Banasthali University

अथ योगसमाचार

भार्गव, गोविन्द प्रसाद · 2009/02

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द्विय पुस्तकालय
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वनस्थली विद्यापीठ
12. १६"
मणी सख्या'
HACHA
PraminanaSINokianars
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पुस्तक संख्या
अवाप्ति संस्था...16921
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-

सूचीपत्र । नम्बर विषय पत्र नम्बर विषय स्वरसाधन १६ स्वासभद २ १७ माण अपानका ज्ञान ८० १८ ८४ ३ १६ ८७ o शब्दवर्णन पडुपाधिवर्णन सप्तसमुद्र वर्णन नरक वर्णन पट्चक्रवर्णन ६० ५ २१ ह २२ २३ जपविधान २०३ ६ स्वरसाधन रोगकी हालतमें | १३ नित्य अभ्यासरीति | २३ प्रार्थनाविधि २६ जीवका वर्णन २-६ बन्धन और मोक्ष ३२ नाड़ोवर्णन नत्वदशन ४० नत्वकी पहिचान ४४ शरीरज्ञान ५६ गभव्यवस्था वर्णन ६१ शरीरव्यवस्थावर्णन | ६५ प्राणवायुके स्थान तथास्वर्गलोकवर्णन अपानवायुकं स्थान ७२ तथामृत्युलाव कवर्णन नाड़ीभेद ७६ २४ अनहद ज्ञान २५ / ज्ञानचर्चा (१) पिंड ज्ञान १०७ १० १.१. १२ १. (२)ब्रह्मज्ञानतथा ११२ तारामंडल वर्णन (३) काल ज्ञान ११७ (४) ईश्वरज्ञान ११६ स्वरोदय सार १३५ राजयोग वर्णन १५६ हठयोग वर्णन १४ १५ २८ १६१

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* श्रीगणाग नमः * अथ योगसमाचारमग्रह योगका सार इस पतलबमे के आदमी अपनी भूनको छोड़कर सच और झूठ परीक्षा करके अपने सीधे रहलेको जानने मामूली बोल चाल में तयार करके लिखा जाता है । और के आदमी अपने धर्मको पिकान मक दा योग्यतासे अपनी उमर ईश्वर अनुरागमें प्रसन्नतासे व्यतीत करके पर- ब्रह्म में अपने विचार को लीन करे याने जीवन्मुक्त होजावे । इसलिये सारे गृह अर्थोको बिलकुल सरल करदिया है । जा वार्ता इस पुस्तक लिखी गई है उसमें सत्पुरुष अपने शामस्वभाव में जहां भूनहो वहां सुधार और प्रकट करें। डाक्टर गोविन्दप्रसाद भार्गव सुकाम जयपुर राजपूताना तारीख १८ अप्रैल सन् १६०० मुताबिक बैसाखमा १० संवन् १९६३ विकणीय बुधनार ।

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* श्री!: *
1921
২৯ অাৰম্ভ -
45
पहिला प्रकर्ण स्वरसाधन ।
जो मनुष्य दिनको चन्द्रस्वर रात्रिको सूर्य स्वर
ऐसे दिन और रात्रिभर रफरले वह हमेशा तन्दुरुस्त रहेगा।
कारण यह है के दिनमें सूर्य के प्रकाशमें जो अग्नि शरी-
रमें बढ़ती है वह चंद्रमा स्वर रहनेसे शान्त होती है । इ.
सी तरह रात्रिमें सूर्यस्वरके रहनेसे चन्द्रमासे उत्पन्न हुआ
शीत निवारण होता है। ऐसे अभ्यासीके शरीरमें कान्ति
विशेष होती है ऐसा आदमी शान्त चित्तवाला अजित
और सब लोगों में पूज्य होता है । इस अभ्याससे जलतत्व
और पृथ्वीतत्व ज्यादा रहता है। भूख प्यासकी बाधा कम
होजाती है। जितने ज्यादा दिन तक ऐसा अभ्यास रहेगा
उतनी ही शक्ति बढ़ती रहेगी। इसका उलटा होनेसे बीमारी
पैदा होगी और मृत्यु जल्द होगी। रोगके नाम बताते
हैं सो समझ लेवें । फुन्सी वाले बुखार, होलदिल, मोती-
जरा, पेचिश, पसलीरोग, सोमरोग याने तपदिक, उन्माद
याने मालीखोलिया, और लकवा याने किसी अंगका बेकार
होजाना।
१

(२) तरकीब स्वरसाधनकी यह है कि एकान्तम बैठा रहे ज्यादा बोले नहीं ज्यादा ग्वाय नहीं स्वरौ ध्यान रखे अगर दिन भर चन्द्रमा और रात्रिभर सूर्य न रहे तो जितने ज्यादा समय तक रहे मोही अच्छा है। आकाशतत्व और सुषुम्ना स्वरको पूरा निगाह रकब इसमें गफलत होनेसे स्वर बदल जाता है। जितनी देर दहणा स्वर रहता है उतनी ही देर बाया एक दूसरेके कमोवेश होनेसे श्रादमी रोगी होजाता है। जिस स्वरको देश्तक रखना हो उसी तरफ ध्यानसे अथवा नाड़ीके ऊपर दवाब पहुँचानेसे या करवट बदलनेसे रोके एकाचे । लेकिन जब पूरे तौरसे बदल जावे तो फिर उसके वेगको रोके नहीं क्योंके पूरा वेग (बल या जोर ) रोके से रुक नहीं सक्ता । सिर्फ सुषुम्नाहीके योगमें यह क्रिया उत्तम रहती है । अक्सर आदमियों की यह आदत है के अपने कार्यके साधने के वास्ते दहिनेसे बांये और बांये ले दाहिने पलट लेते हैं पर पूर्णगतिमें उनकी यह कार- रवाई फिजूल है । इससे शरीरमें रोग उत्पन्न होता है फे- फड़ा और दिल बहुत कमजोर हो जाते हैं, पूर्णगतिसे मतलब जल और पृथ्वीतत्व है चाहे कोई स्वरहो । ( दूस- रा कायदा ) एक स्वरको देर तक रखनेका यह है के श- त्रिकोजितना सूर्यस्वर चलेगा उतनीही देर दिनको चन्द्रस्वर चलेगा इसलिये आसान तरकीब यह है के रात्रिमें हमेशा बाई करवट सोवे और दिन में कभी भी बांई करवटलनेकी इका आपसे न करे । लाचारी में दोष नहीं सब प्रकारके घरकी हालतमें दिन भर अगर होसके तो दाहनी करवट लेटा रहै इससे ज्वर (बुखार ) उतर जाता है, लेकिन उस आदमीका पेट याने( उदर)मल मूत्र से साफ होना चा- हिये । जिन लोगों को दिल की बीमारी है उनको यह सब साधन गुरूसे पूछ कर करना चाहिये । स्वर चलते फिरते दौड़ते कसरतके समय अपने आप बदलता रहता है इस- लिग अभ्यासीको हमेशा धीरे चलनेका रफ्त रखना चा. हिये क्यों के अगर स्वरका पूरा वेग है तो धीरे चलनेसे स्वरमें एलटाव नहीं होगा। बारंबार करवट बदलने से या दौड़नेसे सुषुम्ना पैदा होगी, छोटे बच्चोंमें वहालत तन्दुरस्ता और जवानोंमें बीमारीकी हालत में सुषुम्ना दिन और रात्रिभरमें १२० एकसो बीस बार तक होजाती है । जवान आदमीमें यह स्वर चार घड़ी तक बारी बारीसे रहते हैं। अगर श्राकाशतत्वको शामिल करैतो हर एक स्वर एक मुहूर्त तक याने पांच घड़ी तक रहता है । महनतक- रने वाले आदमियों में ( मजदूर लोग) और अभ्यासी में स्वरके समयका प्रमाण नहीं है। सवाल---स्वर क्या है पूरक और रेचक क्या है ? जवा--स्वर जिन्दगी याने जीवन है। स्वास लेने और वाहर छोड़ने का काम स्वर कहलाता है। जब स्वास भी को चले उस को पूरक और जब नाकके बाहर श्रादे को रेचक कहते हैं । रेचकको भाषामें उसास बोलते (४) सवाल----स्वरकी पैदायश कैसे हुई दाहिना बांया स्वर क्या है ? जवाब-यह क्रिया स्वयं याने कुदरती है। जब बच्चा पै- दा होता है तो धरती के चौगिर्द वाली हवाका दवाब उसके शरीरके सब तरफ होता है उस समय बच्चे के मुँह और नाकके रस्ते हवा फेफड़ोमें भरती है । लेकिन यह शरीरके. अंदर गई हुई हवा फेफड़ोंकी लचकीली ( याने मुड़ने वाली मुलायम ) तासीर याने गुण होनेसे अपने आप बाहर आजाती है। लगातार अंदर बाहर आने जाने से यह क्रियाशरीरमें स्थापित होती है । हवाका दवाव शरीर के अंदर पहुंचने से पहले बच्चे के शरीरमें भी रुधिरका सं. चार होते रहने के सबब हवाका दवाब अंदर मौजूद पाता है इसलिये सिर्फ बाहर भीतरका संबन्ध ही होना जरूरी था । बच्चे का रोना और उसके पैदा होने के पीछे स्वासका लेना स्वयं सिद्ध है ।याने प्रकृति अनुकूल है बेशक अगर रुधिरका संचार बालकके शरीर में उत्पत्ति समय मौजूद नहीं है याने वह मुरदा है तो धरतीके चौगिर्द व्याप्त हु हवाका असर उसके फेफड़ों पर अंदरसे रोकने वाली श- क्तिका अभाव होनेसे याने मुकाबले का दवाब न मिल- ने के सबब कुछ नहीं होगा। सवाल-नाकके दोसुराख हैं फिर एक तरफसे कभी दो- नो सुराखोसे हवाकी आमद रफ्त क्यों है ?

heir जवाब----नालके दाहिनी तरफसे जब स्वास श्राता जाता है तो उसको दाहि । स्वर या सूर्यस्वर या पुरुष कहते हैं। जब नाकक बांई तरफसे स्वासकी अामद रपत होयतो उसको बाय स्वर या चन्द्रस्थर या स्त्री कह- ते हैं । सृष्टीमें जितनी चीजें हैं वह कोई एक जगह स्थिर नहीं हैं मगर इस हालतमें भी जितनी देर कोई एक हिस्सा काय करता है उतनेही समय दूसरा हिस्सा उसी अंगका आराम करता है। इसी तर, बारी बारीसे काम और आराम करते यह परीक्षा अक्सर करके तो मालुम होजाती है परन्तु बहुतसे पदार्थों में यह कारर- बाई बहुतही कमजोर है जैसे धातु आदि पाषाणामें । चार प्रहर दिन रहता है और चार प्रहर रात । इसीतरह सू- यस्वर और चन्द्रस्वर शररिमें बारी बारीसे बराबर सम- य तक रहते हैं। असल में दोनोंमेंसे कोईसा लोप या- ने गाय नहीं होता । जैसे सूर्य और चंद्रका प्रकाश घर- तीके गदिश याने चक्कर पर रक्खा गया है। वैसेही स्वर का प्रकाश भी फेफड़े दिल और नाड़ीकी चाल पर रखा गया है । जैस सूर्यका प्रकाश एक समयमें धरतीके श्रा थे हिस्से पर होता है और उतनीही देरमें दूसरे प्राधे हिस्से पर चन्द्रमाका । तैसेही शरिमें जानना । शरीर में फेफड़े दो हैं जो हृदय स्थानमें छातीके दोनो तरफ हैं इनकी वनावट सुराखदार है जैसे इस्पंज याने बादला की तरह । इसमें शक नहीं के जिम हालतमें दाहिना स्वर ) चलता है उनी देर तक दाहिना फेफड़ा ज्यादा काम करता है। और बाँयाँ कम बल्के दाहिने स्वरमें जल और पृथ्वीतत्व होनेकी हालतमें दाहिनो फेफड़ा बहुत ज्यादा काम करता और बाँयाँ बहुत कम । इस त. रह बांये स्वरके योगमें जानना । इसका सबब बताते हैं के जिस अंगका स्वर चलता है उसी अंगके फेफड़े में ह वा उतनी देर तक विशेष भागमें पहुंचती है और रुधिर भी उसी तरफको उतनी देर तक ज्यादा पहुंचता है । और साफ याने निर्मल होता है । बनिस्बत बाँये अंग के । फिर इसी तरह बाँये स्वरके योग बाँये फेफड़े में येही प्रकार क्रिया जानना । दिन भर या बहुत देर तक एकही स्वरका कायम याने( स्थिर रहना )फेफड़े की ताकत पर प्राधार है । मालुम रहेके जितनी देर एक स्वर ज्या. दा चलता है उतनी ही देर अब दूसरे को काम देना है। जो कदाचित दूसरेमें पवन प्रवेश न करेतो एक फेफड़े को ज्यादा परिश्रम याने मुँहनत करनी होगी जिससे वह बेकार हो जायगा । और दूसरेमें जिसमें हवाका प्रवेश नहीं हुआ है जरूर कोई विकार याने (खलल ) सम- झना । स्वरका बदलना जैसे फेफड़े के ऊपर बताया तैसे ही दिल और नाड़ियों पर जानना। क्योंके पवनका फै- लाव नाड़ियोंके श्राश्रय है । पूरा सबूत यह है के नाड़ि- यों पर दबाव पहुँचानेसे म्बर बदल जाता है। नाड़ियों को अंग्रेजीमें आस्ट्री और फारसी शिरयान कहते हैं ।

७
हैं
उड्डयानवन्धमें सुषुम्ना नाड़ी पर प्रांतका दवाब पहुंचने
से सुषुम्ना स्वर होजाता है । सुषुम्ना नाड़ी शरीरके
मध्यमें नाभिसे लेकर कंठ पर्यन्त है सब नाड़ियोंसे मो.
टी मेरुदएडके सामने पेरुले लगी हुई है और सवा बालि
स्त लंबी है
इसको अंग्रेजीमें अप्रास्टा कहते
आम लोग इस नाड़ीको नाभी पर देखा करते हैं । जिसको
घरन बोलते हैं। जिस तरफका फेफड़ा खराव होजाता
है उसमें वायु भली भांति नहीं जाती उस वक्त तजरबेसे
मालुम हो जायगाके उस तरफका स्वर कमजोर और
तत्वयाग्निको आदि लेकर कोई होगा । सुषुम्नाका प्रकट
होना याने सुषुम्ना स्वर जारी होना प्राणायाम और उड्डया.
नबन्धसे होसक्ता है। लेकिन दौड़ने या पहाड़ पर च.
इनसे भी यही हाल होजायगा । सबब यह है के
वहुतसारी हवा इन हालतोमें फेफड़ेके अन्दर दाखिल
होती है और बहुत जल्द सब नाड़ियों में भर जाती
है जब उनमें गुंजायश नहीं रहती तो फिर संधिरसे
मिली हुई हवाका धका वापिस पाता है और दोनो स्व.
र पूर्ण होजाते हैं जिससे साबित होता है के खूनका दौ.
रा मासूली हालत पर आगया और सब कमजोरी दूर
होगई । जब प्राणायामसें सुषुम्ना प्रकट होयतो समझना
चाहिएके इडा पिंगलाका मार्ग मल रहित होगया जै
से पुस्तकमें लिखा गया है के सुषुम्नामें समाधि लगती
है सो उड्यानबन्धों ऋधिरका का उलटा होजाता

(८)
है याने बजाय इसके कि रुधिर नीचेक अंगोमें जावे । सुषुम्ना
पर दवाब पहुंचनेसे ऊपर दिलकी तरफ जाता है और
संचार बंद होजानेसे गफलत याने समाधि पैदा करता है।
शरीरको खोत समझो और उसमें जो न्यारी न्यारी क्यारि-
यां रखी जाती है उनको रुधिरकी नाड़ियों के समान समझो
दिलको पानीका होज़ समझो जिससे पानी क्यारियोंमें
जायगा। अब जिस हालतमें सब क्यारियां पानीसे बिलकु-
ल भरजावेतो पानीकी धारा ( लहर )वजाय अागेको च.
लनेके उलटी होजकी तरफ लोटगी सोही सुषुम्नाका हाल
जानना । जब अाकाशतत्व बर्तता है तो दोनो फेफड़े बरा.
वर काम करते हैं लेकिन जो हवाके जिसका प्रमाण बँधा
हुश्रा है एक फेफड़ेमें जातीथी वह अब उसके दो बराबर
हिस्सेमें बट कर दोनोमें पहुंचीतो इस सबबसे रुधिरका
संचार सुस्त होजायगा और रूधिरके साफ होनेमें काम
दद मिलेगीके जिस सुस्तीसे शरीरम उच्चाट पैदा होजा
यगा । इसी तरह सुषुम्ना स्वरकी हालतमें जबके एक तरफ
केफेफड़े और नाडियोंकी हवा दूसरी ओरके अंगमें प्रवेश
करनेको है वहमी सिवाय चित्तकी घबराहट और शरीरके
अन्दर रुधिरके दैारेमें खलल (विघ्न ) डालनेके और
कुछ बात नहीं है
यह तबदीली आधामिनटले कुछ ज्यादा समयमें हुआ
करती है लेकिन चलते फिरते दोड़तेसमय दशमिनट तक

( 8 ) - लगती है । मामूली समय इसका यह है के जितनी देरमे शरीर में एक मस्तवा खून का दौरा होचुके सुषुम्ना कायम रह ती है। प्राणवायुकी जितनी थोड़ी मिकदार फेफडामें पहुंचे गी उतनाही पक्षा खून याने रूधिरका कमजोर होजायगा क्योंके उतनाही कल रूधिर नाड़ियों में गमन करेगा जब रुधिर गाढ़ा होता है। जैसे खाना खाने के कुछ देर पीछे गिज़ा याने भोजनके जुज़के मिलनेले तो गाहे खून की मिकदार फेडेमें ज्यादा भालेसे फेफड़े भारी होजाते हैं। और हवा की आमद रफ्तमें पूरी मुलायमियत वाली तासीरसे मदद नहीं करसक्त जिसका नतीजा यह होता है के फेफड़े रुधिरके मैले पदार्थोको रेचक समय पूरे तोरसे निकाल नहीं सक्ते और वायुके जोर वाले केगको नहीं सहन करसक्त । जब- तक साग रुधिर इन मैले पदार्थों से धीरे धीरे साफ न हो जाय ऊपर लिखी समयमेंही अग्नि और आकाशतत्व बर्ता- करते हैं और जब रुधिर मामूली पतला होता है जैसे बहुत सारा मिकदार पानी पीने के एक या आधी घड़ी पीछे तो हवा फेफड़ों में खूब जोरसे आती जाती है तब जल और पृथ्वीतत्व रहता है क्यों के फेफड़े पूरे बलसे काम करते हैं और उन पर मैले रुधिरका बोझ नहीं होता याने इतनी समयमें रुधिरमें मैले पदार्थ मोजूद नहीं होते। सवाल । क्या सबब है के दाहिने स्वरमें क्रूरता और तेजी है और बांयेमें शान्ति है ?

ho
( १० )
जवाब-दाहिने अंगमें दाहिना फेफडा बांयेसे बड़ा है
इसलिये उसमें वनिस्बत बांई तरफके फेफडेके रुधिर और
हवाकी ज्यादा पिकदार रहती है। (२) दाहिने अगों जि
गर है जिसमें बहुतसारी मिकदार वरीदी खून याने
मैले काले रंगके खूनकी रहती है और इसी जगह अ
बके सारे पदार्थ रसकी सूरतमें होते हैं और उनहीका
रुधिर बनता है इस किस्म की तबदीलीमें हरारतकी ज्या
दती हुश्रा करती है सो जानना । (३) शरीरकी मामूली
कारवाईमें याने तमाम व्यवहारमें दाहिना अंग बहुत
इस्तैमालमें आता है इस सबबसे इस अंगमें खून और
हरारतकी ज्यादती रहती है । और जैसे दाहिने स्वरको
क्रूर कहा है वैसेही बलवान भी सो दाहिना अंग बनिसबत
बांये अंगके वलावन है और सबको प्रगट है। शरीरके बां-
ये अंगमें ऊपर लिखे मुताबिक कोई कारवाई नहीं होती
इसलिये शान्त बतलाया। और यही अंग कम काममें
आनेके सबसे कमजोर है । जिगर को यकृत और कले-
जा कहते हैं इसको अग्निका कोठा और सूर्यलोक क.
हते हैं । जैसे सूर्य अपनी किरणों द्वारा सब पदार्थों के जुज़
याने अंशको खेचता है तैसेही जिगर अन्न याने गिज़ा
के सार जुजोंको पित्त के जरिये हल करता है और रुधिर
में शामिल करता है । चन्द्रमा या चन्द्रलोकसे मतलब
प्रकाशय याने मेदा है जिसमें अन्न खाते ही पडता रहता
है और पचता रहता है। और
और जैसे चन्द्रमामे जलके रखें

( ११ )
चनेकी शक्ति है तैसेही मदेमें तमाम अर्क (गिजाका
पतला जुज़ ) और पानी के शोषलेने और रुधिरमें
शामिल करनेकी सामर्थ्य है । तमाम किस्म के अर्क और
पानी पक्वाशयकी बहुत बारीक रुधिरकी नाडियोस शोषा
जाता है । जिनको अंग्रेजी में कैपिल्लरी और योगशास्त्र
में सरस्वती और कोड़ लोग नागिनी कहते हैं। मेदेकोही
जलका कोठा या भंडार व्हत हैं । क्योंके इसीके पाश्रय
सारे.शरीरमें जल फैलत है जैसे सूर्य चन्द्रका उजाला
याने प्रकाश मृत्युलोकों है । तैसेही उदर याने मृत्युलोक
में जिगर और मेदेकाही सब खल है ।
सवाल-अगर किसीके नाकके दोनो सुराखोंसे हवाकी
श्रामद रफ्त याने स्वासका आना जाना बंद होजावे या
दोनो या एक फेफड़ा खराब होजावे तो स्वरकी क्या
हालत होगी?
जवाब-दोनो सूराख दो हालतोंमें बंद होजाते हैं
जैसे नाककी बीमारी होना या तालूमें या कंठमें छेद
का होजाना जिसमें हवा मुँह और नाक दोनोसे संबन्ध
करलेती है । याने दोनोका ऐकही रास्ता हो जाता है
तो आदमी नाक या मुंहसे स्वास लेकर जीता रहसक्ता
है परन्तु जब हवाकी नाली रुकजावे या दोनों फेफड़े
ठोस होजावें और उनमें हवा न जासके तो बहुतही
शीघ्र मृत्यु होजाती है।

( १२ )
जैसे श्रादीकी मौतके समय फेफड़ेके बे हरवत
होजानेसे प्राणवाउके द्वार बंद होजाते हैं याने इड़ा
पिगला सुषुम्ना स्वार नहीं चलते और सिर्फ मुंहसेही
स्वास पाता जाता है तो चारघड़ीके अन्दर मौत हो
जाती है। जब दोनो फेफड़ेके थोड़े थोड़े हिस्से खराब हो जाते
है तो वायु अग्नि अथवा अाकाश कोई ऐसे तत्वकी चाल
रहैगी और कुछ दिनो ऐमेही बरावर होते रहनेसे मौत
हो ायगी जैसे फेफड़के सोजिश याने उसके सूजन
की बीमारीमें जिसको अंग्रेजीमें निमोनिया कहते हैं।
ऐसाही हाल क्षयीरोगमें दोनों फेफड़ोंका होता है। फेफड़े
जितने ज्यादा ठोस होजायगे या गलजायगे उतनीही
कम वायु उनमें प्रवेश करगी । क्योंके सिर्फ तन्दुरस्त
हिस्सोंमें जायगी तो फिर उसी अनुमानसे स्वर और
तत्व कमज़ोर वरतेंगे । अगर नाकका कोई एक सूराख
बिलकुल बंद होजावे या कोई एक फेफड़ा बिलकुल खराव
होजावे तो दूसरी तरफ वालेसे कारवाई जिन्दगीकी
जारी रहेगी परन्तु थोडे दिनों तक । क्योंके एकही फेफड़े
पर सारे शरीरका निर्वाह होना मुश्किल बात है । काय
दा है के जब भी शरीरका एक अंग निकम्मा होजाता
है तो दूसरा उसके काम और आहारका मालिक होता है
परन्तु जो पूरा काम न देसकेतो धीरे धीरे शरीर कश
याने (दुबला) होकर नाशकू प्राप्त होता है।
सवाल-सूर्य और चन्द्रकी कला और उनकी शक्ति या
है

( १३ )
ने सामथ्र्यसे क्या समझना चाहिये ?
जवाब---जना पकाशय याने अदा अन्नसे भरा हुअा हो
ता है उस समय सूर्य याने जिगरको ज्यादा काम करना
होता है याने पित्त पैदा करना इस हालत में जिगरको
पूर्ण तेजस्वी सूर्य जानना जैसो मध्याह्न समयका
होता है इसीतरह पर पकाशयकी वाली और भरी हुई
हालतको पहचानना । याने पक्काशयको अन्नसे भरी
हुई हालतको कला हीन अमावास्याके चन्द्रमाकी तरह
जानना । जैसे पूर्णमासीको समुन्द्रमें जुवारभाठा आता है
राने उस रोज चन्द्रमामें जलके बचनेकी पूरी सामर्थ्य
होती है । तैसे ही खाली मेदाभी पूरी ताक़तमें पानी
को बहुत जल्द शोषता है । बुद्धि से सारी क्रिया जिगर
और मेदेकी सूर्य और चन्द्रमासे अनुमान कर सक्ते है
क्योंके सारी तासीर एक दूसरेसे अापसमें मिलती है ।
दूसरा प्रकर्गा स्वरसाधना रोगकी हालतमें।
आदमी हमेशा तंदुरुस्त नहीं रहसक्ता । मुल्ककी
आवहया और खान पान या जगत् सम्बन्धी कार्य में
अनुचित क्रिया होनेसे शरीरको बाधा होजायाकरती
है । सबसे बड़ी जरूरी बात आदमीके लिये जो जिन्द
गी कायम रखनेकी है वह यह है के वीर्य की रक्षा करे इस
के सिवाय हमेशा ( सर्वदा) उत्तम निर्मल जल और उ
त्तम आहार ( महनतसे कमाई हुई और सच्चे व्योहारसे

(१.४ ) पैदाकी हुई रोटी सुराद है) ग्रहण करे याने ऐसी रोटी खाय हमेशा हवादार खुली स्वच्छ जगहमें रहे । तर गर्म मुल्कमें रहने वाला आदमी मलीन और रोगी हो जाता है। वीर्यकी रक्षाके लिये साधन बतातेहैं। जवान श्रादमी को तन्दुरुस्त हालतमें एक महीनामें एक मरतबा स्त्रीसंग करनेसे कोई बाधा नहीं होसक्ती। गृहस्थ धर्म और ग स्म मुल्कमें रहने वालेको अगर वह तन्दुरुस्त हैं तो ग रमीके मौसममें हर पन्दरखें दिन बरसातमें हर हफ्ते ए क मरतबा ऐसेही सरद मोसममें स्त्रीसंगसे कोई नुक सान नहीं होसक्ता ! अगर पुरुषसे पुरुष या स्त्री से स्त्री आपसमें सोग विलास करें तो नपुंसकता पैदा होती है। और शरीरका बल क्षीण और बुद्धि बिगड़ जाती है । और बदनके सारे हिस्से रोगी होजाते हैं। इसी प्रकार जो स्त्रीसंग समय पुरुष और स्त्रीका एकही स्वर हो यतो येही नुकसान पैदा होता है । और जो पुरुष मैथुन समयके पीछे परिश्रमके काम अथवा दिमागी महनत करते हैं याने गूढवातों को बिचारते हैं या जल पीते हैं श्र थवा पेशाब पखानेकी हाजतके समय स्त्रीसंग करते हैं। उन सबका इसी तरहका हाल होता है जो पुरुष निर्बल तत्व याने अग्नि आकाश अथवा वायुमें स्त्रीसंग करते हैं वो भी नपुंसक होजाते हैं। अगर किसी पुरुषका भोगके आ- दिमें कोई ला स्वर है जो वीर्य पतन समय नहीं है तो इस तरहसे स्वर बदलनेसे गर्भ स्थिति नहीं होगी।

( १५) श्रादिसे अंत तक पुरुषका एकही स्वर रहना स्त्रीके ग भधारण करनेके वास्ते निहायतही जरूरी बात है। औरतको स्वर और तत्वों पर गर्भ धारण होनेकी व्यव- स्था सन्ततिकी प्रकृति पर याने स्वभाव पर असर डालती है । हमेशा स्त्रीका स्वर पुरुषसे उलटा होना चाहिये । रजस्वला होनेके पांच दिन पश्चातसे सोलवें दिन तक स्त्री गर्भको धारण करती है। औरतके वीर्य रजस्वला धर्म होनेके दिनोंमें उसके अंडकोषसे बाहर नि- कल कर गर्भाशय में प्राजाता है जहां रज और वीर्य- का मेल होता है। औरत के अंडकोपको अंग्रेज़ीमें श्रोज- री और गर्भाशयको यूट्रस और रजको श्रोवम् कहते हैं । मरदके वीर्यको इसपरमेटोजुवा कहते हैं । जो पुरुष रातके पिछले प्रहरमें स्त्रीसे भोग करते हैं अथवा रेचक समय प्रारंभ करते हैं वोमी नपुंसकताको प्राप्त हो- ते हैं। अन्नविकार और जलविकारके वास्तै गृहस्थी को यह क्रिया बताते हैं के हमेशा छोटी जवाहर्ड का चूर्ण सीधा नमक मिलाकर रात्रि समय ठंडे जलके साथ सेवन करे नमक हर्डकाबारवां भाग(हिस्सा) होना चा- हिये और जवान आदमीके लिये प्रमाण याने चार माशा से बारह माशा तक होना चाहिये । तमाम पतली दवाई पतला श्राहार हमेशा बांयें स्वरमें लेना चाहिये । सुषुम्ना और श्राकाशतत्वमें कभी कोई वस्तू ग्रहण न करें क्यों के उस समय शरीरमें खूनका ग बहुत सुस्त हो 월 (१६) ताहै । पसीना लाने और थूक पैदा करने वाली चोर्जे बांये स्वरमें और तमाम क्रूर आहार याने गरिष्ठ भो जन और दूर दवाव्यां जैसे धातु उपधातु प्रादिक नशा लाने वाली और जहरीली दवाइयां दाहिने स्वरमें फल दायक हैं । अगर पतली वस्तू या सूंघनेकी चीजें बायें स्वर में इस्तेमाल होंगी तो निहायतही जल्दी शरीर और ख यालकी ताकत पर असर पहुँचेगा । गुरदा और मसाना याने मूत्राशयके रोगमें बांयें स्वरमें इस तरह जिगर मेदा वा प्रांतकी बीमारीमें हना स्वर साधना उत्तम है । करिन रोगीका इलाज दाहिने स्वरों । और बहुत दिनों के रोगीका इलाज बांये स्वरमें प्रारंभ करे। कोई काम बुनियादारीका बल्के बैठना उठनातकभी रेचकमें श्रा- रंभ नहीं हो । चाहिये । देहीके सुखके कारण जितनी वस्तु हैं उनका ग्रहण करना या कोई लाभकारी काम अाकाश और सुषुम्नाके योगमें नहीं होना चाहिये । त- माम प्रकारके कामोंमें पूरकसे प्रारंभ कर बल्के कि- सी कामके लिये इशदा याने इच्छातकभी पूरकमें होना उत्तम साध- है अलबत्ता आकाशतत्वमें रचक समय जो श्राप (याने सराप और बददुवा) दिया जावेतो वह निश्चय असर करती है। अक्सर लोग क्रोधकी हा- लतमें बड़बड़ा कर खोटे बचन बोलते हैं तो हमेशा पूरन के संग होसक्ता इसलिये उन बचनोंका असर नहीं होता। अगर रेचक संग मुख खोलके जैसे लब्ज हाय ghd

(१७)
के साथ रेचकका शुमार है। लाचारीमें खोटा बचन निक
ले वह निश्चय श्राप जानों । हमेशा जो आशीर्वाद
स्मरणसे पूरक समय जल पृथ्वीतत्वमें दिया जाय वह
निश्चय आशीर्वाद है । कभी कभी स्मरणसे श्राप और
वचनसे आशीर्वाद सच्चा होजानेका खबर यह है के
ऊपर लिखे तत्व मौजूद होते हैं और कोई कारण नहीं है।
सवाल-क्या बीमारीके उत्पन्न होने की हालतमें
स्वरके आश्रय कुछ तबदीली रोगमें पैदा होसकती है
या सिर्फ दवाई और पथ्यके भोजनसे रोग हट सक्ते हैं?
जवाब-शरीरकी हालत और चित्तकी हालत जुदे
जुदे समयमें न्यारी न्यारी होती है जैसे प्यासके म
य दिलपे घबराहट और भोजनके पीछ अालस्यको श्रा
ना पेशाव पारखानेकी हाजतके वख्त चित्तमें उच्चाट हो
ता है । ऐसेही तरह तरहके तत्वोंकी हालतमै चित्त
की वृत्ती इकसार नहीं होती है इसी सबबसे शरीर और
श्रात्मा पर न्यारी न्यारी किस्मका अक्स (याने प्रतिबिम्ब)
पड़ता है । और इसी सबबसे सारे कामोंका जुदा २ नतीजा
समय अनुसार निकलता है । दवा और श्राहारही रोग
के निवारणके लिये जरूरी है । और कोई साधन इनकी
वरावरी नहीं करसक्ते हैं।
।
सवाल--क्या सिर्फ
स्वरसाधनसे रोगघट सक्ता है ?

( १८ ) जवाब-बेशक श्राहिस्ता आहिस्ता शरीरकी व्यवस्था असली हालत में प्रासक्ती है अगर ऊपर लिखे मुवाफि क स्वर साधन किया जाय। सवाल-पूरकमें प्रारंभ करनेसे क्या फायदा है और रेचकसे क्या नुकसान ? जवाब-जब स्वर भीतरको जाता है तो उस वक्त शरीर में उमंग पैदा होती है और यही कारण सारे कामोंका अच्छा नतीजा पैदा होने का है । रेचक समय शरीरकी श्रद्धा घटजाती है इसलिये उसके बरखिलाफ होता है याने रसोई काम इच्छा अनुसार पूरा नहीं होता । पूरक पका इरादा जाहिर करता है और रेचक कमहिम्मती और कम- जोरी खयालातका सबूत है। सवाल-क्या जरुरत है के सकील याने सख्त गिज़ा इसीतरह चटनी जैसी मुलाइम पदार्थ दाहिने स्वरके योग- में खाये जावें और सिर्फ पतले पदार्थ बांये स्वरके योग- में इससे क्या नफा और क्या नुकसान है ? जवाब-पतले पदार्थ मेदेकी नाड़ियोंसे सोखे जाते हैं याने कैपिल्लरीजसे । और इसलिये इसी जगहसे खून में घुल कर गुरदोंतक पहुंच कर शरीरसे मूत्रद्वारा निकल जाते हैं। कुछ हिस्सा पसीने के रस्तेसे बाकी और कई रस्तोसें शरीरसे जुदा होते हैं सकील गिज़ाके मुबाफिक (18) इनमें जिगर वगैरहके अंदर कुछ तबदीली नहीं होती न इनसे मल यानी फुजला बनता है पतली वस्तु उसे क- हते हैं जिसमें ज्यादा हिस्सा पानीका है ऊपर लिखे मुता- बिक पतली चीजोंके पचारके लिये बहुत कम समय और हरारतकी जरुरत है इसलिये बांये स्वरमें लेना उ- त्तम है । अगर दाहिनेमें खाये जायेंतो तत्ते तवे पर बूंद डा. लनेकासा हाल होगा याने खूनके उमदा जुज़को ज लाकर खूनको गाढ़ा और मैला बनावेंगे। सकील भोजन मेदेमें तीन घंटेसे लेकर प्राट घंटेके अंदर पचता है पी. छे छोटी और बड़ी प्रांतोंमें पित्त और प्रांत के रसके संग पचता रहता है सो इस सारी क्रिया में चौवीस(२४) घंटे लगते हैं इसी लिये हिन्दूलोग दिन रातमें सिर्फ एकही मतवा खाना खाते हैं के जब तक पुराना न पच जावे दु. बारा आहार खाना बदहज़मी और पेटमें वायू पैदा करता है शरीरमें पानीके पचने और फैलनेका प्रमाण यह है के अगर दोसेर पानी मुहके रस्ते जायता मेदेमें दो घ- डीके अन्दर जज्ब होकर पेशाब और पसीना वन सक्ता है इसी तरह अगर योगो एक सेर पानी १०० दरजा फैरन- हाईट थरमामेटर वाला जिसमें १ माशा नमक मिला हु. श्राहो. गुदाके रस्ते चढाकर एक घड़ीके अंदर पचा जावै याने इस पानीका पेशाव और पसीना बनजावेतो ऐसे साधुको हटमतकी शुद्ध क्रिया बाला जानना । ऊपर लि- खी दोनों तरहकी कारवाई उसी हालतमें होसक्ती है

( २० )
व सारा पेट मल मूत्रसे बिलकुल खाली हो ।
सवाल-भूक प्यास क्या है और किसतरह पर जाहिर
होती है ?
जवा--जब सकील हिस्से खूनमें कम होजाते हैं
और मेरेमें गिजा मौजूद नहीं होतीतो उसके खाली हो
ने की इत्तला दिमाग़ याने भेजे प्रासाब यानी तन्तुके
ज़रिये पहुंचती है और इच्छा भोजन पानेकी उत्पन्न हो
ती है जिसको सूक कहते हैं। इसी तरह जब खून सकील
माद्दे ज्यादा होजाते हैं और पतल कमतौ उस वक्त जो
साहिश पैदा होती है वह प्यास है जब खूनके सारे जुज़
तन्दुरस्त हालतके मुताबिक होते हैं और शरीरका रुधिर
विलकुल निर्मल होता है उस वक्त अन्न और जलकी
जरूरत नहीं होती और न आलश्य होता है ऐसी हालतों
में जल प्रथ्वी बर्ता करते हैं और रूधिर शुद्ध कहाता है चित्त
सावधान होता है शुद्ध शंकल्पकी प्राप्ती होती है याने
उस समय अच्छे कामोंकी तरफ तबीयत लगी रहती है
और उस समय जो काम किया जाय वह लाभकारी हो
ता है अगर भोजन की इच्छा मेदमें गिना मौजूद होने-
के वक्त पैदाहो या बार बार प्यास लगे या आदमी ज
बरदस्ती बार बार ऐसा करतो बीमारीकी पैदायशकी
जः समझना चाहिये जिस वक्त खाना मेदेखें मौजूद होता
है उस वक्त तक अगर पानी या और कोई पतली वस्तु
ज्यादा मिकदारमें पीजावतो बदहजमी पैदा करेगी

(२१) है जैसे कढाईमें चीज पक रही और करीब तयार होचुकी है जिसको लुगदीकी सूरतमें बनना है फिर श्री गर इस वक्तमें उसके अन्दर पानी वगैरह डालाजावे तो लुगदीवनने में देर लगेगी सोही हाजमेका हाल जानना बरखिलाफ इसके अगर उसमें खाना एकचुका बलके उस मेंसे बाहर निकाल लिया गयाहोतौ पानी डालनेसे क- ढाइ धुल कर साफ होजायगी या उसमें कुछ पदार्थ चिपटा हुआ रहमी गया होगातो वहभी जुदा होजायगा यही हाल मेदेका है। जो श्रादमी मेदेमें गिना हज़म होने के पीछे पा नी पीते हैं वह हमेशा तन्दुरस्त रहते हैं और पचानेकी ता कत उनके मेरेमें सुवाफिक दस्तूर बनी रहती है और जो श्रादमी मेदेमें खाना पच चुकने के पीछे बांये स्वरमें ज ल पीते हैं तो वह बहुतही जल्द खूनमें पचता और उस को बिलकुल साफबना देता है । खूनको मामूली हरारत वा ला और उसके खराब पदार्थ बहाकर गुरदों और पसीनोके रस्ते निकालदेता है। सवाल-कौनसी हालतें हैं जिनमें अादमीको भोजन की ज़रूरत कम होती है या बिलकुल नहीं होती। जवाब-तन्दुरस्त अादमीको जो दुनियादारी के मामू. ली काम करता है और उसके पेशाव पारखाना रोजमर्रा मामू- ली तौरसे खारिज होता रहता है मामूली गिज़ा दरकार है लेकिन जब सब प्रकारके या किसी एक प्रकारके मलके

( २२ )
वारिज होनेमें दिक्कत या कमी वाकै होती है तो आमदनी
याने गिजाकी जरूरत कम होजाती है यह हाल बतोर बी-
मारीके ज़ाहिर होताहै, जो योगी षट्कर्म के जरिये तमाम
बदन के अंदरकी गिलाज़त दूर करते हैं और अक्सर
एकही जगह बैठे रहनेकी आदत रखते हैं । और प्राणा
यायके ज़रिये नाड़ियोंको शुद्ध करते हैं । और रुधिरको
प्राणवायू द्वारा निर्मल करते हैं उनको बहुत कम गिज़ा
दरकार होती है । जब ऐसे आदमी समाधि लगावेतो उनको
कुल अंगकी क्रिया बंद होने की वजहसे बिलकुल गि-
जाकी जरूरत नहीं होगी।
सवाल-अगर कोई भोजन बांये स्वरकेयोगमें करे और
पानीको श्रादि लेकर पतली वस्तु दहिने स्वरमें पीवेतो
क्या नतीजा होगा?
जवाल ----तमाम क्रूर आहार बांयें स्वरमें भोजन किये
हुए सख्त कब्ज और पेटका दर्द पैदा करेंगे क्योंके ऐसी
हालतोंमें सुखतलिफ रस जिनके जरिये अन्न पचता है बहु-
तही कम पैदा होंगे और गिजाको पूरी हरारतभी नहीं
पहुंचेगी बल्के अन्चके वगैर पचे हुऐ जुज़ (बारीक हि-
स्से) जलके जज्ब होनेके वक्त उसके साथ साथ रखून
में शामिल होजायेंगे जिससे खून उस तमाम अजजासे
भारी होजायगा और गाढा होजायगा फिर गुरुदोंको
ज्यादा महनत करनी होगी जिससे इन नये पैदा हुये

अनके अजज़ा ( हिस्सोको कहते हैं ) खूनसे जुदा करना पड़ेगा। और जिस जगह यह पहुचेंगे उसी जगह रोग पैदा करेंगे । विपरीत अाहारसे उतपन्न हुऐ रोग खां- सी स्वास होलदिल प्रांतका रुरुजाना जिगर और तिल्ली का बढ़जाना पैदा करेंगे। ऐसेही बवासीर आदि रोगले सिरका दर्द पैदा होता है । पाण्डुरोग, याने ऐनीमिया और श्रामबाद याने एलव्युमिनोरिया विपरीत भोजनस और सब प्रकारके ज्वरकी जड़ इसी सबबसे होती है । दाहिने स्वरमें जलपीते रहनेसे सबप्रकारके गुरदे- के रोग प्रमेह आदि उत्पन्न होते हैं पथरीका वनना और पेशाबमें रेतका आना पैदा होता है शरीरका रुधिर पेट और हृदयके अदरखाले हिस्से विपरीत आहारसे खराब होजाते हैं। शरीरके बाहर वाले हिस्सोंको शुद्ध रखने के लिये नित्य स्नान करना चा- हिये ताके फुसी आदि रोग न सतावें । ठंडे मुल्कमें रहनेसे और खुली हुई बागीचे या जंगलमें रहनेसे तन्दुरुस्ती बनी रहती है। बदबूदार जगहँ और ग़लीज पानीकी जगह के आस पास रहने से आदमी रोगी और निर्बल होजाता है। तीसरा प्रकर्मा नित्य अभ्यासगति। दिनके समय आंखोंसे और रात्रीमें ध्यानसे नाक- के अगले हिस्से याने ( अग्रभाग ) को देखता रहे इससे (२४) चितकी चंचलता घटजाती है। दिव्यदृष्टी होजाती है। दो. इता आदमी जब कहीं ठहरे और यह ऊपर लिखी तरकीब शुरू करके खड़ा रहजाय अथवा बैठजायतो स्वासकी श्रा- मद रफ्त बहुत जल्द कम होजायगी जिससे दिलको ताक़त और दिमागको आराम मिलेगा। प्राणायामके समय और चलते फिरतेभी ऐसाही अभ्यास रखनेसे श्रम याने थकान दूर होती है अकुटी यानी दोनों भवोंके बीचमें देखते रहनेसे ध्यान और समाधि सिद्ध होते हैं देर तक ऐसा अभ्यास होते रहनेसे यह मालूम होने लग- ता है कि हाथ पांवमेंसे जीव निकलता है। धीरे धीरे शिथिलता होतीऔर गफलत आती है वगैर ग़फ़लत हुऐ अ- नहद शब्द नहीं सुनाई देसक्ता और न मन स्थिर हो सक्ता है। पूरे अभ्यास जिसमें यह दशा शरीरकी हो हमेशा गूरूके सामने याने अपनेसे ज्यादा अभ्यासीके साम- ने करे ( सामनेसे मतलव मौजूद होना) ऊपर वाले अ. भ्याससे दिमाग पूरे तौरसे थकजाता है अनुचित रीति होने से आदमी जन्मभरके लिये अंधा होसक्ता है और कई प्रकारकी पीड़ा उत्पन्न होती है ख़ास कर उस- में जिसने यम नियम और अल्प आहारसे शरीरको नहीं साधन किया और के षटकर्मसे मलको नहीं त्यागा । ग्र- हस्तीको निगाहके जरिये अभ्यास करनेसे ज़रूर कोई बा- धा होजायगी इसलिये उसको नेत्र मूंद कर सिरफ ध्यान करनाही उत्तम है जिससे चित ठैर जाय ! अभ्यासीको (२५) निगाह हह्याने याने विसर्जनके वक्त पहिले चाहियेकि अाकाशको देखे पाच मिनिट पीछे मुंह खोल कर जीम याने ( जिह्वा ) की नोकको देखे बार बार निगाह हटानेसे और इधर उधरकी बातें सोचते रहनेले कभी ध्यान नहीं लगता। नाकके अगले हिस्से पर देखते रहनेके लियेभी वक्त बताते हैं जो अभ्यासी दिन भरनिगह रखते हैं बीच- में बिलकुल नहीं हटातेतो उनके वास्ते कोई खास वक्त बताना ज़रूर नहीं । थोड़ीदेर निगह रखने वालोंको प्रा. तःकाल जल और पृथ्वीतत्व और बांये स्वरके योग- में यह क्रिया करनी चाहिये और अग्नि,वायू,अथवा अकाश- के योगमें कभी नहीं साधै । खास कर जब दाहिने स्वर- में ये तीनमेंसे कोईसा तत्वहो क्योंकि सिवाय जल पृथ्वीतत्वकी हालतके और कभी बुद्धी निश्चल नहीं रहती। नये अभ्यासीको प्रातःकाल एक घड़ी रोज यह क्रिया वायें स्वरमें करना चाहिये फिर धीरे धीरे ज्या. दा देरतक इस प्रकार अभ्यास के बलसे तत्वकी पहिचान और उस पर सामर्थ्य होजायगीके चाहे जितनी देर एकही तत्वको चलावे और उनसे कामले ।

( २६ ) चोथा प्रकर्या प्रार्थना। जब अभ्यास प्रारम्भ करे और समास (याने ख़त्म करना) करे अपने किये हुऐ कामोंको याद करे जैसे महाजनलोग अपना रोज़मरीका हिसाब जांचलेते हैं उनमें से जो अनुचित कर्म कियाहो उप्तके वास्ते ईश्वर ( याने सर्व समर्थ वाला ) से क्षमा चाहे और अन्तःकर्ण से उसकी प्रतिज्ञा करे । जो श्रादमी अपने कार्यके वारते ईश्वरसे प्रार्थना करतो वह जगतव्योहार सम्बन्धी है जबतो कुष्गापक्ष ( अंधेरा पसेवाड़ा) में चर्तुदशी या अमावस्या अथवा शनीश्वर या मंगलवारका और जो ईस्वरसंबन्धी होतो शुक्लपक्ष ( चांदना पख- वाड़ा) में दोज सतमी या पूर्णमासी अथवा वृहस्पतवार या सोमवारको नीचे लिखी युक्तीसे करे । जुगतीध्यान -रात्री के पिछले प्रहरमें उठकर पेशाव पा. खानेकी हाजतसे फारिग होकर स्नान आदिकसे श- रीर शुद्ध कर नासिका और मुंह साफ करके चार चुल्लूसे आठ चुल्लू पानी पीकर कोमल प्रासन (स्वस्तिक) पृथ्वी पर बैठ कर मनोरथका ध्यान कर पालती पालती मार कर कमरको सीधा कर ठोड़ी हृदयसे लगावे सामनेकी तरफ दाहिने हातसे बांये पांवका अँगूठा और बांये हाथसे दाहि- ने पांवका अँगूठा पकड़े दोनो आंख वन्द करे एकान्तमें जहां आवाज़ न हो बैठे सोहंका हृदयकमलमें ध्यान करता ( २७ ) और जीभको तालूमें लगाये रक्खे जिससे थूक पैदा होता रहे पांच घड़ी या इससे कुछ देर पहिले निद्रा आवेगी पर वैसीही तरह बैठा रहे पड़े नहीं तो पिछली अचेत अवस्थामें अपना लाभ दीख पड़ेगा जो प्रकाश या चेष्टा दीखे उसे भूले नहीं । पहले अथवा दूसरे या तीसरे मर्तबामें नि- श्चय मनोरथ सिद्ध होगा या जैसा होना होगा दीखजा- यगा। इसीतरह जब दूसरेके वास्ते प्रार्थना करनी है तो करे । रोगीको कमज़ोरको या बुढ़ापेमें बलहीन- होनेके सबब जुगती अनुसार बैठने की सामर्थ्य न होतो मृतक आसनसे बिलकुल चित्त पड़ा रहे हाथ पांव सीधे करके जैसे मुरदा पड़ा रहता है सोहंका उसी प्रकार ध्या- न करता हुआ लेटा रहे शुरू शुरूमें अभ्यासी दीवारका स. हारा ललतो नुकसान नहीं क्योंके परिश्रमसे बदन न थकने पावै। सवाल-क्या वजह है के इस किस्म (प्रकार) के ध्यान- से अपना मतलब स्वप्न अवस्था पैदा होनेसे दीखेगा जिसको होनहार कहते हैं। जवाब-यह अमल कुदरती है आदमीकी सब इच्छा- यानी खयालातकी ताक़त जब सिमट कर एकही जगह कुछ देरके लिये कायम रहती है जैसे सूर्य की किरण आतशी शीशे में तो वह अति प्रबल होकर अपने असली स्वभावको अासानीसे बर्तनेमें समर्थ है इसीतरह जब (२८) सारे खयालात सिमट जाते हैं तो असली मुकाम पर याने रुह (श्रात्मा) के भंडारकी जगह और जोतिमें प्रवेश क रते हैं फिर वहां पूरे व जसे असर करते हैं और इस अव- स्थाका प्रकट होना शुद्ध हृदय होनेसे होता है दिमागके चोथे वतनको जिसको अंगरेजीमें फोर्थवेनट्रीकल (fourth ventricle.) कहते हैं कुल रचनाका भंडार समझा गया है इसको चोथा पद या निर्वाण या सायुज्य मुक्तिदार याने मोक्ष कपाट कहते हैं रुह याने (आत्मा) शरीरसे भिन्न पदार्थ नहीं है सिर्फ एक जौहर इस शरीरका मानना । जैसे शीशेमें आबदारी या उसमें दीख- नेकी तासीर होना यहीहाल शरीर और यात्माकाजानना सवाल-शुद्ध हृदय या शुद्ध संकल्पसे क्या मुराद है कब प्रकट होताहै। जवाव-कायदा है जब रुधिरमें अनेक धातु या नमकके जुज़ ज्यादा होते हैं तो वह खूनमें गरमी पैदा करते हैं और उसवक्त में अग्नितत्व बनता है । और जब मारे शरीरमें खूनका संचार अन्नसे पैदा हुये पदार्थोंको फैला चुकताहै और जगहॅजगहँसे मैलाहुअा रुधिर सिमट कर वा- पिस हृदयमें पाता है जिसके पीछे फेफड़ेमें साफ होने के वास्ते आता है जितना देर रुधिरमें यह मैलापन ज्यादा रहता है और खून में कारखोनिकऐसिड गैस ज्यादा भाग- में रहता है उतनी देर आकाशतत्व वर्तता है इसीतरह तमाम पदार्थ अन्न (भोजन) से नये पैदा होकर खूनके ( 8 ) जुज बनते हैं वह खूनमें नाइट्रोजनके मुरकिवात ( कई चीज मिलकर एक नया पदार्थ मिली हुई तासार वाला ब- नना) ज्यादा मिकदारमें बढ़जाते हैं सो इनके ज्यादा होनेसे वायुतत्व वर्तता है लेकिन जब जलके पीनेसे रुधिरमेंसे बहुतसे गलीज़ माद्दे खूनमें घुलकर गुरदेके रस्ते निक- ल जाते है उस वक्त साधिर मैला न होनेसे साधारण प्रकृति वाला होजाता है उस समय जल और प्रथ्वीतत्व वर्तते हैं । जब रुधिर शुद्ध होतो उस समय चितकी बत्तियां भी अच्छी होती हैं यहतो अस्लियत बताई अब ध्यानमें जबकि ऐसी हालत खूनकी हो और सब तरफसे तबी. यत हट कर एक जगह लगजाय फिर कोई वजह नहीं है के शुद्ध हृदय न कहा जाय । अगर कोई आदमी हमेशा सि वाय गायके दूधके और गिजा न खाय और पानीके नाम- से गंगाजल जो मैला नहो पिया करै वह बहुतसी बी- मारियों और जुदे जुदे प्रकारके भोजनसे उत्पन्न हुये स्व- भावको नहीं भोगेगा ऐसे आदमीकी प्रकृति उत्तम होजा- यगी और योग साधने लायक वनजायगी इसमें शक नहीं. के श्रादमीकी प्रकृति याने स्वभावका दारोमदार भोज- न और जलपान वगैरह परही है इसके अलावा मुख्तलिफ व्यवहार पर समझना याने जैसी सोहबत होगी वैसा अ. सर स्वभावको पलट देगा। पांचवां प्रकर्ण जीवका वर्णन । शरीर संबन्धी पदार्थ जिनका वजूद सृष्टीमें है जी.

(३०) वधारी याने जानदार कहाते हैं। उत्पत्तीसे जिन्दगीके फेल ( काय ) शरू करने वाली ताकत जो हर जानदार चर अचरमें मोजूद है मुराद है। उत्पत्तीका कारण प्रमाणा है याने प्रणव । प्रमागासे मतलब वह सू- क्ष्म देह याने जरी है । जिसके हिस्से नहीं होसक्ते जैसे बृक्षमें बीज प्रमाणके इकडे होजानेले पांच तत्व में से हरएककी देही। प्रथवी सूर्य आदि लोक चर अचर पदार्थ बन गये । प्रमाणमें जो ग्यान है याने हरकत करनेका मादा (खासियत)अथवा उसको इच्छा कहो वह है। संकलपित नाम है। नरदेहीमें तजुरबा करनेले मालुम हुआके इस प्रमाणा- ले एसा उच्चारण होता है जो शब्द अं से मुताविक है। जीब शरीरमें प्रकाश रूपसे व्याप्त है । प्रकृतिसे महत्तत्व- की पैदायश है याने जिससे पांचों तत्व बने । महत्तत्व की उत्पत्ति एक अनादि वस्तुसे है जिसमें यह लय रहता है । वह देह ज्योतिस्वरूप जिसमे यह रहता है ईश्वर मानना । इस मोके पर यह साबित होता है के सृष्टीकी उतपत्ती ईश्वरकी देहसे है । इसलिये सृष्टीकाभी क- भी नाश नहीं होता। जबतक आकाशादितत्वका देह प्रकट है । सृष्टीभी प्रकट है जब यह तत्व लय होजाते हैं तब प्रकृति जो जीबकोटीमें वर्णन है वहभी नजर नहीं पाती । जैसा महाप्रलय समयमें। जितने प्रमाणू से यह पांच तत्वकी देहजो दो किस्मकी है। याने सू. क्ष्म और स्थूल बनी है उनमें से हरएक प्रमाणू कती है।

(३१) याने इच्छा रूप है। यह पहलेही सिद्ध करदिया है के प्रमाणामें इच्छा याने रयान मौजूद है। इच्छाको कर्म कहते हैं इसलिये उत्पत्ती कर्मसे समझनी । कर्मका नाश नही क्योंके उत्पत्ती याने सृष्टीकामी नाश नहीं इसलिये सृष्टी और कर्म साथ बनेरहते हैं। अनेक किस्म के प्रमाणूमे अनेक देह याने ब्रह्माण्डकी रचना है । पांच तत्व जो इस पृथ्वी पर चर अचरको उत्पन्न करता है उ. नसे तीन गुण पैदा होते हैं । जुदे २ गुण हरएकमें प्रकट हैं या- ने सत्व रज तम । हरएक तत्व के लक्षणको प्रकृति कहते हैं याने उसका स्वभाव और गुण । अनेक देहमें जो भिन्न प्रकृति भासती यान दिखाई देती है वह तयों के प्रमाणुओके कमती वेशी और उनकी साफ या मलीन- ताका बायस है। सवाल-कितने प्रकारको उत्पत्ति है, कहा कहाँ है, कि तने ब्रह्माण्ड हैं. जीवस्या है, कर्म क्या है, ईश्वर क्या है ? जवाब-उत्पत्ति सब ब्रह्माण्ड में है ब्रह्माण्डकी संख्या मा. लुम नहीं । सूर्यको आदि लेकर जितने सूक्ष्मसे सूक्ष्म तारागण दुरवीनसे दिखाई देते हैं वह सब चैतन्य हैं और ब्रह्माण्ड हैं, और सृष्टीमें गिने जाते हैं, इससेभी परे कुछ हो उसकी मालुम नहीं । इस पृथ्वी पर शास्त्र अनुकूल चौरासीलाख प्रकारके जीव वर्णन कीये हैं उनमें सब- से श्रेष्ट मनुष्य हैं जो इश्वरकी रचना समझनेका ज्यान ( ३२) रखता है। प्रकृति याने जीव चैतन्यके श्राश्रय है याने ईश्वरके आश्रय है परन्तु प्रकृतिका कायम रहना वगैर कर्मके असंभव है इसलिये कर्मही मुख्य माना गया बल्के इसको उत्पत्तिकी जड़ समझना उत्तम ग्यान है। इस सारी सृष्टीमें कर्ता सब जगहँ व्यापक है जैसे सूर्यको किरण- की ज्योति । इसलिये ईश्वर याने कतारकोभी जोक सूर्य- की तरह ज्योतिका भंडार है ज्योतिस्वरूप या सर्व व्यापक जानना ? छठा प्रकर्णा बन्धन और मोक्ष । दर असल यह दोनो कोई बात नहीं जो उत्पन्न हु- श्रा है वह निश्चय नाशमान है । बन्धन एक तरहकी कल्पना है जिसको वांछा याने (ख्वाहिश) कहते हैं यह सब चर अचर वस्तुमें स्वयं याने कुदरती पाई जाती है। जिन पदार्थोंको बुद्धिमान् लोगोंने जड़ लिखा है उन मेंभी यह प्रकृति ख्वाहिशकी मोजूद है । जिस हालत- में यह तासीर स्वयं है फिर बदलभी नहीं सक्ती। सिर्फ इच्छाही है जो तरह २ की शकलोंमें तबदीलीका कारण है याने आदि शब्दकी ( शब्द याने ब्रह्म ) तरह तरहकी सूरतें दिखाई देती हैं । सूरतमें तबदीली होजाना आवा- गमन कहलाता है। यह क्रिया बन्द होजाना और अस- ली सूरत फिर बनजाना मोक्ष है । साधन मोक्षका कारण है ! पृथ्वी गाने मृत्युलोको साधनका ज्यान (क्रिया- है भेद समझ लेना) सिर्फ मनुष्यमही है । तबदीली शकल. में जीव यकता रहता है जैसे असली सोना अग्नि के ज- रिये तपायमान होता हुआ अब वास्तुका संगम पाकर मिट्टी या मलहोजाता है फिर निहायत मुश्किलले मिली हुई वस्तु मे अनेक क्रियाओंके जरिये जुदा करके असली शकलमें दिखलाना पड़ता है नहींतो तासीरमें शकल. में बिलकुल विरुद्ध होजाता है। इसी तरह सत्संग आदि कि- यानों से असली सूरत में जर्स याने प्रमाणा फिर आस- ता है ( जसे मतलब नरदेही है ) और कुसंगसे बरक्स याने उलटा स्वभाव पकड़ता है जिसको कुमति कहते हैं। देवशास्त्र श्रादि अनेक पत मुक्तिका रस्ता बताते हैं । दर असल मुक्तिकी ख्वाहिशभी असली प्रमागाकी तासीर है जो शरीरमें स्वयं प्रकट है । तमाम धर्म जो दु- नियामें फैले हुए हैं बह सब एकही बात कहते हैं । फरक यह है के अनेक प्रकारके खान, पान, व्यवहार, और बुद्धिकी निर्बलताले समझनेमें धोका होजाता है । सब मतोंका सार दिखाते हैं । सत्य बोलना ईश्वरको एक और सब जगतका की जानना उसका प्रकाश सब जीवमें माननां । पुरुषार्थी मनुष्य और पशुकी कदर क- रना (पुरुषार्थीमें अवतार और पैगंबर शामिल हैं)। और भी बहुतसे पुरुष ऐसे हुये हैं जो दर असल मरे नहीं क्यों के उनके काम अाज तक दुनियाँको फायदा पहुं चा रहे हैं और पहुंचाते रहेंगे । अपनी बुद्धिसे सबको फायदा पहुंचाना और अपनी अक्कल ( याने समझ) को तमाम प्रकारकी सृष्टीके उपदेशसे भरना । श्राहार जी शरीरका निर्वाह करने वाला बुद्धि और बलको बढाने वालाहो प्रहमा करना जिससे शरीर निरोग रहै शक्ति अ. मुसार महनत करना । देखो बालक पेट्में हरकत करता रहता है जिससे साबित होताहैके महनत करना श्रा- दमीकी तासीर है । जरा निवारण करनेके वास्ते कसरत प्रादि करना। मोत टालनेको हठयोग क्रिया साधन का रना । व्याधि निवारणाको वैद्यक पढ़ना और समझना । त. जुरबा हासिल करनेको देशान्तर गमन करना। जिसको यात्रा कहते हैं। बुद्धि बढ़ानेको शास्त्र आदिका पठन करना । यह सन धर्मों के नियम हुये बन्धन नाम क्लेश का है जो ऊपर लिखे धर्म अनुसार नहीं चलती बन्धन ही है। नहीं तो मोक्षका दरजा जिसकी क्षमा और निर- ता कहते हैं प्राप्त होगा। मतलब यहहैके तृष्णा बन्धन है और सन्तोष याने इच्छा का लोप (याने बहुत ही क- मती होजाना) मोक्ष है। हट्यरमीसे मूर्तिकापूजना या पूजन को छोड़देना तरह तरह के भेष और पन्थ में होना या तरह तरहके व्यवहार बदलना । या पान बड़ाईके वास्ते कष्ट सहना मुक्तिके साधन नहीं हैं । सिर्फ वह साधन जिस- से ईश्वर याने सब जगतकै कारमें लो (याने अारूढता होना) लगकर जगत् की आशा छूटजावै मुख्य बात है और इसीका नाम मोक्ष है।

(३५) सातवां प्रकर्गा नाड़ीवर्गान । जैसे पृथ्वीपर जगह जगह जलकी नदियाँ बहती हैं इसी प्रकार शरीरमें नाड़ियां लाधरको बहाती हैं । यह व्यवस्था याने हालत आंखोंसे देखना जरूरी बात है। जिसके बगैर इनका फैलाव और जरूरियातका समझना मुश्किल है। नाड़ियों को उर्दूमें शिरयान फारसीमें रंग और अंग्रेजी में प्राट्रो कहते हैं मतलब इड़ासे बांये अंग- की सारी नाड़ियां हैं । इसी तरह पिङ्गलासे दाहिने अंग की सारी नाड़ियां । इडा नाड़ियां बांये हाथमें शिर और परदन और पीठ और पेट छातीके बांये हिस्सेमे इसीत. रह बांये गोड़ा जांघमें फैलती हैं। नांकके बाईं तरफ गुदा और लिंग अण्डकोष वाभग और गर्भाशय वा मूत्राशय(याने मसा ना)के वांये हिस्से में फैलती हैं। ऊपर लिखे मुताबिक पिंगला नाड़ियां शरीरके सारे दाहिने अंगों में फैलती हैं बुद्धिसे अनुमान करलेना । सुषुम्ना नाड़ी शरीरके मध्यमें मेक- दण्डके सामने मेरुदण्डसे लगी हुई है नाभिसे कण्ठ प- यन्त है अंग्रेजीमें इसको अभास्टा कहते हैं योगीकी पूंगीकी तरह आकार है । जिसके बीचमें दिल लटकता है। जैसे पूंगीका बीचका उभरा हुअा हिस्सा होता है । यह नाड़ी शरीरको सब नाड़ियोंसे ज्यादा मोटी और सब नाड़ियोंकी जड़ है सबसे श्रेष्ट है । इसमें खून ज्या- दा मिकदारमें रहता है। योगशास्त्र में बहत्तर हजार आठ सो चौसठ ७२८६१ नाड़ी प्रमाण लिखी हैं । गंगासे The मतलब शिरगाने जिनमें साफ और सुर्ख खून रहता है और पक्के के साथ बहता है। यमुनासे मतलब व- रहें हैं जो शिरयानोंकी तरह सारे शरीरमें व्याप्त हैं और शिस्यानोंके हमराह याने साथ साथ रहती हैं इनमें स्या- ह रंगका मैला रुधिर रहता है । और परनालेके पानी- की तरह मंद मंद बहता । सरस्वतीसे मतलब क. पिल्लरीज़ हैं याने शिरयानों और वरीदोंके बीचकी ना- लियां हैं। इनमें श्राकर्षणशक्ति बहुतही ज्यादा है बालके वरावर तक सुनाईमें हैं इनहीके जरिये सारा रुधिर शरीरका सिमटकर वरीदोंमें पहुंचता है। तीसरे प्रकार लिंफकी नालियां हैं जो रुधिरकी नालियोंकी तरह सारे शरीरमें फैलती हैं । चोथै प्रकार कायलकी नालियां हैं जो सिर्फ उदरमें पाई जाती हैं। लिंफ अ- सलमें छना हुश्रा खून है जिसकी नालियां बहुत बारी- क हैं और अन्नसे बने हुये रसोंको समेट कर खूनमें शामिल करती हैं। कायल और लिंफैटिक (लिंफकी ना लियां) और वरीदोंका यह काम हैके सब प्रकार जो कु- छ कारवाई रुधिरमें हुई है और जिससे रुधिरमें विकार पैदा हुआ है और रूधिर मैला होगया है या जो रुधिर कायल ( अन्नकारस ) से अब नया बना है वह सब दिलके दाहिने हिस्सेमें पहुंचा दे जिस हिस्सेको यमुना का होज़ याने निकास की जगह कहना चाहिये । दिलके बांयें हिस्से में साफ रखून रहता है इसको गंगाका होज़ (३७) थाने निकासकी जगहँ कहना चाहिये यह सारी क्रिया हृदय कमलके श्राश्रय है इसको अनहद चक्र कहते हैं येही सोहं शब्दका भण्डार है। प्राणवायु याने ओक्सी. जन् नासिकाके द्वारा होकर दोनो फेफड़ोंमें पहुंच कर रुधिरको साफ करती और उसमें मिलकर रहती है। प्राणवायु जीवका आधार है । और जैसे तमाम नाड़ियों में सुषुम्ना श्रेष्ट बताई वैसेही प्राणवायुभी दशों प्रकारकी वायुओंमें मुख्य और श्रेष्टहै । शिरयानोके ज़रिये खून दिलसे निकलकर सारे शरीरमें फैलता है। और वरीदों और लिंफकी नालियोंके द्वारा तमाम शरीरका मैला खून दिलके दाहिने हिस्सेमें श्राजाता है । पीछे यहांसे नाड़ियों के द्वारा फेफड़े में जाकर प्राणवायुसे संगम पाकर साफ होता है। और यह साफ हुआ खून नाड़ियों में दौरा करने के वास्ते दिलके बांये हिस्समें श्राजाता है जहां- से पहिले रवाना हुअाथा । पूरक समय तमाम नाड़ियां शरीरकी प्राणवायुको ग्रहण करती है और रेचक सम य सारा मैल खूनका फेफड़ोंके द्वारा याने स्वासके रस्ते शरीरसे बाहर निकल जाता है ।दिलके सुकड़ने से सो और फैलनेसे हं का शब्द निकलता है इसीतरहपूरक- से सो और रेचक समय हं का शब्द स्वासमें होता है इसको अजपा जाप कहते हैं यह शब्द केवल कुंभको बहुतही वारीक और निहायतही मुहावना होजाता है। जिस अवस्था में योगीराज ध्यान में लयं होजाते हैं । दि है (३६) लके सुकड़नेके वक्त बरीदोंके द्वारा शरीरका रुधिर दिलके दाहिने तरफ वापिस पाता है । कुल नाड़ियां जो हृदय कमल के ऊपर के हिस्सों में बहती हैं उनमें रुधिरका संचार ऊर्ध्वमुख याने खूनकी धार ऊपरको जाती है और दिल के नीचे वाले हिस्सों याने अंगोमें संचार अधोमुख याने धारा नीचेको है। वरीदों और लिंफकी नालियों में शिरायानोंके वरखिलाफ है। याने दिलसे नी. चे वाले हिस्सेमें नीचेसे ऊपरको और दिलसे ऊपर बाले हिस्से में ऊपर नीचे । जब बालक पेटमें होता है तो नाभिके ऊपरके हिस्सों में संचार रुधिरका नीचे को और उसके नीचे वाले हिस्सोंमें संचार उपरको होता है । वजह यहहैके उसका ताल्लुक नाल और जेर- से होता है । और उलटा होनेका सबब यहहैके गर्भ में बालकका सिर नीचेको और पांच ऊपरको होते हैं। पेट अपानवायुका स्थान है और छाती प्राणवायुका । जब प्राणायाममें छाती स्थान प्राणवायुसे भरजाती है और अपान जो षट्कर्म के जरिये शुद्ध करलिया जाता है (याने म. लरहित हो जाता है तो तीनो बन्ध और खेचरीके जरि- ये समाधि लगेगी जिसका बयान हठयोगमें वर्णन होगा। पेटमें जब तक बालक रहता है वह स्वास नहीं लेता और न उसके पेशाब पाखाना बनता है न वह कुछ खाता है सिर्फ प्राणावायुके आश्रय जीता और बढ़ता रहता है सि. म जिगरमें पित्त बनता है जो प्रांतमें जमा होता है।

(३६) और पैदायशके वक्त के पीछे खारिज होता है जिसको लोग दस्त (पाखानां) कहते हैं । गर्भके पहले ४॥ सा. ढ़े च्यार महीने भीतर बालकका दिल भी हरकत नहीं करता है न रुधिरका दौरा नाड़ियोंमें होता है और न बालक पेटमे फिरता है। योगी इस अवस्थाको ग्रहण करेगा जो हमने ऊपर ४॥ साढेच्यार महीने की अंदर वाली दशा लिखी है याने उसकी देहके सारे काम मिट- जायँगे सिर्फ प्राणवायु सिमट कर दिमागके हिस्सों याने जरों में शामिल हो रहैगा यह हरक्रियाका सिद्धान्त वर्णन किया है। नाल दो शिरयान और एक बरीदके मिलने से बनता है इसकी लंबाई एक हाथ या सवाहाथ होती है और इसके जरिये बच्चेकी परवरिश होती है । नाल एक तरफ बच्चे की नाभिमें लगा रहता है याने नाल वाली नाड़ियां बच्चे के शरीरके भीतर पहुंच कर इडा पिंगलामें जाकर खुलती हैं। नाल दूसरी तरफ जेर याने पिलासेण्टासे लगा हुआ है जिसमें फेफड़ेकी तरह बेशुमार बारीक सूराख हे जेर गर्भाशयके (यूटरस याने रहम ) अन्दर वाली दीवारसे लगी रहती है और गर्भाशयकी बारीक नाड़ियों के मुंह इस जेरमें खुलते हैं सो इस प्रकार माताकी प्राणवायुसे बच्चेका पोषण होता है।

(४०) आठवां प्रकर्ण तत्वदर्शन नाम तत्व तादाद अंगुन बज़न १ प्रम.गा हिन्दी अंग्रेजी रेचक में का आकाश ईथर मालुम नहीं मालुम नहीं वायु नाइट्रोजन ८ अंगुल १.४ चौदह अग्नि औकसी न ४ अगुल १६ सोलह हाइडरीजन १६ अंगुल २ एक पृथ्वी कारवन १२ अंगुल १.२ बारह बहुतसे आदमियोंका यह खयाल है के श्राकाश- तत्व दर असल कोई नया तत्व नहीं है। च्यारों तत्व के मिलापले यह नई वस्तु दीखती है इस्ल किस्मका खयाल मुसलमानोंमें आज तक जारी है । तत्वको फारसीमें उ. नसर और अंग्रेजीमें ऐलीमेण्ट कहते हैं । इस जगहँ हम आकाशतत्वको सिद्ध करते हैं। जब किसी चीजको ह. गरत देते हैं तो अक्सर हिस्सा उसका हवामें उड़जाता है । कुछ नीचे बचा हुआ वाकी रहजाता है अगर फिर भी आग पहुंचाते रहैं तोभी शेष जरूर रहता है । चाहे इतना कमती होके उस वस्तुमें मिल जावे जिसमें यह पदार्थ गरम किया गया है । इसीको अाकाश याने शुन्य या उस वस्तुका पैल याने उड़ने वाला माद्दा कहते हैं । जो उड़ने वाली चीजसे भिन्न प्रकृति वाला है। बिजली जो ( ४१ ) बादल में पैदा होती है वह औक्सीजन और हाइड्रोजन- क मिलनेसे पैदा होती है । इसी तरह शरीरमें भी कान्तिजल और अग्निके प्रमाणुओंपर समझना । इनके विशेष मागा होने से विशेष् कान्ति रहती है। धरतीके चौगिर्द वाली हवाका प्रमाणा जलके प्रमाणु से भारी है और इसी सबबसे हमेशा सूर्य की किरणद्वारा पानी भाप बनकर हवाक ऊपर उड़ता है । हवाके प्रमाणका वजन ५८८ है और पानीके प्रमाणाका ३४ है । बेशक समुद्र घरतीके ऊपर है और ना जलसे ऊपर जिसका स. बव यह है के हवा ज़मीनकी गर्दिश याने उसके च- कसे पैदा होती है। और पानी ज़मीनकी गरदिश लगा- तार होते रहने के सबब । और कि धरतीमें अाकर्षणशक्ति होने के सबब पृथ्वीपरसे नहीं गिरसक्ता है न अपनी ज- गहँसे हटसक्ता है जैसे भरा हुआ पानीका लोटा चक्कर- की हालतमें पानीको नहीं गिराता । जैसे पृथ्वी पर ज. ल पृथ्वीको आकर्षण शक्तिसे कायम है तैसेही पृथ्वी सूर्यकी अाकर्षणशक्ति से मुकरि जगह पर चक्कर खाती है । धू- श्रां या भाप जितने पानीसे तयार होती है उतनीही मिक़दारसे भाप असली पानीकी जगहके मुक़ाबिल सतरहसो १७०० गुना जगह रोकती है सबसे भारी श्राका- शतत्वका प्रमाणु है। और सबसे हलका जलतत्वका येही सबब है के रेचक समय फेफड़े हलकी चीजके दूर फैकसक्ते हैं और भारी चीजको बहुत कम दूर सबसे ज्यादा दूर ( ४२ ) याने अाकाशतत्व नाकके कुछ दूर नहीं जाता अन्दरही अंदर रहजाता है और जल हलका होनेके कारण से रेचक समय निकलता है । सुषुम्ना स्वर और आकाशतत्व सिर्फ परलोक कार्य याने परमात्माके स्मर्ण के लिये रखे गए हैं । सुषुम्ना स्वर शरीरमें इसतरह प्रकट है जैसे दिन और रात सूर्य और चन्द्रके निकलने छिपने पर माने गये हैं । हमेशा सुषुम्ना स्वर सूर्य और च- न्द्रस्वरके बदलने पर प्रकट होता है अगर कोई आदमी सुषुम्ना स्वर और आकाशतत्वके योगमें लौकिक काम करेगा वह कार्य सदा निष्फलं है बल्के हानि करता है ऐसा मनुष्य उस पशुके समान समझना जो सर्वदा दिनमें सोवे और रात में जागे याने बुद्धिहीन और मलीन । तमाम शुभ और स्थिरकार्य को जल और पृथ्वीतत्व अच्छे हैं और चर और क्रूर कार्यके वास्ते अग्नि और वायु माने गये हैं जैसे पेशाब पाखाने जाना या भोजन और जल ग्रहण करना । इसी तरह चन्द्रस्वर सौम्य कामके वा- स्तै और. सूर्यस्वर क्रूर कामको जानना । जो आदमी हमे. शा बांये स्वरके योगमें पेशाब करते हैं और बांये स्वरमें ही पानी पीते हैं वह अपनी जिन्दगी भरमें पथरी धातु- तीण आदि रोग. इसीतरहसे दाहिने स्वरमें भोजन पाने वाले और उसी स्वरके योगमें पाखाना फिरते हैं वह त. पाम रोग जिगर तिल्ली आदि अथवा बबासीर नहीं भोगेंगे यह निश्चय है । रोग होते समय ऊपर लिखे साधनसे ( ४३ ) रोग निवारण होजायगा । दुनियामें सारे रोजमर्राके काम पूरकमें प्रारंभ करै । रेचक में प्रारंभ किया हुआ बुद्धि और बलको घटाकर कामको विगाड़ने वाला है । जो आदमी प्राणायाममें रेचक जल्दी करता है उसका प्राणायाम नि. फल बल्के रोगका उत्पन्न करने वाला है इसीको वि. परीत प्राणायाम कहते हैं ऐसे प्राणायामसे उत्पन्न हुये रोगोंकी संख्या बताते हैं। तमाम प्रकार के प्रमेह हौलदिल गठियाका रोग , जलन्धर , गुर्दे की बीमारी , और दम और खांसी और दिलका लटकजाना। जब दिल कोड़ीकी हड्डीके नीचे तक लटकाता है उस वक्तमें स्वांस विप- रति होजाता है। याने दाहिनी करवट लेने से दाहिना स्वर और बांई करवट लेनेसे हमेशा बांया स्वर रहता है। ऐसा आदमी हठयोग क्रियाके साधनमें अशक्त है। प्राणायाम में सार और मुख्य बात यह हैके रेचक धीरे धीरे बहुतही देर तक करता रहै यहां तकके विशेष सामय रेचककी न रहै। इसी तरह पूरक आहिस्ते श्राहिस्ते देरतक करै । रेचक- की वायु ऐसी शनै शनै बाहिर श्रावके नाकके बाहर मालुम न दे रेचक मुंहसे कभी न करै । अलबत्ता शीतकालमें जुकाम और खांसीकी हालतमें वा पेटके आफरनेकी हालतमें या पेटमें हवा वन्द होजानेकी हालतमें या उदर में दरद चल नेकी हालतमें श्रादमी लगातार मृहसे

( ४४ )
ही पूरक और रेचक करता रहे बाचौ से न स्वासले न
छोड़े तो इस्त क्रिया रोग दूर होता है। एक मरतबामें
दो मिन्टसे ज्यादा न होने पावै । बल्के एकही मिन्ट
बहुत है दिनभर में तीन मरतबासे ज्यादा यह क्रिया न करै ।
नवां प्रकर्ण तत्वकी पहचान ।
अभ्यास रीति पहले तीसरे प्रकर्ण में लिख पाये हैं।
तत्व देखानेके वक्त हमेशा यह ख्याल रहैके रेचक मामू-
ली होना चाहिये न तो जोरसे हवा निकाले न हलकी
शीत से । जो सर्वदा स्वयं पाती है वैसे ही पानेदे । सिर्फ
वायुपे ध्यान रक्खे । रेचक जोरसे करने पर असली बात
नहीं दीखेगी । चलते फिरते पाखाना पेशाव करते बातें
करते समय या कसरत करने या मोगकरने या खाने पीने-
के वक्त स्वरमें तत्व नहीं पहचान पड़ेगा। तत्वदर्शनके
वास्ते जरूरी बात यह है के दो चार घड़ी हररोज सबेरेके
वक्त एकान्तमें बैठ कर देखा करे और उसका अनुमान
और लक्षण अपनी देही बिचारता रहै जैसे श्रालस्य
आदि चित्तकी वृत्तियोंको तत्वसे मिलान करना याने
तत्व के अनुकूल चित्त के स्फुरनको पहछानना ।
जलतल नीचेको बहता है और उसकी आवाज अभ्यासी
को अच्छी तरह सुनाई देती है बल्के पासके वैठे आदमियों
को अावाज ऐसे स्वरकी अच्छीतरह सुनाई देती है। नाक
से सोलह अंगुल तक बाहर पाती है।

( ४५ ) ghe नाभि पोर उदरका हिस्सा अच्छीतरह हरकत करता है । बल्के तत्वदर्शी दूसरेका फौरन् पहचान करसक्ता है । यह अनुमान बुद्धि करलेती है। जल और पृथ्वीमें आपस में फरक बताना बहुतही कठिन है। मुइत बाद अभ्यास होनेसे तमीज होलक्ती । कोई आदमी अपने मुख- के सामने शीशा रखकर उस पर स्वास छोड़ कर अक्ससे अनुमान करते हैं। खास कर जाड़े के दिनोमें जबके पानी के अवखरात आपकी सूरतमें होनेसे वा एकदम ठंडा होकर शीशेपै जमजानेसे जुदा जुदा आकार वाले दी- खपड़ते हैं। यह पहचान कभी भरोसे के लायक नहीं है । जल के प्रभागाका श्राकार गोल और ठोस होता है। पृ. थ्वीके प्रमाणका चोकोर अग्निका त्रिकोण। वायुकालंबा तिरछा । श्राकाशका गोल पोला । रिनका रंग लाल । जल का सफेद । वायुका हरा । पृथ्वीका पीला। आकाश. का काला । जलतत्वके चलते समय बुद्धिमें शान्ति होती है परमात्माके स्मरण और नेक काम करने की सूझती है । मधुर और सुगन्धदार वस्तु पर रुचि होती । येही हाल पृथ्वीतत्वका समझना। वायुतत्वके यो. गमें शरीरकी यह चेष्टा होती है के कुछ कार्य प्रारंभ कर कसरत आदि महनत करै । बदनका कोई हिस्सा अपने आप हरकत करने लगता है। जैसे अक्सर आदमी बैठी हुई हालतमें भी हाथ पांव हलाते रहते हैं । और उन को इस कारवाईका खयाल तकभी नहीं होता । गुस्सा है हैं ( ४६ ) थाने कोष इसी हालतमें आता है । काम करनेके वास्ते उमंग उपजती है । परन्तु नतीजा सोचनेकी याने बुद्धि- विचार उस हालतमें पैदा नहीं होता। खट्टी चीजपर या हांसी मज़ाक पर तबियत रहती है । अपघात हमेशा इसी तत्वमें होता है । याद कियाहुअाभी खयालसे जाता रहता है । अगर किसीसे बहस होजायतो हार होजाती है । और शर्मिन्दा होना पड़ता है । वायुतत्व नीचको नहीं है। तिरछा बाहरकी तरफ जाता है । हवा नाकसे पूरे बेगसे निकलती हुइ दीखती है । अग्नितत्वमें चित्तमें आलस्य जम्हाई और सोनेकी तरफ रूचि होगी । पेटभारी और आंखोंमें सुरखी होगी और बदनमें अंगडाई होगी और गरम मालुम होगा नजमें तेज़ी होगी मुख खुश्क होगा चित्तमें मलीनता होगी याने सोच फिकर होगा सोचनेकी ताक़त कम होगी कोई नई तदबीर किसी बड़े मामलेकी या लंबीतजवीजें इस हालतमें सोचना मुश्किल है ईश्वर स्मर- ण में चित्त नहीं लगेगा भूख प्यास होगी। नमक मिरच प्रा- दि मसालेदार चीजों पर तबियत चलैगी गुफ्तगू और तेज आवाजसे नफरत होगी लेकिन इस हालतमें तवियत हमेशा उठबैठनेको याचलदेनेको चाहती है। सारे मनुष्य और पशु इसी तत्व के जोगमें एक जगहसे उठ कर दूसरी जगह चला फिरा करते हैं। और श्रम पाकर आकाश या सुषुम्नामें बैठते हैं । इसी सूर्खतासे थोडा लाम और परिश्रम ज्यादा होता हैं । जब कभी अभ्यासके बलसे या इत्तफाक

(४७)
से कोई यादमी जल पृथ्वीतत्वमे गमन करते हैं तो
वह गत्रा हमेशा सफल होती है । जल पृथ्वीतत्वमें
हमेशा एक जगहँ नैठे रहने को तवीयत चाहती है । बुद्धि
एकही तरफ़ लगी रहती है। अपने श्राप नई नई बातें सूझती
जिनका नतीजा हमेशा अच्छा होता है । अग्नितत्व
स्वरखें बहुत अच्छतिरह मालुम होताहै। नाकमें खुश्की होती
है और गरम हवा निकलती है। आकाश और अग्निमें
पहचानना वाज़ दफ़ा मुश्किल होता है । सिर्फ इसमे यह
वात जरी है के धीरजसे देखेतो पता लगेगाके कोई
एक स्वर चलरहा है दोनो नहीं। अाकाशकी हालतमें दोनो
स्वर चलते हैं लेकिन हवा नाकके नथनोसे बाहर नहीं
लिकलती परन्तु जिस तरफके स्वर पर ध्यान छोगे वही
कुछ अधिकवल वाला पालुम देने लगेगा। थोड़ी देस्तक
ध्यान रखते ग्न्नेसे दोनो चलते हुये फिर दिखाई देंगे । जो
आदमी सर्वदा अभ्यासमें रहता है वह यहभी बता देगा
के आकाशतत्व कोनसे स्वरमें है । साधारण गति जानने
की यह है के जज स्वरमें आकाशतत्व होतो ऐसा विचा-
स्तही थातो बैठजाय या बिलकुल सीधा खडा रहै बदन
हलन नदे जब कोई एक स्वर अधिक बलवाला हो दूसरा
कमजोर होने लगेतो पूरी निगह रक्खै येही वक्त सुषुम्ना
का है जो आधीमिनट तक रह कर स्वर पलट देता है।
ऐ। पलटाव होने में अाकाशका आपही निर्णय होजा
यगाके पहले कौनसे स्वरमें था जोलोग जुदी जुदी तरकी

(४८) से स्वरको पलटने हैं उनको हमेशा दिल और फेफड़े की क- मजोरी होजाती है अगर स्वर बदलना मंजूरहो या एकही स्वर को देर तक रखना है तो हमेशा सुषुम्नाके योगमें कारवाई करे जिसकी तरकीब आगे बयान होगी। स्वरमें यह मालुम करनाकि आकाश है या सुषुम्ना उसकी रीति यह है के पालती पालती मारके सीधा बैठजाय । दोमिनट तक लगातार ना- कके अगले हिस्से पर निगाह दिये रक्खै । अगर सुषुम्ना होगी तो स्वर पलटजायगा। आकाशमें कुछ पलटाव नहीं होगा। अलबत्ता निगाह हटालनेसे कमती बेशीबलवाला स्वर मालुम देगा । तत्वदर्शी लाखों में कोई एक और तत्वों से काम लेनेवाला करोड़ोंमें कोई एक होता है । रावण ओ हिरण्याक्ष तत्वदर्शी और तत्वोंसे काम लेने वाले हुये हैं । अलबत्ता थोड़ा थोड़ा अनुमान करनेसे अादमी हमेशा फायदा उठाता है । याने जो आदमी पूर्ण स्वरके योगमें सारे कार्य करता है वह कभी बुक़सान नहीं उठावेगा । बहुत दिनों बाद अभ्यासीको कुछ परिश्रम नहीं होगा। सारे तत्व अपने आप दिखाई पड़ेंगे। अभ्यासाकी चाहै आंख खुली हुई हालतमें होय या बंद हुई हालत में तमाम चिन्ह उसको बराबर दिखाई देंगे । तत्वके पहचा. नने के लिये यह जरूर नहीं हैके वह सदा सुखी या सवांखा हो रोगी और जन्मान्धभी तत्वको साध सकता है। रंगसे तत्वका पहचानना सिवाय पूर्ण अभ्यासीके दूसरेकी सामर्थ्य नहीं। याद रहेके जब आकाशतत्व दाहिनेस्वरमें होता ( ४६ ) से हैती नीलारंग दीखेगा औरवायें स्वरमें बिलकल काला इसी तरह अग्निका दाहिन स्वरमें बिलकुल सुर्ख और बांये रवरक योगमें अग्नितत्व समय गरम तपाये हुये लोहेकी तरह होगा। एक महीने लगातार साधनले सुजुम्राका रयान ! दो महीनः आकाशका । तीनसे लेकर के महीने के अरसेमें अग्निका । बारह महीनेमें वायुका ।दो वर्षों पृथ्वीका । चार वर्षमें जलका होगा। नाडी शोधन श्रोस्पट- कर्म से यह अनुमान बहुत जल्द होगा। हरएक तत्व बारी बारी एक एक घड़ी रहताहै लेकिन जिसके बस में स्वरका बद- लना या देरतक कायम रखना होजाता है उसके यह तत्व मुख्तलिफ देर तक रहते हैं। और अक्सर देरतक जल या पृथ्वी ही रहते हैं। येही सबब है के अभ्यासीकी बुद्धि स्थिर और उसकी खोटी बासनाओंका नाश होता चला जाता है । स्वरमें जो तत्व बताये हैं उनके बारी बारी एक एक घडी भुगतने से यह मतलब नहीं है के कोई खास तत्व एक घड़ी तक रहता है । बल्के मालुम रहै के पांचोंतत्व हरएक स्वांस- में सुगतते हैं । सिर्फ फरक यह है के जिस तत्वके प्रमाण दूसरे तत्वोंके प्रमाणुओं के प्रमाणसे रेचक समय तादाद में अधिक होते हैं। वोही तल उस समय बर्तनेसे मुराद ( अभिप्राय ) है। जेसे रेचक समय स्वांसमें जलके प्रमाण अग्नि, वायु और श्राकाशग्रादिके प्रमाणुसे ज्यादा है तो जलतत्व कहावेगा। जैसे किसी रेचकमें एक लाखा प्रमागा पांच तत्वोंके हैं उनमें से तीसहज़ार जलके बीसहजार पृथ्वीके, ( ५ ) बीमहनार वायुके, बीमहज़ार अग्निको. दमहज़ार अाकाश के । तो जलक प्रमाणू अधिक होने से जलतत्व दीपंगा याने निर्णय होगा । ऐसा होनेसेकि म्यरमें एकही तत्वक प्रमागा वरतें यादो तीनकेतो निश्चय जल्द मोत होजायगी यह समझना । जो लोग देस्तक एकही स्वर या तत्व सम्यते हैं उनको भी अवश्य दृसगम्बर उतनी दो ग्वना पड़ता है कमोवेश होनेसे ज़रूर वीमारी ऐना होगी। सशल मनुष्य के साधारगा हालतमें तत्व किसतरह वर्तते हैं। जनाव-सुषुम्नाके बाद वायु. फिर अग्नि फिर जल फिर पृथ्वी और सबसे बाद याने पीने आकाश । इसी तम्ह सदा वारी वारीसे सुगतते हैं । कुपथ्य भोजन या संगकी हाल. तमें इनकी दशा उलटी होजाती है । सवाल-ऊपर लिप मुवाफिक बारी बारी तल भुगतन की वजह क्या है। जवाब-याकाशतत्वको प्रलयकाल जाना। सुषुम्नाको बतोर हुक्म के समझोके अव दुवाग रचना याने मृष्टीका प्रारंभ होगा। जमे शरीरमें कोई एक स्वर जारी होगा वायुतत्व जिसको शरीर वल याने फ़ोर्स कहते हैं ।नाइट- रोज़नके मुरकिवातले या प्रोटीड योर इष्टाची चीज़ ( लु लायम बारीक मैदा जैसी चीजें जो हापदार्थका गूदा कह

है
( ५१ )
लाती हैं ) कहते हैं येही पैदायशकी जड़ है येही तत्व
याने वायु जड़ याने बेहरकत चीजको हरकतमें याने
चैतन्य अवस्थामें लाने वाला है। जब माद्दा याने पदार्थ
पैदा होगया तो अब उस मादमें हरारत ने औक्सी-
जनकी जरूरत है ताके पदार्थ ब? तरह तरहकी सूरत
बदले । इसके पी हरारतको एक मुकर्ररा अंदाज़े पर का-
म रग्वेनेके वास्तै हाइड्रोजन याने जलतत्व दार है ।
जो मुख्तलिफ सूरतोमें जिस्य याने शरीरमें दाखिल होता
है जैसे ज अग्नितत्व होता है तोश्रादमी गिज़ा और पानी
के जरिय हाइड्रोजन लेता या आलस्यके मारे सोजाता
है । जिसकारण शरीरकी चेष्टा बहुत कम रहजानेसे अग्नि
शान्ति होजाती है ऐसी हालत होने पर इस हालतको
कायम “खनेके वास्तै जैसे समुद्र कायम रखनेको धरती
दरार है वैसेही शरीरमें जलके पीछे पृथ्वीतत्व बना
रहेगा जिसकी मददसे तमाम बांछा पूरी होगी। पृथ्वी-
तत्वही भोगोंकी ग्वान है और येही तत्व शरीरको
निरोग रखता है जैसे सारे युग व्यतीत होजाने पर प्रलय
होगा वैसेही पृथ्वीतत्व व्यतीत होने पर शरीर श्राकाश
वरतेगा। च्यारोंतत्व के योगमें और खास कर पृथ्वी-
तत्वके योगमें जो शरीरनं परिश्रम और लाभ उठाया
है उस क्रियाले अव खूनमें कारवोनिक ऍसिड्गैस
(याने खूनका मैल ) बहुत बढ़जाता है सो आकाशतल
के रहते रहते कम होता रहेगा। आकाशतत्वकी कायमी

( ५२ ) साधिरके मैला होनेका सबूत है । हकिस्मकी पैदायश याने बास्पति और जमादात याने पाषागादि औ जन्तु जिसमें श्रादमी और जानवर शामिल हैं। याने कुल चर अचरखें इन तत्वोंका येही सिलसिला है जो ऊपर लिखा गया । अनेक प्रका की सृष्टोमें इन तत्वोंका प्रमाण कमती बेशी है जैसे बनास्पतिमें वायु और आकाश ज्यादा तमाम जानवरोमें वायुतत्व ज्यादा है जलके रहने वाले जीवोंमें जलतत्वका हिस्मा ज्यादा है । पाषाण और गतु श्रादि ठोस वस्तुओंमें पृथ्वीतत्वका हिस्सा ज्यादा है । मनुष्यों में पांचोंतत्व वरावर ताक़तसे काम करते हैं । जैसे हरचीज़का आखीरमें नतीजा मोत है । तैसेही इस सारी सृष्टिका नाश ब्रह्माकी उमरके साथ जो उत्पत्ति और प्रलयका कारण है ब्रह्मा, विष्णु,महेश, कोई सा- स मूर्ति नहीं मैं सिर्फ तासीर अनुसार नाम धरा गया याने पदार्थ में उत्पन्न होनेकी ताक़त और उसके कायम रहनकी ताकत ग उसके नाश होने की ताकत हर पदार्थ में हर वक्त मोजूद होती है। पैदा करने वाली ताकत का नाम ब्रह्मा । कायम रहने वाली ताक़तको विष्या और नाश करने वाली ताक़तको महेशा समझना । इन तीनों ताकतोंके चलाने वालेका नाम ब्रह्म याने श्र- नादि या सर्वव्यापक जानना । दुनिया याने सृष्टीका संवत् ब्रह्माकी उमरका वर्ष समझना जिसकी प्राधी उपर खतम होचुकी है । परन्तु यह सारा सिलसिला है. है (५३) मेशा चलते हुये रहना माना जा चुका है। किसी एक ब्रहाके ऊपर इसका शादि अन्त नही है । सगाल-अभ्यास या योगके बलसे जब जल पृथ्वी ज्यादा रहता है तो ऐसे अभ्यास करने वाले बीमार हो कर मर क्यों नहीं जाते । जैस कि पहले लिखाहै के को- ई तत्त्र कमती बेशी होनेसे जल्द मृत्यु होजाती है ? जवान-उनका बदन कृश होजाता हे प्राणवायुके श्राश्रय जीते हैं। ज्यादा महिनत वदनकी नहीं करते और न कर सकते हैं सिर्फ ऐसी जिन्दगी गुजरान कर- ते में जेसे कोई आदमी सिर्फ दूध पर या कोई थोड़ा सा फलवगैरह खाकर या गरम जल पीकर अथवा गंगा- जलके आश्रय रहै ऐसे थोड़े आहार पर आदमी थो. ड़े दिनों तक जिन्दा तो रहसता है पर दुनियाके काम नहीं करसक्ता । अभ्यासी लोग धीरे धीरे श्रा- हारको कम करके शरीरको सिर्फ पवन आश्रय रख कर समाधि सिद्ध करके यातो शरीर त्यागते हैं या किसी दूसरे शरीरमें प्रवेश करके आप खुद बन बैठते हैं जिसको काया पलटना कहते हैं। लेकिन कलियुगमें यह बात किसी योगीसे होना नामुमकिन है। सवाल-स्या तदबीर है जिससे कोई तल्द या स्वर दर तक रखा जासक्ता है।

( ५ ) जवाब-जव अभ्यासीको मालुम हो के किसी स्वरमें जल पृवीतत्व है उसी वक्त ध्यानमें बैटजाये पोर जो जुक्ति प्रार्थनाक वक्तक लिये चीये प्रकर्गामें बनाई गई है उस मुताविक अजपामें सुरत दे रख । जित नी देर तक दूसरी पार सुरत नहीं जायगी उतना ही देर जल या पृथ्वी पहले जो था वह कायम रहेगा । शुम शु. रू में यह क्रिया वांये स्वरमें प्रारंभ करे । वदन किसी हिस्सेको हलने न द इससे प्रामा सूक्ष्म होते हैं याने रेचककी वायु धीरे धीरे दस्तक निकला करती है और स्वांस की तादाद कम होजाती है। दिनका वांय स्वरमें और रात्रिको दाहिने स्वरमें एसा अभ्यास सुखदाई है । जब यह दोनो स्वरोंकी धारणा ध्यानमें इस तरह होती रहे गी तो (६) महीने के अरसे वाद अभ्यासी में यह ताक़त श्राजावेगी के एक तत्व पांच घड़ी तक रहसकेगा याने जल पृथ्वी में से कोई एक । अब वायु अग्नि और याकाशतत्व सिद्ध करने की गति बताते हैं के जव क- भी इन तीनोंमें से कोई वरते तो जो चिन्ह या लक्षण उस ते त्वके दिखाई दें उन गुमाको हद वुद्धिसे न वर्तने दे जैसे-अग्निके प्रभाव में तबीयत पानीको या अन्नको अथ. वा उठकर चलदेने को चाहता है । इसके मुताविक कारवाई न होने दे । यान धीरे धीरे नित्य इस प्रकार साधन कर के तत्व के स्वभावके मुताबिक चेष्टा न करे । जव एक वर्ष तक लगातार ऐसा अभ्याम होगा तो यह तीनों तत्व ( ५.५ ) अभ्यालीके शरीरमें निर्बल होजायँगे। और जो कुछ अभ्यासी चाहेगा उस मुतानिक करने में समर्थ होगा। जब अभ्यासी- के बसमें जल या पृथ्वीको पांच घड़ी तक स्वर में ठहराने की ताकत होजावेगी तो वह सिद्धीको भाक्ष होगा और बाकी तीनो तत्वों पर कब्जा करनेको समर्थ होजायगा। ऐसे प्रादीका वाल्य याने बचन सिद्ध होगा। याने जिस किसीको तत्व निश्चय होने के पीछे श्राप या पाशी. दि देगा वह उसी मुताबिक होगा। सवाल-क्या तरीके हैं जिनसे स्वरुः बदला जासत्ता है स्वर बदलने में सुषुम्ना क्या मतलब है। जवाब-सुषुम्ना नाड़ी पहले नाड़ी प्रकर्णमें बता पाए है। यह योगके सिद्धिकी देने वाली और समाधिका कारण है। क्योंके जब तक सारे शरीरका प्राण सुषुम्नामें सिमट कर पैवस्त (प्रवेश ) नहीं होगा तब कत मूर्छा और समा- धि नहीं होगी। पहले लिख पाये हैं के बड़ी बड़ी शिर- यानों पर दवाब पहुंचानेले स्वर बदल जाताहै सो बताते । नालिसे नीचे वाले अंगों पर जैसे जंघा या (राग) और जंघाके श्रद्धभाग पर अंदरकी तरफ और घुटने और टांगके पीछेके हिस्से पर जो नाड़ीयां हैं उनको दवाने से उसी तरफका स्वर रहेगा जिधरको दवाई गई हैं याने दाहिने ओरकी दवानेसे दाहिनां स्वर भोर बाई ओर वाली नाड़ियां दबानेसे बांया स्वर । अगर एक साथ दोनो घुटने हैं

(५६)
वाली या जंघा वाली नाड़ियों पर दवाब पहुंचाया जा
तो भाकाशतत्व बरतेगा। श्रमर सुषुम्ना नाड़ी पर ,
पहुंचायेंगे तो सुषुम्ना स्वर होजायगा और जब तक
न हटावे तब तक सुषुम्ना बरतेगा। और छातीके
तरफ वाली नाड़ियां या बांये फेफड़े पर दबाव पहुंचाने
हिना स्वर रहेगा। छाती और पेटके दाहिने अंग
नाड़ियां या दाहिने फेफड़ेकी नाड़ियों पर दबाव पहुंच
से बांयां स्वर होजायगा । गुदा और अंडकोशके
तरफ दवाव पहुंचानेखे : बायां स्वर । और दाहिनी
दबाव पहुंचाने से दाहिना स्वर रहेगा। दाहिनी बगल
दाहिना बाजू अथवा गर्दनके दाहिने तरफ वाली नाडि
दवाब पहुंचानेसे बांयां स्वर। और बांई ओर वाली दवा
दाहिना स्वर होजायगा । जो कदाचित् दोनो अंगोंकी
यांएक साथ दबाई जातो श्राकाशतत्व होजायेगा।
नाभिसे नीचे वाले अंगोंमें वर्णन होचुका है । सुत्र
स्वर हमेशा आकाशतत्वक, बाद होता है ।
जब कभी कोई स्वर बहुत देर तक चलाया जाता
और नहीं पलटने दिया जाता ‘बल्को आकाश
नहीं रखा जातातो उन हालतों में अन्सर अारिन
"कुछ देरतक रह कर स्वर दलजाता है। जो आदमी
जुदी तरकीबोंसे स्वर बदलते हैं उनकोभी बगैर श्रा
शतत्व पायें स्वर बद्दलजाता है । स्वर बदललेके !
श्रकाशतत्वका मौजूद होना जरूरी बात नहीं ! लेकि
--

मुपुना हुये बगैर स्वर नहीं बदलसक्ता । अकसर सोती
हाललस जब पारसी जागता है या करवट बदलता है या
खूब जोरसे दोना है या कसरत करता है या प्राणायाम
या शान करता है तो स्वर बदल जाता हेमा सुषुना रहना
है । इबर बदलने हमेशा पुनानाड़ी पर दबान पहुंचता
है या वह प्राणवायुकी नेहट मिकदारसे पीड़ित होजाती है
के जो लगातार स्वांस के साथ बहुत मिकदारमें रुधिरके
धक्षेके साथ शामिल होती है। जब श्रभ्यासी सुषुम्ना स्वर
या श्राकानतल देले उसीवक साधन करे। सुषुलाके
समय जिलतरफका स्वर रखना पंजर हो नासकेलसी और
निगह दिये रहे और जिसतरफका स्वर अब रखना पं.
जर है उसके बर्खिलाफ वाले हाथ से स्वरके बखिलाफ वाली
जांघक अर्बभागके अंदरदाले हिस्से की तरफ अंगूठसे ना
दीको दवाया रखे जैसे अव बांया स्वर है । और श्राकाश
अाहि होकर अब सुषुम्ना होगया है और कायदेके मुता-
विक दाहिना स्वर अावेगा तो चाहियेके स्वस्तिक श्रा-
सन बैठ कर दाहिने हायसे वाई जांघके अर्द्धभागको अंगूठे-
ले दबाके जोके नाड़ीकी जगह
। (यह फीमोरलशिर्या
न् है । अगर दो तीन मिनट तक इसीतरह दवाये रहेंगे तो
स्वर बांयाही रहजायगा दाहिना नहीं आवेगा। जव स्वरो
जल या पृथ्वीतत्व होता है तो स्वरकी पूर्णगति होने
से हवाव पहुंचानेसे कुछ असर नहीं होगा। अगर होगालो
दबाव हटाने के साथही स्वर बदल जयगा। इसलिये हा शर.

( ५८ ) तिया बताते हैं जो श्रादमी सुषुम्ना या अग्नितत्वके योगमें पलटेंगे वही पलट सकेंगे और किसीतत्वका पलटा हुश्रा का. यम नहीं रख सकेंगे। बल्के बजाय फायदेके नुकसान उठावें गे। काशतत्वमें पलटनेकी क्रिया करना बिलकुल फिजूल है । और फेफड़ेकी बीमारियां पैदा होती हैं। प्रागाा. थाम में जक्तक सुषुम्ना प्रकट नहो वह प्राणायाम किसी जामका नहीं । लुषुम्नाका प्रकट होजाना सबूत हैके सब नाड़ियोंमें प्राणवायु पूरी मिकदारमें भरचुकी और रुधिर शुद्ध होगयाप्राणायामसेसूजन जलन्धर तिल्ली जिगर और गुरदेके रोग नाशको प्राप्त होजाते हैं। जब प्राणवायुका संचार याने रुधिरसे मिली हुई प्राणवायुका दौरा बन्द- होने लगता है तो वहां वहां पसीना श्राने लगता है बदन में गरमी लगती है । यहांतको जब प्राण सब नाड़ियोंमेंसे सिमटजाता है ( रुधिर ही प्रागण याने सह है खूनका जानदार होना सावित होचुका है खूनका एक एक जर्रा रह है क्योंके इनही जरों के इकट्ठा होजानेसे शरीर क- नता है ) तो तमाम बदन पसीनेमें डूबजाता है और मूर्छा याने बेहोशी शुरू होती है । इसके जरा देर पीछे जब हृदय और मुखपर प्राणा आते हैं तो सब क्रिया प्राणवायुकी खत्म होजाती हैं जिसको मोत कहते हैं । सिर्फयोगीही है जोइस मौके पर खोचरी द्वारा प्राण गत नहीं होने देगा और के जिसने सदाले गने हमेशासे प्राण अपान शुद्ध कर रखे हैं ।

( ५६ है दसवे प्रकर्गा शरीरान। पृथ्वी श्रादिलोक और प्राकाशादि तत्व और कुल. सृटीका देह -शतके इकट्ठे होनेले बनना है जिनको अंग्रेडीमें ऐटम कहते हैं। यह एक नयाली न्यूरत या सूक्ष्म शरीर जानना । अंग्रेज़ोंने बहुत प्रकारकी खुरददीन ( माइ मोसकोप ) बनाई हैं। जिनसे बहुत प्रकारको सृष्टीके ज़रेको देख्न सक्त है । यह ऐटम याल जी हमेशा चैतन्य है। अब इन्भात् याने मनुष्य की बुनियाद बताते हैं । रुधिर ত্ব যাহা লাল স্মষ অনাহা হল ঘুম হাম স্ক निकल जावे तो आदमी एकदमसे परसता है । रखून की पिकदार शरीरमें सारे बदनके आठवें हिस्सेसे लेकर चाधावें हिस्ते तक होती है । एजूनमें दो प्रकारकी वस्तु है। पतली और गाढ़ी। पतला जुज़ ज्यादा होता । और गाढ़े वाले हिस्से में बेशुमार ज़र्राता होते हैं जिनके हर वक्त नाड़ीके भीतर इकट्ठा होकर चलते रहनेले एक प्रकारका शब्द होता है जिसको भकारध्वनि कहते हैं । इसको. ॐ शब्द मानना यह उत्पत्तिसे लय तक याले पैदायशसे मौत तक बराबर जारी रहता है एक क्षणमयी बन्द नहीं होता । रुधिरके अन्दर एक मकान मिलीमीटरमें चालीस पचास लाख ज़रें होते हैं। एक मिलीमीटर लंबाई में एक इंचका पनीय- वां हिस्सा होता है। अगर सारी नाड़ियाँको जो मनुष्य देहमें हैं अगर किसी जगह लंबाईमें बिछाकर नापा जावे तो तीनहज़ार गज लंबी होती हैं सो समझना चाहिये।

-
(..) .
इस शरीरमें असंख्य जर्गत हैं जिनमेंसे कोई
एक शरीर बनता है । पुरुषके एकदफाके वीर्यस्खलित
में यह ज़रीत याने इसपरमेटोजुवा तीनसोसे पांचसो
होते हैं। जिनमें से एक कोई सा गर्भस्थिति का का
होता है.। सभी शरीरमें सात प्रकारके हैं जो स.
नायसे वर्णन होंगे।
संबाल-जब इसपरमेटोजुबा पुरुषके वीर्यमें मो.
हैं तो इस अकेलेसे औलाद पैदा होसकती है या
अगर नहीं तो क्या यह जड़है या चैतन्य
जवाब- अकेले इसपरमेटोजुवाले वगैर-स्त्रीके रज
भोवम्के संगमके औलाद नहीं होसक्ती। क्योंके जै
मनुष्य वगैर खुराकके. ज़िन्दा नहीं रहसक्ता इसी त.
इसपरमेटोजुवाशी वगैर श्रोवस्के जो उसकी खुराक
जिन्दा नहीं रहसता । इसलिये शरीर नहीं बललता
दूसरे प्रकार समझाते हैं । दरख्तका बीज वगैर मिट्टी, पानी
हवा, और रोशनीके दरख्त पैदा करनेके लायक नहीं है
ऐसेही इसपरमेटोजुवाकी हालत जानना प्रादमीमें मुक्ति
साधन, भोग, योग, हासिल करने की ताकत सब प्रका
सौजूद है परन्तु जैसे दरख्तके बीज अन्न पदार्थोके
शामिल हुये वगैर ऊगने और बढ़नेकी सामर्थ्य नहीं है
वैसेही मनुष्य में नगर अदद शास्त्र व सतगुरुके यह ताकत
नहीं है के मुक्ति होजावें। यह पहले बता आये हैं के कोई

( ६ ) पदार्थ सृष्टीमें जड़ नहीं है । श्योके कोई भी दृश्य या अदृश्य पार्श से ऐसा नहीं है जो बहता नहीं हो याने उसके जरें दाम न कररहेहों या उनका नाश न होता हो या वह फिर दुबारा न पैदा होते हों सिर्फ प्रकृति मेंदले स्था- वर वस्तुको लोगों ने जड़ मानलिया । इसपरमेटोजुवा ह- देशा हरकत में रहता है इसलिये बह चैतन्य है । रयारहवां प्रकर्ण गर्भअवस्था वन । गर्भअवस्थामे वालककी दशा बताते हैं । बालक गर्भाशयमें रहता है जोके पेशाब और पाखानेके रह नेली जगहके दरम्यानमे है । पहले हफ्ते में बालक एक खसखर के दानेकी सूरतमें होता है उसके भीतर फूलक कली के मुताबिक निकाल निकलते हैं । दूलर है पस्ते में चढ़ना शुरू होता है । उसके दो हिस्से एक नालीके जरिये होजाते हैं। तीसरे हफ्ते गिज़ाकी नाली तयार होती है जो बिलकुल नलनी सूरतमें सीधी होती है इसको अंग्रेजीमें ऐलीगटीकैनाल कहते हैं । योगशा. समें इसका नाम कुंडलिनी सर्पिणी या शक्ति याश्रयान- का कोठा रहते हैं। और हाथ पांव कलीकी तरह न कले हुये रहते हैं । दौरान खूनका इन्तजाल होनेके वारने नाड़ियोंका वनना शुरू होता है । चौथे हफ्तेमें दिलका वांया हिस्सा बननाता है। फेफड़े और लवलवा दिखाई देते हैं। लवलवेको अंग्रेजीमं पैनक्रियम् सहते हैं।

( ६२ ) यह मे हे से लगा रहता है । असब याने तंतुकी अगली शा बनाती हैं । तन्तुको अंग्रेजीमें नर्व कहते हैं । यह ना. डियों के साथ साथ रहते हैं । जैसे रेलगाड़ीके साथ तार- पांचो हएते, अनारटा याने सुषुम्ना नाड़ी और पलमो नरी शिल्याने ( दिलसे फेफड़ों में खून लेजाने वाली ना- ड़ियां ) बनती हैं । हंसलीकी हड्डी और नींचेके जबाड़ेमें हड्डी बनाना शुरू होजाता है। छठे हफ्तेमें मेरुदण्ड याने सुमेरू पर्वत जिसको अंग्रेजीमें वर्टेनरलकालप कहते हैं । और आपलोग इसको कमरकी हड्डी कहते हैं तो बलता हैं । कमरकी हड्डी और खोपरीकी हड्डियों और - सलियोंमें कुरीकी शकल कायम होती है जिसको अं. जीमें कार्टिगेज कहते हैं । ( जिस मुलायम जुजस हड्डी बनती है उसको कस कहते हैं ( इस कुरीके बनने पे. प्रतार सरेके सुनाविक पदार्थ रहता)। असब याने तन्तु. दीपिली शाब्द सूत्राशय याने मसाना परदे और लै- किस याने बॅटू और थाईराइड कुर्सी बनते हैं । थाईश. इह एक किस्म की गिनटी है जो गसके दोनो तरफा होती है। जब वह वढजाती है उस बीमारी को बैषा का हते हैं। यह पहाड़ी और चुनेकी धरतीमें विशेष होती है । दांतोंका पन । और स्त्रीपुरुषके चिन्ह बनजाते हैं। गर्भन लंबाई श्राप इंचसे पौन इंच और वजन च्यार पाशा होता है। हाथ पांव अच्छी तरहसे दिखाई देते है । सातवें हपताणें गोश्तके याने मांसके पिण्डे और जगह जगह हड्डियें ह ( ६ ) की बना ट बनजाती है । पाठचे पते में हाथ पांर जुदा जुदा दिखाई देते है। थूककी गिलटियां और गुरदेके ऊपर का खोल याने कैपशूल और तिली बनजाती है । अल- के अंदरका लेन्ल ( इस टिकियाके धुन्धला होजानेसे पोतियाविन्द कहाता है वरना तन्दुरस्तीकी हालतमें यह टिकिया लवकदार मुलायम और नमक वाली होती है) बनजाता है। नवें हफ्तेमें भारत परदफे अण्डकोश तयार हो- जाते है । और गिछाने जामने हैं । सख्त तालु जुडजा. ता है और पित्ता दिखा देता है। जिगर अच्छी तरह तैय्यार होता है। लबाई बाई इंचसे तीन इंच वजन बीस माशा । अंगलियां जुदी जुनी दीखती हैं । तीसरे महीने ये जेह जल्दी जल्दी बनती है । स्त्री पुरुषके चिन्ह खून अच्छीतरह दिखाई देते हैं। अांखके पपोटे और बाल और नाखून वनने शुरू होते हैं । शिर बड़ा और आंखें खूब दिग्नाई देती हैं । बौथा महीनामें खालके नीचे चरखी पाई जाती है । टन्सिल गिलटी हलकके अंदर तालु और कव्वके पीछेकी दन्निी बांई तरफ हाकरती है बनती है। दि माग याने सहस्रदल कमल उठाव दनाववनने शुरू होते हैं लंबाई गर्नकी छै इंच बजन तीन छटांक होजाता है । पां चवें महिनमें रखूनका दौरा यान अठावें हफ्तेमे शुरू होताहे इप्स दिनसे बालक पेटमें डोलने लगता है शिरणवाल होते । गर्भाशय और योनिमे तभीज होसक्ती है। गर्षकी ललाई नो दस इंच वजा पाल टांक । छटे महीलमें वडा

दिमाग छोटे दिमागको ढक लेता है । दिमाग दो है
हैं। बड़ा सामनेको और ऊपरको छोटा । पछिको और
चेको गुद्दीकी हड्डीके खड्डमें रहता है। छोटे दिमागके ज
ये श्रादमी चलता फिरता है और बड़े दिमागके श्रा
पांच ज्ञान इंद्रियोंका काम चलता है दिमागके आश्रय ई
लिये कहा गयाके इसीसे सारे तन्तु निकलते हैं जो क
द्रियों और ज्ञानेंद्रियोंको चैतन्य करते हैं याने इन ज.
में खबर पहुंचाते हैं। गर्भाशयकी दीवार मोटी होजा
है नाखून जिल्दके बाहर निकसे हुये दिखाई देते .
आंखके पपोटे किल्लीके जरिये आपस में मिले
और पलकोंके बाल बने हुये होते हैं। लंबाई ग्यारह बारह
वजन श्राधसेर याने एक पोण्ड । सातवें महीने में ब.
डेढ़सेर से दोसेर तक ओर लंबाई तेरह इंचसे पंदरह
तक आंखे खुली हुई होती हैं याने झिल्ली हटजाती
आठवें महिनमें वजन दोसेरसे अढाई सेर तक :
सोलह इंचले अठारह इंच तक । नवमें महिनेमें .
पपोटे खुले हुये और अण्डकोश (फोते) के अन्दर मौजूद .
ते हैं । लंबाई बीस इंच वजन अढाईसेरसे तीन सेर
दिलके दाहिने बांये हिस्से में एक सूगखके जरिये ताल्लु
याने संयोग रहता है । क्योंके खून फेफड़ोंमें साफ है
गरजले नहीं जाता । यह सूराख बालककी पैदाय :
दस दिन भीतर बंद होजाता है । इससे यह फायदा
मैला रुधिर साफ रुधिरसे दिल के भीतर नहीं मिलता

( ६५ ) जो यह सूगड बंद न होतो रूधिर मैला होजानेसे बालककी एक हफ्ते के अन्दर मृत्यु होजाती है और बदन नीला पड़जाता है। बारहवाप्रकरगा शरीरश्रवस्था वर्णन । हड्डियां श्रादपीके बदन में नीचे लिखी तफसीलसे पाई जाती हैं। मेरुदंड में तेतीस । (मेरुदंडमें जो गूदा रहता है उसको अंग्रेजीमें इस्पाइनलकार्ड और फारसीमें हराम सरज कहते हैं। इसी गूदे से तन्तु निकल कर बाहर शरीरमें फैलते हैं ) खोपरीमें आठ, चहरेमें चौदह, जुवान की जड़में एक, हृदय में याने थोरेक्समें पच्चीस, जिस- में पसलियां भी शामिल हैं। दोनो हाथों में चौंसठ, जिसमें मुजासे लेकर अंगुलियां तककी हड्डियां शामिल हैं । दो- नो पांवों में बासठ, जिनमें कूल्हे (चूतड़) से लेकर पांवकी अंगु. लियां तक शामिल हैं। अगर गोड़ोकी पालियोंकी हड्डियांशा मिल की जावेतो चौसठ होती हैं। कानकी हड्डियां और दांत. शामिल करके सैंतीस हैं । कुल मिल कर दोसै छियालीस २४६ हैं। सारी हड्डियां मजबूत तौरसे बंधी हुई हैं । जो डोरों की तरह कीसी बीज हैं इन डोरियोंको जिनसें है- ड्डियां बंधी हुई हैं अंग्रेजीमें इनको लिगमन्ट कहते हैं । उजलात जिनको अंग्रेजीमें मसिल्ज कहते हैं । हिन्दीमें मांसके पिगडे कहते हैं । बारीक झिल्लियोंके अंदर लि- पटे हुऐ कुल जगह हड्डियोंके ऊपर लगे हुये हैं । और

(६६)
ई
नाजुक बनावटकी हिफाजत करते हैं । इनके जरि
दमी पाता, पीता, चलता, फिरता, और सब चेष्टा क
और यह रुधिरके जरिये गिज़ा हासिल करते हैं
तन्तुके आश्रय काम करते हैं । इनके मोटे और
को इनका निकास याने शुरू और जहां यह सख्त
दार बनावटमें हड्डी पर लगते हैं । उस जगहको
खत्म कहते हैं । खत्म वाला हिस्सा बारीक म.
फेद होता है जिसको आमलोग नस बोलते हैं
ग्रेजीमें टेण्डन कहते हैं । उजलात दो किस्मके हैं
वह जिन पर मनुष्य अपनी इच्छाका दखल रखता
याने चाहे उनको हरकतदे या न दे । दूसरे प्रकारके
जिन पर मरजीका कुछ दखल नहीं है । कुदरती तोरसे
अपना काम चलाते हैं । साधारण आदमी और यो
यह फरकहै के वह उन उजलातसे काम लेगा जिन
साधारणा आदमीको हरकत देनेका' कुछ दखल हाति
नहीं । योगी अपानवायुके कोठेसे. याने गिजाकी
नालीसे इसी तरहसे मूत्राशयसे जो जो काम षट् ५.
दारा लेगा वह दूसरे मनुष्यकी ताकतसे बाहर हैं ।
जैसे धरती पर पहाड़ हैं । ऐसेही शरीरमें हड्डियां ज
लना । शरीरके भीतरवाले पिण्ड जिगरको आदि
अनेक लोक जानना । उजलात शरीरमें मिस्ल राजालो.
के हैं जो पृथ्वीपर जगह २ राज भोगते हैं । और प्रजाका
इन्तजाम करते हैं और प्रजाको कानूनके साथ चलातेहैं कानून
d
.-
स

(६ )
से खुशह इश्वरका हुकम है सो इमीनाले शरीरमें तन्तु बतोर
हरुमके जानना । और जैसे किसी जगइसे हुस्म प्राता
हे वैसेही तन्तुओंका जरिया दिमाग है । शरीरमें दिमाग
ही मालिक है। वीको सत्य नोक या सतगुरूका शाप कहते
हे जिव्हाको योगशास्त्रमें अनु कहतेहैं और जब खेचरी मुदा
द्वारा जिहाका शोधन होजाता है तो उसको कामधेनु
करते हैं । इसका मुफस्सिल हाल हटयोगमें वर्णन होगा।
जिह्वाली एक उजला गाने मांसका पिण्डा है । उजलोंकी
संख्या नीचे लिखकर बताते हैं।
चहरे और खोपीमें उनहत्तर । गर्दनमें चाप्तठ । पीठमें
चौराठ । छातीमें इकानवे । उदरमें बारह । स्वाधिष्ठान चक्र में
सतरह । इस जगह पर औरतमें बजाय सतरहके पचीस हैं।
दोनों हाशेमें एकसो सोलह । दोनो एगोंमें एकसो चौदह ।
छाती और उदरके बीच में एक उजला है जो पंखेकी सूरतका
। उसीके बीच सुषुम्ना नाडी और वरीद और तन्तु और
गिजाकी नाली जिसको अंग्रेजीमें ईसाफैगम् कहते हैं।
छातीसे उदरके हिलेमें उतरते हैं । लिंग और भग वाले
हिस्सोंका या कानके भीतरके उजलोंका जिकर नहीं कियाहै
साधारण अनुमान संख्या बतादी है । जैसे नाड़ीभेद वर्णन
किया वैसेही तन्तुभी दो प्रकारके हैं। और इनका निकाल
बडे दिमाग और छोटे दिमाग और मेरुदण्डके भीतवाले गूदे-
से है जो तन्तु तमाम शरीरकी जगह जगहकी हालतकी

(६८)
ii
खबर दिमागको पहुंचाते हैं उनको अंग्रेजीमें ।
टिक और जो तन्तु दिमागसे मारे शरीरमें खबर
उनको क्रेनियल और इस्पाइनल नर्व कहते हैं ।
नो किस्म के एक दूसरेसे सारी जगह मिले हुये
मकड़ीके जालेकी तरह फैले हुये हैं।
के बीचोबीच एक बहुत बारीक नाली है जो
लेकर दिमागके चौथे बतनमें जाकर खुलती है। इस
वतनको निर्वाण पद कहते है । यह नाली बहुनही
रोक है इसको योगमें नागनी कहते हैं। और
बालका सहस्रवां हिस्सा प्रमाण लिखते हैं। हमारी
बालसे बहुत बारीक है और खुर्दबीन से
अच्छी तरह देखीजाती है । इसको अंग्रेजीमें कैनाल श्री
इस्टिीलङ्ग कहते हैं केवल कुंभक और समाधिमें यह ने
प्राणवायुका स्थान रहता है । बड़े बड़े तन्तुकी ताद
बताते है । क्योंके छोटे तन्तुओंकी तादाद वेशुमार है। दि
मागसे चौबीस जोडे तन्तु निकले हैं । याने दोनो त:.
बारह बारह । यह चौबीस सिर, गर्दन, अांख, चहरा, नांक,
कान, मुख, और हृदयमें फैलते हैं । मेरुदण्डके यूदेखे नि
कले हुये तन्तु इकतीस जोड़े हैं । याने वासट यह दोनो
हाथ दोनो पांव उदर और पट्चक्रमें फैलते हैं। इनका बयान
आगे होगा।
इस शरीर तन्तुका सबसे बड़ा जाल जो सिमपेथोटिक

(६६ ) है किस्मका है । मेदा याने पक्काशयके पीडको और सुषुम्नाके बाई ओर तिलके आकार वालाहे जिसकी शाखा सारे उदर में प्रकाशित है । पकायके पीछे इसतरह रखाहुश्रा है जेस देगचीके नीचे गैस की बत्ती । इलीको योगशास्त्रमें अग्निकुण्ड हवनकुण्ड या सूर्यज्योति कहते हैं। इसको अंग्रेजी में सोलराप्तिकासिस् कहते हैं जैसे शरीर पांच तत्वका बना हुअा है वैसेही इसमें पांच कर्मेन्द्री पांच ज्ञानेन्द्री । कर्मेन्दो दारा श्रादमी सब काम करता है और ज्ञाने- नही द्वारा जो कुछ जगत् में व्याप्त है उसकी खबर पाता है। कर्मेन्द्रियों के नाम यह हैं। मुख, (मुह) हाथ, पांव, गुदा, लिंग, इनके ज़रिये दुनियां के सारे काम और आहारका ग्रहण करना और मल मूत्र आदिका त्याग करना श्रम- लमें आता है । ज्ञानेन्द्रियों के नाम यह हैं। जिहा, आंख, नांक कान, त्वचा, ( जिल्द ) इनके ज़रिये ब्रह्माण्डमें फैली हुई सारी वस्तुवोंका ज्ञान मनुष्यको होता है । पंचा- ग्नि तपनेसे मतलव पंचकर्मेन्द्रिको तपोबलसे वसमें करना है। और पंचयज्ञसे मतलब पंचज्ञानेंद्रीका शो. धन करना है । मंत्र सहित यज्ञ करनेसे मतलब प्रार्थना सहित र्म करना है सो अगर ऐसी हालतमें किसी प्रा. दमीका वाक्य सिद्ध है जब तो वह उन सब सिाद्धयोंको प्राप्त हो जायगा जो मंत्रसे नियतकी गई हैं। नहींतो सारा वक्त व्यर्थ खोना है । हिन्दुस्तानमें इस वक्त ला. खों श्रादमी संध्या नित्य प्रति करते हैं । परन्तु उनमें ( ७० ) gher कोई दो चार प्रादमियोंकोही फलकी प्राप्ति होती जिसका कारण यह हैक वह न तो संध्या याने संधि- को समझते हैं न वह अपने अच्छे कर्मोंसे हृदयको शु- द्ध करते हैं। याने अपना चलन दुरूस्त नहीं रखते । याद रखाना अगर कोई आदमी सुषुम्नास्वरके योगमें पूरक समय शुद्ध हत्यसे प्रार्थना करतो वह लाख मरतबामेंसे एक म- स्तबा चूकने वाली बात नहीं । यहही हाल मूर्ति पूजने वालों- का हैके वह कर्म सहित उपासनासे भक्ति उपजाना चाह- तो हैं लेकिन लाखोंमें कोई एक निबटता है याने उस फू- लको ग्रहण करता है। शुद्ध आचरणही भक्ति उपजासक्त हैं। नाकी कोई साधन इस दरजेको पहुंचानेको समर्थ नहीं। तेरहवां प्रकरण प्राणवायुकेस्थान याने स्वर्गलोक वर्णन। हृदयस्थान स्वर्गलोक है इसमें फेफड़े दो हैं। छातीके दोनो तरफ एक एक है । पसलियोंसे बिलकुल जुदे और किल्ली में लिपटे हुये हैं । इन दोनोकी बनावट इस्पंज याने बादलकीसी तरह सूराखदार है । गर्भअवस्थामें इनका वजन बहुत कम होता है याने हरएक फेफड़ेका वजन बीस माशा। लकिन जब बच्चा पैदा होकर सांस लेता है तो इन फेफड़ों हवा और खूनकी ज्यादा मिकदार मरजानेसे वज़न ढगना बल्क तिगुना होजाता है। जगान বফফর আগাম বাথ ঈক্ষা খলন ?? সব বন্ধু

( १ )
छटांक होता है। और बांयेका नो-दस छटांक फेफड़े-
की मूजन या फेफलेकी और बीमारियों में कमोवेश
होजाता है । मामूली हालतले फेफड़े पानीपै तैरते हैं ।
और जब इनमें कफ और खून बहुत बरजाता है तो
जितने हिस्से में हम कम होगी वह हिस्से डूनजायगे ।
अगर पानी
बहुत सारा
तोमाशी होने-
के सव पानी ड्वजाँयगे।
भरजावे या खून
दिल छातीके वाई तरफ तीसरीसे छठी पसलीके
दरम्यान छातीकी हड्डीके बीच वाले हिल्सेसे लेकर जि
टनी (निपिल ) के एक इंच नीचे तक वाके है । लवाई
पांच इंच चौडाई साढेतीन इच मुटाई ढाई इंच है। भीतर
से खोखला है । और चार हिस्सोमे बटा हुआ है । दाहिने
दो हिस्सोंमें मैला खून और बांये दो हिस्सोंमे साफ याने
निर्मल खून । दिलका राजन ( वेट ) मरदोंमें पांच के
छटांक औरतोमें एक कटींक कम । याद रहैके अोरतो
में सन अंग मर्दोस कुछ हलके होते है जिसका सबब
महहेक अोस्तै मरहोंकी निप्तवन महनत कम करती
। यी उनकी खूणकभी कम होती है । कायदा है के
जो शरीरसे ज्यादा महनत लीजायगीतो उसको ज्यादे
गिज़ाकी जरूरत होती है । दिलको इन्द्रासन समको
जहां प्राणकी राजगद्दी है याने राजशानी है। फेफड़े स्वर्ग
लोक हैं जहां परमाण याने खूनके जर्रात मलको त्याग

( ७२ ) इ कर थाने मृत्युलोको दुःखको तजकर अमृत याने प्राण वायुका सुब्वा सोगते । और फिर नाड़ियों में रमण क- रते हैं। सारे भोग भोग फिर जहा कहीं उनका कर्म बाकी है उसको योगेंगे। वाधवां प्रकरण अपानवायुका स्थान याने उदर या मृत्युलोक वान । इस हिस्सेमें गिजाकी तमाम नाली और जो अंग इस्ले ताल्लुक रखते हैं उनका बयान होगा। नं० १ प्रांत पच्चीस फीट । पांच फीट लंबी बड़ी प्रांत और बील फीट लंबी छोटी प्रांत है। नाभिके मुकाविल छोटी प्रांत झिल्लीसे लिपटी हुई मेरुदण्डसे लगीहुई रहती है । और साडेतीनचक्कर दिये हुये हैं । इसका नाम शक्ति कुंडलिनी है । मलके शरीरले परित्याग होजाने पर जल बस्ती और कुंजरक्रियासे यह हिस्सा धोया जाता है जब प्राणायाम रखून जोरसे होताहैतो आंतके अंदर वाली हवाको गस्ती पहुंचती है । ऐसी हालतमें अभ्यासी मूल बन्धके जरिये याने गुदाको संकोचन करिक उड्डयान की मदद ल लारी हवाको बैंच कर नाडियोमें पैवस्त करदेगा इस- का हाल आगे बतायेंगे। प्रांतका कुतर याने डाया से. टर करीब एक इंचके है । प्रांत अंदरसे पोली होती है जन इसके अन्दर पल और हवा ज्यादा मिकदारमें भी होती है उस वक्त यह ज्यादा फूलजाती है ।

७३ ) नं० - मेदा वाईतरफ पसलियोंके नीचे और वाहरको निकला हुआ है । अंदरसे खोखला है ।घट बढ़ सकता है। वजन दो कटांकले लेकर तीन छटांक नक और लगाई में दम वारह इंच चौड़ाई में च्यार पांच च । जर इसमें अन्न या जल भरा हुभानहीं होता तो यहसुकड़ा हुश्रा छोटा दिखलाई देता है। श्रीर भरी हुई हालतमें यह फूलजाता है । गिजा और पानी मोजूद होनेकी हालत मेदे पर दवाव पहुंचने के सवव उससे ग्स टपकता है जोखट्टे पानी- के मुताविक होता है। नं० ३ जिगर वजनमें वाईस छटांकसे लेकर तीस- छटांक तक होता है । लंबाई इसकी दम बारह इंच चौड़ाई छै सात इच यह दाहिनी तरफ उदरमें पसलियोंके नीचे कुछ वाहरको निकला हुअा रहना है ठोस है । इसके अन्दर बहुत सारा खून रहता है । और इसमें पित्त बनता रहता जोके दिन रातमें पचीस तीस कटांक तक पैदा होता है। मेदका रसभी दिन रातमें दो तीन सेर पैदा होता है। इसी तरह थूकमी दिन रात, दोसेरसे लेकर च्यार सेर तक पैदा होता है यह तीनों रस अनके पचानमें काम पाते हैं । थूक लुकमे (ग्रास ) को चलाने में और उसको मुलायम और मीठा करनमें मदद करता है । वल्के बोलने पुकारने और गानमें मदद देता है। मेदेका रस तमाम श्रा- हारको पचान याने अन्नके सारे पदार्थोंको उनके दारीक हिस्सों में बनाने में काम आता है । इसीको गरल कहते gher

( ७४ )
हैं क्योंके इसी जगह अन्न भस्म होता है। (यह
खूनमें जज्व होजाते हैं और सब तरहकी ..
मिलाहुश्रा एक गोला बनजाता है)।
नं. ४ लवलबा जिसको अंग्रेजीमें पैनक्रियस्
मांसकी तरहका पतला झिल्ली के मुताबिक चीज
देके साथ साथ नीचेको लगा हुआ है। इसके
एक
नाली है जिसके अन्दर कुछ थोडासा रस पैद
प्रांतमें गिरता रहता है । और हाजमे में मदद
इसका वजन डेढ़छटांकसे लेकर तीनछटांक तक
है और लंबाई आठ इंच । चौड़ाई डेढ़ इंच है। ज
लिखे सारे रस बहुत कम पैदा होते हैं तो कोई दीर्घ
होकर मृत्यु होजाती है ।
नं० ५ तिल्लीको अंग्रेजीमें इस्पिलीन कहते हैं
भी जिगरके मुताबिक ठोस है यहां खून साफ होता
यह मेदेके बांई तरह वाके है । भोजन पचनेके स
इसका वजन कुछ बढ़ जाता है । और मौसमी बुखार
इत तक रहने के बाद इसका वजन असलीसे पाठ
गुना होजाता है । मामूली हालतमें बजन
छटांकसे लेकर साढे तीन छटाँक तक होता है। लंबाई
इंच चौड़ाई तीन इंचौर मुटाई डेढ़ इंच है ।
नं ६ गुरदे इस शरीरमें दोहें कमरकी हड्डीके दोनों तर
हते हैं । कूल्हे (चूतड़) की हड्डीसे अढाई इंच ऊँचे और जि.

( ७५ । योर तिल्लीम इसका ऊपरला हिस्मा का रहता है । इन- में खूनसे ऐशाब बनता है । याने जितना खूनमें मामूल ले ज्यादा पानीका हिम्मा होता है यह मव कृनता रहता है । यह तासीर गुरदेहीकी नालियोंमें है और जगह न- ही । गुम्दोंसे ऐशाव बन कर नालियों के जरिये मूत्राशय में श्राकर जमा रहता है । और हाजतके वक्त. शरीरस परि. त्या होता है । हर एक गुरुदेका वजन अढाईछटांकसे तीन छक तक होता है । हर एककी लंबाई च्यार इंच चौड़ाई अढाई इंच सुटाई डेढ इंच होती है । नं० ७ मूत्राशय यही प्रांत और मेदेकी तरह खोखला है । त्रिकोगा है फूली हुई हालतमें जबके पेशाबमे भरा हुआ रहता है तो अण्डके मुताबिक गोल होता है । जब पेशावसे खाली होता है तो छोटा और सुकड़ा हुआ रहता है । इस हालतमें इसका वजन एक छटांक समझना । नं. ८ यूटरस याने गर्भाशय जिस्को फारसीमें रहम कहते हैं । यह अंदरसे खोखला है । इसकी दीवार मोटी है । लंबाई दो इंचमे लेकर लवातीन इंच तक । चोड़ाई डेढ़ इंच से दोइंच तक मुटाई पोन इंचसे एक इंच तक है । और वजनमें ग्राधी छटांकसे पौन छटांक तक होता है । जब इसके भीतर पूरे दिनोंका वालक होता है तो इसका वजन (तोल ) श्राधसेर तक हो जाता है और लंबाई एक फुट तक और सारे पेटमें फैला हुआ रहता है । शक्ल गेंदके मुताबिक होजाती है।

( ७६ ) नं०६ प्रडकोश मदोंके बाहर और औरतोंके उदर के अन्दर है । औरतोंमें इनका वजन मदास श्राधा है पदों में इनका वजन च्यार च्यार तोला समझना।रोगकी हालतमें ती पुरुष दोनोमें इनका वजन कमती वेशी होजा ताहै । अगडकोश वीर्य को रखते हैं। और इनहीमें वीर्य बढ़ता रहता है । और जहांले वक्त पर निकलता रहता है। ऊपर लिखे नउँ प्रकारकी चेष्टा उदरमें इस प्रकार जानना जले नवग्रहयाने लोकशरीरके ऊपर अपना असर रहते हैं लुसन प्रादमी इनही नोंमेसे किसीके बिगड़नेसे मृत्युको शार होतो है मृत्युलोक (याने उदर) जिसको अपान कह- ते हैं। पीतला जरिया हे रुधिरको परमाणुओंको भृष्टी मान- ना जिसकी उत्पत्ति और नाश याने उत्पत्ती कायलसे पोर उनका नाश शुगरके पलोंके द्वारा होता है । एंव प्रकरण नाड़ीभेद याने नमका यान । यह पहले लिख पाये के नाड़ी याने शिरानमें खून इतके साथ वहता है ! और यह एका दिलके सुकड़. से नाडिमार हानयह मालूम होता है । इससे खून की शिकदार जो नाड़ियों में गमनं करती है । बीस दिल- की दिमारियां पिछानी जाती है पेटके अंदर वालवली नज एक सिन्टों: एक्सोवीससे लेकर एकसोपचार परतला होती है। वारशके वक्त एकसोचालीसरो एक- सोतीस तक । एक वर्षकी उमरमें एकसोतीससे एक

99 )
सो पन्दरह तक । दो वर्षकी उमरमें एकसो पन्दरहसे
एकमो दम ! दो वर्षसे लेकर सातवें वर्ष तक सोसे
नब्ने । चीदहरो इकोस वर्ष तककी उमरमें हिच्यासासे
पिछत्तर तक । इसीसप्ते पेंसठ वर्षकी उमरमें पिछत्तरसे
पंसठ तक । बुढापेमें पिच्यासी और सत्तरके दरम्यान
होती है। यह सब तन्दुरस्त हालतका बयान हुआ।
देखनका कायदा यह है के नाड़ीके ऊपर हलकी रीति-
ने तीन अंगुलियां हाथकी रदै दाहिने हाथकी नाड़ी
बांये हाथसे और बांयेकी दाहिने हाथ से देखे । अभ्यासी
वीमारकी नाड़ी को उस तरफके हाथसे देखेंके जिस
अंगका स्वर चैतन्य है । जितनी मस्तवा नाड़ी फुदकती
हुई हाथको एक मिण्टमें मालुम होय वही अनुमान
संख्या मानना । बीमारीकी हालतमें नब्ज एक मिण्टमें
घटते घटते तीस तक और वढते बढ़ते प्रदाईसो तक होजा.
ती है । बहुत कमती होजानेसे दिल और दिमागकी
बीमारी जानना । और नजकी तादाद ज्यादा होनेसे
गुरदोंकी या उदरके किसी हिस्सेकी बीमारी जानना !
और इस हालतमें खूनका दौरा सुस्त और रवून मामूल
से पतला होता है जैसा जलोदर और पाण्डुरोग प्रा.
दिमें । बहुतसी बीमारियोंमें और मरणके समयसे पहले
या गश या समाधिके पहले दरजेमें नाड़ी इतनी वारीक
चलती है के उसका गिनना मुश्किल है।

(6 ७८ )
जुदा उदा तत्व शरीरमें बर्तनेकी हालतमें
नाड़ीका होता है सो वताते हैं। पुराने बैद्यक
बित होता है के पुरुषके दाहिने अंगकी और स्त्री
अंगकी नाड़ी देखना उचित है। उसका मतलब
में यह है के रोगीके जिल अंगका स्वर चलरहा
तरफ अंगवाली नाडीका देग्लै । जिससे बी
उत्तम निदान होय ।
अगर वैद्य तत्वदर्शी है तो वह बजाय २
रोगीके चहरेसे या अनेक चेष्टासे या उसके नाक
मुख पर दृष्टि डालनेसे तत्व रोगीका मालुम करै
रफ नाड़ीसेही पिछान कर मकेगा । अगर उसने
पर या रोगीयोंपर लगातार दो च्यार वर्ष तजुरबा
लिया है । ऐसा तत्वदर्शी जुद जुदे तत्वसे पीडित
पारको निदान अनुसार जल्दी फायदा पहुंचा सत्ता
अतित्वके बर्तनेमें नाड़ी जल्द जल्द और वारीक
है। और आकाशतत्व बर्तने के समयमें नाड़ी दर्द
हलकी और तादाद में ज्यादा होगी । जल पृथ्वीके
में नाड़ी मन्द मन्द इकसार चालसे चलती मालुष
गी। तादादमें मासुली और तीनो अंगुलियों के
इकसार. धार वाली मालुम होगी । हलके दबावसे
पर कुछ असर नही होगा । सुषुम्ना तत्वके योगमें
देखना या दिखलाना दोनो निषेध है ।

( 8 )
माल्हवां प्रकरगा स्वासमंद।
जवान तन्दुरस्त श्रादमी एक मिनिटमं पन्द्रह मरतबामे
न कर अठारह नक स्वाम लेता है । जितनी में श्रादमी एक
स्वास लेता है उतनी ही देरमें नाड़ी पांच टफ चलती है याने
उकलती मालुम होती है । इसी प्रमागसम्वास और नाड़ी
का हाल जानना ।लेकिन जब आदमी लम्बे और गहरे स्वास
देर तक खंचता है या बहुतजल्दी हलके और उथल स्वास
लता है तो ऊपर लिखा प्रमागा कायम नहीं रहता। और
साही रागकी हालतमं ध्यान में तादाद बहुत कम होजा.
ती हैं । और समाधिम स्वास और नाड़ी दोनो चलने वन्द
होजात हैं । मामूली श्रादमीक तन्दुरस्त हालतमें चौबीस
घराठीक अन्दर स्वास २१६०० मरतबा चलता है इस हिसाब
से मनुष्यकी श्रायुष्य याने उमर वानवे करोड़ स्वांसकी लि-
ग्वी है । बीमागकी हालतमें स्वांसकी चाल बजाय पन्द्रहके
एक या दो तक या फी मिनिट अस्सीतक होजाता है । कस
स्त करने या दौड़न के समय स्वासकी तादाद बहुत बदजाती
है । परन्तु सोनकी हालत कम होजाती है । बांई करवट
सोनमें स्वासकी तादाद मामूली और दाहिनी करवट लेटनेमें
तादाद ज्यादा होती है । फेफड़ों की बीमारी में या जलन्धर
श्रादि गंगमें या गर्भिणीक स्वासकी तादाद ज्यादा हो.
ती है । शरीरमें जब ग्यून गादा होता है या गंगी होता है
उस वक्त तादाद ज्यादा होती है । बहोगी यार ननकी
छालनम तादाद कुछ कम हो जाती है।

(८०)
सतारहवां प्रकरण शरीरके आश्रय जो ।
उनका वर्णन याने प्राण अपानका ज्ञा
मनुष्य शरीर मरदके वीर्य और स्त्रीके रजले ।
बनता है इससे साबित होता है के जितनी तरह के पद
पुरुषमें मौजूद हैं वह सब मिलकर गर्भको तैय्यार क
याने पांचोंतत्व और सच प्रकारकी वायु। मनुष्य
जो वायु वर्तमान है उसमें पांचोंतत्व मौजूद हैं। अब
लं यह पैदा होता है के धरतीके चौगिरद वाली हवा में
में वायु और अग्निकेही परमाणा विशेष करके रहते
वाकी तीनतत्व शरीरमें किस प्रकार दाखिल होते
समझाते हैं के श्रादमी भोजन और जलके द्वारा बार्की
तीनतत्वोंका हासिल करके पांचोंको बराबर कार
भोजनमें जल वायु और पृथ्वीके जुज बहुत होते हैं।
तरह जलमें जल और अग्निके अादमी श्राकाशके
भोजनसेही हासिल करता है। रुधिर अन्न और जलके लि.
से बनता है। इस लिये रुधिर पंचतत्वकी बनी हुई
मानना । शरीरके आश्रय वायुके विभाग दो प्रकार
एक प्राण, दूसरा अपान, और फिर अपान के नव भेद
असल में यह सब कुछ प्राणही हैं । परन्तु जुदी जुदी ।
पर जुदी जुदी खासियतले नाममें भेद होगया।
1
,
नं. १ प्राणवायु बनिसबत और जगहके दिल श्री
फेफड़ों और नाड़ियों में विशेष रहती है।

( ८१ ) नं० २ अपान बड़ी प्रांत में रहती है। नं० ३ समानवायु छोटी प्रांतोंमें और लैक्टिरल्ज़ (एक प्रकारकी रसकी नाड़ियों) में रहती है । नं० ४ नागवायु यह मेदेमें रहती है। नं०५ उदानवायु यह कराठसे लेकर मेदे पर्यत जो नाली है उसमें रहती है जिसको अंग्रेजीमें ईसाफैगिस् औ फैरिङ्कर कहते हैं। नं. ६ देवदत्तवायु यह मुखमें रहती है। नं० ७ कलवायु उदरके वाकी ओर हिस्सों में रहती है। नं०८-६ व्यान और धनञ्जय त्वचा वा कर्मेन्द्रियों में रह- ती है। नं० १० कूर्मवायु ज्ञानेन्द्रियों में रहती है। नं. १ प्राणवायुकी मददसे श्रादमी स्वास लेता छोडता है जिससे शरीरका पोषण और मलका त्याग होता है। नं० २ अपानवायु की मदद से सारे अन्नका मैल शरीरसे परित्याग होता है। जोके बड़ी प्रांत में भरा रहता है और हाजतके वक्त खारिज होजाता है । इसका बासागुदामें इस बजहसे बतायाके मलका ज्यादा हिस्सा गुदाके ऊपर बाले हिस्से में रहता है। याने गुदासे लेकर बारह अंगुल ऊंचे तक वाले भागमें पल भरा रहता है।

( ८२ )
नं०३ समानवायुकी मदद से अन्नका रस
प्रांतमें रहता है और पतला सफेद रंगका ह
पंचता और खूनमें मिलने लायक होजाता है इ.
को योग में क्षीरसागर समुद्र कहते हैं । यह रस रवून
है। इसी लिये क्षीरसागर समुद्रकी महिमा वर्णन
जिससे सारे रत्न निकले। समान वायु नाभिस्थान
ना इस लियें बताया गया है के सारा ऊपर लिखा
नाभि वाले भागमें है।
नं० " नागवायुकी मददसे श्रादमी मेदेमें भरी हुई
मुंहके रस्तेसे वाहरको निकालता है जिसको डकार कर
इससे यह फायदा है के मेदेमें गिजा नही सड़ स
बलवत्ता बदहजमी या कोई बीमारी होती है तो छ ।
खसावभी पलट जाता है।
न० ५ उदानवायुकी मददस श्रादभी प्रासको निगल
काहै । और गिजा मेदेमें पहुंची हुईको लौटकर नहीं
देता।
नं. ६ देवदत्तवायुकी मददस प्रादमी मुखका और रूमि
का मैल त्यागता है याने जम्हाई लेकर वायुको त्यागता है
:. सं.७.कृ.कलवायुको मददसे उदरमें खूनका दौरा अ
प्रकार होता रहता है और यह उदरकी सारी पोलमें व्याप्त

इसीकी चैतन्यतास भग्न प्याम जागती है । और जब यह कम मिकदा रह जाती है । जसा जलोदर ग्रादि गंगौ । जवके बजाय पोल होने के जल भरा रहता है तो सूख प्या. ल कम होजाती है। लं०८-६ व्यान और धनत्रएकी मददम यादमीका शरीर कान्तिवाला और अन् स्वरूपका रहता है इस वायु के कमती होने से त्वचांक नीचे वाली वीकी मिकदार घट जाती हैं इमलिये श्रादमी दुबला और बेडोल होजा. ता है। इस वायुसी मिकदार बदजानस अादमीका शरीर फूल जाता है जिमको मुटापा कहते हैं। यही वायु शरीर- की सब प्रकारकी चेष्टाओं में मदद देती है। इसीलिये कमें न्द्रियों में इसका वामा है। अंगम्फुग्गा व्यानकी मददमे होता है। नं० १० कमवायुकी मदद से श्रादमी बाहकी वस्तुप्री- का ज्ञान पाता है इमलिय इसका वासा ज्ञानेन्द्रियोंमें बताया गया। पलक मूंदना और खोलना । इसी तरह से गुदा, लिंग और भगका संकोचन विकांचन इसी वायुकी मददसे होता है इसीलिये कर्मका वासा पलक और गु- दामें बताया गया। क्योंके कूर्म याने कछवेका काम अंगों के संकोचन और विकोचनका है इसलिए इस वायुका नाम प्रकृति अनुसार कूर्म रखा गया। योगी भली भांति नव प्रकारकी अानको शुद्ध करके प्राण के समान एकर्म (८) द्वारा बना लेता है। प्रागा को पुरुष या तात या शिव कहते हैं। और अपानको शक्ति या माता या स्त्री कहते हैं। प्रा. गा के द्वारा शरीर चैतन्य रहता है। और अपानके द्वारा श- रिका पोषण । अपान जमीदारके तौर पर जानना । और प्राण बतोर राजाके । इसी तरह प्राणा को बुद्धि रूपी जानना जिसकी मदद से अपान शरीरमें सारे काम वाजबी तौरसे क- रता रहता है। अठारवां प्रकरणा शब्द वान । पन (याने चित्त) इतना चंचल है के एक क्षण भर भी चुप नहीं है । और अन्तसमय तक उम्मद भी नहीं के स्थिर होसके । इसलिये बुद्धिमान लोगोंने तदबीरें सोची है के जिससे कुछ देर के लिये बासना हटजावे । फिर अगर ऐसा होता रहेगा तो अभ्यास होनेसे मतलब निकल आवेगा। देखिये चाहे कोई कष्टहो या दारिद्रता हो या संपत्तिहो या राज हो अथवा फकीरी हो पहले पहले ज्यादा दुःख या सुःख व्या. ता है। लेकिन जब श्रादमी किसी एक अवस्थाको बहुत दि. नोंतक सुगतता रहता है तो उसके सहने की आदत होजा. ती है या अरुचि पैदा होती है। यही हाल शरीर भुगतता रहता है। जब आदमी दुनियां को यह समझ करके कि यहभी कुछ हकीकत नहीं है और इसकी लालसा दुःखके देने वाली है तो फिर वह विशेष लाभ चाहता है। और रास्ता तलाश करता है. जो योगमार्ग समकना । यह योग अपनी सोलहै (८५) कलायास सर्व मृष्टिक अन्दर प्रकाशित है। इसका खुलासा बताते हैं । शब्द योगली जड है । ध्यान शाखा है । और अनेक पत इस इतके पत्तं जानना । जर आदमी पहले पहले ध्यानमें बैठता हैं और दशों इन्द्रियोंका काम बन्द करके एक तरफ सुम्त लगाता है तो उसे सबसे अब्बल मकारवनि दिमागमें सुनाई देती है यह ॐ है । कुछ दिनों तक एकही प्रकारका शब्द सुनाई देता है । अभ्यास के कई महीनों पीले इसी शब्दका मोहं इस प्रकारसे सुनाई देता है जो पहले पहलं कण्ठ और हृदय पर और कई वर्ष पीछे नाभि पर सुनाई देने लगता है। और गफलत या- ने बहोशी पैदा होजाती है। निलकुल शरीरका होश नहींरहता अगर कोई आवाज कानमें पहुंचाई जावे या कोई सुगन्ध नांकमें तो इसकी उसको खबर कुछ नहीं होती। इस दरजे में अभ्यासीको अनहदशब्द बजाय सोहके सुनाई देता है। शुरूमें उसको दसों में से किसी की पहचान नहीं पड़ेगी लेकिन मुद्दत तक अभ्यास रहनेसे और योगीका मन लय होनेसे यह अनहद माफ तौरसे सुनाई देने लगेंगे। यह दर जागीतारों, पैगम्बरों और उत्तत महात्माओं को नमीव हु- या है। ऐभी अवस्थामें इल्हाम याने आकाशवाणी होती है। और आंखसे छिपी हुई सब वस्तुओंके देखनेका ज्ञान हो- ता है जिसके पीछे योगीमहाप्रकाशका देखेगा अगर उस- ने इमको सहन करलिया के जिसके पीछे अंधेरेमें जाना है याने विश्रामकी जगह तो वह मन प्रकारकी मृष्टिका ज्ञाता

( ।
होसकता है परन्तु बगर पूर्व सचिनक यह फल नाही
प्राप्त होता यह ता शदकी उपमा कही । परन्तु अब जो
दशा शरीरकी इस श्रास्था में होगी सा बताते हैं। जोःपा.
द.मी रोगी है या कमजोर है या उसका देह मल. या पडू
पाधिस शुद्ध नहीं है उसका ऊपर लिखी दशा प्राप्त होना
नामुमकिन है मिर्फ पुराने अभ्यासीको और उत्तम ग्रा.
चरा वालका किंचित् प्राष्टि होती है । शरीरकी शुद्धि, बहुत
जरूरी बात है। शरीर और यात्माका सम्बन्ध अनादि है
और इसी लिय अहिंसाका मत निकला है । जो आदमी
शब्द के जरिये ब्रह्म ( कर्तार) को पहचानने की कोशिश में है
जैले कोई आदमी सूर्यको किरमाके द्वारा सूर्य में प्रवेश कर ।
जब कोई प्रादमी किसी शरीरका दुःब देतो वह कब यह
यकीन दिला सक्ता है के उसने आमाको दुःख नहीं दिया
क्योंके आत्मा वगैर शरीर के किसी जगह मौजूद होना न.
ही सावित होता । इसी तरह आत्माको क्लेश पहुंचाना जो
के इम शरीरमें प्रकाश रूप है या परमागाकी ज्योति है।
जस सूर्य की किरमा सूर्य की ज्योति है । कभी ईश्वरकी प्रा.
ज्ञाका पालन नहीं कहा जा सका यहतो शब्दका मत
है । जो श्रादषी किसी प्रकार भक्ति उपजाकर या सूर्ति
आदिका सेवन करके अपने श्रात्माको शुद्ध करते हैं और
उत्तम अाचरणोंल देहको शुद्ध रखते हैं वहभी शब्दके ज.
रिये हासेल हुई हुई सिद्रियों को प्राप्त होते हैं। जो लोग
बजाय मोहक गम गम इम शब्दं पर ध्यान देते रहते हैं

( ८७ ) उनको इसी तौर सुनाई देने लगता है। दश प्रकारके वाजात्रों के नाम बता देते हैं। जिनको अभ्यासियोंने इस अवस्थामें सुन कर समझाया है । भंवर गुंजार धरूकी आवाज। शखका शब्द । ताल मंजीरा । मुरली का नाद । मेरकी आवाज। मृदंग नफीरी । सिंहकी गर्जीमेघका शब्द । उन्नीसा प्रकर्ण षट् उपाधि वर्णन । ध्यानके वास्ते जरूरी बात यह है के कोई उपाधि नसतावे और तवियत एक तरफ को लगी रहै और कोई विघ्न बीच में नहीं पैदा हो सो नीचे लिख कर स- मझाते हैं। डकार, जमाई, हुचकी और अपान याने वायुका गुदासे निकलना यह च्यारों उपद्रव अपानवायुसे ताल्लुक रखते हैं । इसीमें पेशाव, पाखाना, की हाजत होना वमन याने के होना या जी मचलाना शामिल है। छींक और खांसी यह दो उपद्रव प्राणवायु के हैं। इसमें हसना चिल्ला- ना और गाना शामिल हैं। उपद्रव निवारण विधि लिखने हैं के जिसके हमेशा साधते रहने से क्लेश ध्यान में नहीं उत्पन्न हो सकता। नं० १ डकार खाना खाने के समय तीन आचमनसे ज्या- दा पानी न पीये। मौन रहै । पालती पालती मारके बैठे गांये हायसे दाहिनी जांघ के अर्द्धभागमें अन्दरूनी हिस्से को पकड़े रहै । बोलता नहीं रहै । और न ऊकडू बैठ कर भोजन करै क्योंके बोलते रहने से हवाकी ज्यादा मिकदार ( ८८ ) मेदे में पहुंचेगी । और यह ही डकार का कारण होगा ऊकडू बैठने से अपान खारिज होने का या पेशाव या बीर्य के निकल जानेका अंदेशा है । और के इस बैठकसे आकाश तत्व भी हो सकता है । इसलिये दोनों बातें क. रना मना है याने वर्जनीय है । बदहजमी में खाना न खाय । पानी हमेशा मेदेमें खाना पच जाने के पीछे बांये स्वरमें पीवै। नं० २ जमाई जीभ को उलट कर तालुमें लगाया रखने से या कोई चीज मुहमें चबाते रहने से थूक बराबर पैदा होता रहता है । इस लिये मुंह खुश्क न होने से जहाई नहीं श्रावैगी । दिमागी महनत ( याने विचारके मु. ताल्लिक ) के पीछे और प्राणायाम के पीछे जमाई पाना दिमागके थकजाने की अलामत ( चिन्ह ) है जब कभी जमाई श्राने को होयतो जीभ को तालवे में लगा कर मुह बन्द करके नांकके सुराखों से हवा का परित्याग करै । cho नं० ३हुचकी अक्सर बदहज़मी उदर रोग या दिमागी बीमारी से या मरण समय चला करती है। तन्दुरस्ती में क- भी कभी यह डाया फराम उजले की अचानक हरकत से पैदा होती है । (डाया फराम उजला याने मासका चौड़ा पतला झिल्लीकी सूरत का पडदा है जो हृदयको उदरसे जुदा करता है । और सांस छोड़ने में मदत देता है) इस लिये इस उपद्रव को रोकने के लिये शीतकार और शीत हैं पई) ली कुमक करने वाजिव हैं। जिनसे बदहजमी दूर होगी तमाम कुंडलिनी के भारगकी खुश्की दूर होजायगी और अधिक रस पैदा होगा। इस रीतिसे दीर्घ कालकी हुच- की भी बन्द होजाती है। कुभक की युक्ति हठयोग में वर्णन होगी । सुगम गति और बताते जीभको शक्ति अ. नुसार मुंहसे बाहर निकाले और देर तक निकलाही रक्खे इसी प्रकार वारंवार देर तक जीभको बाहर रख कर फिर मुंहके भीतर लेजाय । इस हालतमें मुंहसे ही स्वास श्रावे जावेगा। न० ४ अपान अपान मलके देर तक पातमें रहनेसे या उसके सड़ने से किसी दवा या मसालेदार चीजोके खाने से या तेलके इस्तेमाल करने से या पेट पर मालिश करवाने से या ऊकडू वैठने से करवट लेकर वैठने या लेटने से या आत और मेरे पर तुरत रखने से वायू गुदासे खारिज होती है इस लिये वाजिब है के जब पाखाने जाय और मल गुदासे खारिज होचुके फिर जहां कहीं बोझ सा मालुम हो वहा आहिस्ता आहिस्ता पेटपे हाथ रखके सरकावे और आगे पीछे पेटको हरकत दे तो मसेड़ीसी मालुम हो- कर आंतमें से मल और हवा निकल जायगी आदमीको चाहिये हमेशा सीधा खडा होना और सीधा बैठना उत्तम है । कसरत करना, फिरना और चित्त लेटनादाहिने स्वरमें करै । पेशाव पाखाने के बेगको रोक नहीं। मालुम रहे के

(8)
डकार और अपान हमेशा वायुतत्वमें वर्तते हैं सो भी
वांये स्वर में ज्यादा । हुचकी और नराई यह दोनो दा-
हिने स्वरमें विशेष और बांयेंमें कम । जमाई अग्नितत्वमें
और हचकी वायुतत्वके कोप वर्ताकरते हैं ।
नं० ५ छकि अगर कभी कुदरती तौरसे आये तो रो-
कना अच्छा नहीं क्योंके मस्तको दर्द पैदा गेजायगा ।
अगर बीमारी की हालत में इसका वेग ज्यादा होयतो मुं.
ह खोलके स्वांस्त्र ले और छोड़े। और हर घराठे में एक एक
मिण्ट ऐसा करै । छींक हमेशा आकाश तत्वमें आती है। खास
कर जब दाहिना स्वर चल चुकाहो और प्रकाश आया हो ।
नं०६ खांसी अक्सर अाकाश या वायुतत्वमें जाती है।
बांये स्वरके योगमें विशेष रहती है। और दिनकी जिसबत
शत में ज्यादा इस लिये बहुतही सुगमरीति बताते हैं
के जब तक खांसी और जुकाम बने रहैं बांये स्वरके यो-
गमें गरम पानी खूब प्रेट भर कर पाना चाहिये । और रा.
विमें कभी श्राहार न पावे । जीमको उलटा करके तालवे में
लगाये रहने से और जलन्धर बन्ध से खांसी बिलकुल
रुक जाती है।
वीसवां प्रकर्ण सप्तासमुद्रवर्णन ।
शरीरमं सात प्रकारके रस हैं जिनको योगियोंने
सात समुहके नामस वर्णन किया है।
नं १ थूक इसको अमर वारुणी अमत या रस
P

(१) कहते हैं । यह कानके सामने वाली जबाड़े वाली और जुनानके नीचे वाली गिलटियों से निकलता है । इसकी मिकदार पहले लिख पाये हैं । जब तक प्रादमी मुंह लाता रहता है या कुछ चबाता रहता है या जुबान को उलट कर तालवे में लगाये रखता है तो यह बराबर पैदा होता रहता है। सोती हालत में, और समाधि लगने में, और खोफ ( डर ) की हालत में, तेज़ बुखारों में कब्ज में, जीम और मुंहकी गिलटियों के सूज जाने में, आकाश तत्व के चलने की हालत में , शंखिया श्रादिके जहर में, बहुत ही कम पैदा होता है । पागल के और बदहजमी में ज्यादा पैदा होता है। , नं० २ मेदे का रस यह रस उस वक्त पैदा होता है जब मेदेमें गिज़ा मोजूद होती है । यहही रस अन्नको मेदे में भस्म करता है । मेदेको शिवजीका लोक जानना और जैसा उनके कण्ठमें जहर रहता बताया है तैसे ही इस रस को उसके समान जानना । जैसे महादेव को जल- धारा प्रिय है वैसे ही मेदा भी खाली होने की हालत में। पर चन्द्रस्वर के योग में जलको खेंचने की बड़ी सामर्थ्य रखता है और नहीं थकता है । यह रस सब रसोंसे ज्यादे जुरूरी चीज है इसके बगैर कोई जानदार अन्न वा जलको पचाने की सामर्थ्य नहीं रखता। कोई छोटे से छोटा कीड़ा भी इस सृष्टी पर नहीं है के जिसके मेदा न हो । इमी-

(६०)
लिये तीनों देवताओं में महादेवकी महिमा विगेषवर्णन
कित है । यह रस बाई करवट सोने से ज्यादा और अच्छा
पैदा होता है । और दाहिनी करवट सोनेमें बहुत कम
क्यों न तो भोजन का दबाव मेदेके फैले हुये हिस्से में
रहेगा और न सोलरप्लिक्सिसके मुकावेल में गिजा
रहेगी । बल्के गिजाका दवाव मेदेके तंग याने दाहिने
हिस्से पर होगा । और जिगर पर मेदेका दवाव पड़ेगा
इस हालतमें पित्त भी कम पैदा होगा । इसलिये हम
सलाह देते हैं के इस रसके पैदा करने की ओर उत्तम
बनाया रखने की कोशिश करे इस के मोजूद रहने पर
छोटी बीमारियों का तो क्या कहना तमाम कडा प्रयकर,
रोगी जो बबाई (फैलने वाले) में गिनती है कभी भी
नहीं सता सत्ता
नं० १ जिगरका रस इसको पिला कहता हैं । यह ही
जीवनका मूल है । इस स्सके बगैर मेदे से पचा हुश्रा भो.
जन रसकी सूरत में नहीं होसक्ता यह विष्णु रण करके
मानना । यहही रस पश्वारे की चीज है । बाई करवट
सोने की हालत में यह रस ज्यादा बनता है । इसलिये
पचने की शक्ति को बढाता नै । यसका सवाद कड़वा है
और पीला सब्जी मायल रंगत का है। जब कभी यह रस
पदा नहीं होता है तो आदमी को सख्त बुखार और कब्ज
होता है। या सफ़ेद रंगके पतले दस्त शुरू होजाते हैं।
या हालत हैजेकी बीमारी में या पहाड पर रहने वालोंको

(8) या कसरत से नरक का पानी पीने वालोंको चने की - रती का पानी पीने वालोंको या अफीम खाने वालों को भुगतनी पड़ती है। अगर यह रस याने पित्त पतला हो और उसी हालत में कब्जी या तुरखारकी बीमारी होतो खून में शामिल हो जाता है । जिसकी फारसी में यरकान हिन्दीमें पीलिया कहते हैं। नं०४ लबलवेकोरतूबत यह रस लबलबे से निकलता है और खारा होता है और गिजा के पचने में मदत देता है। नं०५ प्रांतकी रतूबत याने रस यहभीखारा है। और जस मेदे पर गिज़ाका दबाब होनेसे रस पैदा होता है इसी प्रकार इसमें भी अन्नका ग्स मौजूद होने की हालत में रस टपकता रहता है जो पचने में काम आता है । जब यह रस ज्यादा पैदा होता है। जैसे जुल्लाबकी हालत में । तो इसीके मिलनेसे पखानेकी मिकदार ज्यादा होजाती है । जब यह कम होता है तो पेचिशकी बीमारी हो जाती है। मामूली हालतमें गिज़ासे खून बननेके यह ही जगह है क्योंके इसी रससे खून वनता है । जो यह उत्पत्ति का जरिया है । इसलिये ही नाभीमें ब्रह्माका ध्यान बताया है सो आगे बयान होगा। इसी तरह क्षीरसागरका और मथनका बयान होगा। और उसीसे चौदह रत्न की उत्प- लिका याने धातु उपधात का बयान होगा।

(६४) नं० ६ लिए यह रस खून से उत्पत्ति होता है और उसीमें शामिल होजाता है। जैसे बर्षा समुद्र से । नं०७ दूध भरद औरत दोनो में इसकी जगह मौजूद है जिसको छाती कहते हैं । परन्तु जरूरत के मुताबिक कुदरत से यह इन्तजाम है के जब कोई अंग ज्यादा काम कर- ता है तो उसको खाना ज्यादा मिलता है। सोजब औरत गर्भसे होती है तो औरत की छाती में यह रस गर्भाशय के अपर बालक का दबाव पहुंचने से इस प्रकार पैदा होता है । जैसे दुःखकी हालत में प्राखसे आंसू ! और जब बालक गोदीमें होता है और छाती को चूसता है तो यह अंग बहुत काममें आने से बढ़जाता है और गिजा बच्चे के वास्ते पैदा करता है। योगीको अभ्यासके श्रारखारी दरजे जे में जब ईश्वरसे मोह पैदा होगा तो उसका खून दूधकी रंगत में बदल जायगा। जैसा औरत को अपने बच्चे के मोह याने प्यारसे यह रस ज्यादा पैदा होता है । ऊपर लिखे सा. तो रस रुधिरसे पैदा हुये जानना । जिस मनुष्य के यह सातों इस उत्तम प्रकार बने रहते और पैदा होते रहते हैं उसको स्वर्ग भोक्ता जानना। इक्कीसवां प्रकर्ण शरीरके मल यानो नरकका च्यान। शरीरमें जैसे रसका बयान हुअा और जैसे उसका संबन्ध ..

(५)
रुधिर से बताया तैसेही अव सात प्रकारकेमल जिनको खून
का मैल कहना चाहिए सो बताये जायेंगे ।
कफ यह पल है फेफडों का पीप मलहै रुधिरका पाखाना
मलहै अन्नका । सूत्र मल है रुधिरका । पसीना मल है त्वचा
सानो जिल्हका वीर्य और रजमल है कुल शरीरका । आंसू
रीट कानका मैल । यह जुहे जुदे इंद्रियों के मल कहाते हैं ।
नं० १ कफ खून और हवा फेफड़े में शामिल होता रहा
ता है जब भोजन का रस भली भांति न बनने से रुधिर
गाढा होता है तब खून में मिले हुये अन्नके अजजा याने
हिस्से प्राणवायु से संगम पाकर सड़ते और कफ पैदा कर
ते हैं जब रुधिर निर्मल होता है तो खांसी कफ वगेरह की
बीमारी नहीं होती यह सिद्ध होचुका है।
नं. २ पीप जब वदना का कोई हिस्सा हवाके मुकाविल
रहता है के जहां रुधिरमें हवाका प्रवेश हो सक्ता होतो
हवामें रहने वाले जानवर उस जगह घुस कर रुधिरमें बढ़
जाते हैं। और ऐसी हालत] अगर खून कमजोर है तो
यह जानदार जगह पकड़ लेते हैं और मुद्दतों तक पीपकी
शकलमें खारिज होते रहते हैं ।
नं. ३ पाखाना यह अनका मैल है । जब अमका रस
बन चुकता है तो उसके निकम्मे हिस्से जो खून में शामिल
नहीं होते वह गुदाके रस्ते खारिज़ होते हैं । याद: हो-

। ६६ ) गा महादेवका बासा मेदे में बतलाया गया है। अब हम गुदाको गणेशका बासा बताके सिद्ध करते हैं । गणेशजी को महादेवने अपने शरीरके मैलसे रचा जैसे भोजनने मल तैयार किया लेकिन महादेवजी नेतमाम देवताओंकी महि- मासे बल्के अपनेसे भी ज्यादा गणेशजीकी महिमा वर्णन करके सबसे पहिले इसको पुजवाया । इसी तरह शरीरमें समझना के अगर कोई आदमी भोजन पाता और मेदेमें पचाता हो परन्तु उसके मलका त्याग न होता हो तो वह जी. वधारी सिर्फ पचालेने से सुख नहीं पासक्तता है वल्के उस- को शरीका परित्याग करना होता है । इसलिये सिद्ध होता है के मलका त्याग भोजन पचालेने से ज्यादा जरूरी है। गुदाके साफ करने को गणेशक्रिया कहते हैं। और इस जगह को सूलदार और गुदा के संकोचन क्रियाको मूल बन्ध कहते हैं । यह ही योगकी शुरू क्रिया हे जिसके गणेशपूजन कहमक्ते हैं। जिसको साथै वगैर योग और भोग नहीं सघसक्ते । इसी हिस्से के जरिये बेशुमार चीजें पचती और रुधिर में शामिल होसक्ती । यह हिस्सा हाथीके सूंडके से आकार वाला है और सारी तासीर गणेशजी की तासीरसे अनुमान करलेना। नं० मूत्र आदमी जितना पानी पीता रहता है उस- में से जितना हिस्सा खूनमें मिल सकता है वह तो उममें मिल जाता है बाकी सारी गुरदोंके रम्ते से टपक

! ६१
कर और मूत्राशयमें जमा रह कर लिंग द्वारा शरीरस वा.
हर निकल जाता है।
नं०५ पमीना अगर ऊपर लिखे मुताबिक पानी का
हिम्मा जिल्द याने लवाक स्तं निकलताहै बह पसीना
कहाता है।
नं ०६वीर्य ग्रार रज यहभी मधिर के मेल समझना ।
जो अपने वक्त पर गिरस परित्याग होते रहते हैं ।
नं० ७ ग्रांसू सेंट और कानका मैल । यह मल इंद्रियों
स समय समय पर खारिज होते है ।
जिस आदमी के शरीरमें सब प्रकारका रस मामूली
तोरस पैदा होता रहै और सब मलका परित्याग मामूली
होता रहै तो वह स्वर्ग भोक्ता जानना ऊपर लिखी चि.
कित्सा से सावित होता है के रुधिरमे ही सब प्रकारके
रस और मलकी उत्पत्ति है ।याने एकही चीज से दोपकार
की वस्तु पैदा होती हैं जो एक दूसरे के वरखिलाफ है
यह सिर्फ संगतिकाही फल है इस लिये जा आदमी सत्संग
करेगा तोसर्गको प्राप्त होगा नहींतो कुमंगसे नर्क भोगेगा
वाईसवां प्रकर्ण पदचक्र वर्गान ।
यह असलमें अपानवायुक स्थान हैं। जिनकी जगह
ऊपर बयान कर चुके हैं । । और इन्ही के शोधन की रीति
को षट्कर्म कहते । अपान वायुके प्रबल करने और शुद्ध

(३८) करने के वास्ते षट्कर्म और ध्यान जरूरी बात है। और यह ही कुंडलिनी का ज्ञान है। ध्यान यान सुरत दीये रखने ले सारे अंग बलवान होते हैं । अपानको बल- वान करने से जगत की सारी सिद्धियां प्राप्त होती हैं। और प्राणको बलवान करने से ईश्वर सम्बन्धिनी वस्तुओं का ज्ञान होता है। ध्यान के वास्ते जरूरी बात है के किसी आकार या शब्दका आश्रय पकड़ा जाय जिसके वगैर ध्यानही लगना नामुम- किन है जैसे निराकारको साकार बतायें बिदून बुद्धि अनुमा- न नहीं करसक्ती। इसी तरह ध्यान भी बगैर जुक्तीवा श्रा- श्रयके समझमें नहीं आसक्ता । अगर कोई आदमी अपान याने षट्चक्र को वगैर शुद्ध किये प्राण याने ऊपर वाले चक्रों का ज्ञान हासिल करना नाहैतो उलको महामूर्ख जानना । जैसे बिदून अक्षरके ज्ञा- नके कविता का ज्ञान होना समझ में नहीं प्रासला। ध्यानकी विधि। नं० मूलाधारचक्र गुदाको कहते हैं । श्राकार इस हिस्से का हाथ की सूंडका साहै । च्यार पंखड़ी ( उजलात) का कमल है। दो से यह कमल खुलता और दोसे यह बन्द हो ता है। इस जगह गणेशका बासा है । इस जगह ६०० जप करना । याने इस कमल पर इतनी देर सुरत लगाय रखना जितनी देरमें ६०० स्वांस भुगतते हैं । याने ४० मिगट तक (E) श्रादमियों ने यह देखा होगा जैसे गणेशजी में खूब खाने की सामर्थ्य है वैसेही इस हिस्सेके जरिले मेदेखें भी क ई गुणी कमी देरमें अनेक वस्तु पचती और खूनमें शा. मिल होकर असर पैदा करती हैं । इसलिये यह अंग महाब- ली है।सिद्ध प्रासनले ऊपर लिखी क्रिया करना योग्य है। नं०.३ स्वाधिष्ठान चक्र यह मूत्राशय है जो छै पंखड़ी वाला है । इसी चक्रमें अरडकोश स्थान वीर्य और रजस्थान लिंग,मग और गर्भाशय शामिल हैं । मूत्राशय पीले रंगका फीका कमल है। यह चक्र सुख प्रासनसे सिद्ध होता है । ब्रह्माका ध्यान इस चकमें करना इसलिये बताया गया के यह सारे स्थान उत्पत्ति से ताल्लुक रखते । इस चक्रमें ६००० जप करना याने ६ घंटा चालीस मिण्ड-तक सुरत दिये रखना। नं० ३ नाभिकमल याने मणिपूरकचक्र दश पंखड़ी वाला कमल है।इसका रंग नीला है। यहां विष्वाका ध्यान करे । इस हिस्से में छोटी आंतें शामिल हैं । बाकी और हिस्सा उदरका जिसमें गुरदा, जिगर, तिल्ली, है वह भी शामिल । विष्णु का ध्यान इसलिये बतलाया के यह सारा हिस्सा शरीर के पोषण से ताल्लुक रखता है। यहां भी६००० जप करना। नं० ४ हृदयकमल इस स्थानमें मैदा है इसका रंग बाहर से सपेद है । य हिस्सा दिलसे बहुत पास है। The

(१००)
जब भूबन्ध और उड्डयान बन्य से सारी अपान खिच
कर सोर जाती है। जिसके पासमें प्राण का शब्द
सौजद है याने दिलके अंदर वाला सोहं शब्द । जब ऐसी
हालत भाणा, अपान,की मौजूद होतो अनहन प्रकट होते हैं।
जैसे ढोलके भीतर भीहवा होती है और बाहरभी सिर्फ जगती
ही ठबक लगने से ही शब्द होने लगता है । वैसाही
हाल इस वक्त मेदा और दिलके परस्पर संबन्धसे जो
शब्द उपजता है उसको अनहद बोलते हैं । मेदेके मु.
काम पर अपान के इकट्ठा होजाने से और ऊपर लिखा
शब्द प्रकट होने से मेदेका नाम अनहदचक्र हो
जया । यह बारह पंखडीका कमल । यहां भी ऊपर
लिग्वे मुताविक ६००० जप करना । यहां महादेवका ध्यान
करना । इस ध्यानकी वजह यह है के इस जगह
सारे पदार्थ भस्म होते हैं । और महादेवका कायमी
भस्म करने याने मारने का है । इस लिये प्रति अनुसार
है
जप बतलाया।
नं० ५ विशुद्धचक्र यह सोलह एखडी का कमल है।
याने सोलह उजलों से बना है । खेदेसे लेकर कराठ
पर्यंत का भाग इसमें शामिल है इसका रंग धुन्धला है।यहां
इतनी देर जप करे जितनी देर में एक हजार स्वास भुगतते हैं।
नं० ६ कंठसे लेकर सारे मुखका हिस्सा अकुटी पर्यन्त तक
शामिल है । उसको प्राण्याचक कहते हैं । इसमें तालु
हैं

(२.०१
मूल और नांव के रस्ते शामिल हैं। यह ६४ पंखाडीका
है याने इस जगह ६४ उजले काम करते हैं । इस जगन
इतनी देर निगह दिए रखना चाहिये जितनी देर में एक
हजार स्वास भुगतते हैं।
पहले चक्र ध्यान देताहनेले शरीरमें कान्ति और बलबढता है
दूसरे से वीर्य पुष्ट होता है काम जीता जाता है ।
तीसरे से शरीर में अत्यन्त बल पास होगा और सब प्रकार
की स्मृद्धि सिद्धि योगी के बल में होंगी।
चौथे ले अनहदकी प्राप्ति और प्रेम उपजेगा।
पांचवे से अपने शरीर पर सामर्थ होगी।
छरेसे समाज और खेचरी सिद्ध होगी।
प्राणाके चक्रोंका वर्णन।
प्राणके पहले दो चक्र दिल और फेफड़ा हैं। यह
दोनो केवल कुंभक से सिद्ध होते हैं। जिनमें से हरएक के
जपका वक्त पांच घड़ी है । अपान के पट्चक्र के शोधनसे
मृत्युलोक की सब सृष्टीका ज्ञान होता है । और प्राणके इन
दोनो चक्रों से स्वर्गलोक की सृष्टीका ज्ञान होता है । बाकी चाभ
प्राणवायुके, जिनकी संख्या कोई बार कोई पांच बताते हैं।
यह सब दिमागके अन्दर अनुमान करना । जोके समाधिक
प्रताप से होता है याने लोक लोकान्तरका ज्ञाना । दिमागको
ही सतगुरूका धाम कहते हैं । क्योंके येही बुद्धिका स्थान हो ।
और सतगुरू से भी बुद्धि और उपदेशकी प्राशि होती है।

( १०३ ) तेईसवां प्रकम् जप विधान । ध्यान सहित जप शब्दप्रकर्ण में बयान होचुका । अब वह सुगम रीति लिखते हैं जिसको गृहस्थी और फकीर, रोगी या सुखी, याने हरएक आदमी हरवक्त इसको साधने के वास्ते तैय्यार रहै । वह यह है के कोई एक नाम जो परंपरा से चला श्राता है। और कि जिस में यह विश्वास है के यह शब्द ईश्वरके गुणानुबाद में से है । जपनेके वास्ते अपने हृदयमें ऐसा पक्का ठहरा ले जैसा अनेक मतवाले पूजने के वास्ते कि- सी मन्दिर या मूर्ति या मसजिद या गिरजा या तीर्थ या व्रत मुर्रिर करके भावना उपजाकर अपना प्रेम ईश्वरमें लगा कर मन और सुखी रहते हैं। तैसे ही हमभी यही उपदेश करते हैं के हरकोई आदमीको जो सुगम और उत्तम नाम लगे जि- स्से उसको प्रेम हो और उससे राग द्वेष मिटजावे जपा करै । नाम याने जप का प्रभाव समझानेके वास्ते बाल्मीकी ओर अजामेल को पेश करते हैं । पहिले पहिले मूर्खता दूर होनेके वास्ते और आचरण सुधारने के वास्ते जरूरी बात यह है के नाम मुंहसे जपा जाये । और इसी कोटी में देखा जाता है लाखों श्रादमी माला फेरते हैं। यहां तक के फेरते फेरते ही हरजाते हैं। इसी तरहसे और प्रकारके साधन करने बालों को जानना । इस बड़े समूह में से जो जो महात्मा और कानी पुरुष होते हैं वह जप और साधनको भुगत कर मौ. नी बनते और सारे प्रकारके साधनोंको त्याग देते हैं। फिर वह इस दरजे में क्या करते हैं सो समझाते हैं । के अपने शरीर के किसी अंगमें उसी नामको उपजाते हैं के जिसका जफ मुखसे किया था यह अभ्यास आदमी को इतना भक्ति- वाला और तेजस्वी बनायेगा के जिस दरजे को कोई हठ- योगी या राजयोगी हजारों वर्षकी तपस्या में पहुंच सक्ता है। जपके अभ्याससे जो दशा होगी सो समझाते हैं । आदमी पागलकी सी चेष्टा वाला होजायगा। भक्ति उपजने के सबब जगत् का सारा सवाद उसको इकसार दीखेगा। सुख दुःख समान होंगे । जाड़ा गरमी वर्षाका उसकी आत्मा पर कोई असर नहीं होगा। यह दरजाशुद्ध हृदय वाले सज- नोंको प्राप्त होता है। ऐसे आदमीको प्राणायाम षट्चक्र शो. धन की जरूरत नहीं । क्योंके उसकी आत्माबिलकुल शीशे के मुताबिक साफ है । जिसका सीधा ताल्लुक परमात्मा की ज्योति से है। चोवीसवां प्रकर्ण अनहद ज्ञान । जब तक शरीरमें होश याने ज्ञात और बाहरकी आबा जोका कानमें आना जारी है किसी प्रकार अनहद सुनाई न- हीं देता। अपान की ऊर्ध्वगति होने और प्राणके शरीरमें रू- कने से यह शब्द प्रकट होता है। प्राणवायु हमेशा भीतर और नीचेको जाती है इसीतरह से अपान हमेशा नीचेको याने गु- दाके रस्ते खारिज़ होती है लेकिन जब सुरत याने ध्यानके जरिये अपान बजाय युदासे खारिज़ होनेके उलटी ऊपर को मस्तक तक जावेतो अपानको ऊर्ध्वगति वाला कहते हैं।

( १०४ ) या दूसरी प्रकार यह जानना के षट्चक्रोंके कमलमें अपान. की ऊर्चगति होजाती है। यहही हालत समाधिमें होती है। हिस्टीरिया याने बायगोलेकी बीमारीमें अपानकी ऊर्ध्वगति होजाती है जिससे बेहोशी होजाती है । पेशाव दस्त बन्द होजाते हैं । निगलने और बोलने की ताक़त जाती रहती है। और उस वक्त तक बेहोशी कायम रहती है जब तक अपान अपनी और वापिस न जावे। कुछ आदमियोंका यह ख्याल है के ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारों को रोक कर और मौन होकर बैठने से जो कुछ सुनाई देता है वहही अनहद है । लेकिन ऐसा नहीं है । बल्ले जब शरीर आत्माके प्रेम में मग्न होजाने से वे खबर होजाता है जिसको मूर्छा या बेहोशी कहते हैं उस अवस्थामें प्राण अपान की एकता होजाने से तरह तरहकी आवाज़ सुनाई देती है उनको अनहद कहते हैं। हिस्टीरिया याने वायगोले की बीमारी में अपानके शुद्ध न होने से अनहद पैदा नहीं होसक्ता इसी तरह सिरफ ज्ञानेन्द्रियों को बंद करने और मौन रह- नेसे बेखुदी याने अज्ञात नहीं पैदा होती। और बाहरकी आवाजें सुनाई देखती हैं जो कुछ वह अन्दर सुनता है वह नाड़ियोंके भीतर रुधिर वाले रेगुवोंकी आवाज को सुनता है। अलबत्ता त्राटक साधने वाले को रूह याने श्रात्मा पर ध्यानका अक्स पहुंचने से अनहदकी आवाजों के सुनने का ज्ञान होसक्ता है । षट्चक्रमें ध्यान रखने ले शाने उसके जुदे जुदे हिस्सों में ध्यान देते रहने से जो जो (१०५) उपमा महिमा उन स्थानोकी लिखी है उसकी वजह यह है के वह अवस्था विलकुल स्वपकीसी दशा है । और जो कुछ उस वक्त देखा जाता है वह असली स्थूल दशासे अनगिनत गुनां दीख पड़ता है। यह ही हाल अनहद अ. वस्थामें होता है। जो कुछ आदमी को पहले पहले दीखता है वह सिवाय प्रकाशके और कुछ नहीं । लेकिन अखीरमें अगर उसका अभ्यास प्रवल है प्रकाशके बाद अँधेरा और अन्धेरे के बाद लोकान्तरकी रचना दीखेगी । जो अनेक जन्मकी सिद्धि का नतीजा है । इस दरजेमें श्रादमी को निगाहसे छिपी हुई सब वस्तु दीख पडैगी और वह सब प्रकारकी सिद्धियोंका मालिक होगा। अनहद क्या है सो समझाते हैं। जैसे प्राणवायु के ऊपर दश भेद वर्णन किये यहां भी इसी तौर अनहद के दश भेद हैं । याने ॐ के दश प्रकारके विभाग हैं । और इन्हीकों दशप्रकारके अनहद कहते हैं। पहले पहले शरीरमें सिवाय ॐ शब्दके और कु. छ नहीं समझाया गया। जिसके बाद उसी शब्दके दो विभाग करके एक नया शब्द सोहं सिद्ध किया । इसीत- रह बाकी पाठभी ॐ हीके भेद हैं सो समझाते हैं। कोई आदमी पहले पहले सितार बजता सुनेतो दूसरों से पूछै- गाके इसका क्या नाम है । तो लोग उसको समझादेंगे के इसका नाम सितार है । और यह भी एक किस्मका बाजा है। लेकिन जब यह आदमी कुछ दिनों तक इस प्रकार- का बाजा अनेक मनुष्योंसे सुनता रहैगा तो वह अपने (१०६) श्राप बतादेगाके कौनसा आदमी उनमें से अच्छा वजाने वाला है । और किसका बाजा आमलोग पसन्द करते हैं। आखिर अभ्यास और बुद्धि के बल से सब प्रकार इ- सवाजे को समझने लगेगा यहही अनहदकी भी असलि यत है । जिसको समझना एक मामूली बात नहीं है । अवतारों और पैगंबरों में से किसी किसी को यह दरजा उत्तम रीति हासिल हुश्रा है। इसके सुनने और जानने की रीति नीचे लिख कर समझाते हैं । लोभ और मोहका त्याग करके ऐसे स्थान परनि- वास कर जहां किप्ती अादमी या जानवर पशु पक्षी श्रा- दिकी आवाज न पोहुंचे । नित्य लिखे मुवाफ़िक अभ्यास करे दोनो कानों के सुराखोमें सरकण्डेका गूदा या का- ली मिर्च लाल खालिस रेशमी वरिक कपडे में बांधकर रात दिन रखे और नाभिमें ध्यान लगावे यहांसे शब्द उठ कर ऊपर मस्तक तक सुरतके द्वारा लावे बहुत दिनों के और नित्य साधनसे कई प्रकार की आवाज़ों का भेद समझमें आने लगेगा जितना इनका ज्ञान होता जायगा उत- नी ही सिद्धियोंको अभ्यासी प्राप्त होगा । जब ऐसाध्यान करते करते मूळ भाजावे तो उसका इलाज समाधी में लिखे मुताविक करना चाहिये, नये नये आभ्यासीको यह किया गुरुके सामने करना चाहिये ।

( १०७ )
पच्चीसवां प्रकर्ण ज्ञानचर्चा।
ज्ञान नाम जानने का है। जानना बुद्धिसे होता है।
बुद्धिकी प्राप्ति ईश्वरकी दया और सत्गुरूकी कृपासे होती
है। सत्गुरु उस को कहते हैं जो खुद सत्यरूप हो और
उसका उपदेश ब्रह्मकी पैछान करवादे ।
ज्ञान देहमें अनादि है । जैसै सृष्टी अनादि है । ले-
किन जैसे बीज वगैर मिट्टी पानी हवा और रोशनी के
नहीं पैदा हो सकता और न बढसकता है । इसी तरहसे
शरीरमें ज्ञानभी बीज रूप से अस्थितहै । जो वगैर सत्गुरु
के प्रगट नहीं होता।
ज्ञान अनेक प्रकारका है परन्तु संक्षेपसे बताते हैं।
१ पिण्डज्ञान इससे सब प्रकारकी देहका ( याने
स्थावर जंगमका) उसकी उत्पत्ति लय और मौजुद रहने
का तजरबा हासिल करना और उनके कामको जानना
मुराद है।
नं० २ ब्रह्माण्डज्ञान इससे जितने लोक पृथ्वी और
सूर्यको आदिलेकर छोटे से छोटे तारागण तक दिखाई
देते है। उनका अहवाल जानना ।
नं० ३ कालज्ञान जिसमें दिनरातकी असलियत और
सब सृष्टीकी उत्पत्ति और लयका समय और उनकी जुदीर
अवस्था का हाल मालुम होता है।

( १०८) नं० ४ ईश्वरज्ञान इससे ईश्वरके सारे हुकम जो हर प- दार्थके वास्ते उनकी जिन्दगीमें बर्तने के लिये हैं उनको जानना । सिवाय उसके ईश्वरको और उसके स्वरूपको जानना। नं० १ पिण्डज्ञान पिण्ड देहको कहते हैं । इसमें जो कुछ रचना है वोह सब प्रकारके पिण्डों में इकसार जान- ना । सबमें रस की मौजूदी और मलका त्याग एकही प्रकार समझना । सब प्रकारके जीवोंकी एकही तरह दशा मानना । याने जीवन मरण सबमें इकसार है। सबकी उ- त्पत्ति तत्वके प्रमाणुवों से है । तत्व तादाद में कितने हैं। और कौन कौनसा पिण्ड किन किन तत्वों से बनता है इसके बताने की हमको जरूरत नहीं है । अलबत्ता इस पृथ्वी पर पांच तत्व वर्तमान हैं । जिनसें शरीर बनता है। शरीर में ज्ञान रूपी अात्मा सब प्रकारकी सृष्टीमें व्यापक है। चार प्रकारके जीवोंकी संख्या मानी गई है । और उ. नमें से हरएक कितने हैं । उनकी तादाद बेशुमार है पर- न्तु हमेशा एक अनुमान में रहते हैं । जलके जीव उनको कहते हैं चो जल ही में पेदा होते हैं और वहांही उनका नाश होजाता है। जैसे मगर,सीपी और इस्पंजको आदि लेकर । नं० २ पृथ्वी केजीव इसमें पहाड़ सौना चांदीको पा.

(१०६) दि लेकर धातु और सब प्रकारकी बनास्पति और बर्षाती जन्तु कीड़े मकोड़ेसब शामिल हैं। नं० ३ बनचर इसमें जानदार चौपाये और आदमी शामिल हैं। नं० ४ हवाकेजीक यह जल पृथ्वी और वायुके प्रमा- गुवोंके आश्रय आकाशमें ही रमण करते रहते हैं । और वहांही उनका नाश होजाता है । इस प्रकार की सृष्टीमें से वोहोतसे इतने बारीक जानदार हैं के दृष्टीसे नहीं दिखाई देते । हरदेह में च्यार अवस्था वर्तमान हैं । याने गर्भअवस्था । बालपन । जवानी। और वुढापा । इसीप्रकार च्यार गुण वर्तते हैं । रजोगुण । सतोगुण । तमोगुण । और शून्यस्वभाव । सारे चार पदार्थों में तत्वकी पिछान उनके स्वभाव और आहार विहार पर पिछानी जाती है । सारे अचल पदार्थोंमें तत्वकी पिछान उनके स्थूल होने मुलायम या कैडा होने पतला या उड़ने वाला होनेसे हुवा करती है । वनास्पती में तत्वोंकी पिछान उनके जायके याने सवाद से होती है । और उसी तबसे होती है। जैसे आदमियों में बताई जाचुकी है। याने पहली अव- स्था में श्राकाश विशेष होनेसे सवाद कड़वा रहता है । दूसरी में वायुके विशेष होनेसे खट्टापन । तीसरीमें अग्नि और जल विशेष होनेसे चर्परा और खारीपन । चौथी अवस्थामें पृथ्वीतत्व विशेष होनेसे मीठापन । यह च्यारों ( ११० ) अवस्था सारी प्रकार की वनास्पति में समय अनुसार पैदा होती रहती है। और इनहीं गुणोंसे आदमी को पिछान पडती है। और यह निश्चय करके रोगोंकी हालत में बतौर औषदी इनको वती जाता है । याद रहे जिन फलोंमें जडोंमें पत्तियों में कडवा सवाद होता है वोह अाकाशतत्व से निर्णय किया जाता है । हरदेह में जोरचना है सो समकाते हैं । दुखः सुख रोग और मैथुन (इछा) गर्मी जाडा और आहार और विचार शरीरके लिये नित्य हैं सुखको स्वर्ग और दुख को नर्क कहते हैं शरीरमें विश्वास ईश्वर रूप है । सब प्रकारके शरीर दुःख सुखके अधिकारी हैं ! मनुष्य पूरे तौरसे चैतन्य अवस्था धारण किये हुवे है इस लिये इसमें यहज्ञान विशेश । दुःख अविद्या याने भूल को कह- तेहैं । जबतक आदमी को आत्मज्ञान नहीं होगा उतने दिनतक वोह भूल से पैदा हुये रोगों और दुखोंको भोगे मा इसके बाद सुखको याने उसके शरीर कोदुःख सुख नहीं व्यापैगा। मैथुन बांछाको कहते हैं । यह देहके साथ उत्पन्न होती है । जिसकी बांछा जगत व्यवहार में ज्यादा है वोह भोगी ओर म्लेछकहलातहैं । जो त्यागी हैवाहे ज्ञानीकहा- तेहैं । आहार गर्मी और जाडेके निवारणके वास्ते शरीरमें कुदरती तासीर मौजूद है। जिससे सारेजानवर और आदमी अपने आप बन्दोबस्त करलेतेहैं। यह जिन्दगीके सबसे पहल काम है । और इसके वास्ते बन्दोवस्त करना श. रिकारी है। जिसकी जरूरत. त्यागी को भी है। लेकिन ško ( १.१.१ ) उसको म्लेच्छकी तरहले जरूरत नहीं । जैसे कोई कोई जयत के पदार्टीको बेजरूरत भी इकट्ठा करते रहते हैं लेकिन यह शिक्षा उन्होंने चूहों ले मोहकी अकाखीसे और चिटियों से सीखी है जोके मूर्ख गूरू है । जैसे वह अप- ना संग्रह किया हुआ औरोंके हाथ गुमाते हैं तैसे ही ऐसे मूर्ख और म्लेछ मनुष्य चोरोंके हाथ अपना सारा संग्रह किया गुमादेते हैं । निद्रा और भय आहार और बुद्धिक प्राश्रय हैं। शरीरमें मौत निश्चय है। परन्तु अकालमृत्युका ज्ञान बताते हैं । वेशुमार जानवर एक दूसरे की ग़िज़ा याने भोजन बनते हैं । बहुतसारी बनास्पति समय से पहले उखाडली जाती । पहाड़ोंके पहाड़ उड़ादिये जाते मनुष्यभी योगोंके जरिये समय से पहले प्राण त्यागते हैं। ऊपर लिखे तीन प्रकारकी सृष्टीकी अकालमृत्यु मनुष्यके द्वाराही होती है तो इस हालत में यहही सिद्ध होता है के मनुष्यकी मृत्यु किसी बनास्पति या धातु आदिक या जलचर या बनचर के द्वारा नहीं होसक्ती । फिर क्या कारण है के मनुष्यकी अकाल मृत्यु होती है । सो सूक्ष्म करके समझाते हैं । केवल अज्ञान याने मुर्खता से याने खोटी बुद्धि से वगैर इसके उपजे याने इस खयालके उत्पन्न हुये वगैर मृत्यु होना नामुमकिन है बुद्धि कैसे विगड़ सक्ती है के जिससे मौंत होती है। यह खोरे कर्मोका फल है । खोटे कर्म वेही कहाते हैं जो शास्त्र के विरुद्ध हैं। और जिन को सारे श्रादमी मिल कर खोटे ही बताते हैं। यह अनेक ( ११२ ) मतोंकी पुस्तकों में लिखा हुश्रा है और तजरुवे में श्राचुकाहै. नं २ ब्रह्माण्डज्ञान याने तारामण्डल बनन।ब्रह्माण्डकी संख्या बहुत है । और किसीको इसका पूरा ज्ञान होना नामु. मकिन है। अलबत्ता ज्योतिष और योगके पुराने ग्रंथों में उन ब्रह्माण्डका हाल वर्णन है जिनके असरसे आदर्माको फायदा या नुकसान पहुंचता है। ब्रह्माण्ड याने तारागण इतने हैं जितने मनुष्य शरीरमें रुधिरके परमाणू याने असंख्य समझ. ना। और जैसे शरीरमे रुधिरके प्रमाणुवोंकी या सृष्टीमें जीवकी मृत्यु होती रहती है तैसैही यह ब्रह्माण्ड भी नाशकू प्राप्त होते हैं। और तत्वोंके आश्रय नये वनते रहते हैं। आज कल दुरवीनों के जरिये तारागण देखे जाते हैं। जिनसे उनका आकार और चाल मालुम पड़ती है। सारे तारागणों से आदमीयों, जानवरों और स्थावर पदार्थों पर क्या असर पड- ता है सो पूरे तौरसे समझना कभी नहीं होस का लेकिन जिनके असरसे आदमी या जानवरों, स्थावर पदार्थों पर असर पड़कर जो नतीजा हुआ करता है उसको ज्योतिष ने संक्षेप से बतलाया है । जो जो मुख्य बाते हैं उनको हमभी खुलासे के तौर पर बुद्धिमान पुरुषों के सामने लि- ख कर बताते है । सूर्य पृथ्वीसे कई लाख गुना बड़ा है और धरती से नोकिरोड़ मीलके फासले पर होना बताया गया है। सूर्य से धरती पर उसकी किरणोंका चमत्कार उसके दिखाई देनेके आठ मिण्ट पीछे हमारी प्रांखो तक पहुंच पाता है । यह तजुरबा प्रातःकाल करना चाहिये।

( १९३) ghe के रोशनी एक याने पाठ मिण्टमें सूर्यको किरण सूर्यसे धरती पर पहुं. च जाती है जिसका यह हिसाब सैकिण्डमें १८६००० मील चलती है । आवाज एक सेंकिण्ड में ११०० फीट चलती है ! अगर हवा बहुत जोर की हो तो कुछ फरक पड़जाता है। इसका अंदाजा इस तरह होता है के विजली और तोपकी रोशनी आंख में फौरन आजाती है। पर आवाज कुछ देर पीछे सुनाई देती है। जिससे हिसाब उसके फासले का मालुम होजा- ता है । बादल की उंचाई धरती और समुद्रसे एक मीलसे लेकर पांच मील तक समझना। इसी तरह समुद्रकी गहराई एक मीलसे पांच मील तक समझना। हवाका फैलाव याने हवाकी उंचाई धरती से ५० मील दूर तक जानना । धरती को आदि लेकर सारे ब्रह्माण्ड हमेशा चक्रमें रहते हैं। और इस तरहसें अलग थलक हैं जैसे उड़ता हुश्रा पक्षी धरती से और एक दूसरे की अाकर्षगा शक्तीसे अपनी जग- ह पर कायम रहते हैं। मालुम रहै के एक मील १७६० गजका होता है। धरती ४ मिण्ट में ३५ कोस चलती है । और पश्चिम से पूर्वको हरकत करती है इसी से मुल्क मुल्क में जुदा जुदा समय पर दिन और रात होती है। याने धरती के जिस हिस्से पर सूर्य की किरण पड़ती है याने जोनसा हिस्सा धरती के चक्कर से सूर्य के सामने आता है वोही प्रका- शित रहता है और दिन कहाता है । नीने लिखे ग्रहों को ( ११४ ) लोक याने ब्रह्माण्ड मानना । सूर्य और मंगलको अग्नि तत्वका अण्डार जानना । शुक्रको वायुका । शनिको श्रा- काशका । पृथ्वी और बुधको पृथ्वीका । चंद्रमा और बृहस्प- तिको जलका। राहु केतुको अग्नि और वायुका। येही सवव है के इन ग्रहोंका असर सारी सृष्टी पर इनकी प्रकृति अनु- सार होता है । जन शरीरमें कोई तत्व कोप करता है याने रोग और दुःख पैदा करता है तो इन्ही अण्डारों से उत्पन्न हुअा जानना । इसी तरह लाभ और प्रारोग्यता इन्ही की दृष्टी से होताहै । जैसे शरीरमें पांचों तत्व मिले रहते हैं तैसेही ऊपर लिखे इन दसोंका मिला हुअा असर शरीरमें हरवक्त बना रहता है । वर्तमान समय और असर नीचे लिख कर समझाते हैं। जब चन्द्रस्वर में जलतत्व मौजूद हो तौ चन्द्रमाकी दशा अनुमान करना । पृथ्वी तत्व होतो भूलोक की।वा- यु हो तो शुक्र और राहुकी। अग्नि होतो सूर्य की । आकाश हो तो शनिकी । सुषुम्ना हो तो राहुकी । इसी तरह सूर्य स्वर के वहते जलतत्व में बृहस्पति की । पृथ्वीतत्व में बुध की । वायुतत्व में शुक्र और राहुकी । अग्नि तत्व में मंगलकी । आकाश तत्वमें शनिकी । सुषुम्ना स्व- रमें केतुकी दशा अनुमान करना । यह हाल अभ्यासी प्रश्नकर्ता की जाने और ऐसाही अपने लिये अनुमान करै । यह नित्य दशा हैं । अगर कोई अभ्यासी महीने या साल की या किसी पखवाड़े की बाबत समझना चाहे ( ११५ ) तोऐसा देखने के वास्ते महीनेके पहले दिन इसी तरह वर्ष और पखवाड़े की आदि तिथीमें प्रातःकाल देखले महीने के शुरूका मतलब संक्रान्ति का पहला दिन समझ- ना। अगर कोई मनुष्य अभ्यासी से पाकर अपनी दशा पूछै तो तत्वको देखकर और स्वरको पिछान कर ऊपर लिखे मुताबिक बतादेना। अगर प्रश्न समय तत्व मिले जुले मालुम देतो सबकी प्रकृति मिलाकर जवाब देना । अगर उत्पत्तिसमय किसी बालक की मालुम करनी होतो प्रश्न समय का तत्व विचार कर ग्रहजन्मकालके बताने चाहियें । जिसका यह हिसाब है के प्रश्नसमय वाला त- व जन्म लग्नका मालिक है । कौनसा बालक किस तत्वमें पैदा हुआ वह भी प्रश्न समय वाले तत्वसे अनुमान होगा जिस समय याने (क्षण ) बालक रुदन शुरू करै वह समय पैदायशका गिनाजाता है । या इसको पहला श्वांस गिनना चाहिये । बालक को कौनसा तत्व था जिस समय पैदा हुआ सो उसका तत्व माताके स्वर और तत्व पर जा- नना । क्योंके माताके और गर्भके रुधिरकी एक दशा होती है । जन्म लग्न में जो ग्रह पड़ा हो वह तत्वका सा- ती है । याने वह ही तत्व पैदायशका तत्व है अगर जन्म- लग्नमें कोई ग्रह न हो तो उस लग्नके स्वामी का जो तत्व हो वही जानना । अगर तत्व वाले स्वामी के साथ और ग्रह भी हो तो उन सब से मिली हुई खासियत वाला तत्व जानना ग्रह अनुसार लगन बतादेते हैं।

१
मेष लग्नका स्वामी मंगलावृषका शुक्रोमिथुनका बुध।
कर्क.का चन्द्रमा।सिंहका सुरजोकन्याका बुध । तुलाका शुक्र।
बृश्चिक का मंगलाचनका बृहस्पतिामकर का शनीश्वराकुंभका
शनीचर।मीनका वृहस्पति।मेषका पहला और मीनको सबसे
पिछला जानना । और जिस तरतीबसे लिखे हैं उसी तरती-
बसे गिनना।
पृथ्वी तत्वमें पैदा हुए बालकका सुभाव धीरबुद्धीवाला
सन्तोषी होगा वह ग्यानी मालदार और भोगी होगा।
जलतत्व में पैदा हुए बालक का सुभाव चंचल होगा
वह योगीशास्त्रों का ग्याता, कान्ती वाला, श्रेष्ट, देशान्तरमें
गमन करने वाला होगा।
अग्नितत्वमें उपजा हुआ बालक प्रतापी धनाढय परन्तु मलीन
चेष्टा वाला होगा। रोगी और अल्पसन्तान वाला होगा।
वायुतत्वमें उपजा हुश्रा बालक बड़ा पारकरमी और हो-
सले वाला होगा। इल्मदार होगा लेकिन अल्प आयु वाला
होगा।
आकाशतत्वमें पैदा हुअा बालक नपुंसक या अल्प
आयु वाला होगा। शरीर अंग भंग होगा और उसकी प्रकृती
वायुतत्व वाले से मिली जुली होगी।
सुषुम्ना स्वरकी पैदायश बहुत कमती होती है जल
तत्वमें पैदा हुआ बालक माताके गर्भसे बहुत जल्दी से

१.१.७ ) पैदा हुअा जानना । पृथ्वीमें भी ऐसा ही जानना । वायु और आकाश में पैदा हुश्रा बालक गर्भ में से कष्टसे निकल ताहै । अग्नि में पैदा हुआ बालक रोगी और माता को दुःखित करने वाला होता है । चन्द्रमां को आदि लेकर सब लोकका असर ऊपर समझाए मुताबिक जानना । सवाल-तत्व पांच हैं जिनमें सारी सृष्टी शामिल है। फिर जुदे जुदे आदमी और जानवरों में प्रकृती भेद क्यों बे. शुमार है! जवाब-जैसे हरस्वास में तत्वों के प्रमाण, कमो बेश और मलीन या साफ होते हैं और एक दूसरे के मुवाफिक नहीं होते इसी तरह हर एक शरीर में जुदे प्रकृती वाले होने से और उन के ऊपर समय और देशके असर से बहुत फरक होजाता है इस लिये कुल सृष्टीमें भी एकही तत्वके पैदा हुये जानदारों में प्रकृति भेद हो जाता है जैसे रोगीकी स. न्तान रोगी होती है । शरीर कर्मानुसार बनता है किसीके कर्म किसीसे नहीं मिलते । इसी लिये हरएक देहमें जुदा जुदा हाल होता है। नं०३ कालज्ञान इस के जानने से सारीप्रकार की सृष्टी और उसकी रचना का हाल समय अनुकूल मालूम होता है। समय के विभाग कई प्रकार के हैं । सब से बड़े भाग को युग कहते हैं। युग च्यार हैं। सतयुग। चैतायुग। द्वापर- युग। कलियुग। इन च्यारों का समय ४३२०००० बर्ष हैं।

(११८)
इतनी समय का १००० गुना किया जाय तो ब्रह्मा का एक
दिन होता है । जिस की ऐसे दिनों के हिसाब से १००
वर्ष की आयु मानी गई है । इस सारी रचना के अंत को
महाप्रलय कहते हैं । मृत्युलोकमें २४ घण्टे का दिन रात
होता है। यह समय ६० घड़ी के बराबर होता है। धरतीसूर्यके
गिर्द जिस चक्करमें घूमती है उसमें इस को ३६५ दिन ६
घण्टे ५४ मिण्ट लगते हैं इसी का नाम बर्ष है। रात्रि
में चन्द्रमा प्रकाशमान रहता है । यह धरती से पचासवां
हिस्सा है। यह धरती के गिर्द घूमता रहता है जौनसा
हिस्सा सूर्य के सामने होता है वह प्रकाशमान रहता है ।
और जौनसा हिस्सा धरती के मुकाबिल होताहै वह धुन्धु.
ला होता है । चन्द्रमा की एक परिक्रमा २६ दिन ७ घण्टे
४३ मिण्टमें खतम होती है इस को महीना कहते है ।
जैसे प्रघट में रात्रि दिन हैं तैसे ही शरीर में दो अवस्था हैं ।
एक जाग्रत । दूसरी स्वप्न । समय का सब से छोटा भाग
विएल है दो अवस्था मिली हुई को संन्ध्या कहते हैं शरीर
में भी इसी प्रकार स्वरके पलटाव पर सन्धी होती है जिसको
ब्रह्मसन्ध्या कहते हैं । और यह खास वक्त है के जव अभ्यासी
लोग परमात्माका स्मरण करते हैं जिसका यह फल है के कोई
प्रार्थना निष्फल नहीं जाती। कारण यह है के इस क्षणमें पां-
चौतत्व इकसार तौरसे बर्तते हैं । और चित्त में बड़ी भारी चं.
चलता चिंता और वियोग होता है ऐसी हालतमें जो दुश्रा
( याचना) की जाती है वह श्रात्मा की साक्षी भूत समझी

( ११६ ) जाती है जो कभी टलने वाली नहीं होती । समय के छोटे भाग महीने पखवाड़ा ( पक्ष ) और तिथि या बार हैं। कालज्ञान से शरीरमें ज्ञान पैदा होता है । याने यह जाना जाता है के ब्रह्मा की भी समय पाकर मृत्यु होगी तब इस हालतमें मनुष्यशरीर का खण्डन क्षण में होजाना कोई बड़ी बात नहीं। दुनिया सबसे श्रेष्ठ वह मनुष्य है जिन- का वक्त बेकार नहीं जाता किसी न किसी धन्धेमें हर- वक्त लगे रहते हैं। चाहे वह जगत् से सम्बन्ध रखता हो या ईश्वर श्राराधन से । सब से अधम वे जीव हैं जो हर- वक्त नशे में गाफ़िल होकर न तो जगत् के पदार्थों को भो- ग सक्ते हैं न वे अपनी प्रात्मा को पिछानते ना हरभ- जन करते हैं। जो पुरुष समय की कदर नहीं करता वह पछताता हुआ इस लोक से अपने शरीरको छोटे जन्तु के समान त्याग देगा । और उसका नाम इस दुनिया से मिट जायगा। नं० ४ ईश्वरज्ञान इसके प्रभावसे श्रादमी अपने कर्तार याने अपने मालिकको पिछान लेगा यह सबको निश्च- य है के ईश्वरके श्राकारकी रूपकी और नाम की मालुम नहीं । परन्तु यह समझ कर कि कोई न कोई इस जगत का रचने वाला है । नाम और रूप सब कल्पित करके जुदे जुदे मत वालों ने मुकर्रर करलिया है । और उसी नामसे उसका ध्यान करते हैं। ध्यान के वास्ते श्राकार ( १२० ) समकनेकी जरूरत थी सो हरएक ने अपनी बुद्धि के बलसे विचार करके अनेक मार्ग उसके खोजने को निकाले । और मतोंके नाम से इन मार्गों को प्रसिद्ध किया । सो सारे मतों का सार हम नीचे लिखकर समझादेते हैं। सारे चर अचर पदार्थों में सूर्य की मुताबिक ईश्वरका प्रकाश माने और सब जीवों से निर्वैरता रक्खे । सृष्टी में किसी जीव को उस से भिन्न न समझे । ओरों का दुःख अपने दुःख समान समझे । इन मार्गों में दो बात जानना जरूर है । एकतो यह के सारे जीवों से आदमी का जो संबन्ध है व- ह ज्यों का त्यों. बना रहै । दूसरी यह के सत्य असत्य में परीक्षा होके असली मार्ग ढूंढ पड़े । सारे मनुष्यों के च्यार प्रकार भाग किये गये है। प- हिले हिस्से में वह तमाम मतों के लोग शामिल हैं जि. नका काम ज्ञान के उपदेश करने का है । जैसे हिन्दुओं में अवतार ब्राह्मण और साधु।मुसलमानो में पैगम्बर श्रौलि- या मुल्लां और हाफिज । ईसाइयों में पादरी लोग हैं । दूसरे हिस्से में तमाम पृथ्वी पर सब मुल्कों में राजा लोग हैं जो सब प्रकार का इन्तजाम रखते हैं और प्रजाके दुःख सुख की सम्हाल रखते हैं । तीसरे हिस्से में सारी पृथ्वी पर वह लोग फैले हुये हैं जो नोकरी मज़दूरी खेती और व्यौपार से अपना पेट भरते हैं। और पहले दूसरे हिस्से वाले लोगोंके अपने बलसे कायम रखते हैं । और उनके दुःख सुख में मदद करते हैं। चौथे हिस्से में वह लोग 시음 (१२१. ) हैं जो ऊपर लिखे तीन तरह के मनुष्यों की खिदमत करके पेट भरते हैं। यह ऊपर लिखे च्यार प्रकार मनुष्य सारी पृथ्वी पर इस प्रकार फैले हुये हैं। जै- ले पांचों तत्व सारी सृष्टी में जिस प्रकार यह पांचों तत्व आपस में खूब मिल जुल कर पूर्ण वल से काम करते हैं। वैसेही जिस मुल्क में च्यारों प्रकार के लिखे मनुष्य एक ही सम्पति और वल से काम करते हैं वह देश अतिउत्तम स- मझा जाता है । और जैसे शरीर में किसी एक दो तत्व के निर्वल होने से शरीर रोग को या मृत्यु को प्राप्त होता है । ऐसे ही उस देश का हाल होता है जहां च्यारों तरह के मनुष्यों में से एक दो अपना नियम छोड़ कर खोटे ग्रा- चरण ग्रहण करते हैं । याने वह देश भंग हो जाता है नि- धन और निरादरा होजाता है ऐसा निश्चय जानना दुनिया में उपदेशक लोगोंने जो कुछ साधन ईश्वर- को पिछानने और दुनियाको कुदरती कानून समझाने के वास्ते और सारे लोगोंको एक तरीके पै चलाने के वास्ते मुकर्रर किये उसको धर्मके नाम से प्रगट किया लेकिन जब लोगोंकी समझ में यह साधन मुश्किल मालु- म दिया तो अनेक रीतियां निकाल ली और जहां कहीं वह रहै उसी देश और कालके मुताबिक उनहीं ने जैसी जरूरत समझी उसी मुताबिक उसमें घटा बढा दिया। खान पान या पहनाव या बोली यह कुछ किसी मजहब ( १२२ ) (धर्म ) से ताल्लुक नहीं रखते । अगर कोई ऐसा समझे के इनहीका नाम धर्म है तो यह बड़ी भूलकी बात है । सनातन धर्म समझाते हैं के जिसमें से सारी दुनिया के मत निकले हैं । सतयुग में आदमी पुरुषार्थी थे उनके चाल चलन व्यवहार और खान पान सादा थे । उनकी मति बालकके समान थी याने उनको चोरी जूत्रा हिंसा नहीं व्यापती थी उनकी मुक्ति केवल उनके आच- परही थी। और उनके सारे कानून कुदरती कानूनके मु- ताविकथे । जिसको आज कल के लोग इल्म साइंस (प- दार्थविद्या) कहते हैं । इसी इल्मसे उन्होंने आदमी की खा. सियत को जाना । तमाम सृष्टी और नक्षत्रोंके गुण और अवगुगाको जाना ।पुरुष और स्त्रीकी ताकत को समझाया। यदिरा मांसके अवगुणको समझाया।पुरुषकी ताक़त स्त्री- के भोगने के विषयमें अच्छीप्रकार सिद्ध किया । वनास्पति का खाना उत्तम और मांस और अनाजका (जिसमें दिदल अशामिल हैं) खाना मध्यम वताया। और जो बस्तु रोग पैदा करें जैसे सोर बासी आहार या गली सड़ी बनास्पति या कच्चे फल या मुर्दा जानवरों का खाना अधम बताया । त्रेतायुग में जैसे बालक तरुण अवस्था धारण करके पुस्तक और सृष्टि द्वारा ज्ञान हासिल करता है । वैसेही उन्होने मूर्ति आदिका पूजन और इतिहास आदि पुराण प्रगट किया। जिसका मतलब तरह तरह की बातों से तजरबा हासिल करने का था।

( १२३ ) द्वापरयुगमें जैसै शरीरमें तीसरी अवस्था बीततीहै और इंद्रियां कमजोर होकर अासरा हूंढती हैं । तैसेही श्रादमि मोने वेद और पुराणकी बातों को और उनके अनुसार च- लनेको कठिन माना । और अपने वक्तके पुरुषार्थी म. नुष्यों की ही कदर करके उनसे तजरवा उठाना शुरू किया। कलियुगमें । जैसे शरीरमें चौथी अवस्था वर्तने के समय सारी इंद्री शिथिल होजाती हैं। और किसी कामके करने को दिल नहीं चाहता यातो किसी नशेके आश्रय पड़े रहने को तबीयत चाहती है । या अपने रोगों से चित्त- को चिन्ता लगजाती है। आहार कम रहजाता है । कुटुं ब और व्यवहारी वढजाते हैं । सोही कलियुगमें रोगों के मुवाफिक लोभी उपदेशक और कपटी मित्र मिलते हैं। इंद्रियां शिथिल होने के मुताबिक वेद और शास्त्रके पढने में और उसके अनुकूल काम करने में विश्वास निकल जाने को समझना जो जो उत्तम मनुष्य होते हैं वह कुछ भी न बनने पर नामका आसरा ढूंढ कर उत्तम गतिको पाते । नहींतो दौलत और शरीरके बल पर घमंड करके इसी नशे में चूर रहते हैं। सतयुगके आदिमें सिवाय पूजन परमात्माके और कोई मत नहीं था। और वह लोग बुद्धिके बलसे ऋद्धि सिद्धियों को प्राप्त होतेथे । जिसको आज कल यूरुप के मुल्क वाले और अमेरिका वालों ने कुछ कुछ प्रसिद्ध कि- ( १२४ ) या है । मृर्तिपूजनका सिद्धान्त सिर्फ उसी ज्ञान मार्गके खोजनेका है के जिसके आगे और कुछ नहीं। इसका प्रचार इस तरहसे हुआ है । जैसे कोइ उस्ताद कुम्हार की बनाई हुई मिट्टी की मूर्तिको किसी छोटे बालकके सामने रख कर उस मूर्तिका नाम बताता है । फिर पुस्तक द्वारा सारा इतिहास उस आदमी या जानवर या वनास्पति या नत्तत्रादि देवताओं का जिनके आकारके मुताबिक वह मूर्ति बनाई गई है सब बातें उस बालककै हृदयमें बैठा. ता है । और जब कभी ऐसा बक्त आता है के वह अ- सली चीज प्राप्त होजावंतो उस्ताद बालक को सब प्रकार उस असली पदार्थकी चेष्टा खूब दिखादेता है । उसके पीछे बालक को अख्तियार है के उससे चाहै जो कामले । यह- ही अभिप्राय इस मतका है । अब हम नीचे लिख कर उन सब बातों को समझाते हैं । के जो सनातन मार्गसे निकली हैं लेकिन सारे मतोमें छाया रूपसे वर्तमान हैं। नं० १ औरतका दूसरा विवाह न होने देना । या मर्दकी स्त्री के मौजूद होने पर भी बहुत सारी शादियां करदेना। नं० २ उपदेशकलोगोंका हठधर्मीहाना । नं० ३ जैन मतवालोंका दिनमें खाना खाना और रात्रि में आहार न छूना । या दांतुन नहीं करना । नं०४ अनेक उपदेशकों का मूर्ति पूजनके विरुद्ध होना । ३

( १२५ )
नं. ५ पुरानी पुस्तकों और शास्त्रों के विरुद्ध राय देना
नं०१
समाधान
किली २ दिशा और कौम (जाति)
में च्यारसे लेकर चालीस तक बिवाह पुरषों के लिये निदों-
पलिखे गये हैं और किसी जगह इससे भी ज्यादा
विवाह करलेना दोषमें दाखिल नहीं । दुनियामें कोई
सा मुल्क या जाती एसी नहीं है जिसमें स्त्री के वास्ते
बहुत सारे विवाह करना या पति के मौजूद होने पर कई
पतिसे भोग भोगना लिखाहो इस विषयमें हम नीचे लि-
खकर समझाते हैं। तमाम जानवर छोटे बड़ोंमें यातो
जोड़ा होता है या कोई प्रवन्ध नहीं होता। लेकिन यह
सबूत है कि स्त्री को याने मादाको गर्भवती होनेकी हा.
लतमें मैथुन की इच्छा नहीं होती । जिसका समय हर
एक जानदार (जीव) में नियत (मुर्रिर ) कियागया
है ऐसी हालत नर याने पुरुषमें नहीं देखी जाती। अगर
स्त्री में तीनवर्षके अन्दर एक बर्ष गर्भवती होनेका माना
जावेतो उसके ऊपर लिखे हिसाब से सिर्फ तीन वर्ष में दो
वर्ष भोगकालके मानना अलावा इसके स्त्री हर २८ वें
दिनसे पांच दिन रजस्वला रहतीहै यह समयभी स्त्रीके वास्ते
रोगीके समान है। जो पुरुष सूर्यस्वरके चलते मैथुन करतो
हैं वह कभी कमजोर नहीं होसक्ते । और उनका वीर्य भी
बहुत देरमें स्खलित होता है । चन्द्रस्वरमें इसके वखिला.
फ होता है । हां इतना जरूर है के मैथुनकी इच्छा चाहे पुरु-

( १२६ )
पहो या स्त्री चन्द्रस्वरके योगमें बिशेष करके उत्पन्न होतीहै ।
स्त्रीकी उमर पुरुषसे अक्सर ज्यादा हुआ करती है। और
इसीलिये विधवा स्त्रियोंकी तादाद हमेशा पुरुषसे ज्यादा रहती
है यह हाल सब तरहके जानवरों और मनुष्योंमें इकसार जान
ना इसका सबसे बड़ा सबब यह है । कि स्त्रीयों को परिश्रम
के काम कम करने पड़ते हैं ।
पहिले वक्तोंमें सतीकी रवाज तीन प्रकारसे जारीथी।
एक तो योगबलसे । दूसरे शोक और मोहके सबब । तीसरे
लोक मर्यादसे । जिससे यह साबित होता है के पुरुषकी
उमर स्त्री से कुछ ना कुछ कम होती है। शरीर में भी कुदरती
तौरसे साबित हैके अक्सरकरके पहले प्राणवायु शरीरको त्या-
गताहै और अपान पीछे । सिर्फ जोगियों (अभ्यासी)
और बहुत उमरके आदमियों और जानवरों में अपानका
हिस्सा पहले से कमजोर या शुद्ध रहता है ।
इन ऊपर लिखी अवस्थाओंसे पुरुषका बलवान होना
और भोगोंका सामय रखना पाया जाता है। और स्त्री का
कमजोर रोगी लेकिन ज्यादा उमरवाला होना पाया जाता
है। योगीमें यह सामर्थ्य है के प्राण के बलसे अपानको चाहे
जब खेंच कर स्थान रहित करदे । और फिर उसकी अस:
ली जगहपर पहुंचादे । लेकिन अपानमें यह सामर्थ्य बिल
कुल नहीं के अपने बल से प्राणको कायम रक्खे । यह दो-
नो हालतें समाधि और मौत के वक्त तजरबेमें आती हैं।

( १२७. ) और योग मतकों ही सनातन मान कर दुनियाने यह मत जारी किये हैं के पुरुष (नोप्राणा के समान है) चाहे जित- नी स्त्री भोगे लेकिन स्त्री (जो अपानके समान है ) दूजा पुरुष का सेवन न करे क्योंके उसमें इतनी तो सामर्थ्यहै ही नहीं के एक पुरुष उसको भोगे । आज कल जो चर्चा हि- न्दुस्तान में इस बात के प्रचारका है के बालविधवा या किसी विधवाका विवाह करदेना शास्त्रसे विरुद्ध नहीं। सोहम यह समझते हैं के यातो इस बातकी जरूरत है के ऐसी स्त्रियोंका नये पति के जरिये खान पान का गुजारा हो सके और फैली हुई बदचलनी कम होजाय लेकिन यह स्वयाल इसलिये दुरुस्त नहीं है के इस प्रचारसे उनका मतलब नहीं हासिल होसक्ता । अगर सबूतकी जरूरत है तो हिन्दु- स्तानसे बारह वाले मुल्कोंकी हालत और उनकी बदचलनी और आजादी का प्रभाव खूब समझ लेना। विधवा होनेका सबब यहहै के छोटी उमरमें विवाह काहोना और बदचल- न होना । जिस कारणासे पुरुष को नपुंसकता पैदा होती है और दोनो या दोनों में से कोई सा एक रोगी रहता है। द. रिद्रताके कारण अपने बदनका भी जावता नहीं करसक्ते और कुदरती तोरसे कमजोर रहते हैं। आज कल की र- वाज यहहै के मा बाप अपने वालकोंकी शादी करते हैं। जिस परभी अांखसे देखे वगैर सम्बन्ध करते हैं। विधवा के वास्ते हिन्दुस्तान की छोटी जातो में जिनमें के मरद औरत दोनों इकसार महनत मजदूरी के काम करते (१२८) हैं बहुत दिनसे नाता (विधवा का किसी दूसरे पुरुष के साथ व्यवहार कायम करना) जारी है। अब कुलीन और उन जातियों में जिसमें यह रस्म जारी नहीं है प्रचार करना झगड़ेसे खाली नहीं । और हरएक आदमी अपनी जरूरत को अच्छी तरहसे जान सक्ता है। सरा श्रादमी नहीं समझता फिर क्या फायदा के इस मामले में कोई उपदेश- क जातिबाला या पड़ोसी विधवाविवाहमें सलाह दे या इसके विरुद्ध बोले। नं० २ उपदेशक लोगोंका समूह ( फिरका ) सारी धरती पर फैला हुआ है। अपनी उन्नतिके खातिर किसीके विरुद्ध बचन बोलना इन लोगोंका एक छोटासा काम है। और किसी एक मतका प्रचार करना जिसको वह फिर अ. पने नामही से बोलेंगे सबसे पहिला काम है । परमात्माने सब सृष्टीको इस लायक किया है के वह अपनी जरूरतों को समझे और अपनेही तजरबेसे सबनेकी बदीको जाने । उपदेश सिर्फ एक प्रकारका इतिहास याने जुगराफिया है जिस से अपने और दूसरोंके तजरबोंका और सव श्रृष्टीके श्राद मियोंका खयाल याने राय मालुम होती है । जो उपदेश- क हमेशा अपने बचनकी तरफ बैंचता है वह इतना बुरा नहीं जितनावह है जो दूसरेके आचरणोंको मुल्कको, सृष्टीको, नफरतकी निगाहसे देखता है। जैसाके अक्सर किताबों में एक दूसरेको बुरा कहते हुये देखते हैं । मालुम रहै चौर, जुवारी, रोगी, कृपण, लोभी. इसी तरहसे सत्यवादी और धनाढय, ( १२६) दातार, उपदेशक, को अपना तजस्खा बताने में गुरु हैं। फ़िर उपदेशक किसको तुच्छ जानता है हमारी सलाहमें धरती पर जितने प्रकारकी चीजें हैं वह सब अपना अपना उपदेश याने तरजया बताती हैं । हठधर्मी होना याने अप. नेको पण्डित और दूसरोंको मूर्ख जानना है सो ऐसा पुरुष अक्षम गतिको प्राप्त होता है। दुनियामें तीन तरहका उपदेश वर्तमान है। अव्वल किस्म का उन लोगोंका कथन किया हुआ है जिनका अभिप्राय हमेशा सब जीवको सुख देना है। दूसरे प्रकारका उपदेश किसी मुल्क या किसी जाति वालोंको फायदा पहुंचाने की गरजसे है। तीसरे प्रकारका उपदेश ऐसे लोग करते हैं जिनका खयाल इसीके जरिये रोटी कमाना है। अपना लोभ विचार कर दूसरे का फायदा नुकसान नहीं विचारते ऐसा उपदेश और ऐसा विचारने वाला पुरुष जगत्में बदनाम हो- कर मरता है और उपदेश भी फलदाता नहीं होता। ऐसे उपदे. शकके बन्स (ौलाद) तकका नाश होजाता है। पेट को रोटी औरतनको कपड़ा नहीं मिलता ऐसे आज कल कहीं कहीं ब्राह्मण काजी मुल्लाओंमें देखने में आता है के जागीर- दार होने परभी करजदारऔर दलिद्री हैं यह सिरफ उनके कपट वाले उपदेशका फल है । नं० ३ जैन मतके लाखों श्रादमी इस बात पर अड़े हुए हैं के रातको खाना खाने से जीव हिन्सा होती है शास्त्रोक्त (१३०) मना है इसी तरह रात्रीमें मकानमें दीपक जलाना और जल पीना तक मना है । इस जाति की कमजोर हालत और मनुष्यों की तादाद दुनियां में बहुत ही कम है बलके आगे फैलनकी कुछ अाशा नहीं यहमत बड़े भारी ग्यानी,जोगी, अंबधूत और महात्माओंका चलाया हुआ है। जिनको दिन रात के बखेड़े और अन्न जलके समय या बेसमय पाने से कोई प्रयोजन रखना सावित नहीं होता सिवाय इसके इस धर्म में ग्रहस्थी लोग बहुत हैं । और बैरागी बहुतही कम लेकिन ऊपर लिखा परहेज बैरागीसे ज्यादा ग्रहस्थी वर्तने को तैय्यार हैं। इन लोगोंको चाहिये के धरती पर फैले हुये सारे मनुष्योंसे जोके इनकी निसवत हजारों गुनाह हैं तजर- बा हासिल करें हां इतना जरूर है के योगालोग सूर्यस्वर भोजन करते हैं। अगर सारे जैनमत वाल इस बातको समझ कर सूर्य के प्रकाश याने दिनमें खाना खाते हैं और रात्रिमें चन्द्रस्वरका पहरा मान कर भोजनको त्यागते हैं तबतो उत्तम उपदेश है नहींतो यह भूल उन उपदेश कोंकी फैलाइ हुई जान- ना जिनका काम ग्रहस्थियों को धोका देकर माल इखट्ठा करने का है दांतुनका करना किसीग्रहस्थ या विरक्तको बेवा- जिबी नहीं क्योंके यह साबित होचुका है के मुहमें से बदलूका अाना दांत और मसोडोंकी जडोंमें गिलाजत जमा होनेसे होता है। इसलिये शरीरकी शुद्धि के साथ दांतोंकी सफाइ सबसे ज्यादा जरूरी है । जैनी लोगोंका यह खयाल है के मुहकी भापसे हवा में रहने वाले जानवर मर जाते हैं (१३१ ) tho और इसके बचाने के वास्ते मुंह के सामने कपड़ा रखते हैं देशक उनका यह खशल बहुत ही उत्तम है लेकिन उन- को यह नहीं मालुम है के नाकसे स्वास छोड़ने के समय उन जीवोंका क्या हाल होता है। इसी तरह मुंहसे या ना. कले स्वास लेने भोजन पाने या बातें करते वक्त यह हवाके जीर हमारी जिन्दगीके ऊपर कमा असर डालते हैं। क्या ही अच्छा होता जो जैनमत वाले मुंहके सामने कपड़ा रखने के बजाय मौन धारण कर लेते जिससे न तो जीव हिन्सा होती न यह जीव जैनमत वाले मनुष्यों को मार सक्के थे तमाम वबाई बिमारियों जो आज कल धरती पर फैली हुई हैं वह सब हवाके ही रहने वाले जन्तुसे उत्पन्न होती हैं और यह जन्तु याने छोटे जीव श्रादमियों और जानवरों में नाक और मुंहके जरिये या किकी ज़खमके जरिये शरीरमें दाखिल होकर रुधिरमें बढकर शरीरको नाश करते हैं। हम भली प्रकार सलाह देते हैं के अगर वह ऊपर लिखे काम अपनीही समझसे कर रहे हैं जबतो बहुत उत्तम है नहीं तो पुरानी तरकीबों को देखा देखी न वर्ते मुंहको बन्द करने की निस्वत नाकका जाबता करना बहुत जरुरी है। नहीं तो एक प्रकारका रास्ता मौत के जल्दी बुलानेका है। नं० ४ मूर्तीपूजनके विरुद्ध होना ऐसा मालुम होता है के लोग इस मतके जारी होनकी असलियत नहीं समझ. ते हिन्दु हो या मुसलमान या धरती पर किसी और मत- को मानने वाला हो परमात्मा के स्मरण के वक्त जरूर ( १३२ ) किसी न किसी बात का आसरा लेता है। कोइ लोग शरीरके अंदर वाली रचनाका आसरा लेते हैं जैसे हटयोगी कोइ धरती पर दिखाई देने वाली बस्तुका जैसे माला पुस्तक, मन्दिर, मस्जिद, या गुरूका उपदेश इन बातों से कोई भी खाली नहीं फिर क्या वजह है के लोग मूर्तीपूजनके विरुद्ध हों । हां पुरानी तरकीब और पुराने व्यवहार मुदत तक जारी रहनेसे और उसके अंदर श्रद्धाके घट जाने से अरुचि पैदा होती है इस लिये मनुष्य अपनी बुद्धी और बलके मुताबिक जुदा जुदा मार्ग बना कर और उसके मुताबिक अपने सारे मुल्क चलाने की कोशिश करता है और यही सिद्धान्त जुदे जुड़े मतके प्रगट होनेका है। सूर्ती पूजनका अभिप्राय ( मतलब) हम अच्छी तरह समझा चुके हैं और सनातन से जो इसके कायदे मुकार- स्थे उसका नेम खण्डन होने पर मूर्तीपूजनका खण्डन करना भी जरूरी समझा। मूर्ती पूजनके आदि में यह कहीं नहीं बताया गया के इसके अधिष्ठाता (उपदेशक पुजारीको) जागीरका निकालना और खान पान का बंदोबस्त करना जरूरी बात है । सब आदमियों को इसमें बराबर भागले वर्तना चाहिये अपने आपको पुजवाना या मूर्तीको अनेक प्रकारके आभूषण याने जेवर पहनाना या उस मूर्तीको असली पदार्थकी जगह समझना बड़ी भूल है जो लोग कृष्ण की मूर्ती को कृष्णा समझ कर कृष्णमें अपना प्रेम उपजाना चाहै यह अधम बुद्धि वालोंका मत है अगर कोई

( १३३ )
ऐसा समझता है तो उसको अज्ञानी जानना । जैसे छोटी
सी लड़की गुडियाको नोशा और दुलहन जानती है। और
ऐसा समझ कर उससे मोहोब्बत करती है। याद रहे मूर्ती
पूजन हमारे बालकपनेका गुरु भाव है सो हम को उसकी
कदर जरूर करना चाहिये। और यही महात्माओंका उपदेश
है के जिस किसीसे शरीर और बुद्धिको फायदा पहुंचे उस
का अहसान दयाभाव जन्म भर नहीं भूलना चाहिये।
नं०५ आज कल यह खयाल है के पुराने लोगोंने फ़िजूल
दकवाद (हुजत) लिख दिया है और नई रोशनी वालोंने
उनको दुरस्त करदिया है जिसको हम खुलासा करके
समझाते हैं। और साबित करते हैं के नये आदमियोंको
पुरानी पुस्तकोंके मतलबको समझनाही कठिन है । उसको
दुरस्त करना या उसमें घटा बढ़ा देना नामुमकिन है ।
नं० १ ग्रहस्थ लोगोंके लिये बर्त याने रोज़े रखना।
नं० २ तीन वक्त संध्या करना या पाचों वक्तनमाज पढ़-
ना ऐसाही गिरजा में नमाजके लिये जाना।
नं० ३ हर वर्षके वर्ष तिवार को मनाकर अपनी सोसाइटी
(एक तरहके मत वाले लोगोंका समूह) को प्रसन्न करना।
नं०४ नित्य यग्य करना जिसमें हवन आदि कर्म
शामिल हैं।

(१३४ ) नं०५ नित्य स्नान करना । नं ६ एकान्तमें भोजन पाना । नं०७ माता पिता और गुरू की सेवा मन लगाकर करना और इनकी आग्या वगैर कोई काम न करना इन ऊपर लिखी बातोंको कितने आदमी रोज़ पर बर्तते हैं। और इसका क्या फल उठाते हैं सो सब लोगोंको निवेदन है। सन्ध्योपासना एक तरहकी प्रार्थना है इससे अपने सारे किये हुये पापोंकी क्षमा चाहना मुराद है बर्त रखनसे श- ररिकी उपाधियां दूर होती हैं और इन्द्रयोंका बल एक कायदे पर कायम रहता है । तिवार मानने से सारे उप- देशोंका ताज़ा रखना मन्जूर है । हवन श्रादि करना वा- युको शुद्ध करना और बीमारियोंसे बचाना है । नित्य स्नान करने से शरीरकी चेष्टा सुद्ध रहती है । एकान्तके भोजनसे श्रादमी साना जल्दी खा चुकता है । और अप- नी रूचि अनुसार खाता है । माता पिता और गुरूका- उपदेश लेकर कार्य करने से याने (सलाह) से अपनी बु- द्धि की निर्वलता दूर होजाती है दुनियां में कोई बात सम- के बगैर मुंहसे निकालना बुद्धिकी कमजोरी जाहिर करना है इस लिये इस का इलाज यह है के हमेशा समझने की को- शिश करे और जो कोई समझावे अपने हृदय में रखे जो न समझमें आवे उसका बराबर खोज करता रहै और चुप रह कर सुनता रहै।

(१३५) छब्बीसवां प्रकर्मा स्वरोदयसार। स्वरके जानने और उसके पहचानने बदलने की तरकी- ने पहले लिख्य पाये हैं। अब यह बताया जाएगाके स्वर साधनसे लोक परलोक का ग्यान और जगत्कार्यमें शुभ अशाम जानना और मृत्युका ग्यान कैसे होसक्ता है । स्वर और तत्वका वर्तना दोनो फेफड़ों, दिल और रुधिरकी हा- लत पर सुर्रिर (आधार) है । दिलका दाहिना हिस्सा नीचे पीछे दाने को झुका हुआ है । और बायां हिस्सा ऊपर बांये सामने को। इसलिये दाहिने स्वरकी दिशा दक्षिण और पश्चिम बताई । और बायें स्वरकी दिशा पूर्व और उत्तर । वजह यह है के दाहिने स्वरका ताल्लुक दिलके दा- हिने हिस्से और दाहिने फेफड़े से है। इसी तरह बांये स्वर कादिलके बांये हिस्से और बांये फेफड़े से है । जोआदमी पूर्व और उत्तरमें जाना चाहै जोके चन्द्रमा याने शीतकीज- गह है तो उसको सूर्यस्वर के योगमें गमन करना लाभका- री होगा । जैसे कोई आदमी को ठंडे, मुल्कमें जाने या रह- नेके वास्ते गरम कपड़ा और गरम खानेकी चीजोंकाबंदोव- स्त करना होता है। नहीं तो शीतके दुःखसे रोगोंको या- मृत्युको प्राप्त होता है । जोत्रादमी पश्चिम और दत्तिण में यात्रा करे जो सूर्यस्वरकी गरम और खुश्क दिशा है चन्द्र- स्वरमें जाना उसी तरह लाभकारी होगा जैसे सूर्यस्वर- में पूर्व उत्तरमें बताया। अगर किसी को आकाशमें गमन करनेकी जरूरत है । जैसे बैलूनमें वैट कर उड़ने की या- पहाड़ पर चढ़नेकी तो सूर्यस्वरके योगमें प्रारम्भ करे । और जो कूयेके अन्दर या समुद्रके अन्दर वैठ कर काम करनेकी जरूरत हैतो चन्द्रस्वर के योगमें प्रारंभ करे। अगर किसी श्रा दमीको पूर्व और दक्षिण के कोनेमें या पूर्व और उत्तरके कोनेमें जाना है तो दाहिने स्वरमे।बर्खिलाफ टसके उत्तरयापश्चिमके कोने में इसी तरह दक्षिण और पश्चिमके कोने में चन्द्रस्वर के योगमें यात्रा करना लाभकारी है। उत्तरायण सूर्यका ता. ल्लुक चंन्द्रस्वर से । और दक्षिणायन सूर्यका ताल्लुक तू. यस्वरसे ऊपर लिखे कायदेसे जानना ।शुक्लपक्षमें चन्द्रमा का प्रकाश ज्यादा होते रहने के सबब औरसूर्यका प्रकाश की कला बढ़ने से चन्द्रस्वर कापरा जानना।कृष्णपक्ष में चन्द्रमा कम रहने के सबब उश्नता विशेष रहनेसे सूर्यस्वरका पहरा जानना । मेष लग्नका ताल्लुक सूर्यसे है। वृपका चन्द्रसे। इसी तरन बारी२ सूर्य और चंद्रमासे जानना । कृष्णपक्षकी पहिली तीन तिथी सूर्य की, फिर तीन तिथी चंदकी, इसी ऋभ से आगे जानना। शुक्लपक्षमें पहिली तीन तिथी चंद की फिर तीन तिथी सूर्य की इसी क्रमसे आगे जानना। बार ग्रह और नक्षत्रोंके श्राश्रय है । इनका क्रम इस प्रकार है के बुध, शुक्र, चंद्र और वृहस्पति यह चंद्रस्वरले ताल्ल क रखते हैं बाकी तीनवारोंका ताल्लुक सूर्यस्वर से है इन वारोंका क्रम ग्रहांकी तासीर पर माना गयाहै। जैसे ग्रीष्म वर्षा शरदकाल बारी बारीले भुगतते हैं । लग्न दिन रात्री ( १३७ ) भस्में १२ भुगतते हैं । और जिस लग्नमें सूर्य उदय होता है उससे ७ में छिपता है। इसी तरह शरीरमें जिस स्वरमें सूर्य उदय होता है उसके बर्खिलाफ वाले में छिपता है अगर ऐसा न हो तो उस दिन चित्तको कोई चिन्ता जरूर होती है। सुषुम्ना का लग्न लिखना फिजूल बात है क्यों के इसका समय भी उनही स्वर और तत्वोंसे निकलता है जो सुषुम्नाः प्रकट होने से पहिले मोजूद थे । यही हाल अाकाश- तत्वका जानना। प्रश्नका उत्तर । जल और पृथ्वीतत्व के समय प्रश्नोंका फल लाभकारी है। अग्निमें और वायुमें देरस नतीजा नि- कल ना समझना । सुषुम्ना और श्राकाशके योगमें प्रश्न निष्फल है। याने वह कार्य कुछ नतीजा पैदा नहीं करता या उलटा नुकसान देने वाला होता है। जल पृथ्वीतत्व संवत्की आदि तिथीके प्रातःकालमें बरतने से अभ्यासी को वारह महीने के फलका ज्ञान होसक्ता है। मामूली आदमीको केवल अपने शरीरका । जो संवत्के आदि ति- थीके प्रातःकालमें एक घड़ी तक जलतत्व बर्ते तो अदि- मियों जानवरों और तमाम बनास्पतिके वास्ते सुखदायीई है जो बजाय जलके १ घड़ी तक पृथ्वीतत्व हो तो पहिले से कुछ कम लाभ जानना । संवत्की आदिमें जो १ घड़ी तक बायु वरते तो उस संवत्में युद्ध और जानवरों का क्षय वनास्पतिका ऊजड़ होना और बर्षाका कम होना जा ( १३८) नना । जो १ घड़ी तक अग्नि बरते तो मनुष्योंमें घोर पीड़ा और काल जानना । सब भीठे पदार्थ उस साल में कमती पैदा होंगे। चारा घास फूस थोड़ी मिकदार में पैदा होगा । वर्षा समय पर नहीं होगी। और जो १ घड़ी तक श्राकाश वरते तो उस सालमें दुर्भिक्ष हो वेशुमार बूढे श्रा- दमी और जानवर मृत्युको प्राप्तहों और खुद अभ्यासी रोगी रहै । हवा ज्यादा चले । आंधियां ज्यादा श्रावें । ऐसे वर्षमें कई दफा भूकंप हो । जलसे वायुसे गांवके गांव तवाह हो जावें । जो १ घड़ी तक सुषुम्ना बरते तो उस वर्षमें अ. भ्यासी अपनी मौत समझै । इसका असर संवत् पर बहु तकम है । अगर ऊपर लिखे मुताबिक तत्व १ घड़ी तक नहीं रहे हों बल्के उस घड़ी में दो या तीन तत्व बरते हों तो उनका असर समयविभाग से करलेना ( ऊपर लिखा हाल १०० कोशके भीतर असर रखता है। कोई कोई अभ्यासी पृथ्वीके सारे मुल्कों का हाल बता सक्ता है । प्रातःकालसे मतलब वह वक्त है जिस वक्त रातका अंधेरा जाता रहता है। और पक्षी चिडी कव्वे व- गैरा बोलना और उड़ना शुरू करते हैं । अगर कोई प्रा. दमी बिलकुल अन्धा और बहरा हो या ऐसी जगह बैठा हो जहां ऊपर लिखा कोई चिन्ह मालुमं न दे सके तो ऐ. सा अभ्यासी सिर्फ चिन्तवन से ही भविष्यत् देख सत्ता है। याने ऐसा अभ्याली मल मूत्रादि दोषसे निवृत्त हो- कर अभ्यास में जब कभी उसका जी चाहै तेब बैठे ( १३६ ) ७ और जो कुछ देखना चाहै सो विचारले अगर अभ्यासी खुद रोगी है तो उसका देखा हुआ या बतलाया हुआ फल मानने योग्य नहीं चन्द्रस्वरके काम । गुरुदीक्षा, अन्थरचना, समाधि, प्रार्थना, व्रत रखना, तीर्थयात्रा, दान देना या लेना, वि. वाह करना, लिखना, यज्ञ और हवन करना, जलपीना, पेशाब करना, सूर्यग्रहण के समय और दोजके चन्द्र माके दर्शन के समय बन्दस्वर बर्तना उत्तम है। सूर्यस्वरके काल । व्यौपार याने लेन देन करना। व्यापारकी नई पोथी बदलना, पढना, चाहै कोई विद्या हो, स्त्री के साथ मैथुन करना, युद्ध करना या युद्ध में जाना, बैरीको चाहै पशु हो चाहै मनुष्य हमेशा शून्यओर रखना याने उस दिशामें रखना जिस दिशा वाला स्वर बन्द है। भयानक जगह जाना, युद्धके वास्ते जाने के लिये यात्राके लिये जो मुहूत बताये हैं उस मुताविक जाना । जैसे प- श्चिम दिशाको युद्ध के लिये जाना है तो चन्द्र स्वरमें जाना चाहिये, लेकिन युद्धका प्रारंभ हमेशा सूर्यस्वरमें करना चाहिये । हथियार का प्रहार, वशीकरण, मारण, उच्चाटन, मंत्र का जप, मुक़दमेकी पैरवी, जलमें तिरना, कसरत करना, वैरीके घर जाना । या इम्तिहान देने के लिये खड़ा होना, खाना खाना, पाखाने जाना, करज (ऋण) लेना और देना, स्नान करना, क्षौर कराना, शून्य दिशामें रहा के ७ ( १४० ) हुवा मनुष्य या पशु पाभ्यासी को जीतने को समर्थ नहीं। जब कभी इमतिहान का परच्या या कोई दस्तावेज लिखने का या दस्तखत का काम पड़ेतो यह काम खास तोरसे चन्द्रस्वरके हैं । लेटनेकी हालत में जब आदमी बाई करवट सोता है तो उस समय सूर्यस्वर रहने से सारी चेष्टा शरीरके अन्दर मामूली तौरसे रहती है । इस लिये ऐसा करने वाला आदमी सदा निरोग रहता है । वर्षाका हाल । प्रातःकाल में जिस रोज बादल का रंग सफेद गहरा खाखी मायल हो तो उस दिन वर्षाकी आमद समझै । अगर बादल के सफेद और जुदे जुदे टु- कड़े दिखाई दें तो वर्षा नहीं होगी। अगर हवा पूर्व और उत्तरकी है और स्वरमें जलतत्व हो तो उस रोज निश्चय बादल होजायंगे अगर यह बांये स्वरमें है तो निश्चय वर्षा होगी अगर बादलोंका रंग पीला हो और स्वरमें पृथ्वीतत्व हो तो दिन भर बादल वने रहना अनुमान करै । अगर बादलका रंग लाल है और स्वरमें अग्नितत्व वर्तेतो वर्षा देरसे पारे । जिस दिन बादल बहुत गहरे हों और सारे आसमान पर छा जावें लेकिन स्वरमें श्राकाशया वायु वर्त- ता हो तो उस दिन ओला या विजलीका भय समझे। जिस दिन उपर लिखे सारे आचरण प्रातःकाल में न हों पर सायंकाल में होंतो भी ऊपर लिखे मुताविक समझना । व्यवहारयानेतिजारतमेंलाम अलामविचार तिजारत करने वाले पुरुषके लक्षण बताते हैं के उसको

( १४१ )
दूसरे देश और अजान मनुष्योंसे काम पड़ता है इसलिये
उसको धोका देनेकी आदत बिलकुल छोड़ देना चाहिये
और अपने नफे के खातिर दूसरेका बुरा न सोचना चाहिये
नहीं तो चाहे वह तत्वदर्शी क्यों न हो ज़रूर कर्तव्यकी सज़ा
पायेगा। चाहे तो नित्य चाहे पत्त अथवा महीना या संवत्सर
के पहले दिन जिस चीज़का उसको व्यौपार करना है
उसकी बाबत प्रातःकाल में विचारले । अगर विचार समय
जल या पृथ्वीतत्व किसी पक्षकी आदिमें देखे तो उसी
पक्ष में माल खरीदे । और जिसमें आकाश या अग्नि देखे
उसी पक्षमें बेचदे । जिस पक्षकी आदिमें १ घड़ी या देर
तक सुषुम्ना रहीहो वोही पक्ष व्यौपारको मिटाने वाला है
या उसको नुकसान पहुँचाने वाला है।
भोंचाल प्रादि उपद्रव या वबाई बीमारियों
का फैलना । जिस पक्षों प्रतिपदाके दिन प्रातःकाल
समय एक घड़ी या इससे ज्यादा आकाश तत्व वरते तो
अभ्यासी उस्ल पक्षको भौचाल ( भूकंप ) का मूल समझे
वल्के अपना भी किसी जगह गमन सममैं । जिसपक्षकी
आदिमें एक दो घड़ी तक वायुतत्व बस्तै उस पत्तों
युद्ध प्रघट हो। जिसमें अग्नि बहुत देर तक बरते वह
रोगोंकी खान जानना । भौंचाल आदि उपद्रव या वबाई
बीमारयां अगर किसी पक्षकी आदिमें प्रकट होतो उनका
असर हलका होता है और थोड़े दिनों तक रहता है। और

हालत में भी इच्छा याने ( १४२ ) जो अमावस्या या पूर्णमासी के करीब प्रघट हों उनका असर: देर तक रहता है और बड़े भयंकर स्वरूपमें बर्तमान रहते हैं। स्वप्न अवस्था वर्णन। तमाम कामजो मनुष्य और जानवरों से ताल्लुक रखते हैं वह उनकी जाग्रत अवस्था में वर्तते हैं पर सोती हुई सूक्ष्म शरीर चैतन्यता को धारणा किये रखता है। और जब कभी सोती हुई हालत में यह इच्छा रूप शरीर मल रूपी अग्यानले पाच्छादित नहीं होता तो श्रादमी या जानवर इस अवस्थामें अनेक चेष्टाओंको देखता सुनता और उनको मनोबेगसे भुगतता है । इस को लोग स्वप्न कहते हैं ध्यान भी एक प्रकारका स्वप्न है इसी तरह से समाधी भी। लेकिन स्वप्न हमेशा किसी अ- सली चीजका साया मानना जो के सिवाय समाधी के नहीं दीख सकती। स्वप्न गहरी नीदमें कभी नहीं आता। इसी तरह से जब श्रादमी नशेके सबब या बीमारी के सबब गाफिल हो जाता है तो उस को कुछ नहीं मालुम हो सक्ता जबादमी गहरी नीदमें सोता है तो उस वक्त में रुधिर अनेक तरहके मलसे बोझल होता है। या तो भोजन के रससे उत्पतत्र हुए पदार्थोंसे या नशेकी चीजों के खून में मिलनेसे या तन्तु ( नर्व या प्रासाब) या द- माग पर चोट लगनेसे अादमी या जानवर बिलकुल गा-

( १४३ )
गाफिल रहते हैं । जानवरोंमें कुछभी होता हो उससे इस
जगह हमको कुछ मतलब नहीं है। स्वप्न श्रादमी को
बहुत
थोड़ी देर दीखता है याने १० पलसे ज्यादा नहीं ।
मनोवेग विजलीके मुताविक है इसलिये लम्बेसे लम्बा
स्वप्ना एक क्षण में ( पलक झपकने का वक्त ) खत्म हो
जाता है । औसत इस अवस्थाकी एक मिण्ट समझना।
स्वना दाहिने स्वरके योगमें कम आता है और बांयें स्वरके
योगमें ज्यादा । और दिनकी निसबत रातमें ज्यादा ।
रातके भी पिछले प्रहरमें ज्यादा । इसका सबब यह है कि
दिनों और सूर्यस्वर के योगमें रुधिरमें गरमी ज्यादा रहती
है। अलावह इसके सूर्यस्वरके योगमें दिमाग़के दाहिने श्रा-
धे हिस्से में खून ज्यादा जाता है । बांयें स्वरके योगमें सारी
चेष्टा इसके बखिलाफ़ होती है याने बांयें स्वरके योगमें
दिमाग़के बांईतरफ वाले हिस्सेमें खूनका दौरा प्राणवायू
की ज्यादा मिकदार पहुंचने से मामूली होता रहता है
जिससे विचारशक्ति उत्तम प्रकार बलवान रहती है और
निद्रा समयभी यह शक्ती जाग्रत अवस्थाके समान काम
करती है। विचार और बुद्धिबल दिमाग़के बांये हिस्से में है
इसी कारण बुद्धिमान लोगोंने सारे जगत् के कार्य जिनका
ताल्लुक बुद्धि और विचारसे है बांयें स्वरमें करना बताया
बांयें स्वरमें स्वादाहने कीनिसबत चौगुणी मरतबा अाता है।
जब कभी शरीरमें कोई व्याधि होती है तौ रुधिर मैला
होने से श्रात्माको भी उसी मुताबिक चिन्ता रहती है। जिस

HD ( १४४ ) के सबब बहुत भयंकर और मैली चीजें दिखाई देती । और तन्दुरस्त हालत में उत्तम प्रकारकी वस्तु दिखाई देती हैं। ध्यान और समाधिमें रुधिर और प्रात्मा (ख- यालात पैदा होनेकी ताकत ) शुद्ध होने से इतने प्रकारकी उत्तमसे उत्तम वस्तु दिखाई देती हैं जिनका बयान करना मुश्किल है। मामूली श्रादमीको स्वप्ना बहुत आता है। खास कर उन लोगोंको जो ग्रहस्थ होने के सबब हमेशा चिन्त- वनमें रहते हैं। ऐसे श्रादमी कभी तन्दुरस्त नहीं कहला सक्ते न उनके खयालात कभी एक तरफ लगे रह सक्ते हैं जो लोग अभ्यासी और स्वतंत्र याने आजाद हैं वह लोग स्वमकी अस्लियत बता सक्ते हैं । और ऐसे लोग जहां तक उनसे हो सक्ता है पेटको मलमूत्रके त्यागसे साफ रखते हैं। सूर्यस्वरके योगमें जो स्वप्ना आबै उसके फलकी मयाद ३ बर्ष है । और चंद्रस्वर के स्वप्नके फ- लकी मयाद ६वर्ष है। स्वप्नकी हालतमें जो दशा दीख पड़ती है वह रुधिर और आत्मा की साक्षी है। पहले यह बतादेते हैं के स्व- नेका कुछ फल होता है या नहीं सो इस प्रकार समझना के कोई आदमी अपने दिल में यह खयाल करें के जगत् स्वना है दुःख सुख सब देहके साथ हैं। इसलिये जगत्की बासना भी तजदेना उत्तम है । ऐसा विचार कर अपने ध- न्धे में लगजावे और कुछ महीनों या वर्षों पीछे अपने पु- राने इरादे को पक्का करै । और इसकी भलाई बुराई विचार (१४५) कर सन्यासी विरक्त होजावे तो यह सारी किया उस तणकी पैदा हुई जानना जिस वक्त उसने पहले पहल विचार कि- या था। यह ही हाल स्वपके फलका है। स्वमा सुषुम्नाके योगमें बहुत ही कम आता है शायद हजार दफामें से पांच दफे। हां अलबत्ता असाध्य बीमारोंमें मौतके करीब ऐसा होसक्ता है जबके सुषुम्ना बहुत देर तक कायम रहती है । यह देखने के वास्ते के स्वप्ना किस स्वर और तत्वमें वर्तता है। अखि खुलते के साथही तुरत निर्णय करै । क्योंके यह नियम है के स्वप्न दीखने के बादही आंख खुलजाती है । जब कभी ऐसा विचार समय दोनो स्वर चलते दी तो उसमें यह निश्चय कर लेके सुषुम्ना है या अाकाश । जिसकी पहचान त. त्वदर्शनमें लिख आये हैं। लेकिन याद रहैके सुषुम्नाका उस वक्त प्रतीत होना यह सबूत नहीं है के सुषुम्नामें स्वप्न दीखा है । बजह (कारण) यह है के आदमी जागते के साथही या तो कोई करवट बदलता है या कौसी तरकीव से वैठता है केजिस्से सुषुम्ना स्वर पैदा होता है । जो स्वप्न जल पृथ्वी- तत्वके योगमें अाता है उसका फल उत्तम है। शरीर और भाग्यके वास्ते सुखदायी है । बायु और 'अग्निमें भयंकर पदार्थ दीखते हैं और फल शरीर के वास्ते व्याधि कारक हैं। अाकाशमें वह वस्तु दिखाई देती हैं जो मोह और द्र- व्यसे ताल्लुक रखती हैं। और इसी तत्वके योगमें मनुष्यको नीदमें ही बीर्य स्खलित होजाता है । जल पृथ्वीके योगमें जो स्वप्ना दीखता है उसका फल एक वर्ष से लेकर ५

( १४६ )
वर्षके अंदर होता है। अग्नि और वायुतत्वक स्वनेका
फल ६ महीने में। आकाशतत्व के स्वमेका फल १ महीने
से ३ महीने तक । सुषुम्नामें हमेशा अपना काल दिखाई
देता है जिसके स्वरूप अनगिनत हैं। स्वो के फलसे यह
मतलबहै के जो कुछ अवस्था स्वप्न में देखी है वह किस तरह
पर और कितने दिनमें प्रकट होगी। रोगीको जोस्वप्ना श्रावे
उसका कहा हुआ मानने योग्य नहीं ।
गर्भ और गर्भिणी का बयान ।
गर्भस्थिति रितुश्नान समयसे लेकर ८ दिनके श्र.
न्दर होती है। योतिषमें इसकी बाबत १६ दिन लिखे हैं ।
गर्मस्थिति समयसे २७० दिनसे लेकर ३१६ दिनके दरम्यान
बालक की उत्पति होती है । माताकी बीमारियोंसे या
गर्भपर कोई चोट फेट लगनेसे बीचमें ही गर्भ पतन होजाता
है ऐसाही । दवाइयोंके असरसे जानना । किसी स्त्रीको
योनि नमक के पानी या पारा मिले हुये पानीले नहीं धोना
वाहिए वल्के गर्भके दिनोमें साबुनं या ठंडा पानी इस्तेमाल
करना नुकसान देता है । चाहे मैथुनसे चाहे पिचकारीसे कै-
सभी हो स्त्री में गर्भ ठहर जाता है। जो स्त्री पुरुष सदा रोगी
रहते हैं उनके सन्तान की उत्पत्ति नहीं होती। क्योंके उनका
वीर्य बहुतही कमजोर होता है। गर्भिणी को गैथुन कर्म
और खटाईका ज्यादा खाना बिलकुल सना है इस्से भी
गर्भपतन हो जाता है। जो पुरुष स्त्रीश्राकाशतत्व समय सं.

( १४७ ) गम करते हैं तो उस समय बहुत जल्दी वीर्य पतन हो- जाता है ।जो कदाचित् गर्भस्थिति भी होजावे तो श्रोलाद रोगी अल्प आयुवाली या नपुंसक होती है। गर्भिणी प्रश्न अक्सर करके अभ्यासी से यह पूछा जाता है के किसी स्त्रीको जिसकी बाबत प्रश्नकर्ता अ. पने मनमें विचारता है गर्भ है या नहीं अगर हैं तो क्या है इस विषयमें हम सलाह देते हैं के किसी अभ्यासी को प्रश्न कर्ताका जवाब नहीं देना चाहिये । जब तकके या- तो गर्भिणी या गर्भिणी का पति प्रश्न न करै । अभ्या. सी अपने तत्व और स्वरोंपर विचार कर नीचे लिखे मु. ताविक जवाबदे । अगर स्वरमें प्रश्न समय पूरक है ज- बतो गर्भ सम में । रेचक में गर्भ नहीं। इसी तरह शून्य दिशामें गर्भ है । अगर प्रश्न कर्ता बहते स्वरकी दिशामें खड़ा हो तो गर्भ नहीं हैं ऐसा कहै । अगर सूर्यस्वर वर्तमान है जस्तो पुरुषकी संतान होगी।नहींतो चन्द्रस्वर के योगमें लडकी पैदा होना बताना । बायुतत्व में रहा हुश्रा गर्भ माताको रोगी बनाता है। वशीकरण इसकी विधि अनेक हैं । मंत्रसे, स्मरणसे और अभ्यास से । स्मरण और मंत्रसे वशीकरन करना, कनिष्ट विधि है । और ऐसा करने वाला पुरुष मलीन चे. शा वाला होता है । हम सनातन विधिको बतलाते हैं। जो योगका अंग है। है ( १४८) जैसे पुरुष स्त्रीका संग होनेसे परस्पर प्रेम उपजता ऐसे ही पुरुष और स्त्री स्वरके संगमसे जोजो नतीजा होता है वह ध्यान देके सुनें । जब कभी पुरुष स्त्री एका- न्त में हों जहां दीवा बत्ती तक न हो परस्पर संग विहार- के समय स्त्रीको चाहिये के अपना बांयां स्वर रक्खे और पुरुष दहिना रक्खे । दोनोका श्रोष्ठ (होठ ) मिला रहै । और नाकके अग्रभागसे अप्रभाग ऐसी हालतमें रक्खेके पुरुष स्त्री की जिह्वाको अपने दांतोंसे दाब कर स्त्रीका रेचक समय बार बार स्वर अपनी नाकमें चढावे और साथही अपना स्वर रचक समय स्त्रीके नाकमें छोड़े तो लगातार ४० द- फा ऐसा करनेसे अापसमें ऐसी प्रीति भाव होजायगी के जन्म पर्यंत कायम रहने की उम्मेद है । जोकदाचित् स्त्री- ने पुरुष के स्वरको ग्रहण कियातो पुरुष स्त्रीके वसमें हो- जायगा। अगर पुरुषने स्त्रीका स्वर बँचा है और अपना स्वर नहीं दियातो स्त्री पुरुषके वसमें होजायगी यह निश्च- य मत है लेकिन एक दूसरे की बीमारी भी इस क्रिया के साधने के बक्त शरीरमें स्थापित हो जायगी के जो मृ. त्युकारक है। तमाम ववाई बीमारियां सांसही के जरिये से शरीरमें प्रवेश करती हैं। सो यह क्रिया उस हालत में बहुत खतरनाक है जिस हालत में रोगी का स्वर खेंचा गया हो। वीर्य, बल समझाते हैं। जवान तन्दुरुस्त पुरुष स्त्री ले १ घडी तक मैथुन करने की सामर्थ्य रखता है । लेकिन (१४-६) रोगी की ताकत इतनी घटजाती है के वह आधी मिण्ट तक भी संगम करने के लायक नहीं रहता। अगर किसी को इस प्रकारका बल बढाना है तो श्रादि मत समझाते हैं के ऐसी एकांत जगह में बैठे जहां अादमी और जानवर की बोली तक न सुनाई दे । अगर विरक्त है और हठमार्ग साधन करता है जबतौ उसको नाकके अग्रभाग- पै निगह रखना पड़ेगा।अगर गृहस्थी है तो अांख बंद कर के या खुली रखके नीचे लिखे मुवाफिक साधन करना चाहिये । रात्रि के दूसरे प्रहरमें पेशाव पाखानेकी हाजत से निवृत्त होकर चाहे वो बैठा रहै चाहे बाई करवट लंबा सोजा- य लेकिन हर हालतमें शुरूसे आखिर तक दाहिना स्वर बना रहना चाहिये । अभ्यास ! मैथुन की इच्छा उत्पन्न करै । लिंगको किसी वस्तुसे स्पर्श न होने दे। बिलकुल एक तरफ सुरत रखे जिससे इन्द्री शिथिल न होने पावे । अगर इस प्रकारका अभ्यास कोई आदमी लगातार १० घड़ी तक साध सकेतो वहश्रादमी स्त्रीसे पांचघड़ी तक मैथुन करनेकी सामर्थ्य रबैगा जो वह विरक्त है तो बजरोली मुद्राके साधन योग्य हो जायगा । ऊपर लिखा अभ्यास ऊकडू बैठकर कभी नहीं साधना क्यों के इस आसन वैठने से ५ मिनिट के अंदर आकाशतत्व प्रकट होगा जिस समय अपने आ. प इंद्री में स्थिरता पैदा होजायगी। नये आदमी को चा हिये के पहले पहले जितनी देर यह साधन होसके करे ।

The और रोजमर्रा उसका समय बढाता जाय । ऊकडू वैठ कर हिंदूस्तानी लोग पेशाब पाखाने के लिये वैठा करते हैं लेकिन इस प्रकार सभामें बैठना हमेशा निषेध है । कारण यह है के आकाश बर्तने से कोइ अादमी समामें माननीय नहीं होसक्ता। मृत्युज्ञान । मृत्युके कारण अनेक हैं । मृत्यु सब देहमें इकसार है यह ताकत सब जीवमें उत्पत्ति के साथ पैदा हो- ती है। यह ही शिव याने कालरूप है । यह ताकत शरीर को दोपकारसे मिटाती है । पहले बुद्धिको विगाड़ती है पीछे अनेक रोगोंसे शरीर को पीडित कर कर जीर्ण अव- स्था प्राप्त करती है जिसका अन्त मौत कहलाता है । मनुष्य में श्रायु १०० बर्षकी मानी । ऐसे ही सब जान- वरोंमें वनास्पति में धातु आदिमें ग्रहोंमें सबकी मृत्यु स. मय सुरैर है। श्रादमीमं मौत जिस जिस तरह होती है उन सब बाता का समझाना बड़ा लम्बा काम है । इसलिये संक्षेप करके कुछ थोड़ा सा हाल इस बिषयमें लिखते हैं। शरीरमें परिश्रम होते रहने से और उसके मुताबिक आहार न मिलने से मुल्ककी आब हवा से माता पिता- के बीर्य से. कुसंगसे इतनी प्रकारकी ब्याधियां उत्पन्न हो- तीहै के जिस की गिनती नहीं। मामूली हालतोंमें अपा- नके अशुद्ध होनेसे और प्राणके स्थानोंके कमजोर (१.५१ ) होन से शरीर दुर्बल होजाता है। जवान श्रादमी और बजे “सीतरह से छोटी उमरके जानवर अक्सर प्रत्या- हा और मैथुन और परिश्चम समय अनुसार न भोगने के मृत्युको प्राप्त होते हैं। तमाम छोटी उमर के मादमी जो थोड़े दिन बीमार रहकर मरते हैं वह अक्सर आकाशतत्वके कोपसे याने इल तत्वले मुद्दत तक चलते रहने से मरते हैं । बहुत उमर के बूढ़े आदमी अक्सर करके अग्नितत्वमें अपघा- तको आदि लेकर कूरो में गिरकर बागमें जलकर, या युद्ध करते जो प्राणी जीव त्यागते हैं वह वायुके योगमें होता है । पृथ्वीतत्वमें शरीरको त्यागने वाला मनुष्य सिर्फ योगी है जिसकी दूसरी पहचान यह है के वह जलंतत्वके योग- में पैदा हुआ होगा। और यह अनेक जन्मकी सिद्धियोंका फल है । जो लोग फेफड़े और दिलकी बिमारीसे या वबाई बिमारियोंसे मरते हैं वह सब आकाशतत्व के योगमें शरीर त्यागते हैं। जो दस्त पेचिश जलन्धर श्रादि रोगसे मरते हैं उनके प्राण मुखके रस्ते निकलते हैं। जो पहले से कुछ अधम है क्योंके प्राणकी चेष्टा शरीरमें मृत्युसे पहले बंद होचुकती है । नासिका के द्वारसे हवाकी आमद रफ्त वन्द होचुकती है। जो लोग आकाशतत्वमें मरते हैं वह मरण समय बिलकुल बेहोश होते हैं। ऐसे रोगी ज्यादा से ज्यादा सात दिन और कमसेकम सात घंटा भुगतते हैं। अगर किसी आदमीके आठ प्रहर तक लगातार दाहिना (१५२ ) स्वांस चले या इतनी ही देरतक बांयां तो वह मनुष्य रोग- को जरूर प्राप्त होगा। जिसके फलसे तीसरे बर्ष मरजायगा जितना ज्यादा समय कोई स्वर या तत्व जारी रहेगा और बाकी देर उसके मुकाबले का नहीं चलेगा उतनी ही ज- ल्दी मौत होगी।बूढे श्रादमी अक्सर मौतके दो तीन दिन पहले कभी कभी एक पत्त पहले अपने वदनमें कमजोरी मालुम करते हैं । उसी दिनसे उनकी भूख कम प्यास ज्यादा और गफलत रहती है। किसीको कब्ज और कि- सीको दस्त लगजाते हैं । मौत के ४ घड़ी पेश्तर शरीरमें शोक और मोह एक साथ पैदा होते हैं। और घबराहट शुरू होती है । हिम्मत कम होजाती है यह हालत सुषुम्ना स्वरके चलने से होती है। धीरे धीरे शरीरके सारे अंगोंका प्राण निकलता है । ऐसे वक्तमें सिर्फ वोही लोगईश्वरका स्मरण या भजन कर सक्ते हैं जो हमेशा अपनी जिन्दगीम मलेकाम करते हैं। और ऐसा कोड़ों आदमीयों में कि- सीमें देखा जाता है। नहीं तो इस अंतसमयमें आंखोंसे अश्रुपात ( आंसू ) निकलते हैं। वाणी बंद हो जाती है । अांख खुलीकी खुली रहजाती है। ऐसा अकसर गृहस्ती लोगों और खासकर कृपण मनुष्यों में देखा जाता है । जिस मनुष्यके अन्तसमय सुषुम्ना वर्तने पर भी परमात्माका स्मरण जारी रहता है वहही जलतत्वमें जन्म पाकर और अपनी सारी जिन्दगी को हरिभजनमें प्रीति लगाकर मुक्त होते हैं। जो प्राणी वायुतत्वके योगमें अकालमृत्युसे मरते हैं उनका जन्म अग्नितत्वमें होना निश्चय किया गया है । है sho

( १५३ )
और जो अाकाशतत्व के योग मरते हैं वह निश्चय भू.
लोकमें जन्म लेंगे और कर्मानुसार योनि भोगेंगे।
इस मोके पर हम वह हालत बतादेते हैं जिसको शरीर
सुषुम्नाके योगमें भुगतता है । और इसको पन्चानने और
तजरवा करने के वास्ते गृहस्थी और विरक्त दोनो अच्छीत.
रह यादरखे !
मामूली हालतमें सुषुम्ना इतनी कम देर रहती है के
जिस का असर शरीरधारी को मालुम नहीं पड़ता अलबत्ता
योगीको प्राणायाम समय और गृहस्थीको चलते फिरते
दौड़ते परिश्रमके काम करते वोझ उठाते और कसरत करते
ग मैथुन समय मालुम पड़ता है के जिस वक्त में अगर
कुम्भक के जरिये प्राण को रोका नजाय और चेष्टा शरीरकी
वंदन किई जायतो भयंकर रोगही पैदा नहीं होते बल्के
शरीरसे प्राणही जुदा होते हैं। सुषुम्ना स्वरके योगमें बुद्धि-
विचार नहीं रहता। जैसे हमने प्रत्यक्ष में महाभारत सुना
है व ही हाल इस वक्त पांचो तत्व याने पांडवोंका सा और
उनकी प्रकृति याने द्रौपदीका सा और कौरखके समान इस
शरीस्का होता है । देह बिलकुल निर्बल होता है सुषुम्राको
जानना ही शरीरका और मृत्युका ज्ञान है । उत्पत्तिसे
लेकर सारी जिन्दगी भरमें जब कभी यातो प्राणायामसे या
परिश्रम से या स्वभाविक सुषुम्ना स्वर वर्तता है तो उस.
की हवा नाकसे बाहर २४ उंगल तक निकला करती है

( १५४ ) और सारे शरीरमें पांचोतत्वका बल इकसार होनेके सबब कोई तत्वका लक्षण समझमें नहीं आसक्ता इस वक्त की प्रार्थना करी हुई ऐसीतरह कबूल होती है जैसे कि- सी दुखियाकी जो बस्त्र ओर अन्न बगैर या जाड़े गरमी से पीड़ित और बिलकुल अपाहज हो । जब मरण समयमें सुषुम्ना चलती है तो खूनका दौरा बंद होते रहने से स्वर निर्बलताको प्राप्त होता है और नाकसे ४ अंगुलसे जियादा बाहर नहीं आता और आखरी वक्तमें तो बिलकुल मालुम नहीं होता येही फर्क पहचानने के लायक है जो बेशुमार बूढ़े आदमियोंकीमौतके वक्त समझमें पासका है। सवाल-क्या जरूरत है के कोई काम दाहिने स्वरमें कोई काम वांयें स्वरमें करै । क्या कोई नुकसान होसक्ता है। अगर कुछ लाभ होतो क्या । जवाब-तमाम परिश्रमके काम जिनमें हाथ पांवकी महिनत दरकार है अगर चन्द्रस्वरमें किये जाय तो इसलि- ये नुकसान होगा के दाहिने अंगमें खूनका दौरा उस व- क्त सुस्त हैं इसीतरहसे बुद्धि और विचारके काप अगर- दाहिने स्वरके जोगमें किये जांयतो उस वक्त दिमागके बाये हिस्लेमें खूनका दोरा सुस्तहोनेसे विचार अधूरा रह- जायगा ।

(१५५) विचारशक्तिकी जगह और तमाम ज्ञानइन्द्रियोंका ताल्लुक बडे दिमागके उस नीचेवाले हिस्सेसै है जो भृ कुटीके पीछे मुकाविलमें भृकुटीसे अढाई इंच पीछे है । इ- सको अंग्रेजी में प्रोपटिक्थलमल कहते हैं । जो लोग त्रिकुटी याने भृकुटी में ध्यान रखते हैं उनमें इसस्थान पर जोर पहुंचने से और उतनी देर जितनी देर वह ध्यान क. रसते हैं इस मुकाम पर खूनका दौरा खूब जोरसे होता है याने वहां खून बहुत पहुंचता है और नरब याने असबकी भी खूब परिवर्श होती है । यहही कारण है के जो लोग सुकुटी में ध्यान रखते हैं वह तमाम सिद्धियों को और पूर्ण अभ्यासको पहुँच जाता है और इसी शक्तिके बढ़ने से मनु- ष्य उन सारे पदार्थोंकोसमाधि अवस्थामें विचारता और श्र- न्तरिक्षमें देखता है । अब हम उस शक्तिका बयान करते हैं जो परिश्रम के सारे कामोंमें मदत देती है और कै आदमी की हाथ पांवकी महनत से वह शक्ति चैतन्य रहती है । इस मुका- मको जोके पहले से पीछे की तरफ है कोरपसइसट्राई. इटम कहते हैं । महनती मजदूर लोगों में यह ताकत कु. दरनी तौर से बनी रहती है । अभ्यासीमें और उनलो. गोंमें जो परिश्रमके काम कम करते हैं उनमें यह शक्ति भी कमजोर होजाती है । जो लोग बुद्धि याने विचा- के काम बांयें स्वरके जोगमें करेंगे तो उनका काम ऊ- पर लिखे कायदे के मुताबिक संपूर्ण होजायगा। ऐसे ही दाहने स्वरके जोगेमें जो लोग परिश्रम के काम करते हैं उन (१५६ ) कामौका नतीजाअछाहोता है। इसके उलटा करने से मनुष्य रोगी होजायगा ।तमाम कामोंका अनुमान याने यह विचा. स्ना के कोनसे काम कौनसे स्वरमें किये जावें हरेक आदमी अपनी कलसे विचारले । सत्ताईसवां प्रकर्ण राजयोग वर्णन योग एकताकू कहते हैं। शरीर अात्मामें और श्रा. त्या परमात्मा में लय होना यह ही योगका ज्ञान है। कि. या भेद याने मुख्तलिफ़ साधनोंसे इस के सोलह नाम हैं जिनमें से हर एक को योगकी कला कहते हैं। कृष्णचन्द्र- जी महाराज सोलह कलाओं के ज्ञाता माने गये हैं । इ. नको कोई योगीन्द्र और कोई अवतार करके मानते हैं। इसी तरह से राजा जनक जिनको ज्ञान योगकी प्राप्ति हु. ई ज्ञानी करके मशूर हैं । ज्ञान से वैराग्य उत्पन्न होता है। बेराग्यसे जगत्की वासना बहुत कम होजाती है । योगीको शरीर और अात्माकी शुद्धि रखना याने शुद्ध प्रा. चर्ण वाला होना बेद और शास्त्रको पढ़के या सुनके त- जरवा उठाना । जितेंदी और स्वतंत्र रहना सबसे जरूरी वात हे । सबसे बड़ा साधन आत्माके शुद्ध करनेका यह है के सत्यवादी हो और हृदयमे दया रक्खे। किसी जीव- को न सतावे । अब शरीर का सोधन बताते हैं के हमेशा महनत मजदुरी करके खाय कभी दूसरेसे याचना न करे जिसका मतलब यह है के अपने आपको कभी (१५७ ) कम हिम्मत वाला न बनावे । दूसरे के पुरुषार्थ से अपना ऐन भरे । आज कल फकीरोंकी तादाद इतनी ज्यादा होगई है के उनमें बत ही कमलोग ऐसे रहगये हैं जो अपने जाहिरी स्वरूपके मुताबिक शुद्ध हृदय वाले होते हैं । यह हाल सारे मुल्कोंमें कमोवेश भुगता रहा है । हद मुश्किल यह लगी हुई है के ऐसे लोग कुछ न जा. नने पर भी अपने भापको सबसे उत्तम प्रकट करना चाह- ते हैं । अगर कोई दर असल उत्तम है और गुणी है तो वह अपने आपको इतना दरजे छुपाना चाहता है के उ. साले गुणकी किसी गृहस्थी साधुको खबर होना तो द. रकिनार उसके स्थानतकका पता लगाना मुश्किल है। इसलिये ऐसे अभ्यासीसे किसीको फायदा नहीं पहुंच सक्ता । इन हालतों में यहही बात जरूरी है, के जो पुराने महात्मा अपना उपदेश छोड़गये हैं वहही नित्य विचाग्ने और तजरवा उठाने लायक है। सैकड़ोमें से कोई एक दो उन तजरबोंका समझने वाला होता है बाकी सद भेड़ा चाल पर चलने वाले हैं। दूसरा सवव उपदेशके न समझने का यह है के बहुतसे साधु जो वे लिखे पढ़े हैं वे अपना पेट भरने के खातिर इतनी तरहकी तरकीब काममें लाते हैं के जिनसे दुनिया का रुगैया पैसा ही नहीं लेते बल्के उनके प्राणभी हरलेते हैं । उनमें से २ तरकीब यह हैं एकतो अपने आपको वैद्य मशूर करना। दूसरे हठयोगका आचार्य बनना । इन तरकीबों से (१५८) गृहस्यी साधुनोंका बहुत सत्कार करते हैं लेकिन आग्विर में वह गलः साबित होनेसे और अपना माल लुटाने के, सबब पछताते हैं। हठयोग साधना गृहस्थीको अधिकार नहीं । अगर कोई भूनके इतका साधन करेगा तो उसको रोगकी प्राप्ति होगी । योगकी क्लाओं को नीचे लिख कर समझाते हैं । जिनमें से किसी एक पर दृढ विश्वास होनेसे और साधते रहने से मनुष्य की मोक्ष है। नं० १ क्रियायोग इसमें मूर्ति श्रादिका पूजना व्रत क. रना संध्या और शरीर सोधन गृहस्थधर्म शामिल हैं। नं० २ ज्ञानयोग सृष्टीके सारी फैली हुई रचना से जो कुछ उपदेश याने तजरबा हासिल होसके उसके जरिये अपने बुद्धिबलको बढा कर उसके मुताबिक काम कर ना इसमें मनुष्य के सारे कायदे कानून शामिल हैं। नं० ३ चर्चायोग अनेक मतांसे साधुओं से जुदे जुदे देशके अनुष्यों से जो कुछ वाती विचार मिले उसले अ- पने तजरवे को बढ़ाना । तमाम पुरुषार्थी पत्रुष्यों के मुता- बिक होने की कोशिस करना । ने० ४ हठयोग शरीरको साफ रखने के लिये पटकर्म का साधन । रुधिरशुद्धि के वास्ते प्राणायाम । पाल्मा- की शुद्धि के लिये ध्यान और समाधि । कर्मेन्द्रियोंको शो- कने के वास्ते श्रासन | और ज्ञानइन्द्रियों को रोकने के

है
( Y)
बाम्ने एकान्तस्थान लिथत हिरे गये
नं०५ कर्मयोग असलमें क्रियायोगका अंग है ।
इसके समक्षानेका अभिप्राय गह है के मनुष्य जितने काम
कर वह सब पोकादू हों । अपने शरीरकको सुम्दा देकर
दूसरे जीवको क्लेश न पहंचाचे । अपने को सदा असमर्थ
समझ कर ईश्वरमें भरोसा करे ।
नं० ६ लययोग इससे यह मतलब है के अंपनी
मोतको सदा निश्चय रख के उस परमात्मामें लयं लगावे
जिस में यह देह समाजायगा । और नित्य ऐसाही अ.
यम स्कन्।
नं०७ध्यानयोग एकान्तमें बेठ कर ईश्वरकी रचनाकार
स्मरणा करना । ध्यान अनेक प्रकारके हैं। सबका अभिप्राय
यह है के जो कुछ अनुचित कर्म किये जाते हैं उनको बु.
रामान कर आगेको न करना । पुराने के लिये क्षमा चा-
दना और ईश्वरकी लीला देखते देग्यते उसमें समाना।
नं० ८ मंत्रयोग मंत्र काडों में यह एक किस्मका वाणी
सहित कर्म है । इसकी सिद्धि कभी भी नहीं होसक्ती
क्योंके यह कर्म वासना को दीर्घ करताहै । तंत्र याने टो-
ना भी इसमें शामिल है । क्रोधी और मूल इसी जंजालमें
अपना शरीर होम करते हैं । सिद्धि उस आदमी को हो से
कती है जिसका वाक्य सिद्ध है।

( १६० )
नं० ६ लक्षयोग तमाम उपदेश जो अपनी डमरमें
ग्रहण किया है उसको श्राप वर्तना और उसकी सचाई
और कूठको जांचना।
नं० १० वासनायोग इसका यह प्रयोजन है के जो
खोटी वासनाहै याने जिन कर्मों की इच्छासे शरीर और
बुद्धि का नाश हो उनको त्यागने का अभ्यास करे।
नं० ११ शिवयोग हरवक्त अपनी मोतको याद रखना
और बिचार पूर्वक उन युक्तियों को काम में लाना जि-
नसे मौत टलती है।
नं० १२ ब्रह्मयोग बिचारसे सारे मायामय पदार्थोंको
पिछानकर उनके कर्तारको खोजनेकी कोशिस करना ।
और अपने मनसे द्रोह याने दुश्मनी को निकाल देना
और सब जीव ऐ दया रखना यहही ब्रह्मज्ञान है ।
नं० १३ राजयोग गृहस्थधर्ममें रहते रहते ईश्वरकी
प्राज्ञावोंका पालन करना काया और बुद्धिको निर्मल रखना
सत्यवादी होना लक्षण हैं।
नं० १४ सिद्धियोग अपने पराक्रमसे उन वस्तुवोंको
पास होना जो मामुली आदमियों में नहीं लक्षित है।
यह प्रातिविद्या और देशांतरगमन से हासिल होती हैं ।
नं० १५ अद्वैतयोग परमेश्वरको सर्व समर्थ मानकर

( २६१ )
उसमें अपनी भावना वढाना और अन्यपदार्थों को अपने
समन जीव समक्ष कर मोह हटाना और उनसे याचना
न करना मलब है।
नं० १६ क्रियायुक्त प्रयोग यह भी कर्मयोगका अ
गहै । अपने मनके संकल्प परमात्मा लय करना और
सारे कामोंका शारंभ ओर समाप्ति और युक्तिसाधन उ.
सी कारके आश्रय जानना ।
सिवा प्रा हठयोग वर्नन ।
यह विद्या बहुत सारी युक्तियोंका समूह हैं । इसके
गुरू याने अधिष्ठाता शिव याने काल रूप भगवान हैं ।
और इस उपदेगका मत सदा निरोग रहकर मौतका टा-
लना है । इसलिये हम सबसे पहले महादेव और उसकी
पूजाका वनन करते हैं । महादेव याने शिवलिंग कव्वेको
कहते हैं । जो हलको लटकता है अंग्रेजी में इसको यू.
वियुला कहते हैं । इस की पूजनसे मतलब खेचरी सा.
धन है । और ध्यान से मतलब वह समय है । के जि.
तने कालके पीछे इस की सिद्धि हो सकती है । पूजन
की समाप्ति पर गाल को फुलाकर बम बम बोलना
या जीभको बाहर निकाल कर चारों और घुमाना और
त्रिकटीको देखना इस के लिये निहायत जरूरी बात है ।
के वह समाधि उतरने पर अपने इन अंगोकी जांच कर.

( ११२) लता है। कि यह निकम्मे तो नहीं होगये हैं। क्योंके अं. गर इन अंगोका फालिज यानेलकवा होगया है तो योगी ऊपर लिखे मुताविक चेष्टा नहीं करसकेगा । गा. लका बजाना या मुंह फुलाकर शब्दनिकालना गृहस्थी को या समामें बैठकर ऐसा करना मना है । अगर गृह- स्थीको अपने चहरे के ऊपर लिखे मुताबिक जांच करने की जरूरत है तो एकान्त में नित्य प्रातःकाल शीशमें अपना मुख देखें। हठयोगको अष्टांगयोग कहते हैं । इसका साधने वाला हमेशा मजबूत बदनवाला और जवान ब्रह्मचारी और विरक्त होना चाहिये । जिसका हृदा दया वाला और दुनयां के तजर से भराहो । योगीका स्थान वस्तीसे ११२ कोस दूरहो । वहांकी श्राव हवा गरम न हो । पास पास में वृक्ष और जल का स्थानहो । खाने पीने को उत्त- प बनास्पति याने फलहों । योगीको सब प्रकारके अन्नका त्याय लिखा है । कोई फल जो कहा हो सो कभी न ग्वाना चाहिये। जितने दिनों तक योगक्रिया करे सिराय गोके दुरुपके और श्राहार न पाये । चाहे दुश्यहो चाहे जल हमेशा बांये स्वरमें पीवे । इसके उलटा करनेसे मल- मृत्रके त्यागमें मुश्किल होगी । योगकी चाहे कोईसी निया हो ओजन पाने के समय से लेकर ८ धराटे के अंदर कभी नहीं करना । जब अन्न मेदे (इस्टोमक)से पच कर शांतमें न उतर जाय उस वक्त तक कोई साधन करना (१६३ ) रोग पेदा कैगा । हमेशा शरीर सोधन क्रिया गुरुके सन्मु- रुबु को ! श्रार गुरू उसक्रिया में पूर्ण नहीं है तो उससे उ. एदेश न ले । ध्यान और समाधि हमेशा गुफामें करै जो दो गज लंबा और इतना ही चौडा और ऊंचा होना चा. हिो । उसका द्वार छोटा होना चाहिये और अंदरसे वं- करके बैठे। जहाँ मनुष्य और जीव जन्तु की श्रामदर- फत न हो। सबसे पहले मौतका भय त्याग। और अपने विचारमें हद हो । मान बडाई हिंसा मनोरथ आदिको स्याग दे। हमेशा रात के पहले पहरमें सोया करै भोजन दिनके दूसरे पहरमें करै । और नित्य कमसे कम १ छ. डी तक प्रात:काल समय खुली हवादार जगहमें -ह- लाकरे । नित्यस्नान को किमी जगह शरीर पर बाल न रह ने दे । जिससे ध्यान समय खुजली वगैरा न सता- वे । मधुर वस्तुओंको ग्रहण करे । तमाम खट्टे पदार्थों को त्यागदे। जो केवल दुरवसे पेट न भरे तो घृत या सहत को चाहेतो मुखसे ग्रहण करे चाहे गुदा और लिंग- की और से चढ़ा कर पचाने । ताकत के वास्ते मैथुन करके स्त्रीका रज खेंचे लेकिन यह क्रिया राजयोगियों के लिये है। जो किरजा और वीर्य के स्वलितहोतेही योनिमें मोजूद रहते रहते लिंगद्वारा संचलेते हैं यहही बजरोलीकी सिद्धि कहाति है। इस जगह पर रजसे मतलब वोह पतला खुमाबदार पाहाह जो स्त्री के मैथुन समय योलिसे निकलता है। योगी को भोजन पाने के १ घडी पीछे खाये पीये को ( ०६४ ) कै( वमन) के रस्ते निकाल देना चाहिये । इस क्रिया को गजकर्म या उखाल कहते हैं । आदमी के बदन में जल और आहार इनट्टा मिलकर मेरे के अंदर खट्टारस मौ- जूद होने से जल्द ही अच्छी तरह घुल जाते हैं और उन के वारीक जुज १०मिण्टके पीछे हीभापकी शकल में होकर खूनमें मिलने शुरू होजाते हैं । योगी । घा. डी के पीछे इस लिये शरीर से त्याग देते हैं के भोजन- के सबसे पहले उत्तम रसको ग्रहण कर लेते हैं और वाकी कोयह समझ करके कि यह बचा हुवा पदार्थ प्रांतमें जाकर रस और मल बनावेगा जो कि शरीर सोधन स- मय कठिनताई पैदा करेंगे त्यागते हैं। योगके जुदे जुदे अंगोंका वनन करते हैं। नं० १ यम । सत्यवादी और दयालु होना जितेंद्री और शान्तहोना यह लक्षण सर्वोपरि हैं । क्षमा योग की जड़ है और क्रोध योग की जड को उखाड़नेवाला है। नं० २ नियम । शास्त्रों का विचार, अपने से बड़े की और गुरू की और सत्संगी मनुष्य की सदा हल करना । संतोष में रहना इंद्रियों का स्वाद त्याग देना । जो कुळ अपने में बुद्धि और ज्ञान - उस्से जगत का भला करना । नं०३ शासन । इनकी संख्याबहुत। जिसको जिस तरह से उठने या बैठने की जरूरत पड़ी उन्होंने अपना ३ ( १६५) लजरवा दुनियां के वास्ते रख छोड़ा है। लेकिन जोजरूरी हैं उनका प्रचार हमेशा के वास्ते कायम रखा है। और वह रह है । गृहस्थी और नये अभ्यासी के वास्ते स्वस्तिका मयूर । और पश्चिमतान हैं । योग अभ्यास के वास्ते सि- द्धश्रासन | पद्मासन । सिंहासन । और भवासन हैं। २०४ प्राणायाम । यह क्रिया शरीर के रुधिर को शुद्ध रखने के वास्ते की जाती है। योगी का तात्पर्य इस क्रियाके साधने से यह है के रुधिरको शुद्ध करके कुंभकद्वारा प्राणांकी स्थिति शरीरमें रखे । और इस तरह गहियोंको निश्चयकरक ध्यानके सुखको भोगे। नं०५ प्रत्याहार। भोजन बासी और ठंडा कभी न खाना क्योंके ऐसा पाहार पेटमें वायु (गैस् ) को वढाता है और आलस्य पैदा करता है । भोजनका अनुमान ६ छटांक या १६ पास है। तमाम प्रकारके अन्न मलको वदाते हैं इस लिये त्यागने योग्य हैं । सारे हरे शाक और जमी- कंद वायुको बढाते हैं । इस लिये निषेध हैं। मांस और मदिरा शरीर और बुद्धी दोनोंका नाशकरने वाले हैं। और दयाको कमती करने वाले और क्रोधको उपजाने वाले हैं। दही, छाछ, चणा, गेहूं, लवण, मिरच, आदि वस्तु, वीर्य को तीणा करने वाली चीजें हैं। न०६ धारणा । इसके जरिये उन पदार्थों पर मनुष्य- १ ( १६६) को तारत हासिल होगी जिसका उम ने अपने मन में वि. चार और संकल्प किया । नं०७ ध्यान । ध्यान से उन सब पदार्थोकी सिद्धि होती है जिनकी धारणा की गई है। और यह अनेक शीत से सिद्धि होते हैं जिनका वयान आगे होगा। नं० ८ समाधि । इस हालतमें मन एक ऐसी जगह लए होता है जहाँ जगत बस्तु का खोज नहीं । और सि. वाय आनंदके दूसरी चीज नहीं । अानंदसे मतलब यह है कि उस अवस्थामें जगतके पदार्थोकी बासना उत्पन्न नहीं हो सकती जो के दुःख का मूल है । प कर्म बर्नन । हठ योगकी सारी क्रियावगैर मलमूत्रके त्याग निष्फला हैं। इस लिये सब से पहले इनकी साधना विधि बतलाते हैं। नं० १ बस्ती । शरीरके मलमूत्रको त्याग करके नित्य- प्रातःकाल समय जलमें ऊकडू बैठकर जिसमें कमर डूबीहो शरीरो बनको उतारे यह जगह बिलकुल एकान्तकी होनी चाहिये । फिर गुदाके रस्ते चाहेतो खोखले बासकी नलीको चिकनाई से मुलायम करके चाहे रखड़की मोटीनली जिसका कुतर ( भीतश्की चौडाई ) याने डायाभेटर श्राध इंचहो । लंबाई १२ अगलस १६ अंशुलहोवे गुदामें आहिस्तासे (१६) प्रवेश करे । गुदाको संकोचन विकोचन करे और पेटको सुकड़े और फैलाये । जिस वक्त पेट सुकेड़े उसी वक्त गुदाको सुकेड़े और पेटके फुलाने पर गुदा- को खोले । जोरसे वायु को नीचे को कहा है इतना जोर करेकि अपान हर क्षको के साथ युदासे निकलती रहै । संकोच करती बत्त इस बातका खयाल रक्खे के नली या बड़का मुंह जलसे बाहर ना रहै । ऐसे नित्य करने से जल गुदा में उदले लगजायगा। जितनी शक्ति हो उतना चढ़ावे और पेट पर जोर न दे। जन पेट भराहुंआ भालुम दे तो उस वक्त न्योलीकर्म करै जिसका आगे क्याना होगा। ऐसा करनेसे आंत का सारा हिस्सा धुलजायगा । यह चढ़ाया हुआ पानी उलझे निकल कर ४० गज के फासले पर दूर चलकर इस तरह से त्यागे कि दोनों हाथ घुटने पर रखकर सिर सामने को झुका रख कर खड़ी हालत में हलकी रीति से पेट को अंदरकी तरफ दबाये | अगर कुछ शेष जल मालुम तो पेटको हतेलीसे दबाकर निकाल दे। यह क्रियाएक दफादो दमा तीन दफा करे जब तक पानी शुद्ध न निकले । नये अभ्यासी को यह क्रिया गुरू के सामने करनी चाहिये। पानी हमेशा निर्मल हो और उसमें यातो एक माशा न. मक या आंवले का चूर्ण ४ माशा मिलावे जलकी गरमाई गरमी के मोसममें कुछ कम और जाड़ेमें १०० दरजा फैरन- आद् होना चाहिये । याने ऐसा गररू जैसा शरीर सर्वदा होता है । जलकी मिकदार दो सेर से ४ सेर तक चढ़ .

(१६८) सक्ती है। श्रादमियोंको ओजारोंके जरिये पानी या दवा चढ़वाना नहीं चाहिये । क्योंके इस हालतमें प्रांतकी ता- कत कम होजाती है और दस्त लगजाते हैं। बस्ती अनेक भांतिकी है ऊपर लिखे कायदे मुताबिक पवन वस्ती या औषधि उदरमें ग्रहण की जाती है। जिनकाअाधार मूलको संकोचन विकोवन और पेट को ढीला छोड़ने पर समझना। जलका परित्याग उड्डयानबन्ध पर और उसका उदरमें का- यम रखना न्योलीसे जानना । बस्तीकर्मसे उदर और हृदयके रोग निवृत्त होते हैं । बस्ती अच्छी प्रकार न हो तौ पेट फूल कर मौत हो सक्तीहै। बस्तीकर्मको गणेशक्रिया कहते हैं। और यह ही सव क्रियाओंका मूल जानना ! नं० २ न्योलीकम । पद्मासनसे, या मृतकासनसे उकडू बैठकर, या खडेहोकर, इस प्रकार कि दोनो हाथ दोनो घुटनोसे लगे रहैं रेचक करके प्रारंभ करैजिससे पेट हलका नरम रहे । पहले पहले पेटको शक्ति अनुसार कमरकी तरफ़ पीछेको सुकेड़े मूलबन्ध करे याने खूब जोरसे गुदाको सं. कोचन करे । पेटको अागे पीछे लफावे जिसके पीछे दा. हिने बांये नलोंको घुमावे । जितना अभ्यास बढेगा उत- नहिी इस क्रियामें मदद मिलेगी। मूलबन्ध उड्डयानबन्ध ही कुंडलिनीको जगाते हैं याने अपानको गुदासे खेंचकर कण्ठ पर्यंत चलाते हैं। उड्डयानवन्धमें अपानको बहुत ग- रमी पहुँचती है । और वायु हलकी और शुद्ध होता ऊपरको चलती है जिसको योगमें पटचक्रका ऊर्ध्वरले ( १६६) होजाना कहते हैं यह क्रिया रेचककी है। और पूरक के शुरू होने से पहले खतम होजाती है । पूरकको सुर और रेचक- को असुर कहते हैं । सो यह क्रिया असुरके वलसे सिद्ध हुई है लेकिन इसका लाभ सुर याने प्रागा को मिला है वह लाम समाधि कहाता है। न्योलीकर्म करते हुये सि- वाय पेट के शरीर का कोई अंग न हलना चाहिये इसी क्रियाको प्रांत विलोवणा कहते हैं । वस्ती और न्योलीके सिद्ध होने पर जो लोग गुदा या लिंग द्वारा वायु या उत्तम पदार्थ जैसे जल, घृत, सहत, चढाकर शरीरमें पचाते हैं याने रुधिरमें मिलालेते हैं जो कि कुदरती तरीके से होता है तो ऐसे योगीको भूख,प्यास,शरदी, गरमी, नहीं व्यापैगी। न्योलीकी सिद्धि जब जानना के योगी अपने नलोको ( प्रांतोंको) गुलाईमें घुमा सके।न्योली उन लोगों से जिनका बदन मोटा फूला हुआ है या किसी प्रकारका उदर रोग है होना मुश्किल बात है । बस्ती और न्योली- कर्म उदरमें अन्न मौजूद होनेके वक्त नहीं करना चाहिये नहीं तो उलटा पेटमें दर्द चल जायगा। नं ३ नेती । मोमके जरिये मोटा तागा मुलायम कि- या जाता है । फिर इस तागेको नाकके दाहिने नश्नमें दाखिल करके मुंहमें से निकालते हैं । फिर इसी तौर बांये में से बारी बारी दस बीस दफा ऐसाही करते हैं। कोई कोई आदमी इस क्रियाके बाद गरम जल या घृत्त नाकके द्वारा ही पीते हैं । इसका साधने वाला त्राटकको जरूर सिद्ध ( १७० ) १ कालेगा ! अांखकी जोति बहुत बढ़जायगी। अांख, नाक और दिमागकी सारी बीमारियां दूर होजायगी। इस अ- भ्याससे छींकका आना बंद होजायगा। यह क्रिया नित्य प्रातःकाल करना चाहिये । जो लोग यह खयाल करते हैं के चन्द्रमा और विन्दुका स्थान मस्तक है और सूर्य याने अनिका नाभि इसका यह अभिप्राय है कि थूक जो अमृत या बिंदु है हमेशा सब आदमियोंके मेदे- में पड़ता रहता है। जहां तेजाबी खासियतवाला गरल रूप रस है । यह दोनो रस बर्खिलाफ तासीर वाले हैं इस लिये अमृत इस अग्निकुंडमें पहुंचा हुश्रा बेकार होजाता है। अगर यह विंदू याने थूक मेदे में जानेसे या मुख या नाक के द्वारा निकलनेसे बचाया जाय तो दीर्घायु कर- ता है जिसकी सहज तरकीब यह है के जीभको मोड़कर निस दिन तालूसें मिलाये रखना चाहिये । येही सा- धन निद्रा जीतनेका है । इस क्रियासे बिंदू इसी ठोर जब ( लवलीन ) होने लगजायगा और नींदका अ. भाव हो जायगा । नेतीक्रिया में तागा १२ अंगुलसे १६ अंगुल तक होना चाहिये। नं धोती। लंबा टुकडा च्यार अंगुल चोड़ा बा- हुत उमदा मजबूत बारीक कपड़ेका जिसकी लंबाई १६ हायसे १७ हाथ तक होनी चाहिये । प्राहिस्ता आहिस्ता पानी में भिगो भिगो कर निंगलता रहै । जब यह बाहर

( १७५ )
थोडासा रहजावे तो न्योलीकर्म करे जिससे यह कपड़ा
आंत की तरफ रजु होजाए और मेदेके उस सूराख को
खोलकर जो प्रांतकी तरफहै प्रांत में प्रवेश करे और आगे को
चलता जाय यहां तक के यह कपड़ा सारी प्रांतोमें
से होता हुआ गुदासे निकल आये । यह सिद्धांत जैसा
सुनने में आता है वैसा लिखके दिखाया है। हमारी रायमें
यह क्रिया आज कल किसी मनुष्यसे ऊपर लिखी भांति
सपना बडा कठिन है। इस साधनके आदिमें ही मुंह
और मेहे से खूनका श्राना शुरू होजाता है । सारा मुंह
और हलक सूजजाता है। और दम घुटकर मौत हो
स्मृती है । धोतीके मुकाबले की क्रिया शंखपखाल है ।
जिसका अभिप्राय यह है के मुखसे बहुतसारा गरम ज.
ल पीकर और उसको जरा देर उदरमें ठहरा कर गुदासे
निकाल देना । जिससे कुंडलिनीके ६ चक्र याने गिजा
की तमाम नाली ऐसी साफ हो जावे जैसे धोबी के घर
का धुला हुआ कपड़ा निर्मल होता है । जलको पीकर
न्योलीकर्म करते हैं जिससे यह जल प्रांतमें उतरजाता
और फैल जाता है । गजकर्म और शंखपखालमें यह फर्क
है कि गजकर्ममें पानी मेदे से ही उलटा मुख द्वारा नि-
काला जाता है।
नं ५ ब्रह्मदांतुन । यह कर्म हृदय रोग मेदा और
जिगरके रोगोंको दूर करनेके वास्ते किया जाता है । दांतुन

( १७२ )
किसी दरख्त की मुलायम छाल या शाखाकी ऐरण्डके दरख्त
की या खडकी नलीकी सवाहाथ लंबी लेना चाहिये । यह
ध्यान रहै के दांतुन हमेशा बहुत चिकनाऔर बगैर गांठ के
होना चाहिये और टूटने वाली न हो । मुंह के रस्ते मेदेमें
पहुंचाये और वहां हलकी शीतसे हला कर मुंहसे आहिस्ता
से निकाल ले। जिससे सारा मैल भेदे याने इसटोमक्का
और खराब पित्त जितना उस वक्त मौजूद होगा सब मु-
खाद्वारा निकल जायगा । और इस क्रियाले सारा शरीर
हलका पडजायगा । नया अभ्यासी वजाय दांतुनके अपने
हाथकी अंगुलियोंसे यह क्रिया किया करे।
न० ६ त्राटक । जिन श्रादमियोंने ऊपर लिखी पाचों
क्रिया साधली होंय उसको यह उत्तम क्रिया फलदायक
होगी और सारी इंद्रियों के बेगको रोकने में समर्थ होगी।
इसी के साधने से समाधि सिद्धि होगी। जब नासिकाके
अग्रभाग पर निगह ठहराने की पूरी सामर्थ्य हो जावे
याने कम से कम ५ घड़ी तक की तौ भ्रकुटी के बीच में
निगह रखने की युक्ति साधे । इस को करते रहनेसे स.
माधि प्राप्त होगी।
अासन साधना
जो आसन सबसे ज्यादा जरूरी और सर्वकालमें सु-
खदाई है और कि साधु और गृहस्थी दोनोके लिये हि-
तकारी है रोगकी हालतमें साधने से रोगकी निवृत्ति होती

( १७३ ) है । और तन्दुरस्त हालतमें अभ्यास करते रहनेसे म. दृष्य योग्यताको प्राप्तहोगा। नं १ स्वास्तिकासन । बांई जांधके अर्द्ध भाग पर दाहिना पांव और दाहिनी जांघके अर्द्ध भाग पे बां. या पांव रहै । दोनो एड़ियां जांघके अंदर वाले हिस्से पर रहैं । दोनो हाथोंकी हथेलियां घुटनोपर रहैं । कमर और गरदल बिलकुल सीधी हैं। नं २ मयूरासन । यह श्रासन हमेशा उस वक्त साधना चाहिये जब मेदा याने इसटोमक अन्न और ज- खेल खाली हो । दोनो हाथकी हथेली धरती पर टिकी रहैं। दोनो कूहशी याने ऐल्बो पेटके ऊपर वाले हिस्से पर लगा कर पांव सीधे अाकाशकी तरफ रखे जैसे मोरके पंख नाचती वक्त होते हैं। नं० ३ पश्चिमतानासन सीधा बैठकर दोनो पां- व लंबा पसारे रहै पंजोंकी अंगुलियां ऊंचे को रहैं प्राहि- स्ता आहिस्ता झुक कर दोनो हाथ पसारके. दाहिने हाथ- से दाहिने पांवकी अंगुलियां बांये हाथ से बांये पांवकी अंगुलियां पकड़े । माथा दोनो घुटनोंके बीचमें रखे इस हालतमें उड्डयानबंध या न्योलीकर्म साधे तौ शक्ति जा- गे याने कुंडलिनी में हवा घूमने लगजावे । मुख बढ़े और पाचनशक्ति विशेष हो यह ही इस श्रासनका . फल है।

( १७४ )
नं ४ सिद्धासन बांये पांवकी एडी गुदा और
लिंगके दरम्यान रखे और दाहिने पांवकी एडी लिंगके
ऊपर वाले भाग में याने उसकी जड़में रखे । कमरको सी.
धा रखे अभ्यास समय जालंधर बंध रखे जिससे स्वास
निश्चल हो दोनो हाथ दोनो घुटनो पर रखे।
नं०५ पद्मासन । स्वस्तिक अासन की तरह से दोनो
जंघा पर एडी लगावे कमरको सीधा करके हाथोंको कमर
के पीछे लेजाकर दाहने हाथ से बांये. पांवका अंगूठा और
बांये हाथ दाहने पांवका अंगूठा पड़े। इस हालत में
श्रध्यांसी लोग त्राटक का साधन करते हैं।
नं० ६ मद्रासन टांगोंको जंघा पर सुकेड़ कर दोनों
पात्रोंकी एडियां और पंजे ( तलवे ) आपसमें मिलावे ।
और उनके ऊपर बैठ जाय । निगाह भृकुटी में रहै । इसी
भासन से कुंडलिनी शक्ति जागती है।
नं०७ सिंहासन । टांगोंको जाघोंपर सुकेड़ कर दो-
नो एडियां मूलद्धार पर स्करले टखने एक दूसरेके ऊपर रहे
जांघोंके ऊपर दोनो हाथोंकी हथेली लगी रहें। निगाह
नासिका के अग्रभाग पर रहै। और जिहाको मुखसे बा-
हिर निकाल के उसके अग्र भागको देखता रहे । दाहने
पांवकी एडी गुहाके बांइ तरफ और बांये पांवकी गुदाके
दाहिने तरफ रहे पेट आगेको झुका रहे
रहे कोई . शादी
इसको गोड़ी गालकर बैठना कहते हैं।
करण

( १७५ ) अनेक आसनो के नाम नीचे लिखकर इस अभिप्रायसे दिखलाते हैं कि इन का साधन पहले मनुष्योंने समय स- पय पर किया है । जिनसे रोगोंकी निवृत्ति होती है और शरीर सरल होजाता है । कपाली पालन । भग आसन । ऋतक पालन । मत्स्येंद्र पालन । धनुक श्रासन । कूर्मासन। थिभेदन आसन । कुक्कुटासन । उत्कुणासन । योगासन । वीरासन । गोमुखासन । हस्तभुजासन । पवनमुक्तासन । मुद्रासाधन । नं० १ महामुद्रा । बांये पांवकी एड़ी से उदाको जोरसे दवाये रखे दाहिनी टांग और पांवको फैलाया हुअा रक्खे । दोनो हाथ से दाहिने पांवका अंगूठा पकड़े। फैली हुई जांधके ऊपर माथा रक्खे । वायु मुख के द्वार भरे । तालूकीजड़में लंबि- का जीमको लगाये रक्खे । शक्ति अनुसार कुंभक रक्खे। और बांये स्वरसे रेचक करे । इस ऊपर लिखे अासनसे१२प्राणाया- म करे । इसकी समाप्ति पर प्राप्सन बदले याने दाहिने पांवको उसी तरह सुकड़कर गुदाके नीचे रक्खे। बांया पांव फैलावे। दोनो हाथोंसे बांया पांवका अंगूठा पकड़े और जांघके ऊपर माथा रकावे । मुखले पूरक कर १२ प्राणायाम करे दाहिने स्वर से रेचक करे । इस क्रियासे पथ्य अपथ्य भोजन पचता है । नं २ महावेधमुद्रा । बांई जांघ पर दाहिना पांव और दाहिनी जांघ पर बांया पांव रक्खे । दोनो हाथ सूराखोंमें ( १७६ ) से निकालकर धरती ऐ घरे । और आप इसी आसनसे धरतीसे उठावड़ा होजाय और उठी हुई हालतमें १२ उत्तम प्राणायाम करे । इस से पटवा शुद्ध होते हैं और बायु ऊपर को गमन करती है। नं ३ उड्डयानवन्ध मुद्रा । मल, मूत्र को शरीरसे त्याग कर सिद्धासनसे बैठे । मूलबारको संकोचन करे । पूरक कर कुंभक साधे | कुंभक समय पेटको इतना पीछेको दवावे के पेट पीठसे लग जाये । यह हालत जितनी देर रखसके रक्खे । फिर उड्डयानबन्धको निवारण करे । तिस पीछे स्वरको रेचक करे । अगर रेचक समय सुषुम्ना बर्ते तो यह क्रिया समाप्त करे । नहीं तो बार बार करता रहे जब तक सुषुम्ना प्रगट न हो । यह अभ्यास नित्य प्रातः कालमें करने का है । जब तक केवल कुंभक की प्राप्ति न हो। यह ही बन्ध समाधिका कारण है । नं० ४ मूलबन्ध मुद्रा । मूल को शोधन करके सि- द्धासन बैठे मूलद्वारको संकोचन कर। कुंभक रक्खे । यह ही योगका मूल है । बगैर इसके हठ योगकी सब क्रिया वृथा है। नं० ५ जालन्धरबन्ध मुद्रा । स्वस्तिक आसन बैठकर ठोडीको हंसलीकी हड्डियोंके दरम्यान जो छातीकी हड्डी है जिसको अंग्रेजीमें इस्टरनम कहते हैं बहुत मज- ना रुकजावे। त्रिखणड मुद्रा । इड़ा, पिंग पर क्या करे। कमध्योग रखनेका अ- पन्न करे । जिस पीके कं करे। फिर भी नं० ६ विपरीतकरगी मुद्रा। दोनो हाथ कमरके पीछे ल्यावे । दोनो पांव आकाशकी तरफ उठावे । और उन पांवोके बीच में सिर देकरखे। इसके पीछे दोनो हाथ जो- ड़कर घुटनो के बीच घरे। नीचे माथा ऊपर पांव रहै । दूसरी रीति । कपाली अासनको सिद्ध करे याने धरतीपे मा- था टिका कर दोनो हाथ धरतीपे मिलाये हुये एक दूसरे से कावे । जिसके बीच में माथा रहै । पांव विलकुल सीधे अाकाशकी तरफ खड़े रकले । नं०७ बजरोनी मुद्रा । धरती पर दोनो हथेलियोंको टिकावे और दोनो पांवोको अाकाशकी तरफ सीधे लेजा. दे । पीछे हाथोंके बल पर माथे और सारे बदनको धरती से उठगलेवे । जितनी देर साधन होसके करे । नं० ८ संक्षोभिनी मुद्रा । स्वस्तिक आसन बैठकर प्राणायाम करे । मूलद्वारको संकोचन विकोचन करे । पी. छे मूलबन्धको दृट पको पवन चलावे । इतनी रमें पवन पेटमें घूमती हुई मा- देर कायम

( १७६ )
hr
नं० ६ द्राक्षी पे धरे । और आप इसी आसनसे
णायाम करे । सूनाय और उठी हुई हालतमें १२
कर कुंभक रखे । जइस से पट्वक शुद्ध होते हैं और
न बन्ध कौ । यहांतकके सुषुम्ना
भ्यासी लोग इस अवस्थामें खेचरीका साधन शुरू करते हैं।
नं० १० अाकर्षणी मुद्रा। ऊपर लिखे मुताविक श्रा-
सन और प्राणायाम करे । पवनमें सुरत रखकर पवन को
इतना ऊपरको खंकि कपाल याने शिरमें जाती मालुमदे
इस मुदाके अंतमें बेहोशी होजाती है। जो अपने आप
धीरे धीरे करके उतरसती है।
नं० ११ बीस्य मुद्रा। सिंहासन बैठ प्राणायाम कर
पवन रोके । यह पवन रुकी हुई हृदय तक आकर जोकि
पकाशय याने मेदेका स्थान है शब्द याने नाद प्रघट करे-
गी। जो अन्त में अनहद रूपसे वरतेगी।
नं० १२ उनमनी मुद्रा । पद्मासन बैठ तीनो वंध ल.
गाये पवन बैंच कुंभक रक्खे । वायुको सुषुम्नामें प्रवेशकरे। कई
घड़ी तक कुंभक ठहरनेसे समाधि लगजायगी यह मुद्रा वगैर
खेचरी साधन कुछ कामकी नहीं।
नं० १३ अंकुश मुद्रा । स्वस्तिक अासनसे बैठ प्राणा-
याम कर कुंभक साधे । यहां तककि कुंभक ४ घड़ी तक

(२१ हजावे।
त्रिखण्ड मुद्रा । इड़ा, पिंगलासे, प्राणायाम कर
त्पन्न करे । जिस पीछे कुंभक रोक कर इडास्वरको
करे। फिर शक्ति अनुसार कुंभक रुख सुषुम्ना उत्पन्न
होने पर प्राणोंको पिंगलामें स्थापितकरे । इसक्रियासे शरीर
शौर आत्मा शुद्ध होजाते हैं ।
लं० १५ वार्यरूपी मुद्रा । उड्डयानबन्ध कर जिह्वाको
तालू से लगाया हुमा रक्खे । खीसे भोग करे अपना बीर्य
परित्याग न होने दे। जब स्त्रीका रजस्खलित हो तब लिंग
के संकोचन विकोचन द्वारा मूत्राशय में चढाकर शरीरमें
पचाजाने इस क्रियाके प्रारंभ में शरीरको मल, मूत्रसे खूब
अच्छी तरह शुद्ध करले।
नं० १६ कामराज मुद्रा । इसका यह अभिप्राय है
कि विंदू बसमें आवे । यह वेधमुद्राका अंग है जिसमें बांये
पैर की एड़ी मूलदारके नीचे रखना और दाहिना पांव
लिंगकी जड़में रखना । और कमरको बिलकुल सीधी किये
हुऐ बैठे रहना चाहिये।
नं १७ सहजोली मुद्रा। अमरी बजरी क्रियाओंका
भेद है। सिद्धासन बैठ योनिका संकोचन करे। यहां तक कि
इस द्वारमें कुछभी बस्तु प्रवेश न होसके। शुरूमें जैसे बस्ती
कर्म लिखा है वैसेही योनिको सोधन करे इस क्रियाके अंत

( १७६ ) में स्त्री पुरुसामी धरे । और आप इसी आसनसे पचासकेगी। जैसे पुरुष बस्तीकर्मस पर, हालतमें १२ नं० १८ अगोचरी मुद्रा । सिद्धासन बैठ और से षट्चक्र को देखे । फिर इनमें से सुरत हटाक .हस्र- दल कालमें ध्यान करे। नं० १६ भूचरी मुद्रा । सिद्धासनसे बैठ यूकुटीमें ध्यान दे। सारे शरीरको ध्यान में देखे । जब शरीर थकजाचे तो पलक बंद करले और ज्योति याने प्रकाशको चिन्त- वन करे। नं० २० चाचरी मुद्रा । दोनो नेत्रोंसे नासिका पर निगाह दिये रक्खे । ज्योतिश्राकार कुंडलिनीके स्वरूपका ध्यान करे। नं० २१ शक्तिचालिनी मुद्रा । बजासनसे पवन चलावे याने पालती पालती मारके बैठे । जांघों और य. गों को स्वक मजबूत रक्खे । दाहिने पांवकी एडी गुदाक बांई तरफ हो बांये पांवकी एडी गुदाके दाहिनी तरफहो भत्रका कुंभक का साशन करे । यह क्रिया रात्रिके पिल्ले प्रहरमें करे । उत्तम कुंभक ४ घड़ीका होता है ऐसा कुंभकररख कर उड्डयान बन्ध करे तो निश्चय कुंडलिनी शक्ति जागे । नं० २२ बजौलीमुद्रा । इस क्रियासे वीर्य स्थंभन हो- ता है। इस क्रियाको साधने वाला पराक्रमी मनुष्य होना

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अथ योगसमाचार

Author
भार्गव, गोविन्द प्रसाद
Title
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File name
अथ योगसमाचार
Text
OCR done
Citation
1906
Published
2009/02
Publisher
राजपूताना, जयपुर
Language
Sanskrit
Pages
186
Library
Banasthali University
Classification
Health
Keywords
योग
DLI number
409857
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