्वजपुरुष को प्राकृति रखते है। और शिल्परलाकर पेज न. १८४ श्लोक ५४ का गुजराती अनुवाद मे 'ध्वजाधर अर्थाद ध्वजपुरुष करवो' लिखा है, उसका प्रमाण देते है। उन शिल्पियो को समझना चाहिये कि ध्वजाधार का अर्थ ध्वजपुरुष नही, लेकिन ध्वजादड रखने का कलावा है । दीपार्णव नथ मे नवीन बने हुए देवालयो के चित्र दिये गये हैं, उनके शिखरो के मामलसारो मे ध्वजादंड रखा हुमा मालूम होता है, उनको देखकर अपने ये प्रामाणिक मान लेवें तो दीपाएंव के पेज ११५ मे श्लोक ४६, ५० का अनुवाद पेज न० ११६ मे लिखा है कि-"जो स्कधना मूलमा ध्वजदड प्रविष्ट भाय तो स्कवेध जाणवो, स्कंधवेधणी स्वामी प्रने शिल्पीनो नाश थाय छे ।" यह शास्त्रीय कथन झूठा हो जाता है । शास्त्रीय कथन सत्य मानने के लिये प्रासादमडन के पेज न. ६० मे दिये गये ध्वजदड के रेखा चित्र देखें, इस प्रकार ध्वजदड रखना प्रामाणिक है। दीपार्णव के पृष्ठ न० १२६ की टीप्परपी मे क्षीरार्णव का एक श्लोक का प्रमाण देकर लिखा है कि-'समपर्व अने एकी कागणी वाला ध्वजादड शक्तिदेवी ना (मने महादेवना) मदिरोमा कराववो। जो के एकी के बेकी वेउ प्रकारना ध्वजादडो भवनने विषे तो शुभ ज छ ।' इस विषय मे शिल्पियो को विचार करना चाहिये । यह श्लोक क्षीराव मे नही है, किसी अन्य अथ का होगा या अनुवादक ने मन कल्पित बनाकर १० रखा होगा, मगर 'दोनो प्रकार के ध्वजदंड भवने के लिये शुभ है।' ऐसा अर्य श्लोक से निकलता नहीं है, परन्तु गतिदेवी के मदिरो मे ही दोनो प्रकार के ध्वजदंड वनाना ऐसा निकलता है। अन्य मंदिरो के लिये तो विषमपर्व और समग्रंथी वाला ही ध्वजदंड रखना शास्त्रीय है । पाचवे अध्ययन में प्रासादो में मुख्य जाति वैराज्य प्रादि पचीस प्रासादो का सविस्तर वर्णन उनकी विभक्ति के नकों के साथ लिखा गया है। । ब? अध्ययन मे केसरी जाति के पचीस प्रासादो के नाम और उनकी तल विभक्ति के मतमतान्तर लिखा है । और नव महामेरु प्रासादो का वर्णन है। केसरी आदि पचीस प्रासादो का सविस्तर वर्णन ग्रंथकार ने लिखा नही है, जिसे इस ग्रंथ के अत में परिशिष्ट नं० १ मे अपराजित पृच्छासूत्र० १५६ का केसरी आदि प्रासादों का सविस्तर वर्णन अनेक नको आदि देकर लिखा हुना है। सातवे अध्ययन में प्रासाद के मंडपो का सविस्तर वर्णन रेखा चित्र देकर लिखा गया है। उसमे पेज न० ११६ श्लो० ७ में 'शुकनाससमा घण्टा न्यूना श्रेष्ठा न चाधिका ।' का अर्य दीपाव के सम्पादक पेज नं० १३३ में नीचे टिप्पनी मे 'शुकनासयी घंटा ऊची न करवी, पण नीची होय तो दोप नवी।' ऐसा लिखा है और उसकी पुष्टता के लिये अपराजित पृच्छानूत्र १८५ श्लोक १३ वा का उत्तरार्द्ध भी लिखा है । यह वास्तविक नहीं है, क्योकि जो उत्तरार्द्ध लिखा है वह घंटा नीची रखने के संबंध का नहीं है, परन्तु शुकनास के रखने के स्थान का विषय है । छज्जा से लेकर शिखर के स्कंव तक की ऊंचाई का इक्कीस भाग करना, उनमे से तेरह भाग की ऊवाई मे शुकनास रखना । तेरहवे भाग से अधिक ऊंचा नही रखना, किन्तु तेरहवा भाग से नौचा रखना दोष नहीं है। ऐसा अर्थ है उसको आमलसार घंटा का संवध मिलाना अप्रामाणिक माना जाता है। वितान (चंदवा )- छत के नीचे के तल भाग को वितान-चादनी अथवा चदवा कहते है । उसके मुख्य तीन भेद हैं- १. छत्त में जो लटकती आकृति होवे, वह 'क्षिप्तवितान' कहा जाता है । २ छत की आकृति ऊंची गोल गुम्बज के जैसी हो वह 'उतक्षिप्त वितान' कहा जाता है। ३ यदि छन समतल हो तो उसको 'समतल वितान' कहते हैं । यह विलकुल सादी अयवा अनेक प्रकार के चित्रो मे चितरी हुई अथवा खुदाई वाली होती है । दीपार्णव के पृष्ट १३८ मे श्लोक २२ के अनुवाद मे क्षिप्तोलित, समतल और उदित, ये तीन प्रकार के वितान लिखे हैं । यहा उदित शब्द वधातुका भूत कृदत है, इसलिये इसका अर्थ 'कहा है' ऐमा क्रिया- वाचक होना चाहिये। संवरणा- संवरणा को शिल्पीवर्ग साभरण कहते हैं यह मडप की छत के ऊपर अनेक कलशो की प्राकृति वाला होना है । इमको रचना शास्त्रीय पद्धति का विस्मरण होजाने ने अपनी बुद्धि अनुसार शिल्पीमो बनाते हैं। - ११ आठवा अध्याय साधारण नामका है। उसमे वास्तुदोष, दिङ्मूढ दोष, जीर्णवास्तु, महादोप, भिन्नदोष, अगहीनदोष, पाश्रम, मठ, प्रतिष्ठाविधि, प्रतिष्ठा मडप, यज्ञकुण्ड, मडलप्रतिष्ठा, प्रासाद देवन्यास, जिनदेवप्रतिष्ठा, जलाशयप्रतिष्ठा, वास्तुपुरुष का स्वरूप और प्रथसमाप्ति मगल आदिका वर्णन है । परिशिष्ट न. १ मे केसरी आदि पचीस प्रासादो का सविस्तर वर्णन है। उनकी विभक्तियो की प्रासाद संख्या मे शास्त्रीय मतातर है। जैसे-'समरागण सूत्रधार' मे प्रारहवी विभक्ति का एक भी प्रासाद नहीं है । एवं शिल्पशास्त्री नर्मदाशकर सम्पादित शिल्परत्नाकर' मे वीसवी विभक्ति का एक भी प्रासाद नहीं है। शिल्परत्नाकर मे केसरी जातिका दूसरा सर्वतोभद्र प्रासाद नव गो वाला है, उसके चार कोने पर और चार भद्र के ऊपर एक एक शृग चढाया है, यह शास्त्रीय नहीं है, क्योकि सपादक ने इसमे मन कल्पित परिवर्तन कर दिया है । शास्त्र मे तो नवग कोने के ऊपर चढाने का और भद्र के ऊपर शृग नही चढाने का लिखा है। क्षीरार्णव अथ मे साफ लिखा है कि-कणे शृङ्गन्य कार्य भरे शृग विवर्जयेत् ।' इस प्रकार सोमपुरा प्रबाराम विश्वनाथ प्रकाशित 'केसरादि प्रासादमडन' के पृष्ठ २५ श्लोक १० मे भी लिखा है । मगर शिल्परलाकर के सम्पादक ने इस श्लोक का परिवर्तन करके 'कणे शृग तथा कार्य भद्रे शृग तथैव च । ऐसा लिखा है । इस प्रकार प्राचीन वास्तुशिल्पका परिवर्तन करना विद्वानोको के लिये अनुचित माना जाता है । इसका परिणाम यह हुआ कि- -दीपार्णव के सम्पादक ने भी सर्वतोभद्र प्रासाद के शृ गो का क्रम रक्खा, देखिये पृष्ठ न० ३२१ मे सर्वतोभद्र प्रासाद के शिखर का रेखाचित्र । परिशिष्ट न० २ मे जिनप्रासादो का सविस्तृत वर्णन है । इन प्रासादो के ऊपर श्रीवत्स शृ गो के बदले केसरी मादि शृगो का क्रम चढाने का लिखा है । क्रम शब्द यहा गो का समुहवाचक माना जाता है । पहला क्रम पाच शृ गो का दूसरा क्रम नव शृगो का, तीसरा क्रम तेरह शृ गोका, चौया क्रम सत्रह शृगो का और पाचवा क्रम इक्कीस शृ गो का समुह है । अर्थात् केसरी प्रादि प्रासादो की शृग सस्या को क्रम को सज्ञा दी है। शास्त्रकार जितना न्यूनाधिक क्रम चढाने का लिखते है, वहा आधुनिक शिल्पी नीचे की पक्ति मे एकही सख्या के क्रम चढाते है। जैसे कि-किसी प्रासाद के कोनेके ऊपर चार क्रम, प्रतिकणं के ऊपर तीन क्रम, उपरथ के ऊपर दो क्रम चढाने का लिखा है । वहा आधुनिक शिल्पी नीचे की प्रथम पंक्ति में सबके ऊपर चौथा क्रम चढाते हैं। उसके ऊपर की पक्ति में सबके ऊपर तीसरा क्रम चढाते है । यह नियम अशास्त्रीय है । इस प्रकार प्राचीन देवालयो मे चढाये हुए नही है। शास्त्रीय नियम ऐसा है कि जिस अग के ऊपर जितना क्रम चढाने का लिखा है, वहा सब जगह प्रथम क्रम से ही गिन करके चढावे । प्राद कोने के ऊपर चार क्रम चढाने का है वहा नीचे की प्रथम पक्ति में चौथा, उसके ऊपर तीसरा, उसके ऊपर दूसरा और उसके ऊपर पहला क्रम चढाया जाता है । प्रनिकर्ण के ऊपर तीन क्रम बढाने का लिखा है, वहा नीचे की प्रथम पक्ति मे तीसरा, उसके ऊपर दूसरा और उसके ऊपर प्रथम, उपरय के ऊपर दो क्रम चढाने का लिखा हो वहा पहला क्रम दूसरा, उसके ऊपर पहला क्रम चढाना चाहिये । देखिये अपराजित पृच्छामूत्र के पुष्पकादि प्रासादो की जाति । ऐसा शास्त्रीय नियम के अनुसार नहीं करने मे शिल्परत्नाकर के अष्टम रत्न में जिनप्रासादो का स्वरूप लिखा है-उसमे शृ गो की क्रम संख्या वरावर नही मिलती है, उसकी कोपी टु १२ कोपी दीपार्णव के सम्पादक ने की है जिसे उसमे तो जिनप्रासादो के भूगो की क्रम संख्या मिले ही कहा से यह उतना ही नहीं खुद के नियमानुसार भी शृगो की क्रम संख्या वराबर नहीं मिलती। वडे हर्प का विषय है कि भारतीय प्राचीन संस्कृतिके साहित्यका भारतीय भाषा मे प्रयम वार ही हिन्दी साहित्य की पूर्तिस्प प्रकाशित हो रहा है । मैने कई वर्ष तक इस विषय के अनेक ग्रंथो का मनन पूर्वक अध्ययन करके तथा शिल्पीवर्ग के सहयोग से प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करके, एवं प्राचीन देवालयो और ईमारतो का अवलोकन करके इस ग्रंथ को यथार्थ रूप में आप सज्जनो के सामने उपस्थित करने का सौभाग्य प्राप्त हुमा है। इस अय मे जो विषय कम मालुम होता था, उसको दूसरे प्रथो से लेकर यथा स्थान रखा गया है और जिनके अनुवाद मे शकास्पद मालुम होता था, इसकी स्पष्टता करने के लिये दूसरे ग्रंथो का प्रमाण भी दिया गया है । एकंदर इस विषय का अध्ययन करने वाले अच्छी तरह समझ सके इस पर पूर्ण ध्यान रखा गया है। तथा पारिभाषिक शब्दो का अर्थ हिन्दी भाषा मे पूर्णरूप से प्राप्त नहीं होने से मूलभाषा (संस्कृत) में ही रखा गया है । जिसे सार्वदेशीय अध्ययन करनेवाले को अनुकूलता हो सकी। आशा करता हूं कि इस विषय का अध्ययन करके कोई विषय की भूल मालूम होवे तो सूचित करने की कृपा करेगे। प्रारभिक अभ्यास के समय वीस वर्ष पहले परमजैन चद्रागज ठकुर 'फेरु' विरचित 'वत्युसारपयरण' अर्यात् वास्तुसार प्रकरण नामक का प्राकृत शिल्प ग्रंथ को अनुवाद पूर्वक मैंने छपवाया था, उसमे कई एक जगह मे मडोवर आदि की भूल दृष्टिगोचर होती है, उसको इस ग्रंय से सुधार करके पढने की कृपा करें। प्रयाग परिश्रम करके इस ग्रंथ की विस्तृत भूमिका लिखने की कृपा की है, उन श्रीमान् सुप्रसिद्ध विद्वान् डा. वासुदेवशरणजी अग्रवाल 'अध्यक्ष कला और वास्तु विभाग, काशी विश्वविद्यालय' का धन्यवाद पूर्वक आभार मानता हू । एवं इसके अनुवाद की कितनैक भाषा दोषो को सुधार करके सुन्दर छाप काम कर देने वाले प्रजंता प्रिंटर्स के अध्यक्ष महोदय का भी प्रामार मानना भूला नहीं जाता। सज्जनो से प्रार्थना है कि-मेरी मातृभाषा गुजराती होने से अनुवाद मे भाषादोष अवश्य रहा होगा, उसको क्षमाप्रदान करते हुए सुधार करके पढे ऐसी विनम्र प्रार्थना है । इति शुभम् । फागुण शुकला ५ गुरुवार स. २०१६ जयपुर सिटी ( राजस्थान) भगवानदास जैन सुप्रसिद्ध विद्वान् डॉ. वासुदेवशरणजी अग्रवाल 'प्रध्यक्ष-कला वास्तु विभाग, काशी विश्वविद्यालय द्वारा लिखी हुई गूजराती अनुवाद वाला प्रासाद मण्डन की- भूमिका जयपुर के श्री पं० भगवानदास जैन उन चुने हुए विद्वानो मे मे है, जिन्होने भारतीय स्थापत्य और वास्तु शिल्प के अध्ययन मे विशेष परिश्रम किया है । सन् १९३६ मे ठकुरफेरु विरचित 'वास्तु-सार- प्रकरण' नामक वास्तु संवधी महत्वपूर्ण प्राकृत ग्रन्थ को मूल हिन्दी भाषान्तर और अनेक चित्रो के साथ उन्होने प्रकाशित किया था। उस अन्य को देखते ही मुझे निश्चय हो गया कि ५० भगवानदास ने परम्परागत भारतीय शिल्प के पारिभाषिक शब्दो को ठीक प्रकार समझा है और उन पारिभाषामो के प्राधार पर वे मध्य कालीन शिल्प-अन्यों के सम्पादन और व्यास्यान के सर्वथा अधिकारी विद्वान् हैं। शिल्प शास्त्र के अनुसार निर्मित मन्दिरो या देव प्रासादो के वास्तु की भी वे बहुत अच्छी व्याख्या कर सकते हैं, इसका अनुभव मुझे तब हुआ जब कई वर्ष पूर्व उन्हे साथ लेकर मैं प्रामेर के भव्य मन्दिरो को देखने गया और वहा पण्डितजी ने प्रासाद के उत्मेध या उदय संबंधी भिन्न भिन्न भागो का प्राचीन शब्दावली के साथ विवेचन किया । इस प्रकार की योग्यता रखने वाले विद्वान् इस समय विरल ही हैं। भारतीय-शिल्प-शास्त्र के जो अनेक अन्य विद्यमान है उनकी प्राचीन शब्दावली से मिलाकर अद्यावधि विद्यमान मदिरो के वास्तु-शिल्प की व्यारया, यह एक अत्यन्त आवश्यक कार्य है । जिस की पूर्ति वर्तमान समय में भारतीय स्थापत्य के सुस्पष्ट अध्ययन के लिये आवश्यक है । श्री ५० भगवानदास जैन इस ओर अग्रसर है, इसका महत्वपूर्ण प्रमाण उनका ऊपर किया हुआ 'प्रासाद-मण्डन' का वर्तमान गुजराती अनुवाद है। इसमे मूल ग्रन्थ के माथ गुजराती व्याख्या और अनेक टिप्परिणया दी गई है और साथ मे विषय को स्पष्ट करने के लिए अनेक चित्र भी मुद्रित है। 'सूत्रधार मडन' के विषय मे हमे निश्चित जानकारी प्राप्त होती है। वे चित्तोड के राणा कुंभकर्ण या कुम्भा ( १४३३-१४६८ ई० ) राज्यकाल मे हुए । राणा कुम्भा ने अपने राज्य में अनेक प्रकार से संस्कृति का सवर्धन किया। संगीत की उन्नति के लिए उन्होने अत्यन्त विशाल 'सगीत-राज' अथ का प्रणयन किया । सौभाग्य से यह अन्य सुरक्षित है और इस समय हिन्दू विश्व विद्यालय की ओर से इसका मुद्रण हो रहा है । राणा कुम्भा ने कवि जयदेव' के गीत गोविन्द पर स्वयं एक उत्तम टीका लिखी। उन्होने ही चिसोड मै सुप्रसिद्ध कीर्तिस्तम का निर्माण कराया । उनके राज्य मे कई प्रसिद्ध शिल्पी थे । उनके द्वारा राणा ने अनेक वास्तु और स्थापत्य के कार्य सपादित कराए । 'कोतिस्तम्भ' के निर्माण का कार्य सूत्रधार 'जइता' और उसके दो पुत्र सूत्रधार नापा और पूजा ने १४४२ से १४४८ तक के समय मे पूरा १-श्री रत्लचन्द्र अग्रवाल, १५ वी शती मे मेवाड के कुछ प्रसिद्ध सूत्रधार और स्थपति सम्राट (Some Famous Sculptors & Architects of Mewar-15th. century A. D.) इन्डियन हिस्टॉरिकल क्वार्टरली, भाग ३३, अक ४, दिसम्बर १६५७ पृ० ३२१-~-३३४ किया । इस कार्य मे उसके दो अन्य पुत्र पामा और बलराज भी उसके सहायक थे । राणा कुम्भा के अन्य प्रसिद्ध राजकीय स्थपति सूत्रधार मण्डन हुए। वे संस्कृत भाषा के भी अच्छे विद्वान थे । उन्होने निम्न लिखित गिल्प अन्यो की संस्कृत मे रचना की- प्रासाद मण्डन, वास्तु मण्डन, रूप मण्डन, राज-वल्लम मण्डन, देवता मूर्ति प्रकरण, रूपावतार, वास्तुसार, वास्तु शास्त्र । राजवल्लभ ग्रन्य मै उन्होने अपने सरक्षक सम्राट् राणा कुम्भा का इस प्रकार गौरव के साय उल्लेख किया है- "श्रीमेदपाटे नृपकुम्भकर्ण-स्तदंघ्रिराजीवपरागसेवी । समण्डनात्यो भुवि सूत्रधारस्तेनोद्ध तो भूपनिवल्लभोऽयम् ।" (१४-४३) - रूपमण्डन गन्य मे मूत्रधार मण्डन ने अपने विषय मे लिखा है- "श्रीमद्देगे मैदपाटाभिधाने क्षेत्राख्योऽभूद सूत्रधारो वरिष्ठ । पुत्रो ज्येष्ठो मण्डनस्तस्य तेन प्रोक्त शास्त्रं मण्डन रूपपूर्वम् ।" (६-४०) इसमे ज्ञात होता है कि मण्डन के पिता का नाम सूत्रधार क्षेत्र था । इन्हे ही अन्य लेखों मे क्षेत्राक भी कहा गया है । क्षेत्राक का एक दूसरा पुत्र सूत्रधार नाथ भी था जिसने 'वास्तु मंजरी' नामक ग्रन्य की रचना की । सूत्रधार मण्डन का ज्येष्ठ पुत्र सूत्रधार गोविन्द और छोटा पुत्र सूत्रधार ईश्वर था। सूत्रधार गोविन्द ने तीन ग्रन्थो की रचना की-उबार घोरणि, कलानिधि और द्वारदीपिका । कलानिधि ग्रन्थ मे उनने अपने विषय मे और अपने संरक्षक राणा श्री राजमल्ल ( रायमल्ल ) के विषय मे लिखा है- "सूत्रधारः सदाचारः कलाधारः कलानिधिः । दण्डाधार. सुरागार. श्रिये गोविन्दयादिशत् ॥ राज्ञा श्री राजमल्ले (न) प्रीतस्यामि (ति) मनोहरे । प्रणम्यमाने प्रासादे गोविन्द. संव्यधादिदम् ॥" (विक्र, सं. १५५४) राणा कुंभा की पुत्री रमा वाई का एक लेख (विक्रम सं. १५५४) जावर से प्राप्त हुआ है जिसमे क्षेत्राक के पौत्र और सूत्रधार मण्डन के पुत्र ईश्वर ने 'कमठाणा बनाने का उल्लेख है- "श्रीमेदपाटै परे देगे कुम्भकर्णनुपगृहे क्षेत्राकसूत्रधारस्य पुत्रो मण्डन प्रात्मवान् सूत्रधारमण्डन मुत ईरए कमठाणु विरचितं ।" ईश्वर ने जावर मे विपणु के मन्दिर का निर्माण किया था। इसी ईश्वर का पुत्र सूत्रधार छीतर था जिनका उल्लेख विक्रम नं. १५५६ (१४६६ ई.) के चितौड़ से प्राप्त एक लेख मे आया है । यह राणा राय- १-गृह और देवालय आदि इमारती काम को अभी भी राजस्थानीय शिल्पी 'कमठाणा' बोलते है ।

१५ मल्ल के समय मे उनका राजकीय स्थपति था। इससे विदित होता है कि राणा कुभा के बाद भी सूत्रधार मण्डन के वंशज राजकीय शिल्पियो के रूप में कार्य करते रहे । उन्होने ही उदयपुर के प्रसिद्ध जगदीश मदिर और उदयपुर से चालीस मील दूर काकरौली मे बने हुए राज समुद्र सागर का निर्माण किया। राणा कु भा के राज्य काल मे राणकपुर मे सूत्रधार देपाक ने विक्रम स. १४६६ (१४३६ ई.) मे सुप्रसिद्ध जैन मन्दिर का निर्माण किया । कुभा की पुत्री रमा बाई ने कुभलगढ मे दामोदर मदिर के निर्माण के लिए सूत्रधार रामा को नियुक्त किया । सूत्रधार मण्डन को राणा कुभा का पूरा विश्वास प्राप्त था। उन्होंने कुभलगढ के प्रसिद्ध दुर्ग की वारतु-कल्पना और निर्माण का कार्य सूत्रधार मण्डन को सं १५१५ (१४५८ई ) मे सोपा । यह प्रसिद्ध दुर्ग आज भी अविकाश मे सुरक्षित है और मण्डन की प्रतिभा का साक्षी है । उदयपुर से १४ मील दूर एकलिंग जी नामक भगवान शिव का सुप्रसिद्ध मन्दिर है। उसी के समीप एक अन्य विष्णु मन्दिर भी है। श्री रलचन्द अग्रवाल का अनुमान है कि उसका निर्माण भी सूत्रधार मण्डन ने ही किया था । उस मदिर की भित्तियो के बाहर की पोर तीन रथिकाए हैं । उनमे नृसिंह वराह-विष्णुमुखी तीन मूर्तिया स्थापित हैं। उनकी रचना रूप मण्डन अथ मे वर्णित लक्षणो के अनुसार ही की गई है । एक अष्टमुजी मूर्ति भगवान् वैकुण्ठ की है । दूसरी द्वादशभुजी मूर्ति भगवान् अनत की है और तीसरी सोलह हाथों वाली मूर्ति अलोक्य मोहन की है इनके लक्षण सूत्रधार मण्डन ने अपने रूपमण्डन ग्रथ के तीसरे अध्याय मे (श्लोक ५२-६२ दिये है।' इनके अतिरिक्त सूत्रधार मण्डन ने और भी कितनी ही ब्राह्मण धर्म सबधी देव भूतिया बनाई थी। उपलब्ध मूर्तियो की चौकियो पर लेख उत्कीर्ण हैं । जिनमे मूर्ति का नाम राणा कु मा का नाम और स १५१५-१५१६ की निर्माण तिथि का उल्लेख है । ये मूर्तिया लगभग कुभलगढ दुर्ग के साथ ही बनाई गई थी। तब तक दुर्ग में किसी मदिर का निर्माण नहीं हुआ था, अतएव वे एक वट वृक्ष के नीचे स्थापित कर दी गई थी। इस प्रकार की छ. मातृका मूर्तिया उदयपुर के सग्रहालय में विद्यमान है जिन पर इस प्रकार लेख हैं- "स्वस्ति श्री स० १५१५ वर्षे तथा शाके १३८० प्रवर्तमाने फाल्गुन शुदि १२ बुधे पुष्य नक्षत्रे श्री कुभल मेरु महादुर्गे महाराजाधिराज श्री कु भकर्ण पृथ्वी पुरन्दरेण श्री ब्रह्माणी मूर्ति अस्मिन् वटे स्थापिता । शुभ भवत ॥ श्री ॥" इसी प्रकार के लेख माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही और ऐन्द्री मूर्तियो की चरण चौकियो पर भी है। इसी प्रकार चतुर्विशति वर्ग की विष्णु मूर्तियो का भी रूप मण्डन मे (अध्याय ३,श्लोक १० ०-२२) विपद वर्णन पाया है । उनमे से १२ मूर्तिया कु भलगढ से प्राप्त हो चुकी है जो इस समय उदयपुर के सग्रहालय मे सुरक्षित है । ये मूतिया भगवान विष्णु के सकर्षण, माधव, मधुसूदन, अधोक्षज, प्रद्युम्न, केशव, पुरुषोत्तम, अनिरुद्ध, वासुदेव, दामोदर जनार्दन और गोविन्द रूप की हैं। इनकी चौकियो पर इस प्रकार लेख है- "सं० १५१६ वर्षे शाके १३८२ वर्तमाने आश्विन शुद्ध ३ श्री कुंभमेरी महाराज श्री कु भकर्णान वटे संकर्पण मूर्ति सस्थापिता शुभ भवतु ॥" १-दे० रत्नचन्द्र अग्रवाल, राजस्थान की प्राचीन मूर्तिकला मे महाविष्णु अवधी कुछ पत्रिकाएं, शोधपत्रिका, उदयपुर, भाग ६, अक १ (पौष, वि० स० २०१४ ) पृ० ६, १४, १७ ॥ २- रलचन्द्र अग्रवाल रूप मण्डन तथा कुंभलगढ से प्राप्त महत्वपूर्ण प्ररतर प्रतिमाए, शोष पत्रिका. भाग ८ अक ३ (चैत्र, वि० स० २०१४), पृ० १-१२ (१६) अथर्ववेदभाष्ये है इन सब मूर्तियों की रचना रूप मण्डन ग्रन्थ में वर्णित नक्षणों के अनूमार ययार्यतः हुई है। स्पष्ट है कि सूत्रधार मण्डन शास्त्र और प्रयोग दोनों के निपुण अभ्यासी थे। शिल्प शास्त्र में वे जिन लक्षणों का उल्लेख करते थे उन्हीं के अनुसार स्वयं या अपने शिष्यों द्वारा देव मूर्तियों की रचना भी कराने जाते थे। के लिङ्गराज, किसी समय अपने देश में सूत्रधार मण्डन जैसे सहस्रों की संख्या में लब्ध कीर्ति स्यपति और वास्तु विद्याचार्य हुए । एलोरा के कैलाश मन्दिर, खजुराहो के कंदरिया महादेव, भुवनेश्वर तंजोर के बृहदीश्वर, कोणार्क के सूर्यदेउल आदि एक से एक भव्य देव प्रासादों के निर्माण का श्रेय जिन शिल्पाचार्यों की कल्पना में स्फूरित हुआ और जिन्होंने अपने कार्य कौगल से उन्हें मूर्त रूप दिया वै सचमुन धन्य थे और उन्होंने ही भारतीय संस्कृति के मार्ग-दर्शन का शाश्वत कार्य किया । उन्हीं की परम्परा में सूत्रधार मण्डन भी थे। देव-प्रासाद एवं नृप मंदिर प्रादि के निर्माण गर्ता सूत्रधारों का कितना अधिक सम्मानित स्थान था यह मण्डन के निम्न लिखित श्लोक से ज्ञात होता है "इत्यनन्तरतः कुर्यात् सूत्रधारस्य पूजनम् । भूवित्तवस्त्रालङ्कार-गोमहिप्यश्ववाहनः ।। अन्येषां शिल्पिनां पूजा कत या कर्मकारिगाम् । स्वाधिकारानुसारेण वस्त्रताम्बूलभोजनः ।। काष्ठपापारण निर्माण-कारिणो यत्र मन्दिरै। भुञ्जतेऽसौ तत्र सौख्यं शङ्करग्रिदशैः सह ।। पुण्यं प्रासादजं स्वामी प्रार्थ येत्सूत्रधारतः । सूत्रधारो वदेत् स्वामिन्नक्षयं भवतानव ।।" प्रासादमण्डनः ८.८२-८५ अर्थात् निर्माण की समाप्ति के अनन्तर सूत्रधार का पूजन करना चाहिये और अपनी शक्ति के मनु- सार भूमि, सुवर्ण, वस्त्र, अलङ्कार के द्वारा प्रधान सूत्रधार एवं उनके सहयोगी अन्य बिल्लियों का सम्मान करना आवश्यक है। जिस मन्दिर में शिला या काष्ठ द्वारा निर्माण कार्य करने वाले गिल्पी भोजन गाती है वहीं भगवान शंकर देवों के साथ विराजते हैं । प्रासाद या देव मन्दिर के निर्माण में जो पुण्य है उस पुण्य की प्राप्ति के लिये सूत्रधार से प्रार्थना करनी चाहिए, 'हे सूत्रधार, तुम्हारी कृपा में प्रासाद निर्माण का पुण्य मुझे प्राप्त हो ।' इसके उत्तर में सूत्रधार कहे-हे स्वामिन् ! सब प्रकार पार की अभय वृद्धि हो । सूत्रधार के प्रति सम्मान प्रदर्शन की यह प्रथा लोक मे आजतक जीवित है, जब सूनधार शिल्पी नूतन गृह का द्वार रोककर स्वामी से कहता है 'आजतक यह गृह मेरा था, अब आज से यह तुम्हारा हुमा ।' उसके अनन्तर गृह स्वामी सूत्रधार को इष्ट-वस्तु देकर प्रसन्न करता है और फिर गृह में प्रवेग करता है । सूत्रधार मण्डन का प्रासाद-मण्डन ग्रन्थ भारतीय शिल्प ग्रन्थों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है । मण्डन ने आठ अध्यायों में देव-प्रासादों के निर्माण का स्पष्ट और विस्तृत वर्णन किया है । पहले अध्याय में विश्वकर्मा को सृष्टि का प्रथम सूत्रधार कहा गया है । गृहों के विन्यास और प्रवेश को जो धार्मिक विधि, - है, उन सब का पालन देवायतनो मे भी करना उचित है । चतुर्दश श्लोको मे जिन जिन प्रासादो के प्राकार देवो ने शकर की पूजा के लिए बनाये उन्ही की अनुकृति पर १४ प्रकार के प्रासाद प्रचलित हुए । उनमे देश-भेद से ८ प्रकार के प्रासाद उत्तम जाति के माने जाते है- नागर, द्राविड, भूमिज, लतिन, सावन्धार ( सान्धार), विमान-नागर, पुष्पक और मिश्र । लतिन सम्भवत उस प्रकार के शिखर को कहते थे जिसके उर.शुग मे लता की आकृति का उठता हुआ रूप बनाया जाता था। शिखरो के ये भेद विशेषकर शृग और तिलक नामक अलकरणो के विभेद के कारण होते है। प्रासाद के लिए भूमि का निरूपण आवश्यक है । जो भूमि चुनी जाय उसमे ६४ या सौ पद का घर बनाने चाहिए । प्रत्येक घर का एक-एक देव होता है जिसके नाम से वह पद पुकारा जाता है । मदिर निर्माण मे नक्षत्रो के शुभाशुभ का भी विचार किया जाता है। यहा तक कि निर्माण कर्ता के अतिरिक्त स्थापक अर्थात् स्थति और जिस देवता का मन्दिर हो उनके भी नवाङ्ग नाडी वेष का मिलान प्रावश्यक माना गया है । काष्ठ, मिट्टी, ईट, शिला, धातु और रत्न इन उपकरणो से मदिर बनाए जाते है इनमे उत्तरोत्तर का अधिक पुण्य है । पत्यर के प्रासाद का फल अनत कहा गया है । भारतीय देव प्रासाद अत्यन्त पवित्र कल्पना है । विश्व को जन्म देने वाले देवाधिदेव भगवान का निवास देवगृह या मदिर में माना जाता है। जिसे वेदो मे हिरण्यगर्भ कहा गया है । वही देव मदिर का गर्भगृह है । सृष्टि का मूल जो प्राण तत्व है उमे ही हिरण्य कहते है । प्रत्येक देव प्राणतत्व है वही हिरण्य है, "एक सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" के अनुसार एक ही देव अनेक देवो के रूप मे अभिव्यक्त होता है । प्रत्येक देव हिरण्य की एक-एक कला है अर्थात् मूल-भूत प्राण तत्त्व की एक-एक रश्मि है । मन्दिर का जो उत्सेध या ब्रह्म सूत्र है वही समस्त सृष्टि का मेरु या यूप है । उसे ही वेदो मे 'वाण' कहा गया है । एक बाण वह है जो स्थूल दृश्य सृष्टि का प्राधार है और जो पृथिवी से लेकर शु लोक तक प्रत्येक वस्तु मे मोत-प्रोत है । द्यावा पृथिवी को वैदिक परिभाषा मे रोदमी ब्रह्माण्ड कहते है । इस रोदसी सप्टि मे व्याप्त जो ब्रह्मसूत्र है वही इसका मूलाधार है । उसे ही वैदिक भाषा मे 'पापश' भी कहा जाता है । बाण, प्रोपश, मेरु, ब्रह्मसूत्र ये सव समानार्थक है और इस दृश्य जगत् के उस प्राधार को सूचित करते है जिस ध्रुव विन्दु पर प्रत्येक प्राणी अपने जीवन मे जन्म से मृत्यु तक प्रतिष्ठित रहता है । यह मनुष्य शरीर और इसके भीतर प्रतिष्ठित प्राणतत्त्व विश्वकर्मा की सबसे रहस्यमयी कृति है । देव मन्दिर का निर्माण भी सर्वथा इसी की अनुकृति है । जो चेतना या प्राण है। वही देव-विग्रह या देव मूर्ति है और मन्दिर उसका शरीर है प्राण प्रतिष्ठा से पापारणघटित प्रतिमा देवत्व प्राप्त करती है । जिस प्रकार इस प्रत्यक्ष जगत् मे भूमि, अन्तरिक्ष और धो , तीन लोक है, उसी प्रकार मनुष्य शरीर मे और प्रासाद मे भी तीन लोको की कल्पना है । पैर पृथिवी है, मध्यभाग अन्तरिक्ष है और सिर ध लोक है । इसी प्रकार मन्दिर की जगती या अधिष्ठान पादस्थानीय है, गर्भगृह या मण्डोवर मध्यस्थानीय है और शिखर घ लोक या गीर्प-भाग है । यह त्रिक यज्ञ की तीन अग्नियो का प्रतिनिधि है । मूल भूत एक माग्न सृष्टि के लिए तीन रूपो मे प्रकट हो रही है। उन्हे ही उपनिषदो की परिभाषा मे मन, प्राण और वाक् कहते हैं। वहा वाक् का तात्पर्य पंचभूतो से है क्योकि पंचभूतो मे प्राकाश सबसे सूक्ष्म है और आकाश का गुण शब्द या वाक् है । अतएव वाक् को भाकाशादि पाचो भूतो का प्रतीक मानलिया गया है। मनुष्य शरीर मे जो प्राणाग्नि है वह मन, प्राण और पचभूतो के मिलने से उत्पन्न हुई है (एतन्मयो वाऽअयमात्म वाड मयो मनोमयः प्राणमय' शतपथ १४।४।३।१०) पुरुष के भीतर प्रज्वलित इस अग्नि को ही वैश्वानर कहते है ( स एपोऽग्निशानरो यत्पुरुष , शतपथ १०१६।१।११) । जो वैश्वानर अग्नि है वही पुरुष है जो पुरुष है वही देव-विग्रह या देवमूर्ति के रूप मे दृश्य होता है । मूर्त और अमूर्त, निसक्त पोर मनिसक्त ये प्रजापति के दो रूप है। जो १८ मूर्त है वह त्रिलोकी के रूप मे दृश्य पौर परिमित है । जो अमूर्त है वह अव्यक्त और अपरिमित है । जिसे पुरुष के रूप मे वैश्वानर कहा जाता है वही समष्टि के रूप में पृथिवी अंतरिक्ष और धु लोक रूपी त्रिलोकी है। "स य स वैश्वानर । इमे स लोका. । इयमेव पृथिवी विश्वमग्निर्नरः । अंतरिक्षमेव विश्वं वायुर्नरः । चौरव विश्वमादित्यो नर । शतपय ६।३।०३।" है। हम इस प्रकार मनुष्य देह, अखिल वह्माण्ड और देव प्रासाद इन तीनो का स्वरूप सर्वथा एक- -दूसरे के साय संतुलित एवं प्रतीकात्मक है । जो पिण्ड मे है वही ब्रह्माण्ड मे है और जो उन दोनो में है उसीका मूर्तरूप देव-प्रासाद है । इसी सिद्धान्त पर भारतीय देव-मदिर की ध्रुव कल्पना हुई है । मदिर के गर्भ गृह मे जो देव विग्रह है वह उस अनादि अनन्त ब्रह्म तत्व का प्रतीक है जिसे वैदिक भाषा मे शण कहा गया है । -जो सष्टि से पूर्व मे भो था, जो विश्व के रोम-रोम मे व्याप्त है, वही प्राण सक्का ईश्वर है । नव उसके वश मे है । सृष्टि के पूर्व की अवस्था मे उसे असर कहा जाता है और सृष्टि की अवस्था मे उने ही सब कहते हैं । देव और भूत ये ही दो तत्त्व है जिनसे समस्त विश्व विरचित है । देव, अमृत, ज्योति और सत्य है । भून मय, तम और अन्त है । भूत को ही असुर कहते सवको एक ही समस्या है। अर्यात् मृत्यु, तम और असत्य से अपनी रक्षा करना और अमृत, ज्योति एवं सत्य को भरण मे जाना । यही देव का आश्रय है । देव की शरणागति मनुष्य के लिए रक्षा का एक मात्र मार्ग है । यहाँ कोई प्राणी ऐसा नहीं जो मृत्यु और अन्धकार से बचकर अमृत और प्रकाश की आकाक्षा न करता हो अतएव देवाराधन ही मयं मानव के लिये एकमात्र श्रेयपय है । इस तत्त्व से ही भारतीय संस्कृति के वैदिक युग मे यज संस्था का जन्म हुआ । प्राणाग्नि की उपासना ही यज्ञ का मूल है । त्रिलोकी या रोदसी ब्रह्माण्ड की मूलभूत शक्ति को ख कहते हैं । 'अग्निद्ध.' इस सूत्र के अनुसार जो प्राणाग्नि है वही द्ध है । 'एक एवा- ग्निर्वहुवा समिद्ध ' इस वैदिक परिभाषा के अनुसार जिस प्रकार एक मूलभूत अग्नि से अन्य अनेक अग्नियो का समिन्धन होता है उसी प्रकार एक देव अनेक देवो के रूप में लोक मानस की कल्पना मे आता है । कौन देव महिमा में अधिक है यह प्रश्न ही असंगत है । प्रत्येक देव अमृत का रूप है । वह शक्ति का अनन्त अक्षय त्रोत है । उसके विषय मे उत्तर और अवर या बड़े-छोटे के तारतम्य की कल्पना नही की जा सकती। - देव तत्व मूल मै अव्यक्त है । उमे ही ध्यान की गक्ति से व्यक्त किया जाता है । हृदय की इस अद्- भुत गक्ति को ही प्रेम या भक्ति कहते हैं । यज्ञ के अनुष्ठान मे और देवप्रासादो के अनुष्ठान मे मूलत. कोई अन्तर नहीं है ।जिस प्रकार यज्ञ को त्रिभुवन की नाभि कहा जाता था और उसकी अग्नि जिस वेदि मे प्रज्व- लित होती थी उस वैदि को अनादि अनंत पृथ्वी का केन्द्र मानते थे, उसी प्रकार देव मन्दिर के रूप मे समष्टि विश्व व्यस्टि के लिये मूर्त बनता है और जो समष्टि का सहस्र शीर्षा पुरुष है वह व्यष्टि के लिये देव-विग्रह के रूप मे मूर्त होता है । यजो के द्वारा देव तत्व की उपासना एवं देव प्रासादो के द्वारा उनी देव तत्व की आराधना ये दोनों ही भारतीय संस्कृति के समान प्रतीक ये । देव मदिर मे जो मूर्त विग्रह की प्रदक्षिणा या परिक्रमा की जाती है उसका अभिप्राय भी यही है कि हम अपने आप को उस प्रभाव क्षेत्र मे लौन कर देते हैं जिसे देव की महान् प्राणशक्ति या महिमा कहा जा सकता है। उपासना या आराधना का मूलतत्व यह है कि मनुष्य स्वयं देव हो जाय । जो स्वय प्रदेव है अर्थात देव नहीं बन पाता वह देव को पूजा नहीं कर सकता । मनुष्य के भीतर प्राण पोर मन ये दोनो देव रही है । इनमे दिव्य भाव उत्पन्न करके ही प्राणी देव की उपासना के योग्य बनता है।

१६ जो देव तत्त्व है वही वैदिक भापा मे अग्नि तत्त्व के नाम से अभिहित किया जाता है । कहा है- 'अग्निः मर्वा देवता' अर्थात् जितने देव है अग्नि सबका प्रतीक है । अग्नि सर्व देवमय है । सृष्टि की जितनी दिव्य या समष्टिगत शक्तिया है उन सवको प्राणाग्नि इस मनुष्य देह मे प्रतिष्ठित रखती है। इसी तत्त्व को लेकर देव प्रासादो के स्वरूपका विकास हुआ । जिस प्रकार यज्ञवेदी मे अग्नि का स्थान है उसी प्रकार देव की प्रतिष्ठा के लिए प्रासाद की कल्पना है । देव तत्त्व के साक्षात्कार का महत्वपूर्ण सिद्धान्त यह है कि प्रत्येक प्राणी उसे अपने ही भीतर प्राप्त कर सकता है । जो देव धावा पृथिवी के विशाल प्रतराल में व्याप्त है वही प्रत्येक प्राणी के प्रत करण में है। जैसा कालिदाम ने कहा है- 'वेदान्तेपु यमाहुरेकपुरुषं व्याप्य स्थित रोदसी, प्रतयश्च मुमुक्षुभिनियमितप्राणादिभिग्यते । - अर्थात् प्राण और मन इन दो महती शक्तियो को नियम बद्ध करके अपने भीतर ही उस देवतत्व का जो मर्वत्र व्याप्त है दर्शन किया जा नकता है । इस अध्यात्म नियम के आधार पर भागवत्तो ने विशेषत. देव- प्रामादो के भौतिक रूप की कल्पना और उनमे से उस देवतत्व की उपासना के महत्वपूर्ण शास्त्र का निर्माण किया । विक्रम की प्रथम शताब्दी के तगभग भागवतो का यह दृष्टिकोण उभर कर सामने आ गया और तद- नुमार ही देव मदिरों का निर्माण होने लगा। इस सम्बन्ध में कई मान्यताए विशेष रूप से सामने प्राई । उनमे एक तो यह थी कि यद्यपि मनुप्यो की कल्पना के अनुसार देव एक है किन्तु वे सब एक ही मूल भूत शक्ति के रूप है और उनमे केवल नामो का अन्तर है । यह वही पुराना वैदिक सिद्धान्त था जिसे ऋग्वेद मे 'यो देवाना नामषा एक एव', अथवा 'एक मद्विप्रा बहुधा वदन्ति', इन वाक्यो द्वारा कहा गया था । नामो के सहस्राधिक प्रपच मे एक सूत्रता लाते हुए भागवतों ने देवाधिदेव को विष्णु की सज्ञा दी । 'देवेष्टि व्याप्नोति इति विष्णु", इस निर्वचन के अनुसार यह सज्ञा सर्वथा लोकप्रिय और मान्य हुई । इसी प्रकार वासुदेव आदि अनेक नामो के विपयमे भी उदारदृष्टि से इस प्रकार के निर्वचन किए गए जिनमे नामो के ऐतिहासिक या मानवीय पक्ष को गौण करके उनके देवात्मक या दिव्य पक्ष को प्रधानता मिली । उदाहरण के लिए वासुदेव शब्द की व्युत्पति विष्णुपुराण में इस प्रकार है- सर्वाऽसौ समस्त च वसत्यति वै यत. । तत स वासुदेवेति विद्वनि परिपठ्यते ।। (१।२।१२) सर्वाणि तत्र भूतानि वसन्ति परमात्मनि भूतेषु च स सर्वात्मा वासुदेवस्तत. स्मृतः ॥ (६५८०) - - इसी को महाभारत में इस प्रकार कहा गया है- छादयामि जगत्सवं भूला सूर्य इवाशुभि । सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवः तत स्मृतः ॥ (शान्तिपर्व, ३४१६४१) वासनात्सर्वभूताना वसुत्वा वयोनित । वासुदेवस्ततो वेदाः उद्योगपर्व, (७०१३) । .

२० इमी उदात्त धरातल पर शंकराचार्य ने वासुदेव गन्द की इस प्रकार व्युत्पत्ति दी है- "वमनि वामयति आच्छादयति समिति का वासु., दीव्यति क्रीडते विजिगीपते व्यवहरति द्योतते स्तूयते गच्छ- तीति वा देव । बानुश्वाती देवश्चेति गसुदेव.।" (विष्णु सहस्रनाम' गाङ्कर भाष्य, ४६ श्लोक) इस प्रकार की तरल और तरगित मन स्थिति भागवतो की विशेषता थी जिसके द्वारा उन्होने सव यमों के समन्वय का राजमार्ग अपनाया । देव के वहुविध नामो के विषय मे उनके दृष्टिकोण का सार यह था- पर्यायवाचकः शन्देस्तत्त्वमाद्यमनुत्तमम् । व्याल्यात तत्त्वभावहरेवं मद्भावचिन्तकः ।। (वायु पुराण, ४।४५) अर्यात समल सृष्टि का जो एक आदि कारण है, जिससे श्रेष्ठ और कुछ नहीं है, ऐमे उस एक तत्त्व को ही तत्त्ववेता अनेक पर्यायवाची शब्दों से कहते हैं । इस सुन्दर दृष्टिकोण के कारण समन्वय और नम्प्रोनि के धर्माम्नु मेघ भासीय महाप्रजा के ऊपर उस समय अभिवृप्ट हुए जब देव-प्रासादो के रूप मे सम्वृति का नूतन दिकान हुआ । बौद्ध, जैन और हिन्दू मंदिरों में पारस्परिक स्पर्वा या तनाव की स्थिति न थी किन्तु वे सब एक ही धार्मिक प्रेरणा और स्फूर्ति को मूर्तरूप दे रहे थे । गुप्त कालीन भागवती संस्कृति का यह विशाल नेत्र या जिसके द्वारा प्रजाएं अपने-अपने इष्टदेव का अभिलपित दर्शन प्राप्त कर रही थी। मानवी देह के साथ देव तत्त्व के जिस घनिष्ठ संबंध का उल्लेख ऊपर किया गया है उसका दूसरा प्रत्यक्ष पत्र यह हुआ कि देवालय की कल्पना भी मानुषी देह के अनुसार ही की गई। मानुपी शरीर के जो अग-प्रत्यग हैं उन्ही के अनुसार देव मदिरो के मूर्तरूप का विधान निश्चित हुआ । किसी समय 'पुरुषविधो वै यज्ञ.' प्रर्यान् जना पुस्प वैसा ही यज्ञ का स्वरूप' यह सिद्धान्त मान्य था । उसी को ग्रहण करते हुए 'पुरुष- वियो वै प्रानाद ,' अर्यान् जैसा पुरुष वैसा ही देव मन्दिर का वास्तुगत स्वरूप, यह नया सिद्धान्त मान्य हुआ । पाद, वुर, जहा, गर्भगृह. मडोवर, कप, निखर, ग्रीवा, नासिका, मस्तक, शिखा आदि प्रासाद सवन्धी शब्दा- वली ने मनुष्य और प्रासाद की पारस्परिक अनुकृति सूचित होती है । देव-प्रासादो के निर्माण की तीसरी विशेषता यह थी कि समाज मे कर्मकाण्ड की जो गहरी धार्मिक भावना पी वह देव पूजा या अर्चा के रूप मे ढल गई । प्रत्येक मन्दिर उस-उस क्षेत्र के लिए धर्म का मूर्त रूप नमझा गया। भगवान विष्णु अथवा अन्य देव का जो विशिष्ट सौन्दर्य था उसे ही उस-उस स्थान की प्रमाए अपने अपने देवालयों में मूर्त करने का प्रयत्न करती थी। दिव्य अमूर्त सौन्दर्य को मूर्त रूप मे प्रत्यक्ष करने वा नबन प्रयत्न दिखाई दिया । सुन्दर मूर्ति और मन्दिरो के रूप मे ऐसा प्रतिभासित होता था कि मानो ग्वर्ग के मौन्दर्य को पृषिवि के मानव साक्षान् देख रहे हो । जन समुदाय की सम्मिलित शक्ति और राजशक्ति दोनो वा नदुपयोग प्रनेक सुन्दर देव मन्दिरो के निर्माण में किया गया । यह धार्मिक भावना उत्तरोत्तर वढ़ती ग: और एस युग ऐमा आया जब प्रतापी राष्ट्रकूट जैसे सम्राटो का वैभव ऐलोरा के कैलाश सहश देव मन्दिरो में प्रत्यक्ष समझा जाने लगा । एक-एक मदिर मानो एक एक सम्राट के सर्वाधिक उत्कर्प और समृद्धि का प्रकट नपा । जब लोक में इस प्रकार की भावना सिद्ध हुई तभी मध्यकाल मे उस प्रकार के विशाल मंदिर बन मी निगा वर्णन समरागणमूत्रधार एवं अपराजित पृच्छा ऐसे प्रयो मे पाया जाता है, उन्ही के वास्तु मिल की परम्परा सूत्रधार मण्डन के चंय में भी पाई जाती है। उपासना.

मन्दिर या प्रासाद को देवता का प्रावास माना गया। तब यह कल्पना हुई कि देवता के स्थान पर निरतर असुरो की वक्र दृष्टि रहती है । अतएव असुरो के निवारण या गाति के लिए पूजा-पाठ करना आवश्यक है । प्रामाद-मडन मे इस प्रकार के चौदह गान्ति कर्म या शान्तिक कहे गये हैं । यथा (१) जिस दिन भूमि परीक्षा करने के लिए उसमे खातकर्म किया जाय, (२) जिस दिन फूर्म शिला की स्थापना की जाय, (३) जिस दिन शिलान्यास किया जाय; (४) जिस दिन तल निर्माण या तल-विन्याम के लिए सूत्र-मापन या सूत्र-पातन (सूत्र-छोडना) द्वारा पदो के निशान लगाए जाय; (५) जिम दिन सक्से नीचे के थर का पहला पत्थर, जिसे खुर-शिला कहते हैं (फारसी पत्थर खाकन्दाज) रक्खा जाय, (६) जिस दिन मन्दिर द्वार की स्थापना की जाय; (७) जिन दिन मडप के मुख्य स्तम्भ की स्थापना की जाय, (८) जिस दिन मडप के स्तम्भो के ऊपर भारपट्ट रक्खा जाय; (8) जिस दिन गिखर की चोटी पर पद्मशिला रखी जाय, (१०) जिस दिन गर्भ गृह के शिखर के लगभग बीच मे शुकनासा या नासिका की ऊचाई तक पहुच कर झपा सिह की स्थापना की जाय, (११) जिस दिन शिखर पर हिरण्यमय प्रासाद-पुरुष की स्थापना की जाय, (१२) जिम दिन घण्टा या गमट पर मामलक रक्खा जाय, (१३) जिस दिन मामलसार शिला के ऊपर क्लग की स्थापना की जाय, (१४) और जिस दिन कलश के बरावर मदिर पर ध्वजा रोपण किया जाय । इनमे सस्या २ और सख्या ३ को कुछ लोग अलग मानते है किन्तु य द कूर्मशिला को एक ही पद माना जाय तो उनकी सूची मे केवल १३ शान्ति कर्म होते है और तव चौदहवा शान्तिक देव-प्रतिष्ठा के अवसर पर करना आवश्यक होगा (११३७-३८) प्रामाद के गर्भ गृह की माप एक हाथ से पचास हाथ तक कही गई है । कु भक या जाड्य-कु भ या जाइमा का निकास इसके अतिरिक्त गर्भ गृह की भित्ति के बाहर होना चाहिए । जाज्यकु भ प्रादि विभिन्न थरो का निर्गम तथा पीठ एव छज्जे के जो निर्गम हो उन्हे भी सम सूत्र के बाहर समझना चाहिए । गर्भगृह समरेखा मै चौरस भी हो सकता है, किन्तु उसी में फालना या खाचे देकर प्रासाद मे तीन-पाच सात या नौ विभाग किए जा सकते है । इसका आशय यह है कि यदि प्रासाद के गर्भगृह की लम्बाई पाठ हाथ है तो दोनो ओर दो-दो हाथ के कोण भाग रख कर बीच मे चार हाथ की भित्ति को खाचा देकर थोडा आगे निकाल दिया जा सकता है। इस प्रकार का प्रासाद तीन अगो वाला या उडीसा की शब्दावली मे त्रिरथ प्रासाद कहा जायगा । इसी प्रकार दो कोण, दो खाचे और एक भित्तिरथ वाला प्रासाद पचरथ प्रामाद होता है । दो कोण, दो-दो उपरथ और एक रथ युक्त प्रासाद सप्ताग, एव दो कोण चार-चार उपरथ एव एक रयिका युक्त प्रासाद नवाग या नवरथ प्रासाद कहलाता है ( ११४१) इन फालनानो या खाचो के अनुसार ही प्रासाद का सम्पूर्ण उत्सेच या उदय खडा किया जाता है । अतएव प्रामाद रचनामो मे फालनामो का सर्वाधिक महत्त्व है । खुर-शिला से लेकर शिखर के ऊपरी भाग तक जितने थर एक के ऊपर एक उठते चले जाते है उन सबका विभाग इन्ही फालनामो के अनुसार देखा जाता है । प्रासाद के एक-एक पार्श्व को उमका भद्र कहते है। प्रत्येक भद्र की विविध कल्पना कोण, प्रतिभद्र और बीच वाले भद्राश पर ही निर्भर रहती है। साद की ऊचाई मै जहा-जहा फालनामो के जोड मिलते है वही ऊपर से नीचे तक वरसाती पानी के बहाव के लिए बारीक नालिया काट दी जाती है जिन्हे वारिमार्ग या सलिलान्तर कहते है। भद्र, फालना (प्रतिभद्र ) और कर्ण या कोण की सामान्य माप के विषय मे यह नियम बरता जाता है कि भद्र चार हाथ का हो तो दोनो मोर के प्रतिभद्र या प्रतिरथ दो-दो हाथ के और दोनो कर्ण या कोण भी दो हाथ लम्बे क्ले जाते है अर्थात् कर्ण और फालना से भद्र की लम्बाई दुगुनी होती है।

२२ । प्रसाद मण्डन के दूसरे अध्याय मे जगती, तोरण और देवता के स्थापन मे दिशा के नियम का विशेष उल्लेख है, शमाद के अधिप्शन की संज्ञा जगती है। जैसे राजा के लिए सिंहासन वैसे ही प्रासाद के लिए जगती गे गोमा कही गई है। प्रासाद के अनुरूप पाच प्रकार की जगती होती है-चतुरन (चौरस), आयत (लन्द चौरस), अप्टान (टुंस या अठकोनी), वृत्त (गोल) और वृत्तायत (लम्ब गोल, जिसका एक गिरा गोल और दूसरा प्राप्त होता है, इसे ही यन्त्र या देसर कहते है)। ज्येष्ठ मध्य और कनीयसी तीन प्रकार की जगती कही गई हैं । बगती की ऊचाई और लम्बाई की नाप प्रासाद के अनुसार स्थपति को निश्चित करनी गाहिए, जिनका उल्लेख अन्धकार ने किया है। प्रासाद की चौड़ाई ने तिगुनी चौगुनी या पांचगुनी तक चौड़ी और मण्डय ने नगई ब्यौदी या दूनी लम्बी तक जगती का विधान है । जगती के ऊपर ही प्रासाद का निर्माण किया जाता है अतएव यदि प्रसाद मे एक, दो या तीन भ्रमणी या प्रदक्षिणापय रखने हो तो उनके लिए भी जगती के ऊपर ही जायग रखी जाती है । जगती के निर्माण में चार, वारह, वीस, अठ्ठाइस, या छनील कोण युक्त पतलनानो का निर्माण सूत्रधार मण्डन के समय तक होने लगा था । जगती क्तिनी जी हो और उसमे कितने प्रकार के गलते-गोने वनाए जाय इसके विषय में मण्डन का कथन है कि जगती की ऊंचाई के अट्ठाइस पर या भाग करने उसमे तीन पद का जाल्यकुंभ या जामा, दो पद की करणी, तीन पद का दासा जो पनपत्र ने युक्त हो, दो पद का खरक, उसके ऊपर सात भाग का कुंभ, फिर तीन पद मा कलम, एक भाग का अंतपत्रक, तीन भाग की कपोतली या केवाल, चार भाग का पुष्पकण्ठ या अतराल होना चाहिए । जगती के चारो ओर प्राकार या दीवार और चार द्वार-मण्डप, जल निकालने के लिए मकरानि प्रणाल, सोपान और तोरण भी इच्छानुसार बनाए जा सकते हैं । मण्डप के सामने जो प्रनीती या प्रवेशद्वार हो उनके आगे सोपान में शुण्डिकानि हपिनी वनाई जाती है । तोरण की चौड़ाई गर्न गृह के पदो की नाप के वरावर और ऊंगई मन्दिर के भारपट्टो की ऊचाई के अनुसार रक्खी जाती है । तोरण मन्दिर का विशेष अंग माना जाता था और उसे भी जगती और उसके ऊपर पीठ देकर ऊंचा बनाया जाता या । तोरण की रचना में नाना प्रकार के रूप या मूर्तियो की शोभा बनाई जाती थी । तोरण कई प्रकार के होते थे। जैसे घटाला तोरण, तलक तोरण, हिण्डोला तोरण आदि । प्रासाद के सामने वाहन के लिए चौकी (चतुफिका ) सती जाती थी। देव मन्दिर में वाहन के निर्माण के भी विगैप नियम थे । वाहन की ऊंचाई गभार की मूर्ति के गृह्यन्यन, नाभिस्थान या स्तन रेखा तक रखी जा सकती है । मिलर के जिस भाग पर सिंह की मूर्ति बनाई बाती है ने शुक्रनातिना कहते है । उस नूत्र ने आगे गूढमण्डप, गूडमण्डप से आगे चौकी और उससे आगे नृत्य- मण्डप गे रचना होती है । मण्डपो की संख्या जितनी भी हो सब का विन्यास गर्भगृह के मध्यवर्ती सूत्र से नियमित होता है। मदिर के द्वार के पास त्रिशाला या अलिंद या बलाणक (बार के ऊपर का मंडप) बनाया जाता है । पन्द्रह्वी नती ने मदिरों का विस्तार बहुत बढ गया था और उसके एक भाग मे रय यात्रा वाला बड़ा स्प रन वे लिए रय भाला और दूसरे नाग मे छात्रो के निवास के लिए म० का निर्माण भी होने लगा था । नौनर अध्याय में प्रागर शिला प्रासाद पीठ, पीठ के ऊपर मंडोवर और मन्दिर के द्वार के निर्माण रा विग्न्त वर्णन है। शनाद के मूल मे नीव तगर करने के लिए करीट ( इष्ट का चूर्ण) की पानी के मारगन बाई उरनी चाहिए । इन कार खूब मोटी और लम्बी चौड़ी प्रासाद गरिणी मिला या पत्थर गर्ग बनाम जाना है । इमे ही बुर गिला या खर जिला भी कहते हैं । इस गिला के ऊपर जैसा भी मामाद बनाना हो उसके अनुरूप सर्व प्रथम जगतो या अधिप्लान बनाया जाता है जिसका उल्लेख पहले २३ हुआ है । यदि विशेष रूप से जगती का निर्माण संभव न हो तो भी पत्थर की शिलामो के तीन पर एक के ऊपर एक रखने चाहिए । इन थरो को मिट्ट कहा जाता है । नीचे का भिट्ट दूसरे की अपेक्षा कुछ मोटा और दूसरा तीसरे में कुछ मोटा रक्खा जाता है । मिट्ट जिनना ऊचा हो उसका चौथाई निर्गम या निकास किया जाता है। मिट्ट या जगती के ऊपर प्रासाद पीठ का निर्माण होता है । प्रासाद-पीठ और जगती का भेद स्पष्ट समझ लेना चाहिए । जगती के ऊपर मध्य मे बनाए जाने वाले गर्भ गृह या मडोवर की कुर्सी की संज्ञा प्रासाद पीठ है । इस पीठ की जितनी ऊंचाई होती है उसी के बराबर गर्भ गृह का फर्श रक्खा जाता है । प्रासाद पीठ के निर्माण के लिए भी गोले गलतो का या विभिन्न थरो का विधान है । जैसे नौ अंश का जायकु भ, सात भाग की कणी, कपोतालि या केवाल के साथ सात भाग की ग्रामपट्टी (जिसमें सिंह मुख की आकृति बनी रहती है । और फिर उसके ऊरर बारह भाग का गज थर, दश भाग का अश्व पर और पाठ भाग का नर पर बनाया जाता है। प्रत्येक दो थरो के बीच मे थोडा-अतराल देना उचित है और ऊपर नीचे दोनो और पतली करिणका भी रक्खी जा सकती है। . प्रासाद पीठ के ऊरर गर्भ गृह या मडोवर बनाया जाता है जिसे वास्तविक रूप में प्रासाद का उदय भाग कहना चाहिए । मण्ड का अर्थ है पीठ या आसन और जो भाग उसके ऊपर बनाया जाता था उसके लिए मण्डोवर यह सज्ञा प्रचलित हुई। भडोवर के उत्सेध या उदय को १४४ भागो मे बाटा जाता है। यह ऊंचाई प्रासाद पीठ के मस्तक से छज्जे तक ली जाती है । इसके भाग ये है-खुरक ५ भाग, कुम्भक २० भाग, कलश भाग, अतराल २॥ भाग, कपोतिका या कपोतालि ८ भाग, मची ६ भाग, जड्डा ३५ भाग, उरुजघा (उदम) १५ भाग है (जिमे गुजराती मे 'डोढिया' भी कहा जाता है), भरणी ८ भाग, शिरावटी या गिरापट्ट १० भाग, ऊपर की कपोतालि २ भाग, प्रतराल ढाई भाग और छज्जा १३ भाग । इस प्रकार १४४ भाग मडोवर के उदय मे रखे जाते है । छज्ने का वाहर की ओर निकलता खाता दश भाग होता है। एक विशेष प्रकार का मडोवर मेरु मडोवर कहलाता है, उसमे भरणी के ऊपर से ही ८ भाग की मञ्ची देकर २५ भाग की जघा बनाई जाती है और फिर छज्जे के ऊपर ७ भाग की एक मञ्ची देकर १६ भाग की जधा बनाते है । उसके ऊपर ७ भाग की भरणी, ४ भाग की शिरावटी, ५ भाग का भारपट्ट और फिर १२ भाग का कूट छाद्य या छज्जा । इस प्रकार मडोवर की रचना में तीन जघायें और दो छज्जे बनाये जाते थे। प्रत्येक जड्डा मे भिन्न भिन्न प्रकार की मूर्तिया उत्कीर्ण की जाती है । मामेर के जगत शरणजी के मदिर मे मेरु मडोवर की रचना की गई हैं। एक दूसरे के कार जो थरो का विन्यास है उनमे निर्गम और प्रवेश का अर्थात् बाहर की पौर निकलता खाता और भीतर की योर दवाव रखने के भी नियम दिए गए हैं, मंडन का कथन है कि यदि प्रासाद निर्माण मे अल्प द्रव्य व्यय करमा हो तो तीन जवानो मे से इच्छानुसार जघा, रूप या मूर्तियो का निर्माण छोडा भी जा सकता है ( ३३२८)। इटो से बने मदिर मे भीत को चौडाई गर्भ गृह की चौडाई का चौथा भाग और पत्थर के मदिर मे पाचवा भाग रखनी चाहिए । गभारा वीच मै चौरस (युगास) रखकर उसके दोनो मोर फालनाए देनी चाहिए, जिनका उल्लेख अपर किया जा चुका है । मडन ने फालनाओ के लिए भद्र सुभद्र और प्रतिभद्र शब्दो का प्रयोग किया है। उन्ही के लिए उत्कल की शब्दावली मे रथ, अनुरय, प्रतिरप, कोणरथ शब्द पाते है। मडोवर और उसके सामने बनाये जाने वाले मडपो के खम्भो की ऊँचाई एक दूसरे के साथ मेल मे रखनी मावश्यक है। मंडप के ऊपर की छत या गुमट को करोट कहा गया है। इस करोट की ऊंचाई मडप की २४ - चौड़ाई मे आगे रखनी चाहएि । इस करंट या छत मे नीचे की ओर जो कई थर बनाये जाने है उन्हें दर्दरी कहा जाता था, समट के भीतरी भाग को नितान और ऊपरो भाग को सम्बरण कहते हैं । विज्ञान में दर्दरी या थरी की सत्या विषम रखने का विधान है। इसके अनंतर मंदिर के द्वार का सविस्तर वर्णन है (३॥३७-६६)। द्वार के चार भाग होते हैं अर्यात नीचे देहली या उदुम्बर, दो पार्श्व स्तम्भ और उनके ऊरर उत्तरग या सिरदल । इन चारो को ही मिन्यो अनेक अलंकरणो मे युक्त करने का प्रयत्न करते थे। देवगढ़ के दगावतार मंदिर का अलंकृत द्वार एक ऐसी कृति है जिसकी साज-सज्मा ने गिल्पियों ने अपने कौशल की पराकाष्ठा दिखाई है। प्रायः गुप्त युग में उसी प्रकार के द्वार बनते रहें । गनैः गनः मध्यकालीन मंदिरो में वार निर्माण कला में कुछ विकास और परिवर्तन भी हुआ । मंडन के अनुसार उदुम्बर या देहली की चौड़ाई के तीन भाग करके वीत्र में मन्दारक और दोनो पाश्वों में प्रात या विमुख बनाने चाहिए । मन्दारक के लिए प्राचीन गन्द सन्तानक भी था (अंग्रेजी फेस्टन)। गोल सन्तानक मे पनपत्रो से युक्त मृणाल की आकृति उकेरी जाती थी । ग्रास या सिंह मुख को कोतिवक्त्र या कीर्तिमुख भी कहते घे। देहली के दोनो ओर के पार्च स्तम्भो के नीचे तलरूपक (हिन्दी-तलकड़ा) नाम के दो अलारण बनाये जाते हैं । तलकड़ो के बीच मे देहली के सामने की ओर वीच के दो भागों मे अर्धचन्द्र और उसके दोनो मोर एक-एक गगारा बनाया जाता है। गगारो के पास मे गंखो की और पद्मपत्र की आकृति उत्कीर्ण की जाती हैं । बार की यह विभपता गुप्त युग से ही प्रारम्भ हो गई थी, जैसा कालिदास ने मेवदूत मे वर्णन किया है (द्वारोपान्ते लिखितवपुषौ शंखपद्मौ च दृष्ट्वा, उत्तर मेघ १७) । गगारक या गगारा गन्द की चुत्तत्ति सप्ट नहीं है । यहां पृष्ठ ५६ और वास्नुसार मे पृ० १४० पर गगारक का चित्र दिया गया है। बार की ऊंचाई से उसकी चौड़ाई आधी होनी चाहिए । और यदि चौड़ाई मे एक कला या सोलहवा अंश वढा दिया जाय तो वार को गोभा कुछ अधिक हो जाती है , द्वार के उत्तरग या सिरदल भाग में उस देव की मूर्ति बनानी चाहिए जिसकी गर्भगृह मे प्रतिप्य हो । इस नियम का पालन प्रायः सभी मंदिरो मे पाया जाता है । उन मूर्ति को ललाल-विम्व भी कहते थे। द्वार के दोनो पार्श्व स्तम्भो में कई फालना या भाग बनाये जाते थे जिन्हें मन्कृत मे माला कहा गया है । इस प्रकार एक नाख, त्रिगाख, पंच शाल, सप्त गाख, और नव शाख, तक के पार्च स्तम्भ युक्त द्वार बनाये जाते थे । इन्ही के लिए तिसाही, पंचसाही आदि गन्द हिन्दी में अभी तक प्रचलित है। सूत्रधार मंडन ने एक नियम यह बताया है कि गर्भगृह की दीवार मे जितनी फालना या अंग बनाये जाय उतनी ही द्वार के पार्श्व स्तम्भ मे शाखा रखनी चाहिए (शाखाः स्युरंग तुल्यकाः ३३५६)। द्वार स्तम्भ की सजावट के लिए कई प्रकार के अलंकरण प्रयुक्त किये जाते थे । उनमे रूप या स्त्री पुरुषों की मूर्तियां मुख्य यी । जिम भाग में ये प्राकृतियां उकेरी जाती थी उसे रूप स्तम्भ या रूप शाखा कहते थे । पुरुष संज्ञक और जो सजक गाखानो का उल्लेख मण्डन ने किया है । इस प्रकार की भाखाये गुप्तकालीन मंदिर द्वारो पर भी नोनी है । अलकरणो के अनुसार इन शाखामो के और नाम भी मिलते हैं जैने-पत्रशाखा, सिह शाखा, गन्य गावा, रूल्व गावा आदि । खल्व माखा पर जो अलंकरण बनाया जाता था वह मटर आदि के वेलो में ले हुए गोल प्रत्तानो के सहन होता था। प्रावू के विमलवतही आदि मंदिरो मे तया अन्यत्र भी इसके उदाहरण है । सल्प मम्म प्राचीन था और उसका अर्थ फलिनीलता या नटर आदि की वेल के लिए प्रयुक्त होता था। प्रसाद मडन के चौये अध्याय में प्रारम्भ मे प्रतिमा की ऊंचाई वाते हुए फिर शिखर निर्माण प योरे दार वर्णन दिया गया है । देव प्रानादो के निर्माण मे गिवरी का महत्वपूर्ण स्थान था। मंदिर के वास्तु में नाना प्रकार में मिलरो का विकास देखा जाता है। शिखरों की अनेक जातियां गिल्प नयो मे कही - - गई है । वास्तविक प्रासाद पिपरो के साथ उन्हें मिलाकर अभी तक कोई अध्ययन प्रस्तुत नहीं किया गया है। वाण ने सातयां पाती में बहुभूमिक गिपरो का उल्लेख किया है। प्रारम्भिक गुप्तकाल मे बने हुए साची के छोटे दंय मदिर में कोई गियर नहीं है । देवगढ के दशावतार मंदिर में शिखर के भीतर का ढोला विद्यमान है। वह इस बान का मासी है कि उस मदिर पर भी शिखर की रचना की गई थी। शिखर का प्रारम्भ किस मर में पार कर हुआ यह विपय अनुगंधान के योग्य है । पजाव में मिने हुए उदुम्बर जनपद के सिक्को पर उपलब्ध देवप्रामाद में कार विगूमिका गियर का स्पष्ट अंक्न पाया जाता है। इसमे यह सिद्ध होता है कि निगरो का निर्माण गुप्त युग में पहले होने लगा था। ज्ञात होता है कि मदिर के वास्तु मे दोनो प्रकार मान्य यफ गिर युस्न गर्भ गृह या मप या और दूसरे शिखर विहीन चौरमन वाले सादा मदिर मे साची पौर मानचा फै मान्दरा प्रादि म्यानी में मिले है । इस प्रकार के मदिरो के विकास का पूर्वस्व कुपाण कालीन पन्धाटी में प्राप्त होना है, जिमन तीन राहे पत्यरा को वोरस पत्थर मे पाट कर उसके भीतर बुद्ध या योधिसत्य को प्रतिमा स्थापिन मार दी जाती थी। कालान्तर में वो शिखर मदिरी का अनिवार्य प्रग बनगया और उसकी गोमा एय रूप विधान में प्रत्यधिक ध्यान दिया जाने लगा। मदिर के गर्भ गृह मे खडी हुई या छठी हुई देव प्रतिमा की मचाई कितनी हो और उगका दृष्टिसून कितना कवा सखा जाय इसके विपय में नार फो जनाई के अनुसार निर्णय किया जाता था। जैसे एक विकल्प यह था कि द्वार की ऊचाई के पाठ या नय भाग कर, एक भाग होउपर दोष कमाई के तीन भाग करके उनमे में दो के बरावर मूति की ऊचाई सपनी चाहिए। महिरवे निगर की रजना प्रत्यन्त जटिल विषय है। मडोवर के छज्जे के ऊपर दो एक घर और नगाहर नव गियर का प्रारम्भ करते है । वास्तुनार में इन परी के नाम वेराहु और पहारु कहे है (वास्तुसार १११)न्तु मन ने केवल पहार नामक पर का उल्लेस किया है । शिखर के उठते हुए विन्यास में गो की बना गम अधिक महत्वपूर्ण है । मटोवर की विभिन्न फालनामो की ऊंचाई स्कन्ध के बाद जब शिखर मे उठनी है तो कोए, प्रतिरप और रप गादि की सीध में मृग बनाये जाते है । इन्ही शु गो के द्वारा शिखर का ठाठ जटिल पौर मुन्दर हो जाता है । वीच के विपर को यदि हम एक ईकाई माने तो उसकी चारो दिशामो मे भार उपग बनाये जा सकते है । ये शृग भी शिसर की प्राकृति के होते हैं । यदि मूल शिखर का सामने से दर्शन पिया जाय तो वही मारति शृग की होती है । प्रासाद के गियर का सम्मुख दर्शन ही श ग है । मूल गियर और उसमे नारो मोर के पार श ग म प्रकार कुल ५ श ग युक्तरुप प्रासाद का एक सीधा प्रकार हुमा । वाच के शियर को मूलमजरी और पारी पोर के मूलभून बडे शृगो को उरु शृग कहते हैं । इसी के लिए राजस्थानी और गुजराती रपपतियों में छातियाग शब्द भी प्रचलित है । वस्तुत. शृग और शिखर पर्यायवाची है। मगर फर ने उपथ ग या छातिया शृग को उर सिहर (उर शिखर) कहा है । मूलमजरी के चार भर या पापयों में चार उरुगो के अतिरिक्त और भी अनेक शृग बनाये जाते थे। सूत्रधार मडन ने कहा है कि उमथ गो की संख्या प्रत्येक भद्र में एक से नव तक हो सकती है (४।१०) सबसे बडा उरुग शिखर की स्तिनी ऊचाई तक खखा जाय इसका भी नियम दिया गया है। शिखर के उदय के १३ भाग करके नीचे से मात भाग तक पहला छातिया शृंग बनाया जाता है । अर्याद शिखर की ऊचाई के सात भाग पहले उक ग के नीचे सि जाते है। अब इस उरुग पर दूसरा उरुशृग बैठाना हो तो फिर इसकी ऊचाई के तेरह भाग करके सात भाग तक के उदय तक दूसरा शृग बनाया जाता है इस प्रकार जिस शिखर मै नव उरुग रखने हो उसकी कचाई सोच विचार कर उसी अनुपात से निश्चित करनी होगी। शिखर मे गोलाई लाने या ढलान देने के लिए आवश्यक है कि यदि उसके मूल में दस भाग हो तो अग्र स्थान या सिरे पर छ भाग का अनुपात -- २६ रखना चाहिये । इस अनुपात से शिखर सुहावना प्रतीत होता है । गर्भ गृह की मूलरेखा या चौड़ाइ से शिखर का उदय सवाया रस्खा जाता है । शिखर के वलण अर्थात् नमन की युक्ति साधने के लिए उसके उदय भाग मे और स्कन्ध मे क्रमशः रेखामो और कलानो की सूक्ष्म गणना स्थपति सम्प्रदाय में प्रचलित है । उस विषय का सक्षिप्त सकेत मंडन ने किया है । रेखाम्रो और कलामो का यह विपय अपराजित पृच्छा (प्र. १३६-१४१) मे भी पाया है । खेद है कि यह विषय अभी तक स्पष्ट न होने से इस पर अधिक प्रकाश डालना सम्भव नही । मडन का कथन है कि खरशिला से कलश तक बीस भाग करके आठ या या ६ भाग मे मंडोवर की ऊचाई और शेष मे शिखर का उदय रक्खा जाता है । शिखर के गुमट नुमा उठान को पद्मकोश कहा जाता (४।२३) पद्मकोश की प्राकृति लाने के लिये मडन ने अति संक्षिप्त रीति से एक युक्ति कही है (चतुर्ग ऐन सूत्रेण सपाद. शिखरोदयः (४।२३) इसके अनुसार शिखर की मूलरेखा मे चौगुना सूत्र लेकर यदि नये प्राप्त दोनो विन्दुओ को केन्द्र मानकर गोल रेखाये खीची जाय तो जहा वे एक दूसरे को काटती हो वह शिखर का अतिम विन्दु हुमा । शिखर की मूल रेखा से उसकी (मूल रेखा की) सवाई जितनी ऊंचाई पर एक रेखा खीची जाय तो वह शिखर का स्कन्ध स्थान होगा । इस स्कन्ध और पद्मकोश के अतिम विन्दु तक की ऊचाई के सात भाग करके एक भाग मे ग्रीवा, १३ भाग मे आमलक शिला, १३ भाग मे पद्मपत्र (जिन्हे अाजकल लीलोफर कहते है), और तीन भाग मे कलश का मान रहेगा। शिखर मे शुकनास का भी महत्वपूर्ण स्थान है । शुकनास की ऊचाई के पाच विकल्प कहे है । अर्थात् छज्जे से स्कन्ध तक के उदय को जब इक्कीस भागो मे बाटा जाय तो ६, १०, ११, १२, १३, प्रशो तक कही भी शुकनास का उच्छ्य किया जा सकता है । शुकनासिका के उदय के पुनः नव भाग करके १, ३, ५, ७, या ६ भागो मे कही पर भी झम्पासिंह रखना चाहिये । शुकनासा, प्रासाद या देव मदिर की नासिका के समान है । शिखर मे शुकनासिका का निकलता खाता नीचे के अतराल मण्डप के अनुसार बनाया जाता है । अंतराल मण्डप को कपिली या कोली मण्डप भी कहते है । ( ४।२७) अन्तराल मडप की गहराई छः प्रकार की बताई गई है । शिखर की रचना मे शृग, उरुग (छातिया शृग), प्रत्यग और अण्डको का महत्वपूर्ण स्थान है। एव भिन्न भिन्न प्रकार के शिखरो के लिए उनकी गणना अलग २ की जाती है। इसी प्रकार तवग, तिलक और सिहकर्ण ये भी प्रकारान्तर के अलकरण है जिन्हे प्रासाद के शिखर का भूषण कहा जाता है और इनकी रचना भी शिखर को विभिन्नता प्रदान करती है। मडन के अनुसार प्रासाद के शिखर पर एक हिरण्यमय प्रासाद पुरुष की स्थापना की जाती है । कलश, दण्ड, और ध्वजारोपण के सबध मे भी विवरण पाया जाता है। पाचवे- अध्यायो मे वैराज्य प्रादि पच्चीस प्रकार के प्रासादो के लक्षण कहे गए है । गर्भ गृह के कोण से कोण तक प्रासाद के विस्तार के ४ से ११२ तक आवश्यकतानुसार भाग किए जा सकते है और उन्ही भागो के अनुसार फालनामो के अनेक भेद किए जाते है। प्रासादो के नाम और जातिया उनके शिखरो के अनुसार कही गई है । वस्तुतः इन भेदो के आधार पर प्रासादो की सहस्रो जातिया कल्पित की जाती है । गर्भ गृह, प्रासाद भित्ति, भ्रमणी या परिक्रमा और परिक्रमा-भित्ति यह प्रासाद का विन्यास है । इनमे प्राताद भित्ति, परिक्रमा और परिक्रमा मित्ति तीनो की चौडाई समान होती है। यदि दो हाथ की प्रासाद भित्ति, दो हाथ की परिक्रमा और दो हाथ की भ्रम भित्ति करे तो गर्भ गृह चार हाथ का होना चाहिए । परिक्रमा युक्त प्रासाद दस हाथ से कम का बनाना ठीक नही । प्रासादो के वैराज्य आदि पच्चीस भेद नागर जानि के कहे जाते है । छठे अध्याय मे बिगेपत शिखरो के अनेक भेदापभेदो की व्याख्या करते हुए केसरी २७ प्रादि प्रासादो का निरूपण किया गया है । प्रयोगात्मक दृष्टि से यह विपय अत्यधिक विस्तार को प्राप्त हो गया था। यहा तक कि मेरु-प्रासाद में ५०१ ” गक बनाए जाते थे। वृपभध्वज नामक मेरु मे एक-सहस्र एक अण्डक कहे गये है । मेरु प्रासाद बहु व्यय साध्य होने से केवल राजकीय निर्माण का विषय समझा जाता था। - ७ वें अध्याय में, मण्डपी के निर्माण की विधि दी गई है। १० हाथ से ५० हाथ तक की चौडाई के सम या सपाद मण्डप बनाए जाते थे । जैन मन्दिरो मे गूढमण्डप, चौकी मण्डप, नृत्य मण्डप, इन तीनो मण्डपो का होना मावश्यक माना गया है । मण्डप के ऊपर की छत घण्टा कहलाती थी जिसे हिन्दी मे गूमट कहते है । इसके ऊपर के भाग को सवरण और नीचे के भाग को वितान कहते थे । मडप के निर्माण मे स्तम्भो का विशेषतः विधान किया गया है। ४,८,१२ या २० कोने तक के स्तम्भ अथवा गोल स्तम्भ बनाए जाते थे । स्तम्भो की संख्या के भेद से २७ प्रकार के मण्डप कहे गए है । १२ स्तम्भो से लेकर २-२ की वृद्धि करते हुए ६४ स्तम्भा तक के मण्डपो का उल्लेख है । गूमट की छत के वितान को दर्दरी, रूपकण्ठ, विद्याधर, नर्तकी, गजतालु, कोल प्रादि अलकरणो से युक्त थरो से सुशोभित किया जाता था , एक से एक विधिय विसानो के निर्माण में भारतीय शिल्पाचार्यों ने अपने कौशल का परिचय दिया था । यहा तक कि एक हजार एक सी तेरह प्रकार के वितान कहे गये है । प्रमट के ऊपरी भाग या सवरण के सजावट मे घण्टो का प्रलकरण मुख्य था । न्यूनातिन्यून पाच घटियो से लेकर ४-४ की सख्या बढाते हुए एक सौ एक घंटियो तक की गिनती की जाती थी। पाठने अध्याय में मदिरो के एव वापी-कूप-तडागादि के जीर्णोद्धार की विधि कही गई है। साथ ही राजपुर आदि नगरो के निर्माण को सौथ, जालगवाक्ष, कीर्ति स्तम्भ, जलाराम आदि से सुशोभित करने का वर्णन प्राया है । इसी प्रकार कोष्ठागार, मत्तवारणी, महानस, पुन्यगाला, आयुधशाला, छत्रागार, जल स्थान, विद्या मण्डप, व्यारयान मण्डप आदि के निर्माण का विधान भी किया गया है । इस प्रकार सूत्रधार मण्डन ने अपने वास्तुसार सवन्धी इस अथ में सक्षिप्त शैली द्वारा प्रासाद रचना सवन्धि विस्तृत जानकारी भरने का प्रयत्न किया है । इस ग्रथ का पठन-पाठन मे अधिक प्रचार होना उचित है। श्री प भगवानदास जैन ने अनुवाद और चित्रमय व्याख्या के द्वारा इस प्रथ को सुलभ बनाने का जो प्रयत्न किया है इसके लिए हमे उनका उपकार मानना चाहिए । व्यक्तिगत रीति से हम उनके मोर भी प्राभारी है क्योकि पाज से कई वर्ष पूर्व जयपुर में रहकर हम उनसे इस प्रथ के माक्षात् अध्ययन का अवसर प्राप्त हुमा था । विदित हुआ है कि इस अन्य का वे हिन्दी भापान्तर भी प्रकाशित करना चाहते है । प्राशा है उस सस्करण में विपय को स्पप्ट करने वाले रेखाचित्रो की संख्या मे और भी वृद्धि सभव होगी। वासुदेवशरण अग्रवाल प्रध्यक्ष-कला वास्तु विभाग काशी विश्व विद्यालय ता०१-१-६२ विषयानुक्रमणिका विषय .. पृष्ठ १७ १८ १८ :: : : ४ :: ४ .. पृष्ठ विषय १ शिला और कूर्म का स्थापन क्रम २ शिला के नाम २ धरणी शिला का मान ३ धरणी शिला ऊपर के रूप सूत्रारभ नक्षत्र ४ शिला स्थापन नक्षत्र देवालय का निर्माण स्थान ५ प्रासाद निर्माण पदार्थ ५ देव स्थापन का फल ५ देवालय बनाने का फल ५ वास्तु पूजा का सप्त स्थान शान्ति पूजा का चौदह स्थान प्रासाद का प्रमाण ७ मण्डोवर के थरो का निर्गम प्रासाद के अंगो की संख्या फालनामो का सामान्य मान :: २१ २१ २१ २२ २२ २२ २२ २३ २३ २३ . मगलाचरण देव पूजित शिव स्थान प्रासाद की जाति पाठ जाति के उत्तम प्रासाद प्रासाद का निर्माण समय भूमि परीक्षा वास्तु मडल लिखने का पदार्थ आठ दिक्पाल कार्यारम के समय पूजनीय देव निषेध समय वत्समुख आय प्रादिका विचार देवालय मे विचारणीय आय व्यय और नक्षत्र लाने का प्रकार आयो की सज्ञा और दिशा प्रासाद के प्रशस्त प्राय व्यय सला राशि, योनि, नाडी, गण, चद्रमा आदि जानने का शतपद चक्र ध्वजाय और देवगण नक्षत्र वाले समचोरस क्षेत्र का नाप अश लाने का प्रकार दिक् साधन दिक् साधन यत्र खात विधि : : :: :: : ७ ७ : : : : २४ ८ दूसरा अध्याय - २५ २५ २५ २६ २७ २७ जगती जगती का प्राकार जगति का विस्तार मान १२ मण्डप की जगती १२ भ्रमणी ( परिक्रमा) १४ जगती के कोने १४ जगती की ऊचाई का मान १४ जगती के उदय का थर मान १५ जगती के आभूषण १६ जगती का दिग्दर्शन रेखाचित्र १६ देव के वाहन का स्थान १७ देव के वाहन का उदय १७ देव के वाहन का दृष्टि स्थान नाग वास्तु २७ :: २८ २८ ... राहु (नाग) मुख कूर्ममान गपराजित के मत से कूर्म का मान धीराएंव के मत में कूर्ममान फूर्म का ज्येष्ठ और कनिष्ठ मान २६ ३० ३० .... ३१ ....

२६ पृष्ठ ४६ ५१ ... ५४ ५५ ५५ . ५७ ... ५७ विषय जिनप्रामाद के मडपो का क्रम जिनप्रासाद मे देवलिका का प्रम वावन जिनालय यहत्तर देवनिका चोवीम देवकुलिका रप मोर मठ स्यान शिवलिङ्ग के मागे अन्य देव देव के सम्मुम न्यदेव परसरष्टिसंध दृष्टिवेय का परिहार गियस्नानादना देयो की प्रदक्षिणा जलमार्ग (पनाला) मग्रप स्थित देयों को नाली पूर्व और पश्चिमाभिगुगदेव दक्षिणाभिमुपदेव विस्मिाभिमुग देव मूर्य आपतन गणेग पायतन विष्णु प्रायतन चण्डी प्रायतन गिव पञ्चायतन त्रिदेव स्थापन कम त्रिदेवों का न्यूनारितमान तीसरा अध्याय ५७ की रचना ५८ ... ५८ ६० .. पृष्ठ विषय ३१ प्रासाद के उदय से पीठका उदयमान १४४ भाग का मंडोवर ( दीवार) ३२ १४४ भाग के मडोघर का दिग्दर्शन ३२ चार प्रकार की जघा ३२ मेह मडोवर और उसका चित्र ३२ मामान्य मंडोवर का चित्र ३३ सामान्य मंडोवर २७ भाग का मडोवर सचित्र ३४ मडोवर की मोटाई ३४ शुभाशुभ गर्भगृह लव चोरस शुभ गर्भगृह ३५ स्तभ और मडोवर का समन्वय ३५ गर्भगृह के उदय का मान और गुम्बज ३६ उदुम्बर ( देहली ) की ऊचाई ३६ उदुम्बर ३७ कुम्भा मे हीन उदुम्बर और तल ३७ अर्द्धचन्द्र (शखावर्त) ३७ उत्तरग नागरप्रासाद का द्वारमान ३८ भूमिजादि प्रासाद का द्वारमान ३. द्राविड प्रासाद का द्वारमान ३५ अन्यजाति के प्रासाद का द्वारमान ३६ द्वार शाखा ३६ शाखा के प्राय पात्रा से द्वार का नाम और परिचय विशाखा द्वार का चित्र ४१ न्यूनाधिक शाखामान ४१ विशाखा ४२ शाखा स्तभ का निर्गम ४२ शाखोदर का विस्तार और प्रवेश ४३ मि पच सप्त नव शाखा का चित्र शाखा के द्वारपाल का मान ४६ माखाके रूप ४६ पश्च शाखा ४७ सप्त शाखा ६४ ६४ ६५ ६६ प्रासाद धारिणी परमिला ६७ ६७ ६७ सरगिला का मान भिट्टमान .... ६७ मिट्ट का निर्गम ६८ ६८ पीठ का उदयमान पीठोदय का परमान थरो का निर्गम मान कामदपीठ और करणपीठ प्रामाद का उदयमान (मडोवर) ६६ ६६ ....

३० विषय पृष्ठ पृष्ठ विषय ७० सुवर्णपुरुष का मान और उसकी रचना ७१ कलश की उत्पत्ति और स्थापना नवनासा उत्तरंग के देव ८७ ८८ चौथा अध्याय ... 0 ७२ ७३ द्वारमान से मूनि और पवासन का मान गर्भगृह का मान गर्भगृह के मान से मूत्ति का मान देवो का दृष्टि स्यान देवो का पद स्थान ८६ ८६ ७३ ६० ७३ कलश का उदयमान कलश का विस्तारमान ध्वजादंड रखने का स्थान वजापार (स्तभवेध) का स्थान ध्वजाधार की मोटाई और स्तंभिका ध्वजाचार, ध्वजड और ध्वजा का चित्र ध्वजादड का उदयमान ध्वजादंड का दूसरा उदयमान ध्वजादंड का तीसरा उदयमान ध्वजादंड का विस्तारमान ध्वजादंड की रचना विषमपर्व वाले ध्वजादड के तेरह नाम ध्वजादंड की पाटली ६० ७४ प्रहार थर ७५ ६१ ६१ डाय (छना ) के थर मान शृङ्ग म ७५ .... ७६ ६२ ६२ ६२ १३ ७७ ध्वजा का मान ७८ ध्वजा का महात्म्य ७८ ८० उरु शृङ्ग का क्रम सचित्र शिखर निर्माण २५६ रेखा की साधना सचित्र उदय भेदोद्भव रेखा कलाभेदोद्भव रेखा रेखाचक्र त्रिखडा कला रेखा मोलह प्रकार के चार निखडा की रेखा और कला रेखा सत्या मडोवर और शिखर का उदयमान भिखर विधान ग्रीवा, मामलसार और कला का मान शुकनास का उदय सिंह स्यान कपिली (कोली ) का स्थान कपिली का मान छह प्रकार की कपिली प्रामाद के अडक और आभूपण गिसर के नमन का विभाग आमनसार का मान सचित्र मामलनार के नीचे शिखर के कोणरूप गुवर्णपुरम (प्रामादपुरुप ) की स्थापना ७६ पांचवां अध्याय ७६ ७६ ग्रंथ मान्यता की याचना ६५ वैराज्यप्रासाद ८१ फालना के भेद ६५ ८१ भ्रमणी (परिक्रमा) १ वैराज्य प्रासाद ६६ १२ वैराज्यादि जातिका प्रासाद चित्र ८२ नागर जातिका कलामय मंडोवर चित्र ५२ दिशा के द्वारका नियम ६७ २ नन्दन प्रासाद ६८ ८३ ३ सिंह प्रासाद ६६ ५३ ४ श्रीनन्दन, ५ मदिर और ६ मलयप्रासाद ६६ ७ विमान, विशाल, त्रैलोक्य भूषण प्रासाद १०० १० माहेन्द्र प्रासाद, ११ रत्नशीर्ष १२ सितशृंग प्रासाद १०१ ८५ १३ भूधर, १४ भुवन मडन, १५ त्रैलोक्य विजय, ९६ १६ क्षिति वल्लभ, १७ महीधर प्रासाद १०२ ८४ ८४ ६४ २ ३१ पृष्ठ विषय .... .. . निरधार प्रासाद विपय पृष्ठ १८ कैलास प्रासाद १०३ जिनप्रासाद के मण्डप ११७ १६ नवमंगल, २० गधमादन, २१ सर्वांगसुन्दर, मडप के पाच मान ११८ २२ विजयानन्द प्रासाद १०३ प्रासाद और मंडपका तलदर्शन २३ सर्वा गतिलक, २४ महा भोग, २५ मेरु प्रासाद प्रासाद और मडपोका उदय चित्र और प्रासाद प्रदक्षिणा का फल १०४ प्रासाद के मानसे मडप का नार गुमट का घटा कलश प्रौर शुकनासका मान. छठा अध्याय मडप के समविषमतल ११६ केसरी प्रादि, २५ प्रासादो का नाम १०६ मुख मण्डप १२० पचीस प्रासादो की मुंगसंख्या १०६ स्तभका विस्तार मान १२१ अष्टविभागीय तलमान १०७ प्राकृति से स्तभसज्ञा १२१ दश और बारह विभागीय तलमान १०७ प्राणीव मण्डप १२२ चौदह और सोलह विभागीय तलमान १०७ आठ जाति के गूढ मण्डप १२२ अठारह, वीस प्रौर वाईस विभागीय सर्वा गपूर्ण सागोपाग वाला प्राचीन देवालयका वित्र तलमान १०८ आमेर के जगतशरणजी के मन्दिर का चित्र तलो के क्रम से प्रासाद सख्या १०८ प्राचीन स्तमोका रेखा चित्र १२३ ११० माठ गूढ मडपो का रेखा चित्र १२४ प्रासाद तलाकृति ११० आवू मन्दिर के मण्डप, स्तभ और तोरण का चित्र लम्ब चोरस प्रासाद १११ गूढमडप की फालना १२५ गोल, लबगोल और मष्टानप्रासाद १११ मट के उदय का तीन प्रकार १२५ नागरप्रसाद १११ मटका न्यूनाधिक उदय फल द्राविड प्रासाद बारह चौकी मडप भूमिज प्रासाद ११२ बारह चौकी मडप का रेखा चित्र १२७ लतिन, श्रीवत्स और नागरप्रासाद ११२ सप्तविंशति मडपका रेखा चित्र मेरु प्रासाद ११२ १२६ नृत्यमडप द्राविडजातिका गोपुर प्रासाद चित्र सप्तविंशति मण्डप विमान नागर प्रासाद अष्टान और षोडशास्त्र का मान १ श्रीमेरु २ हेमशीर्ष मेरु, ३ सुरवल्लम क्षिप्त वितान का चित्र उत्क्षिप्त वितान का चित्र वितान का प्रकार १३१ ४ भुवनमण्डन, ५ रत्लशीर्ष, ६ किरणोद्भव ७ कमल हस मेस्त्रासाद ११४ विज्ञान के थर स्वर्णकेतु और 8 वृषभध्वज मेस्त्रासाद ११५ वितान संस्था समतल वितान मे नृसिंहावतार का चित्र सातवां अध्याय वर्ण और जाति के चार प्रकार के वितान १३४ मडपविधान ११७ रंगभूमि गर्भागमण्डप बलाक का स्थान ::: . . मेह प्रासाद ३२ पृष्ठ विषय पृष्ठ १५० छाया भेद १५१ १५१ १५१ १५२ १३७ विपय बलाएक का मान प्रासाद के मान से बलाराक का मान उत्तरग का पेटा भाग पाच प्रकार के बलाएक सवरणा प्रथम सवरणा का रेखा चित्र दूसरी संवरणा का चित्र पचीस सवरणा के नाम प्रथम पुष्पिका संवरणा १८ वी शताब्दी से आधुनिक समय की सवरणा का रेखा चित्र जैसलमेर जैन मन्दिर की संवरणाचिन कोति स्तभ का चित्र दूसरी नन्दिनी संवरणा प्राचीन संवरणा का चित्र .... १३४ १३४ देवपुर, राजमहल और नगर का मान १३५ राजनगर मे देव स्थान प्राश्रम और मठ स्थान विभाग प्रतिष्ठा मुहूर्त १३० प्रतिष्ठा के नक्षत्र १३६ प्रतिष्ठा मे वर्जनीय तिथि १३६ प्रतिष्ठा मण्डप यज्ञ कुण्ड का मान १४० आहुति संख्या से कुण्ड मान दिशानुसार कुण्डो की आकृति मण्डल १४१ ऋत्विजसंख्या १४२ देवस्नान विधि देवशयन १५२ १५२ १५३ १५३ .. .... १५४ १५५ १५५ १५५ .... आठवां अध्याय रत्लन्यास १४३ धातुन्यास १५६ १५६ १५७ १५७ १५८ १५६ . .... शिवलिंग का न्यूनाधिक मान वारतुदोप निपेयवास्तु द्रव्य शिवालय उत्यापन दोप जीर्णोद्धार का पुण्य जीणोंद्वार का वास्तु स्वरूप दिट मूढ दोप दिड मूढ का परिहार प्रव्यक्त प्रासाद का चालन महापुरुप स्थापित देव जीर्णवास्तु पातन विधि महादोष गिरिपत महा दोप मित पोर अभिन्न दोष दया के भिन्नदोप व्यकाव्यक्त प्रासाद मरामर्म दोप अन्य दोषों का फल १६० १६० .... १४३ औषधिन्यास १४३ धान्यन्यास १४४ प्राचार्य और शिल्पियो का सन्मान १४४ प्रासाद के अंगो मे देव न्यास १४४ प्रतिष्ठत देव का प्रथम दर्शन १४ सूत्रधार पूजन १४५ देवालय निर्माण का फल १४५ सूत्रवार का आशिर्वाद १४५ प्राचार्य पूजन १४६ जिनदेवप्रतिष्ठा १४६ जलाश्रय प्रतिष्ठा जलाश्रय बनाने का पुण्य १४७ वास्तु पुरुषोत्पत्ति • १४७ वास्तुपुरुष के ४५ देव १४८ वास्तुमंडल के कोने की आठ देवी १४८ शास्त्र प्रशंसा १४६ अन्तिममगल . १६१ १६२ १६२ . १६७ ३३ पृष्ठ १८६ १८६ १८६ १६० ... .. १६० १६१ १६१ ६६२ १६२ १७४ १६३ १६३ १६४ १७४ . परिशिष्ट नं०१ विषय केसरी आदि २५ प्रासादो का नाम १ केसरी प्रासाद २ सर्वतोभद्र प्रासाद ३ नन्दनप्रासाद ४ नंदिशाल प्रासाद ५ नन्दीशप्रासाद ६ मदर प्रासाद ७ श्रीवृक्षप्रासाद ८ अमृतोद्भव प्रासाद ६ हिमवान प्रासाद १० हेमकूट प्रासाद ११ कैलास प्रासाद १२ पृथ्वीजय प्रासाद १३ इन्द्रनील प्रासाद १४ महानील प्रासाद १५ भूघर प्रासाद १६ रत्नकूट प्रासाद १७ वैडूर्य प्रासाद १८ पराग प्रासाद १६ वचक प्रासाद २० मुकुटोज्ज्वल प्रासाद २१ ऐरावत प्रासाद २२ राजहस प्रासाद २३ पक्षिराज (गरुड) प्रासाद २४ वृषभ प्रासाद २५ मेरु प्रासाद मेरुप्रासाद की प्रदक्षिणा का फल परिशिष्ट नं. २ . विपय पृष्ठ ५ अभिनन्दन जिन प्रासाद १६८ ६ सुमतिजिनवल्लभ प्रासाद १६६ ७ पचप्रभजिन प्रासाद १७० ८ पधराग प्रासाद १७१ ६ पुष्टि पद्धन प्रासाद १७१ १० सुपार्वजिन प्रासाद १७२ ११ श्रीवल्लभप्रासाद १७२ १२ चन्द्रप्रभजिन प्रासाद १७३ १३ श्रीचन्द्रप्रासाद १७३ १४ हितुराज प्रासाद १५ पुष्पदतजिन प्रासाद १७४ १६ शीतल जिन प्रासाद १७ कीतिदायक प्रासाद १७५ १९ मनोहर प्रासाद १६ श्रेयासजिनवल्लभ प्रासाद १७५ २० सुकुल प्रासाद १७७ २१ कुलनन्दन प्रासाद १७७ २२ वासु पूज्य जिन प्रासाद २३ रन सजय प्रासाद १७९ २४ धर्मद प्रासाद १७६ २५ विमल जिनवल्लभ प्रासाद १७६ १७६ २६ मुक्तिद प्रामाद २७ अनन्त जिन प्रासाद १८१ २८ सुरेन्द्र प्रासाद १८१ २६ धर्मनाथ जिन प्रासाद १५१ ३० धर्मवृक्ष प्रासाद १५२ १५३ ३१ शातिनाप जिन प्रासाद १५३ ३२ कामदायक प्रासाद ३३ कुथुनाथ जिनवल्लभ प्रासाद ३४ शक्तिद प्रासाद १८४ ३५ हर्पण प्रासाद १८५ ३६ भूपण प्रासाद १०६ ३७ अरनाथ जिनवल्लभ प्रासाद १८७ ३८ श्रीशैल प्रासाद १८८ ३६ परिनाशन प्रासाद १६५ १६५ १६५ १६६ १६६ १६७ १६७ १६८ .. १६४ . .... ... . २०० २०० २०१ २०१ २०२ .. २०२ जिन प्रासादाध्याय १ ऋषभजिनवल्लभ प्रामाद २ अजितजिनवल्लम प्रासाद ३ सभव जिनवल्लभ प्रासाद ४ अमृतोद्भव प्रासाद .

वृत विषय पृष्ठ २०० २०६ . --- . પિકડ . MM . .... ५२ सुसन प्रानाद ४ ५३ णपर्वनाथ जिन वल्लभ प्रासाद ५४ पदमावती प्रामाद २०८ ५५ प वल्लभ प्रासाद ५६ महावीर जिन प्रानाद २०५ ५७ सप्टाग्द प्रासाद ५८ तुष्टि पुष्टि प्रासाद ०६ जिन शसाद प्रशसा ०६ मन्दों का प्रकारादिकम २०७ गुद्धि पनक २०७ मनुवाद सहायक ग्रन्य २०८ २१० २११ . +4 .... elor ... --

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लताशृगवाला विमान नागर जाति का प्रासाद (पीठ मडोवर और गिखर का
सर्वाङ्गपूर्ण दृश्य)
उदयपुर-मेवाड

4 m -- ETE den- प्रागग्रीव मडप वाला नागर जाति का निरधार प्रासाद खजुराहो (मध्यप्रदेश) ॐ णमो जिणाणं मण्डनसूत्रधारविरचितम् प्रासादमण्डनम् टीकाकारका मंगलाचरण- "परं परमेष्ठिनं जिनं नत्वा करोम्यहम् । प्रासादमण्डनप्रवो-धाय भाषां सुबोधिनीम् ॥" श्रेष्ठ जो पच परमेष्ठी जिनदेव है, उनको नमस्कार करके प्रासाद मंडन नाम के शिल्प- गास्त्र को अच्छी तरह समझने के लिये सुबोधिनी नामकी टीका करता हूँ। ग्रन्थकार का मंगलाचरण- गणेशाय नमस्तस्मै निर्विघ्नसिद्धिहेतवे । आदिगौरीसमुद्भत-तेजसा सम्भूताय' वै ॥१॥ निर्विघ्न रूप से अपने कार्य की सिद्धि के लिए महामाया पार्वतीदेवी के अद्भुत तेज से उत्पन्न हुए श्री गणेश देव को नमस्कार है ॥१॥ महामायेति या गीता चिन्मयी मुनिसत्तमैः । तनोतु वाग्विलासं मे जिह्वायां सा सरस्वती ॥२॥ महान् ऋपियों ने जिनकी स्तुति की है, ऐसो ज्ञानमयी महामाया सरस्वती देवी मेरी जिह्वा में निवास करके वाणी का विस्तार करें ।।२।। सृष्ट्यायसूत्रधारस्य प्रसादाद् विश्वकर्मणः । प्रासादमण्डनं बते सूत्रधारेषु मण्डनः ॥३॥ सृष्टि के आद्य सूत्रधार श्री विश्वकर्मा की कृपा से सूत्रधारो मे श्रेष्ठ भूषण रूप 'भण्डन' नाम का सूत्रधार प्रासादमण्डन नामका यह ग्रन्थ कहता है ॥२॥ गृहेषु यो विधिः प्रोक्तो विनिवेशप्रवेशने । स एव विधिना' कार्यों देवतायतनेष्वपि ॥४॥ (१) सम्भवाय (२) करोतु (३) विदुषा प्रासादमण्डने २ घर बनाने की तथा उसमे प्रवेश करने की जो विधि वास्तुशास्त्र में विद्वानों ने बतलायी है, उस विधि के अनुसार देवालय मे भी कार्य करे ॥४॥ देवपूजित शिवस्थान- हिमाद्रेरुत्तरे पावें चारुदारुवनं' परम् । पावनं शङ्करस्थानं तत्र सर्वेः शिवोऽचिंतः ॥५॥ हिमालय पर्वत के उत्तर दिशा में एक बडा मनोहर देवदार वृक्षों का सुन्दर वन है, यह महादेवजी का पवित्र तीर्थस्थान है। वहां सब देव और दैत्य आदि ने मिलकर महादेव की पूजा को ॥५॥ प्रासादों की जाति- प्रासादाकारपूजाभि-देवदैत्यादिभिः क्रमात् । चतुर्दश समुत्पन्नाः प्रासादानां सुजातयः ॥६॥ देव और दैत्य आदि सब देवो ने अनुक्रम से प्रासाद के आकार वाली शंकर की अनेक प्रकार से पूजा की, जिसके चौदह लोक के देवों द्वारा भिन्न भिन्न रूप से पूजित होने से चौदह प्रकार की प्रासाद की जाति उत्पन्न हुई ॥६॥ प्रासादोत्पत्ति की चौदह जाति- “यत्र येषां कृता पूजा तत्र तन्नामकास्तु ते । प्रासादानां समस्तानां कथयिष्याम्यनुक्रमम् ।। मुरैस्तु नागरा. ख्याता द्राविडा दानवेन्द्रकः । लतिनाश्चैव गन्धर्व-र्यक्षेश्चापि विमानजाः ।। विद्याधरैमिश्रकाश्च वसुभिश्च वराटकाः । सान्धाराश्चोरगैः ख्याताः नरेन्द्र भूमिजास्तथा ।। विमाननागरच्छन्दाः सूर्यलोकसमुद्भवाः । नक्षत्राधिपलोकोक्ताश्छन्दा विमानपुष्पका.॥ पार्वतीसम्भवाः सेना वलभ्याकारसंस्थिताः । हरसिद्धयादिदेवीभिः कार्याः सिहावलोकनाः ।। व्यन्तरस्थितदेवैस्तु फासनाकारिणो मताः । इन्द्रलोकसमुद्भूता रथाश्च विविधा मताः ॥" अपराजितपृच्छा सू० १०६ (१) देवगुरु (२) 'च' प्रथमोऽध्यायः ३ -- O . "-440- -Reema- 'जिन जिन देवो ने प्रासाद के आकार वाली पूजा की, उनके नाम वाले, जो जो प्रासाद उत्पन्न हुए, उनको अनुकम से कहूँगा (१) देवो के पूजन से नागर जाति, (२) दानवो के पूजन से द्राविडनाति, (३) गन्धर्वो के पूजन से लतिनजाति, (४) यक्षों के पूजन से विमानजाति, (५) विद्याधरों के पूजन से मिश्रजाति, (६) वसु देवो के पूजन से वराटकजाति, (७) नागदेवो के पूजन से सान्धार जाति, () नरेन्द्रो के पूजन से भूमिजजाति, (९) सूर्यदेवो के पूजन से विमान- नागर जाति, (१०) चन्द्रमा के पूजन से विमानपुष्पक जाति, (११) पार्वती के पूजन से वलभी नाति, (१२) हरसिद्धि आदि देवियों के पूजन से सिंहावलोकन जाति, (१३) व्यन्तर स्थित देवों के पूजन से फांसी के प्राकार वाली जाति, १४-और इन्द्रलोक के देवो के पूजन से रथारूह (दारुजादि) जाति, ये चौदह जाति के प्रासाद उत्पन्न हुए। पाठ जाति के उत्तम प्रासाद- नागरा द्राविडास्चैव भूमिजा लतिनास्तथा । . सावन्धारा विमानादि-नागराः पुष्पकाङ्किताः' ॥७॥ मिश्रकास्तिलकैः शृङरष्टौ जातिषु चोत्तमाः। सर्वदेवेषु कर्तव्याः शिवस्यापि विशेषतः ॥८॥ चौदह जाति के प्रासादों मे (१) नागर, (२) द्राविड, (३) भूमिज, (४) लतिन, (५) सावं- धार (सांधार केसरी आदि), (६) विमान नागर, (७) विमान पुष्पक, और (८) शृङ्ग और तिलक वाला मिश्र, ये आठ जाति के प्रासाद उत्तम हैं । इसलिये सब देवो के लिये यही बनाने चाहिये, उनमे भी विशेषकर महादेवजी के लिये बनाना श्रेयस्कर है ।।७-८।। प्रासादानां च सर्वेषां जातयो देशमेदतः। चतुर्दश प्रवर्तन्ते ज्ञेया लोकानुसारतः ।।६।। सब प्रासादो के भेद देशो के भेद के अनुसार होते है। इनके मुख्य चौदह भेद है, वे अन्य अपराजित पृच्छा सूत्र ११२ आदि शास्त्रो से जानना चाहिये ।। लक्ष्यलक्षणतोऽभ्यासाद् गुरुमार्गानुसारतः । प्रासादभवनादीनां सर्वज्ञानमत्राप्यते ॥१०॥ प्रासाद और गृह आदि बनाने के लिये सब प्रकार का शिल्पज्ञान, उसके लक्ष्य और लक्षण के अभ्यास से एवं गुरुशिक्षा के अनुसार प्राप्त करना चाहिये ॥१०॥ (१) पुष्पकान्तिका (२) प्रासादमिश्रकारचंव प्रासादमण्डने ४ . १ प्रासाद का निर्माण समय- शुभलग्ने सुनक्षत्रे' पञ्चग्रहवलान्विते । माससंक्रान्तिवत्सादि-निपिधकालवर्जिते ॥११॥ शुभ लग्न और शुभ नक्षत्र मे, पांच ग्रह ( सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र) के वलवान् होने पर, तथा मास, संक्रान्ति और वत्स आदि के निषेध समय को छोड़ कर प्रासाद बनाना प्रारभ करे॥११॥ भूमि परीक्षा- सर्वदिक्षु प्रवाहो वा प्रागुदकशङ्करप्लवाम् । भूमि परीक्ष्य संसिञ्वेत् पञ्चगव्येन कोविदः ॥१२॥ मणिसुवर्णरूप्येण विद्रुमेण फलेन था। प्रथम प्रासाद, वनाने की भूमि की परीक्षा करनी चाहिये । जिस भूमि पर चारों दिशाओं मे पानी का प्रवाह चलता हो अर्थात वह चारों दिशाओं में नीची हो और बोच में ऊंची हो, अथवा पूर्व, उत्तर और ईशान कोनों में नीची हो, अर्थात् इन तीन दिशाओं में पानी का प्रवाह जाता हो तो ऐसी भूमि शुभदायक है । विशेष जानने के लिये देखें अपराजित पृच्छा सूत्र० ५१. इस प्रकार भूमिको परीक्षा करके विद्वान् जन पञ्च गव्य (गाय का दूध, दही, घी, मूत्र और गोबर ) से उस भूमि पर छिड़काव करें तथा मरिण, सोना, रूपा, मूंगा और फलो से भूमि को पवित्र करे ॥१२॥ वास्तुमंडल लिखने का पदार्थ- चतुःपष्टिपदैर्वास्तु लिखेद्वापि शांशकैः ॥१३॥ पिप्टेन वाक्षतैः शुद्धस्ततो चास्तुं समर्चयेत् । पूर्वोक्तेन विधानेन वलिपुप्पैश्च पूजयेत् ॥१४॥ प्रासाद के प्रारभ होने से समाप्त होने तक उतने समय में सात अथवा चौदह बार चौसठ पद का अथवा एकसौ पद का वास्तुमण्डल पूजा जाता है । यह शुद्ध पाटा अथवा शुद्ध चावलो मे बनाना चाहिये । पश्चात् उसे पूर्वाचार्यो द्वारा बतलाई गई विधि के अनुसार बलि और पुप्प आदि से पूजना चाहिये ।।१शा१४॥ (२) शुनच (२) मच्च (३) बलिपुष्पादिपूजनः * विशेष जानने के लिये देखें स्वयंद्वारा अनुदित राजवल्लभमंडन में दूसरा अध्याय । - .

प्रथमोऽध्यायः re. mpawsones- 0000000 --000mnmomdan mammmmmmmmmmmmmmmm आठ दिक्पाल- इन्द्रो वह्निः पितृपतिनैऋतो वरुणो मरुत् । कुवेर ईशः पतयः पूर्वादीनां दिशा क्रमात् ॥१५॥ इन्द्र, अग्नि, यम, नैऋति, वरुण, वायु, कुबेर और ईश, ये आठ देव अनुक्रम से पर्वादि दिशामो के अधिपति है ॥१५॥ कार्यारम्भ के समय पूजनीय देव- दिक्पाला क्षेत्रपालाश्च गणेशश्चण्डिका तथा । एतेषां विधिवत् पूजां कन्या कर्म समारभेत् ॥१६॥ दिक्पाल, क्षेत्रपाल, गणेश और चण्डिका देवी आदि देव देवियो की विधि पूर्वक पूजा करके कार्य प्रारंभ करे ॥१६॥ निषेध समय- धनुर्मीनस्थिते सूर्ये गुरौ शुक्रऽस्तगे विधौ । वैधृतौ व्यतिपाते च दग्धायां न कदाचन ॥१७॥ धन और मीन संक्राति का सूर्य हो, गुरु शुक्र और चन्द्रमा ये अस्त हो, वैधृति और व्यतिपात के योग हो, तथा दग्धा तिथि हो, तब कभी भी नवीन कार्य का प्रारंभ नहीं करना चाहिये ॥१७॥ वत्समुख- कन्यादित्रित्रिमे सूर्य द्वार पूर्वादिषु त्यजेत् । सृष्टया वत्समुखं तत्र स्वामिनो हानिकृयतः ॥१८॥ कन्या आदि तीन तीन राशि पर सूर्य हो, तब अनुक्रम से पूर्व मादि दिशामो में द्वार आदि का कार्य नही करना चाहिये । क्योकि उन दिशानो में सष्टिक्रम से अर्थात् पूर्व, दक्षिण पश्चिम और उत्तर दिशा मे वत्सका मुख रहता है। यह कार्य कराने वाले स्वामी को हानिकारक है । जैसे-कन्या, तुला और वृश्चिक राशि पर सूर्य हो तब वत्स का मुख पूर्व दिशा मे, धन, मकर और कुंभ राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख दक्षिण दिशा में, मीन मेष और वृष राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख पश्चिम दिशा मे; मिथुन, कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब वत्स का मुख उत्तर दिशा में रहता है । ॥१८॥ (१) समाचरेत (२) त्रित्रिगे ६ प्रासानमण्डने Roman 000000000000 000 ५ १० ११५३०१५ वायव्य १० ५ . h जिस दिशा में वत्स का मुख हो, उस दिशा में तथा मुख के सामने वाली दिशा में खात, देव प्रतिष्ठा, द्वार प्रतिष्ठा आदि कार्य करना शास्त्र मे वर्जित है, परन्तु वत्समुख एक दिशा में तीन तीन मास तक रहता है । इसलिये तीन मास तक उक्त कार्य को नही रोकने के लिये ठक्कुर फेर कृत 'वत्युसार पपरण' प्र० १ गाथा २० में विशेष रूप से बतलाया है कि- "गिहभूमि सत्तभाए पण दह तिहि तीस तिहि दहक्ख कमा इन दिणसंखा चउदिसि सिरपुच्छसमकि वच्छठिई ॥" घर या प्रासाद की भूमि का प्रत्येक दिशा में सात सात भाग करना, उनमे अनुक्रम से प्रथम भाग में पांच दिन, दूसरे में दस दिन, तीसरे में पंद्रह दिन, चौथे में तीस दिन, पांचवें मे पंद्रह दिन, छटे में दस दिन और सातवे भाग में पांच दिन वत्स का मुख रहता है । इस प्रकार भूमि की चारो दिशाओं मे दिन संख्या समझना चाहिये । जिस अंक पर वत्स का मुख हो, उसी अंक के सामने वाले बराबर के अंक पर वत्स की पूंछ रहती है । इस प्रकार की वत्स की स्थिति है। जैसे कन्याराशि पर सूर्य हो, न मिनाल्गुन कासिंह सिंह और यदि पूर्व दिशा में खात प्रादि उत्तर कार्य करने की मावश्यकता हो तो कन्याराशि को प्रथम पांच दिन तक प्रथम भाग मे खात आदि कार्य नहीं करना चाहिये, परन्तु दूसरे छह भागों में से किसी एक भाग में शुभ मूहूर्त में कार्य कर सकते है । एवं छठे से पंद्रहवे दिन In तक दूसरे भाग में और सोलहवें से तीस दिन तक तीसरे भाग में कार्य नहीं करें। तुला राशि के सूर्य मे तीस दिन तक मध्य के चौथे भाग में कार्य नही करे। वृश्चिक राशि के सूर्य में पहले पंद्रह दिन पाचवे भाग में, सोलहवें से पचीसवे दिन तक छठे भाग में और छब्बीसवे से तीसवे दिन तक सातमें भाग मे कार्य नहीं करें। इसी प्रकार प्रत्येक दिशा में प्रत्येक सक्रांति के दिन सख्या समझ लेनी चाहिये । अपराजित पृच्छ सूत्र ६२ मे कहा है कि- "देवागारं गृहं यत्र न कुर्याच्छिरःसन्मुखम् । मृत्युरोगभया नित्यं शस्तं च कुक्षिसम्भवम् ।।" REJRE १० १४ पूर्व पश्चिम ३. मीनामीन मीना मेष १० प मि घर या प्रासादकरनेकी १० १५ कन्या कन्या कन्याला सिकाइधिक १० ५ RSAwedaala Phulhd अ - प्रथमोऽध्यायः --- . Amome -- --- 04 Cons ARMA-- -ommonweam.mammer Mate Non- वत्सके सिर के भाग में और उनके सामने के भाग मे देव मंदिर अथवा मनुष्य के घर नही बनावे, यदि बनावगे तो मृत्यु, रोग और भय हमेशा बना रहेगा । इसलिये वत्स की कुक्षि में कार्य करना अच्छा है। विशेप उक्त ग्रंथ मे देखें। आयादिका विचार- आयो व्ययमंशस्य मितिवाटे सुरालये । ध्वजायो देवनक्षत्रं व्ययांशौ प्रथमौ शुभौ ॥१६॥ आय, व्यय, नक्षत्र और अश प्रादि की गणना देवालय में दीवार के बाहर के भाग से होती है । देवालय मे ध्वज प्राय, देव नक्षत्र, प्रथम व्यय और प्रथम अंश ये शुभ है ॥१९॥ केपाश्चिन्मरुता' गेहे वृपसिंहगनाः शुभाः । आयादूनो व्ययः श्रेष्ठः पिशाचस्तु समोऽधिकः ॥२०॥ देवालयों मे वृप, सिंह और गज प्राय भी श्रेष्ठ है । अपराजित पृच्छा सूत्र ६४ में भी कहा है कि-'ध्वजः सिंहो वृषगजी शस्यन्ते सुरवेश्मनि ।' प्राय से व्यय कम हो तो श्रेष्ठ है। सम व्यय हो तो पिशाच और अधिक व्यय हो तो राक्षस नाम का व्यय माना जाता है ॥२०॥ देवालय में विचारणीय- देवतानां गृहे चिन्त्य-मायाधनचतुष्टयम् । नवा नादीवधादि-स्थापकामरयोमिथः ॥२१॥ देवालय में प्राय, व्यय, अंश और नक्षत्र इन चार अंगों का, तथा स्थापक ( देव स्थापन करने वाले ) और देव इन दोनो के परस्पर नाडीवैध, योनि, गण, राशि, वर्ण, वश्य, तारा, वर्ग और राशिपति, इन नव मङ्गों का विचार करना चाहिये ॥२१॥ आयादिचिन्तनं भूमि-लक्षणं वास्तुमण्डलम् । मासनक्षत्रलग्नादि-चिन्तन पूर्वशास्त्रतः ॥२२॥ माय आदिका विचार, भूमिका लक्षण, वास्तु मण्डल, मास, नक्षत्र और लग्न प्रादिका विचार, ये सब राजवल्लभ मंडन और अपराजित पृच्छा आदि शास्त्रो से जानना चाहिये ॥२२॥ आय व्यय और नक्षत्र लाने का प्रकार- "व्यासे देय॑गुणेऽष्टभिविभजिते शेषो ध्वजाबायको, ऽष्टघ्ने तद्गुणिते च धिष्ण्यजिते साहक्षमश्वादिकम् । (१) केपा च (२) हीन मायाद् प्रासादमण्डने ८ Re-on- नक्षत्रे वसुभिर्व्ययोऽपि भजिते होनस्तु लक्ष्मीप्रदः, तुल्यायश्च पिशाचको ध्वजमृते संवद्धितो राक्षसः ॥" राज व०प्र०३ प्रासाद अथवा गृह बनाने की भूमि की लंबाई और चौड़ाई के नाप का गुणाकार करने से जो गुणनफल हो, वह क्षेत्रफल कहा जाता है। इसको आठ से भाग देने से जो शेष बचे, वह ध्वज आदि आय कहलाती है । क्षेत्रफल को आठ से गुणा करके, गुणनफल को सत्ताईस से भाग दे जो शेष बचे वह अश्विनो आदि नक्षत्र होता है। नक्षत्र की जो संख्या पावे, उसमे पाठ का भाग देने से जो शेष बचे वह व्यय कहलाता है । प्राय से व्यय कम हो तो लक्ष्मी को प्राप्त करने वाला है। आय और व्यय दोनों बराबर हो तो पिशाच नाम का व्यय और ध्वज आय को छोड़कर दूसरी आयों से व्यय अधिक हो तो वह राक्षस नाम का व्यय कहलाता है। प्रायों की संज्ञा और दिशा- "ध्वजो घूमश्च सिंहश्च श्वानो वृषखरी गजः । ध्वांक्षश्चेति समुहिष्टाः प्राचादिषु प्रदक्षिणाः ॥" अप० सू० ६४ ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, वृष, खर, गज और ध्वांक्ष, ये आठ प्रायों के नाम है । वे अनुक्रम से पूर्व आदि दिशाओं के स्वामी हैं। प्रासाद के प्रशस्त पाय- ध्वजः सिंहो वृषगजी शस्यते सुरवेश्मनि । अधमानां खरध्वाक्ष-धूमश्वानाः सुखावहाः ।।" अप० सू० ६४ ध्वज, सिंह, वृष और गज ये चार प्राय देवालय में शुभ हैं। तथा खर, ध्वांक्ष, धूम और स्वान ये चार आय अधम जातिवालों के घरों मे सुखकारक है। व्यय संज्ञा- "शान्तः पौरः प्रद्योतश्च श्रियानन्दो मनोहरः । श्रीवत्सो विभवश्चैव चिन्तात्मा च व्ययाः स्मृताः। समो व्ययः पिशाचश्च राक्षसस्तु व्ययोऽधिकः । व्ययो न्यूनो यक्षश्चैव धनधान्यकरः स्मृतः ॥" अप० सू० ६६ शान्त, पौर, प्रद्योत, श्रियानन्द, मनोहर, श्रीवत्स, विभव और चिन्तात्मा, ये व्ययों के आठ नाम हैं। आय और व्यय समान हो तो पिशाच नाम का व्यय, आय से व्यय अधिक हो तो राक्षस नाम का व्यय और प्राय से व्यय कम हो तो यक्ष नाम का व्यय होता है। यह धन धान्य की वृद्धि करने वाला है। (७) विशेष जानने के लिये देखो मेरा अनुवादित राजवल्लभ मंडन ग्रंथ प्रथमोऽध्यायः राशि, योनि, नाड़ी, गण आदि जानने का शतपदचक्र- भतर राशि वर्ण वश्य योनि राशिश | गणनाडी चन्द्र १ प्रश्विनि मेष क्षत्रिय चतुष्पद | प्रश्व मंगल । देव देव प्राद्य उत्तर चो. ला. २भरणी ली. लू. ले. लो. मेष क्षत्रिय चतुष्पद | गज मंगल मनुष्य मध्य उत्तर पौर १मगल ३] कृत्तिका १ मेष १क्षत्रिय २ वृष | ३ वैश्य चतुष्पद बकरा राक्षम प्रत्य | पूर्व प्रद्योत उ. ए. ३ शुक्र पो.वा. ४/ रोहिणी चतुष्पद सर्प शुक्र मनुष्य मन्स्य पूर्व श्रियानंद वृष वैश्य वी. दु. वे. वी. २ वृष २ वैश्य र चतुष्पद का.की./२ मिथुन २ शुद्र | २ मनुष्य २ शुक्र ५ मृगशिर सर्प देव मध्य पूर्व मनोहर २ बुध मार्दा कु.. मिथुन इ.छ. मनुष्य श्वान खुष मनुष्य माध] पूर्व श्रीवत्स ३ वुत्र पुनर्वसु के.को. | ३ मिथुन | ३ शूद्र ३ मनुष्य লিবি हा.ही./ १ कर्क | १ ब्राह्मण १ जलचर देव माध| पूर्व विभव है. पुष्य कर्क माह्मण जलचर बकरा चद्रमा | देव | मध्य | पूर्व चिन्तात्म हो.डा. डी.हु. है. डो. प्राश्लेषा कर्क ब्राह्मण जलचर मार्जार चन्द्रमा राक्षस अत्य पूर्व शान्त १० मघा मा. मी. मु. मे. सिंह क्षत्रिय पौर सूर्य वनचर चहा राक्षम प्रत्य दक्षिण मो. टा ११/पूर्वा फा० सिंह क्षत्रिय बनचर चहा सूर्य सूर्य मनुष्य | मध्य दक्षिण] प्रद्योत टी.. १ सूर्य गौ मनुष्य माद्य दक्षिण धियानन्द है. टो. १सिंह १ क्षत्रिय १ वनचर १२ उत्तरा फा. पा. पी. | ३ कन्या | ३ वैश्य ३ मनुष्य ३ बुध पु.षा. वैश्य भस कन्या मनुष्य देव माघ दक्षिण मनोहर बुध प..

प्रासादमण्डने MA -- ANW000 m memommmmm mommmmmmmmmmmmmmmmmmmmm ननव प्रत्तर राशि | वर्ण वश्य योनि राशीशगणनाक्षी चन्द्र व्यय २ बुध १४] चित्रा मनुष्य | वाघ राक्षस मध्य दक्षिण| श्रीक्स २ शुक्र पे. पो २ कन्या | २ वैश्य रा. री. २ तुला २ तुला | २ शूद्र ३. रे. रो.ता. तुला १५. स्वाति मनुप्य | भैस शुक्र देव अंत्य दक्षिण विभव तो. तु. १६ विशाखा ३ तुला | ३ शूद्र | ३ मनुष्य १ वृश्चिक ३ शुक्र व्याघ ते. तो. राक्षस | अंत्य दक्षिण चिन्तात्मा १ ब्राह्मण १ कीडा १ मंगल १७ अनुराधा ना.नी. नु. ने, वृश्चिक ब्राह्मण कीडा हीरण मंगल देव मध्य पश्चिम शान्त नो या. १८ ज्येष्ठा वृश्चिक ब्राह्मण कीडा होरण मंगल राक्षस आद्य पश्चिम पौर घन क्षत्रिय मनुष्य | कुकर गुरु राक्षस आद्य पश्चिम प्रद्योत २०/पूर्वाषाढा | मु. पा. धन क्षत्रिय मनुष्य चतुष्पद वानर फ.डा. गुरु मनुण मध्य पश्चिम श्रियानद १घन २१ उत्तरापाढा मे. भो. जा. जी. १ क्षत्रिय ३ वैश्य १ ३ मकर चतुष्पद न्यौला १ गुरु ३ शनि मनुप्य अंत्य पश्चिम मनोहर २२ श्रवण खो. खू. खे खो. मकर वश्य चतुष्पद वानर शनि देव प्रत्य पश्चिम श्रीवत्स २३ घनिष्ठा गा.गी.. मकर गुगे. २ वैश्य र जलचर २ शूद्र २ मनुष्य २ कुम्भ सिंह शनि राक्षस मध्य | उत्तर विभव २४ शतभिपा गो. सा. कुम्भ मी.सु शुद्ध मनुष्य | घोडा) शनि राक्षस माद्य | उत्तर चिन्तामा २५ पूर्वा भाद्र से. सो. ३ कुम्भ ३ शुद्ध ३ मनुष्य सिंह दा. दी | १ मीन | १ ब्राह्मण जलचर ३ शनि मनुष्य प्राय उत्तर शान्त १ गुरु २६ उत्तराभाद्र मीन ब्राह्मण | जलचर गौ म.न. गुरु मनुष्य मध्य उत्तर पौर २५ रेवती दे.दो. चा ची. मीन ब्राह्मण जलचर हाथी गुरु देव प्रत्य | उत्तर प्रद्योत प्रथमोऽध्यायः ११ mommemorammam -- Mos. ध्वजाय और देवगणनक्षत्रवाले समचोरस क्षेत्र का माप- - गज-इच नक्षत्र गज नक्षत्र नक्षत्र ७-२१ ७-२३ रेवती मृगशीर मृगशीर रेवती मृगशीर अनुराधा रेवती १५-६ १५-१६ १-१३ १-२१ १६-३ १६-११ पुष्य अनुराधा रेवती पुष्य रेवती अनुराधा मृगशीर रेवती रेवती रेवती पुष्य ५-१५ ८-२३ ६-१ 8-8 ६-१७ २-५ २-७ २-१५ २-२३ अनुराधा रेवती पुष्य पुष्य रवती अनुराधा मृगशीर रेवती मृगशीर अनुराधा पुष्य १७-१३ १७-१५ १७-२३ १०-३ पुष्य रेवती अनुराधा मृगशीर रेवती मृगशीर अनुराधा रेवती पुष्य पुष्य रेवती ३-६ १०-१३ १५-१ १५-६ १५-१७ पुष्य रेवती रेवती ३-१६ - पुष्य ११-७ ११-१५ ११-२३ ४-२१ १२-७ ५-१३ ५-१५ ५-१७ अनुराधा मृगशीर रेवती मृगशीर १२-११ १२-१६ १३-३ रेवती अनुराधा मृगशीर रेवती मृगशीर अनुराधा रेवती पुष्य पुष्य रेवती अनुराधा मृगशीर रेवती मृगशीर १९-३ १९-५ १९-२१ १६-२३ २०-५ २०-७ २०-१५ २०-१६ २०-२३ मृगशीर रेवती मृगशीर रेवती पुनर्वसु पुष्य पृष्य रेवती हस्त अनुराधा मृगशीर रेवती मृगशीर मनुराधा मृगशीर ६-१ ६-६ ६-१७ १३-१३ १३-२१ अनुराधा रेवती पुष्य पुष्य रेवती अनुराधा मृगशीर ७-३ ७-११ २१-७ २१-६ २१-११ २१-१६ २१-२३ १४-१७ १२ प्रासादमण्डने ammmmmMMON- IMAmmmmontomommmmmmmmmmmmlessmenomenommom में - अंश लाने का प्रकार- "तन्मूले व्ययहय॑नामसहिते भक्ते त्रिभिस्त्वंशकः, स्यादिन्द्रो यमभूपती क्रमवशाद् देवे सुरेन्द्रो हितः । वेचामेष यमस्तु पण्यभवने नागे तथा भैरवे, राजांशो गजवाजियाननगरे राज्ञां गृहे मन्दिरे ॥" राज० अ० ३ मूलराशि ( क्षेत्रफल ) मै व्यय की संख्या और घरके नामाक्षर को संख्या जोड़ करके उसमें तीन से भाग दें। जो एक शेष बचे तो इन्द्रांश, दो शेष बचे तो यमांश और तीन (शून्य) शेष बचे तो राजांश जाने । इन्द्र का अंश-देवालय और वेदी में शुभ है। यमका अंश-दुकान, नागदेव और भैरव के प्रासाद में शुभ है । राजा का अंश-गजशाला, अश्वशाला, वाहन, नगर, राजमहल और साधारण घर मे शुभ है। दिक् साधन- रात्रौ दिक्साघनं कुर्याद् दीपसूत्रध्र पैक्यतः । समे भूमिप्रदेशे तु शङ्खना दिवसेऽथवा ॥२३॥ घर और देवालय आदि बराबर वास्तविक दिशा में न होने से दिड मूढदोष माना जाता है । इसलिये गृह आदि बराबर ठोक दिशा में रखने के लिये दिक् साधन करना जरूरी है । रात्रि मे दिशा का साधन दीपक, सूत और ध्रुव से किया जाता है और दिन मे दिशा का साधन समतल भूमि के ऊपर शंकु रखकर किया जाता है ।।२३।। "प्राची मेषतुलारवेरुदयतः स्याद् वैष्णवे वह्निमे, चित्रास्वातिममध्यगा निगदिता प्राची बुधः पञ्चधा । प्रासादं भवनं करोति नगर दिड मूढमर्थक्षयं, हम्र्य देवगृहे पुरे च नितरामायुर्घनं दिङ मुखे ।।" राज० अ० १ मेष और तुला संक्रान्ति को सूर्य का उदय पूर्व दिशा में होता है। श्रवण और कृत्तिका नक्षत्र का उदय पूर्व दिशा मे होता है । चित्रा और स्वाति नक्षत्र के मध्य में पूर्व दिशा मानी जाती है । विद्वानो ने कहा है कि इन पांच प्रकार से पूर्व दिशा को जाने । प्रासाद गृह और नगर को दिड मूढ करने से धन का नाश होता है। यदि ये वास्तविक दिशा में हो तो हमेशा आयु और धन की वृद्धि होती है । रात्री में और दिन में विक्साधन- "तारे मार्कटिके ध्रुवस्य समता नीतेऽवलम्बे नते, दीपात्रेण तदैक्यतश्च कथिता सूत्रेण सौम्या दिशा ।

प्रथमोऽध्यायः शङ्कोर्नेत्रगुणे तु मण्डलवरे छायादयान्मत्स्ययो- जाता यत्र युतिस्तु शङ्क, तलतो याम्योत्तरे स्त* स्फुटे ॥" राज० अ०१ श्लो०११ रात्रि में दिक साधन- सप्तर्षि और ध्रुव के बीच मे एक गज के अन्तर वाले दो तारा है जो ध्रुव के चारो तरफ घूमते है उनको मार्कटिका कहते है । यह मार्कटिका और ध्रुव जब बराबर समसूत्र मे आवे, तब एक अवलब लटकावे और उसके सामने दक्षिण की तरफ एक दीपक रखें। यदि दीपक का अग्र भाग, अवलंब और ध्रुव ये तीनो बराबर समसूत्र में दिखाई पड़े तो उसे उत्तर दिशा आने । अवलंब और दीपक के समसूत्र एक रेखा खींची जाय तो वह उत्तर दक्षिण रेखा होगी। दिन मे दिक्साधन करना हो तो समतल भूमि के उपर बत्तीस अंगुल का एक गोल चक्र बनावें, उसके मध्य बिन्दु पर एक बारह अंगुल के नाप का शंकु रखें । पश्चात् दिन के पूर्वार्ध मे देखे कि शंकुकी छाया गोल मे जिस जगह प्रवेश करे, वहां एक चिह्न करे वह पश्चिम दिशा होगी और दिन के उत्तरार्ध में जहाँ बाहर निकले वहा एक बिन्दु करे यह पूर्व दिशा होगी। पीछे पूर्व और पश्चिम की इन दोनो बिन्दुओ तक एक सरल रेखा खीची जाय तो यह पूर्व पश्चिम रेखा होगी, इसको व्यासार्ध मान करके दो गोल बनावें, जिसे एक मत्स्य के जैसी आकृति होगी, उसके ऊपर और नीचे के योग बिन्दु से एक सरल रेखा खीची जाय तो यह उत्तर दक्षिण रेखा होगो । देखो नीचे का दिक्साधन चक्र- चक्र परिचय- बत्तीस अंगुल का 'इ उ ए' एक गोल है, उसका मध्य बिन्दु 'प्र' है । उसके कार वारह अंगुल का एक शंकु रखकर दिन के पूर्वाद्ध मे देखा गया तो शंकुकी छाया गोल के 'क' बिन्दु के पास प्रवेश करती है, यह पश्चिम दिशा जाने और दिनार्द्ध के बाद 'च' विन्दु के पास बाहर निकलती है, यह पूर्व दिशा जाने । इन 'क' और 'च' दोनों विन्दु तक एक सरल रेखा खीची जाय तो यह पूर्व पश्चिम रेखा होती है । इसको व्यासार्द्ध मान कर 'क' विन्दु से 'च छ ज और दूसरा 'च' बिन्दु से 'क ख ग' ऐसे दो गोल बनावे तो पूर्व पश्चिम रेखा के ऊपर एक मछली के जैसी आकृति हो जाती है । उसके मध्य विन्दु 'अ' से एक सरल रेखा खीची जाय जो गोलके दोनो स्पर्श विन्दु से बाहर निकल जाय, यह उत्तर दक्षिण रेखा होती है । * उपरोक्त प्रकार से भी वास्तविक दिशा का ज्ञान नहीं होता, क्योकि अयनाश के कारण ध्रुव का तारा एव कृत्तिकादि नक्षत्र ठीक दिशा में उदय नहीं होता। जिसे आजकल नश्रीन माविष्कार दिक् साधन यत्र (कुतुबनुमा) से करना चाहिये ।

प्रासादमण्डने w-to-sammember छाया A पूर्व पश्चिम आ छाया खात विधि- नागवास्तु समालोक्य कुर्यात् खातविधि' सुधीः । पापाणान्तं जलान्तं वा ततः कूर्म निवेशयेत् ॥२४॥ प्रथम शेषनाग चक्र का विचार करके विद्वान् शिल्पी खात विधि करें। नीव को खोदने से भूमि में पाषाण अथवा पानी निकल जाय, उसके ऊपर कूर्म (कच्छुआ) की स्थापना करें ।।२४।। नागवास्तु- "कन्यादौ रवितस्त्रये फणीमुखं पूर्वादि सष्टिकमात्" ऐसा राजवल्लभ भण्डन के अध्याय प्रथम श्लोक २२ मे कहा है कि- कन्या, तुला और वृश्चिक राशि का सूर्य हो तब शेषनाग का मुख पूर्व दिशा मे; घन, मकर कुम्भ राशि का सूर्य हो तब दक्षिण दिशा मे; मीन, मेष और वृष राशि का सूर्य हो तब पश्चिम दिशा मे, मिथुन कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब उत्तर मे शेषनाग का मुख रहता है । "पूर्वास्येऽनिलखातनं यममुखे खातं शिवे कारये- च्छीर्षे पश्चिमगे च वह्नि खननं सौम्ये खनेन्नेऋते।" ऐसा राजवल्लभ मण्डन के अध्याय प्रथम श्लोक २४ में कहा है कि-शेषनाग का मुस पूर्व दिशा में हो तो वायुकोण में, दक्षिण दिशा में हो तो ईशानकोण मे, पश्चिम दिशा में हो तो अग्निकोण में और उत्तर दिशा मे हो तो नैऋत्य कोण मे खात करना चाहिये । (१) वास्तुविधि प्रथमोऽध्याय १५ -------- emamaloons 00- । - ज्योतिष शास्त्र के मुहूर्त ग्रन्थों मे अन्य प्रकार से कहा है । मुहूर्त चिन्तामणि के वास्तु प्रकरण श्लोक १९ को टोका में विश्वकर्मा का प्रमाण देकर लिखा है कि "ईशानतः सर्पति कालसर्पो, विहाय सृष्टि गररायेद् विदिक्षु । शेषस्य वास्तोमुखमध्यपुच्छ, त्रयं परित्यज्य खनेच्च तुर्यम् ।।" शेषनाग प्रथम ईशानकोण से चलता है, उसका मुख, नाभि और पूंछ सृष्टिमार्ग को छोड़कर विपरीत विदिशा में रहता है । अर्थात् ईशान मै मुख, वायुकोण में नाभि और नैऋत्य कोण मे पूंछ रहता है । इसलिये इन तीनों विदिशामो को छोड़कर चौथा अग्निकोण खाली रहता है, उसमें प्रथम खात करना चाहिये। राहु (नाग) मुख- "देवालये गेहविधी जलाश्रये, राहोमुख शम्भुदिशो विलोमतः । मीनार्क सिंहामृगार्कतस्त्रिभे, खाते मुखात् पृष्ठविदिकशुभाभवेत् । देवालय का खात मुहूर्त करते समय राहु का मुख यदि मोन, मेष और वृषभ राशि का सूर्य हो तब ईशान कोण में, मिथुन, कर्क और सिंह राशि का सूर्य हो तब वायुकोण मे, कन्या तुला और वृश्चिक राशि का सूर्य हो तब नैऋत्यकोण मे, धन, मकर और कुम्भ राशि का सूर्य हो तव अग्निकोण मे, राहु का मुख रहता है । घरके खात मुहूर्त के समय नाग का मुख सिंह कन्या और तुला राशि के सूर्य में ईशान कोण मे, वृश्चिक धन और मकर राशि के सूर्य मे वायुकोण मे, कुम्भ मीन और मेषराशि के सूर्य मे नैऋत्यकोण मे, वृष मिथुन और कर्क राशि के सूर्य मे अग्निकोण मे राहु का मुख . - रहता है। कुंआ, बावडी, तालाब आदि जलाश्रयको प्रारंभ करते समय राहु का मुख मकर कुम्भ और मीन राशि के सूर्य ईशान कोण मे, मैप वृष और मिथुन राशि के सूर्य मे वायुकोण मे, कर्क सिंह और कन्या राशि के सूर्य मे नैऋत्यकोण मे, तुला वृश्चिक और धन राशी के सूर्य में अग्निकोण में राहु का मुख रहता है। जिस विदिशा में राहु का मुख हो, उसके पीछे की विदिशा मे खात करना शुभ है । जैसे-ईशान कोण मे सुख है, तो अग्निकोण मे, वायुकोण में मुख हो तो ईशानकोण में, नैऋत्य कोण में मुख हो तो वायुकोण मे और अग्निकोण मे मुख हो तो नेऋत्य कोण मे खात करना शुभ है। * राहु मुख याने नागमुख या वास्तुमुख इसमे बहुत मतान्तर है। कोई सृष्टि क्रम से और कोई विलोम क्रम से मानते है । विशेष जानने के लिये देखे स्वयं द्वारा अनुवादित 'राजवल्लभ मंडन प्रथ'।

१६ प्रासादमण्डने -one-- o-man-emom - कूर्ममान- अर्धाङ्ग लो भवेत् कूर्म एकहस्ते सुरालये । अर्धाङ्ग ला ततो वृद्धिः कार्या तिथिकरावधि ॥२५॥ एकत्रिंशत्करान्तं च तदर्धा वृद्धिरिष्यते । ततोऽर्धापि शतार्धान्तं कूर्मों मन्त्रङ्ग लोत्तमः ।।२६।। एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में आधे अंगुल के नाप का कूर्म (कच्छूमा) नींव में स्थापित करे। दोसे पंद्रह हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ पाधा २ अंगुल,बढ़ा करके, (दो हाथ के प्रासाद में एक अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद में डेढ़ अंगुल, चार हाथ के प्रासाद मे दो अंगुल, इस प्रकार आधा २ अंगुल बढ़ाने से पंद्रह हाथ के प्रासाद में साढ़े सात अंगुल के मान का कूर्म होता है ) । सोलह से इकतीस हाथ के विस्तार वाले प्रासाद मे प्रत्येक हाथ पाव २ अंगुल बढ़ा करके और बत्तीस से पचास हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाय एक २ सूत बढ़ा करके नौंव में स्थापित करें। इस प्रकार पचास हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में एक सूत कम चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है ॥२५-२६॥ अपराजितपृच्छा के मत से कूर्ममान- "एकहस्ते सुरागारे कूर्मः स्याच्चतुरङ्ग लः । अर्धाङ्ग ला भवेद् वृद्धिः प्रतिहस्तं दशावधिः ॥ पादवृद्धिः पुनः कुर्याद् विंशतिहस्ततः करे । ऊवं वै विशद्धस्तान्तं वसुहस्तकमङ्ग लम् ॥ ततः परं शतान्तिं सूर्यहस्तकमङ्ग लम् । अनेन क्रमयोगेन क्रमयोगेन मन्वङ्गलः शतार्धके ।।" सूत्र ५२ एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद में कूर्म चार अंगुल के मान का, दोसे दस हाथ के प्रासाद में प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा कर के, ग्यारह से बीस हाथ के प्रासाद में प्रत्येक हाथ पाव २ अंगुल बढ़ा करके, इक्कीस से तीस हाथ के प्रासाद में प्रत्येक हाथ एक २ सूत बढा कर के और इकतीस से पचास हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ र अंगुल बढ़ा कर के वनावे । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद में लगभग चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है । अपराजितपूच्छाके मत से दूसरा कूर्ममान- "एकहस्ते तु प्रासादे कूर्मश्चार्धाङ्ग लः स्मृतः । अर्द्ध वृद्धिः प्रकर्त्तव्या प्रकर्त्तव्या पञ्चदशहस्तावधिः ।। एकत्रिशच्च हस्तान्तं पादवृद्धिः प्रकीर्तिता। तदर्धेन 'पुनर्वृद्धि-मन्वङ्गलः शतार्धके ।।" सूत्र १५३ ।

प्रथमोऽध्यायः १७ एक हाथ के प्रासाद मे कूर्म आधा अंगुल का, दोसे पंद्रह हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा २ अगुल बढा करके, सोलह से एकत्तीस हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ पाव २ अंगुल बढ़ा करके, और बत्तीस से पचास हाथ के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ एक २ सूत बढा करके बनावे। इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद में एक सूत कम चौदह अंगुल के मान का कूर्म होता है। क्षीरार्णव के मत से कूर्ममान- "शिलायाः पञ्चमांशेन कर्तव्यं कूर्ममुत्तमम् । सर्वालङ्कारसंयुक्तं दिव्यपुष्पैश्च पूजितम् ।।" अध्याय १०१ धारणी शिला के पाचवे भाग का कर्म बनावे, यह उत्तम मान है । उसको सब प्रकार के अलंकारो से युक्त करे और सुगंधित पुष्पो से पूजित करे। कूर्म का ज्येष्ठ और कनिष्ठ मान- चतुर्थांशाधिको ज्येष्ठः कनिष्ठो हीनयोगतः । सौवर्णो रूप्पजो वापि स्नाप्यः पञ्चामृतेन स ॥२७॥ तिलयवैस्तथा होम-पूर्णा चैव प्रदापयेत् । कूर्मका जो मान आया हो, वह मध्यम मान है, उसमे इस मान का चौथा भाग बढावे तो ज्येष्ठ मानका और चौथा भाग कम करे तो कनिष्ठ मानका कर्म होता है। यह कर्म सुवर्ण अथवा चादी का बनाना चाहिये । उसको पञ्चामृत से स्नान कराक, तथा तिल और जवो का पूर्ण आहुति पूर्वक होम करके स्थापित करे ॥२७॥ शिला और कूर्म का स्थापन क्रम- ईशानादग्निकोणाद्वा शिलाः स्थाप्याः प्रदक्षिणाः ॥२८॥ मध्ये कूर्मशीला पश्चाद् गीतवादित्रमङ्गलैः। बलिदानं च नैवेद्य विविधान्नं घृतप्लुतम् ।। देवताभ्यः सुधीर्दद्यात् कूर्मन्यासे शिलासु च ।।२६।। इति कर्म स्थापनम् । प्रथम ईशान अथवा अग्नि कोने में नंदा शिला की स्थापना करके पीछे प्रदक्षिण क्रम से अन्य शिलानो को स्थापित करे। पीछे मध्य मे कूर्म शिला (धारणी शिला) को स्थापित करे। शिला स्थापन करते समय मांगलिक गीत और वाजींत्रों का नाद करावे। वास्तु के देवों को बलि वाकुले, नैवैद्य और अनेक प्रकार के धान्य के धृत से पूर्ण मालपूवे आदि चढावें ॥२८-२९॥ प्रा०३ - प्रासादमण्डने howan पुनः शिला स्थापन क्रम- "नन्दा पुरः प्रदातव्यां शिलाः गेपाः प्रदक्षिणे । मध्ये च धरणी स्थाप्या यथाक्रम प्रयत्नतः ॥" क्षीरावे अध्य० १०१ प्रथम नन्दा नाम की शिला को स्थापित करे, पीछे अनुक्रम से भद्रा आदि शिलाओं को प्रदक्षिण क्रम से स्थापित करे और मध्य मे धरणी शिला को स्थापन करे। ऐसा क्षीरार्णव अथ मे कहा है। शिला के नाम- "नन्दा भद्रा नया रिक्ता अजिता चापराजिता। शुक्ला सौभागिनी चैव धरणी नवमी शिला ॥" क्षीरावे अ० १०१ नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता, अजिता, अपराजिता, शुक्ला और सौभागिनी ये अनुक्रम से दिशानों की पाठ शिलानो के नाम है । नववी धरणी नाम की शिला मध्य भाग की है। अपराजित मत से शिला के नाम- "नन्दा भद्रा जया पूर्णा विजया पञ्चमी शिला मङ्गला ह्यजितापरा-जिता च घरपोभवाः ॥" नन्दा, भद्रा, जया, पूर्णा, विजया, मंगला, अजिता, अपराजिता, ये अनुक्रम से दिशाओं को शिला के नाम है और मध्य भाग को नववी धरणी नाम की शिला है । - धरणी शिला का मान- "एक हस्ते तु प्रासादे शिला वेदाङ्गुला भवेत् । द्वयगुला च भवेद् वृद्धि-विच्च दशहस्तकम् ।। दशीय विशपर्यन्तं हरते हस्ते चकाङ्गुला । अ गुला भवेद् वृद्धिावत्यञ्चाशद्धस्तकम् ॥ तृतीयाशे कृते पिण्डे तदर्षे रूपपातकम् । पुष्पाणि च यथाकारं शिलामध्ये हलंकृतम् ॥" क्षीरावे अ० १०१ एक हाथ के प्रासाद मे चार अंगुल की शिला, दोसे दस हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ दो २ अगुल वडा करके, ग्यारह से बोस हाथ तक के प्रासाद में एक एक अंगुल बढ़ा करके, और इक्कीस से पचास हाथ तक के प्रासाद मै प्राधा २ अंगुल बढा करके स्थापित करे। इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद मे ४७ अंगुल के मान को समचोरस धरणी शिला होती है। - प्रथमोऽध्याय १६ -noos शिला का जो समचोरस मान पावे, उसके तीसरे भाग का पिंड (मोटाई) रक्खे । पिंड के प्राधे भाग मे शिला के ऊपर रूपो बनावे । तथा पुषको प्राकृति बनावे । ज्ञान प्रकाश दीपार्णव के मत से धरणी शिला का मान- "एकहस्ते तु प्रासादे शिला वेदाङ्गुला भवेत् । पडंगुला द्विहस्ते तु त्रिहस्ते ग्रहसंख्यया ॥ द्वादशाङ्गुलं शिलामानं प्रासादे चतुर्हस्तके । तृतीयाशोदयः कार्यों हस्ताद्याद् वेदहस्तकम् ।। चतुर्हस्तादितः कृत्वा यावद् द्वादशहस्तकम् । पादोनाड्गुला च वृद्धि हस्ते हस्ते च दापयेत् ॥ सूर्यहस्तादितः कृत्वा यावच्च जिनहस्तकम् । अर्घागुला भवेद् वृद्धि-हच्छ्ये तु नवागुला ।। चतुर्विशादितः कृत्वा यावत् षट्त्रिंश हस्तकम् । पाटोनाड्गुला च वृद्धिः पिण्डं च द्वादशाङ्गुलम् ।। पत्रिंशादितश्च कृत्वा यावत् पञ्चाशद्धस्तकम् । एकागुला भवेद् वृद्धिः पिण्डं च द्वादशाइगुलम् ॥" प्र० ११ एक हाथ के प्रासाद मे शिला का मान चार अंगुल, दो हाथ में छः अंगुल, तीन हाथ में नव अंगुल और चार हाथ के प्रासाद मै बारह अंगुल शिला का मान है । एक से चार हाथ तक के प्रासाद मे शिला का जो मान प्रावे, उपके तीसरे भाग शिला की मोटाई खखे । पाव से बारह हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ पौन २ अंगुल बढ़ाकर के, तेरह से चोबीस हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ प्राधा २ अंगुल बढ़ा करके बनावे । पाच से चौबीस हाथ तक के प्रासाद मे शिला का जो मान प्रावे उसकी मोटाई नव अंगुल की रक्खे । पचीस से छत्तीस हाथ तक पौन २ गदा नागपाता तसार प्रासादमण्डने २० -- -- -Motomooooomne. HOM -- --- A- अंगुल और सेतीस से पचास हाथ तक प्रत्येक हाथ एक अंगुल बढा करके बनावें । उसको मोटाई बारह अंगुल की रक्खे। इस प्रकार समचोरस शिला का कुल मान ४७ अंगुल का होता है। अपराजित मत से धारणी शिला का मान- "नवत्यङ्गुल देयं च पृथुत्वे चतुर्विशतिः । द्वादशाङ्गुलपिण्डं च शिलामानप्रमाणतः ॥" सूत्र ४७ श्लो० १६ नव्वें अंगुल लंबी, चौवीस अंगुल चौड़ी और बारह अंगुल मोटी, यह धरणी शिला का मान जानें। दूसरा मत- "एकहस्ते च प्रासादे शिला वेदाङ्गुला भवेत् । षडंगुला द्विहस्ते च विहस्ते च ग्रहाला ॥ चतुर्हस्ते च प्रासादे शिला स्याद् द्वादशाङ्गुला। तृतीयांशोदयः कार्यो हस्तादौ च युगान्ततः ।। ततोऽपरेऽष्टहस्तान्तं वृद्धिस्त्र्यडगुलतो भवेत् । पुन घड्गुलतो वृद्धिः पञ्चाशद्धस्तकावधि ॥ पादेन चोच्छिता शस्ता तां कुर्यात् पङ्कजान्विताम ॥" सुत्र १५३ एक हाथ के प्रासाद मे चार अंगुल की, दो हाथ के प्रासाद मे छह अंगुल की, तीन हाथ के प्रासाद मे नव अगुल की और चार हाथ के प्रासाद मे बारह अंगुल को समचोरस धरणी शिला स्थापन करना चाहिए। चार हाथ तक के प्रासाद के लिये धरणी शिला का जो मान आया हो, उसके तीसरे भाग शिला को मोटाई रखना चाहिये । पांच से पाठ हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ तीन तीन अंगुल और नव से पचास हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ दो दो अंगुल बढ़ा करके बनावे । इस प्रकार पचास हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद के लिये १०८ अंगुल के मान की धरणी शिला होती है। वह चौथे भाग मोटो रक्खें और कमल की प्राकृतियों से शोभायमान बनावें। धरणी शिला ऊपर के रूप- "लहरं मत्स्यं मण्डूकं मकरी ग्रासमेव च । जलं सर्प शंखयुक्तं शिलामध्ये हलकृतम् ॥" क्षीरा० अ० १०१ प्रथमोऽध्याय २१ aanemama पानी की लहर, मछली, मैढक, मगर, प्रास, जल (कलश) सर्प शंख इत्यादि रूप वना करके शिला को सुशोभित करना चाहिये। कूर्मशिला के रूपो के संबंध में सूत्रधार वीरपाल विरचित बेडाया प्रासाद तिलक ग्रंथ का अध्याय दूसरे मे लीखा है कि- "कूर्ममानमिदं च गर्भरचनाथाग्नी शिलायां जलम, याम्ये मीनमुखं च नैऋतदिशि स्थाप्यं तथा ददुरम् । वारुण्या मकरश्च वायुदिशि वै ग्रासश्च सौम्ये ध्वनिः, नागं शङ्करदिक्षु पूर्वविषये कुम्मः शिलावह्नितः ॥" कूर्म के मान की गर्भ रचना कहता है कि अग्निकोण मे पाणी की लहर, दक्षिण में माछली, नैऋत्य में मेठक, पश्चिम मे मगर, वायुकोण मे ग्रास, उत्तर मे शख, ईशान मे सर्प और पूर्व दिशा मे कुम्भ की प्राकृतिया बनानी चाहिये। शिल्पियो की मान्यता वंश परंपरा से लहर को प्राकृति पूर्व दिशा मे बनाने की है। सूत्रारंभ नक्षत्र- सूत्रारम्भो गृहादीना-मुत्तरायां करत्रये । ब्राझे पुष्ये मृगे मैत्र्ये पौष्एये वासववारुणे ॥३०॥ प्रासाद और गृह आदि का सूत्रारम तीनो उत्तरा ( उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा और उत्तराभाद्रपद), हस्त, चित्रा, स्वाति, रोहिणी, पुष्य, मृगशीर्ष, अनुराधा, रेवती, धनिष्ठा और शतभिषा इन नक्षत्रो में करना चाहिये ॥३० शिला स्थापन नक्षत्र- शिलान्यासस्तु रोहिण्यां श्रवणे हस्तपुष्ययोः । मृगशीर्षे च रेवत्या मुत्तरात्रितये शुमः ॥३१॥ रोहिणी, श्रवण, हस्त, पुष्य, मृगशीर, रेवती और तीनो उत्तरा इन नक्षत्रो मे शिलाकी स्थापना करना शुभ है ॥३१॥ देवालय का निर्माणस्थान- नद्या सिद्धाश्रमे तीर्थे पुरे ग्रामे च गहरे । वापी-बाटी-तडागादि-स्थाने कार्य सुराज्यम् ॥३२॥ - २२ प्रासादमण्डने नदो के तट, सिद्ध पुरुषो के निर्वाण स्थान, तीर्थभूमि, शहर गांव, पर्वत की गुफाओं मे, बावडी, वाटिका (उपवन) और तालाव आदि पवित्र स्थानों मे देवालय बनाना चाहिये ॥३२॥ प्रासाद निर्माण पदार्थ स्वशक्त्या काष्ठमृदिष्ट-का शैलपातुरत्नजम् । देवतायतनं कुर्याद् धर्मार्थकाममोक्षदम् ॥३३॥ अपनी शक्ति के अनुसार काष्ठ, मिट्टी, ईट, पाषाण, सुवर्ण आदि धातुओं और रल, इन पदार्थों का देवालय बनाना चाहिये। किसी भी पदार्थ का देवालय बनाने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है ।।३३।। देव स्थापन का फल- देवानां स्थापनं पूजा पापघ्नं दर्शनादिकम् । धर्मवृद्धिर्भवेदर्थः कामो मोक्षस्ततो नृणाम् ॥३४॥ देवो को स्थापना, पूजा और दर्शन करने से मनुष्यों के सब पापों का नाश होता है तथा धर्म को वृद्धि, एवं अर्थ काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥३४॥ - देवालय बनाने का फल- कोटिघ्नं तृणजे पुण्यं मृन्मये दशसगुणम् । ऐटके शतकोटिघ्नं शैलेऽनन्तं फलं स्मृतम् ॥३॥ देवालय घास का बनाने से कोटिगुणा, मिट्टी का बनाने से दस कोटिगुणा, ईटों का बनाने से सोकोटिगुणा और पाषाण का बनाने से अनन्त गुणा फल होता है ।।३।। वास्तु पूजा का सप्त स्थान- कूर्मसंस्थापने द्वारे पद्माख्यायां च पौरुपे । घटे ध्वजे प्रतिष्ठाया-मेव पुण्याहसप्तकम् ॥३६॥ कूर्म की स्थापना, द्वार स्थापन, पद्मशिला की स्थापना, प्रासाद पुरुष की स्थापना, कलश और ध्वजा चढाना, और देव प्रतिष्ठा, ये सात कार्य करते समय वास्तु पूजन अवश्य करना चाहिये । यह पुण्याहसप्तक कहा जाता है ।।३।।

प्रथमोऽध्यायः २३ on-nam- Poonam शान्तिपूजा का चौदह स्थान- भूम्यारम्भे तथा कूर्मे शिलायां सूत्रपातने । खुरे द्वारोच्छ ये स्तम्भे पट्ट पशिलासु च ॥३७॥ शुकनासे च पुरुपे घण्टायां कलशे तथा । ध्वजोच्छ ये च कुर्भात शान्तिकानि चतुर्दश ॥२८॥ भूमिका प्रारंभ, कूर्म न्यास, शिला ग्यास और सूत्रपात (तलनिर्माण), खुर शिला स्थापन, द्वार और स्तभ स्थापन, पाट चढाते समयं, पद्मशिला, शुकनास और प्रासाद पुरुष के रखते समय, आमलसार, कलश चढाना, और ध्वजा चढाना, ये चौदह कार्य करते समय शान्तिपूजा अवश्य करनी चाहिये ॥३७-३८॥ प्रासाद का प्रमाण- एक हस्तादिप्रासादाद् यावद्धस्तशताधकम् । प्रमाणं कुम्भके मूल-नासिके भित्तिबाह्यतः ॥३९॥ एक हाथ से पचास हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का प्रमाण दोवार के बाहर कु भा के मूलनासक ( कोरणा ) तक गिना जाता है ।।३।। मण्डोवर के थरों का निर्गम- कुम्भादिस्थावराणां च निर्गमः सममत्रतः । पीठस्य निर्गमो बाह्य तथैव छाधकस्य च ॥४०॥ कुम्भा से लेकर छज्जा के तल भाग तक जितने थर बनाये जायं, ये सब थरो के निर्गम समसूत्र मे रखने चाहिये । तथा पीठ और छज्जा का निर्गम थरो के आगे निकलता हुआ रखना चाहिये ॥४०॥ प्रासाद के अंगों की संख्या- त्रिपञ्चसप्तनवमिः फालनाभिविभाजिते । प्रासादस्याङ्गसंख्या च वारिमार्गान्तरस्थितिः ॥४१॥ कर्ण, प्रतिकर्ण और नन्दी आदि फालनाये तीन, पाच, सात अथवा नव संख्या तक की जाती है, ये प्रासाद की अंग संख्या है । उन्हे वारिमार्ग के अंतराल मे (प्रासाद की दीवार से बाहर निकलती) रखना चाहिये ॥४॥ - प्रासादमण्डने फलनाओं का सामान्य मान- फालना कर्णतुल्या स्याद् भद्रं तु द्विगुणं मतम् । सामान्योऽयं विधिस्तुल्यो हस्ताङ गुलविनिर्गमः ॥४२॥ इति श्री सूत्रधारमण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे मिश्रलक्षणो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥ सब फालनायें कोने के मान के बराबर रखनी चाहिये और भद्र कोने से दुगुना रखना चाहिये, ऐसा सामान्य नियम है । ये सब फालनाये प्रासाद का जितने हाथ का बिस्तार हो उतने अंगुल निकलती रखनी चाहिये ।।४।। इति श्रीपंडित भगवानदास जैन द्वारा अनुवादित प्रासादमण्डन के मिश्र- लक्षण नाम के प्रथमाध्याय की सुबोधिनी नाम की भाषाटीका समाप्त ॥१॥ -- अथ प्रासादमण्डनें द्वितीयोऽध्यायः जगती- . - विश्वकर्मोवाच- प्रासादानामधिष्ठानं जंगती सां निगद्यते । यथा सिंहासनं राज्ञः प्रासादस्य तथैव सा ॥१॥ प्रासाद की मर्यादित भूमि को जगती कहते है । जैसे-राजा का सिंहासन रखने के लिये प्रमुक स्थान मर्यादित रखा जाता है, वैसे प्रासाद बनाने के लिये अमुक भूमि मर्यादित रक्खी जाती है ॥१॥ अपराजितपृच्छा के सूत्र ११५ मे श्लोक ५ मे लीखा है कि- "प्रासादो लिङ्गमित्युक्तो जगती पीठमेव च ।।" प्रासाद शिवलिङ्गका स्वरूप है। जैसे शिवलिङ्ग के चारों तरफ पीठिका है, वैसे ही प्रासाद के जगतीरूप पीठिका है। जगती का प्राकार- चतुरस्रायताटासा वृत्ता वृत्तायता तथा । जगती पञ्चधा प्रोक्ता प्रासादस्यानुरूपतः ॥२॥ समचोरस, लंब चोरस, आठ कोने वाली, गोल और लंब गोल, ऐसे पांच आकार वाली जगतो है । उनमे से प्रासाद का जैसा प्राकार हो, वैसी जगती बनानी चाहिये ।। जगती का विस्तार मान- प्रासादपृथुमानाच त्रिगुणा च चतुगुणा । क्रमात् पञ्चगुणा प्रोक्ता ज्येष्ठा मध्या कनिष्ठिका ॥३॥ प्रासाद के विस्तार के मान से तीन गुणी, चार गुणी अथवा पांच गुणी जगती बनानी चाहिये । उनमें तीनगुणी ज्येष्ठमान की, चार गणी मध्यममान की और पांच गुणी कनिष्ठ- मान की जगती समझनी चाहिये ।।३।। प्रा०४ प्रासादमण्डने २६ - . अपराजितपृच्छा सू० ११५ में भी कहा है कि- "प्रासादपृथुमानेन द्वि (त्रि? ) गुणा चोत्तमा तथा मध्यमा चतुर्गुणा'याधमा पञ्चगुणोच्यते " प्रासाद के विस्तार से दुगुनी हो तो उत्तम, चार गुनी हो तो मध्यम और पांच गुनी हो तो कनिष्ठ नान की जगती कही जाती है। कनिष्ठे' ज्येष्ठा कनिष्ठा ज्येष्ठे मध्ये च मध्यमा। प्रासादे जगती कार्या स्वरूपा लक्षणान्विता ॥४॥ कनिष्ठ मान के प्रासाद में ज्येष्ठमान की जंगती, मध्यम मान के प्रसाद में मध्यम मान को. और ज्येष्ठमान के प्रासाद में कनिष्ठ मान को जगती प्रासाद के स्वरूप के लक्षण वाली बनानी । अर्थात् जिस प्रकार का प्रासाद हो, उसी प्रकार की जगती बनानी चाहिये ।।४।। अपराजितपृच्छा में भी लिखा है कि- "ज्येष्ठा कनिष्ठप्रासादे मध्यमे मध्यमा तथा । ज्येप्ठे कनिष्ठा व्याख्याता जगती मानसंख्यया ।।" सूत्र० ११५ कनिष्ठमान के प्रासाद में ज्येष्ठमान की, मध्यममान के प्रासाद में मध्यममान को और ज्येष्ठनान के प्रासाद में कनिष्ठ मान की जगती रखनी चाहिये। रससप्तगुणाख्याता जिने पर्यायसंस्थिते । द्वारिकायां च कर्त्तव्या तथैव पुरुषत्रये ॥१॥ पच कल्याणक (च्यवन, जन्म, दीक्षा, ज्ञान और मोक्ष) वाले अथवा देवकुलिका वाले जिन प्रासाद मे, द्वारिका प्रासाद मे और त्रिपुरुष (ब्रह्मा, विष्णु और शिवं ) के प्रासाद मे छहगुणी अथवा सातगुणी जगती रखनी चाहिये ॥५॥ मण्डप की जगती- मण्डपानुक्रमेणैव सपादांशेन सार्धतः ! द्विगुणा बायता कार्या सहस्रायतने विधिः ॥६॥ मंडप के अनुक्रम से सवायो, डेड़ी अथवा दुगुनी लंबी जगती करनी चाहिये । हजारों प्रासानों में यही विधि है ॥६॥ (१) कन्यो कन्पसा ज्वा", मुद्रित पुस्तकद्वये । (२) 'स्वहस्तायतने। :

द्वितीयोऽध्याय P000-wom A - MARoboolutsaadheer भ्रमणी ( परीक्रमा) त्रिद्वय कभ्रमसंयुक्ता ज्येष्ठा मध्या कनिष्ठिका'। उच्छायस्य 'त्रिमागेन भूमणीनां समुच्छ्यः ॥७॥ जगती मे तीन भ्रमणी (,परिक्रमा ) हो तो ज्येष्ठा, दो भ्रमणी हो तो मध्यमा और एक भ्रमणी हो तो कनिष्ठा जगती कहा जाता है। यह भ्रमणी की ऊचाई जगती की ऊंचाई के तीसरे २ भाग की होनी चाहिये ॥७॥ "कनिष्ठे भ्रमणी चैका मध्यमे भ्रमरणीद्वयम् । ज्येष्ठे विस्रो भ्रमण्यश्च साङ्गोपाङ्गिकसङ्खधया ॥" अप० सूत्र० ११५ कनिष्ठ प्रासाद,हो तो एक भ्रमणी, मध्यम प्रासाद हो तो दो भ्रमरणी, और ज्येष्ठ प्रासाद हो तो तीन भ्रमणी अपनें अंगोपाग वाली बनानी चाहिये । जगती के कोने- चतुष्कोणस्तथा सूर्य-कौणैर्विशतिकोणकैः । अष्टाविंशति-पत्रिंशत्-कोणैः स्युः पञ्च फालनाः ॥८॥ चार कोने वाली, बारह कोने वाली, बीस कोने वाली, अट्ठाईस कोने वाली और छत्तीस कोने वाली, ये पांच प्रकार के कोने वाली जगती है | जगती की ऊंचाई का मान- प्रासादार्किहस्तान्ते व्यंशा द्वाविंशतिकरे । द्वात्रिशे चतुर्थाशा भूतांशोचा शताद्ध के || एक से बारह हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की जगती प्रासाद के अर्ध भाग की ऊंची बनावें । तेरह से बाईस हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की जगती प्रासाद ,के तीसरे भाग की, तेईस से बत्तीस हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की नगती चौथे भाग को, और तैतोस से पचास हाथ के प्रासाद की जगतो. पाचवे भाग की ऊंची बनानी चाहिये ॥६॥ . पुनः- एकहस्ते करेणोच्चा सार्थ शाश्चतुष्करे । सूर्यजैनशतान्तिं क्रमाद् द्वित्रियुगांशकैः ॥१०॥ (१) 'कनीयसी'।

प्रासादमण्डने meme- । एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की जगती एक हाथ, दो हाथ के प्रासाद की. जगती डेढ़ हाथ, तीन हाथ के प्रासाद की जगतो दो हाथ, चार हाथ के प्रासाद की जगती ढाई हाथ ऊंची बनावे । पीछे पांच से बारह हाथ तक के प्रासाद की जगती दूसरे भाग की अर्थात् प्रासाद से आधी, तेरह से चौबीस हाथ के प्रासाद की जगतो तीसरे भाग और पचीस से पचास हाथ तक के प्रासाद की जगती चौथे भाग जितनी ऊंची बनावें ॥१०॥ (यह अपराजितपृच्छों का मत है। देखें सूत्र ११५ श्लोक २३ से २६ ) जगती के उदय का थर मान- तदुच्छ्यं भजेत् प्राज्ञ-स्त्वष्टाविंशतिभिः पदैः । त्रिपदो जाब्यकुम्भश्च द्विपदं कर्णकं तथा ॥११॥ पद्मपत्रसमायुक्ता त्रिपदा शिरपत्रिका द्विपदं खुरकं कुर्यात् सप्तभागं च कुम्भकम् ॥१२॥ कलशस्त्रिपदः प्रोक्तो भागेनान्तरपत्रकम् । कपोतालिस्त्रिभागा च पुष्पकण्ठो युगांशकः ॥१३॥ पुष्पकाज्जाब्यकुम्भस्य निर्गमश्चाष्टभिः पदैः । कर्णेषु च दिशांपालाः प्राच्यादिषु प्रदक्षिणाः॥१॥ जगती के उदय के अट्ठाईस भाग करे। उनमे सें तीन भाग जाडयकुम्भ, को कणिका ( कणी), तीन भाग का पद्मपत्र (दासा) सहित ग्रासपट्टी, दो भाग का खुरा, सात भाग का कुम्भ, तीन भाग का कलश, एक भाग का अंतरपत्र, तीन भाग की कपोताली (केवाल ) और चार भाग का पुष्पकंठ बनावे । पुष्पकंठ से जाड्यकुम्भ का निर्गम आठ भाग रक्खे । जगती के कोने में पूर्वादि सृष्टि क्रम से दिक्पालों को स्थापित करना चाहिये ॥११ से १४॥ का दो । ''- जगती.के आभूषण- प्राकारैण्डिता कार्या चतुरिमण्डपैः । मकरैर्जलनिष्कासः सोपानस्तोरणादिभिः ॥१॥ जगती को किलों से शोभायमान करें, अर्थात् जगती के चारो तरफ किला बनावें । तथा चारों दिशाओं में मण्डप वाले चार द्वार बनावे । पानी निकलने के लिये मगर के मुख वाली नाली रक्खे । एवं सीढियां और तोरणों से शोभायमान जगती बनायें ॥१५॥ (१) शीर्षपत्रिका। --- on द्वितीयोऽध्यायः जगती का उदय और उसके थरों का दिग्दर्शन- वामनबनापर्व ] WWOK OOK WIOIOIK FORIES - सुप38 கொக்கிய नानी मण्डप जाती अयm. तर्वा जातीद्वार जगती का द्वार और द्वार मडप तथा जगती के ऊपर प्रासाद की महापीठ mema २६ ३० २ : प्रासादमण ने -- -- - मण्डापाग्रे प्रतोल्यग्रे सोपानं- शुण्डिकाकृतिम् । तोरणं कारयेत् तस्य । पदपदानुसारतः ॥१६॥ मण्डपा के आगे और प्रतोली (पोल ) के प्राग सीढियो बनावें, इसके दोनों तरफ हाथी को प्राकृति रखे । प्रत्येक पद के अनुसार तोरण बनावे ॥१६॥ . 4 - । तोरणस्योभयस्तम्म-विस्तार गर्भमानतः । भितिगभप्रमाणेन सममानेन वा भवेत् ॥१७॥ - तोरण के दोनों स्तंभ के मध्य का विस्तार प्रासाद के गर्भगृह के मान से, अथवा दीवार के गर्भमान से, अथवा प्रासाद के मान से रखा जाता है ।।१७।। वेदिका पीठरूपा च शोमाभिर्बहुमियुता । विचित्र तोरणं कुर्याद दोला देवस्य तत्र च ॥१८॥ यह जगतीरूप वेदिका प्रासाद को पोठरूप है, इसलिये इसे अनेक प्रकार के रूपों तथा तोरणो से शोभायमान बनाना चाहिये । तोरणो के झूलों में देवों की प्राकृतियां बनावें ॥१८॥ H देवके वाहन का स्थान प्रासादाद्वाईनस्थाने करणीया चतुष्किका । एकद्वित्रिचा पञ्च-रससप्तपदान्तरे ॥१६॥ देवों के वाहन रहने के स्थान पर चौकी बनावें । यह चौकी प्रासाद से एक, दो, तीन, चार, पाच, छह अथवा सात पद जितनी दूर बनावें ॥१९॥ - ... । 7 देवके वाहन का उदय- अर्चायामें नवांशे तु पञ्चषट्सप्त भागिकः । गुह्यनामिस्तनान्तं पा त्रिविधो वाहनोदयः ॥२०॥ मूत्ति के उदय का नव भाग करे । उनमें से पांच, छह अथवा सात भाग के मान का वाहन का उदय रख । अथवा गुह्य, नाभि या स्तन पर्यन्त वाहन का उदय रक्खे। ये तीन २ प्रकार के वाहन का उदय कहा गया है ॥२०॥ (१) 'त्रिविध कुर्यात्' (२) पट्ट पट्टानुसारत.'। (३) 'तयोर्मध्येऽथवा भवेत्' । (४) 'मर्चाया नवमाशे तु द्वितीयोऽध्याय ३१ . . - -- : देवके वाहन का दृष्टिस्थान- पाद जानु कटिं यार-दर्चाया वाहनस्य दृक् । वृपस्य विष्णुमागान्ते सूर्ये व्योमस्तनान्तकम् ॥२६॥ ३ मूत्ति के चरण, जानु अथवा कमर पर्यन्त ऊंचाई में वाहन की दृष्टि रखनी चाहिये । वृषभ ( नन्दी ) को दृष्टि शिवलिंग के विष्णु भाग तक और सूर्य के वाहन (घोडा) को दृष्टि सूक्ति के स्तनभाग तक रखनी चाहिये ॥२१॥ 1 अपराजितपृच्छों में कहा है कि-- "वृपस्य चोच्छ्य' कार्यों विष्णुभागान्तदृष्टिकः ।।- पादं जानु कटिं याव-दर्चाया वाहनस्य हक् । गुह्यनाभिस्तनान्तं वा सूर्ये व्योमस्तनान्तकम् ।। विलोमे कुरुतें पीडा-मधोदृष्टि सुखक्षयम् । स्थानं हन्यादूर्ध्वदृष्टिः स्वस्थाने मुक्तिदायिकां ।" सूत्र० २०८ वृषभ की ऊचाई शिवलिंग के विष्णुभाग तक दृष्टि रहे, इस प्रकार रखे। देवो के वाहन की दृष्टि उनके चरण, जानु अथवा कटि तक रहे तथा गुह्य नाभि और स्तन तक दृष्टि रहे। इस प्रकार ऊंचाई रक्खे । इससे विपरीत रखने से दुख होवेगा, उपरोक्त मान से नीची दृष्टि रहने पर सुख का क्षय होगा और यदि ऊंची दृष्टि ही रहेगी. तो, स्थान भ्रष्ट होगा । इसलिये कहे हुए अपने २ स्थान मे दृष्टि रखने से मुक्तिपद मिलता है। जिन प्रासाद के मंडपों का क्रम-- जिनाग्रे समोसरणं शुकाग्रे गूढमण्डपः।। । गूढस्याने' चतुष्फिका तदने नृत्यमण्डपः ॥२२॥ जिन प्रासाद के आगे समवसरण बनाना । शुकनास (कवलीमडम) के आगे गूढ मण्डप, इसके आगे चौकों मंडप और इसके आगे नृत्यमडप वनाने चाहिये ।।२२॥ जिनप्रासाद में देवकुलिकाका क्रम- द्विसप्तत्या द्विवाणैर्वा चतुर्विंशतितोऽपि वा। : जिनालये चतुर्दिषु सहितं जिनमन्दिरम् ॥२३॥ ऐसा जिनमन्दिर बनाना चाहिये की जिनप्रासाद के चारो तरफ बहत्तर, वावन अथवा चौवीस देवकुलिकाये हो ॥२३॥ (१) 'तस्याने पत्रिकाद्या च। -- ।

प्रासादमएंडने
३२
जैसे
परमजेन ठक्कुर 'फेर' विरचित वत्थुसारपयरण के तीसरे प्रकरण में देवकुलिका को
क्रम बतलाया है।
बावन जिनालय--
"चउतीसं वाम दाहिण नव पुद्धि अठ पुरोन देहरयं ।
मूलपासाय एग: बावण्णजिनालये एवं ॥"
जिनप्रासाद के बायीं और दाहिनी ओर सत्रह २, पीछे के भाग में नौ और आगे पाठे,
ऐसे इकावन देवकुलिका और एक मुख्य प्रासाद मिलकर कुल बावन जिनालय कहा जाता है।
बहत्तर देवकुलिका-
"पणवीसं पणवीसं दाहिणवामेसु पिट्टि इग्गारं ।
दह अग्गे नायव्वं इस बहतरि जिणिदालं ।"
जिनप्रासाद के बांयी और दाहिनी ओर पच्चीस २. पीछे की तरफ ग्यारह और आगे
की तरफ दस, ऐसे इकहत्तर देवकुलिका और एक मुख्य प्रासाद मिलकर कुल बहत्तर जिनालय
कहा जाता है।
चौवीस देवकुलिका--
"अग्गे दाहिण वामे अठ्ठारिणदगेह चउवीसं ।
मूलसिलागाउ कम पकीरए ‘जगइ-मज्झम्मि ॥"
मुख्य जिनप्रासाद के आगे, दाहिनी और बायी ओर, ऐसे तीन दिशा में पाठ २
देवकुलिका बनाने से कुल चौवीस जिनालय कहा जाता है। ये सब देवकुलिकाएं जगती के
प्रान्त (सरहद) भाग में की जाती है।
मण्डपाद् गर्भस्त्रेण वामदक्षिणयोर्दिशोः ।
अष्टापदं प्रकर्त्तव्यं त्रिशाला वा बलाणकम् ॥२४॥
मुख्य जिनप्रासाद के गूढ मंडप की बायीं और दाहिनी ओर अष्टापद, त्रिशाला अथवा
बलाएक बनावे। (सामने भी बलाणक बनाया जाता है) ॥२४॥
रथ और मठ का स्थान-
अपरे रथशाला च मठं याम्ये प्रतिष्ठितम् ।
उत्तरे रथरन्धं च प्रोक्तं श्रीविश्वकर्मणा ॥२॥
देवालय के पीछे की तरफ रथशाला, दक्षिण मे मठ (धर्मगुरु का स्थान ) और उत्तर मे
रथ का प्रवेश द्वार बनावें । ऐसा विश्वकर्मा ने कहा है ॥२५॥

द्वितीयोऽध्याय ३३ जगती तादृशी कार्या प्रासादो यादृशो भवेत् । भिन्नच्छन्दा न कर्तव्या प्रासादासनसंस्थिता ॥२६॥ इति प्रासादजगती। प्रासाद जिस प्रकार का हो, उसी आकार को जगती बनानी चाहिये । भिन्न आकार की नहीं बनानी चाहिये । क्योंकि यह प्रासाद का आसनरूप है ।।२६।। अन्य प्रासाद- अग्रतः पृष्ठतश्चैव वामदक्षिणयोर्दिशो' । प्रासादं कारयेदन्यं नाभिवेधविवर्जितम् ॥२७॥ मुख्य प्रासाद के आगे, पीछे, बायी और दाहिनी ओर दूसरे प्रासाद बनाये जाय, वे सब नाभिवेध (प्रासाद के गर्भ ) को छोडकर के बनावे ॥२७॥ शिवलिंग के प्रागे अन्य देव लिङ्गाने तु न कर्तव्या अर्चारूपेण देवताः । प्रभानष्टा न भोगाय यथा तारा दिवाकरे ॥२८॥ शिवलिंग के सामने कोई भी देव पूजन के रूप में स्थापित करना नही चाहिये। क्योकि जैसे सूर्य के तेज से ताराओं की प्रभा नष्ट होती है, वैसे दूसरे देवों की प्रभा नष्ट होती है। इसलिये वे देव भोगादि सुख सपत्ति नहीं दे सकते ॥२८॥ देव के सम्मुख स्वदेव- शिवस्याने शिवं कुर्याद् ब्रह्माणं ब्रह्मणोऽग्रतः । विष्णोरने भवेद् विष्णु-जिने जिनो रखो रविः ||२६|| शिवके सामने शिव, ब्रह्मा के सामने ब्रह्मा, विष्णु के सामने विष्णु, जिनदेव के सामने जिनदेव और सूर्य के सामने सूर्य, इस प्रकार आपस मे स्वजातीय देव स्थापित किया जाय तो दोष नही माना जाता ॥२९॥ "चण्डिकाये भवेन्माता यक्षः क्षेत्रादिभैरवः । ज्ञेयास्तेपामभिमुखे ये येषां च हितैषिणः ॥"अप० सू० १०८ चडिका आदि देवी के सामने मातृदेवता, यक्ष, क्षेत्रपाल और भैरव आदि देव स्थापित किये जायें तो दोष नही है । क्योकि वे आपस मे हितेषी है। (१) 'तोऽपि वा। (२) जिने जैनो। प्रा०५ ३४ प्रासादमण्डने परस्पर दृष्टिवेध- ब्रह्मा विष्णुरेकनामिान्यां' दोषो न विद्यते । शिवस्याग्रेऽन्यदेवस्य दृष्टिवेधे महद्भयम् ॥३०॥ ब्रह्मा और विष्णु ये दोनो देव एक नाभि मे हों अर्थात् उनका देवालय प्रापस में सामने हो तो दोष नही है । परंतु शिवके सामने दूसरे देवका दृष्टिवेध होता हो तो बड़ा भय उत्पन्न होता है ॥३०॥ दृष्टिवेध का परिहार- प्रसिद्धराजमार्गस्य प्राकारस्यान्तरेऽपि वा । स्थापयेदन्यदेवाश्च तत्र दोषो न विद्यते ॥३१॥ शिवालय और अन्य देवों के देवालय, इन दोनों के बीच मे प्रसिद्ध राजमार्ग (भाम रास्ता) हो, अथवा दीवार हो तो दोष नही है ॥३१॥ शिवस्नानोदक- शिवस्नानोदकं गूढ-मागें चण्डमुखे क्षिपेत् । दृष्टं न लग्येत्तत्र' हन्ति पुण्यं पुराकृतम् ॥३२॥ शिव का स्नानजल गुप्त मार्ग से चण्डगण के मुख में गिरे, इस प्रकार स्नान का जल निकलने की गुप्त नाली रखना चाहिये । दिखते हुये स्नान जल का उल्लंघन (लाधना) नहीं करना चाहिये । क्योकि स्नान जल का उल्लंघन करने से पूर्वकृत पुण्य का नाश होता है ।।३२।। * चंडगण शिवस्नानोदक पी रहा है (१) जिने। (२) स्नानं । * चडनाथ गणदेव का स्वरूप अपराजित पृच्छा सूत्र २०८ में लिखा है कि स्थूल शरीर बाला, भयकर मुख वाला, ऊर्ध्वासन बैठा हुमा और दोनों हाथ से स्नान जल पीता हुमा, ऐसा स्वरूप बना करके पीठिका के जल स्थान के नीचे स्थापन किया जाता है, जिससे स्नान का जल उसके मुख में होकर बाहर गिरे। इस स्नान जल के उच्छिष्ट होजाने पर उसका यदि कभी उल्लघन हो जाय तो दोष नही माना जाता, ऐसा शिल्पियो का कहना है।

द्वितीयोऽध्यायः - देवों की प्रदक्षिणा- एका चण्ड्या रचौ सप्त तिस्रो दद्याद् विनायके । चतस्रो वासुदेवस्य' शिवस्यार्धा प्रदक्षिणा ॥३३॥ चंडीदेवी को एक, सूर्य को सात, गणेश को तीन, विष्णु को चार और महादेव को आधी प्रदक्षिणा देनी चाहिये ॥३३॥ अग्रतो जिनदेवस्य स्तोत्रमन्त्रार्चनादिकम् । कुर्यान दर्शयेत् पृष्ठं सम्मुखं द्वारलचनम् ।।३।। जिनदेव के पागे स्तोत्र, मंत्र और पूजन आदि करे। परंतु बाहर निकलते समय अपनी पीठ नही दिखावे, सम्मुख ही पिछले पैर चलकर द्वार का उल्लंघन करे ॥३४॥ जलमार्ग (पनाला)- पूर्वापरमुखे द्वारे प्रणालं शुभमुत्तरे । इति शास्त्रविचारोऽय-मुत्तरास्या न देवताः ॥३॥ पूर्व और पश्चिम दिशा के द्वार वाले प्रासाद की नाली (पनाला) उत्तर दिशा में रखना शुभ है। उत्तर दिशा में (दक्षिणाभिमुख ) किसी भी देव की स्थापना नही करे ऐसा शास्त्र का नियम है ॥३॥ अपराजितपृच्छा में लीखा है कि- "पूर्वापरं यदा द्वार प्रणालं चोत्तरे शुभम् । प्रशस्तं शिवलिङ्गाना-मिति शास्त्रार्थनिश्चयः॥" सूत्र० १०८ पूर्व और पश्चिम दिशा के द्वार वाले प्रासाद की नाली उत्तर दिशा मे रखना शुभ है। शिवलिंग के लिये तो यह नियम विशेष प्रशंसनीय है । ऐसा शास्त्र का नियम है । "अर्चानां मुखपूर्वाणां प्रणाल वामत. शुभम् । उत्तरास्या न विज्ञेया प्रारूपेण देवताः ।। सूत्र० १०८ यदि देवो का मुख पूर्व दिशा के सामने हो तो उसकी नाली बायी ओर रखना शुभ है। उत्तर दिशा में दक्षिणाभिमुख किसी भी देव की मूत्ति स्थापित नहीं करे। (१) विष्णुदेवस्य । (२) मुत्तरेशा ।

प्रासादमण्डने
३६
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"जैनमुक्ताः समस्ताश्च याम्योत्तरक्रमैः स्थिताः ।
वामदक्षियोगेन कर्त्तव्यं सर्वकामदम् ॥' अ० सूत्र १०८
जिनदेव के प्रासाद दक्षिण और उत्तर दिशा के द्वार वाले भी बनाये जाते हैं। उनकी
नाली वाम दक्षिण योग से अर्थात् दक्षिण दिशा के सामने द्वार वाले अर्थात् दक्षिणाभिमुख
प्रासाद को नालो बायीं ओर तथा उत्तर दिशा के सामने द्वार वाले ( उत्तराभिमुख) प्रासाद की
नाली दाहिनी ओर बनावे, अर्थात् उत्तर या दक्षिण दिशा के द्वार वाले प्रासाद की नाली
पूर्व दिशा में रक्खे । यह सब इच्छापूर्ण करने वाली है।
वास्तुमंजरी मे भी कहा है कि-
"पूर्वापरास्यप्रासादे नाल सौम्ये प्रकारयेत् ।
तत्पूर्वे याम्यसौम्यास्ये मण्डपे वामदक्षिणे ॥"
पूर्व और पश्चिमाभिमुख प्रासाद की नाली उत्तर दिशा मे, उत्तर और दक्षिणाभिमुख
प्रासाद की नाली पूर्व दिशा मे रक्खे । मंडप में स्थापित किये देवों की नाली बायो और
दाहिनी और रखनी चाहिये।
मण्डपस्थित देवों की नाली-
मण्डपे ये स्थिता देवा-स्तेषां वामे च दक्षिणे ।
प्रणालं कारयेद् धीमान् जगन्यां च चतुर्दिशम् ॥३६॥
मंडप मे जो देव स्थापित हों, उनके स्नान जल निकलने की नाली बायी और दाहिनी
ओर रखना चाहिये, अर्थात् मूलनायक के बायी ओर बैठे हुए देवों की नाली बायीं ओर तथा
दाहिनी ओर बैठे हुए देवो की नाली दाहिनी ओर बनावे। जगती के चारों दिशा मे नाली
बनावे ॥३६॥
"वामे वाम प्रकुर्वीत दक्षिणे दक्षिणं शुभम् ।
मण्डपादिषु प्रतिमा येषु युक्त्या विधीयते ॥" अप० सू० १०५
मडप मे जो देव बैठे हो, उनमे मूलनायक के बायी ओर के देवों की नाली बायी ओर
तथा दाहिनी ओर के देवों की नाली दाहिनी ओर बनाना शुभ है ।
पूर्व और पश्चिमाभिमुखदेव-
पूर्वापरास्यदेवानां कुर्यानो दक्षिणोत्तरम् ।
ब्रह्मविष्णुशिवार्केन्द्र-गुहाः पूर्वापराङ्मुखाः ॥३७॥

द्वितीयोऽध्याय ३७ --000-..- - 000000000000000.. 40 00000 : पूर्व और पश्चिम दिशाभिमुख वाले देवों का मुख दक्षिण और उत्तर दिशा में नही रखना चाहिये । ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, इन्द्र और कात्तिकेय, ये देव पूर्व और पश्चिम मुख वाले है। इसलिये इनका मुख पूर्व अथवा पश्चिम दिशा में रहे, इस प्रकार की स्थापना करनी चाहिये ॥३७॥ नगराभिमुखाः श्रेष्ठा मध्ये बाह्य च देवताः । गणेशो धनदो लक्ष्मीः पुरद्वारे सुखावहाः ॥३८॥ नगर के मध्य और बाहर स्थापित किये हुए देवों का मुख नगर के सम्मुख रखना श्रेष्ठ है। गणेश, कुबेर और लक्ष्मीदेवी, उन्हे नगर के दरवाजो पर स्थापित करना सुखदायक है ॥३॥ दक्षिणाभिमुखदेव- विघ्नेशो भैरवश्चण्डी नकुलीशो ग्रहास्तथा । मातरो धनदश्चैव शुभा दक्षिणदिङमुखाः ॥३६॥ गणेश, भैरव, चण्डी, नकुलीश, नवग्रह, मातृदेवता पोर कुवेर, इन देवों को दक्षिणा- भिमुख स्थापित करे तो शुभफल देनेवाले है ॥३६॥ विदिशाभिमुखदेव- नैऋत्याभिमुखः कार्यों हनुमान् वानरेश्वरः । अन्ये विदिङ्मुखा देवा न कर्तव्याः कदाचन ॥४०॥ इति देवानां दृष्टिदोषदिग्विभागः। वानरेश्वर हनुमानजी का मुख नैऋत्य दिशाभिमुख रक्खे । बाकी दूसरे किसी भी देव का मुख विदिशा मे कभी भी नहीं रखना चाहिये ॥४०॥ सूर्य प्रायतन- सूर्याद् गणेशो विष्णुश्च चण्डी शम्भुः प्रदक्षिणे। भानोर है ग्रहास्तस्य गणा द्वादश मूर्तयः ॥४१॥ इति सूर्यायतनम् । सूर्य के पंचायतन देवो मे-मध्य मे सूर्य, उसके प्रदक्षिण क्रम से गणेश, विष्णु, चण्डीदेवी और महादेव को स्थापित करे। तथा नवग्रह और बारह गणों की मूर्तियां भी स्थापित करे ॥४॥ -

प्रासादमण्डने
गणेश पायतन-
गणेशस्य गृहे तद्वचण्डी शम्भुहरी रविः ।
मूर्तयो द्वादशान्येऽपि गणाः स्थाप्पा हिताश्च ये ॥४२॥
इति गणेशायतनम् ।
गणेश के पंचायतन देवों मे-मध्य में गणेश, उसके पीछे प्रदक्षिण क्रम से चंडीदेवी,
महादेव, विष्णु और सूर्य की स्थापना करे। तथा बारह गयो की मूर्तियां भी स्थापित करना
हित कारक है ।।४२॥
विष्णु प्रायतन-
विष्णोः प्रदक्षिणेनैव गणेशार्काम्बिकाशिवाः ।
गोप्यस्तस्यावतारस्य मूर्तयो द्वारिका तथा ॥४३॥
इति विष्ण्वायतनम् ।
विष्णु के पंचायतन देवों मे-मध्य में विष्णु को स्थापित करके उसके प्रदक्षिण क्रमसे
गणेश, सूर्य, अम्बिका और शिव को स्थापित करे। तथा गोपियों को और अवतारों की मूर्तियां
तया द्वारिका नगरी को स्थापित करे ॥४३॥
-
चण्डी पायतन-
चण्डयाः शम्भुर्गणेशोऽकों विष्णुः स्थाप्यः प्रदक्षिणे ।
मातरो मूर्त यो देव्या योगिन्यो भैरवादयः ॥४४॥
इति चण्डिकायतनम् ।
चंडी देवी के पंचायतन देवो में-मध्य में चंडी देवी की स्थापना करके, उसके प्रदक्षिण
क्रम से महादेव, गणेश, सूर्य और विष्णु को स्थापित करें। तथा मादेवी, चौसठ योगिनी
आदि देवियो की और भैरव आदि देवो को भी मूर्तियां स्थापित करें ॥४४॥
शिव पञ्चायतन-
शम्भोः सूर्यों गणेशश्च चण्डी विष्णुः प्रदक्षिणे ।
स्थाप्याः सर्वे शिवस्थाने दृष्टिवेधविवर्जिताः ॥४॥
इति शिवायतनम्।
शिव के पञ्चायतन देवों में मध्य में शिव को स्थापित करके, उसके प्रदक्षिण क्रम से
सूर्य, गणेश, चण्डी और विष्णु को स्थापित करें। परंतु उनका दृष्टिवेध अवश्य छोड़ देवें ॥४५॥

द्वितीयोऽध्याय ms- .. - Rememo--- ~-- त्रिदेव स्थापना क्रम- रुद्रस्त्रिपुरुषे मध्ये रुद्राद्वामगवो हरिः । दक्षिणाङ्ग भवेद् ब्रह्मा विपर्यासे भयावहः ॥४६॥ त्रिपुरुष प्रासाद मे महादेव को मध्य में स्थापित करें। उसकी बायीं भोर विष्णु और दाहिनी ओर ब्रह्मा को स्थापित करें। इसमे विपरीत स्थापन करेगे तो भयकारक होगे ॥४६॥ त्रिदेवों का न्यूनाधिक मान- रुद्रवनविभागोनो हरिरडे पितामहः । तत्तु ल्या पार्वतीदेवी सुखदा सर्वकामदा ॥१७॥ इति विपुरुषन्यासः। * इति श्री सूत्रधार मण्डनविरचिते वास्तुशास्त्रे प्रासादमण्डने जगती- दृष्टिदोपायतनाधिकारे द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ अपराजित पृच्छा शिवमुख का एक तृतीयाश भाग कम करके दो तृतीयाश भाग तक विष्णु की ऊंचाई रक्खे। और विष्णु के मुखार्द्ध भाग तक ब्रह्मा की ऊंचाई रक्खें । ब्रह्मा को ऊचाई के बरावर पार्वती देवी की ऊंचाई रक्खे । यह नियम सुखदायक और सब इच्छितफल देनेवाला है ॥४७॥ में भी कहा है कि- "ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्र-स्त्वेकस्मिन् वा पृथग्गृहे । भूयो न्यूनन्यूनतश्च रुद्रो हरिः पितामहः ॥ अंशोनश्च हराद्विष्णु-विष्णोर, पितामहः । वामदक्षिणयोगेन मध्ये सद्र च स्थापयेत् ॥ सस्थाप्य च शुभं कर्ता नुपाद्याः सुजनाः प्रजा । प्रकर्तव्यं त्यज विप्राद्याः समे यान्ति समन्वितम् ॥ ताभ्यां ह्रस्वो यदा रुद्र' क्षयो राशि जने मृतिः । राष्ट्रक्षोभो नृपयुद्ध ब्रह्मविष्णू समौ यदा । अनावृष्टिर्जने मारि-ब्रह्महस्वे जनार्दने । विपर्यये नृपाद्याश्च अस्वस्था भ्रमति प्रजा ।।" सूत्र १३६

प्रासादमण्डने
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त्रिपुरुष प्रासाद में ब्रह्मा विष्णु और महादेव ये तीनों देव एक ही गर्भगृह में या अलग २
गर्भगृह में स्थापित करना हो तो महादेव से न्यून विष्णु और विष्णु से न्यून ब्रह्मा की ऊंचाई
रखनी चाहिये । महादेव से एक भाग न्यून विष्णु और विष्णु से प्राधा भाग न्यून ब्रह्मा की
ऊंचाई रखनी चाहिये । मध्य में महादेव, उसकी बायी ओर विष्णु और दाहिनी ओर ब्रह्मा
को स्थापित करने मे राजा और प्रजा का कल्याण होता है । विष्णु और ब्रह्मा की ऊचाई से
महादेव को ऊंचाई कम हो तो राजाओं का विनाश और मनुष्यों का भरण होता है। ब्रह्मा
और विष्णु को ऊचाई बराबर हो तो देश में उत्पात और राजानों का युद्ध होता है।
ब्रह्मा को ऊंचाई से विष्णु को ऊंचाई कम हो तो अनावृष्टि और मनुष्यों में महामारी आदि
रोग की उत्पत्ति होती है । इसलिये कहे हुए मानके अनुसार ही इन्हे बनाना चाहिये, विपरीत
करने से राजा और प्रजा अस्वस्थ रहते है।
इति श्री पं० भगवानदास जैन विरचित प्रासाद मण्डन के
दूसरे अध्याय की सुबोधिनी नाम्नी भाषा टीका समाप्त ॥२॥

अथ प्रासादमण्डने तृतीयोऽध्यायः प्रासादधारिणी खरशिला- अतिस्थूला' सुविस्तीर्णा प्रासादधारिणी शिला । । अतीयसुदृढा कार्या इष्टिकाचूर्णवारिभिः ॥१॥ प्रासाद को धारण करनेवाली जो प्राधार शिला है, यह जगती के दासा के ऊपर और प्रथम भिट्ट के नीचे जो बनायी जाती है, उसको खरशिला कहते है । वह अतिस्थूल और अच्छी तरह विस्तारवाली बनावे, तथा इंट, चूना और पानी से बहुत मजबूत बनावे ॥१॥ खरशिला का मान- "प्रासादच्छन्दमस्योर्चे दृढखरशिलोत्तमा । एकहस्ते पादहस्तः पश्चान्तेऽङ्गुलवृद्धितः॥ अर्धाङ्गलं तदुर्वे तु नवान्तं सुदृढोत्तमा । पादद्धि पुनर्दद्याद् हस्ते हस्ते तथा पुनः॥ हस्ताना विंशतिर्याव-दर्द्धपादा तध्वतः । विशत्यङ्गलपिण्डा च शताः तु खरा शिला " अप० सू० १२३ प्रासादतल के ऊपर बहुत मजबूत और उत्तम खरशिला बनावे। वह एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद मे छः अगुल के उदयवाली बनावे। पीछे दो से पाच हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल, छह से नव हाथ तक आधा २ अंगुल, दस से तीस हाथ तक पाव २ अंगुल और इक्तीस से पचास हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद में प्रत्येक हाथ एक २ जव बढ़ा करके बनावे । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद के लिये लगभग वीस अंगुल के ऊंचाई की खरशिला होनी चाहिये । रार्णव अध्याय १०२ में कहा है कि- "प्रथमभिट्टस्याधस्तात पिण्डो वर्ण (कूर्म ?) शिलोत्तमा । तस्य पिण्डस्य चार्धन खरशिलापिण्डमेव च ॥" प्रथम भिट्ट के नीचे कर्मशिला की मोटाई से अर्घमान की खरशिला की मोटाई रक्खे । (१) प्रतिस्थुलातिविस्तीर्ण (२) 'इष्टका'। प्रा०६ ४२ प्रासादमण्डने भिडमान- शिलोपरि भवेद् मिट्ट-मेकहस्ते युगाङ्गुलम् । अर्धाङ्गुला भवेद् वृद्धि-र्यावद्धस्तशताद्ध कम् ॥२॥ खरशिला के ऊपर भिट्ट नाम का थर बनावें। एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद को चार अंगुल के उदय का बनावे । पीछे दोसे पचास हाथ तक के प्रासाद के लिये प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढा करके बनावे ॥२॥ प्रकारन्तर से भिट्टमान- अङ्गुलेनांशहीनेन अर्द्धनाद्धेन च क्रमात् । पञ्चदिगविशतिर्याव-च्छताद्ध च विवद्ध येत् ॥३॥ एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद को चार अंगुल का भिट्ट बनावे । पीछे दो से पांच हाथ तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल, छह से दस हाथ तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ पौन २ अंगुल, ग्यारह से बीस हाथ तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ आधार अंगुल और इक्कीस से पचास हाथ तक के प्रासाद को प्रत्येक हाथ पाव २ अंगुल बढा करके भिट्ट का उदय रक्खे ।।३।। यही मत क्षीरार्णव, अपराजित पृच्छा वास्तुविद्या और वास्तुराज आदि शिल्पग्रन्थों में दिया गया है। भिट्टका निर्गम- एकत्रिीणि मिट्टानि हीनहीनानि कारयेत् । स्वस्त्रोदयप्रमाणस्य चतुर्थाशेन निर्गमः ॥४॥ इति भिट्टमानम् । उपरोक्त कथन के अनुसार भिट्टका जो उदयमान पाया हो, उसमें एक, दो अथवा तीन भिट्ट बना सकते है । परन्तु ये एक दूसरे से हीनमान का बनाना चाहिये । राजसिहकृत वास्तु- राज में कहा है कि-"युगांश ह्रखं द्वितीयं तदर्घोच्चं तृतीयकम् ।" अर्थात् प्रथम भिट्ट से दूसरा भिट्ट पौन भाग का, और तीसरा भिट्ट आधा उदय में रक्खें । तथा अपने २ उदय का चौथा भाग बराबर निर्गम रक्खे ॥४॥ क्षीरार्णवमें "प्रथमं निर्गमं कार्य चतुर्याशे महामुने ! । द्वितीय तृतीयांशेन तृतीयं च तदर्धतः ।।" प्रथम भोट का निर्गम अपने चौथे भाग, दूसरे भिट्टका निर्गम अपने तीसरे भाग और तीसरे भिट्टका निर्गम अपने उदय से आधा रक्खे । कहा है कि- तृतीयोऽध्यायः ४ repoemshmo Mommenteomammemoon पीठ का उदय मान- पीठम त्रिपादांशै-रेकद्वित्रिकरे गृहे । चतुर्हस्ते त्रिसार्धा शं पादांश पञ्चहस्तके ॥५॥ दशविंशतिपत्रिंश-च्छताधं हस्तकावधिः। वृद्धिदत्रियुग्मेन्दु-संख्या स्यादङ्गुलैः क्रमात् ॥६॥ पञ्चाशं हीनमाधिक्य-मेकैकं तु विधा पुनः। भीट के ऊपर पीठ बनाया जाता है, उसका उदयमान-एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की पीठका उदय बारह अंगुल. दो हाथ के प्रासाद की पीठका उदय सोलह अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद की पीठ अठारह अंगुन, चार हाथ के प्रासाद की पीठ अपने साढ़े तीन भाग ( साढे सत्ताईश अंगुल) की, पांच हाथ के प्रासाद की पीठ अपने चौथे भाग (तीस अंगुल) की उदय मे बनावे । छह से दस हाथ तक के प्रासाद की पीठ प्रत्येक हाथ चार २ अंगुल, ग्यारह से बीस हाथ तक के प्रासाद की पीठ प्रत्येक हाथ तीन २ अंगुल, इक्कीस से छत्तीस हाथ तक के प्रासाद की पीठ प्रत्येक हाथ दो २ अंगुल और सेतीस से पचास हाथ तक के प्रासाद की पीठ प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल बढ़ा करके बनावें। इस प्रकार पचास हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की पीठ का उदय पांच हाथ और छह अंगुल होता है । उदय का पांचवां भाग उदय में कम करे तो कनिष्ठ मान की और वढा देवे जो ज्येष्ठ मान की पीठ होती है । ज्येष्ठ मान की पीठ का पांचवां भाग ज्येष्ठ पीठ मे बटावे तो ज्येष्ठ ज्येष्ठ, कम करे तो ज्येष्ठ कनिष्ठ, मध्यम मान के पीठ का पांचवां भाग मध्यम में वढावे तो ज्येष्ठ मध्यम और कम करे तो कनिष्ठ मध्यम, कनिष्ठ मान की पीठ का पाचवां भाग कनिष्ठ पीठ में बढावे तो ज्येष्ठ कनिष्ठ और कम करे तो कनिष्ठ कनिष्ठ मान को पीठ होती है। ऐसे नव प्रकार से पीठ का उदयमान समझना चाहिये ॥६॥ वास्तुमंजरी में कहा है कि- "प्रासादस्य समुत्सेध एकविंशतिभाजिते । पञ्चादिनवभागान्ते पञ्चधा पीठसमुच्छ्यः ।।" प्रासाद की (मंडोवरकी) ऊंचाई का इक्कीस भाग करे । इनमे से पांच, छह, सात, आठ अथवा नव भाग के मान का पीठ का उदय रक्खें। ये पांच प्रकार के पीठ के उदय है। यह मत अपराजित पृच्छा सूत्र १२३ श्लोक ७ में भी लीखा है। तथा श्लोक २५ से २६ तक जो पीठ का मान लिखा है, उसमे चार हाथ के प्रासाद की पीठ प्रर्द्ध, तृतीयांश और चतुर्थांश मान की लिखा है।

४४ प्रासादमण्डने क्षीरार्णव मत से पीठमान- "एकहस्ते तु प्रासादे पीठं वै द्वादशाङ्गलम् । हस्तादिपञ्चपर्यन्तं हस्ते हस्ते पञ्चाङ्गला॥ पञ्चोर्ध्व दशपर्यन्तं वृद्धिर्वेदाङ्गला भवेत् । दशोर्ध्व विशयावत्तु हस्ते हस्ते त्रयाङ्गला ।। विंशोवं पद्रिशान् वृद्धिस्तु चालद्वया । षट्त्रिंशोज़ शंतान्तिं हस्तहस्तकमङ्गला ।। पञ्चमांशे ततो हीनं कनिष्ठं शुभलक्षणम् । पञ्चमांशेऽधिकं चैव ज्येष्ठं त्वष्ट्रा च भाषितम् ॥' अध्याय ३ इसका अर्थ श्लोक पांच और छह के बराबर है। सिर्फ दोसे पांच हाथ तक के प्रासाद की पीठ प्रत्येक हाथ पांच २ अंगुल बढा करके बनाना लिखा है, यही विशेष है। इस मत से पचास हाथ के विस्तार वाले प्रासाद की पीठ का उदय पांच हाथ और पाठ अंगुल का होता है । अपराजितपृच्छा के मतसे पीठ का उदयमान- "एकहस्ते तु प्रासादे पीठं वे द्वादशाङ्गुलम् व्यष्टाङ्गलं द्विहस्ते च त्रिहस्तेऽष्टादशाङ्गलम् ।। अद्धं पादं त्रिभागं वा त्रिविधं परिकल्पयेत् । त्र्यंशेनार्धन पादेन चतुर्हस्ते सुरालये पादं पीठोच्छ्रयं कार्य प्रासादे पञ्चहस्तके । पञ्चोवं दशपर्यन्तं रसाशं हस्तवृद्धये ।। ततो हस्ते चाष्टमांशा वृद्धिः स्याद् द्वाविंशावधि । पत्रिंशदन्तं वृद्धिस्तु हस्ते वै द्वादशाशिका ।। चतुर्विंशत्यंशिका तवं यावच्छतार्धकम् । मध्ये न्यूनेऽधिके पञ्चमाशे ज्येष्ठं कनिष्ठकम् ॥ त्रिज्येष्ठमिति च ख्यातं त्रिमध्यं त्रिकनिष्ठकम् । तस्याभिधानं वक्ष्येऽह-मुदितं नवघोच्छयात् ।।" सूत्र० १२३ एक हाथ के प्रासाद को बारह अंगुल, दो हाथ के प्रासाद को सोलह अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद को अठारह अंगुल पीठ का उदय रवखे । अर्थात् एक हाथ के अर्द्ध भाग, दो हाथ के तीसरे भाग और चार हाथ के चौथे भाग पीठ का उदय रक्खे। चार हाथ के प्रासाद को अर्द्ध भाग ( ४८ अंगुल ), तीसरे भाग ( ३२ अंगुल ) अथवा चौथे भाग (२४ अंगुल) पीठ का उदय रखना चाहिये । पांच हाथ के प्रासाद को चौथे भाग (३० अंगुल), छह से दस हाथ प्रासाद को प्रत्येक हाथ चार २ अंगुल, ग्यारह से वाईस हाथ के प्रासाद को तीन २ अंगुल, तेईस से छत्तीस हाथ के प्रासाद को दो दो अंगुल और सेंतीस से पचास हाथ के प्रासाद को तृतीयोऽध्याय -- --- -00-000--00- नरचय प्रत्येक हाथ एक २ अंगुल बढ़ा करके पीठ का उदय रखना चाहिये । यह पीठ की ऊंचाई का मध्यम मान माना गया है। इसमें इसका पांचवां भाग बढावे तो ज्येष्ठमान और घटावे तो कनिष्ठ मान होता है । ज्येष्ठ मान का पांचवां भाग ज्येष्ठ मे बढावे तो ज्येष्ठ ज्येष्ठ, घटावे तो ज्येष्ठ कनिष्ठ, मध्यम का पाचवा भाग मध्यम मे बढ़ावे तो ज्येष्ठ मध्यम घटावे तो कनिष्ठ मध्यम, कनिष्ठ मान का पाचवा भाग कनिष्ठ मे बढावे तो ज्येष्ठ कनिष्ठ और घटावे तो कनिष्ठ कनिष्ठ, इस प्रकार पीठ के उदय का नव भेद होते है । इन नव भेदो के नाम बतलाते है- "शुभद सर्वतोभद्रं पद्मकं च वसुन्धरम् । सिंहपीठं तथा व्योम गरुडं हंसमेव च ॥ वृपमं यद्भवेत् पीठं मेरोराधारकारणम् । पीठमानमिति ख्यातं प्रासादे आदिशीमया ॥" सूत्र० १२३ शुभद, सर्वतोभद्र, पलक, वसुन्धर, सिंहपीठ, व्योम, गरुड, हंस और वृषभ ये नव नाम पीठोदय के है । इनमे वृषभपीठ मेरुप्रासाद का आधार रूप है । दि० वसुनंदीकृत प्रतिष्ठाशार मे पीठ का मान- "प्रासादविस्तरार्द्धन स्वोच्छ्रितं पीठमुत्तमम् । मध्यमं पादहीनं स्याद् उत्तमार्द्धन कन्यसम् ॥" प्रासाद के विस्तार के अर्द्ध मान का पीठ का उदय रक्खे। इसे उत्तम मान की पीठ माना है। इस उत्तम मान की पीठ के उदय का चार भाग करके उनमे से तीन भाग के मान का पीठ का उदय रक्खे तो मध्यम मान को और दो भाग के मान का पीठ का पासपOTICHILD10000 उदय रवखे तो कनिष्ठ मान की पोठ माना है। पीठोदय का थरमान त्रिपञ्चाशत् समुत्सेधे द्वाविंशत्यंशनिर्गमे ॥७॥ नवांशो जाडथकुम्भश्च सप्तांशा कणिका भवेत् । सान्तरालं कपोतालिः सप्तांशा ग्रासपट्टिका ॥८॥ सूर्यदिग्वसुभागैश्च गजवाजिनराः क्रमात् । बाजिस्थानेऽथवा कार्य स्वस्वदेवस्य वाहनम् ॥६॥ पीठ का जो उदयमान पाया हो, उसमें ५३ भाग करे। उनमे से बाईस भाग के मान का पीठ प्रासाद की महापीठ (१) सप्ताश। (२) कपक। MENT ent १२ mean TREN S छ बयाना ४६ प्रासादमण्डने - 0000- mon- 00-- Mean-deos Momention- का निर्गम रक्खे । उदय के तरेपन भाग में से नव भाग का जाड्यकुम्भ, सात भाग की अतरपत्र के साथ करिणका, सात भाग की कपोतालि के साथ ग्रासपट्टी, इसके ऊपर बारह भाग का गजथर, दश भाग का अश्वथर, और आठ भाग का नरथर बनावे । अश्वथर के स्थान पर देव के वाहन का भी थर बना सकते है ।।७ से हा थरों का निर्गममान- पञ्चांशा कणिकाये तु निर्गमो जाडयकुम्भकः । त्रिसार्दा कर्णिका सार्धा चतुर्भिासपट्टिका ॥१०॥ कुञ्जराधनरा वेदा रामयुग्मांशनिर्गमाः । अन्तरालमधस्तेषा-मूर्वाधः कर्णयुग्मकम् ॥११॥ कणिकासे आगे पांच भाग निकलता जाध्यकुम्भ, ग्रासपट्टी से आगे साढे तीन भाग निकलती कणिका, गजथर से आगे साढे चार भाग निकलती प्रासपट्टी, अश्वथरसे भागे चार भाग निकलता गजथर, नर थरसे आगे तीन भाग निकलता अश्वथर और खुरासे आगे दो भाग निकलता नर थर रखे। इस प्रकार बाईस भाग पीठ का निर्गम जाने । इन गजादि थरों के नीचे अंतराल रक्खे और अंतराल के ऊपर और नीचे दो दो कणिका बनावें ॥१०-११॥ कामदपीठ और कणपीठ (साधारणपीठ)- गजपीठं विना स्वल्प-द्रव्ये पुण्यं महत्तरम् । जाडयकुम्भश्च कर्णाली प्रासपट्टी तदा भवेत् ॥१२॥ कामदं कणपीठं च जाडयकुम्भश्च कर्णिका । लतिने निर्गमं हीनं सान्धारे निर्गमाधिकम् ॥१३॥ गज आदि थरो वाली पीठ को गजनीठ कहते है । ऐसी रूपवाली पीठ बनाने में द्रव्य का अधिक खर्च होता है, इसलिये अपनी शक्ति के अनुसार अल्प द्रब्य से साधारण पीठ बनाने से भी बड़ा पुण्य होता है । गज अश्व आदि रूपोंवाली पीठ को छोड़कर जाड्यकुम्भ, कणिका और केवाल के साथ ग्रासपट्टी वाली साधारण पीठ बनावे, उसको कामदपीठ कहते है। तथा जाड्यकुम्भ और कणिका ये दो थरवाली पीठ बनावे, उसको कणपीठ कहते है । लतिनजाति के प्रासाद के पीठ का निर्गम कम होता है और सांधार जातिके प्रासाद के पीठ का निर्गम अधिक होता है ॥१२-१३॥ सर्वेषां पीठमाधारः पीठहीनं निराश्रयम् । पीठहीनं त्रिनाशाय प्रासादभुवनादिकम् ॥१४॥ इति पीठम् ।

तृतीयोऽध्याय ४७ -meenasam- IOffaik OLDSKERSARY FM जाडका कम कामद पीठ कणपीठ प्रासाद और भवन (गृह) आदि सव मे पीठका आधार हैं, यदि पीठ न होवे तो ये निराधार माने जाते है । इसलिये विना पीठ वाले ये प्रासाद और गृह आदि थोडे समय मे ही नष्ट हो जाते है ॥१४॥ प्रासाद का उदयमान (मंडोवर)- हस्तादिपञ्चपर्यन्तं विस्तारेणोदयः समः । स क्रमानवसप्तेपुनामचन्द्राङ्गुलाधिकः ॥१५॥ पञ्चादिदशपर्यन्तं त्रिंशद्यावच्छता कम् । हस्ते हस्ते क्रमाद् वृद्धि-मनुसूर्यनवाङ्गुला ॥१६॥ एक से पांच हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय विस्तार के बरावर मान का ववावें, परन्तु उनमे क्रमशः नव, सात, पाच, तीन और एक अंगुल बढ़ा करके बनावे । अर्थात् प्रासाद का विस्तार एक हाथ का हो तो उसका उदय एक हाथ और नव अंगुल (कुल ३३ अंगुल ), दो हाथ का हो तो दो हाथ और सात अगुल (कुल ५५ अंगुल), तीन हाथ का हो तो तीन हाथ और पांच अंगुल (कुल ७७ अंगुल ), चार हाथ का हो तो चार हाथ और तीन अगुल (कुल ६६ अंगुल ) और पाच हाथ का हो तो पाच हाथ और एक अंगुल (कुल १२१ मंगुल ) का उदय रक्खे । छह से दस हाथ तक के विस्तार वासे प्रासाद का उदय प्रत्येक हाथ चौदह २ अंगुल, ग्यारह से तीस हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय प्रत्येक हाथ प्रासादमबने बारह २ अंगुल और इकतीस से पचास हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय प्रत्येक हाथ नव २ अंगुल की वृद्धि करके रक्खे । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद की कुल ऊंचाई पचीस हाथ और ग्यारह अंगुल होती है ॥१५-१६॥ देखो अपराजित पृच्छा सूत्र १२६ अन्य प्रकार का उदय मान- एक हस्तादिपञ्चान्तं पृथुत्वेनोदयः समः । हस्ते सूर्याङ्गुलावृद्धि-र्यावत् त्रिंशत्करावधि ॥१७॥ नवाङ्गुला करे वृद्धि-विद्धस्तशतार्धकम् । पीठोचे उदयश्चैव छाद्यान्ते नागरादिपु ॥१८॥ एक से पांच हाथ तक के विस्तार वाले प्रासाद का उदय विस्तार के बराबर रक्खें। पीछे छह से तीस हाथ तक के प्रासाद का उदय प्रत्येक हाथ बारह २ अंगुल बढाकर के और इकतीस से पचास हाथ तक के प्रासाद का उदय प्रत्येक हाथ नव २ अंगुल वढ़ाकर के रखें। यह प्रासाद का उदय पीठ के ऊपर खुरा से लेकर छज्जा के अंत भाग तक माना गया है ॥१७-१८॥ प्रासाद के उदय के लिये अपराजित पृच्छा सूत्र १२६ मे श्लोक १० मे अन्य प्रकार से लीला है कि- "कुम्भकादि प्रहारान्तं प्रयुक्तं वास्तुवेदिभिः । तदधस्तात्तु पीठं च ऊर्वे स्याच्छिखरोदयः॥" कुम्भा के थर से लेकर छाद्य के प्रहार थर के अंत तक ऊचाई जाननी चाहिये, ऐसा वास्तुशास्त्र के जानने वाले विद्वानो ने कहा है । कुम्भा के नीचे पीठ और प्रहार थर के ऊपर शिखर का उदय होता है। क्षीरार्णव के मतानुसार पासाद का उदयमान- "एकहरते तु प्रासादे र्यास्त्रशाङ्गलोदयः । द्विहस्ते तूदयः कार्यों सप्ताङ्गलः करद्वयः ॥ त्रिहस्ते च यदा माना-दधिकश्च पञ्चाङ्गुलः। चतुर्हस्तोदयः कार्य एकनाङ्गुलेनाधिकः ।। विस्तरेण समः कार्यः पञ्चहस्तोदये भवेत् । षड्हस्ते तूदयः कार्यो न्यूनो द्वावलो तथा ॥ उदयः सप्तहस्ते च न्यूनः सप्ताङ्गलस्तथा । अष्टहस्तोदयः कार्यः षोडशाङ्गलहीनकः ॥ हीन एकोनत्रिंशः स्यात् प्रासादे नवहस्तके । दशहस्तेषूदयः कार्योऽष्टहस्तप्रमाणतः ॥ (१) 'नागरोचितः।'

तृतीयोऽध्यायः सपाददश हस्तश्च प्रासादे दशपञ्चके । विशहस्तोदये कार्यः सार्ध द्वादशहस्तकः ।। पञ्चविंशोदये ज्ञेयः पादोनदशपञ्चकः । त्रिंशहस्ते महाप्राज्ञ ! सप्तदशोदयस्तथा ॥ सपादकोनविंशतिः पञ्चत्रिंशे मुनीश्वर !। व्योमवेदे यदा हस्ते सार्थः स्यादेविंशतिः।। चतुविशतिः पादोनः पञ्चचत्वारिंशद्धस्तके । शतार्होदये मान तु हस्ताः स्युः पञ्चविंशतिः।।" प्रासाद का विस्तार एक हाथ हो तो ३३ अंगुल, दो हाथ हो तो ५५ अंगुल, तीन हाथ हो तो ७७ अगुल, चार हाथ हो तो ९७ अगुल, पांच हाथ का हो तो पाच हाथ, छह हाथ का हो तो पांच हाथ और २२ अगुल, सात हाथ का हो तो छह हाथ और १७ अगुल, पाठ हाथ का हो तो सात हाथ और आठ अंगुल, नव हाथ का हो तो सात हाथ और १९ अंगुल, दस हाथ का हो तो आठ हाथ, पंद्रह हाथ का हो तो दस हाथ और छह अंगुल, बीस हाथ का हो तो बारह हाथ और बारह अगुल, पचीस हाथ का हो तो चौदह हाथ और १८ अंगुल, तीस हाथ का हो तो मत्रह हाथ, पेतीस हाथ का हो तो १६ हाथ और छह अंगुल, चालीस हाथ का हो तो २१ हाथ और १२ अंगुल, पैतालीस हाथ का हो तो २३ हाथ १८ अंगुल, और पचास हाथ का हो तो ०५ हाथ का उदय करना चाहिये । अर्थात् दश हाथ के बाद पात्र पांच हाथ मे सवा दो २ हाथ उदय क ने का विधान है। प्रासाद के उदय से पोठका उदयमान- एकविशत्यंशभक्ते प्रासादस्य समुच्छये । पञ्चादिनवभागान्तं पीठस्य पञ्चधोदयः ॥१६॥ प्रासाद का खुरा से लेकर छज्जा तक जो उदयमान आवे, उसका इक्कीस भाग करके पाच, छह, सात, आठ अथवा नव भाग जितना पीठ का उदय रखखे। इस तरह पाच प्रकार से पीठ का उदयमान होता है ।।१।। १४४ भाग के मंडोवर (दीवार) के थरों का उदयमान- वेदवेदेन्दुभक्ते तु छाधान्तं पीठमस्तकात् । खुरकः पञ्चमागः स्याद् विंशतिः कुम्भकस्तथा ॥२०॥ कलशोऽष्टौ द्विसाद्ध तु कर्तव्यमन्तरालम् । कपोतिकाप्टौ मञ्ची च कर्चव्या नवभागिका ॥२२॥ प्रा०७ प्रासादमखने 4.F- . Ant-imum --- ANSALMumoupoundamanupamltanatew पञ्चत्रिंशत्पदा' नवा तिथ्यशैरुद्गमो भवेत् । वसुभिर्भरणी कार्या दिग्मागैश्च' शिरावटी ॥२२॥ अष्टांशो• कपोतालि-द्विसामन्तरालकम् । छाद्य त्रयोदशांशीच्चं दशमागैर्विनिर्गमः ॥२३॥ इति मण्डोवरः। पीठ के ऊपर से छज्जा के अंत भाग तक पूर्वोक्त प्रासाद के उदय का जो मान आया हो, उसका एक सौ चउनालीस (१४४) भाग करें। उनमें से पांच भाग का खुरा, बीस भाग का कुम्भा, पाठ भाग का कलश, ढाई भाग का अंतराल, आठ भाग का केवाल, नव भाग की मंची, पैंतीस भाग को जंघा, पंद्रह भाग का उद्गम (उरजंघा), आठ भाग की भरणी, दस भाग की शिरावटी, आठ भाग की कपोतिका (केवाल), ढाई भाग का अंतराल और तेरह भाग का छज्जा का उदय रक्खे और छज्जा का निर्गम दस भाग का रक्खे ॥२० से २४|| इन १४४ भाग के मडोवर के थरों में जो रूप किया जाता है, उसका वर्णन अपराजित पृच्छा सूत्र १२२ के अनुसार ज्ञानप्रकाश दीपार्णव के पांचवें अध्याय में लिखा है कि- "खुरकः पञ्चभागस्तु विंशतिः कुम्भकस्तथा । पूर्वमध्यापरे भागे ब्रह्मविष्णुरुद्रादयः॥ त्रिसन्ध्या भद्र शोभाढया चित्रपरिकरीताः । नासके रूपसंघाटा गर्भे च रथिकोत्तमा ।। मृणालपत्र शोभान्यं स्तम्भिका तोरणान्विता ।" पीठ के ऊपर खुरा पांच भाग और कुम्भा बौस भाग रखें। कुम्भा मे ब्रह्मा, विष्णु और महादेव का स्वरूप बनावे, इन तीन देवो में से एक मध्य में और उसके दोनों बगल एक २ देव बनावे । भद्र के कुम्भा मे तीन संध्या देवी, अपने परिवार के साथ बनावें, कोणे के कुम्भा मे अनेक प्रकार के रूप बनावे, तथा भद्र के मध्यगर्भ मै सुन्दर रथिका (गवाक्ष) बनावे । कमल के पान के प्राकार और तोरण वाले स्तंभ बनावें। "कलशो वसुभागस्तु सार्घद्वौ चान्तःपत्रकम् ॥ वसुभिश्च कपोतालि-मंञ्चिका नवभागिका । पञ्चत्रिंशदुच्छिता च जना कार्या विचक्षण !॥ भ्रमनिर्वाणतः स्तम्भ-नासकोपाङ्गफालनाः। मूलनासकसर्वेषु स्तम्भाः स्युश्चतुरसकाः ।। गजेः सिंहवरालेश्च मकरैः समलकृताः ।" (१) 'विशत्पश्चयुता' । (२) "शिरावटी दशाशिका ।

तृतीयोऽध्यायः mewom.com Ant- Ammonsoone- MAIL PLNA V MHASIR नागराशिमाम भागवड १४४ भाग का मडोवर (प्रासाद की दीवार) प्रासादमण्डने Course- - - -- - Car- Mon ----- R room Mem mmmmmmm आठ भाग का कलश, ढाई भाग का अंतरपत्र, आठ भाग का केवाल, नव भाग की मंचिका और पैतीस भाग की जंघा करें। कोना और उपांग आदि फालना की जंघा मे भ्रमवाले स्तंभ बनावे, सब मुख्य कोने की जंघा में समचोरस स्तंभ बनावें, तथा गज, सिंह, वरालक और मकर के रूपों से शोभायमान बनावें। "कर्णेषु च दिक्पालाष्टी प्राच्यादिषु प्रदक्षिणे ।। नाट्यशः पश्चिमे भने अन्धकेश्वरो दक्षिणे । चण्डिका' उत्तरे देव्यो दंष्ट्रासुविकृताननाः ।। प्रतिरथे तस्य देव्यः कर्तव्याश्च दिशांपतेः । वारिमार्गे मुनीन्द्राश्च प्रलीनाः तपः साधने । गवाक्षाकारो भद्रेषु कुर्याग्निर्गमभूषितः ।" कर्ण की जंघा मे पाठ दिक्पाल पूर्वादि दिशा के प्रदक्षिण क्रम से रक्खें । नाट्य श (नटराज) पश्चिम भर में, अंधकेश्वर दक्षिण भद्र में, विकराल मुख वाली और भयंकर दांत वाली चंडिका देवी उत्तर दिशा के भद्र मे रक्खे । प्रतिरथ के भद्र में दिक्पालों की देवियां बनावे । वारिमार्ग मे तपः साधना में लीन ऐसे ऋषियों के रूप बनावे। भद्र के गवाक्ष बाहर निकलता हुआ शोभायमान बनावें। चार प्रकार की जंघा "नागरी च तथा लाटी वैराटी द्राविडी तथा ।। शुद्धा तु नागरी ख्याता परिकर्मविजिता । स्त्रीयुग्मसंयुता लाटी वैराटी पत्रसकुला ।। मञ्जरी बहुला कार्या जङ्घा च द्राविडी सदा । नागरी मध्यदेशेषु लाटी लाटे प्रकीतिता। द्राविडी दक्षिणे देशे वैराटी सर्वदेशजा ।" नागरी, लाटी, वैराटी और द्राविडी ये चार प्रकार की जंघा है। उनमे नागरी जंघा विना किसी प्रकार के रूप को और शुद्ध सादी है । स्त्री युगल के रूप वाली लाटी बंधा है। कमल पत्रो वाली वैराटी जघा है । बहुत मजरी (शृङ्गो) वाली द्राविडी बंधा है । मध्यप्रदेश (१) पपराजित पृच्छा सूत्र १२७ श्लोक २४ मे 'वितरागे च शासनदेव्यः ।' अर्थात् वितराग देव के देवालय में चण्डिका के स्थान पर उनकी शासन देवियो को रखना जीखा है।

तृतीयोऽध्यायः POONG-someo.commons - -..." Mon- 0000000mA wwesammemopmenu mom-0mmmwomen------ 4. में नागरी जंघा, लाटदेश मे लाटी जंघा, दक्षिण देश में द्राविडी जंघा और सारे देश में वराटी जंघा प्रसिद्ध है। "उदमः पञ्चदशांशः कपिनासैरलकृतः ।। भरणी वसुभागा तु शिरावटी पञ्चव च । हमारी तदूर्व पञ्चभिः पट्ट कपोतालिर्वसुस्मृता ।। अजली द्विसार्धमन्तःपत्र च त्रिदशं कूटच्छाधकम् । निर्गम वसुभागे तु मेर्वादीनामतः शृणु ॥" खा M सर मलिन राध पानी पंद्रह भाग का उद्गम बनावें, एवं उसमे बन्दरो के रूप बनावे । आठ भाग की भरणी, पांच भाग को शिरावटी, उसके ऊपर पांच भाग का पाट, आठ भाग का केवाल, ढाई भाग का अंतरपत्र और तेरह भाग का छज्जा का उदय रखना चाहिये। छब्बा का निर्गम आठ भाग रक्खे। विरारी piri भरजी मेर मंडोवर- २५ माया [[111111 परम उम जहा २० ३५ मेरुमण्डोवरे मञ्ची भरण्यूर्वेऽष्टमागिका । पञ्चविंशतिका जङ्घा उद्गमश्च त्रयोदश ॥२४॥ अष्टांशा भरणी शेषं पूर्वगत् कल्पयेत् सुधीः । सप्तमागा भवेन्मश्ची कूटच्छाधस्य मस्तके ॥२॥ षोडशांशा पुनर्जा भरणी सप्तभागिका । शिरावटी चतुर्भागा पट्टः स्यात् पञ्चभागिकः ॥२६॥ सूर्या शैः कूटच्छायं च सर्वकामफलप्रदम् । कुम्भकस्य युगांशेन स्थावराणां प्रवेशकः ॥२७॥ इति मेरुमंडोवरः। जिस मंडोवर मे एकसे अधिक जघा होवे, उसको मेरुमडोवर कहते है । उसमें भरणी के ऊपर खुर, कुम्भ, कलश, अंतराल और केवाल, ये प्रथम के पांच पर नही बनाये जाते. किन्तु मञ्ची आदि सब पर बनायं जाते है । इसलिये प्रथम खुरा से लेकर भरणी मदिन योग RSS प्रेसमडीवर भगा प्रासादमण्डने - -- - NormersdeAM.bu .-olden Man "MMU M -- .MAMA तक सबथर १४४ भाग के मान से बनाकर के पीछे उसके ऊपर मञ्ची आदि थर बनायें जाते है, उनका मान इस प्रकार है- उपरोक्त १४४ भाग के मण्डोवर के खुरासे लेकर भरणी तक के सब थर बना करके उसके ऊपर मंची पाठ भाग की, जंचा पचीस भाग की, उद्गम तेरह भाग का और भरणी पाठ भाग की बनानी चाहिये । इसके ऊपर शिरावटी केवाल, अंतराल और छज्जा, ये चार थर १४४ भाग के मंडोथर के मान का बनावें। फिरसे इस छज्जा के ऊपर सात भाग की मची, सोलह भाग की जंघा, सात भाग की भरणी, चार भाग की शिरावटी, पांच भाग का पाट और बारह भाग का कूटछाध बनावे। यह मेरुमंडोवर सब इच्छित फल देने वाला है। कुम्भा का एक चतुर्थांश भाग जितना सब थरों का निर्गम रक्खे ॥२२४ से २७॥ क्षीरार्णव में कहा है कि- "अस्योदये च कर्त्तव्यं प्रथमं षट्कच्छाधकम् । यावत्समोदयः प्राज्ञ ! तावन्मण्डोवरं कृतम् ।। तथाद्यच्छाद्यसस्थाने हूँ जड्थे परिकीत्तिते । "भवेयुदिशजङ्घा शता|दये। षड्विधं कूटच्छाद्य च द्विभूम्योरन्तरे मुने!। भरण्यूर्वे भवेन्माञ्ची छाद्योा न च मञ्चिका ।। पुनर्जङ्घा प्रदातव्या यावद् द्वादशसंख्यया । किश्चित् किञ्चिद् भवेन्यूनं कर्तव्यो भूमिकोच्छ्यः ।। शतार्होदये माने च महामेरुः प्रदापयेत् ।" अध्याय १०४।। जितना प्रासाद का उदय हो, उतना ही ऊंचा मंडोवर रक्खें। इस मंडोवर के उदय में छह छज्जे बनावे । प्रथम छज्जा दो जंघा वाला बनावे । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद में बारह जंघा और छह छन्ना बनाया जाता है। दो दो भूमि के फासले पर एक २ छज्जा बनाना चाहिये । भरणी के ऊपर मांची रक्खें, किन्तु छन्ना के ऊपर मांची नहीं रखनी चाहिये । नीचे की भूमि से ऊपर की भूमि को ऊंचाई कम कम रखनी चाहिये। यह सामान्य मोटर महामेरु मंडोवर पचास हाथ के प्रासाद के लिये बनाना चाहिये । यावत्तु तृतीयोऽध्यायः ..mmmwwwmnirmwwmore -summmmmompokemomenomen सामान्य मंडोवर- शिरावटय द्गमो मची जडा रूपाणि वर्जयेत् । अल्पद्रव्ये महापुण्यं कथितं विश्वकर्मणा ॥२८॥ इति सामान्यमंडोवरः। शिरावटी, उद्गम, मंची और जंघा, इन घरों मे जो जो रूप बनाये जाते हैं, इनसे द्रव्य का अधिक व्यय होता है । इसलिये ये थर बिना रूप का बनावे ताकि खर्च कम हो। विश्वकर्माजी के कथनानुसार इससे पुण्य भी महान होता है । ॥२८॥ २७ भाग का मंडोवर- पीठतश्छाद्यपर्यन्तं सप्तविंशतिभाजिते । द्वादशग्नां खुरादीनां भागसंख्या क्रमेण तु ॥२६॥ स्यादेकवेदसार्धार्ध-सार्द्ध मार्दाष्टभिस्त्रिमिः । साईसाझर्ष भागश्च सार्घद्वौ' शनिर्गमः।। ३०॥ इति प्रकारान्तरे मण्डोवरः। .. पीठ के ऊपर से छन्ना के कार तक मंडोवर के उदय का सत्ताईस (२७) भाग करे। उनमें खुरा आदि बारह थरो की भाग संख्या क्रमशः इस प्रकार है-एक भाग का खुरा, चार भाग का कुंभ, डेढ भाग का कलश, आधा भाग का अंतराल, डेढ भाग का कंवाल, डेढ भाग की माची, आठ भाग की जंघा, तीन भाग का उद्गम, डेढ भाग को भरपो, डेढ भाग का केवाल, आधा भाग का अतराल और ढाई भाग का छन्ना का उदय रक्खे, छन्ना का निर्गम दो भाग मे करे । IR|३०|| मडोवर की मोटाइ- पादांशेनष्टक पञ्च-पडशः शैलदारूजे । सान्धारे चाटमिर्भाग-दशांशैर्धातुरत्नजे ॥३१॥ (१) द्विसाधै। (२) भरणी के ऊपर कितनेक प्रासादो मे शिरावटी है और कितनेक प्रासादो में केवाल देखने में आता है। (३) ण्टाशतो मितिः । प्रकारान्तरे मंडोनरम ५६ प्रासादमण्डने -AmAMMmm MMAR . M MAN Momwww ईंटों के प्रासाद की दीवार प्रासाद के विस्तार के चौथा भाग जितनी, पाषाण के और लकड़ी के प्रासाद की दीवार पांचवें भाग अथवा छठे भाग जितनी, सांधार प्रासाद की दीवार आठवें भाग, धातु और रत्न के प्रासाद की दीवार दसवें भाग जितनी मोटी बनावें ॥३॥ अपराजित सूत्र १२६ में कहा है कि- "मृदिष्टकाकर्मयुक्तां भित्ति पादा प्रकल्पयेत् । पञ्चमांशेऽथवा सा तु षष्ठांशे शैलजे भवेत् ।। दारजे सप्तमांशे च सान्धारे चाष्टमांशके । धातुजे रत्नजे भित्तिःप्रासादे दशमांशतः॥" मिट्टी और ईंट के प्रसाद की दीवार चौथे भाग, पाषाण के प्रासाद की दीवार पांचवे अथवा छठे भाग, लकड़ी के प्रासाद की दीवार सातवे भाग, सान्धार जाति के प्रासाद की दीवार आठवे भाग, धातु और रत्न के प्रासाद की दीवार दसवे भाग जितनी मोटी बनावें। अन्य प्रकार से मंडोवर की मोटाई- चतुरस्रीकृते क्षेत्रे दशभागैविभाजिते । मिचिद्विभागकर्त्तव्या पड्भागं गर्भमन्दिरम् ॥३२॥ समचोरस प्रासाद की भूमि के दस भाग करे। उनमे से दो २ भाग की दीवार की मोटाई रक्खे। बाकी छह भाग का गभारा बनावे ॥३२॥ शुभाशुभगर्भगृह- मध्ये युगात्रं भद्राढ्यं सुभदं प्रतिभद्रकम् । फालनीयं गर्भगृहं दोषदं गर्भमायतम् ।।३३॥ गर्भगृह चार कोने वाला समचोरस बनावे। उसमे भद्र, सुभद्र और प्रतिभद्र आदि फालना (खाचा ) बताना शुभ है । परन्तु लंबचोरस गभारा बनाने पर दोष होता है ॥३३।। अपराजित पृच्छा सूत्र १२६ में कहा है कि- "एकद्वित्रिकमात्रामि-गर्भगेहं यदायतम् । यमचुल्ली तदा नाम भत्त गृहविनाशिका ||" यदि गर्भगृह एक, दो, तीन अंगुल भी सम्मुख लंबा हो तो यह यमचुल्ली नाम का गर्भगृह कहा जाता है। यह स्वामी के गृह का विनाश कारक है।

तृतीयोऽध्यायः coda-- . Mompamouslims -- ---- RamBAR- - लंबचोरस शुभ गर्भगृह- "दारजे वलभीना तु आयतं च न दुपयेत् । प्रशस्त सर्वकृत्येषु चतुरस्र शुभप्रदम् ।।" अप० सू० १२६ दारुजादि (लकड़ी के बने हुए) और बलभी (स्त्रीलिग ) जाति के प्रासाद में गर्भगृह लंबा हो तो दोष नही लगता है। बाकी समस्त जाति के प्रासादों मे समचोरस गर्भगृह बनाना, सब कार्यों में प्रशंसनीय और शुभ है। स्तम्भ और मंडोवर का समन्वय- कुम्भकेन समा कुम्भी स्तम्भप्रान्तेन तूद्गमः । भरण्या भरणी शीर्ष कपोतान्या समं भवेत् ॥३४॥ पेटके' कूटच्छाद्यस्य कुर्यात् पटस्य पेटकम् । मंडोवर का कुम्भ और स्तंभ की कुम्भी, स्तंभ का मथाला और मंडोवर का उद्गम, स्तभ की भरणी और मडोवर की भरणी, मंडोवर की कपोताली और स्तंभ की शिरावटी, ये सब समसूत्र में रखने चाहिये और पाट के पेटा माग तक छज्जा की नमन (छज्जा नमता) रखनी चाहिये। गर्भगृह के उदय का मान और गुम्बज- सपडंशः सपादः स्यात् सार्थो गर्मस्य विस्तरात् ॥३॥ बृहद्देवालये पट्ट-पेटान्तं हि विधोदयः । भजेदष्टमिरेकांशा कुम्भी स्तम्भोऽद्ध पञ्चभिः ॥३६॥ अर्द्धन भरणी शीर्ष-मेकं पट्टस्तु साधकः । व्यासाबैन करोटः स्याद् दर्दरी विपमा शुभा ॥३७॥ इति गृभंगृहोदयप्रमाणम् । गर्भगृह (गभारे) के विस्तार मे विस्तार का षष्ठांश युक्त सवाया अथवा टेढा गर्भगृह का उदय रक्खे । यह गभारे के तन से पाट के पेटा भाग तक गर्भगृह के उदय का तीन प्रकार का मान हुमा । (अपराजित पृच्छा सू० १२९ श्लो०५ मे गभारे का उदय पौने दुगुणा तक रखने (१) 'अघस्तान" प्रा०८ प्रासादमण्डने namwadNGMANIMNUR को कहा है ) जो उदयमान आया हो, उसका आठ भाग करें, उनमें से एक भाग की कुम्भी, साढ़े पांच भाग का स्तंभ, प्राधे भाग को भरणी और एक भाग की शिरावटी वनावें। इसके ऊपर डेढ भाग का केवाल ( पाट ) रक्खें। गर्भगृह के विस्तार से आधा करोट (गुम्बज ) का उदय रखना चाहिये, उसमें दर्दरी का थर विपम संख्या में रक्खें ॥३५ से ३७॥ उदुम्बर (देहली) की ऊँचाई- मूलकर्णस्य सूत्रेण कुम्भेनोदुम्बरः समः । तदधः पञ्चरत्नानि स्थापयेच्छिल्पिपूजया ॥३८॥ साद के कोने के समसूत्र में उदुम्बर (देहली ) बनावें । यह कुम्भा के उदय के बराबर ऊबाई मे रक्खें । इसको स्थापना करते समय नीचे पचरल रक्खे और शिल्पियों का सम्मान करे॥३८॥ उदुम्बर की रचना द्वारव्यासत्रिभागेन मध्ये मन्दारको भवेत् । वृत्तं मन्दारकं कुर्याद् मृणालं पद्मसंयुतम् ॥३६॥ जाडयकुम्मः कणाली च कीर्चिवक्त्रद्वयं तथा । उटुम्बरस्य पार्श्वे च शाखायास्तलरूपकम् ॥४०॥ द्वार के विस्तार का अर्थात् देहली का तीन भाग करें। उनमे से एक भाग का मध्य मे मंदारक बनावे । यह अर्धचंद्र के आकार वाला गोल और पद्मपत्र युक्त बनाना चाहिये । वदुम्बर की ऊंचाई के अर्धभाग में जाड्यकुम्भ और करणी, ये दो थर वाली कणपीठ बनावें। मंदारक के दोनों तरफ एक २ भाग का कीतिमुख (ग्रासमुख) बनावें और उसके बगल शाखा के तलका रूपक बनावें ॥३९-४०॥ कुभा से हीन उदुम्बर और तल- कुम्भस्याद्धे त्रिमागे वा पादे हीन उदुम्बरः । वदर्धे कर्णकं मध्ये पीठान्ते वाह्यभूमिका ॥४१॥ इति उदुम्बर । उदुबर का उदय कुम्भ के उदय के बराबर रखना चाहिये । परन्तु कम करना चाहे तो कुम्भ के उदय का आधा एक तृतीयांश अथवा चौथा भाग जितना कम कर सकते है। उदय के प्राधे भाग तक कण रोठ करना और गर्भगृह का तल रखना चाहिये और बाहर के मंडपों के तल पीठ के उदयान्त बराबर रक्खे ॥४॥ में तृतीयोऽध्यायः -women-maunimmemomammeer nomineero-me-o-. opmeme- --- अपराजित पृच्छा सूत्र १२९ में कहा है कि- "उदुम्बरं तथा वक्ष्ये कुम्भिकान्तं तदुच्छ्यम् । तस्यार्धन विभागेन, पादोनरहितं तथा ॥ उक्तं चतुर्विधं शस्तं कुर्याच्चैवमुदुम्बरम् । अत्युत्तमाश्च चत्वारो न्यूना दुप्यास्तथाधिका ।। खुरकोर्वेऽर्द्ध चन्द्रः स्यात् तदूध्वं स्यादुदुम्वरः । उदुम्बराद्ध त्र्यंशे वा पादे वा गर्भभूमिका ।। मण्डपेषु च सर्वेषु पीठान्ते रङ्गभूमिका ।।" HTRIANCIE ५ aaHE CORAMA अभार-ओ-finarai राखि समया विवार भाग उदुम्बर भाग३ यासमारक यास अपनाया नार-भाग fla 2119 hanno साथीका गंधाया पवा घa २भग मदिर के द्वार की देहलो का उदय भारत भाग तथा श्रद्धचद्र और गगारक.

कुम्भिया प्रथम के मान के अनुसार रखनी चाहिये । एवं अपराजित पृच्छा सूत्र १२६ में तो ६० प्रासादमण्डने अब मै उदुम्बर ( देहली) का स्वरूप कहता हूं। यह स्तंभों की कुम्भियों की ऊंचाई के बराबर ऊंचाई का रक्खे । यदि किसी कारण वश नीचा करने की आवश्यकता हो तो कुम्भी के अर्धमाग, तीसरा भाग अथवा चौथा भाग जितना नीचा कर सकते है। ऐसे चार प्रकार के उदुम्बर का उदय प्रशस्त माना है। इससे हीन अथवा अधिक उदय का बनावें तो दुषित होता * खुरथर के उदय बराबर अर्द्ध चन्द्रका उदय रस्खे, और इसके ऊपर उदुम्बर रक्खे । गर्भगृह के भूमितलका उदय उदुम्बर के गधे, तीसरे अथवा चौथे भाग मे रखो । बाहर के मंडपों का भुमितल पीठ के उदयान्त तक रक्खें और रंगमंडप का भूमितल पीठ के नीचे के अंत्य भाग में रक्खे। क्षीरार्णव में भी कहा है कि- "उदुम्बरे क्षते' कुम्भी स्तम्भकं चावपूर्वकम् । सान्धारे च निरन्धारे कुम्भिकान्तमुदुम्वरम् ॥" अध्याय १०६ यदि किसी कारण वश उदुम्बर का उदय कम किया जाय तो भी कुम्भी और स्तंभ का मान पहले जितना ही रखना चाहिये, अर्थात् स्तम्भकी कुम्भी कम नहीं करनी चाहिये ऐसा विशेष नियम है। बाकी सांधार और निरंधार प्रासादो मे कुम्भी के उदय बरावर उदुम्बर का उदय रखना चाहिये, ऐसा सामान्य नियम है। अर्द्धचन्द्र (शंखावत)-- खुरकेन समं कुर्या-दर्घ चन्द्रस्य चोच्छतिः । द्वाख्याससमं दैर्घ्य निर्गमं स्यात् तदर्धतः ॥४२॥ द्विभागमर्धचन्द्रं च भागेन द्वौ गगारको । शङ्खानसमायुक्तं पनाकारैरलतम् ॥४३॥ इति अर्द्धचन्द्रः। *कितने हा प्राधुनिक शिल्पियो की मान्यता है कि-"उदुम्बर (देहली) कुम्भा से निचा उतारने की आवश्यकता हो तब उसके बराबर स्तंभ की कुम्भिया भी नीची उतारनी चाहिये।" उनकी यह मान्यता प्रामाणिक मालूम नहीं होती. क्योंकि चीराएंव अ० १०६ में सष्ट लिखा है कि-'उदुम्बरे क्षते (हते) कुम्भी स्तम्भ तु पूर्ववत् भवेत् ।' कभी उदुम्बर उदय मे कम करने की मावश्यकता हो तव स्तम्भ मोर उनको उदुम्बर नीचा उतारने को कहा है. तो कुम्भिया नीचे कैसे की जाय ? इससे साफ मालूम होता है कि जब उदुम्बर नीचा करने की प्रावश्यकता हो, तब कुम्मियां नीचे नहीं करनी चाहिते, किन्तु कुम्भा के उदय बराबर कवाई में रखनी चाहिये। (१) 'हते" तृतीयोऽध्यायः ६१ APopm- Non- Man . - m -a-.. -- . 4. mammemoran-e-Immon- उदुम्बर के आगे जो अर्द्ध चन्द्र के जैसी प्राकृति की जाती है, उसका उदय खुर थर के उदय के बराबर रक्खे। द्वार के विस्तार के बराबर अर्द्धचन्द्र लंबा बनावे और लम्बाई से आधा निर्गम रखखे । लम्बाई के तीन भाग करके उनमे से दो भाग का अर्द्धचंद्र और इसके दोनो तरफ प्राधे २ भाग का दो गगारक बनावे। अद्ध चन्द्र और गगारक के बीच में पत्तेवाली वेलयुक्त शख और पापत्र जैसी आकृति से सुशोभित बनावे ॥४२-४३।। उत्तरंग- "उदुम्बरसपादेन उत्तरङ्ग विनिर्दिशेत् । तदुच्छ यं विभजेत भागा अथकविंशतिः ।। पत्रशाखा विशाखा च द्विसार्धा तु कारयेत् । मालाधरं च त्रिभाग कर्तव्यं वामदक्षिणे॥ अवें छाधकः पादोनः पादोना फालना तथा । रथिका सप्तभागाश्च भागैकं कण्ठं भवेत् ।। पड्भागमुत्सेधं कार्य-मुद्गर्म च प्रशस्यते । इदृशं कारयेत् प्राज्ञः सर्वयज्ञफलं भवेत् ॥" वास्तुविद्या प्र०६ द्वार के उदुम्बर के उदय से उतरंग का उदय सवाया रक्खे। जो उदय आवे उसके इक्कीस भाग करे। उनमे से ढाई भाग को पत्रशाखा और विशाखा बनाये। उसके ऊपर तीन भाग का मालाधर, पौन भाग की छज्जी. पौन भाग का फालना, सात भाग की रथिका (गवान ), एक भाग का कंठ और छह भाग का उद्गम बनाये। इस प्रकार बुद्धिमान पुरुष उत्तरंग वनावेगे तो सब यज्ञो के वरावर फलदायक होता है। Bala ३. उत्तरंग Song Game ६२ प्रासादमण्डने MAH detamaaNMMRI---- .. Metween . Nm mmenu Homemmmune- नागरप्रासाद का द्वारमान-- एकहस्ते तु प्रासादे द्वारं स्यात् पोडशाङ्गुलम् । षोडशाङ्गुलिका वृद्धि-विद्धस्तचतुष्टयम् ॥४४॥ अष्टहस्तान्तकं यावद् दीघे वृद्धिगुणाजुला । द्वथङ्गुला प्रतिहस्तं च यावद्धस्तशताद्ध कम् ॥४॥ यानवाहनपल्य द्वार प्रासादसमनाम् । दैान पृथुत्वं स्याच्छोमनं तत्कलाधिकम् ॥४६॥ इति नागरप्रासादद्वारमानम् । नागर जाति के प्रासाद के द्वार का उदय एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के द्वार का उदय सोलह अंगुल रखना चाहिये । पीछे चार हाथ तक सोलह २ अंगुल, पांच से आठ हाथ तक तीन २ अंगुल और नौ से पचास हाथ तक प्रत्येक हाथ दो २ अंगुल बढ़ा करके द्वार का उदय रखना चाहिये । इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद के द्वार का उदय १६० अंगुल' होता है । पालखी, वाहन, शय्या और पलंग तथा प्रासाद और घर का द्वार, ये सब विस्तार में लंबाई से आधा रखना चाहिये । उसमे भी लंबाई का सोलहवां भाग विस्तार में बढ़ावे तो अधिक शोभायमान होता है ॥४४ से ४६।। क्षीरार्णवमें कहा है कि- "एकहस्ते तु प्रासादे द्वारं च षोडशाडगुलम् । इयं वृद्धि. प्रकर्तव्या यावच्च चतुर्हस्तकम् ।। वेदाङ्गुला भवेद् वृद्धि-र्यावच्च दशहस्तकम् । हस्तविंशतिमाने च हस्ते हस्ते त्रयाइगुला।। द्वयाइगुला भवेद् वृद्धिः प्रासादे त्रिंशद्धस्तके । अड्गुलेका ततो वृद्धि-वित्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥ नागराख्यमिदं द्वार-मुक्तं क्षीरावे मुने ।। दशमाशे यदा हीनं द्वारं स्वर्गे मनोहरम् ।। अधिकं दशमांशेन प्रासादे पर्वताश्रये । तावक्षेत्रान्तरे ज्ञातु-महदेवमुनीश्वर !! (१) समरागण सूत्रधार अध्याय ५५ श्लोक १२९ मे चार से अधिक मान के प्रासादो मे तीन तीन अगुल बढाना लीखा है । जिसे पचास हाथ के प्रासाद का द्वारमान २०२ अंगुल का होता है।

तृतीयोऽध्यायः ६३ ३ demandeedom शिवे द्वारं भवेज्ज्येष्ठं कनिष्ठं च जनालये । मध्यमं सर्वदेवानां सर्वकल्याणकारकम् ॥ उत्तममुदयान पादोन मध्यमानकम् । तस्य हीनं कनिष्ठं च विस्तारे द्वारमेव च ।। एवं ज्ञानं यदा ज्ञात्वा यदा द्वारं प्रतिष्ठितम् । नागरं सर्वदेवानां सर्वदेवेषु दुर्लभम् ॥" इति विश्वकर्मकृते क्षीरार्णवे नारदपुच्छिते शताने पञ्चमोऽध्यायः। एक से चार हाथ तक प्रत्येक हाथ सोलह २ अंगुल को, पांच से दश हाथ तक चार र अंगुल को, ग्यारह से बीस हाथ तक तीन २ अगुल की, इक्कीस से तीस हाथ तक दो २ अगुल की और इकतीस से पचास हाथ तक एक अंगुत की वृद्धि करके द्वार बनाना चाहिये। हे मुनि ! यह क्षीराव मे नागर जाति के द्वार का मान कहा । उसमे से दसवां भाग कम करें तो स्वर्ग के और अधिक कर तो पर्वत के प्राधित प्रासाद के द्वारका मान होता है। शिवालय मे ज्येष्ठ द्वार, मनुप्यालय मे कनिष्ठ द्वार और सब देवो के प्रासादो मे मध्यम द्वार बनाना चाहिये । यह सब कल्याण करने वाला है। उदय से आधा विस्तार रक्खे तो यह उत्तम मान का द्वार माना जाता है । इसमे उत्तम मान के विस्तार का चतुर्थाश कम रक्खे तो मध्यम मान का और इसमे भो मध्यम मान के विस्तार का चतुर्थांश कम रक्खें तो कनिष्ठ मान का द्वार माना जाता है। ऐसा समझ करके ही सब देवों के लिये यह नागर जाति का द्वार बनाना चाहिये। भूमिजाविप्रासादका द्वारमान- एकहस्ते सुरागारे द्वारं सूर्याङ्गुलोदयम् । सूर्याङ्गुला प्रतिकरं वृद्धिः पञ्चकरावधि ॥४७॥ पञ्चाङ्गुला च सप्तान्तं नवान्तं सा युगाङ्गुला । द्वधनु ला तु शतान्तिं वृद्धिः कार्या कर प्रति ॥४८॥ इति भूमिजप्रासादद्वारमानम् । एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के द्वार का उदय बारह अंगुल, पीछे पांच हाथ तक प्रत्येक हाथ बारह २ अंगुल, छह और सात हाथ तक पाच २ अंगुल, पाठ और नव हाथ तक चार २ अंगुल, दस से पचास हाथ तक के प्रासाद के द्वार का उदय दो २ अंगुल बढ़ा करके रक्खे। (उदय मे प्राधा विस्तार रखना चाहिये । विस्तार मे उदय का सोलहवां भाग बढाने से अधिक शोभायमान होता है) 16७-४८||

प्रासादमण्डने
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द्राविडप्रासाद का द्वारमान-
प्रासादे एकहस्ते तु द्वारं कुर्याद् दशाङ्गु लम् ।
रसहस्तान्तकं यावत् तावती वृद्धिरिष्यते ॥४॥
पञ्चाङ्ग ला दशान्तं च द्वयङ्गु ला च शताद्ध कम् ।
पृथुत्वं च तदर्धेन शुभ स्यात्तु कलाधिकम् ॥५०॥
इति द्राविडद्वारमानम्।
एक हाथ के प्रासाद के द्वार का उदय दस अंगुल, पीछे छह हाथ तक प्रत्येक हाथ
दस २ अगुल, सात से दस हाथ तक पांच २ अंगुल और ग्यारह से पचास हाथ तक के प्रासाद के
द्वार का उदय प्रत्येक हाथ दो दो अंगुल बढ़ा करके रक्खे । उदय से आधा विस्तार रखें।
विस्तार मे उदय का सोलहवां भाग बढ़ावे तो अधिक शोभायमान होता है ।।४६-५०॥
अन्य जाति के प्रासादों का द्वारमान-
विमाने भूमिजं मानं वैराटेषु तथैव च ।
मिश्रके लतिने चैव प्रशस्तं नागरोद्भवम् ॥५१॥
विमाननागरच्छन्दे कुर्याद् विमानपुष्पके ।
सिंहावलोकने द्वारं नागरं शोभनं मतम् ॥५२।।
वलम्या भूमिजं मानं फांसाकारेषु द्राविडम् ।
धातुजे रत्नजे चैव दारुजे च रथारुहे ॥५॥
इति द्वारमानम् ।
विमान और वैराट जाति के प्रासाद का द्वार भूमिज जाति के मान का, मिश्र और
लतिन जाति के प्रासाद का द्वार नागर जाति के मान का, विमाननागर, विमानपुष्पक और
सिंहावलोकन जाति के प्रासाद का द्वारमान नागर जाति के मान का, वलभी प्रासाद का
द्वारमान भूमिज जाति के मान का, फांसनाकार, धातु, रत्न, दारुज और रथारह जाति के
प्रासाद का द्वार द्राविड जाति के मान का रखना चाहिये ।।५१-५३॥
द्वारशाखा-
नवशाख महेशस्य देवानां सप्तशाखिकम् ।
पञ्चशाखं सार्वभौमे त्रिशाख मण्डलेश्वरे ॥५४॥

तृतीयोऽध्यायः एकशाखं भवेद् द्वारं शूद्रे वैश्ये द्विजे सदा । समशाखं च धूमाये खाने रासभवायसे' ॥५५॥ महादेव के प्रासाद का द्वार नवशाखा वाला, दूसरे देवों के प्रासाद का द्वार सात शाखा वाला, चक्रवर्ती राजाओं के प्रासाद का द्वार पांच शाखावाला, सामान्य राजारों के प्रासाद का द्वार तीन शाखावाला, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र जाति के गृहों के द्वार एक शाखावाला बनावे । दो, चार, छह और पाठ, ये सम शाखावाले द्वार धूम, श्वान, खर और ध्वाक्ष आय वाले घरों में बनाने चाहिये ॥५४-५५।। - शाखा के पाय- "नवशाखे ध्वजश्चको वृषभः पञ्चशासिके । त्रिशाखे च तथा सिंहः सप्तशाखे गजः स्मृतः ।।" अप० सू० १३१ नवशाख मे ध्वज प्राय, पंचशाख मे वृषमाय, त्रिशाख में सिंह प्राय और सप्तशाख में गज प्राय देनी चाहिये। १ प्रासाद के अंग तुल्य शाखा- त्रिपञ्चसप्तनन्दाङ्गे शाखाः स्युरङ्गतुल्यकाः । होनशाखं न कर्तव्य-मधिकाढ्य सुखावहम् ।।६।। प्रासाद के भद्र आदि तीन, पांच, सात अथवा नव अंग है। उनमे से जितने अग का प्रासाद हो, उतनी शाखाये बनानी चाहिये । अंग से कम शाखा नहीं बनाना चाहिये, लेकिन यदि अधिक वनावे तो वह सुखदायक है। - शाखा से द्वारका नाम और परिचय- "पद्मिनी नवशाखं च सप्तशाखं तु हस्तिनी । नन्दिनी पञ्चशाखं च त्रिविधं चोत्तमं भवेत् ॥ मुकुली मालिनी ज्येष्ठा गान्धारी सुभगा तथा । मध्यमेति द्विधा प्रोक्ता कनिष्ठा सुप्रभा स्मृता ॥ मुकुली चाष्टशाखं च षट्शाखं च मालिनी । (१) श्वाने धानेच रासभे । प्रा०६

६६
प्रासादमण्डने
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गान्धारी च चतुः शाखं त्रिशाखं सुभगा स्मृता ।।
सुप्रभा तु द्विशाखं चैकशाखं स्मरकीर्तितम् ॥" अप० २० १३१
नवशाखा वाला द्वारका नाम पधिनी, सात शाखा वाला द्वारका नाम हस्तिनी और
पंचशाखा वाला द्वारका नाम नन्दिनी है। ये तीनों द्वार उत्तम हैं। मुकुली और मालिनी ये
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तृतीयोऽध्यायः ६७ . दोनों द्वार ज्येष्ठ हैं। गांधारी और सुभगा ये दोनों द्वार मध्यम है और सुप्रभा द्वार कनिष्ठ है। पाठ शाखावाला द्वार मुकुली, छह शाखावाला मालिनी, चार शाखावाला गांधारी, तीन शाखावाला सुभगा, दो शाखावाला सुप्रभा और एक शाखावाला स्मरकोत्ति नाम का द्वार है। न्यूनाधिक शाखामान- अङ्गुलं सार्धमद्ध' चा कुर्याद्धीनं तथाधिकम् । आयदोपविशुद्धयर्थं 'हस्यवृद्धी न दृषिते ॥५७|| द्वार शाखा के मान मे शुभ प्राय न आती हो तो एक, डेढ़ अथवा आधा अंगुल न्यूनाधिक करके श्रेष्ठ आय लानी चाहिये । प्राय दोप की शुद्धि के लिये शास्त्रीय मान मे इतना न्यूनाधिक परिवर्तन किया जाय तो दोप नहीं है ।।५०॥. त्रिशाखा- चतुर्भागाङ्कितं कुर्याच्छाखाविस्तारमानकम् । मध्ये द्विभागिकं कुर्यात् स्तम्भं पुरुषसज्ञकम् ॥५॥ स्त्रीसञ्जका भवेच्छाखा पार्वतो भागमागिका । निगमे चैकमागेन रूपस्तम्भः प्रशस्यते ॥५६|| शाखा के विस्तार का चार भाग करे। उनमे से दो भाग का रूप स्तंभ बनावें। यह स्तंभ पुरुप संज्ञक है । इसके दोनो तरफ एक २ भाग की शाखा रक्खे । यह शाखा स्त्री संज्ञक है। रूप स्तंभ का निर्गम एक भाग का रखना श्रेष्ठ है ।।५९ शाखा स्तंभ का निर्गम- एकांश सार्धमागं च पादोनद्वयमेव च । द्विमार्ग निर्गमे कुर्यात् स्तम्भं द्रव्यानुसारतः ॥६॥ द्रव्य की अनुकूलता के अनुसार शाखा के स्तंभ का निर्गम एक, डेढ, पोना दो अथवा दो भाग तक रख सकते है ॥६॥ शाखोदर का विस्तार और प्रवेश- पेटके विस्तरं कार्य प्रवेशस्तु युगांशकः । कोणिका स्तम्भमध्ये तु भूषणार्थ हि पार्श्वयोः ॥६॥ (१) 'हासो वृद्धिनं दुष्यति ।

६८
प्रासादमण्डने
भगा.
विशाखा
नन्तिी
पंचशासा
विभाग
राम
सतिशारवा.
विस्तार
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पधिनी.
मवशाखा.
है
विस्तारभाग
पशास्य
गंधर्वधारमा
रुयसभा
खन्यधारवा
नधया
सिंशावा.
यशाया.
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शाखा के विस्तार का चोथा भाग शाखा का प्रवेश (निर्गम) रक्खे । रूपस्तंभ के दोनों
तरफ शोभा के लिये एक २ कोणिका बनावें, इसमे चंपा के फूलों को अथवा जलवट की आकृति
करें॥६॥
सूत्रधार राजसिंह कृत वास्तुराज में कहा है कि-
"सर्वेषां पेटके व्यासः प्रवेशस्तु युगांशका |
सार्धवेदांशतो वापि पञ्चांशोऽथवा मतः ।।" अध्याय ६
सब शाखाओं का प्रवेश शाखा के विस्तार के चोथे भाग, साढे चार भाग अथवा पांचवें
भाग तक रखें। अपराजित पृच्छा सूत्र १३२ श्लो० २४ ३ में भी यही लिखा है।
शाखा के द्वारपाल का नाम-
द्वारदध्ये चतुर्थाशे द्वारपालो विघियते ।
स्तम्भ शाखादिकं शेषं विशाखा च विभाजयेत् ॥६२॥
इति त्रिशाखमानम् ।
द्वार के उदय का चार भाग करके एक भाग के उदय में द्वारपाल बनावें और बाकी
तीन भाग के उदय में स्तंभ और शाखा आदि बनावें ॥६॥

तृतीयोऽध्यायः mamm-me- -mpornmoom -4000-00-04- शाखा के रूप- "कालिन्दी वामशाखाया दक्षिणे चैव जाह्नवी । गङ्गार्कतनयायुग्म-मुभयोवमिदक्षिणे ।। गन्धर्वा निर्गमे कार्या एकभागा विचक्षणः। तत्सूत्रे खल्वशाखा च सिंहशाखा च भागिका ॥ नन्दी च वामशाखायां कालो दक्षलताश्रितः । यक्षाः स्युरन्तशाखाया निधिहस्ताः शुभोदयाः॥" अप० सू० १३२ बांयी द्वार शाखा के द्वारपाल की बांयी और यमुना और दाहिनी ओर गंगा, तथा दाहिनी द्वार शाखा के द्वारपाल को बायी ओर गंगा और दाहिनी ओर यमुना देवी का रूप बनाना चाहिये । गंधर्व शाखा के समसूत्र मे खल्वशाखा रक्खे, इन दोनों का निर्गम भी एक भाग रक्खें । सिंहशाखा का निर्गम भी एक भाग रक्खें। हाथ में निधि को धारण किये हुए बांयो शाखा मे नंदी और दाहिनी शाखा में काल नाम के यक्षो के रूप बनावे । पञ्चशाखा- पत्रशाखा च गन्धर्वा रूपस्तम्भस्तृतीयकः । चतुर्थी खन्वशाखा च सिंहशाखा च पञ्चमी ।।६।। इति पञ्चशाखाः। पहली पत्रशाखा, दूसरी गान्धर्वशाखा, तीसरा रूपस्तंभ, चौथी खल्वशाखा और पांचवी सिंहशाखा है। पञ्चशाखा का मान- "शाखाविस्तारमानं च षड्भिर्भागैविभाजयेत् । एकभागा भवेच्छाखा रूपस्तम्भो द्विभागिकः ॥ निर्गमश्चकभागेन रूपस्तम्भः प्रशस्यते । कोरिणका स्तम्भमध्ये च उभयोर्वामदक्षिणे ॥ गन्धर्वा निर्गमे कार्या एकभागा विचक्षणः। तत्सूत्रे खल्वशाखा च सिंहशाखा च भागिका ॥ सपादः सार्धभागो वा रूपस्तम्भः प्रशरयते । उत्सेधस्याष्टमांशेन शस्तं शाखोदरं मतम् ।।" अप० सू० १३२ पचशाखा के विस्तार का छह भाग करें। उनमें से एक २ भाग की चार शाखा और दो भाग का रूपस्तम्भ बनावे । रूपस्तम्भ का निर्गम एक भाग रक्खे, इसके दोनों तरफ एक २

७०
प्रासादमण्डने
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कोणी बनावें । गान्धर्व शाखा का निर्गम एक भाग रक्खें । उसके समसूत्र में खल्वशाखा और
सिंहशाखा एक २ भाग निकलती रक्खें। स्तंभ का निर्गम सवा अथवा डेढ़ भाग का भी रख
सकते हैं। द्वार के उदय का अष्टमांश शाखा के पेटाभाग का विस्तार रक्खें।
सप्तशाखा के मान--
प्रथमा पत्रशाखा च गन्धर्वा रूपशाखिका ।
चतुर्थी स्तम्भशाखा च रूपशाखा च पञ्चमी ॥१४॥
पष्ठी तु खल्वशाखा च सिंहशाखा च सप्तमी ।
स्तम्भशाखा भवेन्मध्ये रूपशाखाग्रसूत्रतः ॥६॥
इति सप्तशाखा:।
प्रथमा पत्रशाखा, दूसरी गान्धर्वशाखा, तीसरी रूपशाखा, चौथी स्तंभशाखा, पांचवीं
रूपशाखा, छट्ठी खल्वशाखा और सातवीं सिंहशाखा है। मध्य में स्तंभशाखा रक्खें। यह
रूपशाखा से आगे निकलती हुयी रक्खें ।।६४-६५।।
सप्तशाखा का मान-
"शाखाविस्तारमानं तु वसुभागविभाजितम् ।
भागभागाश्च शाखाः स्यु-मध्यस्तम्भो द्विभागिकः ।।
कोणिका भागपादेन विस्तारे निर्गमे तथा ।
निर्गमः सार्धभागेन रूपस्तम्भः प्रशस्यते ।।
गन्धर्वा सिंहशाखा च निर्गमो भागमेव च ।
निर्गमश्च तदर्धेन शेषाः शाखाः प्रशस्यते ॥" अप० सू० १३२
सप्तशाखा के विस्तार का आठ भाग कर उनमें से प्रत्येक शाखा का विस्तार एक २
भाग और मध्य में स्तंभ का विस्तार दो गाग रक्खें। स्तंभ में दोनो तरफ विस्तार में और
निर्गम मे पाव २ भाग की कोणिका बनावें । डेढ़ भाग निकलता रूपस्तंभ रखना अच्छा है ।
गंधर्व और सिंहशाखा का निर्गम एक २ भाग और बाकी शाखाओं का निर्गम आधा २ भाग
रखना अच्छा है।
नवशाखा के नाम-
पत्रगान्धर्वसञ्ज्ञा च रूपस्तम्भस्तृतीयकः ।
चतुर्थी खन्वशाखा च गन्धर्वा त्वथ पञ्चमी ॥६६॥

तृतीयोऽध्यायः रूपस्तम्भस्तथा पष्ठी रूपशाखा ततः परम् । खल्वशाखा च सिंहाख्या मूलकर्णेन सम्मिता ॥६७|| इति नवशाखाः। प्रथमा पत्रशाखा, दूसरी गाववंशाखा, तीसरी स्तंभशाखा, चौथी खल्वशाखा, पांचवी गांधर्वशाखा, छठा रूपस्तंभ, सातवी रूपशाखा, आठवीं खल्वशाखा और नववी सिंहशाखा है । ये नवशाखा का विस्तार प्रासाद के कोने तक किया जाता है ॥६६-६७॥ नवशाखा कामान- "शाखाविस्तारमानं तु रुद्रभागविभाजितम् । विभागः स्तम्भ इत्युक्त उभयोः कोरिणकाद्वयम् ।। निर्गमः सार्धभागेन पादोनद्वयमेव च। रूपस्तंभद्वयं कार्य गन्धर्वाद्वयमेव च ॥" अप० सूत्र १३२ नवशाखा के विस्तार का ग्यारह भाग करके, उनमे से दोनों स्तंभ दो २ भाग रखना चाहिये । उनके दोनो तरफ पाव २ भाग की कोरिणकाये बनावे। स्तंभका निर्गम डेढा अथवा पौने दुगुना रक्खें । इन नवशाखाओं मे दो स्तंभ और दो गांधर्व शाखा है। दोनो स्तंभ का विस्तार दो २ भाग और प्रत्येक शाखा का विस्तार एक २ भाग रखना चाहिये। उत्तरंग के देव- यस्य देवस्य या मृत्तिः सैव कार्योत्तरङ्गके। शाखायां च परिवारो गणेशश्चोत्तरङ्गके ॥६॥ इति श्री सूत्रधारमंडनविरचिते वास्तुशास्त्रे प्रासादमण्डने भिट्ट- पीठमण्डोवरगर्भगृहोदुम्भरद्वारप्रमाणनामस्तृतीयोऽध्यायः । प्रासाद के गर्भगृह मे जिस देव की मूत्ति प्रतिष्ठित हो, उस देव की मूत्ति द्वार के उत्तरंग में रखनी चाहिये । तया शाखाओं में उस देव के परिवार का रूम बनाना चाहिये । उत्तरंग मे गणेश को भी स्थापित कर सकते है ।।६।। इति श्री पंडित भगवानदास जैन का अनुवादित प्रासादमंडन के तीसरे अध्याय की सुबेधिनी नाम्नी मापाटीका समाप्ता ||३|| अथ प्रासादमण्डने चतुर्थोऽध्यायः द्वारमान से मूत्ति और परासन का मान-- द्वारोच्छायोऽष्टनवधा भागमेकं परित्यजेत् । शेषे व्यंशे द्विभागार्चा व्यंशोना द्वारतोऽथवा ॥१॥ द्वार के उदय का पाठ अथवा नव भाग करे। उनमें से ऊपर का एक भाग छोड़ दें, बाकी जो सात अथवा आठ भाग रहे, उनके तीन भाग करें। उनमे से दो भाग की मूर्ति और एक भाग ऊंचाई में पबासन (पीठिका ) बनावें अथवा दरवाजे का तीन भाग करके उसमें से दो भाग की मूर्ति बनावें ॥१॥ द्वारदर्थे तु द्वात्रिशे तिथिशककलांशकैः । ऊर्ध्वाचा आसनस्था तु मनुविश्वार्क भागतः ॥२॥ . द्वार के उदय का बत्तीस भाग करे। उनमें से पंद्रह, चौदह अथवा सोलह भाग के मान की खड़ी मूर्ति बनावें । बैठी मूत्ति चौदह, तेरह अथवा बारह भाग की बनावें ॥२॥ क्षीरार्णव अ० ११० में लीखा है कि- "द्वारं चाष्टविभक्तं च विधा भक्तं च सप्तभिः । पीठमानं भागमेकं शेषं च प्रतिमा मुने! ॥ सप्तभागं भवेद् द्वारं षड्भागं च विधाकृतम् । द्विभागं प्रतिमामानं शेषं पीठं हि चोच्यते ॥ द्वारं षड्भागिकं कुर्यात त्रिधा पञ्च प्रकल्पयेत् । पीठश्चकेन भागेन द्विभागं प्रतिमा भवेत् ।। एवमूर्ध्वप्रतिमा च अर्द्ध शयनासनं भवेत् । पीठमानं च नान्यत्र शेषस्थाने च निष्कलम् ॥ जलशय्याप्रमाणेन द्वारविस्तारसाधितम् । अन्यथा च यदा अर्चा विस्तर नेव लङ्घयेत् ॥" द्वार की ऊंचाई का पाठ भाग करके ऊपर का एक भाग छोड़ दें, बाकी के सात भाग का तीन भाग करें, उनमें से दो भाग की प्रतिमा और एक भाग की पीठ (पबासन ) बनावें । .

अतुर्थोऽध्यायः ७३ - - - - commommen. --- अथवा द्वार की ऊंचाई का सात भाग करके ऊपर का एक भाग छोड़ दें, बाकी छह भाग तीन भाग करे, उनमें से दो भाग की प्रतिमा और एक भाग का पवासन बनावे । द्वार की ऊंचाई का छह भाग करके ऊपर का एक भाग छोड़ दें, बाकी के पाच भाग का वीन भाग करें, उनमे से दो भाग की प्रतिमा और एक भाग का पवासन बनाये। यह खड़ी प्रतिमा का मान है। शयनासन प्रतिमा के पीठ का मान द्वारोदय के अर्द्धमान का बनावे और बाकी प्रतिमा का मान जाने । जलशय्या वाली प्रतिमा के मानानुसार द्वार का विस्तार रक्खे । अर्थात् जलशय्या- वाली प्रतिमा द्वार के विस्तार से अधिक मान की नहीं बनानी चाहिये । गर्भगृह का मान- चतुरस्रीकृते क्षेत्रे दशभागविभाजिते । 'द्विद्विभागेन द्वौ भित्ती षड्भागं गर्भमन्दिरम् ॥३॥ प्रासाद की समचोरस भूमि के दस भाग करे। उनमे से दो दो भाग की दोनो तरफ की दीवार और वाकी छह भाग का गर्भगृह बनावें ॥३॥ गर्भगृह के मान से मूत्तिका मान-- तृतीयांशेन गर्भस्य प्रासादे प्रतिमोत्तमा । मध्यमा स्वदशांशोना पञ्चाशोना कनीयसी ॥४॥ गर्भगृह के विस्तार के तीसरे भाग की प्रतिमा बनाना उत्तम है। प्रतिमा का दसवां भाग प्रतिमा के मान में से घटादें तो मध्यम मान की और पांचवां भाग घटादे तो कनिष्ठ मान की प्रतिमा माना जाता है ।।४।। देवों का दष्टिस्थान-- आयमागैजेद् द्वार-मष्टममूर्ध्वतस्त्यजेत् । सप्तमसप्तमे दृष्टि-वृप सिंहे ध्बजे शुभा ॥शा देहली के ऊपर से लेकर उत्तरंग के नीचे भाग तक के द्वार के बीच में आठ भाग करें। उनमें से ऊपर का आठवां भाग छोड़कर उसके नीचे का सातवां भाग का पाठ भाग करें। (२) मितिविभागाकतव्या ।' *कितने ही शिल्पी सातवां मोर पाठवां भाग के मध्य मे बाख की कोकी रहे, इस प्रकार प्रतिमा की दृष्टि रखते हैं, इससे प्राय का मेल नहीं मिलता, जिसे उनकी मान्यता प्रमाणिक मालूम नहीं होती। प्रा० १० ७४ प्रसादमण्डने उनमें से भी ऊपर का एक भाग छोड़कर के उसके नीचे का सातवां भाग गज आय है, उसमें सब देवों की दृष्टि रखनी चाहिये । अर्थात् द्वार के मध्य उदय का चौसठ भाग करके उनमें से पचपनवें भाग में दृष्टि रखें। अथवा आठ भाग वाले सातवें भाग के वृष, सिंह और ध्वज आय में भी दृष्टि रखना शुभ माना है ॥५॥ विशेष देवों का दृष्टिस्थान-- पष्ठभागस्य पञ्चाशे लक्ष्मीनारायणादिक । शयनाचेशलिङ्गानि द्वाराद्ध न व्यतिक्रमेत् ॥६॥ द्वार के आठ भागों में जो छठा भाग है, उसके पाठ भाग करके पांचवें भाग में लक्ष्मीनारायण की दृष्टि रक्खें। शयनासन वाले देव और शिवलिङ्ग की दृष्टि द्वार के अर्धभाग में रक्खें, किन्तु द्वारा का उल्लंघन करके दृष्टि नहीं रक्खें ॥६॥ देवों का पदस्थान-- पट्टाधो यक्षभूवाद्याः पट्टाने सर्वदेवताः । तदने वैष्णवं ब्रह्मा मध्ये लिङ्ग शिवस्य च ॥७॥ इति प्रतिमाप्रमाणदृष्टिपदस्थानम् । गर्भगृह के स्तंभ के पर जो पाट रखा जाता है, उसके नीचे यक्ष, भूत और नाग आदि को स्थापित करे। तथा दूसरे सब देव पाट के आगे स्थापित करे। उसके आगे वैष्णव और ब्रह्मा को और गर्भगृह के मध्य (ब्रह्मभाग ) में शिवलिग को स्थापित करें ।।७।। वत्थुसार पयरण ३ के मत से पदस्थान "गन्भगिहड्ढपणंसा जक्खा पढमंसि देवया बीए । जिणकिण्हरवी तइए बंभु चउत्ये शिवं पणगे।" गर्भगृह के बराबर दो भाग करें, उनमे से दीवार के तरफ के भाग के पांच भाग करे, इनमे दीवार वाले प्रथम भाग में यक्षको, दूसरे भाग मे देवियो को, तीसरे भाग में जिनदेव, कृष्ण (बिष्णु ) और सूर्य को, चौथे भाग मे ब्रह्मा को और पांचवें भाग मे (गर्भगृह के मध्य भाग में ) शिवलिङ्ग को स्थापित करें। समरांगण सूत्रधार अ०७० के मत से पदस्थान- "भक्ते प्रासादगर्भाद्ध दशधा पृष्ठभागतः । पिशाचरक्षोदनुजाः स्थाप्या गन्धर्वगुह्यकाः।। मादित्यचण्डिकाविष्णु-ब्रह्मशानाः पद क्रमात् ।।"

चतुर्थोऽध्यायः --- गर्भगृह के बराबर दो भाग करके दीवार की तरफ के अर्धभाग के दस भाग करे, उनमे से दीवार से प्रथम भाग मे पिशाच, दूसरे में राक्षस, तीसरे मे दैत्य, चौथे मे गंधर्व, पांचवे मे थक्ष, छठे में सूर्य, सातवें में चंडिका, पाठवे में विष्णु, नवे मे ब्रह्मा और दसवे मे शिव को स्थापित करे। -- अग्निपुराण अ० ६७ के मत से पदस्थान- "पड्भिविभाजिते गर्ने त्यक्त्वा भागं च पृष्ठतः । स्थापनं पञ्चमांशे च यदि वा वसुभाजिते ।। स्थापनं सप्तमे भागे प्रतिमासु सुखावहम् ॥" गर्भगृह का छह भाग करे, उनमे से दीवार के पासका एक भाग छोड़ दे, उसके आगे के पांचवे भाग मे सब देवो को स्थापित करें। अथवा गर्भगृह के आठ भाग करके दीवार के पासका एक भाग छोड़ दे, उसके आगे सातवें भाग में सब देवो को स्थापित करना सुखकारक है। प्रहार थर-- छाद्यस्योचे प्रहारः स्याच्छृङ्ग शृङ्ग तथैव च । प्रासादङ्गशृङ्गेषु अधोभागे तु छाधकम् ॥८॥ छज्जा के ऊपर प्रहार ऊपर प्रहार का थर बनावें। प्रत्येक शृङ्ग के नीचे प्रहार का थर बनाना चाहिये । उसके नीचे छाद्य (छज्जा) बनावे ॥६॥ छायके थरमान-- छाय भागद्वयं सार्थ सार्धमागं च पालवम् । मुण्डलीक भागमेकं भागेन विलकस्तथा ॥8॥ A छज्जा का उदय दो भाग अथवा डेढ़ (ढाई?) भाग, पालव डेढ़ भाग, मुंडलिक एक भाग और तिलक एक भाग रखना चाहिये ॥ भृगक्रम- मूलकणे रथादौ च एक द्विविक्रमान् न्यसेत् । निरन्धारे मूलभित्तौ सान्धारे भ्रममित्तिषु ॥१०॥ विशेष माहिती के लिये स्वय द्वारा अनुवादित 'देवतामूत्ति प्रकरण' और 'लमण्डन' देखना चाहिये। A यह श्लोक बहुतसी प्रतो मे नहीं है।

७६ प्रासादमण्डने मूलकर्ण (कोना), रथ, उपरथ आदि प्रासाद के अंग है, उनके ऊपर एक, दो अथवा तीन शृङ्ग अनुक्रम से चढावें । निरंधार ( प्रकाश वाला) प्रासाद की मुख्य दीवार पर और सांधार (परिक्रमा वाला) प्रासाद हो तो परिक्रमा की दीवार पर शृङ्गों का क्रम रक्खें ॥१०॥ उरःशृंग का क्रम- उत्शृङ्गाणि भद्रेस्यु-रेकादिग्रहसंख्यया । त्रयोदशोर्चे सप्ताधो लुप्तानि चोरुङ्गकैः ॥११॥ प्रासाद के भद्र के ऊपर एक से नव तक उस्शृङ्ग चढ़ाये जाते है। शिखर के उदय का तेरह भाग करके उनमें से सात भाग के मान का उरत्शृङ्ग बनावें। दूसरा उरःशृङ्गप्रथस के उरःशृङ्ग का तेरह भाग करके उनमें से सात भाग का बनावें। इस प्रकार ऊपर के उरः शृङ्ग का तेरह भाग करके सात भाग के उदय में नीचे का उर:शृङ्ग रक्खें ॥११॥ betet a toute मुख्य शिखर म उरु,गकी रचना शिखरका निर्माण -- शिखर निर्माण- रेखामूले च दिग्भागं कुर्यादने षडंशकम् । षड्वाह्य दोषदं प्रोक्तं पञ्चमध्ये न शोभनम् ॥१२॥ शिखर के नीचे के दोनों कोने के विस्तार का दस भाग करें। उनमें से सिखर के ऊपर के स्कंध का विस्तार छह भाग रखें। इस स्कंध का विस्तार छह भाग से अधिक रक्खें तो चतुर्थोऽध्यायः aulel Ele- शिखर दोष कारक होता है और पांच भाग से कम रक्खे तो शिखर शोभायमान नहीं होता ॥१२॥ ज्ञानरत्नकोष में लीखा है कि-- "चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे दशधा प्रतिभाजिते । द्वौ द्वौ भागी तु कर्तव्यो कोणे कोणे न संशयः॥ भद्रं भागत्रयं कार्य सार्धभागं तु चानुगम् । व्यासमानं सपादं च उच्छयेण तु कारयेत् ।। स्कन्धं षड्भागि कार्य वस्योध्वं नवधा भवेत् । चतुर्भागायतं कोणं विभिर्भागैस्तु चानुगम् ।। भद्रपूर्ण तु द्विभिर्भाग-स्ततस्तु साधयेत् कलाम् ॥" प्रासाद के समचोरस क्षेत्र का दस भाग करे। उनमे से दो दो भाग के दो कोण, तीन भाग का भद्र और डेढ़ २ भाग के दो प्रतिकर्ण बनावे । शिखर विस्तार से ऊंचाई में सवाया रक्खें और उसका स्कंध छह भाग विस्तार में रक्खें। इसका नव भाग करके चार भाग के दोनों कोण, तीन भाग के दोनों प्रतिकर्ण और पूरा भद्र दो भाग का रक्खे। पीछे रेखा बनावें। कलारेखा की साधना- "प्रादिकोणं द्विधा कृत्य प्रथमं वेदभाजितम् ॥ द्वितीयं तु विभिर्भाग-रेवं सप्तकला भवेत् । उदयं यष्टभिर्भागः कृत्वा रेखां समालिखेत् ॥ ऊर्ध्वतिर्यग भागानां भागे भागे तुलाञ्छयेत् । एवं तु सिध्यते रेखा भद्रे कोणे तथानुगे ।" एक तरफ के कोण का दो भाग करें। उनमें से प्रथम भाग का चार और दूसरे भाग का २५६ रेखा का नकशा प्रासादमण्डने -- . तीन भाग करने से सात कला रेखा होती हैं । इसी तरह दूसरी तरफ के कोण की भी सात कला रेखा होती है। ऐसी कुल चोदह कला रेखानों में दोनों प्रतिकर्ण की दो कला रेखा मिलाने से सोलह कला रेखा होती है । इनके उदय में सोलह २ भाग करने से दोसौ छप्पन कला रेखायें होती है। उदयभेदोद्धवरेखा- सपादं शिखरं कार्य सकणं शिखरोदयम् । सपादकर्णयोमध्ये रेखाः स्युः पञ्चविंशतिः ॥१३॥ मूलरेखा के विस्तार से शिखर का उदय सवाया करें। सवाया शिखर में दोनों कोने के मध्य मे पचीस रेखाये है ॥१३॥ सपादकर्णयोर्मध्ये' उदये पञ्चविंशतिः । प्रोक्ता रेखाः कलामेदै-चलणे पञ्चविंशतिः ॥१४॥ सवाया उदय वाले शिखर के दोनों कोने के मध्य में पचीस रेखा उदय में होती हैं। कला के भेद से ये शिखर के नमन में पचौस रेखायें है ॥१४॥ कलाभेदोद्भव रेखा- पञ्चादिनन्दयुग्मान्तं खण्डानि तेष्वनुक्रमात् । अंशवृद्धया कला कार्या दैये स्कन्धे च तन्समाः ॥१५॥ शिखर के उदय का पांच से लेकर उनतीस खंड करें। उन खंडों में अनुक्रम से एक २ कला उदय मे बढ़ावें । जैसे-प्रथम पांच खंडों में एक से पांच कला, छठे मे छह और सातवें मे सात, इस प्रकार उनतीसवे खंड में उनतीस कला है । उदय मे जितनी कला होवे, उतनी कला संख्या स्कंध मे भी बनाना चाहिये ॥१५॥ अष्टादावष्टपष्टयन्तं चतु'या च षोडश । दैयतुल्या कलाः स्कन्धे एकहीनांशोऽशोभनम् ॥१६॥ प्रथम समचार की त्रिकखंडों मे आठ २ कला रेखा है। पीछे आगे के प्रत्येक खंड में चार २ कला बढ़ाने से अठारहवें खंड में अड़सठ कला रेखा होती हैं । उदय मे जितनी कला रेखा हो, उतनी स्कंध मे भी बनावे। एक भी कम रक्खे तो शोभायमान नही लगता ॥१६॥ (१) पुनरुक्ति मालूम होता है।

है चतुर्थोऽध्यायः G रेखाचक्र- ऊर्ध्वा अष्टादशांशाः स्यु-स्तिर्यक्षोडश एव च । चक्रेऽस्मिञ्च भवन्त्येव रेखाणां पारद्वयम् ॥१७॥ शिखर के उदय मे अठारह और तिरछी सोलह रेखा होती है, ऐसा चक्र बनाने से दोसौ छप्पन रेखायें होती हैं, उपर 'कला रेखा की साधना' पढें ॥१७॥ प्रथम समचार की त्रिखंडा कलारेखा- त्रिखणडत् खण्डवृद्धिश्च यावदष्टादशैव हि । एकैकांशे कलाप्टौ च समचारस्तु पोडश ॥१८॥ त्रिखंड से लेकर एक २ खंड वढाते हुए अठारह खंड तक बढावे । प्रथम प्रत्येक त्रिखंड में समचार की आठ २ कला रेखाये है। ऐसे सोलह चार है ॥१॥ दूसरा सपादचार की त्रिखंडा कलारेखा- द्वितीयप्रथमे खण्डे कलाष्टौ द्वितीये नव । तृतीये दशखण्डेषु शेपेष्वयं क्रमः ॥१९॥ दूसरा सपादचार हो तो प्रथम खंड में आठ, दूसरे खंड में नव और तीसरे खंड में दस कला रेखा बनावे । इस प्रकार बाकी के चारो मे भी इसी क्रम रेखा बनावे ॥१er तीसरा सार्द्धचार को त्रिखंडा कलारेखा- अष्टदिक्सूर्यभागैश्च त्रिखण्डा तृतीया भवेत् । अनेन क्रमयोगेन कोष्ठान: प्रपूरयेत् ॥२०॥ तीसरा सार्धचार हो तो प्रथम खंड मे पाठ, दूसरे खंड में दस और तीसरे खंड में बारह कलारेखा बनावे। इस क्रम से दूसरे चारो के कोठे को अंको से पूर्ण करे ॥२०॥ सोलह प्रकार के चार- 'समः सपादः सार्द्धश्च पादोनो द्विगुणस्तथा । द्विगुणश्च सपादो द्वौ सार्थ. पादोनकस्त्रयः ।। - - * श्लोक १५ से २० तक का खुलासा वार प्राशय समझने के लिये देखो चार के भेदो से विखडा की रेखा मोर कला जानने का यत्र ।

८० प्रासादमण्डने त्रिखंडा की रेखा और कला- चार के नाम रेखा का नाम प्रथम खंडकी कला द्वितीय तृतीय खंडकी | खडकी कला कला की कुल संख्या ८ ८ २४ २ ६ २७ १० १२ ८ ४ ८ ५ ३६ ६ ८ १३ १४ २० स ८ ६ समचार शशिनी ८४१८ सपादचार शीतला EX१%१० साचार सौम्या X२॥१२ पादोनद्वयचार যখন ११ X-१४ द्विगुणचार मनोरमा १२ EX२०१६ सपाद द्विगुणचार शुभा १८ EX२-१८ सार्षद्विगुणचार मनोभवा ८x२-२० पादोनत्रयचार वीरा १५ २२ EXP11-२२ त्रिगुणचार कुमुदा १६ २४ EX३-२४ सपाद त्रिगुणचार परशेखरा १७ २६ X३-२६ साद त्रिगुणचार ललिता १८ EX३-२८ लीलावती १६ ८४३%D३० चतुर्गुणचार विदशा EX४-३२ सपाद चतुष्कचार पूर्णमण्डला २१ EX४-३४ सार्घचतुष्कचार पूर्णभद्रा २२ EX४||D३६ पादोन पंचकचार भद्राङ्गी २३ 4X४111%D३८ इस प्रकार चतुःखंडादिकी कला रेखाएं चार के भेदों से समझना चाहिये। ४८ १० ५१ ११ २९ १२ पादोन चतुष्क ८ १३ ८ ३ १४ ६३ १५ ३ चतुर्थोऽध्यायः ८१ 0000am-.- 4000onsoonenoe--- mer- त्रिगुणोऽथ सपादोऽसौ साधः पादोनवेदकः । चतुर्गुणः सपादोऽसौ साधः पादोनपञ्चकः॥ इति पोडशधा चारं त्रिखण्डाद्यासु लक्षयेत् ॥" अप० सू० १३६ त्रिखंडादि खंडो मे सोलह कलाचारों के भेदों से सोलह २ रेखाये उत्पन्न होती हैं । ये सोलह कलाचार इस प्रकार है-प्रथम सम (बराबर ) चार, दूसरा सपाद (सवाया) चार, तीसरा सार्द्ध (डेढा ) चार, चौथा पौने दो गुणा, पांचवा दो गुणा, छट्ठा सवा दो गुणा, सातवां ढाईगुणा, आठवा पौने तीनगुणा, नवा तीनगुणा, दसवा सवा तीनगुणा, ग्यारहवा साढे तीनगुणा, वारहवा पौने चार गुणा, तेरहवां चार गुणा, चौदहवां सवा चार गुणा, पंद्रहवा साढे चार गुणा, और सोलहवां पौने पांच गुणा है। रेखासंख्या- रेखाणां जायते संख्या पट्पञ्चाशच्छतद्वयम् । देध्य भवन्ति यावन्त्यः कलाः स्कन्धेऽपि तत्समाः ॥२१॥ इति रेखानिर्णयः। सोलह प्रकार के कलाचारो के भेदों से प्रत्येक त्रिखंडादि मे सोलह २ रेखाये उत्पन्न होती है । इसलिये रेखापो की कुल संख्या दोसी छप्पन होती हैं। शिखर के उदय मे जितनी कलारेखा उत्पन्न हो, उतनी स्कध में भी बनानी चाहिये ॥२शा मंडोवर और शिखर का उदयमान- विंशद्भिभिजेद् भागैः शिलातः कलशान्तकम् । मण्डोवरोऽष्टसार्धाष्ट-नवांशैः शिखरं' परम् ॥२२॥ खरशिला से लेकर कलश के अंत भाग तक के उदय के बीस भाग करे। उनमे से पाठ, साढे पाठ अथवा नव भाग का मंडोवर का उदय रक्खे, इसी क्रम से ज्येष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ मान के मंडोवर का उदय होता है । ऐसा अप० सू० १३८ मै भी कहा है । बाकी जो भाग रहे, उतने उदय का शिखर बनावे ॥२२॥ शिखर विधान- रेखामूलस्य विस्तारात् पनकोशं समालिखेत् । चतुगुणेन सूत्रेण सपादः शिखरोदयः ॥२३॥ (२) 'विल्लारे'। (१) 'शिखरोदयम्'। प्रा० ११ १२ प्रासादमण्डने -- मूलरेखा के विस्तार से चार गुणा सूत्र से दोनों कोने के मूल बिंदु मे दो गोल बनावे। जिसके दोनों गोल के स्पर्श से कमल को पंखुड़ो जैसी आकृति वाला पद्मकोश बन जाता है। उसमें दोनों कोने के मध्य विस्तार से सवाया शिखर का उदय रक्खे ॥२३॥ ग्रीवा, आमलसार और कलशका मान- स्कन्धकोशान्तरे सप्त-भरते ग्रीवा तु भागतः । सार्ध आमलसारश्च पद्यच्छत्रं तु सार्धकम् ॥२४॥ त्रिभाग उच्चकलशो विभागस्तस्य विस्वरः । प्रासादस्याटमांशेन पृथुत्वं कलशाण्डकम् ॥२॥ ऊपर के लिखे अनुसार सवाया शिखर का उदय करने के बाद जो पद्मकोश का उदय बाकी रहता है, उसमे ग्रीवा, आमलसार और कलश बनावे । जैसे-शिखर के स्कट से लेकर पद्मकोश के अन्त्य बिन्दु तक के उदय का सात भाग करें। उनमे से एक भाग को ग्रीवा, डेढ़ भाग का आमलसार, डेढ़ भाग का पनच्छत्र (चंद्रिका) और तीन भाग का कलश बनावे । द्विभाग के विस्तार वाले कलश का बीजोरा बनावें। कलश के अंडा का विस्तार प्रासाद के आठवे भाग का रक्वें ॥२४-२५॥ - शुकनासका उदय- छाधतः स्कन्धपर्यन्त-मेकविंशतिभाजिते । अङ्कदिगुरुद्रसूर्या शै-विश्वाशैस्तस्य चोच्छृतिः ॥२६॥ छज्जा से लेकर शिखर के स्कंध तक के उदय का इक्कीस भाग करें। इनमे से नव, दस, ग्यारह, बारह अथवा तेरह भाग तक शुकनास का उदय खखे ॥२६॥ सिंहस्थान- शुकनासस्य संस्थाने छाद्यो पञ्चधा मतम् । एकत्रिपञ्चसप्ताङ्क-सिंहस्थानानि कन्पयेत् ॥२७|| (३) 'पत्र' । * शिल्पियो को मान्यता है कि-मूलकणं पायचा) से शिखर का उदय सवाया करना हो तो पायचे के विस्तार से चार गुना सूत्र से, डेढा करना हो तो पाच गुना सूत्र से, पौने दुगुना करना हो तो पौने सात गुना सूत्र से और १३ उदय करना हो तो साढे चार गुना सूत्र से मूलकणं के दोनो बिन्दु से दो गोल बनाने से कमल के पखुडी जैसा आकार बन जाता हैं। इसमे अपने इष्ट मान के उदय में शिखर का स्कंध और बाकी रहे उदय में प्रामलसार और कलश आदि वनावें।

चतुर्थोऽध्यायः Pam-e-o-me --00000000---- ---- --womeos. CompWNo- -- - छज्जा के ऊपर शुकनास का उदय पांच प्रकार का माना है। उनमे से शुकनास के उदय का जो मान आया हो उसका नव भाग करे। इनमे से एक, तीन, पाच, सात अथवा नव, इन पाच भागो मे से किसी भी भाग में सिंह स्थान की कल्पना कर सकते हैं। अर्थात् उस स्थान पर सिह रखा जाता है ॥२७॥ "कपिली (कोली) का स्थान- द्वारस्य दक्षिणे चामे कपिली पड्विधा मता । तदुर्धे शुकनासा स्यात् सैव प्रासादनासिका ॥२८॥ गर्भगृह के द्वार के कार दाहिनी और बायी ओर छह प्रकार से कोली बनावे। उसकी ऊंचाई मे शुकनास बनावे, यह प्रासाद की नासिका है ॥२८॥ कपिली का मान-- प्रासादो दशभागश्च द्वित्रिवेदांशसम्मिताः । प्रासादान पादेन त्रिभागेनाथ निर्मिता |॥२६॥ प्रासाद के विस्तार का दस भाग करे, उनमे से दो, तीन अथवा चार भाग की, तथा प्रासाद के मान से आधे, चौथे अथवा तीसरे भाग के मान की, ऐसे छह प्रकार के मान से कपिली (कोली ) बनाने का विधान है ।।२९॥ -- छह प्रकार की कपिली- "अञ्चिता कुञ्चिता शस्या त्रिघोदितक्रमागताः । मध्यस्था भ्रमा सभ्रमा पट्कोल्यः परिकीतिताः ॥ प्रासादे दशधा भक्ते भूमिसीमा विचक्षण ।। अञ्चिता च द्विभागा स्यात् त्रिभागा कुञ्चिता तथा ।। शस्या चैवं चतुर्भागा विधा चोक्तक्रमागताः । ... ॥ प्रासादपादमध्यस्था भ्रमा सात्रिभागतः । अर्द्ध तु सभ्रमा कार्या प्रासादस्य प्रमाणतः ॥" अप० सू० १३८ . * गर्भगृह के द्वार के मडप को कोली मडप कहते हैं। उसके छज्जा के ऊपर शुकनास के दोनो तरफ शिखर के प्राकार का महप किया जाता है, उसको आधुनिक शिल्पीयो प्रासादपुत्र कहते हैं । उसका नाम कपिली अथवा कोली है।

प्रासादमण्डने ma-Roman Poonam-hote--- --mommendra-moeaso---- अंचिता, कुञ्चिता, शस्या, मध्यस्था, भ्रमा और सभ्रमा ये छह प्रकार के कोली के नाम है। प्रासाद के विस्तार का दस भाग करके, उनमे से दो भाग की कोली बनावे, उसका नाम अंचिता, तीन भाग वाली कोली का नाम कुञ्चिता और चार भाग वाली कोली का नाम शस्या है। तया प्रासाद के विस्तार मान के चौथे भाग की कोलो बनावें, उसका नाम मध्यस्था, तोसरे भाग वालो कोली का नाम भ्रमा और आधे भाग वाली कोली का नाम सभ्रमा है। - प्रासाद के अंडक और प्राभूषण- शृङ्गोरुशृंगप्रत्यङ्ग गणयेदण्डकानि' च। तवङ्गतिलकं कर्ण कुर्यात् प्रासादभूषणम् ॥३०॥ शिखर, उरुशृङ्ग, प्रत्यग और शृङ्ग, ये प्रासाद के अंडक माने जाते हैं, ऐसा विद्वान् लोग मानते है । तथा तवग, तिलक और सिंहवर्ण ये प्रासाद के प्राभूषण माने जाते है ॥३०॥ शिखर के नमन का विभाग-- दशांशे शिखरे मूले अग्रेतननवांशके । साद्धांशको रथौ कौँ द्वौ शेष भद्रमिष्यते ॥३१॥ शिखर के मूल में दस भाग और ऊपर स्कंध के नव भाग करें, उनमें से डेढ़ २ भाग के दो प्रतिरथ और दो दो भाग के दोनों कोने बनावे । बाकी जो तीन भाग नीचे और दो भाग ऊपर बचे है, उस मानका भद्र बनावे ॥३॥ प्रामलसार का मान-- रथयोरुभयोर्मध्ये वृत्तमामलसारकम् । उच्छ्यो विस्तरार्धन चतुर्भागविभाजयेत् ॥३२॥ ग्रीवा चामलसारश्च पादोना च सपादकः । चन्द्रिका भागमानेन भागेनामलसारिका ॥३३॥ दोनो प्रतिरथ के मध्य विस्तार के मान का गोल मामलसार बनाना चाहिये । इसकी ऊंचाई विस्तार से आधी रखखें। ऊंचाई का चार भाग करें। उनमे से पौने भाग की ग्रीवा (गला), सवा भाग का आमलसार, एक भाग की चन्द्रिका और एक भाग की आमलसारिका बनावे ||३२-३३॥ (१) 'मएडकान् गणयेत् सुवोः ।

चतुर्थोऽध्यायः
५
च
प्रकारान्तर से मामलसार का मान--
"स्कन्धः पड्भागको ज्ञेयः सप्ताशामलसारकः ।
क्षेत्रमष्टविंशभागे-रुच्छये
तदर्धतः ॥
ग्रीवा भागवयं कार्या अण्डक. पञ्चभागकः ।
त्रिभागा चन्द्रिका चव तथैवामलसारिका ।।
निर्गमे पट्सार्धभागो भवेदामलसारिका ।
चन्द्रिका द्विसाप्रभागा अण्डकः पञ्च एव च ॥ " ज्ञान प्र० दी० म०६
Hy het
भाग
शिवमय भाग क
सरकाaam AmE-SERTAINS
क्षीरणवमते आमलकारक मान
नि
स्वमते मामलसारका मान
स्कंध का विस्तार छह भाग और आमलसार का विस्तार सात भाग रखे। मामलसार
के विस्तार का अठाईस भाग और ऊंचाई का चौदह भाग करे। उदय मे तीन भाग का गला,
पाच भाग का अंडक, तीन भाग की चन्द्रिका और तीन भाग की प्रामलसारिका रक्खे।
आमलसार के मध्य गर्भ से विस्तार में साढ़े छह भाग निकलती प्रामलसारिका, इससे
ढाई भाग निकलती चद्रिका और इससे पाच भाग निकलता अंडक (प्रामलसार) रखना
चाहिये।
मामलसारके नीचे शिखरके कोणरूप--
"शिवे तु वैश्वरं रूपं ध्यानमग्नं विचक्षण !!
शिखरकरणे दातव्यं जिने कुर्याज्जिनेश्वरः ॥" क्षीरार्णवे।
शिखर के आमलसार के नीचे और स्कंध के कोने के ऊपर शिवालय हो तो ध्यान में
मग्न ऐसे शिव के रूप तथा जिनालय हो तो जिनदेव के रूप रखे जाते है।

८६ प्रासादमण्डने women- सुवर्णपुरुष (प्रासाद पुरुष) का स्थापनक्रम- घृतपात्रं न्यसेन्मध्ये ताम्रतारं सुवर जम् । सौवर्णपुरुष तत्र तुलीपर्यवशायिनम् ॥३४॥ आमलसार के गर्भ मे घी से भरा हुआ सोना, चांदी अथवा तांबे का कलश सुवर्णपुरुष के पास रखना चाहिये । तथा चांदी अथवा चंदन का पलंग रक्खे, उसके ऊपर रेशम की शय्या विछा करके, उस पर सुवर्णपुरुप को शयन करावें । यह विधि शुभ दिन में वास्तु पूजन करके करनी चाहिये । क्योकि यह प्रासाद का मर्मस्थान (जीवस्थान ) है ॥३४॥ सुवर्ण पुरुष का मान और उसकी रचना- प्रमाणं पुरुषस्यार्धा-शुलं कुर्यात् करं प्रति । त्रिपताकं करे वामे हृदिस्थं दक्षिणाम्बुजम् ॥३॥ प्रासाद पुरुष का प्रमाण प्रासाद के विस्तार के अनुसार प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके बनावें । अर्थात् एक हाथ के प्रासाद मे आधा अंगुल, दो हाथ के प्रासाद में एक अंगुल, तोन हाथ के प्रासाद में डेढ़ अंगुल और चार हाथ के प्रासाद में दो अंगुल, इस प्रकार प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके बनावें । इस सुवर्णपुरुष के बांये हाथ में ध्वजा रखकर के यह छाती पर और दाहिना हाथ कमलयुक्त रक्खे ॥३॥ अपराजितपृच्छासूत्र १५३ में कहा है कि-- "प्रथातः सम्प्रवक्ष्यामि पुरुषस्य प्रवेशनम् । न्यसेद् देवालयेष्वेवं जीवस्थानफलं भवेत् ॥ छादनोपप्रवेशेषु शृङ्गमध्येऽयवोपरि । शुकनासावसानेषु वेध वें भूमिकान्तरे ।। मध्यगर्भे विधातव्यो हृदयवर्णको विधिः । हंसतुली ततो कुर्यात् ताम्रपर्यसंस्थिताम् ।। -- EC गुलज * कुछ शिल्पियो का मत है कि-चीसे भरा हुआ सोना, चादी अथवा तांबा के कलश मे सुवर्ण पुरुप को रखकर के, वह कलश पलग पर रक्खें। (१) 'दक्षिण करम्'।

चतुर्थोऽध्यायः ७ -- .. -- EmRR. . शयनं चापि निर्दिष्ट पद्म वै दक्षिणे करे । त्रिातार्क करे वामे कारयेद्ध दि सस्थितम् ॥" यह सुवर्णपुरुप देवालय का जीवस्थान है, इसलिये उसको देवालय मे स्थापना करने का स्थान कहता हूँ-यह छज्जा के प्रवेश मे, शिखर के मध्य भाग मे अथवा उसके ऊपर, शुकनास के अन्तिम स्थान मे, वेदी के ऊपर और दो माल के मध्य गर्भ मे स्थापन करना चाहिये। यह हृदयवर्णक (जीव) विधि है । इसको तावे के पलंग के ऊपर रेशम की शय्या बिछा कर, उसके ऊपर शयन कराना चाहिये । उसके दाहिने हाथ मे कमल और बाये हाथ मे ध्वजा रखकर वह हाथ छाती के ऊपर रखना चाहिये । प्रमाणं तस्य वक्ष्यामि प्रासादादी समस्तके । यावच्छताछु हस्तादेः कल्पयेच्च यथाक्रमम् ॥ वृद्धिरढुङ्गलाद्धस्ते यावन्मेरुं प्रकल्पयेत् । एवविध प्रकर्तव्यं सर्वकामफलप्रदम् ॥ हेमजं तारज वापि ताम्रजं वापि भागशः । कलशे चाम्बुपूर्णे तु सौवर्णं पुरुप न्यसेत् ।। पर्य इस्य चतु पत्सु कुम्भाश्चत्वार एव च । हिरण्यनिधिसंयुक्ता आत्ममुद्राभिरङ्किताः ॥ एवमारोपयेद् देवं यथोक्तं वास्तुशासने । तस्य नैव भवेद् दुखं यावदाभून सम्प्लवम् ॥" अव सुवर्ण पुरुप का प्रमाण कहता हूँ-एक हाथ से पचास हाथ तक के प्रासाद के लिये प्रत्येक हाथ आधा २ अगुल वढा करके वनावे । यह सोना, चादी अथवा तावा का बनाकर जलपूर्ण कलश मे स्थापन करे। पीछे उसको पलंग के ऊपर रक्खे । इसके पश्चात् अपने नाम वाली सुवर्णमुद्रा से भरे हुए चार कलश पलंग के चारो पायो के पास रक्खे। इस प्रकार सुवर्णपुरुष को स्थापित करने से जब तक जगत विद्यमान रहे, तब तक किसी प्रकार का दु.ख देवालय वधाने वाले को नहीं होता है। कलश को उत्पत्ति और स्थापना- क्षीराणवे समुत्पन्न प्रासादस्याग्रजातकम् । माङ्गल्येषु च सर्वेषु कलशं स्थापयेद् वुधः ॥३६॥ जब देवो ने क्षीरसमुद्र का मंथन किया, तब उसमे से चौदह रत्न प्राप्त हुए थे। इन चौदह रत्नो मे एक काम कुम्भ नाम का श्रेष्ठ कलश भी प्राप्त हुआ था। यह प्रासाद के अग्न -- प्रासादमण्डने भाग (शिखर) पर और सब मांगलिक स्थानों मे विद्वान् लोग स्थापित करते हैं ॥३६॥ कलश का उदयमान- पूर्वोकमानतो ज्येष्ठः षोडशांशाधिको भवेत् । द्वात्रिंशदंशतो' मध्यो नवांशोऽभ्युदयं भवेत् ॥३७॥ ग्रीवाषीठं भवेद् भागं त्रिभागेनाण्डकं तथा । कर्णिके भागतुल्ये च त्रिभागं बीजपूरकम् ॥३८॥ + It KW पूर्वोक्त श्लोक २५ में कलश का जो मान लिखा है, उसका मान में उसका सोलहवां भाग बढावे तो ज्येष्ठ मान का और बत्तीसवां भाग बढ़ावें तो मध्यम मान के कलश का उदय होता है। जो उदय आवे उसका नव भाग करे, उन में से एक भाग की ग्रोवा और पीठ, तीन भाग का मा.स्थति अंडक (कलश का पेट), दोनों कणिका (एक छन्नी और एक कणो ) एक २ भाग और तीन भाग का बीजोरा उदय मे कलरामान TALE AVELLO H रक्खें ॥३७-३८॥ कलश का विस्तार मान- एकांशमग्रे द्वौ मूले बह्विवेदांशकर्णिके । ग्रीवा द्वौ पीठमद्धं द्वौ षड्भागं विस्तराण्डकम् ॥३६॥ इति कलशः। बीजोरा के अग्र भाग का विस्तार एक भाग और मूल भाग का विस्तार दो भाग, आर की करणी का विस्तार तीन भाग, नीचे की परणी (छाजली) का विस्तार चार भाग, गला का विस्तार दो भाग, आधी पीठ का विस्तार दो भाग (पूरी पीठ का विस्तार चार भाग) और कलश के पेटका विस्तार छह भाग है ॥३९॥ १ तावदंशोनः कनीयों' चतुर्थोऽध्यायः ---- -mootonorm Pos Cons ध्वजावंड रखने का स्थान- प्रासादपृष्ठदेशे तु दक्षिणे तु प्रविरथे । वजाधारस्तु कर्तव्य ईशाने नैऋतेऽथवा ॥४०॥ इति प्रासादस्यो लक्षणम् । प्रासाद के शिखर के पिछले भाग मे दाहिने प्रतिरथ मे ध्वजादंड रखने का छिद्रवाला स्थान ध्वजाधार (कलावा) वनावे । यह पूर्वाभिमुख प्रासाद के ईशान कोने में और पश्चिमा- भिमुख प्रासाद के नैऋत्य कोने में वनावे ॥४०॥ ध्वजाधार (स्तंभवेध) का स्थान-- "रेखायाः पष्ठमे भागे तदंशे पादजिते । ध्वजाधारस्तु कर्तव्यः प्रतिरये च दक्षिणे॥" ज्ञान प्रदी० अ०६ शिखर की रेखा के उदय का छह भाग करे। उनमे ऊपर के छठे भाग का फिर चार भाग करे, इनमे से नीचे का एक भाग छोड कर, इसके उपर के भाग मे दाहिने प्रतिरथ में जनाधार बनावे अयात् रेखा का चौवीस भाग करके ऊपर के बाईसवे भाग में ध्वजाघार बनावे। - च तु अपराजित के मत से स्तंभवेध का स्थान- "रेखाध' (पश्च') त्रिभागीय सूत्राशे (तदशे) पादवर्जिते । ध्वजोन्नतिस्नु कर्तव्या ईशाने नैऋतेऽथवा ॥ प्रासादपृष्ठदेशे प्रतिरथे दक्षिणे। स्तम्भवस्तु कर्तव्यो भित्तेरष्टमांश के (भित्याश्च पष्ठमाशके)।" सूत्र १४४ शिखर की रेखा (कोण) के ऊपर के अर्ध भाग का तीन भाग करें। ऊपर के तीसरे भाग का फिर चार भाग करके नीचे से एक भाग छोड करके उसके ऊपर के भाग में स्तंभवेध बनावे। यह ईशान अथवा नैऋत कोण मे प्रासाद के पिछले भाग मे दाहिने प्रतिरथ मे दीवार के छठे भाग के मान जितना मोटा बनावे। ध्वजाधार को मोटाई और स्तंभिका- "स्तम्भवेधस्तु कर्तव्यो भित्त्याश्च पष्ठमाशका | घण्टोदयप्रमाणेन स्तम्भिकोदयः कारयेत् ॥ धामहस्ताङ्गलविस्तार-स्तस्योर्वे कलशो भवेत् ॥" ज्ञान प्र० दी० अ०६ प्रा० १२ - ६. प्रासादमण्डने 5-46n -RAMMADIMAN . . DALAMMAMMA- Awasna दीवार के छठे भाग का मोटा स्तंभवेध (ध्वजाधार ) बनावे । ध्वजादंड को मजबूत स्थिर रखने के लिये बगल में एक स्तंभिका रखी जाती है । उसका उदय स्तंभवेध से पामलसार का उदय तक रक्खें। उसकी मोटाई प्रासाद के मान से हस्तांगुल (जितने हाथ हो उतने अंगुल) रक्खें और उसके ऊपर कलश रखें। ध्वजादंड और स्तंभिका इन दोनों का अच्छी तरह वजूबंध करें। একাই भारलीमार ਤਖn: मताका शिखर का २४ भाग करके २२ वां भाग में ध्वजदड और स्तभिका का स्थान- शिखर का छह भाग करके ऊपर के छठे भाग के तीसरे भाग में वजदंड का स्थान- य ५ CURLI 3 2३॥ रेखामा २३ भाग मा ध्वजादंड का उदयमान- दण्डः कार्यस्तृतीयांशः शिलातः' कलशान्तकम् । मध्योऽष्टांशेन हीनोऽसौ ज्येष्ठपादोनः कन्यसः ॥४१॥ १ १. 'शिलान्तः चतुर्थोऽध्यायः -moom-00- momon- .... Homepam-e-00- -- Don- प्रासाद की खरशिला से लेकर कलश के अग्रभाग तक के उदय का तीन भाग करके, इनमे से एक भाग के मान का लंबा ध्वनादंड बनावे। यह ज्येष्ठमान का है। इनमे से आठवा भाग कम करने से मध्यम मान का और चौथा भाग कम करने से कनिष्ठ मान का स्वजादंड होता है ॥४॥ ध्वजादंड का दूसरा उदयमान- प्रासादच्यासमानेन दण्डो ज्येष्ठः प्रकीचितः । मध्यो हीनो दशांशेन पञ्चमांशेन कन्यसः ॥४२॥ प्रासाद के विस्तार के बराबर ध्वजादंड की लंबाई रक्खे, यह ज्येष्ठ मान का ध्वजादंड है । इसमे से दसवा भाग कम करे तो मध्यम मान का और पाचवा भाग कम करे तो कनिष्ठ मान का ध्वजादंड होता है ।।४।। ध्वजावंड का तीसरा उदयमान- "भूलरेखाप्रमाणेन ज्येष्ठः स्याद् दण्डसम्भवः । मध्यमो द्वादशाशोनः षडंशोनः कनिष्ठकः ।।" अप० सू० १४४ मूलरेखा (गर्भगृह अथवा शिखर के नीचे के पायचा के विस्तार जितना) के विस्तार मान का लंबा जादह बनावे, यह ज्येष्ठ मान का है। उसमे से बारहवां भाग कम करे तो मध्यम और छठा भाग कम करतो कनिष्ठ मान का ध्वजादंड होता है। विवेक विलास के प्रथम सर्ग के श्लोक १७६ मे स्पष्ट लिखा है कि- "दण्डः प्रकाशे प्रासादे प्रासादकरसख्यया । सान्धकारे पुनः कार्यों मध्यप्रासादमानतः ।।" प्रकाश वाले (विना परिक्रमा वाले) प्रासाद का ध्वजादंड प्रासाद के मान का बनावे, अर्थात् प्रासाद का जितना विस्तार हो उतना लंबा ध्वजादड बनावे । अंधकार वाले ( परिक्रमा वाले ) प्रासाद का ध्वजादंड मध्य प्रासाद के मान का बनावे । अर्थात् परिक्रमा और उसकी दीवार को छोड़कर के गभारे के दोनो दीवार तक के मान का बनावे। ध्वजादंड का विस्तारमान- एकहस्ते तु प्रासादे दण्ड : पादोनमङ्गुलम् । कुर्यादर्घाडुला वृद्धि-वित्पञ्चाशद्धस्तकम् ॥४३॥ २. पृथु । यह मत प्रचार मे अधिक है।

६२ प्रासादमण्डने - ROMee --- - - 00000-00- ----- एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के ध्वजादंड का विस्तार पौन अंगुल का रक्खे। पीछे पचास हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आधा २ अंगुल बढ़ा करके रखखें ॥४६|| ध्बजादंड की रचना- सुवृत्तः सारदारुश्च ग्रन्थिकोटरवर्जितः । पर्वमिविषमैः कार्यः समग्रन्थिः सुखावहः ॥४४॥ ध्वजादंड बहुत अच्छा और किसी प्रकार की गांठ या पोलारण आदि दोषो से रहित, तथा मजबूत काष्ठ का सुन्दर एवं गोलाकार बनावें। दंड में पर्व (विभाग) विषम संख्या में और ग्रन्थी (चूड़ी ) समसंख्या में रखना सुखदायक है ॥४॥ विषमपर्व वाले ध्वजादंड के तेरह नाम- "जयन्तस्त्वेकपर्वश्च त्रिपर्वशत्रु मर्दनः । पिङ्गल; पञ्चपर्वश्च सप्तपर्वश्च सम्भवः ॥ श्रीमुखो नवपर्वश्च प्रानन्दो रुद्रपर्वकः । त्रिदेवो विश्वपर्वश्च तिथिभिदिव्यशेखरः ।। मुनीन्दुभिः कालदण्डो महोत्कटो नवेन्दुतः । सूर्याख्यस्त्वेकविंशत्या कमलो वह्विनेत्रतः ॥ तत्त्वपर्वो विश्वकमा दण्डनामानि पर्वतः । शस्ताशस्तत्वमेतेषामभिधानगुणोद्भवम् ॥" अप० सू० १४४ एक पर्व वाला जयंत, तीन पर्ववाला शत्रु मर्दन, पांच पर्व का पिगल, सात पर्व का संभव, नव पर्व का श्रीमुख, ग्यारह पर्व का आनंद, तेरह पर्व का त्रिदेव, पद्रह पर्व का दिव्यशेखर, सत्रह पर्व का कालदड, उन्नीस पर्व का महाउत्कट, इक्कीस पर्व का सूर्य, तेबीस पर्व का कमल और पच्चीस पर्व का विश्वकर्मा कहलाता है । वे तेरह प्रकार के दड के नाम पर्व के अनुसार है और नाम के अनुसार शुभाशुभ फल देने वाले है। ध्वजादण्ड की मर्कटी (पाटली)- दण्डदीर्घषडशेन मर्कव्यर्थेन विस्तृता । अर्धचन्द्राकृतिः पार्वे घण्टोर्चे कलशस्तथा ॥४५॥ ध्वजादंड की लंबाई के छठे भाग की मर्कटी (पाटली) की लंबाई खखें। लंबाई से आधी विस्तार में रक्खे। (विस्तार के तीसरे भाग की मोटाई रक्खे।) पाटली का सम्मुख

चतुर्थोऽध्यायः
भाग अद्ध चन्द्र के आकार वाला बनावे। इसके कोने मे घंटडीया लगावे और ऊपर
कलश रक्खे ॥४॥
अपराजितपृच्छा सूत्र १४४ में कहा है कि-
"मण्डूकी तस्य कर्तव्या अर्धचन्द्राकृतिस्तथा।
पृथुदण्डसप्तगुणा हस्तादिपञ्चकावधि ।।
पड्गुणा च द्वादशान्तं शेषाः पञ्चगुणास्तथा।
तथा विभागविस्ताराः कर्तव्याः सर्वकामदाः ।।
अर्धचन्द्राकृतिश्चैव पक्षे कुर्याद् गगारकम् ।
वशोर्चे कलशं चैव पक्षे घण्टाप्रलम्बनम् ।।"
ध्वजादंड की पाटली अर्धचंद्र के आकार की बनावे । वह एक से पाच हाथ तक के लबे
वजादंड के विस्तार से सातगुणो, छह से बारह हाय तक के लम्बे ध्वजादंड के विस्तार से
हगुणो और तेरह से पचास हाय तक के ध्वजादंड के विस्तार से पाचगुणी पाटली लम्बाई में
रखखे । लम्बाई का तीसरा भाग विस्तार मे रक्खे। यह सब इच्छितफल को देनेवाली है।
अर्धचंद्राकृति के दोनो तरफ गगारक बनावे। दंड के ऊपर कलश रखखे और पाटली के दोनो
बगल में लम्बी घंटडीया लगाना चाहिये।
ध्वजा का मान-
ध्वजा दण्डप्रमाणेन देष्येऽष्टांशेन विस्तरे ।
नानावस्त्रैविचित्राये-स्त्रिपञ्चायशिखोत्तमा ॥४६॥
ध्वजादंड के लबाई के मान की ध्वजा की लंबाई रक्खे और लम्बाई से पाठवे भाग की
चौड़ाई रवखे । यह अनेक वर्ण के वस्त्रो की बनावे और अग्रभाग मे तीन अथवा पाच शिखाये
बनावे ॥४६॥
ध्वजा का महात्म्य-
पुरे च नगरे को रथे राजगृहे तथा ।
वापीकूपतडागेषु ध्वजाः कार्या: सुशोभनाः ॥४७॥
पुर, नगर, किला, रथ, राजमहल, वावडी, कूर्मा और तालाव आदि स्थानो के अपर
सुन्दर ध्वजा रखनी चाहिये ॥४७॥
निष्पन्नं शिखरं दृष्ट्वा धजहीने सुरालये ।
असुरा वासमिच्छन्ति वजहीनं न कारयेत् ॥४॥

४
प्रासादमण्डने
30000
तैयार हुए प्रासाद के शिखर को ध्वजा रहित देखकर असुर (रासस) उसमे रहने की
इच्छा करते है। इसलिये देवालय ध्वजा रहित नहीं रखना चाहिये ।।४।।
ध्वजोच्छायेण तुष्यन्ति देवाश्च पितरस्तथा ।
दशाश्वमेधिकं पुण्यं सर्वतीर्थधरादिकम् ॥४६॥
देवालय के ऊपर ध्वजा चढ़ाने से देव और पितर संतुष्ट होते है। तथा दशाश्वमेघ यज्ञ
करने से और समस्त भूतल की तीर्थयात्रा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य प्रासाद के
ऊपर ध्वजा चढाने से होता है ।।४६॥
पञ्चाशत् पूर्वतः पश्चाद्-आत्मानं च तथाधिकम् ।
शतमेकोत्तरं सोऽपि तारयेन्नरकार्णवात् ॥५०॥
इति ध्वजलक्षणं पुण्याधिकारः।
इति श्री सूत्रधारमण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे प्रतिमा-
प्रमाणष्टिपदस्थानशिखरध्वजाकलशलक्षणाधिकारश्चतुर्थोऽध्यायः
||४||
ध्वजा चढ़ानेवाले के वंश की पहले की पचास और पीछे की पचास, तथा एक अपनी
इस तरह कुल एकसी एक पीढी के पूर्वजों को नरकरूपी समुद्र से यह ध्वजा तिरा देती है
अर्थात् उद्धार करती है ॥५०॥
इति श्री पंडित भगवानदास जैन विरचित प्रासादमण्डन ग्रन्थ के चौथा-
अध्ययन की सुबोधिनी नाम्नी मापाटीका समाप्ता ॥४॥

अथ प्रासादमण्डने पञ्चमोऽध्यायः - मंगल- नानाविधमिदं विश्वं विचित्रं येन सूत्रितम् । सूत्रधारः श्रेयसेऽस्तु' सर्वेषां पालनक्षमः ॥१॥ जिसने अनेक प्रकार का यह विचित्र जगत बनाया है, यही सूत्रधार (विश्वकर्मा) सबका पालन करने में समर्थ है। और यही सबके कल्याण के लिये हों ॥१॥ ग्रंथ मान्यता की याचना- न्यूनाधिकं प्रसिद्ध च यत् किञ्चिन्मण्डनोदितम् । विश्वकमप्रसादेन शिल्पिभिर्मान्यता वचः ॥२॥ जगत में जो कुछ मंडन सूत्रधार का न्यूनाधिक रूप से कहा हुमा शिल्पशास्त्र प्रसिद्ध है, वह विश्वकर्मा की कृपा से शिल्पियो से मान्य हो ॥२॥ वैराज्यपासाद- चतुर्भागं समारभ्य यावत्सूर्योत्तरं शतम् । भागसंख्येति विख्याता फालना कर्णबाह्यतः ॥३॥ चार भाग से लेकर एकसो बारह भाग तक के वैराज्यादि प्रासाद होते है । तथा उनकी फालनाऐ कोने से बाहर निकलती होती है। ॥३॥ फालना के भेद- अष्टोत्तरशतं भेदा अंशवृद्धया भवन्ति ते । समार्शविपमैः कार्या-नन्तमेदैश्च फालना ॥४॥ एक २ अंशकी वृद्धि से फालना का एक सौ पाठ भेद होते हैं। एवं समांश और विपमांश के भेदो से फालना के अनन्त भेद भी होते है ॥४॥ एकस्यापि तलस्योचे शिखराणि बहुन्यपि । नामानि जातयस्तेपा-मूर्ध्वमार्गानुसारतः ॥५॥ एक ही तल के ऊपर बहुत प्रकार के शिखर बनाये जाते है और उन शिखरो के निर्माण १. स एव स्यात्।

१६ प्रासादमण्डने mom 4- -- - -- --- ---Modelaynamebook-west- से ही प्रासादों के नाम और उसको जाति, ये दोनों उत्पन्न होते है ।।।। भ्रमणी (परिकमा)- दशहस्तादधो न स्यात् प्रासादो भ्रमसंयुतः । नवाष्टदशमागेन भ्रमो भित्तिविधीयते ॥६॥ दस हाथ से न्यून प्रासाद को भ्रमणी (परिकमा) नहीं किया जाता, किन्तु दस हाथ से अधिक विस्तार वाले प्रासाद को भ्रमणी करना चाहिये । भ्रमणी और दीवार प्रासाद के आठ नव अथवा दसवें भाग की रखना चाहिये ।।६।। १-वैराज्य प्रासाद- वैराज्यश्चतुरस्रः स्याचतुर्दारे चतुष्किका । प्रासादो ब्रह्मणः प्रोक्तो निर्मितो विश्वकर्मणा ॥७॥ प्रथम वैराज्य प्रासाद समचोरस और चार द्वार वाला है। प्रत्येक द्वार चौकी मंडप वाला वनावे । यह प्रासाद ब्रह्माजी ने कहा है और विश्वकर्मा ने निर्माण किया है ॥७॥ बैगन्यादि की प्रथा विभक्ति अंडक || अपराजितपृच्छा सूत्र १५५ में कहा है कि- "चतुरस्रोकृते क्षेत्र तथा षोडशभाजिते । तस्य मध्यं चतुर्भाग-भि सूत्रच कारयेत् ।। द्वादशस्वथ शेषेषु बाह्य भित्तीः प्रकल्पयेत् ।।" वैराज्य प्रासाद की समचोरस भूमिका सोलह भाग कर के उन में से चार भाग का मध्य गर्भगृह बनावे और बाकी बारह भाग में दो २ भाग की दीवार और दो भागकी भ्रमणी बनावे । सपादं शिखरं कार्य घण्टाकलशभूषितम् । चतुर्भिः शुकनासैस्तु सिंहकविराजितम् ।।८॥ इसके शिखर का उदय विस्तार से सवाया बनावे । तथा मामलसार और कलश से सोभायमान करें। एवं चारों ही दिशा मे शुरुनाश तया सिंहकर्ण आदि से शिखर को शोभायमान बनावे ॥६॥ WHERE ओरीसा जगन्नाथपुरी का वैराज्यादि जाति का एकाण्डिक शिखर

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I
नागर जाति के पासाद का कलामय नंडोवर (दोवार)

पञ्चमोऽध्यायः दिशा के द्वार का नियम एकद्वारं भवेत् पूर्व द्विद्वारं पूर्वपश्चिमे । त्रिद्वार मध्यनं द्वारं दक्षिणास्यं विवर्जयेत् ।।६।। प्रासाद का यदि एक द्वार रखना हो तो पूर्वदिशा में ही रक्खे। दो द्वार रखना हो तो पूर्व पश्चिम दिशामे रक्खे । तीन द्वार रखना हो तो दो द्वार के बीच में मुख्य द्वार रक्खे। परन्तु दक्षिणाभिमुख वाला मुख्य द्वार नहीं रखना चाहिये । ऐसा द्वार नहीं बनावें जिससे प्रवेश में उत्तर मुख रहे | चतुर चतुर्दिन शिवब्रह्मजिनालये। होमशालायां कर्त्तव्यं क्वचिद् राजगृहे तथा ॥१०॥ शिव, ब्रह्मा और जिनदेव, इनके प्रासादो मे चारो ही दिशाप्रो मे द्वार रखे जाते हैं। एवं यज्ञशाला और कभी राजमहल में भी चारो दिशाप्रो में द्वार रक्खे जाते है ॥१०॥ अपराजितपृच्छा सूत्र १५७ मे त्रिद्वारके विषय में विशेषरूप से लिखते है कि- "पूर्वोत्तरयाम्ये चैव पूर्वापरोत्तरे तथा । याम्यापरोत्तरे शस्तं त्रिद्वारं त्रिविधं स्मृतम् ।।" पूर्व उत्तर और दक्षिण, पूर्व पश्चिम और उत्तर तथा दक्षिण पश्चिम और उत्तर, इस प्रकार तीन प्रकार के विद्वार प्रशस्त है। "पूर्वापरे स्याद् द्विद्वारं दूपयेच याम्योत्तरे । एकद्वारं च माहेन्धां चतुरं चतुर्दिशम् ॥" अप० सू० १५७ प्रासाद मे दो द्वार बनाना हो तो पूर्व और पश्चिम दिशा में बनावें । परन्तु उत्तर और दक्षिण दिशा में नही बनावे, क्योकि यह दोप कर्ता है । यदि एक ही द्वार बनाना हो तो पूर्व दिशा में ही बनावे और चार द्वार बनाना हो तो चारों दिशा मे बनावे । "पूर्वे च भक्तिदं द्वारं मुक्तिदं वरुणोद्वतम् । याम्योत्तरे शिवे द्वारे कृते दोषो महद्भयम् ।।" अप० सू० १५७ पूर्वदिशा का द्वार भक्ति देनेवाला है और पश्चिम दिशा का द्वार मुक्ति को देनेवाला है। शिव प्रासाद में यदि उत्तर और दक्षिण दिशा में द्वार किया जाय तो बडा दोप और भय करने वाला है। २. 'होमश ला चतुरा' पाठान्तरे । प्रा० १३ .

5 प्रासादमण्डने "एकद्वारंच माहेन्या-मन्यथा दोषदं भवेत् । भद्रं सर्वत्र कल्याणं चतुर्दारं शिवालये ।।" अप० सू० १५७ शिवालय मे एक द्वार रखना हो तो पूर्व दिशा में ही रवखे और अन्य दिशा में रक्खें तो दोष देने वाला है । परन्तु चारो दिशा में चार द्वार बनावें तो कल्याण कारक है । 'ब्रह्मविष्णुरवीणां च कुर्यात् पूर्वोक्तमेव हि । समोसरणे च जैनेन्द्र दिशादोषो न विद्यते ।।" अप० सू० १५७ ब्रह्मा, विष्णु और सूर्य, इन प्रासादों में ऊपर कहे अनुसार द्वार बनावें । जिनदेव के समवसरण प्रासादों में दिशा का दोप नहीं है । चाहे जिस दिशा में द्वार बना सकते है। वैराज्यादिसमुत्पन्नाः प्रासादा ब्रह्मणोदिताः। एक-त्रि-पञ्चसप्ताङ्क-संख्या पञ्चविंशतिः ॥११॥ इति वैराज्यप्रासादः । वैराज्यादि जो पचीस प्रासाद हैं, वे ब्रह्माजी ने बताये हैं। वे एक, तीन, पांच, सात और नव अंगो के भेदवाले है। जैसे-वैराज्यप्रासाद एक अंग फक्त कोना वाला है । नंदन, सिंह और श्रीनन्दन, ये तीन प्रासाद तीन अंग (दो कोना और भद्र ) वाले हैं। मंदर, मलय, विमान, सुविशाल और त्रैलोक्यभूषण, ये पांच प्रासाद पांच भंग (दो कर्ण, दो प्रतिरथ और भद्र ) वाले है। माहेन्द्र, रत्नशीर्ष, शतशृंग, भूधर, भुवनमंडन त्रैलोक्यविजय और पृथ्वीवल्लभ, ये सात प्रासाद सात अंग (दो कर्ण, दो प्रतिरथ, दो रथ और भद्र ) वाले है । महीधर, कैलाश, नवमंगल, गंधमादन, सर्वाङ्गसुन्दर, विजयानन्द, सर्वाङ्गतिलक, महाभोग और मेरु, ये नव प्रासाद नव अंग ( दो कर्ण, दो प्रतिकर्ण दोरथ, दो उपरथ और गद्र) वाले है। ऐसा अपराजित पृच्छा सूत्र १५६ में कहा है ॥१॥ २-नन्दन प्रासाद- चतुर्मक्ते भवेत् कोणो भागो मद्रं द्विभागिकम् । भागाधं निर्गमं मद्रे मद्रे प्रकुर्यान्मुखभद्रकम् ॥१२॥ शृङ्गमेकं भवेत् कोणे द्वे द्वे भद्रे च नन्दनः । इति नंदनः। प्रासाद के तल का चार भाग करे। उनमें से एक २ भाग का कोना और दो भाग का भद्र बनावें । भद्र का निर्गम आधा भाग का रखें। भद्र में मुखभद्र भी बनावें। कोने के ऊपर १. ब्रह्मणाचिता २. 'पणे।

पञ्चमोऽध्यायः ६६ and-moon- - रथिकोपरि ॥१३॥ C राज्याविभयाबीनन्दन प्रसाद mins एक २ शृंग और भद्र के ऊपर दो २ उरुशृंग रक्खे । ऐसा नंदन नाम का प्रासाद है ॥१२॥ शृंगसख्या १३ । कोणे ४ भद्रे और एक शिखर । ३-सिंहप्रासाद- मुखमद्रे प्रतिमद्र-मुद्गमो कर्णशृङ्गे सिंहकर्णः सिंहनामा स उच्यते । देवतासु प्रकर्त्तव्यः सिंहस्तत्रैव शाश्वतः ॥१४॥ तुष्यति गिरिजा तस्य सौभाग्यधनपुत्रदा । रथिका सिंहकर्णश्च भद्रे शृङ्गे च सिंहकः ॥१॥ इति सिंहः। तल विभक्ति नन्दन प्रासाद की तरह ही करे। मुखभद्र मे प्रतिभद्र बनावे । तथा भद्र के गवाक्ष के कार उद्म बनावे । कोने के शृंगो के ऊपर सिंह रक्खे। ऐसा सिंह नाम का प्रासाद है। यह देवता ( देवीओं) के लिये बनावे । इसमे सिंह शाश्वत रहता है, इसलिये पार्वती देवी खुश होती है और सौभाग्य धन और पुत्र देती है । भद्र को रथिका के ऊपर सिंहकर्ण और श्रृंगो के ऊपर भी सिंहकर्ण रखने से सिंह नाम का प्रासाद है ।।१३ से १ ४-श्रीनन्दन प्रासाद- कणे शृङ्ग तु पञ्चाण्डं स श्रीनन्दन उच्यते । इति नन्दनः इतिश्यङ्गप्रासादाः। नन्दन प्रासाद के कोने ऊपर पाच अंडक वाला केसरी शृंग चढ़ावे तो यह श्रीनन्दन नाम का प्रासाद होता है। शृङ्ग संख्या २६ । कोणे केसरी क्रम २०, भद्रे ८, एक शिखर । नदन प्रासाद ५-मंदिर और ६-मलय प्रासाद- व्यङ्गा इत्यर्थः षड्भागै-श्चतुरस्त्र विभाजयेत् ॥१६॥ कर्ण प्रतिरथं कुर्याद् भद्रार्ध भागमागिकम् । समं निर्गममंशैश्च भद्रं, मागाद्ध निर्गमम् ॥१७॥ मगर २. 'देवाना तु। ३. 'निगममस्माच।

१०० प्रासादमण्डने --- commemas-4 Mammalanogamdange mate- द्वे द्वे करें तथा भद्रे शृङ्गमेकं प्रतिरथे। मन्दिरस्तृतीयं मद्रे मलयो भद्रजं त्यजेत् ॥१८॥ ऊपर तीन अंगवाले प्रासादो का वर्णन कहा गया है। अब पांच अंगवाले प्रासादों का वर्णन करते हैं-समचोरस प्रासाद के तलका छह भाग करें। इनमें कर्ण, प्रतिकर्ण और भद्रार्ध, ये प्रत्येक एक २ भाग का रक्खे । कर्ण और प्रतिकर्ण का निर्गम समदल रक्खें और भद्र का निर्गम आधा भाग रखना चाहिये । कर्ण और भद्र के कार दो दो और प्रतिकर्ण के ऊपर एक २ शृङ्ग चढावें। ऐसा मंदिर नाम का प्रासाद है। इस प्रासाद के भद्र के जार तीसरा एक उरुग चढ़ा तो मलय नाम का प्रासाद होता है ॥१६ से १८॥ श्रृंग सख्या २५ । कोणे, भद्रे, प्ररथे ८, एक शिखर । काम्यादि पयागी मन्दर प्रासाद तलागBE ASARLI A OM प्रभापति ७-विमान, ८-विशाल और ६ त्रैलोक्यभूषण प्रासाद- प्रत्यङ्गं तिलकं कुर्यात् प्रतिरथे विमानकः । मद्रोस्सूनवैशालः प्रतिरथे सुभूषणः ॥१६॥ इति पञ्चांगा: पंचत्रासादाः। अपर श्लोक १८ के अंत मे 'भद्रजं त्यजेत्' शब्द का यहां अर्थ करें। मलय नाम के प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक उरुश्रृंग हटा करके कर्ण के दोनों तरफ एक २ प्रत्यंग चढावें और प्रतिरथ के ऊपर एक २ तिलक चढावें, तो इसे विमान नाम का प्रासाद कहा जाता है। विमान प्रासाद के भद्र के ऊपर एक २ ऊरुQग अधिक चढावे, तो विशाल नाम का प्रासाद कहा जाता है, और प्रतिरथ के ऊपर एक २ शृंग अधिक चढावे तो उसे त्रैलोक्यभूषण नामक प्रासाद कहा है ॥१९॥ विमान श्रृंगसंख्याकोणे ८, प्ररथे ८, भद्रे ८, प्रत्यंग ८ एक शिखर एवं कुल ३३ शृंग। तिलक संख्या-प्ररथे १-१ कुल ८। त्रैलोक्यभूषण श्रृंगसंख्या-कोणे ८ प्रतिरथे १६ भद्रे ८. प्रत्यंग ८, एक शिखर एवं ४१ शृंग और तिलक विशाल शृंगसंख्या-भद्र १२ बाकी पूर्ववत् कुल ३७ । तिलक ८ प्ररथे। मदिर प्रसाद पञ्चमोऽध्यायः १०१ mpommanue . -- १०-माहेन्दप्रासाद- चतुरस्रऽष्टमिभक्ते कर्ण प्रतिरथं रथम् । भद्राय भागमागं च भागार्थेन विनिर्गमम् ॥२०॥ वारिमार्गान्तरयुक्ता स्थाश्च तुल्यनिर्गमाः । शृङ्गयुग्मं च तिलकं कर्णे द्वेतु प्रतिरथे ॥२१॥ एक चोपरथे भद्रे त्रीणि त्रीणि चतुर्दिशि । शिखरं पञ्चविस्तारं माहेन्द्रो राज्यदो नृणाम् ॥२२॥ इति माहेन्द्रः । समचोरस तल का आठ भाग करे। इनमे कर्ण, प्रतिरथ, उपरथ और भद्रार्थ, ये प्रत्येक एक २ भाग का रक्खें। भद्रका निर्गम आधा भाग का रक्खे ये सब अग वारिमार्ग वाले बनावें। कर्ण, प्रतिरथ और उपरथ का निर्गम एक २ भाग रक्खें। कर्णके ऊपर दो २ श्रृंग और एक तिलक चढावें, प्रतिरथ के ऊपर दो २ शृग, उपरथ के ऊपर एक २ शृंग और भद्र के ऊपर तीन २ उरुशृंग चढावे । मूल शिखर का विस्तार पात्र भाग रक्खे। ऐसा माहेन्द्र नाम का प्रामाद मनुष्यो को राज्य देनेवाला है ॥२० से २२॥ शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे १६ उपरथे ८, भद्रे १२ एक शिखर एवं कुल ४५, तिलक, ४ कोणे । ११-रत्नशोष प्रासाद- कणे भृङ्गत्रयं शेष शेषं पूर्ववद् रत्नशीर्षकः । इति रत्नशीर्ष। माहेन्द्र प्रासाद के कर्णके ऊपर यदि तीन शृंग चढ़ाया नाय तो उस प्रासाद का नाम रलशीर्ष होता है। गह श्रृंग संख्या-कोणे १२, प्ररथे १६, उपरथे ८ भद्रे १२ एक शिखर, कुल ४६ । पैराध्यारिताही माटे प्रसार गलpic अंडक ARARIANI IIMaiwal TRICIA १२-सितभृग प्रासाद- त्यक्त्वैकमा भद्रस्य मत्वालम्बं च कारयेत् ॥२३॥ मान्द्र प्रासाद १०२ प्रासादमण्डने मस्तके तस्य छाद्यस्य भूङ्गयुग्मं प्रदापयेत् । सितशृङ्गस्तदा नाम ईश्वरस्य सदा प्रियः ॥२४॥ रत्नशीर्ष प्रासाद के भद्र के तीन उरु,गों में से एक कम करके उस स्थान पर मत्तालम्ब (गवाक्ष ) बनावें और उसके छात्र के ऊपर दो शृंग चढावें । ऐसा सितशृंग नाम का प्रसाद ईश्वर को हमेशा प्रिय है ।॥२४॥ श्रृंग संख्या-कोणे १२, प्ररथे १६, उपरथे ८ भद्रे १६ एक शिखर, कुल ५३ १३-भूधर और १४-भुवनमंडन प्रासाद- तिलकं यधु परथे भूधरो नाम नामतः । बायशृङ्गे तु तिलकं नाम्ना भुवनमण्डनः ॥२५॥ सितग प्रासाद के उपरथ ऊपर एक २ तिलक चढ़ावे, तो भूधर नाम का प्रासाद होता है और छाद्य के दोनों शृङ्गों के ऊपर एक २ तिलक चढ़ावे तो भुवनमंडन नाम का प्रासाद होता है ।।२५॥ १५ -त्रैलोक्यविजय और १६-क्षितिवल्लभ प्रासाद- शृङ्गदयं चोपरथे तिलकं कारयेत् सुधीः । त्रैलोक्यविजयो भद्रं भृङ्गण क्षितिबल्लभः ॥२६॥ इति सप्ताङ्गाः सप्तप्रासादाः। यदि उपरथ के ऊपर दो शृंग और एक तिलक किया जाय तो त्रैलोक्यविजय नामका प्रासाद होता है और भद्र के जार एक शृंग अधिक चढाया जाय तो क्षितिवल्लभ नास का प्रासाद होता है ॥२६॥ श्रृंगसंख्या-कोणे १२, प्ररथे १६ उपरथे १६- भद्रे १२ एक शिखर कुल ५७, तिलक ८ १७-महीधर प्रासाद- दशभागकते क्षेत्रे भद्राई भागमानतः । त्रयः प्रतिरथाः कर्णो भागमागाः समो भवेत् ॥२७॥ कणे प्रतिरथे भद्रे द्वे द्वे शृङ्गे प्रकारयेत् । रथोपरथे तिलक च रथोपरि ॥२८॥ मत्वालम्बयुतं भद्रं प्रासादोऽयं महीधरः । प्रत्यङ्ग पञ्चमोऽध्यायः १०३ .-mweam- समचोरस प्रासाद के तलका दस भाग करे। उनमें भद्रार्थ, कर्ण प्रतिकणं, रथ और उपरथ ये प्रत्येक एक २ भाग का बनावें और इनका निर्गम भी एक २ भाग का रक्खें । भद्र का निर्गम आधे भाग का रक्खें। कोना, प्रतिरथ और भद्र के ऊपर दो २ श्रृंग तथा रथ और उपरथ के ऊपर एक २ तिलक चढावें। एवं रथ के ऊपर प्रत्यंग चढावे । भद्र मत्तालब (गवाक्ष ) वाला बनावें। ऐसा महीधर नाम का प्रासाद है ।।२७-२८।। तिलक शृंगसंख्या-कोणे , प्ररथे १६, भद्रे ८, प्रत्यग ८, एक शिखर कुल ४१ । तिलक- रथे, उपरथे १५-कैलास प्रासादः भद्रे शृङ्ग तृतीयं च कैलासः शङ्करप्रिय रहे। महीधर प्रासाद के भद्र के जार तीसरा एक श्रृंग अधिक चढावे तो कैलाश नाम का प्रासाद होता है। यह शंकर को प्रिय है ॥२६॥ शृगसख्या-कोणे ८, प्ररथे १६, भद्रे १२, प्रत्यंग के एक शिखर कुल ४५ । तिलक-रथे ८ उपरये ८ १९-नव मंगल और २०-गंधमादन प्रासाद- भद्रे त्यक्त्वा रथे शृङ्ग नवमङ्गल उच्यते । तथा भद्रे पुनर्दद्यात् तदासौ गन्धमादनः ॥३०॥ कैलाश प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक उरुग कम करके रथ के कार एक २ शृग चढ़ावे तो नवमंगल नामका प्रासाद होता है । यह नवमंगल प्रासाद के भद्र के ऊपर एक ऊरुqग अधिक चढावे तो गंधमावन नाम का प्रासाद होता है ॥३०॥ शृंगसंख्या-४६ । कोणे , प्ररथे १६, भद्र ८, रथे, प्रत्यंग , एक शिखर । तिलक ८ उपरथे २१- सर्वाङ्गसुन्दर और २२- विजयानन्द प्रासाद- भद्रे त्यक्त्वा चोपरथे शृङ्ग सर्वाङ्गसुन्दरः । भद्र दद्यात् पुनः शृङ्ग विजयानन्द उच्यते ॥३१॥ vn 1 REATRE sandy १. 'नाम नामतः।

प्रासादमण्डने गंधमादन प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक उरःशृंग कम करके उपरथ के ऊपर एक २ शृंग चढ़ावें, तो सागसुन्दर नाम का प्रासाद होता है। इसके भद्रके अपर एक २ उरःशृंग फिर चढ़ावे तो विजयानन्द नामका प्रासाद होता है ।।३।। श्रृंगसंख्या-कोणे, प्ररथे १६, रथे ८, भद्र' ८ उपरथे ८, प्रत्यंग ८, एक शिखर कुल ५७ २३-सागतिलक प्रासाद- मत्तालंयुतं भद्र-मुरुभूत परित्यजेत् । भृङ्गाद्वयं च छाद्योचे सांगतिलकस्तथा ॥३२॥ विजयानंद प्रासाद के भद्र के ऊपर से एक २ उरुशृंग कम कर के मत्तालंब (गवाक्ष) बनावें और इस गवाक्ष के छाद्य के ऊपर दो शृंग रखें, तो सर्वांग तिलक नाम का प्रासाद होजाता है ॥३२॥ शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे १६ रथे ८ उपरथे ८, प्रत्यंग ८, भद्रे और गवाक्षे १६, कुल २४-महाभोग प्रासाद- उत्शृङ्ग ततो दद्यान्मत्तालम्बसमन्वितम् । महाभोगस्तदा नाम सर्वकामफलप्रद : ॥३३॥ सर्वांग तिलक प्रासाद के गवाक्ष वाले भद्र के ऊपर एक २ उरुशृंग अधिक चढ़ाने से महाभोग नाम का प्रासाद होता है । यह सब कार्य के फल को देने वाला है ॥३३॥ २५-मेरुप्रासाद- कणे रथे. प्रतिरथे शृङ्गसुपरथे तथा । मेरुरेव समाख्यातः सर्वदेवेषु सर्वदेवेषु पूजितः ॥३४ इति नवाङ्गा नवप्रासादाः । कर्ण, रथ, प्रतिरथ और उपरथ इन सबके ऊपर एक २ शृंग अधिक चढ़ावे तो मेरू नामक प्रासाद होता है, यह सब देवों में पूजनीय है ॥३४॥ एक शिखर ६५ शृंग - प्रासादप्रदक्षिणा का फल- 'प्रदक्षिणात्रयं कार्य मेरुप्रदक्षिणायतम् । फलं स्याच्छैलराज्यस्य मेरोः प्रदक्षिणाकृते ॥३॥ १. 'प्रदक्षिणात्रये स्वर्ण-मेरौ पुसां च यत्फलम् । इएकाशैलजे मेरी तत्फलं प्रदक्षिणाकृते ॥' इति पाठान्तरे ।

पञ्चमोऽध्यायः १०५ - - सुवर्ण के मेरु पर्वत की तीन प्रदक्षिणा करने से जो फल होता है, उतना फल इस पाषाण के बने हुये मेरुप्रासाद को तीन प्रदक्षिणा करने से होता है ||३|| वैराज्यप्रमुखास्तत्र नागरा ब्रह्मणोदिताः । वलमाः सर्वदेवानां शिवस्यापि विशेषतः ॥३६॥ इति श्री सूत्रधार मण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्रे वैराज्यादिप्रासाद- पञ्चविंशत्यधिकारनाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥* धेराज्यादि यह पचीस प्रासाद नागर जाति के है। ये स्वयं ब्रह्माजी के कहे हुए है। इसलिए ये प्रासाद सब देवो के लिये प्रिय है। उनमे भी महादेवजी तो विशेष प्रिय है ॥३६॥ इति श्री पंडित भगवानदास जैन विरचित प्रासाद मण्डनके वैराज्यादी प्रासाद नामके पांचवे अध्यायकी सुबोधिनी नाम्नी भाषाटीका समाप्ता। विशेष जानने के लिये देखें अपराजितपृच्छा सूत्र-१५७ प्रा० १४ अथ प्रासादमण्डने षष्ठोऽध्यायः - केसरी आदि पचीसप्रासादों के नाम- केसरी सर्वतोमद्रो नन्दनो 'नन्दशालिकः । नन्दीशो 'मन्दरश्चैव "श्रीवृक्षश्चामृतोद्भवः ॥१॥ हिमवान् हेमकूटश्च कैलासः पृथिवीजयः । इन्द्रनीलो महानीलो भूधरो रत्नकूटकः ॥२॥ वैडूर्यः पद्मरागरच वजको मुकुटोज्ज्वलः । ऐरावतो राजहंसो गरुडो वृषभध्वजः ॥३॥ मेरुः प्रासादराजः स्याद् देवानामालयो हि सः । ब्रह्मविष्णुशिवार्काणा-मन्येषां न कदाचन ॥४॥ केसरो १, सर्वतोभद्र २, नन्दन ३, नन्दशालिक ४, नन्दीश ५, गन्दर ६, श्रीवृक्ष ७, अमृतोद्भव ८, हिमवान ६, हेमकूट १०, कैलाश ११, पृथिवीजय १२, इन्द्रनील १३, महा- नील १४, भूधर १५, रत्नकूटक १६, वैडूर्य १७, पद्मराग १८, वजक १६, मुकुटोज्ज्वल १०, ऐरावत २१, राजहंस २२, गरुड २३, वृषभध्वज २४, और मेरु २५, ये प्रासादों के पच्चीस नाम हैं। मैरु प्रासाद सब प्रासादों का राजा है और उसमें देवोंका निवास भी है, इसलिए यह मेरु प्रासाद ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सूर्य, इन देवों के लिए बनाना चाहिये, परन्तु दूसरे देवों के लिए यह नहीं बनाना चाहिये ॥१ से ४॥ पचीस प्रासादों की भुग संख्या- आद्यः पञ्चाण्डको ज्ञेयः केसरीनाम नामतः । तापदन्तं चतुद्धि-विदेकोचरं चतुद्धि-विदेकोत्तरं शतम् ॥५॥ प्रथम केसरी नामका प्रासाद पांच शृंगवाला है । (चार कोने पर चार और एक मुख्य शिखर इस प्रकार पांच)। अंतिम प्रासाद तक प्रत्येक प्रासाद के ऊपर अनुक्रमसे चार २ शृंग बढानेसे पच्चीसवें मेरुप्रासादके अपर एक सौ एक शृंग होते हैं ।।।। १. 'नन्दिशालक। २. 'मन्दिर। ३, 'श्रीवत्स'। ४. 'चतुर्णा क्रमवो वृद्धिः।

पष्ठोऽध्यायः . - अष्टविभागीय तलमान- क्षेत्रेऽष्टांशैविभक्ते तु कर्णो भागद्वयं भवेत् । भद्रार्ध कर्णतुल्यं तु भागेनैकेन निर्गमः ॥६॥ समचोरस प्रासाद के तलका आठ भाग करें, उनमे से दो भाग का कोना और दो भाग का भद्रार्ध बनावें। इन अंगों का निर्गम एक २ भाग का सखे ।।६।। दश और बारह विभागीय तलमान-- दशांशे सार्धमागं च भद्रा च प्रतिरथः । कणों विभागः सूर्याशे भद्राधं च प्रतिरथः ॥७॥ समचोरस तलका दस भाग करें। उनमे से दो भाग का कोना, डेढ़ भाग का प्रतिरथ और डेढ भाग का भद्रा बनावे । यदि बारह भाग करना हो तो दो भाग का कर्ण, दो भाग का प्रतिक और दो भाग का भद्रार्ध बनावे ॥७॥ चौदह विभागीय तलमान- चतुर्दशविभक्ते तु कर्णाद्य द्वादशांशवत् । भद्रपाद्वये कार्या भागभागेन नन्दिका ॥८॥ समचोरस तलका चौदह भाग करे। उनमे से कर्ण आदिका मान बारह विभागीय तलमान के अनुसार रक्खें । अर्थात् कर्ण दो भाग, प्रतिकर्ण दो भाग, और भद्रा दो भाग, ऐसे बारह भाग और भद्र के दोनों तरफ एक २ भाग की नन्द्रिका (कोणी) बनावे । ऐसे कुल चौदह भाग होते है | सोलह विभागीय तलमान- पोडशाशे प्रकर्तच्या कर्णप्रतिरथान्तरे । कोणिका भागतुन्या च शेष चतुर्दशांशवत् ॥६॥ समचोरस तलका सोलह भाग करे। उनमे से कर्ण और प्रतिरथ के बीचमे एक २ भाग को कोणिका बनावें। बाकी सब अंगो का मान चौदह विभागीय वलमान के बराबर समझे। अर्थात् कर्ण दो भाग, कोणी एक भाग, प्रतिरथ दो भाग, नंदी एक भाग और भद्रार्ध दो भाग, इस प्रकार सोलह विभागीय तलमान होता है ।।

१०८ प्रासादमण्डने अठारह विभागीय तलमान-- अष्टादशांशे भद्रस्य पावें कैद च नन्दिके । कर्तव्ये भागभागेन शेष स्यात् षोडशांशात् ॥१०॥ समचोरस तलका अठारह भाग करें। उनमें से भद्र के दोनों तरफ दो २ नन्दी एक २ भाग को बनावें । बाको सब सोलह विभागीय तलमान के बराबर जाने । जैसे-कर्ण दो भाग, कोणी एक भाग, प्रतिरथ दो भाग, नन्दी एक भाग, दूसरी नंदी एक भाग और भद्रा दो भाग, ऐसे प्रारह भागीय तलमान जानें ॥१०॥ बीस विभागीय तलमान-- चतुरस्त्रीकृते क्षेत्र विशत्यंशविभाजिते । कों विभागो नन्दिका साांशा पृथुविस्तरे ॥११॥ द्विभागस्तु प्रतिरथो नन्दिका सार्धभागिका । भद्रनन्दी भवेद् भागा भद्राधं युग्मभागिकम् ॥१२॥ समचोरस क्षेत्र के बीस भाग करें। उनमे से दो भाग का करणं, डेढ़ भाग की कोणी, दो भाग का प्रतिरथ, डेढ़ भाग की नंदिका, एक भाग की भद्रनंदी और दो भाग-का भद्रार्ध, इस प्रकार बोस भागीय तलमान बनावें ॥११-१२॥ बाईस विभागीय तलमान-- द्वाविंशतिकृते' क्षेत्रे नन्दये का भद्रपार्श्वयोः । त्रयः प्रतिरथाः कर्णो भद्राधं च द्वि भागिकम् ॥१३॥ समचोरस क्षेत्र के बाईस भाग करें। उनमे से भद्र के दोनों तरफ की नन्दी एक २ भाग की बनावे । बाकी तीन प्रतिरथ ( रथ, उपरथ और प्रतिरथ) कर्ण और भद्रार्थ, ये प्रत्येक दो २ भाग का रक्खे । इस प्रकार बाईस विभागीय तलमान होता है ॥१३॥ तलोंके क्रमसे प्रासाद संख्या-- एकद्वित्रित्रिकं त्रीणि वेदाश्चत्वारि पञ्च च । वलेषु क्रमतोष्टासु केऽप्याहुः शिखराणि हि ॥१४॥ १. 'द्वाविंशत्यंशके नन्दी भागका।

पष्ठोऽध्यायः १०६ m-men- 200mloparda केसरी आदि प्रासादो की तल विभक्ति पाठ है। उनमे क्रमशः एक, दो, तीन, तीन, तीन, चार, चार और पाच प्रासाद है । अर्थात् पाठ तल वाला प्रथम एक प्रासाददस तल का दूसरा और तोसरा ये दो; बारह तल का चौथा, पाचवां और छठा ये तीन प्रासाद; चौदह तल का सातवां, आठवां और नवां ये तीन प्रासाद, सोलह तलका दसवां, ग्यारहवां और बारहवा ये तीन प्रासाद, अठारह तलका तेरहवां, चौदहवां, पद्रहवां और सोलहवां ये चार प्रासाद; बीस तलका सत्रहवा, अठारहवां, उन्नीसवां और बीसवा ये चार प्रासाद और बाईस तलका इक्कीस पञ्चोस तक के पांच प्रासाद हैं। ऐसा किसी (क्षोरार्णव ) का मत है ॥१४॥ शिखरं त्वेकवेदक पनिवेदयुगद्वयम् । तलेपु क्रमतः प्रोस्तो मूलसत्रेऽपराजिते ॥१५॥ केसरी प्रासादों में प्रथम आठ तलका, दोसे पांच ये चार प्रासाद दस तलका, छट्ठा एक प्रासाद बारह तलका, सात से बारह ये छः प्रासाद चौदह तलका, १३ से १५ ये तीन प्रासाद सोलह तलका, १६ से १६ ये चार प्रासाद अठारह तलका, २० से २३ ये चार प्रासाद बीस तलका और चोवीसवां और पच्चीसवा ये दो प्रासाद बाईस तलका होता है । यह मूलसूत्र अपराजितपृच्छा का मत है ।।१५।। तलेष्वष्टासु विहिताः प्रासादाः पञ्चविंशतिः । यस्त्रयः क्रमेणैव चत्वारस्त्वष्टमे तले ॥१६॥ केसरी आदि पच्चीस प्रासादों की जो पाठ तल विभक्ति हैं, उनमें प्रत्येक तल के तीन २ प्रासाद है और पाठवा बाईस विभागीय तल के चार प्रासाद है ॥१६॥ श्रीणि त्रीणि स्वकीयानि दूद्वे परः परस्य च । शिखराणि विधेयानि विश्वकर्मवचो यथा ॥१७॥ ऊपर १६ वे श्लोक मे तलो के तीन २प्रासाद बनाने की जो बात कही गई है। यह मेरा स्वय ( मंडन) का मत है और नीचे के श्लोक १८ वे मे दो दो आदि प्रासाद लिखा है, यह दूसरे का मत है । ये पच्चीस प्रासाद विश्वकर्मा के वचन के अनुसार बनाये हैं ॥१७॥ "द्विद्वय कपट्नयोऽष्टादि-तलेषु पञ्चसु क्रमात् । सप्तैव सप्तमे षष्ठे शिरांसि त्रीणि चाष्टमे ॥१८॥ १. 'वित्र्येक' प्राताइनडने आज वित्तिकों में से पहले पांच तल विच के अटकन से दो, दो, एक, छह और दोन प्रासाद हैं। अभी जल विनति का एक प्रासाद, सातवी जल विभक्ति के सात और पाम्बी वल विभलिके तीन प्रासाद है। भेदाः पञ्चाशदेवकं प्रोक्ताः श्रीविश्वकर्मणा । तेनैशस्मितलेऽपि स्युः शिखराणि बहून्यपि ॥१६॥ कवरी अादि प्रलंक प्रासाद के पचास र भेदत्री विश्वकानांची ने दिये हैं। एकही प्रासाद उनके सर अनेक प्रकार के शिखर बनाये जाते हैं। रयिका सिंहकर्ण च भद्रे योद् गवानान् । प्रत्यस्तिलशाबश्व शोभितं नुरमन्दिरम् ॥२०॥ रविका, हिकर्ण, नद्र में गवाज, प्रत्यंग और तिलक आदि भाषणों से देवालय को सुशोभित बनाने का प्रासादाः कसरीमुख्याः सर्वदेवेषु पूजिताः । पुरराज्ञः प्रलादीनां को न्याणकारिकाः ॥२१॥ इति ज्योतिप्रासादाः पञ्चविंशतिः। केशरी आदि जो पच्चीस प्रासाद है, वे जय देवों के लिये पूजित हैं। इसलिये बनानेवाले नया नगर के राजा और प्रजा का त्याग करने वाले हैं। निरंधार प्रासाद- पत्रिंशत्करतोऽवस्ताद यावद्धस्तचतुष्टयम् । बिना भ्रमनिरन्धाराः कर्तव्याः शान्तिमिच्छता ॥२२॥ छत्तीत हाय ते न्यून चार हाय तक, अर्थात् चार हाय से लेकर छत्तीस हाय तक के विस्तार वाले प्रासाद शान्ति को चाहने वाले शिल्ली भ्रन (परिक्रमा) विनाके निरंवार (प्रकाश वाले) भी बना सकता है। निरंवार प्रावादको परिकना नहीं बनावें ॥२२॥ प्रासादतलाकृतिः- वास्तोः पञ्चविध क्षेत्रं चतुरखं तयायतम् । वृत्तं वृचायतं चैवाटावं देवालयादिषु ॥२३॥ १. प्रष्टा सत्यापन् ।

षष्ठोऽध्यायः चोरस, लंब चोरस, गोल, लंबगोल और पाठ कोना वाला, इस प्रकार पांच आकार के देवालय आदि के वास्तुक्षेत्र हैं ॥२३॥ लम्बचोरस प्रासाद- विस्तारे तु चतुर्भाग-मायामे पञ्चमागिकम् । ऊवं विकलशान् कुर्यात् पृष्ठाग्रे सिंहकर्णकम् ॥२४॥ लंब चोरस प्रासाद के विस्तार में चार भाग और लंबाई मे पांच भाग करना चाहिये और उसके छाद्य के ऊपर तीन गुम्बद (कलश) रखना चाहिये। तथा आगे और पीछे के चारों कोने पर सिंह रखना चाहिये । गोल, लंबगोल और अष्टास्त्र प्रासाद- वृत्तायतं च कर्तव्यं व्यासाचं वामदक्षिणे । कर्णान्तं च भ्रामयेद् वृत्त भद्राणि चाटकोणिका ॥२॥ प्रासादो वर्तु लोऽष्टात्रः प्रायेणैकाण्डकः शुभः । कणे वा श्रेणयोऽण्डानां मण्डपं वत्स्वरूपकम् ॥२६॥ इति पंचक्षेत्राणि। गोल प्रासाद के विस्तार का आधा भाग गोल के दोनो तरफ बढ़ावे तो लंबगोल प्रासाद होता है । तलके मध्यबिंदु से कोने तक व्यासाध मान करके एक गोल खीचा जाय तो गोल- प्रासादतल होता है । चोरस प्रासाद के चार भद्रो में कोना बनाया जाय तो अष्टास प्रासाद होता है । गोल और अष्टास प्रासाद प्रायः करके एक शिखर वाला बनाना शुभ है। अथवा शिखर के कोने मे शृंगो की पंक्ति रखनी चाहिये । इन प्रासादों का मंडप भी इसी स्वरूप का बनाना चाहिये ।।२५-२६।। नागर प्रासाद- विविधै रूपसबाटै-भदैर्गवाचभूषितैः वितानफालनापनेकै गरा मता ॥२७॥ अनेक प्रकार के तलाकृति वाले रूपों से, गवाक्ष वाले भद्रों से तथा अनेक प्रकार के गुम्बदो से और अनेक शृगयुक्त फालनामों से शोभायमान नागर जाति का प्रासाद बनाया जाता है ।।२७॥ २. वृत्ते भद्राणि चाष्ट हि ।

प्रासादमण्डने Monm ayeone - - द्राविड प्रासाद- पीठोपरि भवेद् वेदी पीठानि त्रीणि पञ्च वा । पीठती द्राविड़े रेखा लताशृङ्गादिसंयुता ॥२८॥ द्राविड प्रासाद को पादबंधनादि तीन अथवा पांच पीठ हैं, इस पीठ के ऊपर वेदी होती है । तथा उसको रेखा (कोना) लता और शृंगों वाली होती है ।।२।। भूमिजप्रास पासाद- भूमिकोपरिभूमिश्च 'हस्सा ह्रस्वा नवान्तकम् । विभक्कदलसंयुक्त्वा मूनि भृङ्गेण भूमिजाः ॥२६॥ भूमिज जाति के प्रासाद एक के ऊपर एक ऐसे नव भूमि (माल) तक बनाया जाता है । उसमें नीचे के मालसे ऊपर का माल छोटा २ किया जाता है। पदविभक्ति वाला और ऊपर शृंग वाला भूमिज प्रासाद है ॥२६॥ लतिन श्रीवत्स और नागर जातिके प्रासाद- शृङ्गणैकेन लतिनाः श्रीवत्साचारिसंयुताः । नागरा भ्रमसंयुक्ताः सान्धारास्ते प्रकीर्तिताः ॥३०॥ इति प्रासादजातय। लतिन जाति के प्रासाद एक शृंग वाले है, श्रीवत्स प्रासाद वारि मार्ग वाले हैं। नागर प्रासाद भ्रम (परिकमा) वाले है, उसको सांधार प्रासाद कहते है ॥३०॥ मेरुप्रासादः पञ्चहस्तो भवेन्मेस-रेकोत्तरशताण्डकः । मेदाः पञ्चोनपञ्चाशत् करवृद्धया भवन्ति ते ॥३१॥ हस्ते हस्ते भने वृद्धि-स्त्वण्डकानां च विंशतिः। एकोत्तरसहस्र' स्या-च्छ झाणां च शताद्ध के ॥३२॥ मेरु प्रासाद पांच हाथ से न्यून नहीं बनाया जाता। पांच हाथ के विस्तार वाले मेरु प्रासाद के ऊपर एकसौ एक श्रृंग चढाये जाते है । यह पांच हाथ से एक २ हाथ पचास हाथ तक बढ़ाने से पैंतालीस भेद होते है । बढ़ाये हुए प्रत्येक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद के ऊपर १. "हस्वावर्कनवान्तकम्' इति पाठान्तरे। २. 'श्रीवत्साम्बुपथान्विताः। ३. यहा पञ्चाडी नवांडी आदि चार२ क्रम समझने का है।

THRAM
H
amama
मोनाक्षाजी देवी के मदिर की जगती के द्वार ऊपर का
गोपुर मडप - मदुरा (दक्षिण

....... - rastra
ܦܫܚܐ ܀
PASHUSA
तिरुवण्णाम् (दक्षिण) के मदिर का एक गोपुर मडप

षष्ठोऽध्यायः A- PRNA- - क्रमशः बीस २ शृंग अधिक चढाये जाते है । जैसे-पांच हाथ के विस्तार वाले मेरु प्रासाद के ऊपर एक सौ एक, छह हाथ के प्रासाद के ऊपर एफसी इक्कीस, सात हाथ के प्रासाद के ऊपर एकसौ इकतालीस, इस प्रकार वीस २ मृग बढ़ाते हुए पचास हाथ के मेरु प्रासाद के ऊपर एक हजार एक शृंग हो जाते है ॥३१-३२॥ विमान नागर प्रासाद- केसरिप्रमुखाः कर्णे विमानमुरुमंगकम् । तथैव मूलशिखरं पञ्चभूमिविमानकम् ।।३३।। विमाननागरा जाति-स्तदा प्राहरुद्राहृता । एवं भृकोसशृङ्गाणि सम्मवन्ति बहून्यपि ॥३४॥ जिस प्रासाद के कोने के ऊपर केसरी प्रादि के अनेक शृंग हों, और भद्र के ऊपर उरुशृंग हो, तथा मूल शिखर पांच भूमि (माल) वाला विमानाकार हो, इसको विद्वानो ने विमाननागर जाति का प्रासाद कहा है । इसके ऊपर अनेक शृंग और उरुश्रृंग होते हैं ॥३३-३४॥ *१-श्रीमेप्रासाद और २-हेमशीर्ष मेरुप्रासाद- श्रीमेस्रष्टभागः स्या-देकोचरशताण्डकः । हेमशीपों दशांशश्च युतः सार्धशताण्डकः ॥३५॥ पहला श्रीमेप्रासाद पाठ तलविभक्ति वाला और एकसौ एक श्रृंग वाला है। दूसरा हेमशीप मेरुप्रासाद दश तल विभक्तिवाला और डेढ़सौ श्रृंगवाला है ॥३५॥ ३-सुरवल्लभ मेरुप्रासाद- मागादशमियुक सार्धद्वशतसंयुतः । सुरवल्लभनामा तु प्रोक्त श्रीविश्वकर्मणा ॥३६॥ कर्णो द्विभाग एकांशा कोणी सार्थः प्रतिरथः । अर्धाशा नन्दिका भद्र-मर्थ भागेन सस्मितम् ॥३७॥ तीसरा सुरवल्लभ नाम का मेरु प्रासाद बारह तल विभक्ति वाला और दोसौ पचास (बाईसो) शृंगवाला है। ऐसा श्री विश्वकर्माजी ने कहा है। कोना दो भाग, कोणी एक भाग, * ये नव मे प्रासाद का स्वरूप सविस्तर जानने के लिए देखो अपराजित पृच्छा सूत्र. १८० प्रा०१५ ११४ प्रासादमण्डने 480- Romene suppoor .. --- --- - 4--moooooo- 4 . ----- - प्रतिरथ डेढ़ भाग, कोणी आधा भाग और भद्रार्ध एक भाग, इस प्रकार बारह भाग की तल विभक्ति है ॥३६-३७॥ ४-भुवनमण्डन मेरुप्रासाद- त्रिशतं पञ्चसप्तत्या--धिकैर्यत्राण्डकः सह । भक्तश्चतुर्दशांशैस्तु नाम्ना भुवनमण्डनः ॥३८॥ कोणः कोणी प्रतिरथो नन्दी भद्राधमेव च । द्वये कद्धयांशसार्धाशै-श्चतुर्दशविमाजिते ॥३६॥ चौथा भुवनमण्डन नाम का मेरुप्रासाद तीनसौ पचहत्तर शृंगवाला है। इसके तलका चौदह विभाग करे। उनमे से कोण दो भाग, कोणी एक भाग, प्रतिरथ दो भाग, कोणी प्राधा भाग और भद्रार्ध डेढ़ भाग रक्खे ॥३८-३९॥ ५-रत्नशीर्ष मेरुप्रासाद-- बाणेकवेदयुग्मांशा वेदाः कर्णादिमागतः । रत्नशीपों भवेन्मेरुः पञ्चशतैकशृङ्गकः ॥४०॥ पांचवां रत्नशीर्ष मेरु प्रासाद के तलका बत्तीस भाग करे। उनमें से पांच भाग का कोना, एक भाग की कोनी, चार भाग का प्रतिरथ, दो भाग की नन्दी और चार भाग का भद्रा रक्खे । इस प्रासाद के ऊपर पांचसौ एक शृंग है ॥४०॥ ६-किरणोद्भव मेरुप्रासाद- गुणैकयुग्मचन्द्रद्वौ पुराणांशैविभाजिते । किरणोद्भवमेरुश्च सपादषट्शताण्डकः ॥४१॥ छट्ठा किरणोद्भव मेरु प्रासाद के तल का अठारह भाग करे। उनमे से तीन भाग का कोणा, एक भाग को कोपो, दो भाग का प्रतिरथ, एक भाग की नन्दी और दो भाग का भद्रार्घ रक्खे । इस प्रासाद के ऊपर छसौ पच्चीस शृंग है ॥४१॥ ७-कमलहंस मेरुप्रासाद- रामचन्द्रद्वियुग्मांशै नेत्रविशतिभाजिते नाम्ना कमलहंसः स्यात् सार्धसप्तशताण्डका ॥४२॥ सातवां कमलहंस नामके मेरु प्रासाद के तलका बीस भाग करना चाहिये । उनमे से - पष्ठोऽध्यायः ११५ - , तीन भाग का कोना, एक भाग की कोनी, दो भाग का प्रतिरथ, दो भाग की नंदी और दो भाग का भद्रार्थ रक्खे। इस प्रासाद के ऊपर सातसौ पचास शृंग है ।।४।। ८-स्वर्णकेतु मेप्रासाद- भागैः कर्णादिगर्भान्तं 'वैदार्थसाधंत्र्येकांशैः । द्वाभ्यां च स्वर्णकेतुः स्यात् पञ्चसप्ताष्टशृङ्गकैः ॥४३॥ पाठवा स्वर्णकेतु नामके मेरु प्रासाद के तलका बाईस भाग करे । इनमें से चार भाग का कोना, आधे भाग की कोणी, साढे तीन भाग का प्रतिरथ, एक भाग की नंदी और दो भाग का भद्रा वनावे । इस प्रासाद के ऊपर आठसौ पचहत्तर शृंग है ॥४३|| - वृषभध्वज मेरुप्रासाद- वैदैकरामयुग्मांशै-जिनविभाजित वृषभध्वजमेरुश्च सैकाण्डकसहसवान् ॥४॥ नववां वृपभध्वज मेरु प्रासाद के तलका चौवीस भाग करे। इनमें से चार भाग का कोना, एक भाग की कोनी, तीन भाग का प्रतिरथ, दो भाग की नन्दी और दो भाग का भद्रा रक्खे। यह प्रासाद एक हजार एक शृंग वाला है।४४॥ सभ्रमो भ्रमहीनश्च महामेरुन मद्वयम् । सान्धारेपु प्रकर्चव्यं भद्रे चन्द्रावलोकनम् ॥४॥ उपरोक्त नव महामेरु प्रासाद भ्रम (परिकमा) वाले अथवा विना भ्रमवाले बनाये जाते है। एवं दो भ्रमवाले भी बनाये जाते है । यदि दो भ्रमवाले सान्धार मेरु प्रासाद बनाया जाय तव उसके भद्र मे चंद्रावलोकन करना चाहिये अर्थात् प्रकाश के लिये जाली या गवाक्ष बनाना चाहिये ॥४५॥ राज्ञः स्यात् प्रथमो मेरु-स्ततो हीनो 'द्विजादिकः । विना राज्ञोऽन्यवर्णेन कृते मेरौ महद्भयम् ॥४६॥ इति नवमेरुलक्षणम् । इति श्री सूत्रधार मण्डनविरचिते प्रासादमण्डने वास्तुशास्त्र केसर्यादि प्रासादजातिलक्षणे पञ्चचत्वारिंशन्मेरुलक्षणे पष्ठोऽध्यायः ॥६॥ १. विदासाद त्रिसादका २. 'ज्यवर्णज'

प्रासादमण्डने
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मेस्त्रासाद राजालोग बनावें । धनिक लोग मेरुप्रासाद से न्यून प्रासाद बनावे, अर्थात्
मेरुप्रासाद नही बनावे। यदि बनावें तो राजा के साथ बनावें । राजा के बिना अकेले धनिक
द्वारा बनाया हुआ मेरुप्रासाद बड़ा भयकारक माना है ।।४६।।
इति श्री पंडित भगवानदास जैन द्वारा अनुवादित प्रासादमण्डन का केसर्यादि-
प्रासाद लक्षणनाम का छठा अध्याय की सुबोधिनी नामकी
भाषाटीका समाप्ता ॥६॥

अथ प्रासादमण्डने सप्तमाऽध्यायः मंडप विधान- रत्नगर्भाङ्कन सूर्यचन्द्रताराविवानकम् । विचित्रं मण्डपं येन कृतं तस्मै नमः सदा ॥१॥ लगे हुए रत्नवाले तथा सूर्य चंद्रमा और तारे जैसा तेजस्वी वितान (गुम्बद का पेटा भाग चांदनी) वाले, ऐसे अनेक प्रकार के मण्डपो को जिसने रचना की है, उनको हमेशा नमस्कार है ॥१॥ - गर्भानमंडप- कर्णगूढा विलोक्याश्च एकत्रिद्वारसंयुताः । प्रासादाने प्रार्तव्याः सर्वदेवेषु मण्डपाः ॥२॥ गूढ़ कोना वाला अर्थात् दीवार वाला अथवा विना दीवार वाला खुला, तथा एक अथवा तीन द्वारवाला, ऐसा मंडप सब देवो के प्रासाद के आगे किया जाता है ॥२॥ जिनप्रासाद के मंडप- गूढस्त्रिकस्तथा नृत्यः क्रमेण मण्डपास्त्रयः । जिनस्याग्रे प्रकर्तव्याः सर्वेषां तु बलाणकम् ॥३॥ जिनदेव के गर्भगृह के आगे गूढ मण्डप, इसके आगे चौकी वाले त्रिकमडप और इसके आगे नृत्यमंडप, इस प्रकार अनुक्रम से तीन मंडप बनावे । बाकी सब देवो के गर्भगृह के आगे वलापक वनावे ॥शा मंडपके पांच मान- समं सपादं प्रासादाद साधं च पादोनद्वयम् । द्विगुणं वा प्रकर्तव्यं मण्डपं पञ्चधा मतम् ॥४॥ मंडप का नाप प्रासाद के बराबर, सवाया, डेढा, पौने दुगना अथवा दुगना किया जाता है। ये मंडप के पांच प्रकार के नाप हैं ॥४॥ अपराजितपृच्छा सूत्र १८५ मे सवा दो गुणा और ढाई गुणा ये दो प्रकार का अधिक नाप मिलाकर सात प्रकार के मंडप के नाप लिखे हैं।

११-
प्रासादमण्डने
कोली
(प्रनाला
६७-
चाधिका
गूढ मण्डप
ला
चपिका
R.
त्रिक मण
विनमयर
नव चतुतिका
1---
विसरणप
-
चतुष्टि
नृत्यमण्डप.
गमय
अनुमिका
--
मारोती
प्रासाद और मडपों का तलदर्शन

११४ on- । से दश हाथ के MORN को सिर्फ ₹जानना विका गवाक्ष चाहिये। ग अधिक जता 1 िन्यूना न । न न्यून m मिरा- प में स्तंभ, गर-प्रासाद ममयी (प्रासाद मडन अ.७ हा है कि- है। परन्तु नही माना

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सप्तमोऽध्यायः - roader -- ooooooo- - -- -4 - प्रासादमान से मंडप का नाप- समं सपादं पञ्चाशत्पर्यन्तं दशहस्तकात् (ता)। दशान्तं पञ्चतः सार्ध द्विपादोनं चतुष्करे ॥५॥ त्रिहस्ते द्विगुणं द्वय क-हस्ते कुर्याश्चतुष्किकाम् । प्रायेण मण्डपं साधु द्विगुणं प्रत्यलिन्दकैः ॥६॥ दश हाथ से पचास हाथ तक के प्रासाद को समान अथवा सवाया, पांच हाथ से दश हाथ तक के प्रासाद को डेढा, चार हाथ के प्रासाद को पौने दो गुना और तीन हाथ के विस्तार वाले प्रासाद को दुगुना मंडप बनाना चाहिये। दो और एक हाथ के प्रासाद को सिर्फ चौकी वनावे। प्राय. करके मण्डप का प्रमाण डेढा या दुगना मलिन्द के अनुसार जानना चाहिये ।।५-६॥ गूमट के घंटा कलश और शुकनास का मान- मण्डपे स्तम्भपट्टादि-मध्यपट्टानुसारतः । शुरुनाससमा घण्टा न्यूना श्रेष्ठा न चाधिका ॥७॥ मण्डप मे स्तंभ और पाट मादि सब गर्भगृह के पट्ट आदि के अनुसार रखना चाहिये। मण्डप के गुमट के घंटा कलश की ऊंचाई शुकनास के बराबर रखना चाहिये । कम या अधिक नहीं रखनी चाहिये ॥७॥ अपराजितपृच्छा सूत्र १८५ श्लोक १० मे लिखा है कि-'शुकनाससमा घण्टा न न्यूना न ततोऽधिका।' अर्थात् गुमट के मामलसार कलश की ऊंचाई शुकनास के बराबर रक्खे । न न्यून न अधिक रक्खे। मंडप के समविषम तल- मुखमण्डपसबाटो यदा मित्यन्तरे भवेत् । न दोप: स्तम्भपट्टाधी. समं च विषमं तलम् ॥८॥ गर्भगृह और मुखमंडप के बीच मे यदि भित्त (दीवार) का अंतर हो तो मंडप मे स्तंभ, पट्ट और तल ये समविषम किया जाय, तो दोप नही है । अर्थात् ऊपर के श्लोक में कहा है कि- गर्भगृह के पट्ट स्तंभ के अनुसार बराबर मे मंडप के पट्ट स्तंभ आदि रखा जाता है । परन्तु इन दोनो के बीच में दीवार का अंतर हो तो सम विषम रखा जाय तो दोप नही माना जाताना प्रासादमण्डने wome - . meme- 000--- commen- - . पाट २ परली , *मुखमंडप- नवाष्टदशभागेषु त्रिभिश्चन्द्रावलोकनम् । हस्तकं व्यङ्गुलोनं वा तदूर्ध्व मत्तवारणम् ॥६|| गर्भगृह के आगे मुखमंडप है, उसके उदयका साढे तेरह, साढे चौदह अथवा साढे पंद्रह भाग करें। उनमे से आठ, नव अथवा दस भाग का चंद्रावलोकन (खुला भाग) रक्खें। तथा आसनपट के ऊपर एक हाथ का अथवा इक्कीस अंगुल का मत्तवारण (कठहरा) बनावे ॥६॥ सार्धपञ्चांशकैर्भक्तैः सपादं राजसेनकम् । MSRIRALA सपादत्र्यंशका वेदी भागेनासनपट्टकम् ॥१०॥ खुले भाग के नीचे से मंडप के तल तक साढे पांच भाग करे। उनमें से सवा भाग का राजसेन, सवातीन भाग की वेदी और एक भाग का आसनपट्ट बनावे ॥१०॥ तर्ध्व सार्थसप्तांशा यावत्पदृस्य पेटकम् । सार्धपञ्चाशकः स्तम्भः पादोनं भरणं भवेत् ॥११॥ भागा भरणं वापि सपादं सार्धतः शिरः । आसनपट्ट के ऊपरसे पाटके तलभाग तक साढे सात भाग करे। उनमे से साढे पांच भाग का स्तम्भ रक्खें। उसके ऊपर पौन अथवा आधे भाग की भरणी और इसके ऊपर सवा या डेढ़ भागकी शिरावटी रक्खें ॥११॥ पट्टो द्विभागस्तस्योचे कर्त्तव्यश्छाद्यकोदयः ॥१२॥ विभागः ललितं छाद्य' यावत्' पट्टस्य पेटकम् । अर्धाशोर्चा कपोतालि-विभागः पट्टविस्तरः ॥१३॥ शिरावटी के ऊपर दो भागका पाट रक्के । उसके ऊपर तीन भाग निकलता और पाटके रोटा भाग तक नमा हुया सुन्दर छज्जा बनावे। उसके ऊपर आधे भाग की केवाल बनावें, पाटका विस्तार दो भाग रक्खे ॥१२-१३।। मुखमंडप * विशेष जानकारी के लिए देखो अपराजितपृच्छा सूत्र १८४ श्लोक ५ से १३ तक 0000C 000000 h हक सियासत *. गरमा ९० गजपर जाहरभ सी १. तत्पेट पट्टपेटकम् ।

HODHA
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लूणवसही जैन मदिर
प्रावू
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अनुपम कोतरणी वाला स्तम
मडप का दृश्य

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लाATAMARHI
4UVE MUTIN
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न
आबू जैन मदिर के मडप के स्तभ और इलिका तोरण

सप्तमोऽध्यायः १२१ - -100-0 Andones memeto-conomeN -Reem - . स्तंभ का विस्तारमान और भेद- प्रासादाद् दशरुद्रार्क-भागेन स्तम्भविस्तरः । वेदाष्टरविविंशत्यः कर्णा वृत्तस्तु पञ्चधा ॥१४॥ प्रासाद के दसवा, ग्यारहवा अथवा बारहवा भागके बराबर स्तंभ का विस्तार (मोटाई) रक्खे । तथा चार, पाठ, बारह और वीस कोना वाला और गोल, ऐसे पाच प्रकार के स्तंभ हैं ॥१४॥ अपराजितपृच्छा सूत्र १८४ श्लोक ३५ मे तेरहवा और चौदहवा भाग के बराबर भी स्तंभ का विस्तार रखना लिखा है। प्राकृति से स्तंभसंज्ञा- "चतुरस्राश्च रुचका भद्रका भद्रसंयुताः । वर्द्ध मानाः प्रतिरथस्तथाष्टाश्चिाष्टास्रकाः॥ आसनोवें भवेद् भद्र-मष्टकर्णस्तु स्वस्तिकाः। प्रकर्तच्या पश्चविधा स्तम्भाः प्रासादरूपिणः॥" अप० सू०१८४ चार कोना वाला चतुरस्र, भद्रवाला भद्रक, प्रतिरथवाला वर्द्धमान, पाठ कोना वाला अष्टास्त्र और प्रापन के कार से भद्र और पाठ कोना वाला स्वस्तिक नाम का स्तंभ कहा जाता है । ये पांच प्रकार के स्तंभ प्रासाद के अनुसार बनाना चाहिये । क्षीराणग्रंथ के अनुसार स्तंभ का विस्तार मान- "एकहस्ते तु प्रासादे स्तम्भः स्याच्चतुरङ्गलः । द्वौ हस्ते चाइगुलं सप्त त्रिहस्ते च नवाङ्गलः॥ तस्योवं दशहस्तानां हस्ते हस्ते च द्वयनुला। सपादानला वृद्धिः स्यात् त्रिशद्धस्ते यदा भवेत् ।। अङ्गलेका ततो वृद्धिश्चत्वारिंशश्व हस्तके । तस्योय च शताद्ध च' पादोनमडगुलं भवेत् ॥" एक हाथ के विस्तार वाले प्रासाद का स्तभ चार अंगुल, दो हाथ के प्रासाद का स्तंभ सात अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद का स्तंभ नव अंगुल, चार से दश हाथ के प्रासाद का स्तभ प्रत्येक हाथ दो दो अंगुल, ग्यारह से त्रोस हाथ के प्रासाद का स्तभ प्रत्येक हाथ सवा सवा अंगुल, इकतीस से चालीस हाथ के प्रासाद का स्तंभ प्रत्येक हाथ एक एक अगुल और इकतालीस से प्रा०१६

१२२
प्रासादमण्डने
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000mmoemsonam
पच्चास हाथ के विस्नार वाले प्रासाद का स्तंभ पौन पौन अंगुल बढाकर स्तंभ का विस्तार
करना चाहिये।
स्तंभका अन्य विस्तार मान-
"एक हस्ते तु प्रासादे स्तम्भः स्याञ्चतुरङ्गलः ।
सप्ताङ्गलश्च द्विहस्ते विहस्ते तु नवाङ्गलः ।।
द्वादशाङ्गलविस्तारः प्रासादे
चतुर्हस्तके।
चतुर्हस्तादितः कृत्वा यावद् द्वादशहस्तकम् ॥
सार्धाडगुला भवेद् वृद्धिः प्रतिहस्ते विवद्धयेत् ।
द्वादशहस्तस्योवं तु यावत् त्रिंशद्धस्तकम् ॥
अङ्गलेका ततो वृद्धि-हस्ते हस्ते प्रदापयेत् ।
अत उध्वं ततः कुर्याद् यावत्पञ्चाशद्धस्तकम् ।।
अर्धाङ्गला भवेद् वृद्धिः कर्तव्या शिल्पिभिः सदा ।
उच्छ्य चतुगुणं प्रोक्त-मेतत्स्तम्भस्य लक्षणम् ॥"
इति ज्ञानप्रकाशदीपावे।
एक हाथ के प्रासाद मे स्तंभ का विस्तार चार अंगुल, दो हाथ के प्रासाद में सात
अंगुल, तीन हाथ के प्रासाद में नव अंगुल और चार हाथ के प्रासाद में बारह अंगुल रक्खे ।
पीछे पांच हाथ से बारह हाथ तक के प्रासाद में प्रत्येक हाथ डेढ डेढ अंगुल, तेरह हाथ
से तीस हाथ तक के प्रासाद मे प्रत्येक हाथ एक एक अंगुल और इकतीस से पचास हाथ तक के
प्रासाद मे प्रत्येक हाथ आवा प्राधा अगुल वढा करके स्तंभ का विस्तार रक्खे और विस्तार से
चार गुणी स्तंभ की ऊंचाई रक्खे।
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प्राग्नीव मंडप-
द्वारा स्तम्भवेद्याद्या प्राग्गीवो मण्डपो भवेत् ।
द्विद्विस्तम्भविवृद्धया च पोडशैवं प्रकीचिंता ॥१॥
प्रासाद के द्वारके आगे दो स्तंभवाली प्रथम वेदी है, वह प्रागग्रीव मंडप है । उनमें दो २
स्तंभ बढाने से सोलह प्रकार का प्रागग्रीव मंडप होता है ॥५॥
विशेप जानने के लिये देखो अपराजितपृच्छा सूत्र १८८ श्लोक १ से ११
आठ जाति के गूढ मडप--
मितिः प्रासादवद् गूढे मण्डपेऽष्टविधेषु च ।
चतुरस: सुभद्रश्च तथा प्रतिरथान्वितः ॥१६॥

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सर्वाङ्ग पूर्ण सागोपाग वाला प्राचीन देवालय
आमेर -जयपुर (राजस्थान)

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जगतशरणजी का प्राचीन मेरु मडोवर वाला देवालय
आमेर-जयपुर (राजस्थान)

सप्तमोऽध्यायः १२३ - needom -- --- 12mmendmoon- Heesh HOR 1.4 का स्तभो के नमुने HB भ- प्रासादमण्डने १२४ मुखभद्रयुतो वापि द्वित्रिप्रतिरथैयुतः । कर्णोदकान्तरेणाथ भद्रोदकविभूषितः ॥१७॥ आठ प्रकार के गूढ मंडपों की भी दीवार प्रासाद के दीवार जैसी बनावें अर्थात् प्रासाद की दीवार जितने थरवाली हों उतने थरवाली और रूपों की प्राकृति वाली हो तो रूपों की आकृति वाली गूढ मंडप की दीवार बनानी चाहिये । वे समचोरस, सुभद्र और प्रतिरथ वाला, मुखभद्र और दो या तीन प्रतिरथ वाला, कर्ण जलान्तर वाला अथवा भद्र जलान्तर वाला, ऐसे आठ प्रकार के गूढ मंडप है ॥१६-१७॥ संत राश्य गुदमंडय सत r ਜnਣੀ ਜ਼ नील ७ गुहम्मथ सप्तमोऽध्यायः Mam- Ms ०. ..moonam - ameen-e-on- Com गूढमण्डप की फालना- कर्णतो द्विगुण भद्रं पादोनप्रतिकर्णकः । मद्राधं मुखभद्रं च शेष पड्वसु भाजितम् ॥१८॥ कोने से दुगुणा भद्र और पौन भाग का प्रतिरथ रखखे, भद्र से प्राधा मुखभर रक्खे । बाकी नंदी प्रादि छट्ठ अथवा पाठवे भाग की रक्खे ॥१८॥ दलेनार्धन पादेन दलस्य निर्गमो भवेत् । मूलप्रासादवद् वाझे पीठजङ्घादिमेखला ॥१६॥ फालनाणे का निर्गम अपना चौथा अथवा प्राधा भाग का रक्खे तथा पीठ जंघा आदि की मेखलाएं मुख्य प्रासाद के जैसी बाहर निकलती हुई बनावे ॥१९॥ गवाक्षणान्वितं भद्र-मथ जालकसंयुतम् । गूढोऽथ कर्णगूढो या भद्रे चन्द्रावलोकनम् ॥२०॥ गूढ मंडप के भद्र मे जाली अथवा गवाक्ष बनावे । कोने गुप्त (अंधकार मय) रक्खें अर्थात दीवार बनावे अथवा भद्र मै चद्रावलोकन (खुला भाग) रखें ॥२०॥ त्रिद्वारे चैकवक्त्रेऽथ मुखे कार्या चतुष्किका । गूढे प्राकाशके वृत्त-मोदयं करोटकम् ॥२१॥ इत्यष्टगृढमण्डपाः। गूढ मंडप मे तीन अथवा एक द्वार बनावे और द्वारके आगे चौकी मंडप बनावे । मंडप को गोलाई के विस्तार मान से आधे मान का करोटक (गुमट) का उदय रक्खे ॥२१॥ विशेप जानने के लिये देखे अप० सू० १८७ वर्द्ध मानादि अष्टमंडप । गूमटके उदयका तीन प्रकार- "प्रोदयश्च यत्प्रोक्तो वामन उदयो भवेत् । कृते चैव भवेच्छान्तिः सर्वयज्ञफल लभेत् ।। अधोदयश्च नवधा द्वी भागौ परिवर्जयेत् । उदयो नाम सर्वलोकसुखावह ॥ अर्धोदयश्च नवधा प्रयभागान् परित्यजेत् । वाराह उदयो अनन्तफलदायकः ॥" ज्ञानरलकोशे। . अनन्त नाम 5 १२६ प्रासादमण्डत गुमट का ऊक्य विस्तार से प्राधे मानका रवखें, यह वामन नाम का उदय कहा जाता, यह सब यज्ञों के फल को देने वाला है और शान्तिदायक है। उदय का,नव भाग कर, उन में से दो भाग कम करके सात भाग का उदय रक्खें, उसको अनन्त नाम का उदय कहते हैं, यह सब लोगों के लिये सुख कारक है । नव भाग मे से तीन भाग कम करके छह भाग का उदय रक्खें उसको वाराह नाम का उदय कहते हैं । यह अनन्त फल को देने वाला है। गूमट का न्यूनाधिक उदय फल-- "उदयाश्च समाख्याता अनन्त फलदायकाः । तर देशे भवेच्छान्ति-रारोग्यं च प्रजायते ।। उदये हीनाश्च ये केचित क्रियन्ते मण्डपा भुवि । तत्र मारी महाव्याधी राष्ट्रमनभयं भवेत् ॥ दुभिक्षं चातिरोन च राजा च म्रियते तथा। धनं निष्फलतां याति शिल्लिनो नियन्ते ध्रुवम् ॥” इति ज्ञानरत्नकोशे, उदय का जो मान बतलाया है, उसी मान के अनुसार कार्य करने से वह अनन्त फल, को देने वाला, देश में शान्ति करने वाला और आरोग्यता को बढ़ाने वाला है । यदि ये मंडप 'कहे हुए उदय के मान से हीन कर तो देश में महामारी, अनेक प्रकार की व्याधियां, देश का भय, भयंकर दुभिक्ष, राजा को मृत्यु, धनकी निष्फलता और शिल्पियों की मृत्यु, इत्यादि उपद्रव होने का भय है। बारह चौको मंडप- एकत्रिवेदषट्सप्ता-कचतुष्क्यस्त्रिकाये अग्रे भद्रं विना पावें पार्श्वयोरग्रतस्तथा ॥२२॥ अग्रतस्त्रिचतुष्क्यश्च तथा पार्थद्वयेऽपि च । मुक्तकोणे चतुष्के चेदिति द्वादश मण्डपाः ॥२३॥ गूढमंडप के आगे एक, तीन, चार, छह, सात और नव चौकी वाले, ये छह प्रकार के मंडप हुए, उनमें छट्ठा नव चौकी वाले मंडप के प्रागे एक चौकी हो ७, अथवा आगे चौकोन हो परन्तु दोनों बगल मे एक एक चौकी हो प, तथा दोनों बगल में और आये एक एक चौको हो २, अथवा प्रागे तीन चौको हो, अर्थात तीन तीन चौकी वाली चार लाईन हो १०, इसके दोनों वगल में एक २ चौको हो ११ अथवा दोनों बगल में और आगे एक २ चौकी हो १२, ऐसे बारह प्रकार के चौकी मंडप हैं ।।२२-२३॥ . . - - " सप्तमोऽध्यायः -e-000-- १२७ e-mememomosome--- अपराजितपुच्छा सूत्र १८७ मे विशेषरूप से कहा है कि- गुढ मंडप के आगे एक चौकी वाला सुभद्र १, तीन चौकी वाला किरीटीर, तीन चौकी के आगे एक चौको, ऐसा चार चौकी वाला दुंदुभी ३, तीन २ चौकी की दो लाईन, ऐसा छह चौको वाला प्रान्त ४, छह चौकी के आगे एक चौकी ऐसा सात चौकी वाला मनोहर कामद ५, चौकीमण्डवा २२पद शिर सम 6u स्यका Res . १२ चाकमयडय २यद १२२६ --- तन स . ६ पदम DELHD मो aai यदाय सा R ---- O शांत ध्यदे दिन बाद (१९ DOC प O भूमि Oi FRO SANA १२८ प्रासादमण्डने तीन २ चौकी की तीन लाईन ऐसा नव चौकी वाला शान्त नाम का मंडप कहा जाता है ॥६॥ शान्तमंडा के आगे एक चौको हो तो नंद ७, शान्तमंडप के आगे चौकी न हो, दोनों बगल में एक २ चौकी हो तो सुदर्शन ८, शान्तमंडप के आगे और दोनों बगल मे एक २ चौकी हो तो रम्यक ६, तीन २ चौकी वाली चार लाईन हो तो सुनाभ १०, सुनाभ मंडप के दोनो बगल मे एक २ चौकी हो तो सिंह ११, ओर सिंह मंडप के आगे एक चौकी हो तो सूर्यात्मक नामका मंडप १२ कहा जाता है । इन मंडपों के ऊपर गूमट अथवा संवरणा किया जाता है। गूढस्याग्रे प्रकर्तव्या नानाचतुष्किकान्विताः । चतुरस्त्रादिभेदेन वितानहुभियुताः ॥२४॥ इति द्वादशत्रिकमंडपाः। रियायम सुभद्र सम) 2 पाक्षिक उम सिरक ३६ ( ककार वसमा રામ मुख्यकारिमण्यो. बर्षण सुग्रीय રામ ਕਅਕ मालव રમ, ३० नवुन RON मुजय- म .. अनुमी Bl विशाला म सप्तमोऽध्यायः १२६ ma- -- ----- A- - ऐसे ये बारह प्रकार के मंडप गूढ मंडप के आगे अनेक प्रकार के चौकी वाले किये जाते हैं। तथा ये मंडप समचौरस आदि प्राकृति वाले और अनेक प्रकार के वितान (चदोवा) वाले होते हैं ।।२४॥ नृत्यमण्डप- त्रिकाये रङ्गभूमिर्या तत्रैव नृत्यमण्डपः । प्रासादाग्रेऽथ सर्वत्र प्रकुर्याच विधानतः ॥२॥ चौकी मंडप के आगे जो रंगभूमि है, उसी भूमि के ऊपर ही नृत्यमंडप किया जाता है। ऐसा सरप्रामादो के आगे बनाने का विधान है ।।२।। म 0 (भावस २० स्थावर luodia पुष्यकादि मण्डयो स (गजमेर मी

१३०
प्रासादमण्डने
common-
-
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---
Manacpm-masameeroeimes
सप्तविंशति मण्डप-
सप्तविंशतिरुत्ता ये मण्डपा विश्वकर्मणा ।
तलैस्तु विषमैस्तुल्यैः क्षण स्तम्भैः समैस्तथा ॥२६॥
प्रथमो द्वादशस्तम्भो द्विद्विस्तम्भविवर्द्धनात् ।
यावत् पष्टिश्चतुयुक्ताः सप्तविंशतिमण्डपाः ॥२७॥
श्री विश्वकर्मा ने जो सत्ताईस प्रकार के मंडप कहे है उनके तल सम अथवा विषम कर
सकते हैं, परन्तु क्षण (खड ? ) और स्तंभ ये सम संख्या मे ही रखना चाहिये। पहला मंडप
बारह स्तंभ का है। पीछे दो २ स्तंभ की वृद्धि चौसठ स्तंभ तक बहाने से सत्ताईस मंडप
होते है ॥२६-२७॥
विशेष जानने के लिये देखें समरांगण सूत्रधार अध्याय ६७ और अपराजितपृच्छा
सूत्र १८६ वा । इन दोनो मे प्रथम मंडप चौसठ स्तंभों का लिखा है, पीछे दो २ स्तंभ घटाने से
सत्ताईसवा मंडप बारह स्तभ का बनाने को कहा है।
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Burea सुधकावि२७
मयडपो
२२
(सुगनदन
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मुख्यमत
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Ravin
--
अष्टास्त्र और षोडशास्त्र--
क्षेत्राथू स्वपडशोन-मेकालेऽष्टासमुच्यते ।
कलासः क्षेत्रषड्भागास्तत्पदंशेन संयुतः ॥२८॥

सप्तमोऽध्यायः Pooootmammon- क्षेत्र के विस्तार के प्राधे का छह भाग करे, उनमे से एक भाग कम करके बाकी पांच भाग के मान को अष्टान की एक भुजा का मान जाने । यदि पोडशास्त्र बनाना हो तो क्षेत्र के विस्तार का छह भाग करे। उनमे से एक भाग का छठा भाग विस्तार के छठे भाग में जोड़ देने से जो मान हो, यही मानको पोडशाल की एक भुजा का मान होता है ।।२।। वितान (चंदोवा-गूमट)- अष्टास्त्र पोडशास्त्रं च वृत्वं कुर्यात् तव॑तः । उदयं विस्तरार्धेन पट् पञ्च सप्त वा भवेत् ॥२६॥ मंडप के चंदोवा का उदय बनाने की क्रिया इस प्रकार है। प्रथम पाट के आर अष्टास्त्र बना कर उसके जार पोडशान बनावे और पोडशास्र के ऊपर गोलाई बनावें। मंडप के विस्तार से आधा वितान का उदय रखे । उदय मे पाच छह अथवा सात थर वनावे ॥२९॥ वितान (गूमट) के थर- कर्णदर्दरिका सप्त-भागेन निर्गमोन्नता' । रूपकण्ठस्तु पञ्चांशो द्विभागेनात्र निर्गमः ॥३०॥ - घl. कोल REEKREEHEAKERE KHEHEK: BICINSKI FAS SVIEITal មិន मिनार-२३ भाग उप... KKISH IKI 6341 ६- ना श्यक REAK HERI त्राREHETKRRIER वितान विस्ताहमागद माया १. "निर्गमोच्छयः।' २. 'विभागोन्नत।'

प्रासादमएडने monamoroomam00000 Redmaswomen-00- - mes JANAMA 044 44 -- कर्णदर्दरिका का थर सात भाग के उदय में और सात भाग निगम में रक्खे । रूपकंठ का उदय पांच भाग और निर्गम दो भाग रवखें ॥३०॥ विद्याधरैः समायुक्तं पोडशाष्टदिवाकरैः । जिनसंख्यामितैर्वापि दन्ततुल्यैविराजितम् ।।३१॥ आठ, बारह, सोलह, चौबीस अथवा बत्तीस विद्याधरों से युक्त सुन्दर वितान बनावे ॥३१॥ विद्याधरः पृथुत्वेन सप्तांशो निर्गमो' दश । तदुचे चित्ररूपाश्च नर्तक्यः शालभञ्जिकाः ॥३२॥ विद्याधर का थर विस्तार मे सात भाग और निर्गम मे दस भाग रक्खे। उसके ऊपर अनेक प्रकार से नृत्य करती हुई, अनेक स्वरूप वालो देवांगना रक्खें ॥३२॥ गजतालुस्तु षट्सार्धा प्रथमा द्वितीया तु षट् । तृतीया सार्धपञ्चांशा कोलानि त्रीणि पंच वा ॥३३॥ प्रयम गजतालु साढे छह भाग, दूसरा गजतालु छह भाग और तीसरा गजतालु साढे पांच भाग का रक्खे। तीन अथवा पांच कोल का थर बनावें ॥३३॥ मध्ये विज्ञानं कर्त्तव्यं चित्रवर्णविराजितम् । नाटकादिकथारूपै- नाकारैविराजितम् ||३४|| मडप के मध्य मे वितान (चंदोवा ) अनेक प्रकार के चित्रों से शोभायमान बनावे तथा संगीत और नृत्य करती हुई देवागनामो से और पुराणादि के अनेक प्रकार के कथारूपों से सुशोभित बनावे ॥३४॥ वितान संख्या- एकादशशतान्येव विवानानां त्रयोदश । शुद्धसङ्घाटमिश्राणि क्षिप्तोत्क्षिप्तानि यानि च ॥३॥ ग्यारहसौ तेरह प्रकार के वितान है। वे शुद्ध संघाट (समतल वाले), संघाटमिश्र सम विपम तल वाला, क्षिप्त ( नोचे भान मे लटकते थरो वाला) और उत्क्षिप्त (ऊपर उठी हुई गोलाई वाला) ये चार प्रकार के वितान है ॥३५॥ १. 'निर्गमोदयः।' २. 'नृत्यशोभिताः।'

सप्तमोऽध्यायः -- अपराजित पृच्छा सूत्र. १८६ मे श्लोक ४ मे वितान के मुख्य तीन प्रकार लिखे है । देखो- "वितानानि विचित्राणि क्षिप्तान्युत्सिप्तकानि च । समतलानि ज्ञेयानि उदितानि त्रिधा क्रम त् ॥" क्षिप्त, उत्क्षिप्त और समतल ये तीन प्रकार के वितान कहे हैं। वर्ण और जाति के चार प्रकार के वितान-- "पद्मको नाभिच्छन्दश्च सभामार्गस्वतीयकः। मन्दारक इति प्रोक्तो वितानाश्च चतुविधाः॥" अप० सू० १८६ श्लो० ६ पाक, नाभिछद, सभामार्ग और मन्दारक ये चार प्रकार के वितान हैं। 'पद्मको विप्रजाति: स्यात् क्षत्रियो नाभिच्छन्दकः । सभामार्गों भवेद् वैश्यः शुद्रो मन्दारकस्तथा ।" श्लो०७ व हाण जाति का पक, क्षत्रिय जातिका नाभिछद, वैश्यजातिका सभामार्ग और शूद्रजातिका मंदारक नामका वितान है। "पद्मकः श्वेतवर्णः स्यात् क्षत्रियो रक्तवर्णकः । सभामार्गों भवेत् पीतो मन्दारः सर्ववर्णकः ॥ श्लो०८ सफेद वर्ण का पाक, लाल वर्ण का नाभिछंद, पीले वर्ण का सभामार्ग और अनेक वर्ण का मंदारक है। फिर अपराजित पृच्छा सूत्र १६० मे भी चार प्रकारके वितान कहे है- "वितानांश्च । प्रवक्ष्यामि भेदस्तच चतुर्विधम् । पद्मक नाभिच्छन्दं च सभा मन्दारकं तथा ॥ श्लो०१ शुद्धश्च छन्दसंबाटो भिन्न उद्भिन्न एव च । एतेपा सन्ति ये भेदाः कथये तान् ममासतः॥ श्लो०२ चार प्रकार के वितानो को कहता हू । पद्मक, नामिच्छद, सभा और मन्दारक इन चार प्रकार के वितान के शुद्ध, संघाट, भिन्न और उद्धिन ये चार मैद है । उसको संक्षेप से कहता हूँ। "एकवे च भवेच्छुद्धः संघाटश्च द्विमिश्रणात् । त्रिमिधाश्च तथा भिन्ना उद्भिन्नाश्चतुरन्विताः॥" श्लो० ३ एकही प्रकारको प्राकृति वाले शुद्ध, दो प्रकार की मिश्र प्राकृति वाले सघाट, तीन प्रकार को प्राकृति वाले भिन्न और चार प्रकार की आकृति वाले उद्भिन्न नामके वितान है। "पद्मनाभ सभापद्म सभामन्दारकं तथा । कमलोद्भवमाख्यातं मिश्रकाणा चतुष्टयम् ।।" लो० ४

प्रासादमण्डने
१३४
Poem-
..
पद्मनाभ, सभापम, सभामन्दारक और कमलोद्भव ये चार मिश्र जाति के
वितान हैं । "किन्तु इसमे इसको आकृतियो का वर्णन नहीं लिखा है।'
वितानानि विचित्राणि वस्त्रचित्रादिमेदतः ।
शिल्पिलोके प्रवर्तन्ते तस्माद्यानि लोकतः ॥३६॥
जैसे अनेक प्रकार के चित्र आदि से विभिन्न प्रकार के वस्त्र है, वैसे ही शिल्पशास्त्र में
अनेक प्रकार के वितान है। वे अन्य शास्त्रों से विचार करके बनावे ॥३६॥
रंगभूमि--
मण्डपेषु च सर्वेषु पीठान्ते रङ्गभूमिका ।
कुर्यादुत्तानपट्टेन चित्रपाषाणजेन च ॥३७॥
इति मण्डपाः।
समस्त मंडपो की पीठ के नीचे की जो भूमि है, वह रंग भूमि कही जाती है । वह बड़े
लबे चौड़े पाषाणों से तथा अनेक प्रकार के चित्र विचित्र पाषाणों से बनाने चाहिए ॥३७॥
बलाणक का स्थान--
बलाणं देवगेहाने राजद्वारे गृहे पुरे ।'
जलाश्रयेऽथ कर्तव्यं सर्वेषां मुखमण्डपम् ॥३८॥
देवालय के द्वार के प्रागे तथा प्रवेश द्वारके ऊपर, राजमहल, गृह, नगर और जलाश्रय
( बावडी, तालाब आदि ) इन सब के द्वार के आगे मुखमंडप ( बलाणक ) किया
जाता है ॥३८॥
--
बलाणक का मान-
जगतीपादविस्तीर्थ पादपादेन वर्जितम् ।
शालालिन्देन गर्भेण प्रासादेन सर्म मवेत् ॥३६॥
बलाणक का विस्तार जगतो का चौथा भाग का अथवा चौथे का चौथा भाग न्यून,
शाला और अलिद के मान से, प्रासाद के गर्भमान के अथवा प्रासाद के मान के बराबर
बनावे ॥३॥
प्रासाद मे बलाणक का स्थान--
उत्तमे कन्यसं मध्ये मध्यं ज्येष्ठं तु कन्यसे ।
एकद्वित्रिचतुःपञ्च-रससप्तपदान्तरे ॥४०॥

सप्तमोऽध्यायः १३५ CHAN- --. ou - - DRON. ma- -- Dome- ज्येष्ठमान के प्रासाद में कनिष्ठ मान का, मध्यममान के प्रासाद में मध्यम मान का और कनिष्ठमान के प्रासाद मे ज्येष्ठमान का बलाक किया जाता है। यह प्रासाद से एक, दो तीन, चार, पाच, छह अथवा सात पद के अन्तर से (दूर ) बनाया जाता है * ॥४०॥ मूलप्रासादचद् द्वारं मण्डपे च बलाणके । न्यूनाधिकं न कर्तव्यं दैये हस्ताङ्गुलाधिकम् ॥४१॥ मइप का द्वार और बलाक का द्वार मुख्य प्रासाद के द्वार के बराबर रखना चाहिये । यदि वढाने की आवश्यकता हो तो द्वार की ऊंचाई मै हस्तागुल (जितने हाथ का हो उतने अंगुल) बढ़ा सकते है । यह नीचे के भाग मे वढाना चाहिये, क्यों कि उत्तरंग तो सब समसूत्र में रखा जाता है ऐसा शास्त्रीय कथन है ।।४।। उत्तरंग का पेटा भाग- पेटकं चोत्तरङ्गानां सर्वेषां समसूत्रतः । अङ्गणेन समं पेटं जगत्याश्चोत्तरङ्गजम् ॥४२॥ सव उत्तरंग का पेटा भाग ( उत्तरंग के नीचे का भाग) समसूत्र मे रखना चाहिये और जगती के द्वार के उत्तरंग का पेटा माग प्रासाद के प्रागन जगती के मथला बराबर रखना चाहिये ॥४२॥ पांच प्रकार के वालाणक- जगत्यग्रे चतुष्किका' वामन तद् बलाणकम् । वामे च दक्षिणे द्वारे वेदिकामत्तवारणम् ॥४३॥ जगती के आगे की चौकी के ऊपर जो बलाणक किया जाता है, वह वामन नामका बलाणक कहा जाता है । उसके बायी और दाहिनी ओर के द्वार पर वेदिका और मत्तवारण किया जाता है ॥४३॥ ऊर्धा भूमिः प्रकर्चव्या नृत्यमण्डपसूत्रतः । मत्तवारणं वेदी च विवानं तोरणैयुवा ॥४४॥ - * अपराजित पृच्छा सूत्र १२२ श्लोक १० मे एक से माठ पद के प्रतरे भी बनाना लीखा है । १'चतुष्की या'।

प्रासादमएडने
--
2000mmmmmmmmepumeroomom
बलाणक को ऊर्श्वभूमि नृत्यमंडप के समसूत्र में रखनी चाहिये । तथा मत्तवारण, वेदी,
वितान और तोरणों से शोभायमान बनानी चाहिए ॥४४॥
राजद्वारे बलाणे च पञ्च वा सप्तभूमिकाः ।
तद्विमानं बुधैः प्रोक्तं पुष्करं वारिमध्यतः ॥४॥
राजद्वार के ऊपर जो राव अथवा सात भूमिवाला बलाणक किया जाता है, उसको
विद्वान् शिल्ली विमान अथवा उत्तुंग नामका बलारणक कहते है । तथा जलाश्रय के बलाणक
को पुष्कर नामका बलाणक कहते है ॥४५॥
हर्म्यशालो गृहे वापि कर्तव्यो गोपुराकृतिः ।
एकभूम्यास्त्रिभूम्यन्तं गृहाग्रद्वारमस्तके ॥४६॥
इति पंचबलारणकम् ।
गृहद्वार के आगे एक, दो अथवा तीन भूमिवाला जो बलाक किया जाय, उसका नाम
हर्म्यशाल है । वह गोपुराकृति वाला बनाया जाता है । ( किले के द्वार के ऊपर जो बलाएक
किया जाता है, उसको गोपुर नाम का बलारणक कहते है)।
कौन २ देव के आगे बलाणक करना--
"शिवसूर्यों ब्रह्मविष्णू चण्डिका जिन एव च ।
एतेपा च सुराणा च कुर्यादग्ने बलाणकम् ॥" अप० सू० १२३
शिव, सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु, चडिका और जिन, इन देवो के आगे बलाणक बनाना
चाहिए।
सवरणा-
संवरणा प्रकर्तव्या प्रथमा पञ्चघण्टिका ।
चतुर्घण्टाभिवृद्ध्या च यावदेकोचरं शतम् ॥४७||
मंडप आदि के ऊपर गुमटी के स्थान पर संवरणा की जाती है। प्रथम संबरणा पांच
घंटो को है । आगे प्रत्येक संवरण को चार चार घंटी की वृद्धि से एक सौ घंटो तक बढाया
जाता है॥४७॥
पञ्चविंशति रित्युक्ताः प्रथमा वसुभागिका ।
वेदोचरं शतं यावद् वेदांशा वृद्धिरिष्यते ॥४८॥

सप्तमोऽध्यायः १३७ -- -dontem७-. ------ wommonamesnewmom-- - - mmmmmmmemammommammeen- उपरोक्त टिका की संख्यानुसार संवरणा पच्चीस प्रकार की हैं। उन में प्रथम संवरणा की भूमि का पाठ आठ भाग करें। पीछे प्रत्येक संवरणा में चार चार भाग एक सौ चार भाग तक बढाने चाहिये ॥४॥ भद्राधे रथिकाधे च तवङ्ग वामदक्षिणे। अर्धोदयेन रथिका घण्टा कूटं तवङ्गकम् ।।४६॥ भद्राध की रथिका के मान का दोनो तरफ तवग बनावे । रथिका, घंटा, कूट और तवंग, ये विस्तार से प्राधा उदय में रखें ॥४९॥ मलयाय बलिका पुस्तिका पिटया पEिa me AR.ओ.स्थान मा म पुष्पिका नाम की प्रथम संवरणा प्रा० १८ प्रासादमण्डने प्रथम संवरणा- कलाकूटान्विता पूर्वा पञ्चभिः कलशैयुता । भागतुल्यैस्तथा सिंह-रेवमन्याश्च लक्षिताः ॥५०॥ इति मण्डपोर्ध्वसंवरणाः। इति श्री सूत्रधार मण्डनविरचिते प्रासादमण्डने मण्डपबलाणक- संवरणाधिकारे सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ - नरिकी नामधारामागर. पग्लिाएeal, सिंह inओ.स्वति. ना TU नंदिनी नाम की दूसरी संवरणा सप्तमोऽध्यायः १३६ ܐ प्रथम सवरणा सोलह कूट और पांच घंटाकलश वाली है। तथा कर्ण और उद्म के के ऊपर तल भाग के तुल्य (पाठ) सिंह रक्खे । इस प्रकार अन्य संवरणा बनायी जाती है ॥५०॥ पच्चीस संवरणा के नाम- "पुष्पिका नन्दिनी चैव दशाक्षा देवसुन्दरी । कुलतिलका रम्या च उद्भिन्ना च नारायणी । नलिका चम्पका चैव पद्माख्या च समुद्भवा । त्रिदशा देवगाधारी रत्नगर्भा चूडामणिः ॥ हेमकूटा चित्रकूटा हिमाख्या गन्धमादिनी। मन्दरा मालिनी ख्याता कैलासा रत्नसम्भवा ।। मेरु कुटोद्धवा स्याताः संख्यया पञ्चविंशतिः।" अप० सूत्र १६३ श्लोक २ से ५ पुष्पिका, नन्दिनी, दशाक्षा, देवसुन्दरी, कुलतिलका, रम्या, उभिन्ना, नारायणी, नलिका, चम्पका, पद्मा, समुद्भवा, त्रिदशा, देवगान्धारी, रत्नगर्भा, चूडामणि. हेमकूटा, चित्रकूटा, हिमाख्या, गन्धमादिनी, मन्दरा, मालिनी, केलासा, रत्नसंभवा और मेस्कूटा, ये ये पच्चीस संवरणा के नाम है। ज्ञानरत्नकोश नास के ग्रन्थ मे बत्तीस संवरणा लिखा है। उनके नाम भी अन्य प्रकार के है। घटिका की संख्या प्रासाद के मानानुसार लीखी है । जैसे-एक या दो हाथ के प्रासाद के अपर पांच घंटिका वाली संवरण तीन हाथ के प्रासाद के उपर नव, चार हाथ के प्रासाद के ऊपर तेरह, इस प्रकार पचास हाथ के प्रासाद के पर एकसी उनतीस घंटिका चढाना लोखा है । तथा घंटिकाओं की संख्यानुसार बत्तीस संवरणा के नाम लीखे है। जैसे-पाच घंटावालो पमिनो, नव घंटावाली मेदिनी, तेरह घंटावाली कलशा, इस प्रकार एकसी उनतीस घंटावाली राजवर्द्धनी है। प्रथमा पुष्पिका संवरणा- "चतुरस्त्रीकृते क्षेत्र अष्टधा प्रतिभाजिते । उच्छयः स्याच्चतुभांगैः सर्वासामर्षोदयः ।। मूलकूटोद्भवा. कर्णा द्विभागे. पृथग विस्तरा। भागोदया विधातव्या. कूटा वै सर्वकामदाः ।।"

प्रासादमण्डने
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प्रथम संवरणा की समचोरस भूमिका पाठ भाग करें, उसमें चार भाग संवरणा का
उदय रक्खें। सब संवरणा विस्तार से आधी उदय में रखें । कर्ण के ऊपर मूल घंटा दो, भाग
विस्तार वाली और एक भाग का उदयवाली बनावें एवं कूटा भी विस्तार से प्राधा
उदय में रक्खें।
॥
छायोमास्तदर्धे च कर्णे कर्णे च पण्टिका ।।
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१८ वंशबादी से वर्तमान मासी भवती
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१८ वी शताब्दि से आधुनिक समय की सवरणा शैली ।

album जेसलमेर जैन मदिर के मडप की सवरणा

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कीति स्तंभ - चितौड़गढ़

सप्तमोऽध्यायः १४१ money-msammar तपा भद्रकटाश्च शृङ्गकटास्तदर्धतः । सिंहस्थाना कर्णघण्टी बृहद्घण्टी तदूर्ध्वतः ।। संवरणागर्भमूले रथिका द्वयंशविस्तरा । भागका चोदये कार्या भागा पक्षतवङ्गिका ।। तदूर्वे उद्मो भाग-स्तवङ्गोषे च कूटकः । सिंह वै उदमोवं उरोधण्टा भागोपरि। तदुपरि सिंहस्थानं भागेकं च विनिर्गतम् । तस्योपरि मूलघण्टा द्विभागा च भागोच्छया । अष्टसिंहः पञ्चघण्टेः कूटैरेवं द्विरष्टभिः । चतुभिर्मूलकूटश्च पुष्पिका नाम तु नामतः।।" 'छन्ना के उद्गम के अर्धमान का कोने कोने के ऊपर घंटिका रक्खे। उसके जैसा भद्र का कूट बनावे व इससे प्राधे भाग का शृंगकूट रक्खे । कर्णघंटी पर सिंह रक्खें । उसके ऊपर बोच में बड़ो घंटो रक्खें। संवरणा के गर्भ के मूल मे दो भाग के विस्तार वाली रथिका बनावें और यह उदय में एक भाग की रक्खे । इसके दोनो तरफ तवंगा एक एक भाग की रक्खें और रथिका के ऊपर एक भाग उदय वाला उदम बनावे । तवंगा के ऊपर कूट रखें । उगम और बडी कर्णघंटी के ऊपर सिह रक्खे, उसका निर्गम एक भाग रखे । उसके ऊपर दो भाग के विस्तारवाली और एक भाग का उदय वाली मूलघंटा रक्खे । पाउसिंह ( चार कर्ण और चार भद्र के उदम अपर ) पाच बडी घंटी, सोलह कूट और चार मूलकूट वाली प्रथम पुष्पिका नाम को संवरणा होती है। दूसरो नन्दिनी नाम को सवरणा- "तवङ्गकटयोर्मध्ये तिलकं वयं शबिस्तरम् ।। भागोदयं विधातव्यं रूपसंघाटभूषितम् ॥ तवङ्गरथिकाश्चैव द्विभागोदयिन. स्मृताः। अष्टचत्वारिंशतकूटा मूले स्युः पूर्ववत्तथा ॥ नवघण्टा समायुक्ता स्याद्वै द्वादसिंहतः। नन्दिनी नामविख्याता कर्तव्या शान्तिमिच्छता ॥ कार्या तिलकवृद्धिश्च यावत्क्षेत्रं वेदालकम् । मण्डपवलनिष्कास-भक्तिभागैस्तु कल्पना।

प्रासादसड्ने
बृहद्दभिन्नोद्भिन्ना मण्डपक्रमभागतः ।,
आसां युक्तिविधातव्या मेरुकटान्तकल्पना !
तवंग और कूटके मध्य में दो भाग
के विस्तारवाला और एक भाग के उदय
वाला तलके भूषणरूप तिलक बनावे
तवंगा और रथिका ये दोनों दो भाग के
उदयवाले बनावें । अडतालीस कटा।
नवघण्टा और बारह सिंह वाली नन्दिनी.
नाम की संवरणा शांति की इच्छा
रखने वाले बनावें । समचोरस क्षेत्र के
भागों में तिलककी वृद्धि करनी चाहिये।
मंडप को विस्तार से आधा उदय में
रक्खें। भूमि के बारह भाग की. कल्पना
करे। संवरणायें भिन्न और उद्भिन्न
मी जी की मामी मा यती शेती होती हैं । मण्डप के अनुक्रम
पचीसवीं मेरुकूटा नाम की संवरणा
तक इस प्रकार युक्ति से अन्य संवरणायें,
में
भाग से
HAHER .
बनावें।
इति श्री मंडनसूत्र धार विरचित
प्रासादमंडन के मंडप बलाणक संव
रणा लक्षणवाला सातवां अध्याय की
पंडित भगवानदास जैन ने सुबोधिनी
नाम की भाषा टोका रचो ॥७॥

प्रकथ्यते ॥१॥ अथ प्रासादमण्डनेऽष्टमः साधारणोऽध्यायः अथ साधारणोऽध्यायः सर्वलक्षणसंयुतः । विश्वकर्मप्रसादेन विशेपेण श्री विश्वकर्मा के प्रसाद से सर्व लक्षणो वाला साधारण नाम का यह आठवां अध्याय कुछ विशेषरूप से कहा जाता है ॥१॥ शिवलिंग का न्यूनाधिक मान- 'मानं न्यूनाधिकं वापि स्वयंभूवाणरत्नजे । घटितेपु विधातव्य-मर्चालिङ्गेषु शास्त्रतः ॥२॥ स्वयंभूलिंग, बाणलिंग और रलका लिंग, ये मान मे न्यूनाधिक हो तो दोप नहीं है। परन्तु घड़ा हुप्रा शिवलिंग और मूत्ति तो शास्त्र मे कहे हुए मानानुसार ही होना चाहिये ॥२॥ वास्तुदोष- बहुलेपमल्पलेपं समसन्धिः शिरोगुरुः । सशन्यं पादहीनं तु तच्च वास्तु विनश्यति ॥३॥ अधिक लेपवाला, कम लेपवाला, सांध के ऊपर सांध वाला, ऊपरका हिस्सा मोटा और नीचे पतला, शल्यवाला और कम नीव वाला, ऐसे वास्तु का शीघ्र ही नाश हो जाता है ॥३॥ - निषेधवास्तुद्रव्य- अन्यवास्तुच्यूतं द्रव्य-मन्यवास्तुनि योजयेत् । प्रासादे न भवेत् पूजा गृहे तु न वसेद् गृही ॥४॥ किसी मकान आदि का गिरा हुआ ईट, चूना, पाषाण और लकडी आदि वास्तु द्रव्य, यदि मंदिर मे लगावें तो देव अपूजित रहें और घरमे लगावे तो मालिक का निवास न रहे, अर्थात् मंदिर और गृह शून्य रहे ॥४॥ १ 'मान' के स्थान पर 'वृप' होना चाहिये । क्योकि अपराजित पृच्या सूत्र० १०६ श्लो० ११ मे लिखा है कि-'वृप न्यूनाधिकं वाणे रलजे च स्वयम्भूवि' अर्थात् वाण, रत्न और स्वयभूलिंग के मंदिर में नदी का मान न्यूनाधिक भी हो सकता है। --- प्रासादमण्डने --.. -open-0000-00-00- --- wome-weNMomen - शिवालय उत्थापनदोष- स्वस्थाने संस्थितं यस्य विप्रवास्तुशिवालयम् । अचान्यं सर्वदेशेषु चालिते राष्ट्रविभ्रमः ॥५॥ अपने स्थान मे यथास्थित रहा हुमा और ब्राह्मणों से वास्तु पूजन किया हुआ, ऐसे शिवालय को चलायमान नहीं किया जाता। क्योंकि अचल (चलायमान न हो), को यदि चलायमान किया जाय तो राष्ट्रों में परिवर्तन होता है ॥५॥ जीर्णोद्धार का पुण्य-- वापीकूपतडागानि प्रासादभवनानि च । जीर्णान्युद्धरते यस्तु पुण्यमष्टगुणं लभेत् ॥६॥ वावडी, कुमां, तालाब, प्रासाद (मंदिर) और भवन, ये जीर्ण हो गये हों तो उनका उद्धार करना चाहिये । जीर्णोद्धार करने से पाठ गुना फल होता है ।।६।। जीर्णोद्धार का वास्तु स्वरूप- तद्रूपं तत्प्रमाणं स्यात् पूर्वसूत्रं न चालयेत् । हीने तु जायते हानि-रधिके स्वजनक्षयः' ॥७॥ जीर्णोद्धार करते समय पहले का वास्तु जिस आकार और जिस मानका हो, उसी आकार और उसी मानका रखना चाहिये । अर्थात् पहले के मानसूत्र में परिवर्तन नही करना चाहिये। प्रथम के मान से कम करे तो हानि होवे और अधिक करे तो स्वजन की हानि होवे ॥१॥ वास्तु द्रव्याधिकं कुर्यान्मृत्काष्ठे शैलजं हि वा । शैलजे धातुजं वापि धातुजे रत्नजं तथा ॥८॥ जीर्णोद्धार करते समय प्रथम का वास्तु अल्पद्रव्य का हो तो वह अधिक द्रव्यका बनाना चाहिये । जैसे-प्रथमका वास्तु मिट्टी का हो तो काष्ठ का, काष्ठ का हो तो पाषाण का, पाषाण का हो तो धातु का और धातु का हो तो रत्न का बनाना श्रेयस्कर है ।। दिङ्मूढ दोष- पूर्वोत्तरदिशामूढं मृदं पश्चिमदक्षिणे तत्र मूढममूढं पा यत्र तीर्थ समाहितम् ॥६॥ १. 'तु धनक्षयः।'

ऽष्टमोऽध्यायः Manoraemose- पूर्वोत्तर दिशा (ईशान कोन ) अथवा पश्चिम दक्षिण दिशा (नैऋत्य कोन ) मैं प्रासाद टेढा हो तो दिङ्मूढ दोष नहीं माना जाता। जैसे तीर्थ स्थान में प्रासाद के मूढ और अमूढ का दोप नहीं माना जाता || "पूर्वपश्चिमदिड्मुढं वास्तु स्त्रीनाशकं स्मृतम् । दक्षिणोत्तरदिङ्मूढं सर्वनाशकरं भवेत् ॥" अप० सू० ५२ पूर्व पश्चिम दिशा का वास्तु अग्नि और वायु कोनमे दिङ्मूढ हो तो स्त्री का विनाश कारक है। दक्षिणोत्तर दिशा का वास्तु भी अग्नि और वायुकोन मे दिङ्मूढ हो तो सर्व विनाश कारक है। दिङ्मूढ का परिहार- सिद्धायतनतीर्थेषु नदीनां सङ्गमेषु च। स्वयम्भूबाणलिङ्गेषु तत्र दोपो न विद्यते ॥१०॥ सिद्धायतन अर्थात् सिद्ध पुरुषों का निर्वाण, अग्नि संस्कार, जल संस्कार अथवा भूमि- संस्कार हुआ हो ऐसे पवित्र स्थानो मे, तथा च्यवन, जन्म, दीक्षा ज्ञान और मोक्ष संस्कार हुआ हो, ऐसे तीर्थस्थानो मै, नदी के संगम स्थान मे, बनाया हुमा प्रासाद तथा स्वयंभू और वाण लिंगो के प्रासाद, ये दिङ्मूढ हो तो दोप नहीं है ॥१०॥ अव्यक्त प्रासाद का चालन- अव्यक्तं' मृण्मयं चान्यं त्रिहस्तान्तं तु शैलजम् । दारुजं पुरुषार्द्ध हि अत ऊर्च न चालयेत् ॥११॥ यदि अव्यक्त जीर्ण प्रासाद मिट्टी का हो तो गिरा करके फिर बनावे, पापाण का हो तो तीन हाथ तक और लकडी का हो तो आधे पुरुष के मान तक ऊंचा रहा हो तो चलायमान करे। इससे अधिक ऊंचाई मे रहा हो तो चलायमान न करे ।।११।। महापुरुष स्थापित देव- विषमस्थानमाश्रित्य भग्नं यत्स्थापितं पुरा । तत्र स्थाने स्थिता देवा भग्नाः पूजाफलप्रदाः ॥१२॥ प्राचीन महापुरुषोंने नो देव स्थापित किये हैं, वे विपमासन वाले हो, अथवा खंडित हों तो भी पूजनीय है । क्यो कि उस स्थान पर देवो का निवास है, इसलिये वे देवमूर्तिया पूजन का फल देनेवाली है ॥१२॥ १. 'व्यात तु ऐसा पपयजिप्रपृच्छा सून ११० मे पाठ है । प्रा० १६ १४६ प्रासादमण्डने In. -- -M4100m CAND OM यद्यथा स्थापितं वास्तु तत्तथैव हि कारयेत् । अध्यात चालितं वास्तु दारुणं कुरुते भयम् ॥१३॥ प्राचीन महापुरुषोंने जो वास्तु स्थापित किया है, उसका यदि जीर्णोद्धार किया जाय तो जैसा पहले हो वैसा ही करना चाहिये । जीर्ण वास्तु यदि अंगहीन न हुआ हो तो ऐसे वास्तु को चलायमान करने से बड़ा भयंकर भय उत्पन्न होता है ।।१३।। अथ तथालयेत् प्राज्ञै-जीणं व्यङ्गं च दूषितम् । आचार्य शिल्पिभिः प्राज्ञैः शास्त्रदृष्टथा समुद्धरेत ॥१४॥ यदि प्राचीन वास्तु जीर्ण हो गया हो अथवा अंगहीन होकर दोषवाला हो गया हो तो उसका विद्वान् आचार्य और शिल्पियों की सलाह लेकर शास्त्रानुसार उद्धार करना चाहिये ।।१४॥ जीर्णवास्तु पातन विधि- स्वर्णजं रौप्यजं वापि कुर्यात्रागमथो वृषम् । तस्य शृङ्खण दन्तेन पतितं पातयेत् सुधी: ॥१५॥ इति जीर्णोद्धार विधिः। जीर्णोद्धार के प्रारंभ के समय सोना अथवा चांदी का हाथी अथवा वृषभ बनावें। उस हाथी के दांत से अथवा वृषभ के भृग से जीर्णवास्तु को गिरावे । उसके बाद बुद्धिमान शिल्पी सब गिरा देवें ॥१॥ महादोष- मण्डलं जालकं चैव कीलकं सुषिरं तथा । छिद्रं सन्धिश्च काराश्च महादोषा इति स्मृताः ॥१६॥ देवालय में चूना उतर जाने से मंडलाकार लकीरे दीखती हों, मकड़ी के जाले लगे हों, कीले लगी हों, पोलाण हो गया हों, छिद्र पड गये हों, सांध दीख पड़ती हों और कारागृह बन गवा हो, तो ये महादोष माने गये है ॥१६॥ शिल्पिकृत महादोष- "दिङ्मूढो नष्टछन्दश्च आयहीनः शिरोगुरूः । ज्ञेया दोषास्तु चत्वारःप्रासादाः कर्मदारुणाः ॥" अप० सू० ११० - - ऽष्टमोऽध्यायः १४७ Mom मूपामिर्जालकैर यदि प्रासाद दिङ्मूढ हो गया हो, नष्टबंद हो अर्थात् यथा स्थान प्रासाद के अंगोपांग न हो, आय हीन हो और कार का भाग भारी व नीचे का पतला हो तो उन्हें प्रासाद के चार भयंकर महादोष शिल्पिकृत माना हैं। भिन्न और अभिन्न दोष- मिन्नदोपकरं यस्मात् प्रासादमठमन्दिरम् । रस्मिवातैः प्रमेदितम् ॥१७॥ प्रासाद ( देवालय), मठ (आश्रम) और मंदिर (गृह), इनका गर्भगृह यदि मूषा (लंबा अलिद) से, जालियो से अथवा दरवाजे से आते हुए सूर्य की किरणो से वेधित होता हो तो भिन्न दोप माना जाता है ॥१७॥ अपराजितपुच्छा सूत्र ११० में कहा कि- "भूषाभिर्जालकार-गर्भो यत्र न भिद्यते । अभिन्न कथ्यते तच्च प्रासादो वेश्म वा मठः ॥" प्रासाद, गृह और मठ का गर्भगृह भूपा, जालि और द्वार से आते हुए सूर्य किरणों से भेदित न होता हो तो यह अभिन्न कहा जाता है। - देवों के भिन्नदोष- ब्रह्मविष्णुशिवार्काणां मिन्नं दोपकरं नहि । जिनगौरीगणेशानां गृहं मिन्नं विवर्जयेत् ॥१८॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सूर्य, इनके प्रासादो मे भिन्नदोप हो तो वे दोष कारक नही है। परंतु जिनदेव, गौरी और गणेश के प्रासादो मे भिन्न दोष हो तो दोष कारक है, इस लिये इन्हें भिन्न दोष वाले प्रासाद नही बनावे ॥१८॥ अपराजितपृच्छा सूत्र ११० मे अन्य प्रकार से कहा है कि- "ब्रह्मविष्णुरवीणां च शम्मोः कार्या यहच्छया । गिरिजाया जिनादीनां मन्वन्तरभुवा तथा ॥ एतेषां च सुराणां च प्रासादा भिन्नजिताः । प्रासादमठवेश्मान्यभिन्नानि शुभदानि हि ॥" ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और शिव, इनके प्रासाद भिन्न अथवा अभिन्न अपनी इच्छानुसार बनावे । परन्तु गौरीदेवी, जिनदेव और मन्वंतर मे होने वाले देव, इनके प्रासाद भिन्न दोष से रहित बनावें । प्रासाद, मठ और घर ये भिन्न दोष रहित बनाना शुभ है।

१४८ प्रासादमण्डने व्यक्ताव्यक्त प्रासाद- व्यक्ताव्यक्तं गृहं कुर्याद् मिन्नामिन्नस्य मूर्तिकम् । यथा स्वामिशरीरं स्यात् प्रासादमपि तादृशम् ॥१६॥ इति भिन्नदोषाः। उपरोक्त भिन्न और अभिन्न दोपवाली देवमूत्तियों के लिये व्यक्त और अव्यक्त प्रासाद बनावे । अर्थात् भिन्न दोष रहित देवों के लिये प्रकाश वाले और भिन्न दोषवाले देवों के लिये अंधकारमय प्रासाद बनावें । जैसे स्वामी अपने शरीर के अनुकूल गृह बनाता है, वैसे देवों अनुक्कल प्रासाद बनाना चाहिये ॥१९॥ अपराजित पृच्छा सूत्र ११० में कहा है कि "व्यक्ताव्यक्तं लयं कुर्यादभिन्नभिन्नमूर्तयोः । मूत्तिलक्षण स्वामो प्रासादं तस्य तादृशम् ॥" भिन्न दोपो से रहित शिव आदि की देव मूर्तियों के लिये व्यक्त (प्रकाशवाले ) प्रासाद बनावें और भिन्न दोषवाली गौरी आदि की देव मूत्तियो के लिये अव्यक्त (अंधकारमय) प्रासाद के वनावे। महामर्मदोष- 'मिन्नं चतुर्विधं ज्ञेय-मष्टधा मिश्रकं मतम् । मिश्रकं पूजितं तत्र मिन्नं वै दोपकारकम् ॥२०॥ छन्दभेदो न कर्तव्यो जातिभेदोऽपि वा पुनः । उत्पद्यते महामर्म नातिभेदकृते सति ॥२१॥ भिन्नदोप चार प्रकार के और मिश्रदोष पाठ प्रकार के है। उनमे मिश्रदीप पूजित (शुभ) है और भिन्नदोप दोषकारक है । छंदभेद-जैसे छंदो में गुरु लघु यथावस्थान न होने से छंद दूपित होता है, वैसे प्रासाद की अंगविभक्ति नियमानुसार न होने से प्रासाद दूपित होता है । जातिमेद-प्रासाद की अनेक जातियों में से पीठ प्रादि एक जाति की और शिखर आदि दूसरी जाति का बनाया जाय तो जातिभेद होता है। ऐसा जातिभेद करने से बड़ा मर्मदोष उत्पत्र होता है ।।२०-२१॥ १. भिन्नदोष जानने के लिये देखो अपराजित पृच्छा सूत्र ११० मौर मित्रदोष जानने के लिये देखो अप० सूत्र ११४ श्लो० १ से ।

ऽष्टमोऽध्यायः
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अन्यदोष फल-
द्वारहीने हनेचक्षु-नालीहीने
धनलयः ।
अपदे स्थापिते स्तम्मे महारोगं विनिर्दिशेत् ॥२२॥
द्वार मान मे हीन हो तो नेत्र की हानि, नाली (जलमार्ग) हीन हो तो धन का क्षय और
स्तंभ अपदमे रखा जाय तो महारोग होता है ।।२२।।
स्तम्भन्यासोदये हीने कर्ता तत्र विनश्यति ।
प्रासादे पीठहीने तु नश्यन्ति गजवाजिनः ।।२३।।
स्तंभ का मान विस्तार में अथवा उदय मे हीन हो तो कर्ता का विनाश होता है।
प्रासाद को पीठ मानमे हीन हो तो हाथी घोडा मादि बाहनों की हानि होती है ॥२३॥
रथोपरथहीने तु प्रजापीडां विनिर्दिशेत् ।
कर्णहीने सुरागारे फलं क्वापि न लभ्यते ॥२४॥
प्रासाद के रथ और उपरथ आदि अंग मानमे हीन हो तो प्रजा को पीडा होती है।
यदि कोना मानमे हीन हो तो पूजन का फल कभी भी नहीं मिलता ॥२४॥
जवाहीने हरेद् बन्धूनू ककारापरादिकान् ।
शिखरे हीनमाने तु पुत्रपौत्रधनक्षयः ॥२॥
प्रासाद की जंघा प्रमाण से हीन हो तो करने कराने वाले और दूसरे की हानि होती है।
जो शिखर प्रमाण से न्यून हो तो पुत्र, पौत्र और धनकी हानि होती है ।।२।।
अतिदीचे कुलच्छेदो ह्रस्वे व्याधिविनिर्दिशेत् ।
तस्माच्छास्त्रोक्तमानेन सुखदं सर्वकामदम् ॥२६॥
शिखर यदि मान से अधिक लंबा हो तो कुल की हानि होती है और मान से छोटा
होवे तो रोग उत्पन्न होते है । इसलिये शास्त्र में कहे हुए मानके अनुसार ही प्रासाद बनावे तो
यह सर्व इच्छित फलको देनेवाला होता है ॥२६॥
जगत्यां रोपयेच्छाला शालायां चैव मण्डपम् ।
मण्डपेन च प्रासादो प्रस्तो दोपकारकः ||२७||
इति दोषा.।
जगती में शाला (चौकी मंडप) बनाना, उस शाला मे मंडप और मंडप मे प्रासाद ग्रस्त
हो तो दोषकारक है ॥२७॥

प्रासादमण्डने १५० moreommonwe-me-meanemomer छाया भेद- प्रासादोच्छायविस्तारा-ज्जगती वामदतिणे । छायाभेदा न कर्तव्या यथा लिङ्गस्य पीठिका ॥२८॥ प्रासाद के उदय और विस्तार के अनुसार बायों और दाहिनी और जगती शास्त्रमान के अनुसार रखना चाहिये । ऐसा न करें तो छायादोष होता है, क्योंकि जैसे शिवलिंग की पीठिका रूप जगती हैं, वैसे प्रासाद रूप लिग की जगतीरूप पीठिका है ॥२॥ देवपुर, राजमहल और नगर का मान- जगत्यां त्रिचतुःपञ्च-गुणं देवपुरं त्रिधा । एकद्विवेदसाहस्र-हस्तैः स्याद् राजमन्दिरम् ॥२६॥ कलाटवेदसाहौ-हस्तै राजपुरं समम् । दैये तुल्यं सपादांशं सार्धाशेनाधिकं शुभम् ॥३०॥ जगती मे तीन, चार अथवा पांच गुणा देवपुर का मान हैं । एक, दो अथवा चार हजार हाथ का राजमहल का मान है और सोलह आठ अथवा चार हजार हाथ का राजपुर ( राजधानी वाला नगर) का मान हैं । ये दरेक का तीन २ प्रकार का मान जाने। लंबाई मे विस्तार के बराबर अथवा सवाया तथा डेढा मान का रखना शुभ है ॥२६-३०॥ राजनगर में देवस्थान- द्वादश त्रिपुराणि स्यु-देवस्थानानि चत्वरे । पट्त्रिंशत् षड्मिधा यावदष्टोचरं शतम् ॥३१॥ पुरं प्रासादगृहै। स्पात् सौधैर्जालगवाक्षकैः । कीर्तिस्तम्भैर्जलारामै-मांडैश्च शोभितम् ॥३२॥ इति देवपुरराजपुराणि । राजनगर के चौरास्ते में बारह त्रिपुर (छत्तीस) देवस्थान है। छत्तीस से छह २ बढ़ाते हुए एकसौ आठ तक बढ़ावे, उतने देवस्थान है। यह नगर देव प्रासादों से, जाली और गवाक्षवाले राजमहलो से और गृहों से कीत्तिस्तंभों से, कमां, वावड़ी आदि जलाश्रयों से, किला और मंडपो से शोभित होता है ।।३१-३२।। १. 'गहै।'

अष्टमोऽध्यायः १५१ पाश्रम और मठ- प्रासादस्योत्तरे याम्ये तथाग्नौ पश्चिमेऽपि वा । यतीनामाश्रमं कुर्यान्मठं तद्वित्रिभूमिकम् ॥३३॥ प्रासाद के उत्तर अथवा दक्षिण दिशा में, तथा अग्निकोन मे या पिछले भाग मे यतियों का प्राश्रम तथा ऋपियो का मठ, दो या तीन मंजिल बनावे ॥३३॥ द्विशालमध्ये पदारुः पट्टशालाने शोभिता । मत्तवारणमने च वर्ष पट्टभूमिका ॥३४॥ आश्रम के दोशाला के मध्य में षड्दार (आमने सामने की दीवार में दो दो स्तंभ और उसके ऊपर एक २ एक २पाट, ऐसा षड्दार कहा जाता है ) रक्खे । द्विशाला के आगे सुशोभित पट्टशाला (बरामदा) बनावे और उसके आगे कटहरा बनावे । उसके ऊपर पट्टभूमिका (चंद्रशाला-खुली छत ) रक्खें ॥३४॥ स्थान विभाग- कोष्ठागारं च वायव्ये वहिनकोणे महानसम् । पुष्पगेहं तथेशाने नैऋत्ये पात्रमायुधम् ॥३॥ सत्रागारं च पुरतो वारुण्यां च जलाश्रयम् । मठस्य' पुरतः कुर्याद् विद्याव्याख्यानमण्डपम् ॥३६॥ इति मठः। म: के वायुकोने मे धान्य का कोगर, अग्निकोने मे रसोड़ा, ईशान कोने में पुष्पगृह (पूजोपगरण), नेऋत्य कोने में पात्र और आयुध, आगे के भाग में यज्ञशाला और पश्चिम दिशामे जलस्थान बनावे । एवं मठ के आगे पाठशाला और व्याख्यान मंडप बनावे ॥३५-३६॥ प्रतिष्ठा मुहूर्त- पूर्वोक्ता सप्तपुण्याह-प्रतिष्ठा सर्वसिद्धिदा । खौ सौम्यायने कुर्याद् देवानां स्थापनादिकम् ॥३७॥ प्रथम अध्ययन के श्लोक ३६ में जो सात पुण्य दिन कहे गये है। उनकी प्रतिष्ठा सर्वसिद्धि को देनेवाली है। जव सूर्य उत्तरायन में हो तब देवो को प्रतिष्ठा आदि शुभ कार्य करना चाहिये ॥३६॥ १. 'मठस्योपरितः। १ प्रासादमएडने प्रतिष्ठा के नक्षत्र- प्रतिष्ठा चोत्तरामूल आर्द्रायां च पुनर्वसौ । पुष्ये हस्ते मृगे स्वातौ रोहिण्यां श्रुतिमैत्रमे ॥३८॥ तोन उत्तरा नक्षत्र, मूल, पार्दा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, मृगशीर्ष, स्वाति, रोहिणी, श्रवण और अनुराधा, ये नक्षत्र देव प्रतिष्ठा के कार्य मे शुभ हैं ॥३८॥ प्रतिष्ठा में वर्जनीय तिथि तिथिरिक्तां कुजं धिष्एयं क्रूरविद्धं विधु तथा । दग्धातिथिं च गण्डान्तं चरभोपग्रहं त्यजेत् ॥३६॥ रिक्तातिथि, मंगलवार, क्रूरग्रह से वेधित अथवा युत नक्षत्र और चंद्रमा, दग्वातिथि, नक्षत्र, मास, तिथि और लग्न आदिका गंडांतयोग, चर राशि और उपग्रह ये सब प्रतिष्ठा कार्य में वर्जनीय हैं ॥३॥ सुदिने शुभनक्षत्रे लग्ने सौम्ययुतेक्षिते । अभिपेकः प्रतिष्ठा च प्रवेशादिकमिष्यते ॥४०॥ शुभदिनमे, शुभनक्षत्रमें, शुभलग्नमें, शुभग्रह लग्न में हों अथवा लग्न को देखते हों, ऐसे समय में राज्याभिषेक, देवप्रतिष्ठा और गृह प्रवेश आदि शुभकार्य करना चाहिये ॥४०॥ प्रतिष्ठा मण्डप- प्रासादाने तथैशान्ये उत्तरे मण्डपं शुभम् । त्रिपञ्चसप्तनन्दैका-दशविश्वकरान्तरे ॥४१॥ मण्डपः स्यात् करैरष्ट-दशसर्यकलामितैः । पोडशहस्ततः कुण्ड-शादधिक इष्यते ॥४२॥ स्तम्भैः षोडशभियुक्तं तोरणादिविराजितम् । मण्डपे वेदिका मध्ये पञ्चाष्टनवकुण्डकम् ॥४३॥ प्रासाद के आगे, तथा ईशानकोने में अथवा उत्तर दिशा में प्रतिष्ठा का मंडप बनाना शुभ है । यह मंडप तीन, पांच, सात, नव, ग्यारह अथवा तेरह हाथ तक प्रासाद से दूर रखना चाहिये । तथा आठ, दस, वारह अथवा सोलह हाथ के मान का समचोरस बनाना चाहिये। एवं कुण्डों को विशालता के कारण सोलह हाथ से बड़ा भी मंडप कर सकते है। यह मंडप ऽग्टमोऽध्यायः १५३ --- सोलह स्तंभ वाला और तोरणों से शोभायमान बनावे । तथा मंडप के मध्य में वेदिका और पाच, पाठ अथवा नव यज्ञ कुण्ड बनावे ॥४१ से ४३।। यज्ञकुण्ड का मान- हस्तमात्रं भवेत् कुण्डं मेखलायोनिसंयुतम् । आगमैर्वेदमन्त्रैश्च होमं कुर्याद् विधानतः ॥४४॥ तोन मेसला और, योनि से युक्त ऐसा एक हाथ के मानका यज्ञकुण्ड वनावे । उसमे पागम और वेद के मंत्री से विधिपूर्वक होम करे ॥४४॥ आहुति संख्या से कुण्डमान- अयुने हस्तमात्र स्याद् लक्षाद्धं तु द्विहस्तकम् । त्रिहस्तं लनहोमे स्याद् दशलक्षे चतुष्करम् ॥४॥ त्रिशलते पञ्चहस्तं कोव्बद्ध पटकर मतम् । अशीतिलतेऽद्रिकरं कोटिहोमे कराष्टकम् ॥४६॥ ग्रहपूजानिधाने च कुएडमेककरं भवेत् । मेखलालित्यं वेद-रामयुग्माङ्गुलैः क्रमात् ॥४७॥* दस हजार माहुति के लिये एक हाथ का, पचास हजार प्राहुति के लिये दो हाथ का, एक लारा पाहुति के लिये तीन हाथ का, दस लाख आहुति के लिये चार हाथ का, तीस लाख माहुनि के लिये पाच हाय का, पचास लाख माहुति के लिये यह हाथ का, अस्सी लाख आहुति के लिये सात हाथ का और एक करोड आहुति देना हो तो आठ हाथ का कुण्ड बनावे । ग्रहपूजा प्रादि के विधान में एक हाथ के मान का कुण्ड बनावे । कुण्ड की तीन मेखला क्रमश. चार, तीन और दो अंगुल के मान को सखें ।।४५ से ४७।। दिशानुसार कुण्डों की प्राकृति- "प्राच्याश्चतुष्कोणभगेन्दुखण्ड-त्रिकोणवृत्ताभुजाम्बुजानि । अष्टास्त्रिशक्रेश्वरयोस्तु मध्ये, वेदानि वा वृत्तमुशन्ति कुण्डम् ।।३।। इति मंडपकुंडसिद्धी पूर्व दिशा में समचोरस, अग्निकोण मे योन्याकार, दक्षिण दिशा में अर्द्ध चन्द्र, ने- त्सकोण में त्रिकोण, पश्चिम दिशा में गोल, वायुकोण मे छह कोण, उत्तर में अष्टदल पनाकार * विशेष जानने के लिये देखो अपराजितपृच्छा सूत्र १४७ । प्रा०२० . १५४ प्रासादमण्डने Mwammu- - - और ईशानकोणमे प्रष्टकोण, ये आठ पूर्वदिशासे ईशानकोण तक आठ दिक्पालों के कुण्ड है। तथा पूर्व और ईशान के मध्य भाग मे नवा माचार्य कुण्ड गोल अथवा समचोरस बनावें। 'विशेष जानने के लिये देखे मंडपकुंडसिद्धिः आदि ग्रंथ ।' मंडल- एकद्वित्रिकरं कुर्याद् वेदिकोऽपरि मण्डलम् । ब्रह्मविष्णुरवीणां च सर्वतोभद्रमिष्यते ॥४८॥ वेदिकाके ऊपर एक, दो अथवा तीन हाथ के मानका मंडल बनावें । ब्रह्मा, विष्णु और सूर्य की प्रतिष्ठा मे सर्वतोभद्र नामका मंडल बनावे ॥४॥ भद्रं तु सर्वदेवानां नवनाभिस्तथा त्रयम् । लिङ्गोद्भवं शिवस्यापि लतालिङ्गोद्भवं तथा ॥४६॥ सब देवों की प्रतिष्ठा में भद्र नाम का मंडल, तथा नवनाभी अथवा तीन नाभि वाला लिंगोद्भव मंडल बनावे । शिव की प्रतिष्ठा में लिगोद्भव तथा लतालिङ्गोद्भव नाम का मंडल बनावे ॥४॥ भद्रं च गौरीविलकं देवीनां पूजने हितम् । अर्धचन्द्रं तडागेषु चापाकारं तथैव च ॥५०॥ सब देवियों की पूजन प्रतिष्ठा में भद्र और गौरीतिलक नाम का मंडल बनावें। तथा तालाव की प्रतिष्ठा में अर्धचंद्र चापाकार मंडल बनावे ॥५०॥ टङ्कामं स्वस्तिकं चैव वापीकूपेषु पूजयेत् । पीठिकाजलपट्टषु योन्याकारं तु कामदम् ॥५१॥ वावडी और कुओ की प्रतिष्ठा मे टंकाभ और स्वस्तिक मंडल का पूजन करे। पीठिका और जलवट्ट की प्रतिष्ठा मे योनि के आकार का मंडल पूजने से सब कार्य सिद्ध होते है ॥५१॥ गजदन्तं महादुर्ग प्रशस्तं मण्डलं यजेत् । टङ्कामं चतुरस्त्रं च गजदन्तं महायतम् ॥५२॥ बड़े किले की प्रतिष्ठा मे गजदंत नामका मंडल पूजन करना प्रशस्त है। टंकाभ मंडल का आकार चोरस है और गजदंत मंडल का प्राकार लंबा है ।।२।। विख्यातं सर्वतोभद्रं ज्ञेयमन्योऽन्यलोकतः । पूर्वादितोरणं प्लक्ष-यज्ञाझवटपिप्पलैः ॥५३॥ -- अष्टमोऽध्यायः - सब मंडलो मे सर्वतोभद्र नामका मंडल प्रसिद्ध है, उसका तथा अन्य मंडलों का स्वरूप अन्यशास्त्र (अपराजितपृच्छा सूत्र १४८) से जानें । यज्ञमंडप मे पूर्वादि दिशाओं में अनुक्रम से पीपला, गूलर, बरगद और पीपल के पत्तो का तोरण बाघे ॥५३ ऋत्विजसंख्या- द्वात्रिंशत् पोडशाष्टौ च ऋत्विजो वेदपारगान् । कुलीनानङ्गसम्पूर्णान् यज्ञार्थमभिमन्त्रयेत् ॥५४॥ यज्ञ करने वाले बत्तीस, सोलह अथवा पाठ ऋत्विज आमंत्रित होना चाहिये । ये सब वेदों के ज्ञाता हो, कुलवान हों और अंगहीन न हों ॥५४॥ देवस्नान विधि- मण्डपस्य त्रिभागेन चोचरे स्नानमण्डपम् । स्थण्डिलं वालुकं कृत्वा शय्यायां स्नापयेत् सुरम् ॥५॥ पञ्चगव्यैः कपायैश्च वल्कलैः चीरवृक्षः । स्नापयेत् पञ्चकलशैः शतवारं जलेन च ॥५६॥ मंडप को चारों दिशा में तीन २ भाग करें, अर्थात् मंडप का नव भाग करे। (पाठ दिशा के आठ और एक मध्य वेदी का भाग जाने)। इनमे उत्तर दिशा के भाग में स्नान मंडप बनावे | उसमे रेतीका शुद्ध स्थंडिल (भूमि ) बनाकर उसके ऊपर शय्या मै देव की स्थापना करे। पीछे पंचगव्य से, कषाय वर्ग की औषधियो से और क्षीरवृक्षो की छालो के चूर्ण से स्नात्र- जल तैयार करें, उससे पाच २ कलश एकसौ बार भर करके देवको स्नान करावे ।।५५-५६॥ वेदमन्त्रैश्च वादिन-गतिमङ्गलनिःस्वनै । वस्त्रेणाच्छादयेद् देवं वेद्यन्ते मण्डपे न्यसेत् ॥७॥ स्नान क्रिया के समय वेदमंत्रो के उच्चारणो से, वाजीत्र की ध्वनियो से और मालिक गीतो से आकाश ध्वनिमान करे। स्नान के बाद देवको वस्त्रसे आच्छादित करके, पीछे ईशानकोन की वेदी के ऊपर स्थापित करें ॥७॥ देवशयन- तल्पमारोपयेद् वेद्या-मुत्तराची न्यसेत् ततः । कलशं तु शिरोदेशे पादस्थाने कमण्डलुम् ॥१८॥ - प्रासादमण्डने mammee-..- on - --more- 0000 Seasopmmmm000000 com...mom - ईशानकोन की वेदी के ऊपर देवका शय्यासन रक्खें। उनके चरण उत्तर दिशा में रक्खे । सिर भाग के पास कलश और चरण के स्थान के पास कमंडलु रक्खें ॥५८|| व्यजनं दक्षिणे देशे दर्पर्ण वामतः शुभम् । रत्नन्यासं ततः कुर्याद् दिक्पालादिकपूजनम् ॥५६॥ देवकी दाहिनी ओर पंखा और बायी ओर दर्पण रखना शुभ है। पीछे पाठ दिशाओं मे रत्न को स्थापित करके दिक्पाल आदि की पूजा करें ॥५॥ आग्नेयां गणेशं विद्या-दीशानेग्रहमण्डलम् । नैऋत्ये वास्तुपूजा च वायव्ये मातरः स्मृतः ॥६०॥ अग्निकोन में गणेश, ईशानकोन मे नवग्रह मंडल, नैऋत्य कोन में वास्तुपूजा और वायव्यकोन मे मातृदेवता की स्थापना करे ॥६॥ - रत्नन्यास- वघ्नं वैडूर्यके मुक्ता-मिन्द्रनीलं सुनीलकम् । पुष्परागं च गोमेदं 'प्रवालं पूर्वतः क्रमात् ॥६१॥ वज्र (हीरा), वैडूर्य, मोती, इन्द्रनील, सुनील, पुष्पराग, गोमेद और प्रवाल, पाठ रत्न पूर्वादि सृष्टिक्रम से रक्खे ॥६॥ .. ये धातुन्यास- सुवर्ण रजतं तानं कांस्यं रीतिं च सीसकम् । वङ्ग लोहं च पूर्वादौ सृष्टया धातूनिह न्यसेत् ॥६२॥ सोना, चांदी, ताबा, कांसी, पीतल, सीसा, कलई और लोह, ये आठ धातु पूर्वादि सुष्टिक्रम से रक्खे ॥२॥ औषधिन्यास- *वत्री वह्निः सहदेवी विष्णुकान्तेन्द्रवारुणी । शंखिनी ज्योतिष्मती चैवेश्वरी तान् क्रमान् न्यसेत् ॥६३॥ मराजितपृच्छा सूत्र १४६ श्लो० १५ मे 'वचा' पाठ है। १. 'चन्द्र पूर्वादिषु यजेत्' इति पाठान्तरे । ३

ऽष्टमोऽध्यायः
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वची ( वजदंती), वह्नि (चित्रक), सहदेवी, विष्णुकान्ता, इन्द्रवारुणी, शंखाहुली,
ज्योतिष्मती (मालकागनी ) और शिवलिंगी, ये आठ प्रीपधिया पूर्वादि दिशाओं में सृष्टिकम से
रक्खे ॥६॥
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धान्यन्यास-
यवो बीहिस्तथा कङ्गु-जूर्णाह्वा च तिलैयुताः ।
शाली मुद्गाः समाख्याता गोधूमाथ क्रमेण तु ॥६॥
जव, व्रीहि, कगु, जुमार, तिल, शाली, मूग और गेहू, ये आठ धान्य पूर्वादि दिशामो
मे सृष्टिकम से रक्खे।
प्राचार्य और शिल्पियो का सन्मान-
यद्देवाभरणं पूजा वस्त्रालङ्कारभूषणम् ।
तत्सर्व शिल्पिने दद्याद् आचार्याय तु याज्ञिकम् ॥६५॥
देवसंस्कार के लिये जो वस्त्र और अलंकार आदि आभूषण चढाया जाता है, वे सब
शिल्पिको देना चाहिये और आचार्य को यज्ञ संबधी सब वस्तु देनी चाहिये ॥६५॥
ततो महोत्सव कुर्यान्नृत्यगीतैरनेकशः ।
नैवेद्यारात्रिकं पूजा-मङ्गन्यासादिकं तथा ॥६६॥
पोछे अनेक प्रकार के नृत्य और गीत पूर्वक महोत्सव करे, नैवेद्य चढावे, भारती करे
और अंगन्यास (मुद्रा न्यास ) आदि करे॥६६॥
क्षीरं क्षौद्रं घृतं खण्ड पक्वान्नानि बहून्यपि ।
पडरसस्वादुमक्ष्याणि सन्मानं परिकल्पयेत् ॥६७॥
दूध, शहद, घी, खाड और अनेक प्रकार के पकवान, तथा षड्रस के स्वाद वाले भोजन
पदार्थ, ये सन्मान पूर्वक देव के आगे रखने चाहिये ॥६॥
विप्राणां सम्प्रदायैश्च वेदमन्त्रैस्तथागमैः ।
सकलीकरणं जीवन्यासं कुन्वा प्रतिष्ठयेत् ॥६॥
पोछे ब्राह्मण अपने सम्प्रदाय के अनुसार वेद त्रो से तथा आगम मंत्रो से सकलीकरण
करके देवमे जीवन्यास करें। पोछे प्रतिष्ठित करे ॥६॥

प्रासादमएडने merelese --moonee प्रासाददेव न्यास- प्रासादे देवतान्यासं स्थावरेषु पृथक् पृथक् । खरशिलायां वाराह पौल्यां नागकुलानि च ॥६॥ प्रासाद के थरों और अंगोपांगो में अलग २ देवों का न्यास करके पूजन करें। खरशिला में वाराह देव और भीट के थर मे नागदेव का न्यास करे ॥६॥ प्रकुम्मे जलदेवांश्च पुष्पके किंसुरांस्तथा । 'नन्दिनं जाड्यकुम्भे च कर्णाल्यां स्थापयेद्धरिम् ॥१०॥ कुम्भ के थर मे जलदेव, पुष्पकंठ के थर मे किन्नरदेव, जाड्यकुम्भ मे नंदीदेव, और कणिका के थर मे हरिदेव का न्यास करें ॥७०॥ गणेशं गजपीठे स्या-दश्वपीठे तथाश्विनौ । नरपीठे नरांश्चैव क्षर्मा च खुरके यजेत् ॥७१॥ गजपीठ में गणेश, अश्वनीठ में दोनों अश्विनीकुमार, नरपीठ में नरदेव और खुरा के थर मे पृथ्वीदेवी का न्यास करके पूजन करें ।।७१।। मद्रे संध्यात्रयं 'कुम्मे पार्वती कलशे स्थिताम् । कपोताल्यां च गान्धर्वान् मञ्चिकायां सरस्वतीम् ॥७२॥ भद्र के कुम्भ मे तीन सध्यादेवी, कलश के थर मे पार्वतीदेवी, केवाल के थर में गांधर्वदेव और मांची के थर में सरस्वती देवी का न्यास करें ॥७२॥ बकायां च दिशिपाला-निन्द्रसुद्गमे संस्थितम् । सावित्री भरणीदेशे शिरावट्यां च देविकाम् ॥७३॥ जंघा के थर मे दिक्पाल, उद्गम के थर मे इन्द्र, भरणी के घर में सावित्री और शिरावटी के थर मे भाराधार देवी का न्यास करे॥७३॥ विद्याधरान् कपोवाल्या मन्तराले सुरांस्तथा । पर्जन्यं कूटच्छाये च ततो मध्ये प्रतिष्ठयेत् ॥७४॥ केवाल के थर मे विद्याधर, अंतराल के थर मे किन्नरादि सुर और छज्जा के घर में पर्जन्य (मेघ) देव, इनका न्यास करे । अब भीतर के मध्य भाग में देवों का न्यारा कहते है ॥७४।। - १. 'नन्दिनी'। २. 'स्रष्टारं कुम्भके' अप० सू० १५० श्लो० ८।

ऽष्टमोऽध्यायः
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शाखयोश्चन्द्रसूयौं च
त्रिमूर्तिश्चोत्तरङ्गके ।
उदुम्बरे स्थितं यक्ष-मश्विनावद्धचन्द्र के ॥७॥
द्वारगखानो मे चंद्र और सूर्य, उत्तरंग मै त्रिमूत्ति (ब्रह्मा, विष्णु और शिव ), देहली
मे यक्षों और अर्धचंद्र (शंखावटी) मे दोनो अश्विनीकुमारो का न्यास करें ॥७॥
कौलिकायां घराधारं चिति चोत्तानपट्टके ।
स्तम्भेषु पर्वतांश्चैव-माकाशं च करोटके ॥७६॥
कीलिका मे घराघर, उत्तानपट्ट (बडा पाट ) में क्षिति, स्तंभ मे पर्वत और गुंबद मे
आकाश, इन देवो का न्यास करे ॥७६||
मध्ये प्रतिष्ठयेद् देवं मकरे जाह्नवीं तथा ।
शिखरस्योरशृङ्गेषु पञ्च पञ्च प्रतिष्ठयेत् ॥७७॥
ब्रह्मा विष्णुस्तथा सूर्य ईश्वरी च सदाशिवः ।
शिखरे चेश्वरं देवं शिखायां च सुराधिपम् ॥७८||
गर्भगृह मे स्वदेव, मगर मुखबाली नाली मे गंगाजी, शिखर के उरु गो मे ब्रह्मा,
विष्णु, सूर्य, पार्वती और सदाशिव, इन पांच २ देवो का न्यास करके पूजन करे । शिखर में
ईश्वर देवका और शिखामे सुराधिप (इन्द्र) का न्यास करे ।।७७-७८||
ग्रीवायामम्बरं देव-मण्डके च निशाकरम् ।
पाचं पद्मपत्रे च कलशे च सदाशिवम् ||७६॥
शिखर की प्रीवा में अंबरदेव, शृ गो मे तथा आमलसार मे निशाकर (चंद्रमा),
पमान और पद्मशिला में पद्माक्ष देव, और कलश मे सदाशिव, इन देवो का न्यास करे ॥७९॥
सद्यो वामस्तथाघोर-स्वत्पुरुप ईश एव च ।
कर्णादिगर्भपर्यन्तं पश्चाङ्ग तान् प्रतिष्ठयेत् ॥८॥
इति स्थावर प्रतिष्ठा।
सद्य, वामन, अधोर, तत्पुरुप और ईश, इन पाच देवो का कोने से लेकर गर्भपर्यन्त
पांच अंगों मे (कर्ण, प्रतिरथ, रथ, प्रतिभद्र और मुखभद्र मे ) न्यास करे॥०॥
प्रतिष्ठितदेव का प्रथम दर्शन-
प्रथम देवतादृष्टे-दर्शयेदन्तर्धाहितम् ।
विप्रकुमारिकां वास्तु-ततो लोकान् प्रदर्शयेत् ॥८१॥

१६० प्रासादमण्डने प्रतिष्ठा के दिन रात्रि में देवालय बंध होने के बाद प्रातःकाल खोलने के समय देवका प्रथम दर्शन ब्राह्मण कुमारी करें, बाद में अन्य सब लोग दर्शन करे ॥१॥ सूत्रधार पूजन- 'इत्येवं विविधं कुर्यात् सूत्रधारस्य पूजनम् । भूवित्तवस्त्रालङ्कार-गौमहिष्यश्च वाहनः ॥२॥ अन्येषां शिल्पिनां पूजा कर्तव्या कर्मकारिणाम् । स्वाधिकारानुसारेण वस्त्रैस्ताम्बूलभोजनैः ||८|| अच्छी तरह विधि पूर्वक देव के प्रतिष्ठित होने के बाद भूमि, धन, वस्त्र और अलंकारों से तथा गाय, भैंस और घोड़ा आदि वाहनों से सूत्रधार को सम्मान पूर्वक पूजा करें। एवं काम करने वाले अन्य शिल्पिों की भी उनके योग्यतानुसार वख, तांबूल और भोजन आदि से सम्मान पूर्वक पूजा करें ॥२-८३|| देवालयय निर्माण का फल- काष्ठपाषाणनिर्माण-कारिणो यत्र मन्दिरे । मुक्तेऽसौ च तत्र सौख्यं शङ्करत्रिदशैः सह ॥४॥ काष्ठ अथवा पापारण आदिका प्रासाद जो बनवाता है. वह देवलोक में महादेव तथा अन्य देवों के साथ सुखको भोगता है ।।४।। सूत्रधार का आशिर्वाद पुण्यं प्रासादजं स्वामी प्रार्थयेत् स्त्रधारतः । सूत्रधारो वदेत् स्वामिन् ! अक्षयं भवतात् तव ॥८॥ इति सूत्रधारपूजा। देवालय बनवाने वाला स्वामी सूत्रधार से प्रासाद बंधवाने के पुण्य की प्रार्थना करें, तव सूत्रधार आशीर्वाद देवे कि-हे स्वामिन् देवालय बंधवाने का तुम्हारा पुण्य अक्षय हो' ||८५॥ आचार्य पूजन- आचार्य पूजनं कृत्वा वस्त्रस्वर्णधनैः सह । दानं दद्याद् द्विजातिभ्यो दीनान्धदुर्वलेषु च ॥८६॥ १. 'इत्यनन्तरतः।

अष्टमोऽध्यायः १६१ - सर्वेषां धनमाधारः प्राणीनां जीवनं परम् । वित्ते दत्ते प्रतुष्यन्ति मनुष्याः पितरः सुराः ॥८७ ॥७॥ इति प्रतिष्ठाविधिः। प्रतिष्ठाका कार्य समाप्त होने के बाद वस्त्र और सुवर्ण आदि धन से प्राचार्य की पूजा करें। पीछे ब्राह्मणों को तया दीन, अंव और दुर्बल मनुष्यों को दान देवे । क्योकि सब प्राणियों का माधार धन है, और यही प्राणियो का श्रेष्ठ जीवन है। धन का दान देने से मनुष्य, पितृदेव और अन्य देव संतुष्ट होते है ॥८६-८७॥ जिनदेव प्रतिष्ठा- प्रतिष्ठा वीतरागस्य जिनशासनमार्गतः । नवकारः सरिमंत्रैश्च सिद्धकेवलिमापितैः ॥८॥ वीतराग देव की प्रतिष्ठा जैन शासन मे बतलाई हुई विधि के अनुसार, सिद्ध हुए केवल- ज्ञानियो ने कहे हुए नवकारमंत्र और सूरिमंत्रो के उच्चारण पूर्वक करनी चाहिये || ग्रहाः सर्वज्ञदेवस्य पादपीठे प्रतिष्ठिताः । येनानन्तविमेदेन मुक्तिमार्ग उदाहृताः ॥८६॥ जिनानां मातरो यक्षा यक्षिण्यो गौतमादयः । सिद्धाः कालत्रये जाताश्चतुर्विशतिमूर्चयः ॥१०॥ सर्वज्ञदेव के पादपीठ (पबासन) मे नवग्रह स्थापित करे। ये जिनदेव अनन्त मेदो से मुक्ति मार्ग के अनुगामी कहे गये है। जिनदेव की माता, यक्ष, यक्षिणी और गौतम आदि गणधर आदि की मूर्तिया, तथा तीन काल मे सिद्ध होनेवाले चौवीस २ जिनदेव की मूत्तियां है ।।८९-800 इति स्थाप्या जिनावासे त्रिपाकारं गृहं तथा । सांवर्ण शिखरं 'मन्दारक त्वष्टापदादिकम् ॥६॥ वे मूत्तिया जिनालय में स्थापित करे। जिनालय समवसरण वाला, सवरणा वाला, शिखर वाला, गुम्बद वाला और अष्टापद वाला बनाया जाता है ॥११॥ १. नन्दीश्वर।' 11०२१

१६२
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प्रासादो वीतरागस्य पुरमध्ये सुखावहः ।
नृणां कल्याणकारी स्याचतुर्दिक्षु प्रकल्पयेत् ॥१२॥
इति जिनप्रतिष्ठा।
वीतरागदेव का प्रासाद नगर मे हो तो सुखकारक है, तथा मनुष्यों का कल्याण करने
वाला है । इसलिये चारों दिशा मे ये बनाने चाहियें ॥२॥
जलाश्रय प्रतिष्ठा-
माघादिपञ्चमासेषु वापीकूपादिसंस्कृतम् ।
तडागस्य चतुर्मास्यां
कुर्यादापाढमार्गयोः ॥१३॥
असंस्कृतं जलं देवाः पितरो न पिबन्ति तत् ।
संस्कृते तृप्तिमायाति तस्मात् संस्कारमाचरेत् ॥१४॥
वावड़ी और कूत्रां आदिकी प्रतिष्ठा मीन संक्राति का मास छोड़कर माघ आदि पांच
मास में करे। तालाव की प्रतिष्ठा चौमासे के चार मास आषाढ और मार्गशीर्ष, ये छह मास में
करे । जलाश्रयो के जल का संस्कार न किया जाय तो उसका जल पितृदेव पोते नही है।
संस्कार किये जल से ही पितृदेव तृप्त होते हैं । इसलिये जल का संस्कार अवश्य करना
चाहिये ।।९३-९४॥
जलाश्रय बनवाने का पुण्य-
जीवनं वृक्षजन्तूनां करोति यो जलाश्रयम् ।
दत्ते वा स लभेत्सौख्य-मुन्याँ स्वर्गे च मानवः ॥६॥
जल, वृक्ष और सब जीवों का जीवन है । इसलिये जो मनुष्य जलाश्रय बनवाता है, वह
मनुष्य जगत मे धनधान्य से पूर्ण ऐहिक सुखों को, तथा स्वर्ग के सुखों को प्राप्त करता है और
मोक्ष पाता है ।।
वास्तुपुरुषोत्पत्ति-
पुरान्धकवधे रुद्र-ललाटात् पतितः क्षितौ ।
स्वेदस्तस्मात् समुद्भूतं भूतमत्यन्तं दुस्सहम् ॥६६॥
गृहीत्वा सहसा देवै-यस्तं भूमावधोमुखम् ।
जानुनी कोणयोः पादौ रक्षोदिशि शिवे शिरः ॥१७॥

ऽष्टमोऽध्यायः १६३ प्राचीन समय में जब महादेव ने अंधक नाम के देत्य का विनाश किया, उस समय परिश्रम से महादेव के ललाट मे से पसीना को विन्दु पृथ्वी के ऊपर पड़ी। इस बिन्दु से एक अत्यन्त भयंकर भूत उत्पन्न हुआ । उसको देवी ने शीघ्र ही पकड़ करके पृथ्वी के ऊपर इस प्रकार से प्रीधा गिरा दिया, कि उसकी दोनो नानु और हाथ की दोनो कोन्ही वायु और अग्नि कोने मे, चरण नैऋत्य कोने में और मस्तक ईशान कोने में रहा ।।६६-६७|| चत्वारिंशधु ताः पञ्च वास्तुदेहे स्थिताः सुराः । देव्योऽटौ वाह्यगास्तेषां वसनाद्वास्तुरुच्यते ॥९८|| इस अधेि पड़े हुए वास्तुपुरुप के शरीर पर पैंतालीस देव स्थित हो गये और उसके चारो कोने पर पाठ देविया भी स्थित हो गई। इस प्रकार तरेपन (५३) देव उस भूत के शरीर पर निवास करते हैं, इसलिये उसको वास्तु पुरुप कहते है ।। अधोमुखेन विज्ञप्तौ त्रिदशान् विहितो बलिम् । तेनैव बलिना शान्ति करोति हानिमन्यथा 188|| प्रासादमानादीनां प्रारम्भे परिवर्तने । वास्तुकर्मसु सर्वेषु पूजितः सौख्यदो भवेत् ॥१०॥ अधोमुख करके रहा हुआ वास्तु पुरुप देवो को विनति करता है कि जो मनुष्य मेरे कार बैठे हुए देवो को विधिपूर्वक बलि देवेगा, तो उस बलिके प्रभाव से मै उसको शान्ति प्रदान करूंगा और वलि नहीं देने पर तो हानि करुंगा। इसलिये प्रासाद और भवन आदि के सब वास्तु कर्म के प्रारम्भ से सम्पूर्ण होने तक सब वास्तु कर्म मे वास्तु पूजन करने से सुखशाति होवेगी ॥१-१०॥ एकपदादितो वास्तु-वित्पदसहस्रकम् । द्वात्रिंशन्मण्डलानि स्युः क्षेत्रतुन्या कृतीनि च ॥१०॥ एक पदसे लेकर एक हजार पद तक का वास्तु बनाने का विधान है। वास्तुपूजन के बत्तीस मंडल है, वे क्षेत्र की आकृति के अनुसार प्राकृति वाले है ।।१०१|| A एकाशीतिपदो वास्तु-श्चतुष्पष्टिपदोऽथवा । सर्ववास्तुविभागेषु पूजयेन्मण्डलद्वयम् ॥१०२॥ A सविस्तार जानने के लिये देखें। अपराजित पृच्छा सूर ५७ और ५८ वा।

१६४ प्रासादमण्डने वास्तु पूजन के बत्तीस मंडलों में से इक्यासीपद का और चौसठ पद का, ये दो मंडल पूजने चाहिये ।।१०।। वास्तुपुरुष के ४५ देव- ईशो मूर्धनि पर्जन्यो दक्षिणकर्णमाश्रितः । जयः स्कन्धे महेन्द्राद्याः पञ्च दक्षिणबाहुगाः ॥१०३॥ 'महेन्द्रादित्यसत्याश्च भृश आकाशमेव च । वास्तू पुरुष चक्र- विद्वान वर्जन्य इंदर्य मय भृशमा पीला वीन -- ran PS जा नईमा पारिता पूषा दितथ वैवस्वत इस्त प्रचार याम ធំ भंग न m ग देश वसर अगर पुशल जीव दिलित CREAL ६.ना SHI वास्तुपुरुष के मस्तक पर ईशदेव, दाहिने कान पर पर्जन्यदेव, दाहिने स्कंध पर नयदेव और दाहिनी भुजा पर इन्द्र आदि पांच-इन्द्र, सूर्य, सत्य भृश और आकाश देव स्थित हैं ॥१०॥ बहिर्जानुनि पुपाद्याः सप्त पादनलीस्थिताः ॥१०॥ विशेष जानने के लिये देते राजवल्लभ मंडन अध्याय २. १. 'महेन्द्रः सूर्यः सत्यश्च ।

अष्टमोऽध्यायः १६५ -one-- NA- पुपाथ वितथश्चैव गृहक्षतो यमस्तथा । । गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृगः सप्त सुरा इति ॥१०॥ अग्निकोण मे जानुके उपर अग्नि देव और दाहिने पैर की नलीके ऊपर पुषा आदि सात देव-पुषा, वितथ, गृहक्षत, यम, गान्धर्व, भृगराज और मुग, ये सात देव स्थित है ।।१०४-१०५॥ पादयोः पितरस्तस्मात् सप्त पादनलीस्थिताः । दौवारिकोऽथ सुग्रीवः पुष्पदन्तो जलाधिपः ॥१०६॥ 'असुरशोषयमाश्च रोगो जानुनि संस्थितः । नागो मुख्यश्च भल्लाटः सोमो गिरिश्च बाहुगाः ॥१०७॥ दोनो परके अपर पितृदेव, बाये परकी नली पर दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदत, जलाधिप (वरुण), असुर, शोप, और पापयक्ष्मा ये सात देव स्थित है। नाग, मुख्य, भल्लाट, कुबेर और गिरि (शैल), ये पाच देव बाबी भुजा पर स्थित है ॥१०६-१०७॥ अदितिः स्कन्धदेशे च वामे कणे दिति. स्थितः । द्वात्रिंशद्बाह्यगा देवा नाभिपृष्ठे स्थितो विधिः ॥१०॥ बाये स्कंध पर अदिति देव और बाये कान पर दितिदेव स्थित है। इस प्रकार बत्तीस देव वास्तुपुरुप के बाह्य अंगों पर है । मध्य नाभि के पृष्ठ भाग मे ब्रह्मा स्थित है ।।१०८॥ अर्यमा दचिणे वामे स्तने तु पृथिवीधरः । विवस्वानऽथ मित्रश्च दक्षवामोरुगावुभौ ॥१०॥ दाहिने स्तन पर अर्यमा और बाये स्तन पर पृथ्वीधर देव स्थित है। दाहनी ऊरु पर विवस्वान और बायी ऊरु पर मित्रदेव स्थित है ॥१०॥ आपस्तु गलके वास्तो-रापवत्सो हदि स्थितः । सावित्री सविता तद्वत् कर दक्षिणमाश्रितौ ॥११०॥ वास्तुपुरुष के गले पर मापदेव, हृदय के ऊपर मापवत्स देव स्थित है। दाहिने हाथ पर सावित्री और सविता ये दो देविया स्थित है ॥११०॥ रुद्रोऽसौ वामहस्तके । रुद्रदासोऽपि तत्रैव इति देवमयं वपुः ॥११॥ २. 'सावित्र इन्द्र इन्द्रजयो मे १. 'शेष।' .

१६६
प्रासादमण्डने
woman-
:
मेढ़ (लिंग) स्थान पर इन्द्र और इन्द्रजय देव स्थित है । बायें हाथ पर रुद्र और
रुद्रदास देव स्थित है ! इस प्रकार कुल पैंतालीस देवमय वास्तुपुरुष का शरीर है ॥१११॥
वास्तुमंडल के कोने की आठ देवियां-
ऐशान्ये चरकी बाह्य पीलीपीछा च पूर्वदिक् ।
विदारिकाग्निकोणे च जम्मा याम्यदिशाश्रिता ॥११२||
नैऋत्ये पूतना स्क्रन्दा पश्चिमे वायुकोणके ।
पापराक्षसिका सौम्येऽर्यमैवं सर्वतोऽर्चयेत् ॥११।।
वास्तुमंडल के बाहर ईशानकोने में उत्तर दिशा में चरकी और पूर्व में पीलीपीच्छा,
अग्निकोने मे पूर्व में विदारिका और दक्षिण में जम्भा देवी, नैऋत्यकोने मे दक्षिण मे पूतना
और पश्चिम में स्कन्दा, वायुकोने में पश्चिम मे पापराक्षसिका और उत्तर में अर्यमा देवी का
न्यास करके पूजन करे॥११२-१३||
देवीः क्रूरान् यमादींश्च माषान्नैः सुरयामिषैः ।
अपरान् घृतपक्वान्नैः सर्वान् स्वर्णसुगन्धिमिः ॥११॥
इति वास्तुपुरुषविन्यासः।
देवियो को और यम आदि क्रूर देवो को मापान, सुरा और आमिष से और बाकी के
सब देवो को घत, पक्वान, सुवर्ण और सुगंधित पदार्थों से पूजना चाहिये ।।११४।।
शास्त्रप्रशंसा-
एकेन शास्त्रेण गुणाधिकेन,
विना द्वितीयेन पदार्थसिद्धिः ।
तस्मात् प्रकारान्तरतो विलोक्य,
मणिगुणाढ्योऽपि सहायकाङ्क्षी ॥११॥
इस ग्रन्थ के कर्ता श्रीमंडनसूत्रधार का कहना है कि-शिल्पशास्त्र अनेक है। उनमें
यह एक ही शास्त्र अधिक गुणवाला होने पर भी दूसरे शिल्पशास्त्र देखे बिना पदार्थ की सिद्धि
नहीं होती, इसलिये प्रकारान्तर से दूसरे शिल्पग्रन्थ भी देखने चाहिये । जैसे-अकेला मरिण
थधिक गुणवाला होने पर भी इतनी शोभा नहीं देता जितनी सुवर्णादि अन्य पदार्थों के साथ
मिलाने से देता है। इसी प्रकार शिल्प के अनेक शास्त्र देखने से शिल्पी शिल्पशास्त्र का विद्वान
होता है ॥११॥

अष्टमोऽध्यायः १६७ -- '-memem Mum meena-000mwamann-me com अन्तिममंगल- श्रीविश्वकर्मगणनाथमहेशचण्डी- श्रीविश्वरूपजगदीश्वरसुप्रसादात् । प्रासादमण्डनमिदं रुचिरं चकार, श्रीमण्डनो गुणवतां भुवि सूत्रधारः ॥११६॥ इति श्रीसूत्रधारमण्डनविरचिते वास्तुशास्त्रे प्रासादमण्डने अष्टमोऽध्यायः समाप्तः । सम्पूर्णोऽयं ग्रन्थः । श्री विश्वकर्मा, गणपति, महेश, चडीदेवी और विश्वस्वरूप श्री जगदीश्वर की कृपा से जगत के विद्वानो मे सुप्रसिद्ध मंडन नाम का सूत्रधार है। उसने प्रासाद निर्माण विधि का यह प्रासादमंडन नाम का शास्त्र आनंद पूर्वक बनाया ॥११६।। इति श्री पडित भगवानदास जैन ने इस प्रासादमंडन के आठवे अध्याय को सुबोधिनी नामकी भाषाटीका समाप्त की। * श्रीरस्तु * परिशिष्ट नं.-१ केसरी आदि २५ प्रासाद । (अपराजितपृच्छा सूत्र १५६) विश्वकर्मोवाच- सान्धारांश्च ततो वक्ष्ये प्रासादान् पर्वतोपमान् । शिखरैर्विविधाकारै-नैकाण्डैश्च' विभूषितान् ॥१॥ पर्वत के जैसे शोभायमान, अनेक प्रकार के शिखरवाले और अनेक शृंगों से विभूषित, ऐसे सान्धार जातिके प्रासादो को कहता हूं। ऐसा विश्वकर्मा कहता है ॥१॥ आद्यः पञ्चाण्डको ज्ञेयः केसरी नाम नामतः । 'तावदन्तं चतुद्धि-विदेकोचरं शतम् ॥२॥ प्रथम केसरी नामका प्रासाद पांच शृगो वाला है । पीछे प्रत्येक प्रासाद के ऊपर चार २ शृंग बढाने से पच्चीसवें अंतिम मेरु प्रासाद के ऊपर एक सौ एक श्रृंग होजाता हैं ॥२॥ पच्चीस प्रासादों का नाम- केशरी सर्वतोभद्रो नन्दनो नन्दशालिकः । नन्दीशो मन्दरश्चैत्र श्रीवत्सश्चामृतोद्भवः ॥३॥ हिमवान् हेमकूटश्च कैलासः पृथिवीजयः । इन्द्रनीलो महानीलो भूधरो रत्नकूटकः ॥४॥ वैडूर्यः पद्मरागश्च वनको मुकुटोज्ज्वलः । ऐरावतो राजहंसो गरुडो वृषभस्तथा ॥५॥ मेरुः प्रासादराजः स्याद् देवानामालयो हि सः । संयोगेन च सान्धारान् कथयामि यथार्थतः ॥६॥ १. 'रएडकनकभूपितान् ।' २. 'तावन्तश्चतुरो वृद्धिः।'

परिशिष्टे केसरीप्रासादः १६६ केसरी, सर्वतोभद्र, नन्दन, नन्दशालिक, नन्दीश, मंदर, श्रीवत्स, अमृतोद्भव, हिमवान, हेमकुट, कैलाश, पृथिवीजय, इन्द्रनील, महानील, भूधर, रत्नकूटक, वैडूर्य, पराग, वनक, मुकुटोज्ज्वल, ऐरावत, राजहंस, गरुड, वृपभ और मेरु ये पचीस प्रासाद सांधारजाति के हैं। उसका अनुक्रमसे यथार्थ वर्णन किया जाता है ॥३ से ६॥ 'दशहस्तादधस्तान प्रासादो प्रासादो भ्रमसंयुतः। पट्त्रिंशान्तं निरन्धारा चाव्ये वेदादिहस्ततः ॥७॥ यदि प्रासाद का मान दस हाथ से न्यून न हो तो, वह प्रासाद भ्रम (परिक्रमा) वाला बना सकते है। एवं चार हाथ से छत्तीस हाथ तक के मान का प्रासाद विना भ्रमका भी बना सकते है ॥७॥ पञ्चविंशतिः 'सान्धारा प्रयुक्ता वास्तुवेदिमिः । अमहीनास्तु ये कार्याः शुद्धच्छन्देषु नागराः ||८|| वास्तुशास्त्र के विद्वानो ने ये सान्धार (परिक्रमा वाले) पचीस प्रासाद शुद्ध नागर जाति के कहे है, वे भ्रम रहित भी बना सकते है | १-केसरीप्रासाद- चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे क्षेत्रे अष्टाष्टकविभाजिते । भागभागं भ्रमभित्ति-द्विभागो देवतालयः ॥६॥ सान्धार जाति के प्रासाद की समचोरस भूमि के पाठ २ भाग करे, उनमें से एक भाग को भ्रमणो, एक २ भाग को दो दीवार और दो भागका गभारा बनाना चाहिये || निरन्धारे पदा मिचिन गर्भ प्रकल्पयेत् । मध्यच्छन्दश्च वेदास्रो वाह्य कुम्भायतं शृणु ॥१०॥ यदि प्रासाद निरंधार बनाना हो तो प्रासाद के मान के चौथे भागकी दीवार और प्राधे मानका गभारा बनाना चाहिये । जैसे-आठ हाथ के मानका प्रासाद है, तो उसका चौथा भाग दो २ हाथ की दीवार और चार हाथ का गभारा बनावे । मध्य में गमारा समचोरस रक्खे । अब गभारा के बाहर कुंभा की लंबाई के मानको कहता हूँ॥७॥ १. 'दशहस्तावधी नास्ति। २. गभारेके चारो तरफ फेरी देने के लिये परिक्रमा पनी दावे ऐसे प्रासादी को साधार प्रासाद कहा जाता है पौर परिक्रमा बनी हुई न होके तो निरंधार प्रासाद कहा जाता है। प्रा०२२ प्रासादमण्डले MENT माीि TRURAHMESH क्षेत्राधे च भवेद् मद्रं भद्रा कर्णविस्तरः। कर्णस्याप्रमाणेन कर्तव्यो भद्रनिर्गमः ॥११॥ प्रासाद की भूमिके नाप से आधा भद्रका विस्तार रक्खें। इससे आधे मानका कोणा का विस्तार रक्खे। कोणे के आधे मान का भद्रका निर्गम रक्खें ॥११॥ चतुष्कर्णेषु ख्यातानि श्रीवत्सशिखराणि च । रथिकोद्गमे च पञ्चैव केशरी गिरिजाप्रियः ॥१२॥ इति केसरीप्रासादः॥१॥ प्रासाद के चारों कोरणे के ऊपर एक २श्रीवत्स शृंग चढावें, तथा भद्रके ऊपर रथिका और उम बनावें। इस प्रकार का केसरी नामका प्रासाद पार्वती देवी को प्रिय है ॥१२॥ शृंग संख्या-चार कोणे ४ और एक शिखर एवं कुल ५ श्रृंग। २-सर्वतोभद्रप्रासाद- क्षेत्रे विभक्ते दशधा गर्भः पोडशकोष्ठकैः । मितिं भ्रमं च मित्तिं च भागमार्ग प्रकल्पयेत् ॥१३॥ प्रासाद की समचोर भूमिका दस २ भाग करें। उनमें से मध्य गभारा कुल सोलह भाग का रक्खें। बाकी एक भाग की दीवार, एक भाग की भ्रमणी और एक भागकी दूसरी बाहर की दीवार रक्खें ॥१३॥ द्विभागः कर्ण इत्युक्तो भद्रं पड्भागिकं तथा । निर्गमं चैकमागेन भागिका पार्श्वक्षोभणा ॥१४॥ दो २ भाग का कोला और छभागका भद्र का विस्तार रक्खें। भद्र का निर्गम एक भाग रक्खे और भद्र के दोनों तरफ एक २ भाग की एक २ कोणी बनावें ॥१४॥ कणिका चार्धमागेन भागाधं भद्रनिर्गमम् । भागत्रयं च विस्तारे मुखभद्र विधीयते ॥१५॥ भद्र के दोनों तरफ आधे २ भाग की एक २ कणिका भी बनाना-इस का और कोरपीया का निर्गम आधा भाग और भद्र का निर्गम आधा भाग, इस प्रकार कुल एक भाग भद्र का निर्गम जानें । भद्रका विस्तार छ भाग रखना अपर लिखा है, उनमें से दो कोपी और .

3 - परिशिष्टे केसरीप्रासादः असे d (ARITA अनाम RELand uncle दो कणिका का तीन भाग छोड़ करके बाकी तीन भाग रहे, उतना मुखभद्र का विस्तार रखे ॥१५॥ भद्रे वै तूदगमाः पञ्च कर्णेऽष्टशृङ्गकानि च । श्रीवत्सशिखरं कार्य घण्टाकलशसंयुतम् ॥१६॥ इति सर्वतोभद्रप्रासादः ॥२॥ भद्रके पर पांच २ उद्गम करे। कोणे के ऊपर दो २ एव कुल पाठ शृंग चढावे आमलसार और कलश वाला श्रीवत्स शिखर बनावे ॥१॥ श्रृंगसख्या प्रत्येक कोण पर २२ और एक शिखर एवं कुल ९ श्रृंग। ३-नंदनप्रासाद- श्रीवत्सं भद्रमारूढ रथिकोद्गमभूपिते । नन्दने नन्दति स्वामी दुरितं हरति ध्रुवम् ॥१७॥ इति नन्दनप्रासाद.१३॥ यह नन्दन प्रासाद का मान और स्वरूप सर्वतोभद्र प्रासाद के अनुसार जाने । फर्क इतना कि-भद्र के गवाक्ष और उद्रम के ऊपर एक २ उरुश्रृंग चढ़ावे । इसको बनानेवाला स्वामी आनन्द मे रहता है और सब पापो का नाश करता है ॥१७॥ शृंगसंख्या चार कोणे ८, चार भद्रे ४ और एक शिखर, एव कुल १३ मुंग। गर्म ४-विशालप्रासाद- तस्यैवं भद्रोचे शृङ्ग भद्रं तस्यानुरूपतः । नन्दिशालो गुणैयुक्त स्वरूपो लक्षणान्वितः ॥१८॥ इति नन्दिशालप्रासाद' ||४|| इस नन्दिशालप्रासाद का तलमान और स्वरूप नन्दन प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष इतना कि-भद्र के ऊपर एक २ उरुग अधिक चढावे तो यह नन्दिशाल प्रासाद सब गुणो से युक्त अच्छे लक्षणवाला सुन्दर बनता है ॥१८॥ श्रृंगसंख्या-कोणे ८, भद्रे ८ और एक शिखर, एवं कुल १७ शृंग। ।

प्रासादमण्डने ५-नन्दीशप्रासाद- त्रिभागं च भवेद् भद्र भद्राध प्ररथस्तथा । कणे शृङ्गद्वयं भद्रे एकैकं प्ररथे तथा ॥१६॥ इति नन्दीशप्रासादः || यह नन्दीशप्रासाद का मान और स्वरूप सर्वतोभद्र प्रासाद के अनुसार जाने। विशेष यह है कि-छः भाग का भद्र है, उसके बदले तीन भाग का भद्र और डेढ़ २ भाग का प्रतिरथ बनावें। कोणे के ऊपर दो २, भद्र के ऊपर एक २ और प्रतिरथ के ऊपर एक २ शृंग चढ़ावे ॥१६॥ शृंगसख्या-कोणे ८, प्ररथे ८, भद्रे ४ और एक शिखर, एवं कुल २१ शृंग। ६-मंदरप्रासाद- INR RURIHIMNsness द्वादशांशस्तु विस्तारो · मूलगर्भस्तदर्धतः । भागमागं तु कर्तव्या द्वे भित्ती चान्धकारिका ॥२०॥ कर्णप्ररथमद्राचं कारयेद् द्विद्विभागतः । प्ररथः समनिष्कासो भद्रं भागेन निर्गमम् ॥२१॥ कर्णे द्वे भद्रके द्वे च चैकं प्रतिरथे तथा । सघण्टा कलशा रेखा रथिकोद्गमभूषिताः ॥२२॥ इति मन्दरप्रासादः॥६॥ प्रासाद को समचोरस भूमिका बारह भाग करें। उनमें से छ: भाग का गभारा बनावें, तथा एक २ भाग को दोनों दीवार और एक २ भाग की भ्रमणी (परिक्रमा) बनावें। गभारे के बाहर के भाग में कोणा, प्ररथ और भद्रार्ध ये सब दो २ भाग का रक्खें। उसका निर्गम समदल रक्खें और भद्रका निर्गम एक भाग रक्खें। कोणे के ऊपर दो २ शृंग, भद्रके ऊपर दो २ उरुग और प्रतिरथ के ऊपर एक २ शृंग चढ़ावें। आमलसार, कलश, रेखा, गवाक्ष और उद्गम, ये सब शोभायमान बनावें ॥२० से २२।। शृंगसंख्या-कोणे ८, प्ररथे ८ भद्रे ८और एक शिखर, एव कुल २५ शृग। m Hamme Pung

परिशिष्टे केसरीप्रासादः
--
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७-श्रीवृक्षप्रासाद-
चतुदशांशविस्तार गर्भबायांशपिस्तरः ।
भागमागं भ्रमो नित्ति-नागनिनिस्तु भागिका ॥२३॥
करें शुदयं कुर्या-च्छिपरं चाटापन्नम्म् ।
प्राथः कर्णमानेन तिलक
निलकं भासारि ॥२॥
नन्दिकायां च निलकं भद्रे नवयं भवेत् ।
श्रीकृतस्तु समाख्यातः कनव्यन्नु श्रिया पनेः ॥२५॥
इति श्री.
प्रासाद को समचारम भूमिका चौदह नागानने में
आठ नागका गभारा, एक नागरी दीपार, नाrit
और एक भागको बाहर की दीवार, जमादार भर न
होता है। बाहर का मान दर मार पनुगा ।
विशेष इतना कि-दो भाग का
नाम
LEM
भागको नंदी, और दो भाग का भारी
दोशृंग, प्रतिरय कार एका श्रृंगार in
शिसर का विस्तार पाठ भाग का नाम :
तिलक से। भद्रा जगरनान २ - HI
श्रीवृक्षप्रामाद या समाfrry Rhi
॥२ २
शृंगसंपा-प्रतिरोt.
एवं कुल २९ शृंग। तिलक संत्या-प्रतिरथे और
नए 7:11
५-अमृतोद्भवप्रासाद-
कणे वयं तुर्यान् प्ररथा पूर्व कामनः ।
अमृतोद्भपनामोऽसी प्रामाद: मुनिः ॥२२॥
SHRSHIR
-
यह प्रासाद का तजमान प्रौरान it!
कि-कोण के ार तीनभनय र... HERE
जाने । ऐमा अनुतदिनानासाने ति ॥२॥

१७४ प्रासादमण्डने - शृंगसंख्या-कोणे १२, प्रतिरथे ८, भद्रे १२, एक शिखर, एवं कुल ३३ भृग, तिलक संख्या-प्रतिरथे और नन्दी पर , कुल १६ तिलक । ६-हिमवान् प्रासाद- शृिङ्गे प्रतिरथे त्वमृतोद्भवसंस्थितौ । हिमवान् द्वे उस्शृङ्गै पूज्यः सुरनरोरगैः ॥२७॥ इति हिमवान् प्रासादः ॥६॥ यह प्रासाद का तलमान और स्वरूप-अमृतोद्भव प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह है कि-पढरे के पर तिलक के बदले शृंग अर्थात् दो श्रृंग चढ़ावें और भद्रके ऊपर से एक उरुश्रृंग कम करके दो उरुशृंग रक्खें। ऐसा हिमवान् नामका प्रासाद देव, मनुष्य और नाग- कुमारों से पूजित है ॥२७॥ शृ गसंख्या-कोरणे १२, प्रतिरथे १६, भद्रे ८, एक शिखर, एवं कुल ३७ शृंग और तिलक ८ नंदो के ऊपर। १०-हेमकूट प्रासाद- उस्मृङ्गत्रयं भद्रे नन्दिका विलकान्विता । हेमकूटस्तदा नाम प्रकर्त्तव्यस्त्रिमूर्तिके ॥२८॥ इति हेमकूटप्रासादः ॥१०॥ यह प्रासादका तलमान और स्वरूप हिमवान् प्रासाद के अनुसार जानें। विशेष यह है कि-भद्र के ऊपर तीसरा उरुशृग और नंदी के ऊपर दूसरा तिलक चढ़ावें। यह हेमकूट नामका प्रासाद ब्रह्मा, विष्णु और महेश, यह त्रिमूत्ति के लिये बनावें ॥२८॥ श्रृंगसंख्या-कोणे १२, प्रतिरथे १६, भद्रे १२, एक शिखर, एवं कुल ४१ शृंग और १६ तिलक नन्दी के ऊपर। ११-कैलास प्रासाद- नन्दिकाग्रान्ततः भृङ्ग रेखाश्च तिलकोत्तमाः । कैलासश्च तदा नाम ईश्वरस्य सदा प्रियः ॥२॥ इति कैलासप्रासादः॥११॥ यह प्रासाद का मान और स्वरूप हेमकूट प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह हैं कि- नन्दी के ऊपर दो तिलक है, उसके बदले एक श्रृंग और उसके ऊपर एक तिलक चढावें।

परिशिष्दे केसरीप्रासादः
तथा कोणे के ऊपर तीन श्रृंग हैं, उसके बदले दो शृंग और उसके ऊपर तिलक चढ़ाना
चाहिये । ऐसा कैलास नामका प्रासाद ईश्वर को हमेशा प्रिय है ॥२९॥
मुंगसंख्या कोणे , पढरे १६, नंदी पर , भद्रे १२, एक शिखर, एवं कुल ४५ शृंग
और तिलक कोने और नन्दी के ऊपर।
१२-पृथिवीजय प्रासाद-
रेखोर्चे तिलकं त्यक्त्या शृङ्गं तत्रैव कारयेत् ।
पृथ्वीजयस्तदा नाम
कर्तव्यः सर्वदैवते ॥३०॥
इति पृथ्वीजयप्रासादः ॥१२॥
यह प्रासाद का तलमान और स्वरूप कैलासप्रासादकी तरह जाने । विशेष यह है कि-
कोणेके ऊपर का तिलक हटाकर के उसके बदले शृंग चढ़ावे । ऐसा पृथ्वीजय नामका प्रासाद
सब देवों के लिये बनावे ॥३०॥
श्रृंगसंख्या-कोणे १२, प्रतिरथे १६, नंदी के ऊपर ८, भद्रे १२, एक शिखर, एवं
कुल ४६ शृंग और तिलक ८ नंदी के ऊपर।
१३-इन्द्रनीलप्रासाद-
पोडशांशकविस्तारे द्विभागः कर्णविस्तरः ।
नन्दिका चैकमागेन दुर्थशः प्रतिरथस्तथा ॥३१॥
पुनर्नन्दी भवेद् भागं भद्रं वेदशिविस्तरम् ।
समस्तं समनिष्कासं भद्रे भागो विनिर्गमः ॥३२॥
प्रासाद की समचौरस भूमि का सोलह भाग करे। उनमे से दो भाग का कोण, एक
भागको नन्दी, दो भागका प्रतिरथ, एक भाग की दूसरी नन्दी और दो भागका भद्रार्ध वनावे ।
ये सब अंगोका निर्गम समदल और भद्रका निर्गम एक भाग रक्खे ॥३१-३२॥
चतुष्टयंशको गर्भो वेष्टितो भीचिभागतः ।
बाबमीतिर्भवेद् भागा द्विभागा च भ्रमन्तिका ॥३३॥
सोलह भाग में गभारे का विस्तार आठ भाग (समचोरस ६४ भाग) करे गभारे को
दीवार एक भाग, भ्रमणो दो भाग और बाहर की दीवार एक भाग रखा ॥३३॥

१७६ प्रासादमण्डने Neparame-n-neummenam M -- - MON - MENU . (मायमील साSHAATE HD कणे शृङ्गद्वयं कार्य शिखरं सूर्यविस्तरम् । नन्दिकायां तु तिलकं प्रत्यङ्गच द्विभागिकम् ॥३४॥ शृङ्गद्वयं प्रतिरथे उस्शृङ्ग षडंशकम् । 'शृङ्गद्वयं नन्दिकाया-मुरशृङ्ग युगांशकम् ॥३॥ द्विभागं भद्रशृङ्ग तु शृङ्गाधैं चैव निर्गमः । कणे प्रतिरथे चैव यु दकान्तरभूषितम् ॥३६॥ इन्दनीलस्तदा नाम इन्द्रादिसुरपूजितः । वल्लभः सर्वदेवानां शिवास्यापि विशेषतः ॥३॥ इति इन्द्रनीलप्रासादः॥१३॥ कोणे के ऊपर दो श्रृंग चढ़ावें । शिखर का विस्तार बारह भाग रक्खें । नन्दी के ऊपर एक तिलक चढ़ावें और दो भाग के विस्तार वाला प्रत्यंग चढ़ावे । प्रतिरथ के ऊपर दो शृंग चढ़ावें । पहला उरुगछ भाग विस्तार में रक्खे । नन्दी के ऊपर एक श्रृंग चढ़ावें । दूसरा उरुटंग विस्तार में चार भाग का और तीसरा उरुqग विस्तार में दो भाग का रक्खें। इन उरु,गों का निर्गम विस्तार से आधा रक्खें। कोणा और प्रतिरथ उदकान्तर वाला बनावें । ऐसा इन्द्रनील प्रासाद इन्द्रादि देवों से पूजित है, यह सब देवों को और विशेष कर शिवजी को प्रिय है ॥३४ से ३७॥ शृंग संख्या कोणे, प्रतिरथे १६, भद्र नन्दी के ऊपर , भद्रे १२, प्रत्यंग , एक शिखर, कुल ५३ शृंग और तिलक ८ कर्ण नन्दी पर। १४-महानील प्रासाद-- कर्णे नन्दी (कर्णनन्यां ?) तथा शृङ्गरेखोचे तिलकं तथा । महानीलस्तदा नाम कर्तव्यः सर्वदैवते ॥३८॥ इति महानीलप्रसादः ॥१४॥ गर्मा Jain YA- १. 'गद्वयं' अशुद्ध पाट मालुम होता है। उस स्थान पर 'शृङ्गमेक' ऐसा पाठ चाहिये जिसे शृंगों की संख्या ठीक मिल जाय।

परिशिष्टे केसरीप्रासाद. -- -HAN 40 be- यह महानील प्रासाद का तलमान और स्वरूप इन्द्रनील प्रासाद के अनुसार जानें। विशेष यह है कि-कर्णनन्दी के ऊपर से तिलक हटा करके उसके बदले श्रृंग रक्खे। ऐसा महानील प्रासाद सब देवों के लिये बनावे ॥१८॥ शृंग संरया-कोणे ४, नंदी पर ८, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे १६, नन्दी पर ८ भद्रे १२ और एक शिखर, कुल ५७ शृंग और तिलक ४ कोणे। १५-भूधरप्रासाद- कार्य शृङ्ग च तिलक रेखामध्ये प्रशस्यते । भूधरस्य समाख्यातः प्रासादो देवतालयः ॥३६॥ इति भूधरप्रासादः॥१॥ यह प्रासाद का मान और स्वरूप महानील प्रासाद के अनुसार जाने । विशेप यह कि-कोणे के ऊपर एक शृग अधिक चढावे तो यह भूधर नाम का प्रासाद देवोका स्थानरूप होता है |॥३६॥ शृंग संख्या-कोणे ८, बाकी पूर्ववत् जाने। तिलक ४ कोणे। . RETARURTAIRAGISMENJARAN १६-रत्नकूटप्रासाद भूधरस्य यथा प्रोक्तं द्विभागं वधयेत् पुनः । पूर्ववदलसंख्यायां भद्रपावें द्विनन्दिके ॥४०॥ द्विभागं बाह्यभित्तिश्च शेपं पूर्वप्रकल्पितम् । तलच्छन्दमिति ख्यात-मूर्ध्वमानमतः शृणु ॥४१॥ यह रत्नकूट प्रासाद का मान और स्वरूप भूधर प्रासाद के अनुसार जाने । विशेप यह कि-तल मानमे दो भाग बढ़ावे अर्थात् अठारह भाग करे। तथा भद्र के दोनो तरफ एक २ भाग की दूसरी नन्दी बनावें। और बाहर की दीवार दो भागकी रक्खे। बाकी सब पहले के अनुसार जानें। अब ऊर्ध्वमान सुनिये ॥४०-४१॥ m प्रा०२३ १७८ प्रासादमण्डने mmomemage -RINAAMRINow कणे द्विशृङ्गतिलकं शिखरं सूर्यविस्तरम् । तिलके द्वे नन्दिकायां प्रत्यङ्गतु द्विभागिकम् ॥४२॥ शृङ्गत्रयं प्रतिस्थे षड्भागा चोरुमञ्जरी । तिलके द्वे पुनर्नन्या-मुरुशृङ्ग युगांशकम् ॥४३॥ नन्यां च शृङ्गतिलके त्रिभागा चोरुमञ्जरी । द्विभागं भद्रशृङ्गच अर्धे चार्धे च निर्गमः ॥४४॥ कोणे के ऊपर दो शृंग और एक तिलक चढ़ावे । शिखर का विस्तार बारह भाग का रक्खें। कर्णनन्दो के ऊपर दो तिलक और दो भाग का प्रत्यंग चढ़ावे । प्रतिरथ के ऊपर तीन शृंग और नंदी के ऊपर दो तिलक चढ़ावें। भद्रनन्दी के ऊपर एक शृंग और एक तिलक चढावे । भद्र के ऊपर चार उरुशृंग चढ़ावें, उनमे पहला उरुशृंग छः भाग, दूसरा चार भाग, तोसरा तीन भाग और चौथा दो भाग का रक्खे। ये उरु,गों का निर्गम विस्तार से आधा रक्खे ॥४२ से ४४॥ शृंग संख्या कोणे ८, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे २४, भद्र नन्दी पर ८, भद्रे १६, एक शिखर, कुल ६५ शृंग और तिलक-कोणे ४, कोणी पर १६, प्ररथ नन्दी पर १६ और भद्र नन्दी पर ८, कुल ४४ तिलक। रत्नकूटस्तदा नाम शिवलिङ्गेषु कामदः । प्रशस्तः सर्वदेवेषु राज्ञां तु जयकारणम् ॥४॥ इति रत्नकूटप्रासादः ॥१६॥ ऊपर कहे हुए स्वरूप वाला रत्नकूट प्रासाद शिवलिंग के लिये बनावें तो सब इच्छित फल को देने वाला है । सब देवो के लिये बनावे तो भी प्रशस्त है और राजाओं को विजय कराने वाला है ॥४॥ १७-वैडूर्यप्रासाद- भृङ्ग तृतीय रेखोचे कर्त्तव्यं सर्वशोभनम् । वैडूर्यश्च तदा नाम कर्तव्यः सर्वदैवते. ॥४६॥ इति वैडूर्यप्रासादः ॥१७॥ इस प्रामाद का तलमान और स्वरूप रत्नकूट प्रासाद के अनुसार है। विशेष यह कि-कोणे के आर से तिलक निकाल करके उसके बदले एक तीसरा शृंग चढ़ावें। सब

परिशिष्टे केसरीप्रासादः
१७६
Means
MuMomsana-
शोभायमान बनावे। यह वैडूर्य नाम का प्रासाद सब देवो के लिये बनाना चाहिये ।।४६।।
शृंगसख्या-कोने ९२, प्रत्यंग , प्रतिरथे २४, भद्रनंदी पर ८, भद्रे १६ एक शिखर,
एवं कुल ६९ शृंग। तिलक संख्या-कर्णनंदी पर १६, प्रतिरथ नदी पर १६ और भद्रनन्दी
पर ८, एवं कुल ४० तिलक ।
१८-पद्मरागप्रासाद-
तथैव तिलक नन्यां शृङ्गयुग्मं तु संस्थितम् ।
पद्मरागस्तदा नाम सर्वदेवसुखावहः ॥४७॥
इति पद्मरागप्रासादः ॥१८॥
इस प्रासाद का मान और स्वरूप वैडूर्यप्रासाद की तरह समझे। विशेष यह है कि-
कोणे के ऊपर से तीसरा शृंग हटा करके उसके बदले मे तिलक चढ़ावे और भद्रनंदी के
ऊपर जो एक तिलक और एक शृंग है, उसके बदले दो शृंग रखे। ऐसा पद्मराग नाम का
प्रासाद सब देवो के लिये सुख कारक है ।।४७॥
शृंगसख्या-कोणे ८, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे २४, भद्र नंदी पर १६, भद्रे' १६, एक शिखर,
एवं कुल ७३ शृंग । तिलक संख्या-कोणे ४, कर्णनन्दी पर १६ प्रतिरथ नदी पर १६
एवं कुल ३६ तिलक।
१६-वज्रकप्रासाद-
रेखोचे च ततः शृंगं कर्त्तव्यं सर्वशोभनम् ।
वनकश्चेति नामासौ शक्रादिसुरवल्लभः ॥४॥
इति वजूकप्रासादः ॥१९॥
इस प्रासाद का मान और स्वरूप पद्मराग प्रासाद की तरह जानें । विशेष यह है कि-
कोणे के ऊपर से तिलक हटा करके उसके बदले में शृंग चढ़ावे । यह वचक प्रासाद इन्द्र आदि
देवो को प्रिय है ॥४८॥
भृगसख्या-कोणे १२, प्रत्यंग ८, प्रतिरथे २४, भद्रनंदी पर १६. भद्र १६, एक शिखर,
कुल ७७ शृंग। तिलक सख्या-कर्णनंदी पर १६, प्रतिरथ नन्दी पर १६, कुल ३२ तिलक ।
२०-मुकुटोज्ज्वलप्रासाद-
भक्ते विंशतिधा क्षेत्रे द्विभागः कर्णविस्तरः ।
सार्धभागं भवेबन्दी कर्यवत्प्ररथस्तथा ॥४६॥

१८० प्रासादमण्डने meenagers Mmemamar पुनर्नन्दी सार्धभागा भागा चै भद्रनन्दिका । वेदांशो भद्रविस्तार एकभागस्तु निर्गमः ॥५०॥ द्विमागा बाह्यमित्तिश्च द्विभागा च भ्रमन्तिका । तत्समा मध्यमिचिश्च गर्भोऽष्टांशैः प्रकल्पितः ॥५१॥ m (NanRफुल RATRINGRE) इस प्रासाद की समचोरस भूमिका वीस भाग करें। उनमें से दो भाग का कोरणा, डेढ़ भाग की नंदी, दो भाग का प्ररथ, डेढ भाग की नदी, एक भाग की भद्रनन्दी और चार भाग का भद्र का विस्तार रक्खें। भद्र का निर्गम एक भाग का रक्खें। दो भाग बाहर की दीवार, दो भाग की भ्रमणी, दो भाग की गभारे की दीवार और पाठ भाग का गभारा रक्खें ।।४६ से ५१॥ 11511 VIVANIVAL म कणे द्विशृङ्ग तिलकं रेखा द्विसप्तविस्तरा । नन्यां शृङ्ग च तिलकं प्रत्यङ्ग तर्ध्वतः '१५२।। भृङ्गत्रयं प्रतिकयों सप्तांशा चोरुमञ्जरी । नन्या शृङ्गच तिलक-मुरुशृङ्ग पदंशकम् ॥५३॥ भद्रनन्यां तथा शृङ्ग-मिपुभागोरुमञ्जरी । भद्रशृङ्ग विभागं स मुकुटोज्ज्वल उच्यते ॥५४॥ इति मुकुटोज्ज्वलप्रासादः ॥२०॥ रेखा का विस्तार चौदह भाग का रक्खे । कोणे के आर दो श्रृंग, और एक तिलक, कर्णनंदी के ऊपर एक शंग और एक तिलक, ऊपर प्रत्यंग, प्ररथ के ऊपर तीन श्रृंग, नंदीके ऊपर एक शृंग और एक तिलक, भद्रनन्दी के ऊपर एक शृंग और भद्र के ऊपर चार श्रृंग चढावे । पहला उरुशृंग सात भाग का, दूसरा उरुश्रृंग छः भाग का, तीसरा उरुग पांच भाग का और चौथा उरुश्रृंग दो भाग का रक्खे। ऐसा मुकुटोज्ज्वल प्रासाद है ।।५२ से ५४।। शृंगसंख्या-कोणे ८, प्रत्यंग ८, कर्णनन्दी पर ८, प्ररथे २४, नंदी पर ८, भद्रनन्दी पर ८, भद्रे १६, एक शिखर, कुल ८१ श्रृंग। तिलक संख्या-कोणे ४, कर्णनन्दी पर , प्ररथनन्दो पर ८ कुल २० तिलक ।

परिशिष्टे केसरीप्रासादः १८१ M --00 mo-- --0000 - ne- - . 40 - AM २१-ऐरावतप्रासाद रेखोचे च ततः शृङ्ग फर्त्तव्यं सर्वकामदम् । ऐरावतस्तदा नाम शक्रादिसुरवल्लभः ॥५॥ इत्यरावतप्रासादः ॥२१॥ इसका तलमान और स्वरूप मुकुटोज्ज्वल प्रासाद के अनुसार जाने । विशेप यह है कि- कोणे के ऊपर का तिलक हटाकर के उस जगह शृग रक्खे। यह सव इच्छित फल देनेवाला है । ऐसा ऐरावतप्रासाद इन्द्रादि देवों के लिये प्रिय है ||५|| शृंग सख्या- कोणे १२, नंदी पर ८, प्रत्यंग ८, प्ररथे २४, नंदीपर ८, भद्रनन्दी पर , भद्रे १६, एक शिखर, कुल ८५ शृंग । तिलक संख्या-कर्णनन्दी पर ८, प्रति नन्दी पर ८, कुल १६ तिलक। - २२-राजहंसप्रासाद- तथैव तिलकं कुर्याद् भद्रकणे तु शृङ्गकम् । राजहंसः समाख्यातः कर्तव्यो ब्रह्मानन्दिरे ॥५६|| इति राजहंसप्रासादः ॥२२॥ इसका तलमान और स्वरूप ऐरावत प्रसाद के अनुसार जाने । विशेप यह है कि- कोणे के ऊपर तीसरा शृंग के बदले में एक तिलक चढावें, अर्थात् दो शृग और एक तिलक चढ़ावे । तथा भद्रनंदो के आर एक श्रृंग बढावे। ऐसा राजहंस प्रासाद का स्वरूप है, वह ब्रह्मा के लिये बनावे ॥५३॥ शृंग सख्या-कोणे ८ प्रत्यंग ८, कर्ण नन्दी पर , प्ररथे २४, प्ररथ नंदी के ऊपर , भद्रनन्दी के ऊपर १६, भद्रे १६ और एक शिखर, कुल ६ शृंग। तिलक सख्या-कोणे ४, कर्णनंदी पर प. प्ररथनदी पर ८, एवं कुल २० तिलक । २३-पक्षिराज (गरुड) प्रासाद- रेखोचे च ततः शृङ्ग कर्त्तव्यं सर्वकामदम् । पतिराजस्तदा नाम काव्यः स श्रियः पतेः ॥५७॥ इति पक्षिराजप्रासाद ॥२३॥ इस प्रासाद का मान और स्वरूप राजहस प्रासाद के अनुसार जाने । विशेप यह कि- कोणे के कार का तिलक हटा कर के उसके बदले शृग चढावे । ऐसा पक्षिराज प्रासाद विष्णु के लिये बनाना चाहिये ।।७।। शृगसंख्या-कोरो १२, प्रत्यंग ८, कर्णनंदी पर ८, प्ररथे २४, प्ररथनन्दी पर , भद्रनदी पर १६, भद्रे १६ और एक शिखर, एव कुल ९३ शृंग । तिलक संख्या कर्णनन्दी पर और प्ररथ नन्दी पर ८, एव कुल १६ तिलक ।

१८२ प्रासादमण्डने - २४-वृषभप्रासाद- द्वाविंशत्या विभक्ते च द्विभागा मित्तिका भवेत् । भ्रमणी तत्समा चैव पुनर्मित्तिश्च तत्समा ।।५।। शतमूलपदैर्गर्भ: कर्तव्यो लक्षणान्वितः । कर्णप्रतिरथरथो-परथा द्विद्विविस्तराः ॥५६॥ भद्रनन्दी भवेद् भागं वेदांशो भद्रविस्तरः । भागो भद्रे निर्गमः स्या-च्छेषा 3 पूर्वकल्पिताः ॥६॥ यह वृपभ प्रासाद की समचोरस भूमिका बाईस भाग करे। उनमें से दो भाग की बाहर की दीवार, दो भाग की भ्रमणो, दो भाग को गर्भ की दीवार और दस भाग का गभारा रक्खें। बाहर के अंगों मे-कोण, प्रतिरथ, रथ और उपरथ, ये प्रत्येक दो दो भाग के विस्तार वाले रक्खे । भद्रनन्दी एक भाग की रक्खे और पूरा भद्र चार भाग का रक्खें । भद्र का निर्गम एक भाग का रक्खें। बाकी के सब अंग समदल बनावें ॥५८ से ६०॥ कर्णे द्विशृङ्ग तिलकं शिखरं षोडशांशकम् । शृङ्गद्वयं प्रतिरथे 'प्रत्यङ्ग च त्रिभागिकम् ॥६॥ रथे शृङ्गत्रयं कुर्या-च्छ गोर्षे चोरुमञ्जरी । द्वे द्वे शृङ्गे उपरथे उरुशृङ्गं षडंशकम् ॥६२॥ भद्रनन्धों भवेच्छङ्ग वेदांशा चोरुमञ्जरी । द्विभागं भद्रशृङ्ग च कर्तव्यं च मनोरमम् ॥६॥ सप्तनवत्यण्डकयुक् कर्त्तव्यो लक्षणान्वितः । वृषभो नाम विख्यात ईश्वरस्य सदा प्रियः ॥६४॥ इति वृषभप्रासादः ॥२४॥ शिखर का विस्तार सोलह भाग का करे। कोणो के ऊपर दो शृंग और एक तिलक, प्ररथ कार दो शृंग, उसके कार तीन तीन भाग का प्रत्यंग, रथ के ऊपर तीन श्रृंग, उपरथ के ऊपर दो दो शृंग, भद्रनन्दी के ऊपर एक श्रृंग और भद्र के ऊपर चार उरुझंग चढ़ावे । पहला उरु ग आठ भाग का, दूसरा छह भाग का, तीसरा चार भाग का और चौथा दो भाग का रवखे । सत्तानवे शृंग वाला और सब लक्षण वाला, ऐसा यह वृषभ नाम का प्रासाद ईश्वर को सर्वदा प्रिय है ॥६१ से ६४।। शृंग संख्या-कोणे ८, प्रत्यंग ८, प्ररथे १६ रथे २४, उपरथे १६ भद्रनन्दी पर ८ भद्रे १६ और एक शिखर, एवं कुल ६७ शृंग। तिलक संख्या-४ कोण पर ।

परिशिष्टे केसरीप्रासादः - NRN .. .mmmmsm १५३ - विमाSamme InduTHANI २५-मेरुप्रासाद- कणे शृङत्रयं चैव एकोचरशताण्डकः । मेरुश्चापि समाख्यातः कर्त्तव्यश्च त्रिमूर्तिके ॥६५॥ यह मेरु प्रासाद का मान और स्वरूप वृषभ प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष यह है कि-वृषभ प्रासाद के कोणो के पर का तिलक हटा कर के उसके बदले शृंग चढ़ावे । यह एक सौ एक अंग वाला मेरु प्रासाद ब्रह्मा, विष्णु और महेश के लिये बनावे ॥६॥ शृग सख्या-कोणे १२, प्रत्यग ८, प्ररथे १६, रथे २४, उपरथे १६, भद्रनन्दी के ऊपर ८, भद्र १६, और एक शिखर, एव कुल १०१ शृग। मेस्त्रासाद की प्रदक्षिणा का फल- सर्वस्य हेममेरोश्च यत्पुण्यं त्रिप्रदक्षिणैः । कृते शैलेष्टकाभिश्च तत्पुण्याल्लभतेऽधिकम् ॥६६॥ सम्पूर्ण सुवर्णमय मेरु को तीन प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, उस पुण्य से भी अधिक पुण्य पाषाण अथवा ईट के बने हुवे मेरु प्रासाद की प्रदक्षिणा करने से होता है ॥६६॥ हरो हिरण्यगर्भश्च हरिर्दिनकरस्तथा । एते देवाः स्थिता मेरौ नान्येषां स कदाचन ॥६७॥ इति श्रीखत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रद्योतकारे श्रीभुवनदेवाचार्यो- क्तापराजितपृच्छायां केसर्यादिसान्धारप्रासादनिर्णयाधिकारो नामैकोनपष्टषु चरशवतमं सत्रम् ॥ महादेव, ब्रह्मा, विष्णु और सूर्य, इन देवो को मेरु प्रासाद में प्रतिष्ठित किये जाते है। अन्य दूसरे देवो को कभी भी उसमे प्रतिष्ठित नहीं करना चाहिये ॥३७॥ इति पंडित भगवानदास जैन अनुवादित केसरी आदि पचीस साधार प्रासाद निर्णयाधिकार समाप्त । - परिशिष्ट नं. २ अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः। जय उवाच- शृणु तात ! महादेव ! यन्मया परिपृच्छयते । प्रासादांश्च जिनेन्द्राणां कथयसि किं मां प्रभो ॥१॥ हे महादेव ! पिता मैने आपको जिनेन्द्र के प्रासादों का वर्णन करने का कहा था, उसको हे भगवन् ! श्राप सविस्तार कहेगे? ॥शा किं तलं किञ्च शिखरं किं द्विपञ्चाशदुत्तमाः । समोसरणं किं तात ! कि स्यादष्टापदं हि तत् ॥२॥ महीधरो मुनिवरो द्विधारिणी सुशोभिता । हे तात । उत्तम बावन जिनालय किस प्रकार के है ? तथा उनके तथा शिखरों की रचना कैसी है ? समवसरण, अष्टापद, महीधर, मुनिवर और शोभायमान द्विधारिणी प्रासादों की रचना कैसी है ? उसका माप वर्णन करे ॥२॥ श्रीविश्वकर्मोवाच- शृणु वत्स ! महाप्राज्ञ यचया परिपृच्छयते । प्रासादांश्च जिनेन्द्राणां कथयाम्यहं तच्छणु ॥३॥ श्री विश्वकर्मा अपने जयनाम के पुत्र को सम्बोधन करके कहते है कि--हे महा बुद्धिमान पुत्र ! तुमने जिनेन्द्रो के प्रासादो का वर्णन के लिये पूछा, उसको विस्तार पूर्वक कहता हूँ, सुनो ॥३॥ प्रासादमध्ये मेवो भद्रप्रासादनागराः । अन्तका द्राविडारवैव महीधरा लतिनास्तथा ॥४॥ उत्तम जाति के प्रासादो मे मेस्त्रासाद, नागर जाति के भद्रप्रसाद, अंतकप्रासाद, द्राविड प्रासाद, महीधर प्रासाद और लतिन जाति का प्रासाद, ये उत्तम जाति के प्रासाद है ॥४॥ - अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १८५ तलनिर्माण R- प्रासाददीर्घतो व्यासो मित्तिवाह्य सुरालये। पोडशांशैहरेद् भागं शेष च द्विगुणं भवेत् ।।।। प्रथमे नत्रमे चैव द्वितीये चतुरो भवेत् । अयं रिधिः प्रकर्त्तव्यो भागं च द्विव्यंशं भवेत् ॥६॥ तत्र युतिः प्रकाव्यो प्रासादे सर्वनामतः । शिवमुखे मया श्रुतं भाषितं विश्वकर्मणा ।।७।। मण्डोवर के बाहर के भाग तक प्रासाद की लम्बाई और चौडाई का गुणाकार करके उसको सोलह से भाग दे, जो शेष रहे उसको दुगुणा करना ............." प्रथमा विभक्ति। १-कमलभूषण (ऋषभजिनवल्लभ) प्रासाद- चतुरखीकृते क्षेत्रे द्वात्रिंशल्पदभाजिते । कर्णभागवयं कार्य प्रतिकणस्तथैव च ॥८॥ उपरथस्त्रिभागश्व भद्राय वेदमागिकम् । नन्दिका कर्णिका चैव चैकभागा व्यवस्थिता ॥६॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बत्तीस भाग करे, उनमे से तीन भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिरथ, तीन भाग का उपरथ और चार भाग का भद्रा रक्खे। कोरिणका और नन्दिका एक २ भाग की रक्खे ||-| कणे च क्रमचत्वारि प्रतिकणे अमत्रयम् । उपरथे द्वयं ज्ञेयं कर्णिकायां क्रमद्वयम् ॥१०॥ विशतिरुत्शृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि च पोडश । कणे च केसरी दद्यानन्दनं नन्दशालिकम् ॥११॥ प्रथमक्रमो नन्दीश ऊचे विलकशोमनम् । कमलभूपणनामोऽयं ऋपभजिनवल्लभः ॥१२॥ इति ऋपजिनवल्लभ. कमलभूपणप्रासाद. ॥१॥ FARUR EMAIL प्रा० २४ प्रासावमण्डने १८६ me -- ww--- Harmoremoseen -- कोणे के ऊपर चार'कम, प्रतिकर्ण के ऊपर तीन क्रम, उपरथ और नन्दित्रों के ऊपर दो २ क्रम चढ़ावें चारों दिशा के भद्र के ऊपर कुल बोस उरुग चढावें। तथा सोलह प्रत्यंग कोने पर चढ़ावें । कोणा के ऊपर नीचे से पहला क्रम नन्दिश, दूसरा नन्दशालिक, तीसरा नंदन और चौथा केसरी क्रम चढावें और उसके ऊपर एक शोभायमान तिलक चढ़ावें । ऐसा ऋषभजिन को वल्लभ कमलभूषण नामका प्रासाद है ॥१० से १२॥ शृंगसंख्या-कोणे २२४, प्रतिकणे २८०, उपरथे १४४, नन्दित्रों के ऊपर ४३२, भद्रे २०, प्रत्यंग १६, एक शिखर, कुल १११७ श्रृंग और चार तिलक कोणे के ऊपर। विभक्ति दूसरी। २-अजितजिनवल्लभ-कामदायकप्रासाद- चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे द्वादशपदमाजिते । कर्णभागद्वयं कार्य प्रतिकर्णस्तथैव च ॥१३॥ 'भद्राधं च विभागेन चतुर्दिा व्यवस्थितम् । कर्णे क्रमत्रयं कार्य प्रतिकर्णे क्रमद्वयम् ॥१४॥ अष्टौ चैवोरुशृङ्गाणि ह्यष्टौ प्रन्यङ्गानि च । कणे च केसरी दद्यात् सर्वतोभद्रमेव च ॥१५॥ नन्दनमजिते देयं चतुष्कर्णेषु शोभितम् । कामदायकप्रासादो ह्यजितजिनवल्लभः ॥१६॥ इति अजितजिनवल्लभः कामदायकप्रासादः॥२॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करें, उनमें से दो भागका कोण, दो भाग का प्रतिकर्ण और दो भाग का भद्रार्ध रक्खें । कोणे के ऊपर तीन क्रम, प्रतिकर्ण के ऊपर दो क्रम, १. इस प्रकरण में किसी श्लोक मे 'कर्म' और किसी श्लोक में 'क्रम' ऐसे दो प्रकार के शब्दों का प्रयोग प्राचीन प्रतियो मे देखने में माता है । मैंने प्रायः कर्म के स्थान पर कम शब्द का प्रयोग ठीक समझकर किया है । बाकी दोनो शन्द ठीक हैं । क्रम कहने से भृगो का अनुक्रम और कर्म (काम) कहने से श्रृंगो का समूह अर्थ होता है । काम का समूह प्रथं सोने चांदी के वरग बनाने वालों में प्रचलित है। ये लोग १६० वरग के समूह को एक काम बोलते हैं। २. 'भद्रा साघमागेन नन्दी तु चाघमागिका।' पाठान्तरे ।

मथ जिनेन्द्रप्रासादाध्याय- - आठ उरुशृंग और पाठ प्रत्यंग कोने पर चढावे । कोणे के ऊपर केसरी, सर्वतोभद्र और नंदन ये तीन कम चढ़ावे । ऐसा अजितजिनको वल्लभ कामदायक नाम का प्रासाद है ॥१३ से १६ ।। शृगसंख्या-कोणे १०८, प्रतिकणे ११२, भद्रे ८, प्रत्यंग , और एक शिखर, कुल २३७ श्रृंगा तीसरी विभक्ति। ३-संभवजिनवल्लभ-रत्नकोटिप्रासाद- चतुरस्रीकृते क्षेत्रे नवभागविमाजिते । भद्रार्ध सार्धमागेन चैमागः प्रतिरथः ॥१७॥ कर्णिका नन्दिका पादा साधकणों विचक्षण ।। कणे क्रमद्वयं कार्य प्रतिकणे तथैव च ॥१८॥ 'केसरीसर्वतोभद्र-कमद्वयं व्यवस्थितम् । कर्णिकानन्दिकयोश्च भृङ्गमेकैकं कारयेत् ॥१६॥ पोडश उत्शृङ्गाणि चाष्टौ प्रत्यङ्गानि च । रत्नकोटिश्च नामायं प्रासादा संभवे जिने ॥२०॥ इति संभवजिनवल्लभो रत्नकोटिप्रासाद.||३|| प्रासाद को समचोरस भूमिका नव भाग करें। उनमे से डेढ भाग का भद्रार्थ, एक भाग का प्रतिरथ, करणी और नन्दिका पाव पाव भाग की ओर कोण डेढ भाग का रक्खे । कोणे के ऊपर और प्रतिकर्ण के ऊपर दो दो क्रम केसरी और सर्वतोभद्र चढावे । कपी और नन्दिका के ऊपर एक एक श्रृंग चढावे। चारो दिशा के भद्र के उपर सोलह उरुश्रृंग और पाठ प्रत्यंग कोने पर चढ़ावे । ऐसा संभवजिन को वल्लभ रनकोटि नाम का प्रासाद है। ॥१७ से २०॥ श्रृंगसंख्या-कोणे ५६, प्रतिकणे ११२, कणोपर, नंदीपर, उरुग १६, प्रत्यंग ८, और एक शिखर, कुल २०६ श्रृंग। बार १. 'प्रथमक्रमकेसरी व द्वितीयं च श्रीवत्सकम्' २. अजय च प्रासादमण्डने १८ mandu wom. w-moroman comm.00000mosomameewomen - ४-अमृतोद्भवप्रासाद- तद्रूपे तत्प्रमाणे च रथे कणें तिलकं न्यसेत् । अमृतोद्भवनामोऽयं सर्वदेवेभ्यः कारयेत् ॥२१॥ इत्यमृतोद्भवप्रासादः ॥४॥ तल और स्वरूप रत्नकोटि प्रासाद के अनुसार जानें। बिशेष यह है कि-कोण और प्रतिरथ के ऊपर एक एक तिलक भी चढ़ावें। जिससे अमृतोद्भव नाम का प्रासाद होता है। यह सब देवों के लिये बनावे ।।२।। शृंगसंख्या-पूर्ववत् २०६ । तिलक संख्या-कोणे ४ प्रतिकणे ८ कुल १२ । विभक्तिं चौथी। ५-अभिनन्दनजिनवल्लभ-क्षितिभूषणप्रासाद- चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे पोडशपदभाजिते । कर्णभागद्वयं कार्य प्रतिकर्यास्तथैव च ॥२२॥ उपरथो द्विभागश्च मद्राधं द्वयमेव च । कणे च क्रमचत्वारि प्रतिकणे क्रमत्रयम् ॥२३॥ उपरथे क्रमद्वौ च ऊर्चे तिलकशोभितम् । द्वादश उरुभृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि च षोडश ॥२४॥ क्षितिभूषणनामोऽयं प्रासादश्चाभिनन्दनः। इत्यभिनन्दनजिनवल्लभः क्षितिभूषणप्रासादः ॥॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका सोलह भाग करें। उनमें से दो भाग का कोरण, दो भाग काप्रतिरथ, दो भाग का उपरथ और दो भाग का भद्रार्ध बनावें । कोणे के ऊपर चार क्रम, प्रतिरथ के ऊपर तीन क्रम, उपरथ के ऊपर दो क्रम और एक तिलक चढ़ावे। चारों तरफ के भद्र के ऊपर बारह उस्मंग और सोलह प्रत्यंग चढ़ावे । ऐसा अभिन दन जिन वल्लभ क्षितिभूषण नाम का प्रासाद है ॥२२ से २४॥ शृंगसंख्या-कोणे १७६, प्रतिरथे २१६, उपरथे ११२, भद्रे १२, प्रत्यंग १६ एक शिखर, कुल५३३ भृग। तिलक प्रासाद उपरथे।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः
२८
विभक्ति पांचवीं।
६-सुमतिजिनवल्लभ प्रासाद-
चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे चतुर्दशविभाजिते ॥२५॥
कों द्विभागिको शेयः प्रतिकर्णस्तथैव च ।
निर्गमस्तत्समो ज्ञेयो नन्दिका भागविश्रुता ॥२६॥
भद्रा च द्विभागेन कर्तव्यं च चतुर्दिशि ।
कणे क्रमद्वयं कार्य प्रतिकणे तथैव च ॥२७॥
भद्रे चैवोरुचत्वारि तथाष्टौ प्रत्यङ्गानि च ।
नन्दिकायां शृङ्गकूटं सुमतिजिननामतः ॥२८॥
इति सुमतिजिनवल्लभप्रासादः ।।६।।
समचौरस भूमिका चौदह भाग करे, उनमे से दो भाग का कोना, दो भाग का प्रतिरथ,
एक भाग की नन्दी और दो भाग का भद्रा वनावे । कोना और प्रतिरथ का निर्गम समदल
रक्खे । कोने के ऊपर दो क्रम, प्रतिरथ के आर दो क्रम, प्रत्येक भद्र के अपर चार उरुग,
पाठ प्रत्यंगशृग और नन्दी के ऊपर एक श्रीवत्सशृंग तथा एक कूट चढावे । यह
सुमतिजिन नाम का प्रासाद है ।।२५ से २८।।
श्रृंग सख्या-कोने ५६, प्रतिरथे ११२, भद्रे १६, प्रत्यग, ८, नंदी के ऊपर, एक
शिखर कुल २०१ शृंग। चार कूट नंदी पर ।
विभक्ति छठी।
७-पद्मप्रभजिन प्रासाद-
चतुरस्त्रीकते क्षेत्रे विशधा प्रतिमाजिते ।
कार्यों भागद्वयं कार्यः प्रतिकर्णस्तथैव च ॥२६॥
कर्णिका नन्दिका भागा भद्रा चतुर्मागकम् ।
कणे क्रमद्वयं कार्य प्रतिकणे तथैव च ॥३०॥
केसरी सर्वतोभद्रं क्रमवयं व्यवस्थितम् ।
कर्णिकायां शृङकूट नन्दिकायां तथैव च ॥३१॥
भद्रे चैवोरुचत्वारि ह्यटौ प्रत्यङ्गानि च ।
पद्मवल्लभनामोऽयं जिनेन्द्रे पननायके ॥३२॥
इति पद्मप्रभजिनप्रासादः ॥७॥

१६०
प्रासादमण्डने
।
प्रासाद की समचोरस भूमि का बीस भाग करें। उनमें से दो भाग का कोना, दो भाग
का प्रतिरथ, करिणका एक भाग, नंदी एक भाग और भद्रार्ध चार भाग का रक्खें। कोना
और प्रतिरथ के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र ये दो क्रम चढ़ावें। करिखका और नंदी के ऊपर
एक एक श्रृंग और एक एक कूट चढ़ावें, यह पद्मप्रभजिनदेव को वल्लभ ऐसा पद्मवल्लभ
नाम का प्रासाद है ॥३६ से ३२||
श्रृंगसंख्या-कोने ५६, प्रतिरथे ११२, कारणका पर, नंदी पर , भद्रे १६ और प्रत्यंग
८ एक शिखर कुल २०६ शृंग और आठ कूट-चार करिणका और चार नंदी पर ।
द-परागप्रासाद-
पद्मवल्लभसंस्थाने कर्तव्यः पद्मरागकः ।
रथोघे विलकं दद्यात् स्वरूपो लक्षणान्वितः ॥३३॥
इति पद्मरागप्रासादः ॥८॥
इस प्रासाद का मान और स्वरूप ऊपर के पद्मवल्लभ प्रासाद के अनुसार जाने ।
विशेष यह है कि प्ररथ के ऊपर एक एक तिलक भी चढा, जिसे पद्मराग नाम का प्रासाद
होता है ॥३३॥
६-पुष्टिवर्द्धनप्रासाद-
तद्पे च प्रकर्त्तव्यः कर्णोचे तिलकं न्यसेत् ।
पुष्टिवर्धननामोऽयं तुष्टिं पुष्टिं विवर्धयेत् ॥३४॥
इति पुष्टिवर्द्धन प्रासादः
इस प्रासाद का मान और स्वरूप पद्मराग प्रासाद के अनुसार जानें । विशेष यह है कि
कोणे के ऊपर एक एक तिलक भी चढाने से तुष्टि पुष्टि को बढाने वाला पुष्टिवर्धन नाम
का प्रासाद होता है ॥३४॥
विभक्ति सातवीं।
१०-सुपार्श्वजिनवल्लभप्रासाद
दशभागीकृते क्षेत्रे कर्णोऽस्य च द्विभागिकः ।
प्रतिकर्णः सार्धभागो निर्गमे तत्सम भवेत् ॥३॥
भद्रार्धं च सार्धमागं कपिले भद्रमानयोः ।
निर्गमं पदमानेन चतुर्दिक्षु च योजयेत् ॥३६॥

अथ जिनेन्द्रप्रासादाभ्यायः
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कणे क्रमद्वयं कार्य रथे भद्रे तथोद्गमः ।
सुपार्श्वनामो विज्ञेयः गृहराजः सुखावहः ॥३७॥
इति सुपार्श्वजिनवल्लभप्रासादः ॥१०॥
प्रासाद की समचोरस भूमि का दस भाग करे। उन में से
दो भाग का कोण, डेढ भाग का प्रतिकर्ण बनावे । ये दोनो
अंग समचोरस निकलता रक्खे। भद्रार्घ डेढ भाग का रवखे,
उसके दोनो बगल में दो कपिला भद्र के मान की वनावें। भद्र
का निकाला एक भाग का रक्खे । कोणो के ऊपर दो क्रम
चढ़ावे, तथा प्रतिकर्ण और भद्र के ऊपर डोढीया (उदम) बनावे ।
ऐसा प्रासादराज सुपार्श्वनाम का है, यह सुख देने वाला है
॥ ३५ से ३७॥
शृंगसख्या-कोरणे ५६, एक शिखर कुल ५७ शृंग।
११-श्रीवल्लभप्रासाद-
रथोर्चे शृङ्गमेकं तु भद्रे चैवं चतुर्दिशि ।
श्रीवल्लभस्तदा नाम प्रासादो जिनवल्लमः ॥३८॥
इति श्रीवल्लभप्रासादः ॥११॥
सुपार्वजिन वल्लभ प्रासाद के प्रतिकर्ण के ऊपर एक एक
शृंग और भद्र के ऊपर एक एक उरुश्रृंग चढाने से श्री वल्लभनाम
का प्रासाद होता है, यह जिन देव को प्रिय है। ॥३८॥
शृंग संख्या-कोरणे ५६, प्रतिकोणे , भद्रे ४, एक शिखर,
कुल ६९ शृंग।
विभक्ति आठवीं।
१२-चन्द्रप्रमवल्लभ शीतलप्रसाद
चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे द्वात्रिंशत्पदभाजिते ।
पञ्चभागो भवेत् कर्णः प्रतिकर्णस्तथैव च ॥२६॥
भद्राधं च चतुर्भागं नन्दिका कर्णिका पदा।
समदलं च कर्त्तव्यं चतुर्दिा व्यवस्थितम् ॥४०॥

११२
प्रासादमएडने
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श्रीवत्सं केसरी चैव सर्वतोभद्रमेव च ।
कर्णे चैव प्रदातव्यं रथे चैवं तु तत्समम् ॥४१॥
नन्दिका कणिकायां च द्वे द्वेशृङ्ग च विन्यसेत् ।
भद्रे चैवोरश्चत्वारि प्रत्यङ्गं जिनमेव च ॥४२॥
शीतलो नाम विज्ञेयः सुश्रियं च विवर्धकः ।
चन्द्रप्रभस्य प्रासादो विज्ञेयश्च सुखावहः ॥४३॥
इति चन्द्रप्रभवल्लभः शीतलप्रासादः॥१२॥
प्रासाद की समचोरस भूमि का बत्तीस भाग करें। उन में से पांच भाग का कोण, पांच
भाग का प्रतिकर्ण, चार भाग का भद्रार्थ, कोणी और नन्दिका एक एक भाग की रक्खें। ये
सब अंग समचोरस बनावें । कोण और उपरथ के ऊपर श्रीवत्स, केसरी और सर्वतोभद्र भृग
चढ़ावें । कोखो और नन्दिका के ऊपर दो दो श्रे वत्स,ग, भद्र के ऊपर चार चार उरुशृंग
चढ़ावें और चोबीस प्रत्यंग चढ़ावे । ऐसा शीतल नाम का प्रासाद लक्ष्मी को बढाने वाला है
और चन्द्रप्रभजिन को प्रिय है और सुख कारक है ।।३६ से ४३।।
श्रृंगसंख्या-कोणे ६० प्रतिकणे १२०, कोणीपर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग
२४, एक शिखर, कुल २५३ शृंग।
१३-श्रीचन्द्र प्रासाद-
तद्रूपे च प्रकर्त्तव्यो रथोघे तिलकं न्यसेत् ।
श्रीचन्द्रो नाम विज्ञेयः सुरराजसुखावहः ॥४४॥
इति श्रीचन्द्रप्रासादः ॥१३||
शीतलप्रासाद के प्रतिकर्ण के ऊपर एक एक तिलक भी चढ़ावें तो श्रीचंद्र नाम का
प्रासाद होता है. यह इन्द्र को सुखकारक है ॥४४॥
शृंग संख्या पूर्ववत् २५३ और तिलक ८ प्रतिकणे ।
१४-हितुराजप्रासाद-
नन्दिका कर्णिकायां च ऊर्चे तिलकं शोमनम् ।
हितुराजस्तदा
नाम सुविधिजिनवल्लभः ॥४॥
इति सुविविजिनवल्लभः हितुराजप्रासादः ॥१४॥

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६३ - m -- ऊपर के श्रीचन्द्रप्रासाद की कोणी और नन्दी के ऊपर एक २ तिलक चढाने से सुविधि- जिनवल्लभ ऐसा हितुराज नाम का प्रासाद होता है ।।४।। शृगसख्या पूर्ववत् २५३ । तिलक-कोणी पर , प्रतिकर्ण पर ८, नन्दी पर ८, कुल २४ । विभक्ति नववी । १५-पुष्पदंतप्रासाद- चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे क्षेत्रे चतुर्विशतिभाजिते । भद्राध त्रिपदं वत्स ! रथी कर्णश्च तत्समः ॥४६॥ निर्गमस्तत्प्रमाणेन सर्वशोभासमन्वितम् । स्थे करें तथा भद्रकै शृङ्गे विलकं न्यसेत् ॥४७॥ पुष्पदन्तस्तदा नाम सुविधिजिनवल्लभः । कार्यः सुविधिनाथाय धर्मार्थकाममोक्षदः ॥४८॥ इति पुष्पदंतप्रासादः ॥१५॥ प्रासाद को समचोरस भूमि का चोवीस भाग करे, इन में से कोरण, प्रतिरथ, उपरथ और भद्राध, ये सब तीन तीन भाग का रक्खे। और निर्गम मे ये सव समदल रक्खे । भद्र के आर दो उहQग चढावे । कोना, प्रतिरथ और उपरथ ये तोनो के ऊपर दो दो शृंग और एक एक सिनक चढाने से पुष्पदन नाम का प्रासाद होता है । यह सुविधि जिन को वल्लभ है। ऐसा प्रासाद बनाने से धर्म अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥४६ से ४८॥ शृग संख्या-कोणे ८, प्रतिकणे १६ उपरथे १६, भद्रे ८ एक शिखर कुल ४६ श्रृंग। तिलक संख्या-कोणे ४ प्रतिकणे, उपरथे ८ कुल २० तिलक । विभक्ति दसवीं। १६-शीतलजिनप्रासाद- चतुरस्त्रीकते क्षेत्रे चतुर्विशतिभाजिते । कर्णाश्चैव समाख्यात-श्चतुर्भागश्च विस्तृतः ॥४६॥ प्रतिरथस्त्रयभागो भद्रार्ध भूतभागिकम् । रथे कणे च शृझैकं तदृर्षे तिलक द्वयम् ॥५०॥ प्रा०२५ प्रासादमएडने CM -00-NONwws - - . द्वादश उराशृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि ततोऽष्टमिः । शीतलश्च तदा नाम प्रासादो जिनवल्लभः ॥५१॥ इति शीतलजिनप्रासादः ॥१६॥ प्रासाद की सम चोरस भूमिका चौबीस भाग करें। उनमें से चार भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिरथ और पाच भाग का भद्रार्ध बनावें। कोण और प्रतिकर्ण के ऊपर एक एक शृंग और दो दो तिलक, चारों भद्र के उपर कुल बारह उरुश्रृंग, तथा पाठ प्रत्यंग चढ़ावे । ऐसा शीतल नाम का प्रासाद शीतल जिनको प्रिय है ॥४९ से ५१॥ श्रृंगसंख्या-कोणे ४, प्रतिकणे ८, भद्रे १२, प्रत्यंग ८, एक शिखर, कुल ३३ शृंग। तिलक कोणे , प्रतिकणे १६, कुल २४ तिलक । १७ कोत्तिवायकप्रासाद- तद्रूपे तत्प्रमाणे च कर्तव्यः पूर्वमानतः । कर्णोद्धे च द्वयं शृङ्गे प्रासादः कीर्तिदायकः ||२|| इति कत्तिदायकप्रासादः ॥१७॥ ऊपर के शीतल जिन प्रासाद के कोणे के ऊपर का एक तिलक कम करके उसके बदले शृंग चढ़ाने से कोत्तिदायक नाम का प्रासाद होता है ।।२।। श्रृंगसंख्या-कोणे ८, प्रतिकणे ८, भद्रे १२, प्रत्यंग ८, एक शिंखर, कुल ३७ शृंग। तिलक-कोणे ४, प्रतिकणे १६ । १८-मनोहरप्रासाद- 'कणे सप्त प्रतिकणे पञ्च मनोहरदायकः । तन्मानं च प्रकर्तव्यः स्वरूपो लक्षणान्वितः ॥५३॥ इति मनोहरप्रासादः ॥१८॥ ऊपर के प्रासाद के अनुसार मान और स्वरूप जानें । विशेष यह है कि कोणे के ऊपर एक केसरी क्रम और दो श्रीवत्सरोंग, तथा प्रतिकर्ण के ऊपर एक केसरी क्रम चढाने से मनोहर नाम का प्रासाद होता है ।।५।। शृगसंख्या-कोणे २८, प्रतिकणे ४०, भद्रे १२, प्रत्यग, एक शिखर, कुल ८६ श्रृंग। १. 'करर्ण सदृश प्रतिकणे प्रासादश्च मनोहरः।' पालान्तरे।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्याय १६५ ------ - विभक्ति ग्यारहवीं। १९-श्रेयांसजिनवल्लभप्रासाद- 'पोडशांशः प्रक व्यः कर्ण त्रयं रथस्त्रयम् । भद्रार्ध 'दिपदं वत्स ! चतुर्दिषु नियोजयेत् ॥५४॥ निर्गमं पदमानेन स्वहस्ताङ्ग लमानतः । शृङ्गच विलकं कर्णे रथे भद्रे चैवोद्गमः ।।५।। श्रेयांसवल्लभो नाम प्रासादश्च मनोहरः । इति श्रयासजिनवल्लभप्रासादः ॥१९॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका सोलह भाग करे। उनमे तीन भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिकर्ण और दो भाग का भद्रार्ध बनावें। इसके अंगों का निकाला प्रासाद के पद के अनुसार हस्तांगुल मान का रक्खें । अर्थात् जितने हाथ का प्रासाद हो, उतने अंगुल निकलता रक्खें। कोण और प्रतिकोरण के ऊपर एक एक शृंग और एक एक तिलक चढावे । तथा भद्र के अपर उद्गम बनावें । ऐसाथे यास जिनवल्लभ नाम का सुंदर प्रासाद है ।।५४ से ५५॥ शृंगसंख्या कोणे ४, प्रतिकोणे , एक शिखर, कुल १३ श्रृंग। तिलक संख्या-कोणे ४ प्रतिकणे । २०-सुकुलप्रासाद- तद्रूपे तत्प्रमाणे च शृङ्गचत्वारि भद्रके ॥५६॥ सुकुलो नाम विज्ञेयो प्रासादो बिनवल्लभः । इति सुकुलप्रासादः ॥२०॥ मान और प्रमाण कार के प्रासाद के अनुसार बाने । विशेष यह है कि-भद्र के पर एक एक श्रृंग चढाने से सुकुल नाम का प्रासाद होता है । वह जिन देव को प्रिय है ॥५६॥ शृंग संख्या-कणे ४, प्रतिकणे ८ भद्रे ४, एक शिखर, कुल १७ । तिलक १२ ॥ २१-कुलनंदनप्रासाद- उरभृङ्गाष्टकं कुर्यात् प्रासादः कुलनन्दनः ॥७॥ श्रेयासजिनवल्लभ प्रासाद के भद्र के अपर माठ उरुशृंग चढाने से कुलनन्दन नाम का प्रासाद होता है ।।४७॥ शृग संख्या- कोणे ४, रथे ८, भद्रे , एक शिखर, कुल २१ शृंग। तिलक १२ १. 'भष्टादशाश। २. 'विपद। - . .

प्रासादमण्डने १६६ -- -Sonam- M विभक्ति बारहवीं। २२-वासुपूज्यजिनप्रासाद- चतुरस्त्रीकते क्षेत्रे द्वाविंशपदभाजिते । पदानां तु चतुर्भागाः कणें चैवं तु कारयेत् ॥१८॥ कोणिका पदमानेन प्रतिरथस्त्रिभागकः । नन्दिका भागमानेन भद्रार्धं च द्विभागिकम् ॥५६॥ कणे क्रमवयं कार्य प्रतिकणे क्रमद्वयम् । त्रिकूटं नन्दीकणे च ऊर्चे तिलकशोभनम् ॥६०॥ भद्रे शृङ्गवयं कार्य-मष्टौ प्रत्यङ्गानि च । वासुपूज्यस्तदा नाम वासुपूज्यस्य वल्लभः ॥६१॥ इति वासुपूज्यजिनप्रासादः ॥२२॥ समचोरस भूमि के बाईस भाग करे ! उन में चार भाग का कोण, कर्णनंदी एक भाग, तीन भाग का प्रतिरथ, भद्रनन्दी एक भाग और दो भाग का भद्राई खखें । कोणे के ऊपर तोन क्रम, प्रतिकर्ण के ऊपर दो क्रम, कोणो और नंदो के ऊपर त्रिकूट भंग और उसके अपर तिलक, भद्र के ऊपर तीन तीन उरुन्टंग और आठ प्रत्यंग चढ़ावे । ऐसा वासुपूज्य नामका प्रासाद वासुपूज्य जिन को प्रिय है ॥५८ से ६१॥ श्रृंग संख्या-कोणे १०८, प्रतिरथे ११२, कर्णनंदी पर ८, भद्रनंदी पर ८, भद्रे १२ प्रत्यग ८, एक शिखर कुल २५७ शृंग। तिलक-१६ दोनो नंदी के ऊपर । २३-रत्नसंजयप्रासाद- तद्रूपे च प्रकर्त्तव्यः कोंचे तिलकं न्यसेत् । रत्नसंजयनामोऽयं गृहराजसुखावहः ॥६२॥ इति रत्नसञ्जयप्रासादः ॥२३॥ वासुपूज्यप्रासाद के कोणे के क्रम के ऊपर एक तिलक चढ़ाने से रत्नसंजय नाम का प्रासाद होता है । यह प्रासाद राजसुख कारक है ।।५।। श्रृंग संख्या पूर्ववत् २५७ और तिलक २०-कोणे ४, दोनो नन्दी पर १६ । २४-धर्मदप्रासाद तद्रूपे तत्पनाणे च चतुर्थ सुरुभुङ्गकम् । धर्मदस्तस्य नामायं पुरे वै धर्मवर्धनः ॥६३|| इति धर्मदप्रासादः ॥२४॥ -- ..

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १६७ - रत्नसंजयप्रासाद के भद्र के ऊपर चौथा एक उरुश्रृंग मधिक चढाने से धर्मद नामका प्रासाद होता है, वह नगर मै धर्म को बढाने वाला है ।।६३|| शृंगसंख्या-कोणे १०८ प्रतिरथे ११२, कोणी पर ८, नंदी पर ८, भद्रे १६ प्रत्यंग , एक शिखर कुल २६१ शृंग। तिलक पूर्ववत् २० । विभक्ति तेरहवीं। २५-विमलवल्लभप्रासाद चतुरस्रीकृते क्षेत्रे चतुविशतिभाजिते । पदेन त्रयभागेन कर्णस्तत्र विधीयते ॥६॥ तद्वदज्ञेयः प्रतिकर्णः कोणिका नन्दिका पदा। भद्राधं तु चतुर्भागं निर्गम भागमेव च ॥६॥ समनिर्गमं रथं ज्ञेयं कर्तव्यं चतुरो दिशि | कर्ण शृङ्गवयं कार्य प्रतिकणे 'द्वयमेव च ॥६६॥ नन्दिका कोणिकायां च शृङ्गकूटं सुशोभितम् । भद्रे चैवोरुचत्वारि चाटौ प्रत्यङ्गानि च ॥६॥ विमलवल्लभनामोऽयं प्रासादो विमलप्रियः । इति विमलजिनवल्लभप्रासादः ॥२१॥ समचोरस भूमि का चौवीस भाग करे । उन में तीन भाग का कोण, तीन भाग का प्रतिकर्ण, कोरिणका और नदिका एक एक भाग, और चार भाग का भद्रार्ध वनावें। भद्रका निर्गम एक भाग खखें। रथ और कर्ण का निर्गम समदल रक्खे । कोणे के ऊपर तीन श्रृंग, प्रतिकर्ण के कार दो शृंग, नदिका और कोणिका के ऊपर एक एक शृंग और एक एक कूट, भद्र के ऊपर चार उरुशृंग और आठ प्रत्यंग चढावे । यह विमलजिनवल्लभ नामका प्रासाद विमलबिन को प्रिय है।।६४ से ६७॥ शृंगसंख्या-कोणे १२, प्रतिरथे १६, कोणी पर ८, नंदी पर ८, भद्रे १६, प्रत्यंग ८, एक शिखर कुल ६६ शृंग। कूट १६ । २६-मुक्तिवप्रासाब- तद्रूपे च प्रकर्तव्यो रथे तिलकं दापयेत् ॥६॥ १. तथैव च।'

हम
प्रासादमण्डने
कणिकायां च द्वे शृङ्ग प्रासादो जिनवल्लमः ।
मुक्तिदो नाम विज्ञ यो भुक्तिमुत्ति प्रदायकः ॥६६॥
इति मुक्तिदप्रासादः ॥२६॥
विमलजिनवल्लभ नाम के प्रतिरथ ऊपर एक एक तिलक और दोनों नंदीयों के ऊपर
कूट के बदले शृंग चढावे। जिससे मुक्तिद नामका प्रासाद होता है, यह जिनदेव को प्रिय है
और वैभवादि भोगसामग्री और मुक्ति को देने वाला है ॥६॥
श्रृंग संख्या-कोणे १२, प्रतिरथे १६, कोणी पर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग
८, एक शिखर, कुल ८५, शृंग और तिलक ८ प्रतिरथ पर।
विभक्ति चौदहवीं।
२७-अनन्तजिनप्रासाद-
चतुरस्त्रीकते क्षेत्रे विशतिपदभाजिते ।
त्रीणि त्रीणि ततस्त्रीणि नन्दी पदेति भद्रके ॥७॥
निर्गमं पदमानेन त्रिषु स्थानेषु भद्रके ।
कर्णे क्रमत्रयं कार्य रथोचे तत्समं भवेत् ॥७१।।
भद्रे चैवोरचत्वारि नन्दिकायां क्रमद्वयम् ।
अनन्तजिनप्रासादो धनपुण्यश्रियं लभेत् ॥७२।।
इत्यनन्तजिनप्रासादः ॥२७॥
प्रासाद की समचौरस भूमिका बीस भाग करें। उनमे तीन भाग का कोना, तीन भाग
का उपरथ, तीन भाग का भद्रार्ध और भद्रनन्दी एक भाग जानें । इन अंगों का निकाला एक
भाग का रक्खे । कोण और रय आर तीन तीन क्रम, भद्र के ऊपर चार उरुश्रृंग और भद्र
नन्दी के ऊपर दो क्रम चढ़ावे । ऐसा अनन्तजिनप्रासाद धन, पुण्य और लक्ष्मी को देने
वाला है ।।७० से ७२॥
भृग संख्या-कोणे १०८, प्ररथे २१६, नंदी पर ११२, भद्रे १६, एक सिखर, कुल
४५३ शृंग।
२८-सुरेन्द्रप्रासाव-
अनन्तस्य सस्थाने रथोचे तिलकं न्यसेत् ।
सुरेन्द्रो नाम विज्ञयः सर्वदेवेषु वल्लभः ॥७॥
इति सुरेन्द्रनामप्रासादः ॥२९॥

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः १४ अनन्तजिन प्रासाद के प्ररय के ऊपर एक २ तिलक चढाने से सुरेन्द्र नाम का प्रासाद होता है, यह सर्व देवो के लिए प्रिय है ।।७३।। शृंग संख्या-पूर्ववत् ४५३ और तिलक प्ररथे । विभक्ति पन्द्रहवीं। २६-धर्मनाथजनप्रासाद- चतुरस्त्रीकते क्षेत्रे चाटाविंशतिभाजिते । कर्ण रथं च भद्रा युगमागं विधीयते ॥७४॥ निर्गमं तत्प्रमाणेन द्विभागा नन्दीकोणिका । केसरी सर्वतोभद्रं रथे कर्णे च दापयेत् ॥७॥ तः तिलक देयं सर्वशोभान्वितं कृतम् । नन्दिका कर्णिकायां च शृङ्गोचे शृङ्गमुत्तमम् ॥७६॥ भद्रे चैवोरुचत्वारि चाप्टौ प्रत्यङ्गानि च । धर्मदो नाम विख्यातः पूरे धर्मविवर्धनः ॥७७॥ इति धर्मनाथजनप्रासादः ॥२९॥ प्रासाद को समचोरस भूमि का अट्ठावीस भाग करे। उनमे चार भाग का कोण, चार माग का प्ररय, बार भाग का भद्रार्थ, एक भाग की कोणी, और एक भाग को भद्रनंदी बनावें। ये सब अंग समदल रक्खें। कोण और प्ररथ के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र ये दो क्रम चढावे और उसके कार शोभायमान एक एक तिलक चढावे । कोणी और नन्दी के ऊपर दो दो शृंग चढावे । भद्र के ऊपर चार उरुटंग और आठ प्रत्यंग चढावे । ऐसा धर्म को देने वाला धर्मद नाम का प्रासाद नगर मे धर्म को बढाने वाला है ।।७४ से ७७॥ श्रृंग संख्या-कोणे ५६, प्ररथे ११२, कोणी पर १६, नंदी पर १६, भद्रे १६, प्रत्यंग, ८ एक शिखर, कुल २२५ शृंग और तिलक ४ कोणे और ८ प्ररथे कुल १२ । ३०-धर्मवृक्षप्रासाद- तद् पे तत्प्रमाणे च कर्तव्यः सर्वकामदः । रथोर्चे च कृते शृङ्ग धर्मवृक्षोऽयं नामतः ॥७॥ इति धर्मवृक्षप्रासादः ॥३०॥ .

२०० प्रासादमण्डने धर्मनाथ प्रासाद के प्ररथ के ऊपर तिलक के बदले में एक एक श्रृंग चढाने से धर्मवृक्ष नाम का प्रासाद होता है ॥६॥ शृंग संख्या कोणे ५६:प्ररथे १२०, कोणी पर १६, नंदी पर १६ भद्रे १६, प्रत्यंग का एक शिखर, कुल २३३ और तिलक ४ कोणे। विभक्ति सोलहवीं। ३१-शान्तिजिन अथवा श्रीलिंग प्रासाद- चतुरस्त्रीकृते क्षेत्र द्वादशांशविभाजिते । कर्णो भागद्वयं कार्यः प्रतिकणस्तथैव च ॥७॥ भद्रार्ध सार्धभागेन नन्दिका चार्धभागिका । कर्णे क्रमद्वयं कार्य प्रतिकणे तथैव च ||८|| नन्दिकायां भृङ्गकूट-मुरुशृङ्गाणि द्वादश । शान्तिनामश्च विज्ञयः सर्वदेवेभ्यः कारयेत् ॥१॥ श्रीलिङ्गच तदा नाम श्रीपतिषु सुखावहः । इति शान्तिवल्लभः श्रीलिङ्गप्रासादः ॥३१॥ प्रासाद को समचोरस भूमिका बारह भाग करें। उनमें दो भाग का कोण, दो भाग का प्रतिकणं, डेढ भाग का भद्रा और आधे भाग की भद्रनंदी करें। कोण और प्रतिकर्ण के कार दो दो क्रम, भद्रनंदो के ऊपर एक शृंग और एक कूट, चारों भद्रों के ऊपर बारह उह- शृंग चढावें। ऐसा शांति नामका प्रासाद जानें, यह सब देवों के लिये बनावें । इसका दूसरा नाम श्रोलिङ्ग प्रासाद है, वह विष्णु के लिये सुखदायक है ॥७६ से २।। शृंगसंख्या-कोणे ५६, प्ररथे ११२ भद्रनंदी पर , भद्रे १२, एक शिखर, कुल १८६ शृंग और कूट नंदो पर। - ३२-कामदायक प्रासाद- उरुशृङ्ग पुनर्दद्यात् प्रासादः कामदायकः ॥२॥ इति कामदायकः ॥३२॥ शांतिनाथ प्रासाद के भद्र के ऊपर एक उरुशृंग अधिक चढ़ाने से कामदायक प्रासाद होता है ॥२॥ भृग संख्या-भद्र १६ वाकी पूर्ववत् कुल-१९३ शृंग।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २०१ ---- विभक्ति सत्रहवीं। ३३-कुथुजिनवल्लभ कुमुदप्रासाद- चतुरस्त्रीकृने क्षेत्रे क्षेत्रे चाटभागविभाजिते । कर्णः स्यादेकमागच प्रतिकर्णस्तथैव च ||८|| नन्दिका चैव भागार्धा त्रिपदं भद्रविस्तरम् । निर्गमं पदमानेन स्थापयेच चतुर्दिशि ॥४॥ कणे च केसरी दद्यात् तदा तिलकं न्यसेत् । तत्सदृशं प्रतिकणे नन्यां तु तिलकं न्यसेत् ॥८॥ भद्रे च शृंगमेकं तु कुमुदो नाम नामतः । बल्लभः सर्वदेवानां जिनेन्द्रकुंथुवल्लभः ॥८६॥ इति कुंथुनाथवल्लभः कुमुदप्रासादः ॥३३॥ प्रासाद को समचोरस भूमिका आठ भाग करे । उनमे कोण और प्रतिकर्ण एक एक माग का, भद्रार्ध डेढ भाग और भद्रनन्दी आधा भाग बनावे | भद्र का निर्गम एक भाग रक्खे, इस प्रकार यारो दिशा में व्यवस्था करें। कोण और प्रतिकर्ण के अपर एक एक केसरी शृंग और उसके ऊपर एक एक तिलक चढावे । भद्रनदी के ऊपर तिलक और भद्र के ऊपर एक उभंग चढावें । यह कुमुदनामका प्रासाद सर्वदेवो को और कुंथुजिनदेव को वल्लभ है ।।८३ से ८६॥ शृंगसंख्या-कोणे २०, प्ररथे ४०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल ६५ शृंग। तिलक संख्या- कोणे ४, प्ररथे ८, और नन्दी पर ८, कुल २० तिलक । ३४-शक्तिपासाद- तद्र पं च प्रकर्तव्यं रथे तिलकं दापयेत् । शनिदो नाम विज्ञयः श्रीदेवीपु सुखावहः ॥७॥ इति शक्तिदप्रासादः ॥३४॥ कुमुदप्रासाद के प्ररथ के ऊपर एक २ तिलक अधिक चढ़ाने से शक्तिद नाम का प्रासाद होता है । वह लक्ष्मीदेवी को सुखकारक है ।।८७॥ श्रृंगसंख्या-पूर्ववत् ६५ और तिलक-कोणे ४, प्ररथे १६, नदी पर ८ कुल २८ । प्रा० २६ २०२ प्रासादमखने ... . . .. .. - . ३५-हर्षणप्रासाद- कोंचे शृङ्गदातव्यं प्रासादो हर्षणस्तथा । इति हर्षणप्रासादः ॥३॥ शक्तिद प्रासाद के कोणे के ऊपर एक २ शृंग अधिक चढ़ाने से हर्षण नामका प्रासाद होता है। श्रृंगसंख्या-कोणे २४, प्ररथे ४०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल ६६ श्रृंग । तिलक पूर्ववत् २८॥ - ३६-भूषणप्रासाद- कर्णोचे तिलकं दद्यात् प्रासादो भूषणस्तथा ॥८॥ इति भूषणप्रासादः ॥३६॥ हर्षणप्रासाद के कोणे के ऊपर एक तिलक अधिक चढावे तो भूषण नामका प्रासाद होता है ॥ शृंगसंख्या-पूर्ववत् ६९ और तिलक ३२ । विभक्ति अठारहवीं। ३७-अरनाथजिनवल्लभ-कमलकन्दप्रासाद- चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे चाष्टमागविभाजिते । कणों द्विभागिको ज्ञेयो भद्राधं च द्विभागिकम् ॥८६॥ कणे च शृङ्गमेकं तु केसरी च विधीयते । भद्रे चैवोद्गमः कार्यों जिनेन्द्रे चारनाथके ॥१०॥ इति त्वं विद्धि भो वत्स ! प्रासादो जिनवल्लभः । कमलकन्दनामोऽयं जिनशासनमार्गतः ॥११॥ इति अरनाथजिनवल्लभः कमलकन्दप्रासादः ॥३७॥ प्रासाद को समचोरस भूमिका पाठ भाग करें। उनमें दो भाग का कोण और दो भाग का गद्रार्ध बनावें। कोणे के ऊपर एक २ केसरी शृंग चढ़ावें और भद्र के ऊपर उद्म बनावें । ऐसा अरनाथ जिन के लिये कमलकन्द नाम का प्रासाद हे वत्स! तूंजान 11से ११॥ शृङ्गसंख्या-कोणे २०, एक शिखर, कुल २१ शृंग।

अथ जिनेन्द्रप्रासादा यायः २०३ - ३८-श्रीशैलप्रासाद- कणे च तिलक ज्ञेयं श्रीशैल ईश्वरप्रियः । इति श्रोशेलप्रासादः॥३॥ कमलकन्द प्रासाद के कोणे के ऊपर एक २ तिलक भी चढ़ाने से श्रीशैल नाम का प्रासाद होता है, वह ईश्वर को प्रिय है। भंगसंख्या-पूर्ववत् २१ और तिलक ४ कोणे। ३४-अरिनाशन प्रासाद- भद्रे चैवोरुचवारि प्रासादस्त्वरिनाशनः ||१२|| इत्यरिनाशनप्रासादः ॥३॥ श्रीशैलप्रासाद के भद्र के ऊपर एक २ उरुश्रृंग चढाने से अरिनाशन नामका प्रासाद होता है ॥२॥ शृंगसंख्या-कोणे २०, भद्रे ४, एक शिखर, कुल २५ शृंग और तिलक ४ कोणे। विभक्ति उन्नीसवी। ४०-श्रीमल्लिजिनवल्लभ-महेन्द्रप्रासाद- चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे द्वादशपदभाजिते । कों भागद्वय कार्यः प्रविरथश्च सार्ध ||६|| सार्धमागकं भद्रा चार्धा नन्दीद्वयं भवेत् । कणे क्रमद्वयं कार्य प्रतिस्थे तथैव च ६|| द्वादश उत्शृङ्गाणि स्थापयेच्च चतुर्दिशि । महेन्द्रनामः प्रासादो जिनेन्द्रमन्लिवल्लभः ॥६॥ इति मल्लिजिनवल्लभो महेन्द्रप्रासाद. ॥४०॥ प्रासाद को समचोरस भूमिका बारह भाग करे । उनमे दो भाग का कोण, डेढ़ भागका प्रतिरथ, डेढ भागका भद्रार्थ, करर्णनंदी और भद्रनन्दी प्राधे २ भाग की करे। प्रतिरथ और कोणे के ऊपर केसेरी और सर्वतोभद्र, ये दो क्रम मोर भद्र के ऊपर बारह उरुग चढावे । ऐसा महेन्द्र नामका प्रासाद मल्लिजिनेन्द्र को वल्लभ है ।।९३ से १५॥ श्रृंगसंख्या-कोणे ५६, प्ररथे ११२, भद्रे १२, एक शिखर, कुल १५१ शृंग।

प्रासादमएदने mameememewween-- ---- ४१-मानवेन्द्र प्रासाद- रथोचे तिलकं दद्यान्मानवेन्द्रोऽथ नामतः । इति मानवेन्द्रप्रासादः ॥४१॥ महेन्द्रप्रासाद के प्रतिरथ के ऊपर एक २ तिलक भी चढ़ावें तो मानवेन्द्र नामका प्रासाद होता है । शृंगसख्या पूर्ववत १८१ और तिलक ८ प्ररथे। - ४२-पापनाशनप्रासाद- कोंचे तिलकं दद्यात् प्रासादः पापनाशनः ॥६६॥ इति पापनाशनप्रासादः ||२|| मानवेन्द्रप्रासाद के कोणे के ऊपर एक २ तिलक भी चढ़ावें तो पापनाशन नामका प्रासाद होता है ॥६६॥ शृंगसंख्या पूर्ववतः१८१ । तिलक-कोणे ४, और प्ररथे ८ कुल १२ तिलक । विभक्ति बीसवीं। ४३-मानसतुष्टि नामका मुनिसुव्रतपासाब- चतुतीकृते क्षेत्रे चतुर्दशविभाजिते । बाहुयं रथं कर्ण भद्रार्ध त्रयभागिकम् ॥१७॥ श्रीवत्सं केसरी देयं कर्णे रथे क्रमद्वयम् । द्वादशैवोत्शृङ्गाणि स्थापयेच चतुर्दिशि ॥८॥ मानसतुष्टिनामोऽयं प्रासादो मुनिसुव्रतः । इति मानसतुष्टि नाम मुनिसुव्रतप्रासादः ॥४३|| प्रासाद को समचोरस भूमिका चौदह भाग करे। उनमें दो भागका कोण, दो भागका प्ररथ और तीन भागका भद्राई करे । कोण भोर प्ररथ के ऊपर केसरी और श्रीवत्स ये दो क्रम चढ़ावे । तथा भद्र के ऊपर कुल बारह उरुझंग चढ़ावें। ऐसा मानसतुष्टि नामका मुनिसुव्रत प्रासाद है ॥९७-६८॥ शृंगसंख्या-कोणे २४, प्ररथे ४८, भद्र १२, एक शिखर, कुल ८५ शृंग। ४४-मनोल्याचन्द्र प्रासाद- तद्रूपे रथे तिलकं मनोल्याचन्द्रो नामतः ॥६६॥ इति मनोल्याचन्द्रप्रासादः ।।४४|| अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः मानसतुष्टिप्रासाद के प्ररथ के ऊपर एक २ तिलक चढ़ावे तो मनोल्याचन्न नामका प्रासाद होता है IHEIR शृंगसंख्या पूर्ववत् ८५ और तिलक ८ प्ररथे । ४५-श्रीभवप्रासाद- मनोन्याचन्द्रसंस्थाने कणें न्यसेत् विकेसरीम् । श्रीभवनामो विज्ञेयः कर्त्तव्यस्च त्रिमूर्तये ॥१०॥ इतिश्रीभवनामप्रासादः ||४|| मनोल्याचंद्र प्रासाद के कोणे के ऊपर शृंगो के बदले में दो केसरी शृग चढावे तो श्रीभवनामका प्रासाद होता है। वह त्रिमूत्ति (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) के लिये पनावे ॥१०॥ शंगसत्या-तणे ४०, प्ररथे ४८, न १२, एक शिखर, कुल १०१ शृंग, तिलक प्ररथे । - विभक्ति इक्कीसवीं AL ४६-नमिनाथजिनप्रासाद- चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे पोडशपदभाजिते । कयों भागत्रयं कार्यः प्रतिकणों द्विभागिका ॥१०॥ भद्रा विभाग ज्ञेयं चतुर्दिषु व्यवस्थितम् । क्रमद्वयं रथे कर्णे ऊर्य तिलकशोभनम् ॥१०॥ भद्रे चोरुचत्वारि स्थापयेच्च चतुर्दिशि । नमिशृङ्गश्च नामायं प्रासादो नमिवन्लभः ॥१०३॥ इति नमिजिनवल्लभप्रासाद ||४|| प्रासाद की समचौरस भूमिका सोलह भाग करे । उनमे तीन भाग का कोण, दो भागका प्रतिरथ और तीन भाग का भद्रार्ध करे। कोण और प्ररथ के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र, ये दो क्रम और भद्र के ऊपर चारो दिशा में चार चार उस्टंग चढ़ावे । ऐसा नमिभृग नामका प्रासाद श्री नमिनाथ जिनको प्रिय है ॥१०१ से १०३।। शृंगसख्या-कोणे ५६, प्ररथे ११२, भद्रे १६, एक शिखर, कुल १८५ श्रृंग। तिलक- कोणे ४ प्ररथे ८ कुल १२ तिलक ।

प्रासादमखने -- -eesanto--- ....maaseemajoom 0 विभक्ति इक्कीसवीं B ४७-सुमतिकोतिरासाद- चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे पड्विंशपदभाजिते । कों भागाश्च चत्वारः प्रतिकर्णस्तथैव च ॥१०॥ भद्रं दिग्मागिकं ज्ञेयं चतुर्दिक्षु व्यवस्थितम् । कणे क्रमत्रय कार्य प्रतिकणे क्रमद्वयम् ॥१०॥ द्वादशैवोरुशृङ्गाणि प्रत्यङ्गानि द्वात्रिंशकम् । मन्दिरं प्रथमं कर्म सर्वतोभद्रमेव च ॥१०६॥ केसरी तृतीयं कर्म ऊचे मञ्जरी शोभिता । सुमतिकीर्तिनामोऽयं नमिनाथस्य वल्लभः ॥१०॥ इति नमिजिनवल्लभः सुमतिकीतिप्रासादः ॥४७॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका छब्बीस भाग करें। उनमें चार भाग का कोण, चार भाग का प्ररथ और दस भाग का पूरा भद्र करें। कोणे के ऊपर तीन क्रम, प्ररथ के ऊपर दो क्रम, भद्र के ऊपर कुल बारह उरुशृंग और बत्तीस प्रत्यंग चढ़ावें । उसके ऊपर शिखर शोभायमान करे, ऐसा सुमतिकोत्ति नामका प्रासाद श्रीनमिनाथ जिनको त्रिय है ।।१०४ से १०७।। शृंगसंख्या-कोणे १५६, प्ररथे ११२, भद्रे १२, प्रत्यंग ३२, एक शिखर, कुल ३१३ शृग। यदि प्ररथ के ऊपर मंदिर और सर्वतोभद्र वे दो क्रम रखा जाय तो श्रृंगसंख्या- कोणे १५६, प्ररथे २७२, भद्रे १२, प्रत्यंग ३२, एक शिखर, कुल ४७३ शृंग। ४८-सुरेन्द्रप्रासाद- चद्र पे च प्रकर्त्तव्यो रथे शृङ्गं च दापयेत् । सुरेन्द्र इति नामायं प्रासादः सुरवल्लभः ॥१०॥ इति सुरेन्द्रनामप्रासादः ॥४८॥ सुमतिकोत्ति प्रासाद के प्ररथके ऊपर एक श्रृंग अधिक चढ़ावे तो सुरेन्द्र नामका प्रासाद होता है, वह देवो को प्रिय है ॥१०॥ शृंगसख्या-कोरणे १५६, प्ररथे २८०, भद्रे १२, प्रत्यंग ३२, एक शिखर कुल ४८१ शृंग।

भय जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २०७ mom- Homopmemomom NNNN . memamaana ४९-राजेन्द्रप्रासाद- तद्रूपे च प्रकर्तव्य उरुशृङ्गाणि' पोडश । पूजनान्लभते राज्यं स्वर्गे चैवं महीतले ॥१६॥ इति राजेन्द्रप्रासादः ||४|| सुरेन्द्रप्रासाद के भद्रके ऊपर बारह के बदले सोलह उस्लंग चढ़ाने से राजेन्द्र नामका प्रासाद होता है। उसका पूजन करने से पृथ्वी के ऊपर और स्वर्ग मे राज्य प्राप्त होता है ॥१०॥ शृंगसंख्या-भद्रे १६ वाकी पूर्ववत्, कुल ४८५ श्रृंग। विभक्ति बाईसवीं। ५०-नेमेन्द्रेश्वर प्रासाद- चतुरस्त्रीकृते क्षेत्र द्वाविंशपदभाजिते । बाहुरिन्दुर्युग्मरूप-द्वीन्दुभागाः क्रमेण च ॥११०॥ भद्राधं च द्वयं भागं स्थापयेत्तु चतुर्दिशि । केसरी सर्वतोभद्र' कणे चै क्रमद्वयम् ॥१११॥ केसरी तिलकं चैव रथोचे तु प्रकीर्तितम् । कर्णिकानन्दिकायां च शृङ्गच तिलकं न्यसेत् ॥११२॥ भद्रे चैवोरुचत्वारि प्रत्यङ्गानि च पोडश । नेमेन्द्रेश्वरनामोऽयं प्रासादो नेमिवल्लभः ॥११॥ इति नेमेन्द्र श्वरप्रासादः ॥५०॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका बाईस भाग करे । उनमे दो भाग का कोण, एक भागकी कोणी, दो भागका प्रतिकर्ण, एक भाग कोणी, दो भाग का उपरथ, एक भागकी नन्दी और दो भाग का भद्रार्घ रक्खे । कोणे के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र, ये दो क्रम, प्रतिकर्ण और उपरथ के ऊपर केसरी क्रम और एक तिलक, कोणी और नंदियो के ऊपर एक शृग और एक तिलक, भद्र के ऊपर चार २ उरुभंग, और सोलह प्रत्यग चढावे । ऐसा नेमेन्द्र श्वर नाम का प्रासाद श्री नेमिनाथजनदेव को प्रिय है ॥११० से ११३॥ १. 'उरुङ्ग च पञ्चमम्' । पाठान्तरे ।

प्रासादमण्डने NOR evonommons.---- ----com dehate H ..maduwand MILM-Mahame शृंग संख्या-कोणे ५६, कोणीपर ८, प्ररथे ४०, कोरणीपर ८, उपरथे ४०, नंदी पर ८, भद्र १६. प्रत्यंग १६, एक शिखर कुल १६३ शृग । तिलक संख्या-प्ररथे ८, उपरथे , कर्णनंदी पर ८, प्ररथनंदी पर ८, भद्रनदी पर ८, कुल ४० तिलक । ५१-यतिभूषणप्रासाद- तत्तुल्यं तत्प्रमाणं च रथे शृङ्ग च दापयेत् । वल्लभः सर्वदेवानां प्रासादो यतिभूषणः ॥११॥ इति यतिभूपणप्रासादः ॥५१॥ नेमेद्रेश्वर प्रासाद के प्ररथ और उपरथ ऊपर के तिलक के बदले एक एक शृङ्ग चढाने से यतिभूषण नाम का प्रासाद होता है, वह सब देवों को प्रिय है ॥११४|| श्रृंगसंख्या-प्ररथे ४८, उपरथे ४८ बाकी पूर्ववत् कुल २०६ शृंग। तिलक कुल २४ - तीनों नन्दी पर। ५२-सुपुष्पप्रासाद- तद्रूपं तत्प्रमाणं च रथे दद्याच्च केसरीम् । सुपुष्पो नाम विज्ञेयः प्रासादः सुरवल्लभः ॥११॥ इति सुपुष्पनामप्रासादः ॥५२॥ यतिभूषण प्रासाद के प्ररथ और उपरथ ऊपर के श्रृंग के बदले में एक एक केसरी क्रम चहाने से सुपुष्प नामका प्रासाद होता है । वह देवों को प्रिय है ॥१०॥ शृंग सख्या-परथे ८०, ऊपरथे ८० बाकी पूर्ववत कुल २७३ श्रृंग । तिलक २४ पूर्ववत् विभक्ति तेईसवीं। ५३-पार्ववल्लभप्रासाद- चतुरस्रीकृते क्षेत्रे षड्विंशपदभाजिते । कर्णात्तु गर्भपर्यन्तं विभागानां तु लक्षणम् ॥११६॥ वेदरूषगुणेन्दवो मद्राधं तु चतुष्पदम् । श्रीवत्सं केसरी चैव रथे कणे च दापयेत् ॥११७॥ - १. 'अष्टविशति भाजिते । पाठान्तरे। २. 'द्वय'। - अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः २०६ ---- कर्णिकायां ततः शृङ्ग-मष्टौ प्रत्यङ्गानि च । भद्रे चैवोरुचत्वारि प्रासादः पार्श्ववल्लभः ॥११॥ इति श्री पार्श्ववल्लभप्रासाद ॥५३॥ प्रासाद की समवोरस भूमिका छन्वीस भाग करे। उन मे चार भाग का कोण, एक भाग की कोणी, तीन भाग का प्रतिरथ, एक भाग की नन्दी और भद्रार्ध चार भाग का रक्खे । कोण और प्ररथ के ऊपर एक एक केसरीक्रम और एक एक श्रीवत्स,ग चढावें । कोणी और नन्दी के ऊपर एक एक श्रृंग चढावे । पाठ प्रत्यङ्ग और भद्र के ऊपर चार चार उरुशृंग चढावें । ऐसा पार्श्वनाथवल्लभ नाम का प्रासाद है ॥११६ से ११८॥ शृङ्ग संख्या-कोरणे २४, प्ररथे ४८, भद्र १६ कोणी पर ८, नंदो पर , प्रत्यग ८, एक शिखर कुल ११३ श्रृंग। ५४-पद्मावतीप्रासाद- कर्णे च तिलकं दद्यात् प्रासादस्तत्स्वरूपकः । पद्मावती च नामेति प्रासादो देवीवल्लभः ॥११॥ इति पद्मावतीप्रासादः ॥५४॥ पाचवल्लभ प्रासाद के कोणे के ऊपर एक एक तिलक भी चढावे तो पद्मावती नामका प्रासाद होता है। यह देवी को प्रिय है ॥११॥ शृंग संख्या पूर्ववत् ११३ । तिलक ४ कोणे के पर। - गा - anwarnima ५५-रूपवल्लभप्रासाद- तद्रूपं च प्रकर्त्तव्यं प्रतिकणे कर्णसादृशम् । जिनेन्द्रायतनं चैव प्रासादो रूपवल्लभः ॥१२०॥ इति रूपवल्लभप्रासाद. ॥५॥ पद्मावती प्रासाद के प्ररथ के ऊपर भी एक एक तिलक चढावेतो रूपवल्लभनामका जिनेन्द्रप्रासाद होता है ॥१२०॥ शृंग संख्या-पूर्ववत् ११३ । तिलक १२ । चार कोणे और पाठ प्ररथे । प्रा०२७ २१० प्रासादमण्डने - --00-meme-- --moremo-down-" manmammmmmmmmmmmmmarwomaem. . विभक्ति चौबीसवीं। ५६-वीरविक्रम-महीधरप्रासाद- चतुत्रीकृते क्षेत्रे चतुर्विशतिभाजिते । कर्णस्त्रिभागिको ज्ञेयः प्रतिकर्णश्च तत्समम् ॥१२१॥ कर्णिका नन्दिका भागा भद्राधं च चतुष्पदम् । श्रीवन्सं केसरी चैव सर्वतोभद्रमेव च ॥१२२॥] रथे वणे च दातव्य-मष्टौ प्रत्यङ्गानि च । भद्रे चैवोरुचत्वारि कर्णिकायां शृङ्गोत्तमम् ॥१२३॥ वीरविक्रमनामोऽयं प्रासादो जिनवल्लभः । महीधरश्च नामायं पूजिते फलदायकः ॥१२४॥ इति श्री महावीरजिनवल्लभो वीरविक्रमप्रासादः ॥५३॥ प्रासाद की समचोरस भूमिका चौवीस भाग करें। उनमें कोण और प्रतिकर्ण तीन तीन भाग, कोणी और नन्दी एक एक भाग और भद्रार्ध चार भाग रक्खे । कोण और प्ररथ के ऊपर केसरी और सर्वतोभद्र ये दो क्रम और एक श्रीवत्सशृंग चढावें, भद्र के ऊपर चार उरुग, तथा कोणी और नंदी के ऊपर एक श्रीवत्सशृंग और आठ प्रत्यंग चढावे । ऐसा वीरविक्रम नाम का प्रासाद जिनदेव को प्रिय है ।।१२१ से १२४॥ गर्भया शृंगसंख्या-कोणे ६०, प्ररथे १२०, प्रत्यंग ८, भद्रे १६, कोणी पर ८ नंदी पर ८, एक शिखर, कुल २२१ शृंग। निना मरम्मत Pha lý Hangam . ५७-अष्टापदप्रासाद- तद्रूपे च प्रकर्तव्ये कर्णोचे तिलकं न्यसेत् ।। अष्टापदश्च नामार्य प्रासादो जिनवल्लभः ॥१२॥ द्वत्यष्टापदप्रासादः ।।५४|| वीर विक्रम प्रासाद के कोणे के ऊपर एक एक तिलक भी चढावें तो अष्टापद नामका प्रासाद होता है । वह जिनदेव को प्रिय है ॥१२५।। शृंग संख्या-पूर्ववत् २२१ । तिलक-४ कोणे के ऊपर ।

अथ जिनेन्द्रप्रासादाध्यायः
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५८-तुष्टिपुष्टिदप्रासाद-
तद्रूपं च प्रकर्तव्य-गुरुङ्ग' च पञ्चमम् ।
तुष्टिपुष्टिदनामोऽयं प्रासादो जिनवल्लमः ॥१२६॥
इति तुष्टिपुष्टिदप्रासादः ॥५॥
अप्टापदनासाद के भद्र के ऊपर चार के बदले पाच उरुशृंग चढावे तो तुष्टिपुष्टिद
नामका प्रासाद होता है । वह जिनदेव को प्रिय है ।।१२६।।
शृंग संख्या-भद्रे २० वाकी पूर्ववत् कुल २२५ शृंग और तिलक ४ कोणे
जिनप्रासाद प्रशंसा-
प्रासादाः पूजिता लोके विश्वकर्मणा भापिताः ।
चतुर्विशविभक्तीनां जिनेन्द्रायां विशेषतः ॥१२७॥
उपरोक्त विश्वकर्मा ने कहे हुए चौवीस विभक्ति के जिनेन्द्रदेवो के प्रासाद विशेष
प्रकार से पूजनीय हैं ॥१२७॥
चतुर्दिशि चतुर्दाराः पुरमध्ये सुखावहाः ।
भ्रमाश्च विभ्रमाश्चैव प्रशस्वा सर्वकामदाः ॥१२॥
चारो दिशानी मे द्वारवाले अर्थात् चार द्वारवाले, भ्रमवाले अथवा विना भ्रम के जिनेन्द्र
प्रासाद नगर में हो तो प्रना को सुख देने वाले है। तया प्रशस्त हैं और सब इच्छित फल को
देने वाले है ॥१२॥
शान्तिदाः पुष्टिदाश्चैव प्रजाराज्यसुखावहाः ।
अश्वगंजेलियान-महिषीनन्दीमिस्तथा ॥१२६।।
सर्वश्रिपमाप्नुवन्ति स्थापिताश्च महीवले ।
जिनेन्द्रदेवो के प्रासाद शान्ति देने वाले है। पुष्टि देनेवाले और राजा प्रजा को सुख
देनेवाले है । एवं इस पृथ्वी के ऊपर जिनेन्द्र देवो के प्रासाद स्थापित करने से घोडे, हायी, बेल,
मैस और गाय मादि की सब सम्पत्तियो को देनेवाले हैं ॥१२॥
नगरे ग्रामे पुरे च प्रासादा ऋपभादयः ॥१३०॥
जगत्या मण्डपैयुक्ताः क्रीयन्ते वसुधातले ।
सुलभं दीयते राज्यं स्वर्गे चैवं महीतले ॥१३॥

२१२ प्रासादमण्डने नगर, ग्राम और पुरके मध्य में जगती और मंडप वाले ऋषभ आदि जिनप्रासाद पृथ्वी तल में किया जाता है। जिसे स्वर्ग और पृथ्वी मे राज्य प्राप्ति सुलभ होती है ॥१२० से १३१।। दक्षिणोचरमुखाश्च प्राचीपश्चिमदिङ्मुखाः। वीतरागस्य प्रासादाः पुरमध्ये सुखावहाः ॥१३२॥ इति श्री विश्वकर्मकृतज्ञानप्रकाशदीपावे वास्तुविद्यायां जयपृच्छता जिनप्रासादाधिकारः समाप्तः ।। दक्षिण, उत्तर, पूर्व और पश्चिम, इन चारों दिशा के मुख वाले वीतराग देव के प्राताद नगर में हो तो सुख कारक है ॥१३२॥ इति पं० भगवानदास जैन कृत ज्ञानप्रकाशदीपार्णव के वास्तु- विद्या के जिनप्रासादाधिकार को सुबोधिनी नाम्नी भापाटीका समाप्ता।

इस ग्रंथ में आये हुये शब्दों का सार्थ अकारादि क्रम । न अर्कतनया स्त्री, यमुना देवी। अंश पु. विभाग, अर्चन न. पूजा। प्रतनन, कार का भाग । अर्चा स्त्री. देवमूत्ति । अघोर. उपरप नाम पर का देश अर्धचन्द्र पु. प्रासाद को देहली के प्रागे को मदंगोल पऊन. नव की सरया, पिता मारुति, शसावटो, मडल विशेष, प्रचित. पिलपियामा। अर्थमन् पु. वास्तुदेव, सूर्य, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र । अदल न. इंच, मागता अलिन्द पु. रामदा, दालान । अनि पु. पर, वरण, वनुपाश। अवलम्ब पु. प्रोलभा, रस्सी के वधा हुमा लोहे का छोटा अजिता स्त्री नीरको पानी शिलामा नाम । सा लट्टू, जिसको सिल्पिवर्ग वाघ काम करते अविनाशो गर्भगृह के मांगे : भाग के मान को कोली समय अपने पास रखता है। कामाग। अध्यक्त मि. अप्रकाशित, अपकार मय, अघटित अपकन. गुग, शिर, मामलसार, पसरा का शिवलिंग। पंट, सा अश्वमेध यज्ञविशेष का नाम । अदिति पु. वास्तु सता का नाम । अश्वत्थ पु. ब्रह्मपोपला, पीपल । अदि पु. पंत, सान फो संख्या अश्विन पु. अश्विनीकुमारदेव, प्रचन्द्र के देव प्रविष्ठान न. प्राचार, जगती अष्टादश वि. मठारह की संख्या। अनन्त पु. व्यासाईकमाग के उदयमाना गुन। अष्टापद पु चारो दिशामे माठ पाठ सीढीवाला पर्वत । मनिल पु. बागु, वास्तुदेर। अष्टास्त्रक पु पाठ कोना वाला स्तम अनुग मु. पारा, कोने के तमोर का दूसरा कोना। अन्तरपत्र न. बलरा और केवाल ये दोनों पके और असुर पु. वास्तु देव । अत्र पु. कोना, हद। मन्नर। आ अन्तराल न. देखो अन्तरसत्र, मन्तर। अन्धकारिका स्त्री. परिक्रमा, प्रदक्षिणा। माकाश न. वास्तुदेव, गुंबन का देव । प्रागार न. देवालय, घर, स्थान। माधारिका स्त्री. सो कार का शब्द । अपराजित न, मूत्रसवान गुणकीति का रखा हा आदित्य पु वास्तुदेव, सूर्य । बास्तुशिल्प का बड़ा प्रथा अपराजिता स्त्री. नीर को खो शिला का नाम । पापवत्स पु. वास्तुदेव । अमृतोद्भव पु. केसरी जाति का माया प्रासाद । आमलसार पु. शिखर के स्का के जार कुमार के अभिषेक पु. देयों का मात्र पूर्वक स्नान । पाक जैसा गोल कलश। अम्बरपु. शिवरकी ग्रीयाका देव। मामलसारिका स्त्री. मामलसार के कार की पद्रिका अयुत न. दस हजार की संख्या । के कार की गोल प्राकृति। पर्क पु. सूर्य, बारह की सस्या। आधसूत्रधार पु. विश्वकर्मा। आप पु वास्तुदेव, पानी।

( २१४ ) विशेष । आय पु. संज्ञा विशेष जिसे गृहादि शुभाशुभ देखा जाता उत्सेध पु. ऊंचाई। जाता है, आठ की संख्या, लाभ । उदक न. पानी, जल। आयत वि लंबाई। उदच प्रो. उत्तरदिशा। आयतन न. देवालय, देवो की पंचायतन । उदुम्बर न. द्वारशाखा का नीचला भाग देहली। पारात्रिक न. भारती। उद्गम पु. प्रासाद के दीवार का आठवां थर जो सीढी आर्दा स्त्री. छट्ठा नक्षत्र । के प्राकार वाला है। प्रालय पु. वासस्थान, घर, देवालय । उद्भिन्न पु. चार प्रकार के जातिको प्राकृति वाली छत, आसनपह पु. बैठने का मासन, तकीया। छत का एक भेद । उद्भिन्ना स्त्री. सातवी संवरणा। इन्दु पु. चद्रमा, एक की संख्या । उपग्रह पु. नक्षत्रों की एक संज्ञा । इन्द्र पु. पूर्वदिशा का स्वामी, दिक्पाल, वास्तुदेव, उपरथ पु. कोने के पास का तीसरा कोना। उद्गम थर का देव। उरुमारी स्त्री. उरुग इन्द्रकील न. स्तंभिका जो ध्वजा दंड को मजबूत रखने रखने उरुङ्ग। न. शिखर के भद्र ार चढायें के लिये साथ रखा जाता है। उरशृङ्ग हुए श्रृंग इन्द्रजय पु. वास्तुदेव ऊर्व त्रि. ऊंचाई, कार, इन्द्रनील पु. केसरी जाति का तेरहवां प्रासाद, रत्न उर्चाि स्त्री. खड़ी मूर्ति । ऋ इन्द्रवारुणी स्त्री. बडी इन्द्रफला औषधि । इन्द्रांश पु संज्ञाविशेष जो इमारती काम में देखा ऋक्ष न. नक्षत्र, २७ की संख्या। जाता है। ऋत्विज पु. यज्ञ करने वाले, यज्ञ दीक्षित। इषु पु. पाच की संख्या, बाण. ए ऐ इष्टका । स्त्री. इंट एकादश त्रि. ग्यारह की संख्या। इष्टिका ऐरावत पु. केसरी जाति का २१ वां प्रासाद । ईश पु. नंदी पर का देव. वास्तुदेव, ईशान कोना का क दिक्पाल, महादेव । कङ्ग न. धान्य विशेष, कांग । ईश्वर पु. शिखर का देव, महादेव । कटि स्त्री. कमर, शरीर का मध्य भाग। ईश्वरी स्त्री. प्रौषधि विशेष, शिवलिङ्गी । करणक न. कणी, जाड्यकुभ के ऊपर का घर । करणपीठ न. जाज्यकुंभ और कणी ये दो घरवाली उऊ प्रासाद की पीठ उच्छाय पु. ऊंचाई कणाली स्त्री. कणी नामका घर उत्क्षिप्त न. गुवज का ऊंचा उठा हुमा चंदोवा, छत । कदाचन प्र. कभी। उत्तरंग ल. द्वारशाखा के अपर का मथाला। कनीयस् त्रि. छोटा, लघु । उत्तरा स्त्री. उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढा और उत्तरा कन्या स्त्री. छछी राशिका नाम । भाद्रपद ये तीनो नक्षत्र । कपिली स्त्री. कवली, कोली, शुकनास के दोनो तरफ उत्तानपट्ट पु. बड़ा पाट। शिखर के आकार वाला मडप । - . जाती है। थर। ( २१५ ) कपोताली स्त्री. प्रासाद के दीवार का पाचवा थर, कुंभ पु. मंडोवर का दूसरा घर, कलश । कपोतिका केवाल पर। कुम्भिका स्त्री. स्तंभ के नीचे की कुंभी। करपु. हस्तनक्षम, हाय । कुलतिलका स्त्री. पाचवी सवरणा। करोटक पु. गुवन। कूटच्छाध न. छज्जा। कर्ण न. कोना, पट्टी, मिहकर्ण । कूर्म पु सोना चादी का कामा, जो नीव मे रखा कर्णक न. कणी, जो घरो के ऊपर नीचे पट्टी रखी जाता है। कूर्मशिला स्त्री. कच्छुए के चिह्नवाली धारणी शिला । कर्णगूढ पु. छोपा हुमा कोना, वद कोना । केसरिन् पु. पाच शृंगवाला प्रासाद । कर्णदर्दरिका स्त्री. गुवन के उदय मै नीचला थर । कैलास पु. केसरी जाति का ग्यारहवा और राज्य कर्णसिंह पु. प्रासाद के कोने पर रखा हुमा सिंह । जाति का ठारहवा प्रासाद । कर्णाली स्थी. कणो, जाव्यभा के ऊपर का पर। कोटर पु-न. पोलाण। करिएका स्त्री. थरो के ऊपर नीचे की पट्टी, छोटा कोटि स्त्री करोड सख्या, रेखा की एक भुजा फोना, कोणा और प्ररय के बीच मे कोणी की कोट्ट पु. किला, दुर्ग। फालना। कोल न. गुवज के उदय में गजवालु घर के ऊपर का कर्म न. समुह वाचक, शृगो का समुह । कलश पु. मडोवर का तीसरा थर, शिखर के कार कोविद पु पडित, ज्ञानी । रखा हुमा कलश। कोष्ठागार न. कोठार। कलशाण्डक न. कलश का पेट । क्षण न, खड, विभाग। कला स्त्री. रेखा विशेष, सोलह को सख्या । क्षिति स्त्री. पाटका देवता, पृथ्वी । कलास्त्र पु. सोलह कोना। क्षितिवल्लभ पु वैराज्य जातिका सोलहवा प्रासाद | कपाय पु. पौषधि विशेष। क्षिप्त न. लटकती हुई छत। कास्य न. कासा, पातु विशेप | क्षीर न. दूध। कामदपीठ न, गजमादि रूपयरा से रहित पोछ। क्षीरार्णव पु. समुद्र, वास्तुग्रन्थ विशेप. कारा स्त्री. जेल क्षेत्र न. प्रासादतल। काल पु वास्तुदेव, समय। क्षेत्रपाल पु अमुक मर्यादित भूमिका देव । कालन्दी स्त्री. यमुना ख काष्ठ न. लकडी। किसुर पु. किन्नरदेव, पुषकठ के देव । कीतिवक्त्र न. ग्रासमुख । खरशिला स्त्री. जगती के दाशा के ऊपर पोर भोट कोत्तिस्तंभ पु. विजयस्तम, तोरणवाले स्तम । के नीचे बनी हुई प्रामाद को धारण करनेवाली कीलक न. कील, खूटा शिला। कुज पु मगनग्रह। कुञ्चिता स्त्री. प्रासाद के भाग के मान को कोली चल्वशाखा स्त्री. द्वार की नव शाखामो मे चोथी और पाठवी शाखा कुण्ड न. यज्ञकुंड, जलकुड । कुबेर पु. उत्तर दिशा का दिक्पाल । देवी। क्षोभणा स्त्री. कोनी खण्ड पु विभाग, मजिल, खाड। खरपु बटुा पाय. खातन. मकान की नीय।

( २१६ ) खुर } शिल्पी। धृत न. पी। पु. प्रासाद की दीवार का प्रथम पर ग्रह पु. नवकी संख्या। ग्रास पु. जलचर प्राणी विशेष । खुरक खुरा. ग्रासपट्टी स्त्री. ग्रास के मुखवाला दासा । ग गगारक न. देहली के आगे प्रदचंद्राकृति के दोनो ग्रीवा स्त्री. शिखर का स्कंध और मामलसार के नीचे का भाग। तरफ की फूलपत्ति वाली आकृति । ग्रीवापीठ न. कलश के नीचे का गना। गज पु. सातवां माय, गजथर। घ गजतालु न. गुंबज के उदय में रूपाठ के कार का थर। गजदन्त न. हाथी दांत की प्राकृतिवाला मडल । घट पु. कलश, मामलसार। गजधर पु. देवालय और मकान मादि बनाने वाला घण्टा स्त्री. कलश, मामलसार । घण्टिका स्त्री. छोटी मामलसारिका, संवरणा के कलश। गणेश पु. गणपति । गण्डान्त पु. तिथि नक्षत्र आदि की संधि का समय च गन्धमादन पु. वैराज्यजातिका चीसवां प्रासाद । चण्ड पु. महादेव का गणदेव, यह शिवगि की जलाधारी गन्धमादिनी स्त्री. वीसवी संवरणा। के नीचे स्थापित किया जाता है, जिसे स्नात्र. गन्धर्व पु. वास्तुदेव । जल उसके मुख मे जाकर बाहर गिरता है, गन्धर्वा स्त्री. नवशाखामो मे दूसरी और पांचवी शाखा। यह स्नात्रजल पीछे दोष का नही रहता। गरुड पु. केसरी जाति का तेइसवा प्रासाद । चण्डिका स्त्री. देवी विशेष । गर्भ . गर्भगृह । चतुरस्र वि. समचोरस । गह्वर न. गुफा। चतुर्दश सं. चौदह की सख्या । गान्धर्व पु. केवाल थर का देव । चतुष्किका स्त्री. चौकी मंडप । गान्धारी स्त्री. चार शाखावाला द्वार । चत्वर न, चौक, चाररस्ता, यज्ञ स्थान | गिरि पु. वास्तुदेव, पर्वत । चन्द्र पु. द्वारशाखा का देव, चंद्रमा । गुरण पु. तीन की संख्या, रस्सी, डोरी। चन्द्रशाला स्त्री. खुल्ली छत । गुरु पु. बृहस्पति, पांचवा ग्रह । चन्द्रावलोकन न. खुल्ला भाग । गुह पु. कात्तिक स्वामी। चन्द्रिका स्त्री. मामलसार के ऊपर प्राधे कमल की गूढ पु. गूढमडप, दीवार वाला मडप । माकृतिवाला भाग। गृह न. घर, मकान । चम्पका स्त्री. दशवी संवरणा. गृहक्षत पु वास्तुदेव चरकी स्त्री. वास्तुचक्र के ईशान कोण की देवी । गृहित पु. घरका मालिक । चरभ न.चरलग्न। गेह न. घर, गर्भगृह । चापाकार न. धनुष के प्राकार वाला मंडल । गोधूम पु. गेहूं. धान्य विशेष । चार पु. जिसमे पाव पाव भाग सोलह वार बढाया गोपुर न. किला के द्वार कार का मकान । जाता है, ऐसी सत्रा। गोमेद न. गोमूत्र के रग का रल विशेष । गौरितिलक न. मडल विशेष । चित्रकूटा स्त्रो. ठारहवी सवरणा। चित्रा स्त्री. चौदहवा नक्षत्र । ग्रन्थि स्त्री, गांठ। चिन्तात्मन् पु. आठवां व्यय । .

( २१७ ) नाणि पु. लोहगो परगा। चूर्ण न. नूना । ताम्र न. पातु विशेष, तावा। तिथि स्त्री. पह की सख्या । तोरण न. दोनो स्तभो के बीच में वलयाकार प्राकृति, अ तोरण। छन्दसनसनमा छाधना हिमा ज जगनोली मारी गर्या भूमि, पोटिला, जला स्त्री. प्रामा पार I HIIपा पर अम्मा तो. पापक के पनि कोण को देवी जय मु. पातु जगालो.शिनामा नाम जनप पु. कुमार, गण। जलागि IITTER निक, चौकी मडप। विदश पु. देश विदशा स्त्री. तर वो सवरणा। नियाम. तीन प्रकार, त्रिपुरुष पु प्रह्मा, विष्णु और शिव। त्रिमूत्ति स्त्री. देतो त्रिपुरप, उत्तरण के देव । त्रिंशत् स. तोमको सत्या। त्रैलोक्यभूपण पु. वैराज्यादि नववा प्रासाद । प्रैलोक्यविजय पु. राज्यादि पवा प्रासाद । व्यंश न. तृतीयाश, वीमा भाग। द ॥ 1 जीणं . पूरा जूरगा ली. विशेष, दुपार। भान्याभ पुगीट में गोरा पार नीरसता हा दग्धा स्त्री. तिथि विशेष । दण्ड १. ध्वमा लटकाने का दड। जानु न. पटना। दात पु. वतीस को सस्या, दात, शिखर । जानने वालीवार गिरी दर्पण न. मायना, रूप देखने का काच । जानफनामा बाला, बाराको दलन, फालना, मासगी वो. पेगा, नामी रास दशामा स्थी. तीसरी संवरणा। जिन पु.एम के दो, गोवाम की मापा। दारुन. काप्ट, लकडी, कारीगर। दारुण वि. भयकर। जीव-गासन की प्रतिष्ठा। दिक स्त्री, दिशा, दश की मुख्या। दिक्पाल पु. दिशा के अधिपति देव। ज्योतिष्मती स्तो, मालपागनो पोषधि विशेष । दिवसाधन पु दिशा का ज्ञान करने की मिया दिड्मुख वि. प्रासाद, गृह मादिका टेढापन । काम न. मामल विशेष। दिङ्मूढ दिति पु. वास्तुदेव। दिवाकर यु. बारह की संख्या, सूर्य। तगगन. नालाय, परोपरा दिश स्त्री. यश की संख्या, दिशा। तत्पुरुप पु. प्रामाद की दीवार के रथ का देव । दिशिपाल पुजपा पर के देव । तलन.नीने का तल भाग। दीर्घ वि. लगाई। तल्प न. अध्या, प्रासन । दृढ वि. मजबूत। तवहन. प्रासाद के वर मादि में छोटी माईके दृष्टि स्त्री. मात्र, निगाह । तोरण बाल स्तन युगत मा देवगाधारी स्त्री. चौदहवी सवारणा। द त प्रा०२८ ( २१८ ) देवतायतन पु. देवो की पंचायत । नन्दा स्त्री. प्रथम शिला, जो ईशान अथवा अग्नि कोण देवनक्षत्र न. देवगणवाले नक्षत्र । में प्रथम स्थापित किया जाता है। देवपुर. देवनगर। नन्दिन् पु. महादेव का वाहन, वैल, सांढ । देवसुन्दरी स्त्री. चौथी संवरणा। नन्दिनी स्त्री. पंचशाखा वाला द्वार, जाज्यकुम्भका देव, देय वि. लबाई। दूसरी संवरणा। दोला स्त्री. भूला । हिंडोला। नन्दी स्त्री. कारणी, भद्र के पास की छोटी कोनी। दौवारिक पु. वास्तुदेव । नन्दीश पु. केसरी जाती का पांचवा प्रासाद । द्राविड पु. प्रासाद की एक जाति । नर पु. नरयर, पुरुप की प्राकृति वाली पट्टी। द्राविडी पु. अधिक शृंगोवाली प्रासाद की दीवार, नर्तकी स्त्री. नाच करती हुई पुतली । जंघा। नलिका स्त्री. नववी संवरणा। द्वादश सं. बारह की संख्या । नवनाभि पु. यज्ञमंडल विशेष । द्वार न. दरवाजा। नवमङ्गल पु. वैराज्यादि १६ वां प्रासाद । द्वारपाल पु. द्वारका रक्षक, चौकीदार । नष्टच्छन्द पु. जिसकी तलविभक्ति बरावर न हो। द्विरष्ट सं. सोलह की संख्या । नाग पु. वास्तुदेव. हाथी। ध नागकुल पु. भीट्ट थर के देव । धनद पु. उत्तर दिशा का अधिरति कुवेर देव । नागर पु. प्रासाद की एक जाति । धनुः न. नववी राशि, धनुष्य । नागरा स्त्री. ऊपर का अर्थ देखो। धरणी स्त्री. गर्भगृह के मध्य नीव मे स्थापित नववी नागरी स्त्री. रूपविनाकी सादी जंघा । नागवास्तु पु.न. शेषनाग चक्र, राहुमुख । धराधर पु. कपिली मंडप के देव । नाटयेश पु. नटराज । धिष्ण्य न. २७ की संख्या । नक्षत्र नाभि स्त्री. मध्यभाग। धूम पु. दूसरा पाय । नाभिच्छन्द पु. दो जाति की मिश्र प्राकृति वाली छत । ध्रुव पु. उत्तर दिशा का एक तारा, ध्रुव तारा । नाभिवेध पु. गर्भवेव। ध्वज पु. पहला प्राय, ध्वजा। नारायणी स्त्री. प्राठत्री संवरणा। ध्वजा स्त्री. पताका, झंडा, घजा। नाल न. नाली, पानी नीकलने का परनाला। ध्वजादंड पुं. ध्वजा रखने का दंड, जिसमे ध्वजा नाली स्त्री. देखो ऊपर का अर्थ । लटकाई जाती है। नासक न. कोना। ध्वजाधार पु. ध्वजादंड रखने का कलावा निरन्धार पु. विना परिकमावाला प्रकाश मय प्रासाद । ध्वांक्ष पु. आठवां आय, काक । निर्गम पु. बाहर नीकलता हुमा भाग । न निशाकार पु. मामलसार का देव, चंद्रमा । नकुलीश पु. उध्वरेता महादेव । निःस्वन पु. शन्द । नगर न. गांव, शहर। नृत्य पु. नृत्यमंडप, रंगमडप । नन्द पु. नव को संख्या। नैऋत पु. नैऋत्य कोणके अधिपति दिक्पाल । नन्दन पु. केसरी जाति का तीसरा प्रौर वैराज्यादिका प दूसरा प्रासाद। पक्षिरान पु. केसरी जाति का २३ वां प्रासाद, नन्दशालिक पु. केसरी जाति का चौथा प्रासाद । पञ्च सं. पांच को सख्या। शिला। .

पुष्पदन्त पुं. वास्तुदेव । पुष्पराग न. पुखराज, रल विशेष । ( २१६ ) पन्नगम्य न. माया दही, पी, भूम और गोरर। पिशाव पु. क्षेत्रगणित के प्राय और व्यय दोनो बराबर पन्नानिमात् is it को मया। जानने की सजा पञ्चदेव पु. मा. बार मार सदाशिव पीठ न. प्रासाद को पुरसी, प्रासन । in मन', दो। पोलीपीया स्त्री. वास्तुचक के ईशान कोण की देवी । पचासत् ग. मनान को मरण पुनर्वसु पु. सातवा नक्षत्र। पट्टा. पापणापा। पुरन. गाव, शहर। भूमिता स्त्री. भारती मुग्म पुगोपा। पुराण न. मठारह को सना। पट्टमाला सी. 01, ARAR पुरुष पु. प्रासाद का जीव, जो सुवर्ण का पुरुप बनाकर पताका मामलसार में पलग पर रखा जाता है। पशापात्रो. राम का नाम । पुपञ् , वास्तुदे। पदन ग.हिना। पुष्पकठ , दासा, अतराल । पत्रकपु. IRRI पुष्कर ने, जलायय का मडप, बलाएक । मान. Pitinार। पुष्पगेह न. पूजनगृह । पान न. गलियारा पर, माना। पाराम, सानिया माना। पशिला . गूमारी मायिना, यह पुष्पिका स्रो. गूपद के पर बनी हुई प्रथम सवरणा। inful है। पत्रावी. पशिला, पारसनार! पात. या (Anil पृथिवीजय पु. केसरी जाति का बारहवा प्रासाद । पपिनी श्री नानाARI पृथिवीधर पु. वास्तुदेव । भानन नाव पंठा का ससान, मोटिर।। पन्य पु. urda, 41 का देश पेट न. पाट मादि के नीचे का तल । क. पनग, नारा पेटक पर्यन न. 45 को दो गजमा मन भाग । पर्वत गु. नया देश। पत्य १ पला, साट। पोली स्त्री. प्रासाद की पीठ के नीचे भोट्ट का पर। पाद पु. परण, वीवा भाग! पाराक्षसी नी. वास्तुपा से यागु शोनाको देवी । पार्यती सी. पन के दे। पार्श्व पु. न. एक तरफ, समीप । पालवधम्जा कार चाय का एफथर । पिएक नाबाई, मोटाई। पितामह पु. रहा। दोस्तंभ पिन पु, पानुरेस, पूर्वग, पितर देव। पितृपति पु. या, दक्षिण दिशा का दिक्पाल । पिपल पु मन, पाकर, पिज्ञापन । पुप्य न. पाठवा नक्षत्र पूतना लो, वास्तुचक्र के नैऋत्य कोण की देवो । पृथु पि. विस्तार, पौड़ाई। } पौर पु. दूसरा व्यय का काम। पौरुष पु. प्रासाद पुरुष सबध की विधि । पोण्य न. २७ वा रेवती नक्षत्र। प्रणाल न. पानी निकलने को नाली, परनाला । प्रतिवर्ण न कोनेके समीप का दूसरा कोना। प्रतिभद्र न. मुखभद्र के दोनो तरफ के खाये। प्रतिरथ पु. कोनेके समीप का चौथा कोना। प्रतिष्ठात्री देवस्थापन विधि। प्रतोली स्त्री. पोल, प्रासाद प्रादि के मागे तोरण बाला प्रत्यङ्गन. शिखर के कोनेके दोनो तरफ के लंबा चतुर्थाश मानका अंग।

( २२०) प्रदक्षिणाली. परिक्रमा. फेरी। भल्लाट पु.वास्तुदेव । प्रद्योत पु. तीसरा व्ययका नाम । भवन न. प्रासाद, मंदिर, मकान, गृह । प्रभा स्त्री. तेज, प्रकाश । भाराधार पुं.शिरावटी घर के पूजनीय देव । प्रवाल न. मूंगा, रत्नविशेष । भिट्ट पु. प्रासाद की पीठ के नीचे का पर। प्रवाह पु. पानीका बहाव । भित्ति स्त्री. दीवार। प्रवेश पुं.थरो के भीतर का भाग। भिन्न न. सूर्यकिरण आदि से भेदित गर्भगृह, दोष विशेष, प्रहार पु. भूगो के नीचे का पर। वितान (छत) को एक जाति । प्राक् स्त्री. पूर्वदिशा। भुवनमण्डन पु. वैराज्यादि चौदहवां प्रासाद । प्राकार पु. किला, कोट, दीवार । भूत न. पांच की संख्या, पृथिव्यादि पांच तत्व । प्राग्नीव पु. प्रासाद के गर्भगृह के आगे का मंडा । भूधर पु. केसरी जाति का पंद्रहवां और वैराज्यादि प्राची स्त्री. पूर्वदिशा। जाति का तेरहवां प्रासाद । प्रासाद पुं. देवमदिर. राजमहल । भूमि स्त्री. माल, मजिल। प्लक्ष पु. वृक्ष विशेष, पाकर, पिलखन । भूमिज | पु. प्रासाद की जाति विशेष । प्लव पुं. पानीका बहाव । भूमिजा फ भृङ्गराज पु. वास्तुदेव । फरिणमुख न. शेषनागका मुख, यह नीव खोदने के प्रारंभ भृश पु. वास्तुदेव । में देखा जाता है। भ्रम पु. परिक्रमा, फेरी। फालना श्री. प्रासाद की दीवार के खाचे। भ्रमणी स्त्री. परिक्रमा, फेरी। फांसना स्त्री. प्रासाद की एक जाति विशेष । भ्रमन्तिका स्त्री. देखो ऊपर का शब्द । भ्रमा स्त्री. प्रासाद के भाग के मान का कोली मंडप बङ्गन. कलई नामकी धातु म बलाप न. कक्षासन वाला मंडप, गर्भगृह के बलापक मकर पुं. मगर के मुखबाली नाली। आगे का मडप, मुखमंडप । मञ्ची स्त्री. प्रासाद के दीवार की जंघा के नीचे का बाण पु. पांच को सख्या, शिवलिंग। और केवाल के ऊपर का थर विशेष । बीजपुर न. कलरा के ऊपरका बीजोरा । मञ्जरी स्त्री. प्रासाद का शिखर अथवा श्रृंग। ब्रह्मत् पु. ब्रह्मा। ब्राह्मय न. रोहिणी नक्षत्र । मठ पु. ऋषि माश्रम, धर्मगुरु का स्थान । मण्डन पुं. एक विद्वान सूत्रधार का नाम, जो १५ वी म शताब्दि मे चित्तोड के महाराणा कुभकर्ण भक्ति स्त्री. १२ को सख्या । के माधित था। प्राभूषण। भग्न वि. खडित। मण्डप पु. गर्भगृह के मागे का गृह । भद्र न. मंडल विशेष, प्रासाद का मध्य भाग । मण्डल न गोल आदि आकार वाली पूजन की प्राकृति । भद्रक पु. भद्रवाला स्तभ मण्डकी स्त्री. ध्वजादड के ऊपर की पाटली जिसमें भद्रा स्त्री नीव की दूसरी शिलाका नाम, तिथि विशेष । ध्वजा लगाई जाती है। भरण न. प्रासाद की दीवार का और स्तम के भरणी मण्डोवर पु. प्रासाद की दीवार । कारका थर। मत्तवारण न. कटहरा । व का नाप, कोना। सूपा स्त्री. लवा अलिंद। ( २२१ ) मत्तालम्ब पु. गवाच, झरोखा, माला, वाक ! मुक्ता स्त्री. मोती। मन्त्र न. जाप विशेष। मुखभद्र न. प्रासाद का मध्य भाग | मध्यस्था स्त्री. प्रासाद के भाग के मान का कोली मुखमण्डप पु. गर्भगृह के मागे का मडप, बलाणक ! मंडप का नाम । मुख्य पु. वास्तुचक्र के देव । मनु पु. चौदह की संख्या। मुण्डलीक न. बज्मा के ऊपर का एक थर । मनोहर पुं. पाचवा व्यय का नाम । मुद्ग पु. मूंग, धान्य विशेष। मन्दर पुं. कैसरो जाति का छटा प्रासाद । मूढ न. टेढा, तीची। मन्दरा स्त्री. इक्कसवी सवरणा। मूल न. क्षेत्रफल, यंत्र की लवाई और चौडाई का गुणा- मन्दारक पु.प्रासाद की देहली के मध्यका गोल भाग, कार को २७ से भाग देने से जो शेष बचे यह एक जात की छत। मूलराशि माना जाता है । नीचे का भाग, मन्दिर पु. वैराज्यादि माववा प्रासाद देवालय । एक नक्षत्रा मरुत . वायुदिशा का अधिपति, दिक्पाल । सूलकर्ण न. पु. शिखर के नीचे का कोना । मर्कटो स्त्री. ध्वजादड के कार को पाटली, जिसमै मूलरेखा स्त्री. शिखर की नीचे के दोनो कोणे के बीच ध्वजा लटकाई जाती है। मलय पु. राज्यादि वटा प्रासाद । महानस न. रसोई घर, रसोडा। मृग न. मृगशीर्ष नक्षत्र, मकर राशि, वास्तु देव । महानील पु. केसरी जाति का १४वा प्रासाद । मृगार्क पु. मकर राशि का सूर्य, मकर सक्रान्ति । महाभोग .वराज्यादि २४वा प्रासाद । महीधर पु, वैराज्यादि १७वां प्रासाद । मेखला स्त्री. दीवार का खाचा । महेन्द्र पु. वास्तुदेव । माड पु. मडप, मडवा। मात स्त्री. सप्त मातृ देवता। मार्कटिका स्त्री. ध्रुवतारे के समीप का वो तारा, जो मैन्य न. अनुराधा नक्षत्र । य ध्रुव के चारो तरफ घूमते हैं। मालिनी स्त्री. छह शाखावाले द्वार का नाम, २२ वो यक्ष, माय से कम व्यय जानने की सजा, देहली का सवरणा। देव। माहेन्द्र पु, वैराज्यादि दसवा प्रासाद | माहेन्द्री स्त्री. पूर्वदिशा। मित्र पु. वास्तुदेव । मिश्रका स्त्री, प्रासाद की एक जाति । मिश्रसंघाट न. ऊचा नीचा खाचा वाला गुम्बद का चवोवा, छत। मृत् स्त्रो मट्टी। मेढ़ पुं. पुरुष चिन्ह, निंग। मेरु पु. प्रासाद विशेष, एक पर्वत । मेरुकुटोद्भवा स्त्री. पचीसवी सवरणा। यक्ष्मन् पु. वास्तुदेव । यज्ञान : वृक्ष विशेष, गूलर । यम यु. वक्षिण दिशा का दिक्पाल, बास्तुदेव, भरणी यमाश पुं. क्षेत्रफल का नाम विशेष । मीन पु. सूर्य को १२वी संक्राति, १२वी राशि, मछली। यह पु. जव, धान्य विशेष । यमचुल्ली स्त्री. सम्मुख लका गर्भगृह । यान न. मासन, सवारी, याम्या स्त्री. दक्षिण दिशा युग्म न. वो की सख्या। मोनार्क . मीनराशि का सूर्य, भीन सक्रान्ति मुकुटोज्ज्वल पु. केसरी जाति का २०वा प्रासाद । मुकुली स्त्री. माठ शाखावाले द्वार का नाम | र नृत्य मंडप ( २२२ ) योगिनी स्त्री चौसठ देवी, रूपकण्ठ पु. गुम्बद के उदय में कर्णदर्दरिका के ऊप योनि स्त्री. मंडल विशेष । का थर. रूपस्तंभ पु. द्वारशाखा के मध्य का स्तंभ. रेखा स्त्री. खांचा, कोना। रंगभूमि स्त्री. गर्भगृह के सामने पाचवां नीचा मंडप, रोग. वास्तुदेव । रोहिणी स्त्री. चोथा नक्षत्र । रजत न. चांदी, धातु विशेष । रौप्यज न. चांदी का बना हुआ। रत्नकूट पु. केसरी जाति का सोलहवां प्रासाद । रत्नगर्भा स्त्री. पंद्रहवो संवरणा । ल रत्नशीप पु. वैराज्यादि ११वां प्रासाद । लक्ष्मीनारायण पुं. विष्णुदेव । रत्नसम्भवा स्त्रो २४वी संवरणा। लक्ष्य त. उद्देश्य, चिह्न। रय पु. विशेष प्रकार की गाडी, कोने के समीप का दूसरा लतालिगोद्भव न. मंडल विशेष । कोना, फालना विशेष। लतिन पु. प्रासाद की एक जाति । रया स्त्री. प्रासाद की जाती विशेष । लतिना स्त्री. प्रासाद की एक जाति । रथिका स्त्री. भद्र का गवाक्ष, माला । लय न. मकान, गृह। रतन, प्रवेश द्वार। लाटी स्त्री. स्त्रीयुगलवाली प्रासाद की जंघा । रम्या स्त्री. बटो संवरणा। लिङ्गोद्भव न. वास्तु मंडल विशेष। रवि पु. बारह की संख्या, सूर्य । लोह पु. धातु विशेष, लोहा। रश्मि पु. किरण। व रस पु. छह को संख्या। राक्षस पु. माय से व्यय अधिक जानने की संज्ञा । वक्त्र न. मुख। राजगृह न. राजमहल। वन न. हीरा। राजपुर न. राजधानी का शहर, राजनगर । वज्रक पु. केसरी जाति का १६ वां प्रासाद । राजमन्दिर न. राजमहल । वजो स्त्री. प्रौषधि विशेष, गडूची। राजमार्ग पु. सार्वजनिक आम रास्ता । वट पु. वृक्ष विशेष, बरगद, बड़, राजसेन न. मण्डप की पीठ के ऊपर का थर। वत्स पु. आकाशीय कल्पित एक संज्ञा । राजहंस पु. केसरी जाति का २२ वा प्रासाद । राजाश पु. क्षेत्रफल का नाप विशेष । वराटका स्त्री. प्रासाद की एक जाति । राम पु. तीन को सख्या (राम, परशुराम मौर बलराम) वराल पुं. ग्रास, जलचर जीव विशेष, मगर । रासभ . सर प्राय का नाम । वरुण पु. पश्चिम दिशा का दिक्पाल, वास्तुदेव । राहुमुख न. शेषनागचक्र का मुख । वर्द्धमान पु. प्रतिकर्णवाला स्तंभ । रिक्ता स्त्री नीव की चोयी शिला, ४, ६ और १४ वलभी स्त्री प्रासाद की एक जाति । वल्कल पु. औषधि विशेष । रोति स्त्री. पित्तर, धातु विशेप वसु पु. आठ की संख्या, पाठ देव विशेष । कनकपु. ममबोरस स्तंभ वह्नि पुं. अग्निकोण का दिक्पाल. अग्नि, वास्तुदेव, न्द्र यु.गारह को संचा, वास्तुदेव । चित्रकोपधि। ददास पु. वास्तुदेन, वह्निभ न. कृत्तिका नक्षत्र । बपुस् न. शरीर। तिथि। ।

शिली। विद्याधर पुं. गुम्बद में नृत्य करने वाले देवरूप । वास्तुमण्डल के अग्नि कोने की देवी। व्यङ्ग वि. टेढा। व्यजनन पखा। व्यतिक्रम वि. मर्यादा से अधिक । व्यतिपात पु. सत्तावीस योग मे से एक योग । व्यय पु. माठ की सख्या, खर्च । व्यास पु. विस्तार, गोल का समान्तर दो भाग करने वाली रेखा। व्योमन् न. शून्य, प्राकाश। वीही स्त्री जय, धान्य विशेप। ( २१३ ) वाजिन पुं. अश्वथर, घोडा का थर। विशाल पुं. वैराज्यादि पाठवा प्रासाद | वानरेश्वर पु. हनुमान देव । विश्व न. जगत्, तेरह की संख्या। वापी स्त्री. वावडी। विश्वकर्मन् पु. जगत की रचना करने वाला देव- वामन न. मंडप के व्यास के प्राधे मान के उदयवाला गूम्बद, प्ररथ का देव, जगती के प्रागे का विष्णुकाता स्त्री. औपधि विशेष अपराजिता बलाएक मडप। विस्तीर्ण वि. विस्तार वायव्य पु. वायुकोना। वीतराग पुं. रागरहित जिनदेव । वायस पुं. ध्वात प्राय, कोमा। वृत्त वि. गोलाई। वाराह . मंडप के व्यासा के मान के उदयवाला वृद्धि वि. बढाना । गुम्बद । खरशिला का देव । वृप . पाचवी प्राय, नदीगण, वृषभ । वारि न. पानी, जल। वृषभध्वज पु. केसरी जाति का २४वा प्रासाद । वारिमार्ग न. दीवार से बारह नौकला हुमा खाचा। वेद पुं. चार को सख्या। वारुण न. शतभिषा नक्षत्र, वेदिका स्त्री. पीठ, प्रासाद पादिका मासन । वासवन. घनिष्ठा नक्षत्र । वेदी स्त्री. राजसेन के ऊपर का थर, पीठ। वास्तु पु. न. निवास स्थान, गृहारमादि में विशेष प्रकार वेश्मन् न. मंदिर, घर । की देवपूजन विधि । वैडूर्य पु. केसरीजाति का १७ वा प्रासाद, रल विशेष । वाहन न. सवारी, गाडी। वैधृति पु. सत्यावीस योग मे से एक योग । विघ्नेश पुं. गणपति, गणेश । वैराज्य पु. प्रासाद की एक जाति । विजयानन्द पु. वैराज्यादि २२वा प्रासाद । वैराटी स्त्री. प्रासाद की कमलपत्र वाली दीवार । वितथ पु. वास्तु मडल के देव । वैष्णव पु. श्रवण नक्षत्र। विदारिका स्त्री व्यक्त वि. प्रकाशवाला। केवाल पर का देव। विधि पु. वास्तुमण्डल के देव, ब्रह्मा। विधु पु. चन्द्रमा, एक सम्या। विद्ध वि. वेघ, रुकावट। विपर्यास पु. विपरीत, उलटा। विभव पु. सातवा व्यय। विमान पुं. वैराज्यादि सातवा प्रासाद, राजद्वार के आगे का बलाणक मण्डप। विमानजा स्त्री. प्रासाद की एक जाति । विमाननागरच्छन्दा स्त्री. प्रासाद की एक जाति । विमानपुष्पका स्त्री. प्रासाद को एक जाति । विलोक्य पुं. खुला भाग। विवस्वन् पु. वास्तुमण्डल का देव, सूर्य । विशति स. बीस की सख्या। श शक पु. चौदह की सख्या, इन्द्र । शङ्कर पु ईशानकोन, महादेव । शङ्क.पु. छाया मापक यंत्र । शङ्खावत्त पु. प्रासाद की देहली के माये की प्रद्धचन्द्र के माकारवाली शख और लतामो कालीमाकृति।

प ( २२४ ) शंखिनी स्त्री. शंतावनी, मौषधि विशेष । श्रीवृक्ष पु. केसरी जाति का सातवां प्रासाद सतमुल न. दश की संख्या। खान पु. चौया आय । साताद्ध. पचास की संख्या। शम्नुदिशा स्त्री. ईशान कोन। शयनासन पु. शेषनाग की शय्या पर शयन करने पट् सं. छह की संख्या। वाला विष्णुदेव। पड्दार न. दो दो स्तंम और उसके ऊपर एक एक पाट पष्टि सं. साठ की संख्या। सत्या स्त्री. प्राबाद के ३ भाग के मान का कोलीमंडप । षोडश सं. सोलह की संख्या । शाखोदर न. शाला का पेटा भाग। शास.प्रयम व्यय । स शालभञ्जिका स्त्री. नाच करती हुई पाषाण की संवरणा स्त्री. अनेक छोटे छोटे कलशों वाला गुम्बद । पुत्तलीरां। सकलीकरण न. देव प्रतिष्ठा की विधि विशेष । शाला स्त्री. प्रासाद, गभारा. छोटा कमरा, भद्र, परशाल सङ्घाट पु. तल विभाग ! बरामना। सत्य पु. वास्तुमंडल का देव । शाली स्त्री. चावल, धान्य विशेष, सत्रागार न. यज्ञशाला। शिखर न. शिवलिंग के आकार वाला गुम्बद । सदाशिव पु. कलशका देव, महादेव । शिरः न. शिखर शिरावटी, ग्रासमुख, एक संख्या वाचक । सद्य पुं. कोना का देव। शिर पत्रिका स्त्री. ग्रास के मुखवाली पट्टी, दासा । सन्धि स्त्री. सांप, जोड। शिरावटी स्त्री. भरणी के कार का घर। सन्च्या स्त्री भद्रयर का देव । शिला स्त्री. नीव ने प्रयमवार रखी जाती पापाण शिला। सप्त सं. सात की संख्या। शिव पु ईशान कोन. महादेव । सप्तविंशति सं. सत्तावीस की संख्या । शिर्ष न. भरणी के ऊपर का थर, शिरावटी। सभामार्ग पु.तीन प्रकार की प्राकृति वाली छत । शुकनास न. प्रासाद की नासिका । सभ्रमा स्त्री प्रासाद के भाग के मान का कोलीमण्डप शुक्र पु. छडा ग्रह, यवनाचार्य। समुद्भवा स्त्री. बारहवीं संवरणा। शुक्ला लो. नीद में प्रयम रखी जाती सातवी शिला। समोसरण न. तीन प्राकारवाली वेदी। शुण्डिकाकृति स्त्री. हायो। सरस्वती स्त्री. मंचिका थर का देवता। शुद्धसबाट न. गुम्बद का समतल चंदोवा, छत सर्वतोभद्र पु. केसरी जाति का दूसरा प्रासाद । शृङ्ग न. शिखर, छोटे छोटे शिखर के प्राकार वाले सर्वाङ्गतिलक पु. वैराज्यादि २३वां प्रासाद । सर्वाङ्गसुन्दर पु. वैराज्यादि २१ वा प्रासाद । शेप पु. वास्तुनडल का देव । सवितृ पु. वास्तुमडल का देव, सूर्य । शैलज पु. पापाण का बना हुआ । सहदेवी स्त्री. औपधि विशेष । शैलराज पु. मेरु पर्वत । सान्धार पु. परिक्रमावाले नागर जाति के प्रासाद । श्रवण न. २खां नक्षत्र, सान्धारा स्त्री. प्रासाद की जाति । श्रियानन्द पु. चौया व्यर। सारदारू पु. श्रेष्ठ काष्ठ, धोनन्दन . वैराज्यादि चौया प्रासाद । सावित्र पु. वास्तुमंडल का देव । श्रीवत्स पु. छदा व्यय, प्रासाद विशेष, एक ही सादा सावित्री स्त्री भरणी यर का देवता । मृग। सिंह पु. तीसरी माय, वैराज्यादि प्रासाद। अंडक.

( १२५ ) सिंहशाखा स्त्री. द्वार की नववी शाखा स्कन्दपु शिखर के ऊपर का भाग सिंहस्थान न. शुकनास । स्तम्भ पुथभा, खभा, ध्वजादड सिंहा पु सिंह राशिमा सूर्य । स्तम्भवध पु ध्वजाधार, कलावा । सिंहावलोकना स्त्री. प्रासाद को एक जाति। स्तात्र न स्तुति । सितशृंग पु. वैराज्यादि १२वा प्रासाद । स्व'एडल न. प्रतिष्ठ मडा मे बालु (रेती) को वेदी। सिद्धाश्रम पु सिद्ध पुरुपो का निर्वाणस्थान । जिसके कार देव को स्नान कराया जाता है। सांसक न. सीसा, धातुविशेष । स्थावर न. प्रासाद के थर, शनिवार । सुग्रीव पु वास्तुमडल का देव । स्थूल वि. मोटा। सुनोल न अच्छा नीलम रल । स्नानादक न स्नान जल, चरणामृत । सुप्रभा स्त्री दो शाखावाला द्वार का नाम । स्मरकीति स्त्री. एक शाखा वाला द्वार । सुभगा स्त्री. तीन शाखावाला द्वार । स्वयम्भू पु विना घडित शिवलिंग। सुरपु अन्तराल घर का देव । स्वर्ण न. सोना। मुरवेश्मन् न. देवालय, देव मदिर। स्वस्तिक न. वास्तुमडल विशेष । सुवर्ण न. सोना, घातु विशेष । स्वाति स्त्री. पद्रहवा नचत्र । सुपिर न. छेद, पोलापन । सूत्रधार पु शिल्पी. मदिर मोर मकान प्रादि बनाने हरिपु कणिका का देव, विष्णु वाला कारिगर। हर्म्य न. घर मकान । सूत्रारम्भ पु नीव खोदने के प्रारंभ मे प्रथम वास्तुभूमि हम्यशाल पु घर के द्वार कार का बलाएक में कीले ठोककर उसमे सून पाने का प्रारम । हस्त पु तेरहवा नक्षत्र, हाथ । सूर्य पु. बारह की सरूपा, वास्तुदेव, द्वारशाखा के देव । हस्तानन न. एक हाथ की एक अगुन, दो हाथ की सूष्टि स्त्री. दाहिनी मोर से गिनना, उत्पत्ति पृवी । दो अगुन, इस प्रकार हम सख्या बराबर सोपान न. सीती। अगुल सख्या। सोम पु. वारतुमडल का देव । हस्तिनी स्त्री. सात शाखावाला द्वार । सौध पु राजमहल, हवेती। हिमवान् पु केसरी जाति का नवा प्रासाद । सौभागिनी स्त्री. पाठत्री शिला का नाम । हिमा स्त्री. १९वी सवरणा। सौम्य पु शुभग्रह, बुध । हेमकट पु केसरी जाति का १०वा प्रामाद । सौम्या स्त्री. उत्तर दिशा। हेमकूटा स्त्री १७वी सवरणा। स्कन्दा स्त्रो. वास्तुमडल के नैऋत्य कोन की देवी । ह्रस्व वि छ'टा, कम होना, न्यून । ह शुद्धि-पत्रक पृष्ठ लाईन अशुद्ध पृष्ठ लाईन अशुद्ध , ६३ १३ ३ १२ १४ १६ ११० ૭ ५ २२ १२६ 6 - १३ प्राचादिषु प्राच्यादिषु ११ १७-१३, १६-२३, इन चारो क्षेत्र के नाप में २०-१६. २१-१३, देवगण नक्षत्र नहीं मिलता १२ २२ दिडमुते दिड मुखे कुमा कुंभा २६ पच सार्थतः सार्यतः भूमणीनां ब्रमणीनां ૨ दो की दो भाग की ४१ १३ तदूतः तदूर्वतः ४२ १० दिगविशति दिविंशति पादांश पादांशं १४ प्रतिष्ठ-शार प्रतिष्ठासार ४६ मूर्धावः मूर्ध्वाध १६ कणिका १२ बवावें बना चतुर्विशति चतुर्विशति १९ उदयक ने उदय करने १७ हायसस्याने छाद्यतत्याने द्विभाग মি २४ ४ १३६ २७ . पिका १४५ २९ १४ हगुणी यहाणी विश्वकम विश्वकर्म पासाद प्रासाद और मोर ऽस्वाद नस्ताद वेदाचं वेदाई राजा करतो करें तो क्रमत् क्रमात एक सोची एक सौ एक घंटी भद्राध भद्रा सामों सामथाओं हिस्तरा विस्तरा: अपराजिप्रपृच्छा अपराजितपृच्छा समुदरेत समुद्रेत गवा हो गया हो गुरुः शम्मोः शम्भो कत्तच्या कतंच्या दाहिनी और दाहिनी मोर स्तम्भ भोपग्रह भोपगह कुंडसिद्धि कुंडसिदि मागतः मार्गत: अधिक अधिक कणिका কুষিক कोणीया कोणीयों उत्पृङ्ग उत्शृङ्ग भाग २४ २६ १४७ ४ ५ २२ गृभं हस्व गर्भ " १५२ १५४ ६ है ७७ नाम उच्च येण १० ५९ २९ मान उच्छयेण त्रिखण्डत हस्ताङ्गल प्रकीत्तितः वजादड १७० त्रिखण्डात् हस्ताङ्गल प्रकीर्तितः ध्वजादड २४ २७ १२ ६ १८ । २२७ ) पृष्ठ लाईन अशुद्ध शुद्ध पृष्ठ लाईन शुद्ध शुद्ध २३ १७५ १७६ on २२ २४ ८ तत्प्रभाग पदिशपद वेदरूप पश्चमम् पुरमध्ये तत्प्रमाण षविशपद वेदरूप पञ्चम् पुरमध्ये पुरे ३ ३. चतुष्टयं शको चतुपटय शको २०० उरुङ्ग उरुगृत इन्दनील इन्द्रनील 'रखखें' के बाद लूटा मोर कोने के २११ ऊपर से एक शृग हटा करके उसके २१४ बदले तिलक २१५ रक्स २१६ प्रत्यक्ष प्रत्यङ्ग तु २१७ तिलक तिलक २१६ दिपद द्विाद हुप्रा मेटर- कङ्ग १४ २५ २४ २५ १३ ३५ २६ २३ खाड शिवगिकी सचारणा देध १९० १९२ १६५ शिवलिंग की सवरणा देव २५ ४ व्यवका काम व्यय का नाम " 8403 अनुवाद के सहायक ग्रंथ कर्ता भुवनदेवानाय विश्वमा ग्रंथ १ अपराजितपृच्छा २ क्षीरार्णव ३ ज्ञानप्रकाश दीपार्णव ४ राजवल्लभ मंडन ५ देवता मूर्ति प्रकरण ६ रूपमडन मडन सुधार महाराजा भोजदेव ठकर फेस मय मूमधार कुमार मुनि विश्वकर्मा महर्षि काश्यप गंगाधर 1 ७ समरांगण सूत्रधार ८ वास्तुसार ६ मयमतम् १० शिल्प रत्नम् भाग १-२ ११ विश्वकर्म प्रकाश १२ काश्यप शिल्पम् १३ शिल्प दीपक १४ परिमाण मंजरी १५ जिन संहिता १९ बृहत्साहिता १७ विवेक विलास १८ बृहच्छिल्पशास्त्र १९ प्रासाद मंडन भाग १ २० शिल्प रत्नाकर २१ मानसार शिल्पशास्त्र २२ विश्वकर्म वास्तु शास्त्र २३ मुहर्त चिन्तामणि २४ आरंभसिद्धि वात्तिक २५ प्रतिष्ठासार मल्ल सूत्रधार एक संधि भट्टारक वराह मिहिर जिन दत्त सूरि जगन्ननाथ अंबाराम सोमपुरा अवाराम विश्वनाथ सोमपुरा नर्मदाशंकर सोमपुरा मान सार ऋपि विश्वकर्मा श्री रामदेवज्ञ उदयप्रम देवसरि वसुनंदी

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Prasad Mandan

Author
Jain, Bhagwandas
Title
Prasad Mandan
File name
Prasad Mandan
Text
OCR done
Citation
1963
Published
2009/10
Publisher
Jaipur City, B.s.shrma
Language
Sanskrit
Pages
278
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
345640
Barcode
99999990233975.00
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Banasthali University
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