Sanmati Library, Jaipur
Gomahatmya Chandrika
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गोमाहात्म्यचन्द्रिका।
दोहा-भाति भांति के अर्थ बहु, यामें गूढ अगूढ
याहिपढेगुणरीतिकों,मग समुझतमतिमूढ
सो०-जानहिं चतुर सुजान, शुभ इच्छा मेरी यहै
यहअभिलाषनआन, ग्रंथप्रसिद्धीहोयय ।।१०
दोहा-उमाशंभुपद आसरा, गणपतिको शिरनाय
करोंग्रन्थ प्रारंभ अब,भाषा सरल सुभाय ।।११
गोमाताकी स्तुति ( राग-भैरवी ताल-पंजाबी.)
जयजयजयजननीगोमाई, जगजननीगोमाई-आ
स्ताई।दुःखदलनसुखकरनहेतु सुतपीरहरनभवआई
॥जय०॥देवदनुजगंधर्वनागनर, विदितसबहिप्रभु
ताई ॥जय०॥ उदधिसुतापतिहरबिरंचि नित बन्दि-
त पदमनलाई॥ जय०॥ धरतपयोधितुर्यतनमण्डल
देतदुग्धअधिकाई॥ जय०॥
दिक तुवतनुजनसुखदाई ॥ जय० ॥
के काजक्षीरदे, चरतआपतृणधाई ॥जय०॥
निमातनेहतवनिरखत, कहतशेषसकुचाई॥जय०
कहपावनजानिदयानिधि, आपगुपालकहाई
कताहितुमहुनितसेवहु भवमलसकलबहाई ।ज.
राग जिला ठुमरी.
। सकलपदारथमिलैंउन्हें जोकरतसदागौपूजनकों
नेत० ॥ आस्ताई ॥ उठपातसमयमनमगन
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गोमाहात्म्यचन्द्रिका।
होय, अति आदरसोंजो चरणधोय, सुरभीपदमें जो
लगन होय, को पायदेव दर्शनकों॥ नित० ॥ नव
रुचिर कुसुम मालाबनाय, बहु सुगंध चंदन नग
जुटाय करपूर धूप नैवेद्यलाय, आरति उतार लै चर-
णनकों॥ नित० ॥ करजुगलजोर जो गुणन टेरे,
चिंतत फल मांगे बेर बेर, पुनि मिलत लगे नहि
नेकदेर, सेवकन हरषित भक्तनकों॥नित० ॥२॥
राग झिंझोटी.
धन धन भारतकी हितगैया । अन्न खिया दूधपि-
या ज्योंबालककों मैयामहीमलाई माखन खोवा
दहिया तक खवैया ॥ बहुविधि काज सहायक
सुत जनि जगकों सुख करवैया। चांवल मूंग गहूँ
यव ऊखरु उरद आदि उपजैया ॥ सब पकवान
दोजकों सज सज आप घास चरवैया॥रोग शो-
कको सहज मिटावति जनमनको हुलसैया ॥ यहि
सोकारनसें दैव मुनिन ऋषि मानत कृष्ण कन्हैया ॥
याबिन और कोऊ नहिं जगमें भौसागरकी नैया॥
सुन सेवक याहीके कारण घर घर बजत बधैया ।
धन धन भारतकी हित गैया०॥३॥
दोहा-ग्रीवा हरि मुख हर बसे, प्रष्टे अज बिच देव ॥
रोम रोम प्रति मुनि बसे, कोपांवत गौ भेव॥१॥
मोमाहात्म्यचन्द्रिकाः। . सूर्य शशी दोउ नेत्रहैं। नांगा पुच्छ हजार॥ शैल सकल खुरमें रहैं,गंगामूत्र मंझार ॥२॥ यहां धेनुके तनबिषे, रहैं देव सब छाय।। सोमहात्म कैसे कथै व्यासादिक मुनिगाय॥२॥ भानूदुहिता है सही, धरारूप है खास ॥ श्रेयकाज.ऋतु कारणे, पूजतहै जगतास॥४॥ द्विज अरुगो तनु एक है कुलजु जुदे बिधिकीन्ह हविष्यान्न गोतें प्रगट,मंत्र द्विजनको दीन्ह॥५॥ यज्ञ कार्य गो बिन नहीं गौ तें बेद पुरान॥ देव सकल गौ के विर्षे,गऊ स्वर्गकी खान॥६॥ नमैं धेनुमाता तुझै, श्रीमति सुरभी माय ॥ ब्रह्मसुता तुमकों नमों करियेजननि सहाया। सर्व पवित्रनमें सिरै, गऊ जो मङ्गलरूप । स्वर्गचढत सोपानसी,व्यास कहै सुनु भूपा॥८॥ गऊगऊनिसदिन रटैं,प्रातलेत गउ नाम । तासज्जन सिरताज, रहैं न.जमसें काम॥९॥ हे त्रितापनाशिनी मातेश्वरी! तुझे बारंबार नमस्कार है। हे कलिकलुषहारिणी! गोमाता संसारमें तेरी कृपा कटाक्षके विना, कोईभी कार्य नहीं हो सक्ता, तभीतो उस भक्त भय हारी, दुष्ठदल संहारी, गोद्विज हितकारी, मुरारी ने, चोरासी गोमाहात्म्यचन्द्रिका " लक्ष योनियोंसें तुझे सर्वोपरी बनाईहै; पर हे ? नरक निवा- रिणी माता ! बडाही शोकका विषय है कि, आजकल इस दुष्ट कलिकालके समय में बहुतसे मनुष्योंके हृदयमें तूं एक साधा- रंण पशुवत होगईहै,इसीलिये मैं तेरीकृपा कटाक्षका अवलंबन करके एक छोटीसी पुस्तकद्वारा तेरे महात्मकाप्रकाश करता- हूं।इसवास्ते कि लोगोंके हृदयमें तेरी भक्तिरूपी वृक्ष जो कि सं- मय के प्रवाहसे मुरझा रहाहै, वह पुनः पत्र पुष्प फलयुक्तहो के प्रफुल्लित हो। हे सज्जन महाशयों ! यदि आप धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि चारों पदाथोंको हस्तगत करना चाहते हैं, यदि आपको दैहिक, दैविक और भौक्तिक त्रिताप दूर करनेकी इच्छा है, यदि आप सनातनधर्म रूपी अमृत फलका रसास्वाद लेना चाहते हो, और इस लोक में असंख्य द्रव्य तथा पुत्र कलत्र आदि का पूर्ण सुख भोगकर संसारसागरसे उत्तीर्ण होनेकी इच्छा रखते हो, तो तन मन धन द्वारा गोमाताजीकी सेवा करिये। श्रीगोमाताजीकी सेवा करनेसे ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजीके अतिरिक्त जितने देवी देवताहैं वहभी प्रसन्न होकर आपका अभीष्ट सिद्धकरने में तनिकभी बिलंबनहींकरेंगे। यह आप कदापि.नहीं समझें कि गऊको दियाहुवा अन्न देवताओंको किस प्रकार से प्राप्त होगा ? परंतु हे महाशयो! जिसप्रकार मनुष्य भोजन करताहै और वह पदार्थःप्रथम उदर (पेटमें) जाकर नाड़ियों द्वारा (६) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। प्रथक प्रथक बिभागसे सर्व देहके प्रत्येकस्थानोंमें प्रवेशहोकर सारी इन्द्रियोंको अपने कार्य में प्रवर्त करने की शक्तिदी है। उसीप्रकारसेजो गोमाताजीको दियाहुवाभोजनभी सर्वदेवता- ओंके प्रतिजावेगा, क्योंकि जितने तेतीसक्रोड देवी देवता हैं वे तो सर्व श्री गोमाताजीके शरीरमें निवास करते हैं, इस प्रकारके बचन शास्त्रोंमें कहा है। सो नीचे प्रमाण देखिये श्री गो माताजीके इसपवित्रशरीरमें किस किस स्थानमें कोन कोनसे देवता निवास करते हैं सोदरसातेहैं। श्लोक-पृष्टे ब्रह्मागले विष्णुर्मुखे रुद्रःप्रतिष्ठितः मध्ये देव गणाः सर्वे रोम कूपे महर्षयः॥१॥ नागाः पुच्छे खुराग्रेषु ये चाष्टोकुलपर्वताः मूत्रे गङ्गादयो नद्यो नेत्रयोःशशिभास्करौ॥२॥ एते यस्य स्तनौ देवाः सा धेनुर्वरदास्तु मे ॥ वर्णितंधेनुमाहात्म्यं व्यासेनश्रीमतात्विदम्॥३॥ भाषार्थ-पीठमें ब्रह्माजी,बास करतेहैं,गलेमें विष्णुजी,मुख- में त्रिनेत्र रुद्रजी और मध्यस्था अर्थात् पेटमें सर्वदेवताबास करतेहैं.ओररोमरोममेनारद,व्यास,पाराशर,वसिष्ट, भरद्वाज, विश्वामित्र,सनक सनंदन, सनातन, सनत्कुमारआदि तपोधन महर्षीगण बास करते हैं पुच्छमें नागदेवता, चारोंखुरोंमें पर्वत मूत्रमें गंगादि नदियां ओर एकनेत्रमें सूर्य और दूसरेमें चन्द्रमा ~ गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (७) बांस करते हैं। ऐसा श्रीविष्णुरूपी वेदव्यासभगवानका ब- चनहै । हे प्रियपाठकगणों ! आप इस श्लोकको पढकर स्वयं अनुमान करलेवेंगे कि श्रीगोमाताजीका शरीर कैसा पवित्र और उत्तमहै, कि जहां ब्रह्मा विष्णु महादेवजीको आ- दि लेकर सर्व देवता नित्यप्रति निवास करते हैं। तो फिर इस मातेश्वरीकी प्रशंसा करना मन और लेखिनीकीसक्ति से बाह रहैं। इसत्रिलोकतारिणीमाताजीका महात्मरूपी अमृत आप- को कर्णपुटद्वारापान करानेमें मेरी स्थिति इससमय जैसे गूंगे मनुष्यके समानहैं, कि जिसकों क्षीर आदि मिष्ट भोजन क- राके उसके स्वाद के विषयमें पूछा जावे तो वह क्या कह स- ताहै ? अर्थात् कुछ नहीं कहसत्ता । परन्तु नीति का- रोका कथनहैं कि मनुष्यको श्रेय कार्य करनेमें कदापि हताश न होना चाहिये. यहांपर कुछ वेद मन्त्रोंद्वारा श्रीगो माताजीका महात्मदरसाते हैं, सो आपएकाग्र चित्त पूर्वकप सामवेद यदिन्द्राहं यथात्वभीशीयवस्वएक इत । स्तोतामे गोसरवास्यात् ॥ शिक्षीयमस्मै दित्सेय ॐ शचीपते मनीषिणे यदहं. गोपतिःस्याम् । धेनुष्ट इन्द्रसूनृता यजमानायसुन्वते॥गामश्वं विप्यषीदुह।।छ०उ०सं० प०११ मं०८ भाषार्थ-हे इन्द्र,यदि हमकों आप सामर्थदेतो हमओर गोमाहात्म्यचन्द्रिका। .. अपने अनुगामियोंसें गोरक्षाकरवावें । यजुर्वेद. नमो वृज्याय च गोष्ठयाय च नमस्तल्प्याय च गेह्याय च नमो हृदय्याय च निवेष्याय च नमः का- व्याय च गहरष्ठाय च ॥ अध्याय॥१५॥ मं४४ भाषार्थ-जो मनुष्यमेघसेउत्पन्न हुई वर्षा ओर वर्षा से उत्पन्नहुवात्रणआदिकी रक्षासें गो आदि पशुओको बढावैगे वे पुष्कल भोगोंको प्राप्ति होवेंगे। यहां कुछेकप्रमाण गोमाता की सेवाकरनेमेंपूर्णपुष्टिकारक देते हैं यह प्रमाण महाभारत' पद्मपुराण,ब्रह्मपुराण,भागवतपुराण,शिवपुराणआदिग्रंथोंकेहैं। भविष्यपुराण । तीर्थस्नाने तु यत्पुण्यं यत्पुण्यं विप्रभोजने । यत्पुण्य च महादाने यत्पुण्यं हरिसेवने ॥१॥ सर्बव्रतोप- वासेषु सर्वेष्वेव तपस्सु च । भुवि पर्यटने यत्तु सत्य वाक्येषु यद्भवेत् ॥२॥ यत्पुण्यं सर्व यज्ञेषु प्रायश्चि- त्तानि शुध्यति । सर्वे देवा गवामंगे तीर्थानि तत्पदेषु च ॥ ३॥ भाषार्थ-तीर्थ स्नानकरनेका जो पुन्य, ब्राह्मण भोजन करा- नेका जो पुन्य, हरि सेवनकरनेमें जोपुन्य, महादान देनेका जो पुन्य,सर्ववृत व उपवास करनेका जोपुन्य, सर्व तपश्चयों करनेका जो पुन्य, सत्य भाषणकरनेका जो पुन्य, सर्वभूमि गोमाहात्म्यचन्द्रिका (१) पर्यटन करनेका जो पुन्य सर्व महायज्ञोके करनेका जो पुन्य होताहै, सो पुन्य केवल श्रीगोमाताजीकी सेवाकरनेसे प्राप्त हो सक्ताहै क्योंकि जितने देवता व तीर्थराज व ऋषी महर्षि तो सर्वकाल इस माताजीके शरीरमें निवास करतेहैं,सो इस विष- यका शास्त्रीयप्रमाण आप प्रथम देख आयेहैं? फिरभी देखिये. महाभारत गाश्च शुश्रूषते यश्च, समं वेत्ति च सर्वशः॥ तस्मै तुष्टाः प्रयच्छन्ति, वरानपि सु दुर्लभान् ।। भाषार्थ:-श्री भीष्मपितामह धर्मपुत्र महाराज श्री युधि- ष्ठिरजीसे कहतेहै कि हे राजन् ! जो पुरुष गौओंकी तृण, जल आदिसे सेवा करें, और सर्वत्र समदृष्टि रक्खे उस पुरुषके अर्थ गौएं संतुष्ट होकर दुर्लभ वरको देतीहै"। शिवपुराण ये गोब्राह्मणकन्यानां स्वामिमित्रतपस्विनाम् ॥ विनाशयन्ति कार्याणि ते नराः नारकाः स्मृताः॥ भाषार्थः-शिवपुराणमें श्रीमहादेवजी कहतेहैं कि “जो नर गो, ब्राह्मण, कन्या, स्वामि, मित्र, तपस्वी इनके कार्यमें कुछभी विभ करता है, वह घोर नर्कमे गिरता है"। हे प्रिय बाचकवृन्दो ! उपरोक्त दो श्लोक जो आपने देखे हैं वे महाभारत और शिवपुराणकहै । और इन दोनों में पराई (दुसरेकी) गायको तृण जल आदिसे सेवा करनेमें कितना गोमाहात्म्यचन्द्रिका। पुण्य होताहै, और गायके कार्यमें विन्न करनेवाले को कितना पाप होता है। इसके विषय में यह बचन हैं। अब मैं ऊपरोक्त दोनोंश्लोकोंकाही पूर्णरूपसे पुष्टिकारक एकइतिहासलखताहूँ. "किसी एक स्थानपर कथा बच रहीथी, और जिससमय यह प्रसङ्ग आया, कि यदि कोई मनुष्य श्रीगङ्गाजी की सौ कावड (काष्टकी बनी रहती है जिसके दोनोंतरफ जल रखने सरीखा स्थान रहताहै) लाके श्रीसेतुबंधरामेश्वरके ऊपर च- ढावे तो उसको कैलाशमें बासमिलै । उसी समय एकसात्विक ब्राह्मण (जो कथा सुन रहा था) ने यह कार्य अपने मनमें स्थिरकिया, और उसी समयं कावड श्रीगंगाजीसे भर भरकर और श्रीरामेश्वरपर अभिषेक करना प्रारंभ किया, इस प्रकार करतेकरते श्रीशङ्करकी कृपासे और अपने दृढ विश्वास और पूर्ण परिश्रमसे नन्यान्वे (९९) कावडें तो लाकर श्री- शङ्करके समर्पणकर चुका, और सौवीं कावड भरकर लाताथा कि मार्गमें एक गाय मिली जोतृषाके मारे अत्यन्तही व्याकुल होरहीथी उस ब्राह्मणकी तरफ भाभाँ करके तृषायुक्त होनेका पूर्ण परिचयं अपनी बाणी या चेष्टा द्वारा दिखाया,वह ब्राह्मण भी उत्तम वर्ण, सात्विक स्वभाव और भगवत कथांका श्रवण- के प्रभावसे उस गौका हाकि अभिप्राय स्पष्टतासे समझगया यही नहीं वरन वह दया रूपी समुद्र में निमग्न हो गया और ईश्वर का नाम लेकर वह सारी कावड श्रीगोमाताजी को पिला लाना, 44 गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (११) दी, प्रिय पाठकगण! इस ब्राह्मणको दयामया कितनी सराह ने योग्य हैं जो कितने परिश्रम से कावड लायाथा ? पर श्रीगो माता को ऐसी स्थिति में देख गंगाजल सब पिला दिया, और आप सौंवी कावड पीछी लाने के अर्थ श्रीगंगोत्री की ओर प्र- स्थान करनेलगा इतनेहीमें परमदयालु भक्तभयहारीश्रीशङ्कर रामेश्वर महाराज वहांही.प्रगट हुए सच है कहा है। क.-" श्रेष्ठ गुण ज्ञान जाके कंठ वेद बानी अस. भवन में भवानी सुख संपति रहा करे। कालकूट कंठ जाके चन्द्रमा ललाट जाके, वासुकि सो दास जा के दारुण दहा करै। चार वेद बंदि जाके द्वारपाल नन्दी गण, बरुण कुबेर यमराज हू रहा करै। जगत रिसाय यमराज की कहा वसाय, शङ्कर सहाय तो भयङ्कर कहा करें ॥१॥ उस ब्राह्मणपर शंकर प्रसन्न होकर बोले हे ब्राह्मण ! मैं तेरे पर अत्यन्तही प्रसन्नहुवा हूं ! धन्यहैं तेरे माता पिताकों और तुझको, " वरंब्रूही" (अर्थात् वरदान जो मांगना हो सों मांग) ब्राह्मण हाथ जोडके स्तुति करने लगा, और पश्चात् बोला कि "हे भगवान् ! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हुये हैं तो मेरा यही इच्छित वर मांगना है कि मुझे कैलासबास होवे" तब श्रीचन्द्रमौलि वृषकेतूने कहा कि अब तूं निश्चिन्त होकर (१२) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। अपने स्थानकोजा, तुझे कैलास अवश्यमेव होजावेगा। है प्रिय पाठकगणों! आपने प्रथम श्लोक जो गोमाताको जल तृण देनेके विषयमें महाभारतका पढाहै, उसी विषयका यह प्राचीन इतिहास कितना पुष्ठि कारक है, यह स्वयं अनु- मान कर सकते हैं । एक प्यासी गौको तृप्त करनेसे कैलास प्राप्त हुवाहै, और श्रीशङ्करने दर्शन देके उस दुर्बल ब्राह्मणके मन कमलको किसप्रकार प्रफुल्लित कियाहै और इछित बरसे वञ्चित नहीं रख्खा है तो जो लोग गौमाताकी रक्षा और तृण जलादिकसे सेवा करते होंगे उनके ऐहिक और पारमार्थिक मनोवाञ्छित कामनाएं पूर्णहो इसमें क्या आश्चर्य है। हे स- नातन धर्मावलम्बियो? बोलो एकवार श्रीगोमाताकीजय। अब उसी ब्राह्मणका कुछ वृत्तान्त पुनः लिखता हूं जो मार्गमें कुछ घटना हुई थी। जब वह ब्राह्मण अभिलाषित वर पाकर अपने स्थानको जाने लगा, तब थोडी दूर जानेके अनन्तरही एक विचित्र घटना हुई, कि जिसके लिखते हुए, लेखनी और हृदय दोनों ही कंपायमान होते हैं, पर इस कथाका पूरा वृत्तान्त पाठक गणोंको विदित कराना अत्यावश्यक समझकर विस्तार पूर्वक लिखा जाताहै, सो वह यह है कि जिस मार्गसे ब्राह्मण जा रहाथा; उसके निकटही एक सहरथा जिस्में एक साहूकार रहताथा जिसके इकलौती कन्याथी, और वह उसपर पुत्रसे गोमाहात्म्यचन्द्रिका। भी अधिक प्रेम रखताथा। यहांतक कि उसके रहनेके वास्ते अलगस्थान बनादियाथा। उस साहूकारकाजामात अर्थात् जमाई अपनी स्त्रीको लेनेके निमित्त आया था वेहे दंपति (स्त्री पुरुष) शयन स्थानमें गये तो उस दुष्टा कुटिला स्त्रीने अपने जारकी सम्मति लेके अपने प्रिय पतिके प्राणोंको य- मालयको भेजदिया। क्योंकि वह (शेठका जामातु)मार्गका थका हुवाथा सो अचेत सोयाथा, तब उसका सिर काटलिया और अपने बचावके अर्थ कोई उपाय सोचनेलगी। इतनेमे उस महलके नीचे होकर वोही भोला भाला गरीब ब्राह्मण जा निकला उस स्त्रीने उस ब्राह्मणको पकडलिया और चिल्लाने लगी कि अरे दुष्ट ! मैंने तेरा क्या अपराध किया जो तूने अचानक मेरे पतिको मारडाला. केवल आभूषणोंहीके लेनेकी इच्छाथीतो मैं तुझे ऐसेही सर्व आभूषण उतार देती"। इस प्रकारके अनेक छल उस दुष्टाने रोरो कर तिरिया चरित्र आ- रंभ करदिया। उस समय उस स्त्रीके माता पिता और बहुतसे मनुष्य वहां एकत्रित होगये, और बिचारे निरपराधी ब्राह्मण- को मार पीट करनेके पश्चात् राज्यमें ले गये। तब उस ब्राह्म- णसे राजकर्मचारियोंने इस विषयके इसप्रकारसे प्रश्न किये। अरे ब्राह्मण ! क्या इस दुष्ट कर्मका कर्ता तूं है ? तब वह ब्राह्मण नम्रता पूर्वक अपनी प्राचीन कथा समग्र कहनेलगा। और उनके प्रश्नके उत्तरमें यह कहा कि हे पृथिवीनाथ ! यह गोमाहात्म्यचन्द्रिका। नीचकर्म मेरेही हारा हुवाहै, या और किसीके सो तो इसबात- को वह परमात्माहीजानताहै। जो कि मनुष्योंके भले बुरे क- मौको भली प्रकारसे वो अंतर्यामि देख रहाहै। ऐसा कह कर बिचारा वोहो ब्राह्मण रोने लगा। न्यायाधीश जो वास्तवमें न्यायमूर्ति थे, वो इस विषयकी पूरीरजांच करनेके उपरान्त बोले कि " हे साहूकार! यद्यपि आपके जामातका मारनेवाला यहीहो? किन्तु मेरे हृदयमें तो ऐसा बिश्वास कदापि नहींहोता कि यह काम केवल इसी मनुष्य द्वारा हुवाहो । तथापि न्याय- मार्गद्वारा यह ब्राह्मण जरूर शिक्षा देने योग्यहै. इसमें कोई सन्देहनहीं क्योंकि साक्षियोंके द्वारा यह बात प्रमाणितहोगई है"अतएव उन्होंने उस ब्राह्मणको ब्राह्मण शरीर समझके प्रा णान्त शिक्षा न देके केवल उसके दोनों हाथही कटवा दिये। हे प्रिय पाठको ! जिस समय उस निरपराधी ब्राह्मणके दोनों हाथ कटे होंगे, उस समय उसको कितनी मानसिक और दैहिक वेदना हुई होगी ? इस बातका-लिखना लेखनी और लेखक दोनोंहीकी शक्तिसे बाहर है। जिससमय उसके दोनों हाथ काटदिये गये, तब वह बिचारा रोता गिरता पडता. थोडीही दूरगया कि उसने वहांपर एक शिवालय देखा और शिवालयमें जाकर, शिवजीकी बहुतसे कटु बचनोंसे स्तुति कर, बोला कि हे नाथ ! मैंने आपका क्या अपराध कियाथा,. जिससे आपने मेरी ऐसी कुगति कराई" अन्तमें उस ब्रा-
गोमाहात्म्यचन्द्रिका।
ह्मणने अपने प्राणोंको शिवालयहीमें परित्याग करना उचित
समझकर बैठगया,थोडीही देरमें परमदयालु श्रीशंकरने उसे
शोक सागरमें डूबाहुवा देख सहसा मूर्तिमान प्रकटहुए। और
बोले "अरे विप्र! क्यों शीघ्रता करताहै मैं कहताहूं सो एका-
ग्रचित्तसे सुन, इसजन्मके प्रथम किसी जन्ममें तैने श्रीगो-
माताजीका अपराध कियाथा, वह (अपराध) यह था कि
किसी स्थानपर पांच दश मनुष्य बैठेहुए कोई गोमाताजीके
उपकारार्थ परामर्श कर रहेथे सो तूने जाकर उस कार्यमें विघ्न
डाला, सो यदि अभी तुझे कैलासबास हो जावे तो जो गोमा-
ताका तैने अपराध किया है वो क्या तेरे बदले मैं भोगूंगा;
अभी गोमाताके ऊपर तनिक उपकार (जल पिलाकर)कर
उसका फल तय्यार होगया, उसका कुछ विचारही नहीं। हां
यदि इस जन्ममें उस पापका फल भोग लेगा तो अवश्यमेव
तुझे कैलास प्राप्त होवेगा"। इसप्रकार श्रीशंकर उसका समा-
धानकर अन्तर्ध्यान हुए और वह ब्राह्मणभी अपने स्थानपर
जाके पूर्वजन्मोपार्जित पापकर्मको भोगकर अन्तमें कैलासको
प्राप्तहुआ, जहां बडे२ योगीजनोंकाभी प्रवेशहोना कठिनहै ।
हे प्रिय पाठकगण ! आप देखिये कि मनुष्य महापापसेभी
मुक्त हो जाता है, परन्तु जब उस ब्राह्मणने कोई जन्ममें गौ
के कार्य में बाधा डाली तो उसको इतना दुख भोगना पडा।
आपका दूसराश्लोक जो शिवपुराणका गोमाताके अपराधके
(१६)
गोमाहात्म्यचन्द्रिका।
बिषम था, उसके लियेभी यही इतिहास कितना पुष्टिकारक
है आप स्वयं अनुमान करलेंगे। अब कृपाकर आगे चलिये
आपको गोमहात्मकी कथारूपी अमृतपान कराने में मेरी
तृप्ति नहीं होती।
ब्रह्मपुराण।
एवं कृते महीं पूर्णा रत्नैर्दत्त्वा फलं लभेत् ॥
गोप्रदानेन यत्पुण्यं गवां संरक्षणाद्भवेत् ॥
भाषार्थः-अनाथ गो अर्थात् बेवारसी (बिनाधनी)गोके
शीतकालमें बचावके लिये जो मकान बनादेते हैं, औरदाना,
चारा,पानीसे गोमाताजीकीसेवा करते हैं, और जोशीतकालमें
गौओंको धूनीसे तपातेहैं,वा उन्हें वस्त्र उढातेहैं वे रत्नोंसे परि-
पूर्ण सम्पूर्ण पृथ्वीके दानके तुल्य पुण्यके फलको पातेहै और
गोदानकापुण्य उनको गोसेवासे मिलताहैं। औरभी देखिये-
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महाभारत।
कृत्वा गवाथै शरणं, सीत वातक्षमं महत् ॥
आसष्वमं तारयति, कुलं भरत सत्तम ।
भाषार्थ:-हे भरत !जो शीत,उष्ण, वायूके बचाने योग्य
गोशाला बनवातेहैं, वह अपने छै सात पुरुषको तारतेहैं। यह
सत्य है।
शङ्का-क्यों जी यदि किसी मनुष्यकी गौशाला बनानेकी
सामर्थ्य न हुई तो उसको क्या करना चाहिये ? उत्तर। देखो
भाई ! प्रथम तो मनुष्योंको उचित है कि जहांतक होसके अ.
गोमाहात्म्यचन्द्रिका । (१७) नाथ गौओंके वास्ते कोई स्थान अर्थात् गौशाला बनाना चा- हिये। आप जरा सोचिये तो सही; कि धनाढ्य पुरुष बिवाह, स्वजातिभोजन, वेश्या नृत्य, महफिल आतिशबाजीमें भी तो सहस्रों रुपैये स्वाहा (खर्च) कर देते हैं केवल एक साधारण कीर्ति सम्पादन करनेके वास्ते,उनको इस बात कहलानेका बडा उत्साह रहताहै कि शहरमें मनुष्य हमारी प्रशंसा करें, कि देखो । अमुक सेठके पुत्रके बिवाहमें दिल्ली लखनऊ आदि शहरों के पांच तवायफे इकठेहुए। अहा हा हा ! क्या कहना बहुतही उत्तम नाच और गानाहुवा. बस ऐसी मिथ्या प्रशं- सा खुशामदियोंके मुखसे सुनकर फूलकर कुप्पे हो जातेहैं, और श्रीमान पण्डित जगतनारायणजीके निम्न लिखित बा- योंको चरितार्थ नहीं करतेहैं। दोहा-रांड भांडको तुर्तही, देवे लाख हजार । गोहित चन्दाके लिये, भागत है ज्यों स्थार ॥१॥ चौपाई-वेश्या तुरकन को धन देवे । यही बडाई जग में लेवे ॥१॥ फुलवारी अरु आतशबाजी। फूकै द्रव्य होय कर राजी॥२॥ गउ सभा से जी उचकावे । मुजरा होय तुरत वहां जावे३॥ नृत्य समाज स्वांग अरु मेला । देखन जाय बने अलबेला ॥४॥ और यह बात उनके हृदयमें अच्छी तरहसे समाजाती १८.) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। है कि ऐसा करनेसे लौकिकमें हमारा बडा यश होगा। परन्तु इस बातका उन्हें बिचार नहीं है कि वेश्यानाच और स्वजाती भोजनका यश केवल दशपांच दिनही रहेगा जोकी?जबतक यह कार्य प्रचलित रहेगा। परन्तु श्री गौमाताजीके निमित्त गोशाला आदि बनानेमें इस लोकही में नहीं किन्तु परलोकमें भी उस मनुष्यका अक्षय पुण्य निरन्तर बना रहेगा। दूसरा आप कहते हैं कि कोई गरीबआदमीहुवा और स्वयं द्रव्य खर्च करके गोशाला आदि नहीं बना सकता सो भाई! मैने प्रायः देखा है कि इस माताजीके उपकारकेवास्ते साधारण स्थितिके ही पुरुष उद्योग कर करके मनुष्य शरीरके उत्पन्न होनेका स्वार्थ सिद्ध करलेते हैं। हे प्रिय पाठको ! मेरे उपरोक्त कथनको चरितार्थ कर- नेवाले भारतमें अबभी सैंकडों मनुष्यहैं, तथापि उदाहरणस्व- रूप मैं आपको एक ऐसे व्यक्तिका नाम बताकर कृतकृत्य करताहूं कि जिसने गो माताजीकी असाधारण सेवाका प. रिचय दे गोभक्तोंको मोहित किया और थोडेही दिनोंसे गो लोकको सिधाराहै । यदि कोई महाशय यह शङ्का करें कि तुम्हे क्या मालुम कि वह गोलोकमें गया या और कहीं ? तो इसका समाधान यहहै कि आपने कईवार डाकघरों में तथा बैंकोंमें हजारों रुपैये जमा कराये होंगे. और वहांसे आपको बदलेमें छोटासा पुरजा मिलताहै । वह प्राप्ति सूचक अर्थात् गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (१९) "दस्तावेज" कहलाताहै तो हे प्रियवरों ! जब आपको छो- टेसे कागजहीके देखनेसे विश्वास होजाताहै और यह प्रती- ति रहतीहै कि जब हम चाहेंगे तबही व्याज सहित हमारी जम्मा ले लेंगे। तोगोमाताजीकी सेवा करनेसे गोलोक प्राप्ति हो इसमें क्या आश्चर्य है. क्योंकि अपने वेद पुराण उपनि- षद आदि महान धर्मग्रन्थोंके असंख्य प्रमाणरूपी रसीदें, किंवा दस्तावेजें विद्यमानहै, और हम समग्र सत्य सनातन ध- मावलम्बी उनको सत्य जानते और विश्वास रखतेहैं, तो फिर हमें यह बात अवश्य स्वीकार कर मुक्तकंठसे कहना पड़ेगा कि, गौभक्तोंको निरन्तर गोलोकही मिलताहै। इसमें अणूंमात्रभी सन्देह नहींहैं। उपरोक्त महानुभाव प्रातःस्मरणीय नाम "रा- मप्रतापजी भरथिया" है और उन्होंकी जन्मभूमि उहांहै कि जहां गोभक्तों के लिये यह पुस्तक भेट करनेको गोभक्त दर्श- नाभिलाषीने जिस जन्म भूमिमें जन्म धारण कियाहै उसी देशमें (रामप्रतापजी) इन्होंका जन्महै । इसी कारणसे मेरा उनके साथ साधारण परिचय था, उन्होंने अपने उद्योग और पुरुषार्थ द्वारा सहस्रों रुपैये इकठे कर वहांपर (बिसाऊ प्रांत जयपुर) एक पक्की गोशाला बनवाईहै जिसमें सैंकड़ों अनाथ, लूली, लंगडी, बूढी, गौओंका अत्युत्तमताके साथ पालन पोषण होताहै। यह कार्य उस सर्व शक्तिमान करुणा वरुणालयकी कृपासे आजदिनपर्यन्त उन्नतिके साथ चलता
(२०)
गोमाहात्म्यचन्द्रिका।
रहकर, इस भारतवर्षकी वसुन्धरा रत्नगर्भा नामक पुण्यभूमि
को स्मरणकरताहै,कि थोडेसे समयके पूर्व ऐसे पुण्यमय कार्य
होना एक साधारण बात थी। परन्तु हाय ! आजकालकी
कुटिल गतिके प्रभावसे इस स्वर्ग सोपान(निसेनी)की विजय
पताका गोमाताजीकी सेवा अर्थात् गोशाला, और व्यापार
पर गो कर (टेक्स) लगाना और इस कार्यमें चन्दा देना
आटेमें लूणके समानही रहगयाहै।
हे चतुर हृदयपाठको ! ऐसे पुरुषोंको और उनके माता
पिताओंको धन्यहै, और वेही स्तुतिके पात्र होतेहैं कि जिनका
जीवन समयका विशेष भाग इस माताजीकी सेवामें व्यय हो-
ताहै। नहीं तो इस मनुष्य शरीरके जन्मलेनेका परिणामकेवल
इस कालचक्रकी धुरीमें इधर उधर लौटनाही होताहै । दूसरा
यदि कोई मनुष्य गोमाताजीके निमित्त चंदा उघानेमेंभीसमर्थ
न हो तो उसे अपनी दुकानमें या घरमें एक लोहेकी तथा का-
टकी पेटी(संदूक)जिसके ऊपर केवल एकही छिद्रहो, जिसमें
रुपैया,पैसा,अठन्नी,चोअन्नी, दुअन्नी आदि सुगमताके साथ
पडसके, ऐसी रखना चाहिये और उसकी शक्तिके अनुसार
आने दो आने जैसी उसकी आमदनीहो नित्य उसमें गोनि-
मित्त डालदिया करे, और प्रतिमास पेटीकोखोलकर जो जमा
एकत्रहोवे किसी प्रकारसे गोमाताजीके अर्थ लगादिया करे,
ऐसा करनेसे उस बेपारीकों बहुतसा फायदा होता रहेगा.
। गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (२१) स्त्रियोंकोभी उपदेश करना चाहिये कि वे अपने घरमेंएक गोघट (मिट्टीकाघडा) रक्खें, और उसमें नित्य मुष्टि दो मुष्टी अन्न अथवा आटा डालदिया करै,जब वो घट भरजाया करें तब उसे गोशालामें भिजवादे। स्त्री और पुरुष स्वयं गो- शालामें जाकर घडीदो घडी ब्रूस अथवा वस्त्र द्वारा गौओंको मले, और डांस मच्छर आदि छोटे छोटे जन्तु जो गौमाताके स्थन और कानोंमें चिपके रहतेहैं उढ़े दूर करदे । इस प्रकार सेवा करनेसे उन्हें बड़ा भारी पुण्य होगा। और भी देखिये. श्लोकः-दत्वा पर गवे ग्रासं, पुण्यं स मह दश्रुते॥ सिंह व्याघ्र भय त्रस्तां पङ्क लग्नां जले गताम् ॥ भाषार्थः-पराई गाय तथा अनाथ गायको एक ग्रास अन्नादि थोडासाभी भोजन देनेसे बडा पुण्य होताहै। और सिंह व्याघ्रके भयसे तथा जल, कीचडमे डूबती हुई गौकी जो रक्षा करताहै उसको बडा भारी पुण्य होताहै । इसपर एक दृष्टान्त देतेहैं। कोई एक धनाढ्य पुरुष था परन्तु दैवयोगसे अथवा उ- सके पूर्वजन्मके पापोंके उदय होनेसे वह अति दीन अव- स्थाको प्राप्त होगया। एक दिन अपने घरमें बैठा हुवा, अ- पनी वर्तमान स्थितिको देखकर पश्चात्ताप कर रहा था, कि इतनेहीमें उसका एक मित्रआया, और बोला कि आप इतना (२२) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। सोच मतकरो। यहांसे थोडीही दूरपर एक धनाढ्यपुरुष रह- ताहै और उन(धनाढ्य)मनुष्यके इसजन्मके कियेहुये पुण्यों को द्रव्यद्वारा मोल लेताहै। आपभी उसकेपास जाइये और जो पुण्य आपने कियेहैं उनका द्रव्य लाके कुटुम्बका पालन करिये । निदान उसने अपने शुभचिन्तक मित्रका उपदेश मान अपने मित्रके बताए हुए स्थानपर गया। उसने उस धनाढय पुरुषसे अपना मनोरथ प्रकाश किया। साहूकारने भी प्रसन्नताके साथ उसकी बात मान अपने सेवकोंसे कहा कि वो तराजू ले आओ उस साहूकारका यह नियम था कि तराजूमें एक ओर तो मनुष्यके किये हुए पुण्योंको एक का- गजपर लिखकर रखदे,और दूसरी ओर उसके बराबर सुवर्ण चढावे । जितना सुवर्ण उस कागजके पत्रके बराबर तुले उत नेही बजनका सुवर्ण देदेवे । इसी प्रकार इसकेसाथमीकिया। इसने अपनी सारी अवस्थाभरमें जितना धर्म किया था, वह लिखकर रक्खा । परन्तु हे प्रियपाठको! तराजूमें इतना सोना नहीं चढा कि,जिससे इस बिचारे नवीन निर्धनकी पूर्ति होवे । अन्तमें वह अपने प्रारब्धकी विचित्रता देखकर हताश होने लगा। इतनेमें वह सज्जन (धनाढय पुरुष) बोला कि यदि आपने और भी कोई थोडा बहुत पुन्य कियाहो, और वह भू- लसे रहगयाहो तो वहभी यादकर लो । उसने उत्तर दिया कि मैने ऐसे २ बडे.२ पुण्य किये उसके बदले में तो इतना गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (२३) सुवर्ण चढा, तो फिर छोटे२ पुण्योंको कहतेभी लज्जा आती । परन्तु उस धनाढय साहूकारके अनुरोधसे कहना पड़ा तब वह कहने लगा कि “ मेरे यह नियम था कि एक सेर आटेकी रोटी नित्यप्रति एक अनाथ गौ (जो मेरे मकानके सामनेही रहा करती थी उस)को देदिया करताथा। सो यह भी लिखकर तराजूमें रखता हूं" ऐसा कहकर एक पर्चेपर "गौमाताजीको रोटी देनेका पुण्य" लिखकर तराजूके एक पलडे में रखदिया तो इतना सोना उसके परिवर्तनमें चढा कि वो प्रथम अवस्थासे भी दूनी चौगुनी असामी बनगया। हे प्रिय बाचकवृन्दो ! अनाथ गौओंको पालन अर्थात् उनको श्रद्धानुसार तृण, जल, अर्पण करने में उनको कित- ना पुण्य होताहै वह मेरी क्षुद्र लेखनीद्वारा लिखना मानो आकाश पुष्पोको गृहण करनेकी इच्छा करताहै। आपको जिस विषयकी इच्छा हो वह अभिष्ट केवल श्री- गोमाताजीकी सेवाहीसे प्राप्त होसकेगा इस विषयमें सैंकडो प्रत्यक्ष प्रमाण लिख सकतेहै । परन्तु हाथ कंकनको आरसा क्या ? आप स्वयंही गोमाताजीकी सेवा करके देख लीजिये कि हमारा कहना कहांतक सत्यहै और भी देखिये रघुवंशकी कथामें वर्णनहै। * महाराजा दिलीप (सगर वंशोत्पन्न) के कोई संतान नहीं थी। तब उन्होंने संतानके अर्थ श्रीवशिष्ठजी महाराज २४) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (जो उनके कुलगुरूथे) से प्रार्थना की और उपाय पूछा। राजाको चिन्तारूपी समुद्रमें गोते खाते देख गौकी सेवाहीसे इसकी इच्छा पूर्ण होगी ऐसा ठान अपनी " नन्दिनी" गौ की सेवा करनेकी आज्ञा दी वह इसप्रकार खान, पान सेवा सहवास आदि जैसा परम भक्तिपूर्वक ईश्वर और महत्पुरुषों- का करताहै उसी प्रकार इसका कर । निदान महाराजा दिलीपने भी अपने गुरु महर्षि श्रीव- शिष्ठजीकी आज्ञानुसार, घर और बनमें जाकर दत्त चित्तसे गोमाताजीकी सेवाकर अपनी भक्तिका. परिचय दिया वह अकथनीय है। रघुसर्ग २ श्लोक २१ प्रदक्षिणी कृत्य पय स्विनी तां, सुदक्षिणा साक्षात पात्र हस्ता॥ प्रणम्य चा नर्च बिशाल मस्याः, शृङ्गा न्तरं द्वार मिवार्थ सिद्धेः वत्सोत्सुका पि स्तिमिता सपा, प्रत्यग्रहीत् सेति ननन्द तुस्तौ॥ भक्त्योय पन्ने षु हि तद्विधानां, प्रसाद चिन्हानि पुरः ‘फ- लानि ॥ तामन्ति कन्यस्त बलि प्रदीपा, मन्वास्य गोप्ता गृहिणी सहायः। कृमेण सुप्ता मनु संविवेश, सुप्तोत्थितां प्रातर नू दतिष्टत् ॥ भाषार्थ-आश्रममें आई हुई धेनुकी प्रदक्षिणा पूर्वक सा- प्टाङ्ग प्रणाम करके.सुदक्षिणाने गन्धाक्षत पात्रको वाम हस्तमें गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (२५) धारणकर, दक्षिण हस्तसे नन्दिनीके ललाटकी पूजन करी। मानों यही (ललाट) अर्थ सिद्धिका खुलाहुवा बिशालद्वारहै। : नन्दिनी बालवत्सकी दर्शन लालसाके आधीन होतेहुये भी सुदक्षिणाकी करीहुई पूजाको निश्चलतासे अङ्गिकार की। इससे सुदक्षिणा और दिलीप दोनोहीको आनन्द प्राप्तहुवा। राजा अपने पास पूजनकी सामग्री सहित और प्रज्वलित दीपकके पास नन्दिनीको बैठीहुई देख, आपभी राणीसहित बैठ गया। और नन्दिनीको निद्रायुक्त देख आपभी सो गये। प्रातःकाल होते ही नन्दिनीके पूर्वही राजा जागगया । नन्दिनीने राजाकी परीक्षा करने के वास्ते अपनी मायाके द्वारा सिंह प्रगट किया। और वह (मायाका सिंह)नन्दिनीके कंठपर बलात्कार कर ग्रीवापर चढगया और नन्दिनीने शब्द किया। शब्द सुनके और यह दशा देखके राजाको अत्यन्त क्रोध चढा तब । राजा बोला, “अरे अधम सिंह तूं मेरे द्वारा रक्षित नन्दिनीको सतानेकी चेष्ठा करताहै, इससे मैं तुझे अ- भी यमालयमें भेजताहूं। ऐसा कहकर राजाने अपना धनुष टंकारा और भातेमेसे बाण निकालनेको पिछाडी हाथ किया कि इतनेमें दैवात् राजाका हाथ वैसाका वैसाही स्थंभन हो- गया, राजाको इस प्रकार देख वह सिंह बोला कि हे राजा! "अलं महीपाल तव श्रमेण । प्रयुक्तमप्यत्र मितो वृथा स्यात्॥न पादपोन्मूलनशक्तिरंहः।
(२६) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। शिलोचये मूर्छति मारुतस्य" ॥१॥ अर्थ-इसको छुडानेके विषयमें तेरा सब प्रयत्न नि- फल होंगे इसलिये तूं श्रम मत कर। देख वायूकी शक्ति के- वल वृक्षादिकोंकोही उखेडनेकी है, न कि पर्वतादिकको॥१॥ आगे सारांश श्लोकोंका जो दिया जाताहै उससे मेरा प्रभाव और शक्ति मालुम होगी. कैलास तुल्य शुक्लकान्तियुक्त वृष- भपर आरोहन करनेके समय श्री भूतभावन महादेवजी नि- जचरण कमल स्पर्शसे मेरे पृष्टको पवित्र करतेहैं । अतएव हे राजन् ! तुम मुझे शिवकिङ्कर जानो । मेरा नाम “कु- म्भोदर" है मेरा बल कुम्भकर्ण के पुत्र “निकुम्भ" के बरा- बरहै. मैं केवल पशुजाति सिंह नहीं हूं, इसलिये यह तो तेरी भुजाकाही स्तंभन होगया, यदि तूं बाणका प्रहार करता तो वेहे भी खाली चलाजाता। इस प्रकार सिंहके बचन सुन राजा दिलीप व्याकुल हो गया, और सिंहसे इस प्रकार प्रार्थना करने लगा, स त्वं मदीयेन शरीरवृत्ति, देहेन निर्वतयितुं प्रसीद ॥ दिनावसानोत्सुकबालवत्सा, विसृ ज्यतां धेनुरियं महर्षेः"॥ हे सिंह ! यदि आपका ऐसाही बिचारहै तो मैं इस(गो)के बदलमें अपने शरीरको आपके सामने रख देताहूं, जिसको भक्षणकर आपअपनी क्षुधाका निवारण करलीजिये। गायका
गोमाहात्म्यचन्द्रिका।
(२७)
बच्चा बहुत छोटाहै और वह घासभी नहीं खाता है । अब
सायंकाल होनेसे वह “मा मा" पुकारता होगा। उसकी दया
देखके ही आप इस गायको छोड देवें। इस कार्यसे आपका
बडाभारी यश होगा, और गाय बच्चा बचजानेसे मुझेभी बडा
पुण्य होगा, तब सिंहने राजासे कहा कि हे राजन् ! सुन ।
"एकातपत्रं जगतः प्रभुत्वं नवं वयः कांतमिदं वपुश्च ॥
अल्पस्यहेतोबहुहातुमिच्छन् विचारमूढ प्रतिभासिमत्वम्
भाषार्थ-यदि जीवकी दयासेतूं अपना शरीर देकर इसे
बचाना चाहताहै तो तूं बिचारसे मूढहै, ऐसा मालुम पडता
| है, क्योंकि परमात्माने कोट्यान कोटि मनुष्यों के पालन करने
के वास्ते तुझे बनायाहै । केवल एक गौके लिये ही नहीं ।
एक गौके बचानेसे जब तूं मारा जावेगा तो इस निष्कंटक
राज्य का पालन करनेवाला कौन होगा ?
“अथैकनोरपराधचंडागुरोः कृशानुप्रतिमाद्वि-
भेषि ॥ शक्योस्य मन्युभवता विनेतुंगाः को-
टिशः स्पर्शयता घटोनीः "॥
हे राजन् ! तेरा गुरु अग्निके समानहै,और दूसरी गायभी
उनके यहां नहीं हैं, इस गायके मरनेसे क्रोधित होकर वे तुझे
शाप देंगे यदि इस कारणसे तू इतना भयभीत होता होतो,
इस एक गायके बदले करोडों गायें जो इससेभी अधिक दूध
देनेवाली है वे मुनिको देकर उनका क्रोध शान्त करसकताहै।
(२८) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। पुनः॥ "एतावदुक्त्वा विरते मृगेन्द्र प्रतिस्वनेनास्य गुहागतेन ॥ शिलोच्चयोपि क्षितिपालमुच्चैः प्रीत्या तमेवार्थमभाषतेव"॥ भा०-इतनी बात कहकर सिंह चुप होगया, परन्तु उस गुफामेंसे जो शब्द निकलने लगा,उससे यही मालुम होताथा कि, हिमालयपर्वतभी अपने मित्र सिंहकी मित्रताका परिचय देनेके लिये, राजासे सिंहकी वातका मानों अनुमोदन करता है। सिंहके भयसे नन्दिनीके नेत्रोंमें भय उत्पन्न होने लगा। राजा बोला कि "हे सिंह ! आप यह आज्ञा करते हैं कि एक गायके बदले सहस्रों गायें वशिष्ठजीको देकर, उनका क्रोध शान्त कर सकते हो"। पर यह आपका कहना और बिचार सर्वथा अनुचितहै, क्योंकि । "कथं नु शस्योनुनयो महर्षेर्विश्राणनादन्य- पयस्विनी नाम् । इमामनूनां सुरभेवहि, रुद्रौ- जसा तु प्रहतं त्वयास्याम् ।।" भाषार्थ-नन्दिनी अपनी माता कामधेनुके समान महत्व रखती है, इसके परिवर्तनमें करोडों दूसरी गायें देनेसे भी मुनिका क्रोध कदापि शान्त नहीं होसकता। और आप इस प्रकार नन्दिनीको मारनेको उद्यत हुये हैं, सो मैं जानताहूं, कि यह प्रताप केवल श्रीशूलपाणि, आशुतोष, श्री महादेवजी गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (२९) काही है. नहीं तो दूसरे सिंहकी क्या सामर्थ्य हैं, कि जो न- न्दिनीकी तरफ आंख उठा करभी देख सके" ॥ खैर ? अब मैं तुमसे इतनी प्रार्थना करताहूं और आशा रखताहूं कि आप स्वीकार करेंगे क्योंकि आपके और मेरेइ- तने भाषणसे मित्रता होगई है, अतएव इस मित्रकी यही प्रा- र्थनाहै कि इसके बदलेमें मैं यह शरीर जो आपके अगाडी समर्पण करताहूं, जिसे भक्षणकर इस मेरे गुरुकी गायको छो- डदो इसप्रकार कहकर,गौका पूर्णभक्त और अनुचर क्षत्रिकुल भूषण राजा दिलीप उस सिंहके मुंहके सामने जैसे कि,मांसके पिण्डके समान गिरगया। इसके गिरनेकी ही देरी थी कि वह मायाका सिंह अन्तर्धान होगयाऔर आकाशमार्गसे पुष्पवृष्टी हुई, और नन्दिनी मनुष्यके समान बाणी बोलती हुई कहने लगी। हे प्रिय पुत्र दिलीप! अब उठ मैं तेरेपर अत्यन्त प्रसन्न हूं। मैने तेरी भक्तिकी परीक्षाके अर्थ यह मायाका सिंह बनाया था, नहीं तो ऋषीके प्रभावसे यमराजभी तो मेरी हानि नहीं करसकता फिर तुच्छ सिंहकी क्या गणनाहै। तेरी भक्ति यथा- में शुद्ध अन्तःकरणसे है।तूं वर मांग? प्रियपाठकगणों ! उप- रोक्त लेखसे आपको राजाकी भक्ति भलीप्रकार विदित होगई होगी। धन्यहै. राजा दिलीपको कि जिसने अपना शरीर भी तुच्छ समझलियाथा। अब आगे क्या हुवा सो अवलोकन करिये। राजा एकदम उठा, और नन्दिनीको मातासमान द.
(३०)
गोमाहात्म्यचन्द्रिका।
यालु देखकर प्रार्थना करनेलगा कि हे माता! मेरा जोअभि-
ष्टहै वह कुछ तुमसे छिपा नहीं है। तब नन्दिनीने उत्तरदिया,
हे पुत्र! तू अव आनन्दसे अपने आश्रममें जा तेरेको शी-
घही बडा प्रतापी रघुनामका पुत्र होगा और इलीके बंशमें
स्वयं श्रीविष्णुभगवान अवतार धारणकरके मेरे संतान गौ
वैल और ब्राह्मणों की रक्षाकर रावणादि दुष्ट राक्षसोंको मार
भूमिका भार उतार श्री "राम" नामसे विख्यात होंगे।
महाराजा.दिलीप और नन्दिनीका बडा भारी आख्यान
है परन्तु यहांपर स्थानाभावसे संक्षेपमें लिखा है। यदि आपकी
इच्छा विशेष देखनेकी हो तो " रघुवंशकाव्य" (जो
महाकवि कालिदासकृतहै ) देखें।
हे प्रिय गोभक्तो ! आप इस समय सूक्ष्म दृष्टिसे विचार
करिये कि जब महाराजा दिलीपको किसी प्रकारसे भी स:
न्तान न हुई,सो केवल कुछ दिन गौमाताकी सेवाहीसे होगई?
इस दृष्टान्तमें गोसेवा करनेका कितना महत्व स्पष्टतासे झल.
कताहै उसका आपको अनुभव होगया होगा। तथापि और
भी देखिये कि श्री शत्रुघ्नजीने सुमन्तजीसे पूंछा कि यह तेज
स्वी महा पराक्रमी सत्यवान नामक राजा किसका पुत्र है।
रामाश्वमेध
धेनुं प्रसाद्य बहुभिर्य प्राप तत्पिता।
ऋतंभरारेव्या जगतीं विदितः परधार्मिकः"॥
गौमाहात्म्यचन्द्रिका। पद्मपुराण भा०-"ऋतंभरत” नामक जो बडे धार्मिक और जगत् प्रसिद्ध राजा हुएथे। उन्होंने नियमपूर्वक गोसेवा किरी तब ॥ "गौः प्रसन्ना ददौ पुत्रमनेकगुणसंयुतम् । स- त्यवान् नाम शोभाढ्यंत जानीहि नृपात्मजम्"। भाषार्थ-गौओंने प्रसन्न होकर अनेक गुण संपन्न सत्य- वान् नामक पुत्र प्रदान किया था । अहाहा ! जब इस मा- ताजीकी सेवा करनेसे ऐसे ऐसे अलौकिक फल मिलते हैं, तंब ही तो श्रीमुरारी श्रीकृष्णचन्द्रने इनकी सेवा कीथी। “यो वै नित्यं पूजयति गामिह यवसादिभिः । तस्य देवाश्च पितरो, नित्यं भृत्या भवन्ति हि" ॥ भाषार्थ-जो पुरुष नित्य प्रति गौ माताजीका तृण जल आदिसे पूजन करते हैं उनपर देवता और पितर नित्यप्रति प्रसन्न रहते हैं। भविष्य पुराण " पादाक्रान्तं मदीयो हि, तिलकं कुरुते नरः॥ तीर्थ स्नातो भवेत्सद्योऽभयन्तस्य पदे पदे"॥१॥ भाषार्थ:-जो मनुष्य गायके खुरोकी धूलि अपने मस्तक- पर लगातेहैं, वे सर्व तीर्थोका फल पातेहैं क्योंकि जहांगायें रहतीहै, वहां सर्व तीर्थ रहतेहैं । इसलिये जो नर गौशालामें प्राण त्यागतेहैं वहभी तत्कालही मुक्त होजाते हैं। यह निश्चय है। देखिये जब इसमाताजीकी चरणरजको केवल मस्तकही (३२) गौमाहात्म्यचन्द्रिका । पर धारण करनेसे सर्व तीर्थों में स्नान करनेके सदृष फल होता है, तो हे प्रिय पाठक और गोभक्तो ! जब इस माताजीकी पूर्ण रूपसे तृण जल द्वारा सेवा की जाय तो उस करके कितना पुण्यमिलताहै सो मेरी लेखनीद्वारा लिखना सर्वथा असंभवहै अतएव हे प्रियपाठको ! यदि आपको पूर्ण पुण्य लूटकर प्रत्यक्ष फल प्राप्त करनेकी लालसाहै, तो तन मन धन द्वारा गोमाताजीकी सेवाकरोओर इनके निमित्त सत्त्यानुसार निज द्रव्य तथा चन्दा एकत्रित कर, अपने अपने शहरमे शीघ्रही गोशाला बनवानेका प्रयत्न करिये, और गौमाताजीकी तृण जल द्वारा सेवाकरनेसे बिमुख न होइये । क्योंकि ऐसा समय फिर कभी आपंक हाथ नहीं लगेगा। हे प्रियपाठको ! अपने धर्मग्रन्थोंके सिद्धान्तानुसार या- वद्धर्मोंकी खानि केवल गोमाताजीही है। इस विषयका शा- स्त्रीय प्रमाण नीचे देखिये। अग्नि पुराण अन्नमेव पर गावो देवानां हविरुत्तमम् ॥ पावनं सर्व भूतानां रक्षन्ति च वहन्ति च "॥१॥ भाषार्थ-गौओंके पुत्रोंसे अन्न होताहै,और गौमाताही- से सब देवताओंको हवि मिलती है, और केवल गौकेही दू- धसे पंचगव्य बनताहै, और उसीके पानसे लोग पवित्र हो- तेहैं। इस बिषयका एक दृष्टान्त आपके दृष्टिगोचर करातेहैं।
गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (३३). किसी देशमें एक शुद्र रहताथा, और उसके गौ बछडा आदिहीसे आजीविकाथी। अर्थात् उसका दुग्ध उस नगरके मनुष्योंके यहां विक्रियार्थ जाया करताथा । अकस्मात् एक दिन उसके यहां कोई अतिथी चला गया, उसने उन साधूको श्रद्धापूर्वक गोरस (चाछ) पान कराया और स्वयं आपनेभी भायों सहित पान किया। उस गोरसके पान करनेके प्रभा- वसे दूसरे जन्ममें उन्होंने ब्राह्मणके यहां जन्म लिया, और दिव्यज्ञानको प्राप्तहुए जो कि, बडे २ योगियोंको दुर्लभहै। हे त्रितापनिवारिणी माता ! तेरे दुग्ध दधि घृतादि प- दार्थों में ऐसा अलौकिक गुणहै, तबही तो श्रीविष्णुभगवान मोहित होकर स्वयं तुझे चरानेको बनमें जातेथे । और श्री मद्भागवत् में श्रीकृष्णपरमात्माका कथन है कि "गौको मेराही स्वरूप जानो" इस विषयका शास्त्रीयप्रमाण नीचे देखिये। विप्रा गावश्च वेदाच ऋतवश्च हरेस्तनुः॥" 'अर्थ-ब्राह्मण, गाय,वेद, यज्ञ,ये हरीहीके शरीरहैं । इस वास्ते हे प्रियपाठकवर्गों ! गो सेवा करनेसे श्रीविष्णुकी सेवा होगी। इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है। तथा और भी देखिये। शंखस्मृतिः "बालवृद्धरोगार्ताः श्रान्ता उपासीत शक्तितः॥ प्रतिकार कुर्यात् गवां एष धर्मः अन्यथा विप्लवः॥ . -
(३४) गोमाहात्म्यचन्द्रिका।
गारक्षेत तास्वपीतासु न पीबन्न तिष्ठेडपविशतीषु
न स्वयमुत्थापयेच्छनैराशाखया सपलाशया पृ
ष्ठतो निहन्यात् ॥ इति ॥
भाषार्थ-शंखमुनि कहते हैं कि जो बाल, वृष्ड, रोगी,
कोई भी हो, बडे परिश्रमसे शक्तिअनुसार गायकी सेवा करेंगे
वे सदैव सुख पावेंगे, और जो न करेंगे तो नाश हो जायेंगे।
भा०-मनुष्यको चाहिये किगायकी सदा रक्षा और सेवाकरे।
गायचाहे सूधीहो चाहे खरहटी (तीव्रस्वभाव)हो,चाहे पानी
पीतीहो, चाहे बैठीहो उसको छेडना नहीं परन्तु धीरेसे पीछे
को जाकर कोमल हरा व उत्तम घास उसको डालदेनाचाहिये
हे प्रियपाठको ! बैठी गायको हटानेसे बडा पाप होताहै,
जव भरतजीने कौशल्यासे शपथ करके कहा किहे मातेश्वरी!
श्रीरामचन्द्रजीको बनमें भेजनेमें जो मेरी संमतिहो, किंवा
मुझे यह बात मालूमभीहो तो मेरेको वह पाप लगे, जो गौके
लात मारने वा बैठी हुईको उठानेसे होताहै ? सो।।
प्रियपाठको! अपने यहां क्या वेद,क्या पुरान,क्या उपनि-
षद, आदि ग्रन्थों में इस कलिकलुषहारिणी श्री गौमाताजीकी
सेवा करनेका इतना महात्म लिखाहै, तो फिर आप हस्तगत
अमृतको छोडकर क्यों इस असार संसारमें गोते खातेहो।
कवित्त
"धरोही रहेगो धन धरणी अरु धवल धाम, वृथा
है लगानो.नेह देह गेह धरनी सों। ऊंचे ऊंचे अटा
. . गोमाहात्म्यचन्द्रिका। अरु अटारी सारी न्यारी,धरनीमें समाय अरु प्रमट होत धरनी सों॥क्षणको भरोसोनांहिं वर्षोंको सा: माकर, कोऊना अघात इसमायामन हरणी सों। काम नहीं आवत कोऊ अन्त समय शालिग्राम, गैय्या ही तारत बन तरणी बैतरणी सों"॥१॥ जब इस प्राणीको यमदूत पकडकर यमालयमें ले जाते है, और उसे अतिनिर्दयतासे मारते हैं कि जिसके सुनने मा- त्रहीसे मनुष्यका रोमाञ्च होजाताहै । तब वे प्राणी यमदूतोंके कठोर दंडसे बिकल होकर बारंबार पुकारतेहैं कि हे पुत्र ! हे भाई ! इन पाशधारी यमदूतोंसे हमारी रक्षा करो । तब वे यमकिङ्कर उन्हें बारंबार ताडना करतेहैं, और कहतेहैं कि अरे नीचो ! देखो न तो तुमने अपने उद्धारार्थ गौमाताजी को ग्रास दिया और न उनको तृण, जलसे सन्तुष्ठ किया, तथा न श्रीकृष्णके निमित्त गौ दान किया। केवल अपने कुटुम्बकेही भरण पोषण करनेमें आसक्त रहे । तो अब इस समय तुह्मारी रक्षा कौन करसक्ताहैं । इस वास्ते हे प्रियवरो! हमारे लिखनेका सारांश यहीहै कि इस मनुष्य योनिमें उत्पन्न होकर यदि तन, मन, धन से किसी प्रकारसेभी गौमाताजीके अर्थ उपकार होजावे, उतना ही आपके लिये इस लोक धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, आदि पदार्थों की प्राप्ति, और परलोकमें मोक्षकी देनेवाली है।
(३६) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। यह बात आप सत्यही सत्य समझें, कि इस असार सं- सारमें उत्तिर्ण होनेके लिये श्रीगौमाताजीही ब्रहत् नौकाहै। और श्री अखिल लोकेश्वर श्रीमन्नारायण श्रीभागवतके तु- तीय स्कंधमें कहते हैं, कि गौ और ब्राह्मण मेरे परम देवता हैं। जो लोग गौ ब्राह्मणोंका अनादर करतेहैं वो मेरेको प्रिय नहीं लगते, और मेरा चित्त सदा गौ ब्राह्मणोंहीमें रहताहै। मेरा इष्ट गौ ब्राह्मणहैं। अव देखिये कि स्वयं श्री वैकुण्ठनाथ जगदीश्वर श्रीगौ- माताजीकी कितनी स्तुति करते हैं तो फिर आप अभिष्ट फ. लप्रदायिनी गौमाताजीकी सेवा करें इसमें आश्चर्यही क्याहै। हे प्रियवरो! ये गौमाताही स्वर्ग में आरोहन करनेके वास्ते उत्तम निसरणी (सीडी) है । सर्व जीवोंके कल्याण व उद्धार तथा यज्ञ साधनकेही अर्थ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आदि तेतीस क्रोड देवताओंने गौ रूपधारण कियाहै। जिस देशमें गौओंका समूह अति प्रसन्नताके साथ श्वास छोडताहै, वह देश अकाल आदि उपद्रवोंसे रहित रहताहै। अतएव हे प्रियपाठकगणों ! अब अधिक कहने सुननेकी कोई आवश्यकता नहींहै, आप कायिक अर्थात् शरीर द्वारा, वाचिक अर्थात् बचन द्वारा,मानसिक अर्थात् मनहारा गौमा- ताजीकी सेवा करने में कटिबद्धहो जाइये। फिर देखिये कि इसके परिवर्तनमें आपके यावत् अभिष्ट सिद्ध होतेहैं या नहीं।
गोमाहात्म्यचन्द्रिका।
(३७)
मैंने बहुधा देखाहै कि कइएक महाशयोंकी एक प्रकारकी
बिचित्र रीति होती है, कि जब कोई गौभक्त गौमाताजीके
निमित्त प्रार्थना करताहै कि महाशयजी आप गौमाताजीके
निमित्त इस प्रकारका उद्योग करिये" तो उनके मुखसे इसके
उत्तरमें केवल दो तीनही शब्द निकलतेहैं? अर्थात् वे अपनी
प्रेतबाणीसे झट कह बैठते हैं कि अभी तो हमें अवकाश नहीं
है, क्या करें भाई । घरके धन्धेसेभी फुरसत नहीं मिलती।
हे प्रियपाठको! यह बात आप अच्छी तरहसे याद रंक्दै कि
जहांतक आपको व्यापारादि कार्योंसे फुरसत नहींहै वहांतक
आपको गौमाताजीकीसेवा करनेका सौभाग्यहै। इसविषयपर
आपको एक दृष्टान्त सुनाते हैं । और आशाहै कि ये दृष्टान्त
आपको जैसामनोरंजकहोगा,वैसाही उपदेशजनकभी होगा।
"एक पण्डित और सेठजीका दृष्टान्त"
किसी एक पण्डितजीका धनाढय सेठके साथ परिचयथा।
पण्डितजी नित्य सेठजीके स्थानपर आया जाया करते थे,
और बहुधा यह उपदेशभी किया करते थे।
श्लोक
अम्बरीष शुकमोक्तं नित्यं भागवतं शृणु।
पठस्व स्वमुखेनापि यदीच्छसि भवक्षयम् ॥
भाषार्थ-गौतमजी कहते हैं, कि हे अम्बरीष ! जो तुम
इस संसारसागरसे पार होना चाहो तो यह पुराण (श्रीमहा-
(३८) गोमाहात्म्यचन्द्रिका गवत) सुनो । जो कि व्यासदेवके पुत्र श्रीशुकदेवस्वामिने राजर्षी परीक्षितको सुनाई है। उसको सुनो। और अपने मुं- खसे पाठभी करो। इसप्रकार पण्डितजी सेठजीको श्रीमद्भागवत बंचानेकेवास्ते कहा करतेथे, परन्तु पण्डितजीके ऐसे सदुपदेशको सुनकर, सेठजी इसके प्रत्युत्तरमें कहदेतेथे कि अभी तो हमें अवकाश नहीं है, फिर कभी देखा जायगा। बस केवल ऐसे दो तीनही शब्द बोलकर अपने मुखरूपीबिवर(बिल)को बन्दकरलेतेथे। थोडेही दिनके पश्चात् सेठजीका अकस्मात् देहान्त होगया । कवित्त “ घोडा पील पालखी खवास खिदमतगार जाके । रणमें प्रवीण औ चलैया तलवारके॥ हीरा औ जवाहिर तोशेखानेमेंही धरे रहै । ऐसे छोड चले जैसे बचकाबेगारके। बेणीकवि कहे परस्वारथ न कीन्हे मूढ । कीन्हें काज केवल सुत घरही पितु नारके ॥ काल शर सांधे मद मायामें आंधे कछु। गांठ नहीं बांधे जब कांधे चले चारके" ॥१॥ सवैया गर्भ चढे पुनि सूप चढे पलनापे चढे चढे गोद घना॥हाथि चढे अरुघोडा चढे सुख पाल चढे जोन धनाके । बैरिओ मित्तके चित्त चढे कवि
गोमाहात्म्यचन्द्रिका।
(३९)
ब्रह्म भने दिन बीते पनाके ॥ ईश कृपालको
जान्यो नहिं अब कांधे चढि चले चार जनाके।
महा कवि-बीरबल)
जब सेठजीकी दाह क्रियाके वास्ते उनको स्मसानभूमिका
को लेगये,पंडितजीभी उनके साथ गये। और जब सेठजीको
चितामें रक्खे, कि उक्त पण्डितजीने झट अपनी पोथी पत्रा
खोलके कथा बाचना प्रारंभ करदी। लोगोंने उनसे कहा कि
आप क्या करतेहैं? क्या यह समय कथा बांचनेकाहै? इसबात
पर पण्डितजी बोले,कि भाइयो ! मैने इन्हें कई एकवार कथा
सुनानेका अनुरोध किया,परन्तु आप इसके उत्तरमें सदायही
कहा करते थे कि अभी तो मुझे अवकाश नहीं है। इस वास्ते
इन्हें अब पूर्ण अवकाश मिलाहै, सो मैं इन्हें कथा सुनाताहूं ।
वे लोग पण्डितजीके गूढ बचनोंका भावार्थ स्पष्टतासे समझ
गये, और केवल उस कृपण धनाढ्यकोही नहीं किन्तु स्वयं
अपनेकोभी बारंबार धिक्कार देनेलगे, कि हाय ! मनुष्य केवल
स्त्री पुत्रादिकोंके लालन पालन करनेमेही इस मनुष्य देहके
कर्तव्यकी समाप्ती कर देताहै।
। कबित्त ।
पायोहै मनुज देह ओसर बन्योहै आय ।
ऐसी देह बार बार कहो कहाँ पाइये।
भूलतहैं बावरे तूं सबते सयानो होय ।
रतन अमोल यह काहे को गमाइये ॥.
(४०). गोमाहात्म्यचन्द्रिका। समुझ बिचार कर ठगनको संगत्याग। ठगजै हैं देख कहूं मन न डुलाइये ॥ सुन्दर कहत तूं अबभी सावधान होय। हरीको भजन कर हरीमे समाइये ॥१॥ सो इस वास्ते हे प्रिय सुहृदय पाठको! आप इस अमूल्य नरदेहको केवल भोगादिक विषयों में आसक्त न करिये। जिस प्रकार कमलके पत्रस्थित जल अति चञ्चल होताहै, उसी प्रकार इस मनुष्यके जीवनकीभी अति चपल स्थिति होतीहै, और जब यह प्राणी शरीर छोडके यमदूतों द्वारा अति कठोर पाशों(पाशियों)सेबन्धाहुआ बैतरणीनदी मार्गहोकर नरकोमें || असीम क्लेश सहताहुआ यमालयमें जाताहै। तब यमराज इसे देखकर, कहते हैं, कि अरे मूर्ख ! तुझे बारंबार धिक्कारहै ? जो आजतूं हमारे स्थानपरआया। अरे दुष्ट ! तूंही देख कि, चौ- रासी लक्षयोनियोंमेंसे सर्वोपरि मनुष्ययोनीहै,जो कि जिसकी देवता लोगभी इच्छाकरतेहै। फिर तैने ऐसी नरदेहि पा करभी स्वर्गव मुक्तीका कोईभी साधन न करसका ? और यहांपर तूं हमें पवित्र करनेकों आया। राग भैरवी "इस प्राणीको कृष्णभजनही परमानंद दिखाना हेरे॥ बिनाकिये हरिभक्ति जगतमे मुक्तिन कोई पाता हेरे॥१॥धन दौलत औ कुटुम्ब कबीला गीमाहात्म्यचन्द्रिका। कोई कामन आता हेरे ॥ सब अपने स्वास्थ स्वारथके मुख देखेका नाता हेरे॥२॥हारा पुत्र पौत्रके ऊपर फूला नहीं समाता हेरे।।मया मोह लोभके बश हो वृथा जन्म गुमाता हेरे ॥३॥ अबभी समझ अरे अज्ञानी कहे जिन्हे तू भ्राता हेरे । अन्त समय कोइ कामन आवे आप अके ला जाता हेरे ॥४॥काल आय जब शिर पर गाजत, कफ घटमें विर आता हेरे। आंख फा ड तब चहुं दिशि देखत, शिर धुनि धुनि पछ ताता हेरे॥६॥हरि हरि भज राजस तामस तज, जो तेरा सुख दाता हेरे॥७॥ वोही स- व जगतका स्वामी, सब दुख बंद मिटाता हेरे ॥८॥ माया मोह द्रोह ममता तज, जो नर हरि गुण गाता हेरे॥९॥ “शालिग्राम वही इस जगमें पूरण भक्त कहाता हेरे" ॥१०॥ पाठकगणों ! अब अधिक क्या कहैं। आपभी महाराजा यमराजके उपरोक्त उपदेशको मान करके श्रीगोमाताजीकी श्रद्धापूर्वक सेवा करिये क्योंकि अन्तसमयमें आपका उद्धार केवल श्रीगोमाताजीहीके द्वारा होगा। हे प्रियभ्रातृगणों ! आप इस वर्तमान समयकों एक पर्व कालही समझके गोमाताजीकी तन मन धन द्वारा(कि)किसी (४२) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। प्रकार सेवा करिये यहांपर यदि यह शङ्काहोवे कि पर्वकालमें तो और समयकी अपेक्षा अधिक पुण्य होताहैं । जिसका समा- धान यहहै कि पूर्वकालमे जो फल वर्षों तक घोर तपस्या करने- सेभी नहीं होताथा, वो वर्तमानमें श्रीगोमाताजीकी तनिक सेवा करनेसे प्राप्त होजाताहै। मेरे इस कथनकी पुष्टी श्रीमत्प- रमहंस संहिता अर्थात् श्रीमद्भागवतजी करतीहै। जिस समय गोरूपी पृथ्वी और धर्मरूपी वृषभके पीछे म्लेच्छरूपी कलि- युग दौडता जाताथा, उससमय राजापरीक्षितने उन्हें देखा, और क्रोध मूछितहो बोला कि अरे दुष्ट ! खडारह । मेरे शा- सनमें तैने ऐसा नीच कर्म करनेका साहस किया, इस वास्ते मैं तुझे प्राणदण्ड दिये बिना कदापि न रहूंगा। निदान राजा प- रीक्षितसे कलियुगने अपना छुटकाराहोना कठिन समझा तब वो उनके चरणों में गिरपडा, और गिडगिडा कर बोला, कि हे नाथ ! मुझे मत मारो। मैं आपकी शरणहूं। मेरा अपराध क्षमा करो। ऐसी प्रार्थना करनेपर राजाका कुछेक (किंचित) क्रोध शान्तहुवा, और बोला । कि अरे नीच! तूं इन बिचारे निरप- राधी गायों और बैलोको क्यों सताताथा। उसने अपनी सारी व्यवस्था कही, और बोला कि हे नाथ ! मेरे औगुणोंका तो आप विचार करतेहैं. परन्तु मेरे गुणोंकी ओर तनिकभी ध्यान न दिया सो ? दीजिये,मुझमें कई एक ऐसे उत्तम गुणहै । जि- नका आपसे निवेदन करताहूं। सतयुगमें जिस राजाके राज्यमें गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (४३) एक मनुष्य अपराध करताथा, तोसमस्त राज्यभरके मनुष्यों- को उसका दण्ड मिलता था। ओर त्रेतायुगमें एक मनुष्यके पापकरनेसे सर्व नगरके मनुष्योंको दण्ड दिया जाताथा। और द्वापुरमें जो कोई पाप करता तो उसके कुटुम्बियोंकोही शिक्षा मिलती थी। किंतु कलियुगमें जो पुरुष अन्याय करताहै वो स्वयं अपने शरीर द्वाराही भोग लेताहै उसके कुटुम्ब आदि- कोसे कुछ प्रयोजन नहीं । “कलौकाहि लुप्यते” और यु- गोंमें मनुष्योंको मानसिक अर्थात् मनसे कियाहुवा पाप लग- ताथा, और उसका दण्डभी भोगना पडताथा। परन्तु मेरे रा. । ज्यमें मनुष्योंको मानसिक पाप नहीं लगता किन्तु मानसिक पुण्यकाफल मिल जाताहै। और सतयुगमें जो कोई मनुष्य वै- कुण्ठ जानेके लिये दशसहस्त्र वर्ष तप करतेथे तब उनकी म- नोकामना सफल होतीथी, और त्रेतायुगमें मनुष्यअमित द्र- व्य व्ययकरके सहस्त्रोवर्ष अश्वमेधादियज्ञ करतेथे तब उनका मनोरथ सिद्ध होताथा। द्वापुरमें सो वर्षतक दान वृत, पूजन, ध्यान, आदि करनेसे उनकी इच्छा पूर्ण होतीथी। परन्तु हे राजेंद्र! मेरे राज्यमें जो मनुष्य एक पल मात्रभी एकाग्रचित्त करके, शुद्धमनसे परमेश्वरका स्मरण और ध्यान तथा उनकी कथा वार्ता कहने सुननेसे वह अपने सर्व कार्योंको साधनकर अनेक जन्मोंके पापोंसे छूट मोक्षका भागी होजाताहै। जब राजापरीक्षितने कलियुगके मुखसे इसके गुणोंको सुने (४४) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। तब उनका क्रोध शान्त होगया, और बोले कि मैने तेरा अप- राध क्षमाकिया परन्तु फिर कभी ऐसा नीचकर्म नहीं करना। तव कलियुगने प्रार्थना की कि; हे दीनदयालु ! आपने मुझे अभयकर जीवदान दियाहै तो कृपाकर मेरे रहनेकेलिये कोई स्थानभी बतादीजिये। तब राजाने जुआ,मद्य स्त्री,सुवर्ण,और चौरी इसप्रकार पांच स्थान उसके रहनेके वास्ते बता दिये। प्रियवरो ! जितनी एक दुष्ट मनुष्यमें पाप करनेकी शक्ति नहीं है, उससेभीजादागोमाताजीमें पापनाश करनेकी शक्ति हैं। ऐसा अपने श्रुति, स्मृति,पुराण,आदि धर्मग्रन्थोका सि- हान्त है । जिसका अनुभव आपको इस पुस्तकको आद्यो- पान्त पढ़नेसे होगा. प्रिय वैश्यभ्रातृगणो ! आप लोगोंके हृदयमें तो गोमा- ताजीकी भक्ति होना, यह एक स्वाभाविक गुण है। और शास्त्र भी आप लोगोंके विषयमें ऐसाही कथन करता है देखिये। श्रीमद्भगवद्गीता कृषिवाणिज्यगोरक्षा वैश्यकर्म स्वभावजम् ॥ अर्थात् खेती, व्यापार, और गोरक्षा, यह वैश्यलोगोंका स्वाभाविक कर्म है। फिर आप लोगोंको तोअपना स्वधर्म कर्म पालनकरना उचितहीहै,किन्तुकई सज्जन यवन(मुसलमान) महायशभी इस गौमाताजीको उत्तम और अनेक पदार्थोकी दाता मान वडेआदरसे पालनकरते और दयादृष्टिसे देखतेहैं।
गोमाहात्म्यचन्द्रिका (४५) मेरी एक प्रतिष्ठित यवन महाशयसे मित्रता थी, उनके आगे जब कभी इस विषयकी (गोरक्षा संबंधी) चर्चा चल पडती, तो वे कहा करते थे कि हमारे यहां भी एक गाय है, वो दुग्ध तो बिशेष नहीं देती है मगर यह पाक जानवर है, इसलिये रख छोडी है । वे कभी कभी पण्डित जगतनाराण- जीकृत"इल्तमास काबिल गोर"पुस्तक पढा करतेथे। और बोले कि,जब मैं बिस्तरसे उठताहूं और मेरे नोकरोंका चहरा देखता हूं तो मेरा सारा दिन बडाही खराब गुजरताहै ? और अलावा इसके खानाभी देरसे मिलता है। मगर जब कभी ऐन सुबहही गौका दीदार होता है तब तो सारा दिनही बडा खैरियतसे गुजरता है चुनाचे मैं जिस कमरेमें आराम करता हूं उस कमरेके सामनेही उस गौको बँधवा देता हूं, ताके सु- बह होतेही गौके दर्शन होजावे" हे प्रिय गोभक्तों ! आप स्वयंही अनुमान करलेंगे कि इस यवन कुलभूषण महाशयके कथनके अक्षर २ में कितनी गो- भक्तिरूपी अमृतके फुहारे छूटते हैं, तोहे गुणग्राही पाठको ! जबके अन्यजातीके पुरुषभी श्रीगौमाताके परोपकारी गुणोंपर मोहित होकर बडी आदरकी दृष्टिसे देखतेहैं। और सहस्त्रों रु- पैये चंदामें प्रदानकर उस सर्व शक्तिमान करुणा वरुणालयके कृपाभाजन बनतेहैं । मेरे उपरोक्त लेखको चरितार्थ करनेवा- लेका नाम हिन्दीके प्रसिद्ध साप्ताहिक श्रीवेंकटेश्वर समाचार (४६) गोमाहात्म्यचन्द्रिका । पत्रहै जिसमें पढकर जितना हर्षहुवाहै,वह सीमासे बाहरहै । गुजरातमै गोपालन " मुंबईके गवर्नरने गौओंका पालन करनेके लिये गोशा- ला स्थापितकी है, उसके फण्डमें अभी अधिक रुपैया नहीं हु- वाहै, इस प्रान्तके हिन्दुओंने मौन साधन कियाहै । इस सप्ता- हमें एक सहस्त्र रुपैया मुंबईके प्रधान पादरीने दियाहै। तीन सोरुपैये गवरनरके कर्मचारियोंमेंसे इकठे हुये हैं। (वै.स. मु. ता. १२ सं. २४।१९०१) और आगे इसी पत्रमें कहीं पर मुंबई गवर्नमेण्टका “गोपालक" नामक एक लेख दिया है। उसको यहांपर स्थानाभावसे नहीं लिखा उस बृहत् लेख का सारांश यहहै कि श्रीमान लार्डनार्थकोट महाशयने गौओं की रक्षाकर देशका बडाभारी उपकार कियाहै, और आपने इसकाममें असाधारण दयाप्रकाश करके गौ, बैलोंका, पालन कर अपनी अतुलकीर्तिको भारतमें छोड जावेंगे"। देखो भर्तृहरि "पद्माकरं दिनकरो विकचं करोति चन्द्रो विकासय ति कैरवचक्रवालम् ॥नाभ्यर्थितो जलधरोपि जलं ददाति सन्तः स्वयं परहितेषु कृतातियोगा"॥१॥ अर्थ-सूर्य कमलके समुदायको प्रफुल्लित करता है और चन्द्रमा कुमोदिनीके समुदायको विकासित करता है। तथा मेघभी विनामांगे जल देता है, इसीप्रकार साधुलोग आपही दूसरोंका उपकार करते है। यह उनका स्वभावही होता है f
गोमाहात्म्यचन्द्रिका।
(४७)
प्रियवरो ! गोमाताजीकी सेवा करनेमें तथा अनाथ लूली
लंगडी गौओंके निमित्त चंदा एकत्रित करके उनके रहनेके
वास्ते गोशाला बनाने में तथा गौओंके निमित्त व्यापारादि-
कमें, गोकर लगानेमें कितना पुण्य होता है उसका अनुभव
आपको इस पुस्तकके अवलोकन करनेसे होगा।
अब गोदान करनेमें कितना पुण्य होता है सो अभी नीचे
लिखाजाता है।
सरस्वतिगीता
परलोकं गोपदास्त्वामुवन्ति, दत्वानड्डाहं सूर्य-
लोकं ब्रजन्ति ॥वासो दत्वाचांद्रमसं तु लोकंद
त्वा हिरण्यममरत्वमेति॥१॥धेनुं दत्वा सुप्र
भां सुप्रदोहां कल्याणवत्सामपलायिनींच॥या
वन्ति रोमाणि भवन्ति तस्यास्तावद्वर्षाण्यासते
देवलोके ॥२॥ अनड्डाहं सुव्रतं यो ददाति हल
स्य वोढारमनन्तवीर्यम् ॥ धुरंधरं बलवन्तं यु-
वानं प्राप्नोति लोकान्दशधेनुदस्य ॥३॥ ददाति
यो दै कपिलांसचैलां कांस्योपदोहां द्रविणैरुत्त
रीयः॥ तैस्तैर्गुणैः कामदुहाथ भूत्वा नरं प्रदातार
मुपैति सा गौः॥४॥ यावन्ति रोमाणि भवन्ति
धेन्वास्तावत्फलं भवति गोप्रदाने ॥ पुत्रांश्च
पौत्रांश्च कुलं च सर्वमासप्तमं तारयते परत्र ॥५॥
(४८) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। भाषार्थः-सरस्वतीजी ताक्ष्य ऋषिप्रति कहती है कि हे विप्र ! गोप्रदान करनेवाले पुरुष देवलोकके पारलोकमें जाते हैं। बैलका दान देनेवाले सूर्यलोकको जाते है वस्त्रदान क- रनेवाले चन्द्रलोकको, और सुवर्ण देनेवाले देवता होजाते है सुन्दर कान्ति और सुन्दर दूध देनेवाली, सुन्दर बछडावाली नहीं भागनेवाली, ऐसी गौ दान करनेवाला गौके जितने रोम होते है उतने वर्ष देवलोकमें बसते है सुन्दर हलको बहा- नेवाला और अनन्तवीर्यवाला धुरको धारण करनेवाला बल- वान और जवान बैलका दान करनेवाला दश गौ दानके फ- लको प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य बस्त्रोंसहित कांसीका दोहना और पाल आदि वस्त्रसहित कपिला (गौ)का दान करताहै, वह गौ तिनतिन गुणोंसे कामदुहा होकर दातामनुष्यकों प्राप्त होतीहै। गौके जितने रोमहैं उतना फल गोदानमेंहैं,। परलो- कमें पुत्रपौत्रादि और सात पीढियोंको तारतीहै। हे प्रिय गोपालकों ! देखिये। एक गौदान करनेसे जितने गौके रोम होतेहैं उतने वर्ष गौदान करनेवाला देवलोकमें ब- सताहै, तभी तो यावद्दानोंमें केवल गोदानही सर्व दानोंके तु- ल्यहै। ऐसा अपने शास्त्रकारोंका कथन है। "स्वकर्मभिर्दानवसंनिरुद्ध, तीव्रान्धकारे नर- के पतन्तम् ॥ माहार्णवे नौरिव वातयुक्ता दानं गवां तारयते परत्र”॥
(४९) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। अर्थात्-अपने कर्मोंसे दानों करके रोके हुए बहुत अन्ध कार युक्त जो नरक जिसमें गिरते हुए मनुष्यको महासमुद्र में वातयुक्त नावकी तरह गौकादान परलोकमे तारताहै। सदक्षिणां काञ्चनचारुशृंगी, कांस्योपदोहां द्र- विणैरुत्तरीयैः॥ धेनुं तिलानां ददतो द्विजाय, लोका वसूनां सुलभा भवन्ति ॥१॥ अर्थात-दक्षणासहित सोनेकी सुन्दर श्रृंग(सिंगडियां)सहित और कांसीका दोहना और पाल (झुलना)आदि वस्त्रोंसहित तिलोंकी धेनुको ब्राह्मणोंके अर्थदेनेवालोंको वसुलोक सुलभहै। प्रियपाठको! यहांपर एक दृष्टान्त आपके मनोरंजनार्थ एवं उपदेश निमित्त एक कृपणसेठ और बुढीगायका देते हैं । कवित्त (रुपनका बचन) दाता घर जातीतो कदर ऐसी नाहिं पाती, मेरे घर आई तो बधाई बांट बावरी॥खाने दश खाने तयखानें छिपाय राखू । होउना उदास मेरो यही चित्त चावरी। खाऊंना खवाऊं मरजाऊं तो सिखायजाऊंनाती और पूतनकों आपनो स्व- भावरी॥ दमडीना देऊ कभी स्वप्नमें भिखारि- नको कृपणक है लक्ष्मी घर बैठी गीतगावरी॥ (कृपण सेठे और गोका दृष्टान्त) एक वैश्य महाकृपणथा,जो भोजनभी कठिनाईसे करताथा, दानकरनेके भयसे द'अक्षरभी अपनेमुखसे उच्चारण न करता
(५०)
गौमाहात्म्यचन्द्रिका।
कवित्त
“पोरके किंवाड देत, घरे सबै गारी देत, साधु
नको दोष देत प्रीति नाचहतहैं। मांगनेको ज्वा
ब देत' बात कहे रोय देत, लेत देत भांजी देता
ऐसेही निवत है। बागेहके बंद देत, बारनको
गांठ देत, परदनकी कांछ देत, काममें रहत है।
एतपै सबकोई कहै लाला कछुदेतनाहिं लाला-
जी तो आठों जाम, देतही रहत हैं॥१॥
एक दिन दैवयोगसे सेठजी रोग ग्रसितहोके, यमालयकी
यात्रा करनेके वास्ते अपने उपार्जित कियेहुए पापोंकी गठरी
पुठरी बांध कटिबद्ध हो रहेथे। तब उनके पुत्रोंने कहा,कि पि-
ताजी! हमारी इच्छाहै कि इस समय आपके हाथसे एक गाय
पुण्य करावें । सेठजीने इस बातपर बहुत आना कानी की,
परन्तु उसके पुत्रोंने इनकी बात न मानी, तब अन्तमें सेठजी
बेबस होकर बोले,कि अच्छाभाई तुह्मारी यही इच्छाहै तो एक
काम करो कि, अपने सुक्खन घोसीके एक गायहै, वह मुझसे
उस गायका तीन रुपैया मांगताथा, और मैने उसके दोरुपैये
देनेको कहाथा,उसने जब तो नहीं दी? परन्तु अब दो रुपैयेमें
देदेगा,क्योंकि वह गाय महादुर्बल और बूढी तथा दूधहीनहै।
दोहा-" दांत घिसे अरु खुर फटे, तनिक दूध नहिंदेय।।
ऐसी बूढी गायको, कौन बांध भुस देय" ॥२॥
गोमाहात्म्यचन्द्रिका पठन नगर सो तुम उसे खोललाओ। मैने एकदिन अचानकमार्गमजाते हुये किसी पौराणिककीकथा बच रहीथी उसमें सो सुनी."गो- दान करनेका बडाभारी पुण्यहै नरकमें गिरतेहुए कोभी पीछी गौमाताहीस्वर्गमें लेजातीहै" ये शब्द जाते २ सुने । येसुन मैं भी राजा कर्णका अनुकरणी होनेके लिये अपने मनमें गो- दानका दृढ़ संकल्प करलिया. और गोदानके लिये बजवत् हृदयकर एकदम दोरुपैये धाम दिये,फिर मैं अपने घरूधंधे लगगया। और कुछ अवकाशभी न पाया। यदि किसी समय अवकाशभी हुवा तो यही बिचार मनमें रहा कि जहांतक हो सके इससेभी थोडे में मिलजावे तो उत्तमहै । मैं उसके घरपर कईबार गया. और पावआना आधआना अधिकमी करआ- या। परन्तु उसकी इच्छा ढाई रुपैयेसे कमती न पाई। सो अब तुम जाओ, दोचार आनेकी बचत होजावे उतनाही अच्छाहै, ढाई रुपैयेमें तो वह देहीदेगा,परन्तु इतना जरूर याद रखना कि नोकरकी दस्तूरी और बट्टेके पैसे काट लेना, सो वो पैसे ब्राह्मणको दक्षणा देनेके समय काम आगे"। ये सुनकर उ- सके पुत्रोंने तुरन्तहीजाके ढाईरुपैयेमें गाय लाकर कृपणसेठ- जीके सामने खडी करदी। और घरू पुरोहितजीको बुलाए। पुरोहितजी अपनी प्रेतबाणीसे नीचे लिखाहुआ संकल्प उ- वारण करने लगे। सकंल्प-“ॐ वेश्यां वेश्यां तत्सद ब्राह्मणे, दोपहर (५२) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। प्रहरार्धे श्रीश्वेतगौकल्पे वैवस्वतमनुमन्तरे अष्टा विंशतिमयुगे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जंबुद्धी पे भारतखण्डे आर्यावर्तेकदेशे काशीखण्डे महा श्मशाने गौरीमुखे मासाना मसान मासे शूकर पक्षे मलिनतिथौ उपूर्णमायां चन्द्रग्रहणपर्वणी कालनिमित्तं इमां गां ठंठाम् अस्थिचर्मसहितां दुग्धवच्छक रहितां जीर्णवस्त्रसहितां रुधिरमांस वर्जितां लालचीशर्मणे तुभ्यं हं संपद्यते"।। इति।। कबित्त राग कीन्हें रङ्ग कीन्हें तरुणी प्रसङ्ग कीन्हें हाथ कीन्हें चीकने सुगंध लाख चोलीमें। देह रची गेह रची सुकृति सनेह रची, बासर व्यतीत की- न्हें नाहक ठठोलीमें । बेनी कवि कहे कछु कह तन बनें दशा, दिना चार स्वांगसे दिखायचले होहोली ॥ बोलत न डोलत न खोलत न पलक हाय, काठसे पडेहैं आज काठकी खटोलीमें॥१॥ जब गोदानके पश्चात् ब्राह्मणको दक्षणा देनेका समय आया, तब सेठजीने पुत्रोंसे कहा कि, जो पैसे नोकरकी दस्तूरी के काटे हैं सो देदो । पुत्रोंने उत्तर दिया कि पिताजी दस्तूरी तो उसने नहीं काटी । बस इसके सुनतेही सेठजीने शीतमें आकर प्राण छोडदिये। दूसरे दिन वह गायभी मर- गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (५३) गई। यमदूत सेठजीको नरकयात्रा करानेकेवास्ते अपनी दृढ- पाशोंसे बांधकर यमालयको लेगयो यमराज इनकी तरफ देख कुछेक हंसते हुये चित्रगुप्तजीसे बोले कि जरा आप इनके पाप पुन्यका हिसाब देख लीजिये। तब तो चित्रगुप्तजीने उत्तर दिया कि महाराज इनका क्या हिसाब देखें पापही पाप नामें की तरफलिखे जानेके अतिरिक्त लेशमात्रभी पुण्य जम्मानहीं है। बस इतनी कहनेकी देरथी, तब तो लालाजीके ऊपर यम- दण्डोंकी वर्षा होनेलगी। तब तो लालाजी चिल्लाकर बोले कि मुझे मतमारो। मैने मरती समय एक गोदान कियाहै । गोदा- नका नामलेतेही चित्रगुप्तजी घबराकर बोले कि महाराज मेरा अपराध क्षमाहो। इसने अभी एक गौदान कियाहै, सो मैं रो- जनामचे मे से खातेमें लाना भूल गया था, परन्तु उसके पु- ण्यके पीछे वो गाय केवल दो दिनही जीवित रहीहै। इसका विचार आपकरलेवें। तब यमराजजी सेठजीसे बोले कि, यदि तैने गौदान कियाहै तो वह गाय कहां हैं ? इतना कहतेही वो गाय सेठजीके सन्मुख आकर खडी होगई। और बोली कि सेठजी मैं आपके पुण्यके पीछे एक दिनहीं जीती रहीहूं। सो एक दिनमें जो चाहिये सो काम लेलो। लालाजी बोले कि अच्छा एकहीदिन सही। अब पहिले तो इतनाकाम कर कि ये यमराजजी बैठे हैं इनके पेटमें एक सींग मार ! हे माता !!तूं ही देख इन्होंने मुझे कितना कष्ठ दिया। सेठजीकी आज्ञा (५४) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। पातेही वह गाय यमराजजीके पीछे हुई। यमराज सारी यम- पुरीमें भागे भागे फिरे, परन्तु गाय और सेठजी यमराजाके पीछे मार मार करते चले जातेथे। तब हारके यमराज श्रीच- क्रपाणी वैकुण्ठनाथ श्रीविष्णुभगवानके पास गये। हे प्रियपाठकवर्गो! यहांपर प्रसङ्गानुकूल स्थल देखकर कुछ वैकुण्ठ लोकका वर्णन करतेहैं। वैकुण्ठलोकका वर्णन जिस वैकुण्ठमें सब पुरुष विष्णुभगवानके समान चतु- र्भुज रूपहैं। जिस वैकुण्ठलोकमें आदिपुरुष शब्दमात्रके वक्ता त्रिगुणमाया मृगीके नचानेवाले चक्रपाणी विष्णुभगवान बि- राजते हैं। जिस वैकुण्ठमें "सुखदायक" नामक अति रम- णीय बागहै जिसमें सब कामनाएं पूर्ण करनेवाले फल फूलोंसे शोभित सुन्दर कल्पवृक्ष वगैरह है। ऋतुओंकी शोभासे आठों याम प्रकाशित रहतेहैं। जिस वैकुण्ठमें श्रीमत् अखिल लोक लोकेश्वर श्रीविष्णुभगवानके पापनाशक चरित स्त्रियोंसहित भगवद्पार्शद विमानोंपर बैठे अति मधुर २ शब्दोंसे गायन करतेहैं। जिस वैकुण्ठलोककी नदियोंके जलमें प्रफुल्लित मधु मालतीकी लताओंकी सुगंधसे सारी पुरी सुगन्धित होरहीहै और करी, कपोत, कोकिला, सारस, हंस, चक्रवाक, मयूर, आदि सुन्दर पक्षी दिव्यरूपहैं और श्रीकृष्णचन्द्र आनन्द- कन्दके गुण गाते रहते हैं। और कल्पवृक्ष कुन्दतिलकवृक्ष गोमाहात्म्यचन्द्रिका । (५५) रात्रिमें प्रकाश करनेवाले कमल चंपक (जिनको भवनमें रख- नेसे मनुष्य कभी ऋणी नहीं होते हैं, जिनकी छाया पुरुषोंको हस्तीके समान बलप्रदान करती है) सारा वैकुण्ठ पारिजात आदि कल्पवृक्षोंसे शोमितहै। और श्रीमन्नारायण वैकुण्ठ- नाथके चरणारविन्दोंमें मानों नमस्कार करते दिखाई देते हैं। मरकत वैदूर्य आदि सुवर्णमय विमानोंसे सारा वैकुण्ठ सघन होरहाहै । श्रीलक्ष्मीजी चरणारविन्दमें नपुरध्वनि करती हुई लीलाकेलिये नीलकमल हस्तमें धारण किये हुये शोभितहैं । हे प्रिय पाठको ! आप इस पुस्तकद्वारा संक्षेप रीतिसे वैकुण्ठके दर्शन करचुके आपकी भी वहां जानेकी उत्कण्ठा हुई होगी । देखिये-जब एक दुष्ठ कृपण पुरुषकोभी ऐसी गायके पुण्य करनेसे वैकुंठ मिला, तो फिर यदि आप तन, मन धनसे गौमाताजीकी सेवा करोगे, और बहुत दुग्ध देने- वाली तरुण गायको दक्षिणासहित श्रेष्ठ ब्राह्मणको दानकरोगे, तो क्या आपको वैकुण्ठलोक नहीं प्राप्त होगा ? नहीं नहीं क्यों नहीं?अवश्यमेव होवेहीगा??इस विषयमें अनेक शास्त्रीय प्रमाण पीछे देआयेहैं । अब यमराजजी और सेठजीका भी वृत्तान्त सुनिये । जब बिचारे यमराजजी धबराये हुये, वै. कुण्ठलोकमें जाकर श्रीविष्णुभगवानको प्रणाम कर बोले कि हे भगवन् ! यह वैश्य मेरे प्राणोंका गाहक हो रहाहै इसने अपनी सारी उम्मरमें अनेक पापोंका उपार्जन करनेके अति- (५६) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। रिक्त एक बूढी गौका दान दियाहै, और उसीसे यह त्रिलो- कीका राज्य करना चाहताहै आप जैसी आज्ञा करें वैसाही दण्ड इसे देदेवें। भगवान, अच्छायमराजजी जैसा इसने कर्म कियाहै वै- साही इसको फल देदेना चाहिये। यमराज, महाराज कर्म तो इस दुष्टने घोर नर्कमे जा- नेका कियाहै। भगवान, तो अच्छा नहीमें भेजदो। यह बात सुन से- ठजी हंसते हुए बोले, कि महाराज मैने चित्रगुप्त और यम- राजजीका न्याय पहिलेही देखलिया अव आपके न्यायकी गति देखकर मुझे वडा आश्चर्य होताहै, कि आपभी न्यायी हैं । परन्तु आज आपने वेद, पुराण, शास्त्र, आदि सब झूटे करदिये । क्योंकि उनमें लिखाहै, कि जो पुरुष स्व- नमेंभी भगवानका दर्शन करलेवे उसको वैकुण्ठवास मिलता है। पर मैने साक्षात् दर्शन किया तो भी मुझे नरक ? यह क्या अन्याय?? अरी गाय इनसेभी समझा यह वैश्यका बचन सुनकर भगवान हँसकर बोले कि गाय क्या समझेगी हमही समझगये कि तुम बडे चतुरहो अच्छा यमराजजी तुम जाओ, इनको हम अपनेही पास रक्खेंगे । वस यमराजजी इतनी बात सुनतेही अपना मुख लियेहुए यमलोकको पधारगये । अहाहा ! ऐसी वुढी दुग्धहीन गायके पुण्य करनेसे वैश्यको गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (५७) भजन बैकुण्ठप्राप्ती, और जो लोग सेंकडों गायें उत्तमोत्तम पुण्य करते हैं उनको कितना पुण्य होगा? उसका हे परमेश्वर तुमही जानो ? मनुष्यकी क्या सामर्थ्य है ? जो जानसके। दया निधि तोरी गति लखिना परें। आस्ताई। धनसें धरम धरमसें अधरम,अकरम करम करें।। दया॥१॥पिता बचन टारै सो पापी सो प्रल्हाद तरें। ताके बंध छुडावनको प्रभु, नरसिंह रूप धरै । दयानाशाएक गऊ जो देत विप्रको, सो सुरलोक तरै।। दया०॥३॥कोटि गऊ राजानृग दीन्ही, सोभवकूप परें । दया०॥४॥ नरसिंह पुराण "सदक्षिणांप्रदद्याइ गां सोक्षय्यं सर्वमाप्तवान्। गवि रोमाणि यावन्ति, प्रसूतिकुलसंस्थितः॥ तावन्त्यब्दानि वसति स्वर्गदातान संशयः॥ अर्थात-दक्षिणा सहित जो पुरुष गौका दान करताहै वह अपने सैंकडों पुरुषोंको नरकमेंसे निकालताहै और जितने गौके रोम होते हैं उतने वर्ष शरीर त्यागे पीछे गोदानप्रदाता स्वर्ग बास करताहै। हे प्रिय गोभक्तो! इसप्रकार अनेक प्रमाण इस विषयकहै, परन्तु एक तो विस्तार (स्थानाभावके) भयसे तथा विशेष पढनेका आप लोगोंको समय नहीं मिलनेके कारण, इतनेही (५८) गोसाहात्म्यचन्द्रिका। पर सन्तोष करतेहैं.क्योंकि कोईभी विषय क्यों न हो,जहां- तक उसके ऊपर एकाग्रचित्तके साथ लक्ष नहीं दिया जाता तो उसका सुनना, और पढना हस्तीके स्नान समान निरर्थकहै। इस पर एक उत्तम दृष्टान्त एक वैश्य और पण्डितका आपके भेट करताहूं. किसी नगरमें एक वैश्य रहताथा, जिनके कपडे (वस्त्र)का व्यापार था। उनका एक मित्रथा वह सदैव कथा सुननेकोजाया करताथा। एक दिन सेठजीकोभी बडी आग्रह केसाथ कथा सुननेको राजीकर लेगया। (सेठजीका कथापर तो विशेष प्रेम नहींथा,परन्तु यदि न जाय तो भी मित्र नाराज होंगे ऐसा बिचारकर अनिच्छा होतेभी किसीप्रकार गये)वहां- पर पण्डितजीनेभी विशेष स्वागतकिया कारण वह द्रव्यवान, और नयाही आसामीथा। इससे पण्डितजीने उनको अपने पासही बिठाये,और कथा प्रारंभकी। सेठजी बैठे बैठेही निद्रा देवीके चरण शरणमें प्राप्त होगये। तब स्वप्नमें क्या देखते हैं कि,कोई ग्राहक कपडा लेनेके वास्ते उनकी दुकानपर आया, परन्तु भाव ताव ठीक नहीं हुवा। इससे वह पीछा जानेलगा सेठजीने देखा कि दुकानपर आयाहुआ ग्राहक पीछा जाता है। झट उसे बुलाकर बोले। भाई! लो आठ आनेगजही देना ऐसा कहते हुये पण्डितजीके उपवस्त्र (जो पास था) फाड डाला । इसपर जो मनुष्य कथा सुनरहेथे वे सेठजीको बोले कि क्या आप कथा सुनने आयेहैं या पण्डितजीके वस्त्र फाड- गोमाहात्म्यचन्द्रिका। नेको ? इतनेमें इनकी आंखे खुलगई। और लज्जामें आकर कुछ उत्तर न दे सके। हे प्रियपाठकवर्गों ! हमें पूर्ण आशाहै, कि आपभी इस क्ष- णभंगुर देहका अभिमान न करें और उपरोक्त वैश्यके समान केवल वस्त्र बेचनेहीमें मन न रहकर उस परमपिता परमेश्वर का सदैव स्मरण करते रहेंगे। श्लोकः-यावज्जीवो निवसति देहे, कुशलं तावत् पृच्छति गेहे ॥ गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काले ॥१॥ अर्थात्-जबतक जीव देहमें रहताहै तभीतक ग्रहमें कु- शल पूछते हैं, प्राण वायू निकल जानेसे जब यह शरीर शव- रूपमें परिणत होताहै तब भार्या अर्थात् निज विवाहिता स्त्री (जिसको तुम प्राणसेभी अधिक प्यारी समझतेहो, और हे प्राणप्यारी ! हे सर्वांगसुन्दरी ! हे सुमुखे। हे जीवनाधार ! आदि उपमासे संबोधन करतेहो)वो भी उसको देखकर भय- भीतहो अलग होजातीहै। सचहै। जबतक पुरुषका चित्त उसके (ईश्वर) चरणोंमें लगा रहताहै तभीतकका समय साफल्यहै, अन्यथा यह श- रीर मलमूत्रमयके अतिरिक्त ओर कुछ नहीं है। , कबित्त आवत गलान जो बखान ज्यादाकरो, मादायह (६०) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। मलमूत्र मजाकी सलीती है। कहै “पद्माकर त्यों जरा जब भीजी आय, छीजीदिन रैन जैसे रेणुकाकी भीती है। सीतापति रामकेसनेह ब- सबीती जोपें तोतो दिव्य देह यमयातनासेजी- ती है॥रीती रामनामसे रहीन यह काहूकाम, खारिज खराब हालखालकी खलीती है ॥१॥ महाभारत शान्तिपर्व वार्तिक-कोई महात्मा जलाशयमें (जलके मध्यभागमें) बैठेहुए योगाभ्यास कररहेथै,और उस बृहतजलाशयमें किसी धीमर (पारधी)ने मत्स्यादि जल जन्तुओंको पकडनेके लिये अपना जाल डाला अकस्मात् वे महात्माभी उस जालमें आ- गये, धीमरने एक तपस्वीको अपनी जालमें बन्धे हुए देख, उनसे अपना अपराध क्षमाकी प्रार्थनाकी, ऋषि उसको अ- भय देकर बोले कि इसमें तेरा कोई अपराध नहीं है। परन्तु अब मैं तेरा होगया क्योंकि तुझे इतना परिश्रम वृथाही हुवा, सो यदि तूं मुझे राजाके पास ले चलैं और वो मेरा मूल्य तुझे दे देवै तो मैं तेरे बन्धनसे छूट सकताहूं। निदान वे दोनों रा- जाकेपास गये और अपना अभिप्राय प्रगट किया। राजाइस अभियोगको सुनकर आश्चर्यमें हुआ और अपने मन्त्रिवाँसे परामर्ष करके एकलक्ष सुवर्ण मुद्रा उस ऋषीके मूल्यका उ- चित समझ धीमरको देने लगा। परन्तु ऋषीने कहा कि यह - गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (६१) मूल्य मेरा नहीं होसकता, तब राजाने ५० लक्ष सुवर्ण मुद्रा देना स्वीकार किया, तथापि उस ऋषीका संतोष नहीं हुवा। अन्तमें राजाने ब्रह्मशापके भयसे अपने राज्यका अर्द्धभाग देना अङ्गीकार किया, तबभी ऋषी प्रसन्न न हुए। हे प्रियपाठकगणों! आप इस विषयपर आश्चर्य न करना देखो? श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी महाराज अपनी रामायण- में क्या लिखते हैं। चौपाई-" इन्द्र कुलिश शिव शुलबिशाला । काल दण्ड हरिचक्र कराला॥जे इनकर मारानाहिं मरहीं, बिप्ररोष पावकमें जरहीं ॥१॥ सुरम हिसुर हरिजन अरु गाई।हमरे कुल इनपर न शुराई। बधे पाप अपकीरति हारे॥मार तहीपां परिय तुम्हारे ॥२॥ लक्ष्मणजीके बचन देखो भागवत श्लोकः-"विप्रा गावश्च ऋतवश्च हरिस्तनुः" अर्थात-विप्र, गाय, और वेद ये हरीकेही स्वरूपहै। अतएव हे प्रिय पाठक गणों ! राजा इनसे इतना भयभी- तहोवे जिसमे कोई आश्चर्य नहीं है । निदान वहराजा ब्रह्म- शापके भयसे व्याकुल हो अपने गुरूके पास जाके इस विष- यकी प्रार्थनाकी, राजाको इसप्रकार अधीर देखके गुरुदेव बोले,कि हे पुत्र तुम जरासी बातमें इतना सोच करने लगगये, - (६२) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। अभी तुम शीघ्र जाकर उस ऋषीके मूल्यमें एक गो उस धीमर को दे दो। तब राजा अपने स्थानपर आये, और एक नवीन व्याई और अधिक दूध देनेवाली गौ मंगाकर उस महात्माजी- से बोले कि हे तपोधन आपके मूल्यमें यह गौ इस धीमरको दे- ताहूं,कहिये आप प्रसन्नहुए या नहीं। राज्यकर्म चारी मंत्री उ- पमन्त्री आदि जो उस समय वहापर उपस्थितथे सो इस बात पर बडा आश्चर्य करने लगे कि जब अधाराज्यभी इस ऋषीके मूल्यकी तुलना न करसका तो फिर एक गौ से क्या होसकता है। कहाहै “जेहि मारुत गिरि मेरु उडाही, कहिय तूल केहि लेखेमाहीं” परन्तु उनका बिचार उलटाही हुआ। अर्थात् वे महात्मा केवल एक गौमाताही उस धीमरको दिलाकर राजा- को आशिर्वाद दे बनको चलेगये। हे प्रियगोभक्तो ! तनिक बिचार दृष्टिसे देखिये तो सही, कि जब लक्ष दशलक्ष कोटि दो कोटि तोक्या? किन्तु अर्द्धरा- ज्यके देनेसेभी इन ऋषीके तुल्यकी तुलना न होतेहुए केवल एक गोमाताजीसे होगई, तो इससे अधिक मैं आपको गौमा- ताजीके महात्म तथा गौदानके विषयमें क्या प्रमाण दे सक- ता हूं. तथापि हे प्रियपाठको ! गोमहात्म्यामृतपान करानेमें मेरी तृप्ती नहीं होती। भविष्य पुराणान्तरगत (गोविरात्रिवृत) धर्मपुत्रराजा युधिष्ठिर श्रीकृष्णचन्द्रजीके प्रति पूछतेहैं कि हे भगवान! आपने सर्व पापोंके नाशकरनेवाले अनेक वृत वि- गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (६३) धान कहे है परन्तु अब कृपा करके ऐसावृत मुझे बताइये कि जिस एक वृत मात्रहीके करनेसे मनुष्यको यावत् वृतोंका फल मिलजावे, और वह वृत सब वृतोंमें उत्तम होकर सर्व पापोंका नाश करनेवाला होवे । तब श्रीकृष्णभगवान बोले कि हे पा- ण्डवश्रेष्ठ ! तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो, मैं तुह्मारे प्रति गोत्रि- रात्रि वृत जो एक महावृत है ? उसका विधान कहताहूं जि- सके करनेसे मनुष्योंको अभीष्ट फल मिलताहै । इस बिधानके करनेसे मनुष्यके जन्म जन्मान्तरोंके कियेहुए समस्तपापोंका नाश इसप्रकार होजाताहै कि जैसे अग्नीके संयोगसे रुईका समूह भस्महोजाताहै। कुरुक्षेत्रमें सूर्यग्रहणके समय सो१०० भार सुवर्ण दान करनेका जो पुण्य, चान्द्रायण वृत करनेका जो फल,अश्वमेधादि यज्ञोंका जो पुण्य और सहस्त्रोवर्ष पर्यन्त घोर तपस्या करनेका जो पुण्य आदि अनेक महापुण्य केवल गोत्रिरात्रि वृत करनेसेही मनुष्यके हस्तगत होजाते हैं। यदि कोई स्त्री नियमपूर्वक गोत्रिरात्रि वृत करै तो सोजन्मतक वि- धवा न होवे । अपुत्री अथवा बन्ध्यामी हो तो उसकेभी इस वृतके प्रभावसे चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्नहोताहै। यदि पुरुष करै तो वह निष्कंटक राज्य भोगै, और अन्तमें गोलोकबासी होवे । इसप्रकार श्रीकृष्णचन्द्रने राजा युधिष्ठिरके प्रति कहा. यह वृत भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशीको करना चाहिये। उसदिन ब्रह्मचर्य धारण कर, गौमाताजीकी पूजन (६४) गोमाहात्म्यचन्द्रिका । करना चाहिये और संध्यासमयमें जब गौएं बनसे चरकेआवे तब इनकी परिक्रमा और स्तुतिकर गोमाताजीको खांडके अ- थवा गुडके लड्डू बनाकर देना (खिलाना) चाहिये। हे प्रियपाठकगणों! गोत्रिरात्रिकी कथा और विधि बहुत बडी है, यहांपर बिस्तार भयसे केवल उसकी फलश्रुतीही सं- क्षेपरूपसे लिखी है। यदि आप यह वृत करना चाहते हो तो किसी सुयोग्य पण्डित द्वारा कथा सुनिये और यथोक्त रीति पूर्वक व्रतका आचरणकरिये. दोहा-जेहिं श्रुति गावत रैन दिन, वेदन पावत पार॥ सोइ रघुनाथ सिया सहित,बन्दौं बारंबार ॥१॥ लालबरन लालीलसे, लाल ललाट विशाल ॥ शत्रुदलन जनभय हरण, बन्दों अंजनिलाल॥२॥ अतिविचित्र यह ग्रन्थ है, देखहु सुनहु बिचारि॥ बहुग्रन्थनको सार मत, यामें धरयो निहारि॥३॥ अब मैं बन्दों गुरुचरण, जेहिं प्रसाद वरपाय ।। प्रथमभाग पूरण कियो भ्रातुनहितमललाय॥५॥ ॥ प्रथम भाग समाप्तः॥ पुस्तक मिलनेका ठिकाना-. पंडित श्रीधर शिवलालजी "ज्ञानसागर" छापाखाना मुंबई.
॥ श्रीः॥ गोमाहात्म्यचन्द्रिका। द्वितीय भाग प्रारंभः। मङ्गलाचरणम् सोरठा-ऋद्धि सिद्धि दातार, सिद्धिसदन वारण बदन।। सुमरों बारम्बार, मदन कदनके लालको॥१॥ जयशिव आनंद कंद, भूतनाथ भवभय हरण॥ भक्तिविषय निर्द्वन्द,गौरवरण मङ्गलकरण॥२॥ दोहा-मेरी भव बाधा हरो, राधा माधव सोय ॥ जातनकी झांईपरें, श्याम हरितद्युति होय॥३॥ हेमुकुन्द गोविन्द हरि, नंद नन्दन घनश्याम ॥ चरणशरणमोहिराखिये, कृपासिन्धुसुखधाम ४ सोरठा-जयबन्दावन चंद, श्रीमुकुन्द गोविन्द हरि ॥ नन्दनंदनसुखकन्द,कृपाकरहुजनजानिनिज॥ जयश्रीनन्दकुमार, जयजयजय श्रीराधिका ममउरकरहु बिहार, जयजय गोपीगोपसब॥६॥ दोहा-करुणानिधि करुणायतन-जयप्रभु जगदाधार॥ हरत भूमिको भार तुम, भक्त हेत तनुधार ॥७॥ कृष्ण चरण कोमल अमल, सकल सिद्धिदातार।
गोमाहात्म्यचन्द्रिका। तिनकीरज अज शीशधर, रचत भुवन दशचार। श्लोकः-कस्त्वं शूली मृगय मिषजं नीलकण्ठः प्रियहम्।। केकामेकां कुरु पशुपतिनैव दृष्टे विषाणे ।। स्थाणुर्मुग्धेन वदति तर्जीवितेश:शिवाया। गच्छाटव्यामितिहतवचः पातुवश्चन्द्रमौलिः।१। अर्थ-एक समय त्रिपुरासुरमर्दन, सुरानन्दवर्द्धन,श्रीशि- वजी पार्वतीजीके भवनपधारे, और पटमंगलदेख किंवाड खट- खटाये। तब पार्वतीजीने कहा, कस्त्वं (तू कौनहै) शिवजीने कहा, (हे चन्द्रानने) मैं शूलीहूं (शूलीमहादेवका नामहै और शूल रोगका भी नामहै) तब पार्वतीजीने प्रसन्नरूपसे कहा कि, तुम रोगी हो तो औषधको ढूँढो। फिर शंकरने कहा मैं शूलरोगी नहीं हूं, किन्तु नीलकण्ठ (नीलकण्ठ शङ्करका ना- महै दूसरे पक्षमें मयूरका नामहै) हूं। तब पार्वतीजीने कहा कि, यदि आप नीलकण्ठहैं तो एकाधा मयूरका शब्द तो सुना- इये। फिर शंकरने कहा मैं मयूर नहीं हूं, किन्तु पशुपति (शं- कर दूसरे पक्ष शृंगधारी बलयुक्त पशुओंकाराजा) हूं। फिर पार्वतीजीने कहा, यदि आप पशुपतिहै तो सींग क्यों नहींहै। फिर शंकरने कहा, कि मैं स्थाणू (शंकर दूसरे पक्षमें वृक्ष )हूं। तब पार्वतीजीने कहा । वृक्ष तो बोलतेही नहीं फिर आप कैसे बोलते हैं । शंकरने कहा। मैं वृक्ष नहीं किन्तु शिवाका जीवन (शिवा, पार्वती और दूसरे पक्षमें शियाल)हूं? तब पार्वतीने
गोमाहात्म्यचन्द्रिका।
(६७)
कहा जो आप शिवाका जीवन (पति) हो तो बनमें जाकर
शब्द करो। इस प्रकार पार्वतीके बचनोंसे निरुत्तर हुये थके
सो? शिवजी, वह आपलोगोंकी रक्षाकरो।
॥ गौमाताजीकी स्तुती॥
गैयामाता तुमको सुमरों, कीर्ति सबसे बडी तु-
म्हारी, करोपालना तुम लरिकनमें, पुरुषन देउ
बैतरणि उतारी॥ तुह्मरे दूध दहीकी महिमा,
जानेदेव पितर सब कोय ॥को असतुमबिन दू-
सर जिहिके, गोबरलगे पवित्तर होय॥चारोंजु-
गमे तेरी पूजा, साखी गावे वेद पुराण ॥ तुमरे
नाते कहावे, श्रीगोपाल कृष्ण भगवान ॥४॥
प्रियपाठकवर्गो ! इसद्वितीयभागमें प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा
श्रीगोमाताजीका महात्म दरशाते हैं । अर्थात् गोमाताजीके
दूध दही गोमूत्र गोमय आदिपदार्थोंसेही कितने महारोगोंका
नाशहोता है, और गोमाताजीके ही पुत्रों द्वारा अन्न उत्पन्न
होताहै जिससे अपन इस साडेतीन हाथ देहका पालन करते हैं
यह बात आपखूब याद रक्खै कि जितनी मनुष्यकों सूर्य
चन्द्रमा अग्नि जल वायू आदि पदार्थों की आवश्यकताहै
उससेभी बढकर गोधनकी आवश्यकता है। देखिये।
॥ राग भैरवी॥
जाके दर्शतें पाप मिटतहैं, देवेजो पय अमृतधार ॥
जाके पिये बलबुद्धि बढतहैं,पीडा रोग नसावनहार॥१॥
(६८) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। देतीहै सुतजोबहुउपकारी, करतेहैंजोतुह्मराउपकार॥ हलमे चाले खेचत गाडी, अरु खेंचतहै बहुभार॥२॥ गहरी नदी वेतरणी जिससे, करती है यहपार ॥ फिर ऐसी गौमाताकीसेवा, करते क्योंन विचारा॥३॥ हे प्रियगोभक्तो! अधिक क्या कहैं । गोमाताजीही, और उसके सन्तानही अपने सुख और संपत्तिका फल रूपहै। दे- खिये। सूखा घासचर (खाके) के अमृतवत् दूध देतीहै, और इस माताजीके सन्तान अर्थात् बैलोंहीके द्वारा कृषी होकर अन्न मिलताहै। बडे २ शकट अर्थात् गाडाओंको बैंचते है कि, जिनको घोडे, हाथी, आदि पशूभी बैंचनेमें असमर्थ है, उनको बैल सुगमताकेसाथ एक स्थानसे दूसरे स्थानको किंवा एक ग्रामसे दूसरे ग्रामको ले जातेहैं। पहिले इस भारतवर्षमें जब रेल नहींथी, तब आपलोगोंके पुरुषा हजारोमन बोझा सहस्रों कोसोंतक बैलोंहीके द्वारा ले जानेको समर्थ होतेथे, और अबभी जिसप्रान्तमें रेल नहीं है, वहां श्रीगौमाताजीके सन्तानों द्वाराही आपलोगोंका काम च- लताहै। यदि कोई शङ्का करके प्रश्न करै कि-तुमने शास्त्री- य प्रमाण देकर जो गौका महात्म दरसायाहै, और गौमाता- जीको भारतके यावत्धर्मोंकी खानि जगतमाता स्वर्गकी नि- सरनी आर्योंकी विजयपताका आदि (उपमा संयुक्त शब्दों- द्वारा) गौमाताजीकी प्रशंसाकी, सो तो ठीकहै, परन्तु इस गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (६९) दुसरे भागमें गौओंके गुणोंका प्रत्यक्ष प्रमाण देनेका तुमने प्र- णकियाहै सो तो कुछ दीजियेगा। और यदि गौको “गौमा- ताजी" कहैं तो भैंसकोभी भैंसमाता कहैं जिस्में क्या हानी हैं? क्योंकि प्रथम तो भैंस गायसे बडी होती है, और उसका मू- ल्यभी गायसे दूना चौगुना लगताहै तथा दुग्धभी गायसे अ- धिकही देतीहै ? तो, उसका समाधान (उत्तर)इसप्रकारहै. कि आप भैंसको गायसे उत्तम समझते हो तो बगुलेको चंद्रमा समझने में क्या हानीहै, क्योंकि वह शूभ्रहै और आकाश बि- हारीहै,भैसके अधिक दुग्धदेनेसे गायके बराबर नहीं हो सक- ती जब कि अनेकगुण बताये और आगेको प्रत्यक्षमाणादिकसे बताये जावैगे तब मालुम होजावेगा कि मैंस माता होसकती है या नहीं। आप इस नीतिके बचनको जरापढकर समझिये, श्लो०-उभौ पक्षौशुक्लौ दिविभुवि तथा वारितगतिः सदा मीनान् भुङ्के वसति सकल स्थाणु- शिरसि ॥बके सर्वश्चान्द्रो गुणसमुदयः किं. चिदधिको गुणाः स्थाने मान्या न तु नरवर स्थानरहिताः॥१॥ अर्थात्-किसी कविका कथनहै कि चन्द्रमासेभी अधिक गुण बगुलेमें पायेजाते हैं। देखिये चन्द्रमा एक पक्षमें शुक्लहै और बगुलादोनोंही पक्षमें श्वेतहै । चन्द्रमाकीगति केवल आ- काशहीमें चलनेकी है किन्तुबगुला आकाश और पृथ्वीपर (७०) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। दोनोंजगें फिरनेकी शक्ति रखताहै। चन्द्रमा एक मासमें सवा दो दिनही मीनकों भोगताहै,किन्तुबगुला आजन्मपर्यन्त मी- नको भोगताहैं, चन्द्रमा केवल शंकरहीके ललाटपर विराज- ताहै किन्तुबगुला समस्त स्थाणु, (वृक्ष)पर्वत, आदिके मस्त- कोपर निवास करताहै। इसप्रकार बगुलेमें चन्द्रमासेभी अ- धिक गुणहुए, परन्तु गुणोंका मान्य उत्तम स्थानपरही होता- है न की नीचस्थानमें धारण कियेहुए गुण माननीय होते हैं। इसी प्रकार गाय और भैंसमें बहुत अन्तरहै इसका पाठकगण स्वयं अनुमान करलेवें। हे प्रियपाठकगणों ! हमें पूर्ण आशाहै कि आप इस ऊप- रके कहे श्लोकको पढकर स्वयं अनुमान करलेवें कि गौ भैंसमें पृथ्वी और आकाशका अन्तरहै । अब हम लेख बढने के भयसे भैसके अवगुणोंको न बताकर केवल गौमाताजीके गुणोंकोही प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा सिद्ध करते हैं, कि गोमाताको " माता" क्यों कहते हैं। आप एकाग्रतासे पढिये। माताका पुत्रकेसाथ क्या २ कर्तव्यहै सो बिचार पूर्वक दे- खनेसे यही प्रतीत होताहै कि पुत्रको प्रत्येक दशामें लालन पालन करनाही मुख्य कर्तव्यहै सो यह गुण गायके अतिरिक्त भैंसआदि किसी अन्यपशुमें नहीं पायेजातेहैं। क्योंकि गौमा- ताजी प्रत्येक दशामें बाल्यावस्थासे लेकर वृद्धापकाल पर्यन्त हमारी पालना मातृवत् करती हैं।
१ गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (७१) हे प्रियपाठको ! अब हम उन पदार्थोंको गुणोंसहित नीचे लिखते हैं। जिनसे गोमाताजी हमारी पालन करतीहै । यह विषय अभी थोडेही दिन पूर्व हिन्दीके सुप्रसिद्ध राजस्थान नामक अर्द्धसप्ताहिक समाचारपत्रमें प्रकाशितहो चुकेहै । गो दुग्धके गुण (१) सबसे प्रथम गौमाता हमको दुग्ध देती है जिसके श्रीमान धन्वन्तरीजी महाराज कहते है कि गोदुग्ध जीर्णज्वर, खांसी, शरीरका नित्य प्रति सूखते जाना; पेटमें गोला, व जलंधर आदि रोगोंका होना, अचेत होना, शरीरमें जलन होना, तृ- षा, की विशेषता, हृदयमें पीडा होना, शरीर पीतवर्ण होजा- ना, दस्तहोना, बवासीर, शूल, मलमूत्र,आदिके वेगोंके रोक- नेसे उत्पन्न हुए रोग और अतिसार, योनिसम्बन्धी विविध प्रकारकी पीडा, व खुजली, वरजकी बेगता, न्यूनता आदि, गर्भका न ठहरना, मुखनासिका, गुदा, से रक्त गिरना, विना परिश्रम क्रिये शरीरका थकित सा होजाना, इत्यादि उपरोक्त रोगोंको गोदुग्ध आरोग्य करता है, और, कायिक, बाचिक, मानसिक, पापकर्म गोदुग्ध सेवनसे नहीं होते। बलप्रद धातु- वर्द्धक, और कामोत्साहक है, रसायन तथा आयुवर्द्धकभी है। (१) यहांपे स्थानाभावसे गोदुग्ध, घृत, दधि, भादि पदार्थों का गुंण केवल भाषा वार्ति- कहींमें वर्णन कियाहै मूलश्लोक नहीं लिखेहै यदि आपको उपरोक्त पदार्थोके गुणोंका प्रमाण देखना होतो, चरक, शुश्रुत, वागभट्ट, भादि वैद्यक ग्रंथोंमें देखें एवं गोरक्षाचार्य श्रीमान् जगतनाराणजी रचित समग्र पुस्तकोंसे, किवा मेरे ज्येष्ठाता श्रीमान शिवप्रकाशजी पो- तदार कृत सुजन प्रकाशमें देखें।
(७२) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। नपुंसकता मिटाने और स्मरणशक्ती बढाने में तो यही एक अद्वितीय पदार्थ है। गोदुग्ध विद्यार्थी, योगी, लेखक, न्याया- धीश, गणितज्ञ, चित्रकार, विज्ञानशास्त्रपाठी, (साइराइट- रन्स)शिल्पविद्यानुरागी (इंजिनीयर) ऋषि, मुनि, इत्यादि जनोंकोभी लाभदायक है। इनके चित्त एकाग्र करने और म- स्तिष्क परिश्रम करनेमें बड़ा कामदेता है। प्राचीनकालमें गो- दुग्ध सेवनकरके हमारे ऋषि मुनि एक २ दो २ मासतक स- माधी लगाया करतेथे । परन्तु साम्प्रतकालमै गोदुग्धके गु- णोंको न जानकर आयौंके जैसी संतान होती है वह कुछ आ- पसे अविदित नहीं है. यदि आप प्राचीन और नवीन आर्य बालकोंके गुण तथा उसके शरीरसंबंधमें क्या अन्तर है इस बातको जानना चाहते हो तो भारत सुप्रसिद्ध गोरक्षोपदेशक श्रीमान पण्डित जगतनारायणजीद्वारा संपादित सचित्र ध- मामृतपत्र मुंबईसे प्रकाशित होताहै उसे मंगाकर देखें। मलाईके गुण । मलाई वातरोग नाशकरनेवाली, तृप्तकरनेवाली, बल- कारक, चिक्कण, मिष्ट, पाचनसमयमें मधुर, रक्तपित्त संबन्धी रोगोंको निवारणकरनेवाली, शरीरकी कांति बढानेवाली है। मक्खनके गुण। दूधसे उत्पन्नहुआ मक्खन उत्तम, चिक्कण,मधुर और अ- त्यन्त शीतल, देहको कोमल करता है, नेत्रोंको हितकारी, गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (७३) संग्रहणीके रोगको रोकता है, रक्तपित्तसम्बन्धी रोगोंको तथा नेत्रके सर्वरोगोंको नाशकर शरीरको प्रफुल्लित करताहै । दहीके गुण गौका दही चिक्कण, पाचनसमयमें मिष्ट अग्निको दीप्त क- रताहै, बलवईक, वातनाशक, और रुचिको बढानेवाला है। ।। दहीसे निकले मक्खनके गुण ।। गो दहीसे निकला मक्खन जिसे लूनी भी कहतेहैं, पच- नेमें हलकाहै, शरीरको सुन्दर (क्रांति) करताहै,मिष्ट,वकठ्ठा, और किञ्चित खट्टाभी है, शीतल, तथा बुद्धिवर्धक, जठरा- ग्निवईक हृदयको हितकारी, दस्तबेगको निवारक, और वात पित्तको नाश करताहै। बलवर्द्धक, दाहनाशक, खांसी, ऊभ- और शरीरमें फोडाहोजाना आदिरोगोंको नाश करताहै। ।। गव्य अर्थात् गौकी छाछके गुण ।। गव्यदहीसे बना जो तक्रहै, जिसको छाछ या मठ्ठाभी क- हते हैं यह त्रिदोष अर्थात् वात पित्त कफको शान्त करताहै। पथ्यमें श्रेष्ठ, अग्निवर्द्धक, रुचिवर्द्धक, तथा बुद्धिवर्द्धक, तथा जलंधर बवासिर आदि रोगोंको नाश करताहै। ॥ गोतके गुण ।। गौका घृत मिष्टहै, तिक्ष्ण नहीं शीतलहै, पागलपन, उदर पीडा, शरीरका उष्णहोना, पेट फूलना, आदि रोगोंकों, वात पित्तको शान्त करताहै। अग्निवर्द्धक, स्मरण शक्तिवर्धक, बु- द्विवईक, शरीरको कान्तियुक्त और सुन्दर करताहै। नेत्रोंको हितकारी व पापके जो रोगहै उसका हरण करता,तथा दरिद्र- (७४) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। ताका नाश करताहै (अर्थात् रोगजनित होनेसे मनुष्य निरु- धमी और दरिद्री होजाताहै सो घृत रोग नाशकहै)विष नाश- कहै, संग्रहणी आदि रोगोंको नाश करताहै । पाचनसमयमें मधुर कामोत्पादकहै। हे प्रियपाठकवर्गो ! गौका घृत भी एक अपूर्व पदार्थहै, कि जिसके गुण और लाभ लिखनेमें इसी सदृश पुस्तक बनसक्ती है। अहा हा हा हा कैसाही षटरस पदार्थ,व निपुणपाक कर्ता हो, परन्तु घृत पाकशालामें न होनेसे स्वादु रहित और तमो- गुणप्रद व्यंजन होंगे। सत्यहै "भोजनस्य घृतं सारं" भोजन- का सारांश घी है यदि गो दुग्ध,दधि,तसे अपूर्व (अमृत)प- दार्थ न होते तो आज हम सब उष्णदेशनिवासी(भारतवासी) मधुर रसीले अद्भुत अनोखे अतिस्वादिष्ट कोमल दिव्यभोज- नोंसे जो रक्तवईक, शक्तिवईक, बुद्धिवईक, कान्तिकारक, धातुपुष्टक, मनोत्साहक, कामोत्तेजक, और आरोग्यप्रद पदार्थों के लिये तरसते । अब गोमूत्र, गोमय, (गोबर) गौमय तैल, गोबर भस्म (राख) के गुण नीचे वरणन करतेहैं । ॥ गोमूत्रके गुण ॥ गोमूत्र कटु, तीक्ष्ण, उष्ण, और क्षार गुणयुक्त होनेसे वातका नाश करताहै। पचनेसे हलका, और जठराग्नीको प्र- दीप्त करताहै । बुद्धिवर्धक, पित्तकारक, कफ और वातका नाश करताहै। गोमूत्र कुछकाल सेवन करनेसे उदर संबन्धी गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (७५) सब रोग, और अंजन करनेसे नेत्रसंबन्धी रोगनाश करताहै। ॥ गोमयके गुण ॥ गोमय अर्थात् गोबर पाकशाला, यज्ञशाला, और गृहादि सम्पूर्णस्थान इसके लेपनेसे शुद्ध व चित्त हर्षक होते है। गो- मय औषधियोंके शोधनेमें और वर्ग (टांटिया) आदि अल्प- विषयी जन्तुओंका विष नाश करनेमें उत्तम काम देताहै । इ. न्धन (बलीता) की जगह भी भारतवर्ष उत्तम काम देताहै। दालबाटीका भोजन बनावें तो गोमयके इंधन (कण्डो) बिना बनानाही कठिनहै ।गोमयके उपलों (कण्डो) केभोजनसंबंधी पदार्थोंके नीचे जलानेसे व तपानेसे विषवत वायू नहीं होती, और भोजन भी गुणकारी होताहै। ऋषिगणोंको तो गोबर म- हौषधीके तुल्य है। कैसाही बिगडा बंजर क्षेत्र (खेत)क्यों न हो इसका खात पडतेही भूमि सुधरके उपजाऊ होजाताहै, कि जिसमें अन्न, कन्द, मूल, फलादि अधिकतासे होकर मनुष्यमात्रका पोषण होताहै। ॥गोमय तेलके गुण ॥ गोमयतेल याने गोबरकातैल। यह तैल यंत्रद्वारा निक- लताहै। दाद, खाज, और छंजन, जिव्हामें कैसेही पुराने कै- से भी हो, मर्दन करनेसे निर्मल होजातेहैं। ॥ गोमयकी भस्मके गुण ॥ गोमयकी भस्म (राख)क्षारजलकों भी मृदु करती है। दादके निवारणार्थ जो कुछ कालतक मर्दन करतारहे तो एक -- (७६) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। अपूर्व परीक्षित महौषधी है। कांसी, पीतल,ताम्र, आदि धातु- ओंके झूठे और मैले वर्तनोंपर मर्दन करनेसे शुद्ध और उ- ज्वल होजातेहैं। सीतपित्ती (पिस्ती)इसी राखके मालससे मिटतीहै. विस्फोटक बिगडके शरीरमें रस्सी पडजातीहै, तो इसी राषके लगानेसे घाव भरताहै. राजपूतानेमें इसको उक्तकाममें तथा गोवरकेसाथमें खातकी जगह अधिक काममें लाते हैं। धूम्रपान करनेवाले तथा हुक्का केप्रेमियोंका तो काम कंडेकी अग्निबिना चलनाही कठिनहै. दूसरा एक बडा भारी गुण यहहै कि जो शैव (शिवभक्त) हैं वे इसकी भस्म ललाटपटमें लपेटतेहैं, और वह श्रीमहादे- वजीके परमभक्त कहलाते हैं, तथा शंकर प्रसन्न होते हैं। हे प्रियवर्गों ! हम गौको माताजी क्यों कहतेहैं, इस विष- यका एक ऐसा प्रमाण देतेहैं, जिसको पढनेसे आप स्वयं स- मझजॉयगें कि गौको माताजी कहतेहैं इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हम आय॑सन्तान श्रीगौमाताजीका जितना आदर और दयाकी दृष्टिसे देखें उतनाही थोडाहै । जव एक पुत्रके पाल- न करनेसे माताको मनुष्य "माता" कहते हैं, तब अहा हा हा एक गौसे ४५ ४४० मनुष्योंका पालन होताहै उसे मा- ताकहें तो आश्चर्यही क्याहै ? यह हिसाव श्रीमत् "स्वामिद- यानन्दजी सरस्वतीने” लगायाहै, इसवास्ते हम उन्हें हा- , गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (७७) र्दिक धन्यवाद देतेहैं । यद्यपि उक्त स्वामिजीके और हमारे (सनातनधर्मावलम्बियोंके) सिद्धान्तोंमें रातदिनका अन्तरहै तथापि श्रीगौमाताजीके ऊपर तो ? उनकी और हमारी भक्ती समानरूप होनेसे निस्सन्देह वे स्तुतिके पात्र हैं। क्यों न हो, जब कि किसी मनुष्यद्वारा एक गौकाभी तनिक उपकार, वा सेवा, होजानेसे वह धन्यवादका पात्र होताहै, तो फिर उक्त स्वामिजीने अपने जीवन समयमें अनेक गौशालाएं स्थापित करी, सहस्रों गौओंका उपकार कराकर, गौरक्षाके अनेक ग्रन्थ लिख अपने सदुपदेशद्वारा कई धनाढ्योंसे लक्षों रुपैये चन्देमें लेकर गौभक्तोंके हृदयमें अपना शुभचरित्र चिरकाल के लिये स्थापितकर गौलोकवासी हुएहैं। अतएव हम गोभ- क्तस्वामीजीको जितना धन्यवाददें, और मुक्तकण्ठसे जितनी प्रशंसाकरैं वेहे थोडीहै, और साथही पं० दुर्गाप्रसादजी, तथा गोगुहार पुस्तकके रचयिताकोमी धन्यवाद देतेहैं कि जिनकी पुस्तकसे हमने ये हिसाब उद्धृत कियाहै । वह हिसाब इस प्रकारहै कि- यदि दो गौ, हो तो उनमेंसे एक कमसेकम दोसेर और दु- सरी अधिकसे अधिक २ ० सेर दूध देतीहै। तो एक गौके दू- धका पडता प्रतिदिन ११ सेर हुआ। तीसदिनके महीने में इस प्रकार उसका दूध ८॥ मनहोगा। यदि दो गौओंमें एक कमसे कम और दूसरीको अधिकसे अधिक १८मासतक दूध देती . (७८) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। है तो एक गौके दूध देनेका पडता वारामासमें नन्यानवे मन दूध हुवा । यदि यह दूध प्रतिसे एक छटांक चांवल और डेढ छटांक चीनी (शक्कर) के साथ ओटाया जाय तो वह क्षीर अधिकसे अधिक एक मनुष्यके भोजनके लिये दो सेर समझ लियाजाय तो बहुत अच्छीतरहसे १९८० जनोंको सन्तुष्ट करनेमें भरपूर होगा। फिर समझिये, कि यदि एक गौ कमसे- कम आठवार, और दूसरी अधिकसे अधिक १८ वार अपने जीवन समयमें बच्चा दे तो प्रति गौको १३वच्चेहुए, इस प्रकार एक गौ अपने जीवनमें २५७४० जनोंको भोजन देती है। १३ वचोमें मानलीजिये कि ६ वछिया और ७ बछडे हो, तो उनमेभी मानलो कि एक रोगसे मरजाताहै तो १२ मनुष्योंके लाभ और सहायताके लिये बचे इस रीति करके जब एक गौसे २५७ ४० जनोंके भोजनके लिये दूध होताहै तो छ व- चोसे जब वे गौहोगी तब एकलाख चोपनहजार चारसो१० जनोंके भोजनका दूध होगा.. फिर छै वच्चे बैल हुए और मान लियाजाय कि एक जोडी वैल इतनी धरतीको खोदताहै जि- समें २०० मन अन्न सालकी दोनों फसलोंमें उपजसके तो यह तीन जोडियां ६०० मन सालभरमें उत्पन्न करेंगे। यदि कमसेकम एक जोडा बैल आठवर्षतक भलीभांति काम करस- कताहै तो वह तीन जोडे अपने जीवनभरमें ४८०० मन अन्न उत्पन्न करसकतेहैं । जव एकमनुष्य तीन पाव अन्नसे सन्तुष्ट -----
गोमाहात्म्यचन्द्रिका।
(७९)
होसकताहै, तो ४८०० मन अन्नमें दो लाख ५६ हजार म-
नुष्य एकवारमें भलीभांति भोजन करलेवेंगे। दूध और अन्नसे
इसप्रकार सब मिलकर ४ लाख १० हजार ४ सो ४ ० ज-
नोंका पेटभर सकता है। इस रीति यदि इनकी संतानके ला-
भका लेखा फैलाया जाय तो अगणित प्राणियोंका भोजन
एक गौद्वारा होसकताहै।
श्रीमद्वाल्मीकी रामायण अयोध्याकाण्ड
अन्यदाकिल धर्मज्ञा, सुरभिः सुरसंमता ॥
वहमानौ ददर्शोव्या, पुत्रौ विगतचेतसौ ॥१॥
तावर्द्धदिवसं श्रान्तौ, दृष्ट्वा पुत्रौ महीतले ॥
सरोद पुत्रशोकेन, बाष्पपर्याकुलक्षणम् ॥२॥
अधस्ताद्रजतस्तस्याः सुरराज्ञो महात्मनः ॥
बिन्दवः पतिता गात्रे सूक्ष्मा सुरभिगंधिनः॥३॥
निरीक्षमाणस्तांशको ददर्श सुरभि स्थिताम् ॥
आकाशे विष्ठितां दीनां रुदतीभृशदुःखितां॥४॥
तां दृष्ट्वा शोकसंतप्तां वज्रपाणिर्यशस्विनी ॥
इन्द्रः प्रांजलिरुद्विग्नः सुरराजोब्रवीद्वचः॥५॥
भयं कचिन्न चास्मासु कुतश्चिद्विद्यते महत् ॥
कुतोनिमित्तःशोकस्ते ब्रूहि सर्व हितैषिणि ॥६॥
एवमुक्ता तु सुरभिः सुरराजेन धीमता ॥
प्रत्युवाच ततोधीरा वाक्यं वाक्यविशारदा॥७॥
(८०) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। श्रुतं पापं न वः किंचित्कुतश्चिदमराधिप । अहं तु भनौ शोचामि स्वपुत्रौ विषमे स्थितौ॥८॥ एतौ दृष्ट्वा कृशौ दीनौ सूर्यरश्मिप्रतापितौ॥ बध्यमानौ बलीवौं कर्षकेण दुरात्मना ॥९॥ ममकायात्प्रसूतौ हि दुःखितौ भारपीडितौ ॥ यौ दृष्ट्वा परितप्येहं नास्ति पुत्रसमः प्रियः॥१०॥ यस्याः पुत्रसहस्रेस्तु कृत्स्नं व्याप्तमिदं जगत् ॥ तां दृष्ट्वा रुदतींशकोन सुतान्मन्यते परम् ॥११॥ इन्द्रोह्यश्रुनिपातं तं स्वगात्रे पुण्यगंधिनं ॥ सुरमिं मन्यते दृष्ट्वा भूयसी तामिहेश्वरः॥१२॥ समा प्रतिमवृत्ताया, लोकधारणकाम्यया ॥ श्रीमत्या गुणमुख्यायाः स्वभावपरिचेष्टया॥१३॥ यस्याः पुत्रसहस्राणि सापि शोचति कामधुक् ॥ किंपुना विनारामं कौसल्या वर्तयिष्यति॥१४॥ भाषार्थ-किसीसमय देवताओंकी पूज्यमाता धर्मात्मा कामधेनूने अपने दोपुत्र (बैलोंको) हलमें जुतेहुए, धूपके मारे व्याकुलहुए, अचेत अवस्थामें देखा। जिनको जुते, पूरा दोप्र- हर होगयाथा, और थकभी गयेथे, परन्तु कर्षकने तबतकभी उनको नहीं छोडाथा । कामधेनूको यह देख कर बडा शोक हुवा, और वह आंसू डाल डाल कर रुदन करनेलगी। उसी- समय महानुभाव देवराज (इन्द्रराज) जहां कामधेनू खडीथी गौमाहात्म्यचन्द्रिका। (८१) उसके नीचे होकरके मार्गसे जा रहेथे। जानेके समय उनके शरीरपर वह आंसू गिरे जिनमें कामधेनुकीसी गन्ध आती थी। आंसू अपने ऊपर पडतेही देवराजइन्द्रने ऊपरको नजर उठाई, तब देखा कि शुरभी आकाश (ऊंचे) में खडी रहकर दुःखके मारे व्याकुल हृदयसे रो रही है। वज्रपाणी देवराज- (इन्द्रने) यशस्विनी कामधेनुको इसप्रकार शोकसे सन्तप्त देखकर उदास हो, हाथ जोड बोले । हे सर्वलोकोंके हितकरनेवाली कामधेनुमाताकहो किसलिये रुदनकररही हो सो कहो? हम लोकोपर तो किसी ओरसे कोई विपता नहींआईहै । बुद्धिमान देवराज वज्रपाणी (इन्द्रजी) ने जब इसप्रकार कहा; तब वाक्यविशारदा (बोलनेमें चतुर) श्रीकामधेनुने धीरजधर उत्तरदिया। हे देवराज आजकल रा- क्षसादिकोंका तो कोई खटका नहींहै,इनका पापतो कटगया, पर हम दुःखमें पड रहेहैं और अपने पुत्रोंका शोच कर रहीहूं, देखो यह दोनों बैल अतिदुर्बल होरहेहैं, तिसपरभी सूर्यकी किरणोंसे सन्तप्त होरहेहैं। दोपहर होगया पर तोभी उस दुष्ट किसानने अभीतक इनको नहीं छोड़ा और मारभी रहाहै। वे हमारी देहसे उत्पन्नहुएहैं, इसीकारण उनको दुखित और ह- लमें जुतनेके भारसे पीडित देखकर मारे शोकके नेत्रोंमेसें जल गिरताहै। देखो संसारमें पुत्रोंकेसमान कोई प्यारा नहीं है इसीप्रकारसे जब कि कामधेनुके हजारों लाखों पुत्र पृथिवीपर -ordA (८२) गौमाहात्म्यचन्द्रिका। हैं और वह उनकेलिये रो रहीहै तव यह देख इन्द्रने जाना कि यथार्थमें पुत्रकेसमान दूसरी कोई चीज प्यारी नहींहै। उनके शरीरपर कामधेनुके जो आंसू गिरेथे उनमेसे अतिउत्तम सु- गन्धि निकलती हुई देखके इन्द्रजीने जानलिया कि का- मधेनु संसारमें सबसे श्रेष्ठहै । यद्यपि सुरभीके असंख्य पुत्रहै तथापि लोकके धारणाकी कामनासे व सरल स्वभाव पुत्रव- त्सलतासे, इतनासोच किया, फिर असंख्यात पुत्र होनेपरभी सुरभीको अपने पुत्रोंको दुखित देख इतना सोच हुवा तव इ- कलौते पुत्रकी माता कौशल्याजी रामजीके बिना किस प्रकार जीवन धारण करेगी। हे प्रिय पाठकवर्गो ! यह श्रीमहाल्मीकि रामायणान्तर- गत इतिहासहै और उभय भाग(दोनोंभाग)का पूर्ण समर्थक है। प्रथम भागमें श्रीगौमाताजीकी सेवा, किंवा उन्हें तृणजल द्वारा संतुष्ट रखनेके विषयमें है। इसका प्रमाणभी इसी इ. तिहासमें हैं । अर्थात् जब कामधेनुने अपने पुत्र बैलोंको दु- खित देख व्याकुल हृदय होइतना शोक किया तो जब आप कामधेनुकी संतान अर्थात् गाय बैलोंकी तृण जल द्वारा सेवा करोगे तो क्या अभीष्ट फल नहीं देगी, नहीं? नहीं? अवश्य- मेव देवेगी। क्योंके ईश्वरने इस माताजीका नाम कामधेनु (मनोकामना पूर्ण करनेवाली ) रक्खाहै तो फिर क्या यह अपने नामको चरितार्थ नहीं करेगी। दूसरा प्रस्तुत भागमें गोमाहात्म्यचन्द्रिका। (८३) प्रत्यक्ष प्रमाण देनेका प्रणहै, सोभी इसी इतिहासमें स्पष्टतासे विदित होताहै, अर्थात् यह बात सर्व साधारणतक जानते हैं कि केवल इस माताजीके पुत्रोंही (बैलोंही) के द्वारा अन्न पैदा होताहै, और उसी अन्नसे अपन,अपने साढेतीन हाथम- नुष्य शरीरका भरण पोषण करतेहैं। यदि आज पृथ्विपर गौ- माताजीके पुत्र (बैल) नहीं होते तो, अपनेकोभी यूरोप आदि अन्यप्रान्तोकी तरह हाथी, घोडे, आदिकोंसे खेतीकर घोर परिश्रम उठानेके अतिरिक्त सैंकडों रुपैये स्वाहा करने पडते। उपसंहारमें श्रीयुत गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीके कथना- नुसार “बहुरि बन्दि खलगण सतिभाये, जे बिनुकाज दाहिने बांये" खल अथवा उन दुष्ट लोगोंकी बन्दना करताहूं जो दू- सरेकी निन्दा एवं अपकार करनेमेही अपना गौरव समझतेहैं, और इसी कार्यमें धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष आदि चार पदार्थों की प्राप्ति मानतेहैं। जैसे चौपाई पर अकाज लगितनु परिहरही, जिमि हिमउपल कृषी दलगिरहीं। बचन बज्रसम (तेहिं)सदा पियारा, सहस नयनपर दोष निहारा' तदनुसार वे मेरे परि- श्रमकी तरफ किंवा गौमाताजीके महात्मपर दृष्टि न देकर के- वल छिद्रान्वेषणकर निन्दा करेंगे इस भयसे बारंबार प्रणाम कर प्रार्थना करताहूं। - (८४) गोमाहात्म्यचन्द्रिका। सोरठा- जयजय श्रीशिवनन्द विघ्न विदारक सुखकरण कीजे सर्व अनन्द द्वितिय भाग पूरणभयउ॥१॥ सारदको सिर नाय, बार बार बन्दन करों। लिखी अनुग्रह पाय मतिअनुसारहि चन्द्रिका॥२ सबविधि सुखदे ईश, गौमाताके भक्तको॥ दे अशीश जगदीश, यहलघु ग्रन्थ प्रचारहो॥३॥ गो द्विज सेवकजान, वैश्य बंश शिव भक्तहैं। नामपुनीतहि मान, श्रीहरसामलहै सदा॥४॥ नाराण ममनाम, तिनको लघु प्रिय पुत्रमैं। रत्नललामहिधाम, गोभक्तनको दास यह ॥५॥ निजमतिके अनुसार लिख्यो ग्रन्थ गोभक्तहित॥ महिमाअमितअपारगोहित गोजन लिखसकेद विक्रम संवतजान, उन्नीसो अठवन्नको ॥ ग्रन्थपूर्ण भो मान, पौषकृष्ण गुरु दूजको॥७॥ है समाप्तम्। 03 .. श्रीयुतशेठ हरसायमलजी पोतदारात्मज 40++ नारायण पोतदार (रतलाम.)
मान्यवर विद्यारसिकगणों ! जरा एक बेर इसे भी तो पढ़ लीजिये कि किस प्रकार. धर्मार्थ काम मोक्ष साधनके अमूल्य रत्न थोडे मूल्यमे जारहेहै. "साम वेदीय नित्यकर्म दर्पण 7-जिसमें प्रातःस्मरण शौच, दन्तधावन, नान विधि, स्नानांगतर्पण, भस्म धारण, त्रिकालसंध्या, तर्पण, देवपूजन, बलिवैश्वदेव, भोजनविधि, आदि कई उपयोगी बातें हैं मूल्य केवल ३ आने मात्र डा० व्य० माफ. "संवत्सर फल दीपिका" यह ज्योतिष संबंधी ग्रन्थ समग्र व्या- पारियों के अधिक लाभका है इसमें ग्रह योगायोग, वृष्ठि विचार ग्रह वक्र, उदय, अस्त,वार, संक्रान्ति, धनुष, तारा,नक्षत्र आदि सब बातें सरल कवितामें लिखीगई है इससे पाठक कितना लाभ उठा सकते हैं. यह पढनेहीसे मालूम होगा मूल्य ४ आना मात्र डा० व्य० माफ. "रोटी पंचक इसके गुण नामहीसे झलक रहेहैं. मूल्य १ आना डा० व्य० सहित. मृत्यु सभा प्रहसन " जिसमें सब नशोंकी हानि इस ढंगसे ब- ताई गई हैं कि यदि पढनेपर चित्त प्रसन्न न हो और शिक्षा न मिले तो दाम वापस मूल्य २॥ आना मात्र. "वर्ण प्रदीपिका” यदि छोटे २ बालकोंको वर्णज्ञान भलिभांति करना हो तो इसे जरूर पढावे. मूल्य २॥ आना डा० व्य० सहित. बाल बोध व्याकरण व्याकरण विषय गहन होनेके कारण हम झूठी बडाई हांकना नहीं चाहते हैं, केवल इतनाही कहते हैं कि एक बेर ध्यान पूर्वक पढनेसे मालूम होगा कितना श्रम करके सार निकालाहै । कई मान्यवरोने तो की हमने इसे उत्तम जान अपनी २ “ (२) पाठशालाओंमें इसको रक्खाहै, तथा प्रसिद्ध २ पत्रसंपादकोनेभी प्रशंसा की है मूल्य केवल २॥ आना. डा० व्य० सहित. "कलि प्रपंच पचीसी 7 इसमें कलियुगकी लीला कवितामें खूब झलकाई है. मूल्य १॥ आना. "प्रेमलतिका जरा एक बेर पढ तो लिजिये देखें आपके हृद- यमें प्रेमकी लता उत्पन्न होकर गोदिज हितकारी, वृन्दावनविहारि श्रीराधेश्यामके पदपङ्कज परागमे लोटपोट होकर भक्तिज्ञान वैराग्यके द्वारा शान्तिलाभपाते हैं या नहीं ? यह ग्रंथ संस्कृत श्लोकबद्ध और भाषानुवाद सहितहै मूल्य ३ आना. "बालोहाहमीमांसा" इसमे क्या होगा सो लिखनेकी अवश्य- कताहीनही क्योंकि बचपनोंमे विवाह करनेसे अनेक हानियां होती है यह सब जानते हैं पर किन २ कारणोंसे वे इससे उत्तम जानते हैं उ- सका समाधान तथा किस २ अवस्थामें क्या २ काम करना उचितहे तथा नहीं करनेसे धर्म लोप होकर संसारिक पारमार्थिक कौन २ हा- नियां होती हैं आदि अनेक बातोंका मानो फोटो खींचा है मूल सं- स्कृत और भाषानुवाद सहितहै मूल्य ४ आना मात्र. इसके अतिरिक्त अनेक छोटी २ पुस्तके तयार होरही है और भी कई पुस्तके मुंबईके प्रसिद्ध प्रेसोंकी हिन्दी संस्कृत अनेक पुस्तकों तथा श्रीधर शिवलालजीका असल चंडूपंचांगभी हमारे पास मिलतेहै जबाबी पन आनेसे उत्तर दिया जायगा। आपका कृपाकांक्षी, कवि हेतुरामात्मज मदनराज शर्मा. सेन्ट्रल कालेज हिन्दी टीचर (रतलाम.) n AA --- श्रीराधामाधव. महाशय पाठकगणों, आपकी सेवामें मैंभी एक (यह) बिनयपत्रिका सोमाशाहै कि आपका अमूल्य समय व्यतीत करनेका बिचार न करके इसको पर बरतमान समयमें शेखावाटी भगवानकी पूर्ण कृपा पाई जाती है क्योंकि यहां महाशयोंमे भाग्यवान अधिक पाये जातेहैं ब्यापारमें बड़ी हिम्मत रखते हैं. मुंबई, भासाम तक दिशावरोंमे जा जा के इन महाशयोंने भारी मारी धंदा रोजगार कमर बांधी है. और पुन्य, धर्म, भगवतका स्मरण गोब्राह्मणकी सेवामें रुचि रखते कठिन कलिकालमें भी स्वधर्मका पालन करते है अतः इन्होंको मैं धन्यवाद देता इसी शेखावाटीमें बिसाहु नामके शहरमें श्रीमान शेठ जोरावरमलजी- लजी चडे प्रतापी हुये. इनकी संपूर्ण सुकीर्ति लिखनेसे एक पुस्तक बनसक्ती है भावसे नही लिखके इतनाही कहता हूं कि सहस्रों भूदेवोंने लक्खों रुपैये इनके है. धर्मशालायें मंदिर सदावर्त वगैरह उत्तम उत्तम कार्य किये है इन्होंके पुन्य इनके घराना (कुल) में जो उत्पन्न होते है सो भी धर्मात्माही होके अपने बड़े रीतिमें चलते है उदाहर्ण लीजिये कि इन गोमहात्मचंद्रिकाके रचियता श्रीयुत श्रीमान शेठ हरसहायमलजीके पुत्रहै सो इन्होंका कैसा कोमल हृदय और स्वा सो यह पुस्तकही आप महाशयोंको कहेगी तो मेरे कहनेकी कोई अवश्यकता नह हाशयने अपना अमूल्य समय ब्यय करके लोकोपकारार्थ यह पुस्तक बनाई हित पुस्तक मेरेपास भेजके छपवाई और पुस्तकका संपूर्ण अधिकार देदिया कि भाप कहेगे कि इसमें परोपकार क्याहै ? सो यहहै कि अपने स्वदेश बंधु कियेहै कि यह गउ क्या पदार्थहै. इस माताका स्वरूप ज्ञानमान बुद्धिमान पुरुष स्वार्थी मनुष्योंको नहीं है. च्यार आनाका घास पानी देके छे भानाका दूधकी) हैं और जहांतक बच्चे जनती हैं तहांतक घासपानी देते है फिर वृद्धापकाल सहाल छोडके भूखे मारतेहै मैने नेत्रोंसे देखाहै कि वृद्ध गायें उठने बैठने.. जंगलमें पैर पछाडा करती है. जिसके नेत्र कौवे कुचर डालते है जंबुर्क र्ग काट काटके घोर दुर्दशाके साथ नोंच नोंचके मारते है कोई दयावान मनुष्य निकले तो नेत्रमे जल भरके बाडके कांटोंसें उसका सरीर ढकताहै परंतु पीठके फिरातेही फिर उन कांटोंको दुष्ट जानवर हटाके उसका प्राण लेते हैं। प्योंको बिचारना चाहिये कि, इसमें घोर अधर्महै. देखिये दयावान हमारी र गवर्नमेंटने भी अबोल प्राणियों के लिये दया देखके कैसे कायदे निकालेहै व तथा लंगडे या घाववालेको गाडीमें नहीं जोडने देते है. कायदेसे विरुद्ध जो लादतेहै उसे दंड मिलताहै । और बैल तथा घोडेको निर्दयतासे मारताहै देते है निर्दई लोग फूंका देके दूध दुहतेहैं जिन्होंसे अनेकबार दंड लियाहै कारको धन्यवाद देव जहांतक थोडाहै. परंतु हमारे देसमें इन बातोंका बिल है. कहावतही ऐसी कठोर कहतेहै कि जिस्को लिखनेमें रोमांच होताहै सो। .
माता, - . ने वहलको कुल्हाडेसे नाथै ) कहनेवारोंका तात्पर्य यहहै कि अपनी वस्तुको अपने i भावे सो करै. परंतु कहनेवालोंकी भारी भूलहै. अपनी वस्तु तो पिता, स्त्री, सबही है तो उनके साथ न होनेवाला कार्य कब कर सकोगे अपनीही स्त्रीको आप वोगे तो न दे सकोगे क्योंकि अपने मस्तकपर न्याय परायण गवर्नमेंटहै. तो इन अ- गणियोंका दुख अपने २ धनियो ( मालको) को समझना चाहिये इनकी दयाके रख- होगा, यश होगा. इस गौ जैसे अमुल्य पदार्थको ममजना चाहिये कि अपने बडे २ नि शास्त्रों में क्या कहाहै जो मनुष्य हमारे शास्त्रोंको नहि मानतेहै तो उन महाश- गका ग्रहण करना तो अवश्य चाहिये मेरे ग्राममें १ मनुष्यको उदर विकार होके ग्दर इतना वढा कि पानीकी भगहुई मसकसमान होके असक्त होगया. बैद्य और ने अनेक यत्न किया परंतु अच्छा न हुआ वह ? घरमें गरीवथा मो पामके पैसे होगया घरकेभी दुखी होके उसकी सह्माल छोडी तो, उसने गोमूत्रमें अजवान ग सुरू किया तो दिनभर दिन आराम होके नैरोग्य हुआ जिसके मूत्र में इस प्र- गहै और गोवरभी काममें आताहै अर्थात् भ्रष्टसे भ्रष्ट वस्तु समाग्मे मर मूत्रको तो? वोमी जिसके उत्तमसे उत्तमहै तो ओर दृष्टांत आप लोगों देना बाकीही क्याहै त्मिा, वुद्धिवान पुरुषोंको तो कहनाही क्याहै वो तो स्वयं इम गोमाताका प्रभा- है परंतु न जाननेवालोंको यह पुस्तक उत्तम प्रकारकी शिक्षा देनेवाली है प्राचीन कवेश्वर महाशयने श्रीयत अकबर बादशाहके हुजूग्में एक कचित्त* कहा था सो के हृदयमें दया प्रवेश होगई तो, श्रीयुत शेठ नागयणजीने तो यह अनेक श्लोक की पुस्तकही बनाके अप लोगोंके सेवाम अर्पण की है तो क्या आप लोगारे, उत्पन्न क्यों न होगा अवश्यही होगी यह गौ? धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों नाहै अब इस भमिका को समाप्त करके पाठक महाशयोंसे विनय करताहूं कि क या अनुनित शब्दहो उसकी क्षमा मेरी लघुगुद्धि समजके करै. रिह दंत तृण धरें, ताहि नहिं मारत कोई । हम प्रतिदिन तृण रै, बचन उच्चरे दीन होई ॥ अमृत पय नित स्त्रवहि, बत्स नहि धर्म जिआवहि । हिंदुहि मधुरनदहि, कटुक तुरकहि न पिआवहि ।। कह नरहरि सुनु शाहवर, बिनवत गौ जोरे करन । केहि गुनाह हि मारहीं, मुये चाम सेवत चरन । हमें तिनका (तृण) लेलेवे तो उसको नहीं मारते सो हमतो रातदिन तृण मुंहसे न बोलतीहै, हमारे स्तनोंमें अमृतरूपी दूध बहताहै, हमारे बच्चे आप लोगांकी है गतदिन आपको सवारी देतेहै खंदेपे वजन ढोतेहै खेतीमें इन्हीके श्रमसे ल- नेपजताहै. हम हिंदुओंको दूध मीठा देके ? मुसलमानोंको कडवा नहीं देतीहै ? हरिजी गायकी तरफसे वकील होके शाहसे अरज करते है कि हे शाह गौ आपसे जी कररहीहै कि हमको किस गुनाहसे मारतेहै. हमारे मरजाने बादभी हमारी की सेवाकरतीहै अर्थात अनेक वस्तुएं चर्मकी होतीहै. पाठकोंका शुभचिंतक, पं० किसनलाल.
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