Sanmati Library, Jaipur
Neeti Shrngar Vairagy Shtkatrym Bhasha Teeka Sahit
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श्रीभर्तृहरि विरचितं नीति शृङ्गार वैराग्य **शतकत्रयम् * भाषा टीका सहित । [जिसमें प्रत्येक शतक के अन्त में इसो कवि के बनायो रेशिमालित श्लोक श्री SHRI Ace.No. टीकाकार पं० रामचन्द्र पाठक/बी. नगर. असोको गयपुर. सुमति पुस्तक पं० रामेश्वरदत्त पाण्डेयन सम्धिन कि प्रकाशक- RTHAmar.ANTr.. भार्गव पुस्तकालये, गायघाट बनारस सिटी।
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भूमिका । इस समय नीनिके जितने अन्य प्रचलित और विख्यात हैं उनमें भर्तृहरिशतक कातीनोशतक इतना ऊँचा पद प्राप्त किया है कि विद्वानों का नयनाजन होता हुआ सर्वसाधारण के लिये भी कराठ हार हो गया है। इस अन्य भी जितनी टीकार्य सुग- मता के लिये वीं परन्तु उनसे केवल संस्कृत जानने वाले परिडतों का ही उपकार हुधा है। ऐसे अनूठे और उत्तम ग्रन्थ का प्रवार सर्वसाधरण में न हो सका इस अशुविधा को हटाने के लिये, प्रकाशक को इच्छानुसार सर्व साधारण के उपयोग के निमित्त यह टीका बनाई गई है। इसमें भाषानुवाद इन्वय के अनुसार ऐसी सरल भाषा में की गई है कि बिना प्रयन के सद लोग इसको समझ सकें। अर्थ को स्पष्ट करने के लिये शब्द और वाक्य ब्रकेट में दिये गये हैं और जहां तहां कठिन श्लोको का भावार्थ भी दिया गया है, इली पुस्तक को साहित्य व्याक- रण शास्त्री पं० रामेश्वर जी ने सुधारकर संशोधन किया है, यदि इस अन्य से लोगों का कुछ उपकार होगा तो मैं अपने को कृत रुत्य समझेगा। विनीत प्रकाशन- वावू काशीमसाद भार्गव, विषयानुक्रमणिका नीतिशतकम् । ४५ विषया: पृष्ठाका विषया पृष्ठाकाः मंगला चरणम् १. शिशिरः ४ विषय प्रशंसा अज्ञनिन्दा १ विद्वत्प्रशला दुर्विरक्त वर्णनन् ६ स्त्री परित्यागप्रशंसा ६२ मानशौर्यप्रशंसा १५ यौवन प्रशंसा द्रव्यप्रशंसा कामिनी गर्हण ६५. दुर्जननिन्दा २५ सुविरक प्रशंसा १.४ सुजनप्रशंसा २६ | परिशिष्टश्लोकाः १.६ परोपकार पद्धतिः ३४ इतिश्रृंगारशतकम् धेर्यप्रशंसा वैराग्यशतकम् मंगलाचरणम् देवप्रशंसा ४३ तपणादूषणम् कर्मप्रशंसा तृष्णाधिकारः प्रत्यन्तरश्लोकाः ५० अथविषयाधिकार १२१ विविधविषयकश्लोक ६० रूपतिरस्कारः १२२ इतिनीति शतकम् निस्पृहाधिकार १२३ अथङ्गारशतकम् दुर्भगसेवकवाक्य १२५ मंगलाचरणम् ११ साहंकारपुरुषः १२६ स्त्री प्रशला ६१ ' निममता स्वरूपं भोगादिलक्षणम् ७१ भोगपतिः वसन्तवर्णनम् ७४ निर्वेदयतास्वरूर १३५ ग्रीष्म वर्णनम् ७ विरक्तस्तुतिः (३७ वर्षा ऋतुवर्णनम् ७६ विषय परित्यागः १४६ सन्ताः १५० । हेमन्त वर्णनम् ३ विविधविषयकश्लोकाः १७२ इति वैराग्य शतकम् । शरद् दर्शनम् श्रीगणेशाय नमः भर्तृहरिशतकत्रयम् । अथ नीतिशतकम् | acc.ie सोरठी नगर PAN मंगलाचरणम् । दिकालाधनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये । स्वानुभूत्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे ॥१॥ उस अनन्त चैतन्य मूर्ति, शान्त और तेजस्वरूप पर- मेश्वरको नमस्कार है जो सव दिशा और कालमें व्याप्त है और जो केवल स्वानुभवसे ही जाना जा सकता है ॥ १॥ अथ अज्ञनिन्दा। यांचिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता साप्य न्यमिच्छति जनं स.जनोऽन्यसक्तः। अस्मत्कृते F- २ ... m भर्तृहरिविरचितं- त्र परिशुष्यति काचिदन्याधिक्तां च तं चमदनं च इमां च मां च ॥ २ ॥ वह प्रियतमा जिसकी मैं निरन्तर चिन्ता करता है मुझसे विरक्तहोकर अन्य पुरुष की इच्छा करती है । वह अन्य पुरुप किसी दूसरी स्त्री परासक्त है और वह अन्यत्री मेरे लिये प्राण दे रही है, अतएव (मेरी) प्रिया को (जो अन्य पुरुष से प्रीति रखती है ) धिक्कार है, इस (अन्य) स्त्री को (जो) मुझ पर आसक्त है ) धिक्कार है. मुझको धिक्कार है और उस कामदेव को (जिप्तकी यह सब प्रेरणा है) धिक्कार है ॥२॥ अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि च तं नरं नरञ्जयति॥३!! मूर्ख सहजमें सन्तुष्ट किया जा सकता है और पंडित- तो और भी सहजमें साधनीय है परन्तु अल्पजको ब्रह्मा भी सन्तुष्ट नहीं कर सकत॥३॥ प्रसह्य मणिमुद्धरेन्मकरवक्त्रदंष्ट्रांकुरात् समुद्र मपि संतरेत्प्रचलदुर्मिमालाकुलम् । भुजङ्गमपि कोपितं शिरसि पुष्पवद्धारयेत् न तु प्रतिनि विष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥ ४॥ यह संभव है कि मनुष्य वल द्वारा मगरके डाहों के .... . . नीतिशतकम्। वीच से मणिको निकाल ले, यह.भी.संभव है कि मनुष्य प्रचण्ड लहरवाले भरे समुद्रको तैर कर पार कर ले, अथवा कोपसे भरे सर्पको शिरपर पुष्पके समान धारण कर ले, पर यह कदापि संभव नहीं कि कोई मूर्खका चित्त; जो किसी 'वस्तुपर जम गया है. उसे हटा सके. ॥४॥ लभेत सिकतासु.तैलमपि यत्नतः पीड़यन पिवेच्च मृगतृष्णिाकासु सलिलं पिपासादितः ॥ कदाचिदपि पर्यटञ्छशविषाणमासादयेत् न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत् ॥ ५॥ । यनसे बालू पेरकर तेल निकालना संभव है, प्यासा कदाचित् मृगतृष्णासे अपनी प्यास बुझाले, हूँढने से कंदा- चित् खरगोंशकी सींघ भी मिल सके परन्तु मूर्ख का चित्त जिसवस्तुकी ओर झुका है उससे हटाना कदापि संभव नहीं ' व्यालं बालमृणालतन्तुभिरसौ रोद्ध समु जम्भते छेत्तु वज्रमणीछिरीषकुसुमप्रान्तेनसन्न ह्यते । माधुर्यं मधुविन्दुना रचयितु क्षाराम्बुधेरी हते नेतु वाञ्छति यः खलान्पथि सतां सूक्तः सुधास्य दिभिः ।। ६ ॥ वह पुरुष कोमल कमलकी डंडी के तन्तु से हाथी को .
मत हरिविरचितं- बाँधना चाहता है, हीरेको सिरिसके फूलकी पाँखड़ीसे वेधनो पाहता है और मधुके एक बूंदसे खारे समुद्रको मीठा किया चाहता है जो दुप्टोको अपने अमृत तुल्य वचनोंसे सन्मार्ग में ले जानेकी इच्छा करता है ।। ६ ।। स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा. विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः । विशेषतः सर्वविदां समाजे, विभूषणं मौनमपण्डितानाम् ॥७॥ विधाताने मौन (अर्थात् चुप रहने ) को जो पुरुषोंके स्वाधीन किया है और जिसमें अनेक गुण हैं उसे अज्ञा-- नताका ढकना बनाया है और विशेषकर पण्डितोंकी सभा में मौन ही भूषण है ॥ ७ ॥ यदाकिञ्चिज्ज्ञोऽहं द्विपइव मदान्धसमभवम् तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः । यदा किञ्चित्किञ्चिबुध जनसकाशादवगंतम् तदा मूर्योऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः ॥ ८ ॥ जक मुझे थोड़ा सा ज्ञान :या तव में हाथीकी नाई मदान्ध था और मेरे चित्तमें यह गर्व था कि मैं सर्वज्ञ हूँ पर न्तु जब विद्वानोंकी संगतिसे मुझे कुछ कुछ ज्ञान प्राप्त हुआ तब मेरा मद ज्वरके समान उतर गया और मुझको ज्ञात हुआ कि मैं मूर्ख हूँ ।। :
नीतिशतकम्।
मा कृमिकुलचितं लालाक्लिन्न विगन्धि जुगु
प्सितम् निरुपमरसं प्रीत्या खादन्नरास्थि निरा
मिषम् । सुरपतिमपि श्वा पार्श्वस्थं विलोक्य न
शङ्कते नहि गणयति क्षुद्रो जन्तुः परिग्रहफल्गु
ताम् ॥ ६॥
जब कीड़ोंसे व्याप्त, लारसे भींगे, दुर्गन्ध, निन्दित
निरस और मांस रहित मनुष्यकी हड्डीको निर्लज्ज . कुत्ता
ममसे चबाता है और अपने पास इन्द्रको भी खड़े देखकर
शंका नहीं करता (तो तात्पर्य यह हुआ कि ) नीच पुरुष
जिस पदार्थको ग्रहण कर लेता है उसकी निःसारतापर ध्यान
नहीं देता ॥ 8 ॥
-शिरः शार्वं स्वर्गात्पशुपति शिरस्तः क्षिति
धरम् महीध्रादुत्तुङ्गादवनिमवनेश्चापि जलधिम् ।
अधोधो गंगेय पदमुपगता स्तोकमथवा विवेक
भ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः ॥ १० ॥
यह गङ्गाजी प्रथम स्वर्गसे शिवजीके मस्तक पर गिरी
फिर वहाँसे हिमालय पर्वत पर, और पर्वतसे पृथ्वीपर, और
पृथ्वीपर से समुद्र में इस प्रकार नीचे नीचे ही गिरती गई।
इसमें कुछ आश्चर्य नहीं कि विवेकभ्रष्ट पुरुप भी इसी तरह
सौ सौ प्रकारसे अधोगति को ही प्राप्त करते हैं ॥ १० ॥
मर्तृहरिविरचित- शक्यो वारयितुं जलेन हुतंभुक् छत्रण सूर्यातपो नागेन्द्रो निशिताशेन समदी दण्डेन गोगर्दभौ । व्याधिर्भ पजसइग्रहश्च विविधर्मन्त्र प्रयोगैर्विषं सर्वस्यौपधमस्ति शास्त्रविहितंमूर्खस्य नास्त्यौपधम् ॥ ११ ॥ जलमे अग्निका, बानेसे मूर्यकी गरमी (धूप) का, तीक्षण अंकुशमे उन्मत हाधीका, डण्डसे वैल और गदहेका, अनेक प्रकारका औषधियोंसे व्याधिका और मन्त्र प्रयोगसे विषका निवारण हो सकता है। इस प्रकार शास्त्रोंमें सबकी औषधि कही है परन्तु मूर्खनाकी कोई भी औषधि नहीं है ।। ११॥ साहित्यसंगीतकलाविहीनःसाचात्पशुःपुच्छ। विपाणहीनः । तृणन्न खादन्नपि जीवमानस्त. द्भागधेयं परमं पशूनाम् ॥ १२ ॥ जो मनुष्य साहित्य, संगीत शास्त्र और कलासे विहीन है वह विना सींच और पोंछका साक्षात् पशु है । वह बास न खाकर जीता है यह उस पशुका परम भाग्य है ।। १२॥ येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः। ते मर्त्यलोके भुवि . नीतिशतकम् । भारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥ १३ ॥ जिस पुरुषोको न विद्या है, न तप, न दान है न ज्ञान, न शील है न गुण है और न धर्म है वे मृत्युलोकमें पृथ्वी के भारस्वरूप साक्षात् पशु हैं और मनुष्य रूप धारण करके विचरते हैं ॥ १३ ॥ वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह । न मूर्ख जनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि ॥ १४ ॥ दुर्गम पर्वतोंमें वनचरोंके संग विचरना अच्छा है पर- न्तु मूर्ख पुरुष का संसर्ग इंद्रभवनमें भी अच्छा नहीं ॥४॥ इत्यज्ञनिन्दाप्रकरणम् । अथ विद्वत्पशंसा। शास्त्रोपस्कृतशब्दसुन्दरगिरःशिष्यप्रदेयागमा विख्याताःकवयोवसन्तिविषयेयस्यप्रभो निर्धनाः॥ तज्जाड्यं वसुधाधिपस्य कवयो ह्यर्थविनापीश्वराः कुत्स्याःस्युःकुपरीक्षकाहिमणयोथैरर्घतःपातिताः१५, जब ऐसे सुप्रसिद्ध कवि जिनकी वाणीको शास्त्रोक्त शब्दोंने सुन्दर किया है और जिनकी विद्या शिष्यों के महरिविरचितं- पढ़ाने योग्य है किसी राजाके देशमें निर्धन रहते हैं तो यह जड़ता राजाकी ही है । कवि लोग तो विना धनके ही राजा हैं। वे जवाहिरी कुत्सित हैं जो मणिका मूल्य ( विना परीक्षा किये ) घटाते हैं न कि मणि (खोटे हैं जिनको वे परखते हैं)॥ १५ ॥ ' हतुर्याति न गोचरं किमति शं पुष्णाति यत्सर्वदा ह्यर्थिभ्यः प्रतिपाद्यमानमनिशं प्राप्नोति. वृद्धिं पराम् । कल्पांतेष्वपि न प्रयाति निधन विद्याख्यमन्तर्धनस् येषां तान्पति मानमुंज्झित- नृपाः कस्तैःसह स्पर्धते ॥ १६ ॥ जिनके पास विद्यारूपी धन है जो चोर को देख नहीं पड़ता, जो सर्वदा सुखकी वृद्धि करता है, जो अर्थीको देने से परम वृद्धिको प्राप्त होता है और जिसका कल्पान्तमें भी नाश नहीं होता उनसे हे राजा लोग.! कभी अभिमान-मत करो क्योंकि उनके समान संसारमें कौन है ? ॥१६॥ अधिगतपस्मार्थान्पण्डितान्मावमस्था-तृणमिव लघु लक्ष्मी व तान्संरुणद्धि । अभि नवमदले खाश्यामगण्डलस्थलानाम् न भवति विसतन्तु रणं वारणानाम् ॥ १७ ॥ 1 ,
नोतिरातकम्।
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'जिन पण्डितोंने मोक्ष का ज्ञान प्राप्तकर लिया है उनका
अपमान मत करो। तुणके समान तुम्हारीलवु लक्ष्मी उनको
नहीं रोक सकती जैसे नवीन मदधारासे शोभायमान श्याम
मस्तकवाले हाथी को कमल की डंडी का तन्तु नहीं रोक
सकता ॥ १७॥
अम्भोजिनी वननिवासविलासमेव हंसस्य
हन्ति नितरां कुपितो विधाता । न त्वस्य दुग्ध
जलभेदविधौ प्रसिद्धां वैदग्ध्यकीर्तिमपहर्तुमसौ
समर्थः ।।१८।
विधाता यदि क्रोध करे तो हंसका कमलके वनों में विहार
और वहाँका विलास नाश कर सकता है परन्तु उसके दूध
और पानी अलग करनेकी प्रसिद्ध कीर्तिको विधाताभी नष्ट
नहीं कर सकता [तात्पर्य यह है कि किसीका गुण कोई छीन
नहीं सकता ॥१८॥
केयूरान विभूषयन्ति पुरुष हारा न चंद्रोज्ज्व
लान स्नानंन विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्द्ध
जाः । वाण्येका समलंकरोति पुरुष या संस्कृता
धार्यते क्षीयंते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणंभूष
णम् ॥१६॥
महरिविरचिने- । जापुरुपकी शोभा न तो केयूरसेअर्थात् बाहुभूपण(बाजू वैरखी इत्यादि) से होती है और न चन्द्रके समान उज्ज्वल हारसे, न स्नानसे या उपटनसे, न पुष्पोंका श्रृंगार करनेसे और न वालोंके सँवारनेसे केवल संस्कारयुक्त धारण की हुई वाणी ही पुरुषको शोभित करती है । और सब आभूषण अवश्य क्षयको प्राप्त होते हैं परन्तु केवलवाक् भूपणही पुरुष का सच्चा भूपण है [ जो कदापि नाश नहीं होता] ॥१६॥ विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं विद्याराजकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूपांगुरुः। विद्या बंधुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता विद्या राजसु पूजिता न हि धनं विद्याविहीनः पशुः ॥२०1 विद्या ही मनुष्यका अधिक स्वरूप और अच्छी तरहसे छिण हुआ धन है, विद्या ही भोग राज यश और मुख देने- वाली हैं औरगुरुओंकी गुरू है। विदेश गमनमें विद्या ही परम देवता है । राजाओंमें विद्या ही पूज्य है धन नहीं। जिसमें विद्या नहीं हैं वह पशु है ॥ २० ॥ शान्तिश्चेद्धचनेन किं किमरिभिः क्रोधोस्ति चेहहिनाम् ज्ञातिश्चेदनलेन किं यदि सुहृद्दिव्यौ पधैः किं फलम् । किं सपैयदि दुर्जनः किमु धनै नीतिशतकम् । - विद्याऽनवद्या यदि ब्रीडाचेकिमु भूषणैःसुकविता यद्यस्ति राज्येन किम् ॥२१॥ जिस पुरुषको तमा है उसे कवचकी ( अपनेको दुष्टसे वचानेके लिये) क्या आवश्यकता है क्रोध है, तो शत्रु की क्या आवश्यकता है (अर्थात् शत्रु की नाई क्रोध उसकानाश करनेमें समर्थ है), ज्ञाति है तो अग्निका क्या काम (अर्थात् जातिके लोग अग्निके समान भस्म करनेकी शक्ति रखते हैं) इष्ट मित्र समीप हैं तो दिव्य औषधियोंका क्या प्रयोजन, दुर्जनोंसे संगति है तो सर्पका क्या प्रयोजन, निर्दोष विद्या है तो और धनसे क्या प्रयोजन, लज्जा है अन्य भूपणोंसे क्या काय, और जिसकी सुन्दर कविता है उसके सामने राज्य क्या है ? ॥ २१ ॥ दाक्षिण्यं स्वजने दया परजने शाठ्यं सदा दुर्जनेप्रीतिः साधुजने नयो नृपजने विद्वज्जनेष्वा 'र्जवम् । शौर्यं शत्रुजने क्षमा गुरुजने नारीजने धूर्तता येचैवं पुरुषाः कलासु कुशलास्तेष्वेव लोक स्थितिः । २२॥ इस संसारकी स्थिति उन्हीं लोगोंपर निर्भर है जो इन कलाओं में निपुण हैं-अपने कुटुम्बियोंपर उदारता, पर जनोंपर दया, दुर्जनसे सदा शठता, सज्जनोंसे भीति, राज 4 -१२ मतृहरिविरचिंत- सभामें नीति, विद्वानोंसे नम्रता, शत्रु जनसे शूरता, बड़े लोगोंसे क्षमा, और स्त्रियोंसे धूर्तता ।। २२ ।। जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं मा नोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति । चेतः प्रसाद यति दिक्षु तनोति कीर्तिं सत्सङ्गतिः कथय कि न्न करोति पुंसाम् ॥२३॥ सज्जनोंकी संगति वुद्धिकी जड़ता (अज्ञानताको नाश करती है, वाणी को सत्यसे सींचती है, मान और उन्नतिको देती है, पापको दूर करती है, चित्तको प्रसन्न करती और दिशाओं में कीर्तिको फैलाती है, कहो यह मनुष्यों के लिये क्या नहीं करती ? ॥ २३ ॥ जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः। नास्ति येषां यशःकाये जरामरणजं भयम् ।:२४ पन्य हैं पुण्यात्मा कविश्वर जिन्होंने रसोंको सिद्ध: किया, (जो सव रसोंमें, प्रवीण हैं) जिनकी यश.रूपी. कायाको बुढ़ापा और मृत्युको भय नहीं है ॥ २४ ॥ सुनुः सच्चरितःसती प्रियतमा स्वामी प्रसादो न्मुखः स्निग्धं मित्रमवञ्चकः परिजनो निक्ले शलेशं मनः । प्राकारो रुचिरः स्थिरश्च विभवो :- १३ नीतिशतकम् । विद्यावदातं मुखं तुष्टे विष्टपहारिणीष्टदहरौ संप्रा- प्यते देहिनाम् ।.५॥ जिन प्राणियोंपर सब मनोरथ देनेवाले स्वर्गनिवासी नारायण प्रसन्न होते हैं उनको ये सब प्राप्त होते हैं। सुन्दर पुत्र पतिव्रता स्त्री, अनुग्रह करनेवाला स्वामी, प्रेमी मित्र, धोखा न देनेवाला कुटुम्बी, क्लेश रहित मन, सुन्दर स्वरूप स्थिर संपत्ति, और विद्यासे सुशोभित मुख ॥ २५ ।। प्राणाघातान्निवृत्तिः परधनहरणे संयमः सत्य वाक्यं काले शक्त्या प्रदान युवतिजनकथा मूक भावः परेषाम् : तृष्णास्रोतोविभङ्गो गुरुषु च विनयः सर्वभूतानुकम्पा सामान्यः सर्वशास्त्रष्व नुपहतविधिः श्रेयसामेषपन्थाः प्राण हत्या से निवृत्त रहना,परायेके धनहरण संयमे रखना, सच बोलना, समय पर यथाशक्ति दान देना दूसरों की स्त्रीकी कथामें चुप रहना, तृष्णाके प्रवाहको तोड़ना, बड़े लोगोंसे नम्रता करना, प्राणि मात्रपर दया करना, येही कल्याण कारक मार्ग सव शास्त्रों में सामान्य हैं जिनकी विधि कदापि.भंग नहीं होती ॥ २६ ॥ प्रारभ्यते न खलु विश्नभयेन नीचे : प्रारभ्य से १४ भर्तृहरिविरचितं- विघ्नविहिता विरमन्ति मध्याः। विघ्नैः पुनः पुन रपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजना न परि त्यजन्ति : २७॥ नीच पुरुप विघ्नके भयसे कार्यको प्रारम्भ ही नहीं करते, मध्यम जन आरंभ करते हैं पर विघ्न होते ही छोड़ देते हैं, परन्तु उत्तमजन वारंवार विघ्न होनेपर भी प्रारंभ किये हुए कार्य को (विना पूरा किये) नहीं छोड़ते ॥२७॥ : प्रिया न्याय्या वृत्तिमलिनमसुभगेऽप्यसुक स्मृत्वसन्तो नाभ्यर्थ्याः सुहृदपि न याच्यः कृश धनः । विपद्युच्चैः स्थेय पदमनुविधेयंचमहता सतां कनोद्दिष्टं विषम मसिधारा व्रतमिदम् ।। न्याय युक्त मिय वृत्ति, प्राण जाने पर भी पाप कर्म में न प्रवृत्त होना, दुष्टोसे, अथवा अल्प धनवाले मित्रसे भी कुछ याचना न करना, विपदमें उच्चपदसे रहना, और श्रेष्ठ लोगोंके आचरणको धारण किये रहना, सज्जनों को तरवारकी धारसे भी कठोर व्रत किसने सिखाया है|२८|| il इति विद्वत्लशंसा।
नीतिशतकम्। 4 . अधमानशायप्रशंसा। चुलामोपि जराकृशोऽपि शिथिलप्रायोपि कष्टां दशामापन्नोपि विपन्नदीधितिरपि प्राणेषु नश्यत्स्वपि । मत्तेभेन्द्रविभिन्नकुम्भकवलग्रासेक बद्रस्पृहः किंज़ीर्ण तृणमत्ति मानमहतामग्रे सरः केसरी ||२६1. भूग्वक मारे दुर्बल,, बुढ़ापसे दुःखी, शक्तिहीन, कष्ट दशाको प्राप्त, तंजहीन और प्राणनाश होनेपर भी उन्मत्त गजराज के विदीर्ण मम्तकके ग्रासकी सदा अंभिलापा करने वाला अभिमान के कारण { जन्तुओंमें) अग्रगण्यसिंह क्या कभी मुखी घास खायगा ? ( तात्पर्य यह है कि उत्तम पुरुपोंसे नीच कार्य कदापि नहीं हो सकता ) ||२६ ।। स्वल्पस्नायुवसावशेषमलिनं निर्मा समप्यस्थि कंश्वालब्ध्वा परितोपमेति नतु तत्तस्य क्षुधा शान्तयो सिंहोवुकमङ्कमागतमपि त्यक्त्वा निहि न्तिद्विपम् सर्वः कृच्छ्रगतोपि वाञ्चति जनः सत्वा नुरूपं फलम् ॥३०॥ नाम मात्रकी चर्वी लगा हुआ, मांसरहित और मलिन छोटेसे हड्डी के टुकड़े को पाकर कुत्ता प्रसन्न हो जाता है, भर्तृहरिविरचित- यद्यपि इससे उसकी भूख नहीं जाती। परन्तु गोदमें आये स्यार को छोड़कर सिंह हाथीको. जाकर मारता है ( इससे यह सिद्ध हुआ कि ) समस्त जन चाहे कैसे भी दुःख में हॉवे परन्तु अपने पुरुषार्थके अनुसार फल पानेकी इच्छा करते हैं ॥ ३० ॥ लाङ्गुलचालनमधश्चरणावपातं भूमौ निप त्यवदनोदरदर्शनंच। श्वा पिण्डदस्य कुरुते गज पुङ्गवस्तु धीरं विलोकयति चाटुशतैश्च भुङ्क्ते ॥३१॥ कुत्ता टुकड़ा देनेवालेके आगे पॉछ हिलाकर, पैरॉपर सिर झुकाकर, पृथ्वीपर लोट कर, पेट और मुंह दिखलाता है ( अर्थात् दीनता प्रगट करता है) और गजराज अपने आहार देनेवालेकी ओर एक बार गंभीरतासे देखता और सौ सौ मीठी बातें करने पर भोजन करता है। ( सारांश यह है कि उत्तमजन मार्थना करने पर भी एकाएक किसी वस्तुको अंगीकार नहीं करते)॥३१॥ परिवर्तिनि संसारे मृतः को वान जायते। सजातो येनजातेनजाति वंश-समुन्नतिम् ॥३२॥ इस (चक्रकी नाई.) घूमते हुए संसारमें मरके कौन नहीं जन्म पाता (अर्थात् सभी जन्म पाते हैं परन्तु वहीं १७ , ३३ ।। : नीतिशनकम् । पुरुष जगत्में जन्मा ( अर्थात् उसी पुरुपका जन्म मुफल है) जिसके जन्मसे वंशकी उन्नति हो ॥ ३३ ॥ कुसुमस्तवकस्येव द्वयीवृत्तिर्मनस्विनः। मुनि वा सर्वलोकस्य विशीर्येत वनेऽथवा श्रीष्ट पुरुपोंको वृत्ति फलके गुच्छेकी नाई दो प्रकार की होती है या तो वे सब लोगों के मस्तक ही पर मुशोभित होते हैं अथवा वन ही में मुख कर नष्ट हो जाते हैं।॥३३॥ त्यन्येऽपि बृहस्पतिप्रभृतयःसंभाविताःपञ्च पास्तान्प्रत्येष विशेपविक्रमरुची राहुन वरायते । दावेव असते दिनेश्वरनिशाप्राणेश्वरौ भासुरौ भ्रातः पर्वणि पश्य दानवपतिःशीविशेपीकृतः॥ पराक्रममें विशेष रूचि रखनेवाला राहु वृहस्पति इत्यादि पाँच छः श्रेष्ठ ग्रहोंसे वैर नहीं रखता । हे भाइयो ! देखो कि अमावस और पुनवासीके दिन दानव पति राहु शिर मात्र रह जानेपर तेजस्वी सूर्य और चंद्रमाकोही असता है। (तात्प- र्य यह है कि सच्चे वीर अपने वरावरवालेका सामना करते हैं, और निर्बलको कष्ट नहीं देते) ॥ ३४ ॥ वहति भुवन श्रेणी शेषः फणफणकस्थितां भर्तृहरिविरचितं- कमठपतिना मध्येपृष्ठं सदा स विधार्यते । तमपि कुरुते क्रोडाधीनं पयोधिरनादरादहह महता निः सीमानश्चरित्रविभूतयः ।। ३५ ।। भुवनोंकी पंक्तिको शेपनागअपने चौडे फणपर धारण किये हैं और कच्छपजी उन शेषजी को अपनी पीठपरधारण किये हैं तथा उन कच्छपजी को समुद्रने अनादर से शूकर ( वराह जी) के आधीन किया है । अहो ! महान् पुरुषों के चरित्र की विभूति सीमा रहित है ॥ ३५ ॥ वरं पक्षच्छेदः समदमघवन्मुक्तकुलिशप हारैरुदच्छद्रहलदहनोद्वारगुरुभिः । तुपारा सूनो रहह पितरि क्लेशविवशे नचासौ सम्पातः पय सि पयसां पत्युरुचितः ॥ ३६ ।। ( मदमें भरे इन्द्रके चलाये वज्रके प्रहारसे, जो अत्यन्त प्रज्वलित अमिकी ज्वाला के समान था, उससे मैनाकका पंख कट कर मर जाना भला था परन्तु ओह ! उनको यह. उचित न था कि अपने पिता हिमाचलको क्लेश विवश ( पक्षहीन ) छोड़ समुद्र में कूदकर अपने पंख बचावे [ सा- रांश ग्रह कि-पराक्रमी पुरुष वह है जो स्वयं दुःख में पड़कर भी दूसरों के क्लेश निवारण का प्रयत्न करता है ] २६ नीतिशतकम् ।। यदचेतनोपि पादेःस्पृष्टः प्रज्वलति सवितुरि नकान्तः । तत्तेजस्वी पुरुषः परस्कृतविकृतिकथंस हते । ३७॥ अचेतन (पाणरहित ) होने पर भी सूर्यकान्त मणि सूर्यके किरण रूपी पाँवकी छूनेसे जल उठता है, तो तेजस्वी पुरुष (जो सचेतन है ) दूसरोंके अनादर को कैसे सह सकते है॥३७॥ सिंहः शिशुरपि निपतति मदमलिनकपोल भित्ति पुगजेषु प्रकृतिरियं सत्ववतां न खलु वयस्ते जसो हेतुः ॥ ३८ ॥ सिंहका बच्चा भी मदसे मलिन कपोलवाले गजपर ही आक्रमण करता है क्योंकि तेजस्त्रियों का यह स्वभाव ही है। तेजका हेतु कुछ अवस्था नहीं होता ॥ ३८ ॥ इति मानशौर्य प्रशंसा। CO अथ द्रव्यमशंसा । जातियतु रसातलं गुणगणस्तस्याप्यधो ग च्छतु शीलं शैलतटात्पतत्वभिजनः सन्दह्यतां व वहिनना शौयवैरिणि वज्रमाशुनिपतत्वर्थोऽस्तुनः २० - भर्तृहरिविरचित- केवलं येनकैन विना गुणस्तृणलवप्रायाः सम स्ता इमे . ६ चाहे जाति रसातल में चली जावे, सब उत्तम गुण, उससे भी नीचे चले जाँय, शीलता पर्वत से गिरकर नाश को प्राप्त होवे, कुलीनता अग्निसे जल जाय, और शूरता रूपी शत्रु पर वज्र गिर पड़े परन्तु हमको केवल द्रव्य ही से काम है जिसके विना सब गुण तुणके टुकड़ेके समान हैं३६ तानिन्द्रियाण्यंविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिप्रतिहता वचनं तदेव । अर्थोंष्मणाविरहितः पुरुषः स एव वन्यः क्षणेन भवतीतिविचित्रमेतत अविकल संपूर्ण इन्द्रियां वही हैं, वही नाम है, वही प्रवल बुद्धि भी है, बचन भी है परन्तु वड़ा आश्चर्य है कि वही पुरुप द्रव्यकी उप्णता के विना एक लक्षण और का और ही हो जाता है ॥४०॥ यस्यास्ति वित्तं स नरःकुलीनः स पण्डितः सः श्रुतवान्गुणः॥स एव वक्ता स च दर्शनीयः सर्वेः गुणा काञ्चनमाश्रयन्ते ॥१॥ जिसके पास धन है वही मनुष्य कुलीन, पंडित, शा- स्त्रज्ञ, गुणज्ञ, वक्ता, और दर्शन योग्यं है। तात्पर्य यह कि सव गुण सुवर्ण (धन) के ही आश्रित हैं ॥ ४१ ।।
२१ नीतिशतकम्। दौर्मन्त्र्यानृपतिर्विनश्यतियतिः संगात्सुतोला नादियोऽनध्ययनात्कुल कुतनयाच्छील खलो पासनात् । हीमद्यादनवेक्षणादपि कृषिः स्नेहः प्रवासाश्रयान्मैत्री चापणयात्समृद्धिरनयात्यागा प्रमादाद्धनम् ४२ दुष्ट मंत्रियों की सलाहसे राजा नष्ट हो जाते हैं, संग- तिसे तपस्वी, दुलारसे पुत्र, विद्या न पढ़नेसे ब्राह्मण, कुपूत से कुल, दुष्टकी सेवा से शील, मद्य पीनेसे लज्जा, विना देखे भाले खेती, परदेशमें रहने से स्नेह, अन्याय से मैत्री, अनीतिसे वृद्धि, और प्रमाद पूर्वक (असावधानतासे ) व्यय करने से धनका नाश होता है ।। ४२ ।। दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्त य । यो न ददातिं न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति ? ४३ द्वान, भोग और नाश वही धनकी तीन गति हैं । जो न दान देता है और न धनको अपने उपभोग लाता है उसके धन की नाशरूपी तीसरी गति होती है ।। ४३ ॥ मणिःशाणोल्लीढः समरविजयी हेतिनिहतो मदक्षीणो नागः शरदि सरितः श्यानपुलिनाः ।
२२ भत हरिविरचितं- - कलाशेपश्चन्द्रः सुरतमृदिता वालवनिता । तनि म्ना शोभन्ते गलितविभवाश्चार्थिपु जनाः ४४॥ सानपर खरादा हुआ मरिण, लड़ाई में जीतने वाला शस्त्रों से घायल हुवा वीर, मदसे उतरा हुवा हाथी, शरद ऋतुकी बालू मय तीरवाली मूखी नदी, द्वितीयाका चंद्रमा, काम क्रीडामें मर्दन की हुई वाला स्त्री और अनि दान देने से दरिद्रो भया हुवा पुरुष इन सब की दुर्बलता ही से शोभा है ।। ४४॥ परिक्षीणः कश्चित्स्पृहयति यवानां प्रसृतये स पश्चात्संपूर्णांगणयति धरित्री तृणसमाम् । अतश्चानैकान्त्याद्गुरुलधुतयाथेषु धनिना मव स्था वस्तूनि प्रथयति च संकोचयति च ॥४५॥ जब कोई दद्धि होता है तब वह केवल एक पसर जब की इच्छा करता है और वही पुरुष जव संपन्न हो जाता है तो संसारको तृणवन् गिनता है अतएव यही दोनों चंचल अवस्था पुरुपको गुरु और लघु बनाती हैं और वस्तु (के भी मूल्य )फैलानी और सिकोड़ती हैं ॥ ४५ ॥ राजन्दुधुक्षसि यदि क्षितिधेनुमेतो तेनाद्य वत्समिव लोकममु पापुणातस्मिंश्च सम्यगनिशं
૧૨
...
नीतिशतकम् ।
परिपोष्यमाणे नानाफलै फलति कल्पलतेवभूमिः
हे राजन् ! यदि तुम इस पृथ्वी रूपी गौको दुहना
चाहते हो तो पहिले अपने मजा रूपी बछड़ेका पोषण करो।।
जब प्रजाका भली भाँति पालन किया जायगा तभी पृथ्वी
कल्पलताके समान अनेक प्रकारके फलोंको देगी ॥४६ ।।
सत्यानृता च परुषा प्रियवादिनी च हिंसा
दयालुरपि चार्थपरावदान्या॥ नित्यव्ययाप्रचुरनि
त्यधनागमा च वाराङ्गनेवनृपनीतिरनेकरूपा! ४७॥
राजनीति वेश्याके समान राजसभामे अनेक रूप धा-
रण करती है कही सत्य होती है कहीं असत्य, कहीं
कठोर और कहीं मिय वोलनेवाली, कहीं हिंसा करनेवाली
और कहीं दयालु, कहीं लोभी और कहीं उदार, कभी
बहुतसा धन लुटानेवाली और कभी बहुत संचय करने
वाली ॥४७॥
आज्ञा कीर्तिः पालनं ब्राह्मणानां दानं भोगो
मित्रसंरक्षणं च । येषामेते षड्गुणा न प्रवृताः
कोऽर्थस्तेषां पार्थिवीपाश्रयेण !! ४८ ।।
आज्ञा करनेकी शक्ति, कीर्ति, ब्राह्मणोंका पालन, दान
भोग और मित्रोंकी रक्षा, जिनमें ये छ गुण विद्यमान नहीं
हैं उनको राजाकी सेवाका क्या फल है ॥ ४८ ॥
२४ भर्तृहरिविरवितं- यद्धात्रा निजभालपट्टलिखितं स्तोकं महद्धा धनं तत्प्राप्नोति मरुस्थलेऽपि नितरां मेरौ ततो नाधिकम् । तद्धीरो भव वित्तवत्स कृपणां वृत्ति वृथा मा कृथाः कूपे पश्य पयोनिधावपि घटो गृ हाति तुल्यं जलम् !! ४६ : विधाताने थोड़ा या बहुत जितना धन भाग्यमें लिख दिया है उनना अवश्य ही मरूस्थल ( मारवाड़का भूमि) में भी मिल जायगा उससे अधिक मुमेरु पर्वतपर भी जाने मे न मिलंगाः अतएव धैर्य धरो और धनिकसे वृथा अपनी दीनता मन प्रगट करो । देखो घड़ा कूप और समुद्रमें समान ही जल ग्रहण करता है ॥ ४६॥ त्वमेव चातकाधारोऽसीति केपां न गोचरः। किमम्भोदवरास्माकं कार्पण्योक्तिः प्रतीक्ष्यसे ।५०॥ हे श्रेष्ठ मेघ ! यह कौन नहीं जानता कि-तुहीं हम चातकों के आधार हो तब क्यों तुम हमारी दीनता की प्रतीक्षा करते हो ? ॥ ५० ॥ रेरे चातक सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रय तामम्भोदा वहवो हि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैता दृशः । केचिद् टिभिराईयन्ति वसुधां गर्जन्ति के २५. नातिशतकम् । द्ध था यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्र हि दीनं वचः ।। ५१ ॥ अरे मित्र चातक ! सावधान मनसे क्षण भर मेरी वाते. सुन ले । आकाशमें मेघ बहुतेरे हैं पर सव ऐसे नहीं हैं (जो मेरी प्रर्थनाको स्वीकार करेंगे) कितने तो वरस कर पृथ्वीको भर देते हैं और कितने व्यर्थ ही गरज कर चले जाते हैं । अतएवं जिस जिसको तू देखे प्रत्येकसे दीनताके वाक्य मत कह ॥५१॥ इति द्रव्यप्रशंसा। अथदुर्जननिन्दा अकरूपत्वमकारणविग्रहः परधने परयोपिति च स्पृहा । सुजनबन्धुजनेष्वसहिष्णुता प्रकृतिसि दमिदं हि दुरात्मनाम् १ ५२ ।। दया न करना, विना कारण द्वेष करना, पराये धन और स्त्रीकी इच्छा करना, सज्जन और अपने वन्धुजनसे ईर्षा ये सब दुर्जनके स्वभाविक लक्षण हैं ॥ ५ ॥ दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्यया भूषितोऽपि सन् । मणिनाल कृतः सर्पः किमसौ न भयङ्करः!.५३|| F: . . दुर्जन यदिःविद्यासे भी भूपित हो तो भी वह परित्याग - भर्तृहरिविरचितं- केही योग्य हैं। क्या मणिसे भूपित सर्प भयंकर नहीं होता ? ॥ ५३॥ जाज्यं ह्रीमति गण्यते व्रतरुचौ दम्भः शुचौ कैतवं शूरे निघृणता मुनौ विमतिता दैन्यं पि यालापिनी । तेजस्विन्यवलिप्तता मुखरता वक्तर्य शक्तिः स्थिरे तत्कोनाम गुणो भवेत्स गुणिनां यो दुर्ज नैर्नाङ्कितः ६. ५४ ॥ दुर्जनलोग लज्जावानको जड़, व्रतधारीकोदंभी, पवित्र की पाखंडी, शूरको निर्दयी, मुनिको मूर्ख, प्रियभापी को दीन, तेजस्वीको घमंडी, वक्ताको वकवादी और स्थिर चित्त वाले को आलसी कहते हैं। गुणियोंमें कौनसा ऐसा गुण है कि जिसको दुष्ट लोग कलंक नहीं लगाते ? ॥ ५४ ॥ लोभश्च दगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः सत्यं चेत्तपसां च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम् । सौजन्यं यदि किं जनैः सुमहिमा यद्यस्ति किं मंडनैः सद्विद्या यदि किं धनै रपय शो यद्यस्ति किं मृत्युना ।। ५५ ।। जिसमे लोभ है उसमें फिर और अवगुण क्या चाहिये जो कुटिल है उसको.और पातक करनेका क्या प्रयोजन, २७ नीतिशतकम्। सत्य है तो तपकी क्या आवश्यकता, मन शुद्ध है तो तीर्थ (यात्रा) करनेसे अधि क्या होगा, जो सज्जन हैं उन्हें मित्र और कुटुम्घियोंकी क्या कमी है, यशस्त्रीको कीर्तिसे बढ़ कर क्या भूपण हैं, सद्विद्या है तो अन्य धनकी क्या पाव- श्यकता है, और जिसको अपयश है उसको मृत्यु पानेपर भी क्या होगा ? ( अर्थात् मरनेपर भी अपयशका कलंक मिट नहीं सकता)॥ ५५ ॥ शशी दिवसधूसरो गलितयौवना कामिनी सरो विगतवारिजं मुखमनक्षरं स्वाकृतः। प्रभुर्ध नपरायणाः सततदुर्गतः सज्जनो नृपाङ्गणगतः खलो मनसि सप्त शल्यानिमे १ ५६ ।। दिनका मलीन चंद्रमा, यौवनहीन सुन्दर स्त्री कमलहीन. सरोवर, सुन्दर रूपवान् पुरुपका अतरहीन मुख, धनी कृपण सज्जन दरिद्री और राज सभामें प्राप्त दुष्टये सातो. हमारे मनको कांटेके समान खटकते हैं ॥ ५६ ।। न कश्चिञ्चण्डकोपानामात्मीयो नाम भूभुजा. म् । होतारमपि जुह्वानं स्पृष्टो दहति पावकः ।! अति क्रोधी राजाओंका कोई भी प्रिय नहीं होता। अग्नि होम करने वालेको भी छू पानेपर जला देती है ॥५७|| मौनान्मूकः प्रवचनपटुश्चाटुलो जल्पकोवा भर्तृहरिविरचित धृष्टः पार्श्वे वसति च तदा दूरतश्वीप्रगल्भः क्षा न्त्या भीरुयदि न सहते प्रायशो नाभिजातः से वा धर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ।। ५ । सेवा धर्म अत्यन्त कठिन है और योगियांस होना दुर्गम है क्योंकि यदि सेवक मौन रहे तो गूंगा, वोल चालमें चतुर होतो वकवादी, समीप रहे तो ढीठ, दूर रहे तो मूर्ख, सहनशील होतो डरपोक, और सहनशील नहो तो कुलहीन कहा जाता है ।। ५८ ॥ उद्भासिताखिलखलस्य विशृङ्खलस्य प्राग्जात विस्मृतनिजाघमकर्मवृत्तेः। दैवादवाप्तविभवस्य गुणद्धिपोऽस्य नीचस्य गोचरगतैःसुखमास्यतेकैः ऐसे निरंकुश दुष्टके समीप कौन मुखपूर्वकरह सकता है जो.सद्गुणोंसे द्वेष रखता है, जिसने देवसे विभव पाया हैं, जिसकी दुष्टता भली भाँति प्रगट हो गई है और जिसके पूर्व जन्मके किये हुए अधम कर्म इस जन्ममें उदय हो रहे हैं ॥ ५३॥ आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृ द्धिमती च पश्चात् । दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना छायेव मैत्री खलसूजनानाम् !! ६० ।। , नीतिशतकम्। 23 -- दुष्ट और सज्जेन मैत्री दिनके पूर्वार्ध (प्रातःकालसे दोपहर तक) और उत्तरार्ध ( दोपहरसे लेकर संध्या तक) छायाकी नाई है। दुष्टकी मैत्री आरंभमें लंबी चौड़ी और फिर क्रमसे घटती जाती हैं, परन्तु सज्जनों की पहले थोड़ी और फिर क्रमसे वृद्धिको प्राप्त होती है ॥६० (। मृगमीनसजनानां तृणजलसंतोषविहितवत्ती नाम्।लुब्धकधीवरपिशुनानिष्कारणरिणोजगति इस संसारमें मृग घास खाकर, मछली जल पीकर और मज्जन लोग संतोप करके अपना जीवन व्यतीत करते हैं पर बिना कारण ही इनसे वहेलिये ( मृगसे,) मछुवे (मछलीसे) और दुष्ट (सज्जनांसे)शत्रु ता करते हैं ।।६१।। इति दुर्जननिन्दा । -SRO- अथ सुजनप्रशंसा। वाञ्छा सज्जनसङ्गमे परगुणे प्रीतिगुरौनम्रता विद्यायां व्यसनं स्वयोषिति रतिर्लोकापवादादय, म् । भक्तिः शूलिनि शक्तिरात्मदमने संसर्गमु क्तिः खले एते येषु वसन्ति निर्मलगुणास्तेभ्योन रेभ्यो नमः ।। ६२ ॥ .
३०
भतृहरिविरचितं-
उन पुरुपोंको नमस्कार है जिसमें ये (नीचे लिखे)
दिव्य गुण विद्यमान हैं:-सज्जनोंके संगकी इच्छा दूसरेके
गुणोंमें प्रीति, वड़े लोगोंसे नम्रता, विद्यामें व्यसन, अपनी.
ही स्त्रीमें प्रीति, लोकनिन्दासे भय, महादेवजीमें भक्ती,
आत्मदमन ( अपने मनको वशमें रखने ) की शक्ति,
और दुष्ट संगका त्याग ।। ६२ ।।
विपदि धैर्यमथाभ्युदये जमा सदसि वाक्पटु
ता युधि विक्रमः । यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रु
तौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् । ६३ ।।
आपत्तिमें धैर्य, ऐश्वर्यमें क्षमा, सभा वचनकी चतुराई
युद्धमें पराक्रम, यशमै प्रीति और शास्त्रके अध्ययनकी उत्कट
इच्छा-ये सब गुण महात्माओंमें स्वभावसे ही रहते हैं ।।६३||
प्रदानं प्रच्छनं गृहमुपगते सम्भ्रमविधिः प्रि
यं कृत्वा मौनं संदसि कथनं चाप्युपकृतेः। अनु
सेको लक्ष्म्यां निरभिभवसाराः परकथाः सतां के
नोद्दिष्टं विषममसिधाराव्रतमिदम् ।। ६४ !!
दानको गुप्त रखना, गृहपर आये हुए पुरुषका सम्मान
करना, किसीका भला करके मौन रहना ( अर्थात् दूसरोंसे
अपनी की हुई भलाइ की चर्चा न करना,) दूसरोंके किये
नीतिशतकम्।
...
हुए-उपकारको सभामें कहना, धन पाकर अभिमान न करना
और परायेकी चर्चा उसकी निन्दा रहित करना यह तरवार
की धारके समान कठिन व्रत सज्जनों को किसने सिखाया
है ? ॥ ६४ ॥
करे श्लाध्यस्त्यागः शिरसि गुरुपादप्रणयिता
मुखे सत्या वाणी विजयिभुजोर्वीर्यमतुलम् ।
हृदिस्वच्छा वृत्तिः श्रुतमधिगते च श्रवणयोर्वि
नाप्यैश्वर्येण पकृतिमहतां मण्डनमिदम् ।। ६५ ।।
हाथकी शोभा दान देनेसे और मस्तककी बड़ोंके चरण
पर गिरने से है, मुखकी शोभा सत्य बोलनेसे और दोनो
भुजाओंकी अतुल पराक्रमसे है, हृदयकी शोभा स्वच्छ वृत्तिसे
और कानकी शास्त्रका श्रवण करनेसे हैं। जो लोग स्वभावसे
ही सत्पुरुप हैं उनके यही सव विना ऐश्वर्य के भी आभूपण
हैं ॥६५॥
सम्पत्सु महतां चित्तं भवत्युत्पलकोमलम् ।
श्रापत्सु च महाशैलशिलासंघातकर्कशम् ॥६६॥
महात्मा लोगोंका चित्त संपत्ति होनेपर कलमंकी नाई
कोमल होता है । परन्तु आपत्तिमें पर्वतकी बड़ी शिलाके
समान कठोर हो जाता है ॥६६ ॥
भर्तृहरिविरचितं
संतप्तायसि संस्थितस्य पयसो नामपि न
ज्ञायते मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपत्रस्थित रा
जते । स्यात्यांसागरशुक्ति मध्यपतितं तन्मौक्ति
कं जायते प्रायेणाधममध्यमोत्तमगुणाः संसर्गतो
जायते ।। ६७ ॥
पानीका बूंद नपे हुए लोहेपर पड़नेसे नाम मात्र भी
नहीं रह जाता वहीं द कलम पत्रपर गिरनेसे मोतीके स-
मान शोभायमान होता है और वही (जल) बिन्दु) स्वाति
नक्षत्रमें समुद्रके सोपोंमें पड़कर मोती हो जाता है । ( इससे
यह ज्ञात हुआ कि ) प्रायः संसर्गसे ही सबके गुण अधम,
मध्यम अथवा उत्तम हो जाते हैं ।।६७ ॥
यः पीणयेत्सुचरितैः पितरं स पुत्रो यद्भतु रे
व हितमिच्छति तकलत्रम् । तन्मित्रमापदि सुखे
च समक्रियं यदेतत्रयं जगति पुण्यकृतोलभन्ते.
वही (यथार्थमें) पुत्र है जो पिताको अपने अच्छे च-
रित्रोंसे प्रसन्न करता है, वही पत्नी है जो अपने. पतिका
निरंतर हित चाहती है. वही मित्र है जो मुख तथा दुखमें
समान वर्ताव रक्खे । इस संसारमें केवल पुण्यवान्को ही ये
तीनों मिलते हैं ॥६॥
३३ ܨܬܐ नीतिशतकम् । एको देवः केशवो वा शिवो वा एक मित्रं भूपतिर्वा यतिर्वा । एको वासः पत्तने वा वने वा एका नारी सुन्दरी वा दरी वा ॥ ६६ : एकही देवकी सेवा करना चाहिये चाहे केशव हो अथवा शिव हो, एकही को मित्र वनाना उचित है वह राजा हो या सन्यासी, एकही स्थानमें वास करना उचित हैं चाहे नगरमें वा वनमें, एक ही।से प्रीति करना चाहियें चाहे वह मुन्दर स्त्री हो अथवा गुफा ॥ ६६ ॥ नम्रत्वेनोनमन्तः परगुणकथनैः स्वान्गुणा ख्यापयन्तः स्वार्थान्सम्पादयन्तो तितपिथुतरा रम्भयलाः परार्थेः । शान्त्यैवाक्षेपरूक्षाक्षरमुखर मु. खान्दुर्जनान्दषयन्तः सन्तःसाश्चर्यचर्याजगति व हुमताः कस्य नाभ्यर्चनीया । ७० ॥ इस संसार में ऐसे अद्भुत आचरण वाले सज्जन लोग किसको पूजनीय नहीं होतें जो नम्रतासे ऊँचे होते हैं, जो दूसरोंके गुण कथनसे अपनेको प्रसिद्ध करते हैं, जो विस्तार पूर्वक दूसरोंका कार्य करके अपना कार्य सम्पादन करते हैं, जो अपनी क्षमाही से उन दुष्टोंकी निन्दाको दूपित करते हैं जिनके मुख कोर वचनोंसे पूरिपूर्ण हैं ॥७॥ इति सज्जनप्रशंसा। -- सहरिविरचितं- अथ परोपकार पद्धतिः। भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैनवाम्बुभिभूमि विलम्विनो घनाः । अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृ. द्धिभिः स्वभाव एवैप परोपकारिणाम् !! ७१ il वृक्ष फलके बोझसे नम्र हो जाते (झुक जाने ) हैं, नवीन जलमे परिपूर्ण मेघ पृीपर झुक जाते हैं । इसी प्रकार उत्पुरुष भी धन पाकर उद्धत न होकर नम्र हो जाते हैं। परोपकारी जीवोंका स्वभाव ऐसा होता है ।। ७१॥ श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन दानेन पाणिनं तु कङ्कणेन । विभाति कायः करुणामयानां परोप- कारैर्नतु चंदनेन । कानकी शोभा शास्त्रका श्रवण करनेसे होती हैं कुण्डल पहिरने से नहीं, हाथकी शोभा दान देनसे होती कंगन पहिर नेसे नहीं, करुणामय पुरुपोंकी देह शोभा परोपकार करनेसे होती है चन्दन लगानेसे नहीं ।। ७३ ॥ पापान्निवारयति यो जयते हिताय गुह्याति गृहति गुणान्प्रकटीकरोति।आपद्गतं च न जहाति ददाति काले सन्मित्रलक्षणमिदंप्रवदन्ति सन्तः७३ सन्त लोग सच्चे मित्रक ये लक्षण बताते हैं:--अपने ३६ भर्तृहरिविरचिन- न त्याग कर दूसरोंके भी कार्यमें उद्यम करते हैं, वे मनुष्य रूपी राक्षस हैं जो अपने हितके लिये दूसरोंका काम विगाड़ते परन्तु हम नहीं जानते कि वे कौन हैं (उनको किस नाम से पुकारना चाहिये ) विना प्रयोजन पराये कार्यकी हानि करते हैं॥७५) तोरणात्मगतोदकाय हिगुणा दत्ताःपुरातेऽखिलाः तोरे तापमवेक्ष्य तेन पयसा ह्यात्मा कृशानौहुतः। गन्तुपावकमुन्मनस्तदभवदृष्ट्वा तु मित्रापदं यु तं तेनजलेन श्याम्यति सतांमैत्री पुनस्त्वीदृशी७६ पहले जव जल धमें मिला तब धने उसको अपने सब गुण देकर मित्र बना लिया, (अर्थात् दोनों एक जीव हो गये) दूधको तापमें देखकर (अर्थात् जब वह आग पर उवाला गया) जलने अपनेको ही अग्निमें भस्म किया (अर्थात् वाप्परूपसे जल उड़ गया) दूध अपने मित्र जनको इस आपत्तिमें देख आप भी अनिमें कूदना चाहता था (अयात् उवल कर वहता ही था)कि फिर जलके छींटे पाकर शान्त हो गया। सच है सत्पुरुपोंकी मैत्री ऐसी ही होती ॥७॥ इतः स्वपिति केशवः कुलमितस्तदीयद्धिपामि- तश्च शरणार्थिनः शिखरिणांगणः शेरते ॥ इतोपि
३७
im
नोनिशतकम्।
वडवानलः सह समस्तसंवर्तकै रहो विततमूर्जितं
भरसहं च सिन्धोर्वपुः ॥ ७७ ।।
समुद्र में एक ओर विष्णु भगवान् सोते हैं, दूसरी ओर
उनके शत्रु (अमुर) का कुल बसा है, एक ओर शरणागत
पर्वतोंके समूह पड़े हैं और दूसरी ओर वड़वानल मलयाग्नि
सहित वर्तमान है, पर देखो समुद्र कितना विशाल, बलवान्
और धैर्यवान् है जो इतना भार सह सकता है [ सज्जन भी
समुद्रकी नाई गम्भीर और सहनशील होते हैं ] ॥ ७७ ॥
तृषणांप्रिन्धि भजक्षमा जहिमदं पादे रतिर्मा
कृथाः सत्यं व झनुयाहि साधुपदवीं सेवस्व विद्धज
नम् । मान्यान्मानयविद्विषोऽप्यनुनय प्रच्छादयं
स्वान्गुणान्किति पालयदुःखिते कुरुदयामेतत्सता
लक्षणम् ॥ ७८ ॥
तृपणा छेदन करो, क्षमाको भजा (धारणकरो),
अभिमान को छोड़ो, पापमें प्रीति मत करो, सत्य बोलो,
सज्जनोंके आचरणका अनुकरण करो, विद्वानोंकी सेवाकरो
मान्य जनोंका आदर करो, शत्रुओंको भी, प्रसन्न रक्खो,
अपने गुणोंको छिपाओ, कीर्तिका पालन करों और दुःखियाँपर
दया रक्खो-यही सज्जनोंके लक्षण हैं ॥ ७ ॥
भर्तृहरिविरचितं- - मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णा स्त्रिभु वनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः । परगुणपरमाण न्पर्वतीकृत्य नित्यं निजहृदि विकसंतः सन्तिसन्तः कियन्तः ॥ ७९ ॥ ऐसे सज्जन विरले ही हैं जिनका मन, वाणी और शरीर पुण्यरूपी अमृतसे भरा है, जो अपने उपकारों से त्रिभुवनको तृप्त करते हैं और जो दूसरोंके परमाणु वरावर गुणोंको पर्वतके समान वंदा कर अपने हृदयको प्रफुल्लित करते हैं ॥ ७९ ॥ किन्तेन हेमगिरिणा रजतादिणावा यत्राश्रिताश्च तरवस्तरवस्त एव । मन्यामहे मलयमेव यदाश्रयण कोलनिम्बकुटजा अपि चन्दनाः स्युः ॥ ८० उस सोनेके (सुमेरु) पर्वतसे और चाँदी के ( कैलाश) पर्वतसे क्या ? अर्थात् इनका होना न होना हमारे लिये समान है ) जव कि इनके आश्रित वृक्ष वृक्ष ही बने रहे (अर्थात् सोने चाँदीके न भये) हम लोग तो मलयाचल पर्वतकी बड़ाई करते हैं कि जहाँ कंकोल' नीम और कुटज ऐसे(तीते) क्ष भी चन्दन हो जाते हैं ( तात्पर्य यह है कि उसी महा- नीतिशतकम् । ३६ नुभावकी प्रशंसा करना चाहिये जो सदा लोकोपकार में तत्पर है)|| ८०॥ इति परोपकार पद्धतिः । अथ धैर्यप्रशंसा। रत्नैर्महार्हेस्तुतुपुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम् । सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चि तार्थाद्विरमन्ति धीराः ! ८१ . अमूल्य रत्नों ( को पाकर) से देवता लोग सन्तुष्ट न हुए और भयङ्कर विप ( हलाहल ) से भी भयभीत न हुए, ऐसा होने पर भी समुद्रके मन्थनका प्रयत्न. न छोड़ा अर्थात् अमृत पाये विना उन्होंने विश्राम न किया (तात्पर्य) यह है कि) धीर मनुष्य अपने निश्चित अर्थको विना समाप्त किये हुए नहीं छोड़ते ॥ ८१ ॥ कचिद मौ शय्या कचिदपि च पर्यशयनः कचिच्छाकाहारी कचिदपि च शाल्योदनरुचिः। कचित्कन्थाधारी कचिदपि च दिव्याम्बरधरो मन स्वीकार्यार्थी गणयतिनदुःखं न च सुखम् ।.८२!!
४०
भर्तृहरिविरचितं-
मनस्वी पुरुप जब किसी कार्य सम्पादनमें लगा रहता
है तो सुख और दुःखको नहीं गिनता, कभी वह पृथ्वीपर
सोता है और कभी सेजपर, कभी सागपात खाता है कभी
चावल इत्यादिका उत्तम आहार करता है, कभी गूदड़
ओड़ता है और कभी दिव्य वस्त्र धारण करता है ।। २ ।।
ऐश्वर्य स्थविभूषणं सुजनताशार्थस्य वासंयमो
ज्ञानस्योपशमः श्रुतस्य विनयोचित्तस्यपात्र व्ययः
अक्रोधस्तपसः क्षमाप्रभवितुर्धर्मस्यनिर्व्याजता स
र्वेषामपि सर्वकारणमिदं शीलं परंभषणम्!! ८३ ॥
सज्जनता ऐश्वर्यका भूरण है, वाक्तयन (अभिमानके
वास्थ न कहना) शूरताका, शान्ति ज्ञानका विनय.
शास्त्रज्ञका, रोग्यको देना दानका,क्रोध न करना तपस्वीका,
क्षमा प्रभुताका और निष्कपटता धर्मको शोभा है, परन्तु
यह शील ही अन्य सब (गुणों) का उत्तम भूपण और
कारण है ।। -३॥
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यवा स्तुवन्तु ल
क्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् । अद्यैव वा
मरणमस्तु युगान्तरे वा न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति
पदं न धीराः ॥ ४ ॥
नीतिशतकम्। ४१ नीतिनिपुण लोग चाई निन्दा करें चाहे स्तुति,लक्ष्मी चाहे ('घर में ) आवै अथवा जहाँ चाहे तहाँ चली जाय, मृत्यु चाहे आज हो चाहे युगान्तरमें, परन्तु धीर पुरुष न्यायका मार्ग छोड़कर एक पग भी (वाहर ) नहीं हटते ॥ ८४ ॥ भमाशस्य करण्डपीडिततनोलानेन्द्रियस्य च धाकृत्वाखुर्विवरं स्वयं निपतितोनक्तंमुखेमोगिनः। तृप्तस्तपिशितेन सत्वर मसौते नैवथातः पथालो काःपश्यत दैवमेवहि नृणांवृद्धौ क्षये कारणम् .८५।। एक सर्प पिटारेमें बन्द होनेके कारण पीड़ित था और उसने जीनेकी आशाको छोड़ दिया था और भूखने उसकी सर्व इन्द्रियोंको शिथिल कर दिया था । (आकस्मात् ) रात्रिमें एक चूहा उस पिटारेमें छिद्र करके घुसा और स्वयं सर्पके मुखमें गिर पड़ा, सर्प भी मूपकके मांस से तृप्त होकर उसी छेदसे ( जिसको चूहेने किया था ) निकल गया । हे भाइयों! देखो पुरुषोंकी वृद्धि और लयमें दैव ही कारण है ॥८५॥ पातितोऽपि कराघातैरुत्पतत्येव कन्दुकः। प्रा येण साधुवृत्तानामस्थायिन्यो विपत्तयः ।।६।। हाथके आघातसे गिराया हुआ ( हाथसे पृथ्वीपर ૨૨ भर्तृहरिविरचितं- फेंका हुआ) गेंद भी ऊपर को उछलता है। भले आचरण- वाले मनुष्यों की विपत्ति माय स्थिर नहीं होती ॥२७॥ आलस्यं हिमनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः नास्त्युद्यमसमो बन्युयं कृत्वा नावसीदति!!-७॥ आलस्य ही मनुष्यके शरीरमें रहनेवाला बड़ा शत्रु है। उद्यम के समान मनुष्यका कोई वन्धु नहीं है कि जिसके करनेसे मनुप्य कभी दुःखी नहीं होता ।। ८७ ॥ छिन्नोऽपि रोहति तरुःक्षिणोप्युपचीयते पुन श्चन्द्रः। इति विमृशन्तः सन्तः संतप्यन्ते न वि प्लुता लोके : 8 कतरा हुआ (कलम किया हुआ) वृद्ध फिर वह जाता है, चन्द्रमा क्षीण होकर फिर बढ़कर पूर्ण हो जाताहै, ऐसा विचार करके सन्त लोग इस संसारमे दुःखसे पड़कर भी सन्ताप नहीं करते ॥८॥ इति धैर्य प्रशंसा अथ दैव प्रशंसा । नेता यस्य वृहस्पतिः प्रहरणं वज्रं सुराः सैनि नीतिशतकम् !. काः स्वर्गों दुर्गमनुग्रहः किल हरे रैरावतो वारणः। इत्यैश्वर्यबलान्वितोऽपि बलभिमः परैः संगरे तद्धय तं वरमेव देवशरणं धिग्धिवृथा पौरुपम् ।। ८६il इन्द्र भी संग्राम में शत्रुओंसे हारा यद्यपि उसपर हरि का अनुग्रह था और वह ऐसे ऐश्वर्य और वलसे संयुक्त था- ( यथा) वृहस्पति उसके मन्त्री जैसे देवतागण की सेना,स्वर्ग ऐसा गढ़ और ऐरावत चढ़नेको हाथी। इससे यह विदित होता है कि दैवहीका शरण योग्य है पुरुपार्थ वृथा है और उसको धिक्कार है ॥८६॥ कर्मायत्तं फलं पुंसां बुद्धिः कर्मानुसारिणी । तथापि सुधिया भाव्यं सुविधायें कुर्वता ।।६० यद्यपि पुरुपोंको अपने (पूर्व जन्मसे ) किये हुए कर्म का ही फल मिलता है और बुद्धि उस कर्म के अनुसार ही होती है तथापि बुद्धिमानोंको उचित है कि भली भाँति विचार कर कार्य करें॥१०॥ खल्वाटो दिवसेश्वरस्य किरणैः सन्तापितो म स्तके वाचन्देशमनातपं विधिवशात्तालस्य मूलं गतम् । तत्राप्यस्य महाफलेन पतता भग्नं सश . भर्तृहरिविरचितं- ब्दं शिरः प्रायो गच्छति यत्र भाग्यरहितस्तत्रैव यांत्यापदः!! ६१॥ किसी चंदुला पुरुपका मस्तक जव सूर्यकी किरणों से तपने लगा तो वह छायाका स्थान हूँ ढ़ता हुआ दैवयोगसे एक ताड़के नीचे खड़ा हुआ, वहां जाते ही शीघ्र एक बड़ा फल ( नारियल ) उसपर गिरा और उसके तड़ाके के साथ उसका शिर टूट गया। इसका तात्पर्य यह है कि अभागे लोग जहां जहां जाते हैं वहां वहां विपत्ति भी उनके पीछे पीछे जाती है ॥ ११ ॥ शशिदिवाकरयोग्रवीडनं गंज भुजङ्गमयोर पि बंधनम् । मतिमतां च विलोक्य दरिद्रतां वि धिरहोवलवानिति मे मतिः ॥ १२ ॥ चन्द्रमा और सूर्य ग्रह (राहु) ये पीड़ित,हाथी और सर्प ऐसे पराक्रमी जो ( व ) वन्धनमें पड़े, और बुद्धिमानोंको दरिद्र देखकर मुझे यही निश्चय होता हैं कि अरे दैवगति ही बलवान् है ॥ १२॥ सृजति तावदशेषगुणाकरं पुरुषरत्नमलं करणं भुवः । तदपि तत्क्षणभङ्गि करोति चेत् अहह कष्टमपण्डितता विधेः । १३ ।।
नोतिशतकम्। ४५ CH पहिले विधाता पुरुप रत्नको सब गुणोंकी खान और संसार का अलंकार बनाता है तथापि उसका जीवन क्षण- भंगुर ही कहाता है । अहा ! खेदकी बात है कि इस विषयमें विधि भूल करता है ॥ १३ ॥ पत्रं नैव यदा किरीलविटपे दोषो वसन्तस्य किं नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम् । धारा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणं यत्पूर्व विधिना ललाटलिखितं तन्मा जिंतुकः क्षमः ।। ६४ ॥ जो करीन तसे पत्ते नहीं लाते तो इसमें वसन्तका क्या दोर हैं दिनमें जो उल्लूको दिखायी नहीं पड़ता तो इसमें मूर्यका क्या दोष है, चातकके मुख में जो जलकी धारा नहीं पड़ती तो इसमें मेघका क्या दोप है, ( इस से यह सिद्ध है कि ) जो कुछ विधाताने ललाटमें प्रथम ही लिख दिया है उसको कौन मिटा सकता है. ॥ १४ ॥ इति देवपशशा। अथ कर्मप्रशंसा। नमस्यामों देवान्ननु हतविधेस्तेऽपि वशगा ४६ महरिविरचितं- विधिर्वन्धः सोऽपि प्रतिनियतकमैक फलदः । फल कर्मायत्तंकिममरगणैः किंच विधिना नमस्त कर्मेभ्यो विधिरपि न येभ्यः प्रभवति । १५ !! हम देवताओंको नमस्कार करते हैं पर वे भी विधाता के वशमें हैं, हम विधिको नमस्कार करते हैं परन्तु विधाता भी कर्मके अनुसार ही फल देता है ( अर्थात् इसमें भी कुछ विशेषता नहीं है ) तो जब फल कर्मके अनुसार ही मिलता हैं तो हमें देवता या विधिनासे क्या काम ? अतएव हम कर्मको ही नमस्कार करते हैं (अर्थात् प्रधान मानते हैं) जिसपर विधाताका भी कुछ अधिकार नहीं हैं ॥ १५ ॥ ब्रह्मा येन कुलालवन्नियमितो ब्रह्माण्डमा ण्डोदरे विष्णन दशावतारगहने क्षिप्तो महा सङ्कटे । रुदो येन कपालपाणिपुटकै भिक्षाटनं कारितः सूर्यो भ्राम्यति नित्यमेव गगने तस्मै नमः कर्मणे ।। ६६ हम उस कर्म को नमस्कार करते हैं जिसने ब्रह्माको कुम्हारकी नाई (सृष्टि रचनेके लिये ) ब्राह्मण्डरूपी वर्तनके भीतर बन्द किया, जिसने विष्णुको दश अवतार लेकर वडे संकटमें डाला, जिसने शिवको हाथमें कपाल ले भीख मँग- नीतिशतकम्। ४७ वृक्षाः ॥ ६७ वायी और जिसनेमूर्यको नित्य आकाशमेभ्रमण कराया।॥६६॥ नैवाकृतिः फलति नैव कुल नशील विद्या पि नैव न च यत्नकृतापि मेवा । भग्यानि पूर्व तपसा खलु सञ्चितानि काले फलति पुरुषस्य यथैव मनुप्यकी सुन्दर आकृति फल नहीं देती और न उत्तम कुल, न शील और न विद्या और न वड़ यत्नसे की हुई सेवा । पूर्वजन्मकी तपस्यासे संचित किये हुए भाग्य ह वृक्षकी नाई मनुप्यको समयपर फल देते हैं ।। ६७ ॥ वने रणे शत्रु जलाग्निमध्ये, महार्णवे पर्वत मस्तके वा। सुप्तं प्रमत्तं विषमस्थितं वा, रक्षति पुण्यानि पुराकृतानि पूर्व जन्मके किये पुण्य ही वनमें, संग्राममें, शत्रुके मध्यमें, जलमें, अग्निमें, वड़े समुद्रमें, सोते हुए, असावधान और विपम अवस्थामै पुरुपकी रक्षा करते हैं ।। ६८ || या साधूंश्च खलान्करोति विदुषो मूर्खान्हि तान्दपिणः प्रत्यक्षं कुरुते परोक्षममृतं हालाहलं तत्क्षणात् । तामाराधय सस्त्रियां भगवतीं भोक्तुं भर्तृहरिविरचित- ..... फलं वाच्छितं हे माधो व्यसनैगुणेषु विपुलेवा स्थां वृथा मा कृयाः '६६ है माधो ! अपने वांछित फलका उपभोग करनेकेलिये उस सत्क्रिया रूपी भगवतीकी आराधना करो जो दुष्टोंको सज्जन, मूलोंको पण्डित, शत्रुओंको हितकारी परोक्षको प्रत्यक्ष (अर्थात् गुप्तको प्रगट) और विषको अमृत एकक्षणमें कर देती है । बहुतसे गुणोंके साधनमें हठ करके वृथा मत करो ॥ ६ ॥ गुणवदगुणवदा कुर्वता कार्यमादौ परिणति वधार्या यत्नतः पण्डितेन । अतिरभसकृतानां कर्मणामाविपत्तेर्भवति हृदयदाही शल्यतुल्यो वि पाक: । १०० पण्डितको चाहिये कि किसी भजे या बुरे कामको करनेसे पहले ही यत्नपूर्वक उसके परिणामको शिकार ले कि । अति शीघ्रतासे (बिना विचारे) किये हुए कार्यका फल मरण पर्यन्त हृदयको मर्मनें चुभेकांटेकी नाईदुःखदेता है||१०|| - स्थाल्यां वैदूर्यमय्यां पचति च लशुनं चन्दनै रिन्धनाद्यैःसौवर्णेलागलायौ विलिखति वसुधाम कमूलस्य हेतोः कृत्वा कर्पूरखंडान्वृतिमिह कुरुते
४६
नौतिशतकम् ।
कोद्रयाणां समन्तात्माप्येमां कर्मभूमिः चरति न
मनुजो यस्तपो मन्दभाग्यः । १०१ ।।
वह मन्द भाग्य पुरुप जो कर्मभूमिको प्राप्त कर (अर्थात्
इस संसारसे जन्म ले) तप नहीं करता वह (मानो) मरकत-
मणिके पात्रसे लहसुनको चन्दनके 'ईधनसे पकाता है और
अर्कतकी जड़ ( प्राप्त करने) की इच्छासे सोनेके हलसे
पृथ्वीको जोतता है, और कपूरके वृक्षोंको काट कर कोदो के
चारो ओर डाण बनाता है ।। १०१॥
मजुत्वम्भसि यातु मेरुशिखर शत्रूञ्जयत्वाहवे
वाणिज्यं कृषिसेवनादिसकला विद्याः कलाः शि
क्षिताम्।अाकाशं विपुल प्रयातु.खगवत्कृत्वा प्रय
लं परं नाभाव्यं भवतीह कर्मवशतो भाव्यस्य
नाशः कुतः।। १०२ ॥
मनुष्य चाहे जलमें गोता लगावे, चाहे मेरुके शिखर पर
चला जाय, चाहे शत्रुओंको संग्राम में जीते, चाहे व्यापार,
कृपि, सेवा इत्यादिकी विद्या और कलाओं को सीखे और
चाहे बड़ा प्रयत्न करके पक्षीकी तरह विपुल आकाशमें फिरे,
परन्तु वह अन होनी की होनी कर सकता (जो वात होने-
वाली हैं वह होहीगी) और जो कर्मवशं होनेवाली है सो
नहीं टलती ॥ ११२॥
५० भर्तृहरिविरचिट- भीमं वनं भवति तस्य पुरं प्रधानं सर्वोजनः सुजनतामुपयाति तस्य । कृत्स्ना च भुपयति सन्निधिरत्नपूर्णा यस्यास्ति पूर्वसुकृतं विपुलं नरस्य ।। १०३ ॥ जिस पुरुपके पूर्व जन्मके किये हुए) बहुत पुण्य हैं उसके लिये भयङ्ककर वन प्रधान नगर ( राजधानी) हो जाता है, सब लोगमित्र हो जाते हैं और सम्पूर्ण पृथ्वी भी सम्पूर्ण निधि और रत्नोंसे पूर्ण हो जाती ॥१०३॥ इति कर्मप्रशंला। अथ प्रत्यन्तर श्लोकाः। को लाभो गुणिसङ्गमः किमसुखं प्राज्ञतरेः सङ्गतिः का हानिः समयच्युतिनिपुणता का धर्म तत्वे रतिः । कः शूरो विजितेन्द्रियः प्रियतमा कानुनता किं धनं विद्या किं सुखमप्रवासगमनं राज्यं किमाज्ञाफलं ॥ १०४.॥ लाभ क्या है ? गुणियों की संगति, दुःख क्या है ? सूर्योका संग हानि क्या है ? समय पर चूकना, निपुणता नीतिशतकम्। ५१ क्या है ? धर्ममें प्रीति, शूर कौन है ?जिसने अपनी इन्द्रियोंको जीत ( वशमें कर) लिया है, प्रियतमा कौन है ? जो पति- बता है, धन क्या है ? विद्या मुख क्या है ? परदेश न जाना, राज्य क्या है ? अपनी प्राज्ञाका चलाना ॥१०४॥ मालतीकुसुमस्येव देगतीहमनस्विनः । मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य शीर्यते वन एव वा।।१०५ मनस्वी ( अर्थात् वीर ) पुरुषोंकी मालतीके फूलकी नाई दोही गति होती हैं-या तो वे सब लोगोंके मस्तकही- पर रहते हैं (सब उनका आदर करते हैं ) अथवा वनमें ही सूख जाते हैं ( जंगलमें जाकर शरीर त्यागते हैं ॥ १०५ ॥ अप्रियवचनदरिद्रः प्रियवचनान्यः स्वदार परितुष्टः । परपरिवादनिवृत्तैः क्वचित्क्वचिन्म- ण्डिता वसुधा ॥ १०६ पृथ्वीं कहीं कहीं ( अर्थात् सर्वत्र नहा ) एस पुरुपांसे शुशोभित होती हैं जो प्रिय वचनकी खान है, जिनकोअप्रिय वचनका दरिद्र हैं (अर्थात् जो अप्रिय कभी नहीं बोलते), जो अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट हैं और जो दूसरोंकी निन्दा से रहते हैं । १०६॥ कदर्थितस्यापि. हि धैर्यवृत्ते शक्यते धैर्य :
"पू२ Our भहरिविरचितं- गुणाः प्रमाष्टुम् । अधोमुखस्यापि कृतस्यवह नधिःशिखा याति कदाचिदेव ।। १०७ : धैर्यवान् पुरुप कैसे ही कष्टमें क्यों न पड़े परन्तु उसका. धीरज (धैर्यका गुण) नष्ट नहीं हो सकता । प्रज्वलित अग्निको उलट देनेपर भी उसकी ज्वाला. नीचेकी और कभी भी नहीं जाती ॥ १०७॥ कान्ताकटाक्षविशिखा न दहन्ति यस्य चित्तं न निर्दहति कोपकृशानुतापः । कर्षन्ति भूरिवि प्याश्व न लोभपाशैर्लोकत्रयं जयति कृत्स्नमिदं स धीरः ।। १०८।। वह धैर्यवान् पुरुप तीनों लोकको जीतता है जिसके हृदयको स्त्रियोंके वाण रूपी कटाक्ष नहीं छेदते, जिससे चित्तको क्रोधरूपी अग्निकी आँच नहीं जलाती. और नतो. नाना प्रकारके विपय ही लोभके फन्देमें फंसा कर खींचते है ॥ १०८ ॥ एकेनापि हि शूरेण पादाक्रान्तं महीतलम् । क्रियते भास्करेणैव परिस्फुरित तेजसा : १०! जिस प्रकार सूर्य अपने देदीप्यमान तेजसे ( सारे जग तको प्रकाशित करता है.) उसी प्रकारसे एक ही शूरपृथ्वी ५३ नीतिशतकम्। तलको (अपने पराक्रमसे) पाँवतले दवा लेता हैं ( अर्थात् वशमें कर लेता है ।। १०६ ।। वह्निस्तस्य जलायते जलनिधिः कुल्यायते तत्क्षणान्मेरुःस्वल्पशिलायते मृगपतिः सद्यः कुर गायते । व्यालो माल्यगुणायते विपरसः पीयूप वर्षायते यस्याङ्गविललोकवल्लभतमं शीलं समु न्मीलति ।।११०॥ जिस पुरुपके अंगमें संपूर्ण जगत्को मोहनेवाला शील विद्यमान है उसको अग्नि जलके समान, समुद्र अल्प नदीके समान, मेरु पर्वत छोटीसी पहाड़ीके समान, सिंह मृगके समान, पुप्पमाला के समान और विप भी अमृतकी के समान ज्ञात होता हैं ॥ ११० ॥ लज्जागुणौघजननीजननीमिवस्वामत्यन्तशु द्धहृदयामनुवर्तमानाम् । तेजस्विनः सुखम सूनपि संत्यजन्ति सत्यव्रतव्यसनिनो न पुनः प्रतिज्ञाम् ॥ १११॥ लज्जा इत्यादि गुणोंके समुदायको उत्पन्न करनेवाली और अपनी जननीके समान शुद्ध हृदय और स्वाधीन रहने- वाली प्रतिज्ञाको सत्यनतको धारण करनेवाले तेजस्वीमनुष्य सर्प *
५४
भर्तृहरिविरचितं-
कदापि नहीं छोड़ते परन्तु अपना प्राण भी सुखसे त्याग
देते हैं ।। १५१॥
इति श्रीमद्भर्तृहरि विरचितं नीनिशनक समाप्तम् ।
विविधविषयक श्लोकाः ।
अग्राह्य हृदयं यथैव बदनं यदर्पणान्तर्गतं
भावः पर्वतसूक्ष्ममार्गविषयः स्त्रीणां न विज्ञायते।
चित्तं पुष्करपत्रतीयतरलं विद्धिराशंसितं नारी
नाम विषांकुरैखि लता दोषःसमंवर्धिता॥११२||
स्त्रियोंके हृदयदर्पणमें अन्तर्गत मुखकी नाई ग्रहण नहीं
किये जा सकते, उनके भाव पर्वतके मूक्ष्म मार्गकी नाई
दुर्गम हैं और जाने नहीं जा सकते, पंडितोंने उनका चित्त
कमल पत्रपर पड़े हुए जलके समान चंचल बताया है, इन
दोपोंसे संवर्धित स्त्री उस लताकी नाई है जिसमें विपके
अंकुर उगते हैं ।। ११२ ॥
अभिमुखनिहतस्य सतस्तिष्ठतु तावज्जयोथ
वा स्वर्गः । उभयवलसाधुवादः श्रावणसुखोसौ
वतात्यर्थम् : ११३ ॥
५५ नीतिशतकम्। शत्रुके अभिमुख आक्रमण करनेमें व्रणित (घायल) शूर जयको पाता है अथवा स्वर्गको, इस वार्ताको छोड़ दो। दोनों सेनाओंकी प्रशंसा ही सत्यमें कानोंको सुख देती ॥ ११३ ॥ इयत्येतस्मिन्वा निरवधि चमत्कृत्यतिशयो वराहो वा राहुः प्रभवति चमत्कारविषयः । मही मेको ममां यदयमवहद्धन्त सलिलं शिरः शेषः शत्रु निगलति परः संत्यजति च ।। ११४ ।। वराह और राहु ही अत्यन्त अद्भुत पदार्थोके समूहमें चमत्कारका विषय है क्योंकि वराहने ही जलमें डूवती हुई पृथ्वीको धारणा किया और राहु जिसका शिर ही वचगया है शत्रु (सूर्य) को निगल जाता है और फिर उगल देता है ॥ ११४ ॥ उदन्वच्छन्नाभूः स च निधिरपां योजनशतं सदा पान्थः पूषा गगनपरिमाणं कलयति । इति प्रायो भावाः स्फुरदवधिमुद्रामुकुलिताः सतां प्राज्ञो न्मेषः पुनरयमसीमा विजयते !,११५॥ यह पृथ्वी समुद्रसे घिरी है, और यह जल समुदाय, सैकड़ों योजनों तक आकीर्ण है, सूर्य भी सदा सम्पूर्ण गगन भर्तृहरिविरचित- पर्यन्त भ्रमण करता है। इस प्रकारसे प्रायः सभी वस्तु अवधिकी मुद्रासे मुकुलित है (अर्थात् सब वस्तुओंके संचा लन अथवा स्थितीके मार्ग संवद्ध हैं ) परन्तु यह सज्जनोंकी बुद्धिका नेज असीम ( सीमा रहित) है ॥ ११५ ॥ कमठकुलाचलदिग्जफणिपतिवितापि चल ति वसुधेयम् । प्रतिपन्नममलमनसां न चलति पुंसां युगान्तेपि ॥११६॥ यह वसुधा कूर्मसे, ( सात ) मुख्य पर्वतोंसे, (आठ दिग्गजजोंसे और शेपनागसे धारण किये जानेपर भी चला. यमान ही है । परन्तु शुद्ध अन्तःकरण वाले पुरुषोंके ब्यव- साय युगान्तमें भी चलायमान नहीं होते अर्थात् स्थिर ही रहते हैं।। ११६॥ परिचरितव्याः सन्तो यद्यपि कथयन्ति न सदुपदेशम् । यास्त्वेषां स्वैरकथास्ता एव भवन्ति शास्त्राणि ॥११७॥ यद्यपि सज्जन लोग किसी विपयपर) भले उपदेशन भी दें तो भी उनकी सेवा करना चाहिये क्योंकि इनकी अकस्मात् कही कथा भी शास्त्र (की नाई पूजनीय) होती है ।। ११७ ॥
·५७' नीतिशतकम्। प्रायः कन्दुपातेनोत्पतत्यार्यः पतन्नपि । तथा वनार्यः पतति मृत्पिण्डनं यथा ।।११८.. सज्जन पुरुपका पात (गिरना ) मायः गेंदके समान होता है ( अर्थात् विपत्तिमें पड़कर भी वे शीघ्र ही सुखकी अवस्थाको प्राप्त करते. हैं ) परन्तु अनार्यका पात मिट्टीके ढेलेके समान होता है (जो गिर कर जहाँका तहाँ ही रह जाता है ॥ ११८ ॥ यदि नाम दैवगत्यां जगदसरोज कदाचिदपि जातम् । अवकरनिकरं विकरति तकिं कृकवा कुखि हंसः ॥११॥ यदि केदाचित् यह संसार दैन गतिसे कमलरहित हो जाय तो क्या हंस कुक्कुटकी नाई धूल आदिके समूहको (चोंचसे ) खुलेडेगा [ भाव यह है कि सज्जन लोग वड़ीसे बड़ी आपत्तिमें पड़कर भी नीच कर्म नहीं करते ] ॥११॥ यन्नागा मदभिन्नगण्डकरहास्तिष्ठन्ति निद्रा लसा द्वारे हेम विभूषणाश्च तुरगावल्गन्ति यद्द पिता वीणावेणुमृदङ्गशङ्खपटहैः सुत्पस्तुयद्धोध्यते तत्सर्वसुरलोकदेवसदृशंधर्मस्यविस्फूर्जितम्॥१२० 'जव मत्तं हाथी.जिनके. गंडस्थल मदजलसे अङ्कित हैं ५. भर्तृहरिविरचितं- . निद्राके आलस्यमें पड़े रहते हैं, तभी उनके द्वारपर गवीले सोनेके आभूषण युक्त घोड़े हिनहिनाते हैं और जव वीन, बाँसुरी, मृदङ्ग, शंख और नगाडेका शब्द होता है तभी सोये हुए मनुष्य जाग जाते हैं तो यह सवसुरपतिके समान धर्मका आविष्कार है ॥ १२० ॥ ये सन्तोपनिरन्तरप्रमुदितास्तेषां न भिन्ना मुदो ये त्वन्ये धनलोभसंकुलधियस्तेषां न तृष्णा हता । इत्थं कस्य कृते कृतः स विधिना ताह पदं संपदां स्वात्मन्येव समाप्तहेममहिमा मेरुन मे रोचते “१२१॥ जो लोग सदा सन्तोपसे ही प्रसन्न रहते हैं उनको हर्ष में कभी विघ्न नहीं होता लोगोंका मन सदा धनके लोभहीमें व्याप्त रहता है उनकी तृष्णा कभी हत नहीं होती (अर्थात् उनकी लोभकी प्यास कभी नहीं बुझती) जव ऐसी स्थिति है तो ब्रह्माने सर्व सम्पति के घरवाले मेरु पर्वत को जिसके सुवर्णकी महिमा अपनेहीमें समाप्त होती है (अर्थात् जिस संपत्तिको संतुष्ट लोग नहीं चाहते और जिससे लोभियोंकी तृष्णा नहीं जाती) फिर किसके लिये बना है। मुझे तो पर्वत नहीं अच्छा लगता ॥ १२१ ॥ रक्तत्वं कमलानां सत्पुरुषाणां परोकारित्वम्।
18 नीतिशतकम् । असतांच निर्दयत्वं स्वभावसिद्धत्रिपुत्रियम्।११२॥ कमल में लाली, सत्पुरुषों में परोपकार और दुप्टोंमें निर्दयता ये तीनोंमें स्वभावसे ही वर्तमान रहते हैं ॥१२॥ वाचोहि सत्यं परमं विभूषणं गजाङ्गनायाः कृशता कटौ च । द्विजस्य विद्यचैव पुनस्तथा क्षमा शीलं हि सर्वस्य नरस्य भूषणम् ॥१२३।। वाणी ही सत्यमें सवका उत्तम भूपण है, गजगामिनी स्त्रियोंकी कटिकी दुर्बलता, द्विजोंकी विद्या और इसके अति रिक्त क्षमा और शील सव पुरुपोंका भूपण है ॥ १२ ॥ वरं तुङ्गाच्छृङ्गाद्गुरुशिखरिणः क्वापि विषमे पतित्वायं कायः कठिनहपदन्तैर्विदलितः । वरं न्यस्तो हस्तः फणिपतिमुखे तीब्रदशने वरं वह्नौ पातस्तदपि न कृतः शीलविलयः ॥१२४॥ यह शरीर बड़े पर्वतकी ऊंची चोटीपरसे कठिन और चोरवे चट्टानोंपर गिरकर टुकड़े टुकड़े हो जाय तो भलाहै इस हाथको तीन डंसनेवाले सर्पराजके मुंहमें देना भला है और अग्निमें गिर कर प्राण देना भला है परन्तु शीलको भ्रष्ट करना मनुप्यके लिये अच्छा नहीं ॥ १२४ ॥ विस्मविरसायासादस्माद्दुरध्यवसायतो विप
..
६०
भर्तृहरिविरचितं-
दि महतां धैर्य ध्वंसं यदीक्षितुमीहसे । अपिजड
मते कल्पापाये व्यपेत निजक्रमः कुलशिखरिणः
क्षुद्रा नैते नवाजलराशयः .१२५ !
हे जड़मति । यदि तुम महान् पुरुषोंको विपत्तिमें भी
धैर्यके नाश होनेको देखना चाहते हो तो इस कठिन व्यवं-
सायको छोड़ दो (क्योंकि ) इससे तुम्हारा अर्थ सिद्ध
नहीं हो सकता (तात्पर्य यह है कि सज्जन लोग आपत्निमें
भी अपना धैर्य कभी न छोड़ेंगे जो तुम इनको अधीर देख
सकोगे) क्योंकि ये बड़े पर्वतके समान जुद्र नहीं हैं कि
जिनका क्रम कल्पान्तमें नष्ट हो जायगा और न ये समुद्र हैं
(अर्थात् कल्पान्तमें नाश हो जानेके कारण कविने वृहत्प
र्वतों और समुद्रको यहाँ क्षुद्र कहा है)॥ १२५ ॥
स्पृहयति भुजयोरन्तरमायत करवालकररुह
विदीर्णम् । विजयश्रीर्वीराणां व्युत्पन्नप्रौढवनि .
तेन ।। १२६॥
विजयलक्ष्मी व्युत्पन्न ( कामशास्त्रमें प्रवीण ) और
यौवन माप्त सुन्दरी की नाई वीर लोगोंके खग रूपी नखोंसे
विदीर्ण वक्षः स्थलकी आकां करती है (स्त्रीपक्षमें "कर-
वालकररुहविदीर्ण, का अर्थ है-"कोमल नख, अथवा कर-
बालके समान नख,,)॥ १२६ ॥
नोतिशतकम् ।. ६१ अथ शृंगारशतकम् । मंगलाचरणम् । शम्भु स्वयंभुहरयो हरिणेक्षणानां येनाक्रिय न्त सततं गृहकर्मदासाः ॥ वाचामगोचर चरित्र विचित्रिताय तस्मै नमो भगवते।कुसुमायुधाय।।१।। हम उस भगवान् कुसुमायुध ( कामदेव.)को नमस्कार करते हैं जिनका चरित्र विचित्र होनेके कारण वाणीसें वर्णन नहीं हो सकता और जिन्होंने शिव, ब्रह्मा. और विष्णुको भी गृहकर्म ( करनेके लिये स्त्रियों) के लिये दास वना रक्खा है ॥१॥ अथ स्त्री प्रशंसा। स्मितेन भावे नच लज्जया भिया पराङ्मुखैर कटाक्षवीक्षणेः। वचोभिरीष्ाकलहेन लील या समस्तभावः खलु बन्धनं स्त्रियः ॥ २ ॥ स्त्रियाँ मन्द मुसकानेसें, हाव भावसे, भीति ( भय प्रकट करने)-से,मुख फेर लेनेसे, अर्धकटाक्षसे देखनेसे, मधुर ६२ भर्तृहरिविरचितं- अर्थ नेत्रसे कटाक्ष करना, वचन बोलने से, ईर्षा, कलह और लीलासे इन समस्त भाषासे निश्चय करके ( पुरुषकी ) बन्धन स्वरूप ही हैं ॥२॥ भ्रचातुर्याकुञ्चिताक्षाः कटाक्षाः स्निग्धा वाशे लज्जिताश्चैव हासाः । लीलामन्दं प्रस्थितं च स्मितं च स्त्रीणमेतद्भुषणं चायुधं च ।। ३ भौहें फेरनेकी चतुरता, मधुर बोलना, लज्जित होकर हँसना, लीलासे मन्द मन्द चलना और ठहर जाना, ये स्त्रियोंके भूपण और शस्त्र हैं अर्थात् इन्हीं गुणोंसे स्त्रीकी शोभा है और इन्हीं शस्त्रों से ये पुरुषोंको मारती हैं ।। ३ ॥ कचित्सुम्रभङ्गः क्वचिदपि च लजापरिणतः कचिद्भीतित्रस्तैः क्वचिदपि च लीलाविलसितैः । नवोढानामेभिर्वदनकमलैत्रचलितैः सुरनीला जानां प्रकरपरिपूर्णा इव दृशः ॥ ४ ॥ नवयुवा स्त्रियोंकी दृष्टि, कभी सुन्दर भौंहेटेढी करनेसे, कभी लज्जाके वश शिर झुकानेसे, कभी भयभीत होनेसे, कभी लीलामय विलास करनेसे, कमल सरीखे (सुन्दर ) मुखोंसे और नेत्रोंकी चंचलतासे, देदीप्यमान कमलोंके समुदायकी नाई परिपूर्ण देख पड़ती हैं। ( जिस प्रकार ..
नीतिशतकम् । फूले हुए कमलों पर भ्रमरका समुदाय शोभाको बढ़ाता है उसी तरह सुन्दर स्त्रियोंकी चंचल दृष्टि उनकी शोभाको और भी अधिक कर देती है)॥४॥ वक्त्रं चन्द्रविकासि पङ्कजपरीहासक्षम लोचने वर्णः स्वर्णमपाकरिष्णुरलिनीजिष्णुः कचाना ञ्चयः। वक्षोजाविभकुम्भसंभ्रमहरौ गुर्वी नित म्वस्थली वाचां हारि च मार्दवं युवतिषु खाभा विकं मंडनम् । ५ चन्द्रमाके समान उज्वल मुख, कमलको हँसानेवाले नेत्र, सुवर्ण की चमकको मन्द करने वाली शरीरकी कान्ति, भ्रमरियोंके समुदायको जीतनेवाले केशसमूह, गज मस्तककी शोभाको हरनेवाले स्तन विशाल दोनों नितंव और मनको हरनेवाली कोमल वाणी-वे सब स्त्रियोंके स्वाभाविक भूपण हैं ॥५॥ स्मितं किञ्चिद्वक्त्रे सरलतरलो दृष्टिविभवः परिस्पन्दो वाचामभिनवविलासोक्तिसरसः गती- नामारम्भः किसलयितलीलापरिकरः स्पृशंत्या स्तारुण्यं किमिह नहि रम्यं मृगहशः ॥ ६ ॥ मुखपर मन्द मुसकान, सीधे और चंचल नेत्रोंकी छटा, ६४ मत हरिविरचित नये नये विलासोक्ति.सरस बात करना और लीलासे नवीन पत्तेके समान मन्द मन्द गनिका आरम्भ करना इत्यादि यौवन चढ़नेपर मृगनयनीके कौनसे हाव भाव मुन्दर नहीं होने ? ॥६॥ दृष्टव्येपु किमुत्तमं मृगदृशां प्रेमप्रसन्न मुखं प्रातव्येष्वपिकिंतदास्यपवनः श्राव्येषु किं तद्वचः। किं स्वायेषु तदोष्ठपल्लवरसः स्पृश्येषु किं तत्तनुध्येय किं नवयौवनं सुहृदयैः सर्वत्र तद्विभ्रमः । ७ असक्त पुरुषकि देखने योग्य कौनसी उत्तम वस्तु है ? मृगनयनीका प्रमसे प्रसन्न मुम्ब, घनेमें कौन सी ? उनके मुखकी भाफ; मुनने कौन सी ? उनका (मधुर) वचन स्वादिष्ट पदाथों में कौन मी ? उनके अधर पन्लवका रस; स्पर्श करनेमें कौन मी ? उनका शरीर और ध्यान करने योग्य कौन मी बस्नु है ? उनका यौवन और विलास ॥७॥ एताः स्खलदलयसंहतिमेखलोत्थ झकारनूपु रस्वाहतराजहंस्यः । कुर्वन्ति कस्य न मनो विवशं तरुण्यो वित्रस्तमुग्धहरिणींसदृशैः कयाः १.८॥ ये नवयुवती जिन्होंने अपने कंकणों के शब्दसे; जुद्र घंटिका ( धुंघुरु) की ध्वनि और नुपुर (पैजनी ) की झन FEATURE AAJLADAsi नीतिशतकम् । ६५ ..... करके राजहंसिनियोंकी चालको जीत लिया है, हरिणी के समान नेत्रपात करके किसके मनको विवश (चलायमान) नहीं कर देती ॥ - ॥ कुंकुमपङ्ककलङ्कितदेहा गौरपयोधरकम्पितहा रा। नूपुरहंसरणत्पदपद्मा कं न वशीकुरुते भुवि रामा। 8 ! संसारमें किसको ऐसी मुन्दर स्त्री वशीभूत नहीं कर लेती जिनकी देह केशर और चन्दनसे शोभित है, जिनके गोरे स्तनोंपर हार झूल रहा है और जिनके चरण कमलोंमें नूपुर रूपी हंस शब्द कर रहे हैं ॥ ६ ॥ नूनं हि ते कविवराः विपरीतबोधा ये नित्य माहुखला इति कामिनीनाम् । याभिर्विलोलतर तारकदृष्टिपातः शक्रादयोऽपि विजितास्त्ववलाः कथं ताः ॥ १० । वे श्रेष्ठ कवि निसन्देह उलटी बुद्धिके हैं जो स्त्रियोंको सदा "अवला' [अ+वल =जिसको वल नहीं है।] कहा करते हैं। भला जो (स्त्रियाँ) अपनी' चंचल पुतलियों के कटाक्षसे इन्द्र इत्यादिको भी जीत लेती हैं ( अर्थात् स्वाधीन कर लेती हैं) वे अवला कैसे हो सकती हैं ॥१०॥ ५ ६६ भर्तृहरिविरचित- नूनमाज्ञाकरस्त या सुभ्रुवो मकरध्वजः। यतस्तन्नेत्रसंचारसूचितेषु प्रवर्तते ॥ ११ ॥ मकरध्वज( कामदेव) निःसन्देह मुन्दर भौंहवाली स्त्रियों का अाज्ञाकारी सेवक है क्योंकि जिसकी ओर वह नेत्र फेरता है आँख से संकेत करता है ) उसको ये अपने वशमें कर लेती हैं ॥ ११॥ केशाः संयमिनः श्रुतेरपि परं पारं गते लो चने अन्तर्वक्त्रमपि स्वभावशुचिभिःकीर्ण विजानां गणैः । मुक्तानां सतताधिवासरुचिरं वक्षोजकुम्भ द्वयमित्यं तन्वि वपुः प्रशांतमपि ते क्षोभं करो त्येवनः 1. १२ ॥ हे कृशाङ्गि ! तेरा शरीर, जिसमें केश्य सँवारे हुए हैं, नेत्र कानसे भी पार चले गये हैं ( अथात् अति विशाल हैं), मुखका अन्तर्भाग भी स्वभावहीसे स्वच्छ दातोंकी पङिक्तिसे भरा है, कुम्भकी नाई ( अर्थात् विपुल ) दोनों स्तन निरं- तर मॉतियोंके वाससे ( सदा-मोतियोंकी माला पहिरनेसे) शोभायमान हैं, शान्त होकर भी मुझे वजित करते हैं (अनुराग उत्पन्न करता है)॥ १२ ॥ मुग्धे धानुष्मता केयमपूर्वा लयि दृश्यते ।
नीतिशतकम्। द यदाहरसि चेतांसि गुणैरेव न सायकैः ॥ १३ ॥ है मुन्दरि ! तेरी यह धनुप-विद्या, चतुरना अद्भुत ही देख पड़ती है, जो गुण (प्रत्यंचा) अथात् चतुरताई से ही चित्तको हरण करती है, बाणांस नहीं ।। १३ ।। सति प्रदीपे सत्यग्नो सत्सु तारावीन्दुषु । विनामे मृगशावाल्या तमोभूतमिदं जगत्।।१४॥ दीपक, अग्नि, तारे, मूर्य और चन्द्रमा, इन सबके रहनेपर भी (एक ) मेरी मृगनयनी विना यह संसार अंधरा है ।। १४॥ यदत्तः स्तनभार एपतरले नेत्रेचले भ्रलते । रागान्धेषु तदोष्ठपल्लवमिदं कुर्वन्तु नाम व्यथाम्। सौभाग्याक्षरपंक्तिरेख लिखिता पुष्पायुधेन स्वयं मध्यस्थापि करोति तातमधिक रोमावली केन सा ।। १५ ॥ (हे कामनि) उन्नत कुचोंका भार, चंचल नेत्र, चलायमान भ्रकुटी और ये तेरे अधरपल्लव यदि मदान्धोंको पीड़ा दें तो दें क्योंकि ये सौभाग्यके अक्षरोंकी पंक्ति है जिनको कामदेवने ( तेरेललाटमें ) लिख दिया है, परन्तु यह मध्यस्थ रोमावली क्यों अधिक ताप करती है [सारांश
भतृहरिविरचितं-
यह है कि उन्नत, वंचल और रागवान् सदा पीड़ा देते हैं
परन्तु मध्यस्थको तो ऐसा न करना चाहिये ] ॥ १५ ॥
गुरुणा स्तनभारेण मुखचन्द्रेण भास्वता ।
शनैश्चराभ्यांपादाभ्यां रेजे ग्रहमयीव सा ॥१६॥
वह स्त्री स्तनोंके भारसे गुरु, प्रकाशवान् मुखसे चंद्र,
और दोनों चरणोंसे मन्दगामी ( शनैश्चर ), ऐसी ग्रह मयी
शोभायमान हैं ॥ १६ ॥
तस्या स्तनौयदि घनौ जघनं विहारि वक्त्रं
च चारु तव चित्त किमाकुलत्वम् । पुण्यं कुरुष्व
यदि तेप तवास्ति वाञ्छा पुण्यर्विना न हि
भवन्ति समीहितार्थाः ।। ५७ ।।
हे चित्त ! यदि उस स्त्रीके स्तन कगेर हैं, जघन विहार
करने योग्य हैं ओर मुख सुन्दर है तो ( एसी स्त्रीको देख
कर) तू क्यों व्याकुल होता है ? यदि इनमें ( इनको प्राप्त
करनेमें ) तेरी इच्छा हो तो पुण्य कर क्योंकि पुण्य विना
मनोरथ सिद्ध नहीं होते ॥ १७ ॥
मात्सर्यमुत्सार्य विचार्य कार्यमार्याः समर्या
दमिदं वदन्तु । सेव्या नितम्वाः किल भूधराणा
मुत स्मरस्मेरविलासिनीनाम् ॥ १८ ॥
६४
नीतिशतकम् ।
हे श्रेष्ठ पुरुषों ! मत्सरताको त्याग और मर्यादा सहित
विचार कर ( भला यह तो कहो कि पर्वतके नितंव
(मध्यभाग से दने योग्य हैं अथवा कामदेवके उमंगसे मुसु.
काती हुई कमिनीके नितंब ( कटि पश्चात् भाग) सेवन
योग्य हैं ॥१८॥
संसारेऽस्मिन्नसारे परिणतितरले गती पण्डि
तानांतत्वज्ञानामृतास्भःप्लुप्तलुलित धियां यातु
कालः कदाचित् । नो चेन्मुग्धांगनानां स्तनजघ
नभराभोगसंभोगिनीनां स्थूलोपस्थस्थलीषु स्थ-
गितकरतलस्पर्शलीलोधतानाम् ।।६ ||
इस असार संसारमें जिसकी अंत अवस्था चंचल है,
(अर्थात् जो अंतमें नाश होनेवाला है) पंडितोंकी दोही
गति उत्तम ) हैं। या तो उन लोगोंका समय अच्छी तरह
व्यतीत होता है जिनकी निर्मल बुद्धि अमृत रसमें स्नान
करनेवाली है, अथवा उनका जो अपने पुष्ट स्तन और जघ-
नसे भोग सुख देनेवाली स्त्रियोंके शरीर पर हाथ दिये
चंचलतासे उद्योग करते हैं ।। १६ ।।
सुखेन चन्द्रकान्तेन महानीलैः शिरोरुहैः।
पाणिभ्यां पद्मरागाभ्यां रेजे रत्नमयीव सा॥२०॥
ta य भर्तृहरिविरचितं- वह स्त्री चन्द्रकान्त ऐसे मुखसे, महानील ऐसे केशोंसे और पदमराग ऐसे हस्त युगलासे रत्नोंके समान शोभायमान होती है ( ये तीनों रत्न विशेष हैं ॥ २० ॥ संमोहयन्ति मदयन्ति विडयम्वयन्ति निर्भ संयन्ति रमयन्ति विपादयन्ति । एताः प्रविश्य सदयं हृदयं नराणां किं नाम वामनयना न समाचरन्ति ।। २१ ॥ मुन्दर नेत्रवाली खियाँ मनुष्यों के दयायुक्त हृदय में प्रवेश करके (उनको) मोह लेती हैं, मत्त कर देती हैं, उनकी विडंवना करती और उनको डाटती हैं, उनको रममाण कराती और ( अपने वियोगसे ) उनको विपाद देती हैं- फिर क्या रहा जो ये नहीं करती? ॥२१॥ विश्रम्य विश्रभ्य वनदुमाणां छायासु तन्वी विचचार काचित् । स्तनोत्तरीयेण करोद्धृतेन निवारयन्ती शशिनो मयूखान् ॥ २२ ॥ वनके वृक्षांकी छाया वारंवार विश्राम लेती हुई कुशाङ्गी, हाथसे अपने अंचलोंको (स्तनोंके ऊपरके साड़ी के भागको) हाथमें उठाये और उससे चद्रमाके किरणोंको रोकती हुई जा रही है [ यह कृष्णभिसारिकाका लक्षण है ] ॥ २२ ॥ इति स्त्रीप्रशंसा ७१ नीतिशनकम्। अथ भोगादि लक्षणम् । अदर्शने दर्शनमात्रकामा दृब्वा परिष्वं गरसैकलोलाः। प्रालिंगितायाः पुनरायताच्या- माशास्महे विग्रहयोरभेदम् ।। २३ ।। (हम जब तक किसी।) मृगनयनी (जिसके सौन्दर्य इत्यादिका वर्णन सुन लेते हैं ) नहीं देखते तव केवल उसके देखनेहीकी इच्छा रहती है, देख कर आलिंगनके रसकी लालसा रहती है और आलिंगन करनेपर यही अभिलाषा रहती है कि यह हमारे शरीरसे अलग न हो ॥ २३ ॥ मालती शिरसि जृम्भणोन्मुखी चन्दनं वपुषि कुंकुमान्वितम् । वक्षसि प्रियतमा मनोहरा स्वर्ग एष परिशिष्ट भागतः ॥ २४ ॥ माथेमें शीघ्र ही खिलानेवाले मालतीकी माला पहिने हो, केसर युक्त चंदन शरीरमें लगा हो और प्यारी वक्षः- स्थलसे लिपटी हो तो जानो कि स्वर्गका बचा हुआ सुख यहीं आ गया है ।॥ २४ ॥ प्राङ्मामेति मनागमामितगुणं जाताभिलाषं ततः सबीडं तदनुश्लथोद्यतमनुप्रत्यस्तधैर्य पुनः। प्रेमाईस्पृहणीयनिर्भररहःक्रीडाप्रगल्भं ततो निः ७२ भर्तृहरिरिचित शंकाङ्गविकर्षणादिकसुखंस्म्यं कुलस्त्रीरतम् ॥२५॥ कुल वधूहीसे रति अच्छी होती है जिनमें. पहिले एक "वार नहीं नहीं,, करना, फिर अभिलावा उत्पन्न होना, फिर लज्जा सहित शरीरको ढीला कर देना, फिर धैर्य त्याग देना, प्रेम रसमें सराहने योग्य एकान्त क्रीडाका चातुर्य प्रगट करना और फिर निडर होकर अंग खींचने का अधिक सुख लाभ करना इत्यादि मनोहर गुण होतेहैं।।२।। उरसि निपतितानां स्वस्तधम्मिल्लकानांमुकु लितनयनानां किंचिंदन्मीलितानाम् । सुरतजनि तखेदस्विन्नगण्डस्थलीनामधरमधु वधूनां भाग्य वन्तः पिवन्ति ।। २६ । छातीपर लेटी हुई, जूड़ा खुली हुई, प्राधे नेत्र जिनके मुंदेहुए हैं और कुछ कुछ हिल रहे हैं और मैथुनके श्रमसे जिनके गालोंपर पसीना झलक रहा है-ऐसी स्त्रियोंका अधरामृत भाग्यवान ही पुरुष पान करते हैं ॥२६॥ आमीलितनयनानां यः सुरतरसोऽमुसंविदं कुरुते । मिथुनैमिथोऽवधारितमवितथमिदमेवका मनिर्वहणम् ! २७॥ आलस्यसे भरे हुए नेत्रवाली स्त्रियोंका कामसे तृप्त होना ही स्त्री-पुरुष दोनोंका परस्पर कामका पूजन है।।२७॥
७३ नीतिशतकम्। इदमनुचितमक्रमश्च पुसां यदिह जरास्वपि मन्मथा विकाराः । यदपि च न कृतं नितम्बि नीनां रतनपतनावधि जीवितं स्तं वा " २८ । विधिनाने यह अनुचित और उलटा किया है कि पुरु. षोंको बुढ़ापेमें भी कामका विकार होता है ऐसा ही स्त्रियोंको न किया कि जब तक उनके स्तन न गिरें तभी तक जीयें और कामकी, इच्छा रक्खें ॥ २८ ॥ एतत्कामफलं लोके यद्वयोरेकचित्तता । अन्यचित्तकृते कामे शवयोखि संगमः ॥ ६ ॥ संसारमें स्त्री और पुरुष दोनोंका एक चित्त किसी दूसरी ओर रहा तो संगम मृतक के समान होता है ।।२।। प्रणयमधुराःप्रेमोगाढा रसादलसास्तथा भणि तमधुरा मुग्धप्रायाः प्रकाशितसमदाः । प्रकृतिसु भगा विश्रंभाऱ्या स्मरोदयदायिनो रहसि किमपि स्वैरालापा हरन्ति मृगीदृशाम् .. ३० ॥ मृगनयनियों की सुशीलता से मधुर, प्रेम से ढीले, (भृगारआदि) रससे आलस्य युक्त, सुननेमें मधुर, अव्यक्त आनन्द प्रकाश करनेवाले स्वभावही से सुन्दर और विश्वासके ७४ महरिविरचित- है योग्य, और कामको उत्पन्न करनेवाले स्वच्छन्द वाक्य एका न्तमें मनको हर लेते हैं ॥ ३० ॥ श्रावासः क्रियतांगाङ्ग पापवारिणि वारिणि। स्तनमध्ये तरुण्यावामनोहारिणि हारिणि ३१ पुरुष ! या तो गंगाजीके पाप हरनेवाले तटपरवास करना उत्तम है अथवा मनोहर हारयुक्त तरुणीके स्तनोंके मध्यमें वास करना श्रेष्ठ है ॥ ३१॥ प्रियपुरतो युवतीनां तावत्पदमातनोतु हृदि मानः । भवति :न यावच्चंदनतस्सुरभिनिर्मलः पवनः ॥ ३२ ॥ प्रियके आगे युवती स्त्रियोंका मान हृदयमें तभी तक पैर फैलाता है ( अर्थात् हृदयमें मान ठहरता है ) जब तक कि चन्दन वृक्षको सुगन्धित निर्मल वायु नहीं चलती॥३२॥ इति भोगादि लक्षणम् । अथ वसन्तऋनुवर्णनम् । परिमलभृतो वाताः शाखा नवांकुरकोटयो मधुर विरतोत्कण्ठा वाचः प्रिया पिकपक्षिणाम् ।
শানিমজ্জন। ७५ विरलसुरतस्वेदोद्वारा वधूवदनेन्दवःप्रसरति मधौ रात्र्यं जातो न कस्य गुणोदयः ॥३३॥ सुगन्धयुक्त वायु चल रही है, फोंकी शाखाएँ नये अंकुरोंसे पूर्ण हैं, कोकिल आदि पतियोंकी उत्कण्ठाभरी मधुर वाणी सुन्दर जान पड़ती है और स्त्रियोंके चन्द्र समान मुख रति के श्रमसे निकले पसीनेके वृंदोंसे शोभित हो रहे हैं, ऐसी वसन्त ऋतु की रात्रिमें किस पदार्थमें गुण उत्पन्न नहीं होते ? ॥ ३६॥ मधुस्यं मधुरैरपि कोकिला, कलकलैर्मलय स्य च वायुभिः । विरहिणः पणिहन्ति शरीरिणो विपदि हन्त सुधापि विषायते ।। ३४ ॥ यह (निर्जीव ) वसन्त ऋतु, कोकिलोंके मधुर कलकल (शब्द) से, और मलयाचलकी वायुसे शरीरधारी भी विरही पुरुपोंका वध करता है तो बड़े कष्टकी बात है कि अमृत भी आपत्तिमें विष हो जाता है ।। ३४॥ आवासःकिल किंचिदेव दयितापावें विला सालसः कर्णे कोकिलकाकलीकलखः स्मेरो लतामण्डपः । गोष्ठी सत्कविभिः समं कतिपयैः
भर्तृहरिविरचितं-
सेव्याः सितांशोः कराः कषांचित्सुखयन्ति नेत्र
हृदये चैत्रे विचित्राः क्षपाः :: ३५ है।
किलकिंचत् भाव (जिसमें क्रोध, अश्र पात; हर्ष
इत्यादि भाव एक ही समयमें होते हैं) से विलाससे शिथिल
हो दयिताके पास रहना, कानेसे कोकिलोंकी कलकलाहट
भुनना, अच्छे कवियोंसे वार्तालाप करना और चाँदनीका
सेवन करना ( सुख उठाना ) इन सामग्रियों से चैत्र मासकी
विचित्र रात्रियाँ किसी पुण्यवान हीके हृदय और नेत्रोंको
सुख देती हैं॥ ३५॥
पान्थस्त्रीविरहानलाहुतिकथामातन्वतीमञ्जरी
माकन्देषुपिकाङ्गनाभिरधुनासोत्कण्ठमालोक्यते।
अप्येतेनवपाटलाः परिमलाःपारभार पाटचरा
बांति क्लांति वितानता नवकृतः श्रीखण्डशैला
निलाः ३६॥
इस ( वसन्त ऋतु) में कोयलकी वनिता पथिकोंकी
विरहिणी स्त्रियोंकी विरहाग्निमें आहुतिकी कथाको विस्तार
देने वाली आमकी मंजरीको बड़ी अभिलापासे देखती है;
और नवीन पाटल पुष्पके सुगन्ध समुदायको चुरानेवाले
और विरह विस्तारका नया करनेवाले वायु भी गमन
करते हैं ॥३६॥
७७ नीतिशतकम्। सहकारकुसुमकेसरनिकरभरामोदभूञ्छितदिग न्ले । मधुरमधुविधुरमधुपे मधौ भवेत्कस्य नोत्कण्ठा .. ३७ ॥ ऐसे वसन्त ऋतुमें आमके पौरोंकी केसरके समुदायकी सुगंधिसे दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं, और जिसमें भ्रमर पुष्पोंके मधुर रसको पीकर उन्मत्त हो रहे हैं, किसके मनमें उत्कण्ठा नही होती ? ॥ २७ ॥ इति वसन्तवर्णनम् । अथ ग्रीष्मऋतुवर्णनम् । आच्छाई चन्दनरसाईकरा मृगादयो धाराग हाणि कुसुमानि च कौमुदी च । मन्दे मरुत्सु मनसः शुचि हर्म्यपृष्ठ ग्रीष्मे मदं च मदनं च विवर्द्धयन्ति ।. २८ ॥ ऐसी मृगनयनी स्त्रियाँ जिनके हाथ स्वच्छ चंदनके रससे भीगे हैं, फुहारेवाले घर, सुगन्धित पुष्प, चाँदनी, मन्द पवन, सुगन्धित लता और महलको श्वेत छत ये सब ग्रीष्म ऋतुमें, कामदेवको मदको और बढ़ाते हैं ।। ३८ ॥
: ... भर्तृहरिविरचितं- स्रजो हृद्यामोदा व्यजनपवनश्चन्द्रकिरणाः। परागः कासारो मलयजरजः सीधु विशदम् । शुचिः सौधोत्सङ्गः प्रतनु वसनं पङ्कज दृशो निदाघे तूर्णं तत्सुखमुपलभन्ते सुकृतिनः || पुण्यवान् पुरुप ग्रीष्म ऋतुमें अच्छी सुगंधित माला, पंखेकी वायु, चन्द्रमाके किरण, पुप्प पराग, सरोवर, चंदनका रज, उज्वल मद्य, महीने कोमल वस्त्र, बड़े महलकी स्वच्छ ऊँची छत और कमलनयनी मुन्दर स्त्रीको शीघ्र ही प्राप्त करते हैं ॥३॥ सुधाशुभ्रं धाम स्फुरदमलरश्मिः शशधरः प्रियावक्त्राम्भोजमलयजरजश्चातिसुरभिः।स्रजो हृद्यामोदास्तदिदमखिलं रागिणि जने करोत्यन्तः क्षोभं न तु विषयसंसर्गविमुखे !! १० : चूनेसे छूहा . हुवा श्वेत गृह, दैदीप्यमान स्वच्छ किरणोंवाला चन्द्रमा, प्यारी का मुखकमल, सुगंधित चंदनका रज, सुगंधित पुप्पांकी माला, ये सब प्रेमी पुरुषोंके हृदयमें क्षोभ ( उत्पन्न ) करते हैं परन्तु जो विषयके संसर्गसे विमुख हैं उनके हृदयको नहीं ॥४०॥ इति त्री-मतुवर्णनम् ।
७६
॥
नोतिशतकम् ।
अथ वर्षा ऋतुवर्णनम् ।
तरुणी चैषा दीपितकामा विकसत जाती
पुष्पसुगन्धिः ।उन्नतपीनपयोधरभाराप्रावृट् कुरुते
कस्य न हर्पम् ॥४१!!
वर्षा ऋतु कामको उद्दीपित करनेवाली, खिले हुए
जाती पुप्पको धारण करनेवाली और उन्नत पुष्ट स्तनोंके
भारसे युक्त तरुणी स्त्रीकी नाई किसके (हृदय) में हर्प उत्पन्न
नहीं करती ( इस श्लोकमें वर्पाके सव विशेषण तरुणीमें
घटते हैं;-यथा जाती, जूही और जावित्रीको कहते हैं और
पयोधर मेघ और स्तनको)|४||
वियदुपचितमेघ भूमयः कन्दलिन्यो नवकुद
जकदम्बा मोदिनो गन्धवाहाः। शिखिकुलकल
केकारावरम्या वानान्ताः सुखिनमसुखिनं वा सर्व
मुत्कण्ठयन्ति ।. ४२ ॥
मेघसे अच्छादित आकाश, नये अकुरोंसे पूर्ण पृथ्वी,
नवीन कुटज और कदंव ( के पुष्प ) की, गंधसे सुगंधित
वायु और मयूर समुदायके अव्यक्त मधुर वाणीसे रमणीय
वनके प्रान्त, ये सब वर्षा ऋतुमें सुखी और दुःखी पुरुषोंको
उत्कंठा देते (काममोहित करते ) हैं ॥४२॥
३० भर्तृहरिविरचितं. उपरि घनं घनपटलं तिर्यग्गिस्योऽपि नर्तित मयूराः। वसुधा कंदलधवला दृष्टिः पथिकः क्व यातु संत्रस्तः । ४३ जिसके ऊपर घनघोर (घा) छा रही है, दोनों ओर मयूर नाच रहे हैं, और (नीचेकी ओर) पृथ्वी नवीन अंकुरोंसे हरी हो रही है । ( अर्थात् जब उनके चारो ओर कामोद्दीपनकी वस्तु वर्तमान है ) विरहसे व्याकुल वटोही कैसे संतोप पा सकता है । इतो विद्युदल्लीविलसितमितः केतकितरोः स्फुरद्गन्धः प्रोयजलदनिनद फूर्जितमितः । इतः केकिकीडाकलकलखः पक्ष्मलदृशां कथं यास्य न्त्येते विरहदिवसा; संभृतरसा; ॥ ४ ॥ कमलनयनी स्त्रियोंके ये रसभरे विरहके दिन कैसे वीतेंगे जिनमें इधर तो विद्युल्लताका विलास है और उधर केतकी वृक्षकी उत्कृष्ट सुगन्धित; इधर मेघोंकी गर्जना और उधर मयूरकी क्रीडाका कल कल शब्द ॥४४॥ असूचीसंसारे तमसि नभसि प्रौढजलदध्वनि प्राये तस्मिन् पतित दृषदां नीरनिचये । इदं नीतिशतकम्। सौदामिन्याः कनकमनीयं विलसितं मुदं च ग्लानिचं प्रथयति पथिष्वेव सुदृशाम् ॥ २५ ॥ श्रावण मासके अधिकारमें जिसमें मईका भी प्रवेश नहीं हो सकता, बड़े बड़े मेघोंकी गर्जना और पत्थर सहित वृष्टि तथा मुवर्णके समान विजुलीका वारंवार चमकना त्रियोंको मार्गमें (अपने प्रिय बटोहीके संग) सुख और दुःख उत्पन्न करता है।॥ ४५ ॥ अासारेण न हर्म्यतः प्रियतमर्यातु' बहिः शक्यते शीतोत्कम्पनिमित्तमायतदृशा गाढं समा- लिंग्यते ।जाताः शीतलशीकराश्च मरुतो वान्त्य न्तखेदच्छिदो धन्यानां वत दुर्दिनं सुदिनतां याति प्रियासंगमे ॥ ४६॥ दृष्टिकी झड़ीसे प्रियतमा महलके वाहर नहीं निकल सकती और जाड़ा लगता है और कापती हैं इसलिये गाढ़ आलिंगन करती है, और ( मैथुन ) के अन्तमें श्रम हरनेवाला शीतल जलसे पूर्ण वायु वह रहा है। अहो ? दुर्दिन भी पुरुपको पियाके संग अच्छे दिन होजाताहै॥४६॥ इति वर्षाऋतुवर्णनम् ।
भर्तृहरिविरचित- अथ शरदवर्णनम् । अर्द्ध नीला निशायाः सरभस सुरतायास खि नश्लयांगः प्रोद्ध तासातृष्णो मधुमदनिरतो हर्म्य पृष्ठे विविक्ते । संभोगक्लान्तकान्ताशिथिलभुज लतावर्जितं कर्करीतो ज्योत्स्नाभिन्नाच्छधारंपिव तिनसलिलं शारदं मंदभाग्यः ॥ ४७ ।। वह कामी पुरुप जिसके संग आधी रात तक वेग सहित मैथुन करने से शिथिल हो गये हैं, जिसको प्यास लगी है और जो मद्यमें उन्मत्त हो रहा है, यदि उस समय एकान्त महल की छता पर संभोग से थक स्त्रीकी भुजाओं से भारीमें लाकर दिया हुअा चाँदनी के समान स्वच्छ और शीतल जल नहीं पीता तो वह अवश्य मन्दभागी हैं।॥४७॥ इतिशरद्वर्णनम् । अथ हेमन्तवर्णनम् । हेमन्ते दधिदुग्धसर्पिरेशना माजिष्ठवासोभृतः काश्मीरद्रवसान्द्रदिग्धवपुषः खिन्नाः विचित्रैः स्तैः । पीनोर स्थलकामिनीजनकृताश्लषा गृहा नीतिशतकम्। भ्यन्तरे तांबूलीदलपूगपूरितमुखा धन्याः सुखंशे रते ॥ १८ ॥ हेमन्त ऋतु में वे ही धन्य पुरुप गृह में ( अपनी प्रिय तमाके साथ सुखसे सोते हैं, जो दही, दध और घीका भोजन करते हैं, मजीठसे रंगे वस्त्र पहनते हैं, केशर कस्तूरी का सघन लेप शरीर में कर विचित्र रति ( अनेक प्रकारके आसन भेद ) से खिन्न है, जो पुष्ट स्तनवाली स्त्री जिनका आलिङ्गन करते हैं और जो पान और सुपारियों से अपने मुखको सुशोभित करते हैं ।। ४८ ॥ इति हेमन्तवर्णनम् । अथ शिशिरः । चुम्वन्तो गंगभित्तीरलकवति मुखे सीत्कृता न्यादघाना वक्षः सूत्कंचुकेषु स्तनभरपुलकोद्भद मापादयन्तः । ऊरूनाकम्पयन्तः पृथुजघन तटा संसयन्तोंऽशुकानि व्यक्तं कान्ताजनानां विटच रितकृतः शैशिरा वान्ति वाताः ||४६|| शिशिर ऋतुमें कामीजनके समान आचरण करनेवाले भर्तृहरिविरचितं- वायु वहते हैं जो स्त्रियोंके केशयुक्त कपोलोंको चूमते, शीतके कारण सीत्कार शब्द (सीसी) कराते हैं, कंचुकी रहित- स्तनों को रोमाञ्चित करते हैं, जंघोंको कंपाते हैं और पुष्ट जघनोंसे वस्त्रोंको उड़ाते हैं ॥४६॥ केशानाकुलयन्दशो मुकुलयन्वासो वलादा क्षिपन्नातन्वन्पुलकोद्गमं प्रकटयन्नुढेगकम्पंग तौ । वारंवारमुदारसीत्कृतवशा हन्ताञ्छदान्पीडय प्रायः शैशिर एष सम्प्रति मरकान्तासु कान्ता यते ॥ ५० ॥ शिशिर ऋतुका पवन इस समय स्त्रियों के विषय पति के ऐसा आचरण करता हैं, (वह) वालों को विखेरता, आँखोंको किञ्चित् करता मूंदता, साड़ीको बलात्कार से उड़ाता, देहको रोमाञ्चित करता, चलने में उद्धग और वार वार सीसी शब्द . कराकर ओठों को पीड़ित करता है।॥ ५० ॥ इति शिशिरवर्णनम् । अथ विषयप्रशंसा। असाराः सन्त्वेते. विरतिविरसा यासविषया नीतिशतकम् । जुगुप्सन्तां यदा ननु सकलदोषास्पदमिति । तथा प्यन्तस्तले प्रणिहितधियामप्यतिवलस्तदीयाऽना ख्येयः स्फुरति हृदये कोऽपि महिमा ॥५१॥ ये सब ( भोग विषय ) असार और वैराग्य में विरस करनेवाले हैं। यदि इनको सब दोषो का घर समझ कर लोग निन्दा भी करें तो भी इनकी महिमा अत्यन्त प्रवल है और वर्णन नहीं हो सकती क्योंकि ब्रह्म विचार में लीन पुरुषों के हृदय में भी यह प्रकाशित होती है ।। ५१ । भवन्तो वेदान्तप्रणिहितधियामाप्तगुखो विद ग्वालापानां वयमपि कवीनामनुचराः। तथाप्येत भूमौ नहि परहितात्पुराण्यमधिकं न चास्मि न्संसारे कुवलयदृशो रन्यमपरम् ॥५२॥ आप वेदान्तवेत्ताओं के मान्य गुरु हैं, हम भी अत्यु तम आलाप करनेवाले कवियोंके दास है, तथापि ( यह हम जानते हैं कि इस संसार में परोपकार से बढ़कर पुण्य और कमलनयनी स्त्रियों से अधिक सुन्दर कोई वस्तु नहीं है ॥५२॥ किमिह बहुभिरुक्कैयुक्तिशून्यैः प्रलापैय मिह पुरुषाणां सर्वदा सेवनीयम् । अभिनवमद महरिविरचितं- लीलालालसं सुन्दरीणां स्तनभरपरिखिन्नं यौवनं वा वनं वा ५३|| यहाँ ( इस संसार में ) बहुत सी युक्तिशून्य वकवाद से क्या ? (प्रयोजन हैं), यहाँ पुरुषों से सर्वदा सेवन करने योग्य दो ही वस्तु हैं नवीन मदकी लीलाभिलापिणी स्तनों के भारसे खिन्न ( स्वेदयुक्त) सुन्दर स्त्रियों का , यौवन अथवा वन ॥ ५३॥ इति विषयप्रशसा। अथ दुविरक्त वर्णनम् । सत्यं जना वच्मि न पक्षपाताल्लोकेषु सर्वेष च तथ्यमेतम् । नान्यान्मनोहारि नितम्बिनीभ्यो दुःखैकहेतुर्नचकश्चिदन्यः ।. ५४ ॥ हे लोगो हम सत्य कहते हैं, इसमें कुछ भी पक्षपात नहीं कि इस संसार में स्त्रियों से बढ़कर मन हरनेवाली और दुःख दाई कोई भी वस्तुनहीं है।-५४ ॥ तावदेव कृतिनामपि स्फुरत्येप निर्मलविवेक दीपकः। यावदेव न कुरङ्गचक्षुषां ताड्यते चपल लोचनाञ्चलैः ॥५५॥ ।.
७ ... में नीतिशतकम् । यह विवेकरूपी निर्मल दीपक, विवेकियों के हृदय तभी तक प्रकाशमान रहता हैं जब तक वह मृगनयनी स्त्रियों के चंचल नेत्ररूपी अञ्चलसे नहीं बुझाया जाता ॥ ५५ ॥ वचसि भवति संगत्यागमुद्दिश्य वार्ता श्रुति मुखरमुखानां केवलं पण्डितानाम् । जघनमरुण रत्नग्रन्थिकाञ्चीकलापं कुवलयनयनानां को विहातुं समर्थः ५६॥ "संगत्याग' के विषय की वार्ता, बहुत बोलनेवाले पण्डितों के मुखमैं ही रहती हैं ( अर्थात् त्याग के विषय में बहुत बोलते ही हैं पर त्याग कर नहीं सकते ) क्योंकि लाल रत्नों से जड़ी करधनी पहिरे हुई स्त्रियोंके जघन स्थलोंको छोड़नेमें कौन समर्थ है ? ॥ ५६ ॥ स्वपरनतारकोऽसौ निन्दतियोऽलीकपण्डितो युवतीः । यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापिफलं तथाप्सरसः ।.५७॥ जो (पुरुष ) स्त्रियोंकी निन्दा करता है वह झूठा पण्डित है, आप तो ठगा ही गया औरोंको, भी ठगता है। क्योंकि तपका फल स्वर्ग (प्राप्ति) है और स्वर्गप्राप्तिका फल अप्सराओं का संभोग है ।। ५७ ॥
भर्तृहरिविरचितं- मत्तेमकुम्भदलने भुवि सन्ति शूराः केचि प्रचण्ड मृगराज वधेपि दक्षाः। किंतु ब्रवीमि बलिनां पुरतः प्रसह्य कन्दर्प दर्पदलने विरलाः मनुष्याः ॥५॥ इस संसार में उन्मत्त हाथीके गण्डस्थलको विदीर्ण करनेवाले शूर ( वर्तमान ) हैं। कोई तो प्रचण्ड सिंहके वधर्म भी चतुर हैं। परन्तु मैं वलवानों के आगे हठ करके कहता हूँ कि विरले ही मनुष्य कामदेव के ( उत्पन्न हुए ) मदको हटा सकते हैं ॥ ५८ ॥ सन्मार्गे तावदास्ते प्रभवति पुरुपस्तावदेवेन्द्रि याणां लज्जां तावविधत्त विनयमपि समालम्बते तावदेव । भ्रूचापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथगता नील पक्ष्माण एते यावल्लीलावतीनां न हृदि धृतिमुपो दृष्टिवाणाः पतन्ति ॥५६॥ मनुष्य सन्मार्ग में तभी तक रहता है, तभी तक इन्द्रि- योंका प्रभु है (इन्द्रियोंको वश में रख सकता है), तभी तक लज्जाको धारण करता है और तभी तक विनयको भी । जब तक ये नील पलक रूपी पंख धारण किये, भौहें रूपी धनुष से छोड़े, कान तक फैले ( खींच रखता हैं नीतिशतकम्। कर चलाये हुये ) धैर्यको चुगनेवाले लीलावती स्त्रियों के नयन रूपी वाण उसके हृदय में नहीं लगते ।। ५8 ।। उन्मत्तप्रमसरंम्भादारभन्ते यदंगनाः । तत्र प्रत्यूहमांधातु ब्रह्मापि खलु कातरः ॥६०॥ अत्यन्त प्रेमके उमंगसे उन्मत्त होकर स्त्रियाँ जिस काम को प्रारंभ कर देती है उस कार्यको रोकने में ब्रह्मा भी असमर्थ है।। ६०॥ तावन्महत्त्वं पाण्डित्यं कुलीनत्वं विवेकिता। यावज्ज्वलति नाङ्गषु हंत पञ्चेवपावकः ।।६१? ( मनुष्य में ) बड़ाई, बुद्धिमानी, विवेक और कुली: नता तभी तक रहती हैं जबतक उसका शरीर काम से नहीं जलता ॥ ६१॥ शास्त्रज्ञोऽपि प्रथितविनयोऽप्यात्मबोधोऽपिवा ढं संसारेऽस्मिन्भवति विरलो भाजनं सद्गतीनाम्। येनैतस्मिन्निरयनगरद्वारमुद्घाट्यन्तो वामाक्षीणां भवति कुटिलभूलता कुञ्चिकेव ॥६२ } इस संसार में शास्त्र जाननेवाले, विनय पूर्वक प्रसिद्ध और ज्ञानी बहुतेरे हैं परन्तु उनमें से विरला ही सङ्गति का भागी होता हैं; कारण यह है कि यहाँ सुन्दर नेत्रवाली भर्तृहरिविरचितं- स्त्रियों की कुटील भौहै आकर्षण होती हैं जो नरक नगर के द्वार को खोल देती हैं ॥ ६२॥ कृशः काणः खंजः श्रवणरहितः पुच्छविक लो बणी पूयक्लिन्नः कृमिकुलशतैरावृततनुः । तुधाक्षामो जीर्णः पिठरककपालार्पितगलः शुनी मन्वेति श्वा हतमपि निहन्त्येव मदनः ..६३: दुवल , काना, लंगड़ा, कनकटा, दुमका, घायल, पीच लगा, जिसका शरीर अनगिनत कीड़ों से व्याप्त; भूख का मारा, बुढ्ढा, मट्टीके घड़ेका मुँह जिसके गले में फँसा एसा भी कुत्ता कुतिये के पीछे दौड़ता है । तो तात्पर्य यह हैं कि कामदेव मरेको भी मारता है ।। ६६॥ स्त्रीमुद्रां मकरध्वजस्यपरमां सर्वार्थसम्पत्करीये मूढाः प्रविहाय यांतिकुधियोस्वर्गादिलोभेच्छया। ते तेनैव निहत्य निर्दयतरं नग्नीकृता मुण्डिताः केचित्पञ्चशिखीकृताश्च जटिला कापालिका श्चापरे ।.६२१ स्त्रियाँ कामदेव की मुद्रा ( मोहर ) हैं जो सव अर्थ और संपत्ति की करनेवाली है (अर्थात जिस प्रकार राजा की मुद्रा से अंकित आज्ञा पत्रों से सब कार्य संपादन होता है .88 PARRORE नीतिशतकम् । हैं उसी प्रकार स्त्री रूपी मुद्रा से कामदेव अपना कार्य करता है) जो मूह कुचुद्धि इन्हें त्याग स्वर्गादिककी इच्छासे विरक्त हो जाते हैं उनको विरक्त वेपोंमें मत जानो किन्तु यह समझो कि कामदेवने दया छोड़ उन्हें दंड देकर नंगा किया सिर मुड़वाया, किसीके पाँच चोर्टी रखाई, किसीको जटा- धारी किया, किसी के हाथ में ठिकरा दे भीख मँगवाया।।६४॥ विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णाशनां स्तेऽपिकीमुखपंकजं सुललितं दृष्ट्वैव मोहं गताः शाल्यन्नं स घृतं पयोदधियुतं भुञ्जन्ति ये मा नवास्तेषामिद्रियनिग्रहो यदि भवेद्विन्ध्यस्तरे सागरं ।।६५ । वायुजल और पत्तों के खानेवाले विश्वामित्र, पराशर इत्यादि (बड़े बड़े ऋपि ) भी सुललित स्त्रीके मुखकमलको देखते ही मोहित हो गये तो यदि इन मनुष्यों को जो अन्न, घी, दध इत्यादि खाते हैं, इन्द्रियाँ वश में हो जायँ तो (ऐसी आश्चर्ययुक्त घटना होवे जैसे) विन्ध्याचल पर्वत समुद्र पर तैरने लगे ॥ ६५ ॥ इति दुर्विरकप्रशंसा। जन वे ।
भर्तृहरिविरचितं-
-
अथ स्त्रीपरित्यागप्रशंसा।
संसारेऽस्मिन्नसारे कुनृपतिभुवनद्वारसेवावल
म्वव्यासंग व्यस्तधैर्य कथममलधियो मानसं सं
विदध्युः । यद्येताः प्रोद्यर्दिदुद्युतिनियभृतो न
स्युरम्भोजनेत्राः प्रेसत्काञ्चीकलापाःस्तनभरविन
मन्मध्यभागास्तरुण्यः ॥६६॥
इस असार संसार में निर्मल बुद्धिवाले मनुष्य दुष्ट
राजाओं की द्वारसेवा नाना प्रकारके कलंकों से अधीर
चित्त हो क्यों करते यदि यहाँ ये उदित चंन्द्रमा की ऐसी
कान्ति धारण करनेवाली, शब्दायमान करधनिया की
धारण करनेवाली और स्तनभार से झुकी कठिवाली स्त्रियां
न होती ( तात्पर्य यह है कि इस असार संसार में वड़ बड़े
कष्ट हैं परन्तु सुन्दर स्त्री होके होने के कारण मनुष्य सब
दुःखों को सुखसे झेलता है ) ६६ ॥
सिद्धध्यासितकन्दरे हवपस्कन्धावगादद्रुमे
गङ्गाधौत शिलातले हिमवतः स्थानेस्थिते श्रेय
सि । कः कुर्वीत शिरः प्रणाममलिनं म्लानं मनं
स्वीजनो यद्विवस्तारङ्ग शावनयना नस्युः स्म
रास्त्र स्त्रियः ॥६७॥
नीतिशतकम् । ६३ यदि यहां (इस संसार में) हरिण के. बच्चे के समान नेत्रवाली, कामकी अक्षरूप स्त्रियाँ न होती तो कौन मनस्वी पुरुष ऐसे पुण्यधाम हिमालय को, जिसकी कन्दरा'मैं सिद्ध गण वैठे हैं, जहाँ शिवजी का वैल वृक्षों में कंधा. रगड़ता है और जहाँके पत्थर गंगाजल से धोये जाते हैं,छोड़कर औरों के सन्मुख ) मस्तक झुका कर अपना मन मलीन करता ॥६७ ॥ संसारोदधि तव निस्तारपदवीं न दवीयसी। अन्तरा दुस्ता न स्युर्यदिरे मदिरेक्षणाः ॥१८॥ हे संसार ! यदि तुम्हारे वीचमें मदिरा के समान नेत्रवाली स्त्रियाँ दुस्तर न होती तो तेरी पार करने की स्थिति अति दीर्घ न होती ( अर्थात् तव तुझसे पार होना कठिन न था) ॥ ६८ ॥ इति स्त्रोपरित्यागप्रशंसा। अथ यौवन- प्रशंसा। राजन्तृणाम्बुराशेनहि जगतिगतः कश्चिदे वावसानं को वार्थोऽथैः प्रभूतैः स्ववपुषि गलिते यौवने सानुरागे। गच्छामः सम तावदिकसि भर्तृहरिविरचितं. - तनयनेन्दीवरालोकिनीनां यावच्चाक्रम्य रूपं झटि ति न जरया लुप्यते प्रेयसीनाम् ||६|| हे राजन् ! इस संसार में तृप्णारूपी समुद्रके पार कोई नहीं गया, और जब हमारी अनुराग भरी युवा अवस्था शरीर में ही नष्ट हो गइहै तो अधिक धनोपार्जनसे हमें क्या प्रयोजन हैं । तो हम अभी ही वर जाते हैं कि जिसमें बुढ़ापा प्रफुल्ल कमलके समाने नेत्रवाली पारियों का रूप शीघ्र ही लोप कर दे॥६६॥ रागस्यागारमेकं नरकशतमहादुःखसंप्राप्तिहे तुर्मोहस्योत्पत्तिवीजं जलधरपटलं ज्ञानताराधिप स्य । कन्दर्पस्यैक मित्रं प्रकटितविविधस्पष्टदोष प्रबन्धं लोकेऽस्मिन्नह्यनर्थं निजकुलदहनं यौव नादन्यदस्ति :.७०॥ इस संसार में यौवन को छोड़ अपने ही कुलके दहन करनेवाला दसरा कोई अनर्थ (अनर्थकर) नहीं है, यौवन जो अनुराग का घर है, सैकड़ों नरकों के वडे दुःख प्राप्त करने का हेतु,,मोहकी उत्पत्ति का वीज ज्ञानरूपी चन्द्रमा के दाकनेवाला मेव, कामदेव का एक ही मित्र नाना प्रकार के दोषों को प्रगट करनेवाला, वैराग्य और नीतिका हरण करनेवाला है ।। ७० ॥
६५
नोतिशनकम् ।
शृंगारद मनीरदे प्रचुरतः क्रीडारसस्रोतसि प्रद्युम्न
प्रिय वान्धवे चतुरतामुक्ताफलोदन्वति । तन्वीने
त्रचकोर पारणविधौ सौभाग्यलक्ष्मीनिधौ धन्यः
कोऽपि न विक्रियां कलयति प्राप्ते नवे
यौवने ॥७१॥
वह पुरुप धन्य है जो नवयौवन प्राप्त होने पर विकार
को नहीं करता-ऐसा यौवन जो शृंगाररूपी वृक्षों का
सींचनेवाला मेघहै, विस्तारित क्रीड़ा रसका सोता,; कामदेव
का प्रिय बंधु चतुरतारूपी मोतियों का समुद्र, स्त्रियों की
नेत्ररूपी चकोरोंका चंद्रमा और सौभाग्यलक्ष्मी का
भण्डार है ॥ ७१ ॥
इति योवनप्रशंसा।
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अथ कामिनीगर्हणम् ।
कान्तेत्युत्पललोचनेति विपुलश्रोणीभरेत्यु
सुकः पीनोत्तुङ्गपयोधरेति सुमुखाम्भोजेति सुभ्र
रिति । दृष्ट्वा माद्यति मोदतेऽभिरमते प्रस्तौति
जानन्नपि प्रत्यक्षाशुचिपुत्रिकां स्त्रियमहो 'मोह-
स्य दुश्चेष्टितम् ॥७२॥
भतृहरिविरचितं- (विद्वान् पुरुष भी) स्त्रीको अपवित्रता की प्रत्यंच पुतली जानता हुआ भी उसे देखकर उत्कंठित हो उसे मुन्दर, कमलनयनी, बड़े नितंववाली, बड़े स्यूल और दृढ़ स्तनवाली,सुन्दर कमलमुखी और सुन्दरभौंह वाली कह कर स्तुति करता है, देखकर मोहित होता है, प्रसन्न होता है और रमण करता है । ७२ ॥ स्मृता भवति तापाय दृष्टाचोन्मादवर्धिनी। स्पृष्टा भवतिमोहायासानाम दयिता कथम्!!७३॥ जो स्मरण से संताप देती है, देखने से उन्माद बढ़ाती है (मतवाला बनाती है) और स्पर्श से मोहित कर लेती है ऐसी स्त्रीको प्रिया कैसे कहते हैं ॥ ७३ ॥ तावदेवामृतमयी यावल्लोचनगोचरा। चतुः पथादपगता विषादप्यतिरिच्यते ७४:: स्त्री) तभी तक अमृतमय है जब तक वह दृष्टिगोचर है ( अर्थात् दृष्टिके सामने है) और दृष्टि मार्ग से हट जाने पर विप से अधिक हो जाती हैं (अर्थात् विरह से कष्ट देती है)॥ ७४॥ नामृतं न विषं किंचिदेकां मुक्त्वा नितम्बि नीम्। सैवामृतलतारक्ता विरक्ता विषवल्लरी।।७।।
६७. शृङ्गारशतकम् । एक नितंविनी (स्त्री) को छोड़ न कुछ अमृत है (अमृत के समान सुखकारी वस्तु ) और न कोई विष (दुखकारी वस्तु) क्योंकि यदि वे ही प्रीति करें तो अमृतलता और विरक्त हो जाने पर विपकी मंजरी होती हैं ।। ७५ ॥ आवर्तः संशयानामविनयभवनं पत्तनं साह सानां दोषाणां सन्निधानं कपटशतमयं क्षेत्रम प्रत्ययानाम् । स्वर्गद्वारस्य विघ्नो नरकपुरमुखं सर्वमायाकरण्डं स्त्रीयन्त्र कैन सृष्टं विषममृतमयं प्राणिनां मोहपाशः ॥ ७६ ।। यह स्त्रीरूपी यन्त्र और अमृतमय प्राणियों के मोहका फन्दा किसने. वनाया ? जो सँशयों का भँवर है, अविनय का घर, साहस का नगर, दोपों का स्थान, दुर्गुणों का सैकड़ों कपटों से भरा खेत, स्वर्गका विघ्न, नरकपुरका मुख द्वार) और सब मायाका पिटारा है ॥ ७६ ॥ सत्यत्वेन शशाङ्क एष वदनीभूतो नगेन्दीवर दन्द्र लोचनतां गतं न कनकैरप्यंगयष्टिः कृता। किन्त्वेवं कविभिः प्रतारितमनस्तत्वं विजान न्नपित्वङमांसास्थि मयं.. वपुमृगहशां. मंदो. जनः सेवते ॥७७॥ + 85 भत हरिविरचितं- सचमुच में न तो यह चन्द्रमा ( स्त्रियों का)मुख बन गया, न नये दो कमल आँख हो गये और न सुवर्ण इनकी देह बन गया । परन्तु यह जानकर भी कवियों के बहकाये विवेकहीन पुरुष, स्त्रियों के चर्म अस्थि और माँसमय शरीर को सेवते हैं ।। ७७ ॥ लीलावतीनां सहजा विलासास्तएव मूढस्य हृदि स्फुरन्ति । रागो नलिन्याहि निसर्गसिद्ध स्तत्र भ्रमत्येव मुधा षडंत्रिः॥ ७८ ।। लीलावती स्त्रियोंकासहज (स्वभावसे ही उत्पन्न हुआ) हावभाव ही मूढोंके हृदय में चमकता है । कमलमें ललाई स्वाभाविक है परन्तु भ्रमर व्यर्थ ही (इसको अपने ही लिये वनी जानकर) इनपर (आसक्त होकर ) भ्रमण करते हैं ॥ ७८॥ यदेतत्पूर्णेन्दुद्युतिहरमुदाराकृति वरं मुखार्ज तन्वंग्याः किल वसति तत्राधरमधुः । इदं ताव त्पाकद मफलमिवातीव विरसं व्यतीतेऽस्मिन्काले विषमिव भविष्यत्यसुखदम् ।।७।। यह जो कृशांगियोंका पूर्णचन्द्रकी छविको हरनेवाला सरल आकृतिवाला श्रेष्ठ मुखकमल है जिसमें अधरामृत गृङ्गारशतकम्। 88 rwwna रहता है, वह तो (युवा अवस्थामें अच्छा लगता है परन्तु), काल व्यतीत होनेपर ( अर्थात् वृद्धावस्था प्राप्त करनेपर) मदारके फलके समान अति विरस विपके समान दुःख- कारी होता है ॥ ७९ ॥ .: उन्मीलत्रिवलीतरङ्गनिलया प्रोत्तुङ्गपीनस्तन द्वन्दनोद्यतचक्रवाकमिथुनावक्त्राम्बुजोद्भासिनी। कान्ताकार धरानदीयमभितः कराशयानेष्यते सं सारार्णवमजनं यदि ततो दूरेण संत्यज्यताम्।।८।। हे पुरुपो । यदि तुम संसार सागरमें मग्न हुआ नहीं चाहते हो तो दरहीसे इस स्त्री रूपी नदीका त्याग कर' दो (अर्थात् जैसे नदियोंमें जो वस्तु गिरती हैं वह अन्तमें समु. द्रको जाती हैं उसी प्रकारसे इस नदीमें पड़कर ही मनुष्य संसाररूपी समुद्रमें सहजमें अपना समय व्यतीत कर सकता है) ये नदियाँ जिनमें शोभित उदरकी त्रिवली ही लहरका समूह है, ऊँचे और पुष्ट दोनों स्तन ही चक्रवाक के जोडे, हैं और जिनका गम्भीर प्राशय मुखरूपी.कमलसे शोभित हैं और जिनके चारो ओर क्रूराशय हैं (नदी पक्षमें कछुवा, मगर इत्यादि और स्त्रीपक्षमें कठिनाशय) ॥ ८० ॥ जल्पन्ति सार्द्धमन्येन पश्यन्त्यन्यं सविभ्र . भतृहरिविरचितं- माः। हृदये-चिंयन्तन्त्यन्यं प्रियः को नाम योषि ताम् ॥ ८१॥ स्त्रियोंका (सचमुच) प्रिय कौन है, जब ये किसी अन्य ही पुरुपसे वातें करती हैं और विलास सहित किसी और हीको देखती हैं और हृदयमें किसी और हीको चिन्ता करती हैं ॥१॥ मधु तिष्ठति वाचि-योपितां हृदि हालाहल मेव केवलं । अतएव निपीयतेऽधरो हृदयं मुष्टि भिरेव ताड्यते ।। ८२॥ स्त्रियोंकी वाणीमें मधु और हृदयमें केवल हलाहल विष रहता है इसी कारण ( मनुष्य लोगोंसे ) इनका अधर- पान किया जाता है और हृदय मुठ्ठियोंसे ताड़ित किया किया जाता है ॥ ८२.॥ अपसर सखे दूरादस्मात्कटाक्षविषानलात्मक तिविषमाद्योपित्सदिलासफणाभृतः। इतरफणि ना दष्टाः शक्याश्चिकित्सितुमौषधैश्चतुवनिता भोगिग्रस्तं त्यजन्तिहि मंत्रिणः॥ ८३॥ हे. मित्र ? कटाक्ष विपानल धारण करनेवाले, स्वभाव हीसे विषम, विलासके फन वारण करनेवाले, स्त्रीरूपी सूर्यसे 'पृङ्गारशतकम्। दर भागो (क्योंकि ) अन्य सोका काटो हुा और याँसे अच्छा हो सकता है परन्तु चतुर स्त्रीरूपी सर्पसे उसे, हुओंको मन्त्र जाननेवाले भी छोड़कर भागते हैं ॥८३ ॥ विस्तारितं मकरकेतनधीवरेण, स्त्रीसंज्ञितं बडि शमत्र भवाम्बुरांशौ। येनाचिरात्तदधरामिषलोल मर्त्य, मत्स्यान्विकृष्य पचतीत्यनुरागवह्नौ ॥८॥ इस भवसागरमें कामरूपी केवटने स्त्रीरूपी जालको इसलिये फैलाया है कि वह इनके द्वारा अधर पल्लवके मांस के लोभी मनुष्यरूपी मछलियों को पकड़कर अनुरागकी अग्निमें पकावे ॥८४ ॥ कामिनीकायकान्तारे कुचपर्वत दुर्गमे । मा संचर मनःपान्थ तत्रास्ते स्मरतस्करः ।।५।। हे मनरूपी पथिक ! तू स्त्रियों के शरीररूपी वनमें जो स्तनरूपी पर्वतों से अति दुर्गम है, मत जा (क्योंकि ) वहाँ कामदेवरूपी चोर लगते हैं ( जो तुझे लूटपाट कर मार डालेंगे)॥ ८५॥ व्यादीर्घेण चलेन वक्रगतिना तेजस्विना भोगिना नीलाब्जातिनाहिना' वरमहं दंष्टोन तचक्षुषा। दष्टे संति चिकित्सका दिशिदिशिः .
१०२ भर्तृहरािवरचितं- Farimms प्रायेण धर्मार्थिनो मुग्धाक्षी क्षणवीक्षितस्य नहि मे वैद्यो न चाप्यौषधम् .. ८६ ! बडे, लम्बे चौडे. टेढ़ी चालवाले और तेजवाले नीलक- मलके ऐसे फणधारी सर्प से काटा हुआ (मनुष्य) अच्छा है, परन्तु स्त्रीके कटाक्षसे काटा हुआ अच्छा नहीं क्योंकि प्रायः सव देश में साँप के डसे हुए को बचानेवाले धर्मार्थी होते हैं परन्तु सुन्दर नेत्रवाली स्त्रीकी दृष्टि से काटे हुए को बचाने के लिये न तो कोई वैद्य है और न कोई औषधि है ॥८६॥ इहहि मधुरगीतं नृत्यमेतद्रसोऽयं स्फुरति परि मलोऽसौ स्पर्श एष स्तनानाम् । इति हतपरमार्थं रिन्द्रियैौम्य मापोह्यहितकरणदः पञ्चभिर्व ञ्चितोऽस्मि ।। ८७ : मधुर गीत (जो कर्णेन्द्रियका विषय है), यह नाच ( चनुका विषय ), यह स्वाद (जिंदा का विपय ), यह सुगन्ध (घ्राण का विषय) यह स्तनों का स्पर्श (वगेन्द्रियका विषय ) ये पाँचों इन्द्रियों के पाँच वि. षय हैं। हे राजुन ! इन पाँचों विषयों में भ्रमण करनेवाली, परमार्थ को न करनेवाली और प्रयोजन साधन में अति धूर्त पाँचों इन्द्रियों से तू ठगा गया है ।। ८७ ।। इस संसार में 'ङ्गारशतकम्। १०३ न गम्यो मन्त्राणां न च भवति भैषज्यविष यो न चापि प्रध्वंसंब्रजति विविधैः शान्तिकश तैः । भ्रमावेशादङ्ग किमपि विदधगव्यमसमं स्मरोपस्मारोऽयंभ्रमयति दृशंपूर्णयति च ॥८॥ यह कामदेवरूपी अपस्मार ( मृगीरोग ) में जो भ्रम के आवेश में शरीर को दुखाता, मनको भ्रमाता और नेत्रों को घुमाता है न तो मन्त्रों की कुछ गति है न औषधि कुछ काम कर सकती है और न अनेक प्रकारकी शान्ति (पाठ पूजन इत्यादि) इसका नाश कर सकती है ।। ८८ ।। जात्यन्धाय च दुर्मुखाय च जराजीर्णाखिला ङ्गाय च ग्रामीणाय च दुष्कुलाय च गलत्कुष्ठाभि भूताय च । यच्छन्तीषुमनोहरं निजवपुर्लक्ष्मीलव श्रद्धया पण्यस्त्रीषु विवेककल्पलतिका शस्त्रीषु रज्येत कः॥८६॥ कौन (बुद्धिमान् पुरुष ) ऐसी वेश्याओं से रमणकी इच्छा करेगा जोजन्मकी अन्धी, कुरूप वृद्धावस्था से शिथिल गँवार और नीच जातिकी हैं, जो थोड़े से धनके कारण अपनी सुन्दर देह समर्पण कर देती हैं और जो विवेकरुपी १०४ भर्तृहरिविरचितं- लताकी छुरीके समान हैं (अर्थात् जो सदा विवेक को काटने के लिये प्रस्तुत हैं ॥ ८ ॥ वेश्यासौ मदनज्वाला रूपेन्धनसमेधिता। कामिभिर्यत्र हुयन्ते यौवनानि धनानिच ॥१०॥ वह वेश्या तो सुन्दरता रूपीइन्धन से प्रज्वलित कामा- ग्निकी ज्वाला है और इसमें कामीजन अपना धन और यौवन होम करते हैं ।। ६० ।। कश्चुम्वति कुलपुरुषो वेश्याधरपल्लवं म नोज्ञमपि । चारभटचौरचेटकनटविटनिष्ठीवनशरा वम् ॥ ११॥ कौन कुलीन पुरुप वेश्याओं के मुन्दर अधर पन्लव को जो ठग योद्धा, चोर, दास, नट, नीच और जारों के थूकने का पात्र है, चुम्बन करता है ॥ ६१॥ इति कामिन निगहणम् । अथ सुविरक्तप्रशंसा। धन्यास्तएव तरलायतलोचनानां तारुण्यरूप घन पीनपयोधराणाम् । क्षामोदरोपरिलसत्रिवली १०५ .... श्राङ्गारशतकम् । लतानां दृष्ट्वाकृति विकृतिमेति मनो न ये षाम् ।। ६२ ॥ वे धन्य हैं जिनका मन चंचल, विशाल नेत्रवाली, तरुण, रूपवान् और दृढ़ स्तनवाली, और जिनके क्षीण उद- रपर त्रिवलीलता शोभती है ऐसी स्त्रियोंको देखकर, विकार को नहीं प्राप्त होता ॥ १२ ॥ बालेलीला मुकुलितममी सुन्दरा दृष्टिपाताः किं क्षिप्यन्ते विरम विरम व्यर्थ एष श्रमस्ते । सम्प्रत्यन्ये वयमुपरतं वाल्यमास्थावनान्ते क्षीणो मोहस्तृणमिव जगज्जाल मालोकयामः :.६३, हे वाले ! तू लीलासे मुकुलित ( थोड़े खिले ) और सुन्दर कटान क्यों मुझ पर फेकती है । जाने दे जाने दे तेरा यह श्रम व्यर्थ है, क्योंकि अब हम कुछ और हो गये, लड़कपन हमारा जाता रहा, बनमें हम रहते हैं, मोह भी क्षीण हो गया और अब हम संसार के जालको तृण के समान देखते हैं (अर्थात् इस संसारको असार जानते हैं, और इसमें कुछ तत्व नहीं देखते ।। ६३ ॥ इयं बालामा प्रत्यनवरत मिन्दीवरदल प्रभा चोरंचक्षुः क्षिपति किमभिप्रेतमनया। गतो मो
.
भर्तृहरिविरचितं.
होऽस्माकं स्मर शवस्वाण व्यतिकरज्वलज्ज्वाला:
शान्तास्तदपि न वराकी विरमति ॥.६४ ||
यह वाला ( स्त्री) जो मुझ पर कमल दलकी प्रभा
को चुरानेवाली (अर्थात् तिरस्कार करनेवाली ) दृष्टि को
फेंकती है तो इसका क्या अभिप्राय है। हमारा मोह (अज्ञान)
अब चला गया है और कामदेवरूपी शवरके वाणों से
निकली हुई अग्नि शान्त हो गई है तो भी यह वाला विरामको
प्राप्त नहीं होती (अर्थात् कटाक्ष फेंकती ही जाती है)॥४॥
शुभ्रं सम सविभ्रमा युवतयः श्वेतातपत्रो
ज्ज्वला लक्ष्मीरित्यनुभूयते स्थिरमिवस्फीते शुभे
कर्मणि । विच्छिन्ने नितरामनङ्ग कलह क्रीडा
त्रुटत्तन्तुकं मुक्ताजाल मिव प्रयाति झटितिभ्र
श्यादिशो दृश्यताम् !. ६५॥
स्वच्छ गृह, हावभावयुक्त नवाङ्गना, और श्वेत छत्र-
सहित शोभायमान लक्ष्मी, ये तभी तक स्थिरतासे भोगो
जाती हैं जबतक पुण्यकी वृद्धि रहती है। परन्तु जब पुण्य
जयको माप्त होता है तव सम्पूर्ण भोगविलास कामदेवकी
क्रीड़ा के कलह से टूटे हारके मोतियों की नाई शीघ्र ही
भ्रष्ट होकर देशान्तर में लुप्त हो जाते हैं ॥ ३५॥
शृङ्गारशतकम्। १०७ सदा योगाभ्यासव्यसनवशयोरात्ममनसों रविच्छिन्ना मैत्री स्फुरति यमिनस्तस्य किमु तैः प्रियाणामालापैरघरमधुभिर्वक्त्रविधुभिः सनिश्वा सामोदः सकुचकलशा श्लेषसुरतैः ।। ६६ संयमी (इन्द्रियों को वश में करनेवाले) पुरुषों को जिनके आत्मा और मनको संदा योगाभ्यास ही के व्यसन से निरन्तर मित्रता प्रकट होती है, ( उन्हें ) प्रिय स्त्रियोंके संभापण, अधरामृत, श्वास के सुगन्ध सहित मुखचन्द्र और कुचकलशों को हृदय से लगाकर सुरत से क्या प्रयोजन है ॥ ६॥ किं कन्दर्पकर कदर्थयसि कि कोदण्डझङ्का रित रे रे कोकिल कोमलं कलखंकित्वं वृथावल्ग से । मुग्धेस्निग्ध विदग्धमुग्ध मधुरैलॊलैः कटाक्ष रलं चेतश्चुम्वित चन्द्रचडचरण ध्यानामृत वर्तते ।। ६७ ॥ अरे कामदेव ! तू अपने धनुप के टंकार के शब्दों से हमें क्यों त्रास देता है, अरे कोकिल ! तू वृथा कोमल मधुर शब्दों को बोलता है और हे सुन्दरी ! तू अब चतुरता. से भरे सुन्दर मधुर शब्दों को बोलता है और हे सुन्दरी ! तू aulod १०० - भर्तृहरिविरचितं- अव चतुरता से भरे सुन्दर मधुर चंचल कटानों को मत फेंक क्योंकि अब मेरा मन चुम्बित चन्द्रचूड (शिव) के वरणों के ध्यानरूपी अंमृत में निमग्न हैं ॥६७ ॥ यदासीदज्ञानं स्मरतिमिर संचार जनितं त दासर्वं नारीमय मिदमशेष जगदभूत इदानीम स्माकं पटुतर विवेकाजनदृशां समीभूता दृष्टि स्त्रिभुवन मयि ब्रह्म मनुते ।। ६८।। जव तक (मुझमें ) कामदेवरूपी अन्धकार के संचा र से उत्पन्न हुआ अज्ञान था तब तक यह संपूर्ण संसार स्त्रीमय देख पड़ता था। परन्तु अब हमारे सुन्दर विवेकरूपी अंजन के लगाये नेत्रों की दृष्टि समता को प्राप्त हो गई है अब त्रैलोक्य व्रम्ह मय देख पड़ता है ॥ १८ ॥ वैरागें सञ्चरत्येके नीतौ भ्रमति चापरः । शृङ्गारे रमते कश्चिद्भुवि भेदाः परस्परम् l कोई पुरुष वैराग्य में संचार करता है, कोई नीति में भ्रमण करता है और कोई शृङ्गार में रमता है । इस प्रकार 'नुष्यों की इच्छा भिन्न है (इस श्लोक से कविका अभिप्राय यह है कि इन तीनों की रुचिवालेमनुष्यों के लिये ये तीनों शतक बनाये गये. है ॥ यद्यस्यनास्ति रुचिरं तस्मिंस्तथा स्पृहामनोः शृङ्गारशतकम्। ज्ञऽपि । स्मणीयेऽपिसुधांशो नमनः कामः सरा जिन्यः ॥ १००॥ जो वस्तु जिसको प्रिय नहीं होती चाहे वह सुन्दर हो तो भी उसकी इच्छा उसके लिये नहीं हैं। चन्द्रमा रमणीय है तो भी कमलिनी को इसकी इच्छा नहीं होती । अर्थात् कमलिनी चन्द्रमाको देख प्रफुल्लित नहीं होती ॥ १०० ॥ इति श्रीमद्भर्तृहरि विरचितं शृङ्गारंशतकं समाप्तम् । परिशिष्ट श्लोकाः। अजितात्मासु सम्बद्धः समाधिकृतचापलः। भुजङ्गकुटिलः स्तब्धो भूविक्षेपः खलायते।।१०१॥ अजितेन्द्रिय (मनुष्यों ) से संवन्ध रखनेवाला, समा. धिसे अधिक चंचलता प्रकट करनेवाला संप के समान कुटिल और स्तब्ध इन स्त्रियों का कटाक्ष दुष्ट के समान आचरण करता है ।। १०१ ॥ मत्तेभकुम्भपरिणाहिनि कुंकुमार्दै कान्तापयो धरतटेरसखेदखिनः विक्षौनिधाय भुजपञ्जरमध्य वर्ती धन्यःक्षपांक्षपयति क्षणलब्धनिद्रः॥१०२|| वह पुरुप धन्य है जो रसस्वेद से खिन्न होकर उन्मत्त हाथी के कुम्भों की. नाई. विस्तीर्ण तथा कुकुम से भीजे
भर्ट हरिविरचितं:-
स्त्री के स्तनोंपर.अपने वक्षः स्थल को रख कर स्त्री के भुजा-
रूपी पिंजडे, के वीचमें रहकर क्षणमात्र भी निद्रा को प्राप्त
करके रात्रि व्यतीत करते हैं ॥ १०२॥
सुधामयोऽपि क्षयरोगशान्त्यै नासाग्रमुक्ता
फलकच्छलेन अनङ्गसंजीवनदृष्टिशक्तिमुखामृतं
ते पिवतीव चन्द्रः ॥ १०३ ।।
हे सुन्दरि ! ऐसा जान पड़ता है कि अमृतमय चन्द्रमा
भी जो कामदेव के चैतन्य करने की दृष्टि सामर्थ्य रखता है,
क्षयरोग की शान्ति के लिये नासिका के मोती के बहाने
तेरे अधरामृत का पान करता है ( वैद्य लोग क्षयरोग निवा-
रण के लिये मोती खिलाते हैं)॥१०३ ॥
दिश वनहरिणीभ्यो वंशकाण्डच्छवीनां
कवलमुपलकोटिच्छिन्नमूलंकुशानाम् । शुक युव
तिकपोला पाण्डु ताम्बूलवल्लीदलमरुणनखाः
पाटितं वा वधूभ्यः ॥ १०४ ॥
हे मनुष्यो! तुम तो वनकी मृगियों को (खाने के
लिये ) वाँसको गाँठ के समान विवाले पत्थर के अग्रभाग
से कटे मूलवाला कुशका ग्रास दो अथवा नवयुवा स्त्रियों के
लिये नसों से तोड़े शुकयुवती के कपोल के समान पाण्डु
वर्णवाले उत्तम ताम्बूल के पत्र दो ॥ १०४ ॥
वैराग्यशतकम् । अथ वैराग्यशतकम् । मंगलाचरणम् । चूडोत्तंसितचारुचन्द्रकलिकाचञ्चच्छिखाभा स्करोलीलादग्धविलोलकामशलभः श्रेयोदशा स्फुरन् । अन्तः स्फूर्जदपारमोह तिमिरप्राग्भारमु चाट्यन चेतः सद्मनि योगिनां विजयते ज्ञान प्रदीपो हरः ॥ १ ॥ शिवजी जिनकी जटा में भूषणभूत सुन्दरं चन्द्रकी किरणे शोभायमान हैं और जो चंचल कामदेव रूपी पतंग को लीलासे ही जला देते हैं, कल्याण की स्फूर्ति करते हुए और अन्तः करणमें स्थित.. मोहरुपी अन्धकार को, हटाते हुए, योगियों के मनरूपी घरमें ज्ञानरूपी दीपक का प्रकाश करते हैं ॥१॥ अंथ तृष्णादूषणम् । बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः। अबोधो पहताश्चान्ये जीर्णमङ्ग सुभाषितम् ।।२।।
११२ भर्तृहरिविरचितं- पण्डित लोग ( जिन्हें सत् असत् का ज्ञान है) ईर्षा से ग्रस्त हैं, धनी लोग गवसे दूपित हैं (अर्थात् गर्व के कारण वे गुणका आदर नहीं करते) और अन्य (साधा. रण ) लोग अज्ञानके मारे हैं ( ज्ञान रहित हैं) (इसी कार- रणसे ) सुभापित (उत्तम काव्य ) अंग ही में जीणं होता है ( अर्थात् मनही में रहता है और वहीं नष्ट हो जाता है, पाणी द्वारा वाहर नहीं निकलता ) सारांश यह है कवियों को. कोई उत्साह देनेवाला नहीं है, अतएव उनकी कविता: मनके मनही रह जाती है ॥ २ ॥ न संसारोत्पन्नं चरितमनुश्यामि कुशल विपाकः पुण्यानां जनयति भयं मे विमृशतः। महद्भिः पुण्योपैश्चिरपरिगृहीतांश्च विषया महा न्तो जायन्ते व्यसनमिव दातुविषयिणाम् ॥३] हम संसार से उत्पन्न चरित्रों को कल्याणकारक नहीं. देखते और विचार करने पर पुनीत कमों का फल (अर्थात् स्वर्गादि भी हमें भयरुप. देख पड़ता हैं । (क्योंकि पुण्योंके व्यतीत होने पर स्वर्ग से भी पतन होता है ) वड़ें २ पुण्यों के समूहसे चिरकाल से सञ्चित किये हुए विषय भी अन्त में विषयी पुरुष को दुःख ही. देते हैं ॥३॥ उत्खातं निधिशङ्कया.क्षितितलं. ध्माता गिरे वैराग्यशतकम् । आंतवो निस्तीर्णः सरितांपतिपतयो यत्नेन संतोषिताः । मन्त्राराधनतत्परेण मनसा नीताः श्मशाने निशाःप्राप्तःकाणवराटकोऽपि न मया तृषणेऽधुना मुञ्च माम् ॥ ४ ॥ मैने धनकी आशा से पृथ्वी के तल को खोदा, (रसा यन सिद्ध होने की आशा से ) पर्वत के धातुओंको फूंका, (धन अथवा दान प्राप्त करने की इच्छा से) समुद्र को पार किया, बड़े प्रयत्न से राजाओं को प्रसन्न किया और मन्त्रों को सिद्ध करने के हेतु मन लगाकर अनेक रात्रियों को स्मशान में व्यतीत किया परन्तु ( यह सब करने पर भी) एक कानी कौड़ी भी हाथ न लगी । तो हे तृष्णे ! अब तो मेरा पिण्ड छोड़ दे ॥ ४ ॥ भ्रान्तं देशमनेकदुर्गविषमं प्राप्तं न किं [ चित्फलं त्यक्त्वा जातिकुलाभिमानमुचितं सेवा कृता निष्फला।भुक्तं मानविवर्जितं परगृहे साश कया काकवत् तृष्णे दुर्मति पापकर्मनिरते ना द्यापि सन्तुष्यसि ॥ ५॥ मैंने अनेक दुर्गम देशों में भ्रमण किया परन्तु कुछ भी फल न पाया, (अपने) जाति और कुलके उचित - भर्तृहरिविरचितं- अभिमान को छोड़कर सेवा की वह भी निष्फल हुई, और अभिमान को छोड़कर कौए की नाई डरते डरते दूसरे के घर भोजन किया: हे तृष्णे ! दुर्मति और पाप कर्म में प्रवृत्त तू अभी तक सन्तुष्ट नहीं हुई ॥ ५ ॥ खलोल्लापाः सोढाः कथमपि तदाराधनपरैनिंग ह्यान्तर्वाष्पं हसितमपि शून्येन मनसा । कृत श्चित्तस्तम्भः प्रहसितधियामञ्जलिरपि त्वमाशे मोघ.शे किमपरमतो नर्तयसि माम् ॥ ६ ॥ उन (टों) की आराधना में तत्पर मैने किसी न किसी प्रकार से उनके कुवाक्यों को सहन किया, नेत्रों के आँसुओं को रोक उनके सामने उदास मनसे हँसा किया और मनको स्थिर करके उनके सामने हाथ भी जोड़ा, व्यर्थ आता करनेवाली हे तृष्णे ! अब तू मुझे अधिक क्यों नचाती है ॥६॥ ग्रादित्यस्य गतागतैरहरहः संक्षीयते जीवितं व्यापारवहुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते । दृष्ट्या जन्म जराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्प द्यते पीवा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं ७॥ !
वराग्य.तकम्। १.५ दिन दिन सूर्यके उदय और अस्त होने से आयुष्य तीण होता जाता है, अनेक बड़े बड़े कार्य व्यापार करने से समय बीतता हुआ नहीं जान पड़ता ( इन सबसे यह ज्ञात होता है कि ) यह संसार मोहमयी प्रमादरूपी मदिरा पीकर उन्मत्त सा हो रहा है ॥७॥ दीनादीनमुखैः सदैव शिशुकैराकृटजीर्णाम्ब राक्रोशद्भिः क्षुधितेन रन विधुरा दृश्येत चेद्गे हिनी । याञ्चाभङ्गभयेन गद्गदलसत्त्र्यद्रिली नाक्षरं को देहाति वदेवदग्धजठरस्वार्थे मनस्वी जनः ॥ ८॥ यदि मनुष्य अपनी घरवाली को दुःखित, दीन और सदा भूवे चिल्लाते हुए दीनाःख वचों से उनके फटे वस्त्रों को खिंचा जाता न दे वे तो कौन मनस्त्री पुरुष इस जले पेटके लिये याञ्चा भङ्ग होने के भयसे (कोई 'नहीं' कह देगा इस डर से) गद गद कण्ठ से टूटे फूटे अक्षरों में "मुझे दो" इस वाणी को कहेगा ( तात्पर्य यह है कि स्त्री ही सब अनर्थों का मूल है ) ॥८॥ निवृत्ता भोगेच्छा पुरुषबहुमानो विगलितः समानाः स्वयर्याताः सपदि सुहृदो जीवित समाः। - ११६ भर्तृहरिविरचितं- शनैर्यष्टयोत्थानं घनतिमिररुद्ध च. नयने अहो धृष्टः कायस्तदपि मरणापायचकितः ।। भोग की इच्छा क्षीण हो गई, पुरुषों में सत्कार नष्ट हुआ, समान वयवाले स्वर्ग को चले गये, अब जो मित्रगण बचे हैं उनका जीवन भी पूर्ण हो रहा है, आप भी लकड़ी टेककर उठने लगे और नेत्र घोर अन्धकार से आ गये ! अरे निर्लज्ज शरीर ! इतना होने पर भी अपना मरण सुन चकित हो जाता है !॥ ४ ॥ हिंसाशून्यमयत्नलभ्यमशनं धात्रा मरुत्क ल्पितं व्यालानां पशवस्तृणांकुरभुजः स्पृष्टाः स्थ ली शायिनः । संसारार्णवलङ्घनक्षमधियां वृत्तिः कृता सा नृणां यामन्वेषयतां प्रयान्ति सततं सर्वे समाप्ति गुणाः ॥ १०॥ विधाता ने हिंसारहित और विना प्रयत्नके मिलनेवाले वायु संपोका भोजन बनाया है, और पृथ्वीपर सोनेवाले पशुओंका तृणोंका अंकुर भोजन बनाया है और भवसागर पार करने योग्य जो पुरुष हैं उनकी ऐसी वृत्ति वनाई है कि जिसकी खोज में सव गुण समाप्त हो जाते हैं ( सारांश. यह है कि मनुष्या की वृत्ति बड़ी कंठिन है जिसको सब वैराग्यशतकम्। ११७ www.... नहीं जानते, अतः न जानकर वे ऐसा कार्य करते हैं जिससे उनके सव गुणों का लोप हो जाता है।)॥१०॥ न ध्यातं पदमीश्वरस्य विधिवत् संसारवि च्छित्तये स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुर्धर्मोऽपि नोपा र्जितः । नारीपीनपयोधरोरुयुगुलं स्वप्नेऽपि ना लिङ्गितं मातुः कैवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारा वयम् ॥ ११ ॥ ( हमने ) संसार के छेदन के लिये ( अर्थात् मुक्तिकी इच्छा से )विधिवत् ईश्वर के चरणों का ध्यान नहीं किया, न तो स्वर्गद्वार के किवाड़ खोलने में चतुर धर्मका उपार्जन किया और स्वप्न में भी नारी के दृढ़ स्तनों का और जघ- नोंका आलिंगन न किया, हम तो केवल माता के यौवन रूपी बनके काटने के लिये कुठार ही उत्पन्न हुए ॥ ११ ॥ भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्तास्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः। कालो न यातो वयमेव याता- स्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥ १२ ।। हमने विपयोंका उपभोग नहीं किया किन्तुं विषयोंने ही हमें भोग लिया ( हमको असमर्थ कर दिया.), हमने तप नहीं किया किन्तु तपने ही हमें तपा दिया, काल 1 भर्तृहरिविरचितं- व्यतीत नहीं हुआ किन्तु हम ही व्यतीत हो गये (अर्थात् हमारा मरण पा गया ) और तृष्णा जीर्ण न हुई किन्तु हम ही जीर्ण हो गये ॥१२॥ क्षान्तं न क्षमया गृहोचितसुखं त्यक्तुन सन्तोषतः सोढो दुःसहशीतवाततपनः क्लेशो न तप्तं तपः ॥ ध्यातं वित्तमहर्निशं नियभितप्राणे। शम्भोः पदं ततत्कर्म कृतं यदेव मुनिभिस्तैस्तैः फलैर्वञ्चितम् ॥ १३ ॥ हमने सहन तो किया परन्तु तना से नहीं (अशक्तता से सहन किया ) गृहस्थी के सुखको तो त्यागा परन्तु संतोप से नहीं शीत, वात और तपनके दुःसह क्लेशोंका सहन फिया परन्तु तप न किया, ध्यान को किया परन्तु, धनही का किया और प्राणायाम द्वारा शिवके चरणका नहीं । हमने वे सब कर्म किये जो मुनि लोग करते हैं परन्तु फलके विपय में ठगे गये ( तात्पर्य यह है कि जब तक वित्तमेसे दुष्ट आशा नहीं निकल जाती तव नक मन एकाम् नहीं होता ॥ १६ ॥ वलिभिर्मुखमाकान्तं पलितैरङ्कितं शिरः । गा त्राणि शिथिलायन्ते तृष्णैका तरुणायते ॥१४॥ मुख झुर्रयों से व्याप्त हो गया, सिरके बाल श्वेत राग्यशतकम्। in vino हो गये और सब इन्द्रियाँ शिथिल हो गई, केवल एक तृष्णा ही तरुण होती जाती है ।।१४।। येनैवाम्बरखण्डेन संवीतो निशि चन्द्रमाः । तेनैव च दिवा भानुरहो दौगत्यमेतयोः ॥१५॥ चन्द्रमा जिस आकाशके खण्ड से रात्रि में अपनेको ढकता है उसीसे सूर्यको दिन । अहो इन दोनों की कैसी दुर्गति है ( तात्पर्य यह है कि इस संसार में समरथको भी दीनता प्रगट करनी पड़ती है तो फिर मनुष्यों को क्या कहना हे)॥ १५ ॥ अवश्यं यातारश्चिरतरमुषितापिविषयान वि योगे को भेदस्त्यजति न मनो यत्त्वयममून् । अजन्तः स्वातन्त्रया दतुलपरितापाय मनसः स्वयं त्यक्ता ह्यते शमसुखमनन्तं विदधति॥१६॥ चिरकालतक भोग किये विषय अन्तमें अवश्य छोड़ेंगे तो उनके वियोग होने में क्या संशय है, अतएव मनुष्य को चाहिये कि इनको स्वयं ही छोड़ दे क्योंकि जब वे आपसे छोड़ेंगे ता मनुष्य को बड़ा सन्ताप देंगे परन्तु यदि मनुष्य उनको स्वयं त्याग देगा तो अनन्त सुखका भागी होगा ।। १६॥ .' इति तृष्णादूषणमा
१२०
भर्तृहरिविरचितं-
अथ तृष्णाधिकारः।
विवेकव्याकोशे विदधति शमेशाम्यति तृषा
परिष्वङ्ग तुङ्ग प्रसरतितरां सा परिणतिः । जरा
जीर्णैश्वर्यग्रसन गहना क्षेपकृपणस्तृषापात्रं यस्यां.
भवति मरुतामप्यधिपतिः ।। १७ ॥
विवेक के प्रकाश से शान्तिका उदय होनेपर तृष्णा भी
शान्तिको प्राप्त होती है और जैसे जैसे तृष्णा शरीर में
लिपटाई जाती है वैसे वैसे उसका फैलाव बढ़ता जाता है ।
जरा जीर्ण ऐश्वर्य के ग्रसने के दुःखको निवारण इन्द्र भी
नहीं कर सकता और वह भी इसी तृष्णा का कृपापात्र बन
जाता है (अर्थात् ) तृष्णा बड़ी प्रवल है ) १७ ॥
इति तृष्णाधिकार।
अथ विषयाधिकारः।
भिक्षाशनं.तदपि नीरसमेकवारं शय्या च
भूः परिजनो निजदेहमात्रम् । वस्त्र च जीर्णश
तखण्डमयीचकन्था हा हा तथापि विषयान्न परि
त्यजन्तिः ।।१८॥
वैराग्यशतकम्। १२१ हा हा ! तव भी विषयों की वासना नहीं छोड़ती जब हमको एक वार भिक्षा माँग कर निरस (अन्न) भोजन करना पड़ता है, जब पृथ्वी ही हमारी शैय्या है, अपना शरीर ही परिवार है और जब जीर्ण सैकड़ों जगह फटी हुई कथरी (गुदड़ी) हमारा पहिरनेका वस्त्र है ॥१८॥ स्तनौ मांसग्रन्थी कनककलशावित्युपमितौ मुखं श्लष्मागारं तदपि च शशाङ्कन तुलितम्। स्रवन्मूत्रक्लिन्नं करिवस्करस्पर्धिजघनम् अहो निन्द्य रूपं कविजनविशेषगुरु कृतम् :१६ : (स्त्रियों के ) स्तन माँसके लोथड़े हैं उनको सुवर्णके कलशकी उपमा दी जात है, मुख थुक खखार का स्थान हैं पर उसको चन्द्रके समान कहते हैं और टपकते हुए मूत्र से भीगे जघनको गजेन्द्र के सूड़की उपमा देते हैं । अहो। इस प्रकार से निन्दित ( स्त्री के ) रूपको कवियों ने कैसा बढ़ाया है ॥ १६ ॥ इति विषयाधिकार . अथ रूप तिरस्कारः। अजानन्माहात्म्यं, पततु शलभो दीपदहने १२२ भर्तृहर्गिविरचितं- स मीनोऽप्यज्ञानादडिशयुतमभातु पिशितम् । विजानन्तोऽप्येते वयमिह विपज्जालजटिलान्न मु चामः कामानहह गहनो मोहमहिमा ॥२०॥ पतंग अग्निके माहात्म्य को न जान कर भस्म हो जाय और मचली अनजाने (अर्थात् यह न जान कर कि इस मांसके खाने से उसके कंठ में कांटा लगेगा ) मछली वंसी में लगे मांसको खाय परन्तु देखो कि जान बूझकर भी विपत्ति के जाल में फंसे हुए हम कामको नहीं छोड़ते । अहो ? मोहकी महिमा कैसी प्रवल है ॥ २० ॥ फलमलमशनाय स्वादु पानाय तोयं शयन मवनिपृष्ठं वल्कले वाससी च । नव धनमयुपान भ्रान्तसवेन्द्रियाणामविनयमनुमन्तुनोत्सहे दुर्ज नानाम् .. २१.] भोजनको फल, पीने को स्वादिष्ट पानी, शयन के लिये पृथ्वी और पहिरने को वृक्ष की छाल यथेष्ट हैं तो हम ऐसे दुर्जनों का निरादर क्यों सहें जिनकी इन्द्रियाँ नये उपार्जन किये धनरूपी मदिरा से उन्मत्त हो गई हैं ॥२१॥ विपुलहृदयैर्धन्यैः कैश्चि-जगज्जनितं पुरी विधृतमपरैदतं चान्यैर्विजित्य तृणं यथा । इह हि गग्यशतकम् । १२३ भुवनान्यन्ये धीराश्चतुर्दश भुञ्जते कतपयपुर स्वाम्ये पुंसां क एप मदज्वरः ॥२२॥ यह संसार प्राचीन कालमें विपुल हृदयवाले (सर्वज्ञ) महात्माओं से उत्पन्न किया गया और धारण किया गया; बहुतेरों ने इस संसार को जीतकर तृणवत् समझ कर दूसरों को दे दिया और बहुत से धीर ( राजा) लोग इन चौदहो भुवनका परिपालन करते हैं ( अर्थात् एसे बड़े बड़े लोगों को इतनी बड़ी संपत्ति पाकर कुछ भी अभिमान न हुआ परन्तु देखो ) थोड़ेसे ग्रामों का प्रभुत्व पाकर मनुष्य कैसा मदोन्मत्त हो जाता है ।। २२ ॥ इति रूपतिरस्कारः। अथ निस्पहाणामधिकारः । त्वं राजा वयमप्युपासितगुरुप्रज्ञाभिमानोन्न ताः ख्यातस्त्वं विभवैर्यशांसि कवयो दिनु प्रत न्वन्ति नः । इत्थं मानद नातिदूरमुभयोरप्याव योरन्तरं यद्यस्मासु परांमुखोऽसि वंयमप्येकान्त तो निस्पृहाः ।. २३ ॥ तू राजा है और हम भी गुरुकी सेवा से प्राप्त हुई १२४ भर्तृहरिविरचितं- प्रज्ञाके अभिमान से उन्नत हैं (अर्थात् हे राजा जैसे तुझे अपने राज्य का अभिमान है जैसे हमें अपने बुद्धिका है) यदि तू अपने धनसे परिख्यात है तो हमारा भी यस कवि लोग सब दिशाओं में फैलाते हैं तो हे मानको खंडन करने वाले राजा ! तुझमें हममें बहुत अन्तर नहीं है इसपर भी यदि तू हमसे मुख फेर लेता है तो हम तुझसे भी अधिक निस्पृह हैं ॥ २३॥ अभुक्तायां यस्यां क्षणमपि न यातं नृपशतै 8वस्तस्या लाभे क इव बहुमानः नितिभुजाम् । तदंशस्याप्यंशे तदवयवलेशेऽपि पतयो विषादे कर्तव्ये विदधति जडाः प्रत्युत मुदम् ॥ २४ ! उस पथ्वीका, जो सैकड़ों राजाओं से एक क्षण भी भोगी न जाकर छोड़ दी गई, प्रभुत्व पाकर राजा लोगों को क्या अधिक मान प्राप्त होता है। परन्तु अब इस (पथ्वी ) के अंशके भी अंशको पाकर लोग अपने को भूपति मानते हैं । देखो यह कैसा आश्चर्य है कि मूर्ख लोग शोचनीय वस्तुमें उलटा आनन्द मानते हैं ॥ २४ ॥ मृत्पिण्डो जलरेखया वलयितः सर्वोऽप्ययं न न्वणुः भोगी कृत्य स एव संयुगशतै राज्ञां ग णैर्भुज्यते । नो दधुर्ददतेऽथवा किमपि ते क्षुद्रा
રર
है
वैराग्यशतकम् ।
दरिद्र भृशं धिग्धिक्तान्पुरुषान्धमान्धनलवं वाञ्छ
न्ति तेभ्योऽपि ये ॥ २५ ॥
यह संपूर्ण पृथ्वी मिट्टीका एक छोटा सा पिएंड है जो
जलकी रेखा से घिरा है, अनेक राजा लोग आपस में युद्ध
कर इसके छोटे छोटे भागों को अपने स्वाधीन कर इसपर
राज्य करते हैं, उन अधम पुरुषों को धिक्कार है जो ऐसे
क्षुद्र और दरिद्री राजाओं को दानी कह कर इस वातकी.
परीक्षा करते हुए कि वे अव भी देते हैं कि नहीं उनसे
धनके कणकी आकांक्षा करते हैं ॥ २५ ॥
इति निस्पृहाणामधिकारः।
अथ दुर्भगसेवकस्य वाक्यमाह।
न विटा न नटा न गायका नपरद्रोहनिबद्ध
बुद्धयः। नृप सद्मनि नाम के वयं कुचभारो
न्नमिता न योषितः ।। २६ :
हम न.नट हैं. न विट (पर स्त्री लंपट). हैं, • गवैये
न दूसरों के द्रोह की बुद्धिवाले हैं और न स्तनोंके भार
से मुकी स्त्रियाँ हैं तो राजा की सभा में हमें जाने से क्या
प्रयोजन है ( सारांश यह है कि उपरोक्त गुणोंही का प्रायः
राजसभा मान होता है ) ॥ २६ ॥
Allpap - -- भर्तृहरिविरचित- पुरा विद्वतासीदुपशमवतां क्लेशहंतये गता कालेनासौ विषय मुखसिद्धथै विषयिणाम् । इदा नी सम्प्रेक्ष्य क्षितितलभुजः शास्त्रविमुखा नहो कष्टं साऽपि प्रतिदिन मघोऽधःप्रविशति २७ विद्या पहिले पंडितोंके चित्र से क्लेश दूर करनेको थी, फिर कुछ काल व्यतीत होने पर कामी पुरुषों के विपय सुखकी सिद्धिके लिये हुई परन्तु अहो ! बड़ा कष्ट है कि वह भी इस समय राजाओं को शास्त्रविमुख देखकर अधो- गति को प्राप्त होती जाती है ॥ २७ ॥ इति दुभंगसेवकस्य वाक्यताह । अथ साहङ्कार पुरुष मुदिश्याह । स जातः कोऽप्यासीन्मदनरिपुणा मूर्ध्नि धवलं कमालं यस्योच्चैर्विनिहितमलंकारविधये । नभिः प्राणत्राणप्रवणमतिभिः कश्चिदधुना नम शिः कः पुंसामयमतुलदर्पज्वरभरः ॥२८ ? एक तो ऐसा उत्पन्न हुआ कि किसकोउज्ज्वल कपोल को कामदेव के शत्रु ( महादेवजी ) शोभा के लिये अपने मस्तक पर धारण किया, परन्तु अव प्राणपोपण करनेवाले १२७ वैराग्यशतकम् । लोगों से प्रतिष्ठा पाकर मनुष्य अभिमान के ज्वर से कैसै व्यास हो गये हैं ॥ २८ ॥ अर्थानामीशिषे त्वं वयमपि च गिरामीश्महे यावदर्थं शूरस्त्वं वादिदपज्जरशमनविधावक्षयं पाटवं नः । सेवन्ते त्वां धनाढ्या मतिमलहतये मामपि श्रोतुकामा मय्यप्यास्था न चेत् त्तत्वाय मम सुतरामेप राजन्गतोऽस्मि ।.२६ , हे राजन् । तुम धन के स्वानि हो तो हम भी जब तक शब्दों में अर्थ है तबतक वाणी के ईश्वर (वाक्पति हैं,) तुम शूर हो और हम भी वादियों के अहङ्काररूपी ज्वरके नाशमें प्रवीण हैं, तुम्हारे धनाढ्य लोग सेवक हैं और हमको भी बुद्धिकी मलीनता दूर करने के लिये शास्त्र श्रवण की इच्छावाले सेवन करते हैं (इस प्रकार हम तुम समान हैं) तो यदि हमपर तुम्हारी श्रद्धा नहीं है तो हमारी भी आस्था तुममें नहीं है । लो हम जाते हैं ॥ २६ ॥ इति साहङ्कारपुरुषमुद्दिश्याह । - अथ निर्ममतास्वरूपमाह । अतिक्रान्तः कालो लटभललनाभोगसुभगो ૨૨= - इस संसार । भर्तृहरिविरचितं- भ्रमन्तः श्रान्ताः स्मः सुचिरमिह संसारसरणौ । इदानीं स्वः सिन्धोस्तटभुवि समाक्रन्दनगिरः सुतारैः फूत्कारैः शिव शिव शिवेतिप्रतनुमः.३०॥ सुन्दर स्त्रियों के उपभोग के आनन्द का समय (अर्थात् यौवन ) वीत गया और हम बहुत काल पर्यन्त मार्ग से घूमते २ थक गये। अब तो हम श्री गङ्गाजी की तटसम्बन्धी भूमिपर ऊँची वाससे संसार की निन्दा करते हुए शिव ३ जपेंगे । ३० ॥ माने म्लायिनि खण्डिते च वसुनि व्यर्थ प्रयातेऽर्थिनि क्षीणे वन्धुजो गते परिजने नष्टे शनैयौवने । युक्तं केवलमेतदेव सुधियां यज्जह नु कन्यापयः पूतग्रावगिरीन्द्र कन्दरदरीकुञ्ज निवासः क्वचित् !:३१. जब प्रतिष्ठा भङ्ग हुई, धनका नाश हो गया, याचक- गण विमुख जाने लगे, वन्धुवर्ग क्षयको प्राप्त हुए, परि- जन चले गये और धीरे धीरे युवावस्था भी नाश को प्राप्त दुई तो बुद्धिमान् को यहीं उचित है कि गाजी के जलसे पवित्र की हुई हिमालय पर्वतकी किसी गुफा में निवास करे ।। ३१ ॥ .
१२४
वैराग्यशतकम्।
परेषां चेतांसि प्रतिदिवसमाराध्य बहुधा प्रसा
दं किं नेतु विशसि हृदयं क्लेशकलिलम् ।
प्रसन्ने त्वय्यन्तः स्वयमुदितचिन्त मणिगुणे वि
मुक्तः संकल्पः किमभिलषितं पुष्यतिनते ३२.!
हे हृदय ! क्या तू प्रसाद लेने के लिये मति दिन नाना
मकार से दूसरों के मनकी आराधना करके क्लेश के
कीचड़ में फंसता है ? अन्तः करणमें प्रसन्न होकर जब तू
स्वयं ही चिन्तामणि के गुण प्रकट करेगा (अर्थात् शान्ति,
‘सन्तोष आदि को ग्रहण करेगा ), तब क्या तेरी अभिलाषा
पूर्ण न होगी ? ॥ ३२ ॥
इति निर्ममतास्यरूपमाह ।
अथ भोगपद्धतिः।
भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपाला
दयं मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जरायाः
भयम् । शास्त्र वादभयं गुणे खलभयं काये कृता
न्ताद्यं सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नणां शम्भो
पदं निर्भयम् ॥३३॥
२३० भर्तृहरिविरचित- ALMER भोगमें रोंगका भय है, कुलमें चतिका, धनमें राज का, मौनमें दीनताका, बलमें शत्रुताका, रूपमें जरा (बुडापे) का, शास्त्रमें वादविवादका, गुणमैं दुष्टका, और शरीरमें मृत्युका भय है । इस संसारमें सवही वस्तु भयसे आच्छा- दित है, केवल शिवजीका चरणही पुरुषोंको निर्भय (स्थान) है॥३३॥ अमीपां प्राणानां तुलितविसिनीपत्रपयसां कृते किन्नास्माभिर्विगलितविवेकैर्व्यवसितम् । यदाब्यानामग्र द्रविणमदनिःशङ्कमनसां कृतं वी तवीडेनिजगुणकथापातकमपि ॥ ३४ .. कमल पत्र पर जलकी नाई चञ्चल इन प्राणों के लिये विवेक का त्याग कर हमने कौन कौन कर्म नहीं किये? (अर्थात् सब ही अनुचित कर्म किये ) क्योंकि जब नि- र्लज्ज होकर द्रव्यके मदसे उन्मत्त धनाओंके आगे अपने गुणकथन का पातक किया ( तो इससे बड़कर और क्या होसकता है)॥ ६४ ॥ सा रम्या नगरी महान्सनृपतिः सामन्तचक्र च तत्पार्श्वे तस्य च साविदग्धपरिपत्ताश्चन्द्रविम्या ननाः। उद्रिक्तः स च राजपुत्रनिवहस्तेवन्दि वैराग्यशतकम् । नस्ताः कथाः सर्वंयस्य वशाद गात्स्मृतिपदं काला य तस्मै नमः ।। ३५ ॥ पहिले यह कैसी मुन्दर नगरी थी, कैसा उत्तम राजा था, उसका राज्य कैसा विस्तृत था, सभामें उसके चारों और कैसे कैसे पण्डित और कैसी कैसी चन्द्रमुखी स्त्रियाँ थीं, राजपुत्रों का समूह कैसा प्रवल था, कैसे कन्दी थे और उनकी कैसी उत्तम कथा थी-हम उस कालको नम- स्कार करते हैं जिसके वश होकर ये सब पदार्थ नष्ट होकर स्मृतिपथ (यादगार ) में ही रह गये हैं ॥ ३५ ॥ वयं येभ्यो जाताश्चिरपस्गिता एव खलु ते समं यः संवद्धाः स्मृतिविपयतां ते पिगमिताः। इदानीमेते स्मः प्रतिदिवसमासनपतनाद्गतास्तु ल्यावस्थां सिकतिलनदीतीरतरुभिः ॥ ३६ ।। जिन ( माता पिता ) से हम उत्पन्न हुए उनको गये ( मरे ) बहुत दिन हो गये, जिनके साथ हम बढ़ थे वे भी स्मृतिपदको गये, अब हम नदी के किनारे वालूमें उगे वृक्षकी नाई गिरते ही देख पड़ते हैं ( अर्थात् मृत्युके निकट पहुचते जान पड़ते हैं ॥ ३६॥ तत्रानेके कचिदपि गृहे तत्र तिष्ठत्यथैको
१३२
भर्तृहरिविरचितं-
यात्राप्येकस्तदनु बहवस्तत्र नैकोऽपि चान्ते । इत्थं
चमो रजनिदिवसी दोलयन्द्वाविवाक्षौ कालः
काल्या भुवन फलके क्रीडति प्राणंसारैः ॥३७॥
जिस किसी घरमें अनेक थे वहाँ एक ही देख पड़ता
है, जहाँ एक था वहां अनेक दिखाई देते हैं और अन्तमें
एक भी नहीं रहता । देखो प्राणियोंकी .गोटियाँ बनाकर
डोलते हुए दिन रातके पासे फेंकता हुआ कालपुरुष
अपनी स्त्री काली के साथ कैसा संसाररूपी चौपड़े
खेलता है ।। ३७ ॥
तपस्यन्तः सन्तः किमधिनिवसामः सुरनदी
गुणोदारान्दारानुत परिचरामःसविनयम्। पिवामः
शास्त्रौघानुत विविधकाव्यामृतरसान्न विद्मः किं
कुर्मःकतिपय निमेषायुषि जने ॥ ३८ ॥
हम नहीं जानते कि इस निमेष मात्र स्थिर रहनेवाली
(अर्थात् वहुत थोड़े दिनों तक रहनेवाली ) शरीरसे हम
क्या करें, क्या तप करते हुए गङ्गाजीके तटपर वास करें ?
अथवा गुणवती स्त्रीके विनयपूर्वक गृहस्थीका सेवन कर ?
अथवा क्या हम, वेदान्त शास्त्र समूह और अनेक काव्य
रूपी अमृतका पान करें?॥३८॥
वैराग्यशतकम। · · गंगातीरे हिमगिरिशिलाबद्धपद्मासनस्य ब्रह्म ध्यानाभ्यसनविधिना योगनिद्रां गतस्य । किं ते र्भाव्यं मम सुदिवसैर्यत्र ते निर्विशङ्काः कण्डूयन्ते जरठहरिणाः स्वाङ्गमङ्ग मदीये ॥ ३९ ॥ क्या मेरे ऐसे दिन आवेंगे जब मैं गङ्गाजीके किनारे हिमालयके चटान पर पद्मासन लगाकर वैगा और ब्रम्ह ध्यानमें लीन होकर विधिपूर्वक नेत्र {द योगनिद्राको प्राप्त करू गा जव भयको छोड़ बूढे हरिण अपने शरीरको मेरे शरीरसे रगड़ेंगे ।। ३६ ॥ स्फुरत्कारज्योत्स्नाधवलिततले कापि पुलिने सुखासीनाः शान्तध्वनिपुरजनीषुधसरितः । भवा भोगोद्विग्नाः शिव शिव शिवत्यार्तवचसा कदा स्यामोनन्दोद्गतबहुलबाष्पाप्लुतदृशः ॥ ४० ॥ रात्रियों में जब सम्पूर्ण ध्वनि शान्त हो गई है, गंगा जीके वालुकामय तटपर जो देदीप्यमान चाँदनीसे शुभ्र हो रहे हैं, हम कब सुखसे वैठकर संसारके दुःखसे आतुर हो आर्त स्वरसे शिव शिव कहेंगे और नेत्रोंको आनन्दके आँसुओंसे परिपूर्ण करेंगे ॥ ४० ॥ महादेवो देवः सरिदपि च सैषा सुरसरिदगुहा १३४ भर्तृहरिविरचितं- एवागारं वसनमपि ता एव हरितः । सुहृदा कालोऽयं ब्रतमिदमदैन्यव्रतमिदं कियदां वक्ष्या मो वटविटप एवास्तु दयिता ॥ ४१ महादेव ही हमारे ( एक पूज्य देव हैं ) गंगा हां एक नदी, गुहा ही घर, काल ही मित्र, किसीके सम्मुख दीन न होना यही एक व्रत और वटका वृक्ष ही हमारी दयिता है ( सारांश यह है कि विरक्त पुरुषको ये ही पदार्थ प्रिय होते हैं)॥ ४१ ॥ आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णांतरङ्गा कुला रागग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यमध्वंसिनी। मोहावर्त सुदुस्तराऽतिगहना प्रोत्तुङ्गचिन्तातटी तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगी श्वराः ॥ ४२ ॥ श्राशा एक नदी हैं (कवियोंने अाशाको नदी माना है ) जिसमें मनोरथरूपी जल भरा है, तृष्णारूपी लहरें उठती हैं, जिसमें विषयरूपी ग्राह ( मगर) रहते हैं, वितर्क रूपी पक्षी जिसपर विचरते हैं, जो धैर्यरूपी वृतको ढाहती है, जिसमें मोहरूपी भँवर पड़ते हैं और जो इनसे अत्यन्त दुस्तर और कठिन हो रही है और बड़ी चिन्ता इस नदीके १३५ Zher वैराग्यशतकम्। तट हैं। बड़े बड़े योगी लोग जिनका अन्तःकरण शुद्ध इस नदीके पार जाकर आनन्दको प्राप्त करते हैं॥४२॥ आसंसारं त्रिभुवनमिदं चिन्वतांतात ताहनै वास्माकं नयनपदवीं श्रोत्रवत्मागतो वा। योऽयं धत्ते विषय करिणीगाढगूढाभि मानक्षीबस्यान्तः करण करिणः संयमालानलीलाम् ॥ ४३ ।। हे तात, जवसे संसार उत्पन्न हुआ है तवसे अब तक हम सारा त्रिभुवन खोजते फिरे परन्तु ऐसा मनुष्य देखने और सुनने में न आया जो ( इतना प्रवल हो कि) विषय रूपी हथिनीमें उत्पन्न गूढ़ अभिमानसे, उन्मत्त अन्तःकरण रूपी हाथीको संयम रूपी वन्धनमें वाँधकर रोक ले (ता- त्पर्य यह है कि विपयों में फंसे चञ्चल चित्तको वशमें करना अत्यन्त ही कठिन है)॥४४॥ इति भोगपद्धतिः। . अथ निर्वेदयता स्वरूपमाह । ये वर्धन्ते धनपतिपुरः प्रार्थनादुःखभाजो ये चाल्पत्वं दधति विषयाक्षेपपर्यस्तबुद्धः। तेषामन्तः
१३६
भर्तृहरिविरचितं-
स्फुरितहसितं वासराणां स्मरेयं ध्यानच्छेदे शिख
रिकुहरग्रावशय्या निषण्णः ॥ ४३ :!
पर्वतकी गुफामें चट्टानकी शय्यापर बैठे हुये हम
ध्यानके अन्तरों में मनमें हँसते हुए उन दिनोंका रमण कर
करेंगे जो दिन धनवानोंके सम्मुखः प्रार्थनारूपी दुःखके
भागी होनेके कारण बढ़ते जान पड़ते हैं ( अर्थात् धनाड्यों
की निरन्तर स्तुतिमें वे दिन बीतते नहीं देख पड़ते ) और
जो विपयासक्तं बुद्धिवाले पुरुपोंको छोटे होते हैं ( अर्थात्
कितनी शीघ्रतासे वीत गये सो जान नहीं पड़ता)॥४४॥
विद्या नाधिगता कलङ्क रहिता वित्तं च नोपा
र्जितं शुश्रुपापि समाहितेन मनसा पित्रोन सम्पा
दिता । अालोलायतलोचना युवतयः स्वप्नेऽपि
नालिङ्गिताः कालोऽयं परपिण्डलोलुपतया काकै
खि प्ररितः ४५ ॥
हमने न तो निष्कलंकित विद्या पढ़ी, न धन कमाया,
एकाग्र मनसे माता पिताकी शुश्रा न किया और न स्व-
प्नमें भी चंचल और विस्तीर्ण नेत्रवाली युवतीका आलिङ्गन
किया। हमने तो केवल पराये अन्नका लोभ करते करते.
काककी नाई समय यों ही.व्यतीत किया ॥ ४५ ॥
१३७
.
वैराग्यशतकम्।
वितीर्णे सर्वस्वे तरुणकरुणापूर्णहृदयाः स्मर
न्तः संसारे विगुणपरिणामावधिगतीःवयं पुण्या
रएये परिणतशरचन्द्रकिरणां त्रियामां. नेष्यामो
हरचरणचित्तैकशरणाः ॥ ४६॥
सर्वस्व नाश हो जानेपर, मनमें शिवके चरणोंको
अपना रक्षक जान, सुकुमार करुणापूर्ण हृदय होकर,
संसार को सब गुणोंसे शून्य जानकर शरद ऋतुकी
चाँदनीमें किसी पवित्र वनमें बैठकर हम अपनी रात्रि व्यतीत
करेंगे ॥४६॥
• वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं दुकूलैः सम
इह परितोपो निर्विशेपोविशेषः । स तु भवति
दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे
कोऽर्थ वान्कोदरिद्रः ॥ ४७
यहाँ हम वल्कजों ( छालके वस्त्रों) सेसन्तुष्ट हैं और
तू रेशमी वस्त्रोंसे परितुष्ट हो, अब जो हमारी तुम्हारी तुष्टि
समान हुई तो सन्तोप निर्विशेप हुआ (अर्थात् भेद रहित
हुआ) तो जिसको तृष्णा अधिक है वही दरिद्र है परन्तु
मनके सन्तुष्ट होने पर न कोई दरिद्र है और न कोई
धनी॥४७॥
भलु हरिविरचित- यदेतत्स्वच्छन्दं विहरणमकार्पण्यमशनं सहा यैःसंवासः श्रुतमुपशमैकवतफलम् । मनो मन्द स्पन्दंबहिरपि चिरस्यापि विमृशन नजाने कस्यै पा परिणतिरुदारस्य तपसः ! ४८ : हम नहीं जानते कि स्वच्छन्द विहार करना, विना माँगे भोजन करना, उत्तम पुरुषोंकी सङ्गति करना, ऐसे शान्त्रीका श्रवण करना जिसका फल उपशमरूपी व्रत ही है, हम नहीं जानते कि ये सब फल किस बड़े प्राचीन नपसे प्राप्त होते हैं॥४८॥ पाणिः पात्रं पवित्र भ्रमणपरिगतं भैक्षमक्ष व्यमन्नं विस्तीर्ण वस्त्रमाशा दशकममलं तल्पम स्वल्पमुर्वी । येषांनिःसङ्गताङ्गीकरणपरिणतिः स्वात्मसन्तोषिणस्ते धन्याःसंन्यस्तदैन्यव्यतिकर निकराः कर्म निमूर्लयन्ति ! धन्य हैं वे पुरुप जिनका हाथ ही ( उनके लिये) पवित्र वरतन है, भ्रमण करके लाई हुई भिक्षा ही जिनका भोजन है, अक्षय्य (नय रहित ) विस्तृत दश दिशायें जिनका निर्मल वस्त्र है, बहु विस्तार युक्त पृथ्वी जिनकी शव्या है, जिनके अन्तःकरणकी प्रवृत्ति मव संसगोसे रहित १३६ वैराग्यशतकम्। है, जो ( विषय-भोग तृष्णाको, छोड़) अपने हीमें सन्तुष्ट रहते हैं, जिन्होंने दीनताके समूहको भलीभाँति छोड़ दिया है और जो कर्मको निर्मल करने हैं ( अर्थात् तत्वज्ञानको हटाते हैं और त्रिविध कर्मका नाश करते हैं )॥ ४६ ।। दुराराध्यः स्वामी तुरगचलचित्ताः क्षिति भुजो वयं तु स्थूलेच्छा महति च पदे बद्धमनसः ! जरा देहं मृत्यु हरति सकलं जीवितमिदं सखे नान्यच्छयो जगति विदुषोन्यत्र तपसः ५०॥ इन राजाओंकी, जिनका मन अश्चके समान चंचल है, आराधना करना बड़ा कठिन हैं; परन्तु हमारी इच्छा बड़ी है और बड़े पदमें हमारा चित्त वधा (लगा) है । वृद्धावस्था शरीरको नष्ट करती है और मृत्यु इसका हरण करती है अतएव हे मित्र ! ज्ञानीके लिये इस ससारमें तप वढ़कर कुछ कल्याणकारक नहीं है ॥ ५० ॥ भोगा मेघवितानमध्यविलसत्सौदामिनीचञ्च लाआयुर्वायुविधहिताभ्रपटलीलीनाम्बुवद्धङ्ग रम्। लोला यौवनलालना तनुभृतामित्या कलय्य द्रुतं योगे धैर्य समाधिसिद्धिसुलभे बुद्धिं विद ध्वं बुधाः ॥ ५१ ॥ से १४० भर्तृहरिविरचितं- (देहयारियोंको) भोग, मेय समुदायमें चमकती कि- जलीके समान हैं, अायुप्य, वायुसे छिन्न भिन्न मेघस्थित जलकी नाई जणभंगुर है और यौवनका उमंग भी स्थिर नहीं है. इनका विचार करके हे पण्डित लोग ! योग में अपनी) बुद्धि लगायो जो धैर्यकी समाघिसे मुलभ है ।। ५१ ॥ पुण्ये ग्रामे वन वा महति सितपटच्छन्नपाली कपाली मादाय न्यायागर्भदिजमुखहुतभुग्धूम धूम्रोपकण्ठम् । द्वारं द्वारं प्रवृत्तो वरमुदरदरीपूर णीय क्षुधातों मानी प्राणी सधन्यो न पुनरनुदि नं तुल्यकुल्येषु दीनः ।। ५२ ।। वह मानी पुरुप धन्य हैं जो नुघासे व्याकुल होकर उदरस्पी कन्दराको भरनेके निमित्त श्वेत वस्त्रस दुपा ठीकरा लेकर पुण्य ग्राम अथवा बड़े बनमें उन मनुष्योंके द्वारपर भीख माँगता हैं जिनके चौखट न्याययुक्त (नितिज्ञ) ब्राह्मणोंकी होम. की हुई अग्निसे काले हो गये हैं। परन्तु ममान कुलवालोंके समीप प्रति दिन दीन होना अच्छा नहीं ॥ ५.२ ॥ चाण्डालः किमयं द्विजातिरथवा शूद्रोऽथ कि तापसः किंवा तत्वाविवेकपेशलमतियोगीश्वरः
१४१
?
वैराग्यशतकम् ।
कोऽपि किम् इत्युत्पन्न विकल्पजल्पमुखरैः सम्भा
ध्यमाणाजनैनकुद्धा पथि नैव तुष्टमनसो यान्ति
स्वयं योगिनः ।। ५३ ॥
क्या यह चाण्डाल है ? अथवा द्विजाति हैं ? शूद्र
या तपस्वी है ? अथवा क्या यह तत्वज्ञानमें चतुर कोई
योगीश्वर है ? योगी लोग पुरुपोंसे ( उसके विपयमें ) ऐसे
नाना प्रकारके संशयों पर तर्क वितर्क करते हुए संभाषण
करने पर भी क्रुद्ध नहीं होते और सन्तुष्ट मनसे अपने मार्ग
में चले जाते हैं ॥ ५३ ॥
संखे धन्याः केचित्र टितभववन्धव्यतिकरो
वनान्ते चित्तान्तेऽचिन्वन्तोविषयाशीविपगतिम्।
शरचन्द्रज्योत्स्नाधवल गगना भोगसुभगां नय
न्ते ये रात्रिं सुकृतचय चित्कशरणाः ॥ ५४ ॥
हे मित्र ! धन्य हैं वे पुरुप जिन्होंने संसारके बंधन
का सम्बन्ध तोड़ दिया है, जो मनमें विपयरूपी सर्पकी
गतिको नहीं खोजते, जिनके मनमें पुण्यका समुदाय ही
शरण है और जो वनमें बैठे शरद ऋतुकी चांदनीसे शुभ्र
गगन मंडलसे अति शोभित राति को व्यतीत
करते हैं ॥ ५४॥
१४२ भर्तृहरिविरचितं- एतस्मादिरमेन्द्रियार्थगहनादायासकादाश्रय श्रेयोमार्ग मशेषदुःखशमनव्यापारदर्श क्षणात् । शान्तंभावमुपैहि संत्यज निजां कल्लोललोला गति मा भूयो भज भङ्गुरा भवरति चेतः प्रसीदा धुना ॥ ५५ ॥ हे चित्त ! अब तू प्रसन्न हो, बड़े कष्टसे प्राप्त की हुई इन्द्रियों के विपयरूपी वनसे विश्राम ले, कल्याण मार्गका पाश्रय कर जो संपूर्ण दुःखाँके विध्वंस करनेमें समर्थ है, शान्त भावको अंगीकार कर, तरंगके समान अपनी चंचल गतिको त्याग दे और अब कभी क्षणभंगुर सांसारिक मुख की इच्छा मत कर ॥ ५५ ॥ पुण्यमूलफलैः प्रिये प्रणयिनी वृत्तिं कुरुष्वा धुना भूशय्यानववल्कलैरकरणैरुत्तिष्ठ यामोवनम् क्षुद्राणामविवेकमूढमनसां यत्र श्वराणांसदा चित्त व्याधिविवेकविह्वलगिरांनामापिनश्रयते ॥५६ : हे प्रिये चित्त ! तू अब उठ और पवित्र मूल और फलोंसे अब अपनी वृत्तिको कर, तथा पृथ्वीकी शय्या और नवीन वल्कलोको अपना वस्त्र बना; हम अव वनको जाते हैं, जहाँ उन नीच धनियों का नाम भी न सुन पड़ेगा जो
वैराग्यशतकम्।
अविवेकके कारण मूढमति हैं और जिनकी बुद्धि व्याधिके
विकारसे विह्वल है ।। ५६ ।।
मोहं माजय तामुपाजय रतिं चन्द्रार्ध चूडा
मणौ चेतः स्वगंतरङ्गिणीतटभुवामासङ्गमङ्गीकुरु ।
को वा वीचिपु बुदबुदेषु च तडिल्ल खासु च स्त्री
पुचं ज्वालापुच पन्नगेपुशरिद्ध गेषु च प्रत्ययः
हे चित्त ! माहको दूर कर, चन्द्रार्ध चूडामणि (शि-
वजी, जिनकी जटामें अर्धचन्द्र शोभायमान है ) से प्रीति
कर और स्वर्गतरङ्गिणी (गंगाजी के तटों का संग अंगीकार
क्योंकि लहरोंमें, बुलबुलोंमें, विजलीकी चमकमें,
स्त्रियोंमें, सर्पमें, ज्याला में और नदीके प्रवाहमें, क्या वि
श्वास है [अर्थात् ये सब स्थिर नहीं हैं अतएव इनमें-
विश्वास करना भूल है)॥५७ ।।
अग्रगीतं सरसकवयः पावतो दाक्षिणा
त्याः पृष्ठ लीलावलयरणितं चामर ग्राहिणीनाम
यद्यस्त्येवं कुरु भवरसास्वादने लम्पटत्वं नाचेच्चतः
प्रविश सहसा निर्विकल्पे समाधौ ॥ ५८ ।।
यदि तेरे सन्मुख गान होता हो, पार्श्व ( वगल) में
दक्षिणात्य रसीले कवि हों और पीछे चमर डोलानेवाली
कर,
---
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१४४ भतृहनिवरचितं- मुन्दर स्त्रियोंके कंकणांकी झनकार मुनाई देती तो तू संसार के स्वाद लेनेमें लम्पट हो, नहीं तो हे चित्त ! स्थिर समा- धर्म प्रवेश कर ॥ ५८ ॥ विरमत वुधा योफिसङ्गात्सुखात्क्षणभंगुरा कुरुत करुणामैत्रीप्रज्ञावधूजनसंगम् । न खलु नरक हाराकान्तं घनस्तनमण्डल शरणमर्थवा ओणीविम्ब रणन्मणिमेखलम् ॥५६॥ हे पंडितो ! स्त्रियोंके संगके (से उत्पन्न) क्षणभंगुर मुखसे विश्राम लो और मैत्री, करुणा और प्रज्ञा रूपी स्त्री से सगम करो क्योंकि नरक ( में पड़ने पर) में हारोंसे शोभायमान स्त्रियोंके पुष्ट स्तनमंडल और शब्दायमानमे ख लासे युक्त कटिविम्ब भी सहायता न देंगे ॥ ५६ ॥. मातर्लक्ष्मि भजस्व कंचिदपरं मत्कांक्षिणी मा स्मभूभोंगेभ्यः स्पृहयालवो नहि वयं का निः स्पहाणामसि । सद्यः स्यूतपलाशपत्रपुटिकापात्रे पवित्रीकृते भिक्षासक्तुभिरेव सम्प्रति वयं वृत्ति समीहामहे ।। ६० ॥ हे लक्ष्मी माता ! अव तू किसी अन्य (पुरुष) को भज और मेरी आशाको छोड़ दे क्योंकि अब हमको वैराग्यशतकम। १४५ विषयों में अभिलाषा नहीं है और निस्पृही पुरुषको तू क्या है ( अर्थात् तुच्छसी है ) क्योंकि अब तो हम पलाशके हरे पत्तोंके पवित्र दोनों में भिक्षाकी सत्तसे अपने जीवननिर्वाहकी इच्छा रखते हैं ॥६॥ यूयं वय वयं यूयमित्यासीन्मतिरावयोः। किंजात मधुना मित्र यूयं यूयं वयं वयम् ॥ ६१ ॥ हे मित्र ! जो तुम हो सो हम हैं और जो हम हैं सो तुम हो ( अर्थात् हम दोनों परस्पर एक ही है ) यह हम लोगोंकी पहिले मति थी परन्तु अव न जाने क्या हो गया कि अब तुम तुम ही हो और हम हम ही हैं ( अर्थात् तुम विपयाभिलाषी हो और हम विरक्त हैं अतएव दोनों हम तुम अब समान नहीं हैं ॥ ६१ ॥ बाले लीलामुकुलितमभीमन्थरा दृष्टिपाताः किं क्षिप्यन्ते विरम विरम व्यर्थ एष श्रमस्ते ॥ संप त्यन्येवयमुपरतं बाल्यमास्था वनान्ते क्षीणो मोह स्तृणमिव जगजालमालोकयामः ॥ ६२ ॥ हे वाला स्त्री ! लीलासे मुकुलित इन मन्द कटातोंको हम पर क्यों फकती है, विरम विरम ( हट जा, हट जा) तेरा यह श्रम, व्यर्थ है क्योंकि अब हम दूसरे ही हो गये, हमारी वाल्यावस्था बनान्त में ही बीती, हमारा देह. क्षीण भर्तृहरिविरचितं- .. हो. गया और हम संसार के जालको तृण के समान देखते हैं ॥ ६२॥ इयं वाला मां प्रत्यनवरतमिन्दीवरदल प्रभा चोरं चक्षुः क्षिपति किमभिप्रेतमनया । गतो मो होऽस्माकं स्मरकुसुमवाणव्यतिकरज्वरज्वाला शा न्ता तदपि न वराकी विरमति ॥ ६३ ॥ इमका क्या प्रयोजन है कि जो वाला मुझ पर कमल की शोभा को चुराने वाले नेत्रोंको फेकती है, हमारा मोह तो गया और कामदेवके पुष्पवाण से उत्पन्न हुई ज्वरकी ज्वाला भी शान्त हो गई तो भी यह विचारी शान्त नहीं होती ॥ ६३ ।। रम्यं हमेतलं न किं वसतये श्राव्यं न गे यादिकं किं वा प्राणसमासमागमसुखं नैवाधिक प्रीतये । किंतद्भ्रान्तपतत्पतङ्गपवनव्यालोलदीपां कुरच्छायाचञ्चलमाकलय्य सकलं संतो वनांतं गतः ॥ ६४॥ क्या सन्तोंके निवासके लिये हर्म्य ( महल) न थे ? क्या उनके सुनने के लिये गीत इत्यादि न थे? क्या अधिक प्रीति ( उत्पन्न कराने) के लिये स्त्रीका समागम सुख न वैराग्यशतकम् । wir था ? (अर्थात् यह सब कुछ था) परन्तु उन्होंने इस संसार को गिराते हुए पतंग से हिलाई हुई दीपककी छायाके समान चंचल जाना और वनको चले गये ।। ६४ ।। किं कन्दाः कन्दरेभ्यः प्रलयमुपगता निर्भरा वा गिरिभ्यः प्रध्वस्ता वा तरुभ्यः सरसफलभृतो बल्कलिन्यश्च शाखाः। वीक्ष्यन्ते यन्मुखानि प्र सभमुपगतप्रश्रयाणां खलानां दुःखोपात्ताल्पवित स्मय पवनवशान्नतित भ्रलतानि ॥ ६५ ॥ क्या कन्दराओं में से फन्द और पहाड़ियोंमें से. झरने प्रलयको प्राप्त हुए ( नष्ट हो गये) ? अथवा क्या रस, फल और वल्कलकों धारण करनेवाली वृक्षकी शाखा टूट गई कि उन अवनीत दुष्टोंकी ओर देखा जाता है ( उनके आश्रयंसे रहना पड़ता है ) जिनकी भौहें रूपी लता बड़े कष्टसे उत्पन्न किये हुए अल्प धनके गर्वरूपी पवनसे चञ्चल हैं ( सारांश यह है कि दुष्टोंका आश्रय छोड़कर सज्जनों को वनके फल मूल ' खाकर निर्वाह करना चाहिये ॥ ६.५ ॥ गङ्गातरंगहिमशीकरशीतलानि विद्याधराध्य षितचारुशिलातलानि । स्थानानि कि हिमवतः .
भहरिविरचितं- प्रलयं गतानि यत्सावमानपरपिण्डरता मनु ब्याः॥६६॥ क्या हिमालयके वे स्थान जो गङ्गाजीकी लहरोंके ठण्ड अनुकरणों से शीतल थे और जिनकी शिलातलं पर विद्याधर यहाँ वहाँ बैठते थे नष्ट हो गये कि जो अपमान सहन करने पर भी मनुष्य पराये के दिये ग्रास (अन्न) में रत होते हैं ॥६६॥ यदा मेरु श्रीमान्निपतति युगान्ताग्ननिहितः समुद्रा शुष्यन्ति प्रचुरनिकरग्राहनिलयाः । धरा गच्छत्यन्तं धरणिधरपादेरपि धता शरीरे का वा त करिकलभकर्णाग्रचपले ॥ ६७ ॥ जय श्रीमान सुमेरु पर्वत भी प्रलय की अग्निसे नि- हत होकर गिर पड़ता है, जव समुद्र भी जो बड़े बड़े ग्राह और मकरों का स्थान है, सूख जाता है और जब पर्वतोंके पगों को धारित पृथ्वी भी अन्तको जाती हैं ( अर्थात् नष्ट होती है) तो हाथीके बच्चेके कानके अग्रके सम न चंचल इस शरीरकी क्या बात है ( इस शरीर का क्या भरो- सा है॥६७ ॥. एकाकी निःस्पृहः शान्तः पाणिपात्रो दिग १४ वैराग्यशतकम् । म्बरः। कदा शम्भो भविष्यामि कर्मनिमूलन नमः॥६८॥ हे शम्भु ! कव मैं अकेला, इच्छा रहित, शान्त, पा- णिपात्र ( हाथोंका पात्र बनाने वाला) दिगम्बर (नङ्गा) और कमांकी जड़ उखाड़नेवाला हूंगा ।। ६८॥ प्राप्ताः श्रियः सकलकामदुधास्ततः किं दत्त पदं शिरसि विद्विषतां ततः किम् । सम्मानिताः प्रणयिनो विभवैस्ततः किं कल्पं स्थितं तनुभृतां तनुभिस्ततः किम् ।। ६६ ॥ यदि सब कामना देनेवाली लक्ष्मी भी पाई तोक्यां? यदि शत्रुओंके शिर पर पग भी रक्खे ( अर्थात् शत्रुओंको जीता) तो भी क्या ? प्रणयी जनोंका धनसे सम्मान किया तो क्या ? फिर इस देहसे कल्पपर्यन्त जिये तो भी क्या हुआ ? ( सारांश यह है यदि संसारके निचिके लिये वैराग्य धारण न किया तो यह सब व्यर्थ है) ॥६६॥ जीण कन्था ततः किं सितममलपट पट्ट सूत्रं ततः कि मेका भार्या ततः किं हयकरि सुगणे शवृतो वा ततः किंमभक्तं भुक्तं ततःकि कदशनमयवा वासरांते ततः किं व्यक्त ज्योति भर्तृहरिविरचितं- مه नवान्तर्मथितंभवभयं वैभवं वा ततः किम्॥७॥ यदि जीर्ण गुदड़ी धारण किया तो क्या ? उज्ज्वल निर्मल वस्त्र अथवा प ताम्बर धारण किया वो भी क्या ? एक ही पत्नी हो तो क्या ? और घोड़े. हाथी सहित करोड़ों स्त्रियाँ रहें नो भी क्या ? भात खाया तो क्या ? अथवा सन्ध्या समय कुत्सित अन्न खाये तो भी क्या? यदि संसार के भयको नष्ट करने वाली ब्रह्मकी ज्योतिको हृदयमें धारण न किया तो बड़ा वैभव पाकर भी क्या प्रयोजन है (अर्थात् यह सब व्यर्थ ही है ॥ ७० ॥ भक्तिर्भवे मरणजन्मभय हृदिस्थं स्नेहो न बन्धुषु न मन्मथजा विकाराः। संसर्गदोपरहिता विजना वनान्ता वैराग्यमस्ति किमतः परमर्थनी नीयम् ।। ७१ ॥ ( यदि) शिवमें भक्ति हो, हृदयमें जन्म मरण (वारं वार इस संसारमें जन्म लेने और मरने) का भय हो, बन्धुजनसे स्नेहन. हो, कामजनित विकार मनमें न हों; और संसर्ग दोषसे रहित होकर निर्जन वनमें निवास हो, तो इससे बढ़कर अर्थनीय ( ईश्वरसे माँगने. योग्य ) कौन सा वैराग्य है ।। ७१॥
वैराग्यशतकम्। १५१ तस्मादनन्तमजरं परमं विकासि तद्ब्रह्म चि न्तय किमेभिरसद्रिकल्पैः । यस्यानुषङ्गिण इमे भुवनाधिपत्यं भोगादयः कृपणलोकमता भवन्ति अतएव, अनन्त, अजर ( जरा इत्यादिसे रहितः), सर्वोत्तम शोक रहित ब्रह्मका चिन्तन करो-इन असत् वि. कल्पोंसे क्या प्रयोजन हैं । अर्थात् देहादि अहंकारको त्याग सच्चिदानन्द ब्रह्मकी चिन्ता करो । मूर्ख जनोंको भ्रममें डालनेवाले ये भुवनाधिपत्य भोगविलास उसी ब्रह्मके आ- श्रित हैं ( अर्थात् जिन लोगोंने ब्रह्मका लेशमात्र भी आ- नन्द पाया है उनके निकट त्रिभुवनके राजाओं का भोग विलास निःसार देख पड़ता है ) ॥ ७२ ॥ पातालमाविशसि यासि न भोविलंध्यदिङ मण्डलं भ्रमसि मानस चापलेन । भ्रान्त्यापि जातु विमलं कथ मात्मनीतं तद्ब्रह्म न स्मरसि निर्वृतिमेषि येन ॥ ७३ ॥ अरे मन ! तू अपनी चंचलताके कारण · पाताल में घुसता, है, आकाशका उल्लंघन करता है और सब दिशा- 'ओमें भ्रमण करता है परन्तु · भूले भी उस अपने ही मनमें स्थित विमल ब्रह्मका स्मरण नहीं करता जिससे तू मोक्षको प्राण कर सकता हैं ॥ ७३ ।।
m १५२ भर्तृहरिविरचित- रात्रिः सैव पुनः स व दिवसो मत्वाऽबुधा जन्तवो धावन्त्यद्यमिनस्तथैव निभृतप्रारब्धतत्त कियाः । व्यापारः पुनरुक्तमुक्त विषयैरवं विधेना मुना संसारेण कदर्थिताः कथमहो मोहान्न लज्जा महे ॥ ७४॥ यह रात्रि वही है आर यह दिन वही है ऐसा जान कर मूर्ख लोग अपने अपने कार्यो, उसी प्रकारसे उद्यम करते हुए दौड़ते हैं । परन्तु अहा ! ( कैसे खेदकी बात कि ) वारंवार कहे और भोगे हुए विषयोंसे वारंवार आ. रंभ की हुई उन्ही क्रियाओंको करते हुए हम इस संसारसे कदर्थित (निन्दित) होकर मोहवश लज्जाको प्राप्त नही होते । ( सारांश यह है कि संसार को अनित्य और विषर्योको असार जान कर हमको विरक्तता ग्रहण करनी चाहिये)।। ७४॥ मही स्म्या शय्या विपुलमुपधानं भुजलता वितानं चाकाशं व्यजनमनकूलोऽयमनिलः॥स्फु रद्दीपश्चन्दो विरतिवनितासङ्गमुदितः सुखंशान्ता शेते.मुनिरतनु भूतिप इव ॥ ७५ ॥ शान्त मुनि, जिसकी पृथ्वी ही उचम-शय्या है, भुजा
वैराग्यशतकम् ।
१५३.
ही. विपुल तकिया, विस्तीर्ण आकाश ही ओढ़ना है, अनु-
कूल.पवन ही. पंखा, चन्द्रमा ही प्रकाशमान दीपक और
जिसकी विरति ही स्त्री है, वह अति ऐश्वर्यवान राजाके
समान सुखपूर्वक सोता है ।। ७५ ।।
त्रैलोक्याधिपतित्वमेव विरसं यस्मिन्महाशा
सने तल्लब्ध्वाशनमस्त्रमानघटने भोगे रति मा
कृथाः । भोगाः कोऽपि स एक एव परमो नित्यो
दितो जम्भते यत्स्वादादिरसा भवन्ति विषयास्त्र
लोक्यराज्यादयः ।। ७६ ॥
(हे मन !) जिस ब्रह्मज्ञानसे त्रिभुवनका राज्य भी
निःसार हो जाता है उसे प्राप्त करके भोजन वस्त्र मानके
लिये भोगोंमें प्रीति मत कर । वहीं एक भोग उत्तम है और
प्रकाशमान है जिसके स्वादसे विपय, त्रैलोक्यका. राज्य
इत्यादि सब विरस ( फीके ) हो जाते हैं ।। ७६।।
किं वेदै स्मृतिभिः पुराणपठनैः शान महावि
विस्तरैः स्वर्गग्रामकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियावि
विभ्रमैः । मुक्त्वैकं भवबन्धदुःखरचनाविध्वंसका.
लानलं स्वात्मा नन्दपदप्रवेशकलनं शेषावणि
ग्वृत्तयः ॥७॥
-
१५४
भर्तृहरिविरचितं-
वेद, स्मृति पुराण और बड़े बड़े शास्त्रोंके पड़ने से
क्या ? स्वर्ग रूपी ग्रामकी कुटीमें निवासके फलको देने
वाले कर्म और क्रियाओंके विलासोंसे क्या ? संसारके
वन्धन रूप दुःख रचनाके निमित्त ( उत्पन्न हुई) प्रलयाग्नि
के समान ब्रम्हानन्द पद प्रवेशक उद्योगके अतिरिक्त और
सव वणिक वृत्ति है ( लेन देनका व्यवहार है; अर्थात् ये
सव कर्म क्रिया मनुष्य फलकी आकांक्षासे ही करता है
परन्तु ब्रम्हज्ञान प्राप्तिके उद्योग किसी अन्य फल प्राप्तिके
लिय नहीं होते )॥ ७७ ।।
आयुः कल्लोललोलं कतिपयदिवसस्थायिनी
यौवन श्रीरथः संकल्पकल्पा घनसमयतडिदिभ्रमा
भोगपूराः॥ कण्ठाश्लेपोपगूढं तदपि च न चिरं
यस्त्रियाभिः प्रणीतं ब्रह्मण्यासक्तचित्ता भवत भव
भयाम्भोधिपारं तरीतुम् ।। ७८ ॥
आयुष्य लहरके समान चंचल है, यौवनकी शोभा
गोड़े ही दिन रहने वाली है, धन मनके संकल्पके नाई
पणिक है। भोगके प्रवाह वर्मा कालकी विद्युन्के समान
चंचल हैं और प्रियासे गले मिल कर आलिङ्गन करने का
सुख चिरकाल तक नहीं रहता, अतएव अवसरके भयल्पी
समुद्र को पार करने के लिये ब्रह्म में चित्त लगाओ।।७८||
mowomaa वैराग्यशतकम् । २५५ मनस्वी पुरुप ब्रह्माण्डमंडलीमात्र न लोभाय मनस्विनः। शफरोस्फुरतेनाब्धः क्षुब्धता नतु जायते॥७॥ यह ब्रह्माण्ड मण्डल मनस्थियोंको (आत्म विचारी योगियों) को लुभानेके लिये नहीं है। मछलीके उछलनेसे समुद्रमें क्षोभ प्राप्त नहीं होना ( तात्पर्य यह है कि गम्भीर के. सन्मुख ये त्रिभुवन के सुख अति तुच्छ है) ॥७॥ यदासीदज्ञानं स्मरतिमिरसंस्कारजनितं तदा दृष्टनारी मयमिदमशेषं जगदपि । इदानीमस्माक पटुतरविवेकाञ्जनजुषां समीभूता दृष्टिस्त्रिभुवनम पि ब्रह्म तनुते ॥ ८॥ कामदेव के अन्धकार जनित ज्ञानके कारण यह सम्पूर्ण जगत् हमको स्त्री मय दिखाई देता था परन्तु इस समय हमारी दृष्टि विवेकरूपी अञ्जनके लगानेसे स्वच्छ हो गई हैं जिससे सम्पूर्ण जगत् ब्रह्ममय दिखाई देता है।।८०॥ रम्याश्चन्द्रमरीचयस्तृणवती रम्या वनान्तस्थ ली रम्यं साधुसमागमोद्भव सुखं काव्येषु स्म्याः कथाः । कोपोपाहितबाष्पविन्दुतरल रम्यं प्रिया.
१५३
भर्तृहरिविरचितं-
याः मुखं सर्व रम्यमनित्यतामुपगते चित्तें न
किञ्चित्पुनः ॥ १॥
चन्द्रमाकी किरणें
मधुर
है, तृणयुक्त. वनान्तकी भूमि
सुहावनी है, साधुओंके समागमसे उत्पन्न हुआ मुख रम्य
है, काव्योंकी कथा रमणीय हैं, कोपके कारण निकले
आँस्के यूँदोंसे तरल प्रियाका मुख मुन्दर है-ये सब रम्य
हैं परन्तु संसारकी अनित्यताका ज्ञान मनमें उत्पन्न होनेसे
यह सब कुछ नहीं से ( अर्थात असार ) जान पड़ते हैं।८१॥
भिक्षाशी जनमध्यसंगरहितः स्वायत्तंचेष्टः
सदा दानादानविरक्तमार्गनिरतः कश्चित्तपस्वी
स्थितः । रथ्या क्षीणविशीर्णजीर्णवसनैः रास्यूत
कन्थाधरोनिर्मानो निरहंकृतिः शमसुखाभोगै
कवद्धस्पृहः ॥ ८२॥
ऐसे विरले ही तपस्वी होते हैं जो भिनासे निर्वाह
करते हैं जनोंके समुदायमें प्रीति छोड़कर रहते हैं सदा.
स्वाधीन चेष्टामें लगे रहते हैं, देने लेनेसे भिन्न विरक्त मार्गमें
रत होते हैं, मार्गमें. फटे पुराने - कपड़ोंकी गुदड़ी धारण
करते हैं, मान और अहङ्कारसे रहित और शम सुख (ब्रह्मा-
नन्द के भोगमें ही उत्कट इच्छा रखते हैं ॥ ८२॥
१५७ . वैराग्यशतकम् । मातमेदिनि तात मारुत सखे तेजः सुगन्धो जल भ्रातव्यो म निवद्ध एव भवतामेष प्रणामा जलिः ॥युष्मत्संगवशोपजातसुकृतो द्रेकस्फुरनि मैलज्ञानापास्तसमस्तमोहमहिमा लीये परं ब्रह्मणि ||८ है माता पृथ्वी ! हे पिता वायु ! हे मित्र तेज हे मुबन्धु जल ! और हे भाई आकाश ! मैं हाथ जोड़ तुम्हारे आगे प्रणाम करता हूँ, तुम्हारी सातिके कारण उत्पन्न पुण्यकी, अधिकतासे प्रकाशमय ज्ञान द्वारा मेरी समस्त -मोह महिमा दूर हो गई है और अब मैं परब्रह्ममें लर होता हूँ ॥८॥ यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः । प्रोत्मश्रेयसि तावदेव विदुपा कार्यः प्रयत्नो म हान् प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यम की. दृशः ॥४॥ अब तक वह कलेवरका घर (शरीर) स्वस्थ (निरोग) है जब तक वृद्धावस्थां दूर है,जब तक इन्द्रियोंकीशक्ति न्यून, नहीं हुई है और जब तक आयु क्षीण नहीं हुई है विद्वान .
१५८ भर्तृहरिगिरचित- को चाहिये कि तभी तक अपने कल्याण के निमित्त वडे. घडे, प्रयत्न कर ले क्योंकि घरमें आग लगने पर कुआ खोदना व्यर्थ है ( अर्थात् देहेन्द्रियों के शिथिल होने पर पुरुषों से प्रवल कार्य नहीं हो सकते ॥८४॥ नाभ्यस्ता भुवि वादिवृन्ददमनी विद्या विनी तोचिता खङ्गाने करिकुम्भपीठदलनैर्नाकं न नीतं यशः । कान्ता कोमलपल्लवाधररसः पीतो न च न्द्रोदये तारुण्यं गतमेव निष्फलमहो शून्यालये दीपवत् ॥ ८५॥ हमनें नम्रजनोंके (प्रसन्न करने ) योग्य और वा दियोंको परास्त करने वाली विद्या न पढ़ी, खंड के अग्र भागसे हाथियों के कुभ पृष्ठको विदीर्ण कर स्वर्ग तक अपना यश नहीं पहुँचायाऔर चाँदनी रातप्रियाके कोमल अधरपल्लवका पान न किया ! तो हा ! सूने घरके दीपक को नाई हमारा यौवन निष्फल ही हुआ ॥८५ ॥ ज्ञान सतां मानमदादिनाशन, केषांचिदेत न्मदमानकारणम् । स्थानं विविक्तं यमिनां विमुक्तये, कामातुराणा मपिकामकारणम् ॥८६॥ ज्ञान ही श्रेष्ठ पुरुषों का मान और मोह नाश करता १५६ वैराग्यशतकम्। है और, दुष्टों का मद और मान बढ़ाता है जैसे एकान्त स्थान योगियों को मुक्ति के लिये है वैसे ही वह कामियों का काम अत्यन्त बढ़ता है ॥८६॥ जीर्णा एव मनोरथाः स्वहृदये यातं जरा यौ वन हन्ताङ्गप गुणाश्च वन्ध्यफलतां याता गुण ज्ञविना ॥ किं युक्तं सहसाभ्युपैति बलवान्कालः कृतान्तोऽक्षमी विज्ञा.. मदनान्तकांघ्रियुगल मुक्त्वास्ति नान्या गतिः॥ ८७॥ हा ! मनोरथ अपने हृदय में ही जीर्ण हो गये (अर्थात पूरे न हुए) यौवन बुढ़ापा हो गया, गुणज्ञों के विना गुण भी अंग में ही निप्फलताको माप्त हो गये, अब क्षमा हीन सवको नाश करनेवाला बलवान् काल (मृत्यु) सहसा आ रहा है तो क्या करना उचित है ? ऐसी अवस्था में विद्वानों के लिये कामनाशक शिवजी के चरण युगल को छोड़ दूसरी कोई गति नहीं है ॥ ८७ ॥ तृषा शुष्यत्यास्ये पिवति सलिलं स्वादु सुर भिः क्षुधातः सञ्शालीन्कवलयति शाकादिवलि तान् । प्रदीप्ते कामाग्नौ सुदृढतरमाश्लिष्यति --
१६०
भर्तृहरिविरचितं-
वधू प्रतीकारो व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति
जनः ॥ ८८॥
जव कंठ सूख जाता है तो शीतल सुगन्धित जल
पीता है, जब नुधा से पीड़ित होता है तो शाक इत्यादि के
सहित चावलों को खाता है और कामाग्नि के परितप्त होने
पर स्त्रीका दृढ़ आलिंगन करता है, इस प्रकार इन (भिन्न
भिन्न ) व्याधियों की (प्रत्येक ) औषधियों को पुरुष उलटे
सुख समझता || -८॥
स्नात्वा गाङ्गः पयोभिः शुचिकुसुमफलैरर्च
यित्वा विभोत्वां ध्येये ध्यान नियोज्य क्षितिधर
कुहरग्रावपर्यमूले । आत्मारामः फलाशी गुरुवच
नरतस्त्वत्प्रसादात्स्मरारे दुःखान्मोत्ये कदाहं तव
चरणरतो ध्यानमार्गे कनिष्ठः॥८६॥
हे स्मरारे : ( कामदेव के शत्रु शिवजी ), हे प्रभो!
गंगाजल से स्नान कर, पवित्र जल फूलों से तेरा पूजन
कर, पर्वत का कन्दरा में पर्वत की चट्टान रूपी सेजंपर बैठे
ध्येय (ध्यान करने योग्य ) तुझमें ध्यान लगाकर, गुरुके
वचन मान आत्माराम और फलाशी होकर तेरे ही चरणों
मैं रति रख, तेरे ही ध्यान में मग्न रहनेवाला मैं दुखों
संसार) से मुक्ति पाऊँगा॥८६॥
वैराग्यशतकम्। शय्या शैलशिला गृहगिरिगुहा वस्त्रं तरूणां त्वचः सारङ्गा सुहृदो ननु क्षितिरुहां वृत्तिः फलैः कोमलैः। षां नझरणाम्बुपान मुचितं रत्यै च विद्याङ्गना मन्यन्ते परमेश्वरा शिरसियैर्बद्धो न सेवाञ्जलिः ॥१०॥ हम उन पुरुपों को परमेश्वर (तुल्य ) मानते हैं जिनकी शिला शय्या है, पर्वत की कन्दरा जिनका गृह है, वृक्षों की छाल जिनके वस्त्र हैं, हरिण मित्र हैं, वृक्षों के कोमल फल खाकर जा निर्वाह करते हैं, जो झरनों का जल ही पीते हैं, विद्या रूपी स्त्रीमें जिनकी प्रीति है और जिन्होंने कभी सेवा में अपना हाथ नहीं वाँधा (प्रणाम किया )|| ६०॥ सत्यामेव त्रिलोकी सरिति हरशिरश्चुम्बिनी वच्छटायां सर्जिकल्पयन्त्यांवटविटपभवैवल्कले सत्फलैश्च । कोऽयं विद्धान्विपत्तिज्वरजलितरु जातीवदुःश्वासिकानां वक्त्रं वीक्षेत दुस्थे यदिहि न विभृयात्स्वे कुटुंवेऽनुकंपाम् ॥ ११ ॥ ऐसा त्रिलोकी सरित् (गंगाजी) ले विद्यमान रहने पर जिसका कटिवन शिवजीके मस्तक को चूमता है और .
भर्तृहरिविरचितं- जो तट इत्यादि वृत्तां से वल्कल और नाना प्रकार के अच्छे फलों से सद,त्ति की प्रेरणा करती है, कौन बुद्धिमान् पुरुप ऐसा है कि यदि वह अपने कुटुम्ब पर दया न करे दो कदापि वह विपत्ति ल्यो ज्वर से ग्रस्त लंबी सांस लेती हुई स्त्रियों का मुख न देखे ।। (सारांश यह है कि कुटुम्ब बनाने की इच्छा से ही लोग गृहस्थी के जंजाल में फंसते हैं नही तो गंगा तटपरही सब आनन्द मिल सकते है| ऊधानेपुविचित्रभोजनविवित्तीवातितीवंतपः कौपीनावरणं सुवस्त्र ममितं भिक्षाटनं मण्डनम् । प्रासन मरणं च मङ्गलसमं यस्यां समुत्पद्यते तां काशीं परिहत्य हन्त विवुधैरन्यत्र किं स्थीयते ॥ १२ ॥ हा ! पण्डित लोग काशी का परित्याग कर अन्यत्र क्यों वसते हैं, काशी जहां उपवनों में नाना प्रकार के भोजन बना कर खाना ही तीव्र से तीव्र व्रत है, जहाँ लंगोटी लगाना ही उत्तम वस्त्र है, भीख माँगना ही भूपण है और जहाँ मृत्यु होना ही परम मंगल उत्पन्न करताहै|२|| नार्य ते समयो रहस्यमधुना निद्राति नाथो यदि स्थित्वा द्रक्ष्यति कुप्यति प्रभुरिति द्वारेषु येषां वैराग्यशतकम् । १६३ बचःचेतस्तानपहाय याहि भवनं देवस्य विश्व शितुर्निदीवास्किनिर्दयोक्त्यपरुषं. निःसीमशर्म प्रदम् ।। ६३॥ रे चित्त ! ऐसे धनिकों को जिनके द्वारपर (भिक्षुकों से.) द्वारपाल कहते हैं “यह तुम्हारा समय नहीं है, प्रभु एकान्तमें विचार कर रहे हैं, इस समय सो रहे हैं, यदि उठ कर तुमको यहाँ बैठे देखेंगे तो हम परः कुपित होंगे। उनको तुम त्याग कर विश्वेश्वर की शरण में जाओ.जिनके द्वारपरं कोई रोकनेवाला नहीं हैं, जहाँ कठोर और निर्दय चाक्य सुनने में नहीं आते और जो अत्यन्त सुखदाई है।।६३॥ प्रियसखि विपदण्डव्रातप्रतापपरम्पग परिचय चले चिन्ताचक्रे निधाय विधिः खलः । मृदमिव चलापिण्डीकृत्य प्रगल्भकुलालवद्भ,मयति मनों नों जानीमः किमंत्र विधास्यति ॥ ६ ॥ हे प्रिय मखि ! (बुद्धि) यह दुष्ट विधाता चतुर. कुम्हार की नाई चिन्ताल्पी चक्रपर जो विपत्तिरूपी दंडके ताड़न परंम्परा से अत्यन्त चंचल है, मिट्टी के पिण्ड के समान हमारे मनको घुमाता है हम नहीं जानते कि (ऐसी अवस्था को पहुँचा कर) अब वह क्या करेगा ? ||४|| .. .
१६४ मतु हरिविरचितं- महेश्वरे वा जगतामधीश्वरे जनार्दने वा जग दन्तरात्मनि । तयोर्न भेदप्रतिपत्तिरस्ति मे तथापि भक्ति स्तरुणेन्दुशेखरे ॥ १५ ॥ । यद्यपि जगदीश्वर (शिव) और जगदन्तरात्मा जना दन ( विष्णु ) में कोई भेद जान नहीं पड़ता तो भी जिसके मस्तक में नवीन चन्द्र विराजमान है (अर्थात् शिवम.) उन्हीं में हमारी परम प्रीति है ॥३॥ रे कन्दप कर कदर्थयसि किं कोदण्डटकारवै रे कोकिल कोमलैः कलरवैः किं त्वं वृथा जल्पसि । मुग्धेस्निग्धविदग्धक्षेपमधुरैर्लोलेः कटा नैरलं चेतश्चुम्वित चन्द्रचूडचरणभ्याना मृते वर्तते ॥ १६॥ अरे कामदेव ! न अपने धनुष के दवारों से हायोंको क्यों कष्ट देता है (अर्थात् हमपर अपने पुप्पवाण क्यों फेंकता है) अरे कोकिल कोमल वाणी सेन क्या क्यों बकवाद करता है ? अरे मुन्थे! न अपने प्रिय, चतुर, सुन्दर मधुर और चंचल कानों को हटा ते क्योंकि मेरा विच चन्द्रशेखर महादेवजी के चरणों के ध्यानस्पी अमृत में निमन्न है।॥ १६ ॥ HAmatrimenMARAN वैराग्यशतकम् । कौपीनं शतखण्डजज रतरं कन्था पुनस्ताह शी नैश्चिन्त्यं सुखसाध्यभक्ष्यमशनं निद्राश्मशाने बने । मित्रामित्र समानताति विमला चिन्ताऽथ शून्यालये वस्ताशेष मद प्रमाद मुदितो योगी सुखं तिष्ठति ॥ १७ ॥ इस संसार में योगी ही सुखपूर्वक रहता है जिसका' कौपीन सैकड़ों टुकडे होकर जर्जर हो गया है, और कन्या (कथरी) भी जिसकी ऐसी ही है, जो निश्चिन्त है, जिनको भिक्षान सुखसे साध्य है, जिनकी शैय्या श्मशान और वन है, जो मित्र और शत्रु से समान भाव रखते हैं, अत्यात शून्य स्थान में जो ध्यान (समाधि ) लगाते हैं और जिनका संपूर्ण मद और प्रमाद नष्ट होगया है ॥६॥ भोगा भङ्गवृत्तयो बहुविधास्तैख चायं भव स्तत्कस्येह कृते परिभ्रमतरे लोकाः कृतं चेष्टितैः। अाशापाशशतोपशान्तिविशदं चेतः समाधीयतां कामोच्छित्तिहरे स्वधामनि यदि श्रद्धेयमस्म द्धचः॥१८॥ अरे मनुष्यो ! ( इस संसार में जो) नाना प्रकार के भोग हैं वे भङ्ग वृत्ति ('अर्थात् जन्म मरण के येही कारण, भर्तृहरिविरचितं- हैं) ऐसा जानकर भी ज्यों यहाँ भ्रमण करते है। ऐसी भोग चेष्टा से क्या फल है यदि हमारे वचन पर तुम्हारी श्रद्धा है तो सैकड़ों प्रकार के आशा पाशको तोड़ो निर्मल चित्त होकर स्वयं प्रकाशवान् कामनाशक शिवजी में सदा चित लगाओ ||८॥ धन्यानां गिरिकन्दरे निवसितां ज्योतिःपरं ध्यायतामानन्दाश्रुजलं पिबन्ति शकुना निःशङ्कम केशयाः। अस्माकं तु मनोरथोपरचितगासादवा पीतटक्रीडा, कानन कलिकौतुक जुषामायुः पर क्षीयते ॥ ६ ॥ धन्य हैं वे.पुरुष जो पर्वत की गुफाओं में रहते हैं और परब्रह्म ज्योतिका ध्यान करते हैं, जिनके आनन्द जनित आँसुके जलको पक्षिगण उनके गोदमें निडर बैठकर पीते हैं। हम लोगों की आयुष्य मनोरथरूपी मन्दिर में. वनी वाउली के तट पर क्रीडा कानन में लीलाके कौतुक में क्षीण होती है (सारांश यह है कि हम लोगों का जन्म नाना प्रकार की मिथ्या कल्पना में व्यतीत होता है और मनोरथ कोई भी सिद्ध नहीं होते)॥ 86 अाक्रान्तं मरणेन जन्म जस्सा विधुचलं वैराग्यशतकम्। यौवनं संतोपो धनलिप्सया शमसुखं गौदाङ्गना विनमः । लोकर्मत्सरिभिर्गुणो वनभुवो व्यालेन पादुर्जनैरस्थैर्येण विभूतयोप्युपहृता ग्रस्तं न किं केन वा ॥ १०॥ इस संसार में जन्म मृत्यु से आक्रान्त है, विद्युत्के समान चंचन यौवन बुढ़ापे से, संतोप धनकी कामना से, शान्तिका सुख सुन्दर नियों के विलासों से, गुण मत्सरवा युक्त ( दुष्ट ) जनों से, वन सी से, राजा लोग दुर्जनों से, और ऐश्वर्य अस्थिरता से आच्छादित है • सब किसी न किसी से प्रस्त है [ तात्पर्य यह है कि बध्न की आराधना करी जो किसी से ग्रस्त नहीं हैं)॥१०॥ आधिव्याविशतेर्जनस्य विविधरारोग्यमुन्मू. ल्यते लक्ष्मी यंत्र पतन्ति तत्र विवृतद्वारा इव व्यापदः । जातं जातमवश्यमाशु विवशं मृत्युः करोत्यात्मसात्तम्किनाम निरंकुशेन विधिना यन्नि मितं सुस्थितम् ॥ १०१ ॥ पुरुपके यारोग्य (स्वास्थ्य ) को नाना प्रकार की शारीरिक और मानसिक, व्याधियाँ जड़ से उखाड देती हैं जहाँ लक्ष्मी होती है वहाँ आपत्ति द्वार फोड़ कर आजाती भर्तृहरिविरचितं- है, जो उत्पन्न होता है उनको मृत्यु बलपूर्वक शीघ्र, ही अवश्य. अपने वशमें कर लेती है तो यहाँ निरंकुश विधिने कौनसी वस्तु स्थिर वनाई है ॥ ११ ॥ कृ णामध्यमध्येनियमिततनुभिःस्थीयतेगर्भ वासो कान्ताविश्ल पदुःव्यतिकरविषमे यौवने चोपभोगः ।नारीणामप्यवज्ञाविलमतिनियतं वृद्ध भावोऽप्यसाधुः संसारे रे मनुष्या वदत यदि सुखं स्वल्लमप्यस्ति किञ्चित् ॥ १०२॥ हम लोगों को शरीर से जकड़े हुए अपवित्र गर्भ में बड़ी कठिनता से रहना पड़ता है, यौवन का उपभोग स्त्रियों के वियोगरूपी दु खके कारण अति विषम है, और वृद्धा वस्था में हमको त्रियों से निरादर पाकर सिर नीचा किय शोच में पड़े रहना होता है । हे मनुष्यो ! इस ससार में यदि किंचित् मात्र भी सुख हो तो हमसे कहो (तात्पर्य यह है संसार असार है इसमें मुखका लेश भी नहीं है इसी कारण योगी लोग इसे छोड़ कर 'ब्रह्मानन्द में निमग्र होते हैं)॥१०२॥ आयुर्वर्षशतं नृणां परिमितं रात्रौ तदर्धं गतं तस्यार्द्धस्य परस्य चाईमपरं बालत्ववृद्धत्वयोः ।
वैराग्यशतकम्। शेपं व्याधि वियोग दुःखसहितं सेवादिभिर्नीयते जीवे वारितरङ्गचञ्चलतरे सौख्यं कुतः प्राणि नाम् ॥ १०३ ॥ मनुष्य की आयु सौ वर्ष की नियत की गई है, उसमें से आधा (अधा ५० वर्ष ) रात्रि में सोकर व्यतीत होता है, बाकी के वचे आधे में से आधा ( अर्थात् ५० का आधा २५) लड़कपन और बुढ़ापे में जाता है और अब जो बाकी वचा ( अर्थात् वाकी के २५ वर्ष) व्याधि, वियोग और दुःखसहित सेवा इत्यादि में जाता है । तो ( बतायो) जलके समान चंचल जीवन में मनुष्य को सुख कहाँ मिल सकता है ॥ १०३ ॥ ब्रह्मज्ञानविवेकिनोऽमलधियः कुर्वन्त्यहो दु. करं यन्मुञ्चत्युपभोगभाज्ज्य पिधनान्येकान्ततो निःस्पृहाः॥नमातानि पुरानसंपति न च प्राप्तौ दृढपत्ययो वाञ्छामात्रपरिग्रहाण्यपि परं त्यक्तुन शक्ता वयम् ॥ १०४॥ जिन (पुरुषों) की बुद्धि ब्रह्मज्ञान के विवेक से निर्मल हुई है, वे अत्यन्त दुष्कर कर्मों को करते हैं, वे निस्पृह होकर उपभोग के भाजन धनका परित्याग करते 1 7 भर्तृहरिविरचितं- हैं। परन्तु हमको तो ये वस्तु न पहले कभी प्राप्त हुई, न माप्त हैं और विश्वास है कि भविष्य में भी प्राप्त न होगी:: हम इच्छा मात्र से इनका ग्रहण करते हैं, परन्तु इनका त्याग नहीं कर सकते ॥ १०४॥ व्याधीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ती रोगाश्च शत्रव इव प्रहन्ति देहम् । आयुः परिस्रवति भिन्न घटादिवाम्भो लोकस्तथाप्यहितमाचरताति. चित्रम् ॥ १०५ ॥ वृद्धावस्था बाघिनके समान डराती हुई सन्मुख खड़ी है । रोग भी शत्रु को नाई देहको पीड़ा दे रहा है और आयुप्य भी फूटे घड़े में के जलकी नाई चला जा रहा है और तब भी वड़ा आश्चर्य है, कि मनुष्य ऐसे कर्म करते हैं जिनसे उनका अनहित होता है ॥ १०५॥ गात्रं संकुचितं गतिविगलिता भ्रष्टा च दन्ता वलि टिनश्यति वर्धते बधिरता वक्त्रं च लाला यते । वाक्यं नादियते च बान्धवजनो भायर्यान शुश्रपते हा कष्टं पुरुषस्य जीर्णवयसः पुत्रोऽप्य मित्रायते॥ १०६ ॥ बुड्ढे पुरुषों का शरीर सिकुड़ता जाता है, गति विग.
.
वैराग्यशतकम् ।
लित हो जाती है, दांत टूट जाते हैं, दृष्टि नष्ट हो जाती है,
बहिरापन बढ़ जाता है, मुखसे लार टपकने लगती है, उनको.
आदर वन्धुजन नहीं करते, स्त्री रोवा नहीं करती। अहो
कैसे कटकी बात है, इस अवस्था में पुत्र भी शत्रुके समान
(अर्थात् अनहित ) आचरण करने लगता है ॥ १०६ ॥
क्षणं वालो भूत्वा क्षणमपि युवा कामरसिका
क्षणं वित्तेर्होनः क्षणमपि च सम्पूर्णविभवः ।
ज़राजीणैर नटइव वलीमण्डिततनुर्नरः संसारान्ते
'विशति यमधानी जवनिकाम् ॥ १०७॥
यह मनुष्य क्षणमें वालक होता है, और क्षणमें काम
रसिक युवा हो जाता है, क्षण में दरिद्र और क्षण ही में
ऐश्वर्यसम्पन्न हो जाता है और क्षणमें जरा-जीर्ण (बुढ़ा-
पेसे सिकुडे. हुए) अङ्गोको देख कर फिर नदोंके समानरून
धारण करता हुआ संसार रूपी नाटक के अंगमें यमराज के
नगररूपा जवनिका (पर्दै) में प्रवेश करता है ।।१०७॥
अहो वा हारे वाचलवति रिपौ वा सुहृदि वा
मणौ वा लोठे वा कुसुमशयने वा दृषदि ।।
तृणे वा स्त्रणे वा मम समहशो यांति दिवसाक्व
चित्पुण्यारण्ये शिव शिव शिवेतिलपतः ॥१०॥
२७२ भर्तृहरिविरचितं- कव हमारे दिन शिव शिव जपते हुए किसी पवित्र वनों में व्यतीत होंगे जब हम सर्प अथवा हारको, बलवान् शत्रु अथवा मित्र को, मणि अथवा पापाणको, . पुष्पकी शय्या अथवा पत्थरकी चटानको और तृण अथवा. स्त्रियोंके समूह को एक समान समझेगे ॥ १०८ ॥ धैर्य यस्य पिता क्षमा चजननी शान्तिश्चिरं गेहिनी सत्यं मित्रमिदं दया च भगिनी भ्राता मनः संयमः । शय्या भूमितलं दशोऽपि वसनं ज्ञानामृतं भोजनम् ह्य ते यस्य कुटुम्बिनो वद सखे कस्माद्यं योगिनः ॥ १०६ ॥ हे सखे ? तूही बता कि जिसका पिता धैर्य है, माता क्षमा है, भार्या शान्ति है, सत्य जिसका मित्र है, दया जिस की भगिनी है, मनः संयम (मनको रोकना) जिनका भ्राता है, भूमितल जिसकी शरया है, दिशा जिसके वस्त्र हैं, और ज्ञान रूपी अमृत जिसका भोजन है, ये जिसके परिवार हैंउस योगीको किससे भय है ( अर्थात् वह अभय है ॥ १०६ ॥ इति श्रीमद्रहरिविरचितं वैराग्यशतकं समाप्तम्। ... विविध विषयकश्लोकाः। अकिञ्चनस्य दान्तस्य शान्तस्यसमचेतसः।
१७३ 11 वैराग्यशतकम् । सदासन्तुष्ट मनसः सर्वाः सुखमयादिशः॥१०॥ दरिद्र संयमी, शान्त और समचित्तवाले और संतोपी पुरप को सय दिशा सुखमयी है (अर्थात् ए से पुरुष सर्वत्र सभी पदार्थों से सुख प्राप्त करते हैं ) ।। ११० ॥ अनावर्तीकालो ब्रजतिस वृथा तन्नगणितं दशास्तात्ताः सोदा व्यसनशत सम्पात विधुराः।। कियद्रावक्ष्यामः किमिव बत नात्मन्यपकृतं त्वया वत्तावत्पुनरपि तदेव व्यवसितम् ।। १११ ।। कालका प्रत्यागमन नहीं होता (वीता समय फिर नहीं आता ) वह व्यर्थ गया जो तूने नहीं जाना, तूने सैकड़ों ऐसी दशाएं झेली जो आपत्तियोंसे भरी थीं तो क्या कहें तूने अपने ही बुरेके लिये क्या क्या कर्म नहीं किये ? और वारम्बार अब भी तू ए से ही कमाँ को करता है ।। १११॥ अभिमतमहामानग्रन्थिप्रभेद पटीयसी गुरुतर गुणग्रामाम्भोज स्फुटोज्ज्वल चन्द्रिका ।। विपुलवि लसल्लज्जावल्ली विदारकुठारिका जठरपिठरी दुष्पूरेयं करोति विडम्बनम् ॥ ११२॥ यह उदर रूपी कढ़ाई जो बड़ी कठिनता से भरी जो सकती है, जो अभिमत बडे बडे अभिमानकी गांठको गलाने ramme भर्तृहरिविरचितं- में ( काटनेमें ) बड़ी चतुर है, जो, गुरुतर गुणोंके. समूहः रूपी कमलोंको विकासने वाली चांदनी है और जो कुगरको नाई विशाल और देदीप्यमान लज्जा रूपी लताको काटने में समर्थ है-हमारी बड़ी विडावना करती हैं (तात्पर्य यह है कि इस उदर पूरणके निमित्त मनुष्यों को बड़े बड़े नीच कर्म करने पड़ते हैं ) ॥११२॥ प्रश्नीमहिवयं भिक्षा मांशावासो वसीमहि । शयीमहि महीपृष्ठे कुर्वीमहि किमीश्वरैः॥११३॥ हम भिक्षा पर निर्वाह करते हैं, दिशाओं का वस्त्र बनाते हैं.( अर्थात् नंगे रहते हैं) पृथ्वी के तल पर सोते हैं। हमको सम्पत्तिवान पुरुपों से क्या प्रयोजन है:॥ ११३३ ॥ उत्तिष्ठ क्षणमेकमुद्रह गुरु दारिद्यभार सखे श्रान्तस्तावदहं चिरं मरण सेवे त्वदीयं सुखम् । इत्युक्तो धनवर्जितेन सहसा गत्वा श्मशानेशवो दारिद्यान्मरण वरं वरमिति ज्ञात्वैव तूष्णीं स्थितः ॥ ११४॥ " हे मित्र ! उठो और क्षण भरके लिये इस दरिद्रता के विशाल भारका सहन करों। मैं अव,थंक गया हूं और जोः सुख: तुमने मृत्यु पाकर किया सो मैं अब पाना चाहता हूं।" धनहीन पुरुष से स्मशानपर जाकर कहने पर मुरदा.. का P----- वैराशनकम् । १७५. - . urinar यह जानकर कि दरिद्रता से मरण भला है, चुप रह गया ।। १४४ ॥ एकोरागिषु राजते प्रियतमा देहाधारी हरो नीरागेपु जनो विमुक्त जननासङ्गो न परमात्परः। दुर्वारस्मर वाणपन्नगविषव्याविद्धमुग्धाजनःशेषः कामविडवितान्न विषयान्भोक्तुं नमाक्तक्षमः११५ एक शिवजी ही जिन्होने अन्य त्रियों का संग त्याग दिया है और जो अपनी प्रियतमा (पार्वतीजी) की आधी शरीर को धारण करते हैं अनुरागियों को प्रिय है, और तपस्वियों को भी इनसे बढ़कर और.काई देवता में श्रद्धा नहीं है । परन्तु वाकी बचे लोग (अर्थात् जो शिवका पूजन नहीं करते वे) दुर्निवार कामदेवके वाणरूपी, सर्पसे डसे. जाकर विपयों से व्याज होकर मुग्ध (पागल) हो जाते हैं. और काम से विडम्बित होकर नतो विपयों का त्याग कर सकते हैं और न उनका उपभोग ही कर सकते हैं ॥११॥ एता हसन्ति च रुइन्ति च कार्यहेतोविश्वास यान्ति च परं च न विश्वसन्ति। तस्मान्नरेण कुल शील समन्विते न कार्याः श्मशान घटिका इव वर्जनीयाः॥ ११६ ॥ प
१७६
.
भर्तृहरिविरचितं-
ये (स्त्रियाँ) अपने अभिमाय से हँसती, रोती हैं,
(दूसरों को अपने में ) विश्वास दिलाती हैं परन्तु स्वयं
(किसी में) विश्वास नहीं करती अतएव अच्छे कुलवाले
शीलवान् पुरुष को चाहिये कि श्मशान की गगरी की नाई
इन स्त्रियों का परित्याग करें ।। ११६॥
कदावाराणस्थाममरतटिनी रोधसिवसन्वसानं
कौपीनं शिरसि निदधानाञ्जलिपुटम् । अयेगौरी.
नाथः त्रिपुरहरशम्भो त्रिनयन प्रसीदेत्याकोशन्नि
मिषमिव नेष्यामि दिवसान् ॥ ११७॥
कब मैं काशी में गंगाजी के किनारे पर रह कर,
कौपीन पहिरे शिरपर हाथ बांध कर रक्खे (अर्थात, हाथ
जोड़ो) 'अरे! गौरी नाथ, त्रिपुरहर, शम्भु, त्रिनयन ?
सुंझपर कृपा करो" एसा कहते हुए निमिष के समान
(क्षणभर ) दिनों को व्यतीत करूंगा ॥ ११७ ॥ .
कार्कश्यं स्तनयो शोस्तरलतालीक मुखेश्ला
ध्यते कौटिल्यं कच सञ्चये च वचने मान्यं त्रिके
स्थूलता। भीरुत्वं हृदये सदैव कथितं माया प्रयोगः
प्रिये यासां दोप गुणो गुणो मृगदृशां ताः स्युः
पशूनां प्रियाः ॥ ११८॥
वैराग्यशतकम्। १७७ पशु लोग ही इन मृगनयनी स्त्रियोंके.दोष समुदायको गुण मानते हैं, वे इनके स्तनोंकी कठोरता को, दृष्टिकी चंच लता और मुखके झूठेपनको सराहते हैं, वालोंकी कुटिलता वाणी की मन्दता और कदिकी स्थूलता इन्हें माननीय है, और हृदय की कादरता और अपने प्रियोंके प्रति इनके कपटके प्रयोग को सदा बखानते हैं ॥ ११८ ॥ क्वचिद्रीणावादःक्वचिदपि च हाहेतिरुदितं क्वचिद्विद्वद्गोष्ठी क्वचिदपि सुरामत्तकलहः।क्व: चिद्रामा रम्याः क्वचिदपि गलत्कुष्ठ वपुषो नजाने संसारः किममृत मयः किं विपमयः ? ११६ ॥ कहीं तो बीन बज रही है कहीं हाहाकार रोजाई हो रही है, कहीं तो पंडितोंकी पात चीत और कहीं सुरा (शराब) से उन्मत्त होकर कलह हो रहा है, कहीं तो मुन्दर स्त्रियां हैं और कहीं शरीर गले हुए कोड़ी हैं-नजाने संसार अमृतमय अथवा विपमय ही है।,११६ ।। गा–गिरा च विकलश्चटु मीश्वराणां कुर्वन्न यं प्रहसनस्य नटः कृतोसि । तं त्वां पुनः पलित कणकभाजमेनं नाट्यन केन . नटयिष्यति दीर्घमायुः ॥ १२० ॥. यह है RANI १७% भर्तृहरिविरचितं- तुम टेढ़ी मेढ़ी शरीरसे और लड़खड़ाती हुई वाणी से धनाढ्यों के प्रहसनके पात्र बन गये हो ( हास्यरस प्रधान नाटकको प्रहसन कहते हैं ) फिर न जाने दीर्घ आयुष्य तुम्हारे वाल एक जाने पर क्या क्या नाच नचावेगी ( तात्पर्य यह है कि जब युवा अवस्था तुमने धनिकोंको व्यर्थ प्रशंसा में व्यतीत की है तो अब तुम वृद्धावस्थामें क्या कर सकोगे)॥ १२० ॥ चलालक्ष्मीश्चला प्रणाश्चलं जीवित यौवनम्। चलाचले च संसारे धर्म एकोहि निश्चलः॥२१॥ इस चल संसार में लक्ष्मी, प्राण, जीवन, यौवन सभी चल हैं ( अर्थात् सदा एक ही अवस्था नहीं रहते ) केवल धर्म ही निश्चल है ( जो मदा रहता है और जिसका कभी नाश नहीं होता) ॥ १२१ ॥ चेताश्चिन्तय मारमा स कृदिमामस्थाविनी मास्थया भूपाल भ्रुकुटी कुटी विहरणव्यापार पण्या नाम् । कन्थाकञ्चुकिताः प्रविश्य भवन द्वाराणि वराणसी रथ्या पङ्क्तिषु पाणिपात्रपतितां भिक्षा मपेक्षामहे ।। १२२॥ अरे चित्त! एक वार भी तू इसअस्थायी धनकी उत्कट वैराग्यशतकम् । चिन्ता मत कर जो वेश्याकी नाई राजाओं के भौंरूपी गृह में विहार करती है । अव हम ( धनकी अभिलाषा को छोड़ कथरी धारण करके, काशी की गलियों में गृहोंके द्वार पर हाथ - रूपी. पात्रों में भिक्षा मिलने की अभिलाषा करते हैं ॥ १२२॥ जातः कूर्मः स एकः पृथुभुवनभरायार्पितं येन पृष्ठं श्लाघ्यं जन्म ध्रुवस्य भ्रमतिनियमितं यत्रते जश्विचक्रम् । सजातव्यर्थपक्षाः परहितकरणेनो परिष्टान्नचाधो ब्रह्माण्डो दुम्बरान्त शकवदरे जन्तवोजातनष्टाः ॥ १२३ ।। एक कच्छपजीका जन्म सफल है जो जिन्होंने इस विपुल संसार का भार अपनी पीठ पर लिया है, ध्रुव नक्ष- त्रका जन्म सराहनीय है जिसके कारण यह तेजस्विक ( अर्थात् नक्षत्रोंका समुदाय ) नियम पूर्वक घूमता है। इस संसार में दूसरे जन्तु ( जो परोपकार नहीं करते) गूलरके फलके कीड़ों की नाई हैं जिनको पर ब्यर्थ ही जमते हैं) मनुष्य पक्षमें जिनकी सम्पत्ति और जिनका पराक्रम दूसरों के उपयोग में नहीं आता ) जिनका जन्म और मरण समान है और जब वे दूसरोंका उपकार करते तो नहीं . :- ) भर्तृहरिविरचितं- उनके लिये यह संसार और दूसरा भी ( स्वर्ग ) नष्टही है ॥ १२३ ॥ तङ्ग वेश्म सुताः सतामभिमताःसंख्यातिगाः सम्पदः कल्याणी दयिता वयश्च नवमित्यज्ञान मूढोजनः । मत्वा विश्वमनश्वरं विनिशतैः संसार करागृहे संदृश्य क्षणभङ्गुरं तदखिलं धन्यस्तु सन्यस्यति ।। १२४॥ अज्ञानी मूर्ख मनुष्य ऊंचे घर, सज्जनोंको प्रिय पुत्र, असंख्य सम्पत्ति, सुन्दर स्त्री और नया यौवन देख भूमंड- लको नित्य जानकर इस संसार रूपी कारागार में प्रवेश करते हैं परन्तु धन्य पुरुप इन सवको क्षणभंगुर (तणमें- नष्ट होने वाले ) जानकर सन्यास ले लेते हैं ॥ १२४ ॥ ददतु ददतुगाली गालिमन्तो भवन्तो वद मपि तदभावाग्गालिदाने समर्थः । जगति विदि तमेतदीयते विद्यमानं नहि शशकविषाणं कोपि कस्मैददाति ॥ १२५ ॥ आप लोग गाली देने वाले हो जितनी गाली मन हो दो, हम तो गाली जानते ही नहीं, अतएव गाली देने में वैराग्यशतकम्। २८१ समर्थ नहीं है । मंसार में यह प्रसिद्ध है कि जिसके पास जो विद्यमान है वही वह दे सकता है। खरहे की सींघ भला कोई किसी को दे सकता है ? ॥ १२५ ।। न भिक्षादुष्पापा पथि मम महारामचरिते फलो सम्पूर्ण भूमिमृगचर्मापिक्सनम् । सुखेवा दुःखेर्वा सदृशपरिपाकः खलु तदा त्रिनेत्रं कस्त्यत्त्वा धनलवमदान्धं प्रणमति ॥ १२६॥ जब मेरे मार्गमें बई वटे, उद्यान विद्यमान है, पृथ्वी फलामे भरी है और मृगके चर्म वसका है तो फिर भिक्षा दुप्पाप्य नहीं है और तय तो मुख और दुःखका एकही परिणाम है। ऐसी स्थिति होने पर कौन शिवजीको बोड़ थोड़े धनसे मदान्य पुरुपको प्रणाम करेगा ? ॥ १२६ ॥ नो खड्ड प्रविदारिताः करटिनो नोदोजिता वेरिणस्तन्यङ्ग्या विपुले नितम्बफल के न क्रीडितं लीलया । नो जुष्टं गिरिराजनिझर झणझङ्कार कारं पयः कालोऽयं परपिण्डलोलुपतया काकैरिव प्रेरितः ॥ १२७॥ हमने न तो हाथियोंको काट डाला, न शत्रुओंको कष्ट दिया.और न तन्वङ्गी के वृहत् नितंब पर लीलासे क्रीड़ा १८२ भर्तृहरिविरचित- किया और न हिमालयके शब्दवान् झरनोंका जल पिया, हमने यह काल कौवोंकी नाई दूसरों से टुकड़ा पानेकी इच्छासे ( व्यर्थ ) ही बिताया ।। १२७ ॥ परिभ्रमसि किं वृथा कचन चित्त विश्राम्यतां स्वयं भवति यद्यथा भवति तत्तथा तान्यथा। अतीतमपि न स्मरन्नपि च भाव्य सङ्कल्पयन्नत कितगमागमननुभवस्व भोगानिह ॥ १२८ ॥ अरे चित्त! वृथा इधर उधर क्यों घूमता है, विश्राम ले ( क्योंकि ) जो होने वाला है वह स्वयं ही वैसा ही होता है अन्यथा नहीं होता। वीती हुई वातका स्मरण और होने वाली का संकल्प न करके तू इस संसार में ऐसे फर्लोका अनुभव करता है जिसका आना जाना पहिलेसे नहीं जाना जा सकता ॥ १२८॥ पाणि पात्रयतांनिसर्गशुचिना भक्ष्येण सन्तु ध्यतां यत्रकापि निषीदतां बहुतृणं विश्वं मुहुः पश्यताम् । अत्यागोपि तनोरखण्ड परमानन्दा. वबोधस्पृहां मर्त्यः कोपि शिवप्रसाद सुलभां सम्पत्स्यते योगिनाम् ॥ १.६ ॥ ( इस मृत्यु लोकमें ) कोई ऐसा भी मनुष्य है जो शरी १८३ वैराग्यशतकम्। रके न त्याग करने पर भी (अर्थात् इस संसार में हीरहकर) उस अखण्ड और परमानन्द ज्ञानकी लालसा करता है जो शिवजी के प्रसादसे सहज ही मिल सकता है और जिसको योगी लोग हाथका पात्र बनाकर स्वाभाविक स्वच्छ भिक्षा पाये हुए अन्नसे सन्तुष्ट होकर, बारम्बार संसारको तृणके समान देखते हुए जहाँ कहीं ( इच्छा हुई वहीं) बैठकर (योग द्वारा) प्राप्त करते हैं।। १२६ ॥ प्रशान्तशास्त्रार्थविचारचापलं निवृत्त नानार सकाव्यकौतुकम् । निरस्तनिः शेषविकल्पविस्तर प्रपत्तु मन्विच्छति शङ्करं मनः ॥ १३० ॥ शान्त शास्त्रार्थ के विचार में लगा हुआ ( अर्थात् ब्रह्म ज्ञानका चिन्तन करता हुआ ) यह मन नाना प्रकारके रसोंसे भरे काव्य कौतुकोंको छोड़ और उनसे उत्पन्न अनेक सन्देहों को दूर करके शंकरमें जानेकी इच्छा करता है ॥ १३० ॥ पातालान्न विमोचितोवतवलीनीतो न मृत्युः क्षयं नो मृष्टं शशिलाच्छनं च मलिनं नोन्मू लिता व्याधयः। शेषस्यापि धरां विधृत्य न कृतो भारावतारः क्षणं चेतः सत्पुरुषाभिमानमनिशं मिथ्यावहविद्यते ।। १३०॥
१८४ भर्तृहरिविरचितं- - तुमने.वली को पाताल से नहीं छुड़ाया, मृत्युका तय नहीं किया चन्द्रके लांछनको नहीं मिटाया, व्याधियाँको जड़से नहीं उखाड़ा और शेष नागका पृथ्वी उठाने का भार क्षण भरके लिये भी हलका न किया; हे चित्त ! तू दिन रात सज्जन होनेके झूठे घमण्डसे 'वृथा पीड़ित होता है ॥ १३१॥ फलं स्वेच्छालभ्यं प्रतिवनमखेदं तितिरुहां पयः स्थाने स्थाने शिशिर मधुरं पण्यसरिताम् । मृदुस्पर्शा शय्या सुललितलता पल्लवमयी सह न्ते सन्तापं तदपि धनिनां द्वारिकृपणाः॥१३१ ( जब ) प्रत्येक बनमें वृत्तोंके फल अपने इच्छानुसार विना कष्टके मिल सकते हैं, (जव) स्थान स्थान पर ठण्डी मधुर जलवाली पुण्य नदियाँ मिल सकती हैं और (जव) सुन्दर लतापत्रादिकी वनी सेज छने में कोमल होती है (तो) नीच ही पुरुप धनाढ्यों के द्वारपर सन्ताप सहते हैं॥ १३२॥ भव्यं भक्तं ततः किं कदशनमथवा वासरा न्ते ततः किं कौपीनं वा ततः किं किमथ सित महचामरं वा ततः किम् । एका भर्या ततः किं (८५ वैराग्यशतकम् । शतगुणगुणिता कोटिरेका ततः किं त्वेकोभ्रान्तस्त तःकिं करितुरगशतैवेष्टितो वा ततः किम् ॥ १३ ॥ यदि दिनके अन्तमें (रात्रिको) उत्तम चावलका भात भोजनको मिले तो क्या और बुरा अन्न मिले तो भी क्या ? कौपीन ( लंगोटी) पहिरने को हो तो क्या और लम्वा चौड़ा पीताम्बर हो तो भी क्या ? एक भार्या हो तो क्या और सैकड़ों गुणों से युक्त करोड़ों हों तो भी क्या? अकेला ही भ्रमण करें तो क्या और यदि सैकड़ों हाथी और घोड़ोंसे घिरे हुए घूमें तो भी क्या ? ( योगियोंको ये सब, समान हैं)॥१३२॥ भिक्षा कामदुधा धेनुः कन्था शीतनिवारि णी । अचला तु शिवे भक्तिर्विभवैः किं प्रयोज नम् ॥ १३३ ॥ जब भिक्षा कामधेनु है अर्थात् जब भिक्षासे ही तृप्ति होती हैं) कथरी जाड़े को हटाती है और शिवमें अचल भक्ति है तो विभवसे क्या प्रयोजन है ( अर्थात् धन, सम्पति ऐसी अवस्थामें व्यर्थ है ) ॥१३३।। भिक्षाहारमदैन्यमप्रतिसुखं भीतिच्छिदं सर्वदा दुर्मात्सर्य मदाभिमान मथनं दुःखौघविध्वंसितम् ।
भर्तृहरिविरचितं- सर्वत्रान्वहमप्रयत्नसुलभं साधुप्रियं पावनं शम्भोः सत्रमवार्यमनयनिधिंशंसन्ति योगीश्वराः॥१३॥ योगीश्वर लोग कहते हैं कि शिवजीके पूजनमें ऐसी निधि है जिसका निवारण कोई नहीं कर सकता और जिसका तय कभी नहीं होता-ऐसा पूजन जिसमें अनु- पम मुख है, जो भयको हटा देता है, जो द्वपसे उत्पन्न हुए अभिमानका ध्वंस करता है, दुखके प्रवाहको रोकता है साधुओंको प्रिय है और जो सदा सर्वत्र सुखसे मिल सकता है ॥ १३४॥ भूः पर्यको निजभुजलता कन्दुकं खं वितानं दीपश्चन्दो विरतिवनितालब्धसङ्गप्रमोदः। दिक्का न्ताभिः पवनचमरैर्वीज्यमानः समन्ताद्भितुःशेते नृपइव भुवि त्यक्तसर्वस्पृहोपि ॥ १३५ ॥ संन्यासी अपनी सब आकांक्षाको त्यागकर राजाकी नाई ( नि.शङ्क होकर आनन्दसे ) पृथ्वीपर सोता है, पृथ्वी उसकी सेज है, भुजा तकिया, आकाश ओड़ना, चन्द्रमा दीपक है, वह विरति (वैराग्य) रूपी स्त्रीके संगका आनन्द लेता है और दिशारूपी स्त्रियाँ पवनरूपी चंवरोंको उसके ऊपर डुलाती हैं ॥१३॥ AAWEmpe १८७ वैराग्यशतकम्। भोगास्तुङ्गतरङ्गभङ्गचपलाः प्राणा क्षणध्वंसि निस्तोकान्येव दिनानि यौवनसुखं प्रीतिः प्रियेष्व स्थिरा । तत्संसारम परमेव निखिलं बुद्ध्वा बुधा वोधका लोकानुग्रहपेशलेन मनसा यलः समाधी यताम् ॥ १३६ ॥ हे पण्डित लोग ! भोग, बड़ी बड़ी लहरोंके टूटनेके समान चंचल है, प्राण तणमें नष्ट होनेवाले हैं, यौवन का सुख थोड़े ही दिन रहनेवाला है, प्रिय लोगोंसे प्रीति भी स्थिर नहीं है, अतएव सम्पूर्ण संसारको निसार जानकर तुम लोगोंके उपकार करनेमें अपने मनको यत्न पूर्वक लगायो॥१३६॥ यदक्त' मुहुरीक्षसे न धनिनां व पे न चाटु मृषा नैषां गर्वगिरः शृणोषि न पुनः प्रत्याशया धावसि । काले बाल तणानिखादसि सुखं निद्रा पि निद्रागमे तन्मे ब्रूहि कुरङ्ग कुत्रभवता किं नाम तप्तं तपः ।। १३७ ॥ अरे हरिण ! तूने किस नामका तप कहाँ किया कि जो तुझे बारम्बार धनियोंका मुख नहीं देखना पड़ता, न झूठी स्तुतिके वचन बोलने पड़ते हैं;तू इनकी गर्वीली वाणी
२
पड़ता है
1
महरिविरचितं-
नहीं नुनता और न किसी आशासे तुझे इनके पास दौड़ना
नू समय पर (अर्थात् भूख लगने पर ) कोमल
तृणको खाता है और नींद आने पर मुखसे खोता है [सा-
गंश यह हैं कि वनमें रहनेवाली वहाँ सभी प्रकारके मुख
लभ्य हैं ] ॥१७॥
वर्णसितं शिरसिवीक्ष्य शिरोरुहाणां स्थानं
जरा परिभवस्य यदेव पुंसां । आरोपितास्थिश
कलं परिहत्य यान्ति चाण्डाल कूपमिव दूरतरं
नरुण्यः॥ १३८ ।
तरुणी स्त्रियाँ पुरुषों के शिरपर वालोंको श्वेत देख,
जो पुरुषोंके वृद्धावस्थासे परिभव होने का स्थान है [अर्थात्
वृद्धावस्थाका आगमन प्रायः शिरके बालोंके श्वेत होनेसे
ज्ञात होता है ) छोड़ देती है जैसे वे किसी कुएं पर हड्डीका
टुकड़ा देख उसे चाण्डालका कूप जान छोड़ कर दूर भा-
गती हैं ॥१३॥
समारम्भा भग्नाः कतिन कतिवारांस्तवपशो
पिपासोस्तुच्छेस्मिन्द्रविण मृगतृष्णार्णवजल।तथा
पिप्रत्याशा विरमति न तेद्यापि शतधा न दीणं
यचेतो नियतमशनिग्रावघटितम् ॥ १३६ ॥
BARADARSHAN
वैराग्यशतकम्।
-
अरे पशु ! इस धनरूपी मृगतृष्णाके समुद्रके जलमें
मेरे प्यासेके कितनी बार कर्मके प्रारम्भ भग्न नहीं हुए
। अर्थात् कितनी बार तूने धन उपार्जनके निमित्त नाना
कारके कर्मोका प्रारम्भ किया परन्तु अन्तमें कुछ धन
प्राप्ति न हुई) परन्तु अब भी तेरी आशा नहीं टूटी, तेरा
"उदय निश्चय करके वज्रहीका बना है जो अव भी सैकड़ों
बड़े नहीं हो जाता ॥१६॥
सिंहोवली द्विरदशूकरमांसभोजी संवत्सरेण
रतिमेति किलैकवारंपारावतः खरशिलाकणमात्र
भोजी का भवत्यनुदिनं वद कोत्र हेतुः॥१४०॥
यह प्रसिद्ध है कि बलवान सिंह जो हाथी और शूकर
का मांस खाता है सालमें एक बार रति करता है परन्तु
कबूतर जो पत्थरोंके बड़े टुकडोंको खाता है, प्राविदिन
कामी वना रहता है, भला बताओ इसका क्या कारण है
(उत्तर-पहिलेमें महत्व है और दूसरा नीच है ) ॥१४०॥
स्थितिः पुण्येऽरण्ये सह परिचयो हन्त हरि
पः फतेच्यावृत्तिः प्रतिनदि च तल्पानि दृपदः।
इतीयं सामग्री भवति हरभक्तिं स्पृहयतां वनं वा
गेहं वा सदृशमुपशान्त्येकमनसाम् ॥ १४१॥
भर्तृहरिविरचिट- अहा ! पुण्य वनमें वास, हरिणों से मैत्री, फलोंही से शुद्ध वृत्ति, और प्रत्येक नदीके तटपर पापाणकी शय्या- जो लोग हरिमें भक्तिकी लालसा रखते हैं उनकी ये ही सामग्री हैं। जिनका मन वैराग्यमें लीन है उनके लिये गृह और वन दोनोंमें वास करना समान है ।।१४।। स्वादिष्टं मधुनो घृताच रसवद्यत्तस्रवत्यक्षर दैवी वागमृतात्मनो रसंवतस्तेनैव तृप्ता वयं । कुक्षौ यावदिमे भवन्ति धतो भिक्षाहताः सक्तवस्ताव हास्यकृतार्जनैन हिधनैर्वृत्तिं समीहामहे ॥१४२॥ हम साक्षात् वाग्देवी ( सरस्वती देवी) के मुखसे निकले हुए अमृतमय उन अक्षरोंसे (अर्थात् उपनिषदोंसे) सन्तुष्ट हैं जो मधु अथवा घृतसे भी स्वादिष्ट हैं और जब तक हमारे पास इस शरीरके धारण करने के लिये भिक्षासे उपा र्जित सत्त है तबतक हम सेवासे कमायेधन पर अपना नि. बाह नहीं करना चाहते ॥ १४२ ॥ तामाकविवर भर्तृहरिविरचितं तृतीयं । 11644वैराग्यशतकं समाप्तम् ॥ Join इति ॥ र समाप्तोयग्रन्थः । -
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यहदज्योतिपसार भा. टी. २॥) | कारिकापली
ताजिक नीलकण्ठी भा.डी.) चमत्कार चिन्तामणि
मुह मिताक्षरा २१) फलित संग्रह
जातकालंकार भा. टी. 8) मु चिन्तामणि...
भापा तथा संस्कृत में।
राशिमाला बड़ा -) होडाचक्र
राशिमाला छोटा .) हजुमान ज्योतिष
लग्नजानफ भा.सी.
8) स्वप्न विचार
सामुद्रिक सरीक
४)| लघुपाराशरी
।
छ)
पुस्तक मिलने का पता-
छ भार्गव पुस्तकालय,
गायघाट, बनारस सिटी.